| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
1 නමො තස්ස භගවතො අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धाला माझा नमस्कार असो. විනයපිටකෙ विनयपिटकात පරිවාර-අට්ඨකථා परिवार-अट्ठकथा සොළසමහාවාරො सोळसमहावार පඤ්ඤත්තිවාරවණ්ණනා पण्णत्तिवारवण्णना විසුද්ධපරිවාරස්ස[Pg.137], පරිවාරොති සාසනෙ; ධම්මක්ඛන්ධසරීරස්ස, ඛන්ධකානං අනන්තරා. क्लेशांपासून अत्यंत शुद्ध अशा अर्हतांचा परिवार असलेल्या आणि धम्मस्कंधरूपी शरीर धारण करणाऱ्या भगवंतांच्या शासनात (धम्मामध्ये), खंधकांच्या (महावग्ग आणि चुल्लवग्ग यांच्या) लगेचच नंतर... සඞ්ගහං යො සමාරුළ්හො, තස්ස පුබ්බාගතං නයං; හිත්වා දානි කරිස්සාමි, අනුත්තානත්ථවණ්ණනං. जो 'परिवार' नावाचा विनय संगीतीमध्ये (धम्मसंगतीमध्ये) समाविष्ट केला गेला आहे, त्या विनयातील पूर्वी आलेल्या नियमांना सोडून, आता मी अस्पष्ट अर्थांचे स्पष्टीकरण (अट्ठकथा) करणार आहे. 1. තත්ථ යං තෙන භගවතා…පෙ… පඤ්ඤත්තන්ති ආදිනයප්පවත්තාය තාව පුච්ඡාය අයං සඞ්ඛෙපත්ථො – යො සො භගවා සාසනස්ස චිරට්ඨිතිකත්ථං ධම්මසෙනාපතිනා සද්ධම්මගාරවබහුමානවෙගසමුස්සිතං අඤ්ජලිං සිරස්මිං පතිට්ඨාපෙත්වා යාචිතො දස අත්ථවසෙ පටිච්ච විනයපඤ්ඤත්තිං පඤ්ඤපෙසි, තෙන භගවතා තස්ස තස්ස සික්ඛාපදස්ස පඤ්ඤත්තිකාලං ජානතා, තස්සා තස්සා සික්ඛාපදපඤ්ඤත්තියා දස අත්ථවසෙ පස්සතා; අපිච පුබ්බෙනිවාසාදීහි ජානතා, දිබ්බෙන චක්ඛුනා පස්සතා, තීහි විජ්ජාහි ඡහි වා පන අභිඤ්ඤාහි ජානතා, සබ්බත්ථ අප්පටිහතෙන සමන්තචක්ඛුනා පස්සතා, සබ්බධම්මජානනසමත්ථාය පඤ්ඤාය ජානතා, සබ්බසත්තානං චක්ඛුවිසයාතීතානි තිරොකුට්ටාදිගතානි චාපි රූපානි අතිවිසුද්ධෙන මංසචක්ඛුනා ච පස්සතා, අත්තහිතසාධිකාය සමාධිපදට්ඨානාය පටිවෙධපඤ්ඤාය ජානතා, පරහිතසාධිකාය කරුණාපදට්ඨානාය දෙසනාපඤ්ඤාය පස්සතා, අරහතා සම්මාසම්බුද්ධෙන ‘‘යං පඨමං පාරාජිකං පඤ්ඤත්තං, තං කත්ථ පඤ්ඤත්තං, කං ආරබ්භ පඤ්ඤත්තං, කිස්මිං වත්ථුස්මිං පඤ්ඤත්තං, අත්ථි තත්ථ පඤ්ඤත්ති…පෙ… කෙනාභත’’න්ති. १. त्या (परिवार पाठात) 'ज्या भगवंतांनी... प्रज्ञप्त केले' इत्यादी पद्धतीने विचारलेल्या प्रश्नाचा संक्षिप्त अर्थ असा आहे – ज्या भगवंतांनी शासनाच्या (धम्माच्या) दीर्घकालीन अस्तित्वासाठी, धम्मसेनापतींनी (सारिपुत्त यांनी) सद्धम्मावरील आदर आणि अत्यंत भक्तीने प्रेरित होऊन डोक्यावर अंजली जोडून (हात जोडून) प्रार्थना केली असता, दहा प्रयोजनांना (कारणांना) अनुसरून विनय प्रज्ञप्ती प्रज्ञप्त केली; त्या भगवंतांनी प्रत्येक शिक्षापदाच्या प्रज्ञप्तीचा काळ जाणत, त्या प्रत्येक शिक्षापदाच्या प्रज्ञप्तीची दहा प्रयोजने पाहत; तसेच पूर्वनिवास इत्यादी ज्ञानाने जाणत, दिव्य चक्षूने पाहत, तीन विद्यांनी किंवा सहा अभिज्ञांनी जाणत, सर्व विषयांमध्ये अडथळा नसलेल्या समंतचक्षूने (सर्वज्ञतेने) पाहत, सर्व धम्म जाणण्यास समर्थ असलेल्या प्रज्ञेने जाणत, सर्व प्राण्यांच्या चक्षूंच्या विषयापलीकडील व भिंतीच्या पलीकडील रूपांना देखील अत्यंत शुद्ध अशा मांसचक्षूने पाहत, स्वतःचे हित साधणाऱ्या आणि समाधी हे जवळचे कारण असलेल्या प्रतिवेध-प्रज्ञेने जाणत, परहित साधणाऱ्या आणि करुणेचे अधिष्ठान असलेल्या देशना-प्रज्ञेने पाहत; अशा अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवंतांनी 'जे पहिले पाराजिक प्रज्ञप्त केले, ते कोठे प्रज्ञप्त केले? कोणाला उद्देशून प्रज्ञप्त केले? कोणत्या विषयावर प्रज्ञप्त केले? तेथे मूळ प्रज्ञप्ती आहे काय? ... कोणी आणले?' असा हा प्रश्न विचारला आहे. 2. පුච්ඡාවිස්සජ්ජනෙ [Pg.138] පන ‘‘යං තෙන භගවතා ජානතා පස්සතා අරහතා සම්මාසම්බුද්ධෙන පඨමං පාරාජික’’න්ති ඉදං කෙවලං පුච්ඡාය ආගතස්ස ආදිපදස්ස පච්චුද්ධරණමත්තමෙව, ‘‘කත්ථ පඤ්ඤත්තන්ති වෙසාලියා පඤ්ඤත්තං; කං ආරබ්භාති සුදින්නං කලන්දපුත්තං ආරබ්භා’’ති එවමාදිනා පන නයෙන පුනපි එත්ථ එකෙකං පදං පුච්ඡිත්වාව විස්සජ්ජිතං. එකා පඤ්ඤත්තීති ‘‘යො පන භික්ඛු මෙථුනං ධම්මං පටිසෙවෙය්ය පාරාජිකො හොති අසංවාසො’’ති අයං එකා පඤ්ඤත්ති. ද්වෙ අනුපඤ්ඤත්තියොති ‘‘අන්තමසො තිරච්ඡානගතායපී’’ති ච, ‘‘සික්ඛං අපච්චක්ඛායා’’ති ච මක්කටිවජ්ජිපුත්තකවත්ථූනං වසෙන වුත්තා – ඉමා ද්වෙ අනුපඤ්ඤත්තියො. එත්තාවතා ‘‘අත්ථි තත්ථ පඤ්ඤත්ති අනුපඤ්ඤත්ති අනුප්පන්නපඤ්ඤත්තී’’ති ඉමිස්සා පුච්ඡාය ද්වෙ කොට්ඨාසා විස්සජ්ජිතා හොන්ති. තතියං විස්සජ්ජෙතුං පන ‘‘අනුප්පන්නපඤ්ඤත්ති තස්මිං නත්ථී’’ති වුත්තං. අයඤ්හි අනුප්පන්නපඤ්ඤත්ති නාම අනුප්පන්නෙ දොසෙ පඤ්ඤත්තා; සා අට්ඨගරුධම්මවසෙන භික්ඛුනීනංයෙව ආගතා, අඤ්ඤත්ර නත්ථි. තස්මා වුත්තං ‘‘අනුප්පන්නපඤ්ඤත්ති තස්මිං නත්ථී’’ති. සබ්බත්ථපඤ්ඤත්තීති මජ්ඣිමදෙසෙ චෙව පච්චන්තිමජනපදෙසු ච සබ්බත්ථපඤ්ඤත්ති. විනයධරපඤ්චමෙන ගණෙන ‘‘උපසම්පදා, ගුණඞ්ගුණූපාහනා, ධුවනහානං, චම්මත්ථරණ’’න්ති ඉමානි හි චත්තාරි සික්ඛාපදානි මජ්ඣිමදෙසෙයෙව පඤ්ඤත්ති. එත්ථෙව එතෙහි ආපත්ති හොති, න පච්චන්තිමජනපදෙසු. සෙසානි සබ්බානෙව සබ්බත්ථපඤ්ඤත්ති නාම. २. प्रश्नाच्या उत्तरात तर 'ज्या भगवंतांनी जाणत, पाहत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांनी पहिले पाराजिक...' हे वाक्य केवळ प्रश्नात आलेल्या पहिल्या पदाचा पुन्हा उल्लेख करण्यापुरतेच आहे. 'कोठे प्रज्ञप्त केले? वैशालीमध्ये प्रज्ञप्त केले. कोणाला उद्देशून? कलंदपुत्र सुदिन्नाला उद्देशून' इत्यादी पद्धतीने पुन्हा येथे प्रत्येक पदाचा प्रश्न विचारूनच उत्तर दिले गेले आहे. 'एक प्रज्ञप्ती' म्हणजे 'जो भिक्खू मैथुन धर्माचे सेवन करेल, तो पाराजिक होतो आणि असंवास (संघात राहण्यास अपात्र) होतो' ही एक मूळ प्रज्ञप्ती आहे. 'दोन अनुप्रज्ञप्ती' म्हणजे 'अगदी पशूशी देखील' आणि 'शिक्षेचा त्याग न करता' अशा माकडीण आणि वज्जीपुत्तक यांच्या प्रकरणांच्या आधारे सांगितलेल्या या दोन अनुप्रज्ञप्ती आहेत. एवढ्याने 'तेथे प्रज्ञप्ती, अनुप्रज्ञप्ती, अनुपन्नप्रज्ञप्ती आहे काय?' या प्रश्नाचे दोन भाग उत्तरित होतात. तिसऱ्या भागाचे उत्तर देण्यासाठी 'तेथे अनुपन्नप्रज्ञप्ती नाही' असे म्हटले आहे. कारण ही अनुपन्नप्रज्ञप्ती म्हणजे दोष उत्पन्न होण्यापूर्वीच प्रज्ञप्त केलेली असते. ती आठ गरूधम्मांच्या आधारे केवळ भिक्खुणींसाठीच आली आहे, इतर कोठेही नाही. म्हणूनच 'तेथे अनुपन्नप्रज्ञप्ती नाही' असे म्हटले आहे. 'सर्वत्रप्रज्ञप्ती' म्हणजे मध्यम देश आणि सीमावर्ती जनपदे या सर्व ठिकाणी लागू असणारी प्रज्ञप्ती. कारण विनयधरासह पाच जणांच्या गणाद्वारे 'उपसंपदा, अनेक थरांचे जोडे घालणे, नेहमी स्नान करणे, चामड्याचे आसन वापरणे' ही चार शिक्षापदे केवळ मध्यम देशामध्येच प्रज्ञप्त केली आहेत. येथेच (मध्यम देशातच) या नियमांच्या उल्लंघनाने आपत्ती होते, सीमावर्ती जनपदांमध्ये नाही. याशिवाय इतर सर्व शिक्षापदे 'सर्वत्रप्रज्ञप्ती' या नावाने ओळखली जातात. සාධාරණපඤ්ඤත්තීති භික්ඛූනඤ්චෙව භික්ඛුනීනඤ්ච සාධාරණපඤ්ඤත්ති; සුද්ධභික්ඛූනමෙව හි සුද්ධභික්ඛුනීනං වා පඤ්ඤත්තං සික්ඛාපදං අසාධාරණපඤ්ඤත්ති නාම හොති. ඉදං පන භික්ඛුං ආරබ්භ උප්පන්නෙ වත්ථුස්මිං ‘‘යා පන භික්ඛුනී ඡන්දසො මෙථුනං ධම්මං පටිසෙවෙය්ය, අන්තමසො තිරච්ඡානගතෙනපි පාරාජිකා හොති අසංවාසා’’ති භික්ඛුනීනම්පි පඤ්ඤත්තං, විනීතකථාමත්තමෙව හි තාසං නත්ථි, සික්ඛාපදං පන අත්ථි, තෙන වුත්තං ‘‘සාධාරණපඤ්ඤත්තී’’ති. උභතොපඤ්ඤත්තියම්පි එසෙව නයො. බ්යඤ්ජනමත්තමෙව හි එත්ථ නානං, භික්ඛූනං භික්ඛුනීනම්පි සාධාරණත්තා සාධාරණපඤ්ඤත්ති, උභින්නම්පි පඤ්ඤත්තත්තා උභතොපඤ්ඤත්තීති. අත්ථෙ පන භෙදො නත්ථි. ‘साधारणप्रज्ञप्ती’ म्हणजे भिक्खू आणि भिक्खुणी दोघांसाठी समान असणारी प्रज्ञप्ती. कारण केवळ भिक्खूंसाठीच किंवा केवळ भिक्खुणींसाठीच प्रज्ञप्त केलेले शिक्षापद ‘असाधारणप्रज्ञप्ती’ या नावाने ओळखले जाते. परंतु हे (पहिले पाराजिक) भिक्खूला उद्देशून विषय उत्पन्न झाला असता, ‘जी भिक्खुणी स्वेच्छेने मैथुन धर्माचे सेवन करेल, अगदी पशूशी देखील, ती पाराजिक होते आणि असंवास होते’ अशा प्रकारे भिक्खुणींसाठी देखील प्रज्ञप्त केले गेले आहे. कारण त्यांच्यासाठी केवळ विनीतवस्तूची कथा (निर्णय कथा) नाही, परंतु शिक्षापद तर आहेच. म्हणूनच ‘साधारणप्रज्ञप्ती’ असे म्हटले आहे. ‘उभतोप्रज्ञप्ती’ मध्ये देखील हाच नियम आहे. कारण येथे केवळ शब्दांचाच फरक आहे; भिक्खू आणि भिक्खुणी दोघांसाठी समान असल्यामुळे ती ‘साधारणप्रज्ञप्ती’ आहे, आणि दोघांसाठी प्रज्ञप्त केल्यामुळे ती ‘उभतोप्रज्ञप्ती’ आहे. परंतु अर्थामध्ये काहीही फरक नाही. නිදානොගධන්ති ‘‘යස්ස සියා ආපත්ති සො ආවිකරෙය්යා’’ති එත්ථ සබ්බාපත්තීනං අනුපවිට්ඨත්තා නිදානොගධං; නිදානෙ අනුපවිට්ඨන්ති අත්ථො. දුතියෙන උද්දෙසෙනාති නිදානොගධං නිදානපරියාපන්නම්පි සමානං ‘‘තත්රිමෙ චත්තාරො [Pg.139] පාරාජිකා ධම්මා’’තිආදිනා දුතියෙනෙව උද්දෙසෙන උද්දෙසං ආගච්ඡති. චතුන්නං විපත්තීනන්ති සීලවිපත්තිආදීනං. පඨමා හි ද්වෙ ආපත්තික්ඛන්ධා සීලවිපත්ති නාම, අවසෙසා පඤ්ච ආචාරවිපත්ති නාම. මිච්ඡාදිට්ඨි ච අන්තග්ගාහිකදිට්ඨි ච දිට්ඨිවිපත්ති නාම, ආජීවහෙතු පඤ්ඤත්තානි ඡ සික්ඛාපදානි ආජීවවිපත්ති නාම. ඉති ඉමාසං චතුන්නං විපත්තීනං ඉදං පාරාජිකං සීලවිපත්ති නාම හොති. ‘निदानोगाध’ म्हणजे ‘ज्याला आपत्ती झाली असेल, त्याने ती प्रकट करावी’ या पाठात सर्व आपत्तींचा समावेश होत असल्यामुळे ते ‘निदानोगाध’ आहे; निदानात (प्रातिमोक्षाच्या प्रस्तावनेत) समाविष्ट आहे, असा याचा अर्थ आहे. ‘दुसऱ्या उद्देशाने’ म्हणजे निदानात समाविष्ट असूनही, ‘येथे हे चार पाराजिक धर्म आहेत’ इत्यादी दुसऱ्याच उद्देशाद्वारे (वाचनाद्वारे) ते पठणात येते. ‘चार विपत्तींपैकी’ म्हणजे शीलविपत्ती इत्यादींपैकी. कारण पहिले दोन आपत्ती-स्कंध ‘शीलविपत्ती’ या नावाने ओळखले जातात, उरलेले पाच आपत्ती-स्कंध ‘आचारविपत्ती’ या नावाने ओळखले जातात. मिथ्यादृष्टी आणि अंतग्राहिकदृष्टी ‘दृष्टिविपत्ती’ या नावाने ओळखली जाते, आणि उपजीविकेच्या कारणास्तव प्रज्ञप्त केलेली सहा शिक्षापदे ‘आजीवविपत्ती’ या नावाने ओळखली जातात. अशा प्रकारे या चार विपत्तींपैकी हे पहिले पाराजिक ‘शीलविपत्ती’ आहे. එකෙන සමුට්ඨානෙනාති ද්වඞ්ගිකෙන එකෙන සමුට්ඨානෙන. එත්ථ හි චිත්තං අඞ්ගං හොති, කායෙන පන ආපත්තිං ආපජ්ජති. තෙන වුත්තං ‘‘කායතො ච චිත්තතො ච සමුට්ඨාතී’’ති. ද්වීහි සමථෙහි සම්මතීති ‘‘ආපන්නොසී’’ති සම්මුඛා පුච්ඡියමානො ‘‘ආම ආපන්නොම්හී’’ති පටිජානාති, තාවදෙව භණ්ඩනකලහවිග්ගහා වූපසන්තා හොන්ති, සක්කා ච හොති තං පුග්ගලං අපනෙත්වා උපොසථො වා පවාරණා වා කාතුං. ඉති සම්මුඛාවිනයෙන ච පටිඤ්ඤාතකරණෙන චාති ද්වීහි සමථෙහි සම්මති, න ච තප්පච්චයා කොචි උපද්දවො හොති. යං පන උපරි පඤ්ඤත්තිවග්ගෙ ‘‘න කතමෙන සමථෙන සම්මතී’’ති වුත්තං, තං සමථං ඔතාරෙත්වා අනාපත්ති කාතුං න සක්කාති ඉමමත්ථං සන්ධාය වුත්තං. ‘एकाच समुत्थानाने’ म्हणजे दोन अंगे असलेल्या एकाच समुत्थानाने. कारण येथे मन हे अंग असते, परंतु शरीराने (कायेने) आपत्ती प्राप्त होते. म्हणूनच ‘कायेने आणि चित्ताने (मनाने) समुत्थान होते’ असे म्हटले आहे. ‘दोन समथांनी शांत होते’ म्हणजे ‘तुला आपत्ती झाली आहे काय?’ असे समोर विचारले असता, ‘होय, मला आपत्ती झाली आहे’ असे तो मान्य करतो, त्याच वेळी भांडण, कलह आणि वाद शांत होतात, आणि त्या व्यक्तीला बाजूला करून उपोसथ किंवा प्रवारणा करणे शक्य होते. अशा प्रकारे संमुखाविनय आणि प्रतिज्ञातकरण या दोन समथांनी ती आपत्ती शांत होते, आणि त्या कारणाने कोणताही उपद्रव होत नाही. परंतु पुढे प्रज्ञप्तिवर्गात ‘कोणत्याही समथाने शांत होत नाही’ असे जे म्हटले आहे, ते समथाचा उपयोग करून अनापत्ती (दोषमुक्त) करणे शक्य नाही, या अर्थाला उद्देशून म्हटले आहे. පඤ්ඤත්ති විනයොති ‘‘යො පන භික්ඛූ’’තිආදිනා නයෙන වුත්තමාතිකා පඤ්ඤත්ති විනයොති අත්ථො. විභත්තීති පදභාජනං වුච්චති; විභත්තීති හි විභඞ්ගස්සෙවෙතං නාමං. අසංවරොති වීතික්කමො. සංවරොති අවීතික්කමො. යෙසං වත්තතීති යෙසං විනයපිටකඤ්ච අට්ඨකථා ච සබ්බා පගුණාති අත්ථො. තෙ ධාරෙන්තීති තෙ එතං පඨමපාරාජිකං පාළිතො ච අත්ථතො ච ධාරෙන්ති; න හි සක්කා සබ්බං විනයපිටකං අජානන්තෙන එතස්ස අත්ථො ජානිතුන්ති. කෙනාභතන්ති ඉදං පඨමපාරාජිකං පාළිවසෙන ච අත්ථවසෙන ච යාව අජ්ජතනකාලං කෙන ආනීතන්ති. පරම්පරාභතන්ති පරම්පරාය ආනීතං. पज्ञत्तिविनयो (प्रज्ञप्ति विनय) या पदाचा अर्थ असा आहे की, 'यो पन भिक्खू' (जो कोणी भिक्खू...) इत्यादी पद्धतीने सांगितलेली जी मातिका (नियम) आहे, ती 'पज्ञत्ति' म्हणजेच 'विनय' होय. 'विभत्ती' (विभक्ती) म्हणजे 'पदभाजन' (पदांचे विश्लेषण) म्हटले जाते; कारण 'विभत्ती' हे विभंगाचेच नाव आहे. 'असंवर' म्हणजे उल्लंघन (नियमभंग) करणे. 'संवर' म्हणजे उल्लंघन न करणे (संयम). 'येसं वत्तती' याचा अर्थ असा की, ज्यांना संपूर्ण विनयपिटक आणि अट्ठकथा पूर्णपणे अवगत (तोंडपाठ) आहेत. 'ते धारेन्ति' म्हणजे ते या पहिल्या पाराजिकाला पाळि (मूळ पाठ) आणि अर्थ या दोन्ही रूपांत धारण करतात; कारण संपूर्ण विनयपिटक जाणल्याशिवाय याचा अर्थ समजणे शक्य नाही. 'केनाभतं' म्हणजे हे पहिले पाराजिक पाळिच्या आणि अर्थाच्या रूपाने आजच्या काळापर्यंत कोणी आणले? 'परम्पराभतं' म्हणजे परंपरेने (शिष्यपरंपरेने) आणले गेले आहे. 3. ඉදානි යාය පරම්පරාය ආනීතං, තං දස්සෙතුං ‘‘උපාලි දාසකො චෙවා’’තිආදිනා නයෙන පොරාණකෙහි මහාථෙරෙහි ගාථායො ඨපිතා[Pg.140]. තත්ථ යං වත්තබ්බං, තං නිදානවණ්ණනායමෙව වුත්තං. ඉමිනා නයෙන දුතියපාරාජිකාදිපුච්ඡාවිස්සජ්ජනෙසුපි විනිච්ඡයො වෙදිතබ්බොති. ३. आता, ज्या परंपरेने हे आणले गेले आहे, ती परंपरा दर्शवण्यासाठी 'उपालि दासको चेव' इत्यादी पद्धतीने प्राचीन महाथेरांनी गाथा रचल्या आहेत. त्या गाथांमध्ये जे काही सांगण्यासारखे आहे, ते निदानवण्णनामध्येच (प्रस्तावनेच्या स्पष्टीकरणात) माझ्याद्वारे सांगितले गेले आहे. याच पद्धतीने दुसऱ्या पाराजिकादींच्या प्रश्नोत्तरांमध्येही निर्णय समजून घ्यावा. මහාවිභඞ්ගෙ පඤ්ඤත්තිවාරවණ්ණනා නිට්ඨිතා. महाविभंगातील पज्ञत्तिवारवण्णना (प्रज्ञप्तिवार स्पष्टीकरण) समाप्त झाली. කතාපත්තිවාරාදිවණ්ණනා कतापत्तिवारादींचे स्पष्टीकरण (कतापत्तिवारादिवण्णना) 157. ඉතො පරං ‘‘මෙථුනං ධම්මං පටිසෙවන්තො කති ආපත්තියො ආපජ්ජතී’’ති ආදිප්පභෙදො කතාපත්තිවාරො, ‘‘මෙථුනං ධම්මං පටිසෙවන්තස්ස ආපත්තියො චතුන්නං විපත්තීනං කති විපත්තියො භජන්තී’’ති ආදිප්පභෙදො විපත්තිවාරො, ‘‘මෙථුනං ධම්මං පටිසෙවන්තස්ස ආපත්තියො සත්තන්නං ආපත්තික්ඛන්ධානං කතිහි ආපත්තික්ඛන්ධෙහි සඞ්ගහිතා’’ති ආදිප්පභෙදො සඞ්ගහවාරො, ‘‘මෙථුනං ධම්මං පටිසෙවන්තස්ස ආපත්තියො ඡන්නං ආපත්තිසමුට්ඨානානං කතිහි සමුට්ඨානෙහි සමුට්ඨහන්තී’’ති ආදිප්පභෙදො සමුට්ඨානවාරො, ‘‘මෙථුනං ධම්මං පටිසෙවන්තස්ස ආපත්තියො චතුන්නං අධිකරණානං කතමං අධිකරණ’’න්ති ආදිප්පභෙදො අධිකරණවාරො, ‘‘මෙථුනං ධම්මං පටිසෙවන්තස්ස ආපත්තියො සත්තන්නං සමථානං කතිහි සමථෙහි සම්මන්තී’’ති ආදිප්පභෙදො සමථවාරො, තදනන්තරො සමුච්චයවාරො චාති ඉමෙ සත්ත වාරා උත්තානත්ථා එව. १५७. यानंतर, 'मैथुन धर्माचे सेवन करताना किती आपत्ती ओढवून घेतात?' इत्यादी प्रकारचा 'कतापत्तिवार'; 'मैथुन धर्माचे सेवन करणाऱ्याच्या आपत्ती चार विपत्तींपैकी किती विपत्तींमध्ये विभागल्या जातात?' इत्यादी प्रकारचा 'विपत्तिवार'; 'मैथुन धर्माचे सेवन करणाऱ्याच्या आपत्ती सात आपत्तीस्कंधांपैकी किती आपत्तीस्कंधांमध्ये समाविष्ट होतात?' इत्यादी प्रकारचा 'संगहवार'; 'मैथुन धर्माचे सेवन करणाऱ्याच्या आपत्ती सहा आपत्ती-समुत्थानांपैकी किती समुत्थानांनी उद्भवतात?' इत्यादी प्रकारचा 'समुत्थानवार'; 'मैथुन धर्माचे सेवन करणाऱ्याच्या आपत्ती चार अधिकरणांपैकी कोणते अधिकरण आहेत?' इत्यादी प्रकारचा 'अधिकरणवार'; 'मैथुन धर्माचे सेवन करणाऱ्याच्या आपत्ती सात समथांपैकी किती समथांनी शांत होतात?' इत्यादी प्रकारचा 'समथवार'; आणि त्यानंतरचा 'समुच्चयवार' - हे सात वार स्पष्ट अर्थाचेच (सहज समजणारे) आहेत. 188. තතො පරං ‘‘මෙථුනං ධම්මං පටිසෙවනපච්චයා පාරාජිකං කත්ථ පඤ්ඤත්ත’’න්තිආදිනා නයෙන පුන පච්චයවසෙන එකො පඤ්ඤත්තිවාරො, තස්ස වසෙන පුරිමසදිසා එව කතාපත්තිවාරාදයො සත්ත වාරාති එවං අපරෙපි අට්ඨ වාරා වුත්තා, තෙපි උත්තානත්ථා එව. ඉති ඉමෙ අට්ඨ, පුරිමා අට්ඨාති මහාවිභඞ්ගෙ සොළස වාරා දස්සිතා. තතො පරං තෙනෙව නයෙන භික්ඛුනිවිභඞ්ගෙපි සොළස වාරා ආගතාති එවමිමෙ උභතොවිභඞ්ගෙ ද්වත්තිංස වාරා පාළිනයෙනෙව වෙදිතබ්බා. න හෙත්ථ කිඤ්චි පුබ්බෙ අවිනිච්ඡිතං නාම අත්ථි. १८८. त्यानंतर, 'मैथुन धर्माच्या सेवनाच्या प्रत्ययाने (कारणाने) पाराजिक कोठे प्रज्ञप्त केले गेले?' इत्यादी पद्धतीने पुन्हा प्रत्ययाच्या (कारणाच्या) आधारे एक 'पज्ञत्तिवार' होतो; आणि त्याच्या आधारे पूर्वीसारखेच 'कतापत्तिवार' इत्यादी सात वार होतात. अशा प्रकारे इतरही आठ वार सांगितले आहेत, ते देखील स्पष्ट अर्थाचेच आहेत. अशा प्रकारे हे आठ आणि पूर्वीचे आठ मिळून महाविभंगात सोळा वार दर्शवले आहेत. त्यानंतर, त्याच पद्धतीने भिक्खुनीविभंगातही सोळा वार आले आहेत. अशा प्रकारे या दोन्ही विभंगांतील (उभतोविभंगातील) बत्तीस वार पाळिच्या पद्धतीनेच समजून घ्यावेत. कारण येथे पूर्वी अनिर्णित राहिलेले असे काहीही नाही. මහාවිභඞ්ගෙ ච භික්ඛුනිවිභඞ්ගෙ ච महाविभंगात आणि भिक्खुनीविभंगात සොළසමහාවාරවණ්ණනා නිට්ඨිතා. सोळा महावारांचे स्पष्टीकरण (सोळसमहावारवण्णना) समाप्त झाली. සමුට්ඨානසීසවණ්ණනා समुत्थानसीस स्पष्टीकरण (समुट्ठानसीसवण्णना) 257. තදනන්තරාය [Pg.141] පන සමුට්ඨානකථාය අනත්තා ඉති නිච්ඡයාති අනත්තා ඉති නිච්ඡිතා. සභාගධම්මානන්ති අනිච්චාකාරාදීහි සභාගානං සඞ්ඛතධම්මානං. නාමමත්තං න නායතීති නාමමත්තම්පි න පඤ්ඤායති. දුක්ඛහානින්ති දුක්ඛඝාතනං. ඛන්ධකා යා ච මාතිකාති ඛන්ධකා යා ච මාතිකාති අත්ථො. අයමෙව වා පාඨො. සමුට්ඨානං නියතො කතන්ති සමුට්ඨානං නියතොකතං නියතකතං; නියතසමුට්ඨානන්ති අත්ථො. එතෙන භූතාරොචනචොරිවුට්ඨාපනඅනනුඤ්ඤාතසික්ඛාපදත්තයස්ස සඞ්ගහො පච්චෙතබ්බො. එතානෙව හි තීණි සික්ඛාපදානි නියතසමුට්ඨානානි, අඤ්ඤෙහි සද්ධිං අසම්භින්නසමුට්ඨානානි. २५७. आता, त्यानंतरच्या समुत्थानकथेमध्ये, 'अनत्ता इति निच्छया' म्हणजे 'अनत्ता' (अनात्म) असा निश्चय केला आहे. 'सभागधम्मानं' म्हणजे अनित्यता इत्यादी लक्षणांनी समान असणाऱ्या संखत (संस्कृत) धर्मांचे. 'नाममत्तं न नायती' म्हणजे केवळ नाव देखील स्पष्ट दिसत नाही. 'दुक्खहानिं' म्हणजे दुःखाचा नाश करणे. 'खन्धका या च मातिका' याचा अर्थ खन्धक आणि जी मातिका आहे ती; हाच मूळ पाठ आहे. 'समुट्ठानं नियतो कतं' म्हणजे निश्चित केलेले समुत्थान (नियतसमुत्थान). याद्वारे भूतारोचन (खरे ज्ञान प्रकट करणे), चोरिवुठ्ठापन (चोर स्त्रीला प्रवज्जा देणे) आणि अननुज्ञात (परवानगी नसलेल्या स्त्रीला प्रवज्जा देणे) या तीन सिक्खापदांचा संग्रह समजून घ्यावा. कारण हीच तीन सिक्खापदे निश्चित समुत्थान असणारी आहेत आणि इतर सिक्खापदांच्या समुत्थानांशी न मिसळणारे (असंभिन्न) समुत्थान असणारी आहेत. සම්භෙදං නිදානඤ්චඤ්ඤන්ති අඤ්ඤම්පි සම්භෙදඤ්ච නිදානඤ්ච. තත්ථ සම්භෙදවචනෙන සමුට්ඨානසම්භෙදස්ස ගහණං පච්චෙතබ්බං, තානි හි තීණි සික්ඛාපදානි ඨපෙත්වා සෙසානි සම්භින්නසමුට්ඨානානි. නිදානවචනෙන සික්ඛාපදානං පඤ්ඤත්තිදෙසසඞ්ඛාතං නිදානං පච්චෙතබ්බං. සුත්තෙ දිස්සන්ති උපරීති සික්ඛාපදානං සමුට්ඨානනියමො සම්භෙදො නිදානන්ති ඉමානි තීණි සුත්තම්හි එව දිස්සන්ති; පඤ්ඤායන්තීති අත්ථො. තත්ථ ‘‘එකෙන සමුට්ඨානෙන සමුට්ඨාති, කායතො ච චිත්තතො චා’’තිආදිම්හි තාව පුරිමනයෙ සමුට්ඨානනියමො ච සම්භෙදො ච දිස්සන්ති. ඉතරං පන නිදානං නාම – 'सम्भेदं निदानञ्चञ्ञं' म्हणजे इतरही संभेद (मिश्रण) आणि निदान (स्थान). त्यापैकी 'संभेद' या शब्दाने समुत्थानांच्या मिश्रणाचे ग्रहण करावे; कारण ती तीन सिक्खापदे वगळून उर्वरित सर्व सिक्खापदे मिश्र समुत्थान असणारी आहेत. 'निदान' या शब्दाने सिक्खापदांच्या प्रज्ञप्तीचे स्थान (देश) म्हणून ओळखले जाणारे निदान समजून घ्यावे. 'सुत्ते दिस्सन्ति उपरी' म्हणजे सिक्खापदांचा समुत्थाननियम, संभेद आणि निदान हे तिन्ही सुत्तातच (परिवारातच) दिसतात; म्हणजेच स्पष्ट होतात. त्यापैकी 'एका समुत्थानाने उद्भवते, काया आणि चित्ताने...' इत्यादी पूर्वपद्धतीमध्ये आधी समुत्थाननियम आणि संभेद दिसतात. परंतु दुसरे जे 'निदान' आहे ते म्हणजे - ‘‘වෙසාලියා රාජගහෙ, සාවත්ථියා ච ආළවී; කොසම්බියා ච සක්කෙසු, භග්ගෙසු චෙව පඤ්ඤත්තා’’ති. 'वैशालीत, राजगृहात, श्रावस्तीत आणि आळवीत; कौशाम्बीत, शाक्यांमध्ये आणि भग्गांमध्ये प्रज्ञप्त केले गेले.' එවං උපරි දිස්සති, පරතො ආගතෙ සුත්තෙ දිස්සතීති වෙදිතබ්බං. अशा प्रकारे पुढे दिसते, नंतर येणाऱ्या सुत्तात दिसते, असे समजून घ्यावे. ‘‘විභඞ්ගෙ ද්වීසූ’’ති ගාථාය අයමත්ථො – යං සික්ඛාපදං ද්වීසු විභඞ්ගෙසු පඤ්ඤත්තං උපොසථදිවසෙ භික්ඛූ ච භික්ඛුනියො ච උද්දිසන්ති, තස්ස යථාඤායං සමුට්ඨානං පවක්ඛාමි, තං මෙ සුණාථාති. 'विभंगे द्वीसू' या गाथेचा अर्थ असा आहे - जे सिक्खापद दोन्ही विभंगांमध्ये प्रज्ञप्त केले गेले आहे आणि उपोसथाच्या दिवशी भिक्खू व भिक्खुनी ज्याचे पठण करतात, त्याचे समुत्थान मी योग्य रीतीने सांगेन, ते तुम्ही माझ्याकडून ऐका. සඤ්චරිත්තානුභාසනඤ්චාති සඤ්චරිත්තඤ්ච සමනුභාසනඤ්ච. අතිරෙකඤ්ච චීවරන්ති අතිරෙකචීවරං; කථිනන්ති අත්ථො. ලොමානි පදසොධම්මොති එළකලොමානි [Pg.142] ච පදසොධම්මො ච. භූතං සංවිධානෙන චාති භූතාරොචනඤ්ච සංවිදහිත්වා අද්ධානප්පටිපජ්ජනඤ්ච. ථෙය්යදෙසනා චොරිං චාති ථෙය්යසත්ථො ච ඡත්තපාණිස්ස අගිලානස්ස ධම්මදෙසනා ච චොරිවුට්ඨාපනඤ්ච. අනනුඤ්ඤාතාය තෙරසාති මාතාපිතුසාමිකෙහි අනනුඤ්ඤාතාය සද්ධිං ඉමානි තෙරස සමුට්ඨානානි හොන්ති. සදිසා ඉධ දිස්සරෙති ඉධ උභතොවිභඞ්ගෙ එතෙසු තෙරසසු සමුට්ඨානසීසෙසු එකෙකස්මිං අඤ්ඤානිපි සදිසානි සමුට්ඨානානි දිස්සන්ති. 'सञ्चरित्तानुभासनञ्च' म्हणजे संचरित्त (मध्यस्थी करणे) आणि समनुभासन (अनुभासन). 'अतिरेकञ्च चीवरं' म्हणजे अतिरेकचीवर; याचा अर्थ 'कठिन' (कठिन आस्तरण). 'लोमानि पदसोधम्मो' म्हणजे एळकलोम (मेंढीचे केस) आणि पदसोधम्म (पदाने धम्म शिकवणे). 'भूतं संविधानेन च' म्हणजे भूतारोचन (खरे ज्ञान सांगणे) आणि नियोजन करून प्रवासाला निघणे (अद्धानप्पटिपज्जन). 'थेय्यदेसना चोरिं च' म्हणजे थेय्यसत्थ (चोरांच्या तांड्यासोबत प्रवास करणे), छत्री घेतलेल्या निरोगी व्यक्तीला धम्मदेशना करणे आणि चोर स्त्रीला प्रवज्जा देणे (चोरिवुठ्ठापन). 'अननुञ्ञाताय तेरस' म्हणजे आई-वडील किंवा पतीची परवानगी नसलेल्या स्त्रीसोबत; ही तेरा समुत्थाने आहेत. 'सदिसा इध दिस्सरे' म्हणजे येथे दोन्ही विभंगांमध्ये (उभतोविभंगात) या तेरा समुत्थानशीर्षांपैकी प्रत्येकामध्ये इतरही समान समुत्थाने दिसतात. පඨමපාරාජිකසමුට්ඨානවණ්ණනා पहिल्या पाराजिकाच्या समुत्थानाचे स्पष्टीकरण (पठमपाराजिकसमुट्ठानवण्णना) 258. ඉදානි තානි දස්සෙතුං ‘‘මෙථුනං සුක්කසංසග්ගො’’තිආදි වුත්තං. තත්ථ මෙථුනන්ති ඉදං තාව පඨමපාරාජිකං නාම එකං සමුට්ඨානසීසං, සෙසානි තෙන සදිසානි. තත්ථ සුක්කසංසග්ගොති සුක්කවිස්සට්ඨි චෙව කායසංසග්ගො ච. අනියතා පඨමිකාති පඨමං අනියතසික්ඛාපදං. පුබ්බූපපරිපාචිතාති ‘‘ජානං පුබ්බූපගතං භික්ඛු’’න්ති සික්ඛාපදඤ්ච භික්ඛුනිපරිපාචිතපිණ්ඩපාතසික්ඛාපදඤ්ච. රහො භික්ඛුනියා සහාති භික්ඛුනියා සද්ධිං රහො නිසජ්ජසික්ඛාපදඤ්ච. २५८. आता ती (समान समुत्थाने) दाखवण्यासाठी "मेथुनं सुक्कसंसग्गो" इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये 'मेथुनं' हा शब्द आधी पहिले पाराजिक नावाचे एक मुख्य समुत्थान (उत्पत्तीचे कारण) आहे, उर्वरित सिक्खापदे त्याच्याशी समान आहेत. त्यामध्ये 'सुक्कसंसग्गो' म्हणजे सुक्कविस्सिट्ठि (शुक्रविसर्ग) आणि कायसंसर्ग (शारीरिक संपर्क) हे दोन्ही होय. 'अनियता पठमिका' म्हणजे पहिले अनियत सिक्खापद होय. 'पुब्बूपपरिपाचिता' म्हणजे "जाणूनबुजून आधीच गेलेल्या भिक्खू..." हे सिक्खापद आणि भिक्खुणीने परिपाचित केलेल्या (तयार करवून घेतलेल्या) पिंडपात सिक्खापद होय. 'रहो भिक्खुनिया सहा' म्हणजे भिक्खुणीसोबत एकांतात बसण्याचे सिक्खापद होय. සභොජනෙ රහො ද්වෙ චාති සභොජනෙ කුලෙ අනුපඛජ්ජනිසජ්ජසික්ඛාපදඤ්ච ද්වෙ රහොනිසජ්ජසික්ඛාපදානි ච. අඞ්ගුලි උදකෙ හසන්ති අඞ්ගුලිපතොදකඤ්ච උදකෙ හසධම්මසික්ඛාපදඤ්ච. පහාරෙ උග්ගිරෙ චෙවාති පහාරදානසික්ඛාපදඤ්ච තලසත්තිකඋග්ගිරණසික්ඛාපදඤ්ච. තෙපඤ්ඤාසා ච සෙඛියාති පරිමණ්ඩලනිවාසනාදීනි ඛුද්දකවණ්ණනාවසානෙ වුත්තානි තෙපඤ්ඤාස සෙඛියසික්ඛාපදානි ච. 'सभोजने रहो द्वे च' म्हणजे भोजन चालू असलेल्या कुळामध्ये बळजबरीने घुसून बसण्याचे सिक्खापद आणि दोन एकांतात बसण्याची सिक्खापदे होय. 'अङ्गुलि उदके हसन्ति' म्हणजे अंगुलीप्रतोदक (बोटाने गुदगुल्या करणे) सिक्खापद आणि पाण्यात खेळण्याचे/हसण्याचे (उदके हासधम्म) सिक्खापद होय. 'पहारे उग्गिरे चेवा' म्हणजे प्रहार देण्याचे (मारण्याचे) सिक्खापद आणि तळहात किंवा शस्त्र उगारण्याचे सिक्खापद होय. 'तेपञ्ञासा च सेखिया' म्हणजे परिमंडल (नीट नेसणे) इत्यादी क्षुद्रक वर्णनाच्या शेवटी सांगितलेली त्रेपन्न (५३) सेखिय सिक्खापदे होय. අධක්ඛගාමාවස්සුතාති භික්ඛුනීනං අධක්ඛකසික්ඛාපදඤ්ච ගාමන්තරගමනං අවස්සුතා අවස්සුතස්ස හත්ථතො ඛාදනීයභොජනීයග්ගහණසික්ඛාපදඤ්ච. තලමට්ඨඤ්ච සුද්ධිකාති තලඝාතකං ජතුමට්ඨං උදකසුද්ධිකාදියනඤ්ච. වස්සංවුට්ඨා ච ඔවාදන්ති වස්සංවුට්ඨා ඡප්පඤ්චයොජනානි සික්ඛාපදඤ්ච ඔවාදාය අගමනසික්ඛාපදඤ්ච. නානුබන්ධෙ පවත්තිනින්ති යා පන භික්ඛුනී වුට්ඨාපිතං පවත්තිනිං ද්වෙ වස්සානි නානුබන්ධෙය්යාති වුත්තසික්ඛාපදං. 'अधक्खगामावस्सुता' म्हणजे भिक्खुणींचे अधक्खक (काखेखालील भाग धुणे) सिक्खापद, दुसऱ्या गावात जाण्याचे (गामन्तरगमन) सिक्खापद आणि कामवासनायुक्त (अवस्सुता) भिक्खुणीने कामवासनायुक्त पुरुषाच्या हातातून खाद्यान्न किंवा भोज्यान्न ग्रहण करण्याचे सिक्खापद होय. 'तलमट्ठञ्च सुद्धिका' म्हणजे तलघातक (तळहाताने योनीवर मारणे) सिक्खापद, जतुमट्ठक (कृत्रिम लिंग वापरणे) सिक्खापद आणि उदकशुद्धिका (पाण्याने धुताना अतिप्रमाणात धुणे) सिक्खापद होय. 'वस्संवुट्ठा च ओवादं' म्हणजे वर्षावास पूर्ण झाल्यावर पाच-सहा योजने प्रवास करण्याचे सिक्खापद आणि ओवादासाठी (उपदेशासाठी) न जाण्याचे सिक्खापद होय. 'नानुबन्धे पवत्तिनिं' म्हणजे "जी भिक्खुणी उपसम्पदा देणाऱ्या आपल्या पवत्तिनी (उपाध्याया) भिक्खुणीचे दोन वर्षे अनुगमन (सेवा) करत नाही" असे सांगितलेले सिक्खापद होय. ඉමෙ [Pg.143] සික්ඛාති ඉමා සික්ඛායො; ලිඞ්ගවිපරියායො කතො. කායමානසිකා කතාති කායචිත්තසමුට්ඨානා කතා. 'इमे सिक्खा' म्हणजे 'इमा सिक्खायो' (ही सिक्खापदे); येथे लिंगविपर्यास (व्याकरणिक लिंग बदल) केला आहे. 'कायमानसिक कता' म्हणजे काय (शरीर) आणि चित्त (मन) या दोन्हीपासून उत्पन्न होणारी (कायचित्तसमुत्थान) केली आहेत. දුතියපාරාජිකසමුට්ඨානවණ්ණනා द्वितीय पाराजिक समुत्थान वर्णन 259. අදින්නන්ති ඉදං තාව අදින්නාදානන්ති වා දුතියපාරාජිකන්ති වා එකං සමුට්ඨානසීසං, සෙසානි තෙන සදිසානි. තත්ථ විග්ගහුත්තරීති මනුස්සවිග්ගහඋත්තරිමනුස්සධම්මසික්ඛාපදානි. දුට්ඨුල්ලා අත්තකාමිනන්ති දුට්ඨුල්ලවාචාඅත්තකාමපාරිචරියසික්ඛාපදානි. අමූලා අඤ්ඤභාගියාති ද්වෙ දුට්ඨදොසසික්ඛාපදානි. අනියතා දුතියිකාති දුතියං අනියතසික්ඛාපදං. २५९. 'अदिन्नं' हा शब्द आधी 'अदिन्नादान' (चोरी) किंवा 'द्वितीय पाराजिक' नावाचे एक मुख्य समुत्थान (उत्पत्तीचे कारण) आहे, उर्वरित सिक्खापदे त्याच्याशी समान आहेत. त्यामध्ये 'विग्गहुत्तरी' म्हणजे मनुस्सविग्गह (मनुष्यवध) आणि उत्तरिमनुस्सधम्म (अलौकिक शक्तींचा खोटा दावा) ही सिक्खापदे होय. 'दुट्ठुल्ला अत्तकामिनं' म्हणजे दुट्ठुल्लवाचा (अश्लील भाषण) आणि अत्तकामपारिचरिय (स्वतःच्या कामवासनेची सेवा करवून घेणे) ही सिक्खापदे होय. 'अमूला अञ्ञभागिया' म्हणजे दोन दुट्ठदोस (खोटा आरोप करणे) सिक्खापदे होय. 'अनियता दुतियिका' म्हणजे दुसरे अनियत सिक्खापद होय. අච්ඡින්දෙ පරිණාමනෙති සාමං චීවරං දත්වා අච්ඡින්දනඤ්ච සඞ්ඝිකලාභස්ස අත්තනො පරිණාමනඤ්ච. මුසා ඔමසපෙසුණාති මුසාවාදො ච ඔමසවාදො ච භික්ඛුපෙසුඤ්ඤඤ්ච. දුට්ඨුල්ලා පථවීඛණෙති දුට්ඨුල්ලාපත්තිආරොචනඤ්ච පථවීඛණඤ්ච. භූතං අඤ්ඤාය උජ්ඣාපෙති භූතගාමඅඤ්ඤවාදකඋජ්ඣාපනකසික්ඛාපදානි. 'अच्छिन्दे परिणामने' म्हणजे स्वतः चीवर देऊन ते परत हिरावून घेणे (अच्छिंदन) आणि संघाच्या लाभाला स्वतःकडे वळवणे (परिणामन) होय. 'मुसा ओमसपेसुणा' म्हणजे मुसावाद (असत्य भाषण) सिक्खापद, ओमसवाद (अपमानकारक बोलणे) सिक्खापद आणि भिक्खूंचे पेसुञ्ञ (चहाडी करणे) सिक्खापद होय. 'दुट्ठुल्ला पठवीखणे' म्हणजे duट्ठुल्लापत्तीचे आरोचन (गंभीर आपत्ती दुसऱ्याला सांगणे) सिक्खापद आणि पठवीखणन (जमीन खणणे) सिक्खापद होय. 'भूतं अञ्ञाय उज्झापेति' म्हणजे भूतगाम (वनस्पती नष्ट करणे), अञ्ञवादक (दुसरेच बोलून टाळाटाळ करणे) आणि उज्झापनक (दुसऱ्याची निंदा/तक्रार करणे) ही सिक्खापदे होय. නික්කඩ්ඪනං සිඤ්චනඤ්චාති විහාරතො නික්කඩ්ඪනඤ්ච උදකෙන තිණාදිසිඤ්චනඤ්ච. ආමිසහෙතු භුත්තාවීති ‘‘ආමිසහෙතු භික්ඛුනියො ඔවදන්තී’’ති සික්ඛාපදඤ්ච, භුත්තාවිං අනතිරිත්තෙන ඛාදනීයාදිනා පවාරණාසික්ඛාපදඤ්ච. එහි අනාදරි භිංසාති ‘‘එහාවුසො ගාමං වා’’ති සික්ඛාපදඤ්ච, අනාදරියඤ්ච භික්ඛුභිංසාපනකඤ්ච. අපනිධෙ ච ජීවිතන්ති පත්තාදීනං අපනිධානසික්ඛාපදඤ්ච, සඤ්චිච්ච පාණං ජීවිතාවොරොපනඤ්ච. 'निक्कड्ढनं सिञ्चनञ्च' म्हणजे विहारातून बाहेर हाकलून देणे (निक्कड्ढन) आणि पाण्याने गवत इत्यादी भिजवणे/सिंचन करणे (सिञ्चन) होय. 'आमिसहेतु भुत्तावी' म्हणजे "आमिषाच्या हेतूने भिक्खुणींना उपदेश करतात" हे सिक्खापद, आणि जेवण झालेल्या (भुत्तावी) भिक्खूला शिल्लक न राहिलेल्या (अनतिरिक्त) खाद्यान्नाने किंवा भोज्यान्नाने पुन्हा निमंत्रित करण्याचे (पवारणा) सिक्खापद होय. 'एहि अनादरि भिंसा' म्हणजे "ये मित्रा, गावात जाऊ या" हे सिक्खापद, अनादर (अनादरिय) सिक्खापद आणि भिक्खूला घाबरवणे (भिक्खुभिंसापनक) सिक्खापद होय. 'अपनिधे च जीवितं' म्हणजे पात्र इत्यादी वस्तू लपवून ठेवणे (अपनिधान) सिक्खापद आणि जाणूनबुजून प्राण्याचा जीव घेणे (जीवितवोरोपन) सिक्खापद होय. ජානං සප්පාණකං කම්මන්ති ජානං සප්පාණකඋදකසික්ඛාපදඤ්ච පුනකම්මාය උක්කොටනඤ්ච. ඌනසංවාසනාසනාති ඌනවීසතිවස්සසික්ඛාපදඤ්ච උක්ඛිත්තකෙන සද්ධිං සංවාසසික්ඛාපදඤ්ච නාසිතකසාමණෙරසම්භොගසික්ඛාපදඤ්ච. සහධම්මිකං විලෙඛාති සහධම්මිකං වුච්චමානසික්ඛාපදඤ්ච, විලෙඛාය සංවත්තන්තීති ආගතසික්ඛාපදඤ්ච. මොහො අමූලකෙන චාති මොහනකෙ පාචිත්තියසික්ඛාපදඤ්ච, අමූලකෙන සඞ්ඝාදිසෙසෙන අනුද්ධංසනසික්ඛාපදඤ්ච. 'जाणं सप्पाणकं कम्मं' म्हणजे जाणूनबुजून सजीव (सप्राणक) पाण्याचा वापर करण्याचे सिक्खापद आणि (निर्णय झालेल्या वादाला) पुन्हा कामासाठी उकरून काढणे (उक्कोटन) सिक्खापद होय. 'ऊनसंवासनासना' म्हणजे वीस वर्षांपेक्षा कमी वयाच्या व्यक्तीला उपसंपदा देण्याचे (ऊनवीसतिवस्स) सिक्खापद, संघातून बहिष्कृत केलेल्या (उक्खित्तक) भिक्खूसोबत राहण्याचे (संवास) सिक्खापद आणि हाकलून दिलेल्या (नासितक) सामणेरासोबत संभोग (सहवास) करण्याचे सिक्खापद होय. 'सहधम्मिकं विलेखा' म्हणजे सहधार्मिक नियमांनुसार सांगितले जात असताना उल्लंघन करण्याचे सिक्खापद आणि "विलेखा (संभ्रम) निर्माण करण्यासाठी प्रवृत्त होते" असे आलेले सिक्खापद होय. 'मोहो अमूलकेन च' म्हणजे मोहनक (भ्रमित करणे) पाचित्तिय सिक्खापद आणि अमूलक (निराधारी) संघातून बाद करण्याच्या (संघादिसेस) आरोपाने निंदा करण्याचे (अनुद्धंसन) सिक्खापद होय. කුක්කුච්චං ධම්මිකං චීවරං දත්වාති කුක්කුච්චඋපදහනඤ්ච, ධම්මිකානං කම්මානං ඡන්දං දත්වා ඛීයනඤ්ච, චීවරං දත්වා ඛීයනඤ්ච. පරිණාමෙය්ය පුග්ගලෙති සඞ්ඝිකං ලාභං [Pg.144] පුග්ගලස්ස පරිණාමනසික්ඛාපදං. කිං තෙ අකාලං අච්ඡින්දෙති ‘‘කිං තෙ අය්යෙ එසො පුරිසපුග්ගලො කරිස්සතී’’ති ආගතසික්ඛාපදඤ්ච, ‘‘අකාලචීවරං කාලචීවර’’න්ති අධිට්ඨහිත්වා භාජනසික්ඛාපදඤ්ච, භික්ඛුනියා සද්ධිං චීවරං පරිවත්තෙත්වා අච්ඡින්දනසික්ඛාපදඤ්ච. දුග්ගහී නිරයෙන චාති දුග්ගහිතෙන දුප්පධාරිතෙන පරං උජ්ඣාපනසික්ඛාපදඤ්ච, නිරයෙන වා බ්රහ්මචරියෙන වා අභිසපනසික්ඛාපදඤ්ච. 'कुक्कुच्चं धम्मिकं चीवरं दत्वा' म्हणजे कुक्कुच्च उपदहन (मनात संशय निर्माण करणे) सिक्खापद, धार्मिक कर्मांना संमती (छंद) देऊन नंतर निंदा करणे (खियन) सिक्खापद आणि चीवर देऊन नंतर निंदा करणे सिक्खापद होय. 'परिणामेय्य पुग्गले' म्हणजे संघाचा लाभ वैयक्तिक पुद्गलाकडे (व्यक्तीकडे) वळवण्याचे सिक्खापद होय. 'किं ते अकालं अच्छिन्दे' म्हणजे "हे आर्या, हा पुरुष तुझ्यासाठी काय करणार आहे?" असे आलेले सिक्खापद, "अकाल चीवर हे काल चीवर आहे" असे अधिष्ठान करून वाटणी करण्याचे (भाजन) सिक्खापद आणि भिक्खुणीसोबत चीवर बदलून नंतर ते हिरावून घेण्याचे (अच्छिंदन) सिक्खापद होय. 'दुग्गही निरयेन च' म्हणजे चुकीच्या पद्धतीने ग्रहण केलेल्या आणि चुकीच्या पद्धतीने समजलेल्या गोष्टीवरून दुसऱ्याची निंदा करण्याचे सिक्खापद आणि नरकाची किंवा ब्रह्मचर्य भ्रष्ट होण्याची शपथ घालण्याचे/शाप देण्याचे (अभिसपन) सिक्खापद होय. ගණං විභඞ්ග දුබ්බලන්ති ‘‘ගණස්ස චීවරලාභං අන්තරායං කරෙය්යා’’ති ච ‘‘ධම්මිකං චීවරවිභඞ්ගං පටිබාහෙය්යා’’ති ච ‘‘දුබ්බලචීවරපච්චාසාය චීවරකාලසමයං අතික්කාමෙය්යා’’ති ච වුත්තසික්ඛාපදානි. කථිනා ඵාසු පස්සයන්ති ‘‘ධම්මිකං කථිනුද්ධාරං පටිබාහෙය්ය, භික්ඛුනියා සඤ්චිච්ච අඵාසුං කරෙය්ය, භික්ඛුනියා උපස්සයං දත්වා කුපිතා අනත්තමනා නික්කඩ්ඪෙය්ය වා’’ති වුත්තසික්ඛාපදානි. අක්කොසචණ්ඩී මච්ඡරීති ‘‘භික්ඛුං අක්කොසෙය්ය වා පරිභාසෙය්ය වා, චණ්ඩිකතා ගණං පරිභාසෙය්ය, කුලෙ මච්ඡරිනී අස්සා’’ති වුත්තසික්ඛාපදානි. ගබ්භිනිඤ්ච පායන්තියාති ‘‘ගබ්භිනිං වුට්ඨාපෙය්ය, පායන්තිං වුට්ඨාපෙය්යා’’ති වුත්තසික්ඛාපදානි. 'गणं विभङ्ग दुब्बलं' म्हणजे "गणाच्या चीवरलाभात अडथळा निर्माण करावा" असे, "धार्मिक चीवर-वाटणीला विरोध करावा" असे, आणि "दुर्बल चीवराच्या आशेने चीवर बनवण्याची वेळ निघून जाऊ द्यावी" असे सांगितलेली सिक्खापदे होय. 'कठिना फासु पस्सयन्ति' म्हणजे "धार्मिक कठिन-उद्धाराला विरोध करावा, भिक्खुणीला जाणूनबुजून त्रास द्यावा, किंवा भिक्खुणीला निवासस्थान देऊन नंतर रागाने व असंतुष्ट होऊन बाहेर हाकलून द्यावे" अशी सांगितलेली सिक्खापदे होय. 'अक्कोसचण्डी मच्छरी' म्हणजे "भिक्खूला शिवीगाळ करावी किंवा त्याचा अपमान करावा, रागावलेल्या अवस्थेत गणाचा अपमान करावा, किंवा कुळामध्ये मत्सर बाळगावा" अशी सांगितलेली सिक्खापदे होय. 'गब्भिनिञ्च पायन्तिया' म्हणजे "गर्भवती स्त्रीला उपसंपदा द्यावी, किंवा स्तनपान देणाऱ्या स्त्रीला उपसंपदा द्यावी" अशी सांगितलेली सिक्खापदे होय. ද්වෙවස්සං සික්ඛා සඞ්ඝෙනාති ‘‘ද්වෙ වස්සානි ඡසු ධම්මෙසු අසික්ඛිතසික්ඛං සික්ඛමානං වුට්ඨාපෙය්ය, සික්ඛිතසික්ඛං සික්ඛමානං සඞ්ඝෙන අසම්මතං වුට්ඨාපෙය්යා’’ති වුත්තසික්ඛාපදානි. තයො චෙව ගිහීගතාති ඌනද්වාදසවස්සං ගිහිගතං, පරිපුණ්ණද්වාදසවස්සං ගිහිගතං ‘‘ද්වෙ වස්සානි ඡසු ධම්මෙසු අසික්ඛිතසික්ඛං ද්වෙ වස්සානි සික්ඛිතසික්ඛං සඞ්ඝෙන අසම්මත’’න්ති වුත්තසික්ඛාපදානි. කුමාරිභූතා තිස්සොති ‘‘ඌනවීසතිවස්සං කුමාරිභූත’’න්තිආදිනා නයෙන වුත්තා තිස්සො. ඌනද්වාදසසම්මතාති ‘‘ඌනද්වාදසවස්සා වුට්ඨාපෙය්ය, පරිපුණ්ණද්වාදසවස්සා සඞ්ඝෙන අසම්මතා වුට්ඨාපෙය්යා’’ති වුත්තසික්ඛාපදද්වයං. ‘द्वेवस्सं सिक्खा संघेना’ म्हणजे ‘दोन वर्षे सहा नियमांचे (धर्मांचे) पालन न केलेल्या शिक्षमाणेला उपसंपदा द्यावी’ आणि ‘शिक्षण पूर्ण केलेल्या परंतु संघाने संमती न दिलेल्या शिक्षमाणेला उपसंपदा द्यावी’ अशी सांगितलेली शिक्षापदे होत. ‘तयो चेव गिहीगता’ म्हणजे बारा वर्षांपेक्षा कमी वयाची विवाहित स्त्री (गृहगता), पूर्ण बारा वर्षे वयाची विवाहित स्त्री जिने ‘दोन वर्षे सहा नियमांचे पालन केलेले नाही’ आणि ‘दोन वर्षे शिक्षण पूर्ण केले आहे परंतु संघाने संमती दिलेली नाही’ अशी सांगितलेली शिक्षापदे होत. ‘कुमारीभूता तिस्सो’ म्हणजे ‘एकोणीस वर्षांपेक्षा कमी वयाची कुमारीभूत (अविवाहित मुलगी)’ इत्यादी पद्धतीने सांगितलेली तीन शिक्षापदे होत. ‘ऊनद्वादससम्मता’ म्हणजे ‘बारा वर्षांपेक्षा कमी वयाच्या स्त्रीला उपसंपदा द्यावी’ आणि ‘पूर्ण बारा वर्षे वयाच्या परंतु संघाने संमती न दिलेल्या स्त्रीला उपसंपदा द्यावी’ अशी सांगितलेली दोन शिक्षापदे होत. අලං තාව සොකාවාසන්ති ‘‘අලං තාව තෙ අය්යෙ වුට්ඨාපිතෙනා’’ති ච, ‘‘චණ්ඩිං සොකාවාසං සික්ඛමානං වුට්ඨාපෙය්යා’’ති ච වුත්තසික්ඛාපදද්වයං. ඡන්දා අනුවස්සා ච ද්වෙති ‘‘පාරිවාසිකඡන්දදානෙන සික්ඛමානං වුට්ඨාපෙය්ය, අනුවස්සං වුට්ඨාපෙය්ය, එකං වස්සං ද්වෙ වුට්ඨාපෙය්යා’’ති වුත්තසික්ඛාපදත්තයං. සමුට්ඨානා තිකා කතාති තිකසමුට්ඨානා කතා. ‘अलं ताव सोकावासं’ म्हणजे ‘हे आर्ये, तुला उपसंपदा देण्याची काही गरज नाही’ आणि ‘क्रोधी व शोकाकुल शिक्षमाणेला उपसंपदा द्यावी’ अशी सांगितलेली दोन शिक्षापदे होत. ‘छंदा अनुवस्सा च द्वे’ म्हणजे ‘पारिवासिक छंद देऊन शिक्षमाणेला उपसंपदा द्यावी’, ‘दरवर्षी उपसंपदा द्यावी’ आणि ‘एका वर्षात दोघांना उपसंपदा द्यावी’ अशी सांगितलेली तीन शिक्षापदे होत. ‘समुट्ठाना तिका कता’ म्हणजे ही शिक्षापदे त्रिक-समुत्थान (काय, वाचा आणि मन या तिन्हींपासून उत्पन्न होणारी) म्हणून निश्चित केली आहेत. සඤ්චරිත්තසමුට්ඨානවණ්ණනා सञ्चरित्त-समुत्थान वर्णन 260. සඤ්චරී [Pg.145] කුටි විහාරොති සඤ්චරිත්තං සඤ්ඤාචිකාය කුටිකරණං මහල්ලකවිහාරකරණඤ්ච. ධොවනඤ්ච පටිග්ගහොති අඤ්ඤාතිකාය භික්ඛුනියා පුරාණචීවරධොවාපනඤ්ච චීවරපටිග්ගහණඤ්ච. විඤ්ඤත්තුත්තරි අභිහට්ඨුන්ති අඤ්ඤාතකං ගහපතිං චීවරවිඤ්ඤාපනං තතුත්තරිසාදියනසික්ඛාපදඤ්ච. උභින්නං දූතකෙන චාති ‘‘චීවරචෙතාපන්නං උපක්ඛටං හොතී’’ති ආගතසික්ඛාපදද්වයඤ්ච දූතෙන චීවරචෙතාපන්නපහිතසික්ඛාපදඤ්ච. २६०. ‘सञ्चरी कुटि विहारो’ म्हणजे सञ्चरित्त (मध्यस्थी करणे), संयाचिका कुटीकरण (स्वतःसाठी कुटी बनवणे) आणि महाविहार बनवणे (महल्लकविहारकरण) हे होय. ‘धोवनञ्च पटिग्ग्रहो’ म्हणजे नातेवाईक नसलेल्या भिक्खुणीकडून जुने चीवर धुवून घेणे आणि चीवर स्वीकारणे हे होय. ‘विञ्ञत्तुत्तरि अभिहट्ठुं’ म्हणजे नातेवाईक नसलेल्या गृहपतीकडे चीवराची याचना करणे आणि त्याहून अधिक स्वीकारण्याचे शिक्षापद होय. ‘उभिन्नं दूतकेन च’ म्हणजे ‘दोघांसाठी चीवर निधी तयार ठेवला आहे’ असे आलेले दोन शिक्षापदे आणि दूताद्वारे पाठवलेला चीवर निधी स्वीकारण्याचे शिक्षापद होय. කොසියා සුද්ධද්වෙභාගා, ඡබ්බස්සානි නිසීදනන්ති ‘‘කොසියමිස්සකං සන්ථත’’න්තිආදීනි පඤ්ච සික්ඛාපදානි. රිඤ්චන්ති රූපිකා චෙවාති විභඞ්ගෙ ‘‘රිඤ්චන්ති උද්දෙස’’න්ති ආගතං එළකලොමධොවාපනං රූපියප්පටිග්ගහණසික්ඛාපදඤ්ච. උභො නානප්පකාරකාති රූපියසංවොහාරකයවික්කයසික්ඛාපදද්වයං. ‘कोसिया सुद्धद्वेभागा, छब्बस्सानि निसीदनं’ म्हणजे ‘रेशीम मिश्रित आसन’ इत्यादी पाच शिक्षापदे होत. ‘रिञ्चन्ति रूपिका चेव’ म्हणजे विभंगात ‘रिञ्चन्ति उद्देसं’ असे आलेले मेंढीचे लोकर धुण्याचे शिक्षापद आणि रूपिय (नाणी/पैसे) स्वीकारण्याचे शिक्षापद होय. ‘उभो नानप्पकारका’ म्हणजे रूपिय संव्यवहार (पैशांचे व्यवहार) आणि क्रय-विक्रय (खरेदी-विक्री) ही दोन शिक्षापदे होत. ඌනබන්ධනවස්සිකාති ඌනපඤ්චබන්ධනපත්තසික්ඛාපදඤ්ච වස්සිකසාටිකසික්ඛාපදඤ්ච. සුත්තං විකප්පනෙන චාති සුත්තං විඤ්ඤාපෙත්වා චීවරවායාපනඤ්ච තන්තවායෙ උපසඞ්කමිත්වා චීවරෙ විකප්පාපජ්ජනඤ්ච. ද්වාරදානසිබ්බානි චාති යාව ද්වාරකොසා අග්ගළට්ඨපනාය, ‘‘අඤ්ඤාතිකාය භික්ඛුනියා චීවරං දදෙය්ය, චීවරං සිබ්බෙය්යා’’ති වුත්තසික්ඛාපදත්තයං. පූවපච්චයජොති චාති පූවෙහි වා මන්ථෙහි වා අභිහට්ඨුං පවාරණාසික්ඛාපදං චාතුමාසපච්චයප්පවාරණාජොතිසමාදහනසික්ඛාපදානි ච. ‘ऊनबन्धनवस्सिका’ म्हणजे पाचपेक्षा कमी सांधे (बंधने) असलेल्या पात्राचे शिक्षापद आणि वर्षाशाटिका (पावसाळी वस्त्र) शिक्षापद होय. ‘सुत्तं विकप्पनेन च’ म्हणजे सूत मागून चीवर विणवून घेणे आणि विणकराकडे जाऊन चीवरामध्ये बदल घडवून आणणे हे होय. ‘द्वारदानसिब्बानि च’ म्हणजे दाराच्या चौकटीपर्यंत अडसर लावणे, ‘नातेवाईक नसलेल्या भिक्खुणीला चीवर देणे’ आणि ‘चीवर शिवणे’ अशी सांगितलेली तीन शिक्षापदे होत. ‘पूवपच्चयजोति च’ म्हणजे पिष्टान्न (पुवे) याचक किंवा सक्तू (मंथ) आणून देण्याबाबतचे प्रवारणा शिक्षापद, चार महिन्यांचे प्रत्यय-प्रवारणा शिक्षापद आणि अग्नी पेटवण्याचे (जोति-समादहन) शिक्षापद होय. රතනං සූචි මඤ්චො ච, තූලං නිසීදනකණ්ඩු ච, වස්සිකා ච සුගතෙනාති රතනසික්ඛාපදඤ්චෙව සූචිඝරසික්ඛාපදාදීනි ච සත්ත සික්ඛාපදානි. විඤ්ඤත්ති අඤ්ඤං චෙතාපනා, ද්වෙ සඞ්ඝිකා මහාජනිකා, ද්වෙ පුග්ගලලහුකා ගරූති ‘‘යා පන භික්ඛුනී අඤ්ඤං විඤ්ඤාපෙත්වා අඤ්ඤං විඤ්ඤාපෙය්යා’’තිආදීනි නව සික්ඛාපදානි. ද්වෙ විඝාසා සාටිකා චාති ‘‘උච්චාරං වා පස්සාවං වා සඞ්කාරං වා විඝාසං වා තිරොකුට්ටෙ වා තිරොපාකාරෙ වා ඡඩ්ඩෙය්ය වා ඡඩ්ඩාපෙය්ය වා, හරිතෙ ඡඩ්ඩෙය්ය වා ඡඩ්ඩාපෙය්ය වා’’ති එවං වුත්තානි ද්වෙ විඝාසසික්ඛාපදානි ච උදකසාටිකාසික්ඛාපදඤ්ච. සමණචීවරෙන චාති ‘‘සමණචීවරං දදෙය්යා’’ති ඉදමෙතං සන්ධාය වුත්තං. ‘रतनं सूचि मञ्चो च, तूलं निसीदनकण्डu च, वस्सिका च सुगतेन’ म्हणजे रत्न शिक्षापद आणि सूचिघर (सुईची डबी) शिक्षापदादी सात शिक्षापदे होत. ‘विञ्ञत्ति अञ्ञं चेतापणा, द्वे सङ्घिका महाजनिका, द्वे पुग्गललहुका गरू’ म्हणजे ‘जी भिक्खुणी एका गोष्टीची याचना करून दुसरीच गोष्ट मागते’ इत्यादी नऊ शिक्षापदे होत. ‘द्वे विघासा साटिका च’ म्हणजे ‘मलमूत्र, कचरा किंवा उष्टे अन्न भिंतीच्या पलीकडे किंवा कुंपणाच्या पलीकडे टाकावे किंवा टाकवावे, हिरवळीवर टाकावे किंवा टाकवावे’ अशी सांगितलेली दोन विघास (उष्टे अन्न/कचरा) शिक्षापदे आणि उदकशाटिका (स्नानवस्त्र) शिक्षापद होय. ‘समणचीवरेन च’ हे ‘श्रमण चीवर द्यावे’ या शिक्षापदाला उद्देशून म्हटले आहे. සමනුභාසනාසමුට්ඨානවණ්ණනා समनुभासन-समुत्थान वर्णन 261. භෙදානුවත්තදුබ්බචදූසදුට්ඨුල්ලදිට්ඨි [Pg.146] චාති සඞ්ඝභෙදානුවත්තකදුබ්බචකුලදූසකදුට්ඨුල්ලප්පටිච්ඡාදනදිට්ඨිඅප්පටිනිස්සජ්ජනසික්ඛාපදානි. ඡන්දං උජ්ජග්ඝිකා ද්වෙ චාති ඡන්දං අදත්වා ගමනසික්ඛාපදං උජ්ජග්ඝිකාය අන්තරඝරෙ ගමනනිසීදනසික්ඛාපදද්වයඤ්ච. ද්වෙ ච සද්දාති ‘‘අප්පසද්දො අන්තරඝරෙ ගමිස්සාමි, නිසීදිස්සාමී’’ති සික්ඛාපදද්වයඤ්ච. න බ්යාහරෙති ‘‘න සකබළෙන මුඛෙන බ්යාහරිස්සාමී’’ති සික්ඛාපදං. २६१. ‘भेदानुवत्तदुब्बचदूसदुट्ठुल्लदिट्ठि च’ म्हणजे संघभेद, भेदानुवर्तक (भेदाचे समर्थन करणारे), दुर्वच (ऐकून न घेणारे), कुलदूषक, गंभीर अपराध लपवणारे (दुठ्ठुल्ल-पटिच्छादन) आणि चुकीचे मत न सोडणारे (दिट्ठि-अप्पटिनिस्सज्जन) ही शिक्षापदे होत. ‘छन्दं उज्झग्घिका द्वे च’ म्हणजे छंद (संमती) न देता जाण्याचे शिक्षापद आणि अंतर्गृहात (घरांच्या मध्ये) मोठ्याने हसत जाणे व बसणे ही दोन शिक्षापदे होत. ‘द्वे च सद्दा’ म्हणजे ‘अंतर्गृहात शांतपणे जाईन आणि बसेन’ ही दोन शिक्षापदे होत. ‘न ब्याहरे’ म्हणजे ‘तोंडात घास असताना बोलणार नाही’ हे शिक्षापद होय. ඡමා නීචාසනෙ ඨානං, පච්ඡතො උප්පථෙන චාති ඡමායං නිසීදිත්වා, නීචෙ ආසනෙ නිසීදිත්වා; ඨිතෙන නිසින්නස්ස, පච්ඡතො ගච්ඡන්තෙන පුරතො ගච්ඡන්තස්ස, උප්පථෙන ගච්ඡන්තෙන පථෙන ගච්ඡන්තස්ස ධම්මදෙසනාසික්ඛාපදානි. වජ්ජානුවත්තිගහණාති වජ්ජප්පටිච්ඡාදන, උක්ඛිත්තානුවත්තක, හත්ථග්ගහණාදිසඞ්ඛාතානි තීණි පාරාජිකානි. ඔසාරෙ පච්චාචික්ඛනාති ‘‘අනපලොකෙත්වා කාරකසඞ්ඝං අනඤ්ඤාය ගණස්ස ඡන්දං ඔසාරෙය්යා’’ති ච ‘‘බුද්ධං පච්චක්ඛාමී’’ති ච වුත්තසික්ඛාපදද්වයං. ‘छमा नीचासने ठानं, पच्छतो उप्पथेन च’ म्हणजे जमिनीवर बसून, नीच (कमी उंचीच्या) आसनावर बसून; उभे राहून बसलेल्याला, मागे चालून पुढे चालणाऱ्याला, चुकीच्या मार्गाने चालून योग्य मार्गाने चालणाऱ्याला धम्मदेशना करण्यासंबंधीची शिक्षापदे होत. ‘वज्जानुवत्तिगहणा’ म्हणजे दोष लपवणे (वज्जपटिच्छादन), बहिष्कृत भिक्खूचे समर्थन करणे (उक्खित्तानुवर्तक) आणि हस्तग्रहण (हात पकडणे) इत्यादी म्हणून ओळखली जाणारी तीन पाराजिका शिक्षापदे होत. ‘ओसारे पच्चाचिक्खना’ म्हणजे ‘कारक संघाला न विचारता, इतर गणाची संमती न घेता पुनर्संचयित करणे’ आणि ‘मी बुद्धाचा त्याग करतो’ अशी सांगितलेली दोन शिक्षापदे होत. කිස්මිං සංසට්ඨා ද්වෙ වධීති ‘‘කිස්මිඤ්චිදෙව අධිකරණෙ පච්චාකතා’’ති ච ‘‘භික්ඛුනියො පනෙව සංසට්ඨා විහරන්තී’’ති ච ‘‘යා පන භික්ඛුනී එවං වදෙය්ය සංසට්ඨාව අය්යෙ තුම්හෙ විහරථා’’ති ච ‘‘අත්තානං වධිත්වා වධිත්වා රොදෙය්යා’’ති ච වුත්තසික්ඛාපදානි. විසිබ්බෙ දුක්ඛිතාය චාති ‘‘භික්ඛුනියා චීවරං විසිබ්බෙත්වා වා විසිබ්බාපෙත්වා වා’’ති ච ‘‘දුක්ඛිතං සහජීවිනි’’න්ති ච වුත්තසික්ඛාපදද්වයං. පුන සංසට්ඨා න වූපසමෙති ‘‘සංසට්ඨා විහරෙය්ය ගහපතිනා වා ගහපතිපුත්තෙන වා’’ති එවං පුන වුත්තසංසට්ඨසික්ඛාපදඤ්ච ‘‘එහය්යෙ, ඉමං අධිකරණං වූපසමෙහී’’ති වුච්චමානා, ‘‘සාධූ’’ති පටිස්සුණිත්වා ‘‘සා පච්ඡා අනන්තරායිකිනී නෙව වූපසම්මෙය්යා’’ති වුත්තසික්ඛාපදඤ්ච. ආරාමඤ්ච පවාරණාති ‘‘ජානං සභික්ඛුකං ආරාමං අනාපුච්ඡා පවිසෙය්යා’’ති ච ‘‘උභතොසඞ්ඝෙ තීහි ඨානෙහි න පවාරෙය්යා’’ති ච වුත්තසික්ඛාපදද්වයං. ‘किस्मिं संसट्ठा द्वे वधी’ म्हणजे ‘कोणत्यातरी अधिकरणात पराभूत झालेली’, ‘भिक्खुणी संसृष्ट (एकत्र) राहतात’, ‘जी भिक्खुणी असे म्हणेल की, हे आर्यांनो, तुम्ही संसृष्टच राहा’ आणि ‘स्वतःला मारून मारून रडणे’ अशी सांगितलेली शिक्षापदे होत. ‘विसिब्बे दुक्खिताय च’ म्हणजे ‘भिक्खुणीचे चीवर उसवणे किंवा उसवून घेणे’ आणि ‘आजारी सहचारिणी (सहजीवनी)’ अशी सांगितलेली दोन शिक्षापदे होत. ‘पुन संसट्ठा न वूपसमेति’ म्हणजे ‘गृहपती किंवा गृहपतीच्या पुत्रासोबत संसृष्ट राहावे’ असे पुन्हा सांगितलेले संसृष्ट शिक्षापद आणि ‘हे आर्ये, ye आणि हे अधिकरण शांत कर’ असे म्हटले असता ‘ठीक आहे’ म्हणून संमती देऊन, नंतर कोणतीही अडचण नसताना ते शांत न करणे हे शिक्षापद होय. ‘आरामञ्च पवारणा’ म्हणजे ‘भिक्खू असलेल्या आरामात न विचारता प्रवेश करणे’ आणि ‘उभयसंघात तीन स्थानांवर प्रवारणा न करणे’ अशी सांगितलेली दोन शिक्षापदे होत. අන්වද්ධං සහජීවිනිං ද්වෙති ‘‘අන්වද්ධමාසං භික්ඛුනියා භික්ඛුසඞ්ඝතො ද්වෙ ධම්මා පච්චාසීසිතබ්බා’’ති වුත්තසික්ඛාපදඤ්ච, ‘‘සහජීවිනිං වුට්ඨාපෙත්වා ද්වෙ වස්සානි නෙව අනුග්ගණ්හෙය්ය, සහජීවිනිං වුට්ඨාපෙත්වා නෙව වූපකාසෙය්යා’’ති වුත්තසික්ඛාපදද්වයඤ්ච. චීවරං අනුබන්ධනාති ‘‘සචෙ මෙ ත්වං, අය්යෙ, චීවරං දස්සසි, එවාහං [Pg.147] තං වුට්ඨාපෙස්සාමී’’ති ච ‘‘සචෙ මං ත්වං, අය්යෙ, ද්වෙ වස්සානි අනුබන්ධිස්සසි, එවාහං තං වුට්ඨාපෙස්සාමී’’ති ච වුත්තසික්ඛාපදද්වයං. "Anvaddhaṃ sahajīviniṃ dve" म्हणजे "प्रत्येक पंधरवड्याला भिक्खुणीने भिक्खू संघाकडून दोन गोष्टींची (उपदेश व उपोसथ) अपेक्षा करावी" हे सांगितलेले शिक्षापद आणि "सहजीवनीला (शिष्याला) उपसंपदा देऊन दोन वर्षे तिची काळजी घेऊ नये, सहजीवनीला उपसंपदा देऊन तिला दूर करू नये" हे सांगितलेले दोन शिक्षापदे. "Cīvaraṃ anubandhanā" म्हणजे "जर तू मला, आर्या, चीवर देशील, तरच मी तुला उपसंपदा देईन" आणि "जर तू, आर्या, दोन वर्षे माझ्या मागे राहशील, तरच मी तुला उपसंपदा देईन" हे सांगितलेले दोन शिक्षापदे होय. කථිනසමුට්ඨානවණ්ණනා कठिनसमुत्थान वर्णन 262. උබ්භතං කථිනං තීණීති ‘‘නිට්ඨිතචීවරස්මිං භික්ඛුනා උබ්භතස්මිං කථිනෙ’’ති වුත්තානි ආදිතොව තීණි සික්ඛාපදානි. පඨමං පත්තභෙසජ්ජන්ති ‘‘දසාහපරමං අතිරෙකපත්තො’’ති වුත්තං පඨමපත්තසික්ඛාපදඤ්ච ‘‘පටිසායනීයානි භෙසජ්ජානී’’ති වුත්තසික්ඛාපදඤ්ච. අච්චෙකඤ්චාපි සාසඞ්කන්ති අච්චෙකචීවරසික්ඛාපදඤ්ච තදනන්තරමෙව සාසඞ්කසික්ඛාපදඤ්ච. පක්කමන්තෙන වා දුවෙති ‘‘තං පක්කමන්තො නෙව උද්ධරෙය්යා’’ති භූතගාමවග්ගෙ වුත්තසික්ඛාපදද්වයං. २६२. "Ubbhataṃ kathinaṃ tīṇi" म्हणजे "भिक्खूचे चीवर तयार झाल्यावर आणि कठिन (चीवर संस्कार) समाप्त झाल्यावर" असे सुरुवातीपासून सांगितलेले तीन शिक्षापदे. "Paṭhamaṃ pattabhesajjaṃ" म्हणजे "जास्तीत जास्त दहा दिवस अतिरिक्त पात्र ठेवणे" हे पहिले पात्र-शिक्षापद आणि "औषध म्हणून सेवन करण्यायोग्य औषधे" हे सांगितलेले शिक्षापद. "Accekañcāpi sāsaṅkaṃ" म्हणजे अच्चेक-चीवर शिक्षापद आणि त्याच्या लगेचच नंतरचे साशङ्क-शिक्षापद. "Pakkamantena vā duve" म्हणजे "तो निघून जाताना (आसन) न काढता जाऊ नये" हे भूतगामवर्गात सांगितलेले दोन शिक्षापदे होय. උපස්සයං පරම්පරාති ‘‘භික්ඛුනුපස්සයං ගන්ත්වා භික්ඛුනියො ඔවදෙය්යා’’ති ච ‘‘පරම්පරභොජනෙ පාචිත්තිය’’න්ති ච වුත්තසික්ඛාපදද්වයං. අනතිරිත්තං නිමන්තනාති ‘‘අනතිරිත්තං ඛාදනීයං වා භොජනීයං වා’’ති ච ‘‘නිමන්තිතො සභත්තො සමානො’’ති ච වුත්තසික්ඛාපදද්වයං. විකප්පං රඤ්ඤො විකාලෙති ‘‘සාමං චීවරං විකප්පෙත්වා’’ති ච ‘‘රඤ්ඤො ඛත්තියස්සා’’ති ච ‘‘විකාලෙ ගාමං පවිසෙය්යා’’ති ච වුත්තසික්ඛාපදත්තයං. වොසාසාරඤ්ඤකෙන චාති ‘‘වොසාසමානරූපා ඨිතා’’ති ච ‘‘තථාරූපෙසු ආරඤ්ඤකෙසු සෙනාසනෙසු පුබ්බෙ අප්පටිසංවිදිත’’න්ති ච වුත්තසික්ඛාපදද්වයං. "Upassayaṃ paramparā" म्हणजे "भिक्खुणींच्या निवासस्थानी जाऊन भिक्खुणींना उपदेश करावा" आणि "परंपराबोजनात पाचित्तिय होते" हे सांगितलेले दोन शिक्षापदे. "Anatirittaṃ nimantanā" म्हणजे "अतिरिक्त नसलेले खाणे किंवा भोजन" आणि "निमंत्रित असून भोजन करत असताना" हे सांगितलेले दोन शिक्षापदे. "Vikappaṃ rañño vikāle" म्हणजे "स्वतः चीवराचे विकल्पन करून", "क्षत्रिय राजाच्या" आणि "अवेळी गावात प्रवेश करावा" हे सांगितलेले तीन शिक्षापदे. "Vosāsāraññakena ca" म्हणजे "निर्णय घेण्याच्या स्थितीत उभी असलेली" आणि "तशा प्रकारच्या आरण्यक (जंगलातील) शयनासनांमध्ये आधी न कळवता" हे सांगितलेले दोन शिक्षापदे होय. උස්සයා සන්නිචයඤ්චාති ‘‘උස්සයවාදිකා’’ති ච ‘‘පත්තසන්නිචයං කරෙය්යා’’ති ච වුත්තසික්ඛාපදද්වයං. පුරෙ පච්ඡා විකාලෙ චාති ‘‘යා පන භික්ඛුනී පුරෙභත්තං කුලානි උපසඞ්කමිත්වා’’ති ච, ‘‘පච්ඡාභත්තං කුලානි උපසඞ්කමිත්වා’’ති ච, ‘‘විකාලෙ කුලානි උපසඞ්කමිත්වා’’ති ච වුත්තසික්ඛාපදත්තයං. පඤ්චාහිකා සඞ්කමනීති ‘‘පඤ්චාහිකා සඞ්ඝාටිචාරං අතික්කමෙය්යා’’ති ච ‘‘චීවරසඞ්කමනීයං ධාරෙය්යා’’ති ච වුත්තසික්ඛාපදද්වයං. ද්වෙපි ආවසථෙන චාති ‘‘ආවසථචීවරං අනිස්සජ්ජිත්වා පරිභුඤ්ජෙය්ය, ආවසථං අනිස්සජ්ජිත්වා චාරිකං පක්කමෙය්යා’’ති ච එවං ආවසථෙන සද්ධිං වුත්තසික්ඛාපදානි ච ද්වෙ. "Ussayā sannicayaṃ ca" म्हणजे "कलह निर्माण करणारी" आणि "पात्रांचा संग्रह करावा" हे सांगितलेले दोन शिक्षापदे. "Pure pacchā vikāle ca" म्हणजे "जी भिक्खुणी जेवणापूर्वी कुलांमध्ये जाऊन", "जेवणानंतर कुलांमध्ये जाऊन" आणि "अवेळी कुलांमध्ये जाऊन" हे सांगितलेले तीन शिक्षापदे. "Pañcāhikā saṅkamanī" म्हणजे "पाच दिवसांपेक्षा जास्त काळ संघाटीचा वापर न करता राहणे" आणि "हस्तांतरणीय चीवर धारण करणे" हे सांगितलेले दोन शिक्षापदे. "Dvepi āvasathena ca" म्हणजे "धर्मशाळेतील चीवर न सोडता वापरणे" आणि "धर्मशाळा न सोडता प्रवासाला निघणे" हे 'आवसथ' शब्दाशी संबंधित सांगितलेले दोन शिक्षापदे होय. පසාඛෙ ආසනෙ චෙවාති ‘‘පසාඛෙ ජාතං ගණ්ඩං වා’’ති ච ‘‘භික්ඛුස්ස පුරතො අනාපුච්ඡා ආසනෙ නිසීදෙය්යා’’ති ච වුත්තසික්ඛාපදද්වයං. "Pasākhe āsane ceva" म्हणजे "गुप्तांगावर झालेली गळू किंवा जखम" आणि "भिक्खूच्या समोर न विचारता आसनावर बसावे" हे सांगितलेले दोन शिक्षापदे होय. එළකලොමසමුට්ඨානවණ්ණනා एळकलोम-समुत्थान वर्णन 263. එළකලොමා [Pg.148] ද්වෙ සෙය්යාති එළකලොමසික්ඛාපදඤ්චෙව ද්වෙ ච සහසෙය්යසික්ඛාපදානි. ආහච්ච පිණ්ඩභොජනන්ති ආහච්චපාදකසික්ඛාපදඤ්ච ආවසථපිණ්ඩභොජනසික්ඛාපදඤ්ච. ගණවිකාලසන්නිධීති ගණභොජනවිකාලභොජනසන්නිධිකාරකසික්ඛාපදත්තයං. දන්තපොනෙන චෙලකාති දන්තපොනසික්ඛාපදඤ්ච අචෙලකසික්ඛාපදඤ්ච. උය්යුත්තං සෙනං උය්යොධීති ‘‘උය්යුත්තං සෙනං දස්සනාය ගච්ඡෙය්ය, සෙනාය වසෙය්ය, උය්යොධිකං වා…පෙ… අනීකදස්සනං වා ගච්ඡෙය්යා’’ති වුත්තසික්ඛාපදත්තයං. සුරා ඔරෙන න්හායනාති සුරාපානසික්ඛාපදඤ්ච ඔරෙනද්ධමාසනහානසික්ඛාපදඤ්ච. දුබ්බණ්ණෙ ද්වෙ දෙසනිකාති ‘‘තිණ්ණං දුබ්බණ්ණකරණාන’’න්ති වුත්තසික්ඛාපදඤ්ච වුත්තාවසෙසපාටිදෙසනීයද්වයඤ්ච. ලසුණුපතිට්ඨෙ නච්චනාති ලසුණසික්ඛාපදං, ‘‘භික්ඛුස්ස භුඤ්ජන්තස්ස පානීයෙන වා විධූපනෙන වා උපතිට්ඨෙය්යා’’ති වුත්තසික්ඛාපදං, ‘‘නච්චං වා ගීතං වා වාදිතං වා දස්සනාය ගච්ඡෙය්යා’’ති වුත්තසික්ඛාපදඤ්ච. ඉතො පරං පාළිං විරජ්ඣිත්වා ලිඛන්ති. යථා පන අත්ථං වණ්ණයිස්සාම; එවමෙත්ථ අනුක්කමො වෙදිතබ්බො. २६३. "Eḷakalomā dve seyyā" म्हणजे एळकलोम (मेंढीची लोकर) शिक्षापद आणि दोन सहसेय्या (एकत्र झोपणे) शिक्षापदे. "Āhacca piṇḍabhojanaṃ" म्हणजे आहच्चपादक (खाटांचे पाय जोडणे) शिक्षापद आणि आवसथपिण्डभोजन (धर्मशाळेत भोजन करणे) शिक्षापद. "Gaṇavikālasannidhī" म्हणजे गणभोजन, विकालभोजन आणि सन्निधिकारक (अन्न साठवणे) हे तीन शिक्षापदे. "Dantaponena celakā" म्हणजे दन्तपोण (दात घासण्याची काडी) शिक्षापद आणि अचेलक (नग्न) शिक्षापद. "Uyyuttaṃ senaṃ uyyoधी" म्हणजे "सज्ज झालेल्या सैन्याला पाहण्यासाठी जाणे, सैन्यासोबत राहणे, किंवा युद्धभूमीवर...पे... सैन्याची पाहणी करण्यासाठी जाणे" हे सांगितलेले तीन शिक्षापदे. "Surā orena nhāyanā" म्हणजे सुरापान (मद्यपान) शिक्षापद आणि पंधरवड्यापेक्षा कमी काळात स्नान करण्याचे शिक्षापद. "Dubbaṇṇe dve desanikā" म्हणजे "तीन प्रकारच्या विद्रूपीकरणाचे (रंग लावणे)" हे सांगितलेले शिक्षापद आणि उर्वरित दोन पाटिदेसनीय शिक्षापदे. "Lasuṇupatiṭṭhe naccanā" म्हणजे लसूण खाण्याचे शिक्षापद, "भोजन करत असलेल्या भिक्खूला पाणी किंवा पंख्याने वारा घालत उभे राहणे" हे सांगितलेले शिक्षापद, आणि "नृत्य, गीत किंवा वादन पाहण्यासाठी जाणे" हे सांगितलेले शिक्षापद होय. यानंतर (काही लोक) पाठात चूक करून लिहितात. परंतु, आम्ही ज्या प्रकारे अर्थ स्पष्ट करू, त्याच क्रमाने येथील अनुक्रम समजून घ्यावा. න්හානමත්ථරණං සෙය්යාති ‘‘නග්ගා නහායෙය්ය, එකත්ථරණපාවුරණා තුවට්ටෙය්යුං, එකමඤ්චෙ තුවට්ටෙය්යු’’න්ති වුත්තසික්ඛාපදත්තයං. අන්තොරට්ඨෙ තථා බහීති ‘‘අන්තොරට්ඨෙ සාසඞ්කසම්මතෙ, තිරොරට්ඨෙ සාසඞ්කසම්මතෙ’’ති වුත්තසික්ඛාපදද්වයං. අන්තොවස්සං චිත්තාගාරන්ති ‘‘අන්තොවස්සං චාරිකං පක්කමෙය්ය, රාජාගාරං වා චිත්තාගාරං වා…පෙ… පොක්ඛරණිං වා දස්සනාය ගච්ඡෙය්යා’’ති ච වුත්තසික්ඛාපදද්වයං. ආසන්දිං සුත්තකන්තනාති ‘‘ආසන්දිං වා පල්ලඞ්කං වා පරිභුඤ්ජෙය්ය, සුත්තං කන්තෙය්යා’’ති වුත්තසික්ඛාපදද්වයං. "Nhānamattharaṇaṃ seyyā" म्हणजे "नग्न होऊन स्नान करणे, एकाच पांघरुणात एकत्र झोपणे, एकाच खाटेवर एकत्र झोपणे" हे सांगितलेले तीन शिक्षापदे. "Antoraṭṭhe tathā bahī" म्हणजे "शंकास्पद मानल्या गेलेल्या देशाच्या आत, शंकास्पद मानल्या गेलेल्या देशाच्या बाहेर" हे सांगितलेले दोन शिक्षापदे. "Antovassaṃ cittāgāraṃ" म्हणजे "वर्षावासाच्या काळात प्रवासाला निघणे, राजवाडा किंवा चित्रशाळा...पे... किंवा तलाव पाहण्यासाठी जाणे" हे सांगितलेले दोन शिक्षापदे. "Āsandiṃ suttakantanā" म्हणजे "आसंदी (लांब पाय असलेली खुर्ची) किंवा पलंगाचा वापर करणे, सूत कातणे" हे सांगितलेले दोन शिक्षापदे होय. වෙය්යාවච්චං සහත්ථා චාති ‘‘ගිහිවෙය්යාවච්චං කරෙය්ය, අගාරිකස්ස වා පරිබ්බාජකස්ස වා පරිබ්බාජිකාය වා සහත්ථා ඛාදනීයං වා භොජනීයං වා දදෙය්යා’’ති වුත්තසික්ඛාපදද්වයං. අභික්ඛුකාවාසෙන චාති ‘‘අභික්ඛුකෙ ආවාසෙ වස්සං වසෙය්යා’’ති ඉදමෙතං සන්ධාය වුත්තං. ඡත්තං යානඤ්ච සඞ්ඝාණින්ති ‘‘ඡත්තුපාහනං ධාරෙය්ය, යානෙන යායෙය්ය, සඞ්ඝාණිං ධාරෙය්යා’’ති වුත්තසික්ඛාපදත්තයං. අලඞ්කාරගන්ධවාසිතන්ති ‘‘ඉත්ථාලඞ්කාරං ධාරෙය්ය, ගන්ධචුණ්ණකෙන නහායෙය්ය, වාසිතකෙන පිඤ්ඤාකෙන නහායෙය්යා’’ති වුත්තසික්ඛාපදත්තයං. භික්ඛුනීතිආදිනා ‘‘භික්ඛුනියා උම්මද්දාපෙය්යා’’තිආදීනි චත්තාරි සික්ඛාපදානි වුත්තානි. අසඞ්කච්චිකා ආපත්තීති ‘‘අසඞ්කච්චිකා [Pg.149] ගාමං පවිසෙය්ය පාචිත්තිය’’න්ති එවං වුත්තආපත්ති ච. චත්තාරීසා චතුත්තරීති එතානි සබ්බානිපි චතුචත්තාලීස සික්ඛාපදානි වුත්තානි. "Veyyāvaccaṃ sahatthā ca" म्हणजे "गृहस्थांची सेवा करणे, गृहस्थाला किंवा परिव्राजकाला किंवा परिव्राजिकेला स्वतःच्या हाताने खाद्य किंवा भोजन देणे" हे सांगितलेले दोन शिक्षापदे. "Abhikkhukāvāsena ca" हे "भिक्खू नसलेल्या विहारात वर्षावास घालवणे" या शिक्षापदाला उद्देशून म्हटले आहे. "Chattaṃ yānañca saṅghāṇiṃ" म्हणजे "छत्री व पादत्राणे वापरणे, वाहनाने प्रवास करणे, कंबरपट्टा घालणे" हे सांगितलेले तीन शिक्षापदे. "Alaṅkāragandhavāsitaṃ" म्हणजे "स्त्री-अलंकार धारण करणे, सुगंधी चूर्णाने स्नान करणे, सुवासित पेंडीने स्नान करणे" हे सांगितलेले तीन शिक्षापदे. "Bhikkhunī" इत्यादी शब्दांनी "भिक्खुणीकडून अंगमर्दन करून घेणे" इत्यादी चार शिक्षापदे सांगितली आहेत. "Asaṅkaccikā āpattī" म्हणजे "कांचुकी (छाती झाकणारे वस्त्र) न घालता गावात प्रवेश केल्यास पाचित्तिय होते" अशी सांगितलेली आपत्ती. "Cattārīsā catuttarī" म्हणजे हे सर्व मिळून चव्वेचाळीस (४४) शिक्षापदे सांगितली आहेत. කායෙන න වාචාචිත්තෙන, කායචිත්තෙන න වාචතොති කායෙන චෙව කායචිත්තෙන ච සමුට්ඨහන්ති; න වාචාචිත්තෙන න වාචතොති අත්ථො. ද්විසමුට්ඨානිකා සබ්බෙ, සමා එළකලොමිකාති ඉදං උත්තානත්ථමෙව. "Kāyena na vācācittena, kāyacittena na vācato" म्हणजे केवळ कायेने (शारीरिक कृतीने) आणि काय-चित्ताने (शारीरिक कृती व मनाने) हे नियम उद्भवतात; वाचा-चित्ताने किंवा केवळ वाचेने उद्भवत नाहीत, असा अर्थ आहे. "Dvisamuṭṭhānikā sabbe, samā eḷakalomikā" हे अगदी स्पष्ट अर्थाचेच आहे. පදසොධම්මසමුට්ඨානවණ්ණනා पदसोधम्म-समुट्ठान-वर्णन 264. පදඤ්ඤත්ර අසම්මතාති ‘‘පදසො ධම්මං, මාතුගාමස්ස උත්තරිඡප්පඤ්චවාචාහි ධම්මං දෙසෙය්ය, අඤ්ඤත්ර විඤ්ඤුනා පුරිසවිග්ගහෙන, අසම්මතො භික්ඛුනියො ඔවදෙය්යා’’ති වුත්තසික්ඛාපදත්තයං. තථා අත්ථඞ්ගතෙන චාති ‘‘අත්ථඞ්ගතෙ සූරියෙ ඔවදෙය්යා’’ති ඉදමෙතං සන්ධාය වුත්තං. තිරච්ඡානවිජ්ජා ද්වෙති ‘‘තිරච්ඡානවිජ්ජං පරියාපුණෙය්ය, වාචෙය්යා’’ති එවං වුත්තසික්ඛාපදද්වයං. අනොකාසො ච පුච්ඡනාති ‘‘අනොකාසකතං භික්ඛුං පඤ්හං පුච්ඡෙය්යා’’ති ඉදමෙතං සන්ධාය වුත්තං. २६४. ‘पदञ्ञत्र असम्मता’ (पद, अन्यत्र, असंमत) म्हणजे ‘पदशः धर्म (शिकवणे)’, ‘समजूतदार पुरुषाच्या उपस्थितीशिवाय स्त्रियेला पाच-सहा शब्दांपेक्षा अधिक धर्म उपदेश करणे’ आणि ‘असंमत (अनधिकृत) असताना भिक्खुणींना उपदेश करणे’ हे तीन सांगितलेले सिक्खापद (नियम) आहेत. तसेच ‘अत्थङ्गतेन च’ (अस्त पावलेल्या...) हे ‘सूर्य मावळल्यावर (भिक्खुणींना) उपदेश करणे’ या सिक्खापदाला उद्देशून म्हटले आहे. ‘तिरच्छानविज्जा द्वे’ (दोन तिरच्छानविद्या) म्हणजे ‘तिरच्छानविद्या (हीन विद्या) शिकावी’ आणि ‘ती शिकवावी’ असे हे दोन सांगितलेले सिक्खापद आहेत. ‘अनोकासो च पुच्छना’ (परवानगीशिवाय प्रश्न विचारणे) हे ‘परवानगी न घेतलेल्या भिक्खूला प्रश्न विचारावा’ या सिक्खापदाला उद्देशून म्हटले आहे. අද්ධානසමුට්ඨානවණ්ණනා अद्धान-समुट्ठान-वर्णन 265. අද්ධානනාවං පණීතන්ති ‘‘භික්ඛුනියා සද්ධිං සංවිධාය එකද්ධානමග්ගං පටිපජ්ජෙය්ය, එකං නාවං අභිරුහෙය්ය, පණීතභොජනානි අගිලානො අත්තනො අත්ථාය විඤ්ඤාපෙත්වා භුඤ්ජෙය්යා’’ති වුත්තසික්ඛාපදත්තයං. මාතුගාමෙන සංහරෙති මාතුගාමෙන සද්ධිං සංවිධාය ගමනඤ්ච ‘‘සම්බාධෙ ලොමං සංහරාපෙය්යා’’ති වුත්තසික්ඛාපදඤ්ච. ධඤ්ඤං නිමන්තිතා චෙවාති ‘‘ධඤ්ඤං විඤ්ඤාපෙත්වා වා’’ති ච ‘‘නිමන්තිතා වා පවාරිතා වා ඛාදනීයං වා භොජනීයං වා ඛාදෙය්ය වා භුඤ්ජෙය්ය වා’’ති වුත්තසික්ඛාපදඤ්ච. අට්ඨ චාති භික්ඛුනීනං වුත්තා අට්ඨ පාටිදෙසනීයා වා. २६५. ‘अद्धाननावं पणीतं’ (प्रवास, नौका आणि प्रणीत भोजन) म्हणजे ‘भिक्खुणीसोबत मिळून एकाच मार्गाने प्रवासाला निघणे’, ‘एकाच नौकेत बसणे’ आणि ‘आजारी नसताना स्वतःसाठी प्रणीत (उत्तम) भोजन मागवून जेवणे’ हे तीन सांगितलेले सिक्खापद आहेत. ‘मातुगामेन संहरेति’ म्हणजे ‘स्त्रियेसोबत मिळून प्रवासाला जाणे’ आणि ‘गुह्यभागावरील केस काढणे’ हे सिक्खापद होय. ‘धञ्ञं निमन्तिता चेव’ म्हणजे ‘धान्य मागवून घेणे’ आणि ‘निमंत्रित किंवा प्रवारित (तृप्त) असताना खाणे किंवा जेवणे’ हे सिक्खापद होय. ‘अट्ठ च’ म्हणजे भिक्खुणींसाठी सांगितलेले आठ पाटिदेसनीय सिक्खापद होत. ථෙය්යසත්ථසමුට්ඨානවණ්ණනා थेय्यसत्थ-समुट्ठान-वर्णन 266. ථෙය්යසත්ථං උපස්සුතීති ථෙය්යසත්ථෙන සද්ධිං සංවිධාය එකද්ධානමග්ගගමනඤ්ච උපස්සුතිතිට්ඨනඤ්ච. සූපවිඤ්ඤාපනෙන චාති ඉදං සූපොදනවිඤ්ඤත්තිං සන්ධාය වුත්තං. රත්තිඡන්නඤ්ච ඔකාසන්ති ‘‘රත්තන්ධකාරෙ අප්පදීපෙ, පටිච්ඡන්නෙ [Pg.150] ඔකාසෙ, අජ්ඣොකාසෙ පුරිසෙන සද්ධි’’න්ති එවං වුත්තසික්ඛාපදත්තයං. බ්යූහෙන සත්තමාති ඉදං තදනන්තරමෙව ‘‘රථිකාය වා බ්යූහෙ වා සිඞ්ඝාටකෙ වා පුරිසෙන සද්ධි’’න්ති ආගතසික්ඛාපදං සන්ධාය වුත්තං. २६६. ‘थेय्यसत्थं उपस्सुती’ (चोरांचा तांडा आणि चोरून ऐकणे) म्हणजे ‘चोरांच्या तांड्यासोबत मिळून एकाच मार्गाने प्रवास करणे’ आणि ‘चोरून ऐकण्यासाठी उभे राहणे’ हे होय. ‘सूपविञ्ञापनेन च’ हे ‘वरण आणि भात मागण्याच्या (सूपोदनविञ्ञत्ति)’ सिक्खापदाला उद्देशून म्हटले आहे. ‘रत्तिछन्नं च ओकासं’ म्हणजे ‘रात्रीच्या अंधारात दिवा नसताना’, ‘आडोशाच्या ठिकाणी’ आणि ‘उघड्या जागेत पुरुषासोबत (बसणे)’ असे हे तीन सांगितलेले सिक्खापद आहेत. ‘ब्यूहेन सत्तमा’ हे त्याच्या लगेचच नंतर येणाऱ्या ‘गल्लीत, गल्लीच्या टोकाला किंवा चौकात पुरुषासोबत (बोलणे)’ या आलेल्या सिक्खापदाला उद्देशून म्हटले आहे. ධම්මදෙසනාසමුට්ඨානවණ්ණනා धम्मदेसना-समुट्ठान-वर्णन 267. ධම්මදෙසනාසමුට්ඨානානි එකාදස උත්තානානෙව. එවං තාව සම්භින්නසමුට්ඨානං වෙදිතබ්බං. නියතසමුට්ඨානං පන තිවිධං, තං එකෙකස්සෙව සික්ඛාපදස්ස හොති, තං විසුංයෙව දස්සෙතුං ‘‘භූතං කායෙන ජායතී’’තිආදි වුත්තං, තං උත්තානමෙව. නෙත්තිධම්මානුලොමිකන්ති විනයපාළිධම්මස්ස අනුලොමන්ති. २६७. धम्मदेसना-समुत्थान असणारे अकरा सिक्खापद अगदी स्पष्टच आहेत. अशा प्रकारे, प्रथम संभिन्न-समुत्थान (मिश्र उगम) समजून घ्यावे. परंतु नियत-समुत्थान (निश्चित उगम) तीन प्रकारचे आहे; ते प्रत्येक एकाच सिक्खापदाचे असते. ते स्वतंत्रपणे दाखवण्यासाठी ‘भूतं कायेन जायति’ (कायेने खरे उत्पन्न होते) इत्यादी म्हटले आहे, ते अगदी स्पष्टच आहे. ‘नेत्तिधम्मानुलोमिकं’ म्हणजे विनयपाळि धर्माला अनुकूल असणारे. සමුට්ඨානසීසවණ්ණනා නිට්ඨිතා. समुट्ठानसीस-वर्णन समाप्त झाले. අන්තරපෙය්යාලං अन्तरपेय्याल කතිපුච්ඡාවාරවණ්ණනා कतिपुच्छावार-वर्णन 271. ඉදානි [Pg.151] ආපත්තිආදිකොට්ඨාසෙසු කොසල්ලජනනත්ථං ‘‘කති ආපත්තියො’’තිආදිනා නයෙන මාතිකං ඨපෙත්වා නිද්දෙසප්පටිනිද්දෙසවසෙන විභඞ්ගො වුත්තො. २७१. आता, आपत्ती इत्यादी विभागांमध्ये कौशल्य (ज्ञान) उत्पन्न करण्यासाठी ‘किती आपत्ती आहेत?’ इत्यादी पद्धतीने मातिका (अनुक्रमणिका) मांडून, निर्देश आणि प्रतिनिर्देशाच्या द्वारे विभंग (सविस्तर वर्गीकरण) सांगितले आहे. තත්ථ කති ආපත්තියොති මාතිකාය ච විභඞ්ගෙ ච ආගතාපත්තිපුච්ඡා. එස නයො දුතියපදෙපි. කෙවලඤ්හෙත්ථ ආපත්තියො එව රාසිවසෙන ඛන්ධාති වුත්තා. විනීතවත්ථූනීති තාසං ආපත්තීනං විනයපුච්ඡා; ‘‘විනීතං විනයො වූපසමො’’ති ඉදඤ්හි අත්ථතො එකං, විනීතානියෙව විනීතවත්ථූනීති අයමෙත්ථ පදත්ථො. ඉදානි යෙසු සති ආපත්තියො හොන්ති, අසති න හොන්ති, තෙ දස්සෙතුං ‘‘කති අගාරවා’’ති පුච්ඡාද්වයං. විනීතවත්ථූනීති අයං පන තෙසං අගාරවානං විනයපුච්ඡා. යස්මා පන තා ආපත්තියො විපත්තිං ආපත්තා නාම නත්ථි, තස්මා ‘‘කති විපත්තියො’’ති අයං ආපත්තීනං විපත්තිභාවපුච්ඡා. කති ආපත්තිසමුට්ඨානානීති තාසංයෙව ආපත්තීනං සමුට්ඨානපුච්ඡා. විවාදමූලානි අනුවාදමූලානීති ඉමා ‘‘විවාදාධිකරණං අනුවාදාධිකරණ’’න්ති ආගතානං විවාදානුවාදානං මූලපුච්ඡා. සාරණීයා ධම්මාති විවාදානුවාදමූලානං අභාවකරධම්මපුච්ඡා. භෙදකරවත්ථූනීති අයං ‘‘භෙදනසංවත්තනිකං වා අධිකරණ’’න්තිආදීසු වුත්තභෙදකරණපුච්ඡා. අධිකරණානීති භෙදකරවත්ථූසු සති උප්පජ්ජනධම්මපුච්ඡා. සමථාති තෙසංයෙව වූපසමනධම්මපුච්ඡා. පඤ්ච ආපත්තියොති මාතිකාය ආගතවසෙන වුත්තා. සත්තාති විභඞ්ගෙ ආගතවසෙන. त्यामध्ये ‘किती आपत्ती आहेत?’ हा प्रश्न मातिका आणि विभंग या दोन्हीमध्ये आलेल्या आपत्तींविषयीचा आहे. हाच नियम दुसऱ्या पदातही (कति आपत्तिकंधा) लागू होतो. कारण येथे केवळ आपत्तींनाच समूहाच्या अर्थाने ‘खंध’ (स्कंध) म्हटले आहे. ‘विनीतवत्थूनि’ म्हणजे त्या आपत्तींच्या निवारणाविषयीचा (विनय) प्रश्न आहे; कारण ‘विनीत’, ‘विनय’ आणि ‘वूपसम’ (शमन) हे अर्थाने एकच आहेत. जे विनीत (निवारण केलेले) आहेत, त्यांनाच ‘विनीतवत्थु’ म्हणतात, हा येथे शब्दाचा अर्थ आहे. आता, ज्यांच्या अस्तित्वात आपत्ती होतात आणि नसताना होत नाहीत, ते दाखवण्यासाठी ‘किती अनादर (अगारव) आहेत?’ असे दोन प्रश्न विचारले आहेत. परंतु ‘विनीतवत्थूनि’ हा त्या अनादरांच्या निवारणाविषयीचा प्रश्न आहे. परंतु ज्याअर्थी त्या आपत्ती विपत्तीला प्राप्त झालेल्या नसतात असे नाही, त्यामुळे ‘किती विपत्ती आहेत?’ हा आपत्तींच्या विपत्तीभावाविषयीचा प्रश्न आहे. ‘किती आपत्ती-समुत्थान आहेत?’ हा त्याच आपत्तींच्या उगमाविषयीचा प्रश्न आहे. ‘विवादमुळे आणि अनुवादमुळे’ हे प्रश्न ‘विवादाधिकरण आणि अनुवादाधिकरण’ यामध्ये आलेल्या विवाद व अनुवादांच्या मुळांविषयीचे प्रश्न आहेत. ‘सारणीय धम्म’ हा विवाद व अनुवादांच्या मुळांचा अभाव करणाऱ्या धर्मांविषयीचा प्रश्न आहे. ‘भेदकरवत्थूनि’ हा ‘भेद निर्माण करणारे अधिकरण’ इत्यादींमध्ये सांगितलेल्या भेद करणाऱ्या गोष्टींविषयीचा प्रश्न आहे. ‘अधिकरणानि’ हा भेद करणाऱ्या गोष्टी असताना उत्पन्न होणाऱ्या धर्मांविषयीचा प्रश्न आहे. ‘समथ’ हा त्यांच्याच शमनाच्या (शांत करण्याच्या) धर्मांविषयीचा प्रश्न आहे. ‘पाच आपत्ती’ हे मातिकेमध्ये आलेल्या वर्णनानुसार सांगितले आहे, आणि ‘सात’ हे विभंगामध्ये आलेल्या वर्णनानुसार सांगितले आहे. ආරකා එතෙහි රමතීති ආරති; භුසා වා රති ආරති. විනා එතෙහි රමතීති විරති. පච්චෙකං පච්චෙකං විරමතීති පටිවිරති. වෙරං මණති විනාසෙතීති වෙරමණී. න එතාය එතෙ ආපත්තික්ඛන්ධා කරීයන්තීති අකිරියා. යං එතාය අසති ආපත්තික්ඛන්ධකරණං උප්පජ්ජෙය්ය, තස්ස පටිපක්ඛතො අකරණං. ආපත්තික්ඛන්ධඅජ්ඣාපත්තියා පටිපක්ඛතො අනජ්ඣාපත්ති. වෙලනතො වෙලා; චලයනතො විනාසනතොති අත්ථො[Pg.152]. නිය්යානං සිනොති බන්ධති නිවාරෙතීති සෙතු. ආපත්තික්ඛන්ධානමෙතං අධිවචනං. සො සෙතු එතාය පඤ්ඤත්තියා හඤ්ඤතීති සෙතුඝාතො. සෙසවිනීතවත්ථුනිද්දෙසෙසුපි එසෙව නයො. या (आपत्तींपासून) दूर राहून रममाण होतो, म्हणून ‘आरती’ म्हणतात; किंवा अत्यंत रममाण होणे म्हणजे ‘आरती’ होय. यांच्याशिवाय रममाण होतो, म्हणून ‘विरती’ म्हणतात. प्रत्येकापासून वेगळे होऊन विन्मुख होतो, म्हणून ‘पटीविरती’ म्हणतात. वैराला (पापाला) नष्ट करतो, म्हणून ‘वेरमणी’ म्हणतात. याच्याद्वारे हे आपत्तींचे समूह केले जात नाहीत, म्हणून ‘अकिरिया’ (अक्रिया) म्हणतात. याच्या अभावी जे आपत्तींचे समूह करणे उत्पन्न होईल, त्याच्या विरोधी असल्यामुळे याला ‘अकरण’ म्हणतात. आपत्तींच्या समूहामध्ये पडण्याच्या विरोधी असल्यामुळे याला ‘अनज्झापत्ती’ म्हणतात. मर्यादित करण्याच्या अर्थाने ‘वेला’ म्हणतात; हलवणे किंवा नष्ट करणे हा याचा अर्थ आहे. जे मोक्षाच्या मार्गाला बांधते किंवा अडवते, त्याला ‘सेतु’ म्हणतात. हे आपत्तींच्या समूहांचेच दुसरे नाव (अधिवचन) आहे. तो अडथळा (सेतु) या प्रज्ञप्तीने (नियमाने) नष्ट केला जातो, म्हणून याला ‘सेतुघातो’ म्हणतात. उर्वरित विनीतवत्थूंच्या वर्णनातही हाच नियम लागू होतो. බුද්ධෙ අගාරවාදීසු යො බුද්ධෙ ධරමානෙ උපට්ඨානං න ගච්ඡති, පරිනිබ්බුතෙ චෙතියට්ඨානං බොධිට්ඨානං න ගච්ඡති, චෙතියං වා බොධිං වා න වන්දති, චෙතියඞ්ගණෙ සඡත්තො සඋපාහනො චරති, නත්ථෙතස්ස බුද්ධෙ ගාරවොති වෙදිතබ්බො. යො පන සක්කොන්තොයෙව ධම්මස්සවනං න ගච්ඡති, සරභඤ්ඤං න භණති, ධම්මකථං න කථෙති, ධම්මස්සවනග්ගං භින්දිත්වා ගච්ඡති, වික්ඛිත්තො වා අනාදරො වා නිසීදති, නත්ථෙතස්ස ධම්මෙ ගාරවො. යො ථෙරනවමජ්ඣිමෙසු චිත්තීකාරං න පච්චුපට්ඨාපෙති, උපොසථාගාරවිතක්කමාළකාදීසු කායප්පාගබ්භියං දස්සෙති, යථාවුඩ්ඪං න වන්දති, නත්ථෙතස්ස සඞ්ඝෙ ගාරවො. තිස්සො සික්ඛා සමාදාය අසික්ඛමානොයෙව පන සික්ඛාය අගාරවොති වෙදිතබ්බො. පමාදෙ ච සතිවිප්පවාසෙ තිට්ඨමානොයෙව අප්පමාදලක්ඛණං අබ්රූහයමානො අප්පමාදෙ අගාරවොති වෙදිතබ්බො. තථා ආමිසප්පටිසන්ථාරං ධම්මප්පටිසන්ථාරන්ති ඉමං දුවිධං පටිසන්ථාරං අකරොන්තොයෙව පටිසන්ථාරෙ අගාරවොති වෙදිතබ්බො. ගාරවනිද්දෙසෙ වුත්තවිපරියායෙන අත්ථො වෙදිතබ්බො. बुद्ध, धम्म, संघ यांच्याविषयी अनादर दाखवणाऱ्यांच्या बाबतीत... जो मनुष्य बुद्ध जिवंत असताना त्यांच्या सेवेसाठी (उपस्थान) जात नाही, परिनिर्वाण झाल्यावर चैत्यस्थान किंवा बोधिस्थान येथे जात नाही, चैत्याला किंवा बोधिवृक्षाला वंदन करत नाही, चैत्य अंगणात छत्री घेऊन किंवा पादत्राणे घालून फिरतो, 'त्याच्या मनात बुद्धांविषयी आदर नाही' असे समजावे. आणि जो समर्थ असूनही धम्मश्रवणासाठी जात नाही, स्वरबद्ध धम्मपाठ म्हणत नाही, धम्मकथा सांगत नाही, धम्मश्रवणाची सभा भंग करून निघून जातो, किंवा विचलित चित्ताने अथवा अनादराने बसून राहतो, 'त्याच्या मनात धम्माविषयी आदर नाही' (असे समजावे). जो थेर (वरिष्ठ), नवक (नवीन) आणि मध्यम भिक्खूंविषयी आदरभाव दाखवत नाही, उपोसथ गृह, ध्यानधारणा करण्याचे ठिकाण (वितक्कमोळक) इत्यादी ठिकाणी शारीरिक उद्धटपणा दाखवतो, ज्येष्ठतेनुसार वंदन करत नाही, 'त्याच्या मनात संघाविषयी आदर नाही' (असे समजावे). तसेच, तीन शिक्षा (शील, समाधी, प्रज्ञा) ग्रहण करूनही जो त्यानुसार आचरण करत नाही, त्याला 'शिक्षेविषयी अनादर करणारा' असे समजावे. आणि जो प्रमाद (आळस) व स्मृतिभ्रंश यातच राहून अप्रमादाच्या लक्षणांची वृद्धी करत नाही, त्याला 'अप्रमादाविषयी अनादर करणारा' असे समजावे. त्याचप्रमाणे, आमिष-प्रतिसंथार (भौतिक आदरातिथ्य) आणि धम्म-प्रतिसंथार (धार्मिक आदरातिथ्य) या दोन्ही प्रकारचा प्रतिसंथार न करणाऱ्याला 'प्रतिसंथाराविषयी अनादर करणारा' असे समजावे. 'आदर निर्देशात' याच्या उलट अर्थाने (आदराचा) अर्थ समजून घ्यावा. 272. විවාදමූලනිද්දෙසෙ ‘‘සත්ථරිපි අගාරවො’’තිආදීනං බුද්ධෙ අගාරවාදීසු වුත්තනයෙනෙව අත්ථො වෙදිතබ්බො. අප්පතිස්සොති අනීචවුත්ති; න සත්ථාරං ජෙට්ඨකං කත්වා විහරති. අජ්ඣත්තං වාති අත්තනො සන්තානෙ වා අත්තනො පක්ඛෙ වා; සකාය පරිසායාති අත්ථො. බහිද්ධා වාති පරසන්තානෙ වා පරපක්ඛෙ වා. තත්ර තුම්හෙති තස්මිං අජ්ඣත්තබහිද්ධාභෙදෙ සපරසන්තානෙ වා සපරපරිසාය වා. පහානාය වායමෙය්යාථාති මෙත්තාභාවනාදීහි නයෙහි පහානත්ථං වායමෙය්යාථ; මෙත්තාභාවනාදිනයෙන හි තං අජ්ඣත්තම්පි බහිද්ධාපි පහීයති. අනවස්සවායාති අප්පවත්තිභාවාය. २७२. 'विवादमूल निर्देशात' "शास्त्याविषयी (बुद्धांविषयी) देखील अनादर" इत्यादी शब्दांचा अर्थ 'बुद्धांविषयी अनादर' इत्यादींमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा. 'अप्पतिस्सो' म्हणजे नम्र वृत्ती नसलेला (अनीचवृत्ती); जो शास्त्याला (बुद्धांना) आपले श्रेष्ठ मानून राहत नाही. 'अज्झत्तं वा' (स्वतःमध्ये) म्हणजे स्वतःच्या चित्तसंततीत किंवा स्वतःच्या पक्षात; स्वतःच्या परिषदेत असा अर्थ आहे. 'बहिद्धा वा' (बाहेर) म्हणजे दुसऱ्याच्या चित्तसंततीत किंवा दुसऱ्याच्या पक्षात. 'तत्र तुम्हे' म्हणजे त्या आंतरिक आणि बाह्य अशा भेद असलेल्या स्वतःच्या व दुसऱ्याच्या चित्तसंततीत किंवा स्वतःच्या व दुसऱ्याच्या परिषदेत. 'पहानाय वायमेय्याथ' (त्याग करण्यासाठी प्रयत्न करा) म्हणजे मैत्रीभावना इत्यादी पद्धतींनी (त्या दोषांचा) त्याग करण्यासाठी प्रयत्न करावा; कारण मैत्रीभावनेच्या अभ्यासाने तो दोष स्वतःमध्ये आणि दुसऱ्यामध्येही नष्ट होतो. 'अनवस्सवाय' म्हणजे पुन्हा उत्पन्न न होण्यासाठी (अपुनरुत्पत्तीसाठी). සන්දිට්ඨිපරාමාසීති සකමෙව දිට්ඨිං පරාමසති; යං අත්තනා දිට්ඨිගතං ගහිතං, ඉදමෙව සච්චන්ති ගණ්හාති. ආධානග්ගාහීති දළ්හග්ගාහී. 'संदिट्ठिपरामासी' म्हणजे केवळ स्वतःच्याच मताला (दृष्टीला) चिकटून राहणारा; स्वतः जे मत स्वीकारले आहे, "हेच सत्य आहे" असे तो मानतो. 'आधानग्गाही' म्हणजे घट्ट पकडून ठेवणारा (दृढग्राही). 273. අනුවාදමූලනිද්දෙසො [Pg.153] කිඤ්චාපි විවාදමූලනිද්දෙසෙනෙව සමානො, අථ ඛො අට්ඨාරස භෙදකරවත්ථූනි නිස්සාය විවදන්තානං කොධූපනාහාදයො විවාදමූලානි. තථා විවදන්තා පන සීලවිපත්තිආදීසු අඤ්ඤතරවිපත්තිං ආපජ්ජිත්වා ‘‘අසුකො භික්ඛු අසුකං නාම විපත්තිං ආපන්නො’’ති වා, ‘‘පාරාජිකං ආපන්නොසි, සඞ්ඝාදිසෙසං ආපන්නොසී’’ති වා අනුවදන්ති. එවං අනුවදන්තානං කොධූපනාහාදයො අනුවාදමූලානීති අයමෙත්ථ විසෙසො. २७३. 'अनुवादमूल निर्देश' जरी 'विवादमूल निर्देशा'सारखाच असला, तरी अठरा भेदकारक गोष्टींचा (संघभेद करणाऱ्या गोष्टींचा) आश्रय घेऊन वाद घालणाऱ्यांचे क्रोध, उपनाह (वैर) इत्यादी दोष हे विवादाची मुळे (विवादमूल) असतात. तसेच, वाद घालणारे भिक्खू शील-विपत्ती इत्यादींपैकी एखाद्या विपत्तीला प्राप्त होऊन, "अमुक भिक्खू अमुक नावाच्या विपत्तीला प्राप्त झाला आहे" असे म्हणतात, किंवा "तू पाराजिक (पतन) पावला आहेस, तू संघातिकार (संघादिसेस) पावला आहेस" असा आरोप करतात. अशा प्रकारे आरोप करणाऱ्यांचे क्रोध, उपनाह इत्यादी दोष हे 'अनुवादमूल' (आरोपाची मुळे) ठरतात; हाच या दोन्हीमधील फरक (विशेष) आहे. 274. සාරණීයධම්මනිද්දෙසෙ මෙත්තචිත්තෙන කතං කායකම්මං මෙත්තං කායකම්මං නාම. ආවි චෙව රහො චාති සම්මුඛා ච පරම්මුඛා ච. තත්ථ නවකානං චීවරකම්මාදීසු සහායභාවගමනං සම්මුඛා මෙත්තං කායකම්මං නාම. ථෙරානං පන පාදධොවනබීජනවාතදානාදිභෙදම්පි සබ්බං සාමීචිකම්මං සම්මුඛා මෙත්තං කායකම්මං නාම. උභයෙහිපි දුන්නික්ඛිත්තානං දාරුභණ්ඩාදීනං තෙසු අවමඤ්ඤං අකත්වා අත්තනා දුන්නික්ඛිත්තානං විය පටිසාමනං පරම්මුඛා මෙත්තං කායකම්මං නාම. අයම්පි ධම්මො සාරණීයොති අයං මෙත්තාකායකම්මසඞ්ඛාතො ධම්මො සරිතබ්බො සතිජනකො; යො නං කරොති, තං පුග්ගලං; යෙසං කතො හොති, තෙ පසන්නචිත්තා ‘‘අහො සප්පුරිසො’’ති අනුස්සරන්තීති අධිප්පායො. පියකරණොති තං පුග්ගලං සබ්රහ්මචාරීනං පියං කරොති. ගරුකරණොති තං පුග්ගලං සබ්රහ්මචාරීනං ගරුං කරොති. සඞ්ගහායාතිආදීසු සබ්රහ්මචාරීහි සඞ්ගහෙතබ්බභාවාය. තෙහි සද්ධිං අවිවාදාය සමග්ගභාවාය එකීභාවාය ච සංවත්තති. २७४. 'सारणीयधम्म निर्देशात' मैत्रीपूर्ण चित्ताने केलेले कायिक कर्म म्हणजे 'मैत्रीपूर्ण कायिक कर्म' (मेत्तं कायकम्मं) होय. 'आवि चेव रहो चा' म्हणजे प्रत्यक्ष (समुख) आणि परोक्ष (परोक्ष/पाठीमागे). त्यामध्ये, नवीन भिक्खूंच्या चिवर शिवणे इत्यादी कामांमध्ये मदत करणे म्हणजे 'प्रत्यक्ष मैत्रीपूर्ण कायिक कर्म' होय. तर थेर (वरिष्ठ) भिक्खूंचे पाय धुणे, पंख्याने वारा घालणे इत्यादी सर्व आदरातिथ्य (सामीचीकर्म) करणे म्हणजे 'प्रत्यक्ष मैत्रीपूर्ण कायिक कर्म' होय. दोन्ही प्रकारच्या भिक्खूंनी (वरिष्ठ व कनिष्ठ) अस्ताव्यस्त पडलेल्या लाकडी वस्तू इत्यादींकडे दुर्लक्ष न करता, स्वतःच्याच वस्तू असल्यासारखे त्या व्यवस्थित जागेवर ठेवणे म्हणजे 'परोक्ष मैत्रीपूर्ण कायिक कर्म' होय. 'हा धम्म देखील सारणीय (स्मरणीय) आहे' याचा अर्थ असा की, मैत्रीपूर्ण कायिक कर्माच्या रूपातील हा धम्म नेहमी स्मरणात ठेवण्याजोगा आणि स्मृती जागृत करणारा आहे; जो व्यक्ती हे करतो, त्या व्यक्तीला ज्यांच्यासाठी हे केले गेले आहे ते लोक प्रसन्न चित्ताने "अहा! किती सज्जन माणूस आहे" असे म्हणून त्याचे स्मरण करतात, असा याचा अभिप्राय आहे. 'पियकरणो' म्हणजे तो त्या व्यक्तीला सहब्रह्मचाऱ्यांचा प्रिय बनवतो. 'गरुकरणो' म्हणजे तो त्या व्यक्तीला सहब्रह्मचाऱ्यांचा आदरणीय बनवतो. 'संगहाय' इत्यादी शब्दांचा अर्थ असा की, सहब्रह्मचाऱ्यांकडून स्वीकारले जाण्यासाठी, त्यांच्यासोबत वाद न घालण्यासाठी, एकतेसाठी आणि संघटित राहण्यासाठी हे कारणीभूत ठरते. මෙත්තං වචීකම්මන්තිආදීසු දෙවත්ථෙරො තිස්සත්ථෙරොති එවං පග්ගය්හ වචනං සම්මුඛා මෙත්තං වචීකම්මං නාම. විහාරෙ අසන්තෙ පන තං පටිපුච්ඡන්තස්ස ‘‘කුහිං අම්හාකං දෙවත්ථෙරො, කුහිං අම්හාකං තිස්සත්ථෙරො, කදා නු ඛො ආගමිස්සතී’’ති එවං මමායනවචනං පරම්මුඛා මෙත්තං වචීකම්මං නාම. මෙත්තාසිනෙහසිනිද්ධානි පන නයනානි උම්මීලෙත්වා පසන්නෙන මුඛෙන ඔලොකනං සම්මුඛා මෙත්තං මනොකම්මං නාම. ‘‘දෙවත්ථෙරො තිස්සත්ථෙරො අරොගො හොතු, අප්පාබාධො’’ති සමන්නාහරණං පරම්මුඛා මෙත්තං මනොකම්මං නාම. 'मैत्रीपूर्ण वाचिक कर्म' (मेत्तं वचीकम्मं) इत्यादींमध्ये, "देव थेर, तिस्स थेर" अशा प्रकारे आदराने बोलणे म्हणजे 'प्रत्यक्ष मैत्रीपूर्ण वाचिक कर्म' होय. विहारात ते उपस्थित नसताना, त्यांच्याबद्दल विचारणाऱ्याला "आमचे देव थेर कुठे आहेत? आमचे तिस्स थेर कुठे आहेत? ते कधी परत येतील?" अशा प्रकारे आपुलकीने बोलणे म्हणजे 'परोक्ष मैत्रीपूर्ण वाचिक कर्म' होय. मैत्री आणि स्नेहाने ओथंबलेले डोळे उघडून प्रसन्न चेहऱ्याने पाहणे म्हणजे 'प्रत्यक्ष मैत्रीपूर्ण मानसिक कर्म' (मेत्तं मनोकम्मं) होय. "देव थेर, तिस्स थेर निरोगी राहोत, त्यांना कोणताही आजार नसो" असे मनात चिंतणे म्हणजे 'परोक्ष मैत्रीपूर्ण मानसिक कर्म' होय. අප්පටිවිභත්තභොගීති නෙව ආමිසං පටිවිභජිත්වා භුඤ්ජති, න පුග්ගලං. යො හි ‘‘එත්තකං පරෙසං දස්සාමි, එත්තකං අත්තනා භුඤ්ජිස්සාමි, එත්තකං වා අසුකස්ස [Pg.154] ච අසුකස්ස ච දස්සාමි, එත්තකං අත්තනා භුඤ්ජිස්සාමී’’ති විභජිත්වා භුඤ්ජති, අයං පටිවිභත්තභොගී නාම. අයං පන එවං අකත්වා ආභතං පිණ්ඩපාතං ථෙරාසනතො පට්ඨාය දත්වා ගහිතාවසෙසං භුඤ්ජති. ‘‘සීලවන්තෙහී’’ති වචනතො දුස්සීලස්ස අදාතුම්පි වට්ටති, සාරණීයධම්මපූරකෙන පන සබ්බෙසං දාතබ්බමෙවාති වුත්තං. ගිලාන-ගිලානුපට්ඨාක-ආගන්තුක-ගමිකචීවරකම්මාදිපසුතානං විචෙය්ය දාතුම්පි වට්ටති. න හි එතෙ විචිනිත්වා දෙන්තෙන පුග්ගලවිභාගො කතො හොති, ඊදිසානඤ්හි කිච්ඡලාභත්තා විසෙසො කාතබ්බොයෙවාති අයං කරොති. 'अप्पटिविभत्तभोगी' (न वाटता उपभोग घेणारा) म्हणजे जो आमिष (मिळालेले अन्न/वस्तू) स्वतःसाठी आणि इतरांसाठी वेगळे करून उपभोगत नाही, आणि व्यक्तींमध्येही भेद करत नाही. जो मनुष्य "एवढे मी इतरांना देईन, एवढे मी स्वतः उपभोगीन, किंवा एवढे अमुक अमुक व्यक्तीला देईन आणि एवढे मी स्वतः उपभोगीन" असे वाटून उपभोग घेतो, त्याला 'पटिविभत्तभोगी' (वाटून उपभोग घेणारा) म्हणतात. परंतु, हा (अप्पटिविभत्तभोगी) तसे न करता, आणलेला पिंडपात (भिक्षा) थेरांच्या (वरिष्ठांच्या) आसनापासून वाटण्यास सुरुवात करून, जे उरेल ते स्वतः ग्रहण करतो. "शीलवंतांनाच द्यावे" या वचनानुसार दुःशीलाला (शील नसलेल्याला) न देणे देखील योग्य आहे, परंतु सारणीय धम्माचे पालन करणाऱ्याने सर्वांनाच दिले पाहिजे, असे म्हटले आहे. आजारी व्यक्ती, आजारी व्यक्तीची सेवा करणारा, पाहुणा (आगंतुक), प्रवासी आणि चिवर शिवणे इत्यादी कामात व्यस्त असलेल्यांना निवडून देणे देखील योग्य आहे. कारण अशा प्रकारे निवडून देणाऱ्याकडून 'पुद्गल-विभाग' (व्यक्तींमध्ये भेदभाव) केला जात नाही; कारण अशा कठीण परिस्थितीत लाभ मिळवणाऱ्यांना विशेष महत्त्व दिलेच पाहिजे, म्हणून तो असे करतो. අඛණ්ඩානීතිආදීසු යස්ස සත්තසු ආපත්තික්ඛන්ධෙසු ආදිම්හි වා අන්තෙ වා සික්ඛාපදං භින්නං හොති, තස්ස සීලං පරියන්තෙ ඡින්නසාටකො විය ඛණ්ඩං නාම. යස්ස පන වෙමජ්ඣෙ භින්නං, තස්ස මජ්ඣෙ ඡිද්දසාටකො විය ඡිද්දං නාම හොති. යස්ස පටිපාටියා ද්වෙ තීණි භින්නානි, තස්ස පිට්ඨියං වා කුච්ඡියං වා උට්ඨිතෙන විසභාගවණ්ණෙන කාළරත්තාදීනං අඤ්ඤතරසරීරවණ්ණා ගාවී විය සබලං නාම හොති. යස්ස අන්තරන්තරා භින්නානි, තස්ස අන්තරන්තරා විසභාගවණ්ණබින්දුවිචිත්රා ගාවී විය කම්මාසං නාම හොති. යස්ස පන සබ්බෙන සබ්බං අභින්නානි සීලානි, තස්ස තානි සීලානි අඛණ්ඩානි අච්ඡිද්දානි අසබලානි අකම්මාසානි නාම හොන්ති. තානි පනෙතානි භුජිස්සභාවකරණතො භුජිස්සානි. විඤ්ඤූහි පසත්ථත්තා විඤ්ඤුප්පසත්ථානි. තණ්හාදිට්ඨීහි අපරාමට්ඨත්තා අපරාමට්ඨානි. උපචාරසමාධිං අප්පනාසමාධිං වා සංවත්තයන්තීති සමාධිසංවත්තනිකානීති වුච්චන්ති. සීලසාමඤ්ඤගතො විහරතීති තෙසු තෙසු දිසාභාගෙසු විහරන්තෙහි කල්යාණසීලෙහි භික්ඛූහි සද්ධිං සමානභාවූපගතසීලො විහරති. 'अखण्डानि' इत्यादींमध्ये असा निर्णय समजावा: ज्या व्यक्तीचे सात आपत्ती-स्कंधांपैकी सुरुवातीला किंवा शेवटी एखादे शिक्षापद खंडित होते, त्याचे शील हे काठावर फाटलेल्या वस्त्राप्रमाणे 'खंड' (खंडित) म्हटले जाते. परंतु ज्याचे शिक्षापद मध्यभागी खंडित होते, त्याचे शील हे मध्यभागी छिद्र असलेल्या वस्त्राप्रमाणे 'छिद्र' (छिद्रयुक्त) म्हटले जाते. ज्याचे लागोपाठ दोन किंवा तीन शिक्षापदे खंडित होतात, त्याचे शील हे पाठीवर किंवा पोटावर उठलेल्या विजातीय रंगाच्या (काळ्या, तांबड्या इत्यादींपैकी एका रंगाच्या) ठिपक्यांमुळे डागाळलेल्या गाईप्रमाणे 'शबल' (चित्कबरी) म्हटले जाते. ज्याचे ठिकठिकाणी (अंतराअंतराने) शिक्षापदे खंडित होतात, त्याचे शील हे ठिकठिकाणी विजातीय रंगांच्या ठिपक्यांनी युक्त असलेल्या गाईप्रमाणे 'कल्माष' (विविध रंगांचे) म्हटले जाते. परंतु ज्याचे शील सर्व प्रकारे अखंडित असते, त्याचे ते शील 'अखंड', 'अछिद्र', 'अशबल' आणि 'अकल्माष' म्हटले जाते. आणि ती (शीले) तृष्णेच्या दास्यत्वातून मुक्त करत असल्यामुळे 'भुजिस्स' (मुक्त), विद्वानांद्वारे प्रशंसित असल्यामुळे 'विज्ञुप्पसत्थ' (विज्ञप्रशंसित), तृष्णा आणि दृष्टी यांनी दूषित न झाल्यामुळे 'अपरामट्ठ' (अपरामृष्ट) म्हटली जातात. उपचार समाधी किंवा अर्पणा समाधी उत्पन्न करत असल्यामुळे त्यांना 'समाधिसंवत्तनिक' (समाधीला अनुकूल) असे म्हटले जाते. 'शीलसामन्यगतो विहरति' म्हणजे त्या त्या दिशांमध्ये राहणाऱ्या कल्याणशील भिक्खूंसोबत समान शील धारण करून राहणे होय. යායං දිට්ඨීති මග්ගසම්පයුත්තා සම්මාදිට්ඨි. අරියාති නිද්දොසා. නිය්යාතීති නිය්යානිකා. තක්කරස්සාති යො තථාකාරී හොති, තස්ස. දුක්ඛක්ඛයායාති සබ්බදුක්ඛස්ස ඛයත්ථං. සෙසං යාව සමථභෙදපරියොසානා උත්තානත්ථමෙව. 'यायं दिट्ठि' म्हणजे मार्गाशी संप्रयुक्त असलेली सम्यक् दृष्टी. 'अरिया' म्हणजे निर्दोष. 'निय्याति' म्हणजे (संसारातून) मुक्त करणारी (नैर्याणिक). 'तक्करस्स' म्हणजे जो त्याप्रमाणे आचरण करतो, त्याचे. 'दुक्खक्खयाय' म्हणजे सर्व दुःखाचा क्षय करण्यासाठी. उर्वरित भाग समथभेदाच्या समाप्तीपर्यंत स्पष्ट अर्थाचाच आहे. කතිපුච්ඡාවාරවණ්ණනා නිට්ඨිතා. कतिपुच्छावार-वर्णन समाप्त झाले. ඛන්ධකපුච්ඡාවාරො खन्धकपुच्छावार පුච්ඡාවිස්සජ්ජනාවණ්ණනා प्रश्न-उत्तर वर्णन (पुच्छाविस्सज्जना-वर्णन) 320. උපසම්පදං [Pg.155] පුච්ඡිස්සන්ති උපසම්පදක්ඛන්ධකං පුච්ඡිස්සං. සනිදානං සනිද්දෙසන්ති නිදානෙන ච නිද්දෙසෙන ච සද්ධිං පුච්ඡිස්සාමි. සමුක්කට්ඨපදානං කති ආපත්තියොති යානි තත්ථ සමුක්කට්ඨානි උත්තමානි පදානි වුත්තානි, තෙසං සමුක්කට්ඨපදානං උත්තමපදානං සඞ්ඛෙපතො කති ආපත්තියො හොන්තීති. යෙන යෙන හි පදෙන යා යා ආපත්ති පඤ්ඤත්තා, සා සා තස්ස තස්ස පදස්ස ආපත්තීති වුච්චති. තෙන වුත්තං ‘‘සමුක්කට්ඨපදානං කති ආපත්තියො’’ති. ද්වෙ ආපත්තියොති ඌනවීසතිවස්සං උපසම්පාදෙන්තස්ස පාචිත්තියං, සෙසෙසු සබ්බපදෙසු දුක්කටං. ३२०. 'उपसम्पदं पुच्छिस्सन्ति' म्हणजे उपसंपदा-खंधक विचारणार. 'सनिदानं सनिद्देसं' म्हणजे निदानासह आणि निर्देशासहित विचारणार. 'समुक्कट्ठपदानं कति आपत्तियो' म्हणजे त्या उपसंपदा-खंधकात जी श्रेष्ठ (उत्तम) पदे सांगितली आहेत, त्या श्रेष्ठ पदांच्या संक्षेपाने किती आपत्ती होतात? हा प्रश्न आहे. कारण ज्या ज्या पदाने जी जी आपत्ती भगवंतांनी प्रज्ञप्त केली आहे, ती ती आपत्ती त्या त्या पदाची आपत्ती म्हटली जाते. म्हणूनच 'समुक्कट्ठपदानं कति आपत्तियो' असे म्हटले आहे. 'द्वे आपत्तियो' म्हणजे एकोणीस वर्षांपेक्षा कमी वय असलेल्या व्यक्तीला उपसंपदा देणाऱ्याला पाचित्तिय आपत्ती होते, आणि उर्वरित सर्व पदांमध्ये दुक्कट आपत्ती होते. තිස්සොති ‘‘නස්සන්තෙතෙ විනස්සන්තෙතෙ, කො තෙහි අත්ථො’’ති භෙදපුරෙක්ඛාරානං උපොසථකරණෙ ථුල්ලච්චයං, උක්ඛිත්තකෙන සද්ධිං උපොසථකරණෙ පාචිත්තියං, සෙසෙසු දුක්කටන්ති එවං උපොසථක්ඛන්ධකෙ තිස්සො ආපත්තියො. එකාති වස්සූපනායිකක්ඛන්ධකෙ එකා දුක්කටාපත්තියෙව. 'तिस्सो' (तीन आपत्ती) म्हणजे: 'हे नष्ट होवोत, हे विनाश पावोत, यांच्याशी काय प्रयोजन?' अशा प्रकारे संघाचा भेद करू इच्छिणाऱ्यांनी उपोसथ केल्यास थुल्लच्चय आपत्ती होते; उत्क्षिप्त भिक्खूसोबत उपोसथ केल्यास पाचित्तिय आपत्ती होते; आणि उर्वरित कारणांमुळे दुक्कट आपत्ती होते. अशा प्रकारे उपोसथ-खंधकात तीन आपत्ती होतात. 'एका' म्हणजे वस्सूपनायिका-खंधकात केवळ एकच दुक्कट आपत्ती होते. තිස්සොති භෙදපුරෙක්ඛාරස්ස පවාරයතො ථුල්ලච්චයං, උක්ඛිත්තකෙන සද්ධිං පාචිත්තියං, සෙසෙසු දුක්කටන්ති එවං පවාරණාක්ඛන්ධකෙපි තිස්සො ආපත්තියො. 'तिस्सो' म्हणजे संघभेदाची इच्छा ठेवून प्रवारणा करणाऱ्या भिक्खूला थुल्लच्चय आपत्ती होते; उत्क्षिप्त भिक्खूसोबत प्रवारणा करणाऱ्याला पाचित्तिय आपत्ती होते; आणि उर्वरित कारणांमुळे दुक्कट आपत्ती होते. अशा प्रकारे प्रवारणा-खंधकातही तीन आपत्ती होतात. තිස්සොති වච්ඡතරිං උග්ගහෙත්වා මාරෙන්තානං පාචිත්තියං, රත්තෙන චිත්තෙන අඞ්ගජාතඡුපනෙ ථුල්ලච්චයං, සෙසෙසු දුක්කටන්ති එවං චම්මසංයුත්තෙපි තිස්සො ආපත්තියො. භෙසජ්ජක්ඛන්ධකෙපි සමන්තා ද්වඞ්ගුලෙ ථුල්ලච්චයං, භොජ්ජයාගුයා පාචිත්තියං, සෙසෙසු දුක්කටන්ති එවං තිස්සො ආපත්තියො. 'तिस्सो' म्हणजे कालवडीला उचलून मारणाऱ्या भिक्खूंना पाचित्तिय आपत्ती होते; कामवासनायुक्त चित्ताने जननेंद्रियाला स्पर्श केल्यास थुल्लच्चय आपत्ती होते; आणि उर्वरित कारणांमुळे दुक्कट आपत्ती होते. अशा प्रकारे चर्म-संयुक्तात (चम्म-खंधकात) देखील तीन आपत्ती होतात. भेषज्ज-खंधकातही जननेंद्रियाच्या सभोवताली दोन बोटांच्या अंतरावर शस्त्रक्रिया किंवा वस्तिकर्म केल्यास थुल्लच्चय आपत्ती होते; भोज्य-यागू पिण्यामुळे पाचित्तिय आपत्ती होते; आणि उर्वरित कारणांमुळे दुक्कट आपत्ती होते. अशा प्रकारे तीन आपत्ती होतात. කථිනං කෙවලං පඤ්ඤත්තිමෙව, නත්ථි තත්ථ ආපත්ති. චීවරසංයුත්තෙ කුසචීරවාකචීරෙසු ථුල්ලච්චයං, අතිරෙකචීවරෙ නිස්සග්ගියං, සෙසෙසු දුක්කටන්ති ඉමා තිස්සො ආපත්තියො. कठिन हे केवळ प्रज्ञप्तीच आहे, तिथे कोणतीही आपत्ती नाही. चीवर-संयुक्तात कुशाचे चीवर किंवा वल्कलाचे चीवर परिधान केल्यास थुल्लच्चय आपत्ती होते; अतिरिक्त चीवर ठेवल्यास निस्सग्गिय आपत्ती होते; आणि उर्वरित कारणांमुळे दुक्कट आपत्ती होते. अशा या तीन आपत्ती होतात. චම්පෙය්යකෙ එකා දුක්කටාපත්තියෙව. කොසම්බක-කම්මක්ඛන්ධක-පාරිවාසිකසමුච්චයක්ඛන්ධකෙසුපි එකා දුක්කටාපත්තියෙව. चम्पेय्यक-खंधकात केवळ एकच दुक्कट आपत्ती होते. कोसम्बक-खंधक, कम्म-खंधक, पारिवासिक-खंधक आणि समुच्चय-खंधक यांमध्येही केवळ एकच दुक्कट आपत्ती होते. සමථක්ඛන්ධකෙ [Pg.156] ඡන්දදායකො ඛිය්යති, ඛිය්යනකං පාචිත්තියං, සෙසෙසු දුක්කටන්ති ඉමා ද්වෙ ආපත්තියො. ඛුද්දකවත්ථුකෙ අත්තනො අඞ්ගජාතං ඡින්දති, ථුල්ලච්චයං, රොමට්ඨෙ පාචිත්තියං, සෙසෙසු දුක්කටන්ති ඉමා තිස්සො ආපත්තියො. සෙනාසනක්ඛන්ධකෙ ගරුභණ්ඩවිස්සජ්ජනෙ ථුල්ලච්චයං, සඞ්ඝිකා විහාරා නික්කඩ්ඪනෙ පාචිත්තියං, සෙසෙසු දුක්කටන්ති ඉමා තිස්සො ආපත්තියො. समथ-खंधकात छंदाचे दान देणाऱ्या भिक्खूची निंदा केल्यास निंदा करण्यामुळे पाचित्तिय आपत्ती होते; आणि उर्वरित कारणांमुळे दुक्कट आपत्ती होते. अशा या दोन आपत्ती होतात. खुद्दकवत्थु-खंधकात स्वतःचे जननेंद्रिय कापल्यास थुल्लच्चय आपत्ती होते; रवंथ करण्यामुळे पाचित्तिय आपत्ती होते; आणि उर्वरित कारणांमुळे दुक्कट आपत्ती होते. अशा या तीन आपत्ती होतात. सेनासन-खंधकात गुरुभांड विसर्जित केल्यास थुल्लच्चय आपत्ती होते; सांघिक विहारातून भिक्खूला बाहेर हाकलून दिल्यास पाचित्तिय आपत्ती होते; आणि उर्वरित कारणांमुळे दुक्कट आपत्ती होते. अशा या तीन आपत्ती होतात. සඞ්ඝභෙදෙභෙදකානුවත්තකානං ථුල්ලච්චයං, ගණභොජනෙ පාචිත්තියන්ති ඉමා ද්වෙ ආපත්තියො. සමාචාරං පුච්ඡිස්සන්ති වුත්තෙ වත්තක්ඛන්ධකෙ එකා දුක්කටාපත්තියෙව. සා සබ්බවත්තෙසු අනාදරියෙන හොති. තථා පාතිමොක්ඛට්ඨපනෙ. භික්ඛුනික්ඛන්ධකෙ අප්පවාරණාය පාචිත්තියං, සෙසෙසු දුක්කටන්ති ද්වෙ ආපත්තියො. පඤ්චසතිකසත්තසතිකෙසු කෙවලං ධම්මො සඞ්ගහං ආරොපිතො, නත්ථි තත්ථ ආපත්තීති. संघभेद-खंधकात संघभेद करणाऱ्या भिक्खूचे अनुकरण करणाऱ्यांना थुल्लच्चय आपत्ती होते; गणभोजन केल्यास पाचित्तिय आपत्ती होते. अशा या दोन आपत्ती होतात. 'समाचारं पुच्छिस्सन्ति' असे म्हटल्यावर वत्त-खंधकात केवळ एकच दुक्कट आपत्ती होते. ती सर्व कर्तव्यांमध्ये अनादर केल्यामुळे होते. तसेच पातिमोक्ख-ठपन-खंधकातही समजावे. भिक्खुनी-खंधकात प्रवारणा न केल्यामुळे पाचित्तिय आपत्ती होते; आणि उर्वरित कारणांमुळे दुक्कट आपत्ती होते. अशा या दोन आपत्ती होतात. पंचसतिक आणि सत्तसतिक खंधकांमध्ये केवळ धर्माची संगीती केली गेली आहे, तिथे कोणतीही आपत्ती नाही. ඛන්ධකපුච්ඡාවාරවණ්ණනා නිට්ඨිතා. खंधकपुच्छावार-वर्णन समाप्त झाले. එකුත්තරිකනයො एकुत्तरिकनय (एकूत्तरिक पद्धत) එකකවාරවණ්ණනා एककवार-वर्णन 321. ආපත්තිකරා [Pg.157] ධම්මා ජානිතබ්බාතිආදිම්හි එකුත්තරිකනයෙ ආපත්තිකරා ධම්මා නාම ඡ ආපත්තිසමුට්ඨානානි. එතෙසඤ්හි වසෙන පුග්ගලො ආපත්තිං ආපජ්ජති, තස්මා ‘‘ආපත්තිකරා’’ති වුත්තා. අනාපත්තිකරා නාම සත්ත සමථා. ආපත්ති ජානිතබ්බාති තස්මිං තස්මිං සික්ඛාපදෙ ච විභඞ්ගෙ ච වුත්තා ආපත්ති ජානිතබ්බා. අනාපත්තීති ‘‘අනාපත්ති භික්ඛු අසාදියන්තස්සා’’තිආදිනා නයෙන අනාපත්ති ජානිතබ්බා. ලහුකාති ලහුකෙන විනයකම්මෙන විසුජ්ඣනතො පඤ්චවිධා ආපත්ති. ගරුකාති ගරුකෙන විනයකම්මෙන විසුජ්ඣනතො සඞ්ඝාදිසෙසා ආපත්ති. කෙනචි ආකාරෙන අනාපත්තිභාවං උපනෙතුං අසක්කුණෙය්යතො පාරාජිකාපත්ති ච. සාවසෙසාති ඨපෙත්වා පාරාජිකං සෙසා. අනවසෙසාති පාරාජිකාපත්ති. ද්වෙ ආපත්තික්ඛන්ධා දුට්ඨුල්ලා; අවසෙසා අදුට්ඨුල්ලා. සප්පටිකම්මදුකං සාවසෙසදුකසදිසං. දෙසනාගාමිනිදුකං ලහුකදුකසඞ්ගහිතං. ३२१. 'आपत्तिकरा धम्मा जानितब्बा' इत्यादींनी सुरू होणाऱ्या एकुत्तरिकनयामध्ये, 'आपत्तिकर धर्म' म्हणजे सहा आपत्ती-समुत्थान (आपत्ती उत्पन्न करणारी कारणे) होत. कारण यांच्या प्रभावाने व्यक्ती आपत्तीला प्राप्त होते, म्हणून त्यांना 'आपत्तिकर' म्हटले आहे. 'अनापत्तिकर धर्म' म्हणजे सात समथ होत. 'आपत्ती जाणावी' म्हणजे त्या त्या शिक्षापदात आणि विभंगात सांगितलेली आपत्ती जाणावी. 'अनापत्ती' म्हणजे 'अनापत्ती भिक्खू असादियन्तस्स' इत्यादी पद्धतीने सांगितलेली अनापत्ती जाणावी. 'लहुका' (हलकी आपत्ती) म्हणजे सौम्य विनयकर्माने शुद्ध होणारी पाच प्रकारची आपत्ती होय. 'गरुका' (गंभीर आपत्ती) म्हणजे गंभीर विनयकर्माने शुद्ध होणारी संघादिसेस आपत्ती होय. आणि कोणत्याही प्रकारे अनापत्तीच्या अवस्थेत आणता न येण्याजोगी पाराजिका आपत्ती देखील (गुरू आपत्तीमध्ये) जाणावी. 'सावसेसा' (सावशेष आपत्ती) म्हणजे पाराजिका वगळता उर्वरित आपत्ती जाणावी. 'अनवसेसा' (अनवशेष आपत्ती) म्हणजे पाराजिका आपत्ती जाणावी. दोन आपत्ती-स्कंध हे 'दुट्ठुल्ला' (गंभीर) आहेत; उर्वरित 'अदुट्ठुल्ला' (सौम्य) आहेत. सप्पटिकम्म-दुक हा सावशेष-दुकासारखाच आहे. देसनागामी-दुक हा लहुक-दुकामध्ये समाविष्ट आहे. අන්තරායිකාති සත්තපි ආපත්තියො සඤ්චිච්ච වීතික්කන්තා සග්ගන්තරායඤ්චෙව මොක්ඛන්තරායඤ්ච කරොන්තීති අන්තරායිකා. අජානන්තෙන වීතික්කන්තා පන පණ්ණත්තිවජ්ජාපත්ති නෙව සග්ගන්තරායං න මොක්ඛන්තරායං කරොතීති අනන්තරායිකා. අන්තරායිකං ආපන්නස්සාපි දෙසනාගාමිනිං දෙසෙත්වා වුට්ඨානගාමිනිතො වුට්ඨාය සුද්ධිපත්තස්ස සාමණෙරභූමියං ඨිතස්ස ච අවාරිතො සග්ගමොක්ඛමග්ගොති. සාවජ්ජපඤ්ඤත්තීති ලොකවජ්ජා. අනවජ්ජපඤ්ඤත්තීති පණ්ණත්තිවජ්ජා. කිරියතො සමුට්ඨිතා නාම යං කරොන්තො ආපජ්ජති පාරාජිකාපත්ති විය. අකිරියතොති යං අකරොන්තො ආපජ්ජති, චීවරඅනධිට්ඨානාපත්ති විය. කිරියාකිරියතොති යං කරොන්තො ච අකරොන්තො ච ආපජ්ජති, කුටිකාරාපත්ති විය. अन्तरायिक म्हणजे सातही आपत्तींचे जाणूनबुजून उल्लंघन केले असता, त्या स्वर्गाच्या (सुगतीच्या) मार्गात आणि मोक्षाच्या (निर्वाणाच्या) मार्गात अडथळा निर्माण करतात, म्हणून त्यांना 'अन्तरायिक' म्हणतात. परंतु, अजाणतेपणी उल्लंघन केलेली 'पण्णत्तिवज्ज' आपत्ती (केवळ नियमाचे उल्लंघन) स्वर्गाचा किंवा मोक्षाचा मार्ग रोखत नाही, म्हणून तिला 'अनन्तरायिक' म्हणतात. अन्तरायिक आपत्ती ओढवून घेतलेल्या भिक्खूने देखील देशनागामी आपत्तीची देशना (कबुली) देऊन किंवा वुठ्ठानगामी आपत्तीतून मुक्त होऊन शुद्धी प्राप्त केली असता, आणि सामणेर भूमीमध्ये राहिलेल्याचा स्वर्ग व मोक्षाचा मार्ग अडवला जात नाही. 'सावज्जपण्णत्ति' म्हणजे लोकवज्ज (लोकांनी निंद्य मानलेली आपत्ती) समजावी. 'अनवज्जपण्णत्ति' म्हणजे पण्णत्तिवज्ज (केवळ नियमाचे उल्लंघन असणारी आपत्ती) समजावी. 'क्रिया-समुत्थित' म्हणजे जे कार्य केल्याने आपत्ती ओढवते, जसे की पाराजिक आपत्ती. 'अक्रिया-समुत्थित' म्हणजे जे कार्य न केल्याने आपत्ती ओढवते, जसे की चीवर अधिष्ठान न करण्याची आपत्ती. 'क्रिया-अक्रिया-समुत्थित' म्हणजे जे कार्य केल्याने आणि न केल्यानेही आपत्ती ओढवते, जसे की कुटी बांधण्याची आपत्ती (कुटिकार आपत्ती). පුබ්බාපත්තීති පඨමං ආපන්නාපත්ති. අපරාපත්තීති පාරිවාසිකාදීහි පච්ඡා ආපන්නාපත්ති. පුබ්බාපත්තීනං අන්තරාපත්ති නාම මූලවිසුද්ධියා අන්තරාපත්ති. අපරාපත්තීනං අන්තරාපත්ති නාම අග්ඝවිසුද්ධියා අන්තරාපත්ති. කුරුන්දියං පන ‘‘පුබ්බාපත්ති නාම පඨමං ආපන්නා. අපරාපත්ති නාම මානත්තාරහකාලෙ ආපන්නා. පුබ්බාපත්තීනං අන්තරාපත්ති නාම පරිවාසෙ ආපන්නා. අපරාපත්තීනං අන්තරාපත්ති [Pg.158] නාම මානත්තචාරෙ ආපන්නා’’ති වුත්තං. ඉදම්පි එකෙන පරියායෙන යුජ්ජති. 'पुब्बापत्ती' (पूर्व आपत्ती) म्हणजे प्रथम ओढवलेली आपत्ती. 'अपरापत्ती' (उत्तर आपत्ती) म्हणजे परिवास इत्यादींमध्ये नंतर ओढवलेली आपत्ती समजावी. पूर्व आपत्तींची 'अन्तरापत्ती' म्हणजे मूळ शुद्धीच्या वेळी (परिवास किंवा मानत्त आचरताना) मध्येच ओढवलेली आपत्ती. उत्तर आपत्तींची 'अन्तरापत्ती' म्हणजे मूल्य शुद्धीच्या वेळी मध्येच ओढवलेली आपत्ती. परंतु कुरुन्दी अट्ठकथेत म्हटले आहे की—'पुब्बापत्ती म्हणजे प्रथम ओढवलेली आपत्ती. अपरापत्ती म्हणजे मानत्त देण्याच्या योग्यतेच्या काळात ओढवलेली आपत्ती. पूर्व आपत्तींची अन्तरापत्ती म्हणजे परिवास आचरताना ओढवलेली आपत्ती. उत्तर आपत्तींची अन्तरापत्ती म्हणजे मानत्त आचरताना ओढवलेली आपत्ती.' हे देखील एका दृष्टीने योग्य ठरते. දෙසිතා ගණනූපගා නාම යා ධුරනික්ඛෙපං කත්වා පුන න ආපජ්ජිස්සාමීති දෙසිතා හොති. අගණනූපගා නාම යා ධුරනික්ඛෙපං අකත්වා සඋස්සාහෙනෙව චිත්තෙන අපරිසුද්ධෙන දෙසිතා හොති. අයඤ්හි දෙසිතාපි දෙසිතගණනං න උපෙති. අට්ඨමෙ වත්ථුස්මිං භික්ඛුනියා පාරාජිකමෙව හොති. පඤ්ඤත්ති ජානිතබ්බාතිආදීසු නවසු පදෙසු පඨමපාරාජිකපුච්ඡාය වුත්තනයෙනෙව විනිච්ඡයො වෙදිතබ්බො. 'देसिता गणनूपगा' (मोजणीत यायची देशना) म्हणजे जी आपत्ती पुन्हा न करण्याचा निश्चय करून देशना केली जाते. 'अगणनूपगा' (मोजणीत न येणारी देशना) म्हणजे जी आपत्ती पुन्हा न करण्याचा निश्चय न करता, केवळ उत्साहाने परंतु अशुद्ध चित्ताने देशना केली जाते. कारण अशी देशना केली तरी ती खऱ्या देशनेच्या मोजणीत येत नाही. आठव्या बाबतीत भिक्खुणीला पाराजिकच होते. 'पण्णत्ति जानितब्बा' इत्यादी नऊ पदांमध्ये पहिल्या पाराजिक प्रश्नात सांगितलेल्या पद्धतीनेच निर्णय समजावा. ථුල්ලවජ්ජාති ථුල්ලදොසෙ පඤ්ඤත්තා ගරුකාපත්ති. අථුල්ලවජ්ජාති ලහුකාපත්ති. ගිහිපටිසංයුත්තාති සුධම්මත්ථෙරස්ස ආපත්ති, යා ච ධම්මිකස්ස පටිස්සවස්ස අසච්චාපනෙ ආපත්ති, අවසෙසා න ගිහිපටිසංයුත්තා. පඤ්චානන්තරියකම්මාපත්ති නියතා, සෙසා අනියතා. ආදිකරොති සුදින්නත්ථෙරාදි ආදිකම්මිකො. අනාදිකරොති මක්කටිසමණාදි අනුපඤ්ඤත්තිකාරකො. අධිච්චාපත්තිකො නාම යො කදාචි කරහචි ආපත්තිං ආපජ්ජති. අභිණ්හාපත්තිකො නාම යො නිච්චං ආපජ්ජති. 'थुल्लवज्ज' म्हणजे मोठ्या दोषासाठी प्रज्ञप्त केलेली गुरुकापत्ती (मोठी आपत्ती) समजावी. 'अथुल्लवज्ज' म्हणजे लहुकापत्ती (हलकी आपत्ती) समजावी. 'गिहीपटिसंयुत्त' (गृहस्थांशी संबंधित) म्हणजे सुधम्म थेरांना आलेली आपत्ती, आणि धार्मिक वचनाचे पालन न केल्यामुळे जी आपत्ती येते ती समजावी. उर्वरित आपत्ती गृहस्थांशी संबंधित नसलेल्या समजाव्यात. पाच आनंतर्य कर्मांमुळे ओढवणारी आपत्ती ही 'नियत' (निश्चित) आहे, उर्वरित 'अनियत' आहेत. 'आदिकरोति' म्हणजे सुदिन्न थेर इत्यादी आदिकम्मिक (प्रथम उल्लंघन करणारे) समजावेत. 'अनादिकरोति' म्हणजे मक्कटीसमण (माकडीशी मैथुन करणारा भिक्खू) इत्यादी अनुपण्णत्तिकारक समजावेत. 'अधिच्चापत्तिक' म्हणजे जो कधीतरी किंवा क्वचितच आपत्ती ओढवून घेतो. 'अभिण्हापत्तिक' म्हणजे जो नेहमीच आपत्ती ओढवून घेतो. චොදකො නාම යො වත්ථුනා වා ආපත්තියා වා පරං චොදෙති. යො පන එවං චොදිතො අයං චුදිතකො නාම. පඤ්චදසසු ධම්මෙසු අප්පතිට්ඨහිත්වා අභූතෙන වත්ථුනා චොදෙන්තො අධම්මචොදකො නාම, තෙන තථා චොදිතො අධම්මචුදිතකො නාම. විපරියායෙන ධම්මචොදකචුදිතකා වෙදිතබ්බා. මිච්ඡත්තනියතෙහි වා සම්මත්තනියතෙහි වා ධම්මෙහි සමන්නාගතො නියතො, විපරීතො අනියතො. 'चोदक' (आरोप करणारा) म्हणजे जो घटनेने किंवा आपत्तीने दुसऱ्यावर आरोप करतो. आणि ज्याच्यावर असा आरोप केला जातो, तो 'चुदितक' (आरोपी) होय. पंधरा गुणांमध्ये प्रतिष्ठित न राहता असत्य घटनेने आरोप करणारा 'अधम्मचोदक' (अधार्मिक आरोपकर्ता) होय, आणि त्याने तसा आरोप केलेला व्यक्ती 'अधम्मचुदितक' होय. याच्या उलट 'धम्मचोदक' आणि 'धम्मचुदितक' समजावेत. मिच्छत्त-नियत (मिथ्यात्वात निश्चित) किंवा सम्मत्त-नियत (सम्यक्त्वात निश्चित) गुणांनी युक्त असलेला व्यक्ती 'नियत' होय, आणि याच्या उलट असलेला 'अनियत' होय. සාවකා භබ්බාපත්තිකා නාම, බුද්ධා ච පච්චෙකබුද්ධා ච අභබ්බාපත්තිකා නාම. උක්ඛෙපනීයකම්මකතො උක්ඛිත්තකො නාම, අවසෙසචතුබ්බිධතජ්ජනීයාදිකම්මකතො අනුක්ඛිත්තකො නාම. අයඤ්හි උපොසථං වා පවාරණං වා ධම්මපරිභොගං වා ආමිසපරිභොගං වා න කොපෙති. ‘‘මෙත්තියං භික්ඛුනිං නාසෙථ, දූසකො නාසෙතබ්බො, කණ්ටකො සමණුද්දෙසො නාසෙතබ්බො’’ති එවං ලිඞ්ගදණ්ඩකම්ම-සංවාසනාසනාහි නාසිතබ්බො නාසිතකො නාම. සෙසා සබ්බෙ අනාසිතකා. යෙන සද්ධිං උපොසථාදිකො සංවාසො අත්ථි, අයං සමානසංවාසකො, ඉතරො [Pg.159] නානාසංවාසකො. සො කම්මනානාසංවාසකො ලද්ධිනානාසංවාසකොති දුවිධො හොති. ඨපනං ජානිතබ්බන්ති ‘‘එකං භික්ඛවෙ අධම්මිකං පාතිමොක්ඛට්ඨපන’’න්තිආදිනා නයෙන වුත්තං පාතිමොක්ඛට්ඨපනං ජානිතබ්බන්ති අත්ථො. श्रावक हे 'भब्बापत्तिक' (आपत्ती ओढवून घेण्यास पात्र) असतात, आणि बुद्ध व प्रत्येकबुद्ध हे 'अभब्बापत्तिक' (आपत्ती ओढवून न घेणारे) असतात. ज्याच्यावर उक्खेपनीय कर्म (बहिष्कार) केले गेले आहे, तो 'उक्खित्तक' होय. उर्वरित चार प्रकारची तज्जनीय इत्यादी कर्मे ज्याच्यावर केली गेली आहेत, तो 'अनुक्खित्तक' होय. कारण हा (अनुक्खित्तक) उपोसथ, पवारणा, धम्म-परिभोग किंवा आमिष-परिभोग नष्ट करू शकत नाही. 'मेत्तिया भिक्खुणीचे निष्कासन करा, दूषकाचे निष्कासन करावे, कंटक समणुद्देसाचे निष्कासन करावे' अशा प्रकारे लिंग-नासन, दंडकर्म-नासन आणि संवास-नासन याद्वारे ज्याचे निष्कासन केले जाते, तो 'नासितक' होय. उर्वरित सर्व 'अनासितक' होत. ज्याच्यासोबत उपोसथ इत्यादी संवास (एकत्र राहणे) आहे, तो 'समानसंवासक' होय, आणि इतर व्यक्ती 'नानासंवासक' होय. तो 'कम्म-नानासंवासक' आणि 'लद्धि-नानासंवासक' असा दोन प्रकारचा असतो. 'ठपनं जानितब्बं' (स्थगित करणे समजावे) म्हणजे 'भिक्खूंनो, एक अधार्मिक पातिमोक्ख स्थगित करणे आहे' इत्यादी पद्धतीने सांगितलेले पातिमोक्ख स्थगित करणे समजावे, असा अर्थ आहे. එකකවාරවණ්ණනා නිට්ඨිතා. एककवार-वर्णना समाप्त झाली. දුකවාරවණ්ණනා दुकवार-वर्णना 322. දුකෙසු සචිත්තකා ආපත්ති සඤ්ඤාවිමොක්ඛා, අචිත්තකා නොසඤ්ඤාවිමොක්ඛා. ලද්ධසමාපත්තිකස්ස ආපත්ති නාම භූතාරොචනාපත්ති, අලද්ධසමාපත්තිකස්ස ආපත්ති නාම අභූතාරොචනාපත්ති. සද්ධම්මපටිසඤ්ඤුත්තා නාම පදසොධම්මාදිකා, අසද්ධම්මපටිසඤ්ඤුත්තා නාම දුට්ඨුල්ලවාචාපත්ති. සපරික්ඛාරපටිසඤ්ඤුත්තා නාම නිස්සග්ගියවත්ථුනො අනිස්සජ්ජිත්වා පරිභොගෙ, පත්තචීවරානං නිදහනෙ, කිලිට්ඨචීවරානං අධොවනෙ, මලග්ගහිතපත්තස්ස අපචනෙති එවං අයුත්තපරිභොගෙ ආපත්ති. පරපරික්ඛාරපටිසඤ්ඤුත්තා නාම සඞ්ඝිකමඤ්චපීඨාදීනං අජ්ඣොකාසෙ සන්ථරණඅනාපුච්ඡාගමනාදීසු ආපජ්ජිතබ්බා ආපත්ති. සපුග්ගලපටිසඤ්ඤුත්තා නාම ‘‘මුදුපිට්ඨිකස්ස ලම්බිස්ස ඌරුනා අඞ්ගජාතං පීළෙන්තස්සා’’තිආදිනා නයෙන වුත්තාපත්ති. පරපුග්ගලපටිසඤ්ඤුත්තා නාම මෙථුනධම්මකායසංසග්ගපහාරදානාදීසු වුත්තාපත්ති, ‘‘සිඛරණීසී’’ති සච්චං භණන්තො ගරුකං ආපජ්ජති, ‘‘සම්පජානමුසාවාදෙ පාචිත්තිය’’න්ති මුසා භණන්තො ලහුකං. අභූතාරොචනෙ මුසා භණන්තො ගරුකං. භූතාරොචනෙ සච්චං භණන්තො ලහුකං. ३२२. दुकांमध्ये (दोन-दोनच्या गटांमध्ये) सचित्तक आपत्ती ही 'संज्ञाविमोक्षा' (जाणिवेने मुक्त होणारी) असते, आणि अचित्तक आपत्ती ही 'नोसंज्ञाविमोक्षा' (जाणिवेने मुक्त न होणारी) असते. समापत्ती प्राप्त केलेल्याची आपत्ती म्हणजे 'भूत-आरोचन' आपत्ती (खऱ्या गुणांचे प्रकटीकरण करण्याची आपत्ती) होय, आणि समापत्ती प्राप्त न केलेल्याची आपत्ती म्हणजे 'अभूत-आरोचन' आपत्ती (खोट्या गुणांचे प्रकटीकरण करण्याची आपत्ती) होय. सद्धम्माशी संबंधित आपत्ती म्हणजे 'पदसोधम्म' इत्यादी आपत्ती होत. असद्धम्माशी संबंधित आपत्ती म्हणजे 'दुट्ठुल्लवाचा' आपत्ती (अश्लील बोलण्याची आपत्ती) होय. स्वतःच्या परिष्काराशी (साहित्याशी) संबंधित आपत्ती म्हणजे निस्सग्गिय वस्तूचा त्याग न करता तिचा उपभोग घेणे, पात्र व चीवर उन्हात दीर्घकाळ ठेवणे, मळलेले चीवर न धुणे, मळकटलेले पात्र न भाजणे अशा प्रकारे अयोग्य उपभोगामुळे ओढवणारी आपत्ती होय. दुसऱ्याच्या परिष्काराशी संबंधित आपत्ती म्हणजे संघिक मंच, पीठ इत्यादी उघड्यावर पसरून न विचारता निघून जाणे इत्यादींमुळे ओढवणारी आपत्ती होय. स्वतःच्या शरीराशी संबंधित आपत्ती म्हणजे 'मऊ पाठीचा असलेला, लोंबणारा अवयव असलेला, मांड्यांनी जननेंद्रिय दाबणारा' इत्यादी पद्धतीने सांगितलेली आपत्ती होय. दुसऱ्या व्यक्तीशी संबंधित आपत्ती म्हणजे मैथुनधर्म, कायसंसर्ग (शारीरिक स्पर्श), प्रहार करणे इत्यादींमध्ये सांगितलेली आपत्ती होय. 'तू शिखरिणी आहेस' असे खरे बोलणारा भिक्खू गुरुकापत्ती ओढवून घेतो, आणि 'जाणूनबुजून खोटे बोलल्यास पाचित्तिय होते' या नियमानुसार खोटे बोलणारा लहुकापत्ती ओढवून घेतो. असत्य गुणांचे प्रकटीकरण करताना खोटे बोलणारा गुरुकापत्ती ओढवून घेतो, आणि सत्य गुणांचे प्रकटीकरण करताना खरे बोलणारा लहुकापत्ती ओढवून घेतो. ‘‘සඞ්ඝකම්මං වග්ගං කරිස්සාමී’’ති අන්තොසීමාය එකමන්තෙ නිසීදන්තො භූමිගතො ආපජ්ජති නාම. සචෙ පන අඞ්ගුලිමත්තම්පි ආකාසෙ තිට්ඨෙය්ය, න ආපජ්ජෙය්ය, තෙන වුත්තං ‘‘නො වෙහාසගතො’’ති. වෙහාසකුටියා ආහච්චපාදකං මඤ්චං වා පීඨං වා අභිනිසීදන්තො වෙහාසගතො ආපජ්ජති නාම. සචෙ පන තං භූමියං පඤ්ඤාපෙත්වා නිපජ්ජෙය්ය න ආපජ්ජෙය්ය, තෙන වුත්තං – ‘‘නො භූමිගතො’’ති. ගමියො ගමියවත්තං අපූරෙත්වා ගච්ඡන්තො නික්ඛමන්තො ආපජ්ජති නාම, නො පවිසන්තො. ආගන්තුකො ආගන්තුකවත්තං අපූරෙත්වා සඡත්තුපාහනො පවිසන්තො පවිසන්තො ආපජ්ජති නාම, නො නික්ඛමන්තො. 'मी संघकर्म भिन्न (विभक्त) करीन' असा विचार करून सीमेच्या आत एका बाजूला बसणारा भिक्खू जमिनीवर बसलेला असल्यास आपत्ती ओढवून घेतो. परंतु जर तो बोटभर देखील हवेत राहिला, तर आपत्ती ओढवून घेणार नाही; म्हणूनच म्हटले आहे—'वेहासगत (हवेत असलेला) नाही'. वेहासकुटीमध्ये (हवेतील कुटीत) जोडलेल्या पायांच्या मंचावर किंवा पीठावर जोरात बसणारा भिक्खू हवेत राहून आपत्ती ओढवून घेतो. परंतु जर तो मंच जमिनीवर ठेवून त्यावर झोपला, तर आपत्ती ओढवून घेणार नाही; म्हणूनच म्हटले आहे—'भूमीगत (जमिनीवर असलेला) नाही'. प्रवासाला निघणारा भिक्खू प्रवासाचे कर्तव्य पूर्ण न करता जात असताना विहारामधून बाहेर पडताना आपत्ती ओढवून घेतो, प्रवेश करताना नाही. आगंतुक (नवीन आलेला) भिक्खू आगंतुक कर्तव्य पूर्ण न करता, छत्री व पादत्राणांसह विहारामध्ये प्रवेश करताना आपत्ती ओढवून घेतो, बाहेर पडताना नाही. ආදියන්තො [Pg.160] ආපජ්ජති නාම භික්ඛුනී අතිගම්භීරං උදකසුද්ධිකං ආදියමානා; දුබ්බණ්ණකරණං අනාදියිත්වා චීවරං පරිභුඤ්ජන්තො පන අනාදියන්තො ආපජ්ජති නාම. මූගබ්බතාදීනි තිත්ථියවත්තානි සමාදියන්තො සමාදියන්තො ආපජ්ජති නාම. පාරිවාසිකාදයො පන තජ්ජනීයාදිකම්මකතා වා අත්තනො වත්තං අසමාදියන්තා ආපජ්ජන්ති, තෙ සන්ධාය වුත්තං ‘‘අත්ථාපත්ති න සමාදියන්තො ආපජ්ජතී’’ති. අඤ්ඤාතිකාය භික්ඛුනියා චීවරං සිබ්බන්තො වෙජ්ජකම්මභණ්ඩාගාරිකකම්මචිත්තකම්මාදීනි වා කරොන්තො කරොන්තො ආපජ්ජති නාම. උපජ්ඣායවත්තාදීනි අකරොන්තො අකරොන්තො ආපජ්ජති නාම. අඤ්ඤාතිකාය භික්ඛුනියා චීවරං දදමානො දෙන්තො ආපජ්ජති නාම. සද්ධිවිහාරිකඅන්තෙවාසිකානං චීවරාදීනි අදෙන්තො අදෙන්තො ආපජ්ජති නාම. අඤ්ඤාතිකාය භික්ඛුනියා චීවරං ගණ්හන්තො පටිග්ගණ්හන්තො ආපජ්ජති නාම. ‘‘න භික්ඛවෙ ඔවාදො න ගහෙතබ්බො’’ති වචනතො ඔවාදං අගණ්හන්තො න පටිග්ගණ්හන්තො ආපජ්ජති නාම. दोन बोटांपेक्षा अधिक खोल पाण्यातून पाणी घेऊन शुद्धता ग्रहण करणारी भिक्खुणी 'ग्रहण करून आपत्तीला प्राप्त होणारी' (आदियन्तो आपज्जति) म्हटली जाते. परंतु, विरूप करणारा कप्पबिंदू न घेता चीवराचा उपभोग घेणारा भिक्खू 'न ग्रहण करता आपत्तीला प्राप्त होणारा' (अनादियन्तो आपज्जति) म्हटला जातो. मुके राहण्याचे व्रत (मूकव्रत) इत्यादींसारख्या तीर्थिक व्रतांचे समादान (स्वीकार) करणारा भिक्खू 'समादान करून आपत्तीला प्राप्त होणारा' (समादियन्तो आपज्जति) म्हटला जातो. परंतु, परिवास (पारिवासिक) इत्यादींमध्ये असलेले किंवा तज्जनीय-कर्म इत्यादी शिक्षा झालेले भिक्खू जेव्हा आपापल्या कर्तव्यांचे (वत्त) समादान करत नाहीत, तेव्हा ते आपत्तीला प्राप्त होतात. त्यांना उद्देशूनच असे म्हटले आहे की, 'अशी आपत्ती आहे जी समादान न केल्याने प्राप्त होते' (अत्थापत्ति न समादियन्तो आपज्जति). नातेवाईक नसलेल्या भिक्खुणीचे चीवर शिवणारा किंवा वैद्यकीय काम (वैद्यकर्म), भांडारगृहाचे काम (भांडागारिककर्म), चित्रकाम (चित्रकर्म) इत्यादी कामे करणारा भिक्खू 'करून आपत्तीला प्राप्त होणारा' (करन्तो आपज्जति) म्हटला जातो. उपाध्याय-व्रत (उपज्झायवत्त) इत्यादी कर्तव्ये न करणारा 'न करून आपत्तीला प्राप्त होणारा' (अकरन्तो आपज्जति) म्हटला जातो. नातेवाईक नसलेल्या भिक्खुणीला चीवर देणारा भिक्खू 'देऊन आपत्तीला प्राप्त होणारा' (देन्तो आपज्जति) म्हटला जातो. सार्धविहारी आणि अंतेवासी शिष्यांना चीवर इत्यादी न देणारा भिक्खू 'न देऊन आपत्तीला प्राप्त होणारा' (अदेन्तो आपज्जति) म्हटला जातो. नातेवाईक नसलेल्या भिक्खुणीकडून चीवर स्वीकारणारा भिक्खू 'स्वीकारून आपत्तीला प्राप्त होणारा' (पटिग्गण्हन्तो आपज्जति) म्हटला जातो. “हे भिक्खूंनो, उपदेश ग्रहण न करता राहू नये” या वचनानुसार, उपदेश ग्रहण न करणारा भिक्खू 'न स्वीकारून आपत्तीला प्राप्त होणारा' (न पटिग्गण्हन्तो आपज्जति) म्हटला जातो. නිස්සග්ගියවත්ථුං අනිස්සජ්ජිත්වා පරිභුඤ්ජන්තො පරිභොගෙන ආපජ්ජති නාම. පඤ්චාහිකං සඞ්ඝාටිචාරං අතික්කාමයමානා අපරිභොගෙන ආපජ්ජති නාම. සහගාරසෙය්යං රත්තිං ආපජ්ජති නාම, නො දිවා, ද්වාරං අසංවරිත්වා පටිසල්ලීයන්තො දිවා ආපජ්ජති, නො රත්තිං. එකරත්තඡාරත්තසත්තාහදසාහමාසාතික්කමෙසු වුත්තආපත්තිං ආපජ්ජන්තො අරුණුග්ගෙ ආපජ්ජති නාම, පවාරෙත්වා භුඤ්ජන්තො න අරුණුග්ගෙ ආපජ්ජති නාම. निसग्गिय वस्तूचा त्याग न करता तिचा उपभोग घेणारा भिक्खू 'उपभोगाने आपत्तीला प्राप्त होणारा' (परिभोगेन आपज्जति) म्हटला जातो. पाच दिवसांपेक्षा अधिक काळ संघाटी चीवर बाजूला ठेवणारी (संघाटिचार ओलांडणारी) भिक्खुणी 'उपभोग न घेतल्याने आपत्तीला प्राप्त होणारी' (अपरिभोगेन आपज्जति) म्हटली जाते. एकाच छताखाली एकत्र झोपण्याचे (सहगारसेय्य) वर्तन करणारा भिक्खू रात्रीच्या वेळी आपत्तीला प्राप्त होतो, दिवसा नाही. दार बंद न करता दिवसा एकांतात विश्रांती घेणारा भिक्खू दिवसा आपत्तीला प्राप्त होतो, रात्री नाही. एक रात्र, सहा रात्री, सात दिवस, दहा दिवस किंवा एक महिना ओलांडल्यामुळे सांगितलेल्या आपत्तीला प्राप्त होणारा भिक्खू अरुणोदयाच्या वेळी (अरुणुग्गे) आपत्तीला प्राप्त होतो. पवारणा केल्यानंतर भोजन करणारा भिक्खू अरुणोदयाच्या वेळी आपत्तीला प्राप्त होत नाही. භූතගාමඤ්චෙව අඞ්ගජාතඤ්ච ඡින්දන්තො ඡින්දන්තො ආපජ්ජති නාම, කෙසෙ වා නඛෙ වා න ඡින්දන්තො න ඡින්දන්තො ආපජ්ජති නාම. ආපත්තිං ඡාදෙන්තො ඡාදෙන්තො ආපජ්ජති නාම, ‘‘තිණෙන වා පණ්ණෙන වා පටිච්ඡාදෙත්වා ආගන්තබ්බං, නත්වෙව නග්ගෙන ආගන්තබ්බං, යො ආගච්ඡෙය්ය ආපත්ති දුක්කටස්සා’’ති ඉමං පන ආපත්තිං න ඡාදෙන්තො ආපජ්ජති නාම. කුසචීරාදීනි ධාරෙන්තො ධාරෙන්තො ආපජ්ජති නාම, ‘‘අයං තෙ භික්ඛු පත්තො යාව භෙදනාය ධාරෙතබ්බො’’ති ඉමං ආපත්තිං න ධාරෙන්තො ආපජ්ජති නාම. वनस्पती (भूतगाम) किंवा जननेंद्रिय (अंगजात) तोडणारा भिक्खू 'तोडल्यामुळे आपत्तीला प्राप्त होणारा' (छिन्दन्तो आपज्जति) म्हटला जातो. केस किंवा नखे न कापणारा भिक्खू 'न कापल्यामुळे आपत्तीला प्राप्त होणारा' (न छिन्दन्तो आपज्जति) म्हटला जातो. आपत्ती लपवून ठेवणारा भिक्खू 'लपविल्यामुळे आपत्तीला प्राप्त होणारा' (छादेन्तो आपज्जति) म्हटला जातो. परंतु, “गवताने किंवा पानांनी स्वतःला झाकून यावे, नग्न अवस्थेत येऊ नये; जो नग्न येईल त्याला दुक्कट आपत्ती प्राप्त होईल” या नियमाचे उल्लंघन करून, स्वतःला न झाकता येणारा भिक्खू 'न झाकल्यामुळे आपत्तीला प्राप्त होणारा' (न छादेन्तो आपज्जति) म्हटला जातो. कुश-चीवर (कुश गवताचे वस्त्र) इत्यादी परिधान करणारा भिक्खू 'परिधान केल्यामुळे आपत्तीला प्राप्त होणारा' (धारेन्तो आपज्जति) म्हटला जातो. “हा तुझा भिक्खू-पात्र जोपर्यंत फुटत नाही तोपर्यंत तो सांभाळला पाहिजे” या नियमाचे उल्लंघन करून, पात्र न सांभाळणारा भिक्खू 'न सांभाळल्यामुळे आपत्तीला प्राप्त होणारा' (न धारेन्तो आपज्जति) म्हटला जातो. ‘‘අත්තනා වා අත්තානං නානාසංවාසකං කරොතී’’ති එකසීමායං ද්වීසු සඞ්ඝෙසු නිසින්නෙසු එකස්මිං පක්ඛෙ නිසීදිත්වා පරපක්ඛස්ස ලද්ධිං ගණ්හන්තො යස්මිං [Pg.161] පක්ඛෙ නිසින්නො තෙසං අත්තනාව අත්තානං නානාසංවාසකං කරොති නාම. යෙසං සන්තිකෙ නිසින්නො තෙසං ගණපූරකො හුත්වා කම්මං කොපෙති, ඉතරෙසං හත්ථපාසං අනාගතත්තා. සමානසංවාසකෙපි එසෙව නයො. යෙසඤ්හි සො ලද්ධිං රොචෙති, තෙසං සමානසංවාසකො හොති, ඉතරෙසං නානාසංවාසකො. සත්ත ආපත්තියො සත්ත ආපත්තික්ඛන්ධාති ආපජ්ජිතබ්බතො ආපත්තියො, රාසට්ඨෙන ඛන්ධාති එවං ද්වෙයෙව නාමානි හොන්තීති නාමවසෙන දුකං දස්සිතං. කම්මෙන වා සලාකග්ගාහෙන වාති එත්ථ උද්දෙසො චෙව කම්මඤ්ච එකං, වොහාරො චෙව අනුස්සාවනා ච සලාකග්ගාහො ච එකං, වොහාරානුස්සාවනසලාකග්ගාහා පුබ්බභාගා, කම්මඤ්චෙව උද්දෙසො ච පමාණං. “स्वतःच स्वतःला नानासंवासक (वेगळ्या संवासाचा) करतो” याचा अर्थ असा की, एकाच सीमेमध्ये दोन संघ बसलेले असताना, एका बाजूला बसून दुसऱ्या बाजूचे मत (लद्धि) स्वीकारणारा भिक्खू, ज्या बाजूला तो बसला आहे त्यांच्यासाठी स्वतःच स्वतःला नानासंवासक करतो. ज्यांच्या जवळ तो बसला आहे, त्यांचा गण पूर्ण करणारा (गणपूरक) होऊन, इतरांच्या हस्तपाशामध्ये न आल्यामुळे तो संघाच्या कर्माला बाधा आणतो. समानसंवासक (समान संवासाचा भिक्खू) याच्या बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. कारण, तो ज्यांच्या मताचे समर्थन करतो, त्यांचा तो समानसंवासक होतो आणि इतरांचा नानासंवासक होतो. “सात आपत्ती आणि सात आपत्ती-स्कंध” म्हणजे प्राप्त होण्यायोग्य असल्यामुळे त्यांना 'आपत्ती' म्हणतात, आणि समूहाच्या अर्थाने त्यांना 'स्कंध' म्हणतात. अशा प्रकारे ही दोनच नावे आहेत; नावांच्या आधारे हा द्विक (दुक) दर्शविला आहे. “संघाच्या कर्माने किंवा शलाका-ग्रहणाने” या वाक्याचा निर्णय असा समजला पाहिजे: उद्देश (पातिमोक्ख पठण) आणि संघकर्म हे संघभेदाचे एक कारण आहे. व्यवहार (मत मांडणे), अनुसावन (घोषणा करणे) आणि शलाका-ग्रहण (मतदान करणे) हे दुसरे कारण आहे. व्यवहार, अनुसावन आणि शलाका-ग्रहण हे संघभेदाच्या कर्माचे पूर्वभाग (प्राथमिक टप्पे) आहेत. परंतु संघकर्म आणि उद्देश हेच मुख्य प्रमाण (निर्णायक) आहेत. අද්ධානහීනො නාම ඌනවීසතිවස්සො. අඞ්ගහීනො නාම හත්ථච්ඡින්නාදිභෙදො. වත්ථුවිපන්නො නාම පණ්ඩකො තිරච්ඡානගතො උභතොබ්යඤ්ජනකො ච. අවසෙසා ථෙය්යසංවාසකාදයො අට්ඨ අභබ්බපුග්ගලා කරණදුක්කටකා නාම. දුක්කටකිරියා දුක්කටකම්මා, ඉමස්මිංයෙව අත්තභාවෙ කතෙන අත්තනො කම්මෙන අභබ්බට්ඨානං පත්තාති අත්ථො. අපරිපූරො නාම අපරිපුණ්ණපත්තචීවරො. නො ච යාචති නාම උපසම්පදං න යාචති. අලජ්ජිස්ස ච බාලස්ස චාති අලජ්ජී සචෙපි තෙපිටකො හොති, බාලො ච සචෙපි සට්ඨිවස්සො හොති, උභොපි නිස්සාය න වත්ථබ්බං. බාලස්ස ච ලජ්ජිස්ස චාති එත්ථ බාලස්ස ‘‘ත්වං නිස්සයං ගණ්හා’’ති ආණායපි නිස්සයො දාතබ්බො, ලජ්ජිස්ස පන යාචන්තස්සෙව. සාතිසාරන්ති සදොසං; යං අජ්ඣාචරන්තො ආපත්තිං ආපජ්ජති. वीस वर्षांपेक्षा कमी वय असलेला व्यक्ती 'अद्धाहीन' (वयोमर्यादा नसलेला) म्हटला जातो. हात कापलेला इत्यादी शारीरिक दोष असलेला व्यक्ती 'अंगहीन' म्हटला जातो. पंडक (नपुंसक), तिर्यंच (प्राणी) आणि उभतोब्यंजनक (उभयलिंगी) हे 'वस्तुविपन्न' (दीक्षेसाठी अपात्र व्यक्ती) म्हटले जातात. या तिन्हींव्यतिरिक्त उरलेले थेय्यसंवासक (चोरीने संघात राहणारे) इत्यादी आठ प्रकारचे अभव्य पुद्गल (अपात्र व्यक्ती) 'करणदुक्कट' म्हटले जातात. याचा अर्थ असा की, वाईट कृत्य करणारे आणि वाईट कर्म करणारे हे थेय्यसंवासक इत्यादी व्यक्ती याच जन्मात (अत्तभाव) स्वतःच्या कर्मामुळे अभव्यतेच्या (अपात्रतेच्या) स्थितीला प्राप्त झाले आहेत. ज्यांच्याकडे पूर्ण पात्र आणि चीवर नाही, असा भिक्खू 'अपरिपूर' म्हटला जातो. जो उपसंपदेची (दीक्षेची) याचना करत नाही, तो 'न याचना करणारा' (नो च याचति) म्हटला जातो. “अलज्जी (निर्लज्ज) आणि बाल (अज्ञानी) यांच्या जवळ” याचा अर्थ असा की, अलज्जी व्यक्ती जरी त्रिपिटकधारी असला, आणि बाल व्यक्ती जरी साठ वर्षांचा असला, तरीही त्या दोघांच्या आश्रयाने (निस्सय) राहू नये. “बाल आणि लज्जी यांच्या जवळ” या वाक्यात, बाल व्यक्तीला “तू आश्रय ग्रहण कर” अशी आज्ञा देऊनही आश्रय दिला पाहिजे; परंतु लज्जी व्यक्तीला त्याने याचना केल्यावरच आश्रय दिला पाहिजे. “सातिसार” म्हणजे सदोष; ज्या वस्तूचे उल्लंघन केल्याने व्यक्ती आपत्तीला प्राप्त होतो, अशा सदोष वस्तूचे उल्लंघन करण्यास ते अपात्र (अभव्य) असतात. කායෙන පටික්කොසනා නාම හත්ථවිකාරාදීහි පටික්කොසනා. කායෙන පටිජානාතීති හත්ථවිකාරාදීහි පටිජානාති. උපඝාතිකා නාම උපඝාතා. සික්ඛූපඝාතිකා නාම සික්ඛූපඝාතො. භොගූපඝාතිකා නාම පරිභොගූපඝාතො, තත්ථ තිස්සො සික්ඛා අසික්ඛතො සික්ඛූපඝාතිකාති වෙදිතබ්බා. සඞ්ඝිකං වා පුග්ගලිකං වා දුප්පරිභොගං භුඤ්ජතො භොගූපඝාතිකාති වෙදිතබ්බා. ද්වෙ වෙනයිකාති ද්වෙ අත්ථා විනයසිද්ධා. පඤ්ඤත්තං නාම සකලෙ විනයපිටකෙ කප්පියාකප්පියවසෙන පඤ්ඤත්තං. පඤ්ඤත්තානුලොමං නාම චතූසු මහාපදෙසෙසු දට්ඨබ්බං. සෙතුඝාතොති පච්චයඝාතො; යෙන චිත්තෙන අකප්පියං කරෙය්ය, තස්ස චිත්තස්සාපි අනුප්පාදනන්ති අත්ථො. මත්තකාරිතාති මත්තාය [Pg.162] පමාණෙන කරණං; පමාණෙ ඨානන්ති අත්ථො. කායෙන ආපජ්ජතීති කායද්වාරිකං කායෙන ආපජ්ජති; වචීද්වාරිකං වාචාය. කායෙන වුට්ඨාතීති තිණවත්ථාරකසමථෙ විනාපි දෙසනාය කායෙනෙව වුට්ඨාති; දෙසෙත්වා වුට්ඨහන්තො පන වාචාය වුට්ඨාති. අබ්භන්තරපරිභොගො නාම අජ්ඣොහරණපරිභොගො. බාහිරපරිභොගො නාම සීසමක්ඛනාදි. हातांच्या हालचाली इत्यादींद्वारे नकार देणे म्हणजे 'कायेने नकार देणे' (कायेन पटिक्कोसना) होय. “कायेने स्वीकार करतो” म्हणजे हातांच्या हालचाली इत्यादींद्वारे होकार देणे किंवा स्वीकारणे. विनाश किंवा हानी करणे याला 'उपघातिका' म्हणतात. शिक्षेची (सिक्खा) हानी करणे म्हणजे 'सिक्खूपघातिका' होय. उपभोगाच्या वस्तूंची हानी करणे म्हणजे 'भोगूपघातिका' होय. त्यापैकी, three शिक्षांचे (तिस्सो सिक्खा) पालन न करणाऱ्या व्यक्तीच्या बाबतीत होणाऱ्या हानीला 'सिक्खूपघातिका' समजावे. संघाच्या किंवा वैयक्तिक मालकीच्या वस्तूंचा अयोग्य पद्धतीने उपभोग घेणाऱ्या व्यक्तीच्या बाबतीत होणाऱ्या हानीला 'भोगूपघातिका' समजावे. “दोन वेनयिक” म्हणजे विनय नियमांमध्ये सिद्ध झालेले दोन अर्थ. संपूर्ण विनयपिटकात कप्पिय (योग्य) आणि अकप्पिय (अयोग्य) या स्वरूपात जे प्रज्ञप्त (नियमबद्ध) केले आहे, त्याला 'प्रज्ञप्त' (पञ्ञत्त) म्हणतात. 'प्रज्ञप्तानुलोम' (पञ्ञत्तानुलोम) हे चार महापदेशांमध्ये पाहिले पाहिजे. “सेतुघात” म्हणजे मूळ कारणाचा (प्रत्ययाचा) नाश करणे; याचा अर्थ असा की, ज्या चित्तामुळे मनुष्य अकप्पिय (अयोग्य) कृत्य करतो, त्या चित्तालाच उत्पन्न न होऊ देणे. “मत्तकारिता” म्हणजे योग्य प्रमाणात (मत्ता) कृत्य करणे; योग्य मर्यादेत राहणे असा याचा अर्थ आहे. “कायेने आपत्तीला प्राप्त होतो” म्हणजे कायद्वाराने होणाऱ्या आपत्तीला शरीराने प्राप्त होणे; आणि वचीद्वाराने होणाऱ्या आपत्तीला वाणीने प्राप्त होणे. “कायेने उठतो (मुक्त होतो)” म्हणजे तिणवत्थारक समथामध्ये देशना (प्रकटीकरण) न करताही केवळ शरीरानेच आपत्तीतून मुक्त होणे; परंतु देशना करून मुक्त होणारा व्यक्ती वाणीने मुक्त होतो. अन्न गिळणे किंवा खाणे या स्वरूपातील उपभोगाला 'अभ्यंतर उपभोग' (अब्भन्तरपरिभोग) म्हणतात. डोक्याला तेल लावणे इत्यादी स्वरूपातील उपभोगाला 'बाह्य उपभोग' (बाहिरपरिभोग) म्हणतात. අනාගතං භාරං වහතීති අථෙරොව සමානො ථෙරෙහි වහිතබ්බං බීජනගාහධම්මජ්ඣෙසනාදිභාරං වහති; තං නිත්ථරිතුං වීරියං ආරභති. ආගතං භාරං න වහතීති ථෙරො ථෙරකිච්චං න කරොති, ‘‘අනුජානාමි භික්ඛවෙ ථෙරෙන භික්ඛුනා සාමං වා ධම්මං භාසිතුං, පරං වා අජ්ඣෙසිතුං, අනුජානාමි භික්ඛවෙ ථෙරාධෙය්යං පාතිමොක්ඛ’’න්ති එවමාදි සබ්බං පරිහාපෙතීති අත්ථො. න කුක්කුච්චායිතබ්බං කුක්කුච්චායතීති න කුක්කුච්චායිතබ්බං කුක්කුච්චායිත්වා කරොති. කුක්කුච්චායිතබ්බං න කුක්කුච්චායතීති කුක්කුච්චායිතබ්බං න කුක්කුච්චායිත්වා කරොති. එතෙසං ද්වින්නං දිවා ච රත්තො ච ආසවා වඩ්ඪන්තීති අත්ථො. අනන්තරදුකෙපි වුත්තපටිපක්ඛවසෙන අත්ථො වෙදිතබ්බො. සෙසං තත්ථ තත්ථ වුත්තනයත්තා උත්තානමෙවාති. ‘भविष्यातील ओझे वाहतो’ म्हणजे स्वतः थेर नसतानाही, थेरांनी वाहण्याचे ओझे (जसे की पंखा हातात घेणे, धम्मदेशनेसाठी आमंत्रित करणे इत्यादी जबाबदाऱ्या) वाहतो; ते पूर्ण करण्यासाठी वीर्य (प्रयत्न) आरंभ करतो. ‘आलेले ओझे वाहत नाही’ म्हणजे थेर असूनही थेरांचे कर्तव्य करत नाही, जसे की— 'भिक्खूंनो, मी अनुमती देतो की थेर भिक्खूने स्वतः धम्म सांगावा किंवा दुसऱ्याला आमंत्रित करावे; भिक्खूंनो, मी अनुमती देतो की पातिमोक्ख थेरांच्या अधीन असावे' इत्यादी सर्व कर्तव्ये तो सोडून देतो, असा अर्थ आहे. ‘शंका न घेण्यासारख्या गोष्टीवर शंका घेतो’ म्हणजे शंका न घेण्यासारख्या गोष्टीवर शंका घेऊन ती करतो. ‘शंका घेण्यासारख्या गोष्टीवर शंका घेत नाही’ म्हणजे शंका घेण्यासारख्या गोष्टीवर शंका न घेता ती करतो. ‘या दोन्ही व्यक्तींचे दिवस आणि रात्र आसव वाढतात’ असा अर्थ आहे. पुढील द्विकामध्येही (दुकामध्ये) सांगितलेल्या विरुद्ध अर्थाने अर्थ समजून घ्यावा. उर्वरित भाग त्या त्या ठिकाणी सांगितलेल्या पद्धतीने स्पष्टच आहे. දුකවාරවණ්ණනා නිට්ඨිතා. द्विक-वाराचे (दुकवार) स्पष्टीकरण समाप्त झाले. තිකවාරවණ්ණනා त्रिक-वाराचे (तिकवार) स्पष्टीकरण 323. තිකෙසු අත්ථාපත්ති තිට්ඨන්තෙ භගවති ආපජ්ජතීති අත්ථි ආපත්ති, යං තිට්ඨන්තෙ භගවති ආපජ්ජතීති අත්ථො. එසෙව නයො සබ්බත්ථ. තත්ථ ලොහිතුප්පාදාපත්තිං තිට්ඨන්තෙ ආපජ්ජති. ‘‘එතරහි ඛො පනානන්ද, භික්ඛූ අඤ්ඤමඤ්ඤං ආවුසොවාදෙන සමුදාචරන්ති, න වො මමච්චයෙන එවං සමුදාචරිතබ්බං, නවකෙන, ආනන්ද, භික්ඛුනා ථෙරො භික්ඛූ ‘භන්තෙ’ති වා ‘ආයස්මා’ති වා සමුදාචරිතබ්බො’’ති වචනතො ථෙරං ආවුසොවාදෙන සමුදාචරණපච්චයා ආපත්තිං පරිනිබ්බුතෙ භගවති ආපජ්ජති, නො තිට්ඨන්තෙ. ඉමා ද්වෙ ආපත්තියො ඨපෙත්වා අවසෙසා ධරන්තෙපි භගවති ආපජ්ජති, පරිනිබ්බුතෙපි. ३२३. त्रिकांमध्ये (तिकेसु) 'भगवान जिवंत असताना जी आपत्ती ओढवून घेतली जाते, अशी आपत्ती आहे' असा अर्थ आहे. सर्व ठिकाणी हाच नियम लागू होतो. त्यामध्ये, लोहितुत्पाद आपत्ती (बुद्धांच्या शरीरातून रक्त काढणे) ही भगवान जिवंत असतानाच ओढवून घेतली जाते. 'आनंदा, आता भिक्खू एकमेकांना 'आवुसो' या शब्दाने संबोधित करतात. माझ्या पश्चात तुम्ही असे संबोधित करू नये. आनंदा, नवशिक्या भिक्खूने थेर भिक्खूला 'भन्ते' किंवा 'आयस्मा' असे संबोधित करावे' या वचनानुसार, थेर भिक्खूला 'आवुसो' म्हणून संबोधित केल्यामुळे होणारी आपत्ती भगवान परिनिर्वाण पावल्यानंतर ओढवून घेतली जाते, भगवान जिवंत असताना नाही. या दोन आपत्ती वगळता, उर्वरित आपत्ती भगवान जिवंत असताना किंवा परिनिर्वाण पावल्यानंतरही ओढवून घेतल्या जातात. පවාරෙත්වා අනතිරිත්තං භුඤ්ජන්තො ආපත්තිං කාලෙ ආපජ්ජති නො විකාලෙ. විකාලභොජනාපත්තිං පන විකාලෙ ආපජ්ජති නො කාලෙ. අවසෙසා [Pg.163] කාලෙ චෙව ආපජ්ජති විකාලෙ ච. සහගාරසෙය්යං රත්තිං ආපජ්ජති, ද්වාරං අසංවරිත්වා පටිසල්ලීයනං දිවා. සෙසා රත්තිඤ්චෙව දිවා ච. ‘‘දසවස්සොම්හි අතිරෙකදසවස්සොම්හී’’ති බාලො අබ්යත්තො පරිසං උපට්ඨාපෙන්තො දසවස්සො ආපජ්ජති නො ඌනදසවස්සො. ‘‘අහං පණ්ඩිතො බ්යත්තො’’ති නවො වා මජ්ඣිමො වා පරිසං උපට්ඨාපෙන්තො ඌනදසවස්සො ආපජ්ජති නො දසවස්සො. සෙසා දසවස්සො චෙව ආපජ්ජති ඌනදසවස්සො ච. ‘‘පඤ්චවස්සොම්හී’’ති බාලො අබ්යත්තො අනිස්සාය වසන්තො පඤ්චවස්සො ආපජ්ජති. ‘‘අහං පණ්ඩිතො බ්යත්තො’’ති නවකො අනිස්සාය වසන්තො ඌනපඤ්චවස්සො ආපජ්ජති. සෙසං පඤ්චවස්සො චෙව ආපජ්ජති ඌනපඤ්චවස්සො ච. අනුපසම්පන්නං පදසොධම්මං වාචෙන්තො, මාතුගාමස්ස ධම්මං දෙසෙන්තො එවරූපං ආපත්තිං කුසලචිත්තො ආපජ්ජති, පාරාජික-සුක්කවිස්සට්ඨි-කායසංසග්ග-දුට්ඨුල්ල-අත්තකාමපාරිචරිය-දුට්ඨදොස-සඞ්ඝභෙදපහාරදාන-තලසත්තිකාදිභෙදං අකුසලචිත්තො ආපජ්ජති, අසඤ්චිච්ච සහගාරසෙය්යාදිං අබ්යාකතචිත්තො ආපජ්ජති, යං අරහාව ආපජ්ජති, සබ්බං අබ්යාකතචිත්තොව ආපජ්ජති, මෙථුනධම්මාදිභෙදමාපත්තිං සුඛවෙදනාසමඞ්ගී ආපජ්ජති, දුට්ඨදොසාදිභෙදං දුක්ඛවෙදනාසමඞ්ගී, යං සුඛවෙදනාසමඞ්ගී ආපජ්ජති, තංයෙව මජ්ඣත්තො හුත්වා ආපජ්ජන්තො අදුක්ඛමසුඛවෙදනාසමඞ්ගී ආපජ්ජති. पवारणा केल्यानंतर (अतिरिक्त न केलेले अन्न) खाणारा भिक्खू योग्य वेळी (सकाळी) आपत्ती ओढवून घेतो, विकाल (दुपारनंतर) वेळी नाही. विकाल-भोजन आपत्ती मात्र विकाल वेळी ओढवून घेतो, योग्य वेळी नाही. उर्वरित आपत्ती योग्य वेळी आणि विकाल वेळीही ओढवून घेतो. एकाच छताखाली एकत्र झोपण्याची आपत्ती रात्रीच्या वेळी ओढवून घेतो, दार बंद न करता एकांतात राहण्याची आपत्ती दिवसा ओढवून घेतो. उर्वरित आपत्ती रात्री आणि दिवसाही ओढवून घेतो. 'मी दहा वर्षांचा आहे किंवा दहा वर्षांपेक्षा जास्त वर्षांचा आहे' असा विचार करून, मूर्ख आणि अकुशल भिक्खू परिषदेची सेवा स्वीकारतो, तेव्हा तो दहा वर्षांचा असताना आपत्ती ओढवून घेतो, दहा वर्षांपेक्षा कमी असताना नाही. 'मी पंडित आणि कुशल आहे' असा विचार करून, नवीन किंवा मध्यम भिक्खू परिषदेची सेवा स्वीकारतो, तेव्हा तो दहा वर्षांपेक्षा कमी वर्षांचा असताना आपत्ती ओढवून घेतो, दहा वर्षांचा असताना नाही. उर्वरित आपत्ती दहा वर्षांचा असताना आणि दहा वर्षांपेक्षा कमी असतानाही ओढवून घेतो. 'मी पाच वर्षांचा आहे' असा विचार करून, मूर्ख आणि अकुशल भिक्खू निश्रय न घेता राहतो, तेव्हा तो पाच वर्षांचा असताना आपत्ती ओढवून घेतो. 'मी पंडित आणि कुशल आहे' असा विचार करून, नवीन भिक्खू निश्रय न घेता राहतो, तेव्हा तो पाच वर्षांपेक्षा कमी वर्षांचा असताना आपत्ती ओढवून घेतो. उर्वरित आपत्ती पाच वर्षांचा असताना आणि पाच वर्षांपेक्षा कमी असतानाही ओढवून घेतो. अनुपसंपन्नाला (गृहस्थ किंवा श्रामणेराला) पदांनुसार धम्म शिकवताना किंवा स्त्रीला धम्म उपदेश करताना, अशा प्रकारची आपत्ती कुशल चित्त असताना ओढवून घेतो. पाराजिका, सुक्कविस्सट्ठि (शुक्रविसर्ग), कायसंसर्ग, दुट्ठुल्ल, अत्तकामपारिचरिय, दुट्ठदोस, संघभेद, प्रहार देणे, तळहात किंवा शस्त्राने मारणे इत्यादी प्रकारच्या आपत्ती अकुशल चित्त असताना ओढवून घेतो. नकळतपणे (असंचिच्च) एकाच छताखाली झोपणे इत्यादी आपत्ती अव्याकृत चित्त असताना ओढवून घेतो. जी आपत्ती केवळ अर्हतच ओढवून घेतात, ती सर्व अव्याकृत चित्त असतानाच ओढवून घेतात. मैथुनधर्म इत्यादी प्रकारची आपत्ती सुखवेदनायुक्त असताना ओढवून घेतो. दुष्टदोष इत्यादी प्रकारची आपत्ती दुःखवेदनायुक्त असताना ओढवून घेतो. जी आपत्ती सुखवेदनायुक्त असताना ओढवून घेतो, तीच आपत्ती तटस्थ होऊन ओढवून घेताना अदुःख-असुखवेदनायुक्त असताना ओढवून घेतो. තයො පටික්ඛෙපාති බුද්ධස්ස භගවතො තයො පටික්ඛෙපා. චතූසු පච්චයෙසු මහිච්ඡතා අසන්තුට්ඨිතා කිලෙසසල්ලෙඛනපටිපත්තියා අගොපායනා, ඉමෙ හි තයො ධම්මා බුද්ධෙන භගවතා පටික්ඛිත්තා. අප්පිච්ඡතාදයො පන තයො බුද්ධෙන භගවතා අනුඤ්ඤාතා, තෙන වුත්තං ‘‘තයො අනුඤ්ඤාතා’’ති. ‘तीन निषेध’ म्हणजे बुद्ध भगवंतांचे तीन निषेध आहेत. चार प्रत्ययांमध्ये (चीवर, पिंडपात, सेनासन, ग्लानप्रत्यय-भैषज्य) अति-इच्छा असणे, असंतुष्टता असणे आणि क्लेशांचे निर्मूलन करणाऱ्या प्रतिपदेचे (साधनेचे) रक्षण न करणे; हे तीन धर्म बुद्ध भगवंतांनी निषिद्ध केले आहेत. अल्प-इच्छा इत्यादी तीन गोष्टींना बुद्ध भगवंतांनी अनुमती दिली आहे, म्हणूनच 'तीन गोष्टींना अनुमती दिली आहे' असे म्हटले आहे. ‘‘දසවස්සොම්හී’’ති පරිසං උපට්ඨාපෙන්තො ‘‘පඤ්චවස්සොම්හී’’ති නිස්සයං අගණ්හන්තො බාලො ආපජ්ජති නො පණ්ඩිතො, ඌනදසවස්සො ‘‘බ්යත්තොම්හී’’ති බහුස්සුතත්තා පරිසං උපට්ඨාපෙන්තො ඌනපඤ්චවස්සො ච නිස්සයං අගණ්හන්තො පණ්ඩිතො ආපජ්ජති නො බාලො; අවසෙසං පණ්ඩිතො චෙව ආපජ්ජති බාලො ච. වස්සං අනුපගච්ඡන්තො කාළෙ ආපජ්ජති නො ජුණ්හෙ; මහාපවාරණාය අප්පවාරෙන්තො ජුණ්හෙ ආපජ්ජති නො කාළෙ; අවසෙසං කාළෙ චෙව ආපජ්ජති ජුණ්හෙ ච. වස්සූපගමනං කාළෙ [Pg.164] කප්පති නො ජුණ්හෙ; මහාපවාරණාය පවාරණා ජුණ්හෙ කප්පති නො කාළෙ; සෙසං අනුඤ්ඤාතකං කාළෙ චෙව කප්පති ජුණ්හෙ ච. ‘मी दहा वर्षांचा आहे’ असे समजून परिषदेची सेवा स्वीकारणारा आणि ‘मी पाच वर्षांचा आहे’ असे समजून निश्रय न घेणारा मूर्ख भिक्खू आपत्ती ओढवून घेतो, पंडित नाही. दहा वर्षांपेक्षा कमी वर्षांचा असून ‘मी कुशल आहे’ असे समजून बहुश्रुततेमुळे परिषदेची सेवा स्वीकारणारा आणि पाच वर्षांपेक्षा कमी वर्षांचा असून निश्रय न घेणारा पंडित भिक्खू आपत्ती ओढवून घेतो, मूर्ख नाही. उर्वरित आपत्ती पंडित आणि मूर्ख दोघेही ओढवून घेतात. वर्षावास न स्वीकारणारा भिक्खू कृष्णपक्षात आपत्ती ओढवून घेतो, शुक्लपक्षात नाही. महाप्रवारणेच्या दिवशी प्रवारणा न करणारा भिक्खू शुक्लपक्षात आपत्ती ओढवून घेतो, कृष्णपक्षात नाही. उर्वरित आपत्ती कृष्णपक्षात आणि शुक्लपक्षातही ओढवून घेतो. वर्षावासात प्रवेश करणे कृष्णपक्षात योग्य ठरते, शुक्लपक्षात नाही. महाप्रवारणेची प्रवारणा शुक्लपक्षात योग्य ठरते, कृष्णपक्षात नाही. उर्वरित अनुमत गोष्टी कृष्णपक्षात आणि शुक्लपक्षातही योग्य ठरतात. කත්තිකපුණ්ණමාසියා පච්ඡිමෙ පාටිපදදිවසෙ විකප්පෙත්වා ඨපිතං වස්සිකසාටිකං නිවාසෙන්තො හෙමන්තෙ ආපජ්ජති. කුරුන්දියං පන ‘‘කත්තිකපුණ්ණමදිවසෙ අපච්චුද්ධරිත්වා හෙමන්තෙ ආපජ්ජතී’’ති වුත්තං, තම්පි සුවුත්තං. ‘‘චාතුමාසං අධිට්ඨාතුං තතො පරං විකප්පෙතු’’න්ති හි වුත්තං. අතිරෙකමාසෙ සෙසෙ ගිම්හානෙ පරියෙසන්තො අතිරෙකඩ්ඪමාසෙ සෙසෙ කත්වා නිවාසෙන්තො ච ගිම්හෙ ආපජ්ජති නාම. සතියා වස්සිකසාටිකාය නග්ගො කායං ඔවස්සාපෙන්තො වස්සෙ ආපජ්ජති නාම. පාරිසුද්ධිඋපොසථං වා අධිට්ඨානුපොසථං වා කරොන්තො සඞ්ඝො ආපජ්ජති. සුත්තුද්දෙසඤ්ච අධිට්ඨානුපොසථඤ්ච කරොන්තො ගණො ආපජ්ජති. එකකො සුත්තුද්දෙසං පාරිසුද්ධිඋපොසථඤ්ච කරොන්තො පුග්ගලො ආපජ්ජති. පවාරණායපි එසෙව නයො. कार्तिकी पौर्णिमेच्या नंतरच्या पहिल्या दिवशी (प्रतिपदेला) विकल्पन करून ठेवलेले वर्षाशाटीक (पावसाळी वस्त्र) परिधान करणारा भिक्खू हेमंत ऋतूत आपत्ती ओढवून घेतो. कुरुंदी अठ्ठकथेत मात्र ‘कार्तिकी पौर्णिमेच्या दिवशी प्रत्युद्धार न करता हेमंत ऋतूत परिधान केल्यास आपत्ती ओढवून घेतो’ असे म्हटले आहे, ते देखील योग्यच म्हटले आहे. कारण ‘चार महिने अधिष्ठान करावे, त्यानंतर विकल्पन करावे’ असे म्हटले आहे. उन्हाळ्यात एक महिन्यापेक्षा जास्त काळ शिल्लक असताना पावसाळी वस्त्र शोधणारा आणि अर्ध्या महिन्यापेक्षा जास्त काळ शिल्लक असताना ते शिवून परिधान करणारा भिक्खू उन्हाळ्यात आपत्ती ओढवून घेतो. पावसाळी वस्त्र उपलब्ध असतानाही नग्न होऊन शरीरावर पाऊस पाडून घेणारा भिक्खू पावसाळ्यात आपत्ती ओढवून घेतो. पारिशुद्धी उपोसथ किंवा अधिष्ठान उपोसथ करताना संघ आपत्ती ओढवून घेतो. सुत्तुद्देश उपोसथ आणि अधिष्ठान उपोसथ करताना गण आपत्ती ओढवून घेतो. एकटा भिक्खू सुत्तुद्देश आणि पारिशुद्धी उपोसथ करताना वैयक्तिकरीत्या आपत्ती ओढवून घेतो. प्रवारणेच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. සඞ්ඝුපොසථො ච සඞ්ඝපවාරණා ච සඞ්ඝස්සෙව කප්පති. ගණුපොසථො ච ගණපවාරණා ච ගණස්සෙව කප්පති. අධිට්ඨානුපොසථො ච අධිට්ඨානපවාරණා ච පුග්ගලස්සෙව කප්පති. ‘‘පාරාජිකං ආපන්නොම්හී’’තිආදීනි භණන්තො වත්ථුං ඡාදෙති න ආපත්තිං, ‘‘මෙථුනං ධම්මං පටිසෙවි’’න්තිආදීනි භණන්තො ආපත්තිං ඡාදෙති නො වත්ථුං, යො නෙව වත්ථුං න ආපත්තිං ආරොචෙති, අයං වත්ථුඤ්චෙව ඡාදෙති ආපත්තිඤ්ච. संघ उपोसथ आणि संघ प्रवारणा केवळ संघासाठीच योग्य ठरते. गण उपोसथ आणि गण प्रवारणा केवळ गणासाठीच योग्य ठरते. अधिष्ठान उपोसथ आणि अधिष्ठान प्रवारणा केवळ एका भिक्खूसाठीच योग्य ठरते. ‘मी पाराजिका आपत्ती ओढवून घेतली आहे’ इत्यादी बोलणारा भिक्खू वस्तू (मूळ कृत्य) लपवतो, आपत्ती नाही. ‘मी मैथुनधर्माचे सेवन केले आहे’ इत्यादी बोलणारा भिक्खू आपत्ती लपवतो, वस्तू नाही. जो वस्तू देखील सांगत नाही आणि आपत्ती देखील सांगत नाही, तो वस्तू आणि आपत्ती दोन्ही लपवतो. පටිච්ඡාදෙතීති පටිච්ඡාදි. ජන්තාඝරමෙව පටිච්ඡාදි ජන්තාඝරපටිච්ඡාදි. ඉතරාසුපි එසෙව නයො. ද්වාරං පිදහිත්වා අන්තොජන්තාඝරෙ ඨිතෙන පරිකම්මං කාතුං වට්ටති. උදකෙ ඔතිණ්ණෙනාපි එතදෙව වට්ටති. උභයත්ථ ඛාදිතුං භුඤ්ජිතුං වා න වට්ටති. වත්ථපටිච්ඡාදි සබ්බකප්පියතාය පටිච්ඡන්නෙන සබ්බං කාතුං වට්ටති. වහන්තීති යන්ති නිය්යන්ති; නින්දං වා පටික්කොසං වා න ලභන්ති. චන්දමණ්ඩලං අබ්භාමහිකාධූමරජරාහුවිමුත්තං විවටංයෙව විරොචති, න තෙසු අඤ්ඤතරෙන පටිච්ඡන්නං. තථා සූරියමණ්ඩලං, ධම්මවිනයොපි විවරිත්වා විභජිත්වා දෙසියමානොව විරොචති නො පටිච්ඡන්නො. झाकतो म्हणून ते 'पटिच्छादि' (आच्छादन) होय. जंतघर (स्नानगृह) हेच आच्छादन असल्याने त्याला 'जंतघर-पटिच्छादि' (जंतघर-आच्छादन) म्हणतात. इतरांच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. दार बंद करून जंतघराच्या आत राहिलेल्या भिक्खूने परिकर्म (शरीर घासणे इत्यादी) करणे योग्य आहे. पाण्यात उतरलेल्या भिक्खूने सुद्धा हेच (परिकर्म) करणे योग्य आहे. दोन्ही ठिकाणी खाणे किंवा जेवणे योग्य नाही. वस्त्र-आच्छादन हे सर्व प्रकारे कप्पिय (विहित) असल्यामुळे, वस्त्राने स्वतःला झाकलेल्या भिक्खूने सर्व काही करणे योग्य आहे. 'वहन्ति' म्हणजे जातात, मुक्त होतात; ते निंदा किंवा आक्षेप प्राप्त करत नाहीत. चंद्रमंडळ हे ढग, धुके, धूर, धूळ आणि राहू यांपासून मुक्त झाल्यावरच अनावृत (उघडे) होऊन शोभून दिसते, त्यांच्यापैकी कोणत्याही एकाने झाकलेले असताना नाही. त्याचप्रमाणे सूर्यमंडळही शोभते. धम्म आणि विनय सुद्धा उघडून (स्पष्ट करून) आणि विभागून उपदेशिला (देशना केला) असतांनाच शोभून दिसतो, झाकलेला (गुप्त) असताना नाही. අඤ්ඤෙන [Pg.165] භෙසජ්ජෙන කරණීයෙන අඤ්ඤං විඤ්ඤාපෙන්තො ගිලානො ආපජ්ජති, න භෙසජ්ජෙන කරණීයෙන භෙසජ්ජං විඤ්ඤාපෙන්තො අගිලානො ආපජ්ජති, අවසෙසං ආපත්තිං ගිලානො චෙව ආපජ්ජති අගිලානො ච. दुसऱ्या औषधाच्या गरजेसाठी इतर (तेल इत्यादी) मागवणारा आजारी (गिलाण) भिक्खू आपत्ती प्राप्त करतो. औषध नसलेल्या वस्तूच्या गरजेसाठी औषध मागवणारा निरोगी (अ-गिलाण) भिक्खू आपत्ती प्राप्त करतो. उर्वरित आपत्ती आजारी आणि निरोगी दोन्ही भिक्खू प्राप्त करतात. අන්තො ආපජ්ජති නො බහීති අනුපඛජ්ජ සෙය්යං කප්පෙන්තො අන්තො ආපජ්ජති නො බහි, බහි ආපජ්ජති නො අන්තොති සඞ්ඝිකං මඤ්චාදිං අජ්ඣොකාසෙ සන්ථරිත්වා පක්කමන්තො බහි ආපජ්ජති නො අන්තො, අවසෙසං පන අන්තො චෙව ආපජ්ජති බහි ච. අන්තොසීමායාති ආගන්තුකො ආගන්තුකවත්තං අදස්සෙත්වා සඡත්තුපාහනො විහාරං පවිසන්තො උපචාරසීමං ඔක්කන්තමත්තොව ආපජ්ජති. බහිසීමායාති ගමිකො දාරුභණ්ඩපටිසාමනාදිගමිකවත්තං අපූරෙත්වා පක්කමන්තො උපචාරසීමං අතික්කන්තමත්තොව ආපජ්ජති. අවසෙසං අන්තොසීමාය චෙව ආපජ්ජති බහිසීමාය ච. සති වුඩ්ඪතරෙ අනජ්ඣිට්ඨො ධම්මං භාසන්තො සඞ්ඝමජ්ඣෙ ආපජ්ජති නාම. ගණමජ්ඣෙපි පුග්ගලසන්තිකෙපි එසෙව නයො. කායෙන වුට්ඨාතීති තිණවත්ථාරකසමථෙන වුට්ඨාති. කායං අචාලෙත්වා වාචාය දෙසෙන්තස්ස වාචාය වුට්ඨාති. වචීසම්පයුත්තං කායකිරියං කත්වා දෙසෙන්තස්ස කායෙන වාචාය වුට්ඨාති නාම. සඞ්ඝමජ්ඣෙ දෙසනාගාමිනීපි වුට්ඨානගාමිනීපි වුට්ඨාති. ගණපුග්ගලමජ්ඣෙ පන දෙසනාගාමිනීයෙව වුට්ඨාති. 'आत आपत्ती प्राप्त करतो, बाहेर नाही' म्हणजे (इतर भिक्खूंच्या जवळ) घुसून शय्या (बिछाना) तयार करणारा भिक्खू विहाराच्या आत आपत्ती प्राप्त करतो, बाहेर नाही. 'बाहेर आपत्ती प्राप्त करतो, आत नाही' म्हणजे संघाचा मंच (खाट) इत्यादी उघड्या जागेत पसरवून (न आवरता किंवा न सांगता) निघून जाणारा भिक्खू बाहेर आपत्ती प्राप्त करतो, आत नाही. उर्वरित आपत्ती मात्र तो आत आणि बाहेर दोन्ही ठिकाणी प्राप्त करतो. 'सीमेच्या आत' म्हणजे आगंतुक (नवीन आलेला) भिक्खू आगंतुक-कर्तव्य न पाळता, छत्री आणि पादत्राणांसह विहारात प्रवेश करताना उपचार-सीमेत पाऊल ठेवताच आपत्ती प्राप्त करतो. 'सीमेच्या बाहेर' म्हणजे प्रवास करणारा भिक्खू लाकडी सामान आवरणे इत्यादी गमिक-कर्तव्य पूर्ण न करता निघून जाताना उपचार-सीमेचे उल्लंघन करताच आपत्ती प्राप्त करतो. उर्वरित आपत्ती तो सीमेच्या आत आणि बाहेर दोन्ही ठिकाणी प्राप्त करतो. ज्येष्ठ भिक्खू उपस्थित असताना, त्यांनी न विचारता (आमंत्रित न करता) धम्म उपदेश करणारा भिक्खू संघामध्ये आपत्ती प्राप्त करतो. गणाच्या (समूहाच्या) मध्ये आणि व्यक्तीच्या समोर सुद्धा हाच नियम आहे. 'कायाने उठतो (मुक्त होतो)' म्हणजे तिणवत्थारक शमथाने (तृणप्रस्तारक शमथाने) मुक्त होतो. काया न हलवता केवळ वाणीने देशना देणाऱ्याची वाणीने मुक्ती होते. वाणीशी संबंधित कायिक क्रिया करून देशना देणाऱ्याची काया आणि वाणी दोन्हीने मुक्ती होते. संघाच्या मध्ये देशनागामिनी (देशनेने दूर होणारी) आणि वुठ्ठानगामिनी (प्रायश्चित्ताने दूर होणारी) दोन्ही आपत्ती दूर होतात. परंतु गण आणि व्यक्तीच्या मध्ये केवळ देशनागामिनी आपत्तीच दूर होते. ආගාළ්හාය චෙතෙය්යාති ආගාළ්හාය දළ්හභාවාය චෙතෙය්ය; තජ්ජනීයකම්මාදිකතස්ස වත්තං න පූරයතො ඉච්ඡමානො සඞ්ඝො උක්ඛෙපනීයකම්මං කරෙය්යාති අත්ථො. අලජ්ජී ච හොති බාලො ච අපකතත්තො චාති එත්ථ බාලො ‘‘අයං ධම්මාධම්මං න ජානාති’’ අපකතත්තො වා ‘‘ආපත්තානාපත්තිං න ජානාතී’’ති න එත්තාවතා කම්මං කාතබ්බං; බාලභාවමූලකං පන අපකතත්තභාවමූලකඤ්ච ආපත්තිං ආපන්නස්ස කම්මං කාතබ්බන්ති අත්ථො. අධිසීලෙ සීලවිපන්නො නාම ද්වෙ ආපත්තික්ඛන්ධෙ ආපන්නො; ආචාරවිපන්නො නාම පඤ්ච ආපත්තික්ඛන්ධෙ ආපන්නො; දිට්ඨිවිපන්නො නාම අන්තග්ගාහිකාය දිට්ඨියා සමන්නාගතො. තෙසං ආපත්තිං අපස්සන්තානං අප්පටිකරොන්තානං දිට්ඨිඤ්ච අනිස්සජ්ජන්තානංයෙව කම්මං කාතබ්බං. 'दृढतेने विचार करावा' म्हणजे दृढतेसाठी, मजबूत करण्यासाठी विचार करावा; तज्जनीय-कर्म (तर्जनीय कर्म) इत्यादी केलेल्या आणि आपले कर्तव्य पूर्ण न करणाऱ्या भिक्खूवर संघाने इच्छिले तर उक्खेपनीय-कर्म (उत्क्षेपणीय कर्म) करावे, असा अर्थ आहे. 'तो अलज्जी (निर्लज्ज), बाल (मूर्ख) आणि अपकतत्त (अकुशल) असतो' यामध्ये बाल म्हणजे 'हा धम्म आणि अधम्म जाणत नाही' आणि अपकतत्त म्हणजे 'हा आपत्ती आणि अनापत्ती जाणत नाही'; केवळ एवढ्यावरूनच त्याच्यावर संघकर्म करू नये. परंतु बालभावावर आधारित आणि अपकतत्तभावावर आधारित आपत्ती प्राप्त झालेल्या भिक्खूवर संघकर्म केले पाहिजे, असा अर्थ आहे. अधिशीलामध्ये 'शीलविपन्न' म्हणजे दोन आपत्ती-स्कंध (पाराजिका आणि संघादिसेस) प्राप्त केलेला; 'आचारविपन्न' म्हणजे पाच आपत्ती-स्कंध प्राप्त केलेला; 'दृष्टिविपन्न' म्हणजे अंतग्राहिका दृष्टीने (चुकीच्या मतांनी) युक्त असलेला. जे आपली आपत्ती पाहत नाहीत, तिचे निवारण करत नाहीत आणि आपली चुकीची दृष्टी सोडत नाहीत, अशांवरच संघकर्म केले पाहिजे. කායිකො දවො නාම පාසකාදීහි ජූතකීළනාදිභෙදො අනාචාරො; වාචසිකො දවො නාම මුඛාලම්බරකරණාදිභෙදො අනාචාරො; කායිකවාචසිකො නාම නච්චනගායනාදිභෙදො ද්වීහිපි ද්වාරෙහි අනාචාරො[Pg.166]. කායිකො අනාචාරො නාම කායද්වාරෙ පඤ්ඤත්තසික්ඛාපදවීතික්කමො; වාචසිකො අනාචාරො නාම වචීද්වාරෙ පඤ්ඤත්තසික්ඛාපදවීතික්කමො; කායිකවාචසිකො නාම ද්වාරද්වයෙපි පඤ්ඤත්තසික්ඛාපදවීතික්කමො. කායිකෙන උපඝාතිකෙනාති කායද්වාරෙ පඤ්ඤත්තස්ස සික්ඛාපදස්ස අසික්ඛනෙන, යො හි තං න සික්ඛති, සො නං උපඝාතෙති, තස්මා තස්ස තං අසික්ඛනං ‘‘කායිකං උපඝාතික’’න්ති වුච්චති. සෙසපදද්වයෙපි එසෙව නයො. කායිකෙන මිච්ඡාජීවෙනාති ජඞ්ඝපෙසනිකාදිනා වා ගණ්ඩඵාලනාදිනා වා වෙජ්ජකම්මෙන; වාචසිකෙනාති සාසනඋග්ගහණආරොචනාදිනා; තතියපදං උභයසම්පයොගවසෙන වුත්තං. 'कायिक दव' (शारीरिक खेळ) म्हणजे फासे इत्यादींनी जुगार खेळणे इत्यादी प्रकारचा अनाचार होय. 'वाचसिक दव' (वाचिक खेळ) म्हणजे तोंडाने वाद्य वाजवण्याचा आवाज करणे इत्यादी प्रकारचा अनाचार होय. 'कायिक-वाचसिक दव' म्हणजे नाचणे, गाणे इत्यादी प्रकारचा दोन्ही द्वारांनी (काया आणि वाणीने) होणारा अनाचार होय. 'कायिक अनाचार' म्हणजे कायद्वाराने प्रज्ञप्त केलेल्या शिक्षापदांचे उल्लंघन करणे होय. 'वाचसिक अनाचार' म्हणजे वचीद्वाराने प्रज्ञप्त केलेल्या शिक्षापदांचे उल्लंघन करणे होय. 'कायिक-वाचसिक अनाचार' म्हणजे दोन्ही द्वारांनी प्रज्ञप्त केलेल्या शिक्षापदांचे उल्लंघन करणे होय. 'कायिक उपघातक' म्हणजे कायद्वाराने प्रज्ञप्त केलेल्या शिक्षापदाचे आचरण न करणे; कारण जो त्याचे आचरण करत नाही, तो त्याचा नाश करतो (उपघात करतो), म्हणून त्याचे ते आचरण न करणे 'कायिक उपघातक' असे म्हटले जाते. उर्वरित दोन पदांमध्येही हाच नियम आहे. 'कायिक मिच्छा-आजीव' (शारीरिक चुकीची उपजीविका) म्हणजे पायाने निरोप पोहोचवणे इत्यादीने किंवा गळू कापून देणे इत्यादी वैद्यकीय कामाने उपजीविका करणे होय. 'वाचसिक मिच्छा-आजीव' म्हणजे निरोप घेणे आणि तो पोहोचवणे इत्यादीने युक्त असणे होय. तिसरे पद दोन्हीच्या (काया आणि वाणीच्या) संयोगाच्या आधारे सांगितले आहे. අලං භික්ඛු මා භණ්ඩනන්ති අලං භික්ඛු මා භණ්ඩනං කරි, මා කලහං, මා විවාදං කරීති අත්ථො. න වොහරිතබ්බන්ති න කිඤ්චි වත්තබ්බං; වදතොපි හි තාදිසස්ස වචනං න සොතබ්බං මඤ්ඤන්ති. න කිස්මිඤ්චි පච්චෙකට්ඨානෙති කිස්මිඤ්චි බීජනග්ගාහාදිකෙ එකස්මිම්පි ජෙට්ඨකට්ඨානෙ න ඨපෙතබ්බොති අත්ථො. ඔකාසකම්මං කාරෙන්තස්සාති ‘‘කරොතු ආයස්මා ඔකාසං, අහං තං වත්තුකාමො’’ති එවං ඔකාසං කාරෙන්තස්ස. නාලං ඔකාසකම්මං කාතුන්ති ‘‘කිං ත්වං කරිස්සසී’’ති ඔකාසො න කාතබ්බො. සවචනීයං නාදාතබ්බන්ති වචනං න ආදාතබ්බං, වචනම්පි න සොතබ්බං; යත්ථ ගහෙත්වා ගන්තුකාමො හොති, න තත්ථ ගන්තබ්බන්ති අත්ථො. 'बस करा भिक्खू, भांडू नका' म्हणजे 'बस करा भिक्खू, भांडण करू नका, कलह करू नका, वाद घालू नका', असा अर्थ आहे. 'व्यवहार करू नये (बोलू नये)' म्हणजे काहीही बोलू नये; कारण अशा व्यक्तीने जरी काही सांगितले तरी त्याचे बोलणे ऐकण्यासारखे मानले जात नाही. 'कोणत्याही विशिष्ट पदावर नाही' म्हणजे पंखा पकडणे इत्यादी सारख्या एकाही मुख्य (ज्येष्ठ) पदावर त्याला ठेवू नये, असा अर्थ आहे. 'अवकाश (परवानगी) मागणाऱ्याला' म्हणजे 'आयुष्मानांनी मला परवानगी द्यावी, मी आपल्याला काही सांगू इच्छितो' अशा प्रकारे परवानगी मागणाऱ्या (अलज्जी, बाल, अपकतत्त भिक्खूला). 'परवानगी देणे योग्य नाही' म्हणजे 'तू काय करणार आहेस?' असे म्हणून परवानगी देऊ नये. 'त्याचे बोलणे स्वीकारू नये' म्हणजे त्याचे बोलणे स्वीकारू नये, त्याचे बोलणे ऐकूही नये; तो ज्या अधिकरणाकडे घेऊन जाऊ इच्छितो, तिथे जाऊ नये, असा अर्थ आहे. තීහඞ්ගෙහි සමන්නාගතස්ස භික්ඛුනො විනයොති යං සො ජානාති, සො තස්ස විනයො නාම හොති; සො න පුච්ඡිතබ්බොති අත්ථො. අනුයොගො න දාතබ්බොති ‘‘ඉදං කප්පතී’’ති පුච්ඡන්තස්ස පුච්ඡාය ඔකාසො න දාතබ්බො, ‘‘අඤ්ඤං පුච්ඡා’’ති වත්තබ්බො. ඉති සො නෙව පුච්ඡිතබ්බො නාස්ස පුච්ඡා සොතබ්බාති අත්ථො. විනයො න සාකච්ඡාතබ්බොති විනයපඤ්හො න සාකච්ඡිතබ්බො, කප්පියාකප්පියකථා න සංසන්දෙතබ්බා. 'तीन अंगांनी युक्त असलेल्या भिक्खूचा विनय' म्हणजे तो जे काही (विनय म्हणून) जाणतो, तोच त्याचा विनय असतो; तो (त्याचा विनय) विचारू नये, असा अर्थ आहे. 'अनुयोग (प्रश्न विचारण्याची संधी) देऊ नये' म्हणजे 'हे कप्पिय (योग्य) आहे का?' असे विचारणाऱ्याला प्रश्न विचारण्याची संधी देऊ नये, त्याला 'दुसऱ्या कोणालातरी विचार' असे म्हणावे. अशा प्रकारे त्याला विचारू नये आणि त्याचे प्रश्न ऐकू नयेत, असा अर्थ आहे. 'विनयावर चर्चा करू नये' म्हणजे विनयाशी संबंधित प्रश्नांवर चर्चा करू नये, कप्पिय-अकप्पिय (योग्य-अयोग्य) गोष्टींवर विचारविनिमय करू नये. ඉදමප්පහායාති එතං බ්රහ්මචාරිපටිඤ්ඤාතාදිකං ලද්ධිං අවිජහිත්වා. සුද්ධං බ්රහ්මචාරින්ති ඛීණාසවං භික්ඛුං. ‘‘පාතබ්යතං ආපජ්ජතී’’ති පාතබ්යභාවං පටිසෙවනං ආපජ්ජති. ‘‘ඉදමප්පහායා’’ති වචනතො පන තං බ්රහ්මචාරිපටිඤ්ඤාතං පහාය ඛීණාසවං ‘‘මුසා මයා භණිතං, ඛමථ මෙ’’ති [Pg.167] ඛමාපෙත්වා ‘‘නත්ථි කාමෙසු දොසො’’ති ලද්ධිං විජහිත්වා ගතිවිසොධනං කරෙය්ය. අකුසලමූලානීති අකුසලානි චෙව මූලානි ච, අකුසලානං වා මූලානි අකුසලමූලානි. කුසලමූලෙසුපි එසෙව නයො. දුට්ඨු චරිතානි විරූපානි වා චරිතානි දුච්චරිතානි. සුට්ඨු චරිතානි සුන්දරානි වා චරිතානි සුචරිතානි. කායෙන කරණභූතෙන කතං දුච්චරිතං කායදුච්චරිතං. එස නයො සබ්බත්ථ. සෙසං තත්ථ තත්ථ වුත්තනයත්තා උත්තානමෙවාති. ‘इदमप्पहाय’ म्हणजे ही ‘मी ब्रह्मचारी आहे’ अशी प्रतिज्ञा करण्यापासून सुरू होणारी दृष्टी न सोडता. ‘सुद्धं ब्रह्मचारिं’ म्हणजे क्षीणासव (अर्हत) भिक्खूला. ‘पातब्यतां आपज्जती’ म्हणजे उपभोग घेण्याच्या किंवा सेवन करण्याच्या अवस्थेला प्राप्त होतो. परंतु ‘इदमप्पहाय’ या वचनामुळे, ती ब्रह्मचारी असल्याची प्रतिज्ञा सोडून, क्षीणासव भिक्खूची “माझ्याकडून असत्य बोलले गेले, मला क्षमा करा” अशी क्षमा मागून, आणि “कामांमध्ये (इंद्रियभोगांमध्ये) कोणताही दोष नाही” ही दृष्टी सोडून देऊन गतीचे विशोधन (शुद्धीकरण) करू शकतो. ‘अकुसलमूलानि’ म्हणजे जे अकुशलही आहेत आणि मूळही आहेत, किंवा अकुशलांची मुळे म्हणजे अकुशलमुळे. कुशलमुळांच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. वाईट रीतीने आचरलेले किंवा विकृत आचरण म्हणजे ‘दुच्चरित’ (दुराचरण). चांगल्या प्रकारे आचरलेले किंवा सुंदर आचरण म्हणजे ‘सुचरित’ (सदाचरण). साधनभूत असलेल्या कायेने (शरीराने) केलेले दुराचरण म्हणजे ‘कायदुच्चरित’ होय. हाच नियम सर्वत्र लागू होतो. उर्वरित भाग त्या त्या ठिकाणी सांगितलेल्या पद्धतीनुसार स्पष्टच आहे. තිකවාරවණ්ණනා නිට්ඨිතා. तिकवारवर्णना समाप्त झाली. චතුක්කවාරවණ්ණනා चतुक्कवारवर्णना 324. චතුක්කෙසු සකවාචාය ආපජ්ජති පරවාචාය වුට්ඨාතීති වචීද්වාරිකං පදසොධම්මාදිභෙදං ආපත්තිං ආපජ්ජිත්වා තිණවත්ථාරකසමථට්ඨානං ගතො පරස්ස කම්මවාචාය වුට්ඨාති. පරවාචාය ආපජ්ජති සකවාචාය වුට්ඨාතීති පාපිකාය දිට්ඨියා අප්පටිනිස්සග්ගෙ පරස්ස කම්මවාචාය ආපජ්ජති, පුග්ගලස්ස සන්තිකෙ දෙසෙන්තො සකවාචාය වුට්ඨාති. සකවාචාය ආපජ්ජති සකවාචාය වුට්ඨාතීති වචීද්වාරිකං පදසොධම්මාදිභෙදං ආපත්තිං සකවාචාය ආපජ්ජති, දෙසෙත්වා වුට්ඨහන්තොපි සකවාචාය වුට්ඨාති. පරවාචාය ආපජ්ජති පරවාචාය වුට්ඨාතීති යාවතතියකං සඞ්ඝාදිසෙසං පරස්ස කම්මවාචාය ආපජ්ජති, වුට්ඨහන්තොපි පරස්ස පරිවාසකම්මවාචාදීහි වුට්ඨාති. තතො පරෙසු කායද්වාරිකං කායෙන ආපජ්ජති, දෙසෙන්තො වාචාය වුට්ඨාති. වචීද්වාරිකං වාචාය ආපජ්ජති, තිණවත්ථාරකෙ කායෙන වුට්ඨාති. කායද්වාරිකං කායෙනආපජ්ජති, තමෙව තිණවත්ථාරකෙ කායෙන වුට්ඨාති. වචීද්වාරිකං වාචාය ආපජ්ජති, තමෙව දෙසෙන්තො වාචාය වුට්ඨාති. සඞ්ඝිකමඤ්චස්ස අත්තනො පච්චත්ථරණෙන අනත්ථරතො කායසම්ඵුසනෙ ලොමගණනාය ආපජ්ජිතබ්බාපත්තිං සහගාරසෙය්යාපත්තිඤ්ච පසුත්තො ආපජ්ජති, පබුජ්ඣිත්වා පන ආපන්නභාවං ඤත්වා දෙසෙන්තො පටිබුද්ධො වුට්ඨාති. ජග්ගන්තො ආපජ්ජිත්වා පන තිණවත්ථාරකසමථට්ඨානෙ සයන්තො පටිබුද්ධො ආපජ්ජති පසුත්තො වුට්ඨාති නාම. පච්ඡිමපදද්වයම්පි වුත්තානුසාරෙනෙව වෙදිතබ්බං. ३२४. चतुष्कांमध्ये निर्णय खालीलप्रमाणे समजावा: ‘स्वतःच्या वाणीने आपत्तीला प्राप्त होतो आणि दुसऱ्याच्या वाणीने उठतो’ म्हणजे वचीद्वारिक (वाणीच्या द्वाराने होणाऱ्या) पदशोधन इत्यादी प्रकारच्या आपत्तीला प्राप्त होऊन, तिणवत्थारक समथाच्या (तृणप्रस्तारक शमथाच्या) ठिकाणी गेलेला भिक्खू दुसऱ्याच्या कम्मवाचेमुळे (आपत्तीतून) उठतो. ‘दुसऱ्याच्या वाणीने आपत्तीला प्राप्त होतो आणि स्वतःच्या वाणीने उठतो’ म्हणजे पापी (मिथ्या) दृष्टीचा त्याग न करण्याच्या बाबतीत दुसऱ्याच्या कम्मवाचेमुळे आपत्तीला प्राप्त होतो, आणि दुसऱ्या पुद्गलाच्या (व्यक्तीच्या) सन्निध देशना करताना स्वतःच्या वाणीने उठतो. ‘स्वतःच्या वाणीने आपत्तीला प्राप्त होतो आणि स्वतःच्या वाणीने उठतो’ म्हणजे वचीद्वारिक पदशोधन इत्यादी प्रकारच्या आपत्तीला स्वतःच्या वाणीने प्राप्त होतो, आणि देशना करून उठतानाही स्वतःच्या वाणीनेच उठतो. ‘दुसऱ्याच्या वाणीने आपत्तीला प्राप्त होतो आणि दुसऱ्याच्या वाणीने उठतो’ म्हणजे तिसऱ्या वेळेपर्यंतच्या समनुभाषण कर्माने होणाऱ्या संघादिसेस आपत्तीला दुसऱ्याच्या कम्मवाचेमुळे प्राप्त होतो, आणि उठतानाही दुसऱ्याच्या परिवास-कम्मवाचा इत्यादींमुळे उठतो. त्यानंतरच्या इतर चतुष्कांमध्ये निर्णय असा समजावा: कायद्वारिक आपत्तीला कायेने (शरीराने) प्राप्त होतो, आणि देशना करताना वाणीने उठतो. वचीद्वारिक आपत्तीला वाणीने प्राप्त होतो, आणि तिणवत्थारक समथाच्या वेळी कायेने उठतो. कायद्वारिक आपत्तीला कायेने प्राप्त होतो, आणि त्याच आपत्तीतून तिणवत्थारक समथाच्या वेळी कायेने उठतो. वचीद्वारिक आपत्तीला वाणीने प्राप्त होतो, आणि त्याच आपत्तीतून देशना करताना वाणीने उठतो. सांघिक मंचकावर (खाटेवर) स्वतःचे पांघरूण न घालता निजल्यामुळे, शरीराच्या स्पर्शाने रोमांच्या संख्येनुसार प्राप्त होणाऱ्या आपत्तीला आणि एकाच छताखाली एकत्र निजल्यामुळे होणाऱ्या सहशय्या-आपत्तीला झोपलेला असताना प्राप्त होतो; परंतु जागे झाल्यावर आपत्ती प्राप्त झाल्याचे जाणून देशना करताना जागृत अवस्थेत उठतो. परंतु जागृत असताना (विहार स्वच्छ करताना) आपत्तीला प्राप्त होऊन, तिणवत्थारक समथाच्या ठिकाणी निजलेला असताना ‘जागृत असताना आपत्तीला प्राप्त होतो आणि झोपलेला असताना उठतो’ असे म्हटले जाते. शेवटची दोन पदे देखील पूर्वोक्त पद्धतीनुसारच समजावीत. අචිත්තකාපත්තිං [Pg.168] අචිත්තකො ආපජ්ජති නාම. පච්ඡා දෙසෙන්තො සචිත්තකො වුට්ඨාති. සචිත්තකාපත්තිං සචිත්තකො ආපජ්ජති නාම. තිණවත්ථාරකට්ඨානෙ සයන්තො අචිත්තකො වුට්ඨාති. සෙසපදද්වයම්පි වුත්තානුසාරෙනෙව වෙදිතබ්බං. යො සභාගං ආපත්තිං දෙසෙති, අයං දෙසනාපච්චයා දුක්කටං ආපජ්ජන්තො පාචිත්තියාදීසු අඤ්ඤතරං දෙසෙති, තඤ්ච දෙසෙන්තො දුක්කටං ආපජ්ජති. තං පන දුක්කටං ආපජ්ජන්තො පාචිත්තියාදිතො වුට්ඨාති. පාචිත්තියාදිතො ච වුට්ඨහන්තො තං ආපජ්ජති. ඉති එකස්ස පුග්ගලස්ස එකමෙව පයොගං සන්ධාය ‘‘ආපත්තිං ආපජ්ජන්තො දෙසෙතී’’ති ඉදං චතුක්කං වුත්තන්ති වෙදිතබ්බං. अचित्तक आपत्तीला (जाणूनबुजून न करता) अचित्तक (इच्छा नसताना) होऊन प्राप्त होतो, असे म्हटले जाते. नंतर देशना करताना सचित्तक (जाणीवपूर्वक) होऊन उठतो. सचित्तक आपत्तीला सचित्तक (जाणूनबुजून) होऊन प्राप्त होतो, असे म्हटले जाते. तिणवत्थारक समथाच्या ठिकाणी निजलेला असताना अचित्तक (जाणीव नसताना) होऊन उठतो. उर्वरित दोन पदे देखील पूर्वोक्त पद्धतीनुसारच समजावीत. जो कोणी सभाग (समान प्रकारच्या) आपत्तीची देशना करतो, तो देशनेच्या कारणाने दुक्कट आपत्तीला प्राप्त होत असताना पाचित्तिय इत्यादींपैकी एकाची देशना करतो, आणि त्याची देशना करताना दुक्कट आपत्तीला प्राप्त होतो. परंतु त्या दुक्कट आपत्तीला प्राप्त होत असताना तो पाचित्तिय इत्यादी आपत्तीतून उठतो. आणि पाचित्तिय इत्यादी आपत्तीतून उठताना त्या (दुक्कट) आपत्तीला प्राप्त होतो. अशा प्रकारे एकाच पुद्गलाच्या (व्यक्तीच्या) एकाच प्रयोगाला (प्रयत्नाला) उद्देशून ‘आपत्तीला प्राप्त होत असताना देशना करतो’ हे चतुष्क सांगितले आहे, असे समजावे. කම්මචතුක්කෙ පාපිකාය දිට්ඨියා අප්පටිනිස්සග්ගාපත්තිං කම්මෙන ආපජ්ජති, දෙසෙන්තො අකම්මෙන වුට්ඨාති. විස්සට්ඨිආදිකං අකම්මෙන ආපජ්ජති, පරිවාසාදිනා කම්මෙන වුට්ඨාති. සමනුභාසනං කම්මෙනෙව ආපජ්ජති, කම්මෙන වුට්ඨාති. සෙසං අකම්මෙන ආපජ්ජති, අකම්මෙන වුට්ඨාති. कम्मचतुष्कामध्ये अर्थ खालीलप्रमाणे समजावा: पापी दृष्टीचा त्याग न केल्यामुळे होणाऱ्या आपत्तीला कर्माने (कम्मवाचेने) प्राप्त होतो, आणि देशना करताना अकर्माने (कम्मवाचा नसलेल्या देशनेने) उठतो. (शुक्क) विस्सट्ठि (शुक्रविसर्ग) इत्यादी आपत्तीला अकर्माने प्राप्त होतो, आणि परिवास इत्यादी कर्माने उठतो. समनुभाषण (तिसऱ्या वेळेपर्यंतच्या कर्माने) होणाऱ्या आपत्तीला कर्मानेच प्राप्त होतो, आणि कर्मानेच उठतो. उर्वरित आपत्तीला अकर्माने प्राप्त होतो, आणि अकर्मानेच उठतो. පරික්ඛාරචතුක්කෙ පඨමො සකපරික්ඛාරො, දුතියො සඞ්ඝිකොව තතියො චෙතියසන්තකො, චතුත්ථො ගිහිපරික්ඛාරො. සචෙ පන සො පත්තචීවරනවකම්මභෙසජ්ජානං අත්ථාය ආහටො හොති, අවාපුරණං දාතුං අන්තො ඨපාපෙතුඤ්ච වට්ටති. परिक्खारचतुष्कामध्ये: पहिला स्वतःचा परिक्खार (वैयक्तिक साहित्य) होय, दुसरा सांघिकच (संघाचा) परिक्खार होय, तिसरा चेतिय-संतक (चैत्याचा) परिक्खार होय, आणि चौथा गृहस्थाचा परिक्खार होय. परंतु जर तो गृहस्थाचा परिक्खार पत्त (पात्र), चीवर (वस्त्र), नवकम्म (नवीन बांधकाम) किंवा भेषज्ज (औषध) यांच्यासाठी विहारात आणलेला असेल, तर त्याची किल्ली देणे आणि तो विहाराच्या आत ठेवणे योग्य आहे. සම්මුඛාචතුක්කෙ පාපිකාය දිට්ඨියා අප්පටිනිස්සග්ගාපත්තිං සඞ්ඝස්ස සම්මුඛා ආපජ්ජති, වුට්ඨානකාලෙ පන සඞ්ඝෙන කිච්චං නත්ථීති පරම්මුඛා වුට්ඨාති. විස්සට්ඨිආදිකං පරම්මුඛා ආපජ්ජති, සඞ්ඝස්ස සම්මුඛා වුට්ඨාති. සමනුභාසනං සඞ්ඝස්ස සම්මුඛා එව ආපජ්ජති, සම්මුඛා වුට්ඨාති. සෙසං සම්පජානමුසාවාදාදිභෙදං පරම්මුඛාව ආපජ්ජති, පරම්මුඛාව වුට්ඨාති. අජානන්තචතුක්කං අචිත්තකචතුක්කසදිසං. सम्मुखाचतुष्कामध्ये अर्थ खालीलप्रमाणे समजावा: पापी दृष्टीचा त्याग न केल्यामुळे होणाऱ्या आपत्तीला संघाच्या संमुख (प्रत्यक्ष) प्राप्त होतो, परंतु उठण्याच्या वेळी संघाचे काही काम नसल्यामुळे संघाच्या परोक्ष (अप्रत्यक्ष) उठतो. (शुक्क) विस्सट्ठि इत्यादी आपत्तीला परोक्ष प्राप्त होतो, आणि संघाच्या संमुख उठतो. समनुभाषण आपत्तीला संघाच्या संमुखच प्राप्त होतो, आणि संमुखच उठतो. उर्वरित संपजानमुसावाद (जाणूनबुजून असत्य बोलणे) इत्यादी प्रकारच्या आपत्तीला परोक्षच प्राप्त होतो, आणि परोक्षच उठतो. अजानंतचतुष्क (न जाणता होणारे चतुष्क) हे अचित्तकचतुष्कासारखेच आहे. ලිඞ්ගපාතුභාවෙනාති සයිතස්සෙව භික්ඛුස්ස වා භික්ඛුනියා වා ලිඞ්ගපරිවත්තෙ ජාතෙ සහගාරසෙය්යාපත්ති හොති ඉදමෙව තං පටිච්ච වුත්තං. උභින්නම්පි පන අසාධාරණාපත්ති ලිඞ්ගපාතුභාවෙන වුට්ඨාති. සහපටිලාභචතුක්කෙ යස්ස භික්ඛුනො ලිඞ්ගං පරිවත්තති, සො සහ ලිඞ්ගපටිලාභෙන පඨමං උප්පන්නවසෙන සෙට්ඨභාවෙන ච පුරිමං පුරිසලිඞ්ගං ජහති, පච්ඡිමෙ ඉත්ථිලිඞ්ගෙ පතිට්ඨාති, පුරිසකුත්තපුරිසාකාරාදිවසෙන පවත්තා කායවචීවිඤ්ඤත්තියො පටිප්පස්සම්භන්ති, භික්ඛූති වා පුරිසොති වා එවං පවත්තා පණ්ණත්තියො [Pg.169] නිරුජ්ඣන්ති, යානි භික්ඛුනීහි අසාධාරණානි ඡචත්තාලීස සික්ඛාපදානි තෙහි අනාපත්තියෙව හොති. දුතියචතුක්කෙ පන යස්සා භික්ඛුනියා ලිඞ්ගං පරිවත්තති, සා පච්ඡාසමුප්පත්තියා වා හීනභාවෙන වා පච්ඡිමන්ති සඞ්ඛ්යං ගතං ඉත්ථිලිඞ්ගං ජහති, වුත්තප්පකාරෙන පුරිමන්ති සඞ්ඛ්යං ගතෙ පුරිසලිඞ්ගෙ පතිට්ඨාති. වුත්තවිපරීතා විඤ්ඤත්තියො පටිප්පස්සම්භන්ති, භික්ඛුනීති වා ඉත්ථීති වා එවං පවත්තා පණ්ණත්තියොපි නිරුජ්ඣන්ති, යානි භික්ඛූහි අසාධාරණානි සතං තිංසඤ්ච සික්ඛාපදානි, තෙහි අනාපත්තියෙව හොති. ‘लिंगपातुभावेन’ म्हणजे झोपलेल्याच भिक्खूचे किंवा भिक्खुणीचे लिंग परिवर्तन (लिंग बदल) झाले असता सहगारशय्या-आपत्ती (एकत्र निजण्याची आपत्ती) होते. याच सहगारशय्या-आपत्तीला अनुसरून हे वचन सांगितले आहे. परंतु दोघांच्याही असाधारण आपत्ती लिंगाच्या प्रादुर्भावाने (लिंग परिवर्तनाने) नाहीशा होतात (त्यातून ते उठतात). सहपटिलाभचतुष्कामध्ये: ज्या भिक्खूचे लिंग परिवर्तित होते, तो स्त्री-लिंगाच्या प्राप्तीबरोबरच, प्रथम उत्पन्न झाल्यामुळे आणि श्रेष्ठ असल्यामुळे पूर्वीच्या python पुरुष-लिंगाचा त्याग करतो, आणि नंतरच्या स्त्री-लिंगात प्रतिष्ठित होतो. पुरुषांचे हावभाव, पुरुषांचे आकार इत्यादींमुळे होणाऱ्या कायिक व वाचिक विज्ञाप्ती शांत होतात. ‘भिक्खू’ किंवा ‘पुरुष’ अशा प्रकारे प्रवृत्त झालेल्या संज्ञा (प्रज्ञप्ती) नष्ट होतात. भिक्खुणींशी असाधारण असलेली जी शेचाळीस (४६) शिक्खापदे आहेत, त्यांच्या बाबतीत अनापत्तीच (आपत्ती नसणे) होते. परंतु दुसऱ्या चतुष्कामध्ये: ज्या भिक्खुणीचे लिंग परिवर्तित होते, ती नंतर उत्पन्न झाल्यामुळे किंवा हीन असल्यामुळे ‘नंतरचे’ अशी संज्ञा प्राप्त झालेल्या स्त्री-लिंगाचा त्याग करते, आणि पूर्वोक्त कारणाने ‘पूर्वीचे’ अशी संज्ञा प्राप्त झालेल्या पुरुष-लिंगात प्रतिष्ठित होतो. पूर्वोक्त विज्ञाप्तींच्या विपरीत असलेल्या विज्ञाप्ती शांत होतात. ‘भिक्खुणी’ किंवा ‘स्त्री’ अशा प्रकारे प्रवृत्त झालेल्या संज्ञा देखील नष्ट होतात. भिक्खूंशी असाधारण असलेली जी एकशे तीस (१३०) शिक्खापदे आहेत, त्यांच्या बाबतीत अनापत्तीच होते. චත්තාරො සාමුක්කංසාති චත්තාරො මහාපදෙසා, තෙ හි භගවතා අනුප්පන්නෙ වත්ථුම්හි සයං උක්කංසිත්වා උක්ඛිපිත්වා ඨපිතත්තා ‘‘සාමුක්කංසා’’ති වුච්චන්ති. පරිභොගාති අජ්ඣොහරණීයපරිභොගා, උදකං පන අකාලිකත්තා අප්පටිග්ගහිතකං වට්ටති. යාවකාලිකාදීනි අප්පටිග්ගහිතකානි අජ්ඣොහරිතුං න වට්ටන්ති. චත්තාරි මහාවිකටානි කාලොදිස්සත්තා යථාවුත්තෙ කාලෙ වට්ටන්ති. උපාසකො සීලවාති පඤ්ච වා දස වා සීලානි ගොපයමානො. चार सामुकंस म्हणजे चार महापदेश होत. कारण ते भगवंतांनी एखादी घटना (वस्तू) उत्पन्न होण्यापूर्वीच स्वतः उचलून धरून (प्रकट करून) स्थापित केल्यामुळे त्यांना 'सामुकंस' असे म्हटले जाते. 'परिभोग' म्हणजे खाण्या-पिण्याचे उपभोग्य पदार्थ; परंतु पाणी हे अकालिक (काळाचे बंधन नसलेले) असल्यामुळे, न स्वीकारताही (हस्तांतरित न करताही) चालते. यावकालिक इत्यादी अन्नपदार्थ जर स्वीकारलेले नसतील, तर ते सेवन करण्यास योग्य ठरत नाहीत. चार महाविकट (औषधे) सर्पदंशासारख्या विशिष्ट वेळी निर्दिष्ट केल्यामुळे, सांगितलेल्या वेळी (स्वीकारलेले नसले तरीही) सेवन करण्यास योग्य ठरतात. 'शीलवान उपासक' म्हणजे पाच किंवा दहा शीलांचे रक्षण करणारा होय. ආගන්තුකාදිචතුක්කෙ සඡත්තුපාහනො සසීසං පාරුතො විහාරං පවිසන්තො තත්ථ විචරන්තො ච ආගන්තුකොව ආපජ්ජති, නො ආවාසිකො. ආවාසිකවත්තං අකරොන්තො පන ආවාසිකො ආපජ්ජති, නො ආගන්තුකො. සෙසං කායවචීද්වාරිකං ආපත්තිං උභොපි ආපජ්ජන්ති, අසාධාරණං ආපත්තිං නෙව ආගන්තුකො ආපජ්ජති, නො ආවාසිකො. ගමියචතුක්කෙපි ගමියවත්තං අපූරෙත්වා ගච්ඡන්තො ගමිකො ආපජ්ජති, නො ආවාසිකො. ආවාසිකවත්තං අකරොන්තො පන ආවාසිකො ආපජ්ජති, නො ගමිකො. සෙසං උභොපි ආපජ්ජන්ති, අසාධාරණං උභොපි නාපජ්ජන්ති. වත්ථුනානත්තතාදිචතුක්කෙ චතුන්නං පාරාජිකානං අඤ්ඤමඤ්ඤං වත්ථුනානත්තතාව හොති,නආපත්තිනානත්තතා. සබ්බාපි හි සා පාරාජිකාපත්තියෙව. සඞ්ඝාදිසෙසාදීසුපි එසෙව නයො. භික්ඛුස්ස ච භික්ඛුනියා ච අඤ්ඤමඤ්ඤං කායසංසග්ගෙ භික්ඛුස්ස සඞ්ඝාදිසෙසො භික්ඛුනියා පාරාජිකන්ති එවං ආපත්තිනානත්තතාව හොති, න වත්ථුනානත්තතා, උභින්නම්පි හි කායසංසග්ගොව වත්ථු. තථා ‘‘ලසුණක්ඛාදනෙ භික්ඛුනියා පාචිත්තියං, භික්ඛුස්ස දුක්කට’’න්ති එවමාදිනාපෙත්ථ නයෙන යොජනා වෙදිතබ්බා. චතුන්නං පාරාජිකානං තෙරසහි සඞ්ඝාදිසෙසෙහි සද්ධිං වත්ථුනානත්තතා චෙව ආපත්තිනානත්තතා [Pg.170] ච. එවං සඞ්ඝාදිසෙසාදීනං අනියතාදීහි. ආදිතො පට්ඨාය චත්තාරි පාරාජිකානි එකතො ආපජ්ජන්තානං භික්ඛුභික්ඛුනීනං නෙව වත්ථුනානත්තතා නො ආපත්තිනානත්තතා. විසුං ආපජ්ජන්තෙසුපි සෙසා සාධාරණාපත්තියො ආපජ්ජන්තෙසුපි එසෙව නයො. आगंतुक इत्यादी चतुष्कात, छत्री व पादत्राणांसह, डोके झाकून विहारात प्रवेश करणारा आणि तेथे फिरणारा केवळ आगंतुक भिक्खूच आपत्तीला प्राप्त होतो, निवासी भिक्खू नाही. परंतु निवासी भिक्खूचे कर्तव्य न करणारा निवासी भिक्खू आपत्तीला प्राप्त होतो, आगंतुक नाही. उर्वरित कायिक व वाचिक द्वाराने होणाऱ्या आपत्तीला दोघेही प्राप्त होतात; असाधारण आपत्तीला आगंतुकही प्राप्त होत नाही आणि निवासीही प्राप्त होत नाही. प्रवासी (गमीय) चतुष्कातही, प्रवासाचे कर्तव्य पूर्ण न करता जाणारा प्रवासी भिक्खू आपत्तीला प्राप्त होतो, निवासी नाही. परंतु निवासी भिक्खूचे कर्तव्य न करणारा निवासी भिक्खू आपत्तीला प्राप्त होतो, प्रवासी नाही. उर्वरित आपत्तीला दोघेही प्राप्त होतात आणि असाधारण आपत्तीला दोघेही प्राप्त होत नाहीत. वस्तू-नानात्व (वस्तूंची भिन्नता) इत्यादी चतुष्कात, चार पाराजिकांमध्ये परस्परांमध्ये केवळ वस्तूचीच भिन्नता असते, आपत्तीची भिन्नता नसते. कारण त्या सर्व पाराजिक आपत्तीच आहेत. संघादिसेस इत्यादींमध्येही हाच नियम आहे. भिक्खू आणि भिक्खुणी यांच्या परस्परांच्या शारीरिक संपर्कामुळे (कायसंसर्ग) भिक्खूला संघादिसेस आणि भिक्खुणीला पाराजिक आपत्ती होते; अशा प्रकारे येथे केवळ आपत्तीचीच भिन्नता असते, वस्तूची भिन्नता नसते. कारण दोघांसाठीही शारीरिक संपर्क हीच वस्तू (कारण) आहे. तसेच, 'लसूण खाल्ल्याने भिक्खुणीला पाचित्तिय आणि भिक्खूला दुक्कट आपत्ती होते,' या आणि अशा इतर उदाहरणांवरूनही येथे हाच नियम लागू होतो असे समजावे. चार पाराजिकांची तेरा संघादिसेसांशी तुलना केली असता, वस्तूची भिन्नता आणि आपत्तीची भिन्नता दोन्ही असतात. याचप्रमाणे संघादिसेस इत्यादींची अनियत इत्यादींशी तुलना करावी. सुरुवातीपासून चार पाराजिकांमध्ये एकत्रच आपत्ती प्राप्त होणाऱ्या भिक्खू आणि भिक्खुणींच्या बाबतीत वस्तूची भिन्नताही नसते आणि आपत्तीची भिन्नताही नसते. स्वतंत्रपणे आपत्ती प्राप्त होत असताना किंवा उर्वरित साधारण आपत्ती प्राप्त होत असतानाही हाच नियम लागू होतो. වත්ථුසභාගාදිචතුක්කෙ භික්ඛුස්ස ච භික්ඛුනියා ච කායසංසග්ගෙ වත්ථුසභාගතා, නො ආපත්තිසභාගතා, චතූසු පාරාජිකෙසු ආපත්තිසභාගතා, නො වත්ථුසභාගතා. එස නයො සඞ්ඝාදිසෙසාදීසු. භික්ඛුස්ස ච භික්ඛුනියා ච චතූසු පාරාජිකෙසු වත්ථුසභාගතා චෙව ආපත්තිසභාගතා ච. එස නයො සබ්බාසු සාධාරණාපත්තීසු. අසාධාරණාපත්තියං නෙව වත්ථුසභාගතා නො ආපත්තිසභාගතා. යො හි පුරිමචතුක්කෙ පඨමො පඤ්හො, සො ඉධ දුතියො; යො ච තත්ථ දුතියො, සො ඉධ පඨමො. තතියචතුත්ථෙසු නානාකරණං නත්ථි. वस्तू-सभागता (वस्तूची समानता) इत्यादी चतुष्कात, भिक्खू आणि भिक्खुणी यांच्या शारीरिक संपर्कात (कायसंसर्गात) वस्तूची समानता असते, आपत्तीची समानता नसते. चार पाराजिकांमध्ये आपत्तीची समानता असते, वस्तूची समानता नसते. हाच नियम संघादिसेस इत्यादींमध्येही लागू होतो. भिक्खू आणि भिक्खुणी यांच्या चार पाराजिकांमध्ये वस्तूची समानता आणि आपत्तीची समानता दोन्ही असतात. हाच नियम सर्व साधारण आपत्तींमध्ये लागू होतो. असाधारण आपत्तीमध्ये वस्तूची समानताही नसते आणि आपत्तीची समानताही नसते. कारण जो मागील चतुष्कातील पहिला प्रश्न होता, तो येथे दुसरा आहे; आणि जो तेथे दुसरा होता, तो येथे पहिला आहे. तिसऱ्या आणि चौथ्या प्रश्नांमध्ये कोणताही फरक नाही. උපජ්ඣායචතුක්කෙ සද්ධිවිහාරිකස්ස උපජ්ඣායෙන කත්තබ්බවත්තස්ස අකරණෙ ආපත්තිං උපජ්ඣායො ආපජ්ජති, නො සද්ධිවිහාරිකො උපජ්ඣායස්ස කත්තබ්බවත්තං අකරොන්තො සද්ධිවිහාරිකො ආපජ්ජති, නො උපජ්ඣායො; සෙසං උභොපි ආපජ්ජන්ති, අසාධාරණං උභොපි නාපජ්ජන්ති. ආචරියචතුක්කෙපි එසෙව නයො. उपाध्याय चतुष्कात, सद्धिविहारिकाच्या (शिष्याच्या) प्रति उपाध्यायाने करावयाचे कर्तव्य न केल्यामुळे उपाध्याय आपत्तीला प्राप्त होतो, सद्धिविहारिक नाही. उपाध्यायाच्या प्रति करावयाचे कर्तव्य न करणारा सद्धिविहारिक आपत्तीला प्राप्त होतो, उपाध्याय नाही. उर्वरित आपत्तीला दोघेही प्राप्त होतात आणि असाधारण आपत्तीला दोघेही प्राप्त होत नाहीत. आचार्य चतुष्कातही हाच नियम आहे. ආදියන්තචතුක්කෙ පාදං වා අතිරෙකපාදං වා සහත්ථා ආදියන්තො ගරුකං ආපජ්ජති, ඌනකපාදං ගණ්හාහීති ආණත්තියා අඤ්ඤං පයොජෙන්තො ලහුකං ආපජ්ජති. එතෙන නයෙන සෙසපදත්තයං වෙදිතබ්බං. घेण्याच्या (आदियंत) चतुष्कात, एक पाद (नाणे) किंवा त्याहून अधिक मूल्य स्वतःच्या हाताने घेणारा गंभीर (गुरू) आपत्तीला प्राप्त होतो. 'एक पादपेक्षा कमी मूल्य घे' अशा आज्ञेने दुसऱ्याला प्रवृत्त करणारा सौम्य (लहू) आपत्तीला प्राप्त होतो. या नियमाने उर्वरित तीन पदांचा अर्थ समजून घ्यावा. අභිවාදනාරහචතුක්කෙ භික්ඛුනීනං තාව භත්තග්ගෙ නවමභික්ඛුනිතො පට්ඨාය උපජ්ඣායාපි අභිවාදනාරහා නො පච්චුට්ඨානාරහා. අවිසෙසෙන ච විප්පකතභොජනස්ස භික්ඛුස්ස යො කොචි වුඩ්ඪතරො. සට්ඨිවස්සස්සාපි පාරිවාසිකස්ස සමීපගතො තදහුපසම්පන්නොපි පච්චුට්ඨානාරහො නො අභිවාදනාරහො. අප්පටික්ඛිත්තෙසු ඨානෙසු වුඩ්ඪො නවකස්ස අභිවාදනාරහො චෙව පච්චුට්ඨානාරහො ච. නවකො පන වුඩ්ඪස්ස නෙව අභිවාදනාරහො න පච්චුට්ඨානාරහො. ආසනාරහචතුක්කස්ස පඨමපදං පුරිමචතුක්කෙ දුතියපදෙන, දුතියපදඤ්ච පඨමපදෙන අත්ථතො සදිසං. अभिवादन-योग्य चतुष्कात, भिक्खुणींच्या बाबतीत, भोजनशाळेत नवव्या भिक्खुणीपासून सुरुवात करून उपाध्याय भिक्खुणीसुद्धा अभिवादनास योग्य आहे, परंतु आसनावरून उठून उभे राहण्यास (प्रत्युत्थानास) योग्य नाही. आणि सामान्यतः, भोजन अर्धवट राहिलेल्या (जेवत असलेल्या) भिक्खूसाठी कोणताही ज्येष्ठ भिक्खू अभिवादनास योग्य असतो, परंतु प्रत्युत्थानास नाही. साठ वर्षांची दीक्षा असलेला परिवास (शिक्षेचा काळ) भोगणारा भिक्खू असला तरी, त्याच्या जवळ गेलेला त्याच दिवशी उपसंपदा प्राप्त झालेला नवदीक्षित भिक्खू हा प्रत्युत्थानास योग्य असतो, अभिवादनास नाही. निषिद्ध नसलेल्या ठिकाणी, ज्येष्ठ भिक्खू हा कनिष्ठ भिक्खूसाठी अभिवादनास आणि प्रत्युत्थानास दोन्हीसाठी योग्य असतो. परंतु कनिष्ठ भिक्खू हा ज्येष्ठासाठी अभिवादनास किंवा प्रत्युत्थानास योग्य नसतो. आसन-योग्य चतुष्काचे पहिले पद मागील चतुष्काच्या दुसऱ्या पदाशी आणि दुसरे पद पहिल्या पदाशी अर्थाच्या दृष्टीने समान आहे. කාලචතුක්කෙ [Pg.171] පවාරෙත්වා භුඤ්ජන්තො කාලෙ ආපජ්ජති නො විකාලෙ, විකාලභොජනාපත්තිං විකාලෙ ආපජ්ජති නො කාලෙ, සෙසං කාලෙ චෙව ආපජ්ජති විකාලෙ ච, අසාධාරණං නෙව කාලෙ නො විකාලෙ. පටිග්ගහිතචතුක්කෙ පුරෙභත්තං පටිග්ගහිතාමිසං කාලෙ කප්පති නො විකාලෙ. පානකං විකාලෙ කප්පති, පුනදිවසම්හි නො කාලෙ. සත්තාහකාලිකං යාවජීවිකං කාලෙ චෙව කප්පති විකාලෙ ච. අත්තනො අත්තනො කාලාතීතං යාවකාලිකාදිත්තයං අකප්පියමංසං උග්ගහිතකමප්පටිග්ගහිතකඤ්ච නෙව කාලෙ කප්පති නො විකාලෙ. काल-चतुष्कात, पवारेत (भोजन नाकारल्यानंतर पुन्हा) जेवणारा भिक्खू योग्य वेळी (सकाळी) आपत्तीला प्राप्त होतो, विकाल (दुपारनंतरच्या) वेळी नाही. विकाल-भोजन आपत्तीला विकाल वेळी प्राप्त होतो, योग्य वेळी नाही. उर्वरित आपत्तीला योग्य वेळी आणि विकाल वेळी दोन्ही वेळी प्राप्त होतो; असाधारण आपत्तीला योग्य वेळीही प्राप्त होत नाही आणि विकाल वेळीही नाही. प्रतिग्रहीत (स्वीकारलेल्या वस्तूंच्या) चतुष्कात, भोजनापूर्वी स्वीकारलेले अन्न योग्य वेळी कप्पिय (योग्य) असते, विकाल वेळी नाही. पेय (पानक) विकाल वेळी कप्पिय असते, परंतु दुसऱ्या दिवशी योग्य वेळी नाही. सप्ताहाकालिक आणि यावजीविक औषध योग्य वेळी आणि विकाल वेळी दोन्ही वेळी कप्पिय असते. आपापली वेळ निघून गेलेले यावकालिक इत्यादी तीन प्रकारचे पदार्थ, अकप्पिय (अयोग्य) मांस, स्वतः उचलून घेतलेले आणि न स्वीकारलेले अन्न हे योग्य वेळीही कप्पिय नसते आणि विकाल वेळीही नसते. පච්චන්තිමචතුක්කෙ සමුද්දෙ සීමං බන්ධන්තො පච්චන්තිමෙසු ජනපදෙසු ආපජ්ජති, නො මජ්ඣිමෙසු; පඤ්චවග්ගෙන ගණෙන උපසම්පාදෙන්තො ගුණඞ්ගුණූපාහනං ධුවනහානං චම්මත්ථරණානි ච මජ්ඣිමෙසු ජනපදෙසු ආපජ්ජති නො පච්චන්තිමෙසු. ඉමානි චත්තාරි ‘‘ඉධ න කප්පන්තී’’ති වදන්තොපි පච්චන්තිමෙසු ආපජ්ජති, ‘‘ඉධ කප්පන්තී’’ති වදන්තො පන මජ්ඣිමෙසු ආපජ්ජති. සෙසාපත්තිං උභයත්ථ ආපජ්ජති, අසාධාරණං න කත්ථචි ආපජ්ජති. දුතියචතුක්කෙ පඤ්චවග්ගෙන ගණෙන උපසම්පදාදි චතුබ්බිධම්පි වත්ථු පච්චන්තිමෙසු ජනපදෙසු කප්පති. ‘‘ඉදං කප්පතී’’ති දීපෙතුම්පි තත්ථෙව කප්පති නො මජ්ඣිමෙසු. ‘‘ඉදං න කප්පතී’’ති දීපෙතුං පන මජ්ඣිමෙසු ජනපදෙසු කප්පති නො පච්චන්තිමෙසු. සෙසං ‘‘අනුජානාමි භික්ඛවෙ පඤ්ච ලොණානී’’තිආදි අනුඤ්ඤාතකං උභයත්ථ කප්පති. යං පන අකප්පියන්ති පටික්ඛිත්තං, තං උභයත්ථාපි න කප්පති. प्रत्यन्तिम (सीमावर्ती प्रदेश) चतुष्कात, समुद्रात सीमा बांधणारा भिक्खू प्रत्यन्तिम जनपदांमध्ये आपत्तीला प्राप्त होतो, मध्यम (मध्यवर्ती) जनपदांमध्ये नाही. पाच जणांच्या गणाने उपसंपदा देणारा, अनेक थरांचे पादत्राण वापरणारा, नेहमी स्नान करणारा आणि चामड्याचे आसन पसरवणारा भिक्खू मध्यम जनपदांमध्ये आपत्तीला प्राप्त होतो, प्रत्यन्तिम जनपदांमध्ये नाही. 'या चार गोष्टी येथे कप्पिय (योग्य) नाहीत' असे म्हणणारा भिक्खूसुद्धा प्रत्यन्तिम जनपदांमध्ये आपत्तीला प्राप्त होतो; परंतु 'या येथे कप्पिय आहेत' असे म्हणणारा मध्यम जनपदांमध्ये आपत्तीला प्राप्त होतो. उर्वरित आपत्तीला दोन्ही ठिकाणी प्राप्त होतो, आणि असाधारण आपत्तीला कोठेही प्राप्त होत नाही. दुसऱ्या चतुष्कात, पाच जणांच्या गणाने उपसंपदा देणे इत्यादी चारही प्रकारच्या गोष्टी प्रत्यन्तिम जनपदांमध्ये कप्पिय आहेत. 'हे कप्पिय आहे' असे दर्शवणे देखील तेथेच कप्पिय आहे, मध्यम जनपदांमध्ये नाही. परंतु 'हे कप्पिय नाही' असे दर्शवणे मध्यम जनपदांमध्ये कप्पिय आहे, प्रत्यन्तिम जनपदांमध्ये नाही. उर्वरित 'भिक्खूंनो, मी पाच प्रकारच्या मिठांना अनुमती देतो' इत्यादी अनुमती दिलेल्या गोष्टी दोन्ही ठिकाणी कप्पिय आहेत. परंतु जे अकप्पिय म्हणून निषिद्ध केले आहे, ते दोन्ही ठिकाणी कप्पिय नसते. අන්තොආදිචතුක්කෙ අනුපඛජ්ජ සෙය්යාදිං අන්තො ආපජ්ජති නො බහි, අජ්ඣොකාසෙ සඞ්ඝිකමඤ්චාදීනි නික්ඛිපිත්වා පක්කමන්තො බහි ආපජ්ජති නො අන්තො, සෙසං අන්තො චෙව බහි ච, අසාධාරණං නෙව අන්තො න බහි. අන්තොසීමාදිචතුක්කෙ ආගන්තුකො වත්තං අපූරෙන්තො අන්තොසීමාය ආපජ්ජති, ගමියො බහිසීමාය මුසාවාදාදිං අන්තොසීමාය ච බහිසීමාය ච ආපජ්ජති,අසාධාරණං න කත්ථචි. ගාමචතුක්කෙ අන්තරඝරපටිසංයුත්තං සෙඛියපඤ්ඤත්තිං ගාමෙ ආපජ්ජති නො අරඤ්ඤෙ. භික්ඛුනී අරුණං උට්ඨාපයමානා අරඤ්ඤෙ ආපජ්ජති නො ගාමෙ. මුසාවාදාදිං ගාමෙ චෙව ආපජ්ජති අරඤ්ඤෙ ච, අසාධාරණං න කත්ථචි. अन्तो (आत) इत्यादी चतुष्कात – दुसऱ्या भिक्खूच्या जागेत घुसून निजणे (अनुपक्षज्जसेय्या) इत्यादी आपत्ती विहाराच्या आत ओढवून घेतो, बाहेर नाही. उघड्या जागेत संघिक खाट (मंच) इत्यादी ठेवून निघून गेल्यास बाहेर आपत्ती ओढवून घेतो, आत नाही. उर्वरित आपत्ती आत आणि बाहेर दोन्ही ठिकाणी ओढवून घेतो. असाधारण आपत्ती आतही नाही आणि बाहेरही नाही. अन्तोसीमा (सीमेच्या आत) इत्यादी चतुष्कात – आगंतुक भिक्खूने आपले कर्तव्य पूर्ण न केल्यास तो सीमेच्या आत आपत्ती ओढवून घेतो. जाणारा (प्रवासाला निघणारा) भिक्खू सीमेच्या बाहेर आपत्ती ओढवून घेतो. मुसावाद (असत्य बोलणे) इत्यादी आपत्ती सीमेच्या आत आणि बाहेर दोन्ही ठिकाणी ओढवून घेतो. असाधारण आपत्ती कुठेही ओढवून घेत नाही. ग्राम-चतुष्कात – अंतर्गृहाशी (घरांच्या आत जाण्याशी) संबंधित सेखिय नियमांचे उल्लंघन गावात होते, अरण्यात नाही. भिक्खुणीने अरण्यात अरुणोदय घडवून आणल्यास (रात्र घालवल्यास) अरण्यात आपत्ती ओढवून घेते, गावात नाही. मुसावाद इत्यादी आपत्ती गावात आणि अरण्यात दोन्ही ठिकाणी ओढवून घेतो. असाधारण आपत्ती कुठेही ओढवून घेत नाही. චත්තාරො [Pg.172] පුබ්බකිච්චාති ‘‘සම්මජ්ජනී පදීපො ච උදකං ආසනෙන චා’’ති ඉදං චතුබ්බිධං පුබ්බකරණන්ති වුච්චතීති වුත්තං. ‘‘ඡන්දපාරිසුද්ධිඋතුක්ඛානං භික්ඛුගණනා ච ඔවාදො’’ති ඉමෙ පන ‘‘චත්තාරො පුබ්බකිච්චා’’ති වෙදිතබ්බා. චත්තාරො පත්තකල්ලාති උපොසථො යාවතිකා ච භික්ඛූ කම්මප්පත්තා තෙ ආගතා හොන්ති, සභාගාපත්තියො න විජ්ජන්ති, වජ්ජනීයා ච පුග්ගලා තස්මිං න හොන්ති, පත්තකල්ලන්ති වුච්චතීති. චත්තාරි අනඤ්ඤපාචිත්තියානීති ‘‘එතදෙව පච්චයං කරිත්වා අනඤ්ඤං පාචිත්තිය’’න්ති එවං වුත්තානි අනුපඛජ්ජසෙය්යාකප්පනසික්ඛාපදං ‘‘එහාවුසො ගාමං වා නිගමං වා’’ති සික්ඛාපදං, සඤ්චිච්ච කුක්කුච්චඋපදහනං, උපස්සුතිතිට්ඨනන්ති ඉමානි චත්තාරි. චතස්සො භික්ඛුසම්මුතියොති ‘‘එකරත්තම්පි චෙ භික්ඛු තිචීවරෙන විප්පවසෙය්ය අඤ්ඤත්ර භික්ඛුසම්මුතියා, අඤ්ඤං නවං සන්ථතං කාරාපෙය්ය අඤ්ඤත්ර භික්ඛුසම්මුතියා, තතො චෙ උත්තරි විප්පවසෙය්ය අඤ්ඤත්ර භික්ඛුසම්මුතියා, දුට්ඨුල්ලං ආපත්තිං අනුපසම්පන්නස්ස ආරොචෙය්ය අඤ්ඤත්ර භික්ඛුසම්මුතියා’’ති එවං ආගතා තෙරසහි සම්මුතීහි මුත්තා සම්මුතියො. ගිලානචතුක්කෙ අඤ්ඤභෙසජ්ජෙන කරණීයෙන ලොලතාය අඤ්ඤං විඤ්ඤාපෙන්තො ගිලානො ආපජ්ජති, අභෙසජ්ජකරණීයෙන භෙසජ්ජං විඤ්ඤාපෙන්තො අගිලානො ආපජ්ජති, මුසාවාදාදිං උභොපි ආපජ්ජන්ති, අසාධාරණං උභොපි නාපජ්ජන්ති. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. 'चार पूर्वकृत्ये' म्हणजे – 'झाडलोट करणे, दिवा लावणे, पाणी आणि आसन व्यवस्था करणे' या चार प्रकारच्या गोष्टींना 'पूर्वकर्म' (पुब्बकरण) म्हटले जाते, असे (अट्टकथेत) म्हटले आहे. परंतु, 'छंद (संमती) व पारिशुद्धी आणणे, ऋतू सांगणे, भिक्खूंची गणना करणे आणि (भिक्खुणींना) ओवाद (उपदेश) देणे' या चार गोष्टींना 'पूर्वकृत्ये' (पुब्बकिच्च) समजावे. 'चार पत्तकल्ल' (पात्रता) म्हणजे – उपोसथ असणे, जेवढे भिक्खू संघकर्मासाठी पात्र आहेत ते सर्व उपस्थित असणे, सभाग-आपत्ती (समान स्वरूपाच्या आपत्ती) नसणे, आणि वर्जनीय व्यक्ती तेथे नसणे, याला 'पत्तकल्ल' (योग्य वेळ/पात्रता) म्हटले जाते. 'चार अनन्य-पाचित्तिय' म्हणजे – 'याच कारणाने दुसरे पाचित्तिय होते' अशा प्रकारे सांगितलेले (१) अनुपक्षज्जसेय्या-कप्पन सिक्खापद (दुसऱ्याच्या जागेत निजणे), (२) 'एहावुसो गामं वा निगमं वा' सिक्खापद, (३) संचिच्च-कुकुच्च-उपदहन (जाणूनबुजून संशय निर्माण करणे), आणि (४) उपस्सुति-तिट्ठन (चोरीछुपे ऐकणे) – ही चार होत. 'चार भिक्खू-संमती' म्हणजे – 'जर भिक्खू भिक्खू-संमतीशिवाय एका रात्रीसाठीही तिचीवरापासून दूर राहील...', 'भिक्खू-संमतीशिवाय नवीन संथत (आसन) बनवून घेईल...', 'त्यापेक्षा अधिक काळ भिक्खू-संमतीशिवाय दूर राहील...', 'भिक्खू-संमतीशिवाय अनुपसंपन्नाला दुट्ठुल्ल (गंभीर) आपत्ती सांगेल...' अशा प्रकारे आलेल्या तेरा संमतींमधून मुक्त असलेल्या चार संमती होत. ग्लान (आजारी भिक्खू) चतुष्कात – दुसऱ्या औषधाच्या गरजेपोटी चंचलतेमुळे (लोलुपतेमुळे) इतर औषधाची मागणी केल्यास आजारी भिक्खू आपत्ती ओढवून घेतो. औषधाची गरज नसताना औषधाची मागणी केल्यास निरोगी (अग्लान) भिक्खू आपत्ती ओढवून घेतो. मुसावाद इत्यादी आपत्ती दोघेही ओढवून घेतात. असाधारण आपत्ती दोघेही ओढवून घेत नाहीत. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. චතුක්කවාරවණ්ණනා නිට්ඨිතා. चतुष्कवार-वर्णना समाप्त झाली. පඤ්චකවාරවණ්ණනා पंचकवार-वर्णना 325. පඤ්චකෙසු පඤ්ච පුග්ගලා නියතාති ආනන්තරියානමෙවෙතං ගහණං. පඤ්ච ඡෙදනකා ආපත්තියො නාම පමාණාතික්කන්තෙ මඤ්චපීඨෙ නිසීදනකණ්ඩුප්පටිච්ඡාදිවස්සිකසාටිකාසු සුගතචීවරෙ ච වෙදිතබ්බා. පඤ්චහාකාරෙහීති අලජ්ජිතා, අඤ්ඤාණතා, කුක්කුච්චප්පකතතා, අකප්පියෙ කප්පියසඤ්ඤිතා, කප්පියෙ අකප්පියසඤ්ඤිතාති ඉමෙහි පඤ්චහි. පඤ්ච ආපත්තියො මුසාවාදපච්චයාති පාරාජිකථුල්ලච්චයදුක්කටසඞ්ඝාදිසෙසපාචිත්තියා. අනාමන්තචාරොති ‘‘සන්තං භික්ඛුං අනාපුච්ඡා පුරෙභත්තං පච්ඡාභත්තං කුලෙසු චාරිත්තං ආපජ්ජෙය්යා’’ති ඉමස්ස ආපුච්ඡිත්වා චාරස්ස අභාවො. අනධිට්ඨානන්ති ‘‘ගණභොජනෙ අඤ්ඤත්ර සමයා’’ති වුත්තං [Pg.173] සමයං අධිට්ඨහිත්වා භොජනං අධිට්ඨානං නාම; තථා අකරණං අනධිට්ඨානං. අවිකප්පනා නාම යා පරම්පරභොජනෙ විකප්පනා වුත්තා, තස්සා අකරණං. ඉමානි හි පඤ්ච පිණ්ඩපාතිකස්ස ධුතඞ්ගෙනෙව පටික්ඛිත්තානි. උස්සඞ්කිතපරිසඞ්කිතොති යෙ පස්සන්ති, යෙ සුණන්ති, තෙහි උස්සඞ්කිතො චෙව පරිසඞ්කිතො ච. අපි අකුප්පධම්මො ඛීණාසවොපි සමානො, තස්මා අගොචරා පරිහරිතබ්බා. න හි එතෙසු සන්දිස්සමානො අයසතො වා ගරහතො වා මුච්චති. සොසානිකන්ති සුසානෙ පතිතකං. පාපණිකන්ති ආපණද්වාරෙ පතිතකං. ථූපචීවරන්ති වම්මිකං පරික්ඛිපිත්වා බලිකම්මකතං. ආභිසෙකිකන්ති නහානට්ඨානෙ වා රඤ්ඤො අභිසෙකට්ඨානෙ වා ඡඩ්ඩිතචීවරං. භතපටියාභතන්ති සුසානං නෙත්වා පුන ආනීතකං. පඤ්ච මහාචොරා උත්තරිමනුස්සධම්මෙ වුත්තා. ३२५. पंचकांमध्ये – 'पाच व्यक्ती नियत (निश्चित नरकात जाणाऱ्या) आहेत' हे आनंतर्य कर्मांचेच ग्रहण आहे. 'पाच छेदक आपत्ती' म्हणजे प्रमाणाबाहेर (मोठ्या आकाराचे) मंच (खाट) आणि पीठ (स्टूल), निसीदन (बैठक), कंडुप्पटिच्छादी (खाज सुटल्यावर वापरायचे वस्त्र), वस्सिकासटिका (पावसाळी वस्त्र) आणि सुगत-चीवर (बुद्धांचे चीवर) यांच्या प्रमाणाचे उल्लंघन केल्यावर होणाऱ्या आपत्ती समजाव्यात. 'पाच कारणांनी' म्हणजे – (१) अलज्जिता (निर्लज्जपणा), (२) अज्ञानता, (३) कुक्कुच्चप्पकतता (संशयी स्वभाव), (४) अकल्पिय (अयोग्य) वस्तूला कल्पिय (योग्य) समजणे, आणि (५) कल्पिय (योग्य) वस्तूला अकल्पिय (अयोग्य) समजणे – या पाच कारणांनी. 'मुसावादाच्या (असत्य बोलण्याच्या) प्रत्ययाने होणाऱ्या पाच आपत्ती' म्हणजे – पाराजिक, थुल्लच्चय, दुक्कट, संघादिसेस आणि पाचित्तिय. 'अनामंतचार' म्हणजे – 'विद्यमान भिक्खूला न विचारता जेवणापूर्वी किंवा जेवणानंतर कुळांमध्ये फिरणे' या नियमात विचारल्याशिवाय फिरण्याचा अभाव असणे. 'अनधिट्ठान' म्हणजे – 'गणभोजनात वेळेव्यतिरिक्त...' असे जे म्हटले आहे, त्या वेळेचा निश्चय (अधिट्ठान) करून भोजन करणे म्हणजे 'अधिट्ठान' होय; आणि तसे न करणे म्हणजे 'अनधिट्ठान' होय. 'अविकप्पना' म्हणजे – परस्परभोजनात जी विकप्पना (दुसऱ्याच्या स्वाधीन करणे) सांगितली आहे, ती न करणे. कारण या पाच गोष्टी पिंडपातिक (भिक्षा मागणाऱ्या) भिक्खूने धुतंगानेच वर्ज्य केलेल्या असतात. 'उस्संकित-परिसंकित' (शंकित व संशयास्पद) म्हणजे – जे पाहतात आणि जे ऐकतात, त्यांच्याद्वारे शंकित आणि संशयास्पद ठरलेला. जरी तो अकुप्पधम्म (ज्याचे अर्हतपद नष्ट होऊ शकत नाही असा) आणि क्षीणासव (अर्हत) असला तरीही; म्हणून अयोग्य ठिकाणे (अगोचर) टाळली पाहिजेत. कारण अशा ठिकाणी दिसणारा मनुष्य अपकीर्ती किंवा निंदेपासून वाचू शकत नाही. 'सोसानिक' म्हणजे स्मशानात पडलेले वस्त्र. 'पापणिक' म्हणजे दुकानाच्या दारात पडलेले वस्त्र. 'थूपचीवर' म्हणजे वारुळाला गुंडाळून पूजेसाठी अर्पण केलेले वस्त्र. 'आभिसेकिक' म्हणजे स्नानगृहात किंवा राजाच्या राज्याभिषेकाच्या ठिकाणी टाकून दिलेले वस्त्र. 'भतपटियाभत' म्हणजे स्मशानात नेऊन पुन्हा परत आणलेले वस्त्र. पाच महाचोर उत्तरिमनुस्सधम्म (चौथ्या पाराजिक सिक्खापदात) सांगितले आहेत. පඤ්චාපත්තියො කායතො සමුට්ඨන්තීති පඨමෙන ආපත්තිසමුට්ඨානෙන පඤ්ච ආපත්තියො ආපජ්ජති, ‘‘භික්ඛු කප්පියසඤ්ඤී සඤ්ඤාචිකාය කුටිං කරොතී’’ති එවං අන්තරපෙය්යාලෙ වුත්තාපත්තියො. පඤ්ච ආපත්තියො කායතො ච වාචතො චාති තතියෙන ආපත්තිසමුට්ඨානෙන පඤ්ච ආපත්තියො ආපජ්ජති, ‘‘භික්ඛු කප්පියසඤ්ඤී සංවිදහිත්වා කුටිං කරොතී’’ති එවං තත්ථෙව වුත්තා ආපත්තියො. දෙසනාගාමිනියොති ඨපෙත්වා පාරාජිකඤ්ච සඞ්ඝාදිසෙසඤ්ච අවසෙසා. ‘पाच आपत्ती कायेतून (शरीराद्वारे) उत्पन्न होतात’ म्हणजे पहिल्या आपत्ती-समुत्थानाने (केवळ कायेने) पाच आपत्ती ओढवून घेतो. जसे: 'भिक्खू कल्पिय-संज्ञी होऊन स्वतः याचना करून कुटी (झोपडी) बनवतो' अशा प्रकारे अंतरापेय्यालात सांगितलेल्या आपत्ती होत. ‘पाच आपत्ती कायेने आणि वाचेने (शरीर व वाणीने) उत्पन्न होतात’ म्हणजे तिसऱ्या आपत्ती-समुत्थानाने (काया व वाणीने) पाच आपत्ती ओढवून घेतो. जसे: 'भिक्खू कल्पिय-संज्ञी होऊन (इतरांना) सांगून कुटी बनवतो' अशा प्रकारे तेथेच सांगितलेल्या आपत्ती होत. ‘देशनागामिनी’ म्हणजे पाराजिक आणि संघादिसेस सोडून उर्वरित सर्व आपत्ती. පඤ්ච කම්මානීති තජ්ජනීයනියස්සපබ්බාජනීයපටිසාරණීයානි චත්තාරි උක්ඛෙපනීයඤ්ච තිවිධම්පි එකන්ති පඤ්ච. යාවතතියකෙ පඤ්චාති උක්ඛිත්තානුවත්තිකාය භික්ඛුනියා යාවතතියං සමනුභාසනාය අප්පටිනිස්සජ්ජන්තියා පාරාජිකං ථුල්ලච්චයං දුක්කටන්ති තිස්සො, භෙදකානුවත්තකාදිසමනුභාසනාසු සඞ්ඝාදිසෙසො, පාපිකාය දිට්ඨියා අප්පටිනිස්සග්ගෙ පාචිත්තියං. අදින්නන්ති අඤ්ඤෙන අදින්නං. අවිදිතන්ති පටිග්ගණ්හාමීති චෙතනාය අභාවෙන අවිදිතං. අකප්පියන්ති පඤ්චහි සමණකප්පෙහි අකප්පියකතං; යං වා පනඤ්ඤම්පි අකප්පියමංසං අකප්පියභොජනං. අකතාතිරිත්තන්ති පවාරෙත්වා අතිරිත්තං අකතං. සමජ්ජදානන්ති නටසමජ්ජාදිදානං. උසභදානන්ති ගොගණස්ස අන්තරෙ උසභවිස්සජ්ජනං. චිත්තකම්මදානන්ති ආවාසං කාරෙත්වා තත්ථ චිත්තකම්මං කාරෙතුං වට්ටති. ඉදං පන පටිභානචිත්තකම්මදානං සන්ධාය වුත්තං. ඉමානි හි පඤ්ච කිඤ්චාපි ලොකස්ස පුඤ්ඤසම්මතානි, අථ ඛො අපුඤ්ඤානි අකුසලානියෙව[Pg.174]. උප්පන්නං පටිභානන්ති එත්ථ පටිභානන්ති කථෙතුකම්යතා වුච්චති. ඉමෙ පඤ්ච දුප්පටිවිනොදයාති න සුපටිවිනොදයා; උපායෙන පන කාරණෙන අනුරූපාහි පච්චවෙක්ඛනාඅනුසාසනාදීහි සක්කා පටිවිනොදෙතුන්ති අත්ථො. ‘पाच कर्मे’ म्हणजे – तज्जनीयकर्म, नियस्सकर्म, पब्बाानीयकर्म, पटिसारणीयकर्म ही चार आणि तीन प्रकारच्या उक्खेपनीयकर्मांना एक मानून पाच कर्मे होतात. ‘तिसऱ्यांदा (समजावण्याने) होणाऱ्या पाच आपत्ती’ म्हणजे – उक्खित्तक (बहिष्कृत) भिक्खूचे अनुकरण करणाऱ्या भिक्खुणीने तिसऱ्यांदा समजावूनही (समणुभासन करूनही) आपले मत न सोडल्यास पाराजिक, थुल्लच्चय आणि दुक्कट या तीन आपत्ती; संघभेद करणाऱ्याचे अनुकरण करणाऱ्यांच्या समणुभासनात संघादिसेस आपत्ती; आणि पापी दृष्टी न सोडल्यास पाचित्तिय आपत्ती – अशा पाच आपत्ती होतात. ‘अदिन्न’ म्हणजे दुसऱ्याने न दिलेले. ‘अविदित’ म्हणजे 'मी स्वीकारतो' अशा चेतनेच्या अभावामुळे न समजलेले. ‘अकल्पिय’ म्हणजे पाच समणकल्पांनी (श्रमण-नियमांनी) अकल्पिय केलेले; किंवा इतर कोणतेही अकल्पिय मांस किंवा अकल्पिय भोजन. ‘अकतातिरित्त’ म्हणजे पवारणा केल्यानंतर अतिरित्त (उर्वरित अन्न खाण्याचा विधी) न केलेले. ‘समज्जदान’ म्हणजे नट-तमाशा इत्यादींचे दान. ‘उषभदान’ म्हणजे गाईंच्या कळपात वळू (उषभ) सोडणे. ‘चित्तकम्मदान’ म्हणजे विहार बनवून घेऊन तेथे चित्तकाम (चित्रकाम) करणे योग्य आहे; परंतु येथे 'प्रतिभान-चित्तकम्मदान' (बुद्धीने कल्पिलेले चित्रकाम दान) या संदर्भाने म्हटले आहे. कारण ही पाच दाने जरी जगात पुण्य मानली जात असली, तरी ती प्रत्यक्षात अपुण्य आणि अकुशलच आहेत. ‘उत्पन्न झालेले प्रतिभान’ यामध्ये 'प्रतिभान' म्हणजे बोलण्याची इच्छा (कथेतुकाम्यता) म्हटले आहे. ‘हे पाच कठीणतेने दूर होणारे आहेत’ म्हणजे ते सहजपणे दूर करता येत नाहीत; परंतु योग्य उपायाने, कारणाने आणि अनुरूप अशा पच्चवेक्खण (आत्मपरीक्षण) व अनुशासनाने (उपदेशाने) दूर केले जाऊ शकतात, असा अर्थ आहे. සකචිත්තං පසීදතීති එත්ථ ඉමානි වත්ථූනි – කටඅන්ධකාරවාසී ඵුස්සදෙවත්ථෙරො කිර චෙතියඞ්ගණං සම්මජ්ජිත්වා එකංසං උත්තරාසඞ්ගං කරිත්වා සින්දුවාරකුසුමසන්ථතමිව සමවිප්පකිණ්ණවාලිකං චෙතියඞ්ගණං ඔලොකෙන්තො බුද්ධාරම්මණං පීතිපාමොජ්ජං උප්පාදෙත්වා අට්ඨාසි. තස්මිං ඛණෙ මාරො පබ්බතපාදෙ නිබ්බත්තකාළමක්කටො විය හුත්වා චෙතියඞ්ගණෙ ගොමයං විප්පකිරන්තො ගතො. ථෙරො නාසක්ඛි අරහත්තං පාපුණිතුං, සම්මජ්ජිත්වා අගමාසි. දුතියදිවසෙපි ජරග්ගවො හුත්වා තාදිසමෙව විප්පකාරං අකාසි. තතියදිවසෙ වඞ්කපාදං මනුස්සත්තභාවං නිම්මිනිත්වා පාදෙන පරිකසන්තො අගමාසි. ථෙරො ‘‘එවරූපො බීභච්ඡපුරිසො සමන්තා යොජනප්පමාණෙසු ගොචරගාමෙසු නත්ථි, සියා නු ඛො මාරො’’ති චින්තෙත්වා ‘‘මාරොසි ත්ව’’න්ති ආහ. ‘‘ආම, භන්තෙ, මාරොම්හි, න දානි තෙ වඤ්චෙතුං අසක්ඛි’’න්ති. ‘‘දිට්ඨපුබ්බො තයා තථාගතො’’ති? ‘‘ආම, දිට්ඨපුබ්බො’’ති. ‘‘මාරො නාම මහානුභාවො හොති, ඉඞ්ඝ තාව බුද්ධස්ස භගවතො අත්තභාවසදිසං අත්තභාවං නිම්මිනාහී’’ති? ‘‘න සක්කා, භන්තෙ, තාදිසං රූපං නිම්මිනිතුං; අපිච ඛො පන තංසරික්ඛකං පතිරූපකං නිම්මිනිස්සාමී’’ති සකභාවං විජහිත්වා බුද්ධරූපසදිසෙන අත්තභාවෙන අට්ඨාසි. ථෙරො මාරං ඔලොකෙත්වා ‘‘අයං තාව සරාගදොසමොහො එවං සොභති, කථං නු ඛො භගවා න සොභති සබ්බසො වීතරාගදොසමොහො’’ති බුද්ධාරම්මණං පීතිං පටිලභිත්වා විපස්සනං වඩ්ඪෙත්වා අරහත්තං පාපුණි. මාරො ‘‘වඤ්චිතොම්හි තයා, භන්තෙ’’ති ආහ. ථෙරොපි ‘‘කිං අත්ථි ජරමාර, තාදිසං වඤ්චෙතු’’න්ති ආහ. ලොකන්තරවිහාරෙපි දත්තො නාම දහරභික්ඛු චෙතියඞ්ගණං සම්මජ්ජිත්වා ඔලොකෙන්තො ඔදාතකසිණං පටිලභි. අට්ඨ සමාපත්තියො නිබ්බත්තෙසි. තතො විපස්සනං වඩ්ඪෙත්වා ඵලත්තයං සච්ඡාකාසි. स्वतःचे चित्त प्रसन्न होते याविषयी येथे या कथा आहेत – असे ऐकिवात आहे की, कटअंधकार येथे राहणारे फुस्सदेव थेर चैत्य-अंगण झाडून, एका खांद्यावर उत्तरासंग (वरचे वस्त्र) परिधान करून, जणू काही निर्गुडीच्या फुलांनी अंथरल्यासारखे समप्रमाणात वाळू पसरलेले चैत्य-अंगण पाहत, बुद्धांचे आलंबन घेऊन मनात प्रीती व प्रमोद उत्पन्न करून उभे राहिले. त्या क्षणी मार पर्वताच्या पायथ्याशी उत्पन्न झालेल्या काळ्या माकडासारखे रूप धारण करून चैत्य-अंगणात शेण पसरवून निघून गेला. थेर अर्हत्त्व प्राप्त करू शकले नाहीत, ते पुन्हा झाडून निघून गेले. दुसऱ्या दिवशीही त्याने म्हातारा बैल बनून तसाच उपद्रव केला. तिसऱ्या दिवशी वाकड्या पायाच्या माणसाचे रूप धारण करून पाय फरफटत तो निघून गेला. थेरांनी विचार केला, 'असा बीभत्स माणूस आसपासच्या एक योजन अंतरावरील भिक्षाटनाच्या गावांमध्ये नाही, हा नक्कीच मार असावा.' त्यांनी विचारले, 'तू मार आहेस का?' तो म्हणाला, 'होय, भंते, मी मार आहे. आता मी आपल्या चित्ताला फसवू शकत नाही.' थेरांनी विचारले, 'तू पूर्वी तथागतांना पाहिले आहेस का?' तो म्हणाला, 'होय, मी पाहिले आहे.' थेर म्हणाले, 'मार हा महान सामर्थ्यवान असतो. तर मग, भगवान बुद्धांच्या शरीरासारखे शरीर निर्माण कर पाहू!' तो म्हणाला, 'भंते, तसे रूप निर्माण करणे शक्य नाही. तरीही, मी त्यांच्यासारखेच एक प्रतिरूप निर्माण करतो,' असे म्हणून स्वतःचे रूप सोडून बुद्धरूपासारखे शरीर धारण करून तो उभा राहिला. थेरांनी माराकडे पाहून विचार केला, 'हा राग, द्वेष आणि मोहाने युक्त असलेला मार जर इतका शोभून दिसतो, तर मग सर्व प्रकारे राग, द्वेष आणि मोहापासून मुक्त असलेले भगवान किती बरं शोभून दिसत असतील!' असे बुद्धारम्मण घेऊन त्यांनी प्रीती प्राप्त केली आणि विपश्यना वाढवून अर्हत्त्व प्राप्त केले. मार म्हणाला, 'भंते, मी आपल्याकडून फसला गेलो.' थेरही म्हणाले, 'हे म्हाताऱ्या मारा! तुझ्यासारख्याला फसवण्यात काय विशेष आहे?' लोकन्तर विहारातही दत्त नावाच्या तरुण भिक्खूने चैत्य-अंगण झाडून पाहत असताना ओदात-कसिण प्राप्त केले. त्यांनी आठ समापत्ती उत्पन्न केल्या. त्यानंतर विपश्यना वाढवून तीन फळे साक्षात केली. පරචිත්තං පසීදතීති එත්ථ ඉමානි වත්ථූනි – තිස්සො නාම දහරභික්ඛු ජම්බුකොලචෙතියඞ්ගණං සම්මජ්ජිත්වා සඞ්කාරඡඩ්ඩනිං හත්ථෙන ගහෙත්වාව අට්ඨාසි[Pg.175]. තස්මිං ඛණෙ තිස්සදත්තත්ථෙරො නාම නාවාතො ඔරුය්හ චෙතියඞ්ගණං ඔලොකෙන්තො භාවිතචිත්තෙන සම්මට්ඨට්ඨානන්ති ඤත්වා පඤ්හාසහස්සං පුච්ඡි, ඉතරො සබ්බං විස්සජ්ජෙසි. අඤ්ඤතරස්මිම්පි විහාරෙ ථෙරො චෙතියඞ්ගණං සම්මජ්ජිත්වා වත්තං පරිච්ඡින්දි. යොනකවිසයතො චෙතියවන්දකා චත්තාරො ථෙරා ආගන්ත්වා චෙතියඞ්ගණං දිස්වා අන්තො අප්පවිසිත්වා ද්වාරෙයෙව ඨත්වා එකො ථෙරො අට්ඨ කප්පෙ අනුස්සරි, එකො සොළස, එකො වීසති, එකො තිංස කප්පෙ අනුස්සරි. दुसऱ्याचे चित्त प्रसन्न होते याविषयी येथे या कथा आहेत – तिस्स नावाचे एक तरुण भिक्खू जम्बुकोल चैत्य-अंगण झाडून कचरा टाकण्याची टोपली हातात धरूनच उभे राहिले. त्या क्षणी तिस्सदत्त थेर नावाचे महाथेर जहाजातून उतरून चैत्य-अंगणाकडे पाहत, 'हे विकसित चित्त असलेल्या व्यक्तीने झाडलेले ठिकाण आहे' असे जाणून त्यांनी एक हजार प्रश्न विचारले, आणि दुसऱ्याने (त्या तरुण भिक्खूने) त्या सर्वांची उत्तरे दिली. दुसऱ्या एका विहारातही एका थेरांनी चैत्य-अंगण झाडून आपले कर्तव्य पूर्ण केले. योनक देशातून चैत्याची वंदना करण्यासाठी आलेले चार थेर चैत्य-अंगण पाहून आत प्रवेश न करता दारापाशीच उभे राहिले. एका थेरांनी आठ कल्प आठवले, एकाने सोळा कल्प, एकाने वीस कल्प आणि एकाने तीस कल्प आठवले. දෙවතා අත්තමනා හොන්තීති එත්ථ ඉදං වත්ථු – එකස්මිං කිර විහාරෙ එකො භික්ඛු චෙතියඞ්ගණඤ්ච බොධියඞ්ගණඤ්ච සම්මජ්ජිත්වා නහායිතුං ගතො. දෙවතා ‘‘ඉමස්ස විහාරස්ස කතකාලතො පට්ඨාය එවං වත්තං පූරෙත්වා සම්මට්ඨපුබ්බො භික්ඛු නත්ථී’’ති පසන්නචිත්තා පුප්ඵහත්ථා අට්ඨංසු. ථෙරො ආගන්ත්වා ‘‘කතරගාමවාසිකාත්ථා’’ති ආහ. ‘‘භන්තෙ, ඉධෙව වසාම, ඉමස්ස විහාරස්ස කතකාලතො පට්ඨාය එවං වත්තං පූරෙත්වා සම්මට්ඨපුබ්බො භික්ඛු නත්ථීති තුම්හාකං, භන්තෙ, වත්තෙ පසීදිත්වා පුප්ඵහත්ථා ඨිතාම්හා’’ති දෙවතා ආහංසු. देवता संतुष्ट होतात याविषयी येथे ही कथा आहे – असे ऐकिवात आहे की, एका विहारात एक भिक्खू चैत्य-अंगण आणि बोधी-अंगण झाडून स्नान करण्यासाठी गेले. 'हा विहार स्थापन झाल्यापासून अशा प्रकारे कर्तव्याचे पालन करून पूर्वी कधीही झाडणारे भिक्खू लाभले नाहीत,' असा विचार करून प्रसन्न चित्त झालेल्या देवता हातात फुले घेऊन उभ्या राहिल्या. थेरांनी येऊन विचारले, 'तुम्ही कोणत्या गावातील रहिवासी आहात?' देवता म्हणाल्या, 'भंते, आम्ही येथेच राहतो. हा विहार स्थापन झाल्यापासून अशा प्रकारे कर्तव्याचे पालन करून पूर्वी कधीही झाडणारे भिक्खू लाभले नाहीत, म्हणून भंते, आपल्या या कर्तव्यावर प्रसन्न होऊन आम्ही हातात फुले घेऊन उभे आहोत.' පාසාදිකසංවත්තනිකන්ති එත්ථ ඉදං වත්ථු – එකං කිර අමච්චපුත්තං අභයත්ථෙරඤ්ච ආරබ්භ අයං කථා උදපාදි ‘‘කිං නු ඛො අමච්චපුත්තො පාසාදිකො, අභයත්ථෙරොති උභොපි නෙ එකස්මිං ඨානෙ ඔලොකෙස්සාමා’’ති. ඤාතකා අමච්චපුත්තං අලඞ්කරිත්වා මහාචෙතියං වන්දාපෙස්සාමාති අගමංසු. ථෙරමාතාපි පාසාදිකං චීවරං කාරෙත්වා පුත්තස්ස පහිණි, ‘‘පුත්තො මෙ කෙසෙ ඡින්දාපෙත්වා ඉමං චීවරං පාරුපිත්වා භික්ඛුසඞ්ඝපරිවුතො මහාචෙතියං වන්දතූ’’ති. අමච්චපුත්තො ඤාතිපරිවුතො පාචීනද්වාරෙන චෙතියඞ්ගණං ආරුළ්හො, අභයත්ථෙරො භික්ඛුසඞ්ඝපරිවුතො දක්ඛිණද්වාරෙන චෙතියඞ්ගණං ආරුහිත්වා චෙතියඞ්ගණෙ තෙන සද්ධිං සමාගන්ත්වා ආහ – ‘‘කිං ත්වං, ආවුසො, මහල්ලකත්ථෙරස්ස සම්මට්ඨට්ඨානෙ කචවරං ඡඩ්ඩෙත්වා මයා සද්ධිං යුගග්ගාහං ගණ්හාසී’’ති. අතීතත්තභාවෙ කිර අභයත්ථෙරො මහල්ලකත්ථෙරො නාම හුත්වා ගොචරගාමෙ චෙතියඞ්ගණං සම්මජ්ජි, අමච්චපුත්තො මහාඋපාසකො හුත්වා සම්මට්ඨට්ඨානෙ කචවරං ගහෙත්වා ඡඩ්ඩෙසි. प्रसन्नता उत्पन्न करणारे याविषयी येथे ही कथा आहे – असे ऐकिवात आहे की, एका अमात्यपुत्राला आणि अभय थेरांना उद्देशून ही चर्चा सुरू झाली: 'अमात्यपुत्र अधिक देखणा आहे की अभय थेर? आपण दोघांनाही एकाच ठिकाणी पाहू या.' नातेवाईक अमात्यपुत्राला सजवून 'महाचैत्याची वंदना घडवून आणू' असे म्हणून गेले. थेरांच्या मातेनेही एक सुंदर चीवर तयार करवून आपल्या पुत्राकडे पाठवले आणि निरोप दिला, 'माझ्या पुत्राने केस कापून, हे चीवर परिधान करून, भिक्खू संघासह महाचैत्याची वंदना करावी.' अमात्यपुत्र नातेवाईकांनी वेढलेला होऊन पूर्व दाराने चैत्य-अंगणात चढला. अभय थेर भिक्खू संघासह दक्षिण दाराने चैत्य-अंगणात चढले आणि चैत्य-अंगणात त्याच्याशी भेट झाल्यावर म्हणाले, 'हे आवुसो! तू वृद्ध थेरांनी झाडलेल्या जागेवर कचरा टाकून माझ्याशी बरोबरी करत आहेस काय?' पूर्वजन्मात अभय थेर हे 'महल्लक थेर' (वृद्ध थेर) नावाचे भिक्खू होते आणि त्यांनी भिक्षाटनाच्या गावातील चैत्य-अंगण झाडले होते, तर तो अमात्यपुत्र महाउपासक होता आणि त्याने त्या झाडलेल्या जागेवरील कचरा उचलून फेकला होता. සත්ථුසාසනං කතං හොතීති ඉදං සම්මජ්ජනවත්තං නාම බුද්ධෙහි වණ්ණිතං, තස්මා තං කරොන්තෙන සත්ථුසාසනං කතං හොති. තත්රිදං වත්ථු – ආයස්මා [Pg.176] කිර සාරිපුත්තො හිමවන්තං ගන්ත්වා එකස්මිං පබ්භාරෙ අසම්මජ්ජිත්වාව නිරොධං සමාපජ්ජිත්වා නිසීදි. භගවා ආවජ්ජන්තො ථෙරස්ස අසම්මජ්ජිත්වා නිසින්නභාවං ඤත්වා ආකාසෙන ගන්ත්වා ථෙරස්ස පුරතො අසම්මට්ඨට්ඨානෙ පාදානි දස්සෙත්වා පච්චාගඤ්ඡි. ථෙරො සමාපත්තිතො වුට්ඨිතො භගවතො පාදානි දිස්වා බලවහිරොත්තප්පං පච්චුපට්ඨාපෙත්වා ජණ්ණුකෙහි පතිට්ඨාය ‘‘අසම්මජ්ජිත්වා නිසින්නභාවං වත මෙ සත්ථා අඤ්ඤාසි, සඞ්ඝමජ්ඣෙ දානි චොදනං කාරෙස්සාමී’’ති දසබලස්ස සන්තිකං ගන්ත්වා වන්දිත්වා නිසීදි. භගවා ‘‘කුහිං ගතොසි, සාරිපුත්තා’’ති වත්වා ‘‘න පතිරූපං දානි තෙ මය්හං අනන්තරෙ ඨානෙ ඨත්වා විචරන්තස්ස අසම්මජ්ජිත්වා නිසීදිතු’’න්ති ආහ. තතො පට්ඨාය ථෙරො ගණ්ඨිකපටිමුඤ්චනට්ඨානෙපි තිට්ඨන්තො පාදෙන කචවරං වියූහිත්වාව තිට්ඨති. शास्त्यांचे शासन पूर्ण केले जाते याविषयी – हे झाडण्याचे कर्तव्य बुद्धांनी प्रशंसिले आहे, म्हणून ते करणाऱ्याकडून शास्त्यांच्या शासनाचे पालन केले जाते. त्याविषयी ही कथा आहे – असे ऐकिवात आहे की, आयुष्यमान सारिपुत्त हिमालयात जाऊन एका गुहेत न झाडताच निरोध समापत्तीत प्रवेश करून बसले. भगवंतांनी ध्यान करून थेरांचे न झाडता बसणे जाणून घेतले आणि आकाशातून जाऊन थेरांच्या समोर न झाडलेल्या जागेवर आपल्या पाऊलखुणा दाखवून ते परत आले. थेर समापत्तीतून उठल्यावर भगवंतांच्या पाऊलखुणा पाहून अत्यंत लज्जित व भयभीत झाले. गुडघे टेकून त्यांनी विचार केला, 'माझे न झाडता बसणे शास्त्यांनी जाणले आहे. आता ते संघामध्ये माझी कानउघाडणी करतील.' असे विचार करून ते दशबलांच्या जवळ गेले आणि वंदन करून बसले. भगवान म्हणाले, 'सारिपुत्ता, तू कुठे गेला होतास?' आणि पुढे म्हणाले, 'माझ्या नंतरच्या स्थानावर राहून वावरणाऱ्या तुला न झाडता बसणे योग्य नाही.' तेव्हापासून थेर चीवराची गाठ बांधण्याच्या ठिकाणी उभे राहतानाही पायाने कचरा बाजूला सारूनच उभे राहत असत. අත්තනො භාසපරියන්තං න උග්ගණ්හාතීති ‘‘ඉමස්මිං වත්ථුස්මිං එත්තකං සුත්තං උපලබ්භති, එත්තකො විනිච්ඡයො, එත්තකං සුත්තඤ්ච විනිච්ඡයඤ්ච වක්ඛාමී’’ති එවං අත්තනො භාසපරියන්තං න උග්ගණ්හාති. ‘‘අයං චොදකස්ස පුරිමකථා, අයං පච්ඡිමකථා, අයං චුදිතකස්ස පුරිමකථා, අයං පච්ඡිමකථා, එත්තකං ගය්හූපගං, එත්තකං න ගය්හූපග’’න්ති එවං අනුග්ගණ්හන්තො පන පරස්ස භාසපරියන්තං න උග්ගණ්හාති නාම. ආපත්තිං න ජානාතීති පාරාජිකං වා සඞ්ඝාදිසෙසං වාති සත්තන්නං ආපත්තික්ඛන්ධානං නානාකරණං න ජානාති. මූලන්ති ද්වෙ ආපත්තියා මූලානි කායො ච වාචා ච, තානි න ජානාති. සමුදයන්ති ඡ ආපත්තිසමුට්ඨානානි ආපත්තිසමුදයො නාම, තානි න ජානාති. පාරාජිකාදීනං වත්ථුං න ජානාතීතිපි වුත්තං හොති. නිරොධන්ති අයං ආපත්ති දෙසනාය නිරුජ්ඣති, වූපසම්මති, අයං වුට්ඨානෙනාති එවං ආපත්තිනිරොධං න ජානාති. සත්ත සමථෙ අජානන්තො පන ආපත්තිනිරොධගාමිනිපටිපදං න ජානාති. ‘आपल्या स्वतःच्या भाषणाची मर्यादा ग्रहण करत नाही’ म्हणजे— ‘या प्रकरणात एवढे सूत्र (पाळि) उपलब्ध आहे, एवढा निर्णय उपलब्ध आहे, आणि मी एवढे सूत्र व निर्णय सांगेन’ अशा प्रकारे आपल्या स्वतःच्या भाषणाची मर्यादा मनात निश्चित करत नाही. ‘हे चोदकाचे (आरोप करणाऱ्याचे) पूर्व विधान आहे, हे त्याचे नंतरचे विधान आहे; हे चुदितकाचे (आरोपीचे) पूर्व विधान आहे, हे त्याचे नंतरचे विधान आहे; एवढे ग्रहण करण्यायोग्य आहे, एवढे ग्रहण करण्यायोग्य नाही’ अशा प्रकारे जो मनात ठेवत नाही, तो दुसऱ्याच्या भाषणाची मर्यादा ग्रहण करत नाही असे म्हटले जाते. ‘आपत्ती जाणत नाही’ म्हणजे पाराजिका किंवा संघादिसेस इत्यादी सात आपत्ती-समूहांचे (आपत्तिक्खंधांचे) वर्गीकरण (भेद) जाणत नाही. ‘मूळ’ म्हणजे आपत्तीची दोन मुळे आहेत— काय (शरीर) आणि वाचा (वाणी); ती तो जाणत नाही. ‘समुदय’ म्हणजे आपत्तीचे सहा समुत्थान (उत्पत्तीचे कारणे) ज्याला आपत्ती-समुदय म्हणतात; ती तो जाणत नाही. ‘पाराजिका इत्यादींचे वस्तू (विषय) तो जाणत नाही’ असेही म्हटले आहे. ‘निरोध’ म्हणजे ही आपत्ती देशनेने (प्रकटीकरणाने) निरुद्ध होते, शांत होते; किंवा ही आपत्ती वुट्ठान (परिव्वास, मानत्त इत्यादी) द्वारे निरुद्ध व शांत होते; अशा प्रकारे आपत्तीचा निरोध तो जाणत नाही. सात समथ न जाणणारा विनयधर आपत्ती-निरोधाकडे नेणाऱ्या प्रतिपदेला (मार्गाला) जाणत नाही. අධිකරණපඤ්චකෙ අධිකරණං නාම චත්තාරි අධිකරණානි. අධිකරණස්ස මූලං නාම තෙත්තිංස මූලානි – විවාදාධිකරණස්ස ද්වාදස මූලානි, අනුවාදාධිකරණස්ස චුද්දස, ආපත්තාධිකරණස්ස ඡ, කිච්චාධිකරණස්ස එකං; තානි පරතො ආවි භවිස්සන්ති. අධිකරණසමුදයො නාම අධිකරණසමුට්ඨානං. විවාදාධිකරණං අට්ඨාරස භෙදකරවත්ථූනි නිස්සාය උප්පජ්ජති; අනුවාදාධිකරණං චතස්සො විපත්තියො; ආපත්තාධිකරණං සත්තාපත්තික්ඛන්ධෙ; කිච්චාධිකරණං චත්තාරි සඞ්ඝකිච්චානීති ඉමං විභාගං න ජානාතීති අත්ථො[Pg.177]. අධිකරණනිරොධං න ජානාතීති ධම්මෙන විනයෙන සත්ථුසාසනෙන මූලාමූලං ගන්ත්වා විනිච්ඡයසමථං පාපෙතුං න සක්කොති; ‘‘ඉදං අධිකරණං ද්වීහි, ඉදං චතූහි, ඉදං තීහි ඉදං එකෙන සමථෙන සම්මතී’’ති එවං සත්ත සමථෙ අජානන්තො පන අධිකරණනිරොධගාමිනිපටිපදං න ජානාති නාම. වත්ථුං න ජානාතීති ‘‘ඉදං පාරාජිකස්ස වත්ථු, ඉදං සඞ්ඝාදිසෙසස්සා’’ති එවං සත්තන්නං ආපත්තික්ඛන්ධානං වත්ථුං න ජානාති. නිදානන්ති ‘‘සත්තන්නං නිදානානං ඉදං සික්ඛාපදං එත්ථ පඤ්ඤත්තං, ඉදං එත්ථා’’ති න ජානාති. පඤ්ඤත්තිං න ජානාතීති තස්මිං තස්මිං සික්ඛාපදෙ පඨමපඤ්ඤත්තිං න ජානාති. අනුපඤ්ඤත්තින්ති පුනප්පුනං පඤ්ඤත්තිං න ජානාති. අනුසන්ධිවචනපථන්ති කථානුසන්ධි-විනිච්ඡයානුසන්ධිවසෙන වත්ථුං න ජානාති. ඤත්තිං න ජානාතීති සබ්බෙන සබ්බං ඤත්තිං න ජානාති. ඤත්තියා කරණං න ජානාතීති ඤත්තිකිච්චං න ජානාති, ඔසාරණාදීසු නවසු ඨානෙසු ඤත්තිකම්මං නාම හොති, ඤත්තිදුතියඤත්තිචතුත්ථකම්මෙසු ඤත්තියා කම්මප්පත්තො හුත්වා තිට්ඨතීති න ජානාති. න පුබ්බකුසලො හොති න අපරකුසලොති පුබ්බෙ කථෙතබ්බඤ්ච පච්ඡා කථෙතබ්බඤ්ච න ජානාති, ඤත්ති නාම පුබ්බෙ ඨපෙතබ්බා, පච්ඡා න ඨපෙතබ්බාතිපි න ජානාති. අකාලඤ්ඤූ ච හොතීති කාලං න ජානාති, අනජ්ඣිට්ඨො අයාචිතො භාසති, ඤත්තිකාලම්පි ඤත්තිඛෙත්තම්පි ඤත්තිඔකාසම්පි න ජානාති. अधिकरण-पंचकात ‘अधिकरण’ म्हणजे चार अधिकरणे होत. ‘अधिकरणाचे मूळ’ म्हणजे तेहतीस मुळे होत— विवादाधिकरणाची बारा मुळे, अनुवादाधिकरणाची चौदा, आपत्ताधिकरणाची सहा, आणि किच्चाधिकरणाचे एक मूळ; ती पुढे स्पष्ट होतील. ‘अधिकरण-समुदय’ म्हणजे अधिकरणाचे समुत्थान (उत्पत्तीचे कारण) होय. विवादाधिकरण अठरा भेदक वस्तूंवर अवलंबून उत्पन्न होते; अनुवादाधिकरण चार विपत्तींवर; आपत्ताधिकरण सात आपत्ती-समूहांवर; आणि किच्चाधिकरण चार संघ-कृत्यांवर अवलंबून उत्पन्न होते— हा विभाग तो जाणत नाही, असा अर्थ आहे. ‘अधिकरणाचा निरोध जाणत नाही’ म्हणजे धर्म, विनय आणि शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) शासनानुसार मुळापासून मुळापर्यंत जाऊन निर्णयाच्या शांततेप्रत (विनिच्छय-समथ) पोहोचवण्यास तो असमर्थ असतो. ‘हे अधिकरण दोन समथांनी शांत होते, हे चार समथांनी, हे तीन समथांनी, आणि हे एका समथाने शांत होते’ अशा प्रकारे सात समथ न जाणणारा विनयधर अधिकरण-निरोधाकडे नेणाऱ्या प्रतिपदेला (मार्गाला) जाणत नाही असे म्हटले जाते. ‘वस्तू जाणत नाही’ म्हणजे ‘हे पाराजिकाचे वस्तू (कारण) आहे, हे संघादिसेसाचे वस्तू आहे’ अशा प्रकारे सात आपत्ती-समूहांच्या वस्तूला तो जाणत नाही. ‘निदान’ म्हणजे सात निदानांपैकी ‘हे शिक्षापद येथे प्रज्ञप्त केले गेले आहे, हे येथे प्रज्ञप्त केले गेले आहे’ हे तो जाणत नाही. ‘प्रज्ञप्ती जाणत नाही’ म्हणजे त्या त्या शिक्षापदातील प्रथम प्रज्ञप्ती (मूळ नियम) तो जाणत नाही. ‘अनुप्रज्ञप्ती’ म्हणजे वारंवार प्रज्ञप्त केलेले शिक्षापद तो जाणत नाही. ‘अनुसंधी-वचनपथ’ म्हणजे कथेचा संदर्भ आणि निर्णयाचा संदर्भ यानुसार विषयाला तो जाणत नाही. ‘ज्ञत्ती जाणत नाही’ म्हणजे सर्व प्रकारे संपूर्ण ज्ञत्ती तो जाणत नाही. ‘ज्ञत्तीचे करणे जाणत नाही’ म्हणजे ज्ञत्तीचे कृत्य तो जाणत नाही; ओसारणा इत्यादी नऊ स्थानांमध्ये ‘ज्ञत्ती-कर्म’ असते; ज्ञत्ति-दुतीय आणि ज्ञत्ति-चतुत्थ कर्मांमध्ये ज्ञत्ती मांडल्यावर ते कर्माप्रत पोहोचून स्थित होते, हे तो जाणत नाही. ‘पूर्वी कुशल नसतो आणि नंतरही कुशल नसतो’ म्हणजे पूर्वी काय बोलावे आणि नंतर काय बोलावे हे तो जाणत नाही; तसेच ज्ञत्ती ही सुरुवातीला मांडली पाहिजे, नंतर मांडू नये, हेही तो जाणत नाही. ‘अकाळज्ञ असतो’ म्हणजे तो योग्य वेळ जाणत नाही; न विचारता किंवा विनंती न करताच बोलतो; तसेच ज्ञत्तीची वेळ, ज्ञत्तीचे क्षेत्र आणि ज्ञत्तीची संधी तो जाणत नाही. මන්දත්තා මොමූහත්තාති කෙවලං අඤ්ඤාණෙන මොමූහභාවෙන ධුතඞ්ගෙ ආනිසංසං අජානිත්වා. පාපිච්ඡොති තෙන අරඤ්ඤවාසෙන පච්චයලාභං පත්ථයමානො. පවිවෙකන්ති කායචිත්තඋපධිවිවෙකං. ඉදමත්ථිතන්ති ඉමාය කල්යාණාය පටිපත්තියා අත්ථො එතස්සාති ඉදමත්ථි, ඉදමත්ථිනො භාවො ඉදමත්ථිතා; තං ඉදමත්ථිතංයෙව නිස්සාය න අඤ්ඤං කිඤ්චි ලොකාමිසන්ති අත්ථො. ‘मंदत्वामुळे आणि अत्यंत मूढत्वामुळे’ म्हणजे केवळ अज्ञानामुळे आणि अत्यंत मोहाच्या अवस्थेमुळे धुतांगाचे फायदे न जाणता. ‘पापिच्छ’ म्हणजे त्या अरण्यवासाने प्रत्यय-लाभ (चतुष्प्रत्यय मिळवणे) इच्छिणारा होऊन अरण्यवासी होणे. ‘प्रविवेक’ म्हणजे काय-विवेक, चित्त-विवेक आणि उपधी-विवेक यांची इच्छा करणारा होऊन अरण्यवासी होणे. ‘इदमत्थिता’ म्हणजे ‘या कल्याणकारी प्रतिपदेने (अरण्यवासाने) या भिक्खूचा उद्देश साध्य होतो’ म्हणून तो ‘इदमत्थी’ आहे; आणि इदमत्थीचा भाव म्हणजे ‘इदमत्थिता’ होय. केवळ त्या इदमत्थितेवरच अवलंबून राहून, इतर कोणत्याही लौकिक आमिषावर अवलंबून न राहता तो अरण्यवासी होतो, असा अर्थ आहे. උපොසථං න ජානාතීති නවවිධං උපොසථං න ජානාති. උපොසථකම්මන්ති අධම්මෙනවග්ගාදිභෙදං චතුබ්බිධං උපොසථකම්මං න ජානාති. පාතිමොක්ඛන්ති ද්වෙ මාතිකා න ජානාති. පාතිමොක්ඛුද්දෙසන්ති සබ්බම්පි නවවිධං පාතිමොක්ඛුද්දෙසං න ජානාති. පවාරණන්ති නවවිධං පවාරණං න ජානාති. පවාරණාකම්මං උපොසථකම්මසදිසමෙව. ‘उपोसथ जाणत नाही’ म्हणजे नऊ प्रकारचा उपोसथ तो जाणत नाही. ‘उपोसथ-कर्म’ म्हणजे अधर्म-वर्ग इत्यादी भेदांचे चार प्रकारचे उपोसथ-कर्म तो जाणत नाही. ‘पातिमोक्ख’ म्हणजे दोन मातिका तो जाणत नाही. ‘पातिमोक्ख-उद्देश’ म्हणजे सर्व प्रकारचा नऊ प्रकारचा पातिमोक्ख-उद्देश तो जाणत नाही. ‘पवारणा’ म्हणजे नऊ प्रकारची पवारणा तो जाणत नाही. पवारणा-कर्म हे उपोसथ-कर्मासारखेच असते. අපාසාදිකපඤ්චකෙ [Pg.178] – අපාසාදිකන්ති කායදුච්චරිතාදි අකුසලකම්මං වුච්චති. පාසාදිකන්ති කායසුචරිතාදි කුසලකම්මං වුච්චති. අතිවෙලන්ති වෙලං අතික්කම්ම බහුතරං කාලං කුලෙසු අප්පං විහාරෙති අත්ථො. ඔතාරොති කිලෙසානං අන්තො ඔතරණං. සංකිලිට්ඨන්ති දුට්ඨුල්ලාපත්තිකායසංසග්ගාදිභෙදං. විසුද්ධිපඤ්චකෙපවාරණාග්ගහණෙන නවවිධාපි පවාරණා වෙදිතබ්බා. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. अपासादिक-पंचकात— ‘अपासादिक’ म्हणजे काय-दुश्चरित इत्यादी अकुशल कर्म म्हटले जाते. ‘पासादिक’ म्हणजे काय-सुचरित इत्यादी कुशल कर्म म्हटले जाते. ‘अतिवेळ’ म्हणजे वेळ (भोजनाची वेळ इत्यादी मर्यादा) ओलांडून कुलांमध्ये (घरांमध्ये) जास्त वेळ घालवणे आणि विहारात कमी वेळ घालवणे, असा अर्थ आहे. ‘अवतार’ म्हणजे क्लेशांचे अंतःकरणात प्रवेश करणे होय. ‘संक्लिष्ट’ म्हणजे दुट्ठुल्लापत्ती (गंभीर आपत्ती) आणि काय-संसर्ग आपत्ती इत्यादींचे भेद होय. विशुद्धि-पंचकात पवारणा ग्रहण केल्याने नऊ प्रकारची पवारणा समजली पाहिजे. सर्व ठिकाणी उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. පඤ්චකවාරවණ්ණනා නිට්ඨිතා. पंचक-वाराचे वर्णन समाप्त झाले. ඡක්කවාරවණ්ණනා छक्क-वाराचे वर्णन 326. ඡක්කෙසු – ඡ සාමීචියොති ‘‘සො ච භික්ඛු අනබ්භිතො, තෙ ච භික්ඛූ ගාරය්හා, අයං තත්ථ සාමීචි’’, ‘‘යුඤ්ජන්තායස්මන්තො සකං, මා වො සකං විනස්සාති අයං තත්ථ සාමීචි’’, ‘‘අයං තෙ භික්ඛු පත්තො යාව භෙදනාය ධාරෙතබ්බොති අයං තත්ථ සාමීචි’’, ‘‘තතො නීහරිත්වා භික්ඛූහි සද්ධිං සංවිභජිතබ්බං, අයං තත්ථ සාමීචි’’, ‘‘අඤ්ඤාතබ්බං පරිපුච්ඡිතබ්බං පරිපඤ්හිතබ්බං, අයං තත්ථ සාමීචි’’, ‘‘යස්ස භවිස්සති සො හරිස්සතීති අයං තත්ථ සාමීචී’’ති ඉමා භික්ඛුපාතිමොක්ඛෙයෙව ඡ සාමීචියො. ඡ ඡෙදනකාති පඤ්චකෙ වුත්තා පඤ්ච භික්ඛුනීනං උදකසාටිකාය සද්ධිං ඡ. ඡහාකාරෙහීති අලජ්ජිතා අඤ්ඤාණතා කුක්කුච්චපකතතා අකප්පියෙ කප්පියසඤ්ඤිතා කප්පියෙ අකප්පියසඤ්ඤිතා සතිසම්මොසාති. තත්ථ එකරත්තඡාරත්තසත්තාහාතික්කමාදීසු ආපත්තිං සතිසම්මොසෙන ආපජ්ජති. සෙසං වුත්තනයමෙව. ඡ ආනිසංසා විනයධරෙති පඤ්චකෙ වුත්තා පඤ්ච තස්සාධෙය්යො උපොසථොති ඉමිනා සද්ධිං ඡ. ३२६. छक्कांमध्ये— ‘सहा सामीची (योग्य आचरणे)’ म्हणजे— ‘तो भिक्खू अनब्भित (अद्याप पुनर्संचयित न झालेला) आहे आणि ते भिक्खू निंदनीय आहेत, ही तेथील सामीची आहे’, ‘आयुष्यमानांनो, तुम्ही स्वतःच्या कार्यात युक्त व्हा, तुमचे स्वतःचे नष्ट होऊ नये, ही तेथील सामीची आहे’, ‘हे भिक्खू, हा तुझा पात्र फुटण्यापर्यंत धारण केला पाहिजे, ही तेथील सामीची आहे’, ‘तेथून काढून भिक्खूंसोबत विभागून घेतले पाहिजे, ही तेथील सामीची आहे’, ‘न समजलेले विचारले पाहिजे, प्रश्न विचारले पाहिजेत, ही तेथील सामीची आहे’, ‘ज्याचे असेल तो घेऊन जाईल, ही तेथील सामीची आहे’— या भिक्खू-पातिमोक्खातच सहा सामीची आहेत. ‘सहा छेदक’ म्हणजे पंचकात सांगितलेल्या पाच आणि भिक्खुनींच्या उदक-साटिका (जल-वस्त्र) आपत्तीसह सहा होतात. ‘सहा आकारांनी (कारणांनी)’ म्हणजे— निर्लज्जपणा, अज्ञान, कुक्कुच्च (शंकाकुलता), अकल्पनीय (अयोग्य) गोष्टीला कल्पनीय (योग्य) समजणे, कल्पनीय गोष्टीला अकल्पनीय समजणे, आणि सतिसंमोस (स्मृतीचा लोप). त्यामध्ये, एक रात्र, सहा रात्री, सात दिवस ओलांडणे इत्यादींमुळे होणारी आपत्ती स्मृतीच्या लोपामुळे (विसरल्यामुळे) ओढवते. उर्वरित भाग पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीप्रमाणेच आहे. ‘विनयधराचे सहा फायदे’ म्हणजे पंचकात सांगितलेले पाच आणि ‘त्याच्यावर उपोसथ सोपवला जातो’ या फायद्यासह सहा होतात. ඡ පරමානීති ‘‘දසාහපරමං අතිරෙකචීවරං ධාරෙතබ්බං, මාසපරමං තෙන භික්ඛුනා තං චීවරං නික්ඛිපිතබ්බං, සන්තරුත්තරපරමං තෙන භික්ඛුනා තතො චීවරං සාදිතබ්බං, ඡක්ඛත්තුපරමං තුණ්හීභූතෙන උද්දිස්ස ඨාතබ්බං, නවං පන භික්ඛුනා සන්ථතං කාරාපෙත්වා ඡබ්බස්සානි ධාරෙතබ්බං ඡබ්බස්සපරමතා ධාරෙතබ්බං, තියොජනපරමං සහත්ථා ධාරෙතබ්බානි, දසාහපරමං අතිරෙකපත්තො ධාරෙතබ්බො, සත්තාහපරමං සන්නිධිකාරකං පරිභුඤ්ජිතබ්බානි, ඡාරත්තපරමං තෙන භික්ඛුනා තෙන චීවරෙන විප්පවසිතබ්බං, චතුක්කංසපරමං, අඩ්ඪතෙය්යකංසපරමං, ද්වඞ්ගුලපබ්බපරමං ආදාතබ්බං, අට්ඨඞ්ගුලපරමං මඤ්චපටිපාදකං[Pg.179], අට්ඨඞ්ගුලපරමං දන්තකට්ඨ’’න්ති ඉමානි චුද්දස පරමානි. තත්ථ පඨමානි ඡ එකං ඡක්කං, තතො එකං අපනෙත්වා සෙසෙසු එකෙකං පක්ඛිපිත්වාතිආදිනා නයෙන අඤ්ඤානිපි ඡක්කානි කාතබ්බානි. सहा 'परम' (मर्यादा) म्हणजे: 'जास्तीत जास्त दहा दिवस अतिरिक्त चीवर धारण करावे', 'त्या भिक्खूने ते चीवर जास्तीत जास्त एक महिना बाजूला ठेवावे', 'त्या भिक्खूने त्याहून अधिक (संतर-उत्तर) चीवर जास्तीत जास्त काळ स्वीकार करावे', 'मौन राहून (चीवराच्या) उद्देशाने जास्तीत जास्त सहा वेळा उभे राहावे', 'भिक्खूने नवीन संथत (आसन) बनवून घेतल्यावर ते कमीत कमी सहा वर्षे वापरावे (सहा वर्षांची मर्यादा पाळावी)', 'स्वतःच्या हाताने जास्तीत जास्त तीन योजन (लोकर) वाहून न्यावी', 'जास्तीत जास्त दहा दिवस अतिरिक्त पात्र धारण करावे', 'साठवून ठेवलेले (औषध किंवा अन्न) जास्तीत जास्त सात दिवस सेवन करावे', 'त्या भिक्खूने त्या चीवरापासून जास्तीत जास्त सहा रात्री वेगळे राहावे', 'जास्तीत जास्त चार कंस', 'जास्तीत जास्त अडीच कंस', 'जास्तीत जास्त दोन बोटे रुंद कापून घ्यावे', 'पलंगाचे पाय जास्तीत जास्त आठ बोटे असावेत', 'दात घासण्याची काडी जास्तीत जास्त आठ बोटे असावी' - हे चौदा 'परम' आहेत. त्यापैकी पहिले सहा मिळून एक 'षट्क' (छक्क) बनते. त्यानंतर त्यातील एक वगळून उर्वरित चौदांमधील एकेक मिळवून (नवीन) षट्क बनवावे, या पद्धतीने इतरही षट्के तयार करावीत. ඡ ආපත්තියොති තීණි ඡක්කානි අන්තරපෙය්යාලෙ වුත්තානි. ඡ කම්මානීති තජ්ජනීය-නියස්ස-පබ්බාජනීය-පටිසාරණීයානි චත්තාරි, ආපත්තියා අදස්සනෙ ච අප්පටිකම්මෙ ච වුත්තද්වයම්පි එකං, පාපිකාය දිට්ඨියා අප්පටිනිස්සග්ගෙ එකන්ති ඡ. නහානෙති ඔරෙනඩ්ඪමාසං නහානෙ; විප්පකතචීවරාදිඡක්කද්වයං කථිනක්ඛන්ධකෙ නිද්දිට්ඨං. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. 'सहा आपत्ती' या विषयावरील तीन षट्के अंतरापेय्यालमध्ये (मध्यम संक्षेपात) सांगितली आहेत. 'सहा कर्मे' म्हणजे: तज्जनीय-कर्म, नियस्स-कर्म, पब्बाजनीय-कर्म, आणि पटिसारणीय-कर्म ही चार; आपत्ती न पाहिल्याबद्दल आणि आपत्तीचे निवारण न केल्याबद्दल सांगितलेली दोन कर्मे मिळून एक; आणि वाईट दृष्टीचा (मिथ्या दृष्टीचा) त्याग न केल्याबद्दल एक कर्म; अशी एकूण सहा कर्मे आहेत. 'स्नान' म्हणजे पंधरवड्यापेक्षा कमी काळात स्नान करणे; अपूर्ण राहिलेले चीवर इत्यादी दोन षट्के कठिनक्खन्धकामध्ये निर्देशित केली आहेत. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. ඡක්කවාරවණ්ණනා නිට්ඨිතා. षट्कवार-वर्णन समाप्त झाले. සත්තකවාරවණ්ණනා सप्तकवार-वर्णन 327. සත්තකෙසු – සත්ත සාමීචියොති පුබ්බෙ වුත්තෙසු ඡසු ‘‘සා ච භික්ඛුනී අනබ්භිතා, තා ච භික්ඛුනියො ගාරය්හා, අයං තත්ථ සාමීචී’’ති ඉමං පක්ඛිපිත්වා සත්ත වෙදිතබ්බා. සත්ත අධම්මිකා පටිඤ්ඤාතකරණාති ‘‘භික්ඛු පාරාජිකං අජ්ඣාපන්නො හොති, පාරාජිකෙන චොදියමානො ‘සඞ්ඝාදිසෙසං අජ්ඣාපන්නොම්හී’ති පටිජානාති, තං සඞ්ඝො සඞ්ඝාදිසෙසෙන කාරෙති, අධම්මිකං පටිඤ්ඤාතකරණ’’න්ති එවං සමථක්ඛන්ධකෙ නිද්දිට්ඨා. ධම්මිකාපි තත්ථෙව නිද්දිට්ඨා. සත්තන්නං අනාපත්ති සත්තාහකරණීයෙන ගන්තුන්ති වස්සූපනායිකක්ඛන්ධකෙ වුත්තං. සත්තානිසංසා විනයධරෙති ‘‘තස්සාධෙය්යො උපොසථො පවාරණා’’ති ඉමෙහි සද්ධිං පඤ්චකෙ වුත්තා පඤ්ච සත්ත හොන්ති. සත්ත පරමානීති ඡක්කෙ වුත්තානියෙව සත්තකවසෙන යොජෙතබ්බානි. කතචීවරන්තිආදීනි ද්වෙ සත්තකානි කථිනක්ඛන්ධකෙ නිද්දිට්ඨානි. ३२७. सप्तकांमध्ये – 'सात सामीची' (योग्य आचरण) म्हणजे पूर्वी सांगितलेल्या सहा सामीचींमध्ये 'ती भिक्खुणी अब्भान (पुनर्स्थापना) न झालेली आहे, आणि त्या भिक्खुणी निंदनीय आहेत, ही तेथील सामीची (योग्य पद्धत) आहे' हे समाविष्ट करून सात समजावे. 'सात अधार्मिक प्रतिज्ञातकरण' (अधार्मिक पद्धतीने कबुली देणे) म्हणजे: 'भिक्खूने पाराजिकाचा गुन्हा केला आहे, पाराजिकाचा आरोप झाल्यावर तो 'मी संघादिसेस गुन्हा केला आहे' अशी कबुली देतो, आणि संघ त्याला संघादिसेसानुसार शिक्षा करतो, हे अधार्मिक प्रतिज्ञातकरण आहे' असे समथक्खन्धकामध्ये निर्देशित केले आहे. धार्मिक (कायदेशीर) प्रतिज्ञातकरण देखील तेथेच निर्देशित केले आहे. 'सात जणांना सात दिवसांच्या कामासाठी जाण्यास आपत्ती नाही' हे वस्सूपनायिकाक्खन्धकामध्ये सांगितले आहे. 'विनयधराचे सात फायदे' म्हणजे: 'त्याच्यावर अवलंबून असलेला उपोसथ आणि पवारणा' या दोन फायद्यांसह 'पंचक' (पाचच्या गटात) सांगितलेले पाच फायदे मिळून सात होतात. 'सात परम' (सात मर्यादा) म्हणजे षट्कामध्ये सांगितलेल्या मर्यादाच सप्तकाच्या पद्धतीने जुळवून घ्याव्यात. 'कतचीवर' (तयार केलेले चीवर) इत्यादी दोन सप्तके कठिनक्खन्धकामध्ये निर्देशित केली आहेत. භික්ඛුස්ස න හොති ආපත්ති දට්ඨබ්බා, භික්ඛුස්ස හොති ආපත්ති දට්ඨබ්බා, භික්ඛුස්ස හොති ආපත්ති පටිකාතබ්බාති ඉමානි තීණි සත්තකානි, ද්වෙ අධම්මිකානි, එකං ධම්මිකං; තානි තීණිපි චම්පෙය්යකෙ නිද්දිට්ඨානි. අසද්ධම්මාති අසතං ධම්මා, අසන්තො වා ධම්මා; අසොභනා හීනා ලාමකාති අත්ථො. සද්ධම්මාති සතං බුද්ධාදීනං ධම්මා; සන්තො වා ධම්මා සුන්දරා උත්තමාති අත්ථො. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. 'भिक्खूला आपत्ती होत नाही असे पाहावे', 'भिक्खूला आपत्ती होते असे पाहावे', 'भिक्खूने आपत्तीचे निवारण करावे' ही तीन सप्तके आहेत; यातील दोन अधार्मिक आहेत आणि एक धार्मिक आहे. ही तिन्ही चम्पेय्यक (चम्पेय्य खंधक) मध्ये निर्देशित केली आहेत. 'असद्धम्म' (असत-धर्म) म्हणजे दुर्जनांचे धर्म किंवा वाईट धर्म; याचा अर्थ अशोभनीय, हीन आणि निकृष्ट असा आहे. 'सद्धम्म' (सत्-धर्म) म्हणजे बुद्ध इत्यादी सज्जनांचे धर्म; किंवा चांगले, सुंदर आणि उत्तम धर्म असा याचा अर्थ आहे. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. සත්තකවාරවණ්ණනා නිට්ඨිතා. sattakavāravaṇṇanā niṭṭhitā. අට්ඨකවාරවණ්ණනා अष्टकवार-वर्णन 328. අට්ඨකෙසු [Pg.180] – අට්ඨානිසංසෙති ‘‘න මයං ඉමිනා භික්ඛුනා සද්ධිං උපොසථං කරිස්සාම, විනා ඉමිනා භික්ඛුනා උපොසථං කරිස්සාම, න මයං ඉමිනා භික්ඛුනා සද්ධිං පවාරෙස්සාම, සඞ්ඝකම්මං කරිස්සාම, ආසනෙ නිසීදිස්සාම, යාගුපානෙ නිසීදිස්සාම, භත්තග්ගෙ නිසීදිස්සාම, එකච්ඡන්නෙ වසිස්සාම, යථාවුඩ්ඪං අභිවාදනං පච්චුට්ඨානං අඤ්ජලිකම්මං සාමීචිකම්මං කරිස්සාම, විනා ඉමිනා භික්ඛුනා කරිස්සාමා’’ති එවං කොසම්බකක්ඛන්ධකෙ වුත්තෙ ආනිසංසෙ. දුතියඅට්ඨකෙපි එසෙව නයො, තම්පි හි එවමෙව කොසම්බකක්ඛන්ධකෙ වුත්තං. ३२८. अष्टकांमध्ये – 'आठ फायदे' म्हणजे: 'आम्ही या भिक्खूसोबत उपोसथ करणार नाही, या भिक्खूशिवाय उपोसथ करू, आम्ही या भिक्खूसोबत पवारणा करणार नाही, संघकर्म करू, आसनावर बसू, पेज पिण्याच्या ठिकाणी बसू, भोजनशाळेत बसू, एकाच छताखाली राहू, ज्येष्ठतेनुसार अभिवादन, उठून उभे राहणे, हात जोडणे व आदरयुक्त आचरण करू, या भिक्खूशिवाय करू' असे कोसाम्बकक्खन्धकामध्ये सांगितलेले फायदे आहेत. दुसऱ्या अष्टकातही हाच नियम आहे, कारण ते देखील कोसाम्बकक्खन्धकामध्ये याच प्रकारे सांगितले आहे. අට්ඨ යාවතතියකාති භික්ඛූනං තෙරසකෙ චත්තාරො, භික්ඛුනීනං සත්තරසකෙ භික්ඛූහි අසාධාරණා චත්තාරොති අට්ඨ. අට්ඨහාකාරෙහි කුලානි දූසෙතීති කුලානි දූසෙති පුප්ඵෙන වා ඵලෙන වා චුණ්ණෙන වා මත්තිකාය වා දන්තකට්ඨෙන වා වෙළුයා වා වෙජ්ජිකාය වා ජඞ්ඝපෙසනිකෙන වාති ඉමෙහි අට්ඨහි. අට්ඨ මාතිකා චීවරක්ඛන්ධකෙ, අපරා අට්ඨ කථිනක්ඛන්ධකෙ වුත්තා. අට්ඨහි අසද්ධම්මෙහීති ලාභෙන අලාභෙන යසෙන අයසෙන සක්කාරෙන අසක්කාරෙන පාපිච්ඡතාය පාපමිත්තතාය. අට්ඨ ලොකධම්මා නාම ලාභෙ සාරාගො, අලාභෙ පටිවිරොධො; එවං යසෙ අයසෙ, පසංසාය නින්දාය, සුඛෙ සාරාගො, දුක්ඛෙ පටිවිරොධොති. අට්ඨඞ්ගිකො මුසාවාදොති ‘‘විනිධාය සඤ්ඤ’’න්ති ඉමිනා සද්ධිං පාළියං ආගතෙහි සත්තහීති අට්ඨහි අඞ්ගෙහි අට්ඨඞ්ගිකො. 'आठ यावततीयक' (तिसऱ्यांदा सांगण्यापर्यंतचे गुन्हे) म्हणजे भिक्खूंच्या तेरा गुन्ह्यांपैकी चार, आणि भिक्खुणींच्या सतरा गुन्ह्यांपैकी भिक्खूंशी असाधारण असलेले चार; असे एकूण आठ आहेत. 'आठ प्रकारांनी कुळांना दूषित करतो' म्हणजे: फुले देऊन, फळे देऊन, सुगंधी चूर्ण देऊन, माती देऊन, दंतकाष्ठ देऊन, बांबू देऊन, वैद्यकीय उपचार करून, किंवा निरोप वाहून या आठ कारणांनी कुळांना दूषित करतो. 'आठ मातृका' चीवरक्खन्धकामध्ये आणि इतर आठ कठिनक्खन्धकामध्ये सांगितल्या आहेत. 'आठ असद्धर्मांनी' म्हणजे: लाभ, अलाभ, यश, अपयश, सत्कार, असत्कार, पापी इच्छा आणि पापी मित्रांची संगत. 'आठ लोकधर्म' म्हणजे: लाभ झाल्यावर अतिशय आसक्त होणे, लाभ न झाल्यावर विरोध वाटणे; याचप्रमाणे यश-अपयश, प्रशंसा-निंदा, सुखामध्ये आसक्त होणे आणि दुःखामध्ये विरोध वाटणे, हे आहेत. 'आठ अंगांचा असत्यवाद' म्हणजे: 'संज्ञा बदलून' या अंगासह पाळीमध्ये आलेल्या सात अंगांनुसार, अशा आठ अंगांनी युक्त असलेला आठ अंगांचा असत्यवाद होय. අට්ඨ උපොසථඞ්ගානීති – 'आठ उपोसथ अंगे' म्हणजे – ‘‘පාණං න හනෙ න චාදින්නමාදියෙ,මුසා න භාසෙ න ච මජ්ජපො සියා; අබ්රහ්මචරියා විරමෙය්ය මෙථුනා,රත්තිං න භුඤ්ජෙය්ය විකාලභොජනං. "प्राण्याची हत्या करू नये, न दिलेले घेऊ नये, असत्य बोलू नये, मद्यपान करू नये; मैथुनरूप अब्रह्मचर्यापासून अलिप्त राहावे, रात्रीच्या वेळी अकाली भोजन करू नये. ‘‘මාලං න ධාරෙ න ච ගන්ධමාචරෙ,මඤ්චෙ ඡමායංව සයෙථ සන්ථතෙ; එතඤ්හි අට්ඨඞ්ගිකමාහුපොසථං,බුද්ධෙන දුක්ඛන්තගුනා පකාසිත’’න්ති. (අ. නි. 3.71); "माला (फुलांचे हार) धारण करू नये, सुगंधी द्रव्यांचा वापर करू नये, पलंगावर किंवा जमिनीवर पसरलेल्या आसनावर शयन करावे; यालाच बुद्धांनी दुःखाचा अंत करणाऱ्या गुणांनी युक्त असलेला 'अष्टांगिक उपोसथ' म्हटले आहे." එවං [Pg.181] වුත්තානි අට්ඨ. අට්ඨ දූතෙය්යඞ්ගානීති ‘‘ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සොතා ච හොති සාවෙතා චා’’තිආදිනා නයෙන සඞ්ඝභෙදකෙ වුත්තානි. තිත්ථියවත්තානි මහාඛන්ධකෙ නිද්දිට්ඨානි. අනතිරිත්තා ච අතිරිත්තා ච පවාරණාසික්ඛාපදෙ නිද්දිට්ඨා. අට්ඨන්නං පච්චුට්ඨාතබ්බන්ති භත්තග්ගෙ වුඩ්ඪභික්ඛුනීනං, ආසනම්පි තාසංයෙව දාතබ්බං. උපාසිකාති විසාඛා. අට්ඨානිසංසා විනයධරෙති පඤ්චකෙ වුත්තෙසු පඤ්චසු ‘‘තස්සාධෙය්යො උපොසථො, පවාරණා, සඞ්ඝකම්ම’’න්ති ඉමෙ තයො පක්ඛිපිත්වා අට්ඨ වෙදිතබ්බා. අට්ඨ පරමානීති පුබ්බෙ වුත්තපරමානෙව අට්ඨකවසෙන යොජෙත්වා වෙදිතබ්බානි. අට්ඨසු ධම්මෙසු සම්මා වත්තිතබ්බන්ති ‘‘න පකතත්තස්ස භික්ඛුනො උපොසථො ඨපෙතබ්බො, න පවාරණා ඨපෙතබ්බා’’තිආදිනා නයෙන සමථක්ඛන්ධකෙ නිද්දිට්ඨෙසු අට්ඨසු. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. अशा प्रकारे (अंगुत्तर निकायाच्या अष्टक निपातात) सांगितलेले आठ उपोसथ अंग आहेत. 'आठ दूताचे अंग' म्हणजे: 'इथे, भिक्खूहो, भिक्खू ऐकणारा (स्रोता) आणि ऐकवणारा (श्रावक) असतो' इत्यादी पद्धतीने संघभेदक स्कंधकात सांगितलेले दूताचे आठ अंग आहेत. तित्थिय वत्ते (तीर्थिकांचे आचरण) महास्कंधकात निर्दिष्ट केली आहेत. अनतिरिक्त आणि अतिरिक्त (भोजन) पवारणा सिक्खापदात निर्दिष्ट केले आहेत. 'आठ जणांच्या आदरासाठी उठून उभे राहावे' म्हणजे भोजनशाळेत ज्येष्ठ भिक्खुणींच्या आदरासाठी उठून उभे राहावे आणि त्यांना आसनही दिले पाहिजे. 'उपासिका' म्हणजे विशाखा उपासिका होय. 'विनयधराचे आठ आनिंसंस (फायदे)' म्हणजे: पंचक निपातात सांगितलेल्या पाच फायद्यांमध्ये 'त्याचा उपोसथ, पवारणा आणि संघकर्म ग्राह्य धरले जाते' हे तीन जोडून आठ फायदे समजावेत. 'आठ परमा' म्हणजे पूर्वी (छक्क निपातात) सांगितलेले चौदा परमाच अष्टक पद्धतीने जुळवून आठ परमा समजावेत. 'आठ धर्मांमध्ये योग्य प्रकारे वर्तन करावे' म्हणजे 'सामान्य भिक्खूचा उपोसथ स्थगित करू नये, पवारणा स्थगित करू नये' इत्यादी पद्धतीने शमथ स्कंधकात निर्दिष्ट केलेल्या आठ धर्मांमध्ये योग्य प्रकारे वर्तन करावे. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. අට්ඨකවාරවණ්ණනා නිට්ඨිතා. अष्टकवार वर्णन (अट्ठकवारवण्णना) समाप्त झाले. නවකවාරවණ්ණනා नवकवार वर्णन (नवकवारवण्णना) 329. නවකෙසු – නව ආඝාතවත්ථූනීති ‘‘අනත්ථං මෙ අචරී’’තිආදීනි නව. නව ආඝාතපටිවිනයාති ‘‘අනත්ථං මෙ අචරි, තං කුතෙත්ථ ලබ්භාති ආඝාතං පටිවිනෙතී’’තිආදීනි නව. නව විනීතවත්ථූනීති නවහි ආඝාතවත්ථූහි ආරති විරති පටිවිරති සෙතුඝාතො. නවහි සඞ්ඝො භිජ්ජතීති ‘‘නවන්නං වා, උපාලි, අතිරෙකනවන්නං වා සඞ්ඝරාජි චෙව හොති සඞ්ඝභෙදො චා’’ති. නව පරමානීති පුබ්බෙ වුත්තපරමානෙව නවකවසෙන යොජෙත්වා වෙදිතබ්බානි. නව තණ්හාමූලකා නාම තණ්හං පටිච්ච පරියෙසනා, පරියෙසනං පටිච්ච ලාභො, ලාභං පටිච්ච විනිච්ඡයො, විනිච්ඡයං පටිච්ච ඡන්දරාගො, ඡන්දරාගං පටිච්ච අජ්ඣොසානං, අජ්ඣොසානං පටිච්ච පරිග්ගහො, පරිග්ගහං පටිච්ච මච්ඡරියං, මච්ඡරියං පටිච්ච ආරක්ඛා, ආරක්ඛාධිකරණං දණ්ඩාදානසත්ථාදානකලහවිග්ගහවිවාදතුවංතුවංපෙසුඤ්ඤමුසාවාදා. නව විධමානාති ‘‘සෙය්යස්ස සෙය්යොහමස්මී’’තිමානාදයො. නව චීවරානීති තිචීවරන්ති වා වස්සිකසාටිකාති වාතිආදිනා නයෙන වුත්තානි. න විකප්පෙතබ්බානීති අධිට්ඨිතකාලතො පට්ඨාය න විකප්පෙතබ්බානි. නව අධම්මිකානි දානානීති සඞ්ඝස්ස පරිණතං අඤ්ඤසඞ්ඝස්ස වා චෙතියස්ස වා පුග්ගලස්ස වා පරිණාමෙති, චෙතියස්ස පරිණතං අඤ්ඤචෙතියස්ස වා සඞ්ඝස්ස වා පුග්ගලස්ස වා පරිණාමෙති[Pg.182], පුග්ගලස්ස පරිණතං අඤ්ඤපුග්ගලස්ස වා සඞ්ඝස්ස වා චෙතියස්ස වා පරිණාමෙතීති එවං වුත්තානි. ३२९. नवक निपातामध्ये - 'नऊ आघातवस्तू' (क्रोध निर्माण होण्याची नऊ कारणे) म्हणजे 'त्याने माझे अहित केले' इत्यादी नऊ आघातवस्तू आहेत. 'नऊ आघातप्रतिविनय' (क्रोध दूर करण्याचे नऊ उपाय) म्हणजे 'त्याने माझे अहित केले, पण ते इथे कसे टाळता आले असते?' असा विचार करून क्रोध दूर करणे इत्यादी नऊ आघातप्रतिविनय आहेत. 'नऊ विनीतवस्तू' म्हणजे नऊ आघातवस्तूंपासून आरती (दूर राहणे), विरती (विरक्त होणे), प्रतिविरती (पूर्णपणे टाळणे) आणि सेतुघात (मूळ नष्ट करणे) होय. 'नऊ कारणांनी संघ भेद पावतो' म्हणजे 'हे उपाली, नऊ किंवा नऊपेक्षा अधिक भिक्खूंच्या कारणाने संघात फूट पडते आणि संघभेद होतो.' 'नऊ परमा' म्हणजे पूर्वी सांगितलेले परमाच नवक पद्धतीने जुळवून समजावेत. 'नऊ तृष्णामूलक धर्म' म्हणजे तृष्णेमुळे शोध (परियेसना), शोधामुळे लाभ, लाभामुळे निश्चय (विनिच्छय), निश्चयामुळे छंदराग (आसक्ती), छंदरागामुळे अध्यवसान (अज्झोसान - माझेपणाची भावना), अध्यवसानामुळे परिग्रह (मालकी), परिग्रहामुळे मत्सर (मच्छरिय), मत्सरामुळे आरक्षा (संरक्षण), आणि संरक्षणाच्या कारणाने दंड घेणे, शस्त्र घेणे, कलह, भांडण, वादविवाद, तू-तू मै-मै, चहाडी आणि असत्य भाषण (मुसावाद) निर्माण होतात. 'नऊ प्रकारचे मान (अहंकार)' म्हणजे 'मी श्रेष्ठापेक्षा श्रेष्ठ आहे' इत्यादी नऊ प्रकारचे मान आहेत. 'नऊ चिवरे' म्हणजे तिचिवर किंवा वस्सिकासाटिका (वर्षावास वस्त्र) इत्यादी पद्धतीने सांगितलेली नऊ चिवरे अधिष्ठित करावीत. 'विकल्पन करू नये' म्हणजे अधिष्ठान केल्याच्या वेळेपासून त्यांचे विकल्पन करू नये. 'नऊ अधार्मिक दाने' म्हणजे संघासाठी निश्चित केलेले दान दुसऱ्या संघाला, चेतियाला (स्तुपाला) किंवा पुद्गलाला (व्यक्तीला) वळवणे; चेतियासाठी निश्चित केलेले दान दुसऱ्या चेतियाला, संघाला किंवा पुद्गलाला वळवणे; पुद्गलासाठी निश्चित केलेले दान दुसऱ्या पुद्गलाला, संघाला किंवा चेतियाला वळवणे - अशा प्रकारे सांगितलेली नऊ अधार्मिक दाने आहेत. නව පටිග්ගහපරිභොගාති එතෙසංයෙව දානානං පටිග්ගහා ච පරිභොගා ච. තීණි ධම්මිකානි දානානීති සඞ්ඝස්ස නින්නං සඞ්ඝස්සෙව දෙති, චෙතියස්ස නින්නං චෙතියස්සෙව, පුග්ගලස්ස නින්නං පුග්ගලස්සෙව දෙතීති ඉමානි තීණි. පටිග්ගහපටිභොගාපි තෙසංයෙව පටිග්ගහා ච පරිභොගා ච. නව අධම්මිකා සඤ්ඤත්තියොති අධම්මවාදිපුග්ගලො, අධම්මවාදිසම්බහුලා, අධම්මවාදිසඞ්ඝොති එවං තීණි තිකානි සමථක්ඛන්ධකෙ නිද්දිට්ඨානි. ධම්මිකා සඤ්ඤත්තියොපි ධම්මවාදී පුග්ගලොතිආදිනා නයෙන තත්ථෙව නිද්දිට්ඨා. අධම්මකම්මෙ ද්වෙ නවකානි ඔවාදවග්ගස්ස පඨමසික්ඛාපදනිද්දෙසෙ පාචිත්තියවසෙන වුත්තානි. ධම්මකම්මෙ ද්වෙ නවකානි තත්ථෙව දුක්කටවසෙන වුත්තානි. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. 'नऊ प्रतिग्रह-परिभोग' म्हणजे याच अधार्मिक दानांचे नऊ प्रतिग्रह (स्वीकार) आणि नऊ परिभोग (वापर) होत. 'तीन धार्मिक दाने' म्हणजे संघासाठी निश्चित केलेले दान संघालाच देणे, चेतियासाठी निश्चित केलेले दान चेतियालाच देणे, आणि पुद्गलासाठी निश्चित केलेले दान पुद्गलालाच देणे - ही तीन धार्मिक दाने आहेत. प्रतिग्रह आणि परिभोग देखील त्यांचेच प्रतिग्रह आणि परिभोग समजावेत. 'नऊ अधार्मिक विज्ञापना (समजूत घालणे)' म्हणजे अधम्मवादी पुद्गल, अनेक अधम्मवादी भिक्खू, अधम्मवादी संघ - अशा प्रकारे तीन त्रिक शमथ स्कंधकात निर्दिष्ट केले आहेत. धार्मिक विज्ञापना देखील 'धम्मवादी पुद्गल' इत्यादी पद्धतीने तिथेच निर्दिष्ट केल्या आहेत. अधर्मकर्मात दोन नवक ओवादवग्गच्या (ओवाद वर्गाच्या) पहिल्या सिक्खापदाच्या निर्देशात पाचित्तिय (प्रायश्चित्त) नियमांच्या स्वरूपात सांगितले आहेत. धर्मकर्मात दोन नवक तिथेच दुक्कट (दुष्कृत) नियमांच्या स्वरूपात सांगितले आहेत. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. නවකවාරවණ්ණනා නිට්ඨිතා. नवकवार वर्णन (नवकवारवण्णना) समाप्त झाले. දසකවාරවණ්ණනා दशकवार वर्णन (दसकवारवण्णना) 330. දසකෙසු – දස ආඝාතවත්ථූනීති නවකෙසු වුත්තානි නව ‘‘අට්ඨානෙ වා පන ආඝාතො ජායතී’’ති ඉමිනා සද්ධිං දස හොන්ති. ආඝාතපටිවිනයාපි තත්ථ වුත්තා නව ‘‘අට්ඨානෙ වා පන ආඝාතො ජායති, තං කුතෙත්ථ ලබ්භාති ආඝාතං පටිවිනෙතී’’ති ඉමිනා සද්ධිං දස වෙදිතබ්බා. දස විනීතවත්ථූනීති දසහි ආඝාතවත්ථූහි විරතිසඞ්ඛාතානි දස. දසවත්ථුකා මිච්ඡාදිට්ඨීති ‘‘නත්ථි දින්න’’න්තිආදිවසෙන වෙදිතබ්බා, ‘‘අත්ථි දින්න’’න්තිආදිවසෙන සම්මාදිට්ඨි, ‘‘සස්සතො ලොකො’’තිආදිනා වසෙන පන අන්තග්ගාහිකා දිට්ඨි වෙදිතබ්බා. දස මිච්ඡත්තාති මිච්ඡාදිට්ඨිආදයො මිච්ඡාවිමුත්තිපරියොසානා, විපරීතා සම්මත්තා. සලාකග්ගාහා සමථක්ඛන්ධකෙ නිද්දිට්ඨා. ३३०. दशक निपातामध्ये - 'दहा आघातवस्तू' म्हणजे नवक निपातात सांगितलेल्या नऊ आघातवस्तूंमध्ये 'अयोग्य ठिकाणी (अकारणी) क्रोध उत्पन्न होतो' हे जोडून दहा होतात. आघातप्रतिविनय देखील तिथे (नवक निपातात) सांगितलेल्या नऊ आघातप्रतिविनयांमध्ये 'अयोग्य ठिकाणी क्रोध उत्पन्न होतो, पण तो इथे कसा टाळता आला असता? असा विचार करून क्रोध दूर करणे' हे जोडून दहा समजावेत. 'दहा विनीतवस्तू' म्हणजे दहा आघातवस्तूंपासून विरती (दूर राहणे) स्वरूप दहा विनीतवस्तू आहेत. 'दहा वस्तूंची (मुद्द्यांची) मिथ्यादृष्टी' म्हणजे 'दिलेले दान निरर्थक आहे' इत्यादी पद्धतीने समजावी; 'दिलेले दान फलदायी आहे' इत्यादी पद्धतीने सम्यग्दृष्टी समजावी; आणि 'लोक शाश्वत आहे' इत्यादी पद्धतीने अंतग्राहिका दृष्टी (एकांगी दृष्टी) समजावी. 'दहा मिथ्यात्व' म्हणजे मिथ्यादृष्टीपासून सुरू होऊन मिथ्याविमुक्तीपर्यंतचे दहा मिथ्यात्व आहेत; याच्या उलट असलेले दहा सम्यक्त्व आहेत. शलाका ग्रहण (सलाका ग्रहण - मतपत्रिका घेणे) शमथ स्कंधकात निर्दिष्ट केले आहे. දසහඞ්ගෙහි සමන්නාගතො භික්ඛු උබ්බාහිකාය සම්මන්නිතබ්බොති ‘‘සීලවා හොතී’’තිආදිනා නයෙන සමථක්ඛන්ධකෙ වුත්තෙහි දසහි. දස ආදීනවා රාජන්තෙපුරප්පවෙසනෙ රාජසික්ඛාපදෙ නිද්දිට්ඨා. දස දානවත්ථූනීති අන්නං පානං වත්ථං යානං මාලා ගන්ධං විලෙපනං සෙය්යාවසථං පදීපෙය්යං. දස රතනානීති මුත්තාමණිවෙළුරියාදීනි. දස පංසුකූලානීති සොසානිකං, පාපණිකං[Pg.183], උන්දූරක්ඛායිතං, උපචිකක්ඛායිතං, අග්ගිදඩ්ඪං, ගොඛායිතං, අජිකක්ඛායිතං, ථූපචීවරං, ආභිසෙකියං, භතපටියාභතන්ති එතෙසු උපසම්පන්නෙන උස්සුක්කං කාතබ්බං. දස චීවරධාරණාති ‘‘සබ්බනීලකානි චීවරානි ධාරෙන්තී’’ති වුත්තවසෙන දසාති කුරුන්දියං වුත්තං. මහාඅට්ඨකථායං පන ‘‘නවසු කප්පියචීවරෙසු උදකසාටිකං වා සඞ්කච්චිකං වා පක්ඛිපිත්වා දසා’’ති වුත්තං. 'दहा अंगांनी युक्त असलेल्या भिक्खूची उब्बाहिका (समिती) साठी निवड करावी' म्हणजे 'तो शीलवान असावा' इत्यादी पद्धतीने शमथ स्कंधकात सांगितलेल्या दहा अंगांनी युक्त भिक्खूची निवड करावी. राजाच्या अंतःपुरात प्रवेश करण्याचे 'दहा दोष' राजसिक्खापदात निर्दिष्ट केले आहेत. 'दहा दानवस्तू' म्हणजे अन्न, पान (पेय), वस्त्र, यान (वाहन/पादत्राणे), माला (पुष्पहार), गंध, विलेपन (सुगंधी उटणे), शय्या-आसन (बिछाना व निवासस्थान) आणि प्रदीप (दिवा/तेल). 'दहा रत्ने' म्हणजे मुक्ता (मोती), मणी, वैडूर्य इत्यादी दहा रत्ने आहेत. 'दहा पांसुकूल वस्त्रे' म्हणजे स्मशानातील वस्त्र (सोसानिक), दुकानाच्या दारातील वस्त्र (पापणिक), उंदराने कुरतडलेले वस्त्र (उंदूरक्खायित), वाळवीने खाल्लेले वस्त्र (उपचिकक्खायित), आगीने जळालेले वस्त्र (अग्गिदड्ढ), गायीने खाल्लेले वस्त्र (गोखायित), शेळीने खाल्लेले वस्त्र (अजिकक्खायित), स्तुपावर चढवलेले वस्त्र (थूपचीवर), अभिषेकाच्या ठिकाणी टाकलेले वस्त्र (आभिसेकिय), आणि स्मशानातून परत आणलेले वस्त्र (भतपटियाभत) - या पांसुकूल वस्त्रांच्या बाबतीत उपसंपन्न भिक्खूने प्रयत्न (उत्सुकता) केला पाहिजे. 'दहा चिवर धारण' म्हणजे 'सर्वस्वी निळ्या रंगाची चिवरे धारण करतात' अशा प्रकारे सांगितलेल्या दहा चिवर धारणा आहेत, असे कुरुंदी अठ्ठकथेत सांगितले आहे. महाअठ्ठकथेत मात्र 'नऊ कल्पिय (योग्य) चिवरांमध्ये उदकसाटिका (स्नान वस्त्र) किंवा संकच्चिका (छातीभोवती बांधायचे वस्त्र) जोडून दहा होतात' असे सांगितले आहे. අවන්දනීයපුග්ගලා සෙනාසනක්ඛන්ධකෙ නිද්දිට්ඨා. දස අක්කොසවත්ථූනි ඔමසවාදෙ නිද්දිට්ඨානි. දස ආකාරා පෙසුඤ්ඤසික්ඛාපදෙ නිද්දිට්ඨා. දස සෙනාසනානීති මඤ්චො, පීඨං, භිසි, බිම්බොහනං, චිමිලිකා, උත්තරත්ථරණං, තට්ටිකා, චම්මඛණ්ඩො, නිසීදනං, තිණසන්ථාරො, පණ්ණසන්ථාරොති. දස වරානි යාචිංසූති විසාඛා අට්ඨ, සුද්ධොදනමහාරාජා එකං, ජීවකො එකං. යාගුආනිසංසා ච අකප්පියමංසානි ච භෙසජ්ජක්ඛන්ධකෙ නිද්දිට්ඨානි. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. वंदन न करण्यायोग्य पुद्गल (व्यक्ती) सेनासन स्कंधकात निर्दिष्ट केले आहेत. 'दहा आक्रोशवस्तू' (शिवीगाळ करण्याचे दहा प्रकार) ओमसवाद सिक्खापदात निर्दिष्ट केले आहेत. 'दहा आकार' (चहाडी करण्याचे दहा प्रकार) पेसुञ्ञ सिक्खापदात निर्दिष्ट केले आहेत. 'दहा सेनासने' म्हणजे मंचक (खाट), पीठ (पाट/आसन), भिसी (गादी), बिम्बोहन (उशी), चिमिलिका (जाड कापड), उत्तरत्थरण (चादर/पांघरूण), तट्टिका (चटई), चर्मखंड (कातडे), निसीदन (बैठक वस्त्र), तृणसंथार (गवताचे अंथरूण) आणि पर्णसंथार (पानांचे अंथरूण) हे होत. 'दहा वर मागितले' म्हणजे विशाखेने आठ वर मागितले, शुद्धोदन महाराजांनी एक वर मागितला आणि जीवकाने एक वर मागितला. यागूचे (पेजेचे) आनिंसंस (फायदे) आणि अकल्पिय (अयोग्य) मांस भेषज्ज स्कंधकात निर्दिष्ट केले आहेत. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. දසකවාරවණ්ණනා නිට්ඨිතා. दशक-वाराचे स्पष्टीकरण (दशकवारवण्णना) समाप्त झाले. එකාදසකවාරවණ්ණනා एकादशक-वार स्पष्टीकरण (एकादषकवारवण्णना) 331. එකාදසකෙසු – එකාදසාති පණ්ඩකාදයො එකාදස. එකාදස පාදුකාති දස රතනමයා, එකා කට්ඨපාදුකා. තිණපාදුකමුඤ්ජපාදුකපබ්බජපාදුකාදයො පන කට්ඨපාදුකසඞ්ගහමෙව ගච්ඡන්ති. එකාදස පත්තාති තම්බලොහමයෙන වා දාරුමයෙන වා සද්ධිං දස රතනමයා. එකාදස චීවරානීති සබ්බනීලකාදීනි එකාදස. යාවතතියකාති උක්ඛිත්තානුවත්තිකා භික්ඛුනී, සඞ්ඝාදිසෙසා අට්ඨ, අරිට්ඨො, චණ්ඩකාළීති. එකාදස අන්තරායිකා නාම ‘‘නසි අනිමිත්තා’’ති ආදයො. එකාදස චීවරානි අධිට්ඨාතබ්බානීති තිචීවරං, වස්සිකසාටිකා, නිසීදනං, පච්චත්ථරණං, කණ්ඩුප්පටිච්ඡාදි, මුඛපුඤ්ඡනචොළං, පරික්ඛාරචොළං, උදකසාටිකා, සඞ්කච්චිකාති. න විකප්පෙතබ්බානීති එතානෙව අධිට්ඨිතකාලතො පට්ඨාය න විකප්පෙතබ්බානි. ගණ්ඨිකා ච විධා ච සුත්තමයෙන සද්ධිං එකාදස හොන්ති, තෙ සබ්බෙ ඛුද්දකක්ඛන්ධකෙ නිද්දිට්ඨා. පථවියො පථවිසික්ඛාපදෙ නිද්දිට්ඨා. නිස්සයපටිපස්සද්ධියො උපජ්ඣායම්හා පඤ්ච, ආචරියම්හා ඡ; එවං එකාදස. අවන්දියපුග්ගලා නග්ගෙන සද්ධිං එකාදස, තෙ සබ්බෙ සෙනාසනක්ඛන්ධකෙ නිද්දිට්ඨා[Pg.184]. එකාදස පරමානි පුබ්බෙ වුත්තෙසු චුද්දසසු එකාදසකවසෙන යොජෙත්වා වෙදිතබ්බානි. එකාදස වරානීති මහාපජාපතියා යාචිතවරෙන සද්ධිං පුබ්බෙ වුත්තානි දස. එකාදස සීමාදොසාති ‘‘අතිඛුද්දකං සීමං සම්මන්නන්තී’’තිආදිනා නයෙන කම්මවග්ගෙ ආගමිස්සන්ති. ३३१. एकादशकांमध्ये – 'एकादश' (अकरा) म्हणजे पंडक (नपुंसक) इत्यादी अकरा व्यक्ती. 'अकरा पादुका' म्हणजे दहा रत्नांच्या आणि एक लाकडी पादुका. गवत, मुंज गवत, बब्बाज गवत इत्यादींच्या पादुका लाकडी पादुकांच्या वर्गातच समाविष्ट होतात. 'अकरा पात्रे' म्हणजे तांब्याच्या किंवा लाकडी पात्रासह दहा रत्नांची पात्रे. 'अकरा चीवरे' म्हणजे पूर्णपणे निळे इत्यादी अकरा चीवरे. 'यावततियक' (तिसऱ्यांदा सांगण्यापर्यंतचे) म्हणजे बहिष्कृत भिक्खूचे अनुकरण करणारी भिक्खुणी, आठ संघादिसेस (यावततियक), अरिट्ठ भिक्खू आणि चण्डकाळी भिक्खुणी. 'अकरा अंतरायिक' (अडथळे) म्हणजे "नसि अनिमित्ता" (लिंग नसणे) इत्यादी. 'अकरा चीवरे अधिष्ठित करावीत' म्हणजे त्रिचीवर, वर्षावास वस्त्र (वस्सिकासातिका), निसीदन (आसन), पच्चत्थरण (पांघरूण/बिछाना), कण्डुप्पटिच्छादि (खाज सुटल्यावर वापरायचे वस्त्र), मुखपुंछनचोळ (तोंड पुसण्याचे वस्त्र), परिक्खारचोळ (परिकार वस्त्र), उदकसातिका (स्नान वस्त्र), संकच्चिका (छातीभोवती गुंडाळायचे वस्त्र). 'विकल्पित करू नयेत' म्हणजे हीच वस्त्रे अधिष्ठान केल्याच्या वेळेपासून विकल्पित (दुसऱ्याला देण्यायोग्य) करू नयेत. गाठ (बटण) आणि पट्टी (लूप) सुताच्या दोऱ्यासह अकरा होतात, ते सर्व खुद्दकखन्धकात सांगितले आहेत. मातीचे प्रकार पठवी-सिक्खापदात (जमीन खोदण्याच्या नियमात) सांगितले आहेत. निस्सय (आश्रय) समाप्त होण्याचे मार्ग उपाध्यायाकडून पाच आणि आचार्याकडून सहा; असे अकरा आहेत. वंदन न करण्यायोग्य व्यक्ती नग्न भिक्खूसह अकरा आहेत, त्या सर्व सेनासनखन्धकात सांगितल्या आहेत. अकरा 'परम' (मर्यादा) पूर्वी सांगितलेल्या चौदांमध्ये अकराच्या संख्येनुसार जोडून समजून घ्याव्यात. 'अकरा वर' म्हणजे महाप्रजापती गौतमीने मागितलेल्या वरासह पूर्वी सांगितलेले दहा वर. 'अकरा सीमादोष' म्हणजे "अतिशय लहान सीमा निश्चित करणे" इत्यादी पद्धतीने कम्मवग्गात येतील. අක්කොසකපරිභාසකෙ පුග්ගලෙ එකාදසාදීනවා නාම ‘‘යො සො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු අක්කොසකො පරිභාසකො අරියූපවාදී, සබ්රහ්මචාරීනං අට්ඨානමෙතං අනවකාසො යං සො එකාදසන්නං බ්යසනානං අඤ්ඤතරං බ්යසනං න නිගච්ඡෙය්ය. කතමෙසං එකාදසන්නං? අනධිගතං නාධිගච්ඡති, අධිගතා පරිහායති, සද්ධම්මස්ස න වොදායන්ති, සද්ධම්මෙසු වා අධිමානිකො හොති, අනභිරතො වා බ්රහ්මචරියං චරති, අඤ්ඤතරං වා සංකිලිට්ඨං ආපත්තිං ආපජ්ජති, සික්ඛං වා පච්චක්ඛාය හීනායාවත්තති, ගාළ්හං වා රොගාතඞ්කං ඵුසති, උම්මාදං වා පාපුණාති චිත්තක්ඛෙපං වා, සම්මූළ්හො කාලං කරොති, කායස්ස භෙදා පරම්මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජතී’’ති (අ. නි. 11.6). එත්ථ ච සද්ධම්මොති බුද්ධවචනං අධිප්පෙතං. शिवीगाळ करणाऱ्या आणि धमकावणाऱ्या व्यक्तीचे अकरा दुष्परिणाम (आदीनव) म्हणजे: "भिक्खूंनो, जो भिक्खू आपल्या सब्रह्मचाऱ्यांना (सहकाऱ्यांना) शिवीगाळ करणारा, धमकावणारा आणि आर्यांची निंदा करणारा असतो, त्याने अकरा विनाशांपैकी (व्यसनांपैकी) कोणत्या तरी एका विनाशाला प्राप्त न होणे हे अशक्य आहे, त्याला कोणतीही संधी नाही. कोणत्या अकरांपैकी? १. प्राप्त न झालेले (समाधी इत्यादी) प्राप्त होत नाही, २. प्राप्त झालेल्यापासून तो भ्रष्ट होतो, ३. त्याचे सद्धर्म शुद्ध होत नाहीत, ४. किंवा सद्धर्माविषयी तो अतिमानी (अहंकारी) होतो, ५. किंवा तो अरुचीने ब्रह्मचर्य पाळतो, ६. किंवा तो एखाद्या क्लिष्ट (गंभीर) आपत्तीला (नियमाच्या उल्लंघनाला) प्राप्त होतो, ७. किंवा तो सिक्खेचा (प्रशिक्षणाचा) त्याग करून हीन गृहस्थ जीवनात परत जातो, ८. किंवा त्याला तीव्र आजार किंवा व्याधी जडते, ९. किंवा तो वेडेपणाला किंवा चित्तभ्रमाला प्राप्त होतो, १०. तो अत्यंत संभ्रमावस्थेत मृत्यू पावतो, ११. आणि शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर तो अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात (नरकात) उत्पन्न होतो." (अं. नि. ११.६). आणि येथे 'सद्धर्म' म्हणजे 'बुद्धवचन' अभिप्रेत आहे. ආසෙවිතායාති ආදිතො පට්ඨාය සෙවිතාය. භාවිතායාති නිප්ඵාදිතාය වඩ්ඪිතාය 'आसेवित' म्हणजे सुरुवातीपासून सेवन केलेले. 'भावित' म्हणजे पूर्ण केलेले किंवा विकसित केलेले. වා. බහුලීකතායාති පුනප්පුනං කතාය. යානීකතායාති සුයුත්තයානසදිසාය කතාය. වත්ථුකතායාති යථා පතිට්ඨා හොති; එවං කතාය. අනුට්ඨිතායාති අනු අනු පවත්තිතාය; නිච්චාධිට්ඨිතායාති අත්ථො. පරිචිතායාති සමන්තතො චිතාය; සබ්බදිසාසු චිතාය ආචිතාය භාවිතාය අභිවඩ්ඪිතායාති අත්ථො. සුසමාරද්ධායාති සුට්ඨු සමාරද්ධාය; වසීභාවං උපනීතායාති අත්ථො. න පාපකං සුපිනන්ති පාපකමෙව න පස්සති, භද්රකං පන වුඩ්ඪිකාරණභූතං පස්සති. දෙවතා රක්ඛන්තීති ආරක්ඛදෙවතා ධම්මිකං රක්ඛං පච්චුපට්ඨාපෙන්ති. තුවටං චිත්තං සමාධියතීති ඛිප්පං චිත්තං සමාධියති. උත්තරි අප්පටිවිජ්ඣන්තොති මෙත්තාඣානතො උත්තරිං අරහත්තං අසච්ඡිකරොන්තො සෙඛො වා පුථුජ්ජනො වා හුත්වා කාලං කරොන්තො බ්රහ්මලොකූපගො හොති. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. किंवा. 'बहुलीकृत' म्हणजे वारंवार केलेले. 'यानीकृत' म्हणजे चांगल्या प्रकारे जोडलेल्या वाहनासारखे केलेले. 'वस्तूकृत' म्हणजे ज्या प्रकारे ते दृढ प्रतिष्ठित होईल, तसे केलेले. 'अनुष्ठित' म्हणजे वारंवार प्रवृत्त केलेले; नेहमी अधिष्ठित केलेले असा अर्थ आहे. 'परिचित' म्हणजे सर्व बाजूंनी संचित केलेले; सर्व दिशांना संचित केलेले, गोळा केलेले, विकसित केलेले, वाढवलेले असा अर्थ आहे. 'सुसमारब्ध' म्हणजे चांगल्या प्रकारे आरंभ केलेले; वशित्वाला (नियंत्रणाला) प्राप्त केलेले असा अर्थ आहे. 'वाईट स्वप्न पाहत नाही' म्हणजे वाईट स्वप्न पाहत नाही, तर प्रगतीला कारणीभूत ठरणारे चांगले स्वप्न पाहतो. 'देवता रक्षण करतात' म्हणजे रक्षक देवता धार्मिक रक्षण प्रदान करतात. 'चित्त लवकर समाधीस्थ होते' म्हणजे चित्त वेगाने एकाग्र होते. 'वरचे न जाणणारा' म्हणजे मैत्री-ध्यानापेक्षा वरचे अर्हत्त्व साक्षात न करता, शैक्ष (सेख) किंवा पृथग्जन (पुथुज्जन) म्हणून मृत्यू पावून ब्रह्मलोकात जाणारा होतो. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. එකාදසකවාරවණ්ණනා පරියොසානා एकादशक-वार स्पष्टीकरणाची समाप्ती. එකුත්තරිකවණ්ණනා නිට්ඨිතා. एकुत्तरिक-स्पष्टीकरण (एकुत्तरिकवण्णना) समाप्त झाले. උපොසථාදිපුච්ඡාවිස්සජ්ජනා उपोसथ इत्यादींचे प्रश्नोत्तर (उपोसथादिपुच्छाविस्सज्जना) 332. ‘‘උපොසථකම්මස්ස [Pg.185] කො ආදී’’තිආදීනං පුච්ඡානං විස්සජ්ජනෙ සාමග්ගී ආදීති ‘‘උපොසථං කරිස්සාමා’’ති සීමං සොධෙත්වා ඡන්දපාරිසුද්ධිං ආහරිත්වා සන්නිපතිතානං කායසාමග්ගී ආදි. කිරියා මජ්ඣෙති පුබ්බකිච්චං කත්වා පාතිමොක්ඛඔසාරණකිරියා මජ්ඣෙ. නිට්ඨානං පරියොසානන්ති ‘‘තත්ථ සබ්බෙහෙව සමග්ගෙහි සම්මොදමානෙහි අවිවදමානෙහි සික්ඛිතබ්බ’’න්ති ඉදං පාතිමොක්ඛනිට්ඨානං පරියොසානං. පවාරණාකම්මස්ස සාමග්ගී ආදීති ‘‘පවාරණං කරිස්සාමා’’ති සීමං සොධෙත්වා ඡන්දපවාරණං ආහරිත්වා සන්නිපතිතානං කායසාමග්ගී ආදි. කිරියා මජ්ඣෙති පවාරණාඤත්ති ච පවාරණාකථා ච මජ්ඣෙ, සඞ්ඝනවකස්ස ‘‘පස්සන්තො පටිකරිස්සාමී’’ති වචනං පරියොසානං. තජ්ජනීයකම්මාදීසු වත්ථු නාම යෙන වත්ථුනා කම්මාරහො හොති, තං වත්ථු. පුග්ගලොති යෙන තං වත්ථු කතං, සො පුග්ගලො. කම්මවාචා පරියොසානන්ති ‘‘කතං සඞ්ඝෙන ඉත්ථන්නාමස්ස භික්ඛුනො තජ්ජනීයකම්මං, ඛමති සඞ්ඝස්ස, තස්මා තුණ්හී, එවමෙතං ධාරයාමී’’ති එවං තස්සා තස්සා කම්මවාචාය අවසානවචනං පරියොසානං. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති ३३२. “उपोसथ कर्माची सुरुवात काय आहे?” इत्यादी प्रश्नांच्या उत्तरात: 'सामग्री (एकता) ही सुरुवात आहे' म्हणजे “आम्ही उपोसथ करू” असा विचार करून, सीमा शुद्ध करून, छंद (संमती) आणि पारिशुद्धी आणून एकत्रित आलेल्या भिक्खूंची शारीरिक एकता (कायसामग्गी) ही सुरुवात आहे. 'क्रिया हा मध्य आहे' म्हणजे पूर्वकृत्ये (पुब्बकिच्च) करून पातिमोक्खाचे पठण (पातिमोक्खओसारण) करण्याची क्रिया हा मध्य आहे. 'समाप्ती हा अंत आहे' म्हणजे “तेथे सर्वांनी एकत्र येऊन, आनंदित होऊन, वाद न घालता शिकावे” ही पातिमोक्खाची समाप्ती हा अंत आहे. 'पवारणा कर्माची एकता ही सुरुवात आहे' म्हणजे “आम्ही पवारणा करू” असा विचार करून, सीमा शुद्ध करून, छंद-पवारणा आणून एकत्रित आलेल्यांची शारीरिक एकता ही सुरुवात आहे. 'क्रिया हा मध्य आहे' म्हणजे पवारणा ज्ञप्ती (घोषणा) आणि पवारणा कथा हा मध्य आहे, आणि संघातील सर्वात कनिष्ठ भिक्खूचे “पाहून मी प्रायश्चित्त करीन” हे वचन हा अंत आहे. तज्जनीय कर्म इत्यादींमध्ये: 'वस्तू' म्हणजे ज्या कारणामुळे (वस्तूमुळे) कर्म करण्यास प्राप्त होतो, ती वस्तू. 'पुद्गल' (व्यक्ती) म्हणजे ज्याने ते कृत्य केले आहे, ती व्यक्ती. 'कर्मवाचा हा अंत आहे' म्हणजे “संघाने अमुक नावाच्या भिक्खूचे तज्जनीय कर्म केले आहे, हे संघाला मान्य आहे, म्हणून संघ शांत आहे, असे मी हे धारण करतो” असे त्या त्या कर्मवाचेचे अंतिम वचन हा अंत आहे. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. උපොසථාදිපුච්ඡාවිස්සජ්ජනාවණ්ණනා නිට්ඨිතා. उपोसथ इत्यादींच्या प्रश्नोत्तरांचे स्पष्टीकरण समाप्त झाले. අත්ථවසපකරණාවණ්ණනා अर्थवश-प्रकरणाचे स्पष्टीकरण (अत्थवसपकरणावण्णना) 334. අත්ථවසපකරණෙ – දස අත්ථවසෙතිආදීසු යං වත්තබ්බං තං පඨමපාරාජිකවණ්ණනායමෙව වුත්තං. යං සඞ්ඝසුට්ඨු තං සඞ්ඝඵාසූතිආදීසු උපරිමං උපරිමං පදං හෙට්ඨිමස්ස හෙට්ඨිමස්ස පදස්ස අත්ථො. ३३४. अर्थवश-प्रकरणात – 'दहा अर्थवश' इत्यादींमध्ये जे सांगायचे आहे, ते पहिल्या पाराजिकाच्या स्पष्टीकरणातच सांगितले गेले आहे. 'जे संघासाठी उत्तम, ते संघासाठी सुखकारक' इत्यादींमध्ये, पुढील पुढील पद हे मागील मागील पदाचा अर्थ स्पष्ट करणारे आहे. අත්ථසතං ධම්මසතන්තිආදිම්හි පන යදෙතං දසසු පදෙසු එකෙකං මූලං කත්වා දසක්ඛත්තුං යොජනාය පදසතං වුත්තං. තත්ථ පච්ඡිමස්ස පච්ඡිමස්ස පදස්ස වසෙන අත්ථසතං පුරිමස්ස පුරිමස්ස වසෙන ධම්මසතං වෙදිතබ්බං. අථ වා යෙ දස අත්ථවසෙ පටිච්ච තථාගතෙන සාවකානං සික්ඛාපදං පඤ්ඤත්තං, යෙ පුබ්බෙ පඨමපාරාජිකවණ්ණනායං ‘‘තත්ථ සඞ්ඝසුට්ඨුතා නාම සඞ්ඝස්ස සුට්ඨුභාවො ‘සුට්ඨු දෙවා’ති ආගතට්ඨානෙ විය ‘සුට්ඨු භන්තෙ’ති වචනසම්පටිච්ඡනභාවො, යො ච තථාගතස්ස වචනං සම්පටිච්ඡති, තස්ස තං දීඝරත්තං [Pg.186] හිතාය සුඛාය හොති, තස්මා සඞ්ඝස්ස ‘සුට්ඨු භන්තෙ’ති මම වචනසම්පටිච්ඡනත්ථං පඤ්ඤපෙස්සාමි අසම්පටිච්ඡනෙ ආදීනවං සම්පටිච්ඡනෙ ච ආනිසංසං දස්සෙත්වා න බලක්කාරෙන අභිභවිත්වාති එතමත්ථං ආවිකරොන්තො ආහ – සඞ්ඝසුට්ඨුතායා’’ති එවමාදිනා නයෙන වණ්ණිතා, තෙසං ඉධ දසක්ඛත්තුං ආගතත්තා අත්ථසතං තදත්ථජොතකානඤ්ච පදානං වසෙන ධම්මසතං වෙදිතබ්බං. ඉදානි අත්ථජොතකානං නිරුත්තීනං වසෙන නිරුත්තිසතං, ධම්මභූතානං නිරුත්තීනං වසෙන නිරුත්තිසතන්ති ද්වෙ නිරුත්තිසතානි, අත්ථසතෙ ඤාණසතං, ධම්මසතෙ ඤාණසතං, ද්වීසු නිරුත්තිසතෙසු ද්වෙ ඤාණසතානීති චත්තාරි ඤාණසතානි ච වෙදිතබ්බානි. "अत्थसतं धम्मसतं" इत्यादींमध्ये, दहा पदांपैकी प्रत्येकाला मूळ (आधार) करून दहा वेळा जोडल्याने जे शंभर पदे सांगितले आहेत, त्यामध्ये नंतरच्या नंतरच्या पदाच्या द्वारे शंभर अर्थ (अत्थसतं) आणि आधीच्या आधीच्या पदाच्या द्वारे शंभर धम्म (धम्मसतं) समजावे. किंवा, ज्या दहा अर्थवशांना (प्रयोजनांना) अनुसरून तथागतांनी श्रावकांसाठी शिक्षापद प्रज्ञप्त केले आहे, जे पूर्वी पहिल्या पाराजिकाच्या वर्णनात "तेथे संघसुठ्ठुता म्हणजे संघाचे सुठ्ठुभाव (कल्याण/सुस्थिती). जसे 'सुठ्ठु देवा' या ठिकाणी आले आहे, त्याप्रमाणे 'सुठ्ठु भन्ते' असे वचन स्वीकारण्याचा भाव होय. आणि जो तथागतांच्या वचनाचा स्वीकार करतो, त्याचे ते दीर्घकाळ हितासाठी व सुखासाठी होते. म्हणून संघाच्या 'सुठ्ठु भन्ते' अशा माझ्या वचन-स्वीकारासाठी, न स्वीकारण्यातील दोष आणि स्वीकारण्यातील आणिसंस (फायदे) दाखवून, बळजबरीने न जिंकता मी प्रज्ञप्त करीन, हा अर्थ स्पष्ट करताना 'संघसुठ्ठुताय' असे म्हटले आहे" अशा प्रकारे वर्णन केले आहे, त्यांचे येथे दहा वेळा आल्यामुळे शंभर अर्थ (अत्थसतं) आणि त्या अर्थाला प्रकाशित करणाऱ्या पदांच्या द्वारे शंभर धम्म (धम्मसतं) समजावे. आता, अर्थ प्रकाशित करणाऱ्या निरुक्तींच्या (शब्दांच्या) द्वारे शंभर निरुक्ती, आणि धम्मरूप निरुक्तींच्या द्वारे शंभर निरुक्ती, अशा प्रकारे दोनशे निरुक्ती (द्वे निरुत्तिसतानि), शंभर अर्थांमध्ये शंभर ज्ञान, शंभर धम्मांमध्ये शंभर ज्ञान, आणि दोनशे निरुक्तींमध्ये दोनशे ज्ञान, अशा प्रकारे चारशे ज्ञाने (चत्तारि ञाणसतानि) समजावीत. ‘‘අත්ථසතං ධම්මසතං, ද්වෙ නිරුත්තිසතානි; චත්තාරි ඤාණසතානි, අත්ථවසෙ පකරණෙ’’ති. "शंभर अर्थ (अत्थसतं), शंभर धम्म (धम्मसतं), दोनशे निरुक्ती (द्वे निरुत्तिसतानि); आणि चारशे ज्ञाने (चत्तारि ञाणसतानि) या ग्रंथात अर्थवशांच्या (प्रयोजनांच्या) संबंधात सांगितले आहेत." ඉති හි යං වුත්තං, ඉදමෙතං පටිච්ච වුත්තන්ති. अशा प्रकारे जे म्हटले आहे, ते यालाच अनुसरून म्हटले आहे. ඉති සමන්තපාසාදිකාය විනයසංවණ්ණනාය अशा प्रकारे, समन्तपासादिका नावाच्या विनय-टीकेमध्ये (विनयसंवण्णना) මහාවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. महावग्ग-वर्णन (महावग्गवण्णना) समाप्त झाले. පඨමගාථාසඞ්ගණිකං प्रथम गाथासंगणिक සත්තනගරෙසු පඤ්ඤත්තසික්ඛාපදවණ්ණනා सात नगरांमध्ये प्रज्ञप्त केलेल्या शिक्षापदांचे वर्णन 335. එකංසං [Pg.187] චීවරං කත්වාති එකස්මිං අංසකූටෙ චීවරං කත්වා; සාධුකං උත්තරාසඞ්ගං කත්වාති අත්ථො. පග්ගණ්හිත්වාන අඤ්ජලින්ති දසනඛසමොධානසමුජ්ජලං අඤ්ජලිං උක්ඛිපිත්වා. ආසීසමානරූපො වාති පච්චාසීසමානරූපො විය. කිස්ස ත්වං ඉධ මාගතොති කෙන කාරණෙන කිමත්ථං පත්ථයමානො ත්වං ඉධ ආගතො. කො එවමාහ? සම්මාසම්බුද්ධො. කං එවමාහ? ආයස්මන්තං උපාලිං. ඉති ආයස්මා උපාලි භගවන්තං උපසඞ්කමිත්වා ‘‘ද්වීසු විනයෙසූ’’ති ඉමං ගාථං පුච්ඡි. අථස්ස භගවා ‘‘භද්දකො තෙ උම්මඞ්ගො’’තිආදීනි වත්වා තං විස්සජ්ජෙසි. එස නයො සබ්බත්ථ. ඉති ඉමෙ සබ්බපඤ්හෙ බුද්ධකාලෙ උපාලිත්ථෙරො පුච්ඡි. භගවා බ්යාකාසි. සඞ්ගීතිකාලෙ පන මහාකස්සපත්ථෙරො පුච්ඡි. උපාලිත්ථෙරො බ්යාකාසි. ३३५. 'एकंसं चीवरं कत्वा' म्हणजे एका खांद्यावर चीवर करून; 'साधुकं उत्तरासंगं कत्वा' (उत्तरासंग नीट परिधान करून) असा अर्थ आहे. 'पग्गण्हित्वान अंजलिं' म्हणजे दहा नखांच्या संयोगाने प्रकाशमान असणारी दोन्ही हात जोडून (अंजली) वर उचलून. 'आसीसमानरूपो वा' म्हणजे जणू काही अपेक्षा करणाऱ्याप्रमाणे होऊन. 'किस्स त्वं इध मागतो' म्हणजे कोणत्या कारणाने, कशाची इच्छा करत तू येथे आला आहेस? असे कोणी म्हटले? सम्यक्संबुद्धांनी. कोणाला म्हटले? आयुष्यमान उपालींना. अशा प्रकारे आयुष्यमान उपालींनी भगवंतांकडे जाऊन 'द्वीसु विनयेसू' ही गाथा विचारली. तेव्हा भगवंतांनी त्यांना 'भद्दको ते उम्मङ्गो' इत्यादी गाथा म्हणून त्या प्रश्नाचे उत्तर दिले. हाच नियम सर्वत्र लागू होतो. अशा प्रकारे हे सर्व प्रश्न बुद्धकाळात उपाली स्थविरांनी विचारले आणि भगवंतांनी त्यांचे उत्तर दिले. संगीती (धम्मसंगायन) काळात मात्र महाकस्सप स्थविरांनी विचारले आणि उपाली स्थविरांनी उत्तर दिले. තත්ථ භද්දකො තෙ උම්මඞ්ගොති භද්දකා තෙ පඤ්හා; පඤ්හා හි අවිජ්ජන්ධකාරතො උම්මුජ්ජිත්වා ඨිතත්තා ‘‘උම්මඞ්ගො’’ති වුච්චති. තග්ඝාති කාරණත්ථෙ නිපාතො. යස්මා මං පුච්ඡසි, තස්මා තෙ අහමක්ඛිස්සන්ති අත්ථො. සම්පටිච්ඡනත්ථෙ වා, ‘‘තග්ඝා’’ති හි ඉමිනා වචනං සම්පටිච්ඡිත්වා අක්ඛිස්සන්ති ආහ. ‘‘සමාදහිත්වා විසිබ්බෙන්ති, සාමිසෙන, සසිත්ථක’’න්ති ඉමානි තීණියෙව සික්ඛාපදානි භග්ගෙසු පඤ්ඤත්තානි. त्यामध्ये, 'भद्दको ते उम्मङ्गो' म्हणजे तुझे प्रश्न चांगले आहेत; कारण प्रश्न हे अविद्यारूपी अंधारातून वर येऊन स्थित झाल्यामुळे त्यांना 'उम्मङ्ग' (वर येणे) असे म्हटले जाते. 'तग्घ' हा शब्द कारण दर्शवणारा निपात आहे. 'ज्या अर्थी तू मला विचारत आहेस, त्या अर्थी मी तुला सांगेन' असा अर्थ आहे. किंवा तो स्वीकारण्याच्या अर्थात आहे, कारण 'तग्घ' या शब्दाने प्रश्नाचा स्वीकार करून 'मी सांगेन' असे म्हटले आहे. 'समादहित्वा विसिब्बेन्ति', 'सामिसेन' आणि 'ससित्थकं' ही तीनच शिक्षापदे भग्ग देशात प्रज्ञप्त केली गेली. චතුවිපත්තිවණ්ණනා चतुर्विपत्तीचे वर्णन (चतुविपत्तिवण्णना) 336. යං තං පුච්ඡිම්හාති යං ත්වං අපුච්ඡිම්හා. අකිත්තයීති අභාසි. නොති අම්හාකං. තං තං බ්යාකතන්ති යං යං පුට්ඨං, තං තදෙව බ්යාකතං. අනඤ්ඤථාති අඤ්ඤථා අකත්වා බ්යාකතං. ३३६. 'यं तं पुच्छिम्हा' म्हणजे जे आम्ही आपल्याला विचारले. 'अकित्तयी' म्हणजे सांगितले (भाष्य केले). 'नो' म्हणजे आम्हाला. 'तं तं ब्याकतं' म्हणजे जे जे विचारले गेले, त्या त्या प्रश्नाचे उत्तर दिले गेले. 'अनञ्ञथा' म्हणजे अन्यथा न करता (तंतोतंत) उत्तर दिले गेले. යෙ දුට්ඨුල්ලා සා සීලවිපත්තීති එත්ථ කිඤ්චාපි සීලවිපත්ති නාම පඤ්හෙ නත්ථි, අථ ඛො දුට්ඨුල්ලං විස්සජ්ජෙතුකාමතායෙතං වුත්තං. චතූසු හි විපත්තීසු දුට්ඨුල්ලං එකාය විපත්තියා සඞ්ගහිතං, අදුට්ඨුල්ලං තීහි විපත්තීහි සඞ්ගහිතං. තස්මා ‘‘යෙ දුට්ඨුල්ලා සා සීලවිපත්තී’’ති වත්වා තමෙව විත්ථාරතො දස්සෙතුං ‘‘පාරාජිකං සඞ්ඝාදිසෙසො සීලවිපත්තීති වුච්චතී’’ති ආහ. येथे 'ये दुट्ठुल्ला सा सीलविपत्ती' (जे दुट्ठुल्ल आहेत ती शीलविपत्ती होय) यामध्ये जरी प्रश्नात शीलविपत्तीचा उल्लेख नसला, तरी दुट्ठुल्ल (गंभीर) आपत्तीचे उत्तर देण्याच्या इच्छेने भगवंतांनी असे म्हटले आहे. कारण चार विपत्तींपैकी दुट्ठुल्ल हे एकाच विपत्तीत (शीलविपत्तीत) समाविष्ट होते, तर अदुट्ठुल्ल हे इतर तीन विपत्तींमध्ये समाविष्ट होते. म्हणून 'ये दुट्ठुल्ला सा सीलविपत्ती' असे म्हणून, त्याचेच सविस्तर वर्णन करण्यासाठी 'पाराजिकं संघादिसेसो सीलविपत्तीति वुच्चती' (पाराजिक आणि संघादिसेस यांना शीलविपत्ती म्हटले जाते) असे भगवंतांनी म्हटले. ඉදානි [Pg.188] තිස්සන්නං විපත්තීනං වසෙන අදුට්ඨුල්ලං දස්සෙතුං ‘‘ථුල්ලච්චය’’න්තිආදිමාහ. තත්ථ යො චායං, අක්කොසති හසාධිප්පායොති ඉදං දුබ්භාසිතස්ස වත්ථුදස්සනත්ථං වුත්තං. आता, तीन विपत्तींच्या द्वारे अदुट्ठुल्ल (लहान) आपत्ती दाखवण्यासाठी भगवंतांनी 'थुल्लच्चय' इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये 'यो चायं, अक्कोसति हसाधिप्पायो' (जो हा हसण्याच्या उद्देशाने शिवीगाळ करतो) हे दुब्भासित (दुभाषित) आपत्तीचे कारण दाखवण्यासाठी म्हटले आहे. අබ්භාචික්ඛන්තීති ‘‘තථාහං භගවතා ධම්මං දෙසිතං ආජානාමී’’ති වදන්තා අබ්භාචික්ඛන්ති. 'अब्भाचिक्खन्ति' म्हणजे 'भगवंतांनी ज्या प्रकारे धम्म देशना केली आहे, ती मी तशीच जाणतो' असे म्हणत खोटा आरोप करतात. අයං සා ආජීවවිපත්තිසම්මතාති අයං ඡහි සික්ඛාපදෙහි සඞ්ගහිතා ආජීවවිපත්ති නාම චතුත්ථා විපත්ති සම්මතාති එත්තාවතා ‘‘අදුට්ඨුල්ල’’න්ති ඉදං විස්සජ්ජිතං හොති. 'अयं सा आजीवविपत्तिसम्मता' म्हणजे सहा शिक्षापदांमध्ये समाविष्ट असलेली ही आजीवविपत्ती नावाची चौथी विपत्ती मानली गेली आहे. एवढ्याने 'अदुट्ठुल्लं' या प्रश्नाचे उत्तर पूर्ण होते. ඉදානි ‘‘යෙ ච යාවතතියකා’’ති පඤ්හං විස්සජ්ජෙතුං ‘‘එකාදසා’’තිආදිමාහ. आता, 'ये च यावततियका' (आणि जे तिसऱ्या वेळेपर्यंतचे आहेत) या प्रश्नाचे उत्तर देण्यासाठी भगवंतांनी 'एकादसा' (अकरा) इत्यादी म्हटले आहे. ඡෙදනකාදිවණ්ණනා छेदक इत्यादींचे वर्णन (छेदनाकादिवण्णना) 337. යස්මා පන ‘‘යෙ ච යාවතතියකා’’ති අයං පඤ්හො ‘‘එකාදස යාවතතියකා’’ති එවං සඞ්ඛාවසෙන විස්සජ්ජිතො, තස්මා සඞ්ඛානුසන්ධිවසෙනෙව ‘‘කති ඡෙදනකානී’’තිආදිකෙ අඤ්ඤෙ අන්තරාපඤ්හෙ පුච්ඡි. තෙසං විස්සජ්ජනත්ථං ‘‘ඡ ඡෙදනකානී’’තිආදි වුත්තං. තත්ථ ‘‘එකං භෙදනකං, එකං උද්දාලනකං, සොදස ජානන්ති පඤ්ඤත්තා’’ති ඉදමෙව අපුබ්බං. සෙසං මහාවග්ගෙ විභත්තමෙව. යං පනෙතං අපුබ්බං තත්ථ එකං භෙදනකන්ති සූචිඝරං. එකං උද්දාලනකන්ති තූලොනද්ධමඤ්චපීඨං. සොදසාති සොළස. ජානන්ති පඤ්ඤත්තාති ‘‘ජාන’’න්ති එවං වත්වා පඤ්ඤත්තා, තෙ එවං වෙදිතබ්බා – ‘‘ජානං සඞ්ඝිකං ලාභං පරිණතං අත්තනො පරිණාමෙය්ය, ජානං පුබ්බුපගතං භික්ඛුං අනුපඛජ්ජ නිසජ්ජං කප්පෙය්ය, ජානං සප්පාණකං උදකං තිණං වා මත්තිකං වා සිඤ්චෙය්ය වා සිඤ්චාපෙය්ය වා, ජානං භික්ඛුනිපරිපාචිතං පිණ්ඩපාතං භුඤ්ජෙය්ය, ජානං ආසාදනාපෙක්ඛො භුත්තස්මිං පාචිත්තියං, ජානං සප්පාණකං උදකං පරිභුඤ්ජෙය්ය, ජානං යථාධම්මං නිහතාධිකරණං, ජානං දුට්ඨුල්ලං ආපත්තිං පටිච්ඡාදෙය්ය, ජානං ඌනවීසතිවස්සං පුග්ගලං උපසම්පාදෙය්ය, ජානං ථෙය්යසත්ථෙන සද්ධිං, ජානං තථාවාදිනා භික්ඛුනා අකතානුධම්මෙන, ජානං තථානාසිතං සමණුද්දෙසං, ජානං සඞ්ඝිකං ලාභං පරිණතං පුග්ගලස්ස පරිණාමෙය්ය, ජානං පාරාජිකං ධම්මං අජ්ඣාපන්නං භික්ඛුනිං නෙව අත්තනා පටිචොදෙය්ය, ජානං චොරිං වජ්ඣං විදිතං අනපලොකෙත්වා, ජානං සභික්ඛුකං ආරාමං අනාපුච්ඡා පවිසෙය්යා’’ති. ३३७. पण ज्याअर्थी “जे आणि तिसऱ्या वेळेपर्यंतचे” हा प्रश्न “अकरा तिसऱ्या वेळेपर्यंतचे” अशा प्रकारे संख्येच्या आधारे सोडवला गेला आहे, म्हणून संख्येच्या संबंधाच्या आधारेच “किती छेदनक आहेत?” इत्यादी इतर अंतर्गत प्रश्न विचारले. त्यांच्या समाधासाठी “सहा छेदनक आहेत” इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये “एक भेदनक, एक उद्दालनक, सोळा ‘जाणून’ असे प्रज्ञप्त केले आहेत” हेच नवीन आहे. उर्वरित महावग्गात स्पष्ट केले आहे. जे हे नवीन आहे, त्यामध्ये “एक भेदनक” म्हणजे सुईचे घर (सूचिघर). “एक उद्दालनक” म्हणजे कापूस भरलेला मंच किंवा पीठ (तुलानद्धमंचपीठ). “सोळा” म्हणजे सोळा. “जाणून प्रज्ञप्त केले” म्हणजे “जाणून” असे म्हणून प्रज्ञप्त केलेले नियम, ते याप्रमाणे जाणावे – “जाणूनबुजून संघाचा लाभ जो दुसऱ्याकडे वळवला आहे तो स्वतःकडे वळवणे, जाणूनबुजून आधी आलेल्या भिक्खूच्या जवळ जाऊन बसणे, जाणूनबुजून सजीव पाणी, गवत किंवा माती शिंपडणे किंवा शिंपडवणे, जाणूनबुजून भिक्खुणीने तयार करवलेला पिंडपात ग्रहण करणे, जाणूनबुजून त्रास देण्याच्या इच्छेने जेवलेल्या भिक्खूवर पाचित्तिय आणणे, जाणूनबुजून सजीव पाण्याचा वापर करणे, जाणूनबुजून नियमानुसार मिटवलेले अधिकरण पुन्हा उकरून काढणे, जाणूनबुजून गंभीर आपत्ती लपवणे, जाणूनबुजून वीस वर्षांपेक्षा कमी वयाच्या व्यक्तीला उपसंपदा देणे, जाणूनबुजून चोरांच्या तांड्यासोबत प्रवास करणे, जाणूनबुजून तशाच प्रकारच्या गोष्टी बोलणाऱ्या आणि धर्मानुसार न वागणाऱ्या भिक्खूसोबत राहणे, जाणूनबुजून संघातून काढून टाकलेल्या श्रमणोद्देशाला आश्रय देणे, जाणूनबुजून संघाचा लाभ जो दुसऱ्याकडे वळवला आहे तो एखाद्या व्यक्तीकडे वळवणे, जाणूनबुजून पाराजिक धर्माचा भंग केलेल्या भिक्खुणीला स्वतःहून दोष न दाखवणे, जाणूनबुजून चोर किंवा वधार्ह स्त्रीला संघाला न विचारता प्रवज्जा देणे, जाणूनबुजून भिक्खू असलेल्या आरामात न विचारता प्रवेश करणे.” අසාධාරණාදිවණ්ණනා असाधारण इत्यादींचे वर्णन 338. ඉදානි [Pg.189] ‘‘සාධාරණං අසාධාරණ’’න්ති ඉමං පුරිමපඤ්හං විස්සජ්ජෙන්තො ‘‘වීසං ද්වෙ සතානී’’තිආදිමාහ. තත්ථ භික්ඛුනීහි අසාධාරණෙසු ඡ සඞ්ඝාදිසෙසාති විස්සට්ඨි, කායසංසග්ගො, දුට්ඨුල්ලං, අත්තකාම, කුටි, විහාරොති. ද්වෙ අනියතෙහි අට්ඨාති ද්වීහි අනියතෙහි සද්ධිං අට්ඨ ඉමෙ. ३३८. आता “साधारण आणि असाधारण” या पूर्वीच्या प्रश्नाचे उत्तर देताना “दोनशे वीस” इत्यादी म्हणाले. त्यामध्ये भिक्खुणींशी असाधारण असलेल्या नियमांमध्ये सहा संघादिसेस आहेत, ते म्हणजे – विस्सट्ठि (शुक्रविसर्ग), कायसंसर्ग, दुट्ठुल्ल (गंभीर भाषण), अत्तकाम (आत्मकाम), कुटि (कुटी निर्माण) आणि विहार (विहार निर्माण). दोन अनियत नियमांसह हे आठ होतात. නිස්සග්ගියානි ද්වාදසාති – बारा निस्सग्गिय याप्रमाणे आहेत – ධොවනඤ්ච පටිග්ගහො, කොසෙය්යසුද්ධද්වෙභාගා; ඡබ්බස්සානි නිසීදනං, ද්වෙ ලොමා පඨමො පත්තො; වස්සිකා ආරඤ්ඤකෙන චාති – ඉමෙ ද්වාදස. धुणे आणि स्वीकार, कोसेय्य, सुद्धकाळ, द्वेभाग; सहा वर्षे, निसीदन, दोन लोकर, पहिला पात्र; वर्षाशाटिका आणि आरण्यक – हे बारा आहेत. ද්වෙවීසති ඛුද්දකාති – बावीस क्षुद्रक याप्रमाणे आहेत – සකලො භික්ඛුනීවග්ගො, පරම්පරඤ්ච භොජනං; අනතිරිත්තං අභිහටං, පණීතඤ්ච අචෙලකං; ඌනං දුට්ඨුල්ලඡාදනං. संपूर्ण भिक्खुनीवग्ग, परंपराभोजन, अनतिरिक्त, अभिहट, प्रणीत भोजन, अचेलक, ऊन (कमी वय) आणि दुट्ठुल्लछादन (गंभीर आपत्ती लपवणे). මාතුගාමෙන සද්ධිඤ්ච, යා ච අනික්ඛන්තරාජකෙ; සන්තං භික්ඛුං අනාපුච්ඡා, විකාලෙ ගාමප්පවෙසනා. स्त्रीसोबत प्रवास करणे, आणि जे अनिक्खंतराजक (राजाने बाहेर न पडलेल्या अंतःपुरात जाणे), उपस्थित भिक्खूला न विचारता अवेळी गावात प्रवेश करणे. නිසීදනෙ ච යා සික්ඛා, වස්සිකා යා ච සාටිකා; ද්වාවීසති ඉමා සික්ඛා, ඛුද්දකෙසු පකාසිතාති. निसीदन (आसनाच्या प्रमाणाचे उल्लंघन) याविषयी जे शिक्षापद आहे, आणि वर्षाशाटिकेच्या प्रमाणाचे उल्लंघन याविषयी जे शिक्षापद आहे; या बावीस शिक्षापदे क्षुद्रकांमध्ये (पाचित्तियांमध्ये) प्रकाशित केली आहेत. භික්ඛූහි අසාධාරණෙසුපි සඞ්ඝම්හා දස නිස්සරෙති ‘‘සඞ්ඝම්හා නිස්සාරීයතී’’ති එවං විභඞ්ගෙ වුත්තා, මාතිකායං පන ‘‘නිස්සාරණීයං සඞ්ඝාදිසෙස’’න්ති එවං ආගතා දස. නිස්සග්ගියානි ද්වාදසාති භික්ඛුනිවිභඞ්ගෙ විභත්තානි නිස්සග්ගියානෙව. ඛුද්දකාපි තත්ථ විභත්තඛුද්දකා එව. තථා චත්තාරො පාටිදෙසනීයා, ඉති සතඤ්චෙව තිංසඤ්ච සික්ඛා විභඞ්ගෙ භික්ඛුනීනං භික්ඛූහි අසාධාරණා. සෙසං ඉමස්මිං සාධාරණාසාධාරණවිස්සජ්ජනෙ උත්තානමෙව. भिक्खूंशी असाधारण असलेल्या भिक्खुणींच्या नियमांमध्ये सुद्धा “संघातून बाहेर काढले जाते” अशा प्रकारे विभंगात सांगितलेले दहा नियम आहेत, पण मातृकेमध्ये “निस्सारणीय संघादिसेस” या प्रकारे आलेले दहा नियम आहेत. “बारा निस्सग्गिय” म्हणजे भिक्खुणीविभंगात स्पष्ट केलेले बारा निस्सग्गियच आहेत. क्षुद्रक देखील तेथे स्पष्ट केलेले क्षुद्रकच आहेत. तसेच चार पाटिदेसनीय तेथे स्पष्ट केले आहेत. अशा प्रकारे एकशे तीस शिक्षापदे विभंगात भिक्खुणींचे भिक्खूंशी असाधारण आहेत. या साधारण-असाधारण प्रश्नाच्या समाधानात उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ඉදානි විපත්තියො ච ‘‘යෙහි සමථෙහි සම්මන්තී’’ති ඉදං පඤ්හං විස්සජ්ජෙන්තො අට්ඨෙව පාරාජිකාතිආදිමාහ. තත්ථ දුරාසදාති ඉමිනා තෙසං සප්පටිභයතං [Pg.190] දස්සෙති. කණ්හසප්පාදයො විය හි එතෙ දුරාසදා දුරූපගමනා දුරාසජ්ජනා, ආපජ්ජියමානා මූලච්ඡෙදාය සංවත්තන්ති. තාලවත්ථුසමූපමාති සබ්බං තාලං උද්ධරිත්වා තාලස්ස වත්ථුමත්තකරණෙන සමූපමා. යථා වත්ථුමත්තකතො තාලො න පුන පාකතිකො හොති, එවං න පුන පාකතිකා හොන්ති. आता “आणि कोणत्या समथांनी आपत्ती शांत होतात?” या प्रश्नाचे उत्तर देताना “आठच पाराजिक” इत्यादी भगवान म्हणाले. त्यामध्ये “दुरासदा” (जवळ न जाण्यायोग्य) या शब्दाने त्यांचे भययुक्त असणे दर्शवले आहे. कारण काळ्या नागाप्रमाणे हे दुरासद, जवळ न जाण्यायोग्य आणि स्पर्श न करण्यायोग्य आहेत, ज्यांचा भंग केल्यास ते मुळापासून नष्ट होण्यास कारणीभूत ठरतात. “तालवत्थुसमूपमा” म्हणजे संपूर्ण ताडाचे झाड उपटून टाकून केवळ ताडाच्या झाडाची जागा शिल्लक ठेवण्यासारखी उपमा. ज्याप्रमाणे केवळ जागा शिल्लक राहिलेले ताडाचे झाड पुन्हा मूळ स्वरूपात येऊ शकत नाही, त्याप्रमाणे ते पुन्हा मूळ स्वरूपात येऊ शकत नाहीत. එවං සාධාරණං උපමං දස්සෙත්වා පුන එකෙකස්ස වුත්තං උපමං දස්සෙන්තො පණ්ඩුපලාසොතිආදිමාහ. අවිරුළ්හී භවන්ති තෙති යථා එතෙ පණ්ඩුපලාසාදයො පුනහරිතාදිභාවෙන අවිරුළ්හිධම්මා හොන්ති; එවං පාරාජිකාපි පුන පකතිසීලාභාවෙන අවිරුළ්හිධම්මා හොන්තීති අත්ථො. එත්තාවතා ‘‘විපත්තියො ච යෙහි සමථෙහි සම්මන්තී’’ති එත්ථ ඉමා තාව අට්ඨ පාරාජිකවිපත්තියො කෙහිචි සමථෙහි න සම්මන්තීති එවං දස්සිතං හොති. යා පන විපත්තියො සම්මන්ති, තා දස්සෙතුං තෙවීසති සඞ්ඝාදිසෙසාතිආදි වුත්තං. තත්ථ තීහි සමථෙහීති සබ්බසඞ්ගාහිකවචනමෙතං. සඞ්ඝාදිසෙසා හි ද්වීහි සමථෙහි සම්මන්ති, න තිණවත්ථාරකෙන. සෙසා තීහිපි සම්මන්ති. अशा प्रकारे साधारण उपमा दाखवून पुन्हा प्रत्येकासाठी सांगितलेली उपमा दाखवताना “पंडु पलास” (पिवळे पडलेले पान) इत्यादी म्हणाले. “ते पुन्हा उगवत नाहीत” म्हणजे ज्याप्रमाणे हे पिवळे पडलेले पान इत्यादी पुन्हा हिरवे होत नाहीत; त्याप्रमाणे पाराजिक झालेले देखील पुन्हा मूळ शील प्राप्त करू शकत नसल्यामुळे पुन्हा न उगवण्याच्या स्वभावाचे होतात, असा अर्थ आहे. एवढ्या विवेचनाने “आणि कोणत्या समथांनी आपत्ती शांत होतात?” यामध्ये या आठ पाराजिक आपत्ती कोणत्याही समथांनी शांत होत नाहीत, असे दर्शवले आहे. पण ज्या आपत्ती शांत होतात, त्या दर्शवण्यासाठी “तेवीस संघादिसेस” इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये “तीन समथांनी” हे सर्वसमावेशक वचन आहे. कारण संघादिसेस दोन समथांनी शांत होतात, तिणवत्थारक समथाने नाही. उर्वरित आपत्ती तिन्ही समथांनी शांत होतात. ද්වෙ උපොසථා ද්වෙ පවාරණාති ඉදං භික්ඛූනඤ්ච භික්ඛුනීනඤ්ච වසෙන වුත්තං. විභත්තිමත්තදස්සනෙනෙව චෙතං වුත්තං, න සමථෙහි වූපසමනවසෙන. භික්ඛුඋපොසථො, භික්ඛුනිඋපොසථො, භික්ඛුපවාරණා, භික්ඛුනිපවාරණාති ඉමාපි හි චතස්සො විභත්තියො; විභජනානීති අත්ථො. චත්තාරි කම්මානීති අධම්මෙනවග්ගාදීනි උපොසථකම්මානි. පඤ්චෙව උද්දෙසා චතුරො භවන්ති අනඤ්ඤථාති භික්ඛූනං පඤ්ච උද්දෙසා භික්ඛුනීනං චතුරො භවන්ති, අඤ්ඤථා න භවන්ති; ඉමා අපරාපි විභත්තියො. ආපත්තික්ඛන්ධා ච භවන්ති සත්ත, අධිකරණානි චත්තාරීති ඉමා පන විභත්තියො සමථෙහි සම්මන්ති, තස්මා සත්තහි සමථෙහීතිආදිමාහ. අථ වා ‘‘ද්වෙ උපොසථා ද්වෙ පවාරණා චත්තාරි කම්මානි පඤ්චෙව උද්දෙසා චතුරො භවන්ති, අනඤ්ඤථා’’ති ඉමාපි චතස්සො විභත්තියො නිස්සාය ‘‘නස්සන්තෙතෙ විනස්සන්තෙතෙ’’තිආදිනා නයෙන යා ආපත්තියො ආපජ්ජන්ති, තා යස්මා වුත්තප්පකාරෙහෙව සමථෙහි සම්මන්ති, තස්මා තංමූලකානං ආපත්තීනං සමථදස්සනත්ථම්පි තා විභත්තියො වුත්තාති වෙදිතබ්බා. කිච්චං එකෙනාති කිච්චාධිකරණං එකෙන සමථෙන සම්මති. “दोन उपोसथ, दोन पवारणा” हे भिक्खू आणि भिक्खुणींच्या संबंधाने म्हटले आहे. आणि हे केवळ विभागांचे वर्गीकरण दाखवण्यासाठी म्हटले आहे, समथांनी शांत होण्याच्या संबंधाने नाही. भिक्खू-उपोसथ, भिक्खुणी-उपोसथ, भिक्खू-पवारणा, भिक्खुणी-पवारणा या देखील चार विभागण्या आहेत; विभागणी असा अर्थ आहे. “चार कर्मे” म्हणजे अधर्म-वर्ग इत्यादी उपोसथ कर्मे दर्शवली आहेत. “पाचच उद्देश आणि चार होतात, अन्यथा नाही” म्हणजे भिक्खूंचे पाच उद्देश आणि भिक्खुणींचे चार उद्देश होतात, यापेक्षा वेगळे होत नाहीत; या इतरही विभागण्या आहेत. “आणि सात आपत्तीस्कंध, चार अधिकरणे होतात” या विभागण्या मात्र समथांनी शांत होतात, म्हणून “सात समथांनी” इत्यादी म्हणाले. किंवा “दोन उपोसथ, दोन पवारणा, चार कर्मे, पाचच उद्देश आणि चार होतात, अन्यथा नाही” या चार विभागण्यांच्या आधारे “ते नष्ट होतात, ते विनाश पावतात” इत्यादी पद्धतीने उपोसथक्खंधकात सांगितलेल्या नियमाने ज्या आपत्ती ओढवतात, त्या ज्याअर्थी सांगितलेल्या प्रकारच्याच समथांनी शांत होतात, म्हणून त्या मूळ आपत्तींच्या शांतीचे दर्शन घडवण्यासाठी देखील त्या विभागण्या सांगितल्या आहेत, असे जाणावे. “किच्च एकाने” म्हणजे किच्चाधिकरण एका समथाने शांत होते. පාරාජිකාදිආපත්තිවණ්ණනා पाराजिक इत्यादी आपत्तींचे वर्णन 339. එවං [Pg.191] පුච්ඡානුක්කමෙන සබ්බපඤ්හෙ විස්සජ්ජෙත්වා ඉදානි ‘‘ආපත්තික්ඛන්ධා ච භවන්ති සත්තා’’ති එත්ථ සඞ්ගහිතආපත්තික්ඛන්ධානං පච්චෙකං නිබ්බචනමත්තං දස්සෙන්තො පාරාජිකන්තිආදිමාහ. තත්ථ පාරාජිකන්ති ගාථාය අයමත්ථො – යදිදං පුග්ගලාපත්තිසික්ඛාපදපාරාජිකෙසු ආපත්තිපාරාජිකං නාම වුත්තං, තං ආපජ්ජන්තො පුග්ගලො යස්මා පරාජිතො පරාජයමාපන්නො සද්ධම්මා චුතො පරද්ධො භට්ඨො නිරඞ්කතො ච හොති, අනිහතෙ තස්මිං පුග්ගලෙ පුන උපොසථප්පවාරණාදිභෙදො සංවාසො නත්ථි. තෙනෙතං ඉති වුච්චතීති තෙන කාරණෙන එතං ආපත්තිපාරාජිකන්ති වුච්චති. අයඤ්හෙත්ථ සඞ්ඛෙපත්ථො – යස්මා පරාජිතො හොති තෙන, තස්මා එතං පාරාජිකන්ති වුච්චති. ३३९. अशा प्रकारे प्रश्नांच्या अनुक्रमाने सर्व प्रश्नांची उत्तरे देऊन, आता 'आपत्तींचे सात स्कंध आहेत' यामध्ये समाविष्ट केलेल्या आपत्ती-स्कंधांपैकी प्रत्येकाची व्युत्पत्ती दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी 'पाराजिक' इत्यादी गाथा म्हटली. त्यामध्ये 'पाराजिक' या गाथेचा हा अर्थ आहे—पुद्गल-पाराजिक, आपत्ती-पाराजिक आणि शिक्षापद-पाराजिक यांमध्ये ज्याला 'आपत्ती-पाराजिक' म्हटले गेले आहे, ती आपत्ती प्राप्त करणारा पुद्गल ज्या कारणाने पराजित होतो, पराभवाला प्राप्त होतो, सद्धम्मापासून च्युत होतो, भ्रष्ट होतो, पतित होतो आणि बहिष्कृत केला जातो; आणि त्या पुद्गलाला संघातून बाहेर न काढल्यास, पुन्हा उपोसथ, प्रवारणा इत्यादी प्रकारचा संवास (सहवास) उरत नाही. त्या कारणाने या आपत्तीला 'आपत्ती-पाराजिक' असे म्हटले जाते. येथे हा संक्षिप्त अर्थ आहे—ज्या कारणाने तो पराजित होतो, म्हणून याला 'पाराजिक' असे म्हटले जाते. දුතියගාථායපි බ්යඤ්ජනං අනාදියිත්වා අත්ථමත්තමෙව දස්සෙතුං සඞ්ඝොව දෙති පරිවාසන්තිආදි වුත්තං. අයං පනෙත්ථ අත්ථො – ඉමං ආපත්තිං ආපජ්ජිත්වා වුට්ඨාතුකාමස්ස යං තං ආපත්තිවුට්ඨානං තස්ස ආදිම්හි චෙව පරිවාසදානත්ථාය ආදිතො සෙසෙ මජ්ඣෙ මානත්තදානත්ථාය මූලායපටිකස්සනෙන වා සහ මානත්තදානත්ථාය, අවසානෙ අබ්භානත්ථාය ච සඞ්ඝො ඉච්ඡිතබ්බො, න හෙත්ථ එකම්පි කම්මං විනා සඞ්ඝෙන සක්කා කාතුන්ති සඞ්ඝො, ආදිම්හි චෙව සෙසෙ ච ඉච්ඡිතබ්බො අස්සාති සඞ්ඝාදිසෙසො. दुसऱ्या गाथेचे देखील शब्दांवर भर न देता केवळ अर्थच दर्शवण्यासाठी संगीतिकारांनी 'संघच परिवास देतो' इत्यादी म्हटले आहे. येथे हा अर्थ आहे—ही आपत्ती प्राप्त करून त्यातून मुक्त होण्याची इच्छा असणाऱ्या भिक्खूच्या आपत्ती-मुक्तीसाठी (आपत्ती-वुत्थान), त्याच्या सुरुवातीलाच परिवास देण्यासाठी, आणि सुरुवातीनंतरच्या उर्वरित मध्यभागात मानत्त देण्यासाठी किंवा मूलायपटिकस्सनासह मानत्त देण्यासाठी, आणि शेवटी अब्भान करण्यासाठी संघाची आवश्यकता असते. कारण येथे संघाशिवाय एकही कर्म करणे शक्य नाही. अशा प्रकारे ज्याच्या सुरुवातीला आणि उर्वरित भागात संघाची आवश्यकता असते, म्हणून त्याला 'संघादिसेस' (संघादिशेष) असे म्हटले जाते. තතියගාථාය අනියතො න නියතොති යස්මා න නියතො, තස්මා අනියතො අයමාපත්තික්ඛන්ධොති අත්ථො. කිං කාරණා න නියතොති? අනෙකංසිකතං පදං, යස්මා ඉදං සික්ඛාපදං අනෙකංසෙන කතන්ති අත්ථො. කථං අනෙකංසෙන? තිණ්ණමඤ්ඤතරං ඨානං, තිණ්ණං ධම්මානං අඤ්ඤතරෙන කාරෙතබ්බොති හි තත්ථ වුත්තං, තස්මා ‘‘අනියතො’’ති පවුච්චති, සො ආපත්තික්ඛන්ධො අනියතොති වුච්චති. යථා ච තිණ්ණං අඤ්ඤතරං ඨානං, එවං ද්වින්නං ධම්මානං අඤ්ඤතරං ඨානං යත්ථ වුත්තං, සොපි අනියතො එව. तिसऱ्या गाथेत 'अनियत म्हणजे जो नियत (निश्चित) नाही' असे म्हटले आहे; ज्या कारणाने तो निश्चित नाही, म्हणून हा आपत्ती-स्कंध 'अनियत' आहे, असा अर्थ आहे. कोणत्या कारणाने निश्चित नाही? कारण हे शिक्षापद अनैकांतिक (अनिश्चित) रूपाने बनवले आहे, असा अर्थ आहे. अनैकांतिक कशा प्रकारे? 'तीन स्थानांपैकी एक स्थान'; कारण तेथे 'तीन धर्मांपैकी (आपत्तींपैकी) एकाने कारित करावे' असे म्हटले आहे, म्हणून त्याला 'अनियत' असे म्हटले जाते, तो आपत्ती-स्कंध 'अनियत' म्हटला जातो. आणि ज्याप्रमाणे तीनपैकी एक स्थान सांगितले आहे, त्याचप्रमाणे ज्या दुसऱ्या आपत्ती-स्कंधात दोन धर्मांपैकी एकाचे स्थान सांगितले आहे, तो देखील अनियतच आहे. චතුත්ථගාථාය අච්චයො තෙන සමො නත්ථීති දෙසනාගාමිනීසු අච්චයෙසු තෙන සමො ථූලො අච්චයො නත්ථි, තෙනෙතං ඉති වුච්චති; ථූලත්තා අච්චයස්ස එතං ථුල්ලච්චයන්ති වුච්චතීති අත්ථො. चौथ्या गाथेत 'त्याच्यासारखा दुसरा अपराध नाही' असे म्हटले आहे; देशनागामी (देशनेने शुद्ध होणाऱ्या) अपराधांमध्ये त्याच्यासारखा दुसरा मोठा (स्थूल) अपराध नाही, म्हणून याला असे म्हटले जाते. अपराधाच्या स्थूलत्वामुळे (मोठेपणामुळे) याला 'थुल्लच्चय' (स्थूलात्यय) असे म्हटले जाते, असा अर्थ आहे. පඤ්චමගාථාය [Pg.192] නිස්සජ්ජිත්වාන දෙසෙති තෙනෙතන්ති නිස්සජ්ජිත්වා දෙසෙතබ්බතො නිස්සග්ගියන්ති වුච්චතීති අත්ථො. पाचव्या गाथेत 'त्याग करून देशना करतो, म्हणून याला...' असे म्हटले आहे; त्याग करून (निसर्जन करून) देशना करावयाची असल्यामुळे याला 'निस्सग्गिय' असे म्हटले जाते, असा अर्थ आहे. ඡට්ඨගාථාය පාතෙති කුසලං ධම්මන්ති සඤ්චිච්ච ආපජ්ජන්තස්ස කුසලධම්මසඞ්ඛාතං කුසලචිත්තං පාතෙති, තස්මා පාතෙති චිත්තන්ති පාචිත්තියං. යං පන චිත්තං පාතෙති, තං යස්මා අරියමග්ගං අපරජ්ඣති, චිත්තසම්මොහකාරණඤ්ච හොති, තස්මා ‘‘අරියමග්ගං අපරජ්ඣති, චිත්තසම්මොහනට්ඨාන’’න්ති ච වුත්තං. सहाव्या गाथेत 'कुशल धर्माला पाडतो' असे म्हटले आहे; जाणूनबुजून आपत्ती प्राप्त करणाऱ्याच्या कुशल धर्म नावाच्या कुशल चित्ताला ते पाडते (नष्ट करते), म्हणून 'चित्ताला पाडणारे' ते 'पाचित्तिय' होय. परंतु जे चित्ताला पाडते, ते ज्या कारणाने आर्यमार्गाला बाधा आणते आणि चित्ताच्या संमोहाचे (भ्रमाचे) कारण बनते, म्हणून 'आर्यमार्गाला बाधा आणणारे आणि चित्ताच्या संमोहाचे स्थान' असे देखील म्हटले आहे. පාටිදෙසනීයගාථාසු ‘‘ගාරය්හං ආවුසො ධම්මං ආපජ්ජි’’න්ති වුත්තගාරය්හභාවකාරණදස්සනත්ථමෙව භික්ඛු අඤ්ඤාතකො සන්තොතිආදි වුත්තං. පටිදෙසෙතබ්බතො පන සා ආපත්ති පාටිදෙසනීයාති වුච්චති. पाटिदेसनीय गाथांमध्ये 'हे आवुसो, मी निंदनीय धर्माला प्राप्त झालो आहे' असे सांगितलेल्या निंदनीयतेचे कारण दर्शवण्यासाठीच 'भिक्खू अनोळखी असताना...' इत्यादी म्हटले आहे. परंतु वैयक्तिकरीत्या प्रगट (देशना) करावयाची असल्यामुळे ती आपत्ती 'पाटिदेसनीय' असे म्हटली जाते. දුක්කටගාථාය අපරද්ධං විරද්ධඤ්ච ඛලිතන්ති සබ්බමෙතං ‘‘යඤ්ච දුක්කට’’න්ති එත්ථ වුත්තස්ස දුක්කටස්ස පරියායවචනං. යඤ්හි දුට්ඨු කතං විරූපං වා කතං, තං දුක්කටං. තං පනෙතං යථා සත්ථාරා වුත්තං; එවං අකතත්තා අපරද්ධං, කුසලං විරජ්ඣිත්වා පවත්තත්තා විරද්ධං, අරියවත්තපටිපදං අනාරුළ්හත්තා ඛලිතං. යං මනුස්සො කරෙති ඉදං පනස්ස ඔපම්මනිදස්සනං. තස්සත්ථො – යථා හි යං ලොකෙ මනුස්සො ආවි වා යදි වා රහො පාපං කරොති, තං දුක්කටන්ති පවෙදෙන්ති; එවමිදම්පි බුද්ධප්පටිකුට්ඨෙන ලාමකභාවෙන පාපං, තස්මා දුක්කටන්ති වෙදිතබ්බං. दुक्कट गाथेत 'अपराध, विराध आणि स्खलित' हे सर्व 'जे दुक्कट आहे' यामध्ये सांगितलेल्या 'दुक्कट' शब्दाचे समानार्थी शब्द आहेत. कारण जे वाईट रीतीने केले गेले आहे किंवा विद्रूप रीतीने केले गेले आहे, ते 'दुक्कट' (दुष्कृत) होय. आणि ते शास्त्यांनी (बुद्धांनी) सांगितल्याप्रमाणे न केल्यामुळे 'अपराध' आहे, कुशल धर्माला सोडून प्रवृत्त झाल्यामुळे 'विराध' आहे, आणि आर्य आचरण व प्रतिपदेवर आरूढ न झाल्यामुळे 'स्खलित' आहे. 'जे मनुष्य करतो' हे त्याचे उपमानिदर्शन (उदाहरणाचे स्पष्टीकरण) आहे. त्याचा अर्थ असा—ज्याप्रमाणे जगात मनुष्य उघडपणे किंवा गुप्तपणे जे पाप करतो, त्याला लोक 'दुष्कृत' (वाईट कृत्य) म्हणून घोषित करतात; त्याचप्रमाणे हे देखील बुद्धांनी निंदिलेले असल्यामुळे आणि हीन दर्जाचे असल्यामुळे पाप आहे, म्हणून याला 'दुक्कट' समजावे. දුබ්භාසිතගාථාය දුබ්භාසිතං දුරාභට්ඨන්ති දුට්ඨු ආභට්ඨං භාසිතං ලපිතන්ති දුරාභට්ඨං. යං දුරාභට්ඨං, තං දුබ්භාසිතන්ති අත්ථො. කිඤ්ච භිය්යො? සංකිලිට්ඨඤ්ච යං පදං, සංකිලිට්ඨං යස්මා තං පදං හොතීති අත්ථො. තථා යඤ්ච විඤ්ඤූ ගරහන්ති, යස්මා ච නං විඤ්ඤූ ගරහන්තීති අත්ථො. තෙනෙතං ඉති වුච්චතීති තෙන සංකිලිට්ඨභාවෙන ච විඤ්ඤුගරහනෙනාපි ච එතං ඉති වුච්චති; ‘‘දුබ්භාසිත’’න්ති එවං වුච්චතීති අත්ථො. दुब्भासित गाथेत 'दुब्भासित म्हणजे दुराभट्ट' असे म्हटले आहे; वाईट रीतीने आणलेले, बोललेले, बडबडलेले ते 'दुराभट्ट' होय. जे दुराभट्ट आहे, ते 'दुब्भासित' (दुर्भाषित) होय, असा अर्थ आहे. आणि आणखी काय? 'आणि जे पद संक्लिष्ट (मलीन) आहे', कारण ते पद संक्लिष्ट असते, असा अर्थ आहे. तसेच 'ज्याची सुज्ञ लोक निंदा करतात', कारण सुज्ञ लोक त्याची निंदा करतात, असा अर्थ आहे. त्या संक्लिष्टतेमुळे आणि सुज्ञांच्या निंदेमुळे देखील याला असे म्हटले जाते; म्हणजेच याला 'दुब्भासित' असे म्हटले जाते, असा अर्थ आहे. සෙඛියගාථාය ‘‘ආදි චෙතං චරණඤ්චා’’තිආදිනා නයෙන සෙඛස්ස සන්තකභාවං දීපෙති. තස්මා සෙඛස්ස ඉදං සෙඛියන්ති අයමෙත්ථ සඞ්ඛෙපත්ථො. ඉදං ‘‘ගරුකලහුකඤ්චාපී’’තිආදිපඤ්හෙහි අසඞ්ගහිතස්ස ‘‘හන්ද වාක්යං සුණොම තෙ’’ති ඉමිනා පන ආයාචනවචනෙන සඞ්ගහිතස්ස අත්ථස්ස දීපනත්ථං වුත්තන්ති වෙදිතබ්බං. सेखिय गाथेत 'हे सुरुवातीचे आचरण आहे' इत्यादी पद्धतीने सेख (शैक्ष) पुद्गलाचे स्वामित्व (त्याचे असणे) दर्शवले आहे. म्हणून सेख पुद्गलाचे हे 'सेखिय' होय, हा येथे संक्षिप्त अर्थ आहे. हे 'गुरू आणि लघू देखील...' इत्यादी प्रश्नांमध्ये समाविष्ट न केलेल्या, परंतु 'चला, तुमचे वचन ऐकूया' या प्रार्थना-वचनाने समाविष्ट केलेल्या अर्थाचे स्पष्टीकरण करण्यासाठी म्हटले आहे, असे समजावे. ඡන්නමතිවස්සතීතිආදිම්හිපි [Pg.193] එසෙව නයො. තත්ථ ඡන්නමතිවස්සතීති ගෙහං තාව තිණාදීහි අච්ඡන්නං අතිවස්සති. ඉදං පන ආපත්තිසඞ්ඛාතං ගෙහං ඡන්නං අතිවස්සති; මූලාපත්තිඤ්හි ඡාදෙන්තො අඤ්ඤං නවං ආපත්තිං ආපජ්ජති. විවටං නාතිවස්සතීති ගෙහං තාව අවිවටං සුච්ඡන්නං නාතිවස්සති. ඉදං පන ආපත්තිසඞ්ඛාතං ගෙහං විවටං නාතිවස්සති; මූලාපත්තිඤ්හි විවරන්තො දෙසනාගාමිනිං දෙසෙත්වා වුට්ඨානගාමිනිතො වුට්ඨහිත්වා සුද්ධන්තෙ පතිට්ඨාති. ආයතිං සංවරන්තො අඤ්ඤං ආපත්තිං නාපජ්ජති. තස්මා ඡන්නං විවරෙථාති තෙන කාරණෙන දෙසනාගාමිනිං දෙසෙන්තො වුට්ඨානගාමිනිතො ච වුට්ඨහන්තො ඡන්නං විවරෙථ. එවං තං නාතිවස්සතීති එවඤ්චෙතං විවටං නාතිවස්සතීති අත්ථො. 'झाकलेल्यावर पाऊस पडतो' इत्यादी गाथेत देखील हाच नियम आहे. त्यामध्ये 'झाकलेल्यावर पाऊस पडतो' म्हणजे—प्रथम, गवत इत्यादींनी न झाकलेल्या (उघड्या) घरावर पाऊस पडतो; परंतु हे आपत्ती नावाचे घर झाकलेले (गुप्त ठेवलेले) असताना त्यावर पाऊस पडतो. कारण मूळ आपत्ती लपवणारा भिक्खू दुसऱ्या नवीन आपत्तीला प्राप्त होतो. 'उघड्यावर पाऊस पडत नाही' म्हणजे—प्रथम, न उघडलेले, चांगले झाकलेले घर पावसाने ओले होत नाही; परंतु हे आपत्ती नावाचे घर उघडे (प्रगट) केल्यावर त्यावर पाऊस पडत नाही. कारण मूळ आपत्ती प्रगट करणारा भिक्खू देशनागामी आपत्तीची देशना करून आणि वुत्थानगामी आपत्तीतून मुक्त होऊन शुद्धतेमध्ये प्रतिष्ठित होतो. भविष्यात संयम राखत तो दुसऱ्या आपत्तीला प्राप्त होत नाही. 'म्हणून झाकलेले उघडा' म्हणजे—त्या कारणाने देशनागामी आपत्तीची देशना करताना आणि वुत्थानगामी आपत्तीतून मुक्त होताना झाकलेली आपत्ती उघडी करावी. 'अशा प्रकारे त्यावर पाऊस पडत नाही' म्हणजे अशा प्रकारे उघडे केल्यावर त्यावर पाऊस पडत नाही, असा अर्थ आहे. ගති මිගානං පවනන්ති අජ්ඣොකාසෙ බ්යග්ඝාදීහි පරිපාතියමානානං මිගානං පවනං රුක්ඛාදිගහනං අරඤ්ඤං ගති පටිසරණං හොති, තං පත්වා තෙ අස්සාසන්ති. එතෙනෙව නයෙන ආකාසො පක්ඛීනං ගති. අවස්සං උපගමනට්ඨෙන පන විභවො ගති ධම්මානං, සබ්බෙසම්පි සඞ්ඛතධම්මානං විනාසොව තෙසං ගති. න හි තෙ විනාසං අගච්ඡන්තා ඨාතුං සක්කොන්ති. සුචිරම්පි ඨත්වා පන නිබ්බානං අරහතො ගති, ඛීණාසවස්ස අරහතො අනුපාදිසෙසනිබ්බානධාතු එකංසෙන ගතීති අත්ථො. वाघ इत्यादींद्वारे पाठलाग केला जाणाऱ्या हरणांसाठी वृक्ष इत्यादींनी दाटलेले वन (जंगल) हेच गती (आश्रय) व शरण असते, तिथे पोहोचून ते सुटकेचा श्वास घेतात. याच न्यायाने आकाश ही पक्ष्यांची गती आहे. परंतु, निश्चितपणे प्राप्त होण्याच्या अर्थाने विनाश (विभव) ही धर्मांची गती आहे; सर्व संस्कृत धर्मांचा विनाश हीच त्यांची गती आहे. कारण ते विनाशाप्रत न जाता टिकून राहू शकत नाहीत. दीर्घकाळ टिकून राहिल्यानंतरही, अर्हतासाठी निर्वाण हीच गती आहे; क्षीणास्रव अर्हतासाठी अनुपधिशेष निर्वाणधातू हीच निश्चितपणे गती आहे, असा अर्थ आहे. පඨමගාථාසඞ්ගණිකවණ්ණනා නිට්ඨිතා. प्रथम गाथासंगणिका-वर्णना समाप्त झाली. අධිකරණභෙදං अधिकरणभेद උක්කොටනභෙදාදිවණ්ණනා उक्कोटनभेद इत्यादींचे वर्णन 340. අධිකරණභෙදෙ [Pg.194] ඉමෙ දස උක්කොටාති අධිකරණානං උක්කොටෙත්වා පුන අධිකරණඋක්කොටෙන සමථානං උක්කොටං දස්සෙතුං ‘‘විවාදාධිකරණං උක්කොටෙන්තො කති සමථෙ උක්කොටෙතී’’තිආදිමාහ. තත්ථ විවාදාධිකරණං උක්කොටෙන්තො ද්වෙ සමථෙ උක්කොටෙතීති සම්මුඛාවිනයඤ්ච යෙභුය්යසිකඤ්ච ඉමෙ ද්වෙ උක්කොටෙති, පටිසෙධෙති; පටික්කොසතීති අත්ථො. අනුවාදාධිකරණං උක්කොටෙන්තො චත්තාරොති සම්මුඛාවිනයං, සතිවිනයං, අමූළ්හවිනයං, තස්සපාපියසිකන්ති ඉමෙ චත්තාරො සමථෙ උක්කොටෙති. ආපත්තාධිකරණං උක්කොටෙන්තො තයොති සම්මුඛාවිනයං, පටිඤ්ඤාතකරණං, තිණවත්ථාරකන්ති ඉමෙ තයො සමථෙ උක්කොටෙති. කිච්චාධිකරණං උක්කොටෙන්තො එකන්ති සම්මුඛාවිනයං ඉමං එකං සමථං උක්කොටෙති. ३४०. अधिकरणभेदाच्या प्रकरणात 'हे दहा उक्कोट (आक्षेप)' असे अधिकरणांचे दहा उक्कोट दाखवून, पुन्हा अधिकरणाच्या उक्कोटनाद्वारे समथांचे उक्कोटन दाखवण्यासाठी 'विवादाधिकरण उकरून काढणारा किती समथांचे उक्कोटन करतो?' इत्यादी म्हटले आहे. तिथे, 'विवादाधिकरण उकरून काढणारा दोन समथांचे उक्कोटन करतो' म्हणजे संमुखाविनय आणि येभुय्यसिका या दोन समथांचे उक्कोटन करतो, म्हणजेच विरोध करतो, आक्षेप घेतो, असा अर्थ आहे. 'अनुवादाधिकरण उकरून काढणारा चार समथांचे उक्कोटन करतो' म्हणजे संमुखाविनय, सतिविनय, अमूळ्हविनय आणि तस्सपापियसिगा या चार समथांचे उक्कोटन करतो. 'आपत्ताधिकरण उकरून काढणारा तीन समथांचे उक्कोटन करतो' म्हणजे संमुखाविनय, पटिञ्ञातकरण आणि तिणवत्थारक या तीन समथांचे उक्कोटन करतो. 'किच्चाधिकरण उकरून काढणारा एका समथाचे उक्कोटन करतो' म्हणजे संमुखाविनय या एका समथाचे उक्कोटन करतो. 341. කති උක්කොටාතිආදිපුච්ඡානං විස්සජ්ජනෙ පන ද්වාදසසු උක්කොටෙසු අකතං කම්මන්තිආදයො තාව තයො උක්කොටා විසෙසතො දුතියෙ අනුවාදාධිකරණෙ ලබ්භන්ති. අනිහතං කම්මන්තිආදයො තයො පඨමෙ විවාදාධිකරණෙ ලබ්භන්ති. අවිනිච්ඡිතන්තිආදයො තයො තතියෙ ආපත්තාධිකරණෙ ලබ්භන්ති. අවූපසන්තන්තිආදයො තයො චතුත්ථෙ කිච්චාධිකරණෙ ලබ්භන්ති; අපිච ද්වාදසාපි ච එකෙකස්මිං අධිකරණෙ ලබ්භන්තියෙව. ३४१. 'किती उक्कोट आहेत?' इत्यादी प्रश्नांच्या उत्तरात, बारा उक्कोटांपैकी 'अकतं कम्मं' (न केलेले कर्म) इत्यादी पहिले तीन उक्कोट प्रामुख्याने दुसऱ्या अनुवादाधिकरणात आढळतात. 'अनिहतं कम्मं' (न थांबवलेले कर्म) इत्यादी तीन उक्कोट पहिल्या विवादाधिकरणात आढळतात. 'अविनिच्छितं' (अनिर्णित) इत्यादी तीन उक्कोट तिसऱ्या आपत्ताधिकरणात आढळतात. 'अवू पसंतं' (न शमवलेले) इत्यादी तीन उक्कोट चौथ्या किच्चाधिकरणात आढळतात. शिवाय, हे बाराही उक्कोट प्रत्येक अधिकरणात सामान्यतः आढळतातच. තත්ථජාතකං අධිකරණං උක්කොටෙතීති යස්මිං විහාරෙ ‘‘මය්හං ඉමිනා පත්තො ගහිතො, චීවරං ගහිත’’න්තිආදිනා නයෙන පත්තචීවරාදීනං අත්ථාය අධිකරණං උප්පන්නං හොති, තස්මිංයෙව ච නං විහාරෙ ආවාසිකා සන්නිපතිත්වා ‘‘අලං ආවුසො’’ති අත්තපච්චත්ථිකෙ සඤ්ඤාපෙත්වා පාළිමුත්තකවිනිච්ඡයෙනෙව වූපසමෙන්ති, ඉදං තත්ථජාතකං අධිකරණං නාම. යෙනාපි විනිච්ඡයෙන සමිතං, සොපි එකො සමථොයෙව. ඉමං උක්කොටෙන්තස්සාපි පාචිත්තියං. 'तिथेच उत्पन्न झालेले अधिकरण उकरून काढतो' म्हणजे ज्या विहारात 'याने माझे भिक्षापात्र (पत्त) घेतले, चीवर घेतले' इत्यादी पद्धतीने भिक्षापात्र, चीवर इत्यादींच्या कारणाने अधिकरण उत्पन्न होते, आणि त्याच विहारातील निवासी भिक्खू एकत्र येऊन 'पुरे करा, आवुसो!' असे सांगून त्या वादी-प्रतिवादींना समजावून सांगतात आणि पाळिमुत्तक (पाळी-ग्रंथाबाहेरील) निर्णयानेच ते शमवतात, याला 'तिथेच उत्पन्न झालेले अधिकरण' असे म्हणतात. ज्या निर्णयाने ते शमवले गेले, तो देखील एक प्रकारचा समथच आहे. याचे उक्कोटन (पुनरुत्थान) करणाऱ्यालाही पाचित्तिय होते. තත්ථජාතකං වූපසන්තන්ති සචෙ පන තං අධිකරණං නෙවාසිකා වූපසමෙතුං න සක්කොන්ති, අථඤ්ඤො විනයධරො ආගන්ත්වා ‘‘කිං ආවුසො ඉමස්මිං [Pg.195] විහාරෙ උපොසථො වා පවාරණා වා ඨිතා’’ති පුච්ඡති, තෙහි ච තස්මිං කාරණෙ කථිතෙ තං අධිකරණං ඛන්ධකතො ච පරිවාරතො ච සුත්තෙන විනිච්ඡිනිත්වා වූපසමෙති, ඉදං තත්ථජාතකං වූපසන්තං නාම අධිකරණං. එතං උක්කොටෙන්තස්සාපි පාචිත්තියමෙව. 'तिथेच उत्पन्न झालेले आणि शमवलेले' म्हणजे जर ते अधिकरण तेथील निवासी भिक्खू शमवू शकले नाहीत, आणि दुसरा एखादा विनयधर भिक्खू तिथे येऊन 'आवुसो, या विहारात उपोसथ किंवा पवारणा का थांबली आहे?' असे विचारतो, आणि त्यांनी त्याचे कारण सांगितल्यावर, ते अधिकरण खंधक आणि परिवार यांतील सूत्रांच्या आधारे निर्णय देऊन शमवतो, याला 'तिथेच उत्पन्न झालेले आणि शमवलेले अधिकरण' असे म्हणतात. याचे उक्कोटन करणाऱ्यालाही पाचित्तियच होते. අන්තරාමග්ගෙති තෙ අත්තපච්චත්ථිකා ‘‘න මයං එතස්ස විනිච්ඡයෙ තිට්ඨාම, නායං විනයෙ කුසලො, අසුකස්මිං නාම ගාමෙ විනයධරා ථෙරා වසන්ති, තත්ථ ගන්ත්වා විනිච්ඡිනිස්සාමා’’ති ගච්ඡන්තා අන්තරාමග්ගෙයෙව කාරණං සල්ලක්ඛෙත්වා අඤ්ඤමඤ්ඤං වා සඤ්ඤාපෙන්ති, අඤ්ඤෙ වා තෙ භික්ඛූ නිජ්ඣාපෙන්ති, ඉදම්පි වූපසන්තමෙව හොති. එවං වූපසන්තං අන්තරාමග්ගෙ අධිකරණං උක්කොටෙති යො, තස්සාපි පාචිත්තියමෙව. 'वाटेतच' म्हणजे ते वादी-प्रतिवादी भिक्खू 'आम्ही याच्या निर्णयावर समाधानी नाही, हा विनयात कुशल नाही; अमुक नावाच्या गावात विनयधर थेर राहतात, तिथे जाऊन आम्ही निर्णय घेऊ' असे म्हणून जात असताना, वाटेतच त्या कारणाचा विचार करून आपापसात समेट घडवून आणतात, किंवा इतर भिक्खू त्यांना समजावून सांगतात, हे देखील शमवलेलेच मानले जाते. अशा प्रकारे वाटेत शमवलेले अधिकरण जो उकरून काढतो, त्यालाही पाचित्तियच होते. අන්තරාමග්ගෙ වූපසන්තන්ති න හෙව ඛො පන අඤ්ඤමඤ්ඤං සඤ්ඤත්තියා වා සභාගභික්ඛුනිජ්ඣාපනෙන වා වූපසන්තං හොති; අපිච ඛො පටිපථං ආගච්ඡන්තො එකො විනයධරො දිස්වා ‘‘කත්ථ ආවුසො ගච්ඡථා’’ති පුච්ඡිත්වා ‘‘අසුකං නාම ගාමං, ඉමිනා නාම කාරණෙනා’’ති වුත්තෙ ‘‘අලං, ආවුසො, කිං තත්ථ ගතෙනා’’ති තත්ථෙව ධම්මෙන විනයෙන තං අධිකරණං වූපසමෙති, ඉදං අන්තරාමග්ගෙ වූපසන්තං නාම. එතං උක්කොටෙන්තස්සාපි පාචිත්තියමෙව. 'वाटेत शमवलेले' म्हणजे केवळ आपापसातील समजुतीने किंवा समान विचारसरणीच्या भिक्खूंच्या समजावण्यानेच शमवलेले असते असे नाही; तर समोरून येणाऱ्या एका विनयधर भिक्खूने त्यांना पाहून 'आवुसो, कुठे चाललात?' असे विचारल्यावर, 'अमुक गावाला, या कारणासाठी चाललो आहोत' असे सांगितल्यावर, 'पुरे करा आवुसो, तिथे जाऊन काय फायदा?' असे म्हणून तिथेच धर्म आणि विनयाच्या नियमांनुसार ते अधिकरण शमवतो, याला 'वाटेत शमवलेले अधिकरण' म्हणतात. याचे उक्कोटन करणाऱ्यालाही पाचित्तियच होते. තත්ථ ගතන්ති සචෙ පන ‘‘අලං, ආවුසො, කිං තත්ථ ගතෙනා’’ති වුච්චමානාපි ‘‘මයං තත්ථෙව ගන්ත්වා විනිච්ඡයං පාපෙස්සාමා’’ති විනයධරස්ස වචනං අනාදියිත්වා ගච්ඡන්තියෙව, ගන්ත්වා සභාගානං භික්ඛූනං එතමත්ථං ආරොචෙන්ති. සභාගා භික්ඛූ ‘‘අලං, ආවුසො, සඞ්ඝසන්නිපාතං නාම ගරුක’’න්ති තත්ථෙව නිසීදාපෙත්වා විනිච්ඡිනිත්වා සඤ්ඤාපෙන්ති, ඉදම්පි වූපසන්තමෙව හොති. එවං වූපසන්තං තත්ථ ගතං අධිකරණං උක්කොටෙති යො, තස්සාපි පාචිත්තියමෙව. 'तिथे पोहोचलेले' म्हणजे जर 'पुरे करा आवुसो, तिथे जाऊन काय फायदा?' असे सांगितले तरीही, 'आम्ही तिथेच जाऊन निर्णय मिळवू' असे म्हणून त्या विनयधराच्या शब्दाचा अनादर करून ते पुढे जातातच, आणि तिथे पोहोचून समान विचारसरणीच्या भिक्खूंना ही गोष्ट सांगतात. तेव्हा ते समान विचारसरणीचे भिक्खू 'पुरे करा आवुसो, संघ एकत्र करणे ही गंभीर बाब आहे' असे म्हणून त्यांना तिथेच बसवून, निर्णय देऊन समजावतात, हे देखील शमवलेलेच मानले जाते. अशा प्रकारे तिथे पोहोचून शमवलेले अधिकरण जो उकरून काढतो, त्यालाही पाचित्तियच होते. තත්ථ ගතං වූපසන්තන්ති න හෙව ඛො පන සභාගභික්ඛූනං සඤ්ඤත්තියා වූපසන්තං හොති; අපිච ඛො සඞ්ඝං සන්නිපාතෙත්වා ආරොචිතං සඞ්ඝමජ්ඣෙ විනයධරා වූපසමෙන්ති, ඉදං තත්ථ ගතං වූපසන්තං නාම. එතං උක්කොටෙන්තස්සාපි පාචිත්තියමෙව. 'तिथे पोहोचून शमवलेले' म्हणजे केवळ समान विचारसरणीच्या भिक्खूंच्या समजावण्यानेच शमवलेले असते असे नाही; तर संघाला एकत्र बोलावून, त्यांच्यासमोर मांडलेले अधिकरण संघाच्या मध्यभागी विनयधर भिक्खू शमवतात, याला 'तिथे पोहोचून शमवलेले अधिकरण' म्हणतात. याचे उक्कोटन करणाऱ्यालाही पाचित्तियच होते. සතිවිනයන්ති ඛීණාසවස්ස දින්නං සතිවිනයං උක්කොටෙති, පාචිත්තියමෙව. උම්මත්තකස්ස දින්නෙ අමූළ්හවිනයෙ පාපුස්සන්නස්ස දින්නාය තස්සපාපියසිකායපි එසෙව නයො. 'सतिविनय' म्हणजे क्षीणास्रव अर्हताला दिलेल्या सतिविनयाचे जो उक्कोटन करतो, त्याला पाचित्तियच होते. वेड्या भिक्खूला दिलेल्या अमूळ्हविनयाच्या बाबतीत आणि अनेक पापे केलेल्या भिक्खूला दिलेल्या तस्सपापियसिगाच्या बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. තිණවත්ථාරකං [Pg.196] උක්කොටෙතීති සඞ්ඝෙන තිණවත්ථාරකසමථෙන වූපසමිතෙ අධිකරණෙ ‘‘ආපත්ති නාම එකං භික්ඛුං උපසඞ්කමිත්වා උක්කුටිකං නිසීදිත්වා අඤ්ජලිං පග්ගහෙත්වා දෙසියමානා වුට්ඨාති, යං පනෙතං නිද්දායන්තස්සාපි ආපත්තිවුට්ඨානං නාම, එතං මය්හං න ඛමතී’’ති එවං වදන්තොපි තිණවත්ථාරකං උක්කොටෙති නාම, තස්සාපි පාචිත්තියමෙව. 'तिणवत्थारक उकरून काढतो' म्हणजे संघाने तिणवत्थारक समथाने अधिकरण शमवल्यावर, 'आपत्ती (दोष) ही एका भिक्खूजवळ जाऊन, उकिडवे बसून, हात जोडून, देशना केल्यावरच दूर होते. परंतु, झोपलेल्या भिक्खूची देखील आपत्ती दूर होणे ही जी गोष्ट आहे, ती मला मान्य नाही' असे बोलणारा देखील तिणवत्थारकाचे उक्कोटन करतो असे म्हटले जाते, त्यालाही पाचित्तियच होते. ඡන්දාගතිං ගච්ඡන්තො අධිකරණං උක්කොටෙතීති විනයධරො හුත්වා අත්තනො උපජ්ඣායාදීනං අත්ථාය ‘‘අධම්මං ධම්මො’’තිආදීනි දීපෙත්වා පුබ්බෙ විනිච්ඡිතං අධිකරණං ද්වාදසසු උක්කොටෙසු යෙන කෙනචි උක්කොටෙන්තො ඡන්දාගතිං ගච්ඡන්තො අධිකරණං උක්කොටෙති නාම. ද්වීසු පන අත්තපච්චත්ථිකෙසු එකස්මිං ‘‘අනත්ථං මෙ අචරී’’තිආදිනා නයෙන සමුප්පන්නාඝාතො, තස්ස පරාජයං ආරොපනත්ථං ‘‘අධම්මං ධම්මො’’තිආදීනි දීපෙත්වා පුබ්බෙ විනිච්ඡිතං අධිකරණං ද්වාදසසු උක්කොටෙසු යෙන කෙනචි උක්කොටෙන්තො දොසාගතිං ගච්ඡන්තො අධිකරණං උක්කොටෙති නාම. මන්දො පන මොමූහො මොමූහත්තා එව ‘‘අධම්මං ධම්මො’’තිආදීනි දීපෙත්වා වුත්තනයෙනෙව උක්කොටෙන්තො මොහාගතිං ගච්ඡන්තො අධිකරණං උක්කොටෙති නාම. සචෙ පන ද්වීසු අත්තපච්චත්ථිකෙසු එකො විසමානි කායකම්මාදීනි ගහනමිච්ඡාදිට්ඨිං බලවන්තෙ ච පක්ඛන්තරියෙ අභිඤ්ඤාතෙ භික්ඛූ නිස්සිතත්තා විසමනිස්සිතො ගහනනිස්සිතො බලවනිස්සිතො ච හොති, තස්ස භයෙන ‘‘අයං මෙ ජීවිතන්තරායං වා බ්රහ්මචරියන්තරායං වා කරෙය්යා’’ති ‘‘අධම්මං ධම්මො’’තිආදීනි දීපෙත්වා වුත්තනයෙනෙව උක්කොටෙන්තො භයාගතිං ගච්ඡන්තො අධිකරණං උක්කොටෙති නාම. छंदागतीला प्राप्त होऊन अधिकरणाचे पुनरुत्थान (उक्कोटण) करतो म्हणजे: विनयधर होऊन, आपल्या उपाध्यायादींच्या हितासाठी 'अधम्म हाच धम्म आहे' इत्यादी दाखवून, पूर्वी निर्णय झालेल्या अधिकरणाला बारा प्रकारच्या उक्कोटणांपैकी (पुनरुत्थानांपैकी) कोणत्याही एकाने पुनरुत्थापित करतो, तेव्हा तो 'छंदागतीला प्राप्त होऊन अधिकरणाचे पुनरुत्थान करतो' असे म्हटले जाते. परंतु, दोन विरोधी पक्षांपैकी एकावर 'त्याने माझे अहित केले' इत्यादी प्रकारे द्वेष उत्पन्न झाल्यामुळे, त्याला पराभूत करण्यासाठी 'अधम्म हाच धम्म आहे' इत्यादी दाखवून, पूर्वी निर्णय झालेल्या अधिकरणाला बारा प्रकारच्या उक्कोटणांपैकी कोणत्याही एकाने पुनरुत्थापित करतो, तेव्हा तो 'दोषागतीला प्राप्त होऊन अधिकरणाचे पुनरुत्थान करतो' असे म्हटले जाते. परंतु जो मंद आणि अत्यंत संमोहित आहे, तो संमोहामुळेच 'अधम्म हाच धम्म आहे' इत्यादी दाखवून पूर्वोक्त पद्धतीनेच पुनरुत्थान करतो, तेव्हा तो 'मोहागतीला प्राप्त होऊन अधिकरणाचे पुनरुत्थान करतो' असे म्हटले जाते. परंतु जर दोन विरोधी पक्षांपैकी एक जण विषम कायकर्म इत्यादींचा, गहन मिथ्यादृष्टीचा आणि दुसऱ्या पक्षातील बलवान व प्रसिद्ध भिक्खूंचा आश्रय घेतलेला असल्यामुळे विषम-आश्रित, गहन-आश्रित आणि बलवान-आश्रित असतो, आणि त्याच्या भयाने 'हा माझ्या जीविताला किंवा ब्रह्मचर्याला धोका निर्माण करेल' असे विचार करून, 'अधम्म हाच धम्म आहे' इत्यादी दाखवून पूर्वोक्त पद्धतीनेच पुनरुत्थान करतो, तेव्हा तो 'भयागतीला प्राप्त होऊन अधिकरणाचे पुनरुत्थान करतो' असे म्हटले जाते. තදහුපසම්පන්නොති එකො සාමණෙරො බ්යත්තො හොති බහුස්සුතො, සො විනිච්ඡයෙ පරාජයං පත්වා මඞ්කුභූතෙ භික්ඛූ දිස්වා පුච්ඡති ‘‘කස්මා මඞ්කුභූතාත්ථා’’ති? තෙ තස්ස තං අධිකරණං ආරොචෙන්ති. සො තෙ එවං වදෙති ‘‘හොතු, භන්තෙ, මං උපසම්පාදෙථ, අහං තං අධිකරණං වූපසමෙස්සාමී’’ති. තෙ තං උපසම්පාදෙන්ති. සො දුතියදිවසෙ භෙරිං පහරිත්වා සඞ්ඝං සන්නිපාතෙති. තතො භික්ඛූහි ‘‘කෙන සඞ්ඝො සන්නිපාතිතො’’ති වුත්තෙ ‘‘මයා’’ති වදති. ‘‘කස්මා සන්නිපාතිතො’’ති? ‘‘හිය්යො අධිකරණං දුබ්බිනිච්ඡිතං, තමහං විනිච්ඡිනිස්සාමී’’ති. ‘‘ත්වං පන හිය්යො කුහිං ගතො’’ති? ‘‘අනුපසම්පන්නොම්හි, භන්තෙ, අජ්ජ පන උපසම්පන්නොම්හී’’ති. සො වත්තබ්බො ‘‘ඉදං ආවුසො තුම්හාදිසානං භගවතා සික්ඛාපදං පඤ්ඤත්තං, ‘තදහුපසම්පන්නො [Pg.197] උක්කොටෙති, උක්කොටනකං පාචිත්තිය’න්ති, ගච්ඡ ආපත්තිං දෙසෙහී’’ති. ආගන්තුකෙපි එසෙව නයො. 'त्याच दिवशी उपसंपन्न झालेला' म्हणजे: एक सामणेर चतुर आणि बहुश्रुत असतो. तो निर्णयामध्ये पराभूत झाल्यामुळे खिन्न झालेल्या भिक्खूंना पाहून विचारतो, 'तुम्ही का खिन्न झाला आहात?' ते त्याला त्या अधिकरणाविषयी सांगतात. तो त्यांना असे म्हणतो, 'असू द्या, भंते! मला उपसंपदा द्या, मी त्या अधिकरणाचा शम करीन.' ते त्याला उपसंपदा देतात. तो दुसऱ्या दिवशी दुंदुभी वाजवून संघाला एकत्रित करतो. त्यानंतर भिक्खूंनी 'संघ कोणी एकत्रित केला?' असे विचारले असता, तो 'मी केला' असे म्हणतो. 'का एकत्रित केला?' 'काल अधिकरणाचा चुकीचा निर्णय झाला, मी त्याचा निर्णय करीन.' 'पण तू काल कुठे गेला होतास?' 'भंते, काल मी अनुपसंपन्न होतो, पण आज मी उपसंपन्न आहे.' त्याला असे म्हटले पाहिजे, 'आवुसो, तुमच्यासारख्यांसाठी भगवंतांनी हा शिक्षापद प्रज्ञप्त केला आहे—त्याच दिवशी उपसंपन्न झालेला जर अधिकरणाचे पुनरुत्थान करतो, तर त्याला उक्कोटणक पाचित्तिय होते. जा, आपत्तीची देशना कर.' आगंतुक भिक्खूच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. කාරකොති එකං සඞ්ඝෙන සද්ධිං අධිකරණං විනිච්ඡිනිත්වා පරිවෙණගතං පරාජිතා භික්ඛූ වදන්ති ‘‘කිස්ස, භන්තෙ, තුම්හෙහි එවං විනිච්ඡිතං අධිකරණං, නනු එවං විනිච්ඡිනිතබ්බ’’න්ති. සො ‘‘කස්මා පඨමංයෙව එවං න වදිත්ථා’’ති තං අධිකරණං උක්කොටෙති. එවං යො කාරකො උක්කොටෙති, තස්සාපි උක්කොටනකං පාචිත්තියං. ඡන්දදායකොති එකො අධිකරණවිනිච්ඡයෙ ඡන්දං දත්වා සභාගෙ භික්ඛූ පරාජයං පත්වා ආගතෙ මඞ්කුභූතෙ දිස්වා ‘‘ස්වෙ දානි අහං විනිච්ඡිනිස්සාමී’’ති සඞ්ඝං සන්නිපාතෙත්වා ‘‘කස්මා සන්නිපාතෙසී’’ති වුත්තෙ ‘‘හිය්යො අධිකරණං දුබ්බිනිච්ඡිතං, තමහං අජ්ජ විනිච්ඡිනිස්සාමී’’ති. ‘‘හිය්යො පන ත්වං කත්ථ ගතො’’ති. ‘‘ඡන්දං දත්වා නිසින්නොම්හී’’ති. සො වත්තබ්බො ‘‘ඉදං ආවුසො තුම්හාදිසානං භගවතා සික්ඛාපදං පඤ්ඤත්තං, ‘ඡන්දදායකො උක්කොටෙති, උක්කොටනකං පාචිත්තිය’න්ති, ගච්ඡ ආපත්තිං දෙසෙහී’’ති. 'निर्णय प्रक्रियेत सहभागी असणारा' (कारक) म्हणजे: संघासोबत अधिकरणाचा निर्णय करून विहारात गेलेल्या एका भिक्खूला पराभूत झालेले भिक्खू म्हणतात, 'भंते, तुम्ही अधिकरणाचा असा निर्णय का केला? असा निर्णय करायला हवा नव्हता का?' तो 'तुम्ही आधीच असे का बोलला नाही?' असे म्हणून त्या अधिकरणाचे पुनरुत्थान करतो. अशा प्रकारे जो निर्णय प्रक्रियेत सहभागी असणारा असून पुनरुत्थान करतो, त्यालाही उक्कोटणक पाचित्तिय होते. 'छंद देणारा' (छंददायक) म्हणजे: एक भिक्खू अधिकरणाच्या निर्णयामध्ये आपली संमती (छंद) देऊन, आपल्या समान मताच्या भिक्खूंना पराभूत होऊन खिन्न अवस्थेत आलेले पाहून म्हणतो, 'आता उद्या मी याचा निर्णय करीन.' तो संघाला एकत्रित करतो आणि 'का एकत्रित केले?' असे विचारले असता, 'काल अधिकरणाचा चुकीचा निर्णय झाला, मी आज त्याचा निर्णय करीन' असे सांगतो. 'पण काल तू कुठे गेला होतास?' 'मी छंद देऊन बसलो होतो.' त्याला असे म्हटले पाहिजे, 'आवुसो, तुमच्यासारख्यांसाठी भगवंतांनी हा शिक्षापद प्रज्ञप्त केला आहे—छंद देणारा जर अधिकरणाचे पुनरुत्थान करतो, तर त्याला उक्कोटणक पाचित्तिय होते. जा, आपत्तीची देशना कर.' අධිකරණනිදානාදිවණ්ණනා अधिकरणनिदान-आदींचे वर्णन 342. විවාදාධිකරණං කිංනිදානන්තිආදීසු කිං නිදානමස්සාති කිංනිදානං. කො සමුදයො අස්සාති කිංසමුදයං. කා ජාති අස්සාති කිංජාතිකං. කො පභවො අස්සාති කිංපභවං. කො සම්භාරො අස්සාති කිංසම්භාරං. කිං සමුට්ඨානං අස්සාති කිංසමුට්ඨානං. සබ්බානෙතානි කාරණවෙවචනානියෙව. ३४२. 'विवादाधिकरण कशावर आधारित (किंनिदान) आहे' इत्यादी शब्दांमध्ये: याचे निदान (कारण) काय आहे? म्हणून ते 'किंनिदान' (काय निदान असलेले). याचा समुदय (उत्पत्तीचे कारण) काय आहे? म्हणून ते 'किंसमुदय'. याची जाती (उत्पत्ती) काय आहे? म्हणून ते 'किंजातिक'. याचा प्रभव (उगम) काय आहे? म्हणून ते 'किंप्रभव'. याचा संभार (सामग्री) काय आहे? म्हणून ते 'किंसंभार'. याचे समुत्थान (उत्थान) काय आहे? म्हणून ते 'किंसमुत्थान'. हे सर्व शब्द 'कारण' या शब्दाचेच समानार्थी शब्द आहेत. විවාදනිදානන්තිආදීසුපි අට්ඨාරසභෙදකරවත්ථුසඞ්ඛාතො විවාදො නිදානමෙතස්සාති විවාදනිදානං. විවාදං නිස්සාය උප්පජ්ජනකවිවාදවසෙනෙතං වුත්තං. අනුවාදො නිදානං අස්සාති අනුවාදනිදානං. ඉදම්පි අනුවාදං නිස්සාය උප්පජ්ජනකඅනුවාදවසෙන වුත්තං. ආපත්ති නිදානං අස්සාති ආපත්තිනිදානං. ආපත්තාධිකරණපච්චයා චතස්සො ආපත්තියො ආපජ්ජතීති එවං ආපත්තිං නිස්සාය උප්පජ්ජනකආපත්තිවසෙනෙතං වුත්තං. කිච්චයං නිදානමස්සාති කිච්චයනිදානං; චතුබ්බිධං සඞ්ඝකම්මං කාරණමස්සාති අත්ථො. උක්ඛිත්තානුවත්තිකාය භික්ඛුනියා යාවතතියං සමනුභාසනාදීනං කිච්චං නිස්සාය උප්පජ්ජනකකිච්චානං වසෙනෙතං වුත්තං. අයං චතුන්නම්පි අධිකරණානං විස්සජ්ජනපක්ඛෙ එකපදයොජනා. එතෙනානුසාරෙන සබ්බපදානි යොජෙතබ්බානි. 'विवादनिदान' इत्यादी शब्दांमध्येही: अठरा भेदकर वस्तूंच्या स्वरूपातील विवाद हे ज्याचे निदान (कारण) आहे, ते 'विवादनिदान' होय. पूर्वीच्या विवादाचा आश्रय घेऊन उत्पन्न होणाऱ्या भावी विवादाच्या संदर्भात भगवंतांनी हे सांगितले आहे. अनुवादाचे (आरोपाचे) निदान ज्याला आहे, ते 'अनुवादनिदान' होय. हे देखील पूर्वीच्या अनुवादाचा आश्रय घेऊन उत्पन्न होणाऱ्या भावी अनुवादाच्या संदर्भात भगवंतांनी सांगितले आहे. आपत्तीचे निदान ज्याला आहे, ते 'आपत्तिनिदान' होय. 'आपत्ताधिकरणाच्या कारणाने चार आपत्तींना प्राप्त होतो' अशा प्रकारे पूर्वीच्या आपत्तीचा आश्रय घेऊन उत्पन्न होणाऱ्या भावी आपत्तीच्या संदर्भात भगवंतांनी हे सांगितले आहे. कृत्य हे ज्याचे निदान आहे, ते 'कृत्यनिदान' होय; चार प्रकारचे संघकर्म हे याचे कारण आहे, असा अर्थ आहे. उत्क्षिप्त भिक्खूचे अनुकरण करणाऱ्या भिक्खुणीला तीन वेळा समनुभाषण देण्यासारख्या कृत्याचा आश्रय घेऊन उत्पन्न होणाऱ्या भावी कृत्यांच्या संदर्भात भगवंतांनी हे सांगितले आहे. ही चारही अधिकरणांच्या उत्तराच्या बाजूने एका पदाची योजना आहे. यानुसार सर्व पदांची योजना केली पाहिजे. දුතියපුච්ඡාය [Pg.198] හෙතුනිදානන්තිආදිම්හි විස්සජ්ජනෙ නවන්නං කුසලාකුසලාබ්යාකතහෙතූනං වසෙන හෙතුනිදානාදිතා වෙදිතබ්බා. තතියපුච්ඡාය විස්සජ්ජනෙ බ්යඤ්ජනමත්තං නානං. හෙතුයෙව හි එත්ථ පච්චයොති වුත්තො. दुसऱ्या प्रश्नाच्या 'हेतुनिदान' इत्यादी उत्तरामध्ये: नऊ प्रकारच्या कुशल, अकुशल आणि अव्याकृत हेतूंच्या आधारे 'हेतुनिदान' इत्यादी भाव समजून घ्यावा. तिसऱ्या प्रश्नाच्या उत्तरामध्ये केवळ शब्दाचा (व्यंजनाचा) फरक आहे. कारण येथे हेतूलाच 'प्रत्यय' असे भगवंतांनी म्हटले आहे. 343. මූලපුච්ඡාය විස්සජ්ජනෙ ද්වාදස මූලානීති කොධඋපනාහයුගළකාදීනි ඡ විවාදාමූලානි, ලොභදොසමොහා තයො, අලොභාදොසාමොහා තයොති ඉමානි අජ්ඣත්තසන්තානප්පවත්තානි ද්වාදස මූලානි. චුද්දස මූලානීති තානෙව ද්වාදස කායවාචාහි සද්ධිං චුද්දස හොන්ති. ඡ මූලානීති කායාදීනි ඡ සමුට්ඨානානි. ३४३. मूळ विचारणाऱ्या प्रश्नाच्या उत्तरामध्ये: 'बारा मुळे' म्हणजे क्रोध-उपनाह (राग आणि वैर) इत्यादींच्या जोड्यांसारखी सहा विवादमूळे, लोभ, दोष, मोह हे तीन आणि अलोभ, अदोष, अमोह हे तीन, अशी ही अंतःकरणात (अध्यात्मसंतानामध्ये) प्रवृत्त होणारी बारा मुळे आहेत. 'चौदा मुळे' म्हणजे तीच बारा मुळे काय आणि वाचेसह मिळून चौदा होतात. 'सहा मुळे' म्हणजे काय इत्यादी सहा समुत्थाने होत. සමුට්ඨානපුච්ඡාය විස්සජ්ජනෙ අට්ඨාරස භෙදකරවත්ථූනි සමුට්ඨානානි, තඤ්හි එතෙසු අට්ඨාරසසු භෙදකරවත්ථූසු සමුට්ඨාති, එතෙහි වා කාරණභූතෙහි සමුට්ඨාති. තෙනස්සෙතානි සමුට්ඨානානි වුච්චන්ති. එස නයො සබ්බත්ථ. समुत्थान विचारणाऱ्या प्रश्नाच्या उत्तरामध्ये: अठरा भेदकर वस्तू हीच समुत्थाने आहेत, कारण ते (विवादाधिकरण) या अठरा भेदकर वस्तूंमध्ये उत्पन्न होते, किंवा कारणभूत असलेल्या या भेदकर वस्तूंमुळे उत्पन्न होते. म्हणून यांना या अधिकरणाची समुत्थाने असे म्हटले जाते. हाच नियम सर्वत्र लागू होतो. 344. විවාදාධිකරණං ආපත්තීතිආදිභෙදෙ එකෙන අධිකරණෙන කිච්චාධිකරණෙනාති ඉදං යෙන අධිකරණෙන සම්මන්ති, තං දස්සෙතුං වුත්තං, න පනෙතානි එකංසතො කිච්චාධිකරණෙනෙව සම්මන්ති. න හි පුග්ගලස්ස සන්තිකෙ දෙසෙන්තස්ස කිච්චාධිකරණං නාම අත්ථි. ३४४. 'विवादाधिकरण, आपत्ती' इत्यादी भेदांमध्ये: 'एका अधिकरणाने, कृत्यधिकरणाने' हे जे म्हटले आहे, ते ज्या अधिकरणाने शांत (शमित) होतात, ते दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी सांगितले आहे; परंतु ही अधिकरणे केवळ कृत्यधिकरणानेच शांत होतात असे निश्चितपणे नाही. कारण एखाद्या व्यक्तीच्या समोर आपत्तीची देशना करणाऱ्या भिक्खूच्या बाबतीत कृत्यधिकरण नावाचे काही नसते. න කතමෙන සමථෙනාති සාවසෙසාපත්ති විය න සම්මති. න හි සක්කා සා දෙසෙතුං, න තතො වුට්ඨාය සුද්ධන්තෙ පතිට්ඨාතුං. "कोणत्याही समथाने शांत होत नाही" (न कतमेन समथेनाति) याचा अर्थ असा की, सावेसेस आपत्तीप्रमाणे (सशोष आपत्तीप्रमाणे) ती कोणत्याही समथाने शांत होत नाही. कारण त्या (अनवसेस आपत्तीची) देशना करणे शक्य नाही, आणि त्यातून बाहेर पडून शुद्धतेमध्ये प्रतिष्ठित होणे शक्य नाही. 348. විවාදාධිකරණං හොති අනුවාදාධිකරණන්තිආදි නයො උත්තානොයෙව. ३४८. "विवादाधिकरण होते, अनुवादाधिकरण होते" इत्यादी पद्धत अगदी स्पष्टच आहे. 349. තතො පරං යත්ථ සතිවිනයොතිආදිකා සම්මුඛාවිනයං අමුඤ්චිත්වා ඡ යමකපුච්ඡා වුත්තා, තාසං විස්සජ්ජනෙනෙව අත්ථො පකාසිතො. ३४९. त्यानंतर, जेथे 'सतिविनय' इत्यादी संमुखाविनय समथाला न सोडता सहा यमक प्रश्न (जोडीने विचारलेले प्रश्न) भगवंतांनी सांगितले आहेत, त्यांच्या उत्तरानेच अर्थ स्पष्ट केला गेला आहे. 351. සංසට්ඨාදිපුච්ඡානං විස්සජ්ජනෙ සංසට්ඨාති සතිවිනයකම්මවාචාක්ඛණස්මිංයෙව ද්වින්නම්පි සමථානං සිද්ධත්තා සම්මුඛාවිනයොති වා සතිවිනයොති වා ඉමෙ ධම්මා සංසට්ඨා, නො විසංසට්ඨා. යස්මා පන කදලික්ඛන්ධෙ පත්තවට්ටීනං විය න සක්කා තෙසං විනිබ්භුජිත්වා නානාකරණං දස්සෙතුං, තෙන වුත්තං [Pg.199] ‘‘න ච ලබ්භා ඉමෙසං ධම්මානං විනිබ්භුජිත්වා විනිබ්භුජිත්වා නානාකරණං පඤ්ඤාපෙතු’’න්ති. එස නයො සබ්බත්ථ. ३५१. 'संसट्ठा' (मिश्रित) इत्यादी प्रश्नांच्या उत्तरात 'संसट्ठा' म्हणजे सतिविनय कम्मवाचेच्या क्षणीच दोन्ही समथ सिद्ध होत असल्यामुळे, 'संमुखाविनय' किंवा 'सतिविनय' हे धर्म मिश्रित आहेत, विभक्त नाहीत. परंतु, ज्याप्रमाणे केळीच्या खांबातील पानांच्या गुंडाळ्यांना वेगळे करून त्यांचे वेगळेपण दाखवता येत नाही, त्याचप्रमाणे या (दोन्ही समथांना) वेगळे करून त्यांचे वेगळेपण दाखवणे शक्य नाही. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे - "या धर्मांना वेगळे करून करून त्यांचे वेगळेपण प्रस्थापित करणे शक्य नाही." हाच नियम सर्व ठिकाणी लागू होतो. සත්තසමථනිදානවණ්ණනා सप्तसमथनिदानवण्णना (सात समथांच्या निदानाचे स्पष्टीकरण) समाप्त. 352. කිංනිදානොති පුච්ඡාවිස්සජ්ජනෙ නිදානං නිදානමස්සාති නිදානනිදානො. තත්ථ සඞ්ඝසම්මුඛතා, ධම්මසම්මුඛතා, විනයසම්මුඛතා, පුග්ගලසම්මුඛතාති ඉදං සම්මුඛාවිනයස්ස නිදානං. සතිවෙපුල්ලපත්තො ඛීණාසවො ලද්ධුපවාදො සතිවිනයස්ස නිදානං. උම්මත්තකො භික්ඛු අමූළ්හවිනයස්ස නිදානං. යො ච දෙසෙති, යස්ස ච දෙසෙති, උභින්නං සම්මුඛීභාවො පටිඤ්ඤාතකරණස්ස නිදානං. භණ්ඩනජාතානං අධිකරණං වූපසමෙතුං අසක්කුණෙය්යතා යෙභුය්යසිකාය නිදානං. පාපුස්සන්නො පුග්ගලො තස්සපාපියසිකාය නිදානං. භණ්ඩනජාතානං බහු අස්සාමණකඅජ්ඣාචාරො තිණවත්ථාරකස්ස නිදානං. හෙතුපච්චයවාරා වුත්තනයා එව. ३५२. "किंनिदानो" (काय कारण आहे?) या प्रश्नाच्या उत्तरात - ज्याचे निदान (कारण) आहे तो 'निदाननिदानो' होय. त्यामध्ये संघसंमुखता, धम्मसंमुखता, विनयसंमुखता आणि पुग्गलसंमुखता (व्यक्तीची प्रत्यक्ष उपस्थिती) हे संमुखाविनयाचे निदान (कारण) आहे. स्मृतीच्या परिपूर्णतेला प्राप्त झालेले, आळ (आरोप) आलेले क्षीणासव (अर्हत) हे सतिविनयाचे निदान आहे. उन्मत्त (वेडा) भिक्खू हा अमूळ्हविनयाचे निदान आहे. जो देशना करतो आणि ज्याच्याजवळ देशना केली जाते, त्या दोघांची प्रत्यक्ष उपस्थिती हे पटिञ्ञातकरणाचे निदान आहे. भांडण करणाऱ्या भिक्खूंचे अधिकरण शांत करण्यास असमर्थ असणे हे येभुय्यसिकाचे निदान आहे. अत्यंत पापी व्यक्ती हे तस्सपापियसिकेचे निदान आहे. भांडण करणाऱ्या भिक्खूंचे अनेक अश्रामणक आचरण (भिक्खूला अयोग्य असे वर्तन) हे तिणवत्थारकाचे निदान आहे. हेतू आणि प्रत्यय वार हे आधी सांगितलेल्या पद्धतीप्रमाणेच आहेत. 353. මූලපුච්ඡාය විස්සජ්ජනං උත්තානමෙව. සමුට්ඨානපුච්ඡාය කිඤ්චාපි ‘‘සත්තන්නං සමථානං කතමෙ ඡත්තිංස සමුට්ඨානා’’ති වුත්තං, සම්මුඛාවිනයස්ස පන කම්මසඞ්ගහාභාවෙන සමුට්ඨානාභාවතො ඡන්නංයෙව සමථානං ඡ සමුට්ඨානානි විභත්තානි. තත්ථ කම්මස්ස කිරියාති ඤත්ති වෙදිතබ්බා. කරණන්ති තස්සායෙව ඤත්තියා ඨපෙතබ්බකාලෙ ඨපනං. උපගමනන්ති සයං උපගමනං; අත්තනායෙව තස්ස කම්මස්ස කරණන්ති අත්ථො. අජ්ඣුපගමනන්ති අජ්ඣෙසනුපගමනං; අඤ්ඤං සද්ධිවිහාරිකාදිකං ‘‘ඉදං කම්මං කරොහී’’ති අජ්ඣෙසනන්ති අත්ථො. අධිවාසනාති ‘‘රුච්චති මෙ එතං, කරොතු සඞ්ඝො’’ති එවං අධිවාසනා; ඡන්දදානන්ති අත්ථො. අප්පටික්කොසනාති ‘‘න මෙතං ඛමති, මා එවං කරොථා’’ති අප්පටිසෙධනා. ඉති ඡන්නං ඡක්කානං වසෙන ඡත්තිංස සමුට්ඨානා වෙදිතබ්බා. ३५३. मूळ प्रश्नाचे (मूलपुच्छा) उत्तर अगदी स्पष्टच आहे. समुत्थान प्रश्नामध्ये जरी "सात समथांचे कोणते छत्तीस समुत्थान आहेत?" असे म्हटले असले, तरी संमुखाविनयामध्ये कर्माचा संग्रह नसल्यामुळे आणि समुत्थानाचा अभाव असल्यामुळे, केवळ सहा समथांचेच सहा समुत्थान सविस्तर स्पष्ट केले आहेत. त्यामध्ये 'कम्मस्स किरिया' (कर्माची क्रिया) या शब्दाने 'ञत्ति' (ज्ञप्ती/घोषणा) समजावी. 'करणं' म्हणजे त्याच ज्ञप्तीला योग्य वेळी मांडणे (प्रस्थापित करणे). 'उपगमनं' म्हणजे स्वतः उपस्थित राहणे; स्वतःच ते कर्म करणे असा याचा अर्थ आहे. 'अज्झुपगमनं' म्हणजे विनंतीवरून उपस्थित राहणे; इतर सद्धि विहारिकादींना "हे कर्म कर" अशी विनंती करणे असा याचा अर्थ आहे. 'अधिवासना' म्हणजे "मला हे मान्य आहे, संघाने हे करावे" अशा प्रकारे स्वीकार करणे; म्हणजेच 'छंददान' (संमती देणे) असा याचा अर्थ आहे. 'अप्पटिक्कोसना' म्हणजे "मला हे मान्य नाही, असे करू नका" असे न नाकारणे (मज्जाव न करणे). अशा प्रकारे सहा षटकांच्या आधारे छत्तीस समुत्थान समजावेत. සත්තසමථනානාත්ථාදිවණ්ණනා सप्तसमथनानात्थादिवण्णना (सात समथांच्या विविध अर्थांचे स्पष्टीकरण) समाप्त. 354. නානාත්ථපුච්ඡාවිස්සජ්ජනං උත්තානමෙව. අධිකරණපුච්ඡාවිස්සජ්ජනෙ අයං විවාදො නො අධිකරණන්ති අයං මාතාපුත්තාදීනං විවාදො විරුද්ධවාදත්තා විවාදො නාම හොති, සමථෙහි පන අධිකරණීයතාය අභාවතො අධිකරණං න හොති. අනුවාදාදීසුපි එසෙව නයො. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. ३५४. नानात्थ (विविध अर्थ) प्रश्नाचे उत्तर अगदी स्पष्टच आहे. अधिकरण प्रश्नाच्या उत्तरात "हा विवाद आहे, अधिकरण नाही" याचा अर्थ असा की, आई आणि मुलगा इत्यादींमधील हा विवाद परस्परविरोधी बोलण्यामुळे 'विवाद' तर ठरतो, परंतु समथांद्वारे तो शांत करण्याजोगा नसल्यामुळे 'अधिकरण' ठरत नाही. अनुवादादींमध्येही हाच नियम आहे. उर्वरित सर्व भाग अगदी स्पष्टच आहे. අධිකරණභෙදවණ්ණනා නිට්ඨිතා. अधिकरणभेदवण्णना समाप्त झाली. දුතියගාථාසඞ්ගණිකං द्वितीयगाथासंगणिकं (दुसरे गाथासंगणिक). චොදනාදිපුච්ඡාවිස්සජ්ජනාවණ්ණනා चोदनादिपुच्छाविस्सज्जनावण्णना (चोदना इत्यादी प्रश्नांच्या उत्तरांचे स्पष्टीकरण). 359. දුතියගාථාසඞ්ගණියං [Pg.200] චොදනාති වත්ථුඤ්ච ආපත්තිඤ්ච දස්සෙත්වා චොදනා. සාරණාති දොසසාරණා. සඞ්ඝො කිමත්ථායාති සඞ්ඝසන්නිපාතො කිමත්ථාය. මතිකම්මං පන කිස්ස කාරණාති මතිකම්මං වුච්චති මන්තග්ගහණං; තං කිස්ස කාරණාති අත්ථො. ३५९. द्वितीयगाथासंगणिकामध्ये अर्थ असा समजावा - 'चोदना' म्हणजे वस्तू (घटना) आणि आपत्ती दाखवून दोषारोप करणे. 'सारणा' म्हणजे दोषाची आठवण करून देणे. 'संघो किमत्थाय' म्हणजे संघाचा एकत्र येण्याचा काय हेतू आहे? 'मतिकम्मं पन किस्स कारणा' यामध्ये सल्लामसलत किंवा विचारविनिमय करण्याला 'मतिकम्म' म्हटले आहे; ते कोणत्या कारणासाठी होते? असा याचा अर्थ आहे. චොදනා සාරණත්ථායාති වුත්තප්පකාරා චොදනා, තෙන චුදිතකපුග්ගලෙන චොදකදොසසාරණත්ථාය. නිග්ගහත්ථාය සාරණාති දොසසාරණා පන තස්ස පුග්ගලස්ස නිග්ගහත්ථාය. සඞ්ඝො පරිග්ගහත්ථායාති තත්ථ සන්නිපතිතො සඞ්ඝො විනිච්ඡයපරිග්ගහණත්ථාය; ධම්මාධම්මං තුලනත්ථාය සුවිනිච්ඡිතදුබ්බිනිච්ඡිතං ජානනත්ථායාති අත්ථො. මතිකම්මං පන පාටියෙක්කන්ති සුත්තන්තිකත්ථෙරානඤ්ච විනයධරත්ථෙරානඤ්ච මන්තග්ගහණං පාටෙක්කං පාටෙක්කං විනිච්ඡයසන්නිට්ඨාපනත්ථං. "चोदना सारणत्थाय" म्हणजे वर सांगितलेल्या प्रकारची चोदना (दोषारोप), त्या चोदित (आरोपी) व्यक्तीला चोदकाच्या दोषाची आठवण करून देण्यासाठी असते. "निग्गहत्थाय सारणा" म्हणजे दोषाची आठवण करून देणे हे त्या व्यक्तीच्या निग्रहासाठी (शिक्षेसाठी) असते. "संघो परिग्गहत्थाय" म्हणजे तेथे एकत्र आलेला संघ निर्णयाचे ग्रहण करण्यासाठी, धम्म आणि अधम्माची तुलना करण्यासाठी, आणि योग्य निर्णय व अयोग्य निर्णय समजून घेण्यासाठी असतो, असा याचा अर्थ आहे. "मतिकम्मं पन पाटियेक्कं" म्हणजे सुत्तन्तिक थेर आणि विनयधर थेर यांचा विचारविनिमय आपापल्या परीने निर्णयाप्रत पोहोचण्यासाठी असतो. මා ඛො පටිඝන්ති චුදිතකෙ වා චොදකෙ වා කොපං මා ජනයි. සචෙ අනුවිජ්ජකො තුවන්ති සචෙ ත්වං සඞ්ඝමජ්ඣෙ ඔතිණ්ණං අධිකරණං විනිච්ඡිතුං නිසින්නො විනයධරො. "मा खो पटिघं" म्हणजे चोदित (आरोपी) किंवा चोदक (आरोप करणारा) यांच्यावर राग करू नये. "सचे अनुविज्जको तुवं" म्हणजे जर आपण संघाच्या मध्यभागी उपस्थित झालेल्या अधिकरणाचा निर्णय करण्यासाठी बसलेले विनयधर असाल. විග්ගාහිකන්ති ‘‘න ත්වං ඉමං ධම්මවිනයං ආජානාසී’’තිආදිනයප්පවත්තං. අනත්ථසංහිතන්ති යා අනත්ථං ජනයති, පරිසං ඛොභෙත්වා උට්ඨාපෙති, එවරූපිං කථං මා අභණි. සුත්තෙ විනයෙ වාතිආදීසු සුත්තං නාම උභතොවිභඞ්ගො. විනයො නාම ඛන්ධකො. අනුලොමො නාම පරිවාරො. පඤ්ඤත්තං නාම සකලං විනයපිටකං. අනුලොමිකං නාම චත්තාරො මහාපදෙසා. "विग्गाहिकं" म्हणजे "तुला हा धम्म आणि विनय समजत नाही" इत्यादी प्रकारे बोलणे. "अनत्थसंहितं" म्हणजे जे अनर्थ निर्माण करते, परिषदेला क्षुब्ध करून उठवून लावते, असे भाषण करू नये. "सुत्ते विनये वा" इत्यादींमध्ये 'सुत्त' म्हणजे उभतोविभंग (भिक्खू आणि भिक्खुनी विभंग). 'विनय' म्हणजे खन्धक (महावग्ग आणि चुळ्वग्ग खन्धक). 'अनुलोम' म्हणजे परिवार. 'पञ्ञत्तं' म्हणजे संपूर्ण विनयपिटक. 'अनुलोमिकं' म्हणजे चार महापदेस (महाप्रदेश). අනුයොගවත්තං නිසාමයාති අනුයුඤ්ජනවත්තං නිසාමෙහි. කුසලෙන බුද්ධිමතා කතන්ති ඡෙකෙන පණ්ඩිතෙන ඤාණපාරමිප්පත්තෙන භගවතා නීහරිත්වා ඨපිතං. සුවුත්තන්ති සුපඤ්ඤාපිතං. සික්ඛාපදානුලොමිකන්ති සික්ඛාපදානං අනුලොමං. අයං තාව පදත්ථො, අයං පනෙත්ථ සාධිප්පායසඞ්ඛෙපවණ්ණනා – ‘‘සචෙ ත්වං අනුවිජ්ජකො, මා සහසා භණි, මා අනත්ථසංහිතං විග්ගාහිකකථං [Pg.201] භණි. යං පන කුසලෙන බුද්ධිමතා ලොකනාථෙන එතෙසු සුත්තාදීසු අනුයොගවත්තං කථං සුපඤ්ඤත්තං සබ්බසික්ඛාපදානං අනුලොමං, තං නිසාමය තං උපධාරෙහී’’ති. ගතිං න නාසෙන්තො සම්පරායිකන්ති අත්තනො සම්පරායෙ සුගතිනිබ්බත්තිං අනාසෙන්තො අනුයොගවත්තං නිසාමය. යො හි තං අනිසාමෙත්වා අනුයුඤ්ජති, සො සම්පරායිකං අත්තනො ගතිං නාසෙති, තස්මා ත්වං අනාසෙන්තො නිසාමයාති අත්ථො. ඉදානි තං අනුයොගවත්තං දස්සෙතුං හිතෙසීතිආදිමාහ. තත්ථ හිතෙසීති හිතං එසන්තො ගවෙසන්තො; මෙත්තඤ්ච මෙත්තාපුබ්බභාගඤ්ච උපට්ඨපෙත්වාති අත්ථො. කාලෙනාති යුත්තපත්තකාලෙන; අජ්ඣෙසිතකාලෙයෙව තව භාරෙ කතෙ අනුයුඤ්ජාති අත්ථො. ‘अनुयोगवृत्तं निसामय’ म्हणजे चौकशीच्या कर्तव्याचे (अनुयुंजनवृत्ताचे) ज्ञानाने निरीक्षण कर. ‘कुशलेन बुद्धिमता कतं’ म्हणजे कुशल, खरे पंडित आणि ज्ञानपारमी प्राप्त भगवंतांनी शोधून मांडलेले. ‘सुवृत्तं’ म्हणजे चांगल्या प्रकारे प्रज्ञापित केलेले. ‘सिक्खापदानुलोमिकं’ म्हणजे शिक्षपदांना अनुकूल असलेले. हा तर शब्दाचा अर्थ झाला, परंतु येथे अभिप्रायासह संक्षिप्त स्पष्टीकरण असे आहे – “जर तू अनुविज्जक (चौकशी करणारा विनयधर) असशील, तर घाईघाईने बोलू नकोस, अनर्थकारक व वादग्रस्त भाषण करू नकोस. परंतु, कुशल व बुद्धिमान लोकनाथांनी (बुद्धांनी) या सूत्रादींमध्ये सर्व शिक्षपदांना अनुकूल असे जे अनुयोगवृत्त चांगल्या प्रकारे प्रज्ञापित केले आहे, त्याचे तू निरीक्षण कर, त्याचे चिंतन कर.” ‘गतिं न नासेन्तो सम्परायिकं’ म्हणजे आपल्या परलोकातील सुगतीचा नाश न करता अनुयोगवृत्ताचे निरीक्षण कर. कारण जो त्याचे निरीक्षण न करता चौकशी करतो, तो परलोकातील आपली गती नष्ट करतो. म्हणून तू आपली गती नष्ट न करता त्याचे निरीक्षण कर, असा अर्थ आहे. आता ते अनुयोगवृत्त दाखवण्यासाठी ‘हितेसी’ इत्यादी गाथा स्थविर उपालींनी म्हटली आहे. त्यात ‘हितेसी’ म्हणजे हिताचा शोध घेणारा; मैत्री आणि उपचार मैत्रीची स्थापना करून, असा अर्थ आहे. ‘कालेन’ म्हणजे योग्य व अनुकूल वेळी; केवळ विनंती केलेल्या वेळीच, तुझी जबाबदारी असतानाच चौकशी कर, असा अर्थ आहे. සහසා වොහාරං මා පධාරෙසීති යො එතෙසං සහසා වොහාරො හොති, සහසා භාසිතං, තං මා පධාරෙසි, මා ගණ්හිත්ථ. ‘सहसा वोहारं मा पधारेसि’ म्हणजे या (चोदक व चुदितक) व्यक्तींचे जे घाईघाईचे बोलणे असते, घाईघाईने बोललेले असते, ते स्वीकारू नकोस, ते गृहीत धरू नकोस. පටිඤ්ඤානුසන්ධිතෙන කාරයෙති එත්ථ අනුසන්ධිතන්ති කථානුසන්ධි වුච්චති, තස්මා පටිඤ්ඤානුසන්ධිනා කාරයෙ; කථානුසන්ධිං සල්ලක්ඛෙත්වා පටිඤ්ඤාය කාරයෙති අත්ථො. අථ වා පටිඤ්ඤාය ච අනුසන්ධිතෙන ච කාරයෙ, ලජ්ජිං පටිඤ්ඤාය කාරයෙ; අලජ්ජිං වත්තානුසන්ධිනාති අත්ථො. තස්මා එව පටිඤ්ඤා ලජ්ජීසූති ගාථමාහ. තත්ථ වත්තානුසන්ධිතෙන කාරයෙති වත්තානුසන්ධිනා කාරයෙ, යා අස්ස වත්තෙන සද්ධිං පටිඤ්ඤා සන්ධියති, තාය පටිඤ්ඤාය කාරයෙති අත්ථො. ‘पटिञ्ञानुसंधितेन कारये’ यामध्ये ‘अनुसंधित’ म्हणजे कथानुसंधि (भाषणाचा पूर्व-अपर संबंध) म्हटले जाते. म्हणून प्रतिज्ञा व अनुसंधि यांच्याद्वारे निर्णय घ्यावा; भाषणाचा पूर्व-अपर संबंध लक्षात घेऊन प्रतिज्ञेनुसार निर्णय घ्यावा, असा अर्थ आहे. अथवा प्रतिज्ञेने आणि अनुसंधिने निर्णय घ्यावा; लज्जी (शीलवान) भिक्खूचा प्रतिज्ञेने निर्णय घ्यावा आणि अलज्जी (निर्लज्ज) भिक्खूचा वर्तनाच्या अनुसंधिने (कर्तव्याच्या संबंधाने) निर्णय घ्यावा, असा अर्थ आहे. म्हणूनच ‘पतिञ्ञा लज्जीसु’ ही गाथा स्थविर उपालींनी म्हटली आहे. त्यात ‘वत्तानुकूलतेने निर्णय घ्यावा’ म्हणजे वर्तनाच्या अनुसंधिने निर्णय घ्यावा; त्याची जी प्रतिज्ञा त्याच्या वर्तनाशी सुसंगत ठरते, त्या प्रतिज्ञेनुसार निर्णय घ्यावा, असा अर्थ आहे. සඤ්චිච්චාති ජානන්තො ආපජ්ජති. පරිගූහතීති නිගූහති න දෙසෙති න වුට්ඨාති. ‘संचिच्च’ म्हणजे जाणूनबुजून आपत्तीत पडणे. ‘परिगुहति’ म्हणजे लपवणे, देशना न करणे (आपत्ती प्रकट न करणे) आणि आपत्तीतून बाहेर न पडणे. සා අහම්පි ජානාමීති යං තුම්හෙහි වුත්තං, තං සච්චං, අහම්පි නං එවමෙව ජානාමි. අඤ්ඤඤ්ච තාහන්ති අඤ්ඤඤ්ච තං අහං පුච්ඡාමි. ‘सा अहम्पि जानामि’ म्हणजे जे आपण सांगितले आहे, ते सत्य आहे; मीसुद्धा ते तसेच जाणतो. ‘अञ्ञञ्च ताहं’ म्हणजे मी आपल्याला दुसरा प्रश्न विचारतो. පුබ්බාපරං න ජානාතීති පුරෙකථිතඤ්ච පච්ඡාකථිතඤ්ච න ජානාති. අකොවිදොති තස්මිං පුබ්බාපරෙ අකුසලො. අනුසන්ධිවචනපථං න ජානාතීති කථානුසන්ධිවචනං විනිච්ඡයානුසන්ධිවචනඤ්ච න ජානාති. ‘पुब्बापरं न जानाति’ म्हणजे पूर्वी बोललेले आणि नंतर बोललेले समजत नाही. ‘अकोविदो’ म्हणजे त्या पूर्वापर संबंधात अकुशल असणे. ‘अनुसंधिवचनपथं न जानाति’ म्हणजे कथानुसंधि-वचन (चोदक व चुदितक यांच्या भाषणाशी संबंधित) आणि विनिश्चयानुसंधि-वचन (आपत्ती-अनापत्तीच्या निर्णयाशी संबंधित) न जाणणे. සීලවිපත්තියා චොදෙතීති ද්වීහි ආපත්තික්ඛන්ධෙහි චොදෙති. ආචාරදිට්ඨියාති ආචාරවිපත්තියා චෙව දිට්ඨිවිපත්තියා ච. ආචාරවිපත්තියා චොදෙන්තො පඤ්චහාපත්තික්ඛන්ධෙහි චොදෙති, දිට්ඨිවිපත්තියා චොදෙන්තො [Pg.202] මිච්ඡාදිට්ඨියා චෙව අන්තග්ගාහිකදිට්ඨියා ච චොදෙති. ආජීවෙනපි චොදෙතීති ආජීවහෙතුපඤ්ඤත්තෙහි ඡහි සික්ඛාපදෙහි චොදෙති. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. ‘शीलविपत्तिया चोदेति’ म्हणजे दोन आपत्ती-स्कंधांनी (पाराजिक व संघादिशेष) चोदना (आरोप) करतो. ‘आचारदिट्ठिया’ म्हणजे आचारविपत्तीने आणि दृष्टीविपत्तीने. आचारविपत्तीने चोदना करणारा पाच आपत्ती-स्कंधांनी चोदना करतो; दृष्टीविपत्तीने चोदना करणारा मिथ्यादृष्टीने आणि अंतग्ग्राहिक दृष्टीने चोदना करतो. ‘आजीवेनपि चोदेति’ म्हणजे आजीविकेच्या कारणाने प्रज्ञापित केलेल्या सहा शिक्षपदांनी चोदना करतो. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. දුතියගාථාසඞ්ගණිකවණ්ණනා නිට්ඨිතා. दुसऱ्या गाथासंगणिकेचे स्पष्टीकरण समाप्त झाले. චොදනාකණ්ඩං चोदनाकांड අනුවිජ්ජකකිච්චවණ්ණනා अनुविज्जकाच्या (चौकशी करणाऱ्या विनयधराच्या) कर्तव्याचे स्पष्टीकरण 360-361. ඉදානි [Pg.203] එවං උප්පන්නාය චොදනාය විනයධරෙන කත්තබ්බකිච්චං දස්සෙතුං අනුවිජ්ජකෙනාතිආදි ආරද්ධං. තත්ථ දිට්ඨං දිට්ඨෙනාති ගාථාය අයමත්ථො – එකෙනෙකො මාතුගාමෙන සද්ධිං එකට්ඨානතො නික්ඛමන්තො වා පවිසන්තො වා දිට්ඨො, සො තං පාරාජිකෙන චොදෙති, ඉතරො තස්ස දස්සනං අනුජානාති. තං පන දස්සනං පටිච්ච පාරාජිකං න උපෙති, න පටිජානාති. එවමෙත්ථ යං තෙන දිට්ඨං, තං තස්ස ‘‘දිට්ඨො මයා’’ති ඉමිනා දිට්ඨවචනෙන සමෙති. යස්මා පන ඉතරො තං දස්සනං පටිච්ච දොසං න පටිජානාති, තස්මා අසුද්ධපරිසඞ්කිතො හොති; අමූලකපරිසඞ්කිතොති අත්ථො. තස්ස පුග්ගලස්ස ‘‘සුද්ධො අහ’’න්ති පටිඤ්ඤාය තෙන සද්ධිං උපොසථො කාතබ්බො. සෙසගාථාද්වයෙපි එසෙව නයො. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. ३६०-३६१. आता अशा प्रकारे चोदना (आरोप) उत्पन्न झाल्यावर विनयधराने करावयाचे कर्तव्य दाखवण्यासाठी ‘अनुविज्जकेन’ इत्यादी गाथा सुरू केली आहे. त्यात ‘दिट्ठं दिट्ठेन’ या गाथेचा अर्थ असा आहे – एका भिक्खूने दुसऱ्या भिक्खूला स्त्रीसोबत एकाच ठिकाणाहून बाहेर पडताना किंवा एकाच ठिकाणी प्रवेश करताना पाहिले. तो त्याला पाराजिकाने चोदित करतो (आरोप करतो), आणि दुसरा भिक्खू त्याचे ते पाहणे मान्य करतो. परंतु, त्या पाहण्याच्या आधारे तो पाराजिकाप्रत पोहोचत नाही, ती आपत्ती मान्य करत नाही. अशा प्रकारे, येथे त्याने जे पाहिले आहे, ते त्याच्या “मी पाहिले आहे” या विधानाशी सुसंगत ठरते. परंतु, दुसरा भिक्खू त्या पाहण्याच्या आधारे दोष मान्य करत नसल्यामुळे, तो अशुद्धतेची शंका असलेला (अशुद्धपरिशंकित) किंवा अमूलक शंका असलेला (अमूलकपरिशंकित) ठरतो, असा अर्थ आहे. त्या व्यक्तीच्या “मी शुद्ध आहे” या प्रतिज्ञेवरून (कबुलीवरून) त्याच्यासोबत उपोसथ करावा. उर्वरित दोन गाथांमध्येही हाच नियम लागू होतो. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. අනුවිජ්ජකකිච්චවණ්ණනා නිට්ඨිතා. अनुविज्जकाच्या कर्तव्याचे स्पष्टीकरण समाप्त झाले. චොදකපුච්ඡාවිස්සජ්ජනාවණ්ණනා चोदकाच्या प्रश्नोत्तरांचे स्पष्टीकरण 362-363. චොදනාය කො ආදීතිආදිපුච්ඡානං විස්සජ්ජනෙ සච්චෙ ච අකුප්පෙ චාති සච්චෙ පතිට්ඨාතබ්බං අකුප්පෙ ච. යං කතං වා න කතං වා, තදෙව වත්තබ්බං, න ච චොදකෙ වා අනුවිජ්ජකෙ වා සඞ්ඝෙ වා කොපො උප්පාදෙතබ්බො. ඔතිණ්ණානොතිණ්ණං ජානිතබ්බන්ති ඔතිණ්ණඤ්ච අනොතිණ්ණඤ්ච වචනං ජානිතබ්බං. තත්රායං ජානනවිධි – එත්තකා චොදකස්ස පුබ්බකථා, එත්තකා පච්ඡිමකථා, එත්තකා චුදිතකස්ස පුබ්බකථා, එත්තකා පච්ඡිමකථාති ජානිතබ්බා. චොදකස්ස පමාණං ගණ්හිතබ්බං, චුදිතකස්ස පමාණං ගණ්හිතබ්බං, අනුවිජ්ජකස්ස පමාණං ගණ්හිතබ්බං, අනුවිජ්ජකො අප්පමත්තකම්පි අහාපෙන්තො ‘‘ආවුසො සමන්නාහරිත්වා උජුං කත්වා ආහරා’’ති වත්තබ්බො, සඞ්ඝෙන එවං පටිපජ්ජිතබ්බං. යෙන ධම්මෙන යෙන විනයෙන යෙන සත්ථුසාසනෙන තං අධිකරණං වූපසම්මතීති එත්ථ ධම්මොති භූතං වත්ථු. විනයොති චොදනා චෙව සාරණා ච. සත්ථුසාසනන්ති ඤත්තිසම්පදා චෙව අනුස්සාවනසම්පදා [Pg.204] ච. එතෙන හි ධම්මෙන ච විනයෙන ච සත්ථුසාසනෙන ච අධිකරණං වූපසමති, තස්මා අනුවිජ්ජකෙන භූතෙන වත්ථුනා චොදෙත්වා ආපත්තිං සාරෙත්වා ඤත්තිසම්පදාය චෙව අනුස්සාවනසම්පදාය ච තං අධිකරණං වූපසමෙතබ්බං, අනුවිජ්ජකෙන එවං පටිපජ්ජිතබ්බං. සෙසමෙත්ථ උත්තානමෙව. ३६२-३६३. ‘चोदनेचा आरंभ काय?’ इत्यादी प्रश्नांच्या उत्तरात ‘सच्चे च अकुप्पे च’ म्हणजे सत्यावर आणि अक्रोधावर प्रतिष्ठित राहावे. जे केले आहे किंवा जे केले नाही, तेच सांगावे; आणि चोदक, अनुविज्जक किंवा संघ यांच्यावर क्रोध करू नये. ‘ओतिण्ण-अनोतिण्ण जाणले पाहिजे’ म्हणजे प्रस्तुत आणि अप्रस्तुत वचन जाणले पाहिजे. त्यात जाणण्याची पद्धत अशी आहे – चोदकाचे पूर्वभाषण इतके आहे, उत्तरभाषण इतके आहे; चुदितकाचे पूर्वभाषण इतके आहे, उत्तरभाषण इतके आहे, हे जाणले पाहिजे. चोदकाचे प्रमाण घेतले पाहिजे, चुदितकाचे प्रमाण घेतले पाहिजे, अनुविज्जकाचे प्रमाण घेतले पाहिजे. अनुविज्जकाने अगदी थोडीही उणीव न ठेवता, “आयुष्यमान, नीट लक्ष देऊन सरळपणे मांड” असे म्हटले पाहिजे; संघाने अशा प्रकारे आचरण केले पाहिजे. ‘ज्या धम्माने, ज्या विनयाने, ज्या शास्त्यांच्या शासनाने ते अधिकरण शांत होते’ – येथे ‘धम्म’ म्हणजे सत्य वस्तू (तथ्य). ‘विनय’ म्हणजे चोदना (आरोप करणे) आणि सारणा (आठवण करून देणे). ‘शास्त्यांचे शासन’ म्हणजे ज्ञत्तिसंपदा आणि अनुस्सावनसंपदा. कारण या धम्माने, विनयाने आणि शास्त्यांच्या शासनाने अधिकरण शांत होते. म्हणून अनुविज्जकाने सत्य वस्तूने (तथ्याने) चोदना करून, आपत्तीची आठवण करून देऊन, ज्ञत्तिसंपदेने व अनुस्सावनसंपदेने ते अधिकरण शांत केले पाहिजे. अनुविज्जकाने अशा प्रकारे आचरण केले पाहिजे. येथे उर्वरित अर्थ स्पष्टच आहे. 364. උපොසථො කිමත්ථායාතිආදිපුච්ඡාවිස්සජ්ජනම්පි උත්තානමෙව. අවසානගාථාසු ථෙරෙ ච පරිභාසතීති අවමඤ්ඤං කරොන්තො ‘‘කිං ඉමෙ ජානන්තී’’ති පරිභාසති. ඛතො උපහතින්ද්රියොති තාය ඡන්දාදිගාමිතාය තෙන ච පරිභාසනෙන අත්තනා අත්තනො ඛතත්තා ඛතො. සද්ධාදීනඤ්ච ඉන්ද්රියානං උපහතත්තා උපහතින්ද්රියො. නිරයං ගච්ඡති දුම්මෙධො, න ච සික්ඛාය ගාරවොති සො ඛතො උපහතින්ද්රියො පඤ්ඤාය අභාවතො දුම්මෙධො තීසු සික්ඛාසු අසික්ඛනතො න ච සික්ඛාය ගාරවො කායස්ස භෙදා නිරයමෙව උපගච්ඡති, තස්මා න ච ආමිසං නිස්සාය…පෙ… යථා ධම්මො තථා කරෙති. තස්සත්ථො න ච ආමිසං නිස්සාය කරෙ, චුදිතකචොදකෙසු හි අඤ්ඤතරෙන දින්නං චීවරාදිආමිසං ගණ්හන්තො ආමිසං නිස්සාය කරොති, එවං න කරෙය්ය. න ච නිස්සාය පුග්ගලන්ති ‘‘අයං මෙ උපජ්ඣායො වා ආචරියො වා’’තිආදිනා නයෙන ඡන්දාදීහි ගච්ඡන්තො පුග්ගලං නිස්සාය කරොති, එවං න කරෙය්ය. අථ ඛො උභොපෙතෙ විවජ්ජෙත්වා යථා ධම්මො ඨිතො, තථෙව කරෙය්යාති. ३६४. "उपोसथ कशासाठी आहे?" इत्यादी प्रश्नांची उत्तरे देखील स्पष्टच आहेत. अंतिम गाथांमध्ये "आणि थेरांना दूषण देतो" याचा अर्थ अनादर करत "हे काय जाणतात?" असे म्हणून तो निंदा करतो. "स्वतःचा नाश केलेला आणि इंद्रिये नष्ट झालेला" म्हणजे त्या छंदादी अगतिकडे जाण्यामुळे आणि त्या निंदा करण्यामुळे स्वतःच स्वतःचा नाश केल्यामुळे तो 'नष्ट झालेला' (खत) होय. श्रद्धा इत्यादी इंद्रियांचा नाश झाल्यामुळे तो 'नष्ट-इंद्रिय' (उपहतेंद्रिय) होय. "तो दुर्बुद्धी नरकात जातो, आणि शिक्षेविषयी आदर बाळगत नाही" म्हणजे तो स्वतःचा नाश केलेला, नष्ट-इंद्रिय असलेला, प्रज्ञेच्या अभावामुळे दुर्बुद्धी, तीन शिक्षांमध्ये (शील, समाधी, प्रज्ञा) आचरण न केल्यामुळे शिक्षेविषयी आदर नसलेला, शरीराच्या भेदानंतर (मृत्यूनंतर) नरकातच जातो. म्हणून "आमिषाचा आश्रय न घेता... पे... जसा धर्म आहे तसे करावे" असे आयुष्यमान उपालि थेरांनी म्हटले आहे. त्याचा अर्थ असा समजावा: आमिषाचा आश्रय घेऊन निर्णय करू नये. कारण, चोदित (आरोपी) किंवा चोदक (आरोप करणारा) यांच्यापैकी एकाने दिलेले चीवर इत्यादी आमिष ग्रहण करणारा मनुष्य आमिषाचा आश्रय घेऊन कार्य करतो, असे करू नये. "आणि व्यक्तीचा आश्रय न घेता" म्हणजे "हा माझा उपाध्याय किंवा आचार्य आहे" इत्यादी प्रकारे छंदादी अगतिकडे जाणारा मनुष्य व्यक्तीचा आश्रय घेऊन कार्य करतो, असे करू नये. तर मग, या दोन्ही गोष्टी वर्ज्य करून जसा धर्म (विनय) स्थित आहे, तसेच करावे (निर्णय घ्यावा). උපකණ්ණකං ජප්පතීති ‘‘එවං කථෙහි, මා එවං කථයිත්ථා’’ති කණ්ණමූලෙ මන්තෙති. ජිම්හං පෙක්ඛතීති දොසමෙව ගවෙසති. වීතිහරතීති විනිච්ඡයං හාපෙති. කුම්මග්ගං පටිසෙවතීති ආපත්තිං දීපෙති. "कानात कुजबुजतो" म्हणजे "असे सांग, असे सांगू नकोस" असे कानाच्या जवळ (कानात) बोलतो. "कुटिलतेने पाहतो" म्हणजे दोषच शोधतो. "उल्लंघन करतो" म्हणजे निर्णयाला हानी पोहोचवतो. "कुमार्गाचे सेवन करतो" म्हणजे आपत्ती (विनयभंग) दर्शवतो. අකාලෙන ච චොදෙතීති අනොකාසෙ අනජ්ඣිට්ඨොව චොදෙති. පුබ්බාපරං න ජානාතීති පුරිමකථඤ්ච පච්ඡිමකථඤ්ච න ජානාති. "अवेळी आरोप करतो" म्हणजे अयोग्य प्रसंगी, न विचारता/न बोलावताच आरोप करतो. "पूर्वापार जाणत नाही" म्हणजे पूर्वीचे बोलणे आणि नंतरचे बोलणे जाणत नाही. අනුසන්ධිවචනපථං න ජානාතීති කථානුසන්ධිවිනිච්ඡයානුසන්ධිවසෙන වචනං න ජානාති. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. "भाषणाचा संदर्भ जाणत नाही" म्हणजे कथेचा संदर्भ आणि निर्णयाचा संदर्भ या दृष्टीने बोलणे जाणत नाही. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. චොදනාකණ්ඩවණ්ණනා නිට්ඨිතා. चोदना-कांडाचे वर्णन समाप्त झाले. චූළසඞ්ගාමො चूळसंग्राम (लहान संघर्ष) අනුවිජ්ජකස්ස පටිපත්තිවණ්ණනා अनुविज्जकाची (तपासनीस भिक्खूची) कर्तव्यपद्धतीचे वर्णन 365. චූළසඞ්ගාමෙ [Pg.205] සඞ්ගාමාවචරෙන භික්ඛුනාති සඞ්ගාමො වුච්චති අධිකරණවිනිච්ඡයත්ථාය සඞ්ඝසන්නිපාතො. තත්ර හි අත්තපච්චත්ථිකා චෙව සාසනපච්චත්ථිකා ච උද්ධම්මං උබ්බිනයං සත්ථු සාසනං දීපෙන්තා සමොසරන්ති වෙසාලිකා වජ්ජිපුත්තකා විය. යො භික්ඛු තෙසං පච්චත්ථිකානං ලද්ධිං මද්දිත්වා සකවාදදීපනත්ථාය තත්ථ අවචරති, අජ්ඣොගාහෙත්වා විනිච්ඡයං පවත්තෙති, සො සඞ්ගාමාවචරො නාම යසත්ථෙරො විය. තෙන සඞ්ගාමාවචරෙන භික්ඛුනා සඞ්ඝං උපසඞ්කමන්තෙන නීචචිත්තෙන සඞ්ඝො උපසඞ්කමිතබ්බො. නීචචිත්තෙනාති මානද්ධජං නිපාතෙත්වා නිහතමානචිත්තෙන. රජොහරණසමෙනාති පාදපුඤ්ඡනසමෙන; යථා රජොහරණස්ස සංකිලිට්ඨෙ වා අසංකිලිට්ඨෙ වා පාදෙ පුඤ්ඡියමානෙ නෙව රාගො න දොසො; එවං ඉට්ඨානිට්ඨෙසු අරජ්ජන්තෙන අදුස්සන්තෙනාති අත්ථො. යථාපතිරූපෙ ආසනෙති යථාපතිරූපං ආසනං ඤත්වා අත්තනො පාපුණනට්ඨානෙ ථෙරානං භික්ඛූනං පිට්ඨිං අදස්සෙත්වා නිසීදිතබ්බං. අනානාකථිකෙනාති නානාවිධං තං තං අනත්ථකථං අකථෙන්තෙන. අතිරච්ඡානකථිකෙනාති දිට්ඨසුතමුතම්පි රාජකථාදිකං තිරච්ඡානකථං අකථෙන්තෙන. සාමං වා ධම්මො භාසිතබ්බොති සඞ්ඝසන්නිපාතට්ඨානෙ කප්පියාකප්පියනිස්සිතා වා රූපාරූපපරිච්ඡෙදසමථාචාරවිපස්සනාචාරට්ඨානනිසජ්ජවත්තාදිනිස්සිතා වා කථා ධම්මො නාම. එවරූපො ධම්මො සයං වා භාසිතබ්බො, පරො වා අජ්ඣෙසිතබ්බො. යො භික්ඛු තථාරූපිං කථං කථෙතුං පහොති, සො වත්තබ්බො – ‘‘ආවුසො සඞ්ඝමජ්ඣම්හි පඤ්හෙ උප්පන්නෙ ත්වං කථෙය්යාසී’’ති. අරියො වා තුණ්හීභාවො නාතිමඤ්ඤිතබ්බොති අරියා තුණ්හී නිසීදන්තා න බාලපුථුජ්ජනා විය නිසීදන්ති. අඤ්ඤතරං කම්මට්ඨානං ගහෙත්වාව නිසීදන්ති. ඉති කම්මට්ඨානමනසිකාරවසෙන තුණ්හීභාවො අරියො තුණ්හීභාවො නාම, සො නාතිමඤ්ඤිතබ්බො, කිං කම්මට්ඨානානුයොගෙනාති නාවජානිතබ්බො; අත්තනො පතිරූපං කම්මට්ඨානං ගහෙත්වාව නිසීදිතබ්බන්ති අත්ථො. ३६५. चूळसंग्रामात "संग्रामावचर भिक्खूने" या वाक्यात, अधिकरणाचा (वादाचा) निर्णय करण्यासाठी संघ एकत्र येण्याला 'संग्राम' म्हटले जाते. कारण तेथे स्वतःचे शत्रू असलेले भिक्खू आणि शासनाचे (धम्माचे) शत्रू असलेले भिक्खू, शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) शासनाला अधर्म आणि अविनय म्हणून दर्शवत एकत्र येतात; जसे वैशालीतील वज्जीपुत्तक भिक्खू. जो भिक्खू त्या शत्रूंच्या मतांचे खंडन करून स्वतःचा वाद (मत) स्पष्ट करण्यासाठी तेथे प्रवेश करतो आणि निर्णय प्रस्थापित करतो, तो 'संग्रामावचर' होय; जसे यश थेर. त्या संग्रामावचर भिक्खूने संघाकडे जाताना नम्र चित्ताने संघाकडे जावे. "नम्र चित्ताने" म्हणजे मानाचा ध्वज खाली करून, मानरहित (अहंकाररहित) चित्ताने. "रजोहरणासारखे (धूळ पुसणाऱ्या वस्त्रासारखे)" म्हणजे पाय पुसण्याच्या वस्त्रासारखे; ज्याप्रमाणे पायपुसण्याने मळलेले किंवा न मळलेले पाय पुसले तरी त्याला राग किंवा द्वेष होत नाही, त्याचप्रमाणे इष्ट आणि अनिष्ट गोष्टींमध्ये आसक्त न होता आणि द्वेष न करता राहावे, असा अर्थ आहे. "योग्य आसनावर" म्हणजे योग्य आसन कोणते आहे हे जाणून, स्वतःच्या योग्य ठिकाणी थेर भिक्खूंना पाठ न दाखवता बसावे. "अनेक प्रकारच्या गोष्टी न बोलणारा" म्हणजे विविध प्रकारच्या निरर्थक गोष्टी न बोलणारा. "तिर्यक कथा (अयोग्य चर्चा) न करणारा" म्हणजे पाहिलेल्या, ऐकलेल्या किंवा समजलेल्या गोष्टींविषयी देखील राजकथा इत्यादी तिर्यक कथा न बोलणारा. "स्वतः धम्म सांगावा" म्हणजे संघ एकत्र येण्याच्या ठिकाणी कल्प्य (योग्य) आणि अकल्प्य (अयोग्य) गोष्टींशी संबंधित असलेली, किंवा रूप-अरूप परिच्छेद, समथ आचरण, विपश्यना आचरण, उभे राहणे, बसणे, खंधक वत्त इत्यादींशी संबंधित असलेली चर्चा म्हणजे 'धम्म' होय. अशा प्रकारचा धम्म स्वतः सांगावा किंवा दुसऱ्याला सांगण्याची विनंती करावी. जो भिक्खू अशा प्रकारची चर्चा करण्यास समर्थ आहे, त्याला सांगावे की, "आवुसो, संघामध्ये प्रश्न उपस्थित झाल्यावर आपण बोलावे." "किंवा आर्य मौनाचा अनादर करू नये" म्हणजे आर्य लोक मौन बाळगून बसतात तेव्हा ते अज्ञानी पृथग्जनांप्रमाणे बसत नाहीत. ते कोणत्या तरी कर्मस्थानाचे (ध्यानविषयाचे) आलंबन घेऊनच बसतात. अशा प्रकारे कर्मस्थानाच्या मनसिकारामुळे असणारे मौन म्हणजे 'आर्य मौन' होय. त्याचा अनादर करू नये. "कर्मस्थानाच्या अभ्यासाने काय होणार?" असे म्हणून त्याला तुच्छ लेखू नये; स्वतःला योग्य वाटणारे कर्मस्थान घेऊनच बसावे, असा अर्थ आहे. න උපජ්ඣායො පුච්ඡිතබ්බොති ‘‘කො නාමො තුය්හං උපජ්ඣායො’’ති න පුච්ඡිතබ්බො. එස නයො සබ්බත්ථ. න ජාතීති ‘‘ඛත්තියජාතියො ත්වං බ්රාහ්මණජාතියො’’ති [Pg.206] එවං ජාති න පුච්ඡිතබ්බා. න ආගමොති ‘‘දීඝභාණකොසි ත්වං මජ්ඣිමභාණකො’’ති එවං ආගමො න පුච්ඡිතබ්බො. කුලපදෙසොති ඛත්තියකුලාදිවසෙනෙව වෙදිතබ්බො. අත්රස්ස පෙමං වා දොසො වාති අත්ර පුග්ගලෙ එතෙසං කාරණානං අඤ්ඤතරවසෙන පෙමං වා භවෙය්ය දොසො වා. "उपाध्याय विचारू नये" म्हणजे "तुमच्या उपाध्यायांचे नाव काय आहे?" असे विचारू नये. हाच नियम सर्वत्र लागू होतो. "जात विचारू नये" म्हणजे "तुम्ही क्षत्रिय जातीचे आहात की ब्राह्मण जातीचे आहात?" अशी जात विचारू नये. "आगम विचारू नये" म्हणजे "तुम्ही दीघ-भाणक आहात की मज्झिम-भाणक आहात?" असा आगम विचारू नये. "कुलप्रदेश" देखील क्षत्रिय कुल इत्यादींच्या आधारेच समजावा. "यात त्याचे प्रेम किंवा द्वेष असू शकतो" म्हणजे या व्यक्तीमध्ये या कारणांपैकी एखाद्या कारणामुळे प्रेम किंवा द्वेष निर्माण होऊ शकतो. නො පරිසකප්පිකෙනාති පරිසකප්පකෙන පරිසානුවිධායකෙන න භවිතබ්බං; යං පරිසාය රුච්චති, තදෙව චෙතෙත්වා කප්පෙත්වා න කථෙතබ්බන්ති අත්ථො. න හත්ථමුද්දා දස්සෙතබ්බාති කථෙතබ්බෙ ච අකථෙතබ්බෙ ච සඤ්ඤාජනනත්ථං හත්ථවිකාරො න කාතබ්බො. "परिषदेचे मन राखणारा असू नये" म्हणजे परिषदेचा विचार करणारा किंवा परिषदेचे अनुकरण करणारा असू नये; जे परिषदेला आवडते, केवळ त्याचाच विचार करून आणि कल्पून बोलू नये, असा अर्थ आहे. "हाताने मुद्रा दाखवू नयेत" म्हणजे बोलण्यायोग्य आणि न बोलण्यायोग्य गोष्टींमध्ये संकेत देण्यासाठी हाताने हावभाव करू नयेत. අත්ථං අනුවිධියන්තෙනාති විනිච්ඡයපටිවෙධමෙව සල්ලක්ඛෙන්තෙන ‘‘ඉදං සුත්තං උපලබ්භති, ඉමස්මිං විනිච්ඡයෙ ඉදං වක්ඛාමී’’ති එවං පරිතුලයන්තෙන නිසීදිතබ්බන්ති අත්ථො. න ච ආසනා වුට්ඨාතබ්බන්ති න ආසනා වුට්ඨාය සන්නිපාතමණ්ඩලෙ විචරිතබ්බං, විනයධරෙ උට්ඨිතෙ සබ්බා පරිසා උට්ඨහති. න වීතිහාතබ්බන්ති න විනිච්ඡයො හාපෙතබ්බො. න කුම්මග්ගො සෙවිතබ්බොති න ආපත්ති දීපෙතබ්බා. අසාහසිකෙන භවිතබ්බන්ති න සහසාකාරිනා භවිතබ්බං; සහසා දුරුත්තවචනං න කථෙතබ්බන්ති අත්ථො. වචනක්ඛමෙනාති දුරුත්තවාචං ඛමනසීලෙන. හිතපරිසක්කිනාති හිතෙසිනා හිතගවෙසිනා කරුණා ච කරුණාපුබ්බභාගො ච උපට්ඨාපෙතබ්බොති අයං පදද්වයෙපි අධිප්පායො. අනසුරුත්තෙනාති න අසුරුත්තෙන. අසුරුත්තං වුච්චති විග්ගාහිකකථාසඞ්ඛාතං අසුන්දරවචනං; තං න කථෙතබ්බන්ති අත්ථො. අත්තා පරිග්ගහෙතබ්බොති ‘‘විනිච්ඡිනිතුං වූපසමෙතුං සක්ඛිස්සාමි නු ඛො නො’’ති එවං අත්තා පරිග්ගහෙතබ්බො; අත්තනො පමාණං ජානිතබ්බන්ති අත්ථො. පරො පරිග්ගහෙතබ්බොති ‘‘ලජ්ජියා නු ඛො අයං පරිසා, සක්කා සඤ්ඤාපෙතුං උදාහු නො’’ති එවං පරො පරිග්ගහෙතබ්බො. "निर्णयाचे आकलन करणाऱ्याने" म्हणजे निर्णयाचे आकलन करणाऱ्या ज्ञानाचीच नोंद घेत, "हे सुत्त उपलब्ध आहे, या निर्णयामध्ये मी हे बोलेन" असा विचार करत (आसनावरील) स्थिती निश्चित करावी, असा अर्थ आहे. "आसनातून उठू नये" म्हणजे आसनावरून उठून सभेच्या ठिकाणी इकडेतिकडे फिरू नये; कारण विनयधर उठला की सर्व सभा उठते. "उल्लंघन करू नये" म्हणजे निर्णय कमी करू नये (सोडू नये). "कुमार्गाचे सेवन करू नये" म्हणजे आपत्ती चुकीच्या पद्धतीने प्रकट करू नये. "साहसी (घाईघाईने काम करणारा) असू नये" म्हणजे घाईघाईने काम करणारा असू नये; घाईघाईने वाईट शब्द बोलू नयेत, असा अर्थ आहे. "वचनाला सहन करणारा" म्हणजे वाईट बोलणे सहन करण्याचा स्वभाव असलेला. "हिताची इच्छा करणारा" म्हणजे हित शोधणारा; त्याने करुणा आणि करुणेचा पूर्वभाग (उपचार करुणा) उत्पन्न करावी, हा दोन्ही पदांचा अभिप्राय आहे. "असुरूत्त नसलेला" म्हणजे वाईट न बोलणारा. विवाद निर्माण करणाऱ्या वाईट वचनाला 'असुरूत्त' म्हणतात; ते बोलू नये, असा अर्थ आहे. "स्वतःचे परीक्षण करावे" म्हणजे "मी निर्णय घेण्यास आणि शांत करण्यास समर्थ होईन की नाही?" अशा प्रकारे स्वतःचे परीक्षण करावे; स्वतःची मर्यादा जाणावी, असा अर्थ आहे. "दुसऱ्याचे परीक्षण करावे" म्हणजे "ही परिषद लज्जावान आहे का? त्यांना समजवणे शक्य आहे की नाही?" अशा प्रकारे दुसऱ्याचे परीक्षण करावे। චොදකො පරිග්ගහෙතබ්බොති ‘‘ධම්මචොදකො නු ඛො නො’’ති එවං පරිග්ගහෙතබ්බො. චුදිතකො පරිග්ගහෙතබ්බොති ‘‘ධම්මචුදිතකො නු ඛො නො’’ති එවං පරිග්ගහෙතබ්බො. අධම්මචොදකො පරිග්ගහෙතබ්බොති තස්ස පමාණං ජානිතබ්බං. සෙසෙසුපි එසෙව නයො. වුත්තං [Pg.207] අහාපෙන්තෙනාති චොදකචුදිතකෙහි වුත්තවචනං අහාපෙන්තෙන. අවුත්තං අපකාසෙන්තෙනාති අනොසටං වත්ථුං අප්පකාසෙන්තෙන. මන්දො හාසෙතබ්බොති මන්දො මොමූහො පග්ගණ්හිතබ්බො, ‘‘නනු ත්වං කුලපුත්තො’’ති උත්තෙජෙත්වා අනුයොගවත්තං කථාපෙත්වා තස්ස අනුයොගො ගණ්හිතබ්බො. භීරූ අස්සාසෙතබ්බොති යස්ස සඞ්ඝමජ්ඣං වා ගණමජ්ඣං වා අනොසටපුබ්බත්තා සාරජ්ජං උප්පජ්ජති, තාදිසො ‘‘මා භායි, විස්සට්ඨො කථෙහි, මයං තෙ උපත්ථම්භා භවිස්සාමා’’ති වත්වාපි අනුයොගවත්තං කථාපෙතබ්බො. චණ්ඩො නිසෙධෙතබ්බොති අපසාදෙතබ්බො තජ්ජෙතබ්බො. අසුචි විභාවෙතබ්බොති අලජ්ජිං පකාසෙත්වා ආපත්තිං දෙසාපෙතබ්බො. උජුමද්දවෙනාති යො භික්ඛු උජු සීලවා කායවඞ්කාදිරහිතො, සො මද්දවෙනෙව උපචරිතබ්බො. ධම්මෙසු ච පුග්ගලෙසු චාති එත්ථ යො ධම්මගරුකො හොති න පුග්ගලගරුකො, අයමෙව ධම්මෙසු ච පුග්ගලෙසු ච මජ්ඣත්තොති වෙදිතබ්බො. "चोदकाचे (आरोप करणाऱ्याचे) परीक्षण करावे" म्हणजे "हा धर्मानुसार आरोप करणारा आहे की नाही?" अशा प्रकारे परीक्षण करावे. "चोदितकाचे (ज्यावर आरोप केला आहे त्याचे) परीक्षण करावे" म्हणजे "हा धर्मानुसार चोदितक आहे की नाही?" अशा प्रकारे परीक्षण करावे. "अधर्मचोदकाचे परीक्षण करावे" म्हणजे त्याची मर्यादा जाणावी. उर्वरित पदांमध्येही हाच नियम समजावा. "बोललेले कमी न करता" म्हणजे चोदक आणि चोदितक यांनी बोललेले वचन कमी न करता. "न बोललेले प्रकट न करता" म्हणजे अप्रासंगिक किंवा न घडलेली गोष्ट प्रकट न करता. "मंद व्यक्तीला धीर द्यावा (प्रसन्न करावे)" म्हणजे जो मंद आणि अत्यंत भ्रमित आहे, त्याला प्रोत्साहन द्यावे; "तू कुलीन पुत्र आहेस ना?" असे म्हणून त्याला उत्तेजित करावे आणि चौकशीच्या नियमांनुसार त्याला बोलण्यास लावून त्याची साक्ष (चौकशी) घ्यावी. "भित्र्याला आश्वस्त करावे" म्हणजे ज्याला संघात किंवा गणात कधी न गेल्यामुळे संकोच (भीती) वाटतो, अशा व्यक्तीला "भिऊ नकोस, मोकळेपणाने बोल, आम्ही तुला पाठिंबा देऊ" असे सांगून चौकशीच्या नियमांनुसार बोलण्यास लावावे. "क्रोधी माणसाला रोखावे" म्हणजे त्याची निर्भर्त्सना करावी, त्याला ताकीद द्यावी. "अशुचीला उघडे पाडावे" म्हणजे अलज्जी (निर्लज्ज) व्यक्तीला उघडे पाडून त्याच्याकडून आपत्तीची देशना करून घ्यावी. "सरळ आणि मृदू भावाने" म्हणजे जो भिक्खू सरळ, शीलवान आणि शारीरिक वक्रतेने रहित आहे, त्याच्याशी मृदू वचनानेच व्यवहार करावा. "धर्म आणि पुद्गल (व्यक्ती) यांमध्ये" येथे जो धर्माला आदर देणारा आहे, व्यक्तीला नाही, तोच धर्म आणि पुद्गल यांमध्ये तटस्थ (मध्यस्थ) आहे असे समजावे। 366. සුත්තං සංසන්දනත්ථායාතිආදීසු තෙන ච පන එවං සබ්රහ්මචාරීනං පියමනාපගරුභාවනීයෙන අනුවිජ්ජකෙන සමුදාහටෙසු සුත්තාදීසු සුත්තං සංසන්දනත්ථාය; ආපත්තානාපත්තීනං සංසන්දනත්ථන්ති වෙදිතබ්බං. ඔපම්මං නිදස්සනත්ථායාති ඔපම්මං අත්ථදස්සනත්ථාය. අත්ථො විඤ්ඤාපනත්ථායාති අත්ථො ජානාපනත්ථාය. පටිපුච්ඡා ඨපනත්ථායාති පුච්ඡා පුග්ගලස්ස ඨපනත්ථාය. ඔකාසකම්මං චොදනත්ථායාති වත්ථුනා වා ආපත්තියා වා චොදනත්ථාය. චොදනා සාරණත්ථායාති දොසාදොසං සරාපනත්ථාය. සාරණා සවචනීයත්ථායාති දොසාදොසසාරණා සවචනීයකරණත්ථාය. සවචනීයං පලිබොධත්ථායාති සවචනීයං ‘‘ඉමම්හා ආවාසා පරං මා පක්කමී’’ති එවං පලිබොධත්ථාය. පලිබොධො විනිච්ඡයත්ථායාති විනිච්ඡයං පාපනත්ථාය. විනිච්ඡයො සන්තීරණත්ථායාති දොසාදොසං සන්තීරණත්ථාය තුලනත්ථාය. සන්තීරණං ඨානාට්ඨානගමනත්ථායාති ආපත්තිඅනාපත්තිගරුකලහුකාපත්තිජානනත්ථාය. සඞ්ඝො සම්පරිග්ගහසම්පටිච්ඡනත්ථායාති විනිච්ඡයසම්පටිග්ගහණත්ථාය ච; සුවිනිච්ඡිතදුබ්බිනිච්ඡිතභාවජානනත්ථාය චාති අත්ථො. පච්චෙකට්ඨායිනො අවිසංවාදකට්ඨායිනොති ඉස්සරියාධිපච්චජෙට්ඨකට්ඨානෙ [Pg.208] ච අවිසංවාදකට්ඨානෙ ච ඨිතා; න තෙ අපසාදෙතබ්බාති අත්ථො. ३६६. "सुत्ताची तुलना करण्यासाठी" इत्यादी पदांचा अर्थ असा समजावा: त्या प्रिय, आदरणीय आणि पूजनीय अशा अनुविज्जक (तपासनीस) विनयधराने मांडलेल्या सुत्तादींमध्ये, सुत्त हे आपत्ती आणि अनापत्ती यांच्या तुलनेसाठी (ताळमेळ घालण्यासाठी) असते, असे समजावे. "उपमा उदाहरणासाठी असते" म्हणजे उपमा ही अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी असते. "अर्थ समजवण्यासाठी असतो" म्हणजे अर्थ हा दोन्ही संघांना माहिती करून देण्यासाठी असतो. "प्रतिप्रश्न स्थिर करण्यासाठी असतो" म्हणजे प्रश्न हा त्या व्यक्तीला आपल्या निर्णयावर स्थिर करण्यासाठी असतो. "परवानगी मागणे (ओकासकम्म) आरोप करण्यासाठी असते" म्हणजे वस्तूने किंवा आपत्तीने आरोप करण्यासाठी असते. "आरोप करणे आठवण करून देण्यासाठी असते" म्हणजे दोषाची किंवा अदोषाची आठवण करून देण्यासाठी असते. "आठवण करून देणे बोलण्यास पात्र करण्यासाठी असते" म्हणजे दोषाची किंवा अदोषाची आठवण करून देणे हे बोलण्यास पात्र (सवाचनीय) करण्यासाठी असते. "सवाचनीय प्रतिबंध करण्यासाठी असते" म्हणजे "या विहारातून दुसऱ्या विहारात जाऊ नकोस" अशा प्रकारे प्रतिबंध करण्यासाठी असते. "प्रतिबंध निर्णयाप्रत पोहोचवण्यासाठी असतो" म्हणजे निर्णयाप्रत पोहोचवण्यासाठी असतो. "निर्णय अंतिम निकालासाठी असतो" म्हणजे दोषाचा किंवा अदोषाचा अंतिम निकाल (संतिरण) करण्यासाठी, तुलना करण्यासाठी असतो. "अंतिम निकाल योग्य-अयोग्य स्थानावर जाण्यासाठी असतो" म्हणजे आपत्ती, अनापत्ती, गुरुकापत्ती आणि लहुकापत्ती जाणण्यासाठी असतो. "संघ निर्णय स्वीकारण्यासाठी असतो" म्हणजे निर्णय स्वीकारण्यासाठी आणि तो निर्णय योग्य की अयोग्य हे जाणण्यासाठी असतो, असा अर्थ आहे. "स्वतंत्रपणे राहणारे आणि विसंवाद न करणारे" म्हणजे जे ऐश्वर्य, अधिपत्य आणि ज्येष्ठतेच्या स्थानावर तसेच अविसंवादक (सत्य) स्थानावर स्थित आहेत; त्यांची निर्भर्त्सना करू नये, असा अर्थ आहे। ඉදානි යෙ මන්දා මන්දබුද්ධිනො එවං වදෙය්යුං ‘‘විනයො නාම කිමත්ථායා’’ති තෙසං වචනොකාසපිදහනත්ථමත්තං දස්සෙතුං විනයො සංවරත්ථායාතිආදිමාහ. තත්ථ විනයො සංවරත්ථායාති සකලාපි විනයපඤ්ඤත්ති කායවචීද්වාරසංවරත්ථාය. ආජීවවිසුද්ධිපරියොසානස්ස සීලස්ස උපනිස්සයො හොති; පච්චයො හොතීති අත්ථො. එස නයො සබ්බත්ථ. අපිචෙත්ථ අවිප්පටිසාරොති පාපපුඤ්ඤානං කතාකතවසෙන චිත්තවිප්පටිසාරාභාවො. පාමුජ්ජන්ති දුබ්බලා තරුණපීති. පීතීති බලවා බහලපීති. පස්සද්ධීති කායචිත්තදරථපටිප්පස්සද්ධි. සුඛන්ති කායිකචෙතසිකසුඛං. තඤ්හි දුවිධම්පි සමාධිස්ස උපනිස්සයපච්චයො හොති. සමාධීති චිත්තෙකග්ගතා. යථාභූතඤාණදස්සනන්ති තරුණවිපස්සනා; උදයබ්බයඤාණස්සෙතං අධිවචනං. චිත්තෙකග්ගතා හි තරුණවිපස්සනාය උපනිස්සයපච්චයො හොති. නිබ්බිදාති සිඛාපත්තා වුට්ඨානගාමිනිබලවවිපස්සනා. විරාගොති අරියමග්ගො. විමුත්තීති අරහත්තඵලං. චතුබ්බිධොපි හි අරියමග්ගො අරහත්තඵලස්ස උපනිස්සයපච්චයො හොති. විමුත්තිඤාණදස්සනන්ති පච්චවෙක්ඛණාඤාණං. විමුත්තිඤාණදස්සනං අනුපාදාපරිනිබ්බානත්ථායාති අපච්චයපරිනිබ්බානත්ථාය. අපච්චයපරිනිබ්බානස්ස හි තං පච්චයො හොති, තස්මිං අනුප්පත්තෙ අවස්සං පරිනිබ්බායිතබ්බතොති. එතදත්ථා කථාති අයං විනයකථා නාම එතදත්ථා. මන්තනාති විනයමන්තනා එව. උපනිසාති අයං ‘‘විනයො සංවරත්ථායා’’තිආදිකා පරම්පරපච්චයතාපි එතදත්ථාය. සොතාවධානන්ති ඉමිස්සා පරම්පරපච්චයකථාය සොතාවධානං. ඉමං කථං සුත්වා යං උප්පජ්ජති ඤාණං, තම්පි එතදත්ථාය. යදිදං අනුපාදා චිත්තස්ස විමොක්ඛොති යො අයං චතූහි උපාදානෙහි අනුපාදියිත්වා චිත්තස්ස අරහත්තඵලසඞ්ඛාතො විමොක්ඛො, සොපි එතදත්ථාය; අපච්චයපරිනිබ්බානත්ථාය එවාති අත්ථො. आता जे मंद आणि मंदबुद्धीचे लोक असे म्हणतील की "विनय कशासाठी आहे?", त्यांच्या बोलण्याची संधी बंद करण्यासाठी (तोंड बंद करण्यासाठी) आयुष्यमान उपालि थेरांनी "विनयो संवरत्थाय" (विनय संवरासाठी आहे) इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये "विनयो संवरत्थाय" म्हणजे संपूर्ण विनय प्रज्ञप्ती ही काय आणि वाचेच्या द्वारांच्या संवरासाठी (नियंत्रणासाठी) आहे. ती आजीवपारिसुद्धि शील अंतिम असणाऱ्या शीलाचा उपनिश्रय (बळकट आधार) होते; प्रत्यय (कारण) होते, असा अर्थ आहे. हाच नियम सर्वत्र लागू होतो. शिवाय, येथे "अविप्पटिसार" (पश्चात्ताप नसणे) म्हणजे पाप आणि पुण्याच्या करण्या-न करण्याच्या संदर्भात चित्तामध्ये पश्चात्ताप न होणे. "पामोज्ज" (प्रमोद) म्हणजे दुर्बळ किंवा कोमल प्रीती (तरुण प्रीती). "प्रीती" म्हणजे बलवान किंवा दाट प्रीती. "पस्सद्धि" (प्रश्रब्धी) म्हणजे काय आणि चित्ताच्या त्रासाचे शांत होणे. "सुख" म्हणजे कायिक आणि चैतसिक सुख. कारण ते दोन्ही प्रकारचे सुख समाधीचा उपनिश्रय-प्रत्यय (बळकट आधार) होते. "समाधी" म्हणजे चित्ताची एकाग्रता. "यथाभूतज्ञानदर्शन" म्हणजे तरुण विपश्यना (सुरुवातीची विपश्यना); हे उदयव्यय ज्ञानाचे नाव आहे. कारण चित्ताची एकाग्रता ही तरुण विपश्यनेचा उपनिश्रय-प्रत्यय होते. "निर्वेद" (निब्बिदा) म्हणजे शिखरेला पोहोचलेली आणि वुट्ठानगामिनी (उद्गमनगामी) अशी बलवान विपश्यना. "विराग" म्हणजे आर्यमार्ग. "विमुक्ती" म्हणजे अर्हत्वफल. कारण चारही प्रकारचा आर्यमार्ग हा अर्हत्वफलाचा उपनिश्रय-प्रत्यय होतो. "विमुक्तीज्ञानदर्शन" म्हणजे प्रत्यवेक्षण ज्ञान. "विमुक्तीज्ञानदर्शन अनुपादापरिनिब्बाणत्थाय" म्हणजे अप्रत्यय परिनिर्वाणासाठी (कारणरहित परिनिर्वाणासाठी). कारण ते विमुक्तीज्ञानदर्शन अप्रत्यय परिनिर्वाणाचे कारण होते; ते प्राप्त झाल्यावर निश्चितच परिनिर्वाण प्राप्त होते म्हणून. "एतदत्था कथा" म्हणजे ही विनयकथा या (अनुपादा परिनिर्वाण) अर्थासाठी आहे. "मंतना" म्हणजे विनयाची चर्चाच होय. "उपनिसा" म्हणजे "विनय संवरासाठी आहे" इत्यादी ही जी परस्पर कारणपरंपरा आहे, ती देखील याच उद्देशासाठी आहे. "सोतावधान" (लक्षपूर्वक ऐकणे) म्हणजे या परस्पर कारणपरंपरेच्या कथेचे श्रवण करणे. ही कथा ऐकून जे ज्ञान उत्पन्न होते, ते देखील याच उद्देशासाठी आहे. "यदिदं अनुपादा चित्तस्स विमोक्खो" म्हणजे चार उपादानांचे ग्रहण न करता चित्ताची अर्हत्वफल संज्ञक जी विमुक्ती होते, ती देखील याच उद्देशासाठी आहे; म्हणजेच ती केवळ अप्रत्यय परिनिर्वाणासाठीच आहे, असा अर्थ आहे. 367. අනුයොගවත්තගාථාසු පඨමගාථා වුත්තත්ථා එව. ३६७. अनुयोगवत्त गाथांमध्ये (प्रश्न विचारण्याच्या कर्तव्यासंबंधीच्या गाथांमध्ये) पहिली गाथा आधीच सांगितलेल्या अर्थाचीच आहे. වත්ථුං විපත්තිං ආපත්තිං, නිදානං ආකාරඅකොවිදො පුබ්බාපරං න ජානාතීති ‘‘වත්ථු’’න්තිආදීනි ‘‘න ජානාතී’’ති පදෙන සම්බන්ධො. ‘‘අකොවිදො’’ති [Pg.209] පදස්ස ‘‘ස වෙ තාදිසකො’’ති ඉමිනා සම්බන්ධො. තස්මා අයමෙත්ථ යොජනා – යො භික්ඛු පාරාජිකාදීනං වත්ථුං න ජානාති, චතුබ්බිධං විපත්තිං න ජානාති, සත්තවිධං ආපත්තිං න ජානාති, ‘‘ඉදං සික්ඛාපදං අසුකස්මිං නාම නගරෙ පඤ්ඤත්ත’’න්ති එවං නිදානං න ජානාති, ‘‘ඉදං පුරිමවචනං ඉදං පච්ඡිමවචන’’න්ති පුබ්බාපරං න ජානාති, ‘‘ඉදං කතං ඉදං අකත’’න්ති කතාකතං න ජානාති. සමෙන චාති තෙනෙව පුබ්බාපරං අජානනස්ස සමෙන අඤ්ඤාණෙන, ‘‘කතාකතං න ජානාතී’’ති වුත්තං හොති; එවං තාව නජානාති-පදෙන සද්ධිං සම්බන්ධො වෙදිතබ්බො. යං පනෙතං ‘‘ආකාරඅකොවිදො’’ති වුත්තං, තත්ථ ආකාරඅකොවිදොති කාරණාකාරණෙ අකොවිදො. ඉති ය්වායං වත්ථුආදීනිපි න ජානාති, ආකාරස්ස ච අකොවිදො, ස වෙ තාදිසකො භික්ඛු අපටික්ඛොති වුච්චති. "वत्थुं विपत्तिं आपत्तिं, निदानं आकारअकोविदो पुब्बापरं न जानाति" यामध्ये "वत्थुं" इत्यादी पदांचा "न जानाति" या पदाशी संबंध आहे. "अकोविदो" या पदाचा "स वे तादिसको" याच्याशी संबंध आहे. म्हणून येथे अशी योजना आहे – जो भिक्खू पाराजिका इत्यादींचे वस्तू (मूळ कारण) जाणत नाही, चार प्रकारची विपत्ती जाणत नाही, सात प्रकारची आपत्ती जाणत नाही, "हे शिक्षापद अमुक नावाच्या नगरात प्रज्ञप्त केले गेले" असे निदान (पार्श्वभूमी) जाणत नाही, "हे पूर्व वचन आहे आणि हे नंतरचे वचन आहे" असे पूर्वापर जाणत नाही, "हे केले गेले आणि हे केले गेले नाही" असे कृताकृत जाणत नाही. "समेन च" म्हणजे पूर्वापर न जाणण्याच्या त्याच अज्ञानामुळे "कृताकृत जाणत नाही" असे म्हटले आहे; अशा प्रकारे प्रथम 'न जानाति' या पदाशी संबंध समजून घ्यावा. परंतु जे "आकारअकोविदो" असे म्हटले आहे, त्यामध्ये "आकारअकोविदो" म्हणजे कारण आणि अकारणामध्ये (योग्य आणि अयोग्य कारणांमध्ये) अकुशल असणे. अशा प्रकारे, जो वस्तू इत्यादी देखील जाणत नाही आणि आकाराबाबत (कारणाबाबत) देखील अकुशल आहे, अशा प्रकारच्या भिक्खूला खरोखरच "अपटिक्खो" (अस्वीकार्य) म्हटले जाते. කම්මඤ්ච අධිකරණඤ්චාති ඉමෙසම්පි පදානං ‘‘න ජානාතී’’ති පදෙනෙව සම්බන්ධො. අයං පනෙත්ථ යොජනා – තථෙව ඉති ය්වායං කම්මඤ්ච න ජානාති, අධිකරණඤ්ච න ජානාති, සත්තප්පකාරෙ සමථෙ චාපි අකොවිදො, රාගාදීහි පන රත්තො දුට්ඨො ච මූළ්හො ච, භයෙන භයා ගච්ඡති, සම්මොහෙන මොහා ගච්ඡති, රත්තත්තා පන දුට්ඨත්තා ච ඡන්දා දොසා ච ගච්ඡති, පරං සඤ්ඤාපෙතුං අසමත්ථතාය න ච සඤ්ඤත්තිකුසලො, කාරණාකාරණදස්සනෙ අසමත්ථතාය නිජ්ඣත්තියා ච අකොවිදො අත්තනො සදිසාය පරිසාය ලද්ධත්තා ලද්ධපක්ඛො, හිරියා පරිබාහිරත්තා අහිරිකො, කාළකෙහි කම්මෙහි සමන්නාගතත්තා කණ්හකම්මො, ධම්මාදරියපුග්ගලාදරියානං අභාවතො අනාදරො, ස වෙ තාදිසකො භික්ඛු අපටික්ඛොති වුච්චති, න පටික්ඛිතබ්බො න ඔලොකෙතබ්බො, න සම්මන්නිත්වා ඉස්සරියාධිපච්චජෙට්ඨකට්ඨානෙ ඨපෙතබ්බොති අත්ථො. සුක්කපක්ඛගාථානම්පි යොජනානයො වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බොති. "कम्मञ्च अधिकरणञ्च" या पदांचा देखील "न जानाति" या पदाशीच संबंध आहे. येथे अशी योजना आहे – त्याचप्रमाणे जो कर्म देखील जाणत नाही, अधिकरण देखील जाणत नाही, सात प्रकारच्या शमथांमध्ये देखील अकुशल आहे; परंतु राग इत्यादींनी युक्त होऊन आसक्त, द्वेषयुक्त आणि मोहित होतो, भयामुळे अगतिकडे जातो, संमोहामुळे अगतिकडे जातो, आसक्त असल्यामुळे आणि द्वेषयुक्त असल्यामुळे छंद (राग) आणि द्वेषाने अगतिकडे जातो; दुसऱ्याला समजावून सांगण्यास असमर्थ असल्यामुळे समजावण्यात कुशल नसतो, योग्य आणि अयोग्य कारण दाखवण्यास असमर्थ असल्यामुळे दुसऱ्याला पटवून देण्यात अकुशल असतो; स्वतःसारखीच परिषद मिळाल्यामुळे ज्याने स्वतःचा पक्ष मिळवला आहे; लज्जेच्या बाहेर असल्यामुळे जो निर्लज्ज आहे; काळ्या (अकुशल) कर्मांनी युक्त असल्यामुळे जो कृष्णकर्मा आहे; धम्माचा आदर आणि पुद्गलाचा (व्यक्तीचा) आदर नसल्यामुळे जो अनादर करणारा आहे; अशा प्रकारच्या भिक्खूला खरोखरच "अपटिक्खो" म्हटले जाते. त्याचा स्वीकार करू नये, त्याच्याकडे पाहू नये, त्याला संमत करून ऐश्वर्य, अधिपत्य किंवा श्रेष्ठत्वाच्या स्थानावर स्थापित करू नये, असा अर्थ आहे. शुक्लपक्षाच्या गाथांची योजना देखील याच पद्धतीने समजून घ्यावी. චූළසඞ්ගාමවණ්ණනා නිට්ඨිතා. चूळसंग्राम वर्णन समाप्त झाले. මහාසඞ්ගාමො महासंग्राम වොහරන්තෙන ජානිතබ්බාදිවණ්ණනා व्यवहार करणाऱ्याने जाणण्यायोग्य गोष्टींचे वर्णन 368-374. මහාසඞ්ගාමෙ [Pg.210] – වත්ථුතො වා වත්ථුං සඞ්කමතීති ‘‘පඨමපාරාජිකවත්ථු මයා දිට්ඨං වා සුතං වා’’ති වත්වා පුන පුච්ඡියමානො නිඝංසියමානො ‘‘න මයා පඨමපාරාජිකස්ස වත්ථු දිට්ඨං, න සුතං; දුතියපාරාජිකස්ස වත්ථු දිට්ඨං වා සුතං වා’’ති වදති. එතෙනෙව නයෙන සෙසවත්ථුසඞ්කමනං, විපත්තිතො විපත්තිසඞ්කමනං ආපත්තිතො ආපත්තිසඞ්කමනඤ්ච වෙදිතබ්බං. යො පන ‘‘නෙව මයා දිට්ඨං, න සුත’’න්ති වත්වා පච්ඡා ‘‘මයාපෙතං දිට්ඨං වා සුතං වා’’ති වදති, ‘‘දිට්ඨං වා සුතං වා’’ති වත්වා පච්ඡා ‘‘න දිට්ඨං වා න සුතං වා’’ති වදති, අයං අවජානිත්වා පටිජානාති, පටිජානිත්වා අවජානාතීති වෙදිතබ්බො. එසෙව අඤ්ඤෙනඤ්ඤං පටිචරති නාම. ३६८-३७४. महासंग्रामात – "वस्तूवरून वस्तूवर जाणे" म्हणजे "माझ्याद्वारे पहिले पाराजिकाचे वस्तू पाहिले गेले आहे किंवा ऐकले गेले आहे" असे म्हणून, पुन्हा विचारले असता किंवा घासूनपुसून विचारले असता, "माझ्याद्वारे पहिल्या पाराजिकाचे वस्तू पाहिले गेले नाही, ऐकले गेले नाही; दुसऱ्या पाराजिकाचे वस्तू पाहिले गेले आहे किंवा ऐकले गेले आहे" असे म्हणतो. याच पद्धतीने इतर वस्तूवर जाणे, विपत्तीवरून विपत्तीवर जाणे आणि आपत्तीवरून आपत्तीवर जाणे समजून घ्यावे. परंतु जो "माझ्याद्वारे पाहिलेही गेले नाही, ऐकलेही गेले नाही" असे म्हणून नंतर "माझ्याद्वारे देखील हे पाहिले गेले आहे किंवा ऐकले गेले आहे" असे म्हणतो, किंवा "पाहिले गेले आहे किंवा ऐकले गेले आहे" असे म्हणून नंतर "पाहिले गेले नाही किंवा ऐकले गेले नाही" असे म्हणतो, त्याला "नाकारून स्वीकारणारा" आणि "स्वीकारून नाकारणारा" असे समजावे. हाच "एका गोष्टीने दुसरी गोष्ट लपवणारा" होय. 375. වණ්ණාවණ්ණොති නීලාදිවණ්ණාවණ්ණවසෙන සුක්කවිස්සට්ඨිසික්ඛාපදං වුත්තං. වචනමනුප්පදානන්ති සඤ්චරිත්තං වුත්තං. කායසංසග්ගාදිත්තයං සරූපෙනෙව වුත්තං. ඉති ඉමානි පඤ්ච මෙථුනධම්මස්ස පුබ්බභාගො පුබ්බපයොගොති වෙදිතබ්බානි. ३७५. "वण्णावण्णो" (वर्ण आणि अवर्ण) या पदाने नील इत्यादी विविध रंगांच्या संदर्भात सुक्कविस्सट्ठि (शुक्रविसर्ग) शिक्षापद सांगितले आहे. "वचनमनुप्पदानं" या पदाने संचरित्त (मध्यस्थी) शिक्षापद सांगितले आहे. कायसंसर्ग इत्यादी तीन शिक्षापदे त्यांच्या मूळ स्वरूपातच सांगितली आहेत. अशा प्रकारे ही पाच शिक्षापदे मैथुनधर्माचा पूर्वभाग किंवा पूर्वप्रयोग म्हणून समजून घ्यावीत. 376. චත්තාරි අපලොකනකම්මානීති අධම්මෙනවග්ගාදීනි. සෙසෙසුපි එසෙව නයො. ඉති චත්තාරි චතුක්කානි සොළස හොන්ති. ३७६. "चार अपलोकन कर्मे" म्हणजे अधर्माने वर्ग इत्यादी कर्मे. उरलेल्या पदांमध्ये देखील हाच नियम आहे. अशा प्रकारे चार चतुष्क मिळून सोळा कर्मे होतात. අගතිඅගන්තබ්බවණ්ණනා अगतिकडे न जाण्यासंबंधीचे वर्णन 379. බහුජනඅහිතාය පටිපන්නො හොතීති විනයධරෙන හි එවං ඡන්දාදිගතියා අධිකරණෙ විනිච්ඡිතෙ තස්මිං විහාරෙ සඞ්ඝො ද්විධා භිජ්ජති. ඔවාදූපජීවිනියො භික්ඛුනියොපි ද්වෙ භාගා හොන්ති. උපාසකාපි උපාසිකායොපි දාරකාපි දාරිකායොපි තෙසං ආරක්ඛදෙවතාපි තථෙව ද්විධා භිජ්ජන්ති. තතො භුම්මදෙවතා ආදිං කත්වා යාව අකනිට්ඨබ්රහ්මානො ද්විධාව හොන්ති. තෙන වුත්තං – ‘‘බහුජනඅහිතාය පටිපන්නො හොති…පෙ… දුක්ඛාය දෙවමනුස්සාන’’න්ති. ३७९. "बहुजनांच्या अहितासाठी प्रवृत्त होतो" याविषयी - विनयधराने अशा प्रकारे छंद (राग) इत्यादी गतीनुसार विवादाचा (अधिकरणाचा) निर्णय केला असता, त्या विहारात संघ दोन भागात दुभंगतो. त्या संघाच्या उपदेशावर (ओवादावर) अवलंबून असणाऱ्या भिक्षुणींचेही दोन भाग होतात. उपासक, उपासिका, मुले, मुली आणि त्यांच्या रक्षक देवता (आरक्षक देवता) देखील त्याचप्रमाणे दोन भागात विभागल्या जातात. त्यामुळे भूमदेवतांपासून सुरू करून थेट अकनिठ्ठ ब्रह्मांपर्यंत सर्व दोन भागात विभागले जातात. म्हणूनच आयुष्यमान उपालि स्थविरांनी म्हटले आहे – "बहुजनांच्या अहितासाठी प्रवृत्त होतो...पे०... देव आणि मनुष्यांच्या दुःखासाठी." 382. විසමනිස්සිතොති [Pg.211] විසමානි කායකම්මාදීනි නිස්සිතො. ගහනනිස්සිතොති මිච්ඡාදිට්ඨිඅන්තග්ගාහිකදිට්ඨිසඞ්ඛාතං ගහනං නිස්සිතො. බලවනිස්සිතොති බලවන්තෙ අභිඤ්ඤාතෙ භික්ඛූ නිස්සිතො. ३८२. 'विषमनिस्सितो' म्हणजे विषम (अयोग्य) कायकर्म इत्यादींचा आश्रय घेतलेला. 'गहननिस्सितो' म्हणजे मिथ्यादृष्टी आणि अंतग्ग्राहिकदृष्टी नावाच्या गहन (गुंतागुंतीच्या) दृष्टीचा आश्रय घेतलेला. 'बलवनिस्सितो' म्हणजे बलवान आणि प्रसिद्ध भिक्षूंचा आश्रय घेतलेला. 393. තස්ස අවජානන්තොති තස්ස වචනං අවජානන්තො. උපයොගත්ථෙ වා සාමිවචනං, තං අවජානන්තොති අත්ථො. ३९३. 'तस्स अवजानन्तो' म्हणजे त्याच्या शब्दाचा अनादर करणारा. किंवा येथे षष्ठी विभक्ती ही द्वितीया विभक्तीच्या अर्थात आहे, म्हणून 'त्याचा अनादर करणारा' असा अर्थ आहे. 394. යං අත්ථායාති යදත්ථාය. තං අත්ථන්ති සො අත්ථො. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. ३९४. 'यं अत्थाय' म्हणजे ज्या हेतूसाठी. 'तं अत्थं' म्हणजे तो हेतू. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. මහාසඞ්ගාමවණ්ණනා නිට්ඨිතා. महासंग्रामवर्णना समाप्त झाली. කථිනභෙදං कठिनभेद. කථිනඅත්ථතාදිවණ්ණනා कठिन-आस्तरण इत्यादींची वर्णना. 403. කථිනෙ [Pg.212] – අට්ඨ මාතිකාති ඛන්ධකෙ වුත්තා පක්කමනන්තිකාදිකා අට්ඨ. පලිබොධානිසංසාපි පුබ්බෙ වුත්තා එව. ४०३. कठिनामध्ये – 'आठ मातिका' म्हणजे खन्धकामध्ये सांगितलेल्या पक्कमनंतिका इत्यादी आठ मातिका. पलिबोध (अडथळे) आणि आनिसंस (फायदे) देखील पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच आहेत. 404. පයොගස්සාති චීවරධොවනාදිනො සත්තවිධස්ස පුබ්බකරණස්සත්ථාය යො උදකාහරණාදිකො පයොගො කයිරති, තස්ස පයොගස්ස. කතමෙ ධම්මා අනන්තරපච්චයෙන පච්චයොති අනාගතවසෙන අනන්තරා හුත්වා කතමෙ ධම්මා පච්චයා හොන්තීති අත්ථො. සමනන්තරපච්චයෙනාති සුට්ඨු අනන්තරපච්චයෙන, අනන්තරපච්චයමෙව ආසන්නතරං කත්වා පුච්ඡති. නිස්සයපච්චයෙනාති උප්පජ්ජමානස්ස පයොගස්ස නිස්සයං ආධාරභාවං උපගතා විය හුත්වා කතමෙ ධම්මා පච්චයා හොන්තීති අත්ථො. උපනිස්සයපච්චයෙනාති උපෙතෙන නිස්සයපච්චයෙන; නිස්සයපච්චයමෙව උපගතතරං කත්වා පුච්ඡති. පුරෙජාතපච්චයෙනාති ඉමිනා පඨමං උප්පන්නස්ස පච්චයභාවං පුච්ඡති. පච්ඡාජාතපච්චයෙනාති ඉමිනා පච්ඡා උප්පජ්ජනකස්ස පච්චයභාවං පුච්ඡති. සහජාතපච්චයෙනාති ඉමිනා අපුබ්බං අචරිමං උප්පජ්ජමානානං පච්චයභාවං පුච්ඡති. පුබ්බකරණස්සාති ධොවනාදිනො පුබ්බකරණස්ස. පච්චුද්ධාරස්සාති පුරාණසඞ්ඝාටිආදීනං පච්චුද්ධරණස්ස. අධිට්ඨානස්සාති කථිනචීවරාධිට්ඨානස්ස. අත්ථාරස්සාති කථිනත්ථාරස්ස. මාතිකානඤ්ච පලිබොධානඤ්චාති අට්ඨන්නං මාතිකානං ද්වින්නඤ්ච පලිබොධානං. වත්ථුස්සාති සඞ්ඝාටිආදිනො කථිනවත්ථුස්ස; සෙසං වුත්තනයමෙව. ४०४. 'पयोगास्स' (प्रयोगाचा) म्हणजे चीवर धुणे इत्यादी सात प्रकारच्या पूर्वकरणासाठी पाणी आणणे इत्यादी जो प्रयोग केला जातो, त्या प्रयोगाचा. 'कोणते धर्म अनंतरप्रत्ययाने प्रत्यय होतात?' याचा अर्थ असा की, अनागत रूपाने अनंतर (लगेचच) होऊन कोणते धर्म प्रत्यय होतात? 'समनंतरप्रत्ययाने' म्हणजे चांगल्या प्रकारे अनंतरप्रत्ययाने; अनंतरप्रत्ययालाच अधिक जवळचा करून विचारत आहे. 'निस्सयप्रत्ययाने' म्हणजे उत्पन्न होणाऱ्या प्रयोगाचा आश्रय किंवा आधार बनून कोणते धर्म प्रत्यय होतात? असा अर्थ आहे. 'उपनिस्सयप्रत्ययाने' म्हणजे अधिक जवळ आलेल्या निस्सयप्रत्ययाने; निस्सयप्रत्ययालाच अधिक जवळचा करून विचारत आहे. 'पुरेजातप्रत्ययाने' याद्वारे आधी उत्पन्न झालेल्या धर्माच्या प्रत्ययभावाविषयी विचारत आहे. 'पच्छाजातप्रत्ययाने' याद्वारे नंतर उत्पन्न होणाऱ्या धर्माच्या प्रत्ययभावाविषयी विचारत आहे. 'सहजातप्रत्ययाने' याद्वारे एकाच वेळी (न आधी, न नंतर) उत्पन्न होणाऱ्या धर्मांच्या प्रत्ययभावाविषयी विचारत आहे. 'पुब्बकरणास्स' म्हणजे धुणे इत्यादी पूर्वकरणाचा. 'पच्चुद्धारास्स' म्हणजे जुन्या संघाटी इत्यादींच्या पच्चुद्धाराचा (त्याग करण्याचा). 'अधिट्ठानास्स' म्हणजे कठिन-चीवराच्या अधिट्ठानाचा. 'अत्थारास्स' म्हणजे कठिन आस्तरणाचा. 'मातिकानां च पलिबोधानं च' म्हणजे आठ मातिकांचा आणि दोन पलिबोधांचा. 'वत्थुस्स' म्हणजे संघाटी इत्यादी कठिन-वस्तूचा; उर्वरित भाग पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच आहे. එවං යඤ්ච ලබ්භති යඤ්ච න ලබ්භති, සබ්බං පුච්ඡිත්වා ඉදානි යං යස්ස ලබ්භති, තදෙව දස්සෙන්තො පුබ්බකරණං පයොගස්සාතිආදිනා නයෙන විස්සජ්ජනමාහ. තස්සත්ථො – යං වුත්තං ‘‘පයොගස්ස කතමෙ ධම්මා’’තිආදි, තත්ථ වුච්චතෙ, පුබ්බකරණං පයොගස්ස අනන්තරපච්චයෙන පච්චයො, සමනන්තරනිස්සයඋපනිස්සයපච්චයෙන පච්චයො. පයොගස්ස හි සත්තවිධම්පි පුබ්බකරණං යස්මා තෙන පයොගෙන නිප්ඵාදෙතබ්බස්ස පුබ්බකරණස්සත්ථාය සො පයොගො කයිරති, තස්මා ඉමෙහි චතූහි පච්චයෙහි පච්චයො හොති. පුරෙජාතපච්චයෙ පනෙස උද්දිට්ඨධම්මෙසු එකධම්මම්පි න [Pg.213] ලභති, අඤ්ඤදත්ථු පුබ්බකරණස්ස සයං පුරෙජාතපච්චයො හොති, පයොගෙ සති පුබ්බකරණස්ස නිප්ඵජ්ජනතො. තෙන වුත්තං – ‘‘පයොගො පුබ්බකරණස්ස පුරෙජාතපච්චයෙන පච්චයො’’ති. පච්ඡාජාතපච්චයං පන ලභති, තෙන වුත්තං – ‘‘පුබ්බකරණං පයොගස්ස පච්ඡාජාතපච්චයෙන පච්චයො’’ති. පච්ඡා උප්පජ්ජනකස්ස හි පුබ්බකරණස්ස අත්ථාය සො පයොගො කයිරති. සහජාතපච්චයං පන මාතිකාපලිබොධානිසංසසඞ්ඛාතෙ පන්නරස ධම්මෙ ඨපෙත්වා අඤ්ඤො පයොගාදීසු එකොපි ධම්මො න ලභති, තෙ එව හි පන්නරස ධම්මා සහ කථිනත්ථාරෙන එකතො නිප්ඵජ්ජන්තීති අඤ්ඤමඤ්ඤං සහජාතපච්චයා හොන්ති. තෙන වුත්තං – ‘‘පන්නරස ධම්මා සහජාතපච්චයෙන පච්චයො’’ති. එතෙනුපායෙන සබ්බපදවිස්සජ්ජනානි වෙදිතබ්බානි. अशा प्रकारे जे मिळते आणि जे मिळत नाही, ते सर्व विचारून, आता जे ज्याच्यासाठी मिळते, तेच दाखवण्यासाठी "पुब्बकरणं पयोगास्स" इत्यादी पद्धतीने आयुष्यमान उपालि स्थविरांनी उत्तर दिले. त्याचा अर्थ असा – "प्रयोगाचे कोणते धर्म आहेत" इत्यादी जे म्हटले आहे, त्याविषयी सांगितले जाते की, पूर्वकरण हे प्रयोगासाठी अनंतरप्रत्ययाने प्रत्यय होते, तसेच समनंतर, niस्सय आणि उपनिस्सय प्रत्ययाने प्रत्यय होते. कारण प्रयोगासाठी सातही प्रकारचे पूर्वकरण, ज्या प्रयोगाने ते पूर्वकरण साध्य करायचे आहे, त्या पूर्वकरणाच्या हेतूने तो प्रयोग केला जातो, म्हणून या चार प्रत्ययांनी ते प्रत्यय होते. परंतु पुरेजातप्रत्ययामध्ये हा प्रयोग निर्दिष्ट धर्मांपैकी एकाही धर्माला प्राप्त करत नाही, उलट पूर्वकरणासाठी तो स्वतः पुरेजातप्रत्यय होतो, कारण प्रयोग असल्यावरच पूर्वकरण निष्पन्न होते. म्हणूनच आयुष्यमान उपालि स्थविरांनी म्हटले आहे – "प्रयोग हा पूर्वकरणासाठी पुरेजातप्रत्ययाने प्रत्यय होतो." परंतु तो पच्छाजातप्रत्यय प्राप्त करतो, म्हणूनच म्हटले आहे – "पूर्वकरण हे प्रयोगासाठी पच्छाजातप्रत्ययाने प्रत्यय होते." कारण नंतर उत्पन्न होणाऱ्या पूर्वकरणाच्या हेतूने तो प्रयोग केला जातो. परंतु सहजातप्रत्ययामध्ये मातिका, पलिबोध आणि आनिसंस नावाच्या पंधरा धर्मांना सोडून प्रयोगादींमध्ये इतर एकही धर्म प्राप्त होत नाही. कारण तेच पंधरा धर्म कठिन आस्तरणासोबत एकाच वेळी निष्पन्न होतात, म्हणून ते परस्परांचे सहजातप्रत्यय होतात. म्हणूनच म्हटले आहे – "पंधरा धर्म सहजातप्रत्ययाने प्रत्यय होतात." या पद्धतीने सर्व पदांची उत्तरे समजून घ्यावीत. පුබ්බකරණනිදානාදිවිභාගවණ්ණනා पूर्वकरण-निदान इत्यादींच्या विभागाची वर्णना. 405. පුබ්බකරණං කිංනිදානන්තිආදිපුච්ඡාවිස්සජ්ජනං උත්තානමෙව. ४०५. "पूर्वकरण कशावर आधारित आहे?" इत्यादी प्रश्नांचे उत्तर स्पष्टच आहे. 406-7. ‘‘පයොගො කිංනිදානො’’තිආදීසු පුච්ඡාද්වයවිස්සජ්ජනෙසු හෙතුනිදානො පච්චයනිදානොති එත්ථ ඡ චීවරානි හෙතු චෙව පච්චයො චාති වෙදිතබ්බානි. පුබ්බපයොගාදීනඤ්හි සබ්බෙසං තානියෙව හෙතු, තානි පච්චයො. න හි ඡබ්බිධෙ චීවරෙ අසති පයොගො අත්ථි, න පුබ්බකරණාදීනි, තස්මා ‘‘පයොගො හෙතුනිදානො’’තිආදි වුත්තං. ४०६-७. "प्रयोग कशावर आधारित आहे?" इत्यादी दोन प्रश्नांच्या उत्तरांमध्ये "हेतुनिदान आणि प्रत्ययनिदान" याविषयी सहा प्रकारची चीवरे हेच हेतू आणि प्रत्यय आहेत, असे समजावे. कारण सर्व पूर्वप्रयोग इत्यादींसाठी तीच चीवरे हेतू आणि प्रत्यय आहेत. कारण सहा प्रकारची चीवरे नसतील तर प्रयोगही नसतो आणि पूर्वकरण इत्यादी देखील नसतात. म्हणूनच आयुष्यमान उपालि स्थविरांनी "प्रयोग हा हेतुनिदान आहे" इत्यादी म्हटले आहे. 408. සඞ්ගහවාරෙ – වචීභෙදෙනාති ‘‘ඉමාය සඞ්ඝාටියා, ඉමිනා උත්තරාසඞ්ගෙන, ඉමිනා අන්තරවාසකෙන කථිනං අත්ථරාමී’’ති එතෙන වචීභෙදෙන. කතිමූලාදිපුච්ඡාවිස්සජ්ජනෙ – කිරියා මජ්ඣෙති පච්චුද්ධාරො චෙව අධිට්ඨානඤ්ච. ४०८. संग्रहवारामध्ये – 'वचीभेदाने' म्हणजे "या संघाटीने, या उत्तरासंगाने, या अंतरवासकाने मी कठिन आस्तरण करतो" या वचीभेदाने. 'किती मूळ' इत्यादी प्रश्नांच्या उत्तरांमध्ये – 'क्रिया मध्ये आहे' म्हणजे पच्चुद्धार आणि अधिट्ठान या क्रिया मध्ये आहेत. 411. වත්ථුවිපන්නං හොතීති අකප්පියදුස්සං හොති. කාලවිපන්නං නාම අජ්ජ දායකෙහි දින්නං ස්වෙ සඞ්ඝො කථිනත්ථාරකස්ස දෙති. කරණවිපන්නං නාම තදහෙව ඡින්දිත්වා අකතං. ४११. 'वस्तू-विपन्न होणे' म्हणजे अकल्पनीय (अयोग्य) वस्त्र असणे. 'काल-विपन्न' म्हणजे आज दात्यांनी दिलेले वस्त्र उद्या संघ कठिन आस्तरण करणाऱ्या भिक्षूला देतो. 'करण-विपन्न' म्हणजे त्याच दिवशी कापून न बनवलेले वस्त्र. කථිනාදිජානිතබ්බවිභාගවණ්ණනා कठिनादी जाणण्यायोग्य विभागाची वर्णना. 412. කථිනං [Pg.214] ජානිතබ්බන්තිආදිපුච්ඡාය විස්සජ්ජනෙ – තෙසඤ්ඤෙව ධම්මානන්ති යෙසු රූපාදිධම්මෙසු සති කථිනං නාම හොති, තෙසං සමොධානං මිස්සීභාවො. නාමං නාමකම්මන්තිආදිනා පන ‘‘කථින’’න්ති ඉදං බහූසු ධම්මෙසු නාමමත්තං, න පරමත්ථතො එකො ධම්මො අත්ථීති දස්සෙති. ४१२. "कठिन जाणावे" इत्यादी प्रश्नाच्या उत्तरामध्ये – 'त्याच धर्मांचे' म्हणजे ज्या रूप इत्यादी धर्मांच्या अस्तित्वात 'कठिन' संज्ञा प्राप्त होते, त्यांचे एकत्र येणे (समोधान) किंवा मिश्रण होय. परंतु "नाम, नामकर्म" इत्यादींद्वारे "कठिन" हा शब्द अनेक धर्मांमध्ये केवळ नाममात्र आहे, परमार्थतः असा एक स्वतंत्र धर्म अस्तित्वात नाही, हे दर्शवले आहे. චතුවීසතියා ආකාරෙහීති ‘‘න උල්ලිඛිතමත්තෙනා’’තිආදීහි පුබ්බෙ වුත්තකාරණෙහි. සත්තරසහි ආකාරෙහීති ‘‘අහතෙන අත්ථතං හොති කථින’’න්තිආදීහි පුබ්බෙ වුත්තකාරණෙහි. නිමිත්තකම්මාදීසු යං වත්තබ්බං සබ්බං කථිනක්ඛන්ධකවණ්ණනායං වුත්තං. 'चोवीस आकारांनी' म्हणजे "केवळ रेखाटल्याने नव्हे" इत्यादी पूर्वी सांगितलेल्या कारणांनी. 'सतरा आकारांनी' म्हणजे "नव्या वस्त्राने कठिन आस्तरण होते" इत्यादी पूर्वी सांगितलेल्या कारणांनी. निमित्तकर्म इत्यादींविषयी जे काही सांगायचे आहे, ते सर्व मी कठिनखन्धक वर्णनेमध्ये सांगितले आहे. 416. එකුප්පාදා එකනිරොධාති උප්පජ්ජමානාපි එකතො උප්පජ්ජන්ති, නිරුජ්ඣමානාපි එකතො නිරුජ්ඣන්ති. එකුප්පාදා නානානිරොධාති උප්පජ්ජමානා එකතො උප්පජ්ජන්ති, නිරුජ්ඣමානා නානා නිරුජ්ඣන්ති. කිං වුත්තං හොති? සබ්බෙපි අත්ථාරෙන සද්ධිං එකතො උප්පජ්ජන්ති, අත්ථාරෙ හි සති උද්ධාරො නාම. නිරුජ්ඣමානා පනෙත්ථ පුරිමා ද්වෙ අත්ථාරෙන සද්ධිං එකතො නිරුජ්ඣන්ති, උද්ධාරභාවං පාපුණන්ති. අත්ථාරස්ස හි නිරොධො එතෙසඤ්ච උද්ධාරභාවො එකක්ඛණෙ හොති, ඉතරෙ නානා නිරුජ්ඣන්ති. තෙසු උද්ධාරභාවං පත්තෙසුපි අත්ථාරො තිට්ඨතියෙව. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. ४१६. ‘एक-उत्पाद एक-निरोध’ म्हणजे उत्पन्न होतानाही एकत्र उत्पन्न होतात आणि निरुद्ध होतानाही एकत्र निरुद्ध होतात. ‘एक-उत्पाद नाना-निरोध’ म्हणजे उत्पन्न होताना एकत्र उत्पन्न होतात, पण निरुद्ध होताना वेगवेगळ्या वेळी निरुद्ध होतात. याचा काय अर्थ होतो? सर्व (कठिन उद्धार) कठीण-आस्तरणासोबत (कठिन पसरवण्यासोबत) एकत्रच उत्पन्न होतात; कारण आस्तरण असतानाच ‘उद्धार’ (कठिन नष्ट करणे) संभवतो. परंतु निरुद्ध होताना, यातील पहिले दोन प्रकार आस्तरणासोबत एकत्रच निरुद्ध होतात, म्हणजेच उद्धार-भावाला प्राप्त होतात. कारण आस्तरणाचा निरोध आणि या पहिल्या दोन प्रकारांचा उद्धार-भाव एकाच क्षणी होतो; इतर प्रकार वेगवेगळ्या वेळी निरुद्ध होतात. ते (इतर प्रकार) उद्धार-भावाला प्राप्त झाले तरीही आस्तरण टिकूनच राहते. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. සමන්තපාසාදිකාය විනයසංවණ්ණනාය समंतपासादिका नामक विनय-वर्णनेमध्ये කථිනභෙදවණ්ණනා නිට්ඨිතා. कठिन-भेद-वर्णना समाप्त झाली. පඤ්ඤත්තිවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. पण्णत्ति-वग्ग-वर्णना समाप्त झाली. උපාලිපඤ්චකං उपालि-पंचक අනිස්සිතවග්ගවණ්ණනා अनिस्सित-वग्ग-वर्णना 417. උපාලිපඤ්හෙසු [Pg.215] කතිහි නු ඛො භන්තෙති පුච්ඡාය අයං සම්බන්ධො. ථෙරො කිර රහොගතො සබ්බානි ඉමානි පඤ්චකානි ආවජ්ජෙත්වා ‘‘භගවන්තං දානි පුච්ඡිත්වා ඉමෙසං නිස්සාය වසනකාදීනං අත්ථාය තන්තිං ඨපෙස්සාමී’’ති භගවන්තං උපසඞ්කමිත්වා ‘‘කතිහි නු ඛො භන්තෙ’’තිආදිනා නයෙන පඤ්හෙ පුච්ඡි. තෙසං විස්සජ්ජනෙ උපොසථං න ජානාතීති නවවිධං උපොසථං න ජානාති. උපොසථකම්මං න ජානාතීති අධම්මෙනවග්ගාදිභෙදං චතුබ්බිධං උපොසථකම්මං න ජානාති. පාතිමොක්ඛං න ජානාතීති ද්වෙ මාතිකා න ජානාති. පාතිමොක්ඛුද්දෙසං න ජානාතීති භික්ඛූනං පඤ්චවිධං භික්ඛුනීනං චතුබ්බිධන්ති නවවිධං පාතිමොක්ඛුද්දෙසං න ජානාති. ४१७. उपालिच्या प्रश्नांमध्ये ‘कतीहि नु खो भन्ते’ (हे भन्ते, किती कारणांनी...) या प्रश्नाचा हा संबंध (संदर्भ) आहे. असे म्हटले जाते की, स्थविरांनी (उपालि थेरांनी) एकांतात जाऊन या सर्व पंचकांचे चिंतन केले आणि ‘आता भगवंतांना विचारून, आश्रयाने राहणाऱ्या इत्यादींच्या कल्याणासाठी मी पाठाचा क्रम (तन्ति) प्रस्थापित करेन’ असा विचार करून ते भगवंतांकडे गेले आणि त्यांनी ‘कतीहि नु खो भन्ते’ इत्यादी पद्धतीने प्रश्न विचारले. त्यांच्या उत्तरांमध्ये—‘उपोसत जाणत नाही’ म्हणजे नऊ प्रकारच्या उपोसताला जाणत नाही. ‘उपोसत-कर्म जाणत नाही’ म्हणजे अधर्माने वर्ग इत्यादी भेदांनी युक्त चार प्रकारच्या उपोसत-कर्माला जाणत नाही. ‘पातिमोक्ख जाणत नाही’ म्हणजे दोन मातिका (भिक्खू आणि भिक्खुणी मातिका) जाणत नाही. ‘पातिमोक्ख-उद्देश जाणत नाही’ म्हणजे भिक्खूंचे पाच प्रकारचे आणि भिक्खुणींचे चार प्रकारचे, असे नऊ प्रकारचे पातिमोक्ख-उद्देश जाणत नाही. පවාරණං න ජානාතීති නවවිධං පවාරණං න ජානාති. පවාරණාකම්මං න ජානාතීති අධම්මෙනවග්ගාදිභෙදං චතුබ්බිධං පවාරණාකම්මං න ජානාති. ‘पवारणा जाणत नाही’ म्हणजे नऊ प्रकारची पवारणा जाणत नाही. ‘पवारणा-कर्म जाणत नाही’ म्हणजे अधर्माने वर्ग इत्यादी भेदांनी युक्त चार प्रकारच्या पवारणा-कर्माला जाणत नाही. ආපත්තානාපත්තිං න ජානාතීති තස්මිං තස්මිං සික්ඛාපදෙ නිද්දිට්ඨං ආපත්තිඤ්ච අනාපත්තිඤ්ච න ජානාති. ‘आपत्ती आणि अनापत्ती जाणत नाही’ म्हणजे त्या त्या शिक्षापदांमध्ये निर्दिष्ट केलेल्या आपत्तीला (गुन्ह्याला) आणि अनापत्तीला (गुन्हा नसलेल्या अवस्थेला) जाणत नाही. ආපන්නො කම්මකතොති ආපත්තිං ආපන්නො තප්පච්චයාව සඞ්ඝෙන කම්මං කතං හොති. ‘आपत्तीला प्राप्त झालेला आणि ज्याच्यावर कर्म केले गेले आहे’ म्हणजे आपत्तीला प्राप्त झालेला असून, त्याच कारणाने संघाने त्याच्यावर कर्म केलेले असते. නප්පටිප්පස්සම්භනවග්ගවණ්ණනා न-प्पटिपस्संभन-वग्ग-वर्णना 420. කම්මං නප්පටිප්පස්සම්භෙතබ්බන්ති අයං යස්මා අනුලොමවත්තෙ න වත්තති, තස්මා නාස්ස කම්මං පටිප්පස්සම්භෙතබ්බං; සරජ්ජුකොව විස්සජ්ජෙතබ්බොති අත්ථො. ४२०. ‘कर्म शांत (स्थगित) करू नये’ म्हणजे हा भिक्खू ज्याअर्थी अनुलोम-वृत्तामध्ये (योग्य आचरणात) वर्तन करत नाही, त्याअर्थी त्याचे कर्म शांत करू नये; त्याला बंधनासहच (निर्बंधांसहच) मुक्त केले पाहिजे, असा अर्थ आहे. 421. සචෙ උපාලි සඞ්ඝො සමග්ගකරණීයානි කම්මානි කරොතීති සචෙ සමග්ගෙහි කරණීයානි උපොසථාදීනි කම්මානි කරොති, උපොසථපවාරණාදීසු හි ඨිතාසු උපත්ථම්භො න දාතබ්බො. සචෙ හි සඞ්ඝො අච්චයං දෙසාපෙත්වා සඞ්ඝසාමග්ගිං කරොති, තිණවත්ථාරකසමථං වා කත්වා උපොසථපවාරණං කරොති, එවරූපං සමග්ගකරණීයං නාම කම්මං හොති. තත්ර චෙති සචෙ තාදිසෙ කම්මෙ භික්ඛුනො නක්ඛමති, දිට්ඨාවිකම්මම්පි [Pg.216] කත්වා තථාරූපා සාමග්ගී උපෙතබ්බා, එවං විලොමග්ගාහො න ගණ්හිතබ්බො. යත්ර පන උද්ධම්මං උබ්බිනයං සත්ථු සාසනං දීපෙන්ති, තත්ථ දිට්ඨාවිකම්මං න වට්ටති, පටිබාහිත්වා පක්කමිතබ්බං. ४२१. ‘हे उपालि, जर संघ समग्ग-करणीय (एकता प्रस्थापित करणारी) कर्मे करतो’ म्हणजे जर एकजूट झालेल्या संघाद्वारे करण्याजोगे उपोसत इत्यादी कर्मे करतो; कारण उपोसत, पवारणा इत्यादी चालू असताना (एकता भंग करण्याचा) पाठिंबा देऊ नये. जर संघ अपराधाची देशना करवून घेऊन संघाची एकता प्रस्थापित करतो, किंवा तिणवत्थारक-समथ (तृणप्रस्तारक समथ) करून उपोसत किंवा पवारणा करतो, तर अशा प्रकारच्या कर्माला ‘समग्ग-करणीय’ कर्म म्हणतात. ‘आणि त्यामध्ये’ म्हणजे जर अशा कर्मामध्ये भिक्खूला संमती नसेल, तरीही त्याने आपले मत उघड करून सुद्धा तशा प्रकारच्या एकतेमध्ये सामील झाले पाहिजे, विरोधी भूमिका धरू नये. परंतु ज्या कर्मामध्ये धर्माच्या विरुद्ध आणि विनयाच्या विरुद्ध जाऊन शास्त्यांच्या शासनाचा प्रचार केला जातो, तिथे आपले मत उघड करून सामील होणे योग्य नाही, तर त्याचा विरोध करून तिथून निघून जावे. උස්සිතමන්තී චාති ලොභදොසමොහමානුස්සන්නං වාචං භාසිතා කණ්හවාචො අනත්ථකදීපනො. නිස්සිතජප්පීති අත්තනො ධම්මතාය උස්සදයුත්තං භාසිතුං න සක්කොති; අථ ඛො ‘‘මයා සද්ධිං රාජා එවං කථෙසි, අසුකමහාමත්තො එවං කථෙසි, අසුකො නාම මය්හං ආචරියො වා උපජ්ඣායො වා තෙපිටකො මයා සද්ධිං එවං කථෙසී’’ති එවං අඤ්ඤං නිස්සාය ජප්පති. න ච භාසානුසන්ධිකුසලොති කථානුසන්ධිවචනෙ ච විනිච්ඡයානුසන්ධිවචනෙ ච අකුසලො හොති. න යථාධම්මෙ යථාවිනයෙති න භූතෙන වත්ථුනා ආපත්තිං සාරෙත්වා චොදෙතා හොති. ‘आणि उस्सितमंती’ (गर्विष्ठ बोलणारा) म्हणजे लोभ, द्वेष, मोह आणि मानाने भरलेले बोलणारा, वाईट बोलणारा (कृष्ण-वाणी) आणि अनर्थ प्रकट करणारा होय. ‘निसितजप्पी’ (दुसऱ्याच्या आश्रयाने बोलणारा) म्हणजे जो स्वतःच्या क्षमतेने प्रगल्भ बोलू शकत नाही; तर उलट, ‘माझ्याशी राजा असा बोलला, अमुक महामात्र असा बोलला, अमुक नावाचे माझे आचार्य किंवा उपाध्याय जे त्रिपिटकधारी आहेत, ते माझ्याशी असे बोलले,’ अशा प्रकारे दुसऱ्याचा आश्रय घेऊन बडबड करतो. ‘आणि भाषानुसंधि-कुशल नाही’ म्हणजे संभाषणाच्या संदर्भाशी जुळवून बोलण्यात आणि निर्णयाच्या संदर्भाशी जुळवून बोलण्यात अकुशल असतो. ‘यथाधर्म आणि यथाविनय नाही’ म्हणजे खऱ्या घटनेच्या आधारे आपत्तीची आठवण करून देऊन चोदना (आरोप) करणारा नसतो. උස්සාදෙතා හොතීති ‘‘අම්හාකං ආචරියො මහාතෙපිටකො පරමධම්මකථිකො’’තිආදිනා නයෙන එකච්චං උස්සාදෙති. දුතියපදෙ ‘‘ආපත්තිං කිං සො න ජානාතී’’තිආදිනා එකච්චං අපසාදෙති. අධම්මං ගණ්හාතීති අනිය්යානිකපක්ඛං ගණ්හාති. ධම්මං පටිබාහතීති නිය්යානිකපක්ඛං පටිබාහති. සම්ඵඤ්ච බහුං භාසතීති බහුං නිරත්ථකකථං කථෙති. ‘उत्साहित करणारा (उंचावणारा) असतो’ म्हणजे ‘आमचे आचार्य महान त्रिपिटकधारी आणि सर्वश्रेष्ठ धर्मकथिक आहेत’ इत्यादी पद्धतीने एखाद्याची खोटी प्रशंसा करतो (त्याला चढवतो). दुसऱ्या पदामध्ये (अपसादेता—खाली पाडणारा) ‘त्याला आपत्ती काय माहीत असणार?’ इत्यादी पद्धतीने एखाद्याची निंदा करतो (त्याला खाली पाडतो). ‘अधर्माचा स्वीकार करतो’ म्हणजे अनिय्यानिक पक्ष (संसारातून मुक्त न करणारा मार्ग) स्वीकारतो. ‘धर्माचा प्रतिकार करतो’ म्हणजे निय्यानिक पक्ष (संसारातून मुक्त करणारा मार्ग) रोखतो. ‘आणि पुष्कळ निरर्थक बडबड करतो’ म्हणजे पुष्कळ निरर्थक गोष्टी बोलतो. පසය්හ පවත්තා හොතීති අනජ්ඣිට්ඨො භාරෙ අනාරොපිතෙ කෙවලං මානං නිස්සාය අජ්ඣොත්ථරිත්වා අනධිකාරෙ කථෙතා හොති. අනොකාසකම්මං කාරෙත්වාති ඔකාසකම්මං අකාරෙත්වා පවත්තා හොති. න යථාදිට්ඨියා බ්යාකතා හොතීති යස්ස අත්තනො දිට්ඨි තං පුරක්ඛත්වා න බ්යාකතා; ලද්ධිං නික්ඛිපිත්වා අයථාභුච්චං අධම්මාදීසු ධම්මාදිලද්ධිකො හුත්වා කථෙතා හොතීති අත්ථො. ‘बळजबरीने वर्तन करणारा असतो’ म्हणजे आमंत्रण नसताना आणि जबाबदारी सोपवली नसताना, केवळ अहंकाराचा आश्रय घेऊन, वर्चस्व गाजवून, आपल्या अधिकारात नसलेल्या विषयावर बोलणारा असतो. ‘अवकाश-कर्म न करवून घेता’ म्हणजे परवानगी न मागता बोलणारा असतो. ‘यथादृष्टीने स्पष्टीकरण देणारा नसतो’ म्हणजे स्वतःच्या खऱ्या मताला समोर ठेवून बोलत नाही; तर आपले खरे मत बाजूला ठेवून, असत्य रीतीने, अधर्म इत्यादींमध्ये धर्म इत्यादींचे मत बाळगणारा होऊन बोलणारा असतो, असा अर्थ आहे. වොහාරවග්ගවණ්ණනා वोहार-वग्ग-वर्णना 424. ආපත්තියා පයොගං න ජානාතීති ‘‘අයං ආපත්ති කායප්පයොගා, අයං වචීපයොගා’’ති න ජානාති. ආපත්තියා වූපසමං න ජානාතීති ‘‘අයං ආපත්ති දෙසනාය වූපසමති, අයං වුට්ඨානෙන, අයං නෙව දෙසනාය න වුට්ඨානෙනා’’ති න ජානාති. ආපත්තියා න විනිච්ඡයකුසලො [Pg.217] හොතීති ‘‘ඉමස්මිං වත්ථුස්මිං අයං ආපත්තී’’ති න ජානාති, දොසානුරූපං ආපත්තිං උද්ධරිත්වා පතිට්ඨාපෙතුං න සක්කොති. ४२४. ‘आपत्तीचा प्रयोग जाणत नाही’ म्हणजे ‘ही आपत्ती काय-प्रयोगाने (शारीरिक क्रियेने) होते, ही आपत्ती वची-प्रयोगाने (वाणीने) होते’ हे जाणत नाही. ‘आपत्तीचे शमन जाणत नाही’ म्हणजे ‘ही आपत्ती देशनेने (कबुलीने) शांत होते, ही वुठ्ठानाने (प्रायश्चित्ताने) शांत होते, ही देशनेने किंवा वुठ्ठानाने शांत होत नाही’ हे जाणत नाही. ‘आपत्तीच्या निर्णयामध्ये कुशल नसतो’ म्हणजे ‘या विषयामध्ये ही आपत्ती होते’ हे जाणत नाही, आणि दोषाच्या अनुरूप आपत्ती उद्धृत करून ती सिद्ध करण्यास समर्थ नसतो. අධිකරණසමුට්ඨානං න ජානාතීති ‘‘ඉදං අධිකරණං අට්ඨාරස භෙදකරවත්ථූනි නිස්සාය සමුට්ඨාති, ඉදං චතස්සො විපත්තියො, ඉදං පඤ්ච වා සත්ත වා ආපත්තික්ඛන්ධෙ, ඉදං චත්තාරි සඞ්ඝකිච්චානි නිස්සාය සමුට්ඨාතී’’ති න ජානාති. පයොගං න ජානාතීති ‘‘ඉදං අධිකරණං ද්වාදසමූලප්පයොගං, ඉදං චුද්දසමූලප්පයොගං, ඉදං ඡමූලපයොගං, ඉදං එකමූලපයොග’’න්ති න ජානාති. අධිකරණානඤ්හි යථාසකංමූලමෙව පයොගා නාම හොන්ති, තං සබ්බම්පි න ජානාතීති අත්ථො. වූපසමං න ජානාතීති ‘‘ඉදං අධිකරණං ද්වීහි සමථෙහි වූපසමති, ඉදං තීහි, ඉදං චතූහි, ඉදං එකෙන සමථෙන වූපසමතී’’ති න ජානාති. න විනිච්ඡයකුසලො හොතීති අධිකරණං විනිච්ඡිනිත්වා සමථං පාපෙතුං න ජානාති. अधिकरणसमुत्थान जाणत नाही म्हणजे— 'हे अधिकरण अठरा भेदकर वस्तूंवर अवलंबून उत्पन्न होते, हे चार विपत्तींवर, हे पाच किंवा सात आपत्ती-स्कंधांवर, हे चार संघकृत्यांवर अवलंबून उत्पन्न होते' हे तो जाणत नाही. प्रयोग जाणत नाही म्हणजे— 'या अधिकरणाचा बारा मूळ प्रयोग आहे, या अधिकरणाचा चौदा मूळ प्रयोग आहे, या अधिकरणाचा सहा मूळ प्रयोग आहे, या अधिकरणाचा एक मूळ प्रयोग आहे' हे तो जाणत नाही. कारण अधिकरणांचे आपापले मूळ हेच 'प्रयोग' नावाचे असतात, ते सर्वही तो जाणत नाही, असा अर्थ आहे. व्युपशम जाणत नाही म्हणजे— 'हे अधिकरण दोन समथांनी शांत होते, हे तीन, हे चार, हे एका समथाने शांत होते' हे तो जाणत नाही. निर्णय करण्यात कुशल नसतो म्हणजे अधिकरणाचा निर्णय करून त्याला समथाप्रत नेण्यास तो जाणत नाही. කම්මං න ජානාතීති තජ්ජනීයාදි සත්තවිධං කම්මං න ජානාති. කම්මස්ස කරණං න ජානාතීති ‘‘ඉදං කම්මං ඉමිනා නීහාරෙන කාතබ්බ’’න්ති න ජානාති. කම්මස්ස වත්ථුං න ජානාතීති ‘‘ඉදං තජ්ජනීයස්ස වත්ථු, ඉදං නියස්සාදීන’’න්ති න ජානාති. වත්තන්ති සත්තසු කම්මෙසු හෙට්ඨා චතුන්නං කම්මානං අට්ඨාරසවිධං තිවිධස්ස ච උක්ඛෙපනීයකම්මස්ස තෙචත්තාලීසවිධං වත්තං න ජානාති. කම්මස්ස වූපසමං න ජානාතීති ‘‘යො භික්ඛු වත්තෙ වත්තිත්වා යාචති, තස්ස කම්මං පටිප්පස්සම්භෙතබ්බං, අච්චයො දෙසාපෙතබ්බො’’ති න ජානාති. कर्म जाणत नाही म्हणजे तर्जनीय इत्यादी सात प्रकारचे कर्म तो जाणत नाही. कर्माचे करणे जाणत नाही म्हणजे 'हे कर्म या पद्धतीने केले पाहिजे' हे तो जाणत नाही. कर्माची वस्तू जाणत नाही म्हणजे 'ही तर्जनीय कर्माची वस्तू आहे, ही नियस्स इत्यादी कर्मांची वस्तू आहे' हे तो जाणत नाही. वृत्त म्हणजे सात कर्मांपैकी खालील चार कर्मांचे अठरा प्रकारचे वृत्त आणि तीन प्रकारच्या उत्क्षेपणीय कर्मांचे त्रेचाळीस प्रकारचे वृत्त तो जाणत नाही. कर्माचा व्युपशम जाणत नाही म्हणजे 'जो भिक्खू वृत्ताचे पालन करून याचना करतो, त्याचे कर्म शांत केले पाहिजे आणि त्याचा अपराध देशना करवून घेतला पाहिजे' हे तो जाणत नाही. වත්ථුං න ජානාතීති සත්තන්නං ආපත්තික්ඛන්ධානං වත්ථුං න ජානාති. නිදානං න ජානාතීති ‘‘ඉදං සික්ඛාපදං ඉමස්මිං නගරෙ පඤ්ඤත්තං, ඉදං ඉමස්මි’’න්ති න ජානාති. පඤ්ඤත්තිං න ජානාතීති පඤ්ඤත්තිඅනුපඤ්ඤත්තිඅනුප්පන්නපඤ්ඤත්තිවසෙන තිවිධං පඤ්ඤත්තිං න ජානාති. පදපච්චාභට්ඨං න ජානාතීති සම්මුඛා කාතබ්බං පදං න ජානාති. ‘‘බුද්ධො භගවා’’ති වත්තබ්බෙ ‘‘භගවා බුද්ධො’’ති හෙට්ඨුපරියං කත්වා පදං යොජෙති. वस्तू जाणत नाही म्हणजे सात आपत्ती-स्कंधांची वस्तू तो जाणत नाही. निदान जाणत नाही म्हणजे 'हे शिक्षापद या नगरात प्रज्ञप्त केले गेले, हे या नगरात' हे तो जाणत नाही. प्रज्ञप्ती जाणत नाही म्हणजे प्रज्ञप्ती, अनुप्रज्ञप्ती आणि अनुत्पन्नप्रज्ञप्ती या भेदाने तीन प्रकारची प्रज्ञप्ती तो जाणत नाही. पदाचा विपर्यास जाणत नाही म्हणजे समोर उच्चारायचे पद तो जाणत नाही. 'बुद्धो भगवा' असे म्हणावयाचे असताना 'भगवा बुद्धो' असे उलटसुलट करून पदाची योजना करतो. අකුසලො ච හොති විනයෙති විනයපාළියඤ්ච අට්ඨකථායඤ්ච අකුසලො හොති. आणि विनयात अकुशल असतो म्हणजे विनयपाळीमध्ये आणि अट्ठकथेमध्ये तो अकुशल असतो. ඤත්තිං න ජානාතීති සඞ්ඛෙපතො හි දුවිධා ඤත්ති – ‘‘එසා ඤත්තී’’ති එවං නිද්දිට්ඨා ච අනිද්දිට්ඨා ච. තත්ථ යා එවං අනිද්දිට්ඨා, සා ‘‘කම්මඤත්ති’’ නාම හොති. යා නිද්දිට්ඨා, සා ‘‘කම්මපාදඤත්ති’’ නාම, තං සබ්බෙන සබ්බං ඤත්තිං න ජානාති. ඤත්තියා [Pg.218] කරණං න ජානාතීති නවසු ඨානෙසු කම්මඤත්තියා කරණං න ජානාති, ද්වීසු ඨානෙසු කම්මපාදඤත්තියා. ඤත්තියා අනුස්සාවනන්ති ‘‘ඉමිස්සා ඤත්තියා එකා අනුස්සාවනා, ඉමිස්සා තිස්සො’’ති න ජානාති. ඤත්තියා සමථං න ජානාතීති ය්වායං සතිවිනයො, අමූළ්හවිනයො, තස්සපාපියසිකා, තිණවත්ථාරකොති චතුබ්බිධො සමථො ඤත්තියා විනා න හොති, තං ඤත්තියා සමථොති න ජානාති. ඤත්තියා වූපසමං න ජානාතීති යං අධිකරණං ඉමිනා චතුබ්බිධෙන ඤත්තිසමථෙන වූපසමති, තස්ස තං වූපසමං ‘‘අයං ඤත්තියා වූපසමො කතො’’ති න ජානාති. ज्ञप्ती जाणत नाही म्हणजे संक्षेपाने ज्ञप्ती दोन प्रकारची आहे— 'ही ज्ञप्ती आहे' अशी निर्दिष्ट केलेली आणि अनिर्दिष्ट केलेली. त्यामध्ये जी अशी अनिर्दिष्ट आहे, ती 'कर्मज्ञप्ती' नावाचे असते. जी निर्दिष्ट आहे, ती 'कर्मपादज्ञप्ती' नावाचे असते, तो सर्व प्रकारे त्या सर्व ज्ञप्तीला जाणत नाही. ज्ञप्तीचे करणे जाणत नाही म्हणजे नऊ स्थानांमध्ये कर्मज्ञप्तीचे करणे आणि दोन स्थानांमध्ये कर्मपादज्ञप्तीचे करणे तो जाणत नाही. ज्ञप्तीचे अनुश्रावण म्हणजे 'या ज्ञप्तीचे एक अनुश्रावण असते, या ज्ञप्तीचे तीन असतात' हे तो जाणत नाही. ज्ञप्तीचा समथ जाणत नाही म्हणजे जो हा सतिविनय, अमूळ्हविनय, तस्सपापिय्यसिका आणि तिणवत्थारक असा चार प्रकारचा समथ ज्ञप्तीशिवाय होत नाही, त्याला 'ज्ञप्तीचा समथ' असे तो जाणत नाही. ज्ञप्तीद्वारे व्युपशम जाणत नाही म्हणजे जे अधिकरण या चार प्रकारच्या ज्ञप्ती-समथाने शांत होते, त्याचा तो व्युपशम 'हा ज्ञप्तीद्वारे व्युपशम केला गेला आहे' हे तो जाणत नाही. සුත්තං න ජානාතීති උභතොවිභඞ්ගං න ජානාති. සුත්තානුලොමං න ජානාතීති චත්තාරො මහාපදෙසෙ න ජානාති. විනයං න ජානාතීති ඛන්ධකපරිවාරං න ජානාති. විනයානුලොමං න ජානාතීති චත්තාරො මහාපදෙසෙයෙව න ජානාති. න ච ඨානාඨානකුසලොති කාරණාකාරණකුසලො න හොති. सुत्त जाणत नाही म्हणजे उभतोविभंग जाणत नाही. सुत्तानुलोम जाणत नाही म्हणजे चार महापदेस जाणत नाही. विनय जाणत नाही म्हणजे खंधक आणि परिवार जाणत नाही. विनयानुलोम जाणत नाही म्हणजे चार महापदेसच जाणत नाही. आणि स्थानास्थानकुशल नसतो म्हणजे कारण आणि अकारण यात कुशल नसतो. ධම්මං න ජානාතීති ඨපෙත්වා විනයපිටකං අවසෙසං පිටකද්වයං න ජානාති. ධම්මානුලොමං න ජානාතීති සුත්තන්තිකෙ චත්තාරො මහාපදෙසෙ න ජානාති. විනයං න ජානාතීති ඛන්ධකපරිවාරමෙව න ජානාති. විනයානුලොමං න ජානාතීති චත්තාරො මහාපදෙසෙ න ජානාති. උභතොවිභඞ්ගා පනෙත්ථ අසඞ්ගහිතා හොන්ති, තස්මායං කුරුන්දියං වුත්තං – ‘‘විනයන්ති සකලං විනයපිටකං න ජානාතී’’ති තං න ගහෙතබ්බං. න ච පුබ්බාපරකුසලො හොතීති පුරෙකථාය ච පච්ඡාකථාය ච අකුසලො හොති. සෙසං සබ්බත්ථ වුත්තපටිපක්ඛවසෙන ඤෙය්යත්තා පුබ්බෙ පකාසිතත්තා ච උත්තානමෙවාති. धम्म जाणत नाही म्हणजे विनयपिटक वगळता उर्वरित दोन पिटक तो जाणत नाही. धम्मानुलोम जाणत नाही म्हणजे सुत्तांमधील चार महापदेस तो जाणत नाही. विनय जाणत नाही म्हणजे खंधक आणि परिवारच तो जाणत नाही. विनयानुलोम जाणत नाही म्हणजे चार महापदेस तो जाणत नाही. परंतु येथे दोन्ही विभंग समाविष्ट केलेले नाहीत, म्हणून कुरुंदीमध्ये जे म्हटले आहे— 'विनय म्हणजे संपूर्ण विनयपिटक तो जाणत नाही'— ते स्वीकारू नये. आणि पूर्वापरकुशल नसतो म्हणजे पूर्व कथेमध्ये आणि पश्चात् कथेमध्ये तो अकुशल असतो. उर्वरित सर्व ठिकाणी सांगितलेल्याच्या विरुद्ध अर्थाने समजून घ्यावे लागणारे असल्यामुळे आणि पूर्वीच प्रकाशित केल्यामुळे स्पष्टच आहे. අනිස්සිතවග්ගනප්පටිප්පස්සම්භනවග්ගවොහාරවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. अनिश्रितवर्ग, अप्रतिप्रस्रंभणवर्ग आणि व्यवहारवर्ग यांची वर्णना समाप्त झाली. දිට්ඨාවිකම්මවග්ගවණ්ණනා दिठ्ठाविकम्मवर्ग वर्णना 425. දිට්ඨාවිකම්මවග්ගෙ – දිට්ඨාවිකම්මාති දිට්ඨීනං ආවිකම්මානි; ලද්ධිප්පකාසනානි ආපත්තිදෙසනාසඞ්ඛාතානං විනයකම්මානමෙතං අධිවචනං. අනාපත්තියා දිට්ඨිං ආවි කරොතීති අනාපත්තිමෙව ආපත්තීති දෙසෙතීති අත්ථො[Pg.219]. අදෙසනාගාමිනියාති ගරුකාපත්තියා දිට්ඨිං ආවිකරොති; සඞ්ඝාදිසෙසඤ්ච පාරාජිකඤ්ච දෙසෙතීති අත්ථො. දෙසිතායාති ලහුකාපත්තියාපි දෙසිතාය දිට්ඨිං ආවිකරොති; දෙසිතං පුන දෙසෙතීති අත්ථො. ४२५. दिठ्ठाविकम्मवर्गात— 'दिठ्ठाविकम्म' म्हणजे दृष्टींचे प्रकटीकरण; किंवा मतांचे प्रकाशन; हे आपत्ती-देशना म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या विनयकर्मांचेच नाव आहे. अनापत्तीने दृष्टी प्रकट करतो म्हणजे अनापत्तीलाच आपत्ती म्हणून देशना करतो, असा अर्थ आहे. अदेशनागामिनीने म्हणजे गुरुकापत्तीने दृष्टी प्रकट करतो; संघादिशेष आणि पाराजिकाची देशना करतो, असा अर्थ आहे. देशित केलेल्याने म्हणजे देशित केलेल्या लहुकापत्तीने देखील दृष्टी प्रकट करतो; देशित केलेल्याची पुन्हा देशना करतो, असा अर्थ आहे. චතූහි පඤ්චහි දිට්ඨින්ති යථා චතූහි පඤ්චහි දිට්ඨි ආවිකතා හොති, එවං ආවිකරොති; චත්තාරො පඤ්ච ජනා එකතො ආපත්තිං දෙසෙන්තීති අත්ථො. මනොමානසෙනාති මනසඞ්ඛාතෙන මානසෙන දිට්ඨිං ආවිකරොති; වචීභෙදං අකත්වා චිත්තෙනෙව ආපත්තිං දෙසෙතීති අත්ථො. चार किंवा पाच जणांसमोर दृष्टी म्हणजे ज्या प्रकारे चार किंवा पाच जणांसमोर दृष्टी प्रकट केली जाते, त्या प्रकारे प्रकट करतो; चार किंवा पाच जण मिळून एकत्र आपत्तीची देशना करतात, असा अर्थ आहे. मनोमानसाने म्हणजे मन नावाच्या मानसाने दृष्टी प्रकट करतो; वाणीचा भेद न करता केवळ चित्तानेच आपत्तीची देशना करतो, असा अर्थ आहे. නානාසංවාසකස්සාති ලද්ධිනානාසංවාසකස්ස වා කම්මනානාසංවාසකස්ස වා සන්තිකෙ දිට්ඨිං ආවිකරොති; ආපත්තිං දෙසෙතීති අත්ථො. නානාසීමායාති සමානසංවාසකස්සාපි නානාසීමාය ඨිතස්ස සන්තිකෙ ආවිකරොති. මාළකසීමාය හි ඨිතෙන සීමන්තරිකාය ඨිතස්ස සීමන්තරිකාය වා ඨිතෙන අවිප්පවාසසීමාය ඨිතස්සාපි ආපත්තිං දෙසෙතුං න වට්ටති. අපකතත්තස්සාති උක්ඛිත්තකස්ස වා, යස්ස වා උපොසථපවාරණා ඨපිතා හොන්ති, තස්ස සන්තිකෙ දෙසෙතීති අත්ථො. नानासंवासकाच्या म्हणजे मताने भिन्न संवास असलेल्या किंवा कर्माने भिन्न संवास असलेल्या भिक्खूच्या जवळ दृष्टी प्रकट करतो; आपत्तीची देशना करतो, असा अर्थ आहे. नानासीमेमध्ये म्हणजे समान संवास असूनही वेगवेगळ्या सीमेमध्ये राहिलेल्या भिक्खूच्या जवळ प्रकट करतो. कारण माळक्सीमेमध्ये राहिलेल्याने सीमंतरीकेमध्ये राहिलेल्याला, किंवा सीमंतरीकेमध्ये राहिलेल्याने अविप्रवाससीमेमध्ये राहिलेल्याला देखील आपत्तीची देशना करणे योग्य नाही. अपकृतत्वाच्या म्हणजे उत्क्षिप्त भिक्खूच्या जवळ, किंवा ज्याचा उपोसथ व प्रवारणा स्थगित केली आहे, त्याच्या जवळ देशना करतो, असा अर्थ आहे. 430. නාලං ඔකාසකම්මං කාතුන්ති න පරියත්තං කාතුං; න කාතබ්බන්ති අත්ථො. ඉධාපි අපකතත්තො උක්ඛිත්තකො ච ඨපිතඋපොසථපවාරණො ච. චාවනාධිප්පායොති සාසනතො චාවෙතුකාමො. ४३०. अवकाशकर्म करण्यास समर्थ नाही म्हणजे करण्यास समर्थ नाही; करू नये, असा अर्थ आहे. येथेही अपकृतत्व म्हणजे उत्क्षिप्त भिक्खू आणि ज्याचा उपोसथ व प्रवारणा स्थगित केली आहे असा भिक्खू होय. च्यवन अभिप्राय म्हणजे शासनातून च्युत करण्याची इच्छा असलेला. 432. මන්දත්තා මොමූහත්තාති මන්දභාවෙන මොමූහභාවෙන විස්සජ්ජිතම්පි ජානිතුං අසමත්ථො, කෙවලං අත්තනො මොමූහභාවං පකාසෙන්තොයෙව පුච්ඡති උම්මත්තකො විය. පාපිච්ඡොති ‘‘එවං මං ජනො සම්භාවෙස්සතී’’ති පාපිකාය ඉච්ඡාය පුච්ඡති. පරිභවාති පරිභවං ආරොපෙතුකාමො හුත්වා පුච්ඡති. අඤ්ඤබ්යාකරණෙසුපි එසෙව නයො. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. අත්තාදානවග්ගෙ ච ධුතඞ්ගවග්ගෙ ච යං වත්තබ්බං සියා, තං සබ්බං හෙට්ඨා වුත්තමෙව. ४३२. "मंदत्ता मोमूहत्ता" (मंदत्वामुळे व अत्यंत मूढत्वामुळे) म्हणजे मंदभावामुळे आणि अत्यंत मूढभावामुळे, आधीच स्पष्ट केलेला अर्थ समजण्यासही असमर्थ असलेला, केवळ स्वतःचा मूढभाव प्रकट करतच वेड्यासारखा प्रश्न विचारतो. "पापिच्छो" (पापी इच्छेमुळे) म्हणजे "लोक माझा अशा प्रकारे आदर करतील" असा विचार करून वाईट इच्छेने विचारतो. "परिभवा" म्हणजे दुसऱ्याचा पराभव करण्याची (कमी लेखण्याची) इच्छा ठेवून विचारतो. इतर उत्तरांमध्येही हाच नियम आहे. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. 'अत्तादानवग्ग' आणि 'धुतंगवग्ग' यांमध्ये जे काही सांगण्यासारखे आहे, ते सर्व आधीच सांगितले गेले आहे. දිට්ඨාවිකම්මවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. दिट्ठाविकम्मवग्गवण्णना समाप्त झाली. මුසාවාදවග්ගවණ්ණනා मुसावादवग्गवण्णना 444. මුසාවාදවග්ගෙ [Pg.220] – පාරාජිකං ගච්ඡතීති පාරාජිකගාමී; පාරාජිකාපත්තිභාවං පාපුණාතීති අත්ථො. ඉතරෙසුපි එසෙව නයො. තත්ථ අසන්තඋත්තරිමනුස්සධම්මාරොචනමුසාවාදො පාරාජිකගාමී, අමූලකෙන පාරාජිකෙන අනුද්ධංසනමුසාවාදො සඞ්ඝාදිසෙසගාමී, ‘‘යො තෙ විහාරෙ වසතී’’තිආදිනා පරියායෙන ජානන්තස්ස වුත්තමුසාවාදො ථුල්ලච්චයගාමී, අජානන්තස්ස දුක්කටගාමී, ‘‘සම්පජානමුසාවාදෙ පාචිත්තිය’’න්ති ආගතො පාචිත්තියගාමීති වෙදිතබ්බො. ४४४. 'मुसावादवग्ग' मध्ये निर्णय असा समजावा – "पाराजिकं गच्छति" (पाराजिक आपत्तीला प्राप्त होतो) म्हणजे 'पाराजिकगामी'; पाराजिक आपत्तीच्या अवस्थेला प्राप्त होतो असा अर्थ आहे. इतरांच्या बाबतीतही (संघादिसेसगामी इत्यादी) हाच नियम आहे. त्यामध्ये, स्वतःमध्ये नसलेल्या उत्तरिमनुस्सधम्माचे (अतिमानुष गुणांचे) प्रकटीकरण करणारे असत्य बोलणे हे 'पाराजिकगामी' (पाराजिक आपत्ती आणणारे) आहे. अमूलक (निराधारी) पाराजिक आरोपाने दोषारोप करणारे असत्य बोलणे हे 'संघादिसेसगामी' आहे. "जो तुमच्या विहारात राहतो, तो अर्हत आहे" इत्यादी पर्यायाने (परोक्ष रीतीने) समजणाऱ्या व्यक्तीला बोललेले असत्य हे 'थुल्लच्चयगामी' (थुल्लच्चय आपत्ती आणणारे) आहे, आणि न समजणाऱ्या व्यक्तीला बोललेले असत्य हे 'दुक्कटगामी' आहे. "संपजानमुसावादे पाचित्तियं" (जाणूनबुजून असत्य बोलल्यास पाचित्तिय होते) या वचनानुसार आलेले असत्य हे 'पाचित्तियगामी' समजावे. අදස්සනෙනාති විනයධරස්ස අදස්සනෙන. කප්පියාකප්පියෙසු හි කුක්කුච්චෙ උප්පන්නෙ විනයධරං දිස්වා කප්පියාකප්පියභාවං පටිපුච්ඡිත්වා අකප්පියං පහාය කප්පියං කරෙය්ය, තං අපස්සන්තො පන අකප්පියම්පි කප්පියන්ති කරොන්තො ආපජ්ජති. එවං ආපජ්ජිතබ්බං ආපත්තිං විනයධරස්ස දස්සනෙන නාපජ්ජති, අදස්සනෙනෙව ආපජ්ජති, තෙන වුත්තං ‘‘අදස්සනෙනා’’ති. අස්සවනෙනාති එකවිහාරෙපි වසන්තො පන විනයධරස්ස උපට්ඨානං ගන්ත්වා කප්පියාකප්පියං අපුච්ඡිත්වා වා අඤ්ඤෙසඤ්ච වුච්චමානං අසුණන්තො ආපජ්ජතියෙව, තෙන වුත්තං ‘‘අස්සවනෙනා’’ති. පසුත්තකතාති පසුත්තකතාය. සහගාරසෙය්යඤ්හි පසුත්තකභාවෙනපි ආපජ්ජති. අකප්පියෙ කප්පියසඤ්ඤිතාය ආපජ්ජන්තො පන තථාසඤ්ඤී ආපජ්ජති. සතිසම්මොසා එකරත්තාතික්කමාදිවසෙන ආපජ්ජිතබ්බං ආපජ්ජති. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. "अदस्सनेन" (न पाहिल्यामुळे) म्हणजे विनयधराला (विनयधराचे दर्शन न झाल्यामुळे). कारण, कप्पिय-अकप्पिय (योग्य-अयोग्य) गोष्टींविषयी शंका (कुक्कुच्च) निर्माण झाली असता, विनयधराला पाहून, कप्पिय-अकप्पिय भावाविषयी विचारून, अकप्पिय सोडून कप्पिय करावे. परंतु, त्याला न पाहणारा मनुष्य अकप्पिय गोष्टीलाही कप्पिय समजून करत असताना आपत्तीला प्राप्त होतो. अशा प्रकारे प्राप्त होणाऱ्या आपत्तीला विनयधराच्या दर्शनाने प्राप्त होत नाही, केवळ न दर्शनानेच प्राप्त होतो, म्हणून भगवंतांनी "अदस्सनेन" असे म्हटले आहे. "अस्सवननेन" (न ऐकल्यामुळे) म्हणजे एकाच विहारात राहत असूनही विनयधराच्या सेवेत जाऊन कप्पिय-अकप्पिय गोष्टींविषयी न विचारता किंवा इतरांना सांगितले जात असलेले न ऐकल्यामुळे आपत्तीला प्राप्त होतोच, म्हणून भगवंतांनी "अस्सवननेन" असे म्हटले आहे. "पसुत्तकता" म्हणजे झोपलेले असल्यामुळे. कारण, झोपलेल्या अवस्थेतही 'सहगारसेय्या' (एकाच छताखाली झोपण्याची) आपत्ती प्राप्त होते. अकप्पिय गोष्टीमध्ये कप्पिय अशी संज्ञा (समज) ठेवून आपत्ती प्राप्त करून घेणारा मनुष्य तशी संज्ञा ठेवूनच आपत्तीला प्राप्त होतो. 'सतिसम्मोसा' (स्मृतीच्या भ्रंशामुळे/विसरल्यामुळे) म्हणजे एक रात्र उलटून जाणे इत्यादींच्या प्रभावाने प्राप्त होणाऱ्या आपत्तीला प्राप्त होतो. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. මුසාවාදවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. मुसावादवग्गवण्णना समाप्त झाली. භික්ඛුනොවාදවග්ගවණ්ණනා भिक्खुनोवादवग्गवण्णना 450. භික්ඛුනිවග්ගෙ – අලාභායාති චතුන්නං පච්චයානං අලාභත්ථාය; යථා පච්චයෙ න ලභන්ති, තථා පරිසක්කති වායමතීති අත්ථො. අනත්ථායාති අනත්ථං කලිසාසනං ආරොපෙන්තො පරිසක්කති. අවාසායාති අවාසත්ථාය; යස්මිං ගාමඛෙත්තෙ වසන්ති, තතො නීහරණත්ථාය. සම්පයොජෙතීති අසද්ධම්මපටිසෙවනත්ථාය සම්පයොජෙති. ४५०. 'भिक्खुनीवग्ग' मध्ये निर्णय असा समजावा – "अलाभाय" म्हणजे चार प्रत्ययांच्या (गरजांच्या) अलाभासाठी (न मिळण्यासाठी); ज्या प्रकारे भिक्खुनींना प्रत्यय मिळू नयेत, त्या प्रकारे प्रयत्न करतो, धडपड करतो असा अर्थ आहे. "अनत्थाय" म्हणजे अनर्थकारक (नुकसानकारक) कठोर शासन लादण्यासाठी प्रयत्न करतो. "अवासाय" म्हणजे राहू न देण्यासाठी; ज्या ग्रामक्षेत्रात (गावात) भिक्खुनी राहतात, तेथून त्यांना हाकलून देण्यासाठी प्रयत्न करतो. "सम्पयोजेति" म्हणजे असद्धम्माचे (मैथुन धर्माचे) सेवन करण्यासाठी प्रवृत्त करतो. 451. ‘‘කතිහි [Pg.221] නු ඛො භන්තෙ අඞ්ගෙහි සමන්නාගතාය භික්ඛුනියා කම්මං කාතබ්බ’’න්ති සත්තන්නං කම්මානං අඤ්ඤතරං සන්ධාය පුච්ඡති. ४५१. "भन्ते, किती अंगांनी युक्त असलेल्या भिक्खुनीवर कर्म केले पाहिजे?" हा प्रश्न आयुष्यमान उपाली थेर सात कर्मांपैकी एका कर्माला उद्देशून विचारतात. 454. න සාකච්ඡාතබ්බොති කප්පියාකප්පියනාමරූපපරිච්ඡෙදසමථවිපස්සනාදිභෙදො කථාමග්ගො න කථෙතබ්බො. යස්මා පන ඛීණාසවො භික්ඛු න විසංවාදෙති, තථාරූපස්ස කථාමග්ගස්ස සාමී හුත්වා කථෙති, න ඉතරො; තස්මා පඨමපඤ්චකෙ ‘‘න අසෙක්ඛෙනා’’ති පටික්ඛිපිත්වා දුතියපඤ්චකෙ ‘‘අසෙක්ඛෙනා’’තිආදි වුත්තං. ४५४. "न साकच्छितब्बो" (चर्चा करू नये) म्हणजे कप्पिय-अकप्पिय, नाम-रूप परिच्छेद, समथ-विपस्सना इत्यादी भेद असलेला कथाप्रवाह (चर्चा) करू नये. परंतु, ज्याअर्थी क्षीणासव (अर्हत) भिक्खू विसंवाद करत नाही, तो अशा प्रकारच्या कथाप्रवाहाचा स्वामी होऊन बोलतो, इतर (अनर्हत) नाही; म्हणून पहिल्या पंचकात "न असेक्खेन" (असेक्ख नसलेल्याने) असे नाकारून, दुसऱ्या पंचकात "असेक्खेन" (असेक्खाने) इत्यादी भगवंतांनी सांगितले आहे. න අත්ථපටිසම්භිදාපත්තොති අට්ඨකථාය පටිසම්භිදාපත්තො පභෙදගතඤාණප්පත්තො න හොති. න ධම්මපටිසම්භිදාපත්තොති පාළිධම්මෙ පටිසම්භිදාපත්තො න හොති. න නිරුත්තිපටිසම්භිදාපත්තොති වොහාරනිරුත්තියං පටිසම්භිදාපත්තො න හොති. න පටිභානපටිසම්භිදාපත්තොති යානි තානි පටිභානසඞ්ඛාතානි අත්ථපටිසම්භිදාදීනි ඤාණානි, තෙසු පටිසම්භිදාපත්තො න හොති. යථාවිමුත්තං චිත්තං න පච්චවෙක්ඛිතාති චතුන්නං ඵලවිමුත්තීනං වසෙන යථාවිමුත්තං චිත්තං එකූනවීසතිභෙදාය පච්චවෙක්ඛණාය න පච්චවෙක්ඛිතා හොති. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. "न अत्थपटिसम्भिदापत्तो" म्हणजे अट्ठकथेमध्ये (अर्थात) प्रतिसंभिदा प्राप्त झालेला, प्रभेदगत ज्ञानाला प्राप्त झालेला नसतो. "न धम्मपटिसम्भिदापत्तो" म्हणजे पाळिधम्मामध्ये प्रतिसंभिदा प्राप्त झालेला नसतो. "न निरुत्तिपटिसम्भिदापत्तो" म्हणजे व्यवहारनिरुक्तीमध्ये (भाषेमध्ये) प्रतिसंभिदा प्राप्त झालेला नसतो. "न पटिभानपटिसम्भिदापत्तो" म्हणजे जी प्रतिभानसंज्ञक अत्थप्रतिसंभिदा इत्यादी ज्ञाने आहेत, त्या ज्ञानांमध्ये प्रतिसंभिदा प्राप्त झालेला नसतो. "यथाविमुत्तं चित्तं न पच्चवेक्खिता" म्हणजे चार फलविमुक्तींच्या द्वारे जसे विमुक्त झाले आहे अशा चित्ताचे, एकोणीस प्रकारच्या प्रत्यावेक्षण ज्ञानाने प्रत्यावेक्षण (अवलोकन) केलेले नसते. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. භික්ඛුනොවාදවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. भिक्खुनोवादवग्गवण्णना समाप्त झाली. උබ්බාහිකවග්ගවණ්ණනා उब्बाहिकवग्गवण्णना 455. උබ්බාහිකවග්ගෙ – න අත්ථකුසලොති න අට්ඨකථාකුසලො; අත්ථුද්ධාරෙ ඡෙකො න හොති. න ධම්මකුසලොති ආචරියමුඛතො අනුග්ගහිතත්තා පාළියං න කුසලො, න පාළිසූරො. න නිරුත්තිකුසලොති භාසන්තරවොහාරෙ න කුසලො. න බ්යඤ්ජනකුසලොති සිථිලධනිතාදිවසෙන පරිමණ්ඩලබ්යඤ්ජනාරොපනෙ කුසලො න හොති; න අක්ඛරපරිච්ඡෙදෙ නිපුණොති අත්ථො. න පුබ්බාපරකුසලොති අත්ථපුබ්බාපරෙ ධම්මපුබ්බාපරෙ නිරුත්තිපුබ්බාපරෙ බ්යඤ්ජනපුබ්බාපරෙ පුරෙකථාපච්ඡාකථාසු ච න කුසලො හොති. ४५५. 'उब्बाहिकवग्ग' मध्ये – "न अत्थकुसलो" म्हणजे अट्ठकथेमध्ये कुशल नसलेला; अर्थाचे स्पष्टीकरण करण्यात चतुर नसलेला. "न धम्मकुसलो" म्हणजे आचार्यांच्या मुखातून थेट ग्रहण न केल्यामुळे पाळिमध्ये कुशल नसलेला, पाळिमध्ये धाडसी नसलेला. "न निरुत्तिकुसलो" म्हणजे इतर भाषांच्या व्यवहारात कुशल नसलेला. "न ब्यञ्जनकुसलो" म्हणजे शिथिल-धणित इत्यादींच्या प्रभावाने परिमंडळ व्यंजनांच्या उच्चारणात कुशल नसलेला; अक्षरांच्या विभागात निपुण नसलेला असा अर्थ आहे. "न पुब्बापरकुसलो" म्हणजे अट्ठकथेच्या पूर्व-अपर (मागील-पुढील) संदर्भात, पाळिच्या पूर्व-अपर संदर्भात, निरुक्तीच्या पूर्व-अपर संदर्भात, व्यंजनांच्या पूर्व-अपर संदर्भात आणि आधी बोलण्याच्या व नंतर बोलण्याच्या गोष्टींमध्ये कुशल नसलेला. කොධනොතිආදීනි යස්මා කොධාදීහි අභිභූතො කාරණාකාරණං න ජානාති, විනිච්ඡිතුං න සක්කොති, තස්මා වුත්තානි. පසාරෙතා හොති [Pg.222] නො සාරෙතාති මොහෙතා හොති, න සතිඋප්පාදෙතා; චොදකචුදිතකානං කථං මොහෙති පිදහති න සාරෙතීති අත්ථො. සෙසමෙත්ථ උබ්බාහිකවග්ගෙ උත්තානමෙවාති. "कोधनो" (क्रोधी) इत्यादी शब्द यासाठी सांगितले आहेत कारण क्रोधादी विकारांनी ग्रासलेला मनुष्य योग्य-अयोग्य कारण जाणत नाही आणि निर्णय घेण्यास समर्थ नसतो. "पसारेता होति नो सारेता" म्हणजे संभ्रमित करणारा असतो, स्मृती जागृत करणारा नसतो; चोदक (आरोप करणारा) आणि चोदितक (आरोपी) यांच्या संभाषणाला संभ्रमित करतो, झाकून टाकतो, स्मृती जागृत करत नाही असा अर्थ आहे. या उब्बाहिकवग्ग मधील उर्वरित सर्व अर्थ स्पष्टच आहे. උබ්බාහිකවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. उब्बाहिकवग्गवण्णना समाप्त झाली. අධිකරණවූපසමවග්ගවණ්ණනා अधिकरणवूपसमवग्गवण्णना 457. අධිකරණවූපසමවග්ගෙ – පුග්ගලගරු හොතීති ‘‘අයං මෙ උපජ්ඣායො, අයං මෙ ආචරියො’’තිආදීනි චින්තෙත්වා තස්ස ජයං ආකඞ්ඛමානො ‘‘අධම්මං ධම්මො’’ති දීපෙති. සඞ්ඝගරු හොතීති ධම්මඤ්ච විනයඤ්ච අමුඤ්චිත්වා විනිච්ඡිනන්තො සඞ්ඝගරුකො නාම හොති. චීවරාදීනි ගහෙත්වා විනිච්ඡිනන්තො ආමිසගරුකො නාම හොති, තානි අග්ගහෙත්වා යථාධම්මං විනිච්ඡිනන්තො සද්ධම්මගරුකො නාම හොති. ४५७. 'अधिकरणवूपसमवग्ग' मध्ये – "पुग्गलगुरु होति" (पुद्गल-गुरु असणे) म्हणजे "हे माझे उपाज्झाय (उपाध्याय) आहेत, हे माझे आचार्य आहेत" इत्यादी विचार करून, त्यांच्या विजयाची आकांक्षा ठेवून "अधम्माला धम्म" म्हणून दाखवतो. "संघगुरु होति" म्हणजे धम्म आणि विनय न सोडता निर्णय देणारा विनयधर हा 'संघगरुक' (संघाचा आदर करणारा) असतो. चीवर इत्यादी लाभ घेऊन निर्णय देणारा 'आमिसगरुक' (आमिषाचा आदर करणारा) असतो, आणि ते न घेता धर्मानुसार निर्णय देणारा 'सद्धम्मगरुक' (सद्धम्माचा आदर करणारा) असतो. 458. පඤ්චහුපාලි ආකාරෙහීති පඤ්චහි කාරණෙහි සඞ්ඝො භිජ්ජති – කම්මෙන, උද්දෙසෙන, වොහරන්තො, අනුස්සාවනෙන, සලාකග්ගාහෙනාති. එත්ථ කම්මෙනාති අපලොකනාදීසු චතූසු කම්මෙසු අඤ්ඤතරෙන කම්මෙන. උද්දෙසෙනාති පඤ්චසු පාතිමොක්ඛුද්දෙසෙසු අඤ්ඤතරෙන උද්දෙසෙන. වොහරන්තොති කථයන්තො; තාහි තාහි උපපත්තීහි ‘‘අධම්මං ධම්මො’’තිආදීනි අට්ඨාරස භෙදකරවත්ථූනි දීපෙන්තො. අනුස්සාවනෙනාති ‘‘නනු තුම්හෙ ජානාථ මය්හං උච්චාකුලා පබ්බජිතභාවං බහුස්සුතභාවඤ්ච, මාදිසො නාම උද්ධම්මං උබ්බිනයං සත්ථු සාසනං ගාහෙය්යාති චිත්තම්පි උප්පාදෙතුං තුම්හාකං යුත්තං, කිං මය්හං අවීචි නීලුප්පලවනමිව සීතලො, කිමහං අපායතො න භායාමී’’තිආදිනා නයෙන කණ්ණමූලෙ වචීභෙදං කත්වා අනුස්සාවනෙන. සලාකග්ගාහෙනාති එවං අනුස්සාවෙත්වා තෙසං චිත්තං උපත්ථම්භෙත්වා අනිවත්තිධම්මෙ කත්වා ‘‘ගණ්හථ ඉමං සලාක’’න්ති සලාකග්ගාහෙන. ४५८. पाच आकारांनी (कारणांनी) उपालि, संघ भेद पावतो – कर्माने, उद्देशाने, बोलण्याने (व्यवहाराने), अनुस्रावणाने (घोषणा ऐकविण्याने) आणि शलाकाग्रहणाने (मतपत्रिका स्वीकारण्याने). येथे 'कर्माने' म्हणजे अपलोकन इत्यादी चार प्रकारच्या संघकर्मांपैकी कोणत्याही एका कर्माने. 'उद्देशाने' म्हणजे पाच पातिमोक्ख उद्देशांपैकी कोणत्याही एका उद्देशाने. 'व्यवहार' (वहरन्तो) म्हणजे बोलणारा; त्या त्या योग्य कारणांनी 'अधम्म हा धम्म आहे' इत्यादी अठरा भेदकारक वस्तू (मुद्दे) स्पष्ट करून सांगणारा. 'अनुस्रावणाने' म्हणजे 'तुम्हाला माहीत नाही का की मी उच्च कुळात जन्मून प्रव्रजित झालो आहे आणि बहुश्रुत आहे? माझ्यासारख्याने शास्त्यांच्या शासनाला अधम्म आणि अविणय म्हणून ग्रहण करावे, असा विचार मनात आणणे तरी तुम्हाला योग्य आहे का? माझ्यासाठी अवीची नरक काय निळ्या कमळांच्या वनासारखा शीतल आहे? मी अपायाला (नरकाला) भीत नाही काय?' अशा प्रकारे कानाच्या जवळ शब्दांचा उच्चार करून (फूस लावून) ऐकविणे. 'शलाकाग्रहणाने' म्हणजे अशा प्रकारे ऐकवून (घोषणा करून) त्यांचे मन दृढ करून, त्यांना मागे न हटणारे बनवून 'ही शलाका (मतपत्रिका) घ्या' असे सांगून शलाका ग्रहण करायला लावणे. එත්ථ ච කම්මමෙව උද්දෙසො වා පමාණං, වොහාරානුස්සාවනසලාකග්ගාහා පන පුබ්බභාගා. අට්ඨාරසවත්ථුදීපනවසෙන හි වොහරන්තෙ තත්ථ රුචිජනනත්ථං [Pg.223] අනුස්සාවෙත්වා සලාකාය ගාහිතායපි අභින්නොව හොති සඞ්ඝො. යදා පන එවං චත්තාරො වා අතිරෙකෙ වා සලාකං ගාහෙත්වා ආවෙණිකං කම්මං වා උද්දෙසං වා කරොති, තදා සඞ්ඝො භින්නො නාම හොති. ඉති යං සඞ්ඝභෙදකක්ඛන්ධකවණ්ණනායං අවොචුම්හා ‘‘එවං අට්ඨාරසසු වත්ථූසු යංකිඤ්චි එකම්පි වත්ථුං දීපෙත්වා තෙන තෙන කාරණෙන ‘ඉමං ගණ්හථ, ඉමං රොචෙථා’ති සඤ්ඤාපෙත්වා සලාකං ගාහෙත්වා විසුං සඞ්ඝකම්මෙ කතෙ සඞ්ඝො භින්නො හොති. පරිවාරෙ පන ‘පඤ්චහි, උපාලි, ආකාරෙහි සඞ්ඝො භිජ්ජතී’තිආදි වුත්තං. තස්ස ඉමිනා ඉධ වුත්තෙන සඞ්ඝභෙදලක්ඛණෙන අත්ථතො නානාකරණං නත්ථි. තං පනස්ස නානාකරණාභාවං තත්ථෙව පකාසයිස්සාමා’’ති, ස්වායං පකාසිතො හොති. आणि येथे कर्म किंवा उद्देश हेच प्रमाण (मुख्य) आहे; परंतु व्यवहार, अनुस्रावण आणि शलाकाग्रहण हे पूर्वभाग (पूर्व तयारी) आहेत. कारण अठरा वस्तूंचे स्पष्टीकरण करण्याच्या उद्देशाने बोलत असताना, त्याविषयी आवड निर्माण करण्यासाठी अनुस्रावण करून शलाका ग्रहण करायला लावली तरीही संघ तोपर्यंत भिन्न (विभक्त) होत नाही. पण जेव्हा अशा प्रकारे चार किंवा त्याहून अधिक भिक्खू शलाका ग्रहण करून स्वतंत्र (आवेणिक) कर्म किंवा उद्देश करतात, तेव्हा संघ भिन्न (विभक्त) झाला असे म्हणतात. म्हणून जे आम्ही संघभेदक खन्धक वर्णनेत म्हटले होते: 'अशा प्रकारे अठरा वस्तूंमध्ये कोणत्याही एका वस्तूचे स्पष्टीकरण करून, त्या त्या कारणाने 'हे ग्रहण करा, हे पसंत करा' असे समजावून सांगून, शलाका ग्रहण करायला लावून स्वतंत्र संघकर्म केले असता संघ भिन्न होतो. परंतु परिवारात 'पाच आकारांनी, उपालि, संघ भेद पावतो' इत्यादी भगवंतांनी म्हटले आहे. त्याचा येथे सांगितलेल्या संघभेद लक्षणाशी अर्थाच्या दृष्टीने काही फरक नाही. तो फरकाचा अभाव आम्ही तिथेच (परिवाराच्या अट्ठकथेत) स्पष्ट करू', ते येथे स्पष्ट झाले आहे. පඤ්ඤත්තෙතන්ති පඤ්ඤත්තං එතං. ක්ව පඤ්ඤත්තං? වත්තක්ඛන්ධකෙ. තත්ර හි චුද්දස ඛන්ධකවත්තානි පඤ්ඤත්තානි. තෙනාහ – ‘‘පඤ්ඤත්තෙතං, උපාලි, මයා ආගන්තුකානං භික්ඛූනං ආගන්තුකවත්ත’’න්තිආදි. එවම්පි ඛො උපාලි සඞ්ඝරාජි හොති, නො ච සඞ්ඝභෙදොති එත්තාවතා හි සඞ්ඝරාජිමත්තමෙව හොති, න තාව සඞ්ඝභෙදො; අනුපුබ්බෙන පන අයං සඞ්ඝරාජි වඩ්ඪමානා සඞ්ඝභෙදාය සංවත්තතීති අත්ථො. යථාරත්තන්ති රත්තිපරිමාණානුරූපං; යථාථෙරන්ති අත්ථො. ආවෙනිභාවං කරිත්වාති විසුං වවත්ථානං කරිත්වා. කම්මාකම්මානි කරොන්තීති අපරාපරං සඞ්ඝකම්මං උපාදාය ඛුද්දකානි චෙව මහන්තානි ච කම්මානි කරොන්ති. සෙසමෙත්ථාපි අධිකරණවූපසමවග්ගෙ උත්තානමෙව. 'प्रज्ञप्त' (पञ्ञत्तं) म्हणजे हे प्रज्ञप्त (नियमबद्ध) केले आहे. कुठे प्रज्ञप्त केले आहे? वत्तक्खन्धकात. कारण तिथे चौदा खन्धक-वृत्ते प्रज्ञप्त केली आहेत. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे – 'उपालि, माझ्याद्वारे आगंतुक भिक्खूंसाठी हे आगंतुक वृत्त प्रज्ञप्त केले गेले आहे' इत्यादी. 'अशा प्रकारे सुद्धा, उपालि, संघात केवळ राजी (तूट/दरार) पडते, संघभेद होत नाही' याचा अर्थ एवढ्या कारणाने केवळ संघात दरार पडते, अजून संघभेद होत नाही; परंतु अनुक्रमाने ही संघातील दरार वाढत जाऊन संघभेदाला कारणीभूत ठरते, असा अर्थ आहे. 'यथारत्तं' म्हणजे रात्रीच्या प्रमाणावरून (दीक्षा घेतल्याच्या कालावधीनुसार); ज्येष्ठतेनुसार (यथाथेरं) असा अर्थ आहे. 'आवेणिभावं करित्वा' म्हणजे स्वतंत्रपणे विभागणी करून. 'कम्माकम्मानि करोन्ति' म्हणजे एकामागून एक संघकर्म घेऊन लहान आणि मोठी कर्मे करतात. येथील उर्वरित भाग अधिकरणवूपसम वर्गात सांगितल्याप्रमाणेच स्पष्ट आहे. සඞ්ඝභෙදකවග්ගද්වයවණ්ණනා संघभेदकवग्गद्वयवर्णना 459. සඞ්ඝභෙදවග්ගද්වයෙ – විනිධාය දිට්ඨිං කම්මෙනාති තෙසු අධම්මාදීසු අධම්මාදයො එතෙති එවංදිට්ඨිකොව හුත්වා තං දිට්ඨිං විනිධාය තෙ ධම්මාදිවසෙන දීපෙත්වා විසුං කම්මං කරොති. ඉති යං විනිධාය දිට්ඨිං කම්මං කරොති, තෙන එවං කතෙන විනිධාය දිට්ඨිං කම්මෙන සද්ධිං පඤ්චඞ්ගානි හොන්ති, ‘‘ඉමෙහි ඛො උපාලි පඤ්චහඞ්ගෙහී’’ති අයමෙකස්මිං පඤ්චකෙ අත්ථයොජනා. එතෙන නයෙන සබ්බපඤ්චකානි වෙදිතබ්බානි. එත්ථාපි ච වොහාරාදි අඞ්ගත්තයං පුබ්බභාගවසෙනෙව වුත්තං. කම්මුද්දෙසවසෙන පන අතෙකිච්ඡතා වෙදිතබ්බා. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙව. න හෙත්ථ කිඤ්චි අත්ථි යං පුබ්බෙ අවුත්තනයං. ४५९. संघभेद वर्गद्वयात – 'विनिधाय दिट्ठिं कम्मेन' म्हणजे त्या अधम्म इत्यादींमध्ये 'हे अधम्म इत्यादी आहेत' अशीच दृष्टी ठेवून, ती दृष्टी लपवून (बाजूला ठेवून), त्यांना धम्म इत्यादी रूपाने स्पष्ट करून स्वतंत्र कर्म करतो. अशा प्रकारे दृष्टी लपवून जे कर्म करतो, त्या दृष्टी लपवून केलेल्या कर्मासह पाच अंगे होतात. 'उपालि, या पाच अंगांनी...' ही एका पंचकातील अर्थयोजना आहे. या पद्धतीने सर्व पंचके समजून घ्यावीत. येथेही व्यवहार इत्यादी तीन अंगे पूर्वभागाच्या (पूर्व तयारीच्या) स्वरूपातच भगवंतांनी सांगितली आहेत. परंतु कर्म आणि उद्देशाच्या आधारे अचिकित्स्यता (असाध्यता) समजून घ्यावी. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. येथे असे काहीही नाही जे पूर्वी सांगितले गेले नाही. ආවාසිකවග්ගවණ්ණනා आवासिकवग्गवर्णना 461. ආවාසිකවග්ගෙ [Pg.224] – යථාභතං නික්ඛිත්තොති යථා ආහරිත්වා ඨපිතො. ४६१. आवासिक वर्गात – 'यथाभतं निक्खित्तो' म्हणजे जसे (यमदूतांनी) आणून नरकात ठेवले असावे, तसे (छंद, द्वेष इत्यादींमुळे नरकात ठेवल्यासारखा). 462. විනයබ්යාකරණාති විනයපඤ්හෙ විස්සජ්ජනා. පරිණාමෙතීති නියාමෙති දීපෙති කථෙති. සෙසමෙත්ථ උත්තානමෙව. ४६२. 'विनयव्याकरण' म्हणजे विनयविषयक प्रश्नांची उत्तरे देणे. 'परिणामेति' म्हणजे निश्चित करतो, स्पष्ट करतो, सांगतो. येथील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. කථිනත්ථාරවග්ගවණ්ණනා कठिनत्थारवग्गवर्णना 467. කථිනත්ථාරවග්ගෙ – ඔතමසිකොති අන්ධකාරගතො; තඤ්හි වන්දන්තස්ස මඤ්චපාදාදීසුපි නලාටං පටිහඤ්ඤෙය්ය. අසමන්නාහරන්තොති කිච්චයපසුතත්තා වන්දනං අසමන්නාහරන්තො. සුත්තොති නිද්දං ඔක්කන්තො. එකාවත්තොති එකතො ආවත්තො සපත්තපක්ඛෙ ඨිතො වෙරී විසභාගපුග්ගලො වුච්චති; අයං අවන්දියො. අයඤ්හි වන්දියමානො පාදෙනපි පහරෙය්ය. අඤ්ඤවිහිතොති අඤ්ඤං චින්තයමානො. ४६७. कठिनत्थार वर्गात – 'ओतमसिको' म्हणजे अंधारात असलेला मनुष्य; कारण त्याला वंदन करणाऱ्याचे कपाळ खाटेच्या पायाला इत्यादींना देखील आदळू शकते. 'असमन्नाहरन्तो' म्हणजे इतर कामात व्यस्त असल्यामुळे वंदनाकडे लक्ष न देणारा. 'सुत्तो' म्हणजे झोपलेला (निद्रेत असलेला). 'एकावत्तो' म्हणजे एका बाजूला वळलेला, शत्रूच्या पक्षात असलेला, वैरी, विसभागीय (असहमत) व्यक्तीला 'एकावत्त' म्हटले जाते; हा अवंदनीय (वंदन न करण्यास योग्य) आहे. कारण त्याला वंदन केले असता तो पायाने देखील लाथ मारू शकतो. 'अञ्ञविहितो' म्हणजे दुसऱ्याच गोष्टीचा विचार करत असलेला. ඛාදන්තොති පිට්ඨඛජ්ජකාදීනි ඛාදන්තො. උච්චාරඤ්ච පස්සාවඤ්ච කරොන්තො අනොකාසගතත්තා අවන්දියො. උක්ඛිත්තකොති තිවිධෙනපි උක්ඛෙපනීයකම්මෙන උක්ඛිත්තකො අවන්දියො. තජ්ජනීයාදිකම්මකතා පන චත්තාරො වන්දිතබ්බා. උපොසථපවාරණාපි තෙහි සද්ධිං ලබ්භන්ති. ආදිතො පට්ඨාය ච වුත්තෙසු අවන්දියෙසු නග්ගඤ්ච උක්ඛිත්තකඤ්ච වන්දන්තස්සෙව ආපත්ති. ඉතරෙසං පන අසාරුප්පට්ඨෙන ච අන්තරා වුත්තකාරණෙන ච වන්දනා පටික්ඛිත්තා. ඉතො පරං පච්ඡාඋපසම්පන්නාදයො දසපි ආපත්තිවත්ථුභාවෙනෙව අවන්දියා. තෙ වන්දන්තස්ස හි නියමෙනෙව ආපත්ති. ඉති ඉමෙසු පඤ්චසු පඤ්චකෙසු තෙරස ජනෙ වන්දන්තස්ස අනාපත්ති, ද්වාදසන්නං වන්දනාය ආපත්ති. 'खादन्तो' म्हणजे पिठाचे खाद्यपदार्थ इत्यादी खात असलेला. मलमूत्र विसर्जन करत असलेला, अयोग्य ठिकाणी असल्यामुळे अवंदनीय आहे. 'उक्खित्तको' म्हणजे तिन्ही प्रकारच्या उत्क्षेपणीय कर्माने बहिष्कृत केलेला भिक्खू अवंदनीय आहे. परंतु तज्जनीय इत्यादी कर्मे ज्यांच्यावर केली आहेत असे चार भिक्खू वंदनीय आहेत. त्यांच्यासोबत उपोसथ आणि पवारणा देखील करता येते. सुरुवातीपासून सांगितलेल्या अवंदनीयांमध्ये नग्न आणि बहिष्कृत (उक्खित्तक) व्यक्तीला वंदन करणाऱ्यालाच आपत्ती (दोष) होते. इतरांच्या बाबतीत मात्र अयोग्यतेमुळे आणि मध्ये सांगितलेल्या कारणांमुळे वंदन निषिद्ध केले आहे. यानंतर, नंतर उपसंपदा घेतलेले इत्यादी दहा जण देखील आपत्तीचे कारण असल्यामुळेच अवंदनीय आहेत. त्यांना वंदन करणाऱ्याला निश्चितपणे आपत्ती होते. अशा प्रकारे, या पाच पंचकांमध्ये तेरा जणांना वंदन केल्यास अनापत्ती (दोष नाही) होते, तर बारा जणांना वंदन केल्यास आपत्ती होते. 468. ආචරියො වන්දියොති පබ්බජ්ජාචරියො උපසම්පදාචරියො නිස්සයාචරියො උද්දෙසාචරියො ඔවාදාචරියොති අයං පඤ්චවිධොපි ආචරියො වන්දියො. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. ४६८. 'आचार्याला वंदन करावे' म्हणजे प्रव्रज्या-आचार्य, उपसंपदा-आचार्य, निश्रय-आचार्य, उद्देश-आचार्य आणि ओवाद-आचार्य (उपदेश देणारे आचार्य) असे हे पाचही प्रकारचे आचार्य वंदनीय आहेत. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. කථිනත්ථාරවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. कठिनत्थारवग्गवर्णना समाप्त झाली. නිට්ඨිතා ච උපාලිපඤ්චකවණ්ණනා. आणि उपालिपंचकवर्णना समाप्त झाली. ආපත්තිසමුට්ඨානවණ්ණනා आपत्तिसमुट्ठानवर्णना 470. අචිත්තකො [Pg.225] ආපජ්ජතීතිආදීසු සහසෙය්යාදිපණ්ණත්තිවජ්ජං අසඤ්චිච්ච ආපජ්ජන්තො අචිත්තකො ආපජ්ජති, දෙසෙන්තො සචිත්තකො වුට්ඨාති. යංකිඤ්චි සඤ්චිච්ච ආපජ්ජන්තො සචිත්තකො ආපජ්ජති, තිණවත්ථාරකෙන වුට්ඨහන්තො අචිත්තකො වුට්ඨාති. පුබ්බෙ වුත්තමෙව තිණවත්ථාරකෙන වුට්ඨහන්තො අචිත්තකො ආපජ්ජති, අචිත්තකො වුට්ඨාති. ඉතරං දෙසෙන්තො සචිත්තකො ආපජ්ජති, සචිත්තකො වුට්ඨාති. ‘‘ධම්මදානං කරොමී’’ති පදසොධම්මාදීනි කරොන්තො කුසලචිත්තො ආපජ්ජති, ‘‘බුද්ධානං අනුසාසනිං කරොමී’’ති උදග්ගචිත්තො දෙසෙන්තො කුසලචිත්තො වුට්ඨාති. දොමනස්සිකො හුත්වා දෙසෙන්තො අකුසලචිත්තො වුට්ඨාති, තිණවත්ථාරකෙන නිද්දාගතොව වුට්ඨහන්තො අබ්යාකතචිත්තො වුට්ඨාති. භිංසාපනාදීනි කත්වා ‘‘බුද්ධානං සාසනං කරොමී’’ති සොමනස්සිකො දෙසෙන්තො අකුසලචිත්තො ආපජ්ජති, කුසලචිත්තො වුට්ඨාති. දොමනස්සිකොව දෙසෙන්තො අකුසලචිත්තො වුට්ඨාති, වුත්තනයෙනෙව තිණවත්ථාරකෙන වුට්ඨහන්තො අබ්යාකතචිත්තො වුට්ඨාති. නිද්දොක්කන්තසමයෙ සහගාරසෙය්යං ආපජ්ජන්තො අබ්යාකතචිත්තො ආපජ්ජති, වුත්තනයෙනෙව පනෙත්ථ ‘‘කුසලචිත්තො වුට්ඨාතී’’තිආදි වෙදිතබ්බං. ४७०. "अचित्तको आपज्जति" इत्यादींमध्ये नियमभंगजन्य (सहशय्या इत्यादी प्रज्ञप्तिवज्ज) आपत्तीला जाणूनबुजून न करता (अजाणतेपणे) प्राप्त होणारा भिक्खू 'अचित्तक' (चित्त नसलेला) होऊन आपत्तीला प्राप्त होतो, आणि (आपत्तीची) देशना करताना 'सचित्तक' (चित्त असलेला) होऊन उठतो. कोणतीही आपत्ती जाणूनबुजून प्राप्त करून घेणारा 'सचित्तक' होऊन आपत्तीला प्राप्त होतो, आणि तिणवत्थारकाने (तृणप्रस्तारक समथाने) उठणारा 'अचित्तक' होऊन उठतो. पूर्वी सांगितलेल्याच (सहशय्या इत्यादी प्रज्ञप्तिवज्ज आपत्तीमध्ये) तिणवत्थारकाने उठणारा 'अचित्तक' होऊन आपत्तीला प्राप्त होतो आणि 'अचित्तक' होऊन उठतो. इतर (सचित्तक आपत्तीची) देशना करताना 'सचित्तक' होऊन आपत्तीला प्राप्त होतो आणि 'सचित्तक' होऊन उठतो. "मी धम्मदान करीत आहे" असा विचार करून पदसोधम्म इत्यादी करताना कुशलचित्त होऊन आपत्तीला प्राप्त होतो, "मी बुद्धांच्या अनुशासनाचे पालन करीत आहे" असा विचार करून प्रसन्न चित्ताने देशना करताना कुशलचित्त होऊन उठतो. डोमनस्सयुक्त (खिन्न) होऊन देशना करताना अकुशलचित्त होऊन उठतो, आणि तिणवत्थारकाने झोपलेल्या अवस्थेतच उठणारा अव्याकृतचित्त होऊन उठतो. भय दाखवणे इत्यादी करून "मी बुद्धांच्या शासनाचे कार्य करीत आहे" असा विचार करून सोमनस्सयुक्त (आनंदी) होऊन देशना करताना अकुशलचित्त होऊन आपत्तीला प्राप्त होतो आणि कुशलचित्त होऊन उठतो. डोमनस्सयुक्त होऊनच देशना करताना अकुशलचित्त होऊन उठतो, आणि पूर्वोक्त पद्धतीनेच तिणवत्थारकाने उठणारा अव्याकृतचित्त होऊन उठतो. झोप लागण्याच्या वेळी सहशय्या आपत्तीला प्राप्त होणारा अव्याकृतचित्त होऊन आपत्तीला प्राप्त होतो, आणि येथे पूर्वोक्त पद्धतीनेच "कुशलचित्त होऊन उठतो" इत्यादी समजून घ्यावे. පඨමං පාරාජිකං කතිහි සමුට්ඨානෙහීතිආදි පුබ්බෙ වුත්තනයත්තා උත්තානමෙව. "पहिले पाराजिक किती समुत्थानांनी होते" इत्यादी (वाक्य) पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनुसार स्पष्टच आहे. 473. චත්තාරො පාරාජිකා කතිහි සමුට්ඨානෙහීතිආදීසු උක්කට්ඨපරිච්ඡෙදතො යං යං සමුට්ඨානං යස්ස යස්ස ලබ්භති, තං සබ්බං වුත්තමෙව හොති. ४७३. "चार पाराजिक किती समुत्थानांनी होतात" इत्यादींमध्ये उत्कृष्ट मर्यादेने जे जे समुत्थान ज्या ज्या आपत्तीसाठी प्राप्त होते, ते सर्व सांगितलेलेच आहे. ආපත්තිසමුට්ඨානවණ්ණනා නිට්ඨිතා. आपत्ती-समुत्थान-वर्णना समाप्त झाली. අපරදුතියගාථාසඞ්ගණිකං दुसरे गाथासंगणिक (अपरदुतियगाथासंगणिक). (1) කායිකාදිආපත්තිවණ්ණනා (१) कायिक इत्यादी आपत्तींचे वर्णन. 474. ‘‘කති [Pg.226] ආපත්තියො කායිකා’’තිආදිගාථානං විස්සජ්ජනෙ ඡ ආපත්තියො කායිකාති අන්තරපෙය්යාලෙ චතුත්ථෙන ආපත්තිසමුට්ඨානෙන ඡ ආපත්තියො ආපජ්ජති, ‘‘භික්ඛු මෙථුනං ධම්මං පටිසෙවති, ආපත්ති පාරාජිකස්සා’’තිආදිනා නයෙන වුත්තාපත්තියො. කායද්වාරෙ සමුට්ඨිතත්තා හි එතා කායිකාති වුච්චන්ති. ඡ වාචසිකාති තස්මිංයෙව අන්තරපෙය්යාලෙ පඤ්චමෙන ආපත්තිසමුට්ඨානෙන ඡ ආපත්තියො ආපජ්ජති, ‘‘භික්ඛු පාපිච්ඡො ඉච්ඡාපකතො’’තිආදිනා නයෙන වුත්තාපත්තියො. ඡාදෙන්තස්ස තිස්සොති වජ්ජපටිච්ඡාදිකාය භික්ඛුනියා පාරාජිකං, භික්ඛුස්ස සඞ්ඝාදිසෙසපටිච්ඡාදනෙ පාචිත්තියං, අත්තනො දුට්ඨුල්ලාපත්තිපටිච්ඡාදනෙ දුක්කටං. පඤ්ච සංසග්ගපච්චයාති භික්ඛුනියා කායසංසග්ගෙ පාරාජිකං, භික්ඛුනො සඞ්ඝාදිසෙසො, කායෙන කායපටිබද්ධෙ ථුල්ලච්චයං, නිස්සග්ගියෙන කායපටිබද්ධෙ දුක්කටං, අඞ්ගුලිපතොදකෙ පාචිත්තියන්ති ඉමා කායසංසග්ගපච්චයා පඤ්චාපත්තියො. ४७४. "किती आपत्ती कायिक आहेत?" इत्यादी गाथांच्या उत्तरात "सहा आपत्ती कायिक आहेत" म्हणजे अंतरपेय्यालामध्ये चौथ्या आपत्ती-समुत्थानाने (काय आणि चित्त यांमुळे) सहा आपत्तींना प्राप्त होतो, ज्या "भिक्खू मैथुन धर्माचे सेवन करतो, तर पाराजिक आपत्ती होते" इत्यादी पद्धतीने सांगितलेल्या आपत्ती आहेत. कारण कायद्वाराने (शारीरिक द्वाराने) उत्पन्न झाल्यामुळे यांना 'कायिक' असे म्हटले जाते. "सहा वाचसिक आहेत" म्हणजे त्याच अंतरपेय्यालामध्ये पाचव्या आपत्ती-समुत्थानाने (वाचा आणि चित्त यांमुळे) सहा आपत्तींना प्राप्त होतो, ज्या "भिक्खू पापी इच्छेचा, इच्छेने ग्रस्त असलेला" इत्यादी पद्धतीने सांगितलेल्या आपत्ती आहेत. "लपविणाऱ्याला तीन (आपत्ती होतात)" म्हणजे दोष लपविणाऱ्या भिक्खुणीला पाराजिक होते, भिक्खूने संघादिसेस आपत्ती लपविल्यावर पाचित्तिय होते, आणि स्वतःची दुट्ठुल्ला आपत्ती (गंभीर आपत्ती) लपविल्यावर दुक्कट होते. "संसर्गप्रत्ययाने पाच (आपत्ती होतात)" म्हणजे भिक्खुणीच्या कायसंसर्गाने (शारीरिक संपर्काने) पाराजिक होते, भिक्खूच्या कायसंसर्गाने संघादिसेस होतो, कायेने (शरीराने) कायाशी संबंधित वस्तूचा स्पर्श केल्यास थुल्लच्चय होते, निसर्ग केलेल्या (फेकलेल्या) वस्तूने कायाशी संबंधित वस्तूचा स्पर्श केल्यास दुक्कट होते, आणि बोटाने गुदगुल्या केल्यास पाचित्तिय होते; अशा या कायसंसर्गप्रत्ययाने होणाऱ्या पाच आपत्ती आहेत. අරුණුග්ගෙ තිස්සොති එකරත්තඡාරත්තසත්තාහදසාහමාසාතික්කමවසෙන නිස්සග්ගියං පාචිත්තියං, භික්ඛුනියා රත්තිවිප්පවාසෙ සඞ්ඝාදිසෙසො, ‘‘පඨමම්පි යාමං ඡාදෙති, දුතියම්පි තතියම්පි යාමං ඡාදෙති, උද්ධස්තෙ අරුණෙ ඡන්නා හොති ආපත්ති, යො ඡාදෙති සො දුක්කටං දෙසාපෙතබ්බො’’ති ඉමා අරුණුග්ගෙ තිස්සො ආපත්තියො ආපජ්ජති. ද්වෙ යාවතතියකාති එකාදස යාවතතියකා නාම, පඤ්ඤත්තිවසෙන පන ද්වෙ හොන්ති භික්ඛූනං යාවතතියකා භික්ඛුනීනං යාවතතියකාති. එකෙත්ථ අට්ඨවත්ථුකාති භික්ඛුනීනංයෙව එකා එත්ථ ඉමස්මිං සාසනෙ අට්ඨවත්ථුකා නාම. එකෙන සබ්බසඞ්ගහොති ‘‘යස්ස සියා ආපත්ති, සො ආවිකරෙය්යා’’ති ඉමිනා එකෙන නිදානුද්දෙසෙන සබ්බසික්ඛාපදානඤ්ච සබ්බපාතිමොක්ඛුද්දෙසානඤ්ච සඞ්ගහො හොති. "अरुणोदयाच्या वेळी तीन (आपत्ती होतात)" म्हणजे एक रात्र, सहा रात्री, सात दिवस, दहा दिवस किंवा एक महिना ओलांडण्याच्या (अतिक्रमणाच्या) कारणाने निसग्गिय पाचित्तिय होते; भिक्खुणीच्या रात्रीच्या विप्रवासाने (सोबत नसताना राहण्याने) संघादिसेस होतो; आणि "पहिल्या प्रहरातही लपवतो, दुसऱ्या व तिसऱ्या प्रहरातही लपवतो, आणि अरुणोदय झाल्यावर आपत्ती लपविलेली असते, जो लपवतो त्याला दुक्कट आपत्तीची देशना करवावी लागते" अशा या अरुणोदयाच्या वेळी तीन आपत्तींना प्राप्त होतो. "दोन यावततियक आहेत" म्हणजे अकरा यावततियक (तिसऱ्या वेळेपर्यंतच्या) आपत्ती आहेत, परंतु प्रज्ञप्तीच्या (नियमाच्या) आधारे दोन प्रकारच्या होतात—भिक्खूंच्या यावततियक आणि भिक्खुणींच्या यावततियक. "येथे एक अट्ठवत्थुका (आठ वस्तूंची आपत्ती) आहे" म्हणजे या शासनात केवळ भिक्खुणींचीच एक आपत्ती 'अट्ठवत्थुका' नावाची आहे. "एकाने सर्वांचा संग्रह होतो" म्हणजे "ज्याला आपत्ती झाली असेल, त्याने ती प्रकट करावी" या एका निदान-उद्देशाने सर्व शिक्षपदांचा आणि सर्व पातिमोक्ख-उद्देशांचा संग्रह होतो. විනයස්ස ද්වෙ මූලානීති කායො චෙව වාචා ච. ගරුකා ද්වෙ වුත්තාති පාරාජිකසඞ්ඝාදිසෙසා. ද්වෙ දුට්ඨුල්ලච්ඡාදනාති වජ්ජපටිච්ඡාදිකාය පාරාජිකං [Pg.227] සඞ්ඝාදිසෙසං පටිච්ඡාදකස්ස පාචිත්තියන්ති ඉමා ද්වෙ දුට්ඨුල්ලච්ඡාදනාපත්තියො නාම. "विनयाची दोन मुळे आहेत" म्हणजे काय (शरीर) आणि वाचा. "दोन गरुक (गंभीर आपत्ती) सांगितल्या आहेत" म्हणजे पाराजिक आणि संघादिसेस. "दोन दुट्ठुल्ल-लपविण्याच्या आपत्ती" म्हणजे दोष लपविणाऱ्या भिक्खुणीला पाराजिक आणि संघादिसेस लपविणाऱ्या भिक्खूला पाचित्तिय; अशा या दोन 'दुट्ठुल्लच्छादनापत्ती' (गंभीर आपत्ती लपविण्याच्या आपत्ती) नावाच्या आहेत. ගාමන්තරෙ චතස්සොති ‘‘භික්ඛු භික්ඛුනියා සද්ධිං සංවිදහති, දුක්කටං; අඤ්ඤස්ස ගාමස්ස උපචාරං ඔක්කමති, පාචිත්තියං; භික්ඛුනියා ගාමන්තරං ගච්ඡන්තියා පරික්ඛිත්තෙ ගාමෙ පඨමපාදෙ ථුල්ලච්චයං, දුතියපාදෙ සඞ්ඝාදිසෙසො; අපරික්ඛිත්තස්ස පඨමපාදෙ උපචාරොක්කමනෙ ථුල්ලච්චයං, දුතියපාදෙ සඞ්ඝාදිසෙසො’’ති ඉමා ගාමන්තරෙ දුක්කටපාචිත්තියථුල්ලච්චයසඞ්ඝආදිසෙසවසෙන චතස්සො ආපත්තියො. චතස්සො නදිපාරපච්චයාති ‘‘භික්ඛු භික්ඛුනියා සද්ධිං සංවිදහති, දුක්කටං; නාවං අභිරුහති, පාචිත්තියං; භික්ඛුනියා නදිපාරං ගච්ඡන්තියා උත්තරණකාලෙ පඨමපාදෙ ථුල්ලච්චයං, දුතියපාදෙ සඞ්ඝාදිසෙසො’’ති ඉමා චතස්සො. එකමංසෙ ථුල්ලච්චයන්ති මනුස්සමංසෙ. නවමංසෙසු දුක්කටන්ති සෙසඅකප්පියමංසෙසු. "गावाच्या दरम्यान चार (आपत्ती होतात)" म्हणजे "भिक्खू भिक्खुणीसोबत प्रवास करण्याचे ठरवतो, तर दुक्कट; दुसऱ्या गावाच्या उपचारात (हद्दीत) प्रवेश करतो, तर पाचित्तिय; भिक्खुणी दुसऱ्या गावाला जात असताना, कुंपण घातलेल्या गावात पहिल्या पावलावर थुल्लच्चय, दुसऱ्या पावलावर संघादिसेस; कुंपण नसलेल्या गावाच्या उपचारात प्रवेश करताना पहिल्या पावलावर थुल्लच्चय, दुसऱ्या पावलावर संघादिसेस होतो" अशा या गावाच्या दरम्यान दुक्कट, पाचित्तिय, थुल्लच्चय आणि संघादिसेस या देशाने चार आपत्ती होतात. "नदी पार करण्याच्या कारणाने चार (आपत्ती होतात)" म्हणजे "भिक्खू भिक्खुणीसोबत प्रवास करण्याचे ठरवतो, तर दुक्कट; नौकेवर चढतो, तर पाचित्तिय; भिक्खुणी नदी पार करत असताना, पार करण्याच्या वेळी पहिल्या पावलावर थुल्लच्चय, दुसऱ्या पावलावर संघादिसेस होतो" अशा या चार आपत्ती होतात. "एका मांसाच्या बाबतीत थुल्लच्चय होते" म्हणजे मनुष्यमांसाच्या बाबतीत. "नऊ प्रकारच्या मांसांच्या बाबतीत दुक्कट होते" म्हणजे इतर नऊ अकल्पनीय (अकप्पिय) मांसांच्या बाबतीत. ද්වෙ වාචසිකා රත්තින්ති භික්ඛුනී රත්තන්ධකාරෙ අප්පදීපෙ පුරිසෙන සද්ධිං හත්ථපාසෙ ඨිතා සල්ලපති, පාචිත්තියං; හත්ථපාසං විජහිත්වා ඨිතා සල්ලපති, දුක්කටං. ද්වෙ වාචසිකා දිවාති භික්ඛුනී දිවා පටිච්ඡන්නෙ ඔකාසෙ පුරිසෙන සද්ධිං හත්ථපාසෙ ඨිතා සල්ලපති, පාචිත්තියං; හත්ථපාසං විජහිත්වා සල්ලපති, දුක්කටං. දදමානස්ස තිස්සොති මරණාධිප්පායො මනුස්සස්ස විසං දෙති, සො චෙ තෙන මරති, පාරාජිකං; යක්ඛපෙතානං දෙති, තෙ චෙ මරන්ති, ථුල්ලච්චයං; තිරච්ඡානගතස්ස දෙති, සො චෙ මරති, පාචිත්තියං; අඤ්ඤාතිකාය භික්ඛුනියා චීවරදානෙ පාචිත්තියන්ති එවං දදමානස්ස තිස්සො ආපත්තියො. චත්තාරො ච පටිග්ගහෙති හත්ථග්ගාහ-වෙණිග්ගාහෙසු සඞ්ඝාදිසෙසො, මුඛෙන අඞ්ගජාතග්ගහණෙ පාරාජිකං, අඤ්ඤාතිකාය භික්ඛුනියා චීවරපටිග්ගහණෙ නිස්සග්ගියං පාචිත්තියං, අවස්සුතාය අවස්සුතස්ස හත්ථතො ඛාදනීයං භොජනීයං පටිග්ගණ්හන්තියා ථුල්ලච්චයං; එවං පටිග්ගහෙ චත්තාරො ආපත්තික්ඛන්ධා හොන්ති. "रात्रीच्या वेळी दोन वाचसिक (आपत्ती होतात)" म्हणजे भिक्खुणी रात्रीच्या अंधारात, दिवा नसताना पुरुषासोबत हस्तपाशामध्ये (जवळ) उभी राहून संभाषण करते, तर पाचित्तिय; हस्तपाश सोडून उभी राहून संभाषण करते, तर दुक्कट. "दिवसा दोन वाचसिक (आपत्ती होतात)" म्हणजे भिक्खुणी दिवसा झाकलेल्या (गुप्त) ठिकाणी पुरुषासोबत हस्तपाशामध्ये उभी राहून संभाषण करते, तर पाचित्तिय; हस्तपाश सोडून संभाषण करते, तर दुक्कट. "देणाऱ्याला तीन (आपत्ती होतात)" म्हणजे मारण्याच्या उद्देशाने माणसाला विष देतो, आणि तो जर त्याने मरतो, तर पाराजिक; यक्ष किंवा प्रेतांना देतो, आणि ते जर मरतात, तर थुल्लच्चय; प्राण्याला देतो, आणि तो जर मरतो, तर पाचित्तिय; नातेवाईक नसलेल्या भिक्खुणीला चीवर दिल्यास पाचित्तिय; अशा प्रकारे देणाऱ्याला तीन आपत्ती होतात. "आणि ग्रहण करणाऱ्याला चार (आपत्ती होतात)" म्हणजे हात पकडणे किंवा केसांचा झुपका पकडणे यांमध्ये संघादिसेस होतो, मुखाने अंगजात (जननेंद्रिय) ग्रहण केल्यास पाराजिक होतो, नातेवाईक नसलेल्या भिक्खुणीकडून चीवर ग्रहण केल्यास निसग्गिय पाचित्तिय होते, आणि कामवासनायुक्त भिक्खुणीने कामवासनायुक्त पुरुषाच्या हातातून खाण्यायोग्य किंवा भोज्य पदार्थ ग्रहण केल्यास थुल्लच्चय होते; अशा प्रकारे ग्रहण करण्याच्या बाबतीत चार आपत्तीस्कंध होतात. (2) දෙසනාගාමිනියාදිවණ්ණනා (२) देसनागामिनी इत्यादींचे वर्णन 475. පඤ්ච දෙසනාගාමිනියොති ලහුකා පඤ්ච. ඡ සප්පටිකම්මාති පාරාජිකං ඨපෙත්වා අවසෙසා. එකෙත්ථ අප්පටිකම්මාති එකා පාරාජිකාපත්ති. ४७५. "पाच देसनागामिनी" म्हणजे पाच हलक्या (लहुक) आपत्ती आहेत. "सहा सप्पटिकम्म" (प्रतिकार करता येण्याजोग्या) म्हणजे पाराजिक वगळून उर्वरित सहा आपत्ती. "यात एक अप्पटिकम्म" (प्रतिकार न करता येण्याजोगी) म्हणजे एक पाराजिक आपत्ती होय. විනයගරුකා ද්වෙ වුත්තාති පාරාජිකඤ්චෙව සඞ්ඝාදිසෙසඤ්ච. කායවාචසිකානි චාති සබ්බානෙව සික්ඛාපදානි කායවාචසිකානි, මනොද්වාරෙ පඤ්ඤත්තං [Pg.228] එකසික්ඛාපදම්පි නත්ථි. එකො විකාලෙ ධඤ්ඤරසොති ලොණසොවීරකං. අයමෙව හි එකො ධඤ්ඤරසො විකාලෙ වට්ටති. එකා ඤත්තිචතුත්ථෙන සම්මුතීති භික්ඛුනොවාදකසම්මුති. අයමෙව හි එකා ඤත්තිචතුත්ථකම්මෙන සම්මුති අනුඤ්ඤාතා. "दोन विनयगरुक (विनयात गंभीर) आपत्ती सांगितल्या आहेत" म्हणजे पाराजिक आणि संघादिसेस. "कायक आणि वाचिक" म्हणजे सर्वच शिक्षापदे कायिक आणि वाचिक आहेत; मनोद्वारावर प्रज्ञप्त केलेले एकही शिक्षापद नाही. "विकाल वेळेत एक धान्यरस" म्हणजे लोणसोवीरक (कांजी/औषधी द्रव). हा एकच धान्यरस विकाल वेळेत (दुपारनंतर) कल्प्य (योग्य) आहे. "एक ज्ञत्तिचतुत्थ कर्माने मिळणारी संमती" म्हणजे भिक्खुनी-ओवादक संमती (भिक्षुणींना उपदेश देण्याची संमती). ही एकच संमती ज्ञत्तिचतुत्थ कर्माने अनुमत केली आहे. පාරාජිකා කායිකා ද්වෙති භික්ඛූනං මෙථුනපාරාජිකං භික්ඛුනීනඤ්ච කායසංසග්ගපාරාජිකං. ද්වෙ සංවාසභූමියොති අත්තනා වා අත්තානං සමානසංවාසකං කරොති, සමග්ගො වා සඞ්ඝො උක්ඛිත්තං ඔසාරෙති. කුරුන්දියං පන ‘‘සමානසංවාසකභූමි ච නානාසංවාසකභූමි චා’’ති එවං ද්වෙ සංවාසභූමියො වුත්තා. ද්වින්නං රත්තිච්ඡෙදොති පාරිවාසිකස්ස ච මානත්තචාරිකස්ස ච පඤ්ඤත්තා. ද්වඞ්ගුලා දුවෙති ද්වෙ ද්වඞ්ගුලපඤ්ඤත්තියො, ‘‘ද්වඞ්ගුලපබ්බපරමං ආදාතබ්බ’’න්ති අයමෙකා, ‘‘ද්වඞ්ගුලං වා ද්වෙමාසං වා’’ති අයමෙකා. "दोन कायिक पाराजिक" म्हणजे भिक्षूंचे मैथुन-पाराजिक आणि भिक्षुणींचे कायसंसर्ग-पाराजिक. "दोन संवासभूमी" म्हणजे स्वतः स्वतःला समानसंवासक बनवणे किंवा समग्र संघाने उत्क्षिप्त (बहिष्कृत) भिक्षूला पुन्हा संघात समाविष्ट करणे. कुरुंदी अट्ठकथेत मात्र "समानसंवासक भूमी आणि नानासंवासक भूमी" अशा दोन संवासभूमी सांगितल्या आहेत. "दोघांचा रात्रच्छेद" म्हणजे परिवास (पिरिवास) आचरण करणाऱ्याचा आणि मानत्त आचरण करणाऱ्याचा रात्रच्छेद प्रज्ञप्त केला आहे. "दोन द्वंगुल (दोन बोटे)" म्हणजे दोन द्वंगुल प्रज्ञप्ती आहेत: "दोन बोटांच्या पेऱ्यांइतकेच ग्रहण करावे" ही एक, आणि "दोन बोटे किंवा दोन महिने" ही दुसरी. ද්වෙ අත්තානං වධිත්වානාති භික්ඛුනී අත්තානං වධිත්වා ද්වෙ ආපත්තියො ආපජ්ජති; වධති රොදති, ආපත්ති පාචිත්තියස්ස; වධති න රොදති, ආපත්ති දුක්කටස්ස. ද්වීහි සඞ්ඝො භිජ්ජතීති කම්මෙන ච සලාකග්ගාහෙන ච. ද්වෙත්ථ පඨමාපත්තිකාති එත්ථ සකලෙපි විනයෙ ද්වෙ පඨමාපත්තිකා උභින්නං පඤ්ඤත්තිවසෙන. ඉතරථා පන නව භික්ඛූනං නව භික්ඛුනීනන්ති අට්ඨාරස හොන්ති. ඤත්තියා කරණා දුවෙති ද්වෙ ඤත්තිකිච්චානි – කම්මඤ්ච කම්මපාදකා ච. නවසු ඨානෙසු කම්මං හොති, ද්වීසු කම්මපාදභාවෙන තිට්ඨති. "स्वतःला मारहाण करून दोन आपत्ती" म्हणजे भिक्षुणी स्वतःला मारहाण करून दोन आपत्तींमध्ये पडते; जर ती स्वतःला मारते आणि रडते, तर पाचित्तिय आपत्ती होते; जर ती मारते पण रडत नाही, तर दुक्कट आपत्ती होते. "दोन कारणांनी संघात भेद होतो" म्हणजे कर्माने (अधार्मिक कर्माने) आणि शलाका-ग्रहणाने (मतदानाने). "यात दोन प्रथमापत्ती आहेत" म्हणजे या संपूर्ण विनयात भिक्षू आणि भिक्षुणी दोघांच्याही प्रज्ञप्तीनुसार दोन प्रथमापत्ती आहेत. अन्यथा, भिक्षूंच्या नऊ आणि भिक्षुणींच्या नऊ अशा एकूण अठरा प्रथमापत्ती होतात. "ज्ञत्तीच्या करण्याने दोन" म्हणजे ज्ञत्तीची दोन कार्ये आहेत - कर्म (ज्ञत्तिकर्म) आणि कर्माचा आधार (कर्मपादक ज्ञत्ती). नऊ स्थानांवर कर्म होते, आणि दोन स्थानांवर ते कर्मपादक म्हणून राहते. පාණාතිපාතෙ තිස්සොති ‘‘අනොදිස්ස ඔපාතං ඛණති, සචෙ මනුස්සො මරති, පාරාජිකං; යක්ඛපෙතානං මරණෙ ථුල්ලච්චයං; තිරච්ඡානගතස්ස මරණෙ පාචිත්තිය’’න්ති ඉමා තිස්සො හොන්ති. වාචා පාරාජිකා තයොති වජ්ජපටිච්ඡාදිකාය උක්ඛිත්තානුවත්තිකාය අට්ඨවත්ථුකායාති. කුරුන්දියං පන ‘‘ආණත්තියා අදින්නාදානෙ, මනුස්සමරණෙ, උත්තරිමනුස්සධම්මඋල්ලපනෙ චා’’ති එවං තයො වුත්තා. ඔභාසනා තයොති වච්චමග්ගං පස්සාවමග්ගං ආදිස්ස වණ්ණාවණ්ණභාසනෙ සඞ්ඝාදිසෙසො, වච්චමග්ගං පස්සාවමග්ගං ඨපෙත්වා අධක්ඛකං උබ්භජාණුමණ්ඩලං ආදිස්ස වණ්ණාවණ්ණභණනෙ ථුල්ලච්චයං, උබ්භක්ඛකං අධොජාණුමණ්ඩලං ආදිස්ස වණ්ණාවණ්ණභණනෙ දුක්කටං. සඤ්චරිත්තෙන වා තයොති පටිග්ගණ්හාති වීමංසති පච්චාහරති[Pg.229], ආපත්ති සඞ්ඝාදිසෙසස්ස; පටිග්ගණ්හාති වීමංසති න පච්චාහරති, ආපත්ති ථුල්ලච්චයස්ස; පටිග්ගණ්හාති න වීමංසති න පච්චාහරති, ආපත්ති දුක්කටස්සාති ඉමෙ සඤ්චරිත්තෙන කාරණභූතෙන තයො ආපත්තික්ඛන්ධා හොන්ති. "प्राणातिपातात (जीवहत्येत) तीन आपत्ती" म्हणजे "कोणा एका विशिष्ट व्यक्तीला उद्देशून न करता खड्डा खणला, आणि त्यात पडून जर मनुष्य मरतो, तर पाराजिक; यक्ष किंवा प्रेत मरतात, तर थुल्लच्चय; आणि प्राण्याचा मृत्यू होतो, तर पाचित्तिय" अशा या तीन आपत्ती होतात. "वाणीने होणारे तीन पाराजिक" म्हणजे वज्जपटिच्छादिका (दोष लपवणारी भिक्षुणी), उक्खित्तानुवत्तिका (बहिष्कृत भिक्षूचे अनुकरण करणारी भिक्षुणी) आणि अट्ठवत्थुका (आठ वस्तूंचे उल्लंघन करणारी भिक्षुणी) यांच्या संदर्भातील पाराजिक. कुरुंदी अट्ठकथेत मात्र "आज्ञेवरून (दुसऱ्याकडून करवून घेतलेल्या) अदित्नादानात (चोरीत) पाराजिक, मनुष्यवधात पाराजिक आणि उत्तरिमनुस्सधम्माच्या कथनात पाराजिक" असे तीन पाराजिक सांगितले आहेत. "ओभासना (लैंगिक संकेत/प्रशंसा) तीन प्रकारची" म्हणजे वर्चोमार्ग (गुदद्वार) किंवा प्रस्त्रावमार्ग (मूत्रमार्ग) यांना उद्देशून गुण-अवगुणांचे भाषण केल्यास संघादिसेस होतो; वर्चोमार्ग व प्रस्त्रावमार्ग वगळून जत्रूच्या (खांद्याच्या हाडाच्या) खाली आणि गुडघ्याच्या वरच्या भागाला उद्देशून गुण-अवगुणांचे भाषण केल्यास थुल्लच्चय होतो; आणि जत्रूच्या वरच्या व गुडघ्याच्या खालच्या भागाला उद्देशून गुण-अवगुणांचे भाषण केल्यास दुक्कट होतो. "संचरित्ताने (मध्यस्थीने) तीन आपत्ती" म्हणजे (मध्यस्थीचा निरोप) स्वीकारतो, चौकशी करतो आणि परत पोहोचवतो, तर संघादिसेस आपत्ती होते; स्वीकारतो, चौकशी करतो पण परत पोहोचवत नाही, तर थुल्लच्चय आपत्ती होते; स्वीकारतो पण चौकशी करत नाही आणि परतही पोहोचवत नाही, तर दुक्कट आपत्ती होते. अशा प्रकारे संचरित्त हे कारण असलेल्या या तीन आपत्ती-स्कंध (आपत्तींचे वर्ग) होतात. තයො පුග්ගලා න උපසම්පාදෙතබ්බාති අද්ධානහීනො අඞ්ගහීනො වත්ථුවිපන්නො ච තෙසං නානාකරණං වුත්තමෙව. අපිචෙත්ථ යො පත්තචීවරෙන අපරිපූරො, පරිපූරො ච න යාචති, ඉමෙපි අඞ්ගහීනෙනෙව සඞ්ගහිතා. මාතුඝාතකාදයො ච කරණදුක්කටකා පණ්ඩකඋභතොබ්යඤ්ජනකතිරච්ඡානගතසඞ්ඛාතෙන වත්ථුවිපන්නෙනෙව සඞ්ගහිතාති වෙදිතබ්බා. එස නයො කුරුන්දියං වුත්තො. තයො කම්මානං සඞ්ගහාති ඤත්තිකප්පනා, විප්පකතපච්චත්තං, අතීතකරණන්ති. තත්ථ ‘‘දදෙය්ය කරෙය්යා’’තිආදිභෙදා ඤත්තිකප්පනා; ‘‘දෙති කරොතී’’තිආදිභෙදං විප්පකතපච්චත්තං; ‘‘දින්නං කත’’න්තිආදිභෙදං අතීතකරණං නාමාති ඉමෙහි තීහි කම්මානි සඞ්ගය්හන්ති. අපරෙහිපි තීහි කම්මානි සඞ්ගය්හන්ති – වත්ථුනා, ඤත්තියා, අනුස්සාවනායාති. වත්ථුසම්පන්නඤ්හි ඤත්තිසම්පන්නං අනුස්සාවනසම්පන්නඤ්ච කම්මං නාම හොති, තෙන වුත්තං ‘‘තයො කම්මානං සඞ්ගහා’’ති. නාසිතකා තයො නාම මෙත්තියං භික්ඛුනිං නාසෙථ, දූසකො නාසෙතබ්බො, දසහඞ්ගෙහි සමන්නාගතො සාමණෙරො නාසෙතබ්බො, කණ්ටකං සමණුද්දෙසං නාසෙථාති එවං ලිඞ්ගසංවාසදණ්ඩකම්මනාසනාවසෙන තයො නාසිතකා වෙදිතබ්බා. තිණ්ණන්නං එකවාචිකාති ‘‘අනුජානාමි භික්ඛවෙ ද්වෙ තයො එකානුස්සාවනෙ කාතු’’න්ති වචනතො තිණ්ණං ජනානං එකුපජ්ඣායෙන නානාචරියෙන එකානුස්සාවනා වට්ටති. "तीन व्यक्तींना उपसंपदा देऊ नये" म्हणजे अद्धानहीन (वय वीस वर्षांपेक्षा कमी असलेला), अंगहीन (शारीरिक अवयव नसलेला) आणि वत्थुविपन्न (पात्रता नसलेला). त्यांच्यातील फरक आधीच सांगितला आहे. शिवाय, येथे ज्याच्याकडे पात्र-चीवर अपूर्ण आहे, किंवा पूर्ण असूनही जो उपसंपदेची याचना करत नाही, त्यांचाही 'अंगहीन' मध्येच समावेश होतो. मातृघातक इत्यादी आणि दुष्कृत्य करणारे, तसेच पंडक (नपुंसक), उभतोब्यंजनक (द्विलिंगी) आणि प्राण्यांच्या श्रेणीतील वत्थुविपन्न व्यक्तींचा 'वत्थुविपन्न' मध्येच समावेश होतो, असे समजावे. हाच नियम कुरुंदी अट्ठकथेत सांगितला आहे. "कर्मांचे तीन संग्रह (प्रकार)" म्हणजे ज्ञत्तिकल्पना, विप्पकतपच्चत्त आणि अतीतकरण. त्यापैकी "द्यावे, करावे" इत्यादी प्रकारची योजना म्हणजे 'ज्ञत्तिकल्पना' होय; "देतो, करतो" इत्यादी वर्तमानकालीन क्रिया म्हणजे 'विप्पकतपच्चत्त' होय; "दिले, केले" इत्यादी भूतकालीन क्रिया म्हणजे 'अतीतकरण' होय. या तिन्हींनी कर्मांचा संग्रह होतो. इतर तीन गोष्टींनीही कर्मांचा संग्रह होतो - वस्तूने, ज्ञत्तीने आणि अनुस्सावनाने (घोषणा). कारण कर्म हे वत्थुसंपन्न, ज्ञत्तिसंपन्न आणि अनुस्सावनसंपन्न असते, म्हणूनच आयुष्यमान उपालि थेरांनी "कर्मांचे तीन संग्रह" असे म्हटले आहे. "नाशितक (निष्कासित केलेले) तीन" म्हणजे: "मेत्तिया भिक्षुणीला निष्कासित करा", "दूषक (भिक्षुणी-दूषक) सामणेराला निष्कासित करावे", "दहा अंगांनी युक्त असलेल्या सामणेराला निष्कासित करावे", आणि "कंटक सामणेराला निष्कासित करा". अशा प्रकारे लिंगनाशन, संवासनाशन आणि दंडकर्मनाशन या भेदांनी तीन नाशितक समजावेत. "तिघांसाठी एकच वाचन (एकानुस्सावन)" म्हणजे "हे भिक्षूंनो, मी दोन किंवा तिघांना एकाच अनुस्सावनाने (उपसंपदा देण्यास) अनुमती देतो" या वचनानुसार, तीन उमेदवारांना एकाच उपाध्यायांच्या अंतर्गत आणि वेगवेगळ्या आचार्यांच्या उपस्थितीत एकाच अनुस्सावनाने उपसंपदा देणे कल्प्य (योग्य) आहे. අදින්නාදානෙ තිස්සොති පාදෙ වා අතිරෙකපාදෙ වා පාරාජිකං, අතිරෙකමාසකෙ ථුල්ලච්චයං, මාසකෙ වා ඌනමාසකෙ වා දුක්කටං. චතස්සො මෙථුනපච්චයාති අක්ඛයිතෙ පාරාජිකං, යෙභුය්යෙන ඛයිතෙ ථුල්ලච්චයං, විවටකතෙ මුඛෙ දුක්කටං, ජතුමට්ඨකෙ පාචිත්තියං. ඡින්දන්තස්ස තිස්සොති වනප්පතිං ඡින්දන්තස්ස පාරාජිකං, භූතගාමෙ පාචිත්තියං, අඞ්ගජාතෙ ථුල්ලච්චයං. පඤ්ච ඡඩ්ඩිතපච්චයාති අනොදිස්ස විසං ඡඩ්ඩෙති, සචෙ තෙන මනුස්සො මරති, පාරාජිකං; යක්ඛපෙතෙසු ථුල්ලච්චයං; තිරච්ඡානගතෙ පාචිත්තියං; විස්සට්ඨිඡඩ්ඩනෙ සඞ්ඝාදිසෙසො; සෙඛියෙසු හරිතෙ උච්චාරපස්සාවඡඩ්ඩනෙ දුක්කටං – ඉමා ඡඩ්ඩිතපච්චයා පඤ්චාපත්තියො හොන්ති. "अदित्नादानात (चोरीत) तीन आपत्ती" म्हणजे एक पाद (एक चतुर्थांश नाणे) किंवा त्याहून अधिक मूल्याची चोरी केल्यास पाराजिक; एक मासापेक्षा अधिक मूल्याची चोरी केल्यास थुल्लच्चय; आणि एक मासा किंवा त्याहून कमी मूल्याची चोरी केल्यास दुक्कट आपत्ती होते. "मैथुन प्रत्ययाने (मैथुनामुळे) चार आपत्ती" म्हणजे जंगली प्राण्यांनी न खाल्लेल्या प्रेताशी मैथुन केल्यास पाराजिक; बहुतांश खाल्लेल्या प्रेताशी मैथुन केल्यास थुल्लच्चय; उघडलेल्या मुखात मैथुन केल्यास दुक्कट; आणि लाखेच्या गुळगुळीत खेळण्याने (कृत्रिम लिंगाने) मैथुन केल्यास पाचित्तिय आपत्ती होते. "तोडणाऱ्याला तीन आपत्ती" म्हणजे महावृक्ष (वनस्पती) तोडल्यास पाराजिक; भूतगाम (हिरवी झाडेझुडपे) तोडल्यास पाचित्तिय; आणि स्वतःचे जननेंद्रिय (अंगजात) कापल्यास थुल्लच्चय आपत्ती होते. "विसर्जन प्रत्ययाने (टाकण्यामुळे) पाच आपत्ती" म्हणजे कोणा एका विशिष्ट व्यक्तीला उद्देशून न करता विष टाकले आणि त्यामुळे जर मनुष्य मरतो, तर पाराजिक; यक्ष किंवा प्रेत मरतात, तर थुल्लच्चय; प्राण्याचा मृत्यू होतो, तर पाचित्तिय; वीर्य विसर्जन केल्यास संघादिसेस; आणि सेखिय नियमांनुसार हिरव्या गवतावर मलमूत्र विसर्जन केल्यास दुक्कट आपत्ती होते - अशा या विसर्जन प्रत्ययाने पाच आपत्ती होतात. පාචිත්තියෙන [Pg.230] දුක්කටා කතාති භික්ඛුනොවාදකවග්ගස්මිං දසසු සික්ඛාපදෙසු පාචිත්තියෙන සද්ධිං දුක්කටා කතා එවාති අත්ථො. චතුරෙත්ථ නවකා වුත්තාති පඨමසික්ඛාපදම්හියෙව අධම්මකම්මෙ ද්වෙ, ධම්මකම්මෙ ද්වෙති එවං චත්තාරො නවකා වුත්තාති අත්ථො. ද්වින්නං චීවරෙන චාති භික්ඛූනං සන්තිකෙ උපසම්පන්නාය චීවරං දෙන්තස්ස පාචිත්තියං, භික්ඛුනීනං සන්තිකෙ උපසම්පන්නාය දෙන්තස්ස දුක්කටන්ති එවං ද්වින්නං භික්ඛුනීනං චීවරං දෙන්තස්ස චීවරෙන කාරණභූතෙන ආපත්ති හොතීති අත්ථො. "पाचित्तियेन दुक्कटा कता" म्हणजे भिक्खुनोवादक वर्गातील दहा शिक्षापदांमध्ये पाचित्तिय सोबत दुक्कट आपत्ती देखील विहित केली आहे, असा अर्थ आहे. "चतुरेत्थ नवका वृत्ता" म्हणजे पहिल्याच शिक्षापदामध्ये अधम्मकम्मात दोन आणि धम्मकम्मात दोन, असे चार नवक (नऊचे गट) सांगितले आहेत, असा अर्थ आहे. "द्विन्नं चीवरेन च" म्हणजे भिक्खूंच्या सन्निध उपसंपन्न झालेल्या भिक्खुणीला चीवर देणाऱ्याला पाचित्तिय होते, आणि भिक्खुणींच्या सन्निध उपसंपन्न झालेल्या भिक्खुणीला चीवर देणाऱ्याला दुक्कट होते; अशा प्रकारे दोन भिक्खुणींना चीवर देणाऱ्याला चीवराच्या कारणाने आपत्ती होते, असा अर्थ आहे. අට්ඨ පාටිදෙසනීයාති පාළියං ආගතා එව. භුඤ්ජන්තාමකධඤ්ඤෙන පාචිත්තියෙන දුක්කටා කතාති ආමකධඤ්ඤං විඤ්ඤාපෙත්වා භුඤ්ජන්තියා පාචිත්තියෙන සද්ධිං දුක්කටා කතායෙව. "अट्ठ पाटिदेनीया" म्हणजे पाळीमध्ये (मूळ पाठात) आलेल्या आठ पाटिदेसनीय आपत्तीच होत. "भुञ्जन्त आमकधञ्ञेन पाचित्तियेन दुक्कटा कता" म्हणजे कच्चे धान्य मागवून खाणाऱ्या भिक्खुणीला पाचित्तिय सोबत दुक्कट आपत्ती देखील विहित केली आहे. ගච්ඡන්තස්ස චතස්සොති භික්ඛුනියා වා මාතුගාමෙන වා සද්ධිං සංවිධාය ගච්ඡන්තස්ස දුක්කටං, ගාමූපචාරොක්කමනෙ පාචිත්තියං, යා භික්ඛුනී එකා ගාමන්තරං ගච්ඡති, තස්සා ගාමූපචාරං ඔක්කමන්තියා පඨමපාදෙ ථුල්ලච්චයං, දුතියපාදෙ සඞ්ඝාදිසෙසොති ගච්ඡන්තස්ස ඉමා චතස්සො ආපත්තියො හොන්ති. ඨිතස්ස චාපි තත්තකාති ඨිතස්සපි චතස්සො එවාති අත්ථො. කථං? භික්ඛුනී අන්ධකාරෙ වා පටිච්ඡන්නෙ වා ඔකාසෙ මිත්තසන්ථවවසෙන පුරිසස්ස හත්ථපාසෙ තිට්ඨති, පාචිත්තියං; හත්ථපාසං විජහිත්වා තිට්ඨති, දුක්කටං; අරුණුග්ගමනකාලෙ දුතියිකාය හත්ථපාසං විජහන්තී තිට්ඨති, ථුල්ලච්චයං; විජහිත්වා තිට්ඨති, සඞ්ඝාදිසෙසොති නිසින්නස්ස චතස්සො ආපත්තියො. නිපන්නස්සාපි තත්තකාති සචෙපි හි සා නිසීදති වා නිපජ්ජති වා, එතායෙව චතස්සො ආපත්තියො ආපජ්ජති. "गच्छन्तस्स चतस्सो" म्हणजे भिक्खुणीसोबत किंवा स्त्रीसोबत (मातृगामासोबत) संकेत करून जाणाऱ्या भिक्खूला दुक्कट होते, आणि गावाच्या उपचारात (सीमेत) प्रवेश करताना पाचित्तिय होते. जी भिक्खुणी एकटी दुसऱ्या गावाला जाते, तिच्या गावाच्या उपचारात प्रवेश करताना पहिल्या पावलावर थुल्लच्चय आणि दुसऱ्या पावलावर संघादिसेस होते; अशा प्रकारे जाणाऱ्या व्यक्तीला या चार आपत्ती होतात. "ठितस्स चापि तत्तका" म्हणजे उभे राहिलेल्या व्यक्तीला देखील चारच आपत्ती होतात, असा अर्थ आहे. कसे? भिक्खुणी अंधारात किंवा आच्छादित ठिकाणी मैत्रीच्या संबंधाने पुरुषाच्या हस्तपासात उभी राहते, तेव्हा पाचित्तिय होते; हस्तपास सोडून उभी राहते, तेव्हा दुक्कट होते; अरुणोदयाच्या वेळी सोबतीणीचा हस्तपास सोडून उभी राहते, तेव्हा थुल्लच्चय होते; आणि हस्तपास सोडून उभी राहते, तेव्हा संघादिसेस होते; अशा प्रकारे बसलेल्याच्या (किंवा उभे राहिलेल्याच्या) चार आपत्ती होतात. "निपन्नस्सापि तत्तका" म्हणजे जर ती भिक्खुणी बसली किंवा झोपली, तरीही ती याच चार आपत्तींना प्राप्त होते. (3) පාචිත්තියවණ්ණනා (३) पाचित्तिय-वर्णना 476. පඤ්ච පාචිත්තියානීති පඤ්ච භෙසජ්ජානි පටිග්ගහෙත්වා නානාභාජනෙසු වා එකභාජනෙ වා අමිස්සෙත්වා ඨපිතානි හොන්ති, සත්තාහාතික්කමෙ සො භික්ඛු පඤ්ච පාචිත්තියානි සබ්බානි නානාවත්ථුකානි එකක්ඛණෙ ආපජ්ජති, ‘‘ඉමං පඨමං ආපන්නො, ඉමං පච්ඡා’’ති න වත්තබ්බො. ४७६. "पञ्च पाचित्तियानि" म्हणजे पाच औषधे ग्रहण करून वेगवेगळ्या पात्रांत किंवा एकाच पात्रात न मिसळता ठेवली असतील, तर सात दिवस उलटून गेल्यावर तो भिक्खू वेगवेगळ्या वस्तूंच्या कारणाने होणाऱ्या सर्व पाच पाचित्तिय आपत्तींना एकाच क्षणी प्राप्त होतो. "या आपत्तीला आधी प्राप्त झाला आणि याला नंतर" असे म्हणता येत नाही. නව පාචිත්තියානීති යො භික්ඛු නව පණීතභොජනානි විඤ්ඤාපෙත්වා තෙහි සද්ධිං එකතො එකං කබළං ඔමද්දිත්වා මුඛෙ පක්ඛිපිත්වා පරගළං අතික්කාමෙති, අයං නව පාචිත්තියානි සබ්බානි නානාවත්ථුකානි එකක්ඛණෙ ආපජ්ජති [Pg.231] ‘‘ඉමං පඨමං ආපන්නො, ඉමං පච්ඡා’’ති න වත්තබ්බො. එකවාචාය දෙසෙය්යාති ‘‘අහං, භන්තෙ, පඤ්ච භෙසජ්ජානි පටිග්ගහෙත්වා සත්තාහං අතික්කාමෙත්වා පඤ්ච ආපත්තියො ආපන්නො, තා තුම්හමූලෙ පටිදෙසෙමී’’ති එවං එකවාචාය දෙසෙය්ය, දෙසිතාව හොන්ති, ද්වීහි තීහි වාචාහි කිච්චං නාම නත්ථි. දුතියවිස්සජ්ජනෙපි ‘‘අහං, භන්තෙ, නව පණීතභොජනානි විඤ්ඤාපෙත්වා භුඤ්ජිත්වා නව ආපත්තියො ආපන්නො, තා තුම්හමූලෙ පටිදෙසෙමී’’ති වත්තබ්බං. "नव पाचित्तियानि" म्हणजे जो भिक्खू नऊ प्रकारची प्रणीत भोजने मागवून, ती एकत्र करून, एक घास बनवून, तोंडात टाकून गळ्याखाली उतरवतो, तो वेगवेगळ्या वस्तूंच्या कारणाने होणाऱ्या सर्व नऊ पाचित्तिय आपत्तींना एकाच क्षणी प्राप्त होतो. "या आपत्तीला आधी प्राप्त झाला आणि याला नंतर" असे म्हणता येत नाही. "एकवाचाय देसेय्य" म्हणजे "भन्ते, मी पाच औषधे ग्रहण करून सात दिवस उलटवून पाच आपत्तींना प्राप्त झालो आहे, त्या मी आपल्यासमोर देशना करतो" अशा प्रकारे एकाच वाक्यात देशना केली, तर त्या देशित होतातच; दोन किंवा तीन वाक्यांनी देशना करण्याचे काही प्रयोजन नाही. दुसऱ्या प्रश्नाच्या उत्तरात देखील "भन्ते, मी नऊ प्रणीत भोजने मागवून खाल्ल्यामुळे नऊ आपत्तींना प्राप्त झालो आहे, त्या मी आपल्यासमोर देशना करतो" असे म्हणावे. වත්ථුං කිත්තෙත්වා දෙසෙය්යාති ‘‘අහං, භන්තෙ, පඤ්ච භෙසජ්ජානි පටිග්ගහෙත්වා සත්තාහං අතික්කාමෙසිං, යථාවත්ථුකං තං තුම්හමූලෙ පටිදෙසෙමී’’ති එවං වත්ථුං කිත්තෙත්වා දෙසෙය්ය, දෙසිතාව හොන්ති ආපත්තියො, ආපත්තියා නාමග්ගහණෙන කිච්චං නත්ථි. දුතියවිස්සජ්ජනෙපි ‘‘අහං, භන්තෙ, නව පණීතභොජනානි විඤ්ඤාපෙත්වා භුත්තො, යථාවත්ථුකං තං තුම්හමූලෙ පටිදෙසෙමී’’ති වත්තබ්බං. "वत्थुं कित्तेत्वा देसेय्य" म्हणजे "भन्ते, मी पाच औषधे ग्रहण करून सात दिवस उलटवले आहेत, त्या वस्तूच्या स्वरूपाप्रमाणे मी आपल्यासमोर देशना करतो" अशा प्रकारे वस्तूचा (घटनेचा) उल्लेख करून देशना केली, तर आपत्ती देशित होतातच; आपत्तीचे नाव घेण्याचे काही प्रयोजन नाही. दुसऱ्या प्रश्नाच्या उत्तरात देखील "भन्ते, मी नऊ प्रणीत भोजने मागवून खाल्ली आहेत, त्या वस्तूच्या स्वरूपाप्रमाणे मी आपल्यासमोर देशना करतो" असे म्हणावे. යාවතතියකෙ තිස්සොති උක්ඛිත්තානුවත්තිකාය පාරාජිකං භෙදකානුවත්තකානං කොකාලිකාදීනං සඞ්ඝාදිසෙසං, පාපිකාය දිට්ඨියා අප්පටිනිස්සග්ගෙ චණ්ඩකාළිකාය ච භික්ඛුනියා පාචිත්තියන්ති ඉමා යාවතතියකා තිස්සො ආපත්තියො. ඡ වොහාරපච්චයාති පයුත්තවාචාපච්චයා ඡ ආපත්තියො ආපජ්ජතීති අත්ථො. කථං? ආජීවහෙතු ආජීවකාරණා පාපිච්ඡො ඉච්ඡාපකතො අසන්තං අභූතං උත්තරිමනුස්සධම්මං උල්ලපති, ආපත්ති පාරාජිකස්ස. ආජීවහෙතු ආජීවකාරණා සඤ්චරිත්තං සමාපජ්ජති, ආපත්ති සඞ්ඝාදිසෙසස්ස. ආජීවහෙතු ආජීවකාරණා යො තෙ විහාරෙ වසති සො අරහාති වදති, ආපත්ති ථුල්ලච්චයස්ස. ආජීවහෙතු ආජීවකාරණා භික්ඛු පණීතභොජනානි අත්තනො අත්ථාය විඤ්ඤාපෙත්වා භුඤ්ජති, ආපත්ති පාචිත්තියස්ස. ආජීවහෙතු ආජීවකාරණා භික්ඛුනී පණීතභොජනානි අත්තනො අත්ථාය විඤ්ඤාපෙත්වා භුඤ්ජති, ආපත්ති පාටිදෙසනීයස්ස. ආජීවහෙතු ආජීවකාරණා සූපං වා ඔදනං වා අගිලානො අත්තනො අත්ථාය විඤ්ඤාපෙත්වා භුඤ්ජති, ආපත්ති දුක්කටස්සාති. "यावततियके तिस्सो" म्हणजे बहिष्कृत केलेल्या भिक्खूचे अनुकरण करणाऱ्या भिक्खुणीला पाराजिक होते; संघभेद करणाऱ्या देवदत्ताचे अनुकरण करणाऱ्या कोकालिक इत्यादी भिक्खूंना संघादिसेस होते; आणि पापी दृष्टी न सोडल्यामुळे चण्डकाळी नावाच्या भिक्खुणीला पाचित्तिय होते; या तीन 'यावततियक' (तिसऱ्यांदा बजावल्यानंतर होणाऱ्या) आपत्ती आहेत. "छ वोहारपच्चया" म्हणजे बोलण्याच्या (प्रयुक्त वाणीच्या) कारणाने सहा आपत्तींना प्राप्त होतो, असा अर्थ आहे. कसे? उपजीविकेच्या हेतूने, उपजीविकेच्या कारणाने, पापी इच्छा असलेला आणि इच्छेने वश झालेला भिक्खू नसलेले, असत्य असे उत्तरिमनुष्यधम्म प्रकट करतो, तेव्हा पाराजिक आपत्ती होते. उपजीविकेच्या हेतूने, उपजीविकेच्या कारणाने, जो मध्यस्थी (संचरित्त) करतो, त्याला संघादिसेस आपत्ती होते. उपजीविकेच्या हेतूने, उपजीविकेच्या कारणाने, "जो त्या विहारात राहतो तो अरहंत आहे" असे म्हणतो, त्याला थुल्लच्चय आपत्ती होते. उपजीविकेच्या हेतूने, उपजीविकेच्या कारणाने, भिक्खू स्वतःसाठी प्रणीत भोजने मागवून खातो, तेव्हा पाचित्तिय आपत्ती होते. उपजीविकेच्या हेतूने, उपजीविकेच्या कारणाने, भिक्खुणी स्वतःसाठी प्रणीत भोजने मागवून खाते, तेव्हा पाटिदेसनीय आपत्ती होते. उपजीविकेच्या हेतूने, उपजीविकेच्या कारणाने, निरोगी असताना स्वतःसाठी वरण किंवा भात मागवून खातो, तेव्हा दुक्कट आपत्ती होते. ඛාදන්තස්ස තිස්සොති මනුස්සමංසෙ ථුල්ලච්චයං, අවසෙසෙසු අකප්පියමංසෙසු දුක්කටං, භික්ඛුනියා ලසුණෙ පාචිත්තියං. පඤ්ච භොජනපච්චයාති අවස්සුතා අවස්සුතස්ස පුරිසස්ස හත්ථතො භොජනං ගහෙත්වා තත්ථෙව [Pg.232] මනුස්සමංසං ලසුණං අත්තනො අත්ථාය විඤ්ඤාපෙත්වා ගහිතපණීතභොජනානි අවසෙසඤ්ච අකප්පියමංසං පක්ඛිපිත්වා වොමිස්සකං ඔමද්දිත්වා අජ්ඣොහරමානා සඞ්ඝාදිසෙසං, ථුල්ලච්චයං, පාචිත්තියං, පාටිදෙසනීයං, දුක්කටන්ති ඉමා පඤ්ච ආපත්තියො භොජනපච්චයා ආපජ්ජති. "खादन्तस्स तिस्सो" म्हणजे मानवी मांस खाल्ल्यास थुल्लच्चय होते, इतर अकल्पनीय मांस खाल्ल्यास दुक्कट होते, आणि भिक्खुणीने लसूण खाल्ल्यास पाचित्तिय होते. "पञ्च भोजनपच्चया" म्हणजे कामवासनायुक्त भिक्खुणी कामवासनायुक्त पुरुषाच्या हातातून भोजन ग्रहण करून, त्याच ठिकाणी मानवी मांस आणि लसूण स्वतःसाठी मागवून, घेतलेले प्रणीत भोजन आणि इतर अकल्पनीय मांस एकत्र करून, ते सर्व एकत्र मिसळून, मळून खात असताना संघादिसेस, थुल्लच्चय, पाचित्तिय, पाटिदेसनीय आणि दुक्कट या पाच आपत्तींना भोजनाच्या कारणाने प्राप्त होते। පඤ්ච ඨානානීති ‘‘උක්ඛිත්තානුවත්තිකාය භික්ඛුනියා යාවතතියං සමනුභාසනාය අප්පටිනිස්සජ්ජන්තියා ඤත්තියා දුක්කටං, ද්වීහි කම්මවාචාහි ථුල්ලච්චයං, කම්මවාචාපරියොසානෙ ආපත්ති පාරාජිකස්ස, සඞ්ඝභෙදාය පරක්කමනාදීසු සඞ්ඝාදිසෙසො, පාපිකාය දිට්ඨියා අප්පටිනිස්සග්ගෙ පාචිත්තිය’’න්ති එවං සබ්බා යාවතතියකා පඤ්ච ඨානානි ගච්ඡන්ති. පඤ්චන්නඤ්චෙව ආපත්තීති ආපත්ති නාම පඤ්චන්නං සහධම්මිකානං හොති, තත්ථ ද්වින්නං නිප්පරියායෙන ආපත්තියෙව, සික්ඛාමානසාමණෙරිසාමණෙරානං පන අකප්පියත්තා න වට්ටති. ඉමිනා පරියායෙන තෙසං ආපත්ති න දෙසාපෙතබ්බා, දණ්ඩකම්මං පන තෙසං කාතබ්බං. පඤ්චන්නං අධිකරණෙන චාති අධිකරණඤ්ච පඤ්චන්නමෙවාති අත්ථො. එතෙසංයෙව හි පඤ්චන්නං පත්තචීවරාදීනං අත්ථාය විනිච්ඡයවොහාරො අධිකරණන්ති වුච්චති, ගිහීනං පන අඩ්ඩකම්මං නාම හොති. "पाच स्थाने" म्हणजे "बहिष्कृत भिक्षूचे अनुकरण करणाऱ्या भिक्षुणीने तिसऱ्यांदा समनुभाषण (ताकीद) करूनही आपला हेका न सोडल्यास, ज्ञप्तीच्या वेळी 'दुक्कट' (दुष्कृत) आपत्ती होते; दोन कम्मवाचांच्या वेळी 'थुल्लच्चय' (स्थूल दोष) आपत्ती होते; आणि कम्मवाचा समाप्त झाल्यावर 'पाराजिक' आपत्ती होते. संघभेदासाठी प्रयत्न इत्यादी केल्यास 'संघादिसेस' आपत्ती होते. पापी (चुकीची) दृष्टी न सोडल्यास 'पाचित्तिय' आपत्ती होते." अशा प्रकारे सर्व 'यावततीयक' (तिसऱ्या ताकीदीपर्यंतच्या) आपत्ती या पाच स्थानांना प्राप्त होतात. "पाच जणांनाच आपत्ती होते" म्हणजे आपत्ती ही पाच सहधार्मिकांनाच (समान धर्माचे पालन करणाऱ्यांना) लागू होते. त्यापैकी दोघांना (भिक्षू आणि भिक्षुणी) मुख्य रूपाने आपत्तीच लागू होते. परंतु सिक्खमाना, सामणेरी आणि सामणेर यांना अकल्पनीय (अयोग्य) असल्यामुळे ते लागू पडत नाही. या कारणाने त्यांच्याकडून आपत्तीची देशना (स्वीकृती) करवून घेऊ नये, परंतु त्यांना दंडकर्म दिले पाहिजे. "पाच जणांचे अधिकरण" म्हणजे अधिकरण देखील केवळ पाच जणांचेच होते, असा अर्थ आहे. कारण या पाच जणांच्याच पात्र, चीवर इत्यादींच्या संदर्भातील निर्णयाच्या व्यवहाराला 'अधिकरण' असे म्हटले जाते; गृहस्थांसाठी मात्र याला 'अड्डकम्म' (न्यायालयीन खटला) असे म्हटले जाते. පඤ්චන්නං විනිච්ඡයො හොතීති පඤ්චන්නං සහධම්මිකානංයෙව විනිච්ඡයො නාම හොති. පඤ්චන්නං වූපසමෙන චාති එතෙසංයෙව පඤ්චන්නං අධිකරණං විනිච්ඡිතං වූපසන්තං නාම හොතීති අත්ථො. පඤ්චන්නඤ්චෙව අනාපත්තීති එතෙසංයෙව පඤ්චන්නං අනාපත්ති නාම හොතීති අත්ථො. තීහි ඨානෙහි සොභතීති සඞ්ඝාදීහි තීහි කාරණෙහි සොභති. කතවීතික්කමො හි පුග්ගලො සප්පටිකම්මං ආපත්තිං සඞ්ඝමජ්ඣෙ ගණමජ්ඣෙ පුග්ගලසන්තිකෙ වා පටිකරිත්වා අබ්භුණ්හසීලො පාකතිකො හොති, තස්මා තීහි ඨානෙහි සොභතීති වුච්චති. "पाच जणांचा निर्णय होतो" म्हणजे केवळ पाच सहधार्मिकांचाच निर्णय होतो. "पाच जणांच्या शमनाने" म्हणजे या पाच जणांचेच अधिकरण निर्णयानंतर शांत (शमित) झाले असे म्हटले जाते, असा अर्थ आहे. "पाच जणांनाच अनापत्ती होते" म्हणजे केवळ या पाच जणांनाच अनापत्ती (दोषमुक्तता) होते, असा अर्थ आहे. "तीन स्थानांनी शोभून दिसतो" म्हणजे संघ इत्यादी तीन कारणांनी शोभून दिसतो. कारण ज्या व्यक्तीने विनय नियमांचे उल्लंघन केले आहे, ती व्यक्ती प्रायश्चित्ताने दुरुस्त होण्याजोग्या आपत्तीचे संघाच्या मध्ये, गणाच्या मध्ये किंवा एखाद्या भिक्षूच्या समक्ष प्रायश्चित्त घेऊन पुन्हा शुद्ध शीलवान आणि पूर्ववत बनते. म्हणूनच "तीन स्थानांनी शोभून दिसतो" असे म्हटले जाते. ද්වෙ කායිකා රත්තින්ති භික්ඛුනී රත්තන්ධකාරෙ පුරිසස්ස හත්ථපාසෙ ඨානනිසජ්ජසයනානි කප්පයමානා පාචිත්තියං, හත්ථපාසං විජහිත්වා ඨානාදීනි කප්පයමානා දුක්කටන්ති ද්වෙ කායද්වාරසම්භවා ආපත්තියො රත්තිං ආපජ්ජති. ද්වෙ කායිකා දිවාති එතෙනෙව උපායෙන දිවා පටිච්ඡන්නෙ ඔකාසෙ ද්වෙ ආපත්තියො ආපජ්ජති. නිජ්ඣායන්තස්ස එකා ආපත්තීති ‘‘න ච, භික්ඛවෙ, සාරත්තෙන මාතුගාමස්ස අඞ්ගජාතං උපනිජ්ඣායිතබ්බං[Pg.233]. යො උපනිජ්ඣායෙය්ය, ආපත්ති දුක්කටස්සා’’ති (පාරා. 266) නිජ්ඣායන්තස්ස අයමෙකා ආපත්ති. එකා පිණ්ඩපාතපච්චයාති ‘‘න ච, භික්ඛවෙ, භික්ඛාදායිකාය මුඛං ඔලොකෙතබ්බ’’න්ති (චූළව. 366) එත්ථ දුක්කටාපත්ති, අන්තමසො යාගුං වා බ්යඤ්ජනං වා දෙන්තස්ස සාමණෙරස්සාපි හි මුඛං උල්ලොකයතො දුක්කටමෙව. කුරුන්දියං පන ‘‘එකා පිණ්ඩපාතපච්චයාති භික්ඛුනිපරිපාචිතං පිණ්ඩපාතං භුඤ්ජන්තස්ස පාචිත්තිය’’න්ති වුත්තං. "रात्रीच्या वेळी दोन कायिक (शारीरिक) आपत्ती" म्हणजे भिक्षुणीने रात्रीच्या अंधारात पुरुषाच्या हाताच्या अंतरावर उभे राहणे, बसणे किंवा झोपणे केल्यास 'पाचित्तिय' आपत्ती होते; आणि हाताचे अंतर सोडून उभे राहणे इत्यादी केल्यास 'दुक्कट' आपत्ती होते. अशा प्रकारे ती रात्रीच्या वेळी कायद्वारातून उत्पन्न होणाऱ्या दोन आपत्तींना प्राप्त होते. "दिवसा दोन कायिक आपत्ती" म्हणजे याच पद्धतीने दिवसाच्या वेळी गुप्त ठिकाणी दोन आपत्तींना प्राप्त होते. "निरखून पाहणाऱ्याला एक आपत्ती" म्हणजे "भिक्षूंनो, आसक्तीने स्त्रीच्या गुप्तांगाकडे निरखून पाहू नये. जो निरखून पाहील, त्याला दुक्कट आपत्ती होईल." अशा प्रकारे निरखून पाहणाऱ्याला ही एक आपत्ती होते. "पिंडपाताच्या कारणाने एक आपत्ती" म्हणजे "भिक्षूंनो, भिक्षा देणाऱ्या स्त्रीच्या चेहऱ्याकडे पाहू नये" या संदर्भात सांगितलेली दुक्कट आपत्ती होय. कारण अगदी कण्जी किंवा व्यंजन देणाऱ्या सामणेराच्या चेहऱ्याकडे देखील वर करून पाहणाऱ्या भिक्षूला दुक्कट आपत्तीच होते. परंतु कुरुन्दी अट्टकथेत "पिंडपाताच्या कारणाने एक आपत्ती म्हणजे भिक्षुणीने तयार करवलेला पिंडपात जेवणाऱ्याला पाचित्तिय आपत्ती होते" असे म्हटले आहे. අට්ඨානිසංසෙ සම්පස්සන්ති කොසම්බකක්ඛන්ධකෙ වුත්තානිසංසෙ. උක්ඛිත්තකා තයො වුත්තාති ආපත්තියා අදස්සනෙ අප්පටිකම්මෙ පාපිකාය ච දිට්ඨියා අප්පටිනිස්සග්ගෙති. තෙචත්තාලීස සම්මාවත්තනාති තෙසංයෙව උක්ඛිත්තකානං එත්තකෙසු වත්තෙසු වත්තනා. "आठ आनिशंस (फायदे) पाहतात" म्हणजे कोसम्बक खन्धकात सांगितलेले आनिशंस होय. "तीन निलंबित व्यक्ती सांगितल्या आहेत" म्हणजे आपत्ती न मानल्यामुळे, आपत्तीचे प्रायश्चित्त न घेतल्यामुळे आणि पापी दृष्टी न सोडल्यामुळे निलंबित केलेले तीन भिक्षू होत. "तेहेचाळीस सम्यक वर्तने" म्हणजे त्या निलंबित भिक्षूंचीच एवढ्या (४३) कर्तव्यांमध्ये योग्य वर्तणूक होय. පඤ්චඨානෙ මුසාවාදොති පාරාජිකසඞ්ඝාදිසෙසථුල්ලච්චයපාචිත්තියදුක්කටසඞ්ඛාතෙ පඤ්චට්ඨානෙ මුසාවාදො ගච්ඡති. චුද්දස පරමන්ති වුච්චතීති දසාහපරමාදිනයෙන හෙට්ඨා වුත්තං. ද්වාදස පාටිදෙසනීයාති භික්ඛූනං චත්තාරි භික්ඛුනීනං අට්ඨ. චතුන්නං දෙසනාය චාති චතුන්නං අච්චයදෙසනායාති අත්ථො. කතමා පන සාති? දෙවදත්තෙන පයොජිතානං අභිමාරානං අච්චයදෙසනා, අනුරුද්ධත්ථෙරස්ස උපට්ඨායිකාය අච්චයදෙසනා, වඩ්ඪස්ස ලිච්ඡවිනො අච්චයදෙසනා, වාසභගාමියත්ථෙරස්ස උක්ඛෙපනීයකම්මං කත්වා ආගතානං භික්ඛූනං අච්චයදෙසනාති අයං චතුන්නං අච්චයදෙසනා නාම. "पाच स्थानांमध्ये असत्य भाषण" म्हणजे पाराजिक, संघादिसेस, थुल्लच्चय, पाचित्तिय आणि दुक्कट या पाच स्थानांमध्ये असत्य भाषण जाते (म्हणजे या पाच आपत्तींना कारणीभूत ठरते). "चौदा दिवस मर्यादा" असे जे म्हटले आहे, ते 'दहा दिवस मर्यादा' इत्यादी नियमाने खाली (पूर्वी) सांगितले आहे. "बारा पाटिदेसनीय" म्हणजे भिक्षूंचे चार आणि भिक्षुणींचे आठ पाटिदेसनीय होय. "चार जणांच्या देशनेने" म्हणजे चार जणांच्या अपराध-स्वीकृतीने (अच्चयदेसनेने), असा अर्थ आहे. ती कोणती आहे? देवदत्ताने पाठवलेल्या मारेकऱ्यांची अपराध-स्वीकृती, अनुरुद्ध थेरांच्या सेविकेची अपराध-स्वीकृती, वड्ढ लिच्छवीची अपराध-स्वीकृती, आणि वासभगामिय थेरांवर उत्क्षेपणीय कर्म करून आलेल्या भिक्षूंची अपराध-स्वीकृती. याला 'चार जणांची अपराध-स्वीकृती' असे म्हणतात. අට්ඨඞ්ගිකො මුසාවාදොති ‘‘පුබ්බෙවස්ස හොති මුසා භණිස්ස’’න්ති ආදිං කත්වා ‘‘විනිධාය සඤ්ඤ’’න්ති පරියොසානෙහි (පාචි. 4-5; පරි. 459) අට්ඨහි අඞ්ගෙහි අට්ඨඞ්ගිකො. උපොසථඞ්ගානිපි පාණං න හනෙතිආදිනා නයෙන වුත්තානෙව. අට්ඨ දූතෙය්යඞ්ගානීති ‘‘ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සොතා ච හොති සාවෙතා චා’’තිආදිනා (චූළව. 347) නයෙන සඞ්ඝභෙදකෙ වුත්තානි. අට්ඨ තිත්ථියවත්තානි මහාඛන්ධකෙ වුත්තානි. "आठ अंगांनी युक्त असत्य भाषण" म्हणजे "त्याला आधीच ठाऊक असते की मी असत्य बोलेन" इथपासून सुरू करून "संज्ञा बदलून" या शेवटापर्यंतच्या आठ अंगांनी युक्त असत्य भाषण होय. उपोसथाची अंगे देखील "प्राणातिपात न करणे" इत्यादी पद्धतीने सांगितलेलीच आहेत. "दूताची आठ अंगे" म्हणजे "इथे, भिक्षूंनो, भिक्षू ऐकणारा आणि ऐकवणारा असतो" इत्यादी पद्धतीने संघभेदक खन्धकात सांगितलेली अंगे होत. "तीर्थिकांची आठ वर्तने" महाखन्धकात सांगितली आहेत. අට්ඨවාචිකා උපසම්පදාති භික්ඛුනීනං උපසම්පදං සන්ධාය වුත්තං. අට්ඨන්නං පච්චුට්ඨාතබ්බන්ති භත්තග්ගෙ අට්ඨන්නං භික්ඛුනීනං ඉතරාහි පච්චුට්ඨාය ආසනං දාතබ්බං[Pg.234]. භික්ඛුනොවාදකො අට්ඨහීති අට්ඨහඞ්ගෙහි සමන්නාගතො භික්ඛු භික්ඛුනොවාදකො සම්මන්නිතබ්බො. "आठ वाचनांची उपसंपदा" हे भिक्षुणींच्या उपसंपदेच्या संदर्भात म्हटले आहे. "आठ जणींच्या सन्मानार्थ उभे राहिले पाहिजे" म्हणजे भोजनशाळेत इतर भिक्षुणींनी आठ भिक्षुणींच्या सन्मानार्थ उभे राहून आसन दिले पाहिजे. "आठ गुणांनी युक्त भिक्षुणी-उपदेशक" म्हणजे आठ अंगांनी युक्त असलेल्या भिक्षूला भिक्षुणी-उपदेशक म्हणून संमत केले पाहिजे. එකස්ස ඡෙජ්ජන්ති ගාථාය නවසු ජනෙසු යො සලාකං ගාහෙත්වා සඞ්ඝං භින්දති, තස්සෙව ඡෙජ්ජං හොති, දෙවදත්තො විය පාරාජිකං ආපජ්ජති. භෙදකානුවත්තකානං චතුන්නං ථුල්ලච්චයං කොකාලිකාදීනං විය, ධම්මවාදීනං චතුන්නං අනාපත්ති. ඉමා පන ආපත්තියො ච අනාපත්තියො ච සබ්බෙසං එකවත්ථුකා සඞ්ඝභෙදවත්ථුකා එව. "एकाचा छेद होतो" या गाथेमध्ये अर्थ असा समजावा: नऊ जणांमध्ये जो शलाका (मतपत्रिका) घेऊन संघभेद करतो, त्याचाच छेद (शासनातून समूळ उच्छेद) होतो, तो देवदत्ताप्रमाणे पाराजिक आपत्तीला प्राप्त होतो. भेद करणाऱ्याचे अनुकरण करणाऱ्या चार जणांना कोकालिक इत्यादींप्रमाणे थुल्लच्चय आपत्ती होते. धर्मवादी असलेल्या चार जणांना अनापत्ती (दोष नाही) होते. परंतु या सर्व आपत्ती आणि अनापत्ती सर्वांसाठी एकाच विषयावर आधारित आहेत, म्हणजेच त्या केवळ संघभेद या विषयावरच आधारित आहेत. නව ආඝාතවත්ථූනීති ගාථාය නවහීති නවහි භික්ඛූහි සඞ්ඝො භිජ්ජති. ඤත්තියා කරණා නවාති ඤත්තියා කාතබ්බානි කම්මානි නවාති අත්ථො. සෙසං උත්තානමෙව. "नऊ आघातवस्तू" या गाथेमध्ये "नऊ जणांनी" म्हणजे नऊ भिक्षूंमुळे संघ विभक्त होतो. "ज्ञप्तीने करावयाची नऊ" म्हणजे ज्ञप्तीने करावयाची कर्मे नऊ आहेत, असा अर्थ आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. (4) අවන්දනීයපුග්ගලාදිවණ්ණනා (४) अवंदनीय पुद्गल (वंदन न करण्यायोग्य व्यक्ती) इत्यादींचे वर्णन. 477. දස පුග්ගලා නාභිවාදෙතබ්බාති සෙනාසනක්ඛන්ධකෙ වුත්තා දස ජනා. අඤ්ජලි සාමීචෙන චාති සාමීචිකම්මෙන සද්ධිං අඤ්ජලි ච තෙසං න කාතබ්බො, නෙව පානීයාපුච්ඡනතාලවණ්ටග්ගහණාදි ඛන්ධකවත්තං තෙසං දස්සෙතබ්බං, න අඤ්ජලි පග්ගණ්හිතබ්බොති අත්ථො. දසන්නං දුක්කටන්ති තෙසංයෙව දසන්නං එවං කරොන්තස්ස දුක්කටං හොති. දස චීවරධාරණාති දස දිවසානි අතිරෙකචීවරස්ස ධාරණා අනුඤ්ඤාතාති අත්ථො. ४७७. "दहा व्यक्तींना अभिवादन करू नये" म्हणजे सेनासनखन्धकात सांगितलेल्या दहा व्यक्ती होत. "आणि आदरयुक्त अंजली" म्हणजे आदराच्या कर्मासोबत त्यांना अंजली देखील करू नये; तसेच त्यांना पिण्याचे पाणी विचारणे, ताडपत्राचा पंखा घेणे इत्यादी खन्धक-कर्तव्ये दाखवू नयेत, आणि हात जोडू नयेत, असा अर्थ आहे. "दहा जणांना दुक्कट" म्हणजे त्या दहा जणांच्या बाबतीत असे करणाऱ्या भिक्षूला दुक्कट आपत्ती होते. "दहा दिवस चीवर धारण करणे" म्हणजे दहा दिवसांपर्यंत अतिरिक्त चीवर धारण करण्याची अनुमती आहे, असा अर्थ आहे. පඤ්චන්නං වස්සංවුට්ඨානං, දාතබ්බං ඉධ චීවරන්ති පඤ්චන්නං සහධම්මිකානං සම්මුඛාව දාතබ්බං. සත්තන්නං සන්තෙති දිසාපක්කන්තඋම්මත්තකඛිත්තචිත්තවෙදනාට්ටානං තිණ්ණඤ්ච උක්ඛිත්තකානන්ති ඉමෙසං සත්තන්නං සන්තෙ පතිරූපෙ ගාහකෙ පරම්මුඛාපි දාතබ්බං. සොළසන්නං න දාතබ්බන්ති සෙසානං චීවරක්ඛන්ධකෙ වුත්තානං පණ්ඩකාදීනං සොළසන්නං න දාතබ්බං. ‘पाच वर्षावास पूर्ण केलेल्यांना येथे चीवर दिले जावे’ (पञ्चन्नं वस्संवुट्ठानं, दातब्बं इध चीवरन्ति) याचा अर्थ असा की, पाच सहधम्मिक भिक्खूंच्या समक्षच (प्रत्यक्ष उपस्थितीतच) चीवर दिले जावे. ‘सात जण असताना’ (सत्तन्नं सन्तेति) याचा अर्थ असा की, दुसऱ्या दिशेला निघून गेलेले, वेडे (उन्मत्त), विक्षिप्त चित्त असलेले, वेदनेने पीडित असलेले आणि तीन प्रकारचे उक्खित्तक (निलंबित) भिक्खू; अशा या सात प्रकारच्या भिक्खूंच्या बाबतीत, जर योग्य प्रतिनिधी (स्वीकारणारा) उपलब्ध असेल, तर त्यांच्या परोक्षही (अनुपस्थितीतही) चीवर दिले जाऊ शकते. ‘सोळा जणांना दिले जाऊ नये’ (सोळसन्नं न दातब्बन्ति) याचा अर्थ असा की, चीवरक्खन्धकामध्ये सांगितलेल्या पंडक (नपुंसक) इत्यादी उर्वरित सोळा प्रकारच्या व्यक्तींना चीवर दिले जाऊ नये. කතිසතං රත්තිසතං, ආපත්තියො ඡාදයිත්වානාති කතිසතං ආපත්තියො රත්තිසතං ඡාදයිත්වාන. දසසතං රත්තිසතං, ආපත්තියො ඡාදයිත්වානාති දසසතං ආපත්තියො රත්තිසතං ඡාදයිත්වාන. අයඤ්හෙත්ථ සඞ්ඛෙපත්ථො – යො දිවසෙ සතං සතං සඞ්ඝාදිසෙසාපත්තියො ආපජ්ජිත්වා දස දස දිවසෙ පටිච්ඡාදෙති, තෙන රත්තිසතං ආපත්තිසහස්සං පටිච්ඡාදිතං හොති, සො සබ්බාව තා ආපත්තියො දසාහපටිච්ඡන්නාති [Pg.235] පරිවාසං යාචිත්වා දස රත්තියො වසිත්වාන මුච්චෙය්ය පාරිවාසිකොති. ‘किती शंभर रात्री, आपत्ती लपवून’ (कतिसतं रत्तिसतं, आपत्तियो छादयित्वानति) म्हणजे किती शंभर आपत्ती (गुन्हे) शंभर रात्रींपर्यंत लपवून ठेवल्या. ‘दहाशे रात्री, आपत्ती लपवून’ (दससतं रत्तिसतं, आपत्तियो छादयित्वानति) म्हणजे दहाशे (एक हजार) आपत्ती शंभर रात्रींपर्यंत लपवून ठेवल्या. याचा संक्षिप्त अर्थ असा आहे – जो भिक्खू दररोज शंभर-शंभर संघादिसेस आपत्तींना प्राप्त होतो आणि त्या प्रत्येकी दहा-दहा दिवस लपवून ठेवतो, त्याने शंभर रात्रींपर्यंत एक हजार आपत्ती लपवून ठेवलेल्या असतात. तो पारिवासिक (परिव्वास पाळणारा) भिक्खू त्या सर्व आपत्तींना ‘दहा दिवस लपवलेल्या’ असे मानून समोधान-परिव्हासाची याचना करून, दहा रात्री वास करून (राहून) त्यातून मुक्त होऊ शकतो. ද්වාදස කම්මදොසා වුත්තාති අපලොකනකම්මං අධම්මෙනවග්ගං, අධම්මෙනසමග්ගං, ධම්මෙනවග්ගං, තථා ඤත්තිකම්මඤත්තිදුතියකම්මඤත්තිචතුත්ථකම්මානිපීති එවං එකෙකස්මිං කම්මෙ තයො තයො කත්වා ද්වාදස කම්මදොසා වුත්තා. ‘बारा कम्म-दोष सांगितले आहेत’ (द्वादस कम्मदॉसा वुत्ताति) म्हणजे अपलोकन-कम्म हे अधम्मेन-वग्ग (अधार्मिक व अपूर्ण), अधम्मेन-समग्ग (अधार्मिक व पूर्ण) आणि धम्मेन-वग्ग (धार्मिक व अपूर्ण) अशा प्रकारे तीन प्रकारचे असते. तसेच ञत्ति-कम्म (ज्ञप्ति-कर्म), ञत्ति-दुतिय-कम्म आणि ञत्ति-चतुत्थ-कम्म हे देखील प्रत्येकी तीन प्रकारचे असतात. अशा प्रकारे प्रत्येक कम्माचे तीन-तीन प्रकार करून बारा कम्म-दोष सांगितले आहेत. චතස්සො කම්මසම්පත්තියොති අපලොකනකම්මං ධම්මෙනසමග්ගං, තථා සෙසානිපීති එවං චතස්සො කම්මසම්පත්තියො වුත්තා. ‘चार कम्म-संपत्ती’ (चतस्सो कम्मसम्पत्तियोति) म्हणजे धम्मेन-समग्ग (धार्मिक व पूर्ण) असलेले अपलोकन-कम्म; आणि त्याचप्रमाणे उर्वरित तीन कम्मे (ञत्ति, ञत्ति-दुतिय, ञत्ति-चतुत्थ) देखील धम्मेन-समग्ग असणे. अशा प्रकारे चार कम्म-संपत्ती सांगितल्या आहेत. ඡ කම්මානීති අධම්මෙනවග්ගකම්මං, අධම්මෙනසමග්ගකම්මං, ධම්මපතිරූපකෙනවග්ගකම්මං, ධම්මපතිරූපකෙනසමග්ගකම්මං, ධම්මෙනවග්ගකම්මං, ධම්මෙනසමග්ගකම්මන්ති එවං ඡ කම්මානි වුත්තානි. එකෙත්ථ ධම්මිකා කතාති එකං ධම්මෙන සමග්ගකම්මමෙවෙත්ථ ධම්මිකං කතන්ති අත්ථො. දුතියගාථාවිස්සජ්ජනෙපි එතදෙව ධම්මිකං. ‘सहा कम्मे’ (छ कम्मानीति) म्हणजे अधम्मेन-वग्ग-कम्म, अधम्मेन-समग्ग-कम्म, धम्मपटिरूपकेन-वग्ग-कम्म (धर्माभासयुक्त व अपूर्ण), धम्मपटिरूपकेन-समग्ग-कम्म (धर्माभासयुक्त व पूर्ण), धम्मेन-वग्ग-कम्म आणि धम्मेन-समग्ग-कम्म; अशी सहा कम्मे सांगितली आहेत. ‘यातील एक धार्मिक (वैध) मानले आहे’ (एकेत्थ धम्मिका कताति) याचा अर्थ असा की, या सहा कम्मांपैकी केवळ एकच ‘धम्मेन-समग्ग-कम्म’ हे धार्मिक (वैध) मानले गेले आहे. दुसऱ्या गाथेच्या उत्तरामध्येही हेच कम्म धार्मिक मानले आहे. යං දෙසිතාති යානි දෙසිතානි වුත්තානි පකාසිතානි. අනන්තජිනෙනාතිආදීසු පරියන්තපරිච්ඡෙදභාවරහිතත්තා අනන්තං වුච්චති නිබ්බානං, තං භගවතා රඤ්ඤා සපත්තගණං අභිමද්දිත්වා රජ්ජං විය කිලෙසගණං අභිමද්දිත්වා ජිතං විජිතං අධිගතං සම්පත්තං, තස්මා භගවා ‘‘අනන්තජිනො’’ති වුච්චති. ස්වෙව ඉට්ඨානිට්ඨෙසු නිබ්බිකාරතාය තාදි, වික්ඛම්භනතදඞ්ගසමුච්ඡෙදපටිපස්සද්ධිනිස්සරණවිවෙකසඞ්ඛාතං විවෙකපඤ්චකං අද්දසාති විවෙකදස්සී; තෙන අනන්තජිනෙන තාදිනා විවෙකදස්සිනා යානි ආපත්තික්ඛන්ධානි දෙසිතානි වුත්තානි. එකෙත්ථ සම්මති විනා සමථෙහීති අයමෙත්ථ පදසම්බන්ධො, යානි සත්ථාරා සත්ත ආපත්තික්ඛන්ධානි දෙසිතානි, තත්ථ එකාපි ආපත්ති විනා සමථෙහි න සම්මති, අථ ඛො ඡ සමථා චත්තාරි අධිකරණානීති සබ්බෙපිමෙ ධම්මා සම්මුඛාවිනයෙන සම්මන්ති, සමායොගං ගච්ඡන්ති. එත්ථ පන එකො සම්මුඛාවිනයොව විනා සමථෙහි සම්මති, සමථභාවං ගච්ඡති. න හි තස්ස අඤ්ඤෙන සමථෙන විනා අනිප්ඵත්ති නාම අත්ථි. තෙන වුත්තං – ‘‘එකෙත්ථ සම්මති විනා සමථෙහී’’ති. ඉමිනා තාව අධිප්පායෙන අට්ඨකථාසු අත්ථො වුත්තො. මයං පන ‘‘විනා’’ති නිපාතස්ස පටිසෙධනමත්තමත්ථං ගහෙත්වා ‘‘එකෙත්ථ සම්මති විනා සමථෙහී’’ති [Pg.236] එතෙසු සත්තසු ආපත්තික්ඛන්ධෙසු එකො පාරාජිකාපත්තික්ඛන්ධො විනා සමථෙහි සම්මතීති එතමත්ථං රොචෙය්යාම. වුත්තම්පි චෙතං ‘‘යා සා ආපත්ති අනවසෙසා, සා ආපත්ති න කතමෙන අධිකරණෙන කතමම්හි ඨානෙ න කතමෙන සමථෙන සම්මතී’’ති. ‘जे देशित (उपदेशिले) आहे’ (यं देसिताति) म्हणजे जे उपदेशिले, सांगितले आणि प्रकाशित केले आहे. ‘अनंतजिनाने’ (अनन्तजिनेनाति) इत्यादी शब्दांमध्ये, मर्यादा किंवा सीमा नसलेल्या स्वरूपाचे असल्यामुळे निब्बाणाला (निर्वाणाला) ‘अनंत’ म्हटले जाते. ज्याप्रमाणे एखादा राजा शत्रूंचा पराभव करून राज्य जिंकतो, त्याचप्रमाणे भगवंतांनी क्लेशांच्या समूहाचा नाश करून ते (अनंत निब्बान) जिंकले, विशेष रूपाने जिंकले, प्राप्त केले आणि अधिगत केले; म्हणून भगवंतांना ‘अनंतजिन’ (अनंत जिंकणारे) म्हटले जाते. ते स्वतः इष्ट आणि अनिष्ट गोष्टींमध्ये निर्विकार (अविचलित) राहत असल्यामुळे ‘तादि’ (तथाविध/समतायुक्त) आहेत. त्यांनी विक्खम्भन (दमन), तदङ्ग (तात्कालिक त्याग), समुच्छेद (समूळ उच्चाटन), पटिपस्सद्धि (प्रशमन) आणि निस्सरण (मुक्ती) या पाच प्रकारच्या विवेकांचे (अलिप्ततेचे) दर्शन घेतले, म्हणून ते ‘विवेकदस्सी’ (विवेक पाहणारे) आहेत. त्या अनंतजिन, तादि आणि विवेकदस्सी भगवंतांनी जे आपत्तींचे समूह (आपत्तिक्खन्ध) उपदेशिले आहेत. ‘येथे एक समथांशिवाय शांत होते’ (एकेत्थ सम्मति विना समथेहीति) हा येथील पदांचा संबंध आहे. शास्त्यांनी (बुद्धांनी) जे सात आपत्तींचे समूह उपदेशिले आहेत, त्यांपैकी एकही आपत्ती समथांशिवाय (विवादाच्या शमनाशिवाय) शांत होत नाही. उलट, सहा समथ आणि चार अधिकरणे हे सर्व धर्म ‘सम्मुखाविनय’ (प्रत्यक्ष विनय) द्वारे शांत होतात, त्याच्याशी जोडले जातात. परंतु येथे केवळ एक ‘सम्मुखाविनय’ हाच इतर समथांशिवाय शांत होतो, समथभावाला प्राप्त होतो. कारण इतर समथांशिवाय त्याची असिद्धी (अपूर्णता) होत नाही. म्हणूनच, ‘येथे एक समथांशिवाय शांत होते’ असे आयुष्यमान उपालि थेरांनी म्हटले आहे. अट्ठकथांमध्ये (अट्टकथांमध्ये) प्रथम या अभिप्रायाने अर्थ सांगितला आहे. परंतु आम्ही ‘विना’ या निपाताचा केवळ निषेधार्थक अर्थ घेऊन, ‘येथे एक समथांशिवाय शांत होते’ याचा अर्थ – या सात आपत्ती समूहांपैकी एक ‘पाराजिक आपत्ती समूह’ हा समथांशिवाय शांत होतो, हा अर्थ पसंत करतो. हे असेही म्हटले आहे – ‘जी आपत्ती अनवसेस (निरवशेष/पाराजिक) आहे, ती आपत्ती कोणत्या अधिकरणाने, कोणत्या ठिकाणी आणि कोणत्या समथाने शांत होत नाही?’ ඡඌනදියඩ්ඪසතාති ‘‘ඉධ, උපාලි, භික්ඛු අධම්මං ධම්මොති දීපෙති, තස්මිං අධම්මදිට්ඨි භෙදෙ අධම්මදිට්ඨි, තස්මිං අධම්මදිට්ඨි භෙදෙ ධම්මදිට්ඨි, තස්මිං අධම්මදිට්ඨි භෙදෙ වෙමතිකො, තස්මිං ධම්මදිට්ඨි භෙදෙ අධම්මදිට්ඨි, තස්මිං ධම්මදිට්ඨි භෙදෙ වෙමතිකො, තස්මිං වෙමතිකො භෙදෙ අධම්මදිට්ඨි, තස්මිං වෙමතිකො භෙදෙ ධම්මදිට්ඨි, තස්මිං වෙමතිකො භෙදෙ වෙමතිකො’’ති එවං යානි අට්ඨාරසන්නං භෙදකරවත්ථූනං වසෙන අට්ඨාරස අට්ඨකානි සඞ්ඝභෙදකක්ඛන්ධකෙ වුත්තානි, තෙසං වසෙන ඡඌනදියඩ්ඪසතං ආපායිකා වෙදිතබ්බා. ‘सहाने कमी दीडशे’ (छऊनदियड्ढसताति - १४४) याचा अर्थ असा: ‘हे उपालि! येथे एखादा भिक्खू अधम्माला धम्म म्हणून दाखवतो. त्या अधम्मामध्ये त्याची अधम्म-दृष्टी असते आणि संघभेदाच्या बाबतीतही त्याची अधम्म-दृष्टी असते; त्या अधम्मामध्ये त्याची अधम्म-दृष्टी असते आणि संघभेदाच्या बाबतीत धम्म-दृष्टी असते; त्या अधम्मामध्ये त्याची अधम्म-दृष्टी असते आणि संघभेदाच्या बाबतीत तो संशयी (वेमतिको) असतो; त्या अधम्मामध्ये त्याची धम्म-दृष्टी असते आणि संघभेदाच्या बाबतीत अधम्म-दृष्टी असते; त्या अधम्मामध्ये त्याची धम्म-दृष्टी असते आणि संघभेदाच्या बाबतीत तो संशयी असतो; त्या अधम्मामध्ये तो संशयी असतो आणि संघभेदाच्या बाबतीत अधम्म-दृष्टी असते; त्या अधम्मामध्ये तो संशयी असतो आणि संघभेदाच्या बाबतीत धम्म-दृष्टी असते; त्या अधम्मामध्ये तो संशयी असतो आणि संघभेदाच्या बाबतीत संशयी असतो.’ अशा प्रकारे संघभेदकक्खन्धकामध्ये सांगितलेल्या अठरा संघभेदक वस्तूंच्या (कारणांच्या) आधारे अठरा अष्टके (१८ × ८ = १४४) होतात. त्यांच्या आधारे सहाने कमी दीडशे म्हणजेच १४४ व्यक्ती अपायगामी (नरकात किंवा दुर्गतीत जाणाऱ्या) समजाव्यात. අට්ඨාරස අනාපායිකාති ‘‘ඉධ, උපාලි, භික්ඛු අධම්මං ධම්මොති දීපෙති, තස්මිං ධම්මදිට්ඨි භෙදෙ ධම්මදිට්ඨි අවිනිධාය දිට්ඨිං අවිනිධාය ඛන්තිං අවිනිධාය රුචිං අවිනිධාය භාවං අනුස්සාවෙති, සලාකං ගාහෙති ‘අයං ධම්මො, අයං විනයො, ඉදං සත්ථුසාසනං, ඉමං ගණ්හථ, ඉමං රොචෙථා’ති, අයම්පි ඛො, උපාලි, සඞ්ඝභෙදකො න ආපායිකො න නෙරයිකො න කප්පට්ඨො න අතෙකිච්ඡො’’ති එවං එකෙකස්මිං වත්ථුස්මිං එකෙකං කත්වා සඞ්ඝභෙදකක්ඛන්ධකාවසානෙ වුත්තා අට්ඨාරස ජනා. අට්ඨාරස අට්ඨකා ඡඌනදියඩ්ඪසතවිස්සජ්ජනෙ වුත්තායෙව. ‘अठरा अपायगामी नसलेले’ (अट्ठादस अनापायिकाति) याचा अर्थ असा: ‘हे उपालि! येथे एखादा भिक्खू अधम्माला धम्म म्हणून दाखवतो. त्यामध्ये त्याची धम्म-दृष्टी असते आणि संघभेदाच्या बाबतीतही धम्म-दृष्टी असते. तो आपली दृष्टी न लपवता, आपली पसंती (खन्ति) न लपवता, आपली आवड (रुचि) न लपवता, आपला भाव (अभिप्राय) न लपवता घोषणा करतो, शलाका (मतपत्रिका) स्वीकारायला लावतो की, हा धम्म आहे, हा विनय आहे, हे शास्त्यांचे शासन आहे, हे स्वीकारा, हे पसंत करा. हे उपालि! हा देखील संघभेदक आहे, परंतु तो अपायगामी नाही, निरयगामी (नरकात जाणारा) नाही, कल्पभर नरकात राहणारा नाही आणि असाध्य (ज्याचा उपचार होऊ शकत नाही असा) नाही.’ अशा प्रकारे प्रत्येक वस्तूमध्ये एक-एक करून संघभेदकक्खन्धकाच्या शेवटी अठरा व्यक्ती सांगितल्या आहेत. अठरा अष्टके ही ‘सहाने कमी दीडशे’ च्या उत्तरात सांगितलेलीच आहेत. (5) සොළසකම්මාදිවණ්ණනා (५) सोळा कम्मादींचे वर्णन (सोळसकम्मादिवण्णना). 478. කති කම්මානීතිආදීනං සබ්බගාථානං විස්සජ්ජනං උත්තානමෙවාති. ४७८. ‘किती कम्मे’ (कति कम्मानि) इत्यादी सर्व गाथांचे स्पष्टीकरण अगदी स्पष्ट (सहज समजण्यासारखे) आहे. අපරදුතියගාථාසඞ්ගණිකවණ්ණනා නිට්ඨිතා. दुसऱ्या गाथा-संग्रहाचे इतर वर्णन समाप्त झाले. සෙදමොචනගාථා सेदमोचन गाथा (घाम गाळायला लावणाऱ्या गाथा / कठीण प्रश्न). (1) අවිප්පවාසපඤ්හාවණ්ණනා (१) अविप्पवास (एकत्र राहणे/न दुरावणे) संबंधीच्या प्रश्नाचे वर्णन. 479. සෙදමොචනගාථාසු [Pg.237] අසංවාසොති උපොසථපවාරණාදිනා සංවාසෙන අසංවාසො. සම්භොගො එකච්චො තහිං න ලබ්භතීති අකප්පියසම්භොගො න ලබ්භති, නහාපනභොජනාදිපටිජග්ගනං පන මාතරායෙව කාතුං ලබ්භති. අවිප්පවාසෙන අනාපත්තීති සහගාරසෙය්යාය අනාපත්ති. පඤ්හා මෙසා කුසලෙහි චින්තිතාති එසා පඤ්හා කුසලෙහි පණ්ඩිතෙහි චින්තිතා. අස්සා විස්සජ්ජනං දාරකමාතුයා භික්ඛුනියා වෙදිතබ්බං, තස්සා හි පුත්තං සන්ධායෙතං වුත්තන්ති. ४७९. सेदमोचन गाथांमध्ये, ‘असंवास’ (असंवासो) म्हणजे उपोसथ, पवारणा इत्यादी कर्मांमध्ये एकत्र सहभागी न होणे. ‘तेथे काही उपभोग मिळत नाही’ (सम्भोगो एकच्चो तहिं न लब्भतीति) याचा अर्थ असा की, अकल्पनीय (अयोग्य) उपभोग मिळत नाही. परंतु, आंघोळ घालणे, जेवण देणे इत्यादी काळजी घेणे केवळ आई असलेल्या भिक्खुणीलाच करण्याची परवानगी मिळते. ‘अविप्पवासाने (एकत्र राहिल्याने) आपत्ती होत नाही’ (अविप्पवासेन अनापत्तीति) याचा अर्थ असा की, एकाच छताखाली एकत्र झोपल्याने आपत्ती होत नाही. ‘हा प्रश्न कुशल लोकांनी विचार केला आहे’ (पञ्हा मेसा कुसलेहि चिन्तिताति) म्हणजे या प्रश्नाचा कुशल पंडितांनी विचार केला आहे. याचे उत्तर बालकाची आई असलेल्या भिक्खुणीच्या संदर्भाने समजून घेतले पाहिजे, कारण तिच्या पुत्राला उद्देशूनच हे म्हटले गेले आहे. අවිස්සජ්ජිතගාථා ගරුභණ්ඩං සන්ධාය වුත්තා, අත්ථො පනස්සා ගරුභණ්ඩවිනිච්ඡයෙ වුත්තොයෙව. ‘अविस्सज्जित गाथा’ (अविभाज्य वस्तूंसंबंधीची गाथा) ही गरुभांड (संघाची मौल्यवान/अविभाज्य मालमत्ता) लक्षात घेऊन सांगितली आहे, आणि तिचा अर्थ गरुभांड-विनिर्णयामध्ये (गरुभांडविनिच्छय) सांगितलेलाच आहे. දස පුග්ගලෙ න වදාමීති සෙනාසනක්ඛන්ධකෙ වුත්තෙ දස පුග්ගලෙ න වදාමි. එකාදස විවජ්ජියාති යෙ මහාඛන්ධකෙ එකාදස විවජ්ජනීයපුග්ගලා වුත්තා, තෙපි න වදාමි. අයං පඤ්හා නග්ගං භික්ඛුං සන්ධාය වුත්තා. सेनासनखन्धकामध्ये सांगितलेल्या 'दहा व्यक्तींना मी म्हणत नाही' (दस पुग्गले न वदामि) याचा अर्थ मी त्या दहा व्यक्तींबद्दल बोलत नाही असा आहे. 'अकरा वर्ज्य करावे' (एकादस विवज्जिया) म्हणजे महाखन्धकामध्ये ज्या अकरा वर्ज्य करावयाच्या व्यक्ती सांगितल्या आहेत, त्यांच्याबद्दलही मी बोलत नाही. हा प्रश्न नग्न भिक्खूला उद्देशून विचारला आहे. කථං නු සික්ඛාය අසාධාරණොති පඤ්හා නහාපිතපුබ්බකං භික්ඛුං සන්ධාය වුත්තා. අයඤ්හි ඛුරභණ්ඩං පරිහරිතුං න ලභති, අඤ්ඤෙ ලභන්ති; තස්මා සික්ඛාය අසාධාරණො. 'शिक्षेच्या (नियम पाळण्याच्या) बाबतीत कशा प्रकारे असाधारण आहे?' हा प्रश्न पूर्वी न्हावी असलेल्या भिक्खूला उद्देशून विचारला आहे. कारण त्याला वस्तरा व त्याचे साहित्य (खुरभण्ड) स्वतःजवळ बाळगण्याची परवानगी नसते, तर इतर भिक्खूंना ती असते; म्हणून तो शिक्षेच्या बाबतीत असाधारण (असामायिक) आहे. තං පුග්ගලං කතමං වදන්ති බුද්ධාති අයං පඤ්හා නිම්මිතබුද්ධං සන්ධාය වුත්තා. 'बुद्ध त्या कोणत्या व्यक्तीला म्हणतात?' हा प्रश्न निर्मित बुद्धाला (ऋद्धीने निर्माण केलेल्या बुद्धाला) उद्देशून विचारला आहे. අධොනාභිං විවජ්ජියාති අධොනාභිං විවජ්ජෙත්වා. අයං පඤ්හා යං තං අසීසකං කබන්ධං, යස්ස උරෙ අක්ඛීනි චෙව මුඛඤ්ච හොති, තං සන්ධාය වුත්තා. 'नाभीच्या खाली वर्ज्य करून' (अधोनाभिं विवज्जिया) म्हणजे नाभीच्या खालील भाग वर्ज्य करून. हा प्रश्न त्या डोके नसलेल्या धडाला (कबन्ध प्रेताला) उद्देशून विचारला आहे, ज्याच्या छातीवर डोळे आणि तोंड असते. භික්ඛු සඤ්ඤාචිකාය කුටින්ති අයං පඤ්හා තිණච්ඡාදනං කුටිං සන්ධාය වුත්තා. දුතියපඤ්හා සබ්බමත්තිකාමයං කුටිං සන්ධාය වුත්තා. 'भिक्खूने स्वतः याचना करून कुटी बनवावी' (भिक्खु सञ्ञाचिकाय कुटिं) हा प्रश्न गवताचे छप्पर असलेल्या कुटीला उद्देशून विचारला आहे. दुसरा प्रश्न पूर्णपणे मातीची बनवलेली कुटी उद्देशून विचारला आहे. ආපජ්ජෙය්ය ගරුකං ඡෙජ්ජවත්ථුන්ති අයං පඤ්හා වජ්ජපටිච්ඡාදිකං භික්ඛුනිං සන්ධාය වුත්තා. දුතියපඤ්හා පණ්ඩකාදයො අභබ්බපුග්ගලෙ සන්ධාය වුත්තා. එකාදසපි හි තෙ ගිහිභාවෙයෙව පාරාජිකං පත්තා. 'गंभीर आणि विनाशकारी (छेद्य) आपत्ती प्राप्त होईल' हा प्रश्न (पाराजिका) दोष लपविणाऱ्या भिक्खुणीला उद्देशून विचारला आहे. दुसरा प्रश्न पंडक (नपुंसक) इत्यादी अभव्य (अपात्र) व्यक्तींना उद्देशून विचारला आहे. कारण ते अकराही गृहस्थावस्थेतच पाराजिका (पतित) अवस्थेला प्राप्त झाले आहेत. වාචාති [Pg.238] වාචාය අනාලපන්තො. ගිරං නො ච පරෙ භණෙය්යාති ‘‘ඉති ඉමෙ සොස්සන්තී’’ති පරපුග්ගලෙ සන්ධාය සද්දම්පි න නිච්ඡාරෙය්ය. අයං පඤ්හා ‘‘සන්තිං ආපත්තිං නාවිකරෙය්ය, සම්පජානමුසාවාදස්ස හොතී’’ති ඉමං මුසාවාදං සන්ධාය වුත්තා. තස්ස හි භික්ඛුනො අධම්මිකාය පටිඤ්ඤාය තුණ්හීභූතස්ස නිසින්නස්ස මනොද්වාරෙ ආපත්ති නාම නත්ථි. යස්මා පන ආවිකාතබ්බං න ආවිකරොති, තෙනස්ස වචීද්වාරෙ අකිරියතො අයං ආපත්ති සමුට්ඨාතීති වෙදිතබ්බා. 'वाणी' (वाचा) म्हणजे वाणीने न बोलणारा. 'इतर लोक ऐकतील' (इति इमे सोस्सन्ति) या विचाराने दुसऱ्या व्यक्तींना उद्देशून कोणताही आवाजही काढू नये, याला 'वाणीने न बोलणे' (गिरं नो च परे भणेय्या) म्हणतात. हा प्रश्न 'विद्यमान आपत्ती प्रकट न केल्यास जाणूनबुजून खोटे बोलण्याचा (संपजानमुसावाद) दोष लागतो' या असत्य भाषणाशी (मुसावादाशी) संबंधित आहे. कारण त्या अधार्मिक प्रतिज्ञेमुळे शांत बसलेल्या भिक्खूच्या मनोध्वारात कोणतीही आपत्ती (दोष) उत्पन्न होत नाही. परंतु, जी आपत्ती प्रकट करणे आवश्यक आहे ती तो प्रकट करत नाही, म्हणून त्याच्या वचीध्वारात (वाणीच्या दारात) अक्रियेमुळे (कर्तव्य न केल्यामुळे) ही आपत्ती उत्पन्न होते, असे समजावे. සඞ්ඝාදිසෙසා චතුරොති අයං පඤ්හා අරුණුග්ගෙ ගාමන්තරපරියාපන්නං නදිපාරං ඔක්කන්තභික්ඛුනිං සන්ධාය වුත්තා, සා හි සකගාමතො පච්චූසසමයෙ නික්ඛමිත්වා අරුණුග්ගමනකාලෙ වුත්තප්පකාරං නදිපාරං ඔක්කන්තමත්තාව රත්තිවිප්පවාසගාමන්තරනදිපාරගණම්හාඔහීයනලක්ඛණෙන එකප්පහාරෙනෙව චතුරො සඞ්ඝාදිසෙසෙ ආපජ්ජති. 'चार संघादिसेस' (संघादिसेसा चतुरो) हा प्रश्न पहाटेच्या वेळी दुसऱ्या गावाच्या हद्दीत असलेल्या नदीच्या पलीकडच्या तीरावर गेलेल्या भिक्खुणीला उद्देशून विचारला आहे. कारण ती आपल्या गावातून पहाटे निघून, अरुणोदयाच्या वेळी पूर्वोक्त नदीच्या पलीकडच्या तीरावर पोहोचताच, रात्रीचा मुक्काम (रत्तिविप्पवास), दुसऱ्या गावाच्या हद्दीत जाणे (गामन्तर), नदी पार करणे (नदीपार) आणि गणापासून वेगळे होणे (गणम्हा ओहीयन) या लक्षणांमुळे एकाच वेळी चार संघादिसेस आपत्तींना प्राप्त होते. සියා ආපත්තියො නානාති අයං පඤ්හා එකතොඋපසම්පන්නා ද්වෙ භික්ඛුනියො සන්ධාය වුත්තා. තාසු හි භික්ඛූනං සන්තිකෙ එකතොඋපසම්පන්නාය හත්ථතො ගණ්හන්තස්ස පාචිත්තියං, භික්ඛුනීනං සන්තිකෙ එකතොඋපසම්පන්නාය හත්ථතො ගණ්හන්තස්ස දුක්කටං. 'विविध आपत्ती असू शकतात' (सिया आपत्तियो नाना) हा प्रश्न एका बाजूने उपसंपन्न (एकतोउपसंपन्न) झालेल्या दोन भिक्खुणींना उद्देशून विचारला आहे. कारण त्यांच्यापैकी, भिक्खूंच्या जवळ एका बाजूने उपसंपन्न झालेल्या भिक्खुणीच्या हातातून (चीवर) घेणाऱ्याला पाचित्तिय आपत्ती होते, आणि भिक्खुणीच्या जवळ एका बाजूने उपसंपन्न झालेल्या भिक्खुणीच्या हातातून घेणाऱ्याला दुक्कट आपत्ती होते. චතුරො ජනා සංවිධායාති ආචරියො ච තයො ච අන්තෙවාසිකා ඡමාසකං භණ්ඩං අවහරිංසු, ආචරියස්ස සාහත්ථිකා තයො මාසකා, ආණත්තියාපි තයොව තස්මා ථුල්ලච්චයං ආපජ්ජති, ඉතරෙසං සාහත්ථිකො එකෙකො, ආණත්තිකා පඤ්චාති තස්මා පාරාජිකං ආපජ්ජිංසු. අයමෙත්ථ සඞ්ඛෙපො. විත්ථාරො පන අදින්නාදානපාරාජිකෙ සංවිදාවහාරවණ්ණනායං වුත්තො. 'चार लोकांनी मिळून योजना आखून' (चतुरो जना संविधाय) म्हणजे आचार्य आणि तीन अंतेवासिक (शिष्य) यांनी मिळून सहा मासे (चमासक) किमतीचे भांड (वस्तू) चोरले. आचार्याने स्वतःच्या हाताने तीन मासे चोरले आणि त्याच्या आज्ञेनेही तीनच मासे चोरले गेले, म्हणून त्याला थुल्लच्चय आपत्ती प्राप्त होते. इतरांनी (शिष्यांनी) स्वतःच्या हाताने प्रत्येकी एक मासा चोरला आणि आज्ञेने पाच मासे चोरले गेले, म्हणून ते पाराजिका आपत्तीला प्राप्त झाले. हा येथे संक्षेप आहे. याचा सविस्तर विस्तार 'अदिन्नादान पाराजिका' मधील 'संविदावहार' वर्णनात केला आहे. (2) පාරාජිකාදිපඤ්හාවණ්ණනා (२) पाराजिका इत्यादी प्रश्नांचे वर्णन 480. ඡිද්දං තස්මිං ඝරෙ නත්ථීති අයං පඤ්හා දුස්සකුටිආදීනි සන්ථතපෙය්යාලඤ්ච සන්ධාය වුත්තා. ४८०. 'त्या घरात कोणतेही छिद्र नाही' (छिद्दं तस्मिं घरे नत्थि) हा प्रश्न कापडाची कुटी (दुस्सकुटि) इत्यादी आणि संथतपेय्याला उद्देशून विचारला आहे. තෙලං මධුං ඵාණිතන්ති ගාථා ලිඞ්ගපරිවත්තං සන්ධාය වුත්තා. 'तेल, मध आणि गूळ' (तेलं मधुं फाणितं) ही गाथा लिंगपरिवर्तन (लिंग बदलणाऱ्या व्यक्तीला) उद्देशून विचारली आहे. නිස්සග්ගියෙනාති ගාථා පරිණාමනං සන්ධාය වුත්තා. යො හි සඞ්ඝස්ස පරිණතලාභතො එකං චීවරං අත්තනො, එකං අඤ්ඤස්සාති ද්වෙ චීවරානි ‘‘එකං [Pg.239] මය්හං, එකං තස්ස දෙහී’’ති එකපයඔගෙන පරිණාමෙති, සො නිස්සග්ගියපාචිත්තියඤ්චෙව සුද්ධිකපාචිත්තියඤ්ච එකතො ආපජ්ජති. 'निस्सग्गियने' (निस्सग्गियेन) ही गाथा परिणामन (संघाचा लाभ स्वतःकडे किंवा दुसऱ्याकडे वळवणे) उद्देशून विचारली आहे. जो भिक्खू संघाला मिळालेल्या लाभातून एक चीवर स्वतःसाठी आणि एक चीवर दुसऱ्यासाठी, अशी दोन चीवरे 'एक मला द्या आणि एक त्याला द्या' अशा एकाच वचनाने (प्रयोगाने) वळवतो, तो एकाच वेळी निस्सग्गिय पाचित्तिय आणि शुद्धिक पाचित्तिय या दोन्ही आपत्तींना प्राप्त होतो. කම්මඤ්ච තං කුප්පෙය්ය වග්ගපච්චයාති අයං පඤ්හා ද්වාදසයොජනපමාණෙසු බාරාණසිආදීසු නගරෙසු ගාමසීමං සන්ධාය වුත්තා. 'आणि ते कर्म वर्गाच्या (गणाच्या) प्रत्ययामुळे कोप पावेल (अमान्य होईल)' हा प्रश्न बारा योजन विस्तार असलेल्या वाराणसी इत्यादी नगरांमधील ग्रामसीमेला उद्देशून विचारला आहे. පදවීතිහාරමත්තෙනාති ගාථා සඤ්චරිත්තං සන්ධාය වුත්තා, අත්ථොපි චස්සා සඤ්චරිත්තවණ්ණනායමෙව වුත්තො. 'केवळ पाऊल टाकण्याने' (पदवीतिहारमत्तेन) ही गाथा संचरित्त (मध्यस्थी/जुळवणी करणे) उद्देशून विचारली आहे, आणि तिचा अर्थही संचरित्त वर्णनामध्येच सांगितला आहे. සබ්බානි තානි නිස්සග්ගියානීති අයං පඤ්හා අඤ්ඤාතිකාය භික්ඛුනියා ධොවාපනං සන්ධාය වුත්තා. සචෙ හි තිණ්ණම්පි චීවරානං කාකඌහදනං වා කද්දමමක්ඛිතං වා කණ්ණං ගහෙත්වා භික්ඛුනී උදකෙන ධොවති, භික්ඛුස්ස කායගතානෙව නිස්සග්ගියානි හොන්ති. 'ते सर्व निस्सग्गिय आहेत' (सब्बानि तानि निस्सग्गियानि) हा प्रश्न नातेवाईक नसलेल्या भिक्खुणीकडून चीवर धुवून घेण्याला उद्देशून विचारला आहे. जर तिन्ही चीवरांवर कावळ्याची विष्ठा पडली असेल किंवा चिखल लागला असेल, आणि भिक्खुणीने त्याचा कोपरा धरून ते पाण्याने धुतले, तर भिक्खूच्या शरीरावर असतानाच ते निस्सग्गिय होतात. සරණගමනම්පි න තස්ස අත්ථීති සරණගමනඋපසම්පදාපි නත්ථි. අයං පන පඤ්හා මහාපජාපතියා උපසම්පදං සන්ධාය වුත්තා. 'त्याचे शरणगमनही नाही' (सरणगमनम्पि न तस्स अत्थि) म्हणजे शरणगमन उपसंपदाही नाही. हा प्रश्न महाप्रजापती गौतमीच्या उपसंपदेला उद्देशून विचारला आहे. හනෙය්ය අනරියං මන්දොති තඤ්හි ඉත්ථිං වා පුරිසං වා අනරියං හනෙය්ය. අයං පඤ්හා ලිඞ්ගපරිවත්තෙන ඉත්ථිභූතං පිතරං පුරිසභූතඤ්ච මාතරං සන්ධාය වුත්තා. 'मूर्ख माणसाने अनार्य व्यक्तीला मारावे' (हनेय्य अनरियं मन्दो) म्हणजे त्या अनार्य स्त्रीला किंवा पुरुषाला मारावे. हा प्रश्न लिंगपरिवर्तनामुळे स्त्री झालेल्या पित्याला आणि पुरुष झालेल्या मातेला उद्देशून विचारला आहे. න තෙනානන්තරං ඵුසෙති අයං පඤ්හා මිගසිඞ්ගතාපසසීහකුමාරාදීනං විය තිරච්ඡානමාතාපිතරො සන්ධාය වුත්තා. 'त्यामुळे आनंतर्य कर्म लागत नाही' (न तेनानन्तरं फुसेति) हा प्रश्न मृगशृंग तापस, सिंहकुमार इत्यादींच्या प्राण्यांच्या रूपातील माता-पित्यांप्रमाणे, तिर्यक (प्राणी) योनीतील माता-पित्यांना उद्देशून विचारला आहे. අචොදයිත්වාති ගාථා දූතෙනුපසම්පදං සන්ධාය වුත්තා. චොදයිත්වාති ගාථා පණ්ඩකාදීනං උපසම්පදං සන්ධාය වුත්තා. කුරුන්දියං පන ‘‘පඨමගාථා අට්ඨ අසම්මුඛාකම්මානි, දුතියා අනාපත්තිකස්ස කම්මං සන්ධාය වුත්තා’’ති ආගතං. 'चोदना न करता' (अचोदयित्वा) ही गाथा दूताद्वारे होणाऱ्या उपसंपदेला (दूतेनुपसम्पदा) उद्देशून विचारली आहे. 'चोदना करून' (चोदयित्वा) ही गाथा पंडक इत्यादींच्या उपसंपदेला उद्देशून विचारली आहे. कुरुंदी अठ्ठकथेत मात्र 'पहिली गाथा आठ असम्मुख कर्मांना उद्देशून आणि दुसरी गाथा आपत्ती नसलेल्या भिक्खूच्या कर्माला उद्देशून विचारली आहे' असे आले आहे. ඡින්දන්තස්ස ආපත්තීති වනප්පතිං ඡින්දන්තස්ස පාරාජිකං, තිණලතාදිං ඡින්දන්තස්ස පාචිත්තියං, අඞ්ගජාතං ඡින්දන්තස්ස ථුල්ලච්චයං. ඡින්දන්තස්ස අනාපත්තීති කෙසෙ ච නඛෙ ච ඡින්දන්තස්ස අනාපත්ති. ඡාදෙන්තස්ස ආපත්තීති අත්තනො ආපත්තිං ඡාදෙන්තස්ස අඤ්ඤෙසං වා ආපත්තිං. ඡාදෙන්තස්ස අනාපත්තීති ගෙහාදීනි ඡාදෙන්තස්ස අනාපත්ති. 'कापणाऱ्याला आपत्ती होते' (छिन्दन्तस्स आपत्ती) म्हणजे महावृक्ष (वनस्पती) कापणाऱ्याला पाराजिका, गवत-वेल इत्यादी कापणाऱ्याला पाचित्तिय, आणि जननेंद्रिय (अंगजात) कापणाऱ्याला थुल्लच्चय आपत्ती होते. 'कापणाऱ्याला आपत्ती होत नाही' (छिन्दन्तस्स अनापत्ती) म्हणजे स्वतःचे केस आणि नखे कापणाऱ्याला आपत्ती होत नाही. 'लपविणाऱ्याला आपत्ती होते' (छादेन्तस्स आपत्ती) म्हणजे स्वतःची आपत्ती किंवा इतरांची आपत्ती लपविणाऱ्याला आपत्ती होते. 'झाकणाऱ्याला आपत्ती होत नाही' (छादेन्तस्स अनापत्ती) म्हणजे घर इत्यादींवर छप्पर घालणाऱ्याला (झाकणाऱ्याला) आपत्ती होत नाही. සච්චං [Pg.240] භණන්තොති ගාථාය ‘‘සිඛරණීසි උභතොබ්යඤ්ජනාසී’’ති සච්චං භණන්තො ගරුකං ආපජ්ජති, සම්පජානමුසාවාදෙ පන මුසා භාසතො ලහුකාපත්ති හොති, අභූතාරොචනෙ මුසා භණන්තො ගරුකං ආපජ්ජති, භූතාරොචනෙ සච්චං භාසතො ලහුකාපත්ති හොතීති. 'सत्य बोलणारा' (सच्चं भणन्तो) या गाथेत 'तू शिखरिणी (अंगविकल स्त्री) आहेस, तू उभतोब्यंजन (उभयलिंगी) आहेस' असे सत्य बोलणारा भिक्खू गंभीर (गरुक - संघादिसेस) आपत्तीला प्राप्त होतो. परंतु, जाणूनबुजून खोटे बोलण्यात (संपजानमुसावादात) असत्य बोलणाऱ्याला हलकी (लहुक) आपत्ती होते. असत्य असलेल्या उत्तरामनुष्यधर्माचे कथन करताना खोटे बोलणारा गंभीर (पाराजिका) आपत्तीला प्राप्त होतो, आणि सत्य असलेल्या उत्तरामनुष्यधर्माचे कथन करताना सत्य बोलणाऱ्याला हलकी (पाचित्तिय) आपत्ती होते, असे समजावे. (3) පාචිත්තියාදිපඤ්හාවණ්ණනා (३) पाचित्तिय इत्यादी प्रश्नांचे वर्णन 481. අධිට්ඨිතන්ති ගාථා නිස්සග්ගියචීවරං අනිස්සජ්ජිත්වා පරිභුඤ්ජන්තං සන්ධාය වුත්තා. ४८१. 'अधिष्ठित' (अधिट्ठितं) ही गाथा निस्सग्गिय चीवराचा त्याग न करता त्याचा वापर करणाऱ्या भिक्खूला उद्देशून विचारली आहे. අත්ථඞ්ගතෙ සූරියෙති ගාථා රොමන්ථකං සන්ධාය වුත්තා. 'सूर्य मावळल्यावर' (अत्थङ्गते सूरिये) ही गाथा रवंथ करणाऱ्या (रोमन्थक) भिक्खूला उद्देशून विचारली आहे. න රත්තචිත්තොති ගාථාය අයමත්ථො – රත්තචිත්තො මෙථුනධම්මපාරාජිකං ආපජ්ජති. ථෙය්යචිත්තො අදින්නාදානපාරාජිකං, පරං මරණාය චෙතෙන්තො මනුස්සවිග්ගහපාරාජිකං, සඞ්ඝභෙදකො පන න රත්තචිත්තො න ච පන ථෙය්යචිත්තො න චාපි සො පරං මරණාය චෙතයි, සලාකං පනස්ස දෙන්තස්ස හොති ඡෙජ්ජං, පාරාජිකං හොති, සලාකං පටිග්ගණ්හන්තස්ස භෙදකානුවත්තකස්ස ථුල්ලච්චයං. ‘न रत्तचित्तो’ या गाथेचा हा अर्थ आहे – रागासक्त चित्त असलेला भिक्खू मैथुनधर्म-पाराजिकापत्तीला प्राप्त होतो. चोरीचे चित्त असलेला भिक्खू अदिन्नादान-पाराजिकापत्तीला प्राप्त होतो, दुसऱ्याला मारण्याच्या हेतूने विचार करणारा भिक्खू मनुस्सविग्गह-पाराजिकापत्तीला प्राप्त होतो. परंतु संघभेद करणारा भिक्खू रागासक्त चित्त असलेला नसतो आणि चोरीचे चित्त असलेलाही नसतो, तसेच तो दुसऱ्याला मारण्याचा विचारही करत नाही. तरीसुद्धा, त्याला शलाका देणाऱ्याचा उच्छेद होतो, म्हणजेच पाराजिकापत्ती होते; आणि शलाका स्वीकारणाऱ्या संघभेद करणाऱ्याच्या अनुगामी भिक्खूला थुल्लच्चय आपत्ती होते. ගච්ඡෙය්ය අඩ්ඪයොජනන්ති අයං පඤ්හා සුප්පතිට්ඨිතනිග්රොධසදිසං එකකුලස්ස රුක්ඛමූලං සන්ධාය වුත්තා. ‘गच्छेय्य अढयोजनं’ हा प्रश्न एकाच कुळाच्या, चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित झालेल्या वडाच्या झाडासारख्या वृक्षाच्या मुळाला उद्देशून विचारला आहे. කායිකානීති අයං ගාථා සම්බහුලානං ඉත්ථීනං කෙසෙ වා අඞ්ගුලියො වා එකතො ගණ්හන්තං සන්ධාය වුත්තා. ‘कायिकानि’ ही गाथा अनेक स्त्रियांचे केस किंवा बोटे एकत्र पकडणाऱ्या भिक्खूला उद्देशून म्हटली आहे. වාචසිකානීති අයං ගාථා ‘‘සබ්බා තුම්හෙ සිඛරණියො’’තිආදිනා නයෙන දුට්ඨුල්ලභාණිං සන්ධාය වුත්තා. ‘वाचसिकानि’ ही गाथा ‘तुम्ही सर्व शिखरिणी आहात’ इत्यादी प्रकारे अश्लील शब्द बोलणाऱ्या भिक्खूला उद्देशून म्हटली आहे. තිස්සිත්ථියො මෙථුනං තං න සෙවෙති තිස්සො ඉත්ථියො වුත්තා, තාසුපි යං තං මෙථුනං නාම, තං න සෙවති. තයො පුරිසෙති තයො පුරිසෙපි උපගන්ත්වා මෙථුනං න සෙවති. තයො අනරියපණ්ඩකෙති උභතොබ්යඤ්ජනසඞ්ඛාතෙ තයො අනරියෙ තයො ච පණ්ඩකෙති ඉමෙපි ඡ ජනෙ උපගන්ත්වා මෙථුනං න සෙවති. න චාචරෙ මෙථුනං බ්යඤ්ජනස්මින්ති අනුලොමපාරාජිකවසෙනපි මෙථුනං නාචරති. ඡෙජ්ජං සියා මෙථුනධම්මපච්චයාති සියා මෙථුනධම්මපච්චයා පාරාජිකන්ති. අයං පඤ්හා අට්ඨවත්ථුකං සන්ධාය [Pg.241] වුත්තා, තස්සා හි මෙථුනධම්මස්ස පුබ්බභාගං කායසංසග්ගං ආපජ්ජිතුං වායමන්තියා මෙථුනධම්මපච්චයා ඡෙජ්ජං හොති. ‘तिस्सत्थियो मेथुनं तं न सेवेति’ म्हणजे तीन प्रकारच्या स्त्रिया सांगितल्या आहेत, त्यांच्याशी जे मैथुन म्हटले जाते, ते करत नाही. ‘तयो पुरिसे’ म्हणजे तीन प्रकारच्या पुरुषांच्या जवळ जाऊन मैथुन करत नाही. ‘तयो अनरियपण्डके’ म्हणजे उभतोब्यंजन म्हणून ओळखले जाणारे तीन अनार्य आणि तीन पंडक अशा या सहा प्रकारच्या व्यक्तींच्या जवळ जाऊन मैथुन करत नाही. ‘न चाचरे मेथुनं ब्यंजनस्मिं’ म्हणजे अनुलोम-पाराजिकाच्या प्रभावाने देखील मैथुन आचरण करत नाही. ‘छेज्जं सिया मेथुनधम्मपच्चया’ म्हणजे मैथुनधर्माच्या कारणामुळे पाराजिकापत्ती होऊ शकते. हा प्रश्न अठ्ठवत्थुका भिक्खुनीला उद्देशून विचारला आहे; कारण तिच्या मैथुनधर्माच्या पूर्वभागात कायसंसर्ग प्राप्त करण्याचा प्रयत्न करताना मैथुनधर्माच्या कारणामुळे उच्छेद होतो. මාතරං චීවරන්ති අයං ගාථා පිට්ඨිසමයෙ වස්සිකසාටිකත්ථං සතුප්පාදකරණං සන්ධාය වුත්තා. විනිච්ඡයො පනස්සා වස්සිකසාටිකසික්ඛාපදවණ්ණනායමෙව වුත්තො. ‘मातरं चीवरं’ ही गाथा वर्षावास संपल्यानंतरच्या काळात वर्षावास-वस्त्राच्या उद्देशाने स्मृती जागृत करण्याच्या संदर्भात म्हटली आहे. आणि याचा निर्णय माझ्याद्वारे ‘वस्सिकासाटिक-सिक्खापद’ च्या वर्णनातच सांगितला गेला आहे. කුද්ධො ආරාධකො හොතීති ගාථා තිත්ථියවත්තං සන්ධාය වුත්තා. තිත්ථියො හි වත්තං පූරයමානො තිත්ථියානං වණ්ණෙ භඤ්ඤමානෙ කුද්ධො ආරාධකො හොති, වත්ථුත්තයස්ස වණ්ණෙ භඤ්ඤමානෙ කුද්ධො ගාරය්හො හොතීති තත්ථෙවස්සා විත්ථාරො වුත්තො. දුතියගාථාපි තමෙව සන්ධාය වුත්තා. ‘कुद्धो आराधको होति’ ही गाथा तित्थिय-व्रताला उद्देशून म्हटली आहे. कारण तीर्थक आपले व्रत पूर्ण करत असताना, तीर्थकांच्या गुणांचे वर्णन केले जात असताना क्रोधीत होऊन भिक्खूंना संतुष्ट करणारा होतो; आणि त्रिरत्नांच्या गुणांचे वर्णन केले जात असताना क्रोधीत होऊन निंदनीय ठरतो. याचा सविस्तर विस्तार तेथेच माझ्याद्वारे सांगितला आहे. दुसरी गाथा देखील त्याच विषयाला उद्देशून म्हटली आहे. සඞ්ඝාදිසෙසන්තිආදි ගාථා යා භික්ඛුනී අවස්සුතාව අවස්සුතස්ස පුරිසස්ස හත්ථතො පිණ්ඩපාතං ගහෙත්වා මනුස්සමංසලසුණපණීතභොජනසෙසඅකප්පියමංසෙහි සද්ධිං ඔමද්දිත්වා අජ්ඣොහරති, තං සන්ධාය වුත්තා. ‘संघादिसेसन्ति’ इत्यादी गाथा अशा भिक्खुनीला उद्देशून म्हटली आहे, जी स्वतः रागासक्त असताना, रागासक्त पुरुषाच्या हातातून पिंडपात स्वीकारून, मानवी मांस, लसूण, प्रणीत भोजन आणि मानवी मांसाव्यतिरिक्त इतर अकप्पिय मांसासोबत ते मिसळून खाते. එකො උපසම්පන්නො එකො අනුපසම්පන්නොති ගාථා ආකාසගතං සන්ධාය වුත්තා. සචෙ හි ද්වීසු සාමණෙරෙසු එකො ඉද්ධියා කෙසග්ගමත්තම්පි පථවිං මුඤ්චිත්වා නිසින්නො හොති, සො අනුපසම්පන්නො නාම හොති. සඞ්ඝෙනාපි ආකාසෙ නිසීදිත්වා භූමිගතස්ස කම්මං න කාතබ්බං. සචෙ කරොති, කුප්පති. ‘एको उपसम्पन्नो एको अनुपसम्पन्नो’ ही गाथा आकाशात गेलेल्या सामणेराला उद्देशून म्हटली आहे. कारण जर दोन सामणेरांपैकी एक जण ऋद्धीने केसाच्या टोकाएवढीही जमीन सोडून आकाशात बसलेला असेल, तर तो ‘अनुपसम्पन्न’ ठरतो. संघाद्वारे देखील आकाशात बसून जमिनीवर असलेल्या व्यक्तीसाठी कर्म केले जाऊ नये. जर केले, तर ते कर्म निष्फळ ठरते. අකප්පකතන්ති ගාථා අච්ඡින්නචීවරකං භික්ඛුං සන්ධාය වුත්තා. තස්මිංයෙව චස්සා සික්ඛාපදෙ විත්ථාරෙන විනිච්ඡයොපි වුත්තො. ‘अकप्पकतं’ ही गाथा ज्या भिक्खूचे चीवर हिरावून घेतले गेले आहे, त्याला उद्देशून म्हटली आहे. आणि त्याचा सविस्तर निर्णय त्याच सिक्खापदात माझ्याद्वारे सांगितला गेला आहे. න දෙති න පටිග්ගණ්හාතීති නාපි උය්යොජිකා දෙති, න උය්යොජිතා තස්සා හත්ථතො ගණ්හාති. පටිග්ගහො තෙන න විජ්ජතීති තෙනෙව කාරණෙන උය්යොජිකාය හත්ථතො උය්යොජිතාය පටිග්ගහො න විජ්ජති. ආපජ්ජති ගරුකන්ති එවං සන්තෙපි අවස්සුතස්ස හත්ථතො පිණ්ඩපාතග්ගහණෙ උය්යොජෙන්තී සඞ්ඝාදිසෙසාපත්තිං ආපජ්ජති. තඤ්ච පරිභොගපච්චයාති තඤ්ච පන ආපත්තිං ආපජ්ජමානා තස්සා උය්යොජිතාය පරිභොගපච්චයා ආපජ්ජති[Pg.242]. තස්සා හි භොජනපරියොසානෙ උය්යොජිකාය සඞ්ඝාදිසෙසො හොතීති. දුතියගාථා තස්සායෙව උදකදන්තපොනග්ගහණෙ උය්යොජනං සන්ධාය වුත්තා. ‘न देति न पटिग्गण्हाति’ म्हणजे प्रेरणा देणारी भिक्खुनी देत नाही आणि प्रेरित केलेली भिक्खुनी तिच्या हातातून स्वीकारत नाही. ‘पटिग्गहो तेन न विज्जति’ म्हणजे याच कारणामुळे प्रेरणा देणाऱ्या भिक्खुनीच्या हातातून प्रेरित केलेल्या भिक्खुनीने स्वीकारणे घडत नाही. ‘आपज्जति गरुकं’ म्हणजे असे असले तरी, रागासक्त पुरुषाच्या हातातून पिंडपात स्वीकारण्यास प्रवृत्त केल्यामुळे, प्रेरणा देणारी भिक्खुनी संघादिसेस आपत्तीला प्राप्त होते. ‘तञ्च परिभोगपच्चया’ म्हणजे ती आपत्ती प्राप्त होताना, त्या प्रेरित केलेल्या भिक्खुनीच्या उपभोग घेण्याच्या कारणामुळे प्राप्त होते. कारण तिच्या भोजनाच्या समाप्तीनंतर प्रेरणा देणाऱ्या भिक्खुनीला संघादिसेस आपत्ती होते. दुसरी गाथा तिच्याच पाणी आणि दंतकाष्ठ स्वीकारण्याच्या प्रेरणेला उद्देशून म्हटली आहे. න භික්ඛුනී නො ච ඵුසෙය්ය වජ්ජන්ති සත්තරසකෙසු හි අඤ්ඤතරං ආපත්තිං ආපජ්ජිත්වා අනාදරියෙන ඡාදයමානාපි භික්ඛුනී ඡාදනපච්චයා වජ්ජං න ඵුසති, අඤ්ඤං නවං ආපත්තිං නාපජ්ජති, පටිච්ඡන්නාය වා අප්පටිච්ඡන්නාය වා ආපත්තියා පක්ඛමානත්තමෙව ලභති. අයං පන භික්ඛුනීපි න හොති, සාවසෙසඤ්ච ගරුකං ආපජ්ජිත්වා ඡාදෙත්වා වජ්ජං න ඵුසති. පඤ්හා මෙසා කුසලෙහි චින්තිතාති අයං කිර පඤ්හා උක්ඛිත්තකභික්ඛුං සන්ධාය වුත්තා. තෙන හි සද්ධිං විනයකම්මං නත්ථි, තස්මා සො සඞ්ඝාදිසෙසං ආපජ්ජිත්වා ඡාදෙන්තො වජ්ජං න ඵුසතීති. ‘न भिक्खुनी नो च फुसेय्य वज्जं’ म्हणजे भिक्खुनींसाठी प्रज्ञप्त केलेल्या सतरा संघादिसेस आपत्तींपैकी कोणत्याही एका आपत्तीला प्राप्त होऊन, अनादरामुळे ती लपवून ठेवणारी भिक्खुनी देखील लपवण्याच्या कारणामुळे दोषाला प्राप्त होत नाही, तसेच ती इतर नवीन आपत्तीला प्राप्त होत नाही; लपवलेल्या किंवा न लपवलेल्या आपत्तीसाठी ती केवळ पक्ख-मानत्त प्राप्त करते. परंतु ही व्यक्ती भिक्खुनी देखील नसते, आणि सावसेस अशा गंभीर आपत्तीला प्राप्त होऊन, ती लपवूनही दोषाला प्राप्त होत नाही. ‘पञ्हा मेसा कुसलेहि चिन्तिता’ हा प्रश्न नक्कीच उक्खित्तक भिक्खूला उद्देशून विचारला आहे. कारण त्याच्यासोबत कोणतेही विनय-कर्म केले जात नाही, म्हणून तो संघादिसेस आपत्तीला प्राप्त होऊन ती लपवत असला तरी दोषाला प्राप्त होत नाही. සෙදමොචනගාථාවණ්ණනා නිට්ඨිතා. सेदमोचन-गाथा-वर्णन समाप्त झाले. පඤ්චවග්ගො पंचवग्ग කම්මවග්ගවණ්ණනා कम्मवग्ग-वर्णन 482. කම්මවග්ගෙ [Pg.243] චතුන්නං කම්මානං නානාකරණං සමථක්ඛන්ධකෙ වුත්තමෙව. කිඤ්චාපි වුත්තං, අථ ඛො අයං කම්මවිනිච්ඡයො නාම ආදිතො පට්ඨාය වුච්චමානො පාකටො හොති, තස්මා ආදිතො පට්ඨායෙවෙත්ථ වත්තබ්බං වදිස්සාම. චත්තාරීති කම්මානං ගණනපරිච්ඡෙදවචනමෙතං. කම්මානීති පරිච්ඡින්නකම්මනිදස්සනං. අපලොකනකම්මං නාම සීමට්ඨකසඞ්ඝං සොධෙත්වා ඡන්දාරහානං ඡන්දං ආහරිත්වා සමග්ගස්ස සඞ්ඝස්ස අනුමතියා තික්ඛත්තුං සාවෙත්වා කත්තබ්බං කම්මං. ඤත්තිකම්මං නාම වුත්තනයෙනෙව සමග්ගස්ස සඞ්ඝස්ස අනුමතියා එකාය ඤත්තියා කත්තබ්බං කම්මං. ඤත්තිදුතියකම්මං නාම වුත්තනයෙනෙව සමග්ගස්ස සඞ්ඝස්ස අනුමතියා එකාය ඤත්තියා එකාය ච අනුස්සාවනායාති එවං ඤත්තිදුතියාය අනුස්සාවනාය කත්තබ්බං කම්මං. ඤත්තිචතුත්ථකම්මං නාම වුත්තනයෙනෙව සමග්ගස්ස සඞ්ඝස්ස අනුමතියා එකාය ඤත්තියා තීහි ච අනුස්සාවනාහීති එවං ඤත්තිචතුත්ථාහි තීහි අනුස්සාවනාහි කත්තබ්බං කම්මං. ४८२. कम्मवग्गमध्ये चार प्रकारच्या कर्मांमधील भेद समथक्खंधकात सांगितलाच आहे. जरी तो सांगितला असला, तरी हा कर्म-निर्णय सुरुवातीपासून सांगितल्यास अधिक स्पष्ट होतो. म्हणून, सुरुवातीपासूनच या चार कर्मांविषयी जे सांगायचे आहे ते आम्ही सांगू. ‘चत्तारि’ हा शब्द कर्मांची संख्या मर्यादित करणारा शब्द आहे. ‘कम्मानि’ हा शब्द निश्चित केलेल्या कर्मांचे निदर्शन करणारा आहे. ‘अपलोकन-कम्म’ म्हणजे सीमेमध्ये उपस्थित असलेल्या संघाला शुद्ध करून, संमती देण्यास योग्य असलेल्या भिक्खूंची संमती आणून, समग्र संघाच्या संमतीने तीन वेळा घोषित करून करावयाचे कर्म होय. ‘ञत्तिकम्म’ म्हणजे वर सांगितलेल्या पद्धतीनेच समग्र संघाच्या संमतीने एका ज्ञप्तीने करावयाचे कर्म होय. ‘ञत्तिदुतियकम्म’ म्हणजे वर सांगितलेल्या पद्धतीनेच समग्र संघाच्या संमतीने एका ज्ञप्तीने आणि एका अनुसावनेने, अशा प्रकारे ज्ञप्तीसह दुसऱ्या अनुसावनेने करावयाचे कर्म होय. ‘ञत्तिचतुत्थकम्म’ म्हणजे वर सांगितलेल्या पद्धतीनेच समग्र संघाच्या संमतीने एका ज्ञप्तीने आणि तीन अनुसावनांनी, अशा प्रकारे ज्ञप्तीसह चौथ्या तीन अनुसावनांनी करावयाचे कर्म होय. තත්ථ අපලොකනකම්මං අපලොකෙත්වාව කාතබ්බං, ඤත්තිකම්මාදිවසෙන න කාතබ්බං. ඤත්තිකම්මම්පි එකං ඤත්තිං ඨපෙත්වාව කාතබ්බං, අපලොකනකම්මාදිවසෙන න කාතබ්බං. ඤත්තිදුතියකම්මං පන අපලොකෙත්වා කාතබ්බම්පි අත්ථි, අකාතබ්බම්පි අත්ථි. त्यामध्ये, अपलोकन-कर्म हे केवळ अपलोकन करूनच केले पाहिजे, ज्ञप्तिकर्म इत्यादींच्या पद्धतीने करू नये. ज्ञप्तिकर्म देखील केवळ एक ज्ञप्ती ठेवूनच केले पाहिजे, अपलोकन-कर्म इत्यादींच्या पद्धतीने करू नये. परंतु ज्ञप्तिद्वितीय-कर्म हे अपलोकन करून करण्याजोगे देखील असते आणि न करण्याजोगे देखील असते. තත්ථ සීමාසම්මුති, සීමාසමූහනනං, කථිනදානං, කථිනුද්ධාරො, කුටිවත්ථුදෙසනා, විහාරවත්ථුදෙසනාති ඉමානි ඡ කම්මානි ගරුකානි අපලොකෙත්වා කාතුං න වට්ටන්ති, ඤත්තිදුතියකම්මවාචං සාවෙත්වාව කාතබ්බානි. අවසෙසා තෙරස සම්මුතියො සෙනාසනග්ගාහකමතකචීවරදානාදිසම්මුතියො චාති එතානි ලහුකකම්මානි අපලොකෙත්වාපි කාතුං වට්ටන්ති, ඤත්තිකම්ම-ඤත්තිචතුත්ථකම්මවසෙන පන න කාතබ්බමෙව. ඤත්තිචතුත්ථකම්මවසෙන කයිරමානං දළ්හතරං හොති, තස්මා කාතබ්බන්ති එකච්චෙ වදන්ති. එවං පන සති කම්මසඞ්කරො හොති, තස්මා න කාතබ්බන්ති පටික්ඛිත්තමෙව. සචෙ පන අක්ඛරපරිහීනං වා පදපරිහීනං වා දුරුත්තපදං වා හොති[Pg.244], තස්ස සොධනත්ථං පුනප්පුනං වත්තුං වට්ටති. ඉදං අකුප්පකම්මස්ස දළ්හීකම්මං හොති, කුප්පකම්මෙ කම්මං හුත්වා තිට්ඨති. त्या कर्मांमध्ये सीमासंमृती, सीमासमुहनन, कठिनदान, कठिनउद्धार, कुटीच्या जागेचा निर्देश (कुटिवत्थुदेसना) आणि विहाराच्या जागेचा निर्देश (विहारवत्थुदेसना) ही सहा कर्मे गुरु (महत्त्वाची) असल्यामुळे केवळ अपलोकन करून (परवानगी घेऊन) करणे योग्य नाही; ती ज्ञत्तिदुतीय कम्मवाचा ऐकवूनच केली पाहिजेत. उर्वरित तेरा संमृती आणि सेनासनग्राहक, मृतकचीवरदान इत्यादी संमृती ही लहुक (लहान) कर्मे असल्यामुळे केवळ अपलोकन करूनही करणे योग्य आहे; परंतु ज्ञत्तिकर्म किंवा ज्ञत्तिचतुत्थकर्माच्या स्वरूपात ती करूच नयेत. ‘ज्ञत्तिचतुत्थकर्माच्या स्वरूपात केल्यास ते अधिक दृढ होते, म्हणून तसे करावे’ असे काही आचार्य म्हणतात. परंतु असे केल्यास कर्मांचे संकर (मिश्रण) होते, म्हणून तसे करू नये, असे सांगून याचा निषेधच केला आहे. जर अक्षराची उणीव, पदाची उणीव किंवा चुकीच्या पद्धतीने उच्चारलेले पद असेल, तर त्याच्या शुद्धीकरणासाठी पुन्हा पुन्हा उच्चार करणे योग्य आहे. हे अकुप्प कर्माला (न बिघडणाऱ्या कर्माला) अधिक दृढ करणारे ठरते आणि कुप्प कर्मामध्ये (बिघडलेल्या कर्मामध्ये) ते योग्य कर्म बनून स्थिर होते. ඤත්තිචතුත්ථකම්මං ඤත්තිඤ්ච තිස්සො ච කම්මවාචායො සාවෙත්වාව කාතබ්බං, අපලොකනකම්මාදිවසෙන න කාතබ්බං. පඤ්චහාකාරෙහි විපජ්ජන්තීති පඤ්චහි කාරණෙහි විපජ්ජන්ති. ज्ञत्तिचतुत्थकर्म हे ज्ञत्ति (घोषणा) आणि तीन कम्मवाचा ऐकवूनच केले पाहिजे; अपलोकनकर्म इत्यादींच्या स्वरूपात ते करू नये. ‘पाच प्रकारांनी निष्फळ ठरतात’ म्हणजे पाच कारणांमुळे ते निष्फळ ठरतात. 483. සම්මුඛාකරණීයං කම්මං අසම්මුඛා කරොති, වත්ථුවිපන්නං අධම්මකම්මන්ති එත්ථ අත්ථි කම්මං සම්මුඛාකරණීයං; අත්ථි අසම්මුඛාකරණීයං; තත්ථ අසම්මුඛාකරණීයං නාම දූතෙනුපසම්පදා, පත්තනික්කුජ්ජනං, පත්තුක්කුජ්ජනං, උම්මත්තකස්ස භික්ඛුනො උම්මත්තකසම්මුති, සෙක්ඛානං කුලානං සෙක්ඛසම්මුති, ඡන්නස්ස භික්ඛුනො බ්රහ්මදණ්ඩො, දෙවදත්තස්ස පකාසනීයකම්මං, අප්පසාදනීයං දස්සෙන්තස්ස භික්ඛුනො භික්ඛුනිසඞ්ඝෙන කාතබ්බං අවන්දනීයකම්මන්ති අට්ඨවිධං හොති, තං සබ්බං තත්ථ තත්ථ වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බං. ඉදං අට්ඨවිධම්පි කම්මං අසම්මුඛා කතං සුකතං හොති අකුප්පං. ४८३. ‘जे कर्म समक्ष करायचे असते ते परोक्ष करतो, ते वत्थुविपन्न (वस्तूने बिघडलेले) अधर्मकर्म आहे’ या पाठात—समक्ष करायचे कर्म असते आणि परोक्ष करायचेही कर्म असते. त्यामध्ये परोक्ष करायचे कर्म म्हणजे: दूताद्वारे उपसंपदा, पात्र उपडे करणे (पत्तनिस्कुज्जन), पात्र सुलट करणे (पत्तउक्कुज्जन), वेड्या भिक्खूला वेडेपणाची संमृती देणे (उम्मत्तकसंमृती), शैक्ष कुळांना शैक्ष संमृती देणे, छन्न भिक्खूला ब्रह्मदंड देणे, देवदत्तावर प्रकाशनीय कर्म करणे आणि अप्रसाद (अश्रद्धा) दाखवणाऱ्या भिक्खूवर भिक्खुनीसंघाने करायचे अवंदनीय कर्म; असे हे आठ प्रकारचे कर्म असते. ते सर्व त्या त्या ठिकाणी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावे. हे आठही प्रकारचे कर्म परोक्ष (असमक्ष) केले तरी ते सुकृत (योग्य प्रकारे केलेले) आणि अकुप्प (न बिघडणारे) असते. සෙසානි සබ්බකම්මානි සම්මුඛා එව කාතබ්බානි – සඞ්ඝසම්මුඛතා, ධම්මසම්මුඛතා, විනයසම්මුඛතා, පුග්ගලසම්මුඛතාති ඉමං චතුබ්බිධං සම්මුඛාවිනයං උපනෙත්වාව කාතබ්බානි. එවං කතානි හි සුකතානි හොන්ති. එවං අකතානි පනෙතානි ඉමං සම්මුඛාවිනයසඞ්ඛාතං වත්ථුං විනා කතත්තා වත්ථුවිපන්නානි නාම හොන්ති. තෙන වුත්තං – ‘‘සම්මුඛාකරණීයං කම්මං අසම්මුඛා කරොති, වත්ථුවිපන්නං අධම්මකම්ම’’න්ති. उर्वरित सर्व कर्मे समक्षच केली पाहिजेत—संघसमक्षता, धर्मसमक्षता, विनयसमक्षता आणि पुद्गलसमक्षता या चार प्रकारच्या संमुखविनयाला अनुसरूनच ती केली पाहिजेत. कारण अशा प्रकारे केलेली कर्मे सुकृत (योग्य प्रकारे केलेली) असतात. परंतु अशा प्रकारे न केल्यास, ही कर्मे या संमुखविनय नावाच्या नियमाशिवाय केल्यामुळे वत्थुविपन्न (वस्तूने बिघडलेली) ठरतात. म्हणूनच म्हटले आहे—‘समक्ष करायचे कर्म जो परोक्ष करतो, ते वत्थुविपन्न अधर्मकर्म आहे.’ පටිපුච්ඡාකරණීයාදීසුපි පටිපුච්ඡාදිකරණමෙව වත්ථු, තං වත්ථුං විනා කතත්තා තෙසම්පි වත්ථුවිපන්නතා වෙදිතබ්බා. ඉදං පනෙත්ථ වචනත්ථමත්තං. පටිපුච්ඡා කරණීයං අප්පටිපුච්ඡා කරොතීති පුච්ඡිත්වා චොදෙත්වා සාරෙත්වා කාතබ්බං අපුච්ඡිත්වා අචොදෙත්වා අසාරෙත්වා කරොති. පටිඤ්ඤාය කරණීයං අප්පටිඤ්ඤාය කරොතීති පටිඤ්ඤං ආරොපෙත්වා යථාදින්නාය පටිඤ්ඤාය කාතබ්බං අප්පටිඤ්ඤාය කරොන්තස්ස විප්පලපන්තස්ස බලක්කාරෙන කරොති. සතිවිනයාරහස්සාති දබ්බමල්ලපුත්තත්ථෙරසදිසස්ස ඛීණාසවස්ස. අමූළ්හවිනයාරහස්සාති ගග්ගභික්ඛුසදිසස්ස උම්මත්තකස්ස. තස්සපාපියසිකකම්මාරහස්සාති උපවාළභික්ඛුසදිසස්ස උස්සන්නපාපස්ස. එස නයො සබ්බත්ථ. प्रतिपृच्छाकरणीय (विचारून करायचे) इत्यादी कर्मांमध्येही प्रतिपृच्छा (विचारणे) इत्यादी करणे हीच ‘वस्तू’ आहे; त्या वस्तूशिवाय (त्या कृतीशिवाय) केल्यामुळे त्यांचीही वत्थुविपन्नता (वस्तूने बिघडणे) समजून घ्यावी. येथे हा केवळ शब्दाचा अर्थ आहे. ‘विचारून करायचे कर्म न विचारता करतो’ म्हणजे विचारून, चोदना करून (दोष दाखवून) आणि स्मरण करून देऊन करायचे कर्म न विचारता, चोदना न करता आणि स्मरण करून न देता करतो. ‘कबुलीने करायचे कर्म कबुलीशिवाय करतो’ म्हणजे कबुली घेऊन, दिलेल्या कबुलीनुसार करायचे कर्म, कबुली न देता बडबड करणाऱ्यावर जबरदस्तीने करतो. ‘सतिविनय मिळण्यास पात्र असलेल्याला’ म्हणजे डब्बमल्लपुत्त थेरांसारख्या क्षीणासवाला (अर्हताला). ‘अमूळ्हविनय मिळण्यास पात्र असलेल्याला’ म्हणजे गग्ग भिक्खूसारख्या वेड्या भिक्खूला. ‘तस्सपापियसिककर्म मिळण्यास पात्र असलेल्याला’ म्हणजे उपवाळ भिक्खूसारख्या अत्यंत पापी भिक्खूला. हाच नियम सर्वत्र लागू होतो. අනුපොසථෙ [Pg.245] උපොසථං කරොතීති අනුපොසථදිවසෙ උපොසථං කරොති. උපොසථදිවසො නාම ඨපෙත්වා කත්තිකමාසං අවසෙසෙසු එකාදසසු මාසෙසු භින්නස්ස සඞ්ඝස්ස සාමග්ගිදිවසො ච යථාවුත්තචාතුද්දසපන්නරසා ච. එතං තිප්පකාරම්පි උපොසථදිවසං ඨපෙත්වා අඤ්ඤස්මිං දිවසෙ උපොසථං කරොන්තො අනුපොසථෙ උපොසථං කරොති නාම. යත්ර හි පත්තචීවරාදීනං අත්ථාය අප්පමත්තකෙන කාරණෙන විවදන්තා උපොසථං වා පවාරණං වා ඨපෙන්ති, තත්ථ තස්මිං අධිකරණෙ විනිච්ඡිතෙ ‘‘සමග්ගා ජාතාම්හා’’ති අන්තරා සාමග්ගිඋපොසථං කාතුං න ලභන්ති, කරොන්තෙහි අනුපොසථෙ උපොසථො කතො නාම හොති. ‘अनुपोसथाच्या दिवशी उपोसथ करतो’ म्हणजे उपोसथाचा दिवस नसताना उपोसथ करतो. उपोसथाचा दिवस म्हणजे कत्तिक (कार्तिक) महिना वगळून उर्वरित अकरा महिन्यांमध्ये विभागलेल्या संघाचा सलोखा होण्याचा दिवस (सामग्गीदिवस) आणि आधी सांगितलेले चातुर्दशी (१४ वा दिवस) व पंचदशी (१५ वा दिवस) हे होत. या तीन प्रकारच्या उपोसथ दिवसांना वगळून इतर दिवशी उपोसथ करणारा संघ ‘अनुपोसथाच्या दिवशी उपोसथ करतो’ असे म्हटले जाते. कारण ज्या विहारात पात्र, चीवर इत्यादींच्या क्षुल्लक कारणावरून वाद घालत भिक्खू उपोसथ किंवा पवारणा थांबवून ठेवतात, तिथे त्या विवादाचा निवाडा झाल्यावर ‘आम्ही एक鍾लो आहोत’ असे म्हणून मधल्या काळात सामग्गी उपोसथ करण्याची त्यांना परवानगी नसते; तरीही त्यांनी तसे केल्यास, त्यांनी अनुपोसथाच्या दिवशी उपोसथ केला असे होते. අපවාරණාය පවාරෙතීති අපවාරණාදිවසෙ පවාරෙති; පවාරණාදිවසො නාම එකස්මිං කත්තිකමාසෙ භින්නස්ස සඞ්ඝස්ස සාමග්ගිදිවසො ච පච්චුක්කඩ්ඪිත්වා ඨපිතදිවසො ච ද්වෙ ච පුණ්ණමාසියො. එවං චතුබ්බිධම්පි පවාරණාදිවසං ඨපෙත්වා අඤ්ඤස්මිං දිවසෙ පවාරෙන්තො අපවාරණාය පවාරෙති නාම. ඉධාපි අප්පමත්තකස්ස විවාදස්ස වූපසමෙ සාමග්ගිපවාරණං කාතුං න ලභන්ති, කරොන්තෙහි අපවාරණාය පවාරණා කතා හොති. අපිච ඌනවීසතිවස්සං වා අන්තිමවත්ථුං අජ්ඣාපන්නපුබ්බං වා එකාදසසු වා අභබ්බපුග්ගලෙසු අඤ්ඤතරං උපසම්පාදෙන්තස්සපි වත්ථුවිපන්නං අධම්මකම්මං හොති. එවං වත්ථුතො කම්මානි විපජ්ජන්ති. ‘अपवारणेच्या दिवशी पवारणा करतो’ म्हणजे पवारणेचा दिवस नसताना पवारणा करतो. पवारणेचा दिवस म्हणजे एका कत्तिक (कार्तिक) महिन्यात विभागलेल्या संघाचा सलोखा होण्याचा दिवस, पुढे ढकलून निश्चित केलेला दिवस आणि दोन पौर्णिमा (आश्विन व कार्तिक पौर्णिमा) हे होत. या चार प्रकारच्या पवारणा दिवसांना वगळून इतर दिवशी पवारणा करणारा भिक्खू ‘अपवारणेच्या दिवशी पवारणा करतो’ असे म्हटले जाते. येथेही क्षुल्लक वाद शांत झाल्यावर सामग्गी पवारणा करण्याची त्यांना परवानगी नसते; तरीही त्यांनी तसे केल्यास, त्यांनी अपवारणेच्या दिवशी पवारणा केली असे होते. शिवाय, वीस वर्षांपेक्षा कमी वय असलेल्या व्यक्तीला, किंवा आधी पाराजिकाचा अपराध केलेल्या व्यक्तीला, किंवा अकरा अभव्य पुद्गलांपैकी (अपात्र व्यक्तींपैकी) कोणा एकाला उपसंपदा देणाऱ्या उपाध्यायाचे कर्मही वत्थुविपन्न अधर्मकर्म ठरते. अशा प्रकारे वस्तूच्या दोषाने कर्मे निष्फळ ठरतात. 484. ඤත්තිතො විපත්තියං පන වත්ථුං න පරාමසතීති යස්ස උපසම්පදාදිකම්මං කරොති, තං න පරාමසති, තස්ස නාමං න ගණ්හාති. ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො, අයං ධම්මරක්ඛිතො ආයස්මතො බුද්ධරක්ඛිතස්ස උපසම්පදාපෙක්ඛො’’ති වත්තබ්බෙ ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො, ආයස්මතො බුද්ධරක්ඛිතස්ස උපසම්පදාපෙක්ඛො’’ති වදති; එවං වත්ථුං න පරාමසති. ४८४. ज्ञत्तीच्या दोषाने कर्म निष्फळ होण्यामध्ये ‘वस्तूचा उल्लेख न करणे’ म्हणजे ज्याच्यासाठी उपसंपदा इत्यादी कर्म केले जाते, त्याचा उल्लेख न करणे, त्याचे नाव न घेणे. ‘भन्ते, संघाने माझे ऐकावे, हा धम्मरक्खित आयुष्यमान बुद्धरक्खितांचा उपसंपदापेक्षक आहे’ असे म्हणायचे असताना, ‘भन्ते, संघाने माझे ऐकावे, आयुष्यमान बुद्धरक्खितांचा उपसंपदापेक्षक आहे’ असे म्हणतो; अशा प्रकारे तो वस्तूचा (उपसंपदा घेणाऱ्या व्यक्तीचा) उल्लेख करत नाही. සඞ්ඝං න පරාමසතීති සඞ්ඝස්ස නාමං න ගණ්හාති. ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො, අයං ධම්මරක්ඛිතො’’ති වත්තබ්බෙ ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ, අයං ධම්මරක්ඛිතො’’ති වදති; එවං සඞ්ඝං න පරාමසති. ‘संघाचा उल्लेख न करणे’ म्हणजे संघाचे नाव न घेणे. ‘भन्ते, संघाने माझे ऐकावे, हा धम्मरक्खित आहे’ असे म्हणायचे असताना, ‘भन्ते, माझे ऐकावे, हा धम्मरक्खित आहे’ असे म्हणतो; अशा प्रकारे तो संघाचा उल्लेख करत नाही. පුග්ගලං න පරාමසතීති යො උපසම්පදාපෙක්ඛස්ස උපජ්ඣායො, තං න පරාමසති, තස්ස නාමං න ගණ්හාති. ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො, අයං ධම්මරක්ඛිතො ආයස්මතො බුද්ධරක්ඛිතස්ස උපසම්පදාපෙක්ඛො’’ති වත්තබ්බෙ [Pg.246] ‘‘සුණාතු මෙ, භන්තෙ සඞ්ඝො, අයං ධම්මරක්ඛිතො උපසම්පදාපෙක්ඛො’’ති වදති; එවං පුග්ගලං න පරාමසති. ‘पुद्गलाचा (व्यक्तीचा) उल्लेख न करणे’ म्हणजे जो उपसंपदापेक्षकाचा उपाध्याय आहे, त्याचा उल्लेख न करणे, त्याचे नाव न घेणे. ‘भन्ते, संघाने माझे ऐकावे, हा धम्मरक्खित आयुष्यमान बुद्धरक्खितांचा उपसंपदापेक्षक आहे’ असे म्हणायचे असताना, ‘भन्ते, संघाने माझे ऐकावे, हा धम्मरक्खित उपसंपदापेक्षक आहे’ असे म्हणतो; अशा प्रकारे तो पुद्गलाचा (उपाध्यायाचा) उल्लेख करत नाही. ඤත්තිං න පරාමසතීති සබ්බෙන සබ්බං ඤත්තිං න පරාමසති. ඤත්තිදුතියකම්මෙ ඤත්තිං අට්ඨපෙත්වා ද්වික්ඛත්තුං කම්මවාචාය එව අනුස්සාවනකම්මං කරොති. ඤත්තිචතුත්ථකම්මෙපි ඤත්තිං අට්ඨපෙත්වා චතුක්ඛත්තුං කම්මවාචාය එව අනුස්සාවනකම්මං කරොති; එවං ඤත්තිං න පරාමසති. ज्ञत्तीचा (प्रस्तावाचा) उल्लेख न करणे म्हणजे पूर्णपणे ज्ञत्तीचा उल्लेख न करणे होय. ज्ञत्तिदुतीय कर्मामध्ये ज्ञत्तीला वगळून दोन वेळा केवळ कम्मवाचेनेच अनुस्सावन (घोषणा) कर्म करतो. ज्ञत्तिचतुत्थ कर्मामध्येही ज्ञत्तीला वगळून चार वेळा केवळ कम्मवाचेनेच अनुस्सावन कर्म करतो; अशा प्रकारे ज्ञत्तीचा उल्लेख केला जात नाही. පච්ඡා වා ඤත්තිං ඨපෙතීති පඨමං කම්මවාචාය අනුස්සාවනකම්මං කත්වා ‘‘එසා ඤත්තී’’ති වත්වා ‘‘ඛමති සඞ්ඝස්ස තස්මා තුණ්හී එවමෙතං ධාරයාමී’’ති වදති; එවං පච්ඡා ඤත්තිං ඨපෙති. ඉති ඉමෙහි පඤ්චහාකාරෙහි ඤත්තිතො කම්මානි විපජ්ජන්ති. किंवा नंतर ज्ञत्ती ठेवणे म्हणजे प्रथम कम्मवाचेने अनुस्सावन कर्म करून, नंतर 'एसा ज्ञत्ति' (ही ज्ञत्ती आहे) असे म्हणून 'खमसि संघस्स तस्मा तुम्ही एवमेतं धारयामि' (संघाला हे मान्य आहे, म्हणून संघ शांत आहे, असे मी हे धारण करतो) असे म्हणतो; अशा प्रकारे नंतर ज्ञत्ती ठेवतो. अशा या पाच प्रकारांनी ज्ञत्तीच्या दोषांमुळे कर्मे निष्फळ (विपन्न) होतात. 485. අනුස්සාවනතො විපත්තියං පන වත්ථුආදීනි වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බානි. එවං පන නෙසං අපරාමසනං හොති – ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො’’ති පඨමානුස්සාවනෙ ‘‘දුතියම්පි එතමත්ථං වදාමි, තතියම්පි එතමත්ථං වදාමි, සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො’’ති දුතියතතියානුස්සාවනාසු වා ‘‘අයං ධම්මරක්ඛිතො ආයස්මතො බුද්ධරක්ඛිතස්ස උපසම්පදාපෙක්ඛො’’ති වත්තබ්බෙ ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො, ආයස්මතො බුද්ධරක්ඛිතස්සා’’ති වදන්තො වත්ථුං න පරාමසති නාම. ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො, අයං ධම්මරක්ඛිතො’’ති වත්තබ්බෙ ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ, අයං ධම්මරක්ඛිතො’’ති වදන්තො සඞ්ඝං න පරාමසති නාම. ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො, අයං ධම්මරක්ඛිතො ආයස්මතො බුද්ධරක්ඛිතස්සා’’ති වත්තබ්බෙ ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො, අයං ධම්මරක්ඛිතො උපසම්පදාපෙක්ඛො’’ති වදන්තො පුග්ගලං න පරාමසති නාම. ४८५. परंतु अनुस्सावनाच्या (घोषणा) अपयशात (विपत्तीत) वस्तू (उमेदवार) इत्यादी पाच गोष्टी आधी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्याव्यात. त्यांचा उल्लेख न करणे (अपरामसन) पुढीलप्रमाणे होते – 'सुणातु मे भन्ते संघो' या पहिल्या अनुस्सावनात किंवा 'दुतियम्पि एतमत्थं वदामि, ततियम्पि एतमत्थं वदामि, सुणातु मे भन्ते संघो' या दुसऱ्या व तिसऱ्या अनुस्सावनात, 'अयं धम्मरक्खितो आयस्मतो बुद्धरक्खितस्स उपसम्पदापेक्खो' (हा धम्मरक्षित आयुष्यमान बुद्धरक्षितांच्या उपसंपदा-अपेक्षक आहे) असे म्हणावयाचे असताना, 'सुणातु मे भन्ते संघो, आयस्मतो बुद्धरक्खितस्स...' असे म्हणणारा मनुष्य 'वस्तूचा' (उमेदवाराचा) उल्लेख करत नाही असे म्हटले जाते. 'सुणातु मे भन्ते संघो, अयं धम्मरक्खितो' असे म्हणावयाचे असताना, 'सुणातु मे भन्ते, अयं धम्मरक्खितो' असे म्हणणारा 'संघाचा' उल्लेख करत नाही असे म्हटले जाते. 'सुणातु मे भन्ते संघो, अयं धम्मरक्खितो आयस्मतो बुद्धरक्खितस्स' असे म्हणावयाचे असताना, 'सुणातु मे भन्ते संघो, अयं धम्मरक्खितो उपसम्पदापेक्खो' असे म्हणणारा 'पुद्गलाचा' (उपाध्यायांचा) उल्लेख करत नाही असे म्हटले जाते. සාවනං හාපෙතීති සබ්බෙන සබ්බං කම්මවාචාය අනුස්සාවනං න කරොති, ඤත්තිදුතියකම්මෙ ද්වික්ඛත්තුං ඤත්තිමෙව ඨපෙති, ඤත්තිචතුත්ථකම්මෙ චතුක්ඛත්තුං ඤත්තිමෙව ඨපෙති; එවං අනුස්සාවනං හාපෙති. යොපි ඤත්තිදුතියකම්මෙ එකං ඤත්තිං ඨපෙත්වා එකං කම්මවාචං අනුස්සාවෙන්තො අක්ඛරං වා ඡඩ්ඩෙති, පදං වා දුරුත්තං කරොති, අයම්පි අනුස්සාවනං හාපෙතියෙව. ඤත්තිචතුත්ථකම්මෙ පන එකං ඤත්තිං ඨපෙත්වා සකිමෙව වා ද්වික්ඛත්තුං වා කම්මවාචාය අනුස්සාවනං කරොන්තොපි අක්ඛරං වා පදං වා [Pg.247] ඡඩ්ඩෙන්තොපි දුරුත්තං කරොන්තොපි අනුස්සාවනං හාපෙතියෙවාති වෙදිතබ්බො. घोषणा (सावन) कमी करणे म्हणजे कम्मवाचेचे अनुस्सावन पूर्णपणे न करणे होय. ज्ञत्तिदुतीय कर्मामध्ये दोन वेळा केवळ ज्ञत्तीच ठेवतो, ज्ञत्तिचतुत्थ कर्मामध्ये चार वेळा केवळ ज्ञत्तीच ठेवतो; अशा प्रकारे अनुस्सावन कमी करतो. जो कोणी ज्ञत्तिदुतीय कर्मामध्ये एक ज्ञत्ती ठेवून, एका कम्मवाचेचे अनुस्सावन करताना एखादे अक्षर गाळतो किंवा पदाचा चुकीचा उच्चार (दुरुत्त) करतो, तो देखील अनुस्सावन कमीच करतो. ज्ञत्तिचतुत्थ कर्मामध्ये मात्र एक ज्ञत्ती ठेवून, केवळ एकदाच किंवा दोनदाच कम्मवाचेचे अनुस्सावन करणारा, किंवा एखादे अक्षर किंवा पद गाळणारा, किंवा चुकीचा उच्चार करणारा देखील अनुस्सावन कमीच करतो, असे समजावे. දුරුත්තං කරොතීති එත්ථ පන අයං විනිච්ඡයො – යො හි අඤ්ඤස්මිං අක්ඛරෙ වත්තබ්බෙ අඤ්ඤං වදති, අයං දුරුත්තං කරොති නාම. තස්මා කම්මවාචං කරොන්තෙන භික්ඛුනා ය්වායං – चुकीचा उच्चार (दुरुत्त) करणे याविषयी हा निर्णय आहे – जो खरोखर एखादे अक्षर म्हणावयाचे असताना दुसरेच अक्षर म्हणतो, तो 'चुकीचा उच्चार करतो' असे म्हटले जाते. म्हणून, कम्मवाचा करणाऱ्या भिक्खूने जो हा – ‘‘සිථිලං ධනිතඤ්ච දීඝරස්සං, ගරුකං ලහුකඤ්ච නිග්ගහිතං; සම්බන්ධං වවත්ථිතං විමුත්තං, දසධා බ්යඤ්ජනබුද්ධියා පභෙදො’’ති. 'सिथिल (अल्पप्राण), धनित (महाप्राण), दीघ (दीर्घ), रस्स (ह्रस्व), गरुक (गुरू), लहुक (लघू), निग्गहीत (अनुस्वार), सम्बन्ध (जोडलेले), ववत्थित (विभक्त) आणि विमुत्त (मुक्त) – अशा दहा प्रकारे व्यंजनांच्या (उच्चारांच्या) भेदांचे ज्ञान करून घ्यावे' – වුත්තො, අයං සුට්ඨු උපලක්ඛෙතබ්බො. එත්ථ හි ‘‘සිථිලං’’ නාම පඤ්චසු වග්ගෙසු පඨමතතියං. ‘‘ධනිතං’’ නාම තෙස්වෙව දුතියචතුත්ථං. ‘‘දීඝ’’න්ති දීඝෙන කාලෙන වත්තබ්බං ආකාරාදි. ‘‘රස්ස’’න්ති තතො උපඩ්ඪකාලෙන වත්තබ්බං අකාරාදි. ‘‘ගරුක’’න්ති දීඝමෙව. යං වා ආයස්මතො බුද්ධරක්ඛිතත්ථෙරස්ස යස්ස නක්ඛමතීති එවං සංයොගපරං කත්වා වුච්චති. ‘‘ලහුක’’න්ති රස්සමෙව. යං වා ආයස්මතො බුද්ධරක්ඛිතථෙරස්ස යස්ස න ඛමතීති එවං අසංයොගපරං කත්වා වුච්චති. ‘‘නිග්ගහිත’’න්ති යං කරණානි නිග්ගහෙත්වා අවිස්සජ්ජෙත්වා අවිවටෙන මුඛෙන සානුනාසිකං කත්වා වත්තබ්බං. ‘‘සම්බන්ධ’’න්ති යං පරපදෙන සම්බන්ධිත්වා ‘‘තුණ්හිස්සා’’ති වා ‘‘තුණ්හස්සා’’ති වා වුච්චති. ‘‘වවත්ථිත’’න්ති යං පරපදෙන අසම්බන්ධං කත්වා විච්ඡින්දිත්වා ‘‘තුණ්හී අස්සා’’ති වා ‘‘තුණ්හ අස්සා’’ති වා වුච්චති. ‘‘විමුත්ත’’න්ති යං කරණානි අනිග්ගහෙත්වා විස්සජ්ජෙත්වා විවටෙන මුඛෙන අනුනාසිකං අකත්වා වුච්චති. असे सांगितले आहे, हा व्यंजनांचा भेद चांगल्या प्रकारे लक्षात ठेवला पाहिजे. येथे 'सिथिल' म्हणजे पाच वर्गांमधील पहिले आणि तिसरे अक्षर. 'धनित' म्हणजे त्याच वर्गांमधील दुसरे आणि चौथे अक्षर. 'दीघ' म्हणजे दीर्घ काळाने उच्चारावयाचे 'आ' इत्यादी अक्षर. 'रस्स' म्हणजे त्यापेक्षा अर्ध्या काळाने उच्चारावयाचे 'अ' इत्यादी अक्षर. 'गरुक' म्हणजे दीर्घ अक्षरच; किंवा ज्याच्या पुढे संयुक्त व्यंजन (संयोगपर) करून उच्चार केला जातो, जसे की 'आयस्मतो बुद्धरक्खितत्थेरस्स' किंवा 'यस्स नक्खमति'. 'लहुक' म्हणजे ह्रस्व अक्षरच; किंवा ज्याच्या पुढे संयुक्त व्यंजन नसताना (असंयोगपर) उच्चार केला जातो, जसे की 'आयस्मतो बुद्धरक्खितथेरस्स' किंवा 'यस्स न खमति'. 'निग्गहीत' म्हणजे जे उच्चारस्थानांना (करणांना) दाबून, न सोडता, तोंड न उघडता अनुनासिक करून उच्चारावयाचे असते. 'सम्बन्ध' म्हणजे जे पुढील पदाशी जोडून 'तुण्हिस्सा' किंवा 'तुण्हस्सा' असे म्हटले जाते. 'ववत्थित' म्हणजे जे पुढील पदाशी न जोडता, वेगळे करून 'तुण्हि अस्सा' या प्रकारे किंवा 'तुण्ह अस्सा' या प्रकारे म्हटले जाते. 'विमुत्त' म्हणजे जे उच्चारस्थानांना न दाबता, मोकळे सोडून, तोंड उघडून अनुनासिक न करता म्हटले जाते. තත්ථ ‘‘සුණාතු මෙ’’ති වත්තබ්බෙ ත-කාරස්ස ථ-කාරං කත්වා ‘‘සුණාථු මෙ’’ති වචනං සිථිලස්ස ධනිතකරණං නාම. තථා ‘‘පත්තකල්ලං, එසා ඤත්තී’’ති වත්තබ්බෙ ‘‘පත්ථකල්ලං, එසා ඤත්ථී’’තිආදිවචනඤ්ච. ‘‘භන්තෙ සඞ්ඝො’’ති වත්තබ්බෙ භ-කාර ඝ-කාරානං බ-කාර ග-කාරෙ කත්වා ‘‘බන්තෙ සඞ්ගො’’ති වචනං ධනිතස්ස සිථිලකරණං නාම. ‘‘සුණාතු මෙ’’ති විවටෙන මුඛෙන වත්තබ්බෙ පන ‘‘සුණංතු මෙ’’ති වා ‘‘එසා ඤත්තී’’ති වත්තබ්බෙ ‘‘එසං ඤත්තී’’ති වා අවිවටෙන මුඛෙන අනුනාසිකං කත්වා වචනං විමුත්තස්ස නිග්ගහිතවචනං නාම. ‘‘පත්තකල්ල’’න්ති අවිවටෙන මුඛෙන අනුනාසිකං කත්වා වත්තබ්බෙ ‘‘පත්තකල්ලා’’ති විවටෙන මුඛෙන අනුනාසිකං අකත්වා වචනං නිග්ගහිතස්ස විමුත්තවචනං නාම. त्यामध्ये, 'सुणातु मे' असे म्हणावयाचे असताना 'त' काराचा 'थ' कार करून 'सुणाथु मे' असे म्हणणे म्हणजे सिथिलचे धनित करणे होय. तसेच 'पत्तकल्लं, एसा ज्ञत्ति' असे म्हणावयाचे असताना 'पत्थकल्लं, एसा ज्ञत्थि' इत्यादी म्हणणे देखील (सिथिलचे धनित करणे होय). 'भन्ते संघो' असे म्हणावयाचे असताना 'भ' कार आणि 'घ' काराचे 'ब' कार आणि 'ग' कार करून 'बन्ते संगो' असे म्हणणे म्हणजे धनितचे सिथिल करणे होय. परंतु 'सुणातु मे' असे उघड्या तोंडाने म्हणावयाचे असताना 'सुणन्तु मे' असे म्हणणे, किंवा 'एसा ज्ञत्ति' असे म्हणावयाचे असताना 'एसं ज्ञत्ति' असे तोंड न उघडता अनुनासिक करून म्हणणे म्हणजे विमुत्तचे निग्गहीत उच्चार करणे होय. 'पत्तकल्लं' असे तोंड न उघडता अनुनासिक करून म्हणावयाचे असताना 'पत्तकल्ला' असे तोंड उघडून अनुनासिक न करता म्हणणे म्हणजे निग्गहीतचे विमुत्त उच्चार करणे होय. ඉති [Pg.248] සිථිලෙ කත්තබ්බෙ ධනිතං, ධනිතෙ කත්තබ්බෙ සිථිලං, විමුත්තෙ කත්තබ්බෙ නිග්ගහිතං, නිග්ගහිතෙ කත්තබ්බෙ විමුත්තන්ති ඉමානි චත්තාරි බ්යඤ්ජනානි අන්තොකම්මවාචාය කම්මං දූසෙන්ති. එවං වදන්තො හි අඤ්ඤස්මිං අක්ඛරෙ වත්තබ්බෙ අඤ්ඤං වදති, දුරුත්තං කරොතීති වුච්චති. ඉතරෙසු පන දීඝරස්සාදීසු ඡසු බ්යඤ්ජනෙසු දීඝට්ඨානෙ දීඝමෙව, රස්සට්ඨානෙ ච රස්සමෙවාති එවං යථාඨානෙ තං තදෙව අක්ඛරං භාසන්තෙන අනුක්කමාගතං පවෙණිං අවිනාසෙන්තෙන කම්මවාචා කාතබ්බා. සචෙ පන එවං අකත්වා දීඝෙ වත්තබ්බෙ රස්සං, රස්සෙ වා වත්තබ්බෙ දීඝං වදති; තථා ගරුකෙ වත්තබ්බෙ ලහුකං, ලහුකෙ වා වත්තබ්බෙ ගරුකං වදති; සම්බන්ධෙ වා පන වත්තබ්බෙ වවත්ථිතං, වවත්ථිතෙ වා වත්තබ්බෙ සම්බන්ධං වදති; එවං වුත්තෙපි කම්මවාචා න කුප්පති. ඉමානි හි ඡ බ්යඤ්ජනානි කම්මං න කොපෙන්ති. अशा प्रकारे, सिथिल म्हणावयाचे असताना धनित, धनित म्हणावयाचे असताना सिथिल, विमुत्त म्हणावयाचे असताना निग्गहीत, आणि निग्गहीत म्हणावयाचे असताना विमुत्त – हे चार व्यंजनांचे (उच्चारांचे) दोष कम्मवाचेच्या अंतर्गत कर्माला बिघडवतात (दूषित करतात). कारण असा उच्चार करणारा मनुष्य दुसरे अक्षर म्हणावयाचे असताना दुसरेच म्हणतो, आणि तो चुकीचा उच्चार (दुरुत्त) करतो असे म्हटले जाते. परंतु इतर दीघ, रस्स इत्यादी सहा व्यंजनांच्या बाबतीत, दीघच्या ठिकाणी दीघच आणि रस्सच्या ठिकाणी रस्सचाच अशा प्रकारे योग्य ठिकाणी तेच ते अक्षर उच्चारून, अनुक्रमाने आलेल्या परंपरेचा नाश न करता कम्मवाचा केली पाहिजे. पण जर असे न करता, दीघ म्हणावयाचे असताना rassa, किंवा रस्स म्हणावयाचे असताना दीघ म्हटले; तसेच गरुक म्हणावयाचे असताना लहुक, किंवा लहुक म्हणावयाचे असताना गरुक म्हटले; किंवा सम्बन्धाच्या ठिकाणी ववत्थित, किंवा ववत्थितच्या ठिकाणी सम्बन्धाचा उच्चार केला; तर असे म्हटले तरी कम्मवाचा बिघडत नाही. कारण ही सहा व्यंजने कर्माला बिघडवत नाहीत. යං පන සුත්තන්තිකත්ථෙරා ‘‘ද-කාරො ත-කාරමාපජ්ජති, ත-කාරො ද-කාරමාපජ්ජති, ච-කාරො ජ-කාරමාපජ්ජති, ජ-කාරො ච-කාරමාපජ්ජති, ය-කාරො ක-කාරමාපජ්ජති, ක-කාරො ය-කාරමාපජ්ජති; තස්මා ද-කාරාදීසු වත්තබ්බෙසු ත-කාරාදිවචනං න විරුජ්ඣතී’’ති වදන්ති, තං කම්මවාචං පත්වා න වට්ටති. තස්මා විනයධරෙන නෙව ද-කාරො ත-කාරො කාතබ්බො…පෙ… න ක-කාරො ය-කාරො. යථාපාළියා නිරුත්තිං සොධෙත්වා දසවිධාය බ්යඤ්ජනනිරුත්තියා වුත්තදොසෙ පරිහරන්තෙන කම්මවාචා කාතබ්බා. ඉතරථා හි සාවනං හාපෙති නාම. परंतु, सुत्तन्तधारी थेर (सुत्तन्तिक थेर) जे म्हणतात की— 'द' हा वर्ण 'त' वर्णात बदलू शकतो, 'त' हा वर्ण 'द' वर्णात बदलू शकतो, 'च' हा वर्ण 'ज' वर्णात बदलू शकतो, 'ज' हा वर्ण 'च' वर्णात बदलू शकतो, 'य' हा वर्ण 'क' वर्णात बदलू शकतो, आणि 'क' हा वर्ण 'य' वर्णात बदलू शकतो; म्हणून 'द' इत्यादी वर्णांचे उच्चारण करायचे असताना 'त' इत्यादी वर्णांचे उच्चारण करणे विरुद्ध (चुकीचे) ठरत नाही— ते कम्मवाचेच्या बाबतीत योग्य ठरत नाही. म्हणून विनयधराने 'द' चा 'त' करू नये... तसेच 'क' चा 'य' करू नये. पाळीनुसार शब्दांचे शुद्धीकरण करून, दहा प्रकारच्या व्यंजन-निरुत्तीद्वारे सांगितलेले दोष टाळूनच कम्मवाचा केली पाहिजे. कारण अन्यथा, कम्मवाचेची घोषणा (श्रावण) अपूर्ण किंवा भ्रष्ट ठरते. අකාලෙ වා සාවෙතීති සාවනාය අකාලෙ අනොකාසෙ ඤත්තිං අට්ඨපෙත්වා පඨමංයෙව අනුස්සාවනකම්මං කත්වා පච්ඡා ඤත්තිං ඨපෙති. ඉති ඉමෙහි පඤ්චහාකාරෙහි අනුස්සාවනතො කම්මානි විපජ්ජන්ති. ‘अकाळी घोषणा करतो’ म्हणजे घोषणेच्या अयोग्य वेळी आणि अयोग्य प्रसंगी ज्ञत्ती (प्रस्ताव) न मांडता, आधीच अनुस्सावन कम्म (घोषणा कर्म) करून नंतर ज्ञत्ती मांडणे होय. अशा प्रकारे, या पाच कारणांमुळे अनुस्सावनाच्या (घोषणा करण्याच्या) दोषाने संघकर्मे विफल होतात. 486. සීමතො විපත්තියං පන අතිඛුද්දකසීමා නාම යා එකවීසති භික්ඛූ න ගණ්හාති. කුරුන්දියං පන ‘‘යත්ථ එකවීසති භික්ඛූ නිසීදිතුං න සක්කොන්තී’’ති වුත්තං. තස්මා යා එවරූපා සීමා, අයං සම්මතාපි අසම්මතා, ගාමඛෙත්තසදිසාව හොති, තත්ථ කතං කම්මං කුප්පති. එස නයො සෙසසීමාසුපි. එත්ථ පන අතිමහතී නාම යා කෙසග්ගමත්තෙනාපි තියොජනං අතික්කාමෙත්වා සම්මතා හොති. ඛණ්ඩනිමිත්තා නාම අඝටිතනිමිත්තා වුච්චති. පුරත්ථිමාය දිසාය නිමිත්තං කිත්තෙත්වා අනුක්කමෙනෙව දක්ඛිණාය පච්ඡිමාය උත්තරාය දිසාය කිත්තෙත්වා පුන පුරත්ථිමාය දිසාය පුබ්බකිත්තිතං නිමිත්තං පටිකිත්තෙත්වාව ඨපෙතුං වට්ටති; එවං අඛණ්ඩනිමිත්තා හොති. සචෙ [Pg.249] පන අනුක්කමෙන ආහරිත්වා උත්තරාය දිසාය නිමිත්තං කිත්තෙත්වා තත්ථෙව ඨපෙති, ඛණ්ඩනිමිත්තා හොති. අපරාපි ඛණ්ඩනිමිත්තා නාම යා අනිමිත්තුපගං තචසාරරුක්ඛං වා ඛාණුකං වා පංසුපුඤ්ජවාලිකාපුඤ්ජානං වා අඤ්ඤතරං අන්තරා එකං නිමිත්තං කත්වා සම්මතා හොති. ඡායානිමිත්තා නාම යා පබ්බතච්ඡායාදීනං යංකිඤ්චි ඡායං නිමිත්තං කත්වා සම්මතා හොති. අනිමිත්තා නාම යා සබ්බෙන සබ්බං නිමිත්තානි අකිත්තෙත්වා සම්මතා හොති. ४८६. सीमेच्या दोषाच्या (विफलेतेच्या) बाबतीत, 'अतिखुद्दक सीमा' (अतिशय लहान सीमा) म्हणजे जी सीमा २१ भिक्खूंना सामावून घेऊ शकत नाही. कुरुन्दी अट्ठकथेत मात्र असे म्हटले आहे की— 'जिथे २१ भिक्खू बसू शकत नाहीत' (ती अतिखुद्दक सीमा होय). म्हणून अशी जी सीमा असते, ती निश्चित (संमत) केली असली तरी असंमतच मानली जाते; ती केवळ सामान्य गावाच्या क्षेत्रासारखीच असते आणि तिथे केलेले संघकर्म विफल होते. हाच नियम उर्वरित सीमेच्या बाबतीतही लागू होतो. येथे 'अतिमहती सीमा' (अतिशय मोठी सीमा) म्हणजे जी एका केसाच्या टोकाएवढ्या अंतरानेही तीन योजनांपेक्षा अधिक मोठी निश्चित केली जाते. 'खंडनिमित्त सीमा' (खंडित चिन्हांची सीमा) म्हणजे जिला न जोडलेली चिन्हे (अघटित निमित्त) म्हटले जाते. पूर्व देशाचे चिन्ह घोषित करून, अनुक्रमे दक्षिण, पश्चिम आणि उत्तर दिशेचे चिन्ह घोषित करून, पुन्हा पूर्व दिशेचे आधी घोषित केलेले चिन्ह पुन्हा घोषित करूनच सीमा निश्चित करणे योग्य आहे; अशा प्रकारे ती 'अखंडनिमित्त' (अखंडित चिन्हांची सीमा) होते. पण जर अनुक्रमे आणून उत्तर दिशेचे चिन्ह घोषित करून तिथेच थांबवले, तर ती 'खंडनिमित्त' होते. दुसरीही एक 'खंडनिमित्त' सीमा असते, जी अयोग्य चिन्हांना— जसे की केवळ सालच ज्याचा गाभा आहे असे झाड, किंवा लाकडाचा खुंट, किंवा मातीचा ढीग वा वाळूचा ढीग यांपैकी एक— दोन चिन्हांच्या मध्ये एक चिन्ह बनवून निश्चित केली जाते. 'छायानिमित्त सीमा' म्हणजे जी पर्वताची सावली इत्यादींपैकी कोणत्याही सावलीला चिन्ह मानून निश्चित केली जाते. 'अनिमित्त सीमा' म्हणजे जी कोणत्याही प्रकारे कोणतीही चिन्हे घोषित न करता निश्चित केली जाते. බහිසීමෙ ඨිතො සීමං සම්මන්නති නාම නිමිත්තානි කිත්තෙත්වා නිමිත්තානං බහි ඨිතො සම්මන්නති. නදියා සමුද්දෙ ජාතස්සරෙ සීමං සම්මන්නතීති එතෙසු නදිආදීසු යං සම්මන්නති, සා එවං සම්මතාපි ‘‘සබ්බා, භික්ඛවෙ, නදී අසීමා, සබ්බො සමුද්දො අසීමො, සබ්බො ජාතස්සරො අසීමො’’ති (මහාව. 147) වචනතො අසම්මතාව හොති. සීමාය සීමං සම්භින්දතීති අත්තනො සීමාය පරෙසං සීමං සම්භින්දති. අජ්ඣොත්ථරතීති අත්තනො සීමාය පරෙසං සීමං අජ්ඣොත්ථරති. තත්ථ යථා සම්භෙදො ච අජ්ඣොත්ථරණඤ්ච හොති, තං සබ්බං උපොසථක්ඛන්ධකෙ වුත්තමෙව. ඉති ඉමා එකාදසපි සීමා අසීමා ගාමඛෙත්තසදිසා එව, තාසු නිසීදිත්වා කතං කම්මං කුප්පති. තෙන වුත්තං ‘‘ඉමෙහි එකාදසහි ආකාරෙහි සීමතො කම්මානි විපජ්ජන්තී’’ති. ‘सीमेबाहेर उभे राहून सीमा निश्चित करणे’ म्हणजे चिन्हे घोषित करून, त्या चिन्हांच्या बाहेर उभे राहून सीमा निश्चित करणे होय. ‘नदी, समुद्र किंवा नैसर्गिक तलावामध्ये सीमा निश्चित करणे’ म्हणजे या नदी इत्यादींमध्ये जी सीमा निश्चित केली जाते, ती अशा प्रकारे निश्चित केली असली तरी— 'भिक्खूंनो, सर्व नद्या असीमा (बद्धसीमा नसलेल्या) आहेत, सर्व समुद्र असीमा आहेत, सर्व नैसर्गिक तलाव असीमा आहेत' या भगवंतांच्या वचनानुसार ती असंमतच (निश्चित न केल्यासारखीच) ठरते. ‘सीमेने सीमा संमिश्रित करणे’ म्हणजे स्वतःच्या सीमेने इतरांच्या सीमेला संमिश्रित करणे होय. ‘अतिक्रमण करणे’ म्हणजे स्वतःच्या सीमेने इतरांच्या सीमेवर अतिक्रमण करणे होय. तिथे ज्या प्रकारे संमिश्रण आणि अतिक्रमण होते, ते सर्व उपोसथक्खन्धकामध्ये सांगितलेच आहे. अशा प्रकारे या अकराही सीमा असीमा (बद्धसीमा नसलेल्या) असून केवळ सामान्य गावाच्या क्षेत्रासारख्याच आहेत; त्यांमध्ये बसून केलेले संघकर्म विफल होते. म्हणूनच आयुष्यमान उपाली थेरांनी म्हटले आहे की— 'या अकरा कारणांमुळे सीमेच्या दोषाने संघकर्मे विफल होतात.' 487-488. පරිසතො කම්මවිපත්තියං පන කිඤ්චි අනුත්තානං නාම නත්ථි. යම්පි තත්ථ කම්මප්පත්තඡන්දාරහලක්ඛණං වත්තබ්බං සියා, තම්පි පරතො ‘‘චත්තාරො භික්ඛූ පකතත්තා කම්මප්පත්තා’’තිආදිනා නයෙන වුත්තමෙව. තත්ථ පකතත්තා කම්මප්පත්තාති චතුවග්ගකරණෙ කම්මෙ චත්තාරො පකතත්තා අනුක්ඛිත්තා අනිස්සාරිතා පරිසුද්ධසීලා චත්තාරො භික්ඛූ කම්මප්පත්තා කම්මස්ස අරහා අනුච්ඡවිකා සාමිනො. න තෙහි විනා තං කම්මං කයිරති, න තෙසං ඡන්දො වා පාරිසුද්ධි වා එති. අවසෙසා පන සචෙපි සහස්සමත්තා හොන්ති, සචෙ සමානසංවාසකා, සබ්බෙ ඡන්දාරහාව හොන්ති. ඡන්දපාරිසුද්ධිං දත්වා ආගච්ඡන්තු වා මා වා, කම්මං පන තිට්ඨති. යස්ස පන සඞ්ඝො පරිවාසාදිකම්මං කරොති, සො නෙව කම්මප්පත්තො, නාපි ඡන්දාරහො. අපිච යස්මා තං පුග්ගලං වත්ථුං කත්වා සඞ්ඝො කම්මං කරොති, තස්මා ‘‘කම්මාරහො’’ති වුච්චති. සෙසකම්මෙසුපි එසෙව නයො. ४८७-४८८. परिषदेच्या (उपस्थित भिक्खूंच्या) दोषाने संघकर्म विफल होण्याच्या बाबतीत काहीही अस्पष्ट नाही. तिथे 'कम्मपत्त' (कर्मप्राप्त) आणि 'छन्दारह' (संमती देण्यास पात्र) यांचे जे लक्षण सांगावयाचे आहे, ते देखील पुढे 'चार प्रकृतत्व (सामान्य) भिक्खू कर्मप्राप्त आहेत' इत्यादी पद्धतीने सांगितलेच आहे. तिथे 'प्रकृतत्व कर्मप्राप्त' म्हणजे— चार भिक्खूंच्या समूहाने करावयाच्या संघकर्मात, जे उत्क्षिप्त (निलंबित) केलेले नाहीत, संघातून हाकलून दिलेले नाहीत आणि जे परिशुद्ध शील असलेले आहेत, असे चार प्रकृतत्व (सामान्य) भिक्खू कर्मप्राप्त आहेत; ते संघकर्मासाठी पात्र, योग्य आणि त्याचे स्वामी (अधिकारी) आहेत. त्यांच्याशिवाय ते संघकर्म केले जाऊ शकत नाही, आणि त्यांची केवळ संमती (छन्द) किंवा पारिशुद्धी चालत नाही (त्यांची प्रत्यक्ष उपस्थिती आवश्यक असते). पण उर्वरित भिक्खू जरी संख्येने हजारो असले, आणि जर ते समान संवासक (एकाच सीमेतील) असतील, तर ते सर्व संमती देण्यास पात्र (छन्दारह) असतात. ते आपली संमती आणि पारिशुद्धी देऊन येवोत अथवा न येवोत, संघकर्म मात्र सिद्ध होते. पण ज्या व्यक्तीच्या बाबतीत संघ परिवास इत्यादी कर्म करतो, तो कर्मप्राप्तही नसतो आणि संमती देण्यास पात्रही नसतो. परंतु ज्याअर्थी त्या व्यक्तीला विषय (वस्तू) बनवून संघ कर्म करतो, म्हणून त्याला 'कम्मारह' (कर्मविषय) म्हटले जाते. उर्वरित संघकर्मांमध्येही हाच नियम लागू होतो. 489. පුන [Pg.250] චත්තාරි කම්මානීතිආදිකො නයො පණ්ඩකාදීනං අවත්ථුභාවදස්සනත්ථං වුත්තො. සෙසමෙත්ථ උත්තානමෙව. ४८९. पुन्हा, 'चार कर्मे' इत्यादी पद्धत पंडक (नपुंसक) इत्यादी व्यक्ती संघकर्माचे विषय होण्यास अपात्र आहेत हे दर्शवण्यासाठी आयुष्यमान उपाली थेरांनी सांगितली आहे. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. අපලොකනකම්මකථා अपलोकन-कम्म-कथा (अपलोकन कर्माची चर्चा) 495-496. ඉදානි තෙසං කම්මානං පභෙදදස්සනත්ථං ‘‘අපලොකනකම්මං කති ඨානානි ගච්ඡතී’’තිආදිමාහ. තත්ථ ‘‘අපලොකනකම්මං පඤ්ච ඨානානි ගච්ඡති – ඔසාරණං, නිස්සාරණං, භණ්ඩුකම්මං, බ්රහ්මදණ්ඩං, කම්මලක්ඛණඤ්ඤෙව පඤ්චම’’න්ති එත්ථ ‘‘ඔසාරණං නිස්සාරණ’’න්ති පදසිලිට්ඨතායෙතං වුත්තං. පඨමං පන නිස්සාරණා හොති, පච්ඡා ඔසාරණා. තත්ථ යා කණ්ටකසාමණෙරස්ස දණ්ඩකම්මනාසනා, සා ‘‘නිස්සාරණා’’ති වෙදිතබ්බා. තස්මා එතරහි සචෙපි සාමණෙරො බුද්ධස්ස වා ධම්මස්ස වා සඞ්ඝස්ස වා අවණ්ණං භණති, ‘‘අකප්පියං කප්පිය’’න්ති දීපෙති, මිච්ඡාදිට්ඨිකො හොති අන්තග්ගාහිකාය දිට්ඨියා සමන්නාගතො, සො යාවතතියං නිවාරෙත්වා තං ලද්ධිං නිස්සජ්ජාපෙතබ්බො. නො චෙ විස්සජ්ජෙති, සඞ්ඝං සන්නිපාතෙත්වා ‘‘විස්සජ්ජෙහී’’ති වත්තබ්බො. නො චෙ විස්සජ්ජෙති, බ්යත්තෙන භික්ඛුනා අපලොකනකම්මං කත්වා නිස්සාරෙතබ්බො. එවඤ්ච පන කම්මං කාතබ්බං – ४९५-४९६. आता त्या कर्मांचे प्रकार दर्शवण्यासाठी आयुष्यमान उपाली थेरांनी— 'अपलोकन कम्म किती ठिकाणी (प्रसंगी) लागू होते?' इत्यादी म्हटले आहे. तिथे 'अपलोकन कम्म पाच ठिकाणी लागू होते— ओसारण (संघात पुन्हा घेणे), निस्सारण (संघातून बाहेर काढणे), भण्डुकम्म (मुंडण करणे), ब्रह्मदण्ड आणि पाचवे कम्मलक्षण' यामध्ये 'ओसारण आणि निस्सारण' असे जे म्हटले आहे, ते पदांच्या सुलभ प्रवाहासाठी म्हटले आहे. परंतु आधी निस्सारण (संघातून बाहेर काढणे) होते आणि नंतर ओसारण (संघात पुन्हा घेणे) होते. त्यामध्ये कंटक सामणेराची जी दण्डकम्म-नाशना (शिक्षा म्हणून हकालपट्टी) झाली होती, ती 'निस्सारण' म्हणून जाणावी. म्हणून सध्याच्या काळात जर एखादा सामणेर बुद्धांची, धम्माची किंवा संघाची निंदा करत असेल, 'जे अयोग्य आहे ते योग्य आहे' असे प्रतिपादन करत असेल, मिथ्यादृष्टी असेल आणि अंतग्राहिका दृष्टीने (टोकाच्या विचारांनी) युक्त असेल, तर त्याला तीन वेळा समजावून सांगून ती चुकीची धारणा सोडवण्यास सांगावे. जर त्याने ती सोडली नाही, तर संघाला एकत्रित करून 'ती धारणा सोडून दे' असे त्याला सांगावे. तरीही जर त्याने ती सोडली नाही, तर एका चतुर (कुशल) भिक्खूने अपलोकन कम्म करून त्याला संघातून बाहेर काढावे. आणि हे कर्म अशा प्रकारे केले पाहिजे— ‘‘සඞ්ඝං, භන්තෙ, පුච්ඡාමි – ‘අයං ඉත්ථන්නාමො සාමණෙරො බුද්ධස්ස ධම්මස්ස සඞ්ඝස්ස අවණ්ණවාදී මිච්ඡාදිට්ඨිකො, යං අඤ්ඤෙ සාමණෙරා ලභන්ති, දිරත්තතිරත්තං භික්ඛූහි සද්ධිං සහසෙය්යං, තස්ස අලාභාය නිස්සාරණා රුච්චති සඞ්ඝස්සා’ති. දුතියම්පි… තතියම්පි, භන්තෙ, සඞ්ඝං පුච්ඡාමි – ‘අයං ඉත්ථන්නාමො සාමණෙරො බුද්ධස්ස…පෙ… රුච්චති සඞ්ඝස්සා’ති චර පිරෙ විනස්සා’’ති. “भन्ते, मी संघाला विचारतो— 'हा अमुक नावाचा सामणेर बुद्ध, धम्म आणि संघाची निंदा करणारा आणि मिथ्यादृष्टी आहे. इतर सामणेरांना भिक्खूंसोबत दोन किंवा तीन रात्री एकाच छताखाली झोपण्याची जी परवानगी मिळते, ती याला मिळू नये म्हणून याचे निस्सारण (संघातून बाहेर काढणे) संघाला संमत आहे का?' दुसऱ्यांदाही... तिसऱ्यांदाही, भन्ते, मी संघाला विचारतो— 'हा अमुक नावाचा सामणेर बुद्धांची...इत्यादी... संघाला संमत आहे का?' (त्यानंतर त्याला म्हणावे—) 'चालता हो मूर्खा, नष्ट हो!'” සො අපරෙන සමයෙන ‘‘අහං, භන්තෙ, බාලතාය අඤ්ඤාණතාය අලක්ඛිකතාය එවං අකාසිං, ස්වාහං සඞ්ඝං ඛමාපෙමී’’ති ඛමාපෙන්තො යාවතතියං යාචාපෙත්වා අපලොකනකම්මෙනෙව ඔසාරෙතබ්බො. එවං පන ඔසාරෙතබ්බො, සඞ්ඝමජ්ඣෙ බ්යත්තෙන භික්ඛුනා සඞ්ඝස්ස අනුමතියා සාවෙතබ්බං – त्यानंतरच्या काळात, त्या सामणेराने 'भन्ते, मी अज्ञानामुळे, मूर्खपणामुळे आणि दुर्दैवामुळे असे केले; मी संघाची क्षमा मागतो' असे म्हणत क्षमा याचना केली असता, तीन वेळा क्षमा मागवून घेऊन अपलोकन कर्मानेच त्याला पुन्हा संघात समाविष्ट करावे. आणि त्याला अशा प्रकारे समाविष्ट करावे - संघाच्या मध्यभागी एका कुशल भिक्खूने संघाच्या संमतीने अशी घोषणा करावी - ‘‘සඞ්ඝං, භන්තෙ, පුච්ඡාමි – අයං ඉත්ථන්නාමො සාමණෙරො බුද්ධස්ස ධම්මස්ස සඞ්ඝස්ස අවණ්ණවාදී මිච්ඡාදිට්ඨිකො, යං අඤ්ඤෙ සාමණෙරා ලභන්ති, භික්ඛූහි සද්ධිං දිරත්තතිරත්තං සහසෙය්යං, තස්ස [Pg.251] අලාභාය නිස්සාරිතො, ස්වායං ඉදානි සොරතො නිවාතවුත්ති ලජ්ජිධම්මං ඔක්කන්තො හිරොත්තප්පෙ පතිට්ඨිතො කතදණ්ඩකම්මො අච්චයං දෙසෙති, ඉමස්ස සාමණෙරස්ස යථා පුරෙ කායසම්භොගසාමග්ගිදානං රුච්චති සඞ්ඝස්සා’’ති. भन्ते, मी संघाला विचारतो - हा अमुक नावाचा सामणेर बुद्ध, धम्म आणि संघाची निंदा करणारा (अवर्णवादी) आणि मिथ्यादृष्टी होता. इतर सामणेरांना भिक्खूंसोबत दोन किंवा तीन रात्री एकत्र राहण्याचा (सहशय्या) जो अधिकार मिळतो, तो याला मिळू नये म्हणून याला निष्कासित करण्यात आले होते. तो आता विनयशील, नम्र वृत्तीचा, लज्जाधर्माचे पालन करणारा, ह्री आणि ओत्तप्प (लज्जा आणि पापभिरुता) मध्ये प्रतिष्ठित झालेला असून, दंडकर्म पूर्ण करून आपल्या अपराधाची कबुली देत आहे. या सामणेराला पूर्वीप्रमाणेच शारीरिक सहभोगाची संमती देणे संघाला संमत आहे का? එවං තික්ඛත්තුං වත්තබ්බං. එවං අපලොකනකම්මං ඔසාරණඤ්ච නිස්සාරණඤ්ච ගච්ඡති. භණ්ඩුකම්මං මහාඛන්ධකවණ්ණනායං වුත්තමෙව. බ්රහ්මදණ්ඩො පඤ්චසතිකක්ඛන්ධකෙ වුත්තොයෙව. න කෙවලං පනෙස ඡන්නස්සෙව පඤ්ඤත්තො, යො අඤ්ඤොපි භික්ඛු මුඛරො හොති, භික්ඛූ දුරුත්තවචනෙහි ඝට්ටෙන්තො ඛුංසෙන්තො වම්භෙන්තො විහරති, තස්සපි දාතබ්බො. එවඤ්ච පන දාතබ්බො, සඞ්ඝමජ්ඣෙ බ්යත්තෙන භික්ඛුනා සඞ්ඝස්ස අනුමතියා සාවෙතබ්බං – असे तीन वेळा म्हणावे. अशा प्रकारे अपलोकन कर्माने पुनर्समावेश (ओसारण) आणि निष्कासन (निस्सारण) होते. भंडुकर्म (मुंडण कर्म) महाखंधक वर्णनेत सांगितलेच आहे. ब्रह्मदंड पंचसतिक खंधकात सांगितलाच आहे. परंतु हा केवळ छन्न भिक्खूसाठीच प्रस्थापित केला नव्हता, तर इतर जो कोणी भिक्खू वाचाळ असेल, जो भिक्खूंना अपशब्दांनी दुखावत, शिवीगाळ करत आणि त्यांचा अपमान करत राहतो, त्यालाही हा दिला पाहिजे. आणि तो अशा प्रकारे दिला पाहिजे - संघाच्या मध्यभागी एका कुशल भिक्खूने संघाच्या संमतीने अशी घोषणा करावी - ‘‘භන්තෙ, ඉත්ථන්නාමො භික්ඛු මුඛරො, භික්ඛූ දුරුත්තවචනෙහි ඝට්ටෙන්තො විහරති. සො භික්ඛු යං ඉච්ඡෙය්ය, තං වදෙය්ය. භික්ඛූහි ඉත්ථන්නාමො භික්ඛු නෙව වත්තබ්බො, න ඔවදිතබ්බො, න අනුසාසිතබ්බො. සඞ්ඝං, භන්තෙ, පුච්ඡාමි – ‘ඉත්ථන්නාමස්ස භික්ඛුනො බ්රහ්මදණ්ඩස්ස දානං, රුච්චති සඞ්ඝස්සා’ති. දුතියම්පි පුච්ඡාමි, තතියම්පි පුච්ඡාමි – ‘ඉත්ථන්නාමස්ස, භන්තෙ, භික්ඛුනො බ්රහ්මදණ්ඩස්ස දානං, රුච්චති සඞ්ඝස්සා’’’ති. भन्ते, अमुक नावाचा भिक्खू वाचाळ आहे, तो भिक्खूंना अपशब्दांनी दुखावत राहतो. त्या भिक्खूला जे बोलायचे असेल ते तो बोलो. भिक्खूंनी त्या अमुक नावाच्या भिक्खूशी बोलू नये, त्याला उपदेश करू नये आणि त्याला शिकवण देऊ नये. भन्ते, मी संघाला विचारतो - 'अमुक नावाच्या भिक्खूला ब्रह्मदंड देणे संघाला संमत आहे का?' दुसऱ्यांदाही विचारतो, तिसऱ्यांदाही विचारतो - 'भन्ते, अमुक नावाच्या भिक्खूला ब्रह्मदंड देणे संघाला संमत आहे का?' තස්ස අපරෙන සමයෙන සම්මා වත්තිත්වා ඛමාපෙන්තස්ස බ්රහ්මදණ්ඩො පටිප්පස්සම්භෙතබ්බො. එවඤ්ච පන පටිප්පස්සම්භෙතබ්බො, බ්යත්තෙන භික්ඛුනා සඞ්ඝමජ්ඣෙ සාවෙතබ්බං – त्यानंतरच्या काळात, त्याने योग्य प्रकारे वर्तन करून क्षमा याचना केली असता, त्याचा ब्रह्मदंड मागे घ्यावा. आणि तो अशा प्रकारे मागे घ्यावा - एका कुशल भिक्खूने संघाच्या मध्यभागी अशी घोषणा करावी - ‘‘භන්තෙ, භික්ඛුසඞ්ඝො අසුකස්ස භික්ඛුනො බ්රහ්මදණ්ඩං අදාසි, සො භික්ඛු සොරතො නිවාතවුත්ති ලජ්ජිධම්මං ඔක්කන්තො හිරොත්තප්පෙ පතිට්ඨිතො, පටිසඞ්ඛා ආයතිං සංවරෙ තිට්ඨති, සඞ්ඝං, භන්තෙ, පුච්ඡාමි, තස්ස භික්ඛුනො බ්රහ්මදණ්ඩස්ස පටිප්පස්සද්ධි, රුච්චති සඞ්ඝස්සා’’ති. भन्ते, भिक्खू संघाने अमुक भिक्खूला ब्रह्मदंड दिला होता. तो भिक्खू आता विनयशील, नम्र वृत्तीचा, लज्जाधर्माचे पालन करणारा, ह्री आणि ओत्तप्प मध्ये प्रतिष्ठित झालेला असून, विचारपूर्वक भविष्यात संयम राखण्यास कटिबद्ध आहे. भन्ते, मी संघाला विचारतो - त्या भिक्खूचा ब्रह्मदंड मागे घेणे संघाला संमत आहे का? එවං යාවතතියං වත්වා අපලොකනකම්මෙනෙව බ්රහ්මදණ්ඩො පටිප්පස්සම්භෙතබ්බොති. असे तीन वेळा म्हणून अपलोकन कर्मानेच ब्रह्मदंड मागे घ्यावा. කම්මලක්ඛණඤ්ඤෙව පඤ්චමන්ති යං තං භගවතා භික්ඛුනික්ඛන්ධකෙ ‘‘තෙන ඛො පන සමයෙන ඡබ්බග්ගියා භික්ඛූ භික්ඛුනියො කද්දමොදකෙන ඔසිඤ්චන්ති, ‘අප්පෙව නාම අම්හෙසු සාරජ්ජෙය්යු’න්ති, කායං විවරිත්වා භික්ඛුනීනං දස්සෙන්ති[Pg.252], ඌරුං විවරිත්වා භික්ඛුනීනං දස්සෙන්ති, අඞ්ගජාතං විවරිත්වා භික්ඛුනීනං දස්සෙන්ති, භික්ඛුනියො ඔභාසෙන්ති, භික්ඛුනීහි සද්ධිං සම්පයොජෙන්ති, ‘අප්පෙව නාම අම්හෙසු සාරජ්ජෙය්යු’න්ති. ඉමෙසු වත්ථූසු තෙසං භික්ඛූනං දුක්කටං පඤ්ඤපෙත්වා ‘අනුජානාමි භික්ඛවෙ තස්ස භික්ඛුනො දණ්ඩකම්මං කාතු’න්ති. අථ ඛො භික්ඛුනීනං එතදහොසි – ‘කිං නු ඛො දණ්ඩකම්මං කාතබ්බ’න්ති. භගවතො එතමත්ථං ආරොචෙසුං – ‘අවන්දියො සො භික්ඛවෙ භික්ඛු භික්ඛුනිසඞ්ඝෙන කාතබ්බො’’’ති එවං අවන්දියකම්මං අනුඤ්ඤාතං, තං කම්මලක්ඛණඤ්ඤෙව පඤ්චමං ඉමස්ස අපලොකනකම්මස්ස ඨානං හොති. තස්ස හි කම්මඤ්ඤෙව ලක්ඛණං, න ඔසාරණාදීනි; තස්මා ‘‘කම්මලක්ඛණ’’න්ති වුච්චති. තස්ස කරණං තත්ථෙව වුත්තං. අපිච නං පටිප්පස්සද්ධියා සද්ධිං විත්ථාරතො දස්සෙතුං ඉධාපි වදාම, භික්ඛුනුපස්සයෙ සන්නිපතිතස්ස භික්ඛුනිසඞ්ඝස්ස අනුමතියා බ්යත්තාය භික්ඛුනියා සාවෙතබ්බං – 'कर्मलक्षण हेच पाचवे' म्हणजे जे भगवंतांनी भिक्खुनी खंधकात सांगितले आहे - 'त्या वेळी सहा वर्गीय (छब्बग्गिय) भिक्खू भिक्खुनींवर चिखलाचे पाणी शिंपडत असत, या आशेने की कदाचित त्या आमच्यावर अनुरक्त होतील; ते आपले शरीर उघडे करून भिक्खुनींना दाखवत असत, आपल्या मांड्या उघड्या करून भिक्खुनींना दाखवत असत, आपले जननेंद्रिय उघडे करून भिक्खुनींना दाखवत असत, भिक्खुनींना टोमणे मारत असत, भिक्खुनींशी जवळीक साधत असत, या आशेने की कदाचित त्या आमच्यावर अनुरक्त होतील.' या प्रकरणांमध्ये त्या भिक्खूंसाठी दुक्कट (दुष्कृत) आपत्ती प्रस्थापित करून भगवंतांनी म्हटले - 'भिक्खूंनो, मी त्या भिक्खूवर दंडकर्म करण्याची अनुमती देतो.' त्यानंतर भिक्खुनींच्या मनात विचार आला - 'कोणते दंडकर्म करावे बरे?' त्यांनी भगवंतांना ही गोष्ट सांगितली. भगवंतांनी म्हटले - 'भिक्खूंनो, भिक्खुनी संघाने त्या भिक्खूला अवंदनीय (वंदन न करण्याजोगा) करावे.' अशा प्रकारे जे अवंदनीय कर्म अनुमत केले गेले, ते या अपलोकन कर्माचे 'कर्मलक्षण' नावाचे पाचवे स्थान आहे. कारण त्याचे लक्षण केवळ ते कर्मच आहे, पुनर्समावेश इत्यादी नाही; म्हणून त्याला 'कर्मलक्षण' म्हटले जाते. त्याचे विधी तेथेच सांगितले आहेत. तरीही, ते शांत करण्याच्या विधीसह सविस्तर दाखवण्यासाठी आम्ही येथेही सांगत आहोत. भिक्खुनींच्या निवासस्थानी जमलेल्या भिक्खुनी संघाच्या संमतीने एका कुशल भिक्खुनीने अशी घोषणा करावी - ‘‘අය්යෙ අසුකො නාම අය්යො භික්ඛුනීනං අපාසාදිකං දස්සෙති, එතස්ස අය්යස්ස අවන්දියකරණං රුච්චතීති භික්ඛුනිසඞ්ඝං පුච්ඡාමි, දුතියම්පි… තතියම්පි භික්ඛුනිසඞ්ඝං පුච්ඡාමී’’ති. आर्ये, अमुक नावाचे आर्य भिक्खुनींना अप्रसादकारक वर्तन दाखवत आहेत. या आर्यांना अवंदनीय करणे भिक्खुनी संघाला संमत आहे का? मी भिक्खुनी संघाला विचारते. दुसऱ्यांदाही... तिसऱ्यांदाही मी भिक्खुनी संघाला विचारते. එවං තික්ඛත්තුං සාවෙත්වා අපලොකනකම්මෙන අවන්දියකම්මං කාතබ්බං. असे तीन वेळा घोषित करून अपलोकन कर्माने अवंदनीय कर्म करावे. තතො පට්ඨාය සො භික්ඛු භික්ඛුනීහි න වන්දිතබ්බො. සචෙ අවන්දියමානො හිරොත්තප්පං පච්චුපට්ඨපෙත්වා සම්මා වත්තති, තෙන භික්ඛුනියො ඛමාපෙතබ්බා. ඛමාපෙන්තෙන භික්ඛුනුපස්සයං අගන්ත්වා විහාරෙයෙව සඞ්ඝං වා ගණං වා එකං භික්ඛුං වා උපසඞ්කමිත්වා උක්කුටිකං නිසීදිත්වා අඤ්ජලිං පග්ගහෙත්වා ‘‘අහං භන්තෙ පටිසඞ්ඛා ආයතිං සංවරෙ තිට්ඨාමි, න පුන අපාසාදිකං දස්සෙස්සාමි, භික්ඛුනිසඞ්ඝො මය්හං ඛමතූ’’ති ඛමාපෙතබ්බං. තෙන සඞ්ඝෙන වා ගණෙන වා එකං භික්ඛුං පෙසෙත්වා එකභික්ඛුනා වා සයමෙව ගන්ත්වා භික්ඛුනියො වත්තබ්බා – ‘‘අයං භික්ඛු පටිසඞ්ඛා ආයතිං සංවරෙ ඨිතො, ඉමිනා අච්චයං දෙසෙත්වා භික්ඛුනිසඞ්ඝො ඛමාපිතො, භික්ඛුනිසඞ්ඝො ඉමං වන්දියං කරොතූ’’ති. සො වන්දියො කාතබ්බො. එවඤ්ච පන කාතබ්බො, භික්ඛුනුපස්සයෙ සන්නිපතිතස්ස භික්ඛුනිසඞ්ඝස්ස අනුමතියා බ්යත්තාය භික්ඛුනියා සාවෙතබ්බං – त्या वेळेपासून त्या भिक्खूला भिक्खुनींनी वंदन करू नये. जर वंदन न केले जात असताना, त्याने ह्री आणि ओत्तप्प जागृत करून योग्य प्रकारे वर्तन केले, तर त्याने भिक्खुनींची क्षमा मागावी. क्षमा मागताना त्याने भिक्खुनींच्या निवासस्थानी न जाता, विहारामध्येच संघ, गण किंवा एका भिक्खूजवळ जाऊन, उकिडवे बसून, हात जोडून म्हणावे - 'भन्ते, मी विचारपूर्वक भविष्यात संयम राखण्यास कटिबद्ध आहे, पुन्हा कधीही अप्रसादकारक वर्तन दाखवणार नाही, भिक्खुनी संघाने मला क्षमा करावी.' त्यानंतर त्या संघाने किंवा गणाने एका भिक्खूला पाठवून, किंवा त्या एका भिक्खूने स्वतः जाऊन भिक्खुनींना सांगावे - 'हा भिक्खू विचारपूर्वक भविष्यात संयम राखण्यास कटिबद्ध झाला आहे. याने आपल्या अपराधाची कबुली देऊन भिक्खुनी संघाची क्षमा मागितली आहे. भिक्खुनी संघाने याला वंदनीय करावे.' त्याला वंदनीय करावे. आणि ते अशा प्रकारे करावे - भिक्खुनींच्या निवासस्थानी जमलेल्या भिक्खुनी संघाच्या संमतीने एका कुशल भिक्खुनीने अशी घोषणा करावी - ‘‘අයං අය්යෙ අසුකො නාම අය්යො භික්ඛුනීනං අපාසාදිකං දස්සෙතීති භික්ඛුනිසඞ්ඝෙන අවන්දියො කතො, සො ලජ්ජිධම්මං ඔක්කමිත්වා පටිසඞ්ඛා ආයතිං සංවරෙ ඨිතො අච්චයං දෙසෙත්වා භික්ඛුනිසඞ්ඝං [Pg.253] ඛමාපෙසි, තස්ස අය්යස්ස වන්දියකරණං රුච්චතීති භික්ඛුනිසඞ්ඝං පුච්ඡාමී’’ති – आर्ये, हे अमुक नावाचे आर्य भिक्खुनींना अप्रसादकारक वर्तन दाखवत होते म्हणून भिक्खुनी संघाने त्यांना अवंदनीय केले होते. ते आता लज्जाधर्माचे पालन करत, विचारपूर्वक भविष्यात संयम राखण्यास कटिबद्ध झाले आहेत आणि आपल्या अपराधाची कबुली देऊन त्यांनी भिक्खुनी संघाची क्षमा मागितली आहे. या आर्यांना वंदनीय करणे भिक्खुनी संघाला संमत आहे का? मी भिक्खुनी संघाला विचारते. තික්ඛත්තුං වත්තබ්බං එවං අපලොකනකම්මෙනෙව වන්දියො කාතබ්බො. असे तीन वेळा म्हणावे. अशा प्रकारे अपलोकन कर्मानेच त्यांना वंदनीय करावे. අයං පනෙත්ථ පාළිමුත්තකොපි කම්මලක්ඛණවිනිච්ඡයො. ඉදඤ්හි කම්මලක්ඛණං නාම භික්ඛුනිසඞ්ඝමූලකං පඤ්ඤත්තං, භික්ඛුසඞ්ඝස්සාපි පනෙතං ලබ්භතියෙව. යඤ්හි භික්ඛුසඞ්ඝො සලාකග්ගයාගග්ගභත්තග්ගඋපොසථග්ගෙසු අපලොකනකම්මං කරොති, එතම්පි කම්මලක්ඛණමෙව. අච්ඡින්නචීවරජිණ්ණචීවරනට්ඨචීවරානඤ්හි සඞ්ඝං සන්නිපාතෙත්වා බ්යත්තෙන භික්ඛුනා යාවතතියං සාවෙත්වා අපලොකනකම්මං කත්වා චීවරං දාතුං වට්ටති. අප්පමත්තකවිස්සජ්ජකෙන පන චීවරං කරොන්තස්ස සෙනාසනක්ඛන්ධකවණ්ණනායං වුත්තප්පභෙදානි සූචිආදීනි අනපලොකෙත්වාපි දාතබ්බානි. තෙසං දානෙ සොයෙව ඉස්සරො, තතො අතිරෙකං දෙන්තෙන අපලොකෙත්වා දාතබ්බං. තතො හි අතිරෙකදානෙ සඞ්ඝො සාමී. ගිලානභෙසජ්ජම්පි තත්ථ වුත්තප්පකාරං සයමෙව දාතබ්බං. අතිරෙකං ඉච්ඡන්තස්ස අපලොකෙත්වා දාතබ්බං. යොපි ච දුබ්බලො වා ඡින්නිරියාපථො වා පච්ඡින්නභික්ඛාචාරපථො වා මහාගිලානො, තස්ස මහාවාසෙසු තත්රුප්පාදතො දෙවසිකං නාළි වා උපඩ්ඪනාළි වා එකදිවසංයෙව වා පඤ්ච වා දස වා තණ්ඩුලනාළියො දෙන්තෙන අපලොකනකම්මං කත්වාව දාතබ්බා. පෙසලස්ස භික්ඛුනො තත්රුප්පාදතො ඉණපලිබොධම්පි බහුස්සුතස්ස සඞ්ඝභාරනිත්ථාරකස්ස භික්ඛුනො අනුට්ඨාපනීයසෙනාසනම්පි සඞ්ඝකිච්චං කරොන්තානං කප්පියකාරකාදීනං භත්තවෙතනම්පි අපලොකනකම්මෙන දාතුං වට්ටති. आणि येथे हा पाळि-मुक्त (पाळिमध्ये थेट नसलेला) देखील कर्मलक्षण-विनिश्चय (कर्माच्या लक्षणाचा निर्णय) आहे. कारण हे कर्मलक्षण भिक्षुणीसंघाला मूळ कारण मानून प्रज्ञप्त केले गेले आहे. परंतु, भिक्षुसंघासाठी देखील हे प्राप्त होतेच. कारण भिक्षुसंघ शलाकागृह, यागूगृह, भक्तगृह आणि उपोसथगृहामध्ये जे अपलोकनकर्म करतो, ते देखील कर्मलक्षणच आहे. कारण ज्यांचे चीवर लुटले गेले आहे, ज्यांचे चीवर जीर्ण झाले आहे किंवा ज्यांचे चीवर हरवले आहे, अशा भिक्षूंसाठी संघाला एकत्रित करून, चतुर (कुशल) भिक्षूने तीन वेळा घोषणा करून (श्रावण करून) आणि अपलोकनकर्म करून चीवर देणे योग्य आहे. परंतु, अल्पमात्र वस्तूंचे विसर्जन करणाऱ्या (अप्पमत्तकविस्सज्जक) भिक्षूने, चीवर बनवणाऱ्या भिक्षूला सेनासनखन्धक-वर्णनेमध्ये सांगितलेल्या प्रकारच्या सुया इत्यादी वस्तू अपलोकन न करताही (संघाला न विचारताही) दिल्या पाहिजेत. त्या वस्तूंच्या दानामध्ये तो स्वतःच स्वामी (अधिकारी) आहे. त्यापेक्षा अधिक (जास्त) देत असल्यास, अपलोकन करून (विचारून) दिले पाहिजे. कारण त्यापेक्षा अधिक दानामध्ये संघ हा स्वामी आहे. तेथे सांगितलेल्या प्रकारची ग्लान-भेषज (आजारी भिक्षूची औषधे) देखील स्वतःच दिली पाहिजेत. अधिक इच्छिणाऱ्याला अपलोकन करून दिले पाहिजे. आणि जो भिक्षू दुर्बळ असेल, किंवा ज्याची इरियापथ (हालचाल) खंडित झाली असेल, या कारणाने ज्याचा भिक्षाचर्या मार्ग खंडित झाला असेल, किंवा जो महाग्लाने (अतिशय आजारी) असेल, त्याला महाविहारांमध्ये तेथे उत्पन्न होणाऱ्या साहित्यातून दररोज एक नाळी (माप) किंवा अर्धी नाळी तांदूळ, किंवा एकाच दिवशी पाच किंवा दहा नाळी तांदूळ देताना अपलोकनकर्म करूनच दिले पाहिजेत. शीलवान (पेसल) भिक्षूच्या कर्जाचा भार (ऋणपलिबोध) फेडण्यासाठी तेथील उत्पन्नातून देणे, बहुश्रुत आणि संघाचा भार वाहणाऱ्या भिक्षूला न हलवता येणारे सेनासन (अणुट्ठापनीय सेनासन) देणे, आणि संघाचे कार्य करणाऱ्या कप्पियकारक (सेवक) इत्यादींना भोजनाचा भत्ता (भक्तवेतन) देणे, हे सर्व अपलोकनकर्माने देणे योग्य आहे. චතුපච්චයවසෙන දින්නතත්රුප්පාදතො සඞ්ඝිකං ආවාසං ජග්ගාපෙතුං වට්ටති. ‘‘අයං භික්ඛු ඉස්සරවතාය විචාරෙතී’’ති කථාපච්ඡින්දනත්ථං පන සලාකග්ගාදීසු වා අන්තරසන්නිපාතෙ වා සඞ්ඝං පුච්ඡිත්වාව ජග්ගාපෙතබ්බො. චීවරපිණ්ඩපාතත්ථාය ඔදිස්සදින්නතත්රුප්පාදතොපි අපලොකෙත්වා ආවාසො ජග්ගාපෙතබ්බො. අනපලොකෙත්වාපි වට්ටති. ‘‘සූරො වතායං භික්ඛු චීවරපිණ්ඩපාතත්ථාය දින්නතො ආවාසං ජග්ගාපෙතී’’ති එවං උප්පන්නකථාපච්ඡෙදනත්ථං පන අපලොකනකම්මමෙව කත්වා ජග්ගාපෙතබ්බො. चार प्रत्ययांच्या (चतुपच्चय) स्वरूपात दान केलेल्या आणि तेथे उत्पन्न झालेल्या साहित्यातून सांघिक विहाराची देखभाल (दुरुस्ती) करणे योग्य आहे. परंतु, "हा भिक्षू स्वतःच्या अधिकाराने व्यवस्था पाहत आहे" अशा प्रकारचा वाद किंवा निंदा टाळण्यासाठी, शलाकागृहामध्ये किंवा मध्यवर्ती सभेत संघाला विचारूनच देखभाल केली पाहिजे. चीवर आणि पिंडपातासाठी उद्देशून दान केलेल्या साहित्यातून देखील अपलोकन करूनच विहाराची देखभाल केली पाहिजे. अपलोकन न करताही करणे योग्य आहे; परंतु, "हा भिक्षू खरोखरच धाडसी आहे, जो चीवर आणि पिंडपातासाठी दिलेल्या साहित्यातून विहाराची देखभाल करत आहे" अशा प्रकारची उद्भवलेली निंदा टाळण्यासाठी अपलोकनकर्म करूनच देखभाल केली पाहिजे. චෙතියෙ [Pg.254] ඡත්තං වා වෙදිකං වා බොධිඝරං වා ආසනඝරං වා අකතං වා කරොන්තෙන ජිණ්ණං වා පටිසඞ්ඛරොන්තෙන සුධාකම්මං වා කරොන්තෙන මනුස්සෙ සමාදපෙත්වා කාතුං වට්ටති. සචෙ කාරකො නත්ථි, චෙතියස්ස උපනික්ඛෙපතො කාරෙතබ්බං. උපනික්ඛෙපෙපි අසති අපලොකනකම්මං කත්වා තත්රුප්පාදතො කාරෙතබ්බං, සඞ්ඝිකෙනපි. සඞ්ඝිකෙන හි අපලොකෙත්වා චෙතියකිච්චං කාතුං වට්ටති. චෙතියස්ස සන්තකෙන අපලොකෙත්වාපි සඞ්ඝිකකිච්චං කාතුං න වට්ටති. තාවකාලිකං පන ගහෙත්වා පාකතිකං කාතුං වට්ටති. चैत्यावर छत्र, वेदिका, बोधिगृह किंवा आसनगृह जे अद्याप बनवले गेले नाही ते नवीन बनवताना, किंवा जीर्ण झालेल्याची दुरुस्ती करताना, किंवा चुना लावण्याचे काम (सुधाकर्म) करताना, लोकांना प्रेरित करून (समादापित करून) ते काम करणे योग्य आहे. जर काम करणारा (दाता) नसेल, तर चैत्यासाठी ठेवलेल्या निधीतून (उपनिक्खेप) ते करून घ्यावे. जर निधी देखील नसेल, तर अपलोकनकर्म करून तेथील उत्पन्नातून किंवा सांघिक साहित्यातून ते करून घ्यावे. कारण सांघिक साहित्यातून अपलोकन करून चैत्याचे काम करणे योग्य आहे. परंतु, चैत्याच्या मालकीच्या साहित्यातून अपलोकन करूनही संघाचे काम करणे योग्य नाही. तात्पुरते (तावकलिक) घेऊन नंतर मूळ स्वरूपात परत करणे मात्र योग्य आहे. චෙතියෙ සුධාකම්මාදීනි කරොන්තෙහි පන භික්ඛාචාරතො වා සඞ්ඝතො වා යාපනමත්තං අලභන්තෙහි චෙතියසන්තකතො යාපනමත්තං ගහෙත්වා පරිභුඤ්ජන්තෙහි වත්තං කාතුං වට්ටති, ‘‘වත්තං කරොමා’’ති මච්ඡමංසාදීහි සඞ්ඝභත්තං කාතුං න වට්ටති. යෙ විහාරෙ රොපිතා ඵලරුක්ඛා සඞ්ඝෙන පරිග්ගහිතා හොන්ති, ජග්ගනකම්මං ලභන්ති, යෙසං ඵලානි ඝණ්ටිං පහරිත්වා භාජෙත්වා පරිභුඤ්ජන්ති, තෙසු අපලොකනකම්මං න කාතබ්බං. යෙ පන අපරිග්ගහිතා, තෙසු අපලොකනකම්මං කාතබ්බං. තං පන සලාකග්ගයාගග්ගභත්තග්ගඅන්තරසන්නිපාතෙසුපි කාතුං වට්ටති, උපොසථග්ගෙ පන වට්ටතියෙව. තත්ථ හි අනාගතානම්පි ඡන්දපාරිසුද්ධි ආහරියති, තස්මා තං සුවිසොධිතං හොති. चैत्यावर चुना लावणे इत्यादी कामे करणाऱ्या भिक्षूंना जर भिक्षाचर्येतून किंवा संघाकडून उपजीविकेपुरते (यापनमात्र) अन्न मिळत नसेल, तर त्यांनी चैत्याच्या साहित्यातून उपजीविकेपुरते अन्न घेऊन उपभोग घेत आपले कर्तव्य (वत्त) करणे योग्य आहे. परंतु, "आम्ही काम करत आहोत" असे निमित्त करून मासे, मांस इत्यादींनी युक्त सांघिक भोजन तयार करणे योग्य नाही. विहारामध्ये लावलेली जी फळझाडे संघाने स्वीकारली आहेत, ज्यांची देखभाल केली जाते आणि ज्यांची फळे घंटा वाजवून, वाटून उपभोगली जातात, त्या झाडांच्या बाबतीत अपलोकनकर्म करण्याची आवश्यकता नाही. परंतु, जी झाडे संघाने स्वीकारलेली नाहीत, त्यांच्या बाबतीत अपलोकनकर्म केले पाहिजे. ते अपलोकनकर्म शलाकागृह, यागूगृह, भक्तगृह आणि मध्यवर्ती सभेत देखील करणे योग्य आहे, परंतु उपोसथगृहात करणे अधिक योग्य आहे. कारण तेथे न आलेल्या भिक्षूंची देखील संमती (छंदपारिसुद्धि) आणली जाते, म्हणून ते उत्तम प्रकारे शुद्ध (सुविशोधित) मानले जाते. එවඤ්ච පන කාතබ්බං, බ්යත්තෙන භික්ඛුනා භික්ඛුසඞ්ඝස්ස අනුමතියා සාවෙතබ්බං – आणि हे अशा प्रकारे केले पाहिजे; चतुर (कुशल) भिक्षूने भिक्षुसंघाच्या अनुमतीने पुढीलप्रमाणे घोषणा करावी (श्रावण करावे) – ‘‘භන්තෙ, යං ඉමස්මිං විහාරෙ අන්තොසීමාය සඞ්ඝසන්තකං මූලතචපත්තඅඞ්කුරපුප්ඵඵලඛාදනීයාදි අත්ථි, තං සබ්බං ආගතාගතානං භික්ඛූනං යථාසුඛං පරිභුඤ්ජිතුං රුච්චතීති සඞ්ඝං පුච්ඡාමී’’ති තික්ඛත්තුං පුච්ඡිතබ්බං. "भन्ते, या विहाराच्या अंतःसीमेमध्ये संघाच्या मालकीचे जे काही मूळ, साल, पाने, अंकुर, फुले, फळे आणि खाण्यायोग्य पदार्थ इत्यादी आहेत, ते सर्व येथे येणाऱ्या सर्व भिक्षूंनी आपापल्या इच्छेनुसार उपभोगणे संघाला संमत आहे का? असे मी संघाला विचारतो." - असे तीन वेळा विचारले पाहिजे. චතූහි පඤ්චහි භික්ඛූහි කතං සුකතමෙව. යස්මිං විහාරෙ ද්වෙ තයො ජනා වසන්ති, තෙහි නිසීදිත්වා කතම්පි සඞ්ඝෙන කතසදිසමෙව. යස්මිං පන විහාරෙ එකො භික්ඛු හොති, තෙන භික්ඛුනා උපොසථදිවසෙ පුබ්බකරණපුබ්බකිච්චං කත්වා නිසින්නෙන කතම්පි කතිකවත්තං සඞ්ඝෙන කතසදිසමෙව හොති. चार किंवा पाच भिक्षूंनी केलेले अपलोकनकर्म सुकृत (योग्य प्रकारे केलेले) आहे. ज्या विहारामध्ये दोन किंवा तीन भिक्षू राहतात, त्यांनी एकत्र बसून केलेले अपलोकनकर्म देखील संघाने केल्यासारखेच आहे. परंतु, ज्या विहारामध्ये केवळ एकच भिक्षू असतो, त्या भिक्षूने उपोसथाच्या दिवशी पूर्वकरण आणि पूर्वकृत्य करून, बसून केलेले कतिकवत्त (नियम/करावयाचे कार्य) देखील संघाने केल्यासारखेच असते. කරොන්තෙන [Pg.255] පන ඵලවාරෙන කාතුම්පි චත්තාරො මාසෙ ඡ මාසෙ එකසංවච්ඡරන්ති එවං පරිච්ඡින්දිත්වාපි අපරිච්ඡින්දිත්වාපි කාතුං වට්ටති. පරිච්ඡින්නෙ යථාපරිච්ඡෙදං පරිභුඤ්ජිත්වා පුන කාතබ්බං. අපරිච්ඡින්නෙ යාව රුක්ඛා ධරන්ති තාව වට්ටතියෙව. යෙපි තෙසං රුක්ඛානං බීජෙහි අඤ්ඤෙ රුක්ඛා රොපිතා හොන්ති, තෙසම්පි සා එව කතිකා. परंतु, हे कतिकवत्त करताना फळांच्या हंगामाच्या (फलवार) दृष्टीने करणे, किंवा चार महिने, सहा महिने, एक वर्ष अशा प्रकारे मर्यादा निश्चित करून किंवा मर्यादा निश्चित न करताही करणे योग्य आहे. मर्यादा निश्चित केली असल्यास, त्या मर्यादेनुसार उपभोग घेऊन पुन्हा अपलोकनकर्म केले पाहिजे. मर्यादा निश्चित केली नसल्यास, जोपर्यंत ती झाडे जिवंत आहेत, तोपर्यंत उपभोग घेणे योग्यच आहे. त्या झाडांच्या बियांपासून जी इतर झाडे लावली जातील, त्यांच्यासाठी देखील तोच नियम (कतिकवत्त) लागू होईल. සචෙ පන අඤ්ඤස්මිං විහාරෙ රොපිතා හොන්ති, තෙසං යත්ථ රොපිතා, තස්මිංයෙව විහාරෙ සඞ්ඝො සාමී. යෙපි අඤ්ඤතො බීජානි ආහරිත්වා පුරිමවිහාරෙ පච්ඡා රොපිතා, තෙසු අඤ්ඤා කතිකා කාතබ්බා. කතිකාය කතාය පුග්ගලිකට්ඨානෙ තිට්ඨන්ති, යථාසුඛං ඵලාදීනි පරිභුඤ්ජිතුං වට්ටති. සචෙ පනෙත්ථ තං තං ඔකාසං පරික්ඛිපිත්වා පරිවෙණානි කත්වා ජග්ගන්ති, තෙසං භික්ඛූනං පුග්ගලිකට්ඨානෙ තිට්ඨන්ති. අඤ්ඤෙ පරිභුඤ්ජිතුං න ලභන්ති, තෙහි පන සඞ්ඝස්ස දසභාගං දත්වා පරිභුඤ්ජිතබ්බානි. යොපි මජ්ඣෙවිහාරෙ රුක්ඛං සාඛාහි පරිවාරෙත්වා රක්ඛති, තස්සාපි එසෙව නයො. परंतु, जर ती झाडे दुसऱ्या विहारामध्ये लावली असतील, तर ती जेथे लावली आहेत, त्याच विहारातील संघ त्यांचा स्वामी असेल. जर इतर ठिकाणाहून बिया आणून पूर्वीच्या विहारामध्ये नंतर झाडे लावली असतील, तर त्यांच्यासाठी नवीन नियम (कतिकवत्त) केला पाहिजे. नियम केल्यावर ती झाडे वैयक्तिक मालकीच्या (पुग्गलिक) स्थानावर राहतात आणि त्यांच्या फळांचा इच्छेनुसार उपभोग घेणे योग्य ठरते. परंतु, जर येथे त्या त्या जागेला कुंपण घालून, परिवेण (परिसर) तयार करून देखभाल केली जात असेल, तर ती त्या भिक्षूंच्या वैयक्तिक मालकीची होतात. इतर भिक्षूंना त्यांचा उपभोग घेता येत नाही; परंतु त्यांनी संघाला दहावा भाग (दसभाग) देऊन उपभोग घेतला पाहिजे. जो भिक्षू विहाराच्या मध्यभागी असलेल्या झाडाला फांद्यांनी वेढून त्याचे रक्षण करतो, त्याच्यासाठी देखील हाच नियम आहे. පොරාණවිහාරං ගතස්ස සම්භාවනීයභික්ඛුනො ‘‘ථෙරො ආගතො’’ති ඵලාඵලං ආහරන්ති, සචෙ තත්ථ මූලෙ සබ්බපරියත්තිධරො බහුස්සුතභික්ඛු විහාසි, ‘‘අද්ධා එත්ථ දීඝා කතිකා කතා භවිස්සතී’’ති නික්කුක්කුච්චෙන පරිභුඤ්ජිතබ්බං. විහාරෙ ඵලාඵලං පිණ්ඩපාතිකානම්පි වට්ටති, ධුතඞ්ගං න කොපෙති. සාමණෙරා අත්තනො ආචරියුපජ්ඣායානං බහූනි ඵලානි දෙන්ති, අඤ්ඤෙ භික්ඛූ අලභන්තා ඛිය්යන්ති, ඛිය්යනමත්තමෙව චෙතං හොති. जुन्या विहारात गेलेल्या आदरणीय भिक्खूंच्या जवळ 'थेर आले आहेत' असे म्हणून लोक लहान-मोठी फळे घेऊन येतात. जर तेथे सुरुवातीला सर्व परियत्ती धारण करणारे बहुश्रुत भिक्खू राहत असतील, तर 'नक्कीच येथे दीर्घकालीन नियम (कतीका) केला गेला असेल' असा विचार करून कोणतीही शंका न बाळगता त्याचा उपभोग घ्यावा. विहारातील फळे पिंडपातिक भिक्खूंनाही चालतात, यामुळे धुतंग भंग पावत नाही. सामणेर आपल्या आचार्य आणि उपाध्यायांना पुष्कळ फळे देतात; इतर भिक्खूंना ती न मिळाल्यास ते तक्रार करतात, परंतु ही केवळ तक्रार मात्र असते. සචෙ පන දුබ්භික්ඛං හොති, එකං පනසරුක්ඛං නිස්සාය සට්ඨිපි ජනා ජීවන්ති, තාදිසෙ කාලෙ සබ්බෙසං සඞ්ගහකරණත්ථාය භාජෙත්වා ඛාදිතබ්බං, අයං සාමීචි. යාව පන කතිකවත්තං න පටිප්පස්සම්භති, තාව තෙහි ඛායිතං සුඛායිතමෙව. කදා පන කතිකවත්තං පටිප්පස්සම්භති? යදා සමග්ගො සඞ්ඝො සන්නිපතිත්වා ‘‘ඉතො පට්ඨාය භාජෙත්වා ඛාදන්තූ’’ති සාවෙති. එකභික්ඛුකෙ පන විහාරෙ එකෙන සාවිතෙපි පුරිමකතිකා පටිප්පස්සම්භතියෙව. සචෙ පටිප්පස්සද්ධාය කතිකාය සාමණෙරා නෙව රුක්ඛතො පාතෙන්ති, න භූමිතො ගහෙත්වා භික්ඛූනං දෙන්ති, පතිතඵලානි පාදෙහි පහරන්තා විචරන්ති, තෙසං දසභාගතො පට්ඨාය යාව උපඩ්ඪඵලභාගෙන ඵාතිකම්මං කාතබ්බං. අද්ධා ඵාතිකම්මලොභෙන ආහරිත්වා [Pg.256] දස්සන්ති. පුන සුභික්ඛෙ ජාතෙ කප්පියකාරකෙසු ආගන්ත්වා සාඛාපරිවාරාදීනි කත්වා රුක්ඛෙ රක්ඛන්තෙසු සාමණෙරානං ඵාතිකම්මං න දාතබ්බං, භාජෙත්වා පරිභුඤ්ජිතබ්බං. पण जर दुष्काळ असेल आणि एका फणसाच्या झाडाच्या आधारे साठ लोक (भिक्खू) जगत असतील, तर अशा वेळी सर्वांच्या कल्याणासाठी फळे वाटून खावीत; हा योग्य आचार (सामीची) आहे. जोपर्यंत तो नियम (कतीकावत्त) रद्द होत नाही, तोपर्यंत त्यांनी खाल्लेली फळे योग्य रीतीने खाल्लेलीच असतात. पण हा नियम कधी रद्द होतो? जेव्हा समग्र संघ एकत्रित येऊन 'आजपासून वाटून खावे' अशी घोषणा करतो. एकाच भिक्खू असलेल्या विहारात एकानेच घोषणा केली तरी पूर्वीचा नियम रद्द होतोच. जर नियम रद्द झाल्यावरही सामणेर झाडावरून फळे काढत नसतील, जमिनीवरून उचलून भिक्खूंना देत नसतील आणि पडलेल्या फळांना पायाने लाथाडत फिरत असतील, तर त्यांना दहाव्या भागापासून अर्ध्या भागापर्यंत मोबदला (फातिकम्म) द्यावा. नक्कीच मोबदल्याच्या लोभाने ते फळे आणून देतील. पुन्हा सुकाळ झाल्यावर कप्पियकारक येऊन फांद्यांचे कुंपण इत्यादी करून झाडांचे रक्षण करू लागल्यास सामणेरांना मोबदला देऊ नये, तर वाटून उपभोग घ्यावा. ‘‘විහාරෙ ඵලාඵලං අත්ථී’’ති සාමන්තගාමෙහි මනුස්සා ගිලානානං වා ගබ්භිනීනං වා අත්ථාය ආගන්ත්වා ‘‘එකං නාළිකෙරං දෙථ, අම්බං දෙථ, ලබුජං දෙථා’’ති යාචන්ති, දාතබ්බං න දාතබ්බන්ති? දාතබ්බං. අදීයමානෙ හි තෙ දොමනස්සිකා හොන්ති, දෙන්තෙන පන සඞ්ඝං සන්නිපාතෙත්වා යාවතතියං සාවෙත්වා අපලොකනකම්මං කත්වාව දාතබ්බං, කතිකවත්තං වා කත්වා ඨපෙතබ්බං, එවඤ්ච පන කාතබ්බං, බ්යත්තෙන භික්ඛුනා සඞ්ඝස්ස අනුමතියා සාවෙතබ්බං – 'विहारात लहान-मोठी फळे आहेत' असे ऐकून शेजारच्या गावांतील लोक आजारी लोकांच्या किंवा गरोदर स्त्रियांच्या उपयोगासाठी येऊन 'एक नारळ द्या, आंबा द्या, बडहर द्या' अशी याचना करतात; ते द्यावे की देऊ नये? द्यावे. कारण न दिल्यास ते दुःखी होतात. परंतु देणाऱ्या भिक्खूने संघाला एकत्रित करून, तीन वेळा घोषित करून, अपलोकन कर्म करूनच ते द्यावे किंवा तसा नियम करून ठेवावा. आणि हे अशा प्रकारे करावे; एका चतुर भिक्खूने संघाच्या संमतीने पुढीलप्रमाणे घोषित करावे - ‘‘සාමන්තගාමෙහි මනුස්සා ආගන්ත්වා ගිලානාදීනං අත්ථාය ඵලාඵලං යාචන්ති, ද්වෙ නාළිකෙරානි, ද්වෙ තාලඵලානි, ද්වෙ පනසානි, පඤ්ච අම්බානි, පඤ්ච කදලිඵලානි ගණ්හන්තානං අනිවාරණං, අසුකරුක්ඛතො ච අසුකරුක්ඛතො ච ඵලං ගණ්හන්තානං අනිවාරණං රුච්චති භික්ඛුසඞ්ඝස්සා’’ති තික්ඛත්තුං වත්තබ්බං. 'शेजारच्या गावांतील लोक येऊन आजारी इत्यादींच्या उपयोगासाठी लहान-मोठी फळे मागतात. दोन नारळ, दोन ताडफळे, दोन फणस, पाच आंबे, पाच केळी घेणाऱ्यांना न रोखणे आणि अमुक झाडावरून व अमुक झाडावरून फळे घेणाऱ्यांना न रोखणे हे भिक्खू संघाला संमत आहे का?' असे तीन वेळा म्हणावे. තතො පට්ඨාය ගිලානාදීනං නාමං ගහෙත්වා යාචන්තා ‘‘ගණ්හථා’’ති න වත්තබ්බා, වත්තං පන ආචික්ඛිතබ්බං – ‘‘නාළිකෙරාදීනි ඉමිනා නාම පරිච්ඡෙදෙන ගණ්හන්තානං අසුකරුක්ඛතො ච අසුකරුක්ඛතො ච ඵලං ගණ්හන්තානං අනිවාරණං කත’’න්ති. අනුවිචරිත්වා පන ‘‘අයං මධුරඵලො අම්බො, ඉතො ගණ්හථා’’තිපි න වත්තබ්බා. ඵලභාජනකාලෙ පන ආගතානං සම්මතෙන උපඩ්ඪභාගො දාතබ්බො, අසම්මතෙන අපලොකෙත්වා දාතබ්බං. तेव्हापासून आजारी इत्यादींचे नाव घेऊन मागणाऱ्या लोकांना 'घ्या' असे म्हणू नये, तर नियम सांगावा की, 'नारळ इत्यादी फळे या मर्यादेत घेणाऱ्यांना आणि अमुक झाडावरून व अमुक झाडावरून फळे घेणाऱ्यांना न रोखण्याचा नियम केला आहे.' त्यांच्या मागे मागे फिरून 'हा गोड फळांचा आंबा आहे, यातून घ्या' असेही म्हणू नये. फळ वाटणीच्या वेळी आलेल्या लोकांना संमत भिक्खूने अर्धा भाग द्यावा, तर असमंत भिक्खूने संघाला विचारून द्यावे. ඛීණපරිබ්බයො වා මග්ගගමියසත්ථවාහො වා අඤ්ඤො වා ඉස්සරො ආගන්ත්වා යාචති, අපලොකෙත්වාව දාතබ්බං. බලක්කාරෙන ගහෙත්වා ඛාදන්තො න වාරෙතබ්බො. කුද්ධො හි සො රුක්ඛෙපි ඡින්දෙය්ය, අඤ්ඤම්පි අනත්ථං කරෙය්ය. පුග්ගලිකපරිවෙණං ආගන්ත්වා ගිලානස්ස ගාමෙන යාචන්තො ‘‘අම්හෙහි ඡායාදීනං අත්ථාය රොපිතං, සචෙ අත්ථි, තුම්හෙ ජානාථා’’ති වත්තබ්බො. යදි පන ඵලභරිතාව රුක්ඛා හොන්ති, කණ්ටකෙ බන්ධිත්වා ඵලවාරෙන ඛාදන්ති, අපච්චාසීසන්තෙන හුත්වා දාතබ්බං. බලක්කාරෙන ගණ්හන්තො න වාරෙතබ්බො, පුබ්බෙ වුත්තමෙවෙත්ථ කාරණං. ज्याची शिदोरी संपली आहे असा प्रवासी, किंवा मार्गाने जाणारा व्यापारी तांडा, किंवा इतर कोणी अधिकारी येऊन याचना करत असेल, तर संघाला विचारूनच द्यावे. बळजबरीने घेऊन खाणाऱ्याला अडवू नये; कारण तो रागावून झाडेही तोडू शकतो किंवा इतर काही नुकसानही करू शकतो. वैयक्तिक परिवेणात येऊन आजारी माणसाच्या नावाने मागणाऱ्याला, 'आम्ही हे सावली इत्यादींसाठी लावले आहे, जर फळे असतील तर तुम्हीच पहा' असे म्हणावे. पण जर झाडे फळांनी बहरलेली असतील आणि काटेरी कुंपण घालून फळांच्या पाळीनुसार ते खात असतील, तर कोणतीही अपेक्षा न ठेवता द्यावे. बळजबरीने घेणाऱ्याला अडवू नये, येथेही पूर्वी सांगितलेलेच कारण आहे. සඞ්ඝස්ස [Pg.257] ඵලාරාමො හොති, පටිජග්ගනං න ලභති, සචෙ තං කොචි වත්තසීසෙන ජග්ගති, සඞ්ඝස්සෙව හොති. අථාපි කස්සචි පටිබලස්ස භික්ඛුනො ‘‘ඉමං සප්පුරිස ජග්ගිත්වා දෙහී’’ති සඞ්ඝො භාරං කරොති, සො චෙ වත්තසීසෙන ජග්ගති, එවම්පි සඞ්ඝස්සෙව හොති. ඵාතිකම්මං පච්චාසීසන්තස්ස පන තතියභාගෙන වා උපඩ්ඪභාගෙන වා ඵාතිකම්මං කාතබ්බං. ‘‘භාරියං කම්ම’’න්ති වත්වා එත්තකෙන අනිච්ඡන්තො පන සබ්බං තවෙව සන්තකං කත්වා ‘‘මූලභාගං දසභාගමත්තං දත්වා ජග්ගාහී’’තිපි වත්තබ්බො. ගරුභණ්ඩත්තා පන මූලච්ඡෙජ්ජවසෙන න දාතබ්බං. සො මූලභාගං දත්වා ඛාදන්තො අකතාවාසං වා කත්වා කතාවාසං වා ජග්ගිත්වා නිස්සිතකානං ආරාමං නිය්යාදෙති, තෙහිපි මූලභාගො දාතබ්බොව. යදා පන භික්ඛූ සයං ජග්ගිතුං පහොන්ති, අථ තෙසං ජග්ගිතුඤ්ච න දාතබ්බං, ජග්ගිතකාලෙ ච න වාරෙතබ්බා, ජග්ගනකාලෙයෙව වාරෙතබ්බා. ‘‘බහුං තුම්හෙහි ඛායිතං, ඉදානි මා ජග්ගිත්ථ, භික්ඛුසඞ්ඝොයෙව ජග්ගිස්සතී’’ති වත්තබ්බං. संघाची फळबाग आहे, पण तिची देखभाल होत नाही; जर कोणी भिक्खू कर्तव्यापोटी तिची देखभाल करत असेल, तर ती संघाचीच राहते. किंवा संघाने एखाद्या समर्थ भिक्खूला 'हे सत्पुरुषा, याची देखभाल करून दे' असे सांगून जबाबदारी दिली आणि जर तो कर्तव्यापोटी तिची देखभाल करत असेल, तरीही ती संघाचीच राहते. परंतु मोबदल्याची अपेक्षा करणाऱ्या भिक्खूसाठी तिसऱ्या भागाने किंवा अर्ध्या भागाने मोबदला ठरवावा. 'काम खूप कठीण आहे' असे म्हणून एवढ्या मोबदल्यात काम करण्यास तयार नसलेल्या भिक्खूला, 'हे सर्व तुझेच समजून, मूळ भाग म्हणून दहावा भाग संघाला देऊन याची देखभाल कर' असेही सांगावे. परंतु ती बाग गरुभांड असल्यामुळे ती कायमची (मालकी हक्क तोडून) देऊ नये. तो भिक्खू मूळ भाग देऊन फळे खात असताना, नवीन आवास बांधून किंवा जुन्या आबासाची देखभाल करून आपल्या शिष्यांना ती बाग सोपवतो, तर त्या शिष्यांनीही मूळ भाग दिलाच पाहिजे. पण जेव्हा भिक्खू स्वतः देखभाल करण्यास समर्थ होतात, तेव्हा त्यांना देखभाल करू देऊ नये; आणि फळे येण्याच्या वेळी त्यांना अडवू नये, तर केवळ देखभालीच्या वेळीच अडवावे. 'तुम्ही खूप फळे खाल्ली आहेत, आता देखभाल करू नका, भिक्खू संघच देखभाल करेल' असे म्हणावे. සචෙ පන නෙව වත්තසීසෙන ජග්ගන්තො අත්ථි, න ඵාතිකම්මෙන, න සඞ්ඝො ජග්ගිතුං පහොති, එකො අනාපුච්ඡිත්වාව ජග්ගිත්වා ඵාතිකම්මං වඩ්ඪෙත්වා පච්චාසීසති, අපලොකනකම්මෙන ඵාතිකම්මං වඩ්ඪෙත්වා දාතබ්බං. ඉති ඉමං සබ්බම්පි කම්මලක්ඛණමෙව හොති. අපලොකනකම්මං ඉමානි පඤ්ච ඨානානි ගච්ඡති. पण जर कर्तव्यापोटी देखभाल करणारा कोणी नसेल, मोबदल्यानेही नसेल आणि संघही देखभाल करण्यास समर्थ नसेल, आणि एखादा भिक्खू न विचारताच देखभाल करून, उत्पन्न वाढवून मोबदल्याची अपेक्षा करत असेल, तर अपलोकन कर्माद्वारे मोबदला वाढवून द्यावा. अशा प्रकारे हे सर्व संघाच्या कर्माचेच लक्षण आहे. अपलोकन कर्म या पाच ठिकाणी लागू होते. ඤත්තිකම්මට්ඨානභෙදෙ පන ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො, ඉත්ථන්නාමො ඉත්ථන්නාමස්ස ආයස්මතො උපසම්පදාපෙක්ඛො, අනුසිට්ඨො සො මයා. යදි සඞ්ඝස්ස පත්තකල්ලං, ඉත්ථන්නාමො ආගච්ඡෙය්යාති, ආගච්ඡාහීති වත්තබ්බො’’ති එවං උපසම්පදාපෙක්ඛස්ස ඔසාරණා ඔසාරණා නාම. पण ज्ञत्तीकर्म स्थानांच्या भेदांमध्ये निर्णय असा समजावा: 'भन्ते, संघाने माझे ऐकावे. अमुक नावाचा व्यक्ती अमुक नावाच्या आयुष्यमानांचा उपसंपदापेक्षक आहे. मी त्याला अनुशासित केले आहे. जर संघाची संमती असेल, तर अमुक नावाच्या व्यक्तीने यावे. ये असे त्याला म्हणावे.' अशा प्रकारे उपसंपदापेक्षकाला संघात प्रवेश देणे याला ओसारणा म्हणतात. ‘‘සුණන්තු මෙ ආයස්මන්තා, අයං ඉත්ථන්නාමො භික්ඛු ධම්මකථිකො ඉමස්ස නෙව සුත්තං ආගච්ඡති, නො සුත්තවිභඞ්ගො, සො අත්ථං අසල්ලක්ඛෙත්වා බ්යඤ්ජනච්ඡායාය අත්ථං පටිබාහති. යදායස්මන්තානං පත්තකල්ලං, ඉත්ථන්නාමං භික්ඛුං වුට්ඨාපෙත්වා අවසෙසා ඉමං අධිකරණං වූපසමෙය්යාමා’’ති එවං උබ්බාහිකාවිනිච්ඡයෙ ධම්මකථිකස්ස භික්ඛුනො නිස්සාරණා නිස්සාරණා නාම. "आयुष्यमानांनो, माझे ऐका. हा अमुक नावाचा भिक्खू धर्मकथिक आहे. याला सुत्तही अवगत नाही आणि सुत्तविभंगही नाही. तो अर्थाचे नीट आकलन न करता केवळ व्यंजनांच्या (शब्दांच्या) छायेत अर्थाचा विरोध करतो. जर आयुष्यमानांना योग्य वाटत असेल, तर अमुक नावाच्या भिक्खूला बाहेर काढून उर्वरित आम्ही या अधिकरणाचे शमन करूया." अशा प्रकारे उब्बाहिका-विनिर्णयात (उब्बाहिकाविनिच्छय) धर्मकथिक भिक्खूला बाहेर काढणे म्हणजे 'निस्सारणा' (निसारणा) होय। ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො, අජ්ජුපොසථො පන්නරසො. යදි සඞ්ඝස්ස පත්තකල්ලං, සඞ්ඝො උපොසථං කරෙය්යා’’ති එවං උපොසථකම්මවසෙන ඨපිතා ඤත්ති උපොසථො නාම. "भन्ते, संघाने माझे ऐकावे. आज पंधरावा उपोसथ दिवस आहे. जर संघाचे कार्य अनुकूल असेल, तर संघाने उपोसथ करावा." अशा प्रकारे उपोसथ कर्माच्या निमित्ताने मांडलेली ज्ञप्ति म्हणजे 'उपोसथ' (उपोसथ-ज्ञप्ति) होय। ‘‘සුණාතු [Pg.258] මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො, අජ්ජ පවාරණා පන්නරසී. යදි සඞ්ඝස්ස පත්තකල්ලං, සඞ්ඝො පවාරෙය්යා’’ති එවං පවාරණාකම්මවසෙන ඨපිතා ඤත්ති පවාරණා නාම. "भन्ते, संघाने माझे ऐकावे. आज पंधरावी पवारणा आहे. जर संघाचे कार्य अनुकूल असेल, तर संघाने पवारणा करावी." अशा प्रकारे पवारणा कर्माच्या निमित्ताने मांडलेली ज्ञप्ति म्हणजे 'पवारणा' (पवारणा-ज्ञप्ति) होय। ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො, ඉත්ථන්නාමො ඉත්ථන්නාමස්ස ආයස්මතො උපසම්පදාපෙක්ඛො. යදි සඞ්ඝස්ස පත්තකල්ලං, අහං ඉත්ථන්නාමං අනුසාසෙය්ය’’න්ති. ‘‘යදි සඞ්ඝස්ස පත්තකල්ලං, ඉත්ථන්නාමො ඉත්ථන්නාමං අනුසාසෙය්යා’’ති. ‘‘යදි සඞ්ඝස්ස පත්තකල්ලං, අහං ඉත්ථන්නාමං අන්තරායිකෙ ධම්මෙ පුච්ඡෙය්ය’’න්ති. ‘‘යදි සඞ්ඝස්ස පත්තකල්ලං, ඉත්ථන්නාමො ඉත්ථන්නාමං අන්තරායිකෙ ධම්මෙ පුච්ඡෙය්යා’’ති. ‘‘යදි සඞ්ඝස්ස පත්තකල්ලං, අහං ඉත්ථන්නාමං විනයං පුච්ඡෙය්ය’’න්ති. ‘‘යදි සඞ්ඝස්ස පත්තකල්ලං, ඉත්ථන්නාමො ඉත්ථන්නාමං විනයං පුච්ඡෙය්යා’’ති. ‘‘යදි සඞ්ඝස්ස පත්තකල්ලං, අහං ඉත්ථන්නාමෙන විනයං පුට්ඨො විස්සජ්ජෙය්ය’’න්ති. ‘‘යදි සඞ්ඝස්ස පත්තකල්ලං, ඉත්ථන්නාමො ඉත්ථන්නාමෙන විනයං පුට්ඨො විස්සජ්ජෙය්යා’’ති එවං අත්තානං වා පරං වා සම්මන්නිතුං ඨපිතා ඤත්ති සම්මුති නාම. "भन्ते, संघाने माझे ऐकावे. अमुक नावाचा व्यक्ती अमुक नावाच्या आयुष्यमानांचा उपसंपदा-अपेक्षी आहे. जर संघाचे कार्य अनुकूल असेल, तर मी अमुक नावाच्या उपसंपदा-अपेक्षीला अनुशासित करेन." किंवा "जर संघाचे कार्य अनुकूल असेल, तर अमुक नावाचा भिक्खू अमुक नावाच्या उपसंपदा-अपेक्षीला अनुशासित करेल." किंवा "जर संघाचे कार्य अनुकूल असेल, तर मी अमुक नावाच्या उपसंपदा-अपेक्षीला अंतरायिक (बाधक) धर्मांविषयी विचारू शकेन." किंवा "जर संघाचे कार्य अनुकूल असेल, तर अमुक नावाचा भिक्खू अमुक नावाच्या उपसंपदा-अपेक्षीला अंतरायिक धर्मांविषयी विचारू शकेल." किंवा "जर संघाचे कार्य अनुकूल असेल, तर मी अमुक नावाच्या उपसंपदा-अपेक्षीला विनयाविषयी विचारू शकेन." किंवा "जर संघाचे कार्य अनुकूल असेल, तर अमुक नावाचा भिक्खू अमुक नावाच्या उपसंपदा-अपेक्षीला विनयाविषयी विचारू शकेल." किंवा "जर संघाचे कार्य अनुकूल असेल, तर मी अमुक नावाच्या भिक्खूने विचारलेल्या विनयाचे उत्तर (विसर्जन) करेन." किंवा "जर संघाचे कार्य अनुकूल असेल, तर अमुक नावाचा भिक्खू अमुक नावाच्या भिक्खूने विचारलेल्या विनयाचे उत्तर करेल." अशा प्रकारे स्वतःला किंवा दुसऱ्याला संमत (नियुक्त) करण्यासाठी मांडलेली ज्ञप्ति म्हणजे 'संमुति' (संमुति-ज्ञप्ति) होय। ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො, ඉදං චීවරං ඉත්ථන්නාමස්ස භික්ඛුනො නිස්සග්ගියං සඞ්ඝස්ස නිස්සට්ඨං. යදි සඞ්ඝස්ස පත්තකල්ලං, සඞ්ඝො ඉමං චීවරං ඉත්ථන්නාමස්ස භික්ඛුනො දදෙය්යා’’ති. ‘‘යදායස්මන්තානං පත්තකල්ලං, ආයස්මන්තා ඉමං චීවරං ඉත්ථන්නාමස්ස භික්ඛුනො දදෙය්යු’’න්ති එවං නිස්සට්ඨචීවරපත්තාදීනං දානං දානං නාම. "भन्ते, संघाने माझे ऐकावे. हे चीवर अमुक नावाच्या भिक्खूचे निसग्गिय (त्याज्य) असून ते संघाला समर्पित केले गेले आहे. जर संघाचे कार्य अनुकूल असेल, तर संघाने हे चीवर अमुक नावाच्या भिक्खूला परत द्यावे." किंवा "जर आयुष्यमानांचे कार्य अनुकूल असेल, तर आयुष्यमानांनी हे चीवर अमुक नावाच्या भिक्खूला परत द्यावे." अशा प्रकारे समर्पित केलेले चीवर, पात्र इत्यादींचे दान करणे म्हणजे 'दान' (दान-ज्ञप्ति) होय। ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො, අයං ඉත්ථන්නාමො භික්ඛු ආපත්තිං සරති, විවරති, උත්තානිං කරොති, දෙසෙති. යදි සඞ්ඝස්ස පත්තකල්ලං, අහං ඉත්ථන්නාමස්ස භික්ඛුනො ආපත්තිං පටිග්ගණ්හෙය්යන්ති. යදායස්මන්තානං පත්තකල්ලං, අහං ඉත්ථන්නාමස්ස භික්ඛුනො ආපත්තිං පටිග්ගණ්හෙය්ය’’න්ති. තෙන වත්තබ්බො ‘‘පස්සසී’’ති. ‘‘ආම පස්සාමී’’ති. ආයතිං සංවරෙය්යාසීති එවං ආපත්තිපටිග්ගහො පටිග්ගහො නාම. "भन्ते, संघाने माझे ऐकावे. हा अमुक नावाचा भिक्खू आपल्या आपत्तीचे स्मरण करतो, ती उघड करतो, स्पष्ट करतो आणि तिची देशना करतो. जर संघाचे कार्य अनुकूल असेल, तर मी अमुक नावाच्या भिक्खूची आपत्ती स्वीकारेन." किंवा "जर आयुष्यमानांचे कार्य अनुकूल असेल, तर मी अमुक नावाच्या भिक्खूची आपत्ती स्वीकारेन." त्यानंतर त्या भिक्खूने विचारावे, "तू (आपत्ती) पाहत आहेस का?" त्याने म्हणावे, "होय, मी पाहत आहे." (त्यावर स्वीकारणाऱ्याने म्हणावे), "भविष्यात स्वतःला संयमित ठेव." अशा प्रकारे आपत्तीचा स्वीकार करणे म्हणजे 'प्रतिग्रह' (पटिग्गह) होय। ‘‘සුණන්තු මෙ, ආයස්මන්තා ආවාසිකා. යදායස්මන්තානං පත්තකල්ලං, ඉදානි උපොසථං කරෙය්යාම, පාතිමොක්ඛං උද්දිසෙය්යාම, ආගමෙ කාළෙ පවාරෙය්යාමා’’ති. තෙ චෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛූ භණ්ඩනකාරකා කලහකාරකා විවාදකාරකා භස්සකාරකා සඞ්ඝෙ අධිකරණකාරකා තං කාළං අනුවසෙය්යුං, ආවාසිකෙන භික්ඛුනා බ්යත්තෙන පටිබලෙන ආවාසිකා භික්ඛූ ඤාපෙතබ්බා – ‘‘සුණන්තු මෙ, ආයස්මන්තා ආවාසිකා. යදායස්මන්තානං [Pg.259] පත්තකල්ලං, ඉදානි උපොසථං කරෙය්යාම, පාතිමොක්ඛං උද්දිසෙය්යාම, ආගමෙ ජුණ්හෙ පවාරෙය්යාමා’’ති එවං කතා පවාරණාපච්චුක්කඩ්ඪනා පච්චුක්කඩ්ඪනා නාම. "येथील रहिवासी आयुष्यमानांनो, माझे ऐकावे. जर आयुष्यमानांना अनुकूल वाटत असेल, तर आता आपण उपोसथ करूया, पातिमोक्खाचे पठण करूया आणि येणाऱ्या काळात (पुढील पंधरवड्यात) पवारणा करूया." हे भिक्खूंनो, जर ते भांडण करणारे, कलह करणारे, वाद घालणारे, बडबड करणारे आणि संघात अधिकरण निर्माण करणारे भिक्खू त्या काळातही तेथेच राहत असतील, तर तेथील रहिवासी असलेल्या एका चतुर व समर्थ भिक्खूने तेथील रहिवासी भिक्खूंना सूचित करावे – "येथील रहिवासी आयुष्यमानांनो, माझे ऐकावे. जर आयुष्यमानांना अनुकूल वाटत असेल, तर आता आपण उपोसथ करूया, पातिमोक्खाचे पठण करूया आणि येणाऱ्या जुण्ह (शुक्लपक्षात/पुढील पौर्णिमेला) पवारणा करूया." अशा प्रकारे केलेली पवारणेची पुढे ढकलणी म्हणजे 'पच्चुक्कड्ढना' (पवारणा पुढे ढकलणे) होय। සබ්බෙහෙව එකජ්ඣං සන්නිපතිතබ්බං, සන්නිපතිත්වා බ්යත්තෙන භික්ඛුනා පටිබලෙන සඞ්ඝො ඤාපෙතබ්බො – ‘‘සුණාතු මෙ, භන්තෙ, සඞ්ඝො අම්හාකං භණ්ඩනජාතානං කලහජාතානං විවාදාපන්නානං විහරතං බහුං අස්සාමණකං අජ්ඣාචිණ්ණං භාසිතපරික්කන්තං. සචෙ මයං ඉමාහි ආපත්තීහි අඤ්ඤමඤ්ඤං කාරෙස්සාම, සියාපි තං අධිකරණං කක්ඛළත්තාය වාළත්තාය භෙදාය සංවත්තෙය්ය. යදි සඞ්ඝස්ස පත්තකල්ලං, සඞ්ඝො ඉමං අධිකරණං තිණවත්ථාරකෙන වූපසමෙය්ය ඨපෙත්වා ථුල්ලවජ්ජං, ඨපෙත්වා ගිහිපටිසයුත්ත’’න්ති එවං තිණවත්ථාරකසමථෙන කත්වා සබ්බපඨමා සබ්බසඞ්ගාහිකඤත්ති කම්මලක්ඛණං නාම. सर्वांनी एकत्र जमावे. एकत्र जमून एका चतुर व समर्थ भिक्खूने संघाला सूचित करावे – "भन्ते, संघाने माझे ऐकावे. आपण भांडण, कलह आणि वादात पडलेले असताना अनेक अश्रामणक (भिक्खूला अयोग्य असे) वर्तन केले आहे आणि परस्परांवर आक्षेप घेणारे बोललो आहोत. जर आपण या आपत्तींनुसार एकमेकांवर कारवाई करू लागलो, तर कदाचित ते अधिकरण अधिक कठोर, हिंसक आणि संघाच्या भेदाला (विभाजनाला) कारणीभूत ठरेल. जर संघाचे कार्य अनुकूल असेल, तर संघाने स्थूल दोष (थुल्लवज्ज) आणि गृहस्थांशी संबंधित दोष वगळून या अधिकरणाचे 'तिणवत्थारक' (गवताने झाकण्यासारख्या) समथाने शमन करावे." अशा प्रकारे तिणवत्थारक समथाने केलेली सर्वात पहिली सर्वसमावेशक ज्ञप्ति म्हणजे 'कर्मलक्षण' (कम्मलक्खण) होय। තථා තතො පරා එකෙකස්මිං පක්ඛෙ එකෙකං කත්වා ද්වෙ ඤත්තියො ඉති යථාවුත්තප්පභෙදං ඔසාරණං නිස්සාරණං…පෙ… කම්මලක්ඛණඤ්ඤෙව නවමන්ති ඤත්තිකම්මං ඉමානි නව ඨානානි ගච්ඡති. त्याचप्रमाणे, त्यानंतर प्रत्येक पक्षात एकेक ज्ञप्ति करून दोन ज्ञप्ति होतात. अशा प्रकारे वर सांगितलेल्या प्रकारांनुसार ओसारणा (संघात परत घेणे), निस्सारणा (संघातून बाहेर काढणे)... इत्यादी आणि नववे कर्मलक्षणच होय. अशा प्रकारे ज्ञप्ति-कर्म या नऊ स्थानांमध्ये विभागले जाते। ඤත්තිදුතියකම්මට්ඨානභෙදෙ පන වඩ්ඪස්ස ලිච්ඡවිනො පත්තනික්කුජ්ජනවසෙන ඛන්ධකෙ වුත්තා නිස්සාරණා. තස්සෙව පත්තුක්කුජ්ජනවසෙන වුත්තා ඔසාරණා ච වෙදිතබ්බා. परंतु ज्ञप्ति-द्वितीय कर्माच्या स्थानांच्या विभागात, वड्ढ लिच्छवीचे पात्र पालथे करण्याच्या (बहिष्कृत करण्याच्या) निमित्ताने खंधकात सांगितलेली निस्सारणा (संघातून बाहेर काढणे) आणि त्याच वड्ढ लिच्छवीचे पात्र सुलट करण्याच्या (पुन्हा संघात घेण्याच्या) निमित्ताने सांगितलेली ओसारणा समजावी। සීමාසම්මුති තිචීවරෙන අවිප්පවාසසම්මුති, සන්ථතසම්මුති, භත්තුද්දෙසක-සෙනාසනග්ගාහාපක-භණ්ඩාගාරික-චීවරපටිග්ගාහක-චීවරභාජක-යාගුභාජකඵලභාජක-ඛජ්ජභාජක-අප්පමත්තකවිස්සජ්ජක-සාටියග්ගාහාපක-පත්තග්ගාහාපක-ආරාමිකපෙසකසාමණෙරපෙසකසම්මුතීති එතාසං සම්මුතීනං වසෙන සම්මුති වෙදිතබ්බා. කථිනචීවරදානමතකචීවරදානවසෙන දානං වෙදිතබ්බං. सीमा-संमुति, तिचीवराने अविप्पवास-संमुति, संथत-संमुति, भत्तुद्देसक (भोजन वितरक), सेनासनग्गाहापक (शयनासन देणारा), भंडागारिक (भांडार प्रमुख), चीवरपटिग्गाहक (चीवर स्वीकारणारा), चीवरभाजक (चीवर वाटणारा), यागुभाजक (यवागू वाटणारा), फलभाजक (फळे वाटणारा), खज्जभाजक (खाद्यपदार्थ वाटणारा), अप्पमत्तकविस्सज्जक (क्षुल्लक वस्तूंचे वाटप करणारा), साटियग्गाहापक (वर्षावास वस्त्र देणारा), पत्तग्गाहापक (पात्र देणारा), आरामिकपेसक (आरामातील सेवकांची नियुक्ती करणारा) आणि सामणेरपेसक-संमुति (सामणेरांची नियुक्ती करणारा) – या संमुतींच्या निमित्ताने 'संमुति' समजावी. कठिन-चीवर दान आणि मृतक-चीवर दानाच्या निमित्ताने 'दान' समजावी। කථිනුද්ධාරවසෙන උද්ධාරො වෙදිතබ්බො. කුටිවත්ථුවිහාරවත්ථුදෙසනාවසෙන දෙසනා වෙදිතබ්බා. යා පන තිණවත්ථාරකසමථෙ සබ්බසඞ්ගාහිකඤත්තිඤ්ච එකෙකස්මිං පක්ඛෙ එකෙකං ඤත්තිඤ්චාති තිස්සො ඤත්තියො ඨපෙත්වා පුන එකස්මිං පක්ඛෙ එකා, එකස්මිං පක්ඛෙ එකාති ද්වෙ ඤත්තිදුතියකම්මවාචා වුත්තා, තාසං වසෙන කම්මලක්ඛණං වෙදිතබ්බං. ඉති ඤත්තිදුතියකම්මං ඉමානි සත්ත ඨානානි ගච්ඡති. कठिन उद्धाराच्या (कठिन निष्कासनाच्या) निमित्ताने 'उद्धार' समजावा. कुटीच्या जागेचा निर्देश आणि विहाराच्या जागेचा निर्देश करण्याच्या निमित्ताने 'देशना' समजावी. परंतु जी तिणवत्थारक समथामध्ये सर्वसमावेशक ज्ञप्ति आणि प्रत्येक पक्षात एकेक ज्ञप्ति अशा तीन ज्ञप्ति बाजूला ठेवून, पुन्हा एका पक्षात एक आणि दुसऱ्या पक्षात एक अशा दोन ज्ञप्ति-द्वितीय कर्मवाचा सांगितल्या आहेत, त्यांच्या निमित्ताने 'कर्मलक्षण' समजावे. अशा प्रकारे ज्ञप्ति-द्वितीय कर्म या सात स्थानांमध्ये विभागले जाते। ඤත්තිචතුත්ථකම්මට්ඨානභෙදෙ [Pg.260] පන තජ්ජනීයකම්මාදීනං සත්තන්නං කම්මානං වසෙන නිස්සාරණා, තෙසංයෙව ච කම්මානං පටිප්පස්සම්භනවසෙන ඔසාරණා වෙදිතබ්බා. භික්ඛුනොවාදකසම්මුතිවසෙන සම්මුති වෙදිතබ්බා. පරිවාසදානමානත්තදානවසෙන දානං වෙදිතබ්බං. මූලායපටිකස්සනකම්මවසෙන නිග්ගහො වෙදිතබ්බො. ‘‘උක්ඛිත්තානුවත්තිකා අට්ඨ, යාවතතියකා අරිට්ඨො චණ්ඩකාළී ච ඉමෙ තෙ යාවතතියකා’’ති ඉමාසං එකාදසන්නං සමනුභාසනානං වසෙන සමනුභාසනා වෙදිතබ්බා. උපසම්පදාකම්මඅබ්භානකම්මවසෙන පන කම්මලක්ඛණං වෙදිතබ්බං. ඉති ඤත්තිචතුත්ථකම්මං ඉමානි සත්ත ඨානානි ගච්ඡති. ज्ञप्तिचतुर्थकर्माच्या भेदांमध्ये, तर्जनीय कर्मादी सात कर्मांच्या द्वारे निष्कासन (निसारण) आणि त्याच कर्मांच्या शमनाद्वारे (प्रतिप्रस्रंभण) पुनःप्रवेश (ओसारण) समजावा. भिक्षु-उपदेशक संमतीच्या द्वारे संमती समजावी. परिवास देणे व मानत्त देणे या द्वारे दान समजावे. मूलायपटिकस्सन कर्माच्या द्वारे निग्रह समजावा. 'उत्क्षिप्त भिक्षूचे अनुकरण करणारे आठ, यावततीयक (तिसऱ्यांदा ताकीद देण्याजोगे), अरिट्ठ आणि चण्डकाळी, हे ते यावततीयक आहेत' या अकरा समनुभासनांच्या द्वारे समनुभासन समजावे. उपसंपदा कर्म आणि अब्भान कर्माच्या द्वारे कर्माचे लक्षण समजावे. अशा प्रकारे ज्ञप्तिचतुर्थकर्म या सात स्थानांना प्राप्त होते. 497. ඉති කම්මානි ච කම්මවිපත්තිඤ්ච විපත්තිවිරහිතානං කම්මානං ඨානපභෙදගමනඤ්ච දස්සෙත්වා ඉදානි තෙසං කම්මානං කාරකස්ස සඞ්ඝස්ස පරිච්ඡෙදං දස්සෙන්තො පුන ‘‘චතුවග්ගකරණෙ කම්මෙ’’තිආදිමාහ. තස්සත්ථො පරිසතො කම්මවිපත්තිවණ්ණනායං වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බොති. ४९७. अशा प्रकारे कर्मे, कर्मांची विपत्ती आणि विपत्तीरहित कर्मांच्या विविध स्थानांना प्राप्त होणे दर्शवून, आता त्या कर्मांना करणाऱ्या संघाची मर्यादा दर्शवण्यासाठी आयुष्मान उपाली थेरांनी पुन्हा 'चतुर्वर्गकरणे कम्मे' इत्यादी म्हटले. त्याचा अर्थ कर्माच्या विपत्तीच्या वर्णनात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. කම්මවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. कर्मवर्ग-वर्णन समाप्त झाले. අත්ථවසවග්ගාදිවණ්ණනා अर्थवशवर्ग-आदींचे वर्णन. 498. ඉදානි යානි තානි තෙසං කම්මානං වත්ථුභූතානි සික්ඛාපදානි, තෙසං පඤ්ඤත්තියං ආනිසංසං දස්සෙතුං ‘‘ද්වෙ අත්ථවසෙ පටිච්චා’’තිආදි ආරද්ධං. තත්ථ දිට්ඨධම්මිකානං වෙරානං සංවරායාති පාණාතිපාතාදීනං පඤ්චන්නං දිට්ඨධම්මිකවෙරානං සංවරත්ථාය පිදහනත්ථාය. සම්පරායිකානං වෙරානං පටිඝාතායාති විපාකදුක්ඛසඞ්ඛාතානං සම්පරායිකවෙරානං පටිඝාතත්ථාය, සමුච්ඡෙදනත්ථාය අනුප්පජ්ජනත්ථාය. දිට්ඨධම්මිකානං වජ්ජානං සංවරායාති තෙසංයෙව පඤ්චන්නං වෙරානං සංවරත්ථාය. සම්පරායිකානං වජ්ජානන්ති තෙසංයෙව විපාකදුක්ඛානං. විපාකදුක්ඛානෙව හි ඉධ වජ්ජනීයභාවතො වජ්ජානීති වුත්තානි. දිට්ඨධම්මිකානං භයානන්ති ගරහා උපවාදො තජ්ජනීයාදීනි කම්මානි උපොසථපවාරණානං ඨපනං අකිත්තිපකාසනීයකම්මන්ති එතානි දිට්ඨධම්මිකභයානි නාම, එතෙසං සංවරත්ථාය. සම්පරායිකභයානි පන විපාකදුක්ඛානියෙව, තෙසං පටිඝාතත්ථාය. දිට්ඨධම්මිකානං අකුසලානන්ති පඤ්චවෙරදසඅකුසලකම්මපථප්පභෙදානං [Pg.261] අකුසලානං සංවරත්ථාය. විපාකදුක්ඛානෙව පන අක්ඛමට්ඨෙන සම්පරායිකඅකුසලානීති වුච්චන්ති, තෙසං පටිඝාතත්ථාය. ගිහීනං අනුකම්පායාති අගාරිකානං සද්ධාරක්ඛණවසෙන අනුකම්පනත්ථාය. පාපිච්ඡානං පක්ඛුපච්ඡෙදායාති පාපිච්ඡපුග්ගලානං ගණබන්ධභෙදනත්ථාය ගණභොජනසික්ඛාපදං පඤ්ඤත්තං. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙව. යඤ්හෙත්ථ වත්තබ්බං සියා, තං සබ්බං පඨමපාරාජිකවණ්ණනායමෙව වුත්තන්ති. ४९८. आता जी त्या कर्मांचे मूळ कारण असणारी शिक्षापदे आहेत, त्यांच्या प्रज्ञप्तीमधील (स्थापनेमधील) लाभ दर्शवण्यासाठी 'दोन अर्थवशांना अनुसरून' इत्यादी सुरू केले आहे. त्यामध्ये, 'इहलोकातील वैरांच्या संवरासाठी' म्हणजे प्राणातिपातादी पाच इहलोकातील वैरांच्या संवरासाठी व ते बंद करण्यासाठी. 'परलोकातील वैरांच्या विनाशासाठी' म्हणजे विपाक-दुःख रूप असणाऱ्या परलोकातील वैरांच्या विनाशासाठी, समूळ उच्छेदनासाठी आणि ते उत्पन्न न होण्यासाठी. 'इहलोकातील दोषांच्या संवरासाठी' म्हणजे त्याच पाच वैरांच्या संवरासाठी. 'परलोकातील दोषांच्या' म्हणजे त्याच विपाक-दुःखांच्या; कारण येथे विपाक-दुःखांनाच वर्ज्य करण्यायोग्य असल्यामुळे 'दोष' (वज्ज) म्हटले आहे. 'इहलोकातील भयांच्या' म्हणजे निंदा, अपवाद, तर्जनीयादी कर्मे, उपोसथ व प्रवारणा स्थगित करणे, अकीर्ती-प्रकाशन कर्म - यांना 'इहलोकातील भये' म्हणतात, त्यांच्या संवरासाठी. 'परलोकातील भये' म्हणजे विपाक-दुःखेच होत, त्यांच्या विनाशासाठी. 'इहलोकातील अकुशलांच्या' म्हणजे पाच वैरे आणि दहा अकुशल कर्मपथ रूप असणाऱ्या अकुशलांच्या संवरासाठी. सहन न होण्याच्या अर्थाने विपाक-दुःखांनाच 'परलोकातील अकुशल' म्हटले जाते, त्यांच्या विनाशासाठी. 'गृहस्थांच्या अनुकंपासाठी' म्हणजे गृहस्थांच्या श्रद्धेचे रक्षण करण्याच्या द्वारे त्यांच्यावर अनुकंपा करण्यासाठी. 'पापी इच्छा असणाऱ्यांच्या पक्षाचा उच्छेद करण्यासाठी' म्हणजे पापी इच्छा असणाऱ्या व्यक्तींच्या गटांची तटबंदी तोडण्यासाठी 'गणभोजन शिक्षापद' प्रज्ञप्त केले गेले आहे. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. येथे जे काही सांगण्यासारखे आहे, ते सर्व पहिल्या पाराजिक वर्णनातच सांगितले गेले आहे. සික්ඛාපදෙසු අත්ථවසෙන වණ්ණනා නිට්ඨිතා. शिक्षापदांमधील अर्थवशाच्या द्वारे वर्णन समाप्त झाले. 499. පාතිමොක්ඛාදීසු පාතිමොක්ඛුද්දෙසොති භික්ඛූනං පඤ්චවිධො භික්ඛුනීනං චතුබ්බිධො. පරිවාසදානාදීසු ඔසාරණීයං පඤ්ඤත්තන්ති අට්ඨාරසසු වා තෙචත්තාලීසාය වා වත්තෙසු වත්තමානස්ස ඔසාරණීයං පඤ්ඤත්තං. යෙන කම්මෙන ඔසාරීයති, තං කම්මං පඤ්ඤත්තන්ති අත්ථො. නිස්සාරණීයං පඤ්ඤත්තන්ති භණ්ඩනකාරකාදයො යෙන කම්මෙන නිස්සාරීයන්ති, තං කම්මං පඤ්ඤත්තන්ති අත්ථො. ४९९. प्रातिमोक्ष इत्यादींमध्ये 'प्रातिमोक्ष-उद्देश' म्हणजे भिक्षूंच्या बाबतीत पाच प्रकारचा आणि भिक्षुणींच्या बाबतीत चार प्रकारचा होय. परिवास देणे इत्यादींमध्ये 'ओसारणीय' (पुनःप्रवेशाचे कर्म) प्रज्ञप्त केले आहे म्हणजे अठरा किंवा पंचेचाळीस (४३) व्रतांचे आचरण करणाऱ्या व्यक्तीसाठी संघात पुनःप्रवेश देणारे कर्म प्रज्ञप्त केले आहे. ज्या कर्माने संघात पुनःप्रवेश दिला जातो, ते कर्म प्रज्ञप्त केले आहे, असा अर्थ आहे. 'निसारणीय' (संघातून बाहेर काढण्याचे कर्म) प्रज्ञप्त केले आहे म्हणजे भांडण करणाऱ्या इत्यादींना ज्या कर्माने संघातून बाहेर काढले जाते, ते कर्म प्रज्ञप्त केले आहे, असा अर्थ आहे. 500. අපඤ්ඤත්තෙතිආදීසු අපඤ්ඤත්තෙ පඤ්ඤත්තන්ති සත්තාපත්තික්ඛන්ධා කකුසන්ධඤ්ච සම්මාසම්බුද්ධං කොණාගමනඤ්ච කස්සපඤ්ච සම්මාසම්බුද්ධං ඨපෙත්වා අන්තරා කෙනචි අපඤ්ඤත්තෙ සික්ඛාපදෙ පඤ්ඤත්තං නාම. මක්කටිවත්ථුආදිවිනීතකථා සික්ඛාපදෙ පඤ්ඤත්තෙ අනුපඤ්ඤත්තං නාම. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. ५००. 'अपञ्ञत्ते' इत्यादींमध्ये, 'अपञ्ञत्ते पञ्ञत्तं' (प्रज्ञप्त नसताना प्रज्ञप्त केलेले) म्हणजे ककुसंध सम्यक्संबुद्ध, कोणागमन सम्यक्संबुद्ध आणि कस्सप सम्यक्संबुद्ध यांना सोडून, त्यांच्या दरम्यानच्या काळात कोणाकडूनही शिक्षापद प्रज्ञप्त नसताना जे प्रज्ञप्त केले गेले, त्याला 'प्रज्ञप्त' म्हणतात. माकडीची कथा (मक्कटीवत्थु) इत्यादी विनीत कथा, शिक्षापद प्रज्ञप्त केल्यानंतर जे पुन्हा प्रज्ञप्त केले गेले, त्याला 'अनुप्रज्ञप्त' म्हणतात. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. ආනිසංසවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. आनिशंसवर्ग-वर्णन समाप्त झाले. 501. ඉදානි සබ්බසික්ඛාපදානං එකෙකෙන ආකාරෙන නවධා සඞ්ගහං දස්සෙතුං ‘‘නව සඞ්ගහා’’තිආදිමාහ. තත්ථ වත්ථුසඞ්ගහොති වත්ථුනා සඞ්ගහො. එවං සෙසෙසුපි පදත්ථො වෙදිතබ්බො. අයං පනෙත්ථ අත්ථයොජනා – යස්මා හි එකසික්ඛාපදම්පි අවත්ථුස්මිං පඤ්ඤත්තං නත්ථි, තස්මා සබ්බානි වත්ථුනා සඞ්ගහිතානීති එවං තාව වත්ථුසඞ්ගහො වෙදිතබ්බො. ५०१. आता सर्व शिक्षापदांचा एकेका प्रकारे नऊ प्रकारांनी संग्रह दर्शवण्यासाठी आयुष्मान उपाली थेरांनी 'नऊ संग्रह' इत्यादी म्हटले. त्यामध्ये, 'वस्तू-संग्रह' म्हणजे वस्तूच्या (कारणाच्या) द्वारे संग्रह होय. याचप्रमाणे उर्वरित पदांचाही अर्थ समजावा. येथे अर्थाची योजना अशी आहे - कारण कोणतेही एक शिक्षापद देखील कारणाशिवाय (अ-वस्तूवर) प्रज्ञप्त केलेले नाही, म्हणून सर्व शिक्षापदे वस्तूच्या द्वारे संग्रहित आहेत, अशा प्रकारे प्रथम वस्तू-संग्रह समजावा. යස්මා [Pg.262] පන ද්වෙ ආපත්තික්ඛන්ධා සීලවිපත්තියා සඞ්ගහිතා, පඤ්චාපත්තික්ඛන්ධා ආචාරවිපත්තියා, ඡ සික්ඛාපදානි ආජීවවිපත්තියා සඞ්ගහිතානි, තස්මා සබ්බානිපි විපත්තියා සඞ්ගහිතානීති එවං විපත්තිසඞ්ගහො වෙදිතබ්බො. कारण दोन आपत्ती-स्कंध शील-विपत्तीमध्ये संग्रहित आहेत, पाच आपत्ती-स्कंध आचार-विपत्तीमध्ये आणि सहा शिक्षापदे आजीव-विपत्तीमध्ये संग्रहित आहेत, म्हणून सर्व शिक्षापदे विपत्तीच्या द्वारे संग्रहित आहेत, अशा प्रकारे विपत्ती-संग्रह समजावा. යස්මා පන සත්තහාපත්තීහි මුත්තං එකසික්ඛාපදම්පි නත්ථි, තස්මා සබ්බානි ආපත්තියා සඞ්ගහිතානීති එවං ආපත්තිසඞ්ගහො වෙදිතබ්බො. कारण सात आपत्तींपासून मुक्त असणारे एकही शिक्षापद नाही, म्हणून सर्व शिक्षापदे आपत्तीच्या द्वारे संग्रहित आहेत, अशा प्रकारे आपत्ती-संग्रह समजावा. සබ්බානි ච සත්තසු නගරෙසු පඤ්ඤත්තානීති නිදානෙන සඞ්ගහිතානීති එවං නිදානසඞ්ගහො වෙදිතබ්බො. आणि सर्व शिक्षापदे सात नगरांमध्ये प्रज्ञप्त केली गेली आहेत, म्हणून ती निदानाच्या (स्थानाच्या) द्वारे संग्रहित आहेत, अशा प्रकारे निदान-संग्रह समजावा. යස්මා පන එකසික්ඛාපදම්පි අජ්ඣාචාරිකපුග්ගලෙ අසති පඤ්ඤත්තං නත්ථි, තස්මා සබ්බානි පුග්ගලෙන සඞ්ගහිතානීති එවං පුග්ගලසඞ්ගහො වෙදිතබ්බො. कारण उल्लंघन करणारी व्यक्ती नसताना एकही शिक्षापद प्रज्ञप्त केलेले नाही, म्हणून सर्व शिक्षापदे व्यक्तीच्या द्वारे संग्रहित आहेत, अशा प्रकारे पुद्गल-संग्रह समजावा. සබ්බානි පන පඤ්චහි චෙව සත්තහි ච ආපත්තික්ඛන්ධෙහි සඞ්ගහිතානි, සබ්බානි න විනා ඡහි සමුට්ඨානෙහි සමුට්ඨන්තීති සමුට්ඨානෙන සඞ්ගහිතානි. සබ්බානි ච චතූසු අධිකරණෙසු ආපත්තාධිකරණෙන සඞ්ගහිතානි. සබ්බානි සත්තහි සමථෙහි සමථං ගච්ඡන්තීති සමථෙහි සඞ්ගහිතානි. එවමෙත්ථ ඛන්ධසමුට්ඨානඅධිකරණසමථසඞ්ගහාපි වෙදිතබ්බා. සෙසං පුබ්බෙ වුත්තනයමෙවාති. आणि सर्व शिक्षापदे पाच व सात आपत्ती-स्कंधांच्या द्वारे संग्रहित आहेत. सर्व शिक्षापदे सहा समुत्थानांशिवाय उत्पन्न होत नाहीत, म्हणून ती समुत्थानाच्या द्वारे संग्रहित आहेत. आणि सर्व शिक्षापदे चार अधिकरणांपैकी आपत्ती-अधिकरणाच्या द्वारे संग्रहित आहेत. सर्व शिक्षापदे सात शमथांच्या द्वारे शांत होतात, म्हणून ती शमथांच्या द्वारे संग्रहित आहेत. अशा प्रकारे येथे स्कंध-संग्रह, समुत्थान-संग्रह, अधिकरण-संग्रह आणि शमथ-संग्रह देखील समजावेत. उर्वरित सर्व पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावे. සමන්තපාසාදිකාය විනයසංවණ්ණනාය समंतपासादिका नामक विनय-वर्णनात නවසඞ්ගහිතවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. नवसंग्रहितवर्ग-वर्णन समाप्त झाले. නිට්ඨිතා ච පරිවාරස්ස අනුත්තානත්ථපදවණ්ණනාති. आणि परिवार पाठातील अस्पष्ट अर्थाच्या पदांचे वर्णन समाप्त झाले. නිගමනකථා निगमनकथा (उपसंहार). එත්තාවතා [Pg.263] ච – आणि एवढ्या विस्ताराने – උභතො විභඞ්ගඛන්ධක-පරිවාරවිභත්තිදෙසනං නාථො; විනයපිටකං විනෙන්තො, වෙනෙය්යං යං ජිනො ආහ. जगाचे रक्षक असणाऱ्या जिन भगवंतांनी, विनेय जनांना विनय शिकवताना, दोन्ही विभंग, खंधक आणि परिवार यांनी विभागलेली जी देशना असणारे विनयपिटक सांगितले; සමධිකසත්තවීසති-සහස්සමත්තෙන තස්ස ගන්ථෙන; සංවණ්ණනා සමත්තා, සමන්තපාසාදිකා නාම. त्या विनयपिटकाची 'समंतपासादिका' नावाची व्याख्या, सत्तावीस हजारांपेक्षा काहीशा अधिक ग्रंथप्रमाणाने पूर्ण झाली आहे। තත්රිදං සමන්තපාසාදිකාය සමන්තපාසාදිකත්තස්මිං – त्यासंबंधात, 'समन्तपासादिका' (सर्व बाजूंनी प्रसन्न करणारी) या अट्ठकथेच्या सर्वतोपरी प्रसन्नतेच्या (समन्तपासादिकत्व) संदर्भात हे म्हटले आहे – ආචරියපරම්පරතො, නිදානවත්ථුප්පභෙදදීපනතො; පරසමයවිවජ්ජනතො, සකසමයවිසුද්ධිතො චෙව. आचार्यपरंपरेद्वारे, निदान (प्रस्तावना) आणि वस्तूंच्या (कथांच्या) विविध प्रकारांचे स्पष्टीकरण केल्यामुळे; पर-मतांचा (इतर सिद्धांतांचा) त्याग केल्यामुळे आणि स्व-मताची (स्वतःच्या सिद्धांताची) शुद्धता दर्शविल्यामुळे. බ්යඤ්ජනපරිසොධනතො, පදත්ථතො පාළියොජනක්කමතො; සික්ඛාපදනිච්ඡයතො, විභඞ්ගනයභෙදදස්සනතො. व्यंजनांच्या (शब्दांच्या) शुद्धीकरणाद्वारे, पदांच्या अर्थाद्वारे, पाळीच्या (पाळिपाठाच्या) वाक्यरचना-क्रमाद्वारे; शिक्षापदांच्या (नियमांच्या) निर्णयाद्वारे आणि विभंग-नयाच्या (विश्लेषण पद्धतींच्या) विविध प्रकारांचे दर्शन घडविल्यामुळे. සම්පස්සතං න දිස්සති, කිඤ්චි අපාසාදිකං යතො එත්ථ; විඤ්ඤූනමයං තස්මා, සමන්තපාසාදිකාත්වෙව. कारण यामध्ये (या अट्ठकथेत) सूक्ष्मपणे पाहणाऱ्या विद्वानांना (विज्ञांना) कोणतेही अप्रसन्नकारक (अपासादिक) काहीही दिसून येत नाही; म्हणूनच, ही खरोखरच 'समन्तपासादिका' (सर्व बाजूंनी प्रसन्न करणारी) या नावाने ओळखली जाते. සංවණ්ණනා පවත්තා, විනයස්ස විනෙය්යදමනකුසලෙන; වුත්තස්ස ලොකනාථෙන, ලොකමනුකම්පමානෙනාති. विनेय (दीक्षित होण्यास योग्य) जीवांचे दमन करण्यात (त्यांना सन्मार्गावर आणण्यात) कुशल असलेल्या आणि जगावर अनुकंपा करणाऱ्या लोकनाथांनी (बुद्धांनी) उपदेशिलेल्या विनयाची ही व्याख्या (अट्ठकथा) 'समन्तपासादिका' या नावानेच प्रवृत्त झाली आहे. මහාඅට්ඨකථඤ්චෙව, මහාපච්චරිමෙවච; කුරුන්දිඤ්චාති තිස්සොපි, සීහළට්ඨකථා ඉමා. महाअट्ठकथा, महापच्चरी आणि कुरुन्दी—या तिन्ही सिंहली अट्ठकथा (सिंहळ भाषेतील अट्ठकथा) आहेत. බුද්ධමිත්තොති නාමෙන, විස්සුතස්ස යසස්සිනො; විනයඤ්ඤුස්ස ධීරස්ස, සුත්වා ථෙරස්ස සන්තිකෙ. 'बुद्धमित्त' या नावाने प्रसिद्ध असलेल्या, यशस्वी, विनय जाणणाऱ्या आणि धीर (बुद्धिमान) थेरांच्या सन्निध (जवळ) राहून त्या ऐकल्यानंतर (शिकल्यानंतर), මහාමෙඝවනුය්යානෙ, භූමිභාගෙ පතිට්ඨිතො; මහාවිහාරො යො සත්ථු, මහාබොධිවිභූසිතො. महामेघवन उद्यानाच्या भूमीवर स्थित असलेला आणि शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) महाबोधीने (महाबोधी वृक्षाच्या शाखेने) सुशोभित असलेला जो 'महाविहार' आहे, යං තස්ස දක්ඛිණෙ භාගෙ, පධානඝරමුත්තමං; සුචිචාරිත්තසීලෙන, භික්ඛුසඞ්ඝෙන සෙවිතං. त्याच्या दक्षिण भागात जे एक उत्तम 'प्रधानघर' (ध्यानगृह) आहे, जे अत्यंत शुद्ध चारित्र्य आणि शील असलेल्या भिक्खू संघाद्वारे सेवित (वास्तव्य केलेले) आहे, උළාරකුලසම්භූතො, සඞ්ඝුපට්ඨායකො සදා; අනාකුලාය සද්ධාය, පසන්නො රතනත්තයෙ. उच्च कुळात जन्मलेले, सदैव संघाची सेवा करणारे आणि त्रिरत्नांवर अढळ व शुद्ध श्रद्धेने प्रसन्न असलेले, මහානිගමසාමීති[Pg.264], විස්සුතො තත්ථ කාරයි; චාරුපාකාරසඤ්චිතං, යං පාසාදං මනොරමං. 'महानिगमसामी' (मोठ्या नगराचे स्वामी) या नावाने प्रसिद्ध असलेल्या गृहपतीने तेथे सुंदर तटबंदीने वेढलेला, मनमोहक असा जो प्रासाद (विहार) बांधला, සීතච්ඡායතරූපෙතං, සම්පන්නසලිලාසයං; වසතා තත්ර පාසාදෙ, මහානිගමසාමිනො. जो शीतल छाया देणाऱ्या वृक्षांनी युक्त आणि भरपूर पाणी असलेल्या जलाशयाने (तलावाने) संपन्न आहे; त्या महानिगमसामींच्या प्रासादात राहत असताना, සුචිසීලසමාචාරං, ථෙරං බුද්ධසිරිව්හයං; යා උද්දිසිත්වා ආරද්ධා, ඉද්ධා විනයවණ්ණනා. अत्यंत शुद्ध शील आणि आचरण असलेल्या 'बुद्धसिरी' नावाच्या थेरांना उद्देशून (त्यांच्या विनंतीवरून) ही समृद्ध विनय-व्याख्या (विनयवण्णना) सुरू केली गेली. පාලයන්තස්ස සකලං, ලඞ්කාදීපං නිරබ්බුදං; රඤ්ඤො සිරිනිවාසස්ස, සිරිපාලයසස්සිනො. संपूर्ण लंकाद्वीप उपद्रवमुक्त ठेवून त्याचे रक्षण करणाऱ्या, वैभवाचे निवासस्थान असलेल्या आणि यशस्वी अशा 'सिरिपाल' (श्रीपाल) राजाच्या— සමවීසතිමෙ ඛෙමෙ, ජයසංවච්ඡරෙ අයං; ආරද්ධා එකවීසම්හි, සම්පත්තෙ පරිනිට්ඨිතා. विसाव्या शांततापूर्ण आणि विजयी वर्षात सुरू झालेली ही व्याख्या, एकविसावे वर्ष उजाडले असता पूर्ण झाली. උපද්දවා කුලෙ ලොකෙ, නිරුපද්දවතො අයං; එකසංවච්ඡරෙනෙව, යථා නිට්ඨං උපාගතා. उपद्रवांनी भरलेल्या या जगात, कोणत्याही विघ्नांशिवाय ही व्याख्या जशी एकाच वर्षात पूर्णत्वास आली, එවං සබ්බස්ස ලොකස්ස, නිට්ඨං ධම්මූපසංහිතා; සීඝං ගච්ඡන්තු ආරම්භා, සබ්බෙපි නිරුපද්දවා. त्याचप्रमाणे, संपूर्ण जगाचे धर्माशी संबंधित असलेले सर्व उपक्रम (सत्कार्ये) कोणत्याही विघ्नांशिवाय लवकरच पूर्णत्वास जावोत. චිරට්ඨිතත්ථං ධම්මස්ස, කරොන්තෙන මයා ඉමං; සද්ධම්මබහුමානෙන, යඤ්ච පුඤ්ඤං සමාචිතං. सद्धम्माबद्दलच्या अत्यंत आदरापोटी, धम्माच्या चिरंतन अस्तित्वासाठी ही व्याख्या रचताना माझ्याद्वारे जे काही पुण्य संचित केले गेले आहे, සබ්බස්ස ආනුභාවෙන, තස්ස සබ්බෙපි පාණිනො; භවන්තු ධම්මරාජස්ස, සද්ධම්මරසසෙවිනො. त्या सर्व पुण्याच्या प्रभावाने, सर्व प्राणीमात्र धम्मराजाच्या (बुद्धांच्या) सद्धम्म-रसाचे सेवन करणारे (आस्वाद घेणारे) होवोत. චිරං තිට්ඨතු සද්ධම්මො, කාලෙ වස්සං චිරං පජං; තප්පෙතු දෙවො ධම්මෙන, රාජා රක්ඛතු මෙදිනින්ති. सद्धम्म चिरकाळ टिकून राहो! योग्य वेळी पाऊस पडो! पर्जन्यदेवाने प्रजेला सदैव तृप्त करावे आणि राजाने धर्माने पृथ्वीचे रक्षण करावे! පරමවිසුද්ධසද්ධාබුද්ධිවීරියපටිමණ්ඩිතෙන සීලාචාරජ්ජවමද්දවාදිගුණසමුදයසමුදිතෙන සකසමයසමයන්තරගහනජ්ඣොගාහණසමත්ථෙන පඤ්ඤාවෙය්යත්තියසමන්නාගතෙන තිපිටකපරියත්තිප්පභෙදෙ සාට්ඨකථෙ සත්ථුසාසනෙ අප්පටිහතඤ්ඤාණප්පභාවෙන මහාවෙය්යාකරණෙන කරණසම්පත්තිජනිතසුඛවිනිග්ගතමධුරොදාරවචනලාවණ්ණයුත්තෙන යුත්තමුත්තවාදිනා වාදිවරෙන මහාකවිනා පභින්නපඅසම්භිදාපරිවාරෙ ඡළභිඤ්ඤාදිපභෙදගුණපටිමණ්ඩිතෙ උත්තරිමනුස්සධම්මෙ [Pg.265] සුප්පතිට්ඨිතබුද්ධීනං ථෙරවංසප්පදීපානං ථෙරානං මහාවිහාරවාසීනං වංසාලඞ්කාරභූතෙන විපුලවිසුද්ධබුද්ධිනා බුද්ධඝොසොති ගරූහි ගහිතනාමධෙය්යෙන ථෙරෙන කතා අයං සමන්තපාසාදිකා නාම විනයසංවණ්ණනා – अत्यंत शुद्ध श्रद्धा, प्रज्ञा आणि वीर्याने (उत्साहाने) सुशोभित; शील, आचरण, सरळपणा, मृदुता इत्यादी गुणांच्या समूहाने युक्त; स्व-सिद्धांत आणि पर-सिद्धांतांच्या गहन अरण्यात ज्ञानाने प्रवेश करण्यास समर्थ; प्रज्ञेच्या प्रगल्भतेने संपन्न; अट्ठकथांसह असलेल्या तिपिटक-परियत्तीच्या शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) शासनात अप्रतिहत (अबाधित) ज्ञानप्रभा असणारे; महान व्याकरणकार; कंठ-तालू इत्यादी स्थानांच्या शुद्धतेमुळे सहजपणे बाहेर पडणाऱ्या मधुर आणि उदात्त शब्दांच्या सौंदर्याने युक्त; योग्य आणि प्रिय बोलणारे; वक्त्यांमध्ये श्रेष्ठ; महाकवी; विश्लेषणात्मक ज्ञान (पटिसम्भिदा) आणि सहा अभिज्ञा (अभिज्ञान) इत्यादी गुणांनी सुशोभित अशा उत्तरमनुष्यधर्मात (ध्यान-मार्ग-फलांमध्ये) सुप्रतिष्ठित बुद्धी असलेल्या, थेर-वंशाचे दीप असलेल्या आणि महाविहारात राहणाऱ्या थेरांच्या वंशाचे भूषण असणारे; विशाल व शुद्ध बुद्धी असलेले; आणि गुरूंनी ज्यांना 'बुद्धघोष' हे नाव दिले आहे, अशा थेरांनी रचलेली 'समन्तपासादिका' नावाची ही विनय-व्याख्या (विनयवण्णना)— තාව තිට්ඨතු ලොකස්මිං, ලොකනිත්ථරණෙසිනං; දස්සෙන්තී කුලපුත්තානං, නයං සීලවිසුද්ධියා. संसारातून मुक्त होऊ इच्छिणाऱ्या कुलपुत्रांना शील-शुद्धीचा (शीलविशुद्धीचा) मार्ग दाखवत ही व्याख्या या जगात तोपर्यंत टिकून राहो, යාව බුද්ධොති නාමම්පි, සුද්ධචිත්තස්ස තාදිනො; ලොකම්හි ලොකජෙට්ඨස්ස, පවත්තති මහෙසිනොති. जोपर्यंत शुद्ध चित्त असलेल्या, तादी (अष्टलोकधर्माने विचलित न होणाऱ्या), जगातील ज्येष्ठ आणि महर्षी (महेसी) अशा बुद्धांचे 'बुद्ध' हे नाव देखील या जगात अस्तित्वात आहे. සමන්තපාසාදිකා නාම 'समन्तपासादिका' नावाची විනය-අට්ඨකථා නිට්ඨිතා. विनय-अट्ठकथा समाप्त झाली. | |||
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
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| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |