| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
1 นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส त्या भगवंतांना, अर्हतांना, सम्यक्सम्बुद्धांना माझा नमस्कार असो. ทีฆนิกาโย दीघनिकाय มหาวคฺคปาฬิ महावग्गपाळी ๑. มหาปทานสุตฺตํ १. महापदानसुत्त ปุพฺเพนิวาสปฏิสํยุตฺตกถา पुब्बेनिवासाशी (पूर्वनिवासाशी) संबंधित चर्चा ๑. เอวํ [Pg.1] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม กเรริกุฏิกายํ. อถ โข สมฺพหุลานํ ภิกฺขูนํ ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺตานํ กเรริมณฺฑลมาเฬ สนฺนิสินฺนานํ สนฺนิปติตานํ ปุพฺเพนิวาสปฏิสํยุตฺตา ธมฺมี กถา อุทปาทิ – ‘‘อิติปิ ปุพฺเพนิวาโส, อิติปิ ปุพฺเพนิวาโส’’ติ. १. असे मी ऐकले आहे—एकदा भगवान श्रावस्ती येथे अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामातील करेरीकुटीमध्ये विहार करत होते. तेव्हा, भोजन करून भिक्षाटनाहून परतलेले अनेक भिक्खू करेरी मंडपामध्ये एकत्र जमून बसले असता, त्यांच्यात पूर्वनिवासाशी (पुब्बेनिवासाशी) संबंधित धम्मचर्चा सुरू झाली—'पूर्वनिवास असा होता, पूर्वनिवास तसा होता' अशी. ๒. อสฺโสสิ โข ภควา ทิพฺพาย โสตธาตุยา วิสุทฺธาย อติกฺกนฺตมานุสิกาย เตสํ ภิกฺขูนํ อิมํ กถาสลฺลาปํ. อถ โข ภควา อุฏฺฐายาสนา เยน กเรริมณฺฑลมาโฬ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ, นิสชฺช โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘กายนุตฺถ, ภิกฺขเว, เอตรหิ กถาย สนฺนิสินฺนา; กา จ ปน โว อนฺตรากถา วิปฺปกตา’’ติ? २. भगवंतांनी मानवी मर्यादा ओलांडणाऱ्या, अत्यंत शुद्ध अशा आपल्या दिव्य श्रवणेंद्रियाने (दिव्यश्रोताने) त्या भिक्खूंचे हे संभाषण ऐकले. मग भगवान आपल्या आसनावरून उठले आणि जेथे करेरी मंडप होता तेथे गेले. तेथे जाऊन ते मांडलेल्या आसनावर बसले. बसल्यानंतर भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले—'भिक्खूंनो, तुम्ही आता येथे कोणत्या चर्चेसाठी एकत्र बसला आहात? आणि तुमची कोणती अपूर्ण चर्चा मध्येच थांबली आहे?' เอวํ วุตฺเต เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘อิธ, ภนฺเต, อมฺหากํ ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺตานํ กเรริมณฺฑลมาเฬ สนฺนิสินฺนานํ สนฺนิปติตานํ ปุพฺเพนิวาสปฏิสํยุตฺตา ธมฺมี กถา อุทปาทิ – ‘อิติปิ ปุพฺเพนิวาโส อิติปิ ปุพฺเพนิวาโส’ติ. อยํ โข โน, ภนฺเต, อนฺตรากถา วิปฺปกตา. อถ ภควา อนุปฺปตฺโต’’ติ. असे विचारल्यावर ते भिक्खू भगवंतांना म्हणाले—'भंते, येथे आम्ही भोजन करून भिक्षाटनाहून परतल्यावर या करेरी मंडपामध्ये एकत्र जमून बसलो असता, आमच्यात पूर्वनिवासाशी संबंधित धम्मचर्चा सुरू झाली की—'पूर्वनिवास असा होता, पूर्वनिवास तसा होता' अशी. भंते, हीच आमची चर्चा अपूर्ण राहिली होती, तेवढ्यात भगवंतांचे येथे आगमन झाले.' ๓. ‘‘อิจฺเฉยฺยาถ [Pg.2] โน ตุมฺเห, ภิกฺขเว, ปุพฺเพนิวาสปฏิสํยุตฺตํ ธมฺมึ กถํ โสตุ’’นฺติ? ‘‘เอตสฺส, ภควา, กาโล; เอตสฺส, สุคต, กาโล; ยํ ภควา ปุพฺเพนิวาสปฏิสํยุตฺตํ ธมฺมึ กถํ กเรยฺย, ภควโต สุตฺวา ภิกฺขู ธาเรสฺสนฺตี’’ติ. ‘‘เตน หิ, ภิกฺขเว, สุณาถ,สาธุกํ มนสิ กโรถ, ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – ३. ‘भिक्खूंनो, तुम्हाला पूर्वनिवासाशी संबंधित धम्मचर्चा ऐकण्याची इच्छा आहे का?’ 'भगवंता, हीच योग्य वेळ आहे! सुगता, हीच योग्य वेळ आहे! भगवंतांनी पूर्वनिवासाशी संबंधित धम्मचर्चा करावी, भगवंतांकडून ऐकून भिक्खू त्याचे स्मरण ठेवतील.' 'तसे असेल तर भिक्खूंनो, लक्षपूर्वक ऐका, नीट मनन करा, मी बोलतो.' 'होय, भंते,' असे म्हणून त्या भिक्खूंनी भगवंतांना प्रतिसाद दिला. भगवान म्हणाले— ๔. ‘‘อิโต โส, ภิกฺขเว, เอกนวุติกปฺเป ยํ วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก อุทปาทิ. อิโต โส, ภิกฺขเว, เอกตึเส กปฺเป ยํ สิขี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก อุทปาทิ. ตสฺมิญฺเญว โข, ภิกฺขเว, เอกตึเส กปฺเป เวสฺสภู ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก อุทปาทิ. อิมสฺมิญฺเญว โข, ภิกฺขเว, ภทฺทกปฺเป กกุสนฺโธ ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก อุทปาทิ. อิมสฺมิญฺเญว โข, ภิกฺขเว, ภทฺทกปฺเป โกณาคมโน ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก อุทปาทิ. อิมสฺมิญฺเญว โข, ภิกฺขเว, ภทฺทกปฺเป กสฺสโป ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก อุทปาทิ. อิมสฺมิญฺเญว โข, ภิกฺขเว, ภทฺทกปฺเป อหํ เอตรหิ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก อุปฺปนฺโน. ४. ‘भिक्खूंनो, आजपासून एक्याण्णव (९१) कल्पांपूर्वी विपस्सी नावाचे भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध जगात उत्पन्न झाले. भिक्खूंनो, आजपासून एकतीस (३१) कल्पांपूर्वी शिखी नावाचे भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध जगात उत्पन्न झाले. भिक्खूंनो, त्याच एकतीस कल्पांपूर्वी वेस्सभू नावाचे भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध जगात उत्पन्न झाले. भिक्खूंनो, याच भद्रकल्पात ककुसंध नावाचे भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध जगात उत्पन्न झाले. भिक्खूंनो, याच भद्रकल्पात कोणागमन नावाचे भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध जगात उत्पन्न झाले. भिक्खूंनो, याच भद्रकल्पात कस्सप नावाचे भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध जगात उत्पन्न झाले. भिक्खूंनो, याच भद्रकल्पात आता मी स्वतः अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध म्हणून जगात उत्पन्न झालो आहे.’ ๕. ‘‘วิปสฺสี, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ขตฺติโย ชาติยา อโหสิ, ขตฺติยกุเล อุทปาทิ. สิขี, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ขตฺติโย ชาติยา อโหสิ, ขตฺติยกุเล อุทปาทิ. เวสฺสภู, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ขตฺติโย ชาติยา อโหสิ, ขตฺติยกุเล อุทปาทิ. กกุสนฺโธ, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ พฺราหฺมโณ ชาติยา อโหสิ, พฺราหฺมณกุเล อุทปาทิ. โกณาคมโน, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ พฺราหฺมโณ ชาติยา อโหสิ, พฺราหฺมณกุเล อุทปาทิ. กสฺสโป, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ พฺราหฺมโณ ชาติยา อโหสิ, พฺราหฺมณกุเล อุทปาทิ. อหํ, ภิกฺขเว, เอตรหิ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ขตฺติโย ชาติยา อโหสึ, ขตฺติยกุเล อุปฺปนฺโน. ५. ‘भिक्खूंनो, विपस्सी भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध हे जन्माने क्षत्रिय होते, त्यांचा जन्म क्षत्रिय कुळात झाला होता. भिक्खूंनो, शिखी भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध हे जन्माने क्षत्रिय होते, त्यांचा जन्म क्षत्रिय कुळात झाला होता. भिक्खूंनो, वेस्सभू भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध हे जन्माने क्षत्रिय होते, त्यांचा जन्म क्षत्रिय कुळात झाला होता. भिक्खूंनो, ककुसंध भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध हे जन्माने ब्राह्मण होते, त्यांचा जन्म ब्राह्मण कुळात झाला होता. भिक्खूंनो, कोणागमन भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध हे जन्माने ब्राह्मण होते, त्यांचा जन्म ब्राह्मण कुळात झाला होता. भिक्खूंनो, कस्सप भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध हे जन्माने ब्राह्मण होते, त्यांचा जन्म ब्राह्मण कुळात झाला होता. भिक्खूंनो, आता मी अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध जन्माने क्षत्रिय आहे, माझा जन्म क्षत्रिय कुळात झाला आहे.’ ๖. ‘‘วิปสฺสี[Pg.3], ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โกณฺฑญฺโญ โคตฺเตน อโหสิ. สิขี, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โกณฺฑญฺโญ โคตฺเตน อโหสิ. เวสฺสภู, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โกณฺฑญฺโญ โคตฺเตน อโหสิ. กกุสนฺโธ, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ กสฺสโป โคตฺเตน อโหสิ. โกณาคมโน, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ กสฺสโป โคตฺเตน อโหสิ. กสฺสโป, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ กสฺสโป โคตฺเตน อโหสิ. อหํ, ภิกฺขเว, เอตรหิ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โคตโม โคตฺเตน อโหสึ. ६. ‘भिक्खूंनो, विपस्सी भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध हे गोत्राने कोंडञ्ञ (कौंडिन्य) होते. भिक्खूंनो, शिखी भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध हे गोत्राने कोंडञ्ञ होते. भिक्खूंनो, वेस्सभू भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध हे गोत्राने कोंडञ्ञ होते. भिक्खूंनो, ककुसंध भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध हे गोत्राने कस्सप (कश्यप) होते. भिक्खूंनो, कोणागमन भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध हे गोत्राने कस्सप होते. भिक्खूंनो, कस्सप भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध हे गोत्राने कस्सप होते. भिक्खूंनो, आता मी अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध गोत्राने गोतम (गौतम) आहे.’ ๗. ‘‘วิปสฺสิสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อสีติวสฺสสหสฺสานิ อายุปฺปมาณํ อโหสิ. สิขิสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส สตฺตติวสฺสสหสฺสานิ อายุปฺปมาณํ อโหสิ. เวสฺสภุสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส สฏฺฐิวสฺสสหสฺสานิ อายุปฺปมาณํ อโหสิ. กกุสนฺธสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส จตฺตาลีสวสฺสสหสฺสานิ อายุปฺปมาณํ อโหสิ. โกณาคมนสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ตึสวสฺสสหสฺสานิ อายุปฺปมาณํ อโหสิ. กสฺสปสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส วีสติวสฺสสหสฺสานิ อายุปฺปมาณํ อโหสิ. มยฺหํ, ภิกฺขเว, เอตรหิ อปฺปกํ อายุปฺปมาณํ ปริตฺตํ ลหุกํ; โย จิรํ ชีวติ, โส วสฺสสตํ อปฺปํ วา ภิยฺโย. ७. ‘भिक्खूंनो, विपस्सी भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्धांचे आयुष्यमान ऐंशी हजार वर्षांचे होते. भिक्खूंनो, शिखी भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्धांचे आयुष्यमान सत्तर हजार वर्षांचे होते. भिक्खूंनो, वेस्सभू भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्धांचे आयुष्यमान साठ हजार वर्षांचे होते. भिक्खूंनो, ककुसंध भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्धांचे आयुष्यमान चाळीस हजार वर्षांचे होते. भिक्खूंनो, कोणागमन भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्धांचे आयुष्यमान तीस हजार वर्षांचे होते. भिक्खूंनो, कस्सप भगवान, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्धांचे आयुष्यमान वीस हजार वर्षांचे होते. भिक्खूंनो, आता माझे आयुष्यमान अल्प, मर्यादित आणि क्षणभंगुर आहे; जो दीर्घकाळ जगतो, तो शंभर वर्षे किंवा त्याहून थोडे अधिक जगतो.’ ๘. ‘‘วิปสฺสี, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ปาฏลิยา มูเล อภิสมฺพุทฺโธ. สิขี, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ปุณฺฑรีกสฺส มูเล อภิสมฺพุทฺโธ. เวสฺสภู, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ สาลสฺส มูเล อภิสมฺพุทฺโธ. กกุสนฺโธ, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ สิรีสสฺส มูเล อภิสมฺพุทฺโธ. โกณาคมโน, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ อุทุมฺพรสฺส มูเล อภิสมฺพุทฺโธ. กสฺสโป, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ นิคฺโรธสฺส มูเล อภิสมฺพุทฺโธ. อหํ, ภิกฺขเว, เอตรหิ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ อสฺสตฺถสฺส มูเล อภิสมฺพุทฺโธ. ८. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांना पाटली वृक्षाच्या मुळाशी अभिसंबोध (परम ज्ञान) प्राप्त झाले. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान शिखी यांना पुंडरीक वृक्षाच्या मुळाशी अभिसंबोध प्राप्त झाले. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान वेस्सभू यांना साल वृक्षाच्या मुळाशी अभिसंबोध प्राप्त झाले. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान ककुसंध यांना शिरीष वृक्षाच्या मुळाशी अभिसंबोध प्राप्त झाले. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान कोणागमन यांना उदुंबर वृक्षाच्या मुळाशी अभिसंबोध प्राप्त झाले. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान कस्सप यांना न्यग्रोध वृक्षाच्या मुळाशी अभिसंबोध प्राप्त झाले. भिक्षूंनो, आता या वेळी अर्हत, सम्यक्संबुद्ध असलेल्या मला अस्सत्थ वृक्षाच्या मुळाशी अभिसंबोध प्राप्त झाले आहे. ๙. ‘‘วิปสฺสิสฺส[Pg.4], ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ขณฺฑติสฺสํ นาม สาวกยุคํ อโหสิ อคฺคํ ภทฺทยุคํ. สิขิสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อภิภูสมฺภวํ นาม สาวกยุคํ อโหสิ อคฺคํ ภทฺทยุคํ. เวสฺสภุสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส โสณุตฺตรํ นาม สาวกยุคํ อโหสิ อคฺคํ ภทฺทยุคํ. กกุสนฺธสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส วิธุรสญฺชีวํ นาม สาวกยุคํ อโหสิ อคฺคํ ภทฺทยุคํ. โกณาคมนสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ภิยฺโยสุตฺตรํ นาม สาวกยุคํ อโหสิ อคฺคํ ภทฺทยุคํ. กสฺสปสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ติสฺสภารทฺวาชํ นาม สาวกยุคํ อโหสิ อคฺคํ ภทฺทยุคํ. มยฺหํ, ภิกฺขเว, เอตรหิ สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานํ นาม สาวกยุคํ อโหสิ อคฺคํ ภทฺทยุคํ. ९. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांच्या अग्र आणि श्रेष्ठ श्रावक-युगलाचे (शिष्य-जोडीचे) नाव 'खंड' आणि 'तिस्स' असे होते. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान शिखी यांच्या अग्र आणि श्रेष्ठ श्रावक-युगलाचे नाव 'अभिभू' आणि 'संभव' असे होते. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान वेस्सभू यांच्या अग्र आणि श्रेष्ठ श्रावक-युगलाचे नाव 'सोण' आणि 'उत्तर' असे होते. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान ककुसंध यांच्या अग्र आणि श्रेष्ठ श्रावक-युगलाचे नाव 'विधुर' आणि 'संजीव' असे होते. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान कोणागमन यांच्या अग्र आणि श्रेष्ठ श्रावक-युगलाचे नाव 'भिय्योस' आणि 'उत्तर' असे होते. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान कस्सप यांच्या अग्र आणि श्रेष्ठ श्रावक-युगलाचे नाव 'तिस्स' आणि 'भारद्वाज' असे होते. भिक्षूंनो, आता या वेळी माझ्या अग्र आणि श्रेष्ठ श्रावक-युगलाचे नाव 'सारिपुत्त' आणि 'मोग्गल्लान' असे आहे. ๑๐. ‘‘วิปสฺสิสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ตโย สาวกานํ สนฺนิปาตา อเหสุํ. เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ อฏฺฐสฏฺฐิภิกฺขุสตสหสฺสํ, เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ ภิกฺขุสตสหสฺสํ, เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ อสีติภิกฺขุสหสฺสานิ. วิปสฺสิสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อิเม ตโย สาวกานํ สนฺนิปาตา อเหสุํ สพฺเพสํเยว ขีณาสวานํ. १०. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांच्या श्रावकांचे तीन संमेलन झाले होते. त्यांपैकी एका श्रावक-संमेलनात अडुसष्ट लाख (६८,००,०००) भिक्षू होते, दुसऱ्या एका श्रावक-संमेलनात एक लाख (१,००,०००) भिक्षू होते, आणि तिसऱ्या एका श्रावक-संमेलनात ऐंशी हजार (८०,०००) भिक्षू होते. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांच्या श्रावकांची ही तिन्ही संमेलने केवळ क्षीणासवांचीच (अर्हतांचीच) होती. ‘‘สิขิสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ตโย สาวกานํ สนฺนิปาตา อเหสุํ. เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ ภิกฺขุสตสหสฺสํ, เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ อสีติภิกฺขุสหสฺสานิ, เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ สตฺตติภิกฺขุสหสฺสานิ. สิขิสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อิเม ตโย สาวกานํ สนฺนิปาตา อเหสุํ สพฺเพสํเยว ขีณาสวานํ. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान शिखी यांच्या श्रावकांचे three संमेलन झाले होते. त्यांपैकी एका श्रावक-संमेलनात एक लाख (१,००,०००) भिक्षू होते, दुसऱ्या एका श्रावक-संमेलनात ऐंशी हजार (८०,०००) भिक्षू होते, आणि तिसऱ्या एका श्रावक-संमेलनात सत्तर हजार (७०,०००) भिक्षू होते. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान शिखी यांच्या श्रावकांची ही तिन्ही संमेलने केवळ क्षीणासवांचीच (अर्हतांचीच) होती. ‘‘เวสฺสภุสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ตโย สาวกานํ สนฺนิปาตา อเหสุํ. เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ อสีติภิกฺขุสหสฺสานิ, เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ สตฺตติภิกฺขุสหสฺสานิ, เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ [Pg.5] สฏฺฐิภิกฺขุสหสฺสานิ. เวสฺสภุสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อิเม ตโย สาวกานํ สนฺนิปาตา อเหสุํ สพฺเพสํเยว ขีณาสวานํ. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान वेस्सभू यांच्या श्रावकांचे तीन संमेलन झाले होते. त्यांपैकी एका श्रावक-संमेलनात ऐंशी हजार (८०,०००) भिक्षू होते, दुसऱ्या एका श्रावक-संमेलनात सत्तर हजार (७०,०००) भिक्षू होते, आणि तिसऱ्या एका श्रावक-संमेलनात साठ हजार (६०,०००) भिक्षू होते. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान वेस्सभू यांच्या श्रावकांची ही तिन्ही संमेलने केवळ क्षीणासवांचीच (अर्हतांचीच) होती. ‘‘กกุสนฺธสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ จตฺตาลีสภิกฺขุสหสฺสานิ. กกุสนฺธสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อยํ เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ สพฺเพสํเยว ขีณาสวานํ. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान ककुसंध यांच्या श्रावकांचे एकच संमेलन झाले होते, ज्यामध्ये चाळीस हजार (४०,०००) भिक्षू होते. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान ककुसंध यांच्या श्रावकांचे हे एकमेव संमेलन केवळ क्षीणासवांचेच (अर्हतांचीच) होते. ‘‘โกณาคมนสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ ตึสภิกฺขุสหสฺสานิ. โกณาคมนสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อยํ เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ สพฺเพสํเยว ขีณาสวานํ. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान कोणागमन यांच्या श्रावकांचे एकच संमेलन झाले होते, ज्यामध्ये तीस हजार (३०,०००) भिक्षू होते. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान कोणागमन यांच्या श्रावकांचे हे एकमेव संमेलन केवळ क्षीणासवांचेच (अर्हतांचीच) होते. ‘‘กสฺสปสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ วีสติภิกฺขุสหสฺสานิ. กสฺสปสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อยํ เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ สพฺเพสํเยว ขีณาสวานํ. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान कस्सप यांच्या श्रावकांचे एकच संमेलन झाले होते, ज्यामध्ये वीस हजार (२०,०००) भिक्षू होते. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान कस्सप यांच्या श्रावकांचे हे एकमेव संमेलन केवळ क्षीणासवांचेच (अर्हतांचीच) होते. ‘‘มยฺหํ, ภิกฺขเว, เอตรหิ เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ อฑฺฒเตฬสานิ ภิกฺขุสตานิ. มยฺหํ, ภิกฺขเว, อยํ เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ สพฺเพสํเยว ขีณาสวานํ. भिक्षूंनो, आता या वेळी माझ्या श्रावकांचे एकच संमेलन झाले आहे, ज्यामध्ये साडेबाराशे (१,२५०) भिक्षू होते. भिक्षूंनो, माझे हे एकमेव संमेलन केवळ क्षीणासवांचेच (अर्हतांचेच) होते. ๑๑. ‘‘วิปสฺสิสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อโสโก นาม ภิกฺขุ อุปฏฺฐาโก อโหสิ อคฺคุปฏฺฐาโก. สิขิสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เขมงฺกโร นาม ภิกฺขุ อุปฏฺฐาโก อโหสิ อคฺคุปฏฺฐาโก. เวสฺสภุสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อุปสนฺโต นาม ภิกฺขุ อุปฏฺฐาโก อโหสิ อคฺคุปฏฺฐาโก. กกุสนฺธสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส พุทฺธิโช นาม ภิกฺขุ อุปฏฺฐาโก อโหสิ อคฺคุปฏฺฐาโก. โกณาคมนสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส โสตฺถิโช นาม ภิกฺขุ อุปฏฺฐาโก อโหสิ อคฺคุปฏฺฐาโก. กสฺสปสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส สพฺพมิตฺโต นาม [Pg.6] ภิกฺขุ อุปฏฺฐาโก อโหสิ อคฺคุปฏฺฐาโก. มยฺหํ, ภิกฺขเว, เอตรหิ อานนฺโท นาม ภิกฺขุ อุปฏฺฐาโก อโหสิ อคฺคุปฏฺฐาโก. ११. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांचे 'असोक' नावाचे भिक्षू हे परिचारक आणि मुख्य परिचारक होते. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान शिखी यांचे 'खेमंकर' नावाचे भिक्षू हे परिचारक आणि मुख्य परिचारक होते. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान वेस्सभू यांचे 'उपसंत' नावाचे भिक्षू हे परिचारक आणि मुख्य परिचारक होते. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान ककुसंध यांचे 'बुद्धिझ' नावाचे भिक्षू हे परिचारक आणि मुख्य परिचारक होते. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान कोणागमन यांचे 'सोत्थिज' नावाचे भिक्षू हे परिचारक आणि मुख्य परिचारक होते. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान कस्सप यांचे 'सब्बमित्त' नावाचे भिक्षू हे परिचारक आणि मुख्य परिचारक होते. भिक्षूंनो, आता या वेळी माझे 'आनंद' नावाचे भिक्षू हे परिचारक आणि मुख्य परिचारक आहेत. ๑๒. ‘‘วิปสฺสิสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส พนฺธุมา นาม ราชา ปิตา อโหสิ. พนฺธุมตี นาม เทวี มาตา อโหสิ ชเนตฺติ. พนฺธุมสฺส รญฺโญ พนฺธุมตี นาม นครํ ราชธานี อโหสิ. १२. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांचे पिता 'बंधुमान' नावाचे राजे होते. त्यांची जन्मदात्री माता 'बंधुमती' नावाची देवी (राणी) होत्या. राजा बंधुमान यांचे 'बंधुमती' नावाचे नगर ही राजधानी होती. ‘‘สิขิสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อรุโณ นาม ราชา ปิตา อโหสิ. ปภาวตี นาม เทวี มาตา อโหสิ ชเนตฺติ. อรุณสฺส รญฺโญ อรุณวตี นาม นครํ ราชธานี อโหสิ. भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान शिखी यांचे पिता 'अरुण' नावाचे राजे होते. त्यांची जन्मदात्री माता 'पभावती' नावाची देवी (राणी) होत्या. राजा अरुण यांचे 'अरुणवती' नावाचे नगर ही राजधानी होती. ‘‘เวสฺสภุสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส สุปฺปติโต นาม ราชา ปิตา อโหสิ. วสฺสวตี นาม เทวี มาตา อโหสิ ชเนตฺติ. สุปฺปติตสฺส รญฺโญ อโนมํ นาม นครํ ราชธานี อโหสิ. “भिक्खूहो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान वेस्सभू यांचे पिता 'सुप्पतित' नावाचे राजे होते. त्यांची जन्मदात्री माता 'वस्सवती' नावाची देवी (राणी) होती. राजा सुप्पतित यांचे 'अनोम' नावाचे नगर हे राजधानीचे शहर होते.” ‘‘กกุสนฺธสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อคฺคิทตฺโต นาม พฺราหฺมโณ ปิตา อโหสิ. วิสาขา นาม พฺราหฺมณี มาตา อโหสิ ชเนตฺติ. เตน โข ปน, ภิกฺขเว, สมเยน เขโม นาม ราชา อโหสิ. เขมสฺส รญฺโญ เขมวตี นาม นครํ ราชธานี อโหสิ. “भिक्खूहो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान ककुसन्ध यांचे पिता 'अग्गिदत्त' नावाचे ब्राह्मण होते. त्यांची जन्मदात्री माता 'विसाखा' नावाची ब्राह्मणी होती. भिक्खूहो, त्या काळी 'खेम' नावाचे राजे होते. राजा खेम यांचे 'खेमवती' नावाचे नगर हे राजधानीचे शहर होते.” ‘‘โกณาคมนสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ยญฺญทตฺโต นาม พฺราหฺมโณ ปิตา อโหสิ. อุตฺตรา นาม พฺราหฺมณี มาตา อโหสิ ชเนตฺติ. เตน โข ปน, ภิกฺขเว, สมเยน โสโภ นาม ราชา อโหสิ. โสภสฺส รญฺโญ โสภวตี นาม นครํ ราชธานี อโหสิ. “भिक्खूहो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान कोणागमन यांचे पिता 'यञ्ञदत्त' नावाचे ब्राह्मण होते. त्यांची जन्मदात्री माता 'उत्तरा' नावाची ब्राह्मणी होती. भिक्खूहो, त्या काळी 'सोभ' नावाचे राजे होते. राजा सोभ यांचे 'सोभवती' नावाचे नगर हे राजधानीचे शहर होते.” ‘‘กสฺสปสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส พฺรหฺมทตฺโต นาม พฺราหฺมโณ ปิตา อโหสิ. ธนวตี นาม พฺราหฺมณี มาตา อโหสิ ชเนตฺติ. เตน โข ปน, ภิกฺขเว, สมเยน กิกี [Pg.7] นาม ราชา อโหสิ. กิกิสฺส รญฺโญ พาราณสี นาม นครํ ราชธานี อโหสิ. “भिक्खूहो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान कस्सप यांचे पिता 'ब्रह्मदत्त' नावाचे ब्राह्मण होते. त्यांची जन्मदात्री माता 'धनवती' नावाची ब्राह्मणी होती. भिक्खूहो, त्या काळी 'किकी' नावाचे राजे होते. राजा किकी यांचे 'बाराणसी' नावाचे नगर हे राजधानीचे शहर होते.” ‘‘มยฺหํ, ภิกฺขเว, เอตรหิ สุทฺโธทโน นาม ราชา ปิตา อโหสิ. มายา นาม เทวี มาตา อโหสิ ชเนตฺติ. กปิลวตฺถุ นาม นครํ ราชธานี อโหสี’’ติ. อิทมโวจ ภควา, อิทํ วตฺวาน สุคโต อุฏฺฐายาสนา วิหารํ ปาวิสิ. “भिक्खूहो, आता या वेळी माझे पिता 'सुद्धोदन' नावाचे राजे होते. माझी जन्मदात्री माता 'माया' नावाची देवी (राणी) होती. 'कपिलवत्थु' नावाचे नगर हे राजधानीचे शहर होते.” भगवान असे म्हणाले. हे बोलून सुगत आपल्या आसनावरून उठले आणि विहारात गेले. ๑๓. อถ โข เตสํ ภิกฺขูนํ อจิรปกฺกนฺตสฺส ภควโต อยมนฺตรากถา อุทปาทิ – ‘‘อจฺฉริยํ, อาวุโส, อพฺภุตํ, อาวุโส, ตถาคตสฺส มหิทฺธิกตา มหานุภาวตา. ยตฺร หิ นาม ตถาคโต อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวตฺเต ชาติโตปิ อนุสฺสริสฺสติ, นามโตปิ อนุสฺสริสฺสติ, โคตฺตโตปิ อนุสฺสริสฺสติ, อายุปฺปมาณโตปิ อนุสฺสริสฺสติ, สาวกยุคโตปิ อนุสฺสริสฺสติ, สาวกสนฺนิปาตโตปิ อนุสฺสริสฺสติ – ‘เอวํชจฺจา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปิ, เอวํนามา เอวํโคตฺตา เอวํสีลา เอวํธมฺมา เอวํปญฺญา เอวํวิหารี เอวํวิมุตฺตา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปี’’’ติ. १३. त्यानंतर भगवान निघून गेल्यावर लवकरच त्या भिक्खूंमध्ये आपापसात हा संवाद सुरू झाला: “मित्रांनो, आश्चर्यकारक आहे! मित्रांनो, अद्भुत आहे! तथागतांचे महासामर्थ्य आणि महाप्रभाव! कारण तथागत भूतकाळातील परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा (तृष्णा, मान आणि दृष्टीचा) छेद केलेल्या, संसारमार्गाचा छेद केलेल्या, संसारचक्र समाप्त केलेल्या आणि सर्व दुःखांच्या पलीकडे गेलेल्या बुद्ध भगवंतांचे त्यांच्या जातीनुसार स्मरण करतात, नावावरून स्मरण करतात, गोत्रावरून स्मरण करतात, आयुष्याच्या प्रमाणावरून स्मरण करतात, श्रावक-युगलांवरून स्मरण करतात, श्रावक-संघावरून स्मरण करतात की— ‘ते भगवंत अशा जातीचे होते, अशा नावाचे होते, अशा गोत्राचे होते, अशा शीलाचे होते, अशा समाधी-धर्माचे होते, अशा प्रज्ञेचे होते, अशा विहाराचे होते, अशा प्रकारे विमुक्त झालेले होते.’” ‘‘กึ นุ โข, อาวุโส, ตถาคตสฺเสว นุ โข เอสา ธมฺมธาตุ สุปฺปฏิวิทฺธา, ยสฺสา ธมฺมธาตุยา สุปฺปฏิวิทฺธตฺตา ตถาคโต อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวตฺเต ชาติโตปิ อนุสฺสรติ, นามโตปิ อนุสฺสรติ, โคตฺตโตปิ อนุสฺสรติ, อายุปฺปมาณโตปิ อนุสฺสรติ, สาวกยุคโตปิ อนุสฺสรติ, สาวกสนฺนิปาตโตปิ อนุสฺสรติ – ‘เอวํชจฺจา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปิ, เอวํนามา เอวํโคตฺตา เอวํสีลา เอวํธมฺมา เอวํปญฺญา เอวํวิหารี เอวํวิมุตฺตา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปี’ติ, อุทาหุ เทวตา ตถาคตสฺส เอตมตฺถํ อาโรเจสุํ, เยน ตถาคโต อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวตฺเต ชาติโตปิ อนุสฺสรติ, นามโตปิ อนุสฺสรติ, โคตฺตโตปิ อนุสฺสรติ, อายุปฺปมาณโตปิ อนุสฺสรติ, สาวกยุคโตปิ อนุสฺสรติ, สาวกสนฺนิปาตโตปิ อนุสฺสรติ – ‘เอวํชจฺจา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปิ, เอวํนามา เอวํโคตฺตา เอวํสีลา เอวํธมฺมา เอวํปญฺญา เอวํวิหารี เอวํวิมุตฺตา [Pg.8] เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปี’’’ติ. อยญฺจ หิทํ เตสํ ภิกฺขูนํ อนฺตรากถา วิปฺปกตา โหติ. “मित्रांनो, हे कसे बरे असेल? तथागतांनीच केवळ या धर्मधातूचे उत्तम प्रकारे आकलन केले आहे का, ज्या धर्मधातूच्या उत्तम आकलनामुळे तथागत भूतकाळातील परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा छेद केलेल्या, संसारमार्गाचा छेद केलेल्या, संसारचक्र समाप्त केलेल्या आणि सर्व दुःखांच्या पलीकडे गेलेल्या बुद्ध भगवंतांचे त्यांच्या जातीनुसार स्मरण करतात, नावावरून स्मरण करतात, गोत्रावरून स्मरण करतात, आयुष्याच्या प्रमाणावरून स्मरण करतात, श्रावक-युगलांवरून स्मरण करतात, श्रावक-संघावरून स्मरण करतात की— ‘ते भगवंत अशा जातीचे होते, अशा नावाचे होते, अशा गोत्राचे होते, अशा शीलाचे होते, अशा समाधी-धर्माचे होते, अशा प्रज्ञेचे होते, अशा विहाराचे होते, अशा प्रकारे विमुक्त झालेले होते’? की देवतेने तथागतांना ही गोष्ट सांगितली आहे, ज्यामुळे तथागत भूतकाळातील परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा छेद केलेल्या, संसारमार्गाचा छेद केलेल्या, संसारचक्र समाप्त केलेल्या आणि सर्व दुःखांच्या पलीकडे गेलेल्या बुद्ध भगवंतांचे त्यांच्या जातीनुसार स्मरण करतात, नावावरून स्मरण करतात, गोत्रावरून स्मरण करतात, आयुष्याच्या प्रमाणावरून स्मरण करतात, श्रावक-युगलांवरून स्मरण करतात, श्रावक-संघावरून स्मरण करतात की— ‘ते भगवंत अशा जातीचे होते, अशा नावाचे होते, अशा गोत्राचे होते, अशा शीलाचे होते, अशा समाधी-धर्माचे होते, अशा प्रज्ञेचे होते, अशा विहाराचे होते, अशा प्रकारे विमुक्त झालेले होते’?” आणि भिक्खूंचा हा आपापसातील संवाद अपूर्णच राहिला होता. ๑๔. อถ โข ภควา สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต เยน กเรริมณฺฑลมาโฬ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. นิสชฺช โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘กายนุตฺถ, ภิกฺขเว, เอตรหิ กถาย สนฺนิสินฺนา; กา จ ปน โว อนฺตรากถา วิปฺปกตา’’ติ? १४. त्यानंतर भगवान संध्याकाळच्या वेळी ध्यान-साधनेतून उठून जेथे 'करेरी' वृक्षाभोवतीचा मंडप होता, तेथे गेले. तेथे जाऊन ते तयार केलेल्या आसनावर बसले. बसल्यावर भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले, “भिक्खूहो, तुम्ही आता कोणत्या चर्चेसाठी एकत्र बसला आहात? आणि तुमची कोणती चर्चा अपूर्ण राहिली आहे?” เอวํ วุตฺเต เต ภิกฺขู ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘อิธ, ภนฺเต, อมฺหากํ อจิรปกฺกนฺตสฺส ภควโต อยํ อนฺตรากถา อุทปาทิ – ‘อจฺฉริยํ, อาวุโส, อพฺภุตํ, อาวุโส, ตถาคตสฺส มหิทฺธิกตา มหานุภาวตา, ยตฺร หิ นาม ตถาคโต อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวตฺเต ชาติโตปิ อนุสฺสริสฺสติ, นามโตปิ อนุสฺสริสฺสติ, โคตฺตโตปิ อนุสฺสริสฺสติ, อายุปฺปมาณโตปิ อนุสฺสริสฺสติ, สาวกยุคโตปิ อนุสฺสริสฺสติ, สาวกสนฺนิปาตโตปิ อนุสฺสริสฺสติ – ‘‘เอวํชจฺจา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปิ, เอวํนามา เอวํโคตฺตา เอวํสีลา เอวํธมฺมา เอวํปญฺญา เอวํวิหารี เอวํวิมุตฺตา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปี’’ติ. กึ นุ โข, อาวุโส, ตถาคตสฺเสว นุ โข เอสา ธมฺมธาตุ สุปฺปฏิวิทฺธา, ยสฺสา ธมฺมธาตุยา สุปฺปฏิวิทฺธตฺตา ตถาคโต อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวตฺเต ชาติโตปิ อนุสฺสรติ, นามโตปิ อนุสฺสรติ, โคตฺตโตปิ อนุสฺสรติ, อายุปฺปมาณโตปิ อนุสฺสรติ, สาวกยุคโตปิ อนุสฺสรติ, สาวกสนฺนิปาตโตปิ อนุสฺสรติ – ‘‘เอวํชจฺจา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปิ, เอวํนามา เอวํโคตฺตา เอวํสีลา เอวํธมฺมา เอวํปญฺญา เอวํวิหารี เอวํวิมุตฺตา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปี’’ติ. อุทาหุ เทวตา ตถาคตสฺส เอตมตฺถํ อาโรเจสุํ, เยน ตถาคโต อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวตฺเต ชาติโตปิ อนุสฺสรติ, นามโตปิ อนุสฺสรติ, โคตฺตโตปิ อนุสฺสรติ, อายุปฺปมาณโตปิ อนุสฺสรติ, สาวกยุคโตปิ อนุสฺสรติ, สาวกสนฺนิปาตโตปิ อนุสฺสรติ – ‘เอวํชจฺจา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปิ, เอวํนามา เอวํโคตฺตา เอวํสีลา เอวํธมฺมา เอวํปญฺญา เอวํวิหารี เอวํวิมุตฺตา [Pg.9] เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปี’ติ? อยํ โข โน, ภนฺเต, อนฺตรากถา วิปฺปกตา, อถ ภควา อนุปฺปตฺโต’’ติ. असे म्हटले असता, ते भिक्षू भगवंतांना म्हणाले – "भंते, भगवान निघून गेल्यानंतर लगेचच आमच्यामध्ये ही चर्चा सुरू झाली – 'मित्रांनो, आश्चर्य आहे! मित्रांनो, अद्भुत आहे! तथागतांचे महात्म्य आणि त्यांचा महान प्रभाव! कारण तथागत भूतकाळातील परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा छेद केलेल्या, संसाराचा मार्ग खंडित केलेल्या, संसारचक्र संपुष्टात आणलेल्या आणि सर्व दुःखांतून मुक्त झालेल्या बुद्ध भगवंतांचे स्मरण करतात – त्यांच्या जातीचे स्मरण करतात, नावाचे स्मरण करतात, गोत्राचे स्मरण करतात, आयुष्याच्या प्रमाणाचे स्मरण करतात, त्यांच्या प्रमुख श्रावक जोडीचे स्मरण करतात, त्यांच्या श्रावक संमेलनांचे स्मरण करतात – "ते भगवंत अशा जातीचे होते, अशा नावाचे होते, अशा गोत्राचे होते, अशा शीलाचे होते, अशा धर्माचे होते, अशा प्रज्ञेचे होते, अशा विहाराचे होते, अशा विमुक्तीचे होते." मित्रांनो, तथागतांनीच या धम्मधातूचे पूर्ण आकलन केले आहे का, ज्या धम्मधातूच्या पूर्ण आकलनामुळे तथागत भूतकाळातील परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा छेद केलेल्या, संसाराचा मार्ग खंडित केलेल्या, संसारचक्र संपुष्टात आणलेल्या आणि सर्व दुःखांतून मुक्त झालेल्या बुद्ध भगवंतांचे स्मरण करतात – त्यांच्या जातीचे, नावाचे, गोत्राचे, आयुष्याच्या प्रमाणाचे, श्रावक जोडीचे, श्रावक संमेलनांचे स्मरण करतात – "ते भगवंत अशा जातीचे होते, अशा नावाचे होते, अशा गोत्राचे होते, अशा शीलाचे होते, अशा धर्माचे होते, अशा प्रज्ञेचे होते, अशा विहाराचे होते, अशा विमुक्तीचे होते"? की देवतांनी तथागतांना ही गोष्ट सांगितली आहे, ज्यामुळे तथागत भूतकाळातील परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा छेद केलेल्या, संसाराचा मार्ग खंडित केलेल्या, संसारचक्र संपुष्टात आणलेल्या आणि सर्व दुःखांतून मुक्त झालेल्या बुद्ध भगवंतांचे स्मरण करतात – त्यांच्या जातीचे, नावाचे, गोत्राचे, आयुष्याच्या प्रमाणाचे, श्रावक जोडीचे, श्रावक संमेलनांचे स्मरण करतात – "ते भगवंत अशा जातीचे होते, अशा नावाचे होते, अशा गोत्राचे होते, अशा शीलाचे होते, अशा धर्माचे होते, अशा प्रज्ञेचे होते, अशा विहाराचे होते, अशा विमुक्तीचे होते"?' भंते, आमची ही चर्चा अपूर्णच राहिली होती, तोच भगवंतांचे येथे आगमन झाले." ๑๕. ‘‘ตถาคตสฺเสเวสา, ภิกฺขเว, ธมฺมธาตุ สุปฺปฏิวิทฺธา, ยสฺสา ธมฺมธาตุยา สุปฺปฏิวิทฺธตฺตา ตถาคโต อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวตฺเต ชาติโตปิ อนุสฺสรติ, นามโตปิ อนุสฺสรติ, โคตฺตโตปิ อนุสฺสรติ, อายุปฺปมาณโตปิ อนุสฺสรติ, สาวกยุคโตปิ อนุสฺสรติ, สาวกสนฺนิปาตโตปิ อนุสฺสรติ – ‘เอวํชจฺจา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปิ, เอวํนามา เอวํโคตฺตา เอวํสีลา เอวํธมฺมา เอวํปญฺญา เอวํวิหารี เอวํวิมุตฺตา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปี’ติ. เทวตาปิ ตถาคตสฺส เอตมตฺถํ อาโรเจสุํ, เยน ตถาคโต อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวตฺเต ชาติโตปิ อนุสฺสรติ, นามโตปิ อนุสฺสรติ, โคตฺตโตปิ อนุสฺสรติ, อายุปฺปมาณโตปิ อนุสฺสรติ, สาวกยุคโตปิ อนุสฺสรติ, สาวกสนฺนิปาตโตปิ อนุสฺสรติ – ‘เอวํชจฺจา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปิ, เอวํนามา เอวํโคตฺตา เอวํสีลา เอวํธมฺมา เอวํปญฺญา เอวํวิหารี เอวํวิมุตฺตา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปี’ติ. १५. "भिक्षूंनो, तथागतांनीच या धम्मधातूचे पूर्ण आकलन केले आहे, ज्या धम्मधातूच्या पूर्ण आकलनामुळे तथागत भूतकाळातील परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा छेद केलेल्या, संसाराचा मार्ग खंडित केलेल्या, संसारचक्र संपुष्टात आणलेल्या आणि सर्व दुःखांतून मुक्त झालेल्या बुद्ध भगवंतांचे स्मरण करतात – त्यांच्या जातीचे, नावाचे, गोत्राचे, आयुष्याच्या प्रमाणाचे, श्रावक जोडीचे, श्रावक संमेलनांचे स्मरण करतात – 'ते भगवंत अशा जातीचे होते, अशा नावाचे होते, अशा गोत्राचे होते, अशा शीलाचे होते, अशा धर्माचे होते, अशा प्रज्ञेचे होते, अशा विहाराचे होते, अशा विमुक्तीचे होते.' तसेच देवतांनीही तथागतांना ही गोष्ट सांगितली आहे, ज्यामुळे तथागत भूतकाळातील परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा छेद केलेल्या, संसाराचा मार्ग खंडित केलेल्या, संसारचक्र संपुष्टात आणलेल्या आणि सर्व दुःखांतून मुक्त झालेल्या बुद्ध भगवंतांचे स्मरण करतात – त्यांच्या जातीचे, नावाचे, गोत्राचे, आयुष्याच्या प्रमाणाचे, श्रावक जोडीचे, श्रावक संमेलनांचे स्मरण करतात – 'ते भगवंत अशा जातीचे होते, अशा नावाचे होते, अशा गोत्राचे होते, अशा शीलाचे होते, अशा धर्माचे होते, अशा प्रज्ञेचे होते, अशा विहाराचे होते, अशा विमुक्तीचे होते.'" ‘‘อิจฺเฉยฺยาถ โน ตุมฺเห, ภิกฺขเว, ภิยฺโยโสมตฺตาย ปุพฺเพนิวาสปฏิสํยุตฺตํ ธมฺมึ กถํ โสตุ’’นฺติ? ‘‘เอตสฺส, ภควา, กาโล; เอตสฺส, สุคต, กาโล; ยํ ภควา ภิยฺโยโสมตฺตาย ปุพฺเพนิวาสปฏิสํยุตฺตํ ธมฺมึ กถํ กเรยฺย, ภควโต สุตฺวา ภิกฺขู ธาเรสฺสนฺตี’’ติ. ‘‘เตน หิ, ภิกฺขเว, สุณาถ, สาธุกํ มนสิ กโรถ, ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – "भिक्षूंनो, तुम्हाला पूर्वजन्मांशी संबंधित अधिक सविस्तर धम्मचर्चा ऐकण्याची इच्छा आहे का?" "भगवंता, हीच योग्य वेळ आहे; सुगता, हीच योग्य वेळ आहे; भगवंतांनी पूर्वजन्मांशी संबंधित अधिक सविस्तर धम्मचर्चा करावी, भगवंतांकडून ऐकून भिक्षू त्याचे स्मरण ठेवतील." "तर मग भिक्षूंनो, ऐका, नीट लक्ष द्या, मी सांगतो." "होय, भंते," असे म्हणून त्या भिक्षूंनी भगवंतांना प्रतिसाद दिला. भगवंत म्हणाले – ๑๖. ‘‘อิโต โส, ภิกฺขเว, เอกนวุติกปฺเป ยํ วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก อุทปาทิ. วิปสฺสี, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ขตฺติโย ชาติยา อโหสิ, ขตฺติยกุเล อุทปาทิ. วิปสฺสี, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โกณฺฑญฺโญ โคตฺเตน อโหสิ. วิปสฺสิสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อสีติวสฺสสหสฺสานิ อายุปฺปมาณํ อโหสิ. วิปสฺสี, ภิกฺขเว, ภควา อรหํ [Pg.10] สมฺมาสมฺพุทฺโธ ปาฏลิยา มูเล อภิสมฺพุทฺโธ. วิปสฺสิสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ขณฺฑติสฺสํ นาม สาวกยุคํ อโหสิ อคฺคํ ภทฺทยุคํ. วิปสฺสิสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ตโย สาวกานํ สนฺนิปาตา อเหสุํ. เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ อฏฺฐสฏฺฐิภิกฺขุสตสหสฺสํ, เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ ภิกฺขุสตสหสฺสํ, เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ อสีติภิกฺขุสหสฺสานิ. วิปสฺสิสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อิเม ตโย สาวกานํ สนฺนิปาตา อเหสุํ สพฺเพสํเยว ขีณาสวานํ. วิปสฺสิสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อโสโก นาม ภิกฺขุ อุปฏฺฐาโก อโหสิ อคฺคุปฏฺฐาโก. วิปสฺสิสฺส, ภิกฺขเว, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส พนฺธุมา นาม ราชา ปิตา อโหสิ. พนฺธุมตี นาม เทวี มาตา อโหสิ ชเนตฺติ. พนฺธุมสฺส รญฺโญ พนฺธุมตี นาม นครํ ราชธานี อโหสิ. १६. "भिक्षूंनो, या कल्पापासून एक्याण्णव कल्प मागे, विपस्सी नावाचे भगवान, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध जगात उत्पन्न झाले. भिक्षूंनो, विपस्सी भगवान, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध हे जन्माने क्षत्रिय होते, त्यांचा जन्म क्षत्रिय कुळात झाला होता. भिक्षूंनो, विपस्सी भगवान, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध हे गोत्राने कोंडण्य होते. भिक्षूंनो, विपस्सी भगवान, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांचे आयुष्यमान ऐंशी हजार वर्षांचे होते. भिक्षूंनो, विपस्सी भगवान, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांना पाटली वृक्षाच्या मुळाशी संबोधी प्राप्त झाली. भिक्षूंनो, विपस्सी भगवान, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांची 'खंड' आणि 'तिस्स' नावाची श्रावक जोडी ही अग्र आणि कल्याणकारी जोडी होती. भिक्षूंनो, विपस्सी भगवान, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांच्या श्रावकांचे तीन मेळावे झाले. श्रावकांचा एक मेळावा अडुसष्ट लाख भिक्षूंचा होता, एक मेळावा एक लाख भिक्षूंचा होता, आणि एक मेळावा ऐंशी हजार भिक्षूंचा होता. भिक्षूंनो, विपस्सी भगवान, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांचे हे तिन्ही श्रावक मेळावे केवळ अर्हतांचेच होते. भिक्षूंनो, विपस्सी भगवान, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांचे 'असोक' नावाचे भिक्षू हे मुख्य परिचारक होते. भिक्षूंनो, विपस्सी भगवान, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांचे पिता 'बंधुमान' नावाचे राजे होते. त्यांची जन्मदात्री माता 'बंधुमती' नावाची देवी होती. राजा बंधुमान यांची 'बंधुमती' नावाची राजधानी होती." โพธิสตฺตธมฺมตา बोधिसत्त्वाची धम्मता ๑๗. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี โพธิสตฺโต ตุสิตา กายา จวิตฺวา สโต สมฺปชาโน มาตุกุจฺฉึ โอกฺกมิ. อยเมตฺถ ธมฺมตา. १७. "त्यानंतर, भिक्षूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्व तुषित स्वर्गातून च्युत होऊन, सजग आणि जागरूक राहून मातेच्या गर्भात प्रविष्ट झाले. हा येथील नियम आहे." ๑๘. ‘‘ธมฺมตา, เอสา, ภิกฺขเว, ยทา โพธิสตฺโต ตุสิตา กายา จวิตฺวา มาตุกุจฺฉึ โอกฺกมติ. อถ สเทวเก โลเก สมารเก สพฺรหฺมเก สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย อปฺปมาโณ อุฬาโร โอภาโส ปาตุภวติ อติกฺกมฺเมว เทวานํ เทวานุภาวํ. ยาปิ ตา โลกนฺตริกา อฆา อสํวุตา อนฺธการา อนฺธการติมิสา, ยตฺถ ปิเม จนฺทิมสูริยา เอวํมหิทฺธิกา เอวํมหานุภาวา อาภาย นานุโภนฺติ, ตตฺถปิ อปฺปมาโณ อุฬาโร โอภาโส ปาตุภวติ อติกฺกมฺเมว เทวานํ เทวานุภาวํ. เยปิ ตตฺถ สตฺตา อุปปนฺนา, เตปิ เตโนภาเสน อญฺญมญฺญํ สญฺชานนฺติ – ‘อญฺเญปิ กิร, โภ, สนฺติ สตฺตา อิธูปปนฺนา’ติ. อยญฺจ ทสสหสฺสี โลกธาตุ สงฺกมฺปติ สมฺปกมฺปติ สมฺปเวธติ. อปฺปมาโณ จ อุฬาโร โอภาโส โลเก ปาตุภวติ อติกฺกมฺเมว เทวานํ เทวานุภาวํ. อยเมตฺถ ธมฺมตา. १८. “भिक्खूहो, हा नियम (धम्मता) आहे की, जेव्हा बोधिसत्त्व तुषित लोकांतून च्युत होऊन (देह सोडून) मातेच्या उदरात प्रवेश करतात, तेव्हा देव, मार आणि ब्रह्मांसह या लोकात, तसेच श्रमण, ब्राह्मण, राजे आणि प्रजेसह या मनुष्यलोकात देवांच्या दैवी प्रभावालाही मागे टाकणारा एक अमर्याद आणि भव्य प्रकाश प्रकट होतो. ज्या काही लोकांतरिक (विश्वाच्या सीमेपलीकडील) पोकळ्या आहेत—ज्या उघड्या, निराधार, अत्यंत अंधाऱ्या आणि काळोखाने व्यापलेल्या आहेत, जिथे इतके महाबलाढ्य आणि महाप्रतापी असलेले चंद्र आणि सूर्य देखील आपल्या प्रकाशाने पोहोचू शकत नाहीत—तिथेही देवांच्या दैवी प्रभावाला मागे टाकणारा एक अमर्याद आणि भव्य प्रकाश प्रकट होतो. आणि जे प्राणी तिथे उत्पन्न झाले आहेत, तेही त्या प्रकाशाच्या साहाय्याने एकमेकांना ओळखतात आणि म्हणतात: ‘अरे मित्रांनो! येथे इतरही प्राणी उत्पन्न झाले आहेत तर!’ आणि ही दहा हजारांची लोकधातू (विश्वप्रणाली) कंपित होते, तीव्रतेने थरथरते आणि डळमळीत होते. तसेच देवांच्या दैवी प्रभावाला मागे टाकणारा एक अमर्याद आणि भव्य प्रकाश लोकात प्रकट होतो. हा येथे नियम आहे.” ๑๙. ‘‘ธมฺมตา [Pg.11] เอสา, ภิกฺขเว, ยทา โพธิสตฺโต มาตุกุจฺฉึ โอกฺกนฺโต โหติ, จตฺตาโร นํ เทวปุตฺตา จตุทฺทิสํ รกฺขาย อุปคจฺฉนฺติ – ‘มา นํ โพธิสตฺตํ วา โพธิสตฺตมาตรํ วา มนุสฺโส วา อมนุสฺโส วา โกจิ วา วิเหเฐสี’ติ. อยเมตฺถ ธมฺมตา. १९. “भिक्खूहो, हा नियम आहे की, जेव्हा बोधिसत्त्व मातेच्या उदरात प्रवेश करते झाले असतात, तेव्हा चार देवपुत्र चारही दिशांनी त्यांच्या रक्षणासाठी येतात आणि विचार करतात की—‘कोणताही मनुष्य, अमनुष्य (यक्ष-राक्षस) किंवा इतर कोणीही या बोधिसत्त्वांना किंवा बोधिसत्त्वांच्या मातेला उपद्रव वा इजा न करो.’ हा येथे नियम आहे.” ๒๐. ‘‘ธมฺมตา เอสา, ภิกฺขเว, ยทา โพธิสตฺโต มาตุกุจฺฉึ โอกฺกนฺโต โหติ, ปกติยา สีลวตี โพธิสตฺตมาตา โหติ, วิรตา ปาณาติปาตา, วิรตา อทินฺนาทานา, วิรตา กาเมสุมิจฺฉาจารา, วิรตา มุสาวาทา, วิรตา สุราเมรยมชฺชปฺปมาทฏฺฐานา. อยเมตฺถ ธมฺมตา. २०. “भिक्खूहो, हा नियम आहे की, जेव्हा बोधिसत्त्व मातेच्या उदरात प्रवेश करते झाले असतात, तेव्हा बोधिसत्त्वांची माता स्वभावत:च शीलवान असते; ती प्राणातिपातापासून (जीवहिंसेपासून) अलिप्त असते, अदिन्नादानापासून (चोरीपासून) अलिप्त असते, कामेसुमिच्छाचारापासून (व्यभिचारापासून) अलिप्त असते, मुसावादापासून (असत्य बोलण्यापासून) अलिप्त असते आणि सुरा-मेरय-मज्ज-पमादट्ठानापासून (मद्य व मादक पदार्थांच्या सेवनापासून) अलिप्त असते. हा येथे नियम आहे.” ๒๑. ‘‘ธมฺมตา เอสา, ภิกฺขเว, ยทา โพธิสตฺโต มาตุกุจฺฉึ โอกฺกนฺโต โหติ, น โพธิสตฺตมาตุ ปุริเสสุ มานสํ อุปฺปชฺชติ กามคุณูปสํหิตํ, อนติกฺกมนียา จ โพธิสตฺตมาตา โหติ เกนจิ ปุริเสน รตฺตจิตฺเตน. อยเมตฺถ ธมฺมตา. २१. “भिक्खूहो, हा नियम आहे की, जेव्हा बोधिसत्त्व मातेच्या उदरात प्रवेश करते झाले असतात, तेव्हा बोधिसत्त्वांच्या मातेच्या मनात कोणत्याही पुरुषाविषयी कामवासनेने युक्त विचार उत्पन्न होत नाहीत; आणि कामुक वासनेने युक्त असलेला कोणताही पुरुष बोधिसत्त्वांच्या मातेवर अतिप्रसंग करू शकत नाही (तिचे उल्लंघन करू शकत नाही). हा येथे नियम आहे.” ๒๒. ‘‘ธมฺมตา เอสา, ภิกฺขเว, ยทา โพธิสตฺโต มาตุกุจฺฉึ โอกฺกนฺโต โหติ, ลาภินี โพธิสตฺตมาตา โหติ ปญฺจนฺนํ กามคุณานํ. สา ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิตา สมงฺคีภูตา ปริจาเรติ. อยเมตฺถ ธมฺมตา. २२. “भिक्खूहो, हा नियम आहे की, जेव्हा बोधिसत्त्व मातेच्या उदरात प्रवेश करते झाले असतात, तेव्हा बोधिसत्त्वांच्या मातेला पाचही कामगुणांची (इंद्रियभोगांची) विपुल प्राप्ती होते. ती त्या पाच कामगुणांनी परिपूर्ण व संपन्न होऊन त्यांचा उपभोग घेते. हा येथे नियम आहे.” ๒๓. ‘‘ธมฺมตา เอสา, ภิกฺขเว, ยทา โพธิสตฺโต มาตุกุจฺฉึ โอกฺกนฺโต โหติ, น โพธิสตฺตมาตุ โกจิเทว อาพาโธ อุปฺปชฺชติ. สุขินี โพธิสตฺตมาตา โหติ อกิลนฺตกายา, โพธิสตฺตญฺจ โพธิสตฺตมาตา ติโรกุจฺฉิคตํ ปสฺสติ สพฺพงฺคปจฺจงฺคึ อหีนินฺทฺริยํ. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, มณิ เวฬุริโย สุโภ ชาติมา อฏฺฐํโส สุปริกมฺมกโต อจฺโฉ วิปฺปสนฺโน อนาวิโล สพฺพาการสมฺปนฺโน. ตตฺราสฺส สุตฺตํ อาวุตํ นีลํ วา ปีตํ วา โลหิตํ วา โอทาตํ วา ปณฺฑุสุตฺตํ วา. ตเมนํ จกฺขุมา ปุริโส หตฺเถ กริตฺวา ปจฺจเวกฺเขยฺย – ‘อยํ โข มณิ เวฬุริโย สุโภ ชาติมา อฏฺฐํโส สุปริกมฺมกโต อจฺโฉ วิปฺปสนฺโน อนาวิโล สพฺพาการสมฺปนฺโน. ตตฺริทํ สุตฺตํ อาวุตํ นีลํ วา ปีตํ วา โลหิตํ วา โอทาตํ วา ปณฺฑุสุตฺตํ วา’ติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ยทา โพธิสตฺโต [Pg.12] มาตุกุจฺฉึ โอกฺกนฺโต โหติ, น โพธิสตฺตมาตุ โกจิเทว อาพาโธ อุปฺปชฺชติ, สุขินี โพธิสตฺตมาตา โหติ อกิลนฺตกายา, โพธิสตฺตญฺจ โพธิสตฺตมาตา ติโรกุจฺฉิคตํ ปสฺสติ สพฺพงฺคปจฺจงฺคึ อหีนินฺทฺริยํ. อยเมตฺถ ธมฺมตา. २३. “भिक्खूहो, हा नियम आहे की, जेव्हा बोधिसत्त्व मातेच्या उदरात प्रवेश करते झाले असतात, तेव्हा बोधिसत्त्वांच्या मातेला कोणताही आजार होत नाही. बोधिसत्त्वांची माता निरोगी व शारीरिक थकव्याशिवाय सुखी राहते; आणि ती आपल्या उदरात असलेल्या बोधिसत्त्वांना सर्व अवयवांनी परिपूर्ण आणि अखंड इंद्रियांनी युक्त असलेले स्पष्ट पाहू शकते. भिक्खूहो, हे अगदी तसेच आहे, जसे की एखादा अत्यंत सुंदर, अस्सल, आठ पैलू असलेला, उत्तम प्रकारे पैलू पाडलेला, स्वच्छ, अत्यंत तेजस्वी, निर्मळ आणि सर्व गुणांनी संपन्न असा वैडूर्य मणी (वैडूर्य रत्न) असावा, ज्यामध्ये निळा, पिवळा, तांबडा, पांढरा किंवा फिकट पिवळा दोरा ओवलेला असावा. दृष्टी असलेला एखादा मनुष्य तो मणी आपल्या हातात घेऊन त्याचे निरीक्षण करेल आणि म्हणेल—‘हा वैडूर्य मणी खरोखरच सुंदर, अस्सल, आठ पैलू असलेला, उत्तम प्रकारे पैलू पाडलेला, स्वच्छ, अत्यंत तेजस्वी, निर्मळ आणि सर्व गुणांनी संपन्न आहे; आणि यात हा निळा, पिवळा, तांबडा, पांढरा किंवा फिकट पिवळा दोरा ओवलेला आहे.’ अगदी याचप्रमाणे, भिक्खूहो, जेव्हा बोधिसत्त्व मातेच्या उदरात प्रवेश करते झाले असतात, तेव्हा बोधिसत्त्वांच्या मातेला कोणताही आजार होत नाही, ती निरोगी व शारीरिक थकव्याशिवाय सुखी राहते; आणि ती आपल्या उदरात असलेल्या बोधिसत्त्वांना सर्व अवयवांनी परिपूर्ण आणि अखंड इंद्रियांनी युक्त असलेले स्पष्ट पाहू शकते. हा येथे नियम आहे.” ๒๔. ‘‘ธมฺมตา เอสา, ภิกฺขเว, สตฺตาหชาเต โพธิสตฺเต โพธิสตฺตมาตา กาลงฺกโรติ ตุสิตํ กายํ อุปปชฺชติ. อยเมตฺถ ธมฺมตา. २४. “भिक्खूहो, हा नियम आहे की, बोधिसत्त्वांच्या जन्मानंतर सातव्या दिवशी बोधिसत्त्वांची माता कालवश होते (मृत्यू पावते) आणि तुषित लोकात उत्पन्न होते. हा येथे नियम आहे.” ๒๕. ‘‘ธมฺมตา เอสา, ภิกฺขเว, ยถา อญฺญา อิตฺถิกา นว วา ทส วา มาเส คพฺภํ กุจฺฉินา ปริหริตฺวา วิชายนฺติ, น เหวํ โพธิสตฺตํ โพธิสตฺตมาตา วิชายติ. ทเสว มาสานิ โพธิสตฺตํ โพธิสตฺตมาตา กุจฺฉินา ปริหริตฺวา วิชายติ. อยเมตฺถ ธมฺมตา. २५. “भिक्खूहो, हा नियम आहे की, इतर स्त्रिया ज्याप्रमाणे नऊ किंवा दहा महिने गर्भ उदरात बाळगून प्रसूती पावतात, त्याप्रमाणे बोधिसत्त्वांची माता प्रसूती पावत नाही. बोधिसत्त्वांची माता बोधिसत्त्वांना पूर्ण दहा महिनेच उदरात बाळगून प्रसूती पावते. हा येथे नियम आहे.” ๒๖. ‘‘ธมฺมตา เอสา, ภิกฺขเว, ยถา อญฺญา อิตฺถิกา นิสินฺนา วา นิปนฺนา วา วิชายนฺติ, น เหวํ โพธิสตฺตํ โพธิสตฺตมาตา วิชายติ. ฐิตาว โพธิสตฺตํ โพธิสตฺตมาตา วิชายติ. อยเมตฺถ ธมฺมตา. २६. “भिक्खूहो, हा नियम आहे की, इतर स्त्रिया ज्याप्रमाणे बसून किंवा झोपून प्रसूती पावतात, त्याप्रमाणे बोधिसत्त्वांची माता प्रसूती पावत नाही. बोधिसत्त्वांची माता उभी राहूनच बोधिसत्त्वांना जन्म देते. हा येथे नियम आहे.” ๒๗. ‘‘ธมฺมตา เอสา, ภิกฺขเว, ยทา โพธิสตฺโต มาตุกุจฺฉิมฺหา นิกฺขมติ, เทวา ปฐมํ ปฏิคฺคณฺหนฺติ, ปจฺฉา มนุสฺสา. อยเมตฺถ ธมฺมตา. २७. “भिक्खूहो, हा नियम आहे की, जेव्हा बोधिसत्त्व मातेच्या उदरातून बाहेर येतात, तेव्हा सर्वप्रथम देव त्यांना स्वीकारतात (हातात घेतात) आणि त्यानंतर मनुष्य. हा येथे नियम आहे.” ๒๘. ‘‘ธมฺมตา เอสา, ภิกฺขเว, ยทา โพธิสตฺโต มาตุกุจฺฉิมฺหา นิกฺขมติ, อปฺปตฺโตว โพธิสตฺโต ปถวึ โหติ, จตฺตาโร นํ เทวปุตฺตา ปฏิคฺคเหตฺวา มาตุ ปุรโต ฐเปนฺติ – ‘อตฺตมนา, เทวิ, โหหิ; มเหสกฺโข เต ปุตฺโต อุปฺปนฺโน’ติ. อยเมตฺถ ธมฺมตา. २८. “भिक्खूहो, हा नियम आहे की, जेव्हा बोधिसत्त्व मातेच्या उदरातून बाहेर येतात, तेव्हा ते पृथ्वीला स्पर्श करण्यापूर्वीच, चार देवपुत्र त्यांना स्वीकारतात आणि मातेच्या समोर ठेवून म्हणतात—‘देवी, प्रसन्न व्हा; आपल्या पोटी महाप्रतापी पुत्राचा जन्म झाला आहे!’ हा येथे नियम आहे.” ๒๙. ‘‘ธมฺมตา เอสา, ภิกฺขเว, ยทา โพธิสตฺโต มาตุกุจฺฉิมฺหา นิกฺขมติ, วิสโทว นิกฺขมติ อมกฺขิโต อุเทน อมกฺขิโต เสมฺเหน อมกฺขิโต รุหิเรน อมกฺขิโต เกนจิ อสุจินา สุทฺโธ วิสโท. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, มณิรตนํ กาสิเก วตฺเถ นิกฺขิตฺตํ เนว มณิรตนํ กาสิกํ วตฺถํ มกฺเขติ, นาปิ กาสิกํ วตฺถํ มณิรตนํ มกฺเขติ. ตํ กิสฺส เหตุ? อุภินฺนํ สุทฺธตฺตา. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ยทา โพธิสตฺโต มาตุกุจฺฉิมฺหา นิกฺขมติ, วิสโทว นิกฺขมติ อมกฺขิโต, อุเทน อมกฺขิโต [Pg.13] เสมฺเหน อมกฺขิโต รุหิเรน อมกฺขิโต เกนจิ อสุจินา สุทฺโธ วิสโท. อยเมตฺถ ธมฺมตา. २९. “भिक्खूहो, हा नियम आहे की, जेव्हा बोधिसत्त्व मातेच्या उदरातून बाहेर येतात, तेव्हा ते अत्यंत स्वच्छ व शुद्ध होऊनच बाहेर येतात; ते गर्भाशयातील द्रवाने, कफाने, रक्ताने किंवा कोणत्याही अशुद्धतेने माखलेले नसतात, तर पूर्णपणे शुद्ध आणि निर्मळ असतात. भिक्खूहो, हे अगदी तसेच आहे, जसे की काशीच्या वस्त्रावर ठेवलेले एखादे मौल्यवान रत्न त्या काशीच्या वस्त्राला डागाळत नाही आणि ते वस्त्रही त्या रत्नाला डागाळत नाही. याचे कारण काय? कारण ते दोन्ही अत्यंत शुद्ध असतात. अगदी याचप्रमाणे, भिक्खूहो, जेव्हा बोधिसत्त्व मातेच्या उदरातून बाहेर येतात, तेव्हा ते अत्यंत स्वच्छ व शुद्ध होऊनच बाहेर येतात; ते गर्भाशयातील द्रवाने, कफाने, रक्ताने किंवा कोणत्याही अशुद्धतेने माखलेले नसतात, तर पूर्णपणे शुद्ध आणि निर्मळ असतात. हा येथे नियम आहे.” ๓๐. ‘‘ธมฺมตา เอสา, ภิกฺขเว, ยทา โพธิสตฺโต มาตุกุจฺฉิมฺหา นิกฺขมติ, ทฺเว อุทกสฺส ธารา อนฺตลิกฺขา ปาตุภวนฺติ – เอกา สีตสฺส เอกา อุณฺหสฺส เยน โพธิสตฺตสฺส อุทกกิจฺจํ กโรนฺติ มาตุ จ. อยเมตฺถ ธมฺมตา. ३०. “भिक्खूहो, हा नियम आहे की, जेव्हा बोधिसत्त्व मातेच्या उदरातून बाहेर येतात, तेव्हा आकाशातून पाण्याच्या दोन धारा प्रकट होतात—एक थंड पाण्याची आणि दुसरी गरम पाण्याची, ज्याने ते बोधिसत्त्वांचे आणि त्यांच्या मातेचे स्नान (जलविधी) पूर्ण करतात. हा येथे नियम आहे.” ๓๑. ‘‘ธมฺมตา เอสา, ภิกฺขเว, สมฺปติชาโต โพธิสตฺโต สเมหิ ปาเทหิ ปติฏฺฐหิตฺวา อุตฺตราภิมุโข สตฺตปทวีติหาเรน คจฺฉติ เสตมฺหิ ฉตฺเต อนุธาริยมาเน, สพฺพา จ ทิสา อนุวิโลเกติ, อาสภึ วาจํ ภาสติ ‘อคฺโคหมสฺมิ โลกสฺส, เชฏฺโฐหมสฺมิ โลกสฺส, เสฏฺโฐหมสฺมิ โลกสฺส, อยมนฺติมา ชาติ, นตฺถิทานิ ปุนพฺภโว’ติ. อยเมตฺถ ธมฺมตา. ३१. भिक्खूंनो, हा नियम (धम्मता) आहे की, नुकताच जन्मलेला बोधिसत्त्व आपल्या दोन्ही समान पावलांनी जमिनीवर स्थिर उभा राहून, उत्तरेकडे तोंड करून सात पावले चालतो. त्यावेळी (त्यांच्यावर) पांढरे छत्र धरले जाते. ते सर्व दिशांकडे पाहतात आणि निर्भयपणे (सिंहगर्जनायुक्त) हे शब्द उच्चारतात: 'मी जगामध्ये सर्वश्रेष्ठ आहे, मी जगामध्ये ज्येष्ठ आहे, मी जगामध्ये श्रेष्ठ आहे. हा माझा अंतिम जन्म आहे, आता पुन्हा जन्म (पुनर्भव) नाही.' हा येथील नियम आहे. ๓๒. ‘‘ธมฺมตา เอสา, ภิกฺขเว, ยทา โพธิสตฺโต มาตุกุจฺฉิมฺหา นิกฺขมติ, อถ สเทวเก โลเก สมารเก สพฺรหฺมเก สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย อปฺปมาโณ อุฬาโร โอภาโส ปาตุภวติ, อติกฺกมฺเมว เทวานํ เทวานุภาวํ. ยาปิ ตา โลกนฺตริกา อฆา อสํวุตา อนฺธการา อนฺธการติมิสา, ยตฺถ ปิเม จนฺทิมสูริยา เอวํมหิทฺธิกา เอวํมหานุภาวา อาภาย นานุโภนฺติ, ตตฺถปิ อปฺปมาโณ อุฬาโร โอภาโส ปาตุภวติ อติกฺกมฺเมว เทวานํ เทวานุภาวํ. เยปิ ตตฺถ สตฺตา อุปปนฺนา, เตปิ เตโนภาเสน อญฺญมญฺญํ สญฺชานนฺติ – ‘อญฺเญปิ กิร, โภ, สนฺติ สตฺตา อิธูปปนฺนา’ติ. อยญฺจ ทสสหสฺสี โลกธาตุ สงฺกมฺปติ สมฺปกมฺปติ สมฺปเวธติ อปฺปมาโณ จ อุฬาโร โอภาโส โลเก ปาตุภวติ อติกฺกมฺเมว เทวานํ เทวานุภาวํ. อยเมตฺถ ธมฺมตา. ३२. भिक्खूंनो, हा नियम आहे की, जेव्हा बोधिसत्त्व आपल्या मातेच्या उदरातून बाहेर येतात, तेव्हा देव, मार, ब्रह्मा यांच्यासह या संपूर्ण जगात, तसेच श्रमण, ब्राह्मण, देव आणि मनुष्यांसह सर्व प्रजेमध्ये देवांच्या दैवी प्रभावालाही मागे टाकणारा एक अमर्याद आणि भव्य प्रकाश प्रकट होतो. ज्या लोकांतरिक (नरक) जागा अथांग, निराधार, अंधकारमय आणि घनघोर अंधाराने व्यापलेल्या आहेत, जिथे एवढे महाप्रतापी आणि महातेजस्वी असणारे चंद्र आणि सूर्य देखील आपल्या प्रकाशाने पोहोचू शकत नाहीत, तिथेही देवांच्या दैवी प्रभावाला मागे टाकणारा अमर्याद आणि भव्य प्रकाश प्रकट होतो. तिथे जे प्राणी उत्पन्न झाले आहेत, ते देखील त्या प्रकाशाच्या साहाय्याने एकमेकांना ओळखतात की, 'अरे मित्रांनो! येथे इतरही प्राणी उत्पन्न झाले आहेत.' आणि ही दहा हजारांची लोकधातू (विश्व) थरथरते, तीव्रपणे कंपित होते, डळमळीत होते आणि देवांच्या दैवी प्रभावाला मागे टाकणारा अमर्याद आणि भव्य प्रकाश जगात प्रकट होतो. हा येथील नियम आहे. ทฺวตฺตึสมหาปุริสลกฺขณา महापुरुषाची बत्तीस लक्षणे ๓๓. ‘‘ชาเต โข ปน, ภิกฺขเว, วิปสฺสิมฺหิ กุมาเร พนฺธุมโต รญฺโญ ปฏิเวเทสุํ – ‘ปุตฺโต เต, เทว, ชาโต, ตํ เทโว ปสฺสตู’ติ. อทฺทสา โข, ภิกฺขเว, พนฺธุมา ราชา วิปสฺสึ กุมารํ, ทิสฺวา เนมิตฺเต พฺราหฺมเณ [Pg.14] อามนฺตาเปตฺวา เอตทโวจ – ‘ปสฺสนฺตุ โภนฺโต เนมิตฺตา พฺราหฺมณา กุมาร’นฺติ. อทฺทสํสุ โข, ภิกฺขเว, เนมิตฺตา พฺราหฺมณา วิปสฺสึ กุมารํ, ทิสฺวา พนฺธุมนฺตํ ราชานํ เอตทโวจุํ – ‘อตฺตมโน, เทว, โหหิ, มเหสกฺโข เต ปุตฺโต อุปฺปนฺโน, ลาภา เต, มหาราช, สุลทฺธํ เต, มหาราช, ยสฺส เต กุเล เอวรูโป ปุตฺโต อุปฺปนฺโน. อยญฺหิ, เทว, กุมาโร ทฺวตฺตึสมหาปุริสลกฺขเณหิ สมนฺนาคโต, เยหิ สมนฺนาคตสฺส มหาปุริสสฺส ทฺเวว คติโย ภวนฺติ อนญฺญา. สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี ธมฺมิโก ธมฺมราชา จาตุรนฺโต วิชิตาวี ชนปทตฺถาวริยปฺปตฺโต สตฺตรตนสมนฺนาคโต. ตสฺสิมานิ สตฺตรตนานิ ภวนฺติ. เสยฺยถิทํ – จกฺกรตนํ หตฺถิรตนํ อสฺสรตนํ มณิรตนํ อิตฺถิรตนํ คหปติรตนํ ปริณายกรตนเมว สตฺตมํ. ปโรสหสฺสํ โข ปนสฺส ปุตฺตา ภวนฺติ สูรา วีรงฺครูปา ปรเสนปฺปมทฺทนา. โส อิมํ ปถวึ สาครปริยนฺตํ อทณฺเฑน อสตฺเถน ธมฺเมน อภิวิชิย อชฺฌาวสติ. สเจ โข ปน อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชติ, อรหํ โหติ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก วิวฏจฺฉโท. ३३. भिक्खूंनो, विपस्सी कुमाराचा जन्म झाल्यावर राजा बंधुमान याला कळवण्यात आले की, 'महाराज, आपल्या घरी पुत्राचा जन्म झाला आहे, आपण त्याला पाहावे.' भिक्खूंनो, राजा बंधुमान याने विपस्सी कुमाराला पाहिले आणि पाहून भविष्यवेत्त्या (निमित्त-पाठक) ब्राह्मणांना बोलावून म्हटले, 'हे पूज्य भविष्यवेत्ते ब्राह्मणहो, आपण या कुमाराचे निरीक्षण करावे.' भिक्खूंनो, त्या भविष्यवेत्त्या ब्राह्मणांनी विपस्सी कुमाराचे निरीक्षण केले आणि राजा बंधुमान याला म्हटले, 'महाराज, आपण प्रसन्न व्हावे. आपल्या घरी महाप्रतापी पुत्राचा जन्म झाला आहे. महाराज, हा आपला मोठा लाभ आहे; महाराज, हे आपले मोठे भाग्य आहे की आपल्या कुळात अशा पुत्राचा जन्म झाला आहे. महाराज, हा कुमार महापुरुषाच्या बत्तीस लक्षणांनी युक्त आहे. ज्या महापुरुषाकडे ही लक्षणे असतात, त्याच्यासाठी केवळ दोनच मार्ग (गती) असतात, तिसरा नाही. जर तो गृहस्थाश्रमात राहिला, तर तो चक्रवर्ती, धार्मिक, धम्मराज, चारही दिशांवर विजय मिळवणारा, आपल्या राज्याला स्थिरता देणारा आणि सप्त रत्नांनी युक्त असा राजा होईल. त्याच्याकडे ही सप्त रत्ने असतील, ती म्हणजे: चक्ररत्न, हत्तीरत्न, अश्वरत्न, मणिरत्न, स्त्रीरत्न, गृहपतीरत्न आणि सातवे सेनापतीरत्न (परिणायकरत्न). त्याला एक हजाराहून अधिक शूर, पराक्रमी आणि शत्रूच्या सैन्याचा नाश करणारे पुत्र असतील. तो या समुद्रापर्यंत पसरलेल्या पृथ्वीवर कोणत्याही दंडाशिवाय आणि शस्त्राशिवाय, केवळ धम्माच्या साहाय्याने विजय मिळवून राज्य करेल. परंतु, जर त्याने घराचा त्याग करून अनगारिक (प्रव्रज्या) मार्ग स्वीकारला, तर तो जगात क्लेशांचे आवरण नष्ट करणारा, अरहंत, सम्यक संबुद्ध (सम्मासम्बुद्ध) होईल.' ๓๔. ‘กตเมหิ จายํ, เทว, กุมาโร ทฺวตฺตึสมหาปุริสลกฺขเณหิ สมนฺนาคโต, เยหิ สมนฺนาคตสฺส มหาปุริสสฺส ทฺเวว คติโย ภวนฺติ อนญฺญา. สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี ธมฺมิโก ธมฺมราชา จาตุรนฺโต วิชิตาปี ชนปทตฺถาวริยปฺปตฺโต สตฺตรตนสมนฺนาคโต. ตสฺสิมานิ สตฺตรตนานิ ภวนฺติ. เสยฺยถิทํ – จกฺกรตนํ หตฺถิรตนํ อสฺสรตนํ มณิรตนํ อิตฺถิรตนํ คหปติรตนํ ปริณายกรตนเมว สตฺตมํ. ปโรสหสฺสํ โข ปนสฺส ปุตฺตา ภวนฺติ สูรา วีรงฺครูปา ปรเสนปฺปมทฺทนา. โส อิมํ ปถวึ สาครปริยนฺตํ อทณฺเฑน อสตฺเถน ธมฺเมน อภิวิชิย อชฺฌาวสติ. สเจ โข ปน อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชติ, อรหํ โหติ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก วิวฏจฺฉโท. ३४. 'महाराज, हा कुमार कोणत्या बत्तीस महापुरुष लक्षणांनी युक्त आहे, ज्यांच्यामुळे अशा महापुरुषासाठी केवळ दोनच मार्ग असतात, तिसरा नाही? जर तो गृहस्थाश्रमात राहिला, तर तो चक्रवर्ती, धार्मिक, धम्मराज, चारही दिशांवर विजय मिळवणारा, आपल्या राज्याला स्थिरता देणारा आणि सप्त रत्नांनी युक्त असा राजा होईल. त्याच्याकडे ही सप्त रत्ने असतील, ती म्हणजे: चक्ररत्न, हत्तीरत्न, अश्वरत्न, मणिरत्न, स्त्रीरत्न, गृहपतीरत्न आणि सातवे सेनापतीरत्न. त्याला एक हजाराहून अधिक शूर, पराक्रमी आणि शत्रूच्या सैन्याचा नाश करणारे पुत्र असतील. तो या समुद्रापर्यंत पसरलेल्या पृथ्वीवर कोणत्याही दंडाशिवाय आणि शस्त्राशिवाय, केवळ धम्माच्या साहाय्याने विजय मिळवून राज्य करेल. परंतु, जर त्याने घराचा त्याग करून अनगारिक मार्ग स्वीकारला, तर तो जगात क्लेशांचे आवरण नष्ट करणारा, अरहंत, सम्यक संबुद्ध होईल?' ๓๕. ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร สุปฺปติฏฺฐิตปาโท. ยํ ปายํ, เทว, กุมาโร สุปฺปติฏฺฐิตปาโท. อิทมฺปิสฺส มหาปุริสสฺส มหาปุริสลกฺขณํ ภวติ. ३५. 'महाराज, या कुमाराचे पाय जमिनीवर पूर्णपणे सपाट टेकतात (समतल पाऊल). महाराज, या कुमाराचे पाय जमिनीवर पूर्णपणे सपाट टेकणे, हे देखील या महापुरुषाचे एक महापुरुष लक्षण आहे.' ‘อิมสฺส, เทว, กุมารสฺส เหฏฺฐา ปาทตเลสุ จกฺกานิ ชาตานิ สหสฺสารานิ สเนมิกานิ สนาภิกานิ สพฺพาการปริปูรานิ. ยมฺปิ, อิมสฺส [Pg.15] เทว, กุมารสฺส เหฏฺฐา ปาทตเลสุ จกฺกานิ ชาตานิ สหสฺสารานิ สเนมิกานิ สนาภิกานิ สพฺพาการปริปูรานิ, อิทมฺปิสฺส มหาปุริสสฺส มหาปุริสลกฺขณํ ภวติ. 'महाराज, या कुमाराच्या दोन्ही पायांच्या तळव्यांवर हजार आरे, नेमी (कडा) आणि नाभी (मध्यभाग) असलेले आणि सर्व प्रकारे परिपूर्ण असे चक्र निर्माण झाले आहे. महाराज, या कुमाराच्या पायांच्या तळव्यांवर हजार आरे, नेमी आणि नाभी असलेले आणि सर्व प्रकारे परिपूर्ण असे चक्र निर्माण होणे, हे देखील या महापुरुषाचे एक महापुरुष लक्षण आहे.' ‘อยญฺหิ เทว, กุมาโร อายตปณฺหี…เป… 'महाराज, या कुमाराच्या टाचा लांब आहेत... (इत्यादी)...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร ทีฆงฺคุลี… 'महाराज, या कुमाराची हातापायांची बोटे लांब आहेत...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร มุทุตลุนหตฺถปาโท… 'महाराज, या कुमाराचे हात आणि पाय अत्यंत कोमल आणि मऊ आहेत...' ‘อยญฺหิ, เทว กุมาโร ชาลหตฺถปาโท… 'महाराज, या कुमाराचे हात आणि पाय जाळीदार आहेत (बोटांच्या मध्ये पातळ त्वचा आहे)...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร อุสฺสงฺขปาโท… 'महाराज, या कुमाराचे घोटे उंच आहेत...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร เอณิชงฺโฆ… 'महाराज, या कुमाराच्या पिंडऱ्या एणी (हरणासारख्या) सुंदर आणि सुडौल आहेत...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร ฐิตโกว อโนนมนฺโต อุโภหิ ปาณิตเลหิ ชณฺณุกานิ ปริมสติ ปริมชฺชติ… 'महाराज, हा कुमार न वाकता सरळ उभे राहूनही आपल्या दोन्ही हातांच्या तळव्यांनी गुडघ्यांना स्पर्श करू शकतो आणि कुरवाळू शकतो...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร โกโสหิตวตฺถคุยฺโห… 'महाराज, या कुमाराचे गुप्तेंद्रिय कोशात (त्वचेच्या आवरणात) झाकलेले आहे...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร สุวณฺณวณฺโณ กญฺจนสนฺนิภตฺตโจ… 'महाराज, हा कुमार सुवर्णवर्णी असून त्याची त्वचा शुद्ध सोन्यासारखी चकाकणारी आहे...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร สุขุมจฺฉวี; สุขุมตฺตา ฉวิยา รโชชลฺลํ กาเย น อุปลิมฺปติ … 'महाराज, या कुमाराची त्वचा अत्यंत सुकुमार (मऊ) आहे; त्वचा सुकुमार असल्यामुळे त्याच्या शरीराला धूळ किंवा घाण चिकटत नाही...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร เอเกกโลโม; เอเกกานิ โลมานิ โลมกูเปสุ ชาตานิ… 'महाराज, या कुमाराच्या शरीरावरील प्रत्येक छिद्रात एकच रोम (केस) उगवलेला आहे...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร อุทฺธคฺคโลโม; อุทฺธคฺคานิ โลมานิ ชาตานิ นีลานิ อญฺชนวณฺณานิ กุณฺฑลาวฏฺฏานิ ทกฺขิณาวฏฺฏกชาตานิ… 'महाराज, या कुमाराच्या शरीरावरील रोम वरच्या देशाने वळलेले आहेत; ते रोम निळे, काजळासारखे काळे, कुंडल वळल्यासारखे उजवीकडे वळलेले आहेत...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร พฺรหฺมุชุคตฺโต… 'महाराज, या कुमाराचे शरीर ब्रह्मासारखे सरळ आणि भव्य आहे...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร สตฺตุสฺสโท… 'महाराज, या कुमाराचे शरीर सात ठिकाणी मांसल आणि भरलेले आहे...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร สีหปุพฺพทฺธกาโย… 'महाराज, या कुमाराच्या शरीराचा पूर्वार्ध (पुढचा भाग) सिंहासारखा भव्य आहे...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร จิตนฺตรํโส … 'महाराज, या कुमाराच्या दोन्ही खांद्यांमधील पाठीचा भाग सपाट आणि मांसल आहे...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร นิคฺโรธปริมณฺฑโล ยาวตกฺวสฺส กาโย ตาวตกฺวสฺส พฺยาโม, ยาวตกฺวสฺส พฺยาโม, ตาวตกฺวสฺส กาโย… 'महाराज, हा कुमार वडाच्या झाडासारखा परिमंडळ (प्रमाणबद्ध) आहे; जेवढी त्याच्या शरीराची उंची आहे, तेवढाच त्याच्या दोन्ही पसरलेल्या हातांचा विस्तार आहे आणि जेवढा हातांचा विस्तार आहे, तेवढीच त्याची उंची आहे...' ‘อยญฺหิ[Pg.16], เทว, กุมาโร สมวฏฺฏกฺขนฺโธ… 'महाराज, या कुमाराची मान सुबक आणि गोल आहे...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร รสคฺคสคฺคี… 'महाराज, या कुमाराच्या शरीरात रसज्ञान ग्रहण करणाऱ्या अत्यंत संवेदनशील आणि उत्तम शिरा आहेत...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร สีหหนุ… 'महाराज, या कुमाराचा जबडा सिंहासारखा मजबूत आहे...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร จตฺตาลีสทนฺโต… 'महाराज, या कुमाराला चाळीस दात आहेत...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร สมทนฺโต… 'महाराज, या कुमाराचे दात अत्यंत समान आणि एकसारखे आहेत...' ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร อวิรฬทนฺโต… महाराज, हा कुमार विरळ नसलेल्या (दाट व सलग) दातांनी युक्त आहे. ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร สุสุกฺกทาโฐ… महाराज, या कुमाराचे सुळे अत्यंत शुभ्र आहेत. ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร ปหูตชิวฺโห… महाराज, या कुमाराची जीभ विस्तीर्ण (लांब व रुंद) आहे. ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร พฺรหฺมสฺสโร กรวีกภาณี… महाराज, या कुमाराचा आवाज ब्रह्मासारखा असून तो करविक पक्ष्यासारखा सुमधुर बोलणारा आहे. ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร อภินีลเนตฺโต… महाराज, या कुमाराचे डोळे अतिशय गडद निळे आहेत. ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร โคปขุโม… महाराज, या कुमाराच्या पापण्या गायीच्या पापण्यांसारख्या सुंदर आहेत. อิมสฺส, เทว, กุมารสฺส อุณฺณา ภมุกนฺตเร ชาตา โอทาตา มุทุตูลสนฺนิภา. ยมฺปิ อิมสฺส เทว กุมารสฺส อุณฺณา ภมุกนฺตเร ชาตา โอทาตา มุทุตูลสนฺนิภา, อิทมฺปิมสฺส มหาปุริสสฺส มหาปุริสลกฺขณํ ภวติ. महाराज, या कुमाराच्या दोन्ही भुवयांच्या मध्ये मऊ कापसासारखी मऊ आणि शुभ्र अशी 'उर्णा' उगवली आहे. महाराज, या कुमाराच्या भुवयांच्या मध्ये अशी शुभ्र व कापसासारखी मऊ उर्णा उगवणे, हे देखील या महापुरुषाचे एक महापुरुष-लक्षण आहे. ‘อยญฺหิ, เทว, กุมาโร อุณฺหีสสีโส. ยํ ปายํ, เทว, กุมาโร อุณฺหีสสีโส, อิทมฺปิสฺส มหาปุริสสฺส มหาปุริสลกฺขณํ ภวติ. महाराज, या कुमाराचे मस्तक पगडी किंवा मुकुट धारण केल्यासारखे (उष्णीष-शीर्ष) आहे. महाराज, या कुमाराचे मस्तक असे उष्णीष-शीर्ष असणे, हे देखील या महापुरुषाचे एक महापुरुष-लक्षण आहे. ๓๖. ‘อิเมหิ โข อยํ, เทว, กุมาโร ทฺวตฺตึสมหาปุริสลกฺขเณหิ สมนฺนาคโต, เยหิ สมนฺนาคตสฺส มหาปุริสสฺส ทฺเวว คติโย ภวนฺติ อนญฺญา. สเจ อคารํ อชฺฌาวสติ, ราชา โหติ จกฺกวตฺตี ธมฺมิโก ธมฺมราชา จาตุรนฺโต วิชิตาวี ชนปทตฺถาวริยปฺปตฺโต สตฺตรตนสมนฺนาคโต. ตสฺสิมานิ สตฺตรตนานิ ภวนฺติ. เสยฺยถิทํ – จกฺกรตนํ หตฺถิรตนํ อสฺสรตนํ มณิรตนํ อิตฺถิรตนํ คหปติรตนํ ปริณายกรตนเมว สตฺตมํ. ปโรสหสฺสํ โข ปนสฺส ปุตฺตา ภวนฺติ สูรา วีรงฺครูปา ปรเสนปฺปมทฺทนา. โส อิมํ ปถวึ สาครปริยนฺตํ อทณฺเฑน อสตฺเถน ธมฺเมน อภิวิชิย อชฺฌาวสติ. สเจ โข ปน [Pg.17] อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชติ, อรหํ โหติ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก วิวฏจฺฉโท’ติ. ३६. महाराज, हा कुमार या बत्तीस महापुरुष-लक्षणांनी युक्त आहे. अशा लक्षणांनी युक्त असलेल्या महापुरुषासाठी केवळ दोनच गती असतात, तिसरी नाही. जर तो गृहस्थ जीवनात राहिला, तर तो चक्रवर्ती, धार्मिक, धर्मराज, चारही दिशांवर विजय मिळवणारा, आपल्या राज्याला स्थैर्य देणारा आणि सात रत्नांनी युक्त असा राजा होईल. त्याची ती सात रत्ने अशी असतील: चक्ररत्न, हत्तीरत्न, अश्वरत्न, मणिरत्न, स्त्रीरत्न, गृहपतीरत्न आणि सातवे परिणायकरत्न. त्याला एक हजाराहून अधिक शूर, वीर, शत्रूच्या सैन्याचा पराभव करणारे पुत्र असतील. तो या समुद्रापर्यंत पसरलेल्या पृथ्वीवर दंडाशिवाय आणि शस्त्राशिवाय, केवळ धर्माने विजय मिळवून राज्य करेल. परंतु, जर त्याने गृहत्याग करून अनगारिक (प्रव्रजित) अवस्था स्वीकारली, तर तो जगात अर्हत, सम्यक्संबुद्ध आणि अज्ञानाचा पडदा दूर करणारा होईल. วิปสฺสีสมญฺญา विपस्सी हे नाव पडणे ๓๗. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, พนฺธุมา ราชา เนมิตฺเต พฺราหฺมเณ อหเตหิ วตฺเถหิ อจฺฉาทาเปตฺวา สพฺพกาเมหิ สนฺตปฺเปสิ. อถ โข, ภิกฺขเว, พนฺธุมา ราชา วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ธาติโย อุปฏฺฐาเปสิ. อญฺญา ขีรํ ปาเยนฺติ, อญฺญา นฺหาเปนฺติ, อญฺญา ธาเรนฺติ, อญฺญา องฺเกน ปริหรนฺติ. ชาตสฺส โข ปน, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส เสตจฺฉตฺตํ ธารยิตฺถ ทิวา เจว รตฺติญฺจ – ‘มา นํ สีตํ วา อุณฺหํ วา ติณํ วา รโช วา อุสฺสาโว วา พาธยิตฺถา’ติ. ชาโต โข ปน, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร พหุโน ชนสฺส ปิโย อโหสิ มนาโป. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, อุปฺปลํ วา ปทุมํ วา ปุณฺฑรีกํ วา พหุโน ชนสฺส ปิยํ มนาปํ; เอวเมว โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร พหุโน ชนสฺส ปิโย อโหสิ มนาโป. สฺวาสฺสุทํ องฺเกเนว องฺกํ ปริหริยติ. ३७. त्यानंतर, भिक्खूहो, राजा बंधुमानने भविष्य सांगणाऱ्या ब्राह्मणांना नवीन वस्त्रे देऊन त्यांच्या सर्व इच्छा पूर्ण करून त्यांना संतुष्ट केले. त्यानंतर, भिक्खूहो, राजा बंधुमानने विपस्सी कुमारासाठी दाईंची नियुक्ती केली. काही दाई त्याला दूध पाजत असत, काही त्याला आंघोळ घालत असत, काही त्याला कडेवर घेत असत, तर काही त्याला आपल्या कुशीत घेऊन फिरत असत. भिक्खूहो, जन्मलेल्या विपस्सी कुमाराला थंडी, उष्णता, गवत, धूळ किंवा दव यांचा त्रास होऊ नये म्हणून दिवस-रात्र त्याच्यावर श्वेतछत्र धरले जात असे. भिक्खूहो, जन्मलेला विपस्सी कुमार बहुसंख्य लोकांना अत्यंत प्रिय आणि मनाला आवडणारा होता. भिक्खूहो, ज्याप्रमाणे निळे कमळ, लाल कमळ किंवा पांढरे कमळ लोकांना अत्यंत प्रिय व मनाला आवडणारे असते; त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, vipassī कुमार लोकांना अत्यंत प्रिय आणि मनाला आवडणारा होता. त्याला एका कुशीतून दुसऱ्या कुशीत नेले जात असे. ๓๘. ‘‘ชาโต โข ปน, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร มญฺชุสฺสโร จ อโหสิ วคฺคุสฺสโร จ มธุรสฺสโร จ เปมนิยสฺสโร จ. เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, หิมวนฺเต ปพฺพเต กรวีกา นาม สกุณชาติ มญฺชุสฺสรา จ วคฺคุสฺสรา จ มธุรสฺสรา จ เปมนิยสฺสรา จ; เอวเมว โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร มญฺชุสฺสโร จ อโหสิ วคฺคุสฺสโร จ มธุรสฺสโร จ เปมนิยสฺสโร จ. ३८. भिक्खूहो, जन्मलेला विपस्सी कुमार सुस्पष्ट आवाजाचा, मधुर आवाजाचा, गोड आवाजाचा आणि अत्यंत प्रिय आवाजाचा होता. भिक्खूहो, ज्याप्रमाणे हिमालय पर्वतावर 'करविक' नावाच्या पक्ष्यांची जात सुस्पष्ट, मधुर, गोड आणि अत्यंत प्रिय आवाजाची असते; त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, विपस्सी कुमार सुस्पष्ट आवाजाचा, मधुर आवाजाचा, गोड आवाजाचा आणि अत्यंत प्रिय आवाजाचा होता. ๓๙. ‘‘ชาตสฺส โข ปน, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส กมฺมวิปากชํ ทิพฺพจกฺขุ ปาตุรโหสิ เยน สุทํ สมนฺตา โยชนํ ปสฺสติ ทิวา เจว รตฺติญฺจ. ३९. भिक्खूहो, जन्मलेल्या विपस्सी कुमाराला त्याच्या पूर्वकर्माच्या विपाकामुळे दिव्यचक्षू प्राप्त झाले होते, ज्याच्या साहाय्याने तो दिवस असो वा रात्र, सभोवतालच्या एक योजन अंतरापर्यंत सहज पाहू शकत असे. ๔๐. ‘‘ชาโต โข ปน, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร อนิมิสนฺโต เปกฺขติ เสยฺยถาปิ เทวา ตาวตึสา. ‘อนิมิสนฺโต กุมาโร เปกฺขตี’ติ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ‘วิปสฺสี วิปสฺสี’ ตฺเวว สมญฺญา อุทปาทิ. ४०. भिक्खूहो, जन्मलेला विपस्सी कुमार तावतिंस स्वर्गातील देवांप्रमाणे पापणी न लववता पाहत असे. 'हा कुमार पापणी न लववता पाहतो' या वैशिष्ट्यामुळेच, भिक्खूहो, त्या कुमाराचे 'विपस्सी, विपस्सी' असे नाव पडले. ๔๑. ‘‘อถ [Pg.18] โข, ภิกฺขเว, พนฺธุมา ราชา อตฺถกรเณ นิสินฺโน วิปสฺสึ กุมารํ องฺเก นิสีทาเปตฺวา อตฺเถ อนุสาสติ. ตตฺร สุทํ, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร ปิตุองฺเก นิสินฺโน วิเจยฺย วิเจยฺย อตฺเถ ปนายติ ญาเยน. วิเจยฺย วิเจยฺย กุมาโร อตฺเถ ปนายติ ญาเยนาติ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ภิยฺโยโสมตฺตาย ‘วิปสฺสี วิปสฺสี’ ตฺเวว สมญฺญา อุทปาทิ. ४१. त्यानंतर, भिक्खूहो, राजा बंधुमान जेव्हा न्यायसभेत बसत असे, तेव्हा तो विपस्सी कुमाराला आपल्या मांडीवर बसवून खटल्यांचे मार्गदर्शन करत असे. भिक्खूहो, तिथे वडिलांच्या मांडीवर बसलेला विपस्सी कुमार प्रकरणांचे काळजीपूर्वक विश्लेषण करून न्यायानुसार योग्य निर्णय समजून घेत असे. 'हा कुमार प्रकरणांचे काळजीपूर्वक विश्लेषण करून न्यायानुसार निर्णय समजून घेतो' या कारणामुळे, भिक्खूहो, त्या कुमाराचे 'विपस्सी, विपस्सी' हे नाव अधिकच प्रसिद्ध झाले. ๔๒. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, พนฺธุมา ราชา วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ตโย ปาสาเท การาเปสิ, เอกํ วสฺสิกํ เอกํ เหมนฺติกํ เอกํ คิมฺหิกํ; ปญฺจ กามคุณานิ อุปฏฺฐาเปสิ. ตตฺร สุทํ, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร วสฺสิเก ปาสาเท จตฺตาโร มาเส นิปฺปุริเสหิ ตูริเยหิ ปริจารยมาโน น เหฏฺฐาปาสาทํ โอโรหตี’’ติ. ४२. त्यानंतर, भिक्खूहो, राजा बंधुमानने विपस्सी कुमारासाठी तीन प्रासाद बांधले—एक पावसाळ्यासाठी, एक हिवाळ्यासाठी आणि एक उन्हाळ्यासाठी; आणि तेथे पाच प्रकारच्या कामभोगांची व्यवस्था केली. भिक्खूहो, पावसाळ्याच्या प्रासादात विपस्सी कुमार पावसाळ्याचे चार महिने केवळ स्त्री-वादकांच्या संगीतात रममाण होऊन राहत असे आणि तो कधीही प्रासादाच्या खाली उतरत नसे. ปฐมภาณวาโร. प्रथम भाणवार समाप्त. ชิณฺณปุริโส वृद्ध मनुष्य ๔๓. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร พหูนํ วสฺสานํ พหูนํ วสฺสสตานํ พหูนํ วสฺสสหสฺสานํ อจฺจเยน สารถึ อามนฺเตสิ – ‘โยเชหิ, สมฺม สารถิ, ภทฺทานิ ภทฺทานิ ยานานิ อุยฺยานภูมึ คจฺฉาม สุภูมิทสฺสนายา’ติ. ‘เอวํ, เทวา’ติ โข, ภิกฺขเว, สารถิ วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ภทฺทานิ ภทฺทานิ ยานานิ โยเชตฺวา วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ปฏิเวเทสิ – ‘ยุตฺตานิ โข เต, เทว, ภทฺทานิ ภทฺทานิ ยานานิ, ยสฺส ทานิ กาลํ มญฺญสี’ติ. อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร ภทฺทํ ภทฺทํ ยานํ อภิรุหิตฺวา ภทฺเทหิ ภทฺเทหิ ยาเนหิ อุยฺยานภูมึ นิยฺยาสิ. ४३. त्यानंतर, भिक्खूहो, अनेक वर्षे, शेकडो वर्षे, हजारो वर्षे उलटून गेल्यावर, विपस्सी कुमाराने आपल्या सारथ्याला बोलावून म्हटले—'मित्रा सारथी, उत्तम उत्तम रथ तयार कर, आपण सुंदर भूमी पाहण्यासाठी उद्यानात जाऊया.' भिक्खूहो, सारथ्याने विपस्सी कुमाराच्या आज्ञेचे पालन करून, उत्तम उत्तम रथ तयार केले आणि कुमाराला कळवले—'महाराज, उत्तम उत्तम रथ तयार आहेत, आता आपल्याला योग्य वाटेल त्या वेळी प्रस्थान करावे.' त्यानंतर, भिक्खूहो, विपस्सी कुमार एका उत्तम रथावर आरूढ झाला आणि इतर उत्तम रथांसह उद्यानाकडे निघाला. ๔๔. ‘‘อทฺทสา โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร อุยฺยานภูมึ นิยฺยนฺโต ปุริสํ ชิณฺณํ โคปานสิวงฺกํ โภคฺคํ ทณฺฑปรายนํ ปเวธมานํ คจฺฉนฺตํ อาตุรํ [Pg.19] คตโยพฺพนํ. ทิสฺวา สารถึ อามนฺเตสิ – ‘อยํ ปน, สมฺม สารถิ, ปุริโส กึกโต? เกสาปิสฺส น ยถา อญฺเญสํ, กาโยปิสฺส น ยถา อญฺเญส’นฺติ. ‘เอโส โข, เทว, ชิณฺโณ นามา’ติ. ‘กึ ปเนโส, สมฺม สารถิ, ชิณฺโณ นามา’ติ? ‘เอโส โข, เทว, ชิณฺโณ นาม. น ทานิ เตน จิรํ ชีวิตพฺพํ ภวิสฺสตี’ติ. ‘กึ ปน, สมฺม สารถิ, อหมฺปิ ชราธมฺโม, ชรํ อนตีโต’ติ? ‘ตฺวญฺจ, เทว, มยญฺจมฺห สพฺเพ ชราธมฺมา, ชรํ อนตีตา’ติ. ‘เตน หิ, สมฺม สารถิ, อลํ ทานชฺช อุยฺยานภูมิยา. อิโตว อนฺเตปุรํ ปจฺจนิยฺยาหี’ติ. ‘เอวํ, เทวา’ติ โข, ภิกฺขเว, สารถิ วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ตโตว อนฺเตปุรํ ปจฺจนิยฺยาสิ. ตตฺร สุทํ, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร อนฺเตปุรํ คโต ทุกฺขี ทุมฺมโน ปชฺฌายติ – ‘ธิรตฺถุ กิร, โภ, ชาติ นาม, ยตฺร หิ นาม ชาตสฺส ชรา ปญฺญายิสฺสตี’ติ! ४४. भिक्षूंनो, विपस्सी राजकुमार जेव्हा उद्यानाकडे जात होते, तेव्हा त्यांनी एका वृद्ध माणसाला पाहिले, जो घराच्या वाशासारखा वाकलेला, कुबडा, काठीचा आधार घेतलेला, थरथर कापत चालणारा, आजारी आणि तारुण्य निघून गेलेला होता. त्याला पाहून त्यांनी सारथ्याला विचारले – 'मित्रा सारथी, या माणसाला काय झाले आहे? त्याचे केस इतरांसारखे नाहीत आणि त्याचे शरीरही इतरांसारखे नाही.' सारथ्याने उत्तर दिले, 'राजपुत्र, हा वृद्ध माणूस आहे.' 'पण मित्रा सारथी, वृद्ध म्हणजे काय?' 'राजपुत्र, हा वृद्ध माणूस आहे. आता तो फार काळ जगू शकणार नाही.' 'पण मित्रा सारथी, मीसुद्धा जराधर्मी (वृद्धत्वाच्या अधीन) आहे का? मी वृद्धत्वापासून मुक्त नाही का?' 'राजपुत्र, आपण आणि आम्ही सर्वच जराधर्मी आहोत, वृद्धत्वापासून कोणीही मुक्त नाही.' 'तर मग मित्रा सारथी, आज उद्यानाला जाणे पुरे झाले. येथूनच परत राजवाड्यात चल.' भिक्षूंनो, 'तसेच असो, राजपुत्र,' असे म्हणून सारथ्याने विपस्सी राजकुमाराच्या आज्ञेचे पालन केले आणि तिथूनच तो राजवाड्यात परत आला. भिक्षूंनो, तिथे राजवाड्यात गेल्यावर विपस्सी राजकुमार दुःखी व खिन्न मनाने विचार करू लागले – 'अरेरे! या जन्माला धिक्कार असो, कारण जो जन्म घेतो त्याला वृद्धत्व प्राप्त होणारच!' ๔๕. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, พนฺธุมา ราชา สารถึ อามนฺตาเปตฺวา เอตทโวจ – ‘กจฺจิ, สมฺม สารถิ, กุมาโร อุยฺยานภูมิยา อภิรมิตฺถ? กจฺจิ, สมฺม สารถิ, กุมาโร อุยฺยานภูมิยา อตฺตมโน อโหสี’ติ? ‘น โข, เทว, กุมาโร อุยฺยานภูมิยา อภิรมิตฺถ, น โข, เทว, กุมาโร อุยฺยานภูมิยา อตฺตมโน อโหสี’ติ. ‘กึ ปน, สมฺม สารถิ, อทฺทส กุมาโร อุยฺยานภูมึ นิยฺยนฺโต’ติ? ‘อทฺทสา โข, เทว, กุมาโร อุยฺยานภูมึ นิยฺยนฺโต ปุริสํ ชิณฺณํ โคปานสิวงฺกํ โภคฺคํ ทณฺฑปรายนํ ปเวธมานํ คจฺฉนฺตํ อาตุรํ คตโยพฺพนํ. ทิสฺวา มํ เอตทโวจ – ‘‘อยํ ปน, สมฺม สารถิ, ปุริโส กึกโต, เกสาปิสฺส น ยถา อญฺเญสํ, กาโยปิสฺส น ยถา อญฺเญส’’นฺติ? ‘‘เอโส โข, เทว, ชิณฺโณ นามา’’ติ. ‘‘กึ ปเนโส, สมฺม สารถิ, ชิณฺโณ นามา’’ติ? ‘‘เอโส โข, เทว, ชิณฺโณ นาม น ทานิ เตน จิรํ ชีวิตพฺพํ ภวิสฺสตี’’ติ. ‘‘กึ ปน, สมฺม สารถิ, อหมฺปิ ชราธมฺโม, ชรํ อนตีโต’’ติ? ‘‘ตฺวญฺจ, เทว, มยญฺจมฺห สพฺเพ ชราธมฺมา, ชรํ อนตีตา’’ติ. ४५. त्यानंतर, भिक्षूंनो, बंधुमान राजाने सारथ्याला बोलावून विचारले – 'मित्रा सारथी, राजकुमार उद्यानात रमले का? मित्रा सारथी, राजकुमार उद्यानात प्रसन्न झाले का?' सारथ्याने उत्तर दिले, 'नाही महाराज, राजकुमार उद्यानात रमले नाहीत; नाही महाराज, राजकुमार उद्यानात प्रसन्न झाले नाहीत.' 'पण मित्रा सारथी, उद्यानाकडे जाताना राजकुमारांनी काय पाहिले?' 'महाराज, उद्यानाकडे जाताना राजकुमारांनी एका वृद्ध माणसाला पाहिले, जो घराच्या वाशासारखा वाकलेला, कुबडा, काठीचा आधार घेतलेला, थरथर कापत चालणारा, आजारी आणि तारुण्य निघून गेलेला होता. त्याला पाहून त्यांनी मला विचारले – "मित्रा सारथी, या माणसाला काय झाले आहे? त्याचे केस इतरांसारखे नाहीत आणि त्याचे शरीरही इतरांसारखे नाही." मी म्हणालो, "राजपुत्र, हा वृद्ध माणूस आहे." त्यांनी विचारले, "पण मित्रा सारथी, वृद्ध म्हणजे काय?" मी म्हणालो, "राजपुत्र, हा वृद्ध माणूस आहे. आता तो फार काळ जगू शकणार नाही." त्यांनी विचारले, "पण मित्रा सारथी, मीसुद्धा जराधर्मी आहे का? मी वृद्धत्वापासून मुक्त नाही का?" मी म्हणालो, "राजपुत्र, आपण आणि आम्ही सर्वच जराधर्मी आहोत, वृद्धत्वापासून कोणीही मुक्त नाही." ‘‘‘เตน หิ, สมฺม สารถิ, อลํ ทานชฺช อุยฺยานภูมิยา, อิโตว อนฺเตปุรํ ปจฺจนิยฺยาหี’’’ติ. ‘‘เอวํ, เทวา’’ติ โข อหํ, เทว, วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ตโตว อนฺเตปุรํ ปจฺจนิยฺยาสึ. โส โข, เทว, กุมาโร อนฺเตปุรํ คโต ทุกฺขี ทุมฺมโน ปชฺฌายติ – ‘‘ธิรตฺถุ กิร โภ ชาติ นาม, ยตฺร หิ นาม ชาตสฺส ชรา ปญฺญายิสฺสตี’’’ติ. "'तर मग मित्रा सारथी, आज उद्यानाला जाणे पुरे झाले. येथूनच परत राजवाड्यात चल.'" महाराज, 'तसेच असो, राजपुत्र,' असे म्हणून मी विपस्सी राजकुमारांच्या आज्ञेचे पालन केले आणि तिथूनच राजवाड्यात परत आलो. महाराज, राजवाड्यात गेल्यावर ते राजकुमार दुःखी व खिन्न मनाने विचार करू लागले – 'अरेरे! या जन्माला धिक्कार असो, कारण जो जन्म घेतो त्याला वृद्धत्व प्राप्त होणारच!' พฺยาธิตปุริโส व्याधित पुरुष (आजारी माणूस) ๔๖. ‘‘อถ [Pg.20] โข, ภิกฺขเว, พนฺธุมสฺส รญฺโญ เอตทโหสิ – ४६. त्यानंतर, भिक्षूंनो, बंधुमान राजाच्या मनात असा विचार आला – ‘มา เหว โข วิปสฺสี กุมาโร น รชฺชํ กาเรสิ, มา เหว วิปสฺสี กุมาโร อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิ, มา เหว เนมิตฺตานํ พฺราหฺมณานํ สจฺจํ อสฺส วจน’นฺติ. อถ โข, ภิกฺขเว, พนฺธุมา ราชา วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ภิยฺโยโสมตฺตาย ปญฺจ กามคุณานิ อุปฏฺฐาเปสิ – ‘ยถา วิปสฺสี กุมาโร รชฺชํ กเรยฺย, ยถา วิปสฺสี กุมาโร น อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพเชยฺย, ยถา เนมิตฺตานํ พฺราหฺมณานํ มิจฺฉา อสฺส วจน’นฺติ. 'असे होऊ नये की विपस्सी राजकुमार राज्य करणार नाहीत; असे होऊ नये की विपस्सी राजकुमार गृहत्याग करून अनगारिक (प्रव्रजित) होतील; आणि भविष्य सांगणाऱ्या ब्राह्मणांचे शब्द खरे ठरतील.' म्हणून, भिक्षूंनो, बंधुमान राजाने विपस्सी राजकुमारांसाठी पंचकामगुण (पाच प्रकारची इंद्रियसुखे) अत्यंत विपुल प्रमाणात उपलब्ध करून दिली – जेणेकरून विपस्सी राजकुमारांनी राज्य करावे, त्यांनी गृहत्याग करून अनगारिक होऊ नये आणि भविष्य सांगणाऱ्या ब्राह्मणांचे शब्द खोटे ठरावेत. ‘‘ตตฺร สุทํ, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิโต สมงฺคีภูโต ปริจาเรติ. อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร พหูนํ วสฺสานํ…เป… भिक्षूंनो, तिथे विपस्सी राजकुमार त्या पंचकामगुणांनी युक्त व संपन्न होऊन विलास करू लागले. त्यानंतर, भिक्षूंनो, अनेक वर्षांनंतर... पे... ๔๗. ‘‘อทฺทสา โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร อุยฺยานภูมึ นิยฺยนฺโต ปุริสํ อาพาธิกํ ทุกฺขิตํ พาฬฺหคิลานํ สเก มุตฺตกรีเส ปลิปนฺนํ เสมานํ อญฺเญหิ วุฏฺฐาปิยมานํ อญฺเญหิ สํเวสิยมานํ. ทิสฺวา สารถึ อามนฺเตสิ – ‘อยํ ปน, สมฺม สารถิ, ปุริโส กึกโต? อกฺขีนิปิสฺส น ยถา อญฺเญสํ, สโรปิสฺส น ยถา อญฺเญส’นฺติ? ‘เอโส โข, เทว, พฺยาธิโต นามา’ติ. ‘กึ ปเนโส, สมฺม สารถิ, พฺยาธิโต นามา’ติ? ‘เอโส โข, เทว, พฺยาธิโต นาม อปฺเปว นาม ตมฺหา อาพาธา วุฏฺฐเหยฺยา’ติ. ‘กึ ปน, สมฺม สารถิ, อหมฺปิ พฺยาธิธมฺโม, พฺยาธึ อนตีโต’ติ? ‘ตฺวญฺจ, เทว, มยญฺจมฺห สพฺเพ พฺยาธิธมฺมา, พฺยาธึ อนตีตา’ติ. ‘เตน หิ, สมฺม สารถิ, อลํ ทานชฺช อุยฺยานภูมิยา, อิโตว อนฺเตปุรํ ปจฺจนิยฺยาหี’ติ. ‘เอวํ เทวา’ติ โข, ภิกฺขเว, สารถิ วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ตโตว อนฺเตปุรํ ปจฺจนิยฺยาสิ. ตตฺร สุทํ, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร อนฺเตปุรํ คโต ทุกฺขี ทุมฺมโน ปชฺฌายติ – ‘ธิรตฺถุ กิร โภ ชาติ นาม, ยตฺร หิ นาม ชาตสฺส ชรา ปญฺญายิสฺสติ, พฺยาธิ ปญฺญายิสฺสตี’ติ. ४७. भिक्षूंनो, विपस्सी राजकुमार जेव्हा उद्यानाकडे जात होते, तेव्हा त्यांनी एका आजारी, दुःखी, अत्यंत व्याधिग्रस्त माणसाला पाहिले, जो स्वतःच्याच मलमूत्रात पडलेला होता आणि ज्याला इतर लोक उठवत व झोपवत होते. त्याला पाहून त्यांनी सारथ्याला विचारले – 'मित्रा सारथी, या माणसाला काय झाले आहे? त्याचे डोळे इतरांसारखे नाहीत आणि त्याचा आवाजही इतरांसारखा नाही.' सारथ्याने उत्तर दिले, 'राजपुत्र, हा आजारी (व्याधित) माणूस आहे.' 'पण मित्रा सारथी, आजारी म्हणजे काय?' 'राजपुत्र, हा आजारी माणूस आहे. तो या आजारातून बरा होईल की नाही, हे सांगता येत नाही.' 'पण मित्रा सारथी, मीसुद्धा व्याधिधर्मी (आजाराच्या अधीन) आहे का? मी आजारापासून मुक्त नाही का?' 'राजपुत्र, आपण आणि आम्ही सर्वच व्याधिधर्मी आहोत, आजारापासून कोणीही मुक्त नाही.' 'तर मग मित्रा सारथी, आज उद्यानाला जाणे पुरे झाले. येथूनच परत राजवाड्यात चल.' भिक्षूंनो, 'तसेच असो, राजपुत्र,' असे म्हणून सारथ्याने विपस्सी राजकुमाराच्या आज्ञेचे पालन केले आणि तिथूनच तो राजवाड्यात परत आला. भिक्षूंनो, तिथे राजवाड्यात गेल्यावर विपस्सी राजकुमार दुःखी व खिन्न मनाने विचार करू लागले – 'अरेरे! या जन्माला धिक्कार असो, कारण जो जन्म घेतो त्याला वृद्धत्व प्राप्त होणारच आणि आजारपणही येणारच!' ๔๘. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, พนฺธุมา ราชา สารถึ อามนฺตาเปตฺวา เอตทโวจ – ‘กจฺจิ, สมฺม สารถิ, กุมาโร อุยฺยานภูมิยา อภิรมิตฺถ, กจฺจิ, สมฺม [Pg.21] สารถิ, กุมาโร อุยฺยานภูมิยา อตฺตมโน อโหสี’ติ? ‘น โข, เทว, กุมาโร อุยฺยานภูมิยา อภิรมิตฺถ, น โข, เทว, กุมาโร อุยฺยานภูมิยา อตฺตมโน อโหสี’ติ. ‘กึ ปน, สมฺม สารถิ, อทฺทส กุมาโร อุยฺยานภูมึ นิยฺยนฺโต’ติ? ‘อทฺทสา โข, เทว, กุมาโร อุยฺยานภูมึ นิยฺยนฺโต ปุริสํ อาพาธิกํ ทุกฺขิตํ พาฬฺหคิลานํ สเก มุตฺตกรีเส ปลิปนฺนํ เสมานํ อญฺเญหิ วุฏฺฐาปิยมานํ อญฺเญหิ สํเวสิยมานํ. ทิสฺวา มํ เอตทโวจ – ‘‘อยํ ปน, สมฺม สารถิ, ปุริโส กึกโต, อกฺขีนิปิสฺส น ยถา อญฺเญสํ, สโรปิสฺส น ยถา อญฺเญส’’นฺติ? ‘‘เอโส โข, เทว, พฺยาธิโต นามา’’ติ. ‘‘กึ ปเนโส, สมฺม สารถิ, พฺยาธิโต นามา’’ติ? ‘‘เอโส โข, เทว, พฺยาธิโต นาม อปฺเปว นาม ตมฺหา อาพาธา วุฏฺฐเหยฺยา’’ติ. ‘‘กึ ปน, สมฺม สารถิ, อหมฺปิ พฺยาธิธมฺโม, พฺยาธึ อนตีโต’’ติ? ‘‘ตฺวญฺจ, เทว, มยญฺจมฺห สพฺเพ พฺยาธิธมฺมา, พฺยาธึ อนตีตา’’ติ. ‘‘เตน หิ, สมฺม สารถิ, อลํ ทานชฺช อุยฺยานภูมิยา, อิโตว อนฺเตปุรํ ปจฺจนิยฺยาหี’’ติ. ‘‘เอวํ, เทวา’’ติ โข อหํ, เทว, วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ตโตว อนฺเตปุรํ ปจฺจนิยฺยาสึ. โส โข, เทว, กุมาโร อนฺเตปุรํ คโต ทุกฺขี ทุมฺมโน ปชฺฌายติ – ‘‘‘ธิรตฺถุ กิร โภ ชาติ นาม, ยตฺร หิ นาม ชาตสฺส ชรา ปญฺญายิสฺสติ, พฺยาธิ ปญฺญายิสฺสตี’’’ติ. ४८. “त्यानंतर, भिक्खूंनो, राजा बंधुमाने सारथ्याला बोलावून विचारले – ‘हे सौम्य सारथी, काय राजपुत्र उद्यानात रमले? हे सौम्य सारथी, काय राजपुत्र उद्यानात प्रसन्न झाले?’ ‘नाही महाराज, राजपुत्र उद्यानात रमले नाहीत; नाही महाराज, राजपुत्र उद्यानात प्रसन्न झाले नाहीत.’ ‘तर मग, हे सौम्य सारथी, उद्यानाकडे जाताना राजपुत्राने काय पाहिले?’ ‘महाराज, उद्यानाकडे जाताना राजपुत्राने एका आजारी, दुःखी, अत्यंत गंभीरपणे आजारी असलेल्या माणसाला पाहिले, जो स्वतःच्याच मलमूत्रात पडलेला होता आणि ज्याला इतर लोक उठवत होते व झोपवत होते. त्याला पाहून त्यांनी मला विचारले – “हे सौम्य सारथी, या माणसाला काय झाले आहे? याचे डोळे इतरांसारखे का नाहीत आणि याचा आवाजही इतरांसारखा का नाही?” “महाराज, हा आजारी (व्याधिग्रस्त) मनुष्य आहे.” “हे सौम्य सारथी, आजारी म्हणजे काय?” “महाराज, आजारी म्हणजे असा मनुष्य, जो त्या आजारातून बरा होईल की नाही हे सांगता येत नाही.” “हे सौम्य सारथी, काय मीसुद्धा आजारी पडण्याच्या स्वभावाचा आहे? मी आजारापासून मुक्त नाही का?” “महाराज, आपण, मी आणि इतर सर्वच जण आजारी पडण्याच्या स्वभावाचे आहोत; आपण आजारापासून मुक्त नाही.” “तर मग, हे सौम्य सारथी, आज उद्यानाची काही गरज नाही. येथूनच महालात परत चल.” “होय महाराज,” असे म्हणून मी, महाराज, विपस्सी राजपुत्राच्या आज्ञेचे पालन केले आणि तेथूनच महालात परत आलो. महाराज, महालात परत आल्यावर ते राजपुत्र दुःखी व खिन्न होऊन विचार करू लागले – “अरेरे! या जन्माला धिक्कार असो, कारण जन्मलेल्या प्रत्येकाला वृद्धत्व आणि आजारपण प्राप्त होणारच!”’ กาลงฺกตปุริโส मृत मनुष्य ๔๙. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, พนฺธุมสฺส รญฺโญ เอตทโหสิ – ‘มา เหว โข วิปสฺสี กุมาโร น รชฺชํ กาเรสิ, มา เหว วิปสฺสี กุมาโร อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิ, มา เหว เนมิตฺตานํ พฺราหฺมณานํ สจฺจํ อสฺส วจน’นฺติ. อถ โข, ภิกฺขเว, พนฺธุมา ราชา วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ภิยฺโยโสมตฺตาย ปญฺจ กามคุณานิ อุปฏฺฐาเปสิ – ‘ยถา วิปสฺสี กุมาโร รชฺชํ กเรยฺย, ยถา วิปสฺสี กุมาโร น อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพเชยฺย, ยถา เนมิตฺตานํ พฺราหฺมณานํ มิจฺฉา อสฺส วจน’นฺติ. ४९. “त्यानंतर, भिक्खूंनो, राजा बंधुमाच्या मनात असा विचार आला – ‘राजपुत्र विपस्सी राज्य न करता राहू नयेत; राजपुत्र विपस्सीने गृहत्याग करून अनगारिक (प्रव्रजित) होऊ नये; आणि भविष्य सांगणाऱ्या ब्राह्मणांचे भाकीत खरे ठरू नये.’ म्हणून, भिक्खूंनो, राजा बंधुमाने राजपुत्र विपस्सीसाठी पाच प्रकारच्या कामभोगांची (पंचकामगुण) अत्यंत विपुल प्रमाणात व्यवस्था केली – ‘जेणेकरून राजपुत्र विपस्सी राज्य करतील, गृहत्याग करून अनगारिक होणार नाहीत आणि भविष्य सांगणाऱ्या ब्राह्मणांचे भाकीत खोटे ठरेल.’ ‘‘ตตฺร สุทํ, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิโต สมงฺคีภูโต ปริจาเรติ. อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร พหูนํ วสฺสานํ…เป… “तेथे, भिक्खूंनो, राजपुत्र विपस्सी त्या पाच प्रकारच्या कामभोगांनी युक्त व वेढलेले राहून विलास करू लागले. त्यानंतर, भिक्खूंनो, अनेक वर्षांनंतर... पे... ๕๐. ‘‘อทฺทสา [Pg.22] โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร อุยฺยานภูมึ นิยฺยนฺโต มหาชนกายํ สนฺนิปติตํ นานารตฺตานญฺจ ทุสฺสานํ วิลาตํ กยิรมานํ. ทิสฺวา สารถึ อามนฺเตสิ – ‘กึ นุ โข, โส, สมฺม สารถิ, มหาชนกาโย สนฺนิปติโต นานารตฺตานญฺจ ทุสฺสานํ วิลาตํ กยิรตี’ติ? ‘เอโส โข, เทว, กาลงฺกโต นามา’ติ. ‘เตน หิ, สมฺม สารถิ, เยน โส กาลงฺกโต เตน รถํ เปเสหี’ติ. ‘เอวํ, เทวา’ติ โข, ภิกฺขเว, สารถิ วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ปฏิสฺสุตฺวา เยน โส กาลงฺกโต เตน รถํ เปเสสิ. อทฺทสา โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร เปตํ กาลงฺกตํ, ทิสฺวา สารถึ อามนฺเตสิ – ‘กึ ปนายํ, สมฺม สารถิ, กาลงฺกโต นามา’ติ? ‘เอโส โข, เทว, กาลงฺกโต นาม. น ทานิ ตํ ทกฺขนฺติ มาตา วา ปิตา วา อญฺเญ วา ญาติสาโลหิตา, โสปิ น ทกฺขิสฺสติ มาตรํ วา ปิตรํ วา อญฺเญ วา ญาติสาโลหิเต’ติ. ‘กึ ปน, สมฺม สารถิ, อหมฺปิ มรณธมฺโม มรณํ อนตีโต; มมฺปิ น ทกฺขนฺติ เทโว วา เทวี วา อญฺเญ วา ญาติสาโลหิตา; อหมฺปิ น ทกฺขิสฺสามิ เทวํ วา เทวึ วา อญฺเญ วา ญาติสาโลหิเต’ติ? ‘ตฺวญฺจ, เทว, มยญฺจมฺห สพฺเพ มรณธมฺมา มรณํ อนตีตา; ตมฺปิ น ทกฺขนฺติ เทโว วา เทวี วา อญฺเญ วา ญาติสาโลหิตา; ตฺวมฺปิ น ทกฺขิสฺสสิ เทวํ วา เทวึ วา อญฺเญ วา ญาติสาโลหิเต’ติ. ‘เตน หิ, สมฺม สารถิ, อลํ ทานชฺช อุยฺยานภูมิยา, อิโตว อนฺเตปุรํ ปจฺจนิยฺยาหี’ติ. ‘เอวํ, เทวา’ติ โข, ภิกฺขเว, สารถิ วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ตโตว อนฺเตปุรํ ปจฺจนิยฺยาสิ. ตตฺร สุทํ, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร อนฺเตปุรํ คโต ทุกฺขี ทุมฺมโน ปชฺฌายติ – ‘ธิรตฺถุ กิร, โภ, ชาติ นาม, ยตฺร หิ นาม ชาตสฺส ชรา ปญฺญายิสฺสติ, พฺยาธิ ปญฺญายิสฺสติ, มรณํ ปญฺญายิสฺสตี’ติ. ५०. “भिक्खूंनो, उद्यानाकडे जाताना राजपुत्र विपस्सीने लोकांचा मोठा समुदाय एकत्र आलेला आणि विविध रंगांच्या वस्त्रांनी सजवलेली तिरडी (शवपेटी) तयार केली जात असलेली पाहिली. ते पाहून त्यांनी सारथ्याला विचारले – ‘हे सौम्य सारथी, हा लोकांचा मोठा समुदाय का एकत्र आला आहे आणि विविध रंगांच्या वस्त्रांनी ही तिरडी का तयार केली जात आहे?’ ‘महाराज, हा मृत मनुष्य (कालवश झालेला) आहे.’ ‘तर मग, हे सौम्य सारथी, जेथे तो मृत मनुष्य आहे, तेथे रथ घेऊन चल.’ ‘होय महाराज,’ असे म्हणून, भिक्खूंनो, सारथ्याने राजपुत्र विपस्सीच्या आज्ञेचे पालन केले आणि जेथे तो मृत मनुष्य होता, तेथे रथ नेला. भिक्खूंनो, राजपुत्र विपस्सीने त्या मृत शरीराला पाहिले आणि पाहून सारथ्याला विचारले – ‘हे सौम्य सारथी, मृत मनुष्य म्हणजे काय?’ ‘महाराज, मृत मनुष्य म्हणजे असा, ज्याला आता त्याचे आई-वडील किंवा इतर नातेवाईक पाहू शकणार नाहीत आणि तो स्वतःही आपल्या आई-वडिलांना किंवा नातेवाईकांना पाहू शकणार नाही.’ ‘हे सौम्य सारथी, काय मीसुद्धा मरणशील स्वभावाचा आहे? मी मरणापासून मुक्त नाही का? मलाही महाराज (पिता), महाराणी (माता) किंवा इतर नातेवाईक पुन्हा पाहू शकणार नाहीत का? आणि मीसुद्धा महाराज, महाराणी किंवा इतर नातेवाईकांना पाहू शकणार नाही का?’ ‘महाराज, आपण, मी आणि इतर सर्वच जण मरणशील स्वभावाचे आहोत; आपण मरणापासून मुक्त नाही. आपल्यालाही महाराज, महाराणी किंवा इतर नातेवाईक पाहू शकणार नाहीत आणि आपणही महाराज, महाराणी किंवा इतर नातेवाईकांना पाहू शकणार नाही.’ ‘तर मग, हे सौम्य सारथी, आज उद्यानाची काही गरज नाही. येथूनच महालात परत चल.’ ‘होय महाराज,’ असे म्हणून, भिक्खूंनो, सारथ्याने राजपुत्र विपस्सीच्या आज्ञेचे पालन केले आणि तेथूनच महालात परत आला. तेथे, भिक्खूंनो, महालात परत आल्यावर राजपुत्र विपस्सी दुःखी व खिन्न होऊन विचार करू लागले – ‘अरेरे! या जन्माला धिक्कार असो, कारण जन्मलेल्या प्रत्येकाला वृद्धत्व, आजारपण आणि मृत्यू प्राप्त होणारच!’” ๕๑. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, พนฺธุมา ราชา สารถึ อามนฺตาเปตฺวา เอตทโวจ – ‘กจฺจิ, สมฺม สารถิ, กุมาโร อุยฺยานภูมิยา อภิรมิตฺถ, กจฺจิ, สมฺม สารถิ, กุมาโร อุยฺยานภูมิยา อตฺตมโน อโหสี’ติ? ‘น โข, เทว, กุมาโร อุยฺยานภูมิยา อภิรมิตฺถ, น โข, เทว, กุมาโร อุยฺยานภูมิยา อตฺตมโน อโหสี’ติ. ‘กึ ปน, สมฺม สารถิ, อทฺทส กุมาโร อุยฺยานภูมึ นิยฺยนฺโต’ติ? ‘อทฺทสา โข, เทว, กุมาโร อุยฺยานภูมึ นิยฺยนฺโต มหาชนกายํ สนฺนิปติตํ นานารตฺตานญฺจ ทุสฺสานํ วิลาตํ กยิรมานํ. ทิสฺวา มํ เอตทโวจ – ‘‘กึ นุ โข, โส[Pg.23], สมฺม สารถิ, มหาชนกาโย สนฺนิปติโต นานารตฺตานญฺจ ทุสฺสานํ วิลาตํ กยิรตี’’ติ? ‘‘เอโส โข, เทว, กาลงฺกโต นามา’’ติ. ‘‘เตน หิ, สมฺม สารถิ, เยน โส กาลงฺกโต เตน รถํ เปเสหี’’ติ. ‘‘เอวํ เทวา’’ติ โข อหํ, เทว, วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ปฏิสฺสุตฺวา เยน โส กาลงฺกโต เตน รถํ เปเสสึ. อทฺทสา โข, เทว, กุมาโร เปตํ กาลงฺกตํ, ทิสฺวา มํ เอตทโวจ – ‘‘กึ ปนายํ, สมฺม สารถิ, กาลงฺกโต นามา’’ติ? ‘‘เอโส โข, เทว, กาลงฺกโต นาม. น ทานิ ตํ ทกฺขนฺติ มาตา วา ปิตา วา อญฺเญ วา ญาติสาโลหิตา, โสปิ น ทกฺขิสฺสติ มาตรํ วา ปิตรํ วา อญฺเญ วา ญาติสาโลหิเต’’ติ. ‘‘กึ ปน, สมฺม สารถิ, อหมฺปิ มรณธมฺโม มรณํ อนตีโต; มมฺปิ น ทกฺขนฺติ เทโว วา เทวี วา อญฺเญ วา ญาติสาโลหิตา; อหมฺปิ น ทกฺขิสฺสามิ เทวํ วา เทวึ วา อญฺเญ วา ญาติสาโลหิเต’’ติ? ‘‘ตฺวญฺจ, เทว, มยญฺจมฺห สพฺเพ มรณธมฺมา มรณํ อนตีตา; ตมฺปิ น ทกฺขนฺติ เทโว วา เทวี วา อญฺเญ วา ญาติสาโลหิตา, ตฺวมฺปิ น ทกฺขิสฺสสิ เทวํ วา เทวึ วา อญฺเญ วา ญาติสาโลหิเต’’ติ. ‘‘เตน หิ, สมฺม สารถิ, อลํ ทานชฺช อุยฺยานภูมิยา, อิโตว อนฺเตปุรํ ปจฺจนิยฺยาหี’ติ. ‘‘‘เอวํ, เทวา’’ติ โข อหํ, เทว, วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ตโตว อนฺเตปุรํ ปจฺจนิยฺยาสึ. โส โข, เทว, กุมาโร อนฺเตปุรํ คโต ทุกฺขี ทุมฺมโน ปชฺฌายติ – ‘‘ธิรตฺถุ กิร โภ ชาติ นาม, ยตฺร หิ นาม ชาตสฺส ชรา ปญฺญายิสฺสติ, พฺยาธิ ปญฺญายิสฺสติ, มรณํ ปญฺญายิสฺสตี’’’ติ. ५१. “भिक्खूहो, त्यानंतर राजा बंधुमान यांनी सारथ्याला बोलावून विचारले – ‘मित्रा सारथी, काय राजपुत्र उद्यानात रमले? मित्रा सारथी, काय राजपुत्र उद्यानात प्रसन्न झाले?’ ‘नाही महाराज, राजपुत्र उद्यानात रमले नाहीत; नाही महाराज, राजपुत्र उद्यानात प्रसन्न झाले नाहीत.’ ‘तर मग, मित्रा सारथी, उद्यानाकडे जाताना राजपुत्रांनी काय पाहिले?’ ‘महाराज, उद्यानाकडे जाताना राजपुत्रांनी लोकांचा मोठा समुदाय एकत्र आलेला आणि विविध रंगांच्या वस्त्रांनी सजवलेली पालखी तयार केली जात असलेली पाहिली. ते पाहून त्यांनी मला विचारले – “मित्रा सारथी, हा लोकांचा मोठा समुदाय का एकत्र आला आहे आणि विविध रंगांच्या वस्त्रांनी ही पालखी का तयार केली जात आहे?” “महाराज, हा मृत व्यक्ती (कालवश झालेला) नावाचा प्रकार आहे.” “तर मग, मित्रा सारथी, जेथे तो मृत व्यक्ती आहे, तेथे रथ घेऊन चल.” “होय महाराज,” असे म्हणून मी राजपुत्र विपस्सी यांच्या आज्ञेचे पालन करून जेथे तो मृतदेह होता, तेथे रथ नेला. महाराज, राजपुत्रांनी त्या मृत व्यक्तीला पाहिले आणि मला विचारले – “मित्रा सारथी, हा मृत व्यक्ती म्हणजे काय?” “महाराज, हा मृत व्यक्ती आहे. आता याचे आई-वडील किंवा इतर नातेवाईक याला पाहू शकणार नाहीत आणि हा देखील आपल्या आई-वडिलांना किंवा इतर नातेवाईकांना पाहू शकणार नाही.” “मित्रा सारथी, मग काय मीसुद्धा मरणधर्मी आहे? मरणापासून सुटू शकत नाही का? मलाही महाराज, राणी किंवा इतर नातेवाईक पाहू शकणार नाहीत का? आणि मीसुद्धा महाराज, राणी किंवा इतर नातेवाईकांना पाहू शकणार नाही का?” “महाराज, आपण आणि आम्ही सर्वच मरणधर्मी आहोत, मरणापासून सुटू शकत नाही. आपल्यालाही महाराज, राणी किंवा इतर नातेवाईक पाहू शकणार नाहीत आणि आपणही महाराज, राणी किंवा इतर नातेवाईकांना पाहू शकणार नाही.” “तर मग, मित्रा सारथी, आज उद्यानात जाणे पुरे झाले. येथूनच परत अंतःपुरात चल.” “होय महाराज,” असे म्हणून मी राजपुत्र विपस्सी यांच्या आज्ञेचे पालन करून तेथूनच परत अंतःपुरात आलो. महाराज, अंतःपुरात आल्यावर ते राजपुत्र दुःखी व खिन्न होऊन विचार करू लागले – “अरेरे! या जन्माला (जातीला) धिक्कार असो, कारण जन्मलेल्या प्रत्येकाला वृद्धत्व, व्याधी आणि मृत्यू प्राप्त होणारच!”” ปพฺพชิโต प्रव्रजित ๕๒. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, พนฺธุมสฺส รญฺโญ เอตทโหสิ – ‘มา เหว โข วิปสฺสี กุมาโร น รชฺชํ กาเรสิ, มา เหว วิปสฺสี กุมาโร อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิ, มา เหว เนมิตฺตานํ พฺราหฺมณานํ สจฺจํ อสฺส วจน’นฺติ. อถ โข, ภิกฺขเว, พนฺธุมา ราชา วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ภิยฺโยโสมตฺตาย ปญฺจ กามคุณานิ อุปฏฺฐาเปสิ – ‘ยถา วิปสฺสี กุมาโร รชฺชํ กเรยฺย, ยถา วิปสฺสี กุมาโร น อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพเชยฺย, ยถา เนมิตฺตานํ พฺราหฺมณานํ มิจฺฉา อสฺส วจน’นฺติ. ५२. “भिक्खूहो, त्यानंतर राजा बंधुमान यांच्या मनात असा विचार आला – ‘असे होऊ नये की राजपुत्र विपस्सी राज्यकारभार करणार नाहीत; असे होऊ नये की राजपुत्र विपस्सी गृहत्याग करून अनगारिक (प्रव्रजित) होतील; आणि भविष्य सांगणाऱ्या ब्राह्मणांचे शब्द खरे ठरतील.’ म्हणून, भिक्खूहो, राजा बंधुमान यांनी राजपुत्र विपस्सी यांच्यासाठी पंचकामगुण (पाच प्रकारची इंद्रियसुखे) अधिक प्रमाणात उपलब्ध करून दिली – ‘जेणेकरून राजपुत्र विपस्सी राज्यकारभार करतील, जेणेकरून राजपुत्र विपस्सी गृहत्याग करून अनगारिक होणार नाहीत, आणि भविष्य सांगणाऱ्या ब्राह्मणांचे शब्द खोटे ठरतील.’” ‘‘ตตฺร สุทํ, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิโต สมงฺคีภูโต ปริจาเรติ. อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร พหูนํ วสฺสานํ [Pg.24] พหูนํ วสฺสสตานํ พหูนํ วสฺสสหสฺสานํ อจฺจเยน สารถึ อามนฺเตสิ – ‘โยเชหิ, สมฺม สารถิ, ภทฺทานิ ภทฺทานิ ยานานิ, อุยฺยานภูมึ คจฺฉาม สุภูมิทสฺสนายา’ติ. ‘เอวํ, เทวา’ติ โข, ภิกฺขเว, สารถิ วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ภทฺทานิ ภทฺทานิ ยานานิ โยเชตฺวา วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ปฏิเวเทสิ – ‘ยุตฺตานิ โข เต, เทว, ภทฺทานิ ภทฺทานิ ยานานิ, ยสฺส ทานิ กาลํ มญฺญสี’ติ. อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร ภทฺทํ ภทฺทํ ยานํ อภิรุหิตฺวา ภทฺเทหิ ภทฺเทหิ ยาเนหิ อุยฺยานภูมึ นิยฺยาสิ. “भिक्खूहो, तेथे राजपुत्र विपस्सी त्या पंचकामगुणांनी युक्त व वेढलेले होऊन विलास करू लागले. त्यानंतर, भिक्खूहो, अनेक वर्षे, अनेक शतके, अनेक सहस्र वर्षे उलटून गेल्यावर राजपुत्र विपस्सी यांनी सारथ्याला बोलावून म्हटले – ‘मित्रा सारथी, उत्तम उत्तम रथ तयार कर, आपण सुंदर भूमी पाहण्यासाठी उद्यानात जाऊ या.’ भिक्खूहो, ‘होय महाराज,’ असे म्हणून सारथ्याने राजपुत्र विपस्सी यांच्या आज्ञेचे पालन केले आणि उत्तम उत्तम रथ तयार करून राजपुत्र विपस्सी यांना कळवले – ‘महाराज, आपल्यासाठी उत्तम उत्तम रथ तयार आहेत. आता आपल्याला जाण्यासाठी योग्य वाटेल ती वेळ ठरवावी.’ त्यानंतर, भिक्खूहो, राजपुत्र विपस्सी एका उत्तम रथावर आरूढ होऊन इतर उत्तम रथांसह उद्यानाकडे निघाले.” ๕๓. ‘‘อทฺทสา โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร อุยฺยานภูมึ นิยฺยนฺโต ปุริสํ ภณฺฑุํ ปพฺพชิตํ กาสายวสนํ. ทิสฺวา สารถึ อามนฺเตสิ – ‘อยํ ปน, สมฺม สารถิ, ปุริโส กึกโต? สีสํปิสฺส น ยถา อญฺเญสํ, วตฺถานิปิสฺส น ยถา อญฺเญส’นฺติ? ‘เอโส โข, เทว, ปพฺพชิโต นามา’ติ. ‘กึ ปเนโส, สมฺม สารถิ, ปพฺพชิโต นามา’ติ? ‘เอโส โข, เทว, ปพฺพชิโต นาม สาธุ ธมฺมจริยา สาธุ สมจริยา สาธุ กุสลกิริยา สาธุ ปุญฺญกิริยา สาธุ อวิหึสา สาธุ ภูตานุกมฺปา’ติ. ‘สาธุ โข โส, สมฺม สารถิ, ปพฺพชิโต นาม, สาธุ ธมฺมจริยา สาธุ สมจริยา สาธุ กุสลกิริยา สาธุ ปุญฺญกิริยา สาธุ อวิหึสา สาธุ ภูตานุกมฺปา. เตน หิ, สมฺม สารถิ, เยน โส ปพฺพชิโต เตน รถํ เปเสหี’ติ. ‘เอวํ, เทวา’ติ โข, ภิกฺขเว, สารถิ วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ปฏิสฺสุตฺวา เยน โส ปพฺพชิโต เตน รถํ เปเสสิ. อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร ตํ ปพฺพชิตํ เอตทโวจ – ‘ตฺวํ ปน, สมฺม, กึกโต, สีสมฺปิ เต น ยถา อญฺเญสํ, วตฺถานิปิ เต น ยถา อญฺเญส’นฺติ? ‘อหํ โข, เทว, ปพฺพชิโต นามา’ติ. ‘กึ ปน ตฺวํ, สมฺม, ปพฺพชิโต นามา’ติ? ‘อหํ โข, เทว, ปพฺพชิโต นาม, สาธุ ธมฺมจริยา สาธุ สมจริยา สาธุ กุสลกิริยา สาธุ ปุญฺญกิริยา สาธุ อวิหึสา สาธุ ภูตานุกมฺปา’ติ. ‘สาธุ โข ตฺวํ, สมฺม, ปพฺพชิโต นาม สาธุ ธมฺมจริยา สาธุ สมจริยา สาธุ กุสลกิริยา สาธุ ปุญฺญกิริยา สาธุ อวิหึสา สาธุ ภูตานุกมฺปา’ติ. ५३. “भिक्खूहो, उद्यानाकडे जाताना राजपुत्र विपस्सी यांनी एका मुंडित डोके असलेल्या, काषाय वस्त्र परिधान केलेल्या प्रव्रजित पुरुषाला पाहिले. त्याला पाहून त्यांनी सारथ्याला विचारले – ‘मित्रा सारथी, हा माणूस असा का आहे? याचे डोकेही इतरांसारखे नाही आणि याचे कपडेही इतरांसारखे नाहीत.’ ‘महाराज, हा प्रव्रजित नावाचा प्रकार आहे.’ ‘मित्रा सारथी, प्रव्रजित म्हणजे काय?’ ‘महाराज, प्रव्रजित म्हणजे जो धर्माचे आचरण करणे उत्तम मानतो, समतेचे आचरण करणे उत्तम मानतो, कुशल कर्म करणे उत्तम मानतो, पुण्य कर्म करणे उत्तम मानतो, अहिंसेचे पालन करणे उत्तम मानतो आणि प्राणिमात्रांवर अनुकंपा करणे उत्तम मानतो.’ ‘मित्रा सारथी, तो प्रव्रजित खरोखरच उत्तम आहे; धर्माचे आचरण करणे उत्तम आहे, समतेचे आचरण करणे उत्तम आहे, कुशल कर्म करणे उत्तम आहे, पुण्य कर्म करणे उत्तम आहे, अहिंसेचे पालन करणे उत्तम आहे आणि प्राणिमात्रांवर अनुकंपा करणे उत्तम आहे. तर मग, मित्रा सारथी, जेथे तो प्रव्रजित आहे, तेथे रथ घेऊन चल.’ भिक्खूहो, ‘होय महाराज,’ असे म्हणून सारथ्याने राजपुत्र विपस्सी यांच्या आज्ञेचे पालन केले आणि जेथे तो प्रव्रजित होता, तेथे रथ नेला. त्यानंतर, भिक्खूहो, राजपुत्र विपस्सी यांनी त्या प्रव्रजिताला विचारले – ‘मित्रा, तू असा का आहेस? तुझे डोकेही इतरांसारखे नाही आणि तुझे कपडेही इतरांसारखे नाहीत.’ ‘महाराज, मी प्रव्रजित आहे.’ ‘मित्रा, प्रव्रजित म्हणजे काय?’ ‘महाराज, प्रव्रजित म्हणजे मी जो धर्माचे आचरण करणे उत्तम मानतो, समतेचे आचरण करणे उत्तम मानतो, कुशल कर्म करणे उत्तम मानतो, पुण्य कर्म करणे उत्तम मानतो, अहिंसेचे पालन करणे उत्तम मानतो आणि प्राणिमात्रांवर अनुकंपा करणे उत्तम मानतो.’ ‘मित्रा, तू प्रव्रजित म्हणून खरोखरच उत्तम आहेस; धर्माचे आचरण करणे उत्तम आहे, समतेचे आचरण करणे उत्तम आहे, कुशल कर्म करणे उत्तम आहे, पुण्य कर्म करणे उत्तम आहे, अहिंसेचे पालन करणे उत्तम आहे आणि प्राणिमात्रांवर अनुकंपा करणे उत्तम आहे.’” โพธิสตฺตปพฺพชฺชา बोधिसत्त्व प्रव्रज्या ๕๔. ‘‘อถ [Pg.25] โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี กุมาโร สารถึ อามนฺเตสิ – ‘เตน หิ, สมฺม สารถิ, รถํ อาทาย อิโตว อนฺเตปุรํ ปจฺจนิยฺยาหิ. อหํ ปน อิเธว เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาเทตฺวา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสามี’ติ. ‘เอวํ, เทวา’ติ โข, ภิกฺขเว, สารถิ วิปสฺสิสฺส กุมารสฺส ปฏิสฺสุตฺวา รถํ อาทาย ตโตว อนฺเตปุรํ ปจฺจนิยฺยาสิ. วิปสฺสี ปน กุมาโร ตตฺเถว เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาเทตฺวา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิ. ५४. भिक्खूहो, त्यानंतर विपस्सी राजकुमारांनी सारथीला बोलावून म्हटले – 'मित्रा सारथी, असे असेल तर तू रथ घेऊन येथूनच राजवाड्यात परत जा. मी मात्र येथेच केस आणि दाढी काढून, काषाय वस्त्रे परिधान करून, गृहत्याग करून अनगारिक प्रव्रज्या ग्रहण करीन.' भिक्खूहो, 'तसेच असो, देव!' असे म्हणून सारथीने विपस्सी राजकुमारांच्या शब्दांचे पालन केले आणि रथ घेऊन तो तेथूनच राजवाड्यात परत गेला. विपस्सी राजकुमारांनी मात्र तेथेच केस आणि दाढी काढून, काषाय वस्त्रे परिधान करून, गृहत्याग करून अनगारिक प्रव्रज्या ग्रहण केली. มหาชนกายอนุปพฺพชฺชา महाजनसमुदायाची अनुप्रव्रज्या ๕๕. ‘‘อสฺโสสิ โข, ภิกฺขเว, พนฺธุมติยา ราชธานิยา มหาชนกาโย จตุราสีติ ปาณสหสฺสานิ – ‘วิปสฺสี กิร กุมาโร เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาเทตฺวา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิโต’ติ. สุตฺวาน เตสํ เอตทโหสิ – ‘น หิ นูน โส โอรโก ธมฺมวินโย, น สา โอรกา ปพฺพชฺชา, ยตฺถ วิปสฺสี กุมาโร เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาเทตฺวา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิโต. วิปสฺสีปิ นาม กุมาโร เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาเทตฺวา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสติ, กิมงฺคํ ปน มย’นฺติ. ५५. भिक्खूहो, बंधुमती राजधानीतील चौऱ्याऐंशी हजार लोकांच्या महाजनसमुदायाने ऐकले की – 'विपस्सी राजकुमारांनी केस आणि दाढी काढून, काषाय वस्त्रे परिधान करून, गृहत्याग करून अनगारिक प्रव्रज्या घेतली आहे.' हे ऐकून त्यांच्या मनात असा विचार आला – 'तो धम्म आणि विनय नक्कीच सामान्य नसणार, ती प्रव्रज्याही सामान्य नसणार, ज्यामध्ये विपस्सी राजकुमारांनी केस आणि दाढी काढून, काषाय वस्त्रे परिधान करून, गृहत्याग करून अनगारिक प्रव्रज्या घेतली आहे. जर विपस्सी राजकुमार केस आणि दाढी काढून, काषाय वस्त्रे परिधान करून, गृहत्याग करून अनगारिक प्रव्रज्या घेऊ शकतात, तर मग आपण का नाही?' ‘‘อถ โข, โส ภิกฺขเว, มหาชนกาโย จตุราสีติ ปาณสหสฺสานิ เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาเทตฺวา วิปสฺสึ โพธิสตฺตํ อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิตํ อนุปพฺพชึสุ. ตาย สุทํ, ภิกฺขเว, ปริสาย ปริวุโต วิปสฺสี โพธิสตฺโต คามนิคมชนปทราชธานีสุ จาริกํ จรติ. भिक्खूहो, त्यानंतर त्या चौऱ्याऐंशी हजार लोकांच्या महाजनसमुदायाने केस आणि दाढी काढून, काषाय वस्त्रे परिधान करून, गृहत्याग करून अनगारिक प्रव्रज्या घेतलेल्या विपस्सी बोधिसत्त्वांचे अनुकरण करत अनुप्रव्रज्या घेतली. भिक्खूहो, त्या परिषदेने वेढलेले विपस्सी बोधिसत्त्व गावे, नगरे, जनपदे आणि राजधानीत चारिका करू लागले. ๕๖. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘น โข เมตํ ปติรูปํ โยหํ อากิณฺโณ วิหรามิ, ยํนูนาหํ เอโก คณมฺหา วูปกฏฺโฐ วิหเรยฺย’นฺติ. อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี โพธิสตฺโต อปเรน สมเยน เอโก [Pg.26] คณมฺหา วูปกฏฺโฐ วิหาสิ, อญฺเญเนว ตานิ จตุราสีติ ปพฺพชิตสหสฺสานิ อคมํสุ, อญฺเญน มคฺเคน วิปสฺสี โพธิสตฺโต. ५६. भिक्खूहो, त्यानंतर एकांतात ध्यानस्थ बसलेल्या विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला – 'माझ्यासाठी अशा जनसमुदायात राहणे योग्य नाही. मी या समूहापासून दूर राहून एकटेच विहार केला तर किती बरे होईल!' भिक्खूहो, त्यानंतर काही काळाने विपस्सी बोधिसत्त्व समूहापासून दूर होऊन एकटेच विहार करू लागले. ते चौऱ्याऐंशी हजार प्रव्रजित एका मार्गाने गेले आणि विपस्सी बोधिसत्त्व दुसऱ्या मार्गाने गेले. โพธิสตฺตอภินิเวโส बोधिसत्त्वांचे चिंतन ๕๗. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส วาสูปคตสฺส รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘กิจฺฉํ วตายํ โลโก อาปนฺโน, ชายติ จ ชียติ จ มียติ จ จวติ จ อุปปชฺชติ จ, อถ จ ปนิมสฺส ทุกฺขสฺส นิสฺสรณํ นปฺปชานาติ ชรามรณสฺส, กุทาสฺสุ นาม อิมสฺส ทุกฺขสฺส นิสฺสรณํ ปญฺญายิสฺสติ ชรามรณสฺสา’ติ? ५७. भिक्खूहो, त्यानंतर मुक्कामास असलेल्या, एकांतात ध्यानस्थ बसलेल्या विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला – 'हा संसार खरोखरच अत्यंत कष्टाला प्राप्त झाला आहे; येथे जन्म होतो, जीर्णता येते, मृत्यू होतो, च्युती होते आणि पुन्हा जन्म होतो. तरीही या जरामरणरूपी दुःखातून सुटकेचा मार्ग कोणाला ठाऊक नाही. या जरामरणरूपी दुःखातून सुटकेचा मार्ग कधी बरं दिसून येईल?' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข สติ ชรามรณํ โหติ, กึปจฺจยา ชรามรณ’นฺติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ ปญฺญาย อภิสมโย – ‘ชาติยา โข สติ ชรามรณํ โหติ, ชาติปจฺจยา ชรามรณ’นฺติ. भिक्खूहो, त्यानंतर विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला – 'काय अस्तित्वात असताना जरामरण होते? जरामरण कशामुळे होते?' भिक्खूहो, त्यानंतर विपस्सी बोधिसत्त्वांना योग्य विचार केल्यामुळे प्रज्ञेने असा बोध झाला – 'जन्म अस्तित्वात असताना जरामरण होते, जन्माच्या प्रत्ययामुळे जरामरण होते.' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข สติ ชาติ โหติ, กึปจฺจยา ชาตี’ติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ ปญฺญาย อภิสมโย – ‘ภเว โข สติ ชาติ โหติ, ภวปจฺจยา ชาตี’ติ. भिक्खूहो, त्यानंतर विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला – 'काय अस्तित्वात असताना जन्म होतो? जन्म कशामुळे होतो?' भिक्खूहो, त्यानंतर विपस्सी बोधिसत्त्वांना योग्य विचार केल्यामुळे प्रज्ञेने असा बोध झाला – 'भव अस्तित्वात असताना जन्म होतो, भवाच्या प्रत्ययामुळे जन्म होतो.' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข สติ ภโว โหติ, กึปจฺจยา ภโว’ติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ ปญฺญาย อภิสมโย – ‘อุปาทาเน โข สติ ภโว โหติ, อุปาทานปจฺจยา ภโว’ติ. भिक्खूहो, त्यानंतर विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला – 'काय अस्तित्वात असताना भव होतो? भव कशामुळे होतो?' भिक्खूहो, त्यानंतर विपस्सी बोधिसत्त्वांना योग्य विचार केल्यामुळे प्रज्ञेने असा बोध झाला – 'उपादान अस्तित्वात असताना भव होतो, उपादानाच्या प्रत्ययामुळे भव होतो.' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข สติ อุปาทานํ โหติ, กึปจฺจยา อุปาทาน’นฺติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ ปญฺญาย อภิสมโย – ‘ตณฺหาย โข สติ อุปาทานํ โหติ, ตณฺหาปจฺจยา อุปาทาน’นฺติ. भिक्खूहो, त्यानंतर विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला – 'काय अस्तित्वात असताना उपादान होते? उपादान कशामुळे होते?' भिक्खूहो, त्यानंतर विपस्सी बोधिसत्त्वांना योग्य विचार केल्यामुळे प्रज्ञेने असा बोध झाला – 'तण्हा अस्तित्वात असताना उपादान होते, तण्हेच्या प्रत्ययामुळे उपादान होते.' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข สติ ตณฺหา โหติ, กึปจฺจยา ตณฺหา’ติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส [Pg.27] โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ ปญฺญาย อภิสมโย – ‘เวทนาย โข สติ ตณฺหา โหติ, เวทนาปจฺจยา ตณฺหา’ติ. भिक्खूहो, त्यानंतर विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला – 'काय अस्तित्वात असताना तण्हा होते? तण्हा कशामुळे होते?' भिक्खूहो, त्यानंतर विपस्सी बोधिसत्त्वांना योग्य विचार केल्यामुळे प्रज्ञेने असा बोध झाला – 'वेदना अस्तित्वात असताना तण्हा होते, वेदनेच्या प्रत्ययामुळे तण्हा होते.' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข สติ เวทนา โหติ, กึปจฺจยา เวทนา’ติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ ปญฺญาย อภิสมโย – ‘ผสฺเส โข สติ เวทนา โหติ, ผสฺสปจฺจยา เวทนา’ติ. भिक्खूहो, त्यानंतर विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला – 'काय अस्तित्वात असताना वेदना होते? वेदना कशामुळे होते?' भिक्खूहो, त्यानंतर विपस्सी बोधिसत्त्वांना योग्य विचार केल्यामुळे प्रज्ञेने असा बोध झाला – 'फस्स अस्तित्वात असताना वेदना होते, फस्साच्या प्रत्ययामुळे वेदना होते.' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข สติ ผสฺโส โหติ, กึปจฺจยา ผสฺโส’ติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ ปญฺญาย อภิสมโย – ‘สฬายตเน โข สติ ผสฺโส โหติ, สฬายตนปจฺจยา ผสฺโส’ติ. भिक्खूहो, त्यानंतर विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला – 'काय अस्तित्वात असताना फस्स होतो? फस्स कशामुळे होतो?' भिक्खूहो, त्यानंतर विपस्सी बोधिसत्त्वांना योग्य विचार केल्यामुळे प्रज्ञेने असा बोध झाला – 'सळायतन अस्तित्वात असताना फस्स होतो, सळायतनाच्या प्रत्ययामुळे फस्स होतो.' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข สติ สฬายตนํ โหติ, กึปจฺจยา สฬายตน’นฺติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ ปญฺญาย อภิสมโย – ‘นามรูเป โข สติ สฬายตนํ โหติ, นามรูปปจฺจยา สฬายตน’นฺติ. भिक्खूहो, त्यानंतर विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला – 'काय अस्तित्वात असताना सळायतन होते? सळायतन कशामुळे होते?' भिक्खूहो, त्यानंतर विपस्सी बोधिसत्त्वांना योग्य विचार केल्यामुळे प्रज्ञेने असा बोध झाला – 'नामरूप अस्तित्वात असताना सळायतन होते, नामरूपाच्या प्रत्ययामुळे सळायतन होते.' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข สติ นามรูปํ โหติ, กึปจฺจยา นามรูป’นฺติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ ปญฺญาย อภิสมโย – ‘วิญฺญาเณ โข สติ นามรูปํ โหติ, วิญฺญาณปจฺจยา นามรูป’นฺติ. भिक्खूहो, त्यानंतर विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला – 'काय अस्तित्वात असताना नामरूप होते? नामरूप कशामुळे होते?' भिक्खूहो, त्यानंतर विपस्सी बोधिसत्त्वांना योग्य विचार केल्यामुळे प्रज्ञेने असा बोध झाला – 'विञ्ञाण अस्तित्वात असताना नामरूप होते, विञ्ञाणाच्या प्रत्ययामुळे नामरूप होते.' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข สติ วิญฺญาณํ โหติ, กึปจฺจยา วิญฺญาณ’นฺติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ ปญฺญาย อภิสมโย – ‘นามรูเป โข สติ วิญฺญาณํ โหติ, นามรูปปจฺจยา วิญฺญาณ’นฺติ. त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला— 'काय अस्तित्वात असताना विज्ञान उत्पन्न होते? कशाच्या प्रत्ययामुळे (कारणामुळे) विज्ञान उत्पन्न होते?' त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या योनिसो मनसिकारामुळे (योग्य मनन-चिंतनामुळे) प्रज्ञेने हा साक्षात्कार झाला— 'नामरूप अस्तित्वात असताना विज्ञान उत्पन्न होते, नामरूप-प्रत्ययामुळे विज्ञान उत्पन्न होते.' ๕๘. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘ปจฺจุทาวตฺตติ โข อิทํ วิญฺญาณํ นามรูปมฺหา, นาปรํ คจฺฉติ. เอตฺตาวตา ชาเยถ [Pg.28] วา ชิยฺเยถ วา มิยฺเยถ วา จเวถ วา อุปปชฺเชถ วา, ยทิทํ นามรูปปจฺจยา วิญฺญาณํ, วิญฺญาณปจฺจยา นามรูปํ, นามรูปปจฺจยา สฬายตนํ, สฬายตนปจฺจยา ผสฺโส, ผสฺสปจฺจยา เวทนา, เวทนาปจฺจยา ตณฺหา, ตณฺหาปจฺจยา อุปาทานํ, อุปาทานปจฺจยา ภโว, ภวปจฺจยา ชาติ, ชาติปจฺจยา ชรามรณํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา สมฺภวนฺติ. เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส สมุทโย โหติ’. ५८. त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला— 'हे विज्ञान नामरूपापासून मागे फिरते, त्यापलीकडे जात नाही. एवढ्या मर्यादेतच जन्म घेणे, जीर्ण होणे (वृद्ध होणे), मरणे, च्युत होणे (मृत्यू पावणे) किंवा पुन्हा जन्म घेणे घडते; म्हणजेच— नामरूपाच्या प्रत्ययामुळे विज्ञान उत्पन्न होते, विज्ञानाच्या प्रत्ययामुळे नामरूप उत्पन्न होते, नामरूपाच्या प्रत्ययामुळे षडायतन उत्पन्न होते, षडायतनाच्या प्रत्ययामुळे स्पर्श उत्पन्न होतो, स्पर्शाच्या प्रत्ययामुळे वेदना उत्पन्न होते, वेदनेच्या प्रत्ययामुळे तृष्णा उत्पन्न होते, तृष्णेच्या प्रत्ययामुळे उपादान उत्पन्न होते, उपादानाच्या प्रत्ययामुळे भव उत्पन्न होतो, भवाच्या प्रत्ययामुळे जाती (जन्म) उत्पन्न होते, आणि जातीच्या प्रत्ययामुळे जरा-मरण, शोक, परिदेव (आक्रोश), दुःख, दोमनस्य (मानसिक दुःख) आणि उपायास (हताशपणा) उत्पन्न होतात. अशा प्रकारे या संपूर्ण दुःखसमूहाचा उदय होतो.' ๕๙. ‘‘‘สมุทโย สมุทโย’ติ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุ ธมฺเมสุ จกฺขุํ อุทปาทิ, ญาณํ อุทปาทิ, ปญฺญา อุทปาทิ, วิชฺชา อุทปาทิ, อาโลโก อุทปาทิ. ५९. 'उदय, उदय' असा विचार करत असताना, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांना पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या धर्मांमध्ये चक्षू (ज्ञानचक्षू) उत्पन्न झाला, ज्ञान उत्पन्न झाले, प्रज्ञा उत्पन्न झाली, विद्या उत्पन्न झाली, प्रकाश उत्पन्न झाला. ๖๐. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข อสติ ชรามรณํ น โหติ, กิสฺส นิโรธา ชรามรณนิโรโธ’ติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ ปญฺญาย อภิสมโย – ‘ชาติยา โข อสติ ชรามรณํ น โหติ, ชาตินิโรธา ชรามรณนิโรโธ’ติ. ६०. त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला— 'काय नसताना जरा-मरण होत नाही? कशाच्या निरोधाने जरा-मरणाचा निरोध होतो?' त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या योनिसो मनसिकारामुळे प्रज्ञेने हा साक्षात्कार झाला— 'जाती नसताना जरा-मरण होत नाही, जातीच्या निरोधाने जरा-मरणाचा निरोध होतो.' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข อสติ ชาติ น โหติ, กิสฺส นิโรธา ชาตินิโรโธ’ติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ ปญฺญาย อภิสมโย – ‘ภเว โข อสติ ชาติ น โหติ, ภวนิโรธา ชาตินิโรโธ’ติ. त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला— 'काय नसताना जाती होत नाही? कशाच्या निरोधाने जातीचा निरोध होतो?' त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या योनिसो मनसिकारामुळे प्रज्ञेने हा साक्षात्कार झाला— 'भव नसताना जाती होत नाही, भवाच्या निरोधाने जातीचा निरोध होतो.' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข อสติ ภโว น โหติ, กิสฺส นิโรธา ภวนิโรโธ’ติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ ปญฺญาย อภิสมโย – ‘อุปาทาเน โข อสติ ภโว น โหติ, อุปาทานนิโรธา ภวนิโรโธ’ติ. त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला— 'काय नसताना भव होत नाही? कशाच्या निरोधाने भवाचा निरोध होतो?' त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या योनिसो मनसिकारामुळे प्रज्ञेने हा साक्षात्कार झाला— 'उपादान नसताना भव होत नाही, उपादानाच्या निरोधाने भवाचा निरोध होतो.' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข อสติ อุปาทานํ น โหติ, กิสฺส นิโรธา อุปาทานนิโรโธ’ติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ [Pg.29] ปญฺญาย อภิสมโย – ‘ตณฺหาย โข อสติ อุปาทานํ น โหติ, ตณฺหานิโรธา อุปาทานนิโรโธ’ติ. त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला— 'काय नसताना उपादान होत नाही? कशाच्या निरोधाने उपादानाचा निरोध होतो?' त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या योनिसो मनसिकारामुळे प्रज्ञेने हा साक्षात्कार झाला— 'तृष्णा नसताना उपादान होत नाही, तृष्णेच्या निरोधाने उपादानाचा निरोध होतो.' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข อสติ ตณฺหา น โหติ, กิสฺส นิโรธา ตณฺหานิโรโธ’ติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ ปญฺญาย อภิสมโย – ‘เวทนาย โข อสติ ตณฺหา น โหติ, เวทนานิโรธา ตณฺหานิโรโธ’ติ. त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला— 'काय नसताना तृष्णा होत नाही? कशाच्या निरोधाने तृष्णेचा निरोध होतो?' त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या योनिसो मनसिकारामुळे प्रज्ञेने हा साक्षात्कार झाला— 'वेदना नसताना तृष्णा होत नाही, वेदनेच्या निरोधाने तृष्णेचा निरोध होतो.' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข อสติ เวทนา น โหติ, กิสฺส นิโรธา เวทนานิโรโธ’ติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ ปญฺญาย อภิสมโย – ‘ผสฺเส โข อสติ เวทนา น โหติ, ผสฺสนิโรธา เวทนานิโรโธ’ติ. त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला— 'काय नसताना वेदना होत नाही? कशाच्या निरोधाने वेदनेचा निरोध होतो?' त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या योनिसो मनसिकारामुळे प्रज्ञेने हा साक्षात्कार झाला— 'स्पर्श नसताना वेदना होत नाही, स्पर्शाच्या निरोधाने वेदनेचा निरोध होतो.' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข อสติ ผสฺโส น โหติ, กิสฺส นิโรธา ผสฺสนิโรโธ’ติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ ปญฺญาย อภิสมโย – ‘สฬายตเน โข อสติ ผสฺโส น โหติ, สฬายตนนิโรธา ผสฺสนิโรโธ’ติ. त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला— 'काय नसताना स्पर्श होत नाही? कशाच्या निरोधाने स्पर्शाचा निरोध होतो?' त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या योनिसो मनसिकारामुळे प्रज्ञेने हा साक्षात्कार झाला— 'षडायतन नसताना स्पर्श होत नाही, षडायतनाच्या निरोधाने स्पर्शाचा निरोध होतो.' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข อสติ สฬายตนํ น โหติ, กิสฺส นิโรธา สฬายตนนิโรโธ’ติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ ปญฺญาย อภิสมโย – ‘นามรูเป โข อสติ สฬายตนํ น โหติ, นามรูปนิโรธา สฬายตนนิโรโธ’ติ. त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला— 'काय नसताना षडायतन होत नाही? कशाच्या निरोधाने षडायतनाचा निरोध होतो?' त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या योनिसो मनसिकारामुळे प्रज्ञेने हा साक्षात्कार झाला— 'नामरूप नसताना षडायतन होत नाही, नामरूपाच्या निरोधाने षडायतनाचा निरोध होतो.' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข อสติ นามรูปํ น โหติ, กิสฺส นิโรธา นามรูปนิโรโธ’ติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ ปญฺญาย อภิสมโย – ‘วิญฺญาเณ โข อสติ นามรูปํ น โหติ, วิญฺญาณนิโรธา นามรูปนิโรโธ’ติ. त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला— 'काय नसताना नामरूप होत नाही? कशाच्या निरोधाने नामरूपाचा निरोध होतो?' त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या योनिसो मनसिकारामुळे प्रज्ञेने हा साक्षात्कार झाला— 'विज्ञान नसताना नामरूप होत नाही, विज्ञानाच्या निरोधाने नामरूपाचा निरोध होतो.' ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘กิมฺหิ นุ โข อสติ วิญฺญาณํ น โหติ, กิสฺส นิโรธา วิญฺญาณนิโรโธ’ติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส โยนิโส มนสิการา อหุ [Pg.30] ปญฺญาย อภิสมโย – ‘นามรูเป โข อสติ วิญฺญาณํ น โหติ, นามรูปนิโรธา วิญฺญาณนิโรโธ’ติ. त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला— 'काय नसताना विज्ञान होत नाही? कशाच्या निरोधाने विज्ञानाचा निरोध होतो?' त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या योनिसो मनसिकारामुळे प्रज्ञेने हा साक्षात्कार झाला— 'नामरूप नसताना विज्ञान होत नाही, नामरूपाच्या निरोधाने विज्ञानाचा निरोध होतो.' ๖๑. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส เอตทโหสิ – ‘อธิคโต โข มฺยายํ มคฺโค สมฺโพธาย ยทิทํ – นามรูปนิโรธา วิญฺญาณนิโรโธ, วิญฺญาณนิโรธา นามรูปนิโรโธ, นามรูปนิโรธา สฬายตนนิโรโธ, สฬายตนนิโรธา ผสฺสนิโรโธ, ผสฺสนิโรธา เวทนานิโรโธ, เวทนานิโรธา ตณฺหานิโรโธ, ตณฺหานิโรธา อุปาทานนิโรโธ, อุปาทานนิโรธา ภวนิโรโธ, ภวนิโรธา ชาตินิโรโธ, ชาตินิโรธา ชรามรณํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา นิรุชฺฌนฺติ. เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส นิโรโธ โหติ’. ६१. त्यानंतर, भिक्खूंनो, विपस्सी बोधिसत्त्वांच्या मनात असा विचार आला— 'मला संबोधीसाठी (सत्याच्या साक्षात्कारासाठी) हा मार्ग सापडला आहे, जो असा आहे— नामरूपाच्या निरोधाने विज्ञानाचा निरोध होतो; विज्ञानाच्या निरोधाने नामरूपाचा निरोध होतो; नामरूपाच्या निरोधाने षडायतनाचा निरोध होतो; षडायतनाच्या निरोधाने स्पर्शाचा निरोध होतो; स्पर्शाच्या निरोधाने वेदनेचा निरोध होतो; वेदनेच्या निरोधाने तृष्णेचा निरोध होतो; तृष्णेच्या निरोधाने उपादानाचा निरोध होतो; उपादानाच्या निरोधाने भवाचा निरोध होतो; भवाच्या निरोधाने जातीचा निरोध होतो; आणि जातीच्या निरोधाने जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, दोमनस्य आणि उपायास निरुद्ध होतात. अशा प्रकारे या संपूर्ण दुःखसमूहाचा निरोध होतो.' ๖๒. ‘‘‘นิโรโธ นิโรโธ’ติ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส โพธิสตฺตสฺส ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุ ธมฺเมสุ จกฺขุํ อุทปาทิ, ญาณํ อุทปาทิ, ปญฺญา อุทปาทิ, วิชฺชา อุทปาทิ, อาโลโก อุทปาทิ. ६२. भिक्खूहो, 'निरोध, निरोध' असा विचार करत असताना, विपस्सी बोधिसत्त्वांना पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या धर्मांविषयी चक्षू उत्पन्न झाला, ज्ञान उत्पन्न झाले, प्रज्ञा उत्पन्न झाली, विद्या उत्पन्न झाली, प्रकाश उत्पन्न झाला. ๖๓. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี โพธิสตฺโต อปเรน สมเยน ปญฺจสุ อุปาทานกฺขนฺเธสุ อุทยพฺพยานุปสฺสี วิหาสิ – ‘อิติ รูปํ, อิติ รูปสฺส สมุทโย, อิติ รูปสฺส อตฺถงฺคโม; อิติ เวทนา, อิติ เวทนาย สมุทโย, อิติ เวทนาย อตฺถงฺคโม; อิติ สญฺญา, อิติ สญฺญาย สมุทโย, อิติ สญฺญาย อตฺถงฺคโม; อิติ สงฺขารา, อิติ สงฺขารานํ สมุทโย, อิติ สงฺขารานํ อตฺถงฺคโม; อิติ วิญฺญาณํ, อิติ วิญฺญาณสฺส สมุทโย, อิติ วิญฺญาณสฺส อตฺถงฺคโม’ติ, ตสฺส ปญฺจสุ อุปาทานกฺขนฺเธสุ อุทยพฺพยานุปสฺสิโน วิหรโต น จิรสฺเสว อนุปาทาย อาสเวหิ จิตฺตํ วิมุจฺจี’’ติ. ६३. त्यानंतर, भिक्खूहो, काही काळानंतर विपस्सी बोधिसत्त्व पाच उपादानस्कंधांच्या उदय आणि अस्त (उत्पत्ती आणि विनाश) यांचे अनुदर्शन करत विहरत राहिले – 'असे रूप आहे, असा रूपाचा उदय आहे, असा रूपाचा अस्त आहे; अशी वेदना आहे, असा वेदनेचा उदय आहे, असा वेदनेचा अस्त आहे; अशी संज्ञा आहे, असा संज्ञेचा उदय आहे, असा संज्ञेचा अस्त आहे; असे संस्कार आहेत, असा संस्कारांचा उदय आहे, असा संस्कारांचा अस्त आहे; असे विज्ञान आहे, असा विज्ञानाचा उदय आहे, असा विज्ञानाचा अस्त आहे.' अशा प्रकारे पाच उपादानस्कंधांच्या उदय-अस्ताचे अनुदर्शन करत विहरत असताना, फार काळ न लागता, उपादानरहित होऊन त्यांचे चित्त आसवांपासून मुक्त झाले. ทุติยภาณวาโร. दुसरा भाणवार समाप्त. พฺรหฺมยาจนกถา ब्रह्मयाचना कथा ๖๔. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เอตทโหสิ – ‘ยํนูนาหํ ธมฺมํ เทเสยฺย’นฺติ. อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส [Pg.31] ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เอตทโหสิ – ‘อธิคโต โข มฺยายํ ธมฺโม คมฺภีโร ทุทฺทโส ทุรนุโพโธ สนฺโต ปณีโต อตกฺกาวจโร นิปุโณ ปณฺฑิตเวทนีโย. อาลยรามา โข ปนายํ ปชา อาลยรตา อาลยสมฺมุทิตา. อาลยรามาย โข ปน ปชาย อาลยรตาย อาลยสมฺมุทิตาย ทุทฺทสํ อิทํ ฐานํ ยทิทํ อิทปฺปจฺจยตาปฏิจฺจสมุปฺปาโท. อิทมฺปิ โข ฐานํ ทุทฺทสํ ยทิทํ สพฺพสงฺขารสมโถ สพฺพูปธิปฏินิสฺสคฺโค ตณฺหากฺขโย วิราโค นิโรโธ นิพฺพานํ. อหญฺเจว โข ปน ธมฺมํ เทเสยฺยํ, ปเร จ เม น อาชาเนยฺยุํ; โส มมสฺส กิลมโถ, สา มมสฺส วิเหสา’ติ. ६४. त्यानंतर, भिक्खूहो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांच्या मनात असा विचार आला – 'मी आता धम्म उपदेश करावा का?' त्यानंतर, भिक्खूहो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांच्या मनात पुन्हा असा विचार आला – 'मी जो हा धम्म प्राप्त केला आहे, तो अत्यंत गंभीर, दुर्दर्शक (पाहण्यास कठीण), दुरनुबोध (समजण्यास कठीण), शांत, प्रणीत (उत्कृष्ट), अतर्कावचर (तर्काच्या पलीकडचा), निपुण आणि पंडितांनाच समजण्याजोगा आहे. परंतु ही प्रजा तर आळयात (आसक्तीत) रमणारी, आळयात गढलेली आणि आळयातच आनंद मानणारी आहे. अशा प्रकारे आळयात रमणाऱ्या, आळयात गढलेल्या आणि आळयातच आनंद मानणाऱ्या प्रजेला हे स्थान समजणे कठीण आहे, म्हणजेच 'इदप्पच्चयता-पटिच्चसमुप्पाद' (प्रतीत्यसमुत्पाद). तसेच हे स्थान देखील समजण्यास अत्यंत कठीण आहे, म्हणजेच सर्व संस्कारांचे शमन, सर्व उपाधींचा त्याग, तृष्णेचा क्षय, विराग, निरोध आणि निब्बान (निर्वाण). जर मी धम्माचा उपदेश केला आणि इतरांना तो समजला नाही, तर तो केवळ माझा थकवा आणि माझा त्रास ठरेल.' ๖๕. ‘‘อปิสฺสุ, ภิกฺขเว, วิปสฺสึ ภควนฺตํ อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธํ อิมา อนจฺฉริยา คาถาโย ปฏิภํสุ ปุพฺเพ อสฺสุตปุพฺพา – ६५. शिवाय, भिक्खूहो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांना पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या या आश्चर्यकारक गाथा स्फुरल्या – ‘กิจฺเฉน เม อธิคตํ, หลํ ทานิ ปกาสิตุํ; ราคโทสปเรเตหิ, นายํ ธมฺโม สุสมฺพุโธ. 'मी मोठ्या कष्टाने जो धम्म प्राप्त केला आहे, तो आता प्रकट करणे योग्य नाही; कारण राग आणि द्वेषाने ग्रासलेल्या लोकांना हा धम्म सहज समजणारा नाही.' ‘ปฏิโสตคามึ นิปุณํ, คมฺภีรํ ทุทฺทสํ อณุํ; ราครตฺตา น ทกฺขนฺติ, ตโมขนฺเธน อาวุฏา’ติ. 'प्रवाहविरुद्ध जाणारा (प्रतिस्रोतगामी), निपुण, गंभीर, दुर्दर्शक आणि सूक्ष्म असलेला हा धम्म रागाने अंध झालेले आणि अज्ञानाच्या अंधकाराने वेढलेले लोक पाहू शकणार नाहीत.' ‘‘อิติห, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ปฏิสญฺจิกฺขโต อปฺโปสฺสุกฺกตาย จิตฺตํ นมิ, โน ธมฺมเทสนาย. अशा प्रकारे, भिक्खूहो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांनी विचार केला असता, त्यांचे चित्त धम्म उपदेश करण्याऐवजी उदासीनतेकडे वळले, धम्म उपदेशाकडे नाही. ๖๖. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, อญฺญตรสฺส มหาพฺรหฺมุโน วิปสฺสิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย เอตทโหสิ – ‘นสฺสติ วต โภ โลโก, วินสฺสติ วต โภ โลโก, ยตฺร หิ นาม วิปสฺสิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อปฺโปสฺสุกฺกตาย จิตฺตํ นมติ, โน ธมฺมเทสนายา’ติ. อถ โข โส, ภิกฺขเว, มหาพฺรหฺมา เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย, ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย; เอวเมว พฺรหฺมโลเก อนฺตรหิโต วิปสฺสิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ปุรโต ปาตุรโหสิ. อถ โข โส, ภิกฺขเว, มหาพฺรหฺมา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา ทกฺขิณํ ชาณุมณฺฑลํ ปถวิยํ [Pg.32] นิหนฺตฺวา เยน วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา วิปสฺสึ ภควนฺตํ อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธํ เอตทโวจ – ‘เทเสตุ, ภนฺเต, ภควา ธมฺมํ, เทเสตุ สุคโต ธมฺมํ, สนฺติ สตฺตา อปฺปรชกฺขชาติกา; อสฺสวนตา ธมฺมสฺส ปริหายนฺติ, ภวิสฺสนฺติ ธมฺมสฺส อญฺญาตาโร’ติ. ६६. त्यानंतर, भिक्खूहो, एका महाब्रह्मदेवाने आपल्या चित्ताने अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांच्या चित्तातील हा विचार जाणून घेतला आणि त्याच्या मनात आले – 'अरेरे! हा लोक नष्ट होणार! अरेरे! हा लोक पूर्णपणे नष्ट होणार! कारण अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांचे चित्त धम्म उपदेश करण्याऐवजी उदासीनतेकडे वळत आहे, धम्म उपदेशाकडे नाही.' मग, भिक्खूहो, तो महाब्रह्मदेव – ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपला दुमडलेला हात पसरावा किंवा पसरलेला हात दुमडावा, त्याप्रमाणे – ब्रह्मलोकातून अंतर्धान पावला आणि भगवान विपस्सी यांच्यासमोर प्रकट झाला. त्यानंतर, भिक्खूहो, त्या महाब्रह्मदेवाने आपले उपरणे (उत्तरासंग) एका खांद्यावर घेतले, आपला उजवा गुडघा जमिनीवर टेकवला आणि भगवान विपस्सी यांच्या दिशेने हात जोडून नमस्कार करत त्यांना असे म्हणाला – 'भंते! भगवंतांनी धम्माचा उपदेश करावा, सुगतांनी धम्माचा उपदेश करावा. जगात असेही प्राणी आहेत ज्यांच्या डोळ्यांवर क्लेशांची धूळ फार कमी आहे; धम्म न ऐकल्यामुळे त्यांचा ऱ्हास होत आहे. ते धम्म समजून घेणारे बनतील.' ๖๗. ‘‘เอวํ วุตฺเต, ภิกฺขเว, วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ตํ มหาพฺรหฺมานํ เอตทโวจ – ‘มยฺหมฺปิ โข, พฺรหฺเม, เอตทโหสิ – ‘‘ยํนูนาหํ ธมฺมํ เทเสยฺย’’นฺติ. ตสฺส มยฺหํ, พฺรหฺเม, เอตทโหสิ – ‘‘อธิคโต โข มฺยายํ ธมฺโม คมฺภีโร ทุทฺทโส ทุรนุโพโธ สนฺโต ปณีโต อตกฺกาวจโร นิปุโณ ปณฺฑิตเวทนีโย. อาลยรามา โข ปนายํ ปชา อาลยรตา อาลยสมฺมุทิตา. อาลยรามาย โข ปน ปชาย อาลยรตาย อาลยสมฺมุทิตาย ทุทฺทสํ อิทํ ฐานํ ยทิทํ อิทปฺปจฺจยตาปฏิจฺจสมุปฺปาโท. อิทมฺปิ โข ฐานํ ทุทฺทสํ ยทิทํ สพฺพสงฺขารสมโถ สพฺพูปธิปฏินิสฺสคฺโค ตณฺหากฺขโย วิราโค นิโรโธ นิพฺพานํ. อหญฺเจว โข ปน ธมฺมํ เทเสยฺยํ, ปเร จ เม น อาชาเนยฺยุํ; โส มมสฺส กิลมโถ, สา มมสฺส วิเหสา’’ติ. อปิสฺสุ มํ, พฺรหฺเม, อิมา อนจฺฉริยา คาถาโย ปฏิภํสุ ปุพฺเพ อสฺสุตปุพฺพา – ६७. असे म्हटल्यावर, भिक्खूहो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी त्या महाब्रह्मदेवाला म्हणाले – 'हे ब्रह्मा, माझ्या मनातही असा विचार आला होता की – मी धम्माचा उपदेश करावा. परंतु, हे ब्रह्मा, माझ्या मनात पुन्हा असा विचार आला – मी जो हा धम्म प्राप्त केला आहे, तो अत्यंत गंभीर, दुर्दर्शक, दुरनुबोध, शांत, प्रणीत, अतर्कावचर, niपुण आणि पंडितांनाच समजण्याजोगा आहे. परंतु ही प्रजा तर आळयात रमणारी, आळयात गढलेली आणि आळयातच आनंद मानणारी आहे. अशा प्रकारे आळयात रमणाऱ्या, आळयात गढलेल्या आणि आळयातच आनंद मानणाऱ्या प्रजेला हे स्थान समजणे कठीण आहे, म्हणजेच 'इदप्पच्चयता-पटिच्चसमुप्पाद'. तसेच हे स्थान देखील समजण्यास अत्यंत कठीण आहे, म्हणजेच सर्व संस्कारांचे शमन, सर्व उपाधींचा त्याग, तृष्णेचा क्षय, विराग, निरोध आणि निब्बान. जर मी धम्माचा उपदेश केला आणि इतरांना तो समजला नाही, तर तो केवळ माझा थकवा आणि माझा त्रास ठरेल. शिवाय, हे ब्रह्मा, मला पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या या आश्चर्यकारक गाथा स्फुरल्या – ‘‘กิจฺเฉน เม อธิคตํ, หลํ ทานิ ปกาสิตุํ; ราคโทสปเรเตหิ, นายํ ธมฺโม สุสมฺพุโธ. 'मी मोठ्या कष्टाने जो धम्म प्राप्त केला आहे, तो आता प्रकट करणे योग्य नाही; कारण राग आणि द्वेषाने ग्रासलेल्या लोकांना हा धम्म सहज समजणारा नाही.' ‘‘ปฏิโสตคามึ นิปุณํ, คมฺภีรํ ทุทฺทสํ อณุํ; ราครตฺตา น ทกฺขนฺติ, ตโมขนฺเธน อาวุฏา’’ติ. 'प्रवाहविरुद्ध जाणारा, निपुण, गंभीर, दुर्दर्शक आणि सूक्ष्म असलेला हा धम्म रागाने अंध झालेले आणि अज्ञानाच्या अंधकाराने वेढलेले लोक पाहू शकणार नाहीत.' ‘อิติห เม, พฺรหฺเม, ปฏิสญฺจิกฺขโต อปฺโปสฺสุกฺกตาย จิตฺตํ นมิ, โน ธมฺมเทสนายา’ติ. 'अशा प्रकारे, हे ब्रह्मा, मी विचार केला असता, माझे चित्त धम्म उपदेश करण्याऐवजी उदासीनतेकडे वळले, धम्म उपदेशाकडे नाही.' ๖๘. ‘‘ทุติยมฺปิ โข, ภิกฺขเว, โส มหาพฺรหฺมา…เป… ตติยมฺปิ โข, ภิกฺขเว, โส มหาพฺรหฺมา วิปสฺสึ ภควนฺตํ อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธํ เอตทโวจ – ‘เทเสตุ, ภนฺเต, ภควา ธมฺมํ, เทเสตุ สุคโต ธมฺมํ, สนฺติ สตฺตา อปฺปรชกฺขชาติกา, อสฺสวนตา ธมฺมสฺส ปริหายนฺติ, ภวิสฺสนฺติ ธมฺมสฺส อญฺญาตาโร’ติ. ६८. दुसऱ्यांदाही, भिक्खूहो, तो महाब्रह्मदेव... (तसेच) तिसऱ्यांदाही, भिक्खूहो, तो महाब्रह्मदेव अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांना असे म्हणाला – 'भंते! भगवंतांनी धम्माचा उपदेश करावा, सुगतांनी धम्माचा उपदेश करावा. जगात असेही प्राणी आहेत ज्यांच्या डोळ्यांवर क्लेशांची धूळ फार कमी आहे; धम्म न ऐकल्यामुळे त्यांचा ऱ्हास होत आहे. ते धम्म समजून घेणारे बनतील.' ๖๙. ‘‘อถ [Pg.33] โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ พฺรหฺมุโน จ อชฺเฌสนํ วิทิตฺวา สตฺเตสุ จ การุญฺญตํ ปฏิจฺจ พุทฺธจกฺขุนา โลกํ โวโลเกสิ. อทฺทสา โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ พุทฺธจกฺขุนา โลกํ โวโลเกนฺโต สตฺเต อปฺปรชกฺเข มหารชกฺเข ติกฺขินฺทฺริเย มุทินฺทฺริเย สฺวากาเร ทฺวากาเร สุวิญฺญาปเย ทุวิญฺญาปเย อปฺเปกจฺเจ ปรโลกวชฺชภยทสฺสาวิเน วิหรนฺเต, อปฺเปกจฺเจ น ปรโลกวชฺชภยทสฺสาวิเน วิหรนฺเต. เสยฺยถาปิ นาม อุปฺปลินิยํ วา ปทุมินิยํ วา ปุณฺฑรีกินิยํ วา อปฺเปกจฺจานิ อุปฺปลานิ วา ปทุมานิ วา ปุณฺฑรีกานิ วา อุทเก ชาตานิ อุทเก สํวฑฺฒานิ อุทกานุคฺคตานิ อนฺโต นิมุคฺคโปสีนิ. อปฺเปกจฺจานิ อุปฺปลานิ วา ปทุมานิ วา ปุณฺฑรีกานิ วา อุทเก ชาตานิ อุทเก สํวฑฺฒานิ สโมทกํ ฐิตานิ. อปฺเปกจฺจานิ อุปฺปลานิ วา ปทุมานิ วา ปุณฺฑรีกานิ วา อุทเก ชาตานิ อุทเก สํวฑฺฒานิ อุทกา อจฺจุคฺคมฺม ฐิตานิ อนุปลิตฺตานิ อุทเกน. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ พุทฺธจกฺขุนา โลกํ โวโลเกนฺโต อทฺทส สตฺเต อปฺปรชกฺเข มหารชกฺเข ติกฺขินฺทฺริเย มุทินฺทฺริเย สฺวากาเร ทฺวากาเร สุวิญฺญาปเย ทุวิญฺญาปเย อปฺเปกจฺเจ ปรโลกวชฺชภยทสฺสาวิเน วิหรนฺเต, อปฺเปกจฺเจ น ปรโลกวชฺชภยทสฺสาวิเน วิหรนฺเต. ६९. त्यानंतर, भिक्खूहो, अर्हत सम्यक्संबुद्ध विपस्सी भगवंतांनी ब्रह्माची प्रार्थना जाणून घेऊन आणि प्राण्यांविषयीच्या करुणेपोटी बुद्धचक्षूंनी जगाकडे पाहिले. भिक्खूहो, बुद्धचक्षूंनी जगाकडे पाहत असताना अर्हत सम्यक्संबुद्ध विपस्सी भगवंतांना असे प्राणी दिसले ज्यांच्या डोळ्यांवर (प्रज्ञेच्या डोळ्यांवर क्लेशांची) धूळ कमी होती, ज्यांच्यावर धूळ अधिक होती, ज्यांची इंद्रिये तीक्ष्ण होती, ज्यांची इंद्रिये मंद होती, जे चांगल्या स्वभावाचे होते, जे वाईट स्वभावाचे होते, ज्यांना सहज समजवता येण्यासारखे होते, ज्यांना समजवणे कठीण होते, आणि काही प्राणी परलोकातील दोषांना व पापांना भयाने पाहणारे होते, तर काही परलोकातील दोषांना व पापांना भयाने न पाहणारे होते. ज्याप्रमाणे निळ्या, तांबड्या किंवा पांढऱ्या कमळांच्या तलावात काही कमळे पाण्यातच जन्माला येतात, पाण्यातच वाढतात आणि पाण्याच्या बाहेर न येता पाण्याखालीच राहून विकसित होतात; काही कमळे पाण्यात जन्माला येतात, पाण्यात वाढतात आणि पाण्याच्या पातळीवर येऊन राहतात; तर काही कमळे पाण्यात जन्माला येतात, पाण्यात वाढतात आणि पाण्याच्या वर येऊन उभी राहतात व त्यांना पाण्याचा स्पर्श होत नाही (ती पाण्याने अलिप्त राहतात). त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, अर्हत सम्यक्संबुद्ध विपस्सी भगवंतांनी बुद्धचक्षूंनी जगाकडे पाहत असताना असे प्राणी पाहिले ज्यांच्या डोळ्यांवर धूळ कमी होती, ज्यांच्यावर धूळ अधिक होती, ज्यांची इंद्रिये तीक्ष्ण होती, ज्यांची इंद्रिये मंद होती, जे चांगल्या स्वभावाचे होते, जे वाईट स्वभावाचे होते, ज्यांना सहज समजवता येण्यासारखे होते, ज्यांना समजवणे कठीण होते, आणि काही प्राणी परलोकातील दोषांना व पापांना भयाने पाहणारे होते, तर काही परलोकातील दोषांना व पापांना भयाने न पाहणारे होते. ๗๐. ‘‘อถ โข โส, ภิกฺขเว, มหาพฺรหฺมา วิปสฺสิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย วิปสฺสึ ภควนฺตํ อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธํ คาถาหิ อชฺฌภาสิ – ७०. त्यानंतर, भिक्खूहो, त्या महाब्रह्माने अर्हत सम्यक्संबुद्ध विपस्सी भगवंतांच्या मनातील विचार स्वतःच्या मनाने जाणून घेऊन अर्हत सम्यक्संबुद्ध विपस्सी भगवंतांना गाथांनी असे संबोधित केले – ‘เสเล ยถา ปพฺพตมุทฺธนิฏฺฐิโต, ยถาปิ ปสฺเส ชนตํ สมนฺตโต; ตถูปมํ ธมฺมมยํ สุเมธ, ปาสาทมารุยฺห สมนฺตจกฺขุ. ‘ज्याप्रमाणे खडकाळ पर्वताच्या शिखरावर उभा असलेला मनुष्य सभोवतालच्या सर्व लोकांना पाहू शकतो; हे उत्तम प्रज्ञावंता, हे समंतचक्षू (सर्व बाजूंनी पाहणारे), त्याचप्रमाणे आपण या धर्ममय प्रासादावर आरूढ व्हा. ‘โสกาวติณฺณํ ชนตมเปตโสโก,อเวกฺขสฺสุ ชาติชราภิภูตํ; อุฏฺเฐหิ วีร วิชิตสงฺคาม,สตฺถวาห อณณ วิจร โลเก.เทสสฺสุ ภควา ธมฺมํ,อญฺญาตาโร ภวิสฺสนฺตี’ติ. स्वतः शोकमुक्त राहून, जन्म आणि जरेने (वृद्धत्वामुळे) ग्रस्त असलेल्या आणि शोकात बुडालेल्या या लोकसमुदायाकडे पहा. हे वीरा, हे युद्धविजेत्या, हे सार्थवाहा (प्रवाशांचे मार्गदर्शक), हे ऋणमुक्त भगवंता, उठा आणि जगात विरण करा (भ्रमण करा). भगवंतांनी धर्माचा उपदेश करावा, तो समजून घेणारे लोक नक्कीच मिळतील.’ ๗๑. ‘‘อถ [Pg.34] โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ตํ มหาพฺรหฺมานํ คาถาย อชฺฌภาสิ – ७१. त्यानंतर, भिक्खूहो, अर्हत सम्यक्संबुद्ध विपस्सी भगवंतांनी त्या महाब्रह्माला गाथेने असे उत्तर दिले – ‘อปารุตา เตสํ อมตสฺส ทฺวารา,เย โสตวนฺโต ปมุญฺจนฺตุ สทฺธํ; วิหึสสญฺญี ปคุณํ น ภาสึ,ธมฺมํ ปณีตํ มนุเชสุ พฺรหฺเม’ติ. ‘हे ब्रह्मा, जे ऐकण्यास उत्सुक आहेत त्यांच्यासाठी अमृताची (निर्वाणाची) द्वारे खुली करण्यात आली आहेत, त्यांनी आपली श्रद्धा प्रकट करावी. केवळ श्रम होतील या विचाराने मी मानवांमध्ये या उत्तम व परिपूर्ण धर्माचा उपदेश केला नव्हता.’ ‘‘อถ โข โส, ภิกฺขเว, มหาพฺรหฺมา ‘กตาวกาโส โขมฺหิ วิปสฺสินา ภควตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน ธมฺมเทสนายา’ติ วิปสฺสึ ภควนฺตํ อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺเถว อนฺตรธายิ. त्यानंतर, bhikkhūho, ‘अर्हत सम्यक्संबुद्ध विपस्सी भगवंतांनी मला धर्मोपदेशासाठी अनुमती दिली आहे’ असा विचार करून, त्या महाब्रह्माने अर्हत सम्यक्संबुद्ध विपस्सी भगवंतांना अभिवादन केले, त्यांची प्रदक्षिणा केली आणि तो तिथेच अंतर्धान पावला. อคฺคสาวกยุคํ अग्रश्रावक जोडी ๗๒. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เอตทโหสิ – ‘กสฺส นุ โข อหํ ปฐมํ ธมฺมํ เทเสยฺยํ, โก อิมํ ธมฺมํ ขิปฺปเมว อาชานิสฺสตี’ติ? อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เอตทโหสิ – ‘อยํ โข ขณฺโฑ จ ราชปุตฺโต ติสฺโส จ ปุโรหิตปุตฺโต พนฺธุมติยา ราชธานิยา ปฏิวสนฺติ ปณฺฑิตา วิยตฺตา เมธาวิโน ทีฆรตฺตํ อปฺปรชกฺขชาติกา. ยํนูนาหํ ขณฺฑสฺส จ ราชปุตฺตสฺส, ติสฺสสฺส จ ปุโรหิตปุตฺตสฺส ปฐมํ ธมฺมํ เทเสยฺยํ, เต อิมํ ธมฺมํ ขิปฺปเมว อาชานิสฺสนฺตี’ติ. ७२. त्यानंतर, भिक्खूहो, अर्हत सम्यक्संबुद्ध विपस्सी भगवंतांच्या मनात असा विचार आला – ‘मी सर्वप्रथम कोणाला धर्माचा उपदेश करू? हा धर्म कोण वेगाने समजून घेईल?’ त्यानंतर, भिक्खूहो, अर्हत सम्यक्संबुद्ध विपस्सी भगवंतांच्या मनात असा विचार आला – ‘हा राजपुत्र खंड आणि पुरोहितपुत्र तिस्स हे बंधुमती राजधानीत राहतात. ते पंडित, चतुर, बुद्धिमान आहेत आणि दीर्घकाळापासून त्यांच्या डोळ्यांवर (क्लेशांची) धूळ खूप कमी आहे. मी सर्वप्रथम राजपुत्र खंड आणि पुरोहितपुत्र तिस्स यांनाच धर्माचा उपदेश का करू नये? ते हा धर्म अतिशय वेगाने समजून घेतील.’ ๗๓. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย, ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย; เอวเมว โพธิรุกฺขมูเล อนฺตรหิโต พนฺธุมติยา ราชธานิยา เขเม มิคทาเย ปาตุรโหสิ. อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ทายปาลํ อามนฺเตสิ – ‘เอหิ ตฺวํ, สมฺม ทายปาล, พนฺธุมตึ ราชธานึ ปวิสิตฺวา ขณฺฑญฺจ ราชปุตฺตํ ติสฺสญฺจ ปุโรหิตปุตฺตํ เอวํ วเทหิ – วิปสฺสี, ภนฺเต, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ พนฺธุมตึ ราชธานึ อนุปฺปตฺโต เขเม มิคทาเย วิหรติ, โส [Pg.35] ตุมฺหากํ ทสฺสนกาโม’ติ. ‘เอวํ, ภนฺเต’ติ โข, ภิกฺขเว, ทายปาโล วิปสฺสิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ปฏิสฺสุตฺวา พนฺธุมตึ ราชธานึ ปวิสิตฺวา ขณฺฑญฺจ ราชปุตฺตํ ติสฺสญฺจ ปุโรหิตปุตฺตํ เอตทโวจ – ‘วิปสฺสี, ภนฺเต, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ พนฺธุมตึ ราชธานึ อนุปฺปตฺโต เขเม มิคทาเย วิหรติ; โส ตุมฺหากํ ทสฺสนกาโม’ติ. ७३. त्यानंतर, भिक्खूहो, ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपला दुमडलेला हात पसरतो किंवा पसरलेला हात दुमडतो; त्याचप्रमाणे अर्हत सम्यक्संबुद्ध विपस्सी भगवान बोधिवृक्षाच्या मुळाशी अंतर्धान पावून बंधुमती राजधानीजवळील खेम नावाच्या मृगदायात (हरणांच्या उद्यानात) प्रकट झाले. त्यानंतर, भिक्खूहो, अर्हत सम्यक्संबुद्ध विपस्सी भगवंतांनी उद्यानपालाला बोलावून म्हटले – ‘मित्रा उद्यानपाला, ये. तू बंधुमती राजधानीत प्रवेश करून राजपुत्र खंड आणि पुरोहितपुत्र तिस्स यांना असे सांग – “भंते, अर्हत सम्यक्संबुद्ध विपस्सी भगवान बंधुमती राजधानीत आले असून खेम मृगदायात विहार करत आहेत. ते आपल्याला भेटू इच्छितात.”’ भिक्खूहो, ‘तसेच असो, भंते’ असे म्हणून उद्यानपालाने अर्हत सम्यक्संबुद्ध विपस्सी भगवंतांच्या आज्ञेचे पालन केले आणि बंधुमती राजधानीत प्रवेश करून राजपुत्र खंड आणि पुरोहितपुत्र तिस्स यांना असे म्हटले – ‘भंते, अर्हत सम्यक्संबुद्ध विपस्सी भगवान बंधुमती राजधानीत आले असून खेम मृगदायात विहार करत आहेत. ते आपल्याला भेटू इच्छितात.’ ๗๔. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, ขณฺโฑ จ ราชปุตฺโต ติสฺโส จ ปุโรหิตปุตฺโต ภทฺทานิ ภทฺทานิ ยานานิ โยชาเปตฺวา ภทฺทํ ภทฺทํ ยานํ อภิรุหิตฺวา ภทฺเทหิ ภทฺเทหิ ยาเนหิ พนฺธุมติยา ราชธานิยา นิยฺยึสุ. เยน เขโม มิคทาโย เตน ปายึสุ. ยาวติกา ยานสฺส ภูมิ, ยาเนน คนฺตฺวา ยานา ปจฺโจโรหิตฺวา ปตฺติกาว เยน วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ เตนุปสงฺกมึสุ. อุปสงฺกมิตฺวา วิปสฺสึ ภควนฺตํ อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. ७४. त्यानंतर, भिक्खूहो, राजपुत्र खंड आणि पुरोहितपुत्र तिस्स यांनी उत्तम उत्तम वाहने तयार करवून घेतली, उत्तम वाहनांवर आरूढ होऊन ते त्या उत्तम वाहनांसह बंधुमती राजधानीतून बाहेर पडले. जेथे खेम मृगदाय होता, तिकडे ते गेले. वाहनाने जाण्याजोग्या मर्यादेपर्यंत वाहनाने जाऊन, नंतर वाहनातून उतरून ते पायीच अर्हत सम्यक्संबुद्ध विपस्सी भगवंतांकडे गेले. जवळ जाऊन त्यांनी अर्हत सम्यक्संबुद्ध विपस्सी भगवंतांना आदरपूर्वक अभिवादन केले आणि ते एका बाजूला बसले. ๗๕. ‘‘เตสํ วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ อนุปุพฺพึ กถํ กเถสิ, เสยฺยถิทํ – ทานกถํ สีลกถํ สคฺคกถํ กามานํ อาทีนวํ โอการํ สํกิเลสํ เนกฺขมฺเม อานิสํสํ ปกาเสสิ. ยทา เต ภควา อญฺญาสิ กลฺลจิตฺเต มุทุจิตฺเต วินีวรณจิตฺเต อุทคฺคจิตฺเต ปสนฺนจิตฺเต, อถ ยา พุทฺธานํ สามุกฺกํสิกา ธมฺมเทสนา, ตํ ปกาเสสิ – ทุกฺขํ สมุทยํ นิโรธํ มคฺคํ. เสยฺยถาปิ นาม สุทฺธํ วตฺถํ อปคตกาฬกํ สมฺมเทว รชนํ ปฏิคฺคณฺเหยฺย, เอวเมว ขณฺฑสฺส จ ราชปุตฺตสฺส ติสฺสสฺส จ ปุโรหิตปุตฺตสฺส ตสฺมึเยว อาสเน วิรชํ วีตมลํ ธมฺมจกฺขุํ อุทปาทิ – ‘ยํ กิญฺจิ สมุทยธมฺมํ, สพฺพํ ตํ นิโรธธมฺม’นฺติ. ७५. त्यांना अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांनी अनुक्रमिक उपदेश (अनुपुब्बी कथा) केला; जसे की – दानकथा, शीलकथा, स्वर्गकथा, कामभोगांचे दुष्परिणाम (आदीनव), हीनत्व व संक्लेश आणि नैष्क्रम्याचे (त्यागाचे) लाभ त्यांनी प्रकाशित केले. जेव्हा भगवंतांना समजले की त्यांचे चित्त अनुकूल, मृदू, नीवरणमुक्त, प्रफुल्लित आणि प्रसन्न झाले आहे, तेव्हा त्यांनी बुद्धांचा जो स्वतः साक्षात्कृत केलेला मुख्य धर्मोपदेश (सामुक्कंसिका धम्मदेसना) आहे, तो प्रकाशित केला – दुःख, समुदय, निरोध आणि मार्ग. ज्याप्रमाणे डाग नसलेले स्वच्छ वस्त्र रंग चांगल्या प्रकारे ग्रहण करते, त्याचप्रमाणे राजपुत्र खंड आणि पुरोहितपुत्र तिस्स यांना त्याच आसनावर बसलेले असताना विरज (धुलिकणरहित), वीतमल (मलरहित) धम्मचक्षू उत्पन्न झाला – 'जे काही उदय पावणारे (उत्पत्ती धर्म असलेले) आहे, ते सर्व निरोध पावणारे (लय धर्म असलेले) आहे.' ๗๖. ‘‘เต ทิฏฺฐธมฺมา ปตฺตธมฺมา วิทิตธมฺมา ปริโยคาฬฺหธมฺมา ติณฺณวิจิกิจฺฉา วิคตกถํกถา เวสารชฺชปฺปตฺตา อปรปฺปจฺจยา สตฺถุสาสเน วิปสฺสึ ภควนฺตํ อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธํ เอตทโวจุํ – ‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต, อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต. เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย, ปฏิจฺฉนฺนํ วา วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย ‘‘จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตี’’ติ. เอวเมวํ ภควตา อเนกปริยาเยน ธมฺโม [Pg.36] ปกาสิโต. เอเต มยํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ สรณํ คจฺฉาม ธมฺมญฺจ. ลเภยฺยาม มยํ, ภนฺเต, ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, ลเภยฺยาม อุปสมฺปท’นฺติ. ७६. ते धर्म पाहणारे, धर्माप्रत पोहोचलेले, धर्म जाणणारे, धर्मामध्ये खोलवर उतरलेले, शंकारहित झालेले, संभ्रममुक्त झालेले, आत्मविश्वासाला प्राप्त झालेले आणि शास्त्यांच्या शासनात (धर्मात) परावलंबी न राहता स्वतः साक्षात्कारी झालेले बनले. त्यांनी अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांना असे म्हटले – 'अतिशय सुंदर, भंते! अतिशय सुंदर, भंते! ज्याप्रमाणे, भंते, उपडे केलेले भांडे उताणे करावे, किंवा झाकलेले उघडे करावे, किंवा वाट चुकलेल्याला वाट दाखवावी, किंवा अंधारात तेलाचा दिवा धरावा जेणेकरून डोळे असणाऱ्यांना रूपे दिसू शकतील; त्याचप्रमाणे भगवंतांनी अनेक प्रकारे धर्म प्रकाशित केला आहे. भंते, आम्ही भगवंतांना आणि धर्माला शरण जात आहोत. भंते, आम्हाला भगवंतांच्या सन्निध प्रवज्जा (दीक्षा) मिळावी आणि उपसंपदा (भिक्खू दीक्षा) मिळावी.' ๗๗. ‘‘อลตฺถุํ โข, ภิกฺขเว, ขณฺโฑ จ ราชปุตฺโต, ติสฺโส จ ปุโรหิตปุตฺโต วิปสฺสิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส สนฺติเก ปพฺพชฺชํ อลตฺถุํ อุปสมฺปทํ. เต วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสสิ สมาทเปสิ สมุตฺเตเชสิ สมฺปหํเสสิ; สงฺขารานํ อาทีนวํ โอการํ สํกิเลสํ นิพฺพาเน อานิสํสํ ปกาเสสิ. เตสํ วิปสฺสินา ภควตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺสิยมานานํ สมาทปิยมานานํ สมุตฺเตชิยมานานํ สมฺปหํสิยมานานํ นจิรสฺเสว อนุปาทาย อาสเวหิ จิตฺตานิ วิมุจฺจึสุ. ७७. हे भिक्षूंनो, राजपुत्र खंड आणि पुरोहितपुत्र तिस्स यांनी अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांच्या सन्निध प्रवज्जा मिळवली आणि उपसंपदा मिळवली. अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांनी त्यांना धम्मचर्चेने (धार्मिक उपदेशाने) उपदेशित केले, प्रोत्साहित केले, उत्तेजित केले आणि हर्षित केले; त्यांनी संस्कारांचे (संखारांचे) दुष्परिणाम, हीनत्व व संक्लेश आणि निर्वाणाचे लाभ प्रकाशित केले. अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांच्याद्वारे धम्मचर्चेने उपदेशित, प्रोत्साहित, उत्तेजित आणि हर्षित केले जात असताना, लवकरच त्यांचे चित्त कोणत्याही उपादानाशिवाय (आसक्तीशिवाय) आसवांपासून (आसवांतून) मुक्त झाले. มหาชนกายปพฺพชฺชา महाजनसमुदायाची प्रवज्जा (दीक्षा) ๗๘. ‘‘อสฺโสสิ โข, ภิกฺขเว, พนฺธุมติยา ราชธานิยา มหาชนกาโย จตุราสีติปาณสหสฺสานิ – ‘วิปสฺสี กิร ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ พนฺธุมตึ ราชธานึ อนุปฺปตฺโต เขเม มิคทาเย วิหรติ. ขณฺโฑ จ กิร ราชปุตฺโต ติสฺโส จ ปุโรหิตปุตฺโต วิปสฺสิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส สนฺติเก เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาเทตฺวา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิตา’ติ. สุตฺวาน เนสํ เอตทโหสิ – ‘น หิ นูน โส โอรโก ธมฺมวินโย, น สา โอรกา ปพฺพชฺชา, ยตฺถ ขณฺโฑ จ ราชปุตฺโต ติสฺโส จ ปุโรหิตปุตฺโต เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาเทตฺวา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิตา. ขณฺโฑ จ ราชปุตฺโต ติสฺโส จ ปุโรหิตปุตฺโต เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาเทตฺวา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสนฺติ, กิมงฺคํ ปน มย’นฺติ. อถ โข โส, ภิกฺขเว, มหาชนกาโย จตุราสีติปาณสหสฺสานิ พนฺธุมติยา ราชธานิยา นิกฺขมิตฺวา เยน เขโม มิคทาโย เยน วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา วิปสฺสึ ภควนฺตํ อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. ७८. हे भिक्षूंनो, बंधुमती राजधानीतील चौऱ्याऐंशी हजार लोकांच्या महाजनसमुदायाने ऐकले की – 'अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी हे बंधुमती राजधानीत आले असून खेम नावाच्या मृगदावात (हरिणांच्या वनात) विहार करत आहेत. आणि राजपुत्र खंड व पुरोहितपुत्र तिस्स यांनी अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांच्या सन्निध आपले केस व दाढी काढून, काषाय वस्त्रे परिधान करून, घराचा त्याग करून अनगारिक (बेघर) प्रवज्जा घेतली आहे.' हे ऐकून त्यांच्या मनात असा विचार आला – 'तो धम्म आणि विनय नक्कीच सामान्य (हीन) नसणार, आणि ती प्रवज्जाही सामान्य नसणार, जिथे राजपुत्र खंड आणि पुरोहितपुत्र तिस्स यांनी आपले केस व दाढी काढून, काषाय वस्त्रे परिधान करून, घराचा त्याग करून अनगारिक प्रवज्जा घेतली आहे. जर राजपुत्र खंड आणि पुरोहितपुत्र तिस्स आपले केस व दाढी काढून, काषाय वस्त्रे परिधान करून, घराचा त्याग करून अनगारिक प्रवज्जा घेऊ शकतात, तर मग आपण का नाही?' त्यानंतर, हे भिक्षूंनो, तो चौऱ्याऐंशी हजार लोकांचा महाजनसमुदाय बंधुमती राजधानीतून बाहेर पडून जिथे खेम मृगदाव होता आणि जिथे अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी होते, तिथे आला; आणि तिथे येऊन अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. ๗๙. ‘‘เตสํ [Pg.37] วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ อนุปุพฺพึ กถํ กเถสิ. เสยฺยถิทํ – ทานกถํ สีลกถํ สคฺคกถํ กามานํ อาทีนวํ โอการํ สํกิเลสํ เนกฺขมฺเม อานิสํสํ ปกาเสสิ. ยทา เต ภควา อญฺญาสิ กลฺลจิตฺเต มุทุจิตฺเต วินีวรณจิตฺเต อุทคฺคจิตฺเต ปสนฺนจิตฺเต, อถ ยา พุทฺธานํ สามุกฺกํสิกา ธมฺมเทสนา, ตํ ปกาเสสิ – ทุกฺขํ สมุทยํ นิโรธํ มคฺคํ. เสยฺยถาปิ นาม สุทฺธํ วตฺถํ อปคตกาฬกํ สมฺมเทว รชนํ ปฏิคฺคณฺเหยฺย, เอวเมว เตสํ จตุราสีติปาณสหสฺสานํ ตสฺมึเยว อาสเน วิรชํ วีตมลํ ธมฺมจกฺขุํ อุทปาทิ – ‘ยํ กิญฺจิ สมุทยธมฺมํ สพฺพํ ตํ นิโรธธมฺม’นฺติ. ७९. त्यांना अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांनी अनुक्रमिक उपदेश केला; जसे की – दानकथा, शीलकथा, स्वर्गकथा, कामभोगांचे दुष्परिणाम (आदीनव), हीनत्व व संक्लेश आणि नैष्क्रम्याचे (त्यागाचे) लाभ त्यांनी प्रकाशित केले. जेव्हा भगवंतांना समजले की त्यांचे चित्त अनुकूल, मृदू, नीवरणमुक्त, प्रफुल्लित आणि प्रसन्न झाले आहे, तेव्हा त्यांनी बुद्धांचा जो स्वतः साक्षात्कृत केलेला मुख्य धर्मोपदेश आहे, तो प्रकाशित केला – दुःख, समुदय, निरोध आणि मार्ग. ज्याप्रमाणे डाग नसलेले स्वच्छ वस्त्र रंग चांगल्या प्रकारे ग्रहण करते, त्याचप्रमाणे त्या चौऱ्याऐंशी हजार लोकांच्या समुदायाला त्याच आसनावर बसलेले असताना विरज (धुलिकणरहित), वीतमल (मलरहित) धम्मचक्षू उत्पन्न झाला – 'जे काही उदय पावणारे (उत्पत्ती धर्म असलेले) आहे, ते सर्व निरोध पावणारे (लय धर्म असलेले) आहे.' ๘๐. ‘‘เต ทิฏฺฐธมฺมา ปตฺตธมฺมา วิทิตธมฺมา ปริโยคาฬฺหธมฺมา ติณฺณวิจิกิจฺฉา วิคตกถํกถา เวสารชฺชปฺปตฺตา อปรปฺปจฺจยา สตฺถุสาสเน วิปสฺสึ ภควนฺตํ อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธํ เอตทโวจุํ – ‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต, อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต. เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย, ปฏิจฺฉนฺนํ วา วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย ‘‘จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตี’’ติ. เอวเมวํ ภควตา อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอเต มยํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ สรณํ คจฺฉาม ธมฺมญฺจ ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. ลเภยฺยาม มยํ, ภนฺเต, ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ ลเภยฺยาม อุปสมฺปท’’นฺติ. ८०. ते धर्म पाहणारे, धर्माप्रत पोहोचलेले, धर्म जाणणारे, धर्मामध्ये खोलवर उतरलेले, शंकारहित झालेले, संभ्रममुक्त झालेले, आत्मविश्वासाला प्राप्त झालेले आणि शास्त्यांच्या शासनात (धर्मात) परावलंबी न राहता स्वतः साक्षात्कारी झालेले बनले. त्यांनी अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांना असे म्हटले – 'अतिशय सुंदर, भंते! अतिशय सुंदर, भंते! ज्याप्रमाणे, भंते, उपडे केलेले भांडे उताणे करावे, किंवा झाकलेले उघडे करावे, किंवा वाट चुकलेल्याला वाट दाखवावी, किंवा अंधारात तेलाचा दिवा धरावा जेणेकरून डोळे असणाऱ्यांना रूपे दिसू शकतील; त्याचप्रमाणे भगवंतांनी अनेक प्रकारे धर्म प्रकाशित केला आहे. भंते, आम्ही भगवंतांना, धर्माला आणि भिक्खू संघाला शरण जात आहोत. भंते, आम्हाला भगवंतांच्या सन्निध प्रवज्जा (दीक्षा) मिळावी आणि उपसंपदा (भिक्खू दीक्षा) मिळावी.' ๘๑. ‘‘อลตฺถุํ โข, ภิกฺขเว, ตานิ จตุราสีติปาณสหสฺสานิ วิปสฺสิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, อลตฺถุํ อุปสมฺปทํ. เต วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสสิ สมาทเปสิ สมุตฺเตเชสิ สมฺปหํเสสิ; สงฺขารานํ อาทีนวํ โอการํ สํกิเลสํ นิพฺพาเน อานิสํสํ ปกาเสสิ. เตสํ วิปสฺสินา ภควตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺสิยมานานํ สมาทปิยมานานํ สมุตฺเตชิยมานานํ สมฺปหํสิยมานานํ นจิรสฺเสว อนุปาทาย อาสเวหิ จิตฺตานิ วิมุจฺจึสุ. ८१. हे भिक्षूंनो, त्या चौऱ्याऐंशी हजार मनुष्यांनी अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांच्या सन्निध प्रव्रज्या प्राप्त केली, उपसंपदा प्राप्त केली. भगवान विपस्सी अर्हत सम्यक्संबुद्धांनी त्यांना धम्मकथेने सन्दर्शित केले, समादपित केले, समुत्तेजित केले आणि संप्रहर्षित केले; त्यांनी संस्कारांचे दोष, हीनत्व, संक्लेश आणि निर्वाणाचे फायदे प्रकाशित केले. भगवान विपस्सी अर्हत सम्यक्संबुद्धांद्वारे धम्मकथेने सन्दर्शित, समादपित, समुत्तेजित आणि संप्रहर्षित केले जात असताना, फार काळ न लागताच, उपादान न करता त्यांची चित्ते आसवांपासून मुक्त झाली. ปุริมปพฺพชิตานํ ธมฺมาภิสมโย पूर्वी प्रव्रजित झालेल्यांचे धम्माभिसमय (धम्मसाक्षात्कार) ๘๒. ‘‘อสฺโสสุํ โข, ภิกฺขเว, ตานิ ปุริมานิ จตุราสีติปพฺพชิตสหสฺสานิ – ‘วิปสฺสี กิร ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ พนฺธุมตึ ราชธานึ [Pg.38] อนุปฺปตฺโต เขเม มิคทาเย วิหรติ, ธมฺมญฺจ กิร เทเสตี’ติ. อถ โข, ภิกฺขเว, ตานิ จตุราสีติปพฺพชิตสหสฺสานิ เยน พนฺธุมตี ราชธานี เยน เขโม มิคทาโย เยน วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา วิปสฺสึ ภควนฺตํ อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. ८२. हे भिक्षूंनो, पूर्वी प्रव्रजित झालेल्या त्या चौऱ्याऐंशी हजार जणांनी ऐकले की—'अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी हे बंधुमती राजधानीत पोहोचले असून खेम नावाच्या मृगदायात विहार करत आहेत आणि धम्म उपदेश करत आहेत.' तेव्हा, हे भिक्षूंनो, ते चौऱ्याऐंशी हजार प्रव्रजित जेथे बंधुमती राजधानी होती, जेथे खेम मृगदाय होता आणि जेथे अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी होते, तेथे गेले; आणि तेथे जाऊन भगवान विपस्सी अर्हत सम्यक्संबुद्धांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. ๘๓. ‘‘เตสํ วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ อนุปุพฺพึ กถํ กเถสิ. เสยฺยถิทํ – ทานกถํ สีลกถํ สคฺคกถํ กามานํ อาทีนวํ โอการํ สํกิเลสํ เนกฺขมฺเม อานิสํสํ ปกาเสสิ. ยทา เต ภควา อญฺญาสิ กลฺลจิตฺเต มุทุจิตฺเต วินีวรณจิตฺเต อุทคฺคจิตฺเต ปสนฺนจิตฺเต, อถ ยา พุทฺธานํ สามุกฺกํสิกา ธมฺมเทสนา, ตํ ปกาเสสิ – ทุกฺขํ สมุทยํ นิโรธํ มคฺคํ. เสยฺยถาปิ นาม สุทฺธํ วตฺถํ อปคตกาฬกํ สมฺมเทว รชนํ ปฏิคฺคณฺเหยฺย, เอวเมว เตสํ จตุราสีติปพฺพชิตสหสฺสานํ ตสฺมึเยว อาสเน วิรชํ วีตมลํ ธมฺมจกฺขุํ อุทปาทิ – ‘ยํ กิญฺจิ สมุทยธมฺมํ สพฺพํ ตํ นิโรธธมฺม’นฺติ. ८३. भगवान विपस्सी अर्हत सम्यक्संबुद्धांनी त्यांना अनुक्रमिक कथा सांगितली. जसे की—दानकथा, शीलकथा, स्वर्गकथा, कामांचे (इंद्रियभोगांचे) दोष, हीनत्व, संक्लेश आणि नैष्क्रम्याचे (त्यागाचे) फायदे त्यांनी प्रकाशित केले. जेव्हा भगवंतांना समजले की त्यांची चित्ते अनुकूल, मृदू, नीवरणांपासून मुक्त, प्रफुल्लित आणि प्रसन्न झाली आहेत, तेव्हा त्यांनी बुद्धांची जी सर्वोत्कृष्ट धम्मदेशना आहे, ती प्रकाशित केली—दुःख, समुदाय (दुःखाचे कारण), निरोध (दुःखाचा अंत) आणि मार्ग (दुःख निरोधाचा मार्ग). ज्याप्रमाणे डाग नसलेले स्वच्छ वस्त्र रंग चांगल्या प्रकारे ग्रहण करते, त्याचप्रमाणे त्या चौऱ्याऐंशी हजार प्रव्रजितांना त्याच आसनावर बसलेले असताना विरज आणि विमल धम्मचक्षू उत्पन्न झाला की—'जे काही उत्पन्न होण्याच्या स्वभावाचे आहे, ते सर्व नष्ट होण्याच्या स्वभावाचे आहे.' ๘๔. ‘‘เต ทิฏฺฐธมฺมา ปตฺตธมฺมา วิทิตธมฺมา ปริโยคาฬฺหธมฺมา ติณฺณวิจิกิจฺฉา วิคตกถํกถา เวสารชฺชปฺปตฺตา อปรปฺปจฺจยา สตฺถุสาสเน วิปสฺสึ ภควนฺตํ อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธํ เอตทโวจุํ – ‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต, อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต. เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย, ปฏิจฺฉนฺนํ วา วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย ‘‘จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตี’’ติ. เอวเมวํ ภควตา อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอเต มยํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ สรณํ คจฺฉาม ธมฺมญฺจ ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. ลเภยฺยาม มยํ, ภนฺเต, ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ ลเภยฺยาม อุปสมฺปท’’นฺติ. ८४. तेव्हा धम्म पाहणारे, धम्माप्रत पोहोचलेले, धम्म जाणणारे, धम्मामध्ये अवगाहन केलेले, शंका ओलांडून गेलेले, संभ्रम दूर झालेले, आत्मविश्वासाप्रत पोहोचलेले आणि शास्त्यांच्या शासनात इतर कोणावरही विसंबून न राहणारे ते चौऱ्याऐंशी हजार प्रव्रजित भगवान विपस्सी अर्हत सम्यक्संबुद्धांना असे म्हणाले—'अतिशय सुंदर, भंते! अतिशय सुंदर, भंते! ज्याप्रमाणे, भंते, पालथे घातलेले भांडे उताणे करावे, किंवा झाकलेले उघडे करावे, किंवा वाट चुकलेल्याला वाट दाखवावी, किंवा अंधारात तेलाचा दिवा धरावा जेणेकरून डोळे असणाऱ्यांना रूपे दिसू शकतील; त्याचप्रमाणे भगवंतांनी अनेक पर्यायांनी धम्म प्रकाशित केला आहे. भंते, आम्ही भगवंतांना शरण जातो, धम्माला शरण जातो आणि भिक्खू संघाला शरण जातो. भंते, आम्हाला भगवंतांच्या सन्निध प्रव्रज्या मिळावी, उपसंपदा मिळावी.' ๘๕. ‘‘อลตฺถุํ โข, ภิกฺขเว, ตานิ จตุราสีติปพฺพชิตสหสฺสานิ วิปสฺสิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส สนฺติเก ปพฺพชฺชํ อลตฺถุํ อุปสมฺปทํ. เต วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสสิ สมาทเปสิ สมุตฺเตเชสิ สมฺปหํเสสิ; สงฺขารานํ อาทีนวํ โอการํ สํกิเลสํ นิพฺพาเน อานิสํสํ ปกาเสสิ. เตสํ วิปสฺสินา ภควตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺสิยมานานํ สมาทปิยมานานํ [Pg.39] สมุตฺเตชิยมานานํ สมฺปหํสิยมานานํ นจิรสฺเสว อนุปาทาย อาสเวหิ จิตฺตานิ วิมุจฺจึสุ. ८५. हे भिक्षूंनो, त्या चौऱ्याऐंशी हजार प्रव्रजितांनी भगवान विपस्सी अर्हत सम्यक्संबुद्धांच्या सन्निध प्रव्रज्या प्राप्त केली, उपसंपदा प्राप्त केली. भगवान विपस्सी अर्हत सम्यक्संबुद्धांनी त्यांना धम्मकथेने सन्दर्शित केले, समादपित केले, समुत्तेजित केले आणि संप्रहर्षित केले; त्यांनी संस्कारांचे दोष, हीनत्व, संक्लेश आणि निर्वाणाचे फायदे प्रकाशित केले. भगवान विपस्सी अर्हत सम्यक्संबुद्धांद्वारे धम्मकथेने सन्दर्शित, समादपित, समुत्तेजित आणि संप्रहर्षित केले जात असताना, फार काळ न लागताच, उपादान न करता त्यांची चित्ते आसवांपासून मुक्त झाली. จาริกาอนุชานนํ चारिका (धम्मप्रसारार्थ प्रवास) करण्याची अनुमती ๘๖. ‘‘เตน โข ปน, ภิกฺขเว, สมเยน พนฺธุมติยา ราชธานิยา มหาภิกฺขุสงฺโฆ ปฏิวสติ อฏฺฐสฏฺฐิภิกฺขุสตสหสฺสํ. อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘มหา โข เอตรหิ ภิกฺขุสงฺโฆ พนฺธุมติยา ราชธานิยา ปฏิวสติ อฏฺฐสฏฺฐิภิกฺขุสตสหสฺสํ, ยํนูนาหํ ภิกฺขู อนุชาเนยฺยํ – ‘จรถ, ภิกฺขเว, จาริกํ พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ; มา เอเกน ทฺเว อคมิตฺถ; เทเสถ, ภิกฺขเว, ธมฺมํ อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสถ. สนฺติ สตฺตา อปฺปรชกฺขชาติกา, อสฺสวนตา ธมฺมสฺส ปริหายนฺติ, ภวิสฺสนฺติ ธมฺมสฺส อญฺญาตาโร. อปิ จ ฉนฺนํ ฉนฺนํ วสฺสานํ อจฺจเยน พนฺธุมตี ราชธานี อุปสงฺกมิตพฺพา ปาติโมกฺขุทฺเทสายา’’’ติ. ८६. हे भिक्षूंनो, त्या वेळी बंधुमती राजधानीत अडुसष्ट लाख (६८,००,०००) भिक्षूंचा मोठा संघ राहत होता. तेव्हा, हे भिक्षूंनो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी एकांतात ध्यानस्थ बसले असताना त्यांच्या मनात असा विचार आला—'सध्या बंधुमती राजधानीत अडुसष्ट लाख भिक्षूंचा मोठा संघ राहत आहे. मी भिक्षूंना अशी अनुमती दिली तर किती बरे होईल—'हे भिक्षूंनो, बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेपोटी, देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी चारिका करा. एकाच मार्गाने दोघे एकत्र जाऊ नका. हे भिक्षूंनो, जो धम्म सुरुवातीला कल्याणकारी, मध्ये कल्याणकारी आणि शेवटी कल्याणकारी आहे, जो अर्थयुक्त आणि व्यंजनयुक्त आहे, अशा धम्माचा उपदेश करा; आणि संपूर्ण परिपूर्ण व अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचे प्रकटीकरण करा. असे काही प्राणी आहेत ज्यांच्या डोळ्यांवर धूळ कमी आहे, धम्म न ऐकल्यामुळे त्यांचे नुकसान होत आहे, ते धम्म जाणणारे बनतील. परंतु, प्रत्येक सहा वर्षांच्या समाप्तीनंतर पातिमोक्खाच्या पठणासाठी बंधुमती राजधानीत एकत्र यावे.'' ๘๗. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, อญฺญตโร มหาพฺรหฺมา วิปสฺสิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย, ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย. เอวเมว พฺรหฺมโลเก อนฺตรหิโต วิปสฺสิสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ปุรโต ปาตุรโหสิ. อถ โข โส, ภิกฺขเว, มหาพฺรหฺมา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา เยน วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา วิปสฺสึ ภควนฺตํ อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธํ เอตทโวจ – ‘เอวเมตํ, ภควา, เอวเมตํ, สุคต. มหา โข, ภนฺเต, เอตรหิ ภิกฺขุสงฺโฆ พนฺธุมติยา ราชธานิยา ปฏิวสติ อฏฺฐสฏฺฐิภิกฺขุสตสหสฺสํ, อนุชานาตุ, ภนฺเต, ภควา ภิกฺขู – ‘‘จรถ, ภิกฺขเว, จาริกํ พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ; มา เอเกน ทฺเว อคมิตฺถ; เทเสถ, ภิกฺขเว, ธมฺมํ อาทิกลฺยาณํ [Pg.40] มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสถ. สนฺติ สตฺตา อปฺปรชกฺขชาติกา, อสฺสวนตา ธมฺมสฺส ปริหายนฺติ, ภวิสฺสนฺติ ธมฺมสฺส อญฺญาตาโร’’ติ. อปิ จ, ภนฺเต, มยํ ตถา กริสฺสาม ยถา ภิกฺขู ฉนฺนํ ฉนฺนํ วสฺสานํ อจฺจเยน พนฺธุมตึ ราชธานึ อุปสงฺกมิสฺสนฺติ ปาติโมกฺขุทฺเทสายา’ติ. อิทมโวจ, ภิกฺขเว, โส มหาพฺรหฺมา, อิทํ วตฺวา วิปสฺสึ ภควนฺตํ อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺเถว อนฺตรธายิ. ८७. भिक्खूहो, त्यानंतर एका महाब्रह्मदेवाने अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांच्या मनातील विचार आपल्या मनाने जाणून घेतला. ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपली दुमडलेली बाहू सरळ करतो किंवा सरळ केलेली बाहू दुमडतो, त्याचप्रमाणे तो ब्रह्मलोकातून अंतर्धान पावून अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांच्यासमोर प्रकट झाला. भिक्खूहो, त्यानंतर त्या महाब्रह्मदेवाने आपले उत्तरासंग एका खांद्यावर करून, जेथे अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी होते, तेथे हात जोडून नमस्कार केला आणि भगवान विपस्सी यांना असे म्हटले – 'हे भगवंत, हे सुगत, हे अगदी योग्य आहे! भंते, सध्या बंधुमती राजधानीत एक लाख अडुसष्ट हजार भिक्खूंचा मोठा संघ वास्तव्य करत आहे. भंते, भगवंतांनी भिक्खूंना अशी अनुमती द्यावी – "भिक्खूहो, बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावर अनुकंपा करण्यासाठी, देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी चारिका करा. एकाच मार्गाने दोघे एकत्र जाऊ नका. भिक्खूहो, जो धम्म सुरुवातीला कल्याणकारी, मध्ये कल्याणकारी आणि शेवटी कल्याणकारी आहे, जो अर्थयुक्त आणि व्यंजनयुक्त आहे, अशा पूर्णपणे परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध ब्रह्मचर्याचा उपदेश करा, तो प्रकाशित करा. असे काही प्राणी आहेत ज्यांच्या डोळ्यांवर धूळ कमी आहे, धम्म न ऐकल्यामुळे त्यांचा ऱ्हास होत आहे, ते धम्म जाणणारे बनतील." आणि भंते, आम्ही अशी व्यवस्था करू जेणेकरून भिक्खू दर सहा वर्षांनी प्रातिमोक्ष ऐकण्यासाठी बंधुमती राजधानीत एकत्र येतील.' भिक्खूहो, त्या महाब्रह्मदेवाने असे म्हटले आणि अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांना अभिवादन करून, प्रदक्षिणा घालून तो तेथेच अंतर्धान पावला. ๘๘. ‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘อิธ มยฺหํ, ภิกฺขเว, รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – มหา โข เอตรหิ ภิกฺขุสงฺโฆ พนฺธุมติยา ราชธานิยา ปฏิวสติ อฏฺฐสฏฺฐิภิกฺขุสตสหสฺสํ. ยํนูนาหํ ภิกฺขู อนุชาเนยฺยํ – ‘จรถ, ภิกฺขเว, จาริกํ พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ; มา เอเกน ทฺเว อคมิตฺถ; เทเสถ, ภิกฺขเว, ธมฺมํ อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสถ. สนฺติ สตฺตา อปฺปรชกฺขชาติกา, อสฺสวนตา ธมฺมสฺส ปริหายนฺติ, ภวิสฺสนฺติ ธมฺมสฺส อญฺญาตาโร. อปิ จ, ฉนฺนํ ฉนฺนํ วสฺสานํ อจฺจเยน พนฺธุมตี ราชธานี อุปสงฺกมิตพฺพา ปาติโมกฺขุทฺเทสายาติ. ८८. भिक्खूहो, त्यानंतर अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी संध्याकाळच्या वेळी ध्यानातून उठले आणि त्यांनी भिक्खूंना संबोधित केले – 'भिक्खूहो, येथे एकांतात ध्यानस्थ बसलो असताना माझ्या मनात असा विचार आला – सध्या बंधुमती राजधानीत एक लाख अडुसष्ट हजार भिक्खूंचा मोठा संघ वास्तव्य करत आहे. मी भिक्खूंना अशी अनुमती दिली तर किती बरे होईल – "भिक्खूहो, बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावर अनुकंपा करण्यासाठी, देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी चारिका करा. एकाच मार्गाने दोघे एकत्र जाऊ नका. भिक्खूहो, जो धम्म सुरुवातीला कल्याणकारी, मध्ये कल्याणकारी आणि शेवटी कल्याणकारी आहे, जो अर्थयुक्त आणि व्यंजनयुक्त आहे, अशा पूर्णपणे परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध ब्रह्मचर्याचा उपदेश करा, तो प्रकाशित करा. असे काही प्राणी आहेत ज्यांच्या डोळ्यांवर धूळ कमी आहे, धम्म न ऐकल्यामुळे त्यांचा ऱ्हास होत आहे, ते धम्म जाणणारे बनतील. परंतु, दर सहा वर्षांनी प्रातिमोक्ष ऐकण्यासाठी बंधुमती राजधानीत एकत्र यावे." ‘‘‘อถ โข, ภิกฺขเว, อญฺญตโร มหาพฺรหฺมา มม เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย, ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย, เอวเมว พฺรหฺมโลเก อนฺตรหิโต มม ปุรโต ปาตุรโหสิ. อถ โข โส, ภิกฺขเว, มหาพฺรหฺมา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา เยนาหํ เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา มํ เอตทโวจ – ‘‘เอวเมตํ, ภควา, เอวเมตํ, สุคต. มหา โข, ภนฺเต, เอตรหิ ภิกฺขุสงฺโฆ พนฺธุมติยา ราชธานิยา ปฏิวสติ อฏฺฐสฏฺฐิภิกฺขุสตสหสฺสํ. อนุชานาตุ, ภนฺเต, ภควา ภิกฺขู – ‘จรถ, ภิกฺขเว, จาริกํ พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย [Pg.41] สุขาย เทวมนุสฺสานํ; มา เอเกน ทฺเว อคมิตฺถ; เทเสถ, ภิกฺขเว, ธมฺมํ…เป… สนฺติ สตฺตา อปฺปรชกฺขชาติกา, อสฺสวนตา ธมฺมสฺส ปริหายนฺติ, ภวิสฺสนฺติ ธมฺมสฺส อญฺญาตาโร’ติ. อปิ จ, ภนฺเต, มยํ ตถา กริสฺสาม, ยถา ภิกฺขู ฉนฺนํ ฉนฺนํ วสฺสานํ อจฺจเยน พนฺธุมตึ ราชธานึ อุปสงฺกมิสฺสนฺติ ปาติโมกฺขุทฺเทสายา’’ติ. อิทมโวจ, ภิกฺขเว, โส มหาพฺรหฺมา, อิทํ วตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺเถว อนฺตรธายิ’. भिक्खूहो, त्यानंतर एका महाब्रह्मदेवाने माझ्या मनातील विचार आपल्या मनाने जाणून घेतला. ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपली दुमडलेली बाहू सरळ करतो किंवा सरळ केलेली बाहू दुमडतो, त्याचप्रमाणे तो ब्रह्मलोकातून अंतर्धान पावून माझ्यासमोर प्रकट झाला. भिक्खूहो, त्यानंतर त्या महाब्रह्मदेवाने आपले उत्तरासंग एका खांद्यावर करून, जेथे मी होतो तेथे हात जोडून नमस्कार केला आणि मला असे म्हटले – "हे भगवंत, हे सुगत, हे अगदी योग्य आहे! भंते, सध्या बंधुमती राजधानीत एक लाख अडुसष्ट हजार भिक्खूंचा मोठा संघ वास्तव्य करत आहे. भंते, भगवंतांनी भिक्खूंना अशी अनुमती द्यावी – 'भिक्खूहो, बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावर अनुकंपा करण्यासाठी, देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी चारिका करा. एकाच मार्गाने दोघे एकत्र जाऊ नका. भिक्खूहो, धम्माचा उपदेश करा... (पेय्याल)... असे काही प्राणी आहेत ज्यांच्या डोळ्यांवर धूळ कमी आहे, धम्म न ऐकल्यामुळे त्यांचा ऱ्हास होत आहे, ते धम्म जाणणारे बनतील.' आणि भंते, आम्ही अशी व्यवस्था करू जेणेकरून भिक्खू दर सहा वर्षांनी प्रातिमोक्ष ऐकण्यासाठी बंधुमती राजधानीत एकत्र येतील." भिक्खूहो, त्या महाब्रह्मदेवाने असे म्हटले आणि मला अभिवादन करून, प्रदक्षिणा घालून तो तेथेच अंतर्धान पावला.' ‘‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, จรถ จาริกํ พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ; มา เอเกน ทฺเว อคมิตฺถ; เทเสถ, ภิกฺขเว, ธมฺมํ อาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ ปกาเสถ. สนฺติ สตฺตา อปฺปรชกฺขชาติกา, อสฺสวนตา ธมฺมสฺส ปริหายนฺติ, ภวิสฺสนฺติ ธมฺมสฺส อญฺญาตาโร. อปิ จ, ภิกฺขเว, ฉนฺนํ ฉนฺนํ วสฺสานํ อจฺจเยน พนฺธุมตี ราชธานี อุปสงฺกมิตพฺพา ปาติโมกฺขุทฺเทสายา’ติ. อถ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขู เยภุยฺเยน เอกาเหเนว ชนปทจาริกํ ปกฺกมึสุ. "भिक्खूहो, मी तुम्हाला अनुमती देतो – बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावर अनुकंपा करण्यासाठी, देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी चारिका करा. एकाच मार्गाने दोघे एकत्र जाऊ नका. भिक्खूहो, जो धम्म सुरुवातीला कल्याणकारी, मध्ये कल्याणकारी आणि शेवटी कल्याणकारी आहे, जो अर्थयुक्त आणि व्यंजनयुक्त आहे, अशा पूर्णपणे परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध ब्रह्मचर्याचा उपदेश करा, तो प्रकाशित करा. असे काही प्राणी आहेत ज्यांच्या डोळ्यांवर धूळ कमी आहे, धम्म न ऐकल्यामुळे त्यांचा ऱ्हास होत आहे, ते धम्म जाणणारे बनतील. परंतु, भिक्खूहो, दर सहा वर्षांनी प्रातिमोक्ष ऐकण्यासाठी बंधुमती राजधानीत एकत्र यावे." भिक्खूहो, त्यानंतर बहुतांश भिक्खू एकाच दिवसात जनपदांमध्ये चारिकेसाठी निघून गेले. ๘๙. ‘‘เตน โข ปน สมเยน ชมฺพุทีเป จตุราสีติ อาวาสสหสฺสานิ โหนฺติ. เอกมฺหิ หิ วสฺเส นิกฺขนฺเต เทวตา สทฺทมนุสฺสาเวสุํ – ‘นิกฺขนฺตํ โข, มาริสา, เอกํ วสฺสํ; ปญฺจ ทานิ วสฺสานิ เสสานิ; ปญฺจนฺนํ วสฺสานํ อจฺจเยน พนฺธุมตี ราชธานี อุปสงฺกมิตพฺพา ปาติโมกฺขุทฺเทสายา’ติ. ทฺวีสุ วสฺเสสุ นิกฺขนฺเตสุ… ตีสุ วสฺเสสุ นิกฺขนฺเตสุ… จตูสุ วสฺเสสุ นิกฺขนฺเตสุ… ปญฺจสุ วสฺเสสุ นิกฺขนฺเตสุ เทวตา สทฺทมนุสฺสาเวสุํ – ‘นิกฺขนฺตานิ โข, มาริสา, ปญฺจวสฺสานิ; เอกํ ทานิ วสฺสํ เสสํ; เอกสฺส วสฺสสฺส อจฺจเยน พนฺธุมตี ราชธานี อุปสงฺกมิตพฺพา ปาติโมกฺขุทฺเทสายา’ติ. ฉสุ วสฺเสสุ นิกฺขนฺเตสุ เทวตา สทฺทมนุสฺสาเวสุํ – ‘นิกฺขนฺตานิ โข, มาริสา, ฉพฺพสฺสานิ, สมโย ทานิ พนฺธุมตึ ราชธานึ อุปสงฺกมิตุํ ปาติโมกฺขุทฺเทสายา’ติ. อถ โข เต, ภิกฺขเว, ภิกฺขู อปฺเปกจฺเจ สเกน อิทฺธานุภาเวน อปฺเปกจฺเจ เทวตานํ อิทฺธานุภาเวน เอกาเหเนว พนฺธุมตึ ราชธานึ อุปสงฺกมึสุ ปาติโมกฺขุทฺเทสายาติ. ८९. त्या वेळी जम्बुद्विपात चौऱ्याऐंशी हजार विहार होते. एक वर्ष उलटून गेल्यावर देवतांनी अशी घोषणा केली – ‘हे सन्माननीयहो! एक वर्ष उलटून गेले आहे; आता पाच वर्षे शिल्लक आहेत. पाच वर्षांच्या समाप्तीनंतर प्रातिमोक्ष उद्देशासाठी बंधुमती राजधानीत उपस्थित व्हावे.’ दोन वर्षे उलटून गेल्यावर... तीन वर्षे उलटून गेल्यावर... चार वर्षे उलटून गेल्यावर... पाच वर्षे उलटून गेल्यावर देवतांनी अशी घोषणा केली – ‘हे सन्माननीयहो! पाच वर्षे उलटून गेली आहेत; आता एक वर्ष शिल्लक आहे. एका वर्षाच्या समाप्तीनंतर प्रातिमोक्ष उद्देशासाठी बंधुमती राजधानीत उपस्थित व्हावे.’ सहा वर्षे उलटून गेल्यावर देवतांनी अशी घोषणा केली – ‘हे सन्माननीयहो! सहा वर्षे उलटून गेली आहेत, आता प्रातिमोक्ष उद्देशासाठी बंधुमती राजधानीत उपस्थित होण्याची वेळ आली आहे.’ तेव्हा, भिक्षूंनो, ते भिक्षू काही स्वतःच्या ऋद्धीबळाने तर काही देवतांच्या ऋद्धीबळाने एकाच दिवसात प्रातिमोक्ष उद्देशासाठी बंधुमती राजधानीत उपस्थित झाले. ๙๐. ‘‘ตตฺร [Pg.42] สุทํ, ภิกฺขเว, วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ภิกฺขุสงฺเฆ เอวํ ปาติโมกฺขํ อุทฺทิสติ – ९०. भिक्षूंनो, तेथे अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी भिक्षुसंघाला अशा प्रकारे प्रातिमोक्ष उपदेश करत असत – ‘ขนฺตี ปรมํ ตโป ติติกฺขา,นิพฺพานํ ปรมํ วทนฺติ พุทฺธา; น หิ ปพฺพชิโต ปรูปฆาตี,น สมโณ โหติ ปรํ วิเหฐยนฺโต. ‘तितिक्षा (सहनशीलता) हाच परम तप आहे, बुद्ध निर्वाणालाच परम (सर्वोच्च) म्हणतात; दुसऱ्याला इजा करणारा प्रव्रजित (संन्यासी) असू शकत नाही, आणि दुसऱ्याला त्रास देणारा श्रमण असू शकत नाही. ‘สพฺพปาปสฺส อกรณํ, กุสลสฺส อุปสมฺปทา; สจิตฺตปริโยทปนํ, เอตํ พุทฺธานสาสนํ. ‘सर्व पापांचा त्याग करणे, कुशल कर्मांचे संपादन करणे आणि स्वतःच्या चित्ताला पूर्णपणे शुद्ध करणे; हीच बुद्धांची शिकवण आहे. ‘อนูปวาโท อนูปฆาโต, ปาติโมกฺเข จ สํวโร; มตฺตญฺญุตา จ ภตฺตสฺมึ, ปนฺตญฺจ สยนาสนํ; อธิจิตฺเต จ อาโยโค, เอตํ พุทฺธานสาสน’นฺติ. ‘कोणाचीही निंदा न करणे, कोणालाही इजा न करणे, प्रातिमोक्षात संयम राखणे, भोजनात प्रमाण जाणणे, एकांत स्थळी निवास करणे आणि उच्च चित्ताच्या अभ्यासात मग्न राहणे; हीच बुद्धांची शिकवण आहे.’ เทวตาโรจนํ देवतांचे निवेदन ๙๑. ‘‘เอกมิทาหํ, ภิกฺขเว, สมยํ อุกฺกฏฺฐายํ วิหรามิ สุภควเน สาลราชมูเล. ตสฺส มยฺหํ, ภิกฺขเว, รโหคตสฺส ปฏิสลฺลีนสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘น โข โส สตฺตาวาโส สุลภรูโป, โย มยา อนาวุตฺถปุพฺโพ อิมินา ทีเฆน อทฺธุนา อญฺญตฺร สุทฺธาวาเสหิ เทเวหิ. ยํนูนาหํ เยน สุทฺธาวาสา เทวา เตนุปสงฺกเมยฺย’นฺติ. อถ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย, ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย, เอวเมว อุกฺกฏฺฐายํ สุภควเน สาลราชมูเล อนฺตรหิโต อวิเหสุ เทเวสุ ปาตุรโหสึ. ตสฺมึ, ภิกฺขเว, เทวนิกาเย อเนกานิ เทวตาสหสฺสานิ อเนกานิ เทวตาสตสหสฺสานิ เยนาหํ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐํสุ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข, ภิกฺขเว, ตา เทวตา มํ เอตทโวจุํ – ‘อิโต โส, มาริสา, เอกนวุติกปฺเป ยํ วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก อุทปาทิ. วิปสฺสี, มาริสา, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ขตฺติโย ชาติยา อโหสิ, ขตฺติยกุเล อุทปาทิ. วิปสฺสี, มาริสา, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โกณฺฑญฺโญ โคตฺเตน อโหสิ[Pg.43]. วิปสฺสิสฺส, มาริสา, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อสีติวสฺสสหสฺสานิ อายุปฺปมาณํ อโหสิ. วิปสฺสี, มาริสา, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ปาฏลิยา มูเล อภิสมฺพุทฺโธ. วิปสฺสิสฺส, มาริสา, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ขณฺฑติสฺสํ นาม สาวกยุคํ อโหสิ อคฺคํ ภทฺทยุคํ. วิปสฺสิสฺส, มาริสา, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ตโย สาวกานํ สนฺนิปาตา อเหสุํ. เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ อฏฺฐสฏฺฐิภิกฺขุสตสหสฺสํ. เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ ภิกฺขุสตสหสฺสํ. เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ อสีติภิกฺขุสหสฺสานิ. วิปสฺสิสฺส, มาริสา, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อิเม ตโย สาวกานํ สนฺนิปาตา อเหสุํ สพฺเพสํเยว ขีณาสวานํ. วิปสฺสิสฺส, มาริสา, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อโสโก นาม ภิกฺขุ อุปฏฺฐาโก อโหสิ อคฺคุปฏฺฐาโก. วิปสฺสิสฺส, มาริส, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส พนฺธุมา นาม ราชา ปิตา อโหสิ. พนฺธุมตี นาม เทวี มาตา อโหสิ ชเนตฺติ. พนฺธุมสฺส รญฺโญ พนฺธุมตี นาม นครํ ราชธานี อโหสิ. วิปสฺสิสฺส, มาริสา, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เอวํ อภินิกฺขมนํ อโหสิ เอวํ ปพฺพชฺชา เอวํ ปธานํ เอวํ อภิสมฺโพธิ เอวํ ธมฺมจกฺกปฺปวตฺตนํ. เต มยํ, มาริสา, วิปสฺสิมฺหิ ภควติ พฺรหฺมจริยํ จริตฺวา กาเมสุ กามจฺฉนฺทํ วิราเชตฺวา อิธูปปนฺนา’ติ …เป… ९१. “भिक्षूंनो, एकदा मी उक्कठ्ठा नगरीत सुभग वनात एका मोठ्या साल वृक्षाच्या मुळाशी विहार करत होतो. भिक्षूंनो, तेथे एकांतात ध्यानस्थ बसलो असताना माझ्या मनात असा विचार आला – ‘या दीर्घ संसारात असा कोणताही प्राण्यांचा निवास नाही, जिथे मी यापूर्वी कधी गेलो नाही, केवळ शुद्धावास देवलोकाशिवाय. मग मी शुद्धावास देवलोकातील देवतांकडे का जाऊ नये?’ तेव्हा, भिक्षूंनो, ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपला दुमडलेला हात पसरतो किंवा पसरलेला हात दुमडतो, त्याचप्रमाणे मी उक्कठ्ठा येथील सुभग वनातील साल वृक्षाच्या मुळाशी अंतर्धान पावून अविह देवलोकात प्रकट झालो. भिक्षूंनो, त्या देवलोकातील हजारो आणि लाखो देवता मी जिथे होतो तिथे आल्या; आणि मला अभिवादन करून एका बाजूला उभ्या राहिल्या. एका बाजूला उभ्या राहिलेल्या त्या देवता मला म्हणाल्या – ‘हे सन्माननीय! आजपासून एक्याण्णव कल्प मागे अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी या जगात प्रकट झाले होते. हे सन्माननीय! भगवान विपस्सी अर्हत, सम्यक्संबुद्ध जन्माने क्षत्रिय होते आणि त्यांचा जन्म क्षत्रिय कुळात झाला होता. हे सन्माननीय! भगवान विपस्सी अर्हत, सम्यक्संबुद्ध गोत्राने कौंडिण्य होते. हे सन्माननीय! अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांचे आयुष्यमान ऐंशी हजार वर्षे होते. हे सन्माननीय! भगवान विपस्सी अर्हत, सम्यक्संबुद्ध पाटली वृक्षाच्या मुळाशी संबोधी प्राप्त झाले होते. हे सन्माननीय! अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांचे खंड आणि तिस्स नावाचे अग्रश्रावक होते. हे सन्माननीय! अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांच्या श्रावकांचे तीन संमेलन झाले होते. श्रावकांचे पहिले संमेलन अडुसष्ट लाख भिक्षूंचे होते. दुसरे संमेलन एक लाख भिक्षूंचे होते. तिसरे संमेलन ऐंशी हजार भिक्षूंचे होते. हे सन्माननीय! अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांच्या श्रावकांचे हे तिन्ही संमेलन केवळ क्षीणास्रव (अर्हत) भिक्षूंचेच होते. हे सन्माननीय! अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांचे अशोक नावाचे भिक्षू मुख्य उपस्थायक होते. हे सन्माननीय! अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांचे पिता बंधुमान नावाचे राजे होते. त्यांची माता (जन्मदात्री) बंधुमती नावाची राणी होती. राजा बंधुमान यांची राजधानी बंधुमती नावाचे नगर होते. हे सन्माननीय! अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान विपस्सी यांचे महाभिनिष्क्रमण असे होते, प्रव्रज्या अशी होती, प्रधान (तपश्चर्या) अशी होती, संबोधी अशी होती आणि धम्मचक्रप्रवर्तन असे होते. हे सन्माननीय! आम्ही भगवान विपस्सी यांच्या शासनात ब्रह्मचर्याचे पालन करून, कामभोगांविषयीची आसक्ती नष्ट करून येथे उत्पन्न झालो आहोत.’ ...इत्यादी... ‘‘ตสฺมึเยว โข, ภิกฺขเว, เทวนิกาเย อเนกานิ เทวตาสหสฺสานิ อเนกานิ เทวตาสตสหสฺสานิ เยนาหํ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐํสุ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข, ภิกฺขเว, ตา เทวตา มํ เอตทโวจุํ – ‘อิมสฺมึเยว โข, มาริสา, ภทฺทกปฺเป ภควา เอตรหิ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก อุปฺปนฺโน. ภควา, มาริสา, ขตฺติโย ชาติยา ขตฺติยกุเล อุปฺปนฺโน. ภควา, มาริสา, โคตโม โคตฺเตน. ภควโต, มาริสา, อปฺปกํ อายุปฺปมาณํ ปริตฺตํ ลหุกํ โย จิรํ ชีวติ, โส วสฺสสตํ อปฺปํ วา ภิยฺโย. ภควา, มาริสา, อสฺสตฺถสฺส มูเล อภิสมฺพุทฺโธ. ภควโต, มาริสา, สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานํ นาม สาวกยุคํ อโหสิ อคฺคํ ภทฺทยุคํ[Pg.44]. ภควโต, มาริสา, เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ อฑฺฒเตฬสานิ ภิกฺขุสตานิ. ภควโต, มาริสา, อยํ เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ สพฺเพสํเยว ขีณาสวานํ. ภควโต, มาริสา, อานนฺโท นาม ภิกฺขุ อุปฏฺฐาโก อโหสิ อคฺคุปฏฺฐาโก. ภควโต, มาริสา, สุทฺโธทโน นาม ราชา ปิตา อโหสิ. มายา นาม เทวี มาตา อโหสิ ชเนตฺติ. กปิลวตฺถุ นาม นครํ ราชธานี อโหสิ. ภควโต, มาริสา, เอวํ อภินิกฺขมนํ อโหสิ เอวํ ปพฺพชฺชา เอวํ ปธานํ เอวํ อภิสมฺโพธิ เอวํ ธมฺมจกฺกปฺปวตฺตนํ. เต มยํ, มาริสา, ภควติ พฺรหฺมจริยํ จริตฺวา กาเมสุ กามจฺฉนฺทํ วิราเชตฺวา อิธูปปนฺนา’ติ. “भिक्खूहो, त्याच देवलोकात अनेक हजार आणि अनेक लक्ष देव माझ्याकडे आले; आणि मला अभिवादन करून एका बाजूला उभे राहिले. एका बाजूला उभे राहून, भिक्खूहो, ते देव मला असे म्हणाले – ‘हे सौम्य, याच भद्रकल्पात आता भगवान अर्हत सम्यक्संबुद्ध जगात उत्पन्न झाले आहेत. भगवान, हे सौम्य, जातीने क्षत्रिय असून क्षत्रिय कुळात उत्पन्न झाले आहेत. भगवान, हे सौम्य, गोत्राने गोतम आहेत. भगवंतांचे, हे सौम्य, आयुष्यमान अल्प, मर्यादित आणि वेगाने संपणारे आहे; जो दीर्घकाळ जगतो, तो शंभर वर्षे किंवा त्याहून थोडे कमी किंवा अधिक जगतो. भगवान, हे सौम्य, अस्सत्थ वृक्षाच्या मुळाशी अभिसंबुद्ध झाले. भगवंतांचे, हे सौम्य, सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान नावाचे अग्र आणि भद्र श्रावकयुगल होते. भगवंतांची, हे सौम्य, श्रावकांची एकच सभा झाली, ज्यात साडेबाराशे (१२५०) भिक्खू होते. भगवंतांची, हे सौम्य, श्रावकांची ही एकच सभा झाली, ज्यात सर्वच्या सर्व क्षीणासव होते. भगवंतांचे, हे सौम्य, आनंद नावाचे भिक्खू उपस्थायक होते. भगवंतांचे, हे सौम्य, शुद्धोदन नावाचे राजे पिता होते. माया नावाची देवी जन्मदात्री माता होती. कपिलवत्थु नावाचे नगर राजधानी होते. भगवंतांचे, हे सौम्य, अशा प्रकारे अभिनिष्क्रमण झाले, अशा प्रकारे प्रव्रज्या झाली, अशा प्रकारे प्रधान झाले, अशा प्रकारे अभिसंबोधी झाली, अशा प्रकारे धम्मचक्कपवत्तन झाले. आम्ही, हे सौम्य, भगवंतांच्या शासनात ब्रह्मचर्य आचरून, कामांमधील कामच्छंद नष्ट करून येथे उत्पन्न झालो आहोत.’” ๙๒. ‘‘อถ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อวิเหหิ เทเวหิ สทฺธึ เยน อตปฺปา เทวา เตนุปสงฺกมึ…เป… อถ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อวิเหหิ จ เทเวหิ อตปฺเปหิ จ เทเวหิ สทฺธึ เยน สุทสฺสา เทวา เตนุปสงฺกมึ. อถ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อวิเหหิ จ เทเวหิ อตปฺเปหิ จ เทเวหิ สุทสฺเสหิ จ เทเวหิ สทฺธึ เยน สุทสฺสี เทวา เตนุปสงฺกมึ. อถ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, อวิเหหิ จ เทเวหิ อตปฺเปหิ จ เทเวหิ สุทสฺเสหิ จ เทเวหิ สุทสฺสีหิ จ เทเวหิ สทฺธึ เยน อกนิฏฺฐา เทวา เตนุปสงฺกมึ. ตสฺมึ, ภิกฺขเว, เทวนิกาเย อเนกานิ เทวตาสหสฺสานิ อเนกานิ เทวตาสตสหสฺสานิ เยนาหํ เตนุปสงฺกมึสุ, อุปสงฺกมิตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐํสุ. ९२. “त्यानंतर, भिक्खूहो, मी अविह देवांसह जेथे अतप्प देव होते तेथे गेलो... पे... त्यानंतर, भिक्खूहो, मी अविह आणि अतप्प देवांसह जेथे सुदस्स देव होते तेथे गेलो. त्यानंतर, भिक्खूहो, मी अविह, अतप्प आणि सुदस्स देवांसह जेथे सुदस्सी देव होते तेथे गेलो. त्यानंतर, भिक्खूहो, मी अविह, अतप्प, सुदस्स आणि सुदस्सी देवांसह जेथे अकनिठ्ठ देव होते तेथे गेलो. भिक्खूहो, त्या देवलोकात अनेक हजार आणि अनेक लक्ष देव माझ्याकडे आले; आणि मला अभिवादन करून एका बाजूला उभे राहिले.” ‘‘เอกมนฺตํ ฐิตา โข, ภิกฺขเว, ตา เทวตา มํ เอตทโวจุํ – ‘อิโต โส, มาริสา, เอกนวุติกปฺเป ยํ วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก อุทปาทิ. วิปสฺสี, มาริสา, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ขตฺติโย ชาติยา อโหสิ. ขตฺติยกุเล อุทปาทิ. วิปสฺสี, มาริสา, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โกณฺฑญฺโญ โคตฺเตน อโหสิ. วิปสฺสิสฺส, มาริสา, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อสีติวสฺสสหสฺสานิ อายุปฺปมาณํ อโหสิ. วิปสฺสี, มาริสา, ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ปาฏลิยา มูเล อภิสมฺพุทฺโธ. วิปสฺสิสฺส, มาริสา, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ขณฺฑติสฺสํ นาม สาวกยุคํ อโหสิ อคฺคํ ภทฺทยุคํ. วิปสฺสิสฺส, มาริสา, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ตโย สาวกานํ สนฺนิปาตา อเหสุํ. เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ อฏฺฐสฏฺฐิภิกฺขุสตสหสฺสํ. เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ [Pg.45] ภิกฺขุสตสหสฺสํ. เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ อสีติภิกฺขุสหสฺสานิ. วิปสฺสิสฺส, มาริสา, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อิเม ตโย สาวกานํ สนฺนิปาตา อเหสุํ สพฺเพสํเยว ขีณาสวานํ. วิปสฺสิสฺส, มาริสา, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส อโสโก นาม ภิกฺขุ อุปฏฺฐาโก อโหสิ อคฺคุปฏฺฐาโก. วิปสฺสิสฺส, มาริสา, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส พนฺธุมา นาม ราชา ปิตา อโหสิ พนฺธุมตี นาม เทวี มาตา อโหสิ ชเนตฺติ. พนฺธุมสฺส รญฺโญ พนฺธุมตี นาม นครํ ราชธานี อโหสิ. วิปสฺสิสฺส, มาริสา, ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เอวํ อภินิกฺขมนํ อโหสิ เอวํ ปพฺพชฺชา เอวํ ปธานํ เอวํ อภิสมฺโพธิ, เอวํ ธมฺมจกฺกปฺปวตฺตนํ. เต มยํ, มาริสา, วิปสฺสิมฺหิ ภควติ พฺรหฺมจริยํ จริตฺวา กาเมสุ กามจฺฉนฺทํ วิราเชตฺวา อิธูปปนฺนา’ติ. ตสฺมึเยว โข, ภิกฺขเว, เทวนิกาเย อเนกานิ เทวตาสหสฺสานิ อเนกานิ เทวตาสตสหสฺสานิ เยนาหํ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐํสุ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข, ภิกฺขเว, ตา เทวตา มํ เอตทโวจุํ – ‘อิโต โส, มาริสา, เอกตึเส กปฺเป ยํ สิขี ภควา…เป… เต มยํ, มาริสา, สิขิมฺหิ ภควติ ตสฺมิญฺเญว โข มาริสา, เอกตึเส กปฺเป ยํ เวสฺสภู ภควา…เป… เต มยํ, มาริสา, เวสฺสภุมฺหิ ภควติ…เป… อิมสฺมึเยว โข, มาริสา, ภทฺทกปฺเป กกุสนฺโธ โกณาคมโน กสฺสโป ภควา…เป… เต มยํ, มาริสา, กกุสนฺธมฺหิ โกณาคมนมฺหิ กสฺสปมฺหิ ภควติ พฺรหฺมจริยํ จริตฺวา กาเมสุ กามจฺฉนฺทํ วิราเชตฺวา อิธูปปนฺนา’ติ. “एका बाजूला उभे राहून, भिक्खूहो, ते देव मला असे म्हणाले – ‘हे सौम्य, येथून ९१ कल्पांपूर्वी विपस्सी भगवान अर्हत सम्यक्संबुद्ध जगात उत्पन्न झाले. विपस्सी, हे सौम्य, भगवान अर्हत सम्यक्संबुद्ध जातीने क्षत्रिय होते. ते क्षत्रिय कुळात उत्पन्न झाले. विपस्सी, हे सौम्य, भगवान अर्हत सम्यक्संबुद्ध गोत्राने कोण्डञ्ञ होते. विपस्सी, हे सौम्य, भगवान अर्हत सम्यक्संबुद्धांचे आयुष्यमान ऐंशी हजार (८०,०००) वर्षे होते. विपस्सी, हे सौम्य, भगवान अर्हत सम्यक्संबुद्ध पाटली वृक्षाच्या मुळाशी अभिसंबुद्ध झाले. विपस्सी, हे सौम्य, भगवान अर्हत सम्यक्संबुद्धांचे खण्ड आणि तिस्स नावाचे अग्र आणि भद्र श्रावकयुगल होते. विपस्सी, हे सौम्य, भगवान अर्हत सम्यक्संबुद्धांच्या श्रावकांच्या तीन सभा झाल्या. श्रावकांची एक सभा ६८ लाख (६,८००,०००) भिक्खूंची होती. श्रावकांची दुसरी सभा एक लाख (१,००,०००) भिक्खूंची होती. श्रावकांची तिसरी सभा ऐंशी हजार (८०,०००) भिक्खूंची होती. विपस्सी, हे सौम्य, भगवान अर्हत सम्यक्संबुद्धांच्या श्रावकांच्या या तिन्ही सभा केवळ क्षीणासवांच्याच होत्या. विपस्सी, हे सौम्य, भगवान अर्हत सम्यक्संबुद्धांचे असोक नावाचे भिक्खू उपस्थायक होते. विपस्सी, हे सौम्य, भगवान अर्हत सम्यक्संबुद्धांचे बंधुमान नावाचे राजे पिता होते आणि बंधुमती नावाची देवी जन्मदात्री माता होती. बंधुमान राजाचे बंधुमती नावाचे नगर राजधानी होते. विपस्सी, हे सौम्य, भगवान अर्हत सम्यक्संबुद्धांचे अशा प्रकारे अभिनिष्क्रमण झाले, अशा प्रकारे प्रव्रज्या झाली, अशा प्रकारे प्रधान झाले, अशा प्रकारे अभिसंबोधी झाली, अशा प्रकारे धम्मचक्कपवत्तन झाले. आम्ही, हे सौम्य, विपस्सी भगवंतांच्या शासनात ब्रह्मचर्य आचरून, कामांमधील कामच्छंद नष्ट करून येथे उत्पन्न झालो आहोत.’ भिक्खूहो, त्याच देवलोकात अनेक हजार आणि अनेक लक्ष देव माझ्याकडे आले; आणि मला अभिवादन करून एका बाजूला उभे राहिले. एका बाजूला उभे राहून, भिक्खूहो, ते देव मला असे म्हणाले – ‘हे सौम्य, येथून ३१ कल्पांपूर्वी शिखी भगवान... पे... आम्ही, हे सौम्य, शिखी भगवंतांच्या शासनात... हे सौम्य, त्याच ३१ व्या कल्पात वेस्सभू भगवान... पे... आम्ही, हे सौम्य, वेस्सभू भगवंतांच्या शासनात... पे... हे सौम्य, याच भद्रकल्पात ककुसंध, कोणागमन, कस्सप भगवान... पे... आम्ही, हे सौम्य, ककुसंध, कोणागमन, कस्सप भगवंतांच्या शासनात ब्रह्मचर्य आचरून, कामांमधील कामच्छंद नष्ट करून येथे उत्पन्न झालो आहोत.’” ๙๓. ‘‘ตสฺมึเยว โข, ภิกฺขเว, เทวนิกาเย อเนกานิ เทวตาสหสฺสานิ อเนกานิ เทวตาสตสหสฺสานิ เยนาหํ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐํสุ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข, ภิกฺขเว, ตา เทวตา มํ เอตทโวจุํ – ‘อิมสฺมึเยว โข, มาริสา, ภทฺทกปฺเป ภควา เอตรหิ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก อุปฺปนฺโน. ภควา, มาริสา, ขตฺติโย ชาติยา, ขตฺติยกุเล อุปฺปนฺโน. ภควา, มาริสา, โคตโม โคตฺเตน. ภควโต, มาริสา, อปฺปกํ อายุปฺปมาณํ ปริตฺตํ ลหุกํ โย จิรํ ชีวติ, โส วสฺสสตํ อปฺปํ วา ภิยฺโย. ภควา, มาริสา, อสฺสตฺถสฺส มูเล อภิสมฺพุทฺโธ. ภควโต, มาริสา, สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานํ นาม สาวกยุคํ อโหสิ อคฺคํ ภทฺทยุคํ. ภควโต[Pg.46], มาริสา, เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ อฑฺฒเตฬสานิ ภิกฺขุสตานิ. ภควโต, มาริสา, อยํ เอโก สาวกานํ สนฺนิปาโต อโหสิ สพฺเพสํเยว ขีณาสวานํ. ภควโต, มาริสา, อานนฺโท นาม ภิกฺขุ อุปฏฺฐาโก อคฺคุปฏฺฐาโก อโหสิ. ภควโต, มาริสา, สุทฺโธทโน นาม ราชา ปิตา อโหสิ. มายา นาม เทวี มาตา อโหสิ ชเนตฺติ. กปิลวตฺถุ นาม นครํ ราชธานี อโหสิ. ภควโต, มาริสา, เอวํ อภินิกฺขมนํ อโหสิ, เอวํ ปพฺพชฺชา, เอวํ ปธานํ, เอวํ อภิสมฺโพธิ, เอวํ ธมฺมจกฺกปฺปวตฺตนํ. เต มยํ, มาริสา, ภควติ พฺรหฺมจริยํ จริตฺวา กาเมสุ กามจฺฉนฺทํ วิราเชตฺวา อิธูปปนฺนา’ติ. ९३. “भिक्खूहो, त्याच देवलोकातून अनेक हजार आणि अनेक लाख देवता मी जेथे होतो तेथे आल्या; आल्यावर त्यांनी मला अभिवादन केले आणि त्या एका बाजूला उभ्या राहिल्या. एका बाजूला उभ्या राहिलेल्या त्या देवता मला असे म्हणाल्या – ‘हे पूज्य, याच भद्रकल्पात आता अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान जगात उत्पन्न झाले आहेत. हे पूज्य, भगवान जातीने क्षत्रिय आहेत, क्षत्रिय कुळात उत्पन्न झाले आहेत. हे पूज्य, भगवान गोत्राने गोतम आहेत. हे पूज्य, भगवंतांचे आयुष्यमान अल्प, थोडे आणि मर्यादित आहे; जो दीर्घकाळ जगतो, तो शंभर वर्षे किंवा त्यापेक्षा थोडे कमी-अधिक जगतो. हे पूज्य, भगवान पिंपळाच्या (अस्सत्थ) वृक्षाखाली संबोधी प्राप्त झाले आहेत. हे पूज्य, भगवंतांचे सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान नावाचे श्रावकयुगल (दोन प्रमुख श्रावक) हे अग्र आणि भद्र (उत्कृष्ट) युगल होते. हे पूज्य, भगवंतांच्या श्रावकांचा एकच संनिपात (सभा/मेळावा) झाला, ज्यात साडेबाराशे (१२५०) भिक्खू होते. हे पूज्य, भगवंतांच्या श्रावकांचा हा एकच संनिपात झाला आणि ते सर्वच्या सर्व क्षीणास्रव (अर्हत) होते. हे पूज्य, भगवंतांचे आनंद नावाचे भिक्खू उपस्थायक (सेवक) आणि अग्र-उपस्थायक होते. हे पूज्य, भगवंतांचे पिता शुद्धोदन नावाचे राजे होते. माया नावाची देवी त्यांची जन्मदात्री माता होती. कपिलवस्तू नावाचे नगर त्यांची राजधानी होते. हे पूज्य, भगवंतांचे महाभिनिष्क्रमण असे झाले, प्रव्रज्या अशी झाली, प्रधान (तप/प्रयत्न) असे झाले, अभिसंबोधी अशी झाली आणि धर्मचक्रप्रवर्तन असे झाले. हे पूज्य, आम्ही भगवंतांच्या शासनात ब्रह्मचर्य आचरून, कामांमधील कामच्छंद (वासना) नष्ट करून येथे उत्पन्न झालो आहोत.’” ๙๔. ‘‘อิติ โข, ภิกฺขเว, ตถาคตสฺเสเวสา ธมฺมธาตุ สุปฺปฏิวิทฺธา, ยสฺสา ธมฺมธาตุยา สุปฺปฏิวิทฺธตฺตา ตถาคโต อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวตฺเต ชาติโตปิ อนุสฺสรติ, นามโตปิ อนุสฺสรติ, โคตฺตโตปิ อนุสฺสรติ, อายุปฺปมาณโตปิ อนุสฺสรติ, สาวกยุคโตปิ อนุสฺสรติ, สาวกสนฺนิปาตโตปิ อนุสฺสรติ ‘เอวํชจฺจา เต ภควนฺโต อเหสุํ’ อิติปิ. ‘เอวํนามา เอวํโคตฺตา เอวํสีลา เอวํธมฺมา เอวํปญฺญา เอวํวิหารี เอวํวิมุตฺตา เต ภควนฺโต อเหสุํ’ อิติปีติ. ९४. “अशा प्रकारे, भिक्खूहो, तथागतांनी या धर्मधातूचे उत्तम प्रकारे आकलन (साक्षात्कार) केले आहे, ज्या धर्मधातूच्या उत्तम आकलनामुळे तथागत भूतकाळातील परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा छेद केलेल्या, संसाराचा मार्ग खंडित केलेल्या, संसारचक्र समाप्त केलेल्या आणि सर्व दुःखांतून मुक्त झालेल्या बुद्धांचे जातीनेही स्मरण करतात, नावानेही स्मरण करतात, गोत्रानेही स्मरण करतात, आयुष्यमानानेही स्मरण करतात, श्रावकयुगलानेही स्मरण करतात, श्रावक संनिपातानेही स्मरण करतात की – ‘ते भगवान अशा जातीचे होते’, ‘ते अशा नावाचे, अशा गोत्राचे, अशा शीलाचे, अशा धर्माचे (समाधीचे), अशा प्रज्ञेचे, अशा विहाराचे (राहणीमानाचे) आणि अशा विमुक्तीचे होते’ असेही स्मरण करतात.” ‘‘เทวตาปิ ตถาคตสฺส เอตมตฺถํ อาโรเจสุํ, เยน ตถาคโต อตีเต พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ฉินฺนปปญฺเจ ฉินฺนวฏุเม ปริยาทินฺนวฏฺเฏ สพฺพทุกฺขวีติวตฺเต ชาติโตปิ อนุสฺสรติ, นามโตปิ อนุสฺสรติ, โคตฺตโตปิ อนุสฺสรติ, อายุปฺปมาณโตปิ อนุสฺสรติ, สาวกยุคโตปิ อนุสฺสรติ, สาวกสนฺนิปาตโตปิ อนุสฺสรติ ‘เอวํชจฺจา เต ภควนฺโต อเหสุํ’ อิติปิ. ‘เอวํนามา เอวํโคตฺตา เอวํสีลา เอวํธมฺมา เอวํปญฺญา เอวํวิหารี เอวํวิมุตฺตา เต ภควนฺโต อเหสุํ’ อิติปี’’ติ. “देवतांनीही तथागतांना हीच गोष्ट सांगितली, ज्यामुळे तथागत भूतकाळातील परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा छेद केलेल्या, संसाराचा मार्ग खंडित केलेल्या, संसारचक्र समाप्त केलेल्या आणि सर्व दुःखांतून मुक्त झालेल्या बुद्धांचे जातीनेही स्मरण करतात, नावानेही स्मरण करतात, गोत्रानेही स्मरण करतात, आयुष्यमानानेही स्मरण करतात, श्रावकयुगलानेही स्मरण करतात, श्रावक संनिपातानेही स्मरण करतात की – ‘ते भगवान अशा जातीचे होते’, ‘ते अशा नावाचे, अशा गोत्राचे, अशा शीलाचे, अशा धर्माचे, अशा प्रज्ञेचे, अशा विहाराचे आणि अशा विमुक्तीचे होते’ असेही स्मरण करतात.” อิทมโวจ ภควา. อตฺตมนา เต ภิกฺขู ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทุนฺติ. भगवान असे म्हणाले. त्या भिक्खूंनी आनंदी होऊन भगवंतांच्या भाषणाचे मनापासून अभिनंदन (स्वीकार) केले. มหาปทานสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ ปฐมํ. पहिले महाप्रदान सुत्त (महापदानसुत्त) समाप्त झाले. ๒. มหานิทานสุตฺตํ २. महानिदान सुत्त ปฏิจฺจสมุปฺปาโท प्रतीत्यसमुत्पाद ๙๕. เอวํ [Pg.47] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา กุรูสุ วิหรติ กมฺมาสธมฺมํ นาม กุรูนํ นิคโม. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ, อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต! ยาว คมฺภีโร จายํ, ภนฺเต, ปฏิจฺจสมุปฺปาโท คมฺภีราวภาโส จ, อถ จ ปน เม อุตฺตานกุตฺตานโก วิย ขายตี’’ติ. ‘‘มา เหวํ, อานนฺท, อวจ, มา เหวํ, อานนฺท, อวจ. คมฺภีโร จายํ, อานนฺท, ปฏิจฺจสมุปฺปาโท คมฺภีราวภาโส จ. เอตสฺส, อานนฺท, ธมฺมสฺส อนนุโพธา อปฺปฏิเวธา เอวมยํ ปชา ตนฺตากุลกชาตา กุลคณฺฐิกชาตา มุญฺชปพฺพชภูตา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ สํสารํ นาติวตฺตติ. ९५. मी असे ऐकले आहे – एका वेळी भगवान कुरु देशात कम्मासधम्म नावाच्या कुरुंच्या नगरात (निगमात) विहार करत होते. तेव्हा आयुष्यमान आनंद जेथे भगवान होते तेथे गेले; गेल्यावर भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले आयुष्यमान आनंद भगवंतांना असे म्हणाले – “आश्चर्य आहे, भंते! अद्भुत आहे, भंते! हा प्रतीत्यसमुत्पाद किती गहन आहे आणि किती गहन भासतो! तरीही मला तो अत्यंत सोपा आणि स्पष्ट वाटतो.” “आनंदा, असे बोलू नकोस, आनंदा, असे बोलू नकोस. हा प्रतीत्यसमुत्पाद गहन आहे आणि गहनच भासतो. आनंदा, या या धर्माचे आकलन न झाल्यामुळे आणि त्याचा वेध (साक्षात्कार) न घेतल्यामुळे ही प्रजा गुंतागुंतीच्या सुताच्या गोळ्यासारखी, विणकराच्या गुंतलेल्या धाग्यासारखी आणि मुंज व बब्बज गवतासारखी होऊन अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि संसाराला पार करू शकत नाही.” ๙๖. ‘‘‘อตฺถิ อิทปฺปจฺจยา ชรามรณ’นฺติ อิติ ปุฏฺเฐน สตา, อานนฺท, อตฺถีติสฺส วจนียํ. ‘กึปจฺจยา ชรามรณ’นฺติ อิติ เจ วเทยฺย, ‘ชาติปจฺจยา ชรามรณ’นฺติ อิจฺจสฺส วจนียํ. ९६. “‘या प्रत्ययामुळे (कारणामुळे) जरामरण आहे का?’ असा प्रश्न विचारला असता, आनंदा, सुज्ञ माणसाने ‘आहे’ असे उत्तर दिले पाहिजे. ‘कशाच्या प्रत्ययामुळे (कारणामुळे) जरामरण होते?’ असे विचारल्यास, ‘जातीच्या (जन्माच्या) प्रत्ययामुळे जरामरण होते’ असे उत्तर दिले पाहिजे.” ‘‘‘อตฺถิ อิทปฺปจฺจยา ชาตี’ติ อิติ ปุฏฺเฐน สตา, อานนฺท, อตฺถีติสฺส วจนียํ. ‘กึปจฺจยา ชาตี’ติ อิติ เจ วเทยฺย, ‘ภวปจฺจยา ชาตี’ติ อิจฺจสฺส วจนียํ. “‘या प्रत्ययामुळे जात (जन्म) आहे का?’ असा प्रश्न विचारला असता, आनंदा, सुज्ञ माणसाने ‘आहे’ असे उत्तर दिले पाहिजे. ‘कशाच्या प्रत्ययामुळे जात होते?’ असे विचारल्यास, ‘भवाच्या प्रत्ययामुळे जात होते’ असे उत्तर दिले पाहिजे.” ‘‘‘อตฺถิ อิทปฺปจฺจยา ภโว’ติ อิติ ปุฏฺเฐน สตา, อานนฺท, อตฺถีติสฺส วจนียํ. ‘กึปจฺจยา ภโว’ติ อิติ เจ วเทยฺย, ‘อุปาทานปจฺจยา ภโว’ติ อิจฺจสฺส วจนียํ. “‘या प्रत्ययामुळे भव आहे का?’ असा प्रश्न विचारला असता, आनंदा, सुज्ञ माणसाने ‘आहे’ असे उत्तर दिले पाहिजे. ‘कशाच्या प्रत्ययामुळे भव होतो?’ असे विचारल्यास, ‘उपादानाच्या प्रत्ययामुळे भव होतो’ असे उत्तर दिले पाहिजे.” ‘‘‘อตฺถิ อิทปฺปจฺจยา อุปาทาน’นฺติ อิติ ปุฏฺเฐน สตา, อานนฺท, อตฺถีติสฺส วจนียํ. ‘กึปจฺจยา อุปาทาน’นฺติ อิติ เจ วเทยฺย, ‘ตณฺหาปจฺจยา อุปาทาน’นฺติ อิจฺจสฺส วจนียํ. “‘या प्रत्ययामुळे उपादान आहे का?’ असा प्रश्न विचारला असता, आनंदा, सुज्ञ माणसाने ‘आहे’ असे उत्तर दिले पाहिजे. ‘कशाच्या प्रत्ययामुळे उपादान होते?’ असे विचारल्यास, ‘तण्हेच्या (तृष्णेच्या) प्रत्ययामुळे उपादान होते’ असे उत्तर दिले पाहिजे.” ‘‘‘อตฺถิ [Pg.48] อิทปฺปจฺจยา ตณฺหา’ติ อิติ ปุฏฺเฐน สตา, อานนฺท, อตฺถีติสฺส วจนียํ. ‘กึปจฺจยา ตณฺหา’ติ อิติ เจ วเทยฺย, ‘เวทนาปจฺจยา ตณฺหา’ติ อิจฺจสฺส วจนียํ. “‘या प्रत्ययामुळे तण्हा (तृष्णा) आहे का?’ असा प्रश्न विचारला असता, आनंदा, सुज्ञ माणसाने ‘आहे’ असे उत्तर दिले पाहिजे. ‘कशाच्या प्रत्ययामुळे तण्हा होते?’ असे विचारल्यास, ‘वेदनेच्या प्रत्ययामुळे तण्हा होते’ असे उत्तर दिले पाहिजे.” ‘‘‘อตฺถิ อิทปฺปจฺจยา เวทนา’ติ อิติ ปุฏฺเฐน สตา, อานนฺท, อตฺถีติสฺส วจนียํ. ‘กึปจฺจยา เวทนา’ติ อิติ เจ วเทยฺย, ‘ผสฺสปจฺจยา เวทนา’ติ อิจฺจสฺส วจนียํ. “‘या प्रत्ययामुळे वेदना आहे का?’ असा प्रश्न विचारला असता, आनंदा, सुज्ञ माणसाने ‘आहे’ असे उत्तर दिले पाहिजे. ‘कशाच्या प्रत्ययामुळे वेदना होते?’ असे विचारल्यास, ‘फस्साच्या (स्पर्शाच्या) प्रत्ययामुळे वेदना होते’ असे उत्तर दिले पाहिजे.” ‘‘‘อตฺถิ อิทปฺปจฺจยา ผสฺโส’ติ อิติ ปุฏฺเฐน สตา, อานนฺท, อตฺถีติสฺส วจนียํ. ‘กึปจฺจยา ผสฺโส’ติ อิติ เจ วเทยฺย, ‘นามรูปปจฺจยา ผสฺโส’ติ อิจฺจสฺส วจนียํ. “‘या प्रत्ययामुळे फस्स (स्पर्श) आहे का?’ असा प्रश्न विचारला असता, आनंदा, सुज्ञ माणसाने ‘आहे’ असे उत्तर दिले पाहिजे. ‘कशाच्या प्रत्ययामुळे फस्स होतो?’ असे विचारल्यास, ‘नामरूपाच्या प्रत्ययामुळे फस्स होतो’ असे उत्तर दिले पाहिजे.” ‘‘‘อตฺถิ อิทปฺปจฺจยา นามรูป’นฺติ อิติ ปุฏฺเฐน สตา, อานนฺท, อตฺถีติสฺส วจนียํ. ‘กึปจฺจยา นามรูป’นฺติ อิติ เจ วเทยฺย, ‘วิญฺญาณปจฺจยา นามรูป’นฺติ อิจฺจสฺส วจนียํ. “‘या प्रत्ययामुळे नामरूप आहे का?’ असा प्रश्न विचारला असता, आनंदा, सुज्ञ माणसाने ‘आहे’ असे उत्तर दिले पाहिजे. ‘कशाच्या प्रत्ययामुळे नामरूप होते?’ असे विचारल्यास, ‘विज्ञानाच्या (विञ्ञाण) प्रत्ययामुळे नामरूप होते’ असे उत्तर दिले पाहिजे.” ‘‘‘อตฺถิ อิทปฺปจฺจยา วิญฺญาณ’นฺติ อิติ ปุฏฺเฐน สตา, อานนฺท, อตฺถีติสฺส วจนียํ. ‘กึปจฺจยา วิญฺญาณ’นฺติ อิติ เจ วเทยฺย, ‘นามรูปปจฺจยา วิญฺญาณ’นฺติ อิจฺจสฺส วจนียํ. “‘या प्रत्ययामुळे विज्ञान (विञ्ञाण) आहे का?’ असा प्रश्न विचारला असता, आनंदा, सुज्ञ माणसाने ‘आहे’ असे उत्तर दिले पाहिजे. ‘कशाच्या प्रत्ययामुळे विज्ञान होते?’ असे विचारल्यास, ‘नामरूपाच्या प्रत्ययामुळे विज्ञान होते’ असे उत्तर दिले पाहिजे.” ๙๗. ‘‘อิติ โข, อานนฺท, นามรูปปจฺจยา วิญฺญาณํ, วิญฺญาณปจฺจยา นามรูปํ, นามรูปปจฺจยา ผสฺโส, ผสฺสปจฺจยา เวทนา, เวทนาปจฺจยา ตณฺหา, ตณฺหาปจฺจยา อุปาทานํ, อุปาทานปจฺจยา ภโว, ภวปจฺจยา ชาติ, ชาติปจฺจยา ชรามรณํ โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสา สมฺภวนฺติ. เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส สมุทโย โหติ. ९७. अशा प्रकारे, आनंदा, नामरूपाच्या प्रत्ययाने विज्ञान उत्पन्न होते; विज्ञानाच्या प्रत्ययाने नामरूप उत्पन्न होते; नामरूपाच्या प्रत्ययाने स्पर्श उत्पन्न होतो; स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा उत्पन्न होते; तृष्णेच्या प्रत्ययाने उपादान उत्पन्न होते; उपादानाच्या प्रत्ययाने भव उत्पन्न होतो; भवाच्या प्रत्ययाने जाती (जन्म) उत्पन्न होते; आणि जातीच्या प्रत्ययाने जरा-मरण, शोक, परिदेव (क्रंदन), दुःख, दोमनस्य (मनस्ताप) आणि उपायास (हताशपणा) उत्पन्न होतात. अशा प्रकारे या संपूर्ण दुःखसमूहाचा उदय होतो. ๙๘. ‘‘‘ชาติปจฺจยา ชรามรณ’นฺติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, ตทานนฺท, อิมินาเปตํ ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา ชาติปจฺจยา ชรามรณํ. ชาติ จ หิ, อานนฺท, นาภวิสฺส สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ กสฺสจิ กิมฺหิจิ, เสยฺยถิทํ – เทวานํ วา เทวตฺตาย, คนฺธพฺพานํ วา คนฺธพฺพตฺตาย, ยกฺขานํ วา ยกฺขตฺตาย, ภูตานํ วา ภูตตฺตาย, มนุสฺสานํ วา มนุสฺสตฺตาย, จตุปฺปทานํ วา จตุปฺปทตฺตาย, ปกฺขีนํ วา ปกฺขิตฺตาย, สรีสปานํ วา สรีสปตฺตาย, เตสํ เตสญฺจ หิ, อานนฺท, สตฺตานํ ตทตฺตาย [Pg.49] ชาติ นาภวิสฺส. สพฺพโส ชาติยา อสติ ชาตินิโรธา อปิ นุ โข ชรามรณํ ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท, เอเสว เหตุ เอตํ นิทานํ เอส สมุทโย เอส ปจฺจโย ชรามรณสฺส, ยทิทํ ชาติ’’. ९८. ‘जातीच्या प्रत्ययाने जरा-मरण होते’ असे जे म्हटले गेले आहे, ते, आनंदा, या पद्धतीने समजून घेतले पाहिजे की कशा प्रकारे जातीच्या प्रत्ययाने जरा-मरण होते. आनंदा, जर कोणत्याही प्रकारे, कोणत्याही रूपात, कोणाचीही आणि कुठेही जाती (जन्म) झालीच नसती—जसे की, देवांची देवलोकात, गंधर्वांची गंधर्वलोकात, यक्षांची यक्षलोकात, भूतांची भूतलोकात, मनुष्यांची मनुष्यलोकात, चतुष्पादांची (चार पायांच्या प्राण्यांची) चतुष्पाद रूपात, पक्ष्यांची पक्षी रूपात, किंवा सरपटणाऱ्या प्राण्यांची सरपटणाऱ्या प्राण्यांच्या रूपात; जर त्या त्या प्राण्यांची त्या त्या योनीत जाती झालीच नसती, तर आनंदा, सर्व प्रकारे जातीचा अभाव असताना, जातीच्या निरोधाने काय जरा-मरण दिसून आले असते का? “नाही, भंते.” म्हणूनच, आनंदा, जरा-मरणाचे हेच हेतू, हेच निदान, हाच उदय आणि हाच प्रत्यय आहे, म्हणजेच ‘जाती’. ๙๙. ‘‘‘ภวปจฺจยา ชาตี’ติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, ตทานนฺท, อิมินาเปตํ ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา ภวปจฺจยา ชาติ. ภโว จ หิ, อานนฺท, นาภวิสฺส สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ กสฺสจิ กิมฺหิจิ, เสยฺยถิทํ – กามภโว วา รูปภโว วา อรูปภโว วา, สพฺพโส ภเว อสติ ภวนิโรธา อปิ นุ โข ชาติ ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท, เอเสว เหตุ เอตํ นิทานํ เอส สมุทโย เอส ปจฺจโย ชาติยา, ยทิทํ ภโว’’. ९९. ‘भवाच्या प्रत्ययाने जाती होते’ असे जे म्हटले गेले आहे, ते, आनंदा, या पद्धतीने समजून घेतले पाहिजे की कशा प्रकारे भवाच्या प्रत्ययाने जाती होते. आनंदा, जर कोणत्याही प्रकारे, कोणत्याही रूपात, कोणाचाही आणि कुठेही भव झालाच नसता—जसे की, कामभव, रूपभव किंवा अरूपभव; जर सर्व प्रकारे भवाचा अभाव असताना, भवाच्या निरोधाने काय जाती दिसून आली असती का? “नाही, भंते.” म्हणूनच, आनंदा, जातीचे हेच हेतू, हेच निदान, हाच उदय आणि हाच प्रत्यय आहे, म्हणजेच ‘भव’. ๑๐๐. ‘‘‘อุปาทานปจฺจยา ภโว’ติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, ตทานนฺท, อิมินาเปตํ ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา อุปาทานปจฺจยา ภโว. อุปาทานญฺจ หิ, อานนฺท, นาภวิสฺส สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ กสฺสจิ กิมฺหิจิ, เสยฺยถิทํ – กามุปาทานํ วา ทิฏฺฐุปาทานํ วา สีลพฺพตุปาทานํ วา อตฺตวาทุปาทานํ วา, สพฺพโส อุปาทาเน อสติ อุปาทานนิโรธา อปิ นุ โข ภโว ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท, เอเสว เหตุ เอตํ นิทานํ เอส สมุทโย เอส ปจฺจโย ภวสฺส, ยทิทํ อุปาทานํ’’. १००. ‘उपादानाच्या प्रत्ययाने भव होतो’ असे जे म्हटले गेले आहे, ते, आनंदा, या पद्धतीने समजून घेतले पाहिजे की कशा प्रकारे उपादानाच्या प्रत्ययाने भव होतो. आनंदा, जर कोणत्याही प्रकारे, कोणत्याही रूपात, कोणाचाही आणि कुठेही उपादान झालेच नसते—जसे की, कामुपादान, दिठ्ठुपादान, सीलब्बतुपादान किंवा अत्तवादुपादान; जर सर्व प्रकारे उपादानाचा अभाव असताना, उपादानाच्या निरोधाने काय भव दिसून आला असता का? “नाही, भंते.” म्हणूनच, आनंदा, भवाचे हेच हेतू, हेच निदान, हाच उदय आणि हाच प्रत्यय आहे, म्हणजेच ‘उपादान’. ๑๐๑. ‘‘‘ตณฺหาปจฺจยา อุปาทาน’นฺติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ ตทานนฺท, อิมินาเปตํ ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา ตณฺหาปจฺจยา อุปาทานํ. ตณฺหา จ หิ, อานนฺท, นาภวิสฺส สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ กสฺสจิ กิมฺหิจิ, เสยฺยถิทํ – รูปตณฺหา สทฺทตณฺหา คนฺธตณฺหา รสตณฺหา โผฏฺฐพฺพตณฺหา ธมฺมตณฺหา, สพฺพโส ตณฺหาย อสติ ตณฺหานิโรธา อปิ นุ โข อุปาทานํ ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท, เอเสว เหตุ เอตํ นิทานํ เอส สมุทโย เอส ปจฺจโย อุปาทานสฺส, ยทิทํ ตณฺหา’’. १०१. ‘तृष्णेच्या प्रत्ययाने उपादान होते’ असे जे म्हटले गेले आहे, ते, आनंदा, या पद्धतीने समजून घेतले पाहिजे की कशा प्रकारे तृष्णेच्या प्रत्ययाने उपादान होते. आनंदा, जर कोणत्याही प्रकारे, कोणत्याही रूपात, कोणाचीही आणि कुठेही तृष्णा झालीच नसती—जसे की, रूप-तृष्णा, शब्द-तृष्णा, गंध-तृष्णा, रस-तृष्णा, स्प्रष्टव्य-तृष्णा किंवा धम्म-तृष्णा; जर सर्व प्रकारे तृष्णेचा अभाव असताना, तृष्णेच्या निरोधाने काय उपादान दिसून आले असते का? “नाही, भंते.” म्हणूनच, आनंदा, उपादानाचे हेच हेतू, हेच निदान, हाच उदय आणि हाच प्रत्यय आहे, म्हणजेच ‘तृष्णा’. ๑๐๒. ‘‘‘เวทนาปจฺจยา ตณฺหา’ติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, ตทานนฺท, อิมินาเปตํ ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา เวทนาปจฺจยา ตณฺหา. เวทนา [Pg.50] จ หิ, อานนฺท, นาภวิสฺส สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ กสฺสจิ กิมฺหิจิ, เสยฺยถิทํ – จกฺขุสมฺผสฺสชา เวทนา โสตสมฺผสฺสชา เวทนา ฆานสมฺผสฺสชา เวทนา ชิวฺหาสมฺผสฺสชา เวทนา กายสมฺผสฺสชา เวทนา มโนสมฺผสฺสชา เวทนา, สพฺพโส เวทนาย อสติ เวทนานิโรธา อปิ นุ โข ตณฺหา ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท, เอเสว เหตุ เอตํ นิทานํ เอส สมุทโย เอส ปจฺจโย ตณฺหาย, ยทิทํ เวทนา’’. १०२. ‘वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा होते’ असे जे म्हटले गेले आहे, ते, आनंदा, या पद्धतीने समजून घेतले पाहिजे की कशा प्रकारे वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा होते. आनंदा, जर कोणत्याही प्रकारे, कोणत्याही रूपात, कोणाचीही आणि कुठेही वेदना झालीच नसती—जसे की, चक्षु-संस्पर्शजन्य वेदना, श्रोत-संस्पर्शजन्य वेदना, घ्राण-संस्पर्शजन्य वेदना, जिव्हा-संस्पर्शजन्य वेदना, काय-संस्पर्शजन्य वेदना किंवा मन-संस्पर्शजन्य वेदना; जर सर्व प्रकारे वेदनेचा अभाव असताना, वेदनेच्या निरोधाने काय तृष्णा दिसून आली असती का? “नाही, भंते.” म्हणूनच, आनंदा, तृष्णेचे हेच हेतू, हेच निदान, हाच उदय आणि हाच प्रत्यय आहे, म्हणजेच ‘वेदना’. ๑๐๓. ‘‘อิติ โข ปเนตํ, อานนฺท, เวทนํ ปฏิจฺจ ตณฺหา, ตณฺหํ ปฏิจฺจ ปริเยสนา, ปริเยสนํ ปฏิจฺจ ลาโภ, ลาภํ ปฏิจฺจ วินิจฺฉโย, วินิจฺฉยํ ปฏิจฺจ ฉนฺทราโค, ฉนฺทราคํ ปฏิจฺจ อชฺโฌสานํ, อชฺโฌสานํ ปฏิจฺจ ปริคฺคโห, ปริคฺคหํ ปฏิจฺจ มจฺฉริยํ, มจฺฉริยํ ปฏิจฺจ อารกฺโข. อารกฺขาธิกรณํ ทณฺฑาทานสตฺถาทานกลหวิคฺคหวิวาทตุวํตุวํเปสุญฺญมุสาวาทา อเนเก ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สมฺภวนฺติ. १०३. अशा प्रकारे, आनंदा, वेदनेवर अवलंबून तृष्णा उत्पन्न होते; तृष्णेवर अवलंबून पर्येषणा (शोध) उत्पन्न होते; पर्येषणेवर अवलंबून लाभ उत्पन्न होतो; लाभावर अवलंबून विनिर्णय उत्पन्न होतो; विनिर्णयावर अवलंबून छंदराग उत्पन्न होतो; छंदरागावर अवलंबून अध्यवसान उत्पन्न होते; अध्यवसानावर अवलंबून परिग्रह उत्पन्न होतो; परिग्रहावर अवलंबून मात्सर्य उत्पन्न होते; मात्सर्यावर अवलंबून आरक्ष (संरक्षण) उत्पन्न होते. आणि आरक्षामुळे लाठी उचलणे, शस्त्र उचलणे, कलह, भांडण, वादविवाद, ‘तू-तू मै-मै’, चहाडी आणि असत्य बोलणे यांसारखे अनेक पापी, अकुशल धर्म उत्पन्न होतात. ๑๐๔. ‘‘‘อารกฺขาธิกรณํ ทณฺฑาทานสตฺถาทานกลหวิคฺคหวิวาทตุวํตุวํเปสุญฺญมุสาวาทา อเนเก ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สมฺภวนฺตี’ติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, ตทานนฺท, อิมินาเปตํ ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา อารกฺขาธิกรณํ ทณฺฑาทานสตฺถาทานกลหวิคฺคหวิวาทตุวํตุวํเปสุญฺญมุสาวาทา อเนเก ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สมฺภวนฺติ. อารกฺโข จ หิ, อานนฺท, นาภวิสฺส สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ กสฺสจิ กิมฺหิจิ, สพฺพโส อารกฺเข อสติ อารกฺขนิโรธา อปิ นุ โข ทณฺฑาทานสตฺถาทานกลหวิคฺคหวิวาทตุวํตุวํเปสุญฺญมุสาวาทา อเนเก ปาปกา อกุสลา ธมฺมา สมฺภเวยฺยุ’’นฺติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท, เอเสว เหตุ เอตํ นิทานํ เอส สมุทโย เอส ปจฺจโย ทณฺฑาทานสตฺถาทานกลหวิคฺคหวิวาทตุวํตุวํเปสุญฺญมุสาวาทานํ อเนเกสํ ปาปกานํ อกุสลานํ ธมฺมานํ สมฺภวาย ยทิทํ อารกฺโข. १०४. ‘आरक्षामुळे लाठी उचलणे, शस्त्र उचलणे, कलह, भांडण, वादविवाद, ‘तू-तू मै-मै’, चहाडी आणि असत्य बोलणे यांसारखे अनेक पापी, अकुशल धर्म उत्पन्न होतात’ असे जे म्हटले गेले आहे, ते, आनंदा, या पद्धतीने समजून घेतले पाहिजे की कशा प्रकारे आरक्षामुळे हे सर्व अकुशल धर्म उत्पन्न होतात. आनंदा, जर कोणत्याही प्रकारे, कोणत्याही रूपात, कोणाचेही आणि कुठेही आरक्ष (संरक्षण) झालेच नसते; जर सर्व प्रकारे आरक्षाचा अभाव असताना, आरक्षाच्या निरोधाने काय लाठी उचलणे, शस्त्र उचलणे, कलह, भांडण, वादविवाद, ‘तू-तू मै-मै’, चहाडी आणि असत्य बोलणे यांसारखे अनेक पापी, अकुशल धर्म उत्पन्न झाले असते का? “नाही, भंते.” म्हणूनच, आनंदा, लाठी उचलणे, शस्त्र उचलणे, कलह, भांडण, वादविवाद, ‘तू-तू मै-मै’, चहाडी आणि असत्य बोलणे यांसारख्या अनेक पापी, अकुशल धर्मांच्या उत्पत्तीचे हेच हेतू, हेच निदान, हाच उदय आणि हाच प्रत्यय आहे, म्हणजेच ‘आरक्ष’ (संरक्षण). ๑๐๕. ‘‘‘มจฺฉริยํ ปฏิจฺจ อารกฺโข’ติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, ตทานนฺท, อิมินาเปตํ ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา มจฺฉริยํ ปฏิจฺจ อารกฺโข. มจฺฉริยญฺจ หิ, อานนฺท, นาภวิสฺส สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ กสฺสจิ กิมฺหิจิ[Pg.51], สพฺพโส มจฺฉริเย อสติ มจฺฉริยนิโรธา อปิ นุ โข อารกฺโข ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท, เอเสว เหตุ เอตํ นิทานํ เอส สมุทโย เอส ปจฺจโย อารกฺขสฺส, ยทิทํ มจฺฉริยํ’’. १०५. ‘मत्सरावर (कंजूषपणावर) अवलंबून संरक्षण निर्माण होते’ असे जे म्हटले गेले आहे, हे आनंदा, या प्रकारे समजून घेतले पाहिजे की कशा प्रकारे मत्सरावर अवलंबून संरक्षण निर्माण होते. आनंदा, जर कोणाही व्यक्तीमध्ये, कोणत्याही ठिकाणी, कोणत्याही प्रकारे मत्सर अजिबात नसता, मत्सराचा पूर्णपणे अभाव असता, तर मत्सराच्या निरोधाने संरक्षण दिसून आले असते का? नाही, भन्ते. म्हणूनच, आनंदा, हेच संरक्षणाचे कारण, हेच निदान, हाच उगम आणि हाच प्रत्यय आहे, म्हणजेच हा मत्सर. ๑๐๖. ‘‘‘ปริคฺคหํ ปฏิจฺจ มจฺฉริย’นฺติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, ตทานนฺท, อิมินาเปตํ ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา ปริคฺคหํ ปฏิจฺจ มจฺฉริยํ. ปริคฺคโห จ หิ, อานนฺท, นาภวิสฺส สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ กสฺสจิ กิมฺหิจิ, สพฺพโส ปริคฺคเห อสติ ปริคฺคหนิโรธา อปิ นุ โข มจฺฉริยํ ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท, เอเสว เหตุ เอตํ นิทานํ เอส สมุทโย เอส ปจฺจโย มจฺฉริยสฺส, ยทิทํ ปริคฺคโห’’. १०६. ‘परिग्रहावर अवलंबून मत्सर (कंजूषपणा) निर्माण होतो’ असे जे म्हटले गेले आहे, हे आनंदा, या प्रकारे समजून घेतले पाहिजे की कशा प्रकारे परिग्रहावर अवलंबून मत्सर निर्माण होतो. आनंदा, जर कोणाही व्यक्तीमध्ये, कोणत्याही ठिकाणी, कोणत्याही प्रकारे परिग्रह अजिबात नसता, परिग्रहाचा पूर्णपणे अभाव असता, तर परिग्रहाच्या निरोधाने मत्सर दिसून आला असता का? नाही, भन्ते. म्हणूनच, आनंदा, हेच मत्सराचे कारण, हेच निदान, हाच उगम आणि हाच प्रत्यय आहे, म्हणजेच हा परिग्रह. ๑๐๗. ‘‘‘อชฺโฌสานํ ปฏิจฺจ ปริคฺคโห’ติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, ตทานนฺท, อิมินาเปตํ ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา อชฺโฌสานํ ปฏิจฺจ ปริคฺคโห. อชฺโฌสานญฺจ หิ, อานนฺท, นาภวิสฺส สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ กสฺสจิ กิมฺหิจิ, สพฺพโส อชฺโฌสาเน อสติ อชฺโฌสานนิโรธา อปิ นุ โข ปริคฺคโห ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท, เอเสว เหตุ เอตํ นิทานํ เอส สมุทโย เอส ปจฺจโย ปริคฺคหสฺส – ยทิทํ อชฺโฌสานํ’’. १०७. ‘अध्यवसानावर (तीव्र आसक्तीवर) अवलंबून परिग्रह निर्माण होतो’ असे जे म्हटले गेले आहे, हे आनंदा, या प्रकारे समजून घेतले पाहिजे की कशा प्रकारे अध्यवसानावर अवलंबून परिग्रह निर्माण होतो. आनंदा, जर कोणाही व्यक्तीमध्ये, कोणत्याही ठिकाणी, कोणत्याही प्रकारे अध्यवसान अजिबात नसता, अध्यवसानाचा पूर्णपणे अभाव असता, तर अध्यवसानाच्या निरोधाने परिग्रह दिसून आला असता का? नाही, भन्ते. म्हणूनच, आनंदा, हेच परिग्रहाचे कारण, हेच निदान, हाच उगम आणि हाच प्रत्यय आहे, म्हणजेच हे अध्यवसान. ๑๐๘. ‘‘‘ฉนฺทราคํ ปฏิจฺจ อชฺโฌสาน’นฺติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, ตทานนฺท, อิมินาเปตํ ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา ฉนฺทราคํ ปฏิจฺจ อชฺโฌสานํ. ฉนฺทราโค จ หิ, อานนฺท, นาภวิสฺส สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ กสฺสจิ กิมฺหิจิ, สพฺพโส ฉนฺทราเค อสติ ฉนฺทราคนิโรธา อปิ นุ โข อชฺโฌสานํ ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท, เอเสว เหตุ เอตํ นิทานํ เอส สมุทโย เอส ปจฺจโย อชฺโฌสานสฺส, ยทิทํ ฉนฺทราโค’’. १०८. ‘छंदरागावर अवलंबून अध्यवसान (तीव्र आसक्ती) निर्माण होते’ असे जे म्हटले गेले आहे, हे आनंदा, या प्रकारे समजून घेतले पाहिजे की कशा प्रकारे छंदरागावर अवलंबून अध्यवसान निर्माण होते. आनंदा, जर कोणाही व्यक्तीमध्ये, कोणत्याही ठिकाणी, कोणत्याही प्रकारे छंदराग अजिबात नसता, छंदरागाचा पूर्णपणे अभाव असता, तर छंदरागाच्या निरोधाने अध्यवसान दिसून आले असते का? नाही, भन्ते. म्हणूनच, आनंदा, हेच अध्यवसानाचे कारण, हेच निदान, हाच उगम आणि हाच प्रत्यय आहे, म्हणजेच हा छंदराग. ๑๐๙. ‘‘‘วินิจฺฉยํ ปฏิจฺจ ฉนฺทราโค’ติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, ตทานนฺท, อิมินาเปตํ ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา วินิจฺฉยํ ปฏิจฺจ ฉนฺทราโค. วินิจฺฉโย จ หิ, อานนฺท, นาภวิสฺส สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ กสฺสจิ กิมฺหิจิ, สพฺพโส วินิจฺฉเย อสติ วินิจฺฉยนิโรธา อปิ นุ โข ฉนฺทราโค ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท, เอเสว เหตุ เอตํ นิทานํ เอส สมุทโย เอส ปจฺจโย ฉนฺทราคสฺส, ยทิทํ วินิจฺฉโย’’. १०९. ‘विनिच्चयावर (निर्णयावर) अवलंबून छंदराग निर्माण होतो’ असे जे म्हटले गेले आहे, हे आनंदा, या प्रकारे समजून घेतले पाहिजे की कशा प्रकारे विनिच्चयावर अवलंबून छंदराग निर्माण होतो. आनंदा, जर कोणाही व्यक्तीमध्ये, कोणत्याही ठिकाणी, कोणत्याही प्रकारे विनिच्चय अजिबात नसता, विनिच्चयाचा पूर्णपणे अभाव असता, तर विनिच्चयाच्या निरोधाने छंदराग दिसून आला असता का? नाही, भन्ते. म्हणूनच, आनंदा, हेच छंदरागाचे कारण, हेच निदान, हाच उगम आणि हाच प्रत्यय आहे, म्हणजेच हा विनिच्चय. ๑๑๐. ‘‘‘ลาภํ [Pg.52] ปฏิจฺจ วินิจฺฉโย’ติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, ตทานนฺท, อิมินาเปตํ ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา ลาภํ ปฏิจฺจ วินิจฺฉโย. ลาโภ จ หิ, อานนฺท, นาภวิสฺส สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ กสฺสจิ กิมฺหิจิ, สพฺพโส ลาเภ อสติ ลาภนิโรธา อปิ นุ โข วินิจฺฉโย ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท เอเสว เหตุ เอตํ นิทานํ เอส สมุทโย เอส ปจฺจโย วินิจฺฉยสฺส, ยทิทํ ลาโภ’’. ११०. ‘लाभावर अवलंबून विनिच्चय (निर्णय) निर्माण होतो’ असे जे म्हटले गेले आहे, हे आनंदा, या प्रकारे समजून घेतले पाहिजे की कशा प्रकारे लाभावर अवलंबून विनिच्चय निर्माण होतो. आनंदा, जर कोणाही व्यक्तीमध्ये, कोणत्याही ठिकाणी, कोणत्याही प्रकारे लाभ अजिबात नसता, लाभाचा पूर्णपणे अभाव असता, तर लाभाच्या निरोधाने विनिच्चय दिसून आला असता का? नाही, भन्ते. म्हणूनच, आनंदा, हेच विनिच्चयाचे कारण, हेच निदान, हाच उगम आणि हाच प्रत्यय आहे, म्हणजेच हा लाभ. ๑๑๑. ‘‘‘ปริเยสนํ ปฏิจฺจ ลาโภ’ติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, ตทานนฺท, อิมินาเปตํ ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา ปริเยสนํ ปฏิจฺจ ลาโภ. ปริเยสนา จ หิ, อานนฺท, นาภวิสฺส สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ กสฺสจิ กิมฺหิจิ, สพฺพโส ปริเยสนาย อสติ ปริเยสนานิโรธา อปิ นุ โข ลาโภ ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท, เอเสว เหตุ เอตํ นิทานํ เอส สมุทโย เอส ปจฺจโย ลาภสฺส, ยทิทํ ปริเยสนา’’. १११. ‘परियेसनेवर (शोधावर) अवलंबून लाभ निर्माण होतो’ असे जे म्हटले गेले आहे, हे आनंदा, या प्रकारे समजून घेतले पाहिजे की कशा प्रकारे परियेसनेवर अवलंबून लाभ निर्माण होतो. आनंदा, जर कोणाही व्यक्तीमध्ये, कोणत्याही ठिकाणी, कोणत्याही प्रकारे परियेसना अजिबात नसती, परियेसनेचा पूर्णपणे अभाव असता, तर परियेसनेच्या निरोधाने लाभ दिसून आला असता का? नाही, भन्ते. म्हणूनच, आनंदा, हेच लाभाचे कारण, हेच निदान, हाच उगम आणि हाच प्रत्यय आहे, म्हणजेच ही परियेसना. ๑๑๒. ‘‘‘ตณฺหํ ปฏิจฺจ ปริเยสนา’ติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, ตทานนฺท, อิมินาเปตํ ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา ตณฺหํ ปฏิจฺจ ปริเยสนา. ตณฺหา จ หิ, อานนฺท, นาภวิสฺส สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ กสฺสจิ กิมฺหิจิ, เสยฺยถิทํ – กามตณฺหา ภวตณฺหา วิภวตณฺหา, สพฺพโส ตณฺหาย อสติ ตณฺหานิโรธา อปิ นุ โข ปริเยสนา ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท, เอเสว เหตุ เอตํ นิทานํ เอส สมุทโย เอส ปจฺจโย ปริเยสนาย, ยทิทํ ตณฺหา. อิติ โข, อานนฺท, อิเม ทฺเว ธมฺมา ทฺวเยน เวทนาย เอกสโมสรณา ภวนฺติ’’. ११२. ‘तृष्णेवर अवलंबून परियेसना (शोध) निर्माण होते’ असे जे म्हटले गेले आहे, हे आनंदा, या प्रकारे समजून घेतले पाहिजे की कशा प्रकारे तृष्णेवर अवलंबून परियेसना निर्माण होते. आनंदा, जर कोणाही व्यक्तीमध्ये, कोणत्याही ठिकाणी, कोणत्याही प्रकारे तृष्णा अजिबात नसती, जसे की—कामतृष्णा, भवतृष्णा, विभवतृष्णा—आणि तृष्णेचा पूर्णपणे अभाव असता, तर तृष्णेच्या निरोधाने परियेसना दिसून आली असती का? नाही, भन्ते. म्हणूनच, आनंदा, हेच परियेसनेचे कारण, हेच निदान, हाच उगम आणि हाच प्रत्यय आहे, म्हणजेच ही तृष्णा. अशा प्रकारे, आनंदा, हे दोन्ही धर्म वेदनेमध्ये एकत्र येऊन मिळतात. ๑๑๓. ‘‘‘ผสฺสปจฺจยา เวทนา’ติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, ตทานนฺท, อิมินาเปตํ ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา ‘ผสฺสปจฺจยา เวทนา. ผสฺโส จ หิ, อานนฺท, นาภวิสฺส สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ กสฺสจิ กิมฺหิจิ, เสยฺยถิทํ – จกฺขุสมฺผสฺโส โสตสมฺผสฺโส ฆานสมฺผสฺโส ชิวฺหาสมฺผสฺโส กายสมฺผสฺโส มโนสมฺผสฺโส, สพฺพโส ผสฺเส อสติ ผสฺสนิโรธา อปิ นุ โข เวทนา ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท[Pg.53], เอเสว เหตุ เอตํ นิทานํ เอส สมุทโย เอส ปจฺจโย เวทนาย, ยทิทํ ผสฺโส’’. ११३. ‘स्पर्शाच्या प्रत्ययाने (कारणाने) वेदना निर्माण होते’ असे जे म्हटले गेले आहे, हे आनंदा, या प्रकारे समजून घेतले पाहिजे की कशा प्रकारे स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना निर्माण होते. आनंदा, जर कोणाही व्यक्तीमध्ये, कोणत्याही ठिकाणी, कोणत्याही प्रकारे स्पर्श अजिबात नसता, जसे की—चक्षु-संस्पर्श, श्रोत-संस्पर्श, घ्राण-संस्पर्श, जिव्हा-संस्पर्श, काय-संस्पर्श, मन-संस्पर्श—आणि स्पर्शाचा पूर्णपणे अभाव असता, तर स्पर्शाच्या निरोधाने वेदना दिसून आली असती का? नाही, भन्ते. म्हणूनच, आनंदा, हेच वेदनेचे कारण, हेच निदान, हाच उगम आणि हाच प्रत्यय आहे, म्हणजेच हा स्पर्श. ๑๑๔. ‘‘‘นามรูปปจฺจยา ผสฺโส’ติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, ตทานนฺท, อิมินาเปตํ ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา นามรูปปจฺจยา ผสฺโส. เยหิ, อานนฺท, อากาเรหิ เยหิ ลิงฺเคหิ เยหิ นิมิตฺเตหิ เยหิ อุทฺเทเสหิ นามกายสฺส ปญฺญตฺติ โหติ, เตสุ อากาเรสุ เตสุ ลิงฺเคสุ เตสุ นิมิตฺเตสุ เตสุ อุทฺเทเสสุ อสติ อปิ นุ โข รูปกาเย อธิวจนสมฺผสฺโส ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘เยหิ, อานนฺท, อากาเรหิ เยหิ ลิงฺเคหิ เยหิ นิมิตฺเตหิ เยหิ อุทฺเทเสหิ รูปกายสฺส ปญฺญตฺติ โหติ, เตสุ อากาเรสุ…เป… เตสุ อุทฺเทเสสุ อสติ อปิ นุ โข นามกาเย ปฏิฆสมฺผสฺโส ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘เยหิ, อานนฺท, อากาเรหิ…เป… เยหิ อุทฺเทเสหิ นามกายสฺส จ รูปกายสฺส จ ปญฺญตฺติ โหติ, เตสุ อากาเรสุ…เป… เตสุ อุทฺเทเสสุ อสติ อปิ นุ โข อธิวจนสมฺผสฺโส วา ปฏิฆสมฺผสฺโส วา ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘เยหิ, อานนฺท, อากาเรหิ…เป… เยหิ อุทฺเทเสหิ นามรูปสฺส ปญฺญตฺติ โหติ, เตสุ อากาเรสุ …เป… เตสุ อุทฺเทเสสุ อสติ อปิ นุ โข ผสฺโส ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท, เอเสว เหตุ เอตํ นิทานํ เอส สมุทโย เอส ปจฺจโย ผสฺสสฺส, ยทิทํ นามรูปํ’’. ११४. “‘नामरूप-प्रत्ययाने स्पर्श होतो’ असे जे म्हटले गेले आहे, हे आनंदा, नामरूपामुळे स्पर्श कसा होतो, हे या प्रकारे समजून घेतले पाहिजे. आनंदा, ज्या आकारांनी, ज्या चिन्हांनी, ज्या निमित्तांनी आणि ज्या निर्देशनांनी नाम-कायाची प्रज्ञप्ती होते, ते आकार, ती चिन्हे, ती निमित्ते आणि ते निर्देश नसताना, रूप-कायेमध्ये अधि वचन-स्पर्श दिसून येईल का?” “नाही, भंते.” “आनंदा, ज्या आकारांनी, ज्या चिन्हांनी, ज्या निमित्तांनी आणि ज्या निर्देशनांनी रूप-कायाची प्रज्ञप्ती होते, ते आकार... पे... ते निर्देश नसताना, नाम-कायेमध्ये प्रतिघ-स्पर्श दिसून येईल का?” “नाही, भंते.” “आनंदा, ज्या आकारांनी... पे... ज्या निर्देशनांनी नाम-कायाची आणि रूप-कायाची प्रज्ञप्ती होते, ते आकार... पे... ते निर्देश नसताना, अधि वचन-स्पर्श किंवा प्रतिघ-स्पर्श दिसून येईल का?” “नाही, भंते.” “आनंदा, ज्या आकारांनी... पे... ज्या निर्देशनांनी नामरूपाची प्रज्ञप्ती होते, ते आकार... पे... ते निर्देश नसताना, स्पर्श दिसून येईल का?” “नाही, भंते.” “म्हणूनच, आनंदा, हेच कारण, हेच निदान, हाच उगम आणि हाच प्रत्यय स्पर्शाचा आहे, म्हणजेच हे नामरूप.” ๑๑๕. ‘‘‘วิญฺญาณปจฺจยา นามรูป’นฺติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, ตทานนฺท, อิมินาเปตํ ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา วิญฺญาณปจฺจยา นามรูปํ. วิญฺญาณญฺจ หิ, อานนฺท, มาตุกุจฺฉิสฺมึ น โอกฺกมิสฺสถ, อปิ นุ โข นามรูปํ มาตุกุจฺฉิสฺมึ สมุจฺจิสฺสถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘วิญฺญาณญฺจ หิ, อานนฺท, มาตุกุจฺฉิสฺมึ โอกฺกมิตฺวา โวกฺกมิสฺสถ, อปิ นุ โข นามรูปํ อิตฺถตฺตาย อภินิพฺพตฺติสฺสถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘วิญฺญาณญฺจ หิ, อานนฺท, ทหรสฺเสว สโต โวจฺฉิชฺชิสฺสถ กุมารกสฺส วา กุมาริกาย วา, อปิ นุ โข นามรูปํ วุทฺธึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลํ อาปชฺชิสฺสถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท, เอเสว เหตุ เอตํ นิทานํ เอส สมุทโย เอส ปจฺจโย นามรูปสฺส – ยทิทํ วิญฺญาณํ’’. ११५. “‘विज्ञान-प्रत्ययाने नामरूप होते’ असे जे म्हटले गेले आहे, हे आनंदा, विज्ञानामुळे नामरूप कसे उत्पन्न होते, हे या प्रकारे समजून घेतले पाहिजे. आनंदा, जर विज्ञान मातेच्या गर्भात अवतरले नाही, तर नामरूप मातेच्या गर्भात संघटित होईल का?” “नाही, भंते.” “आनंदा, जर विज्ञान मातेच्या गर्भात अवतरून पुन्हा निघून गेले, तर नामरूप या वर्तमान अस्तित्वासाठी जन्माला येईल का?” “नाही, भंते.” “आनंदा, जर लहान बालक किंवा बालिकेचे विज्ञान बालपणातच खंडित झाले, तर नामरूप वृद्धी, विकास आणि विपुलतेला प्राप्त होईल का?” “नाही, भंते.” “म्हणूनच, आनंदा, हेच कारण, हेच निदान, हाच उगम आणि हाच प्रत्यय नामरूपाचा आहे, म्हणजेच हे विज्ञान.” ๑๑๖. ‘‘‘นามรูปปจฺจยา [Pg.54] วิญฺญาณ’นฺติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, ตทานนฺท, อิมินาเปตํ ปริยาเยน เวทิตพฺพํ, ยถา นามรูปปจฺจยา วิญฺญาณํ. วิญฺญาณญฺจ หิ, อานนฺท, นามรูเป ปติฏฺฐํ น ลภิสฺสถ, อปิ นุ โข อายตึ ชาติชรามรณํ ทุกฺขสมุทยสมฺภโว ปญฺญาเยถา’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท, เอเสว เหตุ เอตํ นิทานํ เอส สมุทโย เอส ปจฺจโย วิญฺญาณสฺส ยทิทํ นามรูปํ. เอตฺตาวตา โข, อานนฺท, ชาเยถ วา ชีเยถ วา มีเยถ วา จเวถ วา อุปปชฺเชถ วา. เอตฺตาวตา อธิวจนปโถ, เอตฺตาวตา นิรุตฺติปโถ, เอตฺตาวตา ปญฺญตฺติปโถ, เอตฺตาวตา ปญฺญาวจรํ, เอตฺตาวตา วฏฺฏํ วตฺตติ อิตฺถตฺตํ ปญฺญาปนาย ยทิทํ นามรูปํ สห วิญฺญาเณน อญฺญมญฺญปจฺจยตา ปวตฺตติ. ११६. “‘नामरूप-प्रत्ययाने विज्ञान होते’ असे जे म्हटले गेले आहे, हे आनंदा, नामरूपामुळे विज्ञान कसे उत्पन्न होते, हे या प्रकारे समजून घेतले पाहिजे. आनंदा, जर विज्ञानाला नामरूपात प्रतिष्ठा लाभली नाही, तर भविष्यात जन्म, जरा, मरण आणि दुःखसमुदयाची उत्पत्ती दिसून येईल का?” “नाही, भंते.” “म्हणूनच, आनंदा, हेच कारण, हेच निदान, हाच उगम आणि हाच प्रत्यय विज्ञानाचा आहे, म्हणजेच हे नामरूप. आनंदा, एवढ्याच मर्यादेत मनुष्य जन्म घेतो, वृद्ध होतो, मरतो, च्युत होतो किंवा पुन्हा उत्पन्न होतो. एवढ्याच मर्यादेत अधि वचन-पथ, एवढ्याच मर्यादेत निरुक्ती-पथ, एवढ्याच मर्यादेत प्रज्ञप्ती-पथ, एवढ्याच मर्यादेत प्रज्ञेचे क्षेत्र आहे. एवढ्याच मर्यादेत हे संसारचक्र फिरते, जेणेकरून या पंचस्कंधांच्या अस्तित्वाची प्रज्ञप्ती होते, म्हणजेच हे नामरूप विज्ञानासह परस्पर प्रत्ययभावाने प्रवर्तित होते.” อตฺตปญฺญตฺติ आत्म-प्रज्ञप्ती ๑๑๗. ‘‘กิตฺตาวตา จ, อานนฺท, อตฺตานํ ปญฺญเปนฺโต ปญฺญเปติ? รูปึ วา หิ, อานนฺท, ปริตฺตํ อตฺตานํ ปญฺญเปนฺโต ปญฺญเปติ – ‘‘รูปี เม ปริตฺโต อตฺตา’’ติ. รูปึ วา หิ, อานนฺท, อนนฺตํ อตฺตานํ ปญฺญเปนฺโต ปญฺญเปติ – ‘รูปี เม อนนฺโต อตฺตา’ติ. อรูปึ วา หิ, อานนฺท, ปริตฺตํ อตฺตานํ ปญฺญเปนฺโต ปญฺญเปติ – ‘อรูปี เม ปริตฺโต อตฺตา’ติ. อรูปึ วา หิ, อานนฺท, อนนฺตํ อตฺตานํ ปญฺญเปนฺโต ปญฺญเปติ – ‘อรูปี เม อนนฺโต อตฺตา’ติ. ११७. “आनंदा, आत्म्याची प्रज्ञप्ती करणारा मनुष्य किती प्रकारे प्रज्ञप्ती करतो? आनंदा, कोणी आत्म्याला रूपवान आणि मर्यादित मानून प्रज्ञप्ती करतो की, ‘माझा आत्मा रूपवान आणि मर्यादित आहे.’ आनंदा, कोणी आत्म्याला रूपवान आणि अमर्याद मानून प्रज्ञप्ती करतो की, ‘माझा आत्मा रूपवान आणि अमर्याद आहे.’ आनंदा, कोणी आत्म्याला अरूप आणि मर्यादित मानून प्रज्ञप्ती करतो की, ‘माझा आत्मा अरूप आणि मर्यादित आहे.’ आनंदा, कोणी आत्म्याला अरूप आणि अमर्याद मानून प्रज्ञप्ती करतो की, ‘माझा आत्मा अरूप आणि अमर्याद आहे.’” ๑๑๘. ‘‘ตตฺรานนฺท, โย โส รูปึ ปริตฺตํ อตฺตานํ ปญฺญเปนฺโต ปญฺญเปติ. เอตรหิ วา โส รูปึ ปริตฺตํ อตฺตานํ ปญฺญเปนฺโต ปญฺญเปติ, ตตฺถ ภาวึ วา โส รูปึ ปริตฺตํ อตฺตานํ ปญฺญเปนฺโต ปญฺญเปติ, ‘อตถํ วา ปน สนฺตํ ตถตฺตาย อุปกปฺเปสฺสามี’ติ อิติ วา ปนสฺส โหติ. เอวํ สนฺตํ โข, อานนฺท, รูปึ ปริตฺตตฺตานุทิฏฺฐิ อนุเสตีติ อิจฺจาลํ วจนาย. ११८. “आनंदा, त्यांपैकी जो मनुष्य आत्म्याला रूपवान आणि मर्यादित मानून प्रज्ञप्ती करतो, तो एकतर वर्तमान काळात आत्म्याला रूपवान आणि मर्यादित मानून प्रज्ञप्ती करतो, किंवा परलोकात आत्म्याला रूपवान आणि मर्यादित मानून प्रज्ञप्ती करतो, किंवा ‘जे असत्य आहे, त्याला मी सत्यात परिणत करीन’ असा विचार त्याच्या मनात येतो. आनंदा, अशा स्थितीत, त्या मनुष्यामध्ये ‘रूपवान आणि मर्यादित आत्म्याची दृष्टी’ अनुशयित करते, असे म्हणणे योग्य ठरेल.” ‘‘ตตฺรานนฺท, โย โส รูปึ อนนฺตํ อตฺตานํ ปญฺญเปนฺโต ปญฺญเปติ. เอตรหิ วา โส รูปึ อนนฺตํ อตฺตานํ ปญฺญเปนฺโต ปญฺญเปติ, ตตฺถ ภาวึ วา โส รูปึ อนนฺตํ อตฺตานํ ปญฺญเปนฺโต ปญฺญเปติ, ‘อตถํ วา ปน [Pg.55] สนฺตํ ตถตฺตาย อุปกปฺเปสฺสามี’ติ อิติ วา ปนสฺส โหติ. เอวํ สนฺตํ โข, อานนฺท, รูปึ อนนฺตตฺตานุทิฏฺฐิ อนุเสตีติ อิจฺจาลํ วจนาย. “आनंदा, त्यांपैकी जो मनुष्य आत्म्याला रूपवान आणि अमर्याद मानून प्रज्ञप्ती करतो, तो एकतर वर्तमान काळात आत्म्याला रूपवान आणि अमर्याद मानून प्रज्ञप्ती करतो, किंवा परलोकात आत्म्याला रूपवान आणि अमर्याद मानून प्रज्ञप्ती करतो, किंवा ‘जे असत्य आहे, त्याला मी सत्यात परिणत करीन’ असा विचार त्याच्या मनात येतो. आनंदा, अशा स्थितीत, त्या मनुष्यामध्ये ‘रूपवान आणि अमर्याद आत्म्याची दृष्टी’ अनुशयित करते, असे म्हणणे योग्य ठरेल.” ‘‘ตตฺรานนฺท, โย โส อรูปึ ปริตฺตํ อตฺตานํ ปญฺญเปนฺโต ปญฺญเปติ. เอตรหิ วา โส อรูปึ ปริตฺตํ อตฺตานํ ปญฺญเปนฺโต ปญฺญเปติ, ตตฺถ ภาวึ วา โส อรูปึ ปริตฺตํ อตฺตานํ ปญฺญเปนฺโต ปญฺญเปติ, ‘อตถํ วา ปน สนฺตํ ตถตฺตาย อุปกปฺเปสฺสามี’ติ อิติ วา ปนสฺส โหติ. เอวํ สนฺตํ โข, อานนฺท, อรูปึ ปริตฺตตฺตานุทิฏฺฐิ อนุเสตีติ อิจฺจาลํ วจนาย. “आनंदा, त्यांपैकी जो मनुष्य आत्म्याला अरूप आणि मर्यादित मानून प्रज्ञप्ती करतो, तो एकतर वर्तमान काळात आत्म्याला अरूप आणि मर्यादित मानून प्रज्ञप्ती करतो, किंवा परलोकात आत्म्याला अरूप आणि मर्यादित मानून प्रज्ञप्ती करतो, किंवा ‘जे असत्य आहे, त्याला मी सत्यात परिणत करीन’ असा विचार त्याच्या मनात येतो. आनंदा, अशा स्थितीत, त्या मनुष्यामध्ये ‘अरूप आणि मर्यादित आत्म्याची दृष्टी’ अनुशयित करते, असे म्हणणे योग्य ठरेल.” ‘‘ตตฺรานนฺท, โย โส อรูปึ อนนฺตํ อตฺตานํ ปญฺญเปนฺโต ปญฺญเปติ. เอตรหิ วา โส อรูปึ อนนฺตํ อตฺตานํ ปญฺญเปนฺโต ปญฺญเปติ, ตตฺถ ภาวึ วา โส อรูปึ อนนฺตํ อตฺตานํ ปญฺญเปนฺโต ปญฺญเปติ, ‘อตถํ วา ปน สนฺตํ ตถตฺตาย อุปกปฺเปสฺสามี’ติ อิติ วา ปนสฺส โหติ. เอวํ สนฺตํ โข, อานนฺท, อรูปึ อนนฺตตฺตานุทิฏฺฐิ อนุเสตีติ อิจฺจาลํ วจนาย. เอตฺตาวตา โข, อานนฺท, อตฺตานํ ปญฺญเปนฺโต ปญฺญเปติ. “आनंदा, त्यांपैकी जो मनुष्य आत्म्याला अरूप आणि अमर्याद मानून प्रज्ञप्ती करतो, तो एकतर वर्तमान काळात आत्म्याला अरूप आणि अमर्याद मानून प्रज्ञप्ती करतो, किंवा परलोकात आत्म्याला अरूप आणि अमर्याद मानून प्रज्ञप्ती करतो, किंवा ‘जे असत्य आहे, त्याला मी सत्यात परिणत करीन’ असा विचार त्याच्या मनात येतो. आनंदा, अशा स्थितीत, त्या मनुष्यामध्ये ‘अरूप आणि अमर्याद आत्म्याची दृष्टी’ अनुशयित करते, असे म्हणणे योग्य ठरेल. आनंदा, एवढ्याच प्रकारे आत्म्याची प्रज्ञप्ती करणारा मनुष्य प्रज्ञप्ती करतो.” นอตฺตปญฺญตฺติ आत्म्याची प्रज्ञप्ती न करणे ๑๑๙. ‘‘กิตฺตาวตา จ, อานนฺท, อตฺตานํ น ปญฺญเปนฺโต น ปญฺญเปติ? รูปึ วา หิ, อานนฺท, ปริตฺตํ อตฺตานํ น ปญฺญเปนฺโต น ปญฺญเปติ – ‘รูปี เม ปริตฺโต อตฺตา’ติ. รูปึ วา หิ, อานนฺท, อนนฺตํ อตฺตานํ น ปญฺญเปนฺโต น ปญฺญเปติ – ‘รูปี เม อนนฺโต อตฺตา’ติ. อรูปึ วา หิ, อานนฺท, ปริตฺตํ อตฺตานํ น ปญฺญเปนฺโต น ปญฺญเปติ – ‘อรูปี เม ปริตฺโต อตฺตา’ติ. อรูปึ วา หิ, อานนฺท, อนนฺตํ อตฺตานํ น ปญฺญเปนฺโต น ปญฺญเปติ – ‘อรูปี เม อนนฺโต อตฺตา’ติ. ११९. आनंदा, आत्मा प्रस्थापित न करणारा मनुष्य कशा प्रकारे आत्मा प्रस्थापित करत नाही? आनंदा, जो रूपात्मक आणि मर्यादित आत्मा प्रस्थापित करत नाही, तो 'माझा आत्मा रूपात्मक व मर्यादित आहे' असे प्रस्थापित करत नाही. आनंदा, जो रूपात्मक आणि अमर्याद आत्मा प्रस्थापित करत नाही, तो 'माझा आत्मा रूपात्मक व अमर्याद आहे' असे प्रस्थापित करत नाही. आनंदा, जो अरूपात्मक आणि मर्यादित आत्मा प्रस्थापित करत नाही, तो 'माझा आत्मा अरूपात्मक व मर्यादित आहे' असे प्रस्थापित करत नाही. आनंदा, जो अरूपात्मक आणि अमर्याद आत्मा प्रस्थापित करत नाही, तो 'माझा आत्मा अरूपात्मक व अमर्याद आहे' असे प्रस्थापित करत नाही. ๑๒๐. ‘‘ตตฺรานนฺท, โย โส รูปึ ปริตฺตํ อตฺตานํ น ปญฺญเปนฺโต น ปญฺญเปติ. เอตรหิ วา โส รูปึ ปริตฺตํ อตฺตานํ น ปญฺญเปนฺโต น ปญฺญเปติ, ตตฺถ ภาวึ วา โส รูปึ ปริตฺตํ อตฺตานํ น ปญฺญเปนฺโต น ปญฺญเปติ, ‘อตถํ วา ปน สนฺตํ ตถตฺตาย อุปกปฺเปสฺสามี’ติ อิติ วา ปนสฺส น โหติ. เอวํ สนฺตํ โข, อานนฺท, รูปึ ปริตฺตตฺตานุทิฏฺฐิ นานุเสตีติ อิจฺจาลํ วจนาย. १२०. आनंदा, त्यामध्ये जो रूपात्मक आणि मर्यादित आत्मा प्रस्थापित करत नाही; तो वर्तमानकाळात रूपात्मक आणि मर्यादित आत्मा प्रस्थापित करत नाही, किंवा परलोकात अस्तित्वात असणारा रूपात्मक आणि मर्यादित आत्मा प्रस्थापित करत नाही, तसेच 'जे असत्य आहे, त्याला मी सत्य सिद्ध करीन' असा विचारही त्याच्या मनात येत नाही. आनंदा, असे असताना, 'रूपात्मक आणि मर्यादित आत्म्याची अनुदृष्टी त्याच्यामध्ये सुप्त रूपात राहत नाही' असे म्हणणे योग्य ठरेल. ‘‘ตตฺรานนฺท[Pg.56], โย โส รูปึ อนนฺตํ อตฺตานํ น ปญฺญเปนฺโต น ปญฺญเปติ. เอตรหิ วา โส รูปึ อนนฺตํ อตฺตานํ น ปญฺญเปนฺโต น ปญฺญเปติ, ตตฺถ ภาวึ วา โส รูปึ อนนฺตํ อตฺตานํ น ปญฺญเปนฺโต น ปญฺญเปติ, ‘อตถํ วา ปน สนฺตํ ตถตฺตาย อุปกปฺเปสฺสามี’ติ อิติ วา ปนสฺส น โหติ. เอวํ สนฺตํ โข, อานนฺท, รูปึ อนนฺตตฺตานุทิฏฺฐิ นานุเสตีติ อิจฺจาลํ วจนาย. आनंदा, त्यामध्ये जो रूपात्मक आणि अमर्याद आत्मा प्रस्थापित करत नाही; तो वर्तमानकाळात रूपात्मक आणि अमर्याद आत्मा प्रस्थापित करत नाही, किंवा परलोकात अस्तित्वात असणारा रूपात्मक आणि अमर्याद आत्मा प्रस्थापित करत नाही, तसेच 'जे असत्य आहे, त्याला मी सत्य सिद्ध करीन' असा विचारही त्याच्या मनात येत नाही. आनंदा, असे असताना, 'रूपात्मक आणि अमर्याद आत्म्याची अनुदृष्टी त्याच्यामध्ये सुप्त रूपात राहत नाही' असे म्हणणे योग्य ठरेल. ‘‘ตตฺรานนฺท, โย โส อรูปึ ปริตฺตํ อตฺตานํ น ปญฺญเปนฺโต น ปญฺญเปติ. เอตรหิ วา โส อรูปึ ปริตฺตํ อตฺตานํ น ปญฺญเปนฺโต น ปญฺญเปติ, ตตฺถ ภาวึ วา โส อรูปึ ปริตฺตํ อตฺตานํ น ปญฺญเปนฺโต น ปญฺญเปติ, ‘อตถํ วา ปน สนฺตํ ตถตฺตาย อุปกปฺเปสฺสามี’ติ อิติ วา ปนสฺส น โหติ. เอวํ สนฺตํ โข, อานนฺท, อรูปึ ปริตฺตตฺตานุทิฏฺฐิ นานุเสตีติ อิจฺจาลํ วจนาย. आनंदा, त्यामध्ये जो अरूपात्मक आणि मर्यादित आत्मा प्रस्थापित करत नाही; तो वर्तमानकाळात अरूपात्मक आणि मर्यादित आत्मा प्रस्थापित करत नाही, किंवा परलोकात अस्तित्वात असणारा अरूपात्मक आणि मर्यादित आत्मा प्रस्थापित करत नाही, तसेच 'जे असत्य आहे, त्याला मी सत्य सिद्ध करीन' असा विचारही त्याच्या मनात येत नाही. आनंदा, असे असताना, 'अरूपात्मक आणि मर्यादित आत्म्याची अनुदृष्टी त्याच्यामध्ये सुप्त रूपात राहत नाही' असे म्हणणे योग्य ठरेल. ‘‘ตตฺรานนฺท, โย โส อรูปึ อนนฺตํ อตฺตานํ น ปญฺญเปนฺโต น ปญฺญเปติ. เอตรหิ วา โส อรูปึ อนนฺตํ อตฺตานํ น ปญฺญเปนฺโต น ปญฺญเปติ, ตตฺถ ภาวึ วา โส อรูปึ อนนฺตํ อตฺตานํ น ปญฺญเปนฺโต น ปญฺญเปติ, ‘อตถํ วา ปน สนฺตํ ตถตฺตาย อุปกปฺเปสฺสามี’ติ อิติ วา ปนสฺส น โหติ. เอวํ สนฺตํ โข, อานนฺท, อรูปึ อนนฺตตฺตานุทิฏฺฐิ นานุเสตีติ อิจฺจาลํ วจนาย. เอตฺตาวตา โข, อานนฺท, อตฺตานํ น ปญฺญเปนฺโต น ปญฺญเปติ. आनंदा, त्यामध्ये जो अरूपात्मक आणि अमर्याद आत्मा प्रस्थापित करत नाही; तो वर्तमानकाळात अरूपात्मक आणि अमर्याद आत्मा प्रस्थापित करत नाही, किंवा परलोकात अस्तित्वात असणारा अरूपात्मक आणि अमर्याद आत्मा प्रस्थापित करत नाही, तसेच 'जे असत्य आहे, त्याला मी सत्य सिद्ध करीन' असा विचारही त्याच्या मनात येत नाही. आनंदा, असे असताना, 'अरूपात्मक आणि अमर्याद आत्म्याची अनुदृष्टी त्याच्यामध्ये सुप्त रूपात राहत नाही' असे म्हणणे योग्य ठरेल. आनंदा, एवढ्याच मर्यादेत आत्मा प्रस्थापित न करणारा मनुष्य आत्मा प्रस्थापित करत नाही. อตฺตสมนุปสฺสนา आत्म्याचे समनुपश्यन ๑๒๑. ‘‘กิตฺตาวตา จ, อานนฺท, อตฺตานํ สมนุปสฺสมาโน สมนุปสฺสติ? เวทนํ วา หิ, อานนฺท, อตฺตานํ สมนุปสฺสมาโน สมนุปสฺสติ – ‘เวทนา เม อตฺตา’ติ. ‘น เหว โข เม เวทนา อตฺตา, อปฺปฏิสํเวทโน เม อตฺตา’ติ อิติ วา หิ, อานนฺท, อตฺตานํ สมนุปสฺสมาโน สมนุปสฺสติ. ‘น เหว โข เม เวทนา อตฺตา, โนปิ อปฺปฏิสํเวทโน เม อตฺตา, อตฺตา เม เวทิยติ, เวทนาธมฺโม หิ เม อตฺตา’ติ อิติ วา หิ, อานนฺท, อตฺตานํ สมนุปสฺสมาโน สมนุปสฺสติ. १२१. आनंदा, आत्म्याचे समनुपश्यन करणारा मनुष्य कशा प्रकारे आत्म्याचे समनुपश्यन करतो? आनंदा, वेदनेलाच आत्मा मानून समनुपश्यन करणारा मनुष्य 'वेदना हाच माझा आत्मा आहे' असे समनुपश्यन करतो. किंवा, 'वेदना हा माझा आत्मा नाही, माझा आत्मा संवेदनरहित आहे' असे आनंदा, आत्म्याचे समनुपश्यन करणारा मनुष्य समनुपश्यन करतो. किंवा, 'वेदना हा माझा आत्मा नाही, आणि माझा आत्मा संवेदनरहितही नाही; माझा आत्मा संवेदन करतो, कारण वेदना-स्वभाव हाच माझा आत्मा आहे' असे आनंदा, आत्म्याचे समनुपश्यन करणारा मनुष्य समनुपश्यन करतो. ๑๒๒. ‘‘ตตฺรานนฺท, โย โส เอวมาห – ‘เวทนา เม อตฺตา’ติ, โส เอวมสฺส วจนีโย – ‘ติสฺโส โข อิมา, อาวุโส, เวทนา – สุขา เวทนา ทุกฺขา เวทนา อทุกฺขมสุขา เวทนา. อิมาสํ โข ตฺวํ ติสฺสนฺนํ [Pg.57] เวทนานํ กตมํ อตฺตโต สมนุปสฺสสี’ติ? ยสฺมึ, อานนฺท, สมเย สุขํ เวทนํ เวเทติ, เนว ตสฺมึ สมเย ทุกฺขํ เวทนํ เวเทติ, น อทุกฺขมสุขํ เวทนํ เวเทติ; สุขํเยว ตสฺมึ สมเย เวทนํ เวเทติ. ยสฺมึ, อานนฺท, สมเย ทุกฺขํ เวทนํ เวเทติ, เนว ตสฺมึ สมเย สุขํ เวทนํ เวเทติ, น อทุกฺขมสุขํ เวทนํ เวเทติ; ทุกฺขํเยว ตสฺมึ สมเย เวทนํ เวเทติ. ยสฺมึ, อานนฺท, สมเย อทุกฺขมสุขํ เวทนํ เวเทติ, เนว ตสฺมึ สมเย สุขํ เวทนํ เวเทติ, น ทุกฺขํ เวทนํ เวเทติ; อทุกฺขมสุขํเยว ตสฺมึ สมเย เวทนํ เวเทติ. १२२. आनंदा, त्यामध्ये जो असे म्हणतो की— 'वेदना हाच माझा आत्मा आहे', त्याला असे विचारले पाहिजे— 'मित्रा, या तीन प्रकारच्या वेदना आहेत— सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना. या तीन वेदनांपैकी तू कोणत्या वेदनेला आत्मा म्हणून पाहतोस?' आनंदा, ज्या वेळी मनुष्य सुखद वेदनेचा अनुभव घेतो, त्या वेळी तो दुःखद वेदनेचा अनुभव घेत नाही, किंवा अदुःख-असुख वेदनेचाही अनुभव घेत नाही; त्या वेळी तो केवळ सुखद वेदनेचाच अनुभव घेतो. आनंदा, ज्या वेळी मनुष्य दुःखद वेदनेचा अनुभव घेतो, त्या वेळी तो सुखद वेदनेचा अनुभव घेत नाही, किंवा अदुःख-असुख वेदनेचाही अनुभव घेत नाही; त्या वेळी तो केवळ दुःखद वेदनेचाच अनुभव घेतो. आनंदा, ज्या वेळी मनुष्य अदुःख-असुख वेदनेचा अनुभव घेतो, त्या वेळी तो सुखद वेदनेचा अनुभव घेत नाही, किंवा दुःखद वेदनेचाही अनुभव घेत नाही; त्या वेळी तो केवळ अदुःख-असुख वेदनेचाच अनुभव घेतो. ๑๒๓. ‘‘สุขาปิ โข, อานนฺท, เวทนา อนิจฺจา สงฺขตา ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนา ขยธมฺมา วยธมฺมา วิราคธมฺมา นิโรธธมฺมา. ทุกฺขาปิ โข, อานนฺท, เวทนา อนิจฺจา สงฺขตา ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนา ขยธมฺมา วยธมฺมา วิราคธมฺมา นิโรธธมฺมา. อทุกฺขมสุขาปิ โข, อานนฺท, เวทนา อนิจฺจา สงฺขตา ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนา ขยธมฺมา วยธมฺมา วิราคธมฺมา นิโรธธมฺมา. ตสฺส สุขํ เวทนํ เวทิยมานสฺส ‘เอโส เม อตฺตา’ติ โหติ. ตสฺสาเยว สุขาย เวทนาย นิโรธา ‘พฺยคา เม อตฺตา’ติ โหติ. ทุกฺขํ เวทนํ เวทิยมานสฺส ‘เอโส เม อตฺตา’ติ โหติ. ตสฺสาเยว ทุกฺขาย เวทนาย นิโรธา ‘พฺยคา เม อตฺตา’ติ โหติ. อทุกฺขมสุขํ เวทนํ เวทิยมานสฺส ‘เอโส เม อตฺตา’ติ โหติ. ตสฺสาเยว อทุกฺขมสุขาย เวทนาย นิโรธา ‘พฺยคา เม อตฺตา’ติ โหติ. อิติ โส ทิฏฺเฐว ธมฺเม อนิจฺจสุขทุกฺขโวกิณฺณํ อุปฺปาทวยธมฺมํ อตฺตานํ สมนุปสฺสมาโน สมนุปสฺสติ, โย โส เอวมาห – ‘เวทนา เม อตฺตา’ติ. ตสฺมาติหานนฺท, เอเตน เปตํ นกฺขมติ – ‘เวทนา เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสิตุํ. १२३. आनंदा, सुखद वेदना देखील अनित्य, संस्कारित, प्रतीत्यसमुत्पन्न, क्षयधर्म, व्ययधर्म, विरागधर्म आणि निरोधधर्म आहे. आनंदा, दुःखद वेदना देखील अनित्य, संस्कारित, प्रतीत्यसमुत्पन्न, क्षयधर्म, व्ययधर्म, विरागधर्म आणि निरोधधर्म आहे. आनंदा, अदुःख-असुख वेदना देखील अनित्य, संस्कारित, प्रतीत्यसमुत्पन्न, क्षयधर्म, व्ययधर्म, विरागधर्म आणि निरोधधर्म आहे. सुखद वेदनेचा अनुभव घेताना त्या व्यक्तीला वाटते की— 'हाच माझा आत्मा आहे.' परंतु, त्याच सुखद वेदनेचा nirodha (नाश) झाल्यावर त्याला वाटते की— 'माझा आत्मा नष्ट झाला.' दुःखद वेदनेचा अनुभव घेताना त्याला वाटते की— 'हाच माझा आत्मा आहे.' परंतु, त्याच दुःखद वेदनेचा nirodha झाल्यावर त्याला वाटते की— 'माझा आत्मा नष्ट झाला.' अदुःख-असुख वेदनेचा अनुभव घेताना त्याला वाटते की— 'हाच माझा आत्मा आहे.' परंतु, त्याच अदुःख-असुख वेदनेचा nirodha झाल्यावर त्याला वाटते की— 'माझा आत्मा नष्ट झाला.' अशा प्रकारे, जो असे म्हणतो की— 'वेदना हाच माझा आत्मा आहे', तो या प्रत्यक्ष जीवनात अनित्य, सुख-दुःखाने मिश्रित आणि उत्पत्ति-विनाशशील असणाऱ्या गोष्टीलाच आत्मा मानून त्याचे समनुपश्यन करत असतो. म्हणूनच, आनंदा, या कारणास्तव 'वेदना हाच माझा आत्मा आहे' असे समनुपश्यन करणे योग्य नाही. ๑๒๔. ‘‘ตตฺรานนฺท, โย โส เอวมาห – ‘น เหว โข เม เวทนา อตฺตา, อปฺปฏิสํเวทโน เม อตฺตา’ติ, โส เอวมสฺส วจนีโย – ‘ยตฺถ ปนาวุโส, สพฺพโส เวทยิตํ นตฺถิ อปิ นุ โข, ตตฺถ ‘‘อยมหมสฺมี’’ติ สิยา’’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท, เอเตน เปตํ นกฺขมติ – ‘น เหว โข เม เวทนา อตฺตา, อปฺปฏิสํเวทโน เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสิตุํ. १२४. आनंदा, त्यामध्ये जो असे म्हणतो की— 'वेदना हा माझा आत्मा नाही, माझा आत्मा संवेदनरहित आहे', त्याला असे विचारले पाहिजे— 'मित्रा, जेथे कोणत्याही प्रकारचे संवेदन पूर्णपणे अस्तित्वात नाही, तेथे 'हा मी आहे' असा विचार उद्भवू शकेल का?' त्यावर तो उत्तर देईल— 'नाही, भंते!' म्हणूनच, आनंदा, या कारणास्तव 'वेदना हा माझा आत्मा नाही, माझा आत्मा संवेदनरहित आहे' असे समनुपश्यन करणे योग्य नाही. ๑๒๕. ‘‘ตตฺรานนฺท[Pg.58], โย โส เอวมาห – ‘น เหว โข เม เวทนา อตฺตา, โนปิ อปฺปฏิสํเวทโน เม อตฺตา, อตฺตา เม เวทิยติ, เวทนาธมฺโม หิ เม อตฺตา’ติ. โส เอวมสฺส วจนีโย – เวทนา จ หิ, อาวุโส, สพฺเพน สพฺพํ สพฺพถา สพฺพํ อปริเสสา นิรุชฺเฌยฺยุํ. สพฺพโส เวทนาย อสติ เวทนานิโรธา อปิ นุ โข ตตฺถ ‘อยมหมสฺมี’ติ สิยา’’ติ? ‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท, เอเตน เปตํ นกฺขมติ – ‘‘น เหว โข เม เวทนา อตฺตา, โนปิ อปฺปฏิสํเวทโน เม อตฺตา, อตฺตา เม เวทิยติ, เวทนาธมฺโม หิ เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสิตุํ. १२५. तेथे, आनंदा, जो कोणी असे म्हणतो – 'वेदना हा माझा अत्ता नाही, आणि माझा अत्ता संवेदनरहित देखील नाही; माझा अत्ता वेदनशील आहे, कारण वेदना हाच माझ्या अत्ताचा स्वभाव आहे.' त्याला असे विचारले पाहिजे – 'मित्रा, जर सर्व वेदना पूर्णपणे, सर्व प्रकारे आणि निरवशेषपणे निरुद्ध झाल्या, तर वेदनांच्या संपूर्ण अभावामुळे, वेदनांच्या निरोधाने, तेथे "हा मी आहे" असा विचार उद्भवू शकेल का?' 'नाही, भंते.' 'म्हणूनच, आनंदा, या कारणास्तव हे मान्य करणे योग्य नाही की – "वेदना हा माझा अत्ता नाही, आणि माझा अत्ता संवेदनरहित देखील नाही; माझा अत्ता वेदनशील आहे, कारण वेदना हाच माझ्या अत्ताचा स्वभाव आहे" असे मानणे योग्य नाही.' ๑๒๖. ‘‘ยโต โข, อานนฺท, ภิกฺขุ เนว เวทนํ อตฺตานํ สมนุปสฺสติ, โนปิ อปฺปฏิสํเวทนํ อตฺตานํ สมนุปสฺสติ, โนปิ ‘อตฺตา เม เวทิยติ, เวทนาธมฺโม หิ เม อตฺตา’ติ สมนุปสฺสติ. โส เอวํ น สมนุปสฺสนฺโต น จ กิญฺจิ โลเก อุปาทิยติ, อนุปาทิยํ น ปริตสฺสติ, อปริตสฺสํ ปจฺจตฺตญฺเญว ปรินิพฺพายติ, ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ ปชานาติ. เอวํ วิมุตฺตจิตฺตํ โข, อานนฺท, ภิกฺขุํ โย เอวํ วเทยฺย – ‘โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา อิติสฺส ทิฏฺฐี’ติ, ตทกลฺลํ. ‘น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา อิติสฺส ทิฏฺฐี’ติ, ตทกลฺลํ. ‘โหติ จ น จ โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา อิติสฺส ทิฏฺฐี’ติ, ตทกลฺลํ. ‘เนว โหติ น น โหติ ตถาคโต ปรํ มรณา อิติสฺส ทิฏฺฐี’ติ, ตทกลฺลํ. ตํ กิสฺส เหตุ? ยาวตา, อานนฺท, อธิวจนํ ยาวตา อธิวจนปโถ, ยาวตา นิรุตฺติ ยาวตา นิรุตฺติปโถ, ยาวตา ปญฺญตฺติ ยาวตา ปญฺญตฺติปโถ, ยาวตา ปญฺญา ยาวตา ปญฺญาวจรํ, ยาวตา วฏฺฏํ, ยาวตา วฏฺฏติ, ตทภิญฺญาวิมุตฺโต ภิกฺขุ, ตทภิญฺญาวิมุตฺตํ ภิกฺขุํ ‘น ชานาติ น ปสฺสติ อิติสฺส ทิฏฺฐี’ติ, ตทกลฺลํ. १२६. जेव्हा, आनंदा, एखादा भिक्खू वेदनेला अत्ता मानत नाही, किंवा अत्ताला संवेदनरहित मानत नाही, किंवा 'माझा अत्ता वेदनशील आहे, कारण वेदना हाच माझ्या अत्ताचा स्वभाव आहे' असेही मानत नाही. तो असे न मानल्यामुळे या जगात कशाचेही उपादान करत नाही. उपादान न केल्यामुळे तो उद्विग्न होत नाही. उद्विग्न न झाल्यामुळे तो स्वतःच परिनिर्वाण प्राप्त करतो आणि जाणतो – 'जन्म संपुष्टात आला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या संसारासाठी काहीही शिल्लक राहिलेले नाही.' आनंदा, अशा प्रकारे विमुक्त चित्त झालेल्या भिक्खूबाबत जर कोणी असे म्हटले की – 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात, अशी त्यांची दृष्टी आहे', तर ते अयोग्य ठरेल. 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात...', 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही...', 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही, अशी त्यांची दृष्टी आहे', तर ते अयोग्य ठरेल. त्याचे कारण काय? आनंदा, जिथपर्यंत संज्ञा आणि संज्ञेचा मार्ग आहे, जिथपर्यंत निरुक्ती आणि निरुक्तीचा मार्ग आहे, जिथपर्यंत प्रज्ञप्ती आणि प्रज्ञप्तीचा मार्ग आहे, जिथपर्यंत प्रज्ञा आणि प्रज्ञेचे क्षेत्र आहे, जिथपर्यंत संसारचक्र आहे आणि ते फिरते – त्या सर्वांना अभिज्ञेने जाणून भिक्खू विमुक्त झालेला असतो. अशा अभिज्ञा-विमुक्त भिक्खूबाबत 'तो जाणत नाही, पाहत नाही, अशी त्याची दृष्टी आहे' असे म्हणणे अयोग्य ठरेल. สตฺต วิญฺญาณฏฺฐิติ सात विज्ञान-स्थिती (विञ्ञाणट्ठिती) ๑๒๗. ‘‘สตฺต โข, อานนฺท, วิญฺญาณฏฺฐิติโย, ทฺเว อายตนานิ. กตมา สตฺต? สนฺตานนฺท, สตฺตา นานตฺตกายา นานตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ มนุสฺสา[Pg.59], เอกจฺเจ จ เทวา, เอกจฺเจ จ วินิปาติกา. อยํ ปฐมา วิญฺญาณฏฺฐิติ. สนฺตานนฺท, สตฺตา นานตฺตกายา เอกตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ เทวา พฺรหฺมกายิกา ปฐมาภินิพฺพตฺตา. อยํ ทุติยา วิญฺญาณฏฺฐิติ. สนฺตานนฺท, สตฺตา เอกตฺตกายา นานตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ เทวา อาภสฺสรา. อยํ ตติยา วิญฺญาณฏฺฐิติ. สนฺตานนฺท, สตฺตา เอกตฺตกายา เอกตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ เทวา สุภกิณฺหา. อยํ จตุตฺถี วิญฺญาณฏฺฐิติ. สนฺตานนฺท, สตฺตา สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา ปฏิฆสญฺญานํ อตฺถงฺคมา นานตฺตสญฺญานํ อมนสิการา ‘อนนฺโต อากาโส’ติ อากาสานญฺจายตนูปคา. อยํ ปญฺจมี วิญฺญาณฏฺฐิติ. สนฺตานนฺท, สตฺตา สพฺพโส อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘อนนฺตํ วิญฺญาณ’นฺติ วิญฺญาณญฺจายตนูปคา. อยํ ฉฏฺฐี วิญฺญาณฏฺฐิติ. สนฺตานนฺท, สตฺตา สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘นตฺถิ กิญฺจี’ติ อากิญฺจญฺญายตนูปคา. อยํ สตฺตมี วิญฺญาณฏฺฐิติ. อสญฺญสตฺตายตนํ เนวสญฺญานาสญฺญายตนเมว ทุติยํ. १२७. आनंदा, सात विज्ञान-स्थिती आणि दोन आयतने आहेत. त्या सात कोणत्या? आनंदा, काही प्राणी शरीराने भिन्न आणि संज्ञेने भिन्न असतात, जसे की मनुष्य, काही देव आणि काही विनिपातिक. ही पहिली विज्ञान-स्थिती आहे. आनंदा, काही प्राणी शरीराने भिन्न पण संज्ञेने एक असतात, जसे की प्रथम ध्यानामुळे उत्पन्न झालेले ब्रह्मकायिक देव. ही दुसरी विज्ञान-स्थिती आहे. आनंदा, काही प्राणी शरीराने एक पण संज्ञेने भिन्न असतात, जसे की आभास्सर देव. ही तिसरी विज्ञान-स्थिती आहे. आनंदा, काही प्राणी शरीराने एक आणि संज्ञेनेही एक असतात, जसे की सुभकिण्ह देव. ही चौथी विज्ञान-स्थिती आहे. आनंदा, काही प्राणी रूपसंज्ञांचे पूर्णपणे अतिक्रमण करून, प्रतिघसंज्ञांच्या अस्तामुळे आणि नानात्वसंज्ञांकडे मनसिकार न केल्यामुळे, 'आकाश अनंत आहे' असे मानून आकासानञ्चायतनात पोहोचतात. ही पाचवी विज्ञान-स्थिती आहे. आनंदा, काही प्राणी आकासानञ्चायतनाचे पूर्णपणे अतिक्रमण करून, 'विज्ञान अनंत आहे' असे मानून विञ्ञाणञ्चायतनात पोहोचतात. ही सहावी विज्ञान-स्थिती आहे. आनंदा, काही प्राणी विञ्ञाणञ्चायतनाचे पूर्णपणे अतिक्रमण करून, 'काहीही नाही' असे मानून आकिञ्चञ्ञायतनात पोहोचतात. ही सातवी विज्ञान-स्थिती आहे. (आणि दोन आयतने कोणती?) असञ्ञसत्त आयतन आणि दुसरे, नेवसञ्ञानासञ्ञायतन. ๑๒๘. ‘‘ตตฺรานนฺท, ยายํ ปฐมา วิญฺญาณฏฺฐิติ นานตฺตกายา นานตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ มนุสฺสา, เอกจฺเจ จ เทวา, เอกจฺเจ จ วินิปาติกา. โย นุ โข, อานนฺท, ตญฺจ ปชานาติ, ตสฺสา จ สมุทยํ ปชานาติ, ตสฺสา จ อตฺถงฺคมํ ปชานาติ, ตสฺสา จ อสฺสาทํ ปชานาติ, ตสฺสา จ อาทีนวํ ปชานาติ, ตสฺสา จ นิสฺสรณํ ปชานาติ, กลฺลํ นุ เตน ตทภินนฺทิตุ’’นฺติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’…เป… ‘‘ตตฺรานนฺท, ยมิทํ อสญฺญสตฺตายตนํ. โย นุ โข, อานนฺท, ตญฺจ ปชานาติ, ตสฺส จ สมุทยํ ปชานาติ, ตสฺส จ อตฺถงฺคมํ ปชานาติ, ตสฺส จ อสฺสาทํ ปชานาติ, ตสฺส จ อาทีนวํ ปชานาติ, ตสฺส จ นิสฺสรณํ ปชานาติ, กลฺลํ นุ เตน ตทภินนฺทิตุ’’นฺติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตตฺรานนฺท, ยมิทํ เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ. โย นุ โข, อานนฺท, ตญฺจ ปชานาติ, ตสฺส จ สมุทยํ ปชานาติ, ตสฺส จ อตฺถงฺคมํ ปชานาติ, ตสฺส จ อสฺสาทํ ปชานาติ, ตสฺส จ อาทีนวํ ปชานาติ, ตสฺส จ นิสฺสรณํ ปชานาติ, กลฺลํ นุ เตน ตทภินนฺทิตุ’’นฺติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. ยโต โข, อานนฺท, ภิกฺขุ อิมาสญฺจ สตฺตนฺนํ วิญฺญาณฏฺฐิตีนํ อิเมสญฺจ ทฺวินฺนํ อายตนานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ วิทิตฺวา อนุปาทา วิมุตฺโต โหติ, อยํ วุจฺจตานนฺท, ภิกฺขุ ปญฺญาวิมุตฺโต. १२८. तेथे, आनंदा, जी ही पहिली विज्ञान-स्थिती आहे – जिच्यात शरीराने भिन्न आणि संज्ञेने भिन्न असणारे प्राणी आहेत, जसे की मनुष्य, काही देव आणि काही विनिपातिक. आनंदा, जो कोणी या पहिल्या विज्ञान-स्थितीला जाणतो, तिच्या उत्पत्तीला जाणतो, तिच्या अस्ताला जाणतो, तिच्यातील आस्वादाला जाणतो, तिच्यातील दोषाला जाणतो आणि तिच्यातून सुटकेला जाणतो, त्याने तिच्यात आनंद मानणे योग्य होईल का?' 'नाही, भंते.' ...तसेच, आनंदा, जे हे असञ्ञसत्त आयतन आहे. आनंदा, जो कोणी त्याला जाणतो, त्याच्या उत्पत्तीला जाणतो, त्याच्या अस्ताला जाणतो, त्याच्यातील आस्वादाला जाणतो, त्याच्यातील दोषाला जाणतो आणि त्याच्यातून सुटकेला जाणतो, त्याने त्यात आनंद मानणे योग्य होईल का?' 'नाही, भंते.' 'तसेच, आनंदा, जे हे नेवसञ्ञानासञ्ञायतन आहे. आनंदा, जो कोणी त्याला जाणतो, त्याच्या उत्पत्तीला जाणतो, त्याच्या अस्ताला जाणतो, त्याच्यातील आस्वादाला जाणतो, त्याच्यातील दोषाला जाणतो आणि त्याच्यातून सुटकेला जाणतो, त्याने त्यात आनंद मानणे योग्य होईल का?' 'नाही, भंते.' आनंदा, जेव्हा एखादा भिक्खू या सात विज्ञान-स्थितींचा आणि या दोन आयतनांचा उदय, अस्त, आस्वाद, दोष आणि सुटका यथाभूत जाणून, उपादानरहित विमुक्त होतो, तेव्हा, आनंदा, त्या भिक्खूला 'प्रज्ञाविमुक्त' असे म्हटले जाते. อฏฺฐ วิโมกฺขา आठ विमोक्ष (अट्ठ विमोक्खा) ๑๒๙. ‘‘อฏฺฐ [Pg.60] โข อิเม, อานนฺท, วิโมกฺขา. กตเม อฏฺฐ? รูปี รูปานิ ปสฺสติ อยํ ปฐโม วิโมกฺโข. อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ, อยํ ทุติโย วิโมกฺโข. สุภนฺเตว อธิมุตฺโต โหติ, อยํ ตติโย วิโมกฺโข. สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา ปฏิฆสญฺญานํ อตฺถงฺคมา นานตฺตสญฺญานํ อมนสิการา ‘อนนฺโต อากาโส’ติ อากาสานญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ, อยํ จตุตฺโถ วิโมกฺโข. สพฺพโส อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘อนนฺตํ วิญฺญาณ’นฺติ วิญฺญาณญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ, อยํ ปญฺจโม วิโมกฺโข. สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘นตฺถิ กิญฺจี’ติ อากิญฺจญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ, อยํ ฉฏฺโฐ วิโมกฺโข. สพฺพโส อากิญฺจญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม ‘เนวสญฺญานาสญฺญา’ยตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ, อยํ สตฺตโม วิโมกฺโข. สพฺพโส เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม สญฺญาเวทยิตนิโรธํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ, อยํ อฏฺฐโม วิโมกฺโข. อิเม โข, อานนฺท, อฏฺฐ วิโมกฺขา. १२९. “आनंदा, हे आठ विमोक्ष (मुक्तीच्या अवस्था) आहेत. कोणते आठ? (१) रूपी (रूपाची जाणीव असलेला) रूपांना पाहतो, हा पहिला विमोक्ष आहे. (२) स्वतःच्या शरीरात अरूपसंज्ञी (रूपाची संज्ञा नसलेला) बाहेर रूपांना पाहतो, हा दुसरा विमोक्ष आहे. (३) ‘ते शुभ (सुंदर) आहे’ असाच निश्चय करतो (अधिमुक्त होतो), हा तिसरा विमोक्ष आहे. (४) सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांचे पूर्णपणे अतिक्रमण केल्यामुळे, प्रतिघसंज्ञांचा (द्वेषयुक्त विचारांचा) अस्त झाल्यामुळे आणि नानात्वसंज्ञांकडे (विविधतेच्या संज्ञांकडे) मन न दिल्यामुळे, ‘आकाश अनंत आहे’ अशा भावनेने आकाशानानंत्यायतन प्राप्त करून विहरतो, हा चौथा विमोक्ष आहे. (५) सर्व प्रकारे आकाशानानंत्यायतन ओलांडून, ‘विज्ञान अनंत आहे’ अशा भावनेने विज्ञानानंत्यायतन प्राप्त करून विहरतो, हा पाचवा विमोक्ष आहे. (६) सर्व प्रकारे विज्ञानानंत्यायतन ओलांडून, ‘काहीही नाही’ अशा भावनेने आकिंचन्यायतन प्राप्त करून विहरतो, हा सहावा विमोक्ष आहे. (७) सर्व प्रकारे आकिंचन्यायतन ओलांडून नैवसंज्ञानासंज्ञायतन प्राप्त करून विहरतो, हा सातवा विमोक्ष आहे. (८) सर्व प्रकारे नैवसंज्ञानासंज्ञायतन ओलांडून संज्ञावेदयितनिरोध (संज्ञा आणि वेदनांचा निरोध) प्राप्त करून विहरतो, हा आठवा विमोक्ष आहे. आनंदा, हेच ते आठ विमोक्ष आहेत.” ๑๓๐. ‘‘ยโต โข, อานนฺท, ภิกฺขุ อิเม อฏฺฐ วิโมกฺเข อนุโลมมฺปิ สมาปชฺชติ, ปฏิโลมมฺปิ สมาปชฺชติ, อนุโลมปฏิโลมมฺปิ สมาปชฺชติ, ยตฺถิจฺฉกํ ยทิจฺฉกํ ยาวติจฺฉกํ สมาปชฺชติปิ วุฏฺฐาติปิ. อาสวานญฺจ ขยา อนาสวํ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหรติ, อยํ วุจฺจตานนฺท, ภิกฺขุ อุภโตภาควิมุตฺโต. อิมาย จ อานนฺท อุภโตภาควิมุตฺติยา อญฺญา อุภโตภาควิมุตฺติ อุตฺตริตรา วา ปณีตตรา วา นตฺถี’’ติ. อิทมโวจ ภควา. อตฺตมโน อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทีติ. १३०. “आनंदा, जेव्हा एखादा भिक्खू या आठ विमोक्षांना अनुलोम (सरळ क्रमाने) प्राप्त करतो, प्रतिलोम (उलट क्रमाने) प्राप्त करतो, अनुलोम-प्रतिलोम (दोन्ही क्रमाने) प्राप्त करतो; ज्या ठिकाणी पाहिजे तिथे, ज्या समापत्तीमध्ये पाहिजे तिथे आणि जितका वेळ पाहिजे तितका वेळ समापन्न (प्रवेश) करतो आणि त्यातून उठतो (बाहेर पडतो); आणि आसवांच्या क्षयामुळे (नाशाने) आसवरहित अशा चेतोविमुक्तीला व प्रज्ञाविमुक्तीला याच जन्मात स्वतः अभिज्ञाने (उच्च ज्ञानाने) साक्षात करून, प्राप्त करून विहरतो; आनंदा, अशा भिक्खूला ‘उभतोभागविमुक्त’ (दोन्ही मार्गांनी मुक्त झालेला) असे म्हटले जाते. आणि आनंदा, या उभतोभागविमुक्तीपेक्षा दुसरी कोणतीही उभतोभागविमुक्ती अधिक श्रेष्ठ किंवा अधिक प्रणीत (उत्कृष्ट) नाही.” भगवान असे म्हणाले. आयुष्यमान आनंद भगवंतांच्या भाषणाने अत्यंत आनंदित व प्रसन्न झाले. มหานิทานสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ ทุติยํ. दुसरे महानिदान सुत्त समाप्त झाले. ๓. มหาปรินิพฺพานสุตฺตํ ३. महापरिनिब्बान सुत्त ๑๓๑. เอวํ [Pg.61] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ คิชฺฌกูเฏ ปพฺพเต. เตน โข ปน สมเยน ราชา มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต วชฺชี อภิยาตุกาโม โหติ. โส เอวมาห – ‘‘อหํ หิเม วชฺชี เอวํมหิทฺธิเก เอวํมหานุภาเว อุจฺเฉจฺฉามิ วชฺชี, วินาเสสฺสามิ วชฺชี, อนยพฺยสนํ อาปาเทสฺสามิ วชฺชี’’ติ. १३१. असे मी ऐकले आहे – एक वेळ भगवान राजगृह येथे गिज्झकूट (गृध्रकूट) पर्वतावर विहरत होते. त्या वेळी मगधचा राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रू वज्जींवर आक्रमण करू इच्छित होता. तो असे म्हणाला – “मी या अत्यंत ऋद्धिवान (सामर्थ्यशाली) आणि अत्यंत महानुभाव (प्रतापशाली) वज्जींचा उच्छेद करीन, वज्जींचा विनाश करीन, वज्जींना पूर्ण विनाशाप्रत पोहोचवीन.” ๑๓๒. อถ โข ราชา มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต วสฺสการํ พฺราหฺมณํ มคธมหามตฺตํ อามนฺเตสิ – ‘‘เอหิ ตฺวํ, พฺราหฺมณ, เยน ภควา เตนุปสงฺกม; อุปสงฺกมิตฺวา มม วจเนน ภควโต ปาเท สิรสา วนฺทาหิ, อปฺปาพาธํ อปฺปาตงฺกํ ลหุฏฺฐานํ พลํ ผาสุวิหารํ ปุจฺฉ – ‘ราชา, ภนฺเต, มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต ภควโต ปาเท สิรสา วนฺทติ, อปฺปาพาธํ อปฺปาตงฺกํ ลหุฏฺฐานํ พลํ ผาสุวิหารํ ปุจฺฉตี’ติ. เอวญฺจ วเทหิ – ‘ราชา, ภนฺเต, มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต วชฺชี อภิยาตุกาโม. โส เอวมาห – ‘‘อหํ หิเม วชฺชี เอวํมหิทฺธิเก เอวํมหานุภาเว อุจฺเฉจฺฉามิ วชฺชี, วินาเสสฺสามิ วชฺชี, อนยพฺยสนํ อาปาเทสฺสามี’’’ติ. ยถา เต ภควา พฺยากโรติ, ตํ สาธุกํ อุคฺคเหตฺวา มม อาโรเจยฺยาสิ. น หิ ตถาคตา วิตถํ ภณนฺตี’’ติ. १३२. त्यानंतर मगधचा राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रूने मगधचा महामात्य (मुख्य मंत्री) असलेल्या वस्सकार ब्राह्मणाला बोलावले आणि म्हटले – “ब्राह्मणा, जा, जिथे भगवान आहेत तिथे जा; तिथे जाऊन माझ्या वतीने भगवंतांच्या चरणांवर डोके ठेवून वंदन कर आणि त्यांच्या निरोगीपणाबद्दल, आजार नसण्याबद्दल, शरीराच्या हलकेपणाबद्दल (उत्थानशीलतेबद्दल), बलाविषयी व सुखावह विहाराविषयी विचारपूस कर – ‘भंते, मगधचा राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रू भगवंतांच्या चरणांवर डोके ठेवून वंदन करत आहे आणि त्यांच्या निरोगीपणाबद्दल, आजार नसण्याबद्दल, शरीराच्या हलकेपणाबद्दल, बलाविषयी व सुखावह विहाराविषयी विचारत आहे.’ आणि असेही सांग – ‘भंते, मगधचा राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रू वज्जींवर आक्रमण करू इच्छित आहे. तो असे म्हणत आहे – “मी या अत्यंत ऋद्धिवान आणि अत्यंत महानुभाव वज्जींचा उच्छेद करीन, वज्जींचा विनाश करीन, वज्जींना पूर्ण विनाशाप्रत पोहोचवीन.”’ भगवान तुला जे काही उत्तर देतील, ते नीट ग्रहण करून (लक्षात ठेवून) मला येऊन सांग. कारण तथागत कधीही असत्य बोलत नाहीत.” วสฺสการพฺราหฺมโณ वस्सकार ब्राह्मण ๑๓๓. ‘‘เอวํ, โภ’’ติ โข วสฺสกาโร พฺราหฺมโณ มคธมหามตฺโต รญฺโญ มาคธสฺส อชาตสตฺตุสฺส เวเทหิปุตฺตสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ภทฺทานิ ภทฺทานิ ยานานิ โยเชตฺวา ภทฺทํ ภทฺทํ ยานํ อภิรุหิตฺวา ภทฺเทหิ ภทฺเทหิ ยาเนหิ ราชคหมฺหา นิยฺยาสิ, เยน คิชฺฌกูโฏ ปพฺพโต เตน ปายาสิ. ยาวติกา ยานสฺส ภูมิ, ยาเนน คนฺตฺวา, ยานา ปจฺโจโรหิตฺวา ปตฺติโกว เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ [Pg.62] นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข วสฺสกาโร พฺราหฺมโณ มคธมหามตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ราชา, โภ โคตม, มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต โภโต โคตมสฺส ปาเท สิรสา วนฺทติ, อปฺปาพาธํ อปฺปาตงฺกํ ลหุฏฺฐานํ พลํ ผาสุวิหารํ ปุจฺฉติ. ราชา, โภ โคตม, มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต วชฺชี อภิยาตุกาโม. โส เอวมาห – ‘อหํ หิเม วชฺชี เอวํมหิทฺธิเก เอวํมหานุภาเว อุจฺเฉจฺฉามิ วชฺชี, วินาเสสฺสามิ วชฺชี, อนยพฺยสนํ อาปาเทสฺสามี’’’ติ. १३३. “तसेच असो, महाराज,” असे म्हणून मगधचा महामात्य वस्सकार ब्राह्मणाने मगधचा राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रूच्या आज्ञेचा स्वीकार केला. त्याने उत्तम उत्तम रथ जोडले, एका उत्तम रथावर तो स्वतः आरूढ झाला आणि उत्तम उत्तम रथांसह राजगृहातून बाहेर पडून गिज्झकूट पर्वताकडे निघाला. रथाने जाण्यायोग्य रस्ता होता तिथपर्यंत रथाने जाऊन, रथातून खाली उतरून तो पायीच जिथे भगवान होते तिथे गेला. तिथे जाऊन त्याने भगवंतांशी कुशल विचारपूस केली. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या मगधच्या महामात्य वस्सकार ब्राह्मणाने भगवंतांना असे म्हटले – “हे गौतम, मगधचा राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रू आपल्या चरणांवर डोके ठेवून वंदन करत आहे आणि आपल्या निरोगीपणाबद्दल, आजार नसण्याबद्दल, शरीराच्या हलकेपणाबद्दल, बलाविषयी व सुखावह विहाराविषयी विचारत आहे. हे गौतम, मगधचा राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रू वज्जींवर आक्रमण करू इच्छित आहे. तो असे म्हणत आहे – ‘मी या अत्यंत ऋद्धिवान आणि अत्यंत महानुभाव वज्जींचा उच्छेद करीन, वज्जींचा विनाश करीन, वज्जींना पूर्ण विनाशाप्रत पोहोचवीन.’” ราชอปริหานิยธมฺมา राजांचे अपरिहानीय धर्म (अवनती न होण्याचे नियम) ๑๓๔. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปิฏฺฐิโต ฐิโต โหติ ภควนฺตํ พีชยมาโน. อถ โข ภควา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘กินฺติ เต, อานนฺท, สุตํ, ‘วชฺชี อภิณฺหํ สนฺนิปาตา สนฺนิปาตพหุลา’ติ? ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต – ‘วชฺชี อภิณฺหํ สนฺนิปาตา สนฺนิปาตพหุลา’’ติ. ‘‘ยาวกีวญฺจ, อานนฺท, วชฺชี อภิณฺหํ สนฺนิปาตา สนฺนิปาตพหุลา ภวิสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, อานนฺท, วชฺชีนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. १३४. त्या वेळी आयुष्यमान आनंद भगवंतांच्या मागे उभे राहून त्यांना पंख्याने वारा घालत होते. तेव्हा भगवंतांनी आयुष्यमान आनंदांना विचारले – “आनंदा, तू असे ऐकले आहेस का की, वज्जी वारंवार एकत्र जमतात आणि त्यांच्या सभा वारंवार होतात?” “होय भंते, मी असे ऐकले आहे की, वज्जी वारंवार एकत्र जमतात आणि त्यांच्या सभा वारंवार होतात.” “आनंदा, जोपर्यंत वज्जी वारंवार एकत्र जमतील आणि त्यांच्या सभा वारंवार होत राहतील, तोपर्यंत वज्जींची केवळ प्रगतीच (वृद्धीच) अपेक्षित आहे, त्यांची अवनती (र्हास) होणार नाही.” ‘‘กินฺติ เต, อานนฺท, สุตํ, ‘วชฺชี สมคฺคา สนฺนิปตนฺติ, สมคฺคา วุฏฺฐหนฺติ, สมคฺคา วชฺชิกรณียานิ กโรนฺตี’ติ? ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต – ‘วชฺชี สมคฺคา สนฺนิปตนฺติ, สมคฺคา วุฏฺฐหนฺติ, สมคฺคา วชฺชิกรณียานิ กโรนฺตี’’ติ. ‘‘ยาวกีวญฺจ, อานนฺท, วชฺชี สมคฺคา สนฺนิปติสฺสนฺติ, สมคฺคา วุฏฺฐหิสฺสนฺติ, สมคฺคา วชฺชิกรณียานิ กริสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, อานนฺท, วชฺชีนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “आनंदा, तू असे ऐकले आहेस का की, वज्जी एकजुटीने एकत्र जमतात, एकजुटीने उठतात (सभा विसर्जित करतात) आणि वज्जींचे कर्तव्यकर्म एकजुटीने पार पाडतात?” “होय भंते, मी असे ऐकले आहे की, वज्जी एकजुटीने एकत्र जमतात, एकजुटीने उठतात आणि वज्जींचे कर्तव्यकर्म एकजुटीने पार पाडतात.” “आनंदा, जोपर्यंत वज्जी एकजुटीने एकत्र जमतील, एकजुटीने उठतील आणि वज्जींचे कर्तव्यकर्म एकजुटीने पार पाडतील, तोपर्यंत वज्जींची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, त्यांची अवनती होणार नाही.” ‘‘กินฺติ เต, อานนฺท, สุตํ, ‘วชฺชี อปญฺญตฺตํ น ปญฺญเปนฺติ, ปญฺญตฺตํ น สมุจฺฉินฺทนฺติ, ยถาปญฺญตฺเต โปราเณ วชฺชิธมฺเม สมาทาย วตฺตนฺตี’’’ติ? ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต – ‘วชฺชี อปญฺญตฺตํ น ปญฺญเปนฺติ, ปญฺญตฺตํ น สมุจฺฉินฺทนฺติ, ยถาปญฺญตฺเต โปราเณ วชฺชิธมฺเม สมาทาย วตฺตนฺตี’’’ติ. ‘‘ยาวกีวญฺจ, อานนฺท, ‘‘วชฺชี อปญฺญตฺตํ น ปญฺญเปสฺสนฺติ, ปญฺญตฺตํ น สมุจฺฉินฺทิสฺสนฺติ, ยถาปญฺญตฺเต โปราเณ วชฺชิธมฺเม สมาทาย วตฺติสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, อานนฺท, วชฺชีนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “आनंदा, तू असे ऐकले आहेस का की, 'वज्जी लोक जे आधी विहित केलेले नाही ते नवीन लागू करत नाहीत, जे आधीच विहित केलेले आहे ते रद्द करत नाहीत आणि पूर्वीपासून चालत आलेल्या वज्जींच्या प्राचीन परंपरांचे (धम्माचे) पालन करून त्यानुसार वागतात'?” “होय, भन्ते, मी असे ऐकले आहे की—'वज्जी लोक जे आधी विहित केलेले नाही ते नवीन लागू करत नाहीत, जे आधीच विहित केलेले आहे ते रद्द करत नाहीत आणि पूर्वीपासून चालत आलेल्या वज्जींच्या प्राचीन परंपरांचे पालन करून त्यानुसार वागतात'.” “आनंदा, जोपर्यंत वज्जी लोक जे आधी विहित केलेले नाही ते नवीन लागू करणार नाहीत, जे आधीच विहित केलेले आहे ते रद्द करणार नाहीत आणि पूर्वीपासून चालत आलेल्या वज्जींच्या प्राचीन परंपरांचे पालन करून त्यानुसार वागतील, तोपर्यंत, आनंदा, वज्जींची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अवनती नाही.” ‘‘กินฺติ [Pg.63] เต, อานนฺท, สุตํ, ‘วชฺชี เย เต วชฺชีนํ วชฺชิมหลฺลกา, เต สกฺกโรนฺติ ครุํ กโรนฺติ มาเนนฺติ ปูเชนฺติ, เตสญฺจ โสตพฺพํ มญฺญนฺตี’’’ติ? ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต – ‘วชฺชี เย เต วชฺชีนํ วชฺชิมหลฺลกา, เต สกฺกโรนฺติ ครุํ กโรนฺติ มาเนนฺติ ปูเชนฺติ, เตสญฺจ โสตพฺพํ มญฺญนฺตี’’’ติ. ‘‘ยาวกีวญฺจ, อานนฺท, วชฺชี เย เต วชฺชีนํ วชฺชิมหลฺลกา, เต สกฺกริสฺสนฺติ ครุํ กริสฺสนฺติ มาเนสฺสนฺติ ปูเชสฺสนฺติ, เตสญฺจ โสตพฺพํ มญฺญิสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, อานนฺท, วชฺชีนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “आनंदा, तू असे ऐकले आहेस का की, 'वज्जी लोक त्यांच्यातील जे वज्जी वृद्ध (ज्येष्ठ) आहेत, त्यांचा आदर करतात, सन्मान करतात, त्यांना मान देतात, पूजतात आणि त्यांचे ऐकणे योग्य मानतात'?” “होय, भन्ते, मी असे ऐकले आहे की—'वज्जी लोक त्यांच्यातील जे वज्जी वृद्ध आहेत, त्यांचा आदर करतात, सन्मान करतात, त्यांना मान देतात, पूजतात आणि त्यांचे ऐकणे योग्य मानतात'.” “आनंदा, जोपर्यंत वज्जी लोक त्यांच्यातील जे वज्जी वृद्ध आहेत, त्यांचा आदर करतील, सन्मान करतील, त्यांना मान देतील, पूजतील आणि त्यांचे ऐकणे योग्य मानतील, तोपर्यंत, आनंदा, वज्जींची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अवनती नाही.” ‘‘กินฺติ เต, อานนฺท, สุตํ, ‘วชฺชี ยา ตา กุลิตฺถิโย กุลกุมาริโย, ตา น โอกฺกสฺส ปสยฺห วาเสนฺตี’’’ติ? ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต – ‘วชฺชี ยา ตา กุลิตฺถิโย กุลกุมาริโย ตา น โอกฺกสฺส ปสยฺห วาเสนฺตี’’’ติ. ‘‘ยาวกีวญฺจ, อานนฺท, วชฺชี ยา ตา กุลิตฺถิโย กุลกุมาริโย, ตา น โอกฺกสฺส ปสยฺห วาเสสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, อานนฺท, วชฺชีนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “आनंदा, तू असे ऐकले आहेस का की, 'वज्जी लोक कुलीन स्त्रिया आणि कुमारिकांचे जबरदस्तीने अपहरण करून किंवा त्यांच्यावर जुलूम करून त्यांना आपल्यासोबत राहण्यास भाग पाडत नाहीत'?” “होय, भन्ते, मी असे ऐकले आहे की—'वज्जी लोक कुलीन स्त्रिया आणि कुमारिकांचे जबरदस्तीने अपहरण करून किंवा त्यांच्यावर जुलूम करून त्यांना आपल्यासोबत राहण्यास भाग पाडत नाहीत'.” “आनंदा, जोपर्यंत वज्जी लोक कुलीन स्त्रिया आणि कुमारिकांचे जबरदस्तीने अपहरण करून किंवा त्यांच्यावर जुलूम करून त्यांना आपल्यासोबत राहण्यास भाग पाडणार नाहीत, तोपर्यंत, आनंदा, वज्जींची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अवनती नाही.” ‘‘กินฺติ เต, อานนฺท, สุตํ, ‘วชฺชี ยานิ ตานิ “आनंदा, तू असे ऐकले आहेस का की, 'वज्जी लोक वज्जींची जी...” วชฺชีนํ วชฺชิเจติยานิ อพฺภนฺตรานิ เจว พาหิรานิ จ, ตานิ สกฺกโรนฺติ ครุํ กโรนฺติ มาเนนฺติ ปูเชนฺติ, เตสญฺจ ทินฺนปุพฺพํ กตปุพฺพํ ธมฺมิกํ พลึ โน ปริหาเปนฺตี’’’ติ? ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต – ‘วชฺชี ยานิ ตานิ วชฺชีนํ วชฺชิเจติยานิ อพฺภนฺตรานิ เจว พาหิรานิ จ, ตานิ สกฺกโรนฺติ ครุํ กโรนฺติ มาเนนฺติ ปูเชนฺติ เตสญฺจ ทินฺนปุพฺพํ กตปุพฺพํ ธมฺมิกํ พลึ โน ปริหาเปนฺตี’’’ติ. ‘‘ยาวกีวญฺจ, อานนฺท, วชฺชี ยานิ ตานิ วชฺชีนํ วชฺชิเจติยานิ อพฺภนฺตรานิ เจว พาหิรานิ จ, ตานิ สกฺกริสฺสนฺติ ครุํ กริสฺสนฺติ มาเนสฺสนฺติ ปูเชสฺสนฺติ, เตสญฺจ ทินฺนปุพฺพํ กตปุพฺพํ ธมฺมิกํ พลึ โน ปริหาเปสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, อานนฺท, วชฺชีนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. नगराच्या आत आणि बाहेर असलेली वज्जींची चैत्ये (देवस्थाने) आहेत, त्यांचा आदर करतात, सन्मान करतात, त्यांना मान देतात, पूजतात आणि त्यांना पूर्वीपासून दिला जाणारा धार्मिक पूजाभाग (अर्पण) बंद करत नाहीत'?” “होय, भन्ते, मी असे ऐकले आहे की—'वज्जी लोक नगराच्या आत आणि बाहेर असलेली वज्जींची जी चैत्ये आहेत, त्यांचा आदर करतात, सन्मान करतात, त्यांना मान देतात, पूजतात आणि त्यांना पूर्वीपासून दिला जाणारा धार्मिक पूजाभाग बंद करत नाहीत'.” “आनंदा, जोपर्यंत वज्जी लोक नगराच्या आत आणि बाहेर असलेली वज्जींची जी चैत्ये आहेत, त्यांचा आदर करतील, सन्मान करतील, त्यांना मान देतील, पूजतील आणि त्यांना पूर्वीपासून दिला जाणारा धार्मिक पूजाभाग बंद करणार नाहीत, तोपर्यंत, आनंदा, वज्जींची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अवनती नाही.” ‘‘กินฺติ เต, อานนฺท, สุตํ, ‘วชฺชีนํ อรหนฺเตสุ ธมฺมิกา รกฺขาวรณคุตฺติ สุสํวิหิตา, กินฺติ อนาคตา จ อรหนฺโต วิชิตํ อาคจฺเฉยฺยุํ, อาคตา จ อรหนฺโต วิชิเต ผาสุ วิหเรยฺยุ’’’นฺติ? ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต ‘วชฺชีนํ อรหนฺเตสุ ธมฺมิกา รกฺขาวรณคุตฺติ สุสํวิหิตา กินฺติ อนาคตา จ อรหนฺโต วิชิตํ อาคจฺเฉยฺยุํ, อาคตา จ อรหนฺโต วิชิเต ผาสุ วิหเรยฺยุ’’’นฺติ. ‘‘ยาวกีวญฺจ, อานนฺท, วชฺชีนํ อรหนฺเตสุ ธมฺมิกา รกฺขาวรณคุตฺติ สุสํวิหิตา ภวิสฺสติ, กินฺติ อนาคตา จ อรหนฺโต วิชิตํ [Pg.64] อาคจฺเฉยฺยุํ, อาคตา จ อรหนฺโต วิชิเต ผาสุ วิหเรยฺยุนฺติ. วุทฺธิเยว, อานนฺท, วชฺชีนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานี’’ติ. “आनंदा, तू असे ऐकले आहेस का की, 'वज्जींनी अर्हंतांच्या बाबतीत धार्मिक संरक्षण, आवरण आणि सुरक्षा उत्तम प्रकारे सुव्यवस्थित केली आहे, जेणेकरून अद्याप न आलेले अर्हंत त्यांच्या राज्यात यावेत आणि आलेले अर्हंत त्यांच्या राज्यात सुखाने राहावेत'?” “होय, भन्ते, मी असे ऐकले आहे की—'वज्जींनी अर्हंतांच्या बाबतीत धार्मिक संरक्षण, आवरण आणि सुरक्षा उत्तम प्रकारे सुव्यवस्थित केली आहे, जेणेकरून अद्याप न आलेले अर्हंत त्यांच्या राज्यात यावेत आणि आलेले अर्हंत त्यांच्या राज्यात सुखाने राहावेत'.” “आनंदा, जोपर्यंत वज्जींनी अर्हंतांच्या बाबतीत धार्मिक संरक्षण, आवरण आणि सुरक्षा उत्तम प्रकारे सुव्यवस्थित केलेली असेल, जेणेकरून अद्याप न आलेले अर्हंत त्यांच्या राज्यात यावेत आणि आलेले अर्हंत त्यांच्या राज्यात सुखाने राहावेत, तोपर्यंत, आनंदा, वज्जींची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अवनती नाही.” ๑๓๕. อถ โข ภควา วสฺสการํ พฺราหฺมณํ มคธมหามตฺตํ อามนฺเตสิ – ‘‘เอกมิทาหํ, พฺราหฺมณ, สมยํ เวสาลิยํ วิหรามิ สารนฺทเท เจติเย. ตตฺราหํ วชฺชีนํ อิเม สตฺต อปริหานิเย ธมฺเม เทเสสึ. ยาวกีวญฺจ, พฺราหฺมณ, อิเม สตฺต อปริหานิยา ธมฺมา วชฺชีสุ ฐสฺสนฺติ, อิเมสุ จ สตฺตสุ อปริหานิเยสุ ธมฺเมสุ วชฺชี สนฺทิสฺสิสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, พฺราหฺมณ, วชฺชีนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานี’’ติ. १३५. त्यानंतर भगवंतांनी मगधचा महामात्य वस्सकार ब्राह्मण याला उद्देशून म्हटले—“ब्राह्मणा, एके काळी मी वैशाली येथील सारंदद चैत्यामध्ये विहार करत होतो. तिथे मी वज्जींना हे सात अपरिहानीय धम्म (अवनती न होऊ देणारे नियम) देशिले (शिकवले) होते. ब्राह्मणा, जोपर्यंत हे सात अपरिहानीय धम्म वज्जींमध्ये टिकून राहतील आणि वज्जी या सात अपरिहानीय धम्मांचे पालन करताना दिसतील, तोपर्यंत, ब्राह्मणा, वज्जींची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अवनती नाही.” เอวํ วุตฺเต, วสฺสกาโร พฺราหฺมโณ มคธมหามตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘เอกเมเกนปิ, โภ โคตม, อปริหานิเยน ธมฺเมน สมนฺนาคตานํ วชฺชีนํ วุทฺธิเยว ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. โก ปน วาโท สตฺตหิ อปริหานิเยหิ ธมฺเมหิ. อกรณียาว, โภ โคตม, วชฺชี รญฺญา มาคเธน อชาตสตฺตุนา เวเทหิปุตฺเตน ยทิทํ ยุทฺธสฺส, อญฺญตฺร อุปลาปนาย อญฺญตฺร มิถุเภทา. หนฺท จ ทานิ มยํ, โภ โคตม, คจฺฉาม, พหุกิจฺจา มยํ พหุกรณียา’’ติ. ‘‘ยสฺสทานิ ตฺวํ, พฺราหฺมณ, กาลํ มญฺญสี’’ติ. อถ โข วสฺสกาโร พฺราหฺมโณ มคธมหามตฺโต ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกามิ. असे म्हटले असता, मगधचा महामात्य वस्सकार ब्राह्मण भगवंतांना म्हणाला—“हे गौतम, या अपरिहानीय धम्मांपैकी केवळ एका धम्माचे जरी वज्जींनी पालन केले, तरी त्यांची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अवनती नाही; मग साती अपरिहानीय धम्मांचे पालन केल्यावर काय सांगावे! हे गौतम, वैदेहीपुत्र मगधराज अजातशत्रू वज्जींचा युद्धाद्वारे पराभव करू शकत नाही, केवळ मन वळवून (लाच देऊन) किंवा त्यांच्यात आपापसात फूट पाडूनच हे शक्य आहे. आता, हे गौतम, आम्ही निघतो. आम्हाला बरीच कामे आहेत आणि अनेक कर्तव्ये पार पाडायची आहेत.” “ब्राह्मणा, आता तुला जी योग्य वेळ वाटेल, त्यानुसार तू कर.” त्यानंतर मगधचा महामात्य वस्सकार ब्राह्मण भगवंतांच्या भाषणाचे अभिनंदन व कौतुक करून, आसनावरून उठून निघून गेला. ภิกฺขุอปริหานิยธมฺมา भिक्खूंचे अपरिहानीय धम्म ๑๓๖. อถ โข ภควา อจิรปกฺกนฺเต วสฺสกาเร พฺราหฺมเณ มคธมหามตฺเต อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘คจฺฉ ตฺวํ, อานนฺท, ยาวติกา ภิกฺขู ราชคหํ อุปนิสฺสาย วิหรนฺติ, เต สพฺเพ อุปฏฺฐานสาลายํ สนฺนิปาเตหี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา ยาวติกา ภิกฺขู ราชคหํ อุปนิสฺสาย วิหรนฺติ, เต สพฺเพ อุปฏฺฐานสาลายํ สนฺนิปาเตตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สนฺนิปติโต, ภนฺเต, ภิกฺขุสงฺโฆ, ยสฺสทานิ, ภนฺเต, ภควา กาลํ มญฺญตี’’ติ. १३६. त्यानंतर, मगधचा महामात्य वस्सकार ब्राह्मण निघून गेल्यावर फार वेळ न होता, भगवंतांनी आयुष्यमान आनंदाला बोलावून म्हटले—“आनंदा, जा, राजगृह आणि त्याच्या आसपास जेवढे भिक्खू राहत आहेत, त्या सर्वांना उपस्थानशाळेत (सभागृहात) एकत्र कर.” “तसेच असो, भन्ते,” असे म्हणून आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला आणि राजगृहाच्या परिसरात राहणाऱ्या सर्व भिक्खूंना उपस्थानशाळेत एकत्र केले. त्यानंतर तो भगवंतांकडे गेला; तिथे जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहून आयुष्यमान आनंद भगवंतांना म्हणाला—“भन्ते, भिक्खूसंघ एकत्र जमला आहे. आता, भन्ते, भगवंतांना जी योग्य वेळ वाटेल, त्यानुसार करावे.” อถ [Pg.65] โข ภควา อุฏฺฐายาสนา เยน อุปฏฺฐานสาลา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. นิสชฺช โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘สตฺต โว, ภิกฺขเว, อปริหานิเย ธมฺเม เทเสสฺสามิ, ตํ สุณาถ, สาธุกํ มนสิกโรถ, ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – त्यानंतर भगवंत आसनावरून उठले आणि जेथे उपस्थानशाळा होती तेथे गेले. तिथे जाऊन ते तयार केलेल्या आसनावर बसले. बसल्यानंतर भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले—“भिक्खूंनो, मी तुम्हाला सात अपरिहानीय धम्मांचा उपदेश करणार आहे. ते लक्षपूर्वक ऐका, नीट मनात साठवून ठेवा, मी बोलतो.” “तसेच असो, भन्ते,” असे म्हणून त्या भिक्खूंनी भगवंतांच्या वचनाला प्रतिसाद दिला. भगवंत म्हणाले— ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู อภิณฺหํ สนฺนิปาตา สนฺนิปาตพหุลา ภวิสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू वारंवार एकत्र जमतील आणि त्यांच्या सभा वारंवार होत राहतील, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู สมคฺคา สนฺนิปติสฺสนฺติ, สมคฺคา วุฏฺฐหิสฺสนฺติ, สมคฺคา สงฺฆกรณียานิ กริสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू एकोप्याने एकत्र जमतील, एकोप्याने सभा विसर्जित करतील आणि एकोप्याने संघाची कर्तव्ये पार पाडतील, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู อปญฺญตฺตํ น ปญฺญเปสฺสนฺติ, ปญฺญตฺตํ น สมุจฺฉินฺทิสฺสนฺติ, ยถาปญฺญตฺเตสุ สิกฺขาปเทสุ สมาทาย วตฺติสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू न घालून दिलेले नियम लागू करणार नाहीत, घालून दिलेले नियम रद्द करणार नाहीत आणि घालून दिलेल्या नियमांनुसार (शिक्खापदांनुसार) आचरण करतील, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู เย เต ภิกฺขู เถรา รตฺตญฺญู จิรปพฺพชิตา สงฺฆปิตโร สงฺฆปริณายกา, เต สกฺกริสฺสนฺติ ครุํ กริสฺสนฺติ มาเนสฺสนฺติ ปูเชสฺสนฺติ, เตสญฺจ โสตพฺพํ มญฺญิสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू जे ज्येष्ठ, अनुभवी (रात्रज्ञ), दीर्घकाळ प्रव्रजित झालेले, संघाचे पिता आणि संघाचे मार्गदर्शक असलेले थेर भिक्षू आहेत, त्यांचा आदर करतील, सन्मान करतील, गौरव करतील, पूजा करतील आणि त्यांचे ऐकणे आपले कर्तव्य मानतील, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู อุปฺปนฺนาย ตณฺหาย โปโนพฺภวิกาย น วสํ คจฺฉิสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू उत्पन्न होणाऱ्या आणि पुनर्जन्म देणाऱ्या तृष्णेच्या आहारी जाणार नाहीत, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู อารญฺญเกสุ เสนาสเนสุ สาเปกฺขา ภวิสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू अरण्यातील निवासस्थानांविषयी (आरण्यक सेनासनांविषयी) आस्था बाळगतील, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู ปจฺจตฺตญฺเญว สตึ อุปฏฺฐเปสฺสนฺติ – ‘กินฺติ อนาคตา จ เปสลา สพฺรหฺมจารี อาคจฺเฉยฺยุํ, อาคตา จ เปสลา สพฺรหฺมจารี ผาสุ วิหเรยฺยุ’นฺติ. วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू स्वतःमध्ये अशी स्मृती (जागरूकता) जागृत ठेवतील की, ‘अजून न आलेले शीलवान सब्रह्मचारी येथे यावेत आणि आलेले शीलवान सब्रह्मचारी सुखाने राहावेत’, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, อิเม สตฺต อปริหานิยา ธมฺมา ภิกฺขูสุ ฐสฺสนฺติ, อิเมสุ จ สตฺตสุ อปริหานิเยสุ ธมฺเมสุ ภิกฺขู สนฺทิสฺสิสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत हे सात अपरिहानीय धर्म भिक्षूंमध्ये टिकून राहतील आणि भिक्षू या सात अपरिहानीय धर्मांचे पालन करताना दिसतील, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. ๑๓๗. ‘‘อปเรปิ [Pg.66] โว, ภิกฺขเว, สตฺต อปริหานิเย ธมฺเม เทเสสฺสามิ, ตํ สุณาถ, สาธุกํ มนสิกโรถ, ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – १३७. “हे भिक्षूंनो, मी तुम्हाला आणखी सात अपरिहानीय धर्म शिकवतो. ते लक्षपूर्वक ऐका आणि मनात नीट साठवून ठेवा, मी सांगतो.” “होय, भंते,” असे म्हणून त्या भिक्षूंनी भगवंतांना प्रतिसाद दिला. भगवंत म्हणाले – ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู น กมฺมารามา ภวิสฺสนฺติ น กมฺมรตา น กมฺมารามตมนุยุตฺตา, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू निरर्थक कामांमध्ये रमणारे, कामाची आवड असणारे आणि कामात मग्न राहणारे होणार नाहीत, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู น ภสฺสารามา ภวิสฺสนฺติ น ภสฺสรตา น ภสฺสารามตมนุยุตฺตา, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू गप्पागोष्टींमध्ये रमणारे, गप्पागोष्टींची आवड असणारे आणि गप्पागोष्टींमध्ये मग्न राहणारे होणार नाहीत, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู น นิทฺทารามา ภวิสฺสนฺติ น นิทฺทารตา น นิทฺทารามตมนุยุตฺตา, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू झोपेत रमणारे, झोपेची आवड असणारे आणि झोपण्यात मग्न राहणारे होणार नाहीत, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู น สงฺคณิการามา ภวิสฺสนฺติ น สงฺคณิกรตา น สงฺคณิการามตมนุยุตฺตา, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू घोळक्यात (टोळीत/गर्दीत) रमणारे, घोळक्याची आवड असणारे आणि घोळक्यात मग्न राहणारे होणार नाहीत, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู น ปาปิจฺฉา ภวิสฺสนฺติ น ปาปิกานํ อิจฺฉานํ วสํ คตา, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू वाईट इच्छा बाळगणारे (पापीच्छा असणारे) आणि वाईट इच्छांच्या आहारी जाणारे होणार नाहीत, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู น ปาปมิตฺตา ภวิสฺสนฺติ น ปาปสหายา น ปาปสมฺปวงฺกา, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू वाईट मित्र असणारे, वाईट सोबती असणारे आणि वाईट लोकांच्या संगतीत राहणारे होणार नाहीत, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู น โอรมตฺตเกน วิเสสาธิคเมน อนฺตราโวสานํ อาปชฺชิสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू केवळ थोड्याशाच विशेष प्राप्तीने (अधिगमाने) संतुष्ट होऊन अर्हत्त्व मिळवण्यापूर्वीच मध्येच थांबणार नाहीत, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, อิเม สตฺต อปริหานิยา ธมฺมา ภิกฺขูสุ ฐสฺสนฺติ, อิเมสุ จ สตฺตสุ อปริหานิเยสุ ธมฺเมสุ ภิกฺขู สนฺทิสฺสิสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत हे सात अपरिहानीय धर्म भिक्षूंमध्ये टिकून राहतील आणि भिक्षू या सात अपरिहानीय धर्मांचे पालन करताना दिसतील, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. ๑๓๘. ‘‘อปเรปิ โว, ภิกฺขเว, สตฺต อปริหานิเย ธมฺเม เทเสสฺสามิ…เป… ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู สทฺธา ภวิสฺสนฺติ…เป… หิริมนา ภวิสฺสนฺติ… โอตฺตปฺปี ภวิสฺสนฺติ… พหุสฺสุตา ภวิสฺสนฺติ… อารทฺธวีริยา ภวิสฺสนฺติ… อุปฏฺฐิตสฺสตี [Pg.67] ภวิสฺสนฺติ… ปญฺญวนฺโต ภวิสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, อิเม สตฺต อปริหานิยา ธมฺมา ภิกฺขูสุ ฐสฺสนฺติ, อิเมสุ จ สตฺตสุ อปริหานิเยสุ ธมฺเมสุ ภิกฺขู สนฺทิสฺสิสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. १३८. “हे भिक्षूंनो, मी तुम्हाला आणखी सात अपरिहानीय धर्म शिकवतो…पे… “जोपर्यंत भिक्षू श्रद्धावान असतील…पे… लज्जा बाळगणारे (हिरी असणारे) असतील… पापभीरू (ओत्तप्प असणारे) असतील… बहुश्रुत असतील… उद्योगी (वीर्यवान) असतील… स्मृती जागृत असणारे असतील… प्रज्ञावान असतील, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. आणि जोपर्यंत हे सात अपरिहानीय धर्म भिक्षूंमध्ये टिकून राहतील आणि भिक्षू या सात अपरिहानीय धर्मांचे पालन करताना दिसतील, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. ๑๓๙. ‘‘อปเรปิ โว, ภิกฺขเว, สตฺต อปริหานิเย ธมฺเม เทเสสฺสามิ, ตํ สุณาถ, สาธุกํ มนสิกโรถ, ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – १३९. “हे भिक्षूंनो, मी तुम्हाला आणखी सात अपरिहानीय धर्म शिकवतो. ते लक्षपूर्वक ऐका आणि मनात नीट साठवून ठेवा, मी सांगतो.” “होय, भंते,” असे म्हणून त्या भिक्षूंनी भगवंतांना प्रतिसाद दिला. भगवंत म्हणाले – ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สติสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวสฺสนฺติ…เป… ธมฺมวิจยสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวสฺสนฺติ… วีริยสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวสฺสนฺติ… ปีติสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวสฺสนฺติ… ปสฺสทฺธิสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวสฺสนฺติ… สมาธิสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวสฺสนฺติ… อุเปกฺขาสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू सतिसंबोज्ज्हंग (स्मृती संबोध्यंग) विकसित करतील…पे… धम्मविचयसंबोज्ज्हंग (धर्मविचय संबोध्यंग) विकसित करतील… वीरियसंबोज्ज्हंग (वीर्य संबोध्यंग) विकसित करतील… पीतिसंबोज्ज्हंग (प्रीती संबोध्यंग) विकसित करतील… पस्सद्धिसंबोज्ज्हंग (प्रश्रब्धी संबोध्यंग) विकसित करतील… समाधिसंबोज्ज्हंग (समाधी संबोध्यंग) विकसित करतील… उपेक्खासंबोज्ज्हंग (उपेक्षा संबोध्यंग) विकसित करतील, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, อิเม สตฺต อปริหานิยา ธมฺมา ภิกฺขูสุ ฐสฺสนฺติ, อิเมสุ จ สตฺตสุ อปริหานิเยสุ ธมฺเมสุ ภิกฺขู สนฺทิสฺสิสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत हे सात अपरिहानीय धर्म भिक्षूंमध्ये टिकून राहतील आणि भिक्षू या सात अपरिहानीय धर्मांचे पालन करताना दिसतील, तोपर्यंत भिक्षूंची केवळ प्रगतीच अपेक्षित आहे, अधोगती नाही. ๑๔๐. ‘‘อปเรปิ โว, ภิกฺขเว, สตฺต อปริหานิเย ธมฺเม เทเสสฺสามิ, ตํ สุณาถ, สาธุกํ มนสิกโรถ, ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – १४०. “हे भिक्षूंनो, मी तुम्हाला आणखी सात अपरिहानीय धर्म शिकवतो. ते लक्षपूर्वक ऐका आणि मनात नीट साठवून ठेवा, मी सांगतो.” “होय, भंते,” असे म्हणून त्या भिक्षूंनी भगवंतांना प्रतिसाद दिला. भगवंत म्हणाले – ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู อนิจฺจสญฺญํ ภาเวสฺสนฺติ…เป… อนตฺตสญฺญํ ภาเวสฺสนฺติ… อสุภสญฺญํ ภาเวสฺสนฺติ… อาทีนวสญฺญํ ภาเวสฺสนฺติ… ปหานสญฺญํ ภาเวสฺสนฺติ… วิราคสญฺญํ ภาเวสฺสนฺติ… นิโรธสญฺญํ ภาเวสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू अनित्य-संज्ञा (अनित्यतेची जाणीव) विकसित करतील... अनात्म-संज्ञा... अशुभ-संज्ञा... आदीनव-संज्ञा (दोषांची जाणीव)... प्रहाण-संज्ञा (त्यागाची जाणीव)... विराग-संज्ञा... निरोध-संज्ञा विकसित करतील, तोपर्यंत, हे भिक्षूंनो, भिक्षूंची केवळ वृद्धीच अपेक्षित आहे, ऱ्हास नव्हे.” ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, อิเม สตฺต อปริหานิยา ธมฺมา ภิกฺขูสุ ฐสฺสนฺติ, อิเมสุ จ สตฺตสุ อปริหานิเยสุ ธมฺเมสุ ภิกฺขู สนฺทิสฺสิสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत हे सात अपरिहानीय (ऱ्हास न घडवून आणणारे) धर्म भिक्षूंमध्ये टिकून राहतील आणि भिक्षू या सात अपरिहानीय धर्मांचे पालन करताना दिसतील, तोपर्यंत, हे भिक्षूंनो, भिक्षूंची केवळ वृद्धीच अपेक्षित आहे, ऱ्हास नव्हे.” ๑๔๑. ‘‘ฉ, โว ภิกฺขเว, อปริหานิเย ธมฺเม เทเสสฺสามิ, ตํ สุณาถ, สาธุกํ มนสิกโรถ, ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – १४१. “हे भिक्षूंनो, मी तुम्हांला सहा अपरिहानीय धर्मांचा उपदेश करतो. ते लक्षपूर्वक ऐका, नीट मनात साठवा, मी बोलतो.” “तसेच असो, भंते,” असे म्हणून त्या भिक्षूंनी भगवंतांना प्रतिसाद दिला. भगवंत पुढे म्हणाले – ‘‘ยาวกีวญฺจ[Pg.68], ภิกฺขเว, ภิกฺขู เมตฺตํ กายกมฺมํ ปจฺจุปฏฺฐาเปสฺสนฺติ สพฺรหฺมจารีสุ อาวิ เจว รโห จ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू आपल्या सहकारी सब्रह्मचाऱ्यांशी प्रत्यक्ष (उघडपणे) आणि परोक्ष (खाजगीत) मैत्रीपूर्ण कायिक कर्म (मैत्रीपूर्ण शारीरिक व्यवहार) आचरणात आणतील, तोपर्यंत, हे भिक्षूंनो, भिक्षूंची केवळ वृद्धीच अपेक्षित आहे, ऱ्हास नव्हे.” ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู เมตฺตํ วจีกมฺมํ ปจฺจุปฏฺฐาเปสฺสนฺติ …เป… เมตฺตํ มโนกมฺมํ ปจฺจุปฏฺฐาเปสฺสนฺติ สพฺรหฺมจารีสุ อาวิ เจว รโห จ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू आपल्या सहकारी सब्रह्मचाऱ्यांशी प्रत्यक्ष आणि परोक्ष मैत्रीपूर्ण वाचिक कर्म (मैत्रीपूर्ण वाणीचा व्यवहार)... मैत्रीपूर्ण मानसिक कर्म (मैत्रीपूर्ण मनाचा व्यवहार) आचरणात आणतील, तोपर्यंत, हे भिक्षूंनो, भिक्षूंची केवळ वृद्धीच अपेक्षित आहे, ऱ्हास नव्हे.” ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู, เย เต ลาภา ธมฺมิกา ธมฺมลทฺธา อนฺตมโส ปตฺตปริยาปนฺนมตฺตมฺปิ ตถารูเปหิ ลาเภหิ อปฺปฏิวิภตฺตโภคี ภวิสฺสนฺติ สีลวนฺเตหิ สพฺรหฺมจารีหิ สาธารณโภคี, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षूंना जे काही धार्मिक मार्गाने आणि न्याय्य रीतीने लाभ मिळतील, अगदी भिक्षापात्रात मिळालेल्या अन्नासारखा लहान लाभही, तो ते स्वतःपुरता मर्यादित न ठेवता, आपल्या शीलवान सब्रह्मचाऱ्यांसोबत वाटून घेऊन त्याचा उपभोग घेतील, तोपर्यंत, हे भिक्षूंनो, भिक्षूंची केवळ वृद्धीच अपेक्षित आहे, ऱ्हास नव्हे.” ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู ยานิ กานิ สีลานิ อขณฺฑานิ อจฺฉิทฺทานิ อสพลานิ อกมฺมาสานิ ภุชิสฺสานิ วิญฺญูปสตฺถานิ อปรามฏฺฐานิ สมาธิสํวตฺตนิกานิ ตถารูเปสุ สีเลสุ สีลสามญฺญคตา วิหริสฺสนฺติ สพฺรหฺมจารีหิ อาวิ เจว รโห จ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू अखंड, अछिद्र, डाग नसलेले (अशबल), डांबर नसलेले (अकल्मष), बंधनांतून मुक्त करणारे (भुजिस्स), विद्वानांनी प्रशंसिलेले (विज्ञूपसत्थ), तृष्णा व दृष्टी यांनी दूषित न झालेले (अपरामट्ठ) आणि समाधीला पोषक असणारे जे काही शील आहेत, अशा शीलांचे आपल्या सहकारी सब्रह्मचाऱ्यांसोबत प्रत्यक्ष आणि परोक्षपणे समानतेने पालन करत राहतील, तोपर्यंत, हे भिक्षूंनो, भिक्षूंची केवळ वृद्धीच अपेक्षित आहे, ऱ्हास नव्हे.” ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขู ยายํ ทิฏฺฐิ อริยา นิยฺยานิกา, นิยฺยาติ ตกฺกรสฺส สมฺมา ทุกฺขกฺขยาย, ตถารูปาย ทิฏฺฐิยา ทิฏฺฐิสามญฺญคตา วิหริสฺสนฺติ สพฺรหฺมจารีหิ อาวิ เจว รโห จ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานิ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत भिक्षू जी दृष्टी (सम्यक् दृष्टी) आर्य आणि मुक्ती देणारी (नैर्याणिक) आहे, जी तिचे आचरण करणाऱ्याला पूर्णपणे दुःखमुक्तीकडे नेते, अशा दृष्टीने युक्त होऊन आपल्या सहकारी सब्रह्मचाऱ्यांसोबत प्रत्यक्ष आणि परोक्षपणे समान दृष्टीने (दृष्टी-सामान्यता) राहतील, तोपर्यंत, हे भिक्षूंनो, भिक्षूंची केवळ वृद्धीच अपेक्षित आहे, ऱ्हास नव्हे.” ‘‘ยาวกีวญฺจ, ภิกฺขเว, อิเม ฉ อปริหานิยา ธมฺมา ภิกฺขูสุ ฐสฺสนฺติ, อิเมสุ จ ฉสุ อปริหานิเยสุ ธมฺเมสุ ภิกฺขู สนฺทิสฺสิสฺสนฺติ, วุทฺธิเยว, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ ปาฏิกงฺขา, โน ปริหานี’’ติ. “हे भिक्षूंनो, जोपर्यंत हे सहा अपरिहानीय धर्म भिक्षूंमध्ये टिकून राहतील आणि भिक्षू या सहा अपरिहानीय धर्मांचे पालन करताना दिसतील, तोपर्यंत, हे भिक्षूंनो, भिक्षूंची केवळ वृद्धीच अपेक्षित आहे, ऱ्हास नव्हे.” ๑๔๒. ตตฺร สุทํ ภควา ราชคเห วิหรนฺโต คิชฺฌกูเฏ ปพฺพเต เอตเทว พหุลํ ภิกฺขูนํ ธมฺมึ กถํ กโรติ – ‘‘อิติ สีลํ, อิติ สมาธิ, อิติ ปญฺญา. สีลปริภาวิโต สมาธิ มหปฺผโล โหติ มหานิสํโส. สมาธิปริภาวิตา ปญฺญา มหปฺผลา โหติ มหานิสํสา. ปญฺญาปริภาวิตํ จิตฺตํ สมฺมเทว อาสเวหิ วิมุจฺจติ, เสยฺยถิทํ – กามาสวา, ภวาสวา, อวิชฺชาสวา’’ติ. १४२. तेथे राजगृह येथे गृध्रकूट पर्वतावर विहार करत असताना भगवंत भिक्षूंना वारंवार हाच धम्म उपदेश देत असत – “असे शील आहे, अशी समाधी आहे, अशी प्रज्ञा आहे. शीलाने परिभावित (दृढ केलेली) समाधी महाफळदायी आणि महाकल्याणकारी ठरते. समाधीने परिभावित प्रज्ञा महाफळदायी आणि महाकल्याणकारी ठरते. प्रज्ञेने परिभावित चित्त आसवांपासून पूर्णपणे मुक्त होते, जसे की – कामासव, भवासव आणि अविद्यासव.” ๑๔๓. อถ [Pg.69] โข ภควา ราชคเห ยถาภิรนฺตํ วิหริตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘อายามานนฺท, เยน อมฺพลฏฺฐิกา เตนุปสงฺกมิสฺสามา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. อถ โข ภควา มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ เยน อมฺพลฏฺฐิกา ตทวสริ. ตตฺร สุทํ ภควา อมฺพลฏฺฐิกายํ วิหรติ ราชาคารเก. ตตฺราปิ สุทํ ภควา อมฺพลฏฺฐิกายํ วิหรนฺโต ราชาคารเก เอตเทว พหุลํ ภิกฺขูนํ ธมฺมึ กถํ กโรติ – ‘‘อิติ สีลํ อิติ สมาธิ อิติ ปญฺญา. สีลปริภาวิโต สมาธิ มหปฺผโล โหติ มหานิสํโส. สมาธิปริภาวิตา ปญฺญา มหปฺผลา โหติ มหานิสํสา. ปญฺญาปริภาวิตํ จิตฺตํ สมฺมเทว อาสเวหิ วิมุจฺจติ, เสยฺยถิทํ – กามาสวา, ภวาสวา, อวิชฺชาสวา’’ติ. १४३. त्यानंतर भगवंत राजगृहात इच्छेनुसार विहार करून आयुष्यमान आनंदाला म्हणाले – “चल आनंदा, आपण अंबलठ्ठिका येथे जाऊ या.” “तसेच असो, भंते,” असे म्हणून आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला. त्यानंतर भगवंत मोठ्या भिक्षुसंघासह अंबलठ्ठिका येथे पोहोचले. तेथे भगवंत अंबलठ्ठिका येथील राजप्रासादात (राजागारक) विहार करत होते. तेथेही विहार करत असताना भगवंत भिक्षूंना वारंवार हाच धम्म उपदेश देत असत – “असे शील आहे, अशी समाधी आहे, अशी प्रज्ञा आहे. शीलाने परिभावित समाधी महाफळदायी आणि महाकल्याणकारी ठरते. समाधीने परिभावित प्रज्ञा महाफळदायी आणि महाकल्याणकारी ठरते. प्रज्ञेने परिभावित चित्त आसवांपासून पूर्णपणे मुक्त होते, जसे की – कामासव, भवासव आणि अविद्यासव.” ๑๔๔. อถ โข ภควา อมฺพลฏฺฐิกายํ ยถาภิรนฺตํ วิหริตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘อายามานนฺท, เยน นาฬนฺทา เตนุปสงฺกมิสฺสามา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. อถ โข ภควา มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ เยน นาฬนฺทา ตทวสริ, ตตฺร สุทํ ภควา นาฬนฺทายํ วิหรติ ปาวาริกมฺพวเน. १४४. त्यानंतर भगवंत अंबलठ्ठिका येथे इच्छेनुसार विहार करून आयुष्यमान आनंदाला म्हणाले – “चल आनंदा, आपण नालंदा येथे जाऊ या.” “तसेच असो, भंते,” असे म्हणून आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला. त्यानंतर भगवंत मोठ्या भिक्षुसंघासह नालंदा येथे पोहोचले. तेथे भगवंत नालंदा येथील पावारिक आंबराईत (पावारिकम्बवन) विहार करत होते. สาริปุตฺตสีหนาโท सारिपुत्त सिंहनाद ๑๔๕. อถ โข อายสฺมา สาริปุตฺโต เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา สาริปุตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘เอวํ ปสนฺโน อหํ, ภนฺเต, ภควติ; น จาหุ น จ ภวิสฺสติ น เจตรหิ วิชฺชติ อญฺโญ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา ภควตา ภิยฺโยภิญฺญตโร ยทิทํ สมฺโพธิย’’นฺติ. ‘‘อุฬารา โข เต อยํ, สาริปุตฺต, อาสภี วาจา ภาสิตา, เอกํโส คหิโต, สีหนาโท นทิโต – ‘เอวํปสนฺโน อหํ, ภนฺเต, ภควติ; น จาหุ น จ ภวิสฺสติ น เจตรหิ วิชฺชติ อญฺโญ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา ภควตา ภิยฺโยภิญฺญตโร ยทิทํ สมฺโพธิย’นฺติ. १४५. त्यानंतर आयुष्यमान सारिपुत्त भगवंतांकडे आले; जवळ येऊन भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान सारिपुत्तांनी भगवंतांना असे म्हटले – “भंते, माझा भगवंतांवर असा विश्वास आहे की, संबोधीच्या बाबतीत भगवंतांपेक्षा अधिक ज्ञानी असलेला दुसरा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण भूतकाळात झाला नाही, भविष्यात होणार नाही आणि वर्तमानातही अस्तित्वात नाही.” “सारिपुत्ता, तू खरोखरच अत्यंत उदात्त आणि निर्भय वचन बोलला आहेस, तू एकच बाजू धरून सिंहनाद केला आहेस – ‘भंते, माझा भगवंतांवर असा विश्वास आहे की, संबोधीच्या बाबतीत भगवंतांपेक्षा अधिक ज्ञानी असलेला दुसरा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण भूतकाळात झाला नाही, भविष्यात होणार नाही आणि वर्तमानातही अस्तित्वात नाही.’” ‘‘กึ [Pg.70] เต, สาริปุตฺต, เย เต อเหสุํ อตีตมทฺธานํ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา, สพฺเพ เต ภควนฺโต เจตสา เจโต ปริจฺจ วิทิตา – ‘เอวํสีลา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปิ, เอวํธมฺมา เอวํปญฺญา เอวํวิหารี เอวํวิมุตฺตา เต ภควนฺโต อเหสุํ อิติปี’’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. “सारिपुत्ता, भूतकाळात जे अर्हत सम्यक्संबुद्ध होऊन गेले, त्या सर्व भगवंतांच्या चित्ताला तू तुझ्या चित्ताने जाणून घेतले आहेस काय की – ‘ते भगवंत अशा शीलाचे होते, अशा धर्माचे होते, अशा प्रज्ञेचे होते, अशा विहाराचे होते, अशा विमुक्तीचे होते’?” “नाही, भंते.” ‘‘กึ ปน เต, สาริปุตฺต, เย เต ภวิสฺสนฺติ อนาคตมทฺธานํ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา, สพฺเพ เต ภควนฺโต เจตสา เจโต ปริจฺจ วิทิตา – ‘เอวํสีลา เต ภควนฺโต ภวิสฺสนฺติ อิติปิ, เอวํธมฺมา เอวํปญฺญา เอวํวิหารี เอวํวิมุตฺตา เต ภควนฺโต ภวิสฺสนฺติ อิติปี’’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "पण काय, सारिपुत्ता, भविष्यात जे अर्हत सम्यक्संबुद्ध होतील, त्या सर्व भगवंतांच्या मनाला तू तुझ्या मनाने जाणून घेतले आहेस का की— 'ते भगवंत अशा शीलाचे असतील, अशा धर्माचे असतील, अशा प्रज्ञेचे असतील, अशा विहाराचे असतील, अशा विमुक्तीचे असतील'?" "नाही, भन्ते." ‘‘กึ ปน เต, สาริปุตฺต, อหํ เอตรหิ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ เจตสา เจโต ปริจฺจ วิทิโต – ‘‘เอวํสีโล ภควา อิติปิ, เอวํธมฺโม เอวํปญฺโญ เอวํวิหารี เอวํวิมุตฺโต ภควา อิติปี’’’ติ? ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’. "पण काय, सारिपुत्ता, वर्तमानकाळात अर्हत सम्यक्संबुद्ध असलेल्या माझ्या (तथागताच्या) मनाला तू तुझ्या मनाने जाणून घेतले आहेस का की— 'भगवंत अशा शीलाचे आहेत, अशा धर्माचे आहेत, अशा प्रज्ञेचे आहेत, अशा विहाराचे आहेत, अशा विमुक्तीचे आहेत'?" "नाही, भन्ते." ‘‘เอตฺถ จ หิ เต, สาริปุตฺต, อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺเนสุ อรหนฺเตสุ สมฺมาสมฺพุทฺเธสุ เจโตปริยญาณํ นตฺถิ. อถ กิญฺจรหิ เต อยํ, สาริปุตฺต, อุฬารา อาสภี วาจา ภาสิตา, เอกํโส คหิโต, สีหนาโท นทิโต – ‘เอวํปสนฺโน อหํ, ภนฺเต, ภควติ; น จาหุ น จ ภวิสฺสติ น เจตรหิ วิชฺชติ อญฺโญ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา ภควตา ภิยฺโยภิญฺญตโร ยทิทํ สมฺโพธิย’’’นฺติ? "तर मग, सारिपुत्ता, भूतकाळ, भविष्यकाळ आणि वर्तमानकाळातील अर्हत सम्यक्संबुद्धांच्या मनाला जाणून घेणारे 'चेतोपरियज्ञान' तुझ्याकडे नाही. मग असे असताना, सारिपुत्ता, तू ही एवढी उदात्त, निर्भय आणि निश्चित अशी सिंहगर्जना का केलीस की— 'भन्ते, माझी भगवंतांवर अशी श्रद्धा आहे की, संबोधीच्या बाबतीत भगवंतांपेक्षा अधिक ज्ञानी असलेला दुसरा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण भूतकाळात झाला नाही, भविष्यकाळात होणार नाही आणि वर्तमानकाळातही अस्तित्वात नाही'?" ๑๔๖. ‘‘น โข เม, ภนฺเต, อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺเนสุ อรหนฺเตสุ สมฺมาสมฺพุทฺเธสุ เจโตปริยญาณํ อตฺถิ, อปิ จ เม ธมฺมนฺวโย วิทิโต. เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, รญฺโญ ปจฺจนฺติมํ นครํ ทฬฺหุทฺธาปํ ทฬฺหปาการโตรณํ เอกทฺวารํ, ตตฺรสฺส โทวาริโก ปณฺฑิโต วิยตฺโต เมธาวี อญฺญาตานํ นิวาเรตา ญาตานํ ปเวเสตา. โส ตสฺส นครสฺส สมนฺตา อนุปริยายปถํ อนุกฺกมมาโน น ปสฺเสยฺย ปาการสนฺธึ วา ปาการวิวรํ วา, อนฺตมโส พิฬารนิกฺขมนมตฺตมฺปิ. ตสฺส เอวมสฺส – ‘เย โข เกจิ โอฬาริกา ปาณา อิมํ นครํ ปวิสนฺติ วา นิกฺขมนฺติ วา, สพฺเพ เต อิมินาว ทฺวาเรน ปวิสนฺติ วา นิกฺขมนฺติ วา’ติ. เอวเมว โข เม, ภนฺเต, ธมฺมนฺวโย วิทิโต – ‘เย เต, ภนฺเต, อเหสุํ อตีตมทฺธานํ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา[Pg.71], สพฺเพ เต ภควนฺโต ปญฺจ นีวรเณ ปหาย เจตโส อุปกฺกิเลเส ปญฺญาย ทุพฺพลีกรเณ จตูสุ สติปฏฺฐาเนสุ สุปติฏฺฐิตจิตฺตา สตฺตโพชฺฌงฺเค ยถาภูตํ ภาเวตฺวา อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุชฺฌึสุ. เยปิ เต, ภนฺเต, ภวิสฺสนฺติ อนาคตมทฺธานํ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา, สพฺเพ เต ภควนฺโต ปญฺจ นีวรเณ ปหาย เจตโส อุปกฺกิเลเส ปญฺญาย ทุพฺพลีกรเณ จตูสุ สติปฏฺฐาเนสุ สุปติฏฺฐิตจิตฺตา สตฺต โพชฺฌงฺเค ยถาภูตํ ภาเวตฺวา อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุชฺฌิสฺสนฺติ. ภควาปิ, ภนฺเต, เอตรหิ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ปญฺจ นีวรเณ ปหาย เจตโส อุปกฺกิเลเส ปญฺญาย ทุพฺพลีกรเณ จตูสุ สติปฏฺฐาเนสุ สุปติฏฺฐิตจิตฺโต สตฺต โพชฺฌงฺเค ยถาภูตํ ภาเวตฺวา อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺโธ’’’ติ. १४६. "भन्ते, भूतकाळ, भविष्यकाळ आणि वर्तमानकाळातील अर्हत सम्यक्संबुद्धांच्या मनाला जाणून घेणारे 'चेतोपरियज्ञान' माझ्याकडे नाही, परंतु मला 'धम्मान्वय' (धर्माचा नियम) माहीत आहे. भन्ते, जसे एखाद्या राजाचे सीमावर्ती नगर असावे, ज्याचे पाया मजबूत असावेत, तटबंदी व दरवाजे भक्कम असावेत आणि त्याला एकच प्रवेशद्वार असावे. तेथे एक चतुर, कुशल आणि बुद्धिमान द्वारपाल असावा, जो अनोळखी लोकांना रोखणारा आणि ओळखीच्या लोकांनाच आत प्रवेश देणारा असावा. तो त्या नगराच्या सभोवतालच्या मार्गाने फिरत असताना त्याला तटबंदीमध्ये कुठेही सांधा किंवा फट दिसणार नाही, अगदी मांजर बाहेर पडू शकेल एवढीही फट दिसणार नाही. त्याला असा विचार येईल— 'जे कोणी मोठे प्राणी या नगरात प्रवेश करतात किंवा बाहेर पडतात, ते सर्व याच प्रवेशद्वारातून प्रवेश करतात किंवा बाहेर पडतात.' त्याचप्रमाणे, भन्ते, मला 'धम्मान्वय' माहीत आहे— 'भन्ते, भूतकाळात जे अर्हत सम्यक्संबुद्ध झाले, त्या सर्व भगवंतांनी मनाला मलिन करणाऱ्या आणि प्रज्ञेला दुर्बळ करणाऱ्या पाच नीवरणांचा त्याग करून, चार स्मृतिप्रस्थानांमध्ये आपले चित्त सुप्रतिष्ठित करून, सात बोध्यंगांची यथार्थ भावना करून अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त केली. भन्ते, भविष्यातही जे अर्हत सम्यक्संबुद्ध होतील, ते सर्व भगवंत मनाला मलिन करणाऱ्या आणि प्रज्ञेला दुर्बळ करणाऱ्या पाच नीवरणांचा त्याग करून, चार स्मृतिप्रस्थानांमध्ये आपले चित्त सुप्रतिष्ठित करून, सात बोध्यंगांची यथार्थ भावना करून अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त करतील. आणि भन्ते, वर्तमानकाळात अर्हत सम्यक्संबुद्ध असलेले भगवंतही मनाला मलिन करणाऱ्या आणि प्रज्ञेला दुर्बळ करणाऱ्या पाच नीवरणांचा त्याग करून, चार स्मृतिप्रस्थानांमध्ये आपले चित्त सुप्रतिष्ठित करून, सात बोध्यंगांची यथार्थ भावना करून अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त झाले आहेत.'" ๑๔๗. ตตฺรปิ สุทํ ภควา นาฬนฺทายํ วิหรนฺโต ปาวาริกมฺพวเน เอตเทว พหุลํ ภิกฺขูนํ ธมฺมึ กถํ กโรติ – ‘‘อิติ สีลํ, อิติ สมาธิ, อิติ ปญฺญา. สีลปริภาวิโต สมาธิ มหปฺผโล โหติ มหานิสํโส. สมาธิปริภาวิตา ปญฺญา มหปฺผลา โหติ มหานิสํสา. ปญฺญาปริภาวิตํ จิตฺตํ สมฺมเทว อาสเวหิ วิมุจฺจติ, เสยฺยถิทํ – กามาสวา, ภวาสวา, อวิชฺชาสวา’’ติ. १४७. "तेथे नाळंदामध्ये पावारिकाच्या आंबावनात विहार करत असताना भगवंत भिक्खूंना वारंवार हाच धम्म उपदेश करत असत— 'असे शील आहे, असा समाधी आहे, अशी प्रज्ञा आहे. शीलाने परिभावित समाधी महाफळदायी आणि महा-अनुशंस (मोठ्या फायद्याचा) ठरतो. समाधीने परिभावित प्रज्ञा महाफळदायी आणि महा-अनुशंस ठरते. प्रज्ञेने परिभावित झालेले चित्त आसवांपासून चांगल्या प्रकारे विमुक्त होते, जसे की— कामासव, भवासव आणि अविद्यासव.'" ทุสฺสีลอาทีนวา "दुःशीलाचे दुष्परिणाम" ๑๔๘. อถ โข ภควา นาฬนฺทายํ ยถาภิรนฺตํ วิหริตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘อายามานนฺท, เยน ปาฏลิคาโม เตนุปสงฺกมิสฺสามา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. อถ โข ภควา มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ เยน ปาฏลิคาโม ตทวสริ. อสฺโสสุํ โข ปาฏลิคามิกา อุปาสกา – ‘‘ภควา กิร ปาฏลิคามํ อนุปฺปตฺโต’’ติ. อถ โข ปาฏลิคามิกา อุปาสกา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข ปาฏลิคามิกา อุปาสกา ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘อธิวาเสตุ โน, ภนฺเต, ภควา อาวสถาคาร’’นฺติ. อธิวาเสสิ ภควา ตุณฺหีภาเวน. อถ โข ปาฏลิคามิกา อุปาสกา ภควโต อธิวาสนํ วิทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา เยน อาวสถาคารํ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา สพฺพสนฺถรึ [Pg.72] อาวสถาคารํ สนฺถริตฺวา อาสนานิ ปญฺญเปตฺวา อุทกมณิกํ ปติฏฺฐาเปตฺวา เตลปทีปํ อาโรเปตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ, อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐํสุ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข ปาฏลิคามิกา อุปาสกา ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘สพฺพสนฺถริสนฺถตํ, ภนฺเต, อาวสถาคารํ, อาสนานิ ปญฺญตฺตานิ, อุทกมณิโก ปติฏฺฐาปิโต, เตลปทีโป อาโรปิโต; ยสฺสทานิ, ภนฺเต, ภควา กาลํ มญฺญตี’’ติ. อถ โข ภควา สายนฺหสมยํ. นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สทฺธึ ภิกฺขุสงฺเฆน เยน อาวสถาคารํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปาเท ปกฺขาเลตฺวา อาวสถาคารํ ปวิสิตฺวา มชฺฌิมํ ถมฺภํ นิสฺสาย ปุรตฺถาภิมุโข นิสีทิ. ภิกฺขุสงฺโฆปิ โข ปาเท ปกฺขาเลตฺวา อาวสถาคารํ ปวิสิตฺวา ปจฺฉิมํ ภิตฺตึ นิสฺสาย ปุรตฺถาภิมุโข นิสีทิ ภควนฺตเมว ปุรกฺขตฺวา. ปาฏลิคามิกาปิ โข อุปาสกา ปาเท ปกฺขาเลตฺวา อาวสถาคารํ ปวิสิตฺวา ปุรตฺถิมํ ภิตฺตึ นิสฺสาย ปจฺฉิมาภิมุขา นิสีทึสุ ภควนฺตเมว ปุรกฺขตฺวา. १४८. "त्यानंतर भगवंत नाळंदामध्ये इच्छेनुसार विहार करून आयुष्यमान आनंदाला म्हणाले— 'चल आनंदा, आपण पाटलिगामाकडे जाऊ या.' आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांना उत्तर दिले— 'होय, भन्ते.' त्यानंतर भगवंत मोठ्या भिक्खू संघासह पाटलिगामाकडे गेले. पाटलिगामातील उपासकांनी ऐकले की— 'भगवंत पाटलिगामात आले आहेत.' तेव्हा पाटलिगामातील उपासक भगवंतांकडे गेले; तिथे जाऊन त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या पाटलिगामातील उपासकांनी भगवंतांना विचारले— 'भन्ते, भगवंतांनी आमच्या विश्रामगृहाचा स्वीकार करावा.' भगवंतांनी मौन बाळगून संमती दिली. तेव्हा पाटलिगामातील उपासक भगवंतांची संमती जाणून आसनावरून उठले, भगवंतांना अभिवादन करून प्रदक्षिणा घातली आणि विश्रामगृहाकडे गेले. तिथे जाऊन त्यांनी विश्रामगृहात सर्व बाजूंनी आच्छादने पसरवली, आसने मांडली, पाण्याचा घडा ठेवला, तेलाचा दिवा लावला आणि पुन्हा भगवंतांकडे गेले. तिथे जाऊन त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि एका बाजूला उभे राहिले. एका बाजूला उभे राहून पाटलिगामातील उपासक भगवंतांना म्हणाले— 'भन्ते, विश्रामगृहात सर्व बाजूंनी आच्छादने पसरवली आहेत, आसने मांडली आहेत, पाण्याचा घडा ठेवला आहे, तेलाचा दिवा लावला आहे. आता भगवंतांना जाण्यासाठी जो योग्य वेळ वाटेल, तो करावा.' त्यानंतर भगवंतांनी संध्याकाळच्या वेळी चीवर परिधान करून, पात्र आणि चीवर घेऊन भिक्खू संघासह विश्रामगृहाकडे प्रस्थान केले. तिथे पोहोचून पाय धुवून त्यांनी विश्रामगृहात प्रवेश केला आणि मधल्या खांबाला टेकून पूर्वेकडे तोंड करून ते बसले. भिक्खू संघानेही पाय धुवून विश्रामगृहात प्रवेश केला आणि पश्चिमेकडील भिंतीला टेकून पूर्वेकडे तोंड करून भगवंतांना समोर ठेवून ते बसले. पाटलिगामातील उपासकांनीही पाय धुवून विश्रामगृहात प्रवेश केला आणि पूर्वेकडील भिंतीला टेकून पश्चिमेकडे तोंड करून भगवंतांना समोर ठेवून ते बसले." ๑๔๙. อถ โข ภควา ปาฏลิคามิเก อุปาสเก อามนฺเตสิ – ‘‘ปญฺจิเม, คหปตโย, อาทีนวา ทุสฺสีลสฺส สีลวิปตฺติยา. กตเม ปญฺจ? อิธ, คหปตโย, ทุสฺสีโล สีลวิปนฺโน ปมาทาธิกรณํ มหตึ โภคชานึ นิคจฺฉติ. อยํ ปฐโม อาทีนโว ทุสฺสีลสฺส สีลวิปตฺติยา. १४९. तेव्हा भगवान पाटलिगामच्या उपासकांना संबोधित करून म्हणाले, "गृहस्थांनो, दुःशीलाच्या (शील नसलेल्याच्या) शील-विपत्तीचे (शील भ्रष्ट होण्याचे) हे पाच दुष्परिणाम आहेत. कोणते पाच? गृहस्थांनो, या जगात दुःशील, शीलभ्रष्ट मनुष्य प्रमादामुळे (बेसावधपणामुळे) मोठ्या प्रमाणावर धनहानीला प्राप्त होतो. दुःशीलाच्या शील-विपत्तीचा हा पहिला दुष्परिणाम आहे." ‘‘ปุน จปรํ, คหปตโย, ทุสฺสีลสฺส สีลวิปนฺนสฺส ปาปโก กิตฺติสทฺโท อพฺภุคฺคจฺฉติ. อยํ ทุติโย อาทีนโว ทุสฺสีลสฺส สีลวิปตฺติยา. "पुन्हा आणखी, गृहस्थांनो, दुःशील आणि शीलभ्रष्ट मनुष्याची अपकीर्ती (वाईट कीर्ती) सर्वत्र पसरते. दुःशीलाच्या शील-विपत्तीचा हा दुसरा दुष्परिणाम आहे." ‘‘ปุน จปรํ, คหปตโย, ทุสฺสีโล สีลวิปนฺโน ยญฺญเทว ปริสํ อุปสงฺกมติ – ยทิ ขตฺติยปริสํ ยทิ พฺราหฺมณปริสํ ยทิ คหปติปริสํ ยทิ สมณปริสํ – อวิสารโท อุปสงฺกมติ มงฺกุภูโต. อยํ ตติโย อาทีนโว ทุสฺสีลสฺส สีลวิปตฺติยา. "पुन्हा आणखी, गृहस्थांनो, दुःशील आणि शीलभ्रष्ट मनुष्य ज्या ज्या परिषदेत (सभेत) जातो – मग ती क्षत्रिय परिषद असो, ब्राह्मण परिषद असो, गृहपती परिषद असो वा श्रमण परिषद असो – तिथे तो आत्मविश्वासाशिवाय (भित्रेपणाने) आणि खजील होऊन जातो. दुःशीलाच्या शील-विपत्तीचा हा तिसरा दुष्परिणाम आहे." ‘‘ปุน จปรํ, คหปตโย, ทุสฺสีโล สีลวิปนฺโน สมฺมูฬฺโห กาลงฺกโรติ. อยํ จตุตฺโถ อาทีนโว ทุสฺสีลสฺส สีลวิปตฺติยา. "पुन्हा आणखी, गृहस्थांनो, दुःशील आणि शीलभ्रष्ट मनुष्य संभ्रमात (व्याकुळ चित्ताने) मृत्यू पावतो. दुःशीलाच्या शील-विपत्तीचा हा चौथा दुष्परिणाम आहे." ‘‘ปุน [Pg.73] จปรํ, คหปตโย, ทุสฺสีโล สีลวิปนฺโน กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชติ. อยํ ปญฺจโม อาทีนโว ทุสฺสีลสฺส สีลวิปตฺติยา. อิเม โข, คหปตโย, ปญฺจ อาทีนวา ทุสฺสีลสฺส สีลวิปตฺติยา. "पुन्हा आणखी, गृहस्थांनो, दुःशील आणि शीलभ्रष्ट मनुष्य शरीराच्या नाशानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय (दुःखद अवस्था), दुर्गती, विनिपात (पतन) आणि नरकात उत्पन्न होतो. दुःशीलाच्या शील-विपत्तीचा हा पाचवा दुष्परिणाम आहे. गृहस्थांनो, हेच ते दुःशीलाच्या शील-विपत्तीचे पाच दुष्परिणाम आहेत." สีลวนฺตอานิสํส शीलवानाचे फायदे (शीलसंपदेचे लाभ) ๑๕๐. ‘‘ปญฺจิเม, คหปตโย, อานิสํสา สีลวโต สีลสมฺปทาย. กตเม ปญฺจ? อิธ, คหปตโย, สีลวา สีลสมฺปนฺโน อปฺปมาทาธิกรณํ มหนฺตํ โภคกฺขนฺธํ อธิคจฺฉติ. อยํ ปฐโม อานิสํโส สีลวโต สีลสมฺปทาย. १५०. "गृहस्थांनो, शीलवानाच्या शीलसंपदेचे (शील संपन्नतेचे) हे पाच फायदे आहेत. कोणते पाच? गृहस्थांनो, या जगात शीलवान, शीलसंपन्न मनुष्य अप्रमादामुळे (जागरूकतेमुळे) मोठ्या प्रमाणावर भोगसंपत्ती (धनसंपत्ती) प्राप्त करतो. शीलवानाच्या शीलसंपदेचा हा पहिला फायदा आहे." ‘‘ปุน จปรํ, คหปตโย, สีลวโต สีลสมฺปนฺนสฺส กลฺยาโณ กิตฺติสทฺโท อพฺภุคฺคจฺฉติ. อยํ ทุติโย อานิสํโส สีลวโต สีลสมฺปทาย. "पुन्हा आणखी, गृहस्थांनो, शीलवान आणि शीलसंपन्न मनुष्याची उत्तम कीर्ती सर्वत्र पसरते. शीलवानाच्या शीलसंपदेचा हा दुसरा फायदा आहे." ‘‘ปุน จปรํ, คหปตโย, สีลวา สีลสมฺปนฺโน ยญฺญเทว ปริสํ อุปสงฺกมติ – ยทิ ขตฺติยปริสํ ยทิ พฺราหฺมณปริสํ ยทิ คหปติปริสํ ยทิ สมณปริสํ วิสารโท อุปสงฺกมติ อมงฺกุภูโต. อยํ ตติโย อานิสํโส สีลวโต สีลสมฺปทาย. "पुन्हा आणखी, गृहस्थांनो, शीलवान आणि शीलसंपन्न मनुष्य ज्या ज्या परिषदेत (सभेत) जातो – मग ती क्षत्रिय परिषद असो, ब्राह्मण परिषद असो, गृहपती परिषद असो वा श्रमण परिषद असो – तिथे तो आत्मविश्वासाने (निर्भयपणे) आणि प्रसन्न चित्ताने जातो. शीलवानाच्या शीलसंपदेचा हा तिसरा फायदा आहे." ‘‘ปุน จปรํ, คหปตโย, สีลวา สีลสมฺปนฺโน อสมฺมูฬฺโห กาลงฺกโรติ. อยํ จตุตฺโถ อานิสํโส สีลวโต สีลสมฺปทาย. "पुन्हा आणखी, गृहस्थांनो, शीलवान आणि शीलसंपन्न मनुष्य असंभ्रमित (शांत व स्पष्ट चित्ताने) मृत्यू पावतो. शीलवानाच्या शीलसंपदेचा हा चौथा फायदा आहे." ‘‘ปุน จปรํ, คหปตโย, สีลวา สีลสมฺปนฺโน กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. อยํ ปญฺจโม อานิสํโส สีลวโต สีลสมฺปทาย. อิเม โข, คหปตโย, ปญฺจ อานิสํสา สีลวโต สีลสมฺปทายา’’ติ. "पुन्हा आणखी, गृहस्थांनो, शीलवान आणि शीलसंपन्न मनुष्य शरीराच्या नाशानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतो. शीलवानाच्या शीलसंपदेचा हा पाचवा फायदा आहे. गृहस्थांनो, हेच ते शीलवानाच्या शीलसंपदेचे पाच फायदे आहेत." ๑๕๑. อถ โข ภควา ปาฏลิคามิเก อุปาสเก พหุเทว รตฺตึ ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสตฺวา สมาทเปตฺวา สมุตฺเตเชตฺวา สมฺปหํเสตฺวา อุยฺโยเชสิ – ‘‘อภิกฺกนฺตา โข, คหปตโย, รตฺติ, ยสฺสทานิ ตุมฺเห กาลํ มญฺญถา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข ปาฏลิคามิกา อุปาสกา ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกมึสุ. อถ โข ภควา อจิรปกฺกนฺเตสุ ปาฏลิคามิเกสุ อุปาสเกสุ สุญฺญาคารํ ปาวิสิ. १५१. त्यानंतर भगवंतांनी पाटलिगामच्या उपासकांना रात्रीच्या बऱ्याच वेळेपर्यंत धम्मचर्चेने उपदेशित केले, धम्मात प्रवृत्त केले, उत्साहित केले आणि हर्षित केले. मग त्यांना निरोप देताना ते म्हणाले, "गृहस्थांनो, रात्र बरीच उलटून गेली आहे, आता तुम्हाला जाण्यासाठी जी योग्य वेळ वाटेल ती तुम्ही ठरवा." "तसेच असो, भन्ते," असे म्हणून पाटलिगामच्या उपासकांनी भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला, आणि आपापल्या आसनावरून उठून भगवंतांना अभिवादन करून, प्रदक्षिणा घालून ते निघून गेले. त्यानंतर, पाटलिगामचे उपासक निघून गेल्यावर लगेचच भगवंतांनी एका शून्यगृहात (एकांत खोलीत) प्रवेश केला. ปาฏลิปุตฺตนครมาปนํ पाटलिपुत्र नगराची निर्मिती ๑๕๒. เตน [Pg.74] โข ปน สมเยน สุนิธวสฺสการา มคธมหามตฺตา ปาฏลิคาเม นครํ มาเปนฺติ วชฺชีนํ ปฏิพาหาย. เตน สมเยน สมฺพหุลา เทวตาโย สหสฺเสว ปาฏลิคาเม วตฺถูนิ ปริคฺคณฺหนฺติ. ยสฺมึ ปเทเส มเหสกฺขา เทวตา วตฺถูนิ ปริคฺคณฺหนฺติ, มเหสกฺขานํ ตตฺถ รญฺญํ ราชมหามตฺตานํ จิตฺตานิ นมนฺติ นิเวสนานิ มาเปตุํ. ยสฺมึ ปเทเส มชฺฌิมา เทวตา วตฺถูนิ ปริคฺคณฺหนฺติ, มชฺฌิมานํ ตตฺถ รญฺญํ ราชมหามตฺตานํ จิตฺตานิ นมนฺติ นิเวสนานิ มาเปตุํ. ยสฺมึ ปเทเส นีจา เทวตา วตฺถูนิ ปริคฺคณฺหนฺติ, นีจานํ ตตฺถ รญฺญํ ราชมหามตฺตานํ จิตฺตานิ นมนฺติ นิเวสนานิ มาเปตุํ. อทฺทสา โข ภควา ทิพฺเพน จกฺขุนา วิสุทฺเธน อติกฺกนฺตมานุสเกน ตา เทวตาโย สหสฺเสว ปาฏลิคาเม วตฺถูนิ ปริคฺคณฺหนฺติโย. อถ โข ภควา รตฺติยา ปจฺจูสสมยํ ปจฺจุฏฺฐาย อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘เก นุ โข, อานนฺท, ปาฏลิคาเม นครํ มาเปนฺตี’’ติ ? ‘‘สุนิธวสฺสการา, ภนฺเต, มคธมหามตฺตา ปาฏลิคาเม นครํ มาเปนฺติ วชฺชีนํ ปฏิพาหายา’’ติ. ‘‘เสยฺยถาปิ, อานนฺท, เทเวหิ ตาวตึเสหิ สทฺธึ มนฺเตตฺวา, เอวเมว โข, อานนฺท, สุนิธวสฺสการา มคธมหามตฺตา ปาฏลิคาเม นครํ มาเปนฺติ วชฺชีนํ ปฏิพาหาย. อิธาหํ, อานนฺท, อทฺทสํ ทิพฺเพน จกฺขุนา วิสุทฺเธน อติกฺกนฺตมานุสเกน สมฺพหุลา เทวตาโย สหสฺเสว ปาฏลิคาเม วตฺถูนิ ปริคฺคณฺหนฺติโย. ยสฺมึ, อานนฺท, ปเทเส มเหสกฺขา เทวตา วตฺถูนิ ปริคฺคณฺหนฺติ, มเหสกฺขานํ ตตฺถ รญฺญํ ราชมหามตฺตานํ จิตฺตานิ นมนฺติ นิเวสนานิ มาเปตุํ. ยสฺมึ ปเทเส มชฺฌิมา เทวตา วตฺถูนิ ปริคฺคณฺหนฺติ, มชฺฌิมานํ ตตฺถ รญฺญํ ราชมหามตฺตานํ จิตฺตานิ นมนฺติ นิเวสนานิ มาเปตุํ. ยสฺมึ ปเทเส นีจา เทวตา วตฺถูนิ ปริคฺคณฺหนฺติ, นีจานํ ตตฺถ รญฺญํ ราชมหามตฺตานํ จิตฺตานิ นมนฺติ นิเวสนานิ มาเปตุํ. ยาวตา, อานนฺท, อริยํ อายตนํ ยาวตา วณิปฺปโถ อิทํ อคฺคนครํ ภวิสฺสติ ปาฏลิปุตฺตํ ปุฏเภทนํ. ปาฏลิปุตฺตสฺส โข, อานนฺท, ตโย อนฺตรายา ภวิสฺสนฺติ – อคฺคิโต วา อุทกโต วา มิถุเภทา วา’’ติ. १५२. त्या वेळी मगध देशाचे महामात्य सुनिध आणि वस्सकार हे वज्जींना रोखण्यासाठी पाटलिगाम येथे एका नगराची निर्मिती करत होते. त्या वेळी हजारो देवता पाटलिगाममध्ये आपापल्या राहण्याच्या जागा निवडत होत्या. ज्या भागात महातेजस्वी देवता जागा निवडत होत्या, तिथे महातेजस्वी राजे आणि महामात्य यांचे निवासस्थाने बांधण्याकडे मन वळत होते. ज्या भागात मध्यम दर्जाच्या देवता जागा निवडत होत्या, तिथे मध्यम दर्जाच्या राजे आणि महामात्य यांचे निवासस्थाने बांधण्याकडे मन वळत होते. ज्या भागात कनिष्ठ दर्जाच्या देवता जागा निवडत होत्या, तिथे कनिष्ठ दर्जाच्या राजे आणि महामात्य यांचे निवासस्थाने बांधण्याकडे मन वळत होते. भगवंतांनी मानवी दृष्टीच्या पलीकडे असलेल्या आपल्या अतिशय शुद्ध दिव्य चक्षूंनी त्या हजारो देवतांना पाटलिगाममध्ये जागा निवडताना पाहिले. त्यानंतर भगवंतांनी पहाटेच्या वेळी उठून आयुष्यमान आनंदाला विचारले, "आनंदा, पाटलिगाममध्ये नगर कोण निर्माण करत आहे?" "भन्ते, मगध देशाचे महामात्य सुनिध आणि वस्सकार हे वज्जींना रोखण्यासाठी पाटलिगाममध्ये नगर निर्माण करत आहेत." "आनंदा, जणू काही तावतिंस देवलोकातील देवतांशी सल्लामसलत करूनच सुनिध आणि वस्सकार हे पाटलिगाममध्ये नगर निर्माण करत आहेत! आनंदा, मी माझ्या मानवी दृष्टीच्या पलीकडे असलेल्या शुद्ध दिव्य चक्षूंनी पाहिले की, हजारो देवता पाटलिगाममध्ये जागा निवडत आहेत. आनंदा, ज्या भागात महातेजस्वी देवता जागा निवडतात, तिथे महातेजस्वी राजे आणि महामात्य यांचे निवासस्थाने बांधण्याकडे मन वळते. ज्या भागात मध्यम दर्जाच्या देवता जागा निवडतात, तिथे मध्यम दर्जाच्या राजे आणि महामात्य यांचे निवासस्थाने बांधण्याकडे मन वळते. ज्या भागात कनिष्ठ दर्जाच्या देवता जागा निवडतात, तिथे कनिष्ठ दर्जाच्या राजे आणि महामात्य यांचे निवासस्थाने बांधण्याकडे मन वळते. आनंदा, जोपर्यंत आर्यांचे निवासस्थान आणि व्यापारमार्ग अस्तित्वात राहतील, तोपर्यंत हे पाटलिपुत्र नावाचे नगर सर्वश्रेष्ठ नगर आणि व्यापारी मालाचे गाठोडे सोडण्याचे मुख्य केंद्र (व्यापार केंद्र) होईल. परंतु आनंदा, पाटलिपुत्राला तीन धोके असतील – अग्नीपासून, पाण्यापासून किंवा आपापसातील फुटीमुळे." ๑๕๓. อถ [Pg.75] โข สุนิธวสฺสการา มคธมหามตฺตา เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทึสุ, สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐํสุ, เอกมนฺตํ ฐิตา โข สุนิธวสฺสการา มคธมหามตฺตา ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘อธิวาเสตุ โน ภวํ โคตโม อชฺชตนาย ภตฺตํ สทฺธึ ภิกฺขุสงฺเฆนา’’ติ. อธิวาเสสิ ภควา ตุณฺหีภาเวน. อถ โข สุนิธวสฺสการา มคธมหามตฺตา ภควโต อธิวาสนํ วิทิตฺวา เยน สโก อาวสโถ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา สเก อาวสเถ ปณีตํ ขาทนียํ โภชนียํ ปฏิยาทาเปตฺวา ภควโต กาลํ อาโรจาเปสุํ – ‘‘กาโล, โภ โคตม, นิฏฺฐิตํ ภตฺต’’นฺติ. १५३. त्यानंतर मगध देशाचे महामात्य सुनिध आणि वस्सकार जेथे भगवान होते तेथे आले. आल्यानंतर त्यांनी भगवंतांशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून ते एका बाजूला उभे राहिले. एका बाजूला उभे राहिलेले मगधचे महामात्य सुनिध आणि वस्सकार भगवंतांना म्हणाले – "हे पूज्य गौतम, आपण भिक्खू संघासह आजच्या भोजनासाठी आमचे आमंत्रण स्वीकारावे." भगवंतांनी मौन बाळगून संमती दिली. त्यानंतर मगधचे महामात्य सुनिध आणि वस्सकार भगवंतांची संमती जाणून घेऊन आपल्या निवासस्थानी गेले. तेथे पोहोचून त्यांनी आपल्या निवासस्थानी उत्तम दर्जाचे खाद्य व भोज्य पदार्थ तयार करवून घेतले आणि भगवंतांना वेळ झाल्याचा निरोप पाठवला – "हे पूज्य गौतम, वेळ झाली आहे, भोजन तयार आहे." อถ โข ภควา ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สทฺธึ ภิกฺขุสงฺเฆน เยน สุนิธวสฺสการานํ มคธมหามตฺตานํ อาวสโถ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. อถ โข สุนิธวสฺสการา มคธมหามตฺตา พุทฺธปฺปมุขํ ภิกฺขุสงฺฆํ ปณีเตน ขาทนีเยน โภชนีเยน สหตฺถา สนฺตปฺเปสุํ สมฺปวาเรสุํ. อถ โข สุนิธวสฺสการา มคธมหามตฺตา ภควนฺตํ ภุตฺตาวึ โอนีตปตฺตปาณึ อญฺญตรํ นีจํ อาสนํ คเหตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺเน โข สุนิธวสฺสกาเร มคธมหามตฺเต ภควา อิมาหิ คาถาหิ อนุโมทิ – त्यानंतर भगवान सकाळी चिवर परिधान करून, पात्र व चिवर घेऊन भिक्खू संघासह मगधचे महामात्य सुनिध आणि वस्सकार यांच्या निवासस्थानी गेले. तेथे पोहोचून ते तयार केलेल्या आसनावर बसले. त्यानंतर मगधचे महामात्य सुनिध आणि वस्सकार यांनी बुद्धप्रमुख भिक्खू संघाला उत्तम खाद्य व भोज्य पदार्थांनी स्वतःच्या हाताने तृप्त केले व संतुष्ट केले. त्यानंतर, भगवंतांनी भोजन आटोपून पात्रातून हात काढून घेतल्यावर, मगधचे महामात्य सुनिध आणि वस्सकार यांनी एक लहान आसन घेतले आणि ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या मगधच्या महामात्यांना, सुनिध आणि वस्सकार यांना भगवंतांनी या गाथांद्वारे अनुमोदित केले (आशीर्वाद दिला) – ‘‘ยสฺมึ ปเทเส กปฺเปติ, วาสํ ปณฺฑิตชาติโย; สีลวนฺเตตฺถ โภเชตฺวา, สญฺญเต พฺรหฺมจารโย. "बुद्धिमान माणसाने ज्या प्रदेशात आपले निवासस्थान बनवले असेल, तेथे त्याने शीलवान, संयमी आणि ब्रह्मचर्य पाळणाऱ्या (भिक्खूंना) भोजन द्यावे. ‘‘ยา ตตฺถ เทวตา อาสุํ, ตาสํ ทกฺขิณมาทิเส; ตา ปูชิตา ปูชยนฺติ, มานิตา มานยนฺติ นํ. तेथील स्थानिक देवतांना त्या दानाचा वाटा (पुण्य) समर्पित करावा. अशा प्रकारे पूजिल्या गेलेल्या त्या देवता त्या माणसाचा आदर करतात आणि सन्मानित केल्यावर त्याचा सन्मान करतात. ‘‘ตโต นํ อนุกมฺปนฺติ, มาตา ปุตฺตํว โอรสํ; เทวตานุกมฺปิโต โปโส, สทา ภทฺรานิ ปสฺสตี’’ติ. त्यामुळे, जशी माता आपल्या पोटच्या मुलावर प्रेम करते, तशीच त्या देवता त्या माणसावर अनुकंपा करतात. देवतांची अनुकंपा लाभलेला मनुष्य नेहमी कल्याणच पाहतो (त्याचे नेहमी कल्याण होते)." อถ โข ภควา สุนิธวสฺสกาเร มคธมหามตฺเต อิมาหิ คาถาหิ อนุโมทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกามิ. त्यानंतर भगवान मगधचे महामात्य सुनिध आणि वस्सकार यांना या गाथांद्वारे अनुमोदित करून आसनावरून उठले आणि निघून गेले. ๑๕๔. เตน [Pg.76] โข ปน สมเยน สุนิธวสฺสการา มคธมหามตฺตา ภควนฺตํ ปิฏฺฐิโต ปิฏฺฐิโต อนุพนฺธา โหนฺติ – ‘‘เยนชฺช สมโณ โคตโม ทฺวาเรน นิกฺขมิสฺสติ, ตํ โคตมทฺวารํ นาม ภวิสฺสติ. เยน ติตฺเถน คงฺคํ นทึ ตริสฺสติ, ตํ โคตมติตฺถํ นาม ภวิสฺสตี’’ติ. อถ โข ภควา เยน ทฺวาเรน นิกฺขมิ, ตํ โคตมทฺวารํ นาม อโหสิ. อถ โข ภควา เยน คงฺคา นที เตนุปสงฺกมิ. เตน โข ปน สมเยน คงฺคา นที ปูรา โหติ สมติตฺติกา กากเปยฺยา. อปฺเปกจฺเจ มนุสฺสา นาวํ ปริเยสนฺติ, อปฺเปกจฺเจ อุฬุมฺปํ ปริเยสนฺติ, อปฺเปกจฺเจ กุลฺลํ พนฺธนฺติ อปารา, ปารํ คนฺตุกามา. อถ โข ภควา – เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย, ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย, เอวเมว – คงฺคาย นทิยา โอริมตีเร อนฺตรหิโต ปาริมตีเร ปจฺจุฏฺฐาสิ สทฺธึ ภิกฺขุสงฺเฆน. อทฺทสา โข ภควา เต มนุสฺเส อปฺเปกจฺเจ นาวํ ปริเยสนฺเต อปฺเปกจฺเจ อุฬุมฺปํ ปริเยสนฺเต อปฺเปกจฺเจ กุลฺลํ พนฺธนฺเต อปารา ปารํ คนฺตุกาเม. อถ โข ภควา เอตมตฺถํ วิทิตฺวา ตายํ เวลายํ อิมํ อุทานํ อุทาเนสิ – १५४. त्या वेळी मगधचे महामात्य सुनिध आणि वस्सकार भगवंतांच्या मागे मागे चालू लागले आणि विचार करू लागले – "आज श्रमण गौतम ज्या दारातून बाहेर पडतील, त्याला 'गौतम द्वार' म्हटले जाईल; आणि ज्या घाटावरून ते गंगा नदी पार करतील, त्याला 'गौतम घाट' म्हटले जाईल." त्यानंतर भगवान ज्या दारातून बाहेर पडले, त्याचे नाव 'गौतम द्वार' झाले. त्यानंतर भगवान जेथे गंगा नदी होती तेथे गेले. त्या वेळी गंगा नदी पाण्याने काठोकाठ भरलेली होती, इतकी की कावळाही काठावर उभा राहून पाणी पिऊ शकत होता. काही लोक पलीकडच्या तीरावर जाण्याच्या इच्छेने नाव शोधत होते, काही तराफा शोधत होते, तर काही बांबूचा किंवा लाकडाचा सांगड (कळ्ळ) बांधीत होते. तेव्हा भगवंतांनी – ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपला दुमडलेला हात पसरतो किंवा पसरलेला हात दुमडतो, त्याचप्रमाणे – गंगेच्या या तीरावरून अंतर्धान पावून भिक्खू संघासह पलीकडच्या तीरावर प्रकट झाले. भगवंतांनी त्या लोकांना पाहिले, जे पलीकडे जाण्याच्या इच्छेने काही नाव शोधत होते, काही तराफा शोधत होते, तर काही सांगड बांधीत होते. तेव्हा भगवंतांनी ही बाब जाणून घेऊन त्या वेळी हे उदान (उद्गार) काढले – ‘‘เย ตรนฺติ อณฺณวํ สรํ, เสตุํ กตฺวาน วิสชฺช ปลฺลลานิ; กุลฺลญฺหิ ชโน พนฺธติ, ติณฺณา เมธาวิโน ชนา’’ติ. "जे अथांग जलाशय (तण्हा-सागर) पार करतात, ते (आर्यमार्गरूपी) पूल बांधून चिखल-दलदल मागे सोडून पार होतात. सामान्य लोक तराफा बांधतात, परंतु ज्ञानी लोक आधीच पार झालेले असतात." ปฐมภาณวาโร. प्रथम भाणवार समाप्त. อริยสจฺจกถา आर्यसत्य कथा ๑๕๕. อถ โข ภควา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘อายามานนฺท, เยน โกฏิคาโม เตนุปสงฺกมิสฺสามา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. อถ โข ภควา มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ เยน โกฏิคาโม ตทวสริ. ตตฺร สุทํ ภควา โกฏิคาเม วิหรติ. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – १५५. त्यानंतर भगवंतांनी आयुष्मान आनंदाला संबोधित केले – "चल आनंदा, आपण कोटिगाम येथे जाऊ या." "तसेच असो, भंते," असे आयुष्मान आनंदाने भगवंतांना उत्तर दिले. त्यानंतर भगवान मोठ्या भिक्खू संघासह कोटिगाम येथे पोहोचले. तेथे भगवान कोटिगाम येथे राहू लागले. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – ‘‘จตุนฺนํ[Pg.77], ภิกฺขเว, อริยสจฺจานํ อนนุโพธา อปฺปฏิเวธา เอวมิทํ ทีฆมทฺธานํ สนฺธาวิตํ สํสริตํ มมญฺเจว ตุมฺหากญฺจ. กตเมสํ จตุนฺนํ? ทุกฺขสฺส, ภิกฺขเว, อริยสจฺจสฺส อนนุโพธา อปฺปฏิเวธา เอวมิทํ ทีฆมทฺธานํ สนฺธาวิตํ สํสริตํ มมญฺเจว ตุมฺหากญฺจ. ทุกฺขสมุทยสฺส, ภิกฺขเว, อริยสจฺจสฺส อนนุโพธา อปฺปฏิเวธา เอวมิทํ ทีฆมทฺธานํ สนฺธาวิตํ สํสริตํ มมญฺเจว ตุมฺหากญฺจ. ทุกฺขนิโรธสฺส, ภิกฺขเว, อริยสจฺจสฺส อนนุโพธา อปฺปฏิเวธา เอวมิทํ ทีฆมทฺธานํ สนฺธาวิตํ สํสริตํ มมญฺเจว ตุมฺหากญฺจ. ทุกฺขนิโรธคามินิยา ปฏิปทาย, ภิกฺขเว, อริยสจฺจสฺส อนนุโพธา อปฺปฏิเวธา เอวมิทํ ทีฆมทฺธานํ สนฺธาวิตํ สํสริตํ มมญฺเจว ตุมฺหากญฺจ. ตยิทํ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ อริยสจฺจํ อนุพุทฺธํ ปฏิวิทฺธํ, ทุกฺขสมุทยํ อริยสจฺจํ อนุพุทฺธํ ปฏิวิทฺธํ, ทุกฺขนิโรธํ อริยสจฺจํ อนุพุทฺธํ ปฏิวิทฺธํ, ทุกฺขนิโรธคามินี ปฏิปทา อริยสจฺจํ อนุพุทฺธํ ปฏิวิทฺธํ, อุจฺฉินฺนา ภวตณฺหา, ขีณา ภวเนตฺติ, นตฺถิทานิ ปุนพฺภโว’’ติ. อิทมโวจ ภควา. อิทํ วตฺวาน สุคโต อถาปรํ เอตทโวจ สตฺถา – "भिक्खूंनो, चार आर्यसत्यांचे आकलन न झाल्यामुळे आणि त्यांचा वेध (साक्षात्कार) न घेतल्यामुळे, मला आणि तुम्हा सर्वांना या दीर्घ संसारात वारंवार जन्म घ्यावा लागला आणि भटकावे लागले. कोणत्या चार आर्यसत्यांचे? भिक्खूंनो, दुःख या आर्यसत्याचे आकलन न झाल्यामुळे आणि त्याचा वेध न घेतल्यामुळे, मला आणि तुम्हा सर्वांना या दीर्घ संसारात भटकावे लागले. दुःखसमुदय (दुःखाची उत्पत्ती) या आर्यसत्याचे आकलन न झाल्यामुळे आणि त्याचा वेध न घेतल्यामुळे, मला आणि तुम्हा सर्वांना या दीर्घ संसारात भटकावे लागले. दुःखनिरोध या आर्यसत्याचे आकलन न झाल्यामुळे आणि त्याचा वेध न घेतल्यामुळे, मला आणि तुम्हा सर्वांना या दीर्घ संसारात भटकावे लागले. दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा (दुःखनिरोधाचा मार्ग) या आर्यसत्याचे आकलन न झाल्यामुळे आणि त्याचा वेध न घेतल्यामुळे, मला आणि तुम्हा सर्वांना या दीर्घ संसारात भटकावे लागले. भिक्खूंनो, आता हे दुःख आर्यसत्य जाणले गेले आहे, त्याचा वेध घेतला गेला आहे; दुःखसमुदय आर्यसत्य जाणले गेले आहे, त्याचा वेध घेतला गेला आहे; दुःखनिरोध आर्यसत्य जाणले गेले आहे, त्याचा वेध घेतला गेला आहे; दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा आर्यसत्य जाणले गेले आहे, त्याचा वेध घेतला गेला आहे. भव-तृष्णा समूळ नष्ट झाली आहे, भवाकडे नेणारे बंधन (भवनित्ती) क्षीण झाले आहे, आता पुनर्जन्म नाही." भगवंतांनी असे सांगितले. सुगतांनी हे सांगितल्यावर, शास्त्यांनी पुढे हे म्हटले – ‘‘จตุนฺนํ อริยสจฺจานํ, ยถาภูตํ อทสฺสนา; สํสิตํ ทีฆมทฺธานํ, ตาสุ ตาสฺเวว ชาติสุ. "चार आर्यसत्यांचे यथार्थ दर्शन न झाल्यामुळे, विविध योनींमध्ये (जन्मांमध्ये) दीर्घकाळ संसरण करावे लागले. ตานิ เอตานิ ทิฏฺฐานิ, ภวเนตฺติ สมูหตา; อุจฺฉินฺนํ มูลํ ทุกฺขสฺส, นตฺถิ ทานิ ปุนพฺภโว’’ติ. "आता ती आर्यसत्ये पाहिली गेली आहेत, भवाचे बंधन समूळ नष्ट झाले आहे, दुःखाचे मूळ कापून टाकले गेले आहे, आता पुनर्जन्म नाही." ตตฺรปิ สุทํ ภควา โกฏิคาเม วิหรนฺโต เอตเทว พหุลํ ภิกฺขูนํ ธมฺมึ กถํ กโรติ – ‘‘อิติ สีลํ, อิติ สมาธิ, อิติ ปญฺญา. สีลปริภาวิโต สมาธิ มหปฺผโล โหติ มหานิสํโส. สมาธิปริภาวิตา ปญฺญา มหปฺผลา โหติ มหานิสํสา. ปญฺญาปริภาวิตํ จิตฺตํ สมฺมเทว อาสเวหิ วิมุจฺจติ, เสยฺยถิทํ – กามาสวา, ภวาสวา, อวิชฺชาสวา’’ติ. तेथे कोटिगाम येथे विहार करत असताना देखील भगवान भिक्खूंना वारंवार हाच धम्म उपदेश देत असत – 'असे शील आहे, असे समाधी आहे, असे प्रज्ञा आहे. शीलाने परिभावित समाधी महाफळदायी व महाकल्याणकारी ठरते. समाधीने परिभावित प्रज्ञा महाफळदायी व महाकल्याणकारी ठरते. प्रज्ञेने परिभावित झालेले चित्त आसवांपासून चांगल्या प्रकारे मुक्त होते, जसे की – कामासव, भवासव आणि अविद्यासव.' อนาวตฺติธมฺมสมฺโพธิปรายณา अनावत्तीधम्म आणि संबोधीपरायण ๑๕๖. อถ โข ภควา โกฏิคาเม ยถาภิรนฺตํ วิหริตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘อายามานนฺท, เยน นาติกา เตนุปงฺกมิสฺสามา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต [Pg.78] ปจฺจสฺโสสิ. อถ โข ภควา มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ เยน นาติกา ตทวสริ. ตตฺรปิ สุทํ ภควา นาติเก วิหรติ คิญฺชกาวสเถ. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สาฬฺโห นาม, ภนฺเต, ภิกฺขุ นาติเก กาลงฺกโต, ตสฺส กา คติ, โก อภิสมฺปราโย? นนฺทา นาม, ภนฺเต, ภิกฺขุนี นาติเก กาลงฺกตา, ตสฺสา กา คติ, โก อภิสมฺปราโย? สุทตฺโต นาม, ภนฺเต, อุปาสโก นาติเก กาลงฺกโต, ตสฺส กา คติ, โก อภิสมฺปราโย? สุชาตา นาม, ภนฺเต, อุปาสิกา นาติเก กาลงฺกตา, ตสฺสา กา คติ, โก อภิสมฺปราโย? กุกฺกุโฏ นาม, ภนฺเต, อุปาสโก นาติเก กาลงฺกโต, ตสฺส กา คติ, โก อภิสมฺปราโย? กาฬิมฺโพ นาม, ภนฺเต, อุปาสโก…เป… นิกโฏ นาม, ภนฺเต, อุปาสโก… กฏิสฺสโห นาม, ภนฺเต, อุปาสโก… ตุฏฺโฐ นาม, ภนฺเต, อุปาสโก… สนฺตุฏฺโฐ นาม, ภนฺเต, อุปาสโก… ภทฺโท นาม, ภนฺเต, อุปาสโก… สุภทฺโท นาม, ภนฺเต, อุปาสโก นาติเก กาลงฺกโต, ตสฺส กา คติ, โก อภิสมฺปราโย’’ติ? १५६. त्यानंतर भगवान कोटिगाम येथे इच्छेनुसार विहार करून आयुष्यमान आनंदाला म्हणाले – 'आनंदा, चल, आपण नातिका येथे जाऊ या.' 'तसेच असो, भंते,' असे म्हणून आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला. त्यानंतर भगवान मोठ्या भिक्खू संघासह नातिका येथे पोहोचले. तेथे भगवान नातिका येथील गिंजकावसथ (विटांचे घर) मध्ये विहार करत होते. त्यानंतर आयुष्यमान आनंद भगवंतांकडे गेले; जवळ जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांना असे विचारले – 'भंते, नातिका येथे साळ्ह नावाचे भिक्खू काळाधीन झाले आहेत, त्यांची गती काय आहे, त्यांचा परलोक कोणता आहे? भंते, नातिका येथे नंदा नावाची भिक्खुणी काळाधीन झाली आहे, तिची गती काय आहे, तिचा परलोक कोणता आहे? भंते, नातिका येथे सुदत्त नावाचा उपासक काळाधीन झाला आहे, त्याची गती काय आहे, त्याचा परलोक कोणता आहे? भंते, नातिका येथे सुजाता नावाची उपासिका काळाधीन झाली आहे, तिची गती काय आहे, तिचा परलोक कोणता आहे? भंते, नातिका येथे कुक्कुट नावाचा उपासक काळाधीन झाला आहे, त्याची गती काय आहे, त्याचा परलोक कोणता आहे? भंते, नातिका येथे काळिम्ब नावाचा उपासक...पे... निकठ नावाचा उपासक... कटिस्सहा नावाचा उपासक... तुट्ठ नावाचा उपासक... संतुट्ठ नावाचा उपासक... भद्द नावाचा उपासक... सुभद्द नावाचा उपासक काळाधीन झाला आहे, त्याची गती काय आहे, त्याचा परलोक कोणता आहे?' ๑๕๗. ‘‘สาฬฺโห, อานนฺท, ภิกฺขุ อาสวานํ ขยา อนาสวํ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหาสิ. นนฺทา, อานนฺท, ภิกฺขุนี ปญฺจนฺนํ โอรมฺภาคิยานํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โอปปาติกา ตตฺถ ปรินิพฺพายินี อนาวตฺติธมฺมา ตสฺมา โลกา. สุทตฺโต, อานนฺท, อุปาสโก ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา ราคโทสโมหานํ ตนุตฺตา สกทาคามี สกิเทว อิมํ โลกํ อาคนฺตฺวา ทุกฺขสฺสนฺตํ กริสฺสติ. สุชาตา, อานนฺท, อุปาสิกา ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โสตาปนฺนา อวินิปาตธมฺมา นิยตา สมฺโพธิปรายณา. กุกฺกุโฏ, อานนฺท, อุปาสโก ปญฺจนฺนํ โอรมฺภาคิยานํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โอปปาติโก ตตฺถ ปรินิพฺพายี อนาวตฺติธมฺโม ตสฺมา โลกา. กาฬิมฺโพ, อานนฺท, อุปาสโก…เป… นิกโฏ, อานนฺท, อุปาสโก… กฏิสฺสโห[Pg.79], อานนฺท, อุปาสโก… ตุฏฺโฐ, อานนฺท, อุปาสโก … สนฺตุฏฺโฐ, อานนฺท, อุปาสโก… ภทฺโท, อานนฺท, อุปาสโก… สุภทฺโท, อานนฺท, อุปาสโก ปญฺจนฺนํ โอรมฺภาคิยานํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โอปปาติโก ตตฺถ ปรินิพฺพายี อนาวตฺติธมฺโม ตสฺมา โลกา. ปโรปญฺญาสํ, อานนฺท, นาติเก อุปาสกา กาลงฺกตา, ปญฺจนฺนํ โอรมฺภาคิยานํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โอปปาติกา ตตฺถ ปรินิพฺพายิโน อนาวตฺติธมฺมา ตสฺมา โลกา. สาธิกา นวุติ, อานนฺท, นาติเก อุปาสกา กาลงฺกตา ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา ราคโทสโมหานํ ตนุตฺตา สกทาคามิโน สกิเทว อิมํ โลกํ อาคนฺตฺวา ทุกฺขสฺสนฺตํ กริสฺสนฺติ. สาติเรกานิ, อานนฺท, ปญฺจสตานิ นาติเก อุปาสกา กาลงฺกตา, ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โสตาปนฺนา อวินิปาตธมฺมา นิยตา สมฺโพธิปรายณา. १५७. 'आनंदा, साळ्ह भिक्खूने आसवांचा क्षय केल्यामुळे, आसवरहित अशा चेतोविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्तीला याच जन्मात स्वतः उच्च ज्ञानाने जाणून, साक्षात करून आणि त्यात प्रतिष्ठित होऊन विहार केला. आनंदा, नंदा भिक्खुणी पाच खालच्या दर्जाच्या (ओरंभागीय) संयोजनांचा क्षय झाल्यामुळे ओपपातिक (स्वयंभू उत्पन्न होणारी) झाली असून, तेथेच परिनिर्वाण प्राप्त करणारी आहे आणि त्या लोकातून पुन्हा न परतणारी आहे. आनंदा, सुदत्त उपासक तीन संयोजनांचा क्षय झाल्यामुळे आणि राग, द्वेष व मोहाच्या क्षीणतेमुळे सकदागामी झाला असून, या लोकात केवळ एकदाच या जगात येऊन दुःखाचा अंत करेल. आनंदा, सुजाता उपासिका तीन संयोजनांचा क्षय झाल्यामुळे सोतापन्न झाली असून, ती अपाय गतीला न जाणारी, निश्चित आणि संबोधीपरायण झाली आहे. आनंदा, कुक्कुट उपासक पाच ओरंभागीय संयोजनांचा क्षय झाल्यामुळे ओपपातिक झाला असून, तेथेच परिनिर्वाण प्राप्त करणारा आणि त्या लोकातून पुन्हा न परतणारा आहे. आनंदा, काळिम्ब उपासक...पे... निकठ उपासक... कटिस्सहा उपासक... तुट्ठ उपासक... संतुट्ठ उपासक... भद्द उपासक... सुभद्द उपासक पाच ओरंभागीय संयोजनांचा क्षय झाल्यामुळे ओपपातिक झाला असून, तेथेच परिनिर्वाण प्राप्त करणारा आणि त्या लोकातून पुन्हा न परतणारा आहे. आनंदा, नातिका येथे पन्नासपेक्षा अधिक उपासक काळाधीन झाले आहेत, जे पाच ओरंभागीय संयोजनांचा क्षय झाल्यामुळे ओपपातिक झाले असून, तेथेच परिनिर्वाण प्राप्त करणारे आणि त्या लोकातून पुन्हा न परतणारे आहेत. आनंदा, नातिका येथे नव्वदपेक्षा अधिक उपासक काळाधीन झाले आहेत, जे तीन संयोजनांचा क्षय झाल्यामुळे आणि राग, द्वेष व मोहाच्या क्षीणतेमुळे सकदागामी झाले असून, या लोकात केवळ एकदाच येऊन दुःखाचा अंत करतील. आनंदा, नातिका येथे पाचशेपेक्षा अधिक उपासक काळाधीन झाले आहेत, जे तीन संयोजनांचा क्षय झाल्यामुळे सोतापन्न झाले असून, अपाय गतीला न जाणारे, निश्चित आणि संबोधीपरायण झाले आहेत.' ธมฺมาทาสธมฺมปริยายา धम्मादास धम्मपर्याय ๑๕๘. ‘‘อนจฺฉริยํ โข ปเนตํ, อานนฺท, ยํ มนุสฺสภูโต กาลงฺกเรยฺย. ตสฺมึเยว กาลงฺกเต ตถาคตํ อุปสงฺกมิตฺวา เอตมตฺถํ ปุจฺฉิสฺสถ, วิเหสา เหสา, อานนฺท, ตถาคตสฺส. ตสฺมาติหานนฺท, ธมฺมาทาสํ นาม ธมฺมปริยายํ เทเสสฺสามิ, เยน สมนฺนาคโต อริยสาวโก อากงฺขมาโน อตฺตนาว อตฺตานํ พฺยากเรยฺย – ‘ขีณนิรโยมฺหิ ขีณติรจฺฉานโยนิ ขีณเปตฺติวิสโย ขีณาปายทุคฺคติวินิปาโต, โสตาปนฺโนหมสฺมิ อวินิปาตธมฺโม นิยโต สมฺโพธิปรายโณ’ติ. १५८. 'आनंदा, मनुष्य जन्माला आलेल्याने मृत्यू पावणे यात काही आश्चर्य नाही. परंतु, प्रत्येक वेळी कोणी मृत्यू पावल्यावर तुम्ही तथागतांकडे येऊन याविषयी विचारणे, हे तथागतांसाठी केवळ त्रासाचे कारण ठरते. म्हणून, आनंदा, मी तुम्हाला 'धम्मादास' (धम्माचा आरसा) नावाचा धम्मपर्याय शिकवतो, ज्याने युक्त असलेला आर्यश्रावक इच्छेनुसार स्वतःच स्वतःबद्दल असे घोषित करू शकेल – 'माझा नरकवास संपला आहे, तिर्यक योनी संपली आहे, प्रेतलोक संपला आहे, अपाय, दुर्गती आणि अधोगती संपली आहे; मी सोतापन्न झालो आहे, अपाय गतीला न जाणारा, निश्चित आणि संबोधीपरायण झालो आहे.' ๑๕๙. ‘‘กตโม จ โส, อานนฺท, ธมฺมาทาโส ธมฺมปริยาโย, เยน สมนฺนาคโต อริยสาวโก อากงฺขมาโน อตฺตนาว อตฺตานํ พฺยากเรยฺย – ‘ขีณนิรโยมฺหิ ขีณติรจฺฉานโยนิ ขีณเปตฺติวิสโย ขีณาปายทุคฺคติวินิปาโต, โสตาปนฺโนหมสฺมิ อวินิปาตธมฺโม นิยโต สมฺโพธิปรายโณ’ติ? १५९. 'आणि आनंदा, तो धम्मादास धम्मपर्याय कोणता आहे, ज्याने युक्त असलेला आर्यश्रावक इच्छेनुसार स्वतःच स्वतःबद्दल असे घोषित करू शकेल – 'माझा नरकवास संपला आहे, तिर्यक योनी संपली आहे, प्रेतलोक संपला आहे, अपाय, दुर्गती आणि अधोगती संपली आहे; मी सोतापन्न झालो आहे, अपाय गतीला न जाणारा, निश्चित आणि संबोधीपरायण झालो आहे'?' ‘‘อิธานนฺท[Pg.80], อริยสาวโก พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคโต โหติ – ‘อิติปิ โส ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน สุคโต โลกวิทู อนุตฺตโร ปุริสทมฺมสารถิ สตฺถา เทวมนุสฺสานํ พุทฺโธ ภควา’ติ. 'येथे, आनंदा, आर्यश्रावक बुद्धांवर अचल श्रद्धेने युक्त असतो – 'ते भगवान अर्हत, सम्यक्संबुद्ध, विद्याचरणसंपन्न, सुगत, lokavidū (विश्वाचे ज्ञाते), अनुत्तर पुरुषदम्यसारथी, देव आणि मानवांचे शास्ता, बुद्ध आणि भगवंत आहेत.'' ‘‘ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคโต โหติ – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม สนฺทิฏฺฐิโก อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหี’ติ. 'तो धम्मावर अचल श्रद्धेने युक्त असतो – 'भगवंतांद्वारे धम्म सुविख्यात आहे, तो प्रत्यक्ष पाहण्याजोगा, तात्काळ फळ देणारा, 'ये आणि पाहा' असे म्हणण्यास योग्य, स्वतःमध्ये धारण करण्यास योग्य आणि विद्वानांनी आपापल्या परीने जाणून घेण्याजोगा आहे.'' ‘‘สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคโต โหติ – ‘สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, อุชุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, ญายปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ, สามีจิปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ ยทิทํ จตฺตาริ ปุริสยุคานิ อฏฺฐ ปุริสปุคฺคลา, เอส ภควโต สาวกสงฺโฆ อาหุเนยฺโย ปาหุเนยฺโย ทกฺขิเณยฺโย อญฺชลิกรณีโย อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสา’ติ. 'तो संघावर अचल श्रद्धेने युक्त असतो – 'भगवंतांचा श्रावकसंघ चांगल्या मार्गाने चालणारा (सुप्रतिपन्न) आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ सरळ मार्गाने चालणारा (ऋजुप्रतिपन्न) आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ न्यायाच्या मार्गाने चालणारा (न्यायप्रतिपन्न) आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ योग्य मार्गाने चालणारा (सामीचीप्रतिपन्न) आहे. म्हणजेच हे जे चार पुरुषयुग आणि आठ पुरुषपुद्गल आहेत, हा भगवंतांचा श्रावकसंघ आहुती स्वीकारण्यास योग्य, पाहुणचारास योग्य, दानास योग्य, हात जोडून अभिवादन करण्यास योग्य आणि जगातील सर्वश्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र आहे.'' ‘‘อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคโต โหติ อขณฺเฑหิ อจฺฉิทฺเทหิ อสพเลหิ อกมฺมาเสหิ ภุชิสฺเสหิ วิญฺญูปสตฺเถหิ อปรามฏฺเฐหิ สมาธิสํวตฺตนิเกหิ. तो आर्यांना प्रिय असलेल्या, अखंडित, छिद्ररहित, डाग नसलेल्या, निष्कलंक, (तृष्णेच्या दास्यत्वातून) मुक्त करणाऱ्या, विद्वानांनी प्रशंसिलेल्या, (तृष्णा व दृष्टी यांनी) अपरामृष्ट (स्पर्श न केलेल्या) आणि समाधीला पोषक असणाऱ्या शीलांनी युक्त असतो. ‘‘อยํ โข โส, อานนฺท, ธมฺมาทาโส ธมฺมปริยาโย, เยน สมนฺนาคโต อริยสาวโก อากงฺขมาโน อตฺตนาว อตฺตานํ พฺยากเรยฺย – ‘ขีณนิรโยมฺหิ ขีณติรจฺฉานโยนิ ขีณเปตฺติวิสโย ขีณาปายทุคฺคติวินิปาโต, โสตาปนฺโนหมสฺมิ อวินิปาตธมฺโม นิยโต สมฺโพธิปรายโณ’’’ติ. “आनंदा, हाच तो ‘धम्मरूपी दर्पण’ (धम्मपर्याय) आहे, ज्याने युक्त असलेला आर्यश्रावक, जर त्याची इच्छा असेल तर, स्वतःच स्वतःविषयी असे घोषित करू शकतो – ‘माझा नरक नष्ट झाला आहे, तिर्यक योनी नष्ट झाली आहे, प्रेत योनी नष्ट झाली आहे, अपाय, दुर्गती आणि विनिपात (पतन) नष्ट झाले आहेत. मी सोतापन्न (स्रोतआपन्न) झालो आहे, दुर्गतीला न जाण्याचा माझा स्वभाव आहे, मी नियत (निश्चित) आहे आणि संबोधीकडे (पूर्ण ज्ञानाकडे) जाणारा आहे.’” ตตฺรปิ สุทํ ภควา นาติเก วิหรนฺโต คิญฺชกาวสเถ เอตเทว พหุลํ ภิกฺขูนํ ธมฺมึ กถํ กโรติ – तेथे नातिका येथे विटांच्या विहारात (गिंजकावसथ) राहत असताना सुद्धा भगवान भिक्खूंना वारंवार हाच धम्मसंवाद देत असत – ‘‘อิติ สีลํ อิติ สมาธิ อิติ ปญฺญา. สีลปริภาวิโต สมาธิ มหปฺผโล โหติ มหานิสํโส. สมาธิปริภาวิตา ปญฺญา มหปฺผลา โหติ มหานิสํสา. ปญฺญาปริภาวิตํ จิตฺตํ สมฺมเทว อาสเวหิ วิมุจฺจติ, เสยฺยถิทํ – กามาสวา, ภวาสวา, อวิชฺชาสวา’’ติ. “असे शील आहे, अशी समाधी आहे, अशी प्रज्ञा आहे. शीलाने परिभावित (सुसंस्कृत) झालेली समाधी महाफळ देणारी आणि महा-अनुशंस (मोठा लाभ) देणारी ठरते. समाधीने परिभावित झालेली प्रज्ञा महाफळ देणारी आणि महा-अनुशंस देणारी ठरते. प्रज्ञेने परिभावित झालेले चित्त आसवांपासून चांगल्या प्रकारे मुक्त होते, जसे की – कामासव (इंद्रियसुखाची आसक्ती), भवासव (अस्तित्वाची आसक्ती) आणि अविद्यासव (अज्ञानाची आसक्ती).” ๑๖๐. อถ [Pg.81] โข ภควา นาติเก ยถาภิรนฺตํ วิหริตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘อายามานนฺท, เยน เวสาลี เตนุปสงฺกมิสฺสามา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. อถ โข ภควา มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ เยน เวสาลี ตทวสริ. ตตฺร สุทํ ภควา เวสาลิยํ วิหรติ อมฺพปาลิวเน. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – १६०. त्यानंतर भगवान नातिका येथे इच्छेनुसार राहिल्यानंतर आयुष्यमान आनंदाला म्हणाले – “चल आनंदा, आपण वेसालीला जाऊया.” “तसेच असो, भंते,” आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांच्या बोलण्याला संमती दिली. त्यानंतर भगवान मोठ्या भिक्खू संघासह वेसालीकडे निघाले आणि तेथे पोहोचले. तेथे वेसालीमध्ये भगवान अंबपालीच्या वनात (अंबपालिवन) राहत होते. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – ‘‘สโต, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ วิหเรยฺย สมฺปชาโน, อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี. กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สโต โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. เวทนาสุ เวทนานุปสฺสี…เป… จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสี…เป… ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สโต โหติ. “भिक्खूंनो, भिक्खूने स्मृतिमान (सजग) आणि संप्रजन्ययुक्त (जागरूक) होऊन विहार करावा, हाच आमचा तुम्हासाठी उपदेश आहे. आणि भिक्खूंनो, भिक्खू कसा स्मृतिमान असतो? येथे, भिक्खूंनो, भिक्खू कायेमध्ये कायानुपश्या (शरीराचे निरीक्षण) करत, आतपी (उद्योगी), संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा (लोभ) आणि दौर्मनस्य (द्वेष) दूर करून विहार करतो. वेदनांमध्ये वेदनानुपश्या करत... चित्तामध्ये चित्तानुपश्या करत... धम्मांमध्ये धम्मानुपश्या करत, आतपी, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा आणि दौर्मनस्य दूर करून विहार करतो. अशा प्रकारे, भिक्खूंनो, भिक्खू स्मृतिमान असतो.” ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺปชาโน โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อภิกฺกนฺเต ปฏิกฺกนฺเต สมฺปชานการี โหติ, อาโลกิเต วิโลกิเต สมฺปชานการี โหติ, สมิญฺชิเต ปสาริเต สมฺปชานการี โหติ, สงฺฆาฏิปตฺตจีวรธารเณ สมฺปชานการี โหติ, อสิเต ปีเต ขายิเต สายิเต สมฺปชานการี โหติ, อุจฺจารปสฺสาวกมฺเม สมฺปชานการี โหติ, คเต ฐิเต นิสินฺเน สุตฺเต ชาคริเต ภาสิเต ตุณฺหีภาเว สมฺปชานการี โหติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺปชาโน โหติ. สโต, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ วิหเรยฺย สมฺปชาโน, อยํ โว อมฺหากํ อนุสาสนี’’ติ. “आणि भिक्खूंनो, भिक्खू कसा संप्रजन्ययुक्त (जागरूक) असतो? येथे, भिक्खूंनो, भिक्खू पुढे जाताना किंवा मागे वळताना संप्रजन्यपूर्वक (पूर्ण जागरूकतेने) कृती करतो; समोर पाहताना किंवा आजूबाजूला पाहताना संप्रजन्यपूर्वक कृती करतो; हात-पाय आखडताना किंवा पसरताना संप्रजन्यपूर्वक कृती करतो; संघात (दुप्पट वस्त्र), पात्र आणि चीवर धारण करताना संप्रजन्यपूर्वक कृती करतो; खाताना, पिताना, चघळताना किंवा चव घेताना संप्रजन्यपूर्वक कृती करतो; मलमूत्र विसर्जन करताना संप्रजन्यपूर्वक कृती करतो; चालताना, उभे असताना, बसलेले असताना, झोपताना, जागत असताना, बोलताना किंवा मौन बाळगताना संप्रजन्यपूर्वक कृती करतो. अशा प्रकारे, भिक्खूंनो, भिक्खू संप्रजन्ययुक्त असतो. भिक्खूंनो, भिक्खूने स्मृतिमान आणि संप्रजन्ययुक्त होऊन विहार करावा, हाच आमचा तुम्हासाठी उपदेश आहे.” อมฺพปาลีคณิกา अंबपाली गणिका ๑๖๑. อสฺโสสิ โข อมฺพปาลี คณิกา – ‘‘ภควา กิร เวสาลึ อนุปฺปตฺโต เวสาลิยํ วิหรติ มยฺหํ อมฺพวเน’’ติ. อถ โข อมฺพปาลี คณิกา ภทฺทานิ ภทฺทานิ ยานานิ โยชาเปตฺวา ภทฺทํ ภทฺทํ ยานํ อภิรุหิตฺวา ภทฺเทหิ ภทฺเทหิ ยาเนหิ เวสาลิยา นิยฺยาสิ. เยน สโก อาราโม เตน ปายาสิ. ยาวติกา ยานสฺส ภูมิ, ยาเนน คนฺตฺวา, ยานา ปจฺโจโรหิตฺวา ปตฺติกาว เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ [Pg.82] นิสินฺนํ โข อมฺพปาลึ คณิกํ ภควา ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสสิ สมาทเปสิ สมุตฺเตเชสิ สมฺปหํเสสิ. อถ โข อมฺพปาลี คณิกา ภควตา ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺสิตา สมาทปิตา สมุตฺเตชิตา สมฺปหํสิตา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อธิวาเสตุ เม, ภนฺเต, ภควา สฺวาตนาย ภตฺตํ สทฺธึ ภิกฺขุสงฺเฆนา’’ติ. อธิวาเสสิ ภควา ตุณฺหีภาเวน. อถ โข อมฺพปาลี คณิกา ภควโต อธิวาสนํ วิทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. १६१. अंबपाली गणिकेने ऐकले की, “भगवान वेसालीला आले असून वेसालीमध्ये माझ्याच आम्रवनात (अंबवनात) राहत आहेत.” त्यानंतर अंबपाली गणिकेने उत्तम उत्तम रथ तयार करवून, एका उत्तम रथावर आरूढ होऊन, इतर उत्तम रथांसह वेसालीहून निघाली. जिथे तिचे स्वतःचे उद्यान होते, तिकडे ती गेली. जिथपर्यंत रथाने जाणे शक्य होते, तिथपर्यंत रथाने जाऊन, रथातून उतरून ती पायीच भगवंताकडे गेली. तेथे जाऊन तिने भगवंतांना अभिवादन केले आणि ती एका बाजूला बसली. एका बाजूला बसलेल्या अंबपाली गणिकेला भगवंतांनी धम्मचर्चेने उपदेश केला, प्रेरित केले, उत्साहित केले आणि आनंदित केले. भगवंतांच्या धम्मचर्चेने उपदेशित, प्रेरित, उत्साहित आणि आनंदित झालेल्या अंबपाली गणिकेने भगवंतांना म्हटले – “भंते, भगवंतांनी भिक्खू संघासह उद्यासाठी माझे भोजन याचक म्हणून स्वीकारावे.” भगवंतांनी मौन राहून संमती दिली. त्यानंतर अंबपाली गणिकेने भगवंतांची संमती जाणून, आसनावरून उठून, भगवंतांना अभिवादन करून, प्रदक्षिणा घालून ती निघून गेली. อสฺโสสุํ โข เวสาลิกา ลิจฺฉวี – ‘‘ภควา กิร เวสาลึ อนุปฺปตฺโต เวสาลิยํ วิหรติ อมฺพปาลิวเน’’ติ. อถ โข เต ลิจฺฉวี ภทฺทานิ ภทฺทานิ ยานานิ โยชาเปตฺวา ภทฺทํ ภทฺทํ ยานํ อภิรุหิตฺวา ภทฺเทหิ ภทฺเทหิ ยาเนหิ เวสาลิยา นิยฺยึสุ. ตตฺร เอกจฺเจ ลิจฺฉวี นีลา โหนฺติ นีลวณฺณา นีลวตฺถา นีลาลงฺการา, เอกจฺเจ ลิจฺฉวี ปีตา โหนฺติ ปีตวณฺณา ปีตวตฺถา ปีตาลงฺการา, เอกจฺเจ ลิจฺฉวี โลหิตา โหนฺติ โลหิตวณฺณา โลหิตวตฺถา โลหิตาลงฺการา, เอกจฺเจ ลิจฺฉวี โอทาตา โหนฺติ โอทาตวณฺณา โอทาตวตฺถา โอทาตาลงฺการา. อถ โข อมฺพปาลี คณิกา ทหรานํ ทหรานํ ลิจฺฉวีนํ อกฺเขน อกฺขํ จกฺเกน จกฺกํ ยุเคน ยุคํ ปฏิวฏฺเฏสิ. อถ โข เต ลิจฺฉวี อมฺพปาลึ คณิกํ เอตทโวจุํ – ‘‘กึ, เช อมฺพปาลิ, ทหรานํ ทหรานํ ลิจฺฉวีนํ อกฺเขน อกฺขํ จกฺเกน จกฺกํ ยุเคน ยุคํ ปฏิวฏฺเฏสี’’ติ? ‘‘ตถา หิ ปน เม, อยฺยปุตฺตา, ภควา นิมนฺติโต สฺวาตนาย ภตฺตํ สทฺธึ ภิกฺขุสงฺเฆนา’’ติ. ‘‘เทหิ, เช อมฺพปาลิ, เอตํ ภตฺตํ สตสหสฺเสนา’’ติ. ‘‘สเจปิ เม, อยฺยปุตฺตา, เวสาลึ สาหารํ ทสฺสถ, เอวมหํ ตํ ภตฺตํ น ทสฺสามี’’ติ. อถ โข เต ลิจฺฉวี องฺคุลึ โผเฏสุํ – ‘‘ชิตมฺห วต โภ อมฺพกาย, ชิตมฺห วต โภ อมฺพกายา’’ติ. वेसालीच्या लिच्छवी राजांनी ऐकले की, “भगवान वेसालीला आले असून वेसालीमध्ये अंबपालीच्या वनात राहत आहेत.” त्यानंतर त्या लिच्छवी राजांनी उत्तम उत्तम रथ तयार करवून, एका उत्तम रथावर आरूढ होऊन, इतर उत्तम रथांसह वेसालीहून निघाले. त्यांच्यामध्ये काही लिच्छवी राजे निळे होते – निळ्या रंगाचे, निळी वस्त्रे परिधान केलेले आणि निळे अलंकार घातलेले; काही पिवळे होते – पिवळ्या रंगाचे, पिवळी वस्त्रे परिधान केलेले आणि पिवळे अलंकार घातलेले; काही लाल होते – लाल रंगाचे, लाल वस्त्रे परिधान केलेले आणि लाल अलंकार घातलेले; काही पांढरे होते – पांढऱ्या रंगाचे, पांढरी वस्त्रे परिधान केलेले आणि पांढरे अलंकार घातलेले. त्यानंतर अंबपाली गणिकेने तरुण लिच्छवी राजांच्या रथांना आपल्या रथाचा आसाला आस, चाकाला चाक आणि जुवाला जू घासून (धडक देऊन) आपला रथ पुढे नेला. तेव्हा ते लिच्छवी राजे अंबपाली गणिकेला म्हणाले – “अगं अंबपाली, तू तरुण लिच्छवी राजांच्या रथांना आसाला आस, चाकाला चाक आणि जुवाला जू घासून का नेलेस?” “कारण, आर्यपुत्रांनो, मी भगवंतांना भिक्खू संघासह उद्याच्या भोजनासाठी निमंत्रित केले आहे.” “अगं अंबपाली, हे भोजन आम्हाला एक लाख (नाण्यांच्या) बदल्यात दे.” “आर्यपुत्रांनो, जरी तुम्ही मला वेसाली तिच्या सर्व उत्पन्नासह (महसुलासह) दिलीत, तरीही मी हे भोजन तुम्हाला देणार नाही.” त्यानंतर त्या लिच्छवी राजांनी बोटे चटकावली (चुटक्या वाजवल्या) आणि म्हणाले – “अरेरे मित्रांनो, आपल्याला एका स्त्रीने (अंबकेने) हरवले! अरेरे मित्रांनो, आपल्याला एका स्त्रीने हरवले!” อถ โข เต ลิจฺฉวี เยน อมฺพปาลิวนํ เตน ปายึสุ. อทฺทสา โข ภควา เต ลิจฺฉวี ทูรโตว อาคจฺฉนฺเต. ทิสฺวาน ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘เยสํ [Pg.83], ภิกฺขเว, ภิกฺขูนํ เทวา ตาวตึสา อทิฏฺฐปุพฺพา, โอโลเกถ, ภิกฺขเว, ลิจฺฉวิปริสํ; อปโลเกถ, ภิกฺขเว, ลิจฺฉวิปริสํ; อุปสํหรถ, ภิกฺขเว, ลิจฺฉวิปริสํ – ตาวตึสสทิส’’นฺติ. อถ โข เต ลิจฺฉวี ยาวติกา ยานสฺส ภูมิ, ยาเนน คนฺตฺวา, ยานา ปจฺโจโรหิตฺวา ปตฺติกาว เยน ภควา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. เอกมนฺตํ นิสินฺเน โข เต ลิจฺฉวี ภควา ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสสิ สมาทเปสิ สมุตฺเตเชสิ สมฺปหํเสสิ. อถ โข เต ลิจฺฉวี ภควตา ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺสิตา สมาทปิตา สมุตฺเตชิตา สมฺปหํสิตา ภควนฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘อธิวาเสตุ โน, ภนฺเต, ภควา สฺวาตนาย ภตฺตํ สทฺธึ ภิกฺขุสงฺเฆนา’’ติ. อถ โข ภควา เต ลิจฺฉวี เอตทโวจ – ‘‘อธิวุตฺถํ โข เม, ลิจฺฉวี, สฺวาตนาย อมฺพปาลิยา คณิกาย ภตฺต’’นฺติ. อถ โข เต ลิจฺฉวี องฺคุลึ โผเฏสุํ – ‘‘ชิตมฺห วต โภ อมฺพกาย, ชิตมฺห วต โภ อมฺพกายา’’ติ. อถ โข เต ลิจฺฉวี ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกมึสุ. त्यानंतर ते लिच्छवी जेथे अंबपाळीचे वन होते, तेथे गेले. भगवंतांनी त्या लिच्छवींना दुरूनच येत असताना पाहिले. त्यांना पाहून त्यांनी भिक्खूंना संबोधित केले – 'भिक्खूंनो, ज्या भिक्खूंनी तावतिंस (त्रायस्त्रिंश) देव पाहिलेले नाहीत, त्यांनी, भिक्खूंनो, या लिच्छवींच्या परिषदेकडे पाहावे; भिक्खूंनो, लिच्छवींच्या परिषदेचे वारंवार निरीक्षण करावे; भिक्खूंनो, लिच्छवींच्या परिषदेची तुलना तावतिंस देवांच्या परिषदेशी करावी.' त्यानंतर ते लिच्छवी वाहनाने जाण्यायोग्य रस्ता असेपर्यंत वाहनाने गेले, मग वाहनातून उतरून पायीच जेथे भगवंत होते तेथे आले. जवळ येऊन त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या त्या लिच्छवींना भगवंतांनी धम्मचर्चेने संदर्शित (प्रबोधित) केले, समादपित (धम्मात प्रवृत्त) केले, समुत्तेजित (उत्साहित) केले आणि संप्रहंसित (आनंदित) केले. त्यानंतर भगवंतांच्या धम्मचर्चेने संदर्शित, समादपित, समुत्तेजित आणि संप्रहंसित झालेल्या त्या लिच्छवींनी भगवंतांना असे म्हटले – 'भंते, भगवंतांनी उद्यासाठी भिक्खू संघासह आमचे भोजन स्वीकारण्याची कृपा करावी.' त्यावर भगवंत त्या लिच्छवींना म्हणाले – 'लिच्छवींनो, मी उद्यासाठी अंबपाळी गणिकेचे भोजन आधीच स्वीकारले आहे.' तेव्हा त्या लिच्छवींनी बोटे मोडली आणि म्हणाले – 'अरेरे! एका स्त्रीने आपल्याला जिंकले (मात दिली), अरेरे! एका स्त्रीने आपल्याला मात दिली.' त्यानंतर ते लिच्छवी भगवंतांच्या भाषणाचे अभिनंदन व अनुमोदन करून, आपापल्या आसनावरून उठले आणि भगवंतांना अभिवादन करून, प्रदक्षिणा घालून निघून गेले. ๑๖๒. อถ โข อมฺพปาลี คณิกา ตสฺสา รตฺติยา อจฺจเยน สเก อาราเม ปณีตํ ขาทนียํ โภชนียํ ปฏิยาทาเปตฺวา ภควโต กาลํ อาโรจาเปสิ – ‘‘กาโล, ภนฺเต, นิฏฺฐิตํ ภตฺต’’นฺติ. อถ โข ภควา ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สทฺธึ ภิกฺขุสงฺเฆน เยน อมฺพปาลิยา คณิกาย นิเวสนํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. อถ โข อมฺพปาลี คณิกา พุทฺธปฺปมุขํ ภิกฺขุสงฺฆํ ปณีเตน ขาทนีเยน โภชนีเยน สหตฺถา สนฺตปฺเปสิ สมฺปวาเรสิ. อถ โข อมฺพปาลี คณิกา ภควนฺตํ ภุตฺตาวึ โอนีตปตฺตปาณึ อญฺญตรํ นีจํ อาสนํ คเหตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนา โข อมฺพปาลี คณิกา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิมาหํ, ภนฺเต, อารามํ พุทฺธปฺปมุขสฺส ภิกฺขุสงฺฆสฺส ทมฺมี’’ติ. ปฏิคฺคเหสิ ภควา อารามํ. อถ โข ภควา อมฺพปาลึ คณิกํ ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสตฺวา สมาทเปตฺวา สมุตฺเตเชตฺวา สมฺปหํเสตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกามิ. ตตฺรปิ สุทํ ภควา เวสาลิยํ วิหรนฺโต อมฺพปาลิวเน เอตเทว พหุลํ ภิกฺขูนํ ธมฺมึ กถํ กโรติ [Pg.84] – ‘‘อิติ สีลํ, อิติ สมาธิ, อิติ ปญฺญา. สีลปริภาวิโต สมาธิ มหปฺผโล โหติ มหานิสํโส. สมาธิปริภาวิตา ปญฺญา มหปฺผลา โหติ มหานิสํสา. ปญฺญาปริภาวิตํ จิตฺตํ สมฺมเทว อาสเวหิ วิมุจฺจติ, เสยฺยถิทํ – กามาสวา, ภวาสวา, อวิชฺชาสวา’’ติ. १६२. त्यानंतर ती रात्र संपल्यावर, अंबपाळी गणिकेने आपल्या आरामात (उद्यानात) उत्तम दर्जाचे खाद्य व भोज्य पदार्थ तयार करवून भगवंतांना वेळ झाल्याचा निरोप पाठवला – 'भंते, वेळ झाली आहे, भोजन तयार आहे.' त्यानंतर भगवंतांनी सकाळी (चीवर) परिधान करून, पात्र व चीवर घेऊन भिक्खू संघासह जेथे अंबपाळी गणिकेचे निवासस्थान होते, तेथे प्रस्थान केले. तेथे पोहोचून ते मांडलेल्या आसनावर बसले. तेव्हा अंबपाळी गणिकेने बुद्धप्रमुख भिक्खू संघाला स्वतःच्या हाताने उत्तम खाद्य व भोज्य पदार्थांनी तृप्त केले आणि पुरेसे होईपर्यंत वाढले. त्यानंतर, भगवंतांनी भोजन करून पात्रातून हात काढून घेतल्याचे पाहून, अंबपाळी गणिकेने एक लहान आसन घेतले आणि ती एका बाजूला बसली. एका बाजूला बसलेल्या अंबपाळी गणिकेने भगवंतांना असे म्हटले – 'भंते, मी हा आराम बुद्धप्रमुख भिक्खू संघाला दान देत आहे.' भगवंतांनी त्या आरामाचा स्वीकार केला. त्यानंतर भगवंतांनी अंबपाळी गणिकेला धम्मचर्चेने संदर्शित, समादपित, समुत्तेजित आणि संप्रहंसित करून, आसनावरून उठून तेथून प्रस्थान केले. तेथे वैशालीमध्ये राहत असताना भगवंत अंबपाळीच्या वनात भिक्खूंना वारंवार हाच धम्म उपदेश देत असत – 'असे शील आहे, असा समाधी आहे, अशी प्रज्ञा आहे. शीलाने परिभावित (दृढ झालेला) समाधी महाफळ देणारा आणि महा-अनुशंस (मोठा लाभ देणारा) ठरतो. समाधीने परिभावित प्रज्ञा महाफळ देणारी आणि महा-अनुशंस ठरते. प्रज्ञेने परिभावित झालेले चित्त आसवांपासून पूर्णपणे मुक्त होते, जसे की – कामासव, भवासव आणि अविद्यासव.' เวฬุวคามวสฺสูปคมนํ वेळुवगामामध्ये वर्षावास स्वीकारणे. ๑๖๓. อถ โข ภควา อมฺพปาลิวเน ยถาภิรนฺตํ วิหริตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘อายามานนฺท, เยน เวฬุวคามโก เตนุปสงฺกมิสฺสามา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. อถ โข ภควา มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ เยน เวฬุวคามโก ตทวสริ. ตตฺร สุทํ ภควา เวฬุวคามเก วิหรติ. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘เอถ ตุมฺเห, ภิกฺขเว, สมนฺตา เวสาลึ ยถามิตฺตํ ยถาสนฺทิฏฺฐํ ยถาสมฺภตฺตํ วสฺสํ อุเปถ. อหํ ปน อิเธว เวฬุวคามเก วสฺสํ อุปคจฺฉามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข เต ภิกฺขู ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา สมนฺตา เวสาลึ ยถามิตฺตํ ยถาสนฺทิฏฺฐํ ยถาสมฺภตฺตํ วสฺสํ อุปคจฺฉึสุ. ภควา ปน ตตฺเถว เวฬุวคามเก วสฺสํ อุปคจฺฉิ. १६३. त्यानंतर भगवंत अंबपाळीच्या वनात इच्छेनुसार राहून आयुष्यमान आनंदाला म्हणाले – 'चल आनंदा, आपण वेळुवगामाकडे जाऊ या.' 'तसेच असो, भंते,' असे म्हणून आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला. त्यानंतर भगवंत मोठ्या भिक्खू संघासह वेळुवगामाकडे गेले. तेथे भगवंत वेळुवगामामध्ये राहू लागले. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – 'भिक्खूंनो, तुम्ही सर्व वैशालीच्या आसपास आपापल्या मित्रांच्या, परिचितांच्या किंवा स्नेह्यांच्या सोयीनुसार वर्षावास स्वीकारा. मी मात्र येथेच वेळुवगामामध्ये वर्षावास स्वीकारतो.' 'तसेच असो, भंते,' असे म्हणून त्या भिक्खूंनी भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला आणि ते वैशालीच्या आसपास आपापल्या मित्रांच्या, परिचितांच्या किंवा स्नेह्यांच्या सोयीनुसार वर्षावासासाठी गेले. भगवंतांनी मात्र तेथेच वेळुवगामामध्ये वर्षावास स्वीकारला. ๑๖๔. อถ โข ภควโต วสฺสูปคตสฺส ขโร อาพาโธ อุปฺปชฺชิ, พาฬฺหา เวทนา วตฺตนฺติ มารณนฺติกา. ตา สุทํ ภควา สโต สมฺปชาโน อธิวาเสสิ อวิหญฺญมาโน. อถ โข ภควโต เอตทโหสิ – ‘‘น โข เมตํ ปติรูปํ, ยฺวาหํ อนามนฺเตตฺวา อุปฏฺฐาเก อนปโลเกตฺวา ภิกฺขุสงฺฆํ ปรินิพฺพาเยยฺยํ. ยํนูนาหํ อิมํ อาพาธํ วีริเยน ปฏิปณาเมตฺวา ชีวิตสงฺขารํ อธิฏฺฐาย วิหเรยฺย’’นฺติ. อถ โข ภควา ตํ อาพาธํ วีริเยน ปฏิปณาเมตฺวา ชีวิตสงฺขารํ อธิฏฺฐาย วิหาสิ. อถ โข ภควโต โส อาพาโธ ปฏิปสฺสมฺภิ. อถ โข ภควา คิลานา วุฏฺฐิโต อจิรวุฏฺฐิโต เคลญฺญา วิหารา นิกฺขมฺม วิหารปจฺฉายายํ ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ [Pg.85] เอตทโวจ – ‘‘ทิฏฺโฐ เม, ภนฺเต, ภควโต ผาสุ; ทิฏฺฐํ เม, ภนฺเต, ภควโต ขมนียํ, อปิ จ เม, ภนฺเต, มธุรกชาโต วิย กาโย. ทิสาปิ เม น ปกฺขายนฺติ; ธมฺมาปิ มํ น ปฏิภนฺติ ภควโต เคลญฺเญน, อปิ จ เม, ภนฺเต, อโหสิ กาจิเทว อสฺสาสมตฺตา – ‘น ตาว ภควา ปรินิพฺพายิสฺสติ, น ยาว ภควา ภิกฺขุสงฺฆํ อารพฺภ กิญฺจิเทว อุทาหรตี’’’ติ. १६४. त्यानंतर वर्षावास स्वीकारलेल्या भगवंतांना तीव्र आजार जडला आणि मरणांतक अशा अत्यंत वेदना होऊ लागल्या. भगवंतांनी स्मृतिमान आणि जागरूक राहून, क्लेश न पावता त्या वेदना सहन केल्या. तेव्हा भगवंतांच्या मनात असा विचार आला – 'माझ्या उपस्थायकांना (सेवकांना) न सांगता आणि भिक्खू संघाचा निरोप न घेता मी परिनिर्वाण पावावे, हे माझ्यासाठी योग्य नाही. मी माझ्या वीर्याने (प्रयत्नाने) या आजाराला दूर सारून, जीवितसंस्कारांचे अधिष्ठान करून काही काळ राहावे, हेच योग्य होईल.' त्यानंतर भगवंतांनी आपल्या वीर्याने त्या आजाराला दूर सारले आणि जीवितसंस्कारांचे अधिष्ठान करून ते राहिले. तेव्हा भगवंतांचा तो आजार शांत झाला. त्यानंतर आजारातून बरे झाल्यावर, बरे होऊन फार वेळ झाला नसताना, भगवंत विहारातून बाहेर आले आणि विहाराच्या सावलीत मांडलेल्या आसनावर बसले. त्यानंतर आयुष्यमान आनंद जेथे भगवंत होते तेथे आले. जवळ येऊन त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले आयुष्यमान आनंद भगवंतांना म्हणाले – 'भंते, मी भगवंतांना सुखात पाहिले आहे; भंते, मी भगवंतांचे आजार सहन करणे पाहिले आहे. परंतु भंते, भगवंतांच्या आजारपणामुळे माझे शरीर जणू जड व सुन्न झाले होते. मला दिशाही सुचत नव्हत्या आणि धम्मही (स्मृती उपस्थान इत्यादी) माझ्या बुद्धीला सुचत नव्हते. तरीही भंते, माझ्या मनात एकच आशेचा किरण होता की – जोपर्यंत भगवंत भिक्खू संघाला उद्देशून काही शेवटचा उपदेश करत नाहीत, तोपर्यंत भगवंत परिनिर्वाण पावणार नाहीत.' ๑๖๕. ‘‘กึ ปนานนฺท, ภิกฺขุสงฺโฆ มยิ ปจฺจาสีสติ ? เทสิโต, อานนฺท, มยา ธมฺโม อนนฺตรํ อพาหิรํ กริตฺวา. นตฺถานนฺท, ตถาคตสฺส ธมฺเมสุ อาจริยมุฏฺฐิ. ยสฺส นูน, อานนฺท, เอวมสฺส – ‘อหํ ภิกฺขุสงฺฆํ ปริหริสฺสามี’ติ วา ‘มมุทฺเทสิโก ภิกฺขุสงฺโฆ’ติ วา, โส นูน, อานนฺท, ภิกฺขุสงฺฆํ อารพฺภ กิญฺจิเทว อุทาหเรยฺย. ตถาคตสฺส โข, อานนฺท, น เอวํ โหติ – ‘อหํ ภิกฺขุสงฺฆํ ปริหริสฺสามี’ติ วา ‘มมุทฺเทสิโก ภิกฺขุสงฺโฆ’ติ วา. สกึ, อานนฺท, ตถาคโต ภิกฺขุสงฺฆํ อารพฺภ กิญฺจิเทว อุทาหริสฺสติ. อหํ โข ปนานนฺท, เอตรหิ ชิณฺโณ วุทฺโธ มหลฺลโก อทฺธคโต วโยอนุปฺปตฺโต. อาสีติโก เม วโย วตฺตติ. เสยฺยถาปิ, อานนฺท, ชชฺชรสกฏํ เวฐมิสฺสเกน ยาเปติ, เอวเมว โข, อานนฺท, เวฐมิสฺสเกน มญฺเญ ตถาคตสฺส กาโย ยาเปติ. ยสฺมึ, อานนฺท, สมเย ตถาคโต สพฺพนิมิตฺตานํ อมนสิการา เอกจฺจานํ เวทนานํ นิโรธา อนิมิตฺตํ เจโตสมาธึ อุปสมฺปชฺช วิหรติ, ผาสุตโร, อานนฺท, ตสฺมึ สมเย ตถาคตสฺส กาโย โหติ. ตสฺมาติหานนฺท, อตฺตทีปา วิหรถ อตฺตสรณา อนญฺญสรณา, ธมฺมทีปา ธมฺมสรณา อนญฺญสรณา. กถญฺจานนฺท, ภิกฺขุ อตฺตทีโป วิหรติ อตฺตสรโณ อนญฺญสรโณ, ธมฺมทีโป ธมฺมสรโณ อนญฺญสรโณ? อิธานนฺท, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ อตาปี สมฺปชาโน สติมา, วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. เวทนาสุ…เป… จิตฺเต…เป… ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา, วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. เอวํ โข, อานนฺท, ภิกฺขุ อตฺตทีโป วิหรติ อตฺตสรโณ อนญฺญสรโณ, ธมฺมทีโป ธมฺมสรโณ อนญฺญสรโณ[Pg.86]. เย หิ เกจิ, อานนฺท, เอตรหิ วา มม วา อจฺจเยน อตฺตทีปา วิหริสฺสนฺติ อตฺตสรณา อนญฺญสรณา, ธมฺมทีปา ธมฺมสรณา อนญฺญสรณา, ตมตคฺเค เม เต, อานนฺท, ภิกฺขู ภวิสฺสนฺติ เย เกจิ สิกฺขากามา’’ติ. १६५. आनंदा, भिक्खूसंघाला माझ्याकडून आणखी काय अपेक्षा आहे? आनंदा, मी कोणताही भेद (आत किंवा बाहेर) न ठेवता धम्माचा उपदेश केला आहे. आनंदा, तथागतांच्या जवळ धम्माच्या बाबतीत 'आचार्यांची मूठ' (गुप्तता) असे काहीही नाही. आनंदा, ज्याच्या मनात असा विचार असेल की, 'मी भिक्खूसंघाचे नेतृत्व करीन' किंवा 'भिक्खूसंघ माझ्यावर अवलंबून असावा', त्यानेच भिक्खूसंघाविषयी काहीतरी सांगावे. पण आनंदा, तथागतांच्या मनात असा विचार कधीच येत नाही की, 'मी भिक्खूसंघाचे नेतृत्व करीन' किंवा 'भिक्खूसंघ माझ्यावर अवलंबून असावा'. मग तथागत भिक्खूसंघाविषयी काहीतरी का सांगतील? आनंदा, आता मी वृद्ध, जर्जर, वयोवृद्ध, जीवनप्रवासाच्या अंतिम टप्प्यावर पोहोचलेला आहे. माझे वय आता ऐंशी वर्षांचे झाले आहे. आनंदा, ज्याप्रमाणे एखादी जुनी जीर्ण झालेली गाडी बांबू किंवा दोऱ्यांच्या बांधणीने कशीबशी चालते, त्याचप्रमाणे तथागतांचे शरीरही जणू काही बांधणीने (फळसमापत्तीच्या आधाराने) चालत आहे. आनंदा, ज्या वेळी तथागत सर्व बाह्य निमित्तांकडे दुर्लक्ष करून, काही विशिष्ट वेदनांच्या निरोधाने, निमित्तरहित अशा चेतोसमाधीमध्ये विहरतात, त्याच वेळी तथागतांचे शरीर अधिक सुखावह असते. म्हणूनच आनंदा, स्वतःचे दीप (आत्मदीप) व्हा, स्वतःचे शरण व्हा, दुसऱ्या कोणाचेही शरण जाऊ नका; धम्मदीप व्हा, धम्मशरण व्हा, धम्माशिवाय इतर कोणाचेही शरण जाऊ नका. आणि आनंदा, भिक्खू स्वतःचा दीप, स्वतःचे शरण, अनन्यशरण, धम्मदीप, धम्मशरण आणि धम्माशिवाय इतर कोणाचेही शरण न घेता कसा विहरतो? आनंदा, येथे भिक्खू शरीरामध्ये शरीराचे सतत दर्शन घेत (कायानुपस्सना करत), उद्योगी, जागरूक आणि स्मृतिमान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा (लोभ) आणि दोमनस्स (दुःख) दूर करून विहरतो. वेदनांमध्ये... चित्तामध्ये... धम्मांमध्ये धम्मानुपस्सना करत, उद्योगी, जागरूक आणि स्मृतिमान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा आणि दोमनस्स दूर करून विहरतो. अशा प्रकारे, आनंदा, भिक्खू स्वतःचा दीप, स्वतःचे शरण, अनन्यशरण, धम्मदीप, धम्मशरण आणि धम्माशिवाय इतर कोणाचेही शरण न घेता विहरतो. आनंदा, जे कोणी आता किंवा माझ्या पश्चात स्वतःचे दीप, स्वतःचे शरण, अनन्यशरण, धम्मदीप, धम्मशरण आणि धम्माशिवाय इतर कोणाचेही शरण न घेता विहरतील, ते सर्व भिक्खू जे शिक्षेची (सिक्खेची) इच्छा बाळगणारे आहेत, ते माझ्या भिक्खूंमध्ये सर्वश्रेष्ठ पदाला पोहोचतील. ทุติยภาณวาโร. दुसरा भाणवार. นิมิตฺโตภาสกถา निमित्त आणि अवभास (संकेत) यांची कथा ๑๖๖. อถ โข ภควา ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เวสาลึ ปิณฺฑาย ปาวิสิ. เวสาลิยํ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺโต อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘คณฺหาหิ, อานนฺท, นิสีทนํ, เยน จาปาลํ เจติยํ เตนุปสงฺกมิสฺสาม ทิวา วิหารายา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา นิสีทนํ อาทาย ภควนฺตํ ปิฏฺฐิโต ปิฏฺฐิโต อนุพนฺธิ. อถ โข ภควา เยน จาปาลํ เจติยํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. อายสฺมาปิ โข อานนฺโท ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. १६६. त्यानंतर भगवान सकाळी वस्त्र परिधान करून, पात्र आणि चीवर घेऊन वैशालीमध्ये भिक्षेसाठी प्रविष्ट झाले. वैशालीमध्ये भिक्षाटन करून, भोजनोत्तर भिक्षाटनाहून परत आल्यावर त्यांनी आयुष्यमान आनंदाला उद्देशून म्हटले – “आनंदा, आसन (बसायचे कातडे) घे, आपण दुपारच्या विश्रांतीसाठी चापाल चेतियाकडे जाऊ या.” “तसेच असो, भंते,” असे म्हणून आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला आणि आसन घेऊन ते भगवंतांच्या मागे मागे गेले. त्यानंतर भगवान जेथे चापाल चेतिय होते, तेथे गेले; आणि तेथे गेल्यावर मांडलेल्या आसनावर बसले. आयुष्यमान आनंदही भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. ๑๖๗. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ ภควา เอตทโวจ – ‘‘รมณียา, อานนฺท, เวสาลี, รมณียํ อุเทนํ เจติยํ, รมณียํ โคตมกํ เจติยํ, รมณียํ สตฺตมฺพํ เจติยํ, รมณียํ พหุปุตฺตํ เจติยํ, รมณียํ สารนฺททํ เจติยํ, รมณียํ จาปาลํ เจติยํ. ยสฺส กสฺสจิ, อานนฺท, จตฺตาโร อิทฺธิปาทา ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา, โส อากงฺขมาโน กปฺปํ วา ติฏฺเฐยฺย กปฺปาวเสสํ วา. ตถาคตสฺส โข, อานนฺท, จตฺตาโร อิทฺธิปาทา ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา, โส อากงฺขมาโน, อานนฺท, ตถาคโต กปฺปํ วา ติฏฺเฐยฺย กปฺปาวเสสํ วา’’ติ. เอวมฺปิ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควตา โอฬาริเก นิมิตฺเต กยิรมาเน โอฬาริเก โอภาเส กยิรมาเน นาสกฺขิ ปฏิวิชฺฌิตุํ; น ภควนฺตํ ยาจิ – ‘‘ติฏฺฐตุ, ภนฺเต, ภควา กปฺปํ, ติฏฺฐตุ สุคโต กปฺปํ พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสาน’’นฺติ, ยถา ตํ มาเรน ปริยุฏฺฐิตจิตฺโต. ทุติยมฺปิ [Pg.87] โข ภควา…เป… ตติยมฺปิ โข ภควา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘รมณียา, อานนฺท, เวสาลี, รมณียํ อุเทนํ เจติยํ, รมณียํ โคตมกํ เจติยํ, รมณียํ สตฺตมฺพํ เจติยํ, รมณียํ พหุปุตฺตํ เจติยํ, รมณียํ สารนฺททํ เจติยํ, รมณียํ จาปาลํ เจติยํ. ยสฺส กสฺสจิ, อานนฺท, จตฺตาโร อิทฺธิปาทา ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา, โส อากงฺขมาโน กปฺปํ วา ติฏฺเฐยฺย กปฺปาวเสสํ วา. ตถาคตสฺส โข, อานนฺท, จตฺตาโร อิทฺธิปาทา ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา, โส อากงฺขมาโน, อานนฺท, ตถาคโต กปฺปํ วา ติฏฺเฐยฺย กปฺปาวเสสํ วา’’ติ. เอวมฺปิ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควตา โอฬาริเก นิมิตฺเต กยิรมาเน โอฬาริเก โอภาเส กยิรมาเน นาสกฺขิ ปฏิวิชฺฌิตุํ; น ภควนฺตํ ยาจิ – ‘‘ติฏฺฐตุ, ภนฺเต, ภควา กปฺปํ, ติฏฺฐตุ สุคโต กปฺปํ พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสาน’’นฺติ, ยถา ตํ มาเรน ปริยุฏฺฐิตจิตฺโต. อถ โข ภควา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘คจฺฉ ตฺวํ, อานนฺท, ยสฺสทานิ กาลํ มญฺญสี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา อวิทูเร อญฺญตรสฺมึ รุกฺขมูเล นิสีทิ. १६७. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान आनंदाला भगवान म्हणाले – “आनंदा, वैशाली रमणीय आहे; उदेन चेतिय रमणीय आहे, गोतमक चेतिय रमणीय आहे, सत्तम्ब चेतिय रमणीय आहे, बहुपुत्त चेतिय रमणीय आहे, सारंदद चेतिय रमणीय आहे, चापाल चेतिय रमणीय आहे. आनंदा, ज्या कोणा व्यक्तीने चार इद्धिपाद विकसित केले आहेत, त्यांचा वारंवार सराव केला आहे, त्यांना आपले वाहन बनवले आहे, त्यांना आपला आधार बनवले आहे, त्यांचे अनुष्ठान केले आहे, त्यांचा परिचय वाढवला आहे आणि त्यांचा चांगला आरंभ केला आहे; ती व्यक्ती इच्छेनुसार संपूर्ण कल्पभर किंवा कल्पाच्या उर्वरित काळापर्यंत जिवंत राहू शकते. आनंदा, तथागतांनी चार इद्धिपाद विकसित केले आहेत, त्यांचा वारंवार सराव केला आहे, त्यांना आपले वाहन बनवले आहे, त्यांना आपला आधार बनवले आहे, त्यांचे अनुष्ठान केले आहे, त्यांचा परिचय वाढवला आहे आणि त्यांचा चांगला आरंभ केला आहे. म्हणून आनंदा, तथागत इच्छेनुसार संपूर्ण कल्पभर किंवा कल्पाच्या उर्वरित काळापर्यंत जिवंत राहू शकतात.” भगवंतांनी इतका स्पष्ट संकेत आणि स्पष्ट प्रकाश दाखवूनही आयुष्यमान आनंद ते समजून घेण्यास असमर्थ ठरले; आणि त्यांनी भगवंतांना अशी विनंती केली नाही की – “भंते, बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेसाठी, देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी भगवान कल्पभर जिवंत राहोत, सुगत कल्पभर जिवंत राहोत.” कारण त्यांचे चित्त जणू काही माराने ग्रासले होते. दुसऱ्यांदाही भगवंतांनी... तसेच तिसऱ्यांदाही भगवंतांनी आयुष्यमान आनंदाला उद्देशून म्हटले – “आनंदा, वैशाली रमणीय आहे; उदेन चेतिय रमणीय आहे, गोतमक चेतिय रमणीय आहे, सत्तम्ब चेतिय रमणीय आहे, बहुपुत्त चेतिय रमणीय आहे, सारंदद चेतिय रमणीय आहे, चापाल चेतिय रमणीय आहे. आनंदा, ज्या कोणा व्यक्तीने चार इद्धिपाद विकसित केले आहेत, त्यांचा वारंवार सराव केला आहे, त्यांना आपले वाहन बनवले आहे, त्यांना आपला आधार बनवले आहे, त्यांचे अनुष्ठान केले आहे, त्यांचा परिचय वाढवला आहे आणि त्यांचा चांगला आरंभ केला आहे; ती व्यक्ती इच्छेनुसार संपूर्ण कल्पभर किंवा कल्पाच्या उर्वरित काळापर्यंत जिवंत राहू शकते. आनंदा, तथागतांनी चार इद्धिपाद विकसित केले आहेत, त्यांचा वारंवार सराव केला आहे, त्यांना आपले वाहन बनवले आहे, त्यांना आपला आधार बनवले आहे, त्यांचे अनुष्ठान केले आहे, त्यांचा परिचय वाढवला आहे आणि त्यांचा चांगला आरंभ केला आहे. म्हणून आनंदा, तथागत इच्छेनुसार संपूर्ण कल्पभर किंवा कल्पाच्या उर्वरित काळापर्यंत जिवंत राहू शकतात.” भगवंतांनी इतका स्पष्ट संकेत आणि स्पष्ट प्रकाश दाखवूनही आयुष्यमान आनंद ते समजून घेण्यास असमर्थ ठरले; आणि त्यांनी भगवंतांना अशी विनंती केली नाही की – “भंते, बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेसाठी, देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी भगवान कल्पभर जिवंत राहोत, सुगत कल्पभर जिवंत राहोत.” कारण त्यांचे चित्त जणू काही माराने ग्रासले होते. त्यानंतर भगवान आयुष्यमान आनंदाला म्हणाले – “आनंदा, आता तू जा, तुला जी वेळ योग्य वाटेल ते कर.” “तसेच असो, भंते,” असे म्हणून आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला, ते आसनावरून उठले, भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि जवळच एका झाडाच्या मुळाशी जाऊन बसले. มารยาจนกถา माराच्या याचनेची कथा ๑๖๘. อถ โข มาโร ปาปิมา อจิรปกฺกนฺเต อายสฺมนฺเต อานนฺเท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข มาโร ปาปิมา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ปรินิพฺพาตุทานิ, ภนฺเต, ภควา, ปรินิพฺพาตุ สุคโต, ปรินิพฺพานกาโล ทานิ, ภนฺเต, ภควโต. ภาสิตา โข ปเนสา, ภนฺเต, ภควตา วาจา – ‘น ตาวาหํ, ปาปิม, ปรินิพฺพายิสฺสามิ, ยาว เม ภิกฺขู น สาวกา ภวิสฺสนฺติ วิยตฺตา วินีตา วิสารทา พหุสฺสุตา ธมฺมธรา ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺนา สามีจิปฺปฏิปนฺนา อนุธมฺมจาริโน, สกํ อาจริยกํ อุคฺคเหตฺวา อาจิกฺขิสฺสนฺติ เทเสสฺสนฺติ ปญฺญเปสฺสนฺติ ปฏฺฐเปสฺสนฺติ วิวริสฺสนฺติ วิภชิสฺสนฺติ อุตฺตานี กริสฺสนฺติ, อุปฺปนฺนํ ปรปฺปวาทํ สหธมฺเมน สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา สปฺปาฏิหาริยํ ธมฺมํ เทเสสฺสนฺตี’ติ[Pg.88]. เอตรหิ โข ปน, ภนฺเต, ภิกฺขู ภควโต สาวกา วิยตฺตา วินีตา วิสารทา พหุสฺสุตา ธมฺมธรา ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺนา สามีจิปฺปฏิปนฺนา อนุธมฺมจาริโน, สกํ อาจริยกํ อุคฺคเหตฺวา อาจิกฺขนฺติ เทเสนฺติ ปญฺญเปนฺติ ปฏฺฐเปนฺติ วิวรนฺติ วิภชนฺติ อุตฺตานีกโรนฺติ, อุปฺปนฺนํ ปรปฺปวาทํ สหธมฺเมน สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา สปฺปาฏิหาริยํ ธมฺมํ เทเสนฺติ. ปรินิพฺพาตุทานิ, ภนฺเต, ภควา, ปรินิพฺพาตุ สุคโต, ปรินิพฺพานกาโลทานิ, ภนฺเต, ภควโต. १६८. त्यानंतर, आयुष्यमान आनंद निघून गेल्यावर काही वेळातच पापी मार जेथे भगवान होते तेथे आला; आणि जवळ येऊन एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेला पापी मार भगवंतांना म्हणाला – “भंते! आता भगवंतांनी परिनिर्वाण प्राप्त करावे, सुगतांनी परिनिर्वाण प्राप्त करावे. भंते! आता भगवंतांच्या परिनिर्वाणाची वेळ आली आहे. भंते! भगवंतांनीच हे वचन म्हटले होते – ‘हे पापी मारा! जोपर्यंत माझे भिक्खू श्रावक हे कुशल, विनीत, विशारद, बहुश्रुत, धम्मधर, धम्मानुधम्मप्रतिपन्न, सामीचीप्रतिपन्न आणि अनुधम्मचारी होत नाहीत; जे आपल्या आचार्यांच्या सिद्धांताचे ग्रहण करून ते सांगू, उपदेशू, प्रज्ञापित करू, प्रस्थापित करू, उघड करू, विभाजित करू आणि स्पष्ट करू शकत नाहीत; आणि उद्भवलेल्या पर-प्रवादाचे धम्माच्या आधारे योग्य प्रकारे खंडन करून प्रातिहार्ययुक्त (प्रभावशाली) धम्माचा उपदेश करू शकत नाहीत, तोपर्यंत मी परिनिर्वाण प्राप्त करणार नाही.’ परंतु भंते! आता भगवंतांचे भिक्खू श्रावक हे कुशल, विनीत, विशारद, बहुश्रुत, धम्मधर, धम्मानुधम्मप्रतिपन्न, सामीचीप्रतिपन्न आणि अनुधम्मचारी झाले आहेत. ते आपल्या आचार्यांच्या सिद्धांताचे ग्रहण करून ते सांगत आहेत, उपदेशत आहेत, प्रज्ञापित करत आहेत, प्रस्थापित करत आहेत, उघड करत आहेत, विभाजित करत आहेत आणि स्पष्ट करत आहेत; तसेच उद्भवलेल्या पर-प्रवादाचे धम्माच्या आधारे योग्य प्रकारे खंडन करून प्रातिहार्ययुक्त धम्माचा उपदेश करत आहेत. भंते! आता भगवंतांनी परिनिर्वाण प्राप्त करावे, सुगतांनी परिनिर्वाण प्राप्त करावे. भंते! आता भगवंतांच्या परिनिर्वाणाची वेळ आली आहे.” ‘‘ภาสิตา โข ปเนสา, ภนฺเต, ภควตา วาจา – ‘น ตาวาหํ, ปาปิม, ปรินิพฺพายิสฺสามิ, ยาว เม ภิกฺขุนิโย น สาวิกา ภวิสฺสนฺติ วิยตฺตา วินีตา วิสารทา พหุสฺสุตา ธมฺมธรา ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺนา สามีจิปฺปฏิปนฺนา อนุธมฺมจารินิโย, สกํ อาจริยกํ อุคฺคเหตฺวา อาจิกฺขิสฺสนฺติ เทเสสฺสนฺติ ปญฺญเปสฺสนฺติ ปฏฺฐเปสฺสนฺติ วิวริสฺสนฺติ วิภชิสฺสนฺติ อุตฺตานีกริสฺสนฺติ, อุปฺปนฺนํ ปรปฺปวาทํ สหธมฺเมน สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา สปฺปาฏิหาริยํ ธมฺมํ เทเสสฺสนฺตี’ติ. เอตรหิ โข ปน, ภนฺเต, ภิกฺขุนิโย ภควโต สาวิกา วิยตฺตา วินีตา วิสารทา พหุสฺสุตา ธมฺมธรา ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺนา สามีจิปฺปฏิปนฺนา อนุธมฺมจารินิโย, สกํ อาจริยกํ อุคฺคเหตฺวา อาจิกฺขนฺติ เทเสนฺติ ปญฺญเปนฺติ ปฏฺฐเปนฺติ วิวรนฺติ วิภชนฺติ อุตฺตานีกโรนฺติ, อุปฺปนฺนํ ปรปฺปวาทํ สหธมฺเมน สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา สปฺปาฏิหาริยํ ธมฺมํ เทเสนฺติ. ปรินิพฺพาตุทานิ, ภนฺเต, ภควา, ปรินิพฺพาตุ สุคโต, ปรินิพฺพานกาโลทานิ, ภนฺเต, ภควโต. भंते! भगवंतांनीच हे वचन म्हटले होते – ‘हे पापी मारा! जोपर्यंत माझ्या भिक्खुणी श्राविका या कुशल, विनीत, विशारद, बहुश्रुत, धम्मधर, धम्मानुधम्मप्रतिपन्न, सामीचीप्रतिपन्न आणि अनुधम्मचारिणी होत नाहीत; ज्या आपल्या आचार्यांच्या सिद्धांताचे ग्रहण करून ते सांगू, उपदेशू, प्रज्ञापित करू, प्रस्थापित करू, उघड करू, विभाजित करू आणि स्पष्ट करू शकत नाहीत; आणि उद्भवलेल्या पर-प्रवादाचे धम्माच्या आधारे योग्य प्रकारे खंडन करून प्रातिहार्ययुक्त (प्रभावशाली) धम्माचा उपदेश करू शकत नाहीत, तोपर्यंत मी परिनिर्वाण प्राप्त करणार नाही.’ परंतु भंते! आता भगवंतांच्या भिक्खुणी श्राविका या कुशल, विनीत, विशारद, बहुश्रुत, धम्मधर, धम्मानुधम्मप्रतिपन्न, सामीचीप्रतिपन्न आणि अनुधम्मचारिणी झाल्या आहेत. त्या आपल्या आचार्यांच्या सिद्धांताचे ग्रहण करून ते सांगत आहेत, उपदेशत आहेत, प्रज्ञापित करत आहेत, प्रस्थापित करत आहेत, उघड करत आहेत, विभाजित करत आहेत आणि स्पष्ट करत आहेत; तसेच उद्भवलेल्या पर-प्रवादाचे धम्माच्या आधारे योग्य प्रकारे खंडन करून प्रातिहार्ययुक्त धम्माचा उपदेश करत आहेत. भंते! आता भगवंतांनी परिनिर्वाण प्राप्त करावे, सुगतांनी परिनिर्वाण प्राप्त करावे. भंते! आता भगवंतांच्या परिनिर्वाणाची वेळ आली आहे. ‘‘ภาสิตา โข ปเนสา, ภนฺเต, ภควตา วาจา – ‘น ตาวาหํ, ปาปิม, ปรินิพฺพายิสฺสามิ, ยาว เม อุปาสกา น สาวกา ภวิสฺสนฺติ วิยตฺตา วินีตา วิสารทา พหุสฺสุตา ธมฺมธรา ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺนา สามีจิปฺปฏิปนฺนา อนุธมฺมจาริโน, สกํ อาจริยกํ อุคฺคเหตฺวา อาจิกฺขิสฺสนฺติ เทเสสฺสนฺติ ปญฺญเปสฺสนฺติ ปฏฺฐเปสฺสนฺติ วิวริสฺสนฺติ วิภชิสฺสนฺติ อุตฺตานีกริสฺสนฺติ, อุปฺปนฺนํ ปรปฺปวาทํ สหธมฺเมน สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา สปฺปาฏิหาริยํ ธมฺมํ เทเสสฺสนฺตี’ติ. เอตรหิ โข ปน, ภนฺเต, อุปาสกา ภควโต สาวกา วิยตฺตา วินีตา วิสารทา พหุสฺสุตา ธมฺมธรา ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺนา สามีจิปฺปฏิปนฺนา อนุธมฺมจาริโน, สกํ อาจริยกํ อุคฺคเหตฺวา อาจิกฺขนฺติ เทเสนฺติ ปญฺญเปนฺติ ปฏฺฐเปนฺติ วิวรนฺติ วิภชนฺติ อุตฺตานีกโรนฺติ, อุปฺปนฺนํ ปรปฺปวาทํ สหธมฺเมน สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา สปฺปาฏิหาริยํ ธมฺมํ เทเสนฺติ. ปรินิพฺพาตุทานิ[Pg.89], ภนฺเต, ภควา, ปรินิพฺพาตุ สุคโต, ปรินิพฺพานกาโลทานิ, ภนฺเต, ภควโต. भंते! भगवंतांनीच हे वचन म्हटले होते – ‘हे पापी मारा! जोपर्यंत माझे उपासक श्रावक हे कुशल, विनीत, विशारद, बहुश्रुत, धम्मधर, धम्मानुधम्मप्रतिपन्न, सामीचीप्रतिपन्न आणि अनुधम्मचारी होत नाहीत; जे आपल्या आचार्यांच्या सिद्धांताचे ग्रहण करून ते सांगू, उपदेशू, प्रज्ञापित करू, प्रस्थापित करू, उघड करू, विभाजित करू आणि स्पष्ट करू शकत नाहीत; आणि उद्भवलेल्या पर-प्रवादाचे धम्माच्या आधारे योग्य प्रकारे खंडन करून प्रातिहार्ययुक्त (प्रभावशाली) धम्माचा उपदेश करू शकत नाहीत, तोपर्यंत मी परिनिर्वाण प्राप्त करणार नाही.’ परंतु भंते! आता भगवंतांचे उपासक श्रावक हे कुशल, विनीत, विशारद, बहुश्रुत, धम्मधर, धम्मानुधम्मप्रतिपन्न, सामीचीप्रतिपन्न आणि अनुधम्मचारी झाले आहेत. ते आपल्या आचार्यांच्या सिद्धांताचे ग्रहण करून ते सांगत आहेत, उपदेशत आहेत, प्रज्ञापित करत आहेत, प्रस्थापित करत आहेत, उघड करत आहेत, विभाजित करत आहेत आणि स्पष्ट करत आहेत; तसेच उद्भवलेल्या पर-प्रवादाचे धम्माच्या आधारे योग्य प्रकारे खंडन करून प्रातिहार्ययुक्त धम्माचा उपदेश करत आहेत. भंते! आता भगवंतांनी परिनिर्वाण प्राप्त करावे, सुगतांनी परिनिर्वाण प्राप्त करावे. भंते! आता भगवंतांच्या परिनिर्वाणाची वेळ आली आहे. ‘‘ภาสิตา โข ปเนสา, ภนฺเต, ภควตา วาจา – ‘น ตาวาหํ, ปาปิม ปรินิพฺพายิสฺสามิ, ยาว เม อุปาสิกา น สาวิกา ภวิสฺสนฺติ วิยตฺตา วินีตา วิสารทา พหุสฺสุตา ธมฺมธรา ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺนา สามีจิปฺปฏิปนฺนา อนุธมฺมจารินิโย, สกํ อาจริยกํ อุคฺคเหตฺวา อาจิกฺขิสฺสนฺติ เทเสสฺสนฺติ ปญฺญเปสฺสนฺติ ปฏฺฐเปสฺสนฺติ วิวริสฺสนฺติ วิภชิสฺสนฺติ อุตฺตานีกริสฺสนฺติ, อุปฺปนฺนํ ปรปฺปวาทํ สหธมฺเมน สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา สปฺปาฏิหาริยํ ธมฺมํ เทเสสฺสนฺตี’ติ. เอตรหิ โข ปน, ภนฺเต, อุปาสิกา ภควโต สาวิกา วิยตฺตา วินีตา วิสารทา พหุสฺสุตา ธมฺมธรา ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺนา สามีจิปฺปฏิปนฺนา อนุธมฺมจารินิโย, สกํ อาจริยกํ อุคฺคเหตฺวา อาจิกฺขนฺติ เทเสนฺติ ปญฺญเปนฺติ ปฏฺฐเปนฺติ วิวรนฺติ วิภชนฺติ อุตฺตานีกโรนฺติ, อุปฺปนฺนํ ปรปฺปวาทํ สหธมฺเมน สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา สปฺปาฏิหาริยํ ธมฺมํ เทเสนฺติ. ปรินิพฺพาตุทานิ, ภนฺเต, ภควา, ปรินิพฺพาตุ สุคโต, ปรินิพฺพานกาโลทานิ, ภนฺเต, ภควโต. भंते! भगवंतांनीच हे वचन म्हटले होते – ‘हे पापी मारा! जोपर्यंत माझ्या उपासिका श्राविका या कुशल, विनीत, विशारद, बहुश्रुत, धम्मधर, धम्मानुधम्मप्रतिपन्न, सामीचीप्रतिपन्न आणि अनुधम्मचारिणी होत नाहीत; ज्या आपल्या आचार्यांच्या सिद्धांताचे ग्रहण करून ते सांगू, उपदेशू, प्रज्ञापित करू, प्रस्थापित करू, उघड करू, विभाजित करू आणि स्पष्ट करू शकत नाहीत; आणि उद्भवलेल्या पर-प्रवादाचे धम्माच्या आधारे योग्य प्रकारे खंडन करून प्रातिहार्ययुक्त (प्रभावशाली) धम्माचा उपदेश करू शकत नाहीत, तोपर्यंत मी परिनिर्वाण प्राप्त करणार नाही.’ परंतु भंते! आता भगवंतांच्या उपासिका श्राविका या कुशल, विनीत, विशारद, बहुश्रुत, धम्मधर, धम्मानुधम्मप्रतिपन्न, सामीचीप्रतिपन्न आणि अनुधम्मचारिणी झाल्या आहेत. त्या आपल्या आचार्यांच्या सिद्धांताचे ग्रहण करून ते सांगत आहेत, उपदेशत आहेत, प्रज्ञापित करत आहेत, प्रस्थापित करत आहेत, उघड करत आहेत, विभाजित करत आहेत आणि स्पष्ट करत आहेत; तसेच उद्भवलेल्या पर-प्रवादाचे धम्माच्या आधारे योग्य प्रकारे खंडन करून प्रातिहार्ययुक्त धम्माचा उपदेश करत आहेत. भंते! आता भगवंतांनी परिनिर्वाण प्राप्त करावे, सुगतांनी परिनिर्वाण प्राप्त करावे. भंते! आता भगवंतांच्या परिनिर्वाणाची वेळ आली आहे. ‘‘ภาสิตา โข ปเนสา, ภนฺเต, ภควตา วาจา – ‘น ตาวาหํ, ปาปิม, ปรินิพฺพายิสฺสามิ, ยาว เม อิทํ พฺรหฺมจริยํ น อิทฺธํ เจว ภวิสฺสติ ผีตญฺจ วิตฺถาริกํ พาหุชญฺญํ ปุถุภูตํ ยาว เทวมนุสฺเสหิ สุปฺปกาสิต’นฺติ. เอตรหิ โข ปน, ภนฺเต, ภควโต พฺรหฺมจริยํ อิทฺธํ เจว ผีตญฺจ วิตฺถาริกํ พาหุชญฺญํ ปุถุภูตํ, ยาว เทวมนุสฺเสหิ สุปฺปกาสิตํ. ปรินิพฺพาตุทานิ, ภนฺเต, ภควา, ปรินิพฺพาตุ สุคโต, ปรินิพฺพานกาโลทานิ, ภนฺเต, ภควโต’’ติ. भंते! भगवंतांनीच हे वचन म्हटले होते – ‘हे पापी मारा! जोपर्यंत माझे हे ब्रह्मचर्य (धम्मशासन) समृद्ध, संपन्न, विस्तृत, बहुजनमान्य, सर्वव्यापी आणि देव-मनुष्यांमध्ये चांगल्या प्रकारे प्रकाशित होत नाही, तोपर्यंत मी परिनिर्वाण प्राप्त करणार नाही.’ परंतु भंते! आता भगवंतांचे हे ब्रह्मचर्य समृद्ध, संपन्न, विस्तृत, बहुजनमान्य, सर्वव्यापी झाले आहे आणि देव-मनुष्यांमध्ये चांगल्या प्रकारे प्रकाशित झाले आहे. भंते! आता भगवंतांनी परिनिर्वाण प्राप्त करावे, सुगतांनी परिनिर्वाण प्राप्त करावे. भंते! आता भगवंतांच्या परिनिर्वाणाची वेळ आली आहे। เอวํ วุตฺเต ภควา มารํ ปาปิมนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อปฺโปสฺสุกฺโก ตฺวํ, ปาปิม, โหหิ, น จิรํ ตถาคตสฺส ปรินิพฺพานํ ภวิสฺสติ. อิโต ติณฺณํ มาสานํ อจฺจเยน ตถาคโต ปรินิพฺพายิสฺสตี’’ติ. असे म्हटले असता, भगवान पापी माराला म्हणाले – 'हे पापी (मार)! तू निश्चिंत राहा. तथागतांचे परिनिर्वाण लवकरच होईल. आजपासून तीन महिन्यांनंतर तथागत परिनिर्वाण प्राप्त करतील.' อายุสงฺขารโอสฺสชฺชนํ आयुसंखाराचा त्याग ๑๖๙. อถ โข ภควา จาปาเล เจติเย สโต สมฺปชาโน อายุสงฺขารํ โอสฺสชิ. โอสฺสฏฺเฐ จ ภควตา อายุสงฺขาเร มหาภูมิจาโล อโหสิ ภึสนโก สโลมหํโส, เทวทุนฺทุภิโย จ ผลึสุ[Pg.90]. อถ โข ภควา เอตมตฺถํ วิทิตฺวา ตายํ เวลายํ อิมํ อุทานํ อุทาเนสิ – १६९. त्यानंतर भगवान चापाल चैत्यामध्ये स्मृतिमान आणि संप्रजन्यशील राहून आयुसंखाराचा त्याग करते झाले. भगवंतांनी आयुसंखाराचा त्याग केला असता, अंगावर काटा आणणारा आणि अत्यंत भयानक असा मोठा धरणीकंप झाला, आणि देवदुंदुभी गर्जू लागल्या. तेव्हा भगवंतांनी हा अर्थ जाणून त्या वेळी हे उदान उद्गारले – ‘‘ตุลมตุลญฺจ สมฺภวํ, ภวสงฺขารมวสฺสชิ มุนิ; อชฺฌตฺตรโต สมาหิโต, อภินฺทิ กวจมิวตฺตสมฺภว’’นฺติ. 'मुनींनी (बुद्धांनी) मोजता येण्याजोगे व अमर्याद असे अस्तित्वाचे मूळ असलेल्या भवसंखाराचा त्याग केला; स्वतःमध्ये मग्न आणि समाधीस्थ राहून, त्यांनी स्वतःपासून उत्पन्न झालेल्या क्लेशांचे कवच एखाद्या योद्ध्याप्रमाणे भेदून टाकले.' มหาภูมิจาลเหตุ महा-धरणीकंपाची कारणे ๑๗๐. อถ โข อายสฺมโต อานนฺทสฺส เอตทโหสิ – ‘‘อจฺฉริยํ วต โภ, อพฺภุตํ วต โภ, มหา วตายํ ภูมิจาโล; สุมหา วตายํ ภูมิจาโล ภึสนโก สโลมหํโส; เทวทุนฺทุภิโย จ ผลึสุ. โก นุ โข เหตุ โก ปจฺจโย มหโต ภูมิจาลสฺส ปาตุภาวายา’’ติ? १७०. तेव्हा आयुष्यमान आनंदांच्या मनात असा विचार आला – 'अहो! आश्चर्य आहे, अहो! अद्भुत आहे. हा धरणीकंप किती मोठा आहे! अंगावर काटा आणणारा आणि अत्यंत भयानक असा हा धरणीकंप खरोखरच अतिशय मोठा आहे; आणि देवदुंदुभीही गर्जत आहेत. या महा-धरणीकंपाच्या उत्पत्तीचे काय कारण आणि काय प्रत्यय असावे?' อถ โข อายสฺมา อานนฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ, อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ, เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต, มหา วตายํ, ภนฺเต, ภูมิจาโล; สุมหา วตายํ, ภนฺเต, ภูมิจาโล ภึสนโก สโลมหํโส; เทวทุนฺทุภิโย จ ผลึสุ. โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ โก ปจฺจโย มหโต ภูมิจาลสฺส ปาตุภาวายา’’ติ? त्यानंतर आयुष्यमान आनंद जेथे भगवान होते तेथे गेले. जवळ जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान आनंदांनी भगवंतांना असे विचारले – 'भंते! आश्चर्य आहे, भंते! अद्भुत आहे. भंते, हा धरणीकंप किती मोठा आहे! अंगावर काटा आणणारा आणि अत्यंत भयानक असा हा धरणीकंप खरोखरच अतिशय मोठा आहे; आणि देवदुंदुभीही गर्जत आहेत. भंते, या महा-धरणीकंपाच्या उत्पत्तीचे काय कारण आणि काय प्रत्यय असावे?' ๑๗๑. ‘‘อฏฺฐ โข อิเม, อานนฺท, เหตู, อฏฺฐ ปจฺจยา มหโต ภูมิจาลสฺส ปาตุภาวาย. กตเม อฏฺฐ? อยํ, อานนฺท, มหาปถวี อุทเก ปติฏฺฐิตา, อุทกํ วาเต ปติฏฺฐิตํ, วาโต อากาสฏฺโฐ. โหติ โข โส, อานนฺท, สมโย, ยํ มหาวาตา วายนฺติ. มหาวาตา วายนฺตา อุทกํ กมฺเปนฺติ. อุทกํ กมฺปิตํ ปถวึ กมฺเปติ. อยํ ปฐโม เหตุ ปฐโม ปจฺจโย มหโต ภูมิจาลสฺส ปาตุภาวาย. १७१. 'आनंदा, महा-धरणीकंप उत्पन्न होण्याची ही आठ कारणे आणि आठ प्रत्यय आहेत. कोणते आठ? आनंदा, ही महापृथ्वी पाण्यावर आधारलेली आहे, पाणी हवेवर आधारलेले आहे आणि हवा आकाशात स्थित आहे. आनंदा, अशी वेळ येते जेव्हा प्रचंड वादळ सुटते. प्रचंड वादळ सुटल्याने पाणी हलते. पाणी हलल्यामुळे पृथ्वी हलते. महा-धरणीकंप उत्पन्न होण्याचे हे पहिले कारण आणि पहिला प्रत्यय आहे.' ‘‘ปุน จปรํ, อานนฺท, สมโณ วา โหติ พฺราหฺมโณ วา อิทฺธิมา เจโตวสิปฺปตฺโต, เทโว วา มหิทฺธิโก มหานุภาโว, ตสฺส ปริตฺตา ปถวีสญฺญา ภาวิตา โหติ, อปฺปมาณา อาโปสญฺญา. โส อิมํ ปถวึ กมฺเปติ สงฺกมฺเปติ สมฺปกมฺเปติ สมฺปเวเธติ. อยํ ทุติโย เหตุ ทุติโย ปจฺจโย มหโต ภูมิจาลสฺส ปาตุภาวาย. 'पुन्हा दुसरे असे की, आनंदा, जेव्हा एखादा ऋद्धीमान आणि चित्तावर पूर्ण नियंत्रण मिळवलेला श्रमण किंवा ब्राह्मण असतो, अथवा एखादा महान ऋद्धीमान व महान सामर्थ्यशाली देव असतो, ज्याने पृथ्वीची संज्ञा अल्प प्रमाणात आणि पाण्याची संज्ञा अमर्याद प्रमाणात विकसित केलेली असते. तो या पृथ्वीला हलवतो, थरथरवतो, तीव्रतेने कंपित करतो आणि डळमळीत करतो. महा-धरणीकंप उत्पन्न होण्याचे हे दुसरे कारण आणि दुसरा प्रत्यय आहे.' ‘‘ปุน [Pg.91] จปรํ, อานนฺท, ยทา โพธิสตฺโต ตุสิตกายา จวิตฺวา สโต สมฺปชาโน มาตุกุจฺฉึ โอกฺกมติ, ตทายํ ปถวี กมฺปติ สงฺกมฺปติ สมฺปกมฺปติ สมฺปเวธติ. อยํ ตติโย เหตุ ตติโย ปจฺจโย มหโต ภูมิจาลสฺส ปาตุภาวาย. 'पुन्हा दुसरे असे की, आनंदा, जेव्हा बोधिसत्व तुषित स्वर्गातून च्युत होऊन स्मृतिमान व संप्रजन्यशील राहून मातेच्या उदरात प्रवेश करतात, तेव्हा ही पृथ्वी हलते, थरथरते, तीव्रतेने कंपित होते आणि डळमळीत होते. महा-धरणीकंप उत्पन्न होण्याचे हे तिसरे कारण आणि तिसरा प्रत्यय आहे.' ‘‘ปุน จปรํ, อานนฺท, ยทา โพธิสตฺโต สโต สมฺปชาโน มาตุกุจฺฉิสฺมา นิกฺขมติ, ตทายํ ปถวี กมฺปติ สงฺกมฺปติ สมฺปกมฺปติ สมฺปเวธติ. อยํ จตุตฺโถ เหตุ จตุตฺโถ ปจฺจโย มหโต ภูมิจาลสฺส ปาตุภาวาย. 'पुन्हा दुसरे असे की, आनंदा, जेव्हा बोधिसत्व स्मृतिमान व संप्रजन्यशील राहून मातेच्या उदरातून बाहेर येतात, तेव्हा ही पृथ्वी हलते, थरथरते, तीव्रतेने कंपित होते आणि डळमळीत होते. महा-धरणीकंप उत्पन्न होण्याचे हे चौथे कारण आणि चौथा प्रत्यय आहे.' ‘‘ปุน จปรํ, อานนฺท, ยทา ตถาคโต อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุชฺฌติ, ตทายํ ปถวี กมฺปติ สงฺกมฺปติ สมฺปกมฺปติ สมฺปเวธติ. อยํ ปญฺจโม เหตุ ปญฺจโม ปจฺจโย มหโต ภูมิจาลสฺส ปาตุภาวาย. 'पुन्हा दुसरे असे की, आनंदा, जेव्हा तथागत अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त करतात, तेव्हा ही पृथ्वी हलते, थरथरते, तीव्रतेने कंपित होते आणि डळमळीत होते. महा-धरणीकंप उत्पन्न होण्याचे हे पाचवे कारण आणि पाचवा प्रत्यय आहे.' ‘‘ปุน จปรํ, อานนฺท, ยทา ตถาคโต อนุตฺตรํ ธมฺมจกฺกํ ปวตฺเตติ, ตทายํ ปถวี กมฺปติ สงฺกมฺปติ สมฺปกมฺปติ สมฺปเวธติ. อยํ ฉฏฺโฐ เหตุ ฉฏฺโฐ ปจฺจโย มหโต ภูมิจาลสฺส ปาตุภาวาย. 'पुन्हा दुसरे असे की, आनंदा, जेव्हा तथागत अनुत्तर धम्मचक्र प्रवर्तन करतात, तेव्हा ही पृथ्वी हलते, थरथरते, तीव्रतेने कंपित होते आणि डळमळीत होते. महा-धरणीकंप उत्पन्न होण्याचे हे सहावे कारण आणि सहावा प्रत्यय आहे.' ‘‘ปุน จปรํ, อานนฺท, ยทา ตถาคโต สโต สมฺปชาโน อายุสงฺขารํ โอสฺสชฺชติ, ตทายํ ปถวี กมฺปติ สงฺกมฺปติ สมฺปกมฺปติ สมฺปเวธติ. อยํ สตฺตโม เหตุ สตฺตโม ปจฺจโย มหโต ภูมิจาลสฺส ปาตุภาวาย. 'पुन्हा दुसरे असे की, आनंदा, जेव्हा तथागत स्मृतिमान व संप्रजन्यशील राहून आयुसंखाराचा त्याग करतात, तेव्हा ही पृथ्वी हलते, थरथरते, तीव्रतेने कंपित होते आणि डळमळीत होते. महा-धरणीकंप उत्पन्न होण्याचे हे सातवे कारण आणि सातवा प्रत्यय आहे.' ‘‘ปุน จปรํ, อานนฺท, ยทา ตถาคโต อนุปาทิเสสาย นิพฺพานธาตุยา ปรินิพฺพายติ, ตทายํ ปถวี กมฺปติ สงฺกมฺปติ สมฺปกมฺปติ สมฺปเวธติ. อยํ อฏฺฐโม เหตุ อฏฺฐโม ปจฺจโย มหโต ภูมิจาลสฺส ปาตุภาวาย. อิเม โข, อานนฺท, อฏฺฐ เหตู, อฏฺฐ ปจฺจยา มหโต ภูมิจาลสฺส ปาตุภาวายา’’ติ. 'पुन्हा दुसरे असे की, आनंदा, जेव्हा तथागत अनुपादिशेष निर्वाणधातूने परिनिर्वाण प्राप्त करतात, तेव्हा ही पृथ्वी हलते, थरथरते, तीव्रतेने कंपित होते आणि डळमळीत होते. महा-धरणीकंप उत्पन्न होण्याचे हे आठवे कारण आणि आठवा प्रत्यय आहे. आनंदा, महा-धरणीकंप उत्पन्न होण्याची हीच ती आठ कारणे आणि आठ प्रत्यय आहेत.' อฏฺฐ ปริสา आठ परिषदा ๑๗๒. ‘‘อฏฺฐ โข อิมา, อานนฺท, ปริสา. กตมา อฏฺฐ? ขตฺติยปริสา, พฺราหฺมณปริสา, คหปติปริสา, สมณปริสา, จาตุมหาราชิกปริสา, ตาวตึสปริสา, มารปริสา, พฺรหฺมปริสา. อภิชานามิ โข ปนาหํ, อานนฺท[Pg.92], อเนกสตํ ขตฺติยปริสํ อุปสงฺกมิตา. ตตฺรปิ มยา สนฺนิสินฺนปุพฺพํ เจว สลฺลปิตปุพฺพญฺจ สากจฺฉา จ สมาปชฺชิตปุพฺพา. ตตฺถ ยาทิสโก เตสํ วณฺโณ โหติ, ตาทิสโก มยฺหํ วณฺโณ โหติ. ยาทิสโก เตสํ สโร โหติ, ตาทิสโก มยฺหํ สโร โหติ. ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสมิ สมาทเปมิ สมุตฺเตเชมิ สมฺปหํเสมิ. ภาสมานญฺจ มํ น ชานนฺติ – ‘โก นุ โข อยํ ภาสติ เทโว วา มนุสฺโส วา’ติ? ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสตฺวา สมาทเปตฺวา สมุตฺเตเชตฺวา สมฺปหํเสตฺวา อนฺตรธายามิ. อนฺตรหิตญฺจ มํ น ชานนฺติ – ‘โก นุ โข อยํ อนฺตรหิโต เทโว วา มนุสฺโส วา’ติ? อภิชานามิ โข ปนาหํ, อานนฺท, อเนกสตํ พฺราหฺมณปริสํ…เป… คหปติปริสํ… สมณปริสํ… จาตุมหาราชิกปริสํ… ตาวตึสปริสํ… มารปริสํ… พฺรหฺมปริสํ อุปสงฺกมิตา. ตตฺรปิ มยา สนฺนิสินฺนปุพฺพํ เจว สลฺลปิตปุพฺพญฺจ สากจฺฉา จ สมาปชฺชิตปุพฺพา. ตตฺถ ยาทิสโก เตสํ วณฺโณ โหติ, ตาทิสโก มยฺหํ วณฺโณ โหติ. ยาทิสโก เตสํ สโร โหติ, ตาทิสโก มยฺหํ สโร โหติ. ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสมิ สมาทเปมิ สมุตฺเตเชมิ สมฺปหํเสมิ. ภาสมานญฺจ มํ น ชานนฺติ – ‘โก นุ โข อยํ ภาสติ เทโว วา มนุสฺโส วา’ติ? ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสตฺวา สมาทเปตฺวา สมุตฺเตเชตฺวา สมฺปหํเสตฺวา อนฺตรธายามิ. อนฺตรหิตญฺจ มํ น ชานนฺติ – ‘โก นุ โข อยํ อนฺตรหิโต เทโว วา มนุสฺโส วา’ติ? อิมา โข, อานนฺท, อฏฺฐ ปริสา. १७२. “आनंदा, या आठ परिषदा आहेत. कोणत्या आठ? क्षत्रिय-परिषद, ब्राह्मण-परिषद, गृहपती-परिषद, श्रमण-परिषद, चातुर्महाराजिक-परिषद, तावतिंस-परिषद, मार-परिषद आणि ब्रह्म-परिषद. आनंदा, मला आठवते की मी अनेक शेकडो क्षत्रिय-परिषदांमध्ये गेलो आहे. तिथे मी त्यांच्यासोबत बसलो आहे, त्यांच्याशी संभाषण केले आहे आणि त्यांच्याशी चर्चाही केली आहे. तिथे जसा त्यांचा वर्ण (रूप) असायचा, तसाच माझाही वर्ण होत असे. जसा त्यांचा स्वर (आवाज) असायचा, तसाच माझाही स्वर होत असे. मी त्यांना धम्म उपदेशाद्वारे संदर्शित (धम्माचे स्पष्टीकरण), समादपित (धम्मात प्रवृत्त), समुत्तेजित (धम्मासाठी उत्साहित) आणि संप्रहर्षित (धम्माच्या आनंदाने उल्लसित) करत असे. मी बोलत असताना ते मला ओळखू शकत नसत की, ‘हा बोलणारा कोण आहे—देव की मनुष्य?’ धम्म उपदेशाद्वारे त्यांना संदर्शित, समादपित, समुत्तेजित आणि संप्रहर्षित करून मी अंतर्धान पावत असे. मी अंतर्धान पावल्यावरही ते मला ओळखू शकत नसत की, ‘हा अंतर्धान पावलेला कोण आहे—देव की मनुष्य?’ आनंदा, मला आठवते की मी अनेक शेकडो ब्राह्मण-परिषदांमध्ये...पे... गृहपती-परिषदांमध्ये... श्रमण-परिषदांमध्ये... चातुर्महाराजिक-परिषदांमध्ये... तावतिंस-परिषदांमध्ये... मार-परिषदांमध्ये... ब्रह्म-परिषदांमध्ये गेलो आहे. तिथेही मी त्यांच्यासोबत बसलो आहे, त्यांच्याशी संभाषण केले आहे आणि त्यांच्याशी चर्चाही केली आहे. तिथे जसा त्यांचा वर्ण असायचा, तसाच माझाही वर्ण होत असे. जसा त्यांचा स्वर असायचा, तसाच माझाही स्वर होत असे. मी त्यांना धम्म उपदेशाद्वारे संदर्शित, समादपित, समुत्तेजित आणि संप्रहर्षित करत असे. मी बोलत असताना ते मला ओळखू शकत नसत की, ‘हा बोलणारा कोण आहे—देव की मनुष्य?’ धम्म उपदेशाद्वारे त्यांना संदर्शित, समादपित, समुत्तेजित आणि संप्रहर्षित करून मी अंतर्धान पावत असे. मी अंतर्धान पावल्यावरही ते मला ओळखू शकत नसत की, ‘हा अंतर्धान पावलेला कोण आहे—देव की मनुष्य?’ आनंदा, या आहेत त्या आठ परिषदा.” อฏฺฐ อภิภายตนานิ आठ अभिभायतने (अभिभूत करण्याची स्थाने) ๑๗๓. ‘‘อฏฺฐ โข อิมานิ, อานนฺท, อภิภายตนานิ. กตมานิ อฏฺฐ? อชฺฌตฺตํ รูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ ปริตฺตานิ สุวณฺณทุพฺพณฺณานิ. ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ ปฐมํ อภิภายตนํ. १७३. “आनंदा, ही आठ अभिभायतने आहेत. कोणती आठ? अध्यात्मतः (स्वतःच्या शरीरात) रूपसंज्ञी होऊन, एखादा मनुष्य बाहेर मर्यादित, सुवर्ण (सुंदर) आणि दुर्वर्ण (कुरूप) रूपे पाहतो. ‘त्यांना अभिभूत करून मी जाणतो आणि पाहतो,’ अशी त्याची संज्ञा असते. हे पहिले अभिभायतन आहे.” ‘‘อชฺฌตฺตํ รูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ อปฺปมาณานิ สุวณฺณทุพฺพณฺณานิ. ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ ทุติยํ อภิภายตนํ. “अध्यात्मतः रूपसंज्ञी होऊन, एखादा मनुष्य बाहेर अमर्याद (विशाल), सुवर्ण आणि दुर्वर्ण रूपे पाहतो. ‘त्यांना अभिभूत करून मी जाणतो आणि पाहतो,’ अशी त्याची संज्ञा असते. हे दुसरे अभिभायतन आहे.” ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ ปริตฺตานิ สุวณฺณทุพฺพณฺณานิ. ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ ตติยํ อภิภายตนํ. “अध्यात्मतः अरूपसंज्ञी होऊन, एखादा मनुष्य बाहेर मर्यादित, सुवर्ण आणि दुर्वर्ण रूपे पाहतो. ‘त्यांना अभिभूत करून मी जाणतो आणि पाहतो,’ अशी त्याची संज्ञा असते. हे तिसरे अभिभायतन आहे.” ‘‘อชฺฌตฺตํ [Pg.93] อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ อปฺปมาณานิ สุวณฺณทุพฺพณฺณานิ. ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ จตุตฺถํ อภิภายตนํ. “अध्यात्मतः अरूपसंज्ञी होऊन, एखादा मनुष्य बाहेर अमर्याद, सुवर्ण आणि दुर्वर्ण रूपे पाहतो. ‘त्यांना अभिभूत करून मी जाणतो आणि पाहतो,’ अशी त्याची संज्ञा असते. हे चौथे अभिभायतन आहे.” ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ นีลานิ นีลวณฺณานิ นีลนิทสฺสนานิ นีลนิภาสานิ. เสยฺยถาปิ นาม อุมาปุปฺผํ นีลํ นีลวณฺณํ นีลนิทสฺสนํ นีลนิภาสํ. เสยฺยถา วา ปน ตํ วตฺถํ พาราณเสยฺยกํ อุภโตภาควิมฏฺฐํ นีลํ นีลวณฺณํ นีลนิทสฺสนํ นีลนิภาสํ. เอวเมว อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ นีลานิ นีลวณฺณานิ นีลนิทสฺสนานิ นีลนิภาสานิ. ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ ปญฺจมํ อภิภายตนํ. “अध्यात्मतः अरूपसंज्ञी होऊन, एखादा मनुष्य बाहेर निळी, निळ्या रंगाची, निळी दिसणारी, निळी प्रभा असलेली रूपे पाहतो. जसे की, अतसीचे फूल निळे, निळ्या रंगाचे, निळे दिसणारे आणि निळी प्रभा असलेले असते; किंवा जसे वाराणसीचे दोन्ही बाजूंनी गुळगुळीत केलेले वस्त्र निळे, निळ्या रंगाचे, निळे दिसणारे आणि निळी प्रभा असलेले असते; त्याचप्रमाणे अध्यात्मतः अरूपसंज्ञी होऊन, एखादा मनुष्य बाहेर निळी, निळ्या रंगाची, निळी दिसणारी, निळी प्रभा असलेली रूपे पाहतो. ‘त्यांना अभिभूत करून मी जाणतो आणि पाहतो,’ अशी त्याची संज्ञा असते. हे पाचवे अभिभायतन आहे.” ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ ปีตานิ ปีตวณฺณานิ ปีตนิทสฺสนานิ ปีตนิภาสานิ. เสยฺยถาปิ นาม กณิการปุปฺผํ ปีตํ ปีตวณฺณํ ปีตนิทสฺสนํ ปีตนิภาสํ. เสยฺยถา วา ปน ตํ วตฺถํ พาราณเสยฺยกํ อุภโตภาควิมฏฺฐํ ปีตํ ปีตวณฺณํ ปีตนิทสฺสนํ ปีตนิภาสํ. เอวเมว อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ ปีตานิ ปีตวณฺณานิ ปีตนิทสฺสนานิ ปีตนิภาสานิ. ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ ฉฏฺฐํ อภิภายตนํ. “अध्यात्मतः अरूपसंज्ञी होऊन, एखादा मनुष्य बाहेर पिवळी, पिवळ्या रंगाची, पिवळी दिसणारी, पिवळी प्रभा असलेली रूपे पाहतो. जसे की, कर्णिकाराचे फूल पिवळे, पिवळ्या रंगाचे, पिवळे दिसणारे आणि पिवळी प्रभा असलेले असते; किंवा जसे वाराणसीचे दोन्ही बाजूंनी गुळगुळीत केलेले वस्त्र पिवळे, पिवळ्या रंगाचे, पिवळे दिसणारे आणि पिवळी प्रभा असलेले असते; त्याचप्रमाणे अध्यात्मतः अरूपसंज्ञी होऊन, एखादा मनुष्य बाहेर पिवळी, पिवळ्या रंगाची, पिवळी दिसणारी, पिवळी प्रभा असलेली रूपे पाहतो. ‘त्यांना अभिभूत करून मी जाणतो आणि पाहतो,’ अशी त्याची संज्ञा असते. हे सहावे अभिभायतन आहे.” ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ โลหิตกานิ โลหิตกวณฺณานิ โลหิตกนิทสฺสนานิ โลหิตกนิภาสานิ. เสยฺยถาปิ นาม พนฺธุชีวกปุปฺผํ โลหิตกํ โลหิตกวณฺณํ โลหิตกนิทสฺสนํ โลหิตกนิภาสํ. เสยฺยถา วา ปน ตํ วตฺถํ พาราณเสยฺยกํ อุภโตภาควิมฏฺฐํ โลหิตกํ โลหิตกวณฺณํ โลหิตกนิทสฺสนํ โลหิตกนิภาสํ. เอวเมว อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ โลหิตกานิ โลหิตกวณฺณานิ โลหิตกนิทสฺสนานิ โลหิตกนิภาสานิ. ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ สตฺตมํ อภิภายตนํ. “अध्यात्मतः अरूपसंज्ञी होऊन, एखादा मनुष्य बाहेर तांबडी (लाल), तांबड्या रंगाची, तांबडी दिसणारी, तांबडी प्रभा असलेली रूपे पाहतो. जसे की, बंधुजीवकाचे फूल तांबडे, तांबड्या रंगाचे, तांबडे दिसणारे आणि तांबडी प्रभा असलेले असते; किंवा जसे वाराणसीचे दोन्ही बाजूंनी गुळगुळीत केलेले वस्त्र तांबडे, तांबड्या रंगाचे, तांबडे दिसणारे आणि तांबडी प्रभा असलेले असते; त्याचप्रमाणे अध्यात्मतः अरूपसंज्ञी होऊन, एखादा मनुष्य बाहेर तांबडी, तांबड्या रंगाची, तांबडी दिसणारी, तांबडी प्रभा असलेली रूपे पाहतो. ‘त्यांना अभिभूत करून मी जाणतो आणि पाहतो,’ अशी त्याची संज्ञा असते. हे सातवे अभिभायतन आहे.” ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ โอทาตานิ โอทาตวณฺณานิ โอทาตนิทสฺสนานิ โอทาตนิภาสานิ. เสยฺยถาปิ นาม โอสธิตารกา [Pg.94] โอทาตา โอทาตวณฺณา โอทาตนิทสฺสนา โอทาตนิภาสา. เสยฺยถา วา ปน ตํ วตฺถํ พาราณเสยฺยกํ อุภโตภาควิมฏฺฐํ โอทาตํ โอทาตวณฺณํ โอทาตนิทสฺสนํ โอทาตนิภาสํ. เอวเมว อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี เอโก พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ โอทาตานิ โอทาตวณฺณานิ โอทาตนิทสฺสนานิ โอทาตนิภาสานิ. ‘ตานิ อภิภุยฺย ชานามิ ปสฺสามี’ติ เอวํสญฺญี โหติ. อิทํ อฏฺฐมํ อภิภายตนํ. อิมานิ โข, อานนฺท, อฏฺฐ อภิภายตนานิ. “अध्यात्मतः अरूपसंज्ञी होऊन, एखादा मनुष्य बाहेर पांढरी (शुभ्र), पांढऱ्या रंगाची, पांढरी दिसणारी, पांढरी प्रभा असलेली रूपे पाहतो. जसे की, ओषधी तारा (शुक्र तारा) पांढरा, पांढऱ्या रंगाचा, पांढरा दिसणारा आणि पांढरी प्रभा असलेला असतो; किंवा जसे वाराणसीचे दोन्ही बाजूंनी गुळगुळीत केलेले वस्त्र पांढरे, पांढऱ्या रंगाचे, पांढरे दिसणारे आणि पांढरी प्रभा असलेले असते; त्याचप्रमाणे अध्यात्मतः अरूपसंज्ञी होऊन, एखादा मनुष्य बाहेर पांढरी, पांढऱ्या रंगाची, पांढरी दिसणारी, पांढरी प्रभा असलेली रूपे पाहतो. ‘त्यांना अभिभूत करून मी जाणतो आणि पाहतो,’ अशी त्याची संज्ञा असते. हे आठवे अभिभायतन आहे. आनंदा, हीच ती आठ अभिभायतने आहेत.” อฏฺฐ วิโมกฺขา आठ विमोक्ष ๑๗๔. ‘‘อฏฺฐ โข อิเม, อานนฺท, วิโมกฺขา. กตเม อฏฺฐ? รูปี รูปานิ ปสฺสติ, อยํ ปฐโม วิโมกฺโข. อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี พหิทฺธา รูปานิ ปสฺสติ, อยํ ทุติโย วิโมกฺโข. สุภนฺเตว อธิมุตฺโต โหติ, อยํ ตติโย วิโมกฺโข. สพฺพโส รูปสญฺญานํ สมติกฺกมา ปฏิฆสญฺญานํ อตฺถงฺคมา นานตฺตสญฺญานํ อมนสิการา ‘อนนฺโต อากาโส’ติ อากาสานญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ, อยํ จตุตฺโถ วิโมกฺโข. สพฺพโส อากาสานญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘อนนฺตํ วิญฺญาณ’นฺติ วิญฺญาณญฺจายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ, อยํ ปญฺจโม วิโมกฺโข. สพฺพโส วิญฺญาณญฺจายตนํ สมติกฺกมฺม ‘นตฺถิ กิญฺจี’ติ อากิญฺจญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ, อยํ ฉฏฺโฐ วิโมกฺโข. สพฺพโส อากิญฺจญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ สตฺตโม วิโมกฺโข. สพฺพโส เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ สมติกฺกมฺม สญฺญาเวทยิตนิโรธํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ, อยํ อฏฺฐโม วิโมกฺโข. อิเม โข, อานนฺท, อฏฺฐ วิโมกฺขา. १७४. आनंदा, हे आठ विमोक्ष आहेत. कोणते आठ? १. रूपी (स्वतःमध्ये रूप असणारा) बाह्य रूपांना पाहतो, हा पहिला विमोक्ष आहे. २. स्वतःमध्ये अरूपसंज्ञी (रूपाची संज्ञा नसलेला) बाह्य रूपांना पाहतो, हा दुसरा विमोक्ष आहे. ३. 'ते शुभ (सुंदर) आहे' अशा भावनेने अधिमुक्त (एकाग्र) होतो, हा तिसरा विमोक्ष आहे. ४. सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांचे पूर्णपणे अतिक्रमण करून, प्रतिघसंज्ञांचा अस्त झाल्यामुळे आणि नानात्वसंज्ञांकडे मन न दिल्यामुळे, 'आकाश अनंत आहे' असे जाणून आकासानंचायतन प्राप्त करून विहरतो, हा चौथा विमोक्ष आहे. ५. सर्व प्रकारे आकासानंचायतनाचे पूर्णपणे अतिक्रमण करून, 'विज्ञान अनंत आहे' असे जाणून विज्ञाणंचायतन प्राप्त करून विहरतो, हा पाचवा विमोक्ष आहे. ६. सर्व प्रकारे विज्ञाणंचायतनाचे पूर्णपणे अतिक्रमण करून, 'काहीही नाही' असे जाणून आकिंचन्यायतन प्राप्त करून विहरतो, हा सहावा विमोक्ष आहे. ७. सर्व प्रकारे आकिंचन्यायतनाचे पूर्णपणे अतिक्रमण करून नेवसंज्ञानासंज्ञायतन प्राप्त करून विहरतो, हा सातवा विमोक्ष आहे. ८. सर्व प्रकारे नेवसंज्ञानासंज्ञायतनाचे पूर्णपणे अतिक्रमण करून संज्ञावेदयितनिरोध प्राप्त करून विहरतो, हा आठवा विमोक्ष आहे. आनंदा, हेच ते आठ विमोक्ष आहेत. ๑๗๕. ‘‘เอกมิทาหํ, อานนฺท, สมยํ อุรุเวลายํ วิหรามิ นชฺชา เนรญฺชราย ตีเร อชปาลนิคฺโรเธ ปฐมาภิสมฺพุทฺโธ. อถ โข, อานนฺท, มาโร ปาปิมา เยนาหํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข, อานนฺท, มาโร ปาปิมา มํ เอตทโวจ – ‘ปรินิพฺพาตุทานิ, ภนฺเต, ภควา; ปรินิพฺพาตุ สุคโต, ปรินิพฺพานกาโลทานิ, ภนฺเต, ภควโต’ติ. เอวํ วุตฺเต อหํ, อานนฺท, มารํ ปาปิมนฺตํ เอตทโวจํ – १७५. आनंदा, एका समयी मी उरुवेलेमध्ये निरंजना नदीच्या तीरावर अजपाल वडाच्या झाडाखाली (अजपाल निग्रोध) नुकताच पूर्ण संबोधी प्राप्त (प्रथम अभिसंबुद्ध) झालेलो असताना विहरत होतो. तेव्हा, आनंदा, पापी मार माझ्याकडे आला आणि एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहून, आनंदा, पापी मार मला म्हणाला – 'भंते, आता भगवंतांनी परिनिर्वाण प्राप्त करावे; सुगतांनी परिनिर्वाण प्राप्त करावे. भंते, आता भगवंतांच्या परिनिर्वाणाची वेळ झाली आहे.' असे म्हटल्यावर, आनंदा, मी पापी माराला असे म्हणालो – ‘‘‘น ตาวาหํ, ปาปิม, ปรินิพฺพายิสฺสามิ, ยาว เม ภิกฺขู น สาวกา ภวิสฺสนฺติ วิยตฺตา วินีตา วิสารทา พหุสฺสุตา ธมฺมธรา ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺนา [Pg.95] สามีจิปฺปฏิปนฺนา อนุธมฺมจาริโน, สกํ อาจริยกํ อุคฺคเหตฺวา อาจิกฺขิสฺสนฺติ เทเสสฺสนฺติ ปญฺญเปสฺสนฺติ ปฏฺฐเปสฺสนฺติ วิวริสฺสนฺติ วิภชิสฺสนฺติ อุตฺตานีกริสฺสนฺติ, อุปฺปนฺนํ ปรปฺปวาทํ สหธมฺเมน สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา สปฺปาฏิหาริยํ ธมฺมํ เทเสสฺสนฺติ. ‘हे पापी मारा, तोपर्यंत मी परिनिर्वाण प्राप्त करणार नाही, जोपर्यंत माझे भिक्खू श्रावक हे कुशल, सुविनीत, विशारद, बहुश्रुत, धम्मधर, धम्मानुधम्मप्रतिपन्न, सामीचीप्रतिपन्न आणि अनुधम्मचारी होणार नाहीत; आणि जोपर्यंत ते आपल्या आचार्यांच्या सिद्धांताचे ग्रहण करून ते सांगणार नाहीत, उपदेश करणार नाहीत, प्रज्ञापित करणार नाहीत, प्रस्थापित करणार नाहीत, उघड करणार नाहीत, त्याचे विभाजन करून स्पष्ट करणार नाहीत; आणि उद्भवलेल्या पर-प्रवादांचे धम्मानुसार उत्तम प्रकारे खंडन करून प्रातिहार्ययुक्त धम्माचा उपदेश करणार नाहीत. ‘‘‘น ตาวาหํ, ปาปิม, ปรินิพฺพายิสฺสามิ, ยาว เม ภิกฺขุนิโย น สาวิกา ภวิสฺสนฺติ วิยตฺตา วินีตา วิสารทา พหุสฺสุตา ธมฺมธรา ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺนา สามีจิปฺปฏิปนฺนา อนุธมฺมจารินิโย, สกํ อาจริยกํ อุคฺคเหตฺวา อาจิกฺขิสฺสนฺติ เทเสสฺสนฺติ ปญฺญเปสฺสนฺติ ปฏฺฐเปสฺสนฺติ วิวริสฺสนฺติ วิภชิสฺสนฺติ อุตฺตานีกริสฺสนฺติ, อุปฺปนฺนํ ปรปฺปวาทํ สหธมฺเมน สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา สปฺปาฏิหาริยํ ธมฺมํ เทเสสฺสนฺติ. ‘हे पापी मारा, तोपर्यंत मी परिनिर्वाण प्राप्त करणार नाही, जोपर्यंत माझ्या भिक्खुणी श्राविका या कुशल, सुविनीत, विशारद, बहुश्रुत, धम्मधर, धम्मानुधम्मप्रतिपन्न, सामीचीप्रतिपन्न आणि अनुधम्मचारिणी होणार नाहीत; आणि जोपर्यंत त्या आपल्या आचार्यांच्या सिद्धांताचे ग्रहण करून ते सांगणार नाहीत, उपदेश करणार नाहीत, प्रज्ञापित करणार नाहीत, प्रस्थापित करणार नाहीत, उघड करणार नाहीत, त्याचे विभाजन करून स्पष्ट करणार नाहीत; आणि उद्भवलेल्या पर-प्रवादांचे धम्मानुसार उत्तम प्रकारे खंडन करून प्रातिहार्ययुक्त धम्माचा उपदेश करणार नाहीत. ‘‘‘น ตาวาหํ, ปาปิม, ปรินิพฺพายิสฺสามิ, ยาว เม อุปาสกา น สาวกา ภวิสฺสนฺติ วิยตฺตา วินีตา วิสารทา พหุสฺสุตา ธมฺมธรา ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺนา สามีจิปฺปฏิปนฺนา อนุธมฺมจาริโน, สกํ อาจริยกํ อุคฺคเหตฺวา อาจิกฺขิสฺสนฺติ เทเสสฺสนฺติ ปญฺญเปสฺสนฺติ ปฏฺฐเปสฺสนฺติ วิวริสฺสนฺติ วิภชิสฺสนฺติ อุตฺตานีกริสฺสนฺติ, อุปฺปนฺนํ ปรปฺปวาทํ สหธมฺเมน สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา สปฺปาฏิหาริยํ ธมฺมํ เทเสสฺสนฺติ. ‘हे पापी मारा, तोपर्यंत मी परिनिर्वाण प्राप्त करणार नाही, जोपर्यंत माझे उपासक श्रावक हे कुशल, सुविनीत, विशारद, बहुश्रुत, धम्मधर, धम्मानुधम्मप्रतिपन्न, सामीचीप्रतिपन्न आणि अनुधम्मचारी होणार नाहीत; आणि जोपर्यंत ते आपल्या आचार्यांच्या सिद्धांताचे ग्रहण करून ते सांगणार नाहीत, उपदेश करणार नाहीत, प्रज्ञापित करणार नाहीत, प्रस्थापित करणार नाहीत, उघड करणार नाहीत, त्याचे विभाजन करून स्पष्ट करणार नाहीत; आणि उद्भवलेल्या पर-प्रवादांचे धम्मानुसार उत्तम प्रकारे खंडन करून प्रातिहार्ययुक्त धम्माचा उपदेश करणार नाहीत. ‘‘‘น ตาวาหํ, ปาปิม, ปรินิพฺพายิสฺสามิ, ยาว เม อุปาสิกา น สาวิกา ภวิสฺสนฺติ วิยตฺตา วินีตา วิสารทา พหุสฺสุตา ธมฺมธรา ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺนา สามีจิปฺปฏิปนฺนา อนุธมฺมจารินิโย, สกํ อาจริยกํ อุคฺคเหตฺวา อาจิกฺขิสฺสนฺติ เทเสสฺสนฺติ ปญฺญเปสฺสนฺติ ปฏฺฐเปสฺสนฺติ วิวริสฺสนฺติ วิภชิสฺสนฺติ อุตฺตานีกริสฺสนฺติ, อุปฺปนฺนํ ปรปฺปวาทํ สหธมฺเมน สุนิคฺคหิตํ นิคฺคเหตฺวา สปฺปาฏิหาริยํ ธมฺมํ เทเสสฺสนฺติ. ‘हे पापी मारा, तोपर्यंत मी परिनिर्वाण प्राप्त करणार नाही, जोपर्यंत माझ्या उपासिका श्राविका या कुशल, सुविनीत, विशारद, बहुश्रुत, धम्मधर, धम्मानुधम्मप्रतिपन्न, सामीचीप्रतिपन्न आणि अनुधम्मचारिणी होणार नाहीत; आणि जोपर्यंत त्या आपल्या आचार्यांच्या सिद्धांताचे ग्रहण करून ते सांगणार नाहीत, उपदेश करणार नाहीत, प्रज्ञापित करणार नाहीत, प्रस्थापित करणार नाहीत, उघड करणार नाहीत, त्याचे विभाजन करून स्पष्ट करणार नाहीत; आणि उद्भवलेल्या पर-प्रवादांचे धम्मानुसार उत्तम प्रकारे खंडन करून प्रातिहार्ययुक्त धम्माचा उपदेश करणार नाहीत. ‘‘‘น ตาวาหํ, ปาปิม, ปรินิพฺพายิสฺสามิ, ยาว เม อิทํ พฺรหฺมจริยํ น อิทฺธญฺเจว ภวิสฺสติ ผีตญฺจ วิตฺถาริกํ พาหุชญฺญํ ปุถุภูตํ ยาว เทวมนุสฺเสหิ สุปฺปกาสิต’นฺติ. ‘हे पापी मारा, तोपर्यंत मी परिनिर्वाण प्राप्त करणार नाही, जोपर्यंत माझे हे ब्रह्मचर्य समृद्ध, संपन्न, विस्तृत, बहुजनमान्य, सर्वव्यापी आणि देव-मनुष्यांमध्ये उत्तम प्रकारे प्रकाशित होणार नाही.’ ๑๗๖. ‘‘อิทาเนว โข, อานนฺท, อชฺช จาปาเล เจติเย มาโร ปาปิมา เยนาหํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข, อานนฺท, มาโร ปาปิมา มํ เอตทโวจ – ‘ปรินิพฺพาตุทานิ, ภนฺเต, ภควา, ปรินิพฺพาตุ สุคโต, ปรินิพฺพานกาโลทานิ, ภนฺเต, ภควโต. ภาสิตา โข ปเนสา, ภนฺเต, ภควตา วาจา – ‘‘น ตาวาหํ, ปาปิม[Pg.96], ปรินิพฺพายิสฺสามิ, ยาว เม ภิกฺขู น สาวกา ภวิสฺสนฺติ…เป… ยาว เม ภิกฺขุนิโย น สาวิกา ภวิสฺสนฺติ…เป… ยาว เม อุปาสกา น สาวกา ภวิสฺสนฺติ…เป… ยาว เม อุปาสิกา น สาวิกา ภวิสฺสนฺติ…เป… ยาว เม อิทํ พฺรหฺมจริยํ น อิทฺธญฺเจว ภวิสฺสติ ผีตญฺจ วิตฺถาริกํ พาหุชญฺญํ ปุถุภูตํ, ยาว เทวมนุสฺเสหิ สุปฺปกาสิต’’นฺติ. เอตรหิ โข ปน, ภนฺเต, ภควโต พฺรหฺมจริยํ อิทฺธญฺเจว ผีตญฺจ วิตฺถาริกํ พาหุชญฺญํ ปุถุภูตํ, ยาว เทวมนุสฺเสหิ สุปฺปกาสิตํ. ปรินิพฺพาตุทานิ, ภนฺเต, ภควา, ปรินิพฺพาตุ สุคโต, ปรินิพฺพานกาโลทานิ, ภนฺเต, ภควโต’ติ. १७६. आनंदा, आजच नुकताच चापाल चैत्यामध्ये पापी मार माझ्याकडे आला आणि एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहून, आनंदा, पापी मार मला म्हणाला – 'भंते, आता भगवंतांनी परिनिर्वाण प्राप्त करावे, सुगतांनी परिनिर्वाण प्राप्त करावे. भंते, आता भगवंतांच्या परिनिर्वाणाची वेळ झाली आहे. भंते, भगवंतांनीच हे वचन म्हटले होते – "हे पापी मारा, तोपर्यंत मी परिनिर्वाण प्राप्त करणार नाही, जोपर्यंत माझे भिक्खू श्रावक... पे... जोपर्यंत माझ्या भिक्खुणी श्राविका... पे... जोपर्यंत माझे उपासक श्रावक... पे... जोपर्यंत माझ्या उपासिका श्राविका... पे... जोपर्यंत माझे हे ब्रह्मचर्य समृद्ध, संपन्न, विस्तृत, बहुजनमान्य, सर्वव्यापी आणि देव-मनुष्यांमध्ये उत्तम प्रकारे प्रकाशित होणार नाही." परंतु भंते, आता भगवंतांचे ब्रह्मचर्य समृद्ध, संपन्न, विस्तृत, बहुजनमान्य, सर्वव्यापी आणि देव-मनुष्यांमध्ये उत्तम प्रकारे प्रकाशित झाले आहे. भंते, आता भगवंतांनी परिनिर्वाण प्राप्त करावे, सुगतांनी परिनिर्वाण प्राप्त करावे. भंते, आता भगवंतांच्या परिनिर्वाणाची वेळ झाली आहे.' ๑๗๗. ‘‘เอวํ วุตฺเต, อหํ, อานนฺท, มารํ ปาปิมนฺตํ เอตทโวจํ – ‘อปฺโปสฺสุกฺโก ตฺวํ, ปาปิม, โหหิ, นจิรํ ตถาคตสฺส ปรินิพฺพานํ ภวิสฺสติ. อิโต ติณฺณํ มาสานํ อจฺจเยน ตถาคโต ปรินิพฺพายิสฺสตี’ติ. อิทาเนว โข, อานนฺท, อชฺช จาปาเล เจติเย ตถาคเตน สเตน สมฺปชาเนน อายุสงฺขาโร โอสฺสฏฺโฐ’’ติ. १७७. असे म्हटल्यावर, आनंदा, मी पापी माराला म्हणालो – 'हे पापी मारा, तू निश्चिंत राहा. लवकरच तथागतांचे परिनिर्वाण होईल. आजपासून तीन महिन्यांनंतर तथागत परिनिर्वाण प्राप्त करतील.' आनंदा, आजच नुकताच चापाल चैत्यामध्ये तथागतांनी स्मृतिमान व संप्रजन्ययुक्त होऊन आपल्या आयुषंस्काराचा त्याग केला आहे. อานนฺทยาจนกถา आनंदाच्या याचनेची कथा ๑๗๘. เอวํ วุตฺเต อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ติฏฺฐตุ, ภนฺเต, ภควา กปฺปํ, ติฏฺฐตุ สุคโต กปฺปํ พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสาน’’นฺติ. १७८. असे म्हटल्यावर, आयुष्यमान आनंदांनी भगवंतांना असे म्हटले – 'भंते, भगवंतांनी एका कल्पापर्यंत राहावे; सुगतांनी एका कल्पापर्यंत राहावे – बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेसाठी, देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी!' ‘‘อลํทานิ, อานนฺท. มา ตถาคตํ ยาจิ, อกาโลทานิ, อานนฺท, ตถาคตํ ยาจนายา’’ติ. ทุติยมฺปิ โข อายสฺมา อานนฺโท…เป… ตติยมฺปิ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ติฏฺฐตุ, ภนฺเต, ภควา กปฺปํ, ติฏฺฐตุ สุคโต กปฺปํ พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสาน’’นฺติ. "बस कर, आनंदा! आता तथागतांना अशी याचना करू नकोस. आनंदा, आता तथागतांना याचना करण्याची ही योग्य वेळ नाही." दुसऱ्यांदाही आणि तिसऱ्यांदाही आयुष्यमान आनंदांनी भगवंतांना असे म्हटले – "भंते, बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेपोटी, देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी भगवंतांनी एक कल्पपर्यंत राहावे, सुगतांनी एक कल्पपर्यंत राहावे." ‘‘สทฺทหสิ ตฺวํ, อานนฺท, ตถาคตสฺส โพธิ’’นฺติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ‘‘อถ กิญฺจรหิ ตฺวํ, อานนฺท, ตถาคตํ ยาวตติยกํ อภินิปฺปีเฬสี’’ติ? ‘‘สมฺมุขา เมตํ, ภนฺเต, ภควโต สุตํ สมฺมุขา ปฏิคฺคหิตํ – ‘ยสฺส กสฺสจิ, อานนฺท, จตฺตาโร อิทฺธิปาทา ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา, โส อากงฺขมาโน กปฺปํ วา ติฏฺเฐยฺย กปฺปาวเสสํ วา. ตถาคตสฺส โข, อานนฺท, จตฺตาโร อิทฺธิปาทา ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา. โส [Pg.97] อากงฺขมาโน, อานนฺท, ตถาคโต กปฺปํ วา ติฏฺเฐยฺย กปฺปาวเสสํ วา’’’ติ. ‘‘สทฺทหสิ ตฺวํ, อานนฺทา’’ติ? ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’. ‘‘ตสฺมาติหานนฺท, ตุยฺเหเวตํ ทุกฺกฏํ, ตุยฺเหเวตํ อปรทฺธํ, ยํ ตฺวํ ตถาคเตน เอวํ โอฬาริเก นิมิตฺเต กยิรมาเน โอฬาริเก โอภาเส กยิรมาเน นาสกฺขิ ปฏิวิชฺฌิตุํ, น ตถาคตํ ยาจิ – ‘ติฏฺฐตุ, ภนฺเต, ภควา กปฺปํ, ติฏฺฐตุ สุคโต กปฺปํ พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสาน’’นฺติ. สเจ ตฺวํ, อานนฺท, ตถาคตํ ยาเจยฺยาสิ, ทฺเวว เต วาจา ตถาคโต ปฏิกฺขิเปยฺย, อถ ตติยกํ อธิวาเสยฺย. ตสฺมาติหานนฺท, ตุยฺเหเวตํ ทุกฺกฏํ, ตุยฺเหเวตํ อปรทฺธํ. "आनंदा, तथागतांच्या बोधीवर तुझा विश्वास आहे का?" "होय, भंते." "तर मग, आनंदा, तू तथागतांना तीन वेळा याचना करून का त्रास दिलास?" "भंते, मी स्वतः भगवंतांच्या मुखातून हे ऐकले आहे, स्वतः त्यांच्याकडून ग्रहण केले आहे – 'आनंदा, ज्या कोणी चार ऋद्धिपाद विकसित केले आहेत, वारंवार अभ्यासले आहेत, वाहनासारखे बनवले आहेत, अधिष्ठानासारखे केले आहेत, दृढ केले आहेत, संचित केले आहेत आणि चांगल्या प्रकारे आरंभिले आहेत, तो इच्छेनुसार एक कल्प किंवा कल्पापेक्षा अधिक काळ राहू शकतो. आनंदा, तथागतांनी चार ऋद्धिपाद विकसित केले आहेत, वारंवार अभ्यासले आहेत, वाहनासारखे बनवले आहेत, अधिष्ठानासारखे केले आहेत, दृढ केले आहेत, संचित केले आहेत आणि चांगल्या प्रकारे आरंभिले आहेत. त्यामुळे, आनंदा, तथागत इच्छेनुसार एक कल्प किंवा कल्पापेक्षा अधिक काळ राहू शकतात.'" "आनंदा, तुझा यावर विश्वास आहे का?" "होय, भंते." "म्हणूनच, आनंदा, हा तुझाच दोष आहे, ही तुझीच चूक आहे, की तथागतांनी इतके स्पष्ट संकेत दिले असताना, इतका स्पष्ट प्रकाश दाखवला असतानाही, तू ते समजून घेऊ शकला नाहीस आणि तथागतांना अशी याचना केली नाहीस – 'भंते, बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेपोटी, देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी भगवंतांनी एक कल्पपर्यंत राहावे, सुगतांनी एक कल्पपर्यंत राहावे.' आनंदा, जर तू तथागतांना याचना केली असतीस, तर तथागतांनी तुझी विनंती दोनदा नाकारली असती, पण तिसऱ्यांदा ती स्वीकारली असती. म्हणूनच, आनंदा, हा तुझाच दोष आहे, ही तुझीच चूक आहे." ๑๗๙. ‘‘เอกมิทาหํ, อานนฺท, สมยํ ราชคเห วิหรามิ คิชฺฌกูเฏ ปพฺพเต. ตตฺราปิ โข ตาหํ, อานนฺท, อามนฺเตสึ – ‘รมณียํ, อานนฺท, ราชคหํ, รมณีโย, อานนฺท, คิชฺฌกูโฏ ปพฺพโต. ยสฺส กสฺสจิ, อานนฺท, จตฺตาโร อิทฺธิปาทา ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา, โส อากงฺขมาโน กปฺปํ วา ติฏฺเฐยฺย กปฺปาวเสสํ วา. ตถาคตสฺส โข, อานนฺท, จตฺตาโร อิทฺธิปาทา ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา, โส อากงฺขมาโน, อานนฺท, ตถาคโต กปฺปํ วา ติฏฺเฐยฺย กปฺปาวเสสํ วา’ติ. เอวมฺปิ โข ตฺวํ, อานนฺท, ตถาคเตน โอฬาริเก นิมิตฺเต กยิรมาเน โอฬาริเก โอภาเส กยิรมาเน นาสกฺขิ ปฏิวิชฺฌิตุํ, น ตถาคตํ ยาจิ – ‘ติฏฺฐตุ, ภนฺเต, ภควา กปฺปํ, ติฏฺฐตุ สุคโต กปฺปํ พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสาน’นฺติ. สเจ ตฺวํ, อานนฺท, ตถาคตํ ยาเจยฺยาสิ, ทฺเว เต วาจา ตถาคโต ปฏิกฺขิเปยฺย, อถ ตติยกํ อธิวาเสยฺย. ตสฺมาติหานนฺท, ตุยฺเหเวตํ ทุกฺกฏํ, ตุยฺเหเวตํ อปรทฺธํ. १७९. "आनंदा, एका वेळी मी राजगृह येथे गृध्रकूट पर्वतावर विहार करत होतो. तिथेही, आनंदा, मी तुला म्हटले होते – 'आनंदा, राजगृह रमणीय आहे, आनंदा, गृध्रकूट पर्वत रमणीय आहे. आनंदा, ज्या कोणी चार ऋद्धिपाद विकसित केले आहेत, वारंवार अभ्यासले आहेत, वाहनासारखे बनवले आहेत, अधिष्ठानासारखे केले आहेत, दृढ केले आहेत, संचित केले आहेत आणि चांगल्या प्रकारे आरंभिले आहेत, तो इच्छेनुसार एक कल्प किंवा कल्पापेक्षा अधिक काळ राहू शकतो. तथागतांनी, आनंदा, चार ऋद्धिपाद विकसित केले आहेत, वारंवार अभ्यासले आहेत, वाहनासारखे बनवले आहेत, अधिष्ठानासारखे केले आहेत, दृढ केले आहेत, संचित केले आहेत आणि चांगल्या प्रकारे आरंभिले आहेत. त्यामुळे, आनंदा, तथागत इच्छेनुसार एक कल्प किंवा कल्पापेक्षा अधिक काळ राहू शकतात.' असे असूनही, आनंदा, तथागतांनी इतके स्पष्ट संकेत दिले असताना, इतका स्पष्ट प्रकाश दाखवला असतानाही, तू ते समजून घेऊ शकला नाहीस आणि तथागतांना अशी याचना केली नाहीस – 'भंते, बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेपोटी, देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी भगवंतांनी एक कल्पपर्यंत राहावे, सुगतांनी एक कल्पपर्यंत राहावे.' आनंदा, जर तू तथागतांना याचना केली असतीस, तर तथागतांनी तुझी विनंती दोनदा नाकारली असती, पण तिसऱ्यांदा ती स्वीकारली असती. म्हणूनच, आनंदा, हा तुझाच दोष आहे, ही तुझीच चूक आहे." ๑๘๐. ‘‘เอกมิทาหํ, อานนฺท, สมยํ ตตฺเถว ราชคเห วิหรามิ โคตมนิคฺโรเธ…เป… ตตฺเถว ราชคเห วิหรามิ โจรปปาเต… ตตฺเถว ราชคเห วิหรามิ เวภารปสฺเส สตฺตปณฺณิคุหายํ… ตตฺเถว ราชคเห วิหรามิ อิสิคิลิปสฺเส กาฬสิลายํ… ตตฺเถว ราชคเห วิหรามิ สีตวเน สปฺปโสณฺฑิกปพฺภาเร… ตตฺเถว ราชคเห วิหรามิ ตโปทาราเม… ตตฺเถว ราชคเห วิหรามิ เวฬุวเน กลนฺทกนิวาเป… ตตฺเถว ราชคเห วิหรามิ ชีวกมฺพวเน… ตตฺเถว ราชคเห วิหรามิ มทฺทกุจฺฉิสฺมึ มิคทาเย [Pg.98] ตตฺราปิ โข ตาหํ, อานนฺท, อามนฺเตสึ – ‘รมณียํ, อานนฺท, ราชคหํ, รมณีโย คิชฺฌกูโฏ ปพฺพโต, รมณีโย โคตมนิคฺโรโธ, รมณีโย โจรปปาโต, รมณียา เวภารปสฺเส สตฺตปณฺณิคุหา, รมณียา อิสิคิลิปสฺเส กาฬสิลา, รมณีโย สีตวเน สปฺปโสณฺฑิกปพฺภาโร, รมณีโย ตโปทาราโม, รมณีโย เวฬุวเน กลนฺทกนิวาโป, รมณียํ ชีวกมฺพวนํ, รมณีโย มทฺทกุจฺฉิสฺมึ มิคทาโย. ยสฺส กสฺสจิ, อานนฺท, จตฺตาโร อิทฺธิปาทา ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา…เป… อากงฺขมาโน, อานนฺท, ตถาคโต กปฺปํ วา ติฏฺเฐยฺย กปฺปาวเสสํ วา’ติ. เอวมฺปิ โข ตฺวํ, อานนฺท, ตถาคเตน โอฬาริเก นิมิตฺเต กยิรมาเน โอฬาริเก โอภาเส กยิรมาเน นาสกฺขิ ปฏิวิชฺฌิตุํ, น ตถาคตํ ยาจิ – ‘ติฏฺฐตุ, ภนฺเต, ภควา กปฺปํ, ติฏฺฐตุ สุคโต กปฺปํ พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสาน’นฺติ. สเจ ตฺวํ, อานนฺท, ตถาคตํ ยาเจยฺยาสิ, ทฺเวว เต วาจา ตถาคโต ปฏิกฺขิเปยฺย, อถ ตติยกํ อธิวาเสยฺย. ตสฺมาติหานนฺท, ตุยฺเหเวตํ ทุกฺกฏํ, ตุยฺเหเวตํ อปรทฺธํ. १८०. "आनंदा, एका वेळी मी त्याच राजगृहात गोतम-न्यग्रोध येथे विहार करत होतो... तसेच राजगृहात चोरप्रपात येथे विहार करत होतो... तसेच राजगृहात वैभार पर्वताच्या कुशीत असलेल्या सप्तपर्णी गुहेत विहार करत होतो... तसेच राजगृहात ऋषिगिरी पर्वताच्या कुशीत असलेल्या काळशिलेवर विहार करत होतो... तसेच राजगृहात शीतवनातील सर्पशौंडिक पर्वताच्या कपारीत विहार करत होतो... तसेच राजगृहात तपोदाराम येथे विहार करत होतो... तसेच राजगृहात वेणूवनातील कलंदकनिवाप येथे विहार करत होतो... तसेच राजगृहात जीवक-आम्रवनात विहार करत होतो... तसेच राजगृहात मद्दकुच्छी येथील मृगदायात विहार करत होतो. तिथेही, आनंदा, मी तुला म्हटले होते – 'आनंदा, राजगृह रमणीय आहे, गृध्रकूट पर्वत रमणीय आहे, गोतम-न्यग्रोध रमणीय आहे, चोरप्रपात रमणीय आहे, वैभार पर्वताच्या कुशीतील सप्तपर्णी गुहा रमणीय आहे, ऋषिगिरी पर्वताच्या कुशीतील काळशिला रमणीय आहे, शीतवनातील सर्पशौंडिक पर्वताची कपार रमणीय आहे, तपोदाराम रमणीय आहे, वेणूवनातील कलंदकनिवाप रमणीय आहे, जीवक-आम्रवन रमणीय आहे, मद्दकुच्छी येथील मृगदाय रमणीय आहे. आनंदा, ज्या कोणी चार ऋद्धिपाद विकसित केले आहेत, वारंवार अभ्यासले आहेत, वाहनासारखे बनवले आहेत, अधिष्ठानासारखे केले आहेत, दृढ केले आहेत, संचित केले आहेत आणि चांगल्या प्रकारे आरंभिले आहेत... तर आनंदा, तथागत इच्छेनुसार एक कल्प किंवा कल्पापेक्षा अधिक काळ राहू शकतात.' असे असूनही, आनंदा, तथागतांनी इतके स्पष्ट संकेत दिले असताना, इतका स्पष्ट प्रकाश दाखवला असतानाही, तू ते समजून घेऊ शकला नाहीस आणि तथागतांना अशी याचना केली नाहीस – 'भंते, बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेपोटी, देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी भगवंतांनी एक कल्पपर्यंत राहावे, सुगतांनी एक कल्पपर्यंत राहावे.' आनंदा, जर तू तथागतांना याचना केली असतीस, तर तथागतांनी तुझी विनंती दोनदा नाकारली असती, पण तिसऱ्यांदा ती स्वीकारली असती. म्हणूनच, आनंदा, हा तुझाच दोष आहे, ही तुझीच चूक आहे." ๑๘๑. ‘‘เอกมิทาหํ, อานนฺท, สมยํ อิเธว เวสาลิยํ วิหรามิ อุเทเน เจติเย. ตตฺราปิ โข ตาหํ, อานนฺท, อามนฺเตสึ – ‘รมณียา, อานนฺท, เวสาลี, รมณียํ อุเทนํ เจติยํ. ยสฺส กสฺสจิ, อานนฺท, จตฺตาโร อิทฺธิปาทา ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา, โส อากงฺขมาโน กปฺปํ วา ติฏฺเฐยฺย กปฺปาวเสสํ วา. ตถาคตสฺส โข, อานนฺท, จตฺตาโร อิทฺธิปาทา ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา, โส อากงฺขมาโน, อานนฺท, ตถาคโต กปฺปํ วา ติฏฺเฐยฺย กปฺปาวเสสํ วา’ติ. เอวมฺปิ โข ตฺวํ, อานนฺท, ตถาคเตน โอฬาริเก นิมิตฺเต กยิรมาเน โอฬาริเก โอภาเส กยิรมาเน นาสกฺขิ ปฏิวิชฺฌิตุํ, น ตถาคตํ ยาจิ – ‘ติฏฺฐตุ, ภนฺเต, ภควา กปฺปํ, ติฏฺฐตุ สุคโต กปฺปํ พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสาน’นฺติ. สเจ ตฺวํ, อานนฺท, ตถาคตํ ยาเจยฺยาสิ, ทฺเวว เต วาจา ตถาคโต ปฏิกฺขิเปยฺย, อถ ตติยกํ อธิวาเสยฺย, ตสฺมาติหานนฺท, ตุยฺเหเวตํ ทุกฺกฏํ, ตุยฺเหเวตํ อปรทฺธํ. १८१. आनंदा, एका वेळी मी याच वैशालीमध्ये उदेन चैत्यात विहार करत होतो. तिथेही मी तुला म्हटले होते—'आनंदा, वैशाली रमणीय आहे, उदेन चैत्य रमणीय आहे. आनंदा, ज्या कोणाही व्यक्तीने चार इद्धिपाद भावित केले आहेत, बहुलीकृत केले आहेत, यानीकृत (वाहनासारखे) केले आहेत, वत्थुकृत (अधिष्ठानासारखे) केले आहेत, अनुष्ठित केले आहेत, परिचित केले आहेत, सुसमारब्ध केले आहेत, ती व्यक्ती इच्छेनुसार एक कल्प किंवा कल्पापेक्षा अधिक काळ जिवंत राहू शकते. आनंदा, तथागताने चार इद्धिपाद भावित केले आहेत, बहुलीकृत केले आहेत, यानीकृत केले आहेत, वत्थुकृत केले आहेत, अनुष्ठित केले आहेत, परिचित केले आहेत, सुसमारब्ध केले आहेत. आनंदा, तथागत इच्छेनुसार एक कल्प किंवा कल्पापेक्षा अधिक काळ जिवंत राहू शकतात.' तरीही, आनंदा, तथागतांनी एवढा स्पष्ट संकेत दिला असताना, स्पष्ट प्रकाश दाखवला असतानाही तुला ते समजले नाही. तू तथागतांना अशी विनंती केली नाहीस—'भंते, भगवान बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेसाठी, देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी एक कल्पपर्यंत जिवंत राहोत; सुगत एक कल्पपर्यंत जिवंत राहोत.' आनंदा, जर तू तथागतांना विनंती केली असतीस, तर तथागत तुझी विनंती दोनदा नाकारून तिसऱ्यांदा ती स्वीकारू शकले असते. म्हणून, आनंदा, ही तुझीच चूक आहे, हा तुझाच अपराध आहे. ๑๘๒. ‘‘เอกมิทาหํ[Pg.99], อานนฺท, สมยํ อิเธว เวสาลิยํ วิหรามิ โคตมเก เจติเย …เป… อิเธว เวสาลิยํ วิหรามิ สตฺตมฺเพ เจติเย… อิเธว เวสาลิยํ วิหรามิ พหุปุตฺเต เจติเย… อิเธว เวสาลิยํ วิหรามิ สารนฺทเท เจติเย… อิทาเนว โข ตาหํ, อานนฺท, อชฺช จาปาเล เจติเย อามนฺเตสึ – ‘รมณียา, อานนฺท, เวสาลี, รมณียํ อุเทนํ เจติยํ, รมณียํ โคตมกํ เจติยํ, รมณียํ สตฺตมฺพํ เจติยํ, รมณียํ พหุปุตฺตํ เจติยํ, รมณียํ สารนฺททํ เจติยํ, รมณียํ จาปาลํ เจติยํ. ยสฺส กสฺสจิ, อานนฺท, จตฺตาโร อิทฺธิปาทา ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา, โส อากงฺขมาโน กปฺปํ วา ติฏฺเฐยฺย กปฺปาวเสสํ วา. ตถาคตสฺส โข, อานนฺท, จตฺตาโร อิทฺธิปาทา ภาวิตา พหุลีกตา ยานีกตา วตฺถุกตา อนุฏฺฐิตา ปริจิตา สุสมารทฺธา, โส อากงฺขมาโน, อานนฺท, ตถาคโต กปฺปํ วา ติฏฺเฐยฺย กปฺปาวเสสํ วา’ติ. เอวมฺปิ โข ตฺวํ, อานนฺท, ตถาคเตน โอฬาริเก นิมิตฺเต กยิรมาเน โอฬาริเก โอภาเส กยิรมาเน นาสกฺขิ ปฏิวิชฺฌิตุํ, น ตถาคตํ ยาจิ – ‘ติฏฺฐตุ ภควา กปฺปํ, ติฏฺฐตุ สุคโต กปฺปํ พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสาน’นฺติ. สเจ ตฺวํ, อานนฺท, ตถาคตํ ยาเจยฺยาสิ, ทฺเวว เต วาจา ตถาคโต ปฏิกฺขิเปยฺย, อถ ตติยกํ อธิวาเสยฺย. ตสฺมาติหานนฺท, ตุยฺเหเวตํ ทุกฺกฏํ, ตุยฺเหเวตํ อปรทฺธํ. १८२. आनंदा, एका वेळी मी याच वैशालीमध्ये गोतमक चैत्यात विहार करत होतो... याच वैशालीमध्ये सत्तम्ब चैत्यात विहार करत होतो... याच वैशालीमध्ये बहुपुत्त चैत्यात विहार करत होतो... याच वैशालीमध्ये सारंदद चैत्यात विहार करत होतो... आनंदा, आजच मी तुला चापाल चैत्यात असताना म्हटले होते—'आनंदा, वैशाली रमणीय आहे, उदेन चैत्य रमणीय आहे, गोतमक चैत्य रमणीय आहे, सत्तम्ब चैत्य रमणीय आहे, बहुपुत्त चैत्य रमणीय आहे, सारंदद चैत्य रमणीय आहे, चापाल चैत्य रमणीय आहे. आनंदा, ज्या कोणाही व्यक्तीने चार इद्धिपाद भावित केले आहेत, बहुलीकृत केले आहेत, यानीकृत केले आहेत, वत्थुकृत केले आहेत, अनुष्ठित केले आहेत, परिचित केले आहेत, सुसमारब्ध केले आहेत, ती व्यक्ती इच्छेनुसार एक कल्प किंवा कल्पापेक्षा अधिक काळ जिवंत राहू शकते. आनंदा, तथागताने चार इद्धिपाद भावित केले आहेत, बहुलीकृत केले आहेत, यानीकृत केले आहेत, वत्थुकृत केले आहेत, अनुष्ठित केले आहेत, परिचित केले आहेत, सुसमारब्ध केले आहेत. आनंदा, तथागत इच्छेनुसार एक कल्प किंवा कल्पापेक्षा अधिक काळ जिवंत राहू शकतात.' तरीही, आनंदा, तथागतांनी एवढा स्पष्ट संकेत दिला असताना, स्पष्ट प्रकाश दाखवला असतानाही तुला ते समजले नाही. तू तथागतांना अशी विनंती केली नाहीस—'भगवान बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेसाठी, देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी एक कल्पपर्यंत जिवंत राहोत; सुगत एक कल्पपर्यंत जिवंत राहोत.' आनंदा, जर तू तथागतांना विनंती केली असतीस, तर तथागत तुझी विनंती दोनदा नाकारून तिसऱ्यांदा ती स्वीकारू शकले असते. म्हणून, आनंदा, ही तुझीच चूक आहे, हा तुझाच अपराध आहे. ๑๘๓. ‘‘นนุ เอตํ, อานนฺท, มยา ปฏิกจฺเจว อกฺขาตํ – ‘สพฺเพเหว ปิเยหิ มนาเปหิ นานาภาโว วินาภาโว อญฺญถาภาโว. ตํ กุเตตฺถ, อานนฺท, ลพฺภา, ยํ ตํ ชาตํ ภูตํ สงฺขตํ ปโลกธมฺมํ, ตํ วต มา ปลุชฺชีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ’. ยํ โข ปเนตํ, อานนฺท, ตถาคเตน จตฺตํ วนฺตํ มุตฺตํ ปหีนํ ปฏินิสฺสฏฺฐํ โอสฺสฏฺโฐ อายุสงฺขาโร, เอกํเสน วาจา ภาสิตา – ‘น จิรํ ตถาคตสฺส ปรินิพฺพานํ ภวิสฺสติ. อิโต ติณฺณํ มาสานํ อจฺจเยน ตถาคโต ปรินิพฺพายิสฺสตี’ติ. ตญฺจ ตถาคโต ชีวิตเหตุ ปุน ปจฺจาวมิสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. อายามานนฺท, เยน มหาวนํ กูฏาคารสาลา เตนุปสงฺกมิสฺสามา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข [Pg.100] อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. १८३. आनंदा, मी आधीच हे सांगितले नव्हते का—'सर्व प्रिय आणि मनपसंत गोष्टींपासून वेगळे होणे, दुरावणे आणि बदलणे अपरिहार्य आहे. आनंदा, जे काही उत्पन्न झाले आहे, अस्तित्वात आले आहे, संखत (संस्कारित) आहे, नाशवंत स्वभावाचे आहे, ते नष्ट होऊ नये, असे कसे घडू शकेल? अशी कोणतीही शक्यता नाही.' आनंदा, तथागतांनी ज्या आयुष्य-संस्काराचा त्याग केला आहे, ओकून टाकला आहे, मुक्त केला आहे, प्रहीन केला आहे, पूर्णपणे सोडून दिला आहे, आणि निश्चितपणे असे वचन दिले आहे की—'लवकरच तथागतांचे परिनिर्वाण होईल. आजपासून तीन महिन्यांनंतर तथागत परिनिर्वाण पावतील.' तथागतांनी केवळ जगण्याच्या हेतूने तो त्यागलेला आयुष्य-संस्कार पुन्हा मागे घ्यावा, हे शक्य नाही. चल आनंदा, आपण महावनातील कूटागारशाळेकडे जाऊया." "तसेच असो, भंते," असे आयुष्मान आनंदाने भगवंतांना उत्तर दिले. อถ โข ภควา อายสฺมตา อานนฺเทน สทฺธึ เยน มหาวนํ กูฏาคารสาลา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘คจฺฉ ตฺวํ, อานนฺท, ยาวติกา ภิกฺขู เวสาลึ อุปนิสฺสาย วิหรนฺติ, เต สพฺเพ อุปฏฺฐานสาลายํ สนฺนิปาเตหี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา ยาวติกา ภิกฺขู เวสาลึ อุปนิสฺสาย วิหรนฺติ, เต สพฺเพ อุปฏฺฐานสาลายํ สนฺนิปาเตตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สนฺนิปติโต, ภนฺเต, ภิกฺขุสงฺโฆ, ยสฺสทานิ, ภนฺเต, ภควา กาลํ มญฺญตี’’ติ. त्यानंतर भगवान आयुष्मान आनंदासह महावनातील कूटागारशाळेकडे गेले. तिथे पोहोचल्यावर त्यांनी आयुष्मान आनंदाला सांगितले—"जा आनंदा, वैशालीच्या परिसरात राहणारे जेवढे भिक्खू आहेत, त्या सर्वांना उपस्थानशाळेत एकत्र कर." "तसेच असो, भंते," असे आयुष्मान आनंदाने भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार करून, वैशालीच्या परिसरात राहणाऱ्या सर्व भिक्खूंना उपस्थानशाळेत एकत्र केले. त्यानंतर ते भगवंतांकडे गेले आणि भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला उभे राहिले. एका बाजूला उभे राहून आयुष्मान आनंद भगवंतांना म्हणाले—"भंते, भिक्खू संघ एकत्र आला आहे. आता भगवंतांना जी योग्य वेळ वाटेल, त्यानुसार त्यांनी करावे." ๑๘๔. อถ โข ภควา เยนุปฏฺฐานสาลา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. นิสชฺช โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ตสฺมาติห, ภิกฺขเว, เย เต มยา ธมฺมา อภิญฺญา เทสิตา, เต โว สาธุกํ อุคฺคเหตฺวา อาเสวิตพฺพา ภาเวตพฺพา พหุลีกาตพฺพา, ยถยิทํ พฺรหฺมจริยํ อทฺธนิยํ อสฺส จิรฏฺฐิติกํ, ตทสฺส พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. กตเม จ เต, ภิกฺขเว, ธมฺมา มยา อภิญฺญา เทสิตา, เย โว สาธุกํ อุคฺคเหตฺวา อาเสวิตพฺพา ภาเวตพฺพา พหุลีกาตพฺพา, ยถยิทํ พฺรหฺมจริยํ อทฺธนิยํ อสฺส จิรฏฺฐิติกํ, ตทสฺส พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. เสยฺยถิทํ – จตฺตาโร สติปฏฺฐานา จตฺตาโร สมฺมปฺปธานา จตฺตาโร อิทฺธิปาทา ปญฺจินฺทฺริยานิ ปญฺจ พลานิ สตฺต โพชฺฌงฺคา อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค. อิเม โข เต, ภิกฺขเว, ธมฺมา มยา อภิญฺญา เทสิตา, เย โว สาธุกํ อุคฺคเหตฺวา อาเสวิตพฺพา ภาเวตพฺพา พหุลีกาตพฺพา, ยถยิทํ พฺรหฺมจริยํ อทฺธนิยํ อสฺส จิรฏฺฐิติกํ, ตทสฺส พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสาน’’นฺติ. १८४. त्यानंतर भगवान जेथे उपस्थानशाळा (सभागृह) होती, तेथे गेले; आणि तेथे गेल्यावर मांडलेल्या आसनावर बसले. बसल्यानंतर भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – "म्हणूनच, भिक्खूंनो, जे धर्म मी स्वतः विशेष ज्ञानाने (अभिज्ञा) जाणले आहेत आणि उपदेशिले आहेत, ते तुम्ही चांगल्या प्रकारे ग्रहण करून, त्यांचे आचरण केले पाहिजे, त्यांची भावना केली पाहिजे आणि त्यांचा वारंवार सराव केला पाहिजे; जेणेकरून हे ब्रह्मचर्य दीर्घकाळ टिकणारे आणि चिरस्थायी होईल, आणि ते बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेसाठी, तसेच देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी ठरेल. आणि भिक्खूंनो, माझ्याद्वारे विशेष ज्ञानाने उपदेशिलेले ते कोणते धर्म आहेत, जे तुम्ही चांगल्या प्रकारे ग्रहण करून, आचरण करून, भावना करून आणि वारंवार सराव करून हे ब्रह्मचर्य दीर्घकाळ टिकणारे आणि चिरस्थायी केले पाहिजे, जे बहुजनहिताय, बहुजनसुखाय, लोकानुकंपाय, देव-मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी ठरेल? ते खालीलप्रमाणे आहेत – चार सतिपट्ठान (स्मृतीचे प्रस्थान), चार सम्मप्पधान (सम्यक प्रयत्न), चार इद्धिपाद (ऋद्धिपाद), पाच इंद्रिये, पाच बळे, सात बोज्झंग (बोध्यंग) आणि आर्य अष्टांगिक मार्ग. भिक्खूंनो, हेच ते धर्म आहेत जे माझ्याद्वारे विशेष ज्ञानाने उपदेशिले गेले आहेत, जे तुम्ही चांगल्या प्रकारे ग्रहण करून, आचरण करून, भावना करून आणि वारंवार सराव करून हे ब्रह्मचर्य दीर्घकाळ टिकणारे आणि चिरस्थायी केले पाहिजे, जे बहुजनहिताय, बहुजनसुखाय, लोकानुकंपाय, देव-मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी ठरेल." ๑๘๕. อถ โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘หนฺททานิ, ภิกฺขเว, อามนฺตยามิ โว, วยธมฺมา สงฺขารา, อปฺปมาเทน สมฺปาเทถ. นจิรํ ตถาคตสฺส [Pg.101] ปรินิพฺพานํ ภวิสฺสติ. อิโต ติณฺณํ มาสานํ อจฺจเยน ตถาคโต ปรินิพฺพายิสฺสตี’’ติ. อิทมโวจ ภควา, อิทํ วตฺวาน สุคโต อถาปรํ เอตทโวจ สตฺถา. – १८५. त्यानंतर भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – "चला तर मग, भिक्खूंनो, आता मी तुम्हाला सांगतो – सर्व संस्कार (उत्पन्न झालेल्या गोष्टी) नाशवंत स्वभावाचे आहेत, अप्रमादाने (जागृत राहून) आपले ध्येय साध्य करा. लवकरच तथागतांचे परिनिर्वाण होईल. आजपासून तीन महिन्यांच्या समाप्तीनंतर तथागत परिनिर्वाण पावतील." भगवंत असे म्हणाले. हे बोलून सुगत आणि शास्त्यांनी पुढे असे म्हटले – ‘‘ปริปกฺโก วโย มยฺหํ, ปริตฺตํ มม ชีวิตํ; ปหาย โว คมิสฺสามิ, กตํ เม สรณมตฺตโน. "माझे वय आता पिकले (वृद्ध झाले) आहे, माझे आयुष्य थोडेच उरले आहे. तुम्हाला सोडून मी जाईन, मी स्वतःचा आश्रय (शरण) स्वतःच तयार केला आहे." ‘‘อปฺปมตฺตา สตีมนฺโต, สุสีลา โหถ ภิกฺขโว; สุสมาหิตสงฺกปฺปา, สจิตฺตมนุรกฺขถ. "भिक्खूंनो, अप्रमादी (जागृत), स्मृतिमान आणि सुशिल व्हा. आपले संकल्प सुसमाहित (एकाग्र) करून स्वतःच्या चित्ताचे रक्षण करा." ‘‘โย อิมสฺมึ ธมฺมวินเย, อปฺปมตฺโต วิหสฺสติ; ปหาย ชาติสํสารํ, ทุกฺขสฺสนฺตํ กริสฺสตี’’ติ. "जो या धम्म आणि विनयामध्ये अप्रमादी राहून आचरण करेल, तो जन्म-मरणाच्या संसाराचा त्याग करून दुःखाचा अंत करेल." ตติโย ภาณวาโร. तिसरा भाणवार समाप्त. นาคาปโลกิตํ नागापलोकित (हत्तीप्रमाणे वळून पाहणे) ๑๘๖. อถ โข ภควา ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย เวสาลึ ปิณฺฑาย ปาวิสิ. เวสาลิยํ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฺปฏิกฺกนฺโต นาคาปโลกิตํ เวสาลึ อปโลเกตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘อิทํ ปจฺฉิมกํ, อานนฺท, ตถาคตสฺส เวสาลิยา ทสฺสนํ ภวิสฺสติ. อายามานนฺท, เยน ภณฺฑคาโม เตนุปสงฺกมิสฺสามา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. १८६. त्यानंतर भगवान सकाळच्या वेळी चिवर परिधान करून, पात्र आणि चिवर घेऊन वैशालीमध्ये पिंडपातासाठी (भिक्षेसाठी) प्रवेश करते झाले. वैशालीमध्ये भिक्षेसाठी फिरून आल्यावर, भोजनोत्तर पिंडपाताहून परतताना, भगवंतांनी हत्तीप्रमाणे संपूर्ण शरीराने वळून (नागापलोकित) वैशालीकडे पाहिले आणि आयुष्यमान आनंदाला संबोधित केले – "आनंदा, तथागतांचे वैशालीचे हे अंतिम दर्शन असेल. चल आनंदा, आपण जेथे भंडगाम आहे, तेथे जाऊ या." "तसेच असो, भंते," असे म्हणून आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांच्या वचनाला संमती दिली. อถ [Pg.102] โข ภควา มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ เยน ภณฺฑคาโม ตทวสริ. ตตฺร สุทํ ภควา ภณฺฑคาเม วิหรติ. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘จตุนฺนํ, ภิกฺขเว, ธมฺมานํ อนนุโพธา อปฺปฏิเวธา เอวมิทํ ทีฆมทฺธานํ สนฺธาวิตํ สํสริตํ มมญฺเจว ตุมฺหากญฺจ. กตเมสํ จตุนฺนํ? อริยสฺส, ภิกฺขเว, สีลสฺส อนนุโพธา อปฺปฏิเวธา เอวมิทํ ทีฆมทฺธานํ สนฺธาวิตํ สํสริตํ มมํ เจว ตุมฺหากญฺจ. อริยสฺส, ภิกฺขเว, สมาธิสฺส อนนุโพธา อปฺปฏิเวธา เอวมิทํ ทีฆมทฺธานํ สนฺธาวิตํ สํสริตํ มมํ เจว ตุมฺหากญฺจ. อริยาย, ภิกฺขเว, ปญฺญาย อนนุโพธา อปฺปฏิเวธา เอวมิทํ ทีฆมทฺธานํ สนฺธาวิตํ สํสริตํ มมํ เจว ตุมฺหากญฺจ. อริยาย, ภิกฺขเว, วิมุตฺติยา อนนุโพธา อปฺปฏิเวธา เอวมิทํ ทีฆมทฺธานํ สนฺธาวิตํ สํสริตํ มมํ เจว ตุมฺหากญฺจ. ตยิทํ, ภิกฺขเว, อริยํ สีลํ อนุพุทฺธํ ปฏิวิทฺธํ, อริโย สมาธิ อนุพุทฺโธ ปฏิวิทฺโธ, อริยา ปญฺญา อนุพุทฺธา ปฏิวิทฺธา, อริยา วิมุตฺติ อนุพุทฺธา ปฏิวิทฺธา, อุจฺฉินฺนา ภวตณฺหา, ขีณา ภวเนตฺติ, นตฺถิ ทานิ ปุนพฺภโว’’ติ. อิทมโวจ ภควา, อิทํ วตฺวาน สุคโต อถาปรํ เอตทโวจ สตฺถา – त्यानंतर भगवान मोठ्या भिक्खू संघासह जेथे भंडगाम होते, तेथे पोहोचले. तेथे भगवान भंडगाममध्ये विहार करू लागले. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – "भिक्खूंनो, चार धर्मांचे आकलन न झाल्यामुळे आणि त्यांचा वेध (साक्षात्कार) न घेतल्यामुळे, मला आणि तुम्हालाही या दीर्घ संसारात वारंवार भटकावे लागले आहे आणि संसरण करावे लागले आहे. कोणत्या चार धर्मांचे? भिक्खूंनो, आर्य शीलाचे आकलन न झाल्यामुळे आणि वेध न घेतल्यामुळे, मला आणि तुम्हाला या दीर्घ संसारात वारंवार भटकावे लागले आहे आणि संसरण करावे लागले आहे. भिक्खूंनो, आर्य समाधीचे आकलन न झाल्यामुळे आणि वेध न घेतल्यामुळे, मला आणि तुम्हाला या दीर्घ संसारात वारंवार भटकावे लागले आहे आणि संसरण करावे लागले आहे. भिक्खूंनो, आर्य प्रज्ञेचे आकलन न झाल्यामुळे आणि वेध न घेतल्यामुळे, मला आणि तुम्हाला या दीर्घ संसारात वारंवार भटकावे लागले आहे आणि संसरण करावे लागले आहे. भिक्खूंनो, आर्य विमुक्तीचे आकलन न झाल्यामुळे आणि वेध न घेतल्यामुळे, मला आणि तुम्हाला या दीर्घ संसारात वारंवार भटकावे लागले आहे आणि संसरण करावे लागले आहे. भिक्खूंनो, आता ते आर्य शील जाणले गेले आहे आणि त्याचा वेध घेतला गेला आहे; आर्य समाधी जाणली गेली आहे आणि तिचा वेध घेतला गेला आहे; आर्य प्रज्ञा जाणली गेली आहे आणि तिचा वेध घेतला गेला आहे; आर्य विमुक्ती जाणली गेली आहे आणि तिचा वेध घेतला गेला आहे. भव-तृष्णा समूळ नष्ट झाली आहे, भव-बंधन (भवनेत्ती) क्षीण झाले आहे, आता पुन्हा जन्म नाही." भगवंत असे म्हणाले. हे बोलून सुगत आणि शास्त्यांनी पुढे असे म्हटले – ‘‘สีลํ สมาธิ ปญฺญา จ, วิมุตฺติ จ อนุตฺตรา; อนุพุทฺธา อิเม ธมฺมา, โคตเมน ยสสฺสินา. "शील, समाधी, प्रज्ञा आणि अनुत्तर (सर्वश्रेष्ठ) विमुक्ती – या धर्मांचे यशस्वी गोतमाने (बुद्धाने) पूर्ण आकलन केले आहे." ‘‘อิติ พุทฺโธ อภิญฺญาย, ธมฺมมกฺขาสิ ภิกฺขุนํ; ทุกฺขสฺสนฺตกโร สตฺถา, จกฺขุมา ปรินิพฺพุโต’’ติ. "अशा प्रकारे बुद्धाने स्वतः विशेष ज्ञानाने जाणून भिक्खूंना धम्माचा उपदेश केला. दुःखाचा अंत करणारे, दिव्य चक्षू असलेले ते शास्ते परिनिर्वाण पावले आहेत." ตตฺราปิ สุทํ ภควา ภณฺฑคาเม วิหรนฺโต เอตเทว พหุลํ ภิกฺขูนํ ธมฺมึ กถํ กโรติ – ‘‘อิติ สีลํ, อิติ สมาธิ, อิติ ปญฺญา. สีลปริภาวิโต สมาธิ มหปฺผโล โหติ มหานิสํโส. สมาธิปริภาวิตา ปญฺญา มหปฺผลา โหติ มหานิสํสา. ปญฺญาปริภาวิตํ จิตฺตํ สมฺมเทว อาสเวหิ วิมุจฺจติ, เสยฺยถิทํ – กามาสวา, ภวาสวา, อวิชฺชาสวา’’ติ. तेथे भंडगाममध्ये विहार करत असतानाही भगवान भिक्खूंना वारंवार हाच धम्मोपदेश करत असत – "असे शील आहे, अशी समाधी आहे, अशी प्रज्ञा आहे. शीलाने परिभावित (युक्त) झालेली समाधी महाफळ देणारी आणि महा-अनुशंस (मोठा लाभ) देणारी ठरते. समाधीने परिभावित झालेली प्रज्ञा महाफळ देणारी आणि महा-अनुशंस देणारी ठरते. प्रज्ञेने परिभावित झालेले चित्त आसवांपासून पूर्णपणे मुक्त होते, जसे की – कामासव, भवासव आणि अविद्यासव." จตุมหาปเทสกถา चार महाप्रदेशांची कथा (चतुमहापदेसकथा) ๑๘๗. อถ โข ภควา ภณฺฑคาเม ยถาภิรนฺตํ วิหริตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘อายามานนฺท, เยน หตฺถิคาโม, เยน อมฺพคาโม, เยน ชมฺพุคาโม, เยน โภคนครํ เตนุปสงฺกมิสฺสามา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. อถ โข [Pg.103] ภควา มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ เยน โภคนครํ ตทวสริ. ตตฺร สุทํ ภควา โภคนคเร วิหรติ อานนฺเท เจติเย. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘จตฺตาโรเม, ภิกฺขเว, มหาปเทเส เทเสสฺสามิ, ตํ สุณาถ, สาธุกํ มนสิกโรถ, ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – १८७. त्यानंतर भगवान भंडगाममध्ये इच्छेनुसार विहार करून आयुष्यमान आनंदाला संबोधित करते झाले – "चल आनंदा, आपण जेथे हत्तिगाम, जेथे अंबगाम, जेथे जंबुगाम आणि जेथे भोगनगर आहे, तेथे जाऊ या." "तसेच असो, भंते," असे म्हणून आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांच्या वचनाला संमती दिली. त्यानंतर भगवान मोठ्या भिक्खू संघासह भोगनगर येथे पोहोचले. तेथे भगवान भोगनगरमधील आनंद चैत्यात विहार करू लागले. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – "भिक्खूंनो, मी तुम्हाला चार महाप्रदेश (महान निकष) उपदेशितो, ते लक्षपूर्वक ऐका, चांगल्या प्रकारे मनात साठवून ठेवा, मी सांगतो." "तसेच असो, भंते," असे म्हणून त्या भिक्खूंनी भगवंतांच्या वचनाला संमती दिली. भगवान पुढे म्हणाले – ๑๘๘. ‘‘อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เอวํ วเทยฺย – ‘สมฺมุขา เมตํ, อาวุโส, ภควโต สุตํ สมฺมุขา ปฏิคฺคหิตํ, อยํ ธมฺโม อยํ วินโย อิทํ สตฺถุสาสน’นฺติ. ตสฺส, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ภาสิตํ เนว อภินนฺทิตพฺพํ นปฺปฏิกฺโกสิตพฺพํ. อนภินนฺทิตฺวา อปฺปฏิกฺโกสิตฺวา ตานิ ปทพฺยญฺชนานิ สาธุกํ อุคฺคเหตฺวา สุตฺเต โอสาเรตพฺพานิ, วินเย สนฺทสฺเสตพฺพานิ. ตานิ เจ สุตฺเต โอสาริยมานานิ วินเย สนฺทสฺสิยมานานิ น เจว สุตฺเต โอสรนฺติ, น จ วินเย สนฺทิสฺสนฺติ, นิฏฺฐเมตฺถ คนฺตพฺพํ – ‘อทฺธา, อิทํ น เจว ตสฺส ภควโต วจนํ; อิมสฺส จ ภิกฺขุโน ทุคฺคหิต’นฺติ. อิติเหตํ, ภิกฺขเว, ฉฑฺเฑยฺยาถ. ตานิ เจ สุตฺเต โอสาริยมานานิ วินเย สนฺทสฺสิยมานานิ สุตฺเต เจว โอสรนฺติ, วินเย จ สนฺทิสฺสนฺติ, นิฏฺฐเมตฺถ คนฺตพฺพํ – ‘อทฺธา, อิทํ ตสฺส ภควโต วจนํ; อิมสฺส จ ภิกฺขุโน สุคฺคหิต’นฺติ. อิทํ, ภิกฺขเว, ปฐมํ มหาปเทสํ ธาเรยฺยาถ. १८८. येथे, भिक्खूंनो, जर एखादा भिक्खू असे म्हणाला – 'आयुष्यमानांनो, मी हे स्वतः भगवंतांच्या समक्ष ऐकले आहे आणि समक्ष ग्रहण केले आहे; हाच धम्म आहे, हाच विनय आहे आणि हेच शास्त्यांचे शासन आहे.' तर भिक्खूंनो, तुम्ही त्या भिक्खूच्या बोलण्याचे ना अभिनंदन केले पाहिजे, ना त्याचा निषेध केला पाहिजे. अभिनंदन किंवा निषेध न करता, त्या शब्दांची आणि व्यंजनांची नीट नोंद घेऊन ती सुत्तांमध्ये पडताळून पाहिली पाहिजेत आणि विनयामध्ये ताडून पाहिली पाहिजेत. जर ती सुत्तांमध्ये पडताळून पाहताना आणि विनयामध्ये ताडून पाहताना सुत्तांमध्ये समाविष्ट होत नसतील आणि विनयामध्ये सुसंगत ठरत नसतील, तर या निष्कर्षाप्रत पोहोचले पाहिजे की – 'नक्कीच हे त्या भगवंतांचे वचन नाही; या भिक्खूने ते चुकीच्या पद्धतीने ग्रहण केले आहे.' म्हणून भिक्खूंनो, तुम्ही त्याचा त्याग केला पाहिजे. परंतु, जर ती सुत्तांमध्ये पडताळून पाहताना आणि विनयामध्ये ताडून पाहताना सुत्तांमध्ये समाविष्ट होत असतील आणि विनयामध्ये सुसंगत ठरत असतील, तर या निष्कर्षाप्रत पोहोचले पाहिजे की – 'नक्कीच हे त्या भगवंतांचे वचन आहे; या भिक्खूने ते योग्य पद्धतीने ग्रहण केले आहे.' भिक्खूंनो, हा पहिला महाअपदेश तुम्ही ध्यानात ठेवावा. ‘‘อิธ ปน, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เอวํ วเทยฺย – ‘อมุกสฺมึ นาม อาวาเส สงฺโฆ วิหรติ สเถโร สปาโมกฺโข. ตสฺส เม สงฺฆสฺส สมฺมุขา สุตํ สมฺมุขา ปฏิคฺคหิตํ, อยํ ธมฺโม อยํ วินโย อิทํ สตฺถุสาสน’นฺติ. ตสฺส, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ภาสิตํ เนว อภินนฺทิตพฺพํ นปฺปฏิกฺโกสิตพฺพํ. อนภินนฺทิตฺวา อปฺปฏิกฺโกสิตฺวา ตานิ ปทพฺยญฺชนานิ สาธุกํ อุคฺคเหตฺวา สุตฺเต โอสาเรตพฺพานิ, วินเย สนฺทสฺเสตพฺพานิ. ตานิ เจ สุตฺเต โอสาริยมานานิ วินเย สนฺทสฺสิยมานานิ น เจว สุตฺเต โอสรนฺติ, น จ วินเย สนฺทิสฺสนฺติ, นิฏฺฐเมตฺถ คนฺตพฺพํ – ‘อทฺธา, อิทํ น เจว ตสฺส ภควโต วจนํ; ตสฺส จ สงฺฆสฺส ทุคฺคหิต’นฺติ. อิติเหตํ, ภิกฺขเว, ฉฑฺเฑยฺยาถ. ตานิ เจ สุตฺเต โอสาริยมานานิ วินเย สนฺทสฺสิยมานานิ สุตฺเต เจว [Pg.104] โอสรนฺติ วินเย จ สนฺทิสฺสนฺติ, นิฏฺฐเมตฺถ คนฺตพฺพํ – ‘อทฺธา, อิทํ ตสฺส ภควโต วจนํ; ตสฺส จ สงฺฆสฺส สุคฺคหิต’นฺติ. อิทํ, ภิกฺขเว, ทุติยํ มหาปเทสํ ธาเรยฺยาถ. भिक्खूंनो, पुन्हा जर एखादा भिक्खू असे म्हणाला – 'अमुक एका विहारात स्थविरांसह आणि प्रमुखांसह संघ निवास करत आहे. मी त्या संघाच्या समक्ष हे ऐकले आहे आणि समक्ष ग्रहण केले आहे; हाच धम्म आहे, हाच विनय आहे आणि हेच शास्त्यांचे शासन आहे.' तर भिक्खूंनो, तुम्ही त्या भिक्खूच्या बोलण्याचे ना अभिनंदन केले पाहिजे, ना त्याचा निषेध केला पाहिजे. अभिनंदन किंवा निषेध न करता, त्या शब्दांची आणि व्यंजनांची नीट नोंद घेऊन ती सुत्तांमध्ये पडताळून पाहिली पाहिजेत आणि विनयामध्ये ताडून पाहिली पाहिजेत. जर ती सुत्तांमध्ये पडताळून पाहताना आणि विनयामध्ये ताडून पाहिली असता सुत्तांमध्ये समाविष्ट होत नसतील आणि विनयामध्ये सुसंगत ठरत नसतील, तर या निष्कर्षाप्रत पोहोचले पाहिजे की – 'नक्कीच हे त्या भगवंतांचे वचन नाही; त्या संघाने ते चुकीच्या पद्धतीने ग्रहण केले आहे.' म्हणून भिक्खूंनो, तुम्ही त्याचा त्याग केला पाहिजे. परंतु, जर ती सुत्तांमध्ये पडताळून पाहताना आणि विनयामध्ये ताडून पाहिली असता सुत्तांमध्ये समाविष्ट होत असतील आणि विनयामध्ये सुसंगत ठरत असतील, तर या निष्कर्षाप्रत पोहोचले पाहिजे की – 'नक्कीच हे त्या भगवंतांचे वचन आहे; त्या संघाने ते योग्य पद्धतीने ग्रहण केले आहे.' भिक्खूंनो, हा दुसरा महाअपदेश तुम्ही ध्यानात ठेवावा. ‘‘อิธ ปน, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เอวํ วเทยฺย – ‘อมุกสฺมึ นาม อาวาเส สมฺพหุลา เถรา ภิกฺขู วิหรนฺติ พหุสฺสุตา อาคตาคมา ธมฺมธรา วินยธรา มาติกาธรา. เตสํ เม เถรานํ สมฺมุขา สุตํ สมฺมุขา ปฏิคฺคหิตํ – อยํ ธมฺโม อยํ วินโย อิทํ สตฺถุสาสน’นฺติ. ตสฺส, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ภาสิตํ เนว อภินนฺทิตพฺพํ…เป… น จ วินเย สนฺทิสฺสนฺติ, นิฏฺฐเมตฺถ คนฺตพฺพํ – ‘อทฺธา, อิทํ น เจว ตสฺส ภควโต วจนํ; เตสญฺจ เถรานํ ทุคฺคหิต’นฺติ. อิติเหตํ, ภิกฺขเว, ฉฑฺเฑยฺยาถ. ตานิ เจ สุตฺเต โอสาริยมานานิ…เป… วินเย จ สนฺทิสฺสนฺติ, นิฏฺฐเมตฺถ คนฺตพฺพํ – ‘อทฺธา, อิทํ ตสฺส ภควโต วจนํ; เตสญฺจ เถรานํ สุคฺคหิต’นฺติ. อิทํ, ภิกฺขเว, ตติยํ มหาปเทสํ ธาเรยฺยาถ. भिक्खूंनो, पुन्हा जर एखादा भिक्खू असे म्हणाला – 'अमुक एका विहारात अनेक बहुश्रुत, आगम जाणणारे, धम्मधर, विनयधर आणि मातिकाधर थेर भिक्खू निवास करत आहेत. मी त्या थेरांच्या समक्ष हे ऐकले आहे आणि समक्ष ग्रहण केले आहे – हाच धम्म आहे, हाच विनय आहे आणि हेच शास्त्यांचे शासन आहे.' तर भिक्खूंनो, तुम्ही त्या भिक्खूच्या बोलण्याचे ना अभिनंदन केले पाहिजे... (इत्यादी)... आणि विनयामध्ये सुसंगत ठरत नसतील, तर या निष्कर्षाप्रत पोहोचले पाहिजे की – 'नक्कीच हे त्या भगवंतांचे वचन नाही; त्या थेरांनी ते चुकीच्या पद्धतीने ग्रहण केले आहे.' म्हणून भिक्खूंनो, तुम्ही त्याचा त्याग केला पाहिजे. परंतु, जर ती सुत्तांमध्ये पडताळून पाहताना... (इत्यादी)... आणि विनयामध्ये सुसंगत ठरत असतील, तर या निष्कर्षाप्रत पोहोचले पाहिजे की – 'नक्कीच हे त्या भगवंतांचे वचन आहे; त्या थेरांनी ते योग्य पद्धतीने ग्रहण केले आहे.' भिक्खूंनो, हा तिसरा महाअपदेश तुम्ही ध्यानात ठेवावा. ‘‘อิธ ปน, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เอวํ วเทยฺย – ‘อมุกสฺมึ นาม อาวาเส เอโก เถโร ภิกฺขุ วิหรติ พหุสฺสุโต อาคตาคโม ธมฺมธโร วินยธโร มาติกาธโร. ตสฺส เม เถรสฺส สมฺมุขา สุตํ สมฺมุขา ปฏิคฺคหิตํ – อยํ ธมฺโม อยํ วินโย อิทํ สตฺถุสาสน’นฺติ. ตสฺส, ภิกฺขเว, ภิกฺขุโน ภาสิตํ เนว อภินนฺทิตพฺพํ นปฺปฏิกฺโกสิตพฺพํ. อนภินนฺทิตฺวา อปฺปฏิกฺโกสิตฺวา ตานิ ปทพฺยญฺชนานิ สาธุกํ อุคฺคเหตฺวา สุตฺเต โอสาริตพฺพานิ, วินเย สนฺทสฺเสตพฺพานิ. ตานิ เจ สุตฺเต โอสาริยมานานิ วินเย สนฺทสฺสิยมานานิ น เจว สุตฺเต โอสรนฺติ, น จ วินเย สนฺทิสฺสนฺติ, นิฏฺฐเมตฺถ คนฺตพฺพํ – ‘อทฺธา, อิทํ น เจว ตสฺส ภควโต วจนํ; ตสฺส จ เถรสฺส ทุคฺคหิต’นฺติ. อิติเหตํ, ภิกฺขเว, ฉฑฺเฑยฺยาถ. ตานิ จ สุตฺเต โอสาริยมานานิ วินเย สนฺทสฺสิยมานานิ สุตฺเต เจว โอสรนฺติ, วินเย จ สนฺทิสฺสนฺติ, นิฏฺฐเมตฺถ คนฺตพฺพํ – ‘อทฺธา, อิทํ ตสฺส ภควโต วจนํ; ตสฺส จ เถรสฺส สุคฺคหิต’นฺติ. อิทํ, ภิกฺขเว, จตุตฺถํ มหาปเทสํ ธาเรยฺยาถ. อิเม โข, ภิกฺขเว, จตฺตาโร มหาปเทเส ธาเรยฺยาถา’’ติ. भिक्खूंनो, पुन्हा जर एखादा भिक्खू असे म्हणाला – 'अमुक एका विहारात एक बहुश्रुत, आगम जाणणारे, धम्मधर, विनयधर आणि मातिकाधर थेर भिक्खू निवास करत आहेत. मी त्या थेराच्या समक्ष हे ऐकले आहे आणि समक्ष ग्रहण केले आहे – हाच धम्म आहे, हाच विनय आहे आणि हेच शास्त्यांचे शासन आहे.' तर भिक्खूंनो, तुम्ही त्या भिक्खूच्या बोलण्याचे ना अभिनंदन केले पाहिजे, ना त्याचा निषेध केला पाहिजे. अभिनंदन किंवा निषेध न करता, त्या शब्दांची आणि व्यंजनांची नीट नोंद घेऊन ती सुत्तांमध्ये पडताळून पाहिली पाहिजेत आणि विनयामध्ये ताडून पाहिली पाहिजेत. जर ती सुत्तांमध्ये पडताळून पाहताना आणि विनयामध्ये ताडून पाहताना सुत्तांमध्ये समाविष्ट होत नसतील आणि विनयामध्ये सुसंगत ठरत नसतील, तर या निष्कर्षाप्रत पोहोचले पाहिजे की – 'नक्कीच हे त्या भगवंतांचे वचन नाही; त्या थेराने ते चुकीच्या पद्धतीने ग्रहण केले आहे.' म्हणून भिक्खूंनो, तुम्ही त्याचा त्याग केला पाहिजे. परंतु, जर ती सुत्तांमध्ये पडताळून पाहताना आणि विनयामध्ये ताडून पाहताना सुत्तांमध्ये समाविष्ट होत असतील आणि विनयामध्ये सुसंगत ठरत असतील, तर या निष्कर्षाप्रत पोहोचले पाहिजे की – 'नक्कीच हे त्या भगवंतांचे वचन आहे; त्या थेराने ते योग्य पद्धतीने ग्रहण केले आहे.' भिक्खूंनो, हा चौथा महाअपदेश तुम्ही ध्यानात ठेवावा. भिक्खूंनो, हे चार महाअपदेश तुम्ही ध्यानात ठेवावेत. ตตฺรปิ สุทํ ภควา โภคนคเร วิหรนฺโต อานนฺเท เจติเย เอตเทว พหุลํ ภิกฺขูนํ ธมฺมึ กถํ กโรติ – ‘‘อิติ สีลํ, อิติ สมาธิ, อิติ ปญฺญา. สีลปริภาวิโต สมาธิ มหปฺผโล โหติ มหานิสํโส[Pg.105]. สมาธิปริภาวิตา ปญฺญา มหปฺผลา โหติ มหานิสํสา. ปญฺญาปริภาวิตํ จิตฺตํ สมฺมเทว อาสเวหิ วิมุจฺจติ, เสยฺยถิทํ – กามาสวา, ภวาสวา, อวิชฺชาสวา’’ติ. तेथे भोगनगर येथे आनंद चेतिय येथे निवास करत असताना भगवंतांनी भिक्खूंना वारंवार हाच धम्म उपदेश केला – 'असे शील आहे, असा समाधी आहे, अशी प्रज्ञा आहे. शीलाने परिभावित समाधी महाफळदायी आणि महाकल्याणकारी ठरते. समाधीने परिभावित प्रज्ञा महाफळदायी आणि महाकल्याणकारी ठरते. प्रज्ञेने परिभावित चित्त आसवांपासून पूर्णपणे मुक्त होते, जसे की – कामासव, भवासव आणि अविद्यासव.' กมฺมารปุตฺตจุนฺทวตฺถุ लोहारपुत्र चुंदाची कथा ๑๘๙. อถ โข ภควา โภคนคเร ยถาภิรนฺตํ วิหริตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘อายามานนฺท, เยน ปาวา เตนุปสงฺกมิสฺสามา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. อถ โข ภควา มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ เยน ปาวา ตทวสริ. ตตฺร สุทํ ภควา ปาวายํ วิหรติ จุนฺทสฺส กมฺมารปุตฺตสฺส อมฺพวเน. อสฺโสสิ โข จุนฺโท กมฺมารปุตฺโต – ‘‘ภควา กิร ปาวํ อนุปฺปตฺโต, ปาวายํ วิหรติ มยฺหํ อมฺพวเน’’ติ. อถ โข จุนฺโท กมฺมารปุตฺโต เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข จุนฺทํ กมฺมารปุตฺตํ ภควา ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสสิ สมาทเปสิ สมุตฺเตเชสิ สมฺปหํเสสิ. อถ โข จุนฺโท กมฺมารปุตฺโต ภควตา ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺสิโต สมาทปิโต สมุตฺเตชิโต สมฺปหํสิโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อธิวาเสตุ เม, ภนฺเต, ภควา สฺวาตนาย ภตฺตํ สทฺธึ ภิกฺขุสงฺเฆนา’’ติ. อธิวาเสสิ ภควา ตุณฺหีภาเวน. อถ โข จุนฺโท กมฺมารปุตฺโต ภควโต อธิวาสนํ วิทิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. १८९. त्यानंतर भगवान भोगनगर येथे आपल्या इच्छेनुसार राहून आयुष्यमान आनंदाला म्हणाले – 'चल आनंदा, आपण पावा नगराकडे जाऊ या.' आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांना उत्तर दिले – 'तसेच असो, भन्ते.' त्यानंतर भगवान मोठ्या भिक्षुसंघासह पावा नगराकडे गेले. तेथे भगवान पावा नगरात सुवर्णकारपुत्र चुंदाच्या आम्रवनात राहिले. सुवर्णकारपुत्र चुंदाने ऐकले की – 'भगवान पावा येथे आले आहेत आणि माझ्या आम्रवनात राहत आहेत.' त्यानंतर सुवर्णकारपुत्र चुंद जेथे भगवान होते तेथे गेला; आणि भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या सुवर्णकारपुत्र चुंदाला भगवंतांनी धम्मकथेने उपदेश केला, प्रोत्साहित केले, उत्तेजित केले आणि हर्षित केले. भगवंतांच्या धम्मकथेने उपदेशित, प्रोत्साहित, उत्तेजित आणि हर्षित झालेल्या सुवर्णकारपुत्र चुंदाने भगवंतांना असे म्हटले – 'भन्ते, भगवंतांनी भिक्षुसंघासह उद्याचे माझे भोजन स्वीकारावे.' भगवंतांनी मौन बाळगून संमती दिली. त्यानंतर सुवर्णकारपुत्र चुंदाने भगवंतांची संमती जाणून घेऊन, आपल्या आसनावरून उठून, भगवंतांना अभिवादन केले आणि प्रदक्षिणा घालून तो निघून गेला. อถ โข จุนฺโท กมฺมารปุตฺโต ตสฺสา รตฺติยา อจฺจเยน สเก นิเวสเน ปณีตํ ขาทนียํ โภชนียํ ปฏิยาทาเปตฺวา ปหูตญฺจ สูกรมทฺทวํ ภควโต กาลํ อาโรจาเปสิ – ‘‘กาโล, ภนฺเต, นิฏฺฐิตํ ภตฺต’’นฺติ. อถ โข ภควา ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย สทฺธึ ภิกฺขุสงฺเฆน เยน จุนฺทสฺส กมฺมารปุตฺตสฺส นิเวสนํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. นิสชฺช โข ภควา จุนฺทํ กมฺมารปุตฺตํ อามนฺเตสิ – ‘‘ยํ เต, จุนฺท, สูกรมทฺทวํ ปฏิยตฺตํ, เตน มํ ปริวิส. ยํ ปนญฺญํ ขาทนียํ โภชนียํ ปฏิยตฺตํ, เตน ภิกฺขุสงฺฆํ ปริวิสา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข จุนฺโท กมฺมารปุตฺโต ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา ยํ อโหสิ สูกรมทฺทวํ ปฏิยตฺตํ, เตน ภควนฺตํ ปริวิสิ. ยํ ปนญฺญํ ขาทนียํ โภชนียํ ปฏิยตฺตํ[Pg.106], เตน ภิกฺขุสงฺฆํ ปริวิสิ. อถ โข ภควา จุนฺทํ กมฺมารปุตฺตํ อามนฺเตสิ – ‘‘ยํ เต, จุนฺท, สูกรมทฺทวํ อวสิฏฺฐํ, ตํ โสพฺเภ นิขณาหิ. นาหํ ตํ, จุนฺท, ปสฺสามิ สเทวเก โลเก สมารเก สพฺรหฺมเก สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย, ยสฺส ตํ ปริภุตฺตํ สมฺมา ปริณามํ คจฺเฉยฺย อญฺญตฺร ตถาคตสฺสา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข จุนฺโท กมฺมารปุตฺโต ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา ยํ อโหสิ สูกรมทฺทวํ อวสิฏฺฐํ, ตํ โสพฺเภ นิขณิตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข จุนฺทํ กมฺมารปุตฺตํ ภควา ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสตฺวา สมาทเปตฺวา สมุตฺเตเชตฺวา สมฺปหํเสตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกามิ. त्यानंतर ती रात्र संपल्यावर सुवर्णकारपुत्र चुंदाने आपल्या घरी उत्तम प्रतीचे खाद्य व भोज्य पदार्थ आणि भरपूर प्रमाणात सूकरमद्दव तयार करवून भगवंतांना भोजनाची वेळ झाल्याचे कळवले – 'भन्ते, वेळ झाली आहे, भोजन तयार आहे.' त्यानंतर भगवान सकाळी वस्त्र परिधान करून, पात्र व चीवर घेऊन भिक्षुसंघासह सुवर्णकारपुत्र चुंदाच्या घरी गेले; आणि तेथे मांडलेल्या आसनावर बसले. बसल्यावर भगवान सुवर्णकारपुत्र चुंदाला म्हणाले – 'चुंदा, जे सूकरमद्दव तू तयार केले आहेस, ते मला वाढ. आणि इतर जे खाद्य व भोज्य पदार्थ तयार केले आहेत, ते भिक्षुसंघाला वाढ.' सुवर्णकारपुत्र चुंदाने भगवंतांना 'तसेच असो, भन्ते' असे उत्तर देऊन, जे सूकरमद्दव तयार केले होते ते भगवंतांना वाढले. आणि इतर जे खाद्य व भोज्य पदार्थ तयार केले होते, ते भिक्षुसंघाला वाढले. त्यानंतर भगवान सुवर्णकारपुत्र चुंदाला म्हणाले – 'चुंदा, जे सूकरमद्दव उरले आहे, ते जमिनीत खड्डा करून पुरून टाक. कारण, चुंदा, देव, मार, ब्रह्मा यांच्यासह या जगात, श्रमण, ब्राह्मण, देव आणि मनुष्यांसह या प्रजेमध्ये, तथागतांशिवाय असा कोणीही मला दिसत नाही, ज्याला हे सूकरमद्दव खाल्ल्यावर ते नीट पचू शकेल.' सुवर्णकारपुत्र चुंदाने भगवंतांना 'तसेच असो, भन्ते' असे उत्तर देऊन, जे सूकरमद्दव उरले होते ते खड्ड्यात पुरून टाकले आणि जेथे भगवान होते तेथे तो गेला; आणि भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या सुवर्णकारपुत्र चुंदाला भगवंतांनी धम्मकथेने उपदेश करून, प्रोत्साहित करून, उत्तेजित करून आणि हर्षित करून आसनावरून उठून तेथून प्रस्थान केले. ๑๙๐. อถ โข ภควโต จุนฺทสฺส กมฺมารปุตฺตสฺส ภตฺตํ ภุตฺตาวิสฺส ขโร อาพาโธ อุปฺปชฺชิ, โลหิตปกฺขนฺทิกา ปพาฬฺหา เวทนา วตฺตนฺติ มารณนฺติกา. ตา สุทํ ภควา สโต สมฺปชาโน อธิวาเสสิ อวิหญฺญมาโน. อถ โข ภควา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘อายามานนฺท, เยน กุสินารา เตนุปสงฺกมิสฺสามา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. १९०. त्यानंतर सुवर्णकारपुत्र चुंदाचे भोजन ग्रहण केल्यानंतर भगवंतांना तीव्र आजार जडला, आणि रक्तातिसाराची प्राणघातक व अत्यंत तीव्र वेदना सुरू झाली. भगवंतांनी सचेत आणि सजग राहून, व्याकुळ न होता ती वेदना सहन केली. त्यानंतर भगवान आयुष्यमान आनंदाला म्हणाले – 'चल आनंदा, आपण कुसिनाराकडे जाऊ या.' आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांना उत्तर दिले – 'तसेच असो, भन्ते.' จุนฺทสฺส ภตฺตํ ภุญฺชิตฺวา, กมฺมารสฺสาติ เม สุตํ; อาพาธํ สมฺผุสี ธีโร, ปพาฬฺหํ มารณนฺติกํ. सुवर्णकार चुंदाचे भोजन ग्रहण केल्यानंतर, धीर भगवंतांना तीव्र आणि प्राणघातक आजार जडला, असे मी ऐकले आहे. ภุตฺตสฺส จ สูกรมทฺทเวน,พฺยาธิปฺปพาฬฺโห อุทปาทิ สตฺถุโน; วิเรจมาโน ภควา อโวจ,คจฺฉามหํ กุสินารํ นครนฺติ. सूकरमद्दव ग्रहण केल्यानंतर शास्त्यांना तीव्र आजार उद्भवला. रक्तातिसार होत असतानाही भगवान म्हणाले – 'मी कुसिनारा नगराला जात आहे.' ปานียาหรณํ पिण्याचे पाणी आणणे ๑๙๑. อถ โข ภควา มคฺคา โอกฺกมฺม เยน อญฺญตรํ รุกฺขมูลํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘อิงฺฆ เม ตฺวํ, อานนฺท, จตุคฺคุณํ สงฺฆาฏึ ปญฺญเปหิ, กิลนฺโตสฺมิ, อานนฺท, นิสีทิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา จตุคฺคุณํ สงฺฆาฏึ ปญฺญเปสิ. นิสีทิ ภควา ปญฺญตฺเต อาสเน. นิสชฺช โข ภควา อายสฺมนฺตํ [Pg.107] อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘อิงฺฆ เม ตฺวํ, อานนฺท, ปานียํ อาหร, ปิปาสิโตสฺมิ, อานนฺท, ปิวิสฺสามี’’ติ. เอวํ วุตฺเต อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิทานิ, ภนฺเต, ปญฺจมตฺตานิ สกฏสตานิ อติกฺกนฺตานิ, ตํ จกฺกจฺฉินฺนํ อุทกํ ปริตฺตํ ลุฬิตํ อาวิลํ สนฺทติ. อยํ, ภนฺเต, กกุธา นที อวิทูเร อจฺโฉทกา สาโตทกา สีโตทกา เสโตทกา สุปฺปติตฺถา รมณียา. เอตฺถ ภควา ปานียญฺจ ปิวิสฺสติ, คตฺตานิ จ สีตี กริสฺสตี’’ติ. १९१. त्यानंतर भगवान रस्त्यावरून बाजूला होऊन एका झाडाच्या बुंध्यापाशी गेले; आणि तेथे जाऊन आयुष्यमान आनंदाला म्हणाले – 'आनंदा, माझ्यासाठी संघाटीची चार घड्या करून आसन पसर. आनंदा, मी थकलो आहे, मी बसेन.' आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांना 'तसेच असो, भन्ते' असे उत्तर देऊन संघाटीची चार घड्या करून आसन पसरले. भगवान मांडलेल्या आसनावर बसले. बसल्यावर भगवान आयुष्यमान आनंदाला म्हणाले – 'आनंदा, माझ्यासाठी पिण्याचे पाणी घेऊन ये. आनंदा, मला तहान लागली आहे, मी पाणी पिईन.' असे म्हटल्यावर आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांना असे म्हटले – 'भन्ते, आत्ताच सुमारे पाचशे गाड्या येथून गेल्या आहेत. त्यांच्या चाकांमुळे ते थोडेसे पाणी ढवळले जाऊन गढूळ व अस्वच्छ झाले आहे आणि वाहत आहे. भन्ते, ही ककुधा नदी जवळच आहे, जिचे पाणी स्वच्छ, मधुर, शीतल, निर्मळ, सुंदर घाट असलेली आणि रमणीय आहे. तेथे भगवान पाणीही पितील आणि आपले शरीरही थंड करतील.' ทุติยมฺปิ โข ภควา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘อิงฺฆ เม ตฺวํ, อานนฺท, ปานียํ อาหร, ปิปาสิโตสฺมิ, อานนฺท, ปิวิสฺสามี’’ติ. ทุติยมฺปิ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อิทานิ, ภนฺเต, ปญฺจมตฺตานิ สกฏสตานิ อติกฺกนฺตานิ, ตํ จกฺกจฺฉินฺนํ อุทกํ ปริตฺตํ ลุฬิตํ อาวิลํ สนฺทติ. อยํ, ภนฺเต, กกุธา นที อวิทูเร อจฺโฉทกา สาโตทกา สีโตทกา เสโตทกา สุปฺปติตฺถา รมณียา. เอตฺถ ภควา ปานียญฺจ ปิวิสฺสติ, คตฺตานิ จ สีตีกริสฺสตี’’ติ. दुसऱ्यांदाही भगवंतांनी आयुष्यमान आनंदाला म्हटले – 'आनंदा, माझ्यासाठी पिण्याचे पाणी घेऊन ये. आनंदा, मला तहान लागली आहे, मी पाणी पिईन.' दुसऱ्यांदाही आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांना असे म्हटले – 'भन्ते, आत्ताच सुमारे पाचशे गाड्या येथून गेल्या आहेत. त्यांच्या चाकांमुळे ते थोडेसे पाणी ढवळले जाऊन गढूळ व अस्वच्छ झाले आहे आणि वाहत आहे. भन्ते, ही ककुधा नदी जवळच आहे, जिचे पाणी स्वच्छ, मधुर, शीतल, निर्मळ, सुंदर घाट असलेली आणि रमणीय आहे. तेथे भगवान पाणीही पितील आणि आपले शरीरही थंड करतील.' ตติยมฺปิ โข ภควา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘อิงฺฆ เม ตฺวํ, อานนฺท, ปานียํ อาหร, ปิปาสิโตสฺมิ, อานนฺท, ปิวิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา ปตฺตํ คเหตฺวา เยน สา นทิกา เตนุปสงฺกมิ. อถ โข สา นทิกา จกฺกจฺฉินฺนา ปริตฺตา ลุฬิตา อาวิลา สนฺทมานา, อายสฺมนฺเต อานนฺเท อุปสงฺกมนฺเต อจฺฉา วิปฺปสนฺนา อนาวิลา สนฺทิตฺถ. อถ โข อายสฺมโต อานนฺทสฺส เอตทโหสิ – ‘‘อจฺฉริยํ วต, โภ, อพฺภุตํ วต, โภ, ตถาคตสฺส มหิทฺธิกตา มหานุภาวตา. อยญฺหิ สา นทิกา จกฺกจฺฉินฺนา ปริตฺตา ลุฬิตา อาวิลา สนฺทมานา มยิ อุปสงฺกมนฺเต อจฺฉา วิปฺปสนฺนา อนาวิลา สนฺทตี’’ติ. ปตฺเตน ปานียํ อาทาย เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต, ตถาคตสฺส มหิทฺธิกตา มหานุภาวตา. อิทานิ สา ภนฺเต นทิกา จกฺกจฺฉินฺนา ปริตฺตา ลุฬิตา อาวิลา สนฺทมานา มยิ อุปสงฺกมนฺเต อจฺฉา วิปฺปสนฺนา อนาวิลา สนฺทิตฺถ. ปิวตุ ภควา ปานียํ ปิวตุ สุคโต ปานีย’’นฺติ. อถ โข ภควา ปานียํ อปายิ. तिसऱ्यांदाही भगवंतांनी आयुष्यमान आनंदांना संबोधित केले – "आनंदा, जा माझ्यासाठी पिण्याचे पाणी घेऊन ये. आनंदा, मला तहान लागली आहे, मी पाणी पिईन." "तसेच असो, भंते," असे म्हणून आयुष्यमान आनंदांनी भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला आणि भिक्षापात्र घेऊन ते त्या लहान नदीकडे गेले. तेव्हा ती लहान नदी, जी गाड्यांच्या चाकांमुळे गढूळ, अल्प पाणी असलेली, खळबळलेली आणि गढूळ वाहत होती, आयुष्यमान आनंद जवळ पोहोचताच स्वच्छ, अत्यंत प्रसन्न आणि गढूळतारहित होऊन वाहू लागली. तेव्हा आयुष्यमान आनंदांच्या मनात असा विचार आला – "अहो आश्चर्य! अहो अद्भुत! तथागतांचे महात्म्य आणि महान प्रभाव किती अद्भूत आहे! ही लहान नदी जी गाड्यांच्या चाकांमुळे गढूळ, अल्प पाणी असलेली, खळबळलेली आणि गढूळ वाहत होती, ती मी जवळ जाताच स्वच्छ, अत्यंत प्रसन्न आणि गढूळतारहित होऊन वाहू लागली आहे." मग पात्रात पिण्याचे पाणी घेऊन ते भगवंतांकडे आले; आणि भगवंतांजवळ येऊन त्यांनी असे म्हटले – "भंते, आश्चर्य आहे! भंते, अद्भुत आहे! तथागतांचे महात्म्य आणि महान प्रभाव किती अद्भूत आहे! भंते, आताच जी लहान नदी गाड्यांच्या चाकांमुळे गढूळ, अल्प पाणी असलेली, खळबळलेली आणि गढूळ वाहत होती, ती मी जवळ जाताच स्वच्छ, अत्यंत प्रसन्न आणि गढूळतारहित होऊन वाहू लागली. भगवंतांनी पाणी प्यावे, सुगतांनी पाणी प्यावे." त्यानंतर भगवंतांनी ते पाणी प्यायले. ปุกฺกุสมลฺลปุตฺตวตฺถุ पुक्कुस मल्लपुत्र कथा ๑๙๒. เตน [Pg.108] โรโข ปน สมเยน ปุกฺกุโส มลฺลปุตฺโต อาฬารสฺส กาลามสฺส สาวโก กุสินาราย ปาวํ อทฺธานมคฺคปฺปฏิปฺปนฺโน โหติ. อทฺทสา โข ปุกฺกุโส มลฺลปุตฺโต ภควนฺตํ อญฺญตรสฺมึ รุกฺขมูเล นิสินฺนํ. ทิสฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ปุกฺกุโส มลฺลปุตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต, สนฺเตน วต, ภนฺเต, ปพฺพชิตา วิหาเรน วิหรนฺติ. ภูตปุพฺพํ, ภนฺเต, อาฬาโร กาลาโม อทฺธานมคฺคปฺปฏิปฺปนฺโน มคฺคา โอกฺกมฺม อวิทูเร อญฺญตรสฺมึ รุกฺขมูเล ทิวาวิหารํ นิสีทิ. อถ โข, ภนฺเต, ปญฺจมตฺตานิ สกฏสตานิ อาฬารํ กาลามํ นิสฺสาย นิสฺสาย อติกฺกมึสุ. อถ โข, ภนฺเต, อญฺญตโร ปุริโส ตสฺส สกฏสตฺถสฺส ปิฏฺฐิโต ปิฏฺฐิโต อาคจฺฉนฺโต เยน อาฬาโร กาลาโม เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อาฬารํ กาลามํ เอตทโวจ – ‘อปิ, ภนฺเต, ปญฺจมตฺตานิ สกฏสตานิ อติกฺกนฺตานิ อทฺทสา’ติ? ‘น โข อหํ, อาวุโส, อทฺทส’นฺติ. ‘กึ ปน, ภนฺเต, สทฺทํ อสฺโสสี’ติ? ‘น โข อหํ, อาวุโส, สทฺทํ อสฺโสสิ’นฺติ. ‘กึ ปน, ภนฺเต, สุตฺโต อโหสี’ติ? ‘น โข อหํ, อาวุโส, สุตฺโต อโหสิ’นฺติ. ‘กึ ปน, ภนฺเต, สญฺญี อโหสี’ติ? ‘เอวมาวุโส’ติ. ‘โส ตฺวํ, ภนฺเต, สญฺญี สมาโน ชาคโร ปญฺจมตฺตานิ สกฏสตานิ นิสฺสาย นิสฺสาย อติกฺกนฺตานิ เนว อทฺทส, น ปน สทฺทํ อสฺโสสิ; อปิสุ เต, ภนฺเต, สงฺฆาฏิ รเชน โอกิณฺณา’ติ? ‘เอวมาวุโส’ติ. อถ โข, ภนฺเต, ตสฺส ปุริสสฺส เอตทโหสิ – ‘อจฺฉริยํ วต โภ, อพฺภุตํ วต โภ, สนฺเตน วต โภ ปพฺพชิตา วิหาเรน วิหรนฺติ. ยตฺร หิ นาม สญฺญี สมาโน ชาคโร ปญฺจมตฺตานิ สกฏสตานิ นิสฺสาย นิสฺสาย อติกฺกนฺตานิ เนว ทกฺขติ, น ปน สทฺทํ โสสฺสตี’ติ! อาฬาเร กาลาเม อุฬารํ ปสาทํ ปเวเทตฺวา ปกฺกามี’’ติ. १९२. त्या वेळी आळार कालामाचा श्रावक असलेला मल्लपुत्र पुक्कुस कुसिनाराहून पावाकडे जाणाऱ्या महामार्गाने प्रवास करत होता. मल्लपुत्र पुक्कुसने भगवंतांना एका झाडाच्या मुळाशी बसलेले पाहिले. पाहून तो भगवंतांकडे गेला; आणि भगवंतांजवळ जाऊन त्यांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या मल्लपुत्र पुक्कुसने भगवंतांना असे म्हटले – "भंते, आश्चर्य आहे! भंते, अद्भुत आहे! भंते, प्रव्रजित खरोखरच अत्यंत शांत विहाराने राहतात. भंते, पूर्वीची गोष्ट आहे, आळार कालाम महामार्गाने प्रवास करत असताना रस्त्यावरून बाजूला होऊन जवळच असलेल्या एका झाडाच्या मुळाशी दुपारच्या विश्रांतीसाठी बसले होते. भंते, तेव्हा सुमारे पाचशे बैलगाड्या आळार कालामांच्या अगदी जवळून निघून गेल्या. भंते, तेव्हा त्या गाड्यांच्या तांड्यामागून येणारा एक माणूस आळार कालामांकडे आला; आणि आळार कालामांजवळ येऊन त्यांना म्हणाला – 'भंते, आपण जवळून गेलेल्या सुमारे पाचशे बैलगाड्या पाहिल्या का?' 'नाही मित्रा, मी त्या पाहिल्या नाहीत,' (असे आळार कालाम म्हणाले). 'पण भंते, आपण त्यांचा आवाज ऐकला का?' 'नाही मित्रा, मी आवाजही ऐकला नाही.' 'तर मग भंते, आपण झोपला होता का?' 'नाही मित्रा, मी झोपलो नव्हतो.' 'तर मग भंते, आपण सज्ञी होता का?' 'होय मित्रा.' 'तर मग भंते, आपण सज्ञी आणि जागृत असतानाही आपल्या अगदी जवळून गेलेल्या सुमारे पाचशे बैलगाड्या पाहिल्या नाहीत आणि त्यांचा आवाजही ऐकला नाही? भंते, तरीही आपले संघाटी वस्त्र धुळीने माखलेले आहे ना?' 'होय मित्रा.' भंते, तेव्हा त्या माणसाच्या मनात असा विचार आला – 'अहो आश्चर्य! अहो अद्भुत! प्रव्रजित खरोखरच अत्यंत शांत विहाराने राहतात, जेथे सज्ञी आणि जागृत असतानाही जवळून गेलेल्या सुमारे पाचशे बैलगाड्या त्यांनी पाहिल्या नाहीत आणि त्यांचा आवाजही ऐकला नाही!' तो आळार कालामांबद्दल अत्यंत आदर व श्रद्धा व्यक्त करून निघून गेला. ๑๙๓. ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, ปุกฺกุส, กตมํ นุ โข ทุกฺกรตรํ วา ทุรภิสมฺภวตรํ วา – โย วา สญฺญี สมาโน ชาคโร ปญฺจมตฺตานิ สกฏสตานิ นิสฺสาย นิสฺสาย อติกฺกนฺตานิ เนว ปสฺเสยฺย, น ปน สทฺทํ [Pg.109] สุเณยฺย; โย วา สญฺญี สมาโน ชาคโร เทเว วสฺสนฺเต เทเว คฬคฬายนฺเต วิชฺชุลฺลตาสุ นิจฺฉรนฺตีสุ อสนิยา ผลนฺติยา เนว ปสฺเสยฺย, น ปน สทฺทํ สุเณยฺยา’’ติ? ‘‘กิญฺหิ, ภนฺเต, กริสฺสนฺติ ปญฺจ วา สกฏสตานิ ฉ วา สกฏสตานิ สตฺต วา สกฏสตานิ อฏฺฐ วา สกฏสตานิ นว วา สกฏสตานิ, สกฏสหสฺสํ วา สกฏสตสหสฺสํ วา. อถ โข เอตเทว ทุกฺกรตรํ เจว ทุรภิสมฺภวตรญฺจ โย สญฺญี สมาโน ชาคโร เทเว วสฺสนฺเต เทเว คฬคฬายนฺเต วิชฺชุลฺลตาสุ นิจฺฉรนฺตีสุ อสนิยา ผลนฺติยา เนว ปสฺเสยฺย, น ปน สทฺทํ สุเณยฺยา’’ติ. १९३. "पुक्कुस, तुला काय वाटते? कोणते अधिक कठीण किंवा साध्य करण्यास अधिक दुष्कर आहे – जो सज्ञी आणि जागृत असताना जवळून गेलेल्या सुमारे पाचशे बैलगाड्या पाहत नाही आणि त्यांचा आवाजही ऐकत नाही; की जो सज्ञी आणि जागृत असताना मुसळधार पाऊस पडत असताना, ढगांचा गडगडाट होत असताना, विजा चमकत असताना आणि वीज कोसळत असतानाही पाहत नाही आणि आवाजही ऐकत नाही?" "भंते, पाचशे, सहाशे, सातशे, आठशे, नऊशे बैलगाड्या किंवा हजारो अथवा लाखो बैलगाड्या काय करू शकणार? उलट, हेच अधिक कठीण आणि साध्य करण्यास अधिक दुष्कर आहे की, जो सज्ञी आणि जागृत असताना मुसळधार पाऊस पडत असताना, ढगांचा गडगडाट होत असताना, विजा चमकत असताना आणि वीज कोसळत असतानाही पाहत नाही आणि आवाजही ऐकत नाही." ‘‘เอกมิทาหํ, ปุกฺกุส, สมยํ อาตุมายํ วิหรามิ ภุสาคาเร. เตน โข ปน สมเยน เทเว วสฺสนฺเต เทเว คฬคฬายนฺเต วิชฺชุลฺลตาสุ นิจฺฉรนฺตีสุ อสนิยา ผลนฺติยา อวิทูเร ภุสาคารสฺส ทฺเว กสฺสกา ภาตโร หตา จตฺตาโร จ พลิพทฺทา. อถ โข, ปุกฺกุส, อาตุมาย มหาชนกาโย นิกฺขมิตฺวา เยน เต ทฺเว กสฺสกา ภาตโร หตา จตฺตาโร จ พลิพทฺทา เตนุปสงฺกมิ. เตน โข ปนาหํ, ปุกฺกุส, สมเยน ภุสาคารา นิกฺขมิตฺวา ภุสาคารทฺวาเร อพฺโภกาเส จงฺกมามิ. อถ โข, ปุกฺกุส, อญฺญตโร ปุริโส ตมฺหา มหาชนกายา เยนาหํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตํ โข อหํ, ปุกฺกุส, ตํ ปุริสํ เอตทโวจํ – ‘กึ นุ โข เอโส, อาวุโส, มหาชนกาโย สนฺนิปติโต’ติ? ‘อิทานิ, ภนฺเต, เทเว วสฺสนฺเต เทเว คฬคฬายนฺเต วิชฺชุลฺลตาสุ นิจฺฉรนฺตีสุ อสนิยา ผลนฺติยา ทฺเว กสฺสกา ภาตโร หตา จตฺตาโร จ พลิพทฺทา. เอตฺเถโส มหาชนกาโย สนฺนิปติโต. ตฺวํ ปน, ภนฺเต, กฺว อโหสี’ติ? ‘อิเธว โข อหํ, อาวุโส, อโหสิ’นฺติ. ‘กึ ปน, ภนฺเต, อทฺทสา’ติ? ‘น โข อหํ, อาวุโส, อทฺทส’นฺติ. ‘กึ ปน, ภนฺเต, สทฺทํ อสฺโสสี’ติ? ‘น โข อหํ, อาวุโส, สทฺทํ อสฺโสสิ’นฺติ. ‘กึ ปน, ภนฺเต, สุตฺโต อโหสี’ติ? ‘น โข อหํ, อาวุโส, สุตฺโต อโหสิ’นฺติ. ‘กึ ปน, ภนฺเต, สญฺญี อโหสี’ติ? ‘เอวมาวุโส’ติ. ‘โส ตฺวํ, ภนฺเต, สญฺญี สมาโน ชาคโร เทเว วสฺสนฺเต เทเว คฬคฬายนฺเต [Pg.110] วิชฺชุลฺลตาสุ นิจฺฉรนฺตีสุ อสนิยา ผลนฺติยา เนว อทฺทส, น ปน สทฺทํ อสฺโสสี’ติ? ‘‘เอวมาวุโส’’ติ? “पुक्कुस, एका समयी मी आतुमा नगरीत एका भुसाच्या कोठारात (कडब्याच्या झोपडीत) राहत होतो. त्या वेळी मुसळधार पाऊस पडत असताना, मेघगर्जना होत असताना, विजा चमकत असताना आणि वीज कोसळली असता, भुसाच्या कोठारापासून अगदी जवळच दोन शेतकरी भाऊ आणि चार बैल मरण पावले. त्यानंतर, पुक्कुस, आतुमा नगरीतील मोठा लोकसमुदाय बाहेर पडून, जेथे ते दोन शेतकरी भाऊ आणि चार बैल मरण पावले होते, तेथे आला. पुक्कुस, त्या वेळी मी भुसाच्या कोठारातून बाहेर पडून कोठाराच्या दाराशी उघड्या जागेत चंक्रमण करत होतो. त्यानंतर, पुक्कुस, त्या लोकसमुदायातील एक माणूस मी जेथे होतो तेथे आला; जवळ येऊन त्याने मला अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभे राहिलेल्या त्या माणसाला मी विचारले—‘हे आवुसो (मित्रा), हा मोठा लोकसमुदाय येथे का गोळा झाला आहे?’ (त्याने उत्तर दिले)—‘भन्ते, नुकताच मुसळधार पाऊस पडत असताना, मेघगर्जना होत असताना, विजा चमकत असताना आणि वीज कोसळली असता दोन शेतकरी भाऊ आणि चार बैल मरण पावले. त्यासाठीच हा लोकसमुदाय येथे गोळा झाला आहे. पण भन्ते, आपण कोठे होतात?’ ‘आवुसो, मी येथेच होतो.’ ‘पण भन्ते, आपण काही पाहिले का?’ ‘नाही आवुसो, मी काही पाहिले नाही.’ ‘पण भन्ते, आपण काही आवाज ऐकला का?’ ‘नाही आवुसो, मी कोणताही आवाज ऐकला नाही.’ ‘पण भन्ते, आपण झोपला होतात का?’ ‘नाही आवुसो, मी झोपलो नव्हतो.’ ‘पण भन्ते, आपण सज्ञी (सचेतन) होतात का?’ ‘होय आवुसो, (मी सज्ञी होतो).’ ‘तर मग भन्ते, आपण सज्ञी आणि जागृत असूनही, मुसळधार पाऊस पडत असताना, मेघगर्जना होत असताना, विजा चमकत असताना आणि वीज कोसळली असता काही पाहिलेही नाही आणि आवाजही ऐकला नाही का?’ ‘होय आवुसो, (हे खरे आहे).’” ‘‘อถ โข, ปุกฺกุส, ปุริสสฺส เอตทโหสิ – ‘อจฺฉริยํ วต โภ, อพฺภุตํ วต โภ, สนฺเตน วต โภ ปพฺพชิตา วิหาเรน วิหรนฺติ. ยตฺร หิ นาม สญฺญี สมาโน ชาคโร เทเว วสฺสนฺเต เทเว คฬคฬายนฺเต วิชฺชุลฺลตาสุ นิจฺฉรนฺตีสุ อสนิยา ผลนฺติยา เนว ทกฺขติ, น ปน สทฺทํ โสสฺสตี’ติ. มยิ อุฬารํ ปสาทํ ปเวเทตฺวา มํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามี’’ติ. “त्यानंतर, पुक्कुस, त्या माणसाच्या मनात असा विचार आला—‘अहो, आश्चर्य आहे! अहो, अद्भुत आहे! हे प्रव्रजित खरोखरच अत्यंत शांत विहाराने (अवस्थेत) राहतात. कारण सज्ञी आणि जागृत असूनही, मुसळधार पाऊस पडत असताना, मेघगर्जना होत असताना, विजा चमकत असताना आणि वीज कोसळली असता त्यांनी काही पाहिलेही नाही आणि आवाजही ऐकला नाही!’ माझ्याविषयी अत्यंत आदर व श्रद्धा व्यक्त करून, मला अभिवादन करून आणि प्रदक्षिणा घालून तो निघून गेला.” เอวํ วุตฺเต ปุกฺกุโส มลฺลปุตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘เอสาหํ, ภนฺเต, โย เม อาฬาเร กาลาเม ปสาโท ตํ มหาวาเต วา โอผุณามิ สีฆโสตาย วา นทิยา ปวาเหมิ. อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต, อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต! เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย, ปฏิจฺฉนฺนํ วา วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย ‘จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตี’ติ; เอวเมวํ ภควตา อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอสาหํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ สรณํ คจฺฉามิ ธมฺมญฺจ ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. อุปาสกํ มํ ภควา ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คต’’นฺติ. असे म्हटले असता, मल्लपुत्र पुक्कुस भगवंतांना म्हणाला—“भन्ते, माझी आळार कालामावरील जी काही श्रद्धा होती, ती मी मोठ्या वादळात उडवून देतो किंवा वेगवान प्रवाहाच्या नदीत वाहून देतो. अतिशय सुंदर, भन्ते! अतिशय सुंदर, भन्ते! ज्याप्रमाणे, भन्ते, कोणी पालथे घातलेले भांडे उताणे करावे, झाकलेले उघडे करावे, वाट चुकलेल्याला वाट दाखवावी किंवा अंधारात तेलाचा दिवा धरावा जेणेकरून डोळे असणाऱ्यांना रूपे दिसू शकतील; त्याचप्रमाणे भगवंतांनी अनेक प्रकारे धम्म प्रकाशित केला आहे. भन्ते, मी भगवंतांना, धम्माला आणि भिक्खू संघाला शरण जातो. भगवंतांनी मला आजपासून जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे.” ๑๙๔. อถ โข ปุกฺกุโส มลฺลปุตฺโต อญฺญตรํ ปุริสํ อามนฺเตสิ – ‘‘อิงฺฆ เม ตฺวํ, ภเณ, สิงฺคีวณฺณํ ยุคมฏฺฐํ ธารณียํ อาหรา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข โส ปุริโส ปุกฺกุสสฺส มลฺลปุตฺตสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ตํ สิงฺคีวณฺณํ ยุคมฏฺฐํ ธารณียํ อาหริ. อถ โข ปุกฺกุโส มลฺลปุตฺโต ตํ สิงฺคีวณฺณํ ยุคมฏฺฐํ ธารณียํ ภควโต อุปนาเมสิ – ‘‘อิทํ, ภนฺเต, สิงฺคีวณฺณํ ยุคมฏฺฐํ ธารณียํ, ตํ เม ภควา ปฏิคฺคณฺหาตุ อนุกมฺปํ อุปาทายา’’ติ. ‘‘เตน หิ, ปุกฺกุส, เอเกน มํ อจฺฉาเทหิ, เอเกน อานนฺท’’นฺติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข ปุกฺกุโส มลฺลปุตฺโต ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา เอเกน ภควนฺตํ อจฺฉาเทติ, เอเกน อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ. อถ โข ภควา ปุกฺกุสํ มลฺลปุตฺตํ ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสสิ สมาทเปสิ สมุตฺเตเชสิ สมฺปหํเสสิ. อถ โข ปุกฺกุโส มลฺลปุตฺโต ภควตา ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺสิโต สมาทปิโต สมุตฺเตชิโต สมฺปหํสิโต อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. १९४. त्यानंतर मल्लपुत्र पुक्कुसाने आपल्या एका सेवकाला बोलावून म्हटले—“अरे मित्रा, जा आणि माझ्यासाठी सुवर्णवर्णाचे, मुलायम वस्त्रजोड घेऊन ये.” “होय, स्वामी,” असे म्हणून त्या माणसाने मल्लपुत्र पुक्कुसाच्या आज्ञेचे पालन केले आणि ते सुवर्णवर्णाचे मुलायम वस्त्रजोड आणले. त्यानंतर मल्लपुत्र पुक्कुसाने ते सुवर्णवर्णाचे मुलायम वस्त्रजोड भगवंतांना अर्पण केले आणि म्हटले—“भन्ते, हे सुवर्णवर्णाचे मुलायम वस्त्रजोड आहे. भगवंतांनी माझ्यावर अनुकंपा करून याचा स्वीकार करावा.” (भगवान म्हणाले)—“तर मग, पुक्कुस, एका वस्त्राने मला आच्छादित कर आणि दुसऱ्याने आनंदाला.” “होय, भन्ते,” असे म्हणून मल्लपुत्र पुक्कुसाने भगवंतांच्या आज्ञेचे पालन केले आणि एका वस्त्राने भगवंतांना आच्छादित केले व दुसऱ्याने आयुष्यमान आनंदाला. त्यानंतर भगवंतांनी मल्लपुत्र पुक्कुसाला धम्म उपदेशाद्वारे (धम्मकथेने) सन्मार्ग दाखवला, उत्साहित केले, प्रेरित केले आणि आनंदित केले. त्यानंतर भगवंतांच्या धम्म उपदेशाने सन्मार्ग मिळालेला, उत्साहित झालेला, प्रेरित झालेला आणि आनंदित झालेला मल्लपुत्र पुक्कुस आपल्या आसनावरून उठला, भगवंतांना अभिवादन केले आणि प्रदक्षिणा घालून निघून गेला. ๑๙๕. อถ [Pg.111] โข อายสฺมา อานนฺโท อจิรปกฺกนฺเต ปุกฺกุเส มลฺลปุตฺเต ตํ สิงฺคีวณฺณํ ยุคมฏฺฐํ ธารณียํ ภควโต กายํ อุปนาเมสิ. ตํ ภควโต กายํ อุปนามิตํ หตจฺจิกํ วิย ขายติ. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต, ยาว ปริสุทฺโธ, ภนฺเต, ตถาคตสฺส ฉวิวณฺโณ ปริโยทาโต. อิทํ, ภนฺเต, สิงฺคีวณฺณํ ยุคมฏฺฐํ ธารณียํ ภควโต กายํ อุปนามิตํ หตจฺจิกํ วิย ขายตี’’ติ. ‘‘เอวเมตํ, อานนฺท, เอวเมตํ, อานนฺท ทฺวีสุ กาเลสุ อติวิย ตถาคตสฺส กาโย ปริสุทฺโธ โหติ ฉวิวณฺโณ ปริโยทาโต. กตเมสุ ทฺวีสุ? ยญฺจ, อานนฺท, รตฺตึ ตถาคโต อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุชฺฌติ, ยญฺจ รตฺตึ อนุปาทิเสสาย นิพฺพานธาตุยา ปรินิพฺพายติ. อิเมสุ โข, อานนฺท, ทฺวีสุ กาเลสุ อติวิย ตถาคตสฺส กาโย ปริสุทฺโธ โหติ ฉวิวณฺโณ ปริโยทาโต. ‘‘อชฺช โข, ปนานนฺท, รตฺติยา ปจฺฉิเม ยาเม กุสินารายํ อุปวตฺตเน มลฺลานํ สาลวเน อนฺตเรน ยมกสาลานํ ตถาคตสฺส ปรินิพฺพานํ ภวิสฺสติ. อายามานนฺท, เยน กกุธา นที เตนุปสงฺกมิสฺสามา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. १९५. त्यानंतर मल्लपुत्र पुक्कुस निघून गेल्यावर काही वेळातच आयुष्यमान आनंदाने ते सुवर्णवर्णाचे मुलायम वस्त्रजोड भगवंतांच्या शरीरावर चढवले. भगवंतांच्या शरीरावर चढवल्यावर ते वस्त्रजोड जणू काही विझलेल्या निखाऱ्यासारखे (तेजहीन) दिसू लागले. तेव्हा आयुष्यमान आनंद भगवंतांना म्हणाला—“भन्ते, आश्चर्य आहे! भन्ते, अद्भुत आहे! तथागतांची अंगकांती किती अत्यंत शुद्ध आणि तेजस्वी दिसत आहे! भन्ते, हे सुवर्णवर्णाचे मुलायम वस्त्रजोड भगवंतांच्या शरीरावर चढवले असता ते जणू काही विझलेल्या निखाऱ्यासारखे भासत आहे.” (भगवान म्हणाले)—“हे अगदी खरे आहे, आनंदा! हे अगदी खरे आहे, आनंदा! दोन प्रसंगी तथागतांचे शरीर अत्यंत शुद्ध आणि अंगकांती अतिशय तेजस्वी होते. कोणत्या दोन प्रसंगी? ज्या रात्री, आनंदा, तथागतांना अनुत्तर सम्यक्संबोध (सम्मासंबोधी) प्राप्त होते, आणि ज्या रात्री तथागत अनुपधिशेष निर्वाणधातूने (अनुपादिशेस निब्बानधातूने) परिनिर्वाण (परिनिब्बान) पावतात. आनंदा, या दोन प्रसंगी तथागतांचे शरीर अत्यंत शुद्ध आणि अंगकांती अतिशय तेजस्वी होते. आनंदा, आज रात्रीच्या अंतिम प्रहरात, कुसिनारा येथील मल्लांच्या उपवतन नावाच्या शालवनात, दोन शालवृक्षांच्या मध्ये तथागतांचे परिनिर्वाण होईल. चल आनंदा, आपण ककुधा नदीकडे जाऊया.” “होय, भन्ते,” असे म्हणून आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांच्या शब्दांचे पालन केले. สิงฺคีวณฺณํ ยุคมฏฺฐํ, ปุกฺกุโส อภิหารยิ; เตน อจฺฉาทิโต สตฺถา, เหมวณฺโณ อโสภถาติ. पुक्कुसाने सुवर्णवर्णाचे मुलायम वस्त्रजोड अर्पण केले; त्याने आच्छादित झालेले सुवर्णवर्णी शास्ता (बुद्ध) अत्यंत शोभून दिसले. ๑๙๖. อถ โข ภควา มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ เยน กกุธา นที เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา กกุธํ นทึ อชฺโฌคาเหตฺวา นฺหตฺวา จ ปิวิตฺวา จ ปจฺจุตฺตริตฺวา เยน อมฺพวนํ เตนุปสงฺกมิ. อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ จุนฺทกํ อามนฺเตสิ – ‘‘อิงฺฆ เม ตฺวํ, จุนฺทก, จตุคฺคุณํ สงฺฆาฏึ ปญฺญเปหิ, กิลนฺโตสฺมิ, จุนฺทก, นิปชฺชิสฺสามี’’ติ. १९६. त्यानंतर भगवान मोठ्या भिक्षुसंघासह जेथे ककुधा नदी होती तेथे गेले; तेथे पोहोचल्यावर ककुधा नदीत उतरून, स्नान करून व पाणी पिऊन, नदीतून बाहेर आले आणि जेथे आम्रवन होते तेथे गेले. तेथे पोहोचून त्यांनी आयुष्यमान चुन्दकाला संबोधित केले – 'हे चुन्दक, माझ्यासाठी चौपदरी संघाटी अंथरून दे. मी थकलो आहे, चुन्दक, मी निजणार आहे.' ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา จุนฺทโก ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา จตุคฺคุณํ สงฺฆาฏึ ปญฺญเปสิ. อถ โข ภควา ทกฺขิเณน ปสฺเสน สีหเสยฺยํ กปฺเปสิ ปาเท ปาทํ อจฺจาธาย สโต สมฺปชาโน อุฏฺฐานสญฺญํ มนสิกริตฺวา. อายสฺมา ปน จุนฺทโก ตตฺเถว ภควโต ปุรโต นิสีทิ. “तसेच असो, भन्ते!” असे म्हणून आयुष्यमान चुन्दकाने भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला आणि चौपदरी संघाटी अंथरली. त्यानंतर भगवंतांनी उजव्या कुशीवर, एका पायावर दुसरा पाय ठेवून, सजग व संप्रजन्य राहून, उठण्याची संज्ञा मनात ठेवून सिंहशयन केले. आणि आयुष्यमान चुन्दक तेथेच भगवंतांच्या समोर बसले. คนฺตฺวาน [Pg.112] พุทฺโธ นทิกํ กกุธํ,อจฺโฉทกํ สาตุทกํ วิปฺปสนฺนํ; โอคาหิ สตฺถา อกิลนฺตรูโป,ตถาคโต อปฺปฏิโม จ โลเก. बुद्ध ककुधा नदीवर गेले, जिचे पाणी स्वच्छ, गोड आणि अत्यंत निर्मळ होते; तेथे शास्ता थकवा न जाणवणाऱ्या रूपाने उतरले, ते तथागत या जगात अतुलनीय आहेत. นฺหตฺวา จ ปิวิตฺวา จุทตาริ สตฺถา,ปุรกฺขโต ภิกฺขุคณสฺส มชฺเฌ; วตฺตา ปวตฺตา ภควา อิธ ธมฺเม,อุปาคมิ อมฺพวนํ มเหสิ. स्नान करून व पाणी पिऊन शास्ता नदीतून बाहेर आले, भिक्षुसंघाच्या मध्यभागी ते वेढलेले होते; या शासनात धर्माचे प्रवचन करणारे भगवान, ते महर्षी आम्रवनात पोहोचले. อามนฺตยิ จุนฺทกํ นาม ภิกฺขุํ,จตุคฺคุณํ สนฺถร เม นิปชฺชํ; โส โจทิโต ภาวิตตฺเตน จุนฺโท,จตุคฺคุณํ สนฺถริ ขิปฺปเมว. त्यांनी चुन्दक नावाच्या भिक्षूला संबोधित केले – 'माझ्या निजण्यासाठी चौपदरी संघाटी अंथरून दे'; भावितचित्त भगवंतांनी प्रेरित केलेला तो चुन्दक, त्याने त्वरित चौपदरी संघाटी अंथरली. นิปชฺชิ สตฺถา อกิลนฺตรูโป,จุนฺโทปิ ตตฺถ ปมุเข นิสีทีติ. शास्ता थकवा न जाणवणाऱ्या रूपाने निजले, आणि चुन्दकही तेथे त्यांच्या समोरच बसला. ๑๙๗. อถ โข ภควา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘สิยา โข, ปนานนฺท, จุนฺทสฺส กมฺมารปุตฺตสฺส โกจิ วิปฺปฏิสารํ อุปฺปาเทยฺย – ‘ตสฺส เต, อาวุโส จุนฺท, อลาภา ตสฺส เต ทุลฺลทฺธํ, ยสฺส เต ตถาคโต ปจฺฉิมํ ปิณฺฑปาตํ ปริภุญฺชิตฺวา ปรินิพฺพุโต’ติ. จุนฺทสฺส, อานนฺท, กมฺมารปุตฺตสฺส เอวํ วิปฺปฏิสาโร ปฏิวิเนตพฺโพ – ‘ตสฺส เต, อาวุโส จุนฺท, ลาภา ตสฺส เต สุลทฺธํ, ยสฺส เต ตถาคโต ปจฺฉิมํ ปิณฺฑปาตํ ปริภุญฺชิตฺวา ปรินิพฺพุโต. สมฺมุขา เมตํ, อาวุโส จุนฺท, ภควโต สุตํ สมฺมุขา ปฏิคฺคหิตํ – ทฺเว เม ปิณฺฑปาตา สมสมผลา สมวิปากา, อติวิย อญฺเญหิ ปิณฺฑปาเตหิ มหปฺผลตรา จ มหานิสํสตรา จ. กตเม ทฺเว? ยญฺจ ปิณฺฑปาตํ ปริภุญฺชิตฺวา ตถาคโต อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุชฺฌติ, ยญฺจ ปิณฺฑปาตํ ปริภุญฺชิตฺวา ตถาคโต อนุปาทิเสสาย นิพฺพานธาตุยา ปรินิพฺพายติ. อิเม ทฺเว ปิณฺฑปาตา สมสมผลา สมวิปากา[Pg.113], อติวิย อญฺเญหิ ปิณฺฑปาเตหิ มหปฺผลตรา จ มหานิสํสตรา จ. อายุสํวตฺตนิกํ อายสฺมตา จุนฺเทน กมฺมารปุตฺเตน กมฺมํ อุปจิตํ, วณฺณสํวตฺตนิกํ อายสฺมตา จุนฺเทน กมฺมารปุตฺเตน กมฺมํ อุปจิตํ, สุขสํวตฺตนิกํ อายสฺมตา จุนฺเทน กมฺมารปุตฺเตน กมฺมํ อุปจิตํ, ยสสํวตฺตนิกํ อายสฺมตา จุนฺเทน กมฺมารปุตฺเตน กมฺมํ อุปจิตํ, สคฺคสํวตฺตนิกํ อายสฺมตา จุนฺเทน กมฺมารปุตฺเตน กมฺมํ อุปจิตํ, อาธิปเตยฺยสํวตฺตนิกํ อายสฺมตา จุนฺเทน กมฺมารปุตฺเตน กมฺมํ อุปจิต’นฺติ. จุนฺทสฺส, อานนฺท, กมฺมารปุตฺตสฺส เอวํ วิปฺปฏิสาโร ปฏิวิเนตพฺโพ’’ติ. อถ โข ภควา เอตมตฺถํ วิทิตฺวา ตายํ เวลายํ อิมํ อุทานํ อุทาเนสิ – १९७. त्यानंतर भगवंतांनी आयुष्यमान आनंदाला संबोधित केले – “आनंदा, असे घडू शकते की, सुवर्णकारपुत्र चुन्द याला कोणीतरी पश्चात्ताप उत्पन्न करून देईल की – ‘हे आवुसो चुन्द, हा तुझा तोटा आहे, हे तुझे दुर्दैव आहे, की ज्याचे शेवटचे अन्न ग्रहण करून तथागत परिनिर्वाण पावले.’ आनंदा, सुवर्णकारपुत्र चुन्द याचा पश्चात्ताप या प्रकारे दूर केला पाहिजे – ‘हे आवुसो चुन्द, हा तुझा लाभ आहे, हे तुझे सुदैव आहे, की ज्याचे शेवटचे अन्न ग्रहण करून तथागत परिनिर्वाण पावले. हे आवुसो चुन्द, मी स्वतः भगवंतांच्या मुखातून हे ऐकले आहे आणि ग्रहण केले आहे – हे दोन पिंडपात समान फळ देणारे, समान विपाक देणारे आहेत, आणि इतर पिंडपातांपेक्षा अत्यंत महाफलदायी व महा-अनुशंसदायी आहेत. कोणते दोन? ज्या पिंडपाताचे ग्रहण करून तथागत अनुत्तर सम्यक्संबोधिस प्राप्त होतात, आणि ज्या पिंडपाताचे ग्रहण करून तथागत अनुपधिशेष निर्वाणधातूने परिनिर्वाण पावतात. हे दोन पिंडपात समान फळ देणारे, समान विपाक देणारे आहेत, आणि इतर पिंडपातांपेक्षा अत्यंत महाफलदायी व महा-अनुशंसदायी आहेत. आयुष्यमान सुवर्णकारपुत्र चुन्द याने आयुष्य वाढवणारे कर्म संचित केले आहे, सौंदर्य वाढवणारे कर्म संचित केले आहे, सुख वाढवणारे कर्म संचित केले आहे, कीर्ती वाढवणारे कर्म संचित केले आहे, स्वर्गप्राप्ती करून देणारे कर्म संचित केले आहे, आणि आधिपत्य मिळवून देणारे कर्म संचित केले आहे.’ आनंदा, सुवर्णकारपुत्र चुन्द याचा पश्चात्ताप या प्रकारे दूर केला पाहिजे.” त्यानंतर भगवंतांनी हा अर्थ जाणून त्या वेळी हे उदान काढले – ‘‘ททโต ปุญฺญํ ปวฑฺฒติ,สํยมโต เวรํ น จียติ; กุสโล จ ชหาติ ปาปกํ,ราคโทสโมหกฺขยา สนิพฺพุโต’’ติ. “दान देणाऱ्याचे पुण्य वाढते, संयम राखणाऱ्याचे वैर वाढत नाही; कुशल मनुष्य पापाचा त्याग करतो, आणि राग, द्वेष व मोहाचा क्षय झाल्याने तो पूर्णपणे शांत होतो.” จตุตฺโถ ภาณวาโร. चौथा भाणवार समाप्त. ยมกสาลา यमक शालवृक्ष ๑๙๘. อถ โข ภควา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘อายามานนฺท, เยน หิรญฺญวติยา นทิยา ปาริมํ ตีรํ, เยน กุสินารา อุปวตฺตนํ มลฺลานํ สาลวนํ เตนุปสงฺกมิสฺสามา’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. อถ โข ภควา มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ เยน หิรญฺญวติยา นทิยา ปาริมํ ตีรํ, เยน กุสินารา อุปวตฺตนํ มลฺลานํ สาลวนํ เตนุปสงฺกมิ. อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘อิงฺฆ เม ตฺวํ, อานนฺท, อนฺตเรน ยมกสาลานํ อุตฺตรสีสกํ มญฺจกํ ปญฺญเปหิ, กิลนฺโตสฺมิ, อานนฺท, นิปชฺชิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา อนฺตเรน ยมกสาลานํ อุตฺตรสีสกํ มญฺจกํ ปญฺญเปสิ. อถ โข ภควา ทกฺขิเณน ปสฺเสน สีหเสยฺยํ กปฺเปสิ ปาเท ปาทํ อจฺจาธาย สโต สมฺปชาโน. १९८. त्यानंतर भगवंतांनी आयुष्यमान आनंदाला संबोधित केले – “चल आनंदा, आपण हिरण्यवती नदीच्या पलीकडच्या तीरावर, कुसिनारा येथील मल्लांच्या उपवर्तन नावाच्या शालवनात जाऊ या.” “तसेच असो, भन्ते!” असे म्हणून आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला. त्यानंतर भगवान मोठ्या भिक्षुसंघासह हिरण्यवती नदीच्या पलीकडच्या तीरावर, कुसिनारा येथील मल्लांच्या उपवर्तन नावाच्या शालवनात गेले. तेथे पोहोचल्यावर त्यांनी आयुष्यमान आनंदाला संबोधित केले – “हे आनंदा, माझ्यासाठी यमक शालवृक्षांच्या मध्ये उत्तरेकडे डोके करून मंचक अंथरून दे. मी थकलो आहे, आनंदा, मी निजणार आहे.” “तसेच असो, भन्ते!” असे म्हणून आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला आणि यमक शालवृक्षांच्या मध्ये उत्तरेकडे डोके करून मंचक अंथरला. त्यानंतर भगवंतांनी उजव्या कुशीवर, एका पायावर दुसरा पाय ठेवून, सजग व संप्रजन्य राहून सिंहशयन केले. เตน [Pg.114] โข ปน สมเยน ยมกสาลา สพฺพผาลิผุลฺลา โหนฺติ อกาลปุปฺเผหิ. เต ตถาคตสฺส สรีรํ โอกิรนฺติ อชฺโฌกิรนฺติ อภิปฺปกิรนฺติ ตถาคตสฺส ปูชาย. ทิพฺพานิปิ มนฺทารวปุปฺผานิ อนฺตลิกฺขา ปปตนฺติ, ตานิ ตถาคตสฺส สรีรํ โอกิรนฺติ อชฺโฌกิรนฺติ อภิปฺปกิรนฺติ ตถาคตสฺส ปูชาย. ทิพฺพานิปิ จนฺทนจุณฺณานิ อนฺตลิกฺขา ปปตนฺติ, ตานิ ตถาคตสฺส สรีรํ โอกิรนฺติ อชฺโฌกิรนฺติ อภิปฺปกิรนฺติ ตถาคตสฺส ปูชาย. ทิพฺพานิปิ ตูริยานิ อนฺตลิกฺเข วชฺชนฺติ ตถาคตสฺส ปูชาย. ทิพฺพานิปิ สงฺคีตานิ อนฺตลิกฺเข วตฺตนฺติ ตถาคตสฺส ปูชาย. त्या वेळी ते यमक शालवृक्ष अवेळी आलेल्या फुलांनी पूर्णपणे बहरले होते. तथागतांच्या पूजेसाठी ते तथागतांच्या शरीरावर फुले वर्षत होते, चहूबाजूंनी वर्षत होते आणि सतत वर्षत होते. आकाशातून दिव्य मंदारव फुले पडत होती; तथागतांच्या पूजेसाठी ती तथागतांच्या शरीरावर वर्षत होती, चहूबाजूंनी वर्षत होती आणि सतत वर्षत होती. आकाशातून दिव्य चंदनाचे चूर्ण पडत होते; तथागतांच्या पूजेसाठी ते तथागतांच्या शरीरावर वर्षत होते, चहूबाजूंनी वर्षत होते आणि सतत वर्षत होते. तथागतांच्या पूजेसाठी आकाशात दिव्य वाद्ये वाजत होती. तथागतांच्या पूजेसाठी आकाशात दिव्य संगीत ऐकू येत होते. ๑๙๙. อถ โข ภควา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘สพฺพผาลิผุลฺลา โข, อานนฺท, ยมกสาลา อกาลปุปฺเผหิ. เต ตถาคตสฺส สรีรํ โอกิรนฺติ อชฺโฌกิรนฺติ อภิปฺปกิรนฺติ ตถาคตสฺส ปูชาย. ทิพฺพานิปิ มนฺทารวปุปฺผานิ อนฺตลิกฺขา ปปตนฺติ, ตานิ ตถาคตสฺส สรีรํ โอกิรนฺติ อชฺโฌกิรนฺติ อภิปฺปกิรนฺติ ตถาคตสฺส ปูชาย. ทิพฺพานิปิ จนฺทนจุณฺณานิ อนฺตลิกฺขา ปปตนฺติ, ตานิ ตถาคตสฺส สรีรํ โอกิรนฺติ อชฺโฌกิรนฺติ อภิปฺปกิรนฺติ ตถาคตสฺส ปูชาย. ทิพฺพานิปิ ตูริยานิ อนฺตลิกฺเข วชฺชนฺติ ตถาคตสฺส ปูชาย. ทิพฺพานิปิ สงฺคีตานิ อนฺตลิกฺเข วตฺตนฺติ ตถาคตสฺส ปูชาย. น โข, อานนฺท, เอตฺตาวตา ตถาคโต สกฺกโต วา โหติ ครุกโต วา มานิโต วา ปูชิโต วา อปจิโต วา. โย โข, อานนฺท, ภิกฺขุ วา ภิกฺขุนี วา อุปาสโก วา อุปาสิกา วา ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺโน วิหรติ สามีจิปฺปฏิปนฺโน อนุธมฺมจารี, โส ตถาคตํ สกฺกโรติ ครุํ กโรติ มาเนติ ปูเชติ อปจิยติ, ปรมาย ปูชาย. ตสฺมาติหานนฺท, ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺนา วิหริสฺสาม สามีจิปฺปฏิปนฺนา อนุธมฺมจาริโนติ. เอวญฺหิ โว, อานนฺท, สิกฺขิตพฺพ’’นฺติ. १९९. तेव्हा भगवंतांनी आयुष्यमान आनंदांना संबोधित केले – "आनंदा, हे जोड-साळवृक्ष (यमकसाळ) अकाली फुललेल्या फुलांनी पूर्णपणे बहरले आहेत. ते तथागतांच्या पूजेसाठी तथागतांच्या शरीरावर फुलांचा वर्षाव करत आहेत, त्यांना सर्व बाजूंनी झाकून टाकत आहेत आणि सतत उधळत आहेत. दिव्य मंदारव फुले देखील आकाशातून पडत आहेत, ती तथागतांच्या पूजेसाठी तथागतांच्या शरीरावर वर्षाव करत आहेत, त्यांना सर्व बाजूंनी झाकून टाकत आहेत आणि सतत उधळत आहेत. दिव्य चंदनाची भुकटी देखील आकाशातून पडत आहे, ती तथागतांच्या पूजेसाठी तथागतांच्या शरीरावर वर्षाव करत आहे, त्यांना सर्व बाजूंनी झाकून टाकत आहे आणि सतत उधळत आहे. दिव्य वाद्ये देखील तथागतांच्या पूजेसाठी आकाशात वाजत आहेत. दिव्य संगीत देखील तथागतांच्या पूजेसाठी आकाशात गुंजत आहे. परंतु, आनंदा, केवळ एवढ्यानेच तथागतांचा आदर, सत्कार, सन्मान, पूजा किंवा अर्चना होत नाही. आनंदा, जो कोणी भिक्खू किंवा भिक्खुणी, उपासक किंवा उपासिका धर्माला अनुसरून योग्य आचरण करतो (धम्मानुधम्मपटिपन्न), योग्य मार्गाने चालतो (सामीचिपटिपन्न) आणि धर्मानुसार वर्तन करतो (अनुधम्मचारी), तोच तथागतांचा आदर करतो, सत्कार करतो, सन्मान करतो, पूजा करतो आणि परम पूजेने त्यांची अर्चना करतो. म्हणूनच, आनंदा, 'आम्ही धम्मानुधम्मपटिपन्न (धर्माला अनुसरून योग्य आचरण करणारे), सामीचिपटिपन्न (योग्य मार्गाने चालणारे) आणि अनुधम्मचारी (धर्मानुसार वर्तन करणारे) होऊन विहरू' – असेच तुम्ही, आनंदा, शिकले पाहिजे." อุปวาณตฺเถโร आयुष्यमान उपवाण थेर ๒๐๐. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา อุปวาโณ ภควโต ปุรโต ฐิโต โหติ ภควนฺตํ พีชยมาโน. อถ โข ภควา อายสฺมนฺตํ อุปวาณํ อปสาเรสิ – ‘‘อเปหิ, ภิกฺขุ, มา เม ปุรโต อฏฺฐาสี’’ติ. อถ โข อายสฺมโต อานนฺทสฺส เอตทโหสิ – ‘‘อยํ โข [Pg.115] อายสฺมา อุปวาโณ ทีฆรตฺตํ ภควโต อุปฏฺฐาโก สนฺติกาวจโร สมีปจารี. อถ จ ปน ภควา ปจฺฉิเม กาเล อายสฺมนฺตํ อุปวาณํ อปสาเรติ – ‘อเปหิ ภิกฺขุ, มา เม ปุรโต อฏฺฐาสี’ติ. โก นุ โข เหตุ, โก ปจฺจโย, ยํ ภควา อายสฺมนฺตํ อุปวาณํ อปสาเรติ – ‘อเปหิ, ภิกฺขุ, มา เม ปุรโต อฏฺฐาสี’ติ? อถ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘อยํ, ภนฺเต, อายสฺมา อุปวาโณ ทีฆรตฺตํ ภควโต อุปฏฺฐาโก สนฺติกาวจโร สมีปจารี. อถ จ ปน ภควา ปจฺฉิเม กาเล อายสฺมนฺตํ อุปวาณํ อปสาเรติ – ‘‘อเปหิ, ภิกฺขุ, มา เม ปุรโต อฏฺฐาสี’’ติ. โก นุ โข, ภนฺเต, เหตุ, โก ปจฺจโย, ยํ ภควา อายสฺมนฺตํ อุปวาณํ อปสาเรติ – ‘‘อเปหิ, ภิกฺขุ, มา เม ปุรโต อฏฺฐาสี’’ติ? ‘‘เยภุยฺเยน, อานนฺท, ทสสุ โลกธาตูสุ เทวตา สนฺนิปติตา ตถาคตํ ทสฺสนาย. ยาวตา, อานนฺท, กุสินารา อุปวตฺตนํ มลฺลานํ สาลวนํ สมนฺตโต ทฺวาทส โยชนานิ, นตฺถิ โส ปเทโส วาลคฺคโกฏินิตุทนมตฺโตปิ มเหสกฺขาหิ เทวตาหิ อปฺผุโฏ. เทวตา, อานนฺท, อุชฺฌายนฺติ – ‘ทูรา จ วตมฺห อาคตา ตถาคตํ ทสฺสนาย. กทาจิ กรหจิ ตถาคตา โลเก อุปฺปชฺชนฺติ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา. อชฺเชว รตฺติยา ปจฺฉิเม ยาเม ตถาคตสฺส ปรินิพฺพานํ ภวิสฺสติ. อยญฺจ มเหสกฺโข ภิกฺขุ ภควโต ปุรโต ฐิโต โอวาเรนฺโต, น มยํ ลภาม ปจฺฉิเม กาเล ตถาคตํ ทสฺสนายา’’’ติ. २००. त्या वेळी आयुष्यमान उपवाण भगवंतांच्या समोर उभे राहून त्यांना पंख्याने वारा घालत होते. तेव्हा भगवंतांनी आयुष्यमान उपवाणांना बाजूला सारले – "भिक्खू, बाजूला हो, माझ्या समोर उभा राहू नकोस." तेव्हा आयुष्यमान आनंदांच्या मनात असा विचार आला – "हे आयुष्यमान उपवाण दीर्घकाळापासून भगवंतांचे उपस्थायक (सेवक), त्यांच्या जवळ राहणारे आणि सतत त्यांच्या सेवेत असणारे आहेत. तरीही भगवंत अंतिम क्षणी आयुष्यमान उपवाणांना बाजूला सारत आहेत – 'भिक्खू, बाजूला हो, माझ्या समोर उभा राहू नकोस.' भगवंतांनी आयुष्यमान उपवाणांना 'भिक्खू, बाजूला हो, माझ्या समोर उभा राहू नकोस' असे म्हणून बाजूला सारण्याचे काय कारण (हेतू) आणि काय निमित्त (प्रत्यय) असावे?" त्यानंतर आयुष्यमान आनंदांनी भगवंतांना विचारले – "भंते, हे आयुष्यमान उपवाण दीर्घकाळापासून भगवंतांचे उपस्थायक, त्यांच्या जवळ राहणारे आणि सतत त्यांच्या सेवेत असणारे आहेत. तरीही भगवंत अंतिम क्षणी आयुष्यमान उपवाणांना बाजूला सारत आहेत – 'भिक्खू, बाजूला हो, माझ्या समोर उभा राहू नकोस.' भंते, भगवंतांनी आयुष्यमान उपवाणांना 'भिक्खू, बाजूला हो, माझ्या समोर उभा राहू नकोस' असे म्हणून बाजूला सारण्याचे काय कारण आणि काय निमित्त आहे?" "आनंदा, दहांही दिशांमधील (दहा हजार) लोकधातूंतून बहुतांश देवता तथागतांच्या दर्शनासाठी एकत्र आल्या आहेत. आनंदा, कुसिनारा येथील मल्लांच्या उपवत्तन साळवनाच्या सभोवताली बारा योजनेच्या परिसरात अशी कोणतीही जागा नाही, अगदी केसाच्या टोकाने स्पर्श करता येईल एवढीही जागा नाही, जी महातेजस्वी (महेशक्ख) देवतांनी व्यापलेली नाही. आनंदा, देवता तक्रार करत आहेत – 'आम्ही तथागतांच्या दर्शनासाठी खूप दूरवरून आलो आहोत. जगात तथागत, अर्हत, सम्यक संबुद्ध कधीतरीच जन्माला येतात. आज रात्रीच्या अंतिम प्रहरात तथागतांचे परिनिर्वाण होणार आहे. आणि हा महातेजस्वी भिक्खू भगवंतांच्या समोर उभा राहून आमची दृष्टी अडवत आहे, ज्यामुळे आम्हाला या अंतिम क्षणी तथागतांचे दर्शन घेता येत नाही.'" ๒๐๑. ‘‘กถํภูตา ปน, ภนฺเต, ภควา เทวตา มนสิกโรตี’’ติ ? ‘‘สนฺตานนฺท, เทวตา อากาเส ปถวีสญฺญินิโย เกเส ปกิริย กนฺทนฺติ, พาหา ปคฺคยฺห กนฺทนฺติ, ฉินฺนปาตํ ปปตนฺติ, อาวฏฺฏนฺติ, วิวฏฺฏนฺติ – ‘อติขิปฺปํ ภควา ปรินิพฺพายิสฺสติ, อติขิปฺปํ สุคโต ปรินิพฺพายิสฺสติ, อติขิปฺปํ จกฺขุํ โลเก อนฺตรธํอายิสฺสตี’ติ. २०१. "पण भंते, देवता कशा प्रकारे विचार करत आहेत (त्यांची मानसिक स्थिती कशी आहे)?" "आनंदा, आकाशात राहणाऱ्या ज्या देवता पृथ्वी-बुद्धीच्या (पृथ्वीची आसक्ती असलेल्या) आहेत, त्या आपलेcase मोकळे सोडून रडत आहेत, आपले हात वर करून आक्रोश करत आहेत, कड्यावरून कोसळल्यासारख्या जमिनीवर पडत आहेत, इकडेतिकडे लोळत आहेत आणि म्हणत आहेत – 'भगवंत अतिशय लवकर परिनिर्वाण पावणार आहेत! सुगत अतिशय लवकर परिनिर्वाण पावणार आहेत! जगातील ज्ञानचक्षू अतिशय लवकर नाहीसे होणार आहेत!'" ‘‘สนฺตานนฺท, เทวตา ปถวิยํ ปถวีสญฺญินิโย เกเส ปกิริย กนฺทนฺติ, พาหา ปคฺคยฺห กนฺทนฺติ, ฉินฺนปาตํ ปปตนฺติ, อาวฏฺฏนฺติ, วิวฏฺฏนฺติ – ‘อติขิปฺปํ ภควา ปรินิพฺพายิสฺสติ, อติขิปฺปํ สุคโต ปรินิพฺพายิสฺสติ, อติขิปฺปํ จกฺขุํ โลเก อนฺตรธายิสฺสตี’’’ติ. "आनंदा, पृथ्वीवर राहणाऱ्या ज्या देवता पृथ्वी-बुद्धीच्या (पृथ्वीची आसक्ती असलेल्या) आहेत, त्या आपले केस मोकळे सोडून रडत आहेत, आपले हात वर करून आक्रोश करत आहेत, कड्यावरून कोसळल्यासारख्या जमिनीवर पडत आहेत, इकडेतिकडे लोळत आहेत आणि म्हणत आहेत – 'भगवंत अतिशय लवकर परिनिर्वाण पावणार आहेत! सुगत अतिशय लवकर परिनिर्वाण पावणार आहेत! जगातील ज्ञानचक्षू अतिशय लवकर नाहीसे होणार आहेत!'" ‘‘ยา [Pg.116] ปน ตา เทวตา วีตราคา, ตา สตา สมฺปชานา อธิวาเสนฺติ – ‘อนิจฺจา สงฺขารา, ตํ กุเตตฺถ ลพฺภา’ติ. "परंतु, ज्या देवता वीतरागी (रागमुक्त) आहेत, त्या जागरूक आणि सजग राहून हे सहन करत आहेत आणि विचार करत आहेत – 'सर्व संस्कार अनित्य आहेत, मग येथे काय मिळणे शक्य आहे (जे उत्पन्न झाले आहे त्याचा नाश अटळ आहे, तर ते नष्ट न व्हावे असे कसे घडू शकेल)?'" จตุสํเวชนียฏฺฐานานิ चार संवेजनीय स्थाने ๒๐๒. ‘‘ปุพฺเพ, ภนฺเต, ทิสาสุ วสฺสํ วุฏฺฐา ภิกฺขู อาคจฺฉนฺติ ตถาคตํ ทสฺสนาย. เต มยํ ลภาม มโนภาวนีเย ภิกฺขู ทสฺสนาย, ลภาม ปยิรุปาสนาย. ภควโต ปน มยํ, ภนฺเต, อจฺจเยน น ลภิสฺสาม มโนภาวนีเย ภิกฺขู ทสฺสนาย, น ลภิสฺสาม ปยิรุปาสนายา’’ติ. २०२. "भंते, पूर्वी विविध दिशांमध्ये वर्षावास पूर्ण केलेले भिक्खू तथागतांच्या दर्शनासाठी येत असत. आम्हाला त्या आदरणीय (मनोभावनीय) भिक्खूंचे दर्शन घेण्याची आणि त्यांची सेवा-उपासना करण्याची संधी मिळत असे. परंतु, भंते, भगवंतांच्या महापरिनिर्वाणानंतर आम्हाला अशा आदरणीय भिक्खूंचे दर्शन घेण्याची आणि त्यांची सेवा-उपासना करण्याची संधी मिळणार नाही." ‘‘จตฺตาริมานิ, อานนฺท, สทฺธสฺส กุลปุตฺตสฺส ทสฺสนียานิ สํเวชนียานิ ฐานานิ. กตมานิ จตฺตาริ? ‘อิธ ตถาคโต ชาโต’ติ, อานนฺท, สทฺธสฺส กุลปุตฺตสฺส ทสฺสนียํ สํเวชนียํ ฐานํ. ‘อิธ ตถาคโต อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺโธ’ติ, อานนฺท, สทฺธสฺส กุลปุตฺตสฺส ทสฺสนียํ สํเวชนียํ ฐานํ. ‘อิธ ตถาคเตน อนุตฺตรํ ธมฺมจกฺกํ ปวตฺติต’นฺติ, อานนฺท, สทฺธสฺส กุลปุตฺตสฺส ทสฺสนียํ สํเวชนียํ ฐานํ. ‘อิธ ตถาคโต อนุปาทิเสสาย นิพฺพานธาตุยา ปรินิพฺพุโต’ติ, อานนฺท, สทฺธสฺส กุลปุตฺตสฺส ทสฺสนียํ สํเวชนียํ ฐานํ. อิมานิ โข, อานนฺท, จตฺตาริ สทฺธสฺส กุลปุตฺตสฺส ทสฺสนียานิ สํเวชนียานิ ฐานานิ. "आनंदा, श्रद्धावान कुलपुत्रासाठी दर्शनीय आणि संवेग उत्पन्न करणारी ही चार स्थाने आहेत. कोणती चार? 'येथे तथागतांचा जन्म झाला' – आनंदा, हे श्रद्धावान कुलपुत्रासाठी दर्शनीय आणि संवेग उत्पन्न करणारे पहिले स्थान आहे. 'येथे तथागतांना अनुत्तर सम्यक संबोधी प्राप्त झाली' – आनंदा, हे श्रद्धावान कुलपुत्रासाठी दर्शनीय आणि संवेग उत्पन्न करणारे दुसरे स्थान आहे. 'येथे तथागतांनी अनुत्तर धम्मचक्र प्रवर्तित केले' – आनंदा, हे श्रद्धावान कुलपुत्रासाठी दर्शनीय आणि संवेग उत्पन्न करणारे तिसरे स्थान आहे. 'येथे तथागतांचे अनुपधिशेष निर्वाणधातूमध्ये परिनिर्वाण झाले' – आनंदा, हे श्रद्धावान कुलपुत्रासाठी दर्शनीय आणि संवेग उत्पन्न करणारे चौथे स्थान आहे. आनंदा, श्रद्धावान कुलपुत्रासाठी दर्शनीय आणि संवेग उत्पन्न करणारी हीच ती चार स्थाने आहेत." ‘‘อาคมิสฺสนฺติ โข, อานนฺท, สทฺธา ภิกฺขู ภิกฺขุนิโย อุปาสกา อุปาสิกาโย – ‘อิธ ตถาคโต ชาโต’ติปิ, ‘อิธ ตถาคโต อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺโธ’ติปิ, ‘อิธ ตถาคเตน อนุตฺตรํ ธมฺมจกฺกํ ปวตฺติต’นฺติปิ, ‘อิธ ตถาคโต อนุปาทิเสสาย นิพฺพานธาตุยา ปรินิพฺพุโต’ติปิ. เย หิ เกจิ, อานนฺท, เจติยจาริกํ อาหิณฺฑนฺตา ปสนฺนจิตฺตา กาลงฺกริสฺสนฺติ, สพฺเพ เต กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิสฺสนฺตี’’ติ. “आनंदा, श्रद्धावान भिक्खू, भिक्खुनी, उपासक आणि उपासिका (या स्थानांना भेट देण्यासाठी) येतील – ‘येथे तथागतांचा जन्म झाला’, ‘येथे तथागतांनी अनुत्तर सम्यक्संबोधित्व प्राप्त केले’, ‘येथे तथागतांनी अनुत्तर धम्मचक्र प्रवर्तित केले’, ‘येथे तथागतांचे अनुपधिशेष निर्वाणधातूमध्ये परिनिर्वाण झाले’. आनंदा, जे कोणी या चैत्ययात्रेला (तीर्थयात्रेला) फिरत असताना प्रसन्न चित्ताने मृत्यू पावतील, ते सर्व शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतील.” อานนฺทปุจฺฉากถา आनंद-प्रश्न-कथा ๒๐๓. ‘‘กถํ มยํ, ภนฺเต, มาตุคาเม ปฏิปชฺชามา’’ติ? ‘‘อทสฺสนํ, อานนฺทา’’ติ. ‘‘ทสฺสเน, ภควา, สติ กถํ ปฏิปชฺชิตพฺพ’’นฺติ? ‘‘อนาลาโป, อานนฺทา’’ติ[Pg.117]. ‘‘อาลปนฺเตน ปน, ภนฺเต, กถํ ปฏิปชฺชิตพฺพ’’นฺติ? ‘‘สติ, อานนฺท, อุปฏฺฐาเปตพฺพา’’ติ. २०३. “भंते, आम्ही स्त्रियांच्या (मातृगामाच्या) बाबतीत कसे वागावे?” “आनंदा, त्यांचे दर्शन न घेणे (त्यांच्याकडे न पाहणे).” “पण भगवंत, जर दर्शन झालेच, तर कसे वागावे?” “आनंदा, त्यांच्याशी संभाषण न करणे.” “परंतु भंते, जर बोलावेच लागले, तर कसे वागावे?” “आनंदा, स्मृती (सती) प्रस्थापित करावी (जागृत ठेवावी).” ๒๐๔. ‘‘กถํ มยํ, ภนฺเต, ตถาคตสฺส สรีเร ปฏิปชฺชามา’’ติ? ‘‘อพฺยาวฏา ตุมฺเห, อานนฺท, โหถ ตถาคตสฺส สรีรปูชาย. อิงฺฆ ตุมฺเห, อานนฺท, สารตฺเถ ฆฏถ อนุยุญฺชถ, สารตฺเถ อปฺปมตฺตา อาตาปิโน ปหิตตฺตา วิหรถ. สนฺตานนฺท, ขตฺติยปณฺฑิตาปิ พฺราหฺมณปณฺฑิตาปิ คหปติปณฺฑิตาปิ ตถาคเต อภิปฺปสนฺนา, เต ตถาคตสฺส สรีรปูชํ กริสฺสนฺตี’’ติ. २०४. “भंते, आम्ही तथागतांच्या शरीराच्या (पार्थिवाच्या) बाबतीत कसे वागावे?” “आनंदा, तुम्ही तथागतांच्या शरीर-पूजेच्या (अंत्यसंस्काराच्या) चिंतेत पडू नका. चला आनंदा, तुम्ही परम कल्याणासाठी (सार्थ) प्रयत्न करा, त्यात तत्पर व्हा; परम कल्याणात अप्रमत्त, उद्योगी आणि समर्पित चित्ताने विहार करा. आनंदा, तथागतांवर अत्यंत श्रद्धा असणारे विद्वान क्षत्रिय, विद्वान ब्राह्मण आणि विद्वान गृहपती आहेत; ते तथागतांच्या शरीराची पूजा (अंत्यसंस्कार) करतील.” ๒๐๕. ‘‘กถํ ปน, ภนฺเต, ตถาคตสฺส สรีเร ปฏิปชฺชิตพฺพ’’นฺติ? ‘‘ยถา โข, อานนฺท, รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส สรีเร ปฏิปชฺชนฺติ, เอวํ ตถาคตสฺส สรีเร ปฏิปชฺชิตพฺพ’’นฺติ. ‘‘กถํ ปน, ภนฺเต, รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส สรีเร ปฏิปชฺชนฺตี’’ติ? ‘‘รญฺโญ, อานนฺท, จกฺกวตฺติสฺส สรีรํ อหเตน วตฺเถน เวเฐนฺติ, อหเตน วตฺเถน เวเฐตฺวา วิหเตน กปฺปาเสน เวเฐนฺติ, วิหเตน กปฺปาเสน เวเฐตฺวา อหเตน วตฺเถน เวเฐนฺติ. เอเตนุปาเยน ปญฺจหิ ยุคสเตหิ รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส สรีรํ เวเฐตฺวา อายสาย เตลโทณิยา ปกฺขิปิตฺวา อญฺญิสฺสา อายสาย โทณิยา ปฏิกุชฺชิตฺวา สพฺพคนฺธานํ จิตกํ กริตฺวา รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส สรีรํ ฌาเปนฺติ. จาตุมหาปเถ รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส ถูปํ กโรนฺติ. เอวํ โข, อานนฺท, รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส สรีเร ปฏิปชฺชนฺติ. ยถา โข, อานนฺท, รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส สรีเร ปฏิปชฺชนฺติ, เอวํ ตถาคตสฺส สรีเร ปฏิปชฺชิตพฺพํ. จาตุมหาปเถ ตถาคตสฺส ถูโป กาตพฺโพ. ตตฺถ เย มาลํ วา คนฺธํ วา จุณฺณกํ วา อาโรเปสฺสนฺติ วา อภิวาเทสฺสนฺติ วา จิตฺตํ วา ปสาเทสฺสนฺติ เตสํ ตํ ภวิสฺสติ ทีฆรตฺตํ หิตาย สุขาย. २०५. “परंतु भंते, तथागतांच्या शरीराच्या बाबतीत कसे वागावे?” “आनंदा, ज्याप्रमाणे चक्रवर्ती राजाच्या शरीराच्या बाबतीत वागतात, त्याचप्रमाणे तथागतांच्या शरीराच्या बाबतीत वागावे.” “परंतु भंते, चक्रवर्ती राजाच्या शरीराच्या बाबतीत कसे वागतात?” “आनंदा, चक्रवर्ती राजाच्या शरीराला नवीन वस्त्राने वेष्टित करतात (गुंडाळतात). नवीन वस्त्राने वेष्टित करून पिंजलेल्या कापसाने वेष्टित करतात. पिंजलेल्या कापसाने वेष्टित करून पुन्हा नवीन वस्त्राने वेष्टित करतात. या पद्धतीने पाचशे वस्त्रजोड्यांनी चक्रवर्ती राजाच्या शरीराला वेष्टित करून, ते तेलाने भरलेल्या धातूच्या द्रोणीत (पेटीत) ठेवतात आणि दुसऱ्या धातूच्या द्रोणीने ते झाकून टाकतात. नंतर सर्व प्रकारच्या सुगंधी लाकडांची चिता रचून चक्रवर्ती राजाच्या शरीराचे दहन करतात. आणि चार महामार्गांच्या (चौकाच्या) संगमावर चक्रवर्ती राजाचा स्तूप बांधतात. आनंदा, अशा प्रकारे चक्रवर्ती राजाच्या शरीराच्या बाबतीत वागतात. आनंदा, ज्याप्रमाणे चक्रवर्ती राजाच्या शरीराच्या बाबतीत वागतात, त्याचप्रमाणे तथागतांच्या शरीराच्या बाबतीत वागावे. चार महामार्गांच्या संगमावर तथागतांचा स्तूप बांधावा. तेथे जे कोणी पुष्प, गंध किंवा चूर्ण वाहतील, किंवा अभिवादन करतील, किंवा आपले चित्त प्रसन्न करतील, ते त्यांच्या दीर्घकालीन हितासाठी आणि सुखासाठी होईल.” ถูปารหปุคฺคโล स्तूपार्ह पुद्गल (स्तूप बांधण्यास योग्य व्यक्ती) ๒๐๖. ‘‘จตฺตาโรเม, อานนฺท, ถูปารหา. กตเม จตฺตาโร? ตถาคโต อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ถูปารโห, ปจฺเจกสมฺพุทฺโธ ถูปารโห, ตถาคตสฺส สาวโก ถูปารโห, ราชา จกฺกวตฺตี ถูปารโหติ. २०६. “आनंदा, हे चार स्तूपार्ह (स्तूप बांधण्यास योग्य) आहेत. कोणते चार? तथागत अर्हत सम्यक्संबुद्ध हे स्तूपार्ह आहेत, प्रत्येकबुद्ध हे स्तूपार्ह आहेत, तथागतांचे श्रावक हे स्तूपार्ह आहेत आणि चक्रवर्ती राजा हे स्तूपार्ह आहेत.” ‘‘กิญฺจานนฺท[Pg.118], อตฺถวสํ ปฏิจฺจ ตถาคโต อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ถูปารโห? ‘อยํ ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ถูโป’ติ, อานนฺท, พหุชนา จิตฺตํ ปสาเทนฺติ. เต ตตฺถ จิตฺตํ ปสาเทตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. อิทํ โข, อานนฺท, อตฺถวสํ ปฏิจฺจ ตถาคโต อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ ถูปารโห. “आनंदा, कोणत्या कारणाचा (प्रयोजनाचा) विचार करून तथागत अर्हत सम्यक्संबुद्ध हे स्तूपार्ह आहेत? ‘हा त्या भगवंत अर्हत सम्यक्संबुद्धांचा स्तूप आहे’ असे म्हणून, आनंदा, बहुसंख्य लोक आपले चित्त प्रसन्न करतात. ते तेथे चित्त प्रसन्न करून शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. आनंदा, याच कारणाचा विचार करून तथागत अर्हत सम्यक्संबुद्ध हे स्तूपार्ह आहेत.” ‘‘กิญฺจานนฺท, อตฺถวสํ ปฏิจฺจ ปจฺเจกสมฺพุทฺโธ ถูปารโห? ‘อยํ ตสฺส ภควโต ปจฺเจกสมฺพุทฺธสฺส ถูโป’ติ, อานนฺท, พหุชนา จิตฺตํ ปสาเทนฺติ. เต ตตฺถ จิตฺตํ ปสาเทตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. อิทํ โข, อานนฺท, อตฺถวสํ ปฏิจฺจ ปจฺเจกสมฺพุทฺโธ ถูปารโห. “आनंदा, कोणत्या कारणाचा विचार करून प्रत्येकबुद्ध हे स्तूपार्ह आहेत? ‘हा त्या भगवंत प्रत्येकबुद्धांचा स्तूप आहे’ असे म्हणून, आनंदा, बहुसंख्य लोक आपले चित्त प्रसन्न करतात. ते तेथे चित्त प्रसन्न करून शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. आनंदा, याच कारणाचा विचार करून प्रत्येकबुद्ध हे स्तूपार्ह आहेत.” ‘‘กิญฺจานนฺท, อตฺถวสํ ปฏิจฺจ ตถาคตสฺส สาวโก ถูปารโห? ‘อยํ ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส สาวกสฺส ถูโป’ติ อานนฺท, พหุชนา จิตฺตํ ปสาเทนฺติ. เต ตตฺถ จิตฺตํ ปสาเทตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. อิทํ โข, อานนฺท, อตฺถวสํ ปฏิจฺจ ตถาคตสฺส สาวโก ถูปารโห. “आनंदा, कोणत्या कारणाचा विचार करून तथागतांचे श्रावक हे स्तूपार्ह आहेत? ‘हा त्या भगवंत अर्हत सम्यक्संबुद्धांच्या श्रावकाचा स्तूप आहे’ असे म्हणून, आनंदा, बहुसंख्य लोक आपले चित्त प्रसन्न करतात. ते तेथे चित्त प्रसन्न करून शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. आनंदा, याच कारणाचा विचार करून तथागतांचे श्रावक हे स्तूपार्ह आहेत.” ‘‘กิญฺจานนฺท, อตฺถวสํ ปฏิจฺจ ราชา จกฺกวตฺตี ถูปารโห? ‘อยํ ตสฺส ธมฺมิกสฺส ธมฺมรญฺโญ ถูโป’ติ, อานนฺท, พหุชนา จิตฺตํ ปสาเทนฺติ. เต ตตฺถ จิตฺตํ ปสาเทตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ. อิทํ โข, อานนฺท, อตฺถวสํ ปฏิจฺจ ราชา จกฺกวตฺตี ถูปารโห. อิเม โข, อานนฺท จตฺตาโร ถูปารหา’’ติ. “आनंदा, कोणत्या कारणाचा विचार करून चक्रवर्ती राजा हे स्तूपार्ह आहेत? ‘हा त्या धार्मिक, धर्मराजाचा स्तूप आहे’ असे म्हणून, आनंदा, बहुसंख्य लोक आपले चित्त प्रसन्न करतात. ते तेथे चित्त प्रसन्न करून शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. आनंदा, याच कारणाचा विचार करून चक्रवर्ती राजा हे स्तूपार्ह आहेत. आनंदा, हेच ते चार स्तूपार्ह आहेत.” อานนฺทอจฺฉริยธมฺโม आनंदाचे आश्चर्यकारक धर्म (अद्भुत गुण) ๒๐๗. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท วิหารํ ปวิสิตฺวา กปิสีสํ อาลมฺพิตฺวา โรทมาโน อฏฺฐาสิ – ‘‘อหญฺจ วตมฺหิ เสโข สกรณีโย, สตฺถุ จ เม ปรินิพฺพานํ ภวิสฺสติ, โย มม อนุกมฺปโก’’ติ. อถ โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘กหํ นุ โข, ภิกฺขเว, อานนฺโท’’ติ? ‘‘เอโส, ภนฺเต, อายสฺมา อานนฺโท วิหารํ ปวิสิตฺวา กปิสีสํ อาลมฺพิตฺวา โรทมาโน ฐิโต – ‘อหญฺจ วตมฺหิ เสโข สกรณีโย, สตฺถุ จ เม ปรินิพฺพานํ ภวิสฺสติ, โย มม อนุกมฺปโก’’’ติ. อถ โข ภควา อญฺญตรํ ภิกฺขุํ อามนฺเตสิ – ‘‘เอหิ ตฺวํ, ภิกฺขุ, มม วจเนน อานนฺทํ อามนฺเตหิ [Pg.119] – ‘สตฺถา ตํ, อาวุโส อานนฺท, อามนฺเตตี’’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข โส ภิกฺขุ ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตทโวจ – ‘‘สตฺถา ตํ, อาวุโส อานนฺท, อามนฺเตตี’’ติ. ‘‘เอวมาวุโส’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ตสฺส ภิกฺขุโน ปฏิสฺสุตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ ภควา เอตทโวจ – ‘‘อลํ, อานนฺท, มา โสจิ มา ปริเทวิ, นนุ เอตํ, อานนฺท, มยา ปฏิกจฺเจว อกฺขาตํ – ‘สพฺเพเหว ปิเยหิ มนาเปหิ นานาภาโว วินาภาโว อญฺญถาภาโว’; ตํ กุเตตฺถ, อานนฺท, ลพฺภา. ยํ ตํ ชาตํ ภูตํ สงฺขตํ ปโลกธมฺมํ, ตํ วต ตถาคตสฺสาปิ สรีรํ มา ปลุชฺชี’ติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. ทีฆรตฺตํ โข เต, อานนฺท, ตถาคโต ปจฺจุปฏฺฐิโต เมตฺเตน กายกมฺเมน หิเตน สุเขน อทฺวเยน อปฺปมาเณน, เมตฺเตน วจีกมฺเมน หิเตน สุเขน อทฺวเยน อปฺปมาเณน, เมตฺเตน มโนกมฺเมน หิเตน สุเขน อทฺวเยน อปฺปมาเณน. กตปุญฺโญสิ ตฺวํ, อานนฺท, ปธานมนุยุญฺช, ขิปฺปํ โหหิสิ อนาสโว’’ติ. २०७. तेव्हा आयुष्यमान आनंद विहारात जाऊन, दाराच्या खांबाला टेकून रडत उभे राहिले – "अरेरे! मी अजूनही केवळ एक 'सेख' (साधक) आहे, ज्याचे कर्तव्य अजून पूर्ण व्हायचे आहे. आणि माझे कल्याण करणारे, माझ्यावर अनुकंपा करणारे माझे शास्ता आता परिनिर्वाण पावत आहेत!" तेव्हा भगवंतांनी भिक्खूंना विचारले, "भिक्खूंनो, आनंद कुठे आहेत?" भिक्खूंनी उत्तर दिले, "भंते, ते आयुष्यमान आनंद विहारात जाऊन, दाराच्या खांबाला टेकून रडत उभे आहेत – 'मी अजूनही केवळ एक सेख आहे, ज्याचे कर्तव्य अजून पूर्ण व्हायचे आहे. आणि माझे कल्याण करणारे, माझ्यावर अनुकंपा करणारे माझे शास्ता आता परिनिर्वाण पावत आहेत!'" तेव्हा भगवंतांनी एका भिक्खूला बोलावले आणि म्हणाले, "भिक्खू, जा आणि माझ्या वतीने आनंदाला सांग – 'आयुष्यमान आनंद, शास्ता तुम्हाला बोलावत आहेत.'" "जी भंते," असे म्हणून तो भिक्खू भगवंतांच्या आज्ञेचे पालन करत जेथे आयुष्यमान आनंद होते तेथे गेला. तेथे जाऊन त्याने आयुष्यमान आनंदांना म्हटले, "आयुष्यमान आनंद, शास्ता तुम्हाला बोलावत आहेत." "ठीक आहे, आवुसो," असे उत्तर देऊन आयुष्यमान आनंदांनी त्या भिक्खूचे म्हणणे स्वीकारले आणि जेथे भगवान होते तेथे ते गेले. तेथे जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान आनंदांना भगवान म्हणाले, "पुरे, आनंद! शोक करू नकोस, रडू नकोस. आनंद, मी तुला आधीच सांगितले नाही का की – 'सर्व प्रिय आणि मनाजोगत्या गोष्टींपासून नानाभाव (वियोग), विनाभाव (विरह) आणि अन्यथाभाव (बदल) होणे अपरिहार्य आहे'? मग आनंद, येथे दुसरी काय अपेक्षा केली जाऊ शकते? जे काही उत्पन्न झाले आहे, अस्तित्वात आले आहे, संस्कृत (संस्कारित) आहे आणि ज्याचा स्वभावच नष्ट होण्याचा आहे, त्या तथागतांच्या शरीराचाही नाश होऊ नये, असे घडणे शक्यच नाही. आनंद, तू दीर्घकाळापासून तथागतांची अत्यंत मैत्रीपूर्ण, हितकारक, सुखकारक, निष्कपट आणि अमर्याद अशा कायिक कर्माने सेवा केली आहेस; अत्यंत मैत्रीपूर्ण, हितकारक, सुखकारक, निष्कपट आणि अमर्याद अशा वाचिक कर्माने सेवा केली आहेस; आणि अत्यंत मैत्रीपूर्ण, हितकारक, सुखकारक, निष्कपट आणि अमर्याद अशा मानसिक कर्माने सेवा केली आहेस. आनंद, तू मोठे पुण्य अर्जित केले आहेस. आता तू साधनेत (प्रधानात) तत्पर हो, तू लवकरच आसवरहित (अनास्रव) होशील." ๒๐๘. อถ โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘เยปิ เต, ภิกฺขเว, อเหสุํ อตีตมทฺธานํ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา, เตสมฺปิ ภควนฺตานํ เอตปฺปรมาเยว อุปฏฺฐากา อเหสุํ, เสยฺยถาปิ มยฺหํ อานนฺโท. เยปิ เต, ภิกฺขเว, ภวิสฺสนฺติ อนาคตมทฺธานํ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา, เตสมฺปิ ภควนฺตานํ เอตปฺปรมาเยว อุปฏฺฐากา ภวิสฺสนฺติ, เสยฺยถาปิ มยฺหํ อานนฺโท. ปณฺฑิโต, ภิกฺขเว, อานนฺโท; เมธาวี, ภิกฺขเว, อานนฺโท. ชานาติ ‘อยํ กาโล ตถาคตํ ทสฺสนาย อุปสงฺกมิตุํ ภิกฺขูนํ, อยํ กาโล ภิกฺขุนีนํ, อยํ กาโล อุปาสกานํ, อยํ กาโล อุปาสิกานํ, อยํ กาโล รญฺโญ ราชมหามตฺตานํ ติตฺถิยานํ ติตฺถิยสาวกาน’นฺติ. २०८. त्यानंतर भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले, "भिक्खूंनो, भूतकाळात जे कोणी अर्हत सम्यक्संबुद्ध होऊन गेले, त्या भगवंतांचे सेवकही आनंदासारखेच श्रेष्ठ आणि समर्पित होते. भिक्खूंनो, भविष्यकाळात जे कोणी अर्हत सम्यक्संबुद्ध होतील, त्या भगवंतांचे सेवकही आनंदासारखेच श्रेष्ठ आणि समर्पित असतील. भिक्खूंनो, आनंद पंडित आहेत; भिक्खूंनो, आनंद मेधावी (बुद्धिमान) आहेत. त्यांना अचूक ठाऊक असते की – 'ही वेळ भिक्खूंसाठी तथागतांच्या दर्शनाला येण्याची आहे, ही वेळ भिक्खुणींसाठी आहे, ही वेळ उपासकांसाठी आहे, ही वेळ उपासिकांसाठी आहे, ही वेळ राजा, राजमहामात्र (मंत्री), इतर पंथांचे आचार्य आणि त्यांच्या शिष्यांसाठी आहे.'" ๒๐๙. ‘‘จตฺตาโรเม, ภิกฺขเว, อจฺฉริยา อพฺภุตา ธมฺมา อานนฺเท. กตเม จตฺตาโร? สเจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุปริสา อานนฺทํ ทสฺสนาย อุปสงฺกมติ, ทสฺสเนน สา อตฺตมนา โหติ. ตตฺร เจ อานนฺโท ธมฺมํ [Pg.120] ภาสติ, ภาสิเตนปิ สา อตฺตมนา โหติ. อติตฺตาว, ภิกฺขเว, ภิกฺขุปริสา โหติ, อถ โข อานนฺโท ตุณฺหี โหติ. สเจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนีปริสา อานนฺทํ ทสฺสนาย อุปสงฺกมติ, ทสฺสเนน สา อตฺตมนา โหติ. ตตฺร เจ อานนฺโท ธมฺมํ ภาสติ, ภาสิเตนปิ สา อตฺตมนา โหติ. อติตฺตาว, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนีปริสา โหติ, อถ โข อานนฺโท ตุณฺหี โหติ. สเจ, ภิกฺขเว, อุปาสกปริสา อานนฺทํ ทสฺสนาย อุปสงฺกมติ, ทสฺสเนน สา อตฺตมนา โหติ. ตตฺร เจ อานนฺโท ธมฺมํ ภาสติ, ภาสิเตนปิ สา อตฺตมนา โหติ. อติตฺตาว, ภิกฺขเว, อุปาสกปริสา โหติ, อถ โข อานนฺโท ตุณฺหี โหติ. สเจ, ภิกฺขเว, อุปาสิกาปริสา อานนฺทํ ทสฺสนาย อุปสงฺกมติ, ทสฺสเนน สา อตฺตมนา โหติ. ตตฺร เจ, อานนฺโท, ธมฺมํ ภาสติ, ภาสิเตนปิ สา อตฺตมนา โหติ. อติตฺตาว, ภิกฺขเว, อุปาสิกาปริสา โหติ, อถ โข อานนฺโท ตุณฺหี โหติ. อิเม โข, ภิกฺขเว, จตฺตาโร อจฺฉริยา อพฺภุตา ธมฺมา อานนฺเท. २०९. "भिक्खूंनो, आनंदांच्या ठिकाणी हे चार आश्चर्यकारक आणि अद्भुत गुण आहेत. कोणते चार? भिक्खूंनो, जर भिक्खूंचा समूह आनंदांच्या दर्शनासाठी येतो, तर त्यांच्या दर्शनानेच तो समूह अत्यंत प्रसन्न होतो. आणि जर आनंद तेथे धम्म उपदेश करतात, तर त्यांच्या उपदेशानेही तो समूह अत्यंत प्रसन्न होतो. भिक्खूंनो, तो भिक्खूंचा समूह तृप्त होतच नाही, तोवर आनंद मौन धारण करतात. जर भिक्खुणींचा समूह आनंदांच्या दर्शनासाठी येतो, तर त्यांच्या दर्शनानेच तो समूह अत्यंत प्रसन्न होतो. आणि जर आनंद तेथे धम्म उपदेश करतात, तर त्यांच्या उपदेशानेही तो समूह अत्यंत प्रसन्न होतो. भिक्खूंनो, तो भिक्खुणींचा समूह तृप्त होतच नाही, तोवर आनंद मौन धारण करतात. जर उपासकांचा समूह आनंदांच्या दर्शनासाठी येतो, तर त्यांच्या दर्शनानेच तो समूह अत्यंत प्रसन्न होतो. आणि जर आनंद तेथे धम्म उपदेश करतात, तर त्यांच्या उपदेशानेही तो समूह अत्यंत प्रसन्न होतो. भिक्खूंनो, तो उपासकांचा समूह तृप्त होतच नाही, तोवर आनंद मौन धारण करतात. जर उपासिकांचा समूह आनंदांच्या दर्शनासाठी येतो, तर त्यांच्या दर्शनानेच तो समूह अत्यंत प्रसन्न होतो. आणि जर आनंद तेथे धम्म उपदेश करतात, तर त्यांच्या उपदेशानेही तो समूह अत्यंत प्रसन्न होतो. भिक्खूंनो, तो उपासिकांचा समूह तृप्त होतच नाही, तोवर आनंद मौन धारण करतात. भिक्खूंनो, आनंदांच्या ठिकाणी हेच ते चार आश्चर्यकारक आणि अद्भुत गुण आहेत." ‘‘จตฺตาโรเม, ภิกฺขเว, อจฺฉริยา อพฺภุตา ธมฺมา รญฺเญ จกฺกวตฺติมฺหิ. กตเม จตฺตาโร? สเจ, ภิกฺขเว, ขตฺติยปริสา ราชานํ จกฺกวตฺตึ ทสฺสนาย อุปสงฺกมติ, ทสฺสเนน สา อตฺตมนา โหติ. ตตฺร เจ ราชา จกฺกวตฺตี ภาสติ, ภาสิเตนปิ สา อตฺตมนา โหติ. อติตฺตาว, ภิกฺขเว, ขตฺติยปริสา โหติ. อถ โข ราชา จกฺกวตฺตี ตุณฺหี โหติ. สเจ ภิกฺขเว, พฺราหฺมณปริสา…เป… คหปติปริสา…เป… สมณปริสา ราชานํ จกฺกวตฺตึ ทสฺสนาย อุปสงฺกมติ, ทสฺสเนน สา อตฺตมนา โหติ. ตตฺร เจ ราชา จกฺกวตฺตี ภาสติ, ภาสิเตนปิ สา อตฺตมนา โหติ. อติตฺตาว, ภิกฺขเว, สมณปริสา โหติ, อถ โข ราชา จกฺกวตฺตี ตุณฺหี โหติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, จตฺตาโรเม อจฺฉริยา อพฺภุตา ธมฺมา อานนฺเท. สเจ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุปริสา อานนฺทํ ทสฺสนาย อุปสงฺกมติ, ทสฺสเนน สา อตฺตมนา โหติ. ตตฺร เจ อานนฺโท ธมฺมํ ภาสติ, ภาสิเตนปิ สา อตฺตมนา โหติ. อติตฺตาว, ภิกฺขเว, ภิกฺขุปริสา โหติ. อถ โข อานนฺโท ตุณฺหี โหติ. สเจ, ภิกฺขเว ภิกฺขุนีปริสา…เป… อุปาสกปริสา…เป… อุปาสิกาปริสา อานนฺทํ ทสฺสนาย อุปสงฺกมติ, ทสฺสเนน สา อตฺตมนา [Pg.121] โหติ. ตตฺร เจ อานนฺโท ธมฺมํ ภาสติ, ภาสิเตนปิ สา อตฺตมนา โหติ. อติตฺตาว, ภิกฺขเว, อุปาสิกาปริสา โหติ. อถ โข อานนฺโท ตุณฺหี โหติ. อิเม โข, ภิกฺขเว, จตฺตาโร อจฺฉริยา อพฺภุตา ธมฺมา อานนฺเท’’ติ. "भिक्खूंनो, चक्रवर्ती राजाच्या ठिकाणी हे चार आश्चर्यकारक आणि अद्भुत गुण असतात. कोणते चार? भिक्खूंनो, जर क्षत्रियांचा समूह चक्रवर्ती राजाच्या दर्शनासाठी येतो, तर त्याच्या दर्शनानेच तो समूह अत्यंत प्रसन्न होतो. आणि जर चक्रवर्ती राजा तेथे भाषण करतो, तर त्याच्या भाषणानेही तो समूह अत्यंत प्रसन्न होतो. भिक्खूंनो, तो क्षत्रियांचा समूह तृप्त होतच नाही, तोवर चक्रवर्ती राजा मौन धारण करतो. जर ब्राह्मणांचा समूह... गृहपतींचा समूह... श्रमणांचा समूह चक्रवर्ती राजाच्या दर्शनासाठी येतो, तर त्याच्या दर्शनानेच तो समूह अत्यंत प्रसन्न होतो. आणि जर चक्रवर्ती राजा तेथे भाषण करतो, तर त्याच्या भाषणानेही तो समूह अत्यंत प्रसन्न होतो. भिक्खूंनो, तो श्रमणांचा समूह तृप्त होतच नाही, तोवर चक्रवर्ती राजा मौन धारण करतो. भिक्खूंनो, अगदी याचप्रमाणे आनंदांच्या ठिकाणी हे चार आश्चर्यकारक आणि अद्भुत गुण आहेत. जर भिक्खूंचा समूह आनंदांच्या दर्शनासाठी येतो, तर त्यांच्या दर्शनानेच तो समूह अत्यंत प्रसन्न होतो. आणि जर आनंद तेथे धम्म उपदेश करतात, तर त्यांच्या उपदेशानेही तो समूह अत्यंत प्रसन्न होतो. भिक्खूंनो, तो भिक्खूंचा समूह तृप्त होतच नाही, तोवर आनंद मौन धारण करतात. जर भिक्खुणींचा समूह... उपासकांचा समूह... उपासिकांचा समूह आनंदांच्या दर्शनासाठी येतो, तर त्यांच्या दर्शनानेच तो समूह अत्यंत प्रसन्न होतो. आणि जर आनंद तेथे धम्म उपदेश करतात, तर त्यांच्या उपदेशानेही तो समूह अत्यंत प्रसन्न होतो. भिक्खूंनो, तो उपासिकांचा समूह तृप्त होतच नाही, तोवर आनंद मौन धारण करतात. भिक्खूंनो, आनंदांच्या ठिकाणी हेच ते चार आश्चर्यकारक आणि अद्भुत गुण आहेत." มหาสุทสฺสนสุตฺตเทสนา महासुदस्सन सुत्त देसना (महासुदर्शन सुत्त प्रवचन) ๒๑๐. เอวํ วุตฺเต อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘มา, ภนฺเต, ภควา อิมสฺมึ ขุทฺทกนครเก อุชฺชงฺคลนครเก สาขานครเก ปรินิพฺพายิ. สนฺติ, ภนฺเต, อญฺญานิ มหานครานิ, เสยฺยถิทํ – จมฺปา ราชคหํ สาวตฺถี สาเกตํ โกสมฺพี พาราณสี; เอตฺถ ภควา ปรินิพฺพายตุ. เอตฺถ พหู ขตฺติยมหาสาลา, พฺราหฺมณมหาสาลา คหปติมหาสาลา ตถาคเต อภิปฺปสนฺนา. เต ตถาคตสฺส สรีรปูชํ กริสฺสนฺตี’’ติ ‘‘มาเหวํ, อานนฺท, อวจ; มาเหวํ, อานนฺท, อวจ – ‘ขุทฺทกนครกํ อุชฺชงฺคลนครกํ สาขานครก’นฺติ. २१०. असे म्हटले असता, आयुष्यमान आनंद भगवंतांना म्हणाले – 'भंते, भगवंतांनी या लहानशा नगरात, या ओसाड नगरात, या शाखा-नगरात परिनिब्बान प्राप्त करू नये. भंते, इतर मोठी शहरे आहेत, जसे की – चंपा, राजगृह, सावत्थी, साकेत, कोसम्बी, वाराणसी; येथे भगवंतांनी परिनिब्बान प्राप्त करावे. येथे अनेक क्षत्रिय महाशाल, ब्राह्मण महाशाल आणि गृहपती महाशाल आहेत, जे तथागतांवर अत्यंत श्रद्धा ठेवतात. ते तथागतांच्या शरीराची पूजा (अंतिम संस्कार) करतील.' 'आनंदा, असे म्हणू नकोस; आनंदा, असे म्हणू नकोस – "लहान नगर, ओसाड नगर, शाखा-नगर" असे.' ‘‘ภูตปุพฺพํ, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน นาม อโหสิ จกฺกวตฺตี ธมฺมิโก ธมฺมราชา จาตุรนฺโต วิชิตาวี ชนปฺปทตฺถาวริยปฺปตฺโต สตฺตรตนสมนฺนาคโต. รญฺโญ, อานนฺท, มหาสุทสฺสนสฺส อยํ กุสินารา กุสาวตี นาม ราชธานี อโหสิ, ปุรตฺถิเมน จ ปจฺฉิเมน จ ทฺวาทสโยชนานิ อายาเมน; อุตฺตเรน จ ทกฺขิเณน จ สตฺตโยชนานิ วิตฺถาเรน. กุสาวตี, อานนฺท, ราชธานี อิทฺธา เจว อโหสิ ผีตา จ พหุชนา จ อากิณฺณมนุสฺสา จ สุภิกฺขา จ. เสยฺยถาปิ, อานนฺท, เทวานํ อาฬกมนฺทา นาม ราชธานี อิทฺธา เจว โหติ ผีตา จ พหุชนา จ อากิณฺณยกฺขา จ สุภิกฺขา จ; เอวเมว โข, อานนฺท, กุสาวตี ราชธานี อิทฺธา เจว อโหสิ ผีตา จ พหุชนา จ อากิณฺณมนุสฺสา จ สุภิกฺขา จ. กุสาวตี, อานนฺท, ราชธานี ทสหิ สทฺเทหิ อวิวิตฺตา อโหสิ ทิวา เจว รตฺติญฺจ, เสยฺยถิทํ – หตฺถิสทฺเทน อสฺสสทฺเทน รถสทฺเทน เภริสทฺเทน มุทิงฺคสทฺเทน วีณาสทฺเทน คีตสทฺเทน สงฺขสทฺเทน สมฺมสทฺเทน ปาณิตาฬสทฺเทน ‘อสฺนาถ ปิวถ ขาทถา’ติ ทสเมน สทฺเทน. 'आनंदा, प्राचीन काळी महासुदस्सन नावाचा एक राजा होता, जो चक्रवर्ती, धार्मिक, धर्मराजा, चारही दिशांवर विजय मिळवणारा, आपल्या जनपदाला स्थैर्य देणारा आणि सात रत्नांनी युक्त असा होता. आनंदा, राजा महासुदस्सनची ही कुसिनारा "कुसावती" नावाची राजधानी होती, जी पूर्वेकडून पश्चिमेकडे बारा योजने लांब आणि उत्तरेकडून दक्षिणेकडे सात योजने रुंद होती. आनंदा, कुसावती राजधानी समृद्ध, संपन्न, लोकसंख्येने भरपूर, माणसांनी गजबजलेली आणि अन्नधान्याने समृद्ध होती. आनंदा, ज्याप्रमाणे देवांची "आळकमंदा" नावाची राजधानी समृद्ध, संपन्न, लोकसंख्येने भरपूर, यक्षांनी गजबजलेली आणि अन्नधान्याने समृद्ध असते; त्याचप्रमाणे, आनंदा, कुसावती राजधानी समृद्ध, संपन्न, लोकसंख्येने भरपूर, माणसांनी गजबजलेली आणि अन्नधान्याने समृद्ध होती. आनंदा, कुसावती राजधानी दिवस-रात्र दहा प्रकारच्या आवाजांनी सतत निनादत असे, ते आवाज म्हणजे – हत्तींचा आवाज, घोड्यांचा आवाज, रथांचा आवाज, भेरीचा आवाज, मृदंगाचा आवाज, विणेचा आवाज, गायनाचा आवाज, शंखाचा आवाज, टाळांचा आवाज आणि दहावा आवाज म्हणजे "खा, प्या, आस्वाद घ्या!" असा घोष.' ‘‘คจฺฉ ตฺวํ, อานนฺท, กุสินารํ ปวิสิตฺวา โกสินารกานํ มลฺลานํ อาโรเจหิ – ‘อชฺช โข, วาเสฏฺฐา, รตฺติยา ปจฺฉิเม ยาเม ตถาคตสฺส ปรินิพฺพานํ [Pg.122] ภวิสฺสติ. อภิกฺกมถ วาเสฏฺฐา, อภิกฺกมถ วาเสฏฺฐา. มา ปจฺฉา วิปฺปฏิสาริโน อหุวตฺถ – อมฺหากญฺจ โน คามกฺเขตฺเต ตถาคตสฺส ปรินิพฺพานํ อโหสิ, น มยํ ลภิมฺหา ปจฺฉิเม กาเล ตถาคตํ ทสฺสนายา’’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปฏิสฺสุตฺวา นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย อตฺตทุติโย กุสินารํ ปาวิสิ. 'जा, आनंदा, कुसिनारामध्ये प्रवेश करून कुसिनाराच्या मल्लांना सांग – "आज रात्रीच्या अंतिम प्रहरात तथागतांचे परिनिब्बान होणार आहे. त्वरित या, वासेठ्ठहो, त्वरित या! नंतर पश्चात्ताप करू नका की – आमच्याच ग्राम-क्षेत्रात तथागतांचे परिनिब्बान झाले, आणि आम्हाला अंतिम वेळी तथागतांचे दर्शन घेण्याची संधी मिळाली नाही!"' 'होय, भंते,' असे म्हणून आयुष्यमान आनंदांनी भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला आणि वस्त्रे परिधान करून, पात्र व चीवर घेऊन, एका सहकाऱ्यासह कुसिनारामध्ये प्रवेश केला. มลฺลานํ วนฺทนา मल्लांचे वंदन ๒๑๑. เตน โข ปน สมเยน โกสินารกา มลฺลา สนฺธาคาเร สนฺนิปติตา โหนฺติ เกนจิเทว กรณีเยน. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท เยน โกสินารกานํ มลฺลานํ สนฺธาคารํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา โกสินารกานํ มลฺลานํ อาโรเจสิ – ‘‘อชฺช โข, วาเสฏฺฐา, รตฺติยา ปจฺฉิเม ยาเม ตถาคตสฺส ปรินิพฺพานํ ภวิสฺสติ. อภิกฺกมถ วาเสฏฺฐา อภิกฺกมถ วาเสฏฺฐา. มา ปจฺฉา วิปฺปฏิสาริโน อหุวตฺถ – ‘อมฺหากญฺจ โน คามกฺเขตฺเต ตถาคตสฺส ปรินิพฺพานํ อโหสิ, น มยํ ลภิมฺหา ปจฺฉิเม กาเล ตถาคตํ ทสฺสนายา’’’ติ. อิทมายสฺมโต อานนฺทสฺส วจนํ สุตฺวา มลฺลา จ มลฺลปุตฺตา จ มลฺลสุณิสา จ มลฺลปชาปติโย จ อฆาวิโน ทุมฺมนา เจโตทุกฺขสมปฺปิตา อปฺเปกจฺเจ เกเส ปกิริย กนฺทนฺติ, พาหา ปคฺคยฺห กนฺทนฺติ, ฉินฺนปาตํ ปปตนฺติ, อาวฏฺฏนฺติ วิวฏฺฏนฺติ – ‘อติขิปฺปํ ภควา ปรินิพฺพายิสฺสติ, อติขิปฺปํ สุคโต ปรินิพฺพายิสฺสติ, อติขิปฺปํ จกฺขุํ โลเก อนฺตรธายิสฺสตี’ติ. อถ โข มลฺลา จ มลฺลปุตฺตา จ มลฺลสุณิสา จ มลฺลปชาปติโย จ อฆาวิโน ทุมฺมนา เจโตทุกฺขสมปฺปิตา เยน อุปวตฺตนํ มลฺลานํ สาลวนํ เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกมึสุ. อถ โข อายสฺมโต อานนฺทสฺส เอตทโหสิ – ‘‘สเจ โข อหํ โกสินารเก มลฺเล เอกเมกํ ภควนฺตํ วนฺทาเปสฺสามิ, อวนฺทิโต ภควา โกสินารเกหิ มลฺเลหิ ภวิสฺสติ, อถายํ รตฺติ วิภายิสฺสติ. ยํนูนาหํ โกสินารเก มลฺเล กุลปริวตฺตโส กุลปริวตฺตโส ฐเปตฺวา ภควนฺตํ วนฺทาเปยฺยํ – ‘อิตฺถนฺนาโม, ภนฺเต, มลฺโล สปุตฺโต สภริโย สปริโส สามจฺโจ ภควโต ปาเท [Pg.123] สิรสา วนฺทตี’ติ. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท โกสินารเก มลฺเล กุลปริวตฺตโส กุลปริวตฺตโส ฐเปตฺวา ภควนฺตํ วนฺทาเปสิ – ‘อิตฺถนฺนาโม, ภนฺเต, มลฺโล สปุตฺโต สภริโย สปริโส สามจฺโจ ภควโต ปาเท สิรสา วนฺทตี’’’ติ. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท เอเตน อุปาเยน ปฐเมเนว ยาเมน โกสินารเก มลฺเล ภควนฺตํ วนฺทาเปสิ. २११. त्या वेळी कुसिनाराचे मल्ल काही कामासाठी संथागारात एकत्र आले होते. तेव्हा आयुष्यमान आनंद कुसिनाराच्या मल्लांच्या संथागाराकडे गेले; तिथे जाऊन त्यांनी कुसिनाराच्या मल्लांना सांगितले – 'आज रात्रीच्या अंतिम प्रहरात तथागतांचे परिनिब्बान होणार आहे. त्वरित या, वासेठ्ठहो, त्वरित या! नंतर पश्चात्ताप करू नका की – "आमच्याच ग्राम-क्षेत्रात तथागतांचे परिनिब्बान झाले, आणि आम्हाला अंतिम वेळी तथागतांचे दर्शन घेण्याची संधी मिळाली नाही!"' आयुष्यमान आनंदांचे हे बोलणे ऐकून मल्ल, मल्लांचे पुत्र, मल्लांच्या सुना आणि मल्लांच्या पत्नी अत्यंत दुःखी, कष्टी आणि मानसिक वेदनेने व्याकुळ झाले. काही जण केस मोकळे सोडून रडू लागले, काही जण हात उंचावून रडू लागले, काही जण कडा कोसळावा तसे जमिनीवर कोसळले, काही जण इकडेतिकडे लोळू लागले आणि तळमळू लागले – 'भगवंत अतिशय लवकर परिनिब्बान प्राप्त करत आहेत! सुगत अतिशय लवकर परिनिब्बान प्राप्त करत आहेत! जगाचा डोळा अतिशय लवकर लुप्त होत आहे!' त्यानंतर ते मल्ल, मल्लांचे पुत्र, मल्लांच्या सुना आणि मल्लांच्या पत्नी अत्यंत दुःखी, कष्टी आणि मानसिक वेदनेने व्याकुळ होऊन मल्लांच्या उपवत्तन नावाच्या सालवनात, जेथे आयुष्यमान आनंद होते, तेथे गेले. तेव्हा आयुष्यमान आनंदांच्या मनात असा विचार आला – 'जर मी कुसिनाराच्या मल्लांना एकेक करून भगवंतांचे वंदन करू दिले, तर सर्व मल्लांचे वंदन पूर्ण होण्यापूर्वीच ही रात्र संपून जाईल. त्यापेक्षा मी कुसिनाराच्या मल्लांना त्यांच्या कुटुंबानुसार उभे करतो आणि भगवंतांचे वंदन करवून घेतो – "भंते, अमुक नावाचा मल्ल आपल्या पुत्रासह, पत्नीसह, परिवारासह आणि मंत्र्यांसह भगवंतांच्या चरणी डोके ठेवून वंदन करत आहे."' त्यानंतर आयुष्यमान आनंदांनी कुसिनाराच्या मल्लांना त्यांच्या कुटुंबानुसार उभे केले आणि भगवंतांचे वंदन करवून घेतले – 'भंते, अमुक नावाचा मल्ल आपल्या पुत्रासह, पत्नीसह, परिवारासह आणि मंत्र्यांसह भगवंतांच्या चरणी डोके ठेवून वंदन करत आहे.' अशा प्रकारे, आयुष्यमान आनंदांनी या उपायाने रात्रीच्या पहिल्या प्रहरातच कुसिनाराच्या सर्व मल्लांकडून भगवंतांचे वंदन करवून घेतले. สุภทฺทปริพฺพาชกวตฺถุ सुभद्द परिव्राजक कथा ๒๑๒. เตน โข ปน สมเยน สุภทฺโท นาม ปริพฺพาชโก กุสินารายํ ปฏิวสติ. อสฺโสสิ โข สุภทฺโท ปริพฺพาชโก – ‘‘อชฺช กิร รตฺติยา ปจฺฉิเม ยาเม สมณสฺส โคตมสฺส ปรินิพฺพานํ ภวิสฺสตี’’ติ. อถ โข สุภทฺทสฺส ปริพฺพาชกสฺส เอตทโหสิ – ‘‘สุตํ โข ปน เมตํ ปริพฺพาชกานํ วุฑฺฒานํ มหลฺลกานํ อาจริยปาจริยานํ ภาสมานานํ – ‘กทาจิ กรหจิ ตถาคตา โลเก อุปฺปชฺชนฺติ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา’ติ. อชฺเชว รตฺติยา ปจฺฉิเม ยาเม สมณสฺส โคตมสฺส ปรินิพฺพานํ ภวิสฺสติ. อตฺถิ จ เม อยํ กงฺขาธมฺโม อุปฺปนฺโน, เอวํ ปสนฺโน อหํ สมเณ โคตเม, ‘ปโหติ เม สมโณ โคตโม ตถา ธมฺมํ เทเสตุํ, ยถาหํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺย’’’นฺติ. อถ โข สุภทฺโท ปริพฺพาชโก เยน อุปวตฺตนํ มลฺลานํ สาลวนํ, เยนายสฺมา อานนฺโท เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, โภ อานนฺท, ปริพฺพาชกานํ วุฑฺฒานํ มหลฺลกานํ อาจริยปาจริยานํ ภาสมานานํ – ‘กทาจิ กรหจิ ตถาคตา โลเก อุปฺปชฺชนฺติ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา’ติ. อชฺเชว รตฺติยา ปจฺฉิเม ยาเม สมณสฺส โคตมสฺส ปรินิพฺพานํ ภวิสฺสติ. อตฺถิ จ เม อยํ กงฺขาธมฺโม อุปฺปนฺโน – เอวํ ปสนฺโน อหํ สมเณ โคตเม ‘ปโหติ เม สมโณ โคตโม ตถา ธมฺมํ เทเสตุํ, ยถาหํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺย’นฺติ. สาธาหํ, โภ อานนฺท, ลเภยฺยํ สมณํ โคตมํ ทสฺสนายา’’ติ. เอวํ วุตฺเต อายสฺมา อานนฺโท สุภทฺทํ ปริพฺพาชกํ เอตทโวจ – ‘‘อลํ, อาวุโส สุภทฺท, มา ตถาคตํ วิเหเฐสิ, กิลนฺโต ภควา’’ติ. ทุติยมฺปิ โข สุภทฺโท ปริพฺพาชโก…เป… ตติยมฺปิ โข สุภทฺโท ปริพฺพาชโก อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, โภ อานนฺท, ปริพฺพาชกานํ วุฑฺฒานํ มหลฺลกานํ อาจริยปาจริยานํ ภาสมานานํ – ‘กทาจิ กรหจิ ตถาคตา [Pg.124] โลเก อุปฺปชฺชนฺติ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา’ติ. อชฺเชว รตฺติยา ปจฺฉิเม ยาเม สมณสฺส โคตมสฺส ปรินิพฺพานํ ภวิสฺสติ. อตฺถิ จ เม อยํ กงฺขาธมฺโม อุปฺปนฺโน – เอวํ ปสนฺโน อหํ สมเณ โคตเม, ‘ปโหติ เม สมโณ โคตโม ตถา ธมฺมํ เทเสตุํ, ยถาหํ อิมํ กงฺขาธมฺมํ ปชเหยฺย’นฺติ. สาธาหํ, โภ อานนฺท, ลเภยฺยํ สมณํ โคตมํ ทสฺสนายา’’ติ. ตติยมฺปิ โข อายสฺมา อานนฺโท สุภทฺทํ ปริพฺพาชกํ เอตทโวจ – ‘‘อลํ, อาวุโส สุภทฺท, มา ตถาคตํ วิเหเฐสิ, กิลนฺโต ภควา’’ติ. २१२. त्या वेळी सुभद्र नावाचा एक परिव्राजक कुसिनारा येथे राहत होता. सुभद्र परिव्राजकाने ऐकले की, "आज रात्रीच्या शेवटच्या प्रहरात श्रमण गोतमांचे परिनिर्वाण होणार आहे." तेव्हा सुभद्र परिव्राजकाच्या मनात असा विचार आला— "मी वयोवृद्ध, ज्येष्ठ, आचार्यांचे आचार्य असलेल्या परिव्राजकांकडून असे बोलताना ऐकले आहे की, 'जगात कधीतरीच अर्हत, सम्यक्संबुद्ध तथागत उत्पन्न होतात.' आणि आजच रात्रीच्या शेवटच्या प्रहरात श्रमण गोतमांचे परिनिर्वाण होणार आहे. माझ्या मनात एक शंका उत्पन्न झाली आहे. श्रमण गोतमांवर माझी अशी श्रद्धा आहे की, श्रमण गोतम मला असा धम्म उपदेशू शकतील, ज्यामुळे माझी ही शंका दूर होईल." त्यानंतर सुभद्र परिव्राजक मल्लांच्या उपवर्तन नावाच्या शालवनात, जेथे आयुष्यमान आनंद होते, तेथे गेला. तेथे जाऊन तो आयुष्यमान आनंदांना म्हणाला— "हे आनंद, मी वयोवृद्ध, ज्येष्ठ, आचार्यांचे आचार्य असलेल्या परिव्राजकांकडून असे बोलताना ऐकले आहे की, 'जगात कधीतरीच अर्हत, सम्यक्संबुद्ध तथागत उत्पन्न होतात.' आणि आजच रात्रीच्या शेवटच्या प्रहरात श्रमण गोतमांचे परिनिर्वाण होणार आहे. माझ्या मनात एक शंका उत्पन्न झाली आहे. श्रमण गोतमांवर माझी अशी श्रद्धा आहे की, श्रमण गोतम मला असा धम्म उपदेशू शकतील, ज्यामुळे माझी ही शंका दूर होईल. हे आनंद, मला श्रमण गोतमांचे दर्शन घेण्याची संधी मिळावी, ही माझी नम्र विनंती आहे." असे म्हटले असता, आयुष्यमान आनंद सुभद्र परिव्राजकाला म्हणाले— "पुरे, मित्र सुभद्र! तथागतांना त्रास देऊ नकोस. भगवान थकले आहेत." दुसऱ्यांदाही सुभद्र परिव्राजक... आणि तिसऱ्यांदाही सुभद्र परिव्राजक आयुष्यमान आनंदांना म्हणाला— "हे आनंद, मी वयोवृद्ध, ज्येष्ठ, आचार्यांचे आचार्य असलेल्या परिव्राजकांकडून असे बोलताना ऐकले आहे की, 'जगात कधीतरीच अर्हत, सम्यक्संबुद्ध तथागत उत्पन्न होतात.' आणि आजच रात्रीच्या शेवटच्या प्रहरात श्रमण गोतमांचे परिनिर्वाण होणार आहे. माझ्या मनात एक शंका उत्पन्न झाली आहे. श्रमण गोतमांवर माझी अशी श्रद्धा आहे की, श्रमण गोतम मला असा धम्म उपदेशू शकतील, ज्यामुळे माझी ही शंका दूर होईल. हे आनंद, मला श्रमण गोतमांचे दर्शन घेण्याची संधी मिळावी, ही माझी नम्र विनंती आहे." तिसऱ्यांदाही आयुष्यमान आनंदांनी सुभद्र परिव्राजकाला सांगितले— "पुरे, मित्र सुभद्र! तथागतांना त्रास देऊ नकोस. भगवान थकले आहेत." ๒๑๓. อสฺโสสิ โข ภควา อายสฺมโต อานนฺทสฺส สุภทฺเทน ปริพฺพาชเกน สทฺธึ อิมํ กถาสลฺลาปํ. อถ โข ภควา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘อลํ, อานนฺท, มา สุภทฺทํ วาเรสิ, ลภตํ, อานนฺท, สุภทฺโท ตถาคตํ ทสฺสนาย. ยํ กิญฺจิ มํ สุภทฺโท ปุจฺฉิสฺสติ, สพฺพํ ตํ อญฺญาเปกฺโขว ปุจฺฉิสฺสติ, โน วิเหสาเปกฺโข. ยํ จสฺสาหํ ปุฏฺโฐ พฺยากริสฺสามิ, ตํ ขิปฺปเมว อาชานิสฺสตี’’ติ. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท สุภทฺทํ ปริพฺพาชกํ เอตทโวจ – ‘‘คจฺฉาวุโส สุภทฺท, กโรติ เต ภควา โอกาส’’นฺติ. อถ โข สุภทฺโท ปริพฺพาชโก เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควตา สทฺธึ สมฺโมทิ, สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข สุภทฺโท ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘เยเม, โภ โคตม, สมณพฺราหฺมณา สงฺฆิโน คณิโน คณาจริยา ญาตา ยสสฺสิโน ติตฺถกรา สาธุสมฺมตา พหุชนสฺส, เสยฺยถิทํ – ปูรโณ กสฺสโป, มกฺขลิ โคสาโล, อชิโต เกสกมฺพโล, ปกุโธ กจฺจายโน, สญฺจโย เพลฏฺฐปุตฺโต, นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต, สพฺเพเต สกาย ปฏิญฺญาย อพฺภญฺญึสุ, สพฺเพว น อพฺภญฺญึสุ, อุทาหุ เอกจฺเจ อพฺภญฺญึสุ, เอกจฺเจ น อพฺภญฺญึสู’’ติ? ‘‘อลํ, สุภทฺท, ติฏฺฐเตตํ – ‘สพฺเพเต สกาย ปฏิญฺญาย อพฺภญฺญึสุ, สพฺเพว น อพฺภญฺญึสุ, อุทาหุ เอกจฺเจ อพฺภญฺญึสุ, เอกจฺเจ น อพฺภญฺญึสู’ติ. ธมฺมํ เต, สุภทฺท, เทเสสฺสามิ; ตํ สุณาหิ สาธุกํ มนสิกโรหิ, ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข สุภทฺโท ปริพฺพาชโก ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. ภควา เอตทโวจ – २१३. भगवंतांनी आयुष्यमान आनंद आणि सुभद्र परिव्राजक यांच्यातील हा संवाद ऐकला. तेव्हा भगवंतांनी आयुष्यमान आनंदांना बोलावून म्हटले— "पुरे, आनंदा! सुभद्राला अडवू नकोस. आनंदा, सुभद्राला तथागतांचे दर्शन घेऊ दे. सुभद्र मला जे काही विचारणार आहे, ते सर्व तो केवळ ज्ञानप्राप्तीच्या इच्छेने विचारणार आहे, मला त्रास देण्याच्या हेतूने नाही. आणि मी त्याच्या प्रश्नाचे जे उत्तर देईन, ते तो त्वरित समजून घेईल." त्यानंतर आयुष्यमान आनंद सुभद्र परिव्राजकाला म्हणाले— "जा, मित्र सुभद्र! भगवंतांनी तुला परवानगी दिली आहे." तेव्हा सुभद्र परिव्राजक जेथे भगवंत होते तेथे गेला. तेथे जाऊन त्याने भगवंतांसोबत कुशलमंगल विचारले. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या सुभद्र परिव्राजकाने भगवंतांना विचारले— "हे गोतम, जे हे श्रमण-ब्राह्मण संघाचे नायक, गणांचे नायक, गणांचे आचार्य, प्रसिद्ध, कीर्तिमान, पंथसंस्थापक आणि बहुसंख्य लोकांद्वारे सत्पुरुष मानले गेलेले आहेत; जसे की— पूरण कस्सप, मक्खलि गोसाल, अजित केसकम्बल, पकुध कच्चायन, संजय बेलट्ठिपुत्त आणि निगण्ठ नातपुत्त; या सर्वांनी आपापल्या दाव्यानुसार सत्य जाणले आहे की सर्वांनीच ते जाणले नाही? किंवा काही जणांनी जाणले आहे आणि काही जणांनी जाणले नाही?" "पुरे, सुभद्रा! हे राहू दे की— 'या सर्वांनी आपापल्या दाव्यानुसार सत्य जाणले आहे की सर्वांनीच ते जाणले नाही, किंवा काही जणांनी जाणले आहे आणि काही जणांनी जाणले नाही.' सुभद्रा, मी तुला धम्माचा उपदेश करतो; तो नीट ऐक, चांगल्या प्रकारे मनात ठेव, मी सांगतो." "होय, भंते!" असे म्हणून सुभद्र परिव्राजकाने भगवंतांचे म्हणणे मान्य केले. भगवंत म्हणाले— ๒๑๔. ‘‘ยสฺมึ โข, สุภทฺท, ธมฺมวินเย อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค น อุปลพฺภติ, สมโณปิ ตตฺถ น อุปลพฺภติ. ทุติโยปิ ตตฺถ สมโณ [Pg.125] น อุปลพฺภติ. ตติโยปิ ตตฺถ สมโณ น อุปลพฺภติ. จตุตฺโถปิ ตตฺถ สมโณ น อุปลพฺภติ. ยสฺมิญฺจ โข, สุภทฺท, ธมฺมวินเย อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค อุปลพฺภติ, สมโณปิ ตตฺถ อุปลพฺภติ, ทุติโยปิ ตตฺถ สมโณ อุปลพฺภติ, ตติโยปิ ตตฺถ สมโณ อุปลพฺภติ, จตุตฺโถปิ ตตฺถ สมโณ อุปลพฺภติ. อิมสฺมึ โข, สุภทฺท, ธมฺมวินเย อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค อุปลพฺภติ, อิเธว, สุภทฺท, สมโณ, อิธ ทุติโย สมโณ, อิธ ตติโย สมโณ, อิธ จตุตฺโถ สมโณ, สุญฺญา ปรปฺปวาทา สมเณภิ อญฺเญหิ. อิเม จ, สุภทฺท, ภิกฺขู สมฺมา วิหเรยฺยุํ, อสุญฺโญ โลโก อรหนฺเตหิ อสฺสาติ. २१४. "सुभद्रा, ज्या धम्म-विनयात आर्य अष्टांगिक मार्ग आढळत नाही, तेथे पहिल्या दर्जाचा श्रमण आढळत नाही, तेथे दुसरा श्रमण आढळत नाही, तेथे तिसरा श्रमण आढळत नाही आणि तेथे चौथा श्रमण देखील आढळत नाही. परंतु, सुभद्रा, ज्या धम्म-विनयात आर्य अष्टांगिक मार्ग आढळतो, तेथे पहिला श्रमण आढळतो, तेथे दुसरा श्रमण आढळतो, तेथे तिसरा श्रमण आढळतो आणि तेथे चौथा श्रमणही आढळतो. सुभद्रा, या धम्म-विनयात आर्य अष्टांगिक मार्ग आढळतो. म्हणूनच, सुभद्रा, येथेच पहिला श्रमण आहे, येथेच दुसरा श्रमण आहे, येथेच तिसरा श्रमण आहे आणि येथेच चौथा श्रमण आहे. इतर पंथ खऱ्या श्रमणांनी शून्य आहेत. सुभद्रा, जर हे भिक्खू योग्य प्रकारे विहरतील, तर हा लोक अर्हतांनी कधीही शून्य होणार नाही." ‘‘เอกูนตึโส วยสา สุภทฺท,ยํ ปพฺพชึ กึกุสลานุเอสี; วสฺสานิ ปญฺญาส สมาธิกานิ,ยโต อหํ ปพฺพชิโต สุภทฺท. "सुभद्रा, जेव्हा मी कल्याणाच्या शोधात गृहत्याग केला, तेव्हा माझे वय एकोणतीस वर्षे होते. सुभद्रा, माझ्या प्रव्रज्येला आता पन्नास वर्षांहून अधिक काळ लोटला आहे," ญายสฺส ธมฺมสฺส ปเทสวตฺตี,อิโต พหิทฺธา สมโณปิ นตฺถิ. "ज्या काळात मी न्याय्य धम्माच्या क्षेत्रातच विहरत राहिलो आहे. याबाहेर दुसरा कोणताही खरा श्रमण अस्तित्वात नाही." ‘‘ทุติโยปิ สมโณ นตฺถิ. ตติโยปิ สมโณ นตฺถิ. จตุตฺโถปิ สมโณ นตฺถิ. สุญฺญา ปรปฺปวาทา สมเณภิ อญฺเญหิ. อิเม จ, สุภทฺท, ภิกฺขู สมฺมา วิหเรยฺยุํ, อสุญฺโญ โลโก อรหนฺเตหิ อสฺสา’’ติ. “दुसरा श्रमणही नाही. तिसरा श्रमणही नाही. चौथा श्रमणही नाही. इतर संप्रदाय श्रमणांपासून शून्य आहेत. हे सुभद्द, जर हे भिक्खू योग्य प्रकारे राहतील, तर हा लोक अर्हतांपासून शून्य होणार नाही.” ๒๑๕. เอวํ วุตฺเต สุภทฺโท ปริพฺพาชโก ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต, อภิกฺกนฺตํ, ภนฺเต. เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย, ปฏิจฺฉนฺนํ วา วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย, ‘จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตี’ติ, เอวเมวํ ภควตา อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอสาหํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ สรณํ คจฺฉามิ ธมฺมญฺจ ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. ลเภยฺยาหํ, ภนฺเต, ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, ลเภยฺยํ อุปสมฺปท’’นฺติ. ‘‘โย โข, สุภทฺท, อญฺญติตฺถิยปุพฺโพ อิมสฺมึ ธมฺมวินเย อากงฺขติ ปพฺพชฺชํ, อากงฺขติ อุปสมฺปทํ, โส จตฺตาโร [Pg.126] มาเส ปริวสติ. จตุนฺนํ มาสานํ อจฺจเยน อารทฺธจิตฺตา ภิกฺขู ปพฺพาเชนฺติ อุปสมฺปาเทนฺติ ภิกฺขุภาวาย. อปิ จ เมตฺถ ปุคฺคลเวมตฺตตา วิทิตา’’ติ. ‘‘สเจ, ภนฺเต, อญฺญติตฺถิยปุพฺพา อิมสฺมึ ธมฺมวินเย อากงฺขนฺตา ปพฺพชฺชํ อากงฺขนฺตา อุปสมฺปทํ จตฺตาโร มาเส ปริวสนฺติ, จตุนฺนํ มาสานํ อจฺจเยน อารทฺธจิตฺตา ภิกฺขู ปพฺพาเชนฺติ อุปสมฺปาเทนฺติ ภิกฺขุภาวาย. อหํ จตฺตาริ วสฺสานิ ปริวสิสฺสามิ, จตุนฺนํ วสฺสานํ อจฺจเยน อารทฺธจิตฺตา ภิกฺขู ปพฺพาเชนฺตุ อุปสมฺปาเทนฺตุ ภิกฺขุภาวายา’’ติ. २१५. असे म्हटले असता, सुभद्द परिव्राजक भगवंतांना म्हणाला – “अतिशय सुंदर, भंते! अतिशय सुंदर, भंते! भंते, जसे एखाद्याने उपडे केलेले भांडे उताणे करावे, किंवा झाकलेले उघडे करावे, किंवा वाट चुकलेल्याला मार्ग दाखवावा, किंवा अंधारात तेलाचा दिवा लावावा जेणेकरून डोळे असणारे रूप पाहू शकतील; त्याचप्रमाणे भगवंतांनी अनेक प्रकारे धम्म प्रकाशित केला आहे. भंते, मी भगवंतांना, धम्माला आणि भिक्खू संघाला शरण जातो. भंते, मला भगवंतांच्या सन्निध प्रव्रज्या मिळावी, उपसंपदा मिळावी.” “सुभद्द, जो कोणी इतर संप्रदायाचा असलेला या धम्म-विनयामध्ये प्रव्रज्या आणि उपसंपदा मिळवू इच्छितो, तो चार महिने परिवारास (प्रतीक्षा काळ) करतो. चार महिन्यांनंतर संतुष्ट झालेले भिक्खू त्याला भिक्खू बनवण्यासाठी प्रव्रज्या आणि उपसंपदा देतात. परंतु, या बाबतीत माझ्याकडून व्यक्ती-व्यक्तीमधील फरक जाणला गेला आहे.” “भंते, जर इतर संप्रदायाचे लोग या धम्म-विनयात प्रव्रज्या आणि उपसंपदा मिळवू इच्छितात आणि चार महिने परिवारास करतात, तर मी चार वर्षे परिवारास करीन. चार वर्षांनंतर संतुष्ट झालेले भिक्खू मला भिक्खू बनवण्यासाठी प्रव्रज्या आणि उपसंपदा देवोत.” อถ โข ภควา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘เตนหานนฺท, สุภทฺทํ ปพฺพาเชหี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควโต ปจฺจสฺโสสิ. อถ โข สุภทฺโท ปริพฺพาชโก อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตทโวจ – ‘‘ลาภา โว, อาวุโส อานนฺท; สุลทฺธํ โว, อาวุโส อานนฺท, เย เอตฺถ สตฺถุ สมฺมุขา อนฺเตวาสิกาภิเสเกน อภิสิตฺตา’’ติ. อลตฺถ โข สุภทฺโท ปริพฺพาชโก ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, อลตฺถ อุปสมฺปทํ. อจิรูปสมฺปนฺโน โข ปนายสฺมา สุภทฺโท เอโก วูปกฏฺโฐ อปฺปมตฺโต อาตาปี ปหิตตฺโต วิหรนฺโต นจิรสฺเสว – ‘ยสฺสตฺถาย กุลปุตฺตา สมฺมเทว อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชนฺติ’ ตทนุตฺตรํ พฺรหฺมจริยปริโยสานํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหาสิ. ‘ขีณา ชาติ, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, กตํ กรณียํ, นาปรํ อิตฺถตฺตายา’ติ อพฺภญฺญาสิ. อญฺญตโร โข ปนายสฺมา สุภทฺโท อรหตํ อโหสิ. โส ภควโต ปจฺฉิโม สกฺขิสาวโก อโหสีติ. त्यानंतर भगवंतांनी आयुष्यमान आनंदांना संबोधित केले – “आनंदा, असे असेल तर सुभद्दला प्रव्रज्या दे.” “तसेच असो, भंते,” असे आयुष्यमान आनंदांनी भगवंतांना उत्तर दिले. त्यानंतर सुभद्द परिव्राजक आयुष्यमान आनंदांना म्हणाला – “आयुष्यमान आनंद, तुमचा मोठा लाभ आहे! आयुष्यमान आनंद, तुम्हाला सुवर्णसंधी लाभली आहे, जे तुम्ही शास्त्यांच्या समक्ष शिष्यत्वाच्या अभिषेकाने अभिषिक्त झाला आहात.” त्यानंतर सुभद्द परिव्राजकाला भगवंतांच्या सन्निध प्रव्रज्या मिळाली आणि उपसंपदा मिळाली. उपसंपदा मिळाल्यानंतर लवकरच आयुष्यमान सुभद्द एकांतात, अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहरू लागले. ज्या हेतूने कुलपुत्र योग्य प्रकारे घराचा त्याग करून अनगारिक प्रव्रज्या ग्रहण करतात, ते ब्रह्मचर्याचे सर्वश्रेष्ठ अंतिम ध्येय त्यांनी याच जन्मात स्वतःच्या विशेष ज्ञानाने साक्षात अनुभवून प्राप्त केले. “जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर काहीही कर्तव्य उरलेले नाही,” असे त्यांनी जाणले. आयुष्यमान सुभद्द अर्हतांपैकी एक झाले. ते भगवंतांचे अंतिम प्रत्यक्ष शिष्य होते. ปญฺจโม ภาณวาโร. पाचवा भाणवार समाप्त. ตถาคตปจฺฉิมวาจา तथागतांचे अंतिम वचन ๒๑๖. อถ โข ภควา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘สิยา โข ปนานนฺท, ตุมฺหากํ เอวมสฺส – ‘อตีตสตฺถุกํ ปาวจนํ, นตฺถิ โน สตฺถา’ติ. น โข ปเนตํ, อานนฺท, เอวํ ทฏฺฐพฺพํ. โย โว, อานนฺท, มยา ธมฺโม จ วินโย [Pg.127] จ เทสิโต ปญฺญตฺโต, โส โว มมจฺจเยน สตฺถา. ยถา โข ปนานนฺท, เอตรหิ ภิกฺขู อญฺญมญฺญํ อาวุโสวาเทน สมุทาจรนฺติ, น โข มมจฺจเยน เอวํ สมุทาจริตพฺพํ. เถรตเรน, อานนฺท, ภิกฺขุนา นวกตโร ภิกฺขุ นาเมน วา โคตฺเตน วา อาวุโสวาเทน วา สมุทาจริตพฺโพ. นวกตเรน ภิกฺขุนา เถรตโร ภิกฺขุ ‘ภนฺเต’ติ วา ‘อายสฺมา’ติ วา สมุทาจริตพฺโพ. อากงฺขมาโน, อานนฺท, สงฺโฆ มมจฺจเยน ขุทฺทานุขุทฺทกานิ สิกฺขาปทานิ สมูหนตุ. ฉนฺนสฺส, อานนฺท, ภิกฺขุโน มมจฺจเยน พฺรหฺมทณฺโฑ ทาตพฺโพ’’ติ. ‘‘กตโม ปน, ภนฺเต, พฺรหฺมทณฺโฑ’’ติ? ‘‘ฉนฺโน, อานนฺท, ภิกฺขุ ยํ อิจฺเฉยฺย, ตํ วเทยฺย. โส ภิกฺขูหิ เนว วตฺตพฺโพ, น โอวทิตพฺโพ, น อนุสาสิตพฺโพ’’ติ. २१६. त्यानंतर भगवंतांनी आयुष्यमान आनंदांना संबोधित केले – “आनंदा, कदाचित तुमच्या मनात असा विचार येईल की – ‘शास्त्यांचे प्रवचन संपले आहे, आता आमचे कोणी शास्ते नाहीत.’ परंतु आनंदा, असे मानू नका. आनंदा, मी तुम्हाला जो धम्म आणि विनय उपदेशिला आहे आणि प्रज्ञप्त केला आहे, तोच माझ्या पश्चात तुमचा शास्ता असेल. आनंदा, सध्या भिक्खू एकमेकांना ‘आवुसो’ (मित्रा) या शब्दाने संबोधित करतात, माझ्या पश्चात त्यांनी तसे संबोधित करू नये. आनंदा, ज्येष्ठ भिक्खूने कनिष्ठ भिक्खूला त्याच्या नावाने, गोत्राने किंवा ‘आवुसो’ या शब्दाने संबोधित करावे. कनिष्ठ भिक्खूने ज्येष्ठ भिक्खूला ‘भंते’ किंवा ‘आयुष्यमान’ असे संबोधित करावे. आनंदा, माझ्या पश्चात जर संघाची इच्छा असेल, तर संघाने लहान-सहान (क्षुद्रानुक्षुद्र) शिक्षापदे रद्द करावीत. आनंदा, माझ्या पश्चात छन्न भिक्खूला ब्रह्मदंड दिला जावा.” “भंते, ब्रह्मदंड म्हणजे काय?” “आनंदा, छन्न भिक्खू जे काही बोलू इच्छितो ते तो बोलू शकतो. परंतु भिक्खूंनी त्याच्याशी बोलू नये, त्याला उपदेश करू नये आणि त्याचे मार्गदर्शन करू नये.” ๒๑๗. อถ โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘สิยา โข ปน, ภิกฺขเว, เอกภิกฺขุสฺสาปิ กงฺขา วา วิมติ วา พุทฺเธ วา ธมฺเม วา สงฺเฆ วา มคฺเค วา ปฏิปทาย วา, ปุจฺฉถ, ภิกฺขเว, มา ปจฺฉา วิปฺปฏิสาริโน อหุวตฺถ – ‘สมฺมุขีภูโต โน สตฺถา อโหสิ, น มยํ สกฺขิมฺหา ภควนฺตํ สมฺมุขา ปฏิปุจฺฉิตุ’’’ นฺติ. เอวํ วุตฺเต เต ภิกฺขู ตุณฺหี อเหสุํ. ทุติยมฺปิ โข ภควา…เป… ตติยมฺปิ โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘สิยา โข ปน, ภิกฺขเว, เอกภิกฺขุสฺสาปิ กงฺขา วา วิมติ วา พุทฺเธ วา ธมฺเม วา สงฺเฆ วา มคฺเค วา ปฏิปทาย วา, ปุจฺฉถ, ภิกฺขเว, มา ปจฺฉา วิปฺปฏิสาริโน อหุวตฺถ – ‘สมฺมุขีภูโต โน สตฺถา อโหสิ, น มยํ สกฺขิมฺหา ภควนฺตํ สมฺมุขา ปฏิปุจฺฉิตุ’’’ นฺติ. ตติยมฺปิ โข เต ภิกฺขู ตุณฺหี อเหสุํ. อถ โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘สิยา โข ปน, ภิกฺขเว, สตฺถุคารเวนปิ น ปุจฺเฉยฺยาถ. สหายโกปิ, ภิกฺขเว, สหายกสฺส อาโรเจตู’’ติ. เอวํ วุตฺเต เต ภิกฺขู ตุณฺหี อเหสุํ. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อจฺฉริยํ, ภนฺเต, อพฺภุตํ, ภนฺเต, เอวํ ปสนฺโน อหํ, ภนฺเต, อิมสฺมึ ภิกฺขุสงฺเฆ, ‘นตฺถิ เอกภิกฺขุสฺสาปิ กงฺขา วา วิมติ วา พุทฺเธ วา ธมฺเม วา สงฺเฆ วา มคฺเค วา ปฏิปทาย วา’’’ติ. ‘‘ปสาทา โข ตฺวํ, อานนฺท, วเทสิ, ญาณเมว เหตฺถ, อานนฺท, ตถาคตสฺส. นตฺถิ อิมสฺมึ ภิกฺขุสงฺเฆ เอกภิกฺขุสฺสาปิ กงฺขา วา วิมติ วา พุทฺเธ วา ธมฺเม วา สงฺเฆ วา มคฺเค วา ปฏิปทาย วา. อิเมสญฺหิ, อานนฺท, ปญฺจนฺนํ ภิกฺขุสตานํ โย ปจฺฉิมโก ภิกฺขุ, โส โสตาปนฺโน อวินิปาตธมฺโม นิยโต สมฺโพธิปรายโณ’’ติ. २१७. त्यानंतर भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – “भिक्खूंनो, जर एखाद्या भिक्खूच्या मनात बुद्ध, धम्म, संघ, मार्ग किंवा प्रतिपदेविषयी काही शंका किंवा संभ्रम असेल, तर भिक्खूंनो, विचारा. नंतर पश्चात्ताप करू नका की – ‘शास्ते आमच्या समोर प्रत्यक्ष उपस्थित होते, तरीही आम्ही भगवंतांना प्रत्यक्ष विचारू शकलो नाही.’” असे म्हटले असता, ते भिक्खू शांत राहिले. दुसऱ्यांदा देखील भगवंतांनी... तिसऱ्यांदा देखील भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – “भिक्खूंनो, जर एखाद्या भिक्खूच्या मनात बुद्ध, धम्म, संघ, मार्ग किंवा प्रतिपदेविषयी काही शंका किंवा संभ्रम असेल, तर भिक्खूंनो, विचारा. नंतर पश्चात्ताप करू नका की – ‘शास्ते आमच्या समोर प्रत्यक्ष उपस्थित होते, तरीही आम्ही भगवंतांना प्रत्यक्ष विचारू शकलो नाही.’” तिसऱ्यांदा देखील ते भिक्खू शांत राहिले. त्यानंतर भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – “भिक्खूंनो, कदाचित शास्त्यांबद्दलच्या आदरापोटी तुम्ही विचारत नसाल. तर भिक्खूंनो, एका मित्राने दुसऱ्या मित्राला (आपली शंका) सांगावी.” असे म्हटले असताही ते भिक्खू शांत राहिले. त्यानंतर आयुष्यमान आनंदांनी भगवंतांना म्हटले – “आश्चर्य आहे भंते! अद्भुत आहे भंते! भंते, या भिक्खू संघावर माझा असा विश्वास आहे की, एकाही भिक्खूच्या मनात बुद्ध, धम्म, संघ, मार्ग किंवा प्रतिपदेविषयी कोणतीही शंका किंवा संभ्रम नाही.” “आनंदा, तू तर केवळ विश्वासाने बोलत आहेस, परंतु तथागतांना याचे प्रत्यक्ष ज्ञान आहे की, या भिक्खू संघात एकाही भिक्खूच्या मनात बुद्ध, धम्म, संघ, मार्ग किंवा प्रतिपदेविषयी कोणतीही शंका किंवा संभ्रम नाही. आनंदा, या पाचशे भिक्खूंपैकी जो सर्वात कनिष्ठ भिक्खू आहे, तो देखील स्रोतापन्न आहे, दुर्गतीला न जाणारा, नियत आणि संबोधी प्राप्त करणारा आहे.” ๒๑๘. อถ [Pg.128] โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘หนฺท ทานิ, ภิกฺขเว, อามนฺตยามิ โว, วยธมฺมา สงฺขารา อปฺปมาเทน สมฺปาเทถา’’ติ. อยํ ตถาคตสฺส ปจฺฉิมา วาจา. २१८. त्यानंतर भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – “हे भिक्खूंनो, आता मी तुम्हाला सांगतो, सर्व संस्कार (संखारा) नाशवंत स्वभावाचे आहेत, अप्रमादाने (जागरूकतेने) स्वतःचे कल्याण साधून घ्या.” हे तथागतांचे अंतिम वचन होते। ปรินิพฺพุตกถา परिनिर्वाण कथा ๒๑๙. อถ โข ภควา ปฐมํ ฌานํ สมาปชฺชิ, ปฐมชฺฌานา วุฏฺฐหิตฺวา ทุติยํ ฌานํ สมาปชฺชิ, ทุติยชฺฌานา วุฏฺฐหิตฺวา ตติยํ ฌานํ สมาปชฺชิ, ตติยชฺฌานา วุฏฺฐหิตฺวา จตุตฺถํ ฌานํ สมาปชฺชิ. จตุตฺถชฺฌานา วุฏฺฐหิตฺวา อากาสานญฺจายตนํ สมาปชฺชิ, อากาสานญฺจายตนสมาปตฺติยา วุฏฺฐหิตฺวา วิญฺญาณญฺจายตนํ สมาปชฺชิ, วิญฺญาณญฺจายตนสมาปตฺติยา วุฏฺฐหิตฺวา อากิญฺจญฺญายตนํ สมาปชฺชิ, อากิญฺจญฺญายตนสมาปตฺติยา วุฏฺฐหิตฺวา เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ สมาปชฺชิ, เนวสญฺญานาสญฺญายตนสมาปตฺติยา วุฏฺฐหิตฺวา สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปชฺชิ. २१९. त्यानंतर भगवंतांनी प्रथम ध्यानात प्रवेश केला. प्रथम ध्यानातून उठून त्यांनी द्वितीय ध्यानात प्रवेश केला. द्वितीय ध्यानातून उठून त्यांनी तृतीय ध्यानात प्रवेश केला. तृतीय ध्यानातून उठून त्यांनी चतुर्थ ध्यानात प्रवेश केला. चतुर्थ ध्यानातून उठून त्यांनी आकासानञ्चायतन (अनंत आकाशाचे आयतन) मध्ये प्रवेश केला. आकासानञ्चायतन समापत्तीतून उठून त्यांनी विञ्ञाणञ्चायतन (अनंत विज्ञानाचे आयतन) मध्ये प्रवेश केला. विञ्ञाणञ्चायतन समापत्तीतून उठून त्यांनी आकिञ्चञ्ञायतन (अकिंचन्यायतन) मध्ये प्रवेश केला. आकिञ्चञ्ञायतन समापत्तीतून उठून त्यांनी नेवसञ्ञानासञ्ञायतन (नैवसंज्ञानासंज्ञायतन) मध्ये प्रवेश केला. नेवसञ्ञानासञ्ञायतन समापत्तीतून उठून त्यांनी सञ्ञावेदयितनिरोध (संज्ञा आणि वेदनांचा निरोध) मध्ये प्रवेश केला। อถ โข อายสฺมา อานนฺโท อายสฺมนฺตํ อนุรุทฺธํ เอตทโวจ – ‘‘ปรินิพฺพุโต, ภนฺเต อนุรุทฺธ, ภควา’’ติ. ‘‘นาวุโส อานนฺท, ภควา ปรินิพฺพุโต, สญฺญาเวทยิตนิโรธํ สมาปนฺโน’’ติ. त्यानंतर आयुष्यमान आनंदांनी आयुष्यमान अनुरुद्धांना असे म्हटले – “भन्ते अनुरुद्ध, भगवंतांचे परिनिर्वाण झाले का?” “नाही, आवुसो आनंद, भगवंतांचे परिनिर्वाण झालेले नाही, ते सञ्ञावेदयितनिरोध समाधीत प्रविष्ट झाले आहेत.” อถ โข ภควา สญฺญาเวทยิตนิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐหิตฺวา เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ สมาปชฺชิ, เนวสญฺญานาสญฺญายตนสมาปตฺติยา วุฏฺฐหิตฺวา อากิญฺจญฺญายตนํ สมาปชฺชิ, อากิญฺจญฺญายตนสมาปตฺติยา วุฏฺฐหิตฺวา วิญฺญาณญฺจายตนํ สมาปชฺชิ, วิญฺญาณญฺจายตนสมาปตฺติยา วุฏฺฐหิตฺวา อากาสานญฺจายตนํ สมาปชฺชิ, อากาสานญฺจายตนสมาปตฺติยา วุฏฺฐหิตฺวา จตุตฺถํ ฌานํ สมาปชฺชิ, จตุตฺถชฺฌานา วุฏฺฐหิตฺวา ตติยํ ฌานํ สมาปชฺชิ, ตติยชฺฌานา วุฏฺฐหิตฺวา ทุติยํ ฌานํ สมาปชฺชิ, ทุติยชฺฌานา วุฏฺฐหิตฺวา ปฐมํ ฌานํ สมาปชฺชิ, ปฐมชฺฌานา วุฏฺฐหิตฺวา ทุติยํ ฌานํ สมาปชฺชิ, ทุติยชฺฌานา วุฏฺฐหิตฺวา ตติยํ ฌานํ สมาปชฺชิ, ตติยชฺฌานา วุฏฺฐหิตฺวา จตุตฺถํ ฌานํ สมาปชฺชิ, จตุตฺถชฺฌานา วุฏฺฐหิตฺวา สมนนฺตรา ภควา ปรินิพฺพายิ. त्यानंतर भगवंतांनी सञ्ञावेदयितनिरोध समापत्तीतून उठून नेवसञ्ञानासञ्ञायतन मध्ये प्रवेश केला. नेवसञ्ञानासञ्ञायतन समापत्तीतून उठून आकिञ्चञ्ञायतन मध्ये प्रवेश केला. आकिञ्चञ्ञायतन समापत्तीतून उठून विञ्ञाणञ्चायतन मध्ये प्रवेश केला. विञ्ञाणञ्चायतन समापत्तीतून उठून आकासानञ्चायतन मध्ये प्रवेश केला. आकासानञ्चायतन समापत्तीतून उठून चतुर्थ ध्यानात प्रवेश केला. चतुर्थ ध्यानातून उठून तृतीय ध्यानात प्रवेश केला. तृतीय ध्यानातून उठून द्वितीय ध्यानात प्रवेश केला. द्वितीय ध्यानातून उठून प्रथम ध्यानात प्रवेश केला. प्रथम ध्यानातून उठून द्वितीय ध्यानात प्रवेश केला. द्वितीय ध्यानातून उठून तृतीय ध्यानात प्रवेश केला. तृतीय ध्यानातून उठून चतुर्थ ध्यानात प्रवेश केला. आणि चतुर्थ ध्यानातून उठल्याबरोबर लगेचच भगवंतांचे परिनिर्वाण झाले। ๒๒๐. ปรินิพฺพุเต ภควติ สห ปรินิพฺพานา มหาภูมิจาโล อโหสิ ภึสนโก สโลมหํโส. เทวทุนฺทุภิโย จ ผลึสุ. ปรินิพฺพุเต ภควติ สห ปรินิพฺพานา พฺรหฺมาสหมฺปติ อิมํ คาถํ อภาสิ – २२०. भगवंतांचे परिनिर्वाण होताच, परिनिर्वाणासोबतच एक अत्यंत भयानक आणि अंगावर काटा आणणारा मोठा धरणीकंप झाला. देवदुंदुभींचा गडगडाट झाला. भगवंतांचे परिनिर्वाण होताच, परिनिर्वाणासोबतच ब्रह्मा सहम्पतींनी ही गाथा म्हटली – ‘‘สพฺเพว [Pg.129] นิกฺขิปิสฺสนฺติ, ภูตา โลเก สมุสฺสยํ; ยตฺถ เอตาทิโส สตฺถา, โลเก อปฺปฏิปุคฺคโล; ตถาคโต พลปฺปตฺโต, สมฺพุทฺโธ ปรินิพฺพุโต’’ติ. “या जगातील सर्वच प्राणी आपल्या शरीराचा (पंचस्कंधांचा) त्याग करतील; कारण ज्या जगात असे अद्वितीय शास्ता, बलप्राप्त (दशबलधारी), सम्यक्संबुद्ध तथागत सुद्धा परिनिर्वाण पावले आहेत.” ๒๒๑. ปรินิพฺพุเต ภควติ สห ปรินิพฺพานา สกฺโก เทวานมินฺโท อิมํ คาถํ อภาสิ – २२१. भगवंतांचे परिनिर्वाण होताच, परिनिर्वाणासोबतच देवांचा राजा शक्राने ही गाथा म्हटली – ‘‘อนิจฺจา วต สงฺขารา, อุปฺปาทวยธมฺมิโน; อุปฺปชฺชิตฺวา นิรุชฺฌนฺติ, เตสํ วูปสโม สุโข’’ติ. “सर्व संस्कार (संखारा) खरोखर अनित्य आहेत, त्यांचा स्वभावच उत्पन्न होणे आणि नष्ट होणे असा आहे. उत्पन्न होऊन ते नष्ट होतात, त्यांचा उपशम (पूर्ण शांत होणे) हाच खरा सुखावह आहे.” ๒๒๒. ปรินิพฺพุเต ภควติ สห ปรินิพฺพานา อายสฺมา อนุรุทฺโธ อิมา คาถาโย อภาสิ – २२२. भगवंतांचे परिनिर्वाण होताच, परिनिर्वाणासोबतच आयुष्यमान अनुरुद्धांनी या गाथा म्हटल्या – ‘‘นาหุ อสฺสาสปสฺสาโส, ฐิตจิตฺตสฺส ตาทิโน; อเนโช สนฺติมารพฺภ, ยํ กาลมกรี มุนิ. “ज्यांचे चित्त स्थिर व अचल होते, अशा तृष्णारहित मुनींनी जेव्हा शांतीला (निर्वाणाला) उद्देशून देह ठेवला, तेव्हा त्यांच्या श्वासोच्छ्वासाची गती थांबली होती। ‘‘อสลฺลีเนน จิตฺเตน, เวทนํ อชฺฌวาสยิ; ปชฺโชตสฺเสว นิพฺพานํ, วิโมกฺโข เจตโส อหู’’ติ. अचल चित्ताने त्यांनी वेदना सहन केल्या. दिव्याच्या ज्योतीप्रमाणे त्यांचे चित्त पूर्णपणे मुक्त झाले.” ๒๒๓. ปรินิพฺพุเต ภควติ สห ปรินิพฺพานา อายสฺมา อานนฺโท อิมํ คาถํ อภาสิ – २२३. भगवंतांचे परिनिर्वाण होताच, परिनिर्वाणासोबतच आयुष्यमान आनंदांनी ही गाथा म्हटली – ‘‘ตทาสิ ยํ ภึสนกํ, ตทาสิ โลมหํสนํ; สพฺพาการวรูเปเต, สมฺพุทฺเธ ปรินิพฺพุเต’’ติ. “सर्व उत्तम गुणांनी संपन्न अशा सम्यक्संबुद्धांचे परिनिर्वाण झाले, तेव्हा तो काळ अत्यंत भयानक होता आणि अंगावर काटा आणणारा होता.” ๒๒๔. ปรินิพฺพุเต ภควติ เย เต ตตฺถ ภิกฺขู อวีตราคา อปฺเปกจฺเจ พาหา ปคฺคยฺห กนฺทนฺติ, ฉินฺนปาตํ ปปตนฺติ, อาวฏฺฏนฺติ วิวฏฺฏนฺติ, ‘‘อติขิปฺปํ ภควา ปรินิพฺพุโต, อติขิปฺปํ สุคโต ปรินิพฺพุโต, อติขิปฺปํ จกฺขุํ โลเก อนฺตรหิโต’’ติ. เย ปน เต ภิกฺขู วีตราคา, เต สตา สมฺปชานา อธิวาเสนฺติ – ‘‘อนิจฺจา สงฺขารา, ตํ กุเตตฺถ ลพฺภา’’ติ. २२४. भगवंतांचे परिनिर्वाण झाल्यावर, तिथे उपस्थित असलेल्या भिक्खूंपैकी जे अजूनही रागमुक्त (आसक्तीमुक्त) झाले नव्हते, त्यातील काही जण आपले हात वर करून रडू लागले, जमिनीवर कोसळले, इकडेतिकडे लोळू लागले आणि म्हणू लागले – “भगवंतांचे परिनिर्वाण फार लवकर झाले! सुगतांचे परिनिर्वाण फार लवकर झाले! जगाचा डोळा फार लवकर नाहीसा झाला!” परंतु जे भिक्खू रागमुक्त होते, त्यांनी स्मृती आणि संप्रजन्य ठेवून हे सहन केले – “सर्व संस्कार अनित्य आहेत, मग यात आपण काय करू शकतो?” ๒๒๕. อถ โข อายสฺมา อนุรุทฺโธ ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘อลํ, อาวุโส, มา โสจิตฺถ มา ปริเทวิตฺถ. นนุ เอตํ, อาวุโส, ภควตา ปฏิกจฺเจว อกฺขาตํ – ‘สพฺเพเหว ปิเยหิ มนาเปหิ นานาภาโว วินาภาโว อญฺญถาภาโว’. ตํ กุเตตฺถ, อาวุโส, ลพฺภา. ‘ยํ ตํ ชาตํ ภูตํ สงฺขตํ ปโลกธมฺมํ, ตํ วต มา ปลุชฺชี’ติ, เนตํ ฐานํ วิชฺชติ[Pg.130]. เทวตา, อาวุโส, อุชฺฌายนฺตี’’ติ. ‘‘กถํภูตา ปน, ภนฺเต, อายสฺมา อนุรุทฺโธ เทวตา มนสิ กโรตี’’ติ ? २२५. त्यानंतर आयुष्यमान अनुरुद्धांनी भिक्खूंना संबोधित केले – “बस करा, आवुसो! शोक करू नका, विलाप करू नका. आवुसो, भगवंतांनी आधीच हे सांगितले नव्हते का की – ‘सर्व प्रिय आणि मनपसंत गोष्टींपासून वेगळे होणे, त्यांचा विनाश होणे आणि त्यांचे स्वरूप बदलणे अपरिहार्य आहे’? मग आवुसो, यात आपण काय करू शकतो? ‘जे काही उत्पन्न झाले आहे, अस्तित्वात आले आहे, संस्कृत (संखत) आहे आणि नाशवंत स्वभावाचे आहे, ते नष्ट होऊ नये’ असे घडणे शक्य नाही. आवुसो, देवता सुद्धा दोष देत आहेत.” “पण भन्ते अनुरुद्ध, देवता कशा प्रकारे विचार करत आहेत?” ‘‘สนฺตาวุโส อานนฺท, เทวตา อากาเส ปถวีสญฺญินิโย เกเส ปกิริย กนฺทนฺติ, พาหา ปคฺคยฺห กนฺทนฺติ, ฉินฺนปาตํ ปปตนฺติ, อาวฏฺฏนฺติ, วิวฏฺฏนฺติ – ‘อติขิปฺปํ ภควา ปรินิพฺพุโต, อติขิปฺปํ สุคโต ปรินิพฺพุโต, อติขิปฺปํ จกฺขุํ โลเก อนฺตรหิโต’ติ. สนฺตาวุโส อานนฺท, เทวตา ปถวิยา ปถวีสญฺญินิโย เกเส ปกิริย กนฺทนฺติ, พาหา ปคฺคยฺห กนฺทนฺติ, ฉินฺนปาตํ ปปตนฺติ, อาวฏฺฏนฺติ, วิวฏฺฏนฺติ – ‘อติขิปฺปํ ภควา ปรินิพฺพุโต, อติขิปฺปํ สุคโต ปรินิพฺพุโต, อติขิปฺปํ จกฺขุํ โลเก อนฺตรหิโต’ติ. ยา ปน ตา เทวตา วีตราคา, ตา สตา สมฺปชานา อธิวาเสนฺติ – ‘อนิจฺจา สงฺขารา, ตํ กุเตตฺถ ลพฺภา’ติ. อถ โข อายสฺมา จ อนุรุทฺโธ อายสฺมา จ อานนฺโท ตํ รตฺตาวเสสํ ธมฺมิยา กถาย วีตินาเมสุํ. “आवुसो आनंद, आकाशात अशा काही देवता आहेत ज्यांची बुद्धी पृथ्वीशी जोडलेली आहे (पृथ्वीसंज्ञी आहेत), त्या आपले केस मोकळे सोडून रडत आहेत, हात वर करून विलाप करत आहेत, जमिनीवर कोसळत आहेत, इकडेतिकडे लोळत आहेत आणि म्हणत आहेत – ‘भगवंतांचे परिनिर्वाण फार लवकर झाले! सुगतांचे परिनिर्वाण फार लवकर झाले! जगाचा डोळा फार लवकर नाहीसा झाला!’ आवुसो आनंद, पृथ्वीवरही अशा काही देवता आहेत ज्या पृथ्वीसंज्ञी आहेत, त्या आपले केस मोकळे सोडून रडत आहेत, हात वर करून विलाप करत आहेत, जमिनीवर कोसळत आहेत, इकडेतिकडे लोळत आहेत आणि म्हणत आहेत – ‘भगवंतांचे परिनिर्वाण फार लवकर झाले! सुगतांचे परिनिर्वाण फार लवकर झाले! जगाचा डोळा फार लवकर नाहीसा झाला!’ परंतु ज्या देवता रागमुक्त आहेत, त्या स्मृती आणि संप्रजन्य ठेवून हे सहन करत आहेत – ‘सर्व संस्कार अनित्य आहेत, मग यात आपण काय करू शकतो?’ त्यानंतर आयुष्यमान अनुरुद्ध आणि आयुष्यमान आनंद यांनी ती उरलेली रात्र धम्मचर्चेत घालवली.” ๒๒๖. อถ โข อายสฺมา อนุรุทฺโธ อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อามนฺเตสิ – ‘‘คจฺฉาวุโส อานนฺท, กุสินารํ ปวิสิตฺวา โกสินารกานํ มลฺลานํ อาโรเจหิ – ‘ปรินิพฺพุโต, วาเสฏฺฐา, ภควา, ยสฺสทานิ กาลํ มญฺญถา’’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข อายสฺมา อานนฺโท อายสฺมโต อนุรุทฺธสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย อตฺตทุติโย กุสินารํ ปาวิสิ. เตน โข ปน สมเยน โกสินารกา มลฺลา สนฺธาคาเร สนฺนิปติตา โหนฺติ เตเนว กรณีเยน. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท เยน โกสินารกานํ มลฺลานํ สนฺธาคารํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา โกสินารกานํ มลฺลานํ อาโรเจสิ – ‘ปรินิพฺพุโต, วาเสฏฺฐา, ภควา, ยสฺสทานิ กาลํ มญฺญถา’ติ. อิทมายสฺมโต อานนฺทสฺส วจนํ สุตฺวา มลฺลา จ มลฺลปุตฺตา จ มลฺลสุณิสา จ มลฺลปชาปติโย จ อฆาวิโน ทุมฺมนา เจโตทุกฺขสมปฺปิตา อปฺเปกจฺเจ เกเส ปกิริย กนฺทนฺติ, พาหา ปคฺคยฺห กนฺทนฺติ, ฉินฺนปาตํ ปปตนฺติ, อาวฏฺฏนฺติ, วิวฏฺฏนฺติ – ‘‘อติขิปฺปํ ภควา ปรินิพฺพุโต, อติขิปฺปํ สุคโต ปรินิพฺพุโต, อติขิปฺปํ จกฺขุํ โลเก อนฺตรหิโต’’ติ. २२६. तेव्हा आयुष्यमान अनुरुद्धांनी आयुष्यमान आनंदांना संबोधित केले – "मित्रा आनंदा, जा, कुसिनारामध्ये प्रवेश करून कुसिनाराच्या मल्लांना सांग – 'हे वासिष्ठांनो, भगवंतांचे परिनिर्वाण झाले आहे. आता तुम्हाला जे योग्य वाटेल ते तुम्ही करावे.'" "तसेच असो, भंते," असे आयुष्यमान आनंदांनी आयुष्यमान अनुरुद्धांना उत्तर दिले. आणि सकाळी चीवर परिधान करून, पात्र व चीवर घेऊन, दुसऱ्या एका भिक्खूसह त्यांनी कुसिनारामध्ये प्रवेश केला. त्या वेळी कुसिनाराचे मल्ल याच कारणासाठी संथागारात (सभामंडपात) एकत्र जमले होते. तेव्हा आयुष्यमान आनंद कुसिनाराच्या मल्लांच्या संथागाराकडे गेले; तिथे पोहोचून त्यांनी कुसिनाराच्या मल्लांना सांगितले – "हे वासिष्ठांनो, भगवंतांचे परिनिर्वाण झाले आहे. आता तुम्हाला जे योग्य वाटेल ते तुम्ही करावे." आयुष्यमान आनंदांचे हे बोलणे ऐकून मल्ल, मल्लांचे पुत्र, मल्लांच्या सुना आणि मल्लांच्या पत्नी अत्यंत दुःखी, उदास आणि मानसिक वेदनेने व्याकुळ झाले. काही जण केस मोकळे सोडून रडू लागले, काही जण हात उंचावून आक्रोश करू लागले, काही जण कड्यावरून कोसळल्यासारखे जमिनीवर पडले, तर काही जण इकडेतिकडे लोळू लागले – "भगवंतांचे अतिशय लवकर परिनिर्वाण झाले! सुगतांचे अतिशय लवकर परिनिर्वाण झाले! जगातील ज्ञानचक्षू अतिशय लवकर अंतर्धान पावले!" พุทฺธสรีรปูชา बुद्धशरीरपूजा ๒๒๗. อถ [Pg.131] โข โกสินารกา มลฺลา ปุริเส อาณาเปสุํ – ‘‘เตน หิ, ภเณ, กุสินารายํ คนฺธมาลญฺจ สพฺพญฺจ ตาฬาวจรํ สนฺนิปาเตถา’’ติ. อถ โข โกสินารกา มลฺลา คนฺธมาลญฺจ สพฺพญฺจ ตาฬาวจรํ ปญฺจ จ ทุสฺสยุคสตานิ อาทาย เยน อุปวตฺตนํ มลฺลานํ สาลวนํ, เยน ภควโต สรีรํ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควโต สรีรํ นจฺเจหิ คีเตหิ วาทิเตหิ มาเลหิ คนฺเธหิ สกฺกโรนฺตา ครุํ กโรนฺตา มาเนนฺตา ปูเชนฺตา เจลวิตานานิ กโรนฺตา มณฺฑลมาเฬ ปฏิยาเทนฺตา เอกทิวสํ วีตินาเมสุํ. २२७. तेव्हा कुसिनाराच्या मल्लांनी आपल्या सेवकांना आज्ञा दिली – "अरे सेवकांनो, मग कुसिनारातील सर्व सुगंधी द्रव्ये, पुष्पमाला आणि सर्व प्रकारची वाद्ये एकत्र करा." त्यानंतर कुसिनाराचे मल्ल सुगंधी द्रव्ये, पुष्पमाला, सर्व प्रकारची वाद्ये आणि पाचशे वस्त्रजोड्या घेऊन मल्लांच्या उपवत्तन नावाच्या शालवनात, जेथे भगवंतांचे शरीर होते, तेथे गेले; तिथे पोहोचून त्यांनी नृत्य, गीत, वादन, पुष्पमाला आणि सुगंधी द्रव्यांनी भगवंतांच्या शरीराचा सत्कार, आदर, सन्मान व पूजा करत, वस्त्रांचे चांदवे उभारून आणि मंडळमाळ (मंडप) सजवून पहिला दिवस घालवला. อถ โข โกสินารกานํ มลฺลานํ เอตทโหสิ – ‘‘อติวิกาโล โข อชฺช ภควโต สรีรํ ฌาเปตุํ, สฺเว ทานิ มยํ ภควโต สรีรํ ฌาเปสฺสามา’’ติ. อถ โข โกสินารกา มลฺลา ภควโต สรีรํ นจฺเจหิ คีเตหิ วาทิเตหิ มาเลหิ คนฺเธหิ สกฺกโรนฺตา ครุํ กโรนฺตา มาเนนฺตา ปูเชนฺตา เจลวิตานานิ กโรนฺตา มณฺฑลมาเฬ ปฏิยาเทนฺตา ทุติยมฺปิ ทิวสํ วีตินาเมสุํ, ตติยมฺปิ ทิวสํ วีตินาเมสุํ, จตุตฺถมฺปิ ทิวสํ วีตินาเมสุํ, ปญฺจมมฺปิ ทิวสํ วีตินาเมสุํ, ฉฏฺฐมฺปิ ทิวสํ วีตินาเมสุํ. तेव्हा कुसिनाराच्या मल्लांच्या मनात असा विचार आला – "आज भगवंतांच्या शरीराचा दाहसंस्कार करण्यास फार उशीर झाला आहे. उद्या आपण भगवंतांच्या शरीराचा दाहसंस्कार करू." त्यानंतर कुसिनाराच्या मल्लांनी भगवंतांच्या शरीराचा नृत्य, गीत, वादन, पुष्पमाला आणि सुगंधी द्रव्यांनी सत्कार, आदर, सन्मान व पूजा करत, वस्त्रांचे चांदवे उभारून आणि मंडळमाळ सजवून दुसरा दिवसही घालवला, तिसरा दिवसही घालवला, चौथा दिवसही घालवला, पाचवा दिवसही घालवला आणि सहावा दिवसही घालवला. อถ โข สตฺตมํ ทิวสํ โกสินารกานํ มลฺลานํ เอตทโหสิ – ‘‘มยํ ภควโต สรีรํ นจฺเจหิ คีเตหิ วาทิเตหิ มาเลหิ คนฺเธหิ สกฺกโรนฺตา ครุํ กโรนฺตา มาเนนฺตา ปูเชนฺตา ทกฺขิเณน ทกฺขิณํ นครสฺส หริตฺวา พาหิเรน พาหิรํ ทกฺขิณโต นครสฺส ภควโต สรีรํ ฌาเปสฺสามา’’ติ. त्यानंतर सातव्या दिवशी कुसिनाराच्या मल्लांच्या मनात असा विचार आला – "आपण भगवंतांच्या शरीराचा नृत्य, गीत, वादन, पुष्पमाला आणि सुगंधी द्रव्यांनी सत्कार, आदर, सन्मान व पूजा करत, नगराच्या दक्षिण दिशेने बाहेरून नेऊन, नगराच्या दक्षिणेला भगवंतांच्या शरीराचा दाहसंस्कार करूया." ๒๒๘. เตน โข ปน สมเยน อฏฺฐ มลฺลปาโมกฺขา สีสํนฺหาตา อหตานิ วตฺถานิ นิวตฺถา ‘‘มยํ ภควโต สรีรํ อุจฺจาเรสฺสามา’’ติ น สกฺโกนฺติ อุจฺจาเรตุํ. อถ โข โกสินารกา มลฺลา อายสฺมนฺตํ อนุรุทฺธํ เอตทโวจุํ – ‘‘โก นุ โข, ภนฺเต อนุรุทฺธ, เหตุ โก ปจฺจโย, เยนิเม อฏฺฐ มลฺลปาโมกฺขา สีสํนฺหาตา อหตานิ วตฺถานิ นิวตฺถา ‘มยํ ภควโต สรีรํ อุจฺจาเรสฺสามา’ติ น สกฺโกนฺติ อุจฺจาเรตุ’’นฺติ? ‘‘อญฺญถา โข, วาเสฏฺฐา, ตุมฺหากํ อธิปฺปาโย, อญฺญถา เทวตานํ อธิปฺปาโย’’ติ. ‘‘กถํ ปน, ภนฺเต, เทวตานํ อธิปฺปาโย’’ติ? ‘‘ตุมฺหากํ โข, วาเสฏฺฐา, อธิปฺปาโย – ‘มยํ ภควโต สรีรํ นจฺเจหิ คีเตหิ วาทิเตหิ มาเลหิ คนฺเธหิ [Pg.132] สกฺกโรนฺตา ครุํ กโรนฺตา มาเนนฺตา ปูเชนฺตา ทกฺขิเณน ทกฺขิณํ นครสฺส หริตฺวา พาหิเรน พาหิรํ ทกฺขิณโต นครสฺส ภควโต สรีรํ ฌาเปสฺสามา’ติ; เทวตานํ โข, วาเสฏฺฐา, อธิปฺปาโย – ‘มยํ ภควโต สรีรํ ทิพฺเพหิ นจฺเจหิ คีเตหิ วาทิเตหิ คนฺเธหิ สกฺกโรนฺตา ครุํ กโรนฺตา มาเนนฺตา ปูเชนฺตา อุตฺตเรน อุตฺตรํ นครสฺส หริตฺวา อุตฺตเรน ทฺวาเรน นครํ ปเวเสตฺวา มชฺเฌน มชฺฌํ นครสฺส หริตฺวา ปุรตฺถิเมน ทฺวาเรน นิกฺขมิตฺวา ปุรตฺถิมโต นครสฺส มกุฏพนฺธนํ นาม มลฺลานํ เจติยํ เอตฺถ ภควโต สรีรํ ฌาเปสฺสามา’ติ. ‘‘ยถา, ภนฺเต, เทวตานํ อธิปฺปาโย, ตถา โหตู’’ติ. २२८. त्या वेळी मल्लांचे आठ प्रमुख नेते डोक्यावरून स्नान करून आणि नवीन वस्त्रे परिधान करून "आम्ही भगवंतांचे शरीर उचलणार" असा विचार करू लागले, परंतु ते शरीर उचलण्यास असमर्थ ठरले. तेव्हा कुसिनाराच्या मल्लांनी आयुष्यमान अनुरुद्धांना विचारले – "भंते अनुरुद्ध, याचे काय कारण आहे, कोणता हेतू आहे, ज्यामुळे हे मल्लांचे आठ प्रमुख नेते डोक्यावरून स्नान करून आणि नवीन वस्त्रे परिधान करूनही 'आम्ही भगवंतांचे शरीर उचलणार' असे म्हणून ते उचलण्यास असमर्थ ठरत आहेत?" "हे वासिष्ठांनो, तुमचा विचार वेगळा आहे आणि देवतांचा विचार वेगळा आहे." "पण भंते, देवतांचा काय विचार आहे?" "हे वासिष्ठांनो, तुमचा विचार असा आहे की – 'आम्ही भगवंतांच्या शरीराचा नृत्य, गीत, वादन, पुष्पमाला आणि सुगंधी द्रव्यांनी सत्कार, आदर, सन्मान व पूजा करत, नगराच्या दक्षिण दिशेने बाहेरून नेऊन, नगराच्या दक्षिणेला भगवंतांच्या शरीराचा दाहसंस्कार करूया'; परंतु हे वासिष्ठांनो, देवतांचा विचार असा आहे की – 'आम्ही दिव्य नृत्य, गीत, वादन, पुष्पमाला आणि सुगंधी द्रव्यांनी भगवंतांच्या शरीराचा सत्कार, आदर, सन्मान व पूजा करत, नगराच्या उत्तर दिशेने नेऊन, उत्तर दाराने नगरात प्रवेश करून, नगराच्या मध्यभागातून नेऊन, पूर्व दाराने बाहेर पडून, नगराच्या पूर्वेला असलेल्या मल्लांच्या "मुकुटबंधन" नावाच्या चैत्यात भगवंतांच्या शरीराचा दाहसंस्कार करूया.'" "भंते, जशी देवतांची इच्छा असेल, तसेच होऊ दे." ๒๒๙. เตน โข ปน สมเยน กุสินารา ยาว สนฺธิสมลสํกฏีรา ชณฺณุมตฺเตน โอธินา มนฺทารวปุปฺเผหิ สนฺถตา โหติ. อถ โข เทวตา จ โกสินารกา จ มลฺลา ภควโต สรีรํ ทิพฺเพหิ จ มานุสเกหิ จ นจฺเจหิ คีเตหิ วาทิเตหิ มาเลหิ คนฺเธหิ สกฺกโรนฺตา ครุํ กโรนฺตา มาเนนฺตา ปูเชนฺตา อุตฺตเรน อุตฺตรํ นครสฺส หริตฺวา อุตฺตเรน ทฺวาเรน นครํ ปเวเสตฺวา มชฺเฌน มชฺฌํ นครสฺส หริตฺวา ปุรตฺถิเมน ทฺวาเรน นิกฺขมิตฺวา ปุรตฺถิมโต นครสฺส มกุฏพนฺธนํ นาม มลฺลานํ เจติยํ เอตฺถ จ ภควโต สรีรํ นิกฺขิปึสุ. २२९. त्या वेळी कुसिनारा नगरी घरांच्या सांध्यांपासून, सांडपाण्याच्या नाल्यांपर्यंत आणि कचऱ्याच्या ढिगाऱ्यांपर्यंत गुडघाभर उंचीपर्यंत दिव्य मंदारव पुष्पांनी आच्छादलेली होती. त्यानंतर देवतांनी आणि कुसिनाराच्या मल्लांनी दिव्य व मानवी नृत्य, गीत, वादन, पुष्पमाला आणि सुगंधी द्रव्यांनी भगवंतांच्या शरीराचा सत्कार, आदर, सन्मान व पूजा करत, नगराच्या उत्तर दिशेने नेऊन, उत्तर दाराने नगरात प्रवेश करून, नगराच्या मध्यभागातून नेऊन, पूर्व दाराने बाहेर पडून, नगराच्या पूर्वेला असलेल्या मल्लांच्या 'मुकुटबंधन' नावाच्या चैत्यात भगवंतांचे शरीर ठेवले. ๒๓๐. อถ โข โกสินารกา มลฺลา อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ เอตทโวจุํ – ‘‘กถํ มยํ, ภนฺเต อานนฺท, ตถาคตสฺส สรีเร ปฏิปชฺชามา’’ติ? ‘‘ยถา โข, วาเสฏฺฐา, รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส สรีเร ปฏิปชฺชนฺติ, เอวํ ตถาคตสฺส สรีเร ปฏิปชฺชิตพฺพ’’นฺติ. ‘‘กถํ ปน, ภนฺเต อานนฺท, รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส สรีเร ปฏิปชฺชนฺตี’’ติ? ‘‘รญฺโญ, วาเสฏฺฐา, จกฺกวตฺติสฺส สรีรํ อหเตน วตฺเถน เวเฐนฺติ, อหเตน วตฺเถน เวเฐตฺวา วิหเตน กปฺปาเสน เวเฐนฺติ, วิหเตน กปฺปาเสน เวเฐตฺวา อหเตน วตฺเถน เวเฐนฺติ. เอเตน อุปาเยน ปญฺจหิ ยุคสเตหิ รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส สรีรํ เวเฐตฺวา อายสาย เตลโทณิยา ปกฺขิปิตฺวา อญฺญิสฺสา อายสาย โทณิยา ปฏิกุชฺชิตฺวา สพฺพคนฺธานํ จิตกํ กริตฺวา รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส สรีรํ ฌาเปนฺติ. จาตุมหาปเถ รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส ถูปํ กโรนฺติ[Pg.133]. เอวํ โข, วาเสฏฺฐา, รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส สรีเร ปฏิปชฺชนฺติ. ยถา โข, วาเสฏฺฐา, รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส สรีเร ปฏิปชฺชนฺติ, เอวํ ตถาคตสฺส สรีเร ปฏิปชฺชิตพฺพํ. จาตุมหาปเถ ตถาคตสฺส ถูโป กาตพฺโพ. ตตฺถ เย มาลํ วา คนฺธํ วา จุณฺณกํ วา อาโรเปสฺสนฺติ วา อภิวาเทสฺสนฺติ วา จิตฺตํ วา ปสาเทสฺสนฺติ, เตสํ ตํ ภวิสฺสติ ทีฆรตฺตํ หิตาย สุขายา’’ติ. อถ โข โกสินารกา มลฺลา ปุริเส อาณาเปสุํ – ‘‘เตน หิ, ภเณ, มลฺลานํ วิหตํ กปฺปาสํ สนฺนิปาเตถา’’ติ. २३०. तेव्हा कुसिनारा येथील मल्लांनी आयुष्यमान आनंदांना विचारले, "भन्ते आनंद, आम्ही तथागतांच्या शरीराचे (पार्थिवाचे) काय करावे?" "वासेठ्ठहो, ज्याप्रमाणे चक्रवर्ती राजाच्या शरीराचे संस्कार केले जातात, त्याचप्रमाणे तथागतांच्या शरीराचे संस्कार केले पाहिजेत." "पण भन्ते आनंद, चक्रवर्ती राजाच्या शरीराचे संस्कार कशा प्रकारे केले जातात?" "वासेठ्ठहो, चक्रवर्ती राजाच्या शरीराला नवीन वस्त्राने वेढतात. नवीन वस्त्राने वेढल्यानंतर पिंजलेल्या कापसाने वेढतात. पिंजलेल्या कापसाने वेढल्यानंतर पुन्हा नवीन वस्त्राने वेढतात. या पद्धतीने पाचशे वस्त्रजोड्यांनी चक्रवर्ती राजाच्या शरीराला वेढून, ते तेलाने भरलेल्या सोन्याच्या द्रोणीत ठेवतात आणि दुसऱ्या सोन्याच्या द्रोणीने ते झाकून टाकतात. नंतर सर्व प्रकारच्या सुगंधी द्रव्यांची चिता रचून चक्रवर्ती राजाच्या शरीराचे दहन करतात. चार रस्त्यांच्या चौकावर चक्रवर्ती राजाचा स्तूप उभारतात. वासेठ्ठहो, अशा प्रकारे चक्रवर्ती राजाच्या शरीराचे संस्कार केले जातात. ज्याप्रमाणे चक्रवर्ती राजाच्या शरीराचे संस्कार केले जातात, त्याचप्रमाणे तथागतांच्या शरीराचे संस्कार केले पाहिजेत. चार रस्त्यांच्या चौकावर तथागतांचा स्तूप उभारला पाहिजे. तिथे जे कोणी पुष्प, गंध किंवा चूर्ण अर्पण करतील, किंवा अभिवादन करतील, अथवा आपले चित्त प्रसन्न करतील, ते त्यांच्यासाठी दीर्घकाळापर्यंत हितकारक आणि सुखकारक ठरेल." तेव्हा कुसिनारा येथील मल्लांनी आपल्या सेवकांना आज्ञा दिली, "अरे सेवकांनो, मग मल्लांचा पिंजलेला कापूस गोळा करा." อถ โข โกสินารกา มลฺลา ภควโต สรีรํ อหเตน วตฺเถน เวเฐตฺวา วิหเตน กปฺปาเสน เวเฐสุํ, วิหเตน กปฺปาเสน เวเฐตฺวา อหเตน วตฺเถน เวเฐสุํ. เอเตน อุปาเยน ปญฺจหิ ยุคสเตหิ ภควโต สรีรํ เวเฐตฺวา อายสาย เตลโทณิยา ปกฺขิปิตฺวา อญฺญิสฺสา อายสาย โทณิยา ปฏิกุชฺชิตฺวา สพฺพคนฺธานํ จิตกํ กริตฺวา ภควโต สรีรํ จิตกํ อาโรเปสุํ. त्यानंतर कुसिनारा येथील मल्लांनी भगवंतांच्या शरीराला नवीन वस्त्राने वेढले, नंतर पिंजलेल्या कापसाने वेढले, आणि पिंजलेल्या कापसाने वेढल्यानंतर पुन्हा नवीन वस्त्राने वेढले. या पद्धतीने पाचशे वस्त्रजोड्यांनी भगवंतांच्या शरीराला वेढून, ते तेलाने भरलेल्या सोन्याच्या द्रोणीत ठेवले आणि दुसऱ्या सोन्याच्या द्रोणीने ते झाकून टाकले. नंतर सर्व प्रकारच्या सुगंधी द्रव्यांची चिता रचून भगवंतांचे शरीर चितेवर चढवले. มหากสฺสปตฺเถรวตฺถุ महाकस्सप थेर यांची कथा (महाकश्यप स्थवीर कथा) ๒๓๑. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา มหากสฺสโป ปาวาย กุสินารํ อทฺธานมคฺคปฺปฏิปฺปนฺโน โหติ มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ ปญฺจมตฺเตหิ ภิกฺขุสเตหิ. อถ โข อายสฺมา มหากสฺสโป มคฺคา โอกฺกมฺม อญฺญตรสฺมึ รุกฺขมูเล นิสีทิ. เตน โข ปน สมเยน อญฺญตโร อาชีวโก กุสินาราย มนฺทารวปุปฺผํ คเหตฺวา ปาวํ อทฺธานมคฺคปฺปฏิปฺปนฺโน โหติ. อทฺทสา โข อายสฺมา มหากสฺสโป ตํ อาชีวกํ ทูรโตว อาคจฺฉนฺตํ, ทิสฺวา ตํ อาชีวกํ เอตทโวจ – ‘‘อปาวุโส, อมฺหากํ สตฺถารํ ชานาสี’’ติ? ‘‘อามาวุโส, ชานามิ, อชฺช สตฺตาหปรินิพฺพุโต สมโณ โคตโม. ตโต เม อิทํ มนฺทารวปุปฺผํ คหิต’’นฺติ. ตตฺถ เย เต ภิกฺขู อวีตราคา อปฺเปกจฺเจ พาหา ปคฺคยฺห กนฺทนฺติ, ฉินฺนปาตํ ปปตนฺติ, อาวฏฺฏนฺติ, วิวฏฺฏนฺติ – ‘‘อติขิปฺปํ ภควา ปรินิพฺพุโต, อติขิปฺปํ สุคโต ปรินิพฺพุโต, อติขิปฺปํ จกฺขุํ โลเก อนฺตรหิโต’’ติ. เย ปน เต ภิกฺขู วีตราคา, เต สตา สมฺปชานา อธิวาเสนฺติ – ‘‘อนิจฺจา สงฺขารา, ตํ กุเตตฺถ ลพฺภา’’ติ. २३१. त्या वेळी आयुष्यमान महाकस्सप सुमारे पाचशे भिक्खूंच्या मोठ्या भिक्खू संघासह पावा नगरीहून कुसिनाराकडे जाणाऱ्या महामार्गाने प्रवास करत होते. तेव्हा आयुष्यमान महाकस्सप मार्गावरून बाजूला होऊन एका झाडाच्या मुळाशी बसले. त्याच वेळी एक आजीवक कुसिनाराहून मंदारव पुष्प घेऊन पावा नगरीकडे जाणाऱ्या महामार्गाने प्रवास करत होता. आयुष्यमान महाकस्सपांनी त्या आजीवकाला दुरूनच येताना पाहिले. त्याला पाहून ते म्हणाले, "मित्रा, तू आमच्या शास्त्यांना (गुरूूंना) ओळखतोस का?" "होय मित्रा, मी ओळखतो. श्रमण गोतम आज सात दिवसांपूर्वी परिनिर्वाण पावले आहेत. तिथूनच मी हे मंदारव पुष्प घेतले आहे." तिथे जे भिक्खू अद्याप वीतरागी (रागमुक्त) झाले नव्हते, त्यांतील काही जण आपले हात वर करून रडू लागले, कड्यावरून कोसळल्यासारखे जमिनीवर पडले, इकडेतिकडे लोळू लागले आणि म्हणू लागले, "भगवंत अतिशय लवकर परिनिर्वाण पावले! सुगत अतिशय लवकर परिनिर्वाण पावले! जगातील ज्ञानचक्षू अतिशय लवकर अंतर्धान पावले!" परंतु जे भिक्खू वीतरागी होते, त्यांनी स्मृतिमान व सजग राहून हे सहन केले आणि विचार केला, "सर्व संस्कार अनित्य आहेत, मग येथे काय अपेक्षा करता येईल?" ๒๓๒. เตน โข ปน สมเยน สุภทฺโท นาม วุทฺธปพฺพชิโต ตสฺสํ ปริสายํ นิสินฺโน โหติ. อถ โข สุภทฺโท วุทฺธปพฺพชิโต เต [Pg.134] ภิกฺขู เอตทโวจ – ‘‘อลํ, อาวุโส, มา โสจิตฺถ, มา ปริเทวิตฺถ, สุมุตฺตา มยํ เตน มหาสมเณน. อุปทฺทุตา จ โหม – ‘อิทํ โว กปฺปติ, อิทํ โว น กปฺปตี’ติ. อิทานิ ปน มยํ ยํ อิจฺฉิสฺสาม, ตํ กริสฺสาม, ยํ น อิจฺฉิสฺสาม, น ตํ กริสฺสามา’’ติ. อถ โข อายสฺมา มหากสฺสโป ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘อลํ, อาวุโส, มา โสจิตฺถ, มา ปริเทวิตฺถ. นนุ เอตํ, อาวุโส, ภควตา ปฏิกจฺเจว อกฺขาตํ – ‘สพฺเพเหว ปิเยหิ มนาเปหิ นานาภาโว วินาภาโว อญฺญถาภาโว’. ตํ กุเตตฺถ, อาวุโส, ลพฺภา. ‘ยํ ตํ ชาตํ ภูตํ สงฺขตํ ปโลกธมฺมํ, ตํ ตถาคตสฺสาปิ สรีรํ มา ปลุชฺชี’ติ, เนตํ ฐานํ วิชฺชตี’’ติ. २३२. त्या वेळी सुभद्द नावाचा वृद्धपणी प्रव्रजित झालेला भिक्खू त्या परिषदेत बसलेला होता. तेव्हा त्या वृद्धप्रव्रजित सुभद्दने त्या भिक्खूंना म्हटले, "मित्रांनो, पुरे करा! शोक करू नका, रडू नका. आपण त्या महाश्रमणापासून चांगल्या प्रकारे मुक्त झालो आहोत. 'हे तुम्हास कल्पते (योग्य आहे), हे तुम्हास कल्पत नाही (अयोग्य आहे)' असे सांगून त्यांनी आपल्याला त्रास दिला होता. आता मात्र आपल्याला जे हवे ते आपण करू आणि जे नको ते करणार नाही." तेव्हा आयुष्यमान महाकस्सपांनी भिक्खूंना संबोधित केले, "मित्रांनो, पुरे करा! शोक करू नका, रडू नका. मित्रांनो, भगवंतांनी आधीच हे सांगितले नव्हते का की, 'सर्व प्रिय आणि मनपसंत गोष्टींपासून वियोग, विनाश आणि परिवर्तन निश्चित आहे'? मग मित्रांनो, येथे काय अपेक्षा करता येईल? 'जे काही जन्मलेले, अस्तित्वात आलेले, संस्कृत (रचलेले) आणि नाशवंत स्वभावाचे आहे, ते तथागतांचे शरीर देखील नष्ट होऊ नये', अशी स्थिती असणे शक्य नाही." ๒๓๓. เตน โข ปน สมเยน จตฺตาโร มลฺลปาโมกฺขา สีสํนฺหาตา อหตานิ วตฺถานิ นิวตฺถา – ‘‘มยํ ภควโต จิตกํ อาฬิมฺเปสฺสามา’’ติ น สกฺโกนฺติ อาฬิมฺเปตุํ. อถ โข โกสินารกา มลฺลา อายสฺมนฺตํ อนุรุทฺธํ เอตทโวจุํ – ‘‘โก นุ โข, ภนฺเต อนุรุทฺธ, เหตุ โก ปจฺจโย, เยนิเม จตฺตาโร มลฺลปาโมกฺขา สีสํนฺหาตา อหตานิ วตฺถานิ นิวตฺถา – ‘มยํ ภควโต จิตกํ อาฬิมฺเปสฺสามา’ติ น สกฺโกนฺติ อาฬิมฺเปตุ’’นฺติ? ‘‘อญฺญถา โข, วาเสฏฺฐา, เทวตานํ อธิปฺปาโย’’ติ. ‘‘กถํ ปน, ภนฺเต, เทวตานํ อธิปฺปาโย’’ติ? ‘‘เทวตานํ โข, วาเสฏฺฐา, อธิปฺปาโย – ‘อยํ อายสฺมา มหากสฺสโป ปาวาย กุสินารํ อทฺธานมคฺคปฺปฏิปฺปนฺโน มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ ปญฺจมตฺเตหิ ภิกฺขุสเตหิ. น ตาว ภควโต จิตโก ปชฺชลิสฺสติ, ยาวายสฺมา มหากสฺสโป ภควโต ปาเท สิรสา น วนฺทิสฺสตี’’’ติ. ‘‘ยถา, ภนฺเต, เทวตานํ อธิปฺปาโย, ตถา โหตู’’ติ. २३३. त्या वेळी मल्लांचे चार प्रमुख नेते डोक्यावरून स्नान करून आणि नवीन वस्त्रे परिधान करून, "आम्ही भगवंतांच्या चितेला अग्नी देऊ" असे म्हणून प्रयत्न करत होते, परंतु ते चिता पेटवू शकले नाहीत. तेव्हा कुसिनारा येथील मल्लांनी आयुष्यमान अनुरुद्धांना विचारले, "भन्ते अनुरुद्ध, याचे काय कारण आणि काय हेतू आहे, ज्यामुळे हे मल्लांचे चार प्रमुख नेते डोक्यावरून स्नान करून आणि नवीन वस्त्रे परिधान करूनही भगवंतांची चिता पेटवू शकत नाहीत?" "वासेठ्ठहो, देवतांचा हेतू काही वेगळाच आहे." "पण भन्ते, देवतांचा काय हेतू आहे?" "वासेठ्ठहो, देवतांचा असा हेतू आहे की, 'हे आयुष्यमान महाकस्सप सुमारे पाचशे भिक्खूंच्या मोठ्या भिक्खू संघासह पावा नगरीहून कुसिनाराकडे जाणाऱ्या महामार्गाने येत आहेत. जोपर्यंत आयुष्यमान महाकस्सप भगवंतांच्या चरणांवर डोके ठेवून वंदन करणार नाहीत, तोपर्यंत भगवंतांची चिता पेटणार नाही.'" "भन्ते, जसा देवतांचा हेतू आहे, तसेच घडू दे." ๒๓๔. อถ โข อายสฺมา มหากสฺสโป เยน กุสินารา มกุฏพนฺธนํ นาม มลฺลานํ เจติยํ, เยน ภควโต จิตโก เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เอกํสํ จีวรํ กตฺวา อญฺชลึ ปณาเมตฺวา ติกฺขตฺตุํ จิตกํ ปทกฺขิณํ กตฺวา ภควโต ปาเท สิรสา วนฺทิ. ตานิปิ โข ปญฺจภิกฺขุสตานิ เอกํสํ จีวรํ กตฺวา อญฺชลึ ปณาเมตฺวา ติกฺขตฺตุํ จิตกํ ปทกฺขิณํ กตฺวา ภควโต ปาเท สิรสา วนฺทึสุ. วนฺทิเต จ ปนายสฺมตา มหากสฺสเปน เตหิ จ ปญฺจหิ ภิกฺขุสเตหิ สยเมว ภควโต จิตโก ปชฺชลิ. २३४. त्यानंतर आयुष्यमान महाकस्सप कुसिनारा येथील मल्लांचे 'मकुटबंधन' नावाचे चैत्य जेथे भगवंतांची चिता होती, तिथे गेले. तिथे पोहोचून त्यांनी आपले चीवर एका खांद्यावर केले, हात जोडून चितेला तीन वेळा प्रदक्षिणा घातली आणि भगवंतांच्या चरणांवर डोके ठेवून वंदन केले. त्या पाचशे भिक्खूंनी देखील आपले चीवर एका खांद्यावर केले, हात जोडून चितेला तीन वेळा प्रदक्षिणा घातली आणि भगवंतांच्या चरणांवर डोके ठेवून वंदन केले. आयुष्यमान महाकस्सप आणि त्या पाचशे भिक्खूंनी वंदन केल्यावर, भगवंतांची चिता स्वतःहूनच पेटली. ๒๓๕. ฌายมานสฺส [Pg.135] โข ปน ภควโต สรีรสฺส ยํ อโหสิ ฉวีติ วา จมฺมนฺติ วา มํสนฺติ วา นฺหารูติ วา ลสิกาติ วา, ตสฺส เนว ฉาริกา ปญฺญายิตฺถ, น มสิ; สรีราเนว อวสิสฺสึสุ. เสยฺยถาปิ นาม สปฺปิสฺส วา เตลสฺส วา ฌายมานสฺส เนว ฉาริกา ปญฺญายติ, น มสิ; เอวเมว ภควโต สรีรสฺส ฌายมานสฺส ยํ อโหสิ ฉวีติ วา จมฺมนฺติ วา มํสนฺติ วา นฺหารูติ วา ลสิกาติ วา, ตสฺส เนว ฉาริกา ปญฺญายิตฺถ, น มสิ; สรีราเนว อวสิสฺสึสุ. เตสญฺจ ปญฺจนฺนํ ทุสฺสยุคสตานํ ทฺเวว ทุสฺสานิ น ฑยฺหึสุ ยญฺจ สพฺพอพฺภนฺตริมํ ยญฺจ พาหิรํ. ทฑฺเฒ จ โข ปน ภควโต สรีเร อนฺตลิกฺขา อุทกธารา ปาตุภวิตฺวา ภควโต จิตกํ นิพฺพาเปสิ. อุทกสาลโตปิ อพฺภุนฺนมิตฺวา ภควโต จิตกํ นิพฺพาเปสิ. โกสินารกาปิ มลฺลา สพฺพคนฺโธทเกน ภควโต จิตกํ นิพฺพาเปสุํ. อถ โข โกสินารกา มลฺลา ภควโต สรีรานิ สตฺตาหํ สนฺธาคาเร สตฺติปญฺชรํ กริตฺวา ธนุปาการํ ปริกฺขิปาเปตฺวา นจฺเจหิ คีเตหิ วาทิเตหิ มาเลหิ คนฺเธหิ สกฺกรึสุ ครุํ กรึสุ มาเนสุํ ปูเชสุํ. २३५. जेव्हा भगवंतांच्या शरीराचे दहन होत होते, तेव्हा त्यांच्या बाह्य त्वचेची, अंतर्त्वचेची, मांसाची, स्नायूंची किंवा सांध्यांमधील द्रवाची राख किंवा काजळी उरली नाही; केवळ शारीरिक धातूच शिल्लक राहिले. ज्याप्रमाणे तूप किंवा तेल जळत असताना त्याची कोणतीही राख किंवा काजळी उरत नाही, त्याचप्रमाणे भगवंतांच्या शरीराचे दहन होत असताना त्यांच्या बाह्य त्वचेची, अंतर्त्वचेची, मांसाची, स्नायूंची किंवा सांध्यांमधील द्रवाची राख किंवा काजळी उरली नाही; केवळ शारीरिक धातूच शिल्लक राहिले. आणि त्या पाचशे वस्त्रांच्या जोड्यांपैकी केवळ दोनच वस्त्रे जळाली नाहीत—जे सर्वात आतले होते आणि जे सर्वात बाहेरचे होते. भगवंतांचे शरीर दहन झाल्यावर, आकाशातून पाण्याच्या धारा प्रकट झाल्या आणि त्यांनी भगवंतांची चिता विझवली. पाण्याच्या साल वृक्षांमधूनही पाणी बाहेर पडून त्यांनी भगवंतांची चिता विझवली. कुसिनारा येथील मल्लांनी देखील सर्व प्रकारच्या सुगंधी पाण्याने भगवंतांची चिता विझवली. त्यानंतर कुसिनाराच्या मल्लांनी भगवंतांच्या शारीरिक धातूंना सात दिवसांपर्यंत आपल्या संथागारात भाल्यांचे कुंपण आणि धनुष्यांची भिंत उभारून कडक पहारा ठेवला आणि नृत्य, गीत, वादन, पुष्पमाला व सुगंधी द्रव्यांनी त्यांचा सत्कार केला, आदर केला, मान दिला आणि पूजा केली. สรีรธาตุวิภาชนํ शारीरिक धातूंचे विभाजन ๒๓๖. อสฺโสสิ โข ราชา มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต – ‘‘ภควา กิร กุสินารายํ ปรินิพฺพุโต’’ติ. อถ โข ราชา มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต โกสินารกานํ มลฺลานํ ทูตํ ปาเหสิ – ‘‘ภควาปิ ขตฺติโย อหมฺปิ ขตฺติโย, อหมฺปิ อรหามิ ภควโต สรีรานํ ภาคํ, อหมฺปิ ภควโต สรีรานํ ถูปญฺจ มหญฺจ กริสฺสามี’’ติ. २३६. मगधचा राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रू याने ऐकले की, 'भगवंत कुसिनारा येथे परिनिर्वाण पावले आहेत.' तेव्हा मगधचा राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रू याने कुसिनाराच्या मल्लांकडे दूत पाठवला की, 'भगवंतही क्षत्रिय होते आणि मीही क्षत्रिय आहे. मीसुद्धा भगवंतांच्या शारीरिक धातूंचा हिस्सा मिळण्यास पात्र आहे. मीसुद्धा भगवंतांच्या शारीरिक धातूंवर स्तूप उभारून त्यांची पूजा-अर्चना करीन.' อสฺโสสุํ โข เวสาลิกา ลิจฺฉวี – ‘‘ภควา กิร กุสินารายํ ปรินิพฺพุโต’’ติ. อถ โข เวสาลิกา ลิจฺฉวี โกสินารกานํ มลฺลานํ ทูตํ ปาเหสุํ – ‘‘ภควาปิ ขตฺติโย มยมฺปิ ขตฺติยา, มยมฺปิ อรหาม ภควโต สรีรานํ ภาคํ, มยมฺปิ ภควโต สรีรานํ ถูปญฺจ มหญฺจ กริสฺสามา’’ติ. वैदेशीच्या लिच्छवींनी ऐकले की, 'भगवंत कुसिनारा येथे परिनिर्वाण पावले आहेत.' तेव्हा वैशालीच्या लिच्छवींनी कुसिनाराच्या मल्लांकडे दूत पाठवला की, 'भगवंतही क्षत्रिय होते आणि आम्हीही क्षत्रिय आहोत. आम्हीसुद्धा भगवंतांच्या शारीरिक धातूंचा हिस्सा मिळण्यास पात्र आहोत. आम्हीसुद्धा भगवंतांच्या शारीरिक धातूंवर स्तूप उभारून त्यांची पूजा-अर्चना करू.' อสฺโสสุํ โข กปิลวตฺถุวาสี สกฺยา – ‘‘ภควา กิร กุสินารายํ ปรินิพฺพุโต’’ติ. อถ โข กปิลวตฺถุวาสี สกฺยา โกสินารกานํ มลฺลานํ [Pg.136] ทูตํ ปาเหสุํ – ‘‘ภควา อมฺหากํ ญาติเสฏฺโฐ, มยมฺปิ อรหาม ภควโต สรีรานํ ภาคํ, มยมฺปิ ภควโต สรีรานํ ถูปญฺจ มหญฺจ กริสฺสามา’’ติ. कपिलवस्तूच्या शाक्यांनी ऐकले की, 'भगवंत कुसिनारा येथे परिनिर्वाण पावले आहेत.' तेव्हा कपिलवस्तूच्या शाक्यांनी कुसिनाराच्या मल्लांकडे दूत पाठवला की, 'भगवंत हे आमच्या कुळातील श्रेष्ठ नातलग होते. आम्हीसुद्धा भगवंतांच्या शारीरिक धातूंचा हिस्सा मिळण्यास पात्र आहोत. आम्हीसुद्धा भगवंतांच्या शारीरिक धातूंवर स्तूप उभारून त्यांची पूजा-अर्चना करू.' อสฺโสสุํ โข อลฺลกปฺปกา พุลโย – ‘‘ภควา กิร กุสินารายํ ปรินิพฺพุโต’’ติ. อถ โข อลฺลกปฺปกา พุลโย โกสินารกานํ มลฺลานํ ทูตํ ปาเหสุํ – ‘‘ภควาปิ ขตฺติโย มยมฺปิ ขตฺติยา, มยมฺปิ อรหาม ภควโต สรีรานํ ภาคํ, มยมฺปิ ภควโต สรีรานํ ถูปญฺจ มหญฺจ กริสฺสามา’’ติ. अल्लाकप्पच्या बुलींनी ऐकले की, 'भगवंत कुसिनारा येथे परिनिर्वाण पावले आहेत.' तेव्हा अल्लाकप्पच्या बुलींनी कुसिनाराच्या मल्लांकडे दूत पाठवला की, 'भगवंतही क्षत्रिय होते आणि आम्हीही क्षत्रिय आहोत. आम्हीसुद्धा भगवंतांच्या शारीरिक धातूंचा हिस्सा मिळण्यास पात्र आहोत. आम्हीसुद्धा भगवंतांच्या शारीरिक धातूंवर स्तूप उभारून त्यांची पूजा-अर्चना करू.' อสฺโสสุํ โข รามคามกา โกฬิยา – ‘‘ภควา กิร กุสินารายํ ปรินิพฺพุโต’’ติ. อถ โข รามคามกา โกฬิยา โกสินารกานํ มลฺลานํ ทูตํ ปาเหสุํ – ‘‘ภควาปิ ขตฺติโย มยมฺปิ ขตฺติยา, มยมฺปิ อรหาม ภควโต สรีรานํ ภาคํ, มยมฺปิ ภควโต สรีรานํ ถูปญฺจ มหญฺจ กริสฺสามา’’ติ. रामग्रामच्या कोलियांनी ऐकले की, 'भगवंत कुसिनारा येथे परिनिर्वाण पावले आहेत.' तेव्हा रामग्रामच्या कोलियांनी कुसिनाराच्या मल्लांकडे दूत पाठवला की, 'भगवंतही क्षत्रिय होते आणि आम्हीही क्षत्रिय आहोत. आम्हीसुद्धा भगवंतांच्या शारीरिक धातूंचा हिस्सा मिळण्यास पात्र आहोत. आम्हीसुद्धा भगवंतांच्या शारीरिक धातूंवर स्तूप उभारून त्यांची पूजा-अर्चना करू.' อสฺโสสิ โข เวฏฺฐทีปโก พฺราหฺมโณ – ‘‘ภควา กิร กุสินารายํ ปรินิพฺพุโต’’ติ. อถ โข เวฏฺฐทีปโก พฺราหฺมโณ โกสินารกานํ มลฺลานํ ทูตํ ปาเหสิ – ‘‘ภควาปิ ขตฺติโย อหํ ปิสฺมิ พฺราหฺมโณ, อหมฺปิ อรหามิ ภควโต สรีรานํ ภาคํ, อหมฺปิ ภควโต สรีรานํ ถูปญฺจ มหญฺจ กริสฺสามี’’ติ. वेठदीपच्या ब्राह्मणाने ऐकले की, 'भगवंत कुसिनारा येथे परिनिर्वाण पावले आहेत.' तेव्हा वेठदीपच्या ब्राह्मणाने कुसिनाराच्या मल्लांकडे दूत पाठवला की, 'भगवंत क्षत्रिय होते आणि मी ब्राह्मण आहे. मीसुद्धा भगवंतांच्या शारीरिक धातूंचा हिस्सा मिळण्यास पात्र आहे. मीसुद्धा भगवंतांच्या शारीरिक धातूंवर स्तूप उभारून त्यांची पूजा-अर्चना करीन.' อสฺโสสุํ โข ปาเวยฺยกา มลฺลา – ‘‘ภควา กิร กุสินารายํ ปรินิพฺพุโต’’ติ. อถ โข ปาเวยฺยกา มลฺลา โกสินารกานํ มลฺลานํ ทูตํ ปาเหสุํ – ‘‘ภควาปิ ขตฺติโย มยมฺปิ ขตฺติยา, มยมฺปิ อรหาม ภควโต สรีรานํ ภาคํ, มยมฺปิ ภควโต สรีรานํ ถูปญฺจ มหญฺจ กริสฺสามา’’ติ. पावाच्या मल्लांनी ऐकले की, 'भगवंत कुसिनारा येथे परिनिर्वाण पावले आहेत.' तेव्हा पावाच्या मल्लांनी कुसिनाराच्या मल्लांकडे दूत पाठवला की, 'भगवंतही क्षत्रिय होते आणि आम्हीही क्षत्रिय आहोत. आम्हीसुद्धा भगवंतांच्या शारीरिक धातूंचा हिस्सा मिळण्यास पात्र आहोत. आम्हीसुद्धा भगवंतांच्या शारीरिक धातूंवर स्तूप उभारून त्यांची पूजा-अर्चना करू.' เอวํ วุตฺเต โกสินารกา มลฺลา เต สงฺเฆ คเณ เอตทโวจุํ – ‘‘ภควา อมฺหากํ คามกฺเขตฺเต ปรินิพฺพุโต, น มยํ ทสฺสาม ภควโต สรีรานํ ภาค’’นฺติ. असे विचारले असता, कुसिनाराच्या मल्लांनी त्या सर्व संघांना व गणांना असे म्हटले की, 'भगवंत आमच्याच भूमीवर परिनिर्वाण पावले आहेत. आम्ही भगवंतांच्या शारीरिक धातूंचा कोणताही हिस्सा देणार नाही.' ๒๓๗. เอวํ วุตฺเต โทโณ พฺราหฺมโณ เต สงฺเฆ คเณ เอตทโวจ – २३७. असे म्हटले असता, द्रोण ब्राह्मणाने त्या संघांना व गणांना हे वचन म्हटले— ‘‘สุณนฺตุ [Pg.137] โภนฺโต มม เอกวาจํ,อมฺหาก ; พุทฺโธ อหุ ขนฺติวาโท; น หิ สาธุ ยํ อุตฺตมปุคฺคลสฺส,สรีรภาเค สิยา สมฺปหาโร. 'हे महाशयांनो, माझे एक वाक्य ऐका. आपले बुद्ध हे क्षमावादी होते. त्या उत्तम पुरुषाच्या शारीरिक धातूंच्या वाटणीवरून संघर्ष व्हावा, हे मुळीच योग्य नाही.' สพฺเพว โภนฺโต สหิตา สมคฺคา,สมฺโมทมานา กโรมฏฺฐภาเค; วิตฺถาริกา โหนฺตุ ทิสาสุ ถูปา,พหู ชนา จกฺขุมโต ปสนฺนา’’ติ. 'आपण सर्वजण एकत्र येऊन, एकोप्याने आणि आनंदाने धातूंचे आठ भाग करूया. सर्व दिशांना स्तूप विस्तृतपणे उभारले जावोत, कारण अनेक लोक त्या चक्षुमान बुद्धांवर श्रद्धा ठेवून आहेत.' ๒๓๘. ‘‘เตน หิ, พฺราหฺมณ, ตฺวญฺเญว ภควโต สรีรานิ อฏฺฐธา สมํ สวิภตฺตํ วิภชาหี’’ติ. ‘‘เอวํ, โภ’’ติ โข โทโณ พฺราหฺมโณ เตสํ สงฺฆานํ คณานํ ปฏิสฺสุตฺวา ภควโต สรีรานิ อฏฺฐธา สมํ สุวิภตฺตํ วิภชิตฺวา เต สงฺเฆ คเณ เอตทโวจ – ‘‘อิมํ เม โภนฺโต ตุมฺพํ ททนฺตุ อหมฺปิ ตุมฺพสฺส ถูปญฺจ มหญฺจ กริสฺสามี’’ติ. อทํสุ โข เต โทณสฺส พฺราหฺมณสฺส ตุมฺพํ. २३८. 'तसे असेल तर हे ब्राह्मणा, तूच भगवंतांच्या शारीरिक धातूंचे आठ समान भागांत व्यवस्थित विभाजन कर.' द्रोण ब्राह्मणाने 'तसेच असो, महाशयांनो' असे म्हणून त्या संघांचे व गणांचे म्हणणे मान्य केले. त्याने भगवंतांच्या शारीरिक धातूंचे आठ समान भागांत व्यवस्थित विभाजन केले आणि त्या संघांना व गणांना म्हटले, 'महाशयांनो, मला हे मोजण्याचे पात्र द्यावे, मीसुद्धा या पात्रावर स्तूप उभारून त्याची पूजा-अर्चना करीन.' त्यांनी ते पात्र द्रोण ब्राह्मणाला दिले. อสฺโสสุํ โข ปิปฺปลิวนิยา โมริยา – ‘‘ภควา กิร กุสินารายํ ปรินิพฺพุโต’’ติ. อถ โข ปิปฺปลิวนิยา โมริยา โกสินารกานํ มลฺลานํ ทูตํ ปาเหสุํ – ‘‘ภควาปิ ขตฺติโย มยมฺปิ ขตฺติยา, มยมฺปิ อรหาม ภควโต สรีรานํ ภาคํ, มยมฺปิ ภควโต สรีรานํ ถูปญฺจ มหญฺจ กริสฺสามา’’ติ. ‘‘นตฺถิ ภควโต สรีรานํ ภาโค, วิภตฺตานิ ภควโต สรีรานิ. อิโต องฺคารํ หรถา’’ติ. เต ตโต องฺคารํ หรึสุ. पिप्पलीवनाच्या मोरियांनी ऐकले की, 'भगवंत कुसिनारा येथे परिनिर्वाण पावले आहेत.' तेव्हा पिप्पलीवनाच्या मोरियांनी कुसिनाराच्या मल्लांकडे दूत पाठवला की, 'भगवंतही क्षत्रिय होते आणि आम्हीही क्षत्रिय आहोत. आम्हीसुद्धा भगवंतांच्या शारीरिक धातूंचा हिस्सा मिळण्यास पात्र आहोत. आम्हीसुद्धा भगवंतांच्या शारीरिक धातूंवर स्तूप उभारून त्यांची पूजा-अर्चना करू.' मल्लांनी उत्तर दिले, 'भगवंतांच्या शारीरिक धातूंचा कोणताही हिस्सा आता उरलेला नाही, भगवंतांच्या धातूंचे वाटप झाले आहे. तुम्ही येथून कोळसे घेऊन जा.' त्यांनी तेथून कोळसे नेले. ธาตุถูปปูชา धातू आणि स्तूपांची पूजा ๒๓๙. อถ โข ราชา มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต ราชคเห ภควโต สรีรานํ ถูปญฺจ มหญฺจ อกาสิ. เวสาลิกาปิ ลิจฺฉวี เวสาลิยํ ภควโต สรีรานํ ถูปญฺจ มหญฺจ อกํสุ. กปิลวตฺถุวาสีปิ สกฺยา กปิลวตฺถุสฺมึ ภควโต สรีรานํ ถูปญฺจ มหญฺจ อกํสุ. อลฺลกปฺปกาปิ พุลโย อลฺลกปฺเป ภควโต สรีรานํ ถูปญฺจ มหญฺจ อกํสุ. รามคามกาปิ โกฬิยา รามคาเม ภควโต สรีรานํ ถูปญฺจ มหญฺจ อกํสุ. เวฏฺฐทีปโกปิ พฺราหฺมโณ เวฏฺฐทีเป ภควโต [Pg.138] สรีรานํ ถูปญฺจ มหญฺจ อกาสิ. ปาเวยฺยกาปิ มลฺลา ปาวายํ ภควโต สรีรานํ ถูปญฺจ มหญฺจ อกํสุ. โกสินารกาปิ มลฺลา กุสินารายํ ภควโต สรีรานํ ถูปญฺจ มหญฺจ อกํสุ. โทโณปิ พฺราหฺมโณ ตุมฺพสฺส ถูปญฺจ มหญฺจ อกาสิ. ปิปฺปลิวนิยาปิ โมริยา ปิปฺปลิวเน องฺคารานํ ถูปญฺจ มหญฺจ อกํสุ. อิติ อฏฺฐ สรีรถูปา นวโม ตุมฺพถูโป ทสโม องฺคารถูโป. เอวเมตํ ภูตปุพฺพนฺติ. २३९. त्यानंतर मगधचा राजा वैदेहीपुत्र अजातशत्रूने राजगृह येथे भगवंतांच्या शरीर-धातूंचे स्तूप आणि पूजा (महोत्सव) केली. वैशालीच्या लिच्छवींनीही वैशाली येथे भगवंतांच्या शरीर-धातूंचे स्तूप आणि पूजा केली. कपिलवस्तूचे रहिवासी असलेल्या शाक्यांनीही कपिलवस्तू येथे भगवंतांच्या शरीर-धातूंचे स्तूप आणि पूजा केली. अल्लकप्पचे बुलिय लोकांनीही अल्लकप्प येथे भगवंतांच्या शरीर-धातूंचे स्तूप आणि पूजा केली. रामगामचे कोलिय लोकांनीही रामगाम येथे भगवंतांच्या शरीर-धातूंचे स्तूप आणि पूजा केली. वेठदीपच्या ब्राह्मणानेही वेठदीप येथे भगवंतांच्या शरीर-धातूंचे स्तूप आणि पूजा केली. पावाचे मल्लांनीही पावा येथे भगवंतांच्या शरीर-धातूंचे स्तूप आणि पूजा केली. कुसिनाराचे मल्लांनीही कुसिनारा येथे भगवंतांच्या शरीर-धातूंचे स्तूप आणि पूजा केली. द्रोण ब्राह्मणानेही कुंभाचा (द्रोणाचा) स्तूप आणि पूजा केली. पिप्पलिवनचे मोरिय लोकांनीही पिप्पलिवन येथे अंगारांचा (कोळशांचा) स्तूप आणि पूजा केली. अशा प्रकारे आठ शरीर-स्तूप, नववा कुंभ-स्तूप आणि दहावा अंगार-स्तूप झाले. पूर्वी असे घडले होते. ๒๔๐. อฏฺฐโทณํ จกฺขุมโต สรีรํ, สตฺตโทณํ ชมฺพุทีเป มเหนฺติ. २४०. चक्षुमान (बुद्धांच्या) शरीराचे आठ द्रोण (भाग) होते; त्यांपैकी सात द्रोणांची जंबुद्विपातील लोक पूजा करतात. เอกญฺจ โทณํ ปุริสวรุตฺตมสฺส, รามคาเม นาคราชา มเหติ. आणि पुरुषोत्तमाच्या (बुद्धांच्या) एका द्रोण भागाची रामगाम येथे नागराज पूजा करतो. เอกาหิ ทาฐา ติทิเวหิ ปูชิตา, เอกา ปน คนฺธารปุเร มหียติ; กาลิงฺครญฺโญ วิชิเต ปุเนกํ, เอกํ ปน นาคราชา มเหติ. एक दाढा (सुळा) त्रिदशलोकात (स्वर्गात देवेंद्रांद्वारे) पूजली जाते, दुसरी गांधारपुरात पूजली जाते; पुन्हा एक कलिंग राजाच्या राज्यात पूजली जाते आणि एक नागराज पूजतो. ตสฺเสว เตเชน อยํ วสุนฺธรา,อายาคเสฏฺเฐหิ มหี อลงฺกตา; เอวํ อิมํ จกฺขุมโต สรีรํ,สุสกฺกตํ สกฺกตสกฺกเตหิ. त्यांच्याच तेजाने ही वसुंधरा आणि ही पृथ्वी श्रेष्ठ पूजनीय स्तूपांनी अलंकृत झाली आहे. अशा प्रकारे, चक्षुमान बुद्धांच्या या शरीराची पूजनीय लोकांद्वारे उत्तम प्रकारे पूजा केली गेली आहे. เทวินฺทนาคินฺทนรินฺทปูชิโต,มนุสฺสินฺทเสฏฺเฐหิ ตเถว ปูชิโต; ตํ วนฺทถ ปญฺชลิกา ลภิตฺวา,พุทฺโธ หเว กปฺปสเตหิ ทุลฺลโภติ. देवेंद्र, नागेंद्र आणि नरेंद्रांद्वारे पूजित, तसेच सर्वश्रेष्ठ मनुष्येंद्रांद्वारे पूजित असलेल्या त्या धातूंचे दर्शन घेऊन हात जोडून वंदन करा; कारण शेकडो कल्प उलटून गेले तरी बुद्ध खरोखरच दुर्लभ आहेत. จตฺตาลีส สมา ทนฺตา, เกสา โลมา จ สพฺพโส; เทวา หรึสุ เอเกกํ, จกฺกวาฬปรมฺปราติ. चाळीस समान दात, केस आणि सर्व रोम (धातू); देव एकामागून एक चक्रवाळात घेऊन गेले. มหาปรินิพฺพานสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ ตติยํ. तिसरे महापरिनिब्बानसुत्त समाप्त झाले. ๔. มหาสุทสฺสนสุตฺตํ ४. महासुदस्सनसुत्त ๒๔๑. เอวํ [Pg.139] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา กุสินารายํ วิหรติ อุปวตฺตเน มลฺลานํ สาลวเน อนฺตเรน ยมกสาลานํ ปรินิพฺพานสมเย. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘มา, ภนฺเต, ภควา อิมสฺมึ ขุทฺทกนครเก อุชฺชงฺคลนครเก สาขานครเก ปรินิพฺพายิ. สนฺติ, ภนฺเต, อญฺญานิ มหานครานิ. เสยฺยถิทํ – จมฺปา, ราชคหํ, สาวตฺถิ, สาเกตํ, โกสมฺพี, พาราณสี; เอตฺถ ภควา ปรินิพฺพายตุ. เอตฺถ พหู ขตฺติยมหาสาลา พฺราหฺมณมหาสาลา คหปติมหาสาลา ตถาคเต อภิปฺปสนฺนา, เต ตถาคตสฺส สรีรปูชํ กริสฺสนฺตี’’ติ. २४१. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान कुसिनारा येथे मल्लांच्या उपवत्तन नावाच्या शालवनात, जोड शालवृक्षांच्या दरम्यान, परिनिर्वाणाच्या वेळी विहार करत होते. तेव्हा आयुष्यमान आनंद जेथे भगवान होते तेथे गेले; जवळ जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले आयुष्यमान आनंद भगवंतांना असे म्हणाले – 'भंते! भगवंतांनी या लहान नगरात, उजाड नगरात, शाखा-नगरात परिनिर्वाण प्राप्त करू नये. भंते! इतर मोठी नगरे आहेत, जसे की – चंपा, राजगृह, सावत्थी, साकेत, कोसम्बी, बाराणसी; येथे भगवंतांनी परिनिर्वाण प्राप्त करावे. येथे अनेक क्षत्रिय महाशाल, ब्राह्मण महाशाल आणि गृहपती महाशाल आहेत जे तथागतांवर अत्यंत श्रद्धा ठेवतात, ते तथागतांच्या शरीराची (धातूंची) पूजा करतील.' ๒๔๒. ‘‘มา เหวํ, อานนฺท, อวจ; มา เหวํ, อานนฺท, อวจ – ขุทฺทกนครกํ อุชฺชงฺคลนครกํ สาขานครก’’นฺติ. २४२. 'आनंदा, असे बोलू नकोस; आनंदा, असे बोलू नकोस की हे लहान नगर, उजाड नगर, शाखा-नगर आहे.' กุสาวตีราชธานี कुसावती राजधानी ‘‘ภูตปุพฺพํ, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน นาม อโหสิ ขตฺติโย มุทฺธาวสิตฺโต จาตุรนฺโต วิชิตาวี ชนปทตฺถาวริยปฺปตฺโต. รญฺโญ, อานนฺท, มหาสุทสฺสนสฺส อยํ กุสินารา กุสาวตี นาม ราชธานี อโหสิ. ปุรตฺถิเมน จ ปจฺฉิเมน จ ทฺวาทสโยชนานิ อายาเมน, อุตฺตเรน จ ทกฺขิเณน จ สตฺตโยชนานิ วิตฺถาเรน. กุสาวตี, อานนฺท, ราชธานี อิทฺธา เจว อโหสิ ผีตา จ พหุชนา จ อากิณฺณมนุสฺสา จ สุภิกฺขา จ. เสยฺยถาปิ, อานนฺท, เทวานํ อาฬกมนฺทา นาม ราชธานี อิทฺธา เจว โหติ ผีตา จ พหุชนา จ อากิณฺณยกฺขา จ สุภิกฺขา จ; เอวเมว โข, อานนฺท, กุสาวตี ราชธานี อิทฺธา เจว อโหสิ ผีตา จ พหุชนา จ อากิณฺณมนุสฺสา จ สุภิกฺขา จ. กุสาวตี, อานนฺท, ราชธานี ทสหิ สทฺเทหิ อวิวิตฺตา อโหสิ ทิวา เจว รตฺติญฺจ, เสยฺยถิทํ – หตฺถิสทฺเทน อสฺสสทฺเทน รถสทฺเทน เภริสทฺเทน มุทิงฺคสทฺเทน วีณาสทฺเทน คีตสทฺเทน สงฺขสทฺเทน [Pg.140] สมฺมสทฺเทน ปาณิตาฬสทฺเทน ‘อสฺนาถ ปิวถ ขาทถา’ติ ทสเมน สทฺเทน. 'आनंदा, पूर्वी महासुदस्सन नावाचा एक राजा होता, जो अभिषिक्त क्षत्रिय, चारही दिशांचा विजेता, विजयी आणि आपल्या जनपदाला स्थैर्य मिळवून देणारा चक्रवर्ती राजा होता. आनंदा, राजा महासुदस्सनची ही कुसिनारा 'कुसावती' नावाची राजधानी होती. ती पूर्वेकडून पश्चिमेकडे बारा योजने लांब आणि उत्तरेकडून दक्षिणेकडे सात योजने रुंद होती. आनंदा, कुसावती राजधानी समृद्ध, संपन्न, लोकसंख्या जास्त असलेली, माणसांनी गजबजलेली आणि सुभिक्ष (अन्नधान्याची सुबत्ता असलेली) होती. आनंदा, ज्याप्रमाणे देवांची 'आळकमंदा' नावाची राजधानी समृद्ध, संपन्न, लोकसंख्या जास्त असलेली, यक्षांनी गजबजलेली आणि सुभिक्ष असते; त्याचप्रमाणे, आनंदा, कुसावती राजधानी समृद्ध, संपन्न, लोकसंख्या जास्त असलेली, माणसांनी गजबजलेली आणि सुभिक्ष होती. आनंदा, कुसावती राजधानी दिवस-रात्र दहा आवाजांनी गुंजत असे, जसे की – हत्तींचा आवाज, घोड्यांचा आवाज, रथांचा आवाज, भेरीचा (नगाऱ्याचा) आवाज, मृदंगाचा आवाज, विणेचा आवाज, गीताचा आवाज, शंखाचा आवाज, झांजेचा आवाज, टाळ्यांचा आवाज आणि 'खा, प्या, आनंद घ्या' हा दहावा आवाज.' ‘‘กุสาวตี, อานนฺท, ราชธานี สตฺตหิ ปากาเรหิ ปริกฺขิตฺตา อโหสิ. เอโก ปากาโร โสวณฺณมโย, เอโก รูปิยมโย, เอโก เวฬุริยมโย, เอโก ผลิกมโย, เอโก โลหิตงฺกมโย, เอโก มสารคลฺลมโย, เอโก สพฺพรตนมโย. กุสาวติยา, อานนฺท, ราชธานิยา จตุนฺนํ วณฺณานํ ทฺวารานิ อเหสุํ. เอกํ ทฺวารํ โสวณฺณมยํ, เอกํ รูปิยมยํ, เอกํ เวฬุริยมยํ, เอกํ ผลิกมยํ. เอเกกสฺมึ ทฺวาเร สตฺต สตฺต เอสิกา นิขาตา อเหสุํ ติโปริสงฺคา ติโปริสนิขาตา ทฺวาทสโปริสา อุพฺเพเธน. เอกา เอสิกา โสวณฺณมยา, เอกา รูปิยมยา, เอกา เวฬุริยมยา, เอกา ผลิกมยา, เอกา โลหิตงฺกมยา, เอกา มสารคลฺลมยา, เอกา สพฺพรตนมยา. กุสาวตี, อานนฺท, ราชธานี สตฺตหิ ตาลปนฺตีหิ ปริกฺขิตฺตา อโหสิ. เอกา ตาลปนฺติ โสวณฺณมยา, เอกา รูปิยมยา, เอกา เวฬุริยมยา, เอกา ผลิกมยา, เอกา โลหิตงฺกมยา, เอกา มสารคลฺลมยา, เอกา สพฺพรตนมยา. โสวณฺณมยสฺส ตาลสฺส โสวณฺณมโย ขนฺโธ อโหสิ, รูปิยมยานิ ปตฺตานิ จ ผลานิ จ. รูปิยมยสฺส ตาลสฺส รูปิยมโย ขนฺโธ อโหสิ, โสวณฺณมยานิ ปตฺตานิ จ ผลานิ จ. เวฬุริยมยสฺส ตาลสฺส เวฬุริยมโย ขนฺโธ อโหสิ, ผลิกมยานิ ปตฺตานิ จ ผลานิ จ. ผลิกมยสฺส ตาลสฺส ผลิกมโย ขนฺโธ อโหสิ, เวฬุริยมยานิ ปตฺตานิ จ ผลานิ จ. โลหิตงฺกมยสฺส ตาลสฺส โลหิตงฺกมโย ขนฺโธ อโหสิ, มสารคลฺลมยานิ ปตฺตานิ จ ผลานิ จ. มสารคลฺลมยสฺส ตาลสฺส มสารคลฺลมโย ขนฺโธ อโหสิ, โลหิตงฺกมยานิ ปตฺตานิ จ ผลานิ จ. สพฺพรตนมยสฺส ตาลสฺส สพฺพรตนมโย ขนฺโธ อโหสิ, สพฺพรตนมยานิ ปตฺตานิ จ ผลานิ จ. ตาสํ โข ปนานนฺท, ตาลปนฺตีนํ วาเตริตานํ สทฺโท อโหสิ วคฺคุ จ รชนีโย จ ขมนีโย จ มทนีโย จ. เสยฺยถาปิ, อานนฺท, ปญฺจงฺคิกสฺส ตูริยสฺส สุวินีตสฺส สุปฺปฏิตาฬิตสฺส สุกุสเลหิ สมนฺนาหตสฺส สทฺโท โหติ วคฺคุ จ [Pg.141] รชนีโย จ ขมนีโย จ มทนีโย จ, เอวเมว โข, อานนฺท, ตาสํ ตาลปนฺตีนํ วาเตริตานํ สทฺโท อโหสิ วคฺคุ จ รชนีโย จ ขมนีโย จ มทนีโย จ. เย โข ปนานนฺท, เตน สมเยน กุสาวติยา ราชธานิยา ธุตฺตา อเหสุํ โสณฺฑา ปิปาสา, เต ตาสํ ตาลปนฺตีนํ วาเตริตานํ สทฺเทน ปริจาเรสุํ. आनंदा, कुसावती ही राजधानी सात तटबंदींनी वेढलेली होती. एक तटबंदी सोन्याची होती, एक चांदीची, एक वैडूर्यमणीची, एक स्फटिकाची, एक लोहितांगमणीची, एक मसारगल्लची आणि एक सर्व प्रकारच्या रत्नांची होती. आनंदा, कुसावती राजधानीला चार रंगांचे दरवाजे होते. एक सोन्याचे दार, एक चांदीचे दार, एक वैडूर्यमणीचे दार आणि एक स्फटिकाचे दार होते. प्रत्येक दारापाशी सात-सात खांब रोवलेले होते, जे तीन पुरुष खोल जमिनीत पुरलेले होते आणि उंचीने बारा पुरुष उंच होते. एक खांब सोन्याचा होता, एक चांदीचा, एक वैडूर्यमणीचा, एक स्फटिकाचा, एक लोहितांगमणीचा, एक मसारगल्लचा आणि एक सर्व प्रकारच्या रत्नांचा होता. आनंदा, कुसावती राजधानी ताडाच्या झाडांच्या सात रांगांनी वेढलेली होती. ताडाची एक रांग सोन्याची होती, एक चांदीची, एक वैडूर्यमणीची, एक स्फटिकाची, एक लोहितांगमणीची, एक मसारगल्लची आणि एक सर्व प्रकारच्या रत्नांची होती. सोन्याच्या ताडवृक्षाचा बुंधा सोन्याचा होता आणि त्याची पाने व फळे चांदीची होती. चांदीच्या ताडवृक्षाचा बुंधा चांदीचा होता आणि त्याची पाने व फळे सोन्याची होती. वैडूर्यमणीच्या ताडवृक्षाचा बुंधा वैडूर्यमणीचा होता आणि त्याची पाने व फळे स्फटिकाची होती. स्फटिकाच्या ताडवृक्षाचा बुंधा स्फटिकाचा होता आणि त्याची पाने व फळे वैडूर्यमणीची होती. लोहितांगमणीच्या ताडवृक्षाचा बुंधा लोहितांगमणीचा होता आणि त्याची पाने व फळे मसारगल्लची होती. मसारगल्लच्या ताडवृक्षाचा बुंधा मसारगल्लचा होता आणि त्याची पाने व फळे लोहितांगमणीची होती. सर्व रत्नांच्या ताडवृक्षाचा बुंधा सर्व रत्नांचा होता आणि त्याची पाने व फळेही सर्व रत्नांचीच होती. आनंदा, वाऱ्याच्या झुळुकीने हलणाऱ्या त्या ताडवृक्षांच्या रांगांमधून निघणारा आवाज अत्यंत मधुर, मनमोहक, आनंददायी आणि धुंद करणारा होता. आनंदा, ज्याप्रमाणे कुशल वादकांनी उत्तम प्रकारे सुसंवादित केलेले आणि वाजवलेले पाच प्रकारच्या वाद्यांचे संगीत मधुर, मनमोहक, आनंददायी आणि धुंद करणारे असते; त्याचप्रमाणे, आनंदा, वाऱ्याने हलणाऱ्या त्या ताडवृक्षांच्या रांगांचा आवाज मधुर, मनमोहक, आनंददायी आणि धुंद करणारा होता. आनंदा, त्या काळी कुसावती राजधानीत जे जुगारी, मद्यपी आणि विलासी लोक होते, ते वाऱ्याने हलणाऱ्या त्या ताडवृक्षांच्या रांगांच्या आवाजाने आनंदित होऊन क्रीडा करत असत. จกฺกรตนํ चक्ररत्न ๒๔๓. ‘‘ราชา, อานนฺท, มหาสุทสฺสโน สตฺตหิ รตเนหิ สมนฺนาคโต อโหสิ จตูหิ จ อิทฺธีหิ. กตเมหิ สตฺตหิ? อิธานนฺท, รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส ตทหุโปสเถ ปนฺนรเส สีสํนฺหาตสฺส อุโปสถิกสฺส อุปริปาสาทวรคตสฺส ทิพฺพํ จกฺกรตนํ ปาตุรโหสิ สหสฺสารํ สเนมิกํ สนาภิกํ สพฺพาการปริปูรํ. ทิสฺวา รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส เอตทโหสิ – ‘สุตํ โข ปเนตํ – ‘‘ยสฺส รญฺโญ ขตฺติยสฺส มุทฺธาวสิตฺตสฺส ตทหุโปสเถ ปนฺนรเส สีสํนฺหาตสฺส อุโปสถิกสฺส อุปริปาสาทวรคตสฺส ทิพฺพํ จกฺกรตนํ ปาตุภวติ สหสฺสารํ สเนมิกํ สนาภิกํ สพฺพาการปริปูรํ, โส โหติ ราชา จกฺกวตฺตี’’ติ. อสฺสํ นุ โข อหํ ราชา จกฺกวตฺตี’ติ. २४३. आनंदा, राजे महासुदर्शन हे सात रत्नांनी आणि चार ऋद्धींनी संपन्न होते. कोणत्या सात रत्नांनी? आनंदा, येथे पंधराव्या दिवशीच्या उपोसथदिनी, राजे महासुदर्शनांनी डोक्यावरून स्नान करून, उपोसथ व्रत धारण केले असताना आणि ते आपल्या श्रेष्ठ प्रासादाच्या वरच्या मजल्यावर बसलेले असताना, त्यांना दिव्य चक्ररत्न प्रकट झाले; जे हजार आरे असलेले, धाव आणि कणा यांनी युक्त आणि सर्व प्रकारे परिपूर्ण होते. ते पाहून राजे महासुदर्शनांच्या मनात असा विचार आला – 'मी असे ऐकले आहे की – "ज्या अभिषिक्त क्षत्रिय राजाला पंधराव्या दिवशीच्या उपोसथदिनी, डोक्यावरून स्नान करून, उपोसथ व्रत धारण केले असताना आणि श्रेष्ठ प्रासादाच्या वरच्या मजल्यावर बसलेले असताना, हजार आरे असलेले, धाव आणि कणा यांनी युक्त आणि सर्व प्रकारे परिपूर्ण असे दिव्य चक्ररत्न प्रकट होते, तो चक्रवर्ती राजा होतो." मग मी चक्रवर्ती राजा आहे काय?' ๒๔๔. ‘‘อถ โข, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน อุฏฺฐายาสนา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา วาเมน หตฺเถน สุวณฺณภิงฺการํ คเหตฺวา ทกฺขิเณน หตฺเถน จกฺกรตนํ อพฺภุกฺกิริ – ‘ปวตฺตตุ ภวํ จกฺกรตนํ, อภิวิชินาตุ ภวํ จกฺกรตน’นฺติ. อถ โข ตํ, อานนฺท, จกฺกรตนํ ปุรตฺถิมํ ทิสํ ปวตฺติ, อนฺวเทว ราชา มหาสุทสฺสโน สทฺธึ จตุรงฺคินิยา เสนาย, ยสฺมึ โข ปนานนฺท, ปเทเส จกฺกรตนํ ปติฏฺฐาสิ, ตตฺถ ราชา มหาสุทสฺสโน วาสํ อุปคจฺฉิ สทฺธึ จตุรงฺคินิยา เสนาย. เย โข ปนานนฺท, ปุรตฺถิมาย ทิสาย ปฏิราชาโน, เต ราชานํ มหาสุทสฺสนํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวมาหํสุ – ‘เอหิ โข มหาราช, สฺวาคตํ เต มหาราช, สกํ เต มหาราช, อนุสาส มหาราชา’ติ. ราชา มหาสุทสฺสโน เอวมาห – ‘ปาโณ น หนฺตพฺโพ, อทินฺนํ น อาทาตพฺพํ, กาเมสุ มิจฺฉา น จริตพฺพา, มุสา น ภณิตพฺพา, มชฺชํ น ปาตพฺพํ, ยถาภุตฺตญฺจ ภุญฺชถา’ติ[Pg.142]. เย โข ปนานนฺท, ปุรตฺถิมาย ทิสาย ปฏิราชาโน, เต รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส อนุยนฺตา อเหสุํ. อถ โข ตํ, อานนฺท, จกฺกรตนํ ปุรตฺถิมํ สมุทฺทํ อชฺโฌคาเหตฺวา ปจฺจุตฺตริตฺวา ทกฺขิณํ ทิสํ ปวตฺติ…เป… ทกฺขิณํ สมุทฺทํ อชฺโฌคาเหตฺวา ปจฺจุตฺตริตฺวา ปจฺฉิมํ ทิสํ ปวตฺติ…เป… ปจฺฉิมํ สมุทฺทํ อชฺโฌคาเหตฺวา ปจฺจุตฺตริตฺวา อุตฺตรํ ทิสํ ปวตฺติ, อนฺวเทว ราชา มหาสุทสฺสโน สทฺธึ จตุรงฺคินิยา เสนาย. ยสฺมึ โข ปนานนฺท, ปเทเส จกฺกรตนํ ปติฏฺฐาสิ, ตตฺถ ราชา มหาสุทสฺสโน วาสํ อุปคจฺฉิ สทฺธึ จตุรงฺคินิยา เสนาย. เย โข ปนานนฺท, อุตฺตราย ทิสาย ปฏิราชาโน, เต ราชานํ มหาสุทสฺสนํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวมาหํสุ – ‘เอหิ โข มหาราช, สฺวาคตํ เต มหาราช, สกํ เต มหาราช, อนุสาส มหาราชา’ติ. ราชา มหาสุทสฺสโน เอวมาห – ‘ปาโณ น หนฺตพฺโพ, อทินฺนํ น อาทาตพฺพํ, กาเมสุ มิจฺฉา น จริตพฺพา, มุสา น ภณิตพฺพา, มชฺชํ น ปาตพฺพํ, ยถาภุตฺตญฺจ ภุญฺชถา’ติ. เย โข ปนานนฺท, อุตฺตราย ทิสาย ปฏิราชาโน, เต รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส อนุยนฺตา อเหสุํ. २४४. त्यानंतर, आनंदा, राजे महासुदर्शन आपल्या आसनावरून उठले, त्यांनी आपले उपरणे एका खांद्यावर घेतले, डाव्या हातात सोन्याची झारी घेतली आणि उजव्या हाताने चक्ररत्नावर पाणी शिंपडले आणि म्हणाले – 'हे पूजनीय चक्ररत्न फिरावे, हे पूजनीय चक्ररत्न विजय मिळवून देवो!' तेव्हा, आनंदा, ते चक्ररत्न पूर्व दिशेकडे फिरू लागले. राजे महासुदर्शन आपल्या चतुरंग सेनेसह त्याच्या मागोमाग गेले. आनंदा, ज्या ठिकाणी ते चक्ररत्न थांबले, तिथे राजे महासुदर्शन आपल्या चतुरंग सेनेसह मुक्कामास राहिले. आनंदा, पूर्व दिशेकडील जे शत्रूराजे होते, त्यांनी राजे महासुदर्शनांकडे येऊन असे म्हटले – 'यावे महाराज! आपले स्वागत असो महाराज! हे राज्य आपलेच आहे महाराज, आपण यावर शासन करावे.' राजे महासुदर्शन म्हणाले – 'प्राणाची हिंसा करू नका, न दिलेले घेऊ नका, कामभोगांमध्ये व्यभिचार करू नका, असत्य बोलू नका, मद्यपान करू नका आणि पूर्वीप्रमाणेच कर गोळा करून उपभोग घ्या.' आनंदा, पूर्व दिशेकडील जे शत्रूराजे होते, ते राजे महासुदर्शनांचे मांडलिक झाले. त्यानंतर, आनंदा, ते चक्ररत्न पूर्व समुद्रात उतरून, पुन्हा वर येऊन दक्षिण दिशेकडे फिरू लागले... दक्षिण समुद्रात उतरून, पुन्हा वर येऊन पश्चिम दिशेकडे फिरू लागले... पश्चिम समुद्रात उतरून, पुन्हा वर येऊन उत्तर दिशेकडे फिरू लागले. राजे महासुदर्शन आपल्या चतुरंग सेनेसह त्याच्या मागोमाग गेले. आनंदा, ज्या ठिकाणी ते चक्ररत्न थांबले, तिथे राजे महासुदर्शन आपल्या चतुरंग सेनेसह मुक्कामास राहिले. आनंदा, उत्तर दिशेकडील जे शत्रूराजे होते, त्यांनी राजे महासुदर्शनांकडे येऊन असे म्हटले – 'यावे महाराज! आपले स्वागत असो महाराज! हे राज्य आपलेच आहे महाराज, आपण यावर शासन करावे.' राजे महासुदर्शन म्हणाले – 'प्राणाची हिंसा करू नका, न दिलेले घेऊ नका, कामभोगांमध्ये व्यभिचार करू नका, असत्य बोलू नका, मद्यपान करू नका आणि पूर्वीप्रमाणेच कर गोळा करून उपभोग घ्या.' आनंदा, उत्तर दिशेकडील जे शत्रूराजे होते, ते राजे महासुदर्शनांचे मांडलिक झाले. ๒๔๕. ‘‘อถ โข ตํ, อานนฺท, จกฺกรตนํ สมุทฺทปริยนฺตํ ปถวึ อภิวิชินิตฺวา กุสาวตึ ราชธานึ ปจฺจาคนฺตฺวา รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส อนฺเตปุรทฺวาเร อตฺถกรณปมุเข อกฺขาหตํ มญฺเญ อฏฺฐาสิ รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส อนฺเตปุรํ อุปโสภยมานํ. รญฺโญ, อานนฺท, มหาสุทสฺสนสฺส เอวรูปํ จกฺกรตนํ ปาตุรโหสิ. २४५. आनंदा, त्यानंतर ते चक्ररत्न महासागराच्या मर्यादेपर्यंतच्या पृथ्वीवर विजय मिळवून कुसावती या राजधानीत परत आले आणि राजा महासुदस्साच्या अंतःपुराच्या दारापाशी, न्यायनिवाडा करण्याच्या मुख्य ठिकाणी, जणू काही आसाला खिळल्यासारखे राजा महासुदस्साच्या अंतःपुराची शोभा वाढवत स्थिरावले. आनंदा, राजा महासुदस्साला अशा प्रकारचे चक्ररत्न प्राप्त झाले. หตฺถิรตนํ हत्तीरत्न ๒๔๖. ‘‘ปุน จปรํ, อานนฺท, รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส หตฺถิรตนํ ปาตุรโหสิ สพฺพเสโต สตฺตปฺปติฏฺโฐ อิทฺธิมา เวหาสงฺคโม อุโปสโถ นาม นาคราชา. ตํ ทิสฺวา รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส จิตฺตํ ปสีทิ – ‘ภทฺทกํ วต โภ หตฺถิยานํ, สเจ ทมถํ อุเปยฺยา’ติ. อถ โข ตํ, อานนฺท, หตฺถิรตนํ – เสยฺยถาปิ นาม คนฺธหตฺถาชานิโย ทีฆรตฺตํ สุปริทนฺโต, เอวเมว ทมถํ อุปคจฺฉิ. ภูตปุพฺพํ, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน ตเมว หตฺถิรตนํ วีมํสมาโน ปุพฺพณฺหสมยํ อภิรุหิตฺวา สมุทฺทปริยนฺตํ ปถวึ อนุยายิตฺวา กุสาวตึ ราชธานึ ปจฺจาคนฺตฺวา ปาตราสมกาสิ. รญฺโญ, อานนฺท, มหาสุทสฺสนสฺส เอวรูปํ หตฺถิรตนํ ปาตุรโหสิ. २४६. आनंदा, पुन्हा आणखी असे की, राजा महासुदस्साला हत्तीरत्न प्राप्त झाले. तो सर्वस्वी पांढरा शुभ्र, सात ठिकाणी जमिनीला स्पर्श करणारा, ऋद्धीमान, आकाशातून गमन करणारा, 'उपोसथ' नावाचा हत्तीराज होता. त्याला पाहून राजा महासुदस्साचे मन प्रसन्न झाले—'जर हा हत्ती वाहन म्हणून प्रशिक्षित झाला, तर किती उत्तम होईल!' आनंदा, त्यानंतर ते हत्तीरत्न, जणू काही दीर्घकाळ उत्तम प्रकारे प्रशिक्षित केलेला एखादा श्रेष्ठ गंधहत्ती असावा, त्याचप्रमाणे पूर्णपणे प्रशिक्षित झाले. आनंदा, पूर्वी असे घडले होते की, राजा महासुदस्साने त्या हत्तीरत्नाची परीक्षा घेण्याच्या उद्देशाने, सकाळीच त्यावर आरूढ होऊन महासागराच्या मर्यादेपर्यंतच्या संपूर्ण पृथ्वीची प्रदक्षिणा केली आणि कुसावती राजधानीत परत येऊन सकाळचे भोजन केले. आनंदा, राजा महासुदस्साला अशा प्रकारचे हत्तीरत्न प्राप्त झाले. อสฺสรตนํ अश्वरत्न ๒๔๗. ‘‘ปุน [Pg.143] จปรํ, อานนฺท, รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส อสฺสรตนํ ปาตุรโหสิ สพฺพเสโต กาฬสีโส มุญฺชเกโส อิทฺธิมา เวหาสงฺคโม วลาหโก นาม อสฺสราชา. ตํ ทิสฺวา รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส จิตฺตํ ปสีทิ – ‘ภทฺทกํ วต โภ อสฺสยานํ สเจ ทมถํ อุเปยฺยา’ติ. อถ โข ตํ, อานนฺท, อสฺสรตนํ เสยฺยถาปิ นาม ภทฺโท อสฺสาชานิโย ทีฆรตฺตํ สุปริทนฺโต, เอวเมว ทมถํ อุปคจฺฉิ. ภูตปุพฺพํ, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน ตเมว อสฺสรตนํ วีมํสมาโน ปุพฺพณฺหสมยํ อภิรุหิตฺวา สมุทฺทปริยนฺตํ ปถวึ อนุยายิตฺวา กุสาวตึ ราชธานึ ปจฺจาคนฺตฺวา ปาตราสมกาสิ. รญฺโญ, อานนฺท, มหาสุทสฺสนสฺส เอวรูปํ อสฺสรตนํ ปาตุรโหสิ. २४७. आनंदा, पुन्हा आणखी असे की, राजा महासुदस्साला अश्वरत्न प्राप्त झाले. तो सर्वस्वी पांढरा शुभ्र, काळे डोके असलेला, मुंज गवतासारखी आयाळ असलेला, ऋद्धीमान, आकाशातून गमन करणारा, 'वलाहक' नावाचा अश्वराज होता. त्याला पाहून राजा महासुदस्साचे मन प्रसन्न झाले—'जर हे अश्ववाहन प्रशिक्षित झाले, तर किती उत्तम होईल!' आनंदा, त्यानंतर ते अश्वरत्न, जणू काही दीर्घकाळ उत्तम प्रकारे प्रशिक्षित केलेला एखादा उत्तम जातिवंत घोडा असावा, त्याचप्रमाणे पूर्णपणे प्रशिक्षित झाले. आनंदा, पूर्वी असे घडले होते की, राजा महासुदस्साने त्या अश्वरत्नाची परीक्षा घेण्याच्या उद्देशाने, सकाळीच त्यावर आरूढ होऊन महासागराच्या मर्यादेपर्यंतच्या संपूर्ण पृथ्वीची प्रदक्षिणा केली आणि कुसावती राजधानीत परत येऊन सकाळचे भोजन केले. आनंदा, राजा महासुदस्साला अशा प्रकारचे अश्वरत्न प्राप्त झाले. มณิรตนํ मणिरत्न ๒๔๘. ‘‘ปุน จปรํ, อานนฺท, รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส มณิรตนํ ปาตุรโหสิ. โส อโหสิ มณิ เวฬุริโย สุโภ ชาติมา อฏฺฐํโส สุปริกมฺมกโต อจฺโฉ วิปฺปสนฺโน อนาวิโล สพฺพาการสมฺปนฺโน. ตสฺส โข ปนานนฺท, มณิรตนสฺส อาภา สมนฺตา โยชนํ ผุฏา อโหสิ. ภูตปุพฺพํ, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน ตเมว มณิรตนํ วีมํสมาโน จตุรงฺคินึ เสนํ สนฺนยฺหิตฺวา มณึ ธชคฺคํ อาโรเปตฺวา รตฺตนฺธการติมิสาย ปายาสิ. เย โข ปนานนฺท, สมนฺตา คามา อเหสุํ, เต เตโนภาเสน กมฺมนฺเต ปโยเชสุํ ทิวาติ มญฺญมานา. รญฺโญ, อานนฺท, มหาสุทสฺสนสฺส เอวรูปํ มณิรตนํ ปาตุรโหสิ. २४८. आनंदा, पुन्हा आणखी असे की, राजा महासुदस्साला मणिरत्न प्राप्त झाले. तो वैडूर्य मणी अत्यंत तेजस्वी, शुद्ध जातीचा, आठ पैलू असलेला, उत्तम पैलू पाडलेला, स्वच्छ, अत्यंत निर्मळ, गढूळ नसलेला आणि सर्व प्रकारे परिपूर्ण असा होता. आनंदा, त्या मणिरत्नाचा प्रकाश चहूबाजूंनी एक योजन अंतरापर्यंत पसरत असे. आनंदा, पूर्वी असे घडले होते की, राजा महासुदस्साने त्या मणिरत्नाची परीक्षा घेण्याच्या उद्देशाने, चतुरंग सेना सज्ज केली आणि तो मणी ध्वजाच्या टोकावर ठेवून रात्रीच्या घनघोर अंधारात कूच केले. आनंदा, त्या परिसरातील जे काही गाव होते, त्या गावातील लोकांनी त्या मण्याच्या प्रकाशाने 'दिवस उजाडला आहे' असे समजून आपापली कामे सुरू केली. आनंदा, राजा महासुदस्साला अशा प्रकारचे मणिरत्न प्राप्त झाले. อิตฺถิรตนํ स्त्रीरत्न ๒๔๙. ‘‘ปุน จปรํ, อานนฺท, รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส อิตฺถิรตนํ ปาตุรโหสิ อภิรูปา ทสฺสนียา ปาสาทิกา ปรมาย วณฺณโปกฺขรตาย สมนฺนาคตา นาติทีฆา นาติรสฺสา นาติกิสา นาติถูลา นาติกาฬิกา นาจฺโจทาตา อติกฺกนฺตา มานุสิวณฺณํ อปฺปตฺตา ทิพฺพวณฺณํ. ตสฺส โข ปนานนฺท, อิตฺถิรตนสฺส เอวรูโป กายสมฺผสฺโส โหติ, เสยฺยถาปิ [Pg.144] นาม ตูลปิจุโน วา กปฺปาสปิจุโน วา. ตสฺส โข ปนานนฺท, อิตฺถิรตนสฺส สีเต อุณฺหานิ คตฺตานิ โหนฺติ, อุณฺเห สีตานิ. ตสฺส โข ปนานนฺท, อิตฺถิรตนสฺส กายโต จนฺทนคนฺโธ วายติ, มุขโต อุปฺปลคนฺโธ. ตํ โข ปนานนฺท, อิตฺถิรตนํ รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส ปุพฺพุฏฺฐายินี อโหสิ ปจฺฉานิปาตินี กิงฺการปฏิสฺสาวินี มนาปจารินี ปิยวาทินี. ตํ โข ปนานนฺท, อิตฺถิรตนํ ราชานํ มหาสุทสฺสนํ มนสาปิ โน อติจริ, กุโต ปน กาเยน. รญฺโญ, อานนฺท, มหาสุทสฺสนสฺส เอวรูปํ อิตฺถิรตนํ ปาตุรโหสิ. २४९. आनंदा, पुन्हा आणखी असे की, राजा महासुदस्साला स्त्रीरत्न प्राप्त झाले. ती अत्यंत रूपवान, दर्शनीय, मनमोहक, उत्तम वर्ण आणि सौंदर्याने युक्त, अति उंच नाही व अति बुटकी नाही, अति कृश नाही व अति स्थूल नाही, अति काळी नाही व अति गोरी नाही अशी होती. ती मानवी सौंदर्याच्या पलीकडची परंतु दिव्य सौंदर्यापर्यंत न पोहोचलेली अशी होती. आनंदा, त्या स्त्रीरत्नाचा शारीरिक स्पर्श मऊ कापसाच्या किंवा सुताच्या पुंजक्यासारखा सुखद होता. आनंदा, त्या स्त्रीरत्नाचे शरीर थंडीच्या दिवसांत उबदार आणि उष्णतेच्या दिवसांत थंड राहत असे. आनंदा, त्या स्त्रीरत्नाच्या शरीरातून चंदनाचा सुगंध आणि मुखातून उत्पलाचा सुगंध दरवळत असे. आनंदा, ते स्त्रीरत्न राजा महासुदस्साच्या आधी उठणारे, नंतर झोपणारे, 'काय करू?' अशी आज्ञा पाळणारे, राजाच्या मनासारखे वागणारे आणि प्रिय बोलणारे होते. आनंदा, त्या स्त्रीरत्नाने राजा महासुदस्साशी मनानेही कधी प्रतारणा केली नाही, मग शरीराने तर दूरच राहिले. आनंदा, राजा महासुदस्साला अशा प्रकारचे स्त्रीरत्न प्राप्त झाले. คหปติรตนํ गृहपतीरत्न ๒๕๐. ‘‘ปุน จปรํ, อานนฺท, รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส คหปติรตนํ ปาตุรโหสิ. ตสฺส กมฺมวิปากชํ ทิพฺพจกฺขุ ปาตุรโหสิ เยน นิธึ ปสฺสติ สสฺสามิกมฺปิ อสฺสามิกมฺปิ. โส ราชานํ มหาสุทสฺสนํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวมาห – ‘อปฺโปสฺสุกฺโก ตฺวํ, เทว, โหหิ, อหํ เต ธเนน ธนกรณียํ กริสฺสามี’ติ. ภูตปุพฺพํ, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน ตเมว คหปติรตนํ วีมํสมาโน นาวํ อภิรุหิตฺวา มชฺเฌ คงฺคาย นทิยา โสตํ โอคาหิตฺวา คหปติรตนํ เอตทโวจ – ‘อตฺโถ เม, คหปติ, หิรญฺญสุวณฺเณนา’ติ. ‘เตน หิ, มหาราช, เอกํ ตีรํ นาวา อุเปตู’ติ. ‘อิเธว เม, คหปติ, อตฺโถ หิรญฺญสุวณฺเณนา’ติ. อถ โข ตํ, อานนฺท, คหปติรตนํ อุโภหิ หตฺเถหิ อุทกํ โอมสิตฺวา ปูรํ หิรญฺญสุวณฺณสฺส กุมฺภึ อุทฺธริตฺวา ราชานํ มหาสุทสฺสนํ เอตทโวจ – ‘อลเมตฺตาวตา มหาราช, กตเมตฺตาวตา มหาราช, ปูชิตเมตฺตาวตา มหาราชา’ติ? ราชา มหาสุทสฺสโน เอวมาห – ‘อลเมตฺตาวตา คหปติ, กตเมตฺตาวตา คหปติ, ปูชิตเมตฺตาวตา คหปตี’ติ. รญฺโญ, อานนฺท, มหาสุทสฺสนสฺส เอวรูปํ คหปติรตนํ ปาตุรโหสิ. २५०. आनंदा, पुन्हा आणखी असे की, राजा महासुदस्साला गृहपतीरत्न प्राप्त झाले. त्याच्या पूर्वकर्माच्या विपाकामुळे त्याला दिव्य चक्षू प्राप्त झाले होते, ज्याद्वारे तो मालक असलेले किंवा मालक नसलेले गुप्त धन पाहू शकत असे. त्याने राजा महासुदस्साकडे येऊन असे म्हटले—'महाराज, आपण निश्चिंत राहा, मी आपल्यासाठी धनाने सर्व धनविषयक कार्ये करीन.' आनंदा, पूर्वी असे घडले होते की, राजा महासुदस्साने त्या गृहपतीरत्नाची परीक्षा घेण्याच्या उद्देशाने, नौकेत बसून गंगा नदीच्या प्रवाहाच्या मध्यभागी जाऊन गृहपतीरत्नाला असे म्हटले—'गृहपती, मला सोन्या-नाण्याची गरज आहे.' 'तर मग महाराज, नौका एका किनाऱ्याला लावू द्या.' 'गृहपती, मला येथेच सोन्या-नाण्याची गरज आहे.' आनंदा, तेव्हा त्या गृहपतीरत्नाने दोन्ही हातांनी पाणी बाजूला सारून सोन्या-नाण्याने भरलेला हंडा बाहेर काढला आणि राजा महासुदस्साला म्हटले—'महाराज, एवढे पुरेसे आहे का? महाराज, एवढ्याने काम होईल का? महाराज, एवढ्याने आपली इच्छापूर्ती झाली का?' राजा महासुदस्साने म्हटले—'गृहपती, एवढे पुरेसे आहे; गृहपती, एवढ्याने काम झाले; गृहपती, एवढ्याने माझी इच्छापूर्ती झाली.' आनंदा, राजा महासुदस्साला अशा प्रकारचे गृहपतीरत्न प्राप्त झाले. ปริณายกรตนํ परिणायकरत्न ๒๕๑. ‘‘ปุน จปรํ, อานนฺท, รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส ปริณายกรตนํ ปาตุรโหสิ ปณฺฑิโต วิยตฺโต เมธาวี ปฏิพโล ราชานํ มหาสุทสฺสนํ [Pg.145] อุปยาเปตพฺพํ อุปยาเปตุํ, อปยาเปตพฺพํ อปยาเปตุํ, ฐเปตพฺพํ ฐเปตุํ. โส ราชานํ มหาสุทสฺสนํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวมาห – ‘อปฺโปสฺสุกฺโก ตฺวํ, เทว, โหหิ, อหมนุสาสิสฺสามี’ติ. รญฺโญ, อานนฺท, มหาสุทสฺสนสฺส เอวรูปํ ปริณายกรตนํ ปาตุรโหสิ. २५१. आनंदा, पुन्हा आणखी असे की, राजा महासुदस्साला परिणायकरत्न प्राप्त झाले. तो पंडित, चतुर, बुद्धिमान आणि राजा महासुदस्साला जवळ करण्यायोग्य व्यक्तीला जवळ करण्यास, दूर करण्यायोग्य व्यक्तीला दूर करण्यास आणि पदावर नियुक्त करण्यायोग्य व्यक्तीला नियुक्त करण्यास समर्थ होता. त्याने राजा महासुदस्साकडे येऊन असे म्हटले—'महाराज, आपण निश्चिंत राहा, मी राज्यकारभाराचे मार्गदर्शन करीन.' आनंदा, राजा महासुदस्साला अशा प्रकारचे परिणायकरत्न प्राप्त झाले. ‘‘ราชา, อานนฺท, มหาสุทสฺสโน อิเมหิ สตฺตหิ รตเนหิ สมนฺนาคโต อโหสิ. आनंदा, राजा महासुदस्स या सात रत्नांनी युक्त होता. จตุอิทฺธิสมนฺนาคโต चार ऋद्धींनी युक्त ๒๕๒. ‘‘ราชา, อานนฺท, มหาสุทสฺสโน จตูหิ อิทฺธีหิ สมนฺนาคโต อโหสิ. กตมาหิ จตูหิ อิทฺธีหิ? อิธานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน อภิรูโป อโหสิ ทสฺสนีโย ปาสาทิโก ปรมาย วณฺณโปกฺขรตาย สมนฺนาคโต อติวิย อญฺเญหิ มนุสฺเสหิ. ราชา, อานนฺท, มหาสุทสฺสโน อิมาย ปฐมาย อิทฺธิยา สมนฺนาคโต อโหสิ. २५२. “आनंदा, राजा महासुदस्सन चार ऋद्धींनी (अद्भूत शक्तींनी) संपन्न होता. कोणत्या चार ऋद्धींनी? आनंदा, या जगात राजा महासुदस्सन अत्यंत देखणा, दर्शनीय, प्रसन्न व्यक्तिमत्त्वाचा आणि इतर मानवांपेक्षा कितीतरी पटीने श्रेष्ठ अशा परम सुंदर शरीरकांतीने संपन्न होता. आनंदा, राजा महासुदस्सन या पहिल्या ऋद्धीने संपन्न होता. ‘‘ปุน จปรํ, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน ทีฆายุโก อโหสิ จิรฏฺฐิติโก อติวิย อญฺเญหิ มนุสฺเสหิ. ราชา, อานนฺท, มหาสุทสฺสโน อิมาย ทุติยาย อิทฺธิยา สมนฺนาคโต อโหสิ. “पुन्हा आणखी असे की, आनंदा, राजा महासुदस्सन इतर मानवांपेक्षा खूप दीर्घायुषी आणि दीर्घकाळ जगणारा होता. आनंदा, राजा महासुदस्सन या दुसऱ्या ऋद्धीने संपन्न होता. ‘‘ปุน จปรํ, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน อปฺปาพาโธ อโหสิ อปฺปาตงฺโก สมเวปากินิยา คหณิยา สมนฺนาคโต นาติสีตาย นาจฺจุณฺหาย อติวิย อญฺเญหิ มนุสฺเสหิ. ราชา, อานนฺท, มหาสุทสฺสโน อิมาย ตติยาย อิทฺธิยา สมนฺนาคโต อโหสิ. “पुन्हा आणखी असे की, आनंदा, राजा महासुदस्सन निरोगी व रोगमुक्त होता. त्याची पचनशक्ती उत्तम होती, जी फार थंडही नव्हती आणि फार उष्णही नव्हती, आणि इतर मानवांपेक्षा अत्यंत श्रेष्ठ होती. आनंदा, राजा महासुदस्सन या तिसऱ्या ऋद्धीने संपन्न होता. ‘‘ปุน จปรํ, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน พฺราหฺมณคหปติกานํ ปิโย อโหสิ มนาโป. เสยฺยถาปิ, อานนฺท, ปิตา ปุตฺตานํ ปิโย โหติ มนาโป, เอวเมว โข, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน พฺราหฺมณคหปติกานํ ปิโย อโหสิ มนาโป. รญฺโญปิ, อานนฺท, มหาสุทสฺสนสฺส พฺราหฺมณคหปติกา ปิยา อเหสุํ มนาปา. เสยฺยถาปิ, อานนฺท, ปิตุ ปุตฺตา ปิยา โหนฺติ มนาปา, เอวเมว โข, อานนฺท, รญฺโญปิ มหาสุทสฺสนสฺส พฺราหฺมณคหปติกา ปิยา อเหสุํ มนาปา. “पुन्हा आणखी असे की, आनंदा, राजा महासुदस्सन हा ब्राह्मण आणि गृहपतींना अत्यंत प्रिय व आवडता होता. आनंदा, ज्याप्रमाणे पिता आपल्या पुत्रांना प्रिय व आवडता असतो, त्याचप्रमाणे राजा महासुदस्सन ब्राह्मण आणि गृहपतींना प्रिय व आवडता होता. आणि आनंदा, राजा महासुदस्सनला देखील ते ब्राह्मण व गृहपती प्रिय आणि आवडते होते. आनंदा, ज्याप्रमाणे पित्याला आपले पुत्र प्रिय व आवडते असतात, त्याचप्रमाणे राजा महासुदस्सनला देखील ते ब्राह्मण व गृहपती प्रिय आणि आवडते होते. ‘‘ภูตปุพฺพํ, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน จตุรงฺคินิยา เสนาย อุยฺยานภูมึ นิยฺยาสิ. อถ โข, อานนฺท, พฺราหฺมณคหปติกา ราชานํ มหาสุทสฺสนํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวมาหํสุ – ‘อตรมาโน, เทว, ยาหิ, ยถา [Pg.146] ตํ มยํ จิรตรํ ปสฺเสยฺยามา’ติ. ราชาปิ, อานนฺท, มหาสุทสฺสโน สารถึ อามนฺเตสิ – ‘อตรมาโน, สารถิ, รถํ เปเสหิ, ยถา อหํ พฺราหฺมณคหปติเก จิรตรํ ปสฺเสยฺย’นฺติ. ราชา, อานนฺท, มหาสุทสฺสโน อิมาย จตุตฺถิยา อิทฺธิยา สมนฺนาคโต อโหสิ. ราชา, อานนฺท, มหาสุทสฺสโน อิมาหิ จตูหิ อิทฺธีหิ สมนฺนาคโต อโหสิ. “पूर्वीची गोष्ट आहे, आनंदा, राजा महासुदस्सन चतुरंग सेनेसह उद्यानाकडे निघाला. तेव्हा, आनंदा, ब्राह्मण आणि गृहपतींनी राजा महासुदस्सनजवळ येऊन असे म्हटले – ‘हे देवा (महाराज), आपण हळूहळू जावे, जेणेकरून आम्ही आपल्याला अधिक काळ पाहू शकू.’ आनंदा, राजा महासुदस्सनने देखील आपल्या सारथ्याला बोलावून म्हटले – ‘सारथी, रथ हळूहळू चालव, जेणेकरून मी या ब्राह्मण आणि गृहपतींना अधिक काळ पाहू शकेन.’ आनंदा, राजा महासुदस्सन या चौथ्या ऋद्धीने संपन्न होता. आनंदा, राजा महासुदस्सन या चार ऋद्धींनी संपन्न होता. ธมฺมปาสาทโปกฺขรณี धम्मप्रासाद आणि धम्मपुष्कळणी (तलाव) ๒๕๓. ‘‘อถ โข, อานนฺท, รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส เอตทโหสิ – ‘ยํนูนาหํ อิมาสุ ตาลนฺตริกาสุ ธนุสเต ธนุสเต โปกฺขรณิโย มาเปยฺย’นฺติ. २५३. “तेव्हा, आनंदा, राजा महासुदस्सनच्या मनात असा विचार आला – ‘मी या ताडाच्या झाडांच्या रांगांच्या दरम्यान, प्रत्येक शंभर धनुष्य अंतरावर एकेक पुष्करणी (तलाव) निर्माण केली तर किती बरे होईल!’ ‘‘มาเปสิ โข, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน ตาสุ ตาลนฺตริกาสุ ธนุสเต ธนุสเต โปกฺขรณิโย. ตา โข ปนานนฺท, โปกฺขรณิโย จตุนฺนํ วณฺณานํ อิฏฺฐกาหิ จิตา อเหสุํ – เอกา อิฏฺฐกา โสวณฺณมยา, เอกา รูปิยมยา, เอกา เวฬุริยมยา, เอกา ผลิกมยา. “त्यानंतर, आनंदा, राजा महासुदस्सनने त्या ताडाच्या झाडांच्या रांगांच्या दरम्यान प्रत्येक शंभर धनुष्य अंतरावर पुष्करणी निर्माण केल्या. आनंदा, त्या पुष्करणी चार रंगांच्या विटांनी बांधलेल्या होत्या – काही विटा सोन्याच्या, काही चांदीच्या, काही वैडूर्यमण्याच्या आणि काही स्फटिकाच्या होत्या. ‘‘ตาสุ โข ปนานนฺท, โปกฺขรณีสุ จตฺตาริ จตฺตาริ โสปานานิ อเหสุํ จตุนฺนํ วณฺณานํ, เอกํ โสปานํ โสวณฺณมยํ เอกํ รูปิยมยํ เอกํ เวฬุริยมยํ เอกํ ผลิกมยํ. โสวณฺณมยสฺส โสปานสฺส โสวณฺณมยา ถมฺภา อเหสุํ, รูปิยมยา สูจิโย จ อุณฺหีสญฺจ. รูปิยมยสฺส โสปานสฺส รูปิยมยา ถมฺภา อเหสุํ, โสวณฺณมยา สูจิโย จ อุณฺหีสญฺจ. เวฬุริยมยสฺส โสปานสฺส เวฬุริยมยา ถมฺภา อเหสุํ, ผลิกมยา สูจิโย จ อุณฺหีสญฺจ. ผลิกมยสฺส โสปานสฺส ผลิกมยา ถมฺภา อเหสุํ, เวฬุริยมยา สูจิโย จ อุณฺหีสญฺจ. ตา โข ปนานนฺท, โปกฺขรณิโย ทฺวีหิ เวทิกาหิ ปริกฺขิตฺตา อเหสุํ เอกา เวทิกา โสวณฺณมยา, เอกา รูปิยมยา. โสวณฺณมยาย เวทิกาย โสวณฺณมยา ถมฺภา อเหสุํ, รูปิยมยา สูจิโย จ อุณฺหีสญฺจ. รูปิยมยาย เวทิกาย รูปิยมยา ถมฺภา อเหสุํ, โสวณฺณมยา สูจิโย จ อุณฺหีสญฺจ. อถ โข, อานนฺท, รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส เอตทโหสิ – ‘ยํนูนาหํ อิมาสุ โปกฺขรณีสุ เอวรูปํ มาลํ โรปาเปยฺยํ อุปฺปลํ ปทุมํ กุมุทํ ปุณฺฑรีกํ สพฺโพตุกํ สพฺพชนสฺส อนาวฏ’นฺติ. โรปาเปสิ โข[Pg.147], อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน ตาสุ โปกฺขรณีสุ เอวรูปํ มาลํ อุปฺปลํ ปทุมํ กุมุทํ ปุณฺฑรีกํ สพฺโพตุกํ สพฺพชนสฺส อนาวฏํ. “आनंदा, त्या पुष्करणींना चार रंगांचे चार-चार जिने (पायऱ्या) होते – एक जिना सोन्याचा, एक चांदीचा, एक वैडूर्यमण्याचा आणि एक स्फटिकाचा होता. सोन्याच्या जिन्याचे खांब सोन्याचे होते, तर त्याच्या आडव्या सुया आणि कठडे चांदीचे होते. चांदीच्या जिन्याचे खांब चांदीचे होते, तर त्याच्या आडव्या सुया आणि कठडे सोन्याचे होते. वैडूर्यमण्याच्या जिन्याचे खांब वैडूर्यमणाचे होते, तर त्याच्या आडव्या सुया आणि कठडे स्फटिकाचे होते. स्फटिकाच्या जिन्याचे खांब स्फटिकाचे होते, तर त्याच्या आडव्या सुया आणि कठडे वैडूर्यमणाचे होते. आनंदा, त्या पुष्करणी दोन वेदिकांनी (कठड्यांनी) वेढलेल्या होत्या – एक वेदिका सोन्याची आणि दुसरी चांदीची होती. सोन्याच्या वेदिकेचे खांब सोन्याचे होते, तर आडव्या सुया आणि कठडे चांदीचे होते. चांदीच्या वेदिकेचे खांब चांदीचे होते, तर आडव्या सुया आणि कठडे सोन्याचे होते. तेव्हा, आनंदा, राजा महासुदस्सनच्या मनात असा विचार आला – ‘मी या पुष्करणींमध्ये सर्व ऋतूंमध्ये फुलणारी आणि सर्वांसाठी खुली असणारी नीलकमळ (उत्पल), रक्तकमळ (पदुम), श्वेतकमळ (कुमुद) आणि पुंडरीक (पांढरे कमळ) अशी फुले लावून घेतली तर किती बरे होईल!’ आनंदा, राजा महासुदस्सनने त्या पुष्करणींमध्ये सर्व ऋतूंमध्ये फुलणारी आणि सर्वांसाठी खुली असणारी नीलकमळ, रक्तकमळ, श्वेतकमळ आणि पुंडरीक अशी फुले लावून घेतली. ๒๕๔. ‘‘อถ โข, อานนฺท, รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส เอตทโหสิ – ‘ยํนูนาหํ อิมาสํ โปกฺขรณีนํ ตีเร นฺหาปเก ปุริเส ฐเปยฺยํ, เย อาคตาคตํ ชนํ นฺหาเปสฺสนฺตี’ติ. ฐเปสิ โข, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน ตาสํ โปกฺขรณีนํ ตีเร นฺหาปเก ปุริเส, เย อาคตาคตํ ชนํ นฺหาเปสุํ. २५४. “तेव्हा, आनंदा, राजा महासुदस्सनच्या मनात असा विचार आला – ‘मी या पुष्करणींच्या काठावर स्नान घालणारे सेवक नेमावेत, जे येणाऱ्या-जाणाऱ्या लोकांना स्नान घालतील.’ आनंदा, राजा महासुदस्सनने त्या पुष्करणींच्या काठावर स्नान घालणारे सेवक नेमले, ज्यांनी येणाऱ्या-जाणाऱ्या लोकांना स्नान घातले. ‘‘อถ โข, อานนฺท, รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส เอตทโหสิ – ‘ยํนูนาหํ อิมาสํ โปกฺขรณีนํ ตีเร เอวรูปํ ทานํ ปฏฺฐเปยฺยํ – อนฺนํ อนฺนฏฺฐิกสฺส, ปานํ ปานฏฺฐิกสฺส, วตฺถํ วตฺถฏฺฐิกสฺส, ยานํ ยานฏฺฐิกสฺส, สยนํ สยนฏฺฐิกสฺส, อิตฺถึ อิตฺถิฏฺฐิกสฺส, หิรญฺญํ หิรญฺญฏฺฐิกสฺส, สุวณฺณํ สุวณฺณฏฺฐิกสฺสา’ติ. ปฏฺฐเปสิ โข, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน ตาสํ โปกฺขรณีนํ ตีเร เอวรูปํ ทานํ – อนฺนํ อนฺนฏฺฐิกสฺส, ปานํ ปานฏฺฐิกสฺส, วตฺถํ วตฺถฏฺฐิกสฺส, ยานํ ยานฏฺฐิกสฺส, สยนํ สยนฏฺฐิกสฺส, อิตฺถึ อิตฺถิฏฺฐิกสฺส, หิรญฺญํ หิรญฺญฏฺฐิกสฺส, สุวณฺณํ สุวณฺณฏฺฐิกสฺส. “तेव्हा, आनंदा, राजा महासुदस्सनच्या मनात असा विचार आला – ‘मी या पुष्करणींच्या काठावर अशा प्रकारचे दान सुरू करावे – अन्न इच्छिणाऱ्याला अन्न, पेय इच्छिणाऱ्याला पेय, वस्त्र इच्छिणाऱ्याला वस्त्र, वाहन इच्छिणाऱ्याला वाहन, शय्या इच्छिणाऱ्याला शय्या, स्त्री इच्छिणाऱ्याला स्त्री, चांदी इच्छिणाऱ्याला चांदी आणि सोने इच्छिणाऱ्याला सोने.’ आनंदा, राजा महासुदस्सनने त्या पुष्करणींच्या काठावर अशा प्रकारचे दान सुरू केले – अन्न इच्छिणाऱ्याला अन्न, पेय इच्छिणाऱ्याला पेय, वस्त्र इच्छिणाऱ्याला वस्त्र, वाहन इच्छिणाऱ्याला वाहन, शय्या इच्छिणाऱ्याला शय्या, स्त्री इच्छिणाऱ्याला स्त्री, चांदी इच्छिणाऱ्याला चांदी आणि सोने इच्छिणाऱ्याला सोने. ๒๕๕. ‘‘อถ โข, อานนฺท, พฺราหฺมณคหปติกา ปหูตํ สาปเตยฺยํ อาทาย ราชานํ มหาสุทสฺสนํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวมาหํสุ – ‘อิทํ, เทว, ปหูตํ สาปเตยฺยํ เทวญฺเญว อุทฺทิสฺส อาภตํ, ตํ เทโว ปฏิคฺคณฺหตู’ติ. ‘อลํ โภ, มมปิทํ ปหูตํ สาปเตยฺยํ ธมฺมิเกน พลินา อภิสงฺขตํ, ตญฺจ โว โหตุ, อิโต จ ภิยฺโย หรถา’ติ. เต รญฺญา ปฏิกฺขิตฺตา เอกมนฺตํ อปกฺกมฺม เอวํ สมจินฺเตสุํ – ‘น โข เอตํ อมฺหากํ ปติรูปํ, ยํ มยํ อิมานิ สาปเตยฺยานิ ปุนเทว สกานิ ฆรานิ ปฏิหเรยฺยาม. ยํนูน มยํ รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส นิเวสนํ มาเปยฺยามา’ติ. เต ราชานํ มหาสุทสฺสนํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวมาหํสุ – ‘นิเวสนํ เต เทว, มาเปสฺสามา’ติ. อธิวาเสสิ โข, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน ตุณฺหีภาเวน. २५५. आनंदा, त्यानंतर ते ब्राह्मण आणि गृहपती भरपूर धन घेऊन राजे महासुदस्सन यांच्याकडे गेले आणि म्हणाले— 'महाराज, हे भरपूर धन आम्ही केवळ आपल्यासाठीच आणले आहे, कृपया आपण याचा स्वीकार करावा.' (राजे म्हणाले—) 'नको मित्रांनो, माझ्याकडेही न्याय्य करातून (धार्मिक बलीने) गोळा केलेले भरपूर धन आहे. हे धन तुमचेच राहू दे आणि यातून तुम्ही आणखीही घेऊन जा.' राजाने नकार दिल्यावर ते एका बाजूला गेले आणि त्यांनी असा विचार केला— 'हे धन आम्ही पुन्हा आमच्या घरी घेऊन जाणे आमच्यासाठी योग्य नाही. मग आम्ही राजे महासुदस्सन यांच्यासाठी एक निवासस्थान (प्रासाद) का बांधू नये?' त्यानंतर ते राजे महासुदस्सन यांच्याकडे गेले आणि म्हणाले— 'महाराज, आम्ही आपल्यासाठी एक निवासस्थान (प्रासाद) बांधू इच्छितो.' आनंदा, राजे महासुदस्सन यांनी शांत राहून (मौन धारण करून) संमती दिली. ๒๕๖. ‘‘อถ โข, อานนฺท, สกฺโก เทวานมินฺโท รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย วิสฺสกมฺมํ เทวปุตฺตํ อามนฺเตสิ – ‘เอหิ [Pg.148] ตฺวํ, สมฺม วิสฺสกมฺม, รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส นิเวสนํ มาเปหิ ธมฺมํ นาม ปาสาท’นฺติ. ‘เอวํ ภทฺทนฺตวา’ติ โข, อานนฺท, วิสฺสกมฺโม เทวปุตฺโต สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปฏิสฺสุตฺวา เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย, เอวเมว เทเวสุ ตาวตึเสสุ อนฺตรหิโต รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส ปุรโต ปาตุรโหสิ. อถ โข, อานนฺท, วิสฺสกมฺโม เทวปุตฺโต ราชานํ มหาสุทสฺสนํ เอตทโวจ – ‘นิเวสนํ เต เทว, มาเปสฺสามิ ธมฺมํ นาม ปาสาท’นฺติ. อธิวาเสสิ โข, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน ตุณฺหีภาเวน. २५६. आनंदा, त्यानंतर देवांचा राजा शक्राने राजे महासुदस्सन यांच्या मनातील विचार आपल्या मनाने जाणून घेऊन विस्सकम्म देवपुत्राला बोलावले आणि म्हटले— 'मित्रा विस्सकम्मा, ये आणि राजे महासुदस्सन यांच्यासाठी 'धम्म' नावाचा प्रासाद (निवासस्थान) तयार कर.' आनंदा, 'तसेच होईल, महाराज' असे म्हणून विस्सकम्म देवपुत्राने देवांचा राजा शक्राच्या आज्ञेचा स्वीकार केला. ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपला दुमडलेला हात सरळ करतो किंवा सरळ केलेला हात पुन्हा दुमडतो, त्याचप्रमाणे तो तावतिंस देवलोकातून अंतर्धान पावला आणि राजे महासुदस्सन यांच्या समोर प्रकट झाला. आनंदा, त्यानंतर विस्सकम्म देवपुत्राने राजे महासुदस्सन यांना म्हटले— 'महाराज, मी आपल्यासाठी 'धम्म' नावाचा प्रासाद (निवासस्थान) तयार करीन.' आनंदा, राजे महासुदस्सन यांनी शांत राहून (मौन धारण करून) संमती दिली. ‘‘มาเปสิ โข, อานนฺท, วิสฺสกมฺโม เทวปุตฺโต รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส นิเวสนํ ธมฺมํ นาม ปาสาทํ. ธมฺโม, อานนฺท, ปาสาโท ปุรตฺถิเมน ปจฺฉิเมน จ โยชนํ อายาเมน อโหสิ. อุตฺตเรน ทกฺขิเณน จ อฑฺฒโยชนํ วิตฺถาเรน. ธมฺมสฺส, อานนฺท, ปาสาทสฺส ติโปริสํ อุจฺจตเรน วตฺถุ จิตํ อโหสิ จตุนฺนํ วณฺณานํ อิฏฺฐกาหิ – เอกา อิฏฺฐกา โสวณฺณมยา, เอกา รูปิยมยา, เอกา เวฬุริยมยา, เอกา ผลิกมยา. आनंदा, विस्सकम्म देवपुत्राने राजे महासुदस्सन यांच्यासाठी 'धम्म' नावाचा प्रासाद तयार केला. आनंदा, तो धम्म प्रासाद पूर्व-पश्चिम लांबीने एक योजन होता आणि उत्तर-दक्षिण रुंदीने अर्धा योजन होता. आनंदा, त्या धम्म प्रासादाचा पाया (अधिष्ठान) तीन पुरुष उंचीचा (माणसाच्या उंचीच्या तिप्पट) होता, जो चार रंगांच्या विटांनी बांधलेला होता— एक वीट सोन्याची, एक चांदीची, एक वैडूर्यमणीची आणि एक स्फटिकाची होती. ‘‘ธมฺมสฺส, อานนฺท, ปาสาทสฺส จตุราสีติ ถมฺภสหสฺสานิ อเหสุํ จตุนฺนํ วณฺณานํ – เอโก ถมฺโภ โสวณฺณมโย, เอโก รูปิยมโย, เอโก เวฬุริยมโย, เอโก ผลิกมโย. ธมฺโม, อานนฺท, ปาสาโท จตุนฺนํ วณฺณานํ ผลเกหิ สนฺถโต อโหสิ – เอกํ ผลกํ โสวณฺณมยํ, เอกํ รูปิยมยํ, เอกํ เวฬุริยมยํ, เอกํ ผลิกมยํ. आनंदा, त्या धम्म प्रासादाला चार रंगांचे चौऱ्याऐंशी हजार (८४,०००) खांब होते— एक खांब सोन्याचा, एक चांदीचा, एक वैडूर्यमणीचा आणि एक स्फटिकाचा होता. आनंदा, तो धम्म प्रासाद चार रंगांच्या फळ्यांनी (तक्त्यांनी) आच्छादलेला होता— एक फळी सोन्याची, एक चांदीची, एक वैडूर्यमणीची आणि एक स्फटिकाची होती. ‘‘ธมฺมสฺส, อานนฺท, ปาสาทสฺส จตุวีสติ โสปานานิ อเหสุํ จตุนฺนํ วณฺณานํ – เอกํ โสปานํ โสวณฺณมยํ, เอกํ รูปิยมยํ, เอกํ เวฬุริยมยํ, เอกํ ผลิกมยํ. โสวณฺณมยสฺส โสปานสฺส โสวณฺณมยา ถมฺภา อเหสุํ รูปิยมยา สูจิโย จ อุณฺหีสญฺจ. รูปิยมยสฺส โสปานสฺส รูปิยมยา ถมฺภา อเหสุํ โสวณฺณมยา สูจิโย จ อุณฺหีสญฺจ. เวฬุริยมยสฺส โสปานสฺส เวฬุริยมยา ถมฺภา อเหสุํ ผลิกมยา สูจิโย จ อุณฺหีสญฺจ. ผลิกมยสฺส โสปานสฺส ผลิกมยา ถมฺภา อเหสุํ เวฬุริยมยา สูจิโย จ อุณฺหีสญฺจ. आनंदा, त्या धम्म प्रासादाला चार रंगांचे चोवीस जिने (पायऱ्या) होते— एक जिना सोन्याचा, एक चांदीचा, एक वैडूर्यमणीचा आणि एक स्फटिकाचा होता. सोन्याच्या जिन्याचे खांब सोन्याचे होते, तर त्याच्या आडव्या सुया (सळया) आणि कठडे (शिरोभाग) चांदीचे होते. चांदीच्या जिन्याचे खांब चांदीचे होते, तर त्याच्या आडव्या सुया आणि कठडे सोन्याचे होते. वैडूर्यमणीच्या जिन्याचे खांब वैडूर्यमणीचे होते, तर त्याच्या आडव्या सुया आणि कठडे स्फटिकाचे होते. स्फटिकाच्या जिन्याचे खांब स्फटिकाचे होते, तर त्याच्या आडव्या सुया आणि कठडे वैडूर्यमणीचे होते. ‘‘ธมฺเม, อานนฺท, ปาสาเท จตุราสีติ กูฏาคารสหสฺสานิ อเหสุํ จตุนฺนํ วณฺณานํ – เอกํ กูฏาคารํ โสวณฺณมยํ, เอกํ รูปิยมยํ, เอกํ เวฬุริยมยํ[Pg.149], เอกํ ผลิกมยํ. โสวณฺณมเย กูฏาคาเร รูปิยมโย ปลฺลงฺโก ปญฺญตฺโต อโหสิ, รูปิยมเย กูฏาคาเร โสวณฺณมโย ปลฺลงฺโก ปญฺญตฺโต อโหสิ, เวฬุริยมเย กูฏาคาเร ทนฺตมโย ปลฺลงฺโก ปญฺญตฺโต อโหสิ, ผลิกมเย กูฏาคาเร สารมโย ปลฺลงฺโก ปญฺญตฺโต อโหสิ. โสวณฺณมยสฺส กูฏาคารสฺส ทฺวาเร รูปิยมโย ตาโล ฐิโต อโหสิ, ตสฺส รูปิยมโย ขนฺโธ โสวณฺณมยานิ ปตฺตานิ จ ผลานิ จ. รูปิยมยสฺส กูฏาคารสฺส ทฺวาเร โสวณฺณมโย ตาโล ฐิโต อโหสิ, ตสฺส โสวณฺณมโย ขนฺโธ, รูปิยมยานิ ปตฺตานิ จ ผลานิ จ. เวฬุริยมยสฺส กูฏาคารสฺส ทฺวาเร ผลิกมโย ตาโล ฐิโต อโหสิ, ตสฺส ผลิกมโย ขนฺโธ, เวฬุริยมยานิ ปตฺตานิ จ ผลานิ จ. ผลิกมยสฺส กูฏาคารสฺส ทฺวาเร เวฬุริยมโย ตาโล ฐิโต อโหสิ, ตสฺส เวฬุริยมโย ขนฺโธ, ผลิกมยานิ ปตฺตานิ จ ผลานิ จ. आनंदा, त्या धम्म प्रासादात चार रंगांचे चौऱ्याऐंशी हजार (८४,०००) कुटागार (शिखरयुक्त खोल्या) होते— एक कुटागार सोन्याचे, एक चांदीचे, एक वैडूर्यमणीचे आणि एक स्फटिकाचे होते. सोन्याच्या कुटागारात चांदीचे आसन (पलंग) मांडलेले होते, चांदीच्या कुटागारात सोन्याचे आसन मांडलेले होते, वैडूर्यमणीच्या कुटागारात हस्तिदंती आसन मांडलेले होते आणि स्फटिकाच्या कुटागारात चंदनाच्या गाभ्याचे (सारमय) आसन मांडलेले होते. सोन्याच्या कुटागाराच्या दाराशी चांदीचे ताडाचे झाड उभे होते, ज्याचा बुंधा चांदीचा होता आणि पाने व फळे सोन्याची होती. चांदीच्या कुटागाराच्या दाराशी सोन्याचे ताडाचे झाड उभे होते, ज्याचा बुंधा सोन्याचा होता आणि पाने व फळे चांदीची होती. वैडूर्यमणीच्या कुटागाराच्या दाराशी स्फटिकाचे ताडाचे झाड उभे होते, ज्याचा बुंधा स्फटिकाचा होता आणि पाने व फळे वैडूर्यमणीची होती. स्फटिकाच्या कुटागाराच्या दाराशी वैडूर्यमणीचे ताडाचे झाड उभे होते, ज्याचा बुंधा वैडूर्यमणीचा होता आणि पाने व फळे स्फटिकाची होती. ๒๕๗. ‘‘อถ โข, อานนฺท, รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส เอตทโหสิ – ‘ยํนูนาหํ มหาวิยูหสฺส กูฏาคารสฺส ทฺวาเร สพฺพโสวณฺณมยํ ตาลวนํ มาเปยฺยํ, ยตฺถ ทิวาวิหารํ นิสีทิสฺสามี’ติ. มาเปสิ โข, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน มหาวิยูหสฺส กูฏาคารสฺส ทฺวาเร สพฺพโสวณฺณมยํ ตาลวนํ, ยตฺถ ทิวาวิหารํ นิสีทิ. ธมฺโม, อานนฺท, ปาสาโท ทฺวีหิ เวทิกาหิ ปริกฺขิตฺโต อโหสิ, เอกา เวทิกา โสวณฺณมยา, เอกา รูปิยมยา. โสวณฺณมยาย เวทิกาย โสวณฺณมยา ถมฺภา อเหสุํ, รูปิยมยา สูจิโย จ อุณฺหีสญฺจ. รูปิยมยาย เวทิกาย รูปิยมยา ถมฺภา อเหสุํ, โสวณฺณมยา สูจิโย จ อุณฺหีสญฺจ. २५७. आनंदा, त्यानंतर राजे महासुदस्सन यांच्या मनात असा विचार आला— 'मी महावियूह नावाच्या कुटागाराच्या दाराशी संपूर्णपणे सोन्याचे ताडवन (ताडाच्या झाडांचे वन) का तयार करू नये, जेथे मी दिवसा विश्रांतीसाठी (दिवाविहारासाठी) बसेन?' आनंदा, राजे महासुदस्सन यांनी महावियूह कुटागाराच्या दाराशी संपूर्णपणे सोन्याचे ताडवन तयार केले, जेथे ते दिवसा विश्रांतीसाठी बसत असत. आनंदा, तो धम्म प्रासाद दोन वेदिकांनी (कठड्यांनी) वेढलेला होता— एक वेदिका सोन्याची आणि एक चांदीची होती. सोन्याच्या वेदिकेचे खांब सोन्याचे होते, तर तिच्या आडव्या सुया आणि कठडे चांदीचे होते. चांदीच्या वेदिकेचे खांब चांदीचे होते, तर तिच्या आडव्या सुया आणि कठडे सोन्याचे होते. ๒๕๘. ‘‘ธมฺโม, อานนฺท, ปาสาโท ทฺวีหิ กิงฺกิณิกชาเลหิ ปริกฺขิตฺโต อโหสิ – เอกํ ชาลํ โสวณฺณมยํ เอกํ รูปิยมยํ. โสวณฺณมยสฺส ชาลสฺส รูปิยมยา กิงฺกิณิกา อเหสุํ, รูปิยมยสฺส ชาลสฺส โสวณฺณมยา กิงฺกิณิกา อเหสุํ. เตสํ โข ปนานนฺท, กิงฺกิณิกชาลานํ วาเตริตานํ สทฺโท อโหสิ วคฺคุ จ รชนีโย จ ขมนีโย จ มทนีโย จ. เสยฺยถาปิ, อานนฺท, ปญฺจงฺคิกสฺส ตูริยสฺส สุวินีตสฺส สุปฺปฏิตาฬิตสฺส [Pg.150] สุกุสเลหิ สมนฺนาหตสฺส สทฺโท โหติ, วคฺคุ จ รชนีโย จ ขมนีโย จ มทนีโย จ, เอวเมว โข, อานนฺท, เตสํ กิงฺกิณิกชาลานํ วาเตริตานํ สทฺโท อโหสิ วคฺคุ จ รชนีโย จ ขมนีโย จ มทนีโย จ. เย โข ปนานนฺท, เตน สมเยน กุสาวติยา ราชธานิยา ธุตฺตา อเหสุํ โสณฺฑา ปิปาสา, เต เตสํ กิงฺกิณิกชาลานํ วาเตริตานํ สทฺเทน ปริจาเรสุํ. นิฏฺฐิโต โข ปนานนฺท, ธมฺโม ปาสาโท ทุทฺทิกฺโข อโหสิ มุสติ จกฺขูนิ. เสยฺยถาปิ, อานนฺท, วสฺสานํ ปจฺฉิเม มาเส สรทสมเย วิทฺเธ วิคตวลาหเก เทเว อาทิจฺโจ นภํ อพฺภุสฺสกฺกมาโน ทุทฺทิกฺโข โหติ มุสติ จกฺขูนิ; เอวเมว โข, อานนฺท, ธมฺโม ปาสาโท ทุทฺทิกฺโข อโหสิ มุสติ จกฺขูนิ. २५८. आनंदा, 'धम्म' नावाचा प्रासाद दोन घुंगरांच्या जाळ्यांनी वेढलेला होता - एक जाळे सोन्याचे होते आणि दुसरे चांदीचे होते. सोन्याच्या जाळ्याला चांदीचे घुंगरू होते आणि चांदीच्या जाळ्याला सोन्याचे घुंगरू होते. आनंदा, जेव्हा वाऱ्याच्या झुळुकीने ती घुंगरांची जाळी हलत असे, तेव्हा त्यांचा निघणारा आवाज अत्यंत मधुर, मनमोहक, आनंददायी आणि मंत्रमुग्ध करणारा असा येत असे. आनंदा, ज्याप्रमाणे कुशल वादकांनी उत्तम प्रकारे सुसंवादित केलेले आणि वाजवलेले पाच प्रकारच्या वाद्यांचे संगीत मधुर, मनमोहक, आनंददायी आणि मंत्रमुग्ध करणारे असते; त्याचप्रमाणे, आनंदा, वाऱ्याच्या झुळुकीने हलणाऱ्या त्या घुंगरांच्या जाळ्यांचा आवाज मधुर, मनमोहक, आनंददायी आणि मंत्रमुग्ध करणारा येत असे. आनंदा, त्या काळी कुसावती राजधानीत जे विलासी, मद्यपी आणि विषयासक्त लोक होते, ते वाऱ्याने हलणाऱ्या त्या घुंगरांच्या जाळ्यांच्या आवाजाने आनंदित होत असत. आनंदा, जेव्हा हा 'धम्म' प्रासाद पूर्ण झाला, तेव्हा तो इतका देदीप्यमान होता की त्याच्याकडे पाहणे कठीण होते, तो डोळे दिपवणारा होता. आनंदा, ज्याप्रमाणे पावसाळ्याच्या शेवटच्या महिन्यात, शरद ऋतूत, जेव्हा आकाश निरभ्र आणि ढगमुक्त असते, तेव्हा आकाशात वर चढणारा सूर्य जसा पाहणे कठीण असते आणि डोळे दिपवून टाकतो; त्याचप्रमाणे, आनंदा, तो 'धम्म' प्रासाद पाहणे कठीण होते आणि तो डोळे दिपवून टाकत असे. ๒๕๙. ‘‘อถ โข, อานนฺท, รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส เอตทโหสิ – ‘ยํนูนาหํ ธมฺมสฺส ปาสาทสฺส ปุรโต ธมฺมํ นาม โปกฺขรณึ มาเปยฺย’นฺติ. มาเปสิ โข, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน ธมฺมสฺส ปาสาทสฺส ปุรโต ธมฺมํ นาม โปกฺขรณึ. ธมฺมา, อานนฺท, โปกฺขรณี ปุรตฺถิเมน ปจฺฉิเมน จ โยชนํ อายาเมน อโหสิ, อุตฺตเรน ทกฺขิเณน จ อฑฺฒโยชนํ วิตฺถาเรน. ธมฺมา, อานนฺท, โปกฺขรณี จตุนฺนํ วณฺณานํ อิฏฺฐกาหิ จิตา อโหสิ – เอกา อิฏฺฐกา โสวณฺณมยา, เอกา รูปิยมยา, เอกา เวฬุริยมยา, เอกา ผลิกมยา. २५९. त्यानंतर, आनंदा, राजा महासुदर्शनांच्या मनात असा विचार आला – 'मी या धम्म प्रासादाच्या समोर 'धम्मा' नावाची एक पुष्करणी तयार केली तर किती बरे होईल!' मग, आनंदा, राजा महासुदर्शनांनी धम्म प्रासादाच्या समोर 'धम्मा' नावाची पुष्करणी तयार केली. आनंदा, ती 'धम्मा' पुष्करणी पूर्व-पश्चिम एक योजन लांब होती आणि उत्तर-दक्षिण अर्धा योजन रुंद होती. आनंदा, ती 'धम्मा' पुष्करणी चार रंगांच्या विटांनी बांधलेली होती – काही विटा सोन्याच्या, काही चांदीच्या, काही वैडूर्यमणीच्या आणि काही स्फटिकाच्या होत्या. ‘‘ธมฺมาย, อานนฺท, โปกฺขรณิยา จตุวีสติ โสปานานิ อเหสุํ จตุนฺนํ วณฺณานํ – เอกํ โสปานํ โสวณฺณมยํ, เอกํ รูปิยมยํ, เอกํ เวฬุริยมยํ, เอกํ ผลิกมยํ. โสวณฺณมยสฺส โสปานสฺส โสวณฺณมยา ถมฺภา อเหสุํ รูปิยมยา สูจิโย จ อุณฺหีสญฺจ. รูปิยมยสฺส โสปานสฺส รูปิยมยา ถมฺภา อเหสุํ โสวณฺณมยา สูจิโย จ อุณฺหีสญฺจ. เวฬุริยมยสฺส โสปานสฺส เวฬุริยมยา ถมฺภา อเหสุํ ผลิกมยา สูจิโย จ อุณฺหีสญฺจ. ผลิกมยสฺส โสปานสฺส ผลิกมยา ถมฺภา อเหสุํ เวฬุริยมยา สูจิโย จ อุณฺหีสญฺจ. आनंदा, त्या 'धम्मा' पुष्करणीला चार रंगांचे चोवीस जिने होते – काही जिने सोन्याचे, काही चांदीचे, काही वैडूर्यमणीचे आणि काही स्फटिकाचे होते. सोन्याच्या जिन्याचे खांब सोन्याचे होते, तर त्याच्या सुया आणि कठडे चांदीचे होते. चांदीच्या जिन्याचे खांब चांदीचे होते, तर त्याच्या सुया आणि कठडे सोन्याचे होते. वैडूर्यमणीच्या जिन्याचे खांब वैडूर्यमणीचे होते, तर त्याच्या सुया आणि कठडे स्फटिकाचे होते. स्फटिकाच्या जिन्याचे खांब स्फटिकाचे होते, तर त्याच्या सुया आणि कठडे वैडूर्यमणीचे होते. ‘‘ธมฺมา, อานนฺท, โปกฺขรณี ทฺวีหิ เวทิกาหิ ปริกฺขิตฺตา อโหสิ – เอกา เวทิกา โสวณฺณมยา, เอกา รูปิยมยา. โสวณฺณมยาย เวทิกาย โสวณฺณมยา [Pg.151] ถมฺภา อเหสุํ รูปิยมยา สูจิโย จ อุณฺหีสญฺจ. รูปิยมยาย เวทิกาย รูปิยมยา ถมฺภา อเหสุํ โสวณฺณมยา สูจิโย จ อุณฺหีสญฺจ. आनंदा, ती 'धम्मा' पुष्करणी दोन वेदिकांनी वेढलेली होती – एक वेदिका सोन्याची होती आणि दुसरी चांदीची होती. सोन्याच्या वेदिकेचे खांब सोन्याचे होते, तर तिच्या सुया आणि कठडे चांदीचे होते. चांदीच्या वेदिकेचे खांब चांदीचे होते, तर तिच्या सुया आणि कठडे सोन्याचे होते. ‘‘ธมฺมา, อานนฺท, โปกฺขรณี สตฺตหิ ตาลปนฺตีหิ ปริกฺขิตฺตา อโหสิ – เอกา ตาลปนฺติ โสวณฺณมยา, เอกา รูปิยมยา, เอกา เวฬุริยมยา, เอกา ผลิกมยา, เอกา โลหิตงฺกมยา, เอกา มสารคลฺลมยา, เอกา สพฺพรตนมยา. โสวณฺณมยสฺส ตาลสฺส โสวณฺณมโย ขนฺโธ อโหสิ รูปิยมยานิ ปตฺตานิ จ ผลานิ จ. รูปิยมยสฺส ตาลสฺส รูปิยมโย ขนฺโธ อโหสิ โสวณฺณมยานิ ปตฺตานิ จ ผลานิ จ. เวฬุริยมยสฺส ตาลสฺส เวฬุริยมโย ขนฺโธ อโหสิ ผลิกมยานิ ปตฺตานิ จ ผลานิ จ. ผลิกมยสฺส ตาลสฺส ผลิกมโย ขนฺโธ อโหสิ เวฬุริยมยานิ ปตฺตานิ จ ผลานิ จ. โลหิตงฺกมยสฺส ตาลสฺส โลหิตงฺกมโย ขนฺโธ อโหสิ มสารคลฺลมยานิ ปตฺตานิ จ ผลานิ จ. มสารคลฺลมยสฺส ตาลสฺส มสารคลฺลมโย ขนฺโธ อโหสิ โลหิตงฺกมยานิ ปตฺตานิ จ ผลานิ จ. สพฺพรตนมยสฺส ตาลสฺส สพฺพรตนมโย ขนฺโธ อโหสิ, สพฺพรตนมยานิ ปตฺตานิ จ ผลานิ จ. ตาสํ โข ปนานนฺท, ตาลปนฺตีนํ วาเตริตานํ สทฺโท อโหสิ, วคฺคุ จ รชนีโย จ ขมนีโย จ มทนีโย จ. เสยฺยถาปิ, อานนฺท, ปญฺจงฺคิกสฺส ตูริยสฺส สุวินีตสฺส สุปฺปฏิตาฬิตสฺส สุกุสเลหิ สมนฺนาหตสฺส สทฺโท โหติ วคฺคุ จ รชนีโย จ ขมนีโย จ มทนีโย จ, เอวเมว โข, อานนฺท, ตาสํ ตาลปนฺตีนํ วาเตริตานํ สทฺโท อโหสิ วคฺคุ จ รชนีโย จ ขมนีโย จ มทนีโย จ. เย โข ปนานนฺท, เตน สมเยน กุสาวติยา ราชธานิยา ธุตฺตา อเหสุํ โสณฺฑา ปิปาสา, เต ตาสํ ตาลปนฺตีนํ วาเตริตานํ สทฺเทน ปริจาเรสุํ. आनंदा, ती 'धम्मा' पुष्करणी ताडाच्या झाडांच्या सात रांगांनी वेढलेली होती – एक ताडाची रांग सोन्याची, एक चांदीची, एक वैडूर्यमणीची, एक स्फटिकाची, एक lohitaṅgamaya (तांबड्या रत्नाची), एक masāragalla (चित्रेविचित्रे रत्नाची) आणि एक सर्व-रत्नमयी होती. सोन्याच्या ताडाच्या झाडाचा बुंधा सोन्याचा होता, तर त्याची पाने आणि फळे चांदीची होती. चांदीच्या ताडाच्या झाडाचा बुंधा चांदीचा होता, तर त्याची पाने आणि फळे सोन्याची होती. वैडूर्यमणीच्या ताडाच्या झाडाचा बुंधा वैडूर्यमणीचा होता, तर त्याची पाने आणि फळे स्फटिकाची होती. स्फटिकाच्या ताडाच्या झाडाचा बुंधा स्फटिकाचा होता, तर त्याची पाने आणि फळे वैडूर्यमणीची होती. lohitaṅgamaya ताडाच्या झाडाचा बुंधा lohitaṅgamaya चा होता, तर त्याची पाने आणि फळे masāragalla ची होती. masāragalla ताडाच्या झाडाचा बुंधा masāragalla चा होता, तर त्याची पाने आणि फळे lohitaṅgamaya ची होती. सर्व-रत्नमयी ताडाच्या झाडाचा बुंधा सर्व-रत्नमयी होता, आणि त्याची पाने व फळे देखील सर्व-रत्नमयी होती. आनंदा, जेव्हा वाऱ्याच्या झुळुकीने ताडाच्या झाडांच्या त्या रांगा हलत असत, तेव्हा त्यांचा निघणारा आवाज अत्यंत मधुर, मनमोहक, आनंददायी आणि मंत्रमुग्ध करणारा असा येत असे. आनंदा, ज्याप्रमाणे कुशल वादकांनी उत्तम प्रकारे सुसंवादित केलेले आणि वाजवलेले पाच प्रकारच्या वाद्यांचे संगीत मधुर, मनमोहक, आनंददायी आणि मंत्रमुग्ध करणारे असते; त्याचप्रमाणे, आनंदा, वाऱ्याच्या झुळुकीने हलणाऱ्या ताडाच्या झाडांच्या त्या रांगांचा आवाज मधुर, मनमोहक, आनंददायी आणि मंत्रमुग्ध करणारा येत असे. आनंदा, त्या काळी कुसावती राजधानीत जे विलासी, मद्यपी आणि विषयासक्त लोक होते, ते वाऱ्याने हलणाऱ्या ताडाच्या झाडांच्या त्या रांगांच्या आवाजाने आनंदित होत असत. ‘‘นิฏฺฐิเต โข ปนานนฺท, ธมฺเม ปาสาเท นิฏฺฐิตาย ธมฺมาย จ โปกฺขรณิยา ราชา มหาสุทสฺสโน ‘เย เตน สมเยน สมเณสุ วา สมณสมฺมตา พฺราหฺมเณสุ วา พฺราหฺมณสมฺมตา’, เต สพฺพกาเมหิ สนฺตปฺเปตฺวา ธมฺมํ ปาสาทํ อภิรุหิ. आनंदा, जेव्हा तो 'धम्म' प्रासाद आणि ती 'धम्मा' पुष्करणी पूर्ण झाली, तेव्हा राजा महासुदर्शनांनी त्या काळी जे श्रमण किंवा श्रमण मानले जाणारे आणि ब्राह्मण किंवा ब्राह्मण मानले जाणारे लोक होते, त्यांना त्यांच्या सर्व इच्छा पूर्ण करून संतुष्ट केले आणि त्यानंतर त्यांनी 'धम्म' प्रासादात प्रवेश केला. ปฐมภาณวาโร. प्रथम भाणवार समाप्त. ฌานสมฺปตฺติ ध्यान-संपत्ती ๒๖๐. ‘‘อถ [Pg.152] โข, อานนฺท, รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส เอตทโหสิ – ‘กิสฺส นุ โข เม อิทํ กมฺมสฺส ผลํ กิสฺส กมฺมสฺส วิปาโก, เยนาหํ เอตรหิ เอวํมหิทฺธิโก เอวํมหานุภาโว’ติ? อถ โข, อานนฺท, รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส เอตทโหสิ – ‘ติณฺณํ โข เม อิทํ กมฺมานํ ผลํ ติณฺณํ กมฺมานํ วิปาโก, เยนาหํ เอตรหิ เอวํมหิทฺธิโก เอวํมหานุภาโว, เสยฺยถิทํ ทานสฺส ทมสฺส สํยมสฺสา’ติ. २६०. त्यानंतर, आनंदा, राजा महासुदर्शनांच्या मनात असा विचार आला – 'माझ्या कोणत्या कर्माचे हे फळ आहे, कोणत्या कर्माचा हा विपाक आहे, ज्यामुळे मी आज इतका महान ऋद्धीवान आणि महान प्रभावशाली झालो आहे?' मग, आनंदा, राजा महासुदर्शनांच्या मनात असा विचार आला – 'माझ्या तीन कर्मांचे हे फळ आहे, तीन कर्मांचा हा विपाक आहे, ज्यामुळे मी आज इतका महान ऋद्धीवान आणि महान प्रभावशाली झालो आहे; ती तीन कर्मे म्हणजे – दान, दम आणि संयम होय.' ‘‘อถ โข, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน เยน มหาวิยูหํ กูฏาคารํ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา มหาวิยูหสฺส กูฏาคารสฺส ทฺวาเร ฐิโต อุทานํ อุทาเนสิ – ‘ติฏฺฐ, กามวิตกฺก, ติฏฺฐ, พฺยาปาทวิตกฺก, ติฏฺฐ, วิหึสาวิตกฺก. เอตฺตาวตา กามวิตกฺก, เอตฺตาวตา พฺยาปาทวิตกฺก, เอตฺตาวตา วิหึสาวิตกฺกา’ติ. त्यानंतर, आनंदा! राजा महासुदस्सन जेथे 'महावियूह' नावाचा कुटागार (शिखरयुक्त प्रासाद) होता, तेथे गेले. तेथे जाऊन महावियूह कुटागाराच्या दाराशी उभे राहून त्यांनी हा उदान (हर्षोद्गार) काढला— 'थांब, कामवितर्क! थांब, व्यापादवितर्क (द्वेषयुक्त विचार)! थांब, विहिंसावितर्क (हिंसायुक्त विचार)! कामवितर्काची मर्यादा एवढीच आहे, व्यापादवितर्काची मर्यादा एवढीच आहे, विहिंसावितर्काची मर्यादा एवढीच आहे!' ๒๖๑. ‘‘อถ โข, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน มหาวิยูหํ กูฏาคารํ ปวิสิตฺวา โสวณฺณมเย ปลฺลงฺเก นิสินฺโน วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหาสิ. วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา อชฺฌตฺตํ สมฺปสาทนํ เจตโส เอโกทิภาวํ อวิตกฺกํ อวิจารํ สมาธิชํ ปีติสุขํ ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหาสิ. ปีติยา จ วิราคา อุเปกฺขโก จ วิหาสิ, สโต จ สมฺปชาโน สุขญฺจ กาเยน ปฏิสํเวเทสิ, ยํ ตํ อริยา อาจิกฺขนฺติ – ‘อุเปกฺขโก สติมา สุขวิหารี’ติ ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหาสิ. สุขสฺส จ ปหานา ทุกฺขสฺส จ ปหานา ปุพฺเพว โสมนสฺสโทมนสฺสานํ อตฺถงฺคมา อทุกฺขมสุขํ อุเปกฺขาสติปาริสุทฺธึ จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหาสิ. २६१. त्यानंतर, आनंदा! राजा महासुदस्सन महावियूह कुटागारात प्रवेश करून सोन्याच्या पलंगावर बसले आणि कामभोगांपासून अलिप्त होऊन, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, वितर्क आणि विचारांसह असणाऱ्या, विवेकापासून (अलिप्ततेपासून) उत्पन्न झालेल्या, प्रीती आणि सुख असणाऱ्या पहिल्या ध्यानात (प्रथम ध्यानात) प्रवेश करून विहरले. वितर्क आणि विचारांच्या शांत होण्याने, अध्यात्मिक प्रसन्नता आणि चित्ताची एकाग्रता असणाऱ्या, वितर्करहित, विचाररहित, समाधीपासून उत्पन्न झालेल्या, प्रीती आणि सुख असणाऱ्या दुसऱ्या ध्यानात (द्वितीय ध्यानात) प्रवेश करून विहरले. प्रीतीचाही विराग झाल्यामुळे ते उपेक्षक (तटस्थ) राहिले आणि स्मृती व संप्रजन्याने (जागरूकतेने) युक्त होऊन शरीराने सुखाचा अनुभव घेऊ लागले, ज्याविषयी आर्य पुरुष म्हणतात— 'जो उपेक्षक, स्मृतिमान आणि सुखविहारी आहे', अशा तिसऱ्या ध्यानात (तृतीय ध्यानात) प्रवेश करून विहरले. सुखाचा आणि दुःखाचा त्याग केल्यामुळे आणि आधीच सोमनस्य (आनंद) व दोमनस्य (विषाद) नष्ट झाल्यामुळे, सुखही नाही आणि दुःखही नाही अशा, उपेक्षा व स्मृतीच्या शुद्धतेने युक्त असणाऱ्या चौथ्या ध्यानात (चतुर्थ ध्यानात) प्रवेश करून विहरले. ๒๖๒. ‘‘อถ โข, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน มหาวิยูหา กูฏาคารา นิกฺขมิตฺวา โสวณฺณมยํ กูฏาคารํ ปวิสิตฺวา รูปิยมเย ปลฺลงฺเก นิสินฺโน เมตฺตาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหาสิ. ตถา ทุติยํ ตถา ตติยํ ตถา จตุตฺถํ. อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ เมตฺตาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหาสิ. กรุณาสหคเตน [Pg.153] เจตสา…เป… มุทิตาสหคเตน เจตสา…เป… อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหาสิ ตถา ทุติยํ ตถา ตติยํ ตถา จตุตฺถํ. อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหาสิ. २६२. त्यानंतर, आनंदा! राजा महासुदस्सन महावियूह कुटागारातून बाहेर पडून सोन्याच्या कुटागारात गेले आणि चांदीच्या पलंगावर बसून मैत्रीपूर्ण चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरले. तसेच दुसऱ्या दिशेला, तसेच तिसऱ्या दिशेला, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, सभोवताली, सर्वत्र, स्वतःप्रमाणेच सर्वांना मानून, संपूर्ण जगाला विशाल, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित (द्वेषरहित) अशा मैत्रीपूर्ण चित्ताने व्यापून विहरले. करुणेने युक्त चित्ताने... पे... मुदितेने युक्त चित्ताने... पे... उपेक्षेने युक्त चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरले, तसेच दुसऱ्या दिशेला, तसेच तिसऱ्या दिशेला, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, सभोवताली, सर्वत्र, स्वतःप्रमाणेच सर्वांना मानून, संपूर्ण जगाला विशाल, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित अशा उपेक्षेने युक्त चित्ताने व्यापून विहरले. จตุราสีติ นครสหสฺสาทิ चौऱ्याऐंशी हजार नगरे इत्यादी ๒๖๓. ‘‘รญฺโญ, อานนฺท, มหาสุทสฺสนสฺส จตุราสีติ นครสหสฺสานิ อเหสุํ กุสาวตีราชธานิปฺปมุขานิ; จตุราสีติ ปาสาทสหสฺสานิ อเหสุํ ธมฺมปาสาทปฺปมุขานิ; จตุราสีติ กูฏาคารสหสฺสานิ อเหสุํ มหาวิยูหกูฏาคารปฺปมุขานิ; จตุราสีติ ปลฺลงฺกสหสฺสานิ อเหสุํ โสวณฺณมยานิ รูปิยมยานิ ทนฺตมยานิ สารมยานิ โคนกตฺถตานิ ปฏิกตฺถตานิ ปฏลิกตฺถตานิ กทลิมิคปวรปจฺจตฺถรณานิ สอุตฺตรจฺฉทานิ อุภโตโลหิตกูปธานานิ; จตุราสีติ นาคสหสฺสานิ อเหสุํ โสวณฺณาลงฺการานิ โสวณฺณธชานิ เหมชาลปฏิจฺฉนฺนานิ อุโปสถนาคราชปฺปมุขานิ; จตุราสีติ อสฺสสหสฺสานิ อเหสุํ โสวณฺณาลงฺการานิ โสวณฺณธชานิ เหมชาลปฏิจฺฉนฺนานิ วลาหกอสฺสราชปฺปมุขานิ; จตุราสีติ รถสหสฺสานิ อเหสุํ สีหจมฺมปริวารานิ พฺยคฺฆจมฺมปริวารานิ ทีปิจมฺมปริวารานิ ปณฺฑุกมฺพลปริวารานิ โสวณฺณาลงฺการานิ โสวณฺณธชานิ เหมชาลปฏิจฺฉนฺนานิ เวชยนฺตรถปฺปมุขานิ; จตุราสีติ มณิสหสฺสานิ อเหสุํ มณิรตนปฺปมุขานิ; จตุราสีติ อิตฺถิสหสฺสานิ อเหสุํ สุภทฺทาเทวิปฺปมุขานิ; จตุราสีติ คหปติสหสฺสานิ อเหสุํ คหปติรตนปฺปมุขานิ; จตุราสีติ ขตฺติยสหสฺสานิ อเหสุํ อนุยนฺตานิ ปริณายกรตนปฺปมุขานิ; จตุราสีติ เธนุสหสฺสานิ อเหสุํ ทุหสนฺทนานิ ทุกูลสนฺทานานิ กํสูปธารณานิ; จตุราสีติ วตฺถโกฏิสหสฺสานิ อเหสุํ โขมสุขุมานํ กปฺปาสิกสุขุมานํ โกเสยฺยสุขุมานํ กมฺพลสุขุมานํ; (รญฺโญ, อานนฺท, มหาสุทสฺสนสฺส) จตุราสีติ ถาลิปากสหสฺสานิ อเหสุํ สายํ ปาตํ ภตฺตาภิหาโร อภิหริยิตฺถ. २६३. आनंदा! राजा महासुदस्सन यांच्याकडे कुसावती राजधानी प्रमुख असलेली चौऱ्याऐंशी हजार नगरे होती; धम्म प्रासाद प्रमुख असलेले चौऱ्याऐंशी हजार प्रासाद (राजवाडे) होते; महावियूह कुटागार प्रमुख असलेले चौऱ्याऐंशी हजार कुटागार होते; सोन्याचे, चांदीचे, हस्तिदंताचे आणि मौल्यवान लाकडाचे बनवलेले, लांब केसांच्या चटयांनी, लोकरीच्या पांढऱ्या चादरींनी, फुलांच्या नक्षीकाम केलेल्या चादरींनी, कदली-हरणाच्या कातड्याच्या उत्कृष्ट अंथरूणांनी अंथरलेले, वर लाल छत असलेले आणि दोन्ही बाजूंना लाल रंगाची उशी असलेले चौऱ्याऐंशी हजार पलंग होते; सोन्याच्या दागिन्यांनी सजवलेले, सोन्याचे ध्वज लावलेले, सोन्याच्या जाळीने झाकलेले आणि उपोसथ हत्तीराज प्रमुख असलेले चौऱ्याऐंशी हजार हत्ती होते; सोन्याच्या दागिन्यांनी सजवलेले, सोन्याचे ध्वज लावलेले, सोन्याच्या जाळीने झाकलेले आणि वलाहक अश्वराज प्रमुख असलेले चौऱ्याऐंशी हजार घोडे होते; सिंहाच्या कातड्याने, वाघाच्या कातड्याने, बिबट्याच्या कातड्याने किंवा पिवळसर लोकरीच्या वस्त्राने वेढलेले, सोन्याच्या दागिन्यांनी सजवलेले, सोन्याचे ध्वज लावलेले, सोन्याच्या जाळीने झाकलेले आणि वैजयंत रथ प्रमुख असलेले चौऱ्याऐंशी हजार रथ होते; मणिरत्न प्रमुख असलेले चौऱ्याऐंशी हजार मणी होते; सुभद्रा देवी प्रमुख असलेल्या चौऱ्याऐंशी हजार स्त्रिया (राण्या) होत्या; गृहपती-रत्न प्रमुख असलेले चौऱ्याऐंशी हजार गृहपती होते; परिणायक-रत्न (मुख्य सल्लागार) प्रमुख असलेले आणि आज्ञा पाळणारे चौऱ्याऐंशी हजार क्षत्रिय होते; सहज दूध देणाऱ्या, तागाच्या दोऱ्यांनी बांधलेल्या आणि काशाच्या भांड्यात दूध काढल्या जाणाऱ्या चौऱ्याऐंशी हजार दुभत्या गाई होत्या; अतिशय तलम क्षोम (ताग), कापूस, रेशीम आणि लोकरीपासून बनवलेले चौऱ्याऐंशी हजार कोटी वस्त्र-जोड होते; आणि आनंदा! राजा महासुदस्सन यांच्यासाठी सकाळी आणि संध्याकाळी वाढण्यासाठी चौऱ्याऐंशी हजार भाताची भांडी शिजवली जात असत. ๒๖๔. ‘‘เตน [Pg.154] โข ปนานนฺท, สมเยน รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส จตุราสีติ นาคสหสฺสานิ สายํ ปาตํ อุปฏฺฐานํ อาคจฺฉนฺติ. อถ โข, อานนฺท, รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส เอตทโหสิ – ‘อิมานิ โข เม จตุราสีติ นาคสหสฺสานิ สายํ ปาตํ อุปฏฺฐานํ อาคจฺฉนฺติ, ยํนูน วสฺสสตสฺส วสฺสสตสฺส อจฺจเยน ทฺเวจตฺตาลีสํ ทฺเวจตฺตาลีสํ นาคสหสฺสานิ สกึ สกึ อุปฏฺฐานํ อาคจฺเฉยฺยุ’นฺติ. อถ โข, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน ปริณายกรตนํ อามนฺเตสิ – ‘อิมานิ โข เม, สมฺม ปริณายกรตน, จตุราสีติ นาคสหสฺสานิ สายํ ปาตํ อุปฏฺฐานํ อาคจฺฉนฺติ, เตน หิ, สมฺม ปริณายกรตน, วสฺสสตสฺส วสฺสสตสฺส อจฺจเยน ทฺเวจตฺตาลีสํ ทฺเวจตฺตาลีสํ นาคสหสฺสานิ สกึ สกึ อุปฏฺฐานํ อาคจฺฉนฺตู’ติ. ‘เอวํ, เทวา’ติ โข, อานนฺท, ปริณายกรตนํ รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส ปจฺจสฺโสสิ. อถ โข, อานนฺท, รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส อปเรน สมเยน วสฺสสตสฺส วสฺสสตสฺส อจฺจเยน ทฺเวจตฺตาลีสํ ทฺเวจตฺตาลีสํ นาคสหสฺสานิ สกึ สกึ อุปฏฺฐานํ อาคมํสุ. २६४. त्या काळी, आनंदा! राजा महासुदस्सन यांच्या सेवेसाठी सकाळी आणि संध्याकाळी चौऱ्याऐंशी हजार हत्ती येत असत. तेव्हा, आनंदा! राजा महासुदस्सन यांच्या मनात असा विचार आला— 'हे चौऱ्याऐंशी हजार हत्ती सकाळी आणि संध्याकाळी माझ्या सेवेसाठी येतात. तर मग असे झाले तर किती बरे होईल की, दर शंभर वर्षांनी बेचाळीस-बेचाळीस हजार हत्तींनी आळीपाळीने एकदाच माझ्या सेवेसाठी यावे!' मग, आनंदा! राजा महासुदस्सन यांनी परिणायक-रत्नाला (मुख्य सल्लागाराला) बोलावून म्हटले— 'प्रिय परिणायक-रत्ना! हे चौऱ्याऐंशी हजार हत्ती सकाळी आणि संध्याकाळी माझ्या सेवेसाठी येतात. म्हणूनच, प्रिय परिणायक-रत्ना! आता दर शंभर वर्षांनी बेचाळीस-बेचाळीस हजार हत्तींनी आळीपाळीने एकदाच माझ्या सेवेसाठी यावे.' आनंदा! परिणायक-रत्नाने राजा महासुदस्सन यांना 'तसेच होईल, महाराज!' असे म्हणून संमती दिली. त्यानंतर, आनंदा! राजा महासुदस्सन यांच्याकडे नंतरच्या काळात दर शंभर वर्षांनी बेचाळीस-बेचाळीस हजार हत्ती आळीपाळीने एकदाच सेवेसाठी येऊ लागले. สุภทฺทาเทวิอุปสงฺกมนํ सुभद्रा देवीचे आगमन ๒๖๕. ‘‘อถ โข, อานนฺท, สุภทฺทาย เทวิยา พหุนฺนํ วสฺสานํ พหุนฺนํ วสฺสสตานํ พหุนฺนํ วสฺสสหสฺสานํ อจฺจเยน เอตทโหสิ – ‘จิรํ ทิฏฺโฐ โข เม ราชา มหาสุทสฺสโน. ยํนูนาหํ ราชานํ มหาสุทสฺสนํ ทสฺสนาย อุปสงฺกเมยฺย’นฺติ. อถ โข, อานนฺท, สุภทฺทา เทวี อิตฺถาคารํ อามนฺเตสิ – ‘เอถ ตุมฺเห สีสานิ นฺหายถ ปีตานิ วตฺถานิ ปารุปถ. จิรํ ทิฏฺโฐ โน ราชา มหาสุทสฺสโน, ราชานํ มหาสุทสฺสนํ ทสฺสนาย อุปสงฺกมิสฺสามา’ติ. ‘เอวํ, อยฺเย’ติ โข, อานนฺท, อิตฺถาคารํ สุภทฺทาย เทวิยา ปฏิสฺสุตฺวา สีสานิ นฺหายิตฺวา ปีตานิ วตฺถานิ ปารุปิตฺวา เยน สุภทฺทา เทวี เตนุปสงฺกมิ. อถ โข, อานนฺท, สุภทฺทา เทวี ปริณายกรตนํ อามนฺเตสิ – ‘กปฺเปหิ, สมฺม ปริณายกรตน, จตุรงฺคินึ เสนํ, จิรํ ทิฏฺโฐ โน ราชา มหาสุทสฺสโน, ราชานํ มหาสุทสฺสนํ ทสฺสนาย อุปสงฺกมิสฺสามา’ติ. ‘เอวํ, เทวี’ติ โข, อานนฺท, ปริณายกรตนํ สุภทฺทาย เทวิยา ปฏิสฺสุตฺวา จตุรงฺคินึ เสนํ กปฺปาเปตฺวา สุภทฺทาย เทวิยา ปฏิเวเทสิ – ‘กปฺปิตา โข, เทวิ, จตุรงฺคินี เสนา, ยสฺสทานิ กาลํ มญฺญสี’ติ. อถ โข, อานนฺท, สุภทฺทา [Pg.155] เทวี จตุรงฺคินิยา เสนาย สทฺธึ อิตฺถาคาเรน เยน ธมฺโม ปาสาโท เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ธมฺมํ ปาสาทํ อภิรุหิตฺวา เยน มหาวิยูหํ กูฏาคารํ เตนุปสงฺกมิ. อุปสงฺกมิตฺวา มหาวิยูหสฺส กูฏาคารสฺส ทฺวารพาหํ อาลมฺพิตฺวา อฏฺฐาสิ. อถ โข, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน สทฺทํ สุตฺวา – ‘กึ นุ โข มหโต วิย ชนกายสฺส สทฺโท’ติ มหาวิยูหา กูฏาคารา นิกฺขมนฺโต อทฺทส สุภทฺทํ เทวึ ทฺวารพาหํ อาลมฺพิตฺวา ฐิตํ, ทิสฺวาน สุภทฺทํ เทวึ เอตทโวจ – ‘เอตฺเถว, เทวิ, ติฏฺฐ มา ปาวิสี’ติ. อถ โข, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน อญฺญตรํ ปุริสํ อามนฺเตสิ – ‘เอหิ ตฺวํ, อมฺโภ ปุริส, มหาวิยูหา กูฏาคารา โสวณฺณมยํ ปลฺลงฺกํ นีหริตฺวา สพฺพโสวณฺณมเย ตาลวเน ปญฺญเปหี’ติ. ‘เอวํ, เทวา’ติ โข, อานนฺท, โส ปุริโส รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส ปฏิสฺสุตฺวา มหาวิยูหา กูฏาคารา โสวณฺณมยํ ปลฺลงฺกํ นีหริตฺวา สพฺพโสวณฺณมเย ตาลวเน ปญฺญเปสิ. อถ โข, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน ทกฺขิเณน ปสฺเสน สีหเสยฺยํ กปฺเปสิ ปาเท ปาทํ อจฺจาธาย สโต สมฺปชาโน. २६५. त्यानंतर, आनंदा, राणी सुभद्देच्या मनात अनेक वर्षांनंतर, अनेक शतकांनंतर, अनेक सहस्र वर्षांनंतर असा विचार आला – ‘मी राजा महासुदस्सन यांना न पाहता बराच काळ झाला आहे. मी राजा महासुदस्सन यांच्या दर्शनासाठी त्यांच्याकडे जावे का?’ त्यानंतर, आनंदा, राणी सुभद्देने आपल्या अंतःपुरातील स्त्रियांना बोलावून म्हटले – ‘या, तुम्ही आपले केस धुवा आणि पिवळी वस्त्रे परिधान करा. आपण राजा महासुदस्सन यांना न पाहता बराच काळ झाला आहे, आपण राजा महासुदस्सन यांच्या दर्शनासाठी जाऊया.’ ‘तसेच असो, देवी!’ असे म्हणून, आनंदा, अंतःपुरातील स्त्रियांनी राणी सुभद्देच्या शब्दांचा स्वीकार केला. त्यांनी आपले केस धुवून, पिवळी वस्त्रे परिधान केली आणि जेथे राणी सुभद्दे होती तेथे त्या आल्या. त्यानंतर, आनंदा, राणी सुभद्देने परिणायकरत्नाला बोलावून म्हटले – ‘मित्रा परिणायकरत्ना, चतुरंग सेना तयार कर. आपण राजा महासुदस्सन यांना न पाहता बराच काळ झाला आहे, आपण राजा महासुदस्सन यांच्या दर्शनासाठी जाऊया.’ ‘तसेच असो, देवी!’ असे म्हणून, आनंदा, परिणायकरत्नाने राणी सुभद्देच्या शब्दांचा स्वीकार केला, चतुरंग सेना तयार केली आणि राणी सुभद्देला कळवले – ‘देवी, चतुरंग सेना तयार आहे. आता आपल्याला जसा योग्य वेळ वाटेल तसे करावे.’ त्यानंतर, आनंदा, राणी सुभद्देने चतुरंग सेनेसह आणि अंतःपुरातील स्त्रियांसह जेथे धम्म प्रासाद होता, तेथे प्रयाण केले. धम्म प्रासादावर चढून ती जेथे महावियूह कूटागार होते, तेथे गेली. तेथे पोहोचून ती महावियूह कूटागाराच्या दाराच्या चौकटीला टेकून उभी राहिली. त्यानंतर, आनंदा, राजा महासुदस्सन यांनी तो आवाज ऐकून विचार केला – ‘हा मोठा जनसमुदायासारखा आवाज कशाचा आहे?’ महावियूह कूटागारातून बाहेर पडताना त्यांनी राणी सुभद्देला दाराच्या चौकटीला टेकून उभे राहिलेले पाहिले. राणी सुभद्देला पाहून ते म्हणाले – ‘देवी, तिथेच थांब, आत येऊ नकोस.’ त्यानंतर, आनंदा, राजा महासुदस्सन यांनी एका सेवकाला बोलावून म्हटले – ‘हे भल्या माणसा, इकडे ये. महावियूह कूटागारातून सोन्याचे आसन बाहेर काढून ते संपूर्ण सुवर्णमय असलेल्या ताडवनात मांड.’ ‘तसेच असो, महाराज!’ असे म्हणून, आनंदा, त्या सेवकाने राजा महासुदस्सन यांच्या आज्ञेचे पालन केले. त्याने महावियूह कूटागारातून सोन्याचे आसन बाहेर काढून ते संपूर्ण सुवर्णमय ताडवनात मांडले. त्यानंतर, आनंदा, राजा महासुदस्सन यांनी उजव्या कुशीवर, एका पायावर दुसरा पाय ठेवून, स्मृतिमान व सजग राहून सिंहशयन केले. ๒๖๖. ‘‘อถ โข, อานนฺท, สุภทฺทาย เทวิยา เอตทโหสิ – ‘วิปฺปสนฺนานิ โข รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส อินฺทฺริยานิ, ปริสุทฺโธ ฉวิวณฺโณ ปริโยทาโต, มา เหว โข ราชา มหาสุทสฺสโน กาลมกาสี’ติ ราชานํ มหาสุทสฺสนํ เอตทโวจ – २६६. त्यानंतर, आनंदा, राणी सुभद्देच्या मनात असा विचार आला – ‘राजा महासुदस्सन यांची इंद्रिये अत्यंत प्रसन्न दिसत आहेत, त्यांच्या त्वचेचा वर्ण अत्यंत शुद्ध आणि उजळ आहे. राजा महासुदस्सन यांचा मृत्यू तर होणार नाही ना!’ म्हणून तिने राजा महासुदस्सन यांना असे म्हटले – ‘อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ นครสหสฺสานิ กุสาวตีราชธานิปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ชเนหิ ชีวิเต อเปกฺขํ กโรหิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ ปาสาทสหสฺสานิ ธมฺมปาสาทปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ชเนหิ ชีวิเต อเปกฺขํ กโรหิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ กูฏาคารสหสฺสานิ มหาวิยูหกูฏาคารปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ชเนหิ ชีวิเต อเปกฺขํ กโรหิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ ปลฺลงฺกสหสฺสานิ โสวณฺณมยานิ รูปิยมยานิ ทนฺตมยานิ สารมยานิ โคนกตฺถตานิ ปฏิกตฺถตานิ ปฏลิกตฺถตานิ กทลิมิคปวรปจฺจตฺถรณานิ สอุตฺตรจฺฉทานิ อุภโตโลหิตกูปธานานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ชเนหิ, ชีวิเต อเปกฺขํ กโรหิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ นาคสหสฺสานิ โสวณฺณาลงฺการานิ โสวณฺณธชานิ เหมชาลปฏิจฺฉนฺนานิ อุโปสถนาคราชปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว[Pg.156], ฉนฺทํ ชเนหิ ชีวิเต อเปกฺขํ กโรหิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ อสฺสสหสฺสานิ โสวณฺณาลงฺการานิ โสวณฺณธชานิ เหมชาลปฏิจฺฉนฺนานิ วลาหกอสฺสราชปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ชเนหิ ชีวิเต อเปกฺขํ กโรหิ. อิมานิ เต, เทว จตุราสีติ รถสหสฺสานิ สีหจมฺมปริวารานิ พฺยคฺฆจมฺมปริวารานิ ทีปิจมฺมปริวารานิ ปณฺฑุกมฺพลปริวารานิ โสวณฺณาลงฺการานิ โสวณฺณธชานิ เหมชาลปฏิจฺฉนฺนานิ เวชยนฺตรถปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ชเนหิ ชีวิเต อเปกฺขํ กโรหิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ มณิสหสฺสานิ มณิรตนปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ชเนหิ ชีวิเต อเปกฺขํ กโรหิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ อิตฺถิสหสฺสานิ อิตฺถิรตนปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ชเนหิ ชีวิเต อเปกฺขํ กโรหิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ คหปติสหสฺสานิ คหปติรตนปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ชเนหิ ชีวิเต อเปกฺขํ กโรหิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ ขตฺติยสหสฺสานิ อนุยนฺตานิ ปริณายกรตนปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ชเนหิ ชีวิเต อเปกฺขํ กโรหิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ เธนุสหสฺสานิ ทุหสนฺทนานิ กํสูปธารณานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ชเนหิ ชีวิเต อเปกฺขํ กโรหิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ วตฺถโกฏิสหสฺสานิ โขมสุขุมานํ กปฺปาสิกสุขุมานํ โกเสยฺยสุขุมานํ กมฺพลสุขุมานํ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ชเนหิ, ชีวิเต อเปกฺขํ กโรหิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ ถาลิปากสหสฺสานิ สายํ ปาตํ ภตฺตาภิหาโร อภิหริยติ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ชเนหิ ชีวิเต อเปกฺขํ กโรหี’ติ. ‘महाराज, कुसावती राजधानी प्रमुख असलेली ही तुमची चौऱ्याऐंशी हजार शहरे आहेत. महाराज, यांच्याविषयी आसक्ती बाळगा, जगण्याची इच्छा धरा. महाराज, धम्म प्रासाद प्रमुख असलेले हे十分に तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार प्रासाद आहेत. महाराज, यांच्याविषयी आसक्ती बाळगा, जगण्याची इच्छा धरा. महाराज, महावियूह कूटागार प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार कूटागार आहेत. महाराज, यांच्याविषयी आसक्ती बाळगा, जगण्याची इच्छा धरा. महाराज, सोन्याचे, चांदीचे, हस्तिदंताचे आणि मौल्यवान लाकडाचे बनवलेले, लांब केसांच्या चटयांनी, पांढऱ्या लोकरीच्या चादरींनी, नक्षीदार पांघरूणांनी, कादली-मृगाच्या उत्कृष्ट कातड्याच्या बिछान्यांनी अंथरलेले, वर लाल छत असलेले आणि दोन्ही बाजूंना लाल रंगाच्या उशी असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार पलंग आहेत. महाराज, यांच्याविषयी आसक्ती बाळगा, जगण्याची इच्छा धरा. महाराज, सोन्याच्या दागिन्यांनी सजवलेले, सोन्याचे ध्वज असलेले, सोन्याच्या जाळीने झाकलेले आणि उपोसथ हत्तीराज प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार हत्ती आहेत. महाराज, यांच्याविषयी आसक्ती बाळगा, जगण्याची इच्छा धरा. महाराज, सोन्याच्या दागिन्यांनी सजवलेले, सोन्याचे ध्वज असलेले, सोन्याच्या जाळीने झाकलेले आणि वलाहक अश्वराज प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार घोडे आहेत. महाराज, यांच्याविषयी आसक्ती बाळगा, जगण्याची इच्छा धरा. महाराज, सिंहाच्या कातड्याने, वाघाच्या कातड्याने, बिबट्याच्या कातड्याने आणि पिवळ्या घोंगड्यांनी वेढलेले, सोन्याच्या दागिन्यांनी सजवलेले, सोन्याचे ध्वज असलेले, सोन्याच्या जाळीने झाकलेले आणि वैजयंत रथ प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार रथ आहेत. महाराज, यांच्याविषयी आसक्ती बाळगा, जगण्याची इच्छा धरा. महाराज, मणिरत्न प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार मणी आहेत. महाराज, यांच्याविषयी आसक्ती बाळगा, जगण्याची इच्छा धरा. महाराज, स्त्रीरत्न प्रमुख असलेल्या या तुमच्या चौऱ्याऐंशी हजार स्त्रिया आहेत. महाराज, यांच्याविषयी आसक्ती बाळगा, जगण्याची इच्छा धरा. महाराज, गृहपतीरत्न प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार गृहपती आहेत. महाराज, यांच्याविषयी आसक्ती बाळगा, जगण्याची इच्छा धरा. महाराज, परिणायकरत्न प्रमुख असलेले आणि तुमचे अनुयायी असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार क्षत्रिय आहेत. महाराज, यांच्याविषयी आसक्ती बाळगा, जगण्याची इच्छा धरा. महाराज, स्वतःहून दूध देणाऱ्या आणि कांस्यपात्रात दूध काढल्या जाणाऱ्या या तुमच्या चौऱ्याऐंशी हजार दुभत्या गाई आहेत. महाराज, यांच्याविषयी आसक्ती बाळगा, जगण्याची इच्छा धरा. महाराज, तलम तागाची, सुती, रेशमी आणि लोकरीची ही तुमची चौऱ्याऐंशी हजार कोटी वस्त्रे आहेत. महाराज, यांच्याविषयी आसक्ती बाळगा, जगण्याची इच्छा धरा. महाराज, सकाळ-संध्याकाळ वाढली जाणारी, चौऱ्याऐंशी हजार अन्नपात्रांमध्ये शिजवलेली ही तुमची भोजन-पात्रे आहेत. महाराज, यांच्याविषयी आसक्ती बाळगा, जगण्याची इच्छा धरा.’ ๒๖๗. ‘‘เอวํ วุตฺเต, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน สุภทฺทํ เทวึ เอตทโวจ – २६७. असे म्हटले असता, आनंदा, राजा महासुदस्सन यांनी राणी सुभद्देला असे म्हटले – ‘ทีฆรตฺตํ โข มํ ตฺวํ, เทวิ, อิฏฺเฐหิ กนฺเตหิ ปิเยหิ มนาเปหิ สมุทาจริตฺถ; อถ จ ปน มํ ตฺวํ ปจฺฉิเม กาเล อนิฏฺเฐหิ อกนฺเตหิ อปฺปิเยหิ อมนาเปหิ สมุทาจรสี’ติ. ‘กถํ จรหิ ตํ, เทว, สมุทาจรามี’ติ? ‘เอวํ โข มํ ตฺวํ, เทวิ, สมุทาจร – ‘‘สพฺเพเหว, เทว, ปิเยหิ มนาเปหิ นานาภาโว วินาภาโว อญฺญถาภาโว, มา โข ตฺวํ, เทว, สาเปกฺโข กาลมกาสิ, ทุกฺขา สาเปกฺขสฺส กาลงฺกิริยา, ครหิตา จ สาเปกฺขสฺส กาลงฺกิริยา. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ นครสหสฺสานิ [Pg.157] กุสาวตีราชธานิปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ ปาสาทสหสฺสานิ ธมฺมปาสาทปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ กูฏาคารสหสฺสานิ มหาวิยูหกูฏาคารปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ ปลฺลงฺกสหสฺสานิ โสวณฺณมยานิ รูปิยมยานิ ทนฺตมยานิ สารมยานิ โคนกตฺถตานิ ปฏิกตฺถตานิ ปฏลิกตฺถตานิ กทลิมิคปวรปจฺจตฺถรณานิ สอุตฺตรจฺฉทานิ อุภโตโลหิตกูปธานานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ นาคสหสฺสานิ โสวณฺณาลงฺการานิ โสวณฺณธชานิ เหมชาลปฏิจฺฉนฺนานิ อุโปสถนาคราชปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ อสฺสสหสฺสานิ โสวณฺณาลงฺการานิ โสวณฺณธชานิ เหมชาลปฏิจฺฉนฺนานิ วลาหกอสฺสราชปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ รถสหสฺสานิ สีหจมฺมปริวารานิ พฺยคฺฆจมฺมปริวารานิ ทีปิจมฺมปริวารานิ ปณฺฑุกมฺพลปริวารานิ โสวณฺณาลงฺการานิ โสวณฺณธชานิ เหมชาลปฏิจฺฉนฺนานิ เวชยนฺตรถปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ มณิสหสฺสานิ มณิรตนปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ อิตฺถิสหสฺสานิ สุภทฺทาเทวิปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ คหปติสหสฺสานิ คหปติรตนปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ ขตฺติยสหสฺสานิ อนุยนฺตานิ ปริณายกรตนปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ เธนุสหสฺสานิ ทุหสนฺทนานิ กํสูปธารณานิ. เอตฺถ เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ วตฺถโกฏิสหสฺสานิ โขมสุขุมานํ กปฺปาสิกสุขุมานํ โกเสยฺยสุขุมานํ กมฺพลสุขุมานํ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต เทว จตุราสีติ ถาลิปากสหสฺสานิ สายํ ปาตํ ภตฺตาภิหาโร อภิหริยติ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสี’’’ติ. "देवी, तू दीर्घकाळापर्यंत माझ्याशी इष्ट, कांत, प्रिय आणि मनाला अनुकूल अशा शब्दांत बोललीस; परंतु आता अंतिम समयी तू माझ्याशी अनिष्ट, अकांत, अप्रिय आणि मनाला प्रतिकूल अशा शब्दांत बोलत आहेस." "महाराज, मग मी आपल्याशी कशा प्रकारे बोलावे?" "देवी, तू माझ्याशी असे बोल – 'महाराज, सर्व प्रिय आणि मनाला अनुकूल असणाऱ्या गोष्टींपासून नानाभाव, विनाभाव आणि अन्यथाभाव होणे अटळ आहे. महाराज, आपण आसक्ती ठेवून मृत्यूला सामोरे जाऊ नका. आसक्ती ठेवून मरणे हे दुःखद आहे आणि आसक्ती ठेवून मरणे हे निंदनीय आहे. महाराज, कुशावती राजधानी प्रमुख असलेली ही तुमची चौऱ्याऐंशी हजार शहरे आहेत. महाराज, या शहरांविषयीची आसक्ती सोडून द्या, जगण्याची इच्छा करू नका. महाराज, धम्मप्रासाद प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार प्रासाद आहेत. महाराज, या प्रासादांविषयीची आसक्ती सोडून द्या, जगण्याची इच्छा करू नका. महाराज, महाव्यूह कुटागार प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार कुटागार आहेत. महाराज, या कुटागारांविषयीची आसक्ती सोडून द्या, जगण्याची इच्छा करू नका. महाराज, सुवर्णमय, रौप्यमय, हस्तिदंती आणि मौल्यवान लाकडाचे बनलेले, लांब लोकरीच्या चटयांनी अंथरलेले, पांढऱ्या लोकरीच्या चादरींनी अंथरलेले, फुलांच्या नक्षीकाम असलेल्या लोकरीच्या चादरींनी अंथरलेले, कदली नावाच्या हरिणाच्या कातड्याच्या उत्कृष्ट अंथरूणांनी युक्त, लाल रंगाच्या चांदव्यांसह आणि दोन्ही बाजूंना लाल रंगाच्या उशींनी युक्त असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार पलंग आहेत. महाराज, या पलंगांविषयीची आसक्ती सोडून द्या, जगण्याची इच्छा करू नका. महाराज, सुवर्णालंकारांनी सुशोभित, सुवर्णध्वज लावलेले, सोन्याच्या जाळ्यांनी झाकलेले आणि उपोसथ हत्तीराज प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार हत्ती आहेत. महाराज, या हत्तींविषयीची आसक्ती सोडून द्या, जगण्याची इच्छा करू नका. महाराज, सुवर्णालंकारांनी सुशोभित, सुवर्णध्वज लावलेले, सोन्याच्या जाळ्यांनी झाकलेले आणि वलाहक अश्वराज प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार घोडे आहेत. महाराज, या घोड्यांविषयीची आसक्ती सोडून द्या, जगण्याची इच्छा करू नका. महाराज, सिंहाच्या कातड्याने मढवलेले, वाघाच्या कातड्याने मढवलेले, बिबट्याच्या कातड्याने मढवलेले, पिवळ्या रंगाच्या घोंगड्यांनी मढवलेले, सुवर्णालंकारांनी सुशोभित, सुवर्णध्वज लावलेले, सोन्याच्या जाळ्यांनी झाकलेले आणि वैजयंत रथ प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार रथ आहेत. महाराज, या रथांविषयीची आसक्ती सोडून द्या, जगण्याची इच्छा करू नका. महाराज, मणिरत्न प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार मणी आहेत. महाराज, या मण्यांविषयीची आसक्ती सोडून द्या, जगण्याची इच्छा करू नका. महाराज, सुभद्रा देवी प्रमुख असलेल्या या तुमच्या चौऱ्याऐंशी हजार स्त्रिया आहेत. महाराज, या स्त्रियांविषयीची आसक्ती सोडून द्या, जगण्याची इच्छा करू नका. महाराज, गृहपती-रत्न प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार गृहपती आहेत. महाराज, या गृहपतींविषयीची आसक्ती सोडून द्या, जगण्याची इच्छा करू नका. महाराज, परिणायक-रत्न प्रमुख असलेले आणि तुमचे अनुकरण करणारे हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार क्षत्रिय आहेत. महाराज, या क्षत्रियांविषयीची आसक्ती सोडून द्या, जगण्याची इच्छा करू नका. महाराज, स्वतःहून दूध देणाऱ्या आणि ज्यांचे दूध कांस्यपात्रात काढले जाते अशा या तुमच्या चौऱ्याऐंशी हजार दुभत्या गाई आहेत. महाराज, या गाईंविषयीची आसक्ती सोडून द्या, जगण्याची इच्छा करू नका. महाराज, तलम सुती, तलम कापूस, तलम रेशमी आणि तलम लोकरीच्या वस्त्रांचे हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार कोटी वस्त्रसंच आहेत. महाराज, या वस्त्रांविषयीची आसक्ती सोडून द्या, जगण्याची इच्छा करू नका. महाराज, सकाळ-संध्याकाळ जेवणासाठी आणली जाणारी ही तुमची चौऱ्याऐंशी हजार अन्नपात्रे आहेत. महाराज, या अन्नाविषयीची आसक्ती सोडून द्या, जगण्याची इच्छा करू नका.' असे तू माझ्याशी बोल." ๒๖๘. ‘‘เอวํ [Pg.158] วุตฺเต, อานนฺท, สุภทฺทา เทวี ปโรทิ อสฺสูนิ ปวตฺเตสิ. อถ โข, อานนฺท, สุภทฺทา เทวี อสฺสูนิ ปุญฺฉิตฺวา ราชานํ มหาสุทสฺสนํ เอตทโวจ – २६८. "आनंदा, असे म्हटले असता, सुभद्रा देवी रडू लागली आणि तिच्या डोळ्यांतून अश्रू वाहू लागले. त्यानंतर, आनंदा, सुभद्रा देवीने आपले अश्रू पुसले आणि राजा महासुदस्सन यांना असे म्हणाली –" ‘สพฺเพเหว, เทว, ปิเยหิ มนาเปหิ นานาภาโว วินาภาโว อญฺญถาภาโว, มา โข ตฺวํ, เทว, สาเปกฺโข กาลมกาสิ, ทุกฺขา สาเปกฺขสฺส กาลงฺกิริยา, ครหิตา จ สาเปกฺขสฺส กาลงฺกิริยา. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ นครสหสฺสานิ กุสาวตีราชธานิปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ ปาสาทสหสฺสานิ ธมฺมปาสาทปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ กูฏาคารสหสฺสานิ มหาวิยูหกูฏาคารปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ ปลฺลงฺกสหสฺสานิ โสวณฺณมยานิ รูปิยมยานิ ทนฺตมยานิ สารมยานิ โคนกตฺถตานิ ปฏิกตฺถตานิ ปฏลิกตฺถตานิ กทลิมิคปวรปจฺจตฺถรณานิ สอุตฺตรจฺฉทานิ อุภโตโลหิตกูปธานานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ นาคสหสฺสานิ โสวณฺณาลงฺการานิ โสวณฺณธชานิ เหมชาลปฏิจฺฉนฺนานิ อุโปสถนาคราชปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ อสฺสสหสฺสานิ โสวณฺณาลงฺการานิ โสวณฺณธชานิ เหมชาลปฏิจฺฉนฺนานิ วลาหกอสฺสราชปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห, ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ รถสหสฺสานิ สีหจมฺมปริวารานิ พฺยคฺฆจมฺมปริวารานิ ทีปิจมฺมปริวารานิ ปณฺฑุกมฺพลปริวารานิ โสวณฺณาลงฺการานิ โสวณฺณธชานิ เหมชาลปฏิจฺฉนฺนานิ เวชยนฺตรถปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ มณิสหสฺสานิ มณิรตนปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ อิตฺถิสหสฺสานิ อิตฺถิรตนปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห, ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต[Pg.159], เทว, จตุราสีติ คหปติสหสฺสานิ คหปติรตนปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ ขตฺติยสหสฺสานิ อนุยนฺตานิ ปริณายกรตนปฺปมุขานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ เธนุสหสฺสานิ ทุหสนฺทนานิ กํสูปธารณานิ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ วตฺถโกฏิสหสฺสานิ โขมสุขุมานํ กปฺปาสิกสุขุมานํ โกเสยฺยสุขุมานํ กมฺพลสุขุมานํ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสิ. อิมานิ เต, เทว, จตุราสีติ ถาลิปากสหสฺสานิ สายํ ปาตํ ภตฺตาภิหาโร อภิหริยติ. เอตฺถ, เทว, ฉนฺทํ ปชห ชีวิเต อเปกฺขํ มากาสี’ติ. “महाराज, सर्व प्रिय व मनाला आवडणाऱ्या गोष्टींपासून वेगळे होणे, दुरावणे आणि त्यांचा विनाश होणे अपरिहार्य आहे. महाराज, आपण आसक्ती ठेवून मृत्यूला सामोरे जाऊ नका. आसक्ती ठेवून मरणे हे दुःखद आहे आणि आसक्ती ठेवून मरणे हे निंदनीय आहे. महाराज, कुसावती राजधानी प्रमुख असलेली ही तुमची चौऱ्याऐंशी हजार शहरे आहेत. महाराज, यांच्यावरील आसक्ती सोडून द्या, जीवनाची ओढ धरू नका. महाराज, धम्मप्रासाद प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार प्रासाद आहेत. महाराज, यांच्यावरील आसक्ती सोडून द्या, जीवनाची ओढ धरू नका. महाराज, महाव्यूह कुटागार प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार कुटागार आहेत. महाराज, यांच्यावरील आसक्ती सोडून द्या, जीवनाची ओढ धरू नका. महाराज, सोन्याचे, चांदीचे, हस्तिदंताचे, मौल्यवान लाकडाचे बनलेले, लांब लोकरीच्या चटयांनी, पांढऱ्या लोकरीच्या चादरींनी, फुलांच्या नक्षीकाम केलेल्या चादरींनी, उत्कृष्ट कदली-मृगाच्या कातड्याच्या अंथरूणांनी अंथरलेले, वर छत असलेले आणि दोन्ही बाजूंना लाल रंगाच्या उशी असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार पलंग आहेत. महाराज, यांच्यावरील आसक्ती सोडून द्या, जीवनाची ओढ धरू नका. महाराज, सोन्याच्या दागिन्यांनी सजवलेले, सोन्याचे ध्वज असलेले, सोन्याच्या जाळीने झाकलेले आणि उपोसथ हत्तीराज प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार हत्ती आहेत. महाराज, यांच्यावरील आसक्ती सोडून द्या, जीवनाची ओढ धरू नका. महाराज, सोन्याच्या दागिन्यांनी सजवलेले, सोन्याचे ध्वज असलेले, सोन्याच्या जाळीने झाकलेले आणि वलाहक अश्वराज प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार घोडे आहेत. महाराज, यांच्यावरील आसक्ती सोडून द्या, जीवनाची ओढ धरू नका. महाराज, सिंहाच्या कातड्याने, वाघाच्या कातड्याने, बिबट्याच्या कातड्याने आणि पिवळसर घोंगडीने वेढलेले, सोन्याच्या दागिन्यांनी सजवलेले, सोन्याचे ध्वज असलेले, सोन्याच्या जाळीने झाकलेले आणि वैजयंत रथ प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार रथ आहेत. महाराज, यांच्यावरील आसक्ती सोडून द्या, जीवनाची ओढ धरू नका. महाराज, मणिरत्न प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार मणी आहेत. महाराज, यांच्यावरील आसक्ती सोडून द्या, जीवनाची ओढ धरू नका. महाराज, स्त्रीरत्न प्रमुख असलेल्या या तुमच्या चौऱ्याऐंशी हजार स्त्रिया आहेत. महाराज, यांच्यावरील आसक्ती सोडून द्या, जीवनाची ओढ धरू नका. महाराज, गृहपतीरत्न प्रमुख असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार गृहपती आहेत. महाराज, यांच्यावरील आसक्ती सोडून द्या, जीवनाची ओढ धरू नका. महाराज, परिणायकरत्न प्रमुख असलेले आणि तुमचे अनुकरण करणारे हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार क्षत्रिय आहेत. महाराज, यांच्यावरील आसक्ती सोडून द्या, जीवनाची ओढ धरू नका. महाराज, स्वतःहून दूध देणाऱ्या आणि ज्यांचे दूध कांस्यपात्रात काढले जाते अशा या तुमच्या चौऱ्याऐंशी हजार दुभत्या गाई आहेत. महाराज, यांच्यावरील आसक्ती सोडून द्या, जीवनाची ओढ धरू नका. महाराज, मलमलीचे, सुती, रेशमी आणि लोकरीचे तलम वस्त्र असलेले हे तुमचे चौऱ्याऐंशी हजार कोटी वस्त्र-जोड आहेत. महाराज, यांच्यावरील आसक्ती सोडून द्या, जीवनाची ओढ धरू नका. महाराज, सकाळ-संध्याकाळ ज्यांच्यासाठी अन्न शिजवून आणले जाते अशी ही तुमची चौऱ्याऐंशी हजार अन्नपात्रे आहेत. महाराज, यांच्यावरील आसक्ती सोडून द्या, जीवनाची ओढ धरू नका.” พฺรหฺมโลกูปคมํ ब्रह्मलोकात गमन ๒๖๙. ‘‘อถ โข, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน นจิรสฺเสว กาลมกาสิ. เสยฺยถาปิ, อานนฺท, คหปติสฺส วา คหปติปุตฺตสฺส วา มนุญฺญํ โภชนํ ภุตฺตาวิสฺส ภตฺตสมฺมโท โหติ, เอวเมว โข, อานนฺท, รญฺโญ มหาสุทสฺสนสฺส มารณนฺติกา เวทนา อโหสิ. กาลงฺกโต จ, อานนฺท, ราชา มหาสุทสฺสโน สุคตึ พฺรหฺมโลกํ อุปปชฺชิ. ราชา, อานนฺท, มหาสุทสฺสโน จตุราสีติ วสฺสสหสฺสานิ กุมารกีฬํ กีฬิ. จตุราสีติ วสฺสสหสฺสานิ โอปรชฺชํ กาเรสิ. จตุราสีติ วสฺสสหสฺสานิ รชฺชํ กาเรสิ. จตุราสีติ วสฺสสหสฺสานิ คิหิภูโต ธมฺเม ปาสาเท พฺรหฺมจริยํ จริ. โส จตฺตาโร พฺรหฺมวิหาเร ภาเวตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา พฺรหฺมโลกูปโค อโหสิ. २६९. “आनंदा, त्यानंतर लवकरच राजा महासुदस्सन कालवश झाले. आनंदा, ज्याप्रमाणे एखाद्या गृहपतीला किंवा गृहपतीच्या पुत्राला स्वादिष्ट भोजन केल्यानंतर सुस्ती येते, त्याचप्रमाणे, आनंदा, राजा महासुदस्सन यांना मरणांतिक वेदना जाणवली. आणि कालवश झाल्यावर, आनंदा, राजा महासुदस्सन सुगती अशा ब्रह्मलोकात उत्पन्न झाले. आनंदा, राजा महासुदस्सन यांनी चौऱ्याऐंशी हजार वर्षे बाललीला केली. चौऱ्याऐंशी हजार वर्षे त्यांनी उपराजपद सांभाळले. चौऱ्याऐंशी हजार वर्षे त्यांनी राज्य केले. आणि चौऱ्याऐंशी हजार वर्षे गृहस्थ असताना त्यांनी धम्मप्रासादात ब्रह्मचर्याचे आचरण केले. त्यांनी चार ब्रह्मविहारांची भावना करून, शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर ब्रह्मलोकात गमन केले.” ๒๗๐. ‘‘สิยา โข ปนานนฺท, เอวมสฺส – ‘อญฺโญ นูน เตน สมเยน ราชา มหาสุทสฺสโน อโหสี’ติ, น โข ปเนตํ, อานนฺท, เอวํ ทฏฺฐพฺพํ. อหํ เตน สมเยน ราชา มหาสุทสฺสโน อโหสึ. มม ตานิ จตุราสีติ นครสหสฺสานิ กุสาวตีราชธานิปฺปมุขานิ, มม ตานิ จตุราสีติ ปาสาทสหสฺสานิ ธมฺมปาสาทปฺปมุขานิ, มม ตานิ จตุราสีติ กูฏาคารสหสฺสานิ มหาวิยูหกูฏาคารปฺปมุขานิ, มม ตานิ จตุราสีติ ปลฺลงฺกสหสฺสานิ โสวณฺณมยานิ รูปิยมยานิ ทนฺตมยานิ สารมยานิ โคนกตฺถตานิ ปฏิกตฺถตานิ ปฏลิกตฺถตานิ กทลิมิคปวรปจฺจตฺถรณานิ สอุตฺตรจฺฉทานิ [Pg.160] อุภโตโลหิตกูปธานานิ, มม ตานิ จตุราสีติ นาคสหสฺสานิ โสวณฺณาลงฺการานิ โสวณฺณธชานิ เหมชาลปฏิจฺฉนฺนานิ อุโปสถนาคราชปฺปมุขานิ, มม ตานิ จตุราสีติ อสฺสสหสฺสานิ โสวณฺณาลงฺการานิ โสวณฺณธชานิ เหมชาลปฏิจฺฉนฺนานิ วลาหกอสฺสราชปฺปมุขานิ, มม ตานิ จตุราสีติ รถสหสฺสานิ สีหจมฺมปริวารานิ พฺยคฺฆจมฺมปริวารานิ ทีปิจมฺมปริวารานิ ปณฺฑุกมฺพลปริวารานิ โสวณฺณาลงฺการานิ โสวณฺณธชานิ เหมชาลปฏิจฺฉนฺนานิ เวชยนฺตรถปฺปมุขานิ, มม ตานิ จตุราสีติ มณิสหสฺสานิ มณิรตนปฺปมุขานิ, มม ตานิ จตุราสีติ อิตฺถิสหสฺสานิ สุภทฺทาเทวิปฺปมุขานิ, มม ตานิ จตุราสีติ คหปติสหสฺสานิ คหปติรตนปฺปมุขานิ, มม ตานิ จตุราสีติ ขตฺติยสหสฺสานิ อนุยนฺตานิ ปริณายกรตนปฺปมุขานิ, มม ตานิ จตุราสีติ เธนุสหสฺสานิ ทุหสนฺทนานิ กํสูปธารณานิ, มม ตานิ จตุราสีติ วตฺถโกฏิสหสฺสานิ โขมสุขุมานํ กปฺปาสิกสุขุมานํ โกเสยฺยสุขุมานํ กมฺพลสุขุมานํ, มม ตานิ จตุราสีติ ถาลิปากสหสฺสานิ สายํ ปาตํ ภตฺตาภิหาโร อภิหริยิตฺถ. २७०. आनंदा, कदाचित तुला असे वाटेल की, 'त्या काळी राजा महासुदस्सन दुसराच कोणीतरी होता.' पण आनंदा, तू असे समजू नयेस. मीच त्या काळी राजा महासुदस्सन होतो. कुसावती राजधानी प्रमुख असलेली ती चौऱ्याऐंशी हजार शहरे माझीच होती; धम्म प्रासाद प्रमुख असलेले ते चौऱ्याऐंशी हजार प्रासाद माझेच होते; महावियूह कुटागार प्रमुख असलेले ते चौऱ्याऐंशी हजार कुटागार माझेच होते; सोन्याचे, चांदीचे, हस्तिदंताचे, मौल्यवान लाकडाचे बनलेले, लांब केसांच्या चटयांनी, पांढऱ्या लोकरीच्या चादरींनी, फुलांच्या नक्षीकाम केलेल्या चादरींनी, कादली-मृगाच्या उत्कृष्ट कातड्याच्या अंथरूणांनी अंथरलेले, वर लाल छत असलेले आणि दोन्ही बाजूंना लाल उशा असलेले ते चौऱ्याऐंशी हजार पलंग माझेच होते; सोन्याच्या दागिन्यांनी सजवलेले, सोन्याचे ध्वज लावलेले, सोन्याच्या जाळीने झाकलेले, उपोसथ हत्तीराज प्रमुख असलेले ते चौऱ्याऐंशी हजार हत्ती माझेच होते; सोन्याच्या दागिन्यांनी सजवलेले, सोन्याचे ध्वज लावलेले, सोन्याच्या जाळीने झाकलेले, वलाहक अश्वराज प्रमुख असलेले ते चौऱ्याऐंशी हजार घोडे माझेच होते; सिंहाच्या कातड्याचे, वाघाच्या कातड्याचे, बिबट्याच्या कातड्याचे, पिवळ्या रंगाच्या घोंगड्यांचे आवरण असलेले, सोन्याच्या दागिन्यांनी सजवलेले, सोन्याचे ध्वज लावलेले, सोन्याच्या जाळीने झाकलेले, वैजयंत रथ प्रमुख असलेले ते चौऱ्याऐंशी हजार रथ माझेच होते; मणिरत्न प्रमुख असलेले ते चौऱ्याऐंशी हजार मणी माझेच होते; सुभद्दा देवी प्रमुख असलेल्या त्या चौऱ्याऐंशी हजार स्त्रिया माझ्याच होत्या; गृहपती रत्न प्रमुख असलेले ते चौऱ्याऐंशी हजार गृहपती माझेच होते; परिणायक रत्न प्रमुख असलेले आणि माझ्या पाठीशी चालणारे ते चौऱ्याऐंशी हजार क्षत्रिय माझेच होते; स्वतःहून दूध देणाऱ्या आणि कांस्यपात्रात दूध काढले जाणाऱ्या त्या चौऱ्याऐंशी हजार दुभत्या गाई माझ्याच होत्या; सुती, रेशमी, लोकरी आणि मलमलीच्या वस्त्रांचे ते चौऱ्याऐंशी हजार कोटी वस्त्रजोड माझेच होते; सकाळी आणि संध्याकाळी वाढले जाणारे चौऱ्याऐंशी हजार थाळी अन्न माझेच होते. ๒๗๑. ‘‘เตสํ โข ปนานนฺท, จตุราสีตินครสหสฺสานํ เอกญฺเญว ตํ นครํ โหติ, ยํ เตน สมเยน อชฺฌาวสามิ ยทิทํ กุสาวตี ราชธานี. เตสํ โข ปนานนฺท, จตุราสีติปาสาทสหสฺสานํ เอโกเยว โส ปาสาโท โหติ, ยํ เตน สมเยน อชฺฌาวสามิ ยทิทํ ธมฺโม ปาสาโท. เตสํ โข ปนานนฺท, จตุราสีติกูฏาคารสหสฺสานํ เอกญฺเญว ตํ กูฏาคารํ โหติ, ยํ เตน สมเยน อชฺฌาวสามิ ยทิทํ มหาวิยูหํ กูฏาคารํ. เตสํ โข ปนานนฺท, จตุราสีติปลฺลงฺกสหสฺสานํ เอโกเยว โส ปลฺลงฺโก โหติ, ยํ เตน สมเยน ปริภุญฺชามิ ยทิทํ โสวณฺณมโย วา รูปิยมโย วา ทนฺตมโย วา สารมโย วา. เตสํ โข ปนานนฺท, จตุราสีตินาคสหสฺสานํ เอโกเยว โส นาโค โหติ, ยํ เตน สมเยน อภิรุหามิ ยทิทํ อุโปสโถ นาคราชา. เตสํ โข ปนานนฺท, จตุราสีติอสฺสสหสฺสานํ เอโกเยว โส อสฺโส โหติ, ยํ เตน สมเยน อภิรุหามิ ยทิทํ วลาหโก อสฺสราชา. เตสํ โข ปนานนฺท, จตุราสีติรถสหสฺสานํ เอโกเยว โส รโถ โหติ, ยํ เตน สมเยน อภิรุหามิ ยทิทํ เวชยนฺตรโถ. เตสํ โข ปนานนฺท, จตุราสีติอิตฺถิสหสฺสานํ เอกาเยว [Pg.161] สา อิตฺถี โหติ, ยา เตน สมเยน ปจฺจุปฏฺฐาติ ขตฺติยานี วา เวสฺสินี วา. เตสํ โข ปนานนฺท, วา. เตสํ โข ปนานนฺท, จตุราสีติวตฺถโกฏิสหสฺสานํ เอกํเยว ตํ ทุสฺสยุคํ โหติ, ยํ เตน สมเยน ปริทหามิ โขมสุขุมํ วา กปฺปาสิกสุขุมํ วา โกเสยฺยสุขุมํ วา กมฺพลสุขุมํ วา. เตสํ โข ปนานนฺท, จตุราสีติถาลิปากสหสฺสานํ เอโกเยว โส ถาลิปาโก โหติ, ยโต นาฬิโกทนปรมํ ภุญฺชามิ ตทุปิยญฺจ สูเปยฺยํ. २७१. आनंदा, त्या चौऱ्याऐंशी हजार शहरांपैकी त्या काळी मी ज्या शहरात राहत होतो, ते केवळ एकच शहर होते, म्हणजेच कुसावती राजधानी. आनंदा, त्या चौऱ्याऐंशी हजार प्रासादांपैकी त्या काळी मी ज्या प्रासादात राहत होतो, तो केवळ एकच प्रासाद होता, म्हणजेच धम्म प्रासाद. आनंदा, त्या चौऱ्याऐंशी हजार कुटागारांपैकी त्या काळी मी ज्या कुटागारात राहत होतो, ते केवळ एकच कुटागार होते, म्हणजेच महावियूह कुटागार. आनंदा, त्या चौऱ्याऐंशी हजार पलंगांपैकी त्या काळी मी ज्या पलंगाचा वापर करत होतो, तो केवळ एकच पलंग होता, मग तो सोन्याचा असो, चांदीचा असो, हस्तिदंताचा असो वा मौल्यवान लाकडाचा असो. आनंदा, त्या चौऱ्याऐंशी हजार हत्तींपैकी त्या काळी मी ज्या हत्तीवर स्वार होत होतो, तो केवळ एकच हत्ती होता, म्हणजेच उपोसथ हत्तीराज. आनंदा, त्या चौऱ्याऐंशी हजार घोड्यांपैकी त्या काळी मी ज्या घोड्यावर स्वार होत होतो, तो केवळ एकच घोडा होता, म्हणजेच वलाहक अश्वराज. आनंदा, त्या चौऱ्याऐंशी हजार रथांपैकी त्या काळी मी ज्या रथावर स्वार होत होतो, तो केवळ एकच रथ होता, म्हणजेच वैजयंत रथ. आनंदा, त्या चौऱ्याऐंशी हजार स्त्रियांपैकी त्या काळी जी स्त्री माझी सेवा करत असे, ती केवळ एकच स्त्री होती, मग ती क्षत्रिय असो वा वैश्य असो. आनंदा, त्या चौऱ्याऐंशी हजार कोटी वस्त्रजोडांपैकी त्या काळी मी जे वस्त्र परिधान करत असे, ते केवळ एकच वस्त्रजोड होते, मग ते सुती असो, कापसाचे असो, रेशमी असो वा लोकरीचे असो. आनंदा, त्या चौऱ्याऐंशी हजार थाळी अन्नांपैकी त्या काळी मी जे भोजन करत असे, ते केवळ एकाच थाळीत शिजवलेले अन्न होते, जे एका नाळी तांदळाचे आणि त्याला साजेसे व्यंजनांचे बनलेले असे. ๒๗๒. ‘‘ปสฺสานนฺท, สพฺเพเต สงฺขารา อตีตา นิรุทฺธา วิปริณตา. เอวํ อนิจฺจา โข, อานนฺท, สงฺขารา; เอวํ อทฺธุวา โข, อานนฺท, สงฺขารา; เอวํ อนสฺสาสิกา โข, อานนฺท, สงฺขารา! ยาวญฺจิทํ, อานนฺท, อลเมว สพฺพสงฺขาเรสุ นิพฺพินฺทิตุํ, อลํ วิรชฺชิตุํ, อลํ วิมุจฺจิตุํ. २७२. आनंदा, बघ, ते सर्व संस्कार भूतकाळात जमा झाले, नष्ट झाले, बदलून गेले. आनंदा, अशा प्रकारे संस्कार अनित्य आहेत; आनंदा, अशा प्रकारे संस्कार अध्रुव आहेत; आनंदा, अशा प्रकारे संस्कार अनाश्वासक आहेत! आनंदा, म्हणूनच सर्व संस्कारांविषयी विरक्त होणे, त्यांच्यावरील आसक्ती सोडणे आणि त्यांच्यापासून मुक्त होणे हेच योग्य आहे. ‘‘ฉกฺขตฺตุํ โข ปนาหํ, อานนฺท, อภิชานามิ อิมสฺมึ ปเทเส สรีรํ นิกฺขิปิตํ, ตญฺจ โข ราชาว สมาโน จกฺกวตฺตี ธมฺมิโก ธมฺมราชา จาตุรนฺโต วิชิตาวี ชนปทตฺถาวริยปตฺโต สตฺตรตนสมนฺนาคโต, อยํ สตฺตโม สรีรนิกฺเขโป. น โข ปนาหํ, อานนฺท, ตํ ปเทสํ สมนุปสฺสามิ สเทวเก โลเก สมารเก สพฺรหฺมเก สสฺสมณพฺราหฺมณิยา ปชาย สเทวมนุสฺสาย ยตฺถ ตถาคโต อฏฺฐมํ สรีรํ นิกฺขิเปยฺยา’’ติ. อิทมโวจ ภควา, อิทํ วตฺวาน สุคโต อถาปรํ เอตทโวจ สตฺถา – आनंदा, मला आठवते की मी या ठिकाणी सहा वेळा माझे शरीर सोडले आहे. आणि तेही एक धार्मिक, धर्मराजा, चारही दिशांवर विजय मिळवणारा, देशात स्थिरता आणणारा, सात रत्नांनी युक्त असा चक्रवर्ती राजा म्हणूनच मी शरीर सोडले होते. हा माझा सातवा शरीरत्याग आहे. आनंदा, देव, मार, ब्रह्मा यांच्यासह या देवलोकात, तसेच श्रमण, ब्राह्मण, राजे आणि माणसांसह या मनुष्यलोकात मला अशी कोणतीही जागा दिसत नाही, जिथे तथागत आठव्यांदा आपले शरीर सोडतील.' असे भगवान म्हणाले. हे बोलून सुगत शास्ता पुढे म्हणाले: ‘‘อนิจฺจา วต สงฺขารา, อุปฺปาทวยธมฺมิโน; อุปฺปชฺชิตฺวา นิรุชฺฌนฺติ, เตสํ วูปสโม สุโข’’ติ. संस्कार खरोखर अनित्य आहेत, ते उत्पन्न होणे आणि नष्ट होणे या स्वभावाचे आहेत. उत्पन्न होऊन ते नष्ट होतात, त्यांचा उपशम हेच सुख आहे. มหาสุทสฺสนสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ จตุตฺถํ. चौथे महासुदस्सन सुत्त समाप्त. ๕. ชนวสภสุตฺตํ ५. जनवसभ सुत्त นาติกิยาทิพฺยากรณํ नातिक ग्रामस्थांच्या प्रश्नांचे उत्तर ๒๗๓. เอวํ [Pg.162] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา นาติเก วิหรติ คิญฺชกาวสเถ. เตน โข ปน สมเยน ภควา ปริโต ปริโต ชนปเทสุ ปริจารเก อพฺภตีเต กาลงฺกเต อุปปตฺตีสุ พฺยากโรติ กาสิโกสเลสุ วชฺชิมลฺเลสุ เจติวํเสสุ กุรุปญฺจาเลสุ มชฺฌสูรเสเนสุ – ‘‘อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน, อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน. ปโรปญฺญาส นาติกิยา ปริจารกา อพฺภตีตา กาลงฺกตา ปญฺจนฺนํ โอรมฺภาคิยานํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โอปปาติกา ตตฺถ ปรินิพฺพายิโน อนาวตฺติธมฺมา ตสฺมา โลกา. สาธิกา นวุติ นาติกิยา ปริจารกา อพฺภตีตา กาลงฺกตา ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา ราคโทสโมหานํ ตนุตฺตา สกทาคามิโน, สกิเทว อิมํ โลกํ อาคนฺตฺวา ทุกฺขสฺสนฺตํ กริสฺสนฺติ. สาติเรกานิ ปญฺจสตานิ นาติกิยา ปริจารกา อพฺภตีตา กาลงฺกตา ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โสตาปนฺนา อวินิปาตธมฺมา นิยตา สมฺโพธิปรายณา’’ติ. २७३. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान नातिका येथील गिंजकावसथ (विटांच्या विहारात) विहार करत होते. त्या वेळी भगवान आजूबाजूच्या विविध जनपदांमध्ये मृत व दिवंगत झालेल्या उपासक-सेवकांच्या पुनर्जन्माविषयी घोषणा करत असत – काशी-कोसल, वज्जी-मल्ल, चेती-वंस, कुरु-पंचाळ, मच्छ-सूरसेन या देशांतील 'अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे, तमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे.' नातिका येथील पन्नासपेक्षा अधिक मृत व दिवंगत झालेले उपासक-सेवक, पाच खालच्या स्तरावरील (ओरंभागीय) संयोजनांचा (बंधनांचा) पूर्णपणे क्षय झाल्यामुळे, ओपपातिक (स्वयंभू उत्पन्न होणारे) बनले असून, तिथेच परिनिर्वाण प्राप्त करणारे आहेत आणि त्या लोकातून परत न फिरणारे (अनागामी) झाले आहेत. नातिका येथील नव्वदपेक्षा अधिक मृत व दिवंगत झालेले उपासक-सेवक, तीन संयोजनांचा क्षय झाल्यामुळे आणि राग, द्वेष व मोहाचा प्रभाव कमी झाल्यामुळे सकदागामी (एकदाच परतणारे) झाले आहेत; ते या जगात केवळ एकदाच येऊन दुःखाचा अंत करतील. नातिका येथील पाचशेपेक्षा अधिक मृत व दिवंगत झालेले उपासक-सेवक, three संयोजनांचा क्षय झाल्यामुळे सोतापन्न झाले असून, ते दुर्गतीला न जाणारे, नियत (निश्चित गती असलेले) आणि संबोधीकडे वाटचाल करणारे आहेत। ๒๗๔. อสฺโสสุํ โข นาติกิยา ปริจารกา – ‘‘ภควา กิร ปริโต ปริโต ชนปเทสุ ปริจารเก อพฺภตีเต กาลงฺกเต อุปปตฺตีสุ พฺยากโรติ กาสิโกสเลสุ วชฺชิมลฺเลสุ เจติวํเสสุ กุรุปญฺจาเลสุ มชฺฌสูรเสเนสุ – ‘อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน, อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน. ปโรปญฺญาส นาติกิยา ปริจารกา อพฺภตีตา กาลงฺกตา ปญฺจนฺนํ โอรมฺภาคิยานํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โอปปาติกา ตตฺถ ปรินิพฺพายิโน อนาวตฺติธมฺมา ตสฺมา โลกา. สาธิกา นวุติ นาติกิยา ปริจารกา อพฺภตีตา กาลงฺกตา ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา ราคโทสโมหานํ ตนุตฺตา สกทาคามิโน สกิเทว อิมํ โลกํ อาคนฺตฺวา ทุกฺขสฺสนฺตํ กริสฺสนฺติ. สาติเรกานิ ปญฺจสตานิ นาติกิยา ปริจารกา อพฺภตีตา กาลงฺกตา ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา [Pg.163] โสตาปนฺนา อวินิปาตธมฺมา นิยตา สมฺโพธิปรายณา’ติ. เตน จ นาติกิยา ปริจารกา อตฺตมนา อเหสุํ ปมุทิตา ปีติโสมนสฺสชาตา ภควโต ปญฺหเวยฺยากรณํ สุตฺวา. २७४. नातिका येथील उपासक-सेवकांनी ऐकले की – 'भगवान आजूबाजूच्या विविध जनपदांमध्ये मृत व दिवंगत झालेल्या उपासक-सेवकांच्या पुनर्जन्माविषयी घोषणा करत आहेत – काशी-कोसल, वज्जी-मल्ल, चेती-वंस, कुरु-पंचाळ, मच्छ-सूरसेन या देशांतील "अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे, तमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे." नातिका येथील पन्नासपेक्षा अधिक मृत व दिवंगत झालेले उपासक-सेवक, पाच खालच्या स्तरावरील संयोजनांचा पूर्णपणे क्षय झाल्यामुळे, ओपपातिक बनले असून, तिथेच परिनिर्वाण प्राप्त करणारे आहेत आणि त्या लोकातून परत न फिरणारे झाले आहेत. नातिका येथील नव्वदपेक्षा अधिक मृत व दिवंगत झालेले उपासक-सेवक, तीन संयोजनांचा क्षय झाल्यामुळे आणि राग, द्वेष व मोहाचा प्रभाव कमी झाल्यामुळे सकदागामी झाले आहेत; ते या जगात केवळ एकदाच येऊन दुःखाचा अंत करतील. नातिका येथील पाचशेपेक्षा अधिक मृत व दिवंगत झालेले उपासक-सेवक, तीन संयोजनांचा क्षय झाल्यामुळे सोतापन्न झाले असून, ते दुर्गतीला न जाणारे, नियत आणि संबोधीकडे वाटचाल करणारे आहेत.' भगवंतांनी विचारलेल्या प्रश्नांचे हे स्पष्टीकरण ऐकून नातिका येथील ते उपासक-सेवक अत्यंत समाधानी, प्रफुल्लित आणि प्रीती व आनंदाने युक्त झाले। ๒๗๕. อสฺโสสิ โข อายสฺมา อานนฺโท – ‘‘ภควา กิร ปริโต ปริโต ชนปเทสุ ปริจารเก อพฺภตีเต กาลงฺกเต อุปปตฺตีสุ พฺยากโรติ กาสิโกสเลสุ วชฺชิมลฺเลสุ เจติวํเสสุ กุรุปญฺจาเลสุ มชฺฌสูรเสเนสุ – ‘อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน, อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน. ปโรปญฺญาส นาติกิยา ปริจารกา อพฺภตีตา กาลงฺกตา ปญฺจนฺนํ โอรมฺภาคิยานํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โอปปาติกา ตตฺถ ปรินิพฺพายิโน อนาวตฺติธมฺมา ตสฺมา โลกา. สาธิกา นวุติ นาติกิยา ปริจารกา อพฺภตีตา กาลงฺกตา ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา ราคโทสโมหานํ ตนุตฺตา สกทาคามิโน สกิเทว อิมํ โลกํ อาคนฺตฺวา ทุกฺขสฺสนฺตํ กริสฺสนฺติ. สาติเรกานิ ปญฺจสตานิ นาติกิยา ปริจารกา อพฺภตีตา กาลงฺกตา ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โสตาปนฺนา อวินิปาตธมฺมา นิยตา สมฺโพธิปรายณา’ติ. เตน จ นาติกิยา ปริจารกา อตฺตมนา อเหสุํ ปมุทิตา ปีติโสมนสฺสชาตา ภควโต ปญฺหเวยฺยากรณํ สุตฺวา’’ติ. २७५. आयुष्यमान आनंदांनी ऐकले की – 'भगवान आजूबाजूच्या विविध जनपदांमध्ये मृत व दिवंगत झालेल्या उपासक-सेवकांच्या पुनर्जन्माविषयी घोषणा करत आहेत – काशी-कोसल, वज्जी-मल्ल, चेती-वंस, कुरु-पंचाळ, मच्छ-सूरसेन या देशांतील "अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे, तमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे." नातिका येथील पन्नासपेक्षा अधिक मृत व दिवंगत झालेले उपासक-सेवक, पाच खालच्या स्तरावरील संयोजनांचा पूर्णपणे क्षय झाल्यामुळे, ओपपातिक बनले असून, तिथेच परिनिर्वाण प्राप्त करणारे आहेत आणि त्या लोकातून परत न फिरणारे झाले आहेत. नातिका येथील नव्वदपेक्षा अधिक मृत व दिवंगत झालेले उपासक-सेवक, तीन संयोजनांचा क्षय झाल्यामुळे आणि राग, द्वेष व मोहाचा प्रभाव कमी झाल्यामुळे सकदागामी झाले आहेत; ते या जगात केवळ एकदाच येऊन दुःखाचा अंत करतील. नातिका येथील पाचशेपेक्षा अधिक मृत व दिवंगत झालेले उपासक-सेवक, तीन संयोजनांचा क्षय झाल्यामुळे सोतापन्न झाले असून, ते दुर्गतीला न जाणारे, नियत आणि संबोधीकडे वाटचाल करणारे आहेत.' आणि भगवंतांनी विचारलेल्या प्रश्नांचे हे स्पष्टीकरण ऐकून नातिका येथील ते उपासक-सेवक अत्यंत समाधानी, प्रफुल्लित आणि प्रीती व आनंदाने युक्त झाले आहेत। อานนฺทปริกถา आनंद-परिकथा ๒๗๖. อถ โข อายสฺมโต อานนฺทสฺส เอตทโหสิ – ‘‘อิเม โข ปนาปิ อเหสุํ มาคธกา ปริจารกา พหู เจว รตฺตญฺญู จ อพฺภตีตา กาลงฺกตา. สุญฺญา มญฺเญ องฺคมคธา องฺคมาคธเกหิ ปริจารเกหิ อพฺภตีเตหิ กาลงฺกเตหิ. เต โข ปนาปิ อเหสุํ พุทฺเธ ปสนฺนา ธมฺเม ปสนฺนา สงฺเฆ ปสนฺนา สีเลสุ ปริปูรการิโน. เต อพฺภตีตา กาลงฺกตา ภควตา อพฺยากตา; เตสมฺปิสฺส สาธุ เวยฺยากรณํ, พหุชโน ปสีเทยฺย, ตโต คจฺเฉยฺย สุคตึ. อยํ โข ปนาปิ อโหสิ ราชา มาคโธ เสนิโย พิมฺพิสาโร ธมฺมิโก ธมฺมราชา หิโต พฺราหฺมณคหปติกานํ เนคมานญฺเจว ชานปทานญฺจ. อปิสฺสุทํ มนุสฺสา กิตฺตยมานรูปา วิหรนฺติ – ‘เอวํ โน โส ธมฺมิโก ธมฺมราชา สุขาเปตฺวา [Pg.164] กาลงฺกโต, เอวํ มยํ ตสฺส ธมฺมิกสฺส ธมฺมรญฺโญ วิชิเต ผาสุ วิหริมฺหา’ติ. โส โข ปนาปิ อโหสิ พุทฺเธ ปสนฺโน ธมฺเม ปสนฺโน สงฺเฆ ปสนฺโน สีเลสุ ปริปูรการี. อปิสฺสุทํ มนุสฺสา เอวมาหํสุ – ‘ยาว มรณกาลาปิ ราชา มาคโธ เสนิโย พิมฺพิสาโร ภควนฺตํ กิตฺตยมานรูโป กาลงฺกโต’ติ. โส อพฺภตีโต กาลงฺกโต ภควตา อพฺยากโต. ตสฺสปิสฺส สาธุ เวยฺยากรณํ พหุชโน ปสีเทยฺย, ตโต คจฺเฉยฺย สุคตึ. ภควโต โข ปน สมฺโพธิ มคเธสุ. ยตฺถ โข ปน ภควโต สมฺโพธิ มคเธสุ, กถํ ตตฺร ภควา มาคธเก ปริจารเก อพฺภตีเต กาลงฺกเต อุปปตฺตีสุ น พฺยากเรยฺย. ภควา เจ โข ปน มาคธเก ปริจารเก อพฺภตีเต กาลงฺกเต อุปปตฺตีสุ น พฺยากเรยฺย, ทีนมนา เตนสฺสุ มาคธกา ปริจารกา; เยน โข ปนสฺสุ ทีนมนา มาคธกา ปริจารกา กถํ เต ภควา น พฺยากเรยฺยา’’ติ? २७६. तेव्हा आयुष्यमान आनंदांच्या मनात असा विचार आला – 'मगध देशातील हे अनेक जुने उपासक-सेवक देखील मृत व दिवंगत झाले आहेत. जणू काही अंग आणि मगध देश तेथील मृत व दिवंगत झालेल्या उपासक-सेवकांपासून रिकामेच झाले आहेत असे वाटते. ते देखील बुद्ध, धम्म आणि संघ यांच्यावर श्रद्धा ठेवणारे होते आणि शीलांचे परिपूर्ण पालन करणारे होते. ते मृत व दिवंगत झाले तरी भगवंतांनी त्यांच्या गतीविषयी काहीही घोषित केले नाही. त्यांच्याविषयी देखील स्पष्टीकरण दिले गेले तर ते चांगले होईल; यामुळे बहुजन श्रद्धावान होतील आणि त्यामुळे सुगतीला जातील. तसेच, मगधचा राजा सेनिय बिंबिसार हा धार्मिक, धर्मराजा आणि ब्राह्मण, गृहपती, नगरातील व जनपदातील लोकांचे कल्याण करणारा होता. लोक त्याची अशी स्तुती करत असत – "त्या धार्मिक धर्मराजाने आम्हाला असे सुखी करून तो काळाच्या पडद्याआड गेला; आम्ही त्या धार्मिक राजाच्या राज्यात किती सुखाने राहत होतो!" तो देखील बुद्ध, धम्म आणि संघ यांच्यावर श्रद्धा ठेवणारा होता आणि शीलांचे परिपूर्ण पालन करणारा होता. लोक असेही म्हणत असत – "मगधचा राजा सेनिय बिंबिसार मृत्यूच्या वेळेपर्यंत भगवंतांची स्तुती करतच दिवंगत झाला." तो मृत व दिवंगत झाला तरी भगवंतांनी त्याच्या गतीविषयी काहीही घोषित केले नाही. त्याच्याविषयी देखील स्पष्टीकरण दिले गेले तर ते चांगले होईल; यामुळे बहुजन श्रद्धावान होतील आणि त्यामुळे सुगतीला जातील. शिवाय, भगवंतांना संबोधी मगध देशातच प्राप्त झाली आहे. जिथे भगवंतांना संबोधी प्राप्त झाली, त्या मगध देशातील मृत व दिवंगत झालेल्या उपासक-सेवकांच्या पुनर्जन्माविषयी भगवान का बरे घोषित करत नाहीत? जर भगवंतांनी मगध देशातील मृत व दिवंगत झालेल्या उपासक-सेवकांच्या पुनर्जन्माविषयी घोषित केले नाही, तर मगधचे उपासक-सेवक खिन्न मनाचे (दुःखी) होतील. जर मगधचे उपासक-सेवक खिन्न मनाचे होणार असतील, तर भगवान त्यांच्याविषयी का बरे घोषित करत नाहीत?' ๒๗๗. อิทมายสฺมา อานนฺโท มาคธเก ปริจารเก อารพฺภ เอโก รโห อนุวิจินฺเตตฺวา รตฺติยา ปจฺจูสสมยํ ปจฺจุฏฺฐาย เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สุตํ เมตํ, ภนฺเต – ‘ภควา กิร ปริโต ปริโต ชนปเทสุ ปริจารเก อพฺภตีเต กาลงฺกเต อุปปตฺตีสุ พฺยากโรติ กาสิโกสเลสุ วชฺชิมลฺเลสุ เจติวํเสสุ กุรุปญฺจาเลสุ มชฺฌสูรเสเนสุ – ‘‘อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน, อสุ อมุตฺร อุปปนฺโน. ปโรปญฺญาส นาติกิยา ปริจารกา อพฺภตีตา กาลงฺกตา ปญฺจนฺนํ โอรมฺภาคิยานํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โอปปาติกา ตตฺถ ปรินิพฺพายิโน อนาวตฺติธมฺมา ตสฺมา โลกา. สาธิกา นวุติ นาติกิยา ปริจารกา อพฺภตีตา กาลงฺกตา ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา ราคโทสโมหานํ ตนุตฺตา สกทาคามิโน, สกิเทว อิมํ โลกํ อาคนฺตฺวา ทุกฺขสฺสนฺตํ กริสฺสนฺติ. สาติเรกานิ ปญฺจสตานิ นาติกิยา ปริจารกา อพฺภตีตา กาลงฺกตา ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โสตาปนฺนา อวินิปาตธมฺมา นิยตา สมฺโพธิปรายณาติ. เตน จ นาติกิยา ปริจารกา อตฺตมนา อเหสุํ ปมุทิตา ปีติโสมนสฺสชาตา ภควโต ปญฺหเวยฺยากรณํ สุตฺวา’’ติ[Pg.165]. อิเม โข ปนาปิ, ภนฺเต, อเหสุํ มาคธกา ปริจารกา พหู เจว รตฺตญฺญู จ อพฺภตีตา กาลงฺกตา. สุญฺญา มญฺเญ องฺคมคธา องฺคมาคธเกหิ ปริจารเกหิ อพฺภตีเตหิ กาลงฺกเตหิ. เต โข ปนาปิ, ภนฺเต, อเหสุํ พุทฺเธ ปสนฺนา ธมฺเม ปสนฺนา สงฺเฆ ปสนฺนา สีเลสุ ปริปูรการิโน, เต อพฺภตีตา กาลงฺกตา ภควตา อพฺยากตา. เตสมฺปิสฺส สาธุ เวยฺยากรณํ, พหุชโน ปสีเทยฺย, ตโต คจฺเฉยฺย สุคตึ. อยํ โข ปนาปิ, ภนฺเต, อโหสิ ราชา มาคโธ เสนิโย พิมฺพิสาโร ธมฺมิโก ธมฺมราชา หิโต พฺราหฺมณคหปติกานํ เนคมานญฺเจว ชานปทานญฺจ. อปิสฺสุทํ มนุสฺสา กิตฺตยมานรูปา วิหรนฺติ – ‘เอวํ โน โส ธมฺมิโก ธมฺมราชา สุขาเปตฺวา กาลงฺกโต. เอวํ มยํ ตสฺส ธมฺมิกสฺส ธมฺมรญฺโญ วิชิเต ผาสุ วิหริมฺหา’ติ. โส โข ปนาปิ, ภนฺเต, อโหสิ พุทฺเธ ปสนฺโน ธมฺเม ปสนฺโน สงฺเฆ ปสนฺโน สีเลสุ ปริปูรการี. อปิสฺสุทํ มนุสฺสา เอวมาหํสุ – ‘ยาว มรณกาลาปิ ราชา มาคโธ เสนิโย พิมฺพิสาโร ภควนฺตํ กิตฺตยมานรูโป กาลงฺกโต’ติ. โส อพฺภตีโต กาลงฺกโต ภควตา อพฺยากโต; ตสฺสปิสฺส สาธุ เวยฺยากรณํ, พหุชโน ปสีเทยฺย, ตโต คจฺเฉยฺย สุคตึ. ภควโต โข ปน, ภนฺเต, สมฺโพธิ มคเธสุ. ยตฺถ โข ปน, ภนฺเต, ภควโต สมฺโพธิ มคเธสุ, กถํ ตตฺร ภควา มาคธเก ปริจารเก อพฺภตีเต กาลงฺกเต อุปปตฺตีสุ น พฺยากเรยฺย? ภควา เจ โข ปน, ภนฺเต, มาคธเก ปริจารเก อพฺภตีเต กาลงฺกเต อุปปตฺตีสุ น พฺยากเรยฺย ทีนมนา เตนสฺสุ มาคธกา ปริจารกา; เยน โข ปนสฺสุ ทีนมนา มาคธกา ปริจารกา กถํ เต ภควา น พฺยากเรยฺยา’’ติ. อิทมายสฺมา อานนฺโท มาคธเก ปริจารเก อารพฺภ ภควโต สมฺมุขา ปริกถํ กตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. २७७. आयुष्यमान आनंद यांनी मगध देशातील उपासक-सेवकांविषयी (परिकारकांविषयी) एकांतात विचार केला. रात्रीच्या शेवटच्या प्रहरात (पहाटे) उठून ते जेथे भगवान होते तेथे गेले. तेथे जाऊन त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसल्यावर आयुष्यमान आनंद भगवंतांना म्हणाले – "भंते, मी असे ऐकले आहे की, भगवान आजूबाजूच्या विविध जनपदांमध्ये मृत पावलेल्या उपासक-सेवकांच्या गतीविषयी (पुनर्जन्माविषयी) सांगतात. काशी-कोसल, वज्जी-मल्ल, चेती-वंस, कुरु-पंचाळ, मच्छ-सूरसेन या देशांमध्ये 'अमुक व्यक्ती अमुक ठिकाणी जन्मली आहे, अमुक व्यक्ती अमुक ठिकाणी जन्मली आहे' असे भगवान सांगतात. नातिका गावातील पन्नासपेक्षा जास्त मृत उपासक-सेवक पाच खालच्या स्तरावरील बंधनांच्या (ओरंभागीय संयोजनांच्या) क्षयामुळे ओपपातिक (स्वयंभू उत्पन्न होणारे) झाले आहेत आणि तेथेच (शुद्धावास लोकामध्ये) परिनिर्वाण प्राप्त करतील, त्या लोकातून ते परत फिरणारे नाहीत (अनागामी झाले आहेत). नातिका गावातील नव्वदपेक्षा जास्त मृत उपासक-सेवक तीन बंधनांच्या (संयोजनांच्या) क्षयामुळे आणि राग, द्वेष व मोहाच्या मंदतेमुळे सकदागामी झाले आहेत, ते या जगात केवळ एकदाच परत येऊन दुःखाचा अंत करतील. नातिका गावातील पाचशेपेक्षा जास्त मृत उपासक-सेवक तीन बंधनांच्या क्षयामुळे सोतापन्न झाले आहेत, ते दुर्गतीला न जाणारे, नियत (निश्चितपणे मुक्त होणारे) आणि संबोधीकडे वाटचाल करणारे झाले आहेत. भगवंतांचे हे प्रश्नांचे उत्तर ऐकून नातिका येथील उपासक-सेवक अत्यंत समाधानी, प्रफुल्लित आणि प्रीती व सोमनस्याने युक्त झाले होते. परंतु भंते, मगध देशातील मृत झालेले उपासक-सेवकही पुष्कळ होते आणि ते दीर्घकाळापासूनचे (अनुभवी) होते. अंग आणि मगध देश जणू मृत पावलेल्या अंग-मगध देशातील उपासक-सेवकांशिवाय शून्य झाल्यासारखे वाटत आहेत. भंते, ते उपासक-सेवक देखील बुद्ध, धम्म आणि संघ यांच्यावर श्रद्धा ठेवणारे (प्रसन्न) होते आणि शील पूर्णपणे पाळणारे होते. परंतु मृत पावलेल्या त्यांच्या गतीविषयी भगवंतांनी काहीही सांगितले नाही. जर त्यांच्या गतीविषयीही भगवंतांनी सांगितले असते, तर ते ऐकून पुष्कळ लोक प्रसन्न झाले असते आणि त्यामुळे ते सुगतीला गेले असते. भंते, मगधचा राजा सेनीय बिंबिसार हा धार्मिक, धर्मराजा होता आणि तो ब्राह्मण, गृहपती, नगरातील व जनपदातील लोकांचे कल्याण करणारा होता. लोक आजही त्याची अशी स्तुती करतात की – 'त्या धार्मिक धर्मराजाने आम्हाला सुखी करून प्राण सोडले. त्या धार्मिक राजाच्या राज्यात आम्ही अत्यंत सुखाने राहिलो.' भंते, तो राजा बिंबिसार देखील बुद्ध, धम्म आणि संघ यांच्यावर श्रद्धा ठेवणारे होते आणि शील पूर्णपणे पाळणारे होते. लोक असेही म्हणतात की – 'मगधचा राजा सेनीय बिंबिसार मृत्यूपर्यंत भगवंतांची स्तुती करतच काळाच्या पडद्याआड गेला.' अशा मृत पावलेल्या बिंबिसार राजाच्या गतीविषयी भगवंतांनी काहीही सांगितले नाही. जर त्याच्या गतीविषयी भगवंतांनी सांगितले असते, तर पुष्कळ लोक प्रसन्न झाले असते आणि त्यामुळे सुगतीला गेले असते. भंते, भगवंतांना संबोधी (ज्ञानप्राप्ती) मगध देशामध्येच झाली आहे. भंते, जेथे भगवंतांना संबोधी प्राप्त झाली, त्या मगध देशातील मृत पावलेल्या उपासक-सेवकांच्या गतीविषयी भगवान का सांगत नाहीत? भंते, जर भगवान मगध देशातील मृत उपासक-सेवकांच्या गतीविषयी सांगणार नाहीत, तर मगधचे उपासक-सेवक खिन्न मनाचे (दुःखी) होतील. मगधचे उपासक-सेवक खिन्न मनाचे होऊ नयेत म्हणून भगवान त्यांच्या गतीविषयी का सांगत नाहीत?" आयुष्यमान आनंद यांनी मगध देशातील उपासक-सेवकांविषयी भगवंतांच्या समोर अशा प्रकारे सविस्तर बोलून, आसनावरून उठून भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि ते निघून गेले. ๒๗๘. อถ โข ภควา อจิรปกฺกนฺเต อายสฺมนฺเต อานนฺเท ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย นาติกํ ปิณฺฑาย ปาวิสิ. นาติเก ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺโต ปาเท ปกฺขาเลตฺวา คิญฺชกาวสถํ ปวิสิตฺวา มาคธเก ปริจารเก อารพฺภ อฏฺฐึ กตฺวา มนสิกตฺวา สพฺพํ เจตสา สมนฺนาหริตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน [Pg.166] นิสีทิ – ‘‘คตึ เนสํ ชานิสฺสามิ อภิสมฺปรายํ, ยํคติกา เต ภวนฺโต ยํอภิสมฺปรายา’’ติ. อทฺทสา โข ภควา มาคธเก ปริจารเก ‘‘ยํคติกา เต ภวนฺโต ยํอภิสมฺปรายา’’ติ. อถ โข ภควา สายนฺหสมยํ ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต คิญฺชกาวสถา นิกฺขมิตฺวา วิหารปจฺฉายายํ ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. २७८. त्यानंतर आयुष्यमान आनंद निघून गेल्यावर काही वेळातच, भगवंतांनी सकाळी चिवर परिधान केले आणि पात्र-चिवर घेऊन ते नातिका गावात भिक्षेसाठी शिरले. नातिका गावात भिक्षाटन करून, भोजनोत्तर भिक्षाटनाहून परत आल्यावर पाय धुवून ते गिंजकावसथ (विटांच्या विहारात) गेले. तेथे मगध देशातील उपासक-सेवकांविषयी आदरपूर्वक, मन लावून, सर्व गोष्टींचा मनात विचार करत ते तयार केलेल्या आसनावर बसले – "मी त्यांची गती आणि परलोक (पुनर्जन्म) जाणून घेईन, त्या थोर व्यक्तींची गती काय आहे आणि त्यांचा परलोक काय आहे." भगवंतांनी मगध देशातील उपासक-सेवकांची गती आणि त्यांचा परलोक पाहिला. त्यानंतर संध्याकाळच्या वेळी भगवान ध्यानातून उठले आणि गिंजकावसथ विहारातून बाहेर पडून विहाराच्या सावलीत तयार केलेल्या आसनावर बसले. ๒๗๙. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข อายสฺมา อานนฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘อุปสนฺตปทิสฺโส ภนฺเต ภควา ภาติริว ภควโต มุขวณฺโณ วิปฺปสนฺนตฺตา อินฺทฺริยานํ. สนฺเตน นูนชฺช ภนฺเต ภควา วิหาเรน วิหาสี’’ติ? ‘‘ยเทว โข เม ตฺวํ, อานนฺท, มาคธเก ปริจารเก อารพฺภ สมฺมุขา ปริกถํ กตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกนฺโต, ตเทวาหํ นาติเก ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺโต ปาเท ปกฺขาเลตฺวา คิญฺชกาวสถํ ปวิสิตฺวา มาคธเก ปริจารเก อารพฺภ อฏฺฐึ กตฺวา มนสิกตฺวา สพฺพํ เจตสา สมนฺนาหริตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทึ – ‘คตึ เนสํ ชานิสฺสามิ อภิสมฺปรายํ, ยํคติกา เต ภวนฺโต ยํอภิสมฺปรายา’ติ. อทฺทสํ โข อหํ, อานนฺท, มาคธเก ปริจารเก ‘ยํคติกา เต ภวนฺโต ยํอภิสมฺปรายา’’’ติ. २७९. त्यानंतर आयुष्यमान आनंद जेथे भगवान होते तेथे गेले. तेथे जाऊन त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसल्यावर आयुष्यमान आनंद भगवंतांना म्हणाले – "भंते, भगवान अत्यंत शांत दिसत आहेत. भगवंतांच्या इंद्रियांच्या प्रसन्नतेमुळे त्यांच्या चेहऱ्याची कांती अत्यंत तेजस्वी दिसत आहे. भंते, आज भगवान नक्कीच एखाद्या शांत विहारात (समाधी अवस्थेत) राहिले असावेत?" "आनंदा, तू मगध देशातील उपासक-सेवकांविषयी माझ्यासमोर बोलून, आसनावरून उठून निघून गेलास, त्यानंतर मी नातिका गावात भिक्षाटन करून, भोजनोत्तर भिक्षाटनाहून परत आल्यावर पाय धुवून गिंजकावसथ विहारात गेलो. तेथे मगध देशातील उपासक-सेवकांविषयी आदरपूर्वक, मन लावून, सर्व गोष्टींचा मनात विचार करत मी तयार केलेल्या आसनावर बसलो – 'मी त्यांची गती आणि परलोक जाणून घेईन, त्या थोर व्यक्तींची गती काय आहे आणि त्यांचा परलोक काय आहे.' आनंदा, मी मगध देशातील उपासक-सेवकांची गती आणि त्यांचा परलोक पाहिला आहे." ชนวสภยกฺโข जनवसभ यक्ष ๒๘๐. ‘‘อถ โข, อานนฺท, อนฺตรหิโต ยกฺโข สทฺทมนุสฺสาเวสิ – ‘ชนวสโภ อหํ ภควา; ชนวสโภ อหํ สุคตา’ติ. อภิชานาสิ โน ตฺวํ, อานนฺท, อิโต ปุพฺเพ เอวรูปํ นามเธยฺยํ สุตํ ยทิทํ ชนวสโภ’’ติ? २८०. "आनंदा, त्यानंतर एका अदृश्य यक्षाने आवाज केला – 'भगवन्, मी जनवसभ आहे; सुगत, मी जनवसभ आहे.' आनंदा, तुला आठवते का, तू यापूर्वी कधी 'जनवसभ' असे नाव ऐकले आहेस का?" ‘‘น โข อหํ, ภนฺเต, อภิชานามิ อิโต ปุพฺเพ เอวรูปํ นามเธยฺยํ สุตํ ยทิทํ ชนวสโภติ, อปิ จ เม, ภนฺเต, โลมานิ หฏฺฐานิ ‘ชนวสโภ’ติ นามเธยฺยํ สุตฺวา. ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, เอตทโหสิ – ‘น หิ นูน โส โอรโก ยกฺโข ภวิสฺสติ ยทิทํ เอวรูปํ นามเธยฺยํ สุปญฺญตฺตํ ยทิทํ ชนวสโภ’’ติ. ‘‘อนนฺตรา โข, อานนฺท, สทฺทปาตุภาวา อุฬารวณฺโณ [Pg.167] เม ยกฺโข สมฺมุเข ปาตุรโหสิ. ทุติยมฺปิ สทฺทมนุสฺสาเวสิ – ‘พิมฺพิสาโร อหํ ภควา; พิมฺพิสาโร อหํ สุคตาติ. อิทํ สตฺตมํ โข อหํ, ภนฺเต, เวสฺสวณสฺส มหาราชสฺส สหพฺยตํ อุปปชฺชามิ, โส ตโต จุโต มนุสฺสราชา ภวิตุํ ปโหมิ. भंते, मला आठवत नाही की मी यापूर्वी कधी 'जनवसभ' असे नाव ऐकले आहे. परंतु, भंते, 'जनवसभ' हे नाव ऐकून माझे रोमांच उभे राहिले. भंते, माझ्या मनात असा विचार आला की, 'ज्या यक्षाचे असे सुंदर नाव आहे, तो नक्कीच कोणी सामान्य यक्ष नसेल.' आनंदा, त्या आवाजाच्या प्रकटीकरणानंतर लगेचच एक भव्य वर्णाचा यक्ष माझ्यासमोर प्रकट झाला. त्याने दुसऱ्यांदाही असा आवाज ऐकवला – 'भगवंत, मी बिंबिसार आहे! सुगता, मी बिंबिसार आहे!' भंते, मी आता सातव्यांदा महाराज वेस्सवणाच्या सहवासात उत्पन्नलो आहे. तिथून च्युत होऊन मी मानवांचा राजा होण्यास समर्थ आहे. อิโต สตฺต ตโต สตฺต, สํสารานิ จตุทฺทส; นิวาสมภิชานามิ, ยตฺถ เม วุสิตํ ปุเร. इथून सात आणि तिथून सात, अशा चौदा संसारांमधील (पुनर्जन्मांमधील) माझे पूर्वीचे निवासस्थान मला आठवते, जिथे मी पूर्वी राहिलो होतो. ๒๘๑. ‘ทีฆรตฺตํ โข อหํ, ภนฺเต, อวินิปาโต อวินิปาตํ สญฺชานามิ, อาสา จ ปน เม สนฺติฏฺฐติ สกทาคามิตายา’ติ. ‘อจฺฉริยมิทํ อายสฺมโต ชนวสภสฺส ยกฺขสฺส, อพฺภุตมิทํ อายสฺมโต ชนวสภสฺส ยกฺขสฺส. ‘‘ทีฆรตฺตํ โข อหํ, ภนฺเต, อวินิปาโต อวินิปาตํ สญฺชานามี’’ติ จ วเทสิ, ‘‘อาสา จ ปน เม สนฺติฏฺฐติ สกทาคามิตายา’’ติ จ วเทสิ, กุโตนิทานํ ปนายสฺมา ชนวสโภ ยกฺโข เอวรูปํ อุฬารํ วิเสสาธิคมํ สญฺชานาตีติ? น อญฺญตฺร, ภควา, ตว สาสนา, น อญฺญตฺร, สุคต, ตว สาสนา; ยทคฺเค อหํ, ภนฺเต, ภควติ เอกนฺติกโต อภิปฺปสนฺโน, ตทคฺเค อหํ, ภนฺเต, ทีฆรตฺตํ อวินิปาโต อวินิปาตํ สญฺชานามิ, อาสา จ ปน เม สนฺติฏฺฐติ สกทาคามิตาย. อิธาหํ, ภนฺเต, เวสฺสวเณน มหาราเชน เปสิโต วิรูฬฺหกสฺส มหาราชสฺส สนฺติเก เกนจิเทว กรณีเยน อทฺทสํ ภควนฺตํ อนฺตรามคฺเค คิญฺชกาวสถํ ปวิสิตฺวา มาคธเก ปริจารเก อารพฺภ อฏฺฐึ กตฺวา มนสิกตฺวา สพฺพํ เจตสา สมนฺนาหริตฺวา นิสินฺนํ – ‘‘คตึ เนสํ ชานิสฺสามิ อภิสมฺปรายํ, ยํคติกา เต ภวนฺโต ยํอภิสมฺปรายา’’ติ. อนจฺฉริยํ โข ปเนตํ, ภนฺเต, ยํ เวสฺสวณสฺส มหาราชสฺส ตสฺสํ ปริสายํ ภาสโต สมฺมุขา สุตํ สมฺมุขา ปฏิคฺคหิตํ – ‘‘ยํคติกา เต ภวนฺโต ยํอภิสมฺปรายา’’ติ. ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, เอตทโหสิ – ภควนฺตญฺจ ทกฺขามิ, อิทญฺจ ภควโต อาโรเจสฺสามีติ. อิเม โข เม, ภนฺเต, ทฺเวปจฺจยา ภควนฺตํ ทสฺสนาย อุปสงฺกมิตุํ’. २८१. 'भंते, दीर्घकाळापासून मी स्वतःला दुर्गतीपासून मुक्त समजत आहे आणि आता माझ्या मनात सकदागामी होण्याची आकांक्षा दृढ झाली आहे.' 'आयुष्यमान जनवसभ यक्षाचे हे बोलणे आश्चर्यकारक आहे, आयुष्यमान जनवसभ यक्षाचे हे बोलणे अद्भुत आहे. तू म्हणालास की, "भंते, दीर्घकाळापासून मी स्वतःला दुर्गतीपासून मुक्त समजत आहे" आणि "माझ्या मनात सकदागामी होण्याची आकांक्षा दृढ झाली आहे." पण आयुष्यमान जनवसभ यक्षाला अशा प्रकारचा महान विशेष अधिगम कशामुळे झाला?' 'भगवंत, आपल्या शासनाशिवाय इतर कशानेही नाही; सुगता, आपल्या शासनाशिवाय इतर कशानेही नाही! भंते, ज्या दिवसापासून मी भगवंतांवर पूर्णपणे प्रसन्न झालो, त्या दिवसापासून, भंते, दीर्घकाळापासून मी स्वतःला दुर्गतीपासून मुक्त समजत आहे आणि माझ्या मनात सकदागामी होण्याची आकांक्षा दृढ झाली आहे. भंते, मला महाराज वेस्सवणाने महाराज विरूळ्हकाकडे काही कामासाठी पाठवले होते. वाटेत मी भगवंतांना विटांच्या घरात (गिंजकावसथ येथे) प्रवेश करताना आणि बसून मगध देशातील उपासकांविषयी आदरपूर्वक, मनःपूर्वक विचार करताना आणि आपल्या चित्ताने सर्व गोष्टींचे चिंतन करताना पाहिले – "मी त्यांची गती आणि परलोकातील अवस्था जाणीन, त्या पूजनीय लोकांची गती काय आहे आणि परलोकातील अवस्था काय आहे." भंते, हे काही आश्चर्यकारक नाही की, महाराज वेस्सवणाने आपल्या परिषदेत बोलताना मी त्यांच्या समक्ष ऐकले आणि समक्ष ग्रहण केले की – "त्या पूजनीय लोकांची गती काय आहे आणि परलोकातील अवस्था काय आहे." भंते, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला – "मी भगवंतांचे दर्शन घेईन आणि ही गोष्ट भगवंतांना सांगेन." भंते, भगवंतांच्या दर्शनासाठी येण्याची ही दोन कारणे आहेत.' เทวสภา देवसभा ๒๘๒. ‘ปุริมานิ[Pg.168], ภนฺเต, ทิวสานิ ปุริมตรานิ ตทหุโปสเถ ปนฺนรเส วสฺสูปนายิกาย ปุณฺณาย ปุณฺณมาย รตฺติยา เกวลกปฺปา จ เทวา ตาวตึสา สุธมฺมายํ สภายํ สนฺนิสินฺนา โหนฺติ สนฺนิปติตา. มหตี จ ทิพฺพปริสา สมนฺตโต นิสินฺนา โหนฺติ, จตฺตาโร จ มหาราชาโน จตุทฺทิสา นิสินฺนา โหนฺติ. ปุรตฺถิมาย ทิสาย ธตรฏฺโฐ มหาราชา ปจฺฉิมาภิมุโข นิสินฺโน โหติ เทเว ปุรกฺขตฺวา; ทกฺขิณาย ทิสาย วิรูฬฺหโก มหาราชา อุตฺตราภิมุโข นิสินฺโน โหติ เทเว ปุรกฺขตฺวา; ปจฺฉิมาย ทิสาย วิรูปกฺโข มหาราชา ปุรตฺถาภิมุโข นิสินฺโน โหติ เทเว ปุรกฺขตฺวา; อุตฺตราย ทิสาย เวสฺสวโณ มหาราชา ทกฺขิณาภิมุโข นิสินฺโน โหติ เทเว ปุรกฺขตฺวา. ยทา, ภนฺเต, เกวลกปฺปา จ เทวา ตาวตึสา สุธมฺมายํ สภายํ สนฺนิสินฺนา โหนฺติ สนฺนิปติตา, มหตี จ ทิพฺพปริสา สมนฺตโต นิสินฺนา โหนฺติ, จตฺตาโร จ มหาราชาโน จตุทฺทิสา นิสินฺนา โหนฺติ. อิทํ เนสํ โหติ อาสนสฺมึ; อถ ปจฺฉา อมฺหากํ อาสนํ โหติ. เย เต, ภนฺเต, เทวา ภควติ พฺรหฺมจริยํ จริตฺวา อธุนูปปนฺนา ตาวตึสกายํ, เต อญฺเญ เทเว อติโรจนฺติ วณฺเณน เจว ยสสา จ. เตน สุทํ, ภนฺเต, เทวา ตาวตึสา อตฺตมนา โหนฺติ ปมุทิตา ปีติโสมนสฺสชาตา ‘‘ทิพฺพา วต โภ กายา ปริปูเรนฺติ, หายนฺติ อสุรกายา’’ติ. อถ โข, ภนฺเต, สกฺโก เทวานมินฺโท เทวานํ ตาวตึสานํ สมฺปสาทํ วิทิตฺวา อิมาหิ คาถาหิ อนุโมทิ – २८२. 'भंते, पूर्वीच्या काळी, फार पूर्वी, वर्षावासाच्या सुरुवातीला, पंधराव्या उपोसथ दिवशी, पौर्णिमेच्या रात्री, सर्व तावतिंस देव सुधम्मा देवसभेत एकत्र जमले होते. चहूबाजूंनी मोठी दिव्य परिषद बसली होती आणि चारही दिशांना चार महाराज बसले होते. पूर्व दिशेला महाराज धतरठ्ठ पश्चिमेकडे तोंड करून देवांना समोर ठेवून बसले होते; दक्षिण दिशेला महाराज विरूळ्हक उत्तरेकडे तोंड करून देवांना समोर ठेवून बसले होते; पश्चिम दिशेला महाराज विरूपक्ख पूर्वेकडे तोंड करून देवांना समोर ठेवून बसले होते; आणि उत्तर दिशेला महाराज वेस्सवण दक्षिणेकडे तोंड करून देवांना समोर ठेवून बसले होते. भंते, जेव्हा सर्व तावतिंस देव सुधम्मा सभेत एकत्र जमलेले असतात, मोठी दिव्य परिषद चहूबाजूंनी बसलेली असते आणि चारही दिशांना चार महाराज बसलेले असतात, तेव्हा ही त्यांची आसने असतात; आणि त्यानंतर आमची आसने असतात. भंते, जे देव भगवंतांच्या शासनात ब्रह्मचर्य पाळून नुकतेच तावतिंस देवलोकात उत्पन्न झाले आहेत, ते इतर देवांपेक्षा वर्ण आणि यशाने अधिक शोभून दिसतात. भंते, त्यामुळे तावतिंस देव अत्यंत संतुष्ट, प्रमुदित आणि प्रीती-सौमनस्याने युक्त होऊन म्हणतात – "अहो! दिव्य शरीरे परिपूर्ण होत आहेत आणि असुरांचे समूह घटत आहेत." भंते, तेव्हा देवांचा राजा सक्क याने तावतिंस देवांची ही प्रसन्नता पाहून या गाथांद्वारे आनंद व्यक्त केला – ‘‘โมทนฺติ วต โภ เทวา, ตาวตึสา สหินฺทกา ; ตถาคตํ นมสฺสนฺตา, ธมฺมสฺส จ สุธมฺมตํ. 'अहो! इंद्र आणि तावतिंस देव तथागतांना वंदन करत आणि धर्माच्या सुधर्मात्वाला नमस्कार करत आनंदित होत आहेत. นเว เทเว จ ปสฺสนฺตา, วณฺณวนฺเต ยสสฺสิเน ; สุคตสฺมึ พฺรหฺมจริยํ, จริตฺวาน อิธาคเต. सुगतांच्या शासनात ब्रह्मचर्य पाळून इथे उत्पन्न झालेल्या, तेजस्वी आणि यशस्वी अशा नवीन देवांना पाहून ते आनंदित होत आहेत. เต อญฺเญ อติโรจนฺติ, วณฺเณน ยสสายุนา; สาวกา ภูริปญฺญสฺส, วิเสสูปคตา อิธ. विशाल प्रज्ञा असलेल्या सुगतांचे हे श्रावक, जे इथे विशेष प्राप्ती करून आले आहेत, ते इतर देवांपेक्षा वर्ण, यश आणि आयुष्याने अधिक शोभून दिसतात. อิทํ [Pg.169] ทิสฺวาน นนฺทนฺติ, ตาวตึสา สหินฺทกา; ตถาคตํ นมสฺสนฺตา, ธมฺมสฺส จ สุธมฺมต’’นฺติ. हे पाहून इंद्र आणि तावतिंस देव तथागतांना वंदन करत आणि धर्माच्या सुधर्मात्वाला नमस्कार करत आनंदित होत आहेत.' ‘เตน สุทํ, ภนฺเต, เทวา ตาวตึสา ภิยฺโยโสมตฺตาย อตฺตมนา โหนฺติ ปมุทิตา ปีติโสมนสฺสชาตา ‘‘ทิพฺพา วต, โภ, กายา ปริปูเรนฺติ, หายนฺติ อสุรกายา’’ติ. อถ โข, ภนฺเต, เยนตฺเถน เทวา ตาวตึสา สุธมฺมายํ สภายํ สนฺนิสินฺนา โหนฺติ สนฺนิปติตา, ตํ อตฺถํ จินฺตยิตฺวา ตํ อตฺถํ มนฺตยิตฺวา วุตฺตวจนาปิ ตํ จตฺตาโร มหาราชาโน ตสฺมึ อตฺเถ โหนฺติ. ปจฺจานุสิฏฺฐวจนาปิ ตํ จตฺตาโร มหาราชาโน ตสฺมึ อตฺเถ โหนฺติ, สเกสุ สเกสุ อาสเนสุ ฐิตา อวิปกฺกนฺตา. 'भंते, यामुळे तावतिंस देव आणखीनच संतुष्ट, प्रमुदित आणि प्रीती-सौमनस्याने युक्त झाले – "अहो! दिव्य शरीरे परिपूर्ण होत आहेत आणि असुरांचे समूह घटत आहेत." भंते, त्यानंतर ज्या कारणासाठी तावतिंस देव सुधम्मा सभेत एकत्र जमले होते, त्या विषयावर विचार करून आणि सल्लामसलत करून, चारही महाराजांना त्या विषयावर आदेश देण्यात आले. चारही महाराजांनी त्या विषयावरील सूचना स्वीकारल्या आणि ते आपापल्या आसनांवर उभे राहिले, तिथून निघून गेले नाहीत.' เต วุตฺตวากฺยา ราชาโน, ปฏิคฺคยฺหานุสาสนึ; วิปฺปสนฺนมนา สนฺตา, อฏฺฐํสุ สมฺหิ อาสเนติ. ते राजे आदेश ऐकून आणि सूचनांचे ग्रहण करून, अत्यंत प्रसन्नचित्त व शांत होऊन आपापल्या आसनांवर उभे राहिले. ๒๘๓. ‘อถ โข, ภนฺเต, อุตฺตราย ทิสาย อุฬาโร อาโลโก สญฺชายิ, โอภาโส ปาตุรโหสิ อติกฺกมฺเมว เทวานํ เทวานุภาวํ. อถ โข, ภนฺเต, สกฺโก เทวานมินฺโท เทเว ตาวตึเส อามนฺเตสิ – ‘‘ยถา โข, มาริสา, นิมิตฺตานิ ทิสฺสนฺติ, อุฬาโร อาโลโก สญฺชายติ, โอภาโส ปาตุภวติ, พฺรหฺมา ปาตุภวิสฺสติ. พฺรหฺมุโน เหตํ ปุพฺพนิมิตฺตํ ปาตุภาวาย ยทิทํ อาโลโก สญฺชายติ โอภาโส ปาตุภวตีติ. २८३. 'भंते, त्यानंतर उत्तर दिशेकडून एक भव्य प्रकाश निर्माण झाला, देवांच्या दिव्य प्रभावालाही ओलांडून एक तेज प्रकट झाले. भंते, तेव्हा देवांचा राजा सक्क याने तावतिंस देवांना संबोधित केले – "मित्रांनो, जशी ही चिन्हे दिसत आहेत, भव्य प्रकाश निर्माण होत आहे आणि तेज प्रकट होत आहे, त्यावरून ब्रह्मा प्रकट होणार आहे. कारण प्रकाशाची निर्मिती आणि तेजाचे प्रकटीकरण हे ब्रह्माच्या आगमनाचे पूर्वचिन्ह आहे."' ‘‘ยถา นิมิตฺตา ทิสฺสนฺติ, พฺรหฺมา ปาตุภวิสฺสติ; พฺรหฺมุโน เหตํ นิมิตฺตํ, โอภาโส วิปุโล มหา’’ติ. "ज्याप्रमाणे ही पूर्वलक्षणे (निमित्त) दिसत आहेत, त्यावरून ब्रह्मा लवकरच प्रकट होईल. हा जो अत्यंत विशाल आणि भव्य प्रकाश पसरला आहे, हे ब्रह्माच्या प्रकटीकरणाचेच पूर्वलक्षण आहे." สนงฺกุมารกถา सनंकुमार ब्रह्माची कथा ๒๘๔. ‘อถ โข, ภนฺเต, เทวา ตาวตึสา ยถาสเกสุ อาสเนสุ นิสีทึสุ – ‘‘โอภาสเมตํ ญสฺสาม, ยํวิปาโก ภวิสฺสติ, สจฺฉิกตฺวาว นํ คมิสฺสามา’’ติ. จตฺตาโรปิ มหาราชาโน ยถาสเกสุ อาสเนสุ นิสีทึสุ – ‘‘โอภาสเมตํ ญสฺสาม ยํวิปาโก ภวิสฺสติ, สจฺฉิกตฺวาว [Pg.170] นํ คมิสฺสามา’’ติ. อิทํ สุตฺวา เทวา ตาวตึสา เอกคฺคา สมาปชฺชึสุ – ‘‘โอภาสเมตํ ญสฺสาม, ยํวิปาโก ภวิสฺสติ, สจฺฉิกตฺวาว นํ คมิสฺสามา’’ติ. २८४. "त्यानंतर, भन्ते! तावतिंस लोकातील देव आपापल्या आसनांवर हे विचार करत बसले की, 'आम्ही या प्रकाशाचे कारण जाणून घेऊ, याचा काय परिणाम होईल तो प्रत्यक्ष पाहूनच मग आम्ही जाऊ.' चारही महाराज (चतुर्महाराज) देखील आपापल्या आसनांवर हे विचार करत बसले की, 'आम्ही या प्रकाशाचे कारण जाणून घेऊ, याचा काय परिणाम होईल तो प्रत्यक्ष पाहूनच मग आम्ही जाऊ.' हे ऐकून तावतिंस देव एकाग्रचित्त होऊन समाधीस्थ झाले (आणि विचार करू लागले) की, 'आम्ही या प्रकाशाचे कारण जाणून घेऊ, याचा काय परिणाम होईल तो प्रत्यक्ष पाहूनच मग आम्ही जाऊ.'" ‘ยทา, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร เทวานํ ตาวตึสานํ ปาตุภวติ, โอฬาริกํ อตฺตภาวํ อภินิมฺมินิตฺวา ปาตุภวติ. โย โข ปน, ภนฺเต, พฺรหฺมุโน ปกติวณฺโณ อนภิสมฺภวนีโย โส เทวานํ ตาวตึสานํ จกฺขุปถสฺมึ. ยทา, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร เทวานํ ตาวตึสานํ ปาตุภวติ, โส อญฺเญ เทเว อติโรจติ วณฺเณน เจว ยสสา จ. เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, โสวณฺโณ วิคฺคโห มานุสํ วิคฺคหํ อติโรจติ; เอวเมว โข, ภนฺเต, ยทา พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร เทวานํ ตาวตึสานํ ปาตุภวติ, โส อญฺเญ เทเว อติโรจติ วณฺเณน เจว ยสสา จ. ยทา, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร เทวานํ ตาวตึสานํ ปาตุภวติ, น ตสฺสํ ปริสายํ โกจิ เทโว อภิวาเทติ วา ปจฺจุฏฺเฐติ วา อาสเนน วา นิมนฺเตติ. สพฺเพว ตุณฺหีภูตา ปญฺชลิกา ปลฺลงฺเกน นิสีทนฺติ – ‘‘ยสฺสทานิ เทวสฺส ปลฺลงฺกํ อิจฺฉิสฺสติ พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร, ตสฺส เทวสฺส ปลฺลงฺเก นิสีทิสฺสตี’’ติ. "भन्ते! जेव्हा जेव्हा सनंकुमार ब्रह्मा तावतिंस देवांच्या समोर प्रकट होतो, तेव्हा तो एक स्थूल (दृश्यमान) रूप धारण करूनच प्रकट होतो. कारण, भन्ते! ब्रह्माचे जे मूळ नैसर्गिक रूप आहे, ते तावतिंस देवांच्या दृष्टीपथात येणे अशक्य आहे. भन्ते! जेव्हा सनंकुमार ब्रह्मा तावतिंस देवांच्या समोर प्रकट होतो, तेव्हा तो आपल्या वर्णाने (तेजाने) आणि यशाने (प्रभावाने) इतर देवांपेक्षा अधिक शोभून दिसतो. भन्ते! ज्याप्रमाणे सोन्याची मूर्ती मानवी शरीरापेक्षा अधिक सुंदर व तेजस्वी दिसते, त्याचप्रमाणे, भन्ते! जेव्हा सनंकुमार ब्रह्मा तावतिंस देवांच्या समोर प्रकट होतो, तेव्हा तो इतर देवांपेक्षा वर्णाने व यशाने अधिक शोभून दिसतो. भन्ते! जेव्हा सनंकुमार ब्रह्मा तावतिंस देवांच्या समोर प्रकट होतो, तेव्हा त्या परिषदेतील कोणताही देव त्याला अभिवादन करत नाही, किंवा त्याच्या स्वागतासाठी उठून उभा राहत नाही, अथवा त्याला आसनासाठी आमंत्रित करत नाही. सर्व देव हात जोडून, मांडी घालून शांतपणे बसतात आणि मनात विचार करतात की, 'सनंकुमार ब्रह्मा आता ज्या देवाच्या आसनावर बसण्याची इच्छा करेल, त्याच्याच आसनावर तो बसेल.'" ‘ยสฺส โข ปน, ภนฺเต, เทวสฺส พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร ปลฺลงฺเก นิสีทติ, อุฬารํ โส ลภติ เทโว เวทปฏิลาภํ; อุฬารํ โส ลภติ เทโว โสมนสฺสปฏิลาภํ. เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, ราชา ขตฺติโย มุทฺธาวสิตฺโต อธุนาภิสิตฺโต รชฺเชน, อุฬารํ โส ลภติ เวทปฏิลาภํ, อุฬารํ โส ลภติ โสมนสฺสปฏิลาภํ. เอวเมว โข, ภนฺเต, ยสฺส เทวสฺส พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร ปลฺลงฺเก นิสีทติ, อุฬารํ โส ลภติ เทโว เวทปฏิลาภํ, อุฬารํ โส ลภติ เทโว โสมนสฺสปฏิลาภํ. อถ, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร โอฬาริกํ อตฺตภาวํ อภินิมฺมินิตฺวา กุมารวณฺณี หุตฺวา ปญฺจสิโข เทวานํ ตาวตึสานํ ปาตุรโหสิ. โส เวหาสํ อพฺภุคฺคนฺตฺวา อากาเส อนฺตลิกฺเข ปลฺลงฺเกน นิสีทิ. เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, พลวา ปุริโส สุปจฺจตฺถเต วา ปลฺลงฺเก สเม วา ภูมิภาเค ปลฺลงฺเกน นิสีเทยฺย; เอวเมว โข, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร เวหาสํ อพฺภุคฺคนฺตฺวา อากาเส อนฺตลิกฺเข ปลฺลงฺเกน นิสีทิตฺวา เทวานํ ตาวตึสานํ สมฺปสาทํ วิทิตฺวา อิมาหิ คาถาหิ อนุโมทิ – "भन्ते! ज्या देवाच्या आसनावर सनंकुमार ब्रह्मा बसतो, त्या देवाला अत्यंत महान आनंद आणि परम सुख प्राप्त होते. भन्ते! ज्याप्रमाणे नुकताच राज्याभिषेक झालेला एखादा क्षत्रिय राजा अत्यंत महान आनंद आणि परम सुख अनुभवतो, त्याचप्रमाणे, भन्ते! ज्या देवाच्या आसनावर सनंकुमार ब्रह्मा बसतो, त्या देवाला अत्यंत महान आनंद आणि परम सुख प्राप्त होते. त्यानंतर, भन्ते! सनंकुमार ब्रह्माने एक स्थूल रूप धारण केले आणि पाच शिखा (अंबाडे) असलेल्या पंचशिख नावाच्या तरुण कुमाराचे रूप घेऊन तो तावतिंस देवांच्या समोर प्रकट झाला. तो आकाशात उंच उडाला आणि अंतराळात मांडी घालून (पद्मासनात) बसला. भन्ते! ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य चांगल्या प्रकारे अंथरलेल्या आसनावर किंवा सपाट जमिनीवर सहजपणे मांडी घालून बसेल, त्याचप्रमाणे, भन्ते! सनंकुमार ब्रह्मा आकाशात उंच उडून अंतराळात मांडी घालून बसला आणि तावतिंस देवांचा आनंद व प्रसन्नता पाहून त्याने या गाथांद्वारे आनंद व्यक्त केला –" ‘‘โมทนฺติ [Pg.171] วต โภ เทวา, ตาวตึสา สหินฺทกา; ตถาคตํ นมสฺสนฺตา, ธมฺมสฺส จ สุธมฺมตํ. "अहो! इंद्रासहित सर्व तावतिंस देव अत्यंत आनंदित होत आहेत. ते तथागतांना आणि त्यांच्या सद्धम्माच्या उत्तमत्वाला वंदन करत आहेत." ‘‘นเว เทเว จ ปสฺสนฺตา, วณฺณวนฺเต ยสสฺสิเน; สุคตสฺมึ พฺรหฺมจริยํ, จริตฺวาน อิธาคเต. "सुगतांच्या (बुद्धांच्या) शासनात ब्रह्मचर्य पाळून येथे (तावतिंस लोकात) उत्पन्न झालेल्या, अत्यंत रूपवान आणि यशस्वी अशा नवीन देवांना पाहून ते आनंदित होत आहेत." ‘‘เต อญฺเญ อติโรจนฺติ, วณฺเณน ยสสายุนา; สาวกา ภูริปญฺญสฺส, วิเสสูปคตา อิธ. "अथांग प्रज्ञावंत सुगतांचे (बुद्धांचे) हे श्रावक येथे विशेष गुणांनी युक्त होऊन आले आहेत. ते आपल्या वर्णाने, यशाने आणि आयुष्याने इतर देवांपेक्षा अधिक शोभून दिसत आहेत." ‘‘อิทํ ทิสฺวาน นนฺทนฺติ, ตาวตึสา สหินฺทกา; ตถาคตํ นมสฺสนฺตา, ธมฺมสฺส จ สุธมฺมต’’นฺติ. "हे पाहून, इंद्रासहित सर्व तावतिंस देव तथागतांना वंदन करत आणि सद्धम्माच्या उत्तमत्वाची प्रशंसा करत अत्यंत हर्षोल्हासित होत आहेत." ๒๘๕. ‘อิมมตฺถํ, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร ภาสิตฺถ; อิมมตฺถํ, ภนฺเต, พฺรหฺมุโน สนงฺกุมารสฺส ภาสโต อฏฺฐงฺคสมนฺนาคโต สโร โหติ วิสฺสฏฺโฐ จ วิญฺเญยฺโย จ มญฺชุ จ สวนีโย จ พินฺทุ จ อวิสารี จ คมฺภีโร จ นินฺนาที จ. ยถาปริสํ โข ปน, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร สเรน วิญฺญาเปติ; น จสฺส พหิทฺธา ปริสาย โฆโส นิจฺฉรติ. ยสฺส โข ปน, ภนฺเต, เอวํ อฏฺฐงฺคสมนฺนาคโต สโร โหติ, โส วุจฺจติ ‘‘พฺรหฺมสฺสโร’’ติ. २८५. "भन्ते! सनंकुमार ब्रह्माने हा अर्थ (विषय) सांगितला. भन्ते! जेव्हा सनंकुमार ब्रह्मा बोलत होता, तेव्हा त्याचा आवाज आठ गुणांनी युक्त (अष्टअंगसमन्नागत) होता. तो आवाज स्पष्ट (विस्सट्ठ), समजण्यास सुलभ (विञ्ञेय्य), मधुर (मञ्जु), ऐकण्यास प्रिय (सवनीय), सुबद्ध (बिन्दु), न विखुरणारा (अविसारी), गंभीर (गंभीर) आणि प्रतिध्वनीयुक्त (निन्नादी) असा होता. भन्ते! सनंकुमार ब्रह्मा आपल्या आवाजाने केवळ परिषदेतील लोकांनाच ऐकवत असे; त्याचा आवाज परिषदेच्या बाहेर जात नसे. भन्ते! ज्याचा आवाज अशा आठ गुणांनी युक्त असतो, त्याला 'ब्रह्मस्वर' (ब्रह्मासारखा आवाज असलेला) असे म्हटले जाते." ‘อถ โข, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร เตตฺตึเส อตฺตภาเว อภินิมฺมินิตฺวา เทวานํ ตาวตึสานํ ปจฺเจกปลฺลงฺเกสุ ปลฺลงฺเกน นิสีทิตฺวา เทเว ตาวตึเส อามนฺเตสิ – ‘‘ตํ กึ มญฺญนฺติ, โภนฺโต เทวา ตาวตึสา, ยาวญฺจ โส ภควา พหุชนหิตาย ปฏิปนฺโน พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. เย หิ เกจิ, โภ, พุทฺธํ สรณํ คตา ธมฺมํ สรณํ คตา สงฺฆํ สรณํ คตา สีเลสุ ปริปูรการิโน เต กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปฺเปกจฺเจ ปรนิมฺมิตวสวตฺตีนํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชนฺติ, อปฺเปกจฺเจ นิมฺมานรตีนํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชนฺติ, อปฺเปกจฺเจ ตุสิตานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชนฺติ, อปฺเปกจฺเจ ยามานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชนฺติ, อปฺเปกจฺเจ ตาวตึสานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชนฺติ, อปฺเปกจฺเจ จาตุมหาราชิกานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชนฺติ. เย สพฺพนิหีนํ กายํ ปริปูเรนฺติ, เต คนฺธพฺพกายํ ปริปูเรนฺตี’’’ติ. "त्यानंतर, भन्ते! सनंकुमार ब्रह्माने स्वतःची तेहतीस रूपे धारण केली आणि तावतिंस देवांच्या प्रत्येक आसनावर तो मांडी घालून बसला. मग त्याने तावतिंस देवांना संबोधित केले – 'हे तावतिंस देवहो! तुम्हाला काय वाटते? ते भगवान बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावर अनुकंपा करण्यासाठी आणि देव व मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी कार्यरत राहिले आहेत. अहो! जे कोणी बुद्धाला शरण गेले आहेत, धम्माला शरण गेले आहेत, संघाला शरण गेले आहेत आणि ज्यांनी शील पूर्णपणे पाळले आहे; ते शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, काही परनिर्मितवसवत्ती देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतात, काही निर्माणरती देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतात, काही तुषित देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतात, काही याम देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतात, काही तावतिंस देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतात, तर काही चातुमहाराजिक देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतात. आणि जे सर्वात कनिष्ठ देवसमूहाला पूर्ण करतात, ते गंधर्व लोकामध्ये उत्पन्न होतात.'" ๒๘๖. ‘อิมมตฺถํ[Pg.172], ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร ภาสิตฺถ; อิมมตฺถํ, ภนฺเต, พฺรหฺมุโน สนงฺกุมารสฺส ภาสโต โฆโสเยว เทวา มญฺญนฺติ – ‘‘ยฺวายํ มม ปลฺลงฺเก สฺวายํ เอโกว ภาสตี’’ติ. २८६. "भन्ते! सनंकुमार ब्रह्माने हा अर्थ सांगितला. भन्ते! सनंकुमार ब्रह्मा जेव्हा हे बोलत होता, तेव्हा त्याच्या आवाजामुळे प्रत्येक देवाला असेच वाटत होते की, 'हा जो माझ्या आसनावर बसला आहे, तो केवळ माझ्याशीच बोलत आहे.'" เอกสฺมึ ภาสมานสฺมึ, สพฺเพ ภาสนฺติ นิมฺมิตา; เอกสฺมึ ตุณฺหิมาสีเน, สพฺเพ ตุณฺหี ภวนฺติ เต. "जेव्हा एक (मूळ ब्रह्मा) बोलतो, तेव्हा सर्व निर्मित रूपे बोलतात; आणि जेव्हा एक शांत बसतो, तेव्हा ती सर्व निर्मित रूपे शांत होतात." ตทาสุ เทวา มญฺญนฺติ, ตาวตึสา สหินฺทกา; ยฺวายํ มม ปลฺลงฺกสฺมึ, สฺวายํ เอโกว ภาสตีติ. "त्या वेळी, इंद्रासहित सर्व तावतिंस देवांना असेच वाटत होते की, 'हा जो माझ्या आसनावर बसला आहे, तो केवळ एकटाच बोलत आहे.'" ‘อถ โข, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร เอกตฺเตน อตฺตานํ อุปสํหรติ, เอกตฺเตน อตฺตานํ อุปสํหริตฺวา สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปลฺลงฺเก ปลฺลงฺเกน นิสีทิตฺวา เทเว ตาวตึเส อามนฺเตสิ – "त्यानंतर, भन्ते! सनंकुमार ब्रह्माने स्वतःला पुन्हा एकाच रूपात संकुचित केले (एक रूप धारण केले). एकाच रूपात आल्यानंतर, तो देवांचा राजा शक्राच्या आसनावर मांडी घालून बसला आणि त्याने तावतिंस देवांना संबोधित केले –" ภาวิตอิทฺธิปาโท "विकसित केलेले ऋद्धिपाद" ๒๘๗. ‘‘‘ตํ กึ มญฺญนฺติ, โภนฺโต เทวา ตาวตึสา, ยาว สุปญฺญตฺตา จิเม เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน จตฺตาโร อิทฺธิปาทา ปญฺญตฺตา อิทฺธิปหุตาย อิทฺธิวิสวิตาย อิทฺธิวิกุพฺพนตาย. กตเม จตฺตาโร? อิธ โภ ภิกฺขุ ฉนฺทสมาธิปฺปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ. วีริยสมาธิปฺปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ. จิตฺตสมาธิปฺปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ. วีมํสาสมาธิปฺปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวติ. อิเม โข, โภ, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน จตฺตาโร อิทฺธิปาทา ปญฺญตฺตา อิทฺธิปหุตาย อิทฺธิวิสวิตาย อิทฺธิวิกุพฺพนตาย. २८७. हे तावतिंस देवहो, याविषयी तुमचे काय मत आहे? सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी ऋद्धीच्या सामर्थ्यासाठी, ऋद्धीच्या कौशल्यासाठी आणि विविध प्रकारच्या ऋद्धींच्या चमत्कारांसाठी हे चार इद्धिपाद किती उत्तम प्रकारे प्रज्ञप्त केले आहेत! कोणते चार? हे देवहो, येथे भिक्खू छंदावर आधारित समाधी आणि प्रधानसंस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची भावना करतो. वीर्यावर आधारित समाधी आणि प्रधानसंस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची भावना करतो. चित्तावर आधारित समाधी आणि प्रधानसंस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची भावना करतो. विमंसेवर आधारित समाधी आणि प्रधानसंस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची भावना करतो. हे देवहो, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी ऋद्धीच्या सामर्थ्यासाठी, ऋद्धीच्या कौशल्यासाठी आणि विविध प्रकारच्या ऋद्धींच्या चमत्कारांसाठी हे चार इद्धिपाद प्रज्ञप्त केले आहेत. ‘‘‘เย หิ เกจิ โภ อตีตมทฺธานํ สมณา วา พฺราหฺมณา วา อเนกวิหิตํ อิทฺธิวิธํ ปจฺจนุโภสุํ, สพฺเพ เต อิเมสํเยว จตุนฺนํ อิทฺธิปาทานํ ภาวิตตฺตา พหุลีกตตฺตา. เยปิ หิ เกจิ โภ อนาคตมทฺธานํ สมณา วา พฺราหฺมณา วา อเนกวิหิตํ อิทฺธิวิธํ ปจฺจนุโภสฺสนฺติ, สพฺเพ เต อิเมสํเยว จตุนฺนํ อิทฺธิปาทานํ ภาวิตตฺตา พหุลีกตตฺตา. เยปิ หิ เกจิ โภ เอตรหิ สมณา วา พฺราหฺมณา วา อเนกวิหิตํ อิทฺธิวิธํ ปจฺจนุโภนฺติ, สพฺเพ เต อิเมสํเยว จตุนฺนํ อิทฺธิปาทานํ ภาวิตตฺตา พหุลีกตตฺตา. ปสฺสนฺติ โน โภนฺโต เทวา ตาวตึสา มมปิมํ [Pg.173] เอวรูปํ อิทฺธานุภาว’’นฺติ? ‘‘เอวํ มหาพฺรหฺเม’’ติ. ‘‘อหมฺปิ โข โภ อิเมสํเยว จตุนฺนญฺจ อิทฺธิปาทานํ ภาวิตตฺตา พหุลีกตตฺตา เอวํ มหิทฺธิโก เอวํมหานุภาโว’’ติ. อิมมตฺถํ, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร ภาสิตฺถ. อิมมตฺถํ, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร ภาสิตฺวา เทเว ตาวตึเส อามนฺเตสิ – हे देवहो, भूतकाळात ज्या कोणी श्रमणांनी किंवा ब्राह्मणांनी विविध प्रकारच्या ऋद्धींचा अनुभव घेतला, त्या सर्वांनी याच चार इद्धिपादांची भावना केल्यामुळे आणि त्यांचा वारंवार सराव केल्यामुळेच तो घेतला. हे देवहो, भविष्यकाळात जे कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण विविध प्रकारच्या ऋद्धींचा अनुभव घेतील, ते सर्व याच चार इद्धिपादांची भावना केल्यामुळे आणि त्यांचा वारंवार सराव केल्यामुळेच घेतील. हे देवहो, वर्तमानकाळात जे कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण विविध प्रकारच्या ऋद्धींचा अनुभव घेत आहेत, ते सर्व याच चार इद्धिपादांची भावना केल्यामुळे आणि त्यांचा वारंवार सराव केल्यामुळेच घेत आहेत. हे तावतिंस देवहो, तुम्ही माझाही असा ऋद्धीचा प्रभाव पाहत आहात ना? 'होय, महाब्रह्मदेवा!' हे देवहो, मीसुद्धा याच चार इद्धिपादांची भावना केल्यामुळे आणि त्यांचा वारंवार सराव केल्यामुळेच असा महाऋद्धीवान आणि महाप्रतापी झालो आहे. भंते, महाब्रह्मा सनंकुमारांनी हा विषय सांगितला. भंते, महाब्रह्मा सनंकुमारांनी हा विषय सांगून तावतिंस देवांना संबोधित केले – ติวิโธ โอกาสาธิคโม तीन प्रकारची अवकाश-प्राप्ती (ओकासाधिगम) ๒๘๘. ‘‘‘ตํ กึ มญฺญนฺติ, โภนฺโต เทวา ตาวตึสา, ยาวญฺจิทํ เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน ตโย โอกาสาธิคมา อนุพุทฺธา สุขสฺสาธิคมาย. กตเม ตโย? อิธ โภ เอกจฺโจ สํสฏฺโฐ วิหรติ กาเมหิ สํสฏฺโฐ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ. โส อปเรน สมเยน อริยธมฺมํ สุณาติ, โยนิโส มนสิ กโรติ, ธมฺมานุธมฺมํ ปฏิปชฺชติ. โส อริยธมฺมสฺสวนํ อาคมฺม โยนิโสมนสิการํ ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปตฺตึ อสํสฏฺโฐ วิหรติ กาเมหิ อสํสฏฺโฐ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ. ตสฺส อสํสฏฺฐสฺส กาเมหิ อสํสฏฺฐสฺส อกุสเลหิ ธมฺเมหิ อุปฺปชฺชติ สุขํ, สุขา ภิยฺโย โสมนสฺสํ. เสยฺยถาปิ, โภ, ปมุทา ปาโมชฺชํ ชาเยถ, เอวเมว โข, โภ, อสํสฏฺฐสฺส กาเมหิ อสํสฏฺฐสฺส อกุสเลหิ ธมฺเมหิ อุปฺปชฺชติ สุขํ, สุขา ภิยฺโย โสมนสฺสํ. อยํ โข, โภ, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน ปฐโม โอกาสาธิคโม อนุพุทฺโธ สุขสฺสาธิคมาย. २८८. हे तावतिंस देवहो, याविषयी तुमचे काय मत आहे? सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी सुखाच्या प्राप्तीसाठी अवकाश-प्राप्तीचे (ओकासाधिगम) तीन प्रकार किती चांगल्या प्रकारे जाणले आहेत! कोणते तीन? हे देवहो, येथे एखादी व्यक्ती कामभोगांमध्ये आणि अकुशल धर्मांमध्ये गुंतून राहते. ती व्यक्ती नंतरच्या काळात आर्य धर्माचे श्रवण करते, योग्य प्रकारे मनन करते आणि धर्मानुसार आचरण करते. ती व्यक्ती आर्य धर्माचे श्रवण, योग्य मनन आणि धर्मानुसार आचरण यांमुळे कामभोगांपासून अलिप्त आणि अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन विहरते. कामभोगांपासून आणि अकुशल धर्मांपासून अलिप्त झालेल्या त्या व्यक्तीला सुख प्राप्त होते आणि त्या सुखातून अधिक आनंद (सौमनस्य) निर्माण होतो. हे देवहो, ज्याप्रमाणे अल्प आनंदापासून तीव्र आनंद उत्पन्न होतो, त्याचप्रमाणे कामभोगांपासून आणि अकुशल धर्मांपासून अलिप्त झालेल्या त्या व्यक्तीला सुख प्राप्त होते आणि त्या सुखातून अधिक आनंद निर्माण होतो. हे देवहो, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी सुखाच्या प्राप्तीसाठी जाणलेली ही पहिली अवकाश-प्राप्ती आहे. ‘‘‘ปุน จปรํ, โภ, อิเธกจฺจสฺส โอฬาริกา กายสงฺขารา อปฺปฏิปฺปสฺสทฺธา โหนฺติ, โอฬาริกา วจีสงฺขารา อปฺปฏิปฺปสฺสทฺธา โหนฺติ, โอฬาริกา จิตฺตสงฺขารา อปฺปฏิปฺปสฺสทฺธา โหนฺติ. โส อปเรน สมเยน อริยธมฺมํ สุณาติ, โยนิโส มนสิ กโรติ, ธมฺมานุธมฺมํ ปฏิปชฺชติ. ตสฺส อริยธมฺมสฺสวนํ อาคมฺม โยนิโสมนสิการํ ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปตฺตึ โอฬาริกา กายสงฺขารา ปฏิปฺปสฺสมฺภนฺติ, โอฬาริกา วจีสงฺขารา ปฏิปฺปสฺสมฺภนฺติ, โอฬาริกา จิตฺตสงฺขารา ปฏิปฺปสฺสมฺภนฺติ. ตสฺส โอฬาริกานํ กายสงฺขารานํ ปฏิปฺปสฺสทฺธิยา โอฬาริกานํ วจีสงฺขารานํ ปฏิปฺปสฺสทฺธิยา โอฬาริกานํ จิตฺตสงฺขารานํ [Pg.174] ปฏิปฺปสฺสทฺธิยา อุปฺปชฺชติ สุขํ, สุขา ภิยฺโย โสมนสฺสํ. เสยฺยถาปิ, โภ, ปมุทา ปาโมชฺชํ ชาเยถ, เอวเมว โข โภ โอฬาริกานํ กายสงฺขารานํ ปฏิปฺปสฺสทฺธิยา โอฬาริกานํ วจีสงฺขารานํ ปฏิปฺปสฺสทฺธิยา โอฬาริกานํ จิตฺตสงฺขารานํ ปฏิปฺปสฺสทฺธิยา อุปฺปชฺชติ สุขํ, สุขา ภิยฺโย โสมนสฺสํ. อยํ โข, โภ, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน ทุติโย โอกาสาธิคโม อนุพุทฺโธ สุขสฺสาธิคมาย. पुन्हा दुसरे असे की, हे देवहो, येथे एखाद्या व्यक्तीचे स्थूल कायसंस्कार शांत झालेले नसतात, स्थूल वचीसंस्कार शांत झालेले नसतात आणि स्थूल चित्तसंस्कार शांत झालेले नसतात. ती व्यक्ती नंतरच्या काळात आर्य धर्माचे श्रवण करते, योग्य प्रकारे मनन करते आणि धर्मानुसार आचरण करते. आर्य धर्माचे श्रवण, योग्य मनन आणि धर्मानुसार आचरण यांमुळे त्या व्यक्तीचे स्थूल कायसंस्कार शांत होतात, स्थूल वचीसंस्कार शांत होतात आणि स्थूल चित्तसंस्कार शांत होतात. त्या व्यक्तीचे स्थूल कायसंस्कार, स्थूल वचीसंस्कार आणि स्थूल चित्तसंस्कार शांत झाल्यामुळे सुख प्राप्त होते आणि त्या सुखातून अधिक आनंद (सौमनस्य) निर्माण होतो. हे देवहो, ज्याप्रमाणे अल्प आनंदापासून तीव्र आनंद उत्पन्न होतो, त्याचप्रमाणे स्थूल कायसंस्कार, स्थूल वचीसंस्कार आणि स्थूल चित्तसंस्कार शांत झाल्यामुळे त्या व्यक्तीला सुख प्राप्त होते आणि त्या सुखातून अधिक आनंद निर्माण होतो. हे देवहो, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी सुखाच्या प्राप्तीसाठी जाणलेली ही दुसरी अवकाश-प्राप्ती आहे. ‘‘‘ปุน จปรํ, โภ, อิเธกจฺโจ ‘อิทํ กุสล’นฺติ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ, ‘อิทํ อกุสล’นฺติ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ. ‘อิทํ สาวชฺชํ อิทํ อนวชฺชํ, อิทํ เสวิตพฺพํ อิทํ น เสวิตพฺพํ, อิทํ หีนํ อิทํ ปณีตํ, อิทํ กณฺหสุกฺกสปฺปฏิภาค’นฺติ ยถาภูตํ นปฺปชานาติ. โส อปเรน สมเยน อริยธมฺมํ สุณาติ, โยนิโส มนสิ กโรติ, ธมฺมานุธมฺมํ ปฏิปชฺชติ. โส อริยธมฺมสฺสวนํ อาคมฺม โยนิโสมนสิการํ ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปตฺตึ, ‘อิทํ กุสล’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ, ‘อิทํ อกุสล’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ. อิทํ สาวชฺชํ อิทํ อนวชฺชํ, อิทํ เสวิตพฺพํ อิทํ น เสวิตพฺพํ, อิทํ หีนํ อิทํ ปณีตํ, อิทํ กณฺหสุกฺกสปฺปฏิภาค’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ. ตสฺส เอวํ ชานโต เอวํ ปสฺสโต อวิชฺชา ปหียติ, วิชฺชา อุปฺปชฺชติ. ตสฺส อวิชฺชาวิราคา วิชฺชุปฺปาทา อุปฺปชฺชติ สุขํ, สุขา ภิยฺโย โสมนสฺสํ. เสยฺยถาปิ, โภ, ปมุทา ปาโมชฺชํ ชาเยถ, เอวเมว โข, โภ, อวิชฺชาวิราคา วิชฺชุปฺปาทา อุปฺปชฺชติ สุขํ, สุขา ภิยฺโย โสมนสฺสํ. อยํ โข, โภ, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน ตติโย โอกาสาธิคโม อนุพุทฺโธ สุขสฺสาธิคมาย. อิเม โข, โภ, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน ตโย โอกาสาธิคมา อนุพุทฺธา สุขสฺสาธิคมายา’’ติ. อิมมตฺถํ, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร ภาสิตฺถ, อิมมตฺถํ, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร ภาสิตฺวา เทเว ตาวตึเส อามนฺเตสิ – "मित्रांनो, पुन्हा आणखी असे की, येथे एखादी व्यक्ती 'हे कुशल आहे' हे यथार्थपणे जाणत नाही, 'हे अकुशल आहे' हे यथार्थपणे जाणत नाही. 'हे सदोष आहे, हे निर्दोष आहे; याचे सेवन करावे, याचे सेवन करू नये; हे हीन आहे, हे प्रणीत (उत्कृष्ट) आहे; हे कृष्ण-शुक्ल (बरे-वाईट) प्रतिपक्षाचे आहे' हे यथार्थपणे जाणत नाही. तो काही काळानंतर आर्यधम्माचे श्रवण करतो, योनीसो मनसिकार (योग्य प्रकारे मनन) करतो आणि धम्मानुधम्म प्रतिपत्ती (धम्मानुसार आचरण) करतो. तो आर्यधम्माच्या श्रवणामुळे, योनीसो मनसिकारामुळे आणि धम्मानुधम्म प्रतिपत्तीमुळे 'हे कुशल आहे' हे यथार्थपणे जाणतो, 'हे अकुशल आहे' हे यथार्थपणे जाणतो. 'हे सदोष आहे, हे निर्दोष आहे; याचे सेवन करावे, याचे सेवन करू नये; हे हीन आहे, हे प्रणीत आहे; हे कृष्ण-शुक्ल प्रतिपक्षाचे आहे' हे यथार्थपणे जाणतो. अशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्या त्या व्यक्तीची अविद्या नष्ट होते आणि विद्या उत्पन्न होते. अविद्येचा नाश झाल्यामुळे आणि विद्येचा उदय झाल्यामुळे सुख उत्पन्न होते, आणि सुखातून अधिकच सोमनस्य (प्रसन्नता) उत्पन्न होते. मित्रांनो, ज्याप्रमाणे अत्यंत हर्षामुळे प्रमोद उत्पन्न होतो, त्याचप्रमाणे अविद्येचा नाश झाल्यामुळे आणि विद्येचा उदय झाल्यामुळे सुख उत्पन्न होते, आणि सुखातून अधिकच सोमनस्य उत्पन्न होते. मित्रांनो, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध अशा त्या भगवंतांनी सुखाच्या प्राप्तीसाठी हा तिसरा 'अवकाशाधिगम' (मुक्तीच्या संधीची प्राप्ती) शोधून काढला आहे. मित्रांनो, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध अशा त्या भगवंतांनी सुखाच्या प्राप्तीसाठी हे तीन अवकाशाधिगम शोधून काढले आहेत." भन्ते, ब्रह्मा सनंकुमारांनी हा अर्थ सांगितला. भन्ते, ब्रह्मा सनंकुमारांनी हा अर्थ सांगून तावतिंस देवांना संबोधित केले— จตุสติปฏฺฐานํ चार सतिपट्ठान ๒๘๙. ‘‘‘ตํ กึ มญฺญนฺติ, โภนฺโต เทวา ตาวตึสา, ยาว สุปญฺญตฺตา จิเม เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน จตฺตาโร สติปฏฺฐานา ปญฺญตฺตา กุสลสฺสาธิคมาย. กตเม จตฺตาโร? อิธ[Pg.175], โภ, ภิกฺขุ อชฺฌตฺตํ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. อชฺฌตฺตํ กาเย กายานุปสฺสี วิหรนฺโต ตตฺถ สมฺมา สมาธิยติ, สมฺมา วิปฺปสีทติ. โส ตตฺถ สมฺมา สมาหิโต สมฺมา วิปฺปสนฺโน พหิทฺธา ปรกาเย ญาณทสฺสนํ อภินิพฺพตฺเตติ. อชฺฌตฺตํ เวทนาสุ เวทนานุปสฺสี วิหรติ…เป… พหิทฺธา ปรเวทนาสุ ญาณทสฺสนํ อภินิพฺพตฺเตติ. อชฺฌตฺตํ จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสี วิหรติ…เป… พหิทฺธา ปรจิตฺเต ญาณทสฺสนํ อภินิพฺพตฺเตติ. อชฺฌตฺตํ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. อชฺฌตฺตํ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรนฺโต ตตฺถ สมฺมา สมาธิยติ, สมฺมา วิปฺปสีทติ. โส ตตฺถ สมฺมา สมาหิโต สมฺมา วิปฺปสนฺโน พหิทฺธา ปรธมฺเมสุ ญาณทสฺสนํ อภินิพฺพตฺเตติ. อิเม โข, โภ, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน จตฺตาโร สติปฏฺฐานา ปญฺญตฺตา กุสลสฺสาธิคมายา’’ติ. อิมมตฺถํ, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร ภาสิตฺถ. อิมมตฺถํ, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร ภาสิตฺวา เทเว ตาวตึเส อามนฺเตสิ – २८९. "हे तावतिंस देवहो, तुम्हाला काय वाटते? सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध अशा त्या भगवंतांनी कुशल धर्माच्या प्राप्तीसाठी हे चार सतिपट्ठान किती उत्तम प्रकारे प्रज्ञप्त केले आहेत! ते चार कोणते? मित्रांनो, येथे भिक्खू स्वतःच्या कायेमध्ये कायेचे सतत दर्शन करत (कायानुपस्सना करत), उद्योगी (आतपी), प्रज्ञावान (संपजान) आणि स्मृतिमान (satiमा) होऊन, जगातील अभिज्झा (लोभ) आणि दोमनस्स (खिन्नता) दूर करून विहरतो. स्वतःच्या कायेमध्ये कायेचे सतत दर्शन करत विहरताना, तो तेथे चित्त चांगल्या प्रकारे एकाग्र करतो, चांगल्या प्रकारे प्रसन्न करतो. तो तेथे चांगल्या प्रकारे समाहित आणि चांगल्या प्रकारे प्रसन्न होऊन, बाह्यतः इतरांच्या कायेमध्ये ज्ञानदर्शन उत्पन्न करतो. स्वतःच्या वेदनांमध्ये वेदनांचे सतत दर्शन करत (वेदनानुपस्सना करत) विहरतो... (तसेच) बाह्यतः इतरांच्या वेदनांमध्ये ज्ञानदर्शन उत्पन्न करतो. स्वतःच्या चित्तामध्ये चित्ताचे सतत दर्शन करत (चित्तानुपस्सना करत) विहरतो... (तसेच) बाह्यतः इतरांच्या चित्तामध्ये ज्ञानदर्शन उत्पन्न करतो. स्वतःच्या धम्मांमध्ये (मानसिक अवस्थांमध्ये) धम्मांचे सतत दर्शन करत (धम्मानुपस्सना करत), उद्योगी, प्रज्ञावान आणि स्मृतिमान होऊन, जगातील अभिज्झा आणि दोमनस्स दूर करून विहरतो. स्वतःच्या धम्मांमध्ये धम्मांचे सतत दर्शन करत विहरताना, तो तेथे चित्त चांगल्या प्रकारे एकाग्र करतो, चांगल्या प्रकारे प्रसन्न करतो. तो तेथे चांगल्या प्रकारे समाहित आणि चांगल्या प्रकारे प्रसन्न होऊन, बाह्यतः इतरांच्या धम्मांमध्ये ज्ञानदर्शन उत्पन्न करतो. मित्रांनो, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध अशा त्या भगवंतांनी कुशल धर्माच्या प्राप्तीसाठी प्रज्ञप्त केलेले हे चार सतिपट्ठान आहेत." भन्ते, ब्रह्मा सनंकुमारांनी हा अर्थ सांगितला. भन्ते, ब्रह्मा सनंकुमारांनी हा अर्थ सांगून तावतिंस देवांना संबोधित केले— สตฺต สมาธิปริกฺขารา समाधीचे सात परिकार ๒๙๐. ‘‘‘ตํ กึ มญฺญนฺติ, โภนฺโต เทวา ตาวตึสา, ยาว สุปญฺญตฺตา จิเม เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน สตฺต สมาธิปริกฺขารา สมฺมาสมาธิสฺส ปริภาวนาย สมฺมาสมาธิสฺส ปาริปูริยา. กตเม สตฺต? สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ. ยา โข, โภ, อิเมหิ สตฺตหงฺเคหิ จิตฺตสฺส เอกคฺคตา ปริกฺขตา, อยํ วุจฺจติ, โภ, อริโย สมฺมาสมาธิ สอุปนิโส อิติปิ สปริกฺขาโร อิติปิ. สมฺมาทิฏฺฐิสฺส โภ, สมฺมาสงฺกปฺโป ปโหติ, สมฺมาสงฺกปฺปสฺส สมฺมาวาจา ปโหติ, สมฺมาวาจสฺส สมฺมากมฺมนฺโต ปโหติ. สมฺมากมฺมนฺตสฺส สมฺมาอาชีโว ปโหติ, สมฺมาอาชีวสฺส สมฺมาวายาโม ปโหติ, สมฺมาวายามสฺส สมฺมาสติ ปโหติ, สมฺมาสติสฺส สมฺมาสมาธิ ปโหติ, สมฺมาสมาธิสฺส สมฺมาญาณํ ปโหติ, สมฺมาญาณสฺส สมฺมาวิมุตฺติ ปโหติ. ยญฺหิ ตํ, โภ, สมฺมา วทมาโน วเทยฺย – ‘สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม สนฺทิฏฺฐิโก อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหิ อปารุตา อมตสฺส [Pg.176] ทฺวารา’ติ อิทเมว ตํ สมฺมา วทมาโน วเทยฺย. สฺวากฺขาโต หิ, โภ, ภควตา ธมฺโม สนฺทิฏฺฐิโก, อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหิ อปารุตา อมตสฺส ทฺวารา. २९०. "हे तावतिंस देवहो, तुम्हाला काय वाटते? सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, अर्हत, सम्यक्सम्बुद्ध अशा त्या भगवंतांनी सम्यक समाधीच्या विकासासाठी आणि सम्यक समाधीच्या परिपूर्णतेसाठी समाधीचे हे सात परिकार (साधने) किती उत्तम प्रकारे प्रज्ञप्त केले आहेत! ते सात कोणते? सम्यक दृष्टी (सम्मादिट्ठि), सम्यक संकल्प (सम्मासंकप्पो), सम्यक वाचा (सम्मावाचा), सम्यक कर्मान्त (सम्माकम्मन्तो), सम्यक आजीव (सम्माआजीवो), सम्यक व्यायाम (सम्मावायामो) आणि सम्यक स्मृती (सम्मासति). मित्रांनो, या सात अंगांनी वेढलेली जी चित्ताची एकाग्रता आहे, त्यालाच 'सोपनिष' (कारणांसह) आणि 'सपरिकार' (साधनांसह) असलेला 'आर्य सम्यक समाधी' असे म्हटले जाते. मित्रांनो, सम्यक दृष्टी असलेल्या व्यक्तीचा सम्यक संकल्प उत्पन्न होतो; सम्यक संकल्प असलेल्याची सम्यक वाचा उत्पन्न होते; सम्यक वाचा असलेल्याचा सम्यक कर्मान्त उत्पन्न होतो; सम्यक कर्मान्त असलेल्याचा सम्यक आजीव उत्पन्न होतो; सम्यक आजीव असलेल्याचा सम्यक व्यायाम उत्पन्न होतो; सम्यक व्यायाम असलेल्याची सम्यक स्मृती उत्पन्न होते; सम्यक स्मृती असलेल्याची सम्यक समाधी उत्पन्न होते; सम्यक समाधी असलेल्याचे सम्यक ज्ञान उत्पन्न होते; आणि सम्यक ज्ञान असलेल्याची सम्यक विमुक्ती उत्पन्न होते. मित्रांनो, जो कोणी यथार्थपणे धम्माची प्रशंसा करत असे म्हणेल की—'भगवंतांनी धम्म उत्तम प्रकारे घोषित केला आहे (स्वाक्खातो), तो याच जन्मात प्रत्यक्ष अनुभवता येणारा (संदिट्ठिको), तात्काळ फळ देणारा (अकालिको), स्वतः या आणि पहा अशा स्वरूपाचा (एहिपस्सिको), स्वतःच्या कल्याणासाठी आचरणात आणण्याजोगा (ओपनेय्यिको) आणि सुज्ञ लोकांनी आपापल्या परीने अनुभवण्याजोगा (पच्चत्तं वेदितब्बो विञ्ञूहि) आहे; अमृताचे (निर्वाणाचे) द्वार खुले झाले आहे'—तो खरोखरच योग्य बोलत असेल. कारण मित्रांनो, भगवंतांनी धम्म उत्तम प्रकारे घोषित केला आहे, तो याच जन्मात प्रत्यक्ष अनुभवता येणारा, तात्काळ फळ देणारा, स्वतः या आणि पहा अशा स्वरूपाचा, स्वतःच्या कल्याणासाठी आचरणात आणण्याजोगा आणि सुज्ञ लोकांनी आपापल्या परीने अनुभवण्याजोगा आहे; आणि अमृताचे द्वार खुले झाले आहे." ‘‘‘เย หิ เกจิ, โภ, พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคตา, ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคตา, สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคตา, อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคตา, เย จิเม โอปปาติกา ธมฺมวินีตา สาติเรกานิ จตุวีสติสตสหสฺสานิ มาคธกา ปริจารกา อพฺภตีตา กาลงฺกตา ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โสตาปนฺนา อวินิปาตธมฺมา นิยตา สมฺโพธิปรายณา. อตฺถิ เจเวตฺถ สกทาคามิโน. "मित्रांनो, जे कोणी बुद्धांवर अचल श्रद्धेने युक्त आहेत, धम्मावर अचल श्रद्धेने युक्त आहेत, संघावर अचल श्रद्धेने युक्त आहेत, आणि आर्यांना प्रिय असलेल्या शीलांनी युक्त आहेत; आणि जे हे चोवीस लाखांहून अधिक मगध देशातील उपासक आहेत, जे धम्मामध्ये सुसंस्कारित होऊन मृत्यूनंतर देवलोकात उत्पन्न झाले आहेत (औपपातिक झाले आहेत), ते सर्व तीन संयोजनांचा (बंधनांचा) नाश झाल्यामुळे सोतापन्न झाले आहेत. ते दुर्गतीला न जाणारे, निश्चित गती असलेले आणि संबोधीकडे वाटचाल करणारे आहेत. आणि त्यांच्यामध्ये सकदागामी देखील आहेत." ‘‘อตฺถายํ อิตรา ปชา, ปุญฺญาภาคาติ เม มโน; สงฺขาตุํ โนปิ สกฺโกมิ, มุสาวาทสฺส โอตฺตปฺป’’นฺติ. "यांच्याव्यतिरिक्त इतरही प्रजा (लोक) आहेत, ज्या पुण्याच्या भागीदार (अनागामी) आहेत, असे मला वाटते; परंतु असत्य बोलण्याच्या भयाने मी त्यांची अचूक संख्या सांगू शकत नाही." ๒๙๑. ‘อิมมตฺถํ, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร ภาสิตฺถ, อิมมตฺถํ, ภนฺเต, พฺรหฺมุโน สนงฺกุมารสฺส ภาสโต เวสฺสวณสฺส มหาราชสฺส เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘‘อจฺฉริยํ วต โภ, อพฺภุตํ วต โภ, เอวรูโปปิ นาม อุฬาโร สตฺถา ภวิสฺสติ, เอวรูปํ อุฬารํ ธมฺมกฺขานํ, เอวรูปา อุฬารา วิเสสาธิคมา ปญฺญายิสฺสนฺตี’’ติ. อถ, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร เวสฺสวณสฺส มหาราชสฺส เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย เวสฺสวณํ มหาราชานํ เอตทโวจ – ‘‘ตํ กึ มญฺญติ ภวํ เวสฺสวโณ มหาราชา อตีตมฺปิ อทฺธานํ เอวรูโป อุฬาโร สตฺถา อโหสิ, เอวรูปํ อุฬารํ ธมฺมกฺขานํ, เอวรูปา อุฬารา วิเสสาธิคมา ปญฺญายึสุ. อนาคตมฺปิ อทฺธานํ เอวรูโป อุฬาโร สตฺถา ภวิสฺสติ, เอวรูปํ อุฬารํ ธมฺมกฺขานํ, เอวรูปา อุฬารา วิเสสาธิคมา ปญฺญายิสฺสนฺตี’’’ติ. २९१. भंते! ब्रह्मा सनंकुमाराने ही गोष्ट सांगितली. भंते! जेव्हा ब्रह्मा सनंकुमार ही गोष्ट सांगत होते, तेव्हा वेस्सवण महाराज यांच्या मनात असा विचार आला— 'अहो आश्चर्य! अहो अद्भुत! असे महान शास्ता अस्तित्वात आले आहेत, अशी महान धम्मदेशना होत आहे आणि अशा महान विशेषाधिगमांची प्राप्ती दिसून येत आहे!' त्यानंतर, भंते! ब्रह्मा सनंकुमाराने वेस्सवण महाराजांच्या मनातील हा विचार आपल्या चेतोपरिय ज्ञानाने जाणून वेस्सवण महाराजांना असे म्हटले— 'महाराज वेस्सवण! तुम्हाला काय वाटते? भूतकाळातही असेच महान शास्ता होऊन गेले आहेत, अशीच महान धम्मदेशना झाली आहे आणि अशाच महान विशेषाधिगमांची प्राप्ती झाली होती. तसेच भविष्यकाळातही असेच महान शास्ता होतील, अशीच महान धम्मदेशना होईल आणि अशाच महान विशेषाधिगमांची प्राप्ती दिसून येईल.' ๒๙๒. ‘‘‘อิมมตฺถํ, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร เทวานํ ตาวตึสานํ อภาสิ, อิมมตฺถํ เวสฺสวโณ มหาราชา พฺรหฺมุโน สนงฺกุมารสฺส เทวานํ [Pg.177] ตาวตึสานํ ภาสโต สมฺมุขา สุตํ สมฺมุขา ปฏิคฺคหิตํ สยํ ปริสายํ อาโรเจสิ’’. २९२. भंते! ब्रह्मा सनंकुमाराने तावतिंस लोकातील देवांना ही गोष्ट सांगितली. वेस्सवण महाराजांनी, ब्रह्मा सनंकुमार तावतिंस देवांना ही गोष्ट सांगत असताना, ती त्यांच्याकडून प्रत्यक्ष ऐकली व ग्रहण केली आणि नंतर ती आपल्या स्वतःच्या परिषदेला ऐकवली. อิมมตฺถํ ชนวสโภ ยกฺโข เวสฺสวณสฺส มหาราชสฺส สยํ ปริสายํ ภาสโต สมฺมุขา สุตํ สมฺมุขา ปฏิคฺคหิตํ ภควโต อาโรเจสิ. อิมมตฺถํ ภควา ชนวสภสฺส ยกฺขสฺส สมฺมุขา สุตฺวา สมฺมุขา ปฏิคฺคเหตฺวา สามญฺจ อภิญฺญาย อายสฺมโต อานนฺทสฺส อาโรเจสิ, อิมมตฺถมายสฺมา อานนฺโท ภควโต สมฺมุขา สุตฺวา สมฺมุขา ปฏิคฺคเหตฺวา อาโรเจสิ ภิกฺขูนํ ภิกฺขุนีนํ อุปาสกานํ อุปาสิกานํ. ตยิทํ พฺรหฺมจริยํ อิทฺธญฺเจว ผีตญฺจ วิตฺถาริกํ พาหุชญฺญํ ปุถุภูตํ ยาว เทวมนุสฺเสหิ สุปฺปกาสิตนฺติ. हीच गोष्ट जनवसभ यक्षाने, वेस्सवण महाराज आपल्या परिषदेला सांगत असताना, त्यांच्याकडून प्रत्यक्ष ऐकली व ग्रहण केली आणि ती भगवंतांना सांगितली. भगवंतांनी जनवसभ यक्षाकडून ती प्रत्यक्ष ऐकून व ग्रहण करून, तसेच स्वतःच्या अभिज्ञेने जाणून घेऊन, आयुष्यमान आनंदांना सांगितली. आयुष्यमान आनंदांनी भगवंतांकडून ती प्रत्यक्ष ऐकून व ग्रहण करून भिक्खू, भिक्खुनी, उपासक आणि उपासिकांना सांगितली. अशा प्रकारे हे ब्रह्मचर्य समृद्ध, संपन्न, विस्तृत, बहुजनप्रिय आणि सर्वत्र पसरलेले झाले आहे, तसेच देव आणि मनुष्यांमध्ये चांगल्या प्रकारे प्रकाशित झाले आहे. ชนวสภสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ ปญฺจมํ. पाचवे जनवसभ सुत्त समाप्त झाले. ๖. มหาโควินฺทสุตฺตํ ६. महागोविंद सुत्त ๒๙๓. เอวํ [Pg.178] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา ราชคเห วิหรติ คิชฺฌกูเฏ ปพฺพเต. อถ โข ปญฺจสิโข คนฺธพฺพปุตฺโต อภิกฺกนฺตาย รตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺโณ เกวลกปฺปํ คิชฺฌกูฏํ ปพฺพตํ โอภาเสตฺวา เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิโต โข ปญฺจสิโข คนฺธพฺพปุตฺโต ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ยํ โข เม, ภนฺเต, เทวานํ ตาวตึสานํ สมฺมุขา สุตํ สมฺมุขา ปฏิคฺคหิตํ, อาโรเจมิ ตํ ภควโต’’ติ. ‘‘อาโรเจหิ เม ตฺวํ, ปญฺจสิขา’’ติ ภควา อโวจ. २९३. असे मी ऐकले आहे— एक वेळ भगवान राजगृह येथील गिद्धकूट पर्वतावर विहार करत होते. तेव्हा पंचशिख नावाचा गंधर्वपुत्र, रात्र संपत आली असताना, अत्यंत मनमोहक कांतीने संपूर्ण गिद्धकूट पर्वत प्रकाशित करून, जेथे भगवान होते तेथे आला. जवळ येऊन त्याने भगवंतांना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेला गंधर्वपुत्र पंचशिख भगवंतांना म्हणाला— 'भंते! तावतिंस देवांच्या समक्ष मी जे प्रत्यक्ष ऐकले आणि ग्रहण केले आहे, ते मी भगवंतांना सांगू इच्छितो.' भगवान म्हणाले— 'पंचशिखा! मला ते सांग.' เทวสภา देवसभा ๒๙๔. ‘‘ปุริมานิ, ภนฺเต, ทิวสานิ ปุริมตรานิ ตทหุโปสเถ ปนฺนรเส ปวารณาย ปุณฺณาย ปุณฺณมาย รตฺติยา เกวลกปฺปา จ เทวา ตาวตึสา สุธมฺมายํ สภายํ สนฺนิสินฺนา โหนฺติ สนฺนิปติตา; มหตี จ ทิพฺพปริสา สมนฺตโต นิสินฺนา โหนฺติ, จตฺตาโร จ มหาราชาโน จตุทฺทิสา นิสินฺนา โหนฺติ; ปุรตฺถิมาย ทิสาย ธตรฏฺโฐ มหาราชา ปจฺฉิมาภิมุโข นิสินฺโน โหติ เทเว ปุรกฺขตฺวา; ทกฺขิณาย ทิสาย วิรูฬฺหโก มหาราชา อุตฺตราภิมุโข นิสินฺโน โหติ เทเว ปุรกฺขตฺวา; ปจฺฉิมาย ทิสาย วิรูปกฺโข มหาราชา ปุรตฺถาภิมุโข นิสินฺโน โหติ เทเว ปุรกฺขตฺวา; อุตฺตราย ทิสาย เวสฺสวโณ มหาราชา ทกฺขิณาภิมุโข นิสินฺโน โหติ เทเว ปุรกฺขตฺวา. ยทา ภนฺเต, เกวลกปฺปา จ เทวา ตาวตึสา สุธมฺมายํ สภายํ สนฺนิสินฺนา โหนฺติ สนฺนิปติตา, มหตี จ ทิพฺพปริสา สมนฺตโต นิสินฺนา โหนฺติ, จตฺตาโร จ มหาราชาโน จตุทฺทิสา นิสินฺนา โหนฺติ, อิทํ เนสํ โหติ อาสนสฺมึ; อถ ปจฺฉา อมฺหากํ อาสนํ โหติ. २९४. भंते! पूर्वीच्या काळी, वर्षावासाच्या शेवटी येणाऱ्या पंधराव्या दिवशीच्या उपोसथाला, पौर्णिमेच्या रात्री, सर्व तावतिंस देव सुधम्मा देवसभेत एकत्र जमले होते. त्यांच्या सभोवताली मोठी दिव्य परिषद बसली होती आणि चारही दिशांना चार महाराज बसले होते. पूर्व दिशेला धतरठ्ठ महाराज देवांना समोर ठेवून पश्चिम दिशेकडे तोंड करून बसले होते. दक्षिण दिशेला विरूळ्हक महाराज देवांना समोर ठेवून उत्तर दिशेकडे तोंड करून बसले होते. पश्चिम दिशेला विरूपक्ख महाराज देवांना समोर ठेवून पूर्व दिशेकडे तोंड करून बसले होते. उत्तर दिशेला वेस्सवण महाराज देवांना समोर ठेवून दक्षिण दिशेकडे तोंड करून बसले होते. भंते! जेव्हा सर्व तावतिंस देव सुधम्मा सभेत एकत्र जमतात, मोठी दिव्य परिषद सभोवताली बसते आणि चारही महाराज चार दिशांना बसतात, तेव्हा ही त्यांची आसने असतात; आणि त्यांच्या मागे आमची आसने असतात. ‘‘เย เต, ภนฺเต, เทวา ภควติ พฺรหฺมจริยํ จริตฺวา อธุนูปปนฺนา ตาวตึสกายํ, เต อญฺเญ เทเว อติโรจนฺติ วณฺเณน เจว ยสสา จ. เตน สุทํ, ภนฺเต, เทวา ตาวตึสา อตฺตมนา โหนฺติ ปมุทิตา [Pg.179] ปีติโสมนสฺสชาตา; ‘ทิพฺพา วต, โภ, กายา ปริปูเรนฺติ, หายนฺติ อสุรกายา’ติ. भंते! जे देव भगवंतांच्या शासनात ब्रह्मचर्य पाळून नुकतेच तावतिंस लोकात उत्पन्न झाले आहेत, ते इतर देवांपेक्षा वर्ण आणि यशाने अधिक शोभून दिसतात. त्यामुळे, भंते! तावतिंस देव अत्यंत प्रसन्न, आनंदित आणि प्रीती-सोमनस्ययुक्त होतात आणि म्हणतात— 'अहो! दिव्य देवसमूह परिपूर्ण होत आहेत आणि असुरसमूह क्षीण होत आहेत!' ๒๙๕. ‘‘อถ โข, ภนฺเต, สกฺโก เทวานมินฺโท เทวานํ ตาวตึสานํ สมฺปสาทํ วิทิตฺวา อิมาหิ คาถาหิ อนุโมทิ – २९५. त्यानंतर, भंते! देवांचा राजा सक्क याने तावतिंस देवांची ही प्रसन्नता पाहून या गाथांद्वारे आनंद व्यक्त केला— ‘โมทนฺติ วต โภ เทวา, ตาวตึสา สหินฺทกา; ตถาคตํ นมสฺสนฺตา, ธมฺมสฺส จ สุธมฺมตํ. 'अहो! इंद्रासह सर्व तावतिंस देव तथागतांना आणि धम्माच्या सुधम्मतेला नमस्कार करत आनंदित होत आहेत. นเว เทเว จ ปสฺสนฺตา, วณฺณวนฺเต ยสสฺสิเน; สุคตสฺมึ พฺรหฺมจริยํ, จริตฺวาน อิธาคเต. सुगतांच्या शासनात ब्रह्मचर्य पाळून येथे उत्पन्न झालेल्या, तेजस्वी आणि यशस्वी अशा नवीन देवांना पाहून ते हर्षित होत आहेत. เต อญฺเญ อติโรจนฺติ, วณฺเณน ยสสายุนา; สาวกา ภูริปญฺญสฺส, วิเสสูปคตา อิธ. विशाल प्रज्ञा असलेल्या सुगतांचे हे श्रावक, जे येथे विशेष गुणांनी युक्त होऊन आले आहेत, ते इतर देवांपेक्षा वर्ण, यश आणि आयुष्याने अधिक शोभून दिसत आहेत. อิทํ ทิสฺวาน นนฺทนฺติ, ตาวตึสา สหินฺทกา; ตถาคตํ นมสฺสนฺตา, ธมฺมสฺส จ สุธมฺมต’นฺติ. हे पाहून इंद्रासह सर्व तावतिंस देव तथागतांना आणि धम्माच्या सुधम्मतेला नमस्कार करत आनंदित होत आहेत.' ‘‘เตน สุทํ, ภนฺเต, เทวา ตาวตึสา ภิยฺโยโส มตฺตาย อตฺตมนา โหนฺติ ปมุทิตา ปีติโสมนสฺสชาตา; ‘ทิพฺพา วต, โภ, กายา ปริปูเรนฺติ, หายนฺติ อสุรกายา’’’ติ. त्यामुळे, भंते! तावतिंस देव अधिकच प्रसन्न, आनंदित आणि प्रीती-सोमनस्ययुक्त झाले आणि म्हणाले— 'अहो! दिव्य देवसमूह परिपूर्ण होत आहेत आणि असुरसमूह क्षीण होत आहेत!' อฏฺฐ ยถาภุจฺจวณฺณา आठ यथार्थ गुण ๒๙๖. ‘‘อถ โข, ภนฺเต, สกฺโก เทวานมินฺโท เทวานํ ตาวตึสานํ สมฺปสาทํ วิทิตฺวา เทเว ตาวตึเส อามนฺเตสิ – ‘อิจฺเฉยฺยาถ โน ตุมฺเห, มาริสา, ตสฺส ภควโต อฏฺฐ ยถาภุจฺเจ วณฺเณ โสตุ’นฺติ? ‘อิจฺฉาม มยํ, มาริส, ตสฺส ภควโต อฏฺฐ ยถาภุจฺเจ วณฺเณ โสตุ’นฺติ. อถ โข, ภนฺเต, สกฺโก เทวานมินฺโท เทวานํ ตาวตึสานํ ภควโต อฏฺฐ ยถาภุจฺเจ วณฺเณ ปยิรุทาหาสิ – ‘ตํ กึ มญฺญนฺติ, โภนฺโต เทวา ตาวตึสา? ยาวญฺจ โส ภควา พหุชนหิตาย ปฏิปนฺโน พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. เอวํ พหุชนหิตาย ปฏิปนฺนํ พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ อิมินาปงฺเคน สมนฺนาคตํ สตฺถารํ เนว อตีตํเส สมนุปสฺสาม, น ปเนตรหิ, อญฺญตฺร เตน ภควตา. २९६. त्यानंतर, भंते! देवांचा राजा सक्क याने तावतिंस देवांची प्रसन्नता पाहून त्यांना विचारले— 'मित्रांनो! तुम्हाला त्या भगवंतांचे आठ यथार्थ गुण ऐकायचे आहेत का?' देव म्हणाले— 'मित्रा! आम्हाला त्या भगवंतांचे आठ यथार्थ गुण ऐकण्याची इच्छा आहे.' तेव्हा, भंते! देवांचा राजा सक्क याने तावतिंस देवांना भगवंतांचे आठ यथार्थ गुण सांगितले— 'तावतिंस देवहो! तुम्हाला काय वाटते? ते भगवान बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेपोटी, तसेच देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी कार्यरत आहेत. अशा प्रकारे बहुजनहितासाठी, बहुजनसुखासाठी, जगावरील अनुकंपेपोटी आणि देव-मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी कार्यरत असणारे आणि या गुणाने युक्त असणारे शास्ता आम्हाला भूतकाळातही कुठे आढळले नाहीत आणि वर्तमानकाळातही या भगवंतांशिवाय इतर कुठे दिसत नाहीत.' ‘‘สฺวากฺขาโต [Pg.180] โข ปน เตน ภควตา ธมฺโม สนฺทิฏฺฐิโก อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหิ. เอวํ โอปเนยฺยิกสฺส ธมฺมสฺส เทเสตารํ อิมินาปงฺเคน สมนฺนาคตํ สตฺถารํ เนว อตีตํเส สมนุปสฺสาม, น ปเนตรหิ, อญฺญตฺร เตน ภควตา. त्या भगवंतांनी धम्माचे उत्तम प्रकारे आख्यान केले आहे, जो प्रत्यक्ष पाहण्याजोगा (संदिट्ठिको), अकालिक (तात्काळ फळ देणारा), 'ये आणि पाहा' (एहिपस्सिको) असे म्हणण्यास योग्य, स्वतःमध्ये सामावून घेण्याजोगा (ओपनेय्यिको) आणि सुज्ञांनी आपापल्या परीने अनुभवण्याजोगा आहे. अशा प्रकारे निर्वाणाकडे नेणाऱ्या धम्माचा उपदेश करणाऱ्या आणि या गुणाने युक्त असलेल्या इतर कोणत्याही शास्त्याला आम्ही भूतकाळातही पाहिले नाही आणि वर्तमानकाळातही त्या भगवंतांशिवाय इतर कोठे पाहत नाही. ‘‘อิทํ กุสลนฺติ โข ปน เตน ภควตา สุปญฺญตฺตํ, อิทํ อกุสลนฺติ สุปญฺญตฺตํ. อิทํ สาวชฺชํ อิทํ อนวชฺชํ, อิทํ เสวิตพฺพํ อิทํ น เสวิตพฺพํ, อิทํ หีนํ อิทํ ปณีตํ, อิทํ กณฺหสุกฺกสปฺปฏิภาคนฺติ สุปญฺญตฺตํ. เอวํ กุสลากุสลสาวชฺชานวชฺชเสวิตพฺพาเสวิตพฺพหีน-ปณีตกณฺหสุกฺกสปฺปฏิภาคานํ ธมฺมานํ ปญฺญเปตารํ อิมินาปงฺเคน สมนฺนาคตํ สตฺถารํ เนว อตีตํเส สมนุปสฺสาม, น ปเนตรหิ, อญฺญตฺร เตน ภควตา. 'हे कुशल आहे' हे त्या भगवंतांनी चांगल्या प्रकारे प्रज्ञप्त (स्पष्ट) केले आहे, 'हे अकुशल आहे' हे स्पष्ट केले आहे. 'हे सदोष आहे, हे निर्दोष आहे; हे आचरणात आणण्याजोगे आहे, हे आचरणात न आणण्याजोगे आहे; हे हीन आहे, हे श्रेष्ठ आहे; हे कृष्ण-शुक्ल (काळे-पांढरे) अशा दोन्ही भागांनी युक्त आहे' हे त्यांनी चांगल्या प्रकारे प्रज्ञप्त केले आहे. अशा प्रकारे कुशल-अकुशल, सदोष-निर्दोष, आचरणीय-अनाचरणीय, हीन-श्रेष्ठ आणि कृष्ण-शुक्ल भागांनी युक्त असलेल्या धम्मांचे प्रज्ञापन करणाऱ्या आणि या गुणाने युक्त असलेल्या इतर कोणत्याही शास्त्याला आम्ही भूतकाळातही पाहिले नाही आणि वर्तमानकाळातही त्या भगवंतांशिवाय इतर कोठे पाहत नाही. ‘‘สุปญฺญตฺตา โข ปน เตน ภควตา สาวกานํ นิพฺพานคามินี ปฏิปทา, สํสนฺทติ นิพฺพานญฺจ ปฏิปทา จ. เสยฺยถาปิ นาม คงฺโคทกํ ยมุโนทเกน สํสนฺทติ สเมติ, เอวเมว สุปญฺญตฺตา เตน ภควตา สาวกานํ นิพฺพานคามินี ปฏิปทา, สํสนฺทติ นิพฺพานญฺจ ปฏิปทา จ. เอวํ นิพฺพานคามินิยา ปฏิปทาย ปญฺญเปตารํ อิมินาปงฺเคน สมนฺนาคตํ สตฺถารํ เนว อตีตํเส สมนุปสฺสาม, น ปเนตรหิ, อญฺญตฺร เตน ภควตา. त्या भगवंतांनी आपल्या श्रावकांसाठी निर्वाणाकडे नेणारा मार्ग (निर्वाणगामी मार्ग) चांगल्या प्रकारे प्रज्ञप्त केला आहे; तो मार्ग आणि निर्वाण एकमेकांशी सुसंगत आहेत (एकमेकांत मिळून जातात). ज्याप्रमाणे गंगेचे पाणी यमुनेच्या पाण्याशी सुसंगत होते, एकत्र मिळते, त्याचप्रमाणे त्या भगवंतांनी श्रावकांसाठी निर्वाणगामी मार्ग चांगल्या प्रकारे प्रज्ञप्त केला आहे आणि तो मार्ग व निर्वाण एकमेकांशी सुसंगत आहेत. अशा प्रकारे निर्वाणगामी मार्गाचे प्रज्ञापन करणाऱ्या आणि या गुणाने युक्त असलेल्या इतर कोणत्याही शास्त्याला आम्ही भूतकाळातही पाहिले नाही आणि वर्तमानकाळातही त्या भगवंतांशिवाय इतर कोठे पाहत नाही. ‘‘อภินิปฺผนฺโน โข ปน ตสฺส ภควโต ลาโภ อภินิปฺผนฺโน สิโลโก, ยาว มญฺเญ ขตฺติยา สมฺปิยายมานรูปา วิหรนฺติ, วิคตมโท โข ปน โส ภควา อาหารํ อาหาเรติ. เอวํ วิคตมทํ อาหารํ อาหรยมานํ อิมินาปงฺเคน สมนฺนาคตํ สตฺถารํ เนว อตีตํเส สมนุปสฺสาม, น ปเนตรหิ, อญฺญตฺร เตน ภควตา. त्या भगवंतांना लाभ आणि कीर्ती विपुल प्रमाणात प्राप्त झाली आहे, इतकी की क्षत्रिय राजे देखील त्यांच्यावर अत्यंत प्रेम व आदर व्यक्त करत राहतात; तरीही ते भगवंत कोणत्याही मदाशिवाय (अहंकार किंवा आसक्तीशिवाय) आहार ग्रहण करतात. अशा प्रकारे मद्रहित होऊन आहार ग्रहण करणाऱ्या आणि या गुणाने युक्त असलेल्या इतर कोणत्याही शास्त्याला आम्ही भूतकाळातही पाहिले नाही आणि वर्तमानकाळातही त्या भगवंतांशिवाय इतर कोठे पाहत नाही. ‘‘ลทฺธสหาโย โข ปน โส ภควา เสขานญฺเจว ปฏิปนฺนานํ ขีณาสวานญฺจ วุสิตวตํ. เต ภควา อปนุชฺช เอการามตํ อนุยุตฺโต วิหรติ. เอวํ เอการามตํ อนุยุตฺตํ อิมินาปงฺเคน สมนฺนาคตํ สตฺถารํ เนว อตีตํเส สมนุปสฺสาม, น ปเนตรหิ, อญฺญตฺร เตน ภควตา. त्या भगवंतांना साधना करणाऱ्या शैक्ष (सेख) आणि ज्यांचे आस्रव नष्ट झाले आहेत अशा अर्हत भिक्खूंचे उत्तम साहचर्य लाभले आहे. तरीही, त्या सहकाऱ्यांना बाजूला ठेवून ते भगवंत एकांतात रममाण होण्यात (एकारामता) मग्न राहतात. अशा प्रकारे एकांतात रममाण होणाऱ्या आणि या गुणाने युक्त असलेल्या इतर कोणत्याही शास्त्याला आम्ही भूतकाळातही पाहिले नाही आणि वर्तमानकाळातही त्या भगवंतांशिवाय इतर कोठे पाहत नाही. ‘‘ยถาวาที โข ปน โส ภควา ตถาการี, ยถาการี ตถาวาที, อิติ ยถาวาที ตถาการี, ยถาการี ตถาวาที. เอวํ ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺนํ อิมินาปงฺเคน สมนฺนาคตํ สตฺถารํ เนว อตีตํเส สมนุปสฺสาม, น ปเนตรหิ, อญฺญตฺร เตน ภควตา. ते भगवंत जसे बोलतात तसेच वागतात आणि जसे वागतात तसेच बोलतात. अशा प्रकारे ते जसे बोलतात तसेच वागणारे आणि जसे वागतात तसेच बोलणारे आहेत. अशा प्रकारे धम्मानुकूल आचरण करणाऱ्या आणि या गुणाने युक्त असलेल्या इतर कोणत्याही शास्त्याला आम्ही भूतकाळातही पाहिले नाही आणि वर्तमानकाळातही त्या भगवंतांशिवाय इतर कोठे पाहत नाही. ‘‘ติณฺณวิจิกิจฺโฉ [Pg.181] โข ปน โส ภควา วิคตกถํกโถ ปริโยสิตสงฺกปฺโป อชฺฌาสยํ อาทิพฺรหฺมจริยํ. เอวํ ติณฺณวิจิกิจฺฉํ วิคตกถํกถํ ปริโยสิตสงฺกปฺปํ อชฺฌาสยํ อาทิพฺรหฺมจริยํ อิมินาปงฺเคน สมนฺนาคตํ สตฺถารํ เนว อตีตํเส สมนุปสฺสาม, น ปเนตรหิ, อญฺญตฺร เตน ภควตา’ติ. ते भगवंत शंका-कुशंकांच्या पलीकडे गेले आहेत, संभ्रमरहित झाले आहेत, ज्यांचे सर्व संकल्प पूर्ण झाले आहेत आणि ज्यांनी श्रेष्ठ ब्रह्मचर्य साध्य केले आहे. अशा प्रकारे शंकारहित, संभ्रमरहित, पूर्णसंकल्प आणि श्रेष्ठ ब्रह्मचर्य प्राप्त केलेल्या व या गुणाने युक्त असलेल्या इतर कोणत्याही शास्त्याला आम्ही भूतकाळातही पाहिले नाही आणि वर्तमानकाळातही त्या भगवंतांशिवाय इतर कोठे पाहत नाही. ๒๙๗. ‘‘อิเม โข, ภนฺเต, สกฺโก เทวานมินฺโท เทวานํ ตาวตึสานํ ภควโต อฏฺฐ ยถาภุจฺเจ วณฺเณ ปยิรุทาหาสิ. เตน สุทํ, ภนฺเต, เทวา ตาวตึสา ภิยฺโยโส มตฺตาย อตฺตมนา โหนฺติ ปมุทิตา ปีติโสมนสฺสชาตา ภควโต อฏฺฐ ยถาภุจฺเจ วณฺเณ สุตฺวา. ตตฺร, ภนฺเต, เอกจฺเจ เทวา เอวมาหํสุ – ‘อโห วต, มาริสา, จตฺตาโร สมฺมาสมฺพุทฺธา โลเก อุปฺปชฺเชยฺยุํ ธมฺมญฺจ เทเสยฺยุํ ยถริว ภควา. ตทสฺส พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสาน’นฺติ. เอกจฺเจ เทวา เอวมาหํสุ – ‘ติฏฺฐนฺตุ, มาริสา, จตฺตาโร สมฺมาสมฺพุทฺธา, อโห วต, มาริสา, ตโย สมฺมาสมฺพุทฺธา โลเก อุปฺปชฺเชยฺยุํ ธมฺมญฺจ เทเสยฺยุํ ยถริว ภควา. ตทสฺส พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสาน’นฺติ. เอกจฺเจ เทวา เอวมาหํสุ – ‘ติฏฺฐนฺตุ, มาริสา, ตโย สมฺมาสมฺพุทฺธา, อโห วต, มาริสา, ทฺเว สมฺมาสมฺพุทฺธา โลเก อุปฺปชฺเชยฺยุํ ธมฺมญฺจ เทเสยฺยุํ ยถริว ภควา. ตทสฺส พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสาน’นฺติ. २९७. हे भन्ते, देवांचा राजा शक्र याने तावतिंस लोकातील देवांसमोर भगवंतांच्या या आठ यथार्थ गुणांचे वर्णन केले. भन्ते, भगवंतांचे हे आठ यथार्थ गुण ऐकून तावतिंस देव अत्यंत आनंदित, प्रफुल्लित आणि प्रीती व सोमनस्याने युक्त झाले. भन्ते, तेथे काही देव असे म्हणाले—'अहो मित्रांनो! जर या जगात चार सम्यकसंबुद्ध उत्पन्न झाले आणि त्यांनी या भगवंतांप्रमाणेच धम्मोपदेश केला, तर किती चांगले होईल! ते बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेसाठी आणि देव व मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी ठरेल.' काही देव म्हणाले—'मित्रांनो, चार सम्यकसंबुद्धांचे राहू द्या; जर या जगात तीन सम्यकसंबुद्ध उत्पन्न झाले आणि त्यांनी या भगवंतांप्रमाणेच धम्मोपदेश केला, तर किती चांगले होईल! ते बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेसाठी आणि देव व मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी ठरेल.' तर काही देव असे म्हणाले—'मित्रांनो, तीन सम्यकसंबुद्धांचेही राहू द्या; जर या जगात दोन सम्यकसंबुद्ध उत्पन्न झाले आणि त्यांनी या भगवंतांप्रमाणेच धम्मोपदेश केला, तर किती चांगले होईल! ते बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेसाठी आणि देव व मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी ठरेल.' ๒๙๘. ‘‘เอวํ วุตฺเต, ภนฺเต, สกฺโก เทวานมินฺโท เทเว ตาวตึเส เอตทโวจ – ‘อฏฺฐานํ โข เอตํ, มาริสา, อนวกาโส, ยํ เอกิสฺสา โลกธาตุยา ทฺเว อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา อปุพฺพํ อจริมํ อุปฺปชฺเชยฺยุํ, เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. อโห วต, มาริสา, โส ภควา อปฺปาพาโธ อปฺปาตงฺโก จิรํ ทีฆมทฺธานํ ติฏฺเฐยฺย. ตทสฺส พหุชนหิตาย พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสาน’นฺติ. อถ โข, ภนฺเต, เยนตฺเถน เทวา ตาวตึสา สุธมฺมายํ สภายํ สนฺนิสินฺนา โหนฺติ สนฺนิปติตา, ตํ อตฺถํ จินฺตยิตฺวา ตํ อตฺถํ มนฺตยิตฺวา วุตฺตวจนาปิ ตํ จตฺตาโร มหาราชาโน ตสฺมึ อตฺเถ โหนฺติ. ปจฺจานุสิฏฺฐวจนาปิ [Pg.182] ตํ จตฺตาโร มหาราชาโน ตสฺมึ อตฺเถ โหนฺติ, สเกสุ สเกสุ อาสเนสุ ฐิตา อวิปกฺกนฺตา. २९८. असे म्हटले असता, हे भन्ते, देवांचा राजा शक्र तावतिंस देवांना म्हणाला—'मित्रांनो, हे अशक्य आहे, असा कोणताही वाव नाही की एकाच लोकधातूमध्ये दोन अर्हत सम्यकसंबुद्ध एकाच वेळी (मागे-पुढे न होता) उत्पन्न होतील; हे कधीही घडू शकत नाही. मित्रांनो, हे किती चांगले होईल जर हे भगवंत निरोगी व व्याधिरहित राहून दीर्घकाळपर्यंत विराजमान राहतील! ते बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेसाठी आणि देव व मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी ठरेल.' त्यानंतर, हे भन्ते, ज्या कारणासाठी तावतिंस देव सुधम्मा सभेत एकत्र आले होते, त्या विषयावर विचार व चर्चा करून, चारही महाराज त्या विषयावर आपले मत मांडून आणि मार्गदर्शन स्वीकारून आपापल्या आसनांवर स्थिर राहिले, तेथून गेले नाहीत. เต วุตฺตวากฺยา ราชาโน, ปฏิคฺคยฺหานุสาสนึ; วิปฺปสนฺนมนา สนฺตา, อฏฺฐํสุ สมฺหิ อาสเนติ. ते राजे आपले बोलणे पूर्ण करून आणि मिळालेले मार्गदर्शन स्वीकारून, प्रसन्न चित्ताने व शांतपणे आपापल्या आसनांजवळ उभे राहिले. ๒๙๙. ‘‘อถ โข, ภนฺเต, อุตฺตราย ทิสาย อุฬาโร อาโลโก สญฺชายิ, โอภาโส ปาตุรโหสิ อติกฺกมฺเมว เทวานํ เทวานุภาวํ. อถ โข, ภนฺเต, สกฺโก เทวานมินฺโท เทเว ตาวตึเส อามนฺเตสิ – ‘ยถา โข, มาริสา, นิมิตฺตานิ ทิสฺสนฺติ, อุฬาโร อาโลโก สญฺชายติ, โอภาโส ปาตุภวติ, พฺรหฺมา ปาตุภวิสฺสติ; พฺรหฺมุโน เหตํ ปุพฺพนิมิตฺตํ ปาตุภาวาย, ยทิทํ อาโลโก สญฺชายติ โอภาโส ปาตุภวตีติ. २९९. त्यानंतर, हे भन्ते, उत्तर दिशेला एक भव्य प्रकाश निर्माण झाला आणि देवांच्या दिव्य तेजालाही मागे टाकणारा एक महाप्रकाश प्रकट झाला. तेव्हा, हे भन्ते, देवांचा राजा शक्र तावतिंस देवांना संबोधित करत म्हणाला—'मित्रांनो, ज्याप्रमाणे ही चिन्हे दिसत आहेत, भव्य प्रकाश निर्माण झाला आहे आणि महाप्रकाश प्रकट झाला आहे, त्यावरून ब्रह्मा प्रकट होणार आहे; कारण जेव्हा प्रकाश निर्माण होतो आणि महाप्रकाश प्रकट होतो, तेव्हा ते ब्रह्माच्या आगमनाचे पूर्वचिन्ह असते.' ‘ยถา นิมิตฺตา ทิสฺสนฺติ, พฺรหฺมา ปาตุภวิสฺสติ; พฺรหฺมุโน เหตํ นิมิตฺตํ, โอภาโส วิปุโล มหา’ติ. 'जशी ही चिन्हे दिसत आहेत, त्यावरून ब्रह्मा प्रकट होणार आहे; कारण हा विशाल आणि महान प्रकाश हेच ब्रह्माच्या आगमनाचे चिन्ह आहे.' สนงฺกุมารกถา सनंकुमार कथा (ब्रह्मा सनंकुमाराची कथा) ๓๐๐. ‘‘อถ โข, ภนฺเต, เทวา ตาวตึสา ยถาสเกสุ อาสเนสุ นิสีทึสุ – ‘โอภาสเมตํ ญสฺสาม, ยํวิปาโก ภวิสฺสติ, สจฺฉิกตฺวาว นํ คมิสฺสามา’ติ. จตฺตาโรปิ มหาราชาโน ยถาสเกสุ อาสเนสุ นิสีทึสุ – ‘โอภาสเมตํ ญสฺสาม, ยํวิปาโก ภวิสฺสติ, สจฺฉิกตฺวาว นํ คมิสฺสามา’ติ. อิทํ สุตฺวา เทวา ตาวตึสา เอกคฺคา สมาปชฺชึสุ – ‘โอภาสเมตํ ญสฺสาม, ยํวิปาโก ภวิสฺสติ, สจฺฉิกตฺวาว นํ คมิสฺสามา’ติ. ३००. भन्ते, त्यानंतर तावतिंस देव आपापल्या आसनांवर बसले—'आम्ही या प्रकाशाचा शोध घेऊ, याचा काय परिणाम (विपाक) होईल, हे प्रत्यक्ष अनुभवूनच आम्ही जाऊ.' चारही महाराज देखील आपापल्या आसनांवर बसले—'आम्ही या प्रकाशाचा शोध घेऊ, याचा काय परिणाम होईल, हे प्रत्यक्ष अनुभवूनच आम्ही जाऊ.' हे ऐकून तावतिंस देव एकाग्रचित्त होऊन समाधीत लीन झाले—'आम्ही या प्रकाशाचा शोध घेऊ, याचा काय परिणाम होईल, हे प्रत्यक्ष अनुभवूनच आम्ही जाऊ.' ‘‘ยทา, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร เทวานํ ตาวตึสานํ ปาตุภวติ, โอฬาริกํ อตฺตภาวํ อภินิมฺมินิตฺวา ปาตุภวติ. โย โข ปน, ภนฺเต, พฺรหฺมุโน ปกติวณฺโณ, อนภิสมฺภวนีโย โส เทวานํ ตาวตึสานํ จกฺขุปถสฺมึ. ยทา, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร เทวานํ ตาวตึสานํ ปาตุภวติ, โส อญฺเญ เทเว อติโรจติ วณฺเณน เจว ยสสา จ. เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, โสวณฺโณ วิคฺคโห มานุสํ วิคฺคหํ อติโรจติ, เอวเมว โข, ภนฺเต, ยทา พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร เทวานํ [Pg.183] ตาวตึสานํ ปาตุภวติ, โส อญฺเญ เทเว อติโรจติ วณฺเณน เจว ยสสา จ. ยทา, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร เทวานํ ตาวตึสานํ ปาตุภวติ, น ตสฺสํ ปริสายํ โกจิ เทโว อภิวาเทติ วา ปจฺจุฏฺเฐติ วา อาสเนน วา นิมนฺเตติ. สพฺเพว ตุณฺหีภูตา ปญฺชลิกา ปลฺลงฺเกน นิสีทนฺติ – ‘ยสฺสทานิ เทวสฺส ปลฺลงฺกํ อิจฺฉิสฺสติ พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร, ตสฺส เทวสฺส ปลฺลงฺเก นิสีทิสฺสตี’ติ. ยสฺส โข ปน, ภนฺเต, เทวสฺส พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร ปลฺลงฺเก นิสีทติ, อุฬารํ โส ลภติ เทโว เวทปฏิลาภํ, อุฬารํ โส ลภติ เทโว โสมนสฺสปฏิลาภํ. เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, ราชา ขตฺติโย มุทฺธาวสิตฺโต อธุนาภิสิตฺโต รชฺเชน, อุฬารํ โส ลภติ เวทปฏิลาภํ, อุฬารํ โส ลภติ โสมนสฺสปฏิลาภํ, เอวเมว โข, ภนฺเต, ยสฺส เทวสฺส พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร ปลฺลงฺเก นิสีทติ, อุฬารํ โส ลภติ เทโว เวทปฏิลาภํ, อุฬารํ โส ลภติ เทโว โสมนสฺสปฏิลาภํ. อถ, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร เทวานํ ตาวตึสานํ สมฺปสาทํ วิทิตฺวา อนฺตรหิโต อิมาหิ คาถาหิ อนุโมทิ – भन्ते, जेव्हा ब्रह्मा सनंकुमार तावतिंस देवांच्या समोर प्रकट होतात, तेव्हा ते एक स्थूल (ओळारिक) रूप धारण करून प्रकट होतात. कारण, भन्ते, ब्रह्मदेवाचे जे मूळ (प्राकृतिक) रूप आहे, ते तावतिंस देवांच्या दृष्टीपथात येणे अशक्य आहे. भन्ते, जेव्हा ब्रह्मा सनंकुमार तावतिंस देवांच्या समोर प्रकट होतात, तेव्हा ते आपल्या वर्णाने (तेजाने) आणि यशाने (वैभवाने) इतर देवांपेक्षा अधिक शोभून दिसतात. भन्ते, ज्याप्रमाणे सोन्याची मूर्ती मानवी शरीरापेक्षा अधिक सुंदर व तेजस्वी दिसते, त्याचप्रमाणे, भन्ते, जेव्हा ब्रह्मा सनंकुमार तावतिंस देवांच्या समोर प्रकट होतात, तेव्हा ते इतर देवांपेक्षा वर्णाने व यशाने अधिक शोभून दिसतात. भन्ते, जेव्हा ब्रह्मा सनंकुमार तावतिंस देवांच्या समोर प्रकट होतात, तेव्हा त्या परिषदेतील कोणताही देव त्यांना अभिवादन करत नाही, किंवा त्यांच्या स्वागतासाठी उठून उभा राहत नाही, अथवा त्यांना आसनासाठी आमंत्रित करत नाही. सर्व देव शांत राहून, हात जोडून, मांडी घालून बसतात—'आता ब्रह्मा सनंकुमार ज्या देवाच्या आसनावर बसण्याची इच्छा करतील, त्या देवाच्या आसनावर ते बसतील.' भन्ते, ब्रह्मा सनंकुमार ज्या देवाच्या आसनावर बसतात, त्या देवाला अत्यंत आनंद (वेदप्रतिलाभ) आणि परम संतोष (सोमनस्सप्रतिलाभ) प्राप्त होतो. भन्ते, ज्याप्रमाणे नुकताच राज्याभिषेक झालेला क्षत्रिय राजा अत्यंत आनंद व परम संतोष प्राप्त करतो, त्याचप्रमाणे, भन्ते, ब्रह्मा सनंकुमार ज्या देवाच्या आसनावर बसतात, त्या देवाला अत्यंत आनंद आणि परम संतोष प्राप्त होतो. त्यानंतर, भन्ते, ब्रह्मा सनंकुमार यांनी तावतिंस देवांची प्रसन्नता जाणून, अदृश्य राहूनच या गाथांद्वारे आनंद व्यक्त केला— ‘โมทนฺติ วต โภ เทวา, ตาวตึสา สหินฺทกา; ตถาคตํ นมสฺสนฺตา, ธมฺมสฺส จ สุธมฺมตํ. 'अहो! इंद्रासह तावतिंस देव खरोखरच आनंदित होत आहेत; ते तथागतांना आणि त्यांच्या सद्धर्माच्या उत्तमतेला वंदन करत आहेत. ‘นเว เทเว จ ปสฺสนฺตา, วณฺณวนฺเต ยสสฺสิเน; สุคตสฺมึ พฺรหฺมจริยํ, จริตฺวาน อิธาคเต. सुगतांच्या (बुद्धांच्या) शासनात ब्रह्मचर्य पाळून येथे (तावतिंस स्वर्गात) आलेल्या, तेजस्वी आणि यशस्वी अशा नवीन देवांना पाहून (ते आनंदित होत आहेत). ‘เต อญฺเญ อติโรจนฺติ, วณฺเณน ยสสายุนา; สาวกา ภูริปญฺญสฺส, วิเสสูปคตา อิธ. विशाल प्रज्ञा असलेल्या सुगतांचे (बुद्धांचे) ते श्रावक, जे येथे विशेष गुणांनी युक्त होऊन आले आहेत, ते इतर देवांपेक्षा वर्ण, यश आणि आयुष्याने अधिक शोभून दिसतात. ‘อิทํ ทิสฺวาน นนฺทนฺติ, ตาวตึสา สหินฺทกา; ตถาคตํ นมสฺสนฺตา, ธมฺมสฺส จ สุธมฺมต’นฺติ. हे पाहून इंद्रासह तावतिंस देव आनंदित होत आहेत; ते तथागतांना आणि त्यांच्या सद्धर्माच्या उत्तमतेला वंदन करत आहेत.' ๓๐๑. ‘‘อิมมตฺถํ, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร อภาสิตฺถ. อิมมตฺถํ, ภนฺเต, พฺรหฺมุโน สนงฺกุมารสฺส ภาสโต อฏฺฐงฺคสมนฺนาคโต สโร โหติ วิสฺสฏฺโฐ จ วิญฺเญยฺโย จ มญฺชุ จ สวนีโย จ พินฺทุ จ อวิสารี จ คมฺภีโร จ นินฺนาที จ. ยถาปริสํ โข ปน, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร สเรน วิญฺญาเปติ, น จสฺส พหิทฺธา ปริสาย โฆโส นิจฺฉรติ. ยสฺส โข ปน, ภนฺเต, เอวํ อฏฺฐงฺคสมนฺนาคโต สโร โหติ, โส วุจฺจติ ‘พฺรหฺมสฺสโร’ติ. อถ โข, ภนฺเต, เทวา ตาวตึสา พฺรหฺมานํ สนงฺกุมารํ เอตทโวจุํ [Pg.184] – ‘สาธุ, มหาพฺรหฺเม, เอตเทว มยํ สงฺขาย โมทาม; อตฺถิ จ สกฺเกน เทวานมินฺเทน ตสฺส ภควโต อฏฺฐ ยถาภุจฺจา วณฺณา ภาสิตา; เต จ มยํ สงฺขาย โมทามา’ติ. ३०१. भन्ते, ब्रह्मा सनंकुमारांनी हा अर्थ (विषय) सांगितला. भन्ते, हा अर्थ सांगताना ब्रह्मा सनंकुमारांचा आवाज आठ गुणांनी युक्त (अष्टांगसमन्नागत) होता—तो स्पष्ट (विस्सट्ठ), समजण्यास सुलभ (विञ्ञेय्य), मधुर (मञ्जु), ऐकण्यास प्रिय (सवनीय), सुस्पष्ट (बिन्दु), न विखुरणारा (अविंसारी), गंभीर (गंभीर) आणि प्रतिध्वनित होणारा (निन्नादी) होता. भन्ते, ब्रह्मा सनंकुमार आपल्या आवाजाने परिषदेला जितके ऐकवायचे आहे तितकेच ऐकवायचे, त्यांचा आवाज परिषदेच्या बाहेर जात नसे. भन्ते, ज्याचा आवाज अशा आठ गुणांनी युक्त असतो, त्याला 'ब्रह्मस्वर' असे म्हटले जाते. त्यानंतर, भन्ते, तावतिंस देव ब्रह्मा सनंकुमारांना म्हणाले—'साधू, महाब्रह्मा! हे जाणून आम्ही अत्यंत आनंदित झालो आहोत. देवांचा राजा शक्र याने देखील त्या भगवंतांचे आठ यथार्थ गुण (यथाभुच्च वण्ण) सांगितले आहेत; ते जाणूनही आम्ही आनंदित झालो आहोत.' อฏฺฐ ยถาภุจฺจวณฺณา आठ यथार्थ गुण (यथाभुच्च वण्ण) ๓๐๒. ‘‘อถ, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร สกฺกํ เทวานมินฺทํ เอตทโวจ – ‘สาธุ, เทวานมินฺท, มยมฺปิ ตสฺส ภควโต อฏฺฐ ยถาภุจฺเจ วณฺเณ สุเณยฺยามา’ติ. ‘เอวํ มหาพฺรหฺเม’ติ โข, ภนฺเต, สกฺโก เทวานมินฺโท พฺรหฺมุโน สนงฺกุมารสฺส ภควโต อฏฺฐ ยถาภุจฺเจ วณฺเณ ปยิรุทาหาสิ. ३०२. त्यानंतर, भन्ते, ब्रह्मा सनंकुमार देवांचा राजा शक्र याला म्हणाले—'साधू, देवराज! आम्ही देखील त्या भगवंतांचे आठ यथार्थ गुण ऐकू इच्छितो.' भन्ते, देवांचा राजा शक्र 'तसेच असो, महाब्रह्मा!' असे म्हणून ब्रह्मा सनंकुमारांना भगवंतांचे आठ यथार्थ गुण सांगू लागला: ‘‘ตํ กึ มญฺญติ, ภวํ มหาพฺรหฺมา? ยาวญฺจ โส ภควา พหุชนหิตาย ปฏิปนฺโน พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. เอวํ พหุชนหิตาย ปฏิปนฺนํ พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ อิมินาปงฺเคน สมนฺนาคตํ สตฺถารํ เนว อตีตํเส สมนุปสฺสาม, น ปเนตรหิ, อญฺญตฺร เตน ภควตา. यावर पूजनीय महाब्रह्मा काय विचार करतात? ते भगवंत बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेपोटी, देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी कार्यरत राहिले आहेत. अशा प्रकारे बहुजनहितासाठी, बहुजनसुखासाठी, जगावरील अनुकंपेपोटी, देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी कार्यरत असणारे आणि या गुणाने युक्त असणारे शास्ता (गुरू) आम्ही भूतकाळात कधी पाहिले नाहीत आणि सद्यकाळातही त्या भगवंतांशिवाय इतर कोठेही पाहत नाही. (१) ‘‘สฺวากฺขาโต โข ปน เตน ภควตา ธมฺโม สนฺทิฏฺฐิโก อกาลิโก เอหิปสฺสิโก โอปเนยฺยิโก ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหิ. เอวํ โอปเนยฺยิกสฺส ธมฺมสฺส เทเสตารํ อิมินาปงฺเคน สมนฺนาคตํ สตฺถารํ เนว อตีตํเส สมนุปสฺสาม, น ปเนตรหิ, อญฺญตฺร เตน ภควตา. त्या भगवंतांनी धर्म सुविख्यात (स्वाक्खातो) केला आहे, जो प्रत्यक्ष अनुभवता येणारा (संदिट्ठिको), तात्काळ फळ देणारा (अकालिको), 'या आणि स्वतः पहा' असे म्हणण्यास योग्य (एहिपस्सिको), स्वतःमध्ये धारण करण्यास योग्य (ओपनेय्यिको) आणि सुज्ञांनी आपापल्या परीने अनुभवण्याजोगा (पच्चत्तं वेदितब्बो विञ्ञूहि) आहे. अशा प्रकारे स्वतःमध्ये धारण करण्यास योग्य असणाऱ्या धर्माचा उपदेश करणारे आणि या गुणाने युक्त असणारे शास्ता आम्ही भूतकाळात कधी पाहिले नाहीत आणि सद्यकाळातही त्या भगवंतांशिवाय इतर कोठेही पाहत नाही. (२) ‘‘อิทํ กุสล’นฺติ โข ปน เตน ภควตา สุปญฺญตฺตํ, ‘อิทํ อกุสล’นฺติ สุปญฺญตฺตํ, ‘อิทํ สาวชฺชํ อิทํ อนวชฺชํ, อิทํ เสวิตพฺพํ อิทํ น เสวิตพฺพํ, อิทํ หีนํ อิทํ ปณีตํ, อิทํ กณฺหสุกฺกสปฺปฏิภาค’นฺติ สุปญฺญตฺตํ. เอวํ กุสลากุสลสาวชฺชานวชฺชเสวิตพฺพาเสวิตพฺพหีนปณีตกณฺหสุกฺกสปฺปฏิภาคานํ ธมฺมานํ ปญฺญาเปตารํ. อิมินาปงฺเคน สมนฺนาคตํ สตฺถารํ เนว อตีตํเส สมนุปสฺสาม, น ปเนตรหิ, อญฺญตฺร เตน ภควตา. त्या भगवंतांनी 'हे कुशल आहे' हे चांगल्या प्रकारे प्रज्ञप्त (स्पष्ट) केले आहे, 'हे अकुशल आहे' हे चांगल्या प्रकारे प्रज्ञप्त केले आहे; 'हे सदोष (सावज्ज) आहे, हे निर्दोष (अनवज्ज) आहे; याचे सेवन करावे, याचे सेवन करू नये; हे हीन आहे, हे प्रणीत (उत्कृष्ट) आहे; हे कृष्ण-शुक्ल (काळे-पांढरे) अशा परस्परविरोधी भागांचे आहे' हे चांगल्या प्रकारे प्रज्ञप्त केले आहे. अशा प्रकारे कुशल-अकुशल, सदोष-निर्दोष, सेवनीय-असेवनीय, हीन-प्रणीत आणि कृष्ण-शुक्ल अशा परस्परविरोधी धर्मांचे प्रज्ञापन करणारे आणि या गुणाने युक्त असणारे शास्ता आम्ही भूतकाळात कधी पाहिले नाहीत आणि सद्यकाळातही त्या भगवंतांशिवाय इतर कोठेही पाहत नाही. (३) ‘‘สุปญฺญตฺตา โข ปน เตน ภควตา สาวกานํ นิพฺพานคามินี ปฏิปทา สํสนฺทติ นิพฺพานญฺจ ปฏิปทา จ. เสยฺยถาปิ นาม คงฺโคทกํ ยมุโนทเกน สํสนฺทติ [Pg.185] สเมติ, เอวเมว สุปญฺญตฺตา เตน ภควตา สาวกานํ นิพฺพานคามินี ปฏิปทา สํสนฺทติ นิพฺพานญฺจ ปฏิปทา จ. เอวํ นิพฺพานคามินิยา ปฏิปทาย ปญฺญาเปตารํ อิมินาปงฺเคน สมนฺนาคตํ สตฺถารํ เนว อตีตํเส สมนุปสฺสาม, น ปเนตรหิ, อญฺญตฺร เตน ภควตา. “त्या भगवंतांनी आपल्या श्रावकांसाठी निर्वाणाकडे नेणारा मार्ग (प्रतिपदा) उत्तम प्रकारे प्रज्ञापित (स्पष्ट) केला आहे, आणि तो मार्ग व निर्वाण एकमेकांशी सुसंगत आहेत. ज्याप्रमाणे गंगेचे पाणी यमुनेच्या पाण्याशी सुसंगत होते, एकरूप होते; त्याचप्रमाणे त्या भगवंतांनी श्रावकांसाठी निर्वाणगामी मार्ग उत्तम प्रकारे प्रज्ञापित केला आहे, आणि तो मार्ग व निर्वाण सुसंगत आहेत. निर्वाणाकडे नेणाऱ्या अशा मार्गाचे प्रज्ञापन करणाऱ्या आणि या गुणाने युक्त असलेल्या अशा शास्त्याला (गुरू/शिक्षकाला) आम्ही भूतकाळातही पाहिले नाही आणि वर्तमानकाळातही त्या भगवंतांशिवाय इतर कोठे पाहत नाही.” ‘‘อภินิปฺผนฺโน โข ปน ตสฺส ภควโต ลาโภ อภินิปฺผนฺโน สิโลโก, ยาว มญฺเญ ขตฺติยา สมฺปิยายมานรูปา วิหรนฺติ. วิคตมโท โข ปน โส ภควา อาหารํ อาหาเรติ. เอวํ วิคตมทํ อาหารํ อาหรยมานํ อิมินาปงฺเคน สมนฺนาคตํ สตฺถารํ เนว อตีตํเส สมนุปสฺสาม, น ปเนตรหิ, อญฺญตฺร เตน ภควตา. “त्या भगवंतांना लाभ (आदर-सत्कार) आणि कीर्ती विपुल प्रमाणात प्राप्त झाली आहे, इतकी की क्षत्रिय देखील त्यांच्यावर अत्यंत प्रेम व आदर ठेवून राहतात असे वाटते. तरीही ते भगवान मदविरहित (अहंकाररहित) होऊन आहाराचे ग्रहण करतात. अशा प्रकारे मदविरहित होऊन आहाराचे ग्रहण करणाऱ्या आणि या गुणाने युक्त असलेल्या अशा शास्त्याला आम्ही भूतकाळातही पाहिले नाही आणि वर्तमानकाळातही त्या भगवंतांशिवाय इतर कोठे पाहत नाही.” ‘‘ลทฺธสหาโย โข ปน โส ภควา เสขานญฺเจว ปฏิปนฺนานํ ขีณาสวานญฺจ วุสิตวตํ, เต ภควา อปนุชฺช เอการามตํ อนุยุตฺโต วิหรติ. เอวํ เอการามตํ อนุยุตฺตํ อิมินาปงฺเคน สมนฺนาคตํ สตฺถารํ เนว อตีตํเส สมนุปสฺสาม, น ปเนตรหิ, อญฺญตฺร เตน ภควตา. “त्या भगवंतांना मार्गावर आरूढ असलेल्या शैक्ष (साधना करणाऱ्या) आणि ज्यांचे आस्रव नष्ट झाले आहेत अशा क्षीणास्रव (अर्हत) व्यक्तींचे साहचर्य (सोबत) लाभले आहे, तरीही ते भगवान त्यांना दूर ठेवून एकांतात रममाण होण्यात (एकारामतेत) मग्न राहतात. अशा प्रकारे एकांतात रममाण होण्यात मग्न असलेल्या आणि या गुणाने युक्त असलेल्या अशा शास्त्याला आम्ही भूतकाळातही पाहिले नाही आणि वर्तमानकाळातही त्या भगवंतांशिवाय इतर कोठे पाहत नाही.” ‘‘ยถาวาที โข ปน โส ภควา ตถาการี, ยถาการี ตถาวาที; อิติ ยถาวาที ตถาการี, ยถาการี ตถาวาที. เอวํ ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปฺปนฺนํ อิมินาปงฺเคน สมนฺนาคตํ สตฺถารํ เนว อตีตํเส สมนุปสฺสาม, น ปเนตรหิ, อญฺญตฺร เตน ภควตา. “ते भगवान जसे बोलतात तसेच वागतात, आणि जसे वागतात तसेच बोलतात; अशा प्रकारे जसे बोलतात तसेच वागतात, आणि जसे वागतात तसेच बोलतात. अशा प्रकारे धम्मानुकूल आचरण करणाऱ्या (धम्मानुधम्मप्रतिपन्न) आणि या गुणाने युक्त असलेल्या अशा शास्त्याला आम्ही भूतकाळातही पाहिले नाही आणि वर्तमानकाळातही त्या भगवंतांशिवाय इतर कोठे पाहत नाही.” ‘‘ติณฺณวิจิกิจฺโฉ โข ปน โส ภควา วิคตกถํกโถ ปริโยสิตสงฺกปฺโป อชฺฌาสยํ อาทิพฺรหฺมจริยํ. เอวํ ติณฺณวิจิกิจฺฉํ วิคตกถํกถํ ปริโยสิตสงฺกปฺปํ อชฺฌาสยํ อาทิพฺรหฺมจริยํ. อิมินาปงฺเคน สมนฺนาคตํ สตฺถารํ เนว อตีตํเส สมนุปสฺสาม, น ปเนตรหิ, อญฺญตฺร เตน ภควตา’ติ. “ते भगवान शंका-कुशंकांच्या (विचिकित्सेच्या) पलीकडे गेले आहेत, संभ्रमापासून (कथंकथेपासून) मुक्त झाले आहेत, आणि ज्यांचे संकल्प पूर्ण झाले आहेत (परियोसितसंकल्प), जे श्रेष्ठ अशा आदि-ब्रह्मचर्यात प्रतिष्ठित आहेत. अशा प्रकारे विचिकित्सा पार केलेल्या, संभ्रमरहित झालेल्या, पूर्ण संकल्प असलेल्या आणि आदि-ब्रह्मचर्यात प्रतिष्ठित असलेल्या, या गुणाने युक्त अशा शास्त्याला आम्ही भूतकाळातही पाहिले नाही आणि वर्तमानकाळातही त्या भगवंतांशिवाय इतर कोठे पाहत नाही.’” ๓๐๓. ‘‘อิเม โข, ภนฺเต, สกฺโก เทวานมินฺโท พฺรหฺมุโน สนงฺกุมารสฺส ภควโต อฏฺฐ ยถาภุจฺเจ วณฺเณ ปยิรุทาหาสิ. เตน สุทํ, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร อตฺตมโน โหติ ปมุทิโต ปีติโสมนสฺสชาโต ภควโต อฏฺฐ ยถาภุจฺเจ วณฺเณ สุตฺวา. อถ, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร โอฬาริกํ อตฺตภาวํ อภินิมฺมินิตฺวา กุมารวณฺณี หุตฺวา ปญฺจสิโข เทวานํ ตาวตึสานํ ปาตุรโหสิ. โส เวหาสํ อพฺภุคฺคนฺตฺวา อากาเส อนฺตลิกฺเข ปลฺลงฺเกน นิสีทิ. เสยฺยถาปิ, ภนฺเต, พลวา [Pg.186] ปุริโส สุปจฺจตฺถเต วา ปลฺลงฺเก สเม วา ภูมิภาเค ปลฺลงฺเกน นิสีเทยฺย, เอวเมว โข, ภนฺเต, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร เวหาสํ อพฺภุคฺคนฺตฺวา อากาเส อนฺตลิกฺเข ปลฺลงฺเกน นิสีทิตฺวา เทเว ตาวตึเส อามนฺเตสิ – ३०३. “भन्ते, देवांचा राजा शक्र याने ब्रह्मा सनत्कुमाराला भगवंतांच्या या आठ यथार्थ गुणांचे वर्णन करून सांगितले. भन्ते, भगवंतांचे हे आठ यथार्थ गुण ऐकून ब्रह्मा सनत्कुमार अत्यंत प्रसन्न, आनंदित आणि प्रीती-सौमनस्याने युक्त झाला. त्यानंतर, भन्ते, ब्रह्मा सनत्कुमाराने एक स्थूल रूप धारण केले आणि पाच शिखा (अंबाडे) असलेल्या पंचशिख नावाच्या तरुण मुलाचे रूप घेऊन तो तावतिंस देवांसमोर प्रकट झाला. तो आकाशात उंच उडाला आणि अंतराळात मांडी घालून (पद्मासन घालून) बसला. भन्ते, ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य चांगल्या प्रकारे अंथरलेल्या आसनावर किंवा सपाट जमिनीवर मांडी घालून बसेल, त्याचप्रमाणे, भन्ते, ब्रह्मा सनत्कुमार आकाशात उंच उडाला आणि अंतराळात मांडी घालून बसला आणि त्याने तावतिंस देवांना संबोधित केले –” โควินฺทพฺราหฺมณวตฺถุ “गोविंद ब्राह्मणाची कथा” ๓๐๔. ‘‘ตํ กึ มญฺญนฺติ, โภนฺโต เทวา ตาวตึสา, ยาว ทีฆรตฺตํ มหาปญฺโญว โส ภควา อโหสิ. ภูตปุพฺพํ, โภ, ราชา ทิสมฺปติ นาม อโหสิ. ทิสมฺปติสฺส รญฺโญ โควินฺโท นาม พฺราหฺมโณ ปุโรหิโต อโหสิ. ทิสมฺปติสฺส รญฺโญ เรณุ นาม กุมาโร ปุตฺโต อโหสิ. โควินฺทสฺส พฺราหฺมณสฺส โชติปาโล นาม มาณโว ปุตฺโต อโหสิ. อิติ เรณุ จ ราชปุตฺโต โชติปาโล จ มาณโว อญฺเญ จ ฉ ขตฺติยา อิจฺเจเต อฏฺฐ สหายา อเหสุํ. อถ โข, โภ, อโหรตฺตานํ อจฺจเยน โควินฺโท พฺราหฺมโณ กาลมกาสิ. โควินฺเท พฺราหฺมเณ กาลงฺกเต ราชา ทิสมฺปติ ปริเทเวสิ – ‘‘ยสฺมึ วต, โภ, มยํ สมเย โควินฺเท พฺราหฺมเณ สพฺพกิจฺจานิ สมฺมา โวสฺสชฺชิตฺวา ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิตา สมงฺคีภูตา ปริจาเรม, ตสฺมึ โน สมเย โควินฺโท พฺราหฺมโณ กาลงฺกโต’’ติ. เอวํ วุตฺเต โภ เรณุ ราชปุตฺโต ราชานํ ทิสมฺปตึ เอตทโวจ – ‘‘มา โข ตฺวํ, เทว, โควินฺเท พฺราหฺมเณ กาลงฺกเต อติพาฬฺหํ ปริเทเวสิ. อตฺถิ, เทว, โควินฺทสฺส พฺราหฺมณสฺส โชติปาโล นาม มาณโว ปุตฺโต ปณฺฑิตตโร เจว ปิตรา, อลมตฺถทสตโร เจว ปิตรา; เยปิสฺส ปิตา อตฺเถ อนุสาสิ, เตปิ โชติปาลสฺเสว มาณวสฺส อนุสาสนิยา’’ติ. ‘‘เอวํ กุมารา’’ติ? ‘‘เอวํ เทวา’’ติ. ३०४. “हे तावतिंस देवहो, तुम्हाला काय वाटते? ते भगवान किती दीर्घकाळापासून महाप्रज्ञावान आहेत! पूर्वीच्या काळी, 'दिसंपती' नावाचा एक राजा होता. दिसंपती राजाचा पुरोहित 'गोविंद' नावाचा एक ब्राह्मण होता. दिसंपती राजाला 'रेणू' नावाचा एक राजकुमार मुलगा होता. गोविंद ब्राह्मणाला 'जोतिपाल' नावाचा एक तरुण मुलगा होता. अशा प्रकारे राजकुमार रेणू, तरुण जोतिपाल आणि इतर सहा क्षत्रिय, हे आठ जण मित्र होते. काही काळानंतर, गोविंद ब्राह्मणाचा मृत्यू झाला. गोविंद ब्राह्मणाचा मृत्यू झाल्यावर राजा दिसंपतीने विलाप केला – ‘अरेरे! ज्या वेळी आम्ही आमची सर्व कामे गोविंद ब्राह्मणावर सोपवून पाच कामगुणांमध्ये मग्न होऊन सुख उपभोगत होतो, त्याच वेळी आमचा पुरोहित गोविंद ब्राह्मण मृत्यू पावला!’ असे म्हटल्यावर राजकुमार रेणू राजा दिसंपतीला म्हणाला – ‘महाराज, गोविंद ब्राह्मणाच्या मृत्यूमुळे आपण अतिशय विलाप करू नका. महाराज, गोविंद ब्राह्मणाचा 'जोतिपाल' नावाचा तरुण मुलगा आहे, जो त्याच्या वडिलांपेक्षाही अधिक बुद्धिमान आहे आणि वडिलांपेक्षाही अधिक कार्यक्षम (हित पाहणारा) आहे. त्याचे वडील ज्या ज्या गोष्टींचे मार्गदर्शन करत असत, त्या सर्व गोष्टींचे मार्गदर्शन जोतिपाल तरुणच करू शकेल.’ ‘राजकुमारा, खरोखरच असे आहे का?’ ‘होय, महाराज, असेच आहे.’” มหาโควินฺทวตฺถุ “महागोविंद कथा” ๓๐๕. ‘‘อถ โข, โภ, ราชา ทิสมฺปติ อญฺญตรํ ปุริสํ อามนฺเตสิ – ‘‘เอหิ ตฺวํ, อมฺโภ ปุริส, เยน โชติปาโล นาม มาณโว เตนุปสงฺกม; อุปสงฺกมิตฺวา โชติปาลํ มาณวํ เอวํ วเทหิ – ‘ภวมตฺถุ ภวนฺตํ โชติปาลํ, ราชา ทิสมฺปติ ภวนฺตํ โชติปาลํ มาณวํ อามนฺตยติ, ราชา ทิสมฺปติ โภโต โชติปาลสฺส มาณวสฺส ทสฺสนกาโม’’’ติ. ‘‘เอวํ, เทวา’’ติ โข, โภ, โส ปุริโส ทิสมฺปติสฺส รญฺโญ ปฏิสฺสุตฺวา เยน [Pg.187] โชติปาโล มาณโว เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา โชติปาลํ มาณวํ เอตทโวจ – ‘‘ภวมตฺถุ ภวนฺตํ โชติปาลํ, ราชา ทิสมฺปติ ภวนฺตํ โชติปาลํ มาณวํ อามนฺตยติ, ราชา ทิสมฺปติ โภโต โชติปาลสฺส มาณวสฺส ทสฺสนกาโม’’ติ. ‘‘เอวํ, โภ’’ติ โข โภ โชติปาโล มาณโว ตสฺส ปุริสสฺส ปฏิสฺสุตฺวา เยน ราชา ทิสมฺปติ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ทิสมฺปตินา รญฺญา สทฺธึ สมฺโมทิ; สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข, โภ, โชติปาลํ มาณวํ ราชา ทิสมฺปติ เอตทโวจ – ‘‘อนุสาสตุ โน ภวํ โชติปาโล, มา โน ภวํ โชติปาโล อนุสาสนิยา ปจฺจพฺยาหาสิ. เปตฺติเก ตํ ฐาเน ฐเปสฺสามิ, โควินฺทิเย อภิสิญฺจิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, โภ’’ติ โข, โภ, โส โชติปาโล มาณโว ทิสมฺปติสฺส รญฺโญ ปจฺจสฺโสสิ. อถ โข, โภ, ราชา ทิสมฺปติ โชติปาลํ มาณวํ โควินฺทิเย อภิสิญฺจิ, ตํ เปตฺติเก ฐาเน ฐเปสิ. อภิสิตฺโต โชติปาโล มาณโว โควินฺทิเย เปตฺติเก ฐาเน ฐปิโต เยปิสฺส ปิตา อตฺเถ อนุสาสิ เตปิ อตฺเถ อนุสาสติ, เยปิสฺส ปิตา อตฺเถ นานุสาสิ, เตปิ อตฺเถ อนุสาสติ; เยปิสฺส ปิตา กมฺมนฺเต อภิสมฺโภสิ, เตปิ กมฺมนฺเต อภิสมฺโภติ, เยปิสฺส ปิตา กมฺมนฺเต นาภิสมฺโภสิ, เตปิ กมฺมนฺเต อภิสมฺโภติ. ตเมนํ มนุสฺสา เอวมาหํสุ – ‘‘โควินฺโท วต, โภ, พฺราหฺมโณ, มหาโควินฺโท วต, โภ, พฺราหฺมโณ’’ติ. อิมินา โข เอวํ, โภ, ปริยาเยน โชติปาลสฺส มาณวสฺส โควินฺโท มหาโควินฺโทตฺเวว สมญฺญา อุทปาทิ. ३०५. त्यानंतर, हे देवहो, राजा दिसम्पतींनी एका सेवकाला बोलावले आणि म्हटले – 'हे माणसा, ये, जिथे जोतिपाल नावाचा तरुण आहे तिथे जा; आणि तिथे जाऊन जोतिपाल तरुणाला असे सांग – "पूजनीय जोतिपाल यांचे कल्याण असो! राजा दिसम्पति पूजनीय जोतिपाल तरुणाला बोलवत आहेत, राजा दिसम्पतींना पूजनीय जोतिपाल तरुणाला भेटण्याची इच्छा आहे."' 'तसेच असो, महाराज,' असे म्हणून त्या सेवकाने राजा दिसम्पतींचे ऐकले आणि तो जोतिपाल तरुणाकडे गेला; तिथे जाऊन त्याने जोतिपाल तरुणाला असे म्हटले – 'पूजनीय जोतिपाल यांचे कल्याण असो! राजा दिसम्पति पूजनीय जोतिपाल तरुणाला बोलवत आहेत, राजा दिसम्पतींना पूजनीय जोतिपाल तरुणाला भेटण्याची इच्छा आहे.' 'तसेच असो, महाशय,' असे म्हणून जोतिपाल तरुणाने त्या सेवकाचे ऐकले आणि तो राजा दिसम्पतींकडे गेला; तिथे जाऊन त्याने राजा दिसम्पतींसोबत कुशल-मंगल विचारले; आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या जोतिपाल तरुणाला राजा दिसम्पति म्हणाले – 'पूजनीय जोतिपाल यांनी आम्हाला उपदेश करावा, पूजनीय जोतिपाल यांनी आम्हाला उपदेश करण्यास नकार देऊ नये. मी आपल्याला माझ्या वडिलांच्या जागी प्रस्थापित करीन आणि गोविंद पदावर आपला अभिषेक करीन.' 'तसेच असो, महाराज,' असे म्हणून जोतिपाल तरुणाने राजा दिसम्पतींचे म्हणणे मान्य केले. त्यानंतर, राजा दिसम्पतींनी जोतिपाल तरुणाचा गोविंद पदावर अभिषेक केला आणि त्याला वडिलांच्या जागी प्रस्थापित केले. गोविंद पदावर अभिषेक झालेला आणि वडिलांच्या जागी प्रस्थापित झालेला जोतिपाल तरुण, त्याचे वडील ज्या हितकारक गोष्टींचा उपदेश करत असत, त्यांचाही उपदेश करू लागला; आणि ज्या हितकारक गोष्टींचा उपदेश त्याच्या वडिलांनी केला नव्हता, त्यांचाही तो उपदेश करू लागला. त्याचे वडील जी कार्ये पूर्ण करत असत, ती कार्येही तो पूर्ण करू लागला; आणि जी कार्ये त्याच्या वडिलांनी पूर्ण केली नव्हती, ती कार्येही तो पूर्ण करू लागला. लोक त्याच्याबद्दल असे म्हणू लागले – 'अहो, हा ब्राह्मण खरोखरच गोविंद आहे! अहो, हा ब्राह्मण खरोखरच महागोविंद आहे!' अशा प्रकारे, हे देवहो, जोतिपाल तरुणाला 'गोविंद, महागोविंद' अशीच संज्ञा प्राप्त झाली. รชฺชสํวิภชนํ राज्यविभाजन ๓๐๖. ‘‘อถ โข, โภ, มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ เยน เต ฉ ขตฺติยา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เต ฉ ขตฺติเย เอตทโวจ – ‘‘ทิสมฺปติ โข, โภ, ราชา ชิณฺโณ วุทฺโธ มหลฺลโก อทฺธคโต วโยอนุปฺปตฺโต, โก นุ โข ปน, โภ, ชานาติ ชีวิตํ? ฐานํ โข ปเนตํ วิชฺชติ, ยํ ทิสมฺปติมฺหิ รญฺเญ กาลงฺกเต ราชกตฺตาโร เรณุํ ราชปุตฺตํ รชฺเช อภิสิญฺเจยฺยุํ. อายนฺตุ, โภนฺโต, เยน เรณุ ราชปุตฺโต เตนุปสงฺกมถ; อุปสงฺกมิตฺวา เรณุํ ราชปุตฺตํ เอวํ วเทถ – ‘‘มยํ โข โภโต เรณุสฺส สหายา ปิยา มนาปา อปฺปฏิกูลา, ยํสุโข ภวํ [Pg.188] ตํสุขา มยํ, ยํทุกฺโข ภวํ ตํทุกฺขา มยํ. ทิสมฺปติ โข, โภ, ราชา ชิณฺโณ วุทฺโธ มหลฺลโก อทฺธคโต วโยอนุปฺปตฺโต, โก นุ โข ปน, โภ, ชานาติ ชีวิตํ? ฐานํ โข ปเนตํ วิชฺชติ, ยํ ทิสมฺปติมฺหิ รญฺเญ กาลงฺกเต ราชกตฺตาโร ภวนฺตํ เรณุํ รชฺเช อภิสิญฺเจยฺยุํ. สเจ ภวํ เรณุ รชฺชํ ลเภถ, สํวิภเชถ โน รชฺเชนา’’ติ. ‘‘เอวํ โภ’’ติ โข, โภ, เต ฉ ขตฺติยา มหาโควินฺทสฺส พฺราหฺมณสฺส ปฏิสฺสุตฺวา เยน เรณุ ราชปุตฺโต เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา เรณุํ ราชปุตฺตํ เอตทโวจุํ – ‘‘มยํ โข โภโต เรณุสฺส สหายา ปิยา มนาปา อปฺปฏิกูลา; ยํสุโข ภวํ ตํสุขา มยํ, ยํทุกฺโข ภวํ ตํทุกฺขา มยํ. ทิสมฺปติ โข, โภ, ราชา ชิณฺโณ วุทฺโธ มหลฺลโก อทฺธคโต วโยอนุปฺปตฺโต, โก นุ โข ปน โภ ชานาติ ชีวิตํ? ฐานํ โข ปเนตํ วิชฺชติ, ยํ ทิสมฺปติมฺหิ รญฺเญ กาลงฺกเต ราชกตฺตาโร ภวนฺตํ เรณุํ รชฺเช อภิสิญฺเจยฺยุํ. สเจ ภวํ เรณุ รชฺชํ ลเภถ, สํวิภเชถ โน รชฺเชนา’’ติ. ‘‘โก นุ โข, โภ, อญฺโญ มม วิชิเต สุโข ภเวถ, อญฺญตฺร ภวนฺเตภิ? สจาหํ, โภ, รชฺชํ ลภิสฺสามิ, สํวิภชิสฺสามิ โว รชฺเชนา’’’ติ. ३०६. त्यानंतर, हे देवहो, महागोविंद ब्राह्मण ज्या ठिकाणी ते सहा क्षत्रिय होते तिथे गेला; तिथे जाऊन त्याने त्या सहा क्षत्रियांना असे म्हटले – 'हे महाशयांनो, राजा दिसम्पति आता वृद्ध, जर्जर, वयोवृद्ध आणि आयुष्याच्या शेवटच्या टप्प्यावर पोहोचलेले आहेत. मानवी जीवनाचा काय भरवसा? राजा दिसम्पतींचा मृत्यू झाल्यावर, राजे बनवणारे राजपुत्र रेणूला राज्यावर अभिषिक्त करतील, अशी दाट शक्यता आहे. या, महाशयांनो, आपण राजपुत्र रेणूकडे जाऊ या; आणि तिथे जाऊन राजपुत्र रेणूला असे सांगू या – "आम्ही पूजनीय रेणूंचे प्रिय, आवडते आणि अनुकूल मित्र आहोत. आपल्या सुखात आमचे सुख आहे आणि आपल्या दुःखात आमचे दुःख आहे. हे महाशयांनो, राजा दिसम्पति आता वृद्ध, जर्जर, वयोवृद्ध आणि आयुष्याच्या शेवटच्या टप्प्यावर पोहोचलेले आहेत. मानवी जीवनाचा काय भरवसा? राजा दिसम्पतींचा मृत्यू झाल्यावर, राजे बनवणारे पूजनीय रेणूला राज्यावर अभिषिक्त करतील, अशी दाट शक्यता आहे. जर पूजनीय रेणूंना राज्य मिळाले, तर त्यांनी आमच्यात राज्याची वाटणी करावी."' 'तसेच असो, महाशय,' असे म्हणून त्या सहा क्षत्रियांनी महागोविंद ब्राह्मणाचे ऐकले आणि ते राजपुत्र रेणूकडे गेले; तिथे जाऊन त्यांनी राजपुत्र रेणूला असे म्हटले – 'आम्ही पूजनीय रेणूंचे प्रिय, आवडते आणि अनुकूल मित्र आहोत. आपल्या सुखात आमचे सुख आहे आणि आपल्या दुःखात आमचे दुःख आहे. हे महाशयांनो, राजा दिसम्पति आता वृद्ध, जर्जर, वयोवृद्ध आणि आयुष्याच्या शेवटच्या टप्प्यावर पोहोचलेले आहेत. मानवी जीवनाचा काय भरवसा? राजा दिसम्पतींचा मृत्यू झाल्यावर, राजे बनवणारे पूजनीय रेणूला राज्यावर अभिषिक्त करतील, अशी दाट शक्यता आहे. जर पूजनीय रेणूंना राज्य मिळाले, तर त्यांनी आमच्यात राज्याची वाटणी करावी.' (यावर राजपुत्र रेणू म्हणाला) – 'हे महाशयांनो, माझ्या राज्यात आपल्याशिवाय इतर कोण सुखी होणार? जर मला राज्य मिळाले, तर मी नक्कीच तुमच्यात राज्याची वाटणी करीन.' ๓๐๗. ‘‘อถ โข, โภ, อโหรตฺตานํ อจฺจเยน ราชา ทิสมฺปติ กาลมกาสิ. ทิสมฺปติมฺหิ รญฺเญ กาลงฺกเต ราชกตฺตาโร เรณุํ ราชปุตฺตํ รชฺเช อภิสิญฺจึสุ. อภิสิตฺโต เรณุ รชฺเชน ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิโต สมงฺคีภูโต ปริจาเรติ. อถ โข, โภ, มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ เยน เต ฉ ขตฺติยา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เต ฉ ขตฺติเย เอตทโวจ – ‘‘ทิสมฺปติ โข, โภ, ราชา กาลงฺกโต. อภิสิตฺโต เรณุ รชฺเชน ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิโต สมงฺคีภูโต ปริจาเรติ. โก นุ โข ปน, โภ, ชานาติ, มทนียา กามา? อายนฺตุ, โภนฺโต, เยน เรณุ ราชา เตนุปสงฺกมถ; อุปสงฺกมิตฺวา เรณุํ ราชานํ เอวํ วเทถ – ทิสมฺปติ โข, โภ, ราชา กาลงฺกโต, อภิสิตฺโต ภวํ เรณุ รชฺเชน, สรติ ภวํ ตํ วจน’’’นฺติ? ३०७. त्यानंतर, हे देवहो, काही काळानंतर राजा दिसम्पतींचा मृत्यू झाला. राजा दिसम्पतींचा मृत्यू झाल्यावर, राजे बनवणाऱ्यांनी राजपुत्र रेणूला राज्यावर अभिषिक्त केले. राज्याभिषेक झाल्यावर राजा रेणू पाच प्रकारच्या कामभोगांमध्ये मग्न होऊन सुख उपभोगू लागला. त्यानंतर, हे देवहो, महागोविंद ब्राह्मण ज्या ठिकाणी ते सहा क्षत्रिय होते तिथे गेला; तिथे जाऊन त्याने त्या सहा क्षत्रियांना असे म्हटले – 'हे महाशयांनो, राजा दिसम्पतींचा मृत्यू झाला आहे. राजा रेणूचा राज्याभिषेक झाला असून तो पाच प्रकारच्या कामभोगांमध्ये मग्न होऊन सुख उपभोगत आहे. हे महाशयांनो, कामभोग हे धुंद करणारे असतात, हे कोणाला ठाऊक नाही? या, महाशयांनो, आपण राजा रेणूकडे जाऊ या; आणि तिथे जाऊन राजा रेणूला असे विचारू या – "हे महाराज, राजा दिसम्पतींचा मृत्यू झाला आहे आणि आपला राज्याभिषेक झाला आहे. पूजनीय रेणूंना आपले ते वचन आठवते का?"' ๓๐๘. ‘‘‘เอวํ[Pg.189], โภ’’ติ โข, โภ, เต ฉ ขตฺติยา มหาโควินฺทสฺส พฺราหฺมณสฺส ปฏิสฺสุตฺวา เยน เรณุ ราชา เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา เรณุํ ราชานํ เอตทโวจุํ – ‘‘ทิสมฺปติ โข, โภ, ราชา กาลงฺกโต, อภิสิตฺโต ภวํ เรณุ รชฺเชน, สรติ ภวํ ตํ วจน’’นฺติ? ‘‘สรามหํ, โภ, ตํ วจนํ. โก นุ โข, โภ, ปโหติ อิมํ มหาปถวึ อุตฺตเรน อายตํ ทกฺขิเณน สกฏมุขํ สตฺตธา สมํ สุวิภตฺตํ วิภชิตุ’’นฺติ? ‘‘โก นุ โข, โภ, อญฺโญ ปโหติ, อญฺญตฺร มหาโควินฺเทน พฺราหฺมเณนา’’ติ? อถ โข, โภ, เรณุ ราชา อญฺญตรํ ปุริสํ อามนฺเตสิ – ‘‘เอหิ ตฺวํ, อมฺโภ ปุริส, เยน มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ เตนุปสงฺกม; อุปสงฺกมิตฺวา มหาโควินฺทํ พฺราหฺมณํ เอวํ วเทหิ – ‘ราชา ตํ, ภนฺเต, เรณุ อามนฺเตตี’’’ติ. ‘‘เอวํ เทวา’’ติ โข, โภ, โส ปุริโส เรณุสฺส รญฺโญ ปฏิสฺสุตฺวา เยน มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา มหาโควินฺทํ พฺราหฺมณํ เอตทโวจ – ‘‘ราชา ตํ, ภนฺเต, เรณุ อามนฺเตตี’’ติ. ‘‘เอวํ, โภ’’ติ โข, โภ, มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ ตสฺส ปุริสสฺส ปฏิสฺสุตฺวา เยน เรณุ ราชา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เรณุนา รญฺญา สทฺธึ สมฺโมทิ. สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เอกมนฺตํ นิสินฺนํ โข, โภ, มหาโควินฺทํ พฺราหฺมณํ เรณุ ราชา เอตทโวจ – ‘‘เอตุ, ภวํ โควินฺโท, อิมํ มหาปถวึ อุตฺตเรน อายตํ ทกฺขิเณน สกฏมุขํ สตฺตธา สมํ สุวิภตฺตํ วิภชตู’’ติ. ‘‘เอวํ, โภ’’ติ โข มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ เรณุสฺส รญฺโญ ปฏิสฺสุตฺวา อิมํ มหาปถวึ อุตฺตเรน อายตํ ทกฺขิเณน สกฏมุขํ สตฺตธา สมํ สุวิภตฺตํ วิภชิ. สพฺพานิ สกฏมุขานิ ปฏฺฐเปสิ. ตตฺร สุทํ มชฺเฌ เรณุสฺส รญฺโญ ชนปโท โหติ. ३०८. “‘तसेच असो, हे महाशयांनो’ असे म्हणून त्या सहा क्षत्रियांनी महागोविंद ब्राह्मणाचे ऐकले आणि ते जेथे राजा रेणू होता तेथे गेले. तेथे जाऊन त्यांनी राजा रेणूला असे म्हटले— ‘हे महाशय, राजा दिसंपती कालवश झाले आहेत आणि आपण, राजा रेणू, राज्याभिषिक्त झाला आहात. आपल्याला आपले ते वचन आठवते का?’ ‘हे महाशयांनो, मला ते वचन आठवते. परंतु, उत्तरेकडे रुंद आणि दक्षिणेकडे गाडीच्या मुखासारखी (अरुंद) असलेल्या या विशाल पृथ्वीला सात समान आणि सुविभक्त भागांत वाटण्यास कोण समर्थ आहे?’ ‘हे महाशय, महागोविंद ब्राह्मणाशिवाय दुसरा कोण समर्थ असू शकतो?’ तेव्हा राजा रेणूने एका पुरुषाला बोलावले— ‘हे माणसा, इकडे ये. तू जेथे महागोविंद ब्राह्मण आहे तेथे जा आणि त्यांना असे सांग— भंते, राजा रेणू आपल्याला बोलवत आहेत.’ ‘तसेच असो, महाराज’ असे म्हणून तो पुरुष राजा रेणूच्या आज्ञेचे पालन करून जेथे महागोविंद ब्राह्मण होते तेथे गेला. तेथे जाऊन त्याने महागोविंद ब्राह्मणांना म्हटले— ‘भंते, राजा रेणू आपल्याला बोलवत आहेत.’ ‘तसेच असो, मित्रा’ असे म्हणून महागोविंद ब्राह्मणाने त्या पुरुषाला संमती दिली आणि ते जेथे राजा रेणू होता तेथे गेले. तेथे जाऊन त्यांनी राजा रेणूसोबत कुशलक्षेम विचारले. आनंददायी व संस्मरणीय संभाषण संपवून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या महागोविंद ब्राह्मणांना राजा रेणू म्हणाला— ‘यावे, महाशय गोविंद! उत्तरेकडे रुंद आणि दक्षिणेकडे गाडीच्या मुखासारखी असलेल्या या विशाल पृथ्वीला सात समान आणि सुविभक्त भागांत विभाजित करावे.’ ‘तसेच असो, महाराज’ असे म्हणून महागोविंद ब्राह्मणाने राजा रेणूचे म्हणणे मान्य केले आणि उत्तरेकडे रुंद व दक्षिणेकडे गाडीच्या मुखासारखी असलेल्या या विशाल पृथ्वीला सात समान आणि सुविभक्त भागांत विभाजित केले. त्यांनी सर्व भागांना गाडीच्या मुखासारखे (सकाटमुख) बनवले. त्या सात भागांच्या मध्यभागी राजा रेणूचा जनपद (देश) होता.” ๓๐๙. ทนฺตปุรํ กลิงฺคานํ, อสฺสกานญฺจ โปตนํ. ३०९. “कलिंगांचे दंतपूर आणि अश्मकांचे (अस्सकांचे) पोतन.” มเหสยํ อวนฺตีนํ, โสวีรานญฺจ โรรุกํ. “अवंतींचे माहिस्सती (महेसय) आणि सोवीरांचे रोरुक.” มิถิลา จ วิเทหานํ, จมฺปา องฺเคสุ มาปิตา; พาราณสี จ กาสีนํ, เอเต โควินฺทมาปิตาติ. “विदेहांची मिथिला, अंगांचे चंपा आणि काशींचे वाराणसी; ही सात शहरे महागोविंदाने निर्माण केली होती.” ๓๑๐. ‘‘อถ [Pg.190] โข, โภ, เต ฉ ขตฺติยา ยถาสเกน ลาเภน อตฺตมนา อเหสุํ ปริปุณฺณสงฺกปฺปา – ‘‘ยํ วต โน อโหสิ อิจฺฉิตํ, ยํ อากงฺขิตํ, ยํ อธิปฺเปตํ, ยํ อภิปตฺถิตํ, ตํ โน ลทฺธ’’นฺติ. ३१०. “तेव्हा, हे महाशयांनो, ते सहा क्षत्रिय आपापल्या प्राप्तीने अत्यंत आनंदित झाले आणि त्यांचे संकल्प पूर्ण झाले— ‘आम्हाला जे हवे होते, ज्याची आम्ही आकांक्षा केली होती, जे आमच्या मनात होते आणि ज्याची आम्ही प्रार्थना केली होती, ते खरोखर आम्हाला मिळाले!’” ‘‘สตฺตภู พฺรหฺมทตฺโต จ, เวสฺสภู ภรโต สห; เรณุ ทฺเว ธตรฏฺฐา จ, ตทาสุํ สตฺต ภารธา’ติ. “सत्तभू, ब्रह्मदत्त, वेस्सभू, भरत, रेणू आणि दोन धतरठ्ठ; हे सात राजे त्या काळी जंबुद्विपाचे धुरंधर (भारवाहक) राजे होते.” ปฐมภาณวาโร นิฏฺฐิโต. “पहिला भाणवार समाप्त.” กิตฺติสทฺทอพฺภุคฺคมนํ “कीर्तीचा प्रसार” ๓๑๑. ‘‘อถ โข, โภ, เต ฉ ขตฺติยา เยน มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ เตนุปสงฺกมึสุ; อุปสงฺกมิตฺวา มหาโควินฺทํ พฺราหฺมณํ เอตทโวจุํ – ‘‘ยถา โข ภวํ โควินฺโท เรณุสฺส รญฺโญ สหาโย ปิโย มนาโป อปฺปฏิกูโล. เอวเมว โข ภวํ โควินฺโท อมฺหากมฺปิ สหาโย ปิโย มนาโป อปฺปฏิกูโล, อนุสาสตุ โน ภวํ โควินฺโท; มา โน ภวํ โควินฺโท อนุสาสนิยา ปจฺจพฺยาหาสี’’ติ. ‘‘เอวํ, โภ’’ติ โข มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ เตสํ ฉนฺนํ ขตฺติยานํ ปจฺจสฺโสสิ. อถ โข, โภ, มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ สตฺต จ ราชาโน ขตฺติเย มุทฺธาวสิตฺเต รชฺเช อนุสาสิ, สตฺต จ พฺราหฺมณมหาสาเล สตฺต จ นฺหาตกสตานิ มนฺเต วาเจสิ. ३११. “तेव्हा, हे महाशयांनो, ते सहा क्षत्रिय जेथे महागोविंद ब्राह्मण होते तेथे गेले. तेथे जाऊन त्यांनी महागोविंद ब्राह्मणांना असे म्हटले— ‘जसे आपण, महाशय गोविंद, राजा रेणूचे प्रिय, अनुकूल आणि अविरोध मित्र आहात, तसेच आपण आमचेही प्रिय, अनुकूल आणि अविरोध मित्र व्हावे. आपण आम्हालाही उपदेश करावा; आपण आम्हाला उपदेश करण्यास नकार देऊ नये.’ ‘तसेच असो, महाशयांनो’ असे म्हणून महागोविंद ब्राह्मणाने त्या सहा क्षत्रियांचे म्हणणे मान्य केले. त्यानंतर, हे महाशयांनो, महागोविंद ब्राह्मणाने त्या सात अभिषिक्त क्षत्रिय राजांना राज्यकारभाराचा उपदेश केला, आणि सात ब्राह्मण महाशाल (श्रीमंत ब्राह्मण) व सातशे स्नातकांना (विद्यार्थ्यांना) मंत्रांचे (वेदांचे) अध्यापन केले.” ๓๑๒. ‘‘อถ โข, โภ, มหาโควินฺทสฺส พฺราหฺมณสฺส อปเรน สมเยน เอวํ กลฺยาโณ กิตฺติสทฺโท อพฺภุคฺคจฺฉิ – ‘‘สกฺขิ มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ พฺรหฺมานํ ปสฺสติ, สกฺขิ มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ พฺรหฺมุนา สากจฺเฉติ สลฺลปติ มนฺเตตี’’ติ. อถ โข, โภ, มหาโควินฺทสฺส พฺราหฺมณสฺส เอตทโหสิ – ‘‘มยฺหํ โข เอวํ กลฺยาโณ กิตฺติสทฺโท อพฺภุคฺคโต – ‘สกฺขิ มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ พฺรหฺมานํ ปสฺสติ, สกฺขิ มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ พฺรหฺมุนา สากจฺเฉติ สลฺลปติ มนฺเตตี’ติ. น โข ปนาหํ พฺรหฺมานํ ปสฺสามิ, น พฺรหฺมุนา สากจฺเฉมิ, น พฺรหฺมุนา สลฺลปามิ[Pg.191], น พฺรหฺมุนา มนฺเตมิ. สุตํ โข ปน เมตํ พฺราหฺมณานํ วุทฺธานํ มหลฺลกานํ อาจริยปาจริยานํ ภาสมานานํ – ‘โย วสฺสิเก จตฺตาโร มาเส ปฏิสลฺลียติ, กรุณํ ฌานํ ฌายติ, โส พฺรหฺมานํ ปสฺสติ พฺรหฺมุนา สากจฺเฉติ พฺรหฺมุนา สลฺลปติ พฺรหฺมุนา มนฺเตตี’ติ. ยํนูนาหํ วสฺสิเก จตฺตาโร มาเส ปฏิสลฺลีเยยฺยํ, กรุณํ ฌานํ ฌาเยยฺย’’นฺติ. ३१२. “त्यानंतर, हे महाशयांनो, काही काळानंतर महागोविंद ब्राह्मणाची अशी उत्तम कीर्ती पसरली— ‘महागोविंद ब्राह्मण प्रत्यक्ष ब्रह्माला पाहतात, ते प्रत्यक्ष ब्रह्माशी चर्चा करतात, संभाषण करतात आणि सल्लामसलत करतात.’ तेव्हा, हे महाशयांनो, महागोविंद ब्राह्मणाच्या मनात असा विचार आला— ‘माझी अशी उत्तम कीर्ती पसरली आहे की— महागोविंद ब्राह्मण प्रत्यक्ष ब्रह्माला पाहतात, प्रत्यक्ष ब्रह्माशी चर्चा करतात, संभाषण करतात आणि सल्लामसलत करतात. परंतु मी तर ब्रह्माला प्रत्यक्ष पाहत नाही, ब्रह्माशी चर्चा करत नाही, संभाषण करत नाही आणि सल्लामसलतही करत नाही. पण मी वृद्ध, ज्येष्ठ आणि आचार्यांचे आचार्य असलेल्या ब्राह्मणांकडून असे ऐकले आहे की— जो कोणी पावसाळ्याचे चार महिने एकांतात राहतो आणि करुणा ध्यानाचा (करुणा झानाचा) सराव करतो, तो ब्रह्माला प्रत्यक्ष पाहतो, ब्रह्माशी चर्चा करतो, संभाषण करतो आणि सल्लामसलत करतो. मग मीही पावसाळ्याचे चार महिने एकांतात राहून करुणा ध्यानाचा सराव का करू नये?’” ๓๑๓. ‘‘อถ โข, โภ, มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ เยน เรณุ ราชา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เรณุํ ราชานํ เอตทโวจ – ‘‘มยฺหํ โข, โภ, เอวํ กลฺยาโณ กิตฺติสทฺโท อพฺภุคฺคโต – ‘สกฺขิ มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ พฺรหฺมานํ ปสฺสติ, สกฺขิ มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ พฺรหฺมุนา สากจฺเฉติ สลฺลปติ มนฺเตตี’ติ. น โข ปนาหํ, โภ, พฺรหฺมานํ ปสฺสามิ, น พฺรหฺมุนา สากจฺเฉมิ, น พฺรหฺมุนา สลฺลปามิ, น พฺรหฺมุนา มนฺเตมิ. สุตํ โข ปน เมตํ พฺราหฺมณานํ วุทฺธานํ มหลฺลกานํ อาจริยปาจริยานํ ภาสมานานํ – ‘โย วสฺสิเก จตฺตาโร มาเส ปฏิสลฺลียติ, กรุณํ ฌานํ ฌายติ, โส พฺรหฺมานํ ปสฺสติ, พฺรหฺมุนา สากจฺเฉติ พฺรหฺมุนา สลฺลปติ พฺรหฺมุนา มนฺเตตี’ติ. อิจฺฉามหํ, โภ, วสฺสิเก จตฺตาโร มาเส ปฏิสลฺลียิตุํ, กรุณํ ฌานํ ฌายิตุํ; นมฺหิ เกนจิ อุปสงฺกมิตพฺโพ อญฺญตฺร เอเกน ภตฺตาภิหาเรนา’’ติ. ‘‘ยสฺสทานิ ภวํ โควินฺโท กาลํ มญฺญตี’’ติ. ३१३. “तेव्हा, हे महाशयांनो, महागोविंद ब्राह्मण जेथे राजा रेणू होता तेथे गेले. तेथे जाऊन त्यांनी राजा रेणूला असे म्हटले— ‘महाराज, माझी अशी उत्तम कीर्ती पसरली आहे की— महागोविंद ब्राह्मण प्रत्यक्ष ब्रह्माला पाहतात, प्रत्यक्ष ब्रह्माशी चर्चा करतात, संभाषण करतात आणि सल्लामसलत करतात. परंतु, महाराज, मी तर ब्रह्माला प्रत्यक्ष पाहत नाही, ब्रह्माशी चर्चा करत नाही, संभाषण करत नाही आणि सल्लामसलतही करत नाही. पण मी वृद्ध, ज्येष्ठ आणि आचार्यांचे आचार्य असलेल्या ब्राह्मणांकडून असे ऐकले आहे की— जो कोणी पावसाळ्याचे चार महिने एकांतात राहतो आणि करुणा ध्यानाचा सराव करतो, तो ब्रह्माला प्रत्यक्ष पाहतो, ब्रह्माशी चर्चा करतो, संभाषण करतो आणि सल्लामसलत करतो. महाराज, माझी अशी इच्छा आहे की मी पावसाळ्याचे चार महिने एकांतात राहावे आणि करुणा ध्यानाचा सराव करावा. भोजन आणणाऱ्या एका व्यक्तीशिवाय इतर कोणीही माझ्याकडे येऊ नये.’ ‘महाशय गोविंद, आपल्याला ज्याची वेळ योग्य वाटते, ते आपण करावे.’” ๓๑๔. ‘‘อถ โข, โภ, มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ เยน เต ฉ ขตฺติยา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เต ฉ ขตฺติเย เอตทโวจ – ‘‘มยฺหํ โข, โภ, เอวํ กลฺยาโณ กิตฺติสทฺโท อพฺภุคฺคโต – ‘สกฺขิ มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ พฺรหฺมานํ ปสฺสติ, สกฺขิ มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ พฺรหฺมุนา สากจฺเฉติ สลฺลปติ มนฺเตตี’ติ. น โข ปนาหํ, โภ, พฺรหฺมานํ ปสฺสามิ, น พฺรหฺมุนา สากจฺเฉมิ, น พฺรหฺมุนา สลฺลปามิ, น พฺรหฺมุนา มนฺเตมิ. สุตํ โข ปน เมตํ พฺราหฺมณานํ วุทฺธานํ มหลฺลกานํ อาจริยปาจริยานํ ภาสมานานํ, ‘โย วสฺสิเก จตฺตาโร มาเส ปฏิสลฺลียติ, กรุณํ ฌานํ ฌายติ, โส พฺรหฺมานํ ปสฺสติ พฺรหฺมุนา สากจฺเฉติ พฺรหฺมุนา สลฺลปติ พฺรหฺมุนา มนฺเตตี’ติ. อิจฺฉามหํ, โภ, วสฺสิเก จตฺตาโร มาเส ปฏิสลฺลียิตุํ, กรุณํ ฌานํ ฌายิตุํ; นมฺหิ เกนจิ อุปสงฺกมิตพฺโพ อญฺญตฺร เอเกน ภตฺตาภิหาเรนา’’ติ. ‘‘ยสฺสทานิ ภวํ โควินฺโท กาลํ มญฺญตี’’’ติ. ३१४. त्यानंतर, हे देवा, महागोविंद ब्राह्मण ज्या ठिकाणी ते सहा क्षत्रिय राजे होते, तिथे गेला. तिथे जाऊन त्याने त्या सहा क्षत्रिय राजांना असे म्हटले— 'अहो, माझी अशी उत्तम कीर्ती पसरली आहे की— "महागोविंद ब्राह्मण प्रत्यक्ष ब्रह्माला पाहतो, महागोविंद ब्राह्मण प्रत्यक्ष ब्रह्माशी संवाद साधतो, संभाषण करतो आणि सल्लामसलत करतो." परंतु, अहो, मी ब्रह्माला पाहत नाही, मी ब्रह्माशी संवाद साधत नाही, मी ब्रह्माशी संभाषण करत नाही, मी ब्रह्माशी सल्लामसलत करत नाही. पण मी वृद्ध, ज्येष्ठ, आचार्य आणि आचार्यांचे आचार्य असणाऱ्या ब्राह्मणांकडून असे बोलताना ऐकले आहे की— "जो वर्षाऋतूचे चार महिने एकांतात राहतो, करुणेच्या ध्यानाचा अभ्यास करतो, तो ब्रह्माला पाहतो, ब्रह्माशी संवाद साधतो, ब्रह्माशी संभाषण करतो आणि ब्रह्माशी सल्लामसलत करतो." अहो, माझी अशी इच्छा आहे की मी वर्षाऋतूचे चार महिने एकांतात राहावे आणि करुणेच्या ध्यानाचा अभ्यास करावा; भोजन आणून देणाऱ्या एका व्यक्तीशिवाय इतर कोणीही माझ्याकडे येऊ नये.' (त्यावर ते राजे म्हणाले—) 'पूजनीय गोविंदजी, ज्याचा आता आपण योग्य काळ समजत असाल, तो आपण करावा.' ๓๑๕. ‘‘อถ [Pg.192] โข, โภ, มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ เยน เต สตฺต จ พฺราหฺมณมหาสาลา สตฺต จ นฺหาตกสตานิ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เต สตฺต จ พฺราหฺมณมหาสาเล สตฺต จ นฺหาตกสตานิ เอตทโวจ – ‘‘มยฺหํ โข, โภ, เอวํ กลฺยาโณ กิตฺติสทฺโท อพฺภุคฺคโต – ‘สกฺขิ มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ พฺรหฺมานํ ปสฺสติ, สกฺขิ มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ พฺรหฺมุนา สากจฺเฉติ สลฺลปติ มนฺเตตี’ติ. น โข ปนาหํ, โภ, พฺรหฺมานํ ปสฺสามิ, น พฺรหฺมุนา สากจฺเฉมิ, น พฺรหฺมุนา สลฺลปามิ, น พฺรหฺมุนา มนฺเตมิ. สุตํ โข ปน เมตํ พฺราหฺมณานํ วุทฺธานํ มหลฺลกานํ อาจริยปาจริยานํ ภาสมานานํ – ‘โย วสฺสิเก จตฺตาโร มาเส ปฏิสลฺลียติ, กรุณํ ฌานํ ฌายติ, โส พฺรหฺมานํ ปสฺสติ, พฺรหฺมุนา สากจฺเฉติ, พฺรหฺมุนา สลฺลปติ, พฺรหฺมุนา มนฺเตตี’ติ. เตน หิ, โภ, ยถาสุเต ยถาปริยตฺเต มนฺเต วิตฺถาเรน สชฺฌายํ กโรถ, อญฺญมญฺญญฺจ มนฺเต วาเจถ; อิจฺฉามหํ, โภ, วสฺสิเก จตฺตาโร มาเส ปฏิสลฺลียิตุํ, กรุณํ ฌานํ ฌายิตุํ; นมฺหิ เกนจิ อุปสงฺกมิตพฺโพ อญฺญตฺร เอเกน ภตฺตาภิหาเรนา’’ติ. ‘‘ยสฺส ทานิ ภวํ โควินฺโท กาลํ มญฺญตี’’ติ. ३१५. त्यानंतर, हे देवा, महागोविंद ब्राह्मण ज्या ठिकाणी ते सात महाशाल ब्राह्मण आणि सातशे स्नातक होते, तिथे गेला. तिथे जाऊन त्याने त्या सात महाशाल ब्राह्मणांना आणि सातशे स्नातकांना असे म्हटले— 'अहो, माझी अशी उत्तम कीर्ती पसरली आहे की— "महागोविंद ब्राह्मण प्रत्यक्ष ब्रह्माला पाहतो, महागोविंद ब्राह्मण प्रत्यक्ष ब्रह्माशी संवाद साधतो, संभाषण करतो आणि सल्लामसलत करतो." परंतु, अहो, मी ब्रह्माला पाहत नाही, मी ब्रह्माशी संवाद साधत नाही, मी ब्रह्माशी संभाषण करत नाही, मी ब्रह्माशी सल्लामसलत करत नाही. पण मी वृद्ध, ज्येष्ठ, आचार्य आणि आचार्यांचे आचार्य असणाऱ्या ब्राह्मणांकडून असे बोलताना ऐकले आहे की— "जो वर्षाऋतूचे चार महिने एकांतात राहतो, करुणेच्या ध्यानाचा अभ्यास करतो, तो ब्रह्माला पाहतो, ब्रह्माशी संवाद साधतो, ब्रह्माशी संभाषण करतो आणि ब्रह्माशी सल्लामसलत करतो." म्हणून, अहो, तुम्ही ऐकलेल्या आणि शिकलेल्या मंत्रांचे विस्ताराने पठण करा आणि एकमेकांना ते मंत्र शिकवा. अहो, माझी अशी इच्छा आहे की मी वर्षाऋतूचे चार महिने एकांतात राहावे आणि करुणेच्या ध्यानाचा अभ्यास करावा; भोजन आणून देणाऱ्या एका व्यक्तीशिवाय इतर कोणीही माझ्याकडे येऊ नये.' (त्यावर ते म्हणाले—) 'पूजनीय गोविंदजी, ज्याचा आता आपण योग्य काळ समजत असाल, तो आपण करावा.' ๓๑๖. ‘‘อถ โข, โภ, มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ เยน จตฺตารีสา ภริยา สาทิสิโย เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา จตฺตารีสา ภริยา สาทิสิโย เอตทโวจ – ‘‘มยฺหํ โข, โภตี, เอวํ กลฺยาโณ กิตฺติสทฺโท อพฺภุคฺคโต – ‘สกฺขิ มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ พฺรหฺมานํ ปสฺสติ, สกฺขิ มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ พฺรหฺมุนา สากจฺเฉติ สลฺลปติ มนฺเตตี’ติ. น โข ปนาหํ, โภตี, พฺรหฺมานํ ปสฺสามิ, น พฺรหฺมุนา สากจฺเฉมิ, น พฺรหฺมุนา สลฺลปามิ, น พฺรหฺมุนา มนฺเตมิ. สุตํ โข ปน เมตํ พฺราหฺมณานํ วุทฺธานํ มหลฺลกานํ อาจริยปาจริยานํ ภาสมานานํ ‘โย วสฺสิเก จตฺตาโร มาเส ปฏิสลฺลียติ, กรุณํ ฌานํ ฌายติ, โส พฺรหฺมานํ ปสฺสติ, พฺรหฺมุนา สากจฺเฉติ, พฺรหฺมุนา สลฺลปติ, พฺรหฺมุนา มนฺเตตีติ, อิจฺฉามหํ, โภตี, วสฺสิเก จตฺตาโร มาเส ปฏิสลฺลียิตุํ, กรุณํ ฌานํ ฌายิตุํ; นมฺหิ เกนจิ อุปสงฺกมิตพฺโพ อญฺญตฺร เอเกน ภตฺตาภิหาเรนา’’ติ. ‘‘ยสฺส ทานิ ภวํ โควินฺโท กาลํ มญฺญตี’’’ติ. ३१६. त्यानंतर, हे देवा, महागोविंद ब्राह्मण ज्या ठिकाणी त्याच्या समान कुळातील चाळीस पत्नी होत्या, तिथे गेला. तिथे जाऊन त्याने त्या चाळीस पत्नींना असे म्हटले— 'देवींनो, माझी अशी उत्तम कीर्ती पसरली आहे की— "महागोविंद ब्राह्मण प्रत्यक्ष ब्रह्माला पाहतो, महागोविंद ब्राह्मण प्रत्यक्ष ब्रह्माशी संवाद साधतो, संभाषण करतो आणि सल्लामसलत करतो." परंतु, देवींनो, मी ब्रह्माला पाहत नाही, मी ब्रह्माशी संवाद साधत नाही, मी ब्रह्माशी संभाषण करत नाही, मी ब्रह्माशी सल्लामसलत करत नाही. पण मी वृद्ध, ज्येष्ठ, आचार्य आणि आचार्यांचे आचार्य असणाऱ्या ब्राह्मणांकडून असे बोलताना ऐकले आहे की— "जो वर्षाऋतूचे चार महिने एकांतात राहतो, करुणेच्या ध्यानाचा अभ्यास करतो, तो ब्रह्माला पाहतो, ब्रह्माशी संवाद साधतो, ब्रह्माशी संभाषण करतो आणि ब्रह्माशी सल्लामसलत करतो." देवींनो, माझी अशी इच्छा आहे की मी वर्षाऋतूचे चार महिने एकांतात राहावे आणि करुणेच्या ध्यानाचा अभ्यास करावा; भोजन आणून देणाऱ्या एका व्यक्तीशिवाय इतर कोणीही माझ्याकडे येऊ नये.' (त्यावर त्या पत्नी म्हणाल्या—) 'पूजनीय गोविंदजी, ज्याचा आता आपण योग्य काळ समजत असाल, तो आपण करावा.' ๓๑๗. ‘‘อถ โข, โภ, มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ ปุรตฺถิเมน นครสฺส นวํ สนฺธาคารํ การาเปตฺวา วสฺสิเก จตฺตาโร มาเส ปฏิสลฺลียิ, กรุณํ [Pg.193] ฌานํ ฌายิ; นาสฺสุธ โกจิ อุปสงฺกมติ อญฺญตฺร เอเกน ภตฺตาภิหาเรน. อถ โข, โภ, มหาโควินฺทสฺส พฺราหฺมณสฺส จตุนฺนํ มาสานํ อจฺจเยน อหุเทว อุกฺกณฺฐนา อหุ ปริตสฺสนา – ‘‘สุตํ โข ปน เมตํ พฺราหฺมณานํ วุทฺธานํ มหลฺลกานํ อาจริยปาจริยานํ ภาสมานานํ – ‘โย วสฺสิเก จตฺตาโร มาเส ปฏิสลฺลียติ, กรุณํ ฌานํ ฌายติ, โส พฺรหฺมานํ ปสฺสติ, พฺรหฺมุนา สากจฺเฉติ พฺรหฺมุนา สลฺลปติ พฺรหฺมุนา มนฺเตตี’ติ. น โข ปนาหํ พฺรหฺมานํ ปสฺสามิ, น พฺรหฺมุนา สากจฺเฉมิ น พฺรหฺมุนา สลฺลปามิ น พฺรหฺมุนา มนฺเตมี’’’ติ. ३१७. त्यानंतर, हे देवा, महागोविंद ब्राह्मणाने नगराच्या पूर्व दिशेला एक नवीन संथागार बांधून घेतले आणि तो वर्षाऋतूचे चार महिने तिथे एकांतात राहिला व करुणेच्या ध्यानाचा अभ्यास करू लागला. भोजन आणून देणाऱ्या एका व्यक्तीशिवाय इतर कोणीही त्याच्याकडे जात नसे. त्यानंतर, हे देवा, चार महिने पूर्ण झाल्यावर महागोविंद ब्राह्मणाच्या मनात खिन्नता आणि तळमळ निर्माण झाली— 'मी वृद्ध, ज्येष्ठ, आचार्य आणि आचार्यांचे आचार्य असणाऱ्या ब्राह्मणांकडून असे बोलताना ऐकले आहे की— "जो वर्षाऋतूचे चार महिने एकांतात राहतो, करुणेच्या ध्यानाचा अभ्यास करतो, तो ब्रह्माला पाहतो, ब्रह्माशी संवाद साधतो, ब्रह्माशी संभाषण करतो आणि ब्रह्माशी सल्लामसलत करतो." परंतु मी तर ब्रह्माला पाहत नाही, मी ब्रह्माशी संवाद साधत नाही, मी ब्रह्माशी संभाषण करत नाही, मी ब्रह्माशी सल्लामसलत करत नाही!' พฺรหฺมุนา สากจฺฉา ब्रह्माशी संवाद ๓๑๘. ‘‘อถ โข, โภ, พฺรหฺมา สนงฺกุมาโร มหาโควินฺทสฺส พฺราหฺมณสฺส เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย, ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย, เอวเมว, พฺรหฺมโลเก อนฺตรหิโต มหาโควินฺทสฺส พฺราหฺมณสฺส สมฺมุเข ปาตุรโหสิ. อถ โข, โภ, มหาโควินฺทสฺส พฺราหฺมณสฺส อหุเทว ภยํ อหุ ฉมฺภิตตฺตํ อหุ โลมหํโส ยถา ตํ อทิฏฺฐปุพฺพํ รูปํ ทิสฺวา. อถ โข, โภ, มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ ภีโต สํวิคฺโค โลมหฏฺฐชาโต พฺรหฺมานํ สนงฺกุมารํ คาถาย อชฺฌภาสิ – ३१८. त्यानंतर, हे देवा, सनत्कुमार ब्रह्माने महागोविंद ब्राह्मणाच्या मनातील विचार आपल्या मनाने जाणून घेतले. ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपला दुमडलेला हात सरळ करतो किंवा सरळ केलेला हात दुमडतो, अगदी त्याचप्रमाणे तो ब्रह्मलोकातून अंतर्धान पावला आणि महागोविंद ब्राह्मणाच्या समोर प्रकट झाला. त्यानंतर, हे देवा, महागोविंद ब्राह्मणाला अत्यंत भीती वाटली, त्याचे शरीर थरथर कापले आणि अंगावर काटा उभा राहिला, जसे पूर्वी कधीही न पाहिलेले रूप पाहून होते. त्यानंतर, तो महागोविंद ब्राह्मण भयभीत, उद्विग्न आणि रोमांचित होऊन सनत्कुमार ब्रह्माला गाथेने म्हणाला— ‘‘‘วณฺณวา ยสวา สิริมา, โก นุ ตฺวมสิ มาริส; อชานนฺตา ตํ ปุจฺฉาม, กถํ ชาเนมุ ตํ มย’’นฺติ. 'हे पूजनीय, आपण अत्यंत तेजस्वी, यशस्वी आणि कीर्तिमान आहात. आपण कोण आहात? आम्ही आपल्याला ओळखत नसल्यामुळे विचारत आहोत, आम्ही आपल्याला कसे ओळखावे?' ‘‘มํ เว กุมารํ ชานนฺติ, พฺรหฺมโลเก สนนฺตนํ ; สพฺเพ ชานนฺติ มํ เทวา, เอวํ โควินฺท ชานหิ’’. 'हे गोविंदा, ब्रह्मलोकातील सर्व देव मला सनातन "कुमार" (सनत्कुमार) म्हणून ओळखतात. तू देखील मला असेच ओळख.' ‘‘‘อาสนํ อุทกํ ปชฺชํ, มธุสากญฺจ พฺรหฺมุโน; อคฺเฆ ภวนฺตํ ปุจฺฉาม, อคฺฆํ กุรุตุ โน ภวํ’’. 'ब्रह्मासाठी आसन, पाणी, पाद्य आणि मधुर शाक हे आदरातिथ्य तयार आहे. आम्ही पूजनीयांना या आदरातिथ्याविषयी विचारत आहोत, पूजनीयांनी आमच्या या आदरातिथ्याचा स्वीकार करावा.' ‘‘ปฏิคฺคณฺหาม เต อคฺฆํ, ยํ ตฺวํ โควินฺท ภาสสิ; ทิฏฺฐธมฺมหิตตฺถาย, สมฺปราย สุขาย จ; กตาวกาโส ปุจฺฉสฺสุ, ยํ กิญฺจิ อภิปตฺถิต’’นฺติ. 'हे गोविंदा, तू जे काही म्हणत आहेस, त्या तुझ्या आदरातिथ्याचा आम्ही स्वीकार करतो. या जन्मातील हितासाठी आणि परलोकातील सुखासाठी, तुला जी काही इच्छा असेल, तो प्रश्न विचारण्यास तुला परवानगी आहे, तू विचारू शकतोस.' ๓๑๙. ‘‘อถ โข, โภ, มหาโควินฺทสฺส พฺราหฺมณสฺส เอตทโหสิ – ‘‘กตาวกาโส โขมฺหิ พฺรหฺมุนา สนงฺกุมาเรน. กึ นุ โข อหํ พฺรหฺมานํ สนงฺกุมารํ [Pg.194] ปุจฺเฉยฺยํ ทิฏฺฐธมฺมิกํ วา อตฺถํ สมฺปรายิกํ วา’ติ? อถ โข, โภ, มหาโควินฺทสฺส พฺราหฺมณสฺส เอตทโหสิ – ‘กุสโล โข อหํ ทิฏฺฐธมฺมิกานํ อตฺถานํ, อญฺเญปิ มํ ทิฏฺฐธมฺมิกํ อตฺถํ ปุจฺฉนฺติ. ยํนูนาหํ พฺรหฺมานํ สนงฺกุมารํ สมฺปรายิกญฺเญว อตฺถํ ปุจฺเฉยฺย’นฺติ. อถ โข, โภ, มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ พฺรหฺมานํ สนงฺกุมารํ คาถาย อชฺฌภาสิ – ३१९. तेव्हा, हे देवहो! महागोविंद ब्राह्मणाच्या मनात असा विचार आला – 'मला सनत्कुमार (सनंकुमार) ब्रह्मांनी संधी दिली आहे. मग मी सनंकुमार ब्रह्माला या जन्मातील (ऐहिक) कल्याणाबद्दल विचारावे की परलोकातील (पारलौकिक) कल्याणाबद्दल?' त्यानंतर, हे देवहो! महागोविंद ब्राह्मणाच्या मनात असा विचार आला – 'मी ऐहिक कल्याणाच्या गोष्टींमध्ये तर कुशल आहेच, आणि इतर लोकही मला ऐहिक कल्याणाबद्दलच विचारतात. मग मी सनंकुमार ब्रह्माला परलोकातील कल्याणाबद्दलच का विचारू नये?' त्यानंतर, हे देवहो! महागोविंद ब्राह्मणाने सनंकुमार ब्रह्माला गाथेने संबोधित केले – ‘‘ปุจฺฉามิ พฺรหฺมานํ สนงฺกุมารํ,กงฺขี อกงฺขึ ปรเวทิเยสุ; กตฺถฏฺฐิโต กิมฺหิ จ สิกฺขมาโน,ปปฺโปติ มจฺโจ อมตํ พฺรหฺมโลก’’นฺติ. मी शंकाकुल होऊन, इतरांच्या शंकांचे निरसन करणाऱ्या आणि स्वतः शंकारहित असलेल्या सनंकुमार ब्रह्माला विचारतो – मनुष्य कोठे स्थित राहून आणि कशाचा अभ्यास (शिकावण) करून अमर अशा ब्रह्मलोकाला प्राप्त करू शकतो? ‘‘หิตฺวา มมตฺตํ มนุเชสุ พฺรหฺเม,เอโกทิภูโต กรุเณธิมุตฺโต ; นิรามคนฺโธ วิรโต เมถุนสฺมา,เอตฺถฏฺฐิโต เอตฺถ จ สิกฺขมาโน; ปปฺโปติ มจฺโจ อมตํ พฺรหฺมโลก’’นฺติ. हे ब्राह्मणा (गोविंदा)! मनुष्यांमध्ये 'माझेपणा' (ममत्व) सोडून, एकाकी राहून, करुणेमध्ये मग्न होऊन, दुर्गंधीपासून (आमगंधापासून) मुक्त राहून आणि मैथुनापासून अलिप्त राहून; यात स्थित राहून आणि याचाच अभ्यास करून मनुष्य अमर अशा ब्रह्मलोकाला प्राप्त करू शकतो. ๓๒๐. ‘‘หิตฺวา มมตฺต’นฺติ อหํ โภโต อาชานามิ. อิเธกจฺโจ อปฺปํ วา โภคกฺขนฺธํ ปหาย มหนฺตํ วา โภคกฺขนฺธํ ปหาย อปฺปํ วา ญาติปริวฏฺฏํ ปหาย มหนฺตํ วา ญาติปริวฏฺฏํ ปหาย เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาเทตฺวา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชติ, ‘อิติ หิตฺวา มมตฺต’นฺติ อหํ โภโต อาชานามิ. ‘เอโกทิภูโต’ติ อหํ โภโต อาชานามิ. อิเธกจฺโจ วิวิตฺตํ เสนาสนํ ภชติ อรญฺญํ รุกฺขมูลํ ปพฺพตํ กนฺทรํ คิริคุหํ สุสานํ วนปตฺถํ อพฺโภกาสํ ปลาลปุญฺชํ, อิติ เอโกทิภูโต’ติ อหํ โภโต อาชานามิ. ‘กรุเณธิมุตฺโต’ติ อหํ โภโต อาชานามิ. อิเธกจฺโจ กรุณาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหรติ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ. อิติ อุทฺธมโธติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ กรุณาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหรติ. อิติ ‘กรุเณธิมุตฺโต’ติ อหํ โภโต อาชานามิ. อามคนฺเธ จ โข อหํ โภโต ภาสมานสฺส น อาชานามิ. ३२०. 'ममत्व सोडणे' याचा अर्थ मला समजतो. येथे एखादी व्यक्ती थोडी किंवा पुष्कळ संपत्ती सोडून, थोडे किंवा मोठे नातेवाईकांचे वर्तुळ सोडून, केस आणि दाढी काढून, काषाय वस्त्रे परिधान करून, घरातून बेघर होऊन प्रव्रजित होते; 'ममत्व सोडणे' याचा अर्थ मला असा समजतो. 'एकाकी राहणे' याचा अर्थ मला समजतो. येथे एखादी व्यक्ती निर्जन अशा शयनासनाचा आश्रय घेते – जसे की अरण्य, वृक्षाचे मूळ, पर्वत, दरी, पर्वताची गुहा, स्मशान, जंगल, उघडे मैदान किंवा गवताचा ढीग; 'एकाकी राहणे' याचा अर्थ मला असा समजतो. 'करुणेमध्ये मग्न असणे' याचा अर्थ मला समजतो. येथे एखादी व्यक्ती करुणेने युक्त अशा चित्ताने एका दिशेला व्यापून राहते, तसेच दुसऱ्या दिशेला, तिसऱ्या दिशेला आणि चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरके, सर्वत्र, सर्वात्मभावाने, संपूर्ण जगाला करुणेने युक्त, विशाल, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित चित्ताने व्यापून राहते; 'करुणेमध्ये मग्न असणे' याचा अर्थ मला असा समजतो. परंतु, आपण ज्या 'आमगंघा'बद्दल (दुर्गंधीबद्दल) बोलत आहात, त्याचा अर्थ मला समजला नाही. ‘‘เก [Pg.195] อามคนฺธา มนุเชสุ พฺรหฺเม,เอเต อวิทฺวา อิธ พฺรูหิ ธีร; เกนาวฏา วาติ ปชา กุรุตุ,อาปายิกา นิวุตพฺรหฺมโลกา’’ติ. हे ब्रह्मा! मनुष्यांमध्ये 'आमगंध' (दुर्गंधी) कोणते आहेत? हे सुज्ञ! मला याविषयी ज्ञान नाही, म्हणून मला सांगा. कोणत्या क्लेशाने झाकल्यामुळे ही प्रजा दुर्गंधीयुक्त होते, अपायगामी (नरकगामी) होते आणि त्यांच्यासाठी ब्रह्मलोक बंद होतो? ‘‘โกโธ โมสวชฺชํ นิกติ จ ทุพฺโภ,กทริยตา อติมาโน อุสูยา; อิจฺฉา วิวิจฺฉา ปรเหฐนา จ,โลโภ จ โทโส จ มโท จ โมโห; เอเตสุ ยุตฺตา อนิรามคนฺธา,อาปายิกา นิวุตพฺรหฺมโลกา’’ติ. क्रोध, असत्य बोलणे (मृषावाद), कपट, द्रोह (मित्राचा विश्वासघात), कंजूषपणा, अतिमान (अहंकार), ईर्ष्या, इच्छा (लोभ), संशय (मत्सर), पर-पीडा (दुसऱ्यांना त्रास देणे), लोभ, द्वेष, मद आणि मोह; या चौदा क्लेशांनी युक्त असलेली प्रजा दुर्गंधीयुक्त (आमगंधी) असते, ती अपायगामी (नरकगामी) होते आणि तिच्यासाठी ब्रह्मलोक बंद होतो. ‘‘ยถา โข อหํ โภโต อามคนฺเธ ภาสมานสฺส อาชานามิ. เต น สุนิมฺมทยา อคารํ อชฺฌาวสตา. ปพฺพชิสฺสามหํ, โภ, อคารสฺมา อนคาริย’’นฺติ. ‘‘ยสฺสทานิ ภวํ โควินฺโท กาลํ มญฺญตี’’ติ. आपण सांगितलेल्या या दुर्गंधीबद्दल (आमगंधाबद्दल) मला जसे समजले आहे, त्यानुसार गृहस्थाश्रमात राहून या दुर्गंधीचा त्याग करणे सोपे नाही. म्हणून, हे पूज्य! मी गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून बेघर होऊन प्रव्रजित होईन. (ब्रह्मा म्हणाले -) 'हे गोविंदा! आता ज्याची वेळ आली आहे असे आपण मानता, ते आपण करावे (प्रव्रजित व्हावे).' เรณุราชอามนฺตนา राजा रेणूला आमंत्रण (संबोधन) ๓๒๑. ‘‘อถ โข, โภ, มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ เยน เรณุ ราชา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เรณุํ ราชานํ เอตทโวจ – ‘‘อญฺญํ ทานิ ภวํ ปุโรหิตํ ปริเยสตุ, โย โภโต รชฺชํ อนุสาสิสฺสติ. อิจฺฉามหํ, โภ, อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิตุํ. ยถา โข ปน เม สุตํ พฺรหฺมุโน อามคนฺเธ ภาสมานสฺส, เต น สุนิมฺมทยา อคารํ อชฺฌาวสตา. ปพฺพชิสฺสามหํ, โภ, อคารสฺมา อนคาริย’’นฺติ. ३२१. त्यानंतर, हे देवहो! महागोविंद ब्राह्मण राजा रेणूकडे गेला आणि जवळ जाऊन राजा रेणूला म्हणाला – 'महाराज! आता आपण आपल्या राज्याचा कारभार पाहण्यासाठी दुसऱ्या पुरोहिताचा शोध घ्यावा. महाराज! माझी गृहस्थाश्रम सोडून बेघर होऊन प्रव्रजित होण्याची इच्छा आहे. ब्रह्मांकडून दुर्गंधीबद्दल (आमगंधाबद्दल) मी जे काही ऐकले आहे, त्यानुसार गृहस्थाश्रमात राहून या दुर्गंधीचा त्याग करणे सोपे नाही. म्हणून, महाराज! मी गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून बेघर होऊन प्रव्रजित होईन.' ‘‘อามนฺตยามิ ราชานํ, เรณุํ ภูมิปตึ อหํ; ตฺวํ ปชานสฺสุ รชฺเชน, นาหํ โปโรหิจฺเจ รเม’’. मी पृथ्वीचा स्वामी राजा रेणू याला संबोधित करतो – आपण स्वतः आपल्या राज्याचा कारभार सांभाळावा, मी आता पुरोहित पदावर रमू शकत नाही. ‘‘สเจ เต อูนํ กาเมหิ, อหํ ปริปูรยามิ เต; โย ตํ หึสติ วาเรมิ, ภูมิเสนาปติ อหํ; ตุวํ ปิตา อหํ ปุตฺโต, มา โน โควินฺท ปาชหิ’’. हे गोविंदा! जर आपल्याकडे भोगांची (कामांची) काही कमतरता असेल, तर मी ती पूर्ण करीन. जो कोणी आपल्याला त्रास देईल, त्याला मी रोखीन; मी या भूमीचा सेनापती (राजा) आहे. आपण माझे पिता आहात आणि मी आपला पुत्र आहे. हे गोविंदा! आम्हांला सोडून जाऊ नका. ‘‘นมตฺถิ อูนํ กาเมหิ, หึสิตา เม น วิชฺชติ; อมนุสฺสวโจ สุตฺวา, ตสฺมาหํ น คเห รเม’’. माझ्याकडे भोगांची कोणतीही कमतरता नाही, आणि मला त्रास देणाराही कोणी नाही. परंतु, अमानुष (ब्रह्माची) वाणी ऐकल्यामुळे, मी आता घरात रमू शकत नाही. ‘‘อมนุสฺโส [Pg.196] กถํวณฺโณ, กึ เต อตฺถํ อภาสถ; ยญฺจ สุตฺวา ชหาสิ โน, เคเห อมฺเห จ เกวลี’’. हे गोविंदा! तो अमानुष (ब्रह्मा) कोणत्या वर्णाचा (रूपाचा) होता? त्याने आपल्याला कोणत्या कल्याणाचा उपदेश केला? ज्याचे ऐकून आपण आपले घर, आम्हांला आणि या संपूर्ण प्रजेला सोडून चालला आहात? ‘‘อุปวุตฺถสฺส เม ปุพฺเพ, ยิฏฺฐุกามสฺส เม สโต; อคฺคิ ปชฺชลิโต อาสิ, กุสปตฺตปริตฺถโต’’. पूर्वी जेव्हा मी एकांतात उपवास करत होतो आणि यज्ञ करण्याची इच्छा बाळगत होतो, तेव्हा कुशाच्या गवताने वेढलेला अग्नी प्रज्वलित केला गेला होता. ‘‘ตโต เม พฺรหฺมา ปาตุรหุ, พฺรหฺมโลกา สนนฺตโน; โส เม ปญฺหํ วิยากาสิ, ตํ สุตฺวา น คเห รเม’’. त्यानंतर ब्रह्मलोकातून सनातन ब्रह्मा माझ्यासमोर प्रकट झाले. त्यांनी माझ्या प्रश्नांचे निरसन केले; ते ऐकल्यानंतर मी आता घरात रमू शकत नाही. ‘‘สทฺทหามิ อหํ โภโต, ยํ ตฺวํ โควินฺท ภาสสิ; อมนุสฺสวโจ สุตฺวา, กถํ วตฺเตถ อญฺญถา. हे गोविंदा! आपण जे काही सांगत आहात, त्यावर माझा पूर्ण विश्वास आहे. अमानुष (ब्रह्माची) वाणी ऐकल्यानंतर आपण इतर प्रकारे कसे वागू शकाल? ‘‘เต ตํ อนุวตฺติสฺสาม, สตฺถา โควินฺท โน ภวํ; มณิ ยถา เวฬุริโย, อกาโจ วิมโล สุโภ; เอวํ สุทฺธา จริสฺสาม, โควินฺทสฺสานุสาสเน’’ติ. आम्ही आपलेच अनुकरण करू. हे गोविंदा! आपण आमचे शास्ता (गुरू) व्हा. ज्याप्रमाणे निष्कलंक, निर्मळ आणि अत्यंत तेजस्वी वैडूर्य मणी असतो, त्याचप्रमाणे आम्ही शुद्ध होऊन गोविंदांच्या (आपल्या) शासनात आचरण करू. ‘‘‘สเจ ภวํ โควินฺโท อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสติ, มยมฺปิ อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสาม. อถ ยา เต คติ, สา โน คติ ภวิสฺสตี’’ติ. जर पूज्य गोविंद गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून बेघर होऊन प्रव्रजित होतील, तर आम्हीही गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून बेघर होऊन प्रव्रजित होऊ. जी आपली गती (मार्ग) असेल, तीच आमचीही गती असेल. ฉ ขตฺติยอามนฺตนา सहा क्षत्रियांना आमंत्रण (संबोधन) ๓๒๒. ‘‘อถ โข, โภ, มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ เยน เต ฉ ขตฺติยา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เต ฉ ขตฺติเย เอตทโวจ – ‘‘อญฺญํ ทานิ ภวนฺโต ปุโรหิตํ ปริเยสนฺตุ, โย ภวนฺตานํ รชฺเช อนุสาสิสฺสติ. อิจฺฉามหํ, โภ, อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิตุํ. ยถา โข ปน เม สุตํ พฺรหฺมุโน อามคนฺเธ ภาสมานสฺส, เต น สุนิมฺมทยา อคารํ อชฺฌาวสตา. ปพฺพชิสฺสามหํ, โภ, อคารสฺมา อนคาริย’’นฺติ. อถ โข, โภ, เต ฉ ขตฺติยา เอกมนฺตํ อปกฺกมฺม เอวํ สมจินฺเตสุํ – ‘‘อิเม โข พฺราหฺมณา นาม ธนลุทฺธา; ยํนูน มยํ มหาโควินฺทํ พฺราหฺมณํ ธเนน สิกฺเขยฺยามา’’ติ. เต มหาโควินฺทํ พฺราหฺมณํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวมาหํสุ – ‘‘สํวิชฺชติ โข, โภ, อิเมสุ สตฺตสุ รชฺเชสุ ปหูตํ สาปเตยฺยํ, ตโต โภโต ยาวตเกน อตฺโถ, ตาวตกํ อาหรียต’’นฺติ. ‘‘อลํ, โภ, มมปิทํ ปหูตํ สาปเตยฺยํ ภวนฺตานํเยว วาหสา. ตมหํ สพฺพํ ปหาย อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสามิ. ยถา โข ปน เม สุตํ พฺรหฺมุโน อามคนฺเธ ภาสมานสฺส, เต น สุนิมฺมทยา อคารํ [Pg.197] อชฺฌาวสตา, ปพฺพชิสฺสามหํ, โภ, อคารสฺมา อนคาริย’’นฺติ. อถ โข, โภ, เต ฉ ขตฺติยา เอกมนฺตํ อปกฺกมฺม เอวํ สมจินฺเตสุํ – ‘‘อิเม โข พฺราหฺมณา นาม อิตฺถิลุทฺธา; ยํนูน มยํ มหาโควินฺทํ พฺราหฺมณํ อิตฺถีหิ สิกฺเขยฺยามา’’ติ. เต มหาโควินฺทํ พฺราหฺมณํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวมาหํสุ – ‘‘สํวิชฺชนฺติ โข, โภ, อิเมสุ สตฺตสุ รชฺเชสุ ปหูตา อิตฺถิโย, ตโต โภโต ยาวติกาหิ อตฺโถ, ตาวติกา อานียต’’นฺติ. ‘‘อลํ, โภ, มมปิมา จตฺตารีสา ภริยา สาทิสิโย. ตาปาหํ สพฺพา ปหาย อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสามิ. ยถา โข ปน เม สุตํ พฺรหฺมุโน อามคนฺเธ ภาสมานสฺส, เต น สุนิมฺมทยา อคารํ อชฺฌาวสตา, ปพฺพชิสฺสามหํ, โภ, อคารสฺมา อนคาริยนฺติ’’. ३२२. त्यानंतर, अहो, महागोविंद ब्राह्मण ज्या ठिकाणी ते सहा क्षत्रिय होते, तिथे गेला. तिथे जाऊन त्याने त्या सहा क्षत्रियांना असे म्हटले – 'आता आपण आपल्या राज्याचा कारभार चालवण्यासाठी दुसऱ्या पुरोहिताचा शोध घ्यावा, जो आपल्या राज्याला उपदेश करेल. हे महाशयांनो, माझी गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून अनगारिक प्रवज्जा घेण्याची इच्छा आहे. कारण, ब्रह्मदेवाने आमगंधाविषयी जे सांगितले आहे आणि मी जे ऐकले आहे, त्यानुसार गृहस्थाश्रमात राहणाऱ्या व्यक्तीला त्या आमगंधाचा त्याग करणे सोपे नाही. म्हणून, हे महाशयांनो, मी गृहस्थाश्रमातून बाहेर पडून अनगारिक प्रवज्जा घेणार आहे.' त्यानंतर, अहो, ते सहा क्षत्रिय एका बाजूला गेले आणि त्यांनी असा विचार केला – 'हे ब्राह्मण धनाच्या बाबतीत लोभी असतात. आपण महागोविंद ब्राह्मणाला धनाचा लोभ दाखवून वश करूया का?' मग ते महागोविंद ब्राह्मणाकडे गेले आणि म्हणाले – 'हे महाशयांनो, या सात राज्यांमध्ये विपुल संपत्ती आहे. त्यातून आपल्याला जितक्या संपत्तीची गरज असेल, तितकी आपण घ्यावी.' (महागोविंद म्हणाला) 'पुरे झाले, हे महाशयांनो! आपल्याच कृपेने माझ्याकडेही भरपूर संपत्ती आहे. मी त्या सर्व संपत्तीचा त्याग करून गृहस्थाश्रमातून अनगारिक प्रवज्जेत प्रवेश करणार आहे. कारण, ब्रह्मदेवाने आमगंधाविषयी जे सांगितले आहे आणि मी जे ऐकले आहे, त्यानुसार गृहस्थाश्रमात राहणाऱ्या व्यक्तीला त्या आमगंधाचा त्याग करणे सोपे नाही. म्हणून, हे महाशयांनो, मी गृहस्थाश्रमातून बाहेर पडून अनगारिक प्रवज्जा घेणार आहे.' त्यानंतर, अहो, ते सहा क्षत्रिय पुन्हा एका बाजूला गेले आणि त्यांनी असा विचार केला – 'हे ब्राह्मण स्त्रियांच्या बाबतीत लोभी असतात. आपण महागोविंद ब्राह्मणाला स्त्रियांचा लोभ दाखवून वश करूया का?' मग ते महागोविंद ब्राह्मणाकडे गेले आणि म्हणाले – 'हे महाशयांनो, या सात राज्यांमध्ये अनेक स्त्रिया आहेत. त्यातून आपल्याला जितक्या स्त्रियांची गरज असेल, तितक्या आपण आणाव्यात.' (महागोविंद म्हणाला) 'पुरे झाले, हे महाशयांनो! माझ्याकडेही माझ्याच योग्यतेच्या चाळीस पत्नी आहेत. मी त्या सर्वांचा त्याग करून गृहस्थाश्रमातून अनगारिक प्रवज्जेत प्रवेश करणार आहे. कारण, ब्रह्मदेवाने आमगंधाविषयी जे सांगितले आहे आणि मी जे ऐकले आहे, त्यानुसार गृहस्थाश्रमात राहणाऱ्या व्यक्तीला त्या आमगंधाचा त्याग करणे सोपे नाही. म्हणून, हे महाशयांनो, मी गृहस्थाश्रमातून बाहेर पडून अनगारिक प्रवज्जा घेणार आहे.' ๓๒๓. ‘‘สเจ ภวํ โควินฺโท อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสติ, มยมฺปิ อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสาม, อถ ยา เต คติ, สา โน คติ ภวิสฺสตีติ. ३२३. जर आदरणीय गोविंद गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून अनगारिक प्रवज्जा घेणार असतील, तर आम्हीही गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून अनगारिक प्रवज्जा घेऊ. मग जी तुमची गती असेल, तीच आमचीही गती होईल. ‘‘สเจ ชหถ กามานิ, ยตฺถ สตฺโต ปุถุชฺชโน; อารมฺภวฺโห ทฬฺหา โหถ, ขนฺติพลสมาหิตา. ज्या कामभोगांमध्ये सामान्य लोक (पृथग्जन) आसक्त असतात, जर तुम्ही त्या कामभोगांचा त्याग करत असाल, तर दृढनिश्चयी होऊन प्रयत्न करा आणि सहनशीलतेच्या बलाने युक्त व्हा. ‘‘เอส มคฺโค อุชุมคฺโค, เอส มคฺโค อนุตฺตโร; สทฺธมฺโม สพฺภิ รกฺขิโต, พฺรหฺมโลกูปปตฺติยาติ. हा मार्ग सरळ मार्ग आहे, हा मार्ग सर्वोत्तम आहे. सत्पुरुषांनी रक्षिलेला हा सद्धम्म ब्रह्मलोकाची प्राप्ती करून देणारा आहे. ‘‘เตน หิ ภวํ โควินฺโท สตฺต วสฺสานิ อาคเมตุ. สตฺตนฺนํ วสฺสานํ อจฺจเยน มยมฺปิ อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสาม, อถ ยา เต คติ, สา โน คติ ภวิสฺสตี’’ติ. असे असेल तर आदरणीय गोविंदांनी सात वर्षे प्रतीक्षा करावी. सात वर्षांनंतर आम्हीही गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून अनगारिक प्रवज्जा घेऊ. मग जी तुमची गती असेल, तीच आमचीही गती होईल. ‘‘‘อติจิรํ โข, โภ, สตฺต วสฺสานิ, นาหํ สกฺโกมิ, ภวนฺเต, สตฺต วสฺสานิ อาคเมตุํ. โก นุ โข ปน, โภ, ชานาติ ชีวิตานํ! คมนีโย สมฺปราโย, มนฺตายํ โพทฺธพฺพํ, กตฺตพฺพํ กุสลํ, จริตพฺพํ พฺรหฺมจริยํ, นตฺถิ ชาตสฺส อมรณํ. ยถา โข ปน เม สุตํ พฺรหฺมุโน อามคนฺเธ ภาสมานสฺส, เต น สุนิมฺมทยา อคารํ อชฺฌาวสตา, ปพฺพชิสฺสามหํ, โภ, อคารสฺมา อนคาริย’’’นฺติ. ‘‘เตน หิ ภวํ โควินฺโท ฉพฺพสฺสานิ อาคเมตุ…เป… ปญฺจ วสฺสานิ อาคเมตุ… จตฺตาริ วสฺสานิ อาคเมตุ… ตีณิ วสฺสานิ อาคเมตุ… ทฺเว วสฺสานิ อาคเมตุ… เอกํ วสฺสํ [Pg.198] อาคเมตุ, เอกสฺส วสฺสสฺส อจฺจเยน มยมฺปิ อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสาม, อถ ยา เต คติ, สา โน คติ ภวิสฺสตี’’ติ. 'हे महाशयांनो, सात वर्षे हा फार मोठा काळ आहे. मी सात वर्षे प्रतीक्षा करू शकत नाही. हे महाशयांनो, मानवी जीवनाचा काय भरवसा! परलोकात तर जावेच लागणार आहे, म्हणून प्रज्ञेने हे जाणले पाहिजे, कुशल कर्म केले पाहिजे आणि ब्रह्मचर्याचे पालन केले पाहिजे; कारण जन्मलेल्या कोणालाही अमरत्व नाही. ब्रह्मदेवाने आमगंधाविषयी जे सांगितले आहे आणि मी जे ऐकले आहे, त्यानुसार गृहस्थाश्रमात राहणाऱ्या व्यक्तीला त्या आमगंधाचा त्याग करणे सोपे नाही. म्हणून, हे महाशयांनो, मी गृहस्थाश्रमातून बाहेर पडून अनगारिक प्रवज्जा घेणार आहे.' (ते म्हणाले) 'असे असेल तर आदरणीय गोविंदांनी सहा वर्षे प्रतीक्षा करावी... पाच वर्षे प्रतीक्षा करावी... चार वर्षे प्रतीक्षा करावी... तीन वर्षे प्रतीक्षा करावी... दोन वर्षे प्रतीक्षा करावी... एक वर्ष प्रतीक्षा करावी. एक वर्षानंतर आम्हीही गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून अनगारिक प्रवज्जा घेऊ. मग जी तुमची गती असेल, तीच आमचीही गती होईल.' ‘‘‘อติจิรํ โข, โภ, เอกํ วสฺสํ, นาหํ สกฺโกมิ ภวนฺเต เอกํ วสฺสํ อาคเมตุํ. โก นุ โข ปน, โภ, ชานาติ ชีวิตานํ! คมนีโย สมฺปราโย, มนฺตายํ โพทฺธพฺพํ, กตฺตพฺพํ กุสลํ, จริตพฺพํ พฺรหฺมจริยํ, นตฺถิ ชาตสฺส อมรณํ. ยถา โข ปน เม สุตํ พฺรหฺมุโน อามคนฺเธ ภาสมานสฺส, เต น สุนิมฺมทยา อคารํ อชฺฌาวสตา, ปพฺพชิสฺสามหํ, โภ, อคารสฺมา อนคาริย’’นฺติ. ‘‘เตน หิ ภวํ โควินฺโท สตฺต มาสานิ อาคเมตุ, สตฺตนฺนํ มาสานํ อจฺจเยน มยมฺปิ อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสาม, อถ ยา เต คติ, สา โน คติ ภวิสฺสตี’’ติ. 'हे महाशयांनो, एक वर्ष हासुद्धा फार मोठा काळ आहे. मी एक वर्ष प्रतीक्षा करू शकत नाही. हे महाशयांनो, मानवी जीवनाचा काय भरवसा! परलोकात तर जावेच लागणार आहे, म्हणून प्रज्ञेने हे जाणले पाहिजे, कुशल कर्म केले पाहिजे आणि ब्रह्मचर्याचे पालन केले पाहिजे; कारण जन्मलेल्या कोणालाही अमरत्व नाही. ब्रह्मदेवाने आमगंधाविषयी जे सांगितले आहे आणि मी जे ऐकले आहे, त्यानुसार गृहस्थाश्रमात राहणाऱ्या व्यक्तीला त्या आमगंधाचा त्याग करणे सोपे नाही. म्हणून, हे महाशयांनो, मी गृहस्थाश्रमातून बाहेर पडून अनगारिक प्रवज्जा घेणार आहे.' (ते म्हणाले) 'असे असेल तर आदरणीय गोविंदांनी सात महिने प्रतीक्षा करावी. सात महिन्यांनंतर आम्हीही गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून अनगारिक प्रवज्जा घेऊ. मग जी तुमची गती असेल, तीच आमचीही गती होईल.' ‘‘‘อติจิรํ โข, โภ, สตฺต มาสานิ, นาหํ สกฺโกมิ ภวนฺเต สตฺต มาสานิ อาคเมตุํ. โก นุ โข ปน, โภ, ชานาติ ชีวิตานํ. คมนีโย สมฺปราโย, มนฺตายํ โพทฺธพฺพํ, กตฺตพฺพํ กุสลํ, จริตพฺพํ พฺรหฺมจริยํ, นตฺถิ ชาตสฺส อมรณํ. ยถา โข ปน เม สุตํ พฺรหฺมุโน อามคนฺเธ ภาสมานสฺส, เต น สุนิมฺมทยา อคารํ อชฺฌาวสตา, ปพฺพชิสฺสามหํ, โภ, อคารสฺมา อนคาริย’’นฺติ. 'हे महाशयांनो, सात महिने हासुद्धा फार मोठा काळ आहे. मी सात महिने प्रतीक्षा करू शकत नाही. हे महाशयांनो, मानवी जीवनाचा काय भरवसा! परलोकात तर जावेच लागणार आहे, म्हणून प्रज्ञेने हे जाणले पाहिजे, कुशल कर्म केले पाहिजे आणि ब्रह्मचर्याचे पालन केले पाहिजे; कारण जन्मलेल्या कोणालाही अमरत्व नाही. ब्रह्मदेवाने आमगंधाविषयी जे सांगितले आहे आणि मी जे ऐकले आहे, त्यानुसार गृहस्थाश्रमात राहणाऱ्या व्यक्तीला त्या आमगंधाचा त्याग करणे सोपे नाही. म्हणून, हे महाशयांनो, मी गृहस्थाश्रमातून बाहेर पडून अनगारिक प्रवज्जा घेणार आहे.' ‘‘‘เตน หิ ภวํ โควินฺโท ฉ มาสานิ อาคเมตุ…เป… ปญฺจ มาสานิ อาคเมตุ… จตฺตาริ มาสานิ อาคเมตุ… ตีณิ มาสานิ อาคเมตุ… ทฺเว มาสานิ อาคเมตุ… เอกํ มาสํ อาคเมตุ… อทฺธมาสํ อาคเมตุ, อทฺธมาสสฺส อจฺจเยน มยมฺปิ อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสาม, อถ ยา เต คติ, สา โน คติ ภวิสฺสตี’’ติ. 'असे असेल तर आदरणीय गोविंदांनी सहा महिने प्रतीक्षा करावी... पाच महिने प्रतीक्षा करावी... चार महिने प्रतीक्षा करावी... तीन महिने प्रतीक्षा करावी... दोन महिने प्रतीक्षा करावी... एक महिना प्रतीक्षा करावी... अर्धा महिना प्रतीक्षा करावी. अर्ध्या महिन्यानंतर आम्हीही गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून अनगारिक प्रवज्जा घेऊ. मग जी तुमची गती असेल, तीच आमचीही गती होईल.' ‘‘‘อติจิรํ โข, โภ, อทฺธมาโส, นาหํ สกฺโกมิ ภวนฺเต อทฺธมาสํ อาคเมตุํ. โก นุ โข ปน, โภ, ชานาติ ชีวิตานํ! คมนีโย สมฺปราโย, มนฺตายํ โพทฺธพฺพํ, กตฺตพฺพํ กุสลํ, จริตพฺพํ พฺรหฺมจริยํ, นตฺถิ ชาตสฺส อมรณํ. ยถา โข ปน เม สุตํ พฺรหฺมุโน อามคนฺเธ ภาสมานสฺส, เต น สุนิมฺมทยา อคารํ อชฺฌาวสตา, ปพฺพชิสฺสามหํ, โภ, อคารสฺมา อนคาริย’’นฺติ. ‘‘เตน หิ ภวํ โควินฺโท สตฺตาหํ อาคเมตุ, ยาว มยํ สเก ปุตฺตภาตโร รชฺเชน อนุสาสิสฺสาม, สตฺตาหสฺส [Pg.199] อจฺจเยน มยมฺปิ อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสาม, อถ ยา เต คติ, สา โน คติ ภวิสฺสตี’’ติ. ‘‘น จิรํ โข, โภ, สตฺตาหํ, อาคเมสฺสามหํ ภวนฺเต สตฺตาห’’นฺติ. 'हे महाशयांनो, अर्धा महिनासुद्धा फार मोठा काळ आहे. मी अर्धा महिना प्रतीक्षा करू शकत नाही. हे महाशयांनो, मानवी जीवनाचा काय भरवसा! परलोकात तर जावेच लागणार आहे, म्हणून प्रज्ञेने हे जाणले पाहिजे, कुशल कर्म केले पाहिजे आणि ब्रह्मचर्याचे पालन केले पाहिजे; कारण जन्मलेल्या कोणालाही अमरत्व नाही. ब्रह्मदेवाने आमगंधाविषयी जे सांगितले आहे आणि मी जे ऐकले आहे, त्यानुसार गृहस्थाश्रमात राहणाऱ्या व्यक्तीला त्या आमगंधाचा त्याग करणे सोपे नाही. म्हणून, हे महाशयांनो, मी गृहस्थाश्रमातून बाहेर पडून अनगारिक प्रवज्जा घेणार आहे.' (ते म्हणाले) 'असे असेल तर आदरणीय गोविंदांनी सात दिवस प्रतीक्षा करावी, जेणेकरून आम्ही आमच्या पुत्रांना आणि भावांना राज्यकारभाराचा उपदेश करू शकू. सात दिवसांनंतर आम्हीही गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून अनगारिक प्रवज्जा घेऊ. मग जी तुमची गती असेल, तीच आमचीही गती होईल.' (महागोविंद म्हणाला) 'हे महाशयांनो, सात दिवस हा फार मोठा काळ नाही. मी आपल्यासाठी सात दिवस प्रतीक्षा करेन.' พฺราหฺมณมหาสาลาทีนํ อามนฺตนา ब्राह्मण महाशाल इत्यादींना संबोधित करणे ๓๒๔. ‘‘อถ โข, โภ, มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ เยน เต สตฺต จ พฺราหฺมณมหาสาลา สตฺต จ นฺหาตกสตานิ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เต สตฺต จ พฺราหฺมณมหาสาเล สตฺต จ นฺหาตกสตานิ เอตทโวจ – ‘‘อญฺญํ ทานิ ภวนฺโต อาจริยํ ปริเยสนฺตุ, โย ภวนฺตานํ มนฺเต วาเจสฺสติ. อิจฺฉามหํ, โภ, อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิตุํ. ยถา โข ปน เม สุตํ พฺรหฺมุโน อามคนฺเธ ภาสมานสฺส. เต น สุนิมฺมทยา อคารํ อชฺฌาวสตา, ปพฺพชิสฺสามหํ, โภ, อคารสฺมา อนคาริย’’นฺติ. ‘‘มา ภวํ โควินฺโท อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิ. ปพฺพชฺชา, โภ, อปฺเปสกฺขา จ อปฺปลาภา จ; พฺรหฺมญฺญํ มเหสกฺขญฺจ มหาลาภญฺจา’’ติ. ‘‘มา ภวนฺโต เอวํ อวจุตฺถ – ‘‘ปพฺพชฺชา อปฺเปสกฺขา จ อปฺปลาภา จ, พฺรหฺมญฺญํ มเหสกฺขญฺจ มหาลาภญฺจา’’ติ. โก นุ โข, โภ, อญฺญตฺร มยา มเหสกฺขตโร วา มหาลาภตโร วา! อหญฺหิ, โภ, เอตรหิ ราชาว รญฺญํ พฺรหฺมาว พฺราหฺมณานํ เทวตาว คหปติกานํ. ตมหํ สพฺพํ ปหาย อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสามิ. ยถา โข ปน เม สุตํ พฺรหฺมุโน อามคนฺเธ ภาสมานสฺส, เต น สุนิมฺมทยา อคารํ อชฺฌาวสตา. ปพฺพชิสฺสามหํ, โภ, อคารสฺมา อนคาริย’’นฺติ. ‘‘สเจ ภวํ โควินฺโท อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสติ, มยมฺปิ อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสาม, อถ ยา เต คติ, สา โน คติ ภวิสฺสตี’’ติ. ३२४. “त्यानंतर, हे मित्रांनो, महागोविंद ब्राह्मण ज्या ठिकाणी ते सात ब्राह्मण महाशाल आणि सातशे स्नातक (दीक्षित विद्यार्थी) होते, तिथे गेले. तिथे पोहोचून त्यांनी त्या सात ब्राह्मण महाशाल आणि सातशे स्नातकांना असे म्हटले – ‘आता आपण आपल्यासाठी दुसरा आचार्य शोधावा, जो आपल्याला मंत्रांचे (वेदांचे) अध्यापन करेल. हे मित्रांनो, माझी गृहस्थाश्रमातून गृहहीन प्रव्रज्येत जाण्याची इच्छा आहे. ब्रह्माकडून आमगंधाविषयी (जगातील दुर्गंधी/अशुद्धतेविषयी) जे काही मी ऐकले आहे, त्यानुसार गृहस्थाश्रमात राहणाऱ्या व्यक्तीला त्या आमगंधाचा त्याग करणे सोपे नाही. म्हणून, हे मित्रांनो, मी गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून गृहहीन प्रव्रज्या घेणार आहे.’ (तेव्हा ते म्हणाले) ‘पूजनीय गोविंद यांनी गृहस्थाश्रमातून गृहहीन प्रव्रज्येत जाऊ नये. हे महाशय, प्रव्रज्या ही अल्प प्रभाव (कीर्ती) आणि अल्प लाभ देणारी आहे; तर ब्राह्मणत्व हे महा-प्रभावशाली आणि महा-लाभदायक आहे.’ (महागोविंद म्हणाले) ‘आपण असे बोलू नका की – प्रव्रज्या अल्प प्रभाव आणि अल्प लाभ देणारी आहे, तर ब्राह्मणत्व महा-प्रभावशाली आणि महा-लाभदायक आहे. हे मित्रांनो, माझ्याशिवाय दुसरा कोण अधिक प्रभावशाली किंवा अधिक लाभ मिळवणारा आहे? कारण, हे मित्रांनो, मी सध्या राजांमध्ये राजासारखा, ब्राह्मणांमध्ये ब्रह्मासारखा आणि गृहपतींमध्ये देवतेसारखा आहे. मी या सर्वांचा त्याग करून गृहस्थाश्रमातून गृहहीन प्रव्रज्या घेणार आहे. ब्रह्माकडून आमगंधाविषयी जे काही मी ऐकले आहे, त्यानुसार गृहस्थाश्रमात राहणाऱ्या व्यक्तीला त्या आमगंधाचा त्याग करणे सोपे नाही. म्हणून, हे मित्रांनो, मी गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून गृहहीन प्रव्रज्या घेणार आहे.’ (तेव्हा ते म्हणाले) ‘जर पूजनीय गोविंद गृहस्थाश्रमातून गृहहीन प्रव्रज्या घेणार असतील, तर आम्हीही गृहस्थाश्रमातून गृहहीन प्रव्रज्या घेऊ. जी आपली गती (मार्ग) असेल, तीच आमचीही गती होईल.’” ภริยานํ อามนฺตนา पत्नींना संबोधित करणे ๓๒๕. ‘‘อถ โข, โภ, มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ เยน จตฺตารีสา ภริยา สาทิสิโย เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา จตฺตารีสา ภริยา สาทิสิโย เอตทโวจ – ‘‘ยา โภตีนํ อิจฺฉติ, สกานิ วา ญาติกุลานิ คจฺฉตุ อญฺญํ วา ภตฺตารํ ปริเยสตุ. อิจฺฉามหํ, โภตี, อคารสฺมา [Pg.200] อนคาริยํ ปพฺพชิตุํ. ยถา โข ปน เม สุตํ พฺรหฺมุโน อามคนฺเธ ภาสมานสฺส, เต น สุนิมฺมทยา อคารํ อชฺฌาวสตา. ปพฺพชิสฺสามหํ, โภตี, อคารสฺมา อนคาริย’’นฺติ. ‘‘ตฺวญฺเญว โน ญาติ ญาติกามานํ, ตฺวํ ปน ภตฺตา ภตฺตุกามานํ. สเจ ภวํ โควินฺโท อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสติ, มยมฺปิ อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิสฺสาม, อถ ยา เต คติ, สา โน คติ ภวิสฺสตี’’ติ. ३२५. “त्यानंतर, हे मित्रांनो, महागोविंद ब्राह्मण आपल्या चाळीस समान कुळातील पत्नींकडे गेले. तिथे पोहोचून त्यांनी त्या चाळीस पत्नींना असे म्हटले – ‘तुमच्यापैकी ज्यांची इच्छा असेल, त्यांनी आपल्या नातेवाईकांच्या घरी जावे किंवा दुसऱ्या पतीचा शोध घ्यावा. हे देवींनो, माझी गृहस्थाश्रमातून गृहहीन प्रव्रज्येत जाण्याची इच्छा आहे. ब्रह्माकडून आमगंधाविषयी जे काही मी ऐकले आहे, त्यानुसार गृहस्थाश्रमात राहणाऱ्या व्यक्तीला त्या आमगंधाचा त्याग करणे सोपे नाही. म्हणून, हे देवींनो, मी गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून गृहहीन प्रव्रज्या घेणार आहे.’ (त्यावर पत्नी म्हणाल्या) ‘नातेवाईकांची इच्छा असणाऱ्या आमच्यासाठी आपणच आमचे नातेवाईक आहात, आणि पतीची इच्छा असणाऱ्या आमच्यासाठी आपणच आमचे पती आहात. जर पूजनीय गोविंद गृहस्थाश्रमातून गृहहीन प्रव्रज्या घेणार असतील, तर आम्हीही गृहस्थाश्रमातून गृहहीन प्रव्रज्या घेऊ. जी आपली गती असेल, तीच आमचीही गती होईल.’” มหาโควินฺทปพฺพชฺชา महागोविंदांची प्रव्रज्या ๓๒๖. ‘‘อถ โข, โภ, มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ ตสฺส สตฺตาหสฺส อจฺจเยน เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาเทตฺวา อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิ. ปพฺพชิตํ ปน มหาโควินฺทํ พฺราหฺมณํ สตฺต จ ราชาโน ขตฺติยา มุทฺธาวสิตฺตา สตฺต จ พฺราหฺมณมหาสาลา สตฺต จ นฺหาตกสตานิ จตฺตารีสา จ ภริยา สาทิสิโย อเนกานิ จ ขตฺติยสหสฺสานิ อเนกานิ จ พฺราหฺมณสหสฺสานิ อเนกานิ จ คหปติสหสฺสานิ อเนเกหิ จ อิตฺถาคาเรหิ อิตฺถิโย เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาเทตฺวา มหาโควินฺทํ พฺราหฺมณํ อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชิตํ อนุปพฺพชึสุ. ตาย สุทํ, โภ, ปริสาย ปริวุโต มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ คามนิคมราชธานีสุ จาริกํ จรติ. ยํ โข ปน, โภ, เตน สมเยน มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ คามํ วา นิคมํ วา อุปสงฺกมติ, ตตฺถ ราชาว โหติ รญฺญํ, พฺรหฺมาว พฺราหฺมณานํ, เทวตาว คหปติกานํ. เตน โข ปน สมเยน มนุสฺสา ขิปนฺติ วา อุปกฺขลนฺติ วา เต เอวมาหํสุ – ‘‘นมตฺถุ มหาโควินฺทสฺส พฺราหฺมณสฺส, นมตฺถุ สตฺต ปุโรหิตสฺสา’’’ติ. ३२६. “त्यानंतर, हे मित्रांनो, त्या सात दिवसांच्या समाप्तीनंतर महागोविंद ब्राह्मणाने आपले केस आणि दाढी कापली (मुंडण केले), काषाय वस्त्रे परिधान केली आणि गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून गृहहीन प्रव्रज्या घेतली. महागोविंद ब्राह्मणाने प्रव्रज्या घेतल्यावर, अभिषिक्त झालेले सात क्षत्रिय राजे, सात ब्राह्मण महाशाल, सातशे स्नातक, त्यांच्या चाळीस समान कुळातील पत्नी, अनेक हजार क्षत्रिय, अनेक हजार ब्राह्मण, अनेक हजार गृहपती आणि अंतःपुरातील अनेक स्त्रियांनीही आपले केस व दाढी कापून, काषाय वस्त्रे परिधान करून, गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून गृहहीन प्रव्रज्या घेतलेल्या महागोविंद ब्राह्मणाचे अनुकरण करत प्रव्रज्या घेतली. हे मित्रांनो, त्या मोठ्या समुदायाने वेढलेले महागोविंद ब्राह्मण गावे, नगरे आणि राजधानीच्या शहरांमध्ये चारिका (धम्मयात्रा) करू लागले. हे मित्रांनो, त्या काळात महागोविंद ब्राह्मण ज्या ज्या गावी किंवा नगरात जात असत, तिथे ते राजांमध्ये राजासारखे, ब्राह्मणांमध्ये ब्रह्मासारखे आणि गृहपतींमध्ये देवतेसारखे पूजनीय ठरत असत. त्या काळात जेव्हा लोक शिंकत किंवा अडखळत असत, तेव्हा ते असे म्हणत – ‘महागोविंद ब्राह्मणाला नमस्कार असो! सात राजांच्या पुरोहिताला नमस्कार असो!’” ๓๒๗. ‘‘มหาโควินฺโท, โภ, พฺราหฺมโณ เมตฺตาสหคเตน เจตสา เอกํ ทิสํ ผริตฺวา วิหาสิ, ตถา ทุติยํ, ตถา ตติยํ, ตถา จตุตฺถํ. อิติ อุทฺธมโธ ติริยํ สพฺพธิ สพฺพตฺตตาย สพฺพาวนฺตํ โลกํ เมตฺตาสหคเตน เจตสา วิปุเลน มหคฺคเตน อปฺปมาเณน อเวเรน อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหาสิ. กรุณาสหคเตน เจตสา…เป… มุทิตาสหคเตน เจตสา…เป… อุเปกฺขาสหคเตน เจตสา…เป… อพฺยาปชฺเชน ผริตฺวา วิหาสิ สาวกานญฺจ พฺรหฺมโลกสหพฺยตาย มคฺคํ เทเสสิ. ३२७. “हे मित्रांनो, महागोविंद ब्राह्मण मैत्रीपूर्ण चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरत असत; तसेच दुसऱ्या, तिसऱ्या आणि चौथ्या दिशेलाही. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरके, सर्वत्र, सर्वांना स्वतःसमान मानून, संपूर्ण विश्वाला विस्तीर्ण, महान, अमर्याद, वैररहित आणि द्वेषरहित अशा मैत्रीपूर्ण चित्ताने व्यापून विहरत असत. तसेच करुणेने युक्त चित्ताने... पे... मुदितेने (सहानुभूतीपूर्वक आनंदाने) युक्त चित्ताने... पे... उपेक्षेने (तटस्थतेने) युक्त चित्ताने... पे... द्वेषरहित होऊन व्यापून विहरत असत आणि आपल्या श्रावकांना (शिष्यांना) ब्रह्मलोकात सहवास मिळवण्याचा मार्ग दाखवत असत.” ๓๒๘. ‘‘เย [Pg.201] โข ปน, โภ, เตน สมเยน มหาโควินฺทสฺส พฺราหฺมณสฺส สาวกา สพฺเพน สพฺพํ สาสนํ อาชานึสุ. เต กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ พฺรหฺมโลกํ อุปปชฺชึสุ. เย น สพฺเพน สพฺพํ สาสนํ อาชานึสุ, เต กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปฺเปกจฺเจ ปรนิมฺมิตวสวตฺตีนํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชึสุ; อปฺเปกจฺเจ นิมฺมานรตีนํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชึสุ; อปฺเปกจฺเจ ตุสิตานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชึสุ; อปฺเปกจฺเจ ยามานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชึสุ; อปฺเปกจฺเจ ตาวตึสานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชึสุ; อปฺเปกจฺเจ จาตุมหาราชิกานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชึสุ; เย สพฺพนิหีนํ กายํ ปริปูเรสุํ เต คนฺธพฺพกายํ ปริปูเรสุํ. อิติ โข, โภ, สพฺเพสํเยว เตสํ กุลปุตฺตานํ อโมฆา ปพฺพชฺชา อโหสิ อวญฺฌา สผลา สอุทฺรยา’’’ติ. ३२८. “हे मित्रांनो, त्या काळात महागोविंद ब्राह्मणाचे जे श्रावक त्यांच्या शिकवणीचे पूर्णपणे आकलन करू शकले, ते शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगती अशा ब्रह्मलोकात उत्पन्न झाले. जे त्यांच्या शिकवणीचे पूर्णपणे आकलन करू शकले नाहीत, ते शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर काही जण परनिर्मितवशवर्ती देवांच्या सहवासात उत्पन्न झाले; काही निर्माणरती देवांच्या सहवासात उत्पन्न झाले; काही तुषित देवांच्या सहवासात उत्पन्न झाले; काही याम देवांच्या सहवासात उत्पन्न झाले; काही तावतिंस देवांच्या सहवासात उत्पन्न झाले; काही चातुमहाराजिका देवांच्या सहवासात उत्पन्न झाले; आणि ज्यांनी सर्वात कनिष्ठ देवयोनी प्राप्त केली, ते गंधर्व योनीत उत्पन्न झाले. अशा प्रकारे, हे मित्रांनो, त्या सर्व कुलपुत्रांची प्रव्रज्या निष्फळ ठरली नाही, ती वांझ ठरली नाही, तर ती सफळ आणि कल्याणकारी ठरली.’” ๓๒๙. ‘‘สรติ ตํ ภควา’’ติ? ‘‘สรามหํ, ปญฺจสิข. อหํ เตน สมเยน มหาโควินฺโท พฺราหฺมโณ อโหสึ. อหํ เตสํ สาวกานํ พฺรหฺมโลกสหพฺยตาย มคฺคํ เทเสสึ. ตํ โข ปน เม, ปญฺจสิข, พฺรหฺมจริยํ น นิพฺพิทาย น วิราคาย น นิโรธาย น อุปสมาย น อภิญฺญาย น สมฺโพธาย น นิพฺพานาย สํวตฺตติ, ยาวเทว พฺรหฺมโลกูปปตฺติยา. ३२९. “‘भगवंतांना याची आठवण आहे का?’ ‘पंचशिखा, मला याची आठवण आहे. त्या काळी मीच तो महागोविंद ब्राह्मण होतो. मीच त्या श्रावकांना ब्रह्मलोकात सहवास मिळवण्याचा मार्ग दाखवला होता. परंतु, पंचशिखा, माझे ते ब्रह्मचर्य (धार्मिक आचरण) वैराग्यासाठी, अनासक्तीसाठी, निरोधासाठी, उपशमासाठी (शांततेसाठी), अभिज्ञेसाठी (उच्च ज्ञानासाठी), संबोधीसाठी (पूर्ण ज्ञानासाठी) किंवा निर्वाणासाठी पूरक नव्हते; ते केवळ ब्रह्मलोकात उत्पन्न होण्यापुरतेच मर्यादित होते.’” อิทํ โข ปน เม, ปญฺจสิข, พฺรหฺมจริยํ เอกนฺตนิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย อุปสมาย อภิญฺญาย สมฺโพธาย นิพฺพานาย สํวตฺตติ. กตมญฺจ ตํ, ปญฺจสิข, พฺรหฺมจริยํ เอกนฺตนิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย อุปสมาย อภิญฺญาย สมฺโพธาย นิพฺพานาย สํวตฺตติ? อยเมว อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค. เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. อิทํ โข ตํ, ปญฺจสิข, พฺรหฺมจริยํ เอกนฺตนิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย อุปสมาย อภิญฺญาย สมฺโพธาย นิพฺพานาย สํวตฺตติ. हे पंचशिखा, माझे हे ब्रह्मचर्य एकांततः (पूर्णपणे) वैराग्यासाठी, विरागासाठी, निरोधासाठी, उपशमासाठी, अभिज्ञेसाठी (उच्च ज्ञानासाठी), संबोधीसाठी (पूर्ण ज्ञानासाठी) आणि निर्वाणासाठी कारणीभूत ठरते. आणि पंचशिखा, ते कोणते ब्रह्मचर्य आहे जे एकांततः वैराग्यासाठी, विरागासाठी, निरोधासाठी, उपशमासाठी, अभिज्ञेसाठी, संबोधीसाठी आणि निर्वाणासाठी कारणीभूत ठरते? हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग होय. जसे की – सम्यक दृष्टी, सम्यक संकल्प, सम्यक वाचा, सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृती आणि सम्यक समाधी. हेच ते, पंचशिखा, ब्रह्मचर्य आहे जे एकांततः वैराग्यासाठी, विरागासाठी, निरोधासाठी, उपशमासाठी, अभिज्ञेसाठी, संबोधीसाठी आणि निर्वाणासाठी कारणीभूत ठरते. ๓๓๐. ‘‘เย โข ปน เม, ปญฺจสิข, สาวกา สพฺเพน สพฺพํ สาสนํ อาชานนฺติ, เต อาสวานํ ขยา อนาสวํ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหรนฺติ; เย น สพฺเพน สพฺพํ สาสนํ อาชานนฺติ, เต ปญฺจนฺนํ โอรมฺภาคิยานํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา [Pg.202] โอปปาติกา โหนฺติ ตตฺถ ปรินิพฺพายิโน อนาวตฺติธมฺมา ตสฺมา โลกา. เย น สพฺเพน สพฺพํ สาสนํ อาชานนฺติ, อปฺเปกจฺเจ ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา ราคโทสโมหานํ ตนุตฺตา สกทาคามิโน โหนฺติ สกิเทว อิมํ โลกํ อาคนฺตฺวา ทุกฺขสฺสนฺตํ กริสฺสนฺติ. เย น สพฺเพน สพฺพํ สาสนํ อาชานนฺติ, อปฺเปกจฺเจ ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โสตาปนฺนา โหนฺติ อวินิปาตธมฺมา นิยตา สมฺโพธิปรายณา. อิติ โข, ปญฺจสิข, สพฺเพสํเยว อิเมสํ กุลปุตฺตานํ อโมฆา ปพฺพชฺชา อวญฺฌา สผลา สอุทฺรยา’’ติ. ३३०. “पंचशिखा, माझे जे श्रावक माझ्या उपदेशाला (शासनाला) पूर्णपणे जाणतात, ते आसवांच्या (विकारांच्या) क्षयामुळे आसवरहित अशा चेतोविमुक्तीला आणि प्रज्ञाविमुक्तीला याच जन्मात स्वतः अभिज्ञेने (उच्च ज्ञानाने) साक्षात करून, प्राप्त करून विहरतात. जे उपदेशाला पूर्णपणे जाणत नाहीत, ते पाच खालच्या स्तरावरील (ओरंभागिय) संयोजनांच्या पूर्ण क्षयामुळे ओपपातिक (स्वयंभू उत्पन्न होणारे) होतात आणि तिथेच परिनिर्वाण प्राप्त करतात, त्या लोकातून पुन्हा परत न येणारे (अनागामी) होतात. जे उपदेशाला पूर्णपणे जाणत नाहीत, त्यांच्यापैकी काही जण तीन संयोजनांच्या क्षयामुळे आणि राग, द्वेष व मोहाच्या मंदतेमुळे सकदागामी (एकदाच परतणारे) होतात, जे या लोकात केवळ एकदाच येऊन दुःखाचा अंत करतील. जे उपदेशाला पूर्णपणे जाणत नाहीत, त्यांच्यापैकी काही जण तीन संयोजनांच्या क्षयामुळे सोतापन्न (प्रवाहात प्रविष्ट झालेले) होतात, जे दुर्गतीला न जाणारे, नियत (निश्चितपणे संबोधी प्राप्त करणारे) आणि संबोधीपरायण असतात. अशा प्रकारे, पंचशिखा, या सर्व कुलपुत्रांचे प्रव्रज्या ग्रहण करणे अमोघ (व्यर्थ न जाणारे), निष्फळ न ठरणारे, सफळ आणि कल्याणकारी ठरले आहे.” อิทมโวจ ภควา. อตฺตมโน ปญฺจสิโข คนฺธพฺพปุตฺโต ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺเถวนฺตรธายีติ. भगवान असे म्हणाले. संतुष्ट झालेल्या पंचशिख गंधर्वपुत्राने भगवंतांच्या भाषणाचे अभिनंदन व अनुमोदन केले, भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि तो तिथेच अंतर्धान पावला. มหาโควินฺทสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ ฉฏฺฐํ. सहावे महागोविंद सुत्त समाप्त झाले. ๗. มหาสมยสุตฺตํ ७. महासमय सुत्त ๓๓๑. เอวํ [Pg.203] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สกฺเกสุ วิหรติ กปิลวตฺถุสฺมึ มหาวเน มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ ปญฺจมตฺเตหิ ภิกฺขุสเตหิ สพฺเพเหว อรหนฺเตหิ; ทสหิ จ โลกธาตูหิ เทวตา เยภุยฺเยน สนฺนิปติตา โหนฺติ ภควนฺตํ ทสฺสนาย ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. อถ โข จตุนฺนํ สุทฺธาวาสกายิกานํ เทวตานํ เอตทโหสิ – ‘‘อยํ โข ภควา สกฺเกสุ วิหรติ กปิลวตฺถุสฺมึ มหาวเน มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ ปญฺจมตฺเตหิ ภิกฺขุสเตหิ สพฺเพเหว อรหนฺเตหิ; ทสหิ จ โลกธาตูหิ เทวตา เยภุยฺเยน สนฺนิปติตา โหนฺติ ภควนฺตํ ทสฺสนาย ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. ยํนูน มยมฺปิ เยน ภควา เตนุปสงฺกเมยฺยาม; อุปสงฺกมิตฺวา ภควโต สนฺติเก ปจฺเจกํ คาถํ ภาเสยฺยามา’’ติ. ३३१. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान शाक्य देशात, कपिलवस्तू येथील महावनात सुमारे पाचशे भिक्खूंच्या मोठ्या भिक्खू संघासोबत विहरत होते, जे सर्वच्या सर्व अर्हत होते. आणि दहा लोकधातूंमधील (विश्वप्रणालींमधील) देवता बहुसंख्येने भगवंतांच्या आणि भिक्खू संघाच्या दर्शनासाठी एकत्र आल्या होत्या. तेव्हा चार शुद्धवास लोकातील देवतांच्या मनात असा विचार आला – “हे भगवान शाक्य देशात, कपिलवस्तू येथील महावनात सुमारे पाचशे भिक्खूंच्या मोठ्या भिक्खू संघासोबत विहरत आहेत, जे सर्वच्या सर्व अर्हत आहेत; आणि दहा लोकधातूंमधील देवता बहुसंख्येने भगवंतांच्या आणि भिक्खू संघाच्या दर्शनासाठी एकत्र आल्या आहेत. तर मग आम्हीही जिथे भगवान आहेत तिथे जावे आणि भगवंतांच्या सन्निध जाऊन प्रत्येकाने एकेक गाथा म्हणावी.” ๓๓๒. อถ โข ตา เทวตา เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย, เอวเมว สุทฺธาวาเสสุ เทเวสุ อนฺตรหิตา ภควโต ปุรโต ปาตุรเหสุํ. อถ โข ตา เทวตา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐํสุ. เอกมนฺตํ ฐิตา โข เอกา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – ३३२. त्यानंतर त्या देवता, ज्याप्रमाणे एखादा बलवान मनुष्य आपली दुमडलेली बाहू पसरावी किंवा पसरलेली बाहू दुमडावी, त्याचप्रमाणे शुद्धवास देवलोकातून अंतर्धान पावल्या आणि भगवंतांच्या समोर प्रकट झाल्या. त्यानंतर त्या देवतांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि त्या एका बाजूला उभ्या राहिल्या. एका बाजूला उभ्या असलेल्या एका देवतेने भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हटली – ‘‘มหาสมโย ปวนสฺมึ, เทวกายา สมาคตา; อาคตมฺห อิมํ ธมฺมสมยํ, ทกฺขิตาเย อปราชิตสงฺฆ’’นฺติ. “या महावनात मोठा मेळावा (महासमय) भरला आहे, देवसमुदाय एकत्र आले आहेत. आम्ही या धर्मसभेला (धम्मसमयाला) या अजिंक्य (अपराजित) संघाचे दर्शन घेण्यासाठी आलो आहोत.” อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – त्यानंतर दुसऱ्या एका देवतेने भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हटली – ‘‘ตตฺร ภิกฺขโว สมาทหํสุ, จิตฺตมตฺตโน อุชุกํ อกํสุ ; สารถีว เนตฺตานิ คเหตฺวา, อินฺทฺริยานิ รกฺขนฺติ ปณฺฑิตา’’ติ. “तेथे भिक्खूंनी आपले चित्त एकाग्र केले आहे, स्वतःचे चित्त सरळ (ऋजू) केले आहे. रथाच्या घोड्यांचे लगाम हाती धरणाऱ्या सारथ्याप्रमाणे, ते प्रज्ञावंत भिक्खू आपल्या इंद्रियांचे रक्षण करत आहेत.” อถ โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – त्यानंतर तिसऱ्या एका देवतेने भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हटली – ‘‘เฉตฺวา ขีลํ เฉตฺวา ปลิฆํ, อินฺทขีลํ อูหจฺจ มเนชา; เต จรนฺติ สุทฺธา วิมลา, จกฺขุมตา สุทนฺตา สุสุนาคา’’ติ. “खिळा (राग-द्वेष-मोहाचा अडथळा) तोडून, अडसर तोडून आणि इंद्रखिळा उपटून टाकून ते तृष्णारहित झाले आहेत. ते शुद्ध, निर्मळ, दिव्य चक्षू असलेल्या भगवंतांद्वारे उत्तम प्रकारे दमित केलेले तरुण हत्तींप्रमाणे (नागांप्रमाणे) विहरत आहेत.” อถ [Pg.204] โข อปรา เทวตา ภควโต สนฺติเก อิมํ คาถํ อภาสิ – त्यानंतर चौथ्या एका देवतेने भगवंतांच्या सन्निध ही गाथा म्हटली – ‘‘เยเกจิ พุทฺธํ สรณํ คตาเส, น เต คมิสฺสนฺติ อปายภูมึ; ปหาย มานุสํ เทหํ, เทวกายํ ปริปูเรสฺสนฺตี’’ติ. “जे कोणी बुद्धाला शरण गेले आहेत, ते अपायभूमीला (दुर्गतीला) जाणार नाहीत. मानवी देहाचा त्याग करून ते देवलोकाला समृद्ध करतील.” เทวตาสนฺนิปาตา देवतांचा मेळावा (देवतासंनिपात) ๓๓๓. อถ โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘เยภุยฺเยน, ภิกฺขเว, ทสสุ โลกธาตูสุ เทวตา สนฺนิปติตา โหนฺติ, ตถาคตํ ทสฺสนาย ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. เยปิ เต, ภิกฺขเว, อเหสุํ อตีตมทฺธานํ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา, เตสมฺปิ ภควนฺตานํ เอตํปรมาเยว เทวตา สนฺนิปติตา อเหสุํ เสยฺยถาปิ มยฺหํ เอตรหิ. เยปิ เต, ภิกฺขเว, ภวิสฺสนฺติ อนาคตมทฺธานํ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา, เตสมฺปิ ภควนฺตานํ เอตํปรมาเยว เทวตา สนฺนิปติตา ภวิสฺสนฺติ เสยฺยถาปิ มยฺหํ เอตรหิ. อาจิกฺขิสฺสามิ, ภิกฺขเว, เทวกายานํ นามานิ; กิตฺตยิสฺสามิ, ภิกฺขเว, เทวกายานํ นามานิ; เทเสสฺสามิ, ภิกฺขเว, เทวกายานํ นามานิ. ตํ สุณาถ, สาธุกํ มนสิกโรถ, ภาสิสฺสามี’’ติ. ‘‘เอวํ, ภนฺเต’’ติ โข เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ३३३. त्यानंतर भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – “भिक्खूंनो, दहाही लोकधातूंमधील देवता बहुसंख्येने तथागतांच्या आणि भिक्खू संघाच्या दर्शनासाठी एकत्र आल्या आहेत. भिक्खूंनो, भूतकाळात जे अर्हत सम्यक संबुद्ध होऊन गेले, त्यांच्याही वेळी अशाच प्रकारे प्रचंड संख्येने देवता एकत्र आल्या होत्या, जशा आता माझ्या वेळी आल्या आहेत. भिक्खूंनो, भविष्यकाळात जे अर्हत सम्यक संबुद्ध होतील, त्यांच्याही वेळी अशाच प्रकारे प्रचंड संख्येने देवता एकत्र येतील, जशा आता माझ्या वेळी आल्या आहेत. भिक्खूंनो, मी देवसमुदायांची नावे सांगेन; भिक्खूंनो, मी देवसमुदायांच्या नावांचे कीर्तन करेन; भिक्खूंनो, मी देवसमुदायांची नावे उपदेशेन. ते लक्षपूर्वक ऐका, चांगल्या प्रकारे मनात साठवा, मी बोलतो.” “होय, भंते,” असे म्हणून त्या भिक्खूंनी भगवंतांना प्रतिसाद दिला. ๓๓๔. ภควา เอตทโวจ – ३३४. भगवान असे म्हणाले – ‘‘สิโลกมนุกสฺสามิ, ยตฺถ ภุมฺมา ตทสฺสิตา; เย สิตา คิริคพฺภรํ, ปหิตตฺตา สมาหิตา. “मी गाथांच्या स्वरूपात सांगेन, जिथे भूमीवर राहणाऱ्या देवता आश्रयाला आहेत. जे भिक्खू पर्वतांच्या गुहांमध्ये राहतात, ज्यांचे चित्त निर्वाणाकडे प्रवृत्त आहे आणि जे समाधीस्थ आहेत. ‘‘ปุถูสีหาว สลฺลีนา, โลมหํสาภิสมฺภุโน; โอทาตมนสา สุทฺธา, วิปฺปสนฺนมนาวิลา’’. “अनेक सिंहाप्रमाणे जे एकांतात राहणारे आहेत, ज्यांनी रोमांच उभे करणाऱ्या भयावर विजय मिळवला आहे, ज्यांचे मन अत्यंत स्वच्छ, शुद्ध, प्रसन्न आणि कलहविरहित आहे.” ภิยฺโย ปญฺจสเต ญตฺวา, วเน กาปิลวตฺถเว; ตโต อามนฺตยี สตฺถา, สาวเก สาสเน รเต. कपिलवस्तूच्या वनात पाचशेहून अधिक श्रावक शासनात (धम्मात) रममाण झाले आहेत हे जाणून, त्यानंतर शास्त्यांनी (बुद्धांनी) आपल्या श्रावकांना संबोधित केले. ‘‘เทวกายา อภิกฺกนฺตา, เต วิชานาถ ภิกฺขโว’’; เต จ อาตปฺปมกรุํ, สุตฺวา พุทฺธสฺส สาสนํ. “भिक्खूंनो, देवसमुदाय आले आहेत, त्यांना तुम्ही (दिव्य चक्षूंनी) ओळखा.” बुद्धांचे हे शासन (आदेश) ऐकून त्या भिक्खूंनी तसा प्रयत्न केला. เตสํ ปาตุรหุ ญาณํ, อมนุสฺสานทสฺสนํ; อปฺเปเก สตมทฺทกฺขุํ, สหสฺสํ อถ สตฺตรึ. त्यांच्यामध्ये मनुष्याव्यतिरिक्त इतर जीवांना (देवतांना) पाहण्याचे ज्ञान (दिव्य चक्षू) प्रकट झाले. काही भिक्खूंनी शंभर देवता पाहिल्या, काहींनी हजार, तर काहींनी सत्तर हजार पाहिल्या. สตํ [Pg.205] เอเก สหสฺสานํ, อมนุสฺสานมทฺทสุํ; อปฺเปเกนนฺตมทฺทกฺขุํ, ทิสา สพฺพา ผุฏา อหุํ. काहींनी एक लाख देवता पाहिल्या, तर काहींनी अनंत देवता पाहिल्या. सर्व दिशा देवतांनी व्यापून गेल्या होत्या. ตญฺจ สพฺพํ อภิญฺญาย, ววตฺถิตฺวาน จกฺขุมา; ตโต อามนฺตยี สตฺถา, สาวเก สาสเน รเต. ते सर्व दिव्य चक्षू असलेल्या भगवंतांनी आपल्या उच्च ज्ञानाने (अभिज्ञेने) जाणले आणि निश्चित केले. त्यानंतर शास्त्यांनी शासनात रममाण असलेल्या श्रावकांना संबोधित केले. ‘‘เทวกายา อภิกฺกนฺตา, เต วิชานาถ ภิกฺขโว; เย โวหํ กิตฺตยิสฺสามิ, คิราหิ อนุปุพฺพโส. “हे भिक्खूहो! देवसमूह आले आहेत. त्यांना तुम्ही (दिव्यचक्षूने) ओळखा. मी त्यांच्याविषयी गाथांद्वारे अनुक्रमाने सांगेन.” ๓๓๕.‘‘สตฺตสหสฺสา เต ยกฺขา, ภุมฺมา กาปิลวตฺถวา. ३३५. “कपिलवस्तूच्या परिसरात राहणारे, भूमीवर निवास करणारे सात हजार यक्ष,” อิทฺธิมนฺโต ชุติมนฺโต, วณฺณวนฺโต ยสสฺสิโน; โมทมานา อภิกฺกามุํ, ภิกฺขูนํ สมิตึ วนํ. “जे ऋद्धिवान, तेजस्वी, रूपवान आणि यशस्वी आहेत, ते आनंदाने भिक्खूंच्या या महावनातील सभेला पाहण्यासाठी आले आहेत.” ‘‘ฉสหสฺสา เหมวตา, ยกฺขา นานตฺตวณฺณิโน; อิทฺธิมนฺโต ชุตีมนฺโต, วณฺณวนฺโต ยสสฺสิโน; โมทมานา อภิกฺกามุํ, ภิกฺขูนํ สมิตึ วนํ. “हिमालयात राहणारे, विविध रंगांचे, ऋद्धिवान, तेजस्वी, रूपवान आणि यशस्वी असे सहा हजार यक्ष आनंदाने भिक्खूंच्या या महावनातील सभेला पाहण्यासाठी आले आहेत.” ‘‘สาตาคิรา ติสหสฺสา, ยกฺขา นานตฺตวณฺณิโน; อิทฺธิมนฺโต ชุติมนฺโต, วณฺณวนฺโต ยสสฺสิโน; โมทมานา อภิกฺกามุํ, ภิกฺขูนํ สมิตึ วนํ. “सातागिरी पर्वतावर राहणारे, विविध रंगांचे, ऋद्धिवान, तेजस्वी, रूपवान आणि यशस्वी असे तीन हजार यक्ष आनंदाने भिक्खूंच्या या महावनातील सभेला पाहण्यासाठी आले आहेत.” ‘‘อิจฺเจเต โสฬสสหสฺสา, ยกฺขา นานตฺตวณฺณิโน; อิทฺธิมนฺโต ชุติมนฺโต, วณฺณวนฺโต ยสสฺสิโน; โมทมานา อภิกฺกามุํ, ภิกฺขูนํ สมิตึ วนํ. “अशा प्रकारे, विविध रंगांचे, ऋद्धिवान, तेजस्वी, रूपवान network आणि यशस्वी असे हे एकूण सोळा हजार यक्ष आनंदाने भिक्खूंच्या या महावनातील सभेला पाहण्यासाठी आले आहेत.” ‘‘เวสฺสามิตฺตา ปญฺจสตา, ยกฺขา นานตฺตวณฺณิโน; อิทฺธิมนฺโต ชุติมนฺโต, วณฺณวนฺโต ยสสฺสิโน; โมทมานา อภิกฺกามุํ, ภิกฺขูนํ สมิตึ วนํ. “वैश्वामित्र पर्वतावर राहणारे, विविध रंगांचे, ऋद्धिवान, तेजस्वी, रूपवान आणि यशस्वी असे पाचशे यक्ष आनंदाने भिक्खूंच्या या महावनातील सभेला पाहण्यासाठी आले आहेत.” ‘‘กุมฺภีโร ราชคหิโก, เวปุลฺลสฺส นิเวสนํ; ภิยฺโย นํ สตสหสฺสํ, ยกฺขานํ ปยิรุปาสติ; กุมฺภีโร ราชคหิโก, โสปาคา สมิตึ วนํ. “राजगृहाचा कुंभीर यक्ष, ज्याचे निवासस्थान वेपुल्ल पर्वतावर आहे, ज्याची एक लाखांहून अधिक यक्ष सेवा करतात; तो राजगृहाचा कुंभीर यक्षसुद्धा भिक्खूंच्या या महावनातील सभेला पाहण्यासाठी आला आहे.” ๓๓๖.‘‘ปุริมญฺจ ทิสํ ราชา, ธตรฏฺโฐ ปสาสติ. ३३६. “पूर्व दिशेचे शासन करणारे राजे धृतराष्ट्र,” คนฺธพฺพานํ อธิปติ, มหาราชา ยสสฺสิโส. “जे गंधर्वांचे अधिपती आहेत, ते यशस्वी महाराज आहेत.” ‘‘ปุตฺตาปิ [Pg.206] ตสฺส พหโว, อินฺทนามา มหพฺพลา; อิทฺธิมนฺโต ชุติมนฺโต, วณฺณวนฺโต ยสสฺสิโน; โมทมานา อภิกฺกามุํ, ภิกฺขูนํ สมิตึ วนํ. “त्यांचे इंद्र नावाचे अनेक महाबलाढ्य पुत्रसुद्धा, जे ऋद्धिवान, तेजस्वी, रूपवान आणि यशस्वी आहेत, ते आनंदाने भिक्खूंच्या या महावनातील सभेला पाहण्यासाठी आले आहेत.” ‘‘ทกฺขิณญฺจ ทิสํ ราชา, วิรูฬฺโห ตํ ปสาสติ ; กุมฺภณฺฑานํ อธิปติ, มหาราชา ยสสฺสิโส. “दक्षिण दिशेचे शासन करणारे राजे विरूढक, जे कुंभांडांचे अधिपती आहेत, ते यशस्वी महाराज आहेत.” ‘‘ปุตฺตาปิ ตสฺส พหโว, อินฺทนามา มหพฺพลา; อิทฺธิมนฺโต ชุติมนฺโต, วณฺณวนฺโต ยสสฺสิโน; โมทมานา อภิกฺกามุํ, ภิกฺขูนํ สมิตึ วนํ. “त्यांचे इंद्र नावाचे अनेक महाबलाढ्य पुत्रसुद्धा, जे ऋद्धिवान, तेजस्वी, रूपवान आणि यशस्वी आहेत, ते आनंदाने भिक्खूंच्या या महावनातील सभेला पाहण्यासाठी आले आहेत.” ‘‘ปจฺฉิมญฺจ ทิสํ ราชา, วิรูปกฺโข ปสาสติ; นาคานญฺจ อธิปติ, มหาราชา ยสสฺสิโส. “पश्चिम दिशेचे शासन करणारे राजे विरूपक्ष, जे नागांचे अधिपती आहेत, ते यशस्वी महाराज आहेत.” ‘‘ปุตฺตาปิ ตสฺส พหโว, อินฺทนามา มหพฺพลา; อิทฺธิมนฺโต ชุติมนฺโต, วณฺณวนฺโต ยสสฺสิโน; โมทมานา อภิกฺกามุํ, ภิกฺขูนํ สมิตึ วนํ. “त्यांचे इंद्र नावाचे अनेक महाबलाढ्य पुत्रसुद्धा, जे ऋद्धिवान, तेजस्वी, रूपवान आणि यशस्वी आहेत, ते आनंदाने भिक्खूंच्या या महावनातील सभेला पाहण्यासाठी आले आहेत.” ‘‘อุตฺตรญฺจ ทิสํ ราชา, กุเวโร ตํ ปสาสติ; ยกฺขานญฺจ อธิปติ, มหาราชา ยสสฺสิโส. “उत्तर दिशेचे शासन करणारे राजे कुवेर, जे यक्षांचे अधिपती आहेत, ते यशस्वी महाराज आहेत.” ‘‘ปุตฺตาปิ ตสฺส พหโว, อินฺทนามา มหพฺพลา; อิทฺธิมนฺโต ชุติมนฺโต, วณฺณวนฺโต ยสสฺสิโน; โมทมานา อภิกฺกามุํ, ภิกฺขูนํ สมิตึ วนํ. “त्यांचे इंद्र नावाचे अनेक महाबलाढ्य पुत्रसुद्धा, जे ऋद्धिवान, तेजस्वी, रूपवान आणि यशस्वी आहेत, ते आनंदाने भिक्खूंच्या या महावनातील सभेला पाहण्यासाठी आले आहेत.” ‘‘ปุริมํ ทิสํ ธตรฏฺโฐ, ทกฺขิเณน วิรูฬฺหโก; ปจฺฉิเมน วิรูปกฺโข, กุเวโร อุตฺตรํ ทิสํ. “पूर्व दिशेला धृतराष्ट्र, दक्षिण दिशेला विरूढक, पश्चिम दिशेला विरूपक्ष आणि उत्तर दिशेला कुवेर;” ‘‘จตฺตาโร เต มหาราชา, สมนฺตา จตุโร ทิสา; ททฺทลฺลมานา อฏฺฐํสุ, วเน กาปิลวตฺถเว. “हे चारही महाराज चारी दिशांना आपापल्या तेजाने तळपत कपिलवस्तूच्या महावनात येऊन उभे राहिले.” ๓๓๗.‘‘เตสํ มายาวิโน ทาสา, อาคุํ วญฺจนิกา สฐา. ३३७. “त्यांचे मायावी, कपटी आणि धूर्त सेवकही आले आहेत:” มายา กุเฏณฺฑุ วิเฏณฺฑุ, วิฏุจฺจ วิฏุโฏ สห. “माया, कुटेंडू, विटेंडू, विटुच्च आणि विटुट यांच्यासह;” ‘‘จนฺทโน กามเสฏฺโฐ จ, กินฺนิฆณฺฑุ นิฆณฺฑุ จ; ปนาโท โอปมญฺโญ จ, เทวสูโต จ มาตลิ. “चंदन, कामसेठ, किंनिघंडू आणि निघंडू; तसेच पनाद, ओपमञ्ञ आणि देवांचा सारथी मातली;” ‘‘จิตฺตเสโน [Pg.207] จ คนฺธพฺโพ, นโฬราชา ชเนสโภ ; อาคา ปญฺจสิโข เจว, ติมฺพรู สูริยวจฺจสา. “गंधर्व चित्तसेन, नळराजा, जनेसभ, पंचशिख आणि तिंबरू व त्याची कन्या सुरियवच्चसा हे सर्व आले आहेत.” ‘‘เอเต จญฺเญ จ ราชาโน, คนฺธพฺพา สห ราชุภิ; โมทมานา อภิกฺกามุํ, ภิกฺขูนํ สมิตึ วนํ. “हे आणि इतर अनेक गंधर्व राजे त्या महाराजांसह आनंदाने भिक्खूंच्या या महावनातील सभेला पाहण्यासाठी आले आहेत.” ๓๓๘.‘‘อถาคุํ นาคสา นาคา, เวสาลา สหตจฺฉกา. ३३८. “त्यानंतर नागास सरोवरातील नाग आणि वैशालीचे नाग आपल्या तच्छक नागपरिवारासह आले आहेत.” กมฺพลสฺสตรา อาคุํ, ปายาคา สห ญาติภิ. “कंबर आणि अस्सतर नाग, तसेच प्रयाग येथील नाग आपल्या नातेवाईकांसह आले आहेत.” ‘‘ยามุนา ธตรฏฺฐา จ, อาคู นาคา ยสสฺสิโน; เอราวโณ มหานาโค, โสปาคา สมิตึ วนํ. “यमुना नदीतील नाग आणि धृतराष्ट्र कुळातील यशस्वी नाग आले आहेत; तसेच ऐरावत नावाचा महान नागराजही या महावनातील सभेला पाहण्यासाठी आला आहे.” ‘‘เย นาคราเช สหสา หรนฺติ, ทิพฺพา ทิชา ปกฺขิ วิสุทฺธจกฺขู; เวหายสา เต วนมชฺฌปตฺตา, จิตฺรา สุปณฺณา อิติ เตส นามํ. “जे नागराजांना बळजबरीने पकडून नेतात, जे दिव्य सामर्थ्य असलेले, द्विज (अंड्यातून व गर्भातून जन्मलेले), पंख असलेले आणि निर्मळ दृष्टी असलेले गरुड आहेत; ते आकाशातून या महावनाच्या मध्यभागी आले आहेत, ज्यांना 'चित्र-सुपर्ण' असे म्हणतात.” ‘‘อภยํ ตทา นาคราชานมาสิ, สุปณฺณโต เขมมกาสิ พุทฺโธ; สณฺหาหิ วาจาหิ อุปวฺหยนฺตา, นาคา สุปณฺณา สรณมกํสุ พุทฺธํ. “त्या वेळी बुद्धांनी गरुडांपासून नागराजांना अभय दिले आणि त्यांचे कल्याण केले. नाग आणि गरुड एकमेकांशी मधुर शब्दांत बोलत बुद्धांना शरण गेले.” ๓๓๙.‘‘ชิตา วชิรหตฺเถน, สมุทฺทํ อสุราสิตา. ३३९. “वज्रधारी इंद्राकडून पराभूत होऊन समुद्राचा आश्रय घेऊन राहणारे असुर,” ภาตโร วาสวสฺเสเต, อิทฺธิมนฺโต ยสสฺสิโน. “जे इंद्राचे (वासवाचे) बंधू आहेत, ते ऋद्धिवान आणि यशस्वी असुरही या महावनात आले आहेत.” ‘‘กาลกญฺจา มหาภิสฺมา, อสุรา ทานเวฆสา; เวปจิตฺติ สุจิตฺติ จ, ปหาราโท นมุจี สห. “भयानक शरीराचे कालकंज असुर, दानवेघस असुर, वेपचित्ती, सुचित्ती, प्रहाद आणि त्यांच्यासोबत नमुची (मार) हे सर्व आले आहेत.” ‘‘สตญฺจ พลิปุตฺตานํ, สพฺเพ เวโรจนามกา; สนฺนยฺหิตฺวา พลิเสนํ, ราหุภทฺทมุปาคมุํ; สมโยทานิ ภทฺทนฺเต, ภิกฺขูนํ สมิตึ วนํ. “बलीचे शंभर पुत्र, जे सर्व वैरोचन नावाचे आहेत, ते आपल्या सैन्यासह सज्ज होऊन राहू भद्राकडे गेले आणि म्हणाले, 'हे भद्र! आता भिक्खूंच्या या महावनातील सभेला जाण्याची वेळ झाली आहे.'” ๓๔๐.‘‘อาโป จ เทวา ปถวี, เตโช วาโย ตทาคมุํ. ३४०. “त्या वेळी जलदेव (आप), पृथ्वीदेव, तेजदेव आणि वायुदेव आले.” วรุณา วารณา เทวา, โสโม จ ยสสา สห. “वरुण देव, वारण देव, सोम देव हे यश (यस) देवांसह आले.” ‘‘เมตฺตา กรุณา กายิกา, อาคุํ เทวา ยสสฺสิโน; ทเสเต ทสธา กายา, สพฺเพ นานตฺตวณฺณิโน. “मैत्री आणि करुणा या भावनांनी युक्त असलेले यशस्वी देव आले. हे दहा प्रकारचे देवसमूह विविध रंगांचे आहेत.” ‘‘อิทฺธิมนฺโต [Pg.208] ชุติมนฺโต, วณฺณวนฺโต ยสสฺสิโน; โมทมานา อภิกฺกามุํ, ภิกฺขูนํ สมิตึ วนํ. “जे ऋद्धिवान, तेजस्वी, रूपवान आणि यशस्वी आहेत, ते आनंदाने भिक्खूंच्या या महावनातील सभेला पाहण्यासाठी आले आहेत.” ‘‘เวณฺฑุเทวา สหลิ จ, อสมา จ ทุเว ยมา; จนฺทสฺสูปนิสา เทวา, จนฺทมาคุํ ปุรกฺขตฺวา. “वेण्हु देव, सहली देव, असम देव आणि दोन यम देव आले. चंद्राचा आश्रय घेणारे देव चंद्रदेवाला पुढे करून आले.” ‘‘สูริยสฺสูปนิสา เทวา, สูริยมาคุํ ปุรกฺขตฺวา; นกฺขตฺตานิ ปุรกฺขตฺวา, อาคุํ มนฺทวลาหกา. “सूर्याचा आश्रय घेणारे देव सूर्यदेवाला पुढे करून आले. नक्षत्रांचा आश्रय घेणारे देव नक्षत्रांना पुढे करून आले आणि मंदवलाहक (मेघ) देवही आले.” ‘‘วสูนํ วาสโว เสฏฺโฐ, สกฺโกปาคา ปุรินฺทโท; ทเสเต ทสธา กายา, สพฺเพ นานตฺตวณฺณิโน. “वसूंचे श्रेष्ठ अधिपती, पूर्वी दान देणारे वासव म्हणजेच शक्र (इंद्र) आले आहेत. हे दहा प्रकारचे देवसमूह विविध रंगांचे आहेत.” ‘‘อิทฺธิมนฺโต ชุติมนฺโต, วณฺณวนฺโต ยสสฺสิโน; โมทมานา อภิกฺกามุํ, ภิกฺขูนํ สมิตึ วนํ. ऋद्धिवंत, तेजस्वी, रूपवान आणि यशस्वी देव आनंदित होऊन भिक्षूंच्या सभेला दर्शनासाठी महावनात आले. ‘‘อถาคุํ สหภู เทวา, ชลมคฺคิสิขาริว; อริฏฺฐกา จ โรชา จ, อุมาปุปฺผนิภาสิโน. त्यानंतर अग्नीच्या ज्वालेप्रमाणे चमकणारे सहभू देव आले. अरिट्ठक, रोज आणि उमापुष्पासारखे (अळशीच्या निळ्या फुलासारखे) तेजस्वी देवही आले. ‘‘วรุณา สหธมฺมา จ, อจฺจุตา จ อเนชกา; สูเลยฺยรุจิรา อาคุํ, อาคุํ วาสวเนสิโน; ทเสเต ทสธา กายา, สพฺเพ นานตฺตวณฺณิโน. वरुण, सहधम्म, अच्चुत, अनेजक, सुलेय्य, रुचिर आणि वासवनेसी देव आले. हे दहा देवसमूह दहा प्रकारे आले असून ते सर्व विविध वर्णांचे (रंगांचे) आहेत. ‘‘อิทฺธิมนฺโต ชุติมนฺโต, วณฺณวนฺโต ยสสฺสิโน; โมทมานา อภิกฺกามุํ, ภิกฺขูนํ สมิตึ วนํ. ऋद्धिवंत, तेजस्वी, रूपवान आणि यशस्वी देव आनंदित होऊन भिक्षूंच्या सभेला दर्शनासाठी महावनात आले. ‘‘สมานา มหาสมนา, มานุสา มานุสุตฺตมา; ขิฑฺฑาปโทสิกา อาคุํ, อาคุํ มโนปโทสิกา. समान, महासमान, मानुष, मानुषुत्तम, खिड्डापदोसिक (क्रीडाप्रदोषिक) आणि मनोपदोसिक (मनःप्रदोषिक) देव आले. ‘‘อถาคุํ หรโย เทวา, เย จ โลหิตวาสิโน; ปารคา มหาปารคา, อาคุํ เทวา ยสสฺสิโน; ทเสเต ทสธา กายา, สพฺเพ นานตฺตวณฺณิโน. त्यानंतर हरि देव आणि लाल वस्त्र परिधान केलेले देव आले. यशस्वी पारग आणि महापारग देवही आले. हे दहा देवसमूह दहा प्रकारे आले असून ते सर्व विविध वर्णांचे आहेत. ‘‘อิทฺธิมนฺโต ชุติมนฺโต, วณฺณวนฺโต ยสสฺสิโน; โมทมานา อภิกฺกามุํ, ภิกฺขูนํ สมิตึ วนํ. ऋद्धिवंत, तेजस्वी, रूपवान आणि यशस्वी देव आनंदित होऊन भिक्षूंच्या सभेला दर्शनासाठी महावनात आले. ‘‘สุกฺกา กรมฺภา อรุณา, อาคุํ เวฆนสา สห; โอทาตคยฺหา ปาโมกฺขา, อาคุํ เทวา วิจกฺขณา. सुक्क, करंभ आणि अरुण देव वेघनस देवांसह आले. ओदातगय्ह नावाचे प्रमुख देव आणि विचक्षण देवही आले. ‘‘สทามตฺตา [Pg.209] หารคชา, มิสฺสกา จ ยสสฺสิโน; ถนยํ อาค ปชฺชุนฺโน, โย ทิสา อภิวสฺสติ. सदामत्त, हारगज, यशस्वी मिस्सक देव आले. तसेच सर्व दिशांना पाऊस पाडणारा पर्जन्य (पज्जुन्न) देव गर्जना करत आला. ‘‘ทเสเต ทสธา กายา, สพฺเพ นานตฺตวณฺณิโน; อิทฺธิมนฺโต ชุติมนฺโต, วณฺณวนฺโต ยสสฺสิโน; โมทมานา อภิกฺกามุํ, ภิกฺขูนํ สมิตึ วนํ. हे दहा देवसमूह दहा प्रकारे आले असून ते सर्व विविध वर्णांचे आहेत. ऋद्धिवंत, तेजस्वी, रूपवान आणि यशस्वी देव आनंदित होऊन भिक्षूंच्या सभेला दर्शनासाठी महावनात आले. ‘‘เขมิยา ตุสิตา ยามา, กฏฺฐกา จ ยสสฺสิโน; ลมฺพีตกา ลามเสฏฺฐา, โชตินามา จ อาสวา; นิมฺมานรติโน อาคุํ, อถาคุํ ปรนิมฺมิตา. खेमिय, तुसित, याम आणि यशस्वी कट्ठक देव आले. लम्बीतक, लामसेट्ठ, जोति आणि आसव देव आले. तसेच निम्मानरति आणि परनिम्मित देवही आले. ‘‘ทเสเต ทสธา กายา, สพฺเพ นานตฺตวณฺณิโน; อิทฺธิมนฺโต ชุติมนฺโต, วณฺณวนฺโต ยสสฺสิโน; โมทมานา อภิกฺกามุํ, ภิกฺขูนํ สมิตึ วนํ. हे दहा देवसमूह दहा प्रकारे आले असून ते सर्व विविध वर्णांचे आहेत. ऋद्धिवंत, तेजस्वी, रूपवान आणि यशस्वी देव आनंदित होऊन भिक्षूंच्या सभेला दर्शनासाठी महावनात आले. ‘‘สฏฺเฐเต เทวนิกายา, สพฺเพ นานตฺตวณฺณิโน; นามนฺวเยน อาคจฺฉุํ, เย จญฺเญ สทิสา สห. हे साठ देवसमूह विविध वर्णांचे असून आपापल्या नावानुसार आले. तसेच त्यांच्यासारखेच इतर देवही त्यांच्यासोबत आले. ‘‘‘ปวุฏฺฐชาติมขิลํ, โอฆติณฺณมนาสวํ; ทกฺเขโมฆตรํ นาคํ, จนฺทํว อสิตาติคํ’. 'ज्यांचा जन्म समाप्त झाला आहे, जे दोषरहित आहेत, ज्यांनी ओघ (संसार-प्रवाह) पार केला आहे, जे अनासव (आसवरहित) आहेत, त्या ओघ पार करणाऱ्या, निष्पाप (नाग) आणि चंद्राप्रमाणे निष्कलंक असलेल्या दशबल बुद्धांचे आपण दर्शन घेऊया' (असा विचार करून ते आले). ๓๔๑.‘‘สุพฺรหฺมา ปรมตฺโต จ, ปุตฺตา อิทฺธิมโต สห. ३४१. Subrahma आणि Paramatta, जे ऋद्धिवंत बुद्धांचे (धम्म)पुत्र आहेत, तेही सोबतच आले. สนงฺกุมาโร ติสฺโส จ, โสปาค สมิตึ วนํ. सनंकुमार आणि तिस्स हे देखील महावनातील भिक्षूंच्या सभेमध्ये आले. ‘‘สหสฺสํ พฺรหฺมโลกานํ, มหาพฺรหฺมาภิติฏฺฐติ; อุปปนฺโน ชุติมนฺโต, ภิสฺมากาโย ยสสฺสิโส. हजार ब्रह्मलोकांचे अधिपती असलेले महाब्रह्मदेव आले. ते तेजस्वी, विशाल शरीराचे आणि कीर्तिमान असून इतर सर्व ब्रह्मदेवांपेक्षा श्रेष्ठ (तेजस्वी) दिसतात. ‘‘ทเสตฺถ อิสฺสรา อาคุํ, ปจฺเจกวสวตฺติโน; เตสญฺจ มชฺฌโต อาค, หาริโต ปริวาริโต. येथे आपापल्या लोकांवर नियंत्रण ठेवणारे दहा महाब्रह्मदेव (अधिपती) आले. त्यांच्या मध्यभागी आपल्या मोठ्या परिवारासह हारित नावाचे महाब्रह्मदेव आले. ๓๔๒.‘‘เต จ สพฺเพ อภิกฺกนฺเต, สอินฺเท เทเว สพฺรหฺมเก. ३४२. इंद्र आणि ब्रह्मदेवांसह ते सर्व देव जेव्हा तेथे आले, มารเสนา อภิกฺกามิ, ปสฺส กณฺหสฺส มนฺทิยํ. तेव्हा मारसेना चालून आली. (भगवान म्हणाले-) 'भिक्षूंनो, त्या कान्हाचा (माराचा) मूर्खपणा पहा!' ‘‘‘เอถ คณฺหถ พนฺธถ, ราเคน พทฺธมตฺถุ โว; สมนฺตา ปริวาเรถ, มา โว มุญฺจิตฺถ โกจิ นํ’. 'या, पकडा, बांधा! यांना रागाने (आसक्तीने) बांधून टाका! चहूबाजूंनी वेढा घाला, तुमच्यापैकी कोणीही कोणाला सोडू नका!' ‘‘อิติ [Pg.210] ตตฺถ มหาเสโน, กณฺโห เสนํ อเปสยิ; ปาณินา ตลมาหจฺจ, สรํ กตฺวาน เภรวํ. अशा प्रकारे, तेथे महासेना असलेल्या कान्हाने (माराने) जमिनीवर हात आपटून आणि भयानक गर्जना करून आपल्या सेनेला पाठवले. ‘‘ยถา ปาวุสฺสโก เมโฆ, ถนยนฺโต สวิชฺชุโก; +ตทา โส ปจฺจุทาวตฺติ, สงฺกุทฺโธ อสยํวเส. जसा विजेसह गर्जना करणारा पावसाळी ढग असतो, तशी गर्जना करत (तो आला). परंतु, कोणालाही आपल्या वशमध्ये करू न शकल्यामुळे तो मार अत्यंत क्रुद्ध होऊन मागे फिरला. ๓๔๓. ตญฺจ สพฺพํ อภิญฺญาย, ววตฺถิตฺวาน จกฺขุมา. ३४३. ते सर्व दिव्य चक्षू असलेल्या बुद्धांनी विशेष ज्ञानाने जाणले आणि निश्चित केले. ตโต อามนฺตยี สตฺถา, สาวเก สาสเน รเต. त्यानंतर शास्त्यांनी (बुद्धांनी) शासनात (धम्मात) रममाण असलेल्या आपल्या श्रावकांना संबोधित केले: ‘‘มารเสนา อภิกฺกนฺตา, เต วิชานาถ ภิกฺขโว; เต จ อาตปฺปมกรุํ, สุตฺวา พุทฺธสฺส สาสนํ; วีตราเคหิ ปกฺกามุํ, เนสํ โลมาปิ อิญฺชยุํ. 'भिक्षूंनो, मारसेना आली आहे, तुम्ही सावध व्हा!' बुद्धांचे हे वचन ऐकून त्या भिक्षूंनी (साधनेचा) दृढ प्रयत्न केला. तेव्हा ती मारसेना वीतरागी (अरहंत) भिक्षूंपासून दूर निघून गेली; ते त्यांचे एक लव (रोम) देखील हलवू शकले नाहीत. ‘‘‘สพฺเพ วิชิตสงฺคามา, ภยาตีตา ยสสฺสิโน; โมทนฺติ สห ภูเตหิ, สาวกา เต ชเนสุตา’’ติ. 'ते सर्व संग्राम जिंकलेले, भयातीत झालेले, यशस्वी आणि लोकांमध्ये प्रसिद्ध असलेले बुद्धांचे श्रावक इतर प्राण्यांसह (आर्यांसह) आनंदित होत आहेत.' มหาสมยสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ สตฺตมํ. सातवे महासमय सुत्त समाप्त झाले. ๘. สกฺกปญฺหสุตฺตํ ८. सक्कपञ्ह सुत्त (शक्रप्रश्न सूत्र) ๓๔๔. เอวํ [Pg.211] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา มคเธสุ วิหรติ, ปาจีนโต ราชคหสฺส อมฺพสณฺฑา นาม พฺราหฺมณคาโม, ตสฺสุตฺตรโต เวทิยเก ปพฺพเต อินฺทสาลคุหายํ. เตน โข ปน สมเยน สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส อุสฺสุกฺกํ อุทปาทิ ภควนฺตํ ทสฺสนาย. อถ โข สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส เอตทโหสิ – ‘‘กหํ นุ โข ภควา เอตรหิ วิหรติ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ’’ติ? อทฺทสา โข สกฺโก เทวานมินฺโท ภควนฺตํ มคเธสุ วิหรนฺตํ ปาจีนโต ราชคหสฺส อมฺพสณฺฑา นาม พฺราหฺมณคาโม, ตสฺสุตฺตรโต เวทิยเก ปพฺพเต อินฺทสาลคุหายํ. ทิสฺวาน เทเว ตาวตึเส อามนฺเตสิ – ‘‘อยํ, มาริสา, ภควา มคเธสุ วิหรติ, ปาจีนโต ราชคหสฺส อมฺพสณฺฑา นาม พฺราหฺมณคาโม, ตสฺสุตฺตรโต เวทิยเก ปพฺพเต อินฺทสาลคุหายํ. ยทิ ปน, มาริสา, มยํ ตํ ภควนฺตํ ทสฺสนาย อุปสงฺกเมยฺยาม อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธ’’นฺติ? ‘‘เอวํ ภทฺทนฺตวา’’ติ โข เทวา ตาวตึสา สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปจฺจสฺโสสุํ. ३४४. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी भगवान बुद्ध मगध देशात, राजगृह नगराच्या पूर्वेला असलेल्या 'अंबसंड' नावाच्या ब्राह्मण गावाच्या उत्तरेकडील वेदियक पर्वतावरील 'इंद्रसाल' गुहेत विहार करत होते. त्या वेळी देवांचा राजा शक्र याला भगवंतांच्या दर्शनाची तीव्र इच्छा निर्माण झाली. तेव्हा शक्राच्या मनात असा विचार आला – 'अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवान सध्या कोठे विहार करत असतील?' शक्राने दिव्य दृष्टीने पाहिले की भगवान मगध देशात, राजगृहाच्या पूर्वेला अंबसंड नावाच्या ब्राह्मण गावाच्या उत्तरेकडील वेदियक पर्वतावरील इंद्रसाल गुहेत विहार करत आहेत. हे पाहून त्याने तावतिंस (त्रायस्त्रिंश) देवांना संबोधित केले – 'हे मित्रांनो! भगवान मगध देशात... इंद्रसाल गुहेत विहार करत आहेत. जर आपण त्या अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवंतांच्या दर्शनासाठी गेलो तर किती बरे होईल!' तावतिंस देवांनी शक्राला उत्तर दिले – 'तसेच असो, महाराज! आपले कल्याण असो.' ๓๔๕. อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท ปญฺจสิขํ คนฺธพฺพเทวปุตฺตํ อามนฺเตสิ – ‘‘อยํ, ตาต ปญฺจสิข, ภควา มคเธสุ วิหรติ ปาจีนโต ราชคหสฺส อมฺพสณฺฑา นาม พฺราหฺมณคาโม, ตสฺสุตฺตรโต เวทิยเก ปพฺพเต อินฺทสาลคุหายํ. ยทิ ปน, ตาต ปญฺจสิข, มยํ ตํ ภควนฺตํ ทสฺสนาย อุปสงฺกเมยฺยาม อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธ’’นฺติ? ‘‘เอวํ ภทฺทนฺตวา’’ติ โข ปญฺจสิโข คนฺธพฺพเทวปุตฺโต สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปฏิสฺสุตฺวา เพลุวปณฺฑุวีณํ อาทาย สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส อนุจริยํ อุปาคมิ. ३४५. त्यानंतर देवांचा राजा शक्र याने पंचशिख नावाच्या गंधर्व देवपुत्राला बोलावले आणि म्हटले – 'प्रिय पंचशिखा! भगवान मगध देशात... इंद्रसाल गुहेत विहार करत आहेत. जर आपण त्या अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवंतांच्या दर्शनासाठी गेलो तर किती बरे होईल!' पंचशिख गंधर्व देवपुत्राने शक्राच्या या वचनाला संमती दिली आणि आपली 'बेलुवपंडु' (पिवळसर बेलाच्या लाकडाची) वीणा घेऊन तो शक्राच्या सोबत जाण्यासाठी निघाला. ๓๔๖. อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท เทเวหิ ตาวตึเสหิ ปริวุโต ปญฺจสิเขน คนฺธพฺพเทวปุตฺเตน ปุรกฺขโต เสยฺยถาปิ นาม พลวา ปุริโส สมิญฺชิตํ วา พาหํ ปสาเรยฺย ปสาริตํ วา พาหํ สมิญฺเชยฺย; เอวเมว เทเวสุ ตาวตึเสสุ อนฺตรหิโต มคเธสุ ปาจีนโต ราชคหสฺส อมฺพสณฺฑา นาม พฺราหฺมณคาโม, ตสฺสุตฺตรโต เวทิยเก ปพฺพเต ปจฺจุฏฺฐาสิ. เตน โข ปน สมเยน เวทิยโก ปพฺพโต [Pg.212] อติริว โอภาสชาโต โหติ อมฺพสณฺฑา จ พฺราหฺมณคาโม ยถา ตํ เทวานํ เทวานุภาเวน. อปิสฺสุทํ ปริโต คาเมสุ มนุสฺสา เอวมาหํสุ – ‘‘อาทิตฺตสฺสุ นามชฺช เวทิยโก ปพฺพโต ฌายติสุ นามชฺช เวทิยโก ปพฺพโต ชลติสุ นามชฺช เวทิยโก ปพฺพโต กึสุ นามชฺช เวทิยโก ปพฺพโต อติริว โอภาสชาโต อมฺพสณฺฑา จ พฺราหฺมณคาโม’’ติ สํวิคฺคา โลมหฏฺฐชาตา อเหสุํ. ३४६. त्यानंतर देवांचा राजा शक्र तावतिंस देवांनी वेढलेला आणि पंचशिख देवपुत्राला पुढे करून, जसा एखादा बलवान मनुष्य आपले दुमडलेले हात पसरतो किंवा पसरलेले हात दुमडतो, अगदी त्याचप्रमाणे तावतिंस देवलोकातून अंतर्धान पावून मगध देशातील राजगृहाच्या पूर्वेला असलेल्या अंबसंड ब्राह्मण गावाच्या उत्तरेकडील वेदियक पर्वतावर प्रकट झाला. त्या वेळी देवांच्या दिव्य प्रभावामुळे वेदियक पर्वत आणि अंबसंड ब्राह्मण गाव अत्यंत प्रकाशमान झाले. आजूबाजूच्या गावांतील लोक आश्चर्यचकित होऊन म्हणू लागले – 'आज वेदियक पर्वताला आग लागली आहे की काय? आज वेदियक पर्वत जळत आहे की काय? आज वेदियक पर्वतातून ज्वाला निघत आहेत की काय? आज वेदियक पर्वत आणि अंबसंड गाव एवढे प्रकाशमान का झाले आहे?' ते सर्व भयभीत झाले आणि त्यांच्या अंगावर रोमांच उभे राहिले. ๓๔๗. อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท ปญฺจสิขํ คนฺธพฺพเทวปุตฺตํ อามนฺเตสิ – ‘‘ทุรุปสงฺกมา โข, ตาต ปญฺจสิข, ตถาคตา มาทิเสน, ฌายี ฌานรตา, ตทนฺตรํ ปฏิสลฺลีนา. ยทิ ปน ตฺวํ, ตาต ปญฺจสิข, ภควนฺตํ ปฐมํ ปสาเทยฺยาสิ, ตยา, ตาต, ปฐมํ ปสาทิตํ ปจฺฉา มยํ ตํ ภควนฺตํ ทสฺสนาย อุปสงฺกเมยฺยาม อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธ’’นฺติ. ‘‘เอวํ ภทฺทนฺตวา’’ติ โข ปญฺจสิโข คนฺธพฺพเทวปุตฺโต สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปฏิสฺสุตฺวา เพลุวปณฺฑุวีณํ อาทาย เยน อินฺทสาลคุหา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ‘‘เอตฺตาวตา เม ภควา เนว อติทูเร ภวิสฺสติ นาจฺจาสนฺเน, สทฺทญฺจ เม โสสฺสตี’’ติ เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. ३४७. तेव्हा देवांचा राजा शक्र पंचशिख गंधर्वदेवपुत्राला म्हणाला – "प्रिय पंचशिख, माझ्यासारख्या व्यक्तीला तथागतांच्या जवळ जाणे कठीण आहे, कारण ते ध्यानात मग्न असतात, ध्यानरत असतात आणि एकांतात ध्यानस्थ असतात. प्रिय पंचशिख, जर तू आधी भगवंतांना प्रसन्न करून घेशील, तर तुझ्याद्वारे आधी भगवंतांना प्रसन्न केल्यावर, नंतर आम्ही त्या अर्हत, सम्यक संबुद्ध भगवंतांच्या दर्शनासाठी त्यांच्याजवळ जाऊ शकू." "तसेच असो, पूजनीय!" असे म्हणून पंचशिख गंधर्वदेवपुत्राने देवांचा राजा शक्राचे म्हणणे मान्य केले आणि आपली बेलुवपंडु (पिवळसर रंगाची बेल-काष्ठाची) वीणा घेऊन जेथे इंद्रसाल गुहा होती, तेथे तो गेला. तेथे पोहोचल्यावर, "इथून भगवंत माझ्यापासून फार दूरही नसतील आणि फार जवळही नसतील, आणि ते माझा आवाज ऐकू शकतील," असा विचार करून तो एका बाजूला उभा राहिला. ปญฺจสิขคีตคาถา पंचशिखाची गीतगाथा ๓๔๘. เอกมนฺตํ ฐิโต โข ปญฺจสิโข คนฺธพฺพเทวปุตฺโต เพลุวปณฺฑุวีณํ อสฺสาเวสิ, อิมา จ คาถา อภาสิ พุทฺธูปสญฺหิตา ธมฺมูปสญฺหิตา สงฺฆูปสญฺหิตา อรหนฺตูปสญฺหิตา กามูปสญฺหิตา – ३४८. एका बाजूला उभे राहून पंचशिख गंधर्वदेवपुत्राने आपली बेलुवपंडु वीणा वाजवली आणि बुद्ध, धम्म, संघ, अर्हत आणि काम (प्रेम) यांच्याशी संबंधित या गाथा गायिल्या – ‘‘วนฺเท เต ปิตรํ ภทฺเท, ติมฺพรุํ สูริยวจฺฉเส; เยน ชาตาสิ กลฺยาณี, อานนฺทชนนี มม. "हे कल्याणी! हे सूर्यवच्चसे (सूर्यासारख्या तेजस्वी)! मी तुझ्या पिता तिम्बरू यांना वंदन करतो, ज्यांच्यामुळे तू जन्माला आलीस आणि माझ्या आनंदाचे कारण बनली आहेस. ‘‘วาโตว เสทตํ กนฺโต, ปานียํว ปิปาสโต; องฺคีรสิ ปิยาเมสิ, ธมฺโม อรหตามิว. "घामाने डबडबलेल्या माणसाला जसा थंड वारा प्रिय वाटतो, तहानलेल्याला जसे पाणी प्रिय वाटते, अर्हतांना जसा धम्म प्रिय वाटतो, तशीच हे अंगीरसी (तेजस्वी), तू मला अत्यंत प्रिय आहेस. ‘‘อาตุรสฺเสว เภสชฺชํ, โภชนํว ชิฆจฺฉโต; ปรินิพฺพาปย มํ ภทฺเท, ชลนฺตมิว วารินา. "आजारी माणसाला जसे औषध प्रिय असते, भुकेलेल्याला जसे अन्न प्रिय असते, तसेच हे कल्याणी, पाण्याने पेटलेला अग्नी शांत करावा, तशी माझी कामवासनेची आग तू शांत कर. ‘‘สีโตทกํ [Pg.213] โปกฺขรณึ, ยุตฺตํ กิญฺชกฺขเรณุนา; นาโค ฆมฺมาภิตตฺโตว, โอคาเห เต ถนูทรํ. "उन्हाने व्याकुळ झालेला हत्ती जसा कमळाच्या परागकणांनी युक्त अशा थंड पाण्याच्या तलावात उतरतो, तसाच मी तुझ्या वक्षस्थळावर आणि उदरावर विसावू इच्छितो. ‘‘อจฺจงฺกุโสว นาโคว, ชิตํ เม ตุตฺตโตมรํ; การณํ นปฺปชานามิ, สมฺมตฺโต ลกฺขณูรุยา. "अंकुश न मानणारा हत्ती जसा 'मी भाला आणि तोमर जिंकले आहेत' अशा मदाने धुंद होऊन काहीच समजत नाही, तसाच मी तुझ्या सुंदर मांड्यांच्या सौंदर्याने मोहित होऊन वेडा झालो आहे आणि मला कशाचेही भान राहिलेले नाही. ‘‘ตยิ เคธิตจิตฺโตสฺมิ, จิตฺตํ วิปริณามิตํ; ปฏิคนฺตุํ น สกฺโกมิ, วงฺกฆสฺโตว อมฺพุโช. "माझे चित्त तुझ्यावर आसक्त झाले आहे, माझे मन पूर्णपणे बदलून गेले आहे. गळाला लागलेल्या माशासारखा मी आता मागे फिरू शकत नाही. ‘‘วามูรุ สช มํ ภทฺเท, สช มํ มนฺทโลจเน; ปลิสฺสช มํ กลฺยาณิ, เอตํ เม อภิปตฺถิตํ. "हे सुंदर मांड्या असलेल्या कल्याणी, मला आलिंगन दे! हे मंदलोचने (सुंदर डोळ्यांच्या), मला आलिंगन दे! हे कल्याणी, मला घट्ट मिठी मार, हीच माझी तीव्र इच्छा आहे. ‘‘อปฺปโก วต เม สนฺโต, กาโม เวลฺลิตเกสิยา; อเนกภาโว สมุปฺปาทิ, อรหนฺเตว ทกฺขิณา. "हे कुरळ्या केसांच्या सुंदरी, तुझ्याबद्दलचे माझे प्रेम सुरुवातीला थोडेच होते, पण आता ते अनेक पटींनी वाढले आहे, जसे अर्हतांना दिलेले दान अनेक पटींनी वाढते. ‘‘ยํ เม อตฺถิ กตํ ปุญฺญํ, อรหนฺเตสุ ตาทิสุ; ตํ เม สพฺพงฺคกลฺยาณิ, ตยา สทฺธึ วิปจฺจตํ. "अशा अर्हतांच्या ठायी मी जे काही पुण्यकर्म केले असेल, हे सर्वांगसुंदरी, त्याचे फळ मला तुझ्यासोबत मिळो. ‘‘ยํ เม อตฺถิ กตํ ปุญฺญํ, อสฺมึ ปถวิมณฺฑเล; ตํ เม สพฺพงฺคกลฺยาณิ, ตยา สทฺธึ วิปจฺจตํ. "या पृथ्वीतलावर मी जे काही पुण्यकर्म केले असेल, हे सर्वांगसुंदरी, त्याचे फळ मला तुझ्यासोबत मिळो. ‘‘สกฺยปุตฺโตว ฌาเนน, เอโกทิ นิปโก สโต; อมตํ มุนิ ชิคีสาโน, ตมหํ สูริยวจฺฉเส. "ज्याप्रमाणे शाक्यपुत्र (बुद्ध) ध्यानात मग्न, एकाग्र, प्रज्ञावान आणि स्मृतिमान होऊन अमृत (निर्वाण) शोधतात, त्याचप्रमाणे हे सूर्यवच्चसे, मी तुला शोधत आहे. ‘‘ยถาปิ มุนิ นนฺเทยฺย, ปตฺวา สมฺโพธิมุตฺตมํ; เอวํ นนฺเทยฺยํ กลฺยาณิ, มิสฺสีภาวํ คโต ตยา. "ज्याप्रमाणे मुनी (बुद्ध) उत्तम संबोधी प्राप्त करून आनंदित होतात, त्याचप्रमाणे हे कल्याणी, तुझ्याशी एकरूप होऊन मला आनंद मिळो. ‘‘สกฺโก เจ เม วรํ ทชฺชา, ตาวตึสานมิสฺสโร; ตาหํ ภทฺเท วเรยฺยาเห, เอวํ กาโม ทฬฺโห มม. "जर तावतिंस देवांचा राजा शक्र मला वर देईल, तर हे कल्याणी, मी तुलाच मागून घेईन, एवढे माझे तुझ्यावर दृढ प्रेम आहे. ‘‘สาลํว น จิรํ ผุลฺลํ, ปิตรํ เต สุเมธเส; วนฺทมาโน นมสฺสามิ, ยสฺสา เสตาทิสี ปชา’’ติ. "नुकत्याच बहरलेल्या साल वृक्षासारख्या शोभणाऱ्या तुझ्या सुजाण पित्याला मी वंदन करतो, ज्यांची तुझ्यासारखी सुंदर कन्या आहे." ๓๔๙. เอวํ วุตฺเต ภควา ปญฺจสิขํ คนฺธพฺพเทวปุตฺตํ เอตทโวจ – ‘‘สํสนฺทติ โข เต, ปญฺจสิข, ตนฺติสฺสโร คีตสฺสเรน, คีตสฺสโร จ ตนฺติสฺสเรน; น จ ปน เต ปญฺจสิข, ตนฺติสฺสโร คีตสฺสรํ อติวตฺตติ, คีตสฺสโร จ ตนฺติสฺสรํ. กทา สํยูฬฺหา ปน เต, ปญฺจสิข, อิมา คาถา พุทฺธูปสญฺหิตา ธมฺมูปสญฺหิตา [Pg.214] สงฺฆูปสญฺหิตา อรหนฺตูปสญฺหิตา กามูปสญฺหิตา’’ติ? ‘‘เอกมิทํ, ภนฺเต, สมยํ ภควา อุรุเวลายํ วิหรติ นชฺชา เนรญฺชราย ตีเร อชปาลนิคฺโรเธ ปฐมาภิสมฺพุทฺโธ. เตน โข ปนาหํ, ภนฺเต, สมเยน ภทฺทา นาม สูริยวจฺฉสา ติมฺพรุโน คนฺธพฺพรญฺโญ ธีตา, ตมภิกงฺขามิ. สา โข ปน, ภนฺเต, ภคินี ปรกามินี โหติ; สิขณฺฑี นาม มาตลิสฺส สงฺคาหกสฺส ปุตฺโต, ตมภิกงฺขติ. ยโต โข อหํ, ภนฺเต, ตํ ภคินึ นาลตฺถํ เกนจิ ปริยาเยน. อถาหํ เพลุวปณฺฑุวีณํ อาทาย เยน ติมฺพรุโน คนฺธพฺพรญฺโญ นิเวสนํ เตนุปสงฺกมึ; อุปสงฺกมิตฺวา เพลุวปณฺฑุวีณํ อสฺสาเวสึ, อิมา จ คาถา อภาสึ พุทฺธูปสญฺหิตา ธมฺมูปสญฺหิตา สงฺฆูปสญฺหิตา อรหนฺตูปสญฺหิตา กามูปสญฺหิตา – ३४९. असे म्हटल्यावर भगवंत पंचशिख गंधर्वदेवपुत्राला म्हणाले – "पंचशिख, तुझ्या वीणेचा सूर तुझ्या गाण्याच्या सुराशी जुळतो आणि गाण्याचा सूर वीणेच्या सुराशी जुळतो. पंचशिख, तुझ्या वीणेचा सूर गाण्याच्या सुराला मागे टाकत नाही आणि गाण्याचा सूर वीणेच्या सुराला मागे टाकत नाही. पण पंचशिख, तू बुद्ध, धम्म, संघ, अर्हत आणि काम यांच्याशी संबंधित या गाथा कधी रचल्यास?" "भन्ते, एके काळी भगवंत नुकतेच संबोधी प्राप्त करून उरुवेला येथील निरंजरा नदीच्या काठावर अजपाल वटवृक्षाखाली विहार करत होते. भन्ते, त्या वेळी मी गंधर्वराज तिम्बरू यांची कन्या भद्रा सूर्यवच्चसा हिच्यावर प्रेम करत होतो. परंतु भन्ते, ती तरुणी दुसऱ्यावर प्रेम करत होती; सारथी मातलीचा मुलगा शिखंडी याच्यावर ती प्रेम करत होती. भन्ते, जेव्हा मला ती तरुणी कोणत्याही उपायाने मिळाली नाही, तेव्हा मी माझी बेलुवपंडु वीणा घेतली आणि गंधर्वराज तिम्बरू यांच्या महालात गेलो. तेथे जाऊन मी बेलुवपंडु वीणा वाजवली आणि बुद्ध, धम्म, संघ, अर्हत आणि काम यांच्याशी संबंधित या गाथा गायिल्या – ‘‘วนฺเท เต ปิตรํ ภทฺเท, ติมฺพรุํ สูริยวจฺฉเส; เยน ชาตาสิ กลฺยาณี, อานนฺทชนนี มม. …เป… "हे कल्याणी! हे सूर्यवच्चसे! मी तुझ्या पिता तिम्बरू यांना वंदन करतो, ज्यांच्यामुळे तू जन्माला आलीस आणि माझ्या आनंदाचे कारण बनली आहेस... इत्यादी... สาลํว น จิรํ ผุลฺลํ, ปิตรํ เต สุเมธเส; วนฺทมาโน นมสฺสามิ, ยสฺสา เสตาทิสี ปชา’’ติ. "नुकत्याच बहरलेल्या साल वृक्षासारख्या शोभणाऱ्या तुझ्या सुजाण पित्याला मी वंदन करतो, ज्यांची तुझ्यासारखी सुंदर कन्या आहे." ‘‘เอวํ วุตฺเต, ภนฺเต, ภทฺทา สูริยวจฺฉสา มํ เอตทโวจ – ‘น โข เม, มาริส, โส ภควา สมฺมุขา ทิฏฺโฐ อปิ จ สุโตเยว เม โส ภควา เทวานํ ตาวตึสานํ สุธมฺมายํ สภายํ อุปนจฺจนฺติยา. ยโต โข ตฺวํ, มาริส, ตํ ภควนฺตํ กิตฺเตสิ, โหตุ โน อชฺช สมาคโม’ติ. โสเยว โน, ภนฺเต, ตสฺสา ภคินิยา สทฺธึ สมาคโม อโหสิ. น จ ทานิ ตโต ปจฺฉา’’ติ. "भन्ते, मी असे गायिल्यावर भद्रा सूर्यवच्चसा मला म्हणाली – 'हे महाशय, मी त्या भगवंतांना प्रत्यक्ष पाहिलेले नाही, परंतु तावतिंस देवांच्या सुधम्मा सभेत नृत्य करत असताना मी त्यांच्याबद्दल ऐकले आहे. हे महाशय, तू त्या भगवंतांचे इतके गुणगान करत आहेस, तर आज आपले मिलन होऊ दे.' भन्ते, त्या तरुणीसोबत माझे तेवढेच मिलन झाले. त्यानंतर आजतागायत आमचे मिलन झालेले नाही." สกฺกูปสงฺกม शक्राचे आगमन ๓๕๐. อถ โข สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส เอตทโหสิ – ‘‘ปฏิสมฺโมทติ ปญฺจสิโข คนฺธพฺพเทวปุตฺโต ภควตา, ภควา จ ปญฺจสิเขนา’’ติ. อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท ปญฺจสิขํ คนฺธพฺพเทวปุตฺตํ อามนฺเตสิ – ‘‘อภิวาเทหิ เม ตฺวํ, ตาต ปญฺจสิข, ภควนฺตํ – ‘สกฺโก, ภนฺเต, เทวานมินฺโท สามจฺโจ สปริชโน ภควโต ปาเท สิรสา วนฺทตี’ติ’’. ‘‘เอวํ ภทฺทนฺตวา’’ติ โข ปญฺจสิโข คนฺธพฺพเทวปุตฺโต สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทติ – ‘‘สกฺโก, ภนฺเต, เทวานมินฺโท สามจฺโจ สปริชโน ภควโต [Pg.215] ปาเท สิรสา วนฺทตี’’ติ. ‘‘เอวํ สุขี โหตุ, ปญฺจสิข, สกฺโก เทวานมินฺโท สามจฺโจ สปริชโน; สุขกามา หิ เทวา มนุสฺสา อสุรา นาคา คนฺธพฺพา เย จญฺเญ สนฺติ ปุถุกายา’’ติ. ३५०. तेव्हा देवांचा राजा शक्र याच्या मनात विचार आला – "पंचशिख गंधर्वदेवपुत्र भगवंतांशी आनंदाने संभाषण करत आहे आणि भगवंतही पंचशिखाशी आनंदाने संभाषण करत आहेत." मग देवांचा राजा शक्र पंचशिख गंधर्वदेवपुत्राला म्हणाला – "प्रिय पंचशिख, माझ्या वतीने भगवंतांना वंदन कर आणि सांग – 'भन्ते, देवांचा राजा शक्र आपल्या अमात्य आणि परिवारासह भगवंतांच्या चरणी डोके ठेवून वंदन करत आहे.'" "तसेच असो, पूजनीय!" असे म्हणून पंचशिख गंधर्वदेवपुत्राने देवांचा राजा शक्राचे म्हणणे मान्य केले आणि भगवंतांना वंदन करून सांगितले – "भन्ते, देवांचा राजा शक्र आपल्या अमात्य आणि परिवारासह भगवंतांच्या चरणी डोके ठेवून वंदन करत आहे." "पंचशिख, देवांचा राजा शक्र आपल्या अमात्य आणि परिवारासह सुखी होवो; कारण देव, मनुष्य, असुर, नाग, गंधर्व आणि इतर सर्व प्राणी सुखाचीच इच्छा करणारे आहेत." ๓๕๑. เอวญฺจ ปน ตถาคตา เอวรูเป มเหสกฺเข ยกฺเข อภิวทนฺติ. อภิวทิโต สกฺโก เทวานมินฺโท ภควโต อินฺทสาลคุหํ ปวิสิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เทวาปิ ตาวตึสา อินฺทสาลคุหํ ปวิสิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐํสุ. ปญฺจสิโขปิ คนฺธพฺพเทวปุตฺโต อินฺทสาลคุหํ ปวิสิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. ३५१. आणि तथागत अशा प्रकारच्या महान प्रभावशाली यक्षांचे अशाच प्रकारे स्वागत करतात. अशा प्रकारे स्वागत केल्यावर, देवांचा राजा शक्र भगवंतांच्या इंद्रसाल गुहेत प्रवेश करून, भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला उभा राहिला. तावतिंस स्वर्गातील देवही इंद्रसाल गुहेत प्रवेश करून, भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला उभे राहिले. पंचशिख गंधर्वदेवपुत्रसुद्धा इंद्रसाल गुहेत प्रवेश करून, भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला उभा राहिला. เตน โข ปน สมเยน อินฺทสาลคุหา วิสมา สนฺตี สมา สมปาทิ, สมฺพาธา สนฺตี อุรุนฺทา สมปาทิ, อนฺธกาโร คุหายํ อนฺตรธายิ, อาโลโก อุทปาทิ ยถา ตํ เทวานํ เทวานุภาเวน. त्या वेळी ती इंद्रसाल गुहा जी खडबडीत होती ती सपाट झाली, जी अरुंद होती ती विस्तीर्ण झाली, गुहेतील अंधार नाहीसा झाला आणि देवांच्या दैवी प्रभावामुळे तिथे प्रकाश निर्माण झाला. ๓๕๒. อถ โข ภควา สกฺกํ เทวานมินฺทํ เอตทโวจ – ‘‘อจฺฉริยมิทํ อายสฺมโต โกสิยสฺส, อพฺภุตมิทํ อายสฺมโต โกสิยสฺส ตาว พหุกิจฺจสฺส พหุกรณียสฺส ยทิทํ อิธาคมน’’นฺติ. ‘‘จิรปฏิกาหํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ ทสฺสนาย อุปสงฺกมิตุกาโม; อปิ จ เทวานํ ตาวตึสานํ เกหิจิ เกหิจิ กิจฺจกรณีเยหิ พฺยาวโฏ; เอวาหํ นาสกฺขึ ภควนฺตํ ทสฺสนาย อุปสงฺกมิตุํ. เอกมิทํ, ภนฺเต, สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ สลฬาคารเก. อถ ขฺวาหํ, ภนฺเต, สาวตฺถึ อคมาสึ ภควนฺตํ ทสฺสนาย. เตน โข ปน, ภนฺเต, สมเยน ภควา อญฺญตเรน สมาธินา นิสินฺโน โหติ, ภูชติ จ นาม เวสฺสวณสฺส มหาราชสฺส ปริจาริกา ภควนฺตํ ปจฺจุปฏฺฐิตา โหติ, ปญฺชลิกา นมสฺสมานา ติฏฺฐติ. อถ ขฺวาหํ, ภนฺเต, ภูชตึ เอตทโวจํ – ‘อภิวาเทหิ เม ตฺวํ, ภคินิ, ภควนฺตํ – ‘‘สกฺโก, ภนฺเต, เทวานมินฺโท สามจฺโจ สปริชโน ภควโต ปาเท สิรสา วนฺทตี’’ติ. เอวํ วุตฺเต, ภนฺเต, สา ภูชติ มํ เอตทโวจ – ‘อกาโล โข, มาริส, ภควนฺตํ ทสฺสนาย; ปฏิสลฺลีโน ภควา’ติ. ‘เตน หี, ภคินิ, ยทา ภควา ตมฺหา สมาธิมฺหา วุฏฺฐิโต โหติ, อถ มม วจเนน ภควนฺตํ อภิวาเทหิ – ‘‘สกฺโก, ภนฺเต, เทวานมินฺโท [Pg.216] สามจฺโจ สปริชโน ภควโต ปาเท สิรสา วนฺทตี’’ติ. กจฺจิ เม สา, ภนฺเต, ภคินี ภควนฺตํ อภิวาเทสิ? สรติ ภควา ตสฺสา ภคินิยา วจน’’นฺติ? ‘‘อภิวาเทสิ มํ สา, เทวานมินฺท, ภคินี, สรามหํ ตสฺสา ภคินิยา วจนํ. อปิ จาหํ อายสฺมโต เนมิสทฺเทน ตมฺหา สมาธิมฺหา วุฏฺฐิโต’’ติ. ‘‘เย เต, ภนฺเต, เทวา อมฺเหหิ ปฐมตรํ ตาวตึสกายํ อุปปนฺนา, เตสํ เม สมฺมุขา สุตํ สมฺมุขา ปฏิคฺคหิตํ – ‘ยทา ตถาคตา โลเก อุปฺปชฺชนฺติ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา, ทิพฺพา กายา ปริปูเรนฺติ, หายนฺติ อสุรกายา’ติ. ตํ เม อิทํ, ภนฺเต, สกฺขิทิฏฺฐํ ยโต ตถาคโต โลเก อุปฺปนฺโน อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ, ทิพฺพา กายา ปริปูเรนฺติ, หายนฺติ อสุรกายาติ. ३५२. तेव्हा भगवान देवांचा राजा शक्र याला म्हणाले – 'हे कोसीय! अत्यंत व्यस्त आणि अनेक कर्तव्ये असणाऱ्या आपल्यासारख्या आदरणीयांचे येथे येणे खरोखरच आश्चर्यकारक आहे, हे खरोखरच अद्भुत आहे!' 'भंते, मी बऱ्याच काळापासून भगवंतांच्या दर्शनासाठी येण्याची इच्छा बाळगून होतो; परंतु तावतिंस स्वर्गातील देवांच्या काही ना काही कामांमध्ये व्यस्त असल्यामुळे मी भगवंतांच्या दर्शनासाठी येऊ शकलो नाही. भंते, एके काळी भगवान श्रावस्ती येथील सलळागारकात विहार करत होते. तेव्हा भंते, मी भगवंतांच्या दर्शनासाठी श्रावस्तीला गेलो होतो. भंते, त्या वेळी भगवान एका विशिष्ट समाधीमध्ये लीन होऊन बसले होते, आणि वैश्रवण महाराजांची दासी असणारी भुजती नावाची देवकन्या भगवंतांच्या समोर हात जोडून नमस्कार करत उभी होती. तेव्हा भंते, मी भुजतीला म्हणालो – भगिनी, तू माझ्या वतीने भगवंतांना वंदन कर आणि सांग की – भंते, देवांचा राजा शक्र आपल्या मंत्र्यांसह आणि परिवारासह भगवंतांच्या चरणी डोके ठेवून वंदन करत आहे. भंते, असे म्हटल्यावर ती भुजती मला म्हणाली – हे महाशय, ही भगवंतांच्या दर्शनाची वेळ नाही; भगवान एकांतात ध्यानस्थ आहेत. तर मग भगिनी, जेव्हा भगवान त्या समाधीतून उठतील, तेव्हा माझ्या शब्दांत भगवंतांना वंदन कर की – भंते, देवांचा राजा शक्र आपल्या मंत्र्यांसह आणि परिवारासह भगवंतांच्या चरणी डोके ठेवून वंदन करत आहे. भंते, त्या भगिनीने माझ्या वतीने भगवंतांना वंदन केले का? भगवंतांना त्या भगिनीचे शब्द आठवतात का?' 'देवांच्या राजा शक्रा, त्या भगिनीने मला वंदन केले होते, मला त्या भगिनीचे शब्द आठवतात. परंतु, मी तुझ्या रथाच्या चाकांच्या आवाजाने त्या समाधीतून उठलो.' 'भंते, जे देव आमच्या आधी तावतिंस स्वर्गात उत्पन्न झाले आहेत, त्यांच्याकडून मी प्रत्यक्ष ऐकले व ग्रहण केले आहे की – जेव्हा जगात अर्हत, सम्यक्संबुद्ध तथागत उत्पन्न होतात, तेव्हा देवलोक भरून जातात आणि असुर योनी क्षीण होते. भंते, हे मी स्वतः प्रत्यक्ष पाहिले आहे की जेव्हापासून जगात अर्हत, सम्यक्संबुद्ध तथागत उत्पन्न झाले आहेत, तेव्हापासून देवलोक भरून जात आहेत आणि असुर योनी क्षीण होत आहे.' โคปกวตฺถุ गोपक कथा ๓๕๓. ‘‘อิเธว, ภนฺเต, กปิลวตฺถุสฺมึ โคปิกา นาม สกฺยธีตา อโหสิ พุทฺเธ ปสนฺนา ธมฺเม ปสนฺนา สงฺเฆ ปสนฺนา สีเลสุ ปริปูรการินี. สา อิตฺถิตฺตํ วิราเชตฺวา ปุริสตฺตํ ภาเวตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปนฺนา. เทวานํ ตาวตึสานํ สหพฺยตํ อมฺหากํ ปุตฺตตฺตํ อชฺฌุปคตา. ตตฺรปิ นํ เอวํ ชานนฺติ – ‘โคปโก เทวปุตฺโต, โคปโก เทวปุตฺโต’ติ. อญฺเญปิ, ภนฺเต, ตโย ภิกฺขู ภควติ พฺรหฺมจริยํ จริตฺวา หีนํ คนฺธพฺพกายํ อุปปนฺนา. เต ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิตา สมงฺคีภูตา ปริจารยมานา อมฺหากํ อุปฏฺฐานํ อาคจฺฉนฺติ อมฺหากํ ปาริจริยํ. เต อมฺหากํ อุปฏฺฐานํ อาคเต อมฺหากํ ปาริจริยํ โคปโก เทวปุตฺโต ปฏิโจเทสิ – ‘กุโตมุขา นาม ตุมฺเห, มาริสา, ตสฺส ภควโต ธมฺมํ อสฺสุตฺถ – อหญฺหิ นาม อิตฺถิกา สมานา พุทฺเธ ปสนฺนา ธมฺเม ปสนฺนา สงฺเฆ ปสนฺนา สีเลสุ ปริปูรการินี อิตฺถิตฺตํ วิราเชตฺวา ปุริสตฺตํ ภาเวตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปนฺนา, เทวานํ ตาวตึสานํ สหพฺยตํ สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปุตฺตตฺตํ อชฺฌุปคตา. อิธาปิ มํ เอวํ ชานนฺติ ‘‘โคปโก เทวปุตฺโต โคปโก เทวปุตฺโต’ติ. ตุมฺเห ปน, มาริสา, ภควติ พฺรหฺมจริยํ จริตฺวา หีนํ คนฺธพฺพกายํ อุปปนฺนา. ทุทฺทิฏฺฐรูปํ วต, โภ, อทฺทสาม, เย มยํ อทฺทสาม [Pg.217] สหธมฺมิเก หีนํ คนฺธพฺพกายํ อุปปนฺเน’ติ. เตสํ, ภนฺเต, โคปเกน เทวปุตฺเตน ปฏิโจทิตานํ ทฺเว เทวา ทิฏฺเฐว ธมฺเม สตึ ปฏิลภึสุ กายํ พฺรหฺมปุโรหิตํ, เอโก ปน เทโว กาเม อชฺฌาวสิ. ३५३. भंते, याच कपिलवस्तूमध्ये गोपिका नावाची एक शाक्यकन्या होती, जी बुद्ध, धम्म आणि संघावर श्रद्धा ठेवणारी आणि शीलांचे परिपूर्ण पालन करणारी होती. तिने स्त्रीभावाचा त्याग करून पुरुषभाव विकसित केला आणि देहपातानंतर, मृत्यूनंतर ती सुगती स्वर्गलोकात उत्पन्न झाली. ती तावतिंस स्वर्गातील देवांमध्ये आमचा पुत्र म्हणून जन्माला आली. तिथेही तिला सर्वजण 'गोपक देवपुत्र, गोपक देवपुत्र' म्हणून ओळखतात. भंते, इतर तीन भिक्खूही होते, ज्यांनी भगवंतांच्या शासनात ब्रह्मचर्य आचरले होते, परंतु ते कनिष्ठ अशा गंधर्व योनीत उत्पन्न झाले. ते पाच कामगुणांनी युक्त होऊन, विलासात मग्न राहून आमच्या सेवेसाठी आणि मनोरंजनासाठी येतात. आमच्या सेवेसाठी आलेल्या त्यांना पाहून गोपक देवपुत्राने त्यांना टोकले – 'हे महाशयांनो! तुम्ही कुठे लक्ष देऊन त्या भगवंतांच्या धम्माचे श्रवण केले होते? मी एक स्त्री असूनही बुद्ध, धम्म आणि संघावर श्रद्धा ठेवणारी, शीलांचे परिपूर्ण पालन करणारी होती. मी स्त्रीभावाचा त्याग करून पुरुषभाव विकसित केला आणि देहपातानंतर, मृत्यूनंतर सुगती स्वर्गलोकात उत्पन्न झाले, तावतिंस देवांमध्ये देवांचा राजा शक्र याचा पुत्र झाले. येथेही मला सर्वजण 'गोपक देवपुत्र, गोपक देवपुत्र' म्हणून ओळखतात. परंतु तुम्ही मात्र भगवंतांच्या शासनात ब्रह्मचर्य पाळूनही कनिष्ठ अशा गंधर्व योनीत उत्पन्न झालात! हे मित्रांनो, आम्ही अत्यंत न पाहण्यासारखे दृश्य पाहिले आहे, की आम्ही आमच्या धम्मबंधूंना कनिष्ठ अशा गंधर्व योनीत उत्पन्न झालेले पाहत आहोत!' भंते, गोपक देवपुत्राने असे टोकल्यावर, त्या तीन देवांपैकी दोघांनी याच जन्मात स्मृती प्राप्त केली आणि ते ब्रह्मपुरोहित देवलोकात उत्पन्न झाले, तर एक देव मात्र कामभोगांमध्येच रमून राहिला. ๓๕๔.‘‘‘อุปาสิกา จกฺขุมโต อโหสึ, ३५४. मी त्या दिव्यचक्षू असणाऱ्या भगवंतांची उपासिका होते, นามมฺปิ มยฺหํ อหุ ‘โคปิกา’ติ; พุทฺเธ จ ธมฺเม จ อภิปฺปสนฺนา,สงฺฆญฺจุปฏฺฐาสึ ปสนฺนจิตฺตา. माझे नाव 'गोपिका' असे होते; बुद्ध आणि धम्मावर माझी अढळ श्रद्धा होती, आणि मी प्रसन्न चित्ताने संघाची सेवा केली. ‘‘‘ตสฺเสว พุทฺธสฺส สุธมฺมตาย,สกฺกสฺส ปุตฺโตมฺหิ มหานุภาโว; มหาชุตีโก ติทิวูปปนฺโน,ชานนฺติ มํ อิธาปิ ‘โคปโก’ติ. त्याच बुद्धांच्या सद्धम्माच्या प्रभावामुळे, मी तावतिंस स्वर्गात उत्पन्न होऊन शक्राचा महान प्रभावशाली आणि महातेजस्वी पुत्र झालो आहे; येथेही मला सर्वजण 'गोपक' म्हणून ओळखतात. ‘‘‘อถทฺทสํ ภิกฺขโว ทิฏฺฐปุพฺเพ,คนฺธพฺพกายูปคเต วสีเน; อิเมหิ เต โคตมสาวกาเส,เย จ มยํ ปุพฺเพ มนุสฺสภูตา. तेव्हा मी पूर्वी पाहिलेल्या त्या भिक्खूंना पाहिले, जे गंधर्व योनीत उत्पन्न होऊन तिथेच राहत होते; हे तेच गौतम बुद्धांचे श्रावक होते, ज्यांच्यासोबत आम्ही पूर्वी मनुष्य असताना राहिलो होतो. ‘‘‘อนฺเนน ปาเนน อุปฏฺฐหิมฺหา,ปาทูปสงฺคยฺห สเก นิเวสเน; กุโตมุขา นาม อิเม ภวนฺโต,พุทฺธสฺส ธมฺมานิ ปฏิคฺคเหสุํ. आम्ही आमच्या घरी अन्न-पानाने त्यांची सेवा केली होती, आणि decorate केलेले पाय धुवून व त्यांना वंदन करून त्यांचा आदर केला होता. या आदरणीयांनी बुद्धांच्या धम्माचे ग्रहण कसे काय केले? ‘‘‘ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ หิ ธมฺโม,สุเทสิโต จกฺขุมตานุพุทฺโธ; อหญฺหิ ตุมฺเหว อุปาสมาโน,สุตฺวาน อริยาน สุภาสิตานิ. कारण दिव्यचक्षू असणाऱ्या भगवंतांनी स्वतः अनुभवून चांगल्या प्रकारे उपदेशिलेला धम्म हा स्वतःच जाणायचा असतो. मी तुमचीच सेवा करत असताना, आर्यांची सुभाषिते ऐकून, ‘‘‘สกฺกสฺส ปุตฺโตมฺหิ มหานุภาโว,มหาชุตีโก ติทิวูปปนฺโน; ตุมฺเห ปน เสฏฺฐมุปาสมานา,อนุตฺตรํ พฺรหฺมจริยํ จริตฺวา. तावतिंस स्वर्गात उत्पन्न होऊन शक्राचा महान प्रभावशाली आणि महातेजस्वी पुत्र झालो आहे. परंतु तुम्ही मात्र सर्वश्रेष्ठ अशा बुद्धांची सेवा करून आणि अनुत्तर ब्रह्मचर्याचे आचरण करूनही, ‘‘‘หีนํ [Pg.218] กายํ อุปปนฺนา ภวนฺโต,อนานุโลมา ภวตูปปตฺติ; ทุทฺทิฏฺฐรูปํ วต อทฺทสาม,สหธมฺมิเก หีนกายูปปนฺเน. कनिष्ठ योनीत उत्पन्न झाला आहात! तुमची ही उत्पत्ती खरोखरच अयोग्य आहे. आमच्या धम्मबंधूंना कनिष्ठ योनीत उत्पन्न झालेले पाहणे, हे आम्ही अत्यंत न पाहण्यासारखे दृश्य पाहिले आहे. ‘‘‘คนฺธพฺพกายูปคตา ภวนฺโต,เทวานมาคจฺฉถ ปาริจริยํ; อคาเร วสโต มยฺหํ,อิมํ ปสฺส วิเสสตํ. “हे गंधर्व योनीला प्राप्त झालेल्यांनो! तुम्ही देवांची सेवा करण्यासाठी आला आहात; परंतु गृहस्थाश्रमात राहणाऱ्या माझ्या या विशेष रूपाकडे जरा पहा. ‘‘‘อิตฺถี หุตฺวา สฺวชฺช ปุโมมฺหิ เทโว,ทิพฺเพหิ กาเมหิ สมงฺคิภูโต’; เต โจทิตา โคตมสาวเกน,สํเวคมาปาทุ สเมจฺจ โคปกํ. “‘पूर्वी मी स्त्री होते, पण आज मी दिव्य कामभोगांनी युक्त असा पुरुष देव झाले आहे.’ गौतम बुद्धांचे श्रावक असलेल्या गोपकाद्वारे अशा प्रकारे प्रेरित केले असता, ते सर्व संवेगाला प्राप्त झाले आणि गोपकाकडे गेले. ‘‘‘หนฺท วิยายาม พฺยายาม,มา โน มยํ ปรเปสฺสา อหุมฺหา’; เตสํ ทุเว วีริยมารภึสุ,อนุสฺสรํ โคตมสาสนานิ. “‘चला, आपण प्रयत्न करू या, पराकाष्ठा करू या! आपण इतरांचे सेवक बनून राहू नये.’ त्यांच्यापैकी दोघांनी गौतम बुद्धांच्या उपदेशांचे स्मरण करत वीर्य (प्रयत्न) सुरू केले. ‘‘อิเธว จิตฺตานิ วิราชยิตฺวา,กาเมสุ อาทีนวมทฺทสํสุ; เต กามสํโยชนพนฺธนานิ,ปาปิมโยคานิ ทุรจฺจยานิ. “याच देवलोकात त्यांनी आपल्या चित्ताला वैराग्ययुक्त केले आणि कामभोगांमधील दोष पाहिले. त्यांनी काम-संयोजनांची बंधने, जी पापी माराची बंधने आहेत आणि पार करण्यास अत्यंत कठीण आहेत, ती तोडून टाकली. ‘‘นาโคว สนฺนานิ คุณานิ เฉตฺวา,เทเว ตาวตึเส อติกฺกมึสุ; สอินฺทา เทวา สปชาปติกา,สพฺเพ สุธมฺมาย สภายุปวิฏฺฐา. “ज्याप्रमाणे एखादा हत्ती भक्कम साखळ्या तोडून टाकतो, त्याप्रमाणे त्यांनी ती बंधने तोडली आणि तावतिंस देवांना मागे टाकून पुढे निघून गेले. इंद्र आणि प्रजापतीसह सर्व देव सुधम्मा देवसभेत बसले होते. ‘‘เตสํ นิสินฺนานํ อภิกฺกมึสุ,วีรา วิราคา วิรชํ กโรนฺตา; เต ทิสฺวา สํเวคมกาสิ วาสโว,เทวาภิภู เทวคณสฺส มชฺเฌ. “तिथे बसलेल्या देवांच्या मध्यभागी, ते वीर, वैराग्य प्राप्त करून आणि स्वतःला निष्पाप (अनागामी) बनवून, सर्वांच्या पुढे निघून गेले. त्यांना पाहून देवराज वासवाने (इंद्राने) देवगणांच्या मध्यभागी संवेग व्यक्त केला. ‘‘‘อิเมหิ [Pg.219] เต หีนกายูปปนฺนา,เทเว ตาวตึเส อภิกฺกมนฺติ’; สํเวคชาตสฺส วโจ นิสมฺม,โส โคปโก วาสวมชฺฌภาสิ. “‘हे पूर्वी कनिष्ठ योनीतील असूनही तावतिंस देवांना मागे टाकून पुढे जात आहेत!’ संवेग उत्पन्न झालेल्या इंद्राचे हे शब्द ऐकून, त्या गोपक देवपुत्राने वासवाला उद्देशून म्हटले: ‘‘‘พุทฺโธ ชนินฺทตฺถิ มนุสฺสโลเก,กามาภิภู สกฺยมุนีติ ญายติ; ตสฺเสว เต ปุตฺตา สติยา วิหีนา,โจทิตา มยา เต สติมชฺฌลตฺถุํ. “‘हे जनेंद्रा! मनुष्यलोकात बुद्ध अस्तित्वात आहेत, जे कामभोगांवर विजय मिळवणारे शाक्यमुनी म्हणून ओळखले जातात. हे देव त्यांचेच पुत्र (श्रावक) आहेत, जे स्मृतीपासून भ्रष्ट झाले होते; परंतु माझ्याद्वारे प्रेरित केल्यावर त्यांनी पुन्हा स्मृती प्राप्त केली आहे. ‘‘‘ติณฺณํ เตสํ อาวสิเนตฺถ เอโก,คนฺธพฺพกายูปคโต วสีโน; ทฺเว จ สมฺโพธิปถานุสาริโน,เทเวปิ หีเฬนฺติ สมาหิตตฺตา. “‘त्या तिघांपैकी एक जण इथेच गंधर्व योनीत राहिला आहे, तर इतर दोघे संबोधीच्या मार्गाचे अनुसरण करणारे बनले आहेत. समाहित चित्त असल्यामुळे ते देवांनाही मागे टाकतात. ‘‘‘เอตาทิสี ธมฺมปฺปกาสเนตฺถ,น ตตฺถ กึกงฺขติ โกจิ สาวโก; นิติณฺณโอฆํ วิจิกิจฺฉฉินฺนํ,พุทฺธํ นมสฺสาม ชินํ ชนินฺทํ’. “‘या शासनात अशी धम्म-प्रकाशना आहे की, तिथे कोणत्याही श्रावकाला शंका उरत नाही. संसार-ओघ पार केलेल्या, संशय नष्ट केलेल्या, विजयी आणि मानवांचे स्वामी असलेल्या त्या बुद्धांना आम्ही वंदन करतो.’ ‘‘ยํ เต ธมฺมํ อิธญฺญาย,วิเสสํ อชฺฌคํสุ เต; กายํ พฺรหฺมปุโรหิตํ,ทุเว เตสํ วิเสสคู. “आपल्या ज्या धम्माला इथे जाणून घेऊन, त्या दोघांनी विशेष गती प्राप्त केली आहे; ते दोघे विशेष गती प्राप्त करून ब्रह्मपुरोहित लोकामध्ये उत्पन्न झाले आहेत. ‘‘ตสฺส ธมฺมสฺส ปตฺติยา,อาคตมฺหาสิ มาริส; กตาวกาสา ภควตา,ปญฺหํ ปุจฺเฉมุ มาริสา’’ติ. “त्या धम्माच्या प्राप्तीसाठी आम्ही इथे आलो आहोत, हे पूजनीय! जर भगवंतांनी आम्हाला अनुमती दिली, तर आम्ही काही प्रश्न विचारू इच्छितो.” ๓๕๕. อถ โข ภควโต เอตทโหสิ – ‘‘ทีฆรตฺตํ วิสุทฺโธ โข อยํ ยกฺโข, ยํ กิญฺจิ มํ ปญฺหํ ปุจฺฉิสฺสติ, สพฺพํ ตํ อตฺถสญฺหิตํเยว ปุจฺฉิสฺสติ, โน อนตฺถสญฺหิตํ. ยญฺจสฺสาหํ ปุฏฺโฐ พฺยากริสฺสามิ, ตํ ขิปฺปเมว อาชานิสฺสตี’’ติ. ३५५. तेव्हा भगवंतांच्या मनात असा विचार आला – “हा यक्ष दीर्घकाळापासून शुद्ध चित्त असलेला आहे. तो मला जो काही प्रश्न विचारेल, तो सर्व अर्थपूर्णच असेल, निरर्थक असणार नाही. आणि मी विचारलेल्या प्रश्नाचे जे उत्तर देईन, ते तो त्वरित समजून घेईल.” ๓๕๖. อถ [Pg.220] โข ภควา สกฺกํ เทวานมินฺทํ คาถาย อชฺฌภาสิ – ३५६. त्यानंतर भगवंतांनी देवराज शक्राला गाथेने संबोधित केले – ‘‘ปุจฺฉ วาสว มํ ปญฺหํ, ยํ กิญฺจิ มนสิจฺฉสิ; ตสฺส ตสฺเสว ปญฺหสฺส, อหํ อนฺตํ กโรมิ เต’’ติ. “हे वासवा! तुझ्या मनात जो काही प्रश्न असेल, तो मला विचार. तुझ्या त्या प्रत्येक प्रश्नाचे मी निरसन करेन.” ปฐมภาณวาโร นิฏฺฐิโต. पहिला भाणवार समाप्त झाला. ๓๕๗. กตาวกาโส สกฺโก เทวานมินฺโท ภควตา อิมํ ภควนฺตํ ปฐมํ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ३५७. भगवंतांकडून अनुमती मिळाल्यावर, देवराज शक्राने भगवंतांना पहिला प्रश्न विचारला – ‘‘กึ สํโยชนา นุ โข, มาริส, เทวา มนุสฺสา อสุรา นาคา คนฺธพฺพา เย จญฺเญ สนฺติ ปุถุกายา, เต – ‘อเวรา อทณฺฑา อสปตฺตา อพฺยาปชฺชา วิหเรมุ อเวริโน’ติ อิติ จ เนสํ โหติ, อถ จ ปน สเวรา สทณฺฑา สสปตฺตา สพฺยาปชฺชา วิหรนฺติ สเวริโน’’ติ? อิตฺถํ สกฺโก เทวานมินฺโท ภควนฺตํ ปญฺหํ อปุจฺฉิ. ตสฺส ภควา ปญฺหํ ปุฏฺโฐ พฺยากาสิ – “हे पूजनीय! देव, मनुष्य, असुर, नाग, गंधर्व आणि इतर जे अनेक प्राणी आहेत, ते कोणत्या बंधनांनी बांधलेले आहेत, ज्यामुळे ते ‘आम्ही वैररहित, दंडरहित, शत्रूरहित, द्वेषरहित आणि शांततेने राहावे’ अशी इच्छा बाळगतात; तरीही ते वैराने, दंडाने, शत्रूने आणि द्वेषाने युक्त होऊन जगतात?” अशा प्रकारे देवराज शक्राने भगवंतांना प्रश्न विचारला. विचारलेल्या या प्रश्नाचे भगवंतांनी उत्तर दिले – ‘‘อิสฺสามจฺฉริยสํโยชนา โข, เทวานมินฺท, เทวา มนุสฺสา อสุรา นาคา คนฺธพฺพา เย จญฺเญ สนฺติ ปุถุกายา, เต – ‘อเวรา อทณฺฑา อสปตฺตา อพฺยาปชฺชา วิหเรมุ อเวริโน’ติ อิติ จ เนสํ โหติ, อถ จ ปน สเวรา สทณฺฑา สสปตฺตา สพฺยาปชฺชา วิหรนฺติ สเวริโน’’ติ. อิตฺถํ ภควา สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปญฺหํ ปุฏฺโฐ พฺยากาสิ. อตฺตมโน สกฺโก เทวานมินฺโท ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิ อนุโมทิ – ‘‘เอวเมตํ, ภควา, เอวเมตํ, สุคต. ติณฺณา เมตฺถ กงฺขา วิคตา กถํกถา ภควโต ปญฺหเวยฺยากรณํ สุตฺวา’’ติ. “हे देवाधिपती शक्रा! ईर्ष्या आणि मात्सर्य या संयोजनांमुळेच देव, मनुष्य, असुर, नाग, गंधर्व आणि इतर जे अनेक प्राणी आहेत, ते ‘आम्ही वैररहित, दंडरहित, शत्रूरहित, द्वेषरहित आणि शांततेने राहावे’ अशी इच्छा बाळगूनही वैराने, दंडाने, शत्रूने आणि द्वेषाने युक्त होऊन जगतात।’ अशा प्रकारे भगवंतांनी देवराज शक्राच्या प्रश्नाचे उत्तर दिले. संतुष्ट झालेल्या देवराज शक्राने भगवंतांच्या भाषणाचे अभिनंदन केले आणि आनंद व्यक्त केला – ‘हे भगवन्! हे अगदी तसेच आहे. हे सुगता! हे अगदी तसेच आहे. भगवंतांचे हे प्रश्नोत्तर ऐकून माझी शंका दूर झाली आहे आणि संभ्रम नाहीसा झाला आहे.’” ๓๕๘. อิติห สกฺโก เทวานมินฺโท ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา ภควนฺตํ อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ३५८. “अशा प्रकारे देवराज शक्राने भगवंतांच्या भाषणाचे अभिनंदन व कौतुक करून भगवंतांना पुढील प्रश्न विचारला – ‘‘อิสฺสามจฺฉริยํ ปน, มาริส, กึนิทานํ กึสมุทยํ กึชาติกํ กึปภวํ; กิสฺมึ สติ อิสฺสามจฺฉริยํ โหติ; กิสฺมึ อสติ อิสฺสามจฺฉริยํ น โหตี’’ติ? ‘‘อิสฺสามจฺฉริยํ โข, เทวานมินฺท, ปิยาปฺปิยนิทานํ ปิยาปฺปิยสมุทยํ ปิยาปฺปิยชาติกํ ปิยาปฺปิยปภวํ; ปิยาปฺปิเย สติ อิสฺสามจฺฉริยํ โหติ, ปิยาปฺปิเย อสติ อิสฺสามจฺฉริยํ น โหตี’’ติ. “परंतु हे पूजनीय! ईर्ष्या आणि मात्सर्य यांचे निदान काय आहे? त्यांचा उगम कशातून होतो? ते कशापासून उत्पन्न होतात? त्यांचा प्रभव काय आहे? काय असल्यावर ईर्ष्या आणि मात्सर्य निर्माण होते आणि काय नसल्यावर ईर्ष्या आणि मात्सर्य निर्माण होत नाही?” “हे देवाधिपती शक्रा! ईर्ष्या आणि मात्सर्य हे प्रिय आणि अप्रिय या कारणांमुळे निर्माण होतात, प्रिय-अप्रिय हाच त्यांचा उगम आहे, प्रिय-अप्रिय हेच त्यांचे उत्पत्तीस्थान आहे, प्रिय-अप्रिय हाच त्यांचा प्रभव आहे. प्रिय आणि अप्रिय असल्यावर ईर्ष्या आणि मात्सर्य निर्माण होते; प्रिय आणि अप्रिय नसल्यावर ईर्ष्या आणि मात्सर्य निर्माण होत नाही.” ‘‘ปิยาปฺปิยํ [Pg.221] โข ปน, มาริส, กึนิทานํ กึสมุทยํ กึชาติกํ กึปภวํ; กิสฺมึ สติ ปิยาปฺปิยํ โหติ; กิสฺมึ อสติ ปิยาปฺปิยํ น โหตี’’ติ? ‘‘ปิยาปฺปิยํ โข, เทวานมินฺท, ฉนฺทนิทานํ ฉนฺทสมุทยํ ฉนฺทชาติกํ ฉนฺทปภวํ; ฉนฺเท สติ ปิยาปฺปิยํ โหติ; ฉนฺเท อสติ ปิยาปฺปิยํ น โหตี’’ติ. “परंतु हे पूजनीय! प्रिय आणि अप्रिय यांचे निदान काय आहे? त्यांचा उगम कशातून होतो? ते कशापासून उत्पन्न होतात? त्यांचा प्रभव काय आहे? काय असल्यावर प्रिय आणि अप्रिय निर्माण होते आणि काय नसल्यावर प्रिय आणि अप्रिय निर्माण होत नाही?” “हे देवाधिपती शक्रा! प्रिय आणि अप्रिय हे छंदावर आधारित आहेत, छंद हाच त्यांचा उगम आहे, छंद हेच त्यांचे उत्पत्तीस्थान आहे, छंद हाच त्यांचा प्रभव आहे. छंद असल्यावर प्रिय आणि अप्रिय निर्माण होते; छंद नसल्यावर प्रिय आणि अप्रिय निर्माण होत नाही.” ‘‘ฉนฺโท โข ปน, มาริส, กึนิทาโน กึสมุทโย กึชาติโก กึปภโว; กิสฺมึ สติ ฉนฺโท โหติ; กิสฺมึ อสติ ฉนฺโท น โหตี’’ติ? ‘‘ฉนฺโท โข, เทวานมินฺท, วิตกฺกนิทาโน วิตกฺกสมุทโย วิตกฺกชาติโก วิตกฺกปภโว; วิตกฺเก สติ ฉนฺโท โหติ; วิตกฺเก อสติ ฉนฺโท น โหตี’’ติ. “परंतु हे पूजनीय! छंद कशावर आधारित आहे? त्याचा उगम कशातून होतो? तो कशापासून उत्पन्न होतो? त्याचा प्रभव काय आहे? काय असल्यावर छंद निर्माण होतो आणि काय नसल्यावर छंद निर्माण होत नाही?” “हे देवाधिपती शक्रा! छंद हा वितर्कावर आधारित आहे, वितर्क हाच त्याचा उगम आहे, वितर्क हेच त्याचे उत्पत्तीस्थान आहे, वितर्क हाच त्यांचा प्रभव आहे. वितर्क असल्यावर छंद निर्माण होतो; वितर्क नसल्यावर छंद निर्माण होत नाही.” ‘‘วิตกฺโก โข ปน, มาริส, กึนิทาโน กึสมุทโย กึชาติโก กึปภโว; กิสฺมึ สติ วิตกฺโก โหติ; กิสฺมึ อสติ วิตกฺโก น โหตี’’ติ? ‘‘วิตกฺโก โข, เทวานมินฺท, ปปญฺจสญฺญาสงฺขานิทาโน ปปญฺจสญฺญาสงฺขาสมุทโย ปปญฺจสญฺญาสงฺขาชาติโก ปปญฺจสญฺญาสงฺขาปภโว; ปปญฺจสญฺญาสงฺขาย สติ วิตกฺโก โหติ; ปปญฺจสญฺญาสงฺขาย อสติ วิตกฺโก น โหตี’’ติ. “परंतु हे पूजनीय! वितर्क कशावर आधारित आहे? त्याचा उगम कशातून होतो? तो कशापासून उत्पन्न होतो? त्याचा प्रभव काय आहे? काय असल्यावर वितर्क निर्माण होतो आणि काय नसल्यावर वितर्क निर्माण होत नाही?” “हे देवाधिपती शक्रा! वितर्क हा प्रपंच-संज्ञा-संख्येवर आधारित आहे, प्रपंच-संज्ञा-संख्या हाच त्याचा उगम आहे, प्रपंच-संज्ञा-संख्या हेच त्याचे उत्पत्तीस्थान आहे, प्रपंच-संज्ञा-संख्या हाच त्यांचा प्रभव आहे. प्रपंच-संज्ञा-संख्या असल्यावर वितर्क निर्माण होतो; प्रपंच-संज्ञा-संख्या नसल्यावर वितर्क निर्माण होत नाही.” ‘‘กถํ ปฏิปนฺโน ปน, มาริส, ภิกฺขุ ปปญฺจสญฺญาสงฺขานิโรธสารุปฺปคามินึ ปฏิปทํ ปฏิปนฺโน โหตี’’ติ? “परंतु हे पूजनीय! भिक्खूने कशा प्रकारे आचरण केले पाहिजे, जेणेकरून तो प्रपंच-संज्ञा-संख्येच्या निरोधासाठी योग्य असलेल्या मार्गावर आरूढ होईल?” เวทนากมฺมฏฺฐานํ “वेदना-कर्मस्थान” ๓๕๙. ‘‘โสมนสฺสํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ – เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปิ. โทมนสฺสํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ – เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปิ. อุเปกฺขํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ – เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปิ. ३५९. “हे देवाधिपती शक्रा! मी सोमनस्य दोन प्रकारचे सांगतो – सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य. हे देवाधिपती शक्रा! मी दोमनस्य दोन प्रकारचे सांगतो – सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य. हे देवाधिपती शक्रा! मी उपेक्षा दोन प्रकारची सांगतो – सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य.” ๓๖๐. ‘‘โสมนสฺสํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปีติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, กิญฺเจตํ ปฏิจฺจ วุตฺตํ? ตตฺถ ยํ ชญฺญา โสมนสฺสํ ‘อิมํ โข เม โสมนสฺสํ เสวโต อกุสลา ธมฺมา อภิวฑฺฒนฺติ, กุสลา ธมฺมา ปริหายนฺตี’ติ, เอวรูปํ โสมนสฺสํ น เสวิตพฺพํ. ตตฺถ ยํ ชญฺญา โสมนสฺสํ ‘อิมํ โข เม โสมนสฺสํ เสวโต [Pg.222] อกุสลา ธมฺมา ปริหายนฺติ, กุสลา ธมฺมา อภิวฑฺฒนฺตี’ติ, เอวรูปํ โสมนสฺสํ เสวิตพฺพํ. ตตฺถ ยํ เจ สวิตกฺกํ สวิจารํ, ยํ เจ อวิตกฺกํ อวิจารํ, เย อวิตกฺเก อวิจาเร, เต ปณีตตเร. โสมนสฺสํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปีติ. อิติ ยํ ตํ วุตฺตํ, อิทเมตํ ปฏิจฺจ วุตฺตํ. ३६०. “हे देवाधिपती शक्रा! मी सोमनस्य (प्रसन्नता) देखील दोन प्रकारचे सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य. असे जे म्हटले गेले आहे, ते कोणत्या कारणास्तव म्हटले आहे? त्या (दोन प्रकारच्या सोमनस्यां) पैकी, ज्या सोमनस्याविषयी असे जाणता येईल की, 'या सोमनस्याचे सेवन केल्याने माझे अकुशल धर्म वाढतात आणि कुशल धर्म नष्ट होतात', अशा प्रकारच्या सोमनस्याचे सेवन करू नये. आणि ज्या सोमनस्याविषयी असे जाणता येईल की, 'या सोमनस्याचे सेवन केल्याने माझे अकुशल धर्म नष्ट होतात आणि कुशल धर्म वाढतात', अशा प्रकारच्या सोमनस्याचे सेवन करावे. त्या (सेवन करण्यायोग्य सोमनस्या) मध्ये जे सवितर्क-सविचार असते आणि जे अवितर्क-अविचार असते, त्या दोन्हीमध्ये जे अवितर्क-अविचार असते, ते अधिक श्रेष्ठ असते. 'हे देवाधिपती शक्रा! मी सोमनस्य देखील दोन प्रकारचे सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य', असे जे म्हटले गेले आहे, ते याच कारणास्तव म्हटले गेले आहे.” ๓๖๑. ‘‘โทมนสฺสํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปีติ. อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, กิญฺเจตํ ปฏิจฺจ วุตฺตํ? ตตฺถ ยํ ชญฺญา โทมนสฺสํ ‘อิมํ โข เม โทมนสฺสํ เสวโต อกุสลา ธมฺมา อภิวฑฺฒนฺติ, กุสลา ธมฺมา ปริหายนฺตี’ติ, เอวรูปํ โทมนสฺสํ น เสวิตพฺพํ. ตตฺถ ยํ ชญฺญา โทมนสฺสํ ‘อิมํ โข เม โทมนสฺสํ เสวโต อกุสลา ธมฺมา ปริหายนฺติ, กุสลา ธมฺมา อภิวฑฺฒนฺตี’ติ, เอวรูปํ โทมนสฺสํ เสวิตพฺพํ. ตตฺถ ยํ เจ สวิตกฺกํ สวิจารํ, ยํ เจ อวิตกฺกํ อวิจารํ, เย อวิตกฺเก อวิจาเร, เต ปณีตตเร. โทมนสฺสํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปี’ติ อิติ ยํ ตํ วุตฺตํ, อิทเมตํ ปฏิจฺจ วุตฺตํ. ३६१. “हे देवाधिपती शक्रा! मी दोमनस्य (खिन्नता) देखील दोन प्रकारचे सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य. असे जे म्हटले गेले आहे, ते कोणत्या कारणास्तव म्हटले आहे? त्या (दोन प्रकारच्या दोमनस्यां) पैकी, ज्या दोमनस्याविषयी असे जाणता येईल की, 'या दोमनस्याचे सेवन केल्याने माझे अकुशल धर्म वाढतात आणि कुशल धर्म नष्ट होतात', अशा प्रकारच्या दोमनस्याचे सेवन करू नये. आणि ज्या दोमनस्याविषयी असे जाणता येईल की, 'या दोमनस्याचे सेवन केल्याने माझे अकुशल धर्म नष्ट होतात आणि कुशल धर्म वाढतात', अशा प्रकारच्या दोमनस्याचे सेवन करावे. त्या (सेवन करण्यायोग्य दोमनस्या) मध्ये जे सवितर्क-सविचार असते आणि जे अवितर्क-अविचार असते, त्या दोन्हीमध्ये जे अवितर्क-अविचार असते, ते अधिक श्रेष्ठ असते. 'हे देवाधिपती शक्रा! मी दोमनस्य देखील दोन प्रकारचे सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य', असे जे म्हटले गेले आहे, ते याच कारणास्तव म्हटले गेले आहे.” ๓๖๒. ‘‘อุเปกฺขํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปีติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, กิญฺเจตํ ปฏิจฺจ วุตฺตํ? ตตฺถ ยํ ชญฺญา อุเปกฺขํ ‘อิมํ โข เม อุเปกฺขํ เสวโต อกุสลา ธมฺมา อภิวฑฺฒนฺติ, กุสลา ธมฺมา ปริหายนฺตี’ติ, เอวรูปา อุเปกฺขา น เสวิตพฺพา. ตตฺถ ยํ ชญฺญา อุเปกฺขํ ‘อิมํ โข เม อุเปกฺขํ เสวโต อกุสลา ธมฺมา ปริหายนฺติ, กุสลา ธมฺมา อภิวฑฺฒนฺตี’ติ, เอวรูปา อุเปกฺขา เสวิตพฺพา. ตตฺถ ยํ เจ สวิตกฺกํ สวิจารํ, ยํ เจ อวิตกฺกํ อวิจารํ, เย อวิตกฺเก อวิจาเร, เต ปณีตตเร. อุเปกฺขํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปีติ อิติ ยํ ตํ วุตฺตํ, อิทเมตํ ปฏิจฺจ วุตฺตํ. ३६२. “हे देवाधिपती शक्रा! मी उपेक्षा (तटस्थता) देखील दोन प्रकारची सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य. असे जे म्हटले गेले आहे, ते कोणत्या कारणास्तव म्हटले आहे? त्या (दोन प्रकारच्या उपेक्षां) पैकी, ज्या उपेक्षेविषयी असे जाणता येईल की, 'या उपेक्षेचे सेवन केल्याने माझे अकुशल धर्म वाढतात आणि कुशल धर्म नष्ट होतात', अशा प्रकारच्या उपेक्षेचे सेवन करू नये. आणि ज्या उपेक्षेविषयी असे जाणता येईल की, 'या उपेक्षेचे सेवन केल्याने माझे अकुशल धर्म नष्ट होतात आणि कुशल धर्म वाढतात', अशा प्रकारच्या उपेक्षेचे सेवन करावे. त्या (सेवन करण्यायोग्य उपेक्षे) मध्ये जी सवितर्क-सविचार असते आणि जी अवितर्क-अविचार असते, त्या दोन्हीमध्ये जी अवितर्क-अविचार असते, ती अधिक श्रेष्ठ असते. 'हे देवाधिपती शक्रा! मी उपेक्षा देखील दोन प्रकारची सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य', असे जे म्हटले गेले आहे, ते याच कारणास्तव म्हटले गेले आहे.” ๓๖๓. ‘‘เอวํ ปฏิปนฺโน โข, เทวานมินฺท, ภิกฺขุ ปปญฺจสญฺญาสงฺขานิโรธสารุปฺปคามินึ ปฏิปทํ ปฏิปนฺโน โหตี’’ติ. อิตฺถํ ภควา สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปญฺหํ ปุฏฺโฐ พฺยากาสิ. อตฺตมโน สกฺโก เทวานมินฺโท ภควโต ภาสิตํ [Pg.223] อภินนฺทิ อนุโมทิ – ‘‘เอวเมตํ, ภควา, เอวเมตํ, สุคต, ติณฺณา เมตฺถ กงฺขา วิคตา กถํกถา ภควโต ปญฺหเวยฺยากรณํ สุตฺวา’’ติ. ३६३. “हे देवाधिपती शक्रा! अशा प्रकारे आचरण करणारा भिक्खू प्रपंच-संज्ञा-संख्येच्या (प्रपंच-संज्ञा-संस्कारांच्या) निरोधासाठी अनुकूल असलेल्या मार्गावर आरूढ झालेला असतो.” अशा प्रकारे, देवाधिपती शक्राने विचारलेल्या प्रश्नाचे भगवंतांनी उत्तर दिले. प्रसन्न चित्त झालेल्या देवाधिपती शक्राने भगवंतांच्या भाषणाचे अभिनंदन केले आणि आनंद व्यक्त केला— “हे भगवंत! हे अगदी तसेच आहे. हे सुगता! हे अगदी तसेच आहे. भगवंतांचे हे प्रश्नोत्तर ऐकून माझी शंका दूर झाली आहे आणि संभ्रम नाहीसा झाला आहे.” ปาติโมกฺขสํวโร पातिमोक्ख-संवर ๓๖๔. อิติห สกฺโก เทวานมินฺโท ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา ภควนฺตํ อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ३६४. अशा प्रकारे, देवाधिपती शक्राने भगवंतांच्या भाषणाचे अभिनंदन करून व आनंद व्यक्त करून भगवंतांना पुढील प्रश्न विचारला— ‘‘กถํ ปฏิปนฺโน ปน, มาริส, ภิกฺขุ ปาติโมกฺขสํวราย ปฏิปนฺโน โหตี’’ติ? ‘‘กายสมาจารํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ – เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปิ. วจีสมาจารํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ – เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปิ. ปริเยสนํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ – เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพ’’มฺปิ. “परंतु पूजनीय (भदंत), कशा प्रकारे आचरण करणारा भिक्खू पातिमोक्ख-संवरासाठी आचरण करणारा ठरतो?” “हे देवाधिपती शक्रा! मी कायिक आचरण (शारीरिक आचरण) देखील दोन प्रकारचे सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य. हे देवाधिपती शक्रा! मी वाचिक आचरण (वाणीचे आचरण) देखील दोन प्रकारचे सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य. हे देवाधिपती शक्रा! मी पर्येषणा (शोध/उपजीविकेचे साधन) देखील दोन प्रकारची सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य.” ‘‘กายสมาจารํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ เสวิตพฺพมฺปิ อเสวิตพฺพมฺปีติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, กิญฺเจตํ ปฏิจฺจ วุตฺตํ? ตตฺถ ยํ ชญฺญา กายสมาจารํ ‘อิมํ โข เม กายสมาจารํ เสวโต อกุสลา ธมฺมา อภิวฑฺฒนฺติ, กุสลา ธมฺมา ปริหายนฺตี’ติ, เอวรูโป กายสมาจาโร น เสวิตพฺโพ. ตตฺถ ยํ ชญฺญา กายสมาจารํ ‘อิมํ โข เม กายสมาจารํ เสวโต อกุสลา ธมฺมา ปริหายนฺติ, กุสลา ธมฺมา อภิวฑฺฒนฺตี’ติ, เอวรูโป กายสมาจาโร เสวิตพฺโพ. กายสมาจารํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ – เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปีติ อิติ ยํ ตํ วุตฺตํ, อิทเมตํ ปฏิจฺจ วุตฺตํ. “'हे देवाधिपती शक्रा! मी कायिक आचरण देखील दोन प्रकारचे सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य', असे जे म्हटले गेले आहे, ते कोणत्या कारणास्तव म्हटले आहे? त्या (दोन प्रकारच्या कायिक आचरणां) पैकी, ज्या कायिक आचरणाविषयी असे जाणता येईल की, 'या कायिक आचरणाचे सेवन केल्याने माझे अकुशल धर्म वाढतात आणि कुशल धर्म नष्ट होतात', अशा प्रकारच्या कायिक आचरणाचे सेवन करू नये. आणि ज्या कायिक आचरणाविषयी असे जाणता येईल की, 'या कायिक आचरणाचे सेवन केल्याने माझे अकुशल धर्म नष्ट होतात आणि कुशल धर्म वाढतात', अशा प्रकारच्या कायिक आचरणाचे सेवन करावे. 'हे देवाधिपती शक्रा! मी कायिक आचरण देखील दोन प्रकारचे सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य', असे जे म्हटले गेले आहे, ते याच कारणास्तव म्हटले गेले आहे.” ‘‘วจีสมาจารํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ – เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปี’ติ. อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, กิญฺเจตํ ปฏิจฺจ วุตฺตํ? ตตฺถ ยํ ชญฺญา วจีสมาจารํ ‘อิมํ โข เม วจีสมาจารํ เสวโต อกุสลา ธมฺมา อภิวฑฺฒนฺติ, กุสลา ธมฺมา ปริหายนฺตี’ติ, เอวรูโป วจีสมาจาโร น เสวิตพฺโพ. ตตฺถ ยํ ชญฺญา วจีสมาจารํ ‘อิมํ โข เม วจีสมาจารํ เสวโต อกุสลา ธมฺมา ปริหายนฺติ, กุสลา ธมฺมา อภิวฑฺฒนฺตี’ติ, เอวรูโป วจีสมาจาโร เสวิตพฺโพ. วจีสมาจารํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ – เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปีติ อิติ ยํ ตํ วุตฺตํ, อิทเมตํ ปฏิจฺจ วุตฺตํ. “'हे देवाधिपती शक्रा! मी वाचिक आचरण देखील दोन प्रकारचे सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य', असे जे म्हटले गेले आहे, ते कोणत्या कारणास्तव म्हटले आहे? त्या (दोन प्रकारच्या वाचिक आचरणां) पैकी, ज्या वाचिक आचरणाविषयी असे जाणता येईल की, 'या वाचिक आचरणाचे सेवन केल्याने माझे अकुशल धर्म वाढतात आणि कुशल धर्म नष्ट होतात', अशा प्रकारच्या वाचिक आचरणाचे सेवन करू नये. आणि ज्या वाचिक आचरणाविषयी असे जाणता येईल की, 'या वाचिक आचरणाचे सेवन केल्याने माझे अकुशल धर्म नष्ट होतात आणि कुशल धर्म वाढतात', अशा प्रकारच्या वाचिक आचरणाचे सेवन करावे. 'हे देवाधिपती शक्रा! मी वाचिक आचरण देखील दोन प्रकारचे सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य', असे जे म्हटले गेले आहे, ते याच कारणास्तव म्हटले गेले आहे.” ‘‘ปริเยสนํปาหํ[Pg.224], เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ – เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปีติ อิติ โข ปเนตํ วุตฺตํ, กิญฺเจตํ ปฏิจฺจ วุตฺตํ? ตตฺถ ยํ ชญฺญา ปริเยสนํ ‘อิมํ โข เม ปริเยสนํ เสวโต อกุสลา ธมฺมา อภิวฑฺฒนฺติ, กุสลา ธมฺมา ปริหายนฺตี’ติ, เอวรูปา ปริเยสนา น เสวิตพฺพา. ตตฺถ ยํ ชญฺญา ปริเยสนํ ‘อิมํ โข เม ปริเยสนํ เสวโต อกุสลา ธมฺมา ปริหายนฺติ, กุสลา ธมฺมา อภิวฑฺฒนฺตี’ติ, เอวรูปา ปริเยสนา เสวิตพฺพา. ปริเยสนํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ – เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปีติ อิติ ยํ ตํ วุตฺตํ, อิทเมตํ ปฏิจฺจ วุตฺตํ. “'हे देवाधिपती शक्रा! मी पर्येषणा देखील दोन प्रकारची सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य', असे जे म्हटले गेले आहे, ते कोणत्या कारणास्तव म्हटले आहे? त्या (दोन प्रकारच्या पर्येषणां) पैकी, ज्या पर्येषणेविषयी असे जाणता येईल की, 'या पर्येषणेचे सेवन केल्याने माझे अकुशल धर्म वाढतात आणि कुशल धर्म नष्ट होतात', अशा प्रकारच्या पर्येषणेचे सेवन करू नये. आणि ज्या पर्येषणेविषयी असे जाणता येईल की, 'या पर्येषणेचे सेवन केल्याने माझे अकुशल धर्म नष्ट होतात आणि कुशल धर्म वाढतात', अशा प्रकारच्या पर्येषणेचे सेवन करावे. 'हे देवाधिपती शक्रा! मी पर्येषणा देखील दोन प्रकारची सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य', असे जे म्हटले गेले आहे, ते याच कारणास्तव म्हटले गेले आहे.” ‘‘เอวํ ปฏิปนฺโน โข, เทวานมินฺท, ภิกฺขุ ปาติโมกฺขสํวราย ปฏิปนฺโน โหตี’’ติ. อิตฺถํ ภควา สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปญฺหํ ปุฏฺโฐ พฺยากาสิ. อตฺตมโน สกฺโก เทวานมินฺโท ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิ อนุโมทิ – ‘‘เอวเมตํ, ภควา, เอวเมตํ, สุคต. ติณฺณา เมตฺถ กงฺขา วิคตา กถํกถา ภควโต ปญฺหเวยฺยากรณํ สุตฺวา’’ติ. “देवाधिपती शक्रा, अशा प्रकारे आचरण करणारा भिक्षू हा पातिमोक्ख-संवर (प्रातिमोक्ष संवरासाठी) आचरण करणारा होतो.” अशा प्रकारे भगवंतांनी देवांचा राजा शक्र याने विचारलेल्या प्रश्नाचे उत्तर दिले. संतुष्ट झालेल्या देवांच्या राजा शक्राने भगवंतांच्या उपदेशाचे अभिनंदन केले व आनंद व्यक्त केला— “हे भगवंत, हे असेच आहे; हे सुगता, हे असेच आहे. भगवंतांचे प्रश्नाचे उत्तर ऐकून माझी याविषयीची शंका दूर झाली आहे आणि संभ्रम नाहीसा झाला आहे.” อินฺทฺริยสํวโร इंद्रिय-संवर (इंद्रिय संयम) ๓๖๕. อิติห สกฺโก เทวานมินฺโท ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา ภควนฺตํ อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ३६५. अशा प्रकारे देवांचा राजा शक्र भगवंतांच्या उपदेशाचे अभिनंदन करून व आनंद व्यक्त करून भगवंतांना पुढील प्रश्न विचारू लागला— ‘‘กถํ ปฏิปนฺโน ปน, มาริส, ภิกฺขุ อินฺทฺริยสํวราย ปฏิปนฺโน โหตี’’ติ? ‘‘จกฺขุวิญฺเญยฺยํ รูปํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ – เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปิ. โสตวิญฺเญยฺยํ สทฺทํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ – เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปิ. ฆานวิญฺเญยฺยํ คนฺธํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ – เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปิ. ชิวฺหาวิญฺเญยฺยํ รสํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ – เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปิ. กายวิญฺเญยฺยํ โผฏฺฐพฺพํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ – เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปิ. มโนวิญฺเญยฺยํ ธมฺมํปาหํ, เทวานมินฺท, ทุวิเธน วทามิ – เสวิตพฺพมฺปิ, อเสวิตพฺพมฺปี’’ติ. “हे सौम्य, भिक्षूने कशा प्रकारे आचरण केले असता तो इंद्रिय-संवरासाठी आचरण करणारा होतो?” “देवाधिपती शक्रा, डोळ्यांनी जाणता येणारे रूप (चक्खुविञ्ञेय्य रूप) मी दोन प्रकारचे सांगतो—सेवन करण्यायोग्य (सेवितब्ब) आणि सेवन न करण्यायोग्य (असेवितब्ब). देवाधिपती शक्रा, कानांनी जाणता येणारा शब्द (सोतविञ्ञेय्य सद्द) मी दोन प्रकारचा सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य. देवाधिपती शक्रा, नाकाने जाणता येणारा गंध (घाणविञ्ञेय्य गंध) मी दोन प्रकारचा सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य. देवाधिपती शक्रा, जिभेने जाणता येणारा रस (जिव्हाविञ्ञेय्य रस) मी दोन प्रकारचा सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य. देवाधिपती शक्रा, शरीराने जाणता येणारा स्पर्श (कायविञ्ञेय्य फोट्ठब्ब) मी दोन प्रकारचा सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य. देवाधिपती शक्रा, मनाने जाणता येणारे धम्म (मनोविञ्ञेय्य धम्म) मी दोन प्रकारचे सांगतो—सेवन करण्यायोग्य आणि सेवन न करण्यायोग्य.” เอวํ วุตฺเต, สกฺโก เทวานมินฺโท ภควนฺตํ เอตทโวจ – असे म्हटले असता, देवांचा राजा शक्र भगवंतांना म्हणाला— ‘‘อิมสฺส โข อหํ, ภนฺเต, ภควตา สงฺขิตฺเตน ภาสิตสฺส เอวํ วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานามิ. ยถารูปํ, ภนฺเต, จกฺขุวิญฺเญยฺยํ รูปํ เสวโต อกุสลา ธมฺมา อภิวฑฺฒนฺติ, กุสลา ธมฺมา ปริหายนฺติ, เอวรูปํ จกฺขุวิญฺเญยฺยํ รูปํ [Pg.225] น เสวิตพฺพํ. ยถารูปญฺจ โข, ภนฺเต, จกฺขุวิญฺเญยฺยํ รูปํ เสวโต อกุสลา ธมฺมา ปริหายนฺติ, กุสลา ธมฺมา อภิวฑฺฒนฺติ, เอวรูปํ จกฺขุวิญฺเญยฺยํ รูปํ เสวิตพฺพํ. ยถารูปญฺจ โข, ภนฺเต, โสตวิญฺเญยฺยํ สทฺทํ เสวโต…เป… ฆานวิญฺเญยฺยํ คนฺธํ เสวโต… ชิวฺหาวิญฺเญยฺยํ รสํ เสวโต… กายวิญฺเญยฺยํ โผฏฺฐพฺพํ เสวโต… มโนวิญฺเญยฺยํ ธมฺมํ เสวโต อกุสลา ธมฺมา อภิวฑฺฒนฺติ, กุสลา ธมฺมา ปริหายนฺติ, เอวรูโป มโนวิญฺเญยฺโย ธมฺโม น เสวิตพฺโพ. ยถารูปญฺจ โข, ภนฺเต, มโนวิญฺเญยฺยํ ธมฺมํ เสวโต อกุสลา ธมฺมา ปริหายนฺติ, กุสลา ธมฺมา อภิวฑฺฒนฺติ, เอวรูโป มโนวิญฺเญยฺโย ธมฺโม เสวิตพฺโพ. “भन्ते, भगवंतांनी संक्षेपाने (थोडक्यात) सांगितलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ मी या प्रकारे समजतो. भन्ते, ज्या प्रकारच्या डोळ्यांनी जाणता येणाऱ्या रूपाचे सेवन केले असता अकुशल धर्म वाढतात आणि कुशल धर्म नष्ट होतात, अशा प्रकारच्या डोळ्यांनी जाणता येणाऱ्या रूपाचे सेवन करू नये. आणि भन्ते, ज्या प्रकारच्या डोळ्यांनी जाणता येणाऱ्या रूपाचे सेवन केले असता अकुशल धर्म नष्ट होतात आणि कुशल धर्म वाढतात, अशा प्रकारच्या डोळ्यांनी जाणता येणाऱ्या रूपाचे सेवन करावे. भन्ते, ज्या प्रकारच्या कानांनी जाणता येणाऱ्या शब्दाचे सेवन केले असता... (तसेच) नाकाने जाणता येणाऱ्या गंधाचे सेवन केले असता... जिभेने जाणता येणाऱ्या रसाचे सेवन केले असता... शरीराने जाणता येणाऱ्या स्पर्शाचे सेवन केले असता... मनाने जाणता येणाऱ्या धम्माचे सेवन केले असता अकुशल धर्म वाढतात आणि कुशल धर्म नष्ट होतात, अशा प्रकारच्या मनाने जाणता येणाऱ्या धम्माचे सेवन करू नये. आणि भन्ते, ज्या प्रकारच्या मनाने जाणता येणाऱ्या धम्माचे सेवन केले असता अकुशल धर्म नष्ट होतात आणि कुशल धर्म वाढतात, अशा प्रकारच्या मनाने जाणता येणाऱ्या धम्माचे सेवन करावे.” ‘‘อิมสฺส โข เม, ภนฺเต, ภควตา สงฺขิตฺเตน ภาสิตสฺส เอวํ วิตฺถาเรน อตฺถํ อาชานโต ติณฺณา เมตฺถ กงฺขา วิคตา กถํกถา ภควโต ปญฺหเวยฺยากรณํ สุตฺวา’’ติ. “भन्ते, भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या या उपदेशाचा अशा प्रकारे सविस्तर अर्थ समजून घेतल्यावर, भगवंतांचे हे प्रश्नोत्तर ऐकून माझी याविषयीची शंका दूर झाली आहे आणि संभ्रम नाहीसा झाला आहे.” ๓๖๖. อิติห สกฺโก เทวานมินฺโท ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา ภควนฺตํ อุตฺตรึ ปญฺหํ อปุจฺฉิ – ३६६. अशा प्रकारे देवांचा राजा शक्र भगवंतांच्या उपदेशाचे अभिनंदन करून व आनंद व्यक्त करून भगवंतांना पुढील प्रश्न विचारू लागला— ‘‘สพฺเพว นุ โข, มาริส, สมณพฺราหฺมณา เอกนฺตวาทา เอกนฺตสีลา เอกนฺตฉนฺทา เอกนฺตอชฺโฌสานา’’ติ? ‘‘น โข, เทวานมินฺท, สพฺเพ สมณพฺราหฺมณา เอกนฺตวาทา เอกนฺตสีลา เอกนฺตฉนฺทา เอกนฺตอชฺโฌสานา’’ติ. “हे सौम्य, सर्वच श्रमण आणि ब्राह्मण हे एकाच सिद्धांताचे (एकान्तवादी), एकाच शीलाचे (एकान्तशील), एकाच इच्छेचे (एकान्तछंद) आणि एकाच ध्येयाचे (एकान्तअज्झोसान) असतात काय?” “देवाधिपती शक्रा, सर्वच श्रमण आणि ब्राह्मण हे एकाच सिद्धांताचे, एकाच शीलाचे, एकाच इच्छेचे आणि एकाच ध्येयाचे नसतात.” ‘‘กสฺมา ปน, มาริส, น สพฺเพ สมณพฺราหฺมณา เอกนฺตวาทา เอกนฺตสีลา เอกนฺตฉนฺทา เอกนฺตอชฺโฌสานา’’ติ? ‘‘อเนกธาตุ นานาธาตุ โข, เทวานมินฺท, โลโก. ตสฺมึ อเนกธาตุนานาธาตุสฺมึ โลเก ยํ ยเทว สตฺตา ธาตุํ อภินิวิสนฺติ, ตํ ตเทว ถามสา ปรามาสา อภินิวิสฺส โวหรนฺติ – ‘อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญ’นฺติ. ตสฺมา น สพฺเพ สมณพฺราหฺมณา เอกนฺตวาทา เอกนฺตสีลา เอกนฺตฉนฺทา เอกนฺตอชฺโฌสานา’’ติ. “परंतु हे सौम्य, सर्वच श्रमण आणि ब्राह्मण हे एकाच सिद्धांताचे, एकाच शीलाचे, एकाच इच्छेचे आणि एकाच ध्येयाचे का नसतात?” “देवाधिपती शक्रा, हा लोक (संसार) अनेक धातूंनी (विविध प्रवृत्तींनी) आणि नानाविध धातूंनी बनलेला आहे. त्या अनेकविध व नानाविध धातूंच्या जगात प्राणी ज्या ज्या प्रवृत्तीला (धातूला) चिकटून राहतात, तिलाच ते अत्यंत हट्टाने व आग्रहाने धरून ठेवतात आणि म्हणतात—‘हेच सत्य आहे, इतर सर्व व्यर्थ आहे.’ म्हणूनच सर्व श्रमण आणि ब्राह्मण हे एकाच सिद्धांताचे, एकाच शीलाचे, एकाच इच्छेचे आणि एकाच ध्येयाचे नसतात.” ‘‘สพฺเพว นุ โข, มาริส, สมณพฺราหฺมณา อจฺจนฺตนิฏฺฐา อจฺจนฺตโยคกฺเขมี อจฺจนฺตพฺรหฺมจารี อจฺจนฺตปริโยสานา’’ติ? ‘‘น โข, เทวานมินฺท, สพฺเพ สมณพฺราหฺมณา อจฺจนฺตนิฏฺฐา อจฺจนฺตโยคกฺเขมี อจฺจนฺตพฺรหฺมจารี อจฺจนฺตปริโยสานา’’ติ. “हे सौम्य, सर्वच श्रमण आणि ब्राह्मण हे अत्यंत निष्ठावान (अत्यंत अंतिम ध्येय गाठलेले), अत्यंत योगक्षेम प्राप्त केलेले (अच्चन्तयोगक्खेमी), अत्यंत ब्रह्मचर्य पाळणारे आणि अत्यंत अंतिम समाप्तीला (अच्चन्तपरियोसान) पोहोचलेले असतात काय?” “देवाधिपती शक्रा, सर्वच श्रमण आणि ब्राह्मण हे अत्यंत निष्ठावान, अत्यंत योगक्षेम प्राप्त केलेले, अत्यंत ब्रह्मचर्य पाळणारे आणि अत्यंत अंतिम समाप्तीला पोहोचलेले नसतात.” ‘‘กสฺมา [Pg.226] ปน, มาริส, น สพฺเพ สมณพฺราหฺมณา อจฺจนฺตนิฏฺฐา อจฺจนฺตโยคกฺเขมี อจฺจนฺตพฺรหฺมจารี อจฺจนฺตปริโยสานา’’ติ? ‘‘เย โข, เทวานมินฺท, ภิกฺขู ตณฺหาสงฺขยวิมุตฺตา เต อจฺจนฺตนิฏฺฐา อจฺจนฺตโยคกฺเขมี อจฺจนฺตพฺรหฺมจารี อจฺจนฺตปริโยสานา. ตสฺมา น สพฺเพ สมณพฺราหฺมณา อจฺจนฺตนิฏฺฐา อจฺจนฺตโยคกฺเขมี อจฺจนฺตพฺรหฺมจารี อจฺจนฺตปริโยสานา’’ติ. “परंतु हे सौम्य, सर्वच श्रमण आणि ब्राह्मण हे अत्यंत निष्ठावान, अत्यंत योगक्षेम प्राप्त केलेले, अत्यंत ब्रह्मचर्य पाळणारे आणि अत्यंत अंतिम समाप्तीला पोहोचलेले का नसतात?” “देवाधिपती शक्रा, जे भिक्षू तृष्णेच्या क्षयामुळे विमुक्त (तृष्णासंक्षयविमुक्त) झाले आहेत, तेच अत्यंत निष्ठावान, अत्यंत योगक्षेम प्राप्त केलेले, अत्यंत ब्रह्मचर्य पाळणारे आणि अत्यंत अंतिम समाप्तीला पोहोचलेले असतात. म्हणूनच सर्व श्रमण आणि ब्राह्मण हे अत्यंत निष्ठावान, अत्यंत योगक्षेम प्राप्त केलेले, अत्यंत ब्रह्मचर्य पाळणारे आणि अत्यंत अंतिम समाप्तीला पोहोचलेले नसतात.” อิตฺถํ ภควา สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส ปญฺหํ ปุฏฺโฐ พฺยากาสิ. อตฺตมโน สกฺโก เทวานมินฺโท ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิ อนุโมทิ – ‘‘เอวเมตํ, ภควา, เอวเมตํ, สุคต. ติณฺณา เมตฺถ กงฺขา วิคตา กถํกถา ภควโต ปญฺหเวยฺยากรณํ สุตฺวา’’ติ. अशा प्रकारे भगवंतांनी देवांचा राजा शक्र याने विचारलेल्या प्रश्नाचे उत्तर दिले. संतुष्ट झालेल्या देवांच्या राजा शक्राने भगवंतांच्या उपदेशाचे अभिनंदन केले व आनंद व्यक्त केला— “हे भगवंत, हे असेच आहे; हे सुगता, हे असेच आहे. भगवंतांचे प्रश्नाचे उत्तर ऐकून माझी याविषयीची शंका दूर झाली आहे आणि संभ्रम नाहीसा झाला आहे.” ๓๖๗. อิติห สกฺโก เทวานมินฺโท ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทิตฺวา อนุโมทิตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ३६७. अशा प्रकारे देवांचा राजा शक्र भगवंतांच्या उपदेशाचे अभिनंदन करून व आनंद व्यक्त करून भगवंतांना म्हणाला— ‘‘เอชา, ภนฺเต, โรโค, เอชา คณฺโฑ, เอชา สลฺลํ, เอชา อิมํ ปุริสํ ปริกฑฺฒติ ตสฺส ตสฺเสว ภวสฺส อภินิพฺพตฺติยา. ตสฺมา อยํ ปุริโส อุจฺจาวจมาปชฺชติ. เยสาหํ, ภนฺเต, ปญฺหานํ อิโต พหิทฺธา อญฺเญสุ สมณพฺราหฺมเณสุ โอกาสกมฺมมฺปิ นาลตฺถํ, เต เม ภควตา พฺยากตา. ทีฆรตฺตานุสยิตญฺจ ปน เม วิจิกิจฺฉากถํกถาสลฺลํ, ตญฺจ ภควตา อพฺพุฬฺห’’นฺติ. “भन्ते, तृष्णा (एजा) हा एक रोग आहे, तृष्णा हा एक गंड (गळू) आहे, तृष्णा हा एक शल्य (काटा) आहे. ही तृष्णा या मनुष्याला त्या त्या भवामध्ये वारंवार जन्म घेण्यासाठी खेचून नेते. म्हणूनच हा मनुष्य उच्च-नीच अवस्थांमध्ये पडतो. भन्ते, ज्या प्रश्नांना विचारण्याची संधी मला या शासनाबाहेरील इतर श्रमण आणि ब्राह्मणांकडे मिळाली नव्हती, त्या प्रश्नांची उत्तरे भगवंतांनी मला दिली आहेत. माझ्या मनात दीर्घकाळापासून वास करणारे संशय आणि संभ्रमाचे शल्य भगवंतांनी उपसून टाकले आहे.” ‘‘อภิชานาสิ โน ตฺวํ, เทวานมินฺท, อิเม ปญฺเห อญฺเญ สมณพฺราหฺมเณ ปุจฺฉิตา’’ติ? ‘‘อภิชานามหํ, ภนฺเต, อิเม ปญฺเห อญฺเญ สมณพฺราหฺมเณ ปุจฺฉิตา’’ติ. ‘‘ยถา กถํ ปน เต, เทวานมินฺท, พฺยากํสุ? สเจ เต อครุ ภาสสฺสู’’ติ. ‘‘น โข เม, ภนฺเต, ครุ ยตฺถสฺส ภควา นิสินฺโน ภควนฺตรูโป วา’’ติ. ‘‘เตน หิ, เทวานมินฺท, ภาสสฺสู’’ติ. ‘‘เยสฺวาหํ, ภนฺเต, มญฺญามิ สมณพฺราหฺมณา อารญฺญิกา ปนฺตเสนาสนาติ, ตฺยาหํ อุปสงฺกมิตฺวา อิเม ปญฺเห ปุจฺฉามิ, เต มยา ปุฏฺฐา น สมฺปายนฺติ, อสมฺปายนฺตา มมํเยว ปฏิปุจฺฉนฺติ – ‘โก นาโม อายสฺมา’ติ? เตสาหํ ปุฏฺโฐ พฺยากโรมิ – ‘อหํ โข, มาริส, สกฺโก เทวานมินฺโท’ติ. เต มมํเยว อุตฺตริ ปฏิปุจฺฉนฺติ – ‘กึ ปนายสฺมา, เทวานมินฺท, กมฺมํ กตฺวา อิมํ ฐานํ ปตฺโต’ติ? เตสาหํ ยถาสุตํ ยถาปริยตฺตํ ธมฺมํ เทเสมิ. เต ตาวตเกเนว อตฺตมนา [Pg.227] โหนฺติ – ‘สกฺโก จ โน เทวานมินฺโท ทิฏฺโฐ, ยญฺจ โน อปุจฺฉิมฺหา, ตญฺจ โน พฺยากาสี’ติ. เต อญฺญทตฺถุ มมํเยว สาวกา สมฺปชฺชนฺติ, น จาหํ เตสํ. อหํ โข ปน, ภนฺเต, ภควโต สาวโก โสตาปนฺโน อวินิปาตธมฺโม นิยโต สมฺโพธิปรายโณ’’ติ. "हे देवाधिपती इंद्रा! तू हे प्रश्न इतर श्रमण-ब्राह्मणांना विचारल्याचे तुला आठवते का?" "होय, भन्ते! मला आठवते की मी हे प्रश्न इतर श्रमण-ब्राह्मणांना विचारले होते." "तर मग, देवाधिपती इंद्रा, त्यांनी काय उत्तर दिले? जर तुला काही अडचण नसेल, तर कृपया सांग." "भन्ते, जिथे भगवान किंवा भगवंतांसारखे पूजनीय पुरुष विराजमान आहेत, तिथे सांगण्यास मला कोणतीही अडचण नाही." "तर मग, देवाधिपती इंद्रा, सांग." "भन्ते, ज्या श्रमण-ब्राह्मणांना मी अरण्यवासी आणि एकांतात राहणारे मानत असे, त्यांच्याकडे जाऊन मी हे प्रश्न विचारत असे. माझ्याद्वारे विचारले असता ते योग्य उत्तर देऊ शकत नसत. उत्तर देण्यास असमर्थ ठरल्यामुळे ते मलाच उलट विचारत असत—'आयुष्यमान, आपले नाव काय आहे?' त्यांनी विचारल्यावर मी त्यांना सांगत असे—'हे महाशयांनो, मी शक्र, देवांचा राजा इंद्र आहे.' मग ते मला पुढे विचारत असत—'पण आयुष्यमान देवाधिपती इंद्रा, आपण कोणते कर्म करून या पदाला प्राप्त झालात?' मग मी त्यांना जसे ऐकले होते आणि जसे शिकलो होतो, त्यानुसार धम्माचा उपदेश करत असे. तेवढ्यानेच ते अत्यंत संतुष्ट होत असत आणि म्हणत—'आम्ही देवांचा राजा शक्र याला पाहिले आणि आम्ही जे प्रश्न विचारले होते, त्यांची उत्तरेही त्याने आम्हाला दिली.' अशा प्रकारे ते माझेच श्रावक बनत असत, मी त्यांचा नाही. परंतु, भन्ते, मी तर भगवंतांचा श्रावक, स्रोतापन्न आहे, दुर्गतीला न जाणारा, नियत आणि संबोधीकडे जाणारा आहे." โสมนสฺสปฏิลาภกถา "सोमनस्य-प्राप्तीची कथा" ๓๖๘. ‘‘อภิชานาสิ โน ตฺวํ, เทวานมินฺท, อิโต ปุพฺเพ เอวรูปํ เวทปฏิลาภํ โสมนสฺสปฏิลาภ’’นฺติ? ‘‘อภิชานามหํ, ภนฺเต, อิโต ปุพฺเพ เอวรูปํ เวทปฏิลาภํ โสมนสฺสปฏิลาภ’’นฺติ. ‘‘ยถา กถํ ปน ตฺวํ, เทวานมินฺท, อภิชานาสิ อิโต ปุพฺเพ เอวรูปํ เวทปฏิลาภํ โสมนสฺสปฏิลาภ’’นฺติ? ३६८. "हे देवाधिपती इंद्रा, तुला यापूर्वी कधी अशा प्रकारचा आनंद आणि सोमनस्य मिळाल्याचे आठवते का?" "होय, भन्ते, मला यापूर्वी अशा प्रकारचा आनंद आणि सोमनस्य मिळाल्याचे आठवते." "तर मग, देवाधिपती इंद्रा, तुला यापूर्वी अशा प्रकारचा आनंद आणि सोमनस्य मिळाल्याचे कसे काय आठवते?" ‘‘ภูตปุพฺพํ, ภนฺเต, เทวาสุรสงฺคาโม สมุปพฺยูฬฺโห อโหสิ. ตสฺมึ โข ปน, ภนฺเต, สงฺคาเม เทวา ชินึสุ, อสุรา ปราชยึสุ. ตสฺส มยฺหํ, ภนฺเต, ตํ สงฺคามํ อภิวิชินิตฺวา วิชิตสงฺคามสฺส เอตทโหสิ – ‘ยา เจว ทานิ ทิพฺพา โอชา ยา จ อสุรา โอชา, อุภยเมตํ เทวา ปริภุญฺชิสฺสนฺตี’ติ. โส โข ปน เม, ภนฺเต, เวทปฏิลาโภ โสมนสฺสปฏิลาโภ สทณฺฑาวจโร สสตฺถาวจโร น นิพฺพิทาย น วิราคาย น นิโรธาย น อุปสมาย น อภิญฺญาย น สมฺโพธาย น นิพฺพานาย สํวตฺตติ. โย โข ปน เม อยํ, ภนฺเต, ภควโต ธมฺมํ สุตฺวา เวทปฏิลาโภ โสมนสฺสปฏิลาโภ, โส อทณฺฑาวจโร อสตฺถาวจโร เอกนฺตนิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย อุปสมาย อภิญฺญาย สมฺโพธาย นิพฺพานาย สํวตฺตตี’’ติ. "भन्ते, पूर्वीच्या काळी देव आणि असुरांमध्ये मोठे युद्ध झाले होते. भन्ते, त्या युद्धात देवांचा विजय झाला आणि असुरांचा पराभव झाला. भन्ते, त्या युद्धात विजय मिळवल्यानंतर, विजयी झालेल्या माझ्या मनात असा विचार आला—'आता जी काही दिव्य ओज आहे आणि जी असुरांची ओज आहे, या दोन्हीचा उपभोग केवळ देवच घेतील.' परंतु, भन्ते, तो आनंद आणि सोमनस्य हे दंड आणि शस्त्रास्त्रांनी युक्त होते; ते वैराग्यासाठी, अनासक्तीसाठी, निरोधासाठी, उपशमासाठी, अभिज्ञेसाठी, संबोधीसाठी आणि निर्वाणासाठी पूरक नव्हते. परंतु, भन्ते, भगवंतांचा धम्म ऐकून मला जो आनंद आणि सोमनस्य प्राप्त झाले आहे, ते दंडाशिवाय आणि शस्त्रांशिवाय आहे; ते पूर्ण वैराग्यासाठी, अनासक्तीसाठी, निरोधासाठी, उपशमासाठी, अभिज्ञेसाठी, संबोधीसाठी आणि निर्वाणासाठी पूरक आहे." ๓๖๙. ‘‘กึ ปน ตฺวํ, เทวานมินฺท, อตฺถวสํ สมฺปสฺสมาโน เอวรูปํ เวทปฏิลาภํ โสมนสฺสปฏิลาภํ ปเวเทสี’’ติ? ‘‘ฉ โข อหํ, ภนฺเต, อตฺถวเส สมฺปสฺสมาโน เอวรูปํ เวทปฏิลาภํ โสมนสฺสปฏิลาภํ ปเวเทมิ. ३६९. "पण देवाधिपती इंद्रा, तू कोणता विशेष लाभ पाहून अशा प्रकारच्या आनंद आणि सोमनस्याची प्रशंसा करत आहेस?" "भन्ते, मी सहा विशेष लाभ पाहून अशा प्रकारच्या आनंद आणि सोमनस्याची प्रशंसा करत आहे." ‘‘อิเธว ติฏฺฐมานสฺส, เทวภูตสฺส เม สโต; ปุนรายุ จ เม ลทฺโธ, เอวํ ชานาหิ มาริส. "याच देवलोकात राहून, देव रूपात असतानाच, मला पुन्हा नवीन आयुष्य प्राप्त झाले आहे; हे महाशया, आपण असे जाणावे." ‘‘อิมํ [Pg.228] โข อหํ, ภนฺเต, ปฐมํ อตฺถวสํ สมฺปสฺสมาโน เอวรูปํ เวทปฏิลาภํ โสมนสฺสปฏิลาภํ ปเวเทมิ. "भन्ते, हा पहिला विशेष लाभ पाहून मी अशा प्रकारच्या आनंद आणि सोमनस्याची प्रशंसा करत आहे." ‘‘จุตาหํ ทิวิยา กายา, อายุํ หิตฺวา อมานุสํ; อมูฬฺโห คพฺภเมสฺสามิ, ยตฺถ เม รมตี มโน. "या दिव्य शरीरातून च्युत होऊन, अमानुष आयुष्याचा त्याग करून, मी मोहविरहित होऊन अशा कुळात जन्म घेईन, जिथे माझे मन रमेल." ‘‘อิมํ โข อหํ, ภนฺเต, ทุติยํ อตฺถวสํ สมฺปสฺสมาโน เอวรูปํ เวทปฏิลาภํ โสมนสฺสปฏิลาภํ ปเวเทมิ. "भन्ते, हा दुसरा विशेष लाभ पाहून मी अशा प्रकारच्या आनंद आणि सोमनस्याची प्रशंसा करत आहे." ‘‘สฺวาหํ อมูฬฺหปญฺญสฺส, วิหรํ สาสเน รโต; ญาเยน วิหริสฺสามิ, สมฺปชาโน ปฏิสฺสโต. "तो मी, मोहविरहित प्रज्ञा असलेल्या भगवंतांच्या शासनात रममाण होऊन, योग्य मार्गाने, जागरूक आणि स्मृतिमान राहून जीवन जगू शकेन." ‘‘อิมํ โข อหํ, ภนฺเต, ตติยํ อตฺถวสํ สมฺปสฺสมาโน เอวรูปํ เวทปฏิลาภํ โสมนสฺสปฏิลาภํ ปเวเทมิ. "भन्ते, हा तिसरा विशेष लाभ पाहून मी अशा प्रकारच्या आनंद आणि सोमनस्याची प्रशंसा करत आहे." ‘‘ญาเยน เม จรโต จ, สมฺโพธิ เจ ภวิสฺสติ; อญฺญาตา วิหริสฺสามิ, สฺเวว อนฺโต ภวิสฺสติ. "योग्य मार्गाने आचरण करत असताना जर मला संबोधी प्राप्त झाली, तर मी उच्च ज्ञान प्राप्त करण्याची इच्छा ठेवून राहीन; आणि तोच माझा या मनुष्यलोकातील शेवटचा जन्म असेल." ‘‘อิมํ โข อหํ, ภนฺเต, จตุตฺถํ อตฺถวสํ สมฺปสฺสมาโน เอวรูปํ เวทปฏิลาภํ โสมนสฺสปฏิลาภํ ปเวเทมิ. "भन्ते, हा चौथा विशेष लाभ पाहून मी अशा प्रकारच्या आनंद आणि सोमनस्याची प्रशंसा करत आहे." ‘‘จุตาหํ มานุสา กายา, อายุํ หิตฺวาน มานุสํ; ปุน เทโว ภวิสฺสามิ, เทวโลกมฺหิ อุตฺตโม. "त्या मानवी शरीरातून च्युत होऊन, मानवी आयुष्याचा त्याग करून, मी पुन्हा देवलोकात एक श्रेष्ठ देव होईन." ‘‘อิมํ โข อหํ, ภนฺเต, ปญฺจมํ อตฺถวสํ สมฺปสฺสมาโน เอวรูปํ เวทปฏิลาภํ โสมนสฺสปฏิลาภํ ปเวเทมิ. "भन्ते, हा पाचवा विशेष लाभ पाहून मी अशा प्रकारच्या आनंद आणि सोमनस्याची प्रशंसा करत आहे." ‘‘เต ปณีตตรา เทวา, อกนิฏฺฐา ยสสฺสิโน; อนฺติเม วตฺตมานมฺหิ, โส นิวาโส ภวิสฺสติ. "जे अत्यंत श्रेष्ठ आणि यशस्वी अकनिष्ठ नावाचे देव आहेत; माझ्या अंतिम जन्मात ते अकनिष्ठ भुवन हेच माझे निवासस्थान असेल." ‘‘อิมํ โข อหํ, ภนฺเต, ฉฏฺฐํ อตฺถวสํ สมฺปสฺสมาโน เอวรูปํ เวทปฏิลาภํ โสมนสฺสปฏิลาภํ ปเวเทมิ. "भन्ते, हा सहावा विशेष लाभ पाहून मी अशा प्रकारच्या आनंद आणि सोमनस्याची प्रशंसा करत आहे." ‘‘อิเม โข อหํ, ภนฺเต, ฉ อตฺถวเส สมฺปสฺสมาโน เอวรูปํ เวทปฏิลาภํ โสมนสฺสปฏิลาภํ ปเวเทมิ. "भन्ते, हे सहा विशेष लाभ पाहून मी अशा प्रकारच्या आनंद आणि सोमनस्याची प्रशंसा करत आहे." ๓๗๐.‘‘อปริโยสิตสงฺกปฺโป[Pg.229], วิจิกิจฺโฉ กถํกถี. ३७०. "ज्यांचे संकल्प अपूर्ण होते, जो संशयी आणि संभ्रमात पडलेला होता," วิจรึ ทีฆมทฺธานํ, อนฺเวสนฺโต ตถาคตํ. "असा मी तथागतांचा शोध घेत दीर्घकाळ भटकत राहिलो." ‘‘ยสฺสุ มญฺญามิ สมเณ, ปวิวิตฺตวิหาริโน; สมฺพุทฺธา อิติ มญฺญาโน, คจฺฉามิ เต อุปาสิตุํ. "ज्या श्रमणांना मी एकांतात राहणारे मानत असे, ते सम्यक संबुद्ध आहेत असे समजून मी त्यांच्या सेवेसाठी जात असे." ‘‘‘กถํ อาราธนา โหติ, กถํ โหติ วิราธนา’; อิติ ปุฏฺฐา น สมฺปายนฺติ, มคฺเค ปฏิปทาสุ จ. "'कशा प्रकारे मार्गाची प्राप्ती होते आणि कशा प्रकारे अप्राप्ती होते?' असे विचारले असता, ते मार्ग आणि आचरणाविषयी योग्य उत्तर देऊ शकत नसत." ‘‘ตฺยสฺสุ ยทา มํ ชานนฺติ, สกฺโก เทวานมาคโต; ตฺยสฺสุ มเมว ปุจฺฉนฺติ, ‘กึ กตฺวา ปาปุณี อิทํ’. "जेव्हा त्यांना समजायचे की देवांचा राजा शक्र आला आहे, तेव्हा ते मलाच विचारत असत—'आपण काय करून हे पद प्राप्त केले?'" ‘‘เตสํ ยถาสุตํ ธมฺมํ, เทสยามิ ชเน สุตํ ; เตน อตฺตมนา โหนฺติ, ‘ทิฏฺโฐ โน วาสโวติ จ’. "मी त्यांना लोकांमध्ये ऐकलेला आणि जसा ऐकला होता तसा धम्म उपदेश करत असे. त्याने ते संतुष्ट होत असत आणि म्हणत—'आम्ही वासवाला पाहिले.'" ‘‘ยทา จ พุทฺธมทฺทกฺขึ, วิจิกิจฺฉาวิตารณํ; โสมฺหิ วีตภโย อชฺช, สมฺพุทฺธํ ปยิรุปาสิย. "परंतु जेव्हा मी संशयाचे निवारण करणाऱ्या बुद्धांना पाहिले, तेव्हा आज मी भयमुक्त होऊन त्या सम्यक संबुद्धांची सेवा करत आहे." ‘‘ตณฺหาสลฺลสฺส หนฺตารํ, พุทฺธํ อปฺปฏิปุคฺคลํ; อหํ วนฺเท มหาวีรํ, พุทฺธมาทิจฺจพนฺธุนํ. "तृष्णारूपी शल्याचा नाश करणाऱ्या, अद्वितीय, महावीर आणि सूर्यवंशी असलेल्या त्या बुद्ध भगवंतांना मी वंदन करतो." ‘‘ยํ กโรมสิ พฺรหฺมุโน, สมํ เทเวหิ มาริส; ตทชฺช ตุยฺหํ กสฺสาม, หนฺท สามํ กโรม เต. "हे महाशया, पूर्वी आम्ही देवांसह ब्रह्माची जी वंदना करत होतो, ती आज आम्ही आपणास अर्पण करत आहोत. चला, आम्ही स्वतः आपणास वंदन करतो." ‘‘ตฺวเมว อสิ สมฺพุทฺโธ, ตุวํ สตฺถา อนุตฺตโร; สเทวกสฺมึ โลกสฺมึ, นตฺถิ เต ปฏิปุคฺคโล’’ติ. "आपणच सम्यक संबुद्ध आहात, आपणच सर्वश्रेष्ठ शास्ता आहात. देवलोकासह या संपूर्ण जगात आपल्या तोडीचा दुसरा कोणीही नाही." ๓๗๑. อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท ปญฺจสิขํ คนฺธพฺพปุตฺตํ อามนฺเตสิ – ‘‘พหูปกาโร โข เมสิ ตฺวํ, ตาต ปญฺจสิข, ยํ ตฺวํ ภควนฺตํ ปฐมํ ปสาเทสิ. ตยา, ตาต, ปฐมํ ปสาทิตํ ปจฺฉา มยํ ตํ ภควนฺตํ ทสฺสนาย อุปสงฺกมิมฺหา อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธํ. เปตฺติเก วา ฐาเน ฐปยิสฺสามิ[Pg.230], คนฺธพฺพราชา ภวิสฺสสิ, ภทฺทญฺจ เต สูริยวจฺฉสํ ทมฺมิ, สา หิ เต อภิปตฺถิตา’’ติ. ३७१. त्यानंतर देवांचा राजा शक्र याने पंचशिख गंधर्वपुत्राला संबोधित केले – “प्रिय पंचशिख, तू माझ्यावर मोठे उपकार केले आहेत, कारण तूच भगवंतांना सर्वप्रथम प्रसन्न केलेस. प्रिय पंचशिख, तू आधी प्रसन्न केल्यामुळेच नंतर आम्ही त्या अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवंतांच्या दर्शनासाठी त्यांच्याकडे जाऊ शकलो. मी तुला तुझ्या पित्याच्या स्थानी प्रस्थापित करेन, तू गंधर्वराज होशील आणि मी तुला कल्याणकारी सूर्यवच्चसा प्रदान करेन, कारण तू तिचीच तीव्र इच्छा केली होतीस.” อถ โข สกฺโก เทวานมินฺโท ปาณินา ปถวึ ปรามสิตฺวา ติกฺขตฺตุํ อุทานํ อุทาเนสิ – ‘‘นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺสา’’ติ. त्यानंतर देवांचा राजा शक्र याने आपल्या हाताने पृथ्वीला स्पर्श करून तीन वेळा हा उद्गार काढला – “त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांना माझा नमस्कार असो!” อิมสฺมิญฺจ ปน เวยฺยากรณสฺมึ ภญฺญมาเน สกฺกสฺส เทวานมินฺทสฺส วิรชํ วีตมลํ ธมฺมจกฺขุํ อุทปาทิ – ‘‘ยํ กิญฺจิ สมุทยธมฺมํ, สพฺพํ ตํ นิโรธธมฺม’’นฺติ. อญฺเญสญฺจ อสีติยา เทวตาสหสฺสานํ, อิติ เย สกฺเกน เทวานมินฺเทน อชฺฌิฏฺฐปญฺหา ปุฏฺฐา, เต ภควตา พฺยากตา. ตสฺมา อิมสฺส เวยฺยากรณสฺส สกฺกปญฺหาตฺเวว อธิวจนนฺติ. आणि हे व्याकरण सांगितले जात असताना, देवांचा राजा शक्र याला विरज आणि वीतमल धम्मचक्षू प्राप्त झाला – “जे काही उत्पन्न होण्याच्या स्वभावाचे आहे, ते सर्व निरुद्ध होण्याच्या स्वभावाचे आहे.” तसेच इतर ऐंशी हजार देवतांनाही धम्मचक्षू प्राप्त झाला. अशा प्रकारे देवांचा राजा शक्र याने विचारलेले प्रश्न भगवंतांनी स्पष्ट केले. म्हणूनच या व्याकरणाला ‘सक्कपञ्ह’ (शक्रप्रश्न) असे नाव पडले. สกฺกปญฺหสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ อฏฺฐมํ. आठवे सक्कपञ्हसुत्त समाप्त झाले. ๙. มหาสติปฏฺฐานสุตฺตํ ९. महासतिपट्ठानसुत्त ๓๗๒. เอวํ [Pg.231] เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา กุรูสุ วิหรติ กมฺมาสธมฺมํ นาม กุรูนํ นิคโม. ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘ภิกฺขโว’’ติ. ‘‘ภทฺทนฺเต’’ติ เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ. ภควา เอตทโวจ – ३७२. मी असे ऐकले आहे – एका वेळी भगवंत कुरु देशात कम्मासधम्म नावाच्या कुरुंच्या नगरात विहार करत होते. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – “भिक्खूंनो!” त्यावर त्या भिक्खूंनी भगवंतांना प्रत्युत्तर दिले – “भदंत!” भगवंत असे म्हणाले – อุทฺเทโส उद्देश ๓๗๓. ‘‘เอกายโน อยํ, ภิกฺขเว, มคฺโค สตฺตานํ วิสุทฺธิยา, โสกปริเทวานํ สมติกฺกมาย ทุกฺขโทมนสฺสานํ อตฺถงฺคมาย ญายสฺส อธิคมาย นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยาย, ยทิทํ จตฺตาโร สติปฏฺฐานา. ३७३. “भिक्खूंनो, प्राण्यांच्या शुद्धीसाठी, शोक आणि रडणे-ओरडणे पार करण्यासाठी, दुःख आणि दौर्मनस्य नष्ट करण्यासाठी, सन्मार्ग प्राप्त करण्यासाठी आणि निर्वाणाचा साक्षात्कार करण्यासाठी हा एकच मार्ग आहे, ज्याला ‘चार सतिपट्ठान’ असे म्हणतात. ‘‘กตเม จตฺตาโร? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ, เวทนาสุ เวทนานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา, วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ, จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ, ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. “ते चार कोणते? भिक्खूंनो, या शासनात भिक्खू कायेमध्ये कायेचे सतत दर्शन करत विहार करतो; तो उद्योगी, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान असतो, आणि जगातील अभिज्झा व दौर्मनस्य दूर करतो. वेदनांमध्ये वेदनांचे सतत दर्शन करत विहार करतो; तो उद्योगी, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान असतो, आणि जगातील अभिज्झा व दौर्मनस्य दूर करतो. चित्तामध्ये चित्ताचे सतत दर्शन करत विहार करतो; तो उद्योगी, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान असतो, आणि जगातील अभिज्झा व दौर्मनस्य दूर करतो. धम्मांमध्ये धम्मांचे सतत दर्शन करत विहार करतो; तो उद्योगी, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान असतो, आणि जगातील अभिज्झा व दौर्मनस्य दूर करतो.” อุทฺเทโส นิฏฺฐิโต. उद्देश समाप्त झाला. กายานุปสฺสนา อานาปานปพฺพํ कायानुपस्सना: आनापानपब्ब ๓๗๔. ‘‘กถญฺจ ปน, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อรญฺญคโต วา รุกฺขมูลคโต วา สุญฺญาคารคโต วา นิสีทติ ปลฺลงฺกํ อาภุชิตฺวา อุชุํ กายํ ปณิธาย ปริมุขํ สตึ อุปฏฺฐเปตฺวา. โส สโตว อสฺสสติ, สโตว ปสฺสสติ. ทีฆํ วา อสฺสสนฺโต ‘ทีฆํ อสฺสสามี’ติ ปชานาติ, ทีฆํ วา ปสฺสสนฺโต ‘ทีฆํ ปสฺสสามี’ติ ปชานาติ. รสฺสํ วา อสฺสสนฺโต ‘รสฺสํ อสฺสสามี’ติ ปชานาติ, รสฺสํ วา ปสฺสสนฺโต ‘รสฺสํ ปสฺสสามี’ติ ปชานาติ. ‘สพฺพกายปฏิสํเวที อสฺสสิสฺสามี’ติ สิกฺขติ[Pg.232], ‘สพฺพกายปฏิสํเวที ปสฺสสิสฺสามี’ติ สิกฺขติ. ‘ปสฺสมฺภยํ กายสงฺขารํ อสฺสสิสฺสามี’ติ สิกฺขติ, ‘ปสฺสมฺภยํ กายสงฺขารํ ปสฺสสิสฺสามี’ติ สิกฺขติ. ३७४. “आणि भिक्खूंनो, भिक्खू कायेमध्ये कायेचे सतत दर्शन करत कसा विहार करतो? भिक्खूंनो, या शासनात भिक्खू अरण्यात जाऊन, किंवा वृक्षाच्या मुळाशी जाऊन, किंवा शून्य घरात जाऊन, मांडी घालून, शरीर सरळ ठेवून आणि समोर स्मृती प्रस्थापित करून बसतो. तो सजग राहूनच श्वास आत घेतो आणि सजग राहूनच श्वास बाहेर सोडतो. दीर्घ श्वास आत घेताना ‘मी दीर्घ श्वास आत घेत आहे’ असे तो जाणतो; दीर्घ श्वास बाहेर सोडताना ‘मी दीर्घ श्वास बाहेर सोडत आहे’ असे तो जाणतो. लहान श्वास आत घेताना ‘मी लहान श्वास आत घेत आहे’ असे तो जाणतो; लहान श्वास बाहेर सोडताना ‘मी लहान श्वास बाहेर सोडत आहे’ असे तो जाणतो. ‘संपूर्ण कायेचा अनुभव घेत मी श्वास आत घेईन’ असा तो सराव करतो; ‘संपूर्ण कायेचा अनुभव घेत मी श्वास बाहेर सोडेन’ असा तो सराव करतो. ‘काया-संस्कारांना शांत करत मी श्वास आत घेईन’ असा तो सराव करतो; ‘काया-संस्कारांना शांत करत मी श्वास बाहेर सोडेन’ असा तो सराव करतो.” ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ทกฺโข ภมกาโร วา ภมการนฺเตวาสี วา ทีฆํ วา อญฺฉนฺโต ‘ทีฆํ อญฺฉามี’ติ ปชานาติ, รสฺสํ วา อญฺฉนฺโต ‘รสฺสํ อญฺฉามี’ติ ปชานาติ เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ทีฆํ วา อสฺสสนฺโต ‘ทีฆํ อสฺสสามี’ติ ปชานาติ, ทีฆํ วา ปสฺสสนฺโต ‘ทีฆํ ปสฺสสามี’ติ ปชานาติ, รสฺสํ วา อสฺสสนฺโต ‘รสฺสํ อสฺสสามี’ติ ปชานาติ, รสฺสํ วา ปสฺสสนฺโต ‘รสฺสํ ปสฺสสามี’ติ ปชานาติ. ‘สพฺพกายปฏิสํเวที อสฺสสิสฺสามี’ติ สิกฺขติ, ‘สพฺพกายปฏิสํเวที ปสฺสสิสฺสามี’ติ สิกฺขติ, ‘ปสฺสมฺภยํ กายสงฺขารํ อสฺสสิสฺสามี’ติ สิกฺขติ, ‘ปสฺสมฺภยํ กายสงฺขารํ ปสฺสสิสฺสามี’ติ สิกฺขติ. อิติ อชฺฌตฺตํ วา กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ, พหิทฺธา วา กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ, อชฺฌตฺตพหิทฺธา วา กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ. สมุทยธมฺมานุปสฺสี วา กายสฺมึ วิหรติ, วยธมฺมานุปสฺสี วา กายสฺมึ วิหรติ, สมุทยวยธมฺมานุปสฺสี วา กายสฺมึ วิหรติ. ‘อตฺถิ กาโย’ติ วา ปนสฺส สติ ปจฺจุปฏฺฐิตา โหติ ยาวเทว ญาณมตฺตาย ปฏิสฺสติมตฺตาย อนิสฺสิโต จ วิหรติ, น จ กิญฺจิ โลเก อุปาทิยติ. เอวมฺปิ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ. “भिक्खूंनो, ज्याप्रमाणे एखादा कुशल कातणारा किंवा त्याचा शिकाऊ उमेदवार दोरी लांब ओढताना ‘मी लांब ओढत आहे’ असे जाणतो, किंवा दोरी लहान ओढताना ‘मी लहान ओढत आहे’ असे जाणतो; उसीप्रमाणे, भिक्खूंनो, भिक्खू दीर्घ श्वास आत घेताना ‘मी दीर्घ श्वास आत घेत आहे’ असे जाणतो, दीर्घ श्वास बाहेर सोडताना ‘मी दीर्घ श्वास बाहेर सोडत आहे’ असे जाणतो, लहान श्वास आत घेताना ‘मी लहान श्वास आत घेत आहे’ असे जाणतो, लहान श्वास बाहेर सोडताना ‘मी लहान श्वास बाहेर सोडत आहे’ असे जाणतो. ‘संपूर्ण कायेचा अनुभव घेत मी श्वास आत घेईन’ असा तो सराव करतो, ‘संपूर्ण कायेचा अनुभव घेत मी श्वास बाहेर सोडेन’ असा तो सराव करतो, ‘काया-संस्कारांना शांत करत मी श्वास आत घेईन’ असा तो सराव करतो, ‘काया-संस्कारांना शांत करत मी श्वास बाहेर सोडेन’ असा तो सराव करतो. अशा प्रकारे तो स्वतःच्या शरीरात कायेचे सतत दर्शन करत विहार करतो, किंवा इतरांच्या शरीरात कायेचे सतत दर्शन करत विहार करतो, किंवा स्वतःच्या आणि इतरांच्या शरीरात कायेचे सतत दर्शन करत विहार करतो. तो कायेमध्ये उत्पत्तीच्या स्वभावाचे सतत दर्शन करत विहार करतो, किंवा कायेमध्ये विनाशाच्या स्वभावाचे सतत दर्शन करत विहार करतो, किंवा कायेमध्ये उत्पत्ती आणि विनाश या दोन्हीच्या स्वभावाचे सतत दर्शन करत विहार करतो. ‘केवळ शरीर अस्तित्वात आहे’ अशी त्याची स्मृती जागृत राहते, जी केवळ ज्ञान आणि सजगता वाढवण्यासाठी उपयुक्त ठरते. तो कशावरही अवलंबून न राहता विहार करतो आणि जगातील कोणत्याही गोष्टीला पकडून ठेवत नाही. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे भिक्खू कायेमध्ये कायेचे सतत दर्शन करत विहार करतो.” อานาปานปพฺพํ นิฏฺฐิตํ. आनापानपब्ब समाप्त झाले. กายานุปสฺสนา อิริยาปถปพฺพํ कायानुपस्सना: इरियापथपब्ब ๓๗๕. ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ คจฺฉนฺโต วา ‘คจฺฉามี’ติ ปชานาติ, ฐิโต วา ‘ฐิโตมฺหี’ติ ปชานาติ, นิสินฺโน วา ‘นิสินฺโนมฺหี’ติ ปชานาติ, สยาโน วา ‘สยาโนมฺหี’ติ ปชานาติ, ยถา ยถา วา ปนสฺส กาโย ปณิหิโต โหติ, ตถา ตถา นํ ปชานาติ. อิติ อชฺฌตฺตํ วา กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ, พหิทฺธา วา กาเย กายานุปสฺสี [Pg.233] วิหรติ, อชฺฌตฺตพหิทฺธา วา กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ. สมุทยธมฺมานุปสฺสี วา กายสฺมึ วิหรติ, วยธมฺมานุปสฺสี วา กายสฺมึ วิหรติ, สมุทยวยธมฺมานุปสฺสี วา กายสฺมึ วิหรติ. ‘อตฺถิ กาโย’ติ วา ปนสฺส สติ ปจฺจุปฏฺฐิตา โหติ ยาวเทว ญาณมตฺตาย ปฏิสฺสติมตฺตาย อนิสฺสิโต จ วิหรติ, น จ กิญฺจิ โลเก อุปาทิยติ. เอวมฺปิ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ. ३७५. “पुन्हा, भिक्खूंनो, भिक्खू चालताना ‘मी चालत आहे’ असे जाणतो, उभा असताना ‘मी उभा आहे’ असे जाणतो, बसलेला असताना ‘मी बसलो आहे’ असे जाणतो, किंवा झोपलेला असताना ‘मी झोपलो आहे’ असे जाणतो. त्याचे शरीर ज्या ज्या स्थितीत ठेवलेले असते, त्या त्या स्थितीला तो तशाच प्रकारे जाणतो. अशा प्रकारे तो स्वतःच्या शरीरात कायेचे सतत दर्शन करत विहार करतो, किंवा इतरांच्या शरीरात कायेचे सतत दर्शन करत विहार करतो, किंवा स्वतःच्या आणि इतरांच्या शरीरात कायेचे सतत दर्शन करत विहार करतो. तो कायेमध्ये उत्पत्तीच्या स्वभावाचे सतत दर्शन करत विहार करतो, किंवा कायेमध्ये विनाशाच्या स्वभावाचे सतत दर्शन करत विहार करतो, किंवा कायेमध्ये उत्पत्ती आणि विनाश या दोन्हीच्या स्वभावाचे सतत दर्शन करत विहार करतो. ‘केवळ शरीर अस्तित्वात आहे’ अशी त्याची स्मृती जागृत राहते, जी केवळ ज्ञान आणि सजगता वाढवण्यासाठी उपयुक्त ठरते. तो कशावरही अवलंबून न राहता विहार करतो आणि जगातील कोणत्याही गोष्टीला पकडून ठेवत नाही. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे भिक्खू कायेमध्ये कायेचे सतत दर्शन करत विहार करतो.” อิริยาปถปพฺพํ นิฏฺฐิตํ. इरियापथपब्ब समाप्त झाले. กายานุปสฺสนา สมฺปชานปพฺพํ कायानुपस्सना: सम्पजानपब्ब ๓๗๖. ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อภิกฺกนฺเต ปฏิกฺกนฺเต สมฺปชานการี โหติ, อาโลกิเต วิโลกิเต สมฺปชานการี โหติ, สมิญฺชิเต ปสาริเต สมฺปชานการี โหติ, สงฺฆาฏิปตฺตจีวรธารเณ สมฺปชานการี โหติ, อสิเต ปีเต ขายิเต สายิเต สมฺปชานการี โหติ, อุจฺจารปสฺสาวกมฺเม สมฺปชานการี โหติ, คเต ฐิเต นิสินฺเน สุตฺเต ชาคริเต ภาสิเต ตุณฺหีภาเว สมฺปชานการี โหติ. อิติ อชฺฌตฺตํ วา…เป… เอวมฺปิ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ. ३७६. “पुन्हा पुढे, भिक्खूहो, भिक्खू पुढे जाताना किंवा मागे वळताना संपजन्यपूर्वक (पूर्ण सजगतेने) कृती करतो; समोर पाहताना किंवा आजूबाजूला पाहताना संपजन्यपूर्वक कृती करतो; हात-पाय वाकवताना किंवा पसरवताना संपजन्यपूर्वक कृती करतो; संघात, पात्र आणि चीवर धारण करताना संपजन्यपूर्वक कृती करतो; खाताना, पिताना, चघळताना आणि चव घेताना संपजन्यपूर्वक कृती करतो; मलमूत्र विसर्जन करताना संपजन्यपूर्वक कृती करतो; चालताना, उभे राहताना, बसताना, झोपताना, जागे असताना, बोलताना किंवा मौन बाळगताना संपजन्यपूर्वक कृती करतो. अशा प्रकारे तो अंतर्गत (स्वतःच्या शरीरात)... याप्रमाणे, भिक्खूहो, भिक्खू शरीरात शरीराचे अनुदर्शन करत विहरतो.” สมฺปชานปพฺพํ นิฏฺฐิตํ. संपजन्य विभाग समाप्त. กายานุปสฺสนา ปฏิกูลมนสิการปพฺพํ कायानुपश्यना: प्रतिकूल-मनसिकार विभाग (शरीराच्या अशुचितेचे चिंतन) ๓๗๗. ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อิมเมว กายํ อุทฺธํ ปาทตลา อโธ เกสมตฺถกา ตจปริยนฺตํ ปูรํ นานปฺปการสฺส อสุจิโน ปจฺจเวกฺขติ – ‘อตฺถิ อิมสฺมึ กาเย เกสา โลมา นขา ทนฺตา ตโจ, มํสํ นฺหารุ อฏฺฐิ อฏฺฐิมิญฺชํ วกฺกํ, หทยํ ยกนํ กิโลมกํ ปิหกํ ปปฺผาสํ, อนฺตํ อนฺตคุณํ [Pg.234] อุทริยํ กรีสํ, ปิตฺตํ เสมฺหํ ปุพฺโพ โลหิตํ เสโท เมโท, อสฺสุ วสา เขโฬ สิงฺฆาณิกา ลสิกา มุตฺต’นฺติ. ३७७. “पुन्हा पुढे, भिक्खूहो, भिक्खू याच शरीराचे, पायाच्या तळव्यापासून वर आणि केसांच्या शेंड्यापासून खाली, त्वचेने वेढलेल्या आणि विविध प्रकारच्या अशुद्धीने भरलेल्या शरीराचे असे निरीक्षण करतो – ‘या शरीरात केस (डोक्याचे), रोम (अंगावरील केस), नखे, दात, त्वचा, मांस, स्नायू (शिरा), हाडे, अस्थिमज्जा, मूत्रपिंड, हृदय, यकृत, पडदा (क्लोम), प्लीहा, फुफ्फुस, मोठे आतडे, लहान आतडे, पोटातील अन्न, विष्ठा, पित्त, कफ, पू, रक्त, घाम, चरबी, अश्रू, वसा (त्वचेचे तेल), लाळ, शेंबूड, लसिका (सांध्यातील द्रव) आणि मूत्र आहे.’” ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, อุภโตมุขา ปุโตฬิ ปูรา นานาวิหิตสฺส ธญฺญสฺส, เสยฺยถิทํ สาลีนํ วีหีนํ มุคฺคานํ มาสานํ ติลานํ ตณฺฑุลานํ. ตเมนํ จกฺขุมา ปุริโส มุญฺจิตฺวา ปจฺจเวกฺเขยฺย – ‘อิเม สาลี, อิเม วีหี อิเม มุคฺคา อิเม มาสา อิเม ติลา อิเม ตณฺฑุลา’ติ. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อิมเมว กายํ อุทฺธํ ปาทตลา อโธ เกสมตฺถกา ตจปริยนฺตํ ปูรํ นานปฺปการสฺส อสุจิโน ปจฺจเวกฺขติ – ‘อตฺถิ อิมสฺมึ กาเย เกสา โลมา…เป… มุตฺต’นฺติ. “ज्याप्रमाणे, भिक्खूहो, दोन्ही बाजूंनी तोंड असलेली एक पिशवी विविध प्रकारच्या धान्यांनी भरलेली असावी, जसे की साळीचे तांदूळ, भात, मूग, उडीद, तीळ आणि तांदूळ; आणि चांगल्या दृष्टी असलेल्या माणसाने ती पिशवी सोडून तिचे निरीक्षण करावे – ‘हे साळीचे तांदूळ आहेत, हा भात आहे, हे मूग आहेत, हे उडीद आहेत, हे तीळ आहेत, हे तांदूळ आहेत.’ त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, भिक्खू याच शरीराचे, पायाच्या तळव्यापासून वर आणि केसांच्या शेंड्यापासून खाली, त्वचेने वेढलेल्या आणि विविध प्रकारच्या अशुद्धीने भरलेल्या शरीराचे असे निरीक्षण करतो – ‘या शरीरात केस, रोम... पे... मूत्र आहे.’” อิติ อชฺฌตฺตํ วา…เป… เอวมฺปิ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ. “अशा प्रकारे तो अंतर्गत... याप्रमाणे, भिक्खूहो, भिक्खू शरीरात शरीराचे अनुदर्शन करत विहरतो.” ปฏิกูลมนสิการปพฺพํ นิฏฺฐิตํ. प्रतिकूल-मनसिकार विभाग समाप्त. กายานุปสฺสนา ธาตุมนสิการปพฺพํ कायानुपश्यना: धातू-मनसिकार विभाग ๓๗๘. ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อิมเมว กายํ ยถาฐิตํ ยถาปณิหิตํ ธาตุโส ปจฺจเวกฺขติ – ‘อตฺถิ อิมสฺมึ กาเย ปถวีธาตุ อาโปธาตุ เตโชธาตุ วาโยธาตู’ติ. ३७८. “पुन्हा पुढे, भिक्खूहो, भिक्खू हे शरीर ज्या स्थितीत आहे, ज्या प्रकारे ठेवलेले आहे, त्या शरीराचे धातूंच्या स्वरूपात निरीक्षण करतो – ‘या शरीरात पृथ्वीधातू, आपधातू (जलधातू), तेजधातू (अग्निधातू) आणि वायूधातू आहेत.’” ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ทกฺโข โคฆาตโก วา โคฆาตกนฺเตวาสี วา คาวึ วธิตฺวา จตุมหาปเถ พิลโส วิภชิตฺวา นิสินฺโน อสฺส, เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อิมเมว กายํ ยถาฐิตํ ยถาปณิหิตํ ธาตุโส ปจฺจเวกฺขติ – ‘อตฺถิ อิมสฺมึ กาเย ปถวีธาตุ อาโปธาตุ เตโชธาตุ วาโยธาตู’ติ. “ज्याप्रमाणे, भिक्खूहो, एखादा कुशल कसाई किंवा त्याचा शिकाऊ सहाय्यक एखाद्या गाईला मारून, चौकामध्ये (चार रस्त्यांच्या संगमावर) तिचे तुकडे करून बसलेला असावा; त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, भिक्खू हे शरीर ज्या स्थितीत आहे, ज्या प्रकारे ठेवलेले आहे, त्या शरीराचे धातूंच्या स्वरूपात निरीक्षण करतो – ‘या शरीरात पृथ्वीधातू, आपधातू, तेजधातू आणि वायूधातू आहेत.’” ‘‘อิติ อชฺฌตฺตํ วา กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ…เป… เอวมฺปิ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ. “अशा प्रकारे तो अंतर्गत शरीरात शरीराचे अनुदर्शन करत विहरतो... याप्रमाणे, भिक्खूहो, भिक्खू शरीरात शरीराचे अनुदर्शन करत विहरतो.” ธาตุมนสิการปพฺพํ นิฏฺฐิตํ. धातू-मनसिकार विभाग समाप्त. กายานุปสฺสนา นวสิวถิกปพฺพํ कायानुपश्यना: नऊ स्मशान-चिंतन विभाग ๓๗๙. ‘‘ปุน [Pg.235] จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เสยฺยถาปิ ปสฺเสยฺย สรีรํ สิวถิกาย ฉฑฺฑิตํ เอกาหมตํ วา ทฺวีหมตํ วา ตีหมตํ วา อุทฺธุมาตกํ วินีลกํ วิปุพฺพกชาตํ. โส อิมเมว กายํ อุปสํหรติ – ‘อยมฺปิ โข กาโย เอวํธมฺโม เอวํภาวี เอวํอนตีโต’ติ. ३७९. “पुन्हा पुढे, भिक्खूहो, भिक्खूने स्मशानात टाकलेले एखादे प्रेत पाहावे—जे एक दिवस झालेले, दोन दिवस झालेले किंवा तीन दिवस झालेले, फुगलेले, निळसर पडलेले आणि पू वाहणारे असावे. तो आपल्या स्वतःच्या शरीराची त्याच्याशी तुलना करतो – ‘माझे हे शरीरसुद्धा याच स्वभावाचे आहे, असेच बनणारे आहे आणि या गतीपासून मुक्त नाही.’” ‘‘อิติ อชฺฌตฺตํ วา …เป… เอวมฺปิ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ. “अशा प्रकारे तो अंतर्गत... याप्रमाणे, भिक्खूहो, भिक्खू शरीरात शरीराचे अनुदर्शन करत विहरतो.” ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เสยฺยถาปิ ปสฺเสยฺย สรีรํ สิวถิกาย ฉฑฺฑิตํ กาเกหิ วา ขชฺชมานํ กุลเลหิ วา ขชฺชมานํ คิชฺเฌหิ วา ขชฺชมานํ กงฺเกหิ วา ขชฺชมานํ สุนเขหิ วา ขชฺชมานํ พฺยคฺเฆหิ วา ขชฺชมานํ ทีปีหิ วา ขชฺชมานํ สิงฺคาเลหิ วา ขชฺชมานํ วิวิเธหิ วา ปาณกชาเตหิ ขชฺชมานํ. โส อิมเมว กายํ อุปสํหรติ – ‘อยมฺปิ โข กาโย เอวํธมฺโม เอวํภาวี เอวํอนตีโต’ติ. “पुन्हा पुढे, भिक्खूहो, भिक्खूने स्मशानात टाकलेले एखादे प्रेत पाहावे—ज्याला कावळे खात आहेत, किंवा सशाणे खात आहेत, किंवा गिधाडे खात आहेत, किंवा करकोचे खात आहेत, किंवा कुत्रे खात आहेत, किंवा वाघ खात आहेत, किंवा चित्ते खात आहेत, किंवा कोल्हे खात आहेत, किंवा विविध प्रकारचे कीटक खात आहेत. तो आपल्या स्वतःच्या शरीराची त्याच्याशी तुलना करतो – ‘माझे हे शरीरसुद्धा याच स्वभावाचे आहे, असेच बनणारे आहे आणि या गतीपासून मुक्त नाही.’” ‘‘อิติ อชฺฌตฺตํ วา…เป… เอวมฺปิ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ. “अशा प्रकारे तो अंतर्गत... याप्रमाणे, भिक्खूहो, भिक्खू शरीरात शरीराचे अनुदर्शन करत विहरतो.” ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เสยฺยถาปิ ปสฺเสยฺย สรีรํ สิวถิกาย ฉฑฺฑิตํ อฏฺฐิกสงฺขลิกํ สมํสโลหิตํ นฺหารุสมฺพนฺธํ…เป… อฏฺฐิกสงฺขลิกํ นิมํสโลหิตมกฺขิตํ นฺหารุสมฺพนฺธํ…เป… อฏฺฐิกสงฺขลิกํ อปคตมํสโลหิตํ นฺหารุสมฺพนฺธํ…เป… อฏฺฐิกานิ อปคตสมฺพนฺธานิ ทิสา วิทิสา วิกฺขิตฺตานิ, อญฺเญน หตฺถฏฺฐิกํ อญฺเญน ปาทฏฺฐิกํ อญฺเญน โคปฺผกฏฺฐิกํ อญฺเญน ชงฺฆฏฺฐิกํ อญฺเญน อูรุฏฺฐิกํ อญฺเญน กฏิฏฺฐิกํ อญฺเญน ผาสุกฏฺฐิกํ อญฺเญน ปิฏฺฐิฏฺฐิกํ อญฺเญน ขนฺธฏฺฐิกํ อญฺเญน คีวฏฺฐิกํ อญฺเญน หนุกฏฺฐิกํ อญฺเญน ทนฺตฏฺฐิกํ อญฺเญน สีสกฏาหํ. โส อิมเมว กายํ อุปสํหรติ – ‘อยมฺปิ โข กาโย เอวํธมฺโม เอวํภาวี เอวํอนตีโต’ติ. “पुन्हा पुढे, भिक्खूहो, भिक्खूने स्मशानात टाकलेले एखादे प्रेत पाहावे—जे केवळ मांस आणि रक्ताने युक्त आणि शिरांनी बांधलेला सांगाडा असावे... किंवा मांस नसलेला, रक्ताने माखलेला आणि शिरांनी बांधलेला सांगाडा असावे... किंवा मांस आणि रक्ताने विरहित, केवळ शिरांनी बांधलेला सांगाडा असावे... किंवा ज्याची हाडे सांध्यांपासून सुटी होऊन दिशा-उपदिशांना विखुरलेली असावीत; जसे की एका बाजूला हाताचे हाड, दुसऱ्या बाजूला पायाचे हाड, एका बाजूला घोट्याचे हाड, दुसऱ्या बाजूला नळीचे हाड, एका बाजूला मांडीचे हाड, दुसऱ्या बाजूला कमरेचे हाड, एका बाजूला बरगडीचे हाड, दुसऱ्या बाजूला पाठीच्या कण्याचे हाड, एका बाजूला खांद्याचे हाड, दुसऱ्या बाजूला मानेचे हाड, एका बाजूला जबड्याचे हाड, दुसऱ्या बाजूला दातांचे हाड, आणि एका बाजूला कवटी. तो आपल्या स्वतःच्या शरीराची त्याच्याशी तुलना करतो – ‘माझे हे शरीरसुद्धा याच स्वभावाचे आहे, असेच बनणारे आहे आणि या गतीपासून मुक्त नाही.’” ‘‘อิติ อชฺฌตฺตํ วา …เป… วิหรติ. “अशा प्रकारे तो अंतर्गत... विहरतो.” ‘‘ปุน [Pg.236] จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เสยฺยถาปิ ปสฺเสยฺย สรีรํ สิวถิกาย ฉฑฺฑิตํ อฏฺฐิกานิ เสตานิ สงฺขวณฺณปฏิภาคานิ…เป… อฏฺฐิกานิ ปุญฺชกิตานิ เตโรวสฺสิกานิ …เป… อฏฺฐิกานิ ปูตีนิ จุณฺณกชาตานิ. โส อิมเมว กายํ อุปสํหรติ – ‘อยมฺปิ โข กาโย เอวํธมฺโม เอวํภาวี เอวํอนตีโต’ติ. อิติ อชฺฌตฺตํ วา กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ, พหิทฺธา วา กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ, อชฺฌตฺตพหิทฺธา วา กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ. สมุทยธมฺมานุปสฺสี วา กายสฺมึ วิหรติ, วยธมฺมานุปสฺสี วา กายสฺมึ วิหรติ, สมุทยวยธมฺมานุปสฺสี วา กายสฺมึ วิหรติ. ‘อตฺถิ กาโย’ติ วา ปนสฺส สติ ปจฺจุปฏฺฐิตา โหติ ยาวเทว ญาณมตฺตาย ปฏิสฺสติมตฺตาย อนิสฺสิโต จ วิหรติ, น จ กิญฺจิ โลเก อุปาทิยติ. เอวมฺปิ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ. “पुन्हा पुढे, भिक्खूहो, भिक्खूने स्मशानात टाकलेले एखादे प्रेत पाहावे—ज्याची हाडे पांढरी पडलेली आणि शंखाच्या रंगासारखी झालेली असावीत... किंवा हाडांचा ढीग झालेली, जी तीन वर्षांपेक्षा अधिक जुनी असावीत... किंवा ती हाडे कुजून चूर्ण झालेली असावीत. तो आपल्या स्वतःच्या शरीराची त्याच्याशी तुलना करतो – ‘माझे हे शरीरसुद्धा याच स्वभावाचे आहे, असेच बनणारे आहे आणि या गतीपासून मुक्त नाही.’ अशा प्रकारे तो स्वतःच्या शरीरात शरीराचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा बाह्य शरीरात शरीराचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा स्वतःच्या आणि बाह्य अशा दोन्ही शरीरांमध्ये शरीराचे अनुदर्शन करत विहरतो. तो शरीरामध्ये उत्पत्तीच्या स्वभावाचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा शरीरामध्ये विनाशाच्या स्वभावाचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा शरीरामध्ये उत्पत्ती आणि विनाश या दोन्हीच्या स्वभावाचे अनुदर्शन करत विहरतो. किंवा ‘केवळ शरीर अस्तित्वात आहे’ अशी त्याची स्मृती केवळ ज्ञान आणि सजगता वाढवण्यापुरती जागृत राहते. तो अनासक्त (तृष्णा आणि दृष्टीचा आश्रय न घेता) होऊन विहरतो आणि जगातील कशाचाही उपादान (आसक्ती) करत नाही. याप्रमाणे, भिक्खूहो, भिक्खू शरीरात शरीराचे अनुदर्शन करत विहरतो.” นวสิวถิกปพฺพํ นิฏฺฐิตํ. नऊ स्मशान-चिंतन विभाग समाप्त. จุทฺทส กายานุปสฺสนา นิฏฺฐิตา. चौदा प्रकारची कायानुपश्यना समाप्त झाली. เวทนานุปสฺสนา वेदनानुपश्यना ๓๘๐. ‘‘กถญฺจ ปน, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เวทนาสุ เวทนานุปสฺสี วิหรติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สุขํ วา เวทนํ เวทยมาโน ‘สุขํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ. ทุกฺขํ วา เวทนํ เวทยมาโน ‘ทุกฺขํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ. อทุกฺขมสุขํ วา เวทนํ เวทยมาโน ‘อทุกฺขมสุขํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ. สามิสํ วา สุขํ เวทนํ เวทยมาโน ‘สามิสํ สุขํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ, นิรามิสํ วา สุขํ เวทนํ เวทยมาโน ‘นิรามิสํ สุขํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ. สามิสํ วา ทุกฺขํ เวทนํ เวทยมาโน ‘สามิสํ ทุกฺขํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ, นิรามิสํ วา ทุกฺขํ เวทนํ เวทยมาโน ‘นิรามิสํ ทุกฺขํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ. สามิสํ วา อทุกฺขมสุขํ เวทนํ เวทยมาโน ‘สามิสํ อทุกฺขมสุขํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ, นิรามิสํ วา อทุกฺขมสุขํ เวทนํ เวทยมาโน ‘นิรามิสํ อทุกฺขมสุขํ เวทนํ เวทยามี’ติ ปชานาติ. อิติ อชฺฌตฺตํ วา เวทนาสุ เวทนานุปสฺสี วิหรติ, พหิทฺธา วา เวทนาสุ [Pg.237] เวทนานุปสฺสี วิหรติ, อชฺฌตฺตพหิทฺธา วา เวทนาสุ เวทนานุปสฺสี วิหรติ. สมุทยธมฺมานุปสฺสี วา เวทนาสุ วิหรติ, วยธมฺมานุปสฺสี วา เวทนาสุ วิหรติ, สมุทยวยธมฺมานุปสฺสี วา เวทนาสุ วิหรติ. ‘อตฺถิ เวทนา’ติ วา ปนสฺส สติ ปจฺจุปฏฺฐิตา โหติ ยาวเทว ญาณมตฺตาย ปฏิสฺสติมตฺตาย อนิสฺสิโต จ วิหรติ, น จ กิญฺจิ โลเก อุปาทิยติ. เอวมฺปิ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ เวทนาสุ เวทนานุปสฺสี วิหรติ. ३८०. आणि भिक्खूंनो, भिक्खू वेदनांमध्ये वेदनेचे अनुदर्शन करत कसा विहरतो? येथे, भिक्खूंनो, भिक्खू सुखद वेदनेचा अनुभव घेत असताना, 'मी सुखद वेदनेचा अनुभव घेत आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो. दुःखद वेदनेचा अनुभव घेत असताना, 'मी दुःखद वेदनेचा अनुभव घेत आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो. अदुःख-असुख वेदनेचा अनुभव घेत असताना, 'मी अदुःख-असुख वेदनेचा अनुभव घेत आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो. सामिष सुखद वेदनेचा अनुभव घेत असताना, 'मी सामिष सुखद वेदनेचा अनुभव घेत आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो; निरामिष सुखद वेदनेचा अनुभव घेत असताना, 'मी निरामिष सुखद वेदनेचा अनुभव घेत आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो. सामिष दुःखद वेदनेचा अनुभव घेत असताना, 'मी सामिष दुःखद वेदनेचा अनुभव घेत आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो; निरामिष दुःखद वेदनेचा अनुभव घेत असताना, 'मी निरामिष दुःखद वेदनेचा अनुभव घेत आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो. सामिष अदुःख-असुख वेदनेचा अनुभव घेत असताना, 'मी सामिष अदुःख-असुख वेदनेचा अनुभव घेत आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो; निरामिष अदुःख-असुख वेदनेचा अनुभव घेत असताना, 'मी निरामिष अदुःख-असुख वेदनेचा अनुभव घेत आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो. अशा प्रकारे, तो स्वतःच्या अंतर्गत वेदनांमध्ये वेदनेचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा इतरांच्या बाह्य वेदनांमध्ये वेदनेचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा स्वतःच्या आणि इतरांच्या अंतर्गत-बाह्य वेदनांमध्ये वेदनेचे अनुदर्शन करत विहरतो. तो वेदनांमध्ये उत्पत्तीच्या स्वभावाचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा वेदनांमध्ये व्ययाच्या स्वभावाचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा वेदनांमध्ये उत्पत्ती आणि व्यय या दोन्हीच्या स्वभावाचे अनुदर्शन करत विहरतो. अथवा 'वेदना आहे' अशी त्याची स्मृती केवळ ज्ञान वाढवण्यासाठी आणि जागरूकतेसाठीच जागृत राहते. तो कशावरही अवलंबून न राहता विहरतो आणि जगातील कोणत्याही गोष्टीला चिकटून राहत नाही. अशा प्रकारे, भिक्खूंनो, भिक्खू वेदनांमध्ये वेदनेचे अनुदर्शन करत विहरतो. เวทนานุปสฺสนา นิฏฺฐิตา. वेदनानुपस्सना समाप्त. จิตฺตานุปสฺสนา चित्तानुपस्सना ๓๘๑. ‘‘กถญฺจ ปน, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสี วิหรติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สราคํ วา จิตฺตํ ‘สราคํ จิตฺต’นฺติ ปชานาติ, วีตราคํ วา จิตฺตํ ‘วีตราคํ จิตฺต’นฺติ ปชานาติ. สโทสํ วา จิตฺตํ ‘สโทสํ จิตฺต’นฺติ ปชานาติ, วีตโทสํ วา จิตฺตํ ‘วีตโทสํ จิตฺต’นฺติ ปชานาติ. สโมหํ วา จิตฺตํ ‘สโมหํ จิตฺต’นฺติ ปชานาติ, วีตโมหํ วา จิตฺตํ ‘วีตโมหํ จิตฺต’นฺติ ปชานาติ. สงฺขิตฺตํ วา จิตฺตํ ‘สงฺขิตฺตํ จิตฺต’นฺติ ปชานาติ, วิกฺขิตฺตํ วา จิตฺตํ ‘วิกฺขิตฺตํ จิตฺต’นฺติ ปชานาติ. มหคฺคตํ วา จิตฺตํ ‘มหคฺคตํ จิตฺต’นฺติ ปชานาติ, อมหคฺคตํ วา จิตฺตํ ‘อมหคฺคตํ จิตฺต’นฺติ ปชานาติ. สอุตฺตรํ วา จิตฺตํ ‘สอุตฺตรํ จิตฺต’นฺติ ปชานาติ, อนุตฺตรํ วา จิตฺตํ ‘อนุตฺตรํ จิตฺต’นฺติ ปชานาติ. สมาหิตํ วา จิตฺตํ ‘สมาหิตํ จิตฺต’นฺติ ปชานาติ, อสมาหิตํ วา จิตฺตํ ‘อสมาหิตํ จิตฺต’นฺติ ปชานาติ. วิมุตฺตํ วา จิตฺตํ ‘วิมุตฺตํ จิตฺต’นฺติ ปชานาติ. อวิมุตฺตํ วา จิตฺตํ ‘อวิมุตฺตํ จิตฺต’นฺติ ปชานาติ. อิติ อชฺฌตฺตํ วา จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสี วิหรติ, พหิทฺธา วา จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสี วิหรติ, อชฺฌตฺตพหิทฺธา วา จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสี วิหรติ. สมุทยธมฺมานุปสฺสี วา จิตฺตสฺมึ วิหรติ, วยธมฺมานุปสฺสี วา จิตฺตสฺมึ วิหรติ, สมุทยวยธมฺมานุปสฺสี วา จิตฺตสฺมึ วิหรติ, ‘อตฺถิ จิตฺต’นฺติ วา ปนสฺส สติ ปจฺจุปฏฺฐิตา โหติ ยาวเทว ญาณมตฺตาย ปฏิสฺสติมตฺตาย อนิสฺสิโต จ วิหรติ, น จ กิญฺจิ โลเก อุปาทิยติ. เอวมฺปิ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสี วิหรติ. ३८१. आणि भिक्खूंनो, भिक्खू चित्तामध्ये चित्ताचे अनुदर्शन करत कसा विहरतो? येथे, भिक्खूंनो, भिक्खू रागासहित चित्ताला 'हे रागासहित चित्त आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो, आणि रागरहित चित्ताला 'हे रागरहित चित्त आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो. द्वेषासहित चित्ताला 'हे द्वेषासहित चित्त आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो, आणि द्वेषरहित चित्ताला 'हे द्वेषरहित चित्त आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो. मोहासहित चित्ताला 'हे मोहासहित चित्त आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो, आणि मोहरहित चित्ताला 'हे मोहरहित चित्त आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो. संक्षिप्त चित्ताला 'हे संक्षिप्त चित्त आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो, आणि विक्षिप्त चित्ताला 'हे विक्षिप्त चित्त आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो. महग्गत चित्ताला 'हे महग्गत चित्त आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो, आणि अमहग्गत चित्ताला 'हे अमहग्गत चित्त आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो. सउत्तर चित्ताला 'हे सउत्तर चित्त आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो, आणि अनुत्तर चित्ताला 'हे अनुत्तर चित्त आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो. समाहित चित्ताला 'हे समाहित चित्त आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो, आणि असमाहित चित्ताला 'हे असमाहित चित्त आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो. मुक्त चित्ताला 'हे मुक्त चित्त आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो, आणि अमुक्त चित्ताला 'हे अमुक्त चित्त आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो. अशा प्रकारे, तो स्वतःच्या अंतर्गत चित्तामध्ये चित्ताचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा इतरांच्या बाह्य चित्तामध्ये चित्ताचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा स्वतःच्या आणि इतरांच्या अंतर्गत-बाह्य चित्तामध्ये चित्ताचे अनुदर्शन करत विहरतो. तो चित्तामध्ये उत्पत्तीच्या स्वभावाचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा चित्तामध्ये व्ययाच्या स्वभावाचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा चित्तामध्ये उत्पत्ती आणि व्यय या दोन्हीच्या स्वभावाचे अनुदर्शन करत विहरतो. अथवा 'चित्त आहे' अशी त्याची स्मृती केवळ ज्ञान वाढवण्यासाठी आणि जागरूकतेसाठीच जागृत राहते. तो कशावरही अवलंबून न राहता विहरतो आणि जगातील कोणत्याही गोष्टीला चिकटून राहत नाही. अशा प्रकारे, भिक्खूंनो, भिक्खू चित्तामध्ये चित्ताचे अनुदर्शन करत विहरतो. จิตฺตานุปสฺสนา นิฏฺฐิตา. चित्तानुपस्सना समाप्त. ธมฺมานุปสฺสนา นีวรณปพฺพํ धम्मानुपस्सना: नीवरण पर्व ๓๘๒. ‘‘กถญฺจ [Pg.238] ปน, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ ปญฺจสุ นีวรเณสุ. กถญฺจ ปน, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ ปญฺจสุ นีวรเณสุ? ३८२. आणि भिक्खूंनो, भिक्खू धम्मांमध्ये धम्माचे अनुदर्शन करत कसा विहरतो? येथे, भिक्खूंनो, भिक्खू पाच नीवरणांच्या रूपात धम्मांमध्ये धम्माचे अनुदर्शन करत विहरतो. आणि भिक्खूंनो, भिक्खू पाच नीवरणांच्या रूपात धम्मांमध्ये धम्माचे अनुदर्शन करत कसा विहरतो? ‘‘อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ กามจฺฉนฺทํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ กามจฺฉนฺโท’ติ ปชานาติ, อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ กามจฺฉนฺทํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ กามจฺฉนฺโท’ติ ปชานาติ, ยถา จ อนุปฺปนฺนสฺส กามจฺฉนฺทสฺส อุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อุปฺปนฺนสฺส กามจฺฉนฺทสฺส ปหานํ โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ ปหีนสฺส กามจฺฉนฺทสฺส อายตึ อนุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ. येथे, भिक्खूंनो, भिक्खू स्वतःमध्ये कामच्छंद उपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये कामच्छंद आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो; किंवा स्वतःमध्ये कामच्छंद अनुपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये कामच्छंद नाही' असे स्पष्टपणे जाणतो. अनुत्पन्न कामच्छंदाची उत्पत्ती कशी होते, हेही तो जाणतो; उत्पन्न झालेल्या कामच्छंदाचा प्रहाण कसा होतो, हेही तो जाणतो; आणि प्रहीण झालेल्या कामच्छंदाची भविष्यात पुन्हा उत्पत्ती कशी होत नाही, हेही तो स्पष्टपणे जाणतो. ‘‘สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ พฺยาปาทํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ พฺยาปาโท’ติ ปชานาติ, อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ พฺยาปาทํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ พฺยาปาโท’ติ ปชานาติ, ยถา จ อนุปฺปนฺนสฺส พฺยาปาทสฺส อุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อุปฺปนฺนสฺส พฺยาปาทสฺส ปหานํ โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ ปหีนสฺส พฺยาปาทสฺส อายตึ อนุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ. स्वतःमध्ये व्यापाद उपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये व्यापाद आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो; किंवा स्वतःमध्ये व्यापाद अनुपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये व्यापाद नाही' असे स्पष्टपणे जाणतो. अनुत्पन्न व्यापादाची उत्पत्ती कशी होते, हेही तो जाणतो; उत्पन्न झालेल्या व्यापादाचा प्रहाण कसा होतो, हेही तो जाणतो; आणि प्रहीण झालेल्या व्यापादाची भविष्यात पुन्हा उत्पत्ती कशी होत नाही, हेही तो स्पष्टपणे जाणतो. ‘‘สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ถินมิทฺธํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ถินมิทฺธ’นฺติ ปชานาติ, อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ถินมิทฺธํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ถินมิทฺธ’นฺติ ปชานาติ, ยถา จ อนุปฺปนฺนสฺส ถินมิทฺธสฺส อุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อุปฺปนฺนสฺส ถินมิทฺธสฺส ปหานํ โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ ปหีนสฺส ถินมิทฺธสฺส อายตึ อนุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ. स्वतःमध्ये थीन-मिद्ध उपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये थीन-मिद्ध आहे' असे स्पष्टपणे जाणतो; किंवा स्वतःमध्ये थीन-मिद्ध अनुपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये थीन-मिद्ध नाही' असे स्पष्टपणे जाणतो. अनुत्पन्न थीन-मिद्धची उत्पत्ती कशी होते, हेही तो जाणतो; उत्पन्न झालेल्या थीन-मिद्धचा प्रहाण कसा होतो, हेही तो जाणतो; आणि प्रहीण झालेल्या थीन-मिद्धची भविष्यात पुन्हा उत्पत्ती कशी होत नाही, हेही तो स्पष्टपणे जाणतो. ‘‘สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจ’นฺติ ปชานาติ, อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจ’นฺติ ปชานาติ, ยถา จ อนุปฺปนฺนสฺส อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจสฺส อุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อุปฺปนฺนสฺส อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจสฺส ปหานํ โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ ปหีนสฺส อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจสฺส อายตึ อนุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ. आपल्यामध्ये 'उद्धच्च-कुक्कुच्च' (औद्धत्य आणि अस्वस्थता) विद्यमान असताना, तो 'माझ्यामध्ये उद्धच्च-कुक्कुच्च आहे' असे जाणतो; आपल्यामध्ये उद्धच्च-कुक्कुच्च विद्यमान नसताना, 'माझ्यामध्ये उद्धच्च-कुक्कुच्च नाही' असे जाणतो. न उद्भवलेल्या उद्धच्च-कुक्कुच्चाची उत्पत्ती कशी होते, हेही तो जाणतो; उद्भवलेल्या उद्धच्च-कुक्कुच्चाचा त्याग कसा होतो, हेही तो जाणतो; आणि त्याग केलेल्या उद्धच्च-कुक्कुच्चाची भविष्यात पुन्हा उत्पत्ती कशी होत नाही, हेही तो जाणतो. ‘‘สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ วิจิกิจฺฉํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ วิจิกิจฺฉา’ติ ปชานาติ, อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ วิจิกิจฺฉํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ วิจิกิจฺฉา’ติ ปชานาติ, ยถา จ อนุปฺปนฺนาย วิจิกิจฺฉาย อุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา [Pg.239] จ อุปฺปนฺนาย วิจิกิจฺฉาย ปหานํ โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ ปหีนาย วิจิกิจฺฉาย อายตึ อนุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ. आपल्यामध्ये 'विचिकित्सा' (संदेह) विद्यमान असताना, तो 'माझ्यामध्ये विचिकित्सा आहे' असे जाणतो; आपल्यामध्ये विचिकित्सा विद्यमान नसताना, 'माझ्यामध्ये विचिकित्सा नाही' असे जाणतो. न उद्भवलेल्या विचिकित्सेची उत्पत्ती कशी होते, हेही तो जाणतो; उद्भवलेल्या विचिकित्सेचा त्याग कसा होतो, हेही तो जाणतो; आणि त्याग केलेल्या विचिकित्सेची भविष्यात पुन्हा उत्पत्ती कशी होत नाही, हेही तो जाणतो. ‘‘อิติ อชฺฌตฺตํ วา ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ, พหิทฺธา วา ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ, อชฺฌตฺตพหิทฺธา วา ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ สมุทยธมฺมานุปสฺสี วา ธมฺเมสุ วิหรติ, วยธมฺมานุปสฺสี วา ธมฺเมสุ วิหรติ, สมุทยวยธมฺมานุปสฺสี วา ธมฺเมสุ วิหรติ ‘อตฺถิ ธมฺมา’ติ วา ปนสฺส สติ ปจฺจุปฏฺฐิตา โหติ ยาวเทว ญาณมตฺตาย ปฏิสฺสติมตฺตาย อนิสฺสิโต จ วิหรติ, น จ กิญฺจิ โลเก อุปาทิยติ. เอวมฺปิ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ ปญฺจสุ นีวรเณสุ. अशा प्रकारे, तो अंतर्गत धम्मांमध्ये धम्मानुपश्यी (धम्मांचे अनुदर्शन करत) राहतो, किंवा बाह्य धम्मांमध्ये धम्मानुपश्यी राहतो, किंवा अंतर्गत आणि बाह्य धम्मांमध्ये धम्मानुपश्यी राहतो. तो धम्मांमध्ये उदय पावणारे स्वरूप पाहत राहतो, किंवा धम्मांमध्ये व्यय पावणारे स्वरूप पाहत राहतो, किंवा धम्मांमध्ये उदय आणि व्यय दोन्ही स्वरूप पाहत राहतो. 'धम्म आहेत' अशी त्याची स्मृती केवळ ज्ञान आणि जागरूकतेच्या वृद्धीसाठी उपस्थित राहते. तो कशावरही अवलंबून न राहता विहरतो आणि जगातील कशाचेही उपादान करत नाही. हे भिक्खूंनो, अशा प्रकारे भिक्खू पाच नीवरणांच्या संदर्भात धम्मांमध्ये धम्मानुपश्यी होऊन विहरतो. นีวรณปพฺพํ นิฏฺฐิตํ. नीवरण-पब्ब समाप्त. ธมฺมานุปสฺสนา ขนฺธปพฺพํ धम्मानुपस्सना: खंध-पब्ब (स्कंधांचा विभाग) ๓๘๓. ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ ปญฺจสุ อุปาทานกฺขนฺเธสุ. กถญฺจ ปน, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ ปญฺจสุ อุปาทานกฺขนฺเธสุ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ – ‘อิติ รูปํ, อิติ รูปสฺส สมุทโย, อิติ รูปสฺส อตฺถงฺคโม; อิติ เวทนา, อิติ เวทนาย สมุทโย, อิติ เวทนาย อตฺถงฺคโม; อิติ สญฺญา, อิติ สญฺญาย สมุทโย, อิติ สญฺญาย อตฺถงฺคโม; อิติ สงฺขารา, อิติ สงฺขารานํ สมุทโย, อิติ สงฺขารานํ อตฺถงฺคโม, อิติ วิญฺญาณํ, อิติ วิญฺญาณสฺส สมุทโย, อิติ วิญฺญาณสฺส อตฺถงฺคโม’ติ, อิติ อชฺฌตฺตํ วา ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ, พหิทฺธา วา ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ, อชฺฌตฺตพหิทฺธา วา ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ. สมุทยธมฺมานุปสฺสี วา ธมฺเมสุ วิหรติ, วยธมฺมานุปสฺสี วา ธมฺเมสุ วิหรติ, สมุทยวยธมฺมานุปสฺสี วา ธมฺเมสุ วิหรติ. ‘อตฺถิ ธมฺมา’ติ วา ปนสฺส สติ ปจฺจุปฏฺฐิตา โหติ ยาวเทว ญาณมตฺตาย ปฏิสฺสติมตฺตาย, อนิสฺสิโต จ วิหรติ, น จ กิญฺจิ โลเก อุปาทิยติ. เอวมฺปิ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ ปญฺจสุ อุปาทานกฺขนฺเธสุ. ३८३. पुन्हा, हे भिक्खूंनो, भिक्खू पाच उपादानस्कंधांच्या संदर्भात धम्मांमध्ये धम्मानुपश्यी होऊन विहरतो. आणि हे भिक्खूंनो, भिक्खू पाच उपादानस्कंधांच्या संदर्भात धम्मांमध्ये धम्मानुपश्यी होऊन कसा विहरतो? येथे, हे भिक्खूंनो, भिक्खू विचार करतो—'असे रूप आहे, असा रूपाचा उदय आहे, असा रूपाचा अस्त आहे; अशी वेदना आहे, असा वेदनेचा उदय आहे, असा वेदनेचा अस्त आहे; अशी संज्ञा आहे, असा संज्ञेचा उदय आहे, असा संज्ञेचा अस्त आहे; असे संस्कार आहेत, असा संस्कारांचा उदय आहे, असा संस्कारांचा अस्त आहे; असे विज्ञान आहे, असा विज्ञानाचा उदय आहे, असा विज्ञानाचा अस्त आहे.' अशा प्रकारे, तो अंतर्गत धम्मांमध्ये धम्मानुपश्यी होऊन विहरतो, किंवा बाह्य धम्मांमध्ये धम्मानुपश्यी होऊन विहरतो, किंवा अंतर्गत आणि बाह्य धम्मांमध्ये धम्मानुपश्यी होऊन विहरतो. तो धम्मांमध्ये उदय पावणारे स्वरूप पाहत राहतो, किंवा धम्मांमध्ये व्यय पावणारे स्वरूप पाहत राहतो, किंवा धम्मांमध्ये उदय आणि व्यय दोन्ही स्वरूप पाहत राहतो. 'धम्म आहेत' अशी त्याची स्मृती केवळ ज्ञान आणि जागरूकतेच्या वृद्धीसाठी उपस्थित राहते. तो कशावरही अवलंबून न राहता विहरतो आणि जगातील कशाचेही उपादान करत नाही. हे भिक्खूंनो, अशा प्रकारे भिक्खू पाच उपादानस्कंधांच्या संदर्भात धम्मांमध्ये धम्मानुपश्यी होऊन विहरतो. ขนฺธปพฺพํ นิฏฺฐิตํ. खंध-पब्ब समाप्त. ธมฺมานุปสฺสนา อายตนปพฺพํ धम्मानुपस्सना: आयतन-पब्ब (आयतनांचा विभाग) ๓๘๔. ‘‘ปุน [Pg.240] จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ ฉสุ อชฺฌตฺติกพาหิเรสุ อายตเนสุ. กถญฺจ ปน, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ ฉสุ อชฺฌตฺติกพาหิเรสุ อายตเนสุ? ३८४. पुन्हा, हे भिक्खूंनो, भिक्खू सहा अंतर्गत आणि बाह्य आयतनांच्या संदर्भात धम्मांमध्ये धम्मानुपश्यी होऊन विहरतो. आणि हे भिक्खूंनो, भिक्खू सहा अंतर्गत आणि बाह्य आयतनांच्या संदर्भात धम्मांमध्ये धम्मानुपश्यी होऊन कसा विहरतो? ‘‘อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ จกฺขุญฺจ ปชานาติ, รูเป จ ปชานาติ, ยญฺจ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สํโยชนํ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อนุปฺปนฺนสฺส สํโยชนสฺส อุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อุปฺปนฺนสฺส สํโยชนสฺส ปหานํ โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ ปหีนสฺส สํโยชนสฺส อายตึ อนุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ. येथे, हे भिक्खूंनो, भिक्खू डोळा जाणतो, रूप जाणतो आणि या दोघांवर अवलंबून जे संयोजन उत्पन्न होते, तेही जाणतो. न उद्भवलेल्या संयोजनाची उत्पत्ती कशी होते, हेही तो जाणतो; उद्भवलेल्या संयोजनाचा त्याग कसा होतो, हेही तो जाणतो; आणि त्याग केलेल्या संयोजनाची भविष्यात पुन्हा उत्पत्ती कशी होत नाही, हेही तो जाणतो. ‘‘โสตญฺจ ปชานาติ, สทฺเท จ ปชานาติ, ยญฺจ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สํโยชนํ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อนุปฺปนฺนสฺส สํโยชนสฺส อุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อุปฺปนฺนสฺส สํโยชนสฺส ปหานํ โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ ปหีนสฺส สํโยชนสฺส อายตึ อนุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ. तो कान जाणतो, शब्द जाणतो आणि या दोघांवर अवलंबून जे संयोजन उत्पन्न होते, तेही जाणतो. न उद्भवलेल्या संयोजनाची उत्पत्ती कशी होते, हेही तो जाणतो; उद्भवलेल्या संयोजनाचा त्याग कसा होतो, हेही तो जाणतो; आणि त्याग केलेल्या संयोजनाची भविष्यात पुन्हा उत्पत्ती कशी होत नाही, हेही तो जाणतो. ‘‘ฆานญฺจ ปชานาติ, คนฺเธ จ ปชานาติ, ยญฺจ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สํโยชนํ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อนุปฺปนฺนสฺส สํโยชนสฺส อุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อุปฺปนฺนสฺส สํโยชนสฺส ปหานํ โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ ปหีนสฺส สํโยชนสฺส อายตึ อนุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ. तो नाक जाणतो, गंध जाणतो आणि या दोघांवर अवलंबून जे संयोजन उत्पन्न होते, तेही जाणतो. न उद्भवलेल्या संयोजनाची उत्पत्ती कशी होते, हेही तो जाणतो; उद्भवलेल्या संयोजनाचा त्याग कसा होतो, हेही तो जाणतो; आणि त्याग केलेल्या संयोजनाची भविष्यात पुन्हा उत्पत्ती कशी होत नाही, हेही तो जाणतो. ‘‘ชิวฺหญฺจ ปชานาติ, รเส จ ปชานาติ, ยญฺจ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สํโยชนํ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อนุปฺปนฺนสฺส สํโยชนสฺส อุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อุปฺปนฺนสฺส สํโยชนสฺส ปหานํ โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ ปหีนสฺส สํโยชนสฺส อายตึ อนุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ. तो जीभ जाणतो, रस जाणतो आणि या दोघांवर अवलंबून जे संयोजन उत्पन्न होते, तेही जाणतो. न उद्भवलेल्या संयोजनाची उत्पत्ती कशी होते, हेही तो जाणतो; उद्भवलेल्या संयोजनाचा त्याग कसा होतो, हेही तो जाणतो; आणि त्याग केलेल्या संयोजनाची भविष्यात पुन्हा उत्पत्ती कशी होत नाही, हेही तो जाणतो. ‘‘กายญฺจ ปชานาติ, โผฏฺฐพฺเพ จ ปชานาติ, ยญฺจ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สํโยชนํ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อนุปฺปนฺนสฺส สํโยชนสฺส อุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อุปฺปนฺนสฺส สํโยชนสฺส ปหานํ โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ ปหีนสฺส สํโยชนสฺส อายตึ อนุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ. तो शरीर जाणतो, स्पर्श जाणतो आणि या दोघांवर अवलंबून जे संयोजन उत्पन्न होते, तेही जाणतो. न उद्भवलेल्या संयोजनाची उत्पत्ती कशी होते, हेही तो जाणतो; उद्भवलेल्या संयोजनाचा त्याग कसा होतो, हेही तो जाणतो; आणि त्याग केलेल्या संयोजनाची भविष्यात पुन्हा उत्पत्ती कशी होत नाही, हेही तो जाणतो. ‘‘มนญฺจ [Pg.241] ปชานาติ, ธมฺเม จ ปชานาติ, ยญฺจ ตทุภยํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ สํโยชนํ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อนุปฺปนฺนสฺส สํโยชนสฺส อุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อุปฺปนฺนสฺส สํโยชนสฺส ปหานํ โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ ปหีนสฺส สํโยชนสฺส อายตึ อนุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ. तो मन जाणतो, धम्म जाणतो आणि या दोघांवर अवलंबून जे संयोजन उत्पन्न होते, तेही जाणतो. न उद्भवलेल्या संयोजनाची उत्पत्ती कशी होते, हेही तो जाणतो; उद्भवलेल्या संयोजनाचा त्याग कसा होतो, हेही तो जाणतो; आणि त्याग केलेल्या संयोजनाची भविष्यात पुन्हा उत्पत्ती कशी होत नाही, हेही तो जाणतो. ‘‘อิติ อชฺฌตฺตํ วา ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ, พหิทฺธา วา ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ, อชฺฌตฺตพหิทฺธา วา ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ. สมุทยธมฺมานุปสฺสี วา ธมฺเมสุ วิหรติ, วยธมฺมานุปสฺสี วา ธมฺเมสุ วิหรติ, สมุทยวยธมฺมานุปสฺสี วา ธมฺเมสุ วิหรติ. ‘อตฺถิ ธมฺมา’ติ วา ปนสฺส สติ ปจฺจุปฏฺฐิตา โหติ ยาวเทว ญาณมตฺตาย ปฏิสฺสติมตฺตาย, อนิสฺสิโต จ วิหรติ, น จ กิญฺจิ โลเก อุปาทิยติ. เอวมฺปิ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ ฉสุ อชฺฌตฺติกพาหิเรสุ อายตเนสุ. अशा प्रकारे, तो स्वतःच्या अंतर्गत धर्मांमध्ये धर्माचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा बाह्य धर्मांमध्ये धर्माचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा अंतर्गत व बाह्य दोन्ही धर्मांमध्ये धर्माचे अनुदर्शन करत विहरतो. तो धर्मांमध्ये उत्पत्तीच्या स्वभावाचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा धर्मांमध्ये विनाशाच्या स्वभावाचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा धर्मांमध्ये उत्पत्ती आणि विनाश या दोन्हीच्या स्वभावाचे अनुदर्शन करत विहरतो. किंवा 'धर्म अस्तित्वात आहेत' अशी त्याची स्मृती केवळ ज्ञान मिळवण्यापुरती आणि जागृती वाढवण्यापुरती जागृत राहते. तो तृष्णा आणि दृष्टीचा आश्रय न घेता विहरतो आणि जगातील कशातही आसक्त होत नाही. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे भिक्षू सहा अंतर्गत आणि बाह्य आयतनांच्या संदर्भात धर्मांमध्ये धर्माचे अनुदर्शन करत विहरतो. อายตนปพฺพํ นิฏฺฐิตํ. आयतन-पर्व समाप्त झाले. ธมฺมานุปสฺสนา โพชฺฌงฺคปพฺพํ धम्मानुपश्यना: बोज्झंग-पर्व ๓๘๕. ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ สตฺตสุ โพชฺฌงฺเคสุ. กถญฺจ ปน, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ สตฺตสุ โพชฺฌงฺเคสุ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ สติสมฺโพชฺฌงฺคํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ สติสมฺโพชฺฌงฺโค’ติ ปชานาติ, อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ สติสมฺโพชฺฌงฺคํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ สติสมฺโพชฺฌงฺโค’ติ ปชานาติ, ยถา จ อนุปฺปนฺนสฺส สติสมฺโพชฺฌงฺคสฺส อุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อุปฺปนฺนสฺส สติสมฺโพชฺฌงฺคสฺส ภาวนาย ปาริปูรี โหติ ตญฺจ ปชานาติ. ३८५. पुन्हा, भिक्षूंनो, भिक्षू सात बोज्झंगांच्या संदर्भात धर्मांमध्ये धर्माचे अनुदर्शन करत विहरतो. आणि भिक्षूंनो, भिक्षू सात बोज्झंगांच्या संदर्भात धर्मांमध्ये धर्माचे अनुदर्शन करत कसा विहरतो? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षूच्या स्वतःमध्ये 'सति-संबोज्झंग' उपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये सति-संबोज्झंग आहे' असे तो स्पष्टपणे जाणतो; किंवा स्वतःमध्ये 'सति-संबोज्झंग' अनुपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये सति-संबोज्झंग नाही' असे तो स्पष्टपणे जाणतो. तसेच अनुत्पन्न सति-संबोज्झंगाची उत्पत्ती कशी होते, हेही तो जाणतो आणि उत्पन्न झालेल्या सति-संबोज्झंगाचा भावनेद्वारे परिपूर्ण विकास कसा होतो, हेही तो स्पष्टपणे जाणतो. ‘‘สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ธมฺมวิจยสมฺโพชฺฌงฺคํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ธมฺมวิจยสมฺโพชฺฌงฺโค’ติ ปชานาติ, อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ธมฺมวิจยสมฺโพชฺฌงฺคํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ธมฺมวิจยสมฺโพชฺฌงฺโค’ติ ปชานาติ, ยถา จ อนุปฺปนฺนสฺส ธมฺมวิจยสมฺโพชฺฌงฺคสฺส อุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อุปฺปนฺนสฺส [Pg.242] ธมฺมวิจยสมฺโพชฺฌงฺคสฺส ภาวนาย ปาริปูรี โหติ ตญฺจ ปชานาติ. स्वतःमध्ये 'धम्मविचय-संबोज्झंग' उपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये धम्मविचय-संबोज्झंग आहे' असे तो स्पष्टपणे जाणतो; किंवा स्वतःमध्ये 'धम्मविचय-संबोज्झंग' अनुपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये धम्मविचय-संबोज्झंग नाही' असे तो स्पष्टपणे जाणतो. तसेच अनुत्पन्न धम्मविचय-संबोज्झंगाची उत्पत्ती कशी होते, हेही तो जाणतो आणि उत्पन्न झालेल्या धम्मविचय-संबोज्झंगाचा भावनेद्वारे परिपूर्ण विकास कसा होतो, हेही तो स्पष्टपणे जाणतो. ‘‘สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ วีริยสมฺโพชฺฌงฺคํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ วีริยสมฺโพชฺฌงฺโค’ติ ปชานาติ, อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ วีริยสมฺโพชฺฌงฺคํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ วีริยสมฺโพชฺฌงฺโค’ติ ปชานาติ, ยถา จ อนุปฺปนฺนสฺส วีริยสมฺโพชฺฌงฺคสฺส อุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อุปฺปนฺนสฺส วีริยสมฺโพชฺฌงฺคสฺส ภาวนาย ปาริปูรี โหติ ตญฺจ ปชานาติ. स्वतःमध्ये 'वीरिय-संबोज्झंग' उपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये वीरिय-संबोज्झंग आहे' असे तो स्पष्टपणे जाणतो; किंवा स्वतःमध्ये 'वीरिय-संबोज्झंग' अनुपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये वीरिय-संबोज्झंग नाही' असे तो स्पष्टपणे जाणतो. तसेच अनुत्पन्न वीरिय-संबोज्झंगाची उत्पत्ती कशी होते, हेही तो जाणतो आणि उत्पन्न झालेल्या वीरिय-संबोज्झंगाचा भावनेद्वारे परिपूर्ण विकास कसा होतो, हेही तो स्पष्टपणे जाणतो. ‘‘สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ปีติสมฺโพชฺฌงฺคํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ปีติสมฺโพชฺฌงฺโค’ติ ปชานาติ, อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ปีติสมฺโพชฺฌงฺคํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ปีติสมฺโพชฺฌงฺโค’ติ ปชานาติ, ยถา จ อนุปฺปนฺนสฺส ปีติสมฺโพชฺฌงฺคสฺส อุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อุปฺปนฺนสฺส ปีติสมฺโพชฺฌงฺคสฺส ภาวนาย ปาริปูรี โหติ ตญฺจ ปชานาติ. स्वतःमध्ये 'पीति-संबोज्झंग' उपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये पीति-संबोज्झंग आहे' असे तो स्पष्टपणे जाणतो; किंवा स्वतःमध्ये 'पीति-संबोज्झंग' अनुपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये पीति-संबोज्झंग नाही' असे तो स्पष्टपणे जाणतो. तसेच अनुत्पन्न पीति-संबोज्झंगाची उत्पत्ती कशी होते, हेही तो जाणतो आणि उत्पन्न झालेल्या पीति-संबोज्झंगाचा भावनेद्वारे परिपूर्ण विकास कसा होतो, हेही तो स्पष्टपणे जाणतो. ‘‘สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ปสฺสทฺธิสมฺโพชฺฌงฺคํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ปสฺสทฺธิสมฺโพชฺฌงฺโค’ติ ปชานาติ, อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ ปสฺสทฺธิสมฺโพชฺฌงฺคํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ ปสฺสทฺธิสมฺโพชฺฌงฺโค’ติ ปชานาติ, ยถา จ อนุปฺปนฺนสฺส ปสฺสทฺธิสมฺโพชฺฌงฺคสฺส อุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อุปฺปนฺนสฺส ปสฺสทฺธิสมฺโพชฺฌงฺคสฺส ภาวนาย ปาริปูรี โหติ ตญฺจ ปชานาติ. स्वतःमध्ये 'पस्सद्धि-संबोज्झंग' उपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये पस्सद्धि-संबोज्झंग आहे' असे तो स्पष्टपणे जाणतो; किंवा स्वतःमध्ये 'पस्सद्धि-संबोज्झंग' अनुपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये पस्सद्धि-संबोज्झंग नाही' असे तो स्पष्टपणे जाणतो. तसेच अनुत्पन्न पस्सद्धि-संबोज्झंगाची उत्पत्ती कशी होते, हेही तो जाणतो आणि उत्पन्न झालेल्या पस्सद्धि-संबोज्झंगाचा भावनेद्वारे परिपूर्ण विकास कसा होतो, हेही तो स्पष्टपणे जाणतो. ‘‘สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ สมาธิสมฺโพชฺฌงฺคํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ สมาธิสมฺโพชฺฌงฺโค’ติ ปชานาติ, อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ สมาธิสมฺโพชฺฌงฺคํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ สมาธิสมฺโพชฺฌงฺโค’ติ ปชานาติ, ยถา จ อนุปฺปนฺนสฺส สมาธิสมฺโพชฺฌงฺคสฺส อุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อุปฺปนฺนสฺส สมาธิสมฺโพชฺฌงฺคสฺส ภาวนาย ปาริปูรี โหติ ตญฺจ ปชานาติ. स्वतःमध्ये 'समाधि-संबोज्झंग' उपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये समाधि-संबोज्झंग आहे' असे तो स्पष्टपणे जाणतो; किंवा स्वतःमध्ये 'समाधि-संबोज्झंग' अनुपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये समाधि-संबोज्झंग नाही' असे तो स्पष्टपणे जाणतो. तसेच अनुत्पन्न समाधि-संबोज्झंगाची उत्पत्ती कशी होते, हेही तो जाणतो आणि उत्पन्न झालेल्या समाधि-संबोज्झंगाचा भावनेद्वारे परिपूर्ण विकास कसा होतो, हेही तो स्पष्टपणे जाणतो. ‘‘สนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ อุเปกฺขาสมฺโพชฺฌงฺคํ ‘อตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ อุเปกฺขาสมฺโพชฺฌงฺโค’ติ ปชานาติ, อสนฺตํ วา อชฺฌตฺตํ อุเปกฺขาสมฺโพชฺฌงฺคํ ‘นตฺถิ เม อชฺฌตฺตํ อุเปกฺขาสมฺโพชฺฌงฺโค’ติ ปชานาติ, ยถา จ อนุปฺปนฺนสฺส อุเปกฺขาสมฺโพชฺฌงฺคสฺส อุปฺปาโท โหติ ตญฺจ ปชานาติ, ยถา จ อุปฺปนฺนสฺส อุเปกฺขาสมฺโพชฺฌงฺคสฺส ภาวนาย ปาริปูรี โหติ ตญฺจ ปชานาติ. स्वतःमध्ये 'उपेक्खा-संबोज्झंग' उपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये उपेक्खा-संबोज्झंग आहे' असे तो स्पष्टपणे जाणतो; किंवा स्वतःमध्ये 'उपेक्खा-संबोज्झंग' अनुपस्थित असताना, 'माझ्यामध्ये उपेक्खा-संबोज्झंग नाही' असे तो स्पष्टपणे जाणतो. तसेच अनुत्पन्न उपेक्खा-संबोज्झंगाची उत्पत्ती कशी होते, हेही तो जाणतो आणि उत्पन्न झालेल्या उपेक्खा-संबोज्झंगाचा भावनेद्वारे परिपूर्ण विकास कसा होतो, हेही तो स्पष्टपणे जाणतो. ‘‘อิติ อชฺฌตฺตํ วา ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ, พหิทฺธา วา ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ, อชฺฌตฺตพหิทฺธา วา ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ. สมุทยธมฺมานุปสฺสี [Pg.243] วา ธมฺเมสุ วิหรติ, วยธมฺมานุปสฺสี วา ธมฺเมสุ วิหรติ, สมุทยวยธมฺมานุปสฺสี วา ธมฺเมสุ วิหรติ ‘อตฺถิ ธมฺมา’ติ วา ปนสฺส สติ ปจฺจุปฏฺฐิตา โหติ ยาวเทว ญาณมตฺตาย ปฏิสฺสติมตฺตาย อนิสฺสิโต จ วิหรติ, น จ กิญฺจิ โลเก อุปาทิยติ. เอวมฺปิ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ สตฺตสุ โพชฺฌงฺเคสุ. अशा प्रकारे, तो स्वतःच्या अंतर्गत धर्मांमध्ये धर्माचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा बाह्य धर्मांमध्ये धर्माचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा अंतर्गत व बाह्य दोन्ही धर्मांमध्ये धर्माचे अनुदर्शन करत विहरतो. तो धर्मांमध्ये उत्पत्तीच्या स्वभावाचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा धर्मांमध्ये विनाशाच्या स्वभावाचे अनुदर्शन करत विहरतो, किंवा धर्मांमध्ये उत्पत्ती आणि विनाश या दोन्हीच्या स्वभावाचे अनुदर्शन करत विहरतो. किंवा 'धर्म अस्तित्वात आहेत' अशी त्याची स्मृती केवळ ज्ञान मिळवण्यापुरती आणि जागृती वाढवण्यापुरती जागृत राहते. तो तृष्णा आणि दृष्टीचा आश्रय न घेता विहरतो आणि जगातील कशातही आसक्त होत नाही. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे भिक्षू सात बोज्झंगांच्या संदर्भात धर्मांमध्ये धर्माचे अनुदर्शन करत विहरतो. โพชฺฌงฺคปพฺพํ นิฏฺฐิตํ. बोज्झंग-पर्व समाप्त झाले. ธมฺมานุปสฺสนา สจฺจปพฺพํ धम्मानुपश्यना: सच्च-पर्व ๓๘๖. ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ จตูสุ อริยสจฺเจสุ. กถญฺจ ปน, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ จตูสุ อริยสจฺเจสุ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ‘อิทํ ทุกฺข’นฺติ ยถาภูตํ ปชานาติ, ‘อยํ ทุกฺขสมุทโย’ติ ยถาภูตํ ปชานาติ, ‘อยํ ทุกฺขนิโรโธ’ติ ยถาภูตํ ปชานาติ, ‘อยํ ทุกฺขนิโรธคามินี ปฏิปทา’ติ ยถาภูตํ ปชานาติ. ३८६. पुन्हा, भिक्षूंनो, भिक्षू चार आर्यसत्यांच्या संदर्भात धर्मांमध्ये धर्माचे अनुदर्शन करत विहरतो. आणि भिक्षूंनो, भिक्षू चार आर्यसत्यांच्या संदर्भात धर्मांमध्ये धर्माचे अनुदर्शन करत कसा विहरतो? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू 'हे दुःख आहे' हे जसे आहे तसे स्पष्टपणे जाणतो; 'हा दुःखसमुदय आहे' हे जसे आहे तसे स्पष्टपणे जाणतो; 'हा दुःखनिरोध आहे' हे जसे आहे तसे स्पष्टपणे जाणतो; 'ही दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा आहे' हे जसे आहे तसे स्पष्टपणे जाणतो. ปฐมภาณวาโร นิฏฺฐิโต. प्रथम भाणवार समाप्त झाला. ทุกฺขสจฺจนิทฺเทโส दुःख-सत्य निर्देश ๓๘๗. ‘‘กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ อริยสจฺจํ? ชาติปิ ทุกฺขา, ชราปิ ทุกฺขา, มรณมฺปิ ทุกฺขํ, โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสาปิ ทุกฺขา, อปฺปิเยหิ สมฺปโยโคปิ ทุกฺโข, ปิเยหิ วิปฺปโยโคปิ ทุกฺโข, ยมฺปิจฺฉํ น ลภติ ตมฺปิ ทุกฺขํ, สงฺขิตฺเตน ปญฺจุปาทานกฺขนฺธา ทุกฺขา. ३८७. आणि भिक्षूंनो, दुःख आर्यसत्य कोणते? जन्म घेणे हेही दुःख आहे, वृद्धत्व हेही दुःख आहे, मृत्यू हेही दुःख आहे, शोक, रडणे-ओरडणे, शारीरिक दुःख, मानसिक दुःख आणि निराशा हेही दुःख आहे. अप्रियांचा संयोग होणे हे दुःख आहे, प्रियांचा वियोग होणे हे दुःख आहे, जे हवे आहे ते न मिळणे हेही दुःख आहे; थोडक्यात सांगायचे तर, पाच उपादानस्कंध हे दुःख आहेत. ๓๘๘. ‘‘กตมา จ, ภิกฺขเว, ชาติ? ยา เตสํ เตสํ สตฺตานํ ตมฺหิ ตมฺหิ สตฺตนิกาเย ชาติ สญฺชาติ โอกฺกนฺติ อภินิพฺพตฺติ ขนฺธานํ ปาตุภาโว อายตนานํ ปฏิลาโภ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ชาติ. ३८८. आणि भिक्खूहो, जाती (जन्म) म्हणजे काय? त्या त्या प्राण्यांचा त्या त्या प्राणि-समूहात जो जन्म (जाती), संजाती (उत्पत्ती), गर्भप्रवेश (ओक्कंती), अभिनिब्बत्ती (पुनर्जन्म), स्कंधांचा प्रादुर्भाव आणि आयतनांची (इंद्रियांची) प्राप्ती होय; भिक्खूहो, याला 'जाती' असे म्हटले जाते. ๓๘๙. ‘‘กตมา [Pg.244] จ, ภิกฺขเว, ชรา? ยา เตสํ เตสํ สตฺตานํ ตมฺหิ ตมฺหิ สตฺตนิกาเย ชรา ชีรณตา ขณฺฑิจฺจํ ปาลิจฺจํ วลิตฺตจตา อายุโน สํหานิ อินฺทฺริยานํ ปริปาโก, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ชรา. ३८९. आणि भिक्खूहो, जरा (वृद्धत्व) म्हणजे काय? त्या त्या प्राण्यांची त्या त्या प्राणि-समूहात जी जरा (म्हातारपण), जीर्णता (झिजणे), दात तुटणे (खंडीच्च), केस पांढरे होणे (पालिच्च), त्वचेवर सुरकुत्या पडणे (वलित्तचता), आयुष्याचा ऱ्हास होणे आणि इंद्रियांची परिपक्वता (शिथिलता) होय; भिक्खूहो, याला 'जरा' असे म्हटले जाते. ๓๙๐. ‘‘กตมญฺจ, ภิกฺขเว, มรณํ? ยํ เตสํ เตสํ สตฺตานํ ตมฺหา ตมฺหา สตฺตนิกายา จุติ จวนตา เภโท อนฺตรธานํ มจฺจุ มรณํ กาลกิริยา ขนฺธานํ เภโท กเฬวรสฺส นิกฺเขโป ชีวิตินฺทฺริยสฺสุปจฺเฉโท, อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, มรณํ. ३९०. आणि भिक्खूहो, मरण म्हणजे काय? त्या त्या प्राण्यांचे त्या त्या प्राणि-समूहातून जे च्युत होणे (चुती), नष्ट होणे (चवनता), विघटन (भेद), अंतर्धान पावणे, मृत्यू (मच्चू), मरण, कालक्रिया (देहवसान), स्कंधांचा भेद (विघटन), कलेवराचा (शरिराचा) त्याग आणि जीवितेंद्रियाचा उच्छेद होय; भिक्खूहो, याला 'मरण' असे म्हटले जाते. ๓๙๑. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, โสโก? โย โข, ภิกฺขเว, อญฺญตรญฺญตเรน พฺยสเนน สมนฺนาคตสฺส อญฺญตรญฺญตเรน ทุกฺขธมฺเมน ผุฏฺฐสฺส โสโก โสจนา โสจิตตฺตํ อนฺโตโสโก อนฺโตปริโสโก, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, โสโก. ३९१. आणि भिक्खूहो, शोक म्हणजे काय? भिक्खूहो, जेव्हा कोणी कोणत्या ना कोणत्या व्यसनाने (हानीने किंवा संकटाने) ग्रस्त होतो किंवा कोणत्या ना कोणत्या दुःखद परिस्थितीने (वेदनांनी) पीडित होतो, तेव्हा होणारा शोक, शोचनीयता, शोकग्रस्तता, अंतःशोक (अंतर्मनातील शोक) आणि तीव्र अंतःशोक; भिक्खूहो, याला 'शोक' असे म्हटले जाते. ๓๙๒. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, ปริเทโว? โย โข, ภิกฺขเว, อญฺญตรญฺญตเรน พฺยสเนน สมนฺนาคตสฺส อญฺญตรญฺญตเรน ทุกฺขธมฺเมน ผุฏฺฐสฺส อาเทโว ปริเทโว อาเทวนา ปริเทวนา อาเทวิตตฺตํ ปริเทวิตตฺตํ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว ปริเทโว. ३९२. आणि भिक्खूहो, परिदेव (विलाप) म्हणजे काय? भिक्खूहो, जेव्हा कोणी कोणत्या ना कोणत्या व्यसनाने (हानीने किंवा संकटाने) ग्रस्त होतो किंवा कोणत्या ना कोणत्या दुःखद परिस्थितीने पीडित होतो, तेव्हा होणारे क्रंदन (आदेव), विलाप (परिदेव), रडण्याची क्रिया, विलाप करण्याची अवस्था; भिक्खूहो, याला 'परिदेव' असे म्हटले जाते. ๓๙๓. ‘‘กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ? ยํ โข, ภิกฺขเว, กายิกํ ทุกฺขํ กายิกํ อสาตํ กายสมฺผสฺสชํ ทุกฺขํ อสาตํ เวทยิตํ, อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ. ३९३. आणि भिक्खूहो, दुःख म्हणजे काय? भिक्खूहो, जे कायिक (शारीरिक) दुःख आहे, कायिक असात (असुखद) आहे, काय-संस्पर्शजन्य (शारीरिक स्पर्शाने उत्पन्न होणारे) दुःखद व असात वेदयित (अनुभूती) आहे; भिक्खूहो, याला 'दुःख' असे म्हटले जाते. ๓๙๔. ‘‘กตมญฺจ, ภิกฺขเว, โทมนสฺสํ? ยํ โข, ภิกฺขเว, เจตสิกํ ทุกฺขํ เจตสิกํ อสาตํ มโนสมฺผสฺสชํ ทุกฺขํ อสาตํ เวทยิตํ, อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, โทมนสฺสํ. ३९४. आणि भिक्खूहो, दोमनस्स (मानसिक दुःख) म्हणजे काय? भिक्खूहो, जे चैतसिक (मानसिक) दुःख आहे, चैतसिक असात (असुखद) आहे, मन-संस्पर्शजन्य (मानसिक स्पर्शाने उत्पन्न होणारे) दुःखद व असात वेदयित (अनुभूती) आहे; भिक्खूहो, याला 'दोमनस्स' असे म्हटले जाते. ๓๙๕. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, อุปายาโส? โย โข, ภิกฺขเว, อญฺญตรญฺญตเรน พฺยสเนน สมนฺนาคตสฺส อญฺญตรญฺญตเรน ทุกฺขธมฺเมน ผุฏฺฐสฺส อายาโส อุปายาโส อายาสิตตฺตํ อุปายาสิตตฺตํ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อุปายาโส. ३९५. आणि भिक्खूहो, उपायास (हताशपणा किंवा निराशा) म्हणजे काय? भिक्खूहो, जेव्हा कोणी कोणत्या ना कोणत्या व्यसनाने (हानीने किंवा संकटाने) ग्रस्त होतो किंवा कोणत्या ना कोणत्या दुःखद परिस्थितीने पीडित होतो, तेव्हा होणारा क्लेश (आयास), अति-क्लेश (उपायास), क्लेशग्रस्तता आणि अति-क्लेशग्रस्तता; भिक्खूहो, याला 'उपायास' असे म्हटले जाते. ๓๙๖. ‘‘กตโม [Pg.245] จ, ภิกฺขเว, อปฺปิเยหิ สมฺปโยโค ทุกฺโข? อิธ ยสฺส เต โหนฺติ อนิฏฺฐา อกนฺตา อมนาปา รูปา สทฺทา คนฺธา รสา โผฏฺฐพฺพา ธมฺมา, เย วา ปนสฺส เต โหนฺติ อนตฺถกามา อหิตกามา อผาสุกกามา อโยคกฺเขมกามา, ยา เตหิ สทฺธึ สงฺคติ สมาคโม สโมธานํ มิสฺสีภาโว, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, อปฺปิเยหิ สมฺปโยโค ทุกฺโข. ३९६. आणि भिक्खूहो, अप्रियांचा संयोग दुःखकारक आहे म्हणजे काय? येथे ज्या व्यक्तीला अनिष्ट, अवांछित, अप्रिय वाटणारे रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श आणि धम्म (विचार) प्राप्त होतात; किंवा जे त्याचे अहित इच्छिणारे, नुकसान इच्छिणारे, असुख इच्छिणारे आणि असुरक्षितता इच्छिणारे आहेत, त्यांच्याशी होणारा संपर्क, समागम, एकत्र येणे आणि मिसळणे; भिक्खूहो, याला 'अप्रियांचा संयोग दुःखकारक आहे' असे म्हटले जाते. ๓๙๗. ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, ปิเยหิ วิปฺปโยโค ทุกฺโข? อิธ ยสฺส เต โหนฺติ อิฏฺฐา กนฺตา มนาปา รูปา สทฺทา คนฺธา รสา โผฏฺฐพฺพา ธมฺมา, เย วา ปนสฺส เต โหนฺติ อตฺถกามา หิตกามา ผาสุกกามา โยคกฺเขมกามา มาตา วา ปิตา วา ภาตา วา ภคินี วา มิตฺตา วา อมจฺจา วา ญาติสาโลหิตา วา, ยา เตหิ สทฺธึ อสงฺคติ อสมาคโม อสโมธานํ อมิสฺสีภาโว, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ปิเยหิ วิปฺปโยโค ทุกฺโข. ३९७. आणि भिक्खूहो, प्रियांचा वियोग दुःखकारक आहे म्हणजे काय? येथे ज्या व्यक्तीला इष्ट, वांछित, प्रिय वाटणारे रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श आणि धम्म प्राप्त होतात; किंवा जे त्याचे हित इच्छिणारे, कल्याण इच्छिणारे, सुख इच्छिणारे आणि सुरक्षितता इच्छिणारे आहेत—जसे की माता, पिता, भाऊ, बहीण, मित्र, सहकारी किंवा नातेवाईक—त्यांच्याशी संपर्क न होणे, समागम न होणे, एकत्र न येणे आणि न मिसळणे; भिक्खूहो, याला 'प्रियांचा वियोग दुःखकारक आहे' असे म्हटले जाते. ๓๙๘. ‘‘กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ยมฺปิจฺฉํ น ลภติ ตมฺปิ ทุกฺขํ? ชาติธมฺมานํ, ภิกฺขเว, สตฺตานํ เอวํ อิจฺฉา อุปฺปชฺชติ – ‘อโห วต มยํ น ชาติธมฺมา อสฺสาม, น จ วต โน ชาติ อาคจฺเฉยฺยา’ติ. น โข ปเนตํ อิจฺฉาย ปตฺตพฺพํ, อิทมฺปิ ยมฺปิจฺฉํ น ลภติ ตมฺปิ ทุกฺขํ. ชราธมฺมานํ, ภิกฺขเว, สตฺตานํ เอวํ อิจฺฉา อุปฺปชฺชติ – ‘อโห วต มยํ น ชราธมฺมา อสฺสาม, น จ วต โน ชรา อาคจฺเฉยฺยา’ติ. น โข ปเนตํ อิจฺฉาย ปตฺตพฺพํ, อิทมฺปิ ยมฺปิจฺฉํ น ลภติ ตมฺปิ ทุกฺขํ. พฺยาธิธมฺมานํ, ภิกฺขเว, สตฺตานํ เอวํ อิจฺฉา อุปฺปชฺชติ ‘อโห วต มยํ น พฺยาธิธมฺมา อสฺสาม, น จ วต โน พฺยาธิ อาคจฺเฉยฺยา’ติ. น โข ปเนตํ อิจฺฉาย ปตฺตพฺพํ, อิทมฺปิ ยมฺปิจฺฉํ น ลภติ ตมฺปิ ทุกฺขํ. มรณธมฺมานํ, ภิกฺขเว, สตฺตานํ เอวํ อิจฺฉา อุปฺปชฺชติ ‘อโห วต มยํ น มรณธมฺมา อสฺสาม, น จ วต โน มรณํ อาคจฺเฉยฺยา’ติ. น โข ปเนตํ อิจฺฉาย ปตฺตพฺพํ, อิทมฺปิ ยมฺปิจฺฉํ น ลภติ ตมฺปิ ทุกฺขํ. โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสธมฺมานํ, ภิกฺขเว, สตฺตานํ เอวํ อิจฺฉา อุปฺปชฺชติ ‘อโห วต มยํ น โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสธมฺมา อสฺสาม, น จ วต โน โสกปริเทวทุกฺขโทมนสฺสุปายาสธมฺมา อาคจฺเฉยฺยุ’นฺติ. น โข ปเนตํ อิจฺฉาย ปตฺตพฺพํ, อิทมฺปิ ยมฺปิจฺฉํ น ลภติ ตมฺปิ ทุกฺขํ. ३९८. आणि भिक्खूहो, जे हवे ते न मिळणे हेही दुःख आहे म्हणजे काय? भिक्खूहो, जन्म घेण्याच्या स्वभाव असणाऱ्या (जातीधर्मी) प्राण्यांच्या मनात अशी इच्छा उत्पन्न होते—'अरेरे! आम्ही जन्म घेण्याच्या स्वभावाचे नसतो तर किती बरे झाले असते! आणि आमच्या वाट्याला जन्म आला नसता तर किती बरे झाले असते!' परंतु केवळ इच्छेने हे प्राप्त होत नाही. हे देखील 'जे हवे ते न मिळणे हेही दुःख आहे' असेच आहे. भिक्खूहो, वृद्ध होण्याच्या स्वभाव असणाऱ्या (जराधर्मी) प्राण्यांच्या मनात अशी इच्छा उत्पन्न होते—'अरेरे! आम्ही वृद्ध होण्याच्या स्वभावाचे नसतो तर किती बरे झाले असते! आणि आमच्या वाट्याला वृद्धत्व आले नसते तर किती बरे झाले असते!' परंतु केवळ इच्छेने हे प्राप्त होत नाही. हे देखील 'जे हवे ते न मिळणे हेही दुःख आहे' असेच आहे. भिक्खूहो, आजारी पडण्याच्या स्वभाव असणाऱ्या (व्याधिधर्मी) प्राण्यांच्या मनात अशी इच्छा उत्पन्न होते—'अरेरे! आम्ही आजारी पडण्याच्या स्वभावाचे नसतो तर किती बरे झाले असते! आणि आमच्या वाट्याला आजारपण आले नसते तर किती बरे झाले असते!' परंतु केवळ इच्छेने हे प्राप्त होत नाही. हे देखील 'जे हवे ते न मिळणे हेही दुःख आहे' असेच आहे. भिक्खूहो, मरण पावण्याच्या स्वभाव असणाऱ्या (मरणधर्मी) प्राण्यांच्या मनात अशी इच्छा उत्पन्न होते—'अरेरे! आम्ही मरण पावण्याच्या स्वभावाचे नसतो तर किती बरे झाले असते! आणि आमच्या वाट्याला मृत्यू आला नसता तर किती बरे झाले असते!' परंतु केवळ इच्छेने हे प्राप्त होत नाही. हे देखील 'जे हवे ते न मिळणे हेही दुःख आहे' असेच आहे. भिक्खूहो, शोक, परिदेव, दुःख, दोमनस्स आणि उपायास यांच्या स्वभावाचे असणाऱ्या प्राण्यांच्या मनात अशी इच्छा उत्पन्न होते—'अरेरे! आम्ही शोक, परिदेव, दुःख, दोमनस्स आणि उपायास यांच्या स्वभावाचे नसतो तर किती बरे झाले असते! आणि आमच्या वाट्याला शोक, परिदेव, दुःख, दोमनस्स आणि उपायास आले नसते तर किती बरे झाले असते!' परंतु केवळ इच्छेने हे प्राप्त होत नाही. हे देखील 'जे हवे ते न मिळणे हेही दुःख आहे' असेच आहे. ๓๙๙. ‘‘กตเม [Pg.246] จ, ภิกฺขเว, สงฺขิตฺเตน ปญฺจุปาทานกฺขนฺธา ทุกฺขา? เสยฺยถิทํ – รูปุปาทานกฺขนฺโธ, เวทนุปาทานกฺขนฺโธ, สญฺญุปาทานกฺขนฺโธ, สงฺขารุปาทานกฺขนฺโธ, วิญฺญาณุปาทานกฺขนฺโธ. อิเม วุจฺจนฺติ, ภิกฺขเว, สงฺขิตฺเตน ปญฺจุปาทานกฺขนฺธา ทุกฺขา. อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ อริยสจฺจํ. ३९९. आणि भिक्खूहो, संक्षेपाने (थोडक्यात) पाच उपादानस्कंध दुःखकारक आहेत म्हणजे काय? ते खालीलप्रमाणे आहेत—रूप-उपादानस्कंध, वेदना-उपादानस्कंध, संज्ञा-उपादानस्कंध, संस्कार-उपादानस्कंध आणि विज्ञान-उपादानस्कंध. भिक्खूहो, यांना संक्षेपाने 'पाच उपादानस्कंध दुःखकारक आहेत' असे म्हटले जाते. भिक्खूहो, यालाच 'दुःख आर्यसत्य' असे म्हटले जाते. สมุทยสจฺจนิทฺเทโส दुःखसमुदय आर्यसत्य निर्देश (दुःखसमुदयाचे स्पष्टीकरण) ๔๐๐. ‘‘กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ทุกฺขสมุทยํ อริยสจฺจํ? ยายํ ตณฺหา โปโนพฺภวิกา นนฺทีราคสหคตา ตตฺรตตฺราภินนฺทินี, เสยฺยถิทํ – กามตณฺหา ภวตณฺหา วิภวตณฺหา. ४००. आणि भिक्खूहो, दुःखसमुदय आर्यसत्य (दुःखाच्या उत्पत्तीचे आर्यसत्य) म्हणजे काय? जी ही तृष्णा (तण्हा) आहे, जी पुनर्जन्म घडवून आणणारी (पोनोब्भविका) आहे, जी नंदीराग (आनंद आणि आसक्ती) याने युक्त आहे आणि त्या त्या विषयात आनंद शोधणारी (तत्र-तत्राभिनंदिनी) आहे; ती खालीलप्रमाणे आहे—कामतृष्णा, भवतृष्णा आणि विभवतृष्णा. ‘‘สา โข ปเนสา, ภิกฺขเว, ตณฺหา กตฺถ อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชติ, กตฺถ นิวิสมานา นิวิสติ? ยํ โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชติ, เอตฺถ นิวิสมานา นิวิสติ. भिक्खूहो, ती ही तृष्णा उत्पन्न होताना कोठे उत्पन्न होते आणि स्थिरावताना कोठे स्थिरावते? या जगात जे काही प्रियरूप (प्रिय वाटणारे) आणि सातरूप (सुखद वाटणारे) आहे, तेथेच ही तृष्णा उत्पन्न होताना उत्पन्न होते आणि तेथेच स्थिरावताना स्थिरावते. ‘‘กิญฺจ โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ? จกฺขุ โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชติ, เอตฺถ นิวิสมานา นิวิสติ. โสตํ โลเก…เป… ฆานํ โลเก… ชิวฺหา โลเก… กาโย โลเก… มโน โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชติ, เอตฺถ นิวิสมานา นิวิสติ. आणि या जगात प्रियरूप आणि सातरूप काय आहे? जगात चक्षु (डोळे) हे प्रियरूप आणि सातरूप आहे, तेथेच ही तृष्णा उत्पन्न होताना उत्पन्न होते आणि तेथेच स्थिरावताना स्थिरावते. जगात श्रोत (कान)... पे... जगात घ्राण (नाक)... जगात जिव्हा (जीभ)... जगात काय (शरीर)... जगात मन हे प्रियरूप आणि सातरूप आहे, तेथेच ही तृष्णा उत्पन्न होताना उत्पन्न होते आणि तेथेच स्थिरावताना स्थिरावते. ‘‘รูปา โลเก… สทฺทา โลเก… คนฺธา โลเก… รสา โลเก… โผฏฺฐพฺพา โลเก… ธมฺมา โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชติ, เอตฺถ นิวิสมานา นิวิสติ. जगामध्ये रूपे... जगामध्ये शब्द... जगामध्ये गंध... जगामध्ये रस... जगामध्ये स्पर्श... जगामध्ये धम्म (मनोविषय) हे प्रिय रूप व सातरूप आहेत; तिथेच ही तृष्णा उत्पन्न होताना उत्पन्न होते आणि तिथेच ती स्थिर होताना स्थिर होते. ‘‘จกฺขุวิญฺญาณํ โลเก… โสตวิญฺญาณํ โลเก… ฆานวิญฺญาณํ โลเก… ชิวฺหาวิญฺญาณํ โลเก… กายวิญฺญาณํ โลเก… มโนวิญฺญาณํ โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชติ, เอตฺถ นิวิสมานา นิวิสติ. जगामध्ये चक्षु-विज्ञान... जगामध्ये श्रोत्र-विज्ञान... जगामध्ये घ्राण-विज्ञान... जगामध्ये जिव्हा-विज्ञान... जगामध्ये काय-विज्ञान... जगामध्ये मनो-विज्ञान हे प्रिय रूप व सातरूप आहे; तिथेच ही तृष्णा उत्पन्न होताना उत्पन्न होते आणि तिथेच ती स्थिर होताना स्थिर होते. ‘‘จกฺขุสมฺผสฺโส โลเก… โสตสมฺผสฺโส โลเก… ฆานสมฺผสฺโส โลเก… ชิวฺหาสมฺผสฺโส โลเก… กายสมฺผสฺโส โลเก… มโนสมฺผสฺโส โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชติ, เอตฺถ นิวิสมานา นิวิสติ. जगामध्ये चक्षु-स्पर्श... जगामध्ये श्रोत्र-स्पर्श... जगामध्ये घ्राण-स्पर्श... जगामध्ये जिव्हा-स्पर्श... जगामध्ये काय-स्पर्श... जगामध्ये मन-स्पर्श हे प्रिय रूप व सातरूप आहे; तिथेच ही तृष्णा उत्पन्न होताना उत्पन्न होते आणि तिथेच ती स्थिर होताना स्थिर होते. ‘‘จกฺขุสมฺผสฺสชา [Pg.247] เวทนา โลเก… โสตสมฺผสฺสชา เวทนา โลเก… ฆานสมฺผสฺสชา เวทนา โลเก… ชิวฺหาสมฺผสฺสชา เวทนา โลเก… กายสมฺผสฺสชา เวทนา โลเก… มโนสมฺผสฺสชา เวทนา โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชติ, เอตฺถ นิวิสมานา นิวิสติ. जगामध्ये चक्षु-स्पर्शापासून उत्पन्न झालेली वेदना... जगामध्ये श्रोत्र-स्पर्शापासून उत्पन्न झालेली वेदना... जगामध्ये घ्राण-स्पर्शापासून उत्पन्न झालेली वेदना... जगामध्ये जिव्हा-स्पर्शापासून उत्पन्न झालेली वेदना... जगामध्ये काय-स्पर्शापासून उत्पन्न झालेली वेदना... जगामध्ये मन-स्पर्शापासून उत्पन्न झालेली वेदना ही प्रिय रूप व सातरूप आहे; तिथेच ही तृष्णा उत्पन्न होताना उत्पन्न होते आणि तिथेच ती स्थिर होताना स्थिर होते. ‘‘รูปสญฺญา โลเก… สทฺทสญฺญา โลเก… คนฺธสญฺญา โลเก… รสสญฺญา โลเก… โผฏฺฐพฺพสญฺญา โลเก… ธมฺมสญฺญา โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชติ, เอตฺถ นิวิสมานา นิวิสติ. जगामध्ये रूप-संज्ञा... जगामध्ये शब्द-संज्ञा... जगामध्ये गंध-संज्ञा... जगामध्ये रस-संज्ञा... जगामध्ये स्पर्श-संज्ञा... जगामध्ये धम्म-संज्ञा ही प्रिय रूप व सातरूप आहे; तिथेच ही तृष्णा उत्पन्न होताना उत्पन्न होते आणि तिथेच ती स्थिर होताना स्थिर होते. ‘‘รูปสญฺเจตนา โลเก… สทฺทสญฺเจตนา โลเก… คนฺธสญฺเจตนา โลเก… รสสญฺเจตนา โลเก… โผฏฺฐพฺพสญฺเจตนา โลเก… ธมฺมสญฺเจตนา โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชติ, เอตฺถ นิวิสมานา นิวิสติ. जगामध्ये रूप-संचेतना... जगामध्ये शब्द-संचेतना... जगामध्ये गंध-संचेतना... जगामध्ये रस-संचेतना... जगामध्ये स्पर्श-संचेतना... जगामध्ये धम्म-संचेतना ही प्रिय रूप व सातरूप आहे; तिथेच ही तृष्णा उत्पन्न होताना उत्पन्न होते आणि तिथेच ती स्थिर होताना स्थिर होते. ‘‘รูปตณฺหา โลเก… สทฺทตณฺหา โลเก… คนฺธตณฺหา โลเก… รสตณฺหา โลเก… โผฏฺฐพฺพตณฺหา โลเก… ธมฺมตณฺหา โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชติ, เอตฺถ นิวิสมานา นิวิสติ. जगामध्ये रूप-तृष्णा... जगामध्ये शब्द-तृष्णा... जगामध्ये गंध-तृष्णा... जगामध्ये रस-तृष्णा... जगामध्ये स्पर्श-तृष्णा... जगामध्ये धम्म-तृष्णा ही प्रिय रूप व सातरूप आहे; तिथेच ही तृष्णा उत्पन्न होताना उत्पन्न होते आणि तिथेच ती स्थिर होताना स्थिर होते. ‘‘รูปวิตกฺโก โลเก… สทฺทวิตกฺโก โลเก… คนฺธวิตกฺโก โลเก… รสวิตกฺโก โลเก… โผฏฺฐพฺพวิตกฺโก โลเก… ธมฺมวิตกฺโก โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชติ, เอตฺถ นิวิสมานา นิวิสติ. जगामध्ये रूप-वितर्क... जगामध्ये शब्द-वितर्क... जगामध्ये गंध-वितर्क... जगामध्ये रस-वितर्क... जगामध्ये स्पर्श-वितर्क... जगामध्ये धम्म-वितर्क हा प्रिय रूप व सातरूप आहे; तिथेच ही तृष्णा उत्पन्न होताना उत्पन्न होते आणि तिथेच ती स्थिर होताना स्थिर होते. ‘‘รูปวิจาโร โลเก… สทฺทวิจาโร โลเก… คนฺธวิจาโร โลเก… รสวิจาโร โลเก… โผฏฺฐพฺพวิจาโร โลเก… ธมฺมวิจาโร โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา อุปฺปชฺชมานา อุปฺปชฺชติ, เอตฺถ นิวิสมานา นิวิสติ. อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ทุกฺขสมุทยํ อริยสจฺจํ. जगामध्ये रूप-विचार... जगामध्ये शब्द-विचार... जगामध्ये गंध-विचार... जगामध्ये रस-विचार... जगामध्ये स्पर्श-विचार... जगामध्ये धम्म-विचार हा प्रिय रूप व सातरूप आहे; तिथेच ही तृष्णा उत्पन्न होताना उत्पन्न होते आणि तिथेच ती स्थिर होताना स्थिर होते. भिक्खूहो, यालाच 'दुःखसमुदय आर्यसत्य' असे म्हटले जाते. นิโรธสจฺจนิทฺเทโส निरोधसत्य निर्देश ๔๐๑. ‘‘กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ทุกฺขนิโรธํ อริยสจฺจํ? โย ตสฺสาเยว ตณฺหาย อเสสวิราคนิโรโธ จาโค ปฏินิสฺสคฺโค มุตฺติ อนาลโย. ४०१. आणि भिक्खूहो, दुःखनिरोध आर्यसत्य कोणते? त्याच तृष्णेचा संपूर्णपणे विराग होऊन निरोध होणे, तिचा त्याग करणे, तिचा सर्वस्वी त्याग करणे, तिच्यापासून मुक्त होणे आणि तिच्याविषयी अनासक्त असणे. ‘‘สา [Pg.248] โข ปเนสา, ภิกฺขเว, ตณฺหา กตฺถ ปหียมานา ปหียติ, กตฺถ นิรุชฺฌมานา นิรุชฺฌติ? ยํ โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา ปหียมานา ปหียติ, เอตฺถ นิรุชฺฌมานา นิรุชฺฌติ. पण भिक्खूहो, ती तृष्णा नष्ट केली असता कुठे नष्ट होते? निरुद्ध केली असता कुठे निरुद्ध होते? जगामध्ये जे काही प्रिय रूप व सातरूप आहे, तिथेच ही तृष्णा नष्ट केली असता नष्ट होते आणि तिथेच निरुद्ध केली असता निरुद्ध होते. ‘‘กิญฺจ โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ? จกฺขุ โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา ปหียมานา ปหียติ, เอตฺถ นิรุชฺฌมานา นิรุชฺฌติ. โสตํ โลเก…เป… ฆานํ โลเก… ชิวฺหา โลเก… กาโย โลเก… มโน โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา ปหียมานา ปหียติ, เอตฺถ นิรุชฺฌมานา นิรุชฺฌติ. आणि जगामध्ये प्रिय रूप व सातरूप काय आहे? जगामध्ये चक्षु हे प्रिय रूप व सातरूप आहे; तिथेच ही तृष्णा नष्ट केली असता नष्ट होते आणि तिथेच निरुद्ध केली असता निरुद्ध होते. जगामध्ये श्रोत्र...पे... घ्राण... जिव्हा... काय... मन हे प्रिय रूप व सातरूप आहे; तिथेच ही तृष्णा नष्ट केली असता नष्ट होते आणि तिथेच निरुद्ध केली असता निरुद्ध होते. ‘‘รูปา โลเก… สทฺทา โลเก… คนฺธา โลเก… รสา โลเก… โผฏฺฐพฺพา โลเก… ธมฺมา โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา ปหียมานา ปหียติ, เอตฺถ นิรุชฺฌมานา นิรุชฺฌติ. जगामध्ये रूपे... जगामध्ये शब्द... जगामध्ये गंध... जगामध्ये रस... जगामध्ये स्पर्श... जगामध्ये धम्म हे प्रिय रूप व सातरूप आहेत; तिथेच ही तृष्णा नष्ट केली असता नष्ट होते आणि तिथेच निरुद्ध केली असता निरुद्ध होते. ‘‘จกฺขุวิญฺญาณํ โลเก… โสตวิญฺญาณํ โลเก… ฆานวิญฺญาณํ โลเก… ชิวฺหาวิญฺญาณํ โลเก… กายวิญฺญาณํ โลเก… มโนวิญฺญาณํ โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา ปหียมานา ปหียติ, เอตฺถ นิรุชฺฌมานา นิรุชฺฌติ. जगामध्ये चक्षु-विज्ञान... जगामध्ये श्रोत्र-विज्ञान... जगामध्ये घ्राण-विज्ञान... जगामध्ये जिव्हा-विज्ञान... जगामध्ये काय-विज्ञान... जगामध्ये मनो-विज्ञान हे प्रिय रूप व सातरूप आहे; तिथेच ही तृष्णा नष्ट केली असता नष्ट होते आणि तिथेच निरुद्ध केली असता निरुद्ध होते. ‘‘จกฺขุสมฺผสฺโส โลเก… โสตสมฺผสฺโส โลเก… ฆานสมฺผสฺโส โลเก… ชิวฺหาสมฺผสฺโส โลเก… กายสมฺผสฺโส โลเก… มโนสมฺผสฺโส โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา ปหียมานา ปหียติ, เอตฺถ นิรุชฺฌมานา นิรุชฺฌติ. जगामध्ये चक्षु-स्पर्श... जगामध्ये श्रोत्र-स्पर्श... जगामध्ये घ्राण-स्पर्श... जगामध्ये जिव्हा-स्पर्श... जगामध्ये काय-स्पर्श... जगामध्ये मन-स्पर्श हे प्रिय रूप व सातरूप आहे; तिथेच ही तृष्णा नष्ट केली असता नष्ट होते आणि तिथेच निरुद्ध केली असता निरुद्ध होते. ‘‘จกฺขุสมฺผสฺสชา เวทนา โลเก… โสตสมฺผสฺสชา เวทนา โลเก … ฆานสมฺผสฺสชา เวทนา โลเก… ชิวฺหาสมฺผสฺสชา เวทนา โลเก… กายสมฺผสฺสชา เวทนา โลเก… มโนสมฺผสฺสชา เวทนา โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา ปหียมานา ปหียติ, เอตฺถ นิรุชฺฌมานา นิรุชฺฌติ. जगामध्ये चक्षु-स्पर्शापासून उत्पन्न झालेली वेदना... जगामध्ये श्रोत्र-स्पर्शापासून उत्पन्न झालेली वेदना... जगामध्ये घ्राण-स्पर्शापासून उत्पन्न झालेली वेदना... जगामध्ये जिव्हा-स्पर्शापासून उत्पन्न झालेली वेदना... जगामध्ये काय-स्पर्शापासून उत्पन्न झालेली वेदना... जगामध्ये मन-स्पर्शापासून उत्पन्न झालेली वेदना ही प्रिय रूप व सातरूप आहे; तिथेच ही तृष्णा नष्ट केली असता नष्ट होते आणि तिथेच निरुद्ध केली असता निरुद्ध होते. ‘‘รูปสญฺญา โลเก… สทฺทสญฺญา โลเก… คนฺธสญฺญา โลเก… รสสญฺญา โลเก… โผฏฺฐพฺพสญฺญา โลเก… ธมฺมสญฺญา โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา ปหียมานา ปหียติ, เอตฺถ นิรุชฺฌมานา นิรุชฺฌติ. जगामध्ये रूप-संज्ञा... जगामध्ये शब्द-संज्ञा... जगामध्ये गंध-संज्ञा... जगामध्ये रस-संज्ञा... जगामध्ये स्पर्श-संज्ञा... जगामध्ये धम्म-संज्ञा ही प्रिय रूप व सातरूप आहे; तिथेच ही तृष्णा नष्ट केली असता नष्ट होते आणि तिथेच निरुद्ध केली असता निरुद्ध होते. ‘‘รูปสญฺเจตนา [Pg.249] โลเก… สทฺทสญฺเจตนา โลเก… คนฺธสญฺเจตนา โลเก… รสสญฺเจตนา โลเก… โผฏฺฐพฺพสญฺเจตนา โลเก… ธมฺมสญฺเจตนา โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา ปหียมานา ปหียติ, เอตฺถ นิรุชฺฌมานา นิรุชฺฌติ. जगामध्ये रूप-संचेतना... जगामध्ये शब्द-संचेतना... जगामध्ये गंध-संचेतना... जगामध्ये रस-संचेतना... जगामध्ये स्पर्श-संचेतना... जगामध्ये धम्म-संचेतना ही प्रिय रूप व सातरूप आहे; तिथेच ही तृष्णा नष्ट केली असता नष्ट होते आणि तिथेच निरुद्ध केली असता निरुद्ध होते. ‘‘รูปตณฺหา โลเก… สทฺทตณฺหา โลเก… คนฺธตณฺหา โลเก… รสตณฺหา โลเก… โผฏฺฐพฺพตณฺหา โลเก… ธมฺมตณฺหา โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา ปหียมานา ปหียติ, เอตฺถ นิรุชฺฌมานา นิรุชฺฌติ. जगामध्ये रूप-तृष्णा... जगामध्ये शब्द-तृष्णा... जगामध्ये गंध-तृष्णा... जगामध्ये रस-तृष्णा... जगामध्ये स्पर्श-तृष्णा... जगामध्ये धम्म-तृष्णा ही प्रिय रूप व सातरूप आहे; तिथेच ही तृष्णा नष्ट केली असता नष्ट होते आणि तिथेच निरुद्ध केली असता निरुद्ध होते. ‘‘รูปวิตกฺโก โลเก… สทฺทวิตกฺโก โลเก… คนฺธวิตกฺโก โลเก… รสวิตกฺโก โลเก… โผฏฺฐพฺพวิตกฺโก โลเก… ธมฺมวิตกฺโก โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา ปหียมานา ปหียติ, เอตฺถ นิรุชฺฌมานา นิรุชฺฌติ. जगामध्ये रूप-वितर्क... जगामध्ये शब्द-वितर्क... जगामध्ये गंध-वितर्क... जगामध्ये रस-वितर्क... जगामध्ये स्पर्श-वितर्क... जगामध्ये धम्म-वितर्क हा प्रिय रूप व सातरूप आहे; तिथेच ही तृष्णा नष्ट केली असता नष्ट होते आणि तिथेच निरुद्ध केली असता निरुद्ध होते. ‘‘รูปวิจาโร โลเก… สทฺทวิจาโร โลเก… คนฺธวิจาโร โลเก… รสวิจาโร โลเก… โผฏฺฐพฺพวิจาโร โลเก… ธมฺมวิจาโร โลเก ปิยรูปํ สาตรูปํ, เอตฺเถสา ตณฺหา ปหียมานา ปหียติ, เอตฺถ นิรุชฺฌมานา นิรุชฺฌติ. อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ทุกฺขนิโรธํ อริยสจฺจํ. जगामध्ये रूप-विचार... जगामध्ये शब्द-विचार... जगामध्ये गंध-विचार... जगामध्ये रस-विचार... जगामध्ये स्पर्श-विचार... जगामध्ये धम्म-विचार हा प्रिय रूप व सातरूप आहे; तिथेच ही तृष्णा नष्ट केली असता नष्ट होते आणि तिथेच निरुद्ध केली असता निरुद्ध होते. भिक्खूहो, यालाच 'दुःखनिरोध आर्यसत्य' असे म्हटले जाते. มคฺคสจฺจนิทฺเทโส मार्गसत्य निर्देश ๔๐๒. ‘‘กตมญฺจ, ภิกฺขเว, ทุกฺขนิโรธคามินี ปฏิปทา อริยสจฺจํ? อยเมว อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เสยฺยถิทํ – สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺโป สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺโต สมฺมาอาชีโว สมฺมาวายาโม สมฺมาสติ สมฺมาสมาธิ. ४०२. “आणि भिक्खूहो, दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपदा (दुःख निरोधाकडे नेणारा मार्ग) आर्यसत्य कोणते? हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग होय, जो याप्रमाणे आहे – सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती आणि सम्यक् समाधी.” ‘‘กตมา จ, ภิกฺขเว, สมฺมาทิฏฺฐิ? ยํ โข, ภิกฺขเว, ทุกฺเข ญาณํ, ทุกฺขสมุทเย ญาณํ, ทุกฺขนิโรเธ ญาณํ, ทุกฺขนิโรธคามินิยา ปฏิปทาย ญาณํ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, สมฺมาทิฏฺฐิ. “आणि भिक्खूहो, सम्यक् दृष्टी कोणती? भिक्खूहो, दुःखाचे ज्ञान, दुःख-समुदयाचे (दुःखाच्या उत्पत्तीचे) ज्ञान, दुःख-निरोधाचे (दुःखाच्या अंताचे) ज्ञान आणि दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपदेचे (दुःख निरोधाकडे नेणाऱ्या मार्गाचे) ज्ञान; भिक्खूहो, यालाच सम्यक् दृष्टी असे म्हटले जाते.” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, สมฺมาสงฺกปฺโป? เนกฺขมฺมสงฺกปฺโป อพฺยาปาทสงฺกปฺโป อวิหึสาสงฺกปฺโป, อยํ วุจฺจติ ภิกฺขเว, สมฺมาสงฺกปฺโป. “आणि भिक्खूहो, सम्यक् संकल्प कोणता? नैष्क्रम्य संकल्प (कामवासनेपासून अलिप्त होण्याचा विचार), अव्यापाद संकल्प (द्वेषरहित विचार) आणि अविहिंसा संकल्प (अहिंसेचा विचार); भिक्खूहो, यालाच सम्यक् संकल्प असे म्हटले जाते.” ‘‘กตมา [Pg.250] จ, ภิกฺขเว, สมฺมาวาจา? มุสาวาทา เวรมณี ปิสุณาย วาจาย เวรมณี ผรุสาย วาจาย เวรมณี สมฺผปฺปลาปา เวรมณี, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, สมฺมาวาจา. “आणि भिक्खूहो, सम्यक् वाचा कोणती? असत्य बोलण्यापासून (मृषावादापासून) विरत राहणे, चहाडी करण्यापासून (पिशुण वाचेपासून) विरत राहणे, कठोर बोलण्यापासून (परुष वाचेपासून) विरत राहणे आणि निरर्थक बडबडीपासून (सम्फप्पलापापासून) विरत राहणे; भिक्खूहो, यालाच सम्यक् वाचा असे म्हटले जाते.” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, สมฺมากมฺมนฺโต? ปาณาติปาตา เวรมณี อทินฺนาทานา เวรมณี กาเมสุมิจฺฉาจารา เวรมณี, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, สมฺมากมฺมนฺโต. “आणि भिक्खूहो, सम्यक् कर्मान्त कोणता? प्राणातिपातापासून (जीवहिंसेपासून) विरत राहणे, अदत्तादानापासून (चोरी करण्यापासून) विरत राहणे आणि कामेसू मिच्छाचारापासून (व्यभिचारापासून) विरत राहणे; भिक्खूहो, यालाच सम्यक् कर्मान्त असे म्हटले जाते.” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, สมฺมาอาชีโว? อิธ, ภิกฺขเว, อริยสาวโก มิจฺฉาอาชีวํ ปหาย สมฺมาอาชีเวน ชีวิตํ กปฺเปติ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, สมฺมาอาชีโว. “आणि भिक्खूहो, सम्यक् आजीव कोणता? येथे, भिक्खूहो, आर्य श्रावक मिथ्या आजीव (चुकीची उपजीविका) सोडून सम्यक् आजीवने (योग्य उपजीविकेने) आपले जीवन व्यतीत करतो; भिक्खूहो, यालाच सम्यक् आजीव असे म्हटले जाते.” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, สมฺมาวายาโม? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อนุปฺปนฺนานํ ปาปกานํ อกุสลานํ ธมฺมานํ อนุปฺปาทาย ฉนฺทํ ชเนติ วายมติ วีริยํ อารภติ จิตฺตํ ปคฺคณฺหาติ ปทหติ; อุปฺปนฺนานํ ปาปกานํ อกุสลานํ ธมฺมานํ ปหานาย ฉนฺทํ ชเนติ วายมติ วีริยํ อารภติ จิตฺตํ ปคฺคณฺหาติ ปทหติ; อนุปฺปนฺนานํ กุสลานํ ธมฺมานํ อุปฺปาทาย ฉนฺทํ ชเนติ วายมติ วีริยํ อารภติ จิตฺตํ ปคฺคณฺหาติ ปทหติ; อุปฺปนฺนานํ กุสลานํ ธมฺมานํ ฐิติยา อสมฺโมสาย ภิยฺโยภาวาย เวปุลฺลาย ภาวนาย ปาริปูริยา ฉนฺทํ ชเนติ วายมติ วีริยํ อารภติ จิตฺตํ ปคฺคณฺหาติ ปทหติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, สมฺมาวายาโม. “आणि भिक्खूहो, सम्यक् व्यायाम कोणता? येथे, भिक्खूहो, भिक्खू अनुत्पन्न (अद्याप उत्पन्न न झालेल्या) पापी, अकुशल धर्मांचा (विचारांचा) उत्पाद रोखण्यासाठी इच्छा निर्माण करतो, प्रयत्न करतो, वीर्य (ऊर्जा) प्रवृत्त करतो, चित्ताचा निग्रह करतो आणि दृढ निश्चय करतो; उत्पन्न झालेल्या पापी, अकुशल धर्मांच्या प्रहाणासाठी (नाशासाठी) इच्छा निर्माण करतो, प्रयत्न करतो, वीर्य प्रवृत्त करतो, चित्ताचा निग्रह करतो आणि दृढ निश्चय करतो; अनुत्पन्न (अद्याप उत्पन्न न झालेल्या) कुशल धर्मांच्या उत्पत्तीसाठी इच्छा निर्माण करतो, प्रयत्न करतो, वीर्य प्रवृत्त करतो, चित्ताचा निग्रह करतो आणि दृढ निश्चय करतो; आणि उत्पन्न झालेल्या कुशल धर्मांच्या स्थितीसाठी, ते नष्ट न होण्यासाठी, त्यांच्या वृद्धीसाठी, विपुलतेसाठी आणि भावनेच्या परिपूर्तीसाठी इच्छा निर्माण करतो, प्रयत्न करतो, वीर्य प्रवृत्त करतो, चित्ताचा निग्रह करतो आणि दृढ निश्चय करतो. भिक्खूहो, यालाच सम्यक् व्यायाम असे म्हटले जाते.” ‘‘กตมา จ, ภิกฺขเว, สมฺมาสติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ; เวทนาสุ เวทนานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ; จิตฺเต จิตฺตานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ; ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ อาตาปี สมฺปชาโน สติมา วิเนยฺย โลเก อภิชฺฌาโทมนสฺสํ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, สมฺมาสติ. “आणि भिक्खूहो, सम्यक् स्मृती कोणती? येथे, भिक्खूहो, भिक्खू कायेमध्ये कायेचे सतत दर्शन घेणारा (कायानुपस्सी) होऊन, उद्योगी (आतापी), संप्रजन्ययुक्त (संपजानो) आणि स्मृतिमान (सतिमा) होऊन, लोकांमधील अभिज्झा (लोभ) आणि दोमनस्स (दौर्मनस्य/खिन्नता) दूर करून विहरतो; वेदनांमध्ये वेदनांचे सतत दर्शन घेणारा (वेदनानुपस्सी) होऊन, उद्योगी, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा आणि दोमनस्स दूर करून विहरतो; चित्तामध्ये चित्ताचे सतत दर्शन घेणारा (चित्तानुपस्सी) होऊन, उद्योगी, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा आणि दोमनस्स दूर करून विहरतो; आणि धर्मांमध्ये (मानसिक अवस्थांमध्ये) धर्मांचे सतत दर्शन घेणारा (धम्मानुपस्सी) होऊन, उद्योगी, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा आणि दोमनस्स दूर करून विहरतो. भिक्खूहो, यालाच सम्यक् स्मृती असे म्हटले जाते.” ‘‘กตโม จ, ภิกฺขเว, สมฺมาสมาธิ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ สวิตกฺกํ สวิจารํ วิเวกชํ ปีติสุขํ ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. วิตกฺกวิจารานํ วูปสมา อชฺฌตฺตํ [Pg.251] สมฺปสาทนํ เจตโส เอโกทิภาวํ อวิตกฺกํ อวิจารํ สมาธิชํ ปีติสุขํ ทุติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. ปีติยา จ วิราคา อุเปกฺขโก จ วิหรติ, สโต จ สมฺปชาโน, สุขญฺจ กาเยน ปฏิสํเวเทติ, ยํ ตํ อริยา อาจิกฺขนฺติ ‘อุเปกฺขโก สติมา สุขวิหารี’ติ ตติยํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. สุขสฺส จ ปหานา ทุกฺขสฺส จ ปหานา ปุพฺเพว โสมนสฺสโทมนสฺสานํ อตฺถงฺคมา อทุกฺขมสุขํ อุเปกฺขาสติปาริสุทฺธึ จตุตฺถํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ. อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, สมฺมาสมาธิ. อิทํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ทุกฺขนิโรธคามินี ปฏิปทา อริยสจฺจํ. “आणि भिक्खूहो, सम्यक् समाधी कोणती? येथे, भिक्खूहो, भिक्खू कामभोगांपासून अलिप्त होऊन, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, सवितर्क (वितर्कासहित) आणि सविचार (विचारासहित), विवेकापासून उत्पन्न झालेले प्रीती व सुख असणारे पहिले ध्यान (प्रथम ध्यान) प्राप्त करून विहरतो. वितर्क आणि विचारांच्या शांत होण्याने, अध्यात्मिक प्रसन्नता आणि चित्ताची एकाग्रता असणारे, वितर्करहित, विचाररहित, समाधीपासून उत्पन्न झालेले प्रीती व सुख असणारे दुसरे ध्यान (द्वितीय ध्यान) प्राप्त करून विहरतो. प्रीतीचाही विराग झाल्यामुळे तो उपेक्षक (तटस्थ) होऊन विहरतो, स्मृतिमान आणि संप्रजन्ययुक्त राहतो, आणि शरीराने सुखाचा अनुभव घेतो, ज्याच्याविषयी आर्य पुरुष म्हणतात की, 'तो उपेक्षक, स्मृतिमान आणि सुखविहारी आहे', असे तिसरे ध्यान (तृतीय ध्यान) प्राप्त करून विहरतो. सुखाचा त्याग केल्यामुळे आणि दुःखाचा त्याग केल्यामुळे, तसेच पूर्वीच सोमनस्य (हर्ष) आणि दोमनस्य (खिन्नता) नष्ट झाल्यामुळे, जे दुःखही नाही आणि सुखही नाही (अदुःखमसुख) अशा, उपेक्षा व स्मृतीच्या शुद्धतेने युक्त असणारे चौथे ध्यान (चतुर्थ ध्यान) प्राप्त करून विहरतो. भिक्खूहो, यालाच सम्यक् समाधी असे म्हटले जाते. आणि भिक्खूहो, यालाच दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपदा आर्यसत्य असे म्हटले जाते.” ๔๐๓. ‘‘อิติ อชฺฌตฺตํ วา ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ, พหิทฺธา วา ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ, อชฺฌตฺตพหิทฺธา วา ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ. สมุทยธมฺมานุปสฺสี วา ธมฺเมสุ วิหรติ, วยธมฺมานุปสฺสี วา ธมฺเมสุ วิหรติ, สมุทยวยธมฺมานุปสฺสี วา ธมฺเมสุ วิหรติ. ‘อตฺถิ ธมฺมา’ติ วา ปนสฺส สติ ปจฺจุปฏฺฐิตา โหติ ยาวเทว ญาณมตฺตาย ปฏิสฺสติมตฺตาย อนิสฺสิโต จ วิหรติ, น จ กิญฺจิ โลเก อุปาทิยติ. เอวมฺปิ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรติ จตูสุ อริยสจฺเจสุ. ४०३. “अशा प्रकारे, तो स्वतःच्या अंतर्गत धर्मांमध्ये धर्मांचे सतत दर्शन घेत विहरतो, किंवा बाह्य धर्मांमध्ये धर्मांचे सतत दर्शन घेत विहरतो, किंवा अंतर्गत व बाह्य दोन्ही धर्मांमध्ये धर्मांचे सतत दर्शन घेत विहरतो. तो धर्मांमध्ये उत्पत्तीच्या स्वभावाचे सतत दर्शन घेत विहरतो, किंवा धर्मांमध्ये विनाशाच्या स्वभावाचे सतत दर्शन घेत विहरतो, किंवा धर्मांमध्ये उत्पत्ती आणि विनाश या दोन्ही स्वभावांचे सतत दर्शन घेत विहरतो. अथवा 'धर्म अस्तित्वात आहेत' अशी त्याची स्मृती केवळ ज्ञान आणि जागरूकतेच्या मर्यादेपर्यंतच प्रस्थापित होते. तो कोणत्याही गोष्टीवर अवलंबून न राहता (अनाश्रित होऊन) विहरतो आणि जगातील कशाचेही उपादान (आसक्तीने ग्रहण) करत नाही. भिक्खूहो, अशा प्रकारे भिक्खू चार आर्य सत्यांच्या संदर्भात धर्मांमध्ये धर्मांचे सतत दर्शन घेत विहरतो.” สจฺจปพฺพํ นิฏฺฐิตํ. सत्य-पर्व समाप्त झाले. ธมฺมานุปสฺสนา นิฏฺฐิตา. धर्मानुपश्यना समाप्त झाली. ๔๐๔. ‘‘โย หิ โกจิ, ภิกฺขเว, อิเม จตฺตาโร สติปฏฺฐาเน เอวํ ภาเวยฺย สตฺตวสฺสานิ, ตสฺส ทฺวินฺนํ ผลานํ อญฺญตรํ ผลํ ปาฏิกงฺขํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม อญฺญา; สติ วา อุปาทิเสเส อนาคามิตา. ४०४. “भिक्खूहो, जो कोणी या चार स्मृतिप्रस्थानांची (सतिपट्ठानांची) अशा प्रकारे सात वर्षे भावना (अभ्यास) करेल, त्याला दोन फळांपैकी एका फळाची निश्चितच अपेक्षा करता येईल: याच जन्मात अर्हतपद (अज्ञा) प्राप्त होईल; किंवा उपाधी (आसक्तीचा अंश) शिल्लक राहिल्यास अनागामी अवस्था प्राप्त होईल.” ‘‘ติฏฺฐนฺตุ, ภิกฺขเว, สตฺตวสฺสานิ. โย หิ โกจิ, ภิกฺขเว, อิเม จตฺตาโร สติปฏฺฐาเน เอวํ ภาเวยฺย ฉ วสฺสานิ…เป… ปญฺจ วสฺสานิ… จตฺตาริ วสฺสานิ… ตีณิ วสฺสานิ… ทฺเว วสฺสานิ… เอกํ วสฺสํ… ติฏฺฐตุ, ภิกฺขเว, เอกํ วสฺสํ. โย หิ โกจิ, ภิกฺขเว, อิเม จตฺตาโร สติปฏฺฐาเน เอวํ ภาเวยฺย สตฺตมาสานิ, ตสฺส ทฺวินฺนํ ผลานํ อญฺญตรํ ผลํ ปาฏิกงฺขํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม อญฺญา; สติ วา อุปาทิเสเส อนาคามิตา. “भिक्खूहो, सात वर्षे तर दूरच राहो. जो कोणी या चार स्मृतिप्रस्थानांची अशा प्रकारे सहा वर्षे... पाच वर्षे... चार वर्षे... तीन वर्षे... दोन वर्षे... एक वर्ष भावना करेल... भिक्खूहो, एक वर्षही दूर राहो. जो कोणी या चार स्मृतिप्रस्थानांची अशा प्रकारे सात महिने भावना करेल, त्याला दोन फळांपैकी एका फळाची निश्चितच अपेक्षा करता येईल: याच जन्मात अर्हतपद प्राप्त होईल; किंवा उपाधी शिल्लक राहिल्यास अनागामी अवस्था प्राप्त होईल.” ‘‘ติฏฺฐนฺตุ[Pg.252], ภิกฺขเว, สตฺต มาสานิ. โย หิ โกจิ, ภิกฺขเว, อิเม จตฺตาโร สติปฏฺฐาเน เอวํ ภาเวยฺย ฉ มาสานิ…เป… ปญฺจ มาสานิ… จตฺตาริ มาสานิ… ตีณิ มาสานิ … ทฺเว มาสานิ… เอกํ มาสํ… อฑฺฒมาสํ… ติฏฺฐตุ, ภิกฺขเว, อฑฺฒมาโส. โย หิ โกจิ, ภิกฺขเว, อิเม จตฺตาโร สติปฏฺฐาเน เอวํ ภาเวยฺย สตฺตาหํ, ตสฺส ทฺวินฺนํ ผลานํ อญฺญตรํ ผลํ ปาฏิกงฺขํ ทิฏฺเฐว ธมฺเม อญฺญา; สติ วา อุปาทิเสเส อนาคามิตาติ. “भिक्खूहो, सात महिने तर दूरच राहो. जो कोणी या चार स्मृतिप्रस्थानांची अशा प्रकारे सहा महिने... पाच महिने... चार महिने... तीन महिने... दोन महिने... एक महिना... अर्धा महिना भावना करेल... भिक्खूहो, अर्धा महिनाही दूर राहो. जो कोणी या चार स्मृतिप्रस्थानांची अशा प्रकारे केवळ सात दिवस भावना करेल, त्याला दोन फळांपैकी एका फळाची निश्चितच अपेक्षा करता येईल: याच जन्मात अर्हतपद प्राप्त होईल; किंवा उपाधी शिल्लक राहिल्यास अनागामी अवस्था प्राप्त होईल.” ๔๐๕. ‘‘เอกายโน อยํ, ภิกฺขเว, มคฺโค สตฺตานํ วิสุทฺธิยา โสกปริเทวานํ สมติกฺกมาย ทุกฺขโทมนสฺสานํ อตฺถงฺคมาย ญายสฺส อธิคมาย นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยาย ยทิทํ จตฺตาโร สติปฏฺฐานาติ. อิติ ยํ ตํ วุตฺตํ, อิทเมตํ ปฏิจฺจ วุตฺต’’นฺติ. อิทมโวจ ภควา. อตฺตมนา เต ภิกฺขู ภควโต ภาสิตํ อภินนฺทุนฺติ. ४०५. "भिक्खूंनो, प्राण्यांच्या शुद्धीसाठी, शोक आणि रडणे-ओरडणे पार करण्यासाठी, दुःख आणि दौर्मनस्य नष्ट करण्यासाठी, सन्मार्ग प्राप्त करण्यासाठी आणि निर्वाणाचा साक्षात्कार करण्यासाठी हा एकच मार्ग आहे, ज्याला 'चार सतीपट्ठान' (स्मृतीचे चार प्रस्थान) म्हटले जाते. जे काही सांगितले गेले आहे, ते याच कारणास्तव सांगितले गेले आहे." भगवान बुद्ध असे म्हणाले. त्या भिक्खूंनी भगवंतांच्या भाषणाचे आनंदाने अभिनंदन केले. มหาสติปฏฺฐานสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ นวมํ. महासतीपट्ठान सुत्त समाप्त झाले. हे नववे सुत्त आहे. ๑๐. ปายาสิสุตฺตํ १०. पायासि सुत्त ๔๐๖. เอวํ [Pg.253] เม สุตํ – เอกํ สมยํ อายสฺมา กุมารกสฺสโป โกสเลสุ จาริกํ จรมาโน มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ ปญฺจมตฺเตหิ ภิกฺขุสเตหิ เยน เสตพฺยา นาม โกสลานํ นครํ ตทวสริ. ตตฺร สุทํ อายสฺมา กุมารกสฺสโป เสตพฺยายํ วิหรติ อุตฺตเรน เสตพฺยํ สึสปาวเน. เตน โข ปน สมเยน ปายาสิ ราชญฺโญ เสตพฺยํ อชฺฌาวสติ สตฺตุสฺสทํ สติณกฏฺโฐทกํ สธญฺญํ ราชโภคฺคํ รญฺญา ปเสนทินา โกสเลน ทินฺนํ ราชทายํ พฺรหฺมเทยฺยํ. ४०६. असे मी ऐकले आहे – एका वेळी आयुष्मान् कुमारकस्सप हे सुमारे पाचशे भिक्खूंच्या मोठ्या भिक्खू संघासह कोसल देशामध्ये चारिका (धम्मयात्रा) करत असताना, कोसल देशातील 'सेतव्या' नावाच्या नगरात पोहोचले. तेथे आयुष्मान् कुमारकस्सप सेतव्या नगराच्या उत्तरेला असलेल्या शिंशपावनात (शिसवीच्या जंगलात) राहत होते. त्या वेळी 'पायासि' नावाचा राजा सेतव्या नगरावर राज्य करत होता. हे नगर लोकसंख्येने समृद्ध, गवत, लाकूड, पाणी आणि धान्याने परिपूर्ण होते, जे कोसलचा राजा पसेनदी याने त्याला राजभोग म्हणून आणि ब्रह्मदेय (शाही देणगी) म्हणून दिले होते. ปายาสิราชญฺญวตฺถุ पायासि राजन्य कथा ๔๐๗. เตน โข ปน สมเยน ปายาสิสฺส ราชญฺญสฺส เอวรูปํ ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ อุปฺปนฺนํ โหติ – ‘‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’ติ. อสฺโสสุํ โข เสตพฺยกา พฺราหฺมณคหปติกา – ‘‘สมโณ ขลุ โภ กุมารกสฺสโป สมณสฺส โคตมสฺส สาวโก โกสเลสุ จาริกํ จรมาโน มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ ปญฺจมตฺเตหิ ภิกฺขุสเตหิ เสตพฺยํ อนุปฺปตฺโต เสตพฺยายํ วิหรติ อุตฺตเรน เสตพฺยํ สึสปาวเน. ตํ โข ปน ภวนฺตํ กุมารกสฺสปํ เอวํ กลฺยาโณ กิตฺติสทฺโท อพฺภุคฺคโต – ‘ปณฺฑิโต พฺยตฺโต เมธาวี พหุสฺสุโต จิตฺตกถี กลฺยาณปฏิภาโน วุทฺโธ เจว อรหา จ. สาธุ โข ปน ตถารูปานํ อรหตํ ทสฺสนํ โหตี’’’ติ. อถ โข เสตพฺยกา พฺราหฺมณคหปติกา เสตพฺยาย นิกฺขมิตฺวา สงฺฆสงฺฆี คณีภูตา อุตฺตเรนมุขา คจฺฉนฺติ เยน สึสปาวนํ. ४०७. त्या वेळी पायासि राजाच्या मनात अशी वाईट (मिथ्या) दृष्टी उत्पन्न झाली होती की – "परलोक अस्तित्वात नाही, औपपातिक (स्वयंभू उत्पन्न होणारे) प्राणी नसतात, आणि चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक नसतो." सेतव्या नगरातील ब्राह्मण आणि गृहपतींनी ऐकले की – "श्रमण गोतमांचे शिष्य श्रमण कुमारकस्सप हे कोसल देशामध्ये चारिका करत सुमारे पाचशे भिक्खूंच्या मोठ्या भिक्खू संघासह सेतव्या नगरात आले आहेत आणि सेतव्या नगराच्या उत्तरेला असलेल्या शिंशपावनात राहत आहेत. त्या पूजनीय कुमारकस्सप यांच्याविषयी अशी चांगली कीर्ती पसरली आहे की – 'ते पंडित, चतुर, बुद्धिमान, बहुश्रुत, सुवक्ते, प्रतिभावान, वृद्ध आणि अर्हत आहेत. अशा अर्हतांचे दर्शन घेणे कल्याणकारी असते.'" तेव्हा सेतव्या नगरातील ब्राह्मण आणि गृहपती सेतव्या नगरातून बाहेर पडून, घोळक्या-घोळक्याने एकत्र होऊन उत्तरेकडे तोंड करून शिंशपावनाच्या दिशेने जाऊ लागले. ๔๐๘. เตน โข ปน สมเยน ปายาสิ ราชญฺโญ อุปริปาสาเท ทิวาเสยฺยํ อุปคโต โหติ. อทฺทสา โข ปายาสิ ราชญฺโญ เสตพฺยเก พฺราหฺมณคหปติเก เสตพฺยาย นิกฺขมิตฺวา สงฺฆสงฺฆี คณีภูเต อุตฺตเรนมุเข คจฺฉนฺเต เยน สึสปาวนํ, ทิสฺวา ขตฺตํ อามนฺเตสิ [Pg.254] – ‘‘กึ นุ โข, โภ ขตฺเต, เสตพฺยกา พฺราหฺมณคหปติกา เสตพฺยาย นิกฺขมิตฺวา สงฺฆสงฺฆี คณีภูตา อุตฺตเรนมุขา คจฺฉนฺติ เยน สึสปาวน’’นฺติ ? ४०८. त्या वेळी पायासि राजा महालाच्या वरच्या मजल्यावर दुपारच्या विश्रांतीसाठी गेला होता. पायासि राजाने सेतव्या नगरातील ब्राह्मण आणि गृहपतींना सेतव्या नगरातून बाहेर पडून, घोळक्या-घोळक्याने एकत्र होऊन उत्तरेकडे तोंड करून शिंशपावनाच्या दिशेने जाताना पाहिले. त्यांना पाहून त्याने आपल्या कारभाऱ्याला विचारले – "हे कारभाऱ्या, सेतव्या नगरातील ब्राह्मण आणि गृहपती सेतव्या नगरातून बाहेर पडून, घोळक्या-घोळक्याने एकत्र होऊन उत्तरेकडे तोंड करून शिंशपावनाच्या दिशेने का जात आहेत?" ‘‘อตฺถิ โข, โภ, สมโณ กุมารกสฺสโป, สมณสฺส โคตมสฺส สาวโก โกสเลสุ จาริกํ จรมาโน มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ ปญฺจมตฺเตหิ ภิกฺขุสเตหิ เสตพฺยํ อนุปฺปตฺโต เสตพฺยายํ วิหรติ อุตฺตเรน เสตพฺยํ สึสปาวเน. ตํ โข ปน ภวนฺตํ กุมารกสฺสปํ เอวํ กลฺยาโณ กิตฺติสทฺโท อพฺภุคฺคโต – ‘ปณฺฑิโต พฺยตฺโต เมธาวี พหุสฺสุโต จิตฺตกถี กลฺยาณปฏิภาโน วุทฺโธ เจว อรหา จา’ติ. ตเมเต ภวนฺตํ กุมารกสฺสปํ ทสฺสนาย อุปสงฺกมนฺตี’’ติ. ‘‘เตน หิ, โภ ขตฺเต, เยน เสตพฺยกา พฺราหฺมณคหปติกา เตนุปสงฺกม; อุปสงฺกมิตฺวา เสตพฺยเก พฺราหฺมณคหปติเก เอวํ วเทหิ – ‘ปายาสิ, โภ, ราชญฺโญ เอวมาห – อาคเมนฺตุ กิร ภวนฺโต, ปายาสิปิ ราชญฺโญ สมณํ กุมารกสฺสปํ ทสฺสนาย อุปสงฺกมิสฺสตี’ติ. ปุรา สมโณ กุมารกสฺสโป เสตพฺยเก พฺราหฺมณคหปติเก พาเล อพฺยตฺเต สญฺญาเปติ – ‘อิติปิ อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’ติ. นตฺถิ หิ, โภ ขตฺเต, ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’ติ. ‘‘เอวํ โภ’’ติ โข โส ขตฺตา ปายาสิสฺส ราชญฺญสฺส ปฏิสฺสุตฺวา เยน เสตพฺยกา พฺราหฺมณคหปติกา เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา เสตพฺยเก พฺราหฺมณคหปติเก เอตทโวจ – ‘‘ปายาสิ, โภ, ราชญฺโญ เอวมาห, อาคเมนฺตุ กิร ภวนฺโต, ปายาสิปิ ราชญฺโญ สมณํ กุมารกสฺสปํ ทสฺสนาย อุปสงฺกมิสฺสตี’’ติ. "महाराज, श्रमण गोतमांचे शिष्य श्रमण कुमारकस्सप हे कोसल देशामध्ये चारिका करत सुमारे पाचशे भिक्खूंच्या मोठ्या भिक्खू संघासह सेतव्या नगरात आले आहेत आणि सेतव्या नगराच्या उत्तरेला असलेल्या शिंशपावनात राहत आहेत. त्या पूजनीय कुमारकस्सप यांच्याविषयी अशी चांगली कीर्ती पसरली आहे की – 'ते पंडित, चतुर, बुद्धिमान, बहुश्रुत, सुवक्ते, प्रतिभावान, वृद्ध आणि अर्हत आहेत.' ते सर्व या पूजनीय कुमारकस्सप यांच्या दर्शनासाठी जात आहेत." "असे असेल तर, हे कारभाऱ्या, तू सेतव्या नगरातील ब्राह्मण आणि गृहपतींकडे जा आणि त्यांना असे सांग – 'महाराज पायासि असे म्हणतात की, आपण सर्वांनी कृपया थोडी वाट पाहावी, महाराज पायासि देखील श्रमण कुमारकस्सप यांच्या दर्शनासाठी येत आहेत.' श्रमण कुमारकस्सप यांनी सेतव्या नगरातील त्या मूर्ख आणि अज्ञानी ब्राह्मण व गृहपतींना 'परलोक आहे, औपपातिक प्राणी आहेत, आणि चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक असतो' असे पटवून देण्यापूर्वीच तू तिथे जा. कारण, हे कारभाऱ्या, परलोक अस्तित्वात नाही, औपपातिक प्राणी नसतात, आणि चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक नसतो." "तथास्तु महाराज," असे म्हणून त्या कारभाऱ्याने पायासि राजाच्या आज्ञेचे पालन केले आणि तो सेतव्या नगरातील ब्राह्मण व गृहपतींकडे गेला. तिथे जाऊन तो त्यांना म्हणाला – "महाराज पायासि असे म्हणतात की, आपण सर्वांनी कृपया थोडी वाट पाहावी, महाराज पायासि देखील श्रमण कुमारकस्सप यांच्या दर्शनासाठी येत आहेत." ๔๐๙. อถ โข ปายาสิ ราชญฺโญ เสตพฺยเกหิ พฺราหฺมณคหปติเกหิ ปริวุโต เยน สึสปาวนํ เยนายสฺมา กุมารกสฺสโป เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมตา กุมารกสฺสเปน สทฺธึ [Pg.255] สมฺโมทิ, สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เสตพฺยกาปิ โข พฺราหฺมณคหปติกา อปฺเปกจฺเจ อายสฺมนฺตํ กุมารกสฺสปํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ; อปฺเปกจฺเจ อายสฺมตา กุมารกสฺสเปน สทฺธึ สมฺโมทึสุ; สมฺโมทนียํ กถํ สารณียํ วีติสาเรตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. อปฺเปกจฺเจ เยนายสฺมา กุมารกสฺสโป เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. อปฺเปกจฺเจ นามโคตฺตํ สาเวตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. อปฺเปกจฺเจ ตุณฺหีภูตา เอกมนฺตํ นิสีทึสุ. ४०९. त्यानंतर पायासि राजा सेतव्या नगरातील ब्राह्मण आणि गृहपतींनी वेढलेला शिंशपावनात जेथे आयुष्मान् कुमारकस्सप होते, तेथे गेला. तिथे जाऊन त्याने आयुष्मान् कुमारकस्सप यांच्याशी कुशलमंगल विचारले आणि आनंददायी व स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. सेतव्या नगरातील काही ब्राह्मण आणि गृहपती आयुष्मान् कुमारकस्सप यांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले; काही जण आयुष्मान् कुमारकस्सप यांच्याशी कुशलमंगल विचारून, आनंददायी व स्मरणीय संभाषण संपवून एका बाजूला बसले; काही जण आयुष्मान् कुमारकस्सप यांच्या दिशेने हात जोडून एका बाजूला बसले; काही जण आपले नाव आणि गोत्र सांगून एका बाजूला बसले; तर काही जण शांत राहून एका बाजूला बसले. นตฺถิกวาโท नास्तिकवाद ๔๑๐. เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข ปายาสิ ราชญฺโญ อายสฺมนฺตํ กุมารกสฺสปํ เอตทโวจ – ‘‘อหญฺหิ, โภ กสฺสป, เอวํวาที เอวํทิฏฺฐี – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ‘‘นาหํ, ราชญฺญ, เอวํวาทึ เอวํทิฏฺฐึ อทฺทสํ วา อสฺโสสึ วา. กถญฺหิ นาม เอวํ วเทยฺย – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’ติ? ४१०. एका बाजूला बसलेल्या पायासि राजाने आयुष्मान् कुमारकस्सप यांना असे म्हटले – "हे कस्सप, माझे असे मत आहे आणि माझी अशी दृष्टी आहे की – 'परलोक अस्तित्वात नाही, औपपातिक प्राणी नसतात, आणि चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक नसतो.'" "हे राजा, मी अशा मताचा किंवा अशा दृष्टीचा माणूस कधी पाहिलेला नाही किंवा ऐकलेला नाही. एखादा माणूस असे कसे काय म्हणू शकतो की – 'परलोक अस्तित्वात नाही, औपपातिक प्राणी नसतात, आणि चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक नसतो'?" จนฺทิมสูริยอุปมา चंद्र आणि सूर्याची उपमा ๔๑๑. ‘‘เตน หิ, ราชญฺญ, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิปุจฺฉิสฺสามิ, ยถา เต ขเมยฺย, ตถา นํ พฺยากเรยฺยาสิ. ตํ กึ มญฺญสิ, ราชญฺญ, อิเม จนฺทิมสูริยา อิมสฺมึ วา โลเก ปรสฺมึ วา, เทวา วา เต มนุสฺสา วา’’ติ? ‘‘อิเม, โภ กสฺสป, จนฺทิมสูริยา ปรสฺมึ โลเก, น อิมสฺมึ; เทวา เต น มนุสฺสา’’ติ. ‘‘อิมินาปิ โข เต, ราชญฺญ, ปริยาเยน เอวํ โหตุ – อิติปิ อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’ติ. ४११. “तर मग, राजन्य, मी तुलाच याविषयी पुन्हा विचारतो. तुला जसे योग्य वाटेल, तसे तू त्याचे उत्तर दे. राजन्य, तुला काय वाटते? हे चंद्र आणि सूर्य या जगात आहेत की परलोकात? ते देव आहेत की मनुष्य?” “हे कश्यप, हे चंद्र आणि सूर्य परलोकात आहेत, या जगात नाहीत; ते देव आहेत, मनुष्य नाहीत.” “राजन्य, याही कारणाने तू असे मानले पाहिजेस की— ‘परलोक आहे, औपपातिक (स्वयंभू उत्पन्न होणारे) प्राणी आहेत, आणि चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ व विपाक असतो.’” ๔๑๒. ‘‘กิญฺจาปิ ภวํ กสฺสโป เอวมาห, อถ โข เอวํ เม เอตฺถ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปน, ราชญฺญ, ปริยาโย, เยน เต ปริยาเยน เอวํ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ? ‘‘อตฺถิ[Pg.256], โภ กสฺสป, ปริยาโย, เยน เม ปริยาเยน เอวํ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ‘‘ยถา กถํ วิย, ราชญฺญา’’ติ? ‘‘อิธ เม, โภ กสฺสป, มิตฺตามจฺจา ญาติสาโลหิตา ปาณาติปาตี อทินฺนาทายี กาเมสุมิจฺฉาจารี มุสาวาที ปิสุณวาจา ผรุสวาจา สมฺผปฺปลาปี อภิชฺฌาลู พฺยาปนฺนจิตฺตา มิจฺฉาทิฏฺฐี. เต อปเรน สมเยน อาพาธิกา โหนฺติ ทุกฺขิตา พาฬฺหคิลานา. ยทาหํ ชานามิ – ‘น ทานิเม อิมมฺหา อาพาธา วุฏฺฐหิสฺสนฺตี’ติ ตฺยาหํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวํ วทามิ – ‘สนฺติ โข, โภ, เอเก สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – เย เต ปาณาติปาตี อทินฺนาทายี กาเมสุมิจฺฉาจารี มุสาวาที ปิสุณวาจา ผรุสวาจา สมฺผปฺปลาปี อภิชฺฌาลู พฺยาปนฺนจิตฺตา มิจฺฉาทิฏฺฐี, เต กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชนฺตี’ติ. ภวนฺโต โข ปาณาติปาตี อทินฺนาทายี กาเมสุมิจฺฉาจารี มุสาวาที ปิสุณวาจา ผรุสวาจา สมฺผปฺปลาปี อภิชฺฌาลู พฺยาปนฺนจิตฺตา มิจฺฉาทิฏฺฐี. สเจ เตสํ ภวตํ สมณพฺราหฺมณานํ สจฺจํ วจนํ, ภวนฺโต กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชิสฺสนฺติ. สเจ, โภ, กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺเชยฺยาถ, เยน เม อาคนฺตฺวา อาโรเจยฺยาถ – ‘อิติปิ อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’ติ. ภวนฺโต โข ปน เม สทฺธายิกา ปจฺจยิกา, ยํ ภวนฺเตหิ ทิฏฺฐํ, ยถา สามํ ทิฏฺฐํ เอวเมตํ ภวิสฺสตี’ติ. เต เม ‘สาธู’ติ ปฏิสฺสุตฺวา เนว อาคนฺตฺวา อาโรเจนฺติ, น ปน ทูตํ ปหิณนฺติ. อยมฺปิ โข, โภ กสฺสป, ปริยาโย, เยน เม ปริยาเยน เอวํ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ४१२. “जरी आदरणीय कश्यप असे म्हणतात, तरीही माझे याविषयी असेच मत आहे की— ‘परलोक नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत, आणि चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ व विपाक नसतो.’” “राजन्य, असे काही कारण आहे का, ज्यामुळे तुझे असे मत आहे की— ‘परलोक नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत, आणि चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ व विपाक नसतो’?” “हे कश्यप, असे कारण आहे, ज्यामुळे माझे असे मत आहे की— ‘परलोक नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत, आणि चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ व विपाक नसतो’.” “राजन्य, ते कसे काय?” “हे कश्यप, येथे माझे मित्र, अमात्य, नातेवाईक आणि सगेसोयरे आहेत, जे जीवहत्या करणारे, चोरी करणारे, व्यभिचार करणारे, असत्य बोलणारे, चहाडी करणारे, कठोर बोलणारे, व्यर्थ बडबड करणारे, लोभी, द्वेषयुक्त मनाचे आणि मिथ्या दृष्टी असणारे आहेत. काही काळानंतर ते आजारी पडतात, दुःखी होतात आणि गंभीर आजाराने ग्रस्त होतात. जेव्हा मला समजते की— ‘आता ते या आजारातून बरे होणार नाहीत’, तेव्हा मी त्यांच्याजवळ जाऊन त्यांना असे सांगतो— ‘मित्रांनो, काही श्रमण आणि ब्राह्मण असे प्रतिपादन करणारे व अशा मताचे आहेत की— जे जीवहत्या करतात, चोरी करतात, व्यभिचार करतात, असत्य बोलतात, चहाडी करतात, कठोर बोलतात, व्यर्थ बडबड करतात, लोभी असतात, द्वेषयुक्त मनाचे असतात आणि मिथ्या दृष्टी असणारे असतात, ते शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि नरकात उत्पन्न होतात. तुम्ही तर जीवहत्या करणारे, चोरी करणारे, व्यभिचार करणारे, असत्य बोलणारे, चहाडी करणारे, कठोर बोलणारे, व्यर्थ बडबड करणारे, लोभी, द्वेषयुक्त मनाचे आणि मिथ्या दृष्टी असणारे आहात. जर त्या श्रमण-ब्राह्मणांचे सांगणे खरे असेल, तर शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर तुम्ही अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि नरकात उत्पन्न व्हाल. मित्रांनो, जर शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर तुम्ही अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि नरकात उत्पन्न झालात, तर माझ्याकडे परत येऊन मला सांगा की— ‘परलोक आहे, औपपातिक प्राणी आहेत, आणि चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ व विपाक असतो.’ तुम्ही माझे विश्वासू आणि खात्रीचे आहात. तुम्ही जे स्वतः पाहिले असेल, ते मी स्वतः पाहिल्यासारखेच होईल.’ त्यांनी मला ‘ठीक आहे’ म्हणून कबूल केले, पण ते परत येऊन मला काही सांगत नाहीत आणि कोणताही निरोपही पाठवत नाहीत. हे कश्यप, हेच ते कारण आहे, ज्यामुळे माझे असे मत आहे की— ‘परलोक नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत, आणि चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ व विपाक नसतो.’” โจรอุปมา चोराची उपमा ๔๑๓. ‘‘เตน หิ, ราชญฺญ, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิปุจฺฉิสฺสามิ. ยถา เต ขเมยฺย ตถา นํ พฺยากเรยฺยาสิ. ตํ กึ มญฺญสิ, ราชญฺญ, อิธ เต ปุริสา โจรํ อาคุจารึ คเหตฺวา ทสฺเสยฺยุํ – ‘อยํ เต, ภนฺเต, โจโร อาคุจารี; อิมสฺส ยํ อิจฺฉสิ, ตํ ทณฺฑํ ปเณหี’ติ. เต ตฺวํ เอวํ วเทยฺยาสิ – ‘เตน หิ, โภ, อิมํ ปุริสํ ทฬฺหาย รชฺชุยา ปจฺฉาพาหํ คาฬฺหพนฺธนํ พนฺธิตฺวา [Pg.257] ขุรมุณฺฑํ กริตฺวา ขรสฺสเรน ปณเวน รถิกาย รถิกํ สิงฺฆาฏเกน สิงฺฆาฏกํ ปริเนตฺวา ทกฺขิเณน ทฺวาเรน นิกฺขมิตฺวา ทกฺขิณโต นครสฺส อาฆาตเน สีสํ ฉินฺทถา’ติ. เต ‘สาธู’ติ ปฏิสฺสุตฺวา ตํ ปุริสํ ทฬฺหาย รชฺชุยา ปจฺฉาพาหํ คาฬฺหพนฺธนํ พนฺธิตฺวา ขุรมุณฺฑํ กริตฺวา ขรสฺสเรน ปณเวน รถิกาย รถิกํ สิงฺฆาฏเกน สิงฺฆาฏกํ ปริเนตฺวา ทกฺขิเณน ทฺวาเรน นิกฺขมิตฺวา ทกฺขิณโต นครสฺส อาฆาตเน นิสีทาเปยฺยุํ. ลเภยฺย นุ โข โส โจโร โจรฆาเตสุ – ‘อาคเมนฺตุ ตาว ภวนฺโต โจรฆาตา, อมุกสฺมึ เม คาเม วา นิคเม วา มิตฺตามจฺจา ญาติสาโลหิตา, ยาวาหํ เตสํ อุทฺทิสิตฺวา อาคจฺฉามี’ติ, อุทาหุ วิปฺปลปนฺตสฺเสว โจรฆาตา สีสํ ฉินฺเทยฺยุ’’นฺติ? ‘‘น หิ โส, โภ กสฺสป, โจโร ลเภยฺย โจรฆาเตสุ – ‘อาคเมนฺตุ ตาว ภวนฺโต โจรฆาตา อมุกสฺมึ เม คาเม วา นิคเม วา มิตฺตามจฺจา ญาติสาโลหิตา, ยาวาหํ เตสํ อุทฺทิสิตฺวา อาคจฺฉามี’ติ. อถ โข นํ วิปฺปลปนฺตสฺเสว โจรฆาตา สีสํ ฉินฺเทยฺยุ’’นฺติ. ‘‘โส หิ นาม, ราชญฺญ, โจโร มนุสฺโส มนุสฺสภูเตสุ โจรฆาเตสุ น ลภิสฺสติ – ‘อาคเมนฺตุ ตาว ภวนฺโต โจรฆาตา, อมุกสฺมึ เม คาเม วา นิคเม วา มิตฺตามจฺจา ญาติสาโลหิตา, ยาวาหํ เตสํ อุทฺทิสิตฺวา อาคจฺฉามี’ติ. กึ ปน เต มิตฺตามจฺจา ญาติสาโลหิตา ปาณาติปาตี อทินฺนาทายี กาเมสุมิจฺฉาจารี มุสาวาที ปิสุณวาจา ผรุสวาจา สมฺผปฺปลาปี อภิชฺฌาลู พฺยาปนฺนจิตฺตา มิจฺฉาทิฏฺฐี, เต กายสฺส เภทา ปรํ มรณา อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ นิรยํ อุปปนฺนา ลภิสฺสนฺติ นิรยปาเลสุ – ‘อาคเมนฺตุ ตาว ภวนฺโต นิรยปาลา, ยาว มยํ ปายาสิสฺส ราชญฺญสฺส คนฺตฺวา อาโรเจม – ‘‘อิติปิ อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ? อิมินาปิ โข เต, ราชญฺญ, ปริยาเยน เอวํ โหตุ – ‘อิติปิ อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ४१३. “तर मग, राजन्य, मी तुलाच याविषयी पुन्हा विचारतो. तुला जसे योग्य वाटेल, तसे तू त्याचे उत्तर दे. राजन्य, तुला काय वाटते? समजा, तुझ्या माणसांनी एखाद्या गुन्हेगार चोराला पकडून तुझ्यासमोर हजर केले आणि म्हटले— ‘महाराज, हा आपला गुन्हेगार चोर आहे; याला आपल्याला हवी ती शिक्षा द्या.’ तेव्हा तू त्यांना असे सांगशील— ‘तर मग, लोकांनो, या माणसाला मजबूत दोरीने पाठीमागे हात बांधून घट्ट बांधा, त्याचे डोके पूर्णपणे मुंडण करा, आणि तीव्र आवाजाच्या ढोलाच्या नादाने त्याला एका रस्त्यावरून दुसऱ्या रस्त्यावर, एका चौकातून दुसऱ्या चौकात फिरवून, दक्षिण दरवाजातून बाहेर काढून, नगराच्या दक्षिणेकडील वधस्तंभावर त्याचे डोके उडवा.’ त्यांनी ‘ठीक आहे’ म्हणून कबूल केले आणि त्या माणसाला मजबूत दोरीने पाठीमागे हात बांधून घट्ट बांधले, त्याचे डोके मुंडण केले, आणि तीव्र आवाजाच्या ढोलाच्या नादाने त्याला एका रस्त्यावरून दुसऱ्या रस्त्यावर, एका चौकातून दुसऱ्या चौकात फिरवून, दक्षिण दरवाजातून बाहेर काढून, नगराच्या दक्षिणेकडील वधस्तंभावर बसवले. तर, त्या चोराला वध करणाऱ्यांकडून (जल्लादांकडून) अशी सवलत मिळेल का की— ‘हे जल्लादांनो, जरा थांबा, अमुक एका गावात किंवा नगरात माझे मित्र, अमात्य आणि नातेवाईक आहेत, मी त्यांना भेटून येतो तोपर्यंत थांबा’? की तो आक्रोश करत असतानाच जल्लाद त्याचे डोके उडवून देतील?” “हे कश्यप, त्या चोराला जल्लादांकडून अशी सवलत मुळीच मिळणार नाही की— ‘हे जल्लादांनो, जरा थांबा, अमुक एका गावात किंवा नगरात माझे मित्र, अमात्य आणि नातेवाईक आहेत, मी त्यांना भेटून येतो तोपर्यंत थांबा.’ उलट, तो आक्रोश करत असतानाच जल्लाद त्याचे डोके उडवून देतील.” “राजन्य, तो चोर तर एक मनुष्य होता आणि जल्लादही मनुष्यच होते, तरीही त्याला त्यांच्याकडून अशी सवलत मिळाली नाही की— ‘हे जल्लादांनो, जरा थांबा, अमुक एका गावात किंवा नगरात माझे मित्र, अमात्य आणि नातेवाईक आहेत, मी त्यांना भेटून येतो तोपर्यंत थांबा.’ मग तुझे ते मित्र, अमात्य, नातेवाईक आणि सगेसोयरे जे जीवहत्या करणारे, चोरी करणारे, व्यभिचार करणारे, असत्य बोलणारे, चहाडी करणारे, कठोर बोलणारे, व्यर्थ बडबड करणारे, लोभी, द्वेषयुक्त मनाचे आणि मिथ्या दृष्टी असणारे होते, ते शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि नरकात पडल्यावर, त्यांना यमदूतांकडून (नरकपालांकडून) अशी सवलत कशी काय मिळेल की— ‘हे नरकपालानो, जरा थांबा, आम्ही पायसी राजन्य याच्याकडे जाऊन सांगून येतो की— परलोक आहे, औपपातिक प्राणी आहेत, आणि चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ व विपाक असतो’? राजन्य, याही कारणाने तू असे मानले पाहिजेस की— ‘परलोक आहे, औपपातिक प्राणी आहेत, आणि चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ व विपाक असतो.’” ๔๑๔. ‘‘กิญฺจาปิ ภวํ กสฺสโป เอวมาห, อถ โข เอวํ เม เอตฺถ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ [Pg.258] กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปน, ราชญฺญ, ปริยาโย เยน เต ปริยาเยน เอวํ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ? ‘‘อตฺถิ, โภ กสฺสป, ปริยาโย, เยน เม ปริยาเยน เอวํ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ‘‘ยถา กถํ วิย, ราชญฺญา’’ติ? ‘‘อิธ เม, โภ กสฺสป, มิตฺตามจฺจา ญาติสาโลหิตา ปาณาติปาตา ปฏิวิรตา อทินฺนาทานา ปฏิวิรตา กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรตา มุสาวาทา ปฏิวิรตา ปิสุณาย วาจาย ปฏิวิรตา ผรุสาย วาจาย ปฏิวิรตา สมฺผปฺปลาปา ปฏิวิรตา อนภิชฺฌาลู อพฺยาปนฺนจิตฺตา สมฺมาทิฏฺฐี. เต อปเรน สมเยน อาพาธิกา โหนฺติ ทุกฺขิตา พาฬฺหคิลานา. ยทาหํ ชานามิ – ‘น ทานิเม อิมมฺหา อาพาธา วุฏฺฐหิสฺสนฺตี’ติ ตฺยาหํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวํ วทามิ – ‘สนฺติ โข, โภ, เอเก สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – เย เต ปาณาติปาตา ปฏิวิรตา อทินฺนาทานา ปฏิวิรตา กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรตา มุสาวาทา ปฏิวิรตา ปิสุณาย วาจาย ปฏิวิรตา ผรุสาย วาจาย ปฏิวิรตา สมฺผปฺปลาปา ปฏิวิรตา อนภิชฺฌาลู อพฺยาปนฺนจิตฺตา สมฺมาทิฏฺฐี เต กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตีติ. ภวนฺโต โข ปาณาติปาตา ปฏิวิรตา อทินฺนาทานา ปฏิวิรตา กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรตา มุสาวาทา ปฏิวิรตา ปิสุณาย วาจาย ปฏิวิรตา ผรุสาย วาจาย ปฏิวิรตา สมฺผปฺปลาปา ปฏิวิรตา อนภิชฺฌาลู อพฺยาปนฺนจิตฺตา สมฺมาทิฏฺฐี. สเจ เตสํ ภวตํ สมณพฺราหฺมณานํ สจฺจํ วจนํ, ภวนฺโต กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิสฺสนฺติ. สเจ, โภ, กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺเชยฺยาถ, เยน เม อาคนฺตฺวา อาโรเจยฺยาถ – ‘อิติปิ อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’ติ. ภวนฺโต โข ปน เม สทฺธายิกา ปจฺจยิกา, ยํ ภวนฺเตหิ ทิฏฺฐํ, ยถา สามํ ทิฏฺฐํ เอวเมตํ ภวิสฺสตี’ติ. เต เม ‘สาธู’ติ ปฏิสฺสุตฺวา เนว อาคนฺตฺวา อาโรเจนฺติ, น ปน ทูตํ ปหิณนฺติ. อยมฺปิ โข, โภ กสฺสป, ปริยาโย, เยน เม ปริยาเยน เอวํ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ४१४. जरी पूज्य कश्यप असे म्हणतात, तरी या बाबतीत माझे मत असेच आहे – 'परलोक नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत, आणि चांगल्या-वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक नाही.' 'पण राजन्य, असे काही कारण किंवा मार्ग आहे का, ज्यामुळे तुमचे असे मत आहे की – परलोक नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत, आणि चांगल्या-वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक नाही?' 'होय, भन्ते कस्सप, असे कारण आहे, ज्यामुळे माझे असे मत आहे की – परलोक नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत, आणि चांगल्या-वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक नाही.' 'ते कशा प्रकारे आहे, राजन्य?' 'हे कश्यप, येथे माझे मित्र, अमात्य, नातेवाईक आणि सगोत्र आहेत, जे प्राणातिपातापासून (जीवहिंसेपासून) अलिप्त आहेत, अदत्तादानापासून (चोरीपासून) अलिप्त आहेत, कामेसू मिच्छाचारापासून (व्यभिचारापासून) अलिप्त आहेत, मृषावादापासून (असत्य बोलण्यापासून) अलिप्त आहेत, पिसुणाय वाचायपासून (चहाडी करण्यापासून) अलिप्त आहेत, फरुसाय वाचायपासून (कठोर बोलण्यापासून) अलिप्त आहेत, संफप्पलापापासून (व्यर्थ बडबडीपासून) अलिप्त आहेत, जे अनभिध्यालू (लोभरहित) आहेत, अव्यापन्नचित्त (द्वेषरहित चित्त असलेले) आहेत आणि सम्यक दृष्टी असलेले आहेत. काही काळानंतर ते आजारी पडतात, दुःखी होतात आणि गंभीर आजारी होतात. जेव्हा मला समजते की, 'आता ते या आजारातून बरे होणार नाहीत', तेव्हा मी त्यांच्याजवळ जाऊन त्यांना असे म्हणतो – 'अहो सज्जनो, काही असे श्रमण आणि ब्राह्मण आहेत जे असे प्रतिपादन करतात आणि ज्यांची अशी दृष्टी आहे की – जे प्राणातिपातापासून अलिप्त आहेत, अदत्तादानापासून अलिप्त आहेत, कामेसू मिच्छाचारापासून अलिप्त आहेत, मृषावादापासून अलिप्त आहेत, पिसुणाय वाचायपासून अलिप्त आहेत, फरुसाय वाचायपासून अलिप्त आहेत, संफप्पलापापासून अलिप्त आहेत, अनभिध्यालू आहेत, अव्यापन्नचित्त आहेत आणि सम्यक दृष्टी असलेले आहेत; ते काया भेदून मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. आपण तर प्राणातिपातापासून अलिप्त आहात, अदत्तादानापासून अलिप्त आहात, कामेसू मिच्छाचारापासून अलिप्त आहात, मृषावादापासून अलिप्त आहात, पिसुणाय वाचायपासून अलिप्त आहात, फरुसाय वाचायपासून अलिप्त आहात, संफप्पलापापासून अलिप्त आहात, अनभिध्यालू आहात, अव्यापन्नचित्त आहात आणि सम्यक दृष्टी असलेले आहात. जर त्या श्रमण-ब्राह्मणांचे वचन सत्य असेल, तर आपण काया भेदून मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न व्हाल. हे सज्जनो, जर आपण काया भेदून मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न झालात, तर माझ्याकडे परत येऊन मला सांगा की – परलोक आहे, औपपातिक प्राणी आहेत, आणि चांगल्या-वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक आहे. कारण आपण माझ्यासाठी विश्वासू आणि विश्वसनीय आहात. आपण जे पाहिले असेल, ते जणू मी स्वतःच पाहिले आहे असे होईल.' त्यांनी मला 'ठीक आहे' म्हणून संमती दिली, तरीही ते परत येऊन मला सांगत नाहीत आणि कोणताही निरोपही पाठवत नाहीत. हे कश्यप, हे देखील एक कारण आहे, ज्यामुळे माझे असे मत आहे की – परलोक नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत, आणि चांगल्या-वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक नाही.' คูถกูปปุริสอุปมา मलमूत्राच्या खड्ड्यात पडलेल्या माणसाची उपमा (गूथकूप-पुरिस-उपमा) ๔๑๕. ‘‘เตน [Pg.259] หิ, ราชญฺญ, อุปมํ เต กริสฺสามิ. อุปมาย มิเธกจฺเจ วิญฺญู ปุริสา ภาสิตสฺส อตฺถํ อาชานนฺติ. เสยฺยถาปิ, ราชญฺญ, ปุริโส คูถกูเป สสีสกํ นิมุคฺโค อสฺส. อถ ตฺวํ ปุริเส อาณาเปยฺยาสิ – ‘เตน หิ, โภ, ตํ ปุริสํ ตมฺหา คูถกูปา อุทฺธรถา’ติ. เต ‘สาธู’ติ ปฏิสฺสุตฺวา ตํ ปุริสํ ตมฺหา คูถกูปา อุทฺธเรยฺยุํ. เต ตฺวํ เอวํ วเทยฺยาสิ – ‘เตน หิ, โภ, ตสฺส ปุริสสฺส กายา เวฬุเปสิกาหิ คูถํ สุนิมฺมชฺชิตํ นิมฺมชฺชถา’ติ. เต ‘สาธู’ติ ปฏิสฺสุตฺวา ตสฺส ปุริสสฺส กายา เวฬุเปสิกาหิ คูถํ สุนิมฺมชฺชิตํ นิมฺมชฺเชยฺยุํ. เต ตฺวํ เอวํ วเทยฺยาสิ – ‘เตน หิ, โภ, ตสฺส ปุริสสฺส กายํ ปณฺฑุมตฺติกาย ติกฺขตฺตุํ สุพฺพฏฺฏิตํ อุพฺพฏฺเฏถา’ติ. เต ตสฺส ปุริสสฺส กายํ ปณฺฑุมตฺติกาย ติกฺขตฺตุํ สุพฺพฏฺฏิตํ อุพฺพฏฺเฏยฺยุํ. เต ตฺวํ เอวํ วเทยฺยาสิ – ‘เตน หิ, โภ, ตํ ปุริสํ เตเลน อพฺภญฺชิตฺวา สุขุเมน จุณฺเณน ติกฺขตฺตุํ สุปฺปโธตํ กโรถา’ติ. เต ตํ ปุริสํ เตเลน อพฺภญฺชิตฺวา สุขุเมน จุณฺเณน ติกฺขตฺตุํ สุปฺปโธตํ กเรยฺยุํ. เต ตฺวํ เอวํ วเทยฺยาสิ – ‘เตน หิ, โภ, ตสฺส ปุริสสฺส เกสมสฺสุํ กปฺเปถา’ติ. เต ตสฺส ปุริสสฺส เกสมสฺสุํ กปฺเปยฺยุํ. เต ตฺวํ เอวํ วเทยฺยาสิ – ‘เตน หิ, โภ, ตสฺส ปุริสสฺส มหคฺฆญฺจ มาลํ มหคฺฆญฺจ วิเลปนํ มหคฺฆานิ จ วตฺถานิ อุปหรถา’ติ. เต ตสฺส ปุริสสฺส มหคฺฆญฺจ มาลํ มหคฺฆญฺจ วิเลปนํ มหคฺฆานิ จ วตฺถานิ อุปหเรยฺยุํ. เต ตฺวํ เอวํ วเทยฺยาสิ – ‘เตน หิ, โภ, ตํ ปุริสํ ปาสาทํ อาโรเปตฺวา ปญฺจกามคุณานิ อุปฏฺฐาเปถา’ติ. เต ตํ ปุริสํ ปาสาทํ อาโรเปตฺวา ปญฺจกามคุณานิ อุปฏฺฐาเปยฺยุํ. ४१५. तर मग, राजन्य, मी तुला एक उपमा देतो. या जगात काही बुद्धिमान लोक उपमेच्या द्वारे बोललेल्या गोष्टीचा अर्थ समजून घेतात. समजा, राजन्य, एखादा माणूस मलमूत्राच्या खड्ड्यात डोक्यासकट बुडालेला आहे. तेव्हा तू तुझ्या माणसांना आज्ञा दिलीस की – 'अरे लोकांनो, त्या माणसाला त्या मलमूत्राच्या खड्ड्यातून बाहेर काढा!' त्यांनी 'ठीक आहे' म्हणून त्या माणसाला त्या मलमूत्राच्या खड्ड्यातून बाहेर काढले. मग तू त्यांना असे म्हणालास – 'अरे लोकांनो, बांबूच्या कपच्यांनी त्या माणसाच्या शरीरावरील मलमूत्र चांगल्या प्रकारे खरवडून स्वच्छ करा.' त्यांनी 'ठीक आहे' म्हणून बांबूच्या कपच्यांनी त्या माणसाच्या शरीरावरील मलमूत्र चांगल्या प्रकारे खरवडून स्वच्छ केले. मग तू त्यांना असे म्हणालास – 'अरे लोकांनो, त्या माणसाच्या शरीराला पांढऱ्या मातीने तीन वेळा चांगल्या प्रकारे घासून स्वच्छ करा.' त्यांनी त्या माणसाच्या शरीराला पांढऱ्या मातीने तीन वेळा चांगल्या प्रकारे घासून स्वच्छ केले. मग तू त्यांना असे म्हणालास – 'अरे लोकांनो, त्या माणसाला तेल लावून सुगंधी बारीक चूर्णाने तीन वेळा चांगल्या प्रकारे धुवून स्वच्छ करा.' त्यांनी त्या माणसाला तेल लावून सुगंधी बारीक चूर्णाने तीन वेळा चांगल्या प्रकारे धुवून स्वच्छ केले. मग तू त्यांना असे म्हणालास – 'अरे लोकांनो, त्या माणसाचे... केस आणि दाढी व्यवस्थित करा.' त्यांनी त्या माणसाचे केस आणि दाढी व्यवस्थित केली. मग तू त्यांना असे म्हणालास – 'अरे लोकांनो, त्या माणसाला मौल्यवान हार, मौल्यवान सुगंधी उटणे आणि मौल्यवान वस्त्रे द्या.' त्यांनी त्या माणसाला मौल्यवान हार, मौल्यवान सुगंधी उटणे आणि मौल्यवान वस्त्रे दिली. मग तू त्यांना असे म्हणालास – 'अरे लोकांनो, त्या माणसाला महालात नेऊन पाच कामगुणांचे सुख उपलब्ध करून द्या.' त्यांनी त्या माणसाला महालात नेऊन पाच कामगुणांचे सुख उपलब्ध करून दिले. ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, ราชญฺญ, อปิ นุ ตสฺส ปุริสสฺส สุนฺหาตสฺส สุวิลิตฺตสฺส สุกปฺปิตเกสมสฺสุสฺส อามุกฺกมาลาภรณสฺส โอทาตวตฺถวสนสฺส อุปริปาสาทวรคตสฺส ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิตสฺส สมงฺคีภูตสฺส ปริจารยมานสฺส ปุนเทว ตสฺมึ คูถกูเป นิมุชฺชิตุกามตา อสฺสา’’ติ? ‘‘โน หิทํ, โภ กสฺสป’’. ‘‘ตํ กิสฺส เหตุ’’? ‘‘อสุจิ, โภ กสฺสป, คูถกูโป อสุจิ เจว อสุจิสงฺขาโต จ ทุคฺคนฺโธ จ ทุคฺคนฺธสงฺขาโต จ เชคุจฺโฉ จ เชคุจฺฉสงฺขาโต [Pg.260] จ ปฏิกูโล จ ปฏิกูลสงฺขาโต จา’’ติ. ‘‘เอวเมว โข, ราชญฺญ, มนุสฺสา เทวานํ อสุจี เจว อสุจิสงฺขาตา จ, ทุคฺคนฺธา จ ทุคฺคนฺธสงฺขาตา จ, เชคุจฺฉา จ เชคุจฺฉสงฺขาตา จ, ปฏิกูลา จ ปฏิกูลสงฺขาตา จ. โยชนสตํ โข, ราชญฺญ, มนุสฺสคนฺโธ เทเว อุพฺพาธติ. กึ ปน เต มิตฺตามจฺจา ญาติสาโลหิตา ปาณาติปาตา ปฏิวิรตา อทินฺนาทานา ปฏิวิรตา กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรตา มุสาวาทา ปฏิวิรตา ปิสุณาย วาจาย ปฏิวิรตา ผรุสาย วาจาย ปฏิวิรตา สมฺผปฺปลาปา ปฏิวิรตา อนภิชฺฌาลู อพฺยาปนฺนจิตฺตา สมฺมาทิฏฺฐี, กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปนฺนา เต อาคนฺตฺวา อาโรเจสฺสนฺติ – ‘อิติปิ อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’ติ? อิมินาปิ โข เต, ราชญฺญ, ปริยาเยน เอวํ โหตุ – ‘อิติปิ อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. “हे राजन्य, तुला काय वाटते? जर एखाद्या माणसाने स्वच्छ स्नान केले असेल, सुगंधी सुवासिक द्रव्ये अंगाला लावली असतील, केस आणि दाढी व्यवस्थित कापली असेल, फुलांचे हार व अलंकार परिधान केले असतील, शुभ्र वस्त्रे परिधान केली असतील आणि तो एका भव्य प्रासादाच्या वरच्या मजल्यावर राहून पाच कामगुणांनी युक्त होऊन, त्यांचा उपभोग घेत आनंदात राहत असेल, तर त्याला पुन्हा त्या विष्ठेच्या खड्ड्यात बुडून राहण्याची इच्छा होईल का?” “नक्कीच नाही, आदरणीय कश्यप.” “त्याचे कारण काय?” “आदरणीय कश्यप, तो विष्ठेचा खड्डा अशुद्ध आहे आणि अशुद्ध मानला जातो, दुर्गंधीयुक्त आहे आणि दुर्गंधीयुक्त मानला जातो, घृणास्पद आहे आणि घृणास्पद मानला जातो, तिरस्करणीय आहे आणि तिरस्करणीय मानला जातो.” “त्याचप्रमाणे, हे राजन्य, देवगणांसाठी मनुष्य हे अशुद्ध आहेत आणि अशुद्ध मानले जातात, दुर्गंधीयुक्त आहेत आणि दुर्गंधीयुक्त मानले जातात, घृणास्पद आहेत आणि घृणास्पद मानले जातात, तिरस्करणीय आहेत आणि तिरस्करणीय मानले जातात. हे राजन्य, मनुष्यांचा वास शंभर योजनांवरूनही देवांना त्रास देतो. मग तुझे जे मित्र, सहकारी, नातेवाईक आणि सगेसोयरे आहेत, ज्यांनी जीवहिंसेपासून विरती घेतली होती, चोरीपासून विरती घेतली होती, कामभोगातील व्यभिचारापासून विरती घेतली होती, असत्य बोलण्यापासून विरती घेतली होती, चहाडी करण्यापासून विरती घेतली होती, कठोर बोलण्यापासून विरती घेतली होती, निरर्थक बडबडीपासून विरती घेतली होती, जे लोभरहित होते, द्वेषरहित चित्त असलेले होते आणि सम्यक दृष्टीने युक्त होते; जे शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न झाले आहेत, ते परत येऊन तुला असे कसे सांगतील की—‘परलोक अस्तित्वात आहे, औपपातिक प्राणी अस्तित्वात आहेत, चांगल्या आणि वाईट कर्मांचे फळ व विपाक अस्तित्वात आहे’? हे राजन्य, याही कारणाने तू हे मान्य कर की—‘परलोक अस्तित्वात आहे, औपपातिक प्राणी अस्तित्वात आहेत, चांगल्या आणि वाईट कर्मांचे फळ व विपाक अस्तित्वात आहे’.” ๔๑๖. ‘‘กิญฺจาปิ ภวํ กสฺสโป เอวมาห, อถ โข เอวํ เม เอตฺถ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปน, ราชญฺญ, ปริยาโย …เป… ‘‘อตฺถิ, โภ กสฺสป, ปริยาโย…เป… ``ยถา กถํ วิย, ราชญฺญาติ? ‘‘อิธ เม, โภ กสฺสป, มิตฺตามจฺจา ญาติสาโลหิตา ปาณาติปาตา ปฏิวิรตา อทินฺนาทานา ปฏิวิรตา กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรตา มุสาวาทา ปฏิวิรตา สุราเมรยมชฺชปมาทฏฺฐานา ปฏิวิรตา, เต อปเรน สมเยน อาพาธิกา โหนฺติ ทุกฺขิตา พาฬฺหคิลานา. ยทาหํ ชานามิ – ‘น ทานิเม อิมมฺหา อาพาธา วุฏฺฐหิสฺสนฺตี’ติ ตฺยาหํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวํ วทามิ – ‘สนฺติ โข, โภ, เอเก สมณพฺราหฺมณา เอวํวาทิโน เอวํทิฏฺฐิโน – เย เต ปาณาติปาตา ปฏิวิรตา อทินฺนาทานา ปฏิวิรตา กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรตา มุสาวาทา ปฏิวิรตา สุราเมรยมชฺชปมาทฏฺฐานา ปฏิวิรตา, เต กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺติ เทวานํ ตาวตึสานํ สหพฺยตนฺติ. ภวนฺโต โข ปาณาติปาตา ปฏิวิรตา อทินฺนาทานา ปฏิวิรตา กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรตา มุสาวาทา ปฏิวิรตา สุราเมรยมชฺชปมาทฏฺฐานา ปฏิวิรตา. สเจ เตสํ ภวตํ สมณพฺราหฺมณานํ สจฺจํ วจนํ, ภวนฺโต กายสฺส เภทา ปรํ [Pg.261] มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิสฺสนฺติ, เทวานํ ตาวตึสานํ สหพฺยตํ. สเจ, โภ, กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺเชยฺยาถ เทวานํ ตาวตึสานํ สหพฺยตํ, เยน เม อาคนฺตฺวา อาโรเจยฺยาถ – `อิติปิ อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโกติ. ภวนฺโต โข ปน เม สทฺธายิกา ปจฺจยิกา, ยํ ภวนฺเตหิ ทิฏฺฐํ, ยถา สามํ ทิฏฺฐํ เอวเมตํ ภวิสฺสตีติ. เต เม ‘สาธู’ติ ปฏิสฺสุตฺวา เนว อาคนฺตฺวา อาโรเจนฺติ, น ปน ทูตํ ปหิณนฺติ. อยมฺปิ โข, โภ กสฺสป, ปริยาโย, เยน เม ปริยาเยน เอวํ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ४१६. “जरी आदरणीय कश्यप असे म्हणत असले, तरी माझे या बाबतीत असेच मत आहे की—‘परलोक अस्तित्वात नाही, औपपातिक प्राणी अस्तित्वात नाहीत, चांगल्या आणि वाईट कर्मांचे फळ व विपाक अस्तित्वात नाही’.” “पण हे राजन्य, तुझ्याकडे असे मानण्याचे काही कारण आहे का?” “होय, आदरणीय कश्यप, माझ्याकडे याचे कारण आहे.” “ते कसे काय, राजन्य?” “इथे माझे जे मित्र, सहकारी, नातेवाईक आणि सगेसोयरे आहेत, ज्यांनी जीवहिंसेपासून विरती घेतली होती, चोरीपासून विरती घेतली होती, कामभोगातील व्यभिचारापासून विरती घेतली होती, असत्य बोलण्यापासून विरती घेतली होती, सुरा-मेरय-मद्य आणि प्रमादस्थानांपासून विरती घेतली होती; ते काही काळानंतर आजारी पडतात, दुःखी होतात आणि गंभीर आजाराने ग्रस्त होतात. जेव्हा मला समजते की—‘आता ते या आजारातून बरे होणार नाहीत’, तेव्हा मी त्यांच्याजवळ जाऊन त्यांना असे सांगतो—‘मित्रांनो, काही श्रमण आणि ब्राह्मण असे प्रतिपादन करणारे व अशा मताचे आहेत की—जे जीवहिंसेपासून, चोरीपासून, व्यभिचारापासून, असत्य बोलण्यापासून आणि सुरा-मद्य-प्रमादस्थानांपासून दूर राहतात, ते शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात, तावतिंस देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतात. तुम्ही तर जीवहिंसेपासून, चोरीपासून, व्यभिचारापासून, असत्य बोलण्यापासून आणि सुरा-मद्य-प्रमादस्थानांपासून दूर राहिला आहात. जर त्या श्रमण-ब्राह्मणांचे सांगणे खरे असेल, तर शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर तुम्ही सुगतीला, स्वर्गलोकात, तावतिंस देवांच्या सहवासात उत्पन्न व्हाल. मित्रांनो, जर तुम्ही शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात, तावतिंस देवांच्या सहवासात उत्पन्न झालात, तर माझ्याकडे परत येऊन मला सांगा की—परलोक अस्तित्वात आहे, औपपातिक प्राणी अस्तित्वात आहेत, चांगल्या आणि वाईट कर्मांचे फळ व विपाक अस्तित्वात आहे. तुम्ही माझे विश्वासू आणि खात्रीचे आहात. तुम्ही जे स्वतः पाहिले असेल, ते जसे पाहिले आहे तसेच असेल.’ त्यांनी मला ‘ठीक आहे’ म्हणून संमती दिली, तरीही ते परत येऊन मला सांगत नाहीत आणि कोणताही संदेशवाहकही पाठवत नाहीत. आदरणीय कश्यप, हेच ते कारण आहे ज्यामुळे माझे असे मत आहे की—‘परलोक अस्तित्वात नाही, औपपातिक प्राणी अस्तित्वात नाहीत, चांगल्या आणि वाईट कर्मांचे फळ व विपाक अस्तित्वात नाही’.” ตาวตึสเทวอุปมา तावतिंस देवांची उपमा ๔๑๗. ‘‘เตน หิ, ราชญฺญ, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิปุจฺฉิสฺสามิ; ยถา เต ขเมยฺย, ตถา นํ พฺยากเรยฺยาสิ. ยํ โข ปน, ราชญฺญ, มานุสฺสกํ วสฺสสตํ, เทวานํ ตาวตึสานํ เอโส เอโก รตฺตินฺทิโว, ตาย รตฺติยา ตึสรตฺติโย มาโส, เตน มาเสน ทฺวาทสมาสิโย สํวจฺฉโร, เตน สํวจฺฉเรน ทิพฺพํ วสฺสสหสฺสํ เทวานํ ตาวตึสานํ อายุปฺปมาณํ. เย เต มิตฺตามจฺจา ญาติสาโลหิตา ปาณาติปาตา ปฏิวิรตา อทินฺนาทานา ปฏิวิรตา กาเมสุมิจฺฉาจารา ปฏิวิรตา มุสาวาทา ปฏิวิรตา สุราเมรยมชฺชปมาทฏฺฐานา ปฏิวิรตา, เต กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปนฺนา เทวานํ ตาวตึสานํ สหพฺยตํ. สเจ ปน เตสํ เอวํ ภวิสฺสติ – ‘ยาว มยํ ทฺเว วา ตีณิ วา รตฺตินฺทิวา ทิพฺเพหิ ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิตา สมงฺคีภูตา ปริจาเรม, อถ มยํ ปายาสิสฺส ราชญฺญสฺส คนฺตฺวา อาโรเจยฺยาม – ‘‘อิติปิ อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’ติ. อปิ นุ เต อาคนฺตฺวา อาโรเจยฺยุํ – ‘อิติปิ อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ? ‘‘โน หิทํ, โภ กสฺสป. อปิ หิ มยํ, โภ กสฺสป, จิรํ กาลงฺกตาปิ ภเวยฺยาม. โก ปเนตํ โภโต กสฺสปสฺส อาโรเจติ [Pg.262] – ‘อตฺถิ เทวา ตาวตึสา’ติ วา ‘เอวํทีฆายุกา เทวา ตาวตึสา’ติ วา. น มยํ โภโต กสฺสปสฺส สทฺทหาม – ‘อตฺถิ เทวา ตาวตึสา’ติ วา ‘เอวํทีฆายุกา เทวา ตาวตึสา’ติ วา’’ติ. ४१७. “तसे असेल तर, हे राजन्य, मी तुलाच याविषयी उलट विचारतो; तुला जसे योग्य वाटेल तसे तू उत्तर दे. हे राजन्य, मानवी शंभर वर्षे म्हणजे तावतिंस देवांचा एक दिवस आणि रात्र होय. अशा तीस रात्रींचा एक महिना होतो, अशा बारा महिन्यांचे एक वर्ष होते आणि अशा वर्षांनुसार दिव्य एक हजार वर्षे हे तावतिंस देवांचे आयुष्यमान असते. तुझे जे मित्र, सहकारी, नातेवाईक आणि सगेसोयरे होते, ज्यांनी जीवहिंसेपासून विरती घेतली होती, चोरीपासून विरती घेतली होती, व्यभिचारापासून विरती घेतली होती, असत्य बोलण्यापासून विरती घेतली होती, सुरा-मद्य-प्रमादस्थानांपासून विरती घेतली होती; ते शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात, तावतिंस देवांच्या सहवासात उत्पन्न झाले आहेत. जर त्यांना असा विचार आला की—‘आधी आपण दोन किंवा तीन दिवस दिव्य पाच कामगुणांनी युक्त होऊन, त्यांचा उपभोग घेऊ आणि त्यानंतर आपण राजन्य पायासीकडे जाऊन त्याला सांगू की—परलोक अस्तित्वात आहे, औपपातिक प्राणी अस्तित्वात आहेत, चांगल्या आणि वाईट कर्मांचे फळ व विपाक अस्तित्वात आहे.’ तर काय ते परत येऊन तुला सांगू शकतील की—‘परलोक अस्तित्वात आहे, औपपातिक प्राणी अस्तित्वात आहेत, चांगल्या आणि वाईट कर्मांचे फळ व विपाक अस्तित्वात आहे’?” “नक्कीच नाही, आदरणीय कश्यप. कारण तोपर्यंत आम्ही केव्हाच मरण पावून खूप काळ लोटला असेल. पण आदरणीय कश्यप यांना हे कोणी सांगितले की—‘तावतिंस देव अस्तित्वात आहेत’ किंवा ‘तावतिंस देवांचे आयुष्य एवढे मोठे असते’? आम्ही आदरणीय कश्यप यांच्या या बोलण्यावर विश्वास ठेवत नाही की—‘तावतिंस देव अस्तित्वात आहेत’ किंवा ‘तावतिंस देवांचे आयुष्य एवढे मोठे असते’.” ชจฺจนฺธอุปมา जन्मांधाची उपमा ๔๑๘. ‘‘เสยฺยถาปิ, ราชญฺญ, ชจฺจนฺโธ ปุริโส น ปสฺเสยฺย กณฺห – สุกฺกานิ รูปานิ, น ปสฺเสยฺย นีลกานิ รูปานิ, น ปสฺเสยฺย ปีตกานิ รูปานิ, น ปสฺเสยฺย โลหิตกานิ รูปานิ, น ปสฺเสยฺย มญฺชิฏฺฐกานิ รูปานิ, น ปสฺเสยฺย สมวิสมํ, น ปสฺเสยฺย ตารกานิ รูปานิ, น ปสฺเสยฺย จนฺทิมสูริเย. โส เอวํ วเทยฺย – ‘นตฺถิ กณฺหสุกฺกานิ รูปานิ, นตฺถิ กณฺหสุกฺกานํ รูปานํ ทสฺสาวี. นตฺถิ นีลกานิ รูปานิ, นตฺถิ นีลกานํ รูปานํ ทสฺสาวี. นตฺถิ ปีตกานิ รูปานิ, นตฺถิ ปีตกานํ รูปานํ ทสฺสาวี. นตฺถิ โลหิตกานิ รูปานิ, นตฺถิ โลหิตกานํ รูปานํ ทสฺสาวี. นตฺถิ มญฺชิฏฺฐกานิ รูปานิ, นตฺถิ มญฺชิฏฺฐกานํ รูปานํ ทสฺสาวี. นตฺถิ สมวิสมํ, นตฺถิ สมวิสมสฺส ทสฺสาวี. นตฺถิ ตารกานิ รูปานิ, นตฺถิ ตารกานํ รูปานํ ทสฺสาวี. นตฺถิ จนฺทิมสูริยา, นตฺถิ จนฺทิมสูริยานํ ทสฺสาวี. อหเมตํ น ชานามิ, อหเมตํ น ปสฺสามิ, ตสฺมา ตํ นตฺถี’ติ. สมฺมา นุ โข โส, ราชญฺญ, วทมาโน วเทยฺยา’’ติ? ‘‘โน หิทํ, โภ กสฺสป. อตฺถิ กณฺหสุกฺกานิ รูปานิ, อตฺถิ กณฺหสุกฺกานํ รูปานํ ทสฺสาวี. อตฺถิ นีลกานิ รูปานิ, อตฺถิ นีลกานํ รูปานํ ทสฺสาวี…เป… อตฺถิ สมวิสมํ, อตฺถิ สมวิสมสฺส ทสฺสาวี. อตฺถิ ตารกานิ รูปานิ, อตฺถิ ตารกานํ รูปานํ ทสฺสาวี. อตฺถิ จนฺทิมสูริยา, อตฺถิ จนฺทิมสูริยานํ ทสฺสาวี. ‘อหเมตํ น ชานามิ, อหเมตํ น ปสฺสามิ, ตสฺมา ตํ นตฺถี’ติ. น หิ โส, โภ กสฺสป, สมฺมา วทมาโน วเทยฺยา’’ติ. ‘‘เอวเมว โข ตฺวํ, ราชญฺญ, ชจฺจนฺธูปโม มญฺเญ ปฏิภาสิ ยํ มํ ตฺวํ เอวํ วเทสิ’’. ४१८. “हे राजन, समजा एखादा जन्मांध मनुष्य असेल, ज्याला काळे किंवा पांढरे रंग दिसत नसतील, निळे रंग दिसत नसतील, पिवळे रंग दिसत नसतील, लाल रंग दिसत नसतील, मंजिष्ठ (गडद लाल) रंग दिसत नसतील, सम-विषम (सखल-सपाट) जागा दिसत नसेल, तारे दिसत नसतील, चंद्र-सूर्य दिसत नसतील. तो असे म्हणेल – ‘काळे-पांढरे रंग अस्तित्वात नाहीत आणि ते पाहणारेही कोणी नाही. निळे रंग अस्तित्वात नाहीत आणि ते पाहणारेही कोणी नाही. पिवळे रंग अस्तित्वात नाहीत आणि ते पाहणारेही कोणी नाही. लाल रंग अस्तित्वात नाहीत आणि ते पाहणारेही कोणी नाही. मंजिष्ठ रंग अस्तित्वात नाहीत आणि ते पाहणारेही कोणी नाही. सम-विषम जागा अस्तित्वात नाही आणि ती पाहणारेही कोणी नाही. तारे अस्तित्वात नाहीत आणि ते पाहणारेही कोणी नाही. चंद्र-सूर्य अस्तित्वात नाहीत आणि ते पाहणारेही कोणी नाही. मला हे माहीत नाही, मला हे दिसत नाही, म्हणून ते अस्तित्वात नाही.’ तर हे राजन, असे बोलणारा तो मनुष्य योग्य बोलत आहे का?” “नाही, आदरणीय कस्सपजी. काळे-पांढरे रंग अस्तित्वात आहेत आणि ते पाहणारेही आहेत. निळे रंग अस्तित्वात आहेत आणि ते पाहणारेही आहेत... (पे)... सम-विषम जागा अस्तित्वात आहे आणि ती पाहणारेही आहेत. तारे अस्तित्वात आहेत आणि ते पाहणारेही आहेत. चंद्र-सूर्य अस्तित्वात आहेत आणि ते पाहणारेही आहेत. ‘मला हे माहीत नाही, मला हे दिसत नाही, म्हणून ते अस्तित्वात नाही’ असे म्हणणारा तो मनुष्य, हे आदरणीय कस्सपजी, योग्य बोलत नाही.” “त्याचप्रमाणे, हे राजन, तू मला जे असे म्हणत आहेस, त्यावरून तू मला जन्मांधासारखाच भासत आहेस.” ‘‘โก ปเนตํ โภโต กสฺสปสฺส อาโรเจติ – ‘อตฺถิ เทวา ตาวตึสา’’ติ วา, ‘เอวํทีฆายุกา เทวา ตาวตึสา’ติ วา? น มยํ โภโต กสฺสปสฺส สทฺทหาม – ‘อตฺถิ เทวา ตาวตึสา’ติ วา ‘เอวํทีฆายุกา เทวา ตาวตึสา’ติ วา’’ติ. ‘‘น โข, ราชญฺญ, เอวํ ปโร โลโก ทฏฺฐพฺโพ, ยถา ตฺวํ มญฺญสิ อิมินา มํสจกฺขุนา. เย โข เต ราชญฺญ สมณพฺราหฺมณา อรญฺญวนปตฺถานิ ปนฺตานิ เสนาสนานิ ปฏิเสวนฺติ[Pg.263], เต ตตฺถ อปฺปมตฺตา อาตาปิโน ปหิตตฺตา วิหรนฺตา ทิพฺพจกฺขุํ วิโสเธนฺติ. เต ทิพฺเพน จกฺขุนา วิสุทฺเธน อติกฺกนฺตมานุสเกน อิมํ เจว โลกํ ปสฺสนฺติ ปรญฺจ สตฺเต จ โอปปาติเก. เอวญฺจ โข, ราชญฺญ, ปโร โลโก ทฏฺฐพฺโพ; นตฺเวว ยถา ตฺวํ มญฺญสิ อิมินา มํสจกฺขุนา. อิมินาปิ โข เต, ราชญฺญ, ปริยาเยน เอวํ โหตุ – ‘อิติปิ อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. “पण आदरणीय कस्सपजींना हे कोणी सांगितले की – ‘तावतींस देव अस्तित्वात आहेत’ किंवा ‘तावतींस देव एवढ्या दीर्घ आयुष्याचे असतात’? आम्ही आदरणीय कस्सपजींच्या या बोलण्यावर विश्वास ठेवत नाही की – ‘तावतींस देव अस्तित्वात आहेत’ किंवा ‘तावतींस देव एवढ्या दीर्घ आयुष्याचे असतात’.” “हे राजन, परलोक अशा प्रकारे पाहता येत नाही, जसा तू या मांसचक्षूंनी (भौतिक डोळ्यांनी) पाहण्याचा विचार करत आहेस. हे राजन, जे श्रमण आणि ब्राह्मण अरण्यातील निर्जन व दुर्गम अशा सेनासनांचा (निवासस्थानांचा) आश्रय घेतात, ते तिथे अप्रमत्त (जागरूक), उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करत असताना दिव्यचक्षू विशुद्ध करतात. ते मानवी दृष्टीच्या पलीकडे असलेल्या त्या विशुद्ध दिव्यचक्षूंनी हा लोक आणि परलोक दोन्ही पाहतात, तसेच औपपातिक (स्वयंभू उत्पन्न होणारे) प्राणीही पाहतात. हे राजन, परलोक अशा प्रकारे पाहिला जाऊ शकतो; पण तू विचार करतोस तसा या मांसचक्षूंनी नाही. हे राजन, या कारणावरूनही तू असे मानले पाहिजेस की – ‘परलोक अस्तित्वात आहे, औपपातिक प्राणी अस्तित्वात आहेत आणि चांगल्या-वाईट (सुकृत-दुष्कृत) कर्मांचे फळ व विपाक अस्तित्वात आहे’.” ๔๑๙. ‘‘กิญฺจาปิ ภวํ กสฺสโป เอวมาห, อถ โข เอวํ เม เอตฺถ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปน, ราชญฺญ, ปริยาโย…เป… อตฺถิ, โภ กสฺสป, ปริยาโย…เป… ยถา กถํ วิย, ราชญฺญา’’ติ? ‘‘อิธาหํ, โภ กสฺสป, ปสฺสามิ สมณพฺราหฺมเณ สีลวนฺเต กลฺยาณธมฺเม ชีวิตุกาเม อมริตุกาเม สุขกาเม ทุกฺขปฏิกูเล. ตสฺส มยฺหํ, โภ กสฺสป, เอวํ โหติ – สเจ โข อิเม โภนฺโต สมณพฺราหฺมณา สีลวนฺโต กลฺยาณธมฺมา เอวํ ชาเนยฺยุํ – ‘อิโต โน มตานํ เสยฺโย ภวิสฺสตี’ติ. อิทานิเม โภนฺโต สมณพฺราหฺมณา สีลวนฺโต กลฺยาณธมฺมา วิสํ วา ขาเทยฺยุํ, สตฺถํ วา อาหเรยฺยุํ, อุพฺพนฺธิตฺวา วา กาลงฺกเรยฺยุํ, ปปาเต วา ปปเตยฺยุํ. ยสฺมา จ โข อิเม โภนฺโต สมณพฺราหฺมณา สีลวนฺโต กลฺยาณธมฺมา น เอวํ ชานนฺติ – ‘อิโต โน มตานํ เสยฺโย ภวิสฺสตี’ติ, ตสฺมา อิเม โภนฺโต สมณพฺราหฺมณา สีลวนฺโต กลฺยาณธมฺมา ชีวิตุกามา อมริตุกามา สุขกามา ทุกฺขปฏิกูลา อตฺตานํ น มาเรนฺติ. อยมฺปิ โข, โภ กสฺสป, ปริยาโย, เยน เม ปริยาเยน เอวํ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ४१९. “जरी आदरणीय कस्सपजी असे म्हणत असले, तरी या बाबतीत माझे मत असेच आहे की – ‘परलोक अस्तित्वात नाही, औपपातिक प्राणी अस्तित्वात नाहीत आणि चांगल्या-वाईट कर्मांचे फळ व विपाक अस्तित्वात नाही’.” “पण हे राजन, असे मानण्याचे काही कारण (पर्याय) आहे का? ... (पे) ... होय, आदरणीय कस्सपजी, असे मानण्याचे कारण आहे ... (पे) ... ते कसे काय, राजन?” “हे आदरणीय कस्सपजी, मी इथे शीलवान, कल्याणकारी धर्माचे आचरण करणारे, जगण्याची इच्छा असणारे, मरण्याची इच्छा नसणारे, सुखाची इच्छा असणारे आणि दुःखाचा तिरस्कार करणारे श्रमण व ब्राह्मण पाहतो. हे आदरणीय कस्सपजी, माझ्या मनात असा विचार येतो – जर या शीलवान आणि कल्याणकारी धर्माचे आचरण करणाऱ्या आदरणीय श्रमण-ब्राह्मणांना हे माहीत असते की – ‘मृत्यूनंतर आमचे अधिक कल्याण होईल’, तर हे शीलवान आणि कल्याणकारी धर्माचे आचरण करणारे आदरणीय श्रमण-ब्राह्मण आताच विष प्राशन करतील, किंवा शस्त्राने स्वतःला संपवून घेतील, किंवा गळफास लावून प्राण सोडतील, किंवा कड्यावरून उडी मारून जीव देतील. पण, या शीलवान आणि कल्याणकारी धर्माचे आचरण करणाऱ्या आदरणीय श्रमण-ब्राह्मणांना हे माहीत नाही की – ‘मृत्यूनंतर आमचे अधिक कल्याण होईल’, म्हणूनच हे शीलवान आणि कल्याणकारी धर्माचे आचरण करणारे आदरणीय श्रमण-ब्राह्मण जगण्याची इच्छा बाळगतात, मरण्याची इच्छा बाळगत नाहीत, सुखाची इच्छा बाळगतात, दुःखाचा तिरस्कार करतात आणि स्वतःचा जीव घेत नाहीत. हे आदरणीय कस्सपजी, हेच ते कारण आहे, ज्या कारणाने माझे असे मत आहे की – ‘परलोक अस्तित्वात नाही, औपपातिक प्राणी अस्तित्वात नाहीत आणि चांगल्या-वाईट कर्मांचे फळ व विपाक अस्तित्वात नाही’.” คพฺภินีอุปมา गर्भिणी उपमा (गर्भवती स्त्रीची उपमा) ๔๒๐. ‘‘เตน หิ, ราชญฺญ, อุปมํ เต กริสฺสามิ. อุปมาย มิเธกจฺเจ วิญฺญู ปุริสา ภาสิตสฺส อตฺถํ อาชานนฺติ. ภูตปุพฺพํ, ราชญฺญ, อญฺญตรสฺส พฺราหฺมณสฺส [Pg.264] ทฺเว ปชาปติโย อเหสุํ. เอกิสฺสา ปุตฺโต อโหสิ ทสวสฺสุทฺเทสิโก วา ทฺวาทสวสฺสุทฺเทสิโก วา, เอกา คพฺภินี อุปวิชญฺญา. อถ โข โส พฺราหฺมโณ กาลมกาสิ. อถ โข โส มาณวโก มาตุสปตฺตึ เอตทโวจ – ‘ยมิทํ, โภติ, ธนํ วา ธญฺญํ วา รชตํ วา ชาตรูปํ วา, สพฺพํ ตํ มยฺหํ; นตฺถิ ตุยฺเหตฺถ กิญฺจิ. ปิตุ เม โภติ, ทายชฺชํ นิยฺยาเทหี’ติ. เอวํ วุตฺเต สา พฺราหฺมณี ตํ มาณวกํ เอตทโวจ – ‘อาคเมหิ ตาว, ตาต, ยาว วิชายามิ. สเจ กุมารโก ภวิสฺสติ, ตสฺสปิ เอกเทโส ภวิสฺสติ; สเจ กุมาริกา ภวิสฺสติ, สาปิ เต โอปโภคฺคา ภวิสฺสตี’ติ. ทุติยมฺปิ โข โส มาณวโก มาตุสปตฺตึ เอตทโวจ – ‘ยมิทํ, โภติ, ธนํ วา ธญฺญํ วา รชตํ วา ชาตรูปํ วา, สพฺพํ ตํ มยฺหํ; นตฺถิ ตุยฺเหตฺถ กิญฺจิ. ปิตุ เม, โภติ, ทายชฺชํ นิยฺยาเทหี’ติ. ทุติยมฺปิ โข สา พฺราหฺมณี ตํ มาณวกํ เอตทโวจ – ‘อาคเมหิ ตาว, ตาต, ยาว วิชายามิ. สเจ กุมารโก ภวิสฺสติ, ตสฺสปิ เอกเทโส ภวิสฺสติ; สเจ กุมาริกา ภวิสฺสติ สาปิ เต โอปโภคฺคา ภวิสฺสตี’ติ. ตติยมฺปิ โข โส มาณวโก มาตุสปตฺตึ เอตทโวจ – ‘ยมิทํ, โภติ, ธนํ วา ธญฺญํ วา รชตํ วา ชาตรูปํ วา, สพฺพํ ตํ มยฺหํ; นตฺถิ ตุยฺเหตฺถ กิญฺจิ. ปิตุ เม, โภติ, ทายชฺชํ นิยฺยาเทหี’ติ. ४२०. “तर मग, हे राजन्य, मी तुला एक उपमा देतो. या जगात काही बुद्धिमान लोक उपमेच्या द्वारे सांगितलेल्या गोष्टीचा अर्थ समजून घेतात. पूर्वीची गोष्ट आहे, हे राजन्य, एका ब्राह्मणाला दोन पत्नी होत्या. एका पत्नीला दहा किंवा बारा वर्षांचा एक मुलगा होता, तर दुसरी पत्नी गरोदर होती आणि तिची प्रसूतीची वेळ जवळ आली होती. तेव्हा तो ब्राह्मण मरण पावला. त्यानंतर त्या तरुण मुलाने आपल्या सावत्र आईला असे म्हटले – ‘आर्ये, जे काही धन, धान्य, चांदी किंवा सोने आहे, ते सर्व माझेच आहे; यात तुमचे काहीही नाही. आर्ये, माझ्या वडिलांचा वारसा मला सोपवून द्या.’ असे म्हटल्यावर त्या ब्राह्मणीने त्या तरुणाला म्हटले – ‘बाळा, मी प्रसूती होईपर्यंत जरा थांब. जर मुलगा झाला, तर त्यालाही एक हिस्सा मिळेल; आणि जर मुलगी झाली, तर ती तुझी दासी होईल.’ दुसऱ्यांदाही त्या तरुणाने आपल्या सावत्र आईला तसेच म्हटले – ‘आर्ये, जे काही धन, धान्य, चांदी किंवा सोने आहे, ते सर्व माझेच आहे; यात तुमचे काहीही नाही. आर्ये, माझ्या वडिलांचा वारसा मला सोपवून द्या.’ दुसऱ्यांदाही त्या ब्राह्मणीने त्या तरुणाला म्हटले – ‘बाळा, मी प्रसूती होईपर्यंत जरा थांब. जर मुलगा झाला, तर त्यालाही एक हिस्सा मिळेल; आणि जर मुलगी झाली, तर ती तुझी दासी होईल.’ तिसऱ्यांदाही त्या तरुणाने आपल्या सावत्र आईला तसेच म्हटले – ‘आर्ये, जे काही धन, धान्य, चांदी किंवा सोने आहे, ते सर्व माझेच आहे; यात तुमचे काहीही नाही. आर्ये, माझ्या वडिलांचा वारसा मला सोपवून द्या.’” ‘‘อถ โข สา พฺราหฺมณี สตฺถํ คเหตฺวา โอวรกํ ปวิสิตฺวา อุทรํ โอปาเทสิ – ‘ยาว วิชายามิ ยทิ วา กุมารโก ยทิ วา กุมาริกา’ติ. สา อตฺตานํ เจว ชีวิตญฺจ คพฺภญฺจ สาปเตยฺยญฺจ วินาเสสิ. ยถา ตํ พาลา อพฺยตฺตา อนยพฺยสนํ อาปนฺนา อโยนิโส ทายชฺชํ คเวสนฺตี, เอวเมว โข ตฺวํ, ราชญฺญ, พาโล อพฺยตฺโต อนยพฺยสนํ อาปชฺชิสฺสสิ อโยนิโส ปรโลกํ คเวสนฺโต; เสยฺยถาปิ สา พฺราหฺมณี พาลา อพฺยตฺตา อนยพฺยสนํ อาปนฺนา อโยนิโส ทายชฺชํ คเวสนฺตี. น โข, ราชญฺญ, สมณพฺราหฺมณา สีลวนฺโต กลฺยาณธมฺมา อปกฺกํ ปริปาเจนฺติ; อปิ จ ปริปากํ อาคเมนฺติ. ปณฺฑิตานํ อตฺโถ หิ, ราชญฺญ, สมณพฺราหฺมณานํ สีลวนฺตานํ กลฺยาณธมฺมานํ ชีวิเตน. ยถา ยถา โข, ราชญฺญ, สมณพฺราหฺมณา สีลวนฺโต กลฺยาณธมฺมา จิรํ ทีฆมทฺธานํ ติฏฺฐนฺติ, ตถา [Pg.265] ตถา พหุํ ปุญฺญํ ปสวนฺติ, พหุชนหิตาย จ ปฏิปชฺชนฺติ พหุชนสุขาย โลกานุกมฺปาย อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสานํ. อิมินาปิ โข เต, ราชญฺญ, ปริยาเยน เอวํ โหตุ – ‘อิติปิ อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. “तेव्हा त्या ब्राह्मणीने हातात शस्त्र घेतले आणि आतल्या खोलीत जाऊन आपले पोट फाडले – ‘मी प्रसूती होईपर्यंत थांबू की काय, मुलगा आहे की मुलगी हे पाहण्यासाठी!’ अशा प्रकारे तिने स्वतःचा, स्वतःच्या प्राणाचा, गर्भाचा आणि सर्व संपत्तीचा नाश केला. ज्याप्रमाणे मूर्ख आणि अडाणी लोक अविचाराने वारसा शोधताना मोठ्या संकटात सापडतात, त्याचप्रमाणे, हे राजन्य, तू देखील मूर्ख व अडाणी बनून अविचाराने परलोकाचा शोध घेताना मोठ्या संकटात पडशील; ज्याप्रमाणे ती मूर्ख व अडाणी ब्राह्मणी अविचाराने वारसा शोधताना विनाशाला प्राप्त झाली. हे राजन्य, शीलवान आणि कल्याणकारी आचरण असणारे श्रमण-ब्राह्मण अपक्व गोष्टीला अकाली पिकवत नाहीत, तर ते परिपक्वतेची वाट पाहतात. हे राजन्य, शीलवान आणि कल्याणकारी आचरण असणाऱ्या ज्ञानी श्रमण-ब्राह्मणांचे जीवन खरोखरच कल्याणकारी असते. हे राजन्य, शीलवान आणि कल्याणकारी आचरण असणारे श्रमण-ब्राह्मण जितका दीर्घकाळ जगतात, तितकेच ते अधिक पुण्य संपादन करतात आणि बहुजनांच्या हितासाठी, बहुजनांच्या सुखासाठी, जगावरील अनुकंपेपोटी, देव आणि मनुष्यांच्या कल्याणासाठी, हितासाठी व सुखासाठी कार्यरत राहतात. म्हणून, हे राजन्य, या कारणाने देखील तू हे मान्य कर की – ‘परलोक आहे, औपपातिक प्राणी आहेत आणि चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ व विपाक देखील आहे.’” ๔๒๑. ‘‘กิญฺจาปิ ภวํ กสฺสโป เอวมาห, อถ โข เอวํ เม เอตฺถ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปน, ราชญฺญ, ปริยาโย…เป… อตฺถิ, โภ กสฺสป, ปริยาโย…เป… ยถา กถํ วิย, ราชญฺญา’’ติ? ‘‘อิธ เม, โภ กสฺสป, ปุริสา โจรํ อาคุจารึ คเหตฺวา ทสฺเสนฺติ – ‘อยํ เต, ภนฺเต, โจโร อาคุจารี; อิมสฺส ยํ อิจฺฉสิ, ตํ ทณฺฑํ ปเณหี’ติ. ตฺยาหํ เอวํ วทามิ – ‘เตน หิ, โภ, อิมํ ปุริสํ ชีวนฺตํเยว กุมฺภิยา ปกฺขิปิตฺวา มุขํ ปิทหิตฺวา อลฺเลน จมฺเมน โอนนฺธิตฺวา อลฺลาย มตฺติกาย พหลาวเลปนํ กริตฺวา อุทฺธนํ อาโรเปตฺวา อคฺคึ เทถา’ติ. เต เม ‘สาธู’ติ ปฏิสฺสุตฺวา ตํ ปุริสํ ชีวนฺตํเยว กุมฺภิยา ปกฺขิปิตฺวา มุขํ ปิทหิตฺวา อลฺเลน จมฺเมน โอนนฺธิตฺวา อลฺลาย มตฺติกาย พหลาวเลปนํ กริตฺวา อุทฺธนํ อาโรเปตฺวา อคฺคึ เทนฺติ. ยทา มยํ ชานาม ‘กาลงฺกโต โส ปุริโส’ติ, อถ นํ กุมฺภึ โอโรเปตฺวา อุพฺภินฺทิตฺวา มุขํ วิวริตฺวา สณิกํ นิลฺโลเกม – ‘อปฺเปว นามสฺส ชีวํ นิกฺขมนฺตํ ปสฺเสยฺยามา’ติ. เนวสฺส มยํ ชีวํ นิกฺขมนฺตํ ปสฺสาม. อยมฺปิ โข, โภ กสฺสป, ปริยาโย, เยน เม ปริยาเยน เอวํ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ४२१. “जरी पूजनीय कस्सप असे म्हणतात, तरीही माझे या बाबतीत असेच मत आहे की – ‘परलोक नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत आणि चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ व विपाक देखील नाही.’” “पण, हे राजन्य, असे मानण्यास काही कारण आहे का?” “होय, पूजनीय कस्सप, असे मानण्यास कारण आहे.” “ते कसे काय, राजन्य?” “पूजनीय कस्सप, समजा इथे माझे सेवक एखाद्या गुन्हेगार चोराला पकडून माझ्यासमोर आणतात आणि म्हणतात – ‘महाराज, हा आपला गुन्हेगार चोर आहे; याला आपल्याला हवी ती शिक्षा द्या.’ तेव्हा मी त्यांना असे सांगतो – ‘तर मग, लोकांनो, या माणसाला जिवंतपणीच एका मोठ्या मातीच्या माठात टाका, त्याचे तोंड बंद करा, ओल्या चामड्याने ते बांधून टाका, त्यावर ओल्या मातीचा जाड थर लेपा आणि त्याला भट्टीत ठेवून आग लावा.’ ते माझे बोलणे ‘फार चांगले’ म्हणून स्वीकारतात आणि त्या माणसाला जिवंतपणीच माठात टाकून, तोंड बंद करून, ओल्या चामड्याने बांधून, ओल्या मातीचा जाड लेप लावून, भट्टीत ठेवून आग लावतात. जेव्हा आम्हाला समजते की ‘तो माणूस मरण पावला आहे’, तेव्हा आम्ही तो माठ खाली उतरवतो, मातीचा लेप काढतो, त्याचे तोंड उघडतो आणि हळूच आत पाहतो – ‘कदाचित त्याचा जीव बाहेर पडताना आम्हाला दिसेल.’ परंतु आम्हाला त्याचा जीव बाहेर पडताना कधीच दिसत नाही. पूजनीय कस्सप, हेच ते कारण आहे ज्यामुळे माझे असे मत आहे की – ‘परलोक नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत आणि चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ व विपाक देखील नाही.’” สุปินกอุปมา स्वप्नाची उपमा ๔๒๒. ‘‘เตน หิ, ราชญฺญ, ตญฺเญเวตฺถ ปฏิปุจฺฉิสฺสามิ, ยถา เต ขเมยฺย, ตถา นํ พฺยากเรยฺยาสิ. อภิชานาสิ โน ตฺวํ, ราชญฺญ, ทิวา เสยฺยํ อุปคโต สุปินกํ ปสฺสิตา อารามรามเณยฺยกํ วนรามเณยฺยกํ ภูมิรามเณยฺยกํ โปกฺขรณีรามเณยฺยก’’นฺติ? ‘‘อภิชานามหํ, โภ กสฺสป, ทิวาเสยฺยํ อุปคโต สุปินกํ ปสฺสิตา อารามรามเณยฺยกํ วนรามเณยฺยกํ ภูมิรามเณยฺยกํ โปกฺขรณีรามเณยฺยก’’นฺติ. ‘‘รกฺขนฺติ ตํ ตมฺหิ สมเย ขุชฺชาปิ [Pg.266] วามนกาปิ เวลาสิกาปิ โกมาริกาปี’’ติ? ‘‘เอวํ, โภ กสฺสป, รกฺขนฺติ มํ ตมฺหิ สมเย ขุชฺชาปิ วามนกาปิ เวลาสิกาปิ โกมาริกาปี’’ติ. ‘‘อปิ นุ ตา ตุยฺหํ ชีวํ ปสฺสนฺติ ปวิสนฺตํ วา นิกฺขมนฺตํ วา’’ติ? ‘‘โน หิทํ, โภ กสฺสป’’. ‘‘ตา หิ นาม, ราชญฺญ, ตุยฺหํ ชีวนฺตสฺส ชีวนฺติโย ชีวํ น ปสฺสิสฺสนฺติ ปวิสนฺตํ วา นิกฺขมนฺตํ วา. กึ ปน ตฺวํ กาลงฺกตสฺส ชีวํ ปสฺสิสฺสสิ ปวิสนฺตํ วา นิกฺขมนฺตํ วา. อิมินาปิ โข เต, ราชญฺญ, ปริยาเยน เอวํ โหตุ – ‘‘อิติปิ อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ४२२. “तर मग, हे राजन्य, मी तुला याविषयीच पुन्हा विचारतो, तुला जसे योग्य वाटेल तसे तू उत्तर दे. हे राजन्य, तुला आठवते का, जेव्हा तू दिवसा विश्रांतीसाठी झोपतोस, तेव्हा स्वप्नात सुंदर उद्याने, सुंदर वने, रमणीय भूमी आणि सुंदर कमळांचे तलाव पाहिले आहेत?” “होय, पूजनीय कस्सप, मला आठवते, दिवसा विश्रांतीसाठी झोपलो असताना मी स्वप्नात सुंदर उद्याने, सुंदर वने, रमणीय भूमी आणि सुंदर कमळांचे तलाव पाहिले आहेत.” “त्या वेळी कुबड्या, बुटक्या, दासी आणि तरुण मुली तुझी राखण करत असतात का?” “होय, पूजनीय कस्सप, त्या वेळी कुबड्या, बुटक्या, दासी आणि तरुण मुली माझी राखण करत असतात.” “मग त्या स्त्रिया तुझ्या शरीरात प्रवेश करणारा किंवा बाहेर पडणारा तुझा जीव पाहतात का?” “नाही, पूजनीय कस्सप, असे कधीच होत नाही.” “हे राजन्य, जर त्या जिवंत स्त्रिया जिवंत असणाऱ्या तुझ्या शरीरात प्रवेश करणारा किंवा बाहेर पडणारा तुझा जीव पाहू शकत नाहीत, तर मग तू मृत व्यक्तीच्या शरीरात प्रवेश करणारा किंवा बाहेर पडणारा जीव कसा काय पाहू शकशील? म्हणून, हे राजन्य, या कारणाने देखील तू हे मान्य कर की – ‘परलोक आहे, औपपातिक प्राणी आहेत आणि चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ व विपाक देखील आहे.’” ๔๒๓. ‘‘กิญฺจาปิ ภวํ กสฺสโป เอวมาห, อถ โข เอวํ เม เอตฺถ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปน, ราชญฺญ, ปริยาโย…เป… ‘‘อตฺถิ, โภ กสฺสป, ปริยาโย…เป… ยถา กถํ วิย ราชญฺญา’’ติ? ‘‘อิธ เม, โภ กสฺสป, ปุริสา โจรํ อาคุจารึ คเหตฺวา ทสฺเสนฺติ – ‘อยํ เต, ภนฺเต, โจโร อาคุจารี; อิมสฺส ยํ อิจฺฉสิ, ตํ ทณฺฑํ ปเณหี’ติ. ตฺยาหํ เอวํ วทามิ – ‘เตน หิ, โภ, อิมํ ปุริสํ ชีวนฺตํเยว ตุลาย ตุเลตฺวา ชิยาย อนสฺสาสกํ มาเรตฺวา ปุนเทว ตุลาย ตุเลถา’ติ. เต เม ‘สาธู’ติ ปฏิสฺสุตฺวา ตํ ปุริสํ ชีวนฺตํเยว ตุลาย ตุเลตฺวา ชิยาย อนสฺสาสกํ มาเรตฺวา ปุนเทว ตุลาย ตุเลนฺติ. ยทา โส ชีวติ, ตทา ลหุตโร จ โหติ มุทุตโร จ กมฺมญฺญตโร จ. ยทา ปน โส กาลงฺกโต โหติ ตทา ครุตโร จ โหติ ปตฺถินฺนตโร จ อกมฺมญฺญตโร จ. อยมฺปิ โข, โภ กสฺสป, ปริยาโย, เยน เม ปริยาเยน เอวํ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ४२३. “जरी आदरणीय कश्यप असे म्हणतात, तरीही मला याविषयी असेच वाटते – ‘या कारणानेही परलोक नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत, आणि चांगल्या-वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक नाही.’” “पण राजन्य, असे मानण्याचे काही कारण आहे का?” “होय, आदरणीय कश्यप, असे मानण्याचे कारण आहे.” “राजन्य, ते कशा प्रकारे आहे?” “आदरणीय कश्यप, येथे माझे सेवक एखाद्या गुन्हेगार चोराला पकडून माझ्यासमोर आणतात आणि म्हणतात – ‘महाराज, हा आपला गुन्हेगार चोर आहे; याला आपल्याला जी शिक्षा द्यायची असेल ती द्या.’ मी त्यांना असे सांगतो – ‘अरे मित्रांनो, तर मग या माणसाला जिवंत असतानाच तराजूत तोलून घ्या, नंतर धनुष्याच्या दोरीने श्वास रोखून त्याला मारून टाका आणि पुन्हा एकदा तराजूत तोलून घ्या.’ ते माझे म्हणणे ‘फार चांगले’ असे स्वीकारून, त्या माणसाला जिवंत असतानाच तराजूत तोलतात, धनुष्याच्या दोरीने श्वास रोखून त्याला मारतात आणि पुन्हा एकदा तराजूत तोलतात. जेव्हा तो जिवंत असतो, तेव्हा तो अधिक हलका, अधिक मऊ आणि अधिक कार्यक्षम असतो. परंतु जेव्हा तो मृत होतो, तेव्हा तो अधिक जड, अधिक कडक आणि अधिक अकार्यक्षम होतो. आदरणीय कश्यप, हे देखील एक कारण आहे, ज्या कारणाने मला असे वाटते की – ‘या कारणानेही परलोक नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत, आणि चांगल्या-वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक नाही.’” สนฺตตฺตอโยคุฬอุปมา तप्त लोहगोलाची उपमा ๔๒๔. ‘‘เตน หิ, ราชญฺญ, อุปมํ เต กริสฺสามิ. อุปมาย มิเธกจฺเจ วิญฺญู ปุริสา ภาสิตสฺส อตฺถํ อาชานนฺติ. เสยฺยถาปิ, ราชญฺญ, ปุริโส ทิวสํ สนฺตตฺตํ [Pg.267] อโยคุฬํ อาทิตฺตํ สมฺปชฺชลิตํ สโชติภูตํ ตุลาย ตุเลยฺย. ตเมนํ อปเรน สมเยน สีตํ นิพฺพุตํ ตุลาย ตุเลยฺย. กทา นุ โข โส อโยคุโฬ ลหุตโร วา โหติ มุทุตโร วา กมฺมญฺญตโร วา, ยทา วา อาทิตฺโต สมฺปชฺชลิโต สโชติภูโต, ยทา วา สีโต นิพฺพุโต’’ติ? ‘‘ยทา โส, โภ กสฺสป, อโยคุโฬ เตโชสหคโต จ โหติ วาโยสหคโต จ อาทิตฺโต สมฺปชฺชลิโต สโชติภูโต, ตทา ลหุตโร จ โหติ มุทุตโร จ กมฺมญฺญตโร จ. ยทา ปน โส อโยคุโฬ เนว เตโชสหคโต โหติ น วาโยสหคโต สีโต นิพฺพุโต, ตทา ครุตโร จ โหติ ปตฺถินฺนตโร จ อกมฺมญฺญตโร จา’’ติ. ‘‘เอวเมว โข, ราชญฺญ, ยทายํ กาโย อายุสหคโต จ โหติ อุสฺมาสหคโต จ วิญฺญาณสหคโต จ, ตทา ลหุตโร จ โหติ มุทุตโร จ กมฺมญฺญตโร จ. ยทา ปนายํ กาโย เนว อายุสหคโต โหติ น อุสฺมาสหคโต น วิญฺญาณสหคโต ตทา ครุตโร จ โหติ ปตฺถินฺนตโร จ อกมฺมญฺญตโร จ. อิมินาปิ โข เต, ราชญฺญ, ปริยาเยน เอวํ โหตุ – ‘อิติปิ อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ४२४. “तर मग, राजन्य, मी तुला एक उपमा देतो. या जगात काही बुद्धिमान लोक उपमेच्या द्वारे सांगितलेल्या गोष्टीचा अर्थ समजून घेतात. राजन्य, समजा एखाद्या माणसाने दिवसभर तापवलेला, पेटलेला, प्रज्वलित झालेला आणि धगधगता लोखंडी गोळा तराजूत तोलला. काही वेळानंतर, जेव्हा तो थंड आणि शांत झाला, तेव्हा त्याने तो पुन्हा तराजूत तोलला. तो लोखंडी गोळा कधी अधिक हलका, अधिक मऊ आणि अधिक कार्यक्षम असेल: जेव्हा तो पेटलेला, प्रज्वलित आणि धगधगता असेल तेव्हा, की जेव्हा तो थंड आणि शांत झालेला असेल तेव्हा?” “आदरणीय कश्यप, जेव्हा तो लोखंडी गोळा उष्णतेने आणि वायूने युक्त असतो, पेटलेला, प्रज्वलित आणि धगधगता असतो, तेव्हा तो अधिक हलका, अधिक मऊ आणि अधिक कार्यक्षम असतो. परंतु जेव्हा तो लोखंडी गोळा उष्णतेने आणि वायूने युक्त नसतो, थंड आणि शांत झालेला असतो, तेव्हा तो अधिक जड, अधिक कडक आणि अधिक अकार्यक्षम असतो.” “राजन्य, अगदी याचप्रमाणे हे शरीर आहे. जेव्हा हे शरीर आयुष्य, उष्णता आणि विज्ञानाने युक्त असते, तेव्हा ते अधिक हलके, अधिक मऊ आणि अधिक कार्यक्षम असते. परंतु जेव्हा हे शरीर आयुष्य, उष्णता आणि विज्ञानाने युक्त नसते, तेव्हा ते अधिक जड, अधिक कडक आणि अधिक अकार्यक्षम होते. राजन्य, या कारणानेही तू असे मानले पाहिजेस की – ‘या कारणानेही परलोक आहे, औपपातिक प्राणी आहेत, आणि चांगल्या-वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक आहे.’” ๔๒๕. ‘‘กิญฺจาปิ ภวํ กสฺสโป เอวมาห, อถ โข เอวํ เม เอตฺถ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปน, ราชญฺญ, ปริยาโย…เป… อตฺถิ, โภ กสฺสป, ปริยาโย…เป… ยถา กถํ วิย ราชญฺญา’’ติ? ‘‘อิธ เม, โภ กสฺสป, ปุริสา โจรํ อาคุจารึ คเหตฺวา ทสฺเสนฺติ – ‘อยํ เต, ภนฺเต, โจโร อาคุจารี; อิมสฺส ยํ อิจฺฉสิ, ตํ ทณฺฑํ ปเณหี’ติ. ตฺยาหํ เอวํ วทามิ – ‘เตน หิ, โภ, อิมํ ปุริสํ อนุปหจฺจ ฉวิญฺจ จมฺมญฺจ มํสญฺจ นฺหารุญฺจ อฏฺฐิญฺจ อฏฺฐิมิญฺชญฺจ ชีวิตา โวโรเปถ, อปฺเปว นามสฺส ชีวํ นิกฺขมนฺตํ ปสฺเสยฺยามา’ติ. เต เม ‘สาธู’ติ ปฏิสฺสุตฺวา ตํ ปุริสํ อนุปหจฺจ ฉวิญฺจ…เป… ชีวิตา โวโรเปนฺติ. ยทา โส อามโต โหติ, ตฺยาหํ เอวํ วทามิ – ‘เตน หิ, โภ, อิมํ ปุริสํ อุตฺตานํ นิปาเตถ, อปฺเปว นามสฺส ชีวํ นิกฺขมนฺตํ ปสฺเสยฺยามา’ติ. เต ตํ ปุริสํ อุตฺตานํ นิปาเตนฺติ. เนวสฺส มยํ ชีวํ นิกฺขมนฺตํ ปสฺสาม. ตฺยาหํ เอวํ วทามิ – ‘เตน หิ, โภ, อิมํ ปุริสํ อวกุชฺชํ นิปาเตถ… ปสฺเสน นิปาเตถ… ทุติเยน ปสฺเสน [Pg.268] นิปาเตถ… อุทฺธํ ฐเปถ… โอมุทฺธกํ ฐเปถ… ปาณินา อาโกเฏถ… เลฑฺฑุนา อาโกเฏถ… ทณฺเฑน อาโกเฏถ… สตฺเถน อาโกเฏถ… โอธุนาถ สนฺธุนาถ นิทฺธุนาถ, อปฺเปว นามสฺส ชีวํ นิกฺขมนฺตํ ปสฺเสยฺยามา’ติ. เต ตํ ปุริสํ โอธุนนฺติ สนฺธุนนฺติ นิทฺธุนนฺติ. เนวสฺส มยํ ชีวํ นิกฺขมนฺตํ ปสฺสาม. ตสฺส ตเทว จกฺขุ โหติ เต รูปา, ตญฺจายตนํ นปฺปฏิสํเวเทติ. ตเทว โสตํ โหติ เต สทฺทา, ตญฺจายตนํ นปฺปฏิสํเวเทติ. ตเทว ฆานํ โหติ เต คนฺธา, ตญฺจายตนํ นปฺปฏิสํเวเทติ. สาว ชิวฺหา โหติ เต รสา, ตญฺจายตนํ นปฺปฏิสํเวเทติ. สฺเวว กาโย โหติ เต โผฏฺฐพฺพา, ตญฺจายตนํ นปฺปฏิสํเวเทติ. อยมฺปิ โข, โภ กสฺสป, ปริยาโย, เยน เม ปริยาเยน เอวํ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ४२५. “जरी आदरणीय कश्यप असे म्हणतात, तरीही मला याविषयी असेच वाटते – ‘या कारणानेही परलोक नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत, आणि चांगल्या-वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक नाही.’” “पण राजन्य, असे मानण्याचे काही कारण आहे का?” “होय, आदरणीय कश्यप, असे मानण्याचे कारण आहे.” “राजन्य, ते कशा प्रकारे आहे?” “आदरणीय कश्यप, येथे माझे सेवक एखाद्या गुन्हेगार चोराला पकडून माझ्यासमोर आणतात आणि म्हणतात – ‘महाराज, हा आपला गुन्हेगार चोर आहे; याला आपल्याला जी शिक्षा द्यायची असेल ती द्या.’ मी त्यांना असे सांगतो – ‘अरे मित्रांनो, तर मग या माणसाची बाह्य त्वचा, अंतस्त्वचा, मांस, शिरा, हाडे आणि अस्थिमज्जा यांना कोणतीही इजा न पोहोचवता त्याला जिवंतपणापासून वंचित करा, जेणेकरून कदाचित आपण त्याचा जीव बाहेर पडताना पाहू शकू.’ ते माझे म्हणणे ‘फार चांगले’ असे स्वीकारून, त्या माणसाची बाह्य त्वचा... इत्यादींना कोणतीही इजा न पोहोचवता त्याला जिवंतपणापासून वंचित करतात. जेव्हा तो अर्धमेला होतो, तेव्हा मी त्यांना असे सांगतो – ‘अरे मित्रांनो, तर मग या माणसाला उताणे निजवा, जेणेकरून कदाचित आपण त्याचा जीव बाहेर पडताना पाहू शकू.’ ते त्या माणसाला उताणे निजवतात. पण आम्हाला त्याचा जीव बाहेर पडताना दिसत नाही. मग मी त्यांना असे सांगतो – ‘अरे मित्रांनो, तर मग या माणसाला पालथे निजवा... एका कुशीवर निजवा... दुसऱ्या कुशीवर निजवा... उभे करा... डोके खाली पाय वर करून ठेवा... हाताने ठोका... दगडाने मारा... काठीने मारा... शस्त्राने मारा... त्याला इकडे-तिकडे हलवा, जोराने हलवा, सर्व बाजूंनी हलवा, जेणेकरून कदाचित आपण त्याचा जीव बाहेर पडताना पाहू शकू.’ ते त्या माणसाला इकडे-तिकडे हलवतात, जोराने हलवतात, सर्व बाजूंनी हलवतात. पण आम्हाला त्याचा जीव बाहेर पडताना दिसत नाही. त्याचे डोळे तसेच असतात आणि रूपेही तशीच असतात, पण तो त्या डोळ्यांनी त्या आयतनाचा अनुभव घेत नाही. त्याचे कान तसेच असतात आणि शब्दही तसेच असतात, पण तो त्या कानांनी त्या आयतनाचा अनुभव घेत नाही. त्याचे नाक तसेच असते आणि गंधही तसेच असतात, पण तो त्या नाकाने त्या आयतनाचा अनुभव घेत नाही. त्याची जीभ तशीच असते आणि रसही तसेच असतात, पण तो त्या जिभेने त्या आयतनाचा अनुभव घेत नाही. त्याचे शरीर तसेच असते आणि स्पर्शही तसेच असतात, पण तो त्या शरीराने त्या आयतनाचा अनुभव घेत नाही. आदरणीय कश्यप, हे देखील एक कारण आहे, ज्या कारणाने मला असे वाटते की – ‘या कारणानेही परलोक नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत, आणि चांगल्या-वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक नाही.’” สงฺขธมอุปมา शंखवादकाची उपमा ๔๒๖. ‘‘เตน หิ, ราชญฺญ, อุปมํ เต กริสฺสามิ. อุปมาย มิเธกจฺเจ วิญฺญู ปุริสา ภาสิตสฺส อตฺถํ อาชานนฺติ. ภูตปุพฺพํ, ราชญฺญ, อญฺญตโร สงฺขธโม สงฺขํ อาทาย ปจฺจนฺติมํ ชนปทํ อคมาสิ. โส เยน อญฺญตโร คาโม เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา มชฺเฌ คามสฺส ฐิโต ติกฺขตฺตุํ สงฺขํ อุปลาเปตฺวา สงฺขํ ภูมิยํ นิกฺขิปิตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. อถ โข, ราชญฺญ, เตสํ ปจฺจนฺตชนปทานํ มนุสฺสานํ เอตทโหสิ – ‘อมฺโภ กสฺส นุ โข เอโส สทฺโท เอวํรชนีโย เอวํกมนีโย เอวํมทนีโย เอวํพนฺธนีโย เอวํมุจฺฉนีโย’ติ. สนฺนิปติตฺวา ตํ สงฺขธมํ เอตทโวจุํ – ‘อมฺโภ, กสฺส นุ โข เอโส สทฺโท เอวํรชนีโย เอวํกมนีโย เอวํมทนีโย เอวํพนฺธนีโย เอวํมุจฺฉนีโย’ติ. ‘เอโส โข, โภ, สงฺโข นาม ยสฺเสโส สทฺโท เอวํรชนีโย เอวํกมนีโย เอวํมทนีโย เอวํพนฺธนีโย เอวํมุจฺฉนีโย’ติ. เต ตํ สงฺขํ อุตฺตานํ นิปาเตสุํ – ‘วเทหิ, โภ สงฺข, วเทหิ, โภ สงฺขา’ติ. เนว โส สงฺโข สทฺทมกาสิ. เต ตํ สงฺขํ อวกุชฺชํ นิปาเตสุํ, ปสฺเสน นิปาเตสุํ, ทุติเยน ปสฺเสน นิปาเตสุํ, อุทฺธํ ฐเปสุํ, โอมุทฺธกํ ฐเปสุํ, ปาณินา อาโกเฏสุํ, เลฑฺฑุนา อาโกเฏสุํ, ทณฺเฑน อาโกเฏสุํ, สตฺเถน อาโกเฏสุํ, โอธุนึสุ [Pg.269] สนฺธุนึสุ นิทฺธุนึสุ – ‘วเทหิ, โภ สงฺข, วเทหิ, โภ สงฺขา’ติ. เนว โส สงฺโข สทฺทมกาสิ. ४२६. “तर मग, राजन्य, मी तुला एक उपमा देतो. या जगात काही सुज्ञ लोक उपमेच्या द्वारे सांगितलेल्या गोष्टीचा अर्थ समजून घेतात. पूर्वीची गोष्ट आहे, राजन्य, एक शंख वाजवणारा माणूस शंख घेऊन एका सीमावर्ती प्रांतात गेला. तो एका गावाजवळ आला; तिथे येऊन गावाच्या मध्यभागी उभा राहून त्याने तीन वेळा शंख फुंकला आणि शंख जमिनीवर ठेवून तो एका बाजूला बसला. तेव्हा, राजन्य, त्या सीमावर्ती प्रांतातील लोकांना असे वाटले – ‘अरे, हा आवाज कोणाचा आहे जो इतका रंजनीय, इतका कमनीय, इतका मदनीय, इतका बंधनीय आणि इतका मुच्छनीय आहे?’ त्यांनी एकत्र येऊन त्या शंख वाजवणाऱ्याला विचारले – ‘अरे, हा आवाज कोणाचा आहे जो इतका रंजनीय, कमनीय, मदनीय, बंधनीय आणि मुच्छनीय आहे?’ (तो म्हणाला) ‘मित्रांनो, हा शंख नावाचा वाद्य आहे, ज्याचा हा आवाज इतका रंजनीय, कमनीय, मदनीय, बंधनीय आणि मुच्छनीय आहे.’ त्यांनी तो शंख उताणा ठेवला आणि म्हणाले – ‘वाज, शंखा वाज! वाज, शंखा वाज!’ पण त्या शंखाने काहीच आवाज केला नाही. त्यांनी तो शंख पालथा घातला, एका कुशीवर ठेवला, दुसऱ्या कुशीवर ठेवला, उभा केला, उलटा उभा केला, हाताने ठोकला, ढेकळाने ठोकला, काठीने मारला, शस्त्राने मारला, इकडे-तिकडे हलवला, झटकला, हलवून हलवून पाहिला – ‘वाज, शंखा वाज! वाज, शंखा वाज!’ पण त्या शंखाने काहीच आवाज केला नाही.” ‘‘อถ โข, ราชญฺญ, ตสฺส สงฺขธมสฺส เอตทโหสิ – ‘ยาว พาลา อิเม ปจฺจนฺตชนปทามนุสฺสา, กถญฺหิ นาม อโยนิโส สงฺขสทฺทํ คเวสิสฺสนฺตี’ติ. เตสํ เปกฺขมานานํ สงฺขํ คเหตฺวา ติกฺขตฺตุํ สงฺขํ อุปลาเปตฺวา สงฺขํ อาทาย ปกฺกามิ. อถ โข, ราชญฺญ, เตสํ ปจฺจนฺตชนปทานํ มนุสฺสานํ เอตทโหสิ – ‘ยทา กิร, โภ, อยํ สงฺโข นาม ปุริสสหคโต จ โหติ วายามสหคโต จ วายุสหคโต จ, ตทายํ สงฺโข สทฺทํ กโรติ, ยทา ปนายํ สงฺโข เนว ปุริสสหคโต โหติ น วายามสหคโต น วายุสหคโต, นายํ สงฺโข สทฺทํ กโรตี’ติ. เอวเมว โข, ราชญฺญ, ยทายํ กาโย อายุสหคโต จ โหติ อุสฺมาสหคโต จ วิญฺญาณสหคโต จ, ตทา อภิกฺกมติปิ ปฏิกฺกมติปิ ติฏฺฐติปิ นิสีทติปิ เสยฺยมฺปิ กปฺเปติ, จกฺขุนาปิ รูปํ ปสฺสติ, โสเตนปิ สทฺทํ สุณาติ, ฆาเนนปิ คนฺธํ ฆายติ, ชิวฺหายปิ รสํ สายติ, กาเยนปิ โผฏฺฐพฺพํ ผุสติ, มนสาปิ ธมฺมํ วิชานาติ. ยทา ปนายํ กาโย เนว อายุสหคโต โหติ, น อุสฺมาสหคโต, น วิญฺญาณสหคโต, ตทา เนว อภิกฺกมติ น ปฏิกฺกมติ น ติฏฺฐติ น นิสีทติ น เสยฺยํ กปฺเปติ, จกฺขุนาปิ รูปํ น ปสฺสติ, โสเตนปิ สทฺทํ น สุณาติ, ฆาเนนปิ คนฺธํ น ฆายติ, ชิวฺหายปิ รสํ น สายติ, กาเยนปิ โผฏฺฐพฺพํ น ผุสติ, มนสาปิ ธมฺมํ น วิชานาติ. อิมินาปิ โข เต, ราชญฺญ, ปริยาเยน เอวํ โหตุ – ‘อิติปิ อตฺถิ ปโร โลโก, อตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, อตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’ติ. “तेव्हा, राजन्य, त्या शंख वाजवणाऱ्याच्या मनात असा विचार आला – ‘हे सीमावर्ती प्रांतातील लोक किती मूर्ख आहेत! हे शंखाचा आवाज किती अयोग्य पद्धतीने शोधत आहेत!’ मग त्यांच्या देखत त्याने शंख हातात घेतला, तीन वेळा फुंकला आणि शंख घेऊन निघून गेला. तेव्हा, राजन्य, त्या सीमावर्ती प्रांतातील लोकांना असे वाटले – ‘अरे मित्रांनो, जेव्हा हा शंख माणसाच्या संपर्कात येतो, प्रयत्नाच्या संपर्कात येतो आणि हवेच्या संपर्कात येतो, तेव्हाच हा शंख आवाज करतो. पण जेव्हा हा शंख माणसाच्या संपर्कात नसतो, प्रयत्नाच्या संपर्कात नसतो आणि हवेच्या संपर्कात नसतो, तेव्हा हा शंख आवाज करत नाही.’ याचप्रमाणे, राजन्य, जेव्हा हे शरीर आयुष्याने, उष्णतेने आणि विज्ञानाने युक्त असते, तेव्हाच ते पुढे जाते, मागे येते, उभे राहते, बसते, झोपते, डोळ्यांनी रूप पाहते, कानाने शब्द ऐकते, नाकाने गंध घेते, जिभेने चव घेते, शरीराने स्पर्शाचा अनुभव घेते आणि मनाने धर्मांना जाणते. पण जेव्हा हे शरीर आयुष्याने युक्त नसते, उष्णतेने युक्त नसते आणि विज्ञानाने युक्त नसते, तेव्हा ते पुढे जात नाही, मागे येत नाही, उभे राहत नाही, बसत नाही, झोपत नाही, डोळ्यांनी रूप पाहत नाही, कानाने शब्द ऐकत नाही, नाकाने गंध घेत नाही, जिभेने चव घेत नाही, शरीराने स्पर्शाचा अनुभव घेत नाही आणि मनाने धर्मांना जाणत नाही. राजन्य, या कारणावरूनही तू असे मानले पाहिजेस की – ‘परलोक आहे, औपपातिक प्राणी आहेत आणि सुकृत-दुष्कृत कर्मांचे फळ व विपाक आहे.’” ๔๒๗. ‘‘กิญฺจาปิ ภวํ กสฺสโป เอวมาห, อถ โข เอวํ เม เอตฺถ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ‘‘อตฺถิ ปน, ราชญฺญ, ปริยาโย…เป… อตฺถิ, โภ กสฺสป, ปริยาโย…เป… ยถา กถํ วิย ราชญฺญา’’ติ? ‘‘อิธ เม, โภ กสฺสป, ปุริสา โจรํ อาคุจารึ คเหตฺวา ทสฺเสนฺติ – ‘อยํ เต, ภนฺเต, โจโร อาคุจารี, อิมสฺส ยํ อิจฺฉสิ, ตํ ทณฺฑํ ปเณหี’ติ. ตฺยาหํ เอวํ วทามิ – ‘เตน หิ, โภ, อิมสฺส ปุริสสฺส ฉวึ ฉินฺทถ[Pg.270], อปฺเปว นามสฺส ชีวํ ปสฺเสยฺยามา’ติ. เต ตสฺส ปุริสสฺส ฉวึ ฉินฺทนฺติ. เนวสฺส มยํ ชีวํ ปสฺสาม. ตฺยาหํ เอวํ วทามิ – ‘เตน หิ, โภ, อิมสฺส ปุริสสฺส จมฺมํ ฉินฺทถ, มํสํ ฉินฺทถ, นฺหารุํ ฉินฺทถ, อฏฺฐึ ฉินฺทถ, อฏฺฐิมิญฺชํ ฉินฺทถ, อปฺเปว นามสฺส ชีวํ ปสฺเสยฺยามา’ติ. เต ตสฺส ปุริสสฺส อฏฺฐิมิญฺชํ ฉินฺทนฺติ, เนวสฺส มยํ ชีวํ ปสฺเสยฺยาม. อยมฺปิ โข, โภ กสฺสป, ปริยาโย, เยน เม ปริยาเยน เอวํ โหติ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ. ४२७. “जरी पूज्य कश्यप असे म्हणतात, तरीही माझे या बाबतीत असेच मत आहे की – ‘परलोक नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत आणि सुकृत-दुष्कृत कर्मांचे फळ व विपाक नाही.’ ‘पण राजन्य, असे मानण्याचे काही कारण आहे का?’ ‘होय, पूज्य कश्यप, असे मानण्याचे कारण आहे.’ ‘ते कसे काय, राजन्य?’ ‘इथे, पूज्य कश्यप, माझे सेवक एका गुन्हेगार चोराला पकडून माझ्यासमोर आणतात आणि म्हणतात – ‘महाराज, हा आपला गुन्हेगार चोर आहे. याला आपल्याला हवी ती शिक्षा द्या.’ तेव्हा मी त्यांना असे सांगतो – ‘तर मग, मित्रांनो, या माणसाची बाह्य त्वचा सोलून काढा, कदाचित आपल्याला त्याचा जीव पाहायला मिळेल.’ ते त्या माणसाची बाह्य त्वचा सोलतात, पण आम्हाला त्याचा जीव दिसत नाही. मग मी त्यांना सांगतो – ‘तर मग, मित्रांनो, या माणसाची जाड त्वचा काढा, मांस कापा, शिरा कापा, हाडे कापा, हाडांमधील मज्जा कापा, कदाचित आपल्याला त्याचा जीव पाहायला मिळेल.’ ते त्या माणसाच्या हाडांमधील मज्जाही कापतात, पण आम्हाला त्याचा जीव दिसत नाही. पूज्य कश्यप, हे देखील एक कारण आहे, ज्या कारणाने माझे असे मत आहे की – ‘परलोक नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत आणि सुकृत-दुष्कृत कर्मांचे फळ व विपाक नाही.’” อคฺคิกชฏิลอุปมา “अग्निक जटिलाची उपमा” ๔๒๘. ‘‘เตน หิ, ราชญฺญ, อุปมํ เต กริสฺสามิ. อุปมาย มิเธกจฺเจ วิญฺญู ปุริสา ภาสิตสฺส อตฺถํ อาชานนฺติ. ภูตปุพฺพํ, ราชญฺญ, อญฺญตโร อคฺคิโก ชฏิโล อรญฺญายตเน ปณฺณกุฏิยา สมฺมติ. อถ โข, ราชญฺญ, อญฺญตโร ชนปเท สตฺโถ วุฏฺฐาสิ. อถ โข โส สตฺโถ ตสฺส อคฺคิกสฺส ชฏิลสฺส อสฺสมสฺส สามนฺตา เอกรตฺตึ วสิตฺวา ปกฺกามิ. อถ โข, ราชญฺญ, ตสฺส อคฺคิกสฺส ชฏิลสฺส เอตทโหสิ – ‘ยํนูนาหํ เยน โส สตฺถวาโส เตนุปสงฺกเมยฺยํ, อปฺเปว นาเมตฺถ กิญฺจิ อุปกรณํ อธิคจฺเฉยฺย’นฺติ. อถ โข โส อคฺคิโก ชฏิโล กาลสฺเสว วุฏฺฐาย เยน โส สตฺถวาโส เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อทฺทส ตสฺมึ สตฺถวาเส ทหรํ กุมารํ มนฺทํ อุตฺตานเสยฺยกํ ฉฑฺฑิตํ. ทิสฺวานสฺส เอตทโหสิ – ‘น โข เม ตํ ปติรูปํ ยํ เม เปกฺขมานสฺส มนุสฺสภูโต กาลงฺกเรยฺย; ยํนูนาหํ อิมํ ทารกํ อสฺสมํ เนตฺวา อาปาเทยฺยํ โปเสยฺยํ วฑฺเฒยฺย’นฺติ. อถ โข โส อคฺคิโก ชฏิโล ตํ ทารกํ อสฺสมํ เนตฺวา อาปาเทสิ โปเสสิ วฑฺเฒสิ. ยทา โส ทารโก ทสวสฺสุทฺเทสิโก วา โหติ ทฺวาทสวสฺสุทฺเทสิโก วา, อถ โข ตสฺส อคฺคิกสฺส ชฏิลสฺส ชนปเท กญฺจิเทว กรณียํ อุปฺปชฺชิ. อถ โข โส อคฺคิโก ชฏิโล ตํ ทารกํ เอตทโวจ – ‘อิจฺฉามหํ, ตาต, ชนปทํ คนฺตุํ; อคฺคึ, ตาต, ปริจเรยฺยาสิ. มา จ เต อคฺคิ นิพฺพายิ. สเจ จ เต อคฺคิ นิพฺพาเยยฺย, อยํ วาสี อิมานิ กฏฺฐานิ อิทํ อรณิสหิตํ, อคฺคึ นิพฺพตฺเตตฺวา อคฺคึ [Pg.271] ปริจเรยฺยาสี’ติ. อถ โข โส อคฺคิโก ชฏิโล ตํ ทารกํ เอวํ อนุสาสิตฺวา ชนปทํ อคมาสิ. ตสฺส ขิฑฺฑาปสุตสฺส อคฺคิ นิพฺพายิ. ४२८. “तर मग, हे राजन्य, मी तुला एक उपमा देतो. या जगात काही बुद्धिमान लोक उपमेच्या द्वारेही सांगितलेल्या गोष्टीचा अर्थ समजून घेतात. पूर्वीची गोष्ट आहे, हे राजन्य, एक अग्निहोत्री जटाधारी तपस्वी अरण्यातील एका पर्णकुटीत राहत असे. त्यानंतर, हे राजन्य, जनपदातील एक व्यापारी तांडा प्रवासाला निघाला होता. तो व्यापारी तांडा त्या अग्निहोत्री जटाधारी तपस्वीच्या आश्रमाजवळ एक रात्र मुक्काम करून निघून गेला. त्यानंतर, हे राजन्य, त्या अग्निहोत्री जटाधारी तपस्वीच्या मनात असा विचार आला – ‘मी त्या व्यापारी तांड्याच्या मुक्कामाच्या ठिकाणी जावे, कदाचित मला तिथे काही उपयुक्त वस्तू मिळेल.’ त्यानंतर तो अग्निहोत्री जटाधारी तपस्वी पहाटेच उठून जेथे तो व्यापारी तांडा थांबला होता, तेथे गेला. तेथे पोहोचल्यावर त्याने त्या व्यापारी तांड्याच्या मुक्कामाच्या ठिकाणी एका लहान, दुर्बळ, पाठीवर निजलेल्या आणि टाकून दिलेल्या बालकाला पाहिले. त्याला पाहून त्याच्या मनात असा विचार आला – ‘माझ्या डोळ्यांदेखत एका मानवी जिवाने प्राण सोडावेत, हे मला योग्य वाटत नाही. मी या बालकाला आश्रमात घेऊन जावे, त्याचे रक्षण करावे, त्याचे पालनपोषण करावे आणि त्याला मोठे करावे.’ त्यानंतर त्या अग्निहोत्री जटाधारी तपस्वीने त्या बालकाला आश्रमात आणले, त्याचे रक्षण केले, पालनपोषण केले आणि त्याला मोठे केले. जेव्हा ते मूल दहा किंवा बारा वर्षांचे झाले, तेव्हा त्या अग्निहोत्री जटाधारी तपस्वीला जनपदात काही काम निर्माण झाले. तेव्हा त्या अग्निहोत्री जटाधारी तपस्वीने त्या मुलाला म्हटले – ‘बाळा, मला जनपदात जायचे आहे. बाळा, तू अग्नीची काळजी घे. तुझा अग्नी विझू देऊ नकोस. आणि जर तुझा अग्नी विझला, तर ही तासणी, ही लाकडे आणि हे अरणी-साहित्य आहे; याने अग्नी प्रज्वलित करून अग्नीची काळजी घे.’ त्यानंतर तो अग्निहोत्री जटाधारी तपस्वी त्या मुलाला असा उपदेश करून जनपदात निघून गेला. तो मुलगा खेळण्यात मग्न असताना अग्नी विझून गेला।” ‘‘อถ โข ตสฺส ทารกสฺส เอตทโหสิ – ‘ปิตา โข มํ เอวํ อวจ – ‘‘อคฺคึ, ตาต, ปริจเรยฺยาสิ. มา จ เต อคฺคิ นิพฺพายิ. สเจ จ เต อคฺคิ นิพฺพาเยยฺย, อยํ วาสี อิมานิ กฏฺฐานิ อิทํ อรณิสหิตํ, อคฺคึ นิพฺพตฺเตตฺวา อคฺคึ ปริจเรยฺยาสี’’ติ. ยํนูนาหํ อคฺคึ นิพฺพตฺเตตฺวา อคฺคึ ปริจเรยฺย’นฺติ. อถ โข โส ทารโก อรณิสหิตํ วาสิยา ตจฺฉิ – ‘อปฺเปว นาม อคฺคึ อธิคจฺเฉยฺย’นฺติ. เนว โส อคฺคึ อธิคจฺฉิ. อรณิสหิตํ ทฺวิธา ผาเลสิ, ติธา ผาเลสิ, จตุธา ผาเลสิ, ปญฺจธา ผาเลสิ, ทสธา ผาเลสิ, สตธา ผาเลสิ, สกลิกํ สกลิกํ อกาสิ, สกลิกํ สกลิกํ กริตฺวา อุทุกฺขเล โกฏฺเฏสิ, อุทุกฺขเล โกฏฺเฏตฺวา มหาวาเต โอปุนิ – ‘อปฺเปว นาม อคฺคึ อธิคจฺเฉยฺย’นฺติ. เนว โส อคฺคึ อธิคจฺฉิ. “त्यानंतर त्या मुलाच्या मनात असा विचार आला – ‘वडिलांनी मला असे म्हटले होते – “बाळा, तू अग्नीची काळजी घे. तुझा अग्नी विझू देऊ नकोस. आणि जर तुझा अग्नी विझला, तर ही तासणी, ही लाकडे आणि हे अरणी-साहित्य आहे; याने अग्नी प्रज्वलित करून अग्नीची काळजी घे.” तर मग मी अग्नी प्रज्वलित करून अग्नीची काळजी घ्यावी.’ त्यानंतर त्या मुलाने ‘कदाचित मला अग्नी मिळेल’ या विचाराने अरणी-साहित्याला तासणीने तासले. पण त्याला अग्नी मिळाला नाही. त्याने अरणी-साहित्याचे दोन तुकडे केले, तीन तुकडे केले, चार तुकडे केले, पाच तुकडे केले, दहा तुकडे केले, शंभर तुकडे केले, त्याचे बारीक बारीक तुकडे केले. बारीक बारीक तुकडे करून त्याने ते उखळात कुटले. उखळात कुटून ‘कदाचित मला अग्नी मिळेल’ या विचाराने ते जोरदार वाऱ्यात उडवले. तरीही त्याला अग्नी मिळाला नाही।” ‘‘อถ โข โส อคฺคิโก ชฏิโล ชนปเท ตํ กรณียํ ตีเรตฺวา เยน สโก อสฺสโม เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา ตํ ทารกํ เอตทโวจ – ‘กจฺจิ เต, ตาต, อคฺคิ น นิพฺพุโต’ติ? ‘อิธ เม, ตาต, ขิฑฺฑาปสุตสฺส อคฺคิ นิพฺพายิ. ตสฺส เม เอตทโหสิ – ‘‘ปิตา โข มํ เอวํ อวจ อคฺคึ, ตาต, ปริจเรยฺยาสิ. มา จ เต, ตาต, อคฺคิ นิพฺพายิ. สเจ จ เต อคฺคิ นิพฺพาเยยฺย, อยํ วาสี อิมานิ กฏฺฐานิ อิทํ อรณิสหิตํ, อคฺคึ นิพฺพตฺเตตฺวา อคฺคึ ปริจเรยฺยาสีติ. ยํนูนาหํ อคฺคึ นิพฺพตฺเตตฺวา อคฺคึ ปริจเรยฺย’’นฺติ. อถ ขฺวาหํ, ตาต, อรณิสหิตํ วาสิยา ตจฺฉึ – ‘‘อปฺเปว นาม อคฺคึ อธิคจฺเฉยฺย’’นฺติ. เนวาหํ อคฺคึ อธิคจฺฉึ. อรณิสหิตํ ทฺวิธา ผาเลสึ, ติธา ผาเลสึ, จตุธา ผาเลสึ, ปญฺจธา ผาเลสึ, ทสธา ผาเลสึ, สตธา ผาเลสึ, สกลิกํ สกลิกํ อกาสึ, สกลิกํ สกลิกํ กริตฺวา อุทุกฺขเล โกฏฺเฏสึ, อุทุกฺขเล โกฏฺเฏตฺวา มหาวาเต โอปุนึ – ‘‘อปฺเปว นาม อคฺคึ อธิคจฺเฉยฺย’’นฺติ. เนวาหํ อคฺคึ อธิคจฺฉิ’’’นฺติ. อถ โข ตสฺส อคฺคิกสฺส ชฏิลสฺส เอตทโหสิ – ‘ยาว พาโล อยํ ทารโก อพฺยตฺโต, กถญฺหิ นาม อโยนิโส อคฺคึ คเวสิสฺสตี’ติ. ตสฺส เปกฺขมานสฺส อรณิสหิตํ คเหตฺวา อคฺคึ นิพฺพตฺเตตฺวา ตํ ทารกํ เอตทโวจ [Pg.272] – ‘เอวํ โข, ตาต, อคฺคิ นิพฺพตฺเตตพฺโพ. น ตฺเวว ยถา ตฺวํ พาโล อพฺยตฺโต อโยนิโส อคฺคึ คเวสี’ติ. เอวเมว โข ตฺวํ, ราชญฺญ, พาโล อพฺยตฺโต อโยนิโส ปรโลกํ คเวสิสฺสสิ. ปฏินิสฺสชฺเชตํ, ราชญฺญ, ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ, ปฏินิสฺสชฺเชตํ, ราชญฺญ, ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ, มา เต อโหสิ ทีฆรตฺตํ อหิตาย ทุกฺขายา’’ติ. “त्यानंतर तो अग्निहोत्री जटाधारी तपस्वी जनपदातील आपले काम संपवून आपल्या आश्रमात परत आला. तेथे आल्यावर त्याने त्या मुलाला विचारले – ‘बाळा, तुझा अग्नी विझला तर नाही ना?’ ‘पिताजी, मी खेळण्यात मग्न असताना येथे अग्नी विझून गेला. तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला – “वडिलांनी मला असे म्हटले होते – बाळा, तू अग्नीची काळजी घे. बाळा, तुझा अग्नी विझू देऊ नकोस. आणि जर तुझा अग्नी विझला, तर ही तासणी, ही लाकडे आणि हे अरणी-साहित्य आहे; याने अग्नी प्रज्वलित करून अग्नीची काळजी घे.” तर मग मी अग्नी प्रज्वलित करून अग्नीची काळजी घ्यावी.’ ‘त्यानंतर, पिताजी, मी “कदाचित मला अग्नी मिळेल” या विचाराने अरणी-साहित्याला तासणीने तासले. पण मला अग्नी मिळाला नाही. मी अरणी-साहित्याचे दोन तुकडे केले, तीन तुकडे केले, चार तुकडे केले, पाच तुकडे केले, दहा तुकडे केले, शंभर तुकडे केले, त्याचे बारीक बारीक तुकडे केले. बारीक बारीक तुकडे करून मी ते उखळात कुटले. उखळात कुटून “कदाचित मला अग्नी मिळेल” या विचाराने ते जोरदार वाऱ्यात उडवले. तरीही मला अग्नी मिळाला नाही.’ तेव्हा त्या अग्निहोत्री जटाधारी तपस्वीच्या मनात असा विचार आला – ‘हा मुलगा किती मूर्ख आणि अज्ञानी आहे! हा अयोग्य पद्धतीने अग्नी कसा काय शोधत आहे!’ त्यानंतर त्याने त्या मुलाच्या देखत अरणी-साहित्य घेऊन अग्नी प्रज्वलित केला आणि त्या मुलाला म्हटले – ‘बाळा, अग्नी असा प्रज्वलित करायचा असतो. तुझ्यासारख्या मूर्ख, अज्ञानी माणसासारखा अयोग्य पद्धतीने अग्नी शोधायचा नसतो.’ त्याचप्रमाणे, हे राजन्य, तू मूर्ख, अज्ञानी आणि अयोग्य पद्धतीने परलोकाचा शोध घेत आहेस. हे राजन्य, या वाईट दृष्टीचा त्याग कर! हे राजन्य, या वाईट दृष्टीचा त्याग कर! हे तुझ्यासाठी दीर्घकाळ अहिताचे आणि दुःखाचे कारण न बनो.’ असे कुमारकस्सप म्हणाले।” ๔๒๙. ‘‘กิญฺจาปิ ภวํ กสฺสโป เอวมาห, อถ โข เนวาหํ สกฺโกมิ อิทํ ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ ปฏินิสฺสชฺชิตุํ. ราชาปิ มํ ปเสนทิ โกสโล ชานาติ ติโรราชาโนปิ – ‘ปายาสิ ราชญฺโญ เอวํวาที เอวํทิฏฺฐี – ‘‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’ติ. สจาหํ, โภ กสฺสป, อิทํ ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ ปฏินิสฺสชฺชิสฺสามิ, ภวิสฺสนฺติ เม วตฺตาโร – ‘ยาว พาโล ปายาสิ ราชญฺโญ อพฺยตฺโต ทุคฺคหิตคาหี’ติ. โกเปนปิ นํ หริสฺสามิ, มกฺเขนปิ นํ หริสฺสามิ, ปลาเสนปิ นํ หริสฺสามี’’ติ. ४२९. “जरी भन्ते कस्सप असे म्हणत असले, तरी मी या वाईट दृष्टीचा त्याग करू शकत नाही. राजा प्रसेनजित कोसल आणि इतर देशांचे राजेही मला ओळखतात की – ‘पायसी राजन्य अशा मताचा आणि अशा दृष्टीचा आहे की – “परलोक नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत, चांगल्या आणि वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक नाही.”’ हे भन्ते कस्सप, जर मी या वाईट दृष्टीचा त्याग केला, तर लोक माझी निंदा करतील की – ‘पायसी राजन्य किती मूर्ख, अज्ञानी आणि चुकीचे मत घट्ट धरून ठेवणारा आहे!’ मी क्रोधापोटी, मत्सरापोटी आणि ईर्षेपोटी याच दृष्टीला धरून ठेवीन।” ทฺเว สตฺถวาหอุปมา दोन सार्थवाहांची उपमा ๔๓๐. ‘‘เตน หิ, ราชญฺญ, อุปมํ เต กริสฺสามิ. อุปมาย มิเธกจฺเจ วิญฺญู ปุริสา ภาสิตสฺส อตฺถํ อาชานนฺติ. ภูตปุพฺพํ, ราชญฺญ, มหาสกฏสตฺโถ สกฏสหสฺสํ ปุรตฺถิมา ชนปทา ปจฺฉิมํ ชนปทํ อคมาสิ. โส เยน เยน คจฺฉิ, ขิปฺปํเยว ปริยาทิยติ ติณกฏฺโฐทกํ หริตกปณฺณํ. ตสฺมึ โข ปน สตฺเถ ทฺเว สตฺถวาหา อเหสุํ เอโก ปญฺจนฺนํ สกฏสตานํ, เอโก ปญฺจนฺนํ สกฏสตานํ. อถ โข เตสํ สตฺถวาหานํ เอตทโหสิ – ‘อยํ โข มหาสกฏสตฺโถ สกฏสหสฺสํ; เต มยํ เยน เยน คจฺฉาม, ขิปฺปเมว ปริยาทิยติ ติณกฏฺโฐทกํ หริตกปณฺณํ. ยํนูน มยํ อิมํ สตฺถํ ทฺวิธา วิภเชยฺยาม – เอกโต ปญฺจ สกฏสตานิ เอกโต ปญฺจ สกฏสตานี’ติ. เต ตํ สตฺถํ ทฺวิธา วิภชึสุ เอกโต ปญฺจ สกฏสตานิ, เอกโต ปญฺจ สกฏสตานิ. เอโก สตฺถวาโห พหุํ ติณญฺจ กฏฺฐญฺจ อุทกญฺจ อาโรเปตฺวา สตฺถํ ปยาเปสิ. ทฺวีหตีหปยาโต โข ปน โส สตฺโถ อทฺทส ปุริสํ กาฬํ โลหิตกฺขํ สนฺนทฺธกลาปํ กุมุทมาลึ อลฺลวตฺถํ อลฺลเกสํ กทฺทมมกฺขิเตหิ จกฺเกหิ [Pg.273] ภทฺเรน รเถน ปฏิปถํ อาคจฺฉนฺตํ’, ทิสฺวา เอตทโวจ – ‘กุโต, โภ, อาคจฺฉสี’ติ? ‘อมุกมฺหา ชนปทา’ติ. ‘กุหึ คมิสฺสสี’ติ? ‘อมุกํ นาม ชนปท’นฺติ. ‘กจฺจิ, โภ, ปุรโต กนฺตาเร มหาเมโฆ อภิปฺปวุฏฺโฐ’ติ? ‘เอวํ, โภ, ปุรโต กนฺตาเร มหาเมโฆ อภิปฺปวุฏฺโฐ, อาสิตฺโตทกานิ วฏุมานิ, พหุ ติณญฺจ กฏฺฐญฺจ อุทกญฺจ. ฉฑฺเฑถ, โภ, ปุราณานิ ติณานิ กฏฺฐานิ อุทกานิ, ลหุภาเรหิ สกเฏหิ สีฆํ สีฆํ คจฺฉถ, มา โยคฺคานิ กิลมิตฺถา’ติ. ४३०. तर मग, राजन्य, मी तुला एक उपमा देतो. उपमेच्या द्वारे या जगातील काही बुद्धिमान लोक बोललेल्या गोष्टीचा अर्थ समजून घेतात. राजन्य, पूर्वीची गोष्ट आहे, एक हजार गाड्यांचा एक मोठा व्यापारी तांडा (सार्थ) पूर्व जनपदाकडून पश्चिम जनपदाकडे चालला होता. तो तांडा ज्या ज्या मार्गाने जात असे, तिथले गवत, लाकूड, पाणी आणि हिरवी पाने लवकरच संपून जात असत. त्या तांड्यामध्ये दोन तांडाप्रमुख (सार्थवाह) होते; एक पाचशे गाड्यांचा प्रमुख होता आणि दुसरा पाचशे गाड्यांचा प्रमुख होता. त्यानंतर त्या तांडाप्रमुखांच्या मनात असा विचार आला—'हा एक हजार गाड्यांचा मोठा तांडा आहे. आपण ज्या ज्या ठिकाणी जातो, तिथे गवत, लाकूड, पाणी आणि हिरवी पाने लवकरच संपून जातात. तर मग आपण या तांड्याचे दोन भाग केले तर किती बरे होईल—एका बाजूला पाचशे गाड्या आणि दुसऱ्या बाजूला पाचशे गाड्या.' त्यांनी त्या तांड्याचे दोन भाग केले—एका बाजूला पाचशे गाड्या आणि दुसऱ्या बाजूला पाचशे गाड्या. त्यातील एका तांडाप्रमुखाने भरपूर गवत, लाकूड आणि पाणी गाड्यांवर लादले आणि आपला तांडा पुढे रवाना केला. दोन-तीन दिवसांच्या प्रवासानंतर, त्या तांडाप्रमुखाने एका माणसाला पाहिले, जो काळाकभिन्न होता, ज्याचे डोळे लाल होते, ज्याने पाठीवर भाता बांधला होता, डोक्यावर पांढऱ्या कमळांची माळ घातली होती, कपडे आणि केस ओले होते, आणि चिखलाने माखलेली चाके असलेल्या एका सुंदर रथातून तो समोरून येत होता. त्याला पाहून तो म्हणाला—'हे महाशय, आपण कोठून येत आहात?' 'अमुक जनपदातून.' 'आपण कोठे जात आहात?' 'अमुक नावाच्या जनपदाकडे.' 'हे महाशय, पुढे अरण्यात मोठा पाऊस पडला आहे का?' 'होय महाशय, पुढे अरण्यात मोठा पाऊस पडला आहे. रस्ते पाण्याने भरले आहेत, भरपूर गवत, लाकूड आणि पाणी आहे. महाशय, तुमचे जुने गवत, लाकूड आणि पाणी फेकून द्या आणि हलक्या वजनाच्या गाड्यांसह वेगाने पुढे जा, बैलांना थकवू नका.' ‘‘อถ โข โส สตฺถวาโห สตฺถิเก อามนฺเตสิ – ‘อยํ, โภ, ปุริโส เอวมาห – ‘‘ปุรโต กนฺตาเร มหาเมโฆ อภิปฺปวุฏฺโฐ, อาสิตฺโตทกานิ วฏุมานิ, พหุ ติณญฺจ กฏฺฐญฺจ อุทกญฺจ. ฉฑฺเฑถ, โภ, ปุราณานิ ติณานิ กฏฺฐานิ อุทกานิ, ลหุภาเรหิ สกเฏหิ สีฆํ สีฆํ คจฺฉถ, มา โยคฺคานิ กิลมิตฺถา’’ติ. ฉฑฺเฑถ, โภ, ปุราณานิ ติณานิ กฏฺฐานิ อุทกานิ, ลหุภาเรหิ สกเฏหิ สตฺถํ ปยาเปถา’ติ. ‘เอวํ, โภ’ติ โข เต สตฺถิกา ตสฺส สตฺถวาหสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ฉฑฺเฑตฺวา ปุราณานิ ติณานิ กฏฺฐานิ อุทกานิ ลหุภาเรหิ สกเฏหิ สตฺถํ ปยาเปสุํ. เต ปฐเมปิ สตฺถวาเส น อทฺทสํสุ ติณํ วา กฏฺฐํ วา อุทกํ วา. ทุติเยปิ สตฺถวาเส… ตติเยปิ สตฺถวาเส… จตุตฺเถปิ สตฺถวาเส… ปญฺจเมปิ สตฺถวาเส… ฉฏฺเฐปิ สตฺถวาเส… สตฺตเมปิ สตฺถวาเส น อทฺทสํสุ ติณํ วา กฏฺฐํ วา อุทกํ วา. สพฺเพว อนยพฺยสนํ อาปชฺชึสุ. เย จ ตสฺมึ สตฺเถ อเหสุํ มนุสฺสา วา ปสู วา, สพฺเพ โส ยกฺโข อมนุสฺโส ภกฺเขสิ. อฏฺฐิกาเนว เสสานิ. त्यानंतर त्या तांडाप्रमुखाने तांड्यातील लोकांना बोलावून म्हटले—'हे महाशयांनो, हा माणूस असे म्हणतोय—"पुढे अरण्यात मोठा पाऊस पडला आहे, रस्ते पाण्याने भरले आहेत, भरपूर गवत, लाकूड आणि पाणी आहे. महाशय, तुमचे जुने गवत, लाकूड आणि पाणी फेकून द्या आणि हलक्या वजनाच्या गाड्यांसह वेगाने पुढे जा, बैलांना थकवू नका." म्हणून महाशयांनो, तुमचे जुने गवत, लाकूड आणि पाणी फेकून द्या आणि हलक्या गाड्यांसह तांडा पुढे न्या.' 'होय महाशय,' असे म्हणून त्या तांड्यातील लोकांनी आपल्या तांडाप्रमुखाचे ऐकले आणि जुने गवत, लाकूड व पाणी फेकून दिले आणि हलक्या गाड्यांसह तांडा पुढे नेला. त्यांना पहिल्या मुक्कामाच्या ठिकाणी गवत, लाकूड किंवा पाणी काहीही आढळले नाही. दुसऱ्या मुक्कामाच्या ठिकाणीही नाही... तिसऱ्या मुक्कामाच्या ठिकाणीही नाही... चौथ्या मुक्कामाच्या ठिकाणीही नाही... पाचव्या मुक्कामाच्या ठिकाणीही नाही... सहाव्या मुक्कामाच्या ठिकाणीही नाही... सातव्या मुक्कामाच्या ठिकाणीही त्यांना गवत, लाकूड किंवा पाणी काहीही आढळले नाही. ते सर्व जण मोठ्या विनाशाला आणि संकटाला बळी पडले. त्या तांड्यामध्ये जे काही मनुष्य किंवा पशू होते, त्या सर्वांना त्या अमानुष यक्षाने खाऊन टाकले. केवळ त्यांची हाडेच शिल्लक राहिली. ‘‘ยทา อญฺญาสิ ทุติโย สตฺถวาโห – ‘พหุนิกฺขนฺโต โข, โภ, ทานิ โส สตฺโถ’ติ พหุํ ติณญฺจ กฏฺฐญฺจ อุทกญฺจ อาโรเปตฺวา สตฺถํ ปยาเปสิ. ทฺวีหตีหปยาโต โข ปน โส สตฺโถ อทฺทส ปุริสํ กาฬํ โลหิตกฺขํ สนฺนทฺธกลาปํ กุมุทมาลึ อลฺลวตฺถํ อลฺลเกสํ กทฺทมมกฺขิเตหิ จกฺเกหิ ภทฺเรน รเถน ปฏิปถํ อาคจฺฉนฺตํ, ทิสฺวา เอตทโวจ – ‘กุโต, โภ, อาคจฺฉสี’ติ? ‘อมุกมฺหา ชนปทา’ติ. ‘กุหึ คมิสฺสสี’ติ? ‘อมุกํ นาม ชนปท’นฺติ. ‘กจฺจิ, โภ, ปุรโต กนฺตาเร มหาเมโฆ อภิปฺปวุฏฺโฐ’ติ? ‘เอวํ, โภ, ปุรโต กนฺตาเร มหาเมโฆ อภิปฺปวุฏฺโฐ. อาสิตฺโตทกานิ วฏุมานิ, พหุ ติณญฺจ กฏฺฐญฺจ อุทกญฺจ. ฉฑฺเฑถ[Pg.274], โภ, ปุราณานิ ติณานิ กฏฺฐานิ อุทกานิ, ลหุภาเรหิ สกเฏหิ สีฆํ สีฆํ คจฺฉถ, มา โยคฺคานิ กิลมิตฺถา’ติ. जेव्हा दुसऱ्या तांडाप्रमुखाला समजले की, 'तो पहिला तांडा निघून आता बरेच दिवस झाले आहेत,' तेव्हा त्याने भरपूर गवत, लाकूड आणि पाणी गाड्यांवर लादले आणि आपला तांडा पुढे रवाना केला. दोन-तीन दिवसांच्या प्रवासानंतर, त्या तांडाप्रमुखाने एका माणसाला पाहिले, जो काळाकभिन्न होता, ज्याचे डोळे लाल होते, ज्याने पाठीवर भाता बांधला होता, डोक्यावर पांढऱ्या कमळांची माळ घातली होती, कपडे आणि केस ओले होते, आणि चिखलाने माखलेली चाके असलेल्या एका सुंदर रथातून तो समोरून येत होता. त्याला पाहून तो म्हणाला—'हे महाशय, आपण कोठून येत आहात?' 'अमुक जनपदातून.' 'आपण कोठे जात आहात?' 'अमुक नावाच्या जनपदाकडे.' 'हे महाशय, पुढे अरण्यात मोठा पाऊस पडला आहे का?' 'होय महाशय, पुढे अरण्यात मोठा पाऊस पडला आहे. रस्ते पाण्याने भरले आहेत, भरपूर गवत, लाकूड आणि पाणी आहे. महाशय, तुमचे जुने गवत, लाकूड आणि पाणी फेकून द्या आणि हलक्या वजनाच्या गाड्यांसह वेगाने पुढे जा, बैलांना थकवू नका.' ‘‘อถ โข โส สตฺถวาโห สตฺถิเก อามนฺเตสิ – ‘อยํ, โภ, ‘‘ปุริโส เอวมาห – ปุรโต กนฺตาเร มหาเมโฆ อภิปฺปวุฏฺโฐ, อาสิตฺโตทกานิ วฏุมานิ, พหุ ติณญฺจ กฏฺฐญฺจ อุทกญฺจ. ฉฑฺเฑถ, โภ, ปุราณานิ ติณานิ กฏฺฐานิ อุทกานิ, ลหุภาเรหิ สกเฏหิ สีฆํ สีฆํ คจฺฉถ; มา โยคฺคานิ กิลมิตฺถา’’ติ. อยํ โภ ปุริโส เนว อมฺหากํ มิตฺโต, น ญาติสาโลหิโต, กถํ มยํ อิมสฺส สทฺธาย คมิสฺสาม. น โว ฉฑฺเฑตพฺพานิ ปุราณานิ ติณานิ กฏฺฐานิ อุทกานิ, ยถาภเตน ภณฺเฑน สตฺถํ ปยาเปถ. น โน ปุราณํ ฉฑฺเฑสฺสามา’ติ. ‘เอวํ, โภ’ติ โข เต สตฺถิกา ตสฺส สตฺถวาหสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ยถาภเตน ภณฺเฑน สตฺถํ ปยาเปสุํ. เต ปฐเมปิ สตฺถวาเส น อทฺทสํสุ ติณํ วา กฏฺฐํ วา อุทกํ วา. ทุติเยปิ สตฺถวาเส… ตติเยปิ สตฺถวาเส… จตุตฺเถปิ สตฺถวาเส… ปญฺจเมปิ สตฺถวาเส… ฉฏฺเฐปิ สตฺถวาเส… สตฺตเมปิ สตฺถวาเส น อทฺทสํสุ ติณํ วา กฏฺฐํ วา อุทกํ วา. ตญฺจ สตฺถํ อทฺทสํสุ อนยพฺยสนํ อาปนฺนํ. เย จ ตสฺมึ สตฺเถปิ อเหสุํ มนุสฺสา วา ปสู วา, เตสญฺจ อฏฺฐิกาเนว อทฺทสํสุ เตน ยกฺเขน อมนุสฺเสน ภกฺขิตานํ. त्यानंतर त्या तांडाप्रमुखाने तांड्यातील लोकांना बोलावून म्हटले—'हे महाशयांनो, हा माणूस असे म्हणतोय—"पुढे अरण्यात मोठा पाऊस पडला आहे, रस्ते पाण्याने भरले आहेत, भरपूर गवत, लाकूड आणि पाणी आहे. महाशय, तुमचे जुने गवत, लाकूड आणि पाणी फेकून द्या आणि हलक्या वजनाच्या गाड्यांसह वेगाने पुढे जा, बैलांना थकवू नका." पण महाशयांनो, हा माणूस आपला मित्र नाही की नातेवाईक नाही. मग आपण याच्या शब्दावर विश्वास ठेवून कसे काय जाऊ शकतो? तुम्ही तुमचे जुने गवत, लाकूड आणि पाणी फेकून देऊ नका. आपण आधीच आणलेल्या साहित्यासह तांडा पुढे नेऊ या. आपण आपले जुने साहित्य फेकून देणार नाही.' 'होय महाशय,' असे म्हणून त्या तांड्यातील लोकांनी आपल्या तांडाप्रमुखाचे ऐकले आणि आधीच आणलेल्या साहित्यासह तांडा पुढे नेला. त्यांना पहिल्या मुक्कामाच्या ठिकाणी गवत, लाकूड किंवा पाणी काहीही आढळले नाही. दुसऱ्या मुक्कामाच्या ठिकाणीही नाही... तिसऱ्या मुक्कामाच्या ठिकाणीही नाही... चौथ्या मुक्कामाच्या ठिकाणीही नाही... पाचव्या मुक्कामाच्या ठिकाणीही नाही... सहाव्या मुक्कामाच्या ठिकाणीही नाही... सातव्या मुक्कामाच्या ठिकाणीही त्यांना गवत, लाकूड किंवा पाणी काहीही आढळले नाही. परंतु, त्यांना तो पहिला तांडा विनाशाप्रत पोहोचलेला दिसला. त्या तांड्यामध्ये जे काही मनुष्य किंवा पशू होते, त्या अमानुष यक्षाने खाऊन टाकलेल्या त्या सर्वांची केवळ हाडेच त्यांना तिथे पडलेली दिसली. ‘‘อถ โข โส สตฺถวาโห สตฺถิเก อามนฺเตสิ – ‘อยํ โข, โภ, สตฺโถ อนยพฺยสนํ อาปนฺโน, ยถา ตํ เตน พาเลน สตฺถวาเหน ปริณายเกน. เตน หิ, โภ, ยานมฺหากํ สตฺเถ อปฺปสารานิ ปณิยานิ, ตานิ ฉฑฺเฑตฺวา, ยานิ อิมสฺมึ สตฺเถ มหาสารานิ ปณิยานิ, ตานิ อาทิยถา’ติ. ‘เอวํ, โภ’ติ โข เต สตฺถิกา ตสฺส สตฺถวาหสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ยานิ สกสฺมึ สตฺเถ อปฺปสารานิ ปณิยานิ, ตานิ ฉฑฺเฑตฺวา ยานิ ตสฺมึ สตฺเถ มหาสารานิ ปณิยานิ, ตานิ อาทิยิตฺวา โสตฺถินา ตํ กนฺตารํ นิตฺถรึสุ, ยถา ตํ ปณฺฑิเตน สตฺถวาเหน ปริณายเกน. เอวเมว โข ตฺวํ, ราชญฺญ, พาโล อพฺยตฺโต อนยพฺยสนํ อาปชฺชิสฺสสิ อโยนิโส ปรโลกํ คเวสนฺโต เสยฺยถาปิ โส ปุริโม สตฺถวาโห. เยปิ ตว โสตพฺพํ สทฺธาตพฺพํ มญฺญิสฺสนฺติ, เตปิ อนยพฺยสนํ อาปชฺชิสฺสนฺติ, เสยฺยถาปิ เต สตฺถิกา. ปฏินิสฺสชฺเชตํ, ราชญฺญ[Pg.275], ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ; ปฏินิสฺสชฺเชตํ, ราชญฺญ, ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ. มา เต อโหสิ ทีฆรตฺตํ อหิตาย ทุกฺขายา’’ติ. तेव्हा त्या सार्थवाहाने (तांड्याच्या प्रमुखाने) आपल्या साथीदारांना (बैलगाडीवाल्यांना) बोलावून म्हटले – 'मित्रांनो, त्या मूर्ख सार्थवाहाच्या (नेत्याच्या) चुकीच्या मार्गदर्शनामुळे हा तांडा पूर्णपणे उद्ध्वस्त आणि नष्ट झाला आहे. म्हणूनच, मित्रांनो, आपल्या तांड्यातील कमी मूल्याच्या वस्तू फेकून द्या आणि या तांड्यातील ज्या अत्यंत मौल्यवान वस्तू आहेत, त्या घ्या.' त्यावर 'ठीक आहे, मित्रांनो' असे म्हणून त्या साथीदारांनी आपल्या सार्थवाहाचे ऐकले आणि आपल्या तांड्यातील कमी मूल्याच्या वस्तू फेकून देऊन, त्या तांड्यातील मौल्यवान वस्तू घेतल्या. अशा प्रकारे त्या सुज्ञ सार्थवाहाच्या मार्गदर्शनाखाली त्यांनी ते भयानक जंगल (कांतार) सुखरूप पार केले. त्याचप्रमाणे, हे राजन्य! तू सुद्धा मूर्ख व अज्ञानी असल्यामुळे, अयोग्य रीतीने परलोकाचा शोध घेत असताना, त्या पहिल्या मूर्ख सार्थवाहाप्रमाणेच स्वतःचा विनाश आणि अधोगती ओढवून घेशील. आणि जे लोक तुझे सांगणे ऐकण्यासारखे व विश्वास ठेवण्यासारखे मानतील, ते सुद्धा त्या मूर्ख सार्थवाहाच्या साथीदारांप्रमाणेच विनाशाला प्राप्त होतील. म्हणून हे राजन्य, या पापकारक चुकीच्या दृष्टीचा (मिथ्या दृष्टीचा) त्याग कर; हे राजन्य, या पापकारक चुकीच्या दृष्टीचा त्याग कर. हे तुझ्यासाठी दीर्घकाळापर्यंत अहितकारक आणि दुःखदायक ठरू नये.' ๔๓๑. ‘‘กิญฺจาปิ ภวํ กสฺสโป เอวมาห, อถ โข เนวาหํ สกฺโกมิ อิทํ ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ ปฏินิสฺสชฺชิตุํ. ราชาปิ มํ ปเสนทิ โกสโล ชานาติ ติโรราชาโนปิ – ‘ปายาสิ ราชญฺโญ เอวํวาที เอวํทิฏฺฐี – ‘‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก…เป… วิปาโก’’’ติ. สจาหํ, โภ กสฺสป, อิทํ ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ ปฏินิสฺสชฺชิสฺสามิ, ภวิสฺสนฺติ เม วตฺตาโร – ‘ยาว พาโล ปายาสิ ราชญฺโญ, อพฺยตฺโต ทุคฺคหิตคาหี’ติ. โกเปนปิ นํ หริสฺสามิ, มกฺเขนปิ นํ หริสฺสามิ, ปลาเสนปิ นํ หริสฺสามี’’ติ. ४३१. जरी आदरणीय कस्सप असे म्हणत असले, तरी मी या पापकारक चुकीच्या दृष्टीचा त्याग करू शकत नाही. कोसलचा राजा पसेनदी आणि इतर परकीय राजेही मला ओळखतात की – 'राजन्य पायासी हा अशा मताचा आणि अशा दृष्टीचा आहे की, "परलोक अस्तित्वात नाही... आणि कर्माचे फळ किंवा विपाकही नाही."' हे कस्सप! जर मी या पापकारक चुकीच्या दृष्टीचा त्याग केला, तर लोक माझ्याबद्दल बोलतील की – 'राजन्य पायासी किती मूर्ख, अज्ञानी आणि चुकीचे मत घट्ट धरून ठेवणारा आहे!' त्यामुळे मी क्रोधापोटी हीच दृष्टी बाळगीन, इतरांचा उपमर्ध करण्यासाठी हीच दृष्टी बाळगीन आणि मत्सरापोटी हीच दृष्टी बाळगीन. คูถภาริกอุปมา मलमूत्र वाहून नेणाऱ्याची उपमा (गूथभारिक उपमा) ๔๓๒. ‘‘เตน หิ, ราชญฺญ, อุปมํ เต กริสฺสามิ. อุปมาย มิเธกจฺเจ วิญฺญู ปุริสา ภาสิตสฺส อตฺถํ อาชานนฺติ. ภูตปุพฺพํ, ราชญฺญ, อญฺญตโร สูกรโปสโก ปุริโส สกมฺหา คามา อญฺญํ คามํ อคมาสิ. ตตฺถ อทฺทส ปหูตํ สุกฺขคูถํ ฉฑฺฑิตํ. ทิสฺวานสฺส เอตทโหสิ – ‘อยํ โข ปหุโต สุกฺขคูโถ ฉฑฺฑิโต, มม จ สูกรภตฺตํ ; ยํนูนาหํ อิโต สุกฺขคูถํ หเรยฺย’นฺติ. โส อุตฺตราสงฺคํ ปตฺถริตฺวา ปหูตํ สุกฺขคูถํ อากิริตฺวา ภณฺฑิกํ พนฺธิตฺวา สีเส อุพฺพาเหตฺวา อคมาสิ. ตสฺส อนฺตรามคฺเค มหาอกาลเมโฆ ปาวสฺสิ. โส อุคฺฆรนฺตํ ปคฺฆรนฺตํ ยาว อคฺคนขา คูเถน มกฺขิโต คูถภารํ อาทาย อคมาสิ. ตเมนํ มนุสฺสา ทิสฺวา เอวมาหํสุ – ‘กจฺจิ โน ตฺวํ, ภเณ, อุมฺมตฺโต, กจฺจิ วิเจโต, กถญฺหิ นาม อุคฺฆรนฺตํ ปคฺฆรนฺตํ ยาว อคฺคนขา คูเถน มกฺขิโต คูถภารํ หริสฺสสี’ติ. ‘ตุมฺเห ขฺเวตฺถ, ภเณ, อุมฺมตฺตา, ตุมฺเห วิเจตา, ตถา หิ ปน เม สูกรภตฺต’นฺติ. เอวเมว โข ตฺวํ, ราชญฺญ, คูถภาริกูปโม มญฺเญ ปฏิภาสิ. ปฏินิสฺสชฺเชตํ, ราชญฺญ, ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ. ปฏินิสฺสชฺเชตํ, ราชญฺญ, ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ. มา เต อโหสิ ทีฆรตฺตํ อหิตาย ทุกฺขายา’’ติ. ४३२. तसे असेल तर, हे राजन्य, मी तुला एक उपमा देतो. या जगात काही बुद्धिमान लोक उपमेच्या द्वारे सांगितलेल्या गोष्टीचा अर्थ समजून घेतात. पूर्वी कधीतरी, हे राजन्य, एक डुकरे पाळणारा माणूस आपल्या गावातून दुसऱ्या एका गावात गेला. तिथे त्याने फेकून दिलेले भरपूर सुकलेले शेण (मलमूत्र) पाहिले. ते पाहून त्याच्या मनात विचार आला – 'हे भरपूर सुकलेले मलमूत्र फेकून दिलेले आहे, आणि हे माझ्या डुकरांचे अन्न होऊ शकते. तर मग मी हे सुकलेले मलमूत्र येथून घेऊन गेलो तर किती बरे होईल!' त्याने आपले उपरणे (उत्तरासंग) पसरले, त्यात भरपूर सुकलेले मलमूत्र भरले, त्याचे गाठोडे बांधले आणि ते डोक्यावर ठेवून तो निघाला. वाटेत अचानक मोठा अवकाळी पाऊस पडू लागला. त्यामुळे ते मलमूत्र ओले होऊन वरून-खालून गळू लागले आणि तो नखांच्या टोकापर्यंत मलमूत्राने माखला गेला, तरीही तो मलमूत्राचे ते गाठोडे डोक्यावर घेऊन चालत राहिला. त्याला पाहून लोक म्हणाले – 'अरे माणसा, तू वेडा झाला आहेस की काय? तुझी बुद्धी ठिकाणावर नाही का? हे वरून-खालून गळणारे मलमूत्राचे गाठोडे, ज्यामुळे तू नखांच्या टोकापर्यंत मलमूत्राने माखला गेला आहेस, तू डोक्यावरून का वाहून नेतो आहेस?' त्यावर तो म्हणाला – 'अरे, तुम्हीच वेडे आहात, तुमचीच बुद्धी ठिकाणावर नाही! कारण हे माझ्या डुकरांचे अन्न आहे.' हे राजन्य! मला असे वाटते की तू सुद्धा या मलमूत्र वाहून नेणाऱ्या माणसासारखाच दिसत आहेस. म्हणून हे राजन्य, या पापकारक चुकीच्या दृष्टीचा त्याग कर. हे राजन्य, या पापकारक चुकीच्या दृष्टीचा त्याग कर. हे तुझ्यासाठी दीर्घकाळापर्यंत अहितकारक आणि दुःखदायक ठरू नये. ๔๓๓. ‘‘กิญฺจาปิ ภวํ กสฺสโป เอวมาห, อถ โข เนวาหํ สกฺโกมิ อิทํ ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ ปฏินิสฺสชฺชิตุํ. ราชาปิ มํ ปเสนทิ โกสโล ชานาติ ติโรราชาโนปิ – ‘ปายาสิ ราชญฺโญ เอวํวาที เอวํทิฏฺฐี – ‘‘อิติปิ นตฺถิ [Pg.276] ปโร โลโก…เป… วิปาโก’’ติ. สจาหํ, โภ กสฺสป, อิทํ ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ ปฏินิสฺสชฺชิสฺสามิ, ภวิสฺสนฺติ เม วตฺตาโร – ‘ยาว พาโล ปายาสิ ราชญฺโญ อพฺยตฺโต ทุคฺคหิตคาหี’ติ. โกเปนปิ นํ หริสฺสามิ, มกฺเขนปิ นํ หริสฺสามิ, ปลาเสนปิ นํ หริสฺสามี’’ติ. ४३३. जरी आदरणीय कस्सप असे म्हणत असले, तरी मी या पापकारक चुकीच्या दृष्टीचा त्याग करू शकत नाही. कोसलचा राजा पसेनदी आणि इतर परकीय राजेही मला ओळखतात की – 'राजन्य पायासी हा अशा मताचा आणि अशा दृष्टीचा आहे की, "परलोक अस्तित्वात नाही... आणि कर्माचे फळ किंवा विपाकही नाही."' हे कस्सप! जर मी या पापकारक चुकीच्या दृष्टीचा त्याग केला, तर लोक माझ्याबद्दल बोलतील की – 'राजन्य पायासी किती मूर्ख, अज्ञानी आणि चुकीचे मत घट्ट धरून ठेवणारा आहे!' त्यामुळे मी क्रोधापोटी हीच दृष्टी बाळगीन, इतरांचा उपमर्ध करण्यासाठी हीच दृष्टी बाळगीन आणि मत्सरापोटी हीच दृष्टी बाळगीन. อกฺขธุตฺตกอุปมา जुगारी माणसाची उपमा (अक्खधुत्तक उपमा) ๔๓๔. ‘‘เตน หิ, ราชญฺญ, อุปมํ เต กริสฺสามิ, อุปมาย มิเธกจฺเจ วิญฺญู ปุริสา ภาสิตสฺส อตฺถํ อาชานนฺติ. ภูตปุพฺพํ, ราชญฺญ, ทฺเว อกฺขธุตฺตา อกฺเขหิ ทิพฺพึสุ. เอโก อกฺขธุตฺโต อาคตาคตํ กลึ คิลติ. อทฺทสา โข ทุติโย อกฺขธุตฺโต ตํ อกฺขธุตฺตํ อาคตาคตํ กลึ คิลนฺตํ, ทิสฺวา ตํ อกฺขธุตฺตํ เอตทโวจ – ‘ตฺวํ โข, สมฺม, เอกนฺติเกน ชินาสิ, เทหิ เม, สมฺม, อกฺเข ปโชหิสฺสามี’ติ. ‘เอวํ สมฺมา’ติ โข โส อกฺขธุตฺโต ตสฺส อกฺขธุตฺตสฺส อกฺเข ปาทาสิ. อถ โข โส อกฺขธุตฺโต อกฺเข วิเสน ปริภาเวตฺวา ตํ อกฺขธุตฺตํ เอตทโวจ – ‘เอหิ โข, สมฺม, อกฺเขหิ ทิพฺพิสฺสามา’ติ. ‘เอวํ สมฺมา’ติ โข โส อกฺขธุตฺโต ตสฺส อกฺขธุตฺตสฺส ปจฺจสฺโสสิ. ทุติยมฺปิ โข เต อกฺขธุตฺตา อกฺเขหิ ทิพฺพึสุ. ทุติยมฺปิ โข โส อกฺขธุตฺโต อาคตาคตํ กลึ คิลติ. อทฺทสา โข ทุติโย อกฺขธุตฺโต ตํ อกฺขธุตฺตํ ทุติยมฺปิ อาคตาคตํ กลึ คิลนฺตํ, ทิสฺวา ตํ อกฺขธุตฺตํ เอตทโวจ – ४३४. तसे असेल तर, हे राजन्य, मी तुला एक उपमा देतो. या जगात काही बुद्धिमान लोक उपमेच्या द्वारे सांगितलेल्या गोष्टीचा अर्थ समजून घेतात. पूर्वी कधीतरी, हे राजन्य, दोन जुगारी सोंगट्यांनी (फाशांनी) खेळत होते. त्यातील एक जुगारी जेव्हा जेव्हा पराभवाचा (हरवणारा) फासा येत असे, तेव्हा तेव्हा तो गिळून टाकत असे. दुसऱ्या जुगाऱ्याने त्या पहिल्या जुगाऱ्याला प्रत्येक वेळी पराभवाचा फासा गिळताना पाहिले. ते पाहून तो त्या जुगाऱ्याला म्हणाला – 'मित्रा, तू तर नेहमीच जिंकतोस. मित्रा, मला ते फासे दे, मी त्यांच्यावर काही विधी (पूजा/बली) करीन.' त्यावर 'ठीक आहे मित्रा' असे म्हणून त्या जुगाऱ्याने त्याला ते फासे दिले. त्यानंतर त्या दुसऱ्या जुगाऱ्याने त्या फाशांना विष लावले आणि पहिल्या जुगाऱ्याला म्हणाला – 'ये मित्रा, आपण पुन्हा फाशांचा खेळ खेळू या.' त्यावर 'ठीक आहे मित्रा' असे म्हणून तो जुगारी तयार झाला. दुसऱ्यांदाही ते जुगारी खेळू लागले. दुसऱ्यांदाही तो जुगारी प्रत्येक वेळी पराभवाचा फासा गिळू लागला. दुसऱ्या जुगाऱ्याने त्याला दुसऱ्यांदाही पराभवाचा फासा गिळताना पाहिले आणि तो त्याला म्हणाला – ‘‘ลิตฺตํ ปรเมน เตชสา, คิลมกฺขํ ปุริโส น พุชฺฌติ; คิล เร คิล ปาปธุตฺตก, ปจฺฉา เต กฏุกํ ภวิสฺสตีติ. 'अत्यंत तीव्र विषाने माखलेला फासा गिळताना या माणसाला त्याचे भान नाही. गिळ, अरे गिळ, हे दुष्ट जुगाऱ्या! नंतर तुला याचे अत्यंत कडू (भयानक) परिणाम भोगावे लागतील.' ‘‘เอวเมว โข ตฺวํ, ราชญฺญ, อกฺขธุตฺตกูปโม มญฺเญ ปฏิภาสิ. ปฏินิสฺสชฺเชตํ, ราชญฺญ, ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ; ปฏินิสฺสชฺเชตํ, ราชญฺญ, ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ. มา เต อโหสิ ทีฆรตฺตํ อหิตาย ทุกฺขายา’’ติ. हे राजन्य! मला असे वाटते की तू सुद्धा या जुगारी माणसासारखाच दिसत आहेस. म्हणून हे राजन्य, या पापकारक चुकीच्या दृष्टीचा त्याग कर; हे राजन्य, या पापकारक चुकीच्या दृष्टीचा त्याग कर. हे तुझ्यासाठी दीर्घकाळापर्यंत अहितकारक आणि दुःखदायक ठरू नये. ๔๓๕. ‘‘กิญฺจาปิ ภวํ กสฺสโป เอวมาห, อถ โข เนวาหํ สกฺโกมิ อิทํ ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ ปฏินิสฺสชฺชิตุํ. ราชาปิ มํ ปเสนทิ โกสโล ชานาติ ติโรราชาโนปิ – ‘ปายาสิ ราชญฺโญ เอวํวาที เอวํทิฏฺฐี – ‘‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก…เป… วิปาโก’’ติ. สจาหํ, โภ กสฺสป, อิทํ ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ [Pg.277] ปฏินิสฺสชฺชิสฺสามิ, ภวิสฺสนฺติ เม วตฺตาโร – ‘ยาว พาโล ปายาสิ ราชญฺโญ อพฺยตฺโต ทุคฺคหิตคาหี’ติ. โกเปนปิ นํ หริสฺสามิ, มกฺเขนปิ นํ หริสฺสามิ, ปลาเสนปิ นํ หริสฺสามี’’ติ. ४३५. जरी आदरणीय कस्सप असे म्हणत असले, तरी मी या पापकारक चुकीच्या दृष्टीचा त्याग करू शकत नाही. कोसलचा राजा पसेनदी आणि इतर परकीय राजेही मला ओळखतात की – 'राजन्य पायासी हा अशा मताचा आणि अशा दृष्टीचा आहे की, "परलोक अस्तित्वात नाही... आणि कर्माचे फळ किंवा विपाकही नाही."' हे कस्सप! जर मी या पापकारक चुकीच्या दृष्टीचा त्याग केला, तर लोक माझ्याबद्दल बोलतील की – 'राजन्य पायासी किती मूर्ख, अज्ञानी आणि चुकीचे मत घट्ट धरून ठेवणारा आहे!' त्यामुळे मी क्रोधापोटी हीच दृष्टी बाळगीन, इतरांचा उपमर्ध करण्यासाठी हीच दृष्टी बाळगीन आणि मत्सरापोटी हीच दृष्टी बाळगीन. สาณภาริกอุปมา तागाचे ओझे वाहणाऱ्याची उपमा ๔๓๖. ‘‘เตน หิ, ราชญฺญ, อุปมํ เต กริสฺสามิ, อุปมาย มิเธกจฺเจ วิญฺญู ปุริสา ภาสิตสฺส อตฺถํ อาชานนฺติ. ภูตปุพฺพํ, ราชญฺญ, อญฺญตโร ชนปโท วุฏฺฐาสิ. อถ โข สหายโก สหายกํ อามนฺเตสิ – ‘อายาม, สมฺม, เยน โส ชนปโท เตนุปสงฺกมิสฺสาม, อปฺเปว นาเมตฺถ กิญฺจิ ธนํ อธิคจฺเฉยฺยามา’ติ. ‘เอวํ สมฺมา’ติ โข สหายโก สหายกสฺส ปจฺจสฺโสสิ. เต เยน โส ชนปโท, เยน อญฺญตรํ คามปฏฺฏํ เตนุปสงฺกมึสุ, ตตฺถ อทฺทสํสุ ปหูตํ สาณํ ฉฑฺฑิตํ, ทิสฺวา สหายโก สหายกํ อามนฺเตสิ – ‘อิทํ โข, สมฺม, ปหูตํ สาณํ ฉฑฺฑิตํ, เตน หิ, สมฺม, ตฺวญฺจ สาณภารํ พนฺธ, อหญฺจ สาณภารํ พนฺธิสฺสามิ, อุโภ สาณภารํ อาทาย คมิสฺสามา’ติ. ‘เอวํ สมฺมา’ติ โข สหายโก สหายกสฺส ปฏิสฺสุตฺวา สาณภารํ พนฺธิตฺวา เต อุโภ สาณภารํ อาทาย เยน อญฺญตรํ คามปฏฺฏํ เตนุปสงฺกมึสุ. ตตฺถ อทฺทสํสุ ปหูตํ สาณสุตฺตํ ฉฑฺฑิตํ, ทิสฺวา สหายโก สหายกํ อามนฺเตสิ – ‘ยสฺส โข, สมฺม, อตฺถาย อิจฺเฉยฺยาม สาณํ, อิทํ ปหูตํ สาณสุตฺตํ ฉฑฺฑิตํ. เตน หิ, สมฺม, ตฺวญฺจ สาณภารํ ฉฑฺเฑหิ, อหญฺจ สาณภารํ ฉฑฺเฑสฺสามิ, อุโภ สาณสุตฺตภารํ อาทาย คมิสฺสามา’ติ. ‘อยํ โข เม, สมฺม, สาณภาโร ทูราภโต จ สุสนฺนทฺโธ จ, อลํ เม ตฺวํ ปชานาหี’ติ. อถ โข โส สหายโก สาณภารํ ฉฑฺเฑตฺวา สาณสุตฺตภารํ อาทิยิ. ४३६. “तर मग, हे राजन्य, मी तुला एक उपमा देतो. या जगात काही बुद्धिमान लोक उपमेच्या द्वारे बोललेल्या गोष्टीचा अर्थ समजून घेतात. पूर्वीची गोष्ट आहे, हे राजन्य, एक जनपद ओसाड झाला. तेव्हा एका मित्राने आपल्या दुसऱ्या मित्राला विचारले – ‘मित्रा, चल, आपण त्या जनपदाकडे जाऊ या, कदाचित आपल्याला तिथे काही धन मिळेल.’ ‘ठीक आहे, मित्रा,’ असे त्या मित्राने दुसऱ्या मित्राला उत्तर दिले. ते त्या जनपदातील एका गावाच्या रस्त्यावर गेले. तिथे त्यांनी भरपूर टाकून दिलेला ताग पाहिला. ते पाहून एका मित्राने दुसऱ्या मित्राला म्हटले – ‘मित्रा, हा भरपूर ताग टाकून दिलेला आहे. म्हणून, मित्रा, तूही तागाचे एक ओझे बांध आणि मीही तागाचे एक ओझे बांधतो. आपण दोघेही तागाचे ओझे घेऊन जाऊ या.’ ‘ठीक आहे, मित्रा,’ असे म्हणून त्या मित्राने त्याचे ऐकले आणि तागाचे ओझे बांधले. ते दोघेही तागाचे ओझे घेऊन दुसऱ्या एका गावाच्या रस्त्याकडे गेले. तिथे त्यांनी भरपूर टाकून दिलेला तागाचा दोरा पाहिला. ते पाहून एका मित्राने दुसऱ्या मित्राला म्हटले – ‘मित्रा, ज्या तागाच्या दोऱ्यासाठी आपल्याला ताग हवा होता, तो हा भरपूर तागाचा दोरा इथे टाकून दिलेला आहे. म्हणून, मित्रा, तू तुझे तागाचे ओझे टाकून दे आणि मीही माझे तागाचे ओझे टाकून देतो. आपण दोघेही तागाच्या दोऱ्याचे ओझे घेऊन जाऊ या.’ ‘मित्रा, हे तागाचे ओझे मी खूप दूरवरून आणले आहे आणि ते चांगल्या प्रकारे बांधलेले आहे. माझ्यासाठी हेच पुरेसे आहे, तू तुझे काय ते बघ.’ तेव्हा त्या दुसऱ्या मित्राने तागाचे ओझे टाकून दिले आणि तागाच्या दोऱ्याचे ओझे घेतले।” ‘‘เต เยน อญฺญตรํ คามปฏฺฏํ เตนุปสงฺกมึสุ. ตตฺถ อทฺทสํสุ ปหูตา สาณิโย ฉฑฺฑิตา, ทิสฺวา สหายโก สหายกํ อามนฺเตสิ – ‘ยสฺส โข, สมฺม, อตฺถาย อิจฺเฉยฺยาม สาณํ วา สาณสุตฺตํ วา, อิมา ปหูตา สาณิโย ฉฑฺฑิตา. เตน หิ, สมฺม, ตฺวญฺจ สาณภารํ ฉฑฺเฑหิ, อหญฺจ สาณสุตฺตภารํ ฉฑฺเฑสฺสามิ, อุโภ สาณิภารํ อาทาย คมิสฺสามา’ติ[Pg.278]. ‘อยํ โข เม, สมฺม, สาณภาโร ทูราภโต จ สุสนฺนทฺโธ จ, อลํ เม, ตฺวํ ปชานาหี’ติ. อถ โข โส สหายโก สาณสุตฺตภารํ ฉฑฺเฑตฺวา สาณิภารํ อาทิยิ. “ते दुसऱ्या एका गावाच्या रस्त्याकडे गेले. तिथे त्यांनी भरपूर टाकून दिलेली तागाची वस्त्रे पाहिली. ते पाहून एका मित्राने दुसऱ्या मित्राला म्हटले – ‘मित्रा, ज्या तागाच्या वस्त्रांसाठी आपल्याला ताग किंवा तागाचा दोरा हवा होता, ती ही भरपूर तागाची वस्त्रे इथे टाकून दिलेली आहेत. म्हणून, मित्रा, तू तुझे तागाचे ओझे टाकून दे आणि मी माझे तागाच्या दोऱ्याचे ओझे टाकून देतो. आपण दोघेही तागाच्या वस्त्रांचे ओझे घेऊन जाऊ या.’ ‘मित्रा, हे तागाचे ओझे मी खूप दूरवरून आणले आहे आणि ते चांगल्या प्रकारे बांधलेले आहे. माझ्यासाठी हेच पुरेसे आहे, तू तुझे काय ते बघ.’ तेव्हा त्या दुसऱ्या मित्राने तागाच्या दोऱ्याचे ओझे टाकून दिले आणि तागाच्या वस्त्रांचे ओझे घेतले।” ‘‘เต เยน อญฺญตรํ คามปฏฺฏํ เตนุปสงฺกมึสุ. ตตฺถ อทฺทสํสุ ปหูตํ โขมํ ฉฑฺฑิตํ, ทิสฺวา…เป… ปหูตํ โขมสุตฺตํ ฉฑฺฑิตํ, ทิสฺวา… ปหูตํ โขมทุสฺสํ ฉฑฺฑิตํ, ทิสฺวา… ปหูตํ กปฺปาสํ ฉฑฺฑิตํ, ทิสฺวา… ปหูตํ กปฺปาสิกสุตฺตํ ฉฑฺฑิตํ, ทิสฺวา… ปหูตํ กปฺปาสิกทุสฺสํ ฉฑฺฑิตํ, ทิสฺวา… ปหูตํ อยํ ฉฑฺฑิตํ, ทิสฺวา… ปหูตํ โลหํ ฉฑฺฑิตํ, ทิสฺวา… ปหูตํ ติปุํ ฉฑฺฑิตํ, ทิสฺวา… ปหูตํ สีสํ ฉฑฺฑิตํ, ทิสฺวา… ปหูตํ สชฺฌํ ฉฑฺฑิตํ, ทิสฺวา… ปหูตํ สุวณฺณํ ฉฑฺฑิตํ, ทิสฺวา สหายโก สหายกํ อามนฺเตสิ – ‘ยสฺส โข, สมฺม, อตฺถาย อิจฺเฉยฺยาม สาณํ วา สาณสุตฺตํ วา สาณิโย วา โขมํ วา โขมสุตฺตํ วา โขมทุสฺสํ วา กปฺปาสํ วา กปฺปาสิกสุตฺตํ วา กปฺปาสิกทุสฺสํ วา อยํ วา โลหํ วา ติปุํ วา สีสํ วา สชฺฌํ วา, อิทํ ปหูตํ สุวณฺณํ ฉฑฺฑิตํ. เตน หิ, สมฺม, ตฺวญฺจ สาณภารํ ฉฑฺเฑหิ, อหญฺจ สชฺฌภารํ ฉฑฺเฑสฺสามิ, อุโภ สุวณฺณภารํ อาทาย คมิสฺสามา’ติ. ‘อยํ โข เม, สมฺม, สาณภาโร ทูราภโต จ สุสนฺนทฺโธ จ, อลํ เม ตฺวํ ปชานาหี’ติ. อถ โข โส สหายโก สชฺฌภารํ ฉฑฺเฑตฺวา สุวณฺณภารํ อาทิยิ. “ते दुसऱ्या एका गावाच्या रस्त्याकडे गेले. तिथे त्यांनी भरपूर टाकून दिलेले क्षौम पाहिले... पे... भरपूर टाकून दिलेला क्षौम-दोरा पाहिला... भरपूर टाकून दिलेले क्षौम-वस्त्र पाहिले... भरपूर टाकून दिलेला कापूस पाहिला... भरपूर टाकून दिलेला सुती दोरा पाहिला... भरपूर टाकून दिलेले सुती वस्त्र पाहिले... भरपूर टाकून दिलेले लोखंड पाहिले... भरपूर टाकून दिलेले तांबे पाहिले... भरपूर टाकून दिलेले कथील पाहिले... भरपूर टाकून दिलेले शिसे पाहिले... भरपूर टाकून दिलेली चांदी पाहिली... भरपूर टाकून दिलेले सोने पाहिले. ते पाहून एका मित्राने दुसऱ्या मित्राला म्हटले – ‘मित्रा, ज्या सोन्यासाठी आपल्याला ताग, तागाचा दोरा, तागाची वस्त्रे, क्षौम, क्षौम-दोरा, क्षौम-वस्त्र, कापूस, सुती दोरा, सुती वस्त्र, लोखंड, तांबे, कथील, शिसे किंवा चांदी हवी होती, ते हे भरपूर सोने इथे टाकून दिलेले आहे. म्हणून, मित्रा, तू तुझे तागाचे ओझे टाकून दे आणि मी माझे चांदीचे ओझे टाकून देतो. आपण दोघेही सोन्याचे ओझे घेऊन जाऊ या.’ ‘मित्रा, हे तागाचे ओझे मी खूप दूरवरून आणले आहे आणि ते चांगल्या प्रकारे बांधलेले आहे. माझ्यासाठी हेच पुरेसे आहे, तू तुझे काय ते बघ.’ तेव्हा त्या दुसऱ्या मित्राने चांदीचे ओझे टाकून दिले आणि सोन्याचे ओझे घेतले।” ‘‘เต เยน สโก คาโม เตนุปสงฺกมึสุ. ตตฺถ โย โส สหายโก สาณภารํ อาทาย อคมาสิ, ตสฺส เนว มาตาปิตโร อภินนฺทึสุ, น ปุตฺตทารา อภินนฺทึสุ, น มิตฺตามจฺจา อภินนฺทึสุ, น จ ตโตนิทานํ สุขํ โสมนสฺสํ อธิคจฺฉิ. โย ปน โส สหายโก สุวณฺณภารํ อาทาย อคมาสิ, ตสฺส มาตาปิตโรปิ อภินนฺทึสุ, ปุตฺตทาราปิ อภินนฺทึสุ, มิตฺตามจฺจาปิ อภินนฺทึสุ, ตโตนิทานญฺจ สุขํ โสมนสฺสํ อธิคจฺฉิ. ‘‘เอวเมว โข ตฺวํ, ราชญฺญ, สาณภาริกูปโม มญฺเญ ปฏิภาสิ. ปฏินิสฺสชฺเชตํ, ราชญฺญ, ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ; ปฏินิสฺสชฺเชตํ, ราชญฺญ, ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ. มา เต อโหสิ ทีฆรตฺตํ อหิตาย ทุกฺขายา’’ติ. “ते आपल्या स्वतःच्या गावाकडे गेले. तिथे जो मित्र तागाचे ओझे घेऊन गेला होता, त्याचे आई-वडील आनंदी झाले नाहीत, त्याचे पत्नी-मुलगे आनंदी झाले नाहीत, त्याचे मित्र आणि नातेवाईक आनंदी झाले नाहीत, आणि त्याला त्या तागामुळे कोणतेही सुख किंवा आनंद मिळाला नाही. परंतु, जो मित्र सोन्याचे ओझे घेऊन गेला होता, त्याचे आई-वडीलही आनंदी झाले, त्याचे पत्नी-मुलगेही आनंदी झाले, त्याचे मित्र आणि नातेवाईकही आनंदी झाले, आणि त्याला त्या सोन्यामुळे सुख आणि आनंद मिळाला. ‘हे राजन्य, तू मला अगदी त्या तागाचे ओझे वाहणाऱ्या माणसासारखाच वाटतोस. हे राजन्य, या पापी दृष्टीचा त्याग कर! हे राजन्य, या पापी दृष्टीचा त्याग कर! ही दृष्टी दीर्घकाळापर्यंत तुझ्या अहितासाठी आणि दुःखासाठी कारणीभूत ठरू नये!’” สรณคมนํ शरणगमन ๔๓๗. ‘‘ปุริเมเนว [Pg.279] อหํ โอปมฺเมน โภโต กสฺสปสฺส อตฺตมโน อภิรทฺโธ. อปิ จาหํ อิมานิ วิจิตฺรานิ ปญฺหาปฏิภานานิ โสตุกาโม เอวาหํ ภวนฺตํ กสฺสปํ ปจฺจนีกํ กาตพฺพํ อมญฺญิสฺสํ. อภิกฺกนฺตํ, โภ กสฺสป, อภิกฺกนฺตํ, โภ กสฺสป. เสยฺยถาปิ, โภ กสฺสป, นิกฺกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย, ปฏิจฺฉนฺนํ วา วิวเรยฺย, มูฬฺหสฺส วา มคฺคํ อาจิกฺเขยฺย, อนฺธกาเร วา เตลปชฺโชตํ ธาเรยฺย ‘จกฺขุมนฺโต รูปานิ ทกฺขนฺตี’ติ เอวเมวํ โภตา กสฺสเปน อเนกปริยาเยน ธมฺโม ปกาสิโต. เอสาหํ, โภ กสฺสป, ตํ ภวนฺตํ โคตมํ สรณํ คจฺฉามิ, ธมฺมญฺจ, ภิกฺขุสงฺฆญฺจ. อุปาสกํ มํ ภวํ กสฺสโป ธาเรตุ อชฺชตคฺเค ปาณุเปตํ สรณํ คตํ. ४३७. “हे कश्यप, तुमच्या पहिल्याच उपमेने मी संतुष्ट आणि प्रसन्न झालो होतो. परंतु, मला ही विविध प्रकारची प्रश्नोत्तरे ऐकायची होती, म्हणूनच मी तुम्हाला विरोध करत राहिलो. अतिशय सुंदर, आदरणीय कश्यप! अतिशय सुंदर, आदरणीय कश्यप! हे कश्यप, जसे एखाद्याने उपडे ठेवलेले भांडे उताणे करावे, झाकलेले उघडे करावे, वाट चुकलेल्याला मार्ग दाखवावा, किंवा अंधारात तेलाचा दिवा धरावा जेणेकरून डोळे असणाऱ्यांना रूपे दिसू शकतील; त्याचप्रमाणे आदरणीय कश्यप यांनी अनेक मार्गांनी धम्माचा प्रकाश पाडला आहे. हे कश्यप, मी त्या भगवान गोतमांना शरण जातो, धम्माला शरण जातो आणि भिक्खू संघाला शरण जातो. आदरणीय कश्यप यांनी मला आजपासून जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे।” ‘‘อิจฺฉามิ จาหํ, โภ กสฺสป, มหายญฺญํ ยชิตุํ, อนุสาสตุ มํ ภวํ กสฺสโป, ยํ มมสฺส ทีฆรตฺตํ หิตาย สุขายา’’ติ. “आणि हे कश्यप, माझी एक महायज्ञ करण्याची इच्छा आहे. आदरणीय कश्यप यांनी मला असा उपदेश करावा, जो दीर्घकाळापर्यंत माझ्या हितासाठी आणि सुखासाठी ठरेल।” ยญฺญกถา यज्ञकथा ๔๓๘. ‘‘ยถารูเป โข, ราชญฺญ, ยญฺเญ คาโว วา หญฺญนฺติ อเชฬกา วา หญฺญนฺติ, กุกฺกุฏสูกรา วา หญฺญนฺติ, วิวิธา วา ปาณา สํฆาตํ อาปชฺชนฺติ, ปฏิคฺคาหกา จ โหนฺติ มิจฺฉาทิฏฺฐี มิจฺฉาสงฺกปฺปา มิจฺฉาวาจา มิจฺฉากมฺมนฺตา มิจฺฉาอาชีวา มิจฺฉาวายามา มิจฺฉาสตี มิจฺฉาสมาธี, เอวรูโป โข, ราชญฺญ, ยญฺโญ น มหปฺผโล โหติ น มหานิสํโส น มหาชุติโก น มหาวิปฺผาโร. เสยฺยถาปิ, ราชญฺญ, กสฺสโก พีชนงฺคลํ อาทาย วนํ ปวิเสยฺย. โส ตตฺถ ทุกฺเขตฺเต ทุพฺภูเม อวิหตขาณุกณฺฏเก พีชานิ ปติฏฺฐาเปยฺย ขณฺฑานิ ปูตีนิ วาตาตปหตานิ อสารทานิ อสุขสยิตานิ. เทโว จ น กาเลน กาลํ สมฺมาธารํ อนุปฺปเวจฺเฉยฺย. อปิ นุ ตานิ พีชานิ วุทฺธึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลํ อาปชฺเชยฺยุํ, กสฺสโก วา วิปุลํ ผลํ อธิคจฺเฉยฺยา’’ติ? ‘‘โน หิทํ โภ กสฺสป’’. ‘‘เอวเมว โข, ราชญฺญ, ยถารูเป ยญฺเญ คาโว วา หญฺญนฺติ, อเชฬกา วา หญฺญนฺติ, กุกฺกุฏสูกรา วา หญฺญนฺติ, วิวิธา วา ปาณา สํฆาตํ อาปชฺชนฺติ, ปฏิคฺคาหกา จ โหนฺติ มิจฺฉาทิฏฺฐี มิจฺฉาสงฺกปฺปา มิจฺฉาวาจา มิจฺฉากมฺมนฺตา มิจฺฉาอาชีวา มิจฺฉาวายามา มิจฺฉาสตี [Pg.280] มิจฺฉาสมาธี, เอวรูโป โข, ราชญฺญ, ยญฺโญ น มหปฺผโล โหติ น มหานิสํโส น มหาชุติโก น มหาวิปฺผาโร. ४३८. “हे राजन्य, ज्या यज्ञात गाई मारल्या जातात, शेळ्या-मेंढ्या मारल्या जातात, कोंबड्या व डुकरे मारली जातात किंवा विविध प्राण्यांचा संहार केला जातो; आणि दान स्वीकारणारे मिथ्यादृष्टी, मिथ्यासंकल्प, मिथ्यावाचा, मिथ्याकर्मान्त, मिथ्याआजीव, मिथ्याव्यायाम, मिथ्यास्मृती आणि मिथ्यासमाधी असणारे असतात; असा यज्ञ, हे राजन्य, महाफळ देणारा ठरत नाही, महान फायद्याचा ठरत नाही, महातेजस्वी ठरत नाही आणि महाविस्तृत ठरत नाही. हे राजन्य, जसे एखाद्या शेतकऱ्याने बी आणि नांगर घेऊन जंगलात प्रवेश करावा. त्याने तेथे नापीक जमिनीत, खडकाळ व उंचसखल भूभागात, जिथले खुंट व काटे उपटलेले नाहीत, अशा वाईट शेतात अशी बीजे पेरावीत जी तुटलेली, सडलेली, वारा आणि उन्हाने खराब झालेली, कस नसलेली आणि नीट न सुकवलेली असतील. आणि पावसानेही वेळच्या वेळी योग्य पाऊस पाडला नाही. तर काय ती बीजे वाढीस लागतील, अंकुरित होतील आणि विपुल प्रमाणात वाढतील? किंवा त्या शेतकऱ्याला भरपूर पीक मिळेल का?” “नाही, आदरणीय कस्सप!” “तसेच, हे राजन्य, ज्या यज्ञात गाई मारल्या जातात, शेळ्या-मेंढ्या मारल्या जातात, कोंबड्या व डुकरे मारली जातात किंवा विविध प्राण्यांचा संहार केला जातो; आणि दान स्वीकारणारे मिथ्यादृष्टी, मिथ्यासंकल्प, मिथ्यावाचा, मिथ्याकर्मान्त, मिथ्याआजीव, मिथ्याव्यायाम, मिथ्यास्मृती आणि मिथ्यासमाधी असणारे असतात; असा यज्ञ, हे राजन्य, महाफळ देणारा ठरत नाही, महान फायद्याचा ठरत नाही, महातेजस्वी ठरत नाही आणि महाविस्तृत ठरत नाही.” ‘‘ยถารูเป จ โข, ราชญฺญ, ยญฺเญ เนว คาโว หญฺญนฺติ, น อเชฬกา หญฺญนฺติ, น กุกฺกุฏสูกรา หญฺญนฺติ, น วิวิธา วา ปาณา สํฆาตํ อาปชฺชนฺติ, ปฏิคฺคาหกา จ โหนฺติ สมฺมาทิฏฺฐี สมฺมาสงฺกปฺปา สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺตา สมฺมาอาชีวา สมฺมาวายามา สมฺมาสตี สมฺมาสมาธี, เอวรูโป โข, ราชญฺญ, ยญฺโญ มหปฺผโล โหติ มหานิสํโส มหาชุติโก มหาวิปฺผาโร. เสยฺยถาปิ, ราชญฺญ, กสฺสโก พีชนงฺคลํ อาทาย วนํ ปวิเสยฺย. โส ตตฺถ สุเขตฺเต สุภูเม สุวิหตขาณุกณฺฏเก พีชานิ ปติฏฺฐเปยฺย อขณฺฑานิ อปูตีนิ อวาตาตปหตานิ สารทานิ สุขสยิตานิ. เทโว จ กาเลน กาลํ สมฺมาธารํ อนุปฺปเวจฺเฉยฺย. อปิ นุ ตานิ พีชานิ วุทฺธึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลํ อาปชฺเชยฺยุํ, กสฺสโก วา วิปุลํ ผลํ อธิคจฺเฉยฺยา’’ติ? ‘‘เอวํ, โภ กสฺสป’’. ‘‘เอวเมว โข, ราชญฺญ, ยถารูเป ยญฺเญ เนว คาโว หญฺญนฺติ, น อเชฬกา หญฺญนฺติ, น กุกฺกุฏสูกรา หญฺญนฺติ, น วิวิธา วา ปาณา สํฆาตํ อาปชฺชนฺติ, ปฏิคฺคาหกา จ โหนฺติ สมฺมาทิฏฺฐี สมฺมาสงฺกปฺปา สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺตา สมฺมาอาชีวา สมฺมาวายามา สมฺมาสตี สมฺมาสมาธี, เอวรูโป โข, ราชญฺญ, ยญฺโญ มหปฺผโล โหติ มหานิสํโส มหาชุติโก มหาวิปฺผาโร’’ติ. “परंतु, हे राजन्य, ज्या यज्ञात गाई मारल्या जात नाहीत, शेळ्या-मेंढ्या मारल्या जात नाहीत, कोंबड्या व डुकरे मारली जात नाहीत किंवा विविध प्राण्यांचा संहार केला जात नाही; आणि दान स्वीकारणारे सम्यक्दृष्टी, सम्यक्संकल्प, सम्यक्वाचा, सम्यक्कर्मान्त, सम्यक्आजीव, सम्यक्व्यायाम, सम्यक्स्मृती आणि सम्यक्समाधी असणारे असतात; असा यज्ञ, हे राजन्य, महाफळ देणारा ठरतो, महान फायद्याचा ठरतो, महातेजस्वी ठरतो आणि महाविस्तृत ठरतो. हे राजन्य, जसे एखाद्या शेतकऱ्याने बी आणि नांगर घेऊन जंगलात प्रवेश करावा. त्याने तेथे सुपीक जमिनीत, सपाट भूभागात, जिथले खुंट व काटे पूर्णपणे उपटून टाकले आहेत, अशा चांगल्या शेतात अशी बीजे पेरावीत जी अखंड, न सडलेली, वारा आणि उन्हाने खराब न झालेली, कसदार आणि नीट सुकवलेली असतील. आणि पावसानेही वेळच्या वेळी योग्य पाऊस पाडला. तर काय ती बीजे वाढीस लागतील, अंकुरित होतील आणि विपुल प्रमाणात वाढतील? किंवा त्या शेतकऱ्याला भरपूर पीक मिळेल का?” “होय, आदरणीय कस्सप!” “तसेच, हे राजन्य, ज्या यज्ञात गाई मारल्या जात नाहीत, शेळ्या-मेंढ्या मारल्या जात नाहीत, कोंबड्या व डुकरे मारली जात नाहीत किंवा विविध प्राण्यांचा संहार केला जात नाही; आणि दान स्वीकारणारे सम्यक्दृष्टी, सम्यक्संकल्प, सम्यक्वाचा, सम्यक्कर्मान्त, सम्यक्आजीव, सम्यक्व्यायाम, सम्यक्स्मृती आणि सम्यक्समाधी असणारे असतात; असा यज्ञ, हे राजन्य, महाफळ देणारा ठरतो, महान फायद्याचा ठरतो, महातेजस्वी ठरतो आणि महाविस्तृत ठरतो.” อุตฺตรมาณววตฺถุ उत्तर माणव कथा ๔๓๙. อถ โข ปายาสิ ราชญฺโญ ทานํ ปฏฺฐเปสิ สมณพฺราหฺมณกปณทฺธิกวณิพฺพกยาจกานํ. ตสฺมึ โข ปน ทาเน เอวรูปํ โภชนํ ทียติ กณาชกํ พิลงฺคทุติยํ, โธรกานิ จ วตฺถานิ คุฬวาลกานิ. ตสฺมึ โข ปน ทาเน อุตฺตโร นาม มาณโว วาวโฏ อโหสิ. โส ทานํ ทตฺวา เอวํ อนุทฺทิสติ – ‘‘อิมินาหํ ทาเนน ปายาสึ ราชญฺญเมว อิมสฺมึ โลเก สมาคจฺฉึ, มา ปรสฺมิ’’นฺติ. อสฺโสสิ โข ปายาสิ ราชญฺโญ – ‘‘อุตฺตโร กิร มาณโว ทานํ ทตฺวา เอวํ อนุทฺทิสติ – ‘อิมินาหํ ทาเนน ปายาสึ ราชญฺญเมว อิมสฺมึ โลเก สมาคจฺฉึ, มา ปรสฺมิ’’’นฺติ. อถ [Pg.281] โข ปายาสิ ราชญฺโญ อุตฺตรํ มาณวํ อามนฺตาเปตฺวา เอตทโวจ – ‘‘สจฺจํ กิร ตฺวํ, ตาต อุตฺตร, ทานํ ทตฺวา เอวํ อนุทฺทิสสิ – ‘อิมินาหํ ทาเนน ปายาสึ ราชญฺญเมว อิมสฺมึ โลเก สมาคจฺฉึ, มา ปรสฺมิ’’’นฺติ? ‘‘เอวํ, โภ’’. ‘‘กิสฺส ปน ตฺวํ, ตาต อุตฺตร, ทานํ ทตฺวา เอวํ อนุทฺทิสสิ – ‘อิมินาหํ ทาเนน ปายาสึ ราชญฺญเมว อิมสฺมึ โลเก สมาคจฺฉึ, มา ปรสฺมิ’นฺติ? นนุ มยํ, ตาต อุตฺตร, ปุญฺญตฺถิกา ทานสฺเสว ผลํ ปาฏิกงฺขิโน’’ติ? ‘‘โภโต โข ทาเน เอวรูปํ โภชนํ ทียติ กณาชกํ พิลงฺคทุติยํ, ยํ ภวํ ปาทาปิ น อิจฺเฉยฺย สมฺผุสิตุํ, กุโต ภุญฺชิตุํ, โธรกานิ จ วตฺถานิ คุฬวาลกานิ, ยานิ ภวํ ปาทาปิ น อิจฺเฉยฺย สมฺผุสิตุํ, กุโต ปริทหิตุํ. ภวํ โข ปนมฺหากํ ปิโย มนาโป, กถํ มยํ มนาปํ อมนาเปน สํโยเชมา’’ติ? ‘‘เตน หิ ตฺวํ, ตาต อุตฺตร, ยาทิสาหํ โภชนํ ภุญฺชามิ, ตาทิสํ โภชนํ ปฏฺฐเปหิ. ยาทิสานิ จาหํ วตฺถานิ ปริทหามิ, ตาทิสานิ จ วตฺถานิ ปฏฺฐเปหี’’ติ. ‘‘เอวํ, โภ’’ติ โข อุตฺตโร มาณโว ปายาสิสฺส ราชญฺญสฺส ปฏิสฺสุตฺวา ยาทิสํ โภชนํ ปายาสิ ราชญฺโญ ภุญฺชติ, ตาทิสํ โภชนํ ปฏฺฐเปสิ. ยาทิสานิ จ วตฺถานิ ปายาสิ ราชญฺโญ ปริทหติ, ตาทิสานิ จ วตฺถานิ ปฏฺฐเปสิ. ४३९. त्यानंतर पायासि राजन्य याने श्रमण, ब्राह्मण, अनाथ, प्रवासी, भिकारी आणि याचक यांच्यासाठी दान देण्यास सुरुवात केली. परंतु त्या दानात कण्यांचा भात आणि आंबट कांजी असे अन्न दिले जात असे, तसेच जाडेभरडे आणि गोंडे असलेले कपडे दिले जात असत. त्या दानाच्या व्यवस्थापनात उत्तर नावाचा एक तरुण नियुक्त होता. तो दान दिल्यानंतर असे म्हणत असे – “या दानामुळे मी या लोकात पायासि राजन्य याच्याशी जोडला गेलो आहे, परलोकात नाही.” पायासि राजन्य याने ऐकले की – “उत्तर माणव दान दिल्यानंतर असे म्हणतो – \"या दानामुळे मी या लोकात पायासि राजन्य याच्याशी जोडला गेलो आहे, परलोकात नाही.\"” तेव्हा पायासि राजन्य याने उत्तर माणवाला बोलावून घेतले आणि त्याला विचारले – “हे प्रिय उत्तर, हे खरे आहे का की तू दान दिल्यानंतर असे म्हणतोस – \"या दानामुळे मी या लोकात पायासि राजन्य याच्याशी जोडला गेलो आहे, परलोकात नाही\"?” “होय, स्वामी, हे खरे आहे.” “पण प्रिय उत्तर, तू दान दिल्यानंतर असे का म्हणतोस? हे प्रिय उत्तर, आपण पुण्य मिळवू इच्छिणारे आहोत आणि दानाच्या फळाची अपेक्षा ठेवणारे आहोत ना?” “स्वामी, आपल्या दानात कण्यांचा भात आणि आंबट कांजी असे अन्न दिले जाते, ज्याला आपण पायाने स्पर्श करणेही पसंत करणार नाही, मग खाणे तर दूरच राहिले! तसेच जाडेभरडे आणि गोंडे असलेले कपडे दिले जातात, ज्यांना आपण पायाने स्पर्श करणेही पसंत करणार नाही, मग परिधान करणे तर दूरच राहिले! आपण तर आमचे प्रिय आणि आदरणीय आहात, मग आम्ही आपल्या प्रिय व्यक्तीला अशा अप्रिय कर्माशी कसे जोडू?” “असे असेल तर, प्रिय उत्तर, मी जसे अन्न खातो, तसेच अन्न दानासाठी तयार कर. आणि मी जसे कपडे परिधान करतो, तसेच कपडे दानासाठी तयार कर.” “तसेच असो, स्वामी,” असे म्हणून उत्तर माणवाने पायासि राजन्य याच्या आज्ञेचे पालन केले. पायासि राजन्य जसे अन्न खात असे, तसेच अन्न त्याने दानासाठी तयार केले; आणि पायासि राजन्य जसे कपडे परिधान करत असे, तसेच कपडे त्याने दानासाठी तयार केले. ๔๔๐. อถ โข ปายาสิ ราชญฺโญ อสกฺกจฺจํ ทานํ ทตฺวา อสหตฺถา ทานํ ทตฺวา อจิตฺตีกตํ ทานํ ทตฺวา อปวิทฺธํ ทานํ ทตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา จาตุมหาราชิกานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชิ สุญฺญํ เสรีสกํ วิมานํ. โย ปน ตสฺส ทาเน วาวโฏ อโหสิ อุตฺตโร นาม มาณโว. โส สกฺกจฺจํ ทานํ ทตฺวา สหตฺถา ทานํ ทตฺวา จิตฺตีกตํ ทานํ ทตฺวา อนปวิทฺธํ ทานํ ทตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชิ เทวานํ ตาวตึสานํ สหพฺยตํ. ४४०. त्यानंतर, पायासि राजन्य याने अनादराने दान दिल्यामुळे, स्वतःच्या हाताने दान न दिल्यामुळे, आदर न दाखवता दान दिल्यामुळे आणि फेकून दिल्यासारखे दान दिल्यामुळे, शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर चातुर्महाराजिक देवांच्या सान्निध्यात रिकाम्या सेरीसक विमानामध्ये उत्पन्न झाला. परंतु, त्याच्या दानाचे व्यवस्थापन करणारा जो उत्तर नावाचा तरुण होता, त्याने आदराने दान दिल्यामुळे, स्वतःच्या हाताने दान दिल्यामुळे, आदरपूर्वक दान दिल्यामुळे आणि फेकून दिल्यासारखे न देता दान दिल्यामुळे, शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात तावतिंस देवांच्या सान्निध्यात उत्पन्न झाला. ปายาสิเทวปุตฺโต पायासि देवपुत्र ๔๔๑. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา ควมฺปติ อภิกฺขณํ สุญฺญํ เสรีสกํ วิมานํ ทิวาวิหารํ คจฺฉติ. อถ โข ปายาสิ เทวปุตฺโต เยนายสฺมา ควมฺปติ เตนุปสงฺกมิ; อุปสงฺกมิตฺวา อายสฺมนฺตํ ควมฺปตึ อภิวาเทตฺวา [Pg.282] เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. เอกมนฺตํ ฐิตํ โข ปายาสึ เทวปุตฺตํ อายสฺมา ควมฺปติ เอตทโวจ – ‘‘โกสิ ตฺวํ, อาวุโส’’ติ? ‘‘อหํ, ภนฺเต, ปายาสิ ราชญฺโญ’’ติ. ‘‘นนุ ตฺวํ, อาวุโส, เอวํทิฏฺฐิโก อโหสิ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’’’ติ? ‘‘สจฺจาหํ, ภนฺเต, เอวํทิฏฺฐิโก อโหสึ – ‘อิติปิ นตฺถิ ปโร โลโก, นตฺถิ สตฺตา โอปปาติกา, นตฺถิ สุกตทุกฺกฏานํ กมฺมานํ ผลํ วิปาโก’ติ. อปิ จาหํ อยฺเยน กุมารกสฺสเปน เอตสฺมา ปาปกา ทิฏฺฐิคตา วิเวจิโต’’ติ. ‘‘โย ปน เต, อาวุโส, ทาเน วาวโฏ อโหสิ อุตฺตโร นาม มาณโว, โส กุหึ อุปปนฺโน’’ติ? ‘‘โย เม, ภนฺเต, ทาเน วาวโฏ อโหสิ อุตฺตโร นาม มาณโว, โส สกฺกจฺจํ ทานํ ทตฺวา สหตฺถา ทานํ ทตฺวา จิตฺตีกตํ ทานํ ทตฺวา อนปวิทฺธํ ทานํ ทตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปนฺโน เทวานํ ตาวตึสานํ สหพฺยตํ. อหํ ปน, ภนฺเต, อสกฺกจฺจํ ทานํ ทตฺวา อสหตฺถา ทานํ ทตฺวา อจิตฺตีกตํ ทานํ ทตฺวา อปวิทฺธํ ทานํ ทตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา จาตุมหาราชิกานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปนฺโน สุญฺญํ เสรีสกํ วิมานํ. เตน หิ, ภนฺเต ควมฺปติ, มนุสฺสโลกํ คนฺตฺวา เอวมาโรเจหิ – ‘สกฺกจฺจํ ทานํ เทถ, สหตฺถา ทานํ เทถ, จิตฺตีกตํ ทานํ เทถ, อนปวิทฺธํ ทานํ เทถ. ปายาสิ ราชญฺโญ อสกฺกจฺจํ ทานํ ทตฺวา อสหตฺถา ทานํ ทตฺวา อจิตฺตีกตํ ทานํ ทตฺวา อปวิทฺธํ ทานํ ทตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา จาตุมหาราชิกานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปนฺโน สุญฺญํ เสรีสกํ วิมานํ. โย ปน ตสฺส ทาเน วาวโฏ อโหสิ อุตฺตโร นาม มาณโว, โส สกฺกจฺจํ ทานํ ทตฺวา สหตฺถา ทานํ ทตฺวา จิตฺตีกตํ ทานํ ทตฺวา อนปวิทฺธํ ทานํ ทตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปนฺโน เทวานํ ตาวตึสานํ สหพฺยต’’’นฺติ. ४४१. त्या वेळी आयुष्यमान गवंपती दुपारच्या विश्रांतीसाठी वारंवार निर्जन अशा सेरीसक विमानामध्ये जात असत. तेव्हा पायासी देवपुत्र जेथे आयुष्यमान गवंपती होते तेथे आला; आणि जवळ येऊन आयुष्यमान गवंपतींना अभिवादन करून एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभे राहिलेल्या पायासी देवपुत्राला आयुष्यमान गवंपती म्हणाले – “मित्रा, तू कोण आहेस?” “भंते, मी पायासी राजन्य आहे.” “मित्रा, तुझी अशी दृष्टी नव्हती का की – ‘परलोक नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत, चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक नाही’?” “भंते, खरोखरच माझी अशी दृष्टी होती की – ‘परलोक नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत, चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक नाही’. परंतु, आदरणीय कुमारकस्सपांनी मला या पापी दृष्टीपासून परावृत्त केले.” “मित्रा, तुझ्या दानाची व्यवस्था पाहणारा जो उत्तर नावाचा तरुण होता, तो कोठे उत्पन्न झाला आहे?” “भंते, माझ्या दानाची व्यवस्था पाहणारा जो उत्तर नावाचा तरुण होता, त्याने आदरपूर्वक दान दिले, स्वतःच्या हाताने दान दिले, सन्मानपूर्वक दान दिले, फेकून दिल्यासारखे न करता दान दिले; त्यामुळे शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर तो सुगती अशा स्वर्गलोकात, तावतिंस देवांच्या सहवासात उत्पन्न झाला आहे. परंतु मी, भंते, अनादरपूर्वक दान दिले, स्वतःच्या हाताने दान दिले नाही, सन्मान न करता दान दिले, फेकून दिल्यासारखे दान दिले; त्यामुळे शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर मी चातुमहाराजिक देवांच्या सहवासात, या निर्जन सेरीसक विमानामध्ये उत्पन्न झालो आहे. म्हणून, भंते गवंपती, आपण मनुष्यलोकात जाऊन असे सांगावे – ‘आदरपूर्वक दान द्या, स्वतःच्या हाताने दान द्या, सन्मानपूर्वक दान द्या, फेकून दिल्यासारखे न करता दान द्या. पायासी राजन्याने अनादरपूर्वक दान दिले, स्वतःच्या हाताने दान दिले नाही, सन्मान न करता दान दिले, फेकून दिल्यासारखे दान दिले; त्यामुळे शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर तो चातुमहाराजिक देवांच्या सहवासात, निर्जन सेरीसक विमानामध्ये उत्पन्न झाला आहे. परंतु, त्याच्या दानाची व्यवस्था पाहणारा जो उत्तर नावाचा तरुण होता, त्याने आदरपूर्वक दान दिले, स्वतःच्या हाताने दान दिले, सन्मानपूर्वक दान दिले, फेकून दिल्यासारखे न करता दान दिले; त्यामुळे शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर तो सुगती अशा स्वर्गलोकात, तावतिंस देवांच्या सहवासात उत्पन्न झाला आहे.’” อถ โข อายสฺมา ควมฺปติ มนุสฺสโลกํ อาคนฺตฺวา เอวมาโรเจสิ – ‘‘สกฺกจฺจํ ทานํ เทถ, สหตฺถา ทานํ เทถ, จิตฺตีกตํ ทานํ เทถ, อนปวิทฺธํ ทานํ เทถ. ปายาสิ ราชญฺโญ อสกฺกจฺจํ ทานํ ทตฺวา อสหตฺถา ทานํ ทตฺวา อจิตฺตีกตํ ทานํ ทตฺวา อปวิทฺธํ ทานํ ทตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา จาตุมหาราชิกานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปนฺโน สุญฺญํ เสรีสกํ วิมานํ. โย ปน ตสฺส ทาเน วาวโฏ อโหสิ อุตฺตโร [Pg.283] นาม มาณโว, โส สกฺกจฺจํ ทานํ ทตฺวา สหตฺถา ทานํ ทตฺวา จิตฺตีกตํ ทานํ ทตฺวา อนปวิทฺธํ ทานํ ทตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปนฺโน เทวานํ ตาวตึสานํ สหพฺยต’’นฺติ. तेव्हा आयुष्यमान गवंपती मनुष्यलोकात आले आणि त्यांनी असे सांगितले – “आदरपूर्वक दान द्या, स्वतःच्या हाताने दान द्या, सन्मानपूर्वक दान द्या, फेकून दिल्यासारखे न करता दान द्या. पायासी राजन्याने अनादरपूर्वक दान दिले, स्वतःच्या हाताने दान दिले नाही, सन्मान न करता दान दिले, फेकून दिल्यासारखे दान दिले; त्यामुळे शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर तो चातुमहाराजिक देवांच्या सहवासात, निर्जन सेरीसक विमानामध्ये उत्पन्न झाला आहे. परंतु, त्याच्या दानाची व्यवस्था पाहणारा जो उत्तर नावाचा तरुण होता, त्याने आदरपूर्वक दान दिले, स्वतःच्या हाताने दान दिले, सन्मानपूर्वक दान दिले, फेकून दिल्यासारखे न करता दान दिले; त्यामुळे शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर तो सुगती अशा स्वर्गलोकात, तावतिंस देवांच्या सहवासात उत्पन्न झाला आहे.” ปายาสิสุตฺตํ นิฏฺฐิตํ ทสมํ. दहावे पायासि सुत्त समाप्त झाले. มหาวคฺโค นิฏฺฐิโต. महावग्ग समाप्त झाला. ตสฺสุทฺทานํ – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – มหาปทาน นิทานํ, นิพฺพานญฺจ สุทสฺสนํ; ชนวสภ โควินฺทํ, สมยํ สกฺกปญฺหกํ; มหาสติปฏฺฐานญฺจ, ปายาสิ ทสมํ ภเว. महापदान, निदान (महानिदान), निब्बान (महापरिनिब्बान), सुदस्सन (महासुदस्सन), जनवसभ, गोविंद (महागोविंद), समय (महासमय), सक्कपञ्हक (सक्कपञ्ह), महासतिपट्ठान आणि दहावे पायासि सुत्त आहे. มหาวคฺคปาฬิ นิฏฺฐิตา. महावग्गपाळि समाप्त झाली. | |||
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
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| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |