| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांना नमस्कार असो. วินยปิฏเก विनयपिटकात จูฬวคฺค-อฏฺฐกถา चुळवग्ग-अट्ठकथा ๑. กมฺมกฺขนฺธกํ १. कम्मक्खन्धक ตชฺชนียกมฺมกถา तज्जनीयकम्मकथा ๑. จูฬวคฺคสฺส [Pg.1] ปฐเม กมฺมกฺขนฺธเก ตาว ปณฺฑุกโลหิตกาติ ปณฺฑุโก เจว โลหิตโก จาติ ฉพฺพคฺคิเยสุ ทฺเว ชนา; เตสํ นิสฺสิตกาปิ ปณฺฑุกโลหิตกาตฺเวว ปญฺญายนฺติ. พลวาพลวํ ปฏิมนฺเตถาติ สุฏฺฐุพลวํ ปฏิวทถ. อลมตฺถตราติ สมตฺถตรา. १. चुळवग्गच्या पहिल्या कम्मक्खन्धकात, प्रथम 'पण्डुकलोहितक' म्हणजे षड्वर्गीय (छब्बग्गिय) भिक्खूंमधील पण्डुक आणि लोहितक हे दोन भिक्खू; त्यांचे आश्रित (शिष्य) देखील 'पण्डुकलोहितक' म्हणूनच ओळखले जातात. 'बलवाबलवं पटिमन्तेथ' म्हणजे अत्यंत प्रबळपणे प्रत्युत्तर द्या. 'अलमत्थतरा' म्हणजे अधिक समर्थ (सक्षम). ตชฺชนียกมฺมกถา นิฏฺฐิตา. तज्जनीयकम्मकथा समाप्त. อธมฺมกมฺมทฺวาทสกกถา अधम्मकम्मद्वादसककथा ๔. อสมฺมุขา กตนฺติอาทีสุ สงฺฆธมฺมวินยปุคฺคลสมฺมุขานํ วินา กตํ, จุทิตกํ อปฺปฏิปุจฺฉิตฺวา กตํ, ตสฺเสว อปฺปฏิญฺญาย กตํ. อเทสนาคามินิยาติ ปาราชิกาปตฺติยา วา สงฺฆาทิเสสาปตฺติยา วา. เอตฺถ ปุริมเกสุ ตีสุ ติเกสุ นว ปทา อธมฺเมนกตํ วคฺเคนกตนฺติ อิเมหิ สทฺธึ เอเกกํ คเหตฺวา นว ติกา วุตฺตา. เอวํ สพฺเพปิ ทฺวาทส ติกา โหนฺติ. ปฏิปกฺขวเสน สุกฺกปกฺเขสุปิ เอเตเยว ทฺวาทส ติกา วุตฺตา. ४. 'असम्मुखा कतं' (समक्ष न करता केलेले) इत्यादी पदांमध्ये—संघ-सम्मुख, धम्म-सम्मुख, विनय-सम्मुख आणि पुग्गल-सम्मुख यांच्याशिवाय केलेले कार्य; आरोपी भिक्खूला (चुदितक) न विचारता केलेले कार्य; आणि त्याच्या संमतीशिवाय केलेले कार्य, असा निर्णय समजावा. 'अदेसनागामिनी' म्हणजे पाराजिकापत्ती किंवा संघादिसेसापत्तीद्वारे केलेले कार्य. येथे पहिल्या तीन त्रिकांमधील (तिक) नऊ पदे, 'अधम्मेन कतं' (अधर्माने केलेले) आणि 'वग्गेन कतं' (गटाने केलेले) या दोन पदांसह एकेक घेऊन नऊ त्रिक भगवंतांनी सांगितले आहेत. अशा प्रकारे सर्व मिळून बारा त्रिक होतात. प्रतिपक्षाच्या नियमाने शुक्लपक्षात (सत्पक्षात) देखील हेच बारा त्रिक भगवंतांनी सांगितले आहेत. ๖. อนนุโลมิเกหิ [Pg.2] คิหิสํสคฺเคหีติ ปพฺพชิตานํ อนนุจฺฉวิเกหิ สหโสกิตาทีหิ คิหิสํสคฺเคหิ. ६. 'अननुलोमिकेहि गिहिसंसग्गेहि' म्हणजे प्रव्रजितांना (भिक्खूंना) अयोग्य असलेल्या, एकत्र दुःख करणे इत्यादी प्रकारे गृहस्थांशी (लोकांशी) मिळून-मिसळून राहण्याने. ติณฺณํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขูนนฺติอาทิ เอเกเกนาปิ องฺเคน ตชฺชนียกมฺมํ กาตุํ วฏฺฏตีติ ทสฺสนตฺถํ วุตฺตํ. ตชฺชนียสฺส หิ วิเสเสน ภณฺฑนการกตฺตํ องฺคํ, นิยสฺสสฺส อภิณฺหาปตฺติกตฺตํ, ปพฺพาชนียสฺส กุลทูสกตฺตํ วุตฺตํ. อิเมสุ ปน ตีสุ องฺเคสุ เยน เกนจิ สพฺพานิปิ กาตุํ วฏฺฏติ. ยทิ เอวํ ยํ จมฺเปยฺยกฺขนฺธเก วุตฺตํ – ‘‘ตชฺชนียกมฺมารหสฺส นิยสฺสกมฺมํ กโรติ…เป… อุปสมฺปทารหํ อพฺเภติ; เอวํ โข อุปาลิ อธมฺมกมฺมํ โหติ อวินยกมฺมํ, เอวญฺจ ปน สงฺโฆ สาติสาโร โหตี’’ติ อิทํ วิรุชฺฌตีติ. อิทญฺจ น วิรุชฺฌติ. กสฺมา? วจนตฺถนานตฺตโต, ‘‘ตชฺชนียกมฺมารหสฺสา’’ติ อิมสฺส หิ วจนสฺส กมฺมสนฺนิฏฺฐานํ อตฺโถ. ‘‘ติณฺณํ, ภิกฺขเว’’ติอาทิวจนสฺส องฺคสมฺภโว, ตสฺมา ยทา สงฺเฆน สนฺนิปติตฺวา ‘‘อิทํ นาม อิมสฺส ภิกฺขุโน กมฺมํ กโรมา’’ติ สนฺนิฏฺฐานํ กตํ โหติ, ตทา กมฺมารโห นาม โหติ. ตสฺส อิมินา ลกฺขเณน ตชฺชนียาทิกมฺมารหสฺส นิยสฺสกมฺมาทิกรณํ อธมฺมกมฺมญฺเจว อวินยกมฺมญฺจาติ เวทิตพฺพํ. ยสฺส ปน ภณฺฑนการกาทีสุ องฺเคสุ อญฺญตรํ องฺคํ อตฺถิ, ตสฺส อากงฺขมาโน สงฺโฆ ยถานุญฺญาเตสุ องฺเคสุ จ กมฺเมสุ จ เยน เกนจิ องฺเคน ยํกิญฺจิ กมฺมํ ววตฺถเปตฺวา ตํ ภิกฺขุํ กมฺมารหํ กตฺวา กมฺมํ กเรยฺย. อยเมตฺถ วินิจฺฉโย. เอวํ ปุพฺเพนาปรํ สเมติ. 'भिक्खूंनो, तीन भिक्खूंचे...' इत्यादी वचन एका जरी अंगाने (कारणाने) तज्जनीय कम्म करणे योग्य आहे, हे दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी सांगितले आहे. कारण, तज्जनीय कम्माचे विशेष अंग म्हणजे भांडणखोर असणे (भण्डनकारकत्व), नियस्स कम्माचे अंग म्हणजे वारंवार आपत्तीत पडणे (अभिण्हापत्तिकत्व) आणि पब्बाजनीय कम्माचे अंग म्हणजे कुळांना दूषित करणे (कुलदूषकत्व) असे सांगितले आहे. परंतु, या तीन अंगांपैकी कोणत्याही एका अंगाने सर्व कम्मे करणे योग्य आहे. जर असे असेल, तर चम्पेय्यक्खन्धकात जे सांगितले आहे की—'तज्जनीय कम्मास पात्र असलेल्या भिक्खूवर नियस्स कम्म करतो...पे... उपसंपदेस पात्र असलेल्याचे अब्भान करतो; हे उपाली, अधम्मकम्म आणि अविनयकम्म आहे, आणि यामुळे संघ दोषास पात्र ठरतो'—हे वचन परस्परविरोधी ठरत नाही का? अशी शंका उपस्थित होते. आणि हे परस्परविरोधी नाही. का? कारण शब्दांच्या अर्थांमधील भिन्नतेमुळे. कारण, 'तज्जनीयकम्मारहस्स' या शब्दाचा अर्थ 'कम्माचा निश्चय' असा आहे, तर 'तिण्णं, भिक्खवे' इत्यादी वचनाचा अर्थ 'अंगांची (कारणांची) शक्यता' असा आहे. म्हणून, जेव्हा संघाने एकत्र येऊन 'या भिक्खूवर अमुक कम्म करूया' असा निश्चय केलेला असतो, तेव्हा तो भिक्खू 'कम्मारह' (कम्मास पात्र) होतो. या लक्षणाने, अशा तज्जनीय कम्मास पात्र ठरलेल्या भिक्खूवर नियस्स कम्म इत्यादी करणे हे 'अधम्मकम्म' आणि 'अविनयकम्म' आहे, असे समजावे. परंतु, ज्या भिक्खूमध्ये भांडणखोर असणे इत्यादी अंगांपैकी कोणतेही एक अंग असेल, तर संघ इच्छेनुसार, अनुमत अंगांमध्ये आणि कम्मांमध्ये कोणत्याही एका अंगाने कोणतेही कम्म निश्चित करून, त्या भिक्खूला कम्मास पात्र ठरवून कम्म करू शकतो. हा येथे निर्णय आहे. अशा प्रकारे पूर्व आणि उत्तर वचनांमध्ये सुसंगती येते. ตตฺถ กิญฺจาปิ ตชฺชนียกมฺเม ภณฺฑนการกวเสน กมฺมวาจา วุตฺตา, อถ โข พาลสฺส อพฺยตฺตสฺส อาปตฺติพหุลสฺส ตชฺชนียกมฺมํ กโรนฺเตน พาลอพฺยตฺตวเสเนว กมฺมวาจา กาตพฺพา. เอวญฺหิ ภูเตน วตฺถุนา กตํ กมฺมํ โหติ, น จ อญฺญสฺส กมฺมสฺส วตฺถุนา. กสฺมา? ยสฺมา อิทมฺปิ อนุญฺญาตนฺติ. เอส นโย สพฺพตฺถ. อฏฺฐารส สมฺมาวตฺตนวตฺถูนิ ปาริวาสิกกฺขนฺธเก วณฺณยิสฺสาม. त्या कम्मांमध्ये, जरी तज्जनीय कम्मात भांडणखोर असण्याच्या संबंधाने कम्मवाचा सांगितली असली, तरीही अज्ञानी (बाल), अकुशल (अव्यत्त) आणि वारंवार आपत्तीत पडणाऱ्या भिक्खूवर तज्जनीय कम्म करताना संघाने बाल-अव्यत्त या कारणानेच कम्मवाचा केली पाहिजे. कारण अशा प्रकारे खऱ्या कारणाने केलेले कम्म होते, आणि इतर कम्माच्या कारणाने केलेले कम्म होत नाही. का? कारण हे देखील अनुमत आहे. हाच नियम सर्वत्र लागू होतो. अठरा सम्यक्-वर्तन वस्तूंचे (सम्मावत्तनवत्थु) वर्णन आम्ही पारिवासिकक्खन्धकात करू. อธมฺมกมฺมทฺวาทสกกถา นิฏฺฐิตา. अधम्मकम्मद्वादसककथा समाप्त. นปฺปฏิปฺปสฺสมฺเภตพฺพอฏฺฐารสกาทิกถา नप्पटिप्पस्सम्भेतब्बअट्ठासरकादिकथा ๘. โลมํ [Pg.3] ปาเตนฺตีติ ปนฺนโลมา โหนฺติ; ภิกฺขู อนุวตฺตนฺตีติ อตฺโถ. เนตฺถารํ วตฺตนฺตีติ นิตฺถรนฺตานํ เอตนฺติ เนตฺถารํ; เยน สกฺกา นิสฺสารณา นิตฺถริตุํ, ตํ อฏฺฐารสวิธํ สมฺมาวตฺตนํ วตฺตนฺตีติ อตฺโถ. กิตฺตกํ กาลํ วตฺตํ ปูเรตพฺพนฺติ? ทส วา ปญฺจ วา ทิวสานิ. อิมสฺมิญฺหิ กมฺมกฺขนฺธเก เอตฺตเกน วตฺตํ ปูริตเมว โหติ. ८. 'लोमं पातेंती' म्हणजे नम्र झालेले (ज्यांचे मान-मर्यादेचे केस गळून पडले आहेत) असतात; ते भिक्खूंचे अनुकरण करतात, असा अर्थ आहे. 'नेत्थारं वत्तन्ती' म्हणजे कम्मातून मुक्त होणाऱ्यांचे हे वर्तन आहे, म्हणून याला 'नेत्थार' म्हणतात; ज्या योग्य वर्तनाने निष्कासन (निस्सारणा) कम्मातून मुक्त होणे शक्य आहे, त्या अठरा प्रकारच्या सम्यक्-वर्तनाचे ते पालन करतात, असा अर्थ आहे. किती काळापर्यंत या वर्तनाचे पालन केले पाहिजे? दहा किंवा पाच दिवस. कारण या कम्मक्खन्धकात एवढ्या काळाने वर्तन पूर्णच होते. นปฺปฏิปฺปสฺสมฺเภตพฺพอฏฺฐารสกาทิกถา นิฏฺฐิตา. नप्पटिप्पस्सम्भेतब्बअट्ठासरकादिकथा समाप्त. นิยสฺสกมฺมกถา नियस्सकम्मकथा ๑๑. เสยฺยสกวตฺถุสฺมึ – อปิสฺสุ ภิกฺขู ปกตาติ อปิสฺสุ ภิกฺขู นิจฺจํ พฺยาวฏา โหนฺติ. เสสํ ตชฺชนีเย วุตฺตสทิสเมว. ११. सेय्यसकच्या कथेत—'अपिस्सु भिक्खू पकता' म्हणजे भिक्खू देखील नेहमी काळजीपूर्वक व्यस्त असतात. उर्वरित भाग तज्जनीय कम्मात सांगितल्याप्रमाणेच आहे. นิยสฺสกมฺมกถา นิฏฺฐิตา. नियस्सकम्मकथा समाप्त. ปพฺพาชนียกมฺมกถา पब्बाजनीयकम्मकथा ๒๑. อสฺสชิปุนพฺพสุกวตฺถุ สงฺฆาทิเสสวณฺณนายํ วุตฺตํ. २१. अस्सजि आणि पुनब्बसु यांची कथा संघादिसेसच्या वर्णनात सांगितली आहे. ๒๗. กายิเกน ทเวนาติอาทีสุ ปเนตฺถ กายิโก ทโว นาม กายกีฬา วุจฺจติ. เสสปททฺวเยปิ เอเสว นโย. กายิโก อนาจาโร นาม กายทฺวาเร ปญฺญตฺตสิกฺขาปทวีติกฺกโม วุจฺจติ. เสสทฺวเยปิ เอเสว นโย. กายิกํ อุปฆาติกํ นาม กายทฺวาเร ปญฺญตฺตสิกฺขาปทสฺส อสิกฺขนภาเวน อุปหนนํ วุจฺจติ; นาสนํ วินาสนนฺติ อตฺโถ. เสสทฺวเยปิ เอเสว นโย. กายิโก มิจฺฉาชีโว นาม ปฏิกฺขิตฺตเวชฺชกมฺมาทิวเสน เตลปจนอริฏฺฐปจนาทีนิ. วาจสิโก มิจฺฉาชีโว นาม คิหีนํ สาสนสมฺปฏิจฺฉนาโรจนาทีนิ. กายิกวาจสิโก นาม ตทุภยํ. เสสํ ตชฺชนีเย วุตฺตนยเมว. २७. येथे 'कायिकेन दवेन' इत्यादी पदांमध्ये—शरीराने खेळणे याला 'कायिक दव' (शारीरिक क्रीडा) असे म्हणतात. उर्वरित दोन पदांमध्येही हाच नियम आहे. कायद्वाराने प्रज्ञप्त केलेल्या (सांगितलेल्या) शिक्षापदांचे उल्लंघन करणे याला 'कायिक अनाचार' म्हणतात. उर्वरित दोन पदांमध्येही हाच नियम आहे. कायद्वाराने प्रज्ञप्त केलेल्या शिक्षापदांचे आचरण न केल्यामुळे त्यांचा नाश करणे याला 'कायिक उपघातिक' म्हणतात; नाश करणे किंवा विनाश करणे असा याचा अर्थ आहे. उर्वरित दोन पदांमध्येही हाच नियम आहे. 'कायिक मिच्छाजीव' (शारीरिक चुकीची उपजीविका) म्हणजे निषिद्ध वैद्यकीय कर्माद्वारे तेल शिजवणे, अरिष्ट (औषधी काढा) शिजवणे इत्यादी करणे. 'वाचसिक मिच्छाजीव' (वाचिक चुकीची उपजीविका) म्हणजे गृहस्थांचे निरोप स्वीकारणे, त्यांना निरोप देणे इत्यादी. 'कायिक-वाचसिक' म्हणजे हे दोन्ही मिळून होणारे. उर्वरित भाग तज्जनीय कम्मात सांगितलेल्या पद्धतीप्रमाणेच आहे. ปพฺพาชนียกมฺมกถา นิฏฺฐิตา. पब्बाजनीयकम्मकथा समाप्त. ปฏิสารณียกมฺมกถา पटिसारणीयकम्मकथा ๓๓. สุธมฺมวตฺถุสฺมึ ปน – อนปโลเกตฺวาติ น อาปุจฺฉิตฺวา. เอตทโวจาติ กึ เต คหปติ เถรานํ ปฏิยตฺตนฺติ สพฺพํ วิวราเปตฺวา ทิสฺวา เอตํ อโวจ. เอกา จ โข อิธ นตฺถิ ยทิทํ ติลสํคุฬิกาติ ยา อยํ ติลสกฺขลิกา นาม วุจฺจติ, สา นตฺถีติ อตฺโถ. ตสฺส กิร คหปติโน [Pg.4] วํเส อาทิมฺหิ เอโก ปูวิโย อโหสิ. เตน นํ เถโร ชาติยา ขุํเสตุกาโม เอวมาห. ยเทว กิญฺจีติ เอวํ พหุํ พุทฺธวจนํ รตนํ ปหาย กิญฺจิเทว ติลสํคุฬิกาวจนํ ภาสิตํ. กุกฺกุฏโปตกอุทาหรเณน อิทํ ทสฺเสติ ‘‘ยถา โส เนว กากวสฺสิตํ น กุกฺกุฏวสฺสิตํ อกาสิ, เอวํ ตยาปิ เนว ภิกฺขุวจนํ น คิหิวจนํ วุตฺต’’นฺติ. ३३. सुधम्माच्या कथेत तर—'अनपलोकेत्वा' म्हणजे न विचारता. 'एतदवोच' म्हणजे 'हे गृहपती, तुम्ही थेरांसाठी काय तयार केले आहे?' असे विचारून सर्व काही उघडून पाहून हे म्हणाले. 'एका च खो इध नत्थि यदिदं तिलसंगुळिका' म्हणजे जिला 'तिलसक्खलिका' (तिळाची वडी) म्हटले जाते, ती येथे नाही, असा अर्थ आहे. असे ऐकिवात आहे की, त्या गृहपतीच्या वंशाच्या सुरुवातीला एक पूर्वज मिठाईवाला (मोदक बनवणारा) होता. त्यामुळे थेरांनी त्याला जातीवरून टोमणा मारण्याच्या (निंदा करण्याच्या) उद्देशाने असे म्हटले. 'यदेव किञ्चि' म्हणजे एवढे मोठे बुद्धवचनरूपी रत्न सोडून केवळ तिळाच्या वडीसारखे क्षुल्लक शब्द बोलले गेले. कोंबडीच्या पिल्लाच्या उदाहरणाने हे दर्शवले आहे की—'ज्याप्रमाणे त्या पिल्लाने कावळ्याचा आवाज काढला नाही आणि कोंबड्याचाही आवाज काढला नाही, त्याचप्रमाणे आपण देखील भिक्खूंचे वचन बोलला नाहीत आणि गृहस्थांचेही वचन बोलला नाहीत.' ปฏิสารณียกมฺมกถา นิฏฺฐิตา. पटिसारणीयकम्मकथा समाप्त. อธมฺมกมฺมาทิทฺวาทสกกถา अधम्मकम्मादिद्वादसककथा ๓๗. อสมฺมุขา กตนฺติอาทโย ติกา วุตฺตปฺปการา เอว. ३७. 'असम्मुखा कतं' इत्यादी त्रिक आधी सांगितलेल्या प्रकाराप्रमाणेच आहेत. ๓๙. องฺคสมนฺนาคโม ปุริเมหิ อสทิโส. ตตฺถ ยถา ลาภํ น ลภนฺติ; เอวํ ปริสกฺกนฺโต ปรกฺกมนฺโต อลาภาย ปริสกฺกติ นาม. เอส นโย อนตฺถาทีสุ. ตตฺถ อนตฺโถติ อตฺถภงฺโค. อนาวาโสติ ตสฺมึ ฐาเน อวสนํ. คิหีนํ พุทฺธสฺส อวณฺณนฺติ คิหีนํ สนฺติเก พุทฺธสฺส อวณฺณํ ภาสติ. ธมฺมิกํ ปฏิสฺสวํ น สจฺจาเปตีติ ยถา สจฺโจ โหติ, เอวํ น กโรติ; วสฺสาวาสํ ปฏิสฺสุณิตฺวา น คจฺฉติ, อญฺญํ วา เอวรูปํ กโรติ. ปญฺจนฺนํ ภิกฺขเวติอาทิ เอกงฺเคนปิ กมฺมารหภาวทสฺสนตฺถํ วุตฺตํ. เสสเมตฺถ อุตฺตานตฺถญฺเจว, ตชฺชนีเย จ วุตฺตนยเมว. ३९. अंगांची पूर्तता (वैशिष्ट्ये) पूर्वीच्या कर्मांपेक्षा वेगळी आहे. त्या अंगांमध्ये, ज्या प्रकारे लाभ मिळत नाही, अशा प्रकारे प्रयत्न करणारा व पराक्रम करणारा भिक्खू 'अलाभासाठी प्रयत्न करणारा' (अलाभाय परिसक्कती) म्हटला जातो. हाच नियम 'अनर्थ' इत्यादी शब्दांच्या बाबतीतही समजावा. त्यामध्ये 'अनर्थ' म्हणजे हिताचा नाश होय. 'अनावास' म्हणजे त्या ठिकाणी राहू न शकणे. 'गृहस्थांजवळ बुद्धांचा अवर्ण' म्हणजे गृहस्थांच्या समोर बुद्धांचे अवर्ण (निंदा) बोलणे होय. 'धार्मिक प्रतिज्ञेचे पालन न करणे' म्हणजे ज्या प्रकारे प्रतिज्ञा खरी ठरेल, त्या प्रकारे न वागणे; जसे की वर्षावास स्वीकारूनही न जाणे किंवा अशाच प्रकारची इतर कोणतीही प्रतिज्ञा मोडणे. 'पाच भिक्खूंनो' इत्यादी वचन भगवंतांनी एका अंगाने (कारणाने) सुद्धा कर्म करण्यास पात्र असल्याचे दाखवण्यासाठी सांगितले आहे. यातील उर्वरित भाग स्पष्ट अर्थाचा आहे आणि तज्जनीय कर्मामध्ये सांगितलेल्या पद्धतीप्रमाणेच आहे. อธมฺมกมฺมาทิทฺวาทสกกถา นิฏฺฐิตา. अधम्मकर्म इत्यादी बारा कथा समाप्त झाल्या. อาปตฺติยา อทสฺสเน อุกฺเขปนียกมฺมกถา आपत्ती न पाहिल्याबद्दल (मान्य न केल्याबद्दल) उत्क्षेपणीय कर्माची कथा. ๔๖. ฉนฺนวตฺถุสฺมึ – อาวาสปรมฺปรญฺจ ภิกฺขเว สํสถาติ สพฺพาวาเสสุ อาโรเจถ. ४६. छन्न भिक्खूच्या बाबतीत— 'भिक्खूंनो, एका विहारातून दुसऱ्या विहारात सांगा' म्हणजे सर्व विहारांमध्ये सांगा (जाहीर करा). ๕๐. ภณฺฑนการโกติอาทีสุ ภณฺฑนาทิปจฺจยา อาปนฺนํ อาปตฺตึ โรเปตฺวา ตสฺสา อทสฺสเนเยว กมฺมํ กาตพฺพํ. ติกา วุตฺตปฺปการา เอว. ५०. 'भांडण करणारा' इत्यादींच्या बाबतीत, भांडण इत्यादी कारणांमुळे झालेल्या आपत्तीचा (दोषाचा) आरोप करून, ती आपत्ती न पाहिल्यामुळेच (मान्य न केल्यामुळेच) उत्क्षेपणीय कर्म केले पाहिजे. त्रिक (तिक) पूर्वी सांगितलेल्या प्रकाराप्रमाणेच आहेत. ๕๑. สมฺมาวตฺตนายํ ปเนตฺถ เตจตฺตาลีส วตฺตานิ. ตตฺถ น อนุทฺธํเสตพฺโพติ น โจเทตพฺโพ. น ภิกฺขุ ภิกฺขูหีติ อญฺโญ ภิกฺขุ อญฺเญหิ ภิกฺขูหิ น ภินฺทิตพฺโพ. น คิหิทฺธโชติ โอทาตวตฺถานิ อจฺฉินฺนทสปุปฺผทสานิ จ น ธาเรตพฺพานิ. น ติตฺถิยทฺธโชติ กุสจีราทีนิ น ธาเรตพฺพานิ. น อาสาเทตพฺโพติ น อปสาเทตพฺโพ. อนฺโต วา พหิ วาติ วิหารสฺส อนฺโต วา พหิ วา. น ติตฺถิยาทิปทตฺตยํ อุตฺตานเมว[Pg.5]. เสสํ สพฺพํ ปาริวาสิกกฺขนฺธเก วณฺณยิสฺสาม. เสสํ ตชฺชนีเย วุตฺตนยเมว. อาปตฺติยา อปฺปฏิกมฺเม อุกฺเขปนียกมฺมํ อิมินา สทิสเมว. ५१. परंतु येथे सम्यक वर्तनामध्ये (योग्य आचरणात) त्रेचाळीस कर्तव्ये आहेत. त्यामध्ये 'आरोप करू नये' म्हणजे चोदना करू नये. 'भिक्खूने भिक्खूंना...' म्हणजे इतर भिक्खूंनी इतर भिक्खूंशी भेद (फूट) पाडू नये. 'गृहस्थांचे चिन्ह धारण करू नये' म्हणजे पांढरी वस्त्रे आणि न कापलेल्या कडा असलेली किंवा फुलांची नक्षी असलेली वस्त्रे परिधान करू नयेत. 'तीर्थकांचे चिन्ह धारण करू नये' म्हणजे कुशाचे (गवताचे) चीवर इत्यादी परिधान करू नयेत. 'आसादन करू नये' म्हणजे दूर घालवू नये (अपमानित करू नये). 'आत किंवा बाहेर' म्हणजे विहाराच्या आत किंवा बाहेर. 'न तित्थिया' इत्यादी तीन पदे अगदी स्पष्ट अर्थाची आहेत. उर्वरित सर्व गोष्टींचे वर्णन आम्ही पारिवासिक खंधकामध्ये करू. उर्वरित भाग तज्जनीय कर्मामध्ये सांगितलेल्या पद्धतीप्रमाणेच आहे. आपत्तीची (दोषाची) दुरुस्ती न केल्याबद्दलचे उत्क्षेपणीय कर्म या कर्मासारखेच आहे. ๖๕. อริฏฺฐวตฺถุ ขุทฺทกวณฺณนายํ วุตฺตํ. ‘‘ภณฺฑนการโก’’ติอาทีสุ ยํ ทิฏฺฐึ นิสฺสาย ภณฺฑนาทีนิ กโรติ, ตสฺสา อปฺปฏินิสฺสคฺเคเยว กมฺมํ กาตพฺพํ. เสสํ ตชฺชนีเย วุตฺตนยเมว. สมฺมาวตฺตนายมฺปิ หิ อิธ เตจตฺตาลีสํเยว วตฺตานีติ. ६५. अरिट्ठ भिक्खूची कथा खुद्दकवत्तूच्या वर्णनात माझ्याकडून सांगितली गेली आहे. 'भांडण करणारा' इत्यादींच्या बाबतीत, ज्या (मिथ्या) दृष्टीचा आश्रय घेऊन तो भांडण इत्यादी करतो, त्या दृष्टीचा त्याग न केल्यामुळेच उत्क्षेपणीय कर्म केले पाहिजे. उर्वरित भाग तज्जनीय कर्मामध्ये सांगितलेल्या पद्धतीप्रमाणेच आहे. कारण येथे सम्यक वर्तनामध्ये देखील त्रेचाळीस कर्तव्येच आहेत. อาปตฺติยา อทสฺสเน อุกฺเขปนียกมฺมกถา นิฏฺฐิตา. आपत्ती न पाहिल्याबद्दल (मान्य न केल्याबद्दल) उत्क्षेपणीय कर्माची कथा समाप्त झाली. กมฺมกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. कर्मखंधकाचे वर्णन समाप्त झाले. ๒. ปาริวาสิกกฺขนฺธกํ २. पारिवासिक खंधक ปาริวาสิกวตฺตกถา पारिवासिक वत्तकथा (पारिवासिक भिक्खूंच्या कर्तव्यांची कथा) ๗๕. ปาริวาสิกกฺขนฺธเก [Pg.6] – ปาริวาสิกาติ ปริวาสํ ปริวสนฺตา. ตตฺถ จตุพฺพิโธ ปริวาโส – อปฺปฏิจฺฉนฺนปริวาโส, ปฏิจฺฉนฺนปริวาโส, สุทฺธนฺตปริวาโส, สโมธานปริวาโสติ. เตสุ ‘‘โย, ภิกฺขเว, อญฺโญปิ อญฺญติตฺถิยปุพฺโพ อิมสฺมึ ธมฺมวินเย อากงฺขติ ปพฺพชฺชํ, อากงฺขติ อุปสมฺปทํ, ตสฺส จตฺตาโร มาเส ปริวาโส ทาตพฺโพ’’ติ (มหาว. ๘๖) เอวํ มหาขนฺธเก วุตฺโต ติตฺถิยปริวาโส อปฺปฏิจฺฉนฺนปริวาโส นาม. ตตฺถ ยํ วตฺตพฺพํ ตํ วุตฺตเมว. อยํ ปน อิธ อนธิปฺเปโต. เสสา ตโย เยน สงฺฆาทิเสสาปตฺติ อาปนฺนา เจว โหติ ปฏิจฺฉาทิตา จ, ตสฺส ทาตพฺพา. เตสุ ยํ วตฺตพฺพํ ตํ สมุจฺจยกฺขนฺธเก วกฺขาม. เอเต ปน อิธ อธิปฺเปตา. ตสฺมา เอเตสุ ยํกิญฺจิ ปริวาสํ ปริวสนฺตา ‘‘ปาริวาสิกา’’ติ เวทิตพฺพา. ७५. पारिवासिक खंधकामध्ये— 'पारिवासिक' म्हणजे परिवास (प्रायश्चित्त काळ) पाळणारे भिक्खू. त्यामध्ये परिवास चार प्रकारचा असतो— अप्पटिच्छन्न परिवास, पटिच्छन्न परिवास, सुद्धंत परिवास आणि समोधान परिवास. त्यांपैकी, "भिक्खूंनो, जो कोणी पूर्वी इतर पंथाचा असलेला या धम्म-विनयात प्रव्रज्या आणि उपसंपदा इच्छितो, त्याला चार महिन्यांचा परिवास दिला पाहिजे," अशा प्रकारे महाखंधकामध्ये सांगितलेला तीर्थक परिवास हा 'अप्पटिच्छन्न परिवास' होय. त्याविषयी जे काही सांगायचे होते, ते आधीच सांगितले गेले आहे. परंतु, हा परिवास येथे अभिप्रेत नाही. उर्वरित तीन परिवास अशा भिक्खूला दिले जातात, ज्याच्याकडून संघादिसेस आपत्ती घडली आहे आणि ती त्याने लपवून ठेवली आहे. त्याविषयी जे काही सांगायचे आहे, ते आम्ही समुच्चय खंधकामध्ये सांगू. परंतु, हे three परिवास येथे अभिप्रेत आहेत. म्हणून, यांपैकी कोणत्याही परिवासाचे पालन करणाऱ्या भिक्खूंना 'पारिवासिक' भिक्खू समजावे. ปกตตฺตานํ ภิกฺขูนนฺติ ฐเปตฺวา นวกตรํ ปาริวาสิกํ อวเสสานํ อนฺตมโส มูลายปฏิกสฺสนารหาทีนมฺปิ. อภิวาทนปจฺจุฏฺฐานนฺติ ยํ เต อภิวาทนาทึ กโรนฺติ, ตํ สาทิยนฺติ, สมฺปฏิจฺฉนฺติ; น ปฏิกฺขิปนฺตีติ อตฺโถ. ตตฺถ สามีจิกมฺมนฺติ ฐเปตฺวา อภิวาทนาทีนิ อญฺญสฺส อนุจฺฉวิกสฺส พีชนวาตทานาทิโน อาภิสมาจาริกสฺเสตํ อธิวจนํ. อาสนาภิหารนฺติ อาสนสฺส อภิหรณํ, อาสนํ คเหตฺวา อภิคมนํ ปญฺญาปนเมว วา. เสยฺยาภิหาเรปิ เอเสว นโย. ปาโททกนฺติ ปาทโธวนอุทกํ. ปาทปีฐนฺติ โธตปาทฏฺฐปนกํ. ปาทกถลิกนฺติ อโธตปาทฏฺฐปนกํ ปาทฆํสนํ วา. อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ สทฺธิวิหาริกานมฺปิ สาทิยนฺตสฺส ทุกฺกฏเมว, ตสฺมา เต วตฺตพฺพา – ‘‘อหํ วินยกมฺมํ กโรมิ, มยฺหํ วตฺตํ มา กโรถ, มา มํ คามปฺปเวสนํ อาปุจฺฉถา’’ติ. สเจ สทฺธาปพฺพชิตา กุลปุตฺตา ‘‘ตุมฺเห, ภนฺเต, ตุมฺหากํ วินยกมฺมํ กโรถา’’ติ วตฺวา วตฺตํ กโรนฺติ, คามปฺปเวสนมฺปิ อาปุจฺฉนฺติเยว, วาริตกาลโต ปฏฺฐาย อนาปตฺติ. มิถุ ยถาวุฑฺฒนฺติ ปาริวาสิกภิกฺขูนํ อญฺญมญฺญํ โย โย วุฑฺโฒ เตน เตน นวกตรสฺส สาทิตุํ. 'प्रकृतत्व भिक्खूंचे' म्हणजे स्वतःपेक्षा कनिष्ठ असलेल्या पारिवासिक भिक्खूला सोडून, उर्वरित सर्व भिक्खूंचे, अगदी मूलायपटिकस्सनार्ह (मूळ शिक्षेकडे परत पाठवण्यास पात्र) इत्यादी भिक्खूंचे सुद्धा. 'अभिवादन व प्रत्युत्थान' म्हणजे ते (प्रकृतत्व भिक्खू) जे अभिवादन इत्यादी करतात, त्याचा स्वीकार करणे, ते मान्य करणे आणि त्याचा निषेध न करणे, असा अर्थ आहे. त्यामध्ये 'सामीचीकर्म' (योग्य आदरयुक्त सेवा) म्हणजे अभिवादन इत्यादी सोडून, इतर योग्य अशा सेवा जसे की पंख्याने वारा घालणे इत्यादी आभिसमाचारिक (शिष्टाचारयुक्त) कर्तव्यांचे नाव आहे. 'आसनाभिहार' म्हणजे आसन आणणे, आसन घेऊन समोर जाणे किंवा आसन मांडणे होय. 'शय्याभिहार' (बिछाना आणणे) या बाबतीतही हाच नियम आहे. 'पादोदक' म्हणजे पाय धुण्याचे पाणी. 'पादपीठ' म्हणजे धुतलेले पाय ठेवण्याची चौकी. 'पादकथलिक' म्हणजे न धुतलेले पाय ठेवण्याची जागा किंवा पाय घासण्याची वस्तू होय. 'दुक्कट आपत्ती' म्हणजे स्वतःच्या सद्धि विहारिकांकडून (शिष्यांकडून) देखील अभिवादन इत्यादी स्वीकारणाऱ्या भिक्खूला दुक्कट आपत्तीच होते. म्हणून त्यांना सांगावे की— "मी विनयकर्म करत आहे, माझ्यासाठी कोणतीही सेवा करू नका, आणि मला गावात प्रवेश करण्याविषयी विचारू नका." जर श्रद्धेने प्रव्रजित झालेले कुलपुत्र "भंते, आपण आपले विनयकर्म करा," असे म्हणून सेवा करतच राहिले आणि गावात प्रवेश करण्याविषयी विचारतच राहिले, तर मनाई केल्याच्या वेळेपासून पुढे आपत्ती होत नाही. 'परस्परांमध्ये ज्येष्ठतेनुसार' म्हणजे पारिवासिक भिक्खूंमध्ये आपापसात जो जो ज्येष्ठ असेल, त्याने स्वतःपेक्षा कनिष्ठ असलेल्या भिक्खूचे अभिवादन इत्यादी स्वीकारण्यास (परवानगी आहे). ปญฺจ [Pg.7] ยถาวุฑฺฒนฺติ ปกตตฺเตหิปิ สทฺธึ วุฑฺฒปฏิปาฏิยา เอว. ตสฺมา ปาติโมกฺเข อุทฺทิสฺสมาเน หตฺถปาเส นิสีทิตุํ วฏฺฏติ. มหาปจฺจริยํ ปน ‘‘ปาฬิยา อนิสีทิตฺวา ปาฬึ วิหาย หตฺถปาสํ อมุญฺจนฺเตน นิสีทิตพฺพ’’นฺติ วุตฺตํ. ปาริสุทฺธิอุโปสเถ กรียมาเน สงฺฆนวกฏฺฐาเน นิสีทิตฺวา ตตฺเถว นิสินฺเนน อตฺตโน ปาฬิยา ปาริสุทฺธิอุโปสโถ กาตพฺโพ. ปวารณายปิ สงฺฆนวกฏฺฐาเน นิสีทิตฺวา ตตฺเถว นิสินฺเนน อตฺตโน ปาฬิยา ปวาเรตพฺพํ. สงฺเฆน ฆณฺฏึ ปหริตฺวา ภาชียมานํ วสฺสิกสาฏิกมฺปิ อตฺตโน ปตฺตฏฺฐาเน คเหตุํ วฏฺฏติ. 'पाच गोष्टी ज्येष्ठतेनुसार' म्हणजे प्रकृतत्व भिक्खूंसोबत देखील ज्येष्ठतेच्या क्रमानेच कराव्यात. म्हणून पातिमोक्खाचे पठण केले जात असताना हस्तपासामध्ये बसणे योग्य आहे. परंतु महाप्रत्यरीमध्ये म्हटले आहे की— "क्रमाने न बसता, क्रम सोडून, हस्तपास न सोडता बसले पाहिजे." पारिसुद्धि उपोसथ केला जात असताना, संघातील कनिष्ठ भिक्खूच्या जागेवर बसून, तेथेच बसलेल्या अवस्थेत आपल्या क्रमानुसार पारिसुद्धि उपोसथ केला पाहिजे. पवारणेच्या वेळी देखील संघातील कनिष्ठ भिक्खूच्या जागेवर बसून, तेथेच बसलेल्या अवस्थेत आपल्या क्रमानुसार पवारणा केली पाहिजे. संघाद्वारे घंटा वाजवून वाटप केले जाणारे वर्षावासिक वस्त्र देखील आपल्या वाटणीच्या जागी घेणे योग्य आहे. โอโณชนนฺติ วิสฺสชฺชนํ วุจฺจติ. สเจ หิ ปาริวาสิกสฺส ทฺเว ตีณิ อุทฺเทสภตฺตาทีนิ ปาปุณนฺติ, อญฺญา จสฺส ปุคฺคลิกภตฺตปจฺจาสา โหติ, ตานิ ปฏิปาฏิยา คเหตฺวา ‘‘ภนฺเต, เหฏฺฐา คาเหถ, อชฺช มยฺหํ ภตฺตปจฺจาสา อตฺถิ, สฺเว คณฺหิสฺสามี’’ติ วตฺวา วิสฺสชฺเชตพฺพานิ. เอวํ ตานิ ปุนทิวเสสุ คณฺหิตุํ ลภติ. ปุนทิวเส สพฺพปฐมํ เอตสฺส ทาตพฺพนฺติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. ยทิ ปน น คณฺหาติ น วิสฺสชฺเชติ, ปุนทิวเส น ลภติ, อิทํ โอโณชนํ นาม ปาริวาสิกสฺเสว โอทิสฺส อนุญฺญาตํ. กสฺมา? ตสฺส หิ สงฺฆนวกฏฺฐาเน นิสินฺนสฺส ภตฺตคฺเค ยาคุขชฺชกาทีนิ ปาปุณนฺติ วา น วา, ตสฺมา โส ‘‘ภิกฺขาหาเรน มา กิลมิตฺถา’’ติ อิทมสฺส สงฺคหกรณตฺถาย โอทิสฺส อนุญฺญาตํ. ओणोजन म्हणजे त्याग करणे (विसर्जन) असे म्हटले जाते. जर पारिवासिक भिक्खूला दोन किंवा तीन उद्देशभक्त (विशिष्ट भोजन) इत्यादी प्राप्त झाले आणि त्याला दुसऱ्या वैयक्तिक भोजनाची (पुग्गलिकभक्त) आशा असेल, तर त्याने ती अनुक्रमाने घेऊन, 'भंते, माझ्या खालील (कनिष्ठ) भिक्खूला हे द्यावे, आज मला भोजनाची आशा आहे, मी उद्या हे घेईन' असे सांगून त्यांचा त्याग करावा. असे केल्याने त्याला पुढील दिवसांमध्ये ते ग्रहण करण्याची संधी मिळते. पुढील दिवशी सर्वात आधी त्यालाच ते दिले जावे, असे कुरुन्दीमध्ये म्हटले आहे. परंतु जर त्याने ते घेतले नाही आणि त्याचा त्यागही केला नाही, तर पुढील दिवशी त्याला ते मिळत नाही. हे 'ओणोजन' केवळ पारिवासिक भिक्खूला उद्देशूनच अनुमत केले गेले आहे. ते कशासाठी? कारण संघात सर्वात कनिष्ठ स्थानी बसलेल्या त्या पारिवासिक भिक्खूला भोजनशाळेत पेज (यागु), खाद्यपदार्थ इत्यादी मिळतात किंवा मिळत नाहीत. म्हणून 'तो भिक्षान्नाअभावी थकून जाऊ नये' या विचाराने, त्याच्यावर अनुग्रह करण्यासाठी हे त्याला उद्देशून अनुमत केले गेले आहे. ภตฺตนฺติ อาคตาคเตหิ วุฑฺฒปฏิปาฏิยา คเหตฺวา คนฺตพฺพํ วิหาเร สงฺฆสฺส จตุสฺสาลภตฺตํ, เอตํ ยถาวุฑฺฒํ ลภติ. ปาฬิยา ปน คนฺตุํ วา ฐาตุํ วา น ลภติ, ตสฺมา ปาฬิโต โอสกฺกิตฺวา หตฺถปาเส ฐิเตน หตฺถํ ปสาเรตฺวา ยถา เสโน นิปติตฺวา คณฺหาติ, เอวํ คณฺหิตพฺพํ. อารามิกสมณุทฺเทเสหิ อาหราเปตุํ น ลภติ. สเจ สยเมว อาหรนฺติ, วฏฺฏติ. รญฺโญ มหาเปฬภตฺเตปิ เอเสว นโย. จตุสฺสาลภตฺเต ปน สเจ โอโณชนํ กตฺตุกาโม โหติ, อตฺตโน อตฺถาย อุกฺขิตฺเต ปิณฺเฑ ‘‘อชฺช เม ภตฺตํ อตฺถิ, สฺเว คณฺหิสฺสามี’’ติ วตฺตพฺพํ. ปุนทิวเส ทฺเว ปิณฺเฑ ลภตีติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. อุทฺเทสภตฺตาทีนิปิ ปาฬิโต โอสกฺกิตฺวาว คเหตพฺพานิ. ยตฺถ ปน นิสีทาเปตฺวา ปริวิสนฺติ, ตตฺถ สามเณรานํ เชฏฺฐเกน ภิกฺขูนํ สงฺฆนวเกน หุตฺวา นิสีทิตพฺพํ. भोजन म्हणजे येणाऱ्या-जाणाऱ्या भिक्खूंनी ज्येष्ठतेच्या क्रमाने घेऊन जावे असे विहारातील संघाचे चतुःशालभक्त (भोजनशाळेतील भोजन) होय; हे ज्येष्ठतेनुसार मिळते. परंतु पारिवासिक भिक्खूला रांगेत जाण्याची किंवा उभे राहण्याची परवानगी नसते. म्हणून रांगेतून बाजूला होऊन, हस्तपाश अंतरावर उभे राहून, हात पसरून, ज्याप्रमाणे ससाणा झडप घालून अन्न उचलतो, त्याप्रमाणे त्याने ते ग्रहण करावे. विहार सेवक (आरामिक) किंवा सामणेर यांच्याकडून ते मागवून घेण्याची त्याला परवानगी नाही. जर ते स्वतःहून आणून देत असतील, तर ते योग्य आहे. राजाच्या महापेळभक्तामध्ये (मोठ्या टोपलीतील भोजनात) देखील हाच नियम लागू होतो. परंतु जर चतुःशालभक्तामध्ये त्याला त्याग (ओणोजन) करण्याची इच्छा असेल, तर स्वतःसाठी वाढलेल्या अन्नाचा पिंड उचलला जात असताना, 'आज माझ्याकडे भोजन आहे, मी उद्या घेईन' असे त्याने म्हणावे. पुढील दिवशी त्याला दोन पिंड मिळतात, असे महाप्रत्यरीमध्ये म्हटले आहे. उद्देशभक्त इत्यादी देखील रांगेतून बाजूला होऊनच ग्रहण करावेत. परंतु जेथे बसवून भोजन वाढले जाते, तेथे त्याने सामणेरांमध्ये सर्वात ज्येष्ठ म्हणून किंवा भिक्खूंमध्ये संघातील सर्वात कनिष्ठ म्हणून बसावे. ๗๖. อิทานิ [Pg.8] ยา อยํ สมฺมาวตฺตนา วุตฺตา, ตตฺถ น อุปสมฺปาเทตพฺพนฺติ อุปชฺฌาเยน หุตฺวา น อุปสมฺปาเทตพฺพํ; วตฺตํ นิกฺขิปิตฺวา ปน อุปสมฺปาเทตุํ วฏฺฏติ. อาจริเยน หุตฺวาปิ กมฺมวาจา น สาเวตพฺพา, อญฺญสฺมึ อสติ วตฺตํ นิกฺขิปิตฺวา สาเวตุํ วฏฺฏติ. น นิสฺสโยติ อาคนฺตุกานํ นิสฺสโย น ทาตพฺโพ. เยหิปิ ปกติยาว นิสฺสโย คหิโต, เต วตฺตพฺพา – ‘‘อหํ วินยกมฺมํ กโรมิ, อสุกตฺเถรสฺส นาม สนฺติเก นิสฺสยํ คณฺหถ, มยฺหํ วตฺตํ มา กโรถ, มา มํ คามปฺปเวสนํ อาปุจฺฉถา’’ติ. สเจ เอวํ วุตฺเตปิ กโรนฺติเยว, วาริตกาลโต ปฏฺฐาย กโรนฺเตสุปิ อนาปตฺติ. ७६. आता जी ही सम्यक् वर्तणूक (सम्मावत्तना) सांगितली आहे, त्यामध्ये 'उपसंपदा देऊ नये' म्हणजे उपाध्याय बनून उपसंपदा देऊ नये; परंतु व्रत (पारिवास) बाजूला ठेवून उपसंपदा देणे योग्य आहे. आचार्य बनून देखील कर्मवाचा ऐकवू नये (वाचन करू नये); दुसरा कोणी उपलब्ध नसल्यास, व्रत बाजूला ठेवून कर्मवाचा ऐकवणे योग्य आहे. 'निस्य देऊ नये' म्हणजे आगंतुक भिक्खूंना निस्य (आश्रय) देऊ नये. ज्यांनी आधीच सामान्यपणे निस्य घेतला आहे, त्यांना सांगावे की— 'मी विनय कर्म करत आहे, तुम्ही अमुक थेरांच्या जवळ निस्य ग्रहण करा, माझ्यासाठी व्रत-सेवा करू नका आणि मला गावात प्रवेश करण्याविषयी विचारू नका.' असे सांगूनही जर ते करतच राहिले, तर मनाई केल्याच्या वेळेपासून त्यांनी सेवा केली तरीही आपत्ती लागत नाही. น สามเณโรติ อญฺโญ สามเณโร น คเหตพฺโพ. อุปชฺฌํ ทตฺวา คหิตสามเณราปิ วตฺตพฺพา – ‘‘อหํ วินยกมฺมํ กโรมิ, มยฺหํ วตฺตํ มา กโรถ, มา มํ คามปฺปเวสนํ อาปุจฺฉถา’’ติ. สเจ เอวํ วุตฺเตปิ กโรนฺติเยว, วาริตกาลโต ปฏฺฐาย กโรนฺเตสุปิ อนาปตฺติ. ภิกฺขุโนวาทกสมฺมุติ นาม อาธิปจฺจฏฺฐานภูตาติ ปฏิกฺขิตฺตา, ตสฺมา ภิกฺขุสงฺฆสฺส วตฺตพฺพํ – ‘‘ภนฺเต, อหํ วินยกมฺมํ กโรมิ, ภิกฺขุโนวาทกํ ชานาถา’’ติ, ปฏิพลสฺส วา ภิกฺขุสฺส ภาโร กาตพฺโพ. อาคตา ภิกฺขุนิโย ‘‘สงฺฆสนฺติกํ คจฺฉถ, สงฺโฆ โว โอวาททายกํ ชานิสฺสตี’’ติ วา ‘‘อหํ วินยกมฺมํ กโรมิ, อสุกภิกฺขุสฺส นาม สนฺติกํ คจฺฉถ, โส โว โอวาทํ ทสฺสตี’’ติ วา วตฺตพฺพา. ‘सामणेर नाही’ म्हणजे दुसरा कोणताही नवीन सामणेर स्वतःच्या सेवेसाठी घेऊ नये. उपाध्याय पद देऊन आधीच घेतलेल्या सामणेरांना देखील सांगावे की— ‘मी विनय कर्म करत आहे, माझ्यासाठी व्रत-सेवा करू नका आणि मला गावात प्रवेश करण्याविषयी विचारू नका.’ असे सांगूनही जर ते करतच राहिले, तर मनाई केल्याच्या वेळेपासून त्यांनी सेवा केली तरीही आपत्ती लागत नाही. भिक्खुनी-ओवादक संमुती (भिक्खुनींना उपदेश देण्याची संमती) ही अधिकारपदासारखी असल्याने ती वर्ज्य केली आहे, म्हणून भिक्खू संघाला सांगावे की— ‘भंते, मी विनय कर्म करत आहे, आपण भिक्खुनींना उपदेश देणाऱ्या दुसऱ्या भिक्खूची व्यवस्था करावी,’ किंवा सक्षम भिक्खूवर हा भार सोपवावा. आलेल्या भिक्खुनींना सांगावे की, ‘तुम्ही संघाकडे जा, संघ तुम्हाला उपदेश देणाऱ्या भिक्खूची माहिती देईल’ किंवा ‘मी विनय कर्म करत आहे, तुम्ही अमुक भिक्खूंच्या जवळ जा, ते तुम्हाला उपदेश देतील.’ สา อาปตฺตีติ สุกฺกวิสฺสฏฺฐิยา ปริวาเส ทินฺเน สุกฺกวิสฺสฏฺฐิ นาปชฺชิตพฺพา. อญฺญา วา ตาทิสิกาติ กายสํสคฺคาทิครุกาปตฺติ. ตโต วา ปาปิฏฺฐตราติ ปาราชิกาปตฺติ; สตฺตสุ หิ อาปตฺตีสุ ทุพฺภาสิตาปตฺติ ปาปิฏฺฐา; ทุกฺกฏาปตฺติ ปาปิฏฺฐตรา; ทุกฺกฏาปตฺติ ปาปิฏฺฐา, ปาฏิเทสนียาปตฺติ ปาปิฏฺฐตราติ เอวํ ปาจิตฺติยถุลฺลจฺจยสงฺฆาทิเสสปาราชิกาปตฺตีสุ นโย เนตพฺโพ. ตาสํ วตฺถูสุปิ ทุพฺภาสิตวตฺถุ ปาปิฏฺฐํ, ทุกฺกฏวตฺถุ ปาปิฏฺฐตรนฺติ ปุริมนเยเนว เภโท เวทิตพฺโพ. ปณฺณตฺติวชฺชสิกฺขาปเท ปน วตฺถุปิ อาปตฺติปิ ปาปิฏฺฐา. โลกวชฺเช อุภยมฺปิ ปาปิฏฺฐตรํ. ‘ती आपत्ती’ म्हणजे सुक्कविस्सठ्ठी (शुक्रविसर्ग) आपत्तीसाठी पारिवास दिला असताना, पुन्हा सुक्कविस्सठ्ठी आपत्ती ओढवून घेऊ नये. ‘किंवा तशाच प्रकारची दुसरी’ म्हणजे कायसंसर्ग इत्यादी सारखी दुसरी कोणतीही गुरुकापत्ती. ‘किंवा त्यापेक्षा अधिक वाईट (पापिष्ठतर)’ म्हणजे पाराजिकापत्ती; कारण सात प्रकारच्या आपत्तींमध्ये दुब्भासितापत्ती ही वाईट आहे; दुक्कटापत्ती ही त्यापेक्षा अधिक वाईट आहे; दुक्कटापत्ती वाईट आहे, पाटिदेसणीयापत्ती त्यापेक्षा अधिक वाईट आहे— याच क्रमाने पाचित्तिय, थुल्लच्चय, संघादिसेस आणि पाराजिकापत्ती यांच्या बाबतीतही हाच नियम लावावा. त्यांच्या वस्तूंच्या (कारणांच्या) बाबतीतही दुब्भासित वस्तू वाईट आहे, दुक्कट वस्तू त्यापेक्षा अधिक वाईट आहे, अशा प्रकारे पूर्वोक्त नियमानेच फरक समजून घ्यावा. परंतु पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तिवद्य) शिक्षापदांमध्ये वस्तू आणि आपत्ती दोन्ही वाईट असतात. लोकवज्ज (लोकवद्य) शिक्षापदांमध्ये दोन्ही गोष्टी अधिक वाईट असतात. กมฺมนฺติ ปริวาสกมฺมวาจา วุจฺจติ. ตํ กมฺมํ ‘‘อกตํ ทุกฺกฏ’’นฺติอาทีหิ วา ‘‘กึ อิทํ กมฺมํ นาม กสิกมฺมํ โครกฺขกมฺม’’นฺติอาทีหิ วา วจเนหิ น ครหิตพฺพํ. กมฺมิกาติ เยหิ ภิกฺขูหิ กมฺมํ กตํ, เต วุจฺจนฺติ, เต ‘‘พาลา อพฺยตฺตา’’ติอาทีหิ วจเนหิ น ครหิตพฺพา. น [Pg.9] สวจนียํ กาตพฺพนฺติ ปลิโพธตฺถาย วา ปกฺโกสนตฺถาย วา สวจนียํ น กาตพฺพํ, ปลิโพธตฺถาย หิ กโรนฺโต ‘‘อหํ อายสฺมนฺตํ อิมสฺมึ วตฺถุสฺมึ สวจนียํ กโรมิ, อิมมฺหา อาวาสา เอกปทมฺปิ มา ปกฺกามิ, ยาว น ตํ อธิกรณํ วูปสนฺตํ โหตี’’ติ เอวํ กโรติ. ปกฺโกสนตฺถาย กโรนฺโต ‘‘อหํ เต สวจนียํ กโรมิ, เอหิ มยา สทฺธึ วินยธรานํ สมฺมุขีภาวํ คจฺฉามา’’ติ เอวํ กโรติ; ตทุภยมฺปิ น กาตพฺพํ. ‘कर्म’ म्हणजे पारिवास कर्मवाचा असे म्हटले जाते. त्या कर्माची ‘हे अयोग्य रीतीने केलेले दुष्कृत आहे’ इत्यादी शब्दांनी किंवा ‘हे कसले कर्म? शेतीचे काम आहे की गोपालन?’ अशा शब्दांनी निंदा करू नये. ‘कर्मिक’ म्हणजे ज्या भिक्खूंनी ते कर्म केले आहे त्यांना म्हटले जाते, त्यांची ‘हे मूर्ख आहेत, अज्ञानी आहेत’ अशा शब्दांनी निंदा करू नये. ‘सवचनीय करू नये’ म्हणजे अडथळा आणण्यासाठी किंवा बोलावण्यासाठी सवचनीय (ताकीद) करू नये. कारण अडथळा आणण्यासाठी सवचनीय करणारा भिक्खू असे करतो की— ‘मी या विषयावर आपणास सवचनीय करत आहे, जोपर्यंत हे अधिकरण शांत होत नाही, तोपर्यंत या विहारातून एक पाऊलही बाहेर टाकू नका.’ आणि बोलावण्यासाठी सवचनीय करणारा भिक्खू असे करतो की— ‘मी तुला सवचनीय करत आहे, चल माझ्यासोबत विनयधरांच्या समोर चल.’ या दोन्ही प्रकारच्या गोष्टी करू नयेत. น อนุวาโทติ วิหาเร เชฏฺฐกฏฺฐานํ น กาตพฺพํ. ปาติโมกฺขุทฺเทสเกน วา ธมฺมชฺเฌสเกน วา น ภวิตพฺพํ. นาปิ เตรสสุ สมฺมุตีสุ เอกสมฺมุติวเสนาปิ อิสฺสริยกมฺมํ กาตพฺพํ. น โอกาโสติ ‘‘กโรตุ เม อายสฺมา โอกาสํ, อหํ ตํ วตฺตุกาโม’’ติ เอวํ ปกตตฺตสฺส โอกาโส น กาเรตพฺโพ, วตฺถุนา วา อาปตฺติยา วา น โจเทตพฺโพ, ‘‘อยํ ปุพฺเพ เต โทโส’’ติ น สาเรตพฺโพ. น ภิกฺขูหิ สมฺปโยเชตพฺพนฺติ อญฺญมญฺญํ โยเชตฺวา กลโห น กาเรตพฺโพ. ‘अनुवाद करू नये’ म्हणजे विहारात मुख्य किंवा ज्येष्ठ पद स्वीकारू नये. पातिमोक्ख वाचन करणारा किंवा धम्म उपदेशासाठी प्रवृत्त करणारा बनू नये. तसेच तेरा संमुतींपैकी एकाही संमुतीच्या आधारे कोणतेही अधिकारपद किंवा नेतृत्वाचे काम करू नये. ‘अवकाश मागू नये’ म्हणजे ‘आयुषमान मला बोलण्याची परवानगी द्यावी, मला आपल्याशी बोलायचे आहे’ अशा प्रकारे प्रकृतत्व (सामान्य) भिक्खूकडून परवानगी मागू नये, वस्तूने किंवा आपत्तीने त्याला चोदित (दोषारोप) करू नये, ‘हा तुझा पूर्वीचा दोष आहे’ अशी त्याला आठवण करून देऊ नये. ‘भिक्खूंना परस्परांशी भिडवू नये’ म्हणजे एकमेकांना भडकवून भांडण लावून देऊ नये. ปุรโตติ สงฺฆตฺเถเรน หุตฺวา ปุรโต น คนฺตพฺพํ, ทฺวาทสหตฺถํ อุปจารํ มุญฺจิตฺวา เอกเกน คนฺตพฺพํ. นิสีทเนปิ เอเสว นโย. อาสนปริยนฺโตติ ภตฺตคฺคาทีสุ สงฺฆนวกาสนํ วุจฺจติ; สฺวาสฺส ทาตพฺโพ, ตตฺถ นิสีทิตพฺพํ. เสยฺยาปริยนฺโตติ เสยฺยานํ ปริยนฺโต, สพฺพลามกํ มญฺจปีฐํ. อยญฺหิ วสฺสคฺเคน อตฺตโน ปตฺตฏฺฐาเน เสยฺยํ คเหตุํ น ลภติ. สพฺพภิกฺขูหิ วิจินิตฺวา คหิตาวเสสา มงฺกุลคูถภริตา เวตฺตลตาทิวินทฺธา ลามกเสยฺยา อสฺส ทาตพฺพา. วิหารปริยนฺโตติ ยถา จ เสยฺยา, เอวํ วสนอาวาโสปิ วสฺสคฺเคน อตฺตโน ปตฺตฏฺฐาเน ตสฺส น วฏฺฏติ. สพฺพภิกฺขูหิ วิจินิตฺวา คหิตาวเสสา ปน รโชหตภูมิ ชตุกมูสิกภริตา ปณฺณสาลา อสฺส ทาตพฺพา. สเจ ปกตตฺตา สพฺเพ รุกฺขมูลิกา อพฺโภกาสิกา จ โหนฺติ, ฉนฺนํ น อุเปนฺติ, สพฺเพปิ เอเตหิ วิสฺสฏฺฐาวาสา นาม โหนฺติ. เตสุ ยํ อิจฺฉติ, ตํ ลภติ. วสฺสูปนายิกทิวเส ปจฺจยํ เอกปสฺเส ฐตฺวา วสฺสคฺเคน คณฺหิตุํ ลภติ. เสนาสนํ น ลภติ, นิพทฺธวสฺสาวาสิกํ เสนาสนํ คณฺหิตุกาเมน วตฺตํ นิกฺขิปิตฺวา คเหตพฺพํ. पुढे जाण्याविषयी: संघथेराच्या (वरिष्ठ भिक्खूच्या) पुढे जाऊ नये, बारा हातांचे अंतर सोडून एकट्याने जावे. बसण्याच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. 'आसनपरियंत' म्हणजे भोजनशाळा इत्यादींमध्ये संघातील सर्वात कनिष्ठ भिक्खूचे आसन म्हटले जाते; ते त्याला (पारिवासिक भिक्खूला) दिले पाहिजे आणि त्याने तिथेच बसावे. 'शय्यापरियंत' म्हणजे शय्यांचा शेवट, जे सर्वात निकृष्ट खाट व पाट (मंचक-पीठ) असते. कारण हा (पारिवासिक भिक्खू) दीक्षा-ज्येष्ठतेनुसार स्वतःला प्राप्त होणाऱ्या ठिकाणी शय्या घेण्यास पात्र नसतो. सर्व भिक्खूंनी निवडून घेतल्यानंतर उरलेली, ढेकणांच्या विष्ठेने भरलेली, वेत व वेली इत्यादींनी विणलेली निकृष्ट शय्याच त्याला दिली पाहिजे. 'विहारपरियंत' म्हणजे ज्याप्रमाणे शय्या, त्याचप्रमाणे राहण्याचा आवास (विहार) देखील दीक्षा-ज्येष्ठतेनुसार स्वतःला प्राप्त होणाऱ्या ठिकाणी मिळणे त्याला योग्य नाही. परंतु, सर्व भिक्खूंनी निवडून घेतल्यानंतर उरलेली, धुळीने माखलेली जमीन असलेली, वटवाघुळे आणि उंदरांनी भरलेली पर्णकुटीच त्याला दिली पाहिजे. जर सर्व प्रकृतत्व (सामान्य) भिक्खू वृक्षमूलिक (झाडाच्या मुळाशी राहणारे) आणि अब्भोकासिक (उघड्यावर राहणारे) धुतंग पाळणारे असतील आणि ते छताखाली येत नसतील, तर सर्वच विहार त्यांच्याकडून परित्यक्त (सोडलेले) मानले जातात. त्यांपैकी जो विहार त्याला हवा असेल, तो त्याला मिळतो. वर्षावास सुरू होण्याच्या दिवशी (वस्सूपनायिका दिवशी) एका बाजूला उभे राहून दीक्षा-ज्येष्ठतेनुसार प्रत्यय (चीवर इत्यादी परिष्कार) घेण्याचा त्याला अधिकार मिळतो. परंतु सेनासन (राहण्याची जागा) मिळत नाही; नियमित वर्षावासाचे सेनासन घेण्याची इच्छा असणाऱ्याने आपले (पारिवासिक) व्रत स्थगित करून ते घेतले पाहिजे. เตน [Pg.10] จ โส สาทิตพฺโพติ ยํ อสฺส อาสนาทิปริยนฺตํ ภิกฺขู เทนฺติ, โส เอว สาทิตพฺโพ. ปุเรสมเณน วา ปจฺฉาสมเณน วาติ ญาติปวาริตฏฺฐาเน ‘‘เอตฺตเก ภิกฺขู คเหตฺวา อาคจฺฉถา’’ติ นิมนฺติเตน ‘‘ภนฺเต, อสุกํ นาม กุลํ ภิกฺขู นิมนฺเตสิ, เอถ ตตฺถ คจฺฉามา’’ติ เอวํ สํวิธาย ภิกฺขู ปุเรสมเณ วา ปจฺฉาสมเณ วา กตฺวา น คนฺตพฺพํ. ‘‘ภนฺเต, อสุกสฺมึ นาม คาเม มนุสฺสา ภิกฺขูนํ อาคมนํ อิจฺฉนฺติ, สาธุ วตสฺส สเจ เตสํ สงฺคหํ กเรยฺยาถา’’ติ เอวํ ปน ปริยาเยน กเถตุํ วฏฺฏติ. ‘त्याने ते स्वीकारले पाहिजे’ म्हणजे भिक्खू त्याला जे आसनाचा शेवट इत्यादी स्थान देतात, तेच त्याने स्वीकारले पाहिजे (त्यातच समाधानी राहावे). ‘पुढे चालणारा श्रमण किंवा मागे चालणारा श्रमण म्हणून’ याविषयी: नातेवाईक किंवा निमंत्रण देणाऱ्यांच्या ठिकाणी “एवढ्या भिक्खूंना घेऊन या” असे निमंत्रित केलेल्या पारिवासिक भिक्खूने “भंते, अमुक नावाचे कुटुंब भिक्खूंना निमंत्रित करत आहे, चला आपण तिथे जाऊ या” अशा प्रकारे नियोजन करून भिक्खूंना आपले पुढे चालणारे किंवा मागे चालणारे श्रमण बनवून जाऊ नये. परंतु, “भंते, अमुक नावाच्या गावात लोक भिक्खूंच्या आगमनाची इच्छा करत आहेत, जर आपण त्यांच्यावर अनुग्रह केलात तर फार चांगले होईल” अशा प्रकारे अप्रत्यक्षपणे (पर्यायाने) सांगणे योग्य आहे. น อารญฺญิกงฺคนฺติ อาคตาคตานํ อาโรเจตุํ หรายมาเนน อารญฺญิกธุตงฺคํ น สมาทาตพฺพํ. เยนาปิ ปกติยา สมาทินฺนํ, เตน ทุติยํ ภิกฺขุํ คเหตฺวา อรญฺเญ อรุณํ อุฏฺฐาเปตพฺพํ, น จ เอกเกน วตฺถพฺพํ. ตถา ภตฺตคฺคาทีสุ อาสนปริยนฺเต นิสชฺชาย หรายมาเนน ปิณฺฑปาติกธุตงฺคมฺปิ น สมาทาตพฺพํ. โย ปน ปกติยาว ปิณฺฑปาติโก ตสฺส ปฏิเสโธ นตฺถิ. ‘आरण्यक अंग स्वीकारू नये’ याविषयी: येणाऱ्या-जाणाऱ्या भिक्खूंना (आपल्या पारिवासिक व्रताविषयी) सांगण्याची लाज वाटत असल्यामुळे आरण्यक धुतंग स्वीकारू नये. ज्याने आधीपासूनच हे धुतंग स्वीकारले असेल, त्याने दुसऱ्या भिक्खूला सोबत घेऊन अरण्यात अरुणोदय होऊ द्यावा (पहाटेच्या वेळी दुसऱ्या भिक्खूसोबत असावे) आणि एकट्याने राहू नये. त्याचप्रमाणे, भोजनशाळा इत्यादींमध्ये आसनाच्या शेवटी बसण्याची लाज वाटत असल्यामुळे पिंडपातिक धुतंग देखील स्वीकारू नये. परंतु, जो आधीपासूनच स्वभावतः पिंडपातिक आहे, त्याला मनाई नाही. น จ ตปฺปจฺจยาติ ‘‘นีหฏภตฺโต หุตฺวา วิหาเรเยว นิสีทิตฺวา ภุญฺชนฺโต รตฺติโย คณยิสฺสามิ, คจฺฉโต เม ภิกฺขุํ ทิสฺวา อนาโรเจนฺตสฺส รตฺติจฺเฉโท สิยา’’ติ อิมินา การเณน ปิณฺฑปาโต น นีหราเปตพฺโพ. มา มํ ชานึสูติ ‘‘มา มํ เอกภิกฺขุปิ ชานาตู’’ติ จ อิมินา อชฺฌาสเยน วิหาเร สามเณเรหิ ปจาเปตฺวา ภุญฺชิตุมฺปิ น ลภติ. คามํ ปิณฺฑาย ปวิสิตพฺพเมว. คิลานสฺส ปน นวกมฺมอาจริยุปชฺฌายกิจฺจาทิปสุตสฺส วา วิหาเรเยว อจฺฉิตุํ วฏฺฏติ. สเจปิ คาเม อเนกสตา ภิกฺขู วิจรนฺติ, น สกฺกา โหติ อาโรเจตุํ, คามกาวาสํ คนฺตฺวา สภาคฏฺฐาเน วสิตุํ วฏฺฏติ. ‘आणि त्या कारणाने नाही’ म्हणजे “मी विहारातच आणलेले अन्न खात बसून रात्रींची गणना करीन; कारण बाहेर जाताना मला एखादा भिक्खू दिसल्यास आणि मी त्याला (माझ्या व्रताविषयी) न सांगितल्यास माझ्या रात्रींची गणना खंडित (रात्तिच्छेद) होईल” या भीतीने किंवा कारणाने विहारात पिंडपात (भिक्षा) मागवून घेऊ नये. ‘मला कोणी ओळखू नये’ म्हणजे “मला एकही भिक्खू ओळखू नये (मी पारिवासिक व्रत पाळत आहे हे कोणाला समजू नये)” या हेतूने विहारात सामणेरांकडून स्वयंपाक करवून घेऊन जेवण्याची देखील त्याला परवानगी नाही. त्याने भिक्षेसाठी गावात प्रवेश केलाच पाहिजे. परंतु, आजारी असलेल्या किंवा नवनिर्माण कार्य (नवकम्म) अथवा आचार्य व उपाध्यायांच्या कार्यात व्यस्त असलेल्या भिक्खूला विहारातच राहणे योग्य आहे. जरी गावात शेकडो भिक्खू फिरत असतील आणि प्रत्येकाला (आपल्या व्रताविषयी) सांगणे शक्य नसेल, तर लहान गावातील विहारात जाऊन समान शील असणाऱ्या भिक्खूंच्या ठिकाणी राहणे योग्य आहे. อาคนฺตุเกนาติ กญฺจิ วิหารํ คเตน ตตฺถ ภิกฺขูนํ อาโรเจตพฺพํ. สเจ สพฺเพ เอกฏฺฐาเน ฐิเต ปสฺสติ, เอกฏฺฐาเน ฐิเตเนว อาโรเจตพฺพํ. อถ รุกฺขมูลาทีสุ วิสุํ วิสุํ ฐิตา โหนฺติ, ตตฺถ ตตฺถ คนฺตฺวา อาโรเจตพฺพํ. สญฺจิจฺจ อนาโรเจนฺตสฺส รตฺติจฺเฉโท จ โหติ, วตฺตเภเท จ ทุกฺกฏํ. อถ วิจินนฺโต เอกจฺเจ น ปสฺสติ, รตฺติจฺเฉโทว โหติ, น วตฺตเภททุกฺกฏํ. ‘आगंतुक भिक्खूने’ म्हणजे कोणत्याही विहारात गेलेल्या पारिवासिक भिक्खूने तिथे राहणाऱ्या भिक्खूंना (आपल्या व्रताविषयी) सांगितले पाहिजे. जर तो सर्व भिक्खूंना एकाच ठिकाणी एकत्र पाहतो, तर एकाच ठिकाणी उभे राहूनच त्याने ते सांगितले पाहिजे. जर ते झाडाच्या मुळाशी इत्यादी वेगवेगळ्या ठिकाणी असतील, तर तिथे तिथे जाऊन सांगितले पाहिजे. जाणूनबुजून न सांगणाऱ्या भिक्खूच्या रात्रींची गणना खंडित (रात्तिच्छेद) होते आणि व्रतभंगामुळे दुक्कट (दुष्कृत) आपत्ती देखील ओढवते. परंतु, शोध घेत असताना जर काही भिक्खू आढळले नाहीत, तर केवळ रात्रींची गणना खंडित होते, व्रतभंगामुळे होणारी दुक्कट आपत्ती ओढवत नाही. อาคนฺตุกสฺสาติ [Pg.11] อตฺตโน วสนวิหารํ อาคตสฺสาปิ เอกสฺส วา พหูนํ วา วุตฺตนเยเนว อาโรเจตพฺพํ. รตฺติจฺเฉทวตฺตเภทาปิ เจตฺถ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพา. สเจ อาคนฺตุกา มุหุตฺตํ วิสฺสมิตฺวา วา อวิสฺสมิตฺวา เอว วา วิหารมชฺเฌน คจฺฉนฺติ, เตสมฺปิ อาโรเจตพฺพํ. สเจ ตสฺส อชานนฺตสฺเสว คจฺฉนฺติ, อยญฺจ ปน คตกาเล ชานาติ, คนฺตฺวา อาโรเจตพฺพํ. สมฺปาปุณิตุํ อสกฺโกนฺตสฺส รตฺติจฺเฉโทว โหติ, น วตฺตเภททุกฺกฏํ. เยปิ อนฺโตวิหารํ อปฺปวิสิตฺวา อุปจารสีมํ โอกฺกมิตฺวา คจฺฉนฺติ, อยญฺจ เนสํ ฉตฺตสทฺทํ วา อุกฺกาสิตสทฺทํ วา ขิปิตสทฺทํ วา สุตฺวาว อาคนฺตุกภาวํ ชานาติ, คนฺตฺวา อาโรเจตพฺพํ. คตกาเล ชานนฺเตนปิ อนุพนฺธิตฺวา อาโรเจตพฺพเมว. สมฺปาปุณิตุํ อสกฺโกนฺตสฺส รตฺติจฺเฉโทว โหติ, น วตฺตเภททุกฺกฏํ. โยปิ รตฺตึเยว อาคนฺตฺวา รตฺตึเยว คจฺฉติ, โสปิสฺส รตฺติจฺเฉทํ กโรติ, อญฺญาตตฺตา ปน วตฺตเภททุกฺกฏํ นตฺถิ. สเจ อชานิตฺวาว อพฺภานํ กโรติ, อกตเมว โหตีติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. ตสฺมา อธิกา รตฺติโย คเหตฺวา กาตพฺพํ, อยํ อปณฺณกปฏิปทา. ‘आगंतुक भिक्खूला’ म्हणजे स्वतःच्या राहण्याच्या विहारात आलेल्या एका किंवा अनेक आगंतुक भिक्खूंना देखील पूर्वोक्त पद्धतीनेच (आपल्या व्रताविषयी) सांगितले पाहिजे. येथे रात्रीचा खंड आणि व्रतभंगामुळे होणारी दुक्कट आपत्ती देखील पूर्वोक्त पद्धतीनेच समजून घ्यावी. जर आगंतुक भिक्खू क्षणभर विश्रांती घेऊन किंवा विश्रांती न घेताच विहाराच्या मध्यभागातून जात असतील, तर त्यांना देखील सांगितले पाहिजे. जर ते या पारिवासिक भिक्खूच्या नकळत निघून गेले आणि नंतर त्याला ते समजले, तर त्याने त्यांच्या मागे जाऊन सांगितले पाहिजे. जर तो त्यांच्यापर्यंत पोहोचण्यास असमर्थ ठरला, तर केवळ रात्रींची गणना खंडित होते, व्रतभंगामुळे होणारी दुक्कट आपत्ती ओढवत नाही. जे भिक्खू विहाराच्या आत प्रवेश न करता उपचार सीमेवरून निघून जातात, आणि हा पारिवासिक भिक्खू त्यांच्या छत्रीचा आवाज, खोकण्याचा आवाज किंवा शिंकण्याचा आवाज ऐकूनच ते आगंतुक असल्याचे जाणतो, तर त्याने जाऊन त्यांना सांगितले पाहिजे. ते निघून गेल्यावर समजले तरी पाठलाग करून सांगितलेच पाहिजे. पोहोचण्यास असमर्थ ठरल्यास केवळ रात्रींची गणना खंडित होते, व्रतभंगामुळे होणारी दुक्कट आपत्ती ओढवत नाही. जो आगंतुक भिक्खू रात्रीच येऊन रात्रीच निघून जातो, तो देखील याच्या रात्रींची गणना खंडित करतो; परंतु अज्ञात असल्यामुळे (माहिती नसल्यामुळे) व्रतभंगामुळे होणारी दुक्कट आपत्ती ओढवत नाही. जर (रात्रीचा खंड पडल्याचे) न जाणताच तो अब्भान (व्रतसमाप्तीची विधी) करतो, तर ते अब्भान न केल्यासारखेच (अवैध) ठरते, असे कुरुंदी अट्ठकथेत म्हटले आहे. म्हणून, अतिरिक्त रात्रींची गणना पूर्ण करूनच अब्भान केले पाहिजे; हीच संशयरहित (अचूक) प्रतिपदा (पद्धत) आहे. นทีอาทีสุ นาวาย คจฺฉนฺตมฺปิ ปรตีเร ฐิตมฺปิ อากาเสน คจฺฉนฺตมฺปิ ปพฺพตตลอรญฺญาทีสุ ทูเร ฐิตมฺปิ ภิกฺขุํ ทิสฺวา สเจ ‘‘ภิกฺขู’’ติ ววตฺถานํ อตฺถิ, นาวาทีหิ วา คนฺตฺวา มหาสทฺทํ กตฺวา วา เวเคน อนุพนฺธิตฺวา วา อาโรเจตพฺพํ, อนาโรเจนฺตสฺส รตฺติจฺเฉโท เจว วตฺตเภททุกฺกฏญฺจ. สเจ วายมนฺโตปิ สมฺปาปุณิตุํ วา สาเวตุํ วา น สกฺโกติ, รตฺติจฺเฉโทว โหติ, น วตฺตเภททุกฺกฏํ. สงฺฆเสนาภยตฺเถโร ปน วิสยาวิสเยน กเถติ – ‘‘วิสเย กิร อนาโรเจนฺตสฺส รตฺติจฺเฉโท เจว วตฺตเภททุกฺกฏญฺจ โหติ, อวิสเย ปน อุภยมฺปิ นตฺถี’’ติ. กรวีกติสฺสตฺเถโร ‘‘สมโณ อยนฺติ ววตฺถานเมว ปมาณํ, สเจปิ อวิสโย โหติ, วตฺตเภททุกฺกฏเมว นตฺถิ, รตฺติจฺเฉโท ปน โหติเยวา’’ติ อาห. नदी इत्यादींमध्ये नावेने जाणाऱ्या, दुसऱ्या किनाऱ्यावर उभे असलेल्या, आकाशातून जाणाऱ्या किंवा पर्वताच्या पठारावर व अरण्यात इत्यादी ठिकाणी दूरवर उभे असलेल्या भिक्खूला पाहून जर “हा भिक्खू आहे” असे निश्चितपणे ओळखणे शक्य असेल, तर नावेने इत्यादी साधनांनी जाऊन किंवा मोठा आवाज करून अथवा वेगाने पाठलाग करून त्याला (आपल्या व्रताविषयी) सांगितले पाहिजे. न सांगणाऱ्या भिक्खूच्या रात्रींची गणना खंडित होते आणि व्रतभंगामुळे दुक्कट आपत्ती देखील ओढवते. जर प्रयत्न करूनही तो त्यांच्यापर्यंत पोहोचण्यास किंवा त्यांना ऐकवण्यास असमर्थ ठरला, तर केवळ रात्रींची गणना खंडित होते, व्रतभंगामुळे होणारी दुक्कट आपत्ती ओढवत नाही. परंतु, संघसेनाभय थेरांनी शक्य सीमा (विषय) आणि अशक्य सीमा (अविषय) या आधारे सांगितले आहे की— “शक्य सीमेत असूनही न सांगणाऱ्या भिक्खूच्या रात्रींची गणना खंडित होते आणि व्रतभंगामुळे दुक्कट आपत्ती देखील ओढवते; परंतु अशक्य सीमेत दोन्हीही (रात्रीचा खंड आणि दुक्कट आपत्ती) होत नाहीत.” करवीकतिस्स थेरांचे म्हणणे आहे की— “हा श्रमण (भिक्खू) आहे असे निश्चितपणे ओळखणे हेच प्रमाण (महत्त्वाचे) आहे. जरी ती अशक्य सीमा असली, तरी व्रतभंगामुळे होणारी दुक्कट आपत्ती ओढवत नाही, परंतु रात्रींची गणना मात्र खंडित होतेच.” อุโปสเถติ ‘‘อุโปสถํ สมฺปาปุณิสฺสามา’’ติ อาคนฺตุกา ภิกฺขู อาคจฺฉนฺติ, อิทฺธิยา คจฺฉนฺตาปิ อุโปสถภาวํ ญตฺวา โอตริตฺวา อุโปสถํ กโรนฺติ, ตสฺมา อาคนฺตุกโสธนตฺถํ อุโปสถทิวเส อาโรเจตพฺพํ. ปวารณายปิ เอเสว นโย. คิลาโนติ คนฺตุํ อสมตฺโถ. ทูเตนาติ เอตฺถ อนุปสมฺปนฺนํ เปเสตุํ น วฏฺฏติ, ภิกฺขุํ เปเสตฺวา อาโรจาเปตพฺพํ. "उपोसतहेति" (उपोसथाच्या दिवशी) म्हणजे "आम्ही उपोसथ करण्याच्या ठिकाणी नीट पोहोचू" असा विचार करून आगंतुक भिक्खू येतात. ऋद्धीने (आकाशातून) जाणारे भिक्खू देखील उपोसथाचा दिवस असल्याचे जाणून खाली उतरून उपोसथ करतात. म्हणून, आगंतुक भिक्खूंच्या शुद्धीसाठी (तपासणीसाठी) उपोसथाच्या दिवशी (त्यांच्या आगमनाची) घोषणा करावी. पवारणेच्या दिवशीही हाच नियम आहे. 'ग्लान' म्हणजे जाण्यास असमर्थ असलेला भिक्खू. 'दूताद्वारे' याविषयीचा निर्णय असा समजावा की, अनुपसंपन्नाला (सामणेर किंवा गृहस्थाला) दूत म्हणून पाठवणे योग्य नाही; भिक्खूलाच दूत म्हणून पाठवून कळवले पाहिजे. อภิกฺขุโก [Pg.12] อาวาโสติ สุญฺญวิหาโร; ยตฺถ เอโกปิ ภิกฺขุ นตฺถิ, ตตฺถ วาสตฺถาย น คนฺตพฺพํ. น หิ ตตฺถ วุตฺถรตฺติโย คณนูปิกา โหนฺติ, ปกตตฺเตน ปน สทฺธึ วฏฺฏติ. ทสวิธนฺตราเย ปน สเจปิ รตฺติโย คณนูปิกา น โหนฺติ, อนฺตรายโต ปริมุจฺจนตฺถาย คนฺตพฺพเมว. เตน วุตฺตํ – ‘‘อญฺญตฺร อนฺตรายา’’ติ. นานาสํวาสเกหิ สทฺธึ วินยกมฺมํ กาตุํ น วฏฺฏติ. เตสํ อนาโรจเนปิ รตฺติจฺเฉโท นตฺถิ, อภิกฺขุกาวาสสทิสเมว โหติ. เตน วุตฺตํ – ‘‘ยตฺถสฺสุ ภิกฺขู นานาสํวาสกา’’ติ. เสสํ อุโปสถกฺขนฺธเก วุตฺตนยเมว. "अभिक्खुक आवास" म्हणजे शून्य विहार (भिक्खू नसलेला विहार); ज्या विहारात एकही भिक्खू नाही, तिथे राहण्यासाठी जाऊ नये. कारण तिथे घालवलेल्या रात्री (वस्सावासाच्या रात्री म्हणून) मोजल्या जात नाहीत. परंतु, प्रकृतत्व (सामान्य) भिक्खूसोबत जाणे योग्य आहे. जर दहा प्रकारच्या अंतरायांपैकी (अडथळ्यांपैकी) एखादा अंतराय असेल, तर जरी रात्री मोजल्या जात नसतील, तरी अंतरायापासून मुक्त होण्यासाठी जाणे योग्यच आहे. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे – "अंतरायाशिवाय (इतर वेळी जाऊ नये)". नानासंवासक (वेगळ्या संवासातील) भिक्खूंसोबत विनय कर्म करणे योग्य नाही. त्यांना न कळवल्याने देखील रात्रीचा छेद होत नाही, कारण तो भिक्खू नसलेल्या आवासासारखाच असतो. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे – "ज्या विहारात नानासंवासक भिक्खू असतील (तो अभिक्खुक आवासासारखाच समजावा)". उर्वरित निर्णय उपोसथक्खंधकात सांगितलेल्या पद्धतीप्रमाणेच समजावा. ๘๑. เอกจฺฉนฺเน อาวาเสติอาทีสุ อาวาโส นาม วสนตฺถาย กตเสนาสนํ. อนาวาโส นาม เจติยฆรํ โพธิฆรํ สมฺมุญฺชนิอฏฺฏโก ทารุอฏฺฏโก ปานียมาโฬ วจฺจกุฏิ ทฺวารโกฏฺฐโกติ เอวมาทิ. ตติยปเทน ตทุภยมฺปิ คหิตํ. เอเตสุ ยตฺถ กตฺถจิ เอกจฺฉนฺเน ฉทนโต อุทกปตนฏฺฐานปริจฺฉินฺเน โอกาเส อุกฺขิตฺตโก วสิตุํ น ลภติ. ‘‘ปาริวาสิโก ปน อนฺโตอาวาเสเยว น ลภตี’’ติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. มหาอฏฺฐกถายํ ปน ‘‘อวิเสเสน อุทกปาเตน วาริต’’นฺติ วุตฺตํ. กุรุนฺทิยํ ‘‘เอเตสุ เอตฺตเกสุ ปญฺจวณฺณจฺฉทนพทฺธฏฺฐาเนสุ ปาริวาสิกสฺส จ อุกฺขิตฺตกสฺส จ ปกตตฺเตน สทฺธึ อุทกปาเตน วาริต’’นฺติ วุตฺตํ. ตสฺมา นานูปจาเรปิ เอกจฺฉนฺเน น วฏฺฏติ. สเจ ปเนตฺถ ตทหุปสมฺปนฺเนปิ ปกตตฺเต ปฐมํ ปวิสิตฺวา นิปนฺเน สฏฺฐิวสฺโสปิ ปาริวาสิโก ปจฺฉา ปวิสิตฺวา ชานนฺโต นิปชฺชติ, รตฺติจฺเฉโท เจว วตฺตเภททุกฺกฏญฺจ. อชานนฺตสฺส รตฺติจฺเฉโทว น วตฺตเภททุกฺกฏํ. สเจ ปน ตสฺมึ ปฐมํ นิปนฺเน ปจฺฉา ปกตตฺโต ปวิสิตฺวา นิปชฺชติ, ปาริวาสิโก จ ชานาติ, รตฺติจฺเฉโท เจว วตฺตเภททุกฺกฏญฺจ. โน เจ ชานาติ, รตฺติจฺเฉโทว น วตฺตเภททุกฺกฏํ. ८१. "एकच्छन्ने आवासे" (एकाच छताखालील आवासात) इत्यादी पाठांमध्ये 'आवास' म्हणजे राहण्यासाठी बनवलेले सेनासन (निवासस्थान) होय. 'अनावास' म्हणजे चैत्यगृह, बोधिगृह, झाडू ठेवण्याची जागा, लाकडे ठेवण्याची जागा, पिण्याच्या पाण्याचे भांडे ठेवण्याची जागा, शौचालय, प्रवेशद्वार (द्वारकोठक) इत्यादी जागा होत. तिसऱ्या पदाने हे दोन्ही (आवास आणि अनावास) घेतले गेले आहेत. यांपैकी कोणत्याही एकाच छताखाली असलेल्या, छतावरून पाणी पडण्याच्या जागेने मर्यादित केलेल्या जागेत उत्क्षिप्तक (निलंबित) भिक्खूला राहण्याची परवानगी नाही. "परंतु पारिवासिक (परिवसात असलेला) भिक्खू आवासाच्या आत राहू शकत नाही" असे महाप्रत्यरीमध्ये म्हटले आहे. महाअट्ठकथेत मात्र "विशेष भेद न करता, पाणी पडण्याच्या मर्यादेने (दोन्हींना) प्रतिबंधित केले आहे" असे म्हटले आहे. कुरुंदीमध्ये "या पाच प्रकारच्या छतांनी बांधलेल्या जागांमध्ये पारिवासिक आणि उत्क्षिप्तक भिक्खूंचे प्रकृतत्व भिक्खूसोबत राहणे पाणी पडण्याच्या मर्यादेने प्रतिबंधित केले आहे" असे म्हटले आहे. म्हणून, वेगवेगळ्या उपचारांमध्ये (सीमांमध्ये) असले तरी एकाच छताखाली राहणे योग्य नाही. जर या ठिकाणी, त्याच दिवशी उपसंपदा मिळालेला प्रकृतत्व भिक्खू आधी प्रवेश करून झोपला असेल आणि साठ वर्षांचा (दीक्षित असलेला) पारिवासिक भिक्खू नंतर प्रवेश करून, हे जाणूनही तिथे झोपला, तर त्याच्या रात्रीचा छेद होतो आणि व्रतभंगामुळे दुक्कट (दुष्कृत) दोष लागतो. न जाणणाऱ्याला केवळ रात्रीचा छेद होतो, व्रतभंगाचा दुक्कट दोष लागत नाही. परंतु जर तो (पारिवासिक भिक्खू) आधी झोपला असेल आणि नंतर प्रकृतत्व भिक्खू प्रवेश करून झोपला, आणि पारिवासिक भिक्खूला हे समजले, तर रात्रीचा छेद होतो आणि व्रतभंगाचा दुक्कट दोष लागतो. जर त्याला समजले नाही, तर केवळ रात्रीचा छेद होतो, व्रतभंगाचा दुक्कट दोष लागत नाही. วุฏฺฐาตพฺพํ นิมนฺเตตพฺโพติ ตทหุปสมฺปนฺนมฺปิ ทิสฺวา วุฏฺฐาตพฺพเมว; วุฏฺฐาย จ ‘‘อหํ อิมินา สุขนิสินฺโน วุฏฺฐาปิโต’’ติ ปรมฺมุเขน น คนฺตพฺพํ, ‘‘อิทํ อาจริย-อาสนํ, เอตฺถ นิสีทถา’’ติ เอวํ นิมนฺเตตพฺโพเยว. นวเกน ปน ‘‘มหาเถรํ โอพทฺธํ กโรมี’’ติ ปาริวาสิกตฺเถรสฺส สนฺติกํ น คนฺตพฺพํ. เอกาสเนติ สมานวสฺสิกาสเน มญฺเจ วา ปีเฐ วา. น ฉมายํ นิสินฺเนติ ปกตตฺเต ภูมิยํ นิสินฺเน อิตเรน อนฺตมโส ติณสนฺถาเรปิ อุจฺจตเร วาลิกาตเลปิ วา น นิสีทิตพฺพํ, ทฺวาทสหตฺถํ ปน อุปจารํ [Pg.13] มุญฺจิตฺวา นิสีทิตุํ วฏฺฏติ. เอกจงฺกเมติ สหาเยน วิย สทฺธึ จงฺกมนฺโต เอกสฺมึ จงฺกเม. "उठले पाहिजे आणि निमंत्रित केले पाहिजे" म्हणजे त्याच दिवशी उपसंपदा मिळालेल्या प्रकृतत्व भिक्खूला पाहून देखील (पारिवासिक भिक्खूने) आपल्या आसनावरून उठलेच पाहिजे; आणि उठून "याने मला सुखाने बसलेल्याला उठवले" असा विचार करून तोंड फिरवून निघून जाऊ नये, तर "आचार्य, हे आसन आहे, येथे बसावे" असे म्हणून त्याला निमंत्रित केलेच पाहिजे. परंतु कनिष्ठ भिक्खूने "मी महाथेरांना अडथळा निर्माण करीन" असा विचार करून पारिवासिक थेरांच्या जवळ जाऊ नये. "एकाच आसनावर" म्हणजे समान वर्षांची दीक्षा असलेल्या भिक्खूंच्या आसनावर, पलंगावर किंवा पाटावर. "जमिनीवर बसू नये" म्हणजे प्रकृतत्व भिक्खू जमिनीवर बसला असता दुसऱ्या (पारिवासिक) भिक्खूने अगदी गवताच्या आसनावर किंवा त्यापेक्षा उंच असलेल्या वाळूच्या ढिगाऱ्यावर देखील बसू नये; परंतु बारा हातांचे अंतर सोडून बसणे योग्य आहे. "एकाच चंक्रमणात" म्हणजे मित्रासोबत चंक्रमण केल्याप्रमाणे एकाच चंक्रमण मार्गावर (चालणे). ฉมายํ จงฺกมนฺตนฺติ ฉมายํ จงฺกมนฺเต, อยเมว วา ปาโฐ. อยํ ปเนตฺถ อตฺโถ – อกตปริจฺเฉทาย ภูมิยา จงฺกมนฺเต ปริจฺเฉทํ กตฺวา วาลิกํ อากิริตฺวา อาลมฺพนํ โยเชตฺวา กตจงฺกเม นีเจปิ น จงฺกมิตพฺพํ, โก ปน วาโท อิฏฺฐกาจยสมฺปนฺเน เวทิกาปริกฺขิตฺเตติ! สเจ ปน ปาการปริกฺขิตฺโต โหติ ทฺวารโกฏฺฐกยุตฺโต ปพฺพตนฺตรวนนฺตรคุมฺพนฺตเรสุ วา สุปฺปฏิจฺฉนฺโน, ตาทิเส จงฺกเม จงฺกมิตุํ วฏฺฏติ. อปฺปฏิจฺฉนฺเนปิ อุปจารํ มุญฺจิตฺวา วฏฺฏติ. "जमिनीवर चंक्रमण करणाऱ्या" म्हणजे जमिनीवर चंक्रमण करत असताना; किंवा हाच मूळ पाठ आहे. याचा अर्थ असा आहे की, मर्यादा न ठरवलेल्या जमिनीवर प्रकृतत्व भिक्खू चंक्रमण करत असताना, मर्यादा ठरवून, वाळू पसरवून आणि धरण्यासाठी कठडा लावून तयार केलेल्या चंक्रमण मार्गावर, तो जरी खाली असला तरी पारिवासिक भिक्खूने चंक्रमण करू नये; मग विटांनी बांधलेल्या आणि कठड्याने वेढलेल्या चंक्रमण मार्गाबद्दल काय बोलावे! परंतु जर तो भिंतीने वेढलेला असेल, प्रवेशद्वाराने युक्त असेल किंवा डोंगरांच्या मध्ये, जंगलात किंवा झुडपांच्या मध्ये चांगल्या प्रकारे झाकलेला असेल, तर अशा चंक्रमण मार्गावर चंक्रमण करणे योग्य आहे. न झाकलेल्या चंक्रमण मार्गावर देखील बारा हातांचे अंतर सोडून चंक्रमण करणे योग्य आहे. วุฑฺฒตเรนาติ เอตฺถ สเจ วุฑฺฒตเร ปาริวาสิเก ปฐมํ นิปนฺเน อิตโร ชานนฺโต ปจฺฉา นิปชฺชติ, รตฺติจฺเฉโท จสฺส โหติ วตฺตเภเท จ ทุกฺกฏํ. วุฑฺฒตรสฺส ปน รตฺติจฺเฉโทว น วตฺตเภททุกฺกฏํ. อชานิตฺวา นิปชฺชติ, ทฺวินฺนมฺปิ วตฺตเภโท นตฺถิ, รตฺติจฺเฉโท ปน โหติ. อถ นวกปาริวาสิเก ปฐมํ นิปนฺเน วุฑฺฒตโร ปจฺฉา นิปชฺชติ, นวโก จ ชานาติ, รตฺติ จสฺส ฉิชฺชติ, วตฺตเภเท จ ทุกฺกฏํ โหติ. วุฑฺฒตรสฺส รตฺติจฺเฉโทว น วตฺตเภโท. โน เจ ชานาติ, ทฺวินฺนมฺปิ วตฺตเภโท นตฺถิ, รตฺติจฺเฉโท ปน โหติ. สเจ ทฺเวปิ อปจฺฉาปุริมํ นิปชฺชนฺติ, วุฑฺฒตรสฺส รตฺติจฺเฉโทว อิตรสฺส วตฺตเภโทปีติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. ทฺเว ปาริวาสิกา สมวสฺสา, เอโก ปฐมํ นิปนฺโน, เอโก ชานนฺโตว ปจฺฉา นิปชฺชติ, รตฺติ จ ฉิชฺชติ, วตฺตเภเท จ ทุกฺกฏํ. ปฐมํ นิปนฺนสฺส รตฺติจฺเฉโทว น วตฺตเภโท. สเจ ปจฺฉา นิปชฺชนฺโตปิ น ชานาติ, ทฺวินฺนมฺปิ วตฺตเภโท นตฺถิ, รตฺติจฺเฉโท ปน โหติ. สเจ ทฺเวปิ อปจฺฉาปุริมํ นิปชฺชนฺติ, ทฺวินฺนมฺปิ รตฺติจฺเฉโทเยว, น วตฺตเภโท. สเจ หิ ทฺเว ปาริวาสิกา เอกโต วเสยฺยุํ, เต อญฺญมญฺญสฺส อชฺฌาจารํ ญตฺวา อคารวา วา วิปฺปฏิสาริโน วา หุตฺวา ปาปิฏฺฐตรํ วา อาปตฺตึ อาปชฺเชยฺยุํ วิพฺภเมยฺยุํ วา, ตสฺมา เนสํ สหเสยฺยา สพฺพปฺปกาเรน ปฏิกฺขิตฺตา. เสสํ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. มูลายปฏิกสฺสนารหาทโย เจตฺถ ปาริวาสิกานํ ปกตตฺตฏฺฐาเน ฐิตาติ เวทิตพฺพา. "वृद्धतराने" (ज्येष्ठाने) याविषयीचा निर्णय असा समजावा: जर ज्येष्ठ पारिवासिक भिक्खू आधी झोपला असेल आणि दुसरा (कनिष्ठ पारिवासिक भिक्खू) हे जाणूनही नंतर झोपला, तर त्या कनिष्ठ भिक्खूच्या रात्रीचा छेद होतो आणि व्रतभंगामुळे दुक्कट दोष लागतो. परंतु ज्येष्ठ भिक्खूचा केवळ रात्रीचा छेद होतो, व्रतभंगाचा दुक्कट दोष लागत नाही. जर न जाणून झोपला, तर दोघांनाही व्रतभंगाचा दोष लागत नाही, परंतु रात्रीचा छेद मात्र होतो. किंवा जर कनिष्ठ पारिवासिक भिक्खू आधी झोपला असेल आणि ज्येष्ठ भिक्खू नंतर झोपला, आणि कनिष्ठ भिक्खूला हे समजले, तर कनिष्ठ भिक्खूच्या रात्रीचा छेद होतो आणि व्रतभंगामुळे दुक्कट दोष लागतो. ज्येष्ठ भिक्खूचा केवळ रात्रीचा छेद होतो, व्रतभंग होत नाही. जर त्याला समजले नाही, तर दोघांनाही व्रतभंगाचा दोष लागत नाही, परंतु रात्रीचा छेद मात्र होतो. जर दोघेही एकाच वेळी (मागे-पुढे न करता) झोपले, तर ज्येष्ठ भिक्खूचा केवळ रात्रीचा छेद होतो आणि दुसऱ्या (कनिष्ठ) भिक्खूचा व्रतभंग देखील होतो, असे कुरुंदीमध्ये म्हटले आहे. जर दोन पारिवासिक भिक्खू समान वर्षांचे असतील, एक आधी झोपला असेल आणि दुसरा हे जाणूनच नंतर झोपला, तर रात्रीचा छेद होतो आणि व्रतभंगामुळे दुक्कट दोष लागतो. आधी झोपलेल्या भिक्खूचा केवळ रात्रीचा छेद होतो, व्रतभंग होत नाही. जर नंतर झोपणाऱ्याला समजले नाही, तर दोघांनाही व्रतभंगाचा दोष लागत नाही, परंतु रात्रीचा छेद मात्र होतो. जर दोघेही एकाच वेळी झोपले, तर दोघांचाही केवळ रात्रीचा छेद होतो, व्रतभंग होत नाही. कारण जर दोन पारिवासिक भिक्खू एकत्र राहिले, तर ते एकमेकांचे अतिचार (उल्लंघन) जाणून आदर नसलेले किंवा पश्चात्ताप करणारे होऊन अधिक वाईट आपत्तीत पडू शकतात किंवा गृहस्थ बनू शकतात (भिक्खू धर्म सोडू शकतात). म्हणून त्यांचे एकत्र झोपणे सर्व प्रकारे प्रतिबंधित केले आहे. उर्वरित भाग सांगितलेल्या पद्धतीप्रमाणेच समजावा. आणि येथे मूलायपटिकस्सनार्ह (मूळ शिक्षेसाठी मागे खेचण्यास पात्र) इत्यादी भिक्खू पारिवासिक भिक्खूंच्या संदर्भात प्रकृतत्व भिक्खूंच्या स्थानी आहेत असे समजावे. ปาริวาสิกจตุตฺโถ เจ, ภิกฺขเว, ปริวาสนฺติ เอตฺถ ปาริวาสิกํ จตุตฺถํ กตฺวา อญฺญสฺส ปริวาสทานาทีนิ กาตุํ น วฏฺฏติ. เอเตสฺเววายํ คณปูรโก [Pg.14] น โหติ, เสสสงฺฆกมฺเมสุ โหติ. คเณ ปน อปฺปโหนฺเต วตฺตํ นิกฺขิปาเปตฺวา คณปูรโก กาตพฺโพติ. "भिक्खूंनो, जर पारिवासिक भिक्खू चौथा असेल तर परिवास..." या पाठात असा निर्णय समजावा की, पारिवासिक भिक्खूला चौथा करून दुसऱ्या भिक्खूला परिवास देणे इत्यादी कर्मे करणे योग्य नाही. केवळ याच (परिवास देणे इत्यादी) कर्मांमध्ये तो गणपूरक होऊ शकत नाही; उर्वरित संघकर्मांमध्ये तो गणपूरक होऊ शकतो. परंतु जर गण (भिक्खूंची संख्या) अपूर्ण असेल, तर त्याचे व्रत बाजूला ठेवायला लावून त्याला गणपूरक बनवावे. ๘๓. อิมํ ปน วตฺตกถํ สุตฺวา วินยธรอุปาลิตฺเถรสฺส รโหคตสฺส เอวํ ปริวิตกฺโก อุทปาทิ – ‘‘ภควตา พหุ ปาริวาสิกวตฺตํ ปญฺญตฺตํ, กติหิ นุ โข เอตฺถ การเณหิ รตฺติจฺเฉโท โหตี’’ติ! โส ภควนฺตํ อุปสงฺกมิตฺวา ตมตฺถํ ปุจฺฉิ. ภควา จสฺส พฺยากาสิ. เตน วุตฺตํ – ‘‘อถ โข อายสฺมา อุปาลิ…เป… รตฺติจฺเฉทา’’ติ. ตตฺถ สหวาโสติ ยฺวายํ ปกตตฺเตน ภิกฺขุนา สทฺธึ เอกจฺฉนฺเนติอาทินา นเยน วุตฺโต เอกโต วาโส. วิปฺปวาโสติ เอกกสฺเสว วาโส. อนาโรจนาติ อาคนฺตุกาทีนํ อนาโรจนา. เอเตสุ ตีสุ เอเกเกน การเณน รตฺติจฺเฉโท โหติ. ८३. परंतु, ही परिवास-कर्तव्याची कथा (वत्तकथा) ऐकून विनयधर उपालि थेरांच्या मनात एकांतात असताना असा विचार उत्पन्न झाला— 'भगवंतांनी परिवास करणाऱ्या भिक्खूंचे अनेक नियम (कर्तव्ये) प्रज्ञप्त केले आहेत. यात किती कारणांमुळे रात्रीचा खंड (रत्तिच्छेद) होतो बरे?' त्यांनी भगवंतांकडे जाऊन हा प्रश्न विचारला. भगवंतांनी त्यांना याचे उत्तर दिले. म्हणूनच संगीतिकारांनी म्हटले आहे— 'त्यानंतर आयुष्यमान उपालि... पे... रत्तिच्छेद.' त्यापैकी, 'सहवास' म्हणजे जो प्रकृतत्व (सामान्य) भिक्खूंसोबत एकाच छताखाली राहणे इत्यादी पद्धतीने सांगितलेला एकत्र वास आहे. 'विप्रवास' म्हणजे एकट्यानेच राहणे. 'अनालोचना' म्हणजे आगंतुक इत्यादी भिक्खूंना न सांगणे. या तिन्हींपैकी कोणत्याही एका कारणामुळे रात्रीचा खंड (रत्तिच्छेद) होतो. ๘๔. น สกฺโกนฺตีติ สงฺฆสฺส มหนฺตตาย ตตฺถ ตตฺถ คนฺตฺวา สพฺเพสํ อาโรเจตุํ อสกฺโกนฺตา โสเธตุํ น สกฺโกนฺติ. ปริวาสํ นิกฺขิปามิ, วตฺตํ นิกฺขิปามีติ อิเมสุ ทฺวีสุ ปเทสุ เอเกนาปิ นิกฺขิตฺโตว โหติ ปริวาโส; ทฺวีหิ สุนิกฺขิตฺโตเยว. สมาทาเนปิ เอเสว นโย. เอวํ วตฺตํ สมาทิยิตฺวา ปริวุตฺถปริวาสสฺส มานตฺตํ คณฺหโต ปุน วตฺตสมาทานกิจฺจํ นตฺถิ, สมาทินฺนวตฺโตเยว เหส ตสฺมาสฺส ฉารตฺตํ มานตฺตํ ทาตพฺพํ, จิณฺณมานตฺโต อพฺเภตพฺโพ. เอวํ อนาปตฺติโก หุตฺวา สุทฺธนฺเต ปติฏฺฐิโต ติสฺโส สิกฺขา ปูเรตฺวา ทุกฺขสฺสนฺตํ กริสฺสตีติ. ८४. 'अशक्य असल्यामुळे' म्हणजे संघाच्या विशालतेमुळे तिथे तिथे जाऊन सर्व भिक्खूंना सांगण्यास असमर्थ असल्याने ते परिवास शुद्ध करू शकत नाहीत. 'मी परिवास सोडतो' किंवा 'मी व्रत सोडतो' या दोन वाक्यांपैकी एकानेही परिवास सोडला जातो; दोन्ही वाक्यांनी तो चांगल्या प्रकारे सोडला जातो. व्रत ग्रहण करण्याच्या (समादान) बाबतीतही हाच नियम आहे. अशा प्रकारे व्रत ग्रहण करून परिवास पूर्ण केलेल्या भिक्खूने जेव्हा मानत्त ग्रहण करावे, तेव्हा पुन्हा व्रत ग्रहण करण्याचे कार्य नसते. कारण त्याने आधीच व्रत ग्रहण केलेले असते, म्हणून त्याला सहा रात्रींचे मानत्त दिले पाहिजे. मानत्त पूर्ण केलेल्या भिक्खूचे अब्भान (पुनर्स्थापना) केले पाहिजे. अशा प्रकारे तो आपत्तीरहित होऊन, शुद्धतेमध्ये प्रतिष्ठित होऊन, तीन शिक्षा पूर्ण करून दुःखाचा अंत करेल. ปาริวาสิกวตฺตกถา นิฏฺฐิตา. परिवास करणाऱ्या भिक्खूंच्या कर्तव्याची कथा (पारिवासिकवत्तकथा) समाप्त झाली. มูลายปฏิกสฺสนารหวตฺตกถา मूलायपटिकस्सनार्ह (मूळ प्रायश्चित्ताकडे परत नेण्यास योग्य) भिक्खूंच्या कर्तव्याची कथा. ๘๖. มูลายปฏิกสฺสนารหา ภิกฺขู สาทิยนฺติ ปกตตฺตานนฺติ ฐเปตฺวา นวกตรํ มูลายปฏิกสฺสนารหํ อวเสสานํ อนฺตมโส ปาริวาสิกาทีนมฺปิ. อิเมสญฺหิ ปาริวาสิกมูลายปฏิกสฺสนารหมานตฺตารหมานตฺตาจาริกพฺภานารหานํ ปญฺจนฺนํ ฐเปตฺวา อตฺตโน อตฺตโน นวกตรํ, เสสา สพฺเพ ปกตตฺตา เอว. กสฺมา? มิถุ ยถาวุฑฺฒํ อภิวาทนาทีนํ อนุญฺญาตตฺตา. เตน วุตฺตํ – ‘‘อวเสสานํ อนฺตมโส ปาริวาสิกาทีนมฺปี’’ติ. มูลายปฏิกสฺสนารหาทิลกฺขณํ ปน เนสํ ปรโต [Pg.15] อาวิภวิสฺสติ. เสสเมตฺถ อิโต ปเรสุ จ มานตฺตารหาทิวตฺเตสุ ปาริวาสิกวตฺเต วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. ८६. मूलायपटिकस्सनार्ह भिक्खू प्रकृतत्व भिक्खूंचे अभिवादन स्वीकारतात—याचा अर्थ स्वतःपेक्षा कनिष्ठ असलेल्या मूलायपटिकस्सनार्ह भिक्खूला सोडून, उर्वरित अगदी परिवास करणाऱ्या इत्यादी भिक्खूंचेही ते अभिवादन स्वीकारतात. कारण या पाच प्रकारच्या भिक्खूंमध्ये—पारिवासिक, मूलायपटिकस्सनार्ह, मानत्तार्ह, मानत्तचारिक आणि अब्भानार्ह—स्वतःपेक्षा कनिष्ठ असलेल्या भिक्खूला सोडून उर्वरित सर्व भिक्खू प्रकृतत्व (सामान्य) भिक्खूच मानले जातात. का? कारण त्यांच्यात आपापसात ज्येष्ठतेनुसार अभिवादन इत्यादी करण्याची अनुमती दिलेली आहे. म्हणूनच म्हटले आहे— 'उर्वरित अगदी परिवास करणाऱ्या इत्यादी भिक्खूंचेही.' परंतु, या मूलायपटिकस्सनार्ह इत्यादींचे लक्षण पुढे स्पष्ट होईल. या मूलायपटिकस्सनार्ह कर्तव्यामध्ये आणि यापुढील मानत्तार्ह इत्यादींच्या कर्तव्यांमध्ये उर्वरित विधी परिवास-कर्तव्यात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. ๘๗. มูลายปฏิกสฺสนารหจตุตฺโถ เจติอาทีสุปิ ยเถว ปาริวาสิโก; เอวํ เอเตปิ เอเตสุ วินยกมฺเมสุ คณปูรกา น โหนฺติ, เสสสงฺฆกมฺเมสุ โหนฺติ. ८७. 'मूलायपटिकस्सनार्ह चौथा भिक्खू' इत्यादी पाठांमध्येही, ज्याप्रमाणे परिवास करणारा भिक्खू गणपूरक (संघाची संख्या पूर्ण करणारा) होत नाही, त्याचप्रमाणे हे भिक्खू देखील या विनयकर्मांमध्ये गणपूरक होत नाहीत; परंतु उर्वरित संघकर्मांमध्ये ते गणपूरक होतात. มูลายปฏิกสฺสนารหวตฺตกถา นิฏฺฐิตา. मूलायपटिकस्सनार्ह भिक्खूंच्या कर्तव्याची कथा समाप्त झाली. มานตฺตจาริกวตฺตกถา मानत्तचारिक (मानत्त आचरण करणाऱ्या) भिक्खूंच्या कर्तव्याची कथा. ๙๐. มานตฺตจาริกสฺส วตฺเตสุ ‘‘เทวสิกํ อาโรเจตพฺพ’’นฺติ วิเสโส. ९०. मानत्त आचरण करणाऱ्या भिक्खूच्या कर्तव्यांमध्ये 'दररोज (भिक्खूंना) कळवले पाहिजे' हा विशेष नियम आहे. ๙๒. รตฺติจฺเฉเทสุ อูเน คเณติ เอตฺถ คโณติ จตฺตาโร วา อติเรกา วา; ตสฺมา สเจปิ ตีหิ ภิกฺขูหิ สทฺธึ วสติ, รตฺติจฺเฉโท โหติเยว. มานตฺตนิกฺเขปสมาทาเนสุ วุตฺตสทิโสว วินิจฺฉโย. เสสํ สพฺพตฺถ อุตฺตานเมวาติ. ९२. रात्रीच्या खंडामध्ये (रत्तिच्छेदात) 'कमी गणामध्ये' या पाठात, 'गण' म्हणजे चार किंवा त्याहून अधिक भिक्खू होय. म्हणून, जरी तो तीन भिक्खूंसोबत राहत असला, तरी रात्रीचा खंड (रत्तिच्छेद) होतोच. मानत्त सोडणे आणि ग्रहण करणे याविषयीचा निर्णय पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच आहे. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. มานตฺตจาริกวตฺตกถา นิฏฺฐิตา. मानत्तचारिक भिक्खूंच्या कर्तव्याची कथा समाप्त झाली. ปาริวาสิกกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. पारिवासिक स्कंधकाची वर्णना (टीका) समाप्त झाली. ๓. สมุจฺจยกฺขนฺธกํ ३. समुच्चयस्कंधक สุกฺกวิสฺสฏฺฐิกถา शुक्कविस्सिट्ठी (शुक्रविसर्ग) कथा. ๙๗. สมุจฺจยกฺขนฺธเก [Pg.16] – ฉารตฺตํ มานตฺตนฺติ เอตฺถ จตุพฺพิธํ มานตฺตํ – อปฺปฏิจฺฉนฺนมานตฺตํ, ปฏิจฺฉนฺนมานตฺตํ, ปกฺขมานตฺตํ, สโมธานมานตฺตนฺติ. ตตฺถ อปฺปฏิจฺฉนฺนมานตฺตํ นาม – ยํ อปฺปฏิจฺฉนฺนาย อาปตฺติยา ปริวาสํ อทตฺวา เกวลํ อาปตฺตึ อาปนฺนภาเวเนว มานตฺตารหสฺส มานตฺตํ ทิยฺยติ. ปฏิจฺฉนฺนมานตฺตํ นาม – ยํ ปฏิจฺฉนฺนาย อาปตฺติยา ปริวุตฺถปริวาสสฺส ทิยฺยติ. ปกฺขมานตฺตํ นาม – ยํ ปฏิจฺฉนฺนาย วา อปฺปฏิจฺฉนฺนาย วา อาปตฺติยา อทฺธมาสํ ภิกฺขุนีนํ ทิยฺยติ. สโมธานมานตฺตํ นาม – ยํ โอธาย เอกโต กตฺวา ทิยฺยติ. เตสุ อิทํ ‘‘อปฺปฏิจฺฉนฺนาย ฉารตฺตํ มานตฺต’’นฺติ วจนโต ‘‘อปฺปฏิจฺฉนฺนมานตฺต’’นฺติ เวทิตพฺพํ. ตํ เทนฺเตน สเจ เอกํ อาปตฺตึ อาปนฺโน โหติ, อิธ วุตฺตนเยน ทาตพฺพํ. สเจ ทฺเว วา ติสฺโส วา ตตุตฺตรึ วา อาปนฺโน, ยเถว ‘‘เอกํ อาปตฺติ’’นฺติ วุตฺตํ; เอวํ ‘‘ทฺเว อาปตฺติโย, ติสฺโส อาปตฺติโย’’ติ วตฺตพฺพํ. ตตุตฺตริ ปน สเจปิ สตํ วา สหสฺสํ วา โหติ, ‘‘สมฺพหุลา’’ติ วตฺตพฺพํ. นานาวตฺถุกาโยปิ เอกโต กตฺวา ทาตพฺพา, ตาสํ ทานวิธึ ปริวาสทาเน กถยิสฺสาม. ९७. समुच्चयस्कंधकात—'सहा रात्रींचे मानत्त' या पाठात, मानत्त चार प्रकारचे आहे—अप्रतिच्छन्न-मानत्त, प्रतिच्छन्न-मानत्त, पक्ष-मानत्त आणि समोधान-मानत्त. त्यापैकी, 'अप्रतिच्छन्न-मानत्त' म्हणजे जे न लपवलेल्या (अप्रतिच्छन्न) आपत्तीसाठी परिवास न देता, केवळ आपत्ती ओढवून घेतल्यामुळे मानत्तार्ह भिक्खूला दिले जाते. 'प्रतिच्छन्न-मानत्त' म्हणजे जे लपवलेल्या (प्रतिच्छन्न) आपत्तीसाठी परिवास पूर्ण केलेल्या भिक्खूला दिले जाते. 'पक्ष-मानत्त' म्हणजे जे लपवलेल्या किंवा न लपवलेल्या आपत्तीसाठी भिक्खुणींना अर्धा महिना (पंधरवडा) दिले जाते. 'समोधान-मानत्त' म्हणजे जे आपत्ती एकत्र करून दिले जाते. त्यापैकी, येथे 'न लपवलेल्या आपत्तीसाठी सहा रात्रींचे मानत्त' असे म्हटल्यामुळे हे 'अप्रतिच्छन्न-मानत्त' आहे असे समजावे. ते देताना, जर भिक्खू एका आपत्तीत पडला असेल, तर येथे सांगितलेल्या पद्धतीने दिले पाहिजे. जर तो दोन, तीन किंवा त्याहून अधिक आपत्तींमध्ये पडला असेल, तर ज्याप्रमाणे 'एक आपत्ती' म्हटले आहे, त्याचप्रमाणे 'दोन आपत्ती', 'तीन आपत्ती' असे म्हणावे. परंतु त्याहून अधिक, अगदी शंभर किंवा हजार आपत्ती असल्या तरी 'अनेक आपत्ती' (संबहुला) असे म्हणावे. वेगवेगळ्या कारणांच्या आपत्ती देखील एकत्र करून दिल्या पाहिजेत; त्या देण्याचा विधी आम्ही परिवास देण्याच्या प्रसंगात सांगू. เอวํ อาปตฺติวเสน กมฺมวาจํ กตฺวา ทินฺเน มานตฺเต ‘‘เอวเมตํ ธารยามี’’ติ กมฺมวาจาปริโยสาเน มาฬกสีมายเมว ‘‘มานตฺตํ สมาทิยามิ, วตฺตํ สมาทิยามี’’ติ วุตฺตนเยน วตฺตํ สมาทาตพฺพํ. วตฺตํ สมาทิยิตฺวา ตตฺเถว สงฺฆสฺส อาโรเจตพฺพํ, อาโรเจนฺเตน จ เอวํ อาโรเจตพฺพํ – अशा प्रकारे आपत्तीनुसार कर्मवाचा करून मानत्त दिले असता, 'मी हे अशा प्रकारे धारण करतो' या कर्मवाचेच्या शेवटी, सीमा मंडपातच (माळका-सीमेतच) 'मी मानत्त ग्रहण करतो, मी व्रत ग्रहण करतो' या पद्धतीने व्रत ग्रहण करावे. व्रत ग्रहण करून तिथेच संघाला कळवावे, आणि कळवताना अशा प्रकारे कळवावे— ‘‘อหํ, ภนฺเต, เอกํ อาปตฺตึ อาปชฺชึ สญฺเจตนิกํ สุกฺกวิสฺสฏฺฐึ อปฺปฏิจฺฉนฺนํ, โสหํ สงฺฆํ เอกิสฺสา อาปตฺติยา สญฺเจตนิกาย สุกฺกวิสฺสฏฺฐิยา อปฺปฏิจฺฉนฺนาย ฉารตฺตํ มานตฺตํ ยาจึ, ตสฺส เม สงฺโฆ เอกิสฺสา อาปตฺติยา สญฺเจตนิกาย สุกฺกวิสฺสฏฺฐิยา อปฺปฏิจฺฉนฺนาย ฉารตฺตํ มานตฺตํ อทาสิ. โสหํ มานตฺตํ จรามิ, เวทยามหํ, ภนฺเต ‘เวทยตี’ติ มํ สงฺโฆ ธาเรตู’’ติ. 'भंते, मी जाणूनबुजून केलेल्या शुक्रविसर्गाची (संचेतनिक सुक्कविस्सिट्ठी) एक न लपवलेली (अप्रतिच्छन्न) आपत्ती ओढवून घेतली आहे. मी संघाकडे त्या जाणूनबुजून केलेल्या शुक्रविसर्गाच्या एका न लपवलेल्या आपत्तीसाठी सहा रात्रींच्या मानत्ताची याचना केली. संघाने मला त्या जाणूनबुजून केलेल्या शुक्रविसर्गाच्या एका न लपवलेल्या आपत्तीसाठी सहा रात्रींचे मानत्त दिले आहे. मी ते मानत्त आचरण करत आहे. भंते, मी हे कळवत आहे; संघाने मला 'हा मानत्त आचरण करत आहे' असे समजावे.' อิมญฺจ ปน อตฺถํ คเหตฺวา ยาย กายจิ ภาสาย อาโรเจตุํ วฏฺฏติเยว. อาโรเจตฺวา สเจ นิกฺขิปิตุกาโม, วุตฺตนเยเนว สงฺฆมชฺเฌ [Pg.17] นิกฺขิปิตพฺพํ. มาฬกโต ภิกฺขูสุ นิกฺขนฺเตสุ เอกสฺสปิ สนฺติเก นิกฺขิปิตุํ วฏฺฏติ. มาฬกโต นิกฺขมิตฺวา สตึ ปฏิลภนฺเตน สหคจฺฉนฺตสฺส สนฺติเก นิกฺขิปิตพฺพํ. สเจ โสปิ ปกฺกนฺโต, อญฺญสฺส ยสฺส มาฬเก นาโรจิตํ, ตสฺส อาโรเจตฺวา นิกฺขิปิตพฺพํ. อาโรเจนฺเตน ปน อวสาเน ‘‘เวทยตีติ มํ อายสฺมา ธาเรตู’’ติ วตฺตพฺพํ. ทฺวินฺนํ อาโรเจนฺเตน ‘‘อายสฺมนฺตา ธาเรนฺตู’’ติ, ติณฺณํ อาโรเจนฺเตน ‘‘อายสฺมนฺโต ธาเรนฺตู’’ติ วตฺตพฺพํ. นิกฺขิตฺตกาลโต ปฏฺฐาย ปกตตฺตฏฺฐาเน ติฏฺฐติ. आणि हाच अर्थ घेऊन कोणत्याही भाषेत कळवणे योग्यच आहे. कळवल्यानंतर जर मानत्त सोडण्याची इच्छा असेल, तर पूर्वोक्त पद्धतीनेच संघामध्ये ते सोडावे. सीमा मंडपातून भिक्खू बाहेर पडले असता, एका भिक्खूच्या जवळ देखील ते सोडणे योग्य आहे. सीमा मंडपातून बाहेर पडून (व्रत सोडण्याची) स्मृती प्राप्त झालेल्या भिक्खूने सोबत जाणाऱ्या भिक्खूच्या जवळ ते सोडावे. जर तो देखील निघून गेला असेल, तर ज्या दुसऱ्या भिक्खूला सीमा मंडपात कळवले नव्हते, त्याला कळवून ते सोडावे. परंतु कळवताना शेवटी (एका भिक्खूजवळ असल्यास) 'मी कळवत आहे, आयुष्यमानांनी मला तसे समजावे' असे म्हणावे. दोन भिक्खूंना कळवताना 'आयुष्यमानांनी मला तसे समजावे' (द्विवचनी रूप) असे म्हणावे, आणि तीन भिक्खूंना कळवताना 'आयुष्यमानांनी मला तसे समजावे' (बहुवचनी रूप) असे म्हणावे. मानत्त सोडल्याच्या वेळेपासून तो प्रकृतत्व (सामान्य भिक्खूच्या) स्थितीत राहतो. สเจ อปฺปภิกฺขุโก วิหาโร โหติ, สภาคา ภิกฺขู วสนฺติ, วตฺตํ อนิกฺขิปิตฺวา อนฺโตวิหาเรเยว รตฺติโย คเณตพฺพา. อถ น สกฺกา โสเธตุํ, วุตฺตนเยเนว วตฺตํ นิกฺขิปิตฺวา ปจฺจูสสมเย จตูหิ ปญฺจหิ วา ภิกฺขูหิ สทฺธึ ปริกฺขิตฺตสฺส วิหารสฺส ปริกฺเขปโต, อปริกฺขิตฺตสฺส ปริกฺเขปารหฏฺฐานโต ทฺเว เลฑฺฑุปาเต อติกฺกมิตฺวา มหามคฺคโต โอกฺกมฺม คุมฺเพน วา วติยา วา ปฏิจฺฉนฺนฏฺฐาเน นิสีทิตพฺพํ. อนฺโตอรุเณเยว วุตฺตนเยน วตฺตํ สมาทิยิตฺวา อาโรเจตพฺพํ. สเจ อญฺโญ โกจิ ภิกฺขุ เกนจิเทว กรณีเยน ตํ ฐานํ อาคจฺฉติ, สเจ เอส ตํ ปสฺสติ, สทฺทํ วาสฺส สุณาติ, อาโรเจตพฺพํ. อนาโรเจนฺตสฺส รตฺติจฺเฉโท เจว วตฺตเภโท จ. जर विहारामध्ये कमी भिक्खू असतील आणि तिथे समान शील-दृष्टी असलेले (सभाग) भिक्खू राहत असतील, तर व्रत न सोडता विहाराच्या आतच रात्री मोजाव्यात. जर (विहार) स्वच्छ करणे शक्य नसेल, तर सांगितलेल्या पद्धतीनेच व्रत सोडून, पहाटेच्या वेळी चार किंवा पाच भिक्खूंसह, कुंपण घातलेल्या विहाराच्या कुंपणापासून किंवा कुंपण नसलेल्या विहाराच्या कुंपण घालण्यायोग्य जागेपासून दोन दगडफेकीचे अंतर ओलांडून, मुख्य रस्त्यावरून बाजूला होऊन झाडीने किंवा कुंपणाने झाकलेल्या ठिकाणी बसावे. अरुणोदयापूर्वीच सांगितलेल्या पद्धतीने व्रत ग्रहण करून (ते इतर भिक्खूंना) जाहीर करावे. जर इतर कोणी भिक्खू काही कामासाठी त्या ठिकाणी आला आणि याने त्याला पाहिले किंवा त्याचा आवाज ऐकला, तर त्याला (आपल्या व्रताविषयी) सांगावे. न सांगणाऱ्याचा रात्रीचा खंड (रत्तिच्छेद) आणि व्रताचा भंग (वत्तभेद) दोन्ही होतो. อถ ทฺวาทสหตฺถํ อุปจารํ โอกฺกมิตฺวา อชานนฺตสฺเสว คจฺฉติ, รตฺติจฺเฉโท โหติ เอว, วตฺตเภโท ปน นตฺถิ. อาโรจิตกาลโต ปฏฺฐาย จ เอกํ ภิกฺขุํ ฐเปตฺวา เสเสหิ สติ กรณีเย คนฺตุมฺปิ วฏฺฏติ. อรุเณ อุฏฺฐิเต ตสฺส ภิกฺขุสฺส สนฺติเก วตฺตํ นิกฺขิปิตพฺพํ. สเจ โสปิ เกนจิ กมฺเมน ปุเรอรุเณเยว คจฺฉติ, อญฺญํ วิหารโต นิกฺขนฺตํ วา อาคนฺตุกํ วา ยํ ปฐมํ ปสฺสติ, ตสฺส สนฺติเก อาโรเจตฺวา วตฺตํ นิกฺขิปิตพฺพํ. อยญฺจ ยสฺมา คณสฺส อาโรเจตฺวา ภิกฺขูนญฺจ อตฺถิภาวํ สลฺลกฺเขตฺวาว วสิ, เตนสฺส อูเน คเณ จรณโทโส วา วิปฺปวาโส วา น โหติ. สเจ น กญฺจิ ปสฺสติ, วิหารํ คนฺตฺวา อตฺตนา สทฺธึ คตภิกฺขูสุ เอกสฺส สนฺติเก นิกฺขิปิตพฺพนฺติ มหาสุมตฺเถโร อาห. มหาปทุมตฺเถโร ปน ‘‘ยํ ปฐมํ ปสฺสติ, ตสฺส อาโรเจตฺวา นิกฺขิปิตพฺพํ; อยํ นิกฺขิตฺตวตฺตสฺส ปริหาโร’’ติ อาห. किंवा जर तो नकळत बारा हातांच्या परिघाबाहेर निघून गेला, तर रात्रीचा खंड (रत्तिच्छेद) नक्कीच होतो, परंतु व्रतभंग (वत्तभेद) होत नाही. आणि व्रत जाहीर केल्याच्या वेळेपासून एका भिक्खूला तिथे ठेवून, उरलेल्या भिक्खूंना काही काम असल्यास जाणे योग्य आहे. अरुणोदय झाल्यावर त्या (राहिलेल्या) भिक्खूच्या जवळ व्रत सोडावे. जर तो (राहिलेला भिक्खू) देखील काही कामानिमित्त अरुणोदयापूर्वीच निघून गेला, तर विहारातून बाहेर पडणाऱ्या किंवा बाहेरून येणाऱ्या ज्या इतर भिक्खूला तो सर्वप्रथम पाहील, त्याच्याजवळ सांगून व्रत सोडावे. आणि हा (मानत्त आचरण करणारा भिक्खू) ज्याअर्थी गणाला (भिक्खूंच्या समूहाला) सांगून आणि भिक्खूंच्या उपस्थितीची नोंद घेऊनच राहिला, त्यामुळे गणाची संख्या कमी झाल्यावरही त्याला आचरणाचा दोष किंवा विप्रवास (विहाराबाहेर राहण्याचा दोष) लागत नाही. जर तो कोणालाही पाहत नसेल, तर विहारात जाऊन स्वतःसोबत आलेल्या भिक्खूंपैकी एकाच्या जवळ व्रत सोडावे, असे महासुमतत्थेर म्हणाले. परंतु महापदमतत्थेर म्हणाले की, 'ज्याला तो सर्वप्रथम पाहील, त्याला सांगून व्रत सोडावे; हे व्रत सोडलेल्या भिक्खूचे संरक्षण आहे.' เอวํ ฉารตฺตํ มานตฺตํ อขณฺฑํ จริตฺวา ยตฺถ สิยา วีสติคโณ ภิกฺขุสงฺโฆ, ตตฺถ โส ภิกฺขุ อพฺเภตพฺโพ. อพฺเภนฺเตหิ จ ปฐมํ อพฺภานารโห [Pg.18] กาตพฺโพ. อยญฺหิ นิกฺขิตฺตวตฺตตฺตา ปกตตฺตฏฺฐาเน ฐิโต, ปกตตฺตสฺส จ อพฺภานํ กาตุํ น วฏฺฏติ, ตสฺมา วตฺตํ สมาทาเปตพฺโพ. วตฺเต สมาทินฺเน อพฺภานารโห โหติ. เตนาปิ วตฺตํ สมาทิยิตฺวา อาโรเจตฺวา อพฺภานํ ยาจิตพฺพํ. อนิกฺขิตฺตวตฺตสฺส ปุน วตฺตสมาทานกิจฺจํ นตฺถิ. โส หิ ฉารตฺตาติกฺกเมเนว อพฺภานารโห โหติ, ตสฺมา โส อพฺเภตพฺโพ. ตตฺร ยฺวายํ ‘‘เอวญฺจ ปน, ภิกฺขเว, อพฺเภตพฺโพ’’ติ ปาฬิยํเยว อพฺภานวิธิ วุตฺโต, อยญฺจ เอกาปตฺติวเสน วุตฺโต. สเจ ปน ทฺเว ติสฺโส สมฺพหุลา วา เอกวตฺถุกา วา นานาวตฺถุกา วา อาปตฺติโย โหนฺติ, ตาสํ วเสน กมฺมวาจา กาตพฺพา. เอวํ อปฺปฏิจฺฉนฺนมานตฺตํ ทาตพฺพํ. ปฏิจฺฉนฺนมานตฺตํ ปน ยสฺมา ปฏิจฺฉนฺนาย อาปตฺติยา ปริวุตฺถปริวาสสฺส ทาตพฺพํ โหติ, ตสฺมา นํ ปริวาสกถายํเยว กถยิสฺสาม. अशा प्रकारे सहा रात्रींचे मानत्त अखंडपणे आचरून, जिथे वीस भिक्खूंचा संघ असेल, तिथे त्या भिक्खूचे अब्भान (पुनर्स्थापना) करावे. आणि अब्भान करणाऱ्यांनी प्रथम त्याला अब्भान मिळण्यास पात्र करावे. कारण, हा व्रत सोडल्यामुळे सामान्य भिक्खूच्या (पकतत्त) स्थितीत असतो, आणि सामान्य भिक्खूचे अब्भान करणे योग्य नाही, म्हणून त्याला व्रत ग्रहण करायला लावावे. व्रत ग्रहण केल्यावर तो अब्भान मिळण्यास पात्र होतो. त्याने देखील व्रत ग्रहण करून व ते जाहीर करून अब्भानाची याचना करावी. ज्याने व्रत सोडले नाही, त्याला पुन्हा व्रत ग्रहण करण्याचे काही प्रयोजन नाही. कारण, तो सहा रात्री पूर्ण झाल्यावरच अब्भान मिळण्यास पात्र होतो, म्हणून त्याचे अब्भान करावे. त्या संदर्भात, 'आणि भिक्खूंनो, अशा प्रकारे अब्भान करावे' ही अब्भान पद्धती पाळीमध्येच सांगितली आहे, आणि ही एका आपत्तीच्या संदर्भात सांगितली आहे. परंतु जर दोन, तीन किंवा अनेक, एकाच वस्तूशी संबंधित किंवा वेगवेगळ्या वस्तूंशी संबंधित आपत्ती असतील, तर त्यानुसार कम्मवाचा करावी. अशा प्रकारे न लपवलेल्या आपत्तीसाठी मानत्त (अप्पटिच्छन्नमानत्त) दिले पाहिजे. परंतु लपवलेल्या आपत्तीसाठी मानत्त (पटिच्छन्नमानत्त) हे परिवास पूर्ण केलेल्या भिक्खूला द्यायचे असल्याने, त्याविषयी आपण 'परिवासकथा' मध्येच चर्चा करू. ปริวาสกถา परिवासकथा ๑๐๒. ‘‘เตน หิ, ภิกฺขเว, สงฺโฆ อุทายิสฺส ภิกฺขุโน เอกิสฺสา อาปตฺติยา สญฺเจตนิกาย สุกฺกวิสฺสฏฺฐิยา เอกาหปฏิจฺฉนฺนาย เอกาหปริวาสํ เทตู’’ติอาทินา นเยน ปาฬิยํ อเนเกหิ อากาเรหิ ปริวาโส จ มานตฺตญฺจ วุตฺตํ. ตสฺส ยสฺมา อาคตาคตฏฺฐาเน วินิจฺฉโย วุจฺจมาโน ปาฬิ วิย อติวิตฺถารํ อาปชฺชติ, น จ สกฺกา โหติ สุเขน ปริคฺคเหตุํ, ตสฺมา นํ สโมธาเนตฺวา อิเธว ทสฺสยิสฺสาม. १०२. 'म्हणूनच, भिक्खूंनो, संघाने उदायी भिक्खूला एका दिवसासाठी लपवलेल्या, जाणीवपूर्वक केलेल्या वीर्यस्खलनाच्या एका आपत्तीसाठी एका दिवसाचा परिवास द्यावा' इत्यादी पद्धतीने पाळीमध्ये अनेक प्रकारे परिवास आणि मानत्त सांगितले गेले आहे. कारण, वेगवेगळ्या ठिकाणी आलेल्या संदर्भांनुसार त्याचा निर्णय सांगताना पाळीप्रमाणेच तो अतिशय विस्तृत होतो आणि तो सहजपणे समजून घेणे शक्य होत नाही, म्हणून आम्ही त्याचे संकलन करून इथेच ते स्पष्ट करू. อยญฺหิ อิธ อธิปฺเปโต ปริวาโส นาม – ปฏิจฺฉนฺนปริวาโส, สุทฺธนฺตปริวาโส, สโมธานปริวาโสติ ติวิโธ โหติ. ตตฺถ ปฏิจฺฉนฺนปริวาโส ตาว ยถาปฏิจฺฉนฺนาย อาปตฺติยา ทาตพฺโพ. กสฺสจิ หิ เอกาหปฏิจฺฉนฺนา อาปตฺติ โหติ ยถา อยํ อุทายิตฺเถรสฺส, กสฺสจิ ทฺวีหาทิปฏิจฺฉนฺนา ยถา ปรโต อาคตา อุทายิตฺเถรสฺเสว, กสฺสจิ เอกา อาปตฺติ โหติ ยถา อยํ, กสฺสจิ ทฺเว ติสฺโส ตตุตฺตริ วา ยถา ปรโต อาคตา, ตสฺมา ปฏิจฺฉนฺนปริวาสํ เทนฺเตน ปฐมํ ตาว ปฏิจฺฉนฺนภาโว ชานิตพฺโพ. कारण, इथे अभिप्रेत असलेला परिवास – पटिच्छन्नपरिवास, सुद्धन्तपरिवास आणि समोधानपरिवास असा three प्रकारचा असतो. त्यापैकी, पटिच्छन्नपरिवास हा जितके दिवस आपत्ती लपवली असेल त्यानुसार दिला पाहिजे. कारण, कोणाची आपत्ती उदायी थेरांप्रमाणे एका दिवसासाठी लपवलेली असते, तर कोणाची दोन किंवा अधिक दिवसांसाठी लपवलेली असते, जसे की उदायी थेरांच्याच नंतर आलेल्या आपत्तींच्या बाबतीत. कोणाची एकच आपत्ती असते, जसे की ही, तर कोणाच्या दोन, तीन किंवा त्याहून अधिक आपत्ती असतात, जसे की नंतर आलेल्या आपत्तींच्या बाबतीत. म्हणून, पटिच्छन्नपरिवास देणाऱ्याने सर्वप्रथम आपत्ती लपवल्याची स्थिती (पटिच्छन्नभाव) जाणून घेतली पाहिजे. อยญฺหิ อาปตฺติ นาม ทสหากาเรหิ ปฏิจฺฉนฺนา โหติ. ตตฺถายํ มาติกา – อาปตฺติ จ โหติ อาปตฺติสญฺญี จ, ปกตตฺโต จ โหติ ปกตตฺตสญฺญี [Pg.19] จ, อนนฺตรายิโก จ โหติ อนนฺตรายิกสญฺญี จ, ปหุ จ โหติ ปหุสญฺญี จ, ฉาเทตุกาโม จ โหติ ฉาเทติ จาติ. कारण, ही आपत्ती दहा कारणांमुळे लपवलेली (पटिच्छन्न) मानली जाते. त्या संदर्भात ही मातृका आहे – आपत्ती देखील असते आणि ती आपत्ती असल्याची जाणीवही असते; तो सामान्य भिक्खू (पकतत्त) देखील असतो आणि तो सामान्य भिक्खू असल्याची जाणीवही असते; अंतराय (अडथळा) नसतो आणि अंतराय नसल्याची जाणीवही असते; तो समर्थ असतो आणि समर्थ असल्याची जाणीवही असते; लपवण्याची इच्छा असते आणि तो ती लपवतो देखील. ตตฺถ อาปตฺติ จ โหติ อาปตฺติสญฺญี จาติ ยํ อาปนฺโน, สา อาปตฺติเยว โหติ. โสปิ จ ตตฺถ อาปตฺติสญฺญีเยว. อิติ ชานนฺโต ฉาเทติ, ฉนฺนาว โหติ. อถ ปนายํ ตตฺถ อนาปตฺติสญฺญี, อจฺฉนฺนา โหติ, อนาปตฺติ ปน อาปตฺติสญฺญายปิ อนาปตฺติสญฺญายปิ ฉาเทนฺเตนาปิ อจฺฉาทิตาว โหติ. ลหุกํ วา ครุกาติ ครุกํ วา ลหุกาติ ฉาเทติ, อลชฺชิปกฺเข ติฏฺฐติ, อาปตฺติ ปน อจฺฉนฺนา โหติ. ครุกํ ลหุกาติ มญฺญมาโน เทเสติ, เนว เทสิตา โหติ, น ฉนฺนา. ครุกํ ครุกาติ ญตฺวา ฉาเทติ, ฉนฺนา โหติ. ครุกลหุกภาวํ น ชานาติ, อาปตฺตึ ฉาเทมีติ ฉาเทติ, ฉนฺนาว โหติ. त्या मातृकेमध्ये, 'आपत्ती देखील असते आणि ती आपत्ती असल्याची जाणीवही असते' याचा अर्थ असा की, ज्या आपत्तीला तो प्राप्त झाला आहे, ती खरोखरच आपत्ती असते आणि त्याला देखील ती आपत्ती असल्याची जाणीव असते. असे जाणून जर तो ती लपवतो, तर ती लपवलेलीच (छन्न) मानली जाते. परंतु, जर त्याला ती आपत्ती नसल्याची जाणीव असेल, तर ती लपवलेली मानली जात नाही. आणि जर ती खरोखरच आपत्ती नसेल, तर ती आपत्ती आहे असे समजून किंवा आपत्ती नाही असे समजून लपवली तरीही ती लपवलेली मानली जात नाही. जर तो हलक्या आपत्तीला भारी (गुरू) आपत्ती म्हणून किंवा भारी आपत्तीला हलकी आपत्ती म्हणून लपवतो, तर तो निर्लज्ज (अलज्जी) लोकांच्या पक्षात उभा राहतो, परंतु ती आपत्ती लपवलेली मानली जात नाही. जर तो भारी आपत्तीला हलकी आपत्ती समजून तिची कबुली (देसना) देतो, तर ती कबूल केलेलीही मानली जात नाही आणि लपवलेलीही मानली जात नाही. जर तो भारी आपत्तीला भारी आपत्ती समजून लपवतो, तर ती लपवलेली मानली जाते. जर त्याला ती भारी आहे की हलकी हे माहीत नसेल, पण 'मी आपत्ती लपवत आहे' असे समजून तो ती लपवतो, तर ती लपवलेलीच मानली जाते. ปกตตฺโตติ ติวิธํ อุกฺเขปนียกมฺมํ อกโต – โส เจ ปกตตฺตสญฺญี หุตฺวา ฉาเทติ, ฉนฺนา โหติ. อถ ‘‘มยฺหํ สงฺเฆน กมฺมํ กต’’นฺติ อปกตตฺตสญฺญี หุตฺวา ฉาเทติ, อจฺฉนฺนา โหติ. อปกตตฺเตน ปกตตฺตสญฺญินา วา อปกตตฺตสญฺญินา วา ฉาทิตาปิ อจฺฉนฺนาว โหติ. วุตฺตมฺปิ เจตํ – 'पकतत्त' म्हणजे ज्याच्यावर तीन प्रकारची उक्खेपनीय कम्मे (बहिष्काराची कर्मे) केली गेलेली नाहीत. जर तो स्वतःला सामान्य भिक्खू (पकतत्त) समजून आपत्ती लपवतो, तर ती लपवलेली मानली जाते. परंतु, जर तो 'संघाने माझ्यावर कर्म केले आहे' असे समजून स्वतःला अपकतत्त (असामान्य भिक्खू) मानून लपवतो, तर ती लपवलेली मानली जात नाही. अपकतत्त (असामान्य) भिक्खूने स्वतःला पकतत्त समजून किंवा अपकतत्त समजून लपवली तरीही ती लपवलेली मानली जात नाही. याविषयी असेही म्हटले आहे – ‘‘อาปชฺชติ ครุกํ สาวเสสํ,ฉาเทติ อนาทริยํ ปฏิจฺจ; น ภิกฺขุนี โน จ ผุเสยฺย วชฺชํ,ปญฺหา เมสา กุสเลหิ จินฺติตา’’ติ. (ปริ. ๔๘๑); 'तो उरलेल्या भागासह (सावसेस) भारी आपत्तीला (संघादिसेस) प्राप्त होतो आणि अनादरामुळे ती लपवतो; ती भिक्खुणी नाही आणि तिला दोषाचा (दुक्कट आपत्तीचा) स्पर्शही होत नाही – हा प्रश्न विद्वानांनी विचारपूर्वक मांडला आहे.' อยญฺหิ ปญฺโห อุกฺขิตฺตเกน กถิโต. कारण, हा प्रश्न उक्खित्तक (बहिष्कृत) भिक्खूच्या संदर्भात विचारला गेला आहे. อนนฺตรายิโกติ ยสฺส ทสสุ อนฺตราเยสุ เอโกปิ นตฺถิ, โส เจ อนนฺตรายิกสญฺญี หุตฺวา ฉาเทติ, ฉนฺนา โหติ. สเจปิ โส ภีรุกชาติกตาย อนฺธกาเร อมนุสฺสจณฺฑมิคภเยน อนฺตรายิกสญฺญี หุตฺวา ฉาเทติ, อจฺฉนฺนาว โหติ. ยสฺส หิ ปพฺพตวิหาเร วสนฺตสฺส กนฺทรํ วา นทึ วา อติกฺกมิตฺวา อาโรเจตพฺพํ โหติ, อนฺตรามคฺเค จ จณฺฑวาฬอมนุสฺสาทิภยํ อตฺถิ, มคฺเค อชครา นิปชฺชนฺติ, นที ปูรา โหติ, เอกสฺมึ ปน สติเยว อนฺตราเย อนฺตรายิกสญฺญี หุตฺวา [Pg.20] ฉาเทติ, อจฺฉนฺนาว โหติ. อนฺตรายิกสฺส ปน อนฺตรายิกสญฺญาย วา อนนฺตรายิกสญฺญาย วา ฉาทยโต อจฺฉนฺนาว โหติ. अन्तराय नसलेला (अनन्तरायिक) म्हणजे ज्याच्या दहा अन्तरायांपैकी एकही अन्तराय अस्तित्वात नाही. जर तो 'अन्तराय नाही' अशी संज्ञा (समज) ठेवून आपत्ती लपवतो, तर ती लपवलेली (छन्न) मानली जाते. परंतु, जर तो भितऱ्या स्वभावामुळे अंधारात अमनुष्य (भूत-पिशाच) किंवा हिंस्र श्वापदांच्या भयाने 'अन्तराय आहे' अशी संज्ञा ठेवून लपवतो, तर ती न लपवलेलीच (अछन्न) मानली जाते. कारण जो पर्वतावरील विहारात राहत असताना, दरी किंवा नदी ओलांडून आपत्तीची माहिती देणे आवश्यक असते, आणि वाटेत हिंस्र श्वापदे, अमनुष्य इत्यादींचे भय असते, वाटेत अजगर पडलेले असतात, नदी पाण्याने भरलेली असते; अशा वेळी एका जरी अन्तरायाचे अस्तित्व असताना 'अन्तराय आहे' अशी संज्ञा ठेवून तो लपवतो, तर ती न लपवलेलीच (अछन्न) मानली जाते. परंतु खरोखरच अन्तराय असताना, 'अन्तराय आहे' अशा संज्ञेने किंवा 'अन्तराय नाही' अशा संज्ञेने लपवणाऱ्याची आपत्ती न लपवलेलीच (अछन्न) मानली जाते. ปหูติ โย สกฺโกติ ภิกฺขุโน สนฺติกํ คนฺตุญฺเจว อาโรเจตุญฺจ; โส เจ ปหุสญฺญี หุตฺวา ฉาเทติ, ฉนฺนา โหติ. สจสฺส มุเข อปฺปมตฺตโก คณฺโฑ วา โหติ, หนุกวาโต วา วิชฺฌติ, ทนฺโต วา รุชฺชติ, ภิกฺขา วา มนฺทา ลทฺธา โหติ, ตาวตเกน ปน เนว วตฺตุํ น สกฺโกติ น คนฺตุํ; อปิจ โข น สกฺโกมีติ สญฺญี โหติ, อยํ ปหุ หุตฺวา อปฺปหุสญฺญี นาม. อิมินา ฉาทิตาปิ อจฺฉาทิตา. อปฺปหุนา ปน วตฺตุํ วา คนฺตุํ วา อสมตฺเถน ปหุสญฺญินา วา อปฺปหุสญฺญินา วา ฉาทิตา โหตุ, อจฺฉาทิตาว. समर्थ (पहू) म्हणजे जो भिक्खूच्या जवळ जाण्यास आणि आपत्ती सांगण्यास समर्थ आहे. जर तो 'मी समर्थ आहे' अशी संज्ञा ठेवून आपत्ती लपवतो, तर ती लपवलेली (छन्न) मानली जाते. जर त्याच्या तोंडात लहानशी गाठ (किंवा फोड) असेल, किंवा जबड्याचा वात ठणकत असेल, किंवा दात दुखत असेल, किंवा भिक्षा कमी मिळाली असेल, परंतु तेवढ्या कारणाने तो बोलण्यास किंवा जाण्यास असमर्थ नसतो; तरीही 'मी असमर्थ आहे' अशी संज्ञा बाळगतो, तर तो समर्थ असूनही 'असमर्थ संज्ञा असलेला' (अप्पहुसञ्ञी) म्हटला जातो. त्याने लपवलेली आपत्ती देखील न लपवलेलीच (अछन्न) मानली जाते. परंतु बोलण्यास किंवा जाण्यास असमर्थ असलेल्या भिक्खूने 'मी समर्थ आहे' किंवा 'मी असमर्थ आहे' अशा संज्ञेने लपवली तरी ती न लपवलेलीच (अछन्न) मानली जाते. ฉาเทตุกาโม จ โหติ ฉาเทติ จาติ อิทํ อุตฺตานตฺถเมว. สเจ ปน ฉาเทสฺสามีติ ธุรนิกฺเขปํ กตฺวา ปุเรภตฺเต วา ปจฺฉาภตฺเต วา ปฐมยามาทีสุ วา ลชฺชิธมฺมํ โอกฺกมิตฺวา อนฺโตอรุเณเยว อาโรเจติ, อยํ ฉาเทตุกาโม น ฉาเทติ นาม. 'लपवण्याची इच्छा असणारा आणि लपवणारा' हे वाक्य स्पष्ट अर्थाचेच आहे. परंतु जर 'मी लपवीन' असा निश्चय (जबाबदारी सोडून देणे) करून, जेवणापूर्वी किंवा जेवणानंतर किंवा रात्रीच्या पहिल्या प्रहरात इत्यादी वेळी लज्जाशील स्वभावाचा आश्रय घेऊन, अरुणोदयाच्या आतच आपत्ती सांगतो, तर तो 'लपवण्याची इच्छा असणारा परंतु न लपवणारा' म्हटला जातो. ยสฺส ปน อภิกฺขุเก ฐาเน วสนฺตสฺส อาปตฺตึ อาปชฺชิตฺวา สภาคสฺส ภิกฺขุโน อาคมนํ อาคเมนฺตสฺส สภาคสนฺติกํ วา คจฺฉนฺตสฺส อทฺธมาโสปิ มาโสปิ อติกฺกมติ, อยํ น ฉาเทตุกาโม ฉาเทติ นาม, อยมฺปิ อจฺฉนฺนาว โหติ. परंतु जो भिक्खू नसलेल्या ठिकाणी राहत असताना आपत्तीत पडतो, आणि समान भागीदार (सभाग) भिक्खूच्या आगमनाची वाट पाहत असताना किंवा सभाग भिक्खूच्या जवळ जात असताना पंधरवडा किंवा महिना उलटून जातो, तो 'लपवण्याची इच्छा नसतानाही लपवणारा' म्हटला जातो. ही आपत्ती देखील न लपवलेलीच (अछन्न) मानली जाते. โย ปน อาปนฺนมตฺโตว อคฺคึ อกฺกนฺตปุริโส วิย สหสา อปกฺกมิตฺวา สภาคฏฺฐานํ คนฺตฺวา อาวิ กโรติ, อยํ น ฉาเทตุกาโมว น ฉาเทติ นาม. สเจ ปน สภาคํ ทิสฺวาปิ ‘‘อยํ เม อุปชฺฌาโย วา อาจริโย วา’’ติ ลชฺชาย นาโรเจติ, ฉนฺนาว โหติ อาปตฺติ. อุปชฺฌายาทิภาโว หิ อิธ อปฺปมาณํ อเวริสภาคมตฺตเมว ปมาณํ, ตสฺมา อเวริสภาคสฺส สนฺติเก อาโรเจตพฺพา. परंतु जो आपत्तीत पडल्याबरोबर, जणू काही विस्तवावर पाय पडलेल्या माणसाप्रमाणे तातडीने निघून, सभाग भिक्खूच्या ठिकाणी जाऊन आपत्ती प्रकट करतो, तो 'लपवण्याची इच्छा नसलेला आणि न लपवणारा' म्हटला जातो. परंतु जर सभाग भिक्खूला पाहूनही 'हे माझे उपाध्याय किंवा आचार्य आहेत' अशा लाजेपोटी आपत्ती सांगत नाही, तर ती आपत्ती लपवलेलीच (छन्न) मानली जाते. कारण येथे उपाध्याय किंवा आचार्य असणे हे प्रमाण (महत्त्वाचे) नाही, तर केवळ वैरी नसलेला सभाग भिक्खू असणे हेच प्रमाण आहे. म्हणून वैरी नसलेल्या सभाग भिक्खूच्या जवळच आपत्ती प्रकट केली पाहिजे. โย ปน วิสภาโค โหติ สุตฺวา ปกาเสตุกาโม, เอวรูปสฺส อุปชฺฌายสฺสาปิ สนฺติเก น อาโรเจตพฺพา. ตตฺถ ปุเรภตฺตํ วา อาปตฺตึ อาปนฺโน โหตุ ปจฺฉาภตฺตํ วา, ทิวา วา รตฺตึ วา ยาว อรุณํ น อุคฺคจฺฉติ ตาว อาโรเจตพฺพํ. อุทฺธสฺเต อรุเณ ปฏิจฺฉนฺนา โหติ, ปฏิจฺฉาทนปจฺจยา จ ทุกฺกฏํ อาปชฺชติ. สภาคสงฺฆาทิเสสํ อาปนฺนสฺส ปน สนฺติเก อาวิ [Pg.21] กาตุํ น วฏฺฏติ. สเจ อาวิ กโรติ, อาปตฺติ อาวิกตา โหติ, ทุกฺกฏา ปน น มุจฺจติ, ตสฺมา สุทฺธสฺส สนฺติเก อาวิกาตพฺพา. อาวิกโรนฺโต จ ‘‘ตุยฺหํ สนฺติเก เอกํ อาปตฺตึ อาวิกโรมี’’ติ วา ‘‘อาจิกฺขามี’’ติ วา ‘‘อาโรเจมี’’ติ วา ‘‘มม เอกํ อาปตฺตึ อาปนฺนภาวํ ชานาหี’’ติ วา วทตุ, ‘‘เอกํ ครุกาปตฺตึ อาวิกโรมี’’ติอาทินา วา นเยน วทตุ, สพฺเพหิปิ อากาเรหิ อปฺปฏิจฺฉนฺนาว โหตีติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. สเจ ปน ลหุกาปตฺตึ อาวิกโรมีติอาทินา นเยน วทติ, ปฏิจฺฉนฺนา โหติ, วตฺถุํ อาโรเจติ, อาปตฺตึ อาโรเจติ, อุภยํ อาโรเจติ, ติวิเธนาปิ อาโรจิตาว โหติ. อิติ อิมานิ ทส การณานิ อุปลกฺเขตฺวา ปฏิจฺฉนฺนปริวาสํ เทนฺเตน ปฐมเมว ปฏิจฺฉนฺนภาโว ชานิตพฺโพ. परंतु जो विसभाग (भिन्न वर्गाचा) असतो आणि ऐकून ती आपत्ती उघड करण्याची इच्छा बाळगतो, अशा प्रकारच्या उपाध्यायांच्या जवळ देखील ती सांगू नये. त्यात, जेवणापूर्वी आपत्तीत पडलेला असो वा जेवणानंतर, दिवसा असो वा रात्री, जोपर्यंत अरुणोदय होत नाही तोपर्यंत ती प्रकट करावी. अरुणोदय झाल्यावर ती लपवलेली (प्रतिच्छन्न) मानली जाते आणि लपवण्याच्या कारणामुळे दुक्कट (दुष्कृत) आपत्ती ओढवते. परंतु सभाग संघादिसेस आपत्तीत पडलेल्या भिक्खूच्या जवळ ती प्रकट करणे योग्य नाही. जर प्रकट केली, तर आपत्ती प्रकट होते खरी, परंतु तो दुक्कट आपत्तीतून मुक्त होत नाही. म्हणून शुद्ध (आपत्ती नसलेल्या) भिक्खूच्या जवळच ती प्रकट करावी. आणि प्रकट करताना त्याने 'मी आपल्याजवळ एक आपत्ती प्रकट करतो' किंवा 'सांगतो' किंवा 'निवेदन करतो' किंवा 'माझ्या एका आपत्तीत पडल्याचे आपण जाणून घ्यावे' असे म्हणावे, किंवा 'मी एक गरुक (गंभीर) आपत्ती प्रकट करतो' इत्यादी पद्धतीने म्हणावे; सर्व प्रकारे ती अलपवलेलीच (अप्रतिच्छन्न) राहते, असे कुरुंदीमध्ये म्हटले आहे. परंतु जर तो 'मी लहुक (सौम्य) आपत्ती प्रकट करतो' अशा पद्धतीने बोलतो, तर ती लपवलेली (प्रतिच्छन्न) मानली जाते. जर तो वस्तू (घटना) सांगतो, आपत्ती सांगतो, किंवा दोन्ही सांगतो, तर तिन्ही प्रकारे ती प्रकट केलेलीच मानली जाते. अशा प्रकारे या दहा कारणांचे नीट निरीक्षण करून, प्रतिच्छन्न परिवास देणाऱ्याने सर्वप्रथम प्रतिच्छन्न भाव (लपवल्याची स्थिती) जाणून घेतली पाहिजे. ตโต ปฏิจฺฉนฺนทิวเส จ อาปตฺติโย จ สลฺลกฺเขตฺวา สเจ เอกาหปฏิจฺฉนฺนา โหติ – ‘‘อหํ, ภนฺเต, เอกํ อาปตฺตึ อาปชฺชึ สญฺเจตนิกํ สุกฺกวิสฺสฏฺฐึ เอกาหปฏิจฺฉนฺน’’นฺติ เอวํ ยาจาเปตฺวา อิธ วุตฺตนเยเนว กมฺมวาจํ วตฺวา ปริวาโส ทาตพฺโพ. อถ ทฺวีหตีหาทิปฏิจฺฉนฺนา โหติ, ทฺวีหปฏิจฺฉนฺนํ ตีหปฏิจฺฉนฺนํ จตูหปฏิจฺฉนฺนํ ปญฺจาหปฏิจฺฉนฺนํ ฉาหปฏิจฺฉนฺนํ สตฺตาหปฏิจฺฉนฺนํ อฏฺฐาหปฏิจฺฉนฺนํ นวาหปฏิจฺฉนฺนํ ทสาหปฏิจฺฉนฺนํ เอกาทสาหปฏิจฺฉนฺนํ ทฺวาทสาหปอจฺฉนฺนํ เตรสาหปฏิจฺฉนฺนํ จุทฺทสาหปฏิจฺฉนฺนนฺติ เอวํ ยาว จุทฺทส ทิวสานิ ทิวสวเสน โยชนา กาตพฺพา. ปญฺจทส ทิวสานิ ปฏิจฺฉนฺนาย ปกฺขปฏิจฺฉนฺนนฺติ วตฺวา โยชนา กาตพฺพา. ตโต ยาว เอกูนตึสติโม ทิวโส, ตาว อติเรกปกฺขปฏิจฺฉนฺนนฺติ. त्यानंतर, लपवलेले दिवस आणि आपत्ती लक्षात घेऊन, जर ती एक दिवस लपवलेली (एक-दिवस-प्रतिच्छन्न) असेल, तर – 'भन्ते, मी एक सचेतनिक सुक्कविस्सट्ठि (शुक्रविसर्ग) आपत्ती ओढवून घेतली आहे, जी एक दिवस लपवलेली आहे' अशी याचना करायला लावून, येथे सांगितलेल्या पद्धतीनेच कम्मवाचा (कर्मवाचा) म्हणून परिवास दिला पाहिजे. जर दोन, तीन इत्यादी दिवस लपवलेली असेल, तर दोन दिवस लपवलेली (द्वि-दिवस-प्रतिच्छन्न), तीन दिवस लपवलेली (त्रि-दिवस-प्रतिच्छन्न), चार दिवस लपवलेली, पाच दिवस लपवलेली, सहा दिवस लपवलेली, सात दिवस लपवलेली, आठ दिवस लपवलेली, नऊ दिवस लपवलेली, दहा दिवस लपवलेली, अकरा दिवस लपवलेली, बारा दिवस लपवलेली, तेरा दिवस लपवलेली, चौदा दिवस लपवलेली – अशा प्रकारे चौदा दिवसांपर्यंत दिवसांच्या हिशोबाने योजना (वाक्यरचना) करावी. पंधरा दिवस लपवलेल्या आपत्तीसाठी 'पक्खप्रतिच्छन्न' (पंधरवडा लपवलेली) असे म्हणून योजना करावी. त्यानंतर एकोणतिसाव्या दिवसापर्यंत 'अतिरेक-पक्खप्रतिच्छन्न' (पंधरवड्याहून अधिक काळ लपवलेली) अशी योजना करावी. ตโต มาสปฏิจฺฉนฺนํ อติเรกมาสปฏิจฺฉนฺนํ ทฺเวมาสปฏิจฺฉนฺนํ อติเรกทฺเวมาสปฏิจฺฉนฺนํ เตมาสปฏิจฺฉนฺนํ อติเรกเตมาสปฏิจฺฉนฺนํ จตุมาสปฏิจฺฉนฺนํ อติเรกจตุมาสปฏิจฺฉนฺนํ ปญฺจมาสปฏิจฺฉนฺนํ อติเรกปญฺจมาสปฏิจฺฉนฺนํ ฉมาสปฏิจฺฉนฺนํ อติเรกฉมาสปฏิจฺฉนฺนํ สตฺตมาสปฏิจฺฉนฺนํ อติเรกสตฺตมาสปฏิจฺฉนฺนํ อฏฺฐมาสปฏิจฺฉนฺนํ อติเรกอฏฺฐมาสปฏิจฺฉนฺนํ นวมาสปฏิจฺฉนฺนํ อติเรกนวมาสปฏิจฺฉนฺนํ ทสมาสปฏิจฺฉนฺนํ อติเรกทสมาสปฏิจฺฉนฺนํ เอกาทสมาสปฏิจฺฉนฺนํ อติเรกเอกาทสมาสปฏิจฺฉนฺนนฺติ เอวํ โยชนา กาตพฺพา. สํวจฺฉเร ปริปุณฺเณ เอกสํวจฺฉรปฏิจฺฉนฺนนฺติ. ตโต ปรํ อติเรกเอกสํวจฺฉร… ทฺเวสํวจฺฉร… อติเรกทฺเวสํวจฺฉร… ติสํวจฺฉร… อติรเกติสํวจฺฉร… จตุสํวจฺฉร… อติเรกจตุสํวจฺฉร… ปญฺจสํวจฺฉร… อติเรกปญฺจสํวจฺฉรปฏิจฺฉนฺนนฺติ [Pg.22] เอวํ ยาว สฏฺฐิสํวจฺฉร… อติเรกสฏฺฐิสํวจฺฉรปฏิจฺฉนฺนนฺติ วา ตโต วา ภิยฺโยปิ วตฺวา โยชนา กาตพฺพา. त्यानंतर एक महिना लपवलेली (मासप्रतिच्छन्न), एका महिन्याहून अधिक काळ लपवलेली (अतिरेक-मासप्रतिच्छन्न), दोन महिने लपवलेली (द्विमासप्रतिच्छन्न), दोन महिन्याहून अधिक काळ लपवलेली (अतिरेक-द्विमासप्रतिच्छन्न), तीन महिने लपवलेली (तिमासप्रतिच्छन्न), तीन महिन्याहून अधिक काळ लपवलेली (अतिरेक-तिमासप्रतिच्छन्न), चार महिने लपवलेली (चतुमासप्रतिच्छन्न), चार महिन्याहून अधिक काळ लपवलेली (अतिरेक-चतुमासप्रतिच्छन्न), पाच महिने लपवलेली (पंचमासप्रतिच्छन्न), पाच महिन्याहून अधिक काळ लपवलेली (अतिरेक-पंचमासप्रतिच्छन्न), सहा महिने लपवलेली (छम्मासप्रतिच्छन्न), सहा महिन्याहून अधिक काळ लपवलेली (अतिरेक-छम्मासप्रतिच्छन्न), सात महिने लपवलेली (सत्तमासप्रतिच्छन्न), सात महिन्याहून अधिक काळ लपवलेली (अतिरेक-सत्तमासप्रतिच्छन्न), आठ महिने लपवलेली (अट्ठमासप्रतिच्छन्न), आठ महिन्याहून अधिक काळ लपवलेली (अतिरेक-अट्ठमासप्रतिच्छन्न), नऊ महिने लपवलेली (नवमासप्रतिच्छन्न), नऊ महिन्याहून अधिक काळ लपवलेली (अतिरेक-नवमासप्रतिच्छन्न), दहा महिने लपवलेली (दसमासप्रतिच्छन्न), दहा महिन्याहून अधिक काळ लपवलेली (अतिरेक-दसमासप्रतिच्छन्न), अकरा महिने लपवलेली (एकादसमासप्रतिच्छन्न), अकरा महिन्याहून अधिक काळ लपवलेली (अतिरेक-एकादसमासप्रतिच्छन्न) – अशी योजना करावी. वर्ष पूर्ण झाल्यावर 'एक संवत्सर (वर्ष) लपवलेली' (एकसंवत्सरप्रतिच्छन्न) अशी योजना करावी. त्यानंतर एका वर्षापेक्षा अधिक काळ लपवलेली, दोन वर्षे लपवलेली, दोन वर्षांपेक्षा अधिक काळ लपवलेली, तीन वर्षे लपवलेली, तीन वर्षांपेक्षा अधिक काळ लपवलेली, चार वर्षे लपवलेली, चार वर्षांपेक्षा अधिक काळ लपवलेली, पाच वर्षे लपवलेली, पाच वर्षांपेक्षा अधिक काळ लपवलेली – अशी योजना करावी. अशा प्रकारे साठ वर्षांपर्यंत, साठ वर्षांपेक्षा अधिक काळ लपवलेली किंवा त्याहूनही अधिक काळ लपवलेली असे म्हणून योजना करावी. สเจ ปน ทฺเว ติสฺโส ตตุตฺตริ วา อาปตฺติโย โหนฺติ, ยถา อิธ เอกํ อาปตฺตินฺติ วุตฺตํ; เอวํ ทฺเว อาปตฺติโย ติสฺโส อาปตฺติโยติ วตฺตพฺพํ. ตโต ปรํ ปน สตํ วา โหตุ สหสฺสํ วา, สมฺพหุลาติ วตฺตุํ วฏฺฏติ. นานาวตฺถุกาสุปิ ‘‘อหํ, ภนฺเต, สมฺพหุลา สงฺฆาทิเสสา อาปตฺติโย อาปชฺชึ – เอกํ สุกฺกวิสฺสฏฺฐึ, เอกํ กายสํสคฺคํ, เอกํ ทุฏฺฐุลฺลวาจํ, เอกํ อตฺตกามํ, เอกํ สญฺจริตฺตํ, เอกาหปฏิจฺฉนฺนาโย’’ติ เอวํ คณนวเสน วา ‘‘อหํ, ภนฺเต, สมฺพหุลา สงฺฆาทิเสสา อาปตฺติโย อาปชฺชึ นานาวตฺถุกาโย เอกาหปฏิจฺฉนฺนาโย’’ติ เอวํ วตฺถุกิตฺตนวเสน วา, ‘‘อหํ, ภนฺเต, สมฺพหุลา สงฺฆาทิเสสา อาปตฺติโย อาปชฺชึ เอกาหปฏิจฺฉนฺนาโย’’ติ เอวํ นามมตฺตวเสน วา โยชนา กาตพฺพา. पण जर दोन, तीन किंवा त्याहून अधिक आपत्ती असतील, तर जसे येथे 'एक आपत्ती' असे म्हटले आहे, तसेच 'दोन आपत्ती', 'तीन आपत्ती' असे म्हणावे. त्याहून अधिक, मग शंभर असो वा हजार, 'संबहुला' (अनेक) असे म्हणणे योग्य आहे. वेगवेगळ्या वस्तू (कारण) असलेल्या आपत्तींमध्ये सुद्धा, 'भन्ते, मी अनेक संघादिसेस आपत्तींना प्राप्त झालो आहे - एक सुक्कविस्सट्ठी, एक कायसंसग्ग, एक दुट्ठुल्लवाचा, एक अत्तकाम, एक संचरित्त, ज्या एक दिवस लपवून ठेवलेल्या आहेत' अशा प्रकारे संख्येच्या आधारे किंवा, 'भन्ते, मी वेगवेगळ्या वस्तूंच्या अनेक संघादिसेस आपत्तींना प्राप्त झालो आहे, ज्या एक दिवस लपवून ठेवलेल्या आहेत' अशा प्रकारे वस्तूच्या उल्लेखाच्या आधारे किंवा, 'भन्ते, मी अनेक संघादिसेस आपत्तींना प्राप्त झालो आहे, ज्या एक दिवस लपवून ठेवलेल्या आहेत' अशा प्रकारे केवळ नावाच्या आधारे योजना करावी. ตตฺถ นามํ ทุวิธํ – สชาติสาธารณญฺจ สพฺพสาธารณญฺจ. ตตฺถ สงฺฆาทิเสโสติ สชาติสาธารณํ, อาปตฺตีติ สพฺพสาธารณํ; ตสฺมา ‘‘สมฺพหุลา อาปตฺติโย อาปชฺชึ เอกาหปฏิจฺฉนฺนาโย’’ติ เอวํ สพฺพสาธารณนามวเสนปิ วตฺตุํ วฏฺฏติ. อิทญฺหิ สพฺพมฺปิ ปริวาสาทิกํ วินยกมฺมํ วตฺถุวเสน โคตฺตวเสน นามวเสน อาปตฺติวเสน จ กาตุํ วฏฺฏติเยว. त्यामध्ये नाव दोन प्रकारचे असते - सजातिसाधारण आणि सर्वसाधारण. त्यामध्ये 'संघादिसेस' हे सजातिसाधारण नाव आहे आणि 'आपत्ती' हे सर्वसाधारण नाव आहे; म्हणून, 'मी अनेक आपत्तींना प्राप्त झालो आहे, ज्या एक दिवस लपवून ठेवलेल्या आहेत' अशा प्रकारे सर्वसाधारण नावाच्या आधारे देखील म्हणणे योग्य आहे. कारण हे सर्व परिवासादी विनयकृत्य वस्तूच्या आधारे, गोत्राच्या आधारे, नावाच्या आधारे आणि आपत्तीच्या आधारे करणे योग्यच आहे. ตตฺถ ‘‘สุกฺกวิสฺสฏฺฐี’’ติ วตฺถุ เจว โคตฺตญฺจ. ‘‘สงฺฆาทิเสโส’’ติ นามญฺเจว อาปตฺติ จ. ‘‘กายสํสคฺโค’’ติ วตฺถุ เจว โคตฺตญฺจ. ‘‘สงฺฆาทิเสโส’’ติ นามญฺเจว อาปตฺติ จ, ตตฺถ ‘‘สุกฺกวิสฺสฏฺฐึ กายสํสคฺค’’นฺติอาทินา วจเนนาปิ ‘‘นานาวตฺถุกาโย’’ติ วจเนนาปิ วตฺถุ เจว โคตฺตญฺจ คหิตํ โหติ. ‘‘สงฺฆาทิเสโส’’ติ วจเนนาปิ ‘‘อาปตฺติโย’’ติ วจเนนาปิ นามญฺเจว อาปตฺติ จ คหิตา โหติ. อิธ ปน เอกํ อาปตฺตึ อาปชฺชึ สญฺเจตนิกํ ‘‘สุกฺกวิสฺสฏฺฐิ’’นฺติ นามมฺปิ วตฺถุโคตฺตานิปิ คหิตาเนว. ยถา จ อิธ ‘‘อยํ อุทายิ ภิกฺขู’’ติ วุตฺตํ; เอวํ โย โย อาปนฺโน โหติ, ตสฺส ตสฺส นามํ คเหตฺวา ‘‘อยํ อิตฺถนฺนาโม ภิกฺขู’’ติ กมฺมวาจา กาตพฺพา. त्यामध्ये 'सुक्कविस्सट्ठी' हे वस्तू देखील आहे आणि गोत्र देखील आहे. 'संघादिसेस' हे नाव देखील आहे आणि आपत्ती देखील आहे. 'कायसंसग्ग' हे वस्तू देखील आहे आणि गोत्र देखील आहे. 'संघादिसेस' हे नाव देखील आहे आणि आपत्ती देखील आहे. त्यामध्ये 'सुक्कविस्सट्ठी कायसंसग्ग' इत्यादी शब्दांनी देखील आणि 'नानावत्थुकायो' या शब्दाने देखील वस्तू आणि गोत्र दोन्ही ग्रहण केले जाते. 'संघादिसेस' या शब्दाने देखील आणि 'आपत्ती' या शब्दाने देखील नाव आणि आपत्ती दोन्ही ग्रहण केले जाते. पण येथे 'एक सचेतनिक सुक्कविस्सट्ठी आपत्ती प्राप्त झालो' यामध्ये नाव देखील आणि वस्तू-गोत्र देखील ग्रहण केलेच आहे. आणि जसे येथे 'हा उदायी भिक्खू' असे म्हटले आहे, तसेच जो जो आपत्तीला प्राप्त झाला असेल, त्याचे त्याचे नाव घेऊन 'हा अमुक नावाचा भिक्खू' अशी कम्मवाचा करावी. กมฺมวาจาปริโยสาเน จ เตน ภิกฺขุนา มาฬกสีมายเมว ‘‘ปริวาสํ สมาทิยามิ, วตฺตํ สมาทิยามี’’ติ วุตฺตนเยเนว วตฺตํ สมาทาตพฺพํ[Pg.23]. สมาทิยิตฺวา ตตฺเถว สงฺฆสฺส อาโรเจตพฺพํ, อาโรเจนฺเตน จ เอวํ อาโรเจตพฺพํ – आणि कम्मवाचेच्या समाप्तीनंतर त्या भिक्खूने माळकसीमेतच (मंडप-सीमेतच) 'मी परिवास समादान करतो, मी वत्त समादान करतो' अशा सांगितलेल्या पद्धतीनेच वत्त समादान करावे. समादान करून तेथेच संघाला निवेदन करावे, आणि निवेदन करताना अशा प्रकारे निवेदन करावे - ‘‘อหํ, ภนฺเต, เอกํ อาปตฺตึ อาปชฺชึ สญฺเจตนิกํ สุกฺกวิสฺสฏฺฐึ เอกาหปฏิจฺฉนฺนํ, โสหํ สงฺฆํ เอกิสฺสา อาปตฺติยา สญฺเจตนิกาย สุกฺกวิสฺสฏฺฐิยา เอกาหปฏิจฺฉนฺนาย เอกาหปริวาสํ ยาจึ, ตสฺส เม สงฺโฆ เอกิสฺสา อาปตฺติยา สญฺเจตนิกาย สุกฺกวิสฺสฏฺฐิยา เอกาหปฏิจฺฉนฺนาย เอกาหปริวาสํ อทาสิ, โสหํ ปริวสามิ – ‘เวทยามหํ, ภนฺเต, เวทยตี’ติ มํ สงฺโฆ ธาเรตู’’ติ. "भन्ते, मी एक दिवस लपवून ठेवलेल्या एका सचेतनिक सुक्कविस्सट्ठी आपत्तीला प्राप्त झालो होतो. त्या मी, संघाकडे एका दिवसासाठी लपवून ठेवलेल्या एका सचेतनिक सुक्कविस्सट्ठी आपत्तीसाठी एक दिवसाच्या परिवासाची याचना केली. त्या मला, संघाने एका दिवसासाठी लपवून ठेवलेल्या एका सचेतनिक सुक्कविस्सट्ठी आपत्तीसाठी एक दिवसाचा परिवास दिला. तो मी परिवास करत आहे - 'भन्ते, मी निवेदन करत आहे, मी परिवास करत आहे' असे संघाने माझे लक्षात ठेवावे." อิมญฺจ ปนตฺถํ คเหตฺวา ยาย กายจิ ภาสาย อาโรเจตุํ วฏฺฏติเยว. อาโรเจตฺวา สเจ นิกฺขิปิตุกาโม, วุตฺตนเยเนว สงฺฆมชฺเฌ นิกฺขิปิตพฺพํ. มาฬกโต ภิกฺขูสุ นิกฺขนฺเตสุ เอกสฺสาปิ สนฺติเก นิกฺขิปิตุํ วฏฺฏติ. มาฬกโต นิกฺขมิตฺวา สตึ ปฏิลภนฺเตน สหคจฺฉนฺตสฺส สนฺติเก นิกฺขิปิตพฺพํ. สเจ โสปิ ปกฺกนฺโต, อญฺญสฺส ยสฺส มาฬเก นาโรจิตํ, ตสฺส อาโรเจตฺวา นิกฺขิปิตพฺพํ. อาโรเจนฺเตน จ อวสาเน ‘‘เวทยตีติ มํ อายสฺมา ธาเรตู’’ติ วตฺตพฺพํ. ทฺวินฺนํ อาโรเจนฺเตน ‘‘อายสฺมนฺตา ธาเรนฺตู’’ติ, ติณฺณํ อาโรเจนฺเตน ‘‘อายสฺมนฺโต ธาเรนฺตู’’ติ วตฺตพฺพํ. นิกฺขิตฺตกาลโต ปฏฺฐาย ปกตตฺตฏฺฐาเน ติฏฺฐติ. आणि हा अर्थ घेऊन कोणत्याही भाषेत निवेदन करणे योग्यच आहे. निवेदन करून जर वत्त बाजूला ठेवण्याची इच्छा असेल, तर सांगितलेल्या पद्धतीनेच संघामध्ये ते बाजूला ठेवावे. माळकावरून (मंडपातून) भिक्खू निघून गेल्यावर एका भिक्खूच्या जवळ देखील ते बाजूला ठेवणे योग्य आहे. माळकावरून बाहेर पडल्यावर ज्याला आठवण येते, त्याने सोबत जाणाऱ्या भिक्खूच्या जवळ ते बाजूला ठेवावे. जर तो देखील निघून गेला असेल, तर ज्या दुसऱ्या भिक्खूला माळकामध्ये निवेदन केले नव्हते, त्याला निवेदन करून बाजूला ठेवावे. आणि निवेदन करताना शेवटी 'मी परिवास करत आहे हे आयुष्मानाने लक्षात ठेवावे' असे म्हणावे. दोघांना निवेदन करताना 'आयुष्मानांनी लक्षात ठेवावे' (द्विवचन), तिघांना निवेदन करताना 'आयुष्मानांनी लक्षात ठेवावे' (बहुवचन) असे म्हणावे. वत्त बाजूला ठेवल्याच्या वेळेपासून तो प्रकृतत्व स्थितीत राहतो. สเจ อปฺปภิกฺขุโก วิหาโร โหติ, สภาคา ภิกฺขู วสนฺติ, วตฺตํ อนิกฺขิปิตฺวา วิหาเรเยว รตฺติปริคฺคโห กาตพฺโพ. อถ น สกฺกา โสเธตุํ, วุตฺตนเยเนว วตฺตํ นิกฺขิปิตฺวา ปจฺจูสสมเย เอเกน ภิกฺขุนา สทฺธึ มานตฺตวณฺณนายํ วุตฺตนเยเนว อุปจารสีมํ อติกฺกมิตฺวา มหามคฺคา โอกฺกมฺม ปฏิจฺฉนฺเน ฐาเน นิสีทิตฺวา อนฺโตอรุเณเยว วุตฺตนเยเนว วตฺตํ สมาทิยิตฺวา ตสฺส ภิกฺขุโน ปริวาโส อาโรเจตพฺโพ. อาโรเจนฺเตน สเจ นวกตโร โหติ, ‘‘อาวุโส’’ติ วตฺตพฺพํ. สเจ วุฑฺฒตโร, ‘‘ภนฺเต’’ติ วตฺตพฺพํ. สเจ อญฺโญ โกจิ ภิกฺขุ เกนจิเทว กรณีเยน ตํ ฐานํ อาคจฺฉติ, สเจ เอส ตํ ปสฺสติ, สทฺทํ วาสฺส สุณาติ, อาโรเจตพฺพํ; อนาโรเจนฺตสฺส รตฺติจฺเฉโท เจว วตฺตเภโท จ. อถ ทฺวาทสหตฺถํ อุปจารํ โอกฺกมิตฺวา อชานนฺตสฺเสว คจฺฉติ, รตฺติจฺเฉโทเยว โหติ, วตฺตเภโท ปน นตฺถิ. जर विहारामध्ये कमी भिक्खू असतील आणि सभाग (समान आपत्ती असलेले) भिक्खू राहत असतील, तर वत्त बाजूला न ठेवता विहारामध्येच रात्रीची गणना करावी. जर शुद्ध करणे शक्य नसेल, तर सांगितलेल्या पद्धतीनेच वत्त बाजूला ठेवून, पहाटेच्या वेळी एका भिक्खूसोबत, मानत्त-वर्णनेमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच उपचारसीमा ओलांडून, महामार्गावरून बाजूला होऊन एका गुप्त ठिकाणी बसून, अरुणोदयापूर्वीच सांगितलेल्या पद्धतीनेच वत्त समादान करून त्या भिक्खूला परिवासाचे निवेदन करावे. निवेदन करताना जर तो कनिष्ठ असेल, तर 'आवुसो' असे म्हणावे. जर तो ज्येष्ठ असेल, तर 'भन्ते' असे म्हणावे. जर दुसरा कोणी भिक्खू काही कामासाठी त्या ठिकाणी आला, आणि जर याने त्याला पाहिले किंवा त्याचा आवाज ऐकला, तर त्याला निवेदन करावे; निवेदन न केल्यास रात्रीचा छेद देखील होतो आणि वत्तभंग देखील होतो. पण जर तो बारा हातांच्या उपचाराच्या बाहेरून न समजताच निघून गेला, तर केवळ रात्रीचा छेद होतो, पण वत्तभंग होत नाही. อุคฺคเต [Pg.24] อรุเณ วตฺตํ นิกฺขิปิตพฺพํ. สเจ โส ภิกฺขุ เกนจิเทว กรณีเยน ปกฺกนฺโต โหติ, ยํ อญฺญํ สพฺพปฐมํ ปสฺสติ, ตสฺส อาโรเจตฺวา นิกฺขิปิตพฺพํ. สเจ ปน กญฺจิ น ปสฺสติ, วิหารํ คนฺตฺวา อตฺตนา สทฺธึ คตภิกฺขุสฺส สนฺติเก นิกฺขิปิตพฺพนฺติ มหาสุมตฺเถโร อาห. มหาปทุมตฺเถโร ปน ‘‘ยํ ปฐมํ ปสฺสติ, ตสฺส อาโรเจตฺวา นิกฺขิปิตพฺพํ, อยํ นิกฺขิตฺตวตฺตสฺส ปริหาโร’’ติ อาห. अरुणोदय झाल्यावर वत्त बाजूला ठेवावे. जर तो भिक्खू काही कामामुळे निघून गेला असेल, तर जो दुसरा भिक्खू सर्वात आधी दिसेल, त्याला निवेदन करून वत्त बाजूला ठेवावे. पण जर कोणीच दिसले नाही, तर विहारात जाऊन स्वतःसोबत गेलेल्या भिक्खूच्या जवळ वत्त बाजूला ठेवावे, असे महासुमा थेरांनी म्हटले आहे. परंतु महापदुम थेरांनी म्हटले आहे की, 'जो सर्वात आधी दिसेल, त्याला निवेदन करून वत्त बाजूला ठेवावे, हा बाजूला ठेवलेल्या वत्ताचा परिहार आहे.' เอวํ ยตฺตกานิ ทิวสานิ อาปตฺติ ปฏิจฺฉนฺนา โหติ, ตตฺตกานิ ตโต อธิกตรานิ วา กุกฺกุจฺจวิโนทนตฺถาย ปริวสิตฺวา สงฺฆํ อุปสงฺกมิตฺวา วตฺตํ สมาทิยิตฺวา มานตฺตํ ยาจิตพฺพํ. อยญฺหิ วตฺเต สมาทินฺเน เอว มานตฺตารโห โหติ นิกฺขิตฺตวตฺเตน ปริวุตฺถตฺตา. อนิกฺขิตฺตวตฺตสฺส ปน ปุน สมาทานกิจฺจํ นตฺถิ, โส หิ ปฏิจฺฉนฺนทิวสาติกฺกเมเนว มานตฺตารโห โหติ, ตสฺมา ตสฺส มานตฺตํ ทาตพฺพเมว. อิทํ ปฏิจฺฉนฺนมานตฺตํ นาม. ตํ เทนฺเตน สเจ เอกาปตฺติ โหติ, ปาฬิยํ วุตฺตนเยเนว ทาตพฺพํ. อถ ทฺเว วา ติสฺโส วา ‘‘โสหํ ปริวุตฺถปริวาโส สงฺฆํ ทฺวินฺนํ อาปตฺตีนํ ติสฺสนฺนํ อาปตฺตีนํ เอกาหปฏิจฺฉนฺนานํ ฉารตฺตํ มานตฺตํ ยาจามี’’ติ ปริวาเส วุตฺตนเยเนว อาปตฺติโย จ ทิวเส จ สลฺลกฺเขตฺวา โยชนา กาตพฺพา. अशा प्रकारे, जितके दिवस आपत्ती लपवून ठेवली असेल, तितके दिवस किंवा त्यापेक्षा अधिक दिवस शंका दूर करण्यासाठी परिवास पूर्ण करून, संघाकडे जाऊन, व्रत ग्रहण करून मानत्तची याचना करावी. कारण हा भिक्खू व्रत ग्रहण केल्यावरच मानत्त मिळण्यास पात्र होतो, कारण त्याने व्रत सोडलेल्या (निक्खित्तवत्त) अवस्थेत परिवास पूर्ण केला आहे. परंतु ज्याने व्रत सोडले नाही (अनिक्खित्तवत्त), त्याला पुन्हा व्रत ग्रहण करण्याचे कर्तव्य नसते; कारण तो लपविलेल्या दिवसांच्या समाप्तीनंतरच मानत्त मिळण्यास पात्र होतो, म्हणून त्याला मानत्त दिलेच पाहिजे. याला 'पठिच्छन्न-मानत्त' असे म्हणतात. ते देताना जर एकच आपत्ती असेल, तर पाळीमध्ये (पाठात) सांगितलेल्या पद्धतीनेच दिले पाहिजे. जर दोन किंवा तीन आपत्ती असतील, तर 'मी परिवास पूर्ण केलेला भिक्खू, संघाकडे दोन आपत्तींसाठी / तीन आपत्तींसाठी, ज्या एक दिवस लपवून ठेवल्या होत्या, सहा रात्रींच्या मानत्तची याचना करत आहे' अशा प्रकारे परिवासाच्या संदर्भात सांगितलेल्या पद्धतीनेच आपत्ती आणि दिवसांची नोंद घेऊन योजना करावी। อปฺปฏิจฺฉนฺนาปตฺตึ ปฏิจฺฉนฺนาปตฺติยา สโมธาเนตฺวาปิ ทาตุํ วฏฺฏติ. กถํ? ปฏิจฺฉนฺนาย เอกาหปริวาสํ วสิตฺวา – अप्पठिच्छन्न (न लपविलेली) आपत्ती पठिच्छन्न (लपविलेल्या) आपत्तीसोबत एकत्रित करून देणे देखील योग्य आहे. कसे? पठिच्छन्न आपत्तीसाठी एक दिवसाचा परिवास पूर्ण करून – ‘‘อหํ, ภนฺเต, เอกํ อาปตฺตึ อาปชฺชึ สญฺเจตนิกํ สุกฺกวิสฺสฏฺฐึ เอกาหปฏิจฺฉนฺนํ, โสหํ สงฺฆํ เอกิสฺสา อาปตฺติยา สญฺเจตนิกาย สุกฺกวิสฺสฏฺฐิยา เอกาหปฏิจฺฉนฺนาย เอกาหปริวาสํ ยาจึ, ตสฺส เม สงฺโฆ เอกิสฺสา อาปตฺติยา สญฺเจตนิกาย สุกฺกวิสฺสฏฺฐิยา เอกาหปฏิจฺฉนฺนาย เอกาหปริวาสํ อทาสิ, โสหํ ปริวุตฺถปริวาโส. อหํ, ภนฺเต, เอกํ อาปตฺตึ อาปชฺชึ สญฺเจตนิกํ สุกฺกวิสฺสฏฺฐึ อปฺปฏิจฺฉนฺนํ. โสหํ, ภนฺเต, สงฺฆํ ตาสํ อาปตฺตีนํ สญฺเจตนิกานํ สุกฺกวิสฺสฏฺฐีนํ ปฏิจฺฉนฺนาย จ อปฺปฏิจฺฉนฺนาย จ ฉารตฺตํ มานตฺตํ ยาจามี’’ติ. “भंते, मी जाणूनबुजून केलेल्या सुक्कविस्सट्ठि (वीर्यपात) रूपी एका आपत्तीला प्राप्त झालो, जी एक दिवस लपवून ठेवली होती. त्या मी, जाणूनबुजून केलेल्या सुक्कविस्सट्ठि रूपी आणि एक दिवस लपवून ठेवलेल्या त्या एका आपत्तीसाठी संघाकडे एक दिवसाच्या परिवासाची याचना केली. त्या मला संघाने जाणूनबुजून केलेल्या सुक्कविस्सट्ठि रूपी आणि एक दिवस लपवून ठेवलेल्या त्या एका आपत्तीसाठी एक दिवसाचा परिवास दिला; तो मी परिवास पूर्ण केलेला आहे. भंते, मी जाणूनबुजून केलेल्या सुक्कविस्सट्ठि रूपी आणखी एका आपत्तीला प्राप्त झालो, जी लपवून ठेवली नव्हती. तो मी, भंते, संघाकडे जाणूनबुजून केलेल्या सुक्कविस्सट्ठि रूपी त्या लपविलेल्या आणि न लपविलेल्या आपत्तींसाठी सहा रात्रींच्या मानत्तची याचना करत आहे।” อถสฺส ตทนุรูปํ กมฺมวาจํ กตฺวา มานตฺตํ ทาตพฺพํ. สเจ ปฏิจฺฉนฺนา ทฺเว, อปฺปฏิจฺฉนฺนา เอกา ‘‘ปฏิจฺฉนฺนานญฺจ อปฺปฏิจฺฉนฺนาย จา’’ติ วตฺตพฺพํ. อถ ปฏิจฺฉนฺนา [Pg.25] เอกา, อปฺปฏิจฺฉนฺนา ทฺเว, ‘‘ปฏิจฺฉนฺนาย จ อปฺปฏิจฺฉนฺนานญฺจา’’ติ วตฺตพฺพํ. สเจ ปฏิจฺฉนฺนาปิ ทฺเว, อปฺปฏิจฺฉนฺนาปิ ทฺเว, ‘‘ปฏิจฺฉนฺนานญฺจ อปฺปฏิจฺฉนฺนานญฺจา’’ติ วตฺตพฺพํ. สพฺพตฺถ อนุรูปํ กมฺมวาจํ กตฺวา มานตฺตํ ทาตพฺพํ. จิณฺณมานตฺตสฺส จ ตทนุรูปเมว กมฺมวาจํ กตฺวา อพฺภานํ กาตพฺพํ. อิธ ปน เอกาปตฺติวเสน วุตฺตํ. อิติ ยํ ปฏิจฺฉนฺนาย อาปตฺติยา ปริวาสาวสาเน มานตฺตํ ทิยฺยติ, อิทํ ปฏิจฺฉนฺนมานตฺตํ นาม. เอวเมตฺถ เอเกเนว โยชนามุเขน ปฏิจฺฉนฺนปริวาโส จ ปฏิจฺฉนฺนมานตฺตญฺจ วุตฺตนฺติ เวทิตพฺพํ. ปกฺขมานตฺตํ สโมธานมานตฺตญฺจ อวเสสปริวาสกถาวสาเน กถยิสฺสาม. त्यानंतर त्याला त्या अनुरूप कम्मवाचा करून मानत्त दिले पाहिजे. जर दोन पठिच्छन्न आणि एक अप्पठिच्छन्न आपत्ती असेल, तर 'पठिच्छन्नानंच अप्पठिच्छन्नाय च' (लपविलेल्या आपत्तींसाठी आणि न लपविलेल्या आपत्तीसाठी) असे म्हणावे. जर एक पठिच्छन्न आणि दोन अप्पठिच्छन्न आपत्ती असतील, तर 'पठिच्छन्नाय च अप्पठिच्छन्नानंच' (लपविलेल्या आपत्तीसाठी आणि न लपविलेल्या आपत्तींसाठी) असे म्हणावे. जर दोन पठिच्छन्न आणि दोन अप्पठिच्छन्न आपत्ती असतील, तर 'पठिच्छन्नानंच अप्पठिच्छन्नानंच' (लपविलेल्या आपत्तींसाठी आणि न लपविलेल्या आपत्तींसाठी) असे म्हणावे. सर्व ठिकाणी अनुरूप कम्मवाचा करून मानत्त दिले पाहिजे. आणि ज्याने मानत्त पूर्ण केले आहे (चिण्णमानत्त), त्याला त्या अनुरूपच कम्मवाचा करून अब्भान केले पाहिजे. परंतु येथे एका आपत्तीच्या संदर्भाने सांगितले आहे. अशा प्रकारे, पठिच्छन्न आपत्तीसाठी परिवासाच्या शेवटी जे मानत्त दिले जाते, त्याला 'पठिच्छन्न-मानत्त' असे म्हणतात. अशा प्रकारे, येथे एकाच योजनेच्या पद्धतीने पठिच्छन्न-परिवास आणि पठिच्छन्न-मानत्त सांगितले आहे, असे जाणावे. पक्ख-मानत्त आणि समोधान-मानत्त याविषयी उर्वरित परिवासाच्या कथेच्या शेवटी सांगू। สุทฺธนฺตปริวาโส สโมธานปริวาโสติ หิ ทฺเว ปริวาสา อวเสสา. ตตฺถ ‘‘สุทฺธนฺตปริวาโส’’ นาม ปรโต อธมฺมิกมานตฺตจาราวสาเน ‘‘เตน โข ปน สมเยน อญฺญตโร ภิกฺขุ สมฺพหุลา สงฺฆาทิเสสา อาปตฺติโย อาปนฺโน โหติ, อาปตฺติปริยนฺตํ น ชานาติ, รตฺติปริยนฺตํ น ชานาตี’’ติ อิมสฺมึ วตฺถุสฺมึ อนุญฺญาตปริวาโส. โส ทุวิโธ – จูฬสุทฺธนฺโต, มหาสุทฺธนฺโตติ. ทุวิโธปิ เจส รตฺติปริจฺเฉทํ สกลํ วา เอกจฺจํ วา อชานนฺตสฺส จ อสฺสรนฺตสฺส จ ตตฺถ เวมติกสฺส จ ทาตพฺโพ. อาปตฺติปริยนฺตํ ปน เอตฺตกา อหํ อาปตฺติโย อาปนฺโนติ ชานาตุ วา มา วา, อการณเมตํ. कारण सुद्धंत-परिवास आणि समोधान-परिवास हे दोन परिवास शिल्लक आहेत. त्यापैकी 'सुद्धंत-परिवास' म्हणजे पुढे अधार्मिक मानत्त आचरणाच्या शेवटी 'त्या वेळी कोणी एक भिक्खू अनेक संघादिसेस आपत्तींना प्राप्त झाला होता, त्याला आपत्तींची मर्यादा माहीत नव्हती, रात्रींची मर्यादा माहीत नव्हती' या प्रकरणात अनुमत (मंजूर) केलेला परिवास होय. तो दोन प्रकारचा आहे – चूळसुद्धंत आणि महासुद्धंत. हा दोन्ही प्रकारचा परिवास, रात्रींचा कालावधी पूर्णपणे किंवा अंशतः माहीत नसलेल्या, आठवत नसलेल्या किंवा त्याविषयी शंका असलेल्या भिक्खूला दिला पाहिजे. परंतु आपत्तींच्या मर्यादेविषयी 'मी इतक्या आपत्तींना प्राप्त झालो आहे' हे त्याला माहीत असो वा नसो, हे महत्त्वाचे नाही (याचा काही संबंध नाही). ตตฺถ โย อุปสมฺปทโต ปฏฺฐาย อนุโลมกฺกเมน วา อาโรจิตทิวสโต ปฏฺฐาย ปฏิโลมกฺกเมน วา ‘‘อสุกญฺจ อสุกญฺจ ทิวสํ วา ปกฺขํ วา มาสํ วา สํวจฺฉรํ วา ตว สุทฺธภาวํ ชานาสี’’ติ ปุจฺฉิยมาโน ‘‘อาม, ภนฺเต, ชานามิ, เอตฺตกํ นาม กาลํ อหํ สุทฺโธ’’ติ วทติ, ตสฺส ทินฺโน สุทฺธนฺตปริวาโส ‘‘จูฬสุทฺธนฺโต’’ติ วุจฺจติ. त्यापैकी, जो भिक्खू उपसंपदेपासून सुरू करून अनुलोम क्रमाने किंवा आपत्ती प्रकट केल्याच्या दिवसापासून सुरू करून प्रतिलोम क्रमाने 'अमुक अमुक दिवस, पक्ष, महिना किंवा वर्ष तुझी शुद्धता तुला माहीत आहे का?' असे विचारले असता, 'होय भंते, मला माहीत आहे, मी इतका काळ शुद्ध होतो' असे म्हणतो, त्याला दिलेल्या सुद्धंत-परिवासाला 'चूळसुद्धंत' असे म्हणतात. ตํ คเหตฺวา ปริวสนฺเตน ยตฺตกํ กาลํ อตฺตโน สุทฺธึ ชานาติ, ตตฺตกํ อปเนตฺวา อวเสสํ มาสํ วา ทฺเวมาสํ วา ปริวสิตพฺพํ. สเจ มาสมตฺตํ อสุทฺโธมฺหีติ สลฺลกฺเขตฺวา อคฺคเหสิ ปริวสนฺโต จ ปุน อญฺญํ มาสํ สรติ, ตมฺปิ มาสํ ปริวสิตพฺพเมว. ปุน ปริวาสทานกิจฺจํ นตฺถิ. อถ ทฺเวมาสํ อสุทฺโธมฺหีติ สลฺลกฺเขตฺวา อคฺคเหสิ, ปริวสนฺโต จ มาสมตฺตเมวาหํ อสุทฺโธมฺหีติ สนฺนิฏฺฐานํ กโรติ, มาสเมว ปริวสิตพฺพํ. ปุน [Pg.26] ปริวาสทานกิจฺจํ นตฺถิ. อยญฺหิ สุทฺธนฺตปริวาโส นาม อุทฺธมฺปิ อาโรหติ, เหฏฺฐาปิ โอโรหติ, อิทมสฺส ลกฺขณํ. อญฺญสฺมึ ปน อาปตฺติวุฏฺฐาเน อิทํ ลกฺขณํ – โย อปฺปฏิจฺฉนฺนํ อาปตฺตึ ปฏิจฺฉนฺนาติ วินยกมฺมํ กโรติ, ตสฺส อาปตฺติ วุฏฺฐาติ. โย ปฏิจฺฉนฺนํ อปฺปฏิจฺฉนฺนาติ วินยกมฺมํ กโรติ, ตสฺส น วุฏฺฐาติ. อจิรปฏิจฺฉนฺนํ จิรปฏิจฺฉนฺนาติ กโรนฺตสฺสาปิ วุฏฺฐาติ. จิรปฏิจฺฉนฺนํ อจิรปฏิจฺฉนฺนาติ กโรนฺตสฺส น วุฏฺฐาติ. เอกํ อาปตฺตึ อาปชฺชิตฺวา สมฺพหุลาติ กโรนฺตสฺสาปิ วุฏฺฐาติ, เอกํ วินา สมฺพหุลานํ อภาวโต. สมฺพหุลา ปน อาปชฺชิตฺวา เอกํ อาปชฺชินฺติ กโรนฺตสฺส น วุฏฺฐาติ. तो (चूळसुद्धंत) ग्रहण करून परिवास करणाऱ्या भिक्खूने जितका काळ स्वतःची शुद्धता माहीत आहे, तितका काळ वगळून उर्वरित एक महिना किंवा दोन महिने परिवास केला पाहिजे. जर त्याने 'मी सुमारे एक महिना अशुद्ध होतो' अशी नोंद घेऊन तो ग्रहण केला आणि परिवास करत असताना त्याला पुन्हा दुसऱ्या महिन्याची आठवण झाली, तर तो महिना देखील त्याने परिवास केलाच पाहिजे. पुन्हा परिवास देण्याचे कर्तव्य नसते. किंवा जर त्याने 'मी दोन महिने अशुद्ध होतो' अशी नोंद घेऊन तो ग्रहण केला, आणि परिवास करत असताना 'मी केवळ एक महिनाच अशुद्ध होतो' असा निर्णय त्याने केला, तर त्याने एक महिनाच परिवास केला पाहिजे. पुन्हा परिवास देण्याचे कर्तव्य नसते. कारण हा सुद्धंत-परिवास वर देखील चढतो (वाढतो) आणि खाली देखील उतरतो (कमी होतो), हे याचे लक्षण आहे. परंतु इतर आपत्तींमधून मुक्त होण्याच्या (आपत्तिवुट्ठाण) बाबतीत हे लक्षण आहे – जो अप्पठिच्छन्न आपत्तीला 'पठिच्छन्न आपत्ती' म्हणून विनयकर्म करतो, त्याची आपत्ती दूर होते. जो पठिच्छन्न आपत्तीला 'अप्पठिच्छन्न आपत्ती' म्हणून विनयकर्म करतो, त्याची आपत्ती दूर होत नाही. जो थोड्या काळासाठी लपविलेल्या आपत्तीला 'दीर्घकाळासाठी लपविलेली आपत्ती' म्हणून विनयकर्म करतो, त्याचीही आपत्ती दूर होते. जो दीर्घकाळासाठी लपविलेल्या आपत्तीला 'थोड्या काळासाठी लपविलेली आपत्ती' म्हणून विनयकर्म करतो, त्याची आपत्ती दूर होत नाही. एका आपत्तीला प्राप्त होऊन 'अनेक आपत्ती' म्हणून विनयकर्म करणाऱ्याचीही आपत्ती दूर होते, कारण एकाशिवाय अनेक आपत्ती असू शकत नाहीत. परंतु अनेक आपत्तींना प्राप्त होऊन 'एका आपत्तीला प्राप्त झालो' म्हणून विनयकर्म करणाऱ्याची आपत्ती दूर होत नाही। โย ปน ยถาวุตฺเตน อนุโลมปฏิโลมนเยน ปุจฺฉิยมาโนปิ รตฺติปริยนฺตํ น ชานาติ เนว สรติ เวมติโก วา โหติ, ตสฺส ทินฺโน สุทฺธนฺตปริวาโส ‘‘มหาสุทฺธนฺโต’’ติ วุจฺจติ. ตํ คเหตฺวา คหิตทิวสโต ปฏฺฐาย ยาว อุปสมฺปททิวโส, ตาว รตฺติโย คเณตฺวา ปริวสิตพฺพํ. อยํ อุทฺธํ นาโรหติ, เหฏฺฐา ปน โอโรหติ. ตสฺมา สเจ ปริวสนฺโต รตฺติปริจฺเฉเท สนฺนิฏฺฐานํ กโรติ, มาโส วา สํวจฺฉโร วา มยฺหํ อาปนฺนสฺสาติ มาสํ วา สํวจฺฉรํ วา ปริวสิตพฺพํ. ปริวาสยาจนทานลกฺขณํ ปเนตฺถ ปรโต ปาฬิยํ อาคตนเยเนว เวทิตพฺพํ. กมฺมวาจาปริโยสาเน วตฺตสมาทานมานตฺตอพฺภานานิ วุตฺตนยาเนว. อยํ สุทฺธนฺตปริวาโส นาม. परंतु, जो भिक्खू आधी सांगितलेल्या अनुलोम-प्रतिलोम पद्धतीने विचारले असताही रात्रीची मर्यादा (कालावधी) जाणत नाही, आठवतही नाही किंवा साशंक असतो, त्याला दिलेल्या शुद्धंतपरिव्यासाला 'महाशुद्धंत' असे म्हणतात. तो (परिव्यास) स्वीकारून, स्वीकारलेल्या दिवसापासून उपसंपदेच्या दिवसापर्यंतच्या रात्री मोजून परिव्यास आचरावा. हा (परिव्यास) वर चढत नाही (वाढत नाही), परंतु खाली उतरू शकतो (कमी होऊ शकतो). म्हणून, जर परिव्यास आचरणारा भिक्खू रात्रीच्या मर्यादेबाबत असा निश्चय करतो की, 'माझ्या आपत्तीला एक महिना किंवा एक वर्ष झाले आहे', तर त्याने एक महिना किंवा एक वर्षभर परिव्यास आचरावा. येथे परिव्यासाची याचना करणे आणि तो देणे याचे लक्षण पुढे पाळीमध्ये आलेल्या पद्धतीनेच जाणावे. कर्मवाचेच्या शेवटी व्रत-समादान (कर्तव्ये स्वीकारणे), मानत्त आणि अब्भान हे आधी सांगितलेल्या पद्धतीनेच असतात. याला 'शुद्धंतपरिव्यास' असे म्हणतात। ‘‘สโมธานปริวาโส’’ นาม ติวิโธ โหติ – โอธานสโมธาโน, อคฺฆสโมธาโน, มิสฺสกสโมธาโนติ. ตตฺถ ‘‘โอธานสโมธาโน’’ นาม – อนฺตราปตฺตึ อาปชฺชิตฺวา ปฏิจฺฉาเทนฺตสฺส ปริวุตฺถทิวเส โอธุนิตฺวา มกฺเขตฺวา ปุริมาย อาปตฺติยา มูลทิวสปริจฺเฉเท ปจฺฉา อาปนฺนํ อาปตฺตึ สโมทหิตฺวา ทาตพฺพปริวาโส วุจฺจติ. โส ปรโต ‘‘เตน หิ ภิกฺขเว สงฺโฆ อุทายึ ภิกฺขุํ อนฺตรา เอกิสฺสา อาปตฺติยา สญฺเจตนิกาย สุกฺกวิสฺสฏฺฐิยา ปญฺจาหปฏิจฺฉนฺนาย มูลาย ปฏิกสฺสิตฺวา ปุริมาย อาปตฺติยา สโมธานปริวาสํ เทตู’’ติ อิโต ปฏฺฐาย วิตฺถารโต ปาฬิยํเยว อาคโต. 'समोधानपरिव्यास' हा तीन प्रकारचा असतो – ओधानसमोधान, अग्घसमोधान आणि मिस्सकसमोधान. त्यापैकी 'ओधानसमोधान' म्हणजे – अंतरापत्ती (मध्यंतरीची आपत्ती) प्राप्त करून ती लपवणाऱ्या भिक्खूचे आधी आचरलेले (परिव्यासाचे) दिवस रद्द करून, पहिल्या आपत्तीच्या मूळ दिवसांच्या मर्यादेमध्ये नंतर प्राप्त झालेली आपत्ती समाविष्ट करून दिला जाणारा परिव्यास होय. तो पुढे 'तेन हि भिक्खवे संघो उदायिं भिक्खुं अंतरा एकिस्सा आपत्तिया संचेतनिकाय सुक्कविस्सट्ठिया पंचाहपटिच्छन्नाय मूलाय पटिकस्सित्वा पुरिमाय आपत्तिया समोधानपरिव्यासं देतू' या पाळी वचनापासून सविस्तरपणे पाळीमध्येच आला आहे। อยํ ปเนตฺถ วินิจฺฉโย – โย ปฏิจฺฉนฺนาย อาปตฺติยา ปริวาสํ คเหตฺวา ปริวสนฺโต วา มานตฺตารโห วา มานตฺตํ จรนฺโต วา อพฺภานารโห วา อญฺญํ อาปตฺตึ อาปชฺชิตฺวา ปุริมาย อาปตฺติยา สมา วา อูนตรา วา รตฺติโย ปฏิจฺฉาเทติ, ตสฺส มูลายปฏิกสฺสเนน เต [Pg.27] ปริวุตฺถทิวเส จ มานตฺตจิณฺณทิวเส จ สพฺเพ โอธุนิตฺวา อทิวเส กตฺวา ปจฺฉา อาปนฺนาปตฺตึ มูลาปตฺติยํ สโมธาย ปริวาโส ทาตพฺโพ. เตน สเจ มูลาปตฺติ ปกฺขปฏิจฺฉนฺนา, อนฺตราปตฺติ อูนกปกฺขปฏิจฺฉนฺนา, ปุน ปกฺขเมว ปริวาโส ปริวสิตพฺโพ. อถาปิ อนฺตราปตฺติ ปกฺขปฏิจฺฉนฺนาว ปกฺขเมว ปริวสิตพฺพํ. เอเตนุปาเยน ยาว สฏฺฐิวสฺสปฏิจฺฉนฺนา มูลาปตฺติ, ตาว วินิจฺฉโย เวทิตพฺโพ. สฏฺฐิวสฺสานิ ปริวสิตฺวา มานตฺตารโห หุตฺวาปิ หิ เอกทิวสํ อนฺตราปตฺตึ ปฏิจฺฉาเทตฺวา ปุนปิ สฏฺฐิวสฺสานิ ปริวาสารโห โหติ. याविषयीचा निर्णय असा आहे – जो भिक्खू लपवलेल्या आपत्तीसाठी परिव्यास घेऊन तो आचरत असताना, किंवा मानत्त मिळण्यास पात्र असताना, किंवा मानत्त आचरत असताना, किंवा अब्भान मिळण्यास पात्र असताना, दुसरी एखादी आपत्ती प्राप्त करून पहिल्या आपत्तीच्या समान किंवा त्यापेक्षा कमी रात्री ती लपवून ठेवतो, त्याला मूळ स्थितीला खेचून (मूलाय पटिकस्सन करून) त्याने आचरलेले परिव्यासाचे दिवस आणि आचरलेले मानत्ताचे दिवस हे सर्व रद्द करून (शून्य करून), नंतर प्राप्त झालेली आपत्ती मूळ आपत्तीमध्ये समाविष्ट करून परिव्यास दिला पाहिजे. त्यामुळे, जर मूळ आपत्ती पंधरवडाभर (पक्षभर) लपवलेली असेल आणि अंतरापत्ती पंधरवड्यापेक्षा कमी काळ लपवलेली असेल, तर पुन्हा पंधरवडाभरच परिव्यास आचरावा लागतो. आणि जर अंतरापत्ती देखील पंधरवडाभरच लपवलेली असेल, तरीही पंधरवडाभरच परिव्यास आचरावा. या पद्धतीने साठ वर्षे लपवलेल्या मूळ आपत्तीपर्यंतचा निर्णय जाणावा. कारण साठ वर्षे परिव्यास आचरून मानत्तास पात्र झाल्यावरही, जर एका दिवसासाठी अंतरापत्ती लपवली, तर तो पुन्हा साठ वर्षांच्या परिव्यासास पात्र होतो। สเจ ปน อนฺตราปตฺติ มูลาปตฺติโต อติเรกปฏิจฺฉนฺนา โหติ, ตตฺถ ‘‘กึ กาตพฺพ’’นฺติ วุตฺเต มหาสุมตฺเถโร อาห – ‘‘อเตกิจฺโฉ อยํ ปุคฺคโล, อเตกิจฺโฉ นาม อาวิการาเปตฺวา วิสฺสชฺเชตพฺโพ’’ติ. มหาปทุมตฺเถโร ปนาห – ‘‘กสฺมา อเตกิจฺโฉ นาม, นนุ อยํ สมุจฺจยกฺขนฺธโก นาม พุทฺธานํ ฐิตกาลสทิโส, อาปตฺติ นาม ปฏิจฺฉนฺนา วา โหตุ อปฺปฏิจฺฉนฺนา วา สมกอูนตรอติเรกปฏิจฺฉนฺนา วา วินยธรสฺส กมฺมวาจํ โยเชตุํ สมตฺถภาโวเยเวตฺถ ปมาณํ, ตสฺมา ยา อติเรกปฏิจฺฉนฺนา โหติ, ตํ มูลาปตฺตึ กตฺวา ตตฺถ อิตรํ สโมธาย ปริวาโส ทาตพฺโพ’’ติ. อยํ ‘‘โอธานสโมธาโน’’ นาม. पण जर अंतरापत्ती मूळ आपत्तीपेक्षा अधिक काळ लपवलेली असेल, तर त्या बाबतीत 'काय करावे?' असे विचारले असता महासुम स्थेरांनी म्हटले – 'हा भिक्खू अतेकिच्छ (अचिकित्स्य) आहे. अतेकिच्छ म्हणजे त्याला (आपत्ती) प्रकट करायला लावून संघातून काढून टाकले पाहिजे.' परंतु महापदुम स्थेरांनी म्हटले – 'तो अतेकिच्छ कसा काय असू शकतो? हा समुच्चयखंधक बुद्धांच्या अस्तित्वाच्या काळासारखाच आहे की नाही? आपत्ती लपवलेली असो वा न लपवलेली असो, समान काळ लपवलेली असो, कमी काळ लपवलेली असो वा अधिक काळ लपवलेली असो, येथे विनयधराची कर्मवाचा लागू करण्याची क्षमता हेच प्रमाण आहे. म्हणून, जी आपत्ती अधिक काळ लपवलेली आहे, तिला मूळ आपत्ती मानून तिच्यामध्ये दुसरी आपत्ती समाविष्ट करून परिव्यास दिला पाहिजे.' याला 'ओधानसमोधान' असे म्हणतात। ‘‘อคฺฆสโมธาโน’’ นาม สมฺพหุลาสุ อาปตฺตีสุ ยา เอกา วา ทฺเว วา ติสฺโส วา สมฺพหุลา วา อาปตฺติโย สพฺพจิรปฏิจฺฉนฺนาโย, ตาสํ อคฺเฆน สโมธาย ตาสํ รตฺติปริจฺเฉทวเสน อวเสสานํ อูนตรปฏิจฺฉนฺนานํ อาปตฺตีนํ ปริวาโส ทิยฺยติ. อยํ วุจฺจติ อคฺฆสโมธาโน. โสปิ ปรโต ‘‘เตน โข ปน สมเยน อญฺญตโร ภิกฺขุ สมฺพหุลา สงฺฆาทิเสสา อาปตฺติโย อาปนฺโน โหติ, เอกา อาปตฺติ เอกาหปฏิจฺฉนฺนา เอกา อาปตฺติ ทฺวีหปฏิจฺฉนฺนา’’ติอาทินา นเยน ปาฬิยํ อาคโตเยว. 'अग्घसमोधान' म्हणजे – अनेक आपत्तींपैकी जी एक, दोन, तीन किंवा अनेक आपत्ती सर्वात जास्त काळ लपवलेल्या असतात, त्यांच्या मूल्याने (कालावधीने) समाविष्ट करून, त्यांच्या रात्रींच्या मर्यादेनुसार उर्वरित कमी काळ लपवलेल्या आपत्तींसाठी जो परिव्यास दिला जातो, त्याला 'अग्घसमोधान' असे म्हणतात. तो देखील पुढे 'तेन खो पन समयेन अञ्ञतरो भिक्खु संबहुला संघादिसेसा आपत्तियो आपन्नो होति, एका आपत्ति एकाहपटिच्छन्ना एका आपत्ति द्वीहपटिच्छन्ना' इत्यादी पद्धतीने पाळीमध्ये आलेलाच आहे। ยสฺส ปน สตํ อาปตฺติโย ทสาหปฏิจฺฉนฺนา, อปรมฺปิ สตํ อาปตฺติโย ทสาหปฏิจฺฉนฺนาติ เอวํ ทสกฺขตฺตุํ กตฺวา อาปตฺติสหสฺสํ ทิวสสตปฏิจฺฉนฺนํ โหติ, เตน กึ กาตพฺพนฺติ? สพฺพํ สโมทหิตฺวา ทส ทิวเส ปริวสิตพฺพํ. เอวํ เอเกเนว ทสาเหน ทิวสสตมฺปิ ปริวสิตเมว โหติ. วุตฺตมฺปิ เจตํ – पण ज्या भिक्खूच्या शंभर आपत्ती दहा दिवस लपवलेल्या असतात, आणि इतर शंभर आपत्ती देखील दहा दिवस लपवलेल्या असतात, असे दहा वेळा केल्याने एक हजार आपत्ती शंभर दिवस लपवल्यासारख्या होतात, त्याने काय करावे? सर्व आपत्ती एकत्र करून दहा दिवस परिव्यास आचरावा. अशा प्रकारे एकाच दहा दिवसांच्या कालावधीने शंभर दिवसांचा परिव्यास देखील आचरल्यासारखाच होतो. हे असे म्हटले देखील आहे – ‘‘ทสสตํ [Pg.28] รตฺติสตํ, อาปตฺติโย ฉาทยิตฺวาน; ทส รตฺติโย วสิตฺวาน, มุจฺเจยฺย ปาริวาสิโก’’ติ. (ปริ. ๔๗๗); 'एक हजार आपत्ती शंभर रात्री लपवून, दहा रात्री (परिव्यास) आचरून, परिव्यास आचरणारा भिक्खू (आपत्तीतून) मुक्त होतो।' อยํ อคฺฆสโมธาโน นาม. याला 'अग्घसमोधान' असे म्हणतात। ‘‘มิสฺสกสโมธาโน’’ นาม – โย นานาวตฺถุกา อาปตฺติโย เอกโต กตฺวา ทิยฺยติ. ตตฺรายํ นโย – 'मिस्सकसमोधान' म्हणजे – जो वेगवेगळ्या वस्तूंच्या (कारणांच्या) आपत्ती एकत्र करून दिला जातो. त्याविषयीची पद्धत अशी आहे – ‘‘อหํ, ภนฺเต, สมฺพหุลา สงฺฆาทิเสสา อาปตฺติโย อาปชฺชึ เอกํ สุกฺกวิสฺสฏฺฐึ, เอกํ กายสํสคฺคํ, เอกํ ทุฏฺฐุลฺลวาจํ, เอกํ อตฺตกามํ, เอกํ สญฺจริตฺตํ, เอกํ กุฏิการํ, เอกํ วิหารการํ, เอกํ ทุฏฺฐโทสํ, เอกํ อญฺญภาคิยํ, เอกํ สงฺฆเภทํ, เอกํ เภทานุวตฺตกํ, เอกํ ทุพฺพจํ, เอกํ กุลทูสกํ, โสหํ, ภนฺเต, สงฺฆํ ตาสํ อาปตฺตีนํ สโมธานปริวาสํ ยาจามี’’ติ – 'भंते, मी अनेक संघादिसेस आपत्ती प्राप्त केल्या आहेत – एक सुक्कविस्सट्ठि, एक कायसंसग्ग, एक दुट्ठुल्लवाचा, एक अत्तकाम, एक संचरित्त, एक कुटिकार, एक विहारकार, एक दुट्ठदोस, एक अञ्ञभागिय, एक संघभेद, एक भेदानुवत्तक, एक दुब्बच, एक कुलदूसक. तो मी, भंते, संघाकडे त्या आपत्तींसाठी समोधानपरिव्यासाची याचना करत आहे' – ติกฺขตฺตุํ ยาจาเปตฺวา ตทนุรูปาย กมฺมวาจาย ปริวาโส ทาตพฺโพ. तीन वेळा याचना करायला लावून, त्या याचनेला अनुरूप अशा कर्मवाचेने परिव्यास दिला पाहिजे। เอตฺถ จ สงฺฆาทิเสสา อาปตฺติโย อาปชฺชึ นานาวตฺถุกาโยติปิ สงฺฆาทิเสสา อาปตฺติโย อาปชฺชินฺติปิ เอวํ ปุพฺเพ วุตฺตนเยน วตฺถุวเสนปิ โคตฺตวเสนปิ นามวเสนปิ อาปตฺติวเสนปิ โยเชตฺวา กมฺมวาจํ กาตุํ วฏฺฏติเยวาติ อยํ มิสฺสกสโมธาโน. สพฺพปริวาสกมฺมวาจาวสาเน ปน นิกฺขิตฺตานิกฺขิตฺตวตฺตาทิกถา ปุริมนเยเนว เวทิตพฺพาติ. आणि येथे 'मी वेगवेगळ्या वस्तूंच्या संघादिसेस आपत्ती प्राप्त केल्या आहेत' असे किंवा 'मी संघादिसेस आपत्ती प्राप्त केल्या आहेत' असे, अशा प्रकारे पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीने वस्तूच्या (कारणांच्या) आधाराने, गोत्राच्या आधाराने, नावाच्या आधाराने किंवा आपत्तीच्या आधाराने जुळवून कर्मवाचा करणे योग्यच आहे. हा 'मिस्सकसमोधान' आहे. परंतु सर्व परिव्यास कर्मवाचेच्या शेवटी निक्खित्त (व्रत सोडणे) आणि अनिक्खित्त (व्रत न सोडणे) इत्यादी व्रतांची चर्चा पूर्वीच्या पद्धतीनेच जाणावी। ปริวาสกถา นิฏฺฐิตา. परिव्यासकथा समाप्त झाली। อิทานิ ยํ วุตฺตํ ‘‘ปกฺขมานตฺตญฺจ สโมธานมานตฺตญฺจ อวเสสปริวาสกถาวสาเน กถยิสฺสามา’’ติ, ตสฺโสกาโส สมฺปตฺโต, ตสฺมา วุจฺจติ – ‘‘ปกฺขมานตฺต’’นฺติ ภิกฺขุนิยา ทาตพฺพมานตฺตํ. ตํ ปน ปฏิจฺฉนฺนายปิ อปฺปฏิจฺฉนฺนายปิ อาปตฺติยา อฑฺฒมาสเมว ทาตพฺพํ. วุตฺตญฺเหตํ – ‘‘ครุธมฺมํ อชฺฌาปนฺนาย ภิกฺขุนิยา อุภโตสงฺเฆ ปกฺขมานตฺตํ จริตพฺพ’’นฺติ (จูฬว. ๔๐๓). ตํ ปน ภิกฺขุนีหิ อตฺตโน สีมํ โสเธตฺวา วิหารสีมาย วา [Pg.29] วิหารสีมํ โสเธตุํ อสกฺโกนฺตีหิ ขณฺฑสีมาย วา สพฺพนฺติเมน ปริจฺเฉเทน จตุวคฺคคณํ สนฺนิปาตาเปตฺวา ทาตพฺพํ. สเจ เอกา อาปตฺติ โหติ เอกิสฺสา วเสน, สเจ ทฺเว วา ติสฺโส วา สมฺพหุลา วา เอกวตฺถุกา วา นานาวตฺถุกา วา ตาสํ ตาสํ วเสน วตฺถุโคตฺตนามอาปตฺตีสุ ยํ ยํ อิจฺฉติ ตํ ตํ อาทาย โยชนา กาตพฺพา. आता, 'उर्वरित परिवास कथेच्या शेवटी आम्ही पक्षमानत्त आणि समोधानमानत्त यांविषयी सांगू' असे जे म्हटले होते, त्याची वेळ आता आली आहे. म्हणून म्हटले जाते— 'पक्षमानत्त' म्हणजे भिक्खुणीला दिले जाणारे मानत्त होय. ते लपविलेल्या किंवा न लपविलेल्या अशा दोन्ही प्रकारच्या आपत्तीसाठी केवळ अर्धा महिना (पंधरा दिवस) दिले पाहिजे. कारण असे म्हटले आहे— 'गरुधम्माचे उल्लंघन करणाऱ्या भिक्खुणीने दोन्ही संघांमध्ये पक्षमानत्ताचे आचरण केले पाहिजे.' ते पक्षमानत्त भिक्खुणींनी स्वतःची सीमा शुद्ध करून विहार सीमेमध्ये, किंवा विहार सीमा शुद्ध करण्यास असमर्थ असल्यास खंडसीमेमध्ये, अगदी शेवटचा पर्याय म्हणून किमान चार भिक्खुणींच्या गणाला एकत्रित करून दिले पाहिजे. जर एकच आपत्ती असेल तर एका आपत्तीच्या आधारे, आणि जर दोन, तीन किंवा अनेक आपत्ती असतील, ज्या एकाच विषयाशी संबंधित असतील किंवा वेगवेगळ्या विषयाशी संबंधित असतील, तर त्या त्या आपत्तींच्या आधारे वस्तू, गोत्र, नाव आणि आपत्ती यांपैकी ज्याची इच्छा असेल, ते घेऊन वाक्यरचना करावी. ตตฺริทํ เอกาปตฺติวเสน มุขมตฺตทสฺสนํ, ตาย อาปนฺนาย ภิกฺขุนิยา ภิกฺขุนิสงฺฆํ อุปสงฺกมิตฺวา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา วุฑฺฒานํ ภิกฺขุนีนํ ปาเท วนฺทิตฺวา อุกฺกุฏิกํ นิสีทิตฺวา อญฺชลึ ปคฺคเหตฺวา เอวมสฺส วจนีโย – ‘‘อหํ, อยฺเย, เอกํ อาปตฺตึ อาปชฺชึ คามนฺตรํ, สาหํ, อยฺเย, เอกิสฺสา อาปตฺติยา คามนฺตราย ปกฺขมานตฺตํ ยาจามี’’ติ. त्यामध्ये, एका आपत्तीच्या आधारे हे केवळ दिशादर्शन आहे. आपत्तीत पडलेल्या त्या भिक्खुणीने भिक्खुणी संघाकडे जाऊन, एका खांद्यावर उत्तरासंग करून, ज्येष्ठ भिक्खुणींच्या चरणांना वंदन करून, उकिडवे बसून आणि हात जोडून याप्रमाणे म्हणावे— 'आर्ये, मी गामन्तर नावाची एक आपत्ती ओढवून घेतली आहे. ती मी, आर्ये, एका गामन्तर आपत्तीसाठी पक्षमानत्ताची याचना करत आहे.' เอวํ ติกฺขตฺตุํ ยาจาเปตฺวา พฺยตฺตาย ภิกฺขุนิยา ปฏิพลาย สงฺโฆ ญาเปตพฺโพ – याप्रमाणे तीन वेळा याचना करवून घेतल्यावर, चतुर आणि सक्षम भिक्खुणीने संघाला याप्रमाणे सूचित करावे— ‘‘สุณาตุ เม อยฺเย สงฺโฆ, อยํ อิตฺถนฺนามา ภิกฺขุนี เอกํ อาปตฺตึ อาปชฺชิ คามนฺตรํ, สา สงฺฆํ เอกิสฺสา อาปตฺติยา คามนฺตราย ปกฺขมานตฺตํ ยาจติ, ยทิ สงฺฆสฺส ปตฺตกลฺลํ, สงฺโฆ อิตฺถนฺนามาย ภิกฺขุนิยา เอกิสฺสา อาปตฺติยา คามนฺตราย ปกฺขมานตฺตํ ทเทยฺย, เอสา ญตฺติ. 'आर्ये संघाने माझे ऐकावे. ही अमुक नावाची भिक्खुणी गामन्तर नावाची एक आपत्ती ओढवून बसली आहे. ती संघाकडे एका गामन्तर आपत्तीसाठी पक्षमानत्ताची याचना करत आहे. जर संघासाठी ही योग्य वेळ असेल, तर संघाने अमुक नावाच्या भिक्खुणीला एका गामन्तर आपत्तीसाठी पक्षमानत्त द्यावे. ही ज्ञप्ति आहे.' ‘‘สุณาตุ เม อยฺเย สงฺโฆ, อยํ…เป… ทุติยมฺปิ… ตติยมฺปิ เอตมตฺถํ วทามิ. สุณาตุ เม อยฺเย สงฺโฆ…เป… เทติ… ทินฺนํ สงฺเฆน อิตฺถนฺนามาย ภิกฺขุนิยา เอกิสฺสา อาปตฺติยา คามนฺตราย ปกฺขมานตฺตํ, ขมติ สงฺฆสฺส, ตสฺมา ตุณฺหี; เอวเมตํ ธารยามี’’ติ. 'आर्ये संघाने माझे ऐकावे, ही... (पेयाला)... दुसऱ्यांदाही... तिसऱ्यांदाही मी हाच विषय मांडते. आर्ये संघाने माझे ऐकावे... (पेयाला)... देत आहे... संघाने अमुक नावाच्या भिक्खुणीला एका गामन्तर आपत्तीसाठी पक्षमानत्त दिले आहे. हे संघाला संमत आहे, म्हणून संघ शांत आहे. असे मी हे लक्षात ठेवते.' กมฺมวาจาปริโยสาเน วตฺตํ สมาทิยิตฺวา ภิกฺขุมานตฺตกถาย วุตฺตนเยเนว สงฺฆสฺส อาโรเจตฺวา นิกฺขิตฺตวตฺตํ วสิตุกามาย ตตฺเถว สงฺฆมชฺเฌ วา ปกฺกนฺตาสุ ภิกฺขุนีสุ เอกภิกฺขุนิยา วา ทุติยิกาย วา สนฺติเก วุตฺตนเยเนว นิกฺขิปิตพฺพํ. อญฺญิสฺสา ปน อาคนฺตุกาย สนฺติเก อาโรเจตฺวา นิกฺขิปิตพฺพํ. นิกฺขิตฺตกาลโต ปฏฺฐาย ปกตตฺตฏฺฐาเน ติฏฺฐติ. ปุน สมาทิยิตฺวา อรุณํ อุฏฺฐาเปนฺติยา ปน ภิกฺขุนีนํเยว สนฺติเก วสิตุํ น ลภติ. ‘‘อุภโตสงฺเฆ ปกฺขมานตฺตํ จริตพฺพ’’นฺติ หิ วุตฺตํ. ตสฺมา อสฺสา อาจริยุปชฺฌายาหิ วิหารํ คนฺตฺวา สงฺคาหกปกฺเข ฐิโต [Pg.30] เอโก มหาเถโร วา ธมฺมกถิโก วา ภิกฺขุ วตฺตพฺโพ – ‘‘เอกิสฺสา ภิกฺขุนิยา วินยกมฺมํ กตฺตพฺพมตฺถิ, ตตฺร โน อยฺยา, จตฺตาโร ภิกฺขู เปเสถา’’ติ. สงฺคหํ อกาตุํ น ลพฺภติ, เปเสสฺสามีติ วตฺตพฺพํ. จตูหิ ปกตตฺตภิกฺขุนีหิ มานตฺตจารินึ ภิกฺขุนึ คเหตฺวา อนฺโตอรุเณเยว นิกฺขมิตฺวา คามูปจารโต ทฺเว เลฑฺฑุปาเต อติกฺกมิตฺวา มคฺคา โอกฺกมฺม คุมฺพวติอาทีหิ ปฏิจฺฉนฺนฏฺฐาเน นิสีทิตพฺพํ. วิหารูปจารโตปิ ทฺเว เลฑฺฑุปาตา อติกฺกมิตพฺพา จตูหิ ปกตตฺตภิกฺขูหิปิ ตตฺถ คนฺตพฺพํ. คนฺตฺวา ปน ภิกฺขุนีหิ สทฺธึ น เอกฏฺฐาเน นิสีทิตพฺพํ, ปฏิกฺกมิตฺวา อวิทูรฏฺฐาเน นิสีทิตพฺพํ. กุรุนฺทิมหาปจฺจรีสุ ปน ‘‘ภิกฺขุนีหิปิ พฺยตฺตํ เอกํ วา ทฺเว วา อุปาสิกาโย ภิกฺขูหิปิ เอกํ วา ทฺเว วา อุปาสเก อตฺตรกฺขณตฺถาย คเหตฺวา คนฺตพฺพ’’นฺติ วุตฺตํ. กุรุนฺทิยํเยว จ ภิกฺขุนุปสฺสยสฺส จ วิหารสฺส จ อุปจารํ มุญฺจิตุํ วฏฺฏตี’’ติ วุตฺตํ, คามสฺสาติ น วุตฺตํ. कम्मवाचेच्या शेवटी व्रताचे ग्रहण करून, भिक्खू-मानत्त कथेमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच संघाला कळवून, व्रत बाजूला ठेवून राहू इच्छिणाऱ्या भिक्खुणीने तेथेच संघाच्या मध्ये किंवा भिक्खुणी निघून गेल्यावर एका भिक्खुणीच्या किंवा दुसऱ्या सहकारी भिक्खुणीच्या जवळ सांगितलेल्या पद्धतीनेच व्रत बाजूला ठेवावे. परंतु, दुसऱ्या आगंतुक भिक्खुणीच्या जवळ मात्र कळवूनच व्रत बाजूला ठेवावे. व्रत बाजूला ठेवल्याच्या वेळेपासून ती सामान्य भिक्खुणीच्या स्थितीत राहते. पुन्हा व्रताचे ग्रहण करून अरुणोदय करणाऱ्या भिक्खुणीला केवळ भिक्खुणींच्याच जवळ राहण्याची परवानगी नाही. कारण 'दोन्ही संघांमध्ये पक्षमानत्ताचे आचरण केले पाहिजे' असे म्हटले आहे. म्हणून तिच्या आचार्या किंवा उपाध्यायांनी भिक्खूंच्या विहारात जाऊन, साहाय्य करणाऱ्यांच्या बाजूने उभे असलेले एक महास्थवीर किंवा धम्मकथक भिक्खू यांना सांगावे— 'एका भिक्खुणीचे विनय-कर्म करायचे आहे, त्यासाठी, हे भंते, आमच्याकडे चार भिक्खू पाठवावेत.' साहाय्य न करणे योग्य नाही, 'मी पाठवतो' असे त्यांनी म्हणावे. चार सामान्य भिक्खुणींनी मानत्ताचे आचरण करणाऱ्या भिक्खुणीला सोबत घेऊन, अरुणोदयाच्या आधीच बाहेर पडून, गावाच्या हद्दीपासून दोन ढेकूळफेक अंतर पार करून, रस्त्यावरून बाजूला होऊन, झाडी इत्यादींनी झाकलेल्या गुप्त ठिकाणी बसावे. भिक्खूंच्या विहार हद्दीपासूनही दोन ढेकूळफेक अंतर पार केले पाहिजे. चार सामान्य भिक्खूंनीही तेथे जावे. तेथे गेल्यावर भिक्खुणींसोबत एकाच ठिकाणी बसू नये, थोडे दूर होऊन जवळच एका ठिकाणी बसावे. कुरुन्दी आणि महापच्चरी अट्ठकथांमध्ये म्हटले आहे की— 'भिक्खुणींनीही एका किंवा दोन चतुर उपासिकांना, आणि भिक्खूंनीही एका किंवा दोन उपासकांना स्वतःच्या रक्षणासाठी सोबत घेऊन जावे.' आणि कुरुन्दीमध्येच 'भिक्खुणींच्या विहाराची आणि भिक्खूंच्या विहाराची हद्द सोडणे योग्य आहे' असे म्हटले आहे, 'गावाची हद्द' असे म्हटलेले नाही. เอวํ นิสินฺเนสุ ปน ภิกฺขูสุ จ ภิกฺขุนีสุ จ ตาย ภิกฺขุนิยา ‘‘มานตฺตํ สมาทิยามิ, วตฺตํ สมาทิยามี’’ติ วตฺตํ สมาทิยิตฺวา ภิกฺขุนีสงฺฆสฺส ตาว เอวํ อาโรเจตพฺพํ – याप्रमाणे भिक्खू आणि भिक्खुणी बसल्यावर, त्या भिक्खुणीने 'मी मानत्त ग्रहण करते, मी व्रत ग्रहण करते' असे म्हणून व्रताचे ग्रहण करावे आणि प्रथम भिक्खुणी संघाला याप्रमाणे कळवावे— ‘‘อหํ, อยฺเย, เอกํ อาปตฺตึ อาปชฺชึ คามนฺตรํ, สาหํ สงฺฆํ เอกิสฺสา อาปตฺติยา คามนฺตราย ปกฺขมานตฺตํ ยาจึ, ตสฺส เม สงฺโฆ เอกิสฺสา อาปตฺติยา คามนฺตราย ปกฺขมานตฺตํ อทาสิ, สาหํ ปกฺขมานตฺตํ จรามิ, ‘เวทยามหํ, อยฺเย, เวทยตี’ติ มํ สงฺโฆ ธาเรตู’’ติ. 'आर्ये, मी गामन्तर नावाची एक आपत्ती ओढवून घेतली होती. मी संघाकडे एका गामन्तर आपत्तीसाठी पक्षमानत्ताची याचना केली होती. त्या मला संघाने एका गामन्तर आपत्तीसाठी पक्षमानत्त दिले आहे. ती मी पक्षमानत्ताचे आचरण करत आहे. 'आर्ये, मी कळवत आहे, मी आचरण करत आहे' हे संघाने लक्षात ठेवावे.' ตโต ภิกฺขุสงฺฆสฺส สนฺติกํ คนฺตฺวา เอวํ อาโรเจตพฺพํ – ‘‘อหํ, อยฺยา, เอกํ อาปตฺตึ อาปชฺชึ …เป… เวทยามหํ, อยฺยา, เวทยตีติ มํ สงฺโฆ ธาเรตู’’ติ. อิธาปิ ยาย กายจิ ภาสาย อาโรเจตุํ วฏฺฏติ. त्यानंतर भिक्खू संघाजवळ जाऊन याप्रमाणे कळवावे— 'भंते, मी एक आपत्ती ओढवून घेतली होती... (पेयाला)... भंते, मी कळवत आहे, मी आचरण करत आहे हे संघाने लक्षात ठेवावे.' येथेही कोणत्याही भाषेत कळवणे योग्य आहे. อาโรเจตฺวา จ ภิกฺขุนิสงฺฆสฺเสว สนฺติเก นิสีทิตพฺพํ, อาโรจิตกาลโต ปฏฺฐาย ภิกฺขูนํ คนฺตุํ วฏฺฏติ. สเจ สาสงฺกํ โหติ, ภิกฺขุนิโย ตตฺเถว ฐานํ ปจฺจาสีสนฺติ, ฐาตพฺพํ. สเจ อญฺโญ ภิกฺขุ วา ภิกฺขุนี [Pg.31] วา ตํ ฐานํ เอติ, ปสฺสนฺติยา อาโรเจตพฺพํ. โน เจ อาโรเจติ, รตฺติจฺเฉโท เจว วตฺตเภททุกฺกฏญฺจ. สเจ อชานนฺติยา เอว อุปจารํ โอกฺกมิตฺวา คจฺฉติ, รตฺติจฺเฉโทว โหติ, น วตฺตเภททุกฺกฏํ. สเจ ภิกฺขุนิโย อุปชฺฌายาทีนํ วตฺตกรณตฺถํ ปเคว คนฺตุกามา โหนฺติ, รตฺติวิปฺปวาสคณโอหียนคามนฺตราปตฺติรกฺขณตฺถํ เอกํ ภิกฺขุนึ ฐเปตฺวา คนฺตพฺพํ. ตาย อรุเณ อุฏฺฐิเต ตสฺสา สนฺติเก วตฺตํ นิกฺขิปิตพฺพํ. เอเตนุปาเยน อขณฺฑา ปญฺจทส รตฺติโย มานตฺตํ จริตพฺพํ. आणि कळवल्यानंतर भिक्खुणी संघाच्याच जवळ बसावे. कळवल्याच्या वेळेपासून भिक्खूंना जाणे योग्य आहे. जर ती जागा शंकास्पद असेल, आणि भिक्खुणींनी तेथेच भिक्खूंच्या थांबण्याची अपेक्षा केली, तर भिक्खूंनी थांबावे. जर दुसरा कोणी भिक्खू किंवा भिक्खुणी त्या ठिकाणी आली, तर पाहणाऱ्या भिक्खुणीने तिला कळवावे. जर तिने कळवले नाही, तर रात्रीचा खंड होतो आणि व्रतभंगाचा दुक्कट गुन्हा होतो. जर नकळतच ती हद्दीबाहेर निघून गेली, तर केवळ रात्रीचा खंड होतो, व्रतभंगाचा दुक्कट गुन्हा होत नाही. जर सोबत आलेल्या भिक्खुणींना आपल्या उपाध्याया इत्यादींचे कर्तव्य करण्यासाठी लवकर जायचे असेल, तर रत्तिविप्पवास, गणओहीयन आणि गामन्तर आपत्तीपासून वाचण्यासाठी एका भिक्खुणीला तेथे ठेवून जावे. अरुणोदय झाल्यावर त्या भिक्खुणीने तिच्या जवळ व्रत बाजूला ठेवावे. या उपायाने अखंड पंधरा रात्री मानत्ताचे आचरण केले पाहिजे. อนิกฺขิตฺตวตฺตาย ปน ปาริวาสิกกฺขนฺธเก วุตฺตนเยเนว สมฺมา วตฺติตพฺพํ. อยํ ปน วิเสโส – ‘‘อาคนฺตุกสฺส อาโรเจตพฺพ’’นฺติ เอตฺถ ยตฺตกา ปุเรภตฺตํ วา ปจฺฉาภตฺตํ วา ตํ คามํ ภิกฺขู วา ภิกฺขุนิโย วา อาคจฺฉนฺติ, สพฺเพสํ อาโรเจตพฺพํ. อนาโรเจนฺติยา รตฺติจฺเฉโท จ วตฺตเภททุกฺกฏญฺจ. สเจปิ รตฺตึ โกจิ ภิกฺขุ ตํ คามูปจารํ โอกฺกมิตฺวา คจฺฉติ, รตฺติจฺเฉโท โหติเยว, อชานนปจฺจยา ปน วตฺตเภทโต มุจฺจติ. กุรุนฺทิอาทีสุ ปน อนิกฺขิตฺตวตฺตภิกฺขูนํ วุตฺตนเยเนว กเถตพฺพนฺติ วุตฺตํ. ตํ ปาริวาสิกวตฺตาทีนํ อุปจารสีมาย ปริจฺฉินฺนตฺตา ยุตฺตตรํ ทิสฺสติ. อุโปสเถ อาโรเจตพฺพํ, ปวารณาย อาโรเจตพฺพํ, จตุนฺนํ ภิกฺขูนญฺจ ภิกฺขุนีนญฺจ เทวสิกํ อาโรเจตพฺพํ. สเจ ภิกฺขูนํ ตสฺมึ คาเม ภิกฺขาจาโร สมฺปชฺชติ, ตตฺเถว คนฺตพฺพํ. โน เจ สมฺปชฺชติ, อญฺญตฺร จริตฺวาปิ ตตฺร อาคนฺตฺวา อตฺตานํ ทสฺเสตฺวา คนฺตพฺพํ. พหิคาเม วา สงฺเกตฏฺฐานํ กาตพฺพํ – ‘‘อสุกสฺมึ นาม ฐาเน อมฺเห ปสฺสิสฺสสี’’ติ. ตาย สงฺเกตฏฺฐานํ คนฺตฺวา อาโรเจตพฺพํ. สงฺเกตฏฺฐาเน อทิสฺวา วิหารํ คนฺตฺวา อาโรเจตพฺพํ. วิหาเร สพฺพภิกฺขูนํ อาโรเจตพฺพํ. สเจ สพฺเพสํ สกฺกา น โหติ อาโรเจตุํ, พหิอุปจารสีมาย ฐตฺวา ภิกฺขุนิโย เปเสตพฺพา. ตาหิ อานีตานํ จตุนฺนํ ภิกฺขูนํ อาโรเจตพฺพํ. สเจ วิหาโร ทูโร โหติ สาสงฺโก, อุปาสเก จ อุปาสิกาโย จ คเหตฺวา คนฺตพฺพํ. สเจ ปน อยํ เอกา วสติ, รตฺติวิปฺปวาสํ อาปชฺชติ, ตสฺมาสฺสา เอกา ปกตตฺตา ภิกฺขุนี สมฺมนฺนิตฺวา ทาตพฺพา เอกจฺฉนฺเน วสนตฺถาย. व्रत न सोडलेल्या (अनिक्खित्तवत्त) पारिवासिक भिक्खुनीने पारिवासिक खन्धकात सांगितलेल्या पद्धतीनेच योग्य प्रकारे वर्तन करावे. परंतु हा विशेष फरक आहे - “आगंतुकाला कळवावे” यामध्ये, जेवढ्या प्रमाणात दुपारच्या जेवणापूर्वी किंवा जेवणानंतर त्या गावात भिक्खू किंवा भिक्खुनी येतात, त्या सर्वांना कळवावे. न कळवल्यास रात्रीचा खंड (रत्तिच्छेद) आणि व्रतभंगामुळे होणारा दुक्कट अपराध होतो. जरी रात्रीच्या वेळी कोणी भिक्खू त्या गावाच्या उपचारात (हद्दीत) प्रवेश करून जात असेल, तरी रत्तिच्छेद होतोच; परंतु अज्ञानाच्या कारणाने ती व्रतभंगाच्या दोषातून मुक्त होते. परंतु कुरुन्दी इत्यादींमध्ये, व्रत न सोडलेल्या भिक्खूंच्या बाबतीत सांगितलेल्या पद्धतीनेच सांगावे, असे म्हटले आहे. ते पारिवासिक व्रत इत्यादींच्या उपचार-सीमेने मर्यादित असल्यामुळे अधिक योग्य वाटते. उपोसथ दिवशी कळवावे, पवारणा दिवशी कळवावे, आणि चार भिक्खू व चार भिक्खुनींना दररोज कळवावे. जर भिक्खूंचा त्या गावात भिक्षाचार सुलभ होत असेल, तर तिथेच जावे. जर सुलभ होत नसेल, तर इतर ठिकाणी भिक्षा मागूनही तिथे येऊन स्वतःला दाखवून जावे. किंवा गावाबाहेर एखादे संकेतस्थान ठरवावे - “अमुक नावाच्या ठिकाणी तुम्ही आम्हाला भेटू शकाल.” तिने त्या संकेतस्थानी जाऊन कळवावे. संकेतस्थानी न भेटल्यास विहारात जाऊन कळवावे. विहारात सर्व भिक्खूंना कळवावे. जर सर्वांना कळवणे शक्य नसेल, तर उपचार-सीमेच्या बाहेर उभे राहून भिक्खुनींना पाठवावे. त्यांनी बोलावून आणलेल्या चार भिक्खूंना कळवावे. जर विहार दूर आणि भीतीदायक असेल, तर उपासक आणि उपासिकांना सोबत घेऊन जावे. परंतु जर ती एकटीच राहत असेल, तर ती रात्रीच्या विप्रवासाचा (रत्तिविप्पवास) अपराध ओढवून घेते; म्हणून तिच्यासोबत एकाच छताखाली राहण्यासाठी एका सामान्य (पकतत्त) भिक्खुनीची संमती देऊन तिला द्यावी. เอวํ อขณฺฑํ มานตฺตํ จริตฺวา วีสติคเณ ภิกฺขุนิสงฺเฆ วุตฺตนเยเนว อพฺภานํ กาตพฺพํ. สเจ มานตฺตํ จรมานา อนฺตราปตฺตึ อาปชฺชติ, มูลาย ปฏิกสฺสิตฺวา [Pg.32] ตสฺสา อาปตฺติยา มานตฺตํ ทาตพฺพนฺติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. อิทํ ‘‘ปกฺขมานตฺตํ’’ นาม. अशा प्रकारे अखंडपणे मानत्तचे आचरण करून, वीस भिक्खुनींच्या संघात सांगितलेल्या पद्धतीनेच अब्भान (पुनर्स्थापना) करावे. जर मानत्तचे आचरण करत असताना ती अंतरापत्ती (मध्यंतरीचा अपराध) ओढवून घेते, तर मुळाकडे खेचून (मूलाय पटिकस्सन करून) त्या अपराधासाठी मानत्त दिले पाहिजे, असे कुरुन्दीमध्ये म्हटले आहे. याला “पक्खमानत्त” (पाक्षिक मानत्त) असे म्हणतात. ‘‘สโมธานมานตฺตํ’’ ปน ติวิธํ โหติ – โอธานสโมธานํ, อคฺฆสโมธานํ, มิสฺสกสโมธานนฺติ. ตตฺถ ยเทตํ ปรโต อุทายิตฺเถรสฺส ปญฺจาหปฏิจฺฉนฺนาย อาปตฺติยา ปริวาสํ ปริวสนฺตสฺส ปริวาเส จ มานตฺตารหฏฺฐาเน จ อนฺตราปตฺตึ อาปชฺชิตฺวา มูลายปฏิกสฺสิตสฺส ‘‘เตน หิ, ภิกฺขเว, สงฺโฆ อุทายิสฺส ภิกฺขุโน ติสฺสนฺนํ อาปตฺตีนํ ฉารตฺตํ มานตฺตํ เทตู’’ติ มานตฺตํ อนุญฺญาตํ, อิทํ ‘‘โอธานสโมธานํ’’ นาม. อิทญฺหิ ปุนปฺปุนํ มูลายปฏิกสฺสเนน ปริวุตฺถทิวเส โอธุนิตฺวา ปุริมาปตฺตีหิ สทฺธึ สโมธาย ทินฺนํ, ตสฺมา โอธานสโมธานนฺติ วุจฺจติ. กุรุนฺทิยํ ปน ‘‘สโมธานปริวาสํ วุตฺถสฺส ทาตพฺพํ มานตฺตํ สโมธานมานตฺต’’นฺติ วุตฺตํ. ตมฺปิ เตน ปริยาเยน ยุชฺชติ. “समोधानमानत्त” चे तीन प्रकार आहेत - ओधानसमोधान, अग्घसमोधान आणि मिस्सकसमोधान. त्यापैकी, नंतर उदायी थेरांनी पाच दिवस लपवलेल्या अपराधासाठी परिवास पाळत असताना, परिवासात आणि मानत्त देण्यास योग्य असलेल्या स्थितीत अंतरापत्ती ओढवून घेतल्यामुळे ज्यांना मुळाकडे खेचले गेले, त्यांना “तर मग, भिक्खूंनो, संघाने उदायी भिक्खूला तीन अपराधांसाठी सहा रात्रींचे मानत्त द्यावे” या शब्दांत जे मानत्त अनुमत केले गेले, त्याला “ओधानसमोधान” असे म्हणतात. कारण हे वारंवार मुळाकडे खेचल्यामुळे परिवास पूर्ण केलेल्या दिवसांना वगळून मागील अपराधांसह एकत्र करून दिले जाते, म्हणून याला ओधानसमोधान असे म्हणतात. परंतु कुरुन्दीमध्ये “समोधानपरिवास पूर्ण केलेल्या भिक्खूला द्यावयाच्या मानत्तला समोधानमानत्त म्हणतात” असे म्हटले आहे. ते देखील त्या पर्यायाने योग्यच ठरते. อคฺฆสโมธานํ ปน มิสฺสกสโมธานญฺจ อคฺฆสโมธานมิสฺสกสโมธานปริวาสาวสาเน ทาตพฺพมานตฺตเมว วุจฺจติ, ตํ ปริวาสกมฺมวาจานุสาเรน โยเชตฺวา ทาตพฺพํ. เอตฺตาวตา ยํ วุตฺตํ ‘‘เตน หิ, ภิกฺขเว, สงฺโฆ อุทายิสฺส ภิกฺขุโน เอกิสฺสา อาปตฺติยา สญฺเจตนิกาย สุกฺกวิสฺสฏฺฐิยา เอกาหปฏิจฺฉนฺนาย เอกาหปริวาสํ เทตูติอาทินา นเยน ปาฬิยํ อเนเกหิ อากาเรหิ ปริวาโส จ มานตฺตญฺจ วุตฺตํ, ตสฺส ยสฺมา อาคตาคตฐาเน วินิจฺฉโย วุจฺจมาโน ปาฬิ วิย อติวิตฺถารํ อาปชฺชติ, น จ สกฺกา โหติ สุเขน ปริคฺคเหตุํ, ตสฺมา นํ สโมธาเนตฺวา อิเธว ทสฺเสสฺสามา’’ติ, ตทิทํ อตฺถโต สมฺปาทิตํ โหติ. परंतु अग्घसमोधान आणि मिस्सकसमोधान हे अग्घसमोधान-परिवास व मिस्सकसमोधान-परिवासाच्या शेवटी द्यावयाच्या मानत्तलाच म्हटले जाते. ते परिवास कम्मवाचेच्या अनुषंगाने योजून दिले पाहिजे. एवढ्या विवेचनाने जे म्हटले होते की - “तर मग, भिक्खूंनो, संघाने उदायी भिक्खूला जाणूनबुजून केलेल्या वीर्यविसर्जनाच्या (संचेतनिक सुक्कविस्सट्ठि) एका दिवसाच्या लपवलेल्या एका अपराधासाठी एक दिवसाचा परिवास द्यावा” इत्यादी पद्धतीने पाळीमध्ये अनेक प्रकारे परिवास आणि मानत्त सांगितले आहे; त्याचे वेगवेगळ्या ठिकाणी आलेले निर्णय सांगत गेल्यास पाळीप्रमाणेच अतिशय सविस्तर होईल आणि ते सहजपणे समजणे शक्य होणार नाही, म्हणून आम्ही त्याचे संकलन करून इथेच दाखवू, ते अर्थाच्या दृष्टीने पूर्ण झाले आहे. ปฏิจฺฉนฺนปริวาสกถา पटिच्छन्नपरिवासकथा ๑๐๒. อิทานิ ยา ตาว อยํ ปฏิจฺฉนฺนาย เอกิสฺสา อาปตฺติยา วเสน ปาฬิ วุตฺตา, สา อุตฺตานตฺถาว. १०२. आता, लपवलेल्या एका अपराधाच्या संबंधात जी पाळी भगवंतांनी सांगितली आहे, तिचा अर्थ अगदी स्पष्टच आहे. ๑๐๘. ตโต ปรํ ทฺวีหตีหจตูหปญฺจาหปฏิจฺฉนฺนานํ วเสน ปาฬึ วตฺวา ปญฺจาหปฏิจฺฉนฺนาย ปริวาสโต ปฏฺฐาย อนฺตราปตฺติ ทสฺสิตา. ยสฺมา ปน ตํ อาปตฺตึ อาปนฺโน มูลายปฏิกสฺสนารโห นาม โหติ, ตสฺมาสฺส [Pg.33] ตตฺถ มูลายปฏิกสฺสนํ อนุญฺญาตํ. สเจ ปน นิกฺขิตฺตวตฺโต อาปชฺชติ, มูลายปฏิกสฺสนารโห น โหติ. กสฺมา? ยสฺมา น โส ปริวสนฺโต อาปนฺโน, ปกตตฺตฏฺฐาเน ฐิโต อาปนฺโน, ตสฺมา ตสฺสา อาปตฺติยา วิสุํ มานตฺตํ จริตพฺพํ. สเจ ปฏิจฺฉนฺนา โหติ ปริวาโสปิ วสิตพฺโพ. ยญฺเจตํ มูลายปฏิกสฺสนํ วุตฺตํ, ตสฺมิมฺปิ กเต ปริวุตฺถทิวสา มกฺขิตา โหนฺติ. อิติ ปริวาเส อนฺตราปตฺตึ ทสฺเสตฺวา ปุน มานตฺตารหสฺส อนฺตราปตฺตึ ทสฺเสตฺวา มูลายปฏิกสฺสนํ วุตฺตํ, ตสฺมิมฺปิ กเต ปริวุตฺถทิวสา มกฺขิตาว โหนฺติ. ตโต ปริวุตฺถปริวาสสฺส ตาสํ ติสฺสนฺนมฺปิ อาปตฺตีนํ สโมธานมานตฺตํ ทสฺสิตํ. ตโต มานตฺตจาริกสฺส อนฺตราปตฺตึ ทสฺเสตฺวา มูลายปฏิกสฺสนํ วุตฺตํ. ตสฺมึ ปน ปฏิกสฺสเน กเต มานตฺตจิณฺณทิวสาปิ ปริวุตฺถทิวสาปิ มกฺขิตาว โหนฺติ. ตโต อพฺภานารหสฺส อนฺตราปตฺตึ ทสฺเสตฺวา มูลายปฏิกสฺสนํ วุตฺตํ. ตสฺมิมฺปิ กเต สพฺเพ เต มกฺขิตาว โหนฺติ. ตโต ปรํ สพฺพา อนฺตราปตฺติโย โยเชตฺวา อพฺภานกมฺมํ ทสฺสิตํ. เอวํ ปฏิจฺฉนฺนวาเร เอกาหปฏิจฺฉนฺนาทิวเสน ปญฺจ, อนฺตราปตฺติวเสน จตสฺโสติ นว กมฺมวาจา ทสฺสิตา โหนฺติ. १०८. त्यानंतर दोन, तीन, चार आणि पाच दिवस लपवलेल्या अपराधांच्या संबंधात पाळी सांगून, पाच दिवस लपवलेल्या अपराधाच्या परिवासापासून सुरुवात करून अंतरापत्ती दर्शविली आहे. परंतु ज्या अर्थी तो अपराध ओढवून घेतलेला भिक्खू मुळाकडे खेचण्यास पात्र ठरतो, म्हणून त्याला त्या अंतरापत्तीच्या बाबतीत मुळाकडे खेचणे अनुमत केले आहे. परंतु जर व्रत सोडलेल्या (निक्खित्तवत्त) भिक्खूने अपराध केला, तर तो मुळाकडे खेचण्यास पात्र ठरत नाही. का? कारण त्याने परिवास पाळत असताना अपराध केलेला नाही, तर सामान्य स्थितीत असताना अपराध केला आहे; म्हणून त्या अपराधासाठी स्वतंत्रपणे मानत्तचे आचरण केले पाहिजे. जर तो अपराध लपवलेला असेल, तर परिवासही पाळला पाहिजे. आणि हे जे मुळाकडे खेचणे सांगितले आहे, ते केले असता परिवास पूर्ण केलेले दिवस रद्द होतात. अशा प्रकारे परिवासातील अंतरापत्ती दर्शवून, पुन्हा मानत्त मिळण्यास पात्र असलेल्या भिक्खूची अंतरापत्ती दर्शवून मुळाकडे खेचणे सांगितले आहे; ते केले असताही परिवास पूर्ण केलेले दिवस रद्दच होतात. त्यानंतर परिवास पूर्ण केलेल्या भिक्खूच्या त्या तिन्ही अपराधांचे समोधानमानत्त दर्शविले आहे. त्यानंतर मानत्तचे आचरण करणाऱ्या भिक्खूची अंतरापत्ती दर्शवून मुळाकडे खेचणे सांगितले आहे. परंतु ते मुळाकडे खेचणे केले असता, मानत्त आचरण केलेले दिवस आणि परिवास पूर्ण केलेले दिवस दोन्हीही रद्दच होतात. त्यानंतर अब्भान मिळण्यास पात्र असलेल्या भिक्खूची अंतरापत्ती दर्शवून मुळाकडे खेचणे सांगितले आहे. ते केले असताही ते सर्व दिवस रद्दच होतात. त्यानंतर सर्व अंतरापत्तींची सांगड घालून अब्भानकर्म दर्शविले आहे. अशा प्रकारे पटिच्छन्न वारात एक दिवस लपवल्याच्या प्रक्रियेनुसार पाच आणि अंतरापत्तीच्या प्रक्रियेनुसार चार, अशा नऊ कम्मवाचा दर्शविल्या आहेत. ปฏิจฺฉนฺนปริวาสกถา นิฏฺฐิตา. पटिच्छन्नपरिवासकथा समाप्त झाली. สโมธานปริวาสกถา समोधानपरिवासकथा ๑๒๕. ตโต ปรํ ปกฺขปฏิจฺฉนฺนาย อาปตฺติยา อนฺโตปริวาสโต ปฏฺฐาย ปญฺจาหปฏิจฺฉนฺนาย อนฺตราปตฺติยา วเสน สโมธานปริวาโส จ, สโมธานมานตฺตญฺจ ทสฺสิตํ. เอตฺถ จ มานตฺตจาริกมานตฺตารหกาเลปิ อาปนฺนาย อาปตฺติยา มูลายปฏิกสฺสเน กเต มานตฺตจิณฺณทิวสาปิ ปริวาสปริวุตฺถทิวสาปิ สพฺเพ มกฺขิตาว โหนฺติ. กสฺมา? ยสฺมา ปฏิจฺฉนฺนา อนฺตราปตฺติ. เตเนว วุตฺตํ – ‘‘มูลาย ปฏิกสฺสิตฺวา ปุริมาย อาปตฺติยา สโมธานปริวาสํ ทตฺวา ฉารตฺตํ มานตฺตํ เทตู’’ติ. ตโต ปรํ สพฺพา อนฺตราปตฺติโย โยเชตฺวา อพฺภานกมฺมํ ทสฺเสตฺวา สุกฺกวิสฺสฏฺฐิวตฺถุ นิฏฺฐาปิตํ. १२५. त्यानंतर, एका पंधरवड्यापर्यंत लपविलेल्या आपत्तीच्या संदर्भात, अंतोपरिवसापासून सुरुवात करून, पाच दिवस लपविलेल्या अंतरापत्तीच्या (मध्यवर्ती आपत्तीच्या) आधारे समोधानपरिवस आणि समोधानमानत्त दर्शविले गेले आहे. आणि येथे, मानत्त आचरण करत असताना किंवा मानत्तास पात्र असलेल्या काळातही घडलेल्या आपत्तीमुळे मूलायपटिकस्सन (मूळ स्थितीकडे परत नेणे) केले असता, मानत्त आचरलेले दिवस आणि परिवस पूर्ण केलेले दिवस हे सर्वच निष्फळ (दूषित) होतात. ते का? कारण ती अंतरापत्ती लपविलेली होती. म्हणूनच असे म्हटले आहे – “मूलाय पटिकस्सित्वा (मूळ स्थितीकडे परत नेऊन) पूर्वीच्या आपत्तीसाठी समोधानपरिवस देऊन सहा रात्रींचे मानत्त द्यावे.” त्यानंतर सर्व अंतरापत्तींची जोडणी करून अब्भानकर्म दर्शवून सुक्कविस्सट्ठि (शुक्रविसर्ग) वस्तू समाप्त केली आहे. สโมธานปริวาสกถา นิฏฺฐิตา. समोधानपरिवसकथा समाप्त झाली. สุกฺกวิสฺสฏฺฐิกถา จ นิฏฺฐิตา. आणि सुक्कविस्सट्ठिकथा समाप्त झाली. อคฺฆสโมธานปริวาสกถา अग्घसमोधानपरिवसकथा ๑๓๔. ตโต เอกาปตฺติมูลกญฺจ อาปตฺติวฑฺฒนกญฺจาติ ทฺเว นเย ทสฺเสตฺวา อคฺฆสโมธานปริวาโส ทสฺสิโต. १३४. त्यानंतर, 'एकापत्तीमूलक' (एका आपत्तीवर आधारित) आणि 'आपत्तीवड्ढनक' (आपत्ती वाढवणारी) असे दोन मार्ग (नय) दर्शवून अग्घसमोधानपरिवस दर्शविला आहे. ตโต [Pg.34] สญฺจิจฺจ อนาโรจิตาปตฺติวตฺถุํ ทสฺเสตฺวา สญฺจิจฺจ อชานนอสฺสรณเวมติกภาเวหิ อนาโรจิตาย อาปตฺติยา ปจฺฉา ลชฺชิธมฺเม วา ญาณสรณนิพฺเพมติกภาเวสุ วา อุปฺปนฺเนสุ ยํ กาตพฺพํ, ตํ ทสฺเสตุํ ‘‘อิธ ปน ภิกฺขเว’’ติอาทินา นเยน ปาฬิ ฐปิตา. ตโต อชานนอสฺสรณเวมติกปฏิจฺฉนฺนานํ อปฺปฏิจฺฉนฺนภาวํ ทสฺเสตุํ ตเถว ปาฬิ ฐปิตา. त्यानंतर, जाणूनबुजून (संचिच्च) न सांगितलेल्या आपत्तीचे प्रकरण दर्शवून; जाणूनबुजून न समजणे, स्मरण नसणे किंवा शंका असणे या कारणांमुळे न सांगितलेल्या आपत्तीच्या बाबतीत, नंतर लज्जीभाव (लज्जीधम्म) उत्पन्न झाल्यावर किंवा ज्ञान, स्मरण व नि:शंकता उत्पन्न झाल्यावर जे काही कर्तव्य आहे, ते दर्शविण्यासाठी “इध पन भिक्खवे” (परंतु येथे, भिक्खूंनो) इत्यादी पद्धतीने पाळी (पाठाची) स्थापना केली आहे. त्यानंतर, न समजणे, स्मरण नसणे आणि शंका असणे यांमुळे लपविलेल्या आपत्तींच्या 'नलपविलेल्या' (अप्पटिच्छन्न) भावाला दर्शविण्यासाठी त्याचप्रमाणे पाळी स्थापित केली आहे. อคฺฆสโมธานปริวาสกถา นิฏฺฐิตา. अग्घसमोधानपरिवसकथा समाप्त झाली. ทฺเวมาสปริวาสกถา द्वेमासपरिवसकथा ๑๓๘. ตโต ทฺวินฺนํ อาปตฺตีนํ ทฺเวมาสปฏิจฺฉนฺนานํ เอกมาสปริวาสยาจนวตฺถุํ ทสฺเสตฺวา อสญฺจิจฺจ อชานนอสฺสรณเวมติกภาเวหิ อนาโรจิเต อิตรสฺมึ มาเส ปจฺฉา ลชฺชิธมฺมาทีสุ อุปฺปนฺเนสุ ยํ กาตพฺพํ, ตํ ทสฺเสตุํ อชานนอสฺสรณเวมติกปฏิจฺฉนฺนสฺส จ อาปนฺนภาวํ ทสฺเสตุํ ปุริมนเยเนว ปาฬิ ฐปิตา. १३८. त्यानंतर, दोन महिने लपविलेल्या दोन आपत्तींसाठी एक महिन्याच्या परिवसाची याचना करण्याचे प्रकरण दर्शवून; नकळत (असंचिच्च), न समजणे, स्मरण नसणे किंवा शंका असणे यांमुळे दुसऱ्या महिन्याची आपत्ती न सांगितली असता, नंतर लज्जीभाव इत्यादी उत्पन्न झाल्यावर जे कर्तव्य आहे ते दर्शविण्यासाठी, आणि न समजणे, स्मरण नसणे व शंका असणे यांमुळे लपविलेल्या आपत्तीत पडल्याचा भाव दर्शविण्यासाठी पूर्वपद्धतीनेच पाळी स्थापित केली आहे. ทฺเวมาสปริวาสกถา นิฏฺฐิตา. द्वेमासपरिवसकथा समाप्त झाली. สุทฺธนฺตปริวาสาทิกถา सुद्धंतपरिवसादिकथा ๑๕๖. ตโต ‘‘อาปตฺติปริยนฺตํ น ชานาติ, รตฺติปริยนฺตํ น ชานาตี’’ติอาทินา นเยน สุทฺธนฺตปริวาโส ทสฺสิโต. १५६. त्यानंतर, “आपत्तीची मर्यादा जाणत नाही, रात्रींची मर्यादा जाणत नाही” इत्यादी पद्धतीने सुद्धंतपरिवस दर्शविला आहे. ๑๖๐. ตโต ปรํ ปาริวาสิกํ อาทึ กตฺวา วิพฺภมิตฺวา ปุนอุปสมฺปนฺนาทีสุ ปฏิปตฺติทสฺสนตฺถํ ปาฬิ ฐปิตา. १६०. त्यानंतर, परिवस आचरण करणाऱ्या (पारिवासिक) भिक्खूपासून सुरुवात करून, गृहस्थ होऊन (विब्भमित्वा) पुन्हा उपसंपदा प्राप्त केलेल्या इत्यादींच्या संदर्भातील आचरण दर्शविण्यासाठी पाळी स्थापित केली आहे. ๑๖๕. ตตฺถ ‘‘อนฺตรา สมฺพหุลา อาปตฺติโย อาปชฺชติ ปริมาณา อปฺปฏิจฺฉนฺนาโย’’ติอาทีสุ อาปตฺติปริจฺเฉทวเสน ปริมาณาโย เจว อปฺปฏิจฺฉนฺนาโย จาติ อตฺโถ. १६५. तेथे, “दरम्यान अनेक आपत्तींमध्ये पडतो, ज्या मोजता येण्याजोग्या (परिमाणा) आणि न लपविलेल्या (अप्पटिच्छन्ना) आहेत” इत्यादी वाक्यांमध्ये, आपत्तीच्या परिच्छेदानुसार (मर्यादेनुसार) त्या मोजता येण्याजोग्या आणि न लपविलेल्या आहेत, असा अर्थ आहे. ๑๖๖. ปจฺฉิมสฺมึ อาปตฺติกฺขนฺเธติ เอโกว โส อาปตฺติกฺขนฺโธ, ปจฺฉา ฉาทิตตฺตา ปน ‘‘ปจฺฉิมสฺมึ อาปตฺติกฺขนฺเธ’’ติ วุตฺตํ. ปุริมสฺมินฺติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. १६६. “पच्छिमस्मिं आपत्तिक्खंधे” (शेवटच्या आपत्तीसमूहात) म्हणजे तो आपत्तीसमूह एकच आहे, परंतु नंतर लपविला गेल्यामुळे “पच्छिमस्मिं आपत्तिक्खंधे” असे म्हटले आहे. “पुरिमस्मिं” (पूर्वीच्या) या शब्दातही हाच नियम (नय) आहे. ๑๘๐. ววตฺถิตา สมฺภินฺนาติ สภาควิสภาคานเมเวตํ ปริยายวจนํ. १८०. “ववत्थिता संभिन्ना” (व्यवस्थित व संभिन्न) हे सभाग (समान) आणि विसभाग (असमान) आपत्तींचेच समानार्थी शब्द (पर्यायवचन) आहेत. สุทฺธนฺตปริวาสาทิกถา นิฏฺฐิตา. सुद्धंतपरिवसादिकथा समाप्त झाली. ทฺเวภิกฺขุวารเอกาทสกาทิกถา द्वेभिक्खूवारएकादसकादिकथा ๑๘๑. ตโต [Pg.35] ปรํ โย ปฏิจฺฉาเทติ, ตสฺมึ ปฏิปตฺติทสฺสนตฺถํ ‘‘ทฺเว ภิกฺขู’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ มิสฺสกนฺติ ถุลฺลจฺจยาทีหิ มิสฺสกํ. สุทฺธกนฺติ สงฺฆาทิเสสํ วินา ลหุกาปตฺติกฺขนฺธเมว. १८१. त्यानंतर, जो लपवितो, त्याच्या संदर्भातील आचरण दर्शविण्यासाठी “द्वे भिक्खू” (दोन भिक्खू) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे “मिस्सकं” (मिश्रित) म्हणजे थुल्लच्चय इत्यादींशी मिश्रित असलेली आपत्ती. “सुद्धकं” (शुद्ध) म्हणजे संघादिसेस वगळता केवळ लघुक आपत्तीसमूहच. ๑๘๔. ตโต ปรํ อวิสุทฺธวิสุทฺธภาวทสฺสนตฺถํ ‘‘อิธ ปน, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺพหุลา สงฺฆาทิเสสา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ พฺยญฺชนโต วา อธิปฺปายโต วา อนุตฺตานํ นาม กิญฺจิ นตฺถิ, ตสฺมา ตญฺจ อิโต ปุพฺเพ อวุตฺตญฺจ สพฺพํ ปาฬิอนุสาเรเนว เวทิตพฺพนฺติ. १८४. त्यानंतर, अशुद्ध आणि शुद्ध भाव दर्शविण्यासाठी “इध पन, भिक्खवे, भिक्खू संबहुला संघादिसेसा” इत्यादी म्हटले आहे. तेथे शब्दाच्या दृष्टीने किंवा अभिप्रायाच्या दृष्टीने अस्पष्ट (अनुत्तान) असे काहीही नाही, म्हणून ते आणि यापूर्वी न सांगितलेले हे सर्व पाळीच्या अनुषंगानेच समजून घ्यावे. ทฺเวภิกฺขุวารเอกาทสกาทิกถา นิฏฺฐิตา. द्वेभिक्खूवारएकादसकादिकथा समाप्त झाली. สมุจฺจยกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. समुच्चयक्खंधकवर्णना समाप्त झाली. ๔. สมถกฺขนฺธกํ ४. समथक्खंधक สมฺมุขาวินยกถา सम्मुखाविनयकथा ๑๘๖-๑๘๗. สมถกฺขนฺธเก [Pg.36] – ‘‘อธมฺมวาที ปุคฺคโล’’ติอาทีนิ ฉ มาติกาปทานิ นิกฺขิปิตฺวา ‘‘อธมฺมวาที ปุคฺคโล ธมฺมวาทึ ปุคฺคลํ สญฺญาเปตี’’ติอาทินา นเยน วิตฺถาโร วุตฺโต. ตตฺถ สญฺญาเปตีติ การณปติรูปกานิ วตฺวา ปริโตเสตฺวา ชานาเปติ. นิชฺฌาเปตีติ ยถา โส ตํ อตฺถํ นิชฺฌายติ, โอโลเกติ; เอวํ กโรติ. เปกฺขติ อนุเปกฺขตีติ ยถา โส ตํ อตฺถํ เปกฺขติ เจว ปุนปฺปุนญฺจ เปกฺขติ; เอวํ กโรติ. ทสฺเสติ อนุทสฺเสตีติ เตสญฺเญว ปริยายวจนานิ. อธมฺเมน วูปสมฺมตีติ ยสฺมา โส อธมฺมเมว ‘‘อยํ ธมฺโม’’ติอาทินา นเยน โมเหตฺวา ทสฺเสติ, ตสฺมา อธมฺเมน วูปสมฺมติ นาม. १८६-१८७. समथक्खंधकामध्ये – “अधम्मवादी पुग्गलो” (अधर्मवादी व्यक्ती) इत्यादी सहा मातिकापदे मांडून, “अधम्मवादी पुग्गलो धम्मवादिं पुग्गलं सञ्ञापेति” (अधर्मवादी व्यक्ती धर्मवादी व्यक्तीला पटवून देते) इत्यादी पद्धतीने सविस्तर विवरण केले आहे. तेथे “सञ्ञापेति” (पटवून देणे) म्हणजे आभासी कारणे सांगून, संतुष्ट करून पटवून देणे. “निज्झापेति” (ध्यान वेधणे) म्हणजे ज्या प्रकारे ती व्यक्ती त्या अर्थाचे ध्यान करते, पाहते; त्या प्रकारे करणे. “पेक्खति अनुपेक्खति” (पाहणे व वारंवार पाहणे) म्हणजे ज्या प्रकारे ती व्यक्ती त्या अर्थाला पाहते आणि पुन्हा पुन्हा पाहते; त्या प्रकारे करणे. “दस्सेति अनुदस्सेति” (दाखवणे व वारंवार दाखवणे) हे त्यांचेच समानार्थी शब्द आहेत. “अधम्मेन वूपसम्मति” (अधर्माने शांत होणे) म्हणजे ज्या कारणाने ती व्यक्ती अधर्मालाच “हा धर्म आहे” इत्यादी पद्धतीने भ्रमित करून दाखवते, म्हणून त्याला 'अधर्माने शांत होणे' असे म्हणतात. ๑๘๘. ธมฺเมน วูปสมฺมตีติ ยสฺมา ธมฺมวาที ธมฺมเมว ‘‘อยํ ธมฺโม’’ติอาทินา นเยน อโมเหตฺวา ทสฺเสติ, ตสฺมา ธมฺเมน วูปสมฺมติ นาม. १८८. “धम्मेन वूपसम्मति” (धर्माने शांत होणे) म्हणजे ज्या कारणाने धर्मवादी व्यक्ती धर्मालाच “हा धर्म आहे” इत्यादी पद्धतीने भ्रमित न करता दाखवते, म्हणून त्याला 'धर्माने शांत होणे' असे म्हणतात. สมฺมุขาวินยกถา นิฏฺฐิตา. सम्मुखाविनयकथा समाप्त झाली. สติวินยกถา सतिविनयकथा ๑๙๕. ปญฺจิมานิ ภิกฺขเว ธมฺมิกานิ สติวินยสฺส ทานานีติ เอตฺถ สุทฺธสฺส อนาปตฺติกสฺส ทานํ เอกํ, อนุวทิตสฺส ทานํ เอกํ, ยาจิตสฺส ทานํ เอกํ, สงฺเฆน ทานํ เอกํ, ธมฺเมน สมคฺคทานํ เอกนฺติ เอวํ ปญฺจ. เอตานิ ปน เอเกกองฺควเสน น ลพฺภนฺติ, ตสฺมา เทสนามตฺตเมเวตํ, ปญฺจงฺคสมนฺนาคตํ ปน สติวินยทานํ ธมฺมิกนฺติ อยเมตฺถ อตฺโถ. ตตฺถ จ อนุวทนฺตีติ โจเทนฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. อยํ ปน สติวินโย ขีณาสวสฺเสว ทาตพฺโพ น อญฺญสฺส, อนฺตมโส อนาคามิโนปิ. โส จ โข อญฺเญน โจทิยมานสฺเสว, น อโจทิยมานสฺส. ทินฺเน จ ปน ตสฺมึ โจทกสฺส กถา น รุหติ. โจเทนฺโตปิ ‘‘อยํ ขีณาสโว สติวินยลทฺโธ, โก ตุยฺหํ กถํ คเหสฺสตี’’ติ อปสาเทตพฺพตํ อาปชฺชติ. १९५. “पञ्चिमानि भिक्खवे धम्मिकानि सतिविनयस्स दानानि” (भिक्खूंनो, सतिविनय देण्याच्या या पाच धर्मसंमत पद्धती आहेत) यामध्ये – शुद्ध व निष्पाप (भिक्खूला) देणे हे एक, आरोप केलेल्याला देणे हे एक, याचना केलेल्याला देणे हे एक, संघाने देणे हे एक, आणि धर्माने (योग्य कारणाने) समग्र संघाने देणे हे एक, अशा प्रकारे पाच आहेत. परंतु, हे एकेका अंगाच्या रूपाने स्वतंत्रपणे प्राप्त होत नाहीत, म्हणून हे केवळ उपदेशमात्र (देसनामत्त) आहे. प्रत्यक्षात पाच अंगांनी युक्त असलेले सतिविनय देणे हेच धर्मसंमत (धम्मिक) आहे, असा येथे अर्थ आहे. आणि तेथे “अनुवदन्ति” म्हणजे चोदना (आरोप) करतात. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. परंतु, हा सतिविनय केवळ क्षीणासवालाच (अर्हतालाच) दिला पाहिजे, इतरांना नाही, अगदी अनागामीलाही नाही. आणि तो देखील दुसऱ्याने चोदना (आरोप) केलेल्यालाच दिला पाहिजे, चोदना न केलेल्याला नाही. आणि तो दिला असता चोदकाचे (आरोप करणाऱ्याचे) बोलणे निष्फळ ठरते. आरोप करणारा देखील “हा क्षीणासव सतिविनय प्राप्त झालेला आहे, तुझे बोलणे कोण स्वीकारणार?” अशा प्रकारे फटकारण्यास (अपसादेतब्बतं) पात्र ठरतो. สติวินยกถา นิฏฺฐิตา. सतिविनयकथा समाप्त झाली. อมูฬฺหวินยกถา अमूळ्हविनयकथा ๑๙๖. ภาสิตปริกฺกนฺตนฺติ [Pg.37] วาจาย ภาสิตํ กาเยน ปริกฺกนฺตํ; ปริกฺกมิตฺวา กตนฺติ อตฺโถ. สรตายสฺมา เอวรูปึ อาปตฺตึ อาปชฺชิตาติ เอตฺถ สรตุ อายสฺมา เอวรูปึ อาปตฺตึ อาปชฺชิตา; อายสฺมา เอวรูปิยา อาปตฺติยาติ อยมตฺโถ. อาปชฺชิตฺวาติ วา ปาโฐ, ตสฺสตฺโถ – ปฐมํ อาปชฺชิตฺวา ปจฺฉา ตํ อาปตฺตึ สรตุ อายสฺมาติ. १९६. “भासितपरिक्कन्तं” म्हणजे वाणीने बोललेले आणि कायेने केलेले; उल्लंघन करून केलेले असा अर्थ आहे. “सरतायस्मा एवरूपिं आपत्तिं आपज्जिता” यामध्ये – आयुष्यमानाने अशा प्रकारच्या आपत्तीत पडल्याचे स्मरण करावे; आयुष्यमानाने अशा प्रकारच्या आपत्तीचे स्मरण करावे, असा अर्थ आहे. किंवा “आपज्जित्वा” असाही पाठ आहे, त्याचा अर्थ – प्रथम आपत्तीत पडून नंतर आयुष्यमानाने त्या आपत्तीचे स्मरण करावे, असा आहे. อมูฬฺหวินยกถา นิฏฺฐิตา. अमूळ्हविनयकथा समाप्त झाली. เยภุยฺยสิกากถา येभुय्यसिकाकथा ๒๐๒. เยภุยฺยสิกาย วูปสเมตุนฺติ เอตฺถ ยสฺสา กิริยาย ธมฺมวาทิโน พหุตรา, เอสา เยภุยฺยสิกา นาม. २०२. “येभुय्यसिका (बहुमताने) द्वारे शांत करावे” यामध्ये, ज्या क्रियेने (शलाका ग्रहण करण्याच्या क्रियेने) धम्मवादी बहुसंख्य होतात, त्या क्रियेला 'येभुय्यसिका' असे म्हणतात. ๒๐๔. อธมฺมิกสลากคฺคาเหสุ โอรมตฺตกนฺติ ปริตฺตํ อปฺปมตฺตกํ ภณฺฑนมตฺตเมว. น จ คติคตนฺติ ทฺเว ตโย อาวาเส น คตํ, ตตฺถ ตตฺเถว วา ทฺวตฺติกฺขตฺตุํ อวินิจฺฉิตํ. น จ สริตสาริตนฺติ ทฺวตฺติกฺขตฺตุํ เตหิ ภิกฺขูหิ สยํ สริตํ วา อญฺเญหิ สาริตํ วา น โหติ. ชานาตีติ สลากํ คาเหนฺโต ชานาติ ‘‘อธมฺมวาที พหุตรา’’ติ. อปฺเปว นามาติ อิมินา นีหาเรน สลากาย คาหิยมานาย ‘‘อปิ นาม อธมฺมวาทิโน พหุตรา อสฺสู’’ติ อยมสฺส อชฺฌาสโย โหติ. อปเรสุปิ ทฺวีสุ เอเสว นโย. २०४. अधार्मिक शलाका ग्रहणांमध्ये (अधर्माने मतदान घेताना) 'ओरमत्तकं' म्हणजे अल्प, थोडे, केवळ भांडणमात्र होय. 'न च गतिगतं' म्हणजे दोन किंवा तीन विहारांमध्ये न गेलेले, किंवा त्याच विहारात दोन-तीन वेळा अनिर्णित राहिलेले होय. 'न च सरितसारितं' म्हणजे त्या भिक्खूंनी स्वतः दोन-तीन वेळा स्मरण केलेले किंवा इतरांनी त्यांना स्मरण करून दिलेले नसणे होय. 'जानाति' म्हणजे शलाका ग्रहण करून घेणारा जाणतो की “अधम्मवादी बहुसंख्य आहेत”. 'अप्पेव नाम' म्हणजे या पद्धतीने शलाका ग्रहण करवून घेताना “कदाचित अधम्मवादी बहुसंख्य असतील” असा त्या भिक्खूचा आशय असतो. इतर दोन बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. อธมฺเมน คณฺหนฺตีติ อธมฺมวาทิโน ‘‘เอวํ มยํ พหู ภวิสฺสามา’’ติ ทฺเว ทฺเว สลากาโย คณฺหนฺติ. วคฺคา คณฺหนฺตีติ ทฺเว ธมฺมวาทิโน เอกํ ธมฺมวาทิสลากํ คณฺหนฺติ ‘‘เอวํ ธมฺมวาทิโน น พหู ภวิสฺสนฺตี’’ติ มญฺญมานา. น จ ยถาทิฏฺฐิยา คณฺหนฺตีติ ธมฺมวาทิโน หุตฺวา ‘‘พลวปกฺขํ ภชิสฺสามา’’ติ อธมฺมวาทิสลากํ คณฺหนฺติ. ธมฺมิกสลากคฺคาเหสุ อยเมวตฺโถ ปริวตฺเตตฺวา เวทิตพฺโพ. เอวํ สลากํ คาเหตฺวา สเจ พหุตรา ธมฺมวาทิโน โหนฺติ; ยถา เต วทนฺติ, เอวํ ตํ อธิกรณํ วูปสเมตพฺพํ, เอวํ เยภุยฺยสิกาย วูปสนฺตํ โหติ. อยเมตฺถ สงฺเขโป. วิตฺถาโร ปน ปรโตปิ อาคมิสฺสติ. 'अधम्मेन गण्हन्ति' म्हणजे अधम्मवादी “अशा प्रकारे आपण बहुसंख्य होऊ” असे विचार करून दोन-दोन शलाका ग्रहण करतात. 'वग्गा गण्हन्ति' म्हणजे दोन धम्मवादी भिक्खू “अशा प्रकारे धम्मवादी बहुसंख्य होणार नाहीत” असे मानून एकच धम्मवादी शलाका ग्रहण करतात. 'न च यथादिट्ठिया गण्हन्ति' म्हणजे धम्मवादी असूनही “आपण बलवान पक्षाला शरण जाऊ” असा विचार करून अधम्मवादी शलाका ग्रहण करतात. धार्मिक शलाका ग्रहणांमध्ये हाच अर्थ उलट करून समजून घ्यावा. अशा प्रकारे शलाका ग्रहण करवून घेऊन जर धम्मवादी बहुसंख्य असतील, तर ते जसे सांगतात, त्याप्रमाणे ते अधिकरण शांत केले पाहिजे. अशा प्रकारे येभुय्यसिका (बहुमताने) द्वारे अधिकरण शांत होते. हा येथे संक्षेप आहे. विस्तार तर पुढे येईलच. เยภุยฺยสิกากถา นิฏฺฐิตา. येभुय्यसिका-कथा समाप्त झाली. ตสฺสปาปิยสิกากถา तस्सपापियसिक-कथा ๒๐๗. อสุจีติ [Pg.38] อสุจีหิ กายวจีกมฺเมหิ สมนฺนาคโต. อลชฺชีติ สญฺจิจฺจ อาปชฺชนาทินา อลชฺชิลกฺขเณน สมนฺนาคโต. สานุวาโทติ สอุปวาโท. อิติ อิเมสญฺจ ติณฺณํ องฺคานํ วเสน ตีณิ กรณานิ, สงฺเฆน กรณํ, ธมฺเมน สมคฺเคน กรณนฺติ อิมานิ จ ทฺเวติ ปญฺจ ตสฺสปาปิยสิกากมฺมสฺส กรณานิ นาม โหนฺติ. เสสเมตฺถ ตชฺชนียาทีสุ วุตฺตนยเมว. อยํ ปเนตฺถ วจนตฺโถ – อิทญฺหิ โย ปาปุสฺสนฺนตาย ปาปิโย ปุคฺคโล, ตสฺส กตฺตพฺพโต ‘‘ตสฺสปาปิยสิกากมฺม’’นฺติ วุจฺจติ. २०७. 'असुचि' म्हणजे अशुद्ध कायिक व वाचिक कर्मांनी युक्त असलेला. 'अलज्जी' म्हणजे जाणूनबुजून आपत्तीत पडणे इत्यादी अलज्जीच्या (निर्लज्जतेच्या) लक्षणांनी युक्त असलेला. 'सानुवादो' म्हणजे आरोपासह असलेला. अशा प्रकारे या तीन अंगांच्या आधारे तीन विधी, आणि संघाने करणे, तसेच धर्माने व समग्र संघाने करणे हे दोन विधी मिळून तस्सपापियसिक कर्माचे पाच विधी (अंगे) होतात. यातील उर्वरित भाग तज्जनीय कर्मादींमध्ये सांगितल्याप्रमाणेच आहे. येथे हा शब्दार्थ आहे - कारण जो पाप वाढल्यामुळे अत्यंत पापी असलेला व्यक्ती आहे, त्याच्यावर हे कर्म करायचे असल्यामुळे याला “तस्सपापियसिक कर्म” असे म्हणतात. ตสฺสปาปิยสิกากถา นิฏฺฐิตา. तस्सपापियसिक-कथा समाप्त झाली. ติณวตฺถารกาทิกถา तिणवत्थारक-कथा ๒๑๒. กกฺขฬตฺตาย วาฬตฺตายาติ กกฺขฬภาวาย เจว วาฬภาวาย จ. เภทายาติ สงฺฆเภทาย. สพฺเพเหว เอกชฺฌนฺติ กสฺสจิ ฉนฺทํ อนาหริตฺวา คิลาเนปิ ตตฺเถว อาเนตฺวา เอกโต สนฺนิปติตพฺพํ. ติณวตฺถารเกน วูปสเมยฺยาติ เอตฺถ อิทํ กมฺมํ ติณวตฺถารกสทิสตฺตา ‘‘ติณวตฺถารโก’’ติ วุตฺตํ. ยถา หิ คูถํ วา มุตฺตํ วา ฆฏฺฏิยมานํ ทุคฺคนฺธตาย พาธติ, ติเณหิ อวตฺถริตฺวา สุปฺปฏิจฺฉาทิตสฺส ปนสฺส โส คนฺโธ น พาธติ; เอวเมว ยํ อธิกรณํ มูลานุมูลํ คนฺตฺวา วูปสมิยมานํ กกฺขฬตฺตาย วาฬตฺตาย เภทาย สํวตฺตติ, ตํ อิมินา กมฺเมน วูปสนฺตํ คูถํ วิย ติณวตฺถารเกน ปฏิจฺฉนฺนํ สุวูปสนฺตํ โหตีติ อิทํ กมฺมํ ติณวตฺถารกสทิสตฺตา ‘‘ติณวตฺถารโก’’ติ วุตฺตํ. २१२. 'कक्खळत्ताय वाळत्ताय' म्हणजे कठोरतेसाठी आणि क्रूरतेसाठी होय. 'भेदाय' म्हणजे संघभेदासाठी होय. 'सब्बेहेव एकज्झं' म्हणजे कोणाचीही संमती (छंद) न आणता, आजारी भिक्खूंनाही तेथेच आणून सर्वांनी एकत्र जमावे. “तिणवत्थारकाने शांत करावे” यामध्ये हे कर्म तिणवत्थारक (गवताने झाकणे) सदृश असल्यामुळे याला 'तिणवत्थारक' असे म्हटले आहे. कारण जसे विष्ठा किंवा मूत्र ढवळले असता दुर्गंधीमुळे त्रास होतो, परंतु गवताने झाकून चांगल्या प्रकारे बंद केल्यास त्याचा दुर्गंध त्रास देत नाही; त्याचप्रमाणे जे अधिकरण मुळापर्यंत जाऊन शांत करण्याचा प्रयत्न केल्यास कठोरतेसाठी, क्रूरतेसाठी आणि संघभेदासाठी कारणीभूत ठरते, ते या कर्माने शांत केले असता, गवताने झाकलेल्या विष्ठेप्रमाणे चांगल्या प्रकारे शांत होते. म्हणून हे कर्म तिणवत्थारक सदृश असल्यामुळे याला 'तिणवत्थारक' असे म्हटले आहे. ๒๑๓. ถุลฺลวชฺชนฺติ ปาราชิกญฺเจว สงฺฆาทิเสสญฺจ. คิหิปฏิสํยุตฺตนฺติ คิหีนํ หีเนน ขุํสนวมฺภนธมฺมิกปฏิสฺสเวสุ อาปนฺนํ อาปตฺตึ. २१३. 'थुल्लवज्जं' म्हणजे पाराजिक आणि संघादिसेस आपत्ती होय. 'गिहिपटिसंयुत्तं' म्हणजे गृहस्थांची हीन शब्दांनी निंदा करणे, अपमान करणे आणि धार्मिक वचनांचे उल्लंघन करणे यामुळे आलेली आपत्ती होय. ๒๑๔. เอวญฺจ ปน ภิกฺขเว เต ภิกฺขู ตาหิ อาปตฺตีหิ วุฏฺฐิตา โหนฺตีติ เอวํ ติณวตฺถารกกมฺมวาจาย กตาย กมฺมวาจาปริโยสาเน ยตฺตกา ตตฺถ สนฺนิปติตา อนฺตมโส สุตฺตาปิ สมาปนฺนาปิ อญฺญวิหิตาปิ สพฺเพ เต ภิกฺขู ยาว อุปสมฺปทมณฺฑลโต ปฏฺฐาย ถุลฺลวชฺชญฺจ คิหิปฏิสํยุตฺตญฺจ ฐเปตฺวา อวเสสา อาปตฺติโย อาปนฺนา, สพฺพาหิ ตาหิ อาปตฺตีหิ วุฏฺฐิตา โหนฺติ. เย ปน ‘‘น [Pg.39] เมตํ ขมตี’’ติ อญฺญมญฺญํ ทิฏฺฐาวิกมฺมํ กโรนฺติ, เตหิ วา สทฺธึ อาปตฺตึ อาปชฺชิตฺวาปิ ตตฺถ อนาคตา, อาคนฺตฺวา วา ฉนฺทํ ทตฺวา ปริเวณาทีสุ นิสินฺนา, เต อาปตฺตีหิ น วุฏฺฐหนฺติ. เตน วุตฺตํ – ‘‘ฐเปตฺวา ทิฏฺฐาวิกมฺมํ ฐเปตฺวา เย น ตตฺถ โหนฺตี’’ติ. २१४. “आणि अशा प्रकारे, भिक्खूंनो, ते भिक्खू त्या आपत्तींमधून मुक्त होतात” म्हणजे अशा प्रकारे तिणवत्थारक कम्मवाचा केल्यावर, कम्मवाचेच्या शेवटी जेवढे भिक्खू तेथे उपस्थित होते, अगदी झोपलेले, समाधीत असलेले किंवा इतर कामात व्यस्त असलेले सुद्धा, ते सर्व भिक्खू उपसंपदा मंडालापासून घेऊन, स्थूल दोष (पाराजिक व संघादिसेस) आणि गृहस्थ-संबंधित आपत्ती वगळून, इतर ज्या काही आपत्तींमध्ये पडले होते, त्या सर्व आपत्तींमधून मुक्त होतात. परंतु जे “मला हे मान्य नाही” असे म्हणून परस्परांमध्ये आपले मत प्रकट करतात, किंवा ज्यांच्यासोबत आपत्तीत पडले असूनही जे तेथे आले नाहीत, किंवा येऊन संमती देऊन विहाराच्या आवारात बसून राहिले, ते त्या आपत्तींमधून मुक्त होत नाहीत. म्हणूनच म्हटले आहे - “मत प्रकट करणारे वगळून आणि जे तेथे उपस्थित नव्हते त्यांना वगळून.” ติณวตฺถารกาทิกถา นิฏฺฐิตา. तिणवत्थारक-कथा समाप्त झाली. อธิกรณกถา अधिकरण-कथा ๒๑๕. ภิกฺขุนีนํ อนุปขชฺชาติ ภิกฺขุนีนํ อนฺโต ปวิสิตฺวา. วิวาทาธิกรณาทีนํ วจนตฺโถ ทุฏฺฐโทสวณฺณนายํ วุตฺโตเยว. วิปจฺจตาย โวหาโรติ จิตฺตทุกฺขตฺถํ โวหาโร; ผรุสวจนนฺติ อตฺโถ. โย ตตฺถ อนุวาโทติ โย เตสุ อนุวทนฺเตสุ อุปวาโท. อนุวทนาติ อาการนิทสฺสนเมตํ; อุปวทนาติ อตฺโถ. อนุลฺลปนา อนุภณนาติ อุภยํ อนุวทนเววจนมตฺตเมว. อนุสมฺปวงฺกตาติ ปุนปฺปุนํ กายจิตฺตวาจาหิ ตตฺเถว สมฺปวงฺกตา; อนุวทนภาโวติ อตฺโถ. อพฺภุสฺสหนตาติ ‘‘กสฺมา เอวํ น อุปวทิสฺสามิ, อุปวทิสฺสามิเยวา’’ติ อุสฺสาหํ กตฺวา อนุวทนา. อนุพลปฺปทานนฺติ ปุริมวจนสฺส การณํ ทสฺเสตฺวา ปจฺฉิมวจเนน พลปฺปทานํ. २१५. 'भिक्खुनीनं अनुपहज्ज' म्हणजे भिक्खुणींच्या मध्ये प्रवेश करून होय. विवादाधिकरण इत्यादी शब्दांचा अर्थ 'दुट्ठदोस' च्या वर्णनात सांगितलाच आहे. 'विपच्चताय वोहारो' म्हणजे मनाला दुःख देण्यासाठी केलेले बोलणे; याचा अर्थ कठोर वचन असा आहे. 'यो तत्थ अनुवादो' म्हणजे त्या आरोप करणाऱ्यांमध्ये जो आरोप आहे. 'अनुवदना' हे आरोप करण्याच्या पद्धतीचे दर्शक आहे; याचा अर्थ आरोप करणे असा आहे. 'अनुल्लपना अनुभणना' हे दोन्ही शब्द 'अनुवदन' चे केवळ समानार्थी शब्द आहेत. 'अनुसम्पवङ्कता' म्हणजे वारंवार काय, चित्त आणि वाणीने त्याच आरोपाकडे झुकणे; याचा अर्थ आरोप करणाऱ्याचा भाव असा आहे. 'अब्भुस्सहनता' म्हणजे “मी असा आरोप का करणार नाही? मी आरोप करणारच!” असा उत्साह दाखवून आरोप करणे होय. 'अनुबलप्पदानं' म्हणजे पहिल्या वचनाचे कारण दाखवून नंतरच्या वचनाने त्याला बळ देणे होय. กิจฺจยตา กรณียตาติ เอตฺถ กิจฺจเมว กิจฺจยํ, กิจฺจยสฺส ภาโว กิจฺจยตา, กรณียสฺส ภาโว กรณียตา; อุภยมฺเปตํ สงฺฆกมฺมสฺเสว อธิวจนํ. อปโลกนกมฺมนฺติอาทิ ปน ตสฺเสว ปเภทวจนํ. ตตฺถ อปโลกนกมฺมํ นาม สีมฏฺฐกสงฺฆํ โสเธตฺวา ฉนฺทารหานํ ฉนฺทํ อาหริตฺวา สมคฺคสฺส สงฺฆสฺส อนุมติยา ติกฺขตฺตุํ สาเวตฺวา กตฺตพฺพกมฺมํ. ญตฺติกมฺมํ นาม วุตฺตนเยเนว สมคฺคสฺส สงฺฆสฺส อนุมติยา เอกาย ญตฺติยา กตฺตพฺพกมฺมํ. ญตฺติทุติยกมฺมํ นาม วุตฺตนเยเนว สมคฺคสฺส สงฺฆสฺส อนุมติยา เอกาย ญตฺติยา เอกาย จ อนุสฺสาวนายาติ เอวํ ญตฺติทุติยาย อนุสฺสาวนาย กตฺตพฺพกมฺมํ. ญตฺติจตุตฺถกมฺมํ นาม วุตฺตนเยเนว สมคฺคสฺส สงฺฆสฺส อนุมติยา เอกาย ญตฺติยา ตีหิ จ อนุสฺสาวนาหีติ เอวํ ญตฺติจตุตฺถาหิ ตีหิ อนุสฺสาวนาหิ กตฺตพฺพกมฺมํ. किच्चायता करणीयता या वाक्यात कर्तव्य (किच्च) हेच 'किच्चय' होय. किच्चयाचा भाव (अस्तित्व किंवा कृती) म्हणजे 'किच्चायता' होय. करणीयाचा (करण्यायोग्य गोष्टीचा) भाव म्हणजे 'करणीयता' होय. हे दोन्ही शब्द 'संघकर्मा'चेच समानार्थी (अधिवचन) आहेत. परंतु 'अपलोकनकर्म' इत्यादी शब्द त्याचेच (संघकर्माचेच) भेद दर्शवणारे शब्द आहेत. त्यापैकी, 'अपलोकनकर्म' म्हणजे सीमेत उपस्थित असलेल्या संघाचे शोधन करून (पात्र नसलेल्यांना वगळून), संमती देण्यास पात्र असलेल्या भिक्खूंची संमती (छंद) आणून, समग्र संघाच्या अनुमतीने तीन वेळा घोषित करून करावयाचे कर्म होय. 'ज्ञत्तिकर्म' म्हणजे पूर्वोक्त पद्धतीनेच समग्र संघाच्या अनुमतीने एका ज्ञत्तीद्वारे (प्रस्तावाद्वारे) करावयाचे कर्म होय. 'ज्ञत्तिदुतीयकर्म' म्हणजे पूर्वोक्त पद्धतीनेच समग्र संघाच्या अनुमतीने एका ज्ञत्तीने आणि एका अनुसावनेने (घोषणा/कम्मवाचेने), अशा प्रकारे ज्ञत्तिदुतीय अनुसावनेने करावयाचे कर्म होय. 'ज्ञत्तिचतुत्थकर्म' म्हणजे पूर्वोक्त पद्धतीनेच समग्र संघाच्या अनुमतीने एका ज्ञत्तीने आणि तीन अनुसावनांनी, अशा प्रकारे ज्ञत्तिचतुत्थ तीन अनुसावनांनी करावयाचे कर्म होय. ตตฺถ อปโลกนกมฺมํ อปโลเกตฺวาว กาตพฺพํ, ญตฺติกมฺมาทิวเสน น กาตพฺพํ. ญตฺติกมฺมมฺปิ เอกํ ญตฺตึ ฐเปตฺวาว กาตพฺพํ, อปโลกนกมฺมาทิวเสน น กาตพฺพํ. ญตฺติทุติยกมฺมํ ปน อปโลเกตฺวา กตฺตพฺพมฺปิ อตฺถิ, อกตฺตพฺพมฺปิ อตฺถิ. ตตฺถ สีมาสมฺมุติ สีมาสมูหนนํ กถินทานํ กถินุพฺภาโร [Pg.40] กุฏิวตฺถุเทสนา วิหารวตฺถุเทสนาติ อิมานิ ฉ กมฺมานิ ครุกานิ, อปโลเกตฺวา กาตุํ น วฏฺฏนฺติ. ญตฺติทุติยกมฺมวาจํ สาเวตฺวาว กาตพฺพานิ. อวเสสา เตรส สมฺมุติโย เสนาสนคฺคาหกมตกจีวรทานาทิสมฺมุติโย จาติ เอวรูปานิ ลหุกกมฺมานิ อปโลเกตฺวาปิ กาตุํ วฏฺฏนฺติ. ญตฺติกมฺมญตฺติจตุตฺถกมฺมวเสน ปน น กาตพฺพเมว. ญตฺติจตุตฺถกมฺมํ ญตฺติญฺจ ติสฺโส จ กมฺมวาจาโย สาเวตฺวาว กาตพฺพํ, อปโลกนกมฺมาทิวเสน น กาตพฺพนฺติ อยเมตฺถ สงฺเขโป. त्यापैकी, अपलोकनकर्म हे केवळ अपलोकन (परवानगी विचारून/घोषणा करून) करूनच केले पाहिजे, ज्ञत्तिकर्म इत्यादींच्या पद्धतीने करू नये. ज्ञत्तिकर्म देखील केवळ एक ज्ञत्ती (प्रस्ताव) ठेवूनच केले पाहिजे, अपलोकनकर्म इत्यादींच्या पद्धतीने करू नये. परंतु ज्ञत्तिदुतीयकर्म हे अपलोकन करून करण्याजोगे देखील असते आणि न करण्याजोगे देखील असते. त्यामध्ये, सीमासंमूर्ती (सीमा निश्चित करणे), सीमासमूहनन (सीमा रद्द करणे), कठीणदान (कठीण चिवर दान करणे), कठीणउद्धार (कठीण चिवर मर्यादा समाप्त करणे), कुटीवत्थुदेसना (कुटीसाठी जागा निश्चित करणे), विहारवत्थुदेसना (विहारासाठी जागा निश्चित करणे) - ही सहा कर्मे गुरु (महत्त्वाची/मोठी) असल्याने केवळ अपलोकन करून करणे योग्य नाही. ती ज्ञत्तिदुतीय कम्मवाचा ऐकवूनच (घोषित करूनच) केली पाहिजेत. उर्वरित तेरा संमती (संमूर्ती), जसे की सेनासनग्गाहक (शयनगृह वाटप करणारा), मृतकचिवरदान (मृत भिक्खूचे चिवर वाटप करणे) इत्यादी संमूर्ती, अशी लघु कर्मे केवळ अपलोकन करूनही करणे योग्य आहे. परंतु ती ज्ञत्तिकर्म किंवा ज्ञत्तिचतुत्थकर्माच्या पद्धतीने करू नयेत. ज्ञत्तिचतुत्थकर्म हे एक ज्ञत्ती आणि तीन कम्मवाचा ऐकवूनच केले पाहिजे, अपलोकनकर्म इत्यादींच्या पद्धतीने करू नये. हा येथे संक्षेप (थोडक्यात सारांश) आहे. วิตฺถารโต ปน อิมานิ จตฺตาริ กมฺมานิ ‘‘กติหากาเรหิ วิปชฺชนฺตี’’ติอาทินา นเยน ปริวาราวสาเน กมฺมวคฺเค เอเตสํ วินิจฺฉโย อาคโตเยว. ยํ ปน ตตฺถ อนุตฺตานํ, ตํ กมฺมวคฺเคเยว วณฺณยิสฺสาม. เอวญฺหิ สติ น อฏฺฐาเน วณฺณนา ภวิสฺสติ, อาทิโต ปฏฺฐาย จ ตสฺส ตสฺส กมฺมสฺส วิญฺญาตตฺตา สุวิญฺเญยฺโย ภวิสฺสติ. सविस्तरपणे तर, ही चार कर्मे "किती प्रकारांनी अयशस्वी होतात" (कतीहाकारेहि विपज्जन्ति) इत्यादी पद्धतीने परिवार पाठाच्या शेवटी असलेल्या 'कम्मवग्ग' मध्ये या कर्मांचा निर्णय आलेलाच आहे. परंतु जेथे काही स्पष्ट नसेल, त्याचे स्पष्टीकरण आम्ही कम्मवग्गातच करू. कारण असे केल्याने अयोग्य ठिकाणी स्पष्टीकरण होणार नाही, आणि सुरुवातीपासूनच त्या त्या कर्माचे स्वरूप समजल्यामुळे ते सहज आकलन होईल. ๒๑๖. วิวาทาธิกรณสฺส กึ มูลนฺติอาทีนิ ปาฬิวเสเนว เวทิตพฺพานิ. २१६. "विवादाधिकरणाचे मूळ काय आहे?" इत्यादी गोष्टी पाळी (मूळ मजकूर) नुसारच समजून घ्याव्यात. ๒๒๐. ‘‘วิวาทาธิกรณํ สิยา กุสล’’นฺติอาทีสุ เยน วิวทนฺติ, โส จิตฺตุปฺปาโท วิวาโท, สมเถหิ จ อธิกรณียตาย อธิกรณนฺติ เอวมาทินา นเยน อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. २२०. "विवादाधिकरण हे कुशल असू शकते" इत्यादी वाक्यांमध्ये, ज्या चित्तोत्पादाने (विचाराने) वाद घालतात, तो चित्तोत्पाद म्हणजे 'विवाद' होय. आणि समथांद्वारे शांत केले जाण्याच्या योग्यतेमुळे त्याला 'अधिकरण' म्हणतात. अशा प्रकारे याचा अर्थ समजून घ्यावा. ๒๒๒. อาปตฺตาธิกรณํ สิยา อกุสลํ สิยา อพฺยากตํ, นตฺถิ อาปตฺตาธิกรณํ กุสลนฺติ เอตฺถ สนฺธาย ภาสิตวเสน อตฺโถ เวทิตพฺโพ. ยสฺมิญฺหิ ปถวิขณนาทิเก อาปตฺตาธิกรเณ กุสลจิตฺตํ องฺคํ โหติ, ตสฺมึ สติ น สกฺกา วตฺตุํ ‘‘นตฺถิ อาปตฺตาธิกรณํ กุสล’’นฺติ, ตสฺมา นยิทํ องฺคปฺปโหนกจิตฺตํ สนฺธาย วุตฺตํ. อิทํ ปน สนฺธาย วุตฺตํ. ยํ ตาว อาปตฺตาธิกรณํ โลกวชฺชํ, ตํ เอกนฺตโต อกุสลเมว, ตตฺถ ‘‘สิยา อกุสล’’นฺติ วิกปฺโป นตฺถิ. ยํ ปน ปณฺณตฺติวชฺชํ, ตํ ยสฺมา สญฺจิจฺจ ‘‘อิมํ อาปตฺตึ วีติกฺกมามี’’ติ วีติกฺกมนฺตสฺเสว อกุสลํ โหติ, อสญฺจิจฺจ ปน กิญฺจิ อชานนฺตสฺส สหเสยฺยาทิวเสน อาปชฺชโต อพฺยากตํ โหติ, ตสฺมา ตตฺถ สญฺจิจฺจาสญฺจิจฺจวเสน อิมํ วิกปฺปภาวํ [Pg.41] สนฺธาย อิทํ วุตฺตํ – ‘‘อาปตฺตาธิกรณํ สิยา อกุสลํ, สิยา อพฺยากตํ, นตฺถิ อาปตฺตาธิกรณํ กุสล’’นฺติ. २२२. "आपत्ती-अधिकरण हे अकुशल असू शकते, अव्याकृत असू शकते, परंतु आपत्ती-अधिकरण कुशल असू शकत नाही" या वाक्यात अभिप्रेत असलेल्या अर्थानुसार (संधाय भासित) अर्थ समजून घ्यावा. कारण ज्या जमीन खणणे इत्यादी आपत्ती-अधिकरणात कुशल चित्त हे अंग (कारण) असते, ते अस्तित्वात असताना "आपत्ती-अधिकरण कुशल नसते" असे म्हणता येत नाही. म्हणून, हे विधान केवळ अंगाला पूरक असलेल्या चित्ताला उद्देशून केलेले नाही. तर हे पुढील गोष्टीला उद्देशून म्हटले आहे: जे आपत्ती-अधिकरण 'लोकवज्ज' (लोकापवादात्मक/नैसर्गिक पाप) आहे, ते पूर्णपणे अकुशलच असते; त्यात "अकुशल असू शकते" असा कोणताही संशय (विकल्प) नाही. परंतु जे 'पण्णत्तिवज्ज' (प्रज्ञप्ती-उल्लंघन/नियमभंग) आहे, ते जाणूनबुजून (सञ्चिच्च) "मी या आपत्तीचे उल्लंघन करतो" असे म्हणून उल्लंघन करणाऱ्याचेच अकुशल होते. पण नकळत, काहीही माहिती नसताना, सहशय्या (एकत्र झोपणे) इत्यादींमुळे आपत्ती ओढवून घेणाऱ्याचे ते अव्याकृत (तटस्थ) असते. म्हणून, तेथे जाणूनबुजून किंवा नकळत केलेल्या उल्लंघनाच्या आधारे या विकल्पाचा विचार करून असे म्हटले आहे की - "आपत्ती-अधिकरण अकुशल असू शकते, अव्याकृत असू शकते, परंतु आपत्ती-अधिकरण कुशल असू शकत नाही." สเจ ปน ‘‘ยํ กุสลจิตฺโต อาปชฺชติ, อิทํ วุจฺจติ อาปตฺตาธิกรณํ กุสล’’นฺติ วเทยฺย, อจิตฺตกานํ ปน เอฬกโลมปทโสธมฺมาทิสมุฏฺฐานานมฺปิ กุสลจิตฺตํ อาปชฺเชยฺย, น จ ตตฺถ วิชฺชมานมฺปิ กุสลจิตฺตํ อาปตฺติยา องฺคํ. กายวจีวิญฺญตฺติวเสน ปน จลิตปฺปวตฺตานํ กายวาจานํ อญฺญตรเมว องฺคํ, ตญฺจ รูปกฺขนฺธปริยาปนฺนตฺตา อพฺยากตนฺติ. जर कोणी असे म्हटले की, "कुशल चित्त असताना जी आपत्ती ओढवते, त्याला कुशल आपत्ती-अधिकरण म्हणतात," तर अचित्तक (चित्त नसलेल्या) अशा एळकलोम (मेंढीचे केस) किंवा पदसोधम्म (पठण नियम) इत्यादी समुत्थानांमध्ये देखील कुशल चित्त प्राप्त होईल. परंतु तेथे उपस्थित असलेले कुशल चित्त हे आपत्तीचे अंग (कारण) नसते. तर कायविज्ञप्ती आणि वचीविज्ञप्तीद्वारे प्रवृत्त होणाऱ्या काया आणि वाचेपैकी एकच त्याचे अंग असते. आणि ते रूपस्कंधात समाविष्ट असल्यामुळे अव्याकृत असते, असे समजावे. ยํ ชานนฺโตติอาทิมฺหิ ปน อยมตฺโถ – ยํ จิตฺตํ อาปตฺติยา องฺคํ โหติ, เตน วตฺถุํ ชานนฺโต ‘‘อิทํ วีติกฺกมามี’’ติ จ วีติกฺกมากาเรน สทฺธึ ชานนฺโต สญฺชานนฺโต วีติกฺกมเจตนาวเสน เจเตตฺวา ปกปฺเปตฺวา อุปกฺกมวเสน มทฺทนฺโต อภิวิตริตฺวา นิราสงฺกจิตฺตํ เปเสตฺวา ยํ อาปตฺตาธิกรณํ วีติกฺกมํ อาปชฺชติ, ตสฺส เอวํ วีติกฺกมโต โย วีติกฺกโม, อิทํ วุจฺจติ ‘‘อาปตฺตาธิกรณํ อกุสล’’นฺติ. "जे जाणत असताना" (यं जानन्तो) इत्यादी वाक्यांचा अर्थ असा आहे - जे चित्त आपत्तीचे अंग असते, त्या चित्ताने वस्तू (विषय) जाणत, "मी याचे उल्लंघन करत आहे" अशा उल्लंघनाच्या स्वरूपासह जाणत आणि पूर्णपणे ओळखत (संजानंत), उल्लंघनाच्या चेतनेने विचार करून व योजना करून, उपक्रमाच्या (प्रयत्नाच्या) बळाने दडपून आणि अतिक्रमण करून, शंकारहित (निर्भय) चित्त प्रवृत्त करून, ज्या आपत्ती-अधिकरणाचे उल्लंघन करतो, अशा प्रकारे उल्लंघन करणाऱ्याचा जो अतिरेक (उल्लंघन) होतो, त्याला "अकुशल आपत्ती-अधिकरण" असे म्हणतात. อพฺยากตวาเรปิ ยํ จิตฺตํ อาปตฺติยา องฺคํ โหติ, ตสฺส อภาเวน อชานนฺโต วีติกฺกมากาเรน จ สทฺธึ อชานนฺโต อสญฺชานนฺโต อาปตฺติองฺคภูตาย วีติกฺกมเจตนาย อภาเวน อเจเตตฺวา สญฺจิจฺจ มทฺทนสฺส อภาเวน อนภิวิตริตฺวา นิราสงฺกจิตฺตํ อเปเสตฺวา ยํ อาปตฺตาธิกรณํ วีติกฺกมํ อาปชฺชติ, ตสฺส เอวํ วีติกฺกมโต โย วีติกฺกโม, อิทํ วุจฺจติ ‘‘อาปตฺตาธิกรณํ อพฺยากต’’นฺติ. अव्याकृत वारात देखील, जे चित्त आपत्तीचे अंग असते, त्याच्या अभावामुळे न जाणता, आणि उल्लंघनाच्या स्वरूपासह न जाणता व न ओळखता, आपत्तीचे अंग असलेल्या उल्लंघन-चेतनेच्या अभावामुळे विचार न करता, जाणूनबुजून दडपून टाकण्याचा अभाव असल्यामुळे अतिक्रमण न करता, शंकारहित चित्त प्रवृत्त न करता, ज्या आपत्ती-अधिकरणाचे उल्लंघन करतो, अशा प्रकारे उल्लंघन करणाऱ्याचा जो अतिरेक (उल्लंघन) होतो, त्याला "अव्याकृत आपत्ती-अधिकरण" असे म्हणतात. हा याचा अर्थ आहे. ๒๒๔. อยํ วิวาโท โน อธิกรณนฺติอาทีสุ สมเถหิ อธิกรณียตาย อภาวโต โนอธิกรณนฺติ เอวมตฺโถ เวทิตพฺโพ. २२४. "हा विवाद आहे, अधिकरण नाही" इत्यादी वाक्यांमध्ये, समथांद्वारे शांत केले जाण्याच्या अभावामुळे ते 'अधिकरण' नाही, असा अर्थ समजून घ्यावा. อธิกรณกถา นิฏฺฐิตา. अधिकरणकथा समाप्त झाली. อธิกรณวูปสมนสมถกถา अधिकरण शांत करणाऱ्या समथांची कथा. ๒๒๘. ยาวติกา จ ภิกฺขู กมฺมปฺปตฺตาติ เอตฺถ จตุวคฺคกรเณ กมฺเม จตฺตาโร, ปญฺจวคฺคกรเณ ปญฺจ, ทสวคฺคกรเณ ทส, วีสติวคฺคกรเณ วีสติ ภิกฺขู กมฺมปฺปตฺตาติ เวทิตพฺพา. २२८. "जितके भिक्खू कर्माला प्राप्त आहेत" (यावतिका च भिक्खू कम्मप्पत्ता) या वाक्यात, चतुर्वर्ग (चार भिक्खूंच्या समूहाने) करावयाच्या कर्मात चार भिक्खू, पंचवर्ग कर्मात पाच भिक्खू, दशवर्ग कर्मात दहा भिक्खू, आणि विंशतिवर्ग (वीस भिक्खूंच्या समूहाने) करावयाच्या कर्मात वीस भिक्खू 'कम्मप्पत्त' (कर्म करण्यास पात्र/उपस्थित) समजावेत. ๒๓๐. สุปริคฺคหิตนฺติ [Pg.42] สุฏฺฐุ ปริคฺคหิตํ กตฺวา สมฺปฏิจฺฉิตพฺพํ. สมฺปฏิจฺฉิตฺวา จ ปน ‘‘อชฺช ภณฺฑกํ โธวาม, อชฺช ปตฺตํ ปจาม, อชฺเชโก ปลิโพโธ อตฺถี’’ติ มานนิคฺคหตฺถาย กติปาหํ อติกฺกาเมตพฺพํ. २३०. 'सुपरिग्गहितं' म्हणजे चांगल्या प्रकारे निश्चित करून स्वीकारले पाहिजे. आणि स्वीकारल्यानंतर, "आज आपण भांडी (वस्तू) धुवूया, आज आपण पात्र भाजूया, आज एक अडथळा (पलिबोध) आहे" असे म्हणून, (अधिकरण करणाऱ्यांच्या) मानाचे दमन करण्यासाठी काही दिवस पुढे ढकलले पाहिजे (विलंब केला पाहिजे). ๒๓๑. อนนฺตานิ เจว ภสฺสานิ ชายนฺตีติ อปริมาณานิ อิโต จิโต จ วจนานิ อุปฺปชฺชนฺติ. ‘‘ภาสานี’’ติปิ ปาโฐ, อยเมวตฺโถ. อุพฺพาหิกาย สมฺมนฺนิตพฺโพติ อปโลเกตฺวา วา สมฺมนฺนิตพฺโพ ปรโต วุตฺตาย ญตฺติทุติยาย วา กมฺมวาจาย. เอวํ สมฺมเตหิ ปน ภิกฺขูหิ วิสุํ วา นิสีทิตฺวา ตสฺสาเยว วา ปริสาย ‘‘อญฺเญหิ อสมฺมเตหิ น กิญฺจิ กเถตพฺพ’’นฺติ สาเวตฺวา ตํ อธิกรณํ วินิจฺฉิตพฺพํ. २३१. अमर्याद भाषणे उत्पन्न होतात म्हणजे याच्याकडून आणि त्याच्याकडून असंख्य शब्द (किंवा बोलणे) उत्पन्न होतात. 'भासानि' असाही पाठ आहे, त्याचा हाच अर्थ आहे. 'उब्बाहिकाय संमन्नितब्बो' (उब्बाहिकेसाठी संमत केले पाहिजे) म्हणजे विचारून (परवानगी घेऊन) किंवा नंतर सांगितलेल्या ज्ञत्तिदुतीय कम्मवाचेद्वारे संमत केले पाहिजे. परंतु, अशा प्रकारे संमत केलेल्या भिक्खूंनी वेगळे बसून किंवा त्याच परिषदेत 'इतर असंमत भिक्खूंनी काहीही बोलू नये' असे जाहीर करून त्या अधिकरणाचा निर्णय केला पाहिजे. ๒๓๓. ตตฺราสฺสาติ ตสฺสํ ปริสติ ภเวยฺย. เนว สุตฺตํ อาคตนฺติ น มาติกา อาคตา. โน สุตฺตวิภงฺโคติ วินโยปิ น ปคุโณ. พฺยญฺชนจฺฉายาย อตฺถํ ปฏิพาหตีติ พฺยญฺชนมตฺตเมว คเหตฺวา อตฺถํ ปฏิเสเธติ. ชาตรูปรชตเขตฺตวตฺถุปฏิคฺคหณาทีสุ วินยธเรหิ ภิกฺขูหิ อาปตฺติยา การิยมาเน ทิสฺวา ‘‘กึ อิเม อาปตฺติยา กาเรถ, ‘นนุ ชาตรูปรชตปฏิคฺคหณา ปฏิวิรโต โหตี’ติ เอวํ สุตฺเต ปฏิวิรติมตฺตเมว วุตฺตํ, นตฺถิ เอตฺถ อาปตฺตี’’ติ วทติ. อปโร ธมฺมกถิโก สุตฺตสฺส อาคตตฺตา โอลมฺเพตฺวา นิวาเสนฺตานํ อาปตฺติยา อาโรปิยมานาย ‘‘กึ อิเมสํ อาปตฺตึ โรเปถ, ‘นนุ ปริมณฺฑลํ นิวาเสสฺสามีติ สิกฺขา กรณียา’ติ เอวํ สิกฺขากรณมตฺตเมเวตฺถ วุตฺตํ, นตฺถิ เอตฺถ อาปตฺตี’’ติ วทติ. २३३. 'तत्रास्स' म्हणजे त्या परिषदेत असावे. 'नेव सुत्तं आगतं' म्हणजे मातिका मुखोद्गत नाही. 'नो सुत्तविभङ्गो' म्हणजे विनयही चांगला अभ्यासलेला नाही. 'व्यंजनच्छायेने अर्थाचा निषेध करतो' म्हणजे केवळ शब्दाचाच आधार घेऊन अर्थाचा निषेध करतो. सोने, चांदी, शेत, जमीन इत्यादी स्वीकारण्याच्या बाबतीत विनयधर भिक्खूंनी आपत्ती लागू करताना पाहून, 'हे भिक्खू का आपत्ती लागू करत आहेत? सुत्तात तर 'सोने-चांदी स्वीकारण्यापासून विरत राहतो' असे केवळ विरतीचेच वर्णन केले आहे ना? येथे कोणतीही आपत्ती नाही,' असे तो म्हणतो. दुसरा धम्मकथिका, सुत्त मुखोद्गत असल्यामुळे, वस्त्र लोळवून नेसणाऱ्या भिक्खूंवर आपत्ती लादली जात असताना म्हणतो, 'यांच्यावर का आपत्ती लादता? 'भोवताली व्यवस्थित नेसेन अशी शिक्षा करावी' असे येथे केवळ शिक्षेचाच (अभ्यासाचाच) उल्लेख आहे ना? येथे कोणतीही आपत्ती नाही.' ๒๓๔. ยถา พหุตรา ภิกฺขูติ เอตฺถ เอเกนปิ อธิกา พหุตราว โก ปน วาโท ทฺวีหิ ตีหีติ. २३४. 'यथा बहुतरा भिक्खू' यामध्ये एका भिक्खूने जरी जास्त असले तरी ते बहुसंख्याकच आहेत; मग दोन किंवा तीन भिक्खूंनी जास्त असण्याबद्दल तर काय सांगावे! อธิกรณวูปสมนสมถกถา นิฏฺฐิตา. अधिकरण शांत करण्याची समथकथा समाप्त झाली. ติวิธสลากคฺคาหกถา त्रिविध शलाका ग्रहण कथा ๒๓๕. สญฺญตฺติยาติ สญฺญาปนตฺถาย. คูฬฺหกนฺติอาทีสุ อลชฺชุสฺสนฺนาย ปริสาย คูฬฺหโก สลากคฺคาโห กาตพฺโพ, ลชฺชุสฺสนฺนาย ปริสาย วิวฏโก, พาลุสฺสนฺนาย สกณฺณชปฺปโก. วณฺณาวณฺณาโย กตฺวาติ ธมฺมวาทีนญฺจ อธมฺมวาทีนญฺจ สลากาโย นิมิตฺตสญฺญํ อาโรเปตฺวา อญฺญมญฺญํ วิสภาคา กาตพฺพา. ตโต ตา สพฺพาปิ จีวรโภเค [Pg.43] กตฺวา วุตฺตนเยน คาเหตพฺพา. ทุคฺคโหติ ปจฺจุกฺกฑฺฒิตพฺพนฺติ ‘‘ทุคฺคหิตา สลากาโย’’ติ วตฺวา ปุน คเหตฺวา ยาวตติยํ คาเหตพฺพา. สุคฺคโหติ สาเวตพฺพนฺติ เอกสฺมิมฺปิ ธมฺมวาทิมฺหิ อติเรกชาเต ‘‘สุคฺคหิตา สลากาโย’’ติ สาเวตพฺพํ. ยถา จ เต ธมฺมวาทิโน วทนฺติ ตถา ตํ อธิกรณํ วูปสเมตพฺพนฺติ. อถ ยาวตติยมฺปิ อธมฺมวาทิโนว พหุตรา โหนฺติ, อชฺช ‘‘อกาโล, สฺเว ชานิสฺสามา’’ติ วุฏฺฐหิตฺวา อลชฺชีนํ ปกฺขเภทตฺถาย ธมฺมวาทิปกฺขํ ปริเยสิตฺวา ปุนทิวเส สลากคฺคาโห กาตพฺโพ. อยํ คูฬฺหโก สลากคฺคาโห. २३५. 'सञ्ञत्तिया' म्हणजे समजावण्यासाठी. 'गुळ्हक' इत्यादी शब्दांमध्ये—अलज्जींची (निर्लज्जांची) बहुसंख्या असलेल्या परिषदेत गुप्त शलाका ग्रहण (गुळ्हक शलाकाग्गाह) करावे; लज्जींची बहुसंख्या असलेल्या परिषदेत उघड शलाका ग्रहण (विवटक) करावे; आणि मूर्खांची बहुसंख्या असलेल्या परिषदेत कानात सांगून शलाका ग्रहण (सकण्णजप्पक) करावे. 'वण्णावण्णayो कत्वा' म्हणजे धम्मवादी आणि अधम्मवादी यांच्या शलाकांवर विशिष्ट चिन्ह ठेवून त्या एकमेकांपासून भिन्न कराव्यात. त्यानंतर त्या सर्व शलाका चीवराच्या घडीत ठेवून सांगितलेल्या पद्धतीने ग्रहण कराव्यात. 'दुग्गहो' म्हणजे परत घेणे—'शलाका चुकीच्या पद्धतीने घेतल्या गेल्या आहेत' असे सांगून, त्या परत घेऊन तीन वेळा होईपर्यंत पुन्हा ग्रहण कराव्यात. 'सुग्गहो' म्हणजे जाहीर करणे—एक जरी धम्मवादी अधिक झाला तरी 'शलाका योग्य प्रकारे घेतल्या गेल्या आहेत' असे जाहीर करावे. आणि जसे ते धम्मवादी म्हणतात, त्याप्रमाणे त्या अधिकरणाचे शमन करावे. परंतु, जर तिसऱ्यांदाही अधम्मवादीच बहुसंख्य ठरले, तर 'आज वेळ नाही, उद्या पाहू' असे म्हणून उठून जावे आणि अलज्जींच्या पक्षाचा भेद करण्यासाठी धम्मवादी पक्षाचा शोध घेऊन दुसऱ्या दिवशी पुन्हा शलाका ग्रहण करावे. हे गुप्त शलाका ग्रहण होय. สกณฺณชปฺปเก ปน คหิเต วตฺตพฺโพติ เอตฺถ สเจ สงฺฆตฺเถโร อธมฺมวาทิสลากํ คณฺหาติ, โส เอวํ อวโพเธตพฺโพ – ‘‘ภนฺเต, ตุมฺเห มหลฺลกา วโยอนุปฺปตฺตา, ตุมฺหากํ เอตํ น ยุตฺตํ, อยํ ปน ธมฺมวาทิสลากา’’ติ อสฺส อิตรา สลากา ทสฺเสตพฺพา. สเจ โส ตํ คณฺหาติ, ทาตพฺพา. อถ เนว อวพุชฺฌติ, ตโต ‘‘มา กสฺสจิ อาโรเจหี’’ติ วตฺตพฺโพ. เสสํ วุตฺตนยเมว. วิวฏโก วิวฏตฺโถเยว. कानात सांगून शलाका ग्रहण करण्याच्या बाबतीत 'घेतल्यावर सांगावे' याविषयी निर्णय असा आहे—जर संघस्थवीर अधम्मवादी शलाका घेत असतील, तर त्यांना हळूच समजावून सांगावे: 'भंते, आपण वृद्ध आहात, वयोवृद्ध आहात; आपल्याला हे योग्य नाही. ही धम्मवादी शलाका आहे.' असे सांगून त्यांना दुसरी शलाका दाखवावी. जर त्यांनी ती घेतली, तर ती द्यावी. पण जर त्यांना समजलेच नाही, तर 'कोणालाही सांगू नका' असे त्यांना सांगावे. उर्वरित भाग सांगितल्याप्रमाणेच आहे. 'विवटक' (उघड शलाका ग्रहण) हा उघड अर्थाचाच आहे. ติวิธสลากคฺคาหกถา นิฏฺฐิตา. त्रिविध शलाका ग्रहण कथा समाप्त झाली. ตสฺสปาปิยสิกาวินยกถา तस्सपापिय्यसिका विनय कथा ๒๓๘. ปาราชิกสามนฺตํ วาติ เอตฺถ เมถุนธมฺเม ปาราชิกสามนฺตํ นาม ทุกฺกฏํ โหติ. อทินฺนาทานาทีสุ ถุลฺลจฺจยํ. นิพฺเพเฐนฺตนฺติ ‘‘น สรามี’’ติ วจเนน นิพฺเพฐยมานํ. อติเวเฐตีติ ‘‘อิงฺฆายสฺมา’’ติอาทิวจเนหิ อติเวฐิยติ. สรามิ โข อหํ อาวุโสติ ปาราชิกปฏิจฺฉาทนตฺถาย เอวํ ปฏิชานาติ. ปุน เตน อติเวฐิยมาโน ‘‘สรามิ โข’’ติ ปฏิญฺญํ ทตฺวา ‘‘อิทานิ มํ นาเสสฺสนฺตี’’ติ ภเยน ‘‘ทวาย เม’’ติอาทิมาห. เอตสฺส ตสฺสปาปิยสิกากมฺมํ กาตพฺพํ. สเจ สีลวา ภวิสฺสติ, วตฺตํ ปริปูเรตฺวา ปฏิปฺปสฺสทฺธึ ลภติ, โน เจ ตถา นาสิตโกว ภวิสฺสติ. เสสํ สพฺพตฺถ อุตฺตานตฺถเมวาติ. २३८. 'पाराजिकसामन्तं वा' यामध्ये मैथुनधर्माच्या बाबतीत पाराजिकाच्या जवळची आपत्ती म्हणजे 'दुक्कट' आपत्ती होय. अदिन्नादान (चोरी) इत्यादींच्या बाबतीत पाराजिकाच्या जवळची आपत्ती म्हणजे 'थुल्लच्चय' आपत्ती होय. 'निब्बेठेंतं' म्हणजे 'मला आठवत नाही' असे म्हणून स्वतःची सुटका करून घेणारा. 'अतिवेठेति' म्हणजे 'हे आयुष्यमान, आठवून पहा' इत्यादी शब्दांनी त्याला अधिकच गुंतवले जाते. 'मला आठवते आहे, आवुसो' असे तो पाराजिक आपत्ती लपवण्यासाठी कबूल करतो. पुन्हा चोदकाने त्याला अधिक गुंतवल्यावर, 'मला आठवते आहे' अशी कबुली देऊन, 'आता हे मला नष्ट करतील' या भीतीने 'मी थट्टेने केले' इत्यादी गोष्टी सांगतो. अशा भिक्खूवर 'तस्सपापिय्यसिका कम्म' केले पाहिजे. जर तो शीलवान असेल, तर तो आपले कर्तव्य पूर्ण करून त्या कर्मापासून मुक्ती मिळवतो; जर तो शीलवान नसेल, तर तो नष्ट झालेलाच राहील. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. ตสฺสปาปิยสิกาวินยกถา นิฏฺฐิตา. तस्सपापिय्यसिका विनय कथा समाप्त झाली. สมถกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. समथक्खन्धक वण्णना समाप्त झाली. ๕. ขุทฺทกวตฺถุกฺขนฺธกํ ५. खुद्दकवत्थुक्खन्धक ขุทฺทกวตฺถุกถา खुद्दकवत्थु कथा ๒๔๓. ขุทฺทกวตฺถุกฺขนฺธเก [Pg.44] – มลฺลมุฏฺฐิกาติ มุฏฺฐิกมลฺลา. คามมุทฺทวาติ ฉวิราคมณฺฑนานุยุตฺตา นาคริกมนุสฺสา. คามโมทฺทวาติปิ ปาโฐ; เอเสวตฺโถ. ถมฺเภติ นฺหานติตฺเถ นิขณิตฺวา ฐปิตตฺถมฺเภ. २४३. खुद्दकवत्थुक्खन्धकात—'मल्लमूठिका' म्हणजे मुष्टीयुद्ध करणारे मल्ल. 'गाममुद्दवा' म्हणजे त्वचेचे सौंदर्य वाढवण्याच्या आणि शृंगार करण्याच्या मागे लागलेले शहरी लोक. 'गाममोद्दवा' असाही पाठ आहे; त्याचा हाच अर्थ आहे. 'थम्भे' म्हणजे स्नानघाटावर रोवून ठेवलेल्या खांबावर. กุฏฺเฏติ อิฏฺฐกาสิลาทารุกุฏฺฏานํ อญฺญตรสฺมึ. อฏฺฏาเน นฺหายนฺตีติ เอตฺถ อฏฺฏานํ นาม รุกฺขํ ผลกํ วิย ตจฺเฉตฺวา อฏฺฐปทากาเรน ราชิโย ฉินฺทิตฺวา นฺหานติตฺเถ นิขณนฺติ, ตตฺถ จุณฺณานิ อากิริตฺวา มนุสฺสา กายํ ฆํสนฺติ. คนฺธพฺพหตฺถเกนาติ นฺหานติตฺเถ ฐปิเตน ทารุมยหตฺเถน, เตน กิร จุณฺณานิ คเหตฺวา มนุสฺสา สรีรํ ฆํสนฺติ. กุรุวินฺทกสุตฺติยาติ กุรุวินฺทกปาสาณจุณฺณานิ ลาขาย พนฺธิตฺวา กตคุฬิกกลาปโก วุจฺจติ, ตํ อุโภสุ อนฺเตสุ คเหตฺวา สรีรํ ฆํสนฺติ. วิคฺคยฺห ปริกมฺมํ การาเปนฺตีติ อญฺญมญฺญํ สรีเรน สรีรํ ฆํสนฺติ. มลฺลกํ นาม มกรทนฺตเก ฉินฺทิตฺวา มลฺลกมูลสณฺฐาเนน กตํ มลฺลกนฺติ วุจฺจติ, อิทํ คิลานสฺสาปิ น วฏฺฏติ. 'कुट्टे' म्हणजे वीट, दगड किंवा लाकडाच्या भिंतींपैकी एखाद्या भिंतीवर. 'अट्ठाने न्हायन्ति' यामध्ये 'अट्ठाण' म्हणजे लाकूड फळीसारखे तासून, त्यावर बुद्धिबळाच्या पटासारखे आठ कप्पे कोरून ते स्नानघाटावर रोवून ठेवतात; त्यावर चूर्ण पसरवून लोक आपले शरीर घासतात. 'गन्धब्बहत्थकेन' म्हणजे स्नानघाटावर ठेवलेल्या लाकडी हाताने; त्या लाकडी हाताने चूर्ण घेऊन लोक आपले शरीर घासतात. 'कुरुविन्दकसुत्तिया' म्हणजे कुरुविंदक दगडाचे चूर्ण लाखेने एकत्र करून बनवलेल्या लहान गोळ्यांचा समूह होय; तो दोन्ही टोकांना धरून शरीर घासतात. 'विग्गय्ह परिकम्मं कारापेन्ति' म्हणजे एकमेकांच्या शरीराने शरीर घासतात. 'मल्लक' म्हणजे मगरीच्या दातांसारखे कोरीव काम करून थुंकपात्राच्या तळाच्या आकाराचे बनवलेले वर्तुळ; याला मल्लक म्हणतात. हे आजारी भिक्खूलाही अयोग्य आहे. ๒๔๔. อกตมลฺลกํ นาม ทนฺเต อจฺฉินฺทิตฺวา กตํ, อิทํ อคิลานสฺเสว น วฏฺฏติ; อิฏฺฐกาขณฺฑํ ปน กปาลขณฺฑํ วา วฏฺฏติ. อุกฺกาสิกนฺติ วตฺถวฏฺฏึ; ตสฺมา นฺหายนฺตสฺส ยสฺส กสฺสจิ นฺหานสาฏกวฏฺฏิยา ปิฏฺฐึ ฆํสิตุํ วฏฺฏติ. ปุถุปาณิกนฺติ หตฺถปริกมฺมํ วุจฺจติ, ตสฺมา สพฺเพสํ หตฺเถน ปิฏฺฐิปริกมฺมํ กาตุํ วฏฺฏติ. २४४. 'अकतमल्लक' म्हणजे मगरीचे दात न कोरता बनवलेले वर्तुळ; हे केवळ निरोगी भिक्खूला अयोग्य आहे (आजारी भिक्खूला चालू शकते). परंतु विटेचा तुकडा किंवा खापराचा तुकडा वापरणे योग्य आहे. 'उक्कासिक' म्हणजे कपड्याची गुंडाळी; त्यामुळे स्नान करणाऱ्या कोणत्याही भिक्खूला स्नानवस्त्राच्या गुंडाळीने पाठ घासणे योग्य आहे. 'पुथुपाणिक' म्हणजे हाताने मालिश करणे; त्यामुळे सर्व भिक्खूंना हाताने पाठीची मालिश करणे योग्य आहे. ๒๔๕. วลฺลิกาติ กณฺณโต นิกฺขนฺตมุตฺโตลมฺพกาทีนํ เอตํ อธิวจนํ; น เกวลญฺจ วลฺลิกา เอว, ยํกิญฺจิ กณฺณปิฬนฺธนํ อนฺตมโส ตาลปณฺณมฺปิ น วฏฺฏติ. ปามงฺคนฺติ ยํกิญฺจิ ปลมฺพกสุตฺตํ. กณฺฐสุตฺตกนฺติ ยํกิญฺจิ คีวูปคอาภรณํ. กฏิสุตฺตกนฺติ ยํกิญฺจิ กฏิปิฬนฺธนํ อนฺตมโส สุตฺตตนฺตุมตฺตมฺปิ. โอวฏฺฏิกนฺติ วลยํ. กายูราทีนิ ปากฏาเนว, อกฺขกานํ เหฏฺฐา พาหาภรณํ ยํกิญฺจิ อาภรณํ น วฏฺฏติ. २४५. 'वल्लिका' हे कानातून बाहेर पडणाऱ्या व लटकणाऱ्या मोत्यांच्या माळा इत्यादींचे नाव आहे. आणि केवळ वल्लिकाच (मोत्यांचे डूल) अयोग्य आहे असे नाही, तर कोणतेही कानाचे आभूषण, अगदी ताडाचे पान (ताडपत्र) सुद्धा वापरणे अयोग्य आहे. 'पामंग' म्हणजे कोणतेही लटकणारे सुताचे बंधन (किंवा यज्ञोपवीतासारखे लटकणारे सुत). 'कंठसुत्तक' म्हणजे गळ्यातील कोणतेही आभूषण. 'कटिसुत्तक' म्हणजे कंबरेचे कोणतेही आभूषण, अगदी केवळ सुताचा दोरा सुद्धा (वापरणे अयोग्य आहे). 'ओवट्टिक' म्हणजे कडे (कंगन). केयूर (बाजूबंद) इत्यादी स्पष्टच आहेत; जत्रूच्या (कॉलरबोनच्या) खाली दंडाचे कोणतेही आभूषण घालणे अयोग्य आहे. ๒๔๖. ทุมาสิกํ [Pg.45] วา ทุวงฺคุลํ วาติ เอตฺถ สเจ เกสา อนฺโตทฺเวมาเส ทฺวงฺคุลํ ปาปุณนฺติ, อนฺโตทฺเวมาเสว ฉินฺทิตพฺพา. ทฺวงฺคุเลหิ อติกฺกาเมตุํ น วฏฺฏติ. สเจปิ น ทีฆา, ทฺเวมาสโต เอกทิวสมฺปิ อติกฺกาเมตุํ น วฏฺฏติเยว; เอวมยํ อุภเยนปิ อุกฺกฏฺฐปริจฺเฉโทว วุตฺโต, ตโต โอรํ ปน นวฏฺฏนภาโว นาม นตฺถิ. २४६. 'दुमासिकं वा दुवंगुलं वा' (दोन महिने किंवा दोन बोटे) याविषयीचा निर्णय असा समजावा: जर केस दोन महिन्यांच्या आत दोन बोटे लांबीचे होत असतील, तर दोन महिन्यांच्या आतच ते कापले पाहिजेत. दोन बोटांपेक्षा जास्त वाढू देणे अयोग्य आहे. जरी ते लांब झाले नसले तरी, दोन महिन्यांपेक्षा एक दिवसही जास्त काळ जाऊ देणे अयोग्यच आहे. अशा प्रकारे या दोन्ही शब्दांनी ही कमाल मर्यादाच सांगितली आहे. परंतु त्यापेक्षा कमी कालावधीत किंवा कमी लांबी असताना केस कापण्यास कोणतीही बंदी (अयोग्यता) नाही. โกจฺเฉน โอสณฺเฐนฺตีติ โกจฺเฉน โอลิขิตฺวา สนฺนิสีทาเปนฺติ. ผณเกนาติ ทนฺตมยาทีสุ เยน เกนจิ. หตฺถผณเกนาติ หตฺเถเนว ผณกิจฺจํ กโรนฺตา องฺคุลีหิ โอสณฺเฐนฺติ. สิตฺถเตลเกนาติ มธุสิตฺถกนิยฺยาสาทีสุ เยน เกนจิ จิกฺกเลน. อุทกเตลเกนาติ อุทกมิสฺสเกน เตเลน. มณฺฑนตฺถาย สพฺพตฺถ ทุกฺกฏํ, อุทฺธโลเมน ปน อนุโลมนิปาตนตฺถํ หตฺถํ เตเมตฺวา สีสํ ปุญฺฉิตพฺพํ. อุณฺหาภิตตฺตรชสิรานมฺปิ อลฺลหตฺเถน ปุญฺฉิตุํ วฏฺฏติ. 'कोच्छेन ओसण्ठेंति' म्हणजे ब्रशने (किंवा डुकराच्या केसांच्या कंगव्याने) खाली विंचरून केस व्यवस्थित बसवणे. 'फणकेन' म्हणजे हस्तिदंत इत्यादींपासून बनवलेल्या कोणत्याही कंगव्याने विंचरणे. 'हत्थफणकेन' म्हणजे हातानेच कंगव्याचे काम करत बोटांनी केस खाली विंचरून व्यवस्थित बसवणे. 'सित्थतेलकेन' म्हणजे मधमाशांचे मेण, डिंक इत्यादी चिकट पदार्थांपैकी कोणत्याही चिकट द्रवाने केस बसवणे. 'उदकतेलकेन' म्हणजे पाण्याने मिश्रित केलेल्या तेलाने केस बसवणे. नटण्याच्या उद्देशाने या सर्व प्रकारे डोके विंचरल्यास 'दुक्कट' (दुष्कृत) दोष होतो. परंतु, ज्याचे केस वरच्या देशाने उभे राहतात अशा भिक्खूने ते केस खाली बसवण्यासाठी हात ओला करून डोक्यावरून फिरवण्यास (डोके पुसण्यास) हरकत नाही. उन्हाने तापलेल्या किंवा धुळीने माखलेल्या डोके असलेल्या भिक्खूंना सुद्धा ओल्या हाताने डोके पुसणे योग्य आहे. ๒๔๗. น ภิกฺขเว อาทาเส วา อุทกปตฺเต วาติ เอตฺถ กํสปตฺตาทีนิปิ เยสุ มุขนิมิตฺตํ ปญฺญายติ, สพฺพานิ อาทาสสงฺขเมว คจฺฉนฺติ. กญฺชิยาทีนิปิ จ อุทกปตฺตสงฺขเมว. ตสฺมา ยตฺถ กตฺถจิ โอโลเกนฺตสฺส ทุกฺกฏํ. อาพาธปจฺจยาติ ‘‘สญฺฉวิ นุ โข เม วโณ, อุทาหุ น ตาวา’’ติ ชานนตฺถํ; ‘‘ชิณฺโณ นุ โขมฺหิ โน’’ติ เอวํ อายุสงฺขารํ โอโลกนตฺถมฺปิ วฏฺฏตีติ วุตฺตํ. २४७. 'भिक्खूंनो, आरशात किंवा पाण्याच्या पात्रात पाहू नये' या पाठातील निर्णय असा समजावा: कांस्याचे भांडे इत्यादी ज्या वस्तूंमध्ये चेहऱ्याचे प्रतिबिंब दिसते, त्या सर्व वस्तू आरशाच्याच श्रेणीत येतात. आणि कांजी इत्यादी द्रवपदार्थ सुद्धा पाण्याच्या पात्राच्याच श्रेणीत येतात. म्हणून, अशा कोणत्याही वस्तूत स्वतःचे प्रतिबिंब पाहणाऱ्या भिक्खूला 'दुक्कट' दोष होतो. आजारपणामुळे पाहिल्यास दोष होत नाही (अनापत्ती). 'माझी जखम बरी झाली आहे (नवीन त्वचा आली आहे) की नाही?' हे जाणून घेण्यासाठी; किंवा 'मी वृद्ध झालो आहे की नाही?' अशा प्रकारे आपल्या वयाची स्थिती पाहण्यासाठी सुद्धा प्रतिबिंब पाहणे योग्य आहे, असे म्हटले आहे. มุขํ อาลิมฺปนฺตีติ วิปฺปสนฺนฉวิราคกเรหิ มุขาเลปเนหิ อาลิมฺปนฺติ. อุมฺมทฺเทนฺตีติ นานาอุมฺมทฺทเนหิ อุมฺมทฺเทนฺติ. จุณฺเณนฺตีติ มุขจุณฺณเกน มกฺเขนฺติ. มโนสิลิกาย มุขํ ลญฺเฉนฺตีติ มโนสิลาย ติลกาทีนิ ลญฺฉนานิ กโรนฺติ, ตานิ หริตาลาทีหิปิ น วฏฺฏนฺติเยว. องฺคราคาทโย ปากฏาเยว. สพฺพตฺถ ทุกฺกฏํ. 'मुखं आलिम्पंति' म्हणजे त्वचेचा रंग उजळवणाऱ्या आणि आकर्षक बनवणाऱ्या चेहऱ्याच्या लेपांनी लेप लावणे. 'उम्मद्देन्ति' म्हणजे विविध प्रकारच्या उटण्यांनी चेहरा घासणे. 'चुण्णेन्ति' म्हणजे चेहऱ्याच्या पावडरने चेहरा माखणे. 'मनोसिलाय मुखं लञ्छेन्ति' म्हणजे मनशिलने (एका खनिजाने) चेहऱ्यावर टिळा किंवा इतर चिन्हे लावणे; ती चिन्हे हरताळ इत्यादींनी लावणे सुद्धा अयोग्यच आहे. अंगराग (शरीराला रंग लावणे, ओठ किंवा नखे रंगवणे) इत्यादी गोष्टी स्पष्टच अयोग्य आहेत. या सर्व प्रकारच्या सुशोभिकरणात 'दुक्कट' दोष होतो. ๒๔๘. น ภิกฺขเว นจฺจํ วาติอาทีสุ ยํกิญฺจิ นจฺจํ อนฺตมโส โมรนจฺจมฺปิ ทสฺสนาย คจฺฉนฺตสฺส ทุกฺกฏํ. สยมฺปิ นจฺจนฺตสฺส วา นจฺจาเปนฺตสฺส วา ทุกฺกฏเมว. คีตมฺปิ ยํกิญฺจิ นฏคีตํ วา สาธุคีตํ วา อนฺตมโส ทนฺตคีตมฺปิ ‘‘ยํ คายิสฺสามา’’ติ ปุพฺพภาเค โอกูชนฺตา กโรนฺติ, เอตมฺปิ น วฏฺฏติ. สยํ คายนฺตสฺสาปิ คายาเปนฺตสฺสาปิ ทุกฺกฏเมว. วาทิตมฺปิ ยํกิญฺจิ [Pg.46] น วฏฺฏติ. ยํ ปน นิฏฺฐุภนฺโต วา สาสงฺเก วา ฐิโต อจฺฉริกํ วา โผเฏติ, ปาณึ วา ปหรติ, ตตฺถ อนาปตฺติ. สพฺพํ อนฺตราราเม ฐิตสฺส ปสฺสโต อนาปตฺติ. ‘‘ปสฺสิสฺสามี’’ติ วิหารโต วิหารํ คจฺฉนฺตสฺส อาปตฺติเยว. อาสนสาลาย นิสินฺโน ปสฺสติ, อนาปตฺติ. ‘‘ปสฺสิสฺสามี’’ติ อุฏฺฐหิตฺวา คจฺฉโต อาปตฺติ. วีถิยํ ฐตฺวา คีวํ ปริวตฺเตตฺวา ปสฺสโตปิ อาปตฺติเยว. २४८. 'भिक्खूंनो, नृत्य...' इत्यादी पाठांमध्ये निर्णय असा समजावा: कोणतेही नृत्य, अगदी मोराचे नृत्य सुद्धा पाहण्यासाठी जाणाऱ्या भिक्खूला 'दुक्कट' दोष होतो. स्वतः नाचणाऱ्याला किंवा दुसऱ्याला नाचवणाऱ्याला सुद्धा 'दुक्कट' दोषच होतो. गाणे सुद्धा कोणतेही असो—नटाचे गाणे असो किंवा अनित्यता इत्यादींशी संबंधित असलेले धार्मिक गाणे असो, अगदी दातांनी गुणगुणणे सुद्धा अयोग्य आहे. 'आम्ही हे गाणार आहोत' असा विचार करून गाण्यापूर्वी जो गुणगुणण्याचा आवाज काढतात, ते सुद्धा अयोग्य आहे. स्वतः गाणाऱ्याला आणि दुसऱ्याकडून गाऊन घेणाऱ्याला सुद्धा 'दुक्कट' दोषच होतो. कोणतेही वाद्य वाजवणे सुद्धा अयोग्य आहे. परंतु, थुंकताना किंवा भीतीदायक ठिकाणी उभे असताना जर कोणी चुटकी वाजवतो किंवा टाळी वाजवतो, तर त्यात दोष नाही (अनापत्ती). विहाराच्या आत उभे राहून हे सर्व पाहणाऱ्या किंवा ऐकणाऱ्या भिक्खूला दोष नाही. 'Passissāmī' (मी पाहीन) असा विचार करून एका विहारातून दुसऱ्या विहारात जाणाऱ्याला दोष लागतोच. भोजनशाळेत बसून पाहत असेल तर दोष नाही. 'Passissāmī' (मी पाहीन) असा विचार करून उठून जाणाऱ्याला दोष लागतो. रस्त्यावर उभे राहून मान वळवून पाहणाऱ्याला सुद्धा दोष लागतोच. ๒๔๙. สรกุตฺตินฺติ สรกิริยํ. ภงฺโค โหตีติ อลทฺธํ อุปฺปาเทตุํ น สกฺโกติ; ลทฺธํ สมาปชฺชิตุํ. ปจฺฉิมา ชนตาติ อมฺหากํ อาจริยาปิ อุปชฺฌายาปิ เอวํ คายึสูติ ปจฺฉิโม ชโน ทิฏฺฐานุคตึ อาปชฺชติ; ตเถว คายติ. น ภิกฺขเว อายตเกนาติ เอตฺถ อายตโก นาม ตํ ตํ วตฺตํ ภินฺทิตฺวา อกฺขรานิ วินาเสตฺวา ปวตฺโต. ธมฺเม ปน สุตฺตนฺตวตฺตํ นาม อตฺถิ, ชาตกวตฺตํ นาม อตฺถิ, คาถาวตฺตํ นาม อตฺถิ, ตํ วินาเสตฺวา อติทีฆํ กาตุํ น วฏฺฏติ. จตุรสฺเสน วตฺเตน ปริมณฺฑลานิ ปทพฺยญฺชนานิ ทสฺเสตพฺพานิ. สรภญฺญนฺติ สเรน ภณนํ. สรภญฺเญ กิร ตรงฺควตฺตโธตกวตฺตคลิตวตฺตาทีนิ ทฺวตฺตึส วตฺตานิ อตฺถิ. เตสุ ยํ อิจฺฉติ, ตํ กาตุํ ลภติ. สพฺเพสํ ปทพฺยญฺชนํ อวินาเสตฺวา วิการํ อกตฺวา สมณสารุปฺเปน จตุรสฺเสน นเยน ปวตฺตนํเยว ลกฺขณํ. २४९. 'सरकुत्ति' म्हणजे आवाजाचे खेळ करणे (गाण्यासारखा आवाज काढणे). 'भंगो होति' म्हणजे न मिळालेली समाधी प्राप्त करू न शकणे किंवा प्राप्त झालेली समाधी टिकवू (तिच्यात प्रवेश करू) न शकणे. 'पच्छिमा जनता' म्हणजे 'आमचे आचार्य आणि उपाध्याय सुद्धा असेच गात असत' असे म्हणून नंतरची पिढी (शिष्यवर्ग) पाहिलेल्या व ऐकलेल्या गोष्टींचे अनुकरण करते आणि त्यांच्यासारखेच गाते. 'भिक्खूंनो, दीर्घ स्वराने...' या पाठात 'आयतक' म्हणजे त्या त्या पठणपद्धतीचे नियम मोडून आणि अक्षरांचा उच्चार बिघडून काढलेला आवाज. परंतु धम्माच्या पठणात 'सुत्तंतवत्त' (सुत्तांचे पठण करण्याचे नियम), 'जातकवत्त' (जातकांचे पठण करण्याचे नियम) आणि 'गाथावत्त' (गाथांचे पठण करण्याचे नियम) अस्तित्वात आहेत; ते नियम मोडून अतिशय दीर्घ स्वर लावणे अयोग्य आहे. सुस्पष्ट व संतुलित पठणपद्धतीने परिपूर्ण पदे आणि व्यंजने स्पष्टपणे उच्चारली पाहिजेत. 'सरभञ्ञ' म्हणजे स्वरासह (सुरात) पठण करणे. सरभञ्ञ पठणात तरंगवत्त, धोतकवत्त, गलितवत्त इत्यादी बत्तीस प्रकारच्या पठणपद्धती आहेत असे म्हणतात. त्यांपैकी जी पद्धत हवी असेल, ती वापरण्याची परवानगी आहे. परंतु या सर्व पद्धतींमध्ये पदे आणि व्यंजने न बिघडवता, स्वरांमध्ये विकृती न आणता, श्रमणांना योग्य अशा सुस्पष्ट व संतुलित पद्धतीने पठण करणे हेच त्याचे मुख्य लक्षण आहे. พาหิรโลมึ อุณฺณินฺติ อุณฺณโลมานิ พหิ กตฺวา อุณฺณปาวารํ ปารุปนฺติ; ตถา ธาเรนฺตสฺส ทุกฺกฏํ. โลมานิ อนฺโต กตฺวา ปารุปิตุํ วฏฺฏติ. สมณกปฺปกถา ภูตคามสิกฺขาปทวณฺณนายํ วุตฺตา. 'बाहिरलोमं उण्णिं' म्हणजे लोकरीचे केस बाहेरच्या बाजूला करून लोकरीची शाल पांघरतात; अशा प्रकारे पांघरणाऱ्या भिक्खूला 'दुक्कट' दोष होतो. लोकरीचे केस आतल्या बाजूला करून पांघरण्यास हरकत नाही. श्रमणकप्पकथा भूतगाम सिक्खापदाच्या वर्णनात सांगितली गेली आहे. ๒๕๑. น ภิกฺขเว อตฺตโน องฺคชาตนฺติ องฺคชาตํ ฉินฺทนฺตสฺเสว ถุลฺลจฺจยํ. อญฺญํ ปน กณฺณนาสาองฺคุลิอาทึ ยํกิญฺจิ ฉินฺทนฺตสฺส ตาทิสํ วา ทุกฺขํ อุปฺปาเทนฺตสฺส ทุกฺกฏํ. อหิกีฏทฏฺฐาทีสุ ปน อญฺญอาพาธปจฺจยา วา โลหิตํ วา โมเจนฺตสฺส ฉินฺทนฺตสฺส วา อนาปตฺติ. २५१. 'भिक्खूंनो, स्वतःचे जननेंद्रिय...' या पाठात स्वतःचे जननेंद्रिय कापणाऱ्या भिक्खूलाच 'थुल्लच्चय' दोष होतो. परंतु कान, नाक, बोटे इत्यादींपैकी कोणतेही इतर अंग कापणाऱ्याला किंवा तशाच प्रकारची वेदना उत्पन्न करणाऱ्याला 'दुक्कट' दोष होतो. परंतु साप किंवा विंचू इत्यादी चावल्यामुळे किंवा इतर कोणत्याही आजारपणामुळे रक्त काढणाऱ्याला किंवा अंग कापणाऱ्याला दोष नाही (अनापत्ती). ๒๕๒. จนฺทนคณฺฐิ อุปฺปนฺนา โหตีติ จนฺทนฆฏิกา อุปฺปนฺนา โหติ. โส กิร อุทฺธญฺจ อโธ จ ชาลานิ ปริกฺขิปาเปตฺวา คงฺคาย นทิยา กีฬติ, ตสฺส นทีโสเตน วุยฺหมานา จนฺทนคณฺฐิ อาคนฺตฺวา ชาเล ลคฺคา, ตมสฺส ปุริสา อาหริตฺวา อทํสุ; เอวํ สา อุปฺปนฺนา โหติ. อิทฺธิปาฏิหาริยนฺติ เอตฺถ [Pg.47] วิกุพฺพนิทฺธิปาฏิหาริยํ ปฏิกฺขิตฺตํ, อธิฏฺฐานิทฺธิ ปน อปฺปฏิกฺขิตฺตาติ เวทิตพฺพา. २५२. 'चंदनगंठि उप्पन्ना होति' म्हणजे चंदनाचा तुकडा प्राप्त झाला. असे म्हणतात की, तो (राजगृहाचा श्रेष्ठी) नदीच्या वरच्या व खालच्या बाजूला जाळी पसरवून गंगा नदीत जलक्रीडा करत होता. नदीच्या प्रवाहाने वाहत आलेली चंदनाची गाठ (तुकडा) येऊन त्याच्या जाळ्यात अडकली, ती त्याच्या माणसांनी काढून त्याला दिली; अशा प्रकारे ती प्राप्त झाली होती. 'इद्धिपाटिहारियं' या पाठात 'विकुब्बन ऋद्धीचे प्रातिहार्य' (विविध रूपे धारण करण्याचे चमत्कार दाखवणे) निषिद्ध केले आहे, परंतु 'अधिष्ठान ऋद्धी' निषिद्ध केलेली नाही, असे समजावे. น ภิกฺขเว โสวณฺณมโย ปตฺโตติอาทีสุ สเจปิ คิหี ภตฺตคฺเค สุวณฺณตฏฺฏิกาทีสุ พฺยญฺชนํ กตฺวา อุปนาเมนฺติ, อามสิตุมฺปิ น วฏฺฏติ. ผลิกมยกาจมยกํสมยานิ ปน ตฏฺฏิกาทีนิ ภาชนานิ ปุคฺคลิกปริโภเคเนว น วฏฺฏนฺติ, สงฺฆิกปริโภเคน วา คิหิวิกฏานิ วา วฏฺฏนฺติ. ‘‘ตมฺพโลหมโยปิ ปตฺโตว น วฏฺฏติ, ถาลกํ ปน วฏฺฏตี’’ติ อิทํ สพฺพํ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. มณิมโยติ เอตฺถ ปน อินฺทนีลาทิมณิมโย วุตฺโต. กํสมโยติ เอตฺถ วฏฺฏโลหมโยปิ สงฺคหิโต. हे भिक्खूहो, 'सोन्याचा पत्त (पात्र)' इत्यादींच्या बाबतीत, जरी गृहस्थांनी भोजनशाळेत सोन्याच्या थाळी इत्यादींमध्ये व्यंजन ठेवून ते सादर केले, तरी त्याला स्पर्श करणे देखील योग्य नाही. स्फटिक, काच आणि कांस्य यांच्या बनवलेल्या थाळ्या इत्यादी भांडी वैयक्तिक वापरासाठी योग्य नाहीत, परंतु संघाच्या वापरासाठी किंवा गृहस्थांनी विशेष तयार केलेले असल्यास ती योग्य आहेत. 'तांब्याचा बनवलेला पत्त देखील योग्य नाही, परंतु थाळी योग्य आहे,' हे सर्व कुरुन्दी अट्ठकथेत सांगितले आहे. येथे 'मणिमय' म्हणजे इंद्रनील इत्यादी मण्यांनी बनवलेले भांडे असे म्हटले आहे. 'कांस्यमय' यामध्ये मिश्रधातूचा (काशाचा) देखील समावेश होतो. ๒๕๓. ลิขิตุนฺติ ตนุกรณตฺถาเยตํ วุตฺตํ. ปกติมณฺฑลนฺติ มกรทนฺตจฺฉินฺนกมณฺฑลเมว. २५३. 'लिखितुं' (खरवडणे/पातळ करणे) हे पात्र पातळ करण्याच्या उद्देशाने सांगितले आहे. 'पकतिमंडल' (सामान्य मंडल) म्हणजे मकराच्या दाताच्या आकाराचे कापलेले मंडलच होय. ๒๕๔. อาวฏฺฏิตฺวาติ อญฺญมญฺญํ ปหริตฺวา. ปตฺตาธารกนฺติ เอตฺถ ‘‘ทนฺตวลฺลิเวตฺตาทีหิ กเต ภูมิอาธารเก ตโย, ทารุอาธารเก ทฺเว ปตฺเต อุปรูปริ ฐเปตุํ วฏฺฏตี’’ติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. มหาอฏฺฐกถายํ ปน วุตฺตํ – ‘‘ภูมิอาธารเก ติณฺณํ ปตฺตานํ อโนกาโส, ทฺเว ฐเปตุํ วฏฺฏติ. ทารุอาธารกทณฺฑาธารเกสุปิ สุสชฺชิเตสุ เอเสว นโย. ภมโกฏิสทิโส ปน ทารุอาธารโก ตีหิ ทณฺฑเกหิ พทฺโธ ทณฺฑกาธาโร จ เอกสฺสปิ ปตฺตสฺส อโนกาโส, ตตฺถ ฐเปตฺวาปิ หตฺเถน คเหตฺวา เอว นิสีทิตพฺพํ. ภูมิยํ ปน นิกฺกุชฺชิตฺวา เอกเมว ฐเปตพฺพ’’นฺติ. २५४. 'आवट्ठित्वा' म्हणजे एकमेकांवर आदळून. 'पत्ताधारक' (पात्राचा आधार) याविषयी: 'हस्तिदंत, वेल किंवा वेत इत्यादींनी बनवलेल्या जमिनीवरील आधारावर तीन पात्रे आणि लाकडी आधारावर दोन पात्रे एकावर एक ठेवणे योग्य आहे,' असे कुरुन्दी अट्ठकथेत सांगितले आहे. महाअट्ठकथेत मात्र असे सांगितले आहे की—'जमिनीवरील आधारावर तीन पात्रे ठेवण्यास योग्य जागा नाही, तेथे दोन पात्रे ठेवणे योग्य आहे. चांगल्या प्रकारे बनवलेल्या लाकडी आधारावर आणि काठीच्या आधारावर देखील हाच नियम लागू होतो. परंतु खरादीच्या टोकासारखा लाकडी आधार आणि तीन काठ्यांनी बांधलेला काठीचा आधार एका पात्रासाठी देखील योग्य जागा नाही; तेथे पात्र ठेवले तरी ते हाताने धरूनच बसले पाहिजे. जमिनीवर मात्र पात्र पालथे घालून एकच पात्र ठेवावे.' มิฑฺฒนฺเตติ อาลินฺทกมิฑฺฒิกาทีนํ อนฺเต. สเจ ปน ปริวตฺเตตฺวา ตตฺเถว ปติฏฺฐาติ, เอวรูปาย วิตฺถิณฺณาย มิฑฺฒิยา ฐเปตุํ วฏฺฏติ. ปริภณฺฑนฺเตติ พาหิรปสฺเส กตาย ตนุกมิฑฺฒิกาย อนฺเต. มิฑฺฒิยํ วุตฺตนเยเนเวตฺถาปิ วินิจฺฉโย เวทิตพฺโพ. 'मिड्ढन्ते' म्हणजे ओट्याच्या किंवा सज्जाच्या कडेला. पण जर पात्र गडगडून तेथेच स्थिर राहत असेल, तर अशा रुंद ओट्यावर पात्र ठेवणे योग्य आहे. 'परिभण्डन्ते' म्हणजे बाहेरील भिंतीच्या बाजूला बनवलेल्या अरुंद ओट्याच्या कडेला. येथेही ओट्याच्या बाबतीत सांगितलेल्या नियमाप्रमाणेच निर्णय समजावा. โจฬกนฺติ ยํ ปตฺถริตฺวา ปตฺโต ฐปียติ; ตสฺมึ ปน อสติ กฏสารเก วา ตฏฺฏิกาย วา มตฺติกาปริภณฺฑกตาย ภูมิยา วา ยตฺถ น ทุสฺสติ, ตถารูปาย วาลิกาย วา ฐเปตุํ วฏฺฏติ. ปํสุรชาทีสุ ปน ขรภูมิยํ วา ฐเปนฺตสฺส ทุกฺกฏํ. ปตฺตมาฬกํ อิฏฺฐกาหิ วา ทารูหิ วา กาตุํ วฏฺฏติ[Pg.48]. ปตฺตกุณฺโฑลิกาติ มหามุขกุณฺฑสณฺฐานา ภณฺฑกุกฺขลิกา วุจฺจติ. โย ลคฺเคยฺยาติ ยตฺถ กตฺถจิ ลคฺเคนฺตสฺส ทุกฺกฏเมว. จีวรวํเสปิ พนฺธิตฺวา ฐเปตุํ น วฏฺฏติ. ภณฺฑกฏฺฐปนตฺถเมว วา กตํ โหตุ นิสีทนสยนตฺถํ วา ยตฺถ กตฺถจิ มญฺเจ วา ปีเฐ วา ฐเปนฺตสฺส ทุกฺกฏํ, อญฺเญน ปน ภณฺฑเกน สทฺธึ พนฺธิตฺวา ฐเปตุํ วฏฺฏติ. อฏนิยํ พนฺธิตฺวา โอลมฺเพตุํ วา วฏฺฏติ, พนฺธิตฺวาปิ อุปริ ฐเปตุํ น วฏฺฏติเยว. สเจ ปน มญฺโจ วา ปีฐํ วา อุกฺขิปิตฺวา จีวรวํสาทีสุ อฏฺฏกฉนฺเนน ฐปิตํ โหติ, ตตฺถ ฐเปตุํ วฏฺฏติ. อํสวทฺธนเกน อํสกูเฏ ลคฺเคตฺวา องฺเก ฐเปตุํ วฏฺฏติ. ฉตฺเต ภตฺตปูโรปิ อํสกูเฏ ลคฺคิตปตฺโตปิ ฐเปตุํ น วฏฺฏติ, ภณฺฑเกน ปน สทฺธึ พนฺธิตฺวา วา อฏฺฏกํ กตฺวา วา ฐปิเต โย โกจิ ฐเปตุํ วฏฺฏติ. 'चोळक' म्हणजे जे कापड पसरून त्यावर पात्र ठेवले जाते; परंतु ते कापड नसताना चटईवर, चटईच्या तुकड्यावर, मातीने सारवलेल्या जमिनीवर किंवा जेथे पात्राचे नुकसान होणार नाही अशा वाळूवर पात्र ठेवणे योग्य आहे. धूळ, कचरा इत्यादींवर किंवा खडबडीत जमिनीवर पात्र ठेवल्यास दुक्कट गुन्हा होतो. पात्रासाठीचा कट्टा विटांनी किंवा लाकडाने बनवणे योग्य आहे. 'पत्तकुण्डोलिका' म्हणजे रुंद तोंडाच्या मातीच्या भांड्यासारखे पात्र ठेवण्याचे भांडे होय. 'जो टांगेल' म्हणजे कोणत्याही ठिकाणी पात्र टांगल्यास दुक्कटच होतो. चिवर टांगण्याच्या बांबूवर देखील पात्र बांधून ठेवणे योग्य नाही. वस्तू ठेवण्यासाठी बनवलेले असो किंवा बसण्यासाठी व झोपण्यासाठी बनवलेले असो, कोणत्याही खाटेवर किंवा पाटावर पात्र ठेवल्यास दुक्कट होतो; परंतु इतर वस्तूंसोबत एकत्र बांधून ठेवणे योग्य आहे. खाटेच्या किंवा पाटाच्या चौकटीला बांधून लटकवणे योग्य आहे, परंतु बांधूनही त्याच्या वरच्या बाजूला ठेवणे योग्य नाहीच. पण जर खाट किंवा पाट उचलून चिवर टांगण्याच्या बांबू इत्यादींवर माळ्यासारखे करून ठेवले असेल, तर तेथे पात्र ठेवणे योग्य आहे. खांद्यावरील पट्ट्याने खांद्यावर लटकवून मांडीवर ठेवणे योग्य आहे. छत्रीवर अन्नाने भरलेले पात्र किंवा खांद्यांवर लटकवलेले पात्र ठेवणे योग्य नाही; परंतु इतर वस्तूंसोबत बांधून किंवा माळा करून ठेवलेल्या छत्रीवर कोणतेही पात्र ठेवणे योग्य आहे. ๒๕๕. ปตฺตหตฺเถนาติ เอตฺถ น เกวลํ ยสฺส ปตฺโต หตฺเถ, โส เอว ปตฺตหตฺโถ, น เกวลญฺจ กวาฏเมว ปณาเมตุํ น ลภติ; อปิจ โข ปน หตฺเถ วา ปิฏฺฐิปาเท วา ยตฺถ กตฺถจิ สรีราวยเว ปตฺตสฺมึ สติ หตฺเถน วา ปาเทน วา สีเสน วา เยน เกนจิ สรีราวยเวน กวาฏํ วา ปณาเมตุํ ฆฏิกํ วา อุกฺขิปิตุํ สูจึ วา กุญฺจิกาย อปาปุริตุํ น ลภติ. อํสกูเฏ ปน ปตฺตํ ลคฺเคตฺวา ยถาสุขํ อวาปุริตุํ ลภติ. २५५. 'पत्तहत्थेन' (हातात पात्र असलेला) या पाठात: केवळ ज्याच्या हातात पात्र आहे तोच 'पत्तहत्थ' नव्हे, आणि केवळ दरवाजा ढकलण्याचीच परवानगी नाही असे नाही; तर हातात, पायाच्या पाठीवर किंवा शरीराच्या कोणत्याही भागात पात्र असताना, हाताने, पायाने, डोक्याने किंवा शरीराच्या कोणत्याही भागाने दरवाजा ढकलणे, अडसर वर उचलणे किंवा किल्लीने कडी उघडण्याची परवानगी नाही. परंतु खांद्यांवर पात्र लटकवून सोयीस्करपणे दरवाजा उघडण्याची परवानगी आहे. ตุมฺพกฏาหนฺติ ลาพุกฏาหํ วุจฺจติ, ตํ ปริหริตุํ น วฏฺฏติ. ลภิตฺวา ปน ตาวกาลิกํ ปริภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. ฆฏิกฏาเหปิ เอเสว นโย. ฆฏิกฏาหนฺติ ฆฏิกปาลํ. อภุํ เมติ อุตฺราสวจนเมตํ. สพฺพปํสุกูลิเกนาติ เอตฺถ จีวรญฺจ มญฺจปีฐญฺจ ปํสุกูลํ วฏฺฏติ, อชฺโฌหรณียํ ปน ทินฺนกเมว คเหตพฺพํ. 'तुम्बकटाह' म्हणजे भोपळ्याचे कवच म्हटले जाते, ते नेहमी जवळ बाळगणे योग्य नाही. परंतु ते मिळाल्यास तात्पुरत्या वापरासाठी वापरणे योग्य आहे. मातीच्या भांड्याच्या तुकड्याच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. 'घटिकटाह' म्हणजे मातीच्या भांड्याचा तुकडा होय. 'अभुं मे' हा भीती किंवा आश्चर्याचा उद्गार आहे. 'सब्बपंसुकूलिकेन' (सर्व पांसुकूलिक) यामध्ये चिवर आणि खाट-पाट पांसुकूल वापरणे योग्य आहे, परंतु खाण्यापिण्याचे अन्न मात्र दान दिलेलेच स्वीकारले पाहिजे. จลกานีติ จพฺเพตฺวา อปวิทฺธามิสานิ. อฏฺฐิกานีติ มจฺฉมํสอฏฺฐิกานิ. อุจฺฉิฏฺโฐทกนฺติ มุขวิกฺขาลโนทกํ. เอเตสุ ยํกิญฺจิ ปตฺเตน นีหรนฺตสฺส ทุกฺกฏํ. ปตฺตํ ปฏิคฺคหํ กตฺวา หตฺถํ โธวิตุมฺปิ น ลภติ. หตฺถโธตปาทโธตอุทกมฺปิ ปตฺเต อากิริตฺวา นีหริตุํ น วฏฺฏติ. อนุจฺฉิฏฺฐํ สุทฺธปตฺตํ อุจฺฉิฏฺฐหตฺเถน คณฺหิตุํ น วฏฺฏติ, วามหตฺเถน ปเนตฺถ อุทกํ อาสิญฺจิตฺวา เอกํ อุทกคณฺฑุสํ [Pg.49] คเหตฺวา อุจฺฉิฏฺฐหตฺเถน คณฺหิตุํ วฏฺฏติ. เอตฺตาวตาปิ หิ โส อุจฺฉิฏฺฐปตฺโต โหติ, หตฺถํ ปน พหิ อุทเกน วิกฺขาเลตฺวา คเหตุํ วฏฺฏติ. มจฺฉมํสผลาผลาทีนิ ขาทนฺโต ยํ ตตฺถ อฏฺฐึ วา จลกํ วา ฉฑฺเฑตุกาโม โหติ, ตํ ปตฺเต ฐเปตุํ น ลภติ. ยํ ปน ปฏิขาทิตุกาโม โหติ, ตํ ปตฺเต ฐเปตุํ ลภติ. อฏฺฐิกกณฺฏกาทีนิ ตตฺเถว กตฺวา หตฺเถน ลุญฺจิตฺวา ขาทิตุํ วฏฺฏติ. มุขโต นีหฏํ ปน ยํกิญฺจิ ปุน ขาทิตุกาโม โหติ, ตํ ปตฺเต ฐเปตุํ น ลภติ. สิงฺคิเวรนาฬิเกรขณฺฑานิ ฑํสิตฺวา ปุน ฐเปตุํ ลภติ. 'चलकानि' म्हणजे चावून टाकून दिलेले अन्नाचे तुकडे. 'अट्ठिकानि' म्हणजे मासे आणि मांसाची हाडे. 'उच्छिट्ठोदकं' म्हणजे तोंड धुण्याचे पाणी. यांपैकी काहीही पात्राने बाहेर टाकणाऱ्या भिक्खूला दुक्कट गुन्हा होतो. पात्राला थुंकण्याचे भांडे बनवून त्यात हात धुण्याची देखील परवानगी नाही. हात किंवा पाय धुण्याचे पाणी देखील पात्रात ओतून बाहेर टाकणे योग्य नाही. उष्टे नसलेले स्वच्छ पात्र उष्ट्या हाताने पकडणे योग्य नाही; परंतु डाव्या हाताने त्यात पाणी ओतून, पाण्याचा एक घोट घेऊन, उष्ट्या हाताने पात्र पकडणे योग्य आहे. कारण एवढ्याने देखील ते पात्र उष्टे पात्र बनते; परंतु हात बाहेर पाण्याने धुवून पात्र पकडणे योग्य आहे. मासे, मांस, फळे इत्यादी खाताना, त्यातील जे हाड किंवा चोथा टाकून देण्याची इच्छा असेल, ते पात्रात ठेवण्याची परवानगी नाही. परंतु जे पुन्हा खाण्याची इच्छा असेल, ते पात्रात ठेवण्याची परवानगी आहे. हाडे, काटे इत्यादी तेथेच ठेवून, हाताने सोलून खाणे योग्य आहे. तोंडातून बाहेर काढलेले कोणतेही अन्न पुन्हा खाण्याची इच्छा नसली, तर ते पात्रात ठेवण्याची परवानगी नाही. आले किंवा नारळाचे तुकडे चावून पुन्हा पात्रात ठेवण्याची परवानगी आहे. ๒๕๖. นมตกนฺติ สตฺถกเวฐนกํ ปิโลติกขณฺฑํ. ทณฺฑสตฺถกนฺติ ปิปฺผลกํ วา อญฺญมฺปิ วา ยํกิญฺจิ ทณฺฑํ โยเชตฺวา กตสตฺถกํ. २५६. 'नमतक' म्हणजे लहान चाकू गुंडाळण्याचे कापडाचे तुकडे. 'दण्डसत्थक' म्हणजे वस्तरा किंवा इतर कोणताही दांडा जोडून बनवलेला लहान चाकू. กณฺณกิตา โหนฺตีติ มลคฺคหิตา โหนฺติ. กิณฺเณน ปูเรตุนฺติ กิณฺณจุณฺเณน ปูเรตุํ. สตฺตุยาติ หลิทฺทิมิสฺสเกน ปิฏฺฐจุณฺเณน. สริตกนฺติ ปาสาณจุณฺณํ วุจฺจติ; เตน ปูเรตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. มธุสิตฺถเกน สาเรตุนฺติ มธุสิตฺถเกน มกฺเขตุํ. สริตกํ ปริภิชฺชตีติ ตํ มกฺขิตมธุสิตฺถกํ ภิชฺชติ. สริตสิปาฏิกนฺติ มธุสิตฺถกปิโลติกํ; สตฺถโกสกสิปาฏิยา ปน สริตสิปาฏิกาย อนุโลมาติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. กถินนฺติ นิสฺเสณิมฺปิ ตตฺถ อตฺถริตพฺพกฏสารกกิลญฺชานํ อญฺญตรมฺปิ. กถินรชฺชุนฺติ ยาย ทุปฏฺฏจีวรํ สิพฺพนฺตา กถิเน จีวรมฺปิ พนฺธนฺติ. กถินํ นปฺปโหตีติ ทีฆสฺส ภิกฺขุโน ปมาเณน กตํ กถินํ; ตตฺถ รสฺสสฺส ภิกฺขุโน จีวรํ ปตฺถริยมานํ นปฺปโหติ, อนฺโตเยว โหติ; ทณฺฑเก น ปาปุณาตีติ อตฺโถ. ทณฺฑกถินนฺติ ตสฺส มชฺเฌ อิตรสฺส ภิกฺขุโน ปมาเณน อญฺญํ นิสฺเสณึ พนฺธิตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. कण्णकिता होन्तीति म्हणजे मळकटलेले किंवा गंजलेले असणे. किण्णेन पुरेतुन्ति म्हणजे किण्वचूर्णाने (यीस्टच्या चूर्णाने) भरणे. सत्तुयाति म्हणजे हळद मिश्रित पिठाच्या चूर्णाने. सरितकन्ति म्हणजे दगडाचे चूर्ण (पाषाणचूर्ण) म्हटले जाते; त्याने भरणे, अशी मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. मधुसिट्ठकेन सारेतुन्ति म्हणजे मेणाने माखणे (लेपणे). सरितकं परिभिज्जतीति म्हणजे ते माखलेले मेण खराब होते. सरितसिपाटिकाति म्हणजे मेण लावलेली कापडी पिशवी; तलवारीच्या कोशाची कापडी पिशवी ही मेण लावलेल्या कापडी पिशवीसारखीच असते, असे कुरुन्दीमध्ये म्हटले आहे. कठिनन्ति म्हणजे चौकट (निश्रेणी) किंवा त्यावर अंथरण्याची चटई किंवा चटईचे तुकडे यांपैकी काहीही. कठिनरज्जुन्ति म्हणजे ज्या दोरीने दुपदरी चीवर शिवताना चौकटीवर चीवर देखील बांधतात. कठिनं नप्पहोतीति म्हणजे उंच भिक्खूच्या मापाने बनवलेली चौकट; त्यावर बुटक्या भिक्खूचे चीवर पसरले असता ते पुरत नाही, ते आतच राहते, दांड्यापर्यंत पोहोचत नाही, असा अर्थ आहे. दण्डकठिनन्ति म्हणजे त्याच्या मध्यभागी दुसऱ्या भिक्खूच्या मापाने दुसरी चौकट बांधण्यास मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे। พิทลกนฺติ ทณฺฑกถินปฺปมาเณน กฏสารกสฺส ปริยนฺเต ปฏิสํหริตฺวา ทุคุณกรณํ. สลากนฺติ ทุปฏฺฏจีวรสฺส อนฺตเร ปเวสนสลากํ. วินนฺธนรชฺชุนฺติ มหานิสฺเสณิยา สทฺธึ ขุทฺทกํ นิสฺเสณึ วินนฺธิตุํ รชฺชุํ. วินนฺธนสุตฺตนฺติ ขุทฺทกนิสฺเสณิยา จีวรํ วินนฺธิตุํ สุตฺตกํ. วินนฺธิตฺวา จีวรํ สิพฺเพตุนฺติ เตน สุตฺตเกน ตตฺถ จีวรํ วินนฺธิตฺวา สิพฺพิตุํ. วิสมา โหนฺตีติ กาจิ ขุทฺทกา โหนฺติ, กาจิ มหนฺตา. กฬิมฺภกนฺติ ปมาณสญฺญากรณํ ยํกิญฺจิ ตาลปณฺณาทึ. โมฆสุตฺตกนฺติ วฑฺฒกีนํ ทารูสุ [Pg.50] กาฬสุตฺเตน วิย หลิทฺทิสุตฺเตน สญฺญากรณํ. องฺคุลิยา ปฏิคฺคณฺหนฺตีติ สูจิมุขํ องฺคุลิยา ปฏิจฺฉนฺติ. ปฏิคฺคหนฺติ องฺคุลิโกสกํ. बिदलकन्ति म्हणजे दांड्याच्या चौकटीच्या मापाने चटईच्या कडा दुमडून दुप्पट करणे. सलाकान्ति म्हणजे दुपदरी चीवराच्या आत घालण्याची बांबूची पट्टी (सळई). विनन्धनरज्जुन्ति म्हणजे मोठ्या चौकटीसोबत लहान चौकट बांधण्यासाठी दोरी. विनन्धनसुत्तन्ति म्हणजे लहान चौकटीवर चीवर बांधण्यासाठी लहान सुतळी (दोरा). विनन्धित्वा चीवरं सिब्बितुन्ति म्हणजे त्या लहान सुतळीने तेथे चीवर बांधून शिवणे. विसमा होन्तीति म्हणजे काही शिवणकामातील अंतर अरुंद असते आणि काही रुंद असते. कळिम्भकन्ति म्हणजे मापाची खूण करण्यासाठी ताडपत्रासारखे काहीही साधन. मोघसुत्तन्ति म्हणजे सुतारांच्या लाकडावर काळ्या दोऱ्याने खूण करण्याप्रमाणे, हळदीच्या दोऱ्याने खूण करणे. अङ्गुलिया पटिग्गण्हन्तीति म्हणजे सुईचे टोक बोटाने पकडणे (स्वीकारणे). पटिग्गहन्ति म्हणजे अंगुलिकोश (बोटात घालण्याचे अंगठण). ๒๕๗. อาเวสนวิตฺถกํ นาม ยํกิญฺจิ ปาติจงฺโกฏกาทิ. อุจฺจวตฺถุกนฺติ ปํสุํ อากิริตฺวา อุจฺจวตฺถุกํ กาตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. โอคุมฺเผตฺวา อุลฺลิตฺตาวลิตฺตํ กาตุนฺติ ฉทนํ โอธุนิตฺวา ฆนทณฺฑกํ กตฺวา อนฺโต เจว พหิ จ มตฺติกาย ลิมฺปิตุนฺติ อตฺโถ. โคฆํสิกายาติ เวฬุํ วา รุกฺขทณฺฑํ วา อนฺโตกตฺวา เตน สทฺธึ สงฺฆริตุนฺติ อตฺโถ. พนฺธนรชฺชุนฺติ ตถา สงฺฆริตสฺส พนฺธนรชฺชุํ. २५७. आवेसनवित्थकं नाम म्हणजे वाटी, तबकडी इत्यादी काहीही भांडे. उच्चवत्थुकन्ति म्हणजे माती टाकून उंच ओटा बनवण्यास मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. ओगुम्फित्वा उल्लित्तावुलित्तं कातुन्ति म्हणजे छप्पर झाडून, मजबूत दांडे लावून, आतून आणि बाहेरून मातीने लिंपणे, असा अर्थ आहे. गोधंसिकायति म्हणजे बांबूचा किंवा लाकडाचा दांडा आत ठेवून, त्यासह गुंडाळणे (घडी करणे), अशी मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. बन्धनरज्जुन्ति म्हणजे त्याप्रमाणे गुंडाळलेल्या चटईला बांधण्याची दोरी। ๒๕๘. กฏจฺฉุปริสฺสาวนํ นาม ตีสุ ทณฺฑเกสุ วินนฺธิตฺวา กตํ. २५८. कटच्छुपरिस्सावनं नाम म्हणजे तीन लहान दांड्यांवर बांधून तयार केलेले जलगाळणे (पाणी गाळण्याचे साधन). ๒๕๙. โย น ทเทยฺยาติ อปริสฺสาวนกสฺเสว โย น ททาติ, ตสฺส อาปตฺติ. โย ปน อตฺตโน หตฺเถ ปริสฺสาวเน วิชฺชมาเนปิ ยาจติ, ตสฺส น อกามา ทาตพฺพํ. ทณฺฑปริสฺสาวนนฺติ รชกานํ ขารปริสฺสาวนํ วิย จตูสุ ปาเทสุ พทฺธนิสฺเสณิกาย สาฏกํ พนฺธิตฺวา มชฺเฌทณฺฑเก อุทกํ อาสิญฺจิตพฺพํ, ตํ อุโภปิ โกฏฺฐาเส ปูเรตฺวา ปริสฺสวติ. โอตฺถรกํ นาม ยํ อุทเก โอตฺถริตฺวา ฆฏเกน อุทกํ คณฺหนฺติ, ตญฺหิ จตูสุ ทณฺฑเกสุ วตฺถํ พนฺธิตฺวา อุทเก จตฺตาโร ขาณุเก นิขณิตฺวา เตสุ พนฺธิตฺวา สพฺพปริยนฺเต อุทกโต โมเจตฺวา มชฺเฌ โอตฺถริตฺวา ฆเฏน อุทกํ คณฺหนฺติ. มกสกุฏิกาติ จีวรกุฏิกา วุจฺจติ. २५९. यो न ददेय्याति म्हणजे ज्या भिक्खूकडे जलगाळणे नाही, त्याला जो देत नाही, त्याला आपत्ती होते. परंतु जो भिक्खू स्वतःच्या हातात जलगाळणे असतानाही याचना करतो, त्याला नाखुशीने देऊ नये. दण्डपरिस्सावनन्ति म्हणजे धोब्यांच्या खार गाळण्याच्या साधनाप्रमाणे, चार पायांच्या चौकटीवर कापड बांधून, मधल्या दांड्यावर पाणी ओतावे; ते दोन्ही भाग भरून गाळले जाते. ओत्थारकं नाम म्हणजे जे पाण्यात पसरून लहान घागरीने पाणी काढतात; ते कापड चार दांड्यांवर बांधून, पाण्यात चार खुंट्या ठोकून त्यावर बांधतात, सर्व कडा पाण्यापासून वर ठेवतात आणि मध्यभागी पसरून घागरीने पाणी काढतात. मकसकुटिकाति म्हणजे चीवराची बनवलेली लहान कुटी (झोपडी) म्हटले जाते। ๒๖๐. อภิสนฺนกายาติ เสมฺหาทิโทสุสฺสนฺนกายา. อคฺคฬวฏฺฏิ นาม ทฺวารพาหาย สมปฺปมาโณเยว อคฺคฬตฺถมฺโภ วุจฺจติ, ยตฺถ ตีณิ จตฺตาริ ฉิทฺทานิ กตฺวา สูจิโย เทนฺติ. กปิสีสกํ นาม ทฺวารพาหํ วิชฺฌิตฺวา ตตฺถ ปเวสิโต อคฺคฬปาสโก วุจฺจติ. สูจิกาติ ตตฺถ มชฺเฌ ฉิทฺทํ กตฺวา ปเวสิตา. ฆฏิกาติ อุปริ โยชิตา. มณฺฑลิกํ กาตุนฺติ นีจวตฺถุกํ จินิตุํ. ธูมเนตฺตนฺติ ธูมนิกฺขมนฉิทฺทํ. วาเสตุนฺติ คนฺเธน วาเสตุํ. อุทกฏฺฐานนฺติ อุทกตฺถปนฏฺฐานํ. ตตฺถ ฆเฏน อุทกํ ฐเปตฺวา สราวเกน วฬญฺเชตพฺพํ. โกฏฺฐโกติ ทฺวารโกฏฺฐโก. २६०. अभिसन्नकायाति म्हणजे कफ इत्यादी दोषांनी युक्त शरीर असलेले. अग्गळवट्टि नाम म्हणजे दाराच्या चौकटीच्या आकाराचा अडसर घालण्याचा खांब; ज्यामध्ये तीन किंवा चार छिद्रे करून अडसर (सुई) घालतात. कपिसीसकं नाम म्हणजे दाराची चौकट कोरून त्यात बसवलेला अडसर धरून ठेवणारा लाकडी सांधा (कपीशीर्षक) म्हटले जाते. सूचिकाति म्हणजे त्याच्या मध्यभागी छिद्र करून बसवलेली लहान कडी (लहान अडसर). घटिकाति म्हणजे वरच्या भागात जोडलेला मोठा अडसर. मण्डलिकं कातुन्ति म्हणजे सखल पाया (ओटा) बांधणे. धूमनेत्तन्ति म्हणजे धूर बाहेर जाण्याचे छिद्र. वासेतुन्ति म्हणजे सुगंधाने सुवासित करणे. उदकट्ठानन्ति म्हणजे पाणी ठेवण्याची जागा; तेथे घागरीने पाणी ठेवून वाटीने वापरावे. कोट्ठकोति म्हणजे प्रवेशद्वार (द्वारकोठक). ๒๖๑. ติสฺโส [Pg.51] ปฏิจฺฉาทิโยติ เอตฺถ ชนฺตาฆรปฏิจฺฉาทิ จ อุทกปฏิจฺฉาทิ จ ปริกมฺมํ กโรนฺตสฺเสว วฏฺฏติ, เสเสสุ อภิวาทนาทีสุ น วฏฺฏติ. วตฺถปฏิจฺฉาทิ สพฺพกมฺเมสุ วฏฺฏติ. อุทกํ น โหตีติ นฺหาโนทกํ น โหติ. २६१. तिस्सो पटिच्छादियोति म्हणजे तीन आच्छादने; येथे जंतघर (स्नानगृह) आच्छादन आणि जल आच्छादन हे केवळ अंगमर्दन (परिकर्म) करणाऱ्या भिक्खूलाच योग्य आहे, इतर अभिवादन इत्यादी कामांत योग्य नाही. वत्थपटिच्छादि म्हणजे वस्त्र आच्छादन सर्व कामांत योग्य आहे. उदकं न होतीति म्हणजे स्नानाचे पाणी नसणे। ๒๖๒. ตุลนฺติ ปณฺณิกานํ วิย อุทกอุพฺพาหนกตุลํ. กรกฏโก วุจฺจติ โคเณ วา โยเชตฺวา หตฺเถหิ วา คเหตฺวา ทีฆวรตฺตาทีหิ อากฑฺฒนยนฺตํ. จกฺกวฏฺฏกนฺติ อรหฏฆฏิยนฺตํ. จมฺมขณฺฑํ นาม ตุลาย วา กรกฏเก วา โยเชตพฺพกํ จมฺมภาชนํ. ปากฏา โหตีติ อปริกฺขิตฺตา โหติ. อุทกปุญฺฉนีติ ทณฺฑมยาปิ วิสาณมยาปิ ทารุมยาปิ วฏฺฏติ, ตสฺสา อสติ โจฬเกนาปิ อุทกํ ปจฺจุทฺธริตุํ วฏฺฏติ. २६२. तुलन्ति म्हणजे भाजीपाला पिकवणाऱ्या शेतकऱ्यांच्या पाणी उपसण्याच्या लाटाप्रमाणे (विहिरीवरून पाणी काढण्याचा मोठा दांडा). करकटको म्हणजे बैल जोडून किंवा हाताने धरून, लांब दोरीने ओढण्याचे यंत्र (कपिला). चक्कवट्टकन्ति म्हणजे रहाटगाडगे (चाकीचे यंत्र). चम्मचण्डं नाम म्हणजे लाटावर किंवा रहाटावर जोडण्याचे चामड्याचे भांडे (मोठ). पाकटा होतीति म्हणजे कुंपण नसलेली (उघडी) असणे. उदकपुञ्छनी म्हणजे पाणी पुसण्याचे साधन; ते दाताचे, शिंगाचे किंवा लाकडाचे बनवलेले देखील चालते; ते नसल्यास कापडाच्या तुकड्याने देखील पाणी पुसणे योग्य आहे। ๒๖๓. อุทกมาติกนฺติ อุทกสฺส อาคมนมาติกํ. นิลฺเลขชนฺตาฆรํ นาม อาวิทฺธปกฺขปาสกํ วุจฺจติ, โคปานสีนํ อุปริ มณฺฑเล ปกฺขปาสเก ฐเปตฺวา กตกูฏจฺฉทนสฺเสตํ นามํ. จาตุมาสํ นิสีทเนนาติ นิสีทเนน จตฺตาโร มาเส น วิปฺปวสิตพฺพนฺติ อตฺโถ. २६३. उदकमातिकन्ति म्हणजे पाणी येण्याचा पाट (कालवा). निल्लेखजंन्ताघरं नाम म्हणजे गोपानासीच्या (वाशांच्या) वरच्या वर्तुळावर बाजूचे वासे ठेवून बनवलेले शिखरदार छप्पर असलेले जंतघर. चातुमासं निसीदनेनाति म्हणजे निसिदन (बैठकीचे कापड) सोडून चार महिने राहू नये, असा अर्थ आहे। ๒๖๔. ปุปฺผาภิกิณฺเณสูติ ปุปฺเผหิ สนฺถเตสุ. นมตกํ นาม เอฬกโลเมหิ กตํ อวายิมํ จมฺมขณฺฑปริหาเรน ปริภุญฺชิตพฺพํ. อาสิตฺตกูปธานํ นาม ตมฺพโลเหน วา รชเตน วา กตาย เปฬาย เอตํ อธิวจนํ, ปฏิกฺขิตฺตตฺตา ปน ทารุมยาปิ น วฏฺฏติ. มโฬริกาติ ทณฺฑธารโก วุจฺจติ. ยฏฺฐิอาธารกปณฺณาธารกปจฺฉิกปิฏฺฐานิปิ เอตฺเถว ปวิฏฺฐานิ. อาธารกสงฺเขปคมนโต หิ ปฏฺฐาย ฉิทฺทํ วิทฺธมฺปิ อวิทฺธมฺปิ วฏฺฏติเยว. เอกภาชเนติ เอตฺถ สเจ เอโก ภิกฺขุ ภาชนโต ผลํ วา ปูวํ วา คเหตฺวา คจฺฉติ, ตสฺมึ อปคเต อิตรสฺส เสสกํ ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. อิตรสฺสาปิ ตสฺมึ ขีเณ ปุน คเหตุํ วฏฺฏติ. २६४. पुप्फाभिकिण्णेसूति म्हणजे फुलांनी अंथरलेल्या (सजविलेल्या). नमतकं नाम म्हणजे मेंढीच्या केसांपासून बनवलेले न विणलेले कापड (नमदा); ते चामड्याच्या तुकड्याच्या कडेने वापरावे. आसित्तकूपधानं नाम म्हणजे तांब्यापासून किंवा चांदीपासून बनवलेल्या टोपलीचे नाव; परंतु लाकडाची टोपली निषिद्ध असल्याने ती योग्य नाही. मळोरिकाति म्हणजे पात्राचा (भिक्षापात्राचा) आधार असलेला दांडा. यट्ठिआधारक-पण्णाधारक-पच्छिकपिट्ठानिपी म्हणजे काठीचा आधार, पानांचा आधार, टोपलीचा तळ हे देखील यातच समाविष्ट आहेत. आधारकाच्या संक्षेपात समाविष्ट झाल्यापासून, छिद्र असलेले, आरपार छिद्र असलेले किंवा छिद्र नसलेले देखील योग्यच आहे. एकभाजनेति म्हणजे एकाच पात्रात; येथे जर एक भिक्खू पात्रातून फळ किंवा गोड पदार्थ (खाद्य) घेऊन जातो, तर तो निघून गेल्यावर दुसऱ्या भिक्खूला उरलेले खाणे योग्य आहे. दुसऱ्या भिक्खूचे ते संपल्यावर पुन्हा घेणे देखील योग्य आहे। ๒๖๕. อฏฺฐหงฺเคหีติ เอตฺถ เอเกเกนปิ องฺเคน สมนฺนาคตสฺส อนฺโตสีมาย วา นิสฺสีมํ คนฺตฺวา นทีอาทีสุ วา นิกฺกุชฺชิตุํ วฏฺฏติเยว. เอวํ นิกฺกุชฺชิเต ปน ปตฺเต ตสฺส เคเห โกจิ เทยฺยธมฺโม น คเหตพฺโพ [Pg.52] – ‘‘อสุกสฺส เคเห ภิกฺขํ มา คณฺหิตฺถา’’ติ อญฺเญสุ วิหาเรสุปิ เปเสตพฺพํ. อุกฺกุชฺชนกาเล ปน ยาวตติยํ ยาจาเปตฺวา หตฺถปาสํ วิชหาเปตฺวา ญตฺติทุติยกมฺเมน อุกฺกุชฺชิตพฺโพ. २६५. 'आठ अंगांनी' याविषयी, एका जरी अंगाने युक्त असलेल्या उपासकाच्या बाबतीत, बद्ध सीमेच्या आत किंवा सीमेबाहेर जाऊन नदी इत्यादींमध्ये (पात्र) पालथे करणे योग्यच आहे. अशा प्रकारे पात्र पालथे केले असता, त्याच्या घरातून कोणतीही दान देण्यायोग्य वस्तू (भिक्षा) स्वीकारू नये - "अमुक उपासकाच्या घरातून भिक्षा घेऊ नका" असे सांगून इतर विहारांमध्येही निरोप पाठवावा. पात्र सरळ (उताणे) करतेवेळी मात्र तीन वेळा विनंती करायला लावून, संघाचा हस्तपास सोडवून (उपासक वज्जनीय असल्याने हस्तपास सोडवून) ज्ञत्तिदुतीय कम्मवाचेने पात्र सरळ करावे. ๒๖๘. ปุรกฺขตฺวาติ อคฺคโต กตฺวา. สํหรนฺตูติ สํหริยนฺตุ. เจลปฏิกนฺติ เจลสนฺถรํ. โส กิร ‘‘สเจ อหํ ปุตฺตํ ลจฺฉามิ, อกฺกมิสฺสติ เม ภควา เจลปฏิก’’นฺติ อิมินา อชฺฌาสเยน สนฺถริ, อภพฺโพ เจส ปุตฺตลาภาย; ตสฺมา ภควา น อกฺกมิ. ยทิ อกฺกเมยฺย, ปจฺฉา ปุตฺตํ อลภนฺโต ‘‘นายํ สพฺพญฺญู’’ติ ทิฏฺฐึ คณฺเหยฺย. อิทํ ตาว ภควโต อนกฺกมเน การณํ. ยสฺมา ปน ภิกฺขูปิ เย อชานนฺตา อกฺกเมยฺยุํ, เต คิหีนํ ปริภูตา ภเวยฺยุํ; ตสฺมา ภิกฺขู ปริภวโต โมเจตุํ สิกฺขาปทํ ปญฺญเปสิ. อิทํ สิกฺขาปทปญฺญาปเน การณํ. २६८. 'पुरक्खत्वा' म्हणजे पुढे करून. 'संहरन्तु' म्हणजे गोळा केले जावे (किंवा काढून घेतले जावे). 'चेलपटिकं' म्हणजे वस्त्राचे अंथरूण. तो (बोधिसत्व राजकुमार) असे विचार करत होता की, "जर मला पुत्रप्राप्ती झाली, तर भगवान माझ्या या वस्त्राच्या अंथरूणावर पाय ठेवून चालतील," या आशेने त्याने ते अंथरले होते. परंतु तो पुत्रप्राप्तीसाठी अपात्र होता; म्हणून भगवान त्यावर चालले नाहीत. जर ते त्यावर चालले असते, आणि नंतर त्याला पुत्रप्राप्ती झाली नसती, तर "हे श्रमण गौतम सर्वज्ञ नाहीत" अशी मिथ्या दृष्टी त्याने घेतली असती. भगवंतांनी त्यावर न चालण्याचे हे पहिले कारण आहे. दुसरे कारण म्हणजे, जर इतर भिक्खूही न जाणता त्यावर चालले असते, तर ते गृहस्थांकडून तुच्छ मानले गेले असते; म्हणून भिक्खूंना अशा अपमानापासून वाचवण्यासाठी भगवंतांनी हा शिक्षापद प्रस्थापित केला. हे शिक्षापद प्रस्थापित करण्याचे कारण आहे. มงฺคลตฺถาย ยาจิยมาเนนาติ อปคตคพฺภา วา โหตุ ครุคพฺภา วา, เอวรูเปสุ ฐาเนสุ มงฺคลตฺถาย ยาจิยมาเนน อกฺกมิตุํ วฏฺฏติ. โธตปาทกํ นาม ปาทโธวนฏฺฐาเน โธเตหิ ปาเทหิ อกฺกมนตฺถาย ปจฺจตฺถรณํ อตฺถตํ โหติ, ตํ อกฺกมิตุํ วฏฺฏติ. 'मंगलकार्यासाठी विनंती केली असता' याविषयी, गर्भपात झालेली असो वा नुकतीच प्रसूती झालेली असो, किंवा गर्भवती असो, अशा प्रसंगी मंगलकार्यासाठी (वस्त्राच्या अंथरूणावर चालण्याची) विनंती केली असता, त्यावर चालणे योग्य आहे. 'धोतपादक' म्हणजे पाय धुण्याच्या ठिकाणी धुतलेल्या पायांनी चालण्यासाठी अंथरलेले अंथरूण होय, त्यावर चालणे योग्य आहे. ๒๖๙. กตกํ นาม ปทุมกณฺณิกาการํ ปาทฆํสนตฺถํ กณฺฏเก อุฏฺฐาเปตฺวา กตํ. ตํ วฏฺฏํ วา โหตุ จตุรสฺสาทิเภทํ วา, พาหุลิกานุโยคตฺตา ปฏิกฺขิตฺตเมว, เนว ปฏิคฺคเหตุํ น ปริภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. สกฺขราติ ปาสาโณ วุจฺจติ; ปาสาณเผณโกปิ วฏฺฏติ. วิธูปนนฺติ วีชนี วุจฺจติ. ตาลวณฺฏํ ปน ตาลปณฺเณหิ วา กตํ โหตุ เวฬุทนฺตวิลีเวหิ วา โมรปิญฺเฉหิ วา จมฺมวิกตีหิ วา สพฺพํ วฏฺฏติ. มกสพีชนี ทนฺตมยวิสาณมยทณฺฑกาปิ วฏฺฏติ, วากมยพีชนิยา เกตกปาโรหกุนฺตาลปณฺณาทิมยาปิ สงฺคหิตา. २६९. 'कटक' म्हणजे कमळाच्या कर्णिपेसारखा (कमळाच्या मध्यभागासारखा) पाय घासण्यासाठी काटे वर काढून तयार केलेला पायपुसणा होय. तो गोल असो वा चौकोनी इत्यादी प्रकारचा असो, विलासीपणाच्या प्रवृत्तीमुळे तो निषिद्धच आहे, तो स्वीकारणे किंवा वापरणे योग्य नाही. 'सक्खरा' म्हणजे दगड; दगडाचा फेस (दगडाचा सच्छिद्र तुकडा) वापरणे योग्य आहे. 'विधूपन' म्हणजे पंखा. ताडपत्राचा पंखा ताडाच्या पानांपासून बनवलेला असो, बांबू किंवा हस्तिदंताच्या कामट्यांपासून बनवलेला असो, मोराच्या पिसांपासून बनवलेला असो, किंवा चामड्याच्या विविध प्रकारांपासून बनवलेला असो, सर्व प्रकार योग्य आहेत. डास पळवण्याचा पंखा, हस्तिदंत किंवा शिंगाची दांडी असलेला पंखा देखील योग्य आहे. वल्कलाचा पंखा, केतकीच्या पानांचा पंखा इत्यादींचाही यात समावेश होतो. ๒๗๐. คิลานสฺส ฉตฺตนฺติ เอตฺถ ยสฺส กายฑาโห วา ปิตฺตโกโป วา โหติ, จกฺขุ วา ทุพฺพลํ, อญฺโญ วา โกจิ อาพาโธ วินา ฉตฺเตน อุปฺปชฺชติ, ตสฺส คาเม วา อรญฺเญ วา ฉตฺตํ วฏฺฏติ. วสฺเส ปน จีวรคุตฺตตฺถํ วาฬมิคโจรภเยสุ จ อตฺตคุตฺตตฺถมฺปิ วฏฺฏติ. เอกปณฺณจฺฉตฺตํ ปน สพฺพตฺเถว วฏฺฏติ. २७०. 'आजारी भिक्खूसाठी छत्री' याविषयी हा निर्णय समजावा: ज्याला अंगदाह (ज्वर) किंवा पित्तप्रकोप झाला असेल, किंवा डोळे अशक्त असतील, किंवा छत्रीशिवाय इतर कोणताही आजार उद्भवत असेल, तर त्याला गावात किंवा अरण्यात छत्री वापरणे योग्य आहे. पावसाळ्यात मात्र चीवराच्या रक्षणासाठी आणि हिंस्र श्वापदे किंवा चोरांच्या भयापासून स्वतःच्या रक्षणासाठी छत्री वापरणे योग्य आहे. एका पानाची छत्री (किंवा पंखा) मात्र सर्व ठिकाणी आणि सर्व वेळी वापरणे योग्य आहे. อสิสฺสาติ [Pg.53] อสิ อสฺส. วิชฺโชตลตีติ วิชฺโชตติ. ทณฺฑสมฺมุตินฺติ เอตฺถ ปมาณยุตฺโต จตุหตฺโถเยว ทณฺโฑ สมฺมนฺนิตฺวา ทาตพฺโพ. ตโต อูนาติริตฺโต วินาปิ สมฺมุติยา สพฺเพสํ วฏฺฏติ. สิกฺกา ปน อคิลานสฺส น วฏฺฏติ, คิลานสฺสาปิ สมฺมนฺนิตฺวาว ทาตพฺพา. 'असिस्स' म्हणजे त्याची तलवार. 'विज्जोतलति' म्हणजे चमकते. 'दंडसंमुति' याविषयी हा निर्णय समजावा: प्रमाणबद्ध म्हणजे चार हात लांबीचाच दंड (काठी) संमत करून द्यावा. त्यापेक्षा कमी किंवा जास्त लांबीचा दंड संमुतीशिवाय देखील सर्व भिक्खूंना (आजारी असो वा नसो) वापरणे योग्य आहे. परंतु 'सिक्का' (शिकं/झोळी) आजारी नसलेल्या भिक्खूला वापरणे योग्य नाही, आजारी भिक्खूला देखील ती संमत करूनच द्यावी. ๒๗๓. โรมนฺถกสฺสาติ เอตฺถ ฐเปตฺวา โรมนฺถกํ เสสานํ อาคตํ อุคฺคารํ มุเข สนฺธาเรตฺวา คิลนฺตานํ อาปตฺติ. สเจ ปน อสนฺธาริตเมว ปรคลํ คจฺฉติ, วฏฺฏติ. २७३. 'रोमंथक' (रवंथ करणाऱ्या) भिक्खूविषयी हा निर्णय समजावा: रवंथ करणाऱ्या भिक्खूला वगळून, इतर भिक्खूंच्या बाबतीत वर आलेली ओकारी तोंडात धरून ठेवून ती गिळल्यास आपत्ती होते. परंतु जर ती तोंडात न धरता थेट गळ्यातून खाली गेली, तर आपत्ती होत नाही. ยํ ทิยฺยมานนฺติ ยํ ทายเกหิ ทิยฺยมานํ ปฏิคฺคหิตภาชนโต พหิ ปติตํ, ตํ ภิกฺขุนา สามํ คเหตฺวา ปริภุญฺชิตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. อิทํ โภชนวคฺเค วณฺณิตเมว. 'जे दिले जात असताना' म्हणजे जे अन्न किंवा खाद्यपदार्थ दात्यांकडून दिले जात असताना भिक्षापात्राच्या बाहेर पडले असेल, ते भिक्खूने स्वतः उचलून ग्रहण करण्यास मी अनुमती देत आहे, असा अर्थ आहे. हे भोजनवग्गमध्ये माझ्याद्वारे स्पष्ट केलेच आहे. ๒๗๔. กุปฺปํ กริสฺสามีติ สทฺทํ กริสฺสามิ. นขาทีหิ นขจฺเฉทเน อาปตฺติ นตฺถิ, อนุรกฺขณตฺถํ ปน นขจฺเฉทนํ อนุญฺญาตํ. วีสติมฏฺฐนฺติ วีสติปิ นเข ลิขิตมฏฺเฐ การาเปนฺติ. มลมตฺตนฺติ นขโต มลมตฺตํ อปกฑฺฒิตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. २७४. 'कुप्पं करिस्सामि' म्हणजे मी आवाज (ओरडणे) करीन. नखांनी नखे कापल्यास आपत्ती नाही, परंतु (नखांचे) रक्षण करण्यासाठी नख कापण्याचे साधन (नखकापणी/कात्री) अनुमत केले आहे. 'वीसतिमट्ठं' म्हणजे वीसही नखे घासून गुळगुळीत करून घेतात. 'मलमत्तं' म्हणजे नखांमधील केवळ मळ काढून टाकण्यास मी अनुमती देत आहे, असा अर्थ आहे. ๒๗๕. ขุรสิปาฏิกนฺติ ขุรโกสกํ. มสฺสุํ กปฺปาเปนฺตีติ กตฺตริยา มสฺสุํ เฉทาเปนฺติ. มสฺสุํ วฑฺฒาเปนฺตีติ มสฺสุํ ทีฆํ กาเรนฺติ. โคโลมิกนฺติ หนุกมฺหิ ทีฆํ กตฺวา ฐปิตํ เอฬกมสฺสุ วุจฺจติ. จตุรสฺสกนฺติ จตุโกณํ. ปริมุขนฺติ อุเร โลมสํหรณํ. อฑฺฒทุกนฺติ อุทเร โลมราชิฏฺฐปนํ. อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ มสฺสุกปฺปาปนาทีสุ สพฺพตฺถ อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺส. อาพาธปฺปจฺจยา สมฺพาเธ โลมนฺติ คณฺฑวณรุธิอาทิอาพาธปฺปจฺจยา. กตฺตริกายาติ คณฺฑวณรุธิสีสโรคาพาธปฺปจฺจยา. สกฺขราทีหิ นาสิกาโลมคฺคาหาปเน อาปตฺติ นตฺถิ. อนุรกฺขณตฺถํ ปน สณฺฑาโส อนุญฺญาโต. น ภิกฺขเว ปลิตํ คาหาเปตพฺพนฺติ เอตฺถ ยํ ภมุกาย วา นลาเฏ วา ทาฐิกาย วา อุคฺคนฺตฺวา พีภจฺฉํ ฐิตํ, ตาทิสํ โลมํ ปลิตํ วา อปลิตํ วา คาหาเปตุํ วฏฺฏติ. २७५. 'खुरसिपाटिकं' म्हणजे वस्तऱ्याचे घर (म्यान). 'मस्सुं कप्पापेन्ति' म्हणजे कात्रीने दाढी कापतात. 'मस्सुं वड्ढापेन्ति' म्हणजे दाढी लांब वाढवतात. 'गोलोमिक' म्हणजे हनुवटीवर लांब ठेवून मेंढीच्या दाढीसारखी केलेली दाढी होय. 'चतुरस्सक' म्हणजे चौकोनी दाढी. 'परिमुख' म्हणजे छातीवरील केस काढणे. 'अड्ढदुक' म्हणजे पोटावर केसांची रेघ ठेवणे. 'आपत्ति दुक्कटस्स' म्हणजे दाढी कापणे इत्यादी सर्व बाबतीत दुक्कट आपत्ती होते. 'आजाराच्या कारणास्तव गुप्तांगावरील केस' म्हणजे गळू, जखम, रक्तस्त्राव इत्यादी आजारांच्या कारणास्तव गुप्तांगावरील केस काढण्यास अनुमती आहे. 'कत्तरिकाय' म्हणजे गळू, जखम, रक्तस्त्राव किंवा डोक्याचा आजार या कारणास्तव कात्रीने केस कापण्यास अनुमती आहे. खडे इत्यादींनी नाकातील केस उपटल्यास आपत्ती नाही, परंतु संरक्षणासाठी चिमटा वापरण्यास अनुमती दिली आहे. "भिक्खूंनो, पिकलेले केस उपटू नयेत" याविषयी हा निर्णय समजावा: जे केस भुवयांवर, कपाळावर किंवा गालावर वाढून कुरूप दिसत असतील, असे पांढरे किंवा काळे केस उपटणे योग्य आहे. ๒๗๗. กํสปตฺถริกาติ กํสภณฺฑวาณิชา. พนฺธนมตฺตนฺติ วาสิกตฺตรยฏฺฐิอาทีนํ พนฺธนมตฺตํ. २७७. 'कंसपत्थरिका' म्हणजे कांस्य धातूच्या भांड्यांचा व्यापार करणारे व्यापारी. 'बंधनमत्तं' म्हणजे वस्तरा, कात्री, काठी इत्यादींच्या टोकाला बांधण्याची दोरी किंवा कडे. ๒๗๘. น [Pg.54] ภิกฺขเว อกายพนฺธเนนาติ เอตฺถ อพนฺธิตฺวา นิกฺขมนฺเตน ยตฺถ สรติ, ตตฺถ พนฺธิตพฺพํ. อาสนสาลาย พนฺธิสฺสามีติ คนฺตุํ วฏฺฏติ. สริตฺวา ยาว น พนฺธติ, น ตาว ปิณฺฑาย จริตพฺพํ. กลาพุกํ นาม พหุรชฺชุกํ. เทฑฺฑุภกํ นาม อุทกสปฺปสีสสทิสํ. มุรชํ นาม มุรชวฏฺฏิสณฺฐานํ เวเฐตฺวา กตํ. มทฺทวีณํ นาม ปามงฺคสณฺฐานํ. อีทิสญฺหิ เอกมฺปิ น วฏฺฏติ, ปเคว พหูนิ. ปฏฺฏิกํ สูกรนฺตกนฺติ เอตฺถ ปกติวีตา วา มจฺฉกณฺฏกวายิมา วา ปฏฺฏิกา วฏฺฏติ, เสสา กุญฺชรจฺฉิกาทิเภทา น วฏฺฏนฺติ. สูกรนฺตกํ นาม กุญฺชิกาโกสกสณฺฐานํ โหติ. เอกรชฺชุกํ ปน มุทฺทิกกายพนฺธนญฺจ สูกรนฺตกํ อนุโลเมติ. อนุชานามิ ภิกฺขเว มุรชํ มทฺทวีณนฺติ อิทํ ทสาสุเยว อนุญฺญาตํ. ปามงฺคทสา เจตฺถ จตุนฺนํ อุปริ น วฏฺฏติ. โสภณํ นาม เวเฐตฺวา มุขวฏฺฏิสิพฺพนํ. คุณกํ นาม มุทิงฺคสณฺฐาเนน สิพฺพนํ; เอวํ สิพฺพิตา หิ อนฺตา ถิรา โหนฺติ. ปวนนฺโตติ ปาสนฺโต วุจฺจติ. २७८. "भिक्खूंनो, कंबरपट्टा न बांधता..." याविषयी हा निर्णय समजावा: कंबरपट्टा न बांधता विहाराबाहेर पडलेल्या भिक्खूला जेथे आठवण होईल, तेथे त्याने तो बांधावा. "मी आसनशाळेत (जेवणाच्या ठिकाणी) बांधेन" असा विचार करून जाणे योग्य आहे. आठवण होऊनही जोपर्यंत तो बांधत नाही, तोपर्यंत त्याने भिक्षेसाठी फिरू नये. 'कलाबुक' म्हणजे अनेक दोऱ्या असलेला कंबरपट्टा. 'देड्डुभक' म्हणजे पाण्याच्या सापाच्या डोक्यासारखा असलेला कंबरपट्टा. 'मुरज' म्हणजे मुरज (मृदंग) वाद्याच्या वेढ्यासारखा गुंडाळून बनवलेला कंबरपट्टा. 'मद्दवीण' म्हणजे साखळीच्या आकाराचा कंबरपट्टा. असा मद्दवीण कंबरपट्टा एक पदरी असला तरी योग्य नाही, मग बहुपदरी तर मुळीच योग्य नाही. 'पट्टिकं सूकरन्तकं' याविषयी, साधी विणलेली पट्टी किंवा माशाच्या काट्यासारखी विणलेली पट्टी योग्य आहे; हत्तीच्या डोळ्यासारखी विणलेली पट्टी इत्यादी इतर प्रकार योग्य नाहीत. 'सूकरन्तक' म्हणजे किल्लीच्या पिशवीसारख्या आकाराचा कंबरपट्टा होय. एक दोरी असलेला कंबरपट्टा आणि मुद्रिकेसारखा (अंगठीसारखा) कंबरपट्टा सूकरन्तक कंबरपट्ट्याशी सुसंगत आहे. "भिक्खूंनो, मी मुरज आणि मद्दवीण यांना अनुमती देतो" हे केवळ कंबरपट्ट्याच्या गोंड्यांच्या (झालरीच्या) बाबतीतच अनुमत आहे. आणि यात साखळीसारखे गोंडे चारपेक्षा जास्त असणे योग्य नाही. 'सोभण' म्हणजे कडा गुंडाळून शिवणे. 'गुणक' म्हणजे मृदंगाच्या आकारासारखे शिवणे; अशा प्रकारे शिवल्याने कंबरपट्ट्याची टोके मजबूत होतात. 'पवानन्तो' म्हणजे कडीचे टोक (फासा) होय. ๒๘๐. หตฺถิโสณฺฑกํ นาม นาภิมูลโต หตฺถิโสณฺฑสณฺฐานํ โอลมฺพกํ กตฺวา นิวตฺถํ โจฬิกอิตฺถีนํ นิวาสนํ วิย. มจฺฉวาฬกํ นาม เอกโต ทสนฺตํ เอกโต ปาสนฺตํ โอลมฺเพตฺวา นิวตฺถํ. จตุกณฺณกํ นาม อุปริ ทฺเว, เหฏฺฐโต ทฺเวติ เอวํ จตฺตาโร กณฺเณ ทสฺเสตฺวา นิวตฺถํ. ตาลวณฺฏกํ นาม ตาลวณฺฏากาเรน สาฏกํ โอลมฺเพตฺวา นิวาสนํ. สตวลิกํ นาม ทีฆสาฏกํ อเนกกฺขตฺตุํ โอภญฺชิตฺวา โอวฏฺฏิกํ กโรนฺเตน นิวตฺถํ, วามทกฺขิณปสฺเสสุ วา นิรนฺตรํ วลิโย ทสฺเสตฺวา นิวตฺถํ. สเจ ปน ชาณุโต ปฏฺฐาย เอกา วา ทฺเว วา วลิโย ปญฺญายนฺติ, วฏฺฏติ. २८०. 'हत्तीच्या सोंडेसारखे नेसणे' (हत्थिसोण्डक) म्हणजे नाभीच्या मुळापासून हत्तीच्या सोंडेच्या आकारासारखे लोंबते ठेवून नेसणे, जसे चोळ देशातील स्त्रियांचे नेसणे असते. 'माशाच्या शेपटीसारखे नेसणे' (मच्छवाळक) म्हणजे एका बाजूला वस्त्राचा काठ (झालर) आणि दुसऱ्या बाजूला फासा लोंबणारा ठेवून नेसणे. 'चार कोपऱ्यांचे नेसणे' (चतुकण्णक) म्हणजे वर दोन आणि खाली दोन अशा प्रकारे चार कोपरे दाखवून नेसणे. 'ताडपत्राच्या पंख्यासारखे नेसणे' (तालवण्टक) म्हणजे ताडपत्राच्या पंख्याच्या आकाराप्रमाणे वस्त्र लोंबते ठेवून नेसणे. 'शंभर घड्यांचे नेसणे' (सतवलिक) म्हणजे लांब वस्त्राला अनेक वेळा दुमडून कंबरपट्टा (ओवट्टिक) बनवून नेसणे, किंवा डाव्या व उजव्या बाजूला सतत घड्या दाखवून नेसणे. परंतु जर गुडघ्यापासून खाली एक किंवा दोन घड्या दिसत असतील, तर ते योग्य आहे. สํเวลฺลิยํ นิวาเสนฺตีติ มลฺลกมฺมการาทโย วิย กจฺฉํ พนฺธิตฺวา นิวาเสนฺติ; เอวํ นิวาเสตุํ คิลานสฺสปิ มคฺคปฺปฏิปนฺนสฺสปิ น วฏฺฏติ. ยมฺปิ มคฺคํ คจฺฉนฺตา เอกํ วา ทฺเว วา โกเณ อุกฺขิปิตฺวา อนฺตรวาสกสฺส อุปริ ลคฺเคนฺติ, อนฺโต วา เอกํ กาสาวํ ตถา นิวาเสตฺวา พหิ อปรํ นิวาเสนฺติ, สพฺพํ น วฏฺฏติ. คิลาโน ปน อนฺโต กาสาวสฺส โอวฏฺฏิกํ ทสฺเสตฺวา อปรํ อุปริ นิวาเสตุํ ลภติ. อคิลาเนน ทฺเว นิวาเสนฺเตน สคุณํ [Pg.55] กตฺวา นิวาเสตพฺพานิ. อิติ ยญฺจ อิธ ปฏิกฺขิตฺตํ, ยญฺจ เสขิยวณฺณนายํ; ตํ สพฺพํ วชฺเชตฺวา นิพฺพิการํ ติมณฺฑลํ ปฏิจฺฉาเทนฺเตน ปริมณฺฑลํ นิวาเสตพฺพํ. ยํกิญฺจิ วิการํ กโรนฺโต ทุกฺกฏา น มุจฺจติ. น ภิกฺขเว คิหิปารุตํ ปารุปิตพฺพนฺติ เอวํ ปฏิกฺขิตฺตํ คิหิปารุตํ อปารุปิตฺวา, อุโภ กณฺเณ สมํ กตฺวา ปารุปนํ ปริมณฺฑลปารุปนํ นาม, ตํ ปารุปิตพฺพํ. 'संवेल्लीय' पद्धतीने नेसणे म्हणजे मल्ल किंवा कामगार इत्यादींप्रमाणे कास घालून (काष्टा मारून) नेसणे; अशा प्रकारे नेसणे आजारी भिक्खूला किंवा प्रवासाला निघालेल्या भिक्खूलाही कल्पत नाही (योग्य नाही). प्रवासात जाताना एक किंवा दोन कोपरे वर उचलून अंतर्वासकाच्या (नेसूच्या वस्त्राच्या) वर खोचणे, किंवा आत एक काषाय वस्त्र तशा प्रकारे नेसून बाहेरून दुसरे वस्त्र नेसणे, हे सर्व अयोग्य आहे. परंतु आजारी भिक्खू आतल्या काषाय वस्त्राची घडी (ओवट्टिक) दाखवून वरून दुसरे वस्त्र नेसू शकतो. निरोगी भिक्खूने दोन वस्त्रे नेसायची असल्यास ती दुहेरी करून नेसली पाहिजेत. अशा प्रकारे, जे येथे वर्ज्य केले आहे आणि जे सेखिय नियमांच्या वर्णनात वर्ज्य केले आहे, त्या सर्वांचा त्याग करून, कोणताही विकार (विचित्रपणा) न करता, तिन्ही मंडले (दोन्ही गुडघे आणि नाभी) झाकून गोल (परिमंडल) नेसले पाहिजे. जो कोणी विचित्र प्रकारे नेसतो, तो दुक्कट आपत्तीतून सुटू शकत नाही. "भिक्खूंनो, गृहस्थांप्रमाणे वस्त्र पांघरू नये" अशा प्रकारे वर्ज्य केलेले गृहस्थांचे पांघरूण न पांघरता, दोन्ही कोपरे समान करून पांघरण्याला 'परिमंडल पांघरूण' म्हणतात, तसेच पांघरले पाहिजे. ตตฺถ ยํกิญฺจิ เสตปฏปารุตํ ปริพฺพาชกปารุตํ เอกสาฏกปารุตํ โสณฺฑปารุตํ อนฺเตปุริกปารุตํ มหาเชฏฺฐกปารุตํ กุฏิปเวสกปารุตํ พฺราหฺมณปารุตํ ปาฬิการกปารุตนฺติ เอวมาทิ ปริมณฺฑลลกฺขณโต อญฺญถา ปารุตํ, สพฺพเมตํ คิหิปารุตํ นาม. ตสฺมา ยถา เสตปฏา อฑฺฒปาลกนิคณฺฐา ปารุปนฺติ, ยถา จ เอกจฺเจ ปริพฺพาชกา อุรํ วิวริตฺวา ทฺวีสุ อํสกูเฏสุ ปาวุรณํ ฐเปนฺติ, ยถา จ เอกสาฏกา มนุสฺสา นิวตฺถสาฏกสฺส เอเกนนฺเตน ปิฏฺฐึ ปารุปิตฺวา อุโภ กณฺเณ อุโภสุ อํสกูเฏสุ ฐเปนฺติ, ยถา จ สุราโสณฺฑาทโย สาฏเกน คีวํ ปริกฺขิปนฺตา อุโภ อนฺเต อุทเร วา โอลมฺเพนฺติ; ปิฏฺฐิยํ วา ขิปนฺติ, ยถา จ อนฺเตปุริกาโย อกฺขิตารกมตฺตํ ทสฺเสตฺวา โอคุณฺฐิกํ ปารุปนฺติ, ยถา จ มหาเชฏฺฐา ทีฆสาฏกํ นิวาเสตฺวา ตสฺเสว เอเกนนฺเตน สกลสรีรํ ปารุปนฺติ, ยถา จ กสฺสกา เขตฺตกุฏึ ปวิสนฺตา สาฏกํ ปลิเวเฐตฺวา อุปกจฺฉเก ปกฺขิปิตฺวา ตสฺเสว เอเกนนฺเตน สรีรํ ปารุปนฺติ, ยถา จ พฺราหฺมณา อุภินฺนํ อุปกจฺฉกานํ อนฺตเรน สาฏกํ ปเวเสตฺวา อํสกูเฏสุ ปกฺขิปนฺติ, ยถา จ ปาฬิการโก ภิกฺขุ เอกํสปารุปเนน ปารุตํ วามพาหุํ วิวริตฺวา จีวรํ อํสกูฏํ อาโรเปติ; เอวํ อปารุปิตฺวา สพฺเพปิ เอเต อญฺเญ จ เอวรูเป ปารุปนโทเส วชฺเชตฺวา นิพฺพิการํ ปริมณฺฑลํ ปารุปิตพฺพํ. ตถา อปารุปิตฺวา อาราเม วา อนฺตรฆเร วา อนาทเรน ยํกิญฺจิ วิการํ กโรนฺตสฺส ทุกฺกฏํ. त्यामध्ये, पांढरे वस्त्र नेसणाऱ्यांचे पांघरूण, परिव्राजकांचे पांघरूण, एकच वस्त्र पांघरणाऱ्यांचे पांघरूण, मद्यपींचे पांघरूण, अंतःपुरातील स्त्रियांचे पांघरूण, मुख्य कारागिरांचे पांघरूण, शेतातील झोपडीत प्रवेश करणाऱ्यांचे पांघरूण, ब्राह्मणांचे पांघरूण, रांगेत बसणाऱ्या भिक्खूंचे पांघरूण इत्यादी जे काही परिमंडल लक्षणापेक्षा वेगळ्या प्रकारे पांघरले जाते, ते सर्व 'गृहस्थांचे पांघरूण' म्हटले जाते. म्हणून, ज्याप्रमाणे पांढरे वस्त्र नेसणारे अर्धपालक निगंठ पांघरतात; ज्याप्रमाणे काही परिव्राजक छाती उघडी ठेवून दोन्ही खांद्यांवर पांघरूण ठेवतात; ज्याप्रमाणे एकच वस्त्र नेसणारे लोक नेसलेल्या वस्त्राच्या एका टोकाने पाठ झाकून दोन्ही कोपरे दोन्ही खांद्यांवर ठेवतात; ज्याप्रमाणे मद्यपी इत्यादी वस्त्राने गळा गुंडाळून दोन्ही टोके छातीवर लोंबती ठेवतात किंवा पाठीवर टाकतात; ज्याप्रमाणे अंतःपुरातील स्त्रिया केवळ डोळे दिसतील एवढेच उघडे ठेवून डोक्यावरून बुरखा घेऊन पांघरतात; ज्याप्रमाणे मुख्य कारागीर लांब वस्त्र नेसून त्याच्याच एका टोकाने संपूर्ण शरीर पांघरतात; ज्याप्रमाणे शेतकरी शेतातील झोपडीत प्रवेश करताना वस्त्र गुंडाळून काखेत खोचतात आणि त्याच्याच एका टोकाने शरीर पांघरतात; ज्याप्रमाणे ब्राह्मण दोन्ही काखेच्या मधून वस्त्र घालून खांद्यांवर टाकतात; आणि ज्याप्रमाणे रांगेत बसणारा भिक्खू एका खांद्यावरून पांघरलेल्या वस्त्रातून डावा हात उघडा करून चीवर खांद्यांवर चढवतो; अशा प्रकारे न पांघरता, हे सर्व आणि इतर अशाच प्रकारचे पांघरण्याचे दोष टाळून, कोणताही विकार न करता परिमंडल (गोल) पांघरले पाहिजे. तसे न पांघरता आरामात किंवा घरांच्या वस्तीत (अंतर्गृहात) अनादराने कोणताही विचित्रपणा करणाऱ्या भिक्खूला दुक्कट आपत्ती होते. ๒๘๑. มุณฺฑวฏฺฏีติ ยถา รญฺโญ กุหิญฺจิ คจฺฉโต ปริกฺขารภณฺฑวหนมนุสฺสาติ อธิปฺปาโย. อนฺตรากาชนฺติ มชฺเฌ ลคฺเคตฺวา ทฺวีหิ วหิตพฺพภารํ. २८१. 'मुंडवट्टी' म्हणजे राजा कोठे जात असताना त्याच्या उपकरणांचे गाठोडे वाहून नेणारे लोक ज्याप्रमाणे दोन्ही बाजूंनी कावड वाहून नेतात, तसा अर्थ आहे. 'अंतराकाज' म्हणजे मध्ये ओझे अडकवून दोघांनी वाहून नेण्याचे ओझे. ๒๘๒. อจกฺขุสฺสนฺติ [Pg.56] จกฺขูนํ หิตํ น โหติ; ปริหานึ ชเนติ. นจฺฉาเทตีติ น รุจฺจติ. อฏฺฐงฺคุลปรมนฺติ มนุสฺสานํ ปมาณงฺคุเลน อฏฺฐงฺคุลปรมํ. อติมฏาหกนฺติ อติขุทฺทกํ. २८२. 'अचक्खुस्स' म्हणजे डोळ्यांसाठी हितकारक नसलेले; जे डोळ्यांना हानी पोहोचवते (दृष्टी कमजोर करते). 'नच्छादेति' म्हणजे आवडत नाही. 'अठ्ठंगुलपरमं' म्हणजे माणसांच्या प्रमाणभूत बोटांच्या मापाने जास्तीत जास्त आठ बोटे लांबीचे (दंतकाष्ठ). 'अतिमटाहकं' म्हणजे अत्यंत लहान (दंतकाष्ठ). ๒๘๓. ทายํ อาลิมฺเปนฺตีติ ติณวนาทีสุ อคฺคึ เทนฺติ. ปฏคฺคินฺติ ปฏิอคฺคึ. ปริตฺตนฺติ อปฺปหริตกรเณน วา ปริขาขณเนน วา ปริตฺตาณํ. เอตฺถ ปน อนุปสมฺปนฺเน สติ สยํ อคฺคึ ทาตุํ น ลภติ, อสติ อคฺคิมฺปิ ทาตุํ ลภติ, ภูมึ ตจฺเฉตฺวา ติณานิปิ หริตุํ, ปริขมฺปิ ขณิตุํ, อลฺลสาขํ ภญฺชิตฺวาปิ อคฺคึ นิพฺพาเปตุํ ลภติ, เสนาสนํ ปตฺตํ วา อปฺปตฺตํ วา ตถา นิพฺพาเปตุํ ลภติเยว. อุทเกน ปน กปฺปิเยเนว ลภติ, น อิตเรน. २८३. 'दायं आलिंपेन्ति' म्हणजे गवत, जंगल इत्यादींना आग लावतात. 'पटग्गि' म्हणजे प्रति-अग्नी (आगीच्या समोर लावलेली आग). 'परित्तं' म्हणजे हिरवे गवत इत्यादी काढून टाकून किंवा खंदक खणून केलेली सुरक्षा. येथे जर अनुपसंपन्न (सामणेर किंवा गृहस्थ) हजर असेल, तर स्वतः आग लावण्याची परवानगी नाही; तो हजर नसल्यास स्वतः आग लावण्याचीही परवानगी आहे. जमीन खरवडून गवत काढून टाकण्याची, खंदक खणण्याची, आणि ओल्या फांद्या तोडून आग विझवण्याचीही परवानगी आहे. विहारापर्यंत पोहोचलेली किंवा न पोहोचलेली आग अशा प्रकारे विझवण्याची परवानगी आहेच. पाण्याने विझवायचे असल्यास केवळ कल्पिय (योग्य) पाण्यानेच विझवण्याची परवानगी आहे, इतर पाण्याने नाही. ๒๘๔. สติ กรณีเยติ สุกฺขกฏฺฐาทิคฺคหณกิจฺเจ สติ. โปริสิยนฺติ ปุริสปฺปมาณํ. อาปทาสูติ วาฬมิคาทโย วา ทิสฺวา มคฺคมูฬฺโห วา ทิสา โอโลเกตุกาโม หุตฺวา ทวฑาหํ วา อุทโกฆํ วา อาคจฺฉนฺตํ ทิสฺวา เอวรูปาสุ อาปทาสุ อติอุจฺจมฺปิ รุกฺขํ อาโรหิตุํ วฏฺฏติ. २८४. 'सति करणीये' म्हणजे सुके लाकूड इत्यादी गोळा करण्याचे काम असताना. 'पोरिसियं' म्हणजे माणसाच्या उंचीइतक्या उंचीपर्यंत झाडावर चढणे. 'आपदासु' म्हणजे हिंस्र श्वापद इत्यादींना पाहून, किंवा रस्ता चुकल्यामुळे दिशा पाहण्याची इच्छा असताना, किंवा वणवा अथवा पाण्याचा पूर येताना पाहून, अशा प्रकारच्या आपत्तींमध्ये अत्यंत उंच झाडावर चढणेही योग्य आहे. ๒๘๕. กลฺยาณวากฺกรณาติ มธุรสทฺทา. ฉนฺทโส อาโรเปมาติ เวทํ วิย สกฺกตภาสาย วาจนามคฺคํ อาโรเปม. สกาย นิรุตฺติยาติ เอตฺถ สกา นิรุตฺติ นาม สมฺมาสมฺพุทฺเธน วุตฺตปฺปกาโร มาคธิโก โวหาโร. २८५. 'कल्याणवाक्करण' म्हणजे मधुर आवाज असलेले. 'छन्दसो आरोपेम' म्हणजे वेदांप्रमाणे संस्कृत भाषेमध्ये बुद्धवचनांचे पठण करणे. 'सकाय निरुत्तिया' यामध्ये 'सका निरुत्ति' (स्वतःची भाषा) म्हणजे सम्यक्संबुद्धांनी उपदेशिलेली मागधी भाषा (मागधी व्यवहार) होय. ๒๘๖. โลกายตํ นาม สพฺพํ อุจฺฉิฏฺฐํ, สพฺพํ อนุจฺฉิฏฺฐํ, เสโต กาโก, กาโฬ พโก; อิมินา จ อิมินา จ การเณนาติ เอวมาทินิรตฺถกการณปฏิสํยุตฺตํ ติตฺถิยสตฺถํ. २८६. 'लोकायतन' म्हणजे "सर्व काही उच्छिष्ट (उरलेले) आहे, सर्व काही अनुच्छिष्ट आहे; कावळा पांढरा असतो, बगळा काळा असतो; या आणि या कारणामुळे" इत्यादी निरर्थक कारणांशी संबंधित असलेले तीर्थकांचे (पाखंड्यांचे) शास्त्र होय. ๒๘๘. อนฺตรา อโหสีติ อนฺตริตา อโหสิ ปฏิจฺฉนฺนา. २८८. 'अंतरा अहोसि' म्हणजे खंडित झाली किंवा झाकली गेली. ๒๘๙. อาพาธปฺปจฺจยาติ ยสฺส อาพาธสฺส ลสุณํ เภสชฺชํ; ตปฺปจฺจยาติ อตฺโถ. २८९. 'आबाधपच्चया' म्हणजे ज्या आजारासाठी लसूण हे औषध आहे, त्या आजाराच्या कारणास्तव, असा अर्थ आहे. ๒๙๐. ปสฺสาวปาทุกนฺติ เอตฺถ ปาทุกา อิฏฺฐกาหิปิ สิลาหิปิ ทารูหิปิ กาตุํ วฏฺฏติ. วจฺจปาทุกายปิ เอเสว นโย. ปริเวณนฺติ วจฺจกุฏิปริกฺเขปพฺภนฺตรํ. २९०. 'पस्सावपादुका' (लघवी करण्याची पाटी) यामध्ये विटांनी, दगडांनी किंवा लाकडाने पादुका बनवणे योग्य आहे. शौचाच्या पादुकेबाबतही (वच्चपादुका) हाच नियम आहे. 'परिवेण' म्हणजे शौचकुटीच्या कुंपणाच्या आतील जागा. ๒๙๓. ยถาธมฺโม [Pg.57] กาเรตพฺโพติ ทุกฺกฏวตฺถุมฺหิ ทุกฺกเฏน ปาจิตฺติยวตฺถุมฺหิ ปาจิตฺติเยน กาเรตพฺโพ. ปหรณตฺถํ กตํ ปหรณีติ วุจฺจติ, ยสฺส กสฺสจิ อาวุธสงฺขาตสฺเสตํ อธิวจนํ, ตํ ฐเปตฺวา อญฺญํ สพฺพํ โลหภณฺฑํ อนุชานามีติ อตฺโถ. กตกญฺจ กุมฺภการิกญฺจาติ เอตฺถ กตกํ วุตฺตเมว. กุมฺภการิกญฺจาติ ธนิยสฺเสว สพฺพมตฺติกามยกุฏิ วุจฺจติ. เสสํ สพฺพตฺถ อุตฺตานเมวาติ. २९३. धम्माप्रमाणे (नियमांनुसार) कारवाई करावी म्हणजे दुक्कट (दुष्कृत) प्रकरणात दुक्कट आपत्तीद्वारे आणि पाचित्तिय प्रकरणात पाचित्तिय आपत्तीद्वारे कारवाई करावी. प्रहार करण्यासाठी (मारण्यासाठी) बनवलेल्या वस्तूला 'पहरणी' असे म्हणतात; हे कोणत्याही शस्त्राचे नाव आहे. ते वगळून इतर सर्व धातूच्या भांड्यांना (लोहभांड्यांना) मी अनुमती देतो, असा याचा अर्थ आहे. 'कतकं च कुंभकारिकं च' यामध्ये 'कतक' आधीच सांगितले आहे. 'कुंभकारिक' म्हणजे धनीय थेराची संपूर्ण मातीची कुटी होय. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. ขุทฺทกวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. खुद्दकवत्थु कथा समाप्त झाली. ขุทฺทกวตฺถุกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. खुद्दकवत्थु खंधकाचे वर्णन (वण्णना) समाप्त झाले. ๖. เสนาสนกฺขนฺธกํ ६. सेनासनखंधक วิหารานุชานนกถา विहार अनुमती कथा ๒๙๔. เสนาสนกฺขนฺธเก [Pg.58] – อปญฺญตฺตํ โหตีติ อนนุญฺญาตํ โหติ. วิหาโร นาม อฑฺฒโยคาทิมุตฺตโก อวเสสาวาโส. อฑฺฒโยโคติ สุปณฺณวงฺกเคหํ. ปาสาโทติ ทีฆปาสาโท. หมฺมิยนฺติ อุปริอากาสตเล ปติฏฺฐิตกูฏาคาโร ปาสาโทเยว. คุหาติ อิฏฺฐกาคุหา สิลาคุหา ทารุคุหา ปํสุคุหา. อาคตานาคตสฺส จาตุทฺทิสสฺส สงฺฆสฺสาติ อาคตสฺส จ อนาคตสฺส จ จตูสุ ทิสาสุ อปฺปฏิหตจารสฺส จาตุทฺทิสสฺส สงฺฆสฺส. २९४. सेनासन खंधकामध्ये – 'अपञ्ञत्तं होति' म्हणजे अनुमती न दिलेले असते. 'विहार' म्हणजे अढयोग इत्यादी सोडून उर्वरित निवासस्थान होय. 'अढयोग' म्हणजे गरुडाच्या पंखासारखे वक्र छप्पर असलेले घर. 'प्रासाद' म्हणजे लांब प्रासाद (इमारत). 'हम्मिय' म्हणजे वर उघड्या गच्चीवर शिखर असलेली प्रासादवजा इमारत. 'गुहा' म्हणजे विटांची गुहा, दगडाची गुहा, लाकडाची गुहा आणि मातीची गुहा होय. 'आगत-अनागताय चातुर्दिसाय संघाय' म्हणजे आलेल्या आणि न आलेल्या, चारही दिशांना विनाअडथळा संचार करणाऱ्या चातुर्दिश संघासाठी. ๒๙๕. อนุโมทนคาถาสุ – สีตํ อุณฺหนฺติ อุตุวิสภาควเสน วุตฺตํ. สิสิเร จาปิ วุฏฺฐิโยติ เอตฺถ สิสิโรติ สมฺผุสิตกวาโต วุจฺจติ. วุฏฺฐิโยติ อุชุกเมฆวุฏฺฐิโย เอว. เอตานิ สพฺพานิ ปฏิหนฺตีติ อิมินาว ปเทน โยเชตพฺพานิ. २९५. अनुमोदन गाथांमध्ये – 'शीत आणि उष्ण' हे प्रतिकूल ऋतूंच्या प्रभावामुळे भगवंतांनी म्हटले आहे. 'शिशिरे चापि वुट्ठियो' यामध्ये 'शिशिर' म्हणजे थंड व वेगवान वारा आणि 'वुट्ठि' म्हणजे थेट पडणारा पाऊस होय. या सर्वांचा संबंध 'पठिहन्ति' (नष्ट करतात/दूर करतात) या एकाच पदाशी जोडला पाहिजे. ปฏิหญฺญตีติ วิหาเรน ปฏิหญฺญติ. เลณตฺถนฺติ นิลียนตฺถํ. สุขตฺถนฺติ สีตาทิปริสฺสยาภาเวน สุขวิหารตฺถํ. ฌายิตุญฺจ วิปสฺสิตุนฺติ อิทมฺปิ ปททฺวยํ ‘‘สุขตฺถญฺจา’’ติ อิมินาว ปเทน โยเชตพฺพํ. อิทญฺหิ วุตฺตํ โหติ – สุขตฺถญฺจ วิหารทานํ, กตมํ สุขตฺถํ? ฌายิตุํ วิปสฺสิตุญฺจ ยํ สุขํ, ตทตฺถํ. อถ วา ปรปเทนปิ โยเชตพฺพํ – ฌายิตุญฺจ วิปสฺสิตุญฺจ วิหารทานํ; อิธ ฌายิสฺสนฺติ วิปสฺสิสฺสนฺตีติ ททโต วิหารทานํ สงฺฆสฺส อคฺคํ พุทฺเธน วณฺณิตํ. วุตฺตญฺเหตํ – ‘‘โส จ สพฺพทโท โหติ, โย ททาติ อุปสฺสย’’นฺติ (สํ. นิ. ๑.๔๒). 'पठिहञ्ञति' म्हणजे विहाराद्वारे दूर केले जाते. 'लेणत्थं' म्हणजे आश्रयासाठी (क्रीडा/विश्रांतीसाठी). 'सुखत्थं' म्हणजे थंडी इत्यादी उपद्रव नसल्यामुळे सुखाने राहण्यासाठी. 'झायितुं च विपस्सितुं' (ध्यान करण्यासाठी आणि विपश्यना करण्यासाठी) हे दोन्ही शब्द 'सुखत्थञ्च' या पदाशी जोडले पाहिजेत. याचा अर्थ असा आहे – विहाराचे दान सुखासाठी आहे. कोणते सुख? ध्यान आणि विपश्यना केल्याने जे सुख मिळते, त्या सुखासाठी. किंवा पुढील पदाशीही जोडता येईल – ध्यान करण्यासाठी आणि विपश्यना करण्यासाठी विहाराचे दान दिले जाते; 'येथे ते ध्यान करतील आणि विपश्यना करतील' असा विचार करून संघाला विहार दान देणाऱ्याचे दान बुद्धांनी सर्वश्रेष्ठ म्हटले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – 'जो आश्रय (विहार) देतो, तो सर्व काही देणारा ठरतो' (संयुत्त निकाय १.४२). ยสฺมา จ อคฺคํ วณฺณิตํ, ‘‘ตสฺมา หิ ปณฺฑิโต โปโส’’ติ คาถา. วาสเยตฺถ พหุสฺสุเตติ เอตฺถ วิหาเร ปริยตฺติพหุสฺสุเต จ ปฏิเวธพหุสฺสุเต จ วาเสยฺย. เตสํ อนฺนญฺจาติ ยํ เตสํ อนุจฺฉวิกํ อนฺนญฺจ ปานญฺจ วตฺถานิ จ มญฺจปีฐาทิเสนาสนานิ จ, ตํ สพฺพํ เตสุ อุชุภูเตสุ อกุฏิลจิตฺเตสุ. ทเทยฺยาติ นิทเหยฺย. ตญฺจ โข วิปฺปสนฺเนน เจตสา น [Pg.59] จิตฺตปฺปสาทํ วิราเธตฺวา, เอวํ วิปฺปสนฺนจิตฺตสฺส หิ เต ตสฺส ธมฺมํ เทเสนฺติ…เป… ปรินิพฺพาติ อนาสโวติ. आणि ज्याअर्थी हे सर्वश्रेष्ठ म्हटले आहे, म्हणूनच 'तस्मा हि पण्डितो पोसो' (म्हणून शहाण्या माणसाने विहार बांधावेत) ही गाथा आली आहे. 'वासेयेत्थ बहुस्सुते' म्हणजे या विहारात परियत्ति-बहुश्रुत (ग्रंथ शिकलेले) आणि पटिवेध-बहुश्रुत (अनुभवी) भिक्खूंना राहू द्यावे. 'तेसं अन्नञ्च' म्हणजे त्यांना योग्य असे अन्न, पेय, वस्त्र आणि खाट-पाट (मंच-पीठ) इत्यादी सेनासने द्यावीत. हे सर्व सरळ आणि निष्कपट मनाच्या भिक्खूंना द्यावे. 'ददेय्य' म्हणजे अर्पण करावे. आणि ते प्रसन्न चित्ताने द्यावे, मनातील प्रसन्नता नष्ट न करता. अशा प्रसन्न चित्त असलेल्या दात्याला ते धम्माचा उपदेश करतात... आणि तो या शासनात सत्य जाणून घेऊन अनास्रव (आसवरहित) होऊन परिनिर्वाण प्राप्त करतो. ๒๙๖. อาวิญฺฉนจฺฉิทฺทํ อาวิญฺฉนรชฺชุนฺติ เอตฺถ รชฺชุ นาม สเจปิ ทีปินงฺคุฏฺเฐน กตา โหติ, วฏฺฏติเยว; น กาจิ น วฏฺฏติ. ตีณิ ตาฬานีติ ติสฺโส กุญฺจิกาโย. ยนฺตกํ สูจิกนฺติ เอตฺถ ยํ ยํ ชานาติ ตํ ตํ ยนฺตกํ, ตสฺส วิวรณสูจิกญฺจ กาตุํ วฏฺฏติ. เวทิกาวาตปานํ นาม เจติเย เวทิกาสทิสํ. ชาลวาตปานํ นาม ชาลกพทฺธํ. สลากวาตปานํ นาม ถมฺภกวาตปานํ. จกฺกลิกนฺติ เอตฺถ โจฬกปาทปุญฺฉนํ พนฺธิตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. วาตปานภิสีติ วาตปานปฺปมาเณน ภิสึ กตฺวา พนฺธิตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. มิฑฺฒินฺติ มิฑฺฒกํ. พิทลมญฺจกนฺติ เวตฺตมญฺจํ; เวฬุวิลีเวหิ วา วีตํ. २९६. 'आविञ्छनच्छिद्दं आविञ्छनरज्जुं' यामध्ये 'रज्जु' (दोरी) जर बिबट्याच्या शेपटीने बनवली असेल, तरीही ती चालते; कोणतीही दोरी चालणार नाही असे नाही. 'तीणि ताळानि' म्हणजे तीन किल्ल्या. 'यन्तकं सूचिकं' यामध्ये जे काही यंत्र म्हणून ओळखले जाते ते 'यंतक' होय, आणि ते उघडण्याची किल्ली बनवणे योग्य आहे. 'वेदिकावातपान' म्हणजे चैत्यातील वेदिकेसारखी खिडकी. 'जालवातपान' म्हणजे जाळी बसवलेली खिडकी. 'सलाकावातपान' म्हणजे सळ्या बसवलेली खिडकी. 'चक्कलिका' म्हणजे चिंध्यांपासून बनवलेले पायपुसणे बांधण्याची मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. 'वातपानभिसि' म्हणजे खिडकीच्या आकाराची गादी बनवून ती बांधण्याची मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. 'मिद्धिं' म्हणजे लाकूड किंवा मातीचे लहान आसन. 'बिदल मञ्चकं' म्हणजे वेताची खाट किंवा बांबूच्या कामट्यांनी विणलेली खाट होय. ๒๙๗. อาสนฺทิโกติ จตุรสฺสปีฐํ วุจฺจติ. อุจฺจกมฺปิ อาสนฺทิกนฺติ วจนโต เอกโตภาเคน ทีฆปีฐเมว หิ อฏฺฐงฺคุลปาทกํ วฏฺฏติ, จตุรสฺสอาสนฺทิโก ปน ปมาณาติกฺกนฺโตปิ วฏฺฏตีติ เวทิตพฺโพ. สตฺตงฺโค นาม ตีสุ ทิสาสุ อปสฺสยํ กตฺวา กตมญฺโจ, อยมฺปิ ปมาณาติกฺกนฺโต วฏฺฏติ. ภทฺทปีฐนฺติ เวตฺตมยํ ปีฐํ วุจฺจติ. ปีฐิกาติ ปิโลติกาพทฺธปีฐเมว. เอฬกปาทปีฐํ นาม ทารุปฏฺฏิกาย อุปริ ปาเท ฐเปตฺวา โภชนผลกํ วิย กตปีฐํ วุจฺจติ. อามลกวฏฺฏิกปีฐํ นาม อามลกากาเรน โยชิตํ พหุปาทกปีฐํ. อิมานิ ตาว ปาฬิยํ อาคตปีฐานิ. ทารุมยํ ปน สพฺพํ ปีฐํ วฏฺฏตีติ อยเมตฺถ วินิจฺฉโย. โกจฺฉนฺติ อุสิรมยํ วา มุญฺชปพฺพชมยํ วา. २९७. 'आसन्दिको' म्हणजे चौरस पाट होय. 'उच्चकम्पि आसन्दिकं' या वचनानुसार, एका बाजूने लांब असलेला आणि आठ बोटे पाय असलेला पाट चालतो. परंतु चौरस आसंदिक हा प्रमाणाबाहेर असला तरीही चालतो, असे समजावे. 'सत्तंग' म्हणजे तीन बाजूंनी टेकण्यासाठी आधार असलेली खाट; ही देखील प्रमाणाबाहेर असली तरी चालते. 'भद्दपीठ' म्हणजे वेताचा पाट होय. 'पीठिका' म्हणजे कपड्याने विणलेला पाट. 'एळकपादपीठ' म्हणजे लाकडी फळीवर पाय ठेवून जेवणाच्या टेबलासारखा बनवलेला पाट होय. 'आमलकवट्टिकपीठ' म्हणजे आवळ्याच्या आकाराचे अनेक पाय असलेला पाट. हे पाळीमध्ये आलेले पाट आहेत. लाकडाचे बनवलेले सर्व पाट चालतात, हा येथे निर्णय आहे. 'कोच्छ' म्हणजे वाळ्याचे किंवा मुंज व पब्बज गवताचे बनवलेले आसन होय. อฏฺฐงฺคุลปรมํ มญฺจปฏิปาทกนฺติ เอตฺถ มนุสฺสานํ ปมาณงฺคุลเมว อฏฺฐงฺคุลํ. จิมิลิกา นาม ปริกมฺมกตาย ภูมิยา ฉวิสํรกฺขณตฺถาย อตฺถรณํ วุจฺจติ. รุกฺขตูลนฺติ สิมฺพลิรุกฺขาทีนํ เยสํ เกสญฺจิ รุกฺขานํ ตูลํ. ลตาตูลนฺติ ขีรวลฺลิอาทีนํ ยาสํ กาสญฺจิ วลฺลีนํ ตูลํ. โปฏกิตูลนฺติ โปฏกิติณาทีนํ เยสํ เกสญฺจิ ติณชาติกานํ อนฺตมโส อุจฺฉุนฬาทีนมฺปิ ตูลํ. เอเตหิ ตีหิ สพฺพภูตคามา สงฺคหิตา โหนฺติ. รุกฺขวลฺลิติณชาติโย หิ มุญฺจิตฺวา อญฺโญ ภูตคาโม นาม นตฺถิ, ตสฺมา ยสฺส กสฺสจิ ภูตคามสฺส ตูลํ พิมฺโพหเน [Pg.60] วฏฺฏติ, ภิสึ ปน ปาปุณิตฺวา สพฺพมฺเปตํ อกปฺปิยตูลนฺติ วุจฺจติ. น เกวลญฺจ พิมฺโพหเน เอตํ ตูลเมว, หํสโมราทีนํ สพฺพสกุณานํ สีหาทีนํ สพฺพจตุปฺปทานญฺจ โลมมฺปิ วฏฺฏติ. ปิยงฺคุปุปฺผพกุฬปุปฺผาทิ ปน ยํกิญฺจิ ปุปฺผํ น วฏฺฏติ. ตมาลปตฺตํ สุทฺธเมว น วฏฺฏติ, มิสฺสกํ ปน วฏฺฏติ. ภิสีนํ อนุญฺญาตํ ปญฺจวิธํ อุณฺณาทิตูลมฺปิ วฏฺฏติ. 'अट्ठंगुलपरमं मञ्चपटिपादकं' यामध्ये 'आठ बोटे' म्हणजे माणसाच्या बोटांच्या प्रमाणातील आठ बोटे होय. 'चिमिलिका' म्हणजे सारवलेल्या जमिनीचा पृष्ठभाग खराब होऊ नये म्हणून त्यावर अंथरलेले आच्छादन होय. 'रुक्खतूल' म्हणजे शेवरी इत्यादी कोणत्याही झाडांचा कापूस. 'लतातूल' म्हणजे दूध देणाऱ्या वेली इत्यादी कोणत्याही वेलींचा कापूस. 'पोठकीतूल' म्हणजे पोठकी गवत इत्यादी तृणवर्गीय वनस्पतींचा, अगदी ऊस व बोरू इत्यादींचाही कापूस होय. या तिन्हींमध्ये सर्व वनस्पतींचा (भूतगामांचा) समावेश होतो. कारण झाडे, वेली आणि गवत सोडून इतर कोणतीही वनस्पती नाही. म्हणून कोणत्याही वनस्पतीचा कापूस उशीमध्ये चालतो. परंतु गादी बनवण्यासाठी हा सर्व कापूस 'अकप्पिय' (अयोग्य) कापूस मानला जातो. केवळ उशीमध्ये हाच कापूस चालतो असे नाही, तर हंस, मोर इत्यादी सर्व पक्ष्यांचे आणि सिंह इत्यादी सर्व प्राण्यांचे केस/पिसे देखील चालतात. परंतु प्रियंगू, बकुळ इत्यादी कोणतीही फुले चालत नाहीत. तमालपत्र केवळ स्वतःच चालत नाही, परंतु मिश्रित केलेले चालते. गाद्यांसाठी अनुमती दिलेला पाच प्रकारचा लोकर इत्यादी कापूस देखील उशीमध्ये चालतो. อทฺธกายิกานีติ อุปฑฺฒกายปฺปมาณานิ, เยสุ กฏิโต ปฏฺฐาย ยาว สีสํ อุปทหนฺติ. สีสปฺปมาณํ นาม ยสฺส วิตฺถารโต ตีสุ กณฺเณสุ ทฺวินฺนํ กณฺณานํ อนฺตรํ มินียมานํ วิทตฺถิ เจว จตุรงฺคุลญฺจ โหติ, มชฺฌฏฺฐานํ มุฏฺฐิรตนํ โหติ. ทีฆโต ปน ทิยฑฺฒรตนํ วา ทฺวิรตนํ วาติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. อยํ สีสปฺปมาณสฺส อุกฺกฏฺฐปริจฺเฉโท. อิโต อุทฺธํ น วฏฺฏติ, เหฏฺฐา ปน วฏฺฏติ. อคิลานสฺส สีสุปธานญฺจ ปาทุปธานญฺจาติ ทฺวยเมว วฏฺฏติ. คิลานสฺส พิมฺโพหนานิ สนฺถริตฺวา อุปริ ปจฺจตฺถรณํ กตฺวา นิปชฺชิตุมฺปิ วฏฺฏติ. ‘‘ยานิ ปน ภิสีนํ อนุญฺญาตานิ ปญฺจ กปฺปิยตูลานิ, เตหิ พิมฺโพหนํ มหนฺตมฺปิ วฏฺฏตี’’ติ ผุสฺสเทวตฺเถโร อาห. วินยธรอุปติสฺสตฺเถโร ปน ‘‘พิมฺโพหนํ กริสฺสามี’ติ กปฺปิยตูลํ วา อกปฺปิยตูลํ วา ปกฺขิปิตฺวา กโรนฺตสฺส ปมาณเมว วฏฺฏตี’’ติ อาห. अर्धकायिक म्हणजे अर्ध्या शरीराच्या आकाराचे, ज्यावर कंबरेपासून डोक्यापर्यंत टेकवले जाते. 'शीषप्रमाण' (डोक्याच्या आकाराची उशी) म्हणजे ज्याच्या रुंदीमध्ये तीन कोनांपैकी दोन कोनांमधील अंतर मोजले असता एक वीत आणि चार बोटे असते, आणि मध्यभाग एक मुठीसह हात (मुष्टि-रत्न) असतो. लांबीने मात्र ते दीड हात किंवा दोन हात असते, असे 'कुरुंदी' मध्ये म्हटले आहे. हे शीषप्रमाण उशीचे कमाल परिमाण (मर्यादा) आहे. यापेक्षा जास्त आकाराचे अयोग्य आहे, परंतु कमी आकाराचे योग्य आहे. निरोगी व्यक्तीसाठी डोक्याची उशी आणि पायाची उशी या दोनच गोष्टी योग्य आहेत. आजारी व्यक्तीसाठी उश्या पसरवून त्यावर चादर घालून झोपणे देखील योग्य आहे. 'परंतु गाद्यांसाठी जी पाच प्रकारची कल्प्य कापूस अनुमत आहेत, त्यांनी बनवलेली उशी मोठी असली तरी योग्य आहे,' असे फुस्सदेव स्थविरांनी म्हटले आहे. परंतु विनयधर उपतिस्स स्थविरांनी म्हटले आहे की, 'मी उशी बनवीन' असे म्हणून कल्प्य कापूस किंवा अकल्प्य कापूस भरून बनवणाऱ्यासाठी प्रमाणातीलच (उशी) योग्य आहे. ปญฺจ ภิสิโยติ ปญฺจหิ อุณฺณาทีหิ ปูริตภิสิโย. ตูลคณนาย หิ เอตาสํ คณนา วุตฺตา. ตตฺถ อุณฺณคฺคหเณน น เกวลํ เอฬกโลมเมว คหิตํ, ฐเปตฺวา มนุสฺสโลมํ ยํกิญฺจิ กปฺปิยากปฺปิยมํสชาตีนํ ปกฺขิจตุปฺปทานํ โลมํ, สพฺพํ อิธ อุณฺณคฺคหเณเนว คหิตํ. ตสฺมา ฉนฺนํ จีวรานํ ฉนฺนํ อนุโลมจีวรานญฺจ อญฺญตเรน ภิสิจฺฉวึ กตฺวา ตํ สพฺพํ ปกฺขิปิตฺวา ภิสึ กาตุํ วฏฺฏติ. เอฬกโลมานิ ปน อปกฺขิปิตฺวา กมฺพลเมว จตุคฺคุณํ วา ปญฺจคุณํ วา ปกฺขิปิตฺวา กตาปิ อุณฺณภิสิสงฺขฺยเมว คจฺฉติ. 'पाच गाद्या' म्हणजे लोकरी इत्यादी पाच प्रकारच्या वस्तूंनी भरलेल्या गाद्या. कापसाच्या गणनेनुसार भगवंतांनी यांची गणना सांगितली आहे. तेथे 'उण्ण' (लोकर) या शब्दाने केवळ मेंढीचे केसच घेतले जात नाहीत, तर मानवी केस वगळून कल्प्य किंवा अकल्प्य मांस असलेल्या पक्षी व चतुष्पाद प्राण्यांचे जे काही केस आहेत, ते सर्व येथे 'उण्ण' या शब्दानेच घेतले जातात. म्हणून सहा प्रकारच्या चीवरांपैकी किंवा सहा प्रकारच्या अनुलोम चीवरांपैकी कोणत्याही एका कापडाने गादीचे कव्हर बनवून, त्यात ते सर्व केस भरून गादी बनवणे योग्य आहे. मेंढीचे केस न भरता केवळ घोंगडीच चार पदरी किंवा पाच पदरी करून आत भरून बनवलेली गादी देखील 'उण्णभिसि' (लोकरीची गादी) याच संज्ञेस प्राप्त होते. โจฬภิสิอาทีสุ ยํกิญฺจิ นวโจฬํ วา ปุราณโจฬํ วา สํหริตฺวา วา อนฺโต ปกฺขิปิตฺวา วา กตา โจฬภิสิ, ยํกิญฺจิ วากํ ปกฺขิปิตฺวา กตา วากภิสิ, ยํกิญฺจิ ติณํ ปกฺขิปิตฺวา กตา ติณภิสิ, อญฺญตฺร สุทฺธตมาลปตฺตํ ยํกิญฺจิ ปณฺณํ ปกฺขิปิตฺวา กตา ปณฺณภิสีติ เวทิตพฺพา. ตมาลปตฺตํ ปน อญฺเญน มิสฺสเมว วฏฺฏติ, สุทฺธํ น วฏฺฏติ. ภิสิยา ปมาณนิยโม [Pg.61] นตฺถิ, มญฺจภิสิ ปีฐภิสิ ภูมตฺถรณภิสิ จงฺกมนภิสิ ปาทปุญฺฉนภิสีติ เอตาสํ อนุรูปโต สลฺลกฺเขตฺวา อตฺตโน รุจิวเสน ปมาณํ กาตพฺพํ. ยํ ปเนตํ อุณฺณาทิปญฺจวิธตูลมฺปิ ภิสิยํ วฏฺฏติ, ตํ ‘‘มสูรเกปิ วฏฺฏตี’’ติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. เอเตน มสูรกํ ปริภุญฺชิตุํ วฏฺฏตีติ สิทฺธํ โหติ. चोळभिसि (कापडाची गादी) इत्यादींमध्ये निर्णय असा समजावा: कोणतेही नवीन कापड किंवा जुने कापड घडी करून किंवा आत भरून बनवलेली गादी म्हणजे 'चोळभिसि' होय. कोणतीही झाडाची साल (वाक) आत भरून बनवलेली गादी म्हणजे 'वाकभिसि' होय. कोणतेही गवत आत भरून बनवलेली गादी म्हणजे 'तिणभिसि' (गवताची गादी) होय. केवळ तमालपत्राची पाने वगळून इतर कोणतीही पाने आत भरून बनवलेली गादी म्हणजे 'पण्णभिसि' (पानांची गादी) समजावी. तमालपत्राची पाने मात्र इतर पानांसोबत मिश्रित करूनच वापरणे योग्य आहे, केवळ तमालपत्राची पाने भरणे अयोग्य आहे. गादीच्या आकाराचा कोणताही निश्चित नियम नाही. मंचक-गादी (पलंगावरील गादी), पीठ-गादी (पाटावरील गादी), भूमत्थरण-गादी (जमिनीवरील गादी), चंक्रमण-गादी (चालण्याच्या मार्गावरील गादी), पादपुंछन-गादी (पाय पुसण्याची गादी) - यांच्या गरजेनुसार आणि स्वतःच्या आवडीनुसार आकार ठरवावा. गादीसाठी जे पाच प्रकारचे लोकरी इत्यादी कापूस योग्य आहेत, ते 'मसूराक' (चामड्याची गादी) साठी देखील योग्य आहेत, असे 'कुरुंदी' मध्ये म्हटले आहे. यावरून मसूराक वापरणे योग्य आहे, हे सिद्ध होते. มญฺจภิสึ ปีเฐ สนฺถรนฺตีติ มญฺจภิสึ ปีเฐ อตฺถรนฺติ; อตฺถรณตฺถาย หรนฺตีติ ยุชฺชติ. อุลฺโลกํ อกริตฺวาติ เหฏฺฐา จิมิลิกํ อทตฺวา. โผสิตุนฺติ รชเนน วา หลิทฺทิยา วา อุปริ ผุสิตานิ ทาตุํ. ภตฺติกมฺมนฺติ ภิสิจฺฉวิยา อุปริ ภตฺติกมฺมํ. หตฺถภตฺตินฺติ ปญฺจงฺคุลิภตฺตึ. 'मंचक-गादी पाटावर पसरतात' म्हणजे मंचक-गादी पाटावर पसरतात; किंवा पसरवण्यासाठी नेतात, असा अर्थ योग्य आहे. 'उल्लोक न करता' म्हणजे खाली जाड कापड (चिमिलिका) न घालता. 'शिंपडणे' म्हणजे रंगाने किंवा हळदीने वर ठिपके देणे. 'भत्तिकम्म' म्हणजे गादीच्या कव्हरवर नक्षीकाम करणे. 'हत्थभत्ति' म्हणजे पाच बोटांचे ठसे उमटवून नक्षीकाम करणे. ๒๙๘. อิกฺกาสนฺติ รุกฺขนิยฺยาสํ วา สิเลสํ วา. ปิฏฺฐมทฺทนฺติ ปิฏฺฐขลึ. กุณฺฑกมตฺติกนฺติ กุณฺฑกมิสฺสกมตฺติกํ. สาสปกุฏฺฏนฺติ สาสปปิฏฺฐํ. สิตฺถเตลกนฺติ วิลีนมธุสิตฺถกํ. อจฺจุสฺสนฺนํ โหตีติ พินฺทุ พินฺทุ หุตฺวา ติฏฺฐติ. ปจฺจุทฺธริตุนฺติ ปุญฺฉิตุํ. คณฺฑุมตฺติกนฺติ คณฺฑุปฺปาทคูถมตฺติกํ. กสาวนฺติ อามลกหรีตกานํ กสาวํ. २९८. 'इक्कास' म्हणजे झाडाचा डिंक किंवा सरस. 'पिठ्ठमद्द' म्हणजे पिठाची खळ. 'कुण्डकमत्तिक' म्हणजे कोंडा मिश्रित केलेली माती. 'सासपकुट्ट' म्हणजे मोहरीचे पीठ. 'सित्थतेलुक' म्हणजे वितळलेले मधमाशांचे मेण. 'अच्चुस्सन्न होते' म्हणजे थेंब थेंब होऊन राहणे. 'पच्चुद्धरितुं' म्हणजे पुसून टाकणे. 'गण्डुमत्तिक' म्हणजे गांडुळाची माती. 'कसाव' म्हणजे आवळा आणि हिरडा यांचा काढा. ๒๙๙. น ภิกฺขเว ปฏิภานจิตฺตนฺติ เอตฺถ น เกวลํ อิตฺถิปุริสรูปเมว, ติรจฺฉานรูปมฺปิ อนฺตมโส คณฺฑุปฺปาทรูปมฺปิ ภิกฺขุโน สยํ กาตุํ วา ‘‘กโรหี’’ติ วตฺตุํ วา น วฏฺฏติ, ‘‘อุปาสก ทฺวารปาลํ กโรหี’’ติ วตฺตุมฺปิ น ลพฺภติ. ชาตกปกรณอสทิสทานาทีนิ ปน ปสาทนียานิ นิพฺพิทาปฏิสํยุตฺตานิ วา วตฺถูนิ ปเรหิ การาเปตุํ ลพฺภติ. มาลากมฺมาทีนิ สยมฺปิ กาตุํ ลพฺภติ. २९९. 'भिक्खूंनो, कल्पक चित्र (प्रतिभानचित्र) काढू नये' या पाठात केवळ स्त्री-पुरुषांचे चित्रच नव्हे, तर प्राण्यांचे चित्र, अगदी गांडुळाचे चित्र देखील भिक्खूने स्वतः काढणे किंवा 'काढ' असे सांगणे अयोग्य आहे. 'उपासका, द्वारपाल बनव' असे सांगण्याची देखील परवानगी नाही. परंतु जातक कथेतील प्रसंग, असदृश दान इत्यादी प्रसन्नता निर्माण करणारे किंवा वैराग्याशी संबंधित विषय इतरांकडून बनवून घेण्याची परवानगी आहे. फुलांची नक्षी (मालाकर्म) इत्यादी स्वतः देखील करण्याची परवानगी आहे. ๓๐๐. อฬกมนฺทาติ เอกงฺคณา มนุสฺสาภิกิณฺณา. ตโย คพฺเภติ เอตฺถ สิวิกาคพฺโภติ จตุรสฺสคพฺโภ. นาฬิกาคพฺโภติ วิตฺถารโต ทิคุณติคุณายาโม ทีฆคพฺโภ. หมฺมิยคพฺโภติ อากาสตเล กูฏาคารคพฺโภ วา มุณฺฑจฺฉทนคพฺโภ วา. ३००. 'अलकमंदा' म्हणजे एकच अंगण असलेले आणि माणसांनी गजबजलेले नगर. 'तीन खोल्या' या पाठात: 'शिविकागर्भ' म्हणजे चौकोनी खोली. 'नाळिकागर्भ' म्हणजे रुंदीपेक्षा दुप्पट किंवा तिप्पट लांबी असलेली लांब खोली. 'हम्मियगर्भ' म्हणजे उघड्या छतावर असलेली शिखराची खोली किंवा सपाट छताची खोली होय. กลงฺกปาทกนฺติ รุกฺขํ วิชฺฌิตฺวา ตตฺถ ขาณุเก อาโกเฏตฺวา กตํ, ตํ อาหริมํ ภิตฺติปาทํ ชิณฺณกุฏฺฏปาทสฺส อุปตฺถมฺภนตฺถํ ภูมิยํ ปติฏฺฐาเปตุํ อนุชานามีติ [Pg.62] อตฺโถ. ปริตฺตาณกิฏิกนฺติ วสฺสปริตฺตาณตฺถํ กิฏิกํ. อุทฺทสุธนฺติ วจฺฉกโคมเยน เจว ฉาริกาย จ สทฺธึ มทฺทิตมตฺติกํ. 'कलंकपादक' म्हणजे लाकडाला छिद्र करून त्यात खुंट्या ठोकून बनवलेला पाया. तो हलवता येणारा भिंतीचा पाया जीर्ण झालेल्या भिंतीला आधार देण्यासाठी जमिनीवर स्थापित करण्याची मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. 'परित्राणकिटिक' म्हणजे पावसापासून संरक्षणासाठी बनवलेला पडदा. 'उद्दसुधा' म्हणजे वासराचे शेण आणि राख एकत्र करून मळलेली माती. อาฬินฺโท นาม ปมุขํ วุจฺจติ. ปฆนํ นาม ยํ นิกฺขมนฺตา จ ปวิสนฺตา จ ปาเทหิ หนนฺติ, ตสฺส วิหารทฺวาเร อุภโต กุฏฺฏํ นีหริตฺวา กตปเทสสฺเสตํ อธิวจนํ, ‘‘ปฆาน’’นฺติปิ วุจฺจติ. ปกุฏฺฏนฺติ มชฺเฌ คพฺภสฺส สมนฺตา ปริยาคาโร วุจฺจติ. ‘‘ปกุฏ’’นฺติปิ ปาโฐ. โอสารกนฺติ อนาฬินฺทเก วิหาเร วํสํ ทตฺวา ตโต ทณฺฑเก โอสาเรตฺวา กตฉทนปมุขํ. สํสารณกิฏิโก นาม จกฺกลยุตฺโต กิฏิโก. 'आळिंद' म्हणजे ओसरी (व्हरांडा). 'पघन' म्हणजे जेथे बाहेर जाणारे आणि आत येणारे पायांनी स्पर्श करतात. विहाराच्या दाराच्या दोन्ही बाजूंना भिंत बाहेर काढून बनवलेल्या जागेचे हे नाव आहे, याला 'पघान' असेही म्हणतात. 'पकुट्ट' म्हणजे मध्यवर्ती खोलीच्या सभोवताली फिरता येणारा मार्ग. 'पकुट' असाही पाठ आहे. 'ओसारक' म्हणजे ओसरी नसलेल्या विहारात बांबू लावून, त्यावरून लाकडी दांडे खाली सोडून बनवलेले छप्पर. 'संसरणकिटिक' म्हणजे चाके असलेला सरकता पडदा. ๓๐๑. ปานียภาชนนฺติ ปิวนฺตานํ ปานียทานภาชนํ. อุฬุงฺโก จ ถาลกญฺจ ปานียสงฺขสฺส อนุโลมานิ. ३०१. 'पानीयभाजन' म्हणजे पाणी पिणाऱ्यांना पाणी देण्याचे भांडे. पळी आणि वाटी हे पिण्याच्या पाण्याच्या पात्राला अनुरूप आहेत. ๓๐๓. อเปสีติ ทีฆทารุมฺหิ ขาณุเก ปเวเสตฺวา กณฺฏกสาขาหิ วินนฺธิตฺวา กตํ ทฺวารถกนกํ. ปลิโฆติ คามทฺวาเรสุ วิย จกฺกยุตฺตํ ทฺวารถกนกํ. ३०३. 'अपेसी' म्हणजे लांब लाकडात खुंट्या बसवून आणि काट्यांच्या फांद्यांनी बांधून बनवलेले दार बंद करण्याचे साधन. 'परिघ' म्हणजे गावाच्या वेशीप्रमाणे चाके असलेले दार बंद करण्याचे साधन. ๓๐๕. อสฺสตรีหิ ยุตฺตา รถา อสฺสตรีรถา. อามุตฺตมณิกุณฺฑลาติ อามุตฺตมณิกุณฺฑลานิ. ३०५. खेचरांनी जोडलेले रथ म्हणजे 'अस्सतरीरथ'. 'आमुत्त मणिकुंडल' म्हणजे रत्नांची कर्णफुले परिधान केलेले. ปรินิพฺพุโตติ กิเลสปรินิพฺพาเนน ปรินิพฺพุโต. สีติภูโตติ กิเลสาตปาภาเวน สีติภูโต. นิรูปธีติ กิเลสุปธิอภาเวน นิรูปธีติ วุจฺจติ. 'परिनिब्बुतो' (परिनिर्वृत) म्हणजे क्लेशांच्या परिनिर्वाणाने शांत झालेला. 'शीतीभूत' म्हणजे क्लेशांच्या संतापाच्या अभावामुळे शीतल झालेला. 'निरुपधी' म्हणजे क्लेशरूपी उपाधीच्या अभावामुळे 'निरुपधी' असे म्हटले जाते. สพฺพา อาสตฺติโย เฉตฺวาติ รูปาทีสุ วา วิสเยสุ สพฺพภเวสุ วา ปตฺถนาโย ฉินฺทิตฺวา. หทเย ทรนฺติ จิตฺเต กิเลสทรถํ วิเนตฺวา. เวยฺยายิกนฺติ วยกรณํ วุจฺจติ. 'सर्व आसक्ती तोडून' म्हणजे रूप इत्यादी विषयांवरील किंवा सर्व भवांवरील तृष्णा नष्ट करून. 'हृदयात संताप' म्हणजे चित्तातील क्लेशांचा संताप दूर करून. 'वैय्यायिक' म्हणजे खर्च करण्याचे साधन म्हटले जाते. ๓๐๗. อาเทยฺยวาโจติ ตสฺส วจนํ พหู ชนา อาทิยิตพฺพํ โสตพฺพํ มญฺญนฺตีติ อตฺโถ. อาราเม อกํสูติ เย สธนา, เต อตฺตโน ธเนน อกํสุ. เย มนฺทธนา เจว อธนา จ, เตสํ ธนํ อทาสิ. อิติ โส สตสหสฺสกหาปเณ สตสหสฺสคฺฆนกญฺจ ภณฺฑํ ทตฺวา ปญฺจจตฺตาลีสโยชนิเก อทฺธาเน โยชเน โยชเน วิหารปติฏฺฐานํ กตฺวา สาวตฺถึ อคมาสิ. ३०७. ‘आदेय्यवाचो’ म्हणजे त्याचे (त्या अनाथपिंडिक गृहपतीचे) बोलणे अनेक लोक स्वीकारण्यायोग्य आणि ऐकण्यायोग्य मानतात, असा अर्थ आहे. ‘आरामे अकंसु’ (आराम बांधले) म्हणजे जे धनवान होते, त्यांनी स्वतःच्या धनाने ते बांधले. जे अल्प धन असलेले आणि निर्धन होते, त्यांना त्याने धन दिले. अशा प्रकारे त्याने एक लाख कहापण आणि एक लाख मूल्याचे साहित्य देऊन, पंचेचाळीस योजने लांबीच्या प्रवासात प्रत्येक योजनेवर विहाराची स्थापना करून तो सावत्थीला गेला. โกฏิสนฺถรํ [Pg.63] สนฺถราเปสีติ กหาปณโกฏิยา กหาปณโกฏึ ปฏิปาเทตฺวา สนฺถริ. เย ตตฺถ รุกฺขา วา โปกฺขรณิโย วา เตสํ ปริกฺเขปปฺปมาณํ คเหตฺวา อญฺญสฺมึ ฐาเน สนฺถริตฺวา อทาสิ. เอวมสฺส อฏฺฐารสโกฏิกํ นิธานํ ปริกฺขยํ อคมาสิ. ‘कोटिसन्थरं सन्थरापेसि’ (कोटींच्या थराने अंथरले) म्हणजे एका कहापणाच्या कडेला दुसरा कहापण जोडून (स्पर्श करून) थर रचला. तिथे जे वृक्ष किंवा तलाव होते, त्यांच्या परिघाचे प्रमाण घेऊन दुसऱ्या ठिकाणी (त्याच्या बदल्यात कहापण) पसरून दिले. अशा प्रकारे त्याचे अठरा कोटींचे साठवलेले धन संपुष्टात आले. กุมารสฺส เอตทโหสีติ คหปติโน เอวํ พหุธนํ จชนฺตสฺสาปิ มุขสฺส วิปฺปสนฺนาการํ ทิสฺวา เอตํ อโหสิ. โกฏฺฐกํ มาเปสีติ สตฺตภูมิกํ ทฺวารโกฏฺฐกปาสาทํ มาเปสิ. ‘कुमारस्स एतदहोसि’ (कुमाराच्या मनात हा विचार आला) म्हणजे गृहपती एवढे प्रचंड धन त्याग करत असतानाही त्याच्या चेहऱ्यावरील अत्यंत प्रसन्न भाव पाहून (कुमाराच्या मनात) हा विचार आला. ‘कोट्ठकं मापेसि’ म्हणजे सात मजली प्रवेशद्वार असलेला प्रासाद (गोपूर) निर्माण केला. อถ โข อนาถปิณฺฑิโก คหปติ เชตวเน วิหาเร การาเปสิ…เป… มณฺฑเป การาเปสีติ อปราหิปิ อฏฺฐารสหิ โกฏีหิ เอเต วิหาราทโย การาเปสิ อฏฺฐกรีสปฺปมาณาย ภูมิยา. วิปสฺสิสฺส หิ ภควโต ปุนพฺพสุมิตฺโต คหปติ โยชนปฺปมาณํ ภูมึ สุวณฺณิฏฺฐกาสนฺถเรน กิณิตฺวา วิหารํ การาเปสิ. สิขิสฺส ปน สิริวฑฺโฒ คหปติ ติคาวุตปฺปมาณํ สุวณฺณยฏฺฐิสนฺถเรน, เวสฺสภุสฺส โสตฺถิโช คหปติ อฑฺฒโยชนปฺปมาณํ สุวณฺณผาลสนฺถเรน, กกุสนฺธสฺส ปน อจฺจุโต คหปติ คาวุตปฺปมาณํ สุวณฺณหตฺถิปทสนฺถเรน, โกณาคมนสฺส อุคฺโค คหปติ อฑฺฒคาวุตปฺปมาณํ สุวณฺณิฏฺฐกาสนฺถเรน, กสฺสปสฺส สุมงฺคโล คหปติ วีสติอุสภปฺปมาณํ สุวณฺณกจฺฉปสนฺถเรน, อมฺหากํ ภควโต สุทตฺโต คหปติ อฏฺฐกรีสปฺปมาณํ ภูมึ กหาปณสนฺถเรน กิณิตฺวา วิหารํ การาเปสีติ; เอวํ อนุปุพฺเพน ปริหายนฺติ สมฺปตฺติโยติ อลเมว สพฺพสมฺปตฺตีสุ วิรชฺชิตุํ อลํ วิมุจฺจิตุนฺติ. ‘अथ खो... कारापेसि’ (त्यानंतर अनाथपिंडिक गृहपतीने जेतवनात विहार बांधला... पे... मंडप बांधले) म्हणजे इतरही अठरा कोटी खर्च करून आठ करीस प्रमाणाच्या जमिनीवर हे विहार इत्यादी बांधले. कारण, विपस्सी भगवंतांच्या काळी पुनब्बसुमित्त गृहपतीने एक योजन प्रमाणाची जमीन सोन्याच्या विटांचे थर रचून खरेदी केली व विहार बांधला. शिखी भगवंतांच्या काळी सिरीवड्ढ गृहपतीने तीन गावुत प्रमाणाची जमीन सोन्याच्या काठ्यांचे थर रचून खरेदी केली व विहार बांधला. वेस्सभू भगवंतांच्या काळी सोत्थिज गृहपतीने अर्धा योजन प्रमाणाची जमीन सोन्याच्या नांगराच्या फाळांचे थर रचून खरेदी केली व विहार बांधला. ककुसंध भगवंतांच्या काळी अच्चुत गृहपतीने एक गावुत प्रमाणाची जमीन सोन्याच्या हत्तीच्या पावलांचे थर रचून खरेदी केली व विहार बांधला. कोणागमन भगवंतांच्या काळी उग्ग गृहपतीने अर्धा गावुत प्रमाणाची जमीन सोन्याच्या विटांचे थर रचून खरेदी केली व विहार बांधला. कस्सप भगवंतांच्या काळी सुमंगल गृहपतीने वीस उसभ प्रमाणाची जमीन सोन्याच्या कासवांचे थर रचून खरेदी केली व विहार बांधला. आमच्या भगवंतांच्या काळी सुदत्त गृहपतीने आठ करीस प्रमाणाची जमीन कहापणांचे थर रचून खरेदी केली व विहार बांधला. अशा प्रकारे अनुक्रमे संपत्तीचा ऱ्हास होत जातो. म्हणून सर्व संपत्तीविषयी विरक्त होणे योग्यच आहे, तिच्यापासून मुक्त होणे योग्यच आहे (हा उपदेश आहे). ๓๐๘. ขณฺฑนฺติ ภินฺโนกาโส. ผุลฺลนฺติ ผลิโตกาโส. ปฏิสงฺขริสฺสตีติ ปากติกํ กริสฺสติ. ลทฺธนวกมฺเมน ปน ภิกฺขุนา วาสิผรสุนิขาทนาทีนิ คเหตฺวา สยํ น กาตพฺพํ, กตากตํ ชานิตพฺพํ. ३०८. ‘खंडं’ म्हणजे तुटलेली किंवा नष्ट झालेली जागा. ‘फुल्लं’ म्हणजे तडे गेलेली जागा. ‘पटिसङ्खरिस्सति’ म्हणजे पूर्ववत (मूळ स्थितीत) करेल. परंतु, नवकम्म (दुरुस्तीचे काम) मिळालेल्या भिक्खूने स्वतः तासणी, कुऱ्हाड, पटाशी इत्यादी घेऊन काम करू नये, तर काय केले आहे आणि काय करायचे बाकी आहे, हे जाणून घ्यावे. ๓๑๐. ปิฏฺฐิโต ปิฏฺฐิโต คนฺตฺวาติ เถโร กิร คิลาเน ปฏิชคฺคนฺโต ชิณฺเณ วุฑฺเฒ สงฺคณฺหนฺโต สพฺพปจฺฉโต อาคจฺฉติ. อิทมสฺส จาริตฺตํ. เตน วุตฺตํ – ‘‘ปิฏฺฐิโต ปิฏฺฐิโต คนฺตฺวา’’ติ. อคฺคาสนนฺติ เถราสนํ. อคฺโคทกนฺติ ทกฺขิโณทกํ. อคฺคปิณฺฑนฺติ สงฺฆตฺเถรปิณฺฑํ. อนฺตรา สตฺถีนํ กริตฺวาติ จตุนฺนํ ปาทานํ อนฺตเร กริตฺวา. ३१०. ‘पिट्ठितो पिट्ठितो गन्त्वा’ (मागून मागून जाऊन) म्हणजे थेर (सारिपुत्त) आजारी भिक्खूंची सेवा करत आणि वृद्ध व ज्येष्ठ भिक्खूंना साहाय्य करत सर्वांच्या शेवटी येत असत. हे त्यांचे आचरण होते. म्हणूनच संगीतिकारांनी "पिट्ठितो पिट्ठितो गन्त्वा" असे म्हटले आहे. ‘अग्गासनं’ म्हणजे थेरांचे (ज्येष्ठ भिक्खूंचे) आसन. ‘अग्गोदकं’ म्हणजे श्रेष्ठ जल (दान देण्याचे पाणी). ‘अग्गपिंडं’ म्हणजे संघातील ज्येष्ठ थेरांचे अन्न. ‘अन्तरा सत्थीनं करित्वा’ म्हणजे (खाटेच्या किंवा आसनाच्या) चार पायांच्या मध्ये ठेवून. ๓๑๕. ปติฏฺฐาเปสีติ [Pg.64] อฏฺฐารสโกฏิปริจฺจาคํ กตฺวา ปติฏฺฐาเปสิ. เอวํ สพฺพาปิ จตุปณฺณาสโกฏิโย ปริจฺจชิ. ३१५. ‘पतिट्ठापेसि’ (प्रतिष्ठापित केले) म्हणजे अठरा कोटींचा त्याग करून स्थापना केली. अशा प्रकारे त्यांनी एकूण चोपन्न कोटींचा त्याग केला. วิหารานุชานนกถา นิฏฺฐิตา. विहार अनुमतीची कथा समाप्त झाली. อาสนปฺปฏิพาหนาทิกถา आसन नाकारण्याविषयीची कथा ๓๑๖. วิปฺปกตโภชโนติ อนฺตรฆเร วา วิหาเร วา อรญฺเญ วา ยตฺถ กตฺถจิ ภุญฺชมาโน ภิกฺขุ อนิฏฺฐิเต โภชเน น วุฏฺฐาเปตพฺโพ. อนฺตรฆเร ปจฺฉา อาคเตน ภิกฺขํ คเหตฺวา คนฺตพฺพํ. สเจ มนุสฺสา วา ภิกฺขู วา ‘‘ปวิสถา’’ติ วทนฺติ, ‘‘มยิ ปวิสนฺเต ภิกฺขู อุฏฺฐหิสฺสนฺตี’’ติ วตฺตพฺพํ. ‘‘เอถ, ภนฺเต, อาสนํ อตฺถี’’ติ วุตฺเตน ปน ปวิสิตพฺพํ. สเจ โกจิ กิญฺจิ น วทติ, อาสนสาลํ คนฺตฺวา อติสมีปํ อคนฺตฺวา สภาคฏฺฐาเน ฐาตพฺพํ. โอกาเส กเต ‘‘ปวิสถา’’ติ วุตฺเตน ปน ปวิสิตพฺพํ. สเจ ปน ยํ อาสนํ ตสฺส ปาปุณาติ, ตตฺถ อภุญฺชนฺโต ภิกฺขุ นิสินฺโน โหติ, ตํ อุฏฺฐาเปตุํ วฏฺฏติ. ยาคุขชฺชกาทีสุ ปน ยํกิญฺจิ ปิวิตฺวา วา ขาทิตฺวา วา ยาว อญฺโญ อาคจฺฉติ, ตาว นิสินฺนํ ริตฺตหตฺถมฺปิ วุฏฺฐาเปตุํ น วฏฺฏติ. วิปฺปกตโภชโนเยว หิ โส โหติ. ३१६. ‘विप्पकतभोजनो’ (अपूर्ण भोजन असलेला) म्हणजे गावात, विहारात किंवा अरण्यात, कोणत्याही ठिकाणी भोजन करत असलेल्या भिक्खूला त्याचे भोजन पूर्ण झाले नसताना उठवू नये. गावात नंतर आलेल्या भिक्खूने भिक्षा घेऊन निघून जावे. जर लोकांनी किंवा भिक्खूंनी "आत या" असे म्हटले, तर "मी आत आल्यास (कनिष्ठ) भिक्खू आसनावरून उठतील" असे म्हणावे. परंतु "भंते, या, आसन आहे" असे म्हटल्यावर मात्र आत प्रवेश करावा. जर कोणी काहीच बोलले नाही, तर भोजनशाळेत जाऊन, अगदी जवळ न जाता आपल्या योग्यतेच्या ठिकाणी उभे राहावे. जागा करून दिल्यावर "आत या" असे म्हटल्यावर मात्र प्रवेश करावा. परंतु, जे आसन त्याला मिळते, तिथे जर भोजन न करत असलेला भिक्खू बसलेला असेल, तर त्याला उठवणे योग्य आहे. परंतु, यागू (पेज), खाद्य इत्यादींपैकी काहीही पिऊन किंवा खाऊन, जोपर्यंत दुसरा भिक्खू येत नाही तोपर्यंत रिकाम्या हाताने बसलेल्या भिक्खूलासुद्धा उठवणे योग्य नाही. कारण तो अपूर्ण भोजन असलेलाच मानला जातो. สเจ วุฏฺฐาเปตีติ สเจ อาปตฺตึ อติกฺกมิตฺวาปิ วุฏฺฐาเปติเยว. ปวาริโต จ โหตีติ ยํ โส วุฏฺฐาเปติ, อยญฺจ ภิกฺขุ ปวาริโต จ โหติ, เตน วตฺตพฺโพ – ‘‘คจฺฉ อุทกํ อาหราหี’’ติ. วุฑฺฒตรญฺหิ ภิกฺขุํ อาณาเปตุํ อิทเมว เอกํ ฐานนฺติ. สเจ โส อุทกมฺปิ น อาหรติ, ตโต ยญฺจ นวกตเรน กตฺตพฺพํ, ตํ ทสฺเสนฺโต ‘‘สาธุกํ สิตฺถานี’’ติอาทิมาห. ‘सचे वुट्ठापेति’ (जर उठवतो) म्हणजे नियमाचे उल्लंघन करूनही जर तो उठवतोच. ‘पवारितो च होति’ म्हणजे ज्याला त्याने उठवले आहे तो भिक्खू जर पवारित (तृप्त) असेल, तर त्याला "जा, पाणी घेऊन ये" असे सांगावे. कारण आपल्यापेक्षा ज्येष्ठ भिक्खूला आज्ञा करण्यासाठी हे एकच स्थान (प्रसंग) आहे. जर तो पाणीही आणत नसेल, तर कनिष्ठ भिक्खूने जे केले पाहिजे ते दर्शवण्यासाठी "साधुकं सितथानि" (भाताचे कण नीट गोळा करणे) इत्यादी म्हटले आहे. คิลานสฺส ปติรูปํ เสยฺยนฺติ เอตฺถ โย กาสภคนฺทราติสาราทีหิ คิลาโน โหติ, เขฬมลฺลกวจฺจกปาลาทีนิ ฐเปตพฺพานิ โหนฺติ. กุฏฺฐิ วา โหติ, เสนาสนํ ทูเสติ; เอวรูปสฺส เหฏฺฐาปาสาทปณฺณสาลาทีสุ อญฺญตรํ เอกมนฺตํ เสนาสนํ ทาตพฺพํ. ยสฺมึ วสนฺเต เสนาสนํ น ทุสฺสติ, ตสฺส วรเสยฺยาปิ ทาตพฺพาว. โยปิ สิเนหปานวิเรจนนตฺถุกมฺมาทีสุ ยํกิญฺจิ เภสชฺชํ กโรติ, สพฺโพ โส คิลาโนเยว, ตสฺสาปิ สลฺลกฺเขตฺวา ปติรูปํ เสนาสนํ ทาตพฺพํ. เลสกปฺเปนาติ อปฺปเกน สีสาพาธาทิมตฺเตน. ภิกฺขู คเณตฺวาติ ‘‘เอตฺตกา นาม ภิกฺขู’’ติ วิหาเร ภิกฺขูนํ ปริจฺเฉทํ ญตฺวา. ‘गिलाणस्स पतिरूपं सेय्यं’ (आजारी भिक्खूला योग्य शय्यासन) या पाठात—जो खोकला, भगंदर, अतिसार इत्यादींनी आजारी असतो, ज्याच्यासाठी थुंकपात्र, शौचपात्र इत्यादी ठेवावे लागते, किंवा जो कुष्ठरोगी असतो आणि शय्यासन खराब करतो; अशा प्रकारच्या आजारी भिक्खूला प्रासादाच्या खालच्या मजल्यावर किंवा पर्णकुटी इत्यादींपैकी एका बाजूला योग्य शय्यासन द्यावे. ज्या ठिकाणी राहिल्याने शय्यासन खराब होत नाही, त्याला उत्तम शय्यासनसुद्धा दिलेच पाहिजे. जो कोणी स्नेहपान (तेल/तूप पिणे), रेचक घेणे, नस्यकर्म इत्यादींपैकी कोणताही औषधोपचार करतो, तो सर्व आजारीच आहे; त्यालाही लक्षात घेऊन योग्य शय्यासन द्यावे. ‘लेसकप्पेन’ म्हणजे डोकेदुखी इत्यादींसारख्या किरकोळ आजाराने. ‘भिक्खू गणेत्वा’ म्हणजे "विहारात एवढे भिक्खू आहेत" अशी भिक्खूंची संख्या निश्चितपणे जाणून घेऊन. อาสนปฺปฏิพาหนาทิกถา นิฏฺฐิตา. आसन नाकारण्याविषयीची कथा समाप्त झाली. เสนาสนคฺคาหกถา शय्यासन स्वीकारण्याविषयीची कथा ๓๑๘. เสยฺยาติ [Pg.65] มญฺจฏฺฐานานิ วุจฺจนฺติ. เสยฺยคฺเคนาติ เสยฺยาปริจฺเฉเทน, วสฺสูปนายิกทิวเส กาลํ โฆเสตฺวา เอกมญฺจฏฺฐานํ เอกสฺส ภิกฺขุโน คาเหตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. เสยฺยคฺเคน คาเหนฺตาติ เสยฺยาปริจฺเฉเทน คาหิยมานา. เสยฺยา อุสฺสารยึสูติ มญฺจฏฺฐานานิ อติเรกานิ อเหสุํ. วิหารคฺคาทีสุปิ เอเสว นโย. อนุภาคนฺติ ปุน อปรมฺปิ ภาคํ ทาตุํ. อติมนฺเทสุ หิ ภิกฺขูสุ เอเกกสฺส ภิกฺขุโน ทฺเว ตีณิ ปริเวณานิ ทาตพฺพานิ. น อกามา ทาตพฺโพติ อนิจฺฉาย น ทาตพฺโพ. ตตฺถ วสฺสูปนายิกทิวเส คหิเต อนุภาเค ปจฺฉา อาคตานํ น อตฺตโน อรุจิยา โส อนุภาโค ทาตพฺโพ. สเจ ปน เยน คหิโต, โส จ อตฺตโน รุจิยา ตํ อนุภาคํ วา ปฐมภาคํ วา เทติ, วฏฺฏติ. ३१८. शय्या म्हणजे पलंगाची (खाटेची) जागा असे म्हटले जाते. 'शय्यांच्या संख्येनुसार' (सेय्यग्गेन) म्हणजे शय्यांच्या विभागाने; वर्षावास सुरू होण्याच्या दिवशी वेळ घोषित करून एका भिक्खूला एका पलंगाची जागा घेण्याची मी अनुमती देतो, असा याचा अर्थ आहे. 'शय्यांच्या संख्येनुसार ग्रहण करणे' म्हणजे शय्यांच्या विभागाने ग्रहण केले जाणे. 'शय्या अतिरिक्त झाल्या' म्हणजे पलंगाच्या जागा गरजेपेक्षा जास्त झाल्या. विहार ग्रहण करणे इत्यादी बाबींमध्येही हाच नियम लागू होतो. 'अनुभाग' म्हणजे पुन्हा दुसरा भाग देणे. कारण भिक्खूंची संख्या अत्यंत कमी असल्यास, प्रत्येक भिक्खूला दोन किंवा तीन परिवेण (कुटी किंवा परिसर) दिले जावेत. 'इच्छा नसताना देऊ नये' म्हणजे इच्छेविरुद्ध देऊ नये. त्यामध्ये, वर्षावासाच्या दिवशी अनुभाग ग्रहण केल्यानंतर, नंतर आलेल्या भिक्खूंना स्वतःच्या इच्छेविरुद्ध तो अनुभाग दिला जाऊ नये. परंतु, ज्याने तो ग्रहण केला आहे, त्याने जर स्वतःच्या इच्छेने तो अनुभाग किंवा पहिला भाग दिला, तर ते योग्य आहे. นิสฺสีเม ฐิตสฺสาติ อุปจารสีมโต พหิ ฐิตสฺส. อนฺโต อุปจารสีมาย ปน ทูเร ฐิตสฺสาปิ ลพฺภติเยว. เสนาสนํ คเหตฺวาติ วสฺสูปนายิกทิวเส คเหตฺวา. สพฺพกาลํ ปฏิพาหนฺตีติ จตุมาสจฺจเยน อุตุกาเลปิ ปฏิพาหนฺติ. ตีสุ เสนาสนคฺคาเหสุ ปุริมโก จ ปจฺฉิมโก จาติ อิเม ทฺเว คาหา ถาวรา. 'सीमेबाहेर राहिलेल्याला' म्हणजे उपचार सीमेच्या बाहेर राहिलेल्या भिक्खूला. परंतु उपचार सीमेच्या आत दूर राहिलेल्या भिक्खूला देखील सेनासन मिळतेच. 'सेनासन ग्रहण करून' म्हणजे वर्षावासाच्या दिवशी ते ग्रहण करून. 'सर्वकाळ अडवून ठेवतात' म्हणजे चार महिने उलटून गेल्यावर ऋतूच्या काळातही ते अडवून ठेवतात. तीन प्रकारच्या सेनासन ग्रहणांपैकी पूर्व (पुरिमक) आणि पश्चिम (पच्छिमक) हे दोन ग्रहण निश्चित (स्थिर) आहेत. อนฺตรามุตฺตเก อยํ วินิจฺฉโย – เอกสฺมึ วิหาเร มหาลาภเสนาสนํ โหติ. เสนาสนสามิกา วสฺสูปคตํ ภิกฺขุํ สพฺพปจฺจเยหิ สกฺกจฺจํ อุปฏฺฐหิตฺวา ปวาเรตฺวา คมนกาเล พหุํ สมณปริกฺขารํ เทนฺติ. มหาเถรา ทูรโตปิ อาคนฺตฺวา วสฺสูปนายิกทิวเส ตํ คเหตฺวา ผาสุํ วสิตฺวา วุตฺถวสฺสา ลาภํ คณฺหิตฺวา ปกฺกมนฺติ. อาวาสิกา ‘‘มยํ เอตฺถุปฺปนฺนํ ลาภํ น ลภาม, นิจฺจํ อาคนฺตุกมหาเถราว ลภนฺติ, เตเยว นํ อาคนฺตฺวา ปฏิชคฺคิสฺสนฺตี’’ติ ปลุชฺชนฺตมฺปิ น โอโลเกนฺติ. ภควา ตสฺส ปฏิชคฺคนตฺถํ ‘‘อปรชฺชุคตาย ปวารณาย อายตึ วสฺสาวาสตฺถาย อนฺตรามุตฺตโก คาเหตพฺโพ’’ติ อาห. अंतरामुत्तक सेनासन ग्रहणाबाबत हा निर्णय आहे – एका विहारामध्ये मोठे लाभ देणारे सेनासन असते. सेनासनाच्या मालकांनी (दायकांनी) वर्षावास करणाऱ्या भिक्खूची सर्व प्रत्ययांनी (गरजांनी) आदरपूर्वक सेवा करून, प्रवारणा करून, जाण्याच्या वेळी पुष्कळ श्रमण-परिकार (साहित्य) देतात. महास्थवीर दूरवरूनही येऊन वर्षावासाच्या दिवशी ते सेनासन ग्रहण करतात, सुखाने राहतात आणि वर्षावास पूर्ण झाल्यावर लाभ घेऊन निघून जातात. तेथील स्थानिक (आवासिक) भिक्खू विचार करतात: 'आम्हाला येथे उत्पन्न होणारा लाभ मिळत नाही, नेहमी आगंतुक महास्थवीरांनाच तो मिळतो. तेच या सेनासनाची काळजी घेतील,' असे म्हणून ते सेनासन नष्ट होत असले तरी त्याकडे पाहत नाहीत. भगवंतांनी त्याची काळजी घेण्यासाठी (दुरुस्तीसाठी) 'प्रवारणेच्या दुसऱ्या दिवशी भविष्यातील वर्षावासासाठी अंतरामुत्तक सेनासन ग्रहण करावे' असे म्हटले आहे. ตํ คาเหนฺเตน สงฺฆตฺเถโร วตฺตพฺโพ – ‘‘ภนฺเต อนฺตรามุตฺตกเสนาสนํ คณฺหถา’’ติ. สเจ คณฺหาติ, ทาตพฺพํ; โน เจ เอเตเนว อุปาเยน อนุเถรํ อาทึ กตฺวา โย คณฺหาติ, ตสฺส อนฺตมโส สามเณรสฺสาปิ ทาตพฺพํ. เตน ตํ เสนาสนํ อฏฺฐมาเส ปฏิชคฺคิตพฺพํ. ฉทนภิตฺติภูมีสุ [Pg.66] ยํ กิญฺจิ ขณฺฑํ วา ผุลฺลํ วา โหติ, ตํ สพฺพํ ปฏิสงฺขริตพฺพํ. อุทฺเทสปริปุจฺฉาทีหิ ทิวสํ เขเปตฺวา รตฺตึ ตตฺถ วสิตุมฺปิ วฏฺฏติ. รตฺตึ ปริเวเณ วสิตฺวา ตตฺถ ทิวสํ เขเปตุมฺปิ วฏฺฏติ. รตฺตินฺทิวํ ตตฺเถว วสิตุมฺปิ วฏฺฏติ. อุตุกาเล อาคตานํ วุฑฺฒานํ น ปฏิพาหิตพฺพํ. วสฺสูปนายิกทิวเส ปน สมฺปตฺเต สเจ สงฺฆตฺเถโร ‘‘มยฺหํ อิทํ เสนาสนํ เทถา’’ติ วทติ, น ลภติ. ‘‘ภนฺเต, อิทํ อนฺตรามุตฺตกํ คเหตฺวา อฏฺฐมาเส เอเกน ภิกฺขุนา ปฏิชคฺคิต’’นฺติ วตฺวา น ทาตพฺพํ. อฏฺฐมาเส ปฏิชคฺคกภิกฺขุสฺเสว คหิตํ โหติ. ते ग्रहण करवून घेणाऱ्याने संघस्थविरांना सांगावे – 'भंते, अंतरामुत्तक सेनासन ग्रहण करा.' जर ते ग्रहण करत असतील, तर त्यांना द्यावे; जर ते ग्रहण करत नसतील, तर याच पद्धतीने अनुस्थविरांपासून सुरुवात करून जो कोणी ग्रहण करेल, अगदी शेवटी श्रामणेराला (सामणेराला) देखील ते द्यावे. त्याने त्या सेनासनाची आठ महिने काळजी घेतली पाहिजे (देखभाल केली पाहिजे). छप्पर, भिंत किंवा जमीन यांपैकी जे काही तुटलेले किंवा तडे गेलेले असेल, ते सर्व दुरुस्त केले पाहिजे. उद्देश (पाठ शिकणे) आणि परिपुच्छा (प्रश्न विचारणे) इत्यादींमध्ये दिवस घालवून रात्री तेथे राहणे देखील योग्य आहे. रात्री परिवेणात राहून तेथे दिवस घालवणे देखील योग्य आहे. रात्रंदिवस तेथेच राहणे देखील योग्य आहे. ऋतूच्या काळात आलेल्या ज्येष्ठ भिक्खूंना अडवू नये. परंतु वर्षावासाचा दिवस आल्यावर जर संघस्थवीर म्हणाले, 'मला हे सेनासन द्या,' तर त्यांना ते मिळत नाही. 'भंते, हे अंतरामुत्तक सेनासन घेऊन एका भिक्खूने आठ महिने याची देखभाल केली आहे,' असे सांगून ते देऊ नये. आठ महिने देखभाल करणाऱ्या भिक्खूनेच ते ग्रहण केलेले असते. ยสฺมึ ปน เสนาสเน เอกสํวจฺฉเร ทฺวิกฺขตฺตุํ ปจฺจเย เทนฺติ ฉมาสจฺจเยน ฉมาสจฺจเยน, ตํ อนฺตรามุตฺตกํ น คาเหตพฺพํ. ยสฺมึ วา ติกฺขตฺตุํ เทนฺติ จตุมาสจฺจเยน จตุมาสจฺจเยน, ยสฺมึ วา จตุกฺขตฺตุํ เทนฺติ เตมาสจฺจเยน เตมาสจฺจเยน, ตํ อนฺตรามุตฺตกํ น คาเหตพฺพํ. ปจฺจเยเนว หิ ตํ ปฏิชคฺคนํ ลภิสฺสติ. ยสฺมึ ปน เอกสํวจฺฉเร สกิเทว พหุปจฺจเย เทนฺติ, เอตํ อนฺตรามุตฺตกํ คาเหตพฺพนฺติ. อยํ ตาว อนฺโตวสฺเส วสฺสูปนายิกทิวเสน ปาฬิยํ อาคตเสนาสนคฺคาหกถา. परंतु ज्या सेनासनात एका वर्षात सहा-सहा महिन्यांच्या अंतराने दोनदा प्रत्यय (दान) दिले जातात, ते अंतरामुत्तक म्हणून ग्रहण करू नये. किंवा ज्यामध्ये चार-चार महिन्यांच्या अंतराने तीनदा प्रत्यय दिले जातात, किंवा ज्यामध्ये तीन-तीन महिन्यांच्या अंतराने चारदा प्रत्यय दिले जातात, ते अंतरामुत्तक म्हणून ग्रहण करू नये. कारण प्रत्ययामुळेच (दात्यांच्या दानामुळेच) त्याची देखभाल होईल. परंतु ज्या सेनासनात एका वर्षात एकदाच पुष्कळ प्रत्यय दिले जातात, ते अंतरामुत्तक म्हणून ग्रहण करावे. ही वर्षावासाच्या आत वर्षावासाच्या दिवसाच्या संदर्भाने पाळीमध्ये (मूळ पाठात) आलेली सेनासन ग्रहण करण्याची कथा आहे. อยํ ปน เสนาสนคฺคาโห นาม ทุวิโธ โหติ – อุตุกาเล จ วสฺสาวาเส จ. ตตฺถ อุตุกาเล ตาว เกจิ อาคนฺตุกา ภิกฺขู ปุเรภตฺตํ อาคจฺฉนฺติ, เกจิ ปจฺฉาภตฺตํ ปฐมยามํ วา มชฺฌิมยามํ วา ปจฺฉิมยามํ วา เย ยทา อาคจฺฉนฺติ, เตสํ ตทาว ภิกฺขู อุฏฺฐาเปตฺวา เสนาสนํ ทาตพฺพํ. อกาโล นาม นตฺถิ. เสนาสนปญฺญาปเกน ปน ปณฺฑิเตน ภวิตพฺพํ, เอกํ วา ทฺเว วา มญฺจฏฺฐานานิ ฐเปตพฺพานิ. สเจ วิกาเล เอโก วา ทฺเว วา เถรา อาคจฺฉนฺติ, เต วตฺตพฺพา – ‘‘ภนฺเต, อาทิโต ปฏฺฐาย วุฏฺฐาปิยมาเน สพฺเพปิ ภิกฺขู อุพฺภณฺฑิกา ภวิสฺสนฺติ, ตุมฺเห อมฺหากํ วสนฏฺฐาเนเยว วสถา’’ติ. परंतु हे सेनासन ग्रहण करणे दोन प्रकारचे असते – ऋतूच्या काळात आणि वर्षावासात. त्यात ऋतूच्या काळात काही आगंतुक भिक्खू भोजनापूर्वी येतात, काही भोजनानंतर पहिल्या प्रहरात, मध्यम प्रहरात किंवा अंतिम प्रहरात येतात. जे जेव्हा येतात, तेव्हाच तेथील भिक्खूंना उठवून त्यांना सेनासन दिले पाहिजे. अवेळी (अयोग्य वेळ) असे काही नसते. परंतु सेनासन लावणारा (व्यवस्थापक) भिक्खू बुद्धिमान असावा, त्याने एक किंवा दोन पलंगांच्या जागा राखून ठेवाव्यात. जर अवेळी एक किंवा दोन स्थवीर आले, तर त्यांना सांगावे – 'भंते, सुरुवातीपासून सर्वांना उठवले तर सर्वच भिक्खू आपले सामान उचलून विचलित होतील (त्रासतील). आपण आमच्याच राहण्याच्या ठिकाणी राहावे.' พหูสุ ปน อาคเตสุ วุฏฺฐาเปตฺวา ปฏิปาฏิยา ทาตพฺพํ. สเจ เอเกกํ ปริเวณํ ปโหติ, เอเกกํ ปริเวณํ ทาตพฺพํ. ตตฺถ อคฺคิสาลทีฆสาลมณฺฑลมาลาทโย สพฺเพปิ ตสฺเสว ปาปุณนฺติ. เอวํ อปฺปโหนฺเต ปาสาทคฺเคน ทาตพฺพํ. ปาสาเทสุ อปฺปโหนฺเตสุ โอวรกคฺเคน ทาตพฺพํ. โอวรเกสุ [Pg.67] อปฺปโหนฺเตสุ เสยฺยคฺเคน ทาตพฺพํ. เสยฺยคฺเคสุ อปฺปโหนฺเตสุ มญฺจฏฺฐาเนน ทาตพฺพํ. มญฺจฏฺฐาเน อปฺปโหนฺเต เอกปีฐกฏฺฐานวเสน ทาตพฺพํ. ภิกฺขุโน ปน ฐิโตกาสมตฺตํ น คาเหตพฺพํ. เอตญฺหิ เสนาสนํ นาม น โหติ. ปีฐกฏฺฐาเน ปน อปฺปโหนฺเต เอกํ มญฺจฏฺฐานํ วา ปีฐกฏฺฐานํ วา วาเรน วาเรน คเหตฺวา ‘‘ภนฺเต, วิสฺสมถา’’ติ ติณฺณํ ชนานํ ทาตพฺพํ, น หิ สกฺกา สีตสมเย สพฺพรตฺตึ อชฺโฌกาเส วสิตุํ. มหาเถเรน ปฐมยามํ วิสฺสมิตฺวา นิกฺขมิตฺวา ทุติยตฺเถรสฺส วตฺตพฺพํ – ‘‘อาวุโส, อิธ ปวิสาหี’’ติ. สเจ มหาเถโร นิทฺทาครุโก โหติ, กาลํ น ชานาติ, อุกฺกาสิตฺวา ทฺวารํ อาโกเฏตฺวา ‘‘ภนฺเต, กาโล ชาโต, สีตํ อนุทหตี’’ติ วตฺตพฺพํ. เตน นิกฺขมิตฺวา โอกาโส ทาตพฺโพ, อทาตุํ น ลภติ. ทุติยตฺเถเรนปิ มชฺฌิมยามํ วิสฺสมิตฺวา ปุริมนเยเนว อิตรสฺส ทาตพฺพํ. นิทฺทาครุโก วุตฺตนเยเนว วุฏฺฐาเปตพฺโพ. เอวํ เอกรตฺตึ เอกมญฺจฏฺฐานํ ติณฺณํ ทาตพฺพํ. ชมฺพุทีเป ปน เอกจฺเจ ภิกฺขู ‘‘เสนาสนํ นาม มญฺจฏฺฐานํ วา ปีฐฏฺฐานํ วา กิญฺจิเทว กสฺสจิ สปฺปายํ โหติ, กสฺสจิ อสปฺปาย’’นฺติ อาคนฺตุกา โหนฺตุ วา มา วา, เทวสิกํ เสนาสนํ คาเหนฺติ. อยํ อุตุกาเล เสนาสนคฺคาโห นาม. पण अनेक भिक्खू आले असता, (आधी आलेल्या कनिष्ठ भिक्खूंना) उठवून अनुक्रमाने (आसन/निवास) द्यावे. जर एकेक परिवेण (प्रांगण/कुटी) पुरेसे असेल, तर एकेक परिवेण द्यावे. तेथे अग्निशाला (शेकोटीची जागा), दीर्घशाला (लांब ओसरी), मंडळमाळ (मंडप/सभा गृह) इत्यादी सर्व काही त्याच भिक्खूला मिळते. जर ते अपुरे पडले, तर प्रासादाच्या (इमारतीच्या) भागांनुसार द्यावे. प्रासाद अपुरे पडल्यास खोल्यांच्या (ओवरक) भागांनुसार द्यावे. खोल्या अपुऱ्या पडल्यास शय्येच्या (बिछान्यांच्या) संख्येनुसार द्यावे. शय्या अपुऱ्या पडल्यास मंचाच्या (खाटेच्या) जागेनुसार द्यावे. मंचाची जागा अपुरी पडल्यास एका पाठाच्या (स्टूल/खुर्चीच्या) जागेनुसार द्यावे. पण भिक्खूला केवळ उभे राहण्याइतकी जागा देऊ नये. कारण याला 'सेनासन' म्हणत नाही. पण पाठाची जागाही अपुरी पडल्यास, एक मंचाची जागा किंवा पाठाची जागा पाळीपाळीने घेऊन, 'भंते, विश्रांती घ्या' असे म्हणून तीन जणांना द्यावी. कारण थंडीच्या दिवसांत संपूर्ण रात्र उघड्यावर राहणे शक्य नसते. महास्थविरांनी पहिल्या प्रहरात विश्रांती घेऊन बाहेर पडावे आणि दुसऱ्या स्थविरांना सांगावे - 'आवुसो, येथे प्रवेश करा.' जर महास्थवीर गाढ झोपेत असतील आणि त्यांना वेळेचे भान नसेल, तर खोकून, दरवाजा वाजवून 'भंते, वेळ झाली आहे, थंडी वाजत आहे' असे सांगावे. त्यांनी बाहेर येऊन जागा दिली पाहिजे, जागा न देणे त्यांना अनुज्ञेय नाही. दुसऱ्या स्थविरांनीही मध्यम प्रहरात विश्रांती घेऊन पूर्वीच्याच पद्धतीने दुसऱ्याला (तिसऱ्याला) जागा द्यावी. गाढ झोपलेल्याला पूर्वोक्त पद्धतीनेच उठवावे. अशा प्रकारे एका रात्रीत एक मंचाची जागा तीन जणांना दिली जावी. जंबुद्विपात मात्र काही भिक्खू 'सेनासन म्हणजे मंचाची जागा किंवा पाठाची जागा, जी कोणासाठी तरी अनुकूल (सप्पाय) असते तर कोणासाठी प्रतिकूल (असप्पाय)' असे समजून, आगंतुक भिक्खू येवोत वा न येवोत, दररोज सेनासन ग्रहण करतात. याला 'ऋतूच्या काळात सेनासन ग्रहण करणे' असे म्हणतात. วสฺสาวาเส ปน อตฺถิ อาคนฺตุกวตฺตํ, อตฺถิ อาวาสิกวตฺตํ, อาคนฺตุเกน ตาว สกฏฺฐานํ มุญฺจิตฺวา อญฺญตฺถ คนฺตฺวา วสิตุกาเมน วสฺสูปนายิกทิวสเมว ตตฺถ น คนฺตพฺพํ. วสนฏฺฐานํ วา หิ ตตฺร สมฺพาธํ ภเวยฺย, ภิกฺขาจาโร วา น สมฺปชฺเชยฺย, เตน น ผาสุํ วิหเรยฺย. ตสฺมา ‘‘อิทานิ มาสมตฺเตน วสฺสูปนายิกา ภวิสฺสตี’’ติ ตํ วิหารํ ปวิสิตพฺพํ. ตตฺถ มาสมตฺตํ วสนฺโต สเจ อุทฺเทสตฺถิโก อุทฺเทสสมฺปตฺตึ สลฺลกฺเขตฺวา, สเจ กมฺมฏฺฐานิโก กมฺมฏฺฐานสปฺปายตํ สลฺลกฺเขตฺวา, สเจ ปจฺจยตฺถิโก ปจฺจยลาภํ สลฺลกฺเขตฺวา อนฺโตวสฺเส สุขํ วสิสฺสติ. वर्षावासाच्या संदर्भात आगंतुक-कर्तव्य (आगंतुकवत्त) आणि आवासिक-कर्तव्य (आवासिकवत्त) असते. प्रथम, आपले स्थान सोडून दुसऱ्या ठिकाणी जाऊन राहू इच्छिणाऱ्या आगंतुक भिक्खूने वर्षावास सुरू होण्याच्या दिवशीच (वस्सूपनायिका दिवशीच) तेथे जाऊ नये. कारण तेथील राहण्याची जागा अरुंद असू शकते किंवा भिक्षाटन योग्य प्रकारे सुलभ नसू शकते, ज्यामुळे त्यांना सुखाने राहता येणार नाही. म्हणून, 'आता एका महिन्याने वर्षावास सुरू होईल' अशा वेळीच त्या विहारात प्रवेश करावा. तेथे एक महिना राहत असताना, जर ते उद्देशार्थी (अध्ययन करू इच्छिणारे) असतील तर अध्ययनाची अनुकूलता पाहून, जर ते कर्मस्थानिक (ध्यान साधना करणारे) असतील तर कर्मस्थानाची अनुकूलता पाहून, आणि जर ते प्रत्ययार्थी (चीवर-पिंडपात इत्यादींची गरज असलेले) असतील तर प्रत्यय-लाभाची अनुकूलता पाहून वर्षावासात सुखाने राहू शकतील. สกฏฺฐานโต จ ตตฺถ คจฺฉนฺเตน น โคจรคาโม ฆฏฺเฏตพฺโพ, น ตตฺถ มนุสฺสา วตฺตพฺพา – ‘‘ตุมฺเห นิสฺสาย สลากภตฺตาทีนิ วา ยาคุขชฺชกาทีนิ วา วสฺสาวาสิกํ วา นตฺถิ, อยํ เจติยสฺส ปริกฺขาโร, อยํ อุโปสถาคารสฺส, อิทํ ตาฬญฺเจว สูจิ จ สมฺปฏิจฺฉถ ตุมฺหากํ วิหาร’’นฺติ. เสนาสนํ ปน ชคฺคิตฺวา ทารุภณฺฑมตฺติกาภณฺฑานิ ปฏิสาเมตฺวา คมิยวตฺตํ ปูเรตฺวา คนฺตพฺพํ. เอวํ คจฺฉนฺเตนาปิ ทหเรหิ ปตฺตจีวรภณฺฑิกาโย อุกฺขิปาเปตฺวา [Pg.68] เตลนาฬิกตฺตรทณฺฑาทีนิ คาหาเปตฺวา ฉตฺตํ ปคฺคยฺห อตฺตานํ ทสฺเสนฺเตน คามทฺวาเรเนว น คนฺตพฺพํ, ปฏิจฺฉนฺเนน อฏวิมคฺเคน คนฺตพฺพํ. อฏวิมคฺเค อสติ คุมฺพาทีนิ มทฺทนฺเตน น คนฺตพฺพํ, คมิยวตฺตํ ปน ปูเรตฺวา วิตกฺกํ ฉินฺทิตฺวา สุทฺธจิตฺเตน คมนวตฺเตเนว คนฺตพฺพํ. สเจ ปน คามทฺวาเรน มคฺโค โหติ, คจฺฉนฺตญฺจ นํ สปริวารํ ทิสฺวา มนุสฺสา ‘‘อมฺหากํ เถโร วิยา’’ติ อุปธาวิตฺวา ‘‘กุหึ, ภนฺเต, สพฺพปริกฺขาเร คเหตฺวา คจฺฉถา’’ติ วทนฺติ, เตสุ เจ เอโก เอวํ วทติ – ‘‘วสฺสูปนายิกกาโล นามายํ, ยตฺถ อนฺโตวสฺเส นิพทฺธภิกฺขาจาโร ภณฺฑปฏิจฺฉาทนญฺจ ลพฺภติ, ตตฺถ ภิกฺขู คจฺฉนฺตี’’ติ. ตสฺส เจ สุตฺวา เต มนุสฺสา ‘‘ภนฺเต, อิมสฺมิมฺปิ คาเม ชโน ภุญฺชติ เจว นิวาเสติ จ, มา อญฺญตฺถ คจฺฉถา’’ติ วตฺวา มิตฺตามจฺเจ ปกฺโกสาเปตฺวา สพฺเพ สมฺมนฺตยิตฺวา วิหาเร นิพทฺธวตฺตญฺจ สลากภตฺตาทีนิ จ วสฺสาวาสิกญฺจ ปฏฺฐเปตฺวา ‘‘อิเธว ภนฺเต วสถา’’ติ ยาจนฺติ, สพฺพํ สาทิตุํ วฏฺฏติ. สพฺพญฺเหตํ กปฺปิยญฺเจว อนวชฺชญฺจ. กุรุนฺทิยํ ปน ‘‘‘กุหึ คจฺฉถา’ติ วุตฺเต ‘อสุกฏฺฐาน’นฺติ วตฺวา, ‘กสฺมา ตตฺถ คจฺฉถา’ติ วุตฺเต ‘การณํ อาจิกฺขิตพฺพ’’’นฺติ วุตฺตํ. อุภยมฺปิ ปเนตฺถ สุทฺธจิตฺตตฺตาว อนวชฺชํ. อิทํ อาคนฺตุกวตฺตํ นาม. आणि आपल्या स्थानावरून तेथे जाताना गोचरगावाला (भिक्षेच्या गावाला) त्रास देऊ नये, आणि तेथील लोकांना असे म्हणू नये - 'तुमच्यावर अवलंबून राहून आम्हाला शलाका-भात (सलाकाभत्त) किंवा यवागू-खाद्यपेय किंवा वर्षावासिक चीवर काहीही मिळाले नाही. हा चैत्याचा परिष्कार (साहित्य) आहे, हा उपोसथागाराचा आहे, ही तुमच्या विहाराची किल्ली आणि सुई स्वीकारा.' उलट, सेनासनाची स्वच्छता करून, लाकडी व मातीची भांडी व्यवस्थित ठेवून, गमन-कर्तव्य (गमीयवत्त) पूर्ण करून जावे. अशा प्रकारे जातानाही, कनिष्ठ भिक्खूंकडून पात्र-चीवरांचे गाठोडे उचलवून, तेलाची कुपी व काठी इत्यादी पकडायला लावून, छत्री धरून स्वतःचे प्रदर्शन करत गावाच्या मुख्य दरवाजातून जाऊ नये, तर गुप्त अशा वनमार्गाने (जंगलाच्या रस्त्याने) जावे. वनमार्ग नसल्यास झुडपे तुडवत जाऊ नये, तर गमन-कर्तव्य पूर्ण करून, मनातले विचार थांबवून, शुद्ध चित्ताने गमन-नियमांनुसारच जावे. पण जर गावाच्या दरवाजातूनच रस्ता असेल आणि त्यांना सपरिवारासह जाताना पाहून लोक 'हे तर आमच्या थेरांसारखेच आहेत' असे म्हणून जवळ धावत येतील आणि विचारतील, 'भंते, सर्व परिष्कार घेऊन आपण कोठे जात आहात?' जर त्यांच्यापैकी एखादा सुज्ञ माणूस असे म्हणाला - 'हा वर्षावास सुरू होण्याचा काळ आहे. जेथे वर्षावासात नियमित भिक्षा आणि वस्तूंचे आच्छादन मिळते, तेथे भिक्खू जातात.' त्याचे ऐकून जर ते लोक 'भंते, या गावातही लोक खातात आणि वस्त्रे नेसतात, आपण इतरत्र जाऊ नका' असे म्हणून मित्र व नातेवाईकांना बोलावून, सर्वांनी मिळून विचारविनिमय करून विहारात नियमित भिक्षा, शलाका-भात आणि वर्षावासिक चीवर देण्याची व्यवस्था करून 'भंते, येथेच राहावे' अशी विनंती करत असतील, तर ते सर्व स्वीकारणे योग्य आहे. कारण हे सर्व कप्पिय (योग्य) आणि अनवद्य (दोषरहित) आहे. परंतु कुरुन्दी अट्ठकथेत म्हटले आहे - ''कोठे जात आहात?' असे विचारले असता 'अमुक ठिकाणी' असे सांगावे, आणि 'तेथे का जात आहात?' असे विचारले असता 'कारण सांगावे'.' येथे दोन्ही प्रकारची विधाने शुद्ध चित्तामुळे दोषरहितच आहेत. याला 'आगंतुक-कर्तव्य' (आगंतुकवत्त) म्हणतात. อิทํ ปน อาวาสิกวตฺตํ – ปฏิกจฺเจว หิ อาวาสิเกหิ วิหาโร ชคฺคิตพฺโพ. ขณฺฑผุลฺลปฏิสงฺขรณปริภณฺฑานิ กาตพฺพานิ. รตฺติฏฺฐานทิวาฏฺฐานวจฺจกุฏิปสฺสาวฏฺฐานานิ ปธานฆรวิหารมคฺโคติ อิมานิ สพฺพานิ ปฏิชคฺคิตพฺพานิ, เจติเย สุธากมฺมํ มุทฺทเวทิกาย เตลมกฺขนํ มญฺจปีฐปฏิชคฺคนนฺติ อิทมฺปิ สพฺพํ กาตพฺพํ – ‘‘วสฺสํ วสิตุกามา อาคนฺตฺวา อุทฺเทสปริปุจฺฉากมฺมฏฺฐานานุโยคาทีนิ กโรนฺตา สุขํ วสิสฺสนฺตี’’ติ. กตปริกมฺเมหิ อาสาฬฺหีชุณฺหปญฺจมิโต ปฏฺฐาย วสฺสาวาสิกํ ปุจฺฉิตพฺพํ. กตฺถ ปุจฺฉิตพฺพํ? ยโต ปกติยา ลพฺภติ. เยหิ ปน น ทินฺนปุพฺพํ, เต ปุจฺฉิตุํ น วฏฺฏติ. กสฺมา ปุจฺฉิตพฺพํ? กทาจิ หิ มนุสฺสา เทนฺติ, กทาจิ ทุพฺภิกฺขาทีหิ อุปทฺทุตา น เทนฺติ. ตตฺถ เย น ทสฺสนฺติ, เต อปุจฺฉิตฺวา วสฺสาวาสิเก คาหิเต คาหิตภิกฺขูนํ ลาภนฺตราโย โหติ, ตสฺมา ปุจฺฉิตฺวาว คาเหตพฺพํ, ปุจฺฉนฺเตน ‘‘ตุมฺหากํ วสฺสาวาสิกคฺคาหกกาโล อุปกฏฺโฐ’’ติ วตฺตพฺพํ. สเจ วทนฺติ ‘‘ภนฺเต, อิมํ สํวจฺฉรํ ฉาตกาทีหิ อุปทฺทุตมฺห, น สกฺโกม ทาตุ’’นฺติ วา ‘‘ยํ มยํ ปุพฺเพ เทม, ตโต อูนตรํ ทสฺสามา’’ติ วา ‘‘อิทานิ กปฺปาโส สุลโภ, ยํ ปุพฺเพ เทม, ตโต พหุตรํ ทสฺสามา’’ติ [Pg.69] วา วทนฺติ, ตํ สลฺลกฺเขตฺวา ตทนุรูเปน นเยน เตสํ เตสํ เสนาสเน ภิกฺขูนํ วสฺสาวาสิกํ คาเหตพฺพํ. हे तर निवासी भिक्खूंचे कर्तव्य (आवासिकवत्त) आहे – कारण निवासी भिक्खूंनी आधीच विहाराची स्वच्छता केली पाहिजे. तुटलेल्या-फुटलेल्या भागांची दुरुस्ती आणि सारवण (परिभण्ड) केले पाहिजे. रात्रीची जागा, दिवसाची जागा, शौचालय (वच्चकुटि), मुतारी (पस्सावट्ठान), ध्यानगृह (पधानघर) आणि विहाराचा मार्ग या सर्वांची स्वच्छता केली पाहिजे. चैत्यावर चुना लावणे (सुधाकम्म), चैत्याच्या वरील वेदिकेवर (मुद्दवेदिका) तेल लावणे, खाटा व आसनांची (मञ्चपीठ) स्वच्छता करणे, हे सर्वही केले पाहिजे – 'वर्षावास करू इच्छिणारे भिक्खू येथे येऊन पाठांतर (उद्देस), विचारपूस (परिपुच्छा), आणि कम्मट्ठान (ध्यान) इत्यादींचा अभ्यास करत सुखाने राहतील' या विचाराने हे सर्व केले पाहिजे. पूर्वतयारी (परिकम्म) केलेल्या भिक्खूंनी आषाढ शुद्ध पंचमीपासून (आसाळ्हीजुण्हपञ्चमी) वर्षावासिक चीवराविषयी विचारणा केली पाहिजे. कोठे विचारणा करावी? जेथून सामान्यतः ते प्राप्त होते, तेथे विचारणा करावी. परंतु ज्यांनी पूर्वी कधीही दिले नाही, त्यांना विचारणे योग्य नाही. का विचारणा करावी? कारण कधी लोक देतात, तर कधी दुष्काळ इत्यादी संकटांमुळे पीडित होऊन देत नाहीत. त्या लोकांमध्ये जे देणार नाहीत, त्यांना न विचारता वर्षावासिक चीवरासाठी विहार स्वीकारल्यास, विहार स्वीकारणाऱ्या भिक्खूंच्या लाभाला अंतराय (अडथळा) निर्माण होतो, म्हणून विचारूनच विहार स्वीकारला पाहिजे. विचारताना भिक्खूने म्हणावे, 'तुमच्यासाठी वर्षावासिक चीवर देण्याची वेळ जवळ आली आहे.' जर ते म्हणाले, 'भंते, या वर्षी आम्ही भूक/दुष्काळ इत्यादींनी पीडित आहोत, आम्ही देण्यास असमर्थ आहोत' किंवा 'आम्ही पूर्वी जे देत होतो, त्यापेक्षा कमी देऊ' किंवा 'आता कापूस सहज उपलब्ध आहे, म्हणून आम्ही पूर्वीपेक्षा अधिक देऊ', तर त्या गोष्टीची नोंद घेऊन त्यानुसार योग्य पद्धतीने त्या-त्या लोकांच्या सेनासनात भिक्खूंसाठी वर्षावासिक चीवर स्वीकारले पाहिजे. สเจ มนุสฺสา วทนฺติ – ‘‘ยสฺส อมฺหากํ วสฺสาวาสิกํ ปาปุณาติ, โส เตมาสํ ปานียํ อุปฏฺฐาเปตุ, วิหารมคฺคํ ชคฺคตุ, เจติยงฺคณโพธิยงฺคณานิ ชคฺคตุ, โพธิรุกฺเข อุทกํ อาสิญฺจตู’’ติ, ยสฺส ตํ ปาปุณาติ, ตสฺส อาจิกฺขิตพฺพํ. โย ปน คาโม ปฏิกฺกมฺม โยชนทฺวิโยชนนฺตเร โหติ, ตตฺร เจ กุลานิ อุปนิกฺเขปํ ฐเปตฺวา วิหาเร วสฺสาวาสิกํ เทนฺติเยว, ตานิ กุลานิ อปุจฺฉิตฺวาปิ เตสํ เสนาสเน วตฺตํ กตฺวา วสนฺตสฺส วสฺสาวาสิกํ คาเหตพฺพํ. สเจ ปน เตสํ เสนาสเน ปํสุกูลิโก วสติ, อาคตญฺจ ตํ ทิสฺวา ‘‘ตุมฺหากํ วสฺสาวาสิกํ เทมา’’ติ วทนฺติ, เตน สงฺฆสฺส อาจิกฺขิตพฺพํ. สเจ ตานิ กุลานิ สงฺฆสฺส ทาตุํ น อิจฺฉนฺติ, ‘‘ตุมฺหากํเยว เทมา’’ติ วทนฺติ, สภาโค ภิกฺขุ ‘‘วตฺตํ กตฺวา คณฺหาหี’’ติ วตฺตพฺโพ. ปํสุกูลิกสฺส ปเนตํ น วฏฺฏติ, อิติ สทฺธาเทยฺเย ทายกมนุสฺสา ปุจฺฉิตพฺพา. जर लोक म्हणाले – 'ज्या भिक्खूला आमचे वर्षावासिक चीवर मिळेल, त्यांनी तीन महिने पिण्याचे पाणी उपलब्ध करावे, विहाराच्या मार्गाची स्वच्छता करावी, चैत्य प्रांगण व बोधी प्रांगणाची स्वच्छता करावी, आणि बोधिवृक्षाला पाणी घालावे', तर ज्या भिक्खूला ते चीवर मिळणार आहे, त्यांना हे सांगितले पाहिजे. जो गाव विहारापासून दूर एक किंवा दोन योजने अंतरावर आहे, आणि तेथील कुटुंबे विहाराजवळ ठेवलेली वस्तू (उपनिक्खेप) ठेवून विहारात वर्षावासिक चीवर देतातच, तर त्या कुटुंबांना न विचारताही, त्यांच्या सेनासनात कर्तव्यांचे पालन करून राहणाऱ्या भिक्खूसाठी वर्षावासिक चीवर स्वीकारले पाहिजे. पण जर त्यांच्या सेनासनात एखादा पांसुकुलिक (पांसुकुलिक धुतंग पाळणारा भिक्खू) राहत असेल, आणि त्यांना आलेले पाहून लोक म्हणाले, 'आम्ही आपल्याला वर्षावासिक चीवर देतो', तर त्यांनी संघाला हे सांगितले पाहिजे. जर ती कुटुंबे संघाला देण्यास तयार नसतील आणि म्हणतील, 'आम्ही केवळ आपल्यालाच देतो', तर समान शील असलेल्या (सभागो) भिक्खूने त्यांना म्हणावे, 'कर्तव्य पूर्ण करून ते स्वीकारावे.' परंतु पांसुकुलिक भिक्खूसाठी हे योग्य नाही. अशा प्रकारे श्रद्धेने दिल्या जाणाऱ्या दानाबाबत (सद्धादेय्य) दानशूर लोकांना विचारले पाहिजे. ตตฺรุปฺปาเท ปน กปฺปิยการกา ปุจฺฉิตพฺพา. กถํ ปุจฺฉิตพฺพา? ‘‘กึ, อาวุโส, สงฺฆสฺส ภณฺฑปฏิจฺฉาทนํ ภวิสฺสตี’’ติ. สเจ วทนฺติ – ‘‘ภวิสฺสติ, ภนฺเต, เอเกกสฺส นวหตฺถํ สาฏกํ ทสฺสาม, วสฺสาวาสิกํ คาเหถา’’ติ, คาเหตพฺพํ. สเจปิ วทนฺติ – ‘‘สาฏกํ นตฺถิ; วตฺถุ ปน อตฺถิ, คาเหถ, ภนฺเต’’ติ, วตฺถุมฺหิ สนฺเตปิ คาเหตุํ วฏฺฏติเยว. กปฺปิยการกานญฺหิ หตฺเถ ‘‘กปฺปิยภณฺฑํ ปริภุญฺชถา’’ติ ทินฺนวตฺถุโต ยํ ยํ กปฺปํ, ตํ ตํ สพฺพํ ปริภุญฺชิตุํ อนุญฺญาตํ. परंतु त्या विहारात उत्पन्न होणाऱ्या लाभाच्या बाबतीत कप्पियकारकांना विचारले पाहिजे. कसे विचारावे? 'आयुष्यमान (आवुसो), संघासाठी आच्छादन करणारे चीवर-भांड (वस्त्र) उपलब्ध होईल का?' जर ते म्हणाले – 'होईल भंते, आम्ही प्रत्येकाला नऊ हात लांबीचे वस्त्र (साटक) देऊ, आपण वर्षावासिक सेनासन स्वीकारावे', तर ते स्वीकारले पाहिजे. जर ते असेही म्हणाले – 'वस्त्र नाही, परंतु वस्तू (धन/साधन) आहे, भंते, आपण सेनासन स्वीकारावे', तर वस्तू उपलब्ध असतानाही ते स्वीकारणे योग्यच आहे. कारण कप्पियकारकांच्या हाती 'कप्पिय वस्तूंचा (योग्य वस्तूंचा) उपभोग घ्या' असे म्हणून दिलेल्या वस्तूंमधून जे जे कप्पिय (योग्य/विहित) आहे, त्या सर्व वस्तूंचा उपभोग घेण्याची अनुमती आहे. ยํ ปเนตฺถ ปิณฺฑปาตตฺถาย คิลานปจฺจยตฺถาย วา อุทฺทิสฺส ทินฺนํ, ตํ จีวเร อุปนาเมนฺเตหิ สงฺฆสุฏฺฐุตาย อปโลเกตฺวา อุปนาเมตพฺพํ. เสนาสนตฺถาย อุทฺทิสฺส ทินฺนํ ครุภณฺฑํ โหติ, จีวรวเสเนว จตุปจฺจยวเสน วา ทินฺนํ จีวเร อุปนาเมนฺตานํ อปโลกนกมฺมกิจฺจํ นตฺถิ, อปโลกนกมฺมํ กโรนฺเตหิ จ ปุคฺคลวเสเนว กาตพฺพํ, สงฺฆวเสน น กาตพฺพํ. ชาตรูปรชตวเสนาปิ อามกธญฺญวเสน วา อปโลกนกมฺมํ น วฏฺฏติ. กปฺปิยภณฺฑวเสน จีวรตณฺฑุลาทิวเสเนว จ วฏฺฏติ. ตํ ปน เอวํ กตฺตพฺพํ – ‘‘อิทานิ สุภิกฺขํ สุลภปิณฺฑํ, ภิกฺขู จีวเรน กิลมนฺติ, เอตฺตกํ นาม ตณฺฑุลภาคํ ภิกฺขูนํ จีวรํ กาตุํ รุจฺจตี’’ติ. ‘‘คิลานปจฺจโย สุลโภ [Pg.70] คิลาโน วา นตฺถิ, เอตฺตกํ นาม ตณฺฑุลภาคํ ภิกฺขูนํ จีวรํ กาตุํ รุจฺจตี’’ติ. परंतु येथे जे पिंडपातासाठी किंवा ग्लानप्रत्ययासाठी (औषधासाठी) उद्देशून दिले आहे, ते चीवरासाठी वळवताना भिक्खूंनी संघाच्या संमतीसाठी (संघाच्या हितासाठी) विचारणा करून (अपलोकेत्वा) वळवले पाहिजे. सेनासनासाठी उद्देशून दिलेली वस्तू ही 'गरुभांड' (संघाची मोठी मालमत्ता) असते. चीवराच्या स्वरूपात किंवा चार प्रत्ययांच्या (चतुपच्चय) स्वरूपात दिलेल्या वस्तूंना चीवरासाठी वळवताना विचारणा करण्याचे (अपलोकन कर्माचे) काही प्रयोजन नाही. आणि विचारणा कर्म (अपलोकनकर्म) करणाऱ्यांनी ते केवळ पुद्गल-भावाने (वैयक्तिक पातळीवर) केले पाहिजे, संघाच्या नावाने करू नये. सोने-चांदीच्या स्वरूपात किंवा कच्च्या धान्याच्या स्वरूपात विचारणा कर्म करणे योग्य नाही. कप्पिय भांड (योग्य वस्तू) किंवा चीवर, तांदूळ इत्यादींच्या स्वरूपातच विचारणा कर्म करणे योग्य आहे. ते अशा प्रकारे केले पाहिजे – 'सध्या सुभिक्ष आहे, पिंडपात सहज उपलब्ध आहे, परंतु भिक्खू चीवराअभावी त्रस्त आहेत. तर एवढा तांदळाचा भाग भिक्खूंसाठी चीवर बनवण्यासाठी वापरणे योग्य वाटेल का?' किंवा 'ग्लानप्रत्यय (औषध) सहज उपलब्ध आहे किंवा कोणी आजारी नाही, तर एवढा तांदळाचा भाग भिक्खूंसाठी चीवर बनवण्यासाठी वापरणे योग्य वाटेल का?' เอวํ จีวรปจฺจยํ สลฺลกฺเขตฺวา เสนาสนสฺส กาเล โฆสิเต สนฺนิปติเต สงฺเฆ เสนาสนคฺคาหโก สมฺมนฺนิตพฺโพ. สมฺมนฺนนฺเตน จ ทฺเว สมฺมนฺนิตพฺพาติ วุตฺตํ. เอวญฺหิ นวโก วุฑฺฒตรสฺส, วุฑฺโฒ จ นวกสฺส คาเหสฺสติ. มหนฺเต ปน มหาวิหารสทิเส วิหาเร ตโย จตฺตาโร ชนา สมฺมนฺนิตพฺพา. กุรุนฺทิยํ ปน ‘‘อฏฺฐปิ โสฬสปิ ชเน สมฺมนฺนิตุํ วฏฺฏตี’’ติ วุตฺตํ. เตสํ สมฺมุติ กมฺมวาจายปิ อปโลกเนนปิ วฏฺฏติเยว. अशा प्रकारे चीवर प्रत्ययाची नोंद घेऊन, सेनासन वाटपाची वेळ घोषित झाल्यावर संघ एकत्रित आल्यावर सेनासन स्वीकारणारा (सेनासनग्गाहक) भिक्खू नियुक्त (संमत) केला पाहिजे. आणि नियुक्ती करताना दोन भिक्खू नियुक्त करावेत, असे म्हटले आहे. कारण असे केल्याने कनिष्ठ (नवक) भिक्खू ज्येष्ठ (वुड्ढतर) भिक्खूला सेनासन स्वीकारण्यास मदत करेल आणि ज्येष्ठ भिक्खू कनिष्ठ भिक्खूला सेनासन स्वीकारण्यास मदत करेल. परंतु महाविहारासारख्या मोठ्या विहारात तीन किंवा चार भिक्खू नियुक्त करावेत. कुरुन्दी अट्ठकथेत तर 'आठ किंवा सोळा भिक्खू देखील नियुक्त करणे योग्य आहे' असे म्हटले आहे. त्यांची नियुक्ती कम्मवाचेने किंवा अपलोकनाने (संमतीने) करणे योग्यच आहे. เตหิ สมฺมเตหิ ภิกฺขูหิ เสนาสนํ สลฺลกฺเขตพฺพํ, เจติยฆรํ โพธิฆรํ อาสนฆรํ สมฺมุญฺชนิอฏฺโฏ ทารุอฏฺโฏ วจฺจกุฏิ อิฏฺฐกสาลา วฑฺฒกิสาลา ทฺวารโกฏฺฐโก ปานียมาโฬ มคฺโค โปกฺขรณีติ เอตานิ หิ อเสนาสนานิ, วิหาโร อฑฺฒโยโค ปาสาโท หมฺมิยํ คุหา มณฺฑโป รุกฺขมูลํ เวฬุคุมฺโพติ อิมานิ เสนาสนานิ, ตานิ คาเหตพฺพานิ. คาเหนฺเตน จ ‘‘ปฐมํ ภิกฺขู คเณตุํ, ภิกฺขู คเณตฺวา เสยฺยา คเณตุ’’นฺติ เอตฺถ วุตฺตนเยน คาเหตพฺพานิ. สเจ สงฺฆิโก จ สทฺธาเทยฺโย จาติ ทฺเว จีวรปจฺจยา โหนฺติ, เตสุ ยํ ภิกฺขู ปฐมํ คณฺหิตุํ อิจฺฉนฺติ, ตํ คาเหตฺวา ตสฺส ฐิติกโต ปฏฺฐาย อิตโร คาเหตพฺโพ. त्या नियुक्त भिक्खूंनी सेनासनांची नोंद घेतली पाहिजे. चैत्यगृह, बोधीगृह, आसनगृह, झाडू ठेवण्याची जागा (सम्मुञ्जनीअट्ट), लाकडे ठेवण्याची जागा (दारुअट्ट), शौचालय (वच्चकुटि), विटांची शाळा (इट्ठकसाला), सुतारांची शाळा (वड्ढकिसाला), प्रवेशद्वार (द्वारकोट्ठक), पिण्याच्या पाण्याचा माळ (पानीयमाळ), रस्ता आणि तलाव (पोक्खरणी) – ही सेनासने (राहण्याच्या जागा) नाहीत. विहार, अढ्ढयोग, प्रासाद, हम्मिय, गुहा, मंडप, वृक्षाचे मूळ (झाडाखालील जागा), बांबूचे बेट (वेळुगुम्ब) – ही सेनासने आहेत, ती स्वीकारली पाहिजेत. आणि सेनासन स्वीकारताना 'प्रथम भिक्खूंची गणना करावी, भिक्खूंची गणना करून शय्यांची (आसनांची) गणना करावी' या येथे सांगितलेल्या पद्धतीने ते स्वीकारले पाहिजे. जर सांघिक (संघाचे) आणि श्रद्धादेय्य (श्रद्धेने दिलेले) असे दोन प्रकारचे चीवर प्रत्यय असतील, तर त्यांपैकी जे भिक्खूंना आधी स्वीकारण्याची इच्छा असेल, ते स्वीकारून, त्याच्या उर्वरित भागापासून सुरुवात करून दुसरे स्वीकारले पाहिजे. สเจ ปน ภิกฺขูนํ อปฺปตาย ปริเวณคฺเคน เสนาสเน คาหิยมาเน เอกํ ปริเวณํ มหาลาภํ โหติ, ทส วา ทฺวาทส วา จีวรานิ ลภนฺติ, ตํ วิชเฏตฺวา อญฺเญสุ อลาภเกสุ อาวาเสสุ ปกฺขิปิตฺวา อญฺเญสมฺปิ ภิกฺขูนํ คาเหตพฺพนฺติ มหาสุมตฺเถโร อาห. มหาปทุมตฺเถโร ปนาห – ‘‘น เอวํ กาตพฺพํ, มนุสฺสา หิ อตฺตโน อาวาสชคฺคนตฺถาย ปจฺจยํ เทนฺติ, ตสฺมา อญฺเญหิ ภิกฺขูหิ ตตฺถ ปวิสิตพฺพ’’นฺติ. สเจ ปเนตฺถ มหาเถโร ปฏิกฺโกสติ – ‘‘มาวุโส, เอวํ คาเหถ, ภควโต อนุสิฏฺฐึ กโรถ, วุตฺตญฺเหตํ ภควตา – ‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, ปริเวณคฺเคน คาเหตุ’’’นฺติ ตสฺส ปฏิกฺโกสนาย อฏฺฐตฺวา ‘‘ภนฺเต ภิกฺขู พหู, ปจฺจโย มนฺโท, สงฺคหํ กาตุํ วฏฺฏตี’’ติ ตํ สญฺญาเปตฺวา คาเหตพฺพเมว. परंतु, भिक्खूंच्या अल्पतेमुळे (कमी संख्येमुळे) परिवेणाच्या (परिसराच्या) मर्यादेनुसार सेनासन ग्रहण करवून घेतले जात असताना, जर एखादे परिवेण मोठ्या लाभाचे असेल आणि तेथे दहा किंवा बारा चीवरे मिळत असतील, तर ते विभागून इतर लाभ नसलेल्या आवासांमध्ये (विहारांमध्ये) पाठवून इतर भिक्खूंनाही ग्रहण करवून घ्यावे, असे महासुम थेरांनी म्हटले. परंतु महापदुम थेरांनी म्हटले – “असे करू नये, कारण लोक आपल्या आवासाच्या देखभालीसाठी प्रत्यय (साधने) देतात, म्हणून इतर भिक्खूंनी तेथे प्रवेश करावा (सहभागी व्हावे).” जर यावर महाथेर विरोध करत असतील की – “आयुष्यमानांनो, असे ग्रहण करू नका, भगवंतांच्या अनुशासनाचे पालन करा. भगवंतांनी असे म्हटले आहे – ‘भिक्खूंनो, मी परिवेणाच्या मर्यादेनुसार ग्रहण करण्यास अनुमती देतो’”, तर त्यांच्या विरोधाला न जुमानता, “भंते, भिक्खू पुष्कळ आहेत, प्रत्यय कमी आहेत, परस्पर साहाय्य करणे योग्य आहे” असे त्यांना समजवून सांगून ते ग्रहण करवून घ्यावेच. คาเหนฺเตน [Pg.71] จ สมฺมเตน ภิกฺขุนา มหาเถรสฺส สนฺติกํ คนฺตฺวา เอวํ วตฺตพฺพํ – ‘‘ภนฺเต, ตุมฺหากํ เสนาสนํ ปาปุณาติ, คณฺหถ ปจฺจยํ ธาเรถา’’ติ. ‘‘อสุกกุลสฺส ปจฺจโย อสุกเสนาสนญฺจ มยฺหํ ปาปุณาติ, อาวุโส’’ติ, ‘‘ปาปุณาติ, ภนฺเต, คณฺหถ น’’นฺติ, ‘‘คณฺหามิ, อาวุโส’’ติ, คหิตํ โหติ. สเจ ปน ‘‘คหิตํ โว, ภนฺเต’’ติ วุตฺเต ‘‘คหิตํ เม’’ติ วา ‘‘คณฺหิสฺสถ, ภนฺเต’’ติ วุตฺเต ‘‘คณฺหิสฺสามี’’ติ วา วทติ, ‘‘อคหิตํ โหตี’’ติ มหาสุมตฺเถโร อาห. มหาปทุมตฺเถโร ปนาห – ‘‘อตีตานาคตวจนํ วา โหตุ, วตฺตมานวจนํ วา, สตุปฺปาทมตฺตอาลยกรณมตฺตเมว เจตฺถ ปมาณํ, ตสฺมา คหิตเมว โหตี’’ติ. आणि सेनासन ग्रहण करवून घेणाऱ्या संमत (नियुक्त) भिक्खूने महाथेरांच्या जवळ जाऊन असे म्हणावे – “भंते, आपल्याला हे सेनासन प्राप्त होत आहे, ते ग्रहण करा आणि प्रत्यय स्वीकारा.” “आयुष्यमाना, अमुक कुलाचा प्रत्यय आणि अमुक सेनासन मला प्राप्त होत आहे का?” असे विचारल्यावर, “होय भंते, प्राप्त होत आहे, आपण ते ग्रहण करावे” असे म्हणावे. “आयुष्यमाना, मी ते ग्रहण करतो” असे म्हटल्यास ते ग्रहण केले गेले असे होते. परंतु जर “भंते, आपण ते ग्रहण केले का?” असे विचारल्यावर “मी ग्रहण केले आहे” असे किंवा “भंते, आपण ग्रहण कराल का?” असे विचारल्यावर “मी ग्रहण करीन” असे म्हटले, तर “ते ग्रहण न केल्यासारखेच होते” असे महासुम थेरांनी म्हटले. परंतु महापदुम थेरांनी म्हटले – “भूतकाळ किंवा भविष्यकाळातील वचन असो वा वर्तमानकाळातील वचन असो, येथे केवळ स्मृती जागृत होणे आणि स्वीकारण्याची इच्छा असणे एवढेच प्रमाण आहे, म्हणून ते ग्रहण केले गेले असेच मानले जाते.” โยปิ ปํสุกูลิโก ภิกฺขุ เสนาสนํ คเหตฺวา ปจฺจยํ วิสฺสชฺเชติ, อยมฺปิ น อญฺญสฺมึ อาวาเส ปกฺขิปิตพฺโพ. ตสฺมึเยว ปริเวเณ อคฺคิสาลาย วา ทีฆสาลาย วา รุกฺขมูเล วา อญฺญสฺส คาเหตุํ วฏฺฏติ. ปํสุกูลิโก ‘‘วสามี’’ติ เสนาสนํ ชคฺคิสฺสติ, อิตโร ‘‘ปจฺจยํ คณฺหามี’’ติ, เอวํ ทฺวีหิ การเณหิ เสนาสนํ สุชคฺคิตตรํ ภวิสฺสติ. มหาปจฺจริยํ ปน วุตฺตํ – ‘‘ปํสุกูลิเก วาสตฺถาย เสนาสนํ คณฺหนฺเต เสนาสนคฺคาหาปเกน วตฺตพฺพํ – ‘ภนฺเต, อิธ ปจฺจโย อตฺถิ, โส กึ กาตพฺโพ’ติ. เตน ‘เหฏฺฐา อญฺญํ คาหาเปหี’ติ วตฺตพฺโพ. สเจ ปน กิญฺจิ อวตฺวาว วสติ, วุตฺถวสฺสสฺส จ ปาทมูเล ฐเปตฺวา สาฏกํ เทนฺติ, วฏฺฏติ. อถ วสฺสาวาสิกํ เทมาติ วทนฺติ, ตสฺมึ เสนาสเน วสฺสํวุตฺถภิกฺขูนํ ปาปุณาตี’’ติ. เยสํ ปน เสนาสนํ นตฺถิ; เกวลํ ปจฺจยเมว เทนฺติ, เตสํ ปจฺจยํ อวสฺสาวาสิเก เสนาสเน คาเหตุํ วฏฺฏติ. जो पांसुकूलिक भिक्खू सेनासन ग्रहण करून प्रत्यय (साधने) सोडून देतो, तो प्रत्यय देखील दुसऱ्या विहारात पाठवू नये. त्याच परिवेणात अग्निशाला, दीर्घशाला किंवा वृक्षाच्या मुळाशी दुसऱ्या भिक्खूसाठी ते ग्रहण करणे योग्य आहे. पांसुकूलिक भिक्खू “मी येथे राहतो” या विचाराने सेनासनाची देखभाल करेल, आणि दुसरा भिक्खू “मी प्रत्यय ग्रहण करतो” या विचाराने सेनासनाची देखभाल करेल. अशा प्रकारे दोन कारणांमुळे सेनासनाची अधिक चांगल्या प्रकारे देखभाल होईल. महाप्रत्यरीमध्ये म्हटले आहे – “पांसुकूलिक भिक्खू राहण्यासाठी सेनासन ग्रहण करत असताना सेनासन ग्रहण करवून देणाऱ्याने म्हणावे – ‘भंते, येथे प्रत्यय उपलब्ध आहेत, त्यांचे काय करावे?’ त्यावर त्याने (पांसुकूलिक भिक्खूने) म्हणावे – ‘खाली इतर भिक्खूला ते ग्रहण करवून दे.’ परंतु जर तो काहीही न बोलता राहतो, आणि वर्षावास पूर्ण झाल्यावर त्याच्या पायाजवळ ठेवून वस्त्र दान दिले जाते, तर ते योग्य आहे. परंतु जर लोक ‘आम्ही वर्षावासिक देत आहोत’ असे म्हणतात, तर ते त्या सेनासनात वर्षावास पूर्ण केलेल्या भिक्खूंना प्राप्त होते.” परंतु ज्या लोकांकडे सेनासन नाही, जे केवळ प्रत्ययच देतात, त्यांचा प्रत्यय वर्षावास न केलेल्या सेनासनात ग्रहण करणे योग्य आहे. มนุสฺสา ถูปํ กตฺวา วสฺสาวาสิกํ คาหาเปนฺติ, ถูโป นาม อเสนาสนํ, ตสฺส สมีเป รุกฺเข วา มณฺฑเป วา อุปนิพนฺธิตฺวา คาหาเปตพฺพํ. เตน ภิกฺขุนา เจติยํ ปฏิชคฺคิตพฺพํ. โพธิรุกฺขโพธิฆรอาสนฆรสมฺมุญฺชนิอฏฺฏทารุอฏฺฏวจฺจกุฏิทฺวารโกฏฺฐกปานียมาฬกทนฺตกฏฺฐมาฬเกสุปิ เอเสว นโย. โภชนสาลา ปน เสนาสนเมว, ตสฺมา ตํ เอกสฺส วา พหูนํ วา ปริจฺฉินฺทิตฺวา คาเหตุํ วฏฺฏตีติ สพฺพมิทํ วิตฺถาเรน มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. लोक स्तूप बांधून वर्षावासिक ग्रहण करवून घेतात, स्तूप म्हणजे सेनासन नव्हे, त्याच्या जवळ असलेल्या झाडाशी किंवा मंडपात संबंध जोडून ते ग्रहण करवून घ्यावे. त्या भिक्खूने चेतियाची देखभाल करावी. बोधिवृक्ष, बोधिगृह, आसनगृह, झाडू ठेवण्याची जागा, लाकूड ठेवण्याची जागा, शौचालय, प्रवेशद्वार, पिण्याच्या पाण्याचे ठिकाण आणि दंतकाष्ठ ठेवण्याच्या जागेच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. भोजनशाळा ही सेनासनच आहे, म्हणून ती एकासाठी किंवा अनेकांसाठी विभागून ग्रहण करणे योग्य आहे, हे सर्व सविस्तरपणे महाप्रत्यरीमध्ये सांगितले आहे. เสนาสนคฺคาหาปเกน ปน ปาฏิปทอรุณโต ปฏฺฐาย ยาว ปุน อรุณํ น ภิชฺชติ ตาว คาเหตพฺพํ, อิทญฺหิ เสนาสนคฺคาหสฺส เขตฺตํ. สเจ [Pg.72] ปาโตว คาหิเต เสนาสเน อญฺโญ วิตกฺกจาริโก ภิกฺขุ อาคนฺตฺวา เสนาสนํ ยาจติ, ‘‘คหิตํ, ภนฺเต, เสนาสนํ, วสฺสูปคโต สงฺโฆ, รมณีโย วิหาโร, รุกฺขมูลาทีสุ ยตฺถ อิจฺฉถ ตตฺถ วสถา’’ติ วตฺตพฺโพ. วสฺสูปคเตหิ อนฺโตวสฺเส นิพทฺธวตฺตํ ฐเปตฺวา วสฺสูปคตา ภิกฺขู ‘‘สมฺมุญฺชนิโย พนฺธถา’’ติ วตฺตพฺพา. สุลภา เจ ทณฺฑกา เจว สลากาโย จ โหนฺติ, เอเกเกน ฉ ปญฺจ มุฏฺฐิสมฺมุญฺชนิโย, ทฺเว ติสฺโส ยฏฺฐิสมฺมุญฺชนิโย วา พนฺธิตพฺพา. ทุลฺลภา เจ โหนฺติ, ทฺเว ติสฺโส มุฏฺฐิสมฺมุญฺชนิโย เอกา ยฏฺฐิสมฺมุญฺชนี พนฺธิตพฺพา. สามเณเรหิ ปญฺจ ปญฺจ อุกฺกา โกฏฺเฏตพฺพา. วสนฏฺฐาเน กสาวปริภณฺฑํ กาตพฺพํ. सेनासन ग्रहण करवून देणाऱ्याने प्रतिपदेच्या अरुणोदयापासून सुरू करून जोपर्यंत पुन्हा अरुणोदय होत नाही तोपर्यंत ग्रहण करवून घ्यावे, कारण हाच सेनासन ग्रहणाचा काळ आहे. जर सकाळीच सेनासन ग्रहण केले गेले असताना दुसरा एखादा भ्रमण करणारा भिक्खू येऊन सेनासनाची याचना करतो, तर त्याला म्हणावे – “भंते, सेनासन ग्रहण केले गेले आहे, संघ वर्षावासाला बसला आहे, विहार रमणीय आहे, झाडाच्या मुळाशी इत्यादी ठिकाणी जेथे आपली इच्छा असेल तेथे आपण राहावे.” वर्षावासाला बसलेल्या भिक्खूंनी वर्षावासाच्या काळात नियमित कर्तव्ये बाजूला ठेवून, वर्षावासाला बसलेल्या भिक्खूंना “झाडू तयार करा” असे सांगावे. जर काठ्या आणि झाडूच्या काड्या सहज उपलब्ध असतील, तर प्रत्येकाने पाच किंवा सहा मुठ्ठी-झाडू किंवा दोन-तीन दांड्याचे झाडू बांधावेत. जर त्या मिळणे कठीण असेल, तर दोन-तीन मुठ्ठी-झाडू आणि एक दांड्याचा झाडू बांधावा. सामणेरांनी पाच-पाच मशाली तयार कराव्यात. राहण्याच्या ठिकाणी काषाय रंगाने (गेरूने) सारवासारव करावी. วตฺตํ กโรนฺเตหิ ปน ‘‘น อุทฺทิสิตพฺพํ, น อุทฺทิสาเปตพฺพํ, น สชฺฌาโย กาตพฺโพ, น ปพฺพาเชตพฺพํ, น อุปสมฺปาเทตพฺพํ, น นิสฺสโย ทาตพฺโพ, น ธมฺมสวนํ กาตพฺพํ, สพฺเพว หิ เอเต ปปญฺจา. นิปฺปปญฺจา หุตฺวา สมณธมฺมเมว กริสฺสามา’’ติ วา ‘‘สพฺเพ เตรส ธุตงฺคานิ สมาทิยนฺตุ, เสยฺยํ อกปฺเปตฺวา ฐานจงฺกเมหิ วีตินาเมนฺตุ, มูคพฺพตํ คณฺหนฺตุ, สตฺตาหกรณีเยน คตาปิ ภาชนียภณฺฑํ ลภนฺตู’’ติ วา เอวรูปํ อธมฺมิกวตฺตํ น กาตพฺพํ. เอวํ ปน กาตพฺพํ – ปริยตฺติธมฺโม นาม ติวิธมฺปิ สทฺธมฺมํ ปติฏฺฐาเปติ; ตสฺมา สกฺกจฺจํ อุทฺทิสถ, อุทฺทิสาเปถ, สชฺฌายํ กโรถ, ปธานฆเร วสนฺตานํ สงฺฆฏฺฏนํ อกตฺวา อนฺโตวิหาเร นิสีทิตฺวา อุทฺทิสถ, อุทฺทิสาเปถ, สชฺฌายํ กโรถ, ธมฺมสวนํ สมิทฺธํ กโรถ, ปพฺพาเชนฺตา โสเธตฺวา ปพฺพาเชถ, โสเธตฺวา อุปสมฺปาเทถ, โสเธตฺวา นิสฺสยํ เทถ, เอโกปิ หิ กุลปุตฺโต ปพฺพชฺชํ อุปสมฺปทญฺจ ลภิตฺวา สกลสาสนํ ปติฏฺฐาเปติ, อตฺตโน ถาเมน ยตฺตกานิ สกฺโกถ ตตฺตกานิ ธุตงฺคานิ สมาทิยถ. อนฺโตวสฺสํ นาเมตํ สกลทิวสํ รตฺติยา จ ปฐมปจฺฉิมยาเมสุ อปฺปมตฺเตหิ ภวิตพฺพํ, วีริยํ อารภิตพฺพํ. โปราณกมหาเถราปิ สพฺพปลิโพเธ ฉินฺทิตฺวา อนฺโตวสฺเส เอกจาริกวตฺตํ ปูรยึสุ, ภสฺเส มตฺตํ ชานิตฺวา ทสวตฺถุกกถํ ทสอสุภทสานุสฺสติอฏฺฐตึสารมฺมณกถญฺจ กาตุํ วฏฺฏติ, อาคนฺตุกานํ วตฺตํ กาตุํ สตฺตาหกรณีเยน คตานํ อปโลเกตฺวา ทาตุํ วฏฺฏตีติ เอวรูปํ วตฺตํ กาตพฺพํ. परंतु वर्षावासाचे व्रत पाळणाऱ्या भिक्खूंनी असा अधार्मिक नियम करू नये की, 'वाचन करू नये, वाचन करवून घेऊ नये, सज्झाय (पठण) करू नये, प्रव्रज्या देऊ नये, उपसंपदा देऊ नये, निस्सय (आश्रय) देऊ नये, धम्मश्रवण करू नये; कारण हे सर्व प्रपंच आहेत. आम्ही प्रपंचरहित होऊन केवळ श्रमणधर्माचेच आचरण करू'; किंवा 'सर्व भिक्खूंनी तेरा धुतांगांचे समादान करावे, झोप न घेता केवळ उभे राहून आणि चंक्रमण करून वेळ घालवावा, मूकव्रत धारण करावे, आणि सप्ताहाकरणीय कार्याने गेलेल्या भिक्खूंनाही वाटणीचे साहित्य मिळावे.' परंतु या प्रकारे नियम केला पाहिजे – परियत्ती धम्म हा तिन्ही प्रकारच्या सद्धम्माची स्थापना करतो; म्हणून आदरपूर्वक वाचन करा, वाचन करवून घ्या, सज्झाय करा. प्रधानघरात (ध्यानगृहात) राहणाऱ्यांना त्रास न देता, विहाराच्या आत बसून हळू आवाजात वाचन करा, वाचन करवून घ्या, सज्झाय करा, धम्मश्रवण परिपूर्ण करा. प्रव्रज्या देताना पात्रता तपासूनच प्रव्रज्या द्या, पात्रता तपासूनच उपसंपदा द्या, पात्रता तपासूनच निस्सय द्या. कारण एक जरी कुलपुत्र प्रव्रज्या आणि उपसंपदा मिळवून संपूर्ण शासनाची स्थापना करू शकतो. आपल्या सामर्थ्यानुसार जितकी धुतांगे स्वीकारू शकता, तितकी धुतांगे स्वीकारा. या वर्षावासाच्या काळात संपूर्ण दिवसभर आणि रात्रीच्या पहिल्या व शेवटच्या प्रहरात अप्रमत्त राहिले पाहिजे आणि वीर्य (प्रयत्न) आरंभिले पाहिजे. प्राचीन महाथेरांनी देखील सर्व पलिबोध (अडथळे) तोडून वर्षावासात एकचारिका व्रत पूर्ण केले होते. संभाषणात मर्यादा ओळखून, दहा वत्थुकथा, दहा अशुमकथा, दहा अनुस्सतीकथा आणि अडतीस कम्मट्ठाण आरंभांविषयी चर्चा करणे योग्य आहे. आगंतुक भिक्खूंचे कर्तव्य करणे आणि सप्ताहाकरणीय कार्याने गेलेल्या भिक्खूंना विचारून वस्तू देणे योग्य आहे; अशा प्रकारचे व्रत केले पाहिजें. อปิจ [Pg.73] ภิกฺขู โอวทิตพฺพา – ‘‘วิคฺคาหิกปิสุณผรุสวจนานิ มา วทถ, ทิวเส ทิวเส สีลานิ อาวชฺเชนฺตา จตุรารกฺขํ อหาเปนฺตา มนสิการพหุลา วิหรถา’’ติ. ทนฺตกฏฺฐขาทนวตฺตํ อาจิกฺขิตพฺพํ, เจติยํ วา โพธึ วา วนฺทนฺเตน คนฺธมาลํ วา ปูเชนฺเตน ปตฺตํ วา ถวิกาย ปกฺขิปนฺเตน น กเถตพฺพํ, ภิกฺขาจารวตฺตํ อาจิกฺขิตพฺพํ – ‘‘อนฺโตคาเม มนุสฺเสหิ สทฺธึ ปจฺจยสญฺญุตฺตกถา วา วิสภาคกถา วา น กเถตพฺพา, รกฺขิตินฺทฺริเยหิ ภวิตพฺพํ, ขนฺธกวตฺตญฺจ เสขิยวตฺตญฺจ ปูเรตพฺพ’’นฺติ เอวรูปา พหุกาปิ นิยฺยานิกกถา อาจิกฺขิตพฺพาติ. शिवाय, भिक्खूंना असा उपदेश केला पाहिजे – 'वादविवादाचे, चहाडीचे आणि कठोर शब्द बोलू नका. दररोज आपल्या शीलांचे चिंतन करत, चतुरारक्षा (चार संरक्षक ध्यानपद्धती) कमी न होऊ देता, मनसिकार प्रचुर करून विहार करा.' दातवण घासण्याचा नियम सांगितला पाहिजे. चैत्य किंवा बोधिवृक्षाची वंदना करताना, गंध-पुष्प अर्पण करताना किंवा पात्र पिशवीत ठेवताना बोलू नये. भिक्षाटनाचा नियम सांगितला पाहिजे – 'गावाच्या आत लोकांसोबत प्रत्यय-संबंधित (भौतिक गरजांविषयी) किंवा विसभागकथा (धम्माशी विसंगत गोष्टी) बोलू नयेत. इंद्रिये संयमित ठेवली पाहिजेत, आणि खंधक व्रत व सेखिय व्रत पूर्ण केले पाहिजे.' अशा प्रकारच्या अनेक नैर्याणिक कथा (संसारातून मुक्त करणाऱ्या धम्मचर्चा) सांगितल्या पाहिजेत. ปจฺฉิมวสฺสูปนายิกทิวเส ปน สเจ กาลํ โฆเสตฺวา สนฺนิปติเต สงฺเฆ โกจิ ทสหตฺถํ วตฺถํ อาหริตฺวา วสฺสาวาสิกํ เทติ, อาคนฺตุโก สเจ ภิกฺขุ สงฺฆตฺเถโร โหติ, ตสฺส ทาตพฺพํ. นวโก เจ โหติ, สมฺมเตน ภิกฺขุนา สงฺฆตฺเถโร วตฺตพฺโพ – ‘‘สเจ ภนฺเต อิจฺฉถ, ปฐมภาคํ มุญฺจิตฺวา อิทํ วตฺถํ คณฺหถา’’ติ, อมุญฺจนฺตสฺส น ทาตพฺพํ. สเจ ปน ปุพฺเพ คาหิตํ มุญฺจิตฺวา คณฺหาติ, ทาตพฺพํ. เอเตเนวุปาเยน ทุติยตฺเถรโต ปฏฺฐาย ปริวตฺเตตฺวา ปตฺตฏฺฐาเน อาคนฺตุกสฺส ทาตพฺพํ. สเจ ปฐมวสฺสูปคตา ทฺเว ตีณิ จตฺตาริ ปญฺจ วา วตฺถานิ อลตฺถุํ, ลทฺธํ ลทฺธํ เอเตเนวุปาเยน วิสฺสชฺชาเปตฺวา ยาว อาคนฺตุกสฺส สมกํ โหติ, ตาว ทาตพฺพํ. เตน ปน สมเก ลทฺเธ อวสิฏฺโฐ อนุภาโค เถราสเน ทาตพฺโพ. ปจฺจุปฺปนฺเน ลาเภ สติ ฐิติกาย คาเหตุํ กติกํ กาตุํ วฏฺฏติ. परंतु पश्चिमिक वर्षावास सुरू होण्याच्या दिवशी, जर वेळेची घोषणा करून संघ एकत्रित झाल्यावर, कोणी दहा हात लांबीचे कापड आणून वर्षावासिक वस्त्र दान करत असेल, आणि जर आगंतुक भिक्खू हा संघाचा थेर (वरिष्ठ) असेल, तर ते त्याला दिले पाहिजे. जर तो नवशिक्या (कनिष्ठ) असेल, तर नियुक्त केलेल्या भिक्खूने संघथेरांना असे म्हणावे – 'भंते, जर आपली इच्छा असेल, तर आधी मिळालेला हिस्सा सोडून हे वस्त्र स्वीकारावे.' जर त्यांनी आधीचा हिस्सा सोडला नाही, तर हे वस्त्र त्यांना देऊ नये. परंतु जर त्यांनी पूर्वी घेतलेला हिस्सा सोडून हे वस्त्र स्वीकारले, तर ते त्यांना द्यावे. याच पद्धतीने दुसऱ्या थेरांपासून सुरुवात करून, हिस्सा बदलून घेऊन, योग्य स्थानी आगंतुक भिक्खूला वस्त्र द्यावे. जर पहिल्या वर्षावासात प्रवेश केलेल्या भिक्खूंना दोन, तीन, चार किंवा पाच वस्त्रे मिळाली असतील, तर मिळालेले प्रत्येक वस्त्र याच पद्धतीने सोडवून घेऊन, जोपर्यंत आगंतुक भिक्खूचा हिस्सा त्यांच्या समान होत नाही, तोपर्यंत ते त्याला दिले पाहिजे. परंतु जेव्हा त्याला समान हिस्सा मिळतो, तेव्हा उरलेला अतिरिक्त भाग थेरांच्या आसनावर (वरिष्ठांना) दिला पाहिजे. वर्तमानकाळात लाभ उपलब्ध असताना, क्रमानुसार तो स्वीकारण्यासाठी नियम (कतिक) करणे योग्य आहे. สเจ ทุพฺภิกฺขํ โหติ, ทฺวีสุปิ วสฺสูปนายิกาสุ วสฺสูปคตา ภิกฺขู ภิกฺขาย กิลมนฺตา ‘‘อาวุโส, อิธ วสนฺตา สพฺเพว กิลมาม, สาธุ วต ทฺเวภาคา โหม, เยสํ ญาติปวาริตฏฺฐานานิ อตฺถิ, เต ตตฺถ วสิตฺวา ปวารณาย อาคนฺตฺวา อตฺตโน ปตฺตํ วสฺสาวาสิกํ คณฺหนฺตู’’ติ วทนฺติ, เตสุ เย ตตฺถ วสิตฺวา ปวารณาย อาคจฺฉนฺติ, เตสํ อปโลเกตฺวา วสฺสาวาสิกํ ทาตพฺพํ. สาทิยนฺตาปิ หิ เต เนว วสฺสาวาสิกสฺส สามิโน, ขียนฺตาปิ จ อาวาสิกา เนว อทาตุํ ลภนฺติ. กุรุนฺทิยํ ปน วุตฺตํ – ‘‘กติกวตฺตํ กาตพฺพํ – ‘สพฺเพสํ โน อิธ ยาคุภตฺตํ นปฺปโหติ, สภาคฏฺฐาเน วสิตฺวา อาคจฺฉถ, ตุมฺหากํ ปตฺตํ วสฺสาวาสิกํ ลภิสฺสถา’ติ. ตญฺเจ เอโก ปฏิพาหติ, สุปฏิพาหิตํ; โน เจ [Pg.74] ปฏิพาหติ, กติกา สุกตา. ปจฺฉา เตสํ ตตฺถ วสิตฺวา อาคตานํ อปโลเกตฺวา ทาตพฺพํ, อปโลกนกาเล ปฏิพาหิตุํ น ลพฺภตี’’ติ. ปุนปิ วุตฺตํ – ‘‘สเจ วสฺสูปคเตสุ เอกจฺจานํ วสฺสาวาสิเก อปาปุณนฺเต ภิกฺขู กติกํ กโรนฺติ – ‘ฉินฺนวสฺสานํ วสฺสาวาสิกญฺจ อิทานิ อุปฺปชฺชนกวสฺสาวาสิกญฺจ อิเมสํ ทาตุํ รุจฺจตี’ติ เอวํ กติกาย กตาย คาหิตสทิสเมว โหติ, อุปฺปนฺนุปฺปนฺนํ เตสเมว ทาตพฺพ’’นฺติ. जर दुष्काळ असेल, आणि दोन्ही वर्षावासांत प्रवेश केलेले भिक्खू भिक्षेसाठी त्रास सहन करत असतील आणि ते असे म्हणत असतील – 'आयुष्यमानहो, येथे राहून आपण सर्वच जण त्रास सहन करत आहोत. आपण दोन भागात विभागले गेलो तर बरे होईल. ज्यांच्याकडे नातेवाईक किंवा निमंत्रण देणारे लोक आहेत, त्यांनी तिथे राहावे आणि पवारणेच्या दिवशी येऊन आपला वर्षावासिक हिस्सा घेऊन जावा.' तर त्यांच्यापैकी जे तिथे राहून पवारणेच्या दिवशी परत येतात, त्यांना विचारून वर्षावासिक वस्त्र दिले पाहिजे. कारण जरी त्यांनी ते स्वीकारले, तरी ते त्या वर्षावासिक वस्त्राचे मालक होत नाहीत, आणि जरी स्थानिक भिक्खूंनी नाराजी व्यक्त केली, तरी ते न देता राहू शकत नाहीत. परंतु कुरुंदी अट्ठकथेत असे म्हटले आहे – 'असा नियम केला पाहिजे – आपल्या सर्वांसाठी येथे पेज आणि भात पुरेसा नाही. तुम्ही अनुकूल ठिकाणी राहून परत या. तुम्हाला तुमचा मिळालेला वर्षावासिक लाभ मिळेल.' जर एकानेही याला विरोध केला, तर तो विरोध योग्य मानला जावा; जर कोणी विरोध केला नाही, तर तो नियम चांगल्या प्रकारे संमत झाला असे समजावे. नंतर, तिथे राहून परत आलेल्या भिक्खूंना विचारून ते दिले पाहिजे, आणि विचारण्याच्या वेळी विरोध करता येत नाही. पुन्हा असे म्हटले आहे – 'जर वर्षावास केलेल्या भिक्खूंपैकी काहींना वर्षावासिक वस्त्र मिळाले नाही आणि भिक्खू असा नियम करतात की – ज्यांचा वर्षावास खंडित झाला आहे त्यांचे वर्षावासिक वस्त्र आणि आता नव्याने मिळणारे वर्षावासिक वस्त्र यांना देणे योग्य आहे का? अशा प्रकारे नियम केल्यास, ते वस्त्र आधीच दिल्यासारखेच होते, आणि जेव्हा जेव्हा नवीन वस्त्र प्राप्त होईल, तेव्हा तेव्हा ते त्यांनाच दिले पाहिजे.' เตมาสํ ปานียํ อุปฏฺฐาเปตฺวา วิหารมคฺคเจติยงฺคณโพธิยงฺคณานิ ชคฺคิตฺวา โพธิรุกฺเข อุทกํ สิญฺจิตฺวา ปกฺกนฺโตปิ วิพฺภนฺโตปิ วสฺสาวาสิกํ ลภติเยว. ภตินิวิฏฺฐญฺหิ เตน กตํ. สงฺฆิกํ ปน อปโลกนกมฺมํ กตฺวา คาหิตํ อนฺโตวสฺเส วิพฺภนฺโตปิ ลภเตว. ปจฺจยวเสน คาหิตํ ปน น ลภตีติ วทนฺติ. तीन महिने पिण्याचे पाणी उपलब्ध करून देऊन, विहाराचा रस्ता, चैत्य प्रांगण आणि बोधी प्रांगण स्वच्छ ठेवून, बोधिवृक्षाला पाणी घालून, निघून गेलेला किंवा गृहस्थ झालेला भिक्खू देखील वर्षावासिक वस्त्र मिळवण्यास पात्र ठरतोच. कारण त्याने सेवेचे कार्य केले आहे. परंतु जर संघिक वस्तू अपलोकन कर्म (संघाच्या संमतीने) करून घेतली असेल, तर वर्षावासाच्या दरम्यान गृहस्थ झालेला भिक्खू देखील ती मिळवतोच. परंतु जर ती केवळ प्रत्यय (वैयक्तिक गरजेच्या) स्वरूपात घेतली असेल, तर ती मिळत नाही, असे म्हणतात. สเจ วุตฺถวสฺโส ทิสํคมิโก ภิกฺขุ อาวาสิกสฺส หตฺถโต กิญฺจิเทว กปฺปิยภณฺฑํ คเหตฺวา ‘‘อสุกกุเล มยฺหํ วสฺสาวาสิกํ ปตฺตํ, ตํ คณฺหถา’’ติ วตฺวา คตฏฺฐาเน วิพฺภมติ, วสฺสาวาสิกํ สงฺฆิกํ โหติ. สเจ ปน มนุสฺเส สมฺมุขา สมฺปฏิจฺฉาเปตฺวา คจฺฉติ, ลภติ. ‘‘อิทํ วสฺสาวาสิกํ อมฺหากํ เสนาสเน วุตฺถภิกฺขุโน เทมา’’ติ วุตฺเต, ยสฺส คาหิตํ ตสฺเสว โหติ. สเจ ปน เสนาสนสามิกสฺส ปิยกมฺยตาย ปุตฺตธีตาทโย พหูนิ วตฺถานิ อาหริตฺวา ‘‘อมฺหากํ เสนาสเน เทมา’’ติ เทนฺติ, ตตฺถ วสฺสูปคตสฺส เอกเมว วตฺถํ ทาตพฺพํ, เสสานิ สงฺฆิกานิ โหนฺติ, วสฺสาวาสิกฏฺฐิติกาย คาเหตพฺพานิ. ฐิติกาย อสติ เถราสนโต ปฏฺฐาย คาเหตพฺพานิ. เสนาสเน วสฺสูปคตํ ภิกฺขุํ นิสฺสาย อุปฺปนฺเนน จิตฺตปฺปสาเทน พหูนิ วตฺถานิ อาหริตฺวา ‘‘เสนาสนสฺส เทมา’’ติ ทินฺเนสุปิ เอเสว นโย. สเจ ปน ปาทมูเล ฐเปตฺวา ‘‘เอตสฺส ภิกฺขุโน เทมา’’ติ วทนฺติ, ตสฺเสว โหนฺติ. जर वर्षावास पूर्ण केलेला आणि दुसऱ्या ठिकाणी जाऊ इच्छिणारा भिक्खू स्थानिक (आवासिक) भिक्खूच्या हातातून काही कप्पिय वस्तू घेऊन, "अमुक कुळात माझे वर्षावासिक वस्त्र आले आहे, ते तुम्ही घ्या," असे सांगून गेलेल्या ठिकाणी जर गृहस्थ बनला (भ्रष्ट झाला), तर ते वर्षावासिक वस्त्र संघाचे होते. पण जर तो लोकांना प्रत्यक्ष स्वीकारायला लावून जातो, तर त्याला ते मिळते. "हे वर्षावासिक वस्त्र आमच्या सेनासनात वर्षावास केलेल्या भिक्खूला देतो," असे म्हटले असता, ज्याच्यासाठी ते घेतले गेले आहे, त्याचेच ते होते. पण जर सेनासनाच्या मालकावरील प्रेमापोटी मुले-मुली इत्यादींनी अनेक वस्त्रे आणून "आमच्या सेनासनात देतो" असे म्हणून दिली, तर तेथे वर्षावास केलेल्या भिक्खूला एकच वस्त्र दिले पाहिजे, उर्वरित वस्त्रे संघाची होतात; ती वर्षावासिक नियमानुसार घेतली पाहिजेत. नियम नसताना थेरांच्या आसनापासून (ज्येष्ठतेनुसार) ती घेतली पाहिजेत. सेनासनात वर्षावास करणाऱ्या भिक्खूच्या आधारे उत्पन्न झालेल्या चित्तप्रसादाने अनेक वस्त्रे आणून "सेनासनाला देतो" असे म्हणून दिली तरीही हाच नियम लागू होतो. पण जर पायाजवळ ठेवून "या भिक्खूला देतो" असे म्हणतात, तर ती त्याचीच होतात. เอกสฺส เคเห ทฺเว วสฺสาวาสิกานิ – ปฐมภาโค สามเณรสฺส คาหิโต โหติ, ทุติโย เถราสเน. โส เอกํ ทสหตฺถํ, เอกํ อฏฺฐหตฺถํ สาฏกํ เปเสติ ‘‘วสฺสาวาสิกํ ปตฺตภิกฺขูนํ เทถา’’ติ วิจินิตฺวา วรภาคํ สามเณรสฺส ทตฺวา อนุภาโค เถราสเน ทาตพฺโพ. สเจ ปน อุโภปิ ฆรํ เนตฺวา โภเชตฺวา สยเมว ปาทมูเล ฐเปติ, ยํ ยสฺส ทินฺนํ, ตเทว ตสฺส โหติ. एका गृहस्थाच्या घरात दोन वर्षावासिक वस्त्रे आहेत – पहिला भाग सामणेरासाठी घेतला गेला आहे आणि दुसरा थेरांच्या आसनासाठी. तो एक दहा हात लांबीचे आणि एक आठ हात लांबीचे वस्त्र "वर्षावासिक वस्त्र प्राप्त झालेल्या भिक्खूंना द्या" असे सांगून पाठवतो. अशा वेळी निवड करून उत्तम भाग (दहा हातांचे वस्त्र) सामणेराला देऊन कनिष्ठ भाग (आठ हातांचे वस्त्र) थेरांच्या आसनावर दिले पाहिजे. पण जर दोघांनाही घरी नेऊन, भोजन देऊन स्वतःच पायाजवळ ठेवतो, तर जे ज्याला दिले आहे, ते त्याचेच होते. อิโต [Pg.75] ปรํ มหาปจฺจริยํ อาคตนโย โหติ – ‘‘เอกสฺส ฆเร ทหรสามเณรสฺส วสฺสาวาสิกํ ปาปุณาติ, โส เจ ปุจฺฉติ – ‘อมฺหากํ วสฺสาวาสิกํ กสฺส ปตฺต’นฺติ, ‘สามเณรสฺสา’ติ อวตฺวา ‘ทานกาเล ชานิสฺสสี’ติ วตฺวา ทานทิวเส เอกํ มหาเถรํ เปเสตฺวา นีหราเปตพฺพํ. สเจ ยสฺส วสฺสาวาสิกํ ปตฺตํ, โส วิพฺภมติ วา กาลํ วา กโรติ, มนุสฺสา เจ ปุจฺฉนฺติ – ‘กสฺส อมฺหากํ วสฺสาวาสิกํ ปตฺต’นฺติ, เตสํ ยถาภูตํ อาจิกฺขิตพฺพํ. สเจ เต วทนฺติ – ‘ตุมฺหากํ เทมา’ติ, ตสฺส ภิกฺขุโน ปาปุณาติ. อถ สงฺฆสฺส วา คณสฺส วา เทนฺติ, สงฺฆสฺส วา คณสฺส วา ปาปุณาติ. สเจ วสฺสูปคตา สุทฺธปํสุกูลิกาเยว โหนฺติ, อาเนตฺวา ทินฺนํ วสฺสาวาสิกํ เสนาสนปริกฺขารํ วา กตฺวา ฐเปตพฺพํ, พิมฺโพหนาทีนิ วา กาตพฺพานี’’ติ. อิทํ เนวาสิกวตฺตํ. यानंतर महाप्रत्यरी (महापच्चरी) अट्ठकथेत आलेली पद्धत अशी आहे – "एका गृहस्थाच्या घरात लहान सामणेराला वर्षावासिक वस्त्र प्राप्त होते. जर तो गृहस्थ विचारतो – 'आमचे वर्षावासिक वस्त्र कोणाला प्राप्त झाले आहे?', तर 'सामणेराला' असे न सांगता, 'दानाच्या वेळी समजेल' असे सांगून दानाच्या दिवशी एका महाथेरांना पाठवून ते मागवून घ्यावे. जर ज्याला वर्षावासिक वस्त्र प्राप्त झाले आहे, तो गृहस्थ बनला किंवा कालवश झाला, आणि लोक विचारतात – 'आमचे वर्षावासिक वस्त्र कोणाला प्राप्त झाले आहे?', तर त्यांना जसे आहे तसे सांगितले पाहिजे. जर ते म्हणतात – 'आम्ही तुम्हालाच देतो', तर ते त्या भिक्खूला प्राप्त होते. किंवा जर ते संघाला किंवा गणाला देतात, तर ते संघाला किंवा गणाला प्राप्त होते. जर वर्षावास केलेले भिक्खू केवळ शुद्ध पांसुकूलिक असतील, तर आणून दिलेले वर्षावासिक वस्त्र सेनासनाचे साहित्य करून ठेवले पाहिजे किंवा उशी इत्यादी बनवले पाहिजे." हे नेवासिक वृत्त (स्थानिक भिक्खूंचे कर्तव्य) आहे. เสนาสนคฺคาหกถา นิฏฺฐิตา. सेनासन स्वीकारण्याची कथा समाप्त झाली. อุปนนฺทวตฺถุกถา उपनंद भिक्खूची कथा ๓๑๙. อุปนนฺทวตฺถุสฺมึ – ตตฺถ ตยา โมฆปุริส คหิตํ อิธ มุตฺตํ, อิธ ตยา คหิตํ ตตฺร มุตฺตนฺติ เอตฺถ อยมตฺโถ – ยํ ตยา ตตฺถ เสนาสนํ คหิตํ, ตํ เต คณฺหนฺเตเนว อิธ มุตฺตํ โหติ. ‘‘อิธ ทานาหํ, อาวุโส, มุญฺจามี’’ติ วทนฺเตน ปน ตํ ตตฺราปิ มุตฺตํ. เอวํ ตฺวํ อุภยตฺถ ปริพาหิโรติ. ३१९. उपनंद भिक्खूच्या कथेत – 'तेथे तुझ्याद्वारे, हे मोघपुरुषा, जे घेतले गेले ते येथे सुटले; येथे तुझ्याद्वारे जे घेतले गेले ते तेथे सुटले' याचा अर्थ असा आहे – जे सेनासन तुझ्याद्वारे तेथे घेतले गेले, ते घेताच तुझे येथील सेनासन सुटले. "हे आवुसो, आता मी हे येथे सोडतो," असे म्हणणाऱ्या तुझ्याद्वारे ते तेथेही सुटले. अशा प्रकारे तू दोन्ही ठिकाणी सेनासनापासून वंचित झालास. อยํ ปเนตฺถ วินิจฺฉโย – คหเณน คหณํ ปฏิปฺปสฺสมฺภติ, คหเณน อาลโย ปฏิปฺปสฺสมฺภติ, อาลเยน คหณํ ปฏิปฺปสฺสมฺภติ, อาลเยน อาลโย ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. กถํ? อิเธกจฺโจ วสฺสูปนายิกทิวเส เอกสฺมึ วิหาเร เสนาสนํ คเหตฺวา สามนฺตวิหารํ คนฺตฺวา ตตฺราปิ คณฺหาติ, ตสฺส อิมินา คหเณน ปุริมํ คหณํ ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. อปโร ‘‘อิธ วสิสฺสามี’’ติ อาลยมตฺตํ กตฺวา สามนฺตวิหารํ คนฺตฺวา ตตฺถ เสนาสนํ คณฺหาติ, ตสฺส อิมินา คหเณน ปุริโม อาลโย ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. เอโก ‘‘อิธ วสิสฺสามี’’ติ เสนาสนํ วา คเหตฺวา อาลยํ วา กตฺวา สามนฺตวิหารํ คนฺตฺวา ‘‘อิเธว ทานิ วสิสฺสามี’’ติ อาลยํ กโรติ, อิจฺจสฺส อาลเยน วา คหณํ อาลเยน วา อาลโย ปฏิปฺปสฺสมฺภติ, สพฺพตฺถ ปจฺฉิเม [Pg.76] คหเณ วา อาลเย วา ติฏฺฐติ. โย ปน ‘‘เอกสฺมึ วิหาเร เสนาสนํ คเหตฺวา อญฺญสฺมึ วิหาเร วสิสฺสามี’’ติ คจฺฉติ, ตสฺส อุปจารสีมาติกฺกเม เสนาสนคฺคาโห ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. ยทิ ปน ‘‘ตตฺถ ผาสุ ภวิสฺสติ, วสิสฺสามิ; โน เจ, อาคมิสฺสามี’’ติ คนฺตฺวา อผาสุภาวํ ญตฺวา ปจฺจาคจฺฉติ, วฏฺฏติ. येथे हा निर्णय आहे – घेण्याने घेणे शांत होते, घेण्याने आसक्ती शांत होते, आसक्तीने घेणे शांत होते, आसक्तीने आसक्ती शांत होते. कसे? येथे एखादा भिक्खू वर्षावास सुरू होण्याच्या दिवशी एका विहारात सेनासन घेऊन, जवळच्या विहारात जाऊन तेथेही सेनासन घेतो. त्याच्या या नवीन घेण्याने पूर्वीचे घेणे शांत होते. दुसरा भिक्खू "मी येथे राहीन" अशी केवळ आसक्ती ठेवून जवळच्या विहारात जाऊन तेथे सेनासन घेतो. त्याच्या या नवीन घेण्याने पूर्वीची आसक्ती शांत होते. एक भिक्खू "मी येथे राहीन" असे म्हणून सेनासन घेऊन किंवा आसक्ती ठेवून जवळच्या विहारात जाऊन "आता मी येथेच राहीन" अशी आसक्ती करतो. अशा प्रकारे त्याच्या आसक्तीने घेणे किंवा आसक्तीने आसक्ती शांत होते. सर्व ठिकाणी शेवटच्या घेण्यावर किंवा शेवटच्या आसक्तीवरच तो टिकून राहतो. पण जो भिक्खू "एका विहारात सेनासन घेऊन दुसऱ्या विहारात राहीन" असे म्हणून जातो, त्याची उपचार-सीमा ओलांडताच सेनासन घेणे शांत होते. पण जर "तेथे अनुकूल असेल तर राहीन, नाहीतर परत येईन" असा विचार करून जाऊन, तेथे प्रतिकूलता असल्याचे जाणून परत येतो, तर ते योग्य आहे. ๓๒๐. ติวสฺสนฺตเรนาติ เอตฺถ ติวสฺสนฺตโร นาม โย ทฺวีหิ วสฺเสหิ มหนฺตตโร วา ทหรตโร วา โหติ. โย ปน เอเกน วสฺเสน มหนฺตตโร วา ทหรตโร วา โหติ, โย วา สมานวสฺโส, ตตฺถ วตฺตพฺพเมว นตฺถิ. อิเม สพฺเพ เอกสฺมึ มญฺเจ วา ปีเฐ วา ทฺเว ทฺเว หุตฺวา นิสีทิตุํ ลภนฺติ. ยํ ติณฺณํ ปโหติ, ตํ สํหาริมํ วา โหตุ อสํหาริมํ วา, ตถารูเป อปิ ผลกขณฺเฑ อนุปสมฺปนฺเนนาปิ สทฺธึ นิสีทิตุํ วฏฺฏติ. ३२०. "तिवस्सन्तर" (तीन वर्षांचे अंतर) म्हणजे जो दोन वर्षांनी मोठा किंवा लहान असतो. पण जो एका वर्षाने मोठा किंवा लहान असतो, किंवा जो समान वर्षावासाचा असतो, त्याबाबत तर बोलण्याची गरजच नाही. हे सर्व एकाच खाटेवर किंवा पाटावर दोन-दोन जण होऊन बसू शकतात. जे आसन तिघांना पुरेसे असते, मग ते हलवता येणारे असो वा न हलवता येणारे असो, तशा प्रकारच्या लाकडी फळीवर अनुपसंपन्नासोबत देखील बसणे योग्य आहे. หตฺถินขกนฺติ หตฺถิกุมฺเภ ปติฏฺฐิตํ; เอวํ กตสฺส กิเรตํ นามํ. สพฺพํ ปาสาทปริโภคนฺติ สุวณฺณรชตาทิวิจิตฺรานิ กวาฏานิ มญฺจปีฐานิ ตาลวณฺฏานิ สุวณฺณรชตมยปานียฆฏปานียสราวานิ ยํกิญฺจิ จิตฺตกมฺมกตํ, สพฺพํ วฏฺฏติ. ‘‘ปาสาทสฺส ทาสิทาสํ เขตฺตวตฺถุํ โคมหึสํ เทมา’’ติ วทนฺติ, ปาเฏกฺกํ คหณกิจฺจํ นตฺถิ, ปาสาเท ปฏิคฺคหิเต ปฏิคฺคหิตเมว โหติ. โคนกาทีนิ สงฺฆิกวิหาเร วา ปุคฺคลิกวิหาเร วา มญฺจปีฐเกสุ อตฺถริตฺวา ปริภุญฺชิตุํ น วฏฺฏนฺติ. ธมฺมาสเน ปน คิหิวิกฏนิหาเรน ลพฺภนฺติ, ตตฺราปิ นิปชฺชิตุํ น วฏฺฏติ. "हत्थिनखक" म्हणजे हत्तीच्या मस्तकावर आधारलेले; अशा प्रकारे बनवलेल्या प्रासादाला हे नाव दिले जाते असे म्हणतात. "सर्व प्रासाद-परिभोग" म्हणजे सोने-चांदी इत्यादींनी सुशोभित केलेली दारे, खाटा-पाट, ताडाचे पंखे, सोने-चांदीचे पिण्याच्या पाण्याचे घडे व वाट्या आणि जे काही चित्रकाम केलेले साहित्य असेल, ते सर्व वापरणे योग्य आहे. "प्रासादासाठी दासी-दास, शेतजमीन, गायी-म्हशी देतो," असे जर लोक म्हणतात, तर ते स्वतंत्रपणे स्वीकारण्याची गरज नाही; प्रासाद स्वीकारला की ते स्वीकारले गेले असेच होते. गोनक (लोकरीचे गालिचे) इत्यादी संघिक विहारात किंवा वैयक्तिक विहारात खाटांवर किंवा पाटांवर पसरून वापरणे योग्य नाही. पण धर्मासनावर गृहस्थांच्या विशिष्ट पद्धतीच्या आच्छादनासह ते वापरण्याची परवानगी आहे, परंतु तेथेही झोपणे योग्य नाही. อุปนนฺทวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. उपनंद भिक्खूची कथा समाप्त झाली. อวิสฺสชฺชิยวตฺถุกถา अविस्सज्जिय (न सोडता येणाऱ्या वस्तूंची) कथा ๓๒๑. ปญฺจิมานีติ ราสิวเสน ปญฺจ, สรูปวเสน ปเนตานิ พหูนิ โหนฺติ. ตตฺถ อาราโม นาม ปุปฺผาราโม วา ผลาราโม วา. อารามวตฺถุ นาม เตสํเยว อารามานํ อตฺถาย ปริจฺฉินฺทิตฺวา ฐปิโตกาโส; เตสุ วา อาราเมสุ วินฏฺเฐสุ เตสํ โปราณกภูมิภาโค. วิหาโร นาม ยํกิญฺจิ ปาสาทาทิเสนาสนํ. วิหารวตฺถุ นาม ตสฺส ปติฏฺฐาโนกาโส. มญฺโจ นาม – มสารโก, พุนฺทิกาพทฺโธ, กุฬีรปาทโก อาหจฺจปาทโกติ อิเมสํ ปุพฺเพ วุตฺตานํ จตุนฺนํ มญฺจานํ อญฺญตโร[Pg.77]. ปีฐํ นาม มสารกาทีนํเยว จตุนฺนํ ปีฐานํ อญฺญตรํ. ภิสิ นาม อุณฺณภิสิอาทีนํ ปญฺจนฺนํ อญฺญตรา. พิมฺโพหนํ นาม วุตฺตปฺปการานํ พิมฺโพหนานํ อญฺญตรํ. โลหกุมฺภี นาม กาฬโลเหน วา ตมฺพโลเหน วา เยน เกนจิ โลเหน กตา กุมฺภี. โลหภาณกาทีสุปิ เอเสว นโย. เอตฺถ ปน ภาณกนฺติ อรญฺชโร วุจฺจติ. วารโกติ ฆโฏ. กฏาหํ กฏาหเมว. วาสิอาทีสุ วลฺลิอาทีสุ จ ทุวิญฺเญยฺยํ นาม นตฺถิ. เอวํ – ३२१. ‘पाच’ (पञ्चिमानि) म्हणजे समूहाच्या दृष्टीने पाच, परंतु स्वरूपाच्या दृष्टीने हे अनेक आहेत. त्यामध्ये ‘आराम’ म्हणजे फुलांचा बगीचा (पुष्पआराम) किंवा फळांचा बगीचा (फलआराम) होय. ‘आरामवस्तू’ म्हणजे त्याच आरामांच्या उपयोगासाठी निश्चित करून ठेवलेली जागा; किंवा ते आराम नष्ट झाल्यावर त्यांची जुनी भूमी (जमीन) होय. ‘विहार’ म्हणजे प्रासाद (महाल) इत्यादी कोणतेही शयनासन (निवासस्थान) होय. ‘विहारवस्तू’ म्हणजे त्या विहाराच्या स्थापनेची जागा होय. ‘मंच’ (पलंग) म्हणजे – मसारक (कोरीव पायांचा पलंग), बुन्दिकाबद्ध (पट्ट्यांनी बांधलेला पलंग), कुळीरपादक (खेकड्याच्या पायासारखा वाकड्या पायांचा पलंग) आणि आहच्चपादक (टोचून बसवलेल्या पायांचा पलंग) या पूर्वी सांगितलेल्या चार प्रकारच्या मंचांपैकी कोणताही एक होय. ‘पीठ’ (पाट/स्टूल) म्हणजे मसारक इत्यादी चार प्रकारच्या पीठांपैकी कोणतेही एक होय. ‘भिसी’ (गादी) म्हणजे उण्णभिसी (लोकरची गादी) इत्यादी पाच प्रकारच्या भिसींपैकी कोणतीही एक होय. ‘बिम्बोहन’ (उशी) म्हणजे वर सांगितलेल्या प्रकारच्या उशांपैकी कोणतीही एक होय. ‘लोहकुंभी’ म्हणजे काळ्या लोखंडाची किंवा तांब्याची किंवा कोणत्याही धातूची बनवलेली कुंभी (भांडे) होय. लोहभाणक इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. येथे ‘भाणक’ म्हणजे मोठा माठ (अरांजर) आणि ‘वारक’ म्हणजे घडा होय. ‘कटाह’ म्हणजे कढईच होय. वासी (कुऱ्हाड/तासणी) इत्यादी आणि वल्ली (वेल/दोरी) इत्यादींमध्ये समजण्यास कठीण असे काही नाही. अशा प्रकारे – ทฺวิสงฺคหานิ ทฺเว โหนฺติ, ตติยํ จตุสงฺคหํ; จตุตฺถํ นวโกฏฺฐาสํ, ปญฺจมํ อฏฺฐเภทนํ. दोन (अविस्सज्जीय वस्तू) दोन प्रकारच्या संग्रहाने युक्त असतात, तिसरी चार प्रकारच्या संग्रहाने युक्त असते; चौथी नऊ भागांची (प्रकारांची) असते आणि पाचवी आठ प्रकारची असते. อิติ ปญฺจหิ ราสีหิ, ปญฺจนิมฺมลโลจโน; ปญฺจวีสวิธํ นาโถ, ครุภณฺฑํ ปกาสยิ. अशा प्रकारे, पाच निर्मळ चक्षू असणाऱ्या नाथांनी (बुद्धांनी) पाच समूहांच्या द्वारे पंचवीस प्रकारच्या गरूभांडाचे (सामायिक वस्तूंचे) प्रकटीकरण केले. ตตฺรายํ วินิจฺฉยกถา – อิทญฺหิ สพฺพมฺปิ ครุภณฺฑํ อิธ อวิสฺสชฺชิยํ, กีฏาคิริวตฺถุสฺมึ ‘‘อเวภงฺคิย’’นฺติ วุตฺตํ. ปริวาเร ปน – त्या गरूभांडाच्या बाबतीत हा निर्णय आहे – कारण हे सर्वच गरूभांड येथे ‘अविस्सज्जीय’ (त्याग न करण्याजोगे) आणि कीटागिरी प्रकरणात ‘अवेभंगीय’ (विभाजन न करण्याजोगे) असे भगवंतांनी म्हटले आहे. परंतु परिवार पाठात – ‘‘อวิสฺสชฺชิยํ อเวภงฺคิยํ, ปญฺจ วุตฺตา มเหสินา; วิสฺสชฺเชนฺตสฺส ปริภุญฺชนฺตสฺส อนาปตฺติ,ปญฺหา เมสา กุสเลหิ จินฺติตา’’ติ. (ปริ. ๔๗๙) – “महर्षींनी (बुद्धांनी) पाच अविस्सज्जीय आणि अवेभंगीय वस्तू सांगितल्या आहेत; त्यांचा त्याग करणाऱ्याला किंवा त्यांचा उपभोग घेणाऱ्याला आपत्ती (दोष) होत नाही, हा प्रश्न विधीतज्ज्ञांनी विचारपूर्वक सोडवला आहे.” อาคตํ. ตสฺมา มูลจฺเฉชฺชวเสน อวิสฺสชฺชิยํ อเวภงฺคิยญฺจ ปริวตฺตนวเสน ปน วิสฺสชฺเชนฺตสฺส ปริภุญฺชนฺตสฺส จ อนาปตฺตีติ เอวเมตฺถ อธิปฺปาโย เวทิตพฺโพ. असे आले आहे. म्हणून, कायमची मालकी देण्याच्या दृष्टीने ते अविस्सज्जीय आणि अवेभंगीय आहे, परंतु अदलाबदल (विनिमय) करण्याच्या दृष्टीने त्याग करणाऱ्याला आणि उपभोग घेणाऱ्याला आपत्ती होत नाही, असा येथे अभिप्राय समजला पाहिजे. ตตฺรายํ อนุปุพฺพิกถา – อิทํ ตาว ปญฺจวิธมฺปิ จีวรปิณฺฑปาตเภสชฺชตฺถาย อุปเนตุํ น วฏฺฏติ. ถาวเรน จ ถาวรํ ครุภณฺเฑน จ ครุภณฺฑํ ปริวตฺเตตุํ วฏฺฏติ. ถาวเร ปน เขตฺตํ วตฺถุ ตฬากํ มาติกาติ เอวรูปํ ภิกฺขุสงฺฆสฺส วิจาเรตุํ วา สมฺปฏิจฺฉิตุํ วา อธิวาเสตุํ วา น วฏฺฏติ, กปฺปิยการเกเหว วิจาริตโต กปฺปิยภณฺฑํ วฏฺฏติ. อาราเมน ปน อารามํ อารามวตฺถุํ วิหารํ วิหารวตฺถุนฺติ อิมานิ จตฺตาริ ปริวตฺเตตุํ วฏฺฏติ. त्या अदलाबदलीच्या बाबतीत हा अनुक्रम आहे – प्रथम तर हे पाचही प्रकारचे गरूभांड चीवर, पिंडपात आणि औषधांच्या उपयोगासाठी वापरणे योग्य नाही. परंतु स्थावर वस्तूने स्थावर वस्तूची आणि गरूभांडाने गरूभांडाची अदलाबदल करणे योग्य आहे. स्थावर वस्तूंच्या बाबतीत शेत, जमीन, तलाव, कालवा अशा प्रकारच्या गोष्टींची भिक्खू संघाने व्यवस्था लावणे, स्वीकार करणे किंवा संमती देणे योग्य नाही; कप्पियकारकांनी (गृहस्थांनी) व्यवस्था लावलेल्यामधून कप्पियभांड (योग्य वस्तू) स्वीकारणे योग्य आहे. परंतु आरामाने (बगीच्याने) आराम, आरामवस्तू, विहार आणि विहारवस्तू या चार गोष्टींची अदलाबदल करणे योग्य आहे. ตตฺรายํ ปริวตฺตนนโย – สงฺฆสฺส นาฬิเกราราโม ทูเร โหติ, กปฺปิยการกา วา พหุตรํ ขาทนฺติ. ยมฺปิ น ขาทนฺติ, ตโต สกฏเวตนํ ทตฺวา [Pg.78] อปฺปเมว หรนฺติ. อญฺเญสํ ปน ตสฺส อารามสฺส อวิทูรคามวาสีนํ มนุสฺสานํ วิหารสฺส สมีเป อาราโม โหติ, เต สงฺฆํ อุปสงฺกมิตฺวา สเกน อาราเมน ตํ อารามํ ยาจนฺติ, สงฺเฆน ‘‘รุจฺจติ สงฺฆสฺสา’’ติ อปโลเกตฺวา สมฺปฏิจฺฉิตพฺโพ. สเจปิ ภิกฺขูนํ รุกฺขสหสฺสํ โหติ, มนุสฺสานํ ปญฺจ สตานิ, ‘‘ตุมฺหากํ อาราโม ขุทฺทโก’’ติ น วตฺตพฺพํ. กิญฺจาปิ หิ อยํ ขุทฺทโก, อถ โข อิตรโต พหุตรํ อายํ เทติ. สเจปิ สมกเมว เทติ; เอวมฺปิ อิจฺฉิติจฺฉิตกฺขเณ ปริภุญฺชิตุํ สกฺกาติ คเหตพฺพเมว. สเจ ปน มนุสฺสานํ พหุตรา รุกฺขา โหนฺติ, ‘‘นนุ ตุมฺหากํ พหุตรา รุกฺขา’’ติ วตฺตพฺพํ. สเจ ‘‘อติเรกํ อมฺหากํ ปุญฺญํ โหตุ, สงฺฆสฺส เทมา’’ติ วทนฺติ, ชานาเปตฺวา สมฺปฏิจฺฉิตุํ วฏฺฏติ. ภิกฺขูนํ รุกฺขา ผลธาริโน, มนุสฺสานํ รุกฺขา น ตาว ผลํ คณฺหนฺติ, กิญฺจาปิ น คณฺหนฺติ, น จิเรน คณฺหิสฺสนฺตีติ สมฺปฏิจฺฉิตพฺพเมว. มนุสฺสานํ รุกฺขา ผลธาริโน, ภิกฺขูนํ น ตาว ผลํ คณฺหนฺติ, ‘‘นนุ ตุมฺหากํ รุกฺขา ผลธาริโน’’ติ วตฺตพฺพํ. สเจ ‘‘คณฺหถ, ภนฺเต, อมฺหากํ ปุญฺญํ ภวิสฺสตี’’ติ เทนฺติ, ชานาเปตฺวา สมฺปฏิจฺฉิตุํ วฏฺฏติ; เอวํ อาราเมน อาราโม ปริวตฺเตตพฺโพ. เอเตเนว นเยน อารามวตฺถุปิ วิหาโรปิ วิหารวตฺถุปิ อาราเมน ปริวตฺเตตพฺพํ. อารามวตฺถุนา จ มหนฺเตน วา ขุทฺทเกน วา อารามอารามวตฺถุ วิหารวิหารวตฺถูนิ. त्या अदलाबदलीची पद्धत अशी आहे – संघाचा नारळाचा बगीचा दूर आहे, आणि कप्पियकारकच (राखणदार) जास्त फळे खातात. जे ते खात नाहीत, त्यातून गाडीचे भाडे देऊन अगदी थोडेच विहारात घेऊन येतात. दुसऱ्या बाजूला, त्या बगीच्याच्या जवळच्या गावात राहणाऱ्या लोकांचा बगीचा विहाराच्या जवळ आहे. ते संघाकडे येऊन आपल्या बगीच्याच्या बदल्यात तो (संघाचा) बगीचा मागतात. अशा वेळी संघाने “संघाला हे संमत आहे का?” असे विचारून (अपलोकून) तो स्वीकारला पाहिजे. जरी भिक्खूंचे एक हजार वृक्ष असतील आणि लोकांचे पाचशे वृक्ष असतील, तरी “तुमचा बगीचा लहान आहे” असे म्हणू नये. कारण जरी हा बगीचा लहान असला, तरी तो दुसऱ्या बगीच्यापेक्षा जास्त उत्पन्न देतो. जरी तो सारखेच उत्पन्न देत असेल, तरीही हव्या त्या वेळी त्याचा उपभोग घेणे शक्य आहे, म्हणून तो स्वीकारलाच पाहिजे. पण जर लोकांचे वृक्ष जास्त असतील, तर “तुमचे वृक्ष जास्त आहेत ना?” असे म्हणावे. जर ते “आम्हाला अधिक पुण्य लाभो, आम्ही संघाला दान देत आहोत” असे म्हणतात, तर संघाला अवगत करून तो स्वीकारणे योग्य आहे. जर भिक्खूंचे वृक्ष फळे देणारे असतील आणि लोकांचे वृक्ष अजून फळे देत नसतील, तरीही जरी ते फळे देत नसले तरी लवकरच फळे देतील, म्हणून तो स्वीकारलाच पाहिजे. जर लोकांचे वृक्ष फळे देणारे असतील आणि भिक्खूंचे वृक्ष अजून फळे देत नसतील, तर “तुमचे वृक्ष फळे देणारे आहेत ना?” असे म्हणावे. जर ते “भन्ते, स्वीकार करा, आम्हाला पुण्य लाभेल” असे म्हणून दान देतात, तर संघाला अवगत करून तो स्वीकारणे योग्य आहे; अशा प्रकारे आरामाने आराम बदलला पाहिजे. याच पद्धतीने आरामवस्तू, विहार आणि विहारवस्तू देखील आरामाने बदलली पाहिजे. तसेच मोठ्या किंवा लहान आरामवस्तूने आराम, आरामवस्तू, विहार आणि विहारवस्तू यांची अदलाबदल करावी. กถํ วิหาเรน วิหาโร ปริวตฺเตตพฺโพ? สงฺฆสฺส อนฺโตคาเม เคหํ โหติ, มนุสฺสานํ วิหารมชฺเฌ ปาสาโท, อุโภปิ อคฺเฆน สมกา, สเจ มนุสฺสา เตน ปาสาเทน ตํ เคหํ ยาจนฺติ, สมฺปฏิจฺฉิตุํ วฏฺฏติ. ภิกฺขูนํ เจ มหคฺฆตรํ เคหํ โหติ, ‘‘มหคฺฆตรํ อมฺหากํ เคห’’นฺติ วุตฺเต ‘‘กิญฺจาปิ มหคฺฆตรํ, ปพฺพชิตานํ อสารุปฺปํ, น สกฺกา ตตฺถ ปพฺพชิเตหิ วสิตุํ, อิทํ ปน สารุปฺปํ คณฺหถา’’ติ วทนฺติ; เอวมฺปิ สมฺปฏิจฺฉิตุํ วฏฺฏติ. สเจ ปน มนุสฺสานํ มหคฺฆํ โหติ, ‘‘นนุ ตุมฺหากํ เคหํ มหคฺฆ’’นฺติ วตฺตพฺพํ. ‘‘โหตุ, ภนฺเต, อมฺหากํ ปุญฺญํ ภวิสฺสติ, คณฺหถา’’ติ วุตฺเต ปน สมฺปฏิจฺฉิตุํ วฏฺฏติ. เอวํ วิหาเรน วิหาโร ปริวตฺเตตพฺโพ. เอเตเนว นเยน วิหารวตฺถุปิ อาราโมปิ อารามวตฺถุปิ วิหาเรน ปริวตฺเตตพฺพํ. วิหารวตฺถุนา จ มหคฺเฆน วา อปฺปคฺเฆน วา วิหารวิหารวตฺถุอารามอารามวตฺถูนิ. เอวํ ตาว ถาวเรน ถาวรปริวตฺตนํ เวทิตพฺพํ. विहाराने विहार कसा बदलावा? संघाचे गावात एक घर आहे आणि लोकांचा विहाराच्या मध्यभागी एक प्रासाद (महाल) आहे. दोन्ही किमतीने समान आहेत. जर लोक त्या प्रासादाच्या बदल्यात ते घर मागतात, तर ते स्वीकारणे योग्य आहे. जर भिक्खूंचे घर अधिक किमतीचे असेल आणि “आमचे घर अधिक किमतीचे आहे” असे म्हटल्यावर जर ते म्हणतात की, “जरी ते अधिक किमतीचे असले, तरी ते प्रव्रजितांसाठी अयोग्य आहे. तिथे प्रव्रजितांना राहणे शक्य नाही. परंतु हा प्रासाद योग्य आहे, आपण याचा स्वीकार करावा”; तरीही ते स्वीकारणे योग्य आहे. पण जर लोकांचे घर अधिक किमतीचे असेल, तर “तुमचे घर अधिक किमतीचे आहे ना?” असे म्हणावे. “असू द्या भन्ते, आम्हाला पुण्य लाभेल, आपण स्वीकार करावा” असे त्यांनी म्हटल्यावर ते स्वीकारणे योग्य आहे. अशा प्रकारे विहाराने विहार बदलला पाहिजे. याच पद्धतीने विहारवस्तू, आराम आणि आरामवस्तू देखील विहाराने बदलली पाहिजे. तसेच अधिक किमतीच्या किंवा कमी किमतीच्या विहारवस्तूने विहार, विहारवस्तू, आराम आणि आरामवस्तू यांची अदलाबदल करावी. अशा प्रकारे प्रथम स्थावर वस्तूने स्थावर वस्तूची अदलाबदल समजून घ्यावी. ครุภณฺเฑน [Pg.79] ครุภณฺฑปริวตฺตเน ปน มญฺจปีฐํ มหนฺตํ วา โหตุ ขุทฺทกํ วา, อนฺตมโส จตุรงฺคุลปาทกํ วา คามทารเกหิ ปํสฺวาคารเกสุ กีฬนฺเตหิ กตมฺปิ สงฺฆสฺส ทินฺนกาลโต ปฏฺฐาย ครุภณฺฑํ โหติ. สเจปิ ราชราชมหามตฺตาทโย เอกปฺปหาเรเนว มญฺจสตํ วา มญฺจสหสฺสํ วา เทนฺติ, สพฺเพ กปฺปิยมญฺจา สมฺปฏิจฺฉิตพฺพา, สมฺปฏิจฺฉิตฺวา วุฑฺฒปฏิปาฏิยา ‘‘สงฺฆิกปริโภเคน ปริภุญฺชถา’’ติ ทาตพฺพา, ปุคฺคลิกวเสน น ทาตพฺพา. อติเรกมญฺเจ ภณฺฑาคาราทีสุ ปญฺญเปตฺวา ปตฺตจีวรํ นิกฺขิปิตุมฺปิ วฏฺฏติ. พหิสีมาย ‘‘สงฺฆสฺส เทมา’’ติ ทินฺนมญฺโจ สงฺฆตฺเถรสฺส วสนฏฺฐาเน ทาตพฺโพ. ตตฺถ เจ พหู มญฺจา โหนฺติ, มญฺเจน กมฺมํ นตฺถิ; ยสฺส วสนฏฺฐาเน กมฺมํ อตฺถิ, ตตฺถ ‘‘สงฺฆิกปริโภเคน ปริภุญฺชถา’’ติ ทาตพฺโพ. มหคฺเฆน สตคฺฆนเกน วา สหสฺสคฺฆนเกน วา สตสหสฺสคฺฆนเกน วา มญฺเจน อญฺญํ มญฺจสตํ ลภติ, ปริวตฺเตตฺวา คเหตพฺพํ. น เกวลํ มญฺเจน มญฺโจเยว, อารามอารามวตฺถุวิหารวิหารวตฺถุปีฐภิสิพิมฺโพหนานิปิ ปริวตฺเตตุํ วฏฺฏนฺติ. เอส นโย ปีฐภิสิพิมฺโพหเนสุปิ. เอเตสุ หิ กปฺปิยากปฺยิยํ วุตฺตนยเมว. ตตฺถ อกปฺปิยํ น ปริภุญฺชิตพฺพํ, กปฺปิยํ สงฺฆิกปริโภเคน ปริภุญฺชิตพฺพํ. อกปฺปิยํ วา มหคฺฆํ กปฺปิยํ วา ปริวตฺเตตฺวา วุตฺตวตฺถูนิ คเหตพฺพานิ. อครุภณฺฑุปคํ ปน ภิสิพิมฺโพหนํ นาม นตฺถิ. परंतु, गरूभांड बदलण्याच्या बाबतीत, मंच (पलंग) किंवा पीठ (आसन) मोठे असो वा लहान, अगदी शेवटी गावातील मुलांनी मातीच्या घरांमध्ये खेळताना बनवलेले चार बोटे पायांचे जरी असले तरी, ते संघाला दान दिल्यापासून गरूभांडच ठरते. जरी राजे, राजांचे महामात्य इत्यादींनी एकाच वेळी शंभर किंवा हजार मंच दान दिले, तरी ते सर्व कप्पिय मंच स्वीकारले पाहिजेत. ते स्वीकारून, ज्येष्ठतेच्या क्रमानुसार 'सांघिक परिभोगाने (संघाच्या उपयोगासाठी) वापरा' असे सांगून दिले पाहिजेत; वैयक्तिक मालकी म्हणून (पुग्गलिक रूपाने) देऊ नयेत. अतिरिक्त मंच भांडारगृहात इत्यादी ठिकाणी ठेवून त्यावर पात्र आणि चीवर ठेवण्यासही हरकत नाही. सीमेच्या बाहेर 'संघाला देतो' असे म्हणून दान दिलेला मंच संघस्थविराच्या निवासस्थानी दिला पाहिजे. जर तिथे अनेक मंच असतील आणि मंचाचे काही काम नसेल, तर ज्याच्या निवासस्थानी मंचाची गरज आहे, तिथे 'सांघिक परिभोगाने वापरा' असे म्हणून तो दिला पाहिजे. शंभर, हजार किंवा लाख मोलाच्या अत्यंत मौल्यवान मंचाच्या बदल्यात जर इतर शंभर मंच मिळत असतील, तर ते बदलून घेतले पाहिजेत. केवळ मंचाच्या बदल्यात मंचच नव्हे, तर आराम (उद्यान), आरामाची जमीन, विहार, विहाराची जमीन, पीठ (आसन), भिसी (गादी) आणि बिम्बोहन (उशी) हे देखील बदलणे योग्य आहे. हाच नियम पीठ, भिसी आणि बिम्बोहन यांच्या बाबतीतही लागू होतो. कारण यांच्यामध्ये कप्पिय आणि अकप्पिय हे आधी सांगितलेल्या नियमाप्रमाणेच आहे. त्यापैकी अकप्पिय वस्तू वापरू नयेत, कप्पिय वस्तू सांघिक परिभोगाने वापरल्या पाहिजेत. अकप्पिय किंवा मौल्यवान कप्पिय वस्तू बदलून आधी सांगितलेल्या वस्तू घेतल्या पाहिजेत. परंतु, गरूभांडामध्ये न येणारी अशी कोणतीही भिसी किंवा बिम्बोहन नसते. โลหกุมฺภี โลหภาณกํ โลหกฏาหนฺติ อิมานิ ตีณิ มหนฺตานิ วา โหนฺตุ ขุทฺทกานิ วา อนฺตมโส ปสตมตฺตอุทกคณฺหนกานิปิ ครุภณฺฑานิเยว. โลหวารโก ปน กาฬโลหตมฺพโลหวฏฺฏโลหกํสโลหานํ เยน เกนจิ กโต สีหฬทีเป ปาทคณฺหนโก ภาเชตพฺโพ. ปาโท จ นาม มคธนาฬิยา ปญฺจนาฬิมตฺตํ คณฺหาติ, ตโต อธิกคณฺหนโก ครุภณฺฑํ. อิมานิ ตาว ปาฬิยํ อาคตานิ โลหภาชนานิ. लोहकुंभी (लोखंडी घडा), लोहभाणक (पाणी साठवण्याचे मोठे भांडे) आणि लोहकठाह (लोखंडी कढई) या तीन वस्तू मोठ्या असोत वा लहान, अगदी शेवटी एक पळभर पाणी मावणारी जरी असली तरी ती गरूभांडच आहेत. परंतु लोखंडी घडा (लोहवारक) जो काळे लोखंड, तांबे, पितळ किंवा कासे यांपैकी कोणत्याही धातूचा बनवलेला असो, सिंहलद्वीपामध्ये एक 'पाद' पाणी मावणारा घडा वाटणीस योग्य मानला जातो. 'पाद' म्हणजे मगध देशाच्या नाळी मापानुसार पाच नाळी इतके पाणी मावणारे माप होय. त्यापेक्षा जास्त पाणी मावणारा घडा हा गरूभांड ठरतो. ही सर्व पाळीमध्ये (मूळ पाठात) आलेली धातूची भांडी आहेत. ปาฬิยํ ปน อนาคตานิปิ ภิงฺคารปฏิคฺคหอุฬุงฺกทพฺพิกฏจฺฉุปาติตฏฺฏกสรกสมุคฺคองฺคารกปลฺลธูมกฏจฺฉุอาทีนิ ขุทฺทกานิ วา มหนฺตานิ วา สพฺพานิ ครุภณฺฑานิ. ปตฺโต, อยถาลกํ, ตมฺพโลหถาลกนฺติ อิมานิ ปน ภาชนียานิ. กํสโลหวฏฺฏโลหภาชนวิกติ สงฺฆิกปริโภเคน วา คิหิวิกฏา วา วฏฺฏติ, ปุคฺคลิกปริโภเคน น วฏฺฏติ. กํสโลหาทิภาชนํ [Pg.80] สงฺฆสฺส ทินฺนมฺปิ หิ ปาริหาริยํ น วฏฺฏติ. ‘‘คิหิวิกฏนิหาเรเนว ปริภุญฺชิตพฺพ’’นฺติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. परंतु पाळीमध्ये न आलेली देखील भिंगार (झारी), पतिggह (पिंकदाणी), उळुंक (पळी), दब्बी (मोठा चमचा), कटच्छु (चमचा), पाती (थाळी), तट्टक (बशी), सरक (पिण्याचे भांडे), समुग्ग (डबा), अंगारकपल्ल (शेगडी), धूमकटच्छु (धूप देण्याची पळी) इत्यादी लहान असोत वा मोठी, ही सर्व गरूभांड आहेत. परंतु भिक्षापात्र, लोखंडी वाटी आणि तांब्याची वाटी या वस्तू वाटणीस योग्य आहेत. कासे किंवा पितळ या धातूंची बनवलेली विशिष्ट भांडी सांघिक परिभोगाने किंवा गृहस्थांच्या पद्धतीने वापरणे योग्य आहे, परंतु वैयक्तिक परिभोगाने वापरणे अयोग्य आहे. कारण काशाचे इत्यादी भांडे संघाला दान दिले असले तरी ते स्वतःसोबत घेऊन फिरणे योग्य नाही. 'ते केवळ गृहस्थांच्या विशिष्ट पद्धतीनेच वापरले पाहिजे,' असे महाप्रत्यरीमध्ये म्हटले आहे. ฐเปตฺวา ปน ภาชนวิกตึ อญฺญสฺมิมฺปิ กปฺปิยโลหภณฺเฑ – อญฺชนี, อญฺชนิสลากา, กณฺณมลหรณี, สูจิ, ปณฺณสูจิ, ขุทฺทโก, ปิปฺผลโก, ขุทฺทกํ, อารกณฺฏกํ, กุญฺจิกา, ตาฬํ, กตฺตรยฏฺฐิ เวธโก, นตฺถุทานํ, ภินฺทิวาโล, โลหกูโฏ, โลหกุฏฺฏิ, โลหคุโฬ, โลหปิณฺฑิ, โลหจกฺกลิกํ, อญฺญมฺปิ วิปฺปกตโลหภณฺฑํ ภาชนียํ. ธูมเนตฺตผาลทีปรุกฺขทีปกปลฺลกโอลมฺพกทีปอิตฺถิปุริสติรจฺฉานคตรูปกานิ ปน อญฺญานิ วา ภิตฺติจฺฉทนกวาฏาทีสุ อุปเนตพฺพานิ, อนฺตมโส โลหขิลกํ อุปาทาย สพฺพานิ โลหภณฺฑานิ ครุภณฺฑานิเยว โหนฺติ, อตฺตนา ลทฺธานิปิ ปริหริตฺวา ปุคฺคลิกปริโภเคน น ปริภุญฺชิตพฺพานิ, สงฺฆิกปริโภเคน วา คิหิวิกฏานิ วา วฏฺฏนฺติ. ติปุภณฺเฑปิ เอเสว นโย. ขีรปาสาณมยานิ ตฏฺฏกสรกาทีนิ ครุภณฺฑานิเยว. परंतु भांड्यांचे प्रकार वगळता, इतर कप्पिय धातूच्या वस्तूंमध्ये – अंजनपेटी, अंजनशलाका, कान साफ करण्याची काडी, सुई, पानावर लिहिण्याची लेखणी, लहान सुरी, लहान आर (टोचा), किल्ली, कुलूप, काठीला बसवण्याचे धातूचे कडे, नाकात औषध घालण्याची नळी, त्रिशूळ, लोखंडी हातोडा, लोखंडी छिन्नी, लोखंडी गोळा, लोखंडी ठोकळा, लोखंडी चक्र आणि इतर न घडवलेले धातूचे साहित्य हे सर्व वाटणीस योग्य आहे. परंतु धूर पिण्याची नळी, नांगराचा फाळ, समई, पणती, टांगता दिवा, स्त्री-पुरुष किंवा प्राण्यांच्या धातूच्या मूर्ती, किंवा भिंत, छप्पर, दारे इत्यादींना जोडण्याच्या इतर वस्तू – अगदी शेवटी लोखंडी खिळ्यापासून सुरुवात करून सर्व धातूच्या वस्तू या गरूभांडच असतात. स्वतःला मिळाल्या असल्या तरी त्या स्वतःजवळ बाळगून वैयक्तिक परिभोगाने वापरू नयेत; त्या सांघिक परिभोगाने किंवा गृहस्थांच्या पद्धतीने वापरणे योग्य आहे. कथील आणि शिसे यांच्या वस्तूंच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. दुधासारख्या पांढऱ्या दगडाच्या रकाब्या, पेले इत्यादी वस्तू देखील गरूभांडच आहेत. ฆฏโก ปน เตลภาชนํ วา ปาทคณฺหนกโต อติเรกเมว ครุภณฺฑํ. สุวณฺณรชตหารกูฏชาติผลิกภาชนานิ คิหิวิกฏานิปิ น วฏฺฏนฺติ, ปเคว สงฺฆิกปริโภเคน วา ปุคฺคลิกปริโภเคน วา. เสนาสนปริโภเค ปน อามาสมฺปิ อนามาสมฺปิ สพฺพํ วฏฺฏติ. परंतु लहान घडा किंवा तेलाचे भांडे जर 'पाद' मापापेक्षा अधिक क्षमतेचे असेल, तरच ते गरूभांड ठरते. सोने, चांदी, पितळ आणि अस्सल स्फटिकाची भांडी गृहस्थांच्या पद्धतीने बनवलेली असली तरीही वापरणे अयोग्य आहे, मग सांघिक परिभोगाने किंवा वैयक्तिक परिभोगाने वापरण्याचा तर प्रश्नच उद्भवत नाही. परंतु सेनासनाच्या (निवासस्थानाच्या) उपयोगासाठी स्पर्श करण्यायोग्य किंवा स्पर्श न करण्यायोग्य अशा सर्व वस्तू वापरणे योग्य आहे. วาสิอาทีสุ ยาย วาสิยา ฐเปตฺวา ทณฺฑกฏฺฐจฺเฉทนํ วา อุจฺฉุตจฺฉนํ วา อญฺญํ มหากมฺมํ กาตุํ น สกฺกา, อยํ ภาชนียา. ตโต มหตฺตรี เยน เกนจิ อากาเรน กตา วาสิ ครุภณฺฑเมว. ผรสุ ปน อนฺตมโส เวชฺชานํ สิราเวธนผรสุปิ ครุภณฺฑเมว. กุฐาริยํ ผรสุสทิโส เอว วินิจฺฉโย. ยา ปน อาวุธสงฺเขเปน กตา, อยํ อนามาสา. กุทาโล อนฺตมโส จตุรงฺคุลมตฺโตปิ ครุภณฺฑเมว. นิขาทนํ จตุรสฺสมุขํ วา โหตุ โทณิมุขํ วา วงฺกํ วา อุชุกํ วา, อนฺตมโส สมฺมุญฺชนิทณฺฑกเวธนมฺปิ ทณฺฑพทฺธํ เจ, ครุภณฺฑเมว. สมฺมุญฺชนิทณฺฑขณนกํ ปน อทณฺฑกํ ผลมตฺตเมว, ยํ สกฺกา สิปาฏิกาย ปกฺขิปิตฺวา ปริหริตุํ, ตํ ภาชนียํ. สิขรมฺปิ นิขาทเนเนว สงฺคหิตํ. เยหิ มนุสฺเสหิ วิหาเร วาสิอาทีนิ ทินฺนานิ โหนฺติ, เต จ ฆเร ทฑฺเฒ วา [Pg.81] โจเรหิ วา วิลุตฺเต ‘‘เทถ โน, ภนฺเต, อุปกรเณ, ปุน ปากติเก กริสฺสามา’’ติ วทนฺติ, ทาตพฺพา. สเจ อาหรนฺติ, น วาเรตพฺพา; อนาหรนฺตาปิ น โจเทตพฺพา. वासी (लहान सुरी) इत्यादींमध्ये, ज्या सुरीने दातून कापणे किंवा ऊस सोलणे याव्यतिरिक्त इतर कोणतेही मोठे काम करणे शक्य नाही, ती सुरी वाटणीस योग्य आहे. त्यापेक्षा मोठी आणि कोणत्याही प्रकारे बनवलेली वासी ही गरूभांडच आहे. परंतु परशू (कुऱ्हाड), अगदी वैद्यांची नस कापण्याची लहान कुऱ्हाड असली तरीही, गरूभांडच आहे. कुठारीच्या बाबतीतही परशूसारखाच निर्णय आहे. परंतु जी शस्त्र म्हणून बनवली गेली आहे, ती स्पर्श न करण्यायोग्य आहे. कुदळ अगदी चार बोटे आकाराची असली तरीही गरूभांडच आहे. छिन्नी चौकोनी तोंडाची असो, द्रोणाकृती तोंडाची असो, वक्र असो वा सरळ असो, अगदी झाडूच्या दांड्याला छिद्र पाडणारी का होईना, जर ती दांड्याला जोडलेली असेल तर ती गरूभांडच आहे. परंतु झाडूच्या दांड्याला छिद्र पाडणारी छिन्नी जर दांड्याशिवाय केवळ पात्याच्या स्वरूपात असेल, जिला पिशवीत ठेवून स्वतःसोबत बाळगणे शक्य असेल, तर ती वाटणीस योग्य आहे. लहान छिन्नी देखील छिन्नीच्या नियमातच समाविष्ट आहे. ज्या लोकांनी विहारात वासी इत्यादी वस्तू दान दिल्या असतील, आणि त्यांचे घर जळाल्यास किंवा चोरांनी लुटल्यास जर ते 'भंते, आम्हाला आमची साधने द्या, आम्ही ती पुन्हा पूर्ववत करून घेऊ' असे म्हणत असतील, तर ती त्यांना दिली पाहिजेत. जर ते ती परत आणून देत असतील तर त्यांना अडवू नये; आणि जर त्यांनी ती परत आणली नाहीत, तरी त्यांच्याकडे मागणी करू नये. กมฺมารตฏฺฏการจุนฺทการนฬการมณิการปตฺตพนฺธกานํ อธิกรณิมุฏฺฐิกสณฺฑาสตุลาทีนิ สพฺพานิ โลหมยอุปกรณานิ สงฺเฆ ทินฺนกาลโต ปฏฺฐาย ครุภณฺฑานิ. ติปุโกฏฺฏกสุวณฺณการจมฺมการอุปกรเณสุปิ เอเสว นโย. อยํ ปน วิเสโส – ติปุโกฏฺฏกอุปกรเณสุปิ ติปุจฺเฉทนสตฺถกํ, สุวณฺณการอุปกรเณสุ สุวณฺณจฺเฉทนสตฺถกํ, จมฺมการอุปกรเณสุ กตปริกมฺมจมฺมฉิทฺทนกํ ขุทฺทกสตฺถกนฺติ อิมานิ ภาชนียภณฺฑานิ. นหาปิตตุนฺนการอุปกรเณสุปิ ฐเปตฺวา มหากตฺตรึ มหาสณฺฑาสํ มหาปิปฺผลกญฺจ สพฺพํ ภาชนียํ. มหากตฺตริอาทีนิ ครุภณฺฑานิ. लोहार, कांस्यकार (तांबट), खरादी (लाकूड कोरणारे), वेणूकार (टोपल्या विणणारे), मणिकार (रत्ने कोरणारे) आणि भिक्षापात्र दुरुस्त करणारे यांच्या ऐरण, लहान हातोडी, सांडशी, तराजू इत्यादी सर्व लोखंडी व धातूची उपकरणे संघाला दान दिल्यापासून 'गरूभांड' (अविभाज्य वस्तू) ठरतात. कथील कामगार, सुवर्णकार आणि चर्मकार यांच्या उपकरणांच्या बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. परंतु यामध्ये हा विशेष फरक आहे – कथील कामगाराच्या उपकरणांमध्ये कथील कापण्याची लहान सुरी, सुवर्णकाराच्या उपकरणांमध्ये सोने कापण्याची लहान सुरी आणि चर्मकाराच्या उपकरणांमध्ये प्रक्रिया केलेले चामडे कापण्याची किंवा त्याला छिद्र पाडण्याची लहान सुरी, या विभाजनीय वस्तू (भाजनियभांड) आहेत. न्हावी आणि शिंपी यांच्या उपकरणांमध्ये सुद्धा मोठी कात्री, मोठी सांडशी आणि मोठा वस्तरा वगळता इतर सर्व वस्तू विभाजनीय आहेत. मोठी कात्री इत्यादी वस्तू मात्र गरूभांड आहेत. วลฺลิอาทีสุ เวตฺตวลฺลิอาทิกา ยา กาจิ อฑฺฒพาหุปฺปมาณา วลฺลิ สงฺฆสฺส ทินฺนา วา ตตฺถชาตกา วา รกฺขิตโคปิตา ครุภณฺฑํ โหติ, สา สงฺฆกมฺเม จ เจติยกมฺเม จ กเต สเจ อติเรกา โหติ, ปุคฺคลิกกมฺเมปิ อุปเนตุํ วฏฺฏติ; อรกฺขิตา ปน ครุภณฺฑเมว น โหติ. สุตฺตมกจิวากนาฬิเกรหีรจมฺมมยา รชฺชุกา วา โยตฺตานิ วา วาเก จ นาฬิเกรหีเร จ วฏฺเฏตฺวา กตา เอกวฏฺฏา วา ทฺวิวฏฺฏา วา สงฺฆสฺส ทินฺนกาลโต ปฏฺฐาย ครุภณฺฑํ. สุตฺตํ ปน อวฏฺเฏตฺวา ทินฺนํ มกจิวากนาฬิเกรหีรา จ ภาชนียา. เยหิ ปเนตานิ รชฺชุกโยตฺตาทีนิ ทินฺนานิ โหนฺติ, เต อตฺตโน กรณีเยน หรนฺตา น วาเรตพฺพา. वेली इत्यादींच्या बाबतीत, वेताची वेल इत्यादी कोणतीही वेल जी अर्ध्या हाताच्या जाडीची असेल, ती संघाला दान दिलेली असो किंवा संघाच्या जमिनीवर उगवलेली असो, जर ती संरक्षित व सुरक्षित ठेवलेली असेल तर ती 'गरूभांड' होते. संघकर्म आणि चेतियकर्म (स्तूपाचे काम) पूर्ण झाल्यावर जर ती वेल शिल्लक राहिली, तर ती वैयक्तिक कामासाठी वापरणे योग्य आहे; परंतु जी वेल संरक्षित केलेली नाही, ती गरूभांड होत नाही. सूत, ताग, नारळाच्या शेंड्या आणि चामडे यांपासून बनवलेल्या दोऱ्या किंवा चामड्याचे पट्टे, तसेच ताग आणि नारळाच्या शेंड्या वळवून बनवलेली एकपदरी किंवा दुपदरी दोरी, संघाला दान दिल्यापासून गरूभांड ठरते. परंतु न वळवलेले सूत, ताग आणि नारळाच्या शेंड्या दान केल्यास त्या विभाजनीय आहेत. ज्या दात्यांनी या दोऱ्या, चामड्याचे पट्टे इत्यादी दान केले आहेत, त्यांनी स्वतःच्या गरजेनुसार ते परत नेल्यास त्यांना अडवू नये. โย โกจิ อนฺตมโส อฏฺฐงฺคุลสูจิทณฺฑมตฺโตปิ เวฬุ สงฺฆสฺส ทินฺโน วา ตตฺถชาตโก วา รกฺขิตโคปิโต ครุภณฺฑํ, โสปิ สงฺฆกมฺเม จ เจติยกมฺเม จ กเต อติเรโก ปุคฺคลิกกมฺเม ทาตุํ วฏฺฏติ. ปาทคณฺหนกเตลนาฬิ ปน กตฺตรยฏฺฐิ, อุปาหนทณฺฑโก, ฉตฺตทณฺโฑ, ฉตฺตสลากาติ อิทเมตฺถ ภาชนียภณฺฑํ. ทฑฺฒเคหมนุสฺสา คณฺหิตฺวา คจฺฉนฺตา น วาเรตพฺพา. รกฺขิตโคปิตํ เวฬุํ คณฺหนฺเตน สมกํ วา อติเรกํ วา ถาวรํ อนฺตมโส ตํอคฺฆนกมฺปิ ผาติกมฺมํ กตฺวา คเหตพฺโพ[Pg.82]. ผาติกมฺมํ อกตฺวา คณฺหนฺเตน ตตฺเถว วฬญฺเชตพฺโพ, คมนกาเล สงฺฆิกาวาเส ฐเปตฺวา คนฺตพฺพํ. อสติยา คเหตฺวา คเตน ปหิณิตฺวา ทาตพฺโพ. เทสนฺตรํ คเตน สมฺปตฺตวิหาเร สงฺฆิกาวาเส ฐเปตพฺโพ. अगदी कमीत कमी आठ बोटे लांब आणि सुईच्या दांड्यासारखा जाड असलेला कोणताही बांबू संघाला दान दिलेला असो किंवा तिथेच उगवलेला असो, जर तो संरक्षित व सुरक्षित असेल तर तो 'गरूभांड' आहे. तो देखील संघकर्म आणि चेतियकर्म पूर्ण झाल्यावर शिल्लक राहिल्यास वैयक्तिक कामासाठी देणे योग्य आहे. परंतु एक पाद मूल्याचे तेलाचे नळकांडे, चालण्याची काठी, पादत्राणे अडकवण्याची काठी, छत्रीचा दांडा आणि छत्रीच्या कामट्या, हे सर्व येथे विभाजनीय भांड आहे. ज्यांची घरे जळाली आहेत अशा लोकांनी बांबू घेऊन जाताना त्यांना अडवू नये. संरक्षित व सुरक्षित बांबू घेणाऱ्या भिक्खूंनी समान किंवा अधिक मूल्याची कायमस्वरूपी वस्तू देऊन, किंवा कमीत कमी त्या बांबूच्या मूल्याइतकी भरपाई (फातिकम्म) करून तो घ्यावा. भरपाई न करता घेणाऱ्या भिक्खूंनी तो त्याच विहारात वापरावा आणि निघून जाताना तो सांघिक विहारात ठेवूनच जावे. विसरून सोबत घेऊन गेलेल्या भिक्खूंनी तो परत पाठवून द्यावा. दुसऱ्या देशात/गावात गेलेल्या भिक्खूंनी, तिथे पोहोचलेल्या सांघिक विहारात तो ठेवावा. ติณนฺติ มุญฺชํ ปพฺพชญฺจ ฐเปตฺวา อวเสสํ ยํกิญฺจิ ติณํ. ยตฺถ ปน ติณํ นตฺถิ, ตตฺถ ปณฺเณหิ ฉาเทนฺติ; ตสฺมา ปณฺณมฺปิ ติเณเนว สงฺคหิตํ. อิติ มุญฺชาทีสุ ยํกิญฺจิ มุฏฺฐิปฺปมาณมฺปิ ติณํ ตาลปณฺณาทีสุ จ เอกํ ปณฺณมฺปิ สงฺฆสฺส ทินฺนํ วา ตตฺถชาตกํ วา พหาราเม สงฺฆสฺส ติณวตฺถุโต ชาตติณํ วา รกฺขิตโคปิตํ ครุภณฺฑํ โหติ, ตมฺปิ สงฺฆกมฺเม จ เจติยกมฺเม จ กเต อติเรกํ ปุคฺคลิกกมฺเม ทาตุํ วฏฺฏติ. ทฑฺฒเคหมนุสฺสา คเหตฺวา คจฺฉนฺตา น วาเรตพฺพา. อฏฺฐงฺคุลปฺปมาโณปิ ริตฺตโปตฺถโก ครุภณฺฑเมว. 'तृण' (गवत) म्हणजे मुंज गवत आणि बब्बज गवत वगळता उरलेले कोणतेही गवत होय. परंतु ज्या ठिकाणी गवत नसते, तिथे पानांनी छप्पर छातात; म्हणून पानांचाही तृणामध्येच समावेश होतो. अशा प्रकारे, मुंज इत्यादी गवतांपैकी मूठभर गवत देखील आणि ताडाच्या पानांपैकी एक पान देखील संघाला दान दिलेले असो किंवा तिथेच उगवलेले असो, अथवा विहाराबाहेर संघाच्या गवताळ जमिनीवर उगवलेले गवत असो, जर ते संरक्षित व सुरक्षित असेल तर ते 'गरूभांड' होते. ते देखील संघकर्म आणि चेतियकर्म पूर्ण झाल्यावर शिल्लक राहिल्यास वैयक्तिक कामासाठी देणे योग्य आहे. ज्यांची घरे जळाली आहेत अशा लोकांनी ते घेऊन जाताना त्यांना अडवू नये. आठ बोटे आकाराचे कोरे ताडपत्र देखील गरूभांडच आहे. มตฺติกา ปกติมตฺติกา วา โหตุ ปญฺจวณฺณา วา สุธา วา สชฺชุรสกงฺคุฏฺฐสิเลสาทีสุ วา ยํกิญฺจิ, ทุลฺลภฏฺฐาเน อาเนตฺวา วา ทินฺนํ ตตฺถชาตกํ วา รกฺขิตโคปิตํ ตาลผลปกฺกมตฺตํ ครุภณฺฑํ โหติ. ตมฺปิ สงฺฆกมฺเม จ เจติยกมฺเม จ นิฏฺฐิเต อติเรกํ ปุคฺคลิกกมฺเม ทาตุํ วฏฺฏติ. หิงฺคุหิงฺคุลกหริตาลมโนสิลญฺชนานิ ปน ภาชนียภณฺฑานิ. माती ही साधी माती असो, पाच रंगांची माती असो, चुना असो किंवा राळ, डिंक, लाख इत्यादींपैकी काहीही असो; दुर्मिळ ठिकाणाहून आणून दान दिलेली असो किंवा तिथेच उपलब्ध असलेली व संरक्षित-सुरक्षित ठेवलेली असो, पिकलेल्या ताडफळाच्या आकाराची माती किंवा राळ देखील 'गरूभांड' होते. ती देखील संघकर्म आणि चेतियकर्म पूर्ण झाल्यावर शिल्लक राहिल्यास वैयक्तिक कामासाठी देणे योग्य आहे. परंतु हिंग, हिंगूळ, हरताळ, मनशिल आणि अंजन (काजळ) या विभाजनीय वस्तू आहेत. ทารุภณฺเฑ โย โกจิ อฏฺฐงฺคุลสูจิทณฺฑมตฺโตปิ ทารุภณฺฑโก ทารุทุลฺลภฏฺฐาเน สงฺฆสฺส ทินฺโน วา ตตฺถชาตโก วา รกฺขิตโคปิโต, อยํ ครุภณฺฑํ โหตีติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. มหาอฏฺฐกถายํ ปน สพฺพมฺปิ ทารุเวฬุจมฺมปาสาณาทิวิกตึ ทารุภณฺเฑน สงฺคณฺหิตฺวา ‘‘เตน โข ปน สมเยน สงฺฆสฺส อาสนฺทิโก อุปฺปนฺโน โหตี’’ติ อิโต ปฏฺฐาย ทารุภณฺฑวินิจฺฉโย วุตฺโต. लाकडी वस्तूंच्या (दारुभांड) बाबतीत, अगदी आठ बोटे लांब आणि सुईच्या दांड्यासारखा जाड असलेला कोणताही लाकडाचा तुकडा, लाकूड दुर्मिळ असलेल्या ठिकाणी संघाला दान दिलेला असो किंवा तिथेच उगवलेला असो, जर तो संरक्षित व सुरक्षित असेल, तर तो 'गरूभांड' होतो, असे कुरुंदी अट्ठकथेत म्हटले आहे. परंतु महाअट्ठकथेत लाकूड, बांबू, चामडे, दगड इत्यादींपासून बनवलेल्या सर्व प्रकारच्या वस्तूंचा 'लाकडी वस्तूंमध्ये' समावेश करून, 'त्या वेळी संघाला आसंदिक प्राप्त झाले' या पाठापासून पुढे लाकडी वस्तूंचा निर्णय (दारुभांडविनिच्छय) सांगितला आहे. ตตฺรายํ อตฺถุทฺธาโร, อาสนฺทิโก, สตฺตงฺโค, ภทฺทปีฐํ, ปีฐิกา, เอฬกปาทกปีฐํ, อามลกวฏฺฏกปีฐํ, ผลกํ, โกจฺฉํ, ปลาลปีฐกนฺติ อิเมสุ [Pg.83] ตาว ยํกิญฺจิ ขุทฺทกํ วา โหตุ มหนฺตํ วา, สงฺฆสฺส ทินฺนํ ครุภณฺฑํ โหติ. ปลาลปีเฐน เจตฺถ กทลิปตฺตาทิปีฐานิปิ สงฺคหิตานิ. พฺยคฺฆจมฺมโอนทฺธมฺปิ วาฬรูปปริกฺขิตฺตํ, รตนปริสิพฺพิตํ, โกจฺฉกํ ครุภณฺฑเมว. त्यातील अर्थाचा संक्षेप असा आहे: आसंदिक (लांब पायांचे आसन), सत्तंग (सात अवयव असलेला पलंग), bhaddapīṭhaṃ (वेताचे सुंदर आसन), पिठिका (कापडाने मढवलेले लहान आसन), एळकपादकपीठ (मेंढ्याच्या पायासारखे पाय असलेले आसन), आमलकवट्टकपीठ (गोल पाय असलेले गोल आसन), लाकडी फळी, कोच्छ (विणलेले आसन) आणि पलालपीठक (पेंढ्याचे आसन) या आसनांपैकी कोणतेही आसन लहान असो वा मोठे, संघाला दान दिले असता ते 'गरूभांड' होते. आणि येथे पलालपीठामध्ये केळीच्या पानांपासून बनवलेल्या आसनांचाही समावेश होतो. वाघाच्या चामड्याने मढवलेले, हिंस्र श्वापदांच्या आकृतींनी वेढलेले आणि रत्नांनी विणलेले कोच्छक देखील गरूभांडच आहे. วงฺกผลกํ, ทีฆผลกํ, จีวรโธวนผลกํ, ฆฏฺฏนผลกํ, ฆฏฺฏนมุคฺคโร, ทนฺตกฏฺฐจฺเฉทนคณฺฐิกา, ทณฺฑมุคฺคโร, อมฺพณํ, รชนโทณิ, อุทกปฏิจฺฉโก, ทารุมโย วา ทนฺตมโย วา เวฬุมโย วา สปาทโกปิ อปาทโกปิ สมุคฺโค, มญฺชูสา, ปาทคณฺหนกโต อติเรกปฺปมาโณ กรณฺโฑ, อุทกโทณิ, อุทกกฏาหํ, อุฬุงฺโก, กฏจฺฉุ, ปานียสราวํ, ปานียสงฺโขติ เอเตสุปิ ยํกิญฺจิ สงฺเฆ ทินฺนํ ครุภณฺฑํ. สงฺขถาลกํ ปน ภาชนียํ, ตถา ทารุมโย อุทกตุมฺโพ. वक्र फळी, लांब फळी, चीवर धुण्याची फळी, चीवर ठोकण्याची फळी, चीवर ठोकण्याचा सोटा (मुद्गल), दातवण कापण्याचा लाकडी ठोकळा, दांडा असलेला हातोडा, पाणी साठवण्याचे भांडे (द्रोणी), रंग तयार करण्याची द्रोणी, पाणी झेळणारे भांडे, लाकडाची, हस्तिदंताची किंवा बांबूची बनवलेली, पाय असलेली किंवा पाय नसलेली डबी (पेटी), मोठी पेटी, एक पाद मूल्यापेक्षा अधिक आकाराचा करंडा, पाण्याची द्रोणी, पाण्याचा मोठा हंडा, पळी (ओगराळे), डाव (चमचा), पिण्याच्या पाण्याचे भांडे आणि पिण्याच्या पाण्याचा शंख, या वस्तूंपैकी कोणतीही वस्तू संघाला दान दिली असता ती 'गरूभांड' होते. परंतु शंखाची लहान वाटी विभाजनीय आहे, त्याचप्रमाणे लाकडी पाण्याचे पात्र (तुंबा) देखील विभाजनीय आहे. ปาทกถลิกมณฺฑลํ ทารุมยํ วา โหตุ โจฬปณฺณาทิมยํ วา สพฺพํ ครุภณฺฑํ. อาธารโก ปตฺตปิธานํ, ตาลวณฺฏํ, พีชนี, จงฺโกฏกํ, ปจฺฉิ, ยฏฺฐิสมฺมุญฺชนี มุฏฺฐิสมฺมุญฺชนีติ เอเตสุปิ ยํกิญฺจิ ขุทฺทกํ วา มหนฺตํ วา ทารุเวฬุปณฺณจมฺมาทีสุ เยน เกนจิ กตํ ครุภณฺฑเมว. पाय घासण्याची गोल फळी लाकडाची असो किंवा कापड, पानांची वगैरे बनवलेली असो, ती सर्व 'गरूभांड' आहे. पात्राचा आधार (स्टँड), पात्राचे झाकण, ताडाचा पंखा, पंखा, फुलांची टोपली (करंडा), टोपली, दांडा असलेली झाडू आणि मुठीची झाडू, या वस्तूंपैकी कोणतीही वस्तू लहान असो वा मोठी, लाकूड, बांबू, पाने, चामडे इत्यादींपैकी कशानेही बनवलेली असो, ती गरूभांडच आहे. ถมฺภตุลาโสปานผลกาทีสุ ทารุมยํ วา ปาสาณมยํ วา ยํกิญฺจิ เคหสมฺภารรูปํ, โย โกจิ กฏสารโก, ยํกิญฺจิ ภูมตฺถรณํ, ยํกิญฺจิ อกปฺปิยจมฺมํ, สพฺพํ สงฺเฆ ทินฺนํ ครุภณฺฑํ, ภูมตฺถรณํ กาตุํ วฏฺฏติ. เอฬกจมฺมํ ปน ปจฺจตฺถรณคติกํ โหติ, ตมฺปิ ครุภณฺฑเมว. กปฺปิยจมฺมานิ ภาชนียานิ. กุรุนฺทิยํ ปน ‘‘สพฺพํ มญฺจปฺปมาณํ จมฺมํ ครุภณฺฑ’’นฺติ วุตฺตํ. खांब, वासे, पायऱ्या, फळ्या इत्यादींमध्ये लाकडी किंवा दगडी असलेले कोणतेही घराचे साहित्य, कोणतीही चटई, जमिनीवर अंथरण्याचे कोणतेही अंथरूण, कोणतेही अकल्पनीय (अयोग्य) चामडे, हे सर्व संघास दिले असता 'गरुभांड' (सांघिक मालमत्ता) होते; ते जमिनीवर अंथरण्यासाठी वापरणे योग्य आहे. मेंढीचे चामडे हे अंथरण्यासारखेच असते, त्यामुळे ते देखील गरुभांडच आहे. कल्पनीय (योग्य) चामडी मात्र विभाजनीय (भाजनिय) आहेत. कुरुंदी अट्ठकथेत म्हटले आहे की, "खाटेच्या आकाराचे सर्व चामडे हे गरुभांडच आहे." อุทุกฺขลํ, มุสลํ, สุปฺปํ, นิสทํ, นิสทโปโต, ปาสาณโทณิ, ปาสาณกฏาหํ, ตุริเวมภสฺตาทิ สพฺพํ เปสการาทิภณฺฑํ, สพฺพํ กสิภณฺฑํ, สพฺพํ จกฺกยุตฺตกยานํ ครุภณฺฑเมว. มญฺจปาโท, มญฺจอฏนี, ปีฐปาโท, ปีฐอฏนี, วาสิผรสุอาทีนํ ทณฺฑาติ เอเตสุ ยํกิญฺจิ วิปฺปกตตจฺฉนกมฺมํ อนิฏฺฐิตเมว ภาชนียํ, ตจฺฉิตมฏฺฐํ ปน ครุภณฺฑํ โหติ. อนุญฺญาตวาสิยา ปน ทณฺโฑ ฉตฺตมุฏฺฐิปณฺณํ กตฺตรยฏฺฐิ อุปาหนา อรณิสหิตํ ธมฺมกรโณ ปาทคณฺหนกโต อนติริตฺตํ อามลกตุมฺพํ อามลกฆโฏ ลาพุกตุมฺพํ ลาพุฆโฏ วิสาณกตุมฺพนฺติ สพฺพเมตํ ภาชนียํ, ตโต มหนฺตตรํ ครุภณฺฑํ. उखळ, मुसळ, सूप, पाटा, वरवंटा, दगडाची कुंडी, दगडाचे भांडे, विणकराचे माग, कातण यंत्र, चामड्याची पिशवी इत्यादी विणकराचे सर्व साहित्य, शेतीचे सर्व साहित्य आणि चाके असलेले सर्व वाहन हे गरुभांडच आहे. खाटेचा पाय, खाटेची ईस, पाटाचा पाय, पाटाची ईस, तासणी व कुऱ्हाड इत्यादींचे दांडे - या लाकडी वस्तूंमध्ये ज्यांचे तासण्याचे काम अपूर्ण आहे, अशा अपूर्ण वस्तूच केवळ विभाजनीय आहेत; परंतु तासून गुळगुळीत केलेल्या वस्तू मात्र गरुभांड असतात. अनुमती दिलेल्या तासणीचा दांडा, छत्री, छत्रीची मूठ किंवा ताडाचे पान, काठी, पादत्राणे, अरणी, धम्मकरण (पाणी गाळण्याचे साधन), एका पादापेक्षा अधिक नसलेले आवळ्याचे भांडे, आवळ्याचा घडा, भोपळ्याचे भांडे, भोपळ्याचा घडा, शिंगाचे भांडे - हे सर्व विभाजनीय आहे. यापेक्षा मोठे असलेले भांडे गरुभांड असते. หตฺถิทนฺโต [Pg.84] วา ยํกิญฺจิ วิสาณํ วา อตจฺฉิตํ ยถาชาตเมว ภาชนียํ, เตหิ กตมญฺจปาทาทีสุ ปุริมสทิโสเยว วินิจฺฉโย. ตจฺฉิตนิฏฺฐิโตปิ หิงฺคุกรณฺฑโก อญฺชนกรณฺฑโก คณฺฐิกา วิโธ อญฺชนี อญฺชนิสลากา อุทกปุญฺฉนีติ อิทํ สพฺพํ ภาชนียเมว. हत्तीचा सुळा (हस्तिदंत) किंवा कोणतेही शिंग, जे तासलेले नाही आणि नैसर्गिक स्वरूपात आहे, ते विभाजनीय आहे. त्यांच्यापासून बनवलेले खाटेचे पाय इत्यादींच्या बाबतीत पूर्वीप्रमाणेच निर्णय समजावा. तासून पूर्ण केलेली हिंगाची डबी, काजळाची डबी, गुंडी, कंबरपट्ट्याची गुंडी, काजळ घालण्याची नळी, काजळाची सळई, पाणी पुसण्याचे कापड - हे सर्व विभाजनीयच आहे. มตฺติกาภณฺเฑ สพฺพํ มนุสฺสานํ อุปโภคปริโภคํ ฆฏปิฐราทิกุลาลภาชนํ ปตฺตกฏาหํ องฺคารกฏาหํ ธูมทานกํ ทีปรุกฺขโก ทีปกปลฺลิกา จยนิฏฺฐกา ฉทนิฏฺฐกา ถูปิกาติ สงฺฆสฺส ทินฺนกาลโต ปฏฺฐาย ครุภณฺฑํ, ปาทคณฺหนกโต อนติริตฺตปฺปมาโณ ปน ฆฏโก ปตฺตํ ถาลกํ กญฺจนโก กุณฺฑิกาติ อิทเมตฺถ ภาชนียภณฺฑํ. ยถา จ มตฺติกาภณฺเฑ; เอวํ โลหภณฺเฑปิ กุณฺฑิกา ภาชนียโกฏฺฐาสเมว ภชตีติ อยเมตฺถ อนุปุพฺพิกถา. मातीच्या भांड्यांमध्ये, माणसांच्या वापरासाठी असलेली कुंभाराची सर्व भांडी जसे की घडा, मडके इत्यादी, पात्र भाजण्याचे भांडे, निखारे ठेवण्याचे भांडे, धूपपात्र, दीपवृक्ष (दिवा लावण्याचा स्तंभ), पणती, भिंत बांधण्याच्या विटा, छप्पर छावण्याच्या विटा (कौले) आणि कळस - हे सर्व संघाला दिल्यापासून गरुभांड होते. परंतु, एका पादापेक्षा अधिक नसलेल्या आकाराचा लहान घडा, पात्र, वाटी, पाण्याचे भांडे, तोटीचा तांब्या (कुंडिका) - हे या मातीच्या भांड्यांमध्ये विभाजनीय भांड आहे. आणि ज्याप्रमाणे मातीच्या भांड्यांमध्ये, त्याचप्रमाणे धातूच्या भांड्यांमध्ये देखील तोटीचा तांब्या (कुंडिका) हा विभाजनीय भागातच मोडतो. हा या विषयातील अनुक्रमिक निर्णय आहे. อวิสฺสชฺชิยวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. अविभाजनीय वस्तूंची कथा समाप्त झाली. นวกมฺมทานกถา नवकम्म (नवीन बांधकाम) देण्याची कथा. ๓๒๓. ภณฺฑิกาฏฺฐปนมตฺเตนาติ ทฺวารพาหานํ อุปริ กโปตภณฺฑิกโยชนมตฺเตน. ปริภณฺฑกรณมตฺเตนาติ โคมยปริภณฺฑกสาวปริภณฺฑกรณมตฺเตน. ธูมกาลิกนฺติ อิทํ ยาวสฺส จิตกธูโม น ปญฺญายติ, ตาว อยํ วิหาโร เอตสฺเสวาติ เอวํ ธูมกาเล อปโลเกตฺวา กตปริโยสิตํ วิหารํ เทนฺติ. วิปฺปกตนฺติ เอตฺถ วิปฺปกโต นาม ยาว โคปานสิโย น อาโรหนฺติ. โคปานสีสุ ปน อารุฬฺหาสุ พหุกโต นาม โหติ, ตสฺมา ตโต ปฏฺฐาย น ทาตพฺโพ, กิญฺจิเทว สมาทเปตฺวา กาเรสฺสติ. ขุทฺทเก วิหาเร กมฺมํ โอโลเกตฺวา ฉปฺปญฺจวสฺสิกนฺติ กมฺมํ โอโลเกตฺวา จตุหตฺถวิหาเร จตุวสฺสิกํ, ปญฺจหตฺเถ ปญฺจวสฺสิกํ, ฉหตฺเถ ฉวสฺสิกํ ทาตพฺพํ. อฑฺฒโยโค ปน ยสฺมา สตฺตฏฺฐหตฺโถ โหติ, ตสฺมา เอตฺถ ‘‘สตฺตฏฺฐวสฺสิก’’นฺติ วุตฺตํ. สเจ ปน โส นวหตฺโถ โหติ นววสฺสิกมฺปิ ทาตพฺพํ. มหลฺลเก ปน ทสหตฺเถ เอกาทสหตฺเถ วิหาเร วา ปาสาเท วา ทสวสฺสิกํ วา เอกาทสวสฺสิกํ วา ทาตพฺพํ. ทฺวาทสหตฺเถ ปน ตโต อธิเก วา โลหปาสาทสทิเสปิ ทฺวาทสวสฺสิกเมว ทาตพฺพํ, น ตโต อุตฺตริ. ३२३. 'भांडिका ठेवण्यामात्रेने' म्हणजे दरवाजाच्या चौकटीच्या वर कबुतरांना बसण्यासाठी लहान लाकूड बसवण्यामात्रेने. 'परिभांड करण्यामात्रेने' म्हणजे शेणाने किंवा गेरूने सारवण्यामात्रेने. 'धूमकालिक' म्हणजे जोपर्यंत त्या भिक्खूच्या चितेचा धूर दिसत नाही, तोपर्यंत हा विहार त्याचाच राहील - अशा प्रकारे धूर निघण्याच्या काळापर्यंत अनुमती घेऊन पूर्ण केलेला विहार देतात. 'विप्पकत' (अपूर्ण) म्हणजे जोपर्यंत छपराचे वासे चढवले जात नाहीत, तोपर्यंत तो विहार अपूर्ण समजला जातो. वासे चढवल्यानंतर तो 'बहुकत' (बहुतांश पूर्ण झालेला) समजला जातो; म्हणून त्यानंतर तो (नवकम्म म्हणून) देऊ नये; मालक स्वतःच कोणालातरी नियुक्त करून ते काम पूर्ण करून घेईल. लहान विहाराच्या बाबतीत काम पाहून 'सहा किंवा पाच वर्षांचे' नवकम्म द्यावे. काम पाहून चार हात लांबीच्या विहारासाठी चार वर्षांचे, पाच हात लांबीच्या विहारासाठी पाच वर्षांचे आणि सहा हात लांबीच्या विहारासाठी सहा वर्षांचे नवकम्म द्यावे. 'अड्ढयोग' (दोन बाजूला उतरते छप्पर असलेला विहार) हा सात किंवा आठ हात लांबीचा असतो, म्हणून येथे 'सात किंवा आठ वर्षांचे' असे म्हटले आहे. जर तो नऊ हात लांबीचा असेल, तर नऊ वर्षांचे देखील नवकम्म द्यावे. मोठ्या विहारात किंवा प्रासादात, जो दहा किंवा अकरा हात लांबीचा असेल, दहा किंवा अकरा वर्षांचे नवकम्म द्यावे. बारा हात लांबीच्या किंवा त्यापेक्षा मोठ्या विहारात, अगदी लोहप्रासादासारख्या विहारात देखील जास्तीत जास्त बारा वर्षांचेच नवकम्म द्यावे, त्यापेक्षा जास्त नाही. นวกมฺมิโก [Pg.85] ภิกฺขุ อนฺโตวสฺเส ตํ อาวาสํ ลภติ, อุตุกาเล ปฏิพาหิตุํ น ลภติ. สเจ โส อาวาโส ชีรติ, อาวาสสามิกสฺส วา ตสฺส วํเส อุปฺปนฺนสฺส วา กสฺสจิ กเถตพฺพํ – ‘‘อาวาโส เต นสฺสติ, ชคฺคถ เอตํ อาวาส’’นฺติ. สเจ โส น สกฺโกติ, ภิกฺขูหิ ญาตี วา อุปฏฺฐาเก วา สมาทเปตฺวา ชคฺคิตพฺโพ. สเจ เตปิ น สกฺโกนฺติ, สงฺฆิเกน ปจฺจเยน ชคฺคิตพฺโพ. ตสฺมิมฺปิ อสติ เอกํ อาวาสํ วิสฺสชฺเชตฺวา อวเสสา ชคฺคิตพฺพา. พหู วิสฺสชฺเชตฺวา เอกํ สณฺฐาเปตุมฺปิ วฏฺฏติเยว. नवकम्म (बांधकाम) सांभाळणाऱ्या भिक्खूला वर्षावासाच्या काळात तो आवास मिळतो; इतर ऋतूंमध्ये त्याला इतरांना रोखण्याचा अधिकार नसतो. जर तो आवास जीर्ण होत असेल, तर आवासाच्या मालकाला किंवा त्याच्या वंशातील कोणालातरी सांगावे की - "तुमचा आवास नष्ट होत आहे, या आवासाची काळजी घ्या." जर तो असमर्थ असेल, तर भिक्खूंनी नातेवाईक किंवा उपस्थायकांना (सेवकांना) प्रवृत्त करून त्याची दुरुस्ती करावी. जर ते देखील असमर्थ असतील, तर सांघिक साधनांनी त्याची दुरुस्ती करावी. ते देखील नसल्यास, एक आवास सोडून देऊन उर्वरित आवासांची दुरुस्ती करावी. अनेक आवास सोडून देऊन केवळ एकच आवास टिकवून ठेवणे देखील योग्यच आहे. ทุพฺภิกฺเข ภิกฺขูสุ ปกฺกนฺเตสุ สพฺเพ อาวาสา นสฺสนฺติ, ตสฺมา เอกํ วา ทฺเว วา ตโย วา อาวาเส วิสฺสชฺเชตฺวา ตโต ยาคุภตฺตจีวราทีนิ ปริภุญฺชนฺเตหิ เสสาวาสา ชคฺคิตพฺพาเยว. กุรุนฺทิยํ ปน วุตฺตํ ‘‘สงฺฆิเก ปจฺจเย อสติ เอโก ภิกฺขุ ‘ตุยฺหํ เอกํ มญฺจฏฺฐานํ คเหตฺวา ชคฺคาหี’ติ วตฺตพฺโพ. สเจ พหุตรํ อิจฺฉติ, ติภาคํ วา อุปฑฺฒภาคํ วา ทตฺวาปิ ชคฺคาเปตพฺพํ. อถ ‘ถมฺภมตฺตเมเวตฺถ อวสิฏฺฐํ, พหุกมฺมํ กาตพฺพ’นฺติ น อิจฺฉติ, ‘ตุยฺหํ ปุคฺคลิกเมว กตฺวา ชคฺค; เอวมฺปิ หิ สงฺฆสฺส ภณฺฑกฏฺฐปนฏฺฐานํ นวกานญฺจ วสนฏฺฐานํ ลภิสฺสตี’ติ ชคฺคาเปตพฺโพ. เอวํ ชคฺคิโต ปน ตสฺมึ ชีวนฺเต ปุคฺคลิโก โหติ, มเต สงฺฆิโกเยว. สเจ สทฺธิวิหาริกานํ ทาตุกาโม โหติ, กมฺมํ โอโลเกตฺวา ติภาคํ วา อุปฑฺฒํ วา ปุคฺคลิกํ กตฺวา ชคฺคาเปตพฺโพ. เอวญฺหิ สทฺธิวิหาริกานํ ทาตุํ ลภติ. เอวํ ชคฺคนเก ปน อสติ ‘เอกํ อาวาสํ วิสฺสชฺเชตฺวา’ติอาทินา นเยน ชคฺคาเปตพฺโพ’’ติ. दुष्काळात भिक्खू निघून गेल्यावर सर्व आवास नष्ट होतात; म्हणून एक, दोन किंवा तीन आवास सोडून देऊन, त्यापासून मिळणारी पेज, अन्न, चीवर इत्यादींचा उपभोग घेत उर्वरित आवासांची काळजी घ्यावी. कुरुंदीमध्ये म्हटले आहे की - "सांघिक साधने नसताना, एका भिक्खूला सांगावे की - 'तू तुझ्यासाठी एका खाटेची जागा घेऊन याची काळजी घे.' जर त्याला अधिक हवे असेल, तर तिसरा भाग किंवा अर्धा भाग देऊन देखील त्याची दुरुस्ती करून घ्यावी. जर 'येथे फक्त खांबच शिल्लक आहेत, खूप काम करावे लागेल' असे म्हणून तो तयार नसेल, तर त्याला सांगावे की - 'तू हे स्वतःचे वैयक्तिक (पुद्गलिक) करून याची काळजी घे; कारण असे केल्याने देखील संघाला वस्तू ठेवण्याची जागा आणि नवीन भिक्खूंना राहण्याची जागा मिळेल.' अशा प्रकारे त्याची दुरुस्ती करून घ्यावी. अशा प्रकारे दुरुस्ती केलेला आवास तो जिवंत असेपर्यंत वैयक्तिक असतो, त्याच्या मृत्यूनंतर तो सांघिकच होतो. जर तो आपल्या सद्धिविहारिकांना (शिष्यांना) तो देऊ इच्छित असेल, तर त्याचे काम पाहून तिसरा भाग किंवा अर्धा भाग वैयक्तिक करून दुरुस्ती करून घ्यावी. कारण असे केल्याने त्याला तो सद्धिविहारिकांना देता येतो. जर अशी काळजी घेणारा कोणी नसेल, तर 'एक आवास सोडून देऊन' इत्यादी पद्धतीने त्याची दुरुस्ती करून घ्यावी." อิทมฺปิ จ อญฺญํ ตตฺเถว วุตฺตํ – ทฺเว ภิกฺขู สงฺฆิกํ ภูมึ คเหตฺวา โสเธตฺวา สงฺฆิกํ เสนาสนํ กโรนฺติ. เยน สา ภูมิ ปฐมํ คหิตา, โส สามี. อุโภปิ ปุคฺคลิกํ กโรนฺติ, โสเยว สามี. โส สงฺฆิกํ กโรติ, อิตโร ปุคฺคลิกํ กโรติ, อญฺญํ เจ พหุํ เสนาสนฏฺฐานํ อตฺถิ, ปุคฺคลิกํ กโรนฺโตปิ น วาเรตพฺโพ. อญฺญสฺมึ ปน ตาทิเส ปฏิรูเป ฐาเน อสติ ตํ ปฏิพาหิตฺวา สงฺฆิกํ กโรนฺเตเนว กาตพฺพํ. ยํ ปน ตสฺส ตตฺถ วยกมฺมํ กตํ, ตํ ทาตพฺพํ. สเจ ปน กตาวาเส วา อาวาสกรณฏฺฐาเน วา ฉายูปคผลูปครุกฺขา โหนฺติ, อปโลเกตฺวา [Pg.86] หาเรตพฺพา. ปุคฺคลิกา เจ โหนฺติ, สามิกา อาปุจฺฉิตพฺพา; โน เจ เทนฺติ, ยาวตติยํ อาปุจฺฉิตฺวา ‘‘รุกฺขอคฺฆนกมูลํ ทสฺสามา’’ติ หาเรตพฺพา. हे देखील दुसरे त्याच (कुरुन्दी अट्ठकथेत) म्हटले आहे – दोन भिक्खू संघाची जमीन घेऊन, ती स्वच्छ करून संघिक सेनासन तयार करतात. ज्याने ती जमीन प्रथम घेतली होती, तो त्याचा स्वामी आहे. जर दोघेही वैयक्तिक (पुग्गलिक) सेनासन बनवत असतील, तर तोच स्वामी आहे. तो संघिक बनवतो आणि दुसरा वैयक्तिक बनवतो, जर तिथे इतर पुष्कळ सेनासनाची जागा असेल, तर वैयक्तिक बनवणाऱ्यालाही रोखू नये. परंतु जर दुसरी तशी योग्य जागा नसेल, तर त्याला रोखून संघिक सेनासन बनवणाऱ्यानेच ते बनवले पाहिजे. परंतु त्याने तिथे जो काही खर्च केला असेल, तो त्याला दिला पाहिजे. जर तयार केलेल्या विहारात किंवा विहार बनवण्याच्या जागेत सावली देणारे किंवा फळ देणारे वृक्ष असतील, तर संघाची अनुमती घेऊन ते काढून टाकावेत. जर ते वैयक्तिक असतील, तर त्यांच्या मालकांना विचारले पाहिजे; जर त्यांनी परवानगी दिली नाही, तर तीन वेळा विचारून 'आम्ही वृक्षाचे योग्य मूल्य देऊ' असे सांगून ते काढून टाकावेत. โย ปน สงฺฆิกวลฺลิมตฺตมฺปิ อคฺคเหตฺวา อาหริเมน อุปกรเณน สงฺฆิกาย ภูมิยา ปุคฺคลิกวิหารํ กาเรติ, อุปฑฺฒํ สงฺฆิกํ โหติ; อุปฑฺฒํ ปุคฺคลิกํ. ปาสาโท เจ โหติ, เหฏฺฐาปาสาโท สงฺฆิโก; อุปริ ปุคฺคลิโก. สเจ โส เหฏฺฐาปาสาทํ อิจฺฉติ, ตสฺส โหติ. อถ เหฏฺฐา จ อุปริ จ อิจฺฉติ, อุภยตฺถ อุปฑฺฒํ ลภติ. ทฺเว เสนาสนานิ กาเรติ – เอกํ สงฺฆิกํ, เอกํ ปุคฺคลิกํ. สเจ วิหาเร อุฏฺฐิเตน ทพฺพสมฺภาเรน กาเรติ, ตติยภาคํ ลภติ. สเจ อกตฏฺฐาเน จยํ วา ปมุขํ วา กโรติ, พหิกุฏฺเฏ อุปฑฺฒํ สงฺฆสฺส, อุปฑฺฒํ ตสฺส. อถ มหนฺตํ วิสมํ ปูเรตฺวา อปเท ปทํ ทสฺเสตฺวา กตํ โหติ, อนิสฺสโร ตตฺถ สงฺโฆ. परंतु जो कोणी संघाची वेल देखील न घेता, स्वतः आणलेल्या साहित्याने संघाच्या जमिनीवर वैयक्तिक विहार बनवतो, त्याचा अर्धा भाग संघिक होतो आणि अर्धा भाग वैयक्तिक होतो. जर तो प्रासाद (मजली इमारत) असेल, तर खालचा प्रासाद संघिक होतो आणि वरचा वैयक्तिक होतो. जर त्याला खालचा प्रासाद हवा असेल, तर तो त्याचा होतो. किंवा जर त्याला खालचा आणि वरचा दोन्ही मजले हवे असतील, तर दोन्ही ठिकाणी त्याला अर्धा भाग मिळतो. जर तो दोन सेनासने बनवतो – तर एक संघिक होते आणि एक वैयक्तिक होते. जर तो विहारात उपलब्ध असलेल्या लाकूड-साहित्याने बनवतो, तर त्याला तिसरा भाग मिळतो. जर तो न बांधलेल्या जागेवर भिंत किंवा ओसरी बांधतो, तर बाहेरील भिंतीचा अर्धा भाग संघाचा आणि अर्धा भाग त्याचा होतो. किंवा जर मोठी विषम जागा भरून काढून, जिथे पूर्वी काहीच नव्हते अशा जागी बांधकाम केले असेल, तर तिथे संघाचा अधिकार राहत नाही. เอกํ วรเสยฺยนฺติ เอตฺถ นวกมฺมทานฏฺฐาเน วา วสฺสคฺเคน ปตฺตฏฺฐาเน วา ยํ อิจฺฉติ, ตํ เอกํ วรเสยฺยํ อนุชานามีติ อตฺโถ. ‘एकं वरसेय्यं’ (एक उत्तम शय्या) यामध्ये, नवकम्म देण्याच्या ठिकाणी किंवा वर्षावासानुसार मिळालेल्या ठिकाणी जे त्याला हवे असेल, ते एक उत्तम शय्या घेण्याची मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. ปริโยสิเต ปกฺกมติ ตสฺเสเวตนฺติ ปุน อาคนฺตฺวา วสนฺตสฺส อนฺโตวสฺสํ ตสฺเสว ตํ; อนาคจฺฉนฺตสฺส ปน สทฺธิวิหาริกาทโย คเหตุํ น ลภนฺติ. ‘परियोसिते पक्कमति तस्सेवेत’ याचा अर्थ – पुन्हा येऊन वर्षावासाच्या आत राहणाऱ्या भिक्खूचेच ते राहते; परंतु तो न आल्यास, त्याच्या सद्धि विहारिकादी भिक्खूंना ते घेता येत नाही. นวกมฺมทานกถา นิฏฺฐิตา. नवकम्म देण्याची कथा समाप्त झाली. อญฺญตฺรปฏิโภคปฏิกฺเขปาทิกถา अन्यत्र उपभोग घेण्यास मनाई इत्यादींची कथा. ๓๒๔. นาติหรนฺตีติ อญฺญตฺร หริตฺวา น ปริภุญฺชนฺติ. คุตฺตตฺถายาติ ยํ ตตฺถ มญฺจปีฐาทิ, ตสฺส คุตฺตตฺถาย, ตํ อญฺญตฺร หริตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. ตสฺมา ตํ อญฺญตฺร หริตฺวา สงฺฆิกปริโภเคน ปริภุญฺชนฺตสฺส นฏฺฐํ สุนฏฺฐํ, ชิณฺณํ สุชิณฺณํ. สเจ อโรคํ ตสฺมึ วิหาเร ปฏิสงฺขเต ปุน ปากติกํ กาตพฺพํ. ปุคฺคลิกปริโภเคน ปริภุญฺชโต นฏฺฐํ วา ชิณฺณํ วา คีวา โหติ, ตสฺมึ ปฏิสงฺขเต ทาตพฺพเมว. สเจ ตโต โคปานสิอาทีนิ คเหตฺวา อญฺญสฺมึ สงฺฆิกาวาเส โยเชนฺติ, สุโยชิตานิ. ปุคฺคลิกาวาเส โยเชนฺเตหิ ปน มูลํ วา ทาตพฺพํ, ปฏิปากติกํ วา กาตพฺพํ ฉฑฺฑิตวิหารโต มญฺจปีฐาทีนิ เถยฺยจิตฺเตน คณฺหนฺโต อุทฺธาเรเยว ภณฺฑคฺเฆน กาเรตพฺโพ. ปุน อาวาสิกกาเล ทสฺสามีติ คเหตฺวา สงฺฆิกปริโภเคน ปริภุญฺชนฺตสฺส นฏฺฐํ สุนฏฺฐํ, ชิณฺณํ สุชิณฺณํ. อโรคญฺเจ ปากติกํ กาตพฺพํ[Pg.87]. ปุคฺคลิกปริโภเคน ปริภุญฺชนฺตสฺส นฏฺฐํ คีวา โหติ. ตโต ทฺวารวาตปานาทีนิ สงฺฆิกาวาเส วา ปุคฺคลิกาวาเส วา โยชิตานิ ปฏิทาตพฺพานิเยว. ३२४. ‘नातिहरन्ति’ म्हणजे दुसऱ्या विहारात नेऊन ते वापरत नाहीत. ‘गुत्तत्थाय’ म्हणजे तिथे जे खाट, पाट इत्यादी साहित्य आहे, त्याच्या सुरक्षेसाठी ते दुसऱ्या विहारात नेण्याची मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. म्हणून, ते दुसऱ्या विहारात नेऊन संघिक उपभोग म्हणून वापरणाऱ्या भिक्खूचे ते साहित्य हरवले तर ते चांगल्या प्रकारे हरवले, आणि जीर्ण झाले तर ते चांगल्या प्रकारे जीर्ण झाले. जर ते सुरक्षित असेल, तर तो विहार दुरुस्त झाल्यावर ते पुन्हा पूर्ववत केले पाहिजे. वैयक्तिक उपभोग म्हणून वापरणाऱ्याचे जर ते हरवले किंवा जीर्ण झाले, तर तो ऋणी होतो; तो विहार दुरुस्त झाल्यावर त्याने ते परत दिलेच पाहिजे. जर तिथून वासे इत्यादी साहित्य घेऊन दुसऱ्या संघिक विहारात जोडले, तर ते योग्य प्रकारे जोडले गेले आहे. परंतु वैयक्तिक विहारात जोडणाऱ्यांनी त्याचे मूल्य दिले पाहिजे किंवा ते पूर्ववत केले पाहिजे. परित्यक्त विहारातून खाट, पाट इत्यादी साहित्य चोरीच्या उद्देशाने घेणाऱ्याला, उचलण्याच्या वेळीच साहित्याच्या मूल्याने दंडित केले पाहिजे. ‘पुन्हा रहिवासी भिक्खू आल्यावर मी परत देईन’ अशा विचाराने घेऊन संघिक उपभोग म्हणून वापरणाऱ्याचे जर ते हरवले तर ते चांगल्या प्रकारे हरवले, आणि जीर्ण झाले तर ते चांगल्या प्रकारे जीर्ण झाले. जर ते सुरक्षित असेल, तर ते पूर्ववत केले पाहिजे. वैयक्तिक उपभोग म्हणून वापरणाऱ्याचे जर ते हरवले, तर तो ऋणी होतो. तिथून दरवाजे, खिडक्या इत्यादी साहित्य संघिक विहारात किंवा वैयक्तिक विहारात जोडले गेले असल्यास, ते परत दिलेच पाहिजे. ผาติกมฺมตฺถายาติ วฑฺฒิกมฺมตฺถาย. ผาติกมฺมญฺเจตฺถ สมกํ วา อติเรกํ วา อคฺฆนกํ มญฺจปีฐาทิเสนาสนเมว วฏฺฏติ. ‘फातिकम्मतथाय’ म्हणजे वृद्धी करण्याच्या उद्देशाने. आणि येथे विनिमय (फातिकम्म) म्हणून समान किंवा अधिक मूल्याचे खाट, पाट इत्यादी सेनासनच योग्य ठरते. จกฺกลิกนฺติ กมฺพลาทีหิ เวเฐตฺวา กตจกฺกลิกํ. อลฺเลหิ ปาเทหีติ เยหิ อกฺกนฺตฏฺฐาเน อุทกํ ปญฺญายติ, เอวรูเปหิ ปาเทหิ ปริภณฺฑกตภูมิ วา เสนาสนํ วา น อกฺกมิตพฺพํ. สเจ ปน อุทกสิเนหมตฺตเมว ปญฺญายติ, น อุทกํ, วฏฺฏติ. ปาทปุญฺฉนึ ปน อลฺลปาเทหิปิ อกฺกมิตุํ วฏฺฏติเยว. สอุปาหเนน โธตปาเทหิ อกฺกมิตพฺพฏฺฐาเนเยว น วฏฺฏติ. ‘चक्कलिकं’ म्हणजे घोंगडी इत्यादी गुंडाळून बनवलेले गोलाकार आसन. ‘ओल्या पायांनी’ म्हणजे ज्या पायांनी पाऊल ठेवलेल्या जागी पाणी स्पष्ट दिसते, अशा प्रकारच्या पायांनी शेणाने सारवलेली जमीन किंवा सेनासनावर पाऊल ठेवू नये. परंतु जर केवळ पाण्याचा ओलावाच दिसत असेल, पाणी नाही, तर पाऊल ठेवणे योग्य आहे. परंतु पायपुसणीवर ओल्या पायांनी देखील पाऊल ठेवणे योग्यच आहे. पादत्राणे घालून, स्वच्छ धुतलेल्या पायांनी पाऊल ठेवण्याच्या जागी देखील पाऊल ठेवणे योग्य नाही. โจฬเกน ปลิเวเฐตุนฺติ สุธาภูมิยํ วา ปริภณฺฑภูมิยํ วา สเจ ตฏฺฏิกา วา กฏสารโก วา นตฺถิ, โจฬเกน ปาทา เวเฐตพฺพา, ตสฺมึ อสติ ปณฺณมฺปิ อตฺถริตุํ วฏฺฏติ. กิญฺจิ อนตฺถริตฺวา ฐเปนฺตสฺส ปน ทุกฺกฏํ. ยทิ ปน ตตฺถ เนวาสิกา อนตฺถตายปิ ภูมิยา ฐเปนฺติ, อโธตปาเทหิปิ วฬญฺเชนฺติ, ตเถว วฬญฺเชตุํ วฏฺฏติ. ‘चोळकेन पलिवेठेतुं’ म्हणजे चुन्याने सारवलेल्या किंवा शेणाने सारवलेल्या जमिनीवर जर चटई किंवा ताटवडी नसेल, तर कापडाने पाय गुंडाळले पाहिजेत; ते नसल्यास पाने देखील पसरणे योग्य आहे. परंतु काहीही न पसरता पाय ठेवणाऱ्याला दुक्कट दोष होतो. परंतु जर तिथे राहणारे स्थानिक भिक्खू काहीही न पसरता जमिनीवर पाय ठेवतात आणि न धुतलेल्या पायांनी देखील वापरतात, तर तसेच वापरणे योग्य आहे. น ภิกฺขเว ปริกมฺมกตา ภิตฺตีติ เสตภิตฺติ วา จิตฺตกมฺมกตา วา. น เกวลญฺจ ภิตฺติเมว, ทฺวารมฺปิ วาตปานมฺปิ อปสฺเสนผลกมฺปิ ปาสาณตฺถมฺภมฺปิ รุกฺขตฺถมฺภมฺปิ จีวเรน วา เกนจิ วา อปฺปฏิจฺฉาเทตฺวา อปสฺสยิตุํ น ลพฺภติเยว. ‘न भिक्खवे परिकम्मकता भित्ति’ म्हणजे पांढरी भिंत असो किंवा चित्रकाम केलेली भिंत असो. आणि केवळ भिंतीलाच नव्हे, तर दरवाजा, खिडकी, टेकण्याचा पाट, दगडाचा खांब किंवा लाकडाचा खांब याला देखील चीवराने किंवा इतर कशानेही न झाकता टेकणे योग्य नाही. โธตปาทกาติ โธตปาทกา หุตฺวา โธเตหิ ปาเทหิ อกฺกมิตพฺพฏฺฐาเน นิปชฺชิตุํ กุกฺกุจฺจายนฺติ. ‘‘โธตปาทเก’’ติปิ ปาโฐ. โธเตหิ ปาเทหิ อกฺกมิตพฺพฏฺฐานสฺเสตํ อธิวจนํ. ปจฺจตฺถริตฺวาติ ปริภณฺฑกตํ ภูมึ วา ภูมตฺถรณเสนาสนํ วา สงฺฆิกมญฺจปีฐํ วา อตฺตโน สนฺตเกน ปจฺจตฺถรเณน ปจฺจตฺถริตฺวาว นิปชฺชิตพฺพํ. สเจ นิทฺทายโตปิ ปจฺจตฺถรเณ สงฺกุฏิเต โกจิ สรีราวยโว มญฺจํ วา ปีฐํ วา ผุสติ, อาปตฺติเยว. โลเมสุ ปน โลมคณนาย อาปตฺติเยว. ปริโภคสีเสน อปสฺสยนฺตสฺสาปิ เอเสว นโย. หตฺถตลปาทตเลหิ ปน ผุสิตุํ วา อกฺกมิตุํ วา วฏฺฏติ. มญฺจปีฐํ นีหรนฺตสฺส กาเย ปฏิหญฺญติ, อนาปตฺติ. ‘धोतपादका’ म्हणजे स्वच्छ धुतलेले पाय असलेले होऊन, धुतलेल्या पायांनी पाऊल ठेवण्याच्या जागी झोपण्यास संकोच करतात. ‘धोतपादके’ असाही पाठ आहे. हे धुतलेल्या पायांनी पाऊल ठेवण्याच्या जागेचे नाव आहे. ‘पच्चत्थरित्वा’ म्हणजे शेणाने सारवलेली जमीन, जमिनीवर पसरलेले सेनासन किंवा संघिक खाट-पाट यावर स्वतःच्या पांघरूणाने ते झाकूनच झोपले पाहिजे. जर झोपेत असताना देखील पांघरूण सुरकुतले आणि शरीराचा कोणताही भाग खाट किंवा पाटाला स्पर्श झाला, तर आपत्ती होतेच. केसांचा स्पर्श झाल्यास, केसांच्या संख्येनुसार आपत्ती होते. उपभोग घेण्याच्या उद्देशाने टेकणाऱ्या भिक्खूच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. परंतु हाताच्या तळव्यांनी किंवा पायाच्या तळव्यांनी स्पर्श करणे किंवा पाऊल ठेवणे योग्य आहे. खाट किंवा पाट बाहेर काढताना शरीराला स्पर्श झाला, तर आपत्ती होत नाही. อญฺญตฺรปริโภคปฏิกฺเขปาทิกถา นิฏฺฐิตา. इतरत्र उपभोग घेण्यास मनाई इत्यादींची कथा समाप्त झाली. สงฺฆภตฺตาทิอนุชานนกถา संघभक्त (संघाचे भोजन) इत्यादींच्या अनुमतीची कथा. ๓๒๕. น [Pg.88] สกฺโกนฺติ สงฺฆภตฺตํ กาตุนฺติ สกลสฺส สงฺฆสฺส ภตฺตํ กาตุํ น สกฺโกนฺติ. อุทฺเทสภตฺตนฺติอาทีสุ ‘‘เอกํ วา ทฺเว วา…เป… ทส วา ภิกฺขู สงฺฆโต อุทฺทิสิตฺวา เทถา’’ติ เอวํ อุทฺเทเสน ลทฺธภิกฺขูนํ ภตฺตํ กาตุํ อิจฺฉนฺติ. อปเร ตเถว ภิกฺขู ปริจฺฉินฺทิตฺวา นิมนฺเตตฺวา เตสํ ภตฺตํ กาตุํ อิจฺฉนฺติ. อปเร สลากาโย ฉินฺทิตฺวา, อปเร ปกฺขิกํ อุโปสถิกํ ปาฏิปทิกนฺติ เอวํ นิยาเมตฺวา, เอกสฺส วา ทฺวินฺนํ วา…เป… ทสนฺนํ วา ภิกฺขูนํ ภตฺตํ กาตุํ อิจฺฉนฺติ. อิติ เอตานิ ภตฺตานิ อุทฺเทสภตฺตํ นิมนฺตนนฺติ อิมํ โวหารํ ปตฺตานิ. ยสฺมา ปน เต สเจปิ ทุพฺภิกฺเข น สกฺโกนฺติ, สุภิกฺเข ชาเต ปน ปุน สงฺฆภตฺตํ กาตุํ สกฺขิสฺสนฺติ, ตสฺมา ภควา ตมฺปิ อนฺโต กตฺวา ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, สงฺฆภตฺตํ อุทฺเทสภตฺต’’นฺติอาทิมาห. ३२५. "संघभक्त करण्यास असमर्थ आहेत" याचा अर्थ संपूर्ण संघासाठी भोजन तयार करण्यास ते असमर्थ आहेत. 'उद्देशभक्त' इत्यादी शब्दांमध्ये असा अर्थ समजून घ्यावा— "संघातून एका, दोन... किंवा दहा भिक्खूंना उद्देशून (निवडून) द्या" अशा निर्देशाने मिळालेल्या भिक्खूंसाठी काही दाते भोजन देण्याची इच्छा करतात. इतर दाते त्याचप्रमाणे भिक्खूंची संख्या निश्चित करून, त्यांना निमंत्रित करून त्यांच्यासाठी भोजन देण्याची इच्छा करतात. इतर दाते शलाका (चिट्ठ्या) वाटून भोजन देण्याची इच्छा करतात; तर इतर दाते पाक्षिक, उपोसथिक, प्रतिपदिक असे निश्चित करून एका, दोन... किंवा दहा भिक्खूंसाठी भोजन देण्याची इच्छा करतात. अशा प्रकारे या भोजनांना 'उद्देशभक्त', 'निमंत्रणभक्त' इत्यादी संज्ञा प्राप्त झाल्या आहेत. परंतु, दुष्काळाच्या वेळी जरी ते संघभक्त करण्यास असमर्थ असले, तरी सुकाळ झाल्यावर पुन्हा संघभक्त करण्यास समर्थ होतील; म्हणून भगवंतांनी त्यालाही समाविष्ट करून "भिक्खूंनो, मी संघभक्त, उद्देशभक्त इत्यादींना अनुमती देतो" असे म्हटले. ตตฺถ สงฺฆภตฺเต ฐิติกา นาม นตฺถิ, ตสฺมา ‘‘อมฺหากํ อชฺช ทส ทฺวาทส ทิวสา ภุญฺชนฺตานํ อิทานิ อญฺญโต ภิกฺขู อาเนถา’’ติ น เอวํ ตตฺถ วตฺตพฺพํ. ‘‘ปุริมทิวเสสุ อมฺเหหิ น ลทฺธํ, อิทานิ ตํ อมฺหากํ คาเหถา’’ติ เอวมฺปิ วตฺตุํ น ลพฺภติ. ตญฺหิ อาคตาคตานํ ปาปุณาติเยว. त्या संघभक्तामध्ये 'ठितिका' (भोजन घेण्याची पाळी किंवा क्रम) नावाचा कोणताही नियम नसतो. म्हणून, "आम्हाला आज जेवताना दहा किंवा बारा दिवस झाले आहेत, आता दुसऱ्या विहारातून भिक्खूंना आणा" असे तेथे म्हणता येत नाही. "मागील दिवसांत आम्हाला भोजन मिळाले नाही, आता ते आम्हाला द्यावे" असेही म्हणता येत नाही. कारण ते संघभक्त येणाऱ्या प्रत्येक भिक्खूला मिळतेच. สงฺฆภตฺตาทิอนุชานนกถา นิฏฺฐิตา. संघभक्त इत्यादींच्या अनुमतीची कथा समाप्त झाली. อุทฺเทสภตฺตกถา उद्देशभक्त कथा อุทฺเทสภตฺตาทีสุ ปน อยํ นโย – รญฺญา วา ราชมหามตฺเตน วา สงฺฆโต อุทฺทิสิตฺวา ‘‘เอตฺตเก ภิกฺขู อาเนถา’’ติ ปหิเต กาลํ โฆเสตฺวา ฐิติกา ปุจฺฉิตพฺพา. สเจ อตฺถิ, ตโต ปฏฺฐาย คาเหตพฺพํ; โน เจ, เถราสนโต ปฏฺฐาย คาเหตพฺพํ. อุทฺเทสเกน ปิณฺฑปาติกานมฺปิ น อติกฺกาเมตพฺพํ. เต ปน ธุตงฺคํ รกฺขนฺตา สยเมว อติกฺกมิสฺสนฺติ; เอวํ คาหิยมาเน อลสชาติกา มหาเถรา ปจฺฉา อาคจฺฉนฺติ, ‘‘ภนฺเต, วีสติวสฺสานํ คาหิยติ, ตุมฺหากํ ฐิติกา อติกฺกนฺตา’’ติ น วตฺตพฺพา, ฐิติกํ ฐเปตฺวา เตสํ คาเหตฺวา ปจฺฉา ฐิติกาย คาเหตพฺพํ. ‘‘อสุกวิหาเร พหุํ อุทฺเทสภตฺตํ อุปฺปนฺน’’นฺติ สุตฺวา โยชนนฺตริกวิหารโตปิ ภิกฺขู อาคจฺฉนฺติ, สมฺปตฺตสมฺปตฺตานํ ฐิตฏฺฐานโต ปฏฺฐาย คาเหตพฺพํ. อสมฺปตฺตานมฺปิ อุปจารสีมํ ปวิฏฺฐานํ อนฺเตวาสิกาทีสุ คณฺหนฺเตสุ [Pg.89] คาเหตพฺพเมว. พหิอุปจารสีมาย ฐิตานํ คาเหถาติ วทนฺติ, น คาเหตพฺพํ. สเจ ปน อุปจารสีมํ โอกฺกนฺเตหิ เอกาพทฺธา หุตฺวา อตฺตโน วิหารทฺวาเร วา อนฺโตวิหาเรเยว วา โหนฺติ, ปริสาวเสน วฑฺฒิตา นาม สีมา โหติ, ตสฺมา คาเหตพฺพํ. สงฺฆนวกสฺส ทินฺเนปิ ปจฺฉา อาคตานํ คาเหตพฺพเมว. ทุติยภาเค ปน เถราสนํ อารุฬฺเห ปุน อาคตานํ ปฐมภาโค น ปาปุณาติ, ทุติยภาคโต วสฺสคฺเคน คาเหตพฺพํ. उद्देशभक्त इत्यादींमध्ये हा नियम आहे— राजाने किंवा राजमहामात्याने संघातून उद्देशून "इतक्या भिक्खूंना घेऊन या" असा निरोप पाठवला असता, वेळेची घोषणा करून 'ठितिका' (पाळीचा क्रम) विचारली पाहिजे. जर पाळीचा क्रम असेल, तर तिथून पुढे भोजन ग्रहण करावे; जर नसेल, तर स्थविरांच्या आसनापासून (ज्येष्ठतेनुसार) ग्रहण करावे. भोजन वाटप करणाऱ्याने पिंडपातिक (भिक्षाटन करणाऱ्या) भिक्खूंनाही वगळू नये. परंतु ते धुतंगाचे रक्षण करत असल्यामुळे स्वतःच ते ग्रहण करणार नाहीत. अशा प्रकारे भोजन दिले जात असताना, आळशी स्वभावाचे महास्थवीर उशिरा आले, तर "भंते, वीस वर्षांच्या वर्षावास असलेल्या भिक्खूंना भोजन दिले जात आहे, तुमची पाळी निघून गेली आहे" असे त्यांना म्हणू नये. पाळीचा क्रम थांबवून, आधी त्यांना भोजन देऊन, नंतर पाळीच्या क्रमाने भोजन द्यावे. "अमुक विहारात पुष्कळ उद्देशभक्त मिळाले आहे" असे ऐकून एक योजन अंतरावरील विहारातूनही भिक्खू येतात. अशा वेळी आलेल्या प्रत्येक भिक्खूच्या स्थानापासून (ज्येष्ठतेनुसार) भोजन द्यावे. जे अजून प्रत्यक्ष पोहोचले नाहीत, पण उपचारसीमेत प्रवेश केला आहे, त्यांच्या वतीने त्यांच्या अंतेवासिक (शिष्य) इत्यादींनी भोजन घेतले तरी ते ग्राह्यच धरावे. उपचारसीमेच्या बाहेर असलेल्या भिक्खूंसाठी "भोजन द्या" असे म्हटले तरी ते देऊ नये. परंतु, जर उपचारसीमेत प्रवेश केलेल्या भिक्खूंशी सलग जोडलेले (एकबद्ध) राहून ते स्वतःच्या विहारद्वारावर किंवा विहाराच्या आतच असतील, तर परिषदेच्या प्रभावामुळे ती सीमा वाढली असे मानले जाते, म्हणून त्यांना भोजन द्यावे. नवशिक्या भिक्खूला भोजन दिले गेले असले तरी, नंतर आलेल्या ज्येष्ठ भिक्खूंना भोजन दिलेच पाहिजे. परंतु दुसऱ्या भागात स्थविरांच्या आसनावर आरूढ झाल्यावर पुन्हा आलेल्यांना पहिल्या भागातील भोजन मिळत नाही, तर दुसऱ्या भागातून वर्षावासानुसार भोजन दिले पाहिजे. เอกสฺมึ วิหาเร เอกํ ภตฺตุทฺเทสฏฺฐานํ ปริจฺฉินฺทิตฺวา คาวุตปฺปมาณายปิ อุปจารสีมาย ยตฺถ กตฺถจิ อาโรจิตํ อุทฺเทสภตฺตํ, ตสฺมึเยว ภตฺตุทฺเทสฏฺฐาเน คาเหตพฺพํ. เอโก เอกสฺส ภิกฺขุโน ปหิณาติ ‘‘สฺเวปิ สงฺฆโต อุทฺทิสิตฺวา ทส ภิกฺขู ปหิณถา’’ติ, เตน โส อตฺโถ ภตฺตุทฺเทสกสฺส อาโรเจตพฺโพ. สเจ ตํ ทิวสํ ปมุสฺสติ, ทุติยทิวเส ปาโตว อาโรเจตพฺโพ. อถ ปมุสฺสิตฺวาว ปิณฺฑาย ปวิสนฺโต สรติ, ยาว อุปจารสีมํ นาติกฺกมติ, ตาว ยา โภชนสาลาย ปกติฏฺฐิติกา, ตสฺสาเยว วเสน คาเหตพฺพํ. สเจปิ อุปจารสีมํ อติกฺกนฺตา ภิกฺขู จ อุปจารสีมฏฺฐเกหิ เอกาพทฺธา โหนฺติ, อญฺญมญฺญํ ทฺวาทสหตฺถนฺตรํ อวิชหิตฺวา คจฺฉนฺติ, ปกติฏฺฐิติกาย วเสน คาเหตพฺพํ. ภิกฺขูนํ ปน ตาทิเส เอกาพทฺเธ อสติ พหิอุปจารสีมาย ยสฺมึ ฐาเน สรติ, ตตฺถ นวํ ฐิติกํ กตฺวา คาเหตพฺพํ. อนฺโตคาเม อาสนสาลาย สรนฺเตน อาสนสาลาย ฐิติกาย คาเหตพฺพํ. ยตฺถ กตฺถจิ สริตฺวา คาเหตพฺพเมว, อคาเหตุํ น วฏฺฏติ. น หิ เอตํ ทุติยทิวเส ลพฺภตีติ. एका विहारात एकच भोजन वाटपाचे स्थान निश्चित करून, एक गावुत प्रमाणाच्या उपचारसीमेत कोठेही उद्देशभक्ताविषयी सांगितले गेले असले, तरी ते त्याच भोजन वाटपाच्या स्थानावर ग्रहण करावे. एखादा दाता एका भिक्खूकडे निरोप पाठवतो की, "उद्याही संघातून उद्देशून दहा भिक्खूंना पाठवा", तर त्या भिक्खूने तो निरोप भोजन वाटप करणाऱ्या भिक्खूला कळवला पाहिजे. जर त्या दिवशी तो विसरला, तर दुसऱ्या दिवशी सकाळीच कळवला पाहिजे. आणि जर विसरून भिक्षेसाठी जात असताना त्याला आठवले, तर जोपर्यंत तो उपचारसीमा ओलांडत नाही, तोपर्यंत भोजनशाळेतील जी मूळ पाळी आहे, त्यानुसारच भोजन ग्रहण करावे. जरी उपचारसीमा ओलांडलेले भिक्खू आणि उपचारसीमेत असलेले भिक्खू एकमेकांशी सलग जोडलेले असतील आणि एकमेकांपासून बारा हातांचे अंतर न सोडता जात असतील, तरी मूळ पाळीच्या क्रमानुसारच भोजन ग्रहण करावे. परंतु भिक्खूंमध्ये असे एकबद्धत्व नसताना, उपचारसीमेच्या बाहेर ज्या ठिकाणी आठवण येईल, तेथे नवीन पाळीचा क्रम निश्चित करून भोजन ग्रहण करावे. गावाच्या आत आसनशाळेत आठवण आल्यास, आसनशाळेतील पाळीच्या क्रमानुसार भोजन ग्रहण करावे. कोठेही आठवण आल्यास ते ग्रहण केलेच पाहिजे, ग्रहण न करणे योग्य नाही; कारण हे भोजन दुसऱ्या दिवशी मिळत नाही. สเจ สกวิหารโต อญฺญํ วิหารํ คจฺฉนฺเต ภิกฺขู ทิสฺวา โกจิ อุทฺเทสภตฺตํ อุทฺทิสาเปติ, ยาว อนฺโตอุปจาเร วา อุปจารสีมฏฺฐเกหิ สทฺธึ วุตฺตนเยน เอกาพทฺธา วา โหนฺติ, ตาว สกวิหาเร ฐิติกาวเสเนว คาเหตพฺพํ. พหิอุปจาเร ฐิตานํ ทินฺนํ ปน ‘‘สงฺฆโต ภนฺเต เอตฺตเก นาม ภิกฺขู อุทฺทิสถา’’ติ วุตฺเต สมฺปตฺตานํ คาเหตพฺพํ. ตตฺถ ทฺวาทสหตฺถนฺตรํ อวิชหิตฺวา เอกาพทฺธนเยน ทูเร ฐิตาปิ สมฺปตฺตาเยวาติ เวทิตพฺพํ. สเจ ยํ วิหารํ คจฺฉนฺติ, ตตฺถ ปวิฏฺฐานํ อาโรเจนฺติ, ตสฺส วิหารสฺส ฐิติกาวเสน คาเหตพฺพํ. สเจปิ คามทฺวาเร วา วีถิยํ วา จตุกฺเก [Pg.90] วา อนฺตรฆเร วา ภิกฺขู ทิสฺวา โกจิ สงฺฆุทฺเทสํ อาโรเจติ, ตสฺมึ ตสฺมึ ฐาเน อนฺโตอุปจารคตานํ คาเหตพฺพํ. जर आपल्या विहारातून दुसऱ्या विहारात जाणाऱ्या भिक्खूंना पाहून कोणी उद्देशभक्त देण्याची इच्छा व्यक्त करतो, तर जोपर्यंत ते उपचारसीमेच्या आत आहेत किंवा उपचारसीमेत असलेल्या भिक्खूंशी सांगितलेल्या पद्धतीने सलग जोडलेले आहेत, तोपर्यंत स्वतःच्या विहारातील पाळीच्या क्रमानुसारच भोजन ग्रहण करावे. परंतु उपचारसीमेच्या बाहेर असलेल्या भिक्खूंना दिलेल्या भोजनाविषयी "भंते, संघातून इतक्या भिक्खूंना उद्देशून पाठवा" असे म्हटले असता, तेथे उपस्थित असलेल्या भिक्खूंनीच ते ग्रहण करावे. तेथे बारा हातांचे अंतर न सोडता सलग जोडलेले असल्यामुळे दूर असलेले भिक्खू देखील उपस्थितच आहेत असे समजावे. जर ते ज्या विहारात जात आहेत, तेथे प्रवेश केल्यावर उद्देशभक्ताविषयी सांगितले गेले, तर त्या विहारातील पाळीच्या क्रमानुसार भोजन ग्रहण करावे. जरी गावाच्या वेशीवर, रस्त्यावर, चव्हाट्यावर किंवा घराच्या आत भिक्खूंना पाहून कोणी संघोद्देश जाहीर केले, तर त्या त्या ठिकाणी उपचारसीमेच्या आत असलेल्या भिक्खूंनी ते ग्रहण करावे. ฆรูปจาโร เจตฺถ ‘‘เอกํ ฆรํ เอกูปจารํ, เอกํ ฆรํ นานูปจารํ, นานาฆรํ เอกูปจารํ, นานาฆรํ นานูปจาร’’นฺติ อิเมสํ วเสน เวทิตพฺโพ. ตตฺถ ยํ เอกกุลสฺส ฆรํ เอกวฬญฺชํ โหติ, ตํ สุปฺปปาตปริจฺเฉทสฺส อนฺโต เอกูปจารํ นาม. ตตฺถุปฺปนฺโน อุทฺเทสลาโภ ตสฺมึ อุปจาเร ภิกฺขาจารวตฺเตนปิ ฐิตานํ สพฺเพสํ ปาปุณาติ, เอตํ ‘‘เอกํ ฆรํ เอกูปจารํ’’ นาม. आणि येथील घराची उपचारसीमा ही "एक घर एक उपचार, एक घर अनेक उपचार, अनेक घरे एक उपचार, अनेक घरे अनेक उपचार" या चार प्रकारांनुसार समजून घ्यावी. त्यापैकी, जे एका कुटुंबाचे घर असून एकाच प्रवेशद्वाराने वापरले जाते, ते सूप फेकण्याच्या मर्यादेच्या आत 'एक उपचार' मानले जाते. तेथे मिळालेला उद्देशभक्ताचा लाभ त्या उपचारसीमेत भिक्षाटनाच्या नियमाने उभे असलेल्या सर्व भिक्खूंना मिळतो. याला "एक घर एक उपचार" असे म्हणतात. ยํ ปน เอกํ ฆรํ ทฺวินฺนํ ภริยานํ สุขวิหารตฺถาย มชฺเฌ ภิตฺตึ อุฏฺฐาเปตฺวา นานาทฺวารวฬญฺชํ กตํ, ตตฺถุปฺปนฺโน อุทฺเทสลาโภ ภิตฺติอนฺตริกสฺส น ปาปุณาติ, ตสฺมึ ตสฺมึ ฐาเน นิสินฺนสฺเสว ปาปุณาติ, เอตํ ‘‘เอกํ ฆรํ นานูปจารํ’’ นาม. परंतु, जे एकच घर दोन पत्नींच्या सुखासाठी मध्ये भिंत घालून वेगवेगळ्या प्रवेशद्वारांनी वापरण्यायोग्य बनवले गेले आहे, तेथे मिळालेला उद्देशभक्ताचा लाभ भिंतीच्या पलीकडे असलेल्या भिक्खूला मिळत नाही, तर तो त्या त्या भागात बसलेल्या भिक्खूलाच मिळतो. याला "एक घर अनेक उपचार" असे म्हणतात. ยสฺมึ ปน ฆเร พหู ภิกฺขู นิมนฺเตตฺวา อนฺโตเคหโต ปฏฺฐาย เอกาพทฺเธ กตฺวา ปฏิวิสฺสกฆรานิปิ ปูเรตฺวา นิสีทาเปนฺติ, ตตฺถุปฺปนฺโน อุทฺเทสลาโภ สพฺเพสํ ปาปุณาติ. ยมฺปิ นานากุลสฺส นิเวสนํ มชฺเฌ ภิตฺตึ อกตฺวา เอกทฺวาเรเนว วฬญฺชนฺติ, ตตฺราปิ เอเสว นโย. เอตํ ‘‘นานาฆรํ เอกูปจารํ’’ นาม. परंतु, ज्या घरात अनेक भिक्खूंना निमंत्रित करून, घराच्या आतून सुरुवात करून (आसन व्यवस्था) एकमेकांशी जोडलेली करून शेजारची घरे देखील भरून त्यांना बसवितात, तेथे उत्पन्न झालेला उद्देश-लाभ सर्वांना प्राप्त होतो. तसेच, वेगवेगळ्या कुळांचे जे घर आहे, ज्याच्या मध्ये भिंत न घालता एकाच दाराने ते वापरतात, तेथेही हाच नियम लागू होतो. याला "नानाघर एकउपचार" (भिन्न घरे, एकच परिसर) असे म्हणतात. โย ปน นานานิเวสเนสุ นิสินฺนานํ ภิกฺขูนํ อุทฺเทสลาโภ อุปฺปชฺชติ, กิญฺจาปิ ภิตฺติจฺฉิทฺเทน ภิกฺขู ทิสฺสนฺติ, ตสฺมึ ตสฺมึ นิเวสเน นิสินฺนานํเยว ปาปุณาติ, เอตํ ‘‘นานาฆรํ นานูปจารํ’’ นาม. परंतु, वेगवेगळ्या घरांमध्ये बसलेल्या भिक्खूंना जो उद्देश-लाभ उत्पन्न होतो, जरी भिंतीच्या छिद्रातून भिक्खू दिसत असले, तरी त्या त्या घरामध्ये बसलेल्या भिक्खूंनाच तो प्राप्त होतो. याला "नानाघर नानोपचार" (भिन्न घरे, भिन्न परिसर) असे म्हणतात. โย ปน คามทฺวารวีถิจตุกฺเกสุ อญฺญตรสฺมึ ฐาเน อุทฺเทสภตฺตํ ลภิตฺวา อญฺญสฺมึ ภิกฺขุสฺมึ อสติ อตฺตโนว ปาปุณาเปตฺวา ทุติยทิวเสปิ ตสฺมึเยว ฐาเน อญฺญํ ลภติ, เตน ยํ อญฺญํ นวกํ วา วุฑฺฒํ วา ภิกฺขุํ ปสฺสติ, ตสฺส คาเหตพฺพํ. สเจ โกจิ นตฺถิ, อตฺตโนว ปาเปตฺวา ภุญฺชิตพฺพํ. परंतु, जो भिक्खू गावाचे द्वार, रस्ता किंवा चौक यांपैकी एखाद्या ठिकाणी उद्देशभक्त (विशिष्ट भिक्खूंसाठी दिलेले भोजन) मिळवून, दुसरा भिक्खू हजर नसल्यामुळे ते स्वतःलाच प्राप्त करून घेतो आणि दुसऱ्या दिवशीही त्याच ठिकाणी दुसरे उद्देशभक्त मिळवतो, त्याने तेथे ज्या दुसऱ्या कनिष्ठ किंवा वरिष्ठ भिक्खूला पाहिले असेल, त्याला ते ग्रहण करू द्यावे. जर कोणीही नसेल, तर स्वतःच ते प्राप्त करून घेऊन भोजन करावे. สเจ อาสนสาลาย นิสีทิตฺวา กาลํ ปฏิมาเนนฺเตสุ ภิกฺขูสุ โกจิ อาคนฺตฺวา ‘‘สงฺฆุทฺเทสปตฺตํ เทถ, อุทฺเทสปตฺตํ เทถ, สงฺฆโต อุทฺทิสิตฺวา ปตฺตํ เทถ, สงฺฆิกํ ปตฺตํ เทถา’’ติ วา วทติ, อุทฺเทสปตฺตํ ฐิติกาย คาเหตฺวา ทาตพฺพํ. ‘‘สงฺฆุทฺเทสภิกฺขุํ เทถ, สงฺฆโต อุทฺทิสิตฺวา ภิกฺขุํ เทถ, สงฺฆิกํ ภิกฺขุํ เทถา’’ติ วุตฺเตปิ เอเสว นโย. जर आसनशाळेत बसून भिक्खू वेळेची प्रतीक्षा करत असताना एखादा गृहस्थ येऊन "संघ-उद्दिष्ट पात्र द्या", "उद्दिष्ट पात्र द्या", "संघाकडून उद्दिष्ट करून पात्र द्या" किंवा "सांघिक पात्र द्या" असे म्हणतो, तर ते उद्दिष्ट पात्र क्रमानुसार (पाळीनुसार) स्वीकारायला लावून द्यावे. "संघ-उद्दिष्ट भिक्खू द्या", "संघाकडून उद्दिष्ट करून भिक्खू द्या" किंवा "सांघिक भिक्खू द्या" असे म्हटले तरीही हाच नियम लागू होतो. อุทฺเทสโก [Pg.91] ปเนตฺถ เปสโล ลชฺชี เมธาวี อิจฺฉิตพฺโพ, เตน ติกฺขตฺตุํ ฐิติกํ ปุจฺฉิตฺวา สเจ โกจิ ฐิติกํ ชานนฺโต นตฺถิ, เถราสนโต คาเหตพฺพํ. สเจ ปน ‘‘อหํ ชานามิ, ทสวสฺเสน ลทฺธ’’นฺติ โกจิ ภณติ, ‘‘อตฺถาวุโส, ทสวสฺสา ภิกฺขู’’ติ ปุจฺฉิตพฺพํ. สเจ ตสฺส สุตฺวา ‘‘ทสวสฺสมฺห ทสวสฺสมฺหา’’ติ พหู อาคจฺฉนฺติ, ‘‘ตุยฺหํ ปาปุณาติ, ตุยฺหํ ปาปุณาตี’’ติ อวตฺวา ‘‘สพฺเพ อปฺปสทฺทา โหถา’’ติ วตฺวา ปฏิปาฏิยา ฐเปตพฺพา. ฐเปตฺวา ‘‘กติ อิจฺฉถา’’ติ อุปาสโก ปุจฺฉิตพฺโพ. ‘‘เอตฺตเก นาม, ภนฺเต, ภิกฺขู’’ติ วุตฺเต ‘‘ตุยฺหํ ปาปุณาติ, ตุยฺหํ ปาปุณาตี’’ติ อวตฺวา สพฺพนวกสฺส วสฺสคฺคญฺจ อุตุ จ ทิวสภาโค จ ฉายา จ ปุจฺฉิตพฺพา. สเจ ฉายายปิ ปุจฺฉิยมานาย อญฺโญ วุฑฺฒตโร อาคจฺฉติ, ตสฺส ทาตพฺพํ. อถ ฉายํ ปุจฺฉิตฺวา ‘‘ตุยฺหํ ปาปุณาตี’’ติ วุตฺเต วุฑฺฒตโร อาคจฺฉติ, น ลภติ. กถาปปญฺเจน หิ นิสินฺนสฺสาปิ นิทฺทายนฺตสฺสาปิ คาหิตํ สุคฺคาหิตํ, อติกฺกนฺตํ สุอติกฺกนฺตํ, ภาชนียภณฺฑญฺหิ นาเมตํ สมฺปตฺตสฺเสว ปาปุณาติ, ตตฺถ สมฺปตฺตภาโว อุปจาเรน ปริจฺฉินฺทิตพฺโพ. อาสนสาลาย จ อนฺโตปริกฺเขโป อุปจาโร, ตสฺมึ ฐิตสฺส ลาโภ ปาปุณาตีติ. आणि येथे उद्देशक (भोजन वाटप करणारा भिक्खू) हा शीलवान, लज्जावान (पापाची लाज बाळगणारा) आणि बुद्धिमान असावा. त्याने तीन वेळा पाळीविषयी विचारून, जर पाळी जाणणारा कोणी नसेल, तर थेरांच्या (ज्येष्ठ भिक्खूंच्या) आसनापासून सुरुवात करून वाटप करावे. परंतु जर कोणी भिक्खू म्हणतो की, "मी जाणतो, दहा वर्षांच्या वर्षावास असलेल्या भिक्खूने हे मिळवले आहे," तर "आयुष्यमानहो! दहा वर्षांचे वर्षावास असलेले भिक्खू आहेत का?" असे विचारावे. त्याचे ऐकून जर अनेक भिक्खू "आम्ही दहा वर्षांचे आहोत, आम्ही दहा वर्षांचे आहोत" असे म्हणत आले, तर "तुम्हाला मिळते, तुम्हाला मिळते" असे न सांगता, "सर्वजण शांत व्हा" असे सांगून त्यांना क्रमाने उभे करावे. उभे करून उपासकाला विचारावे की, "तुम्हाला किती भिक्खू हवे आहेत?" जेव्हा तो म्हणेल, "भंते! मला इतके भिक्खू हवे आहेत," तेव्हा "तुम्हाला मिळते, तुम्हाला मिळते" असे न सांगता, सर्वात कनिष्ठ भिक्खूच्या वर्षावासाची संख्या, ऋतू, दिवसाचा भाग आणि सावली विचारली पाहिजे. सावलीविषयी विचारत असताना जर दुसरा कोणी अधिक ज्येष्ठ भिक्खू आला, तर त्याला ते दिले पाहिजे. परंतु, सावली विचारून "तुम्हाला मिळते" असे म्हटल्यावर जर अधिक ज्येष्ठ भिक्खू आला, तर त्याला ते मिळत नाही. कारण संभाषणाच्या विस्तारामुळे बसलेल्याने किंवा झोपलेल्यानेही जे स्वीकारले आहे, ते योग्य प्रकारे स्वीकारलेले मानले जाते आणि जे उलटून गेले आहे, ते योग्य प्रकारे उलटून गेलेले मानले जाते. कारण हे वाटप करण्याचे द्रव्य उपस्थित असलेल्यालाच प्राप्त होते. तेथे उपस्थित असण्याची स्थिती परिसराच्या मर्यादेने निश्चित केली पाहिजे. आणि आसनशाळेचे आतील कुंपण (परिसर) हाच 'उपचार' (परिसर) आहे, त्यात उपस्थित असलेल्यालाच लाभ प्राप्त होतो. โกจิ อาสนสาลโต อฏฺฐ อุทฺเทสปตฺเต อาหราเปตฺวา สตฺต ปตฺเต ปณีตโภชนานํ เอกํ อุทกสฺส ปูเรตฺวา อาสนสาลายํ ปหิณาติ, คเหตฺวา อาคตา กิญฺจิ อวตฺวา ภิกฺขูนํ หตฺเถสุ ปติฏฺฐาเปตฺวา ปกฺกมนฺติ. เยน ยํ ลทฺธํ, ตสฺเสว ตํ โหติ. เยน ปน อุทกํ ลทฺธํ, ตสฺส อติกฺกนฺตมฺปิ ฐิติกํ ฐเปตฺวา อญฺญํ อุทฺเทสภตฺตํ คาเหตพฺพํ. ตญฺจ ลูขํ วา ลภตุ ปณีตํ วา ติจีวรปริวารํ วา, ตสฺเสเวตํ. อีทิโส หิสฺส ปุญฺญวิเสโส. อุทกํ ปน ยสฺมา อามิสํ น โหติ, ตสฺมา อญฺญํ อุทฺเทสภตฺตํ ลพฺภติ. एखादा दायक आसनशाळेतून आठ उद्दिष्ट पात्रे मागवून घेऊन, त्यांतील सात पात्रे उत्कृष्ट भोजनाने आणि एक पात्र पाण्याने भरून आसनशाळेत पाठवतो. ते घेऊन आलेले लोक काहीही न बोलता भिक्खूंच्या हातांमध्ये ती पात्रे ठेवून निघून जातात. ज्या भिक्खूने जे पात्र मिळवले, ते भोजन त्याचेच होते. परंतु ज्याने पाण्याचे पात्र मिळवले, त्याच्यासाठी उलटून गेलेली पाळी देखील राखून ठेवून दुसरे उद्देशभक्त स्वीकारू द्यावे. आणि ते साधे असो, उत्कृष्ट असो किंवा त्रिचीवराच्या दानासह असो, ते त्याचेच होते. कारण अशा प्रकारचा त्याचा पुण्यविशेष असतो. परंतु पाणी हे भोजन (आमिष) नसल्यामुळे, त्याला दुसरे उद्देशभक्त मिळते. สเจ ปน เต คเหตฺวา อาคตา ‘‘อิทํ กิร ภนฺเต สพฺพํ ภาเชตฺวา ภุญฺชถา’’ติ วตฺวา คจฺฉนฺติ, สพฺเพหิ ภาเชตฺวา ภุญฺชิตฺวา อุทกํ ปาตพฺพํ. สงฺฆโต อุทฺทิสิตฺวา ‘‘อฏฺฐ มหาเถเร เทถ, มชฺฌิเม เทถ, นวเก เทถ, ปริปุณฺณวสฺสสามเณเร เทถ, มชฺฌิมภาณกาทโย เทถ, มยฺหํ ญาติภิกฺขู เทถา’’ติ วทนฺตสฺส ปน ‘‘อุปาสก, ตฺวํ เอวํ วทสิ, ฐิติกาย ปน เตสํ น ปาปุณาตี’’ติ วตฺวา ฐิติกาวเสเนว ทาตพฺพา. ทหรสามเณเรหิ [Pg.92] ปน อุทฺเทสภตฺเตสุ ลทฺเธสุ สเจ ทายกานํ ฆเร มงฺคลํ โหติ, ‘‘ตุมฺหากํ อาจริยุปชฺฌาเย เปเสถา’’ติ วตฺตพฺพํ. परंतु जर ते पात्रे घेऊन आलेले लोक "भंते! हे सर्व वाटून घेऊन भोजन करा" असे म्हणून निघून गेले, तर सर्वांनी ते वाटून भोजन करावे आणि पाणी प्यावे. परंतु जर एखादा उपासक संघाकडून उद्दिष्ट करून "आठ महाथेरांना द्या", "मध्यम भिक्खूंना द्या", "नवदीक्षित भिक्खूंना द्या", "पूर्ण वय झालेल्या सामणेरांना द्या", "मज्झिमभाणक इत्यादींना द्या" किंवा "माझ्या नातेवाईक भिक्खूंना द्या" असे म्हणत असेल, तर त्याला "उपासका! तू असे म्हणतोस, परंतु पाळीनुसार त्यांना ते प्राप्त होत नाही" असे सांगून पाळीच्या क्रमानेच भिक्खूंना ते दिले पाहिजे. परंतु लहान सामणेरांना उद्देशभक्त मिळाले असता, जर दायकांच्या घरी काही मंगल कार्य असेल, तर "तुमच्या आचार्य आणि उपाध्यायांना पाठवा" असे त्यांना सांगावे. ยสฺมึ ปน อุทฺเทสภตฺเต ปฐมภาโค สามเณรานํ ปาปุณาติ, อนุภาโค มหาเถรานํ, น ตตฺถ สามเณรา ‘‘มยํ ปฐมภาคํ ลภิมฺหา’’ติ ปุรโต คนฺตุํ ลภนฺติ, ยถาปฏิปาฏิยา เอว คนฺตพฺพํ. ‘‘สงฺฆโต อุทฺทิสิตฺวา ‘ตุมฺเห เอถา’ติ วุตฺเต ‘มยฺหํ อญฺญทาปิ ชานิสฺสสิ, ฐิติกา ปน เอวํ คจฺฉตี’’’ติ ฐิติกาวเสเนว คาเหตพฺพํ. อถ ‘‘สงฺฆุทฺเทสปตฺตํ เทถา’’ติ วตฺวา อคาหิเตเยว ปตฺเต ยสฺส กสฺสจิ ปตฺตํ คเหตฺวา ปูเรตฺวา อาหรติ, อาหฏมฺปิ ฐิติกาย เอว คาเหตพฺพํ. परंतु ज्या उद्देशभक्तामध्ये पहिला भाग सामणेरांना प्राप्त होतो आणि नंतरचा भाग महाथेरांना प्राप्त होतो, तेथे सामणेरांनी "आम्ही पहिला भाग मिळवला आहे" असे म्हणून महाथेरांच्या पुढे जाणे योग्य नाही, त्यांनी क्रमानुसारच गेले पाहिजे. "संघाकडून उद्दिष्ट करून 'तुम्ही चला'" असे म्हटल्यावर, "माझ्यासाठी इतर वेळीही तू समजशील, परंतु पाळी अशी चालते" असे सांगून पाळीच्या क्रमानेच ते स्वीकारले पाहिजे. किंवा "संघ-उद्दिष्ट पात्र द्या" असे म्हणून पात्र अजून स्वीकारले नसतानाच, ज्या कोणाचेही पात्र घेऊन, ते भरून जर आणले, तर आणलेले पात्र देखील पाळीच्या क्रमानेच स्वीकारले पाहिजे. เอโก ‘‘สงฺฆุทฺเทสปตฺตํ อาหรา’’ติ เปสิโต ‘‘ภนฺเต, เอกํ ปตฺตํ เทถ, นิมนฺตนภตฺตํ อาหริสฺสามี’’ติ วทติ, โส เจ อุทฺเทสภตฺตฆรโต อยํ อาคโตติ ญตฺวา ภิกฺขูหิ ‘‘นนุ ตฺวํ อสุกฆรโต อาคโต’’ติ วุตฺโต ‘‘อาม, ภนฺเต, น นิมนฺตนภตฺตํ, อุทฺเทสภตฺต’’นฺติ ภณติ, ฐิติกาย คเหตพฺพํ. โย ปน ‘‘เอกํ ปตฺตํ อาหรา’’ติ วุตฺโต ‘‘‘กิ’นฺติ วตฺวา อาหรามี’’ติ วตฺวา ‘‘ยถา เต รุจฺจตี’’ติ วุตฺโต อาคจฺฉติ, อยํ วิสฺสฏฺฐทูโต นาม. อุทฺเทสปตฺตํ วา ปฏิปาฏิปตฺตํ วา ปุคฺคลิกปตฺตํ วา ยํ อิจฺฉติ, ตํ ตสฺส ทาตพฺพํ. เอโก พาโล อพฺยตฺโต ‘‘อุทฺเทสปตฺตํ อาหรา’’ติ เปสิโต วตฺตุํ น ชานาติ, ตุณฺหีภูโต ติฏฺฐติ, โส ‘‘กสฺส สนฺติกํ อาคโตสี’’ติ วา ‘‘กสฺส ปตฺตํ หริสฺสสี’’ติ วา น วตฺตพฺโพ. เอวญฺหิ วุตฺโต ปุจฺฉาสภาเคน ‘‘ตุมฺหากํ สนฺติกํ อาคโตมฺหี’’ติ ‘‘ตุมฺหากํ ปตฺตํ หริสฺสามี’’ติ วา วเทยฺย, ตโต ตํ ภิกฺขุํ อญฺเญ ภิกฺขู ชิคุจฺฉนฺตา น โอโลเกยฺยุํ. ‘‘กุหึ คจฺฉสิ, กึ กโรนฺโต อาหิณฺฑสี’’ติ ปน วตฺตพฺโพ. ตสฺส ‘‘อุทฺเทสปตฺตตฺถาย อาคโตมฺหี’’ติ วทนฺตสฺส คาเหตฺวา ปตฺโต ทาตพฺโพ. एक दायक 'संघाने निर्दिष्ट केलेले पात्र घेऊन ये' असे पाठवला असता, 'भन्ते, मला एक पात्र द्या, मी निमंत्रणाचे भोजन घेऊन येतो' असे म्हणतो. तो उद्देशभक्ताच्या (निर्दिष्ट भोजनाच्या) घरातून आला आहे हे जाणून जर भिक्खूंनी त्याला विचारले, 'तू अमुक घरातून आला आहेस ना?' आणि त्याने उत्तर दिले, 'होय भन्ते, हे निमंत्रणाचे भोजन नाही, तर उद्देशभक्त आहे,' तर ते पाळीनुसार (ठितिकानुसार) ग्रहण करावे. परंतु, ज्याला 'एक पात्र घेऊन ये' असे म्हटले असता, 'मी काय म्हणून घेऊन येऊ?' असे विचारून आणि 'तुला जसे योग्य वाटेल तसे घेऊन ये' असे सांगितल्यावर जो येतो, त्याला 'विस्सट्ठदूत' (मुक्त दूत) म्हणतात. त्याला उद्देशपात्र, पाळीचे पात्र किंवा वैयक्तिक पात्र यांपैकी जे हवे असेल ते द्यावे. एखादा अज्ञानी व अकुशल दायक 'उद्देशपात्र घेऊन ये' असे पाठवला असता काय बोलावे हे न समजल्याने शांत उभा राहतो, त्याला 'तू कोणाकडे आला आहेस?' किंवा 'तू कोणाचे पात्र घेऊन जाणार आहेस?' असे विचारू नये. कारण असे विचारल्यास, तो प्रश्नाला अनुसरून 'मी आपल्याकडे आलो आहे' किंवा 'मी आपले पात्र घेऊन जाईन' असे म्हणू शकतो. त्यामुळे इतर भिक्खू त्या भिक्खूचा संकोच वाटून त्याच्याकडे पाहणार नाहीत. उलट त्याला, 'तू कुठे जात आहेस? काय करत फिरत आहेस?' असे विचारावे. त्याने 'मी उद्देशपात्रासाठी आलो आहे' असे म्हटल्यावर, त्याला पात्र ग्रहण करायला देऊन ते द्यावे. เอกา กูฏฏฺฐิติกา นาม โหติ. รญฺโญ วา หิ ราชมหามตฺตสฺส วา เคเห อติปณีตานิ อฏฺฐ อุทฺเทสภตฺตานิ นิจฺจํ ทิยฺยนฺติ, ตานิ เอกจาริกภตฺตานิ กตฺวา ภิกฺขู วิสุํ ฐิติกาย ปริภุญฺชนฺติ. เอกจฺเจ ภิกฺขู ‘‘สฺเว ทานิ อมฺหากํ ปาปุณิสฺสนฺตี’’ติ อตฺตโน ฐิติกํ สลฺลกฺเขตฺวา คตา, เตสุ อนาคเตสุเยว อญฺเญ อาคนฺตุกา ภิกฺขู อาคนฺตฺวา อาสนสาลาย [Pg.93] นิสีทนฺติ; ตงฺขณญฺเญว ราชปุริสา อาคนฺตฺวา ‘‘ปณีตภตฺตปตฺเต เทถา’’ติ วทนฺติ. อาคนฺตุกา ฐิติกํ อชานนฺตา คาเหนฺติ. ตงฺขณญฺเญว จ ฐิติกํ ชานนกภิกฺขู อาคนฺตฺวา ‘‘กึ คาเหถา’’ติ วทนฺติ. ‘‘ราชเคเห ปณีตภตฺต’’นฺติ. ‘‘กติวสฺสโต ปฏฺฐายา’’ติ? ‘‘เอตฺตกวสฺสโต นามา’’ติ. ‘‘มา คาเหถา’’ติ นิวาเรตฺวา ฐิติกาย คาเหตพฺพํ. คาหิเต อาคเตหิปิ ปตฺตทานกาเล อาคเตหิปิ ทินฺนกาเล อาคเตหิปิ ราชเคหโต ปตฺเต ปูเรตฺวา อาหฏกาเล อาคเตหิปิ ราชา ‘‘อชฺช ภิกฺขูเยว อาคจฺฉนฺตู’’ติ เปเสตฺวา ภิกฺขูนํเยว หตฺเถ ปิณฺฑปาตํ เทติ; เอวํ ทินฺนปิณฺฑปาตํ คเหตฺวา อาคตกาเล อาคเตหิปิ ฐิติกํ ชานนกภิกฺขูหิ ‘‘มา ภุญฺชิตฺถา’’ติ วาเรตฺวา ฐิติกายเมว คาเหตพฺพํ. 'कूटठितिका' (कपटपूर्ण पाळी) नावाची एक पद्धत असते. राजाच्या किंवा राजमहामात्राच्या घरी अत्यंत उत्तम दर्जाचे आठ उद्देशभक्त नेहमी दिले जातात. भिक्खू त्या भोजनाला एकाच पाळीचे भोजन बनवून स्वतंत्रपणे पाळीनुसार (ठितिकानुसार) ग्रहण करतात. काही भिक्खू 'उद्या आता आमची पाळी येईल' असे स्वतःच्या पाळीची नोंद ठेवून निघून गेले. ते अद्याप आले नसतानाच, इतर आगंतुक भिक्खू येऊन आसनशाळेत बसतात. त्याच क्षणी राजपुरुष येऊन 'उत्तम भोजनासाठी पात्रे द्या' असे म्हणतात. आगंतुक भिक्खू पाळीचा नियम न जाणता पात्रे देतात. त्याच क्षणी पाळीचा नियम जाणणारे भिक्खू येऊन विचारतात, 'तुम्ही काय स्वीकारत आहात?' 'राजवाड्यातील उत्तम भोजन.' 'किती वर्षांच्या ज्येष्ठतेपासून स्वीकारत आहात?' 'अमुक इतक्या वर्षांच्या ज्येष्ठतेपासून.' 'स्वीकारू नका' असे त्यांना रोखून, पाळीनुसारच ते ग्रहण करावे. पात्रे स्वीकारली गेली असताना, पात्रे देण्याच्या वेळी, पात्रे दिली गेल्यानंतर, किंवा राजवाड्यातून पात्रे भरून आणली गेल्यावर जरी मूळ पाळीचे भिक्खू आले, अथवा राजाने 'आज भिक्खूंनीच यावे' असा निरोप पाठवून भिक्खूंच्याच हातात पिंडपात दिला असता, अशा प्रकारे दिलेला पिंडपात घेऊन परत येण्याच्या वेळी जरी ते आले, तरी पाळीचा नियम जाणणाऱ्या भिक्खूंनी 'जेवू नका' असे त्यांना रोखून, पाळीनुसारच ते ग्रहण करावे. อถ เน ราชา โภเชตฺวา ปตฺเตปิ เนสํ ปูเรตฺวา เทติ, ยํ อาหฏํ ตํ ฐิติกาย คาเหตพฺพํ. สเจ ปน ‘‘มา ตุจฺฉหตฺถา คจฺฉนฺตู’’ติ โถกเมว ปตฺเตสุ ปกฺขิตฺตํ โหติ, ตํ น คาเหตพฺพํ. อถ ภุญฺชิตฺวา ตุจฺฉปตฺตาว อาคจฺฉนฺติ, ยํ เตหิ ภุตฺตํ, ตํ เนสํ คีวา โหตีติ มหาสุมตฺเถโร อาห. มหาปทุมตฺเถโร ปนาห – ‘‘คีวากิจฺจํ เอตฺถ นตฺถิ, ฐิติกํ ปน อชานนฺเตหิ ยาว ชานนกา อาคจฺฉนฺติ, ตาว นิสีทิตพฺพํ สิยา; เอวํ สนฺเตปิ ภุตฺตํ สุภุตฺตํ, อิทานิ ปตฺตฏฺฐาเนน คาเหตพฺพ’’นฺติ. जर राजाने त्यांना स्वतः जेवू घालून त्यांची पात्रेही भरून दिली, तर जे भोजन आणले गेले आहे, ते पाळीनुसारच ग्रहण करावे. पण जर 'ते रिकाम्या हाताने जाऊ नयेत' असा विचार करून पात्रांमध्ये थोडेच भोजन टाकले असेल, तर ते पाळीनुसार ग्रहण करू नये. जर ते भोजन करून रिकाम्या पात्रांसह परत आले, तर त्यांनी जे भोजन केले, ते त्यांचे कर्ज (ऋण) होते, असे महासुम थेर म्हणतात. परंतु महापदुम थेर म्हणतात— 'येथे कर्जाचा संबंध नाही. परंतु पाळीचा नियम न जाणणाऱ्यांनी जोपर्यंत नियम जाणणारे भिक्खू येत नाहीत, तोपर्यंत वाट पाहत बसणे योग्य होते. असे असले तरी, जे भोजन केले गेले ते योग्य प्रकारेच केले गेले. आता ते पात्र मिळालेल्या स्थानानुसार (पाळीनुसार) ग्रहण करावे.' เอโก ติจีวรปริวาโร สตคฺฆนโก ปิณฺฑปาโต อวสฺสิกสฺส ภิกฺขุโน ปตฺโต, วิหาเร จ ‘‘เอวรูโป ปิณฺฑปาโต อวสฺสิกสฺส ปตฺโต’’ติ ลิขิตฺวา ฐเปสุํ. อถ สฏฺฐิวสฺสจฺจเยน อญฺโญ ตถารูโป ปิณฺฑปาโต อุปฺปนฺโน, อยํ กึ อวสฺสิกฏฺฐิติกาย คาเหตพฺโพ, อุทาหุ สฏฺฐิวสฺสิกฏฺฐิติกายาติ. สฏฺฐิวสฺสิกฏฺฐิติกายาติ วุตฺตํ, อยญฺหิ ภิกฺขุ ฐิติกํ คเหตฺวาเยว วฑฺฒิโตติ. एक त्रिचीवरयुक्त आणि शंभर कार्षापण मूल्याचा पिंडपात एका नवदीक्षित (वसा नसलेल्या) भिक्खूला मिळाला, आणि विहारात 'अशा प्रकारचा पिंडपात नवदीक्षिताला मिळाला' असे लिहून ठेवले गेले. त्यानंतर साठ वर्षांनंतर तशाच प्रकारचा दुसरा पिंडपात उत्पन्न झाला. हा पिंडपात नवदीक्षिताच्या पाळीनुसार ग्रहण करावा की साठ वर्षांच्या ज्येष्ठ भिक्खूच्या पाळीनुसार? 'साठ वर्षांच्या ज्येष्ठ भिक्खूच्या पाळीनुसार ग्रहण करावा' असे म्हटले आहे, कारण हा भिक्खू ती पाळी घेऊनच ज्येष्ठ झाला आहे. เอโก อุทฺเทสภตฺตํ ภุญฺชิตฺวา สามเณโร ชาโต, ปุน ตํ ภตฺตํ สามเณรฏฺฐิติกาย ปตฺตํ คณฺหิตุํ ลภติ. อยํ กิร อนฺตราภฏฺฐโก นาม. โย ปน ปริปุณฺณวสฺโส สามเณโร ‘‘สฺเว อุทฺเทสภตฺตํ ลภิสฺสตี’’ติ อชฺเชว อุปสมฺปชฺชติ, อติกฺกนฺตา ตสฺส ฐิติกา. เอกสฺส ภิกฺขุโน อุทฺเทสภตฺตํ ปตฺตํ, ปตฺโต จสฺส น ตุจฺโฉ โหติ, โส อญฺญสฺส สมีเป นิสินฺนสฺส ปตฺตํ ทาเปติ, ตญฺเจ เถยฺยาย หรนฺติ, คีวา โหติ[Pg.94]. สเจ ปน โส ภิกฺขุ ‘‘มยฺหํ ปตฺตํ ทมฺมี’’ติ สยเมว เทติ, อสฺส คีวา น โหติ. อถาปิ เตน ภตฺเตน อนตฺถิโก หุตฺวา ‘‘อลํ มยฺหํ, ตเวตํ ภตฺตํ ทมฺมิ, ปตฺตํ เปเสตฺวา อาหราเปหี’’ติ อญฺญํ วทติ, ยํ ตโต อาหรียติ สพฺพํ ปตฺตสามิกสฺส โหติ. ปตฺตญฺเจ เถยฺยาย หรนฺติ, สุหโฏ; ภตฺตสฺส ทินฺนตฺตา คีวา น โหติ. एक भिक्खू उद्देशभक्त ग्रहण करून पुन्हा सामणेर झाला, तो पुन्हा ते भोजन सामणेरांच्या पाळीनुसार मिळवण्यास पात्र ठरतो. त्याला 'अंतराभट्ठक' (मध्येच घसरलेला) म्हणतात. परंतु, जो वीस वर्षे पूर्ण झालेला सामणेर 'उद्या मला उद्देशभक्त मिळेल' अशा वेळी आजच उपसंपदा ग्रहण करतो, त्याची पाळी निघून जाते. एका भिक्खूला उद्देशभक्त मिळाले, आणि त्याचे पात्र रिकामे नव्हते. तो जवळ बसलेल्या दुसऱ्या भिक्खूचे पात्र पाठवतो. जर ते पात्र चोरीच्या उद्देशाने घेऊन गेले, तर ते कर्ज ठरते. पण जर तो भिक्खू 'मी माझे पात्र देतो' असे स्वतःहून देतो, तर त्याचे कर्ज होत नाही. किंवा जर त्याला त्या भोजनाची गरज नसेल आणि तो दुसऱ्याला म्हणतो, 'मला नको, मी हे भोजन तुला देतो, तू पात्र पाठवून ते मागवून घे,' तर तिथून जे काही आणले जाईल, ते सर्व पात्राच्या मालकाचे होते. जर ते पात्र चोरीच्या उद्देशाने घेऊन गेले, तरी ते योग्य प्रकारे आणले गेले असे मानले जाते; भोजन दिले गेल्यामुळे कर्ज होत नाही. วิหาเร ทส ภิกฺขู โหนฺติ, เตสุ นว ปิณฺฑปาติกา, เอโก สาทิยนโก. ‘‘ทส อุทฺเทสปตฺเต เทถา’’ติ วุตฺเต ปิณฺฑปาติกา คเหตุํ น อิจฺฉนฺติ. อิตโร ภิกฺขุ ‘‘สพฺพานิ มยฺหํ ปาปุณนฺตี’’ติ คณฺหาติ, ฐิติกา น โหติ. เอเกกํ เจ ปาเปตฺวา คณฺหาติ, ฐิติกา ติฏฺฐติ. เอวํ คาเหตฺวา ทสหิปิ ปตฺเตหิ อาหราเปตฺวา ‘‘ภนฺเต, มยฺหํ สงฺคหํ กโรถา’’ติ นว ปตฺเต ปิณฺฑปาติกานํ เทติ, ภิกฺขุทตฺติยํ นาเมตํ, คณฺหิตุํ วฏฺฏติ. एका विहारात दहा भिक्खू असतात, त्यांपैकी नऊ पिंडपातिक असतात आणि एक उद्देशभक्त स्वीकारणारा असतो. 'दहा उद्देशपात्रे द्या' असे म्हटले असता, पिंडपातिक भिक्खू ते घेण्याची इच्छा करत नाहीत. दुसरा भिक्खू 'हे सर्व मलाच मिळतात' असे म्हणून सर्व पात्रे घेतो, तर पाळीचा नियम राहत नाही. जर तो एकेक करून स्वतःसाठी मिळवून घेतो, तर पाळीचा नियम कायम राहतो. अशा प्रकारे ग्रहण करून, दहाही पात्रांद्वारे भोजन मागवून, 'भन्ते, माझ्यावर अनुग्रह करा' असे म्हणून तो नऊ पात्रे पिंडपातिक भिक्खूंना देतो, याला 'भिक्खुदत्तिय' (भिक्खूने दिलेले) म्हणतात, ते ग्रहण करणे योग्य आहे. สเจ โส อุปาสโก ‘‘ภนฺเต, ฆรํ อาคนฺตพฺพ’’นฺติ วทติ, โส จ ภิกฺขุ เต ภิกฺขู ‘‘เอถ, ภนฺเต, มยฺหํ สหายา โหถา’’ติ ตสฺส ฆรํ คจฺฉติ. ยํ ตตฺถ ลภติ, สพฺพํ ตสฺเสว โหติ. อิตเร เตน ทินฺนํ ลภนฺติ. อถ เนสํ ฆเรเยว นิสีทาเปตฺวา ทกฺขิโณทกํ ทตฺวา ยาคุขชฺชกาทีนิ เทนฺติ, ‘‘ภนฺเต, ยํ มนุสฺสา เทนฺติ, ตํ คณฺหถา’’ติ ตสฺส ภิกฺขุโน วจเนเนว อิตเรสํ วฏฺฏติ. ภุตฺตาวีนํ ปตฺเต ปูเรตฺวา คณฺหิตฺวา คมนตฺถาย เทนฺติ, สพฺพํ ตสฺเสว ภิกฺขุโน โหติ, เตน ทินฺนํ อิตเรสํ วฏฺฏติ. जर तो उपासक 'भन्ते, घरी यावे' असे म्हणतो, आणि तो भिक्खू इतर भिक्खूंना 'भन्ते, चला, माझे सोबती व्हा' असे सांगून त्या उपासकाच्या घरी जातो, तर तिथे जे काही मिळते, ते सर्व त्याच भिक्खूचे होते. इतरांना त्याने दिलेले मिळते. किंवा जर त्यांना घरातच बसवून, दानोदक देऊन, यागू व खाद्यपदार्थ इत्यादी देतात, आणि 'भन्ते, लोक जे देतात ते ग्रहण करा' असे म्हणतात, तर त्या भिक्खूच्या सांगण्यावरूनच इतर पिंडपातिक भिक्खूंना ते ग्रहण करणे योग्य ठरते. भोजन झाल्यावर, पात्रे भरून घेऊन जाण्यासाठी देतात, तर ते सर्व त्याच भिक्खूचे होते, आणि त्याने दिलेले इतरांना ग्रहण करणे योग्य ठरते. ยทิ ปน เต วิหาเรเยว เตน ภิกฺขุนา ‘‘ภนฺเต, มยฺหํ ภิกฺขํ คณฺหถ, มนุสฺสานญฺจ วจนํ กาตุํ วฏฺฏตี’’ติ วุตฺตา คจฺฉนฺติ, ยํ ตตฺถ ภุญฺชนฺติ เจว นีหรนฺติ จ, สพฺพํ ตํ ตสฺเสว สนฺตกํ. อถาปิ ‘‘มยฺหํ ภิกฺขํ คณฺหถา’’ติ อวุตฺตา ‘‘มนุสฺสานํ วจนํ กาตุํ วฏฺฏตี’’ติ คจฺฉนฺติ, ตตฺร เจ เอกสฺส มธุเรน สเรน อนุโมทนํ กโรนฺตสฺส สุตฺวา เถรานญฺจ อุปสเม ปสีทิตฺวา พหุํ สมณปริกฺขารํ เทนฺติ, อยํ เถเรสุ ปสาเทน อุปฺปนฺโน ‘‘อกตภาโค’’ นาม, ตสฺมา สพฺเพสํ ปาปุณาติ. परंतु, जर त्या पिंडपातिक भिक्खूंना विहारातच त्या भिक्खूने, “भंते, माझी भिक्षा ग्रहण करा आणि लोकांच्या शब्दाचा मान राखणे योग्य आहे,” असे म्हटल्यावरून ते जातात, तर तिथे ते जे काही भोजन करतात आणि जे काही घेऊन येतात, ते सर्व त्या भिक्खूचेच मालकीचे होते. आणि जर, “माझी भिक्षा ग्रहण करा,” असे न सांगता, “लोकांच्या शब्दाचा मान राखणे योग्य आहे,” असे म्हणून ते जातात, आणि तिथे जर एका भिक्खूचे मधुर स्वरातील अनुमोदन ऐकून किंवा थेरांच्या शांततेवर प्रसन्न होऊन लोक पुष्कळ श्रमण-परिकार दान देतात, तर हा थेरांवरील प्रसन्नतेमुळे उत्पन्न झालेला 'अकृतभाग' (आधी न ठरवलेला वाटा) नावाचा लाभ आहे; म्हणून तो सर्वांना प्राप्त होतो. เอโก สงฺฆโต อุทฺทิสาเปตฺวา ฐิติกาย คาหิตํ ปตฺตํ หริตฺวา ปณีตสฺส ขาทนียโภชนียสฺส ปูเรตฺวา อาหริตฺวา ‘‘อิมํ, ภนฺเต, สพฺโพ สงฺโฆ ปริภุญฺชตู’’ติ เทติ, สพฺเพหิ ภาเชตฺวา ปริภุญฺชิตพฺพํ. ปตฺตสามิกสฺส ปน อติกฺกนฺตมฺปิ ฐิติกํ ฐเปตฺวา อญฺญํ อุทฺเทสภตฺตํ ทาตพฺพํ. อถ [Pg.95] ‘‘ปฐมํเยว สพฺพํ สงฺฆิกํ ปตฺตํ เทถา’’ติ วทติ, เอกสฺส ลชฺชิภิกฺขุโน สนฺตโก ปตฺโต ทาตพฺโพ. อาหริตฺวา จ ‘‘สพฺโพ สงฺโฆ ปริภุญฺชตู’’ติ วุตฺเต ภาเชตฺวา ปริภุญฺชิตพฺพํ. जर एखादा उपासक संघाकडून निर्देशित करवून, पाळीनुसार घेतलेले पात्र घेऊन, ते उत्तम खाद्य-भोज्य पदार्थांनी भरून आणतो आणि “भंते, या सर्व अन्नाचा संपूर्ण संघाने उपभोग घ्यावा,” असे म्हणून दान देतो, तर सर्वांनी ते वाटून ग्रहण करावे. परंतु, पात्राच्या मालक असलेल्या भिक्खूची पाळी निघून गेली असली तरी ती राखून ठेवून, त्याला दुसरे उद्दिष्टभक्त (त्याच्या वाट्याचे भोजन) दिले पाहिजे. किंवा जर तो उपासक आधीच, “सर्वप्रथम सांघिक पात्र द्या,” असे म्हणतो, तर एका लज्जी (शीलवान) भिक्खूचे पात्र दिले पाहिजे. आणि ते भोजन आणून, “सर्व संघाने उपभोग घ्यावा,” असे म्हटल्यावर, ते वाटून ग्रहण करावे. เอโก ปาติยา ภตฺตํ อาหริตฺวา ‘‘สงฺฆุทฺเทสํ ทมฺมี’’ติ วทติ, เอเกกํ อาโลปํ อทตฺวา ฐิติกาย เอกสฺส ยาปนมตฺตํ กตฺวา ทาตพฺพํ. อถ โส ภตฺตํ อาหริตฺวา กิญฺจิ วตฺตุํ อชานนฺโต ตุณฺหีภูโต อจฺฉติ, ‘‘กสฺส เต อานีตํ, กสฺส ทาตุกาโมสี’’ติ น วตฺตพฺพํ. ปุจฺฉาสภาเคน หิ ‘‘ตุมฺหากํ อานีตํ, ตุมฺหากํ ทาตุกาโมมฺหี’’ติ วเทยฺย, ตโต ตํ ภิกฺขุํ อญฺเญ ภิกฺขู ชิคุจฺฉนฺตา คีวํ ปริวตฺเตตฺวา โอโลเกตพฺพมฺปิ น มญฺเญยฺยุํ. สเจ ปน ‘‘กุหึ ยาสิ, กึ กโรนฺโต อาหิณฺฑสี’’ติ วุตฺเต ‘‘อุทฺเทสภตฺตํ คเหตฺวา อาคโตมฺหี’’ติ วทติ, เอเกน ลชฺชิภิกฺขุนา ฐิติกาย คาเหตพฺพํ. สเจ อาภตํ พหุ โหติ, สพฺเพสํ ปโหติ, ฐิติกากิจฺจํ นตฺถิ, เถราสนโต ปฏฺฐาย ปตฺตํ ปูเรตฺวา ทาตพฺพํ. जर एखादा उपासक थाळीत भोजन आणून, “मी संघासाठी उद्दिष्ट भोजन देत आहे,” असे म्हणतो, तर एकेक घास न देता, पाळीनुसार एका भिक्खूच्या उपजीविकेपुरते (पोट भरेल इतके) करून दिले पाहिजे. जर तो भोजन आणून, काय बोलावे हे न समजल्यामुळे शांत उभा राहतो, तर त्याला, “तू हे कोणासाठी आणले आहेस? तुला कोणाला देण्याची इच्छा आहे?” असे विचारू नये. कारण अशा प्रश्नाच्या प्रभावाने तो कदाचित् म्हणेल की, “मी आपल्यासाठीच आणले आहे, मला आपल्यालाच देण्याची इच्छा आहे.” त्यामुळे इतर भिक्खू त्या भिक्खूचा तिरस्कार करतील आणि मान फिरवून त्याच्याकडे पाहणेही योग्य समजणार नाहीत. पण जर, “तू कुठे जात आहेस? काय करत फिरत आहेस?” असे विचारले असता, तो “मी उद्दिष्टभक्त घेण्यासाठी आलो आहे,” असे म्हणतो, तर एका लज्जी भिक्खूने पाळीनुसार ते ग्रहण करावे. जर आणलेले अन्न पुष्कळ असेल आणि सर्वांना पुरणारे असेल, तर पाळीच्या नियमाची आवश्यकता नाही; थेरांच्या आसनापासून सुरुवात करून पात्र भरून दिले पाहिजे. ‘‘สงฺฆุทฺเทสปตฺตํ เทถา’’ติ วุตฺเต ‘‘กึ อาหริสฺสสี’’ติ อวตฺวา ปกติฏฺฐิติกาย เอว คาเหตพฺพํ. โย ปน ปายาโส วา รสปิณฺฑปาโต วา นิจฺจํ ลพฺภติ; เอวรูปานํ ปณีตโภชนานํ อาเวณิกา ฐิติกา กาตพฺพา, ตถา สปริวาราย ยาคุยา มหคฺฆานํ ผลานํ ปณีตานญฺจ ขชฺชกานํ. ปกติภตฺตยาคุผลขชฺชกานํ ปน เอกาว ฐิติกา กาตพฺพา. ‘‘สปฺปึ อาหริสฺสามี’’ติ วุตฺเต สพฺพสปฺปีนํ เอกาว ฐิติกา วฏฺฏติ, ตถา สพฺพเตลานํ. ‘‘มธุํ อาหริสฺสามี’’ติ วุตฺเต ปน มธุโน เอกาว ฐิติกา วฏฺฏติ, ตถา ผาณิตสฺส ลฏฺฐิมธุกาทีนญฺจ เภสชฺชานํ. สเจ ปน คนฺธมาลํ สงฺฆุทฺเทสํ เทนฺติ, ปิณฺฑปาติกสฺส วฏฺฏติ, น วฏฺฏตีติ. อามิสสฺเสว ปฏิกฺขิตฺตตฺตา วฏฺฏติ, สงฺฆํ อุทฺทิสฺส ทินฺนตฺตา ปน น คเหตพฺพนฺติ วทนฺติ. “संघासाठी उद्दिष्ट पात्र द्या,” असे म्हटल्यावर, “तू काय आणणार आहेस?” असे न विचारता नेहमीच्या पाळीनुसारच पात्र दिले पाहिजे. परंतु, जी खीर (पायस) किंवा स्वादिष्ट पिंडपात नेहमी मिळतो; अशा प्रकारच्या उत्तम भोजनासाठी स्वतंत्र पाळी निश्चित केली पाहिजे. तसेच सपरिवारासह पेज (यागु), महागडी फळे आणि उत्तम खाद्यान्नांसाठीही स्वतंत्र पाळी निश्चित केली पाहिजे. परंतु सामान्य भात, पेज, फळे आणि खाद्यान्नांसाठी एकच पाळी ठेवली पाहिजे. “मी तूप आणणार आहे,” असे म्हटल्यावर सर्व प्रकारच्या तुपासाठी एकच पाळी योग्य ठरते, तसेच सर्व प्रकारच्या तेलांसाठीही. परंतु “मी मध आणणार आहे,” असे म्हटल्यावर मधासाठी एकच पाळी योग्य ठरते, तसेच गुळवणी (फाणित), ज्येष्ठमध इत्यादी औषधांसाठीही. पण जर ते संघासाठी सुगंध आणि फुले देतात, तर ते पिंडपातिक भिक्खूला योग्य आहे की अयोग्य? केवळ आमिषाचाच (अन्नाचाच) निषेध असल्यामुळे ते योग्य आहे, परंतु संघाला उद्देशून दिले असल्यामुळे ते ग्रहण करू नये, असे आचार्य म्हणतात. อุทฺเทสภตฺตกถา นิฏฺฐิตา. उद्दिष्टभक्तकथा समाप्त झाली. นิมนฺตนภตฺตกถา निमंत्रणभक्तकथा นิมนฺตนํ ปุคฺคลิกญฺเจ, สยเมว อิสฺสโร. สงฺฆิกํ ปน อุทฺเทสภตฺเต วุตฺตนเยเนว คาเหตพฺพํ. สเจ ปเนตฺถ ทูโต พฺยตฺโต โหติ, ‘‘ภนฺเต[Pg.96], ราชเคเห ภิกฺขุสงฺฆสฺส ภตฺตํ คณฺหถา’’ติ อวตฺวา ‘‘ภิกฺขํ คณฺหถา’’ติ วทติ, ปิณฺฑปาติกานมฺปิ วฏฺฏติ. อถ ทูโต อพฺยตฺโต ‘‘ภตฺตํ คณฺหถา’’ติ วทติ, ภตฺตุทฺเทสโก พฺยตฺโต ‘‘ภตฺต’’นฺติ อวตฺวา ‘‘ภนฺเต, ตุมฺเห ยาถา’’ติ วทติ; เอวมฺปิ ปิณฺฑปาติกานมฺปิ วฏฺฏติ. ตุมฺหากํ ปฏิปาฏิยา ‘‘ภตฺตํ ปาปุณาตี’’ติ วุตฺเต ปน น วฏฺฏติ. สเจ นิมนฺเตตุํ อาคตมนุสฺโส อาสนสาลํ ปวิสิตฺวา ‘‘อฏฺฐ ภิกฺขู เทถา’’ติ วา ‘‘อฏฺฐ ปตฺเต เทถา’’ติ วา วทติ; เอวมฺปิ ปิณฺฑปาติกานํ วฏฺฏติ, ‘‘ตุมฺเห จ ตุมฺเห จ คจฺฉถา’’ติ วตฺตพฺพํ. สเจ ปน ‘‘อฏฺฐ ภิกฺขู เทถ; ภตฺตํ คณฺหถ, อฏฺฐ ปตฺเต เทถ; ภตฺตํ คณฺหถา’’ติ วทติ, ปฏิปาฏิยา คาเหตพฺพํ. คาเหนฺเตน ปน วิจฺฉินฺทิตฺวา ‘‘ภตฺต’’นฺติ อวทนฺเตน ‘‘ตุมฺเห จ ตุมฺเห จ คจฺฉถา’’ติ วุตฺเต ปิณฺฑปาติกานํ วฏฺฏติ. ‘‘ภนฺเต, ตุมฺหากํ ปตฺตํ เทถ, ตุมฺเห เอถา’’ติ วุตฺเต ปน ‘‘สาธุ, อุปาสกา’’ติ คนฺตพฺพํ. สงฺฆโต อุทฺทิสิตฺวา ‘‘ตุมฺเห เอถา’’ติ วุตฺเตปิ ยถาฐิติกาย คาเหตพฺพํ. जर निमंत्रण वैयक्तिक असेल, तर तो स्वतःच त्याचा स्वामी असतो. परंतु जर ते सांघिक असेल, तर उद्दिष्टभक्तामध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच ते ग्रहण केले पाहिजे. आणि जर इथे निमंत्रण देणारा दूत चतुर असेल, आणि “भंते, राजवाड्यात भिक्खू संघासाठी भोजन ग्रहण करा,” असे न म्हणता, “भिक्षा ग्रहण करा,” असे म्हणतो, तर पिंडपातिक भिक्खूंसाठीही ते योग्य आहे. जर दूत अकुशल असेल आणि “भोजन ग्रहण करा” असे म्हणतो, आणि भोजन वाटप करणारा भिक्खू (भत्तुद्देसक) चतुर असून “भोजन” असा शब्द न वापरता, “भंते, आपण जावे,” असे म्हणतो; तरीही पिंडपातिक भिक्खूंसाठी ते योग्य आहे. परंतु “आपल्या पाळीनुसार भोजन प्राप्त होत आहे,” असे म्हटल्यास ते योग्य नाही. जर निमंत्रण देण्यासाठी आलेला माणूस आसनशाळेत प्रवेश करून, “आठ भिक्खू द्या” किंवा “आठ पात्रे द्या” असे म्हणतो; तरीही पिंडपातिक भिक्खूंसाठी ते योग्य आहे, आणि (भत्तुद्देसकाने) “तुम्ही आणि तुम्ही जावे,” असे म्हणावे. परंतु जर तो, “आठ भिक्खू द्या, भोजन ग्रहण करा; आठ पात्रे द्या, भोजन ग्रहण करा,” असे म्हणतो, तर पाळीनुसारच ते ग्रहण केले पाहिजे. परंतु ग्रहण करवून घेणाऱ्याने शब्दाचा छेद करून “भोजन” असे न म्हणता, “तुम्ही आणि तुम्ही जावे,” असे म्हटल्यास पिंडपातिक भिक्खूंसाठी ते योग्य आहे. परंतु “भंते, आपले पात्र द्या, आपण यावे,” असे म्हटल्यावर, “ठीक आहे, उपासका,” असे म्हणून जावे. संघाकडून निर्देशित करून “आपण यावे,” असे म्हटल्यावरही पाळीच्या नियमानुसारच ते ग्रहण केले पाहिजे. นิมนฺตนภตฺตฆรโต ปน ปตฺตตฺถาย อาคตสฺส อุทฺเทสภตฺเต วุตฺตนเยเนว ฐิติกาย ปตฺโต ทาตพฺโพ. เอโก ‘‘สงฺฆโต ปฏิปาฏิยา ปตฺต’’นฺติ อวตฺวา เกวลํ ‘‘เอกํ ปตฺตํ เทถา’’ติ วตฺวา อคาหิเตเยว ปตฺเต ยสฺส กสฺสจิ ปตฺตํ คเหตฺวา ปูเรตฺวา อาหรติ, ตํ ปตฺตสามิกสฺเสว โหติ, อุทฺเทสภตฺเต วิย ฐิติกาย น คาเหตพฺพํ. อิธาปิ โย อาคนฺตฺวา ตุณฺหีภูโต ติฏฺฐติ, โส ‘‘กสฺส สนฺติกํ อาคโตสี’’ติ วา ‘‘กสฺส ปตฺตํ หริสฺสสี’’ติ วา น วตฺตพฺโพ. परंतु निमंत्रण भोजनाच्या घरातून पात्रासाठी आलेल्या माणसाला, उद्दिष्टभक्तामध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच पाळीनुसार पात्र दिले पाहिजे. जर एखादा उपासक, “संघाकडून पाळीनुसार पात्र द्या,” असे न म्हणता केवळ, “एक पात्र द्या,” असे म्हणून, पात्र देण्यापूर्वीच कोणत्याही एका भिक्खूचे पात्र घेऊन ते भरून आणतो, तर ते त्या पात्राच्या मालकाचेच होते; उद्दिष्टभक्ताप्रमाणे पाळीनुसार ते ग्रहण करू नये. इथेही जो येऊन शांत उभा राहतो, त्याला, “तू कोणाकडे आला आहेस?” किंवा “तू कोणाचे पात्र घेऊन जाणार आहेस?” असे विचारू नये. ปุจฺฉาสภาเคน หิ ‘‘ตุมฺหากํ สนฺติกํ อาคโต, ตุมฺหากํ ปตฺตํ หริสฺสามี’’ติ วเทยฺย, ตโต โส ภิกฺขุ ภิกฺขูหิ ชิคุจฺฉนีโย อสฺส. ‘‘กุหึ คจฺฉสิ, กึ กโรนฺโต อาหิณฺฑสี’’ติ ปน วุตฺเต ‘‘ตสฺส ปตฺตตฺถาย อาคโตมฺหี’’ติ วทนฺตสฺส ปฏิปาฏิยา ภตฺตฏฺฐิติกาย คาเหตฺวา ปตฺโต ทาตพฺโพ. ‘‘ภตฺตาหรณกปตฺตํ เทถา’’ติ วุตฺเตปิ ปฏิปาฏิยา ภตฺตฏฺฐิติกาย เอว ทาตพฺโพ. สเจ อาหริตฺวา ‘‘สพฺโพ สงฺโฆ ภุญฺชตู’’ติ วทติ, ภาเชตฺวา ภุญฺชิตพฺพํ. ปตฺตสามิกสฺส อติกฺกนฺตมฺปิ ฐิติกํ ฐเปตฺวา อญฺญํ ปฏิปาฏิภตฺตํ คาเหตพฺพํ. कारण अशा प्रश्नाच्या प्रभावाने तो कदाचित् म्हणेल की, “मी आपल्याकडेच आलो आहे, मी आपलेच पात्र घेऊन जाईन.” त्यामुळे तो भिक्खू इतर भिक्खूंच्या तिरस्कारास पात्र होईल. परंतु, “तू कुठे जात आहेस? काय करत फिरत आहेस?” असे विचारले असता, “मी त्याच्या पात्रासाठी आलो आहे,” असे म्हणणाऱ्याला पाळीनुसार भोजनाच्या क्रमाचे पालन करून पात्र दिले पाहिजे. “भोजन आणण्यासाठी पात्र द्या,” असे म्हटल्यावरही पाळीनुसार भोजनाच्या क्रमानेच पात्र दिले पाहिजे. जर तो भोजन आणून, “सर्व संघाने भोजन करावे,” असे म्हणतो, तर ते वाटून ग्रहण करावे. पात्राच्या मालक असलेल्या भिक्खूची पाळी निघून गेली असली तरी ती राखून ठेवून, त्याला दुसरे पाळीनुसारचे भोजन दिले पाहिजे. เอโก [Pg.97] ปาติยา ภตฺตํ อาหริตฺวา ‘‘สงฺฆสฺส ทมฺมี’’ติ วทติ, อาโลปภตฺตฏฺฐิติกโต ปฏฺฐาย อาโลปสงฺเขเปน ภาเชตพฺพํ. สเจ ปน ตุณฺหีภูโต อจฺฉติ, ‘‘กสฺส เต อาภตํ, กสฺส ทาตุกาโมสี’’ติ น วตฺตพฺโพ. สเจ ปน ‘‘กุหึ คจฺฉสิ, กึ กโรนฺโต อาหิณฺฑสี’’ติ วุตฺเต ‘‘สงฺฆสฺส เม ภตฺตํ อาภตํ, เถรานํ เม ภตฺตํ อาภต’’นฺติ วทติ, คเหตฺวา อาโลปภตฺตฏฺฐิติกาย ภาเชตพฺพํ. สเจ ปน เอวํ อาภตํ พหุํ โหติ, สกลสฺส สงฺฆสฺส พหุ โหติ, อภิหฏภิกฺขา นาม ปิณฺฑปาติกานมฺปิ วฏฺฏติ, ฐิติกาปุจฺฉนกิจฺจํ นตฺถิ, เถราสนโต ปฏฺฐาย ปตฺตํ ปูเรตฺวา ทาตพฺพํ. जर एखादा दाता पात्रात अन्न आणून 'मी हे संघाला देत आहे' असे म्हणतो, तर घास-भाताच्या वाटपाच्या नियमापासून (आलोपभक्त-ठितिका) सुरुवात करून घासाच्या प्रमाणात त्याची विभागणी करावी. परंतु, जर तो मौन राहून उभा राहिला, तर 'तू हे कोणासाठी आणले आहेस? तुला कोणाला देण्याची इच्छा आहे?' असे त्याला विचारू नये. पण जर 'तू कोठे जात आहेस? काय करत फिरत आहेस?' असे विचारल्यावर तो 'मी संघासाठी अन्न आणले आहे, थेरांसाठी (स्थविरांसाठी) मी अन्न आणले आहे' असे म्हणतो, तर ते स्वीकारून घास-भाताच्या वाटपाच्या नियमानुसार त्याची विभागणी करावी. परंतु, जर अशा प्रकारे आणलेले अन्न पुष्कळ असेल आणि संपूर्ण संघासाठी पुरेसे असेल, तर 'अभिहतभिक्षा' (सादर केलेली भिक्षा) नावाचे हे अन्न पिंडपातिक (केवळ भिक्षेवर राहणाऱ्या) भिक्षूंनाही चालते. अशा वेळी वाटपाच्या नियमाविषयी विचारण्याची आवश्यकता नसते; थेरांच्या आसनापासून सुरुवात करून पात्र भरून अन्न द्यावे. อุปาสโก สงฺฆตฺเถรสฺส วา คนฺถธุตงฺควเสน อภิญฺญาตสฺส วา ภตฺตุทฺเทสกสฺส วา ปหิณาติ ‘‘อมฺหากํ ภตฺตคหณตฺถาย อฏฺฐ ภิกฺขู คเหตฺวา อาคจฺฉถา’’ติ, สเจปิ ญาติอุปฏฺฐาเกหิ เปสิตํ โหติ, อิเม ตโย ชนา ปุจฺฉิตุํ น ลภนฺติ, อารุฬฺหาเยว มาติกํ, สงฺฆโต อฏฺฐ ภิกฺขู อุทฺทิสาเปตฺวา อตฺตนวเมหิ คนฺตพฺพํ. กสฺมา? ภิกฺขุสงฺฆสฺส หิ เอเต ภิกฺขู นิสฺสาย ลาโภ อุปฺปชฺชตีติ. คนฺถธุตงฺคาทีหิ ปน อนภิญฺญาโต อาวาสิกภิกฺขุ ปุจฺฉิตุํ ลภติ, ตสฺมา เตน ‘‘กึ สงฺฆโต คณฺหามิ, อุทาหุ เย ชานามิ, เตหิ สทฺธึ อาคจฺฉามี’’ติ มาติกํ อาโรเปตฺวา ยถา ทายกา วทนฺติ, ตถา ปฏิปชฺชิตพฺพํ. ‘‘ตุมฺหากํ นิสฺสิตเก วา เย วา ชานาถ, เต คเหตฺวา เอถา’’ติ วุตฺเต ปน เย อิจฺฉนฺติ, เตหิ สทฺธึ คนฺตุํ ลภติ. สเจ ‘‘อฏฺฐ ภิกฺขู ปหิณถา’’ติ เปเสนฺติ, สงฺฆโตว เปเสตพฺพา. อตฺตนา สเจ อญฺญสฺมึ คาเม สกฺกา โหติ ภิกฺขา ลภิตุํ, อญฺโญ คาโม คนฺตพฺโพ. น สกฺกา เจ โหติ ลภิตุํ, โสเยว คาโม ปิณฺฑาย ปวิสิตพฺโพ. जर एखादा उपासक संघथेरांकडे, किंवा ग्रंथ व धुतंगाच्या पालनामुळे प्रसिद्ध असलेल्या भिक्षूंकडे, यांपैकी कोणाकडे किंवा भत्तुद्देशकाकडे (अन्न वाटप करणाऱ्या भिक्षूकडे) असा निरोप पाठवतो की, 'आमच्याकडून अन्न स्वीकारण्यासाठी आठ भिक्षूंना घेऊन यावे'; जरी हा निरोप नातेवाईक किंवा सेवकांकडून आलेला असला, तरी या तिन्ही व्यक्तींना (दात्याला अधिक प्रश्न) विचारण्याची परवानगी नसते. त्यांनी नियमावलीनुसार (मातिका) संघातून आठ भिक्षू नियुक्त करून, स्वतः नववे होऊन (स्वतःसह नऊ जणांनी) जावे. असे का? कारण या भिक्षूंना अनुसरूनच भिक्षू संघाला लाभ प्राप्त होतो. परंतु, ग्रंथ व धुतंग इत्यादींमुळे प्रसिद्ध नसलेला एखादा सामान्य निवासी भिक्षू (आवासिक भिक्षू) विचारू शकतो. म्हणून त्याने 'मी संघातून भिक्षू घेऊ की ज्यांना मी ओळखतो त्यांना सोबत घेऊन येऊ?' असा प्रश्न विचारून, जसे दाते सांगतील त्याप्रमाणे आचरण करावे. परंतु, जर दात्याने 'तुमच्यावर आश्रित असलेल्यांना किंवा ज्यांना तुम्ही ओळखता त्यांना घेऊन या' असे म्हटले, तर ज्यांच्यासोबत जाण्याची इच्छा असेल, त्यांना सोबत घेऊन जाण्याची परवानगी मिळते. जर दाते 'आठ भिक्षूंना पाठवा' असा निरोप पाठवतात, तर संघातूनच भिक्षू पाठवावेत. जर स्वतःला दुसऱ्या गावात भिक्षा मिळणे शक्य असेल, तर दुसऱ्या गावात जावे. जर भिक्षा मिळणे शक्य नसेल, तर भिक्षेसाठी त्याच गावात प्रवेश करावा. นิมนฺติตภิกฺขู อาสนสาลาย นิสินฺนา โหนฺติ, ตตฺร เจ มนุสฺสา ‘‘ปตฺเต เทถา’’ติ อาคจฺฉนฺติ, อนิมนฺติเตหิ น ทาตพฺพา. ‘‘เอเต นิมนฺติตภิกฺขู’’ติ วตฺตพฺพํ. ‘‘ตุมฺเหปิ เทถา’’ติ วุตฺเต ปน ทาตุํ วฏฺฏติ. อุสฺสวาทีสุ มนุสฺสา สยเมว ปริเวณานิ จ ปธานฆรานิ จ คนฺตฺวา ติปิฏเก จ ธมฺมกถิเก จ ภิกฺขุสเตนปิ สทฺธึ นิมนฺเตนฺติ. ตทา เยปิ ชานนฺติ, เต คเหตฺวา คนฺตุํ วฏฺฏติ. กสฺมา? น หิ มหาภิกฺขุสงฺเฆน อตฺถิกา มนุสฺสา ปริเวณานิ จ ปธานฆรานิ คจฺฉนฺติ, สนฺนิปาตฏฺฐานโตว ยถาสตฺติ ยถาพลํ ภิกฺขู คณฺหิตฺวา คจฺฉนฺตีติ. आमंत्रित भिक्षू जेव्हा आसनशाळेत बसलेले असतात, आणि तेथे जर लोक 'पात्रे द्या' असे म्हणत आले, तर जे आमंत्रित नाहीत अशा भिक्षूंनी आपली पात्रे देऊ नयेत. 'हे आमंत्रित भिक्षू आहेत' असे त्यांना सांगावे. परंतु, जर लोकांनी 'तुम्हीही पात्रे द्या' असे म्हटले, तर पात्र देणे योग्य ठरते. उत्सवाच्या प्रसंगी लोक स्वतःच विहाराच्या आवारात (परिवेण) आणि ध्यानकुटींमध्ये जाऊन त्रिपिटकधारी व धम्मकथिका भिक्षूंना शेकडो भिक्षूंसह आमंत्रित करतात. अशा वेळी, ज्या भिक्षूंना ते ओळखतात, त्यांना सोबत घेऊन जाणे योग्य ठरते. असे का? कारण संपूर्ण महाभिक्षू संघाची आवश्यकता नसलेले लोक विहाराच्या आवारात किंवा ध्यानकुटींमध्ये जात नाहीत, तर ते मुख्य सभास्थानावरूनच आपल्या शक्ती व क्षमतेनुसार भिक्षूंना सोबत घेऊन जातात. สเจ [Pg.98] ปน สงฺฆตฺเถโร วา คนฺถธุตงฺควเสน อภิญฺญาตโก วา ภตฺตุทฺเทสโก วา อญฺญตฺร วา วสฺสํ วสิตฺวา กตฺถจิ วา คนฺตฺวา ปุน สกฏฺฐานํ อาคจฺฉนฺติ, มนุสฺสา จ อาคนฺตุกสฺส สกฺการํ กโรนฺติ, เอกวารํ เย ชานนฺติ, เต คเหตฺวา คนฺตพฺพํ. ปฏิพทฺธกาลโต ปน ปฏฺฐาย ทุติยวาเร อารทฺเธ สงฺฆโตเยว คเหตฺวา คนฺตพฺพํ. อภินวอาคนฺตุกาว หุตฺวา ญาตี วา อุปฏฺฐาเก วา ปสฺสิสฺสามาติ คจฺฉนฺติ, ตตฺร เตสํ ญาตี จ อุปฏฺฐากา จ สกฺการํ กโรนฺติ. เอตฺถ ปน เย ชานนฺติ, เต คเหตฺวา คนฺตุํ วฏฺฏติ. परंतु, जर संघथेर, किंवा ग्रंथ व धुतंग पालनामुळे प्रसिद्ध असलेले भिक्षू, किंवा भत्तुद्देशक इतर ठिकाणी वर्षावास करून किंवा कोठेही जाऊन पुन्हा आपल्या मूळ ठिकाणी परत येतात, आणि लोक त्या आगंतुक भिक्षूंचा सत्कार करतात, तर पहिल्या वेळी ज्या भिक्षूंना ते ओळखतात, त्यांना सोबत घेऊन जावे. परंतु, तेथे नियमित वास्तव्य सुरू झाल्यापासून, दुसऱ्या वेळेपासून मात्र संघातूनच भिक्षू घेऊन जावे. जर ते नवीन आगंतुक म्हणूनच 'आम्ही नातेवाईक किंवा उपस्थायकांना (सेवकांना) भेटू' असा विचार करून जातात, आणि तेथे त्यांचे नातेवाईक व उपस्थायक त्यांचा सत्कार करतात, तर अशा प्रसंगी ज्यांना ते ओळखतात, त्यांना सोबत घेऊन जाणे योग्य ठरते. โย ปน อติลาภี โหติ, สกฏฺฐานญฺจ อาคนฺตุกฏฺฐานญฺจ เอกสทิสํ, สพฺพตฺถ มนุสฺสา สงฺฆภตฺตํ สชฺเชตฺวาว นิสีทนฺติ, เตน สงฺฆโตว คเหตฺวา คนฺตพฺพนฺติ อยํ นิมนฺตเน วิเสโส. อวเสโส สพฺพปญฺโห อุทฺเทสภตฺเต วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. กุรุนฺทิยํ ปน ‘‘อฏฺฐ มหาเถเร เทถา’’ติ วุตฺเต ‘‘อฏฺฐ มหาเถราว ทาตพฺพา’’ติ วุตฺตํ. เอส นโย มชฺฌิมาทีสุ. สเจ ปน อวิเสเสตฺวา ‘‘อฏฺฐ ภิกฺขู เทถา’’ติ วทติ, สงฺฆโต ทาตพฺพา. परंतु, जो भिक्षू अत्यंत लाभवान असतो, ज्याच्यासाठी स्वतःचे ठिकाण आणि नवीन ठिकाण दोन्ही सारखेच असते, आणि जेथे सर्व ठिकाणी लोक संघासाठी अन्न तयार करूनच बसलेले असतात, त्याने संघातूनच भिक्षू घेऊन जावे. हा आमंत्रणाबाबतचा विशेष नियम आहे. उर्वरित सर्व प्रश्न 'उद्देशभक्त' मध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनुसारच समजून घ्यावेत. कुरुंदी अट्ठकथेत म्हटले आहे की, 'आठ महाथेर द्या' असे म्हटल्यावर 'आठ महाथेरच दिले पाहिजेत'. हाच नियम मध्यम श्रेणीच्या भिक्षूंच्या बाबतीतही लागू होतो. परंतु, जर कोणताही विशेष उल्लेख न करता केवळ 'आठ भिक्षू द्या' असे म्हटले, तर संघातूनच भिक्षू दिले पाहिजेत. นิมนฺตนภตฺตกถา นิฏฺฐิตา. निमंत्रण-भक्तकथा समाप्त झाली। สลากภตฺตกถา शलाका-भक्तकथा สลากภตฺเต ปน ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, สลากาย วา ปฏฺฏิกาย วา อุปนิพนฺธิตฺวา โอปุญฺชิตฺวา อุทฺทิสิตุ’’นฺติ วจนโต รุกฺขสารมยาย สลากาย วา เวฬุวิลีวตาลปณฺณาทิมยาย ปฏฺฏิกาย วา ‘‘อสุกสฺส นาม สลากภตฺต’’นฺติ เอวํ อกฺขรานิ อุปนิพนฺธิตฺวา ปจฺฉิยํ วา จีวรโภเค วา กตฺวา สพฺพา สลากาโย โอปุญฺชิตฺวา ปุนปฺปุนํ เหฏฺฐุปริวเสเนว อาโลเฬตฺวา ปญฺจงฺคสมนฺนาคเตน ภตฺตุทฺเทสเกน สเจ ฐิติกา อตฺถิ, ฐิติกโต ปฏฺฐาย; โน เจ อตฺถิ, เถราสนโต ปฏฺฐาย สลากา ทาตพฺพา. ปจฺฉา อาคตานมฺปิ เอกาพทฺธวเสน ทูเร ฐิตานมฺปิ อุทฺเทสภตฺเต วุตฺตนเยเนว ทาตพฺพา. शलाका-भक्ताच्या (सलाका-भक्त) बाबतीत, 'भिक्षूंनो, मी शलाकेवर किंवा पट्टीवर नावे लिहून, ती एकत्र करून वाटप करण्याची अनुमती देतो' या भगवंतांच्या वचनानुसार, कडक लाकडाच्या शलाकेवर किंवा बांबूच्या पट्टीवर, ताडपत्रावर इत्यादींवर 'अमुक व्यक्तीचे शलाका-भक्त' अशी अक्षरे लिहून, ती टोपलीत किंवा चीवराच्या घडीत ठेवून, सर्व शलाका एकत्र करून, वारंवार वर-खाली करून चांगल्या प्रकारे मिसळाव्यात. त्यानंतर पाच गुणांनी युक्त असलेल्या भत्तुद्देशक भिक्षूने, जर वाटपाचा क्रम निश्चित असेल, तर त्या क्रमापासून सुरुवात करून; आणि जर क्रम निश्चित नसेल, तर थेरांच्या आसनापासून सुरुवात करून शलाकांचे वाटप करावे. नंतर आलेल्या भिक्षूंना तसेच एकाच रांगेत जोडलेले असल्यामुळे दूर बसलेल्या भिक्षूंनाही 'उद्देशभक्त' मध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनुसारच शलाका द्याव्यात. สเจ [Pg.99] วิหารสฺส สมนฺตโต พหู โคจรคามา, ภิกฺขู ปน น พหุกา, คามวเสนปิ สลากาโย ปาปุณนฺติ, ‘‘ตุมฺหากํ อสุกคาเม สลากภตฺตํ ปาปุณาตี’’ติ คามวเสเนว คาเหตพฺพา. เอวํ คาเหนฺเตน สเจปิ เอเกกสฺมึ คาเม นานปฺปการานิ สฏฺฐิสลากภตฺตานิ, สพฺพานิ คาหิตาเนว โหนฺติ, ตสฺส ปตฺตคามสมีเป อญฺญานิปิ ทฺเว ตีณิ สลากภตฺตานิ โหนฺติ, ตานิปิ ตสฺเสว ทาตพฺพานิ. น หิ สกฺกา เตสํ การณา อญฺญํ ภิกฺขุํ ปหิณิตุนฺติ. जर विहाराच्या सभोवताली अनेक गोचरग्राम (भिक्षेची गावे) असतील, परंतु भिक्षूंची संख्या जास्त नसेल, आणि गावांच्या क्रमानुसार शलाका वाटल्या जात असतील, तर 'तुम्हाला अमुक गावात शलाका-भक्त मिळाले आहे' असे सांगून गावाच्या क्रमानुसारच शलाका स्वीकारण्यास सांगावे. अशा प्रकारे शलाकांचे वाटप करताना, जरी एका एका गावात वेगवेगळ्या प्रकारचे साठ शलाका-भक्त असले, तरी ते सर्व स्वीकारले गेले पाहिजेत. जर त्या भिक्षूला मिळालेल्या गावाच्या जवळच इतरही दोन-तीन शलाका-भक्त असतील, तर ती देखील त्याच भिक्षूला दिली पाहिजेत. कारण केवळ त्या दोन-तीन शलाका-भक्तांसाठी दुसऱ्या भिक्षूला पाठवणे शक्य नसते. สเจ เอกจฺเจสุ คาเมสุ พหูนิ สลากภตฺตานิ สลฺลกฺเขตฺวา สตฺตนฺนมฺปิ อฏฺฐนฺนมฺปิ ภิกฺขูนํ ทาตพฺพานิ. ททนฺเตน ปน จตุนฺนํ ปญฺจนฺนํ ภตฺตานํ สลากาโย เอกโต พนฺธิตฺวา ทาตพฺพา. สเจ ตํ คามํ อติกฺกมิตฺวา อญฺโญ คาโม โหติ, ตสฺมิญฺจ เอกเมว สลากภตฺตํ, ตํ ปน ปาโตว เทนฺติ, ตมฺปิ เอเตสุ ภิกฺขูสุ เอกสฺส นิคฺคเหน ทตฺวา ‘‘ปาโตว ตํ คเหตฺวา ปจฺฉา โอริมคาเม อิตรานิ ภตฺตานิ คณฺหาหี’’ติ วตฺตพฺโพ. สเจ โอริมคาเม สลากภตฺเตสุ อคาหิเตสฺเวว คาหิตสญฺญาย คจฺฉติ, ปรภาคคาเม สลากภตฺตํ คาเหตฺวา ปุน วิหารํ อาคนฺตฺวา อิตรานิ คาเหตฺวา โอริมคาโม คนฺตพฺโพ. ‘‘น หิ พหิสีมาย สงฺฆลาโภ คาเหตุํ ลพฺภตี’’ติ อยํ นโย กุรุนฺทิยํ วุตฺโต. जर काही गावांमध्ये पुष्कळ शलाकाभक्त असतील, तर त्यांची नोंद घेऊन ते सात किंवा आठ भिक्खूंना दिले पाहिजेत. परंतु, वाटप करणाऱ्या भिक्खूने चार किंवा पाच भोजनांच्या शलाका (चिठ्ठ्या) एकत्र बांधून दिल्या पाहिजेत. जर त्या गावाला ओलांडून दुसरे गाव असेल आणि त्या गावात केवळ एकच शलाकाभक्त असेल, आणि ते जर सकाळीच दिले जात असेल, तर ते देखील या (सात किंवा आठ) भिक्खूंपैकी एकाला आग्रहाने देऊन, "सकाळीच ते ग्रहण करून नंतर या बाजूच्या गावात इतर भोजनांचा स्वीकार कर," असे सांगितले पाहिजे. जर पहिल्या गावातील शलाकाभक्त अजून घेतले नसतानाच, 'ते घेतले आहे' अशा समजुतीने तो भिक्खू निघून गेला, तर त्याने दुसऱ्या गावातील शलाकाभक्त ग्रहण करून पुन्हा विहारात परत यावे आणि इतर भोजन घेऊन पहिल्या गावात जावे. कारण, "सीमेबाहेर संघलाभ ग्रहण करण्याची अनुमती नसते." हा नियम 'कुरुन्दी' अट्ठकथेत सांगितला आहे. สเจ ปน ภิกฺขู พหู โหนฺติ, คามวเสน สลากา น ปาปุณนฺติ, วีถิวเสน วา วีถิยํ เอกเคหวเสน วา กุลวเสน วา คาเหตพฺพา. วีถิอาทีสุ จ ยตฺถ พหูนิ ภตฺตานิ, ตตฺถ คาเม วุตฺตนเยเนว พหูนํ ภิกฺขูนํ คาเหตพฺพานิ. สลากาสุ อสติ อุทฺทิสิตฺวาปิ คาเหตพฺพานิ. जर भिक्खू पुष्कळ असतील आणि गावाच्या हिशोबाने शलाका पुरत नसतील, तर गल्लीच्या हिशोबाने, किंवा गल्लीतील एका घराच्या हिशोबाने, किंवा कुटुंबाच्या हिशोबाने त्या दिल्या पाहिजेत. गल्ली इत्यादींमध्ये जेथे पुष्कळ भोजन असेल, तेथे गावात सांगितलेल्या पद्धतीनेच अनेक भिक्खूंना ते ग्रहण करायला दिले पाहिजे. जर शलाका नसतील, तर केवळ निर्देश करून (नाव घेऊन) देखील भोजन ग्रहण करायला दिले पाहिजे. สลากทายเกน ปน วตฺตํ ชานิตพฺพํ. เตน หิ กาลสฺเสว วุฏฺฐาย ปตฺตจีวรํ คเหตฺวา โภชนสาลํ คนฺตฺวา อสมฺมฏฺฐฏฺฐานํ สมฺมชฺชิตฺวา ปานียํ ปริโภชนียํ อุปฏฺฐาเปตฺวา ‘‘อิทานิ ภิกฺขูหิ วตฺตํ กตํ ภวิสฺสตี’’ติ กาลํ สลฺลกฺเขตฺวา ฆณฺฏึ ปหริตฺวา ภิกฺขูสุ สนฺนิปติเตสุ ปฐมเมว วารคาเม สลากภตฺตํ คาเหตพฺพํ. ‘‘ตุยฺหํ อสุกสฺมึ นาม วารคาเม สลากา ปาปุณาติ ตตฺร คจฺฉา’’ติ วตฺตพฺพํ. शलाका देणाऱ्या भिक्खूने आपले कर्तव्य जाणले पाहिजे. त्याने सकाळी लवकर उठून, पात्र व चीवर घेऊन भोजनशाळेत जावे; न झाडलेली जागा झाडून स्वच्छ करावी; पिण्याचे व वापरण्याचे पाणी आणून ठेवावे. "आता भिक्खूंनी आपले कर्तव्य पूर्ण केले असेल," अशी वेळेची नोंद घेऊन घंटा वाजवावी. भिक्खू एकत्र जमल्यावर, सर्वात आधी पाळीच्या गावातील शलाकाभक्त ग्रहण करायला दिले पाहिजे. "आपल्याला अमुक नावाच्या पाळीच्या गावात शलाका मिळाली आहे, आपण तेथे जावे," असे त्यांना सांगितले पाहिजे. สเจ อติเรกคาวุเต คาโม โหติ, ตํ ทิวสํ คจฺฉนฺตา กิลมนฺติ, ‘‘สฺเว ตุยฺหํ วารคาเม ปาปุณาตี’’ติ อชฺเชว คาเหตพฺพํ. โย วารคามํ เปสิยมาโน [Pg.100] น คจฺฉติ, อญฺญํ สลากํ มคฺคติ, น ทาตพฺพา. สทฺธานญฺหิ มนุสฺสานํ ปุญฺญหานิ สงฺฆสฺส จ ลาภจฺเฉโท โหติ, ตสฺมา ตสฺส ทุติเยปิ ตติเยปิ ทิวเส อญฺญา สลากา น ทาตพฺพา, ‘‘อตฺตโน ปตฺตฏฺฐานํ คนฺตฺวา ภุญฺชาหี’’ติ วตฺตพฺโพ, ตีณิ ปน ทิวสานิ อคจฺฉนฺตสฺส วารคามโต โอริมวารคาเม สลากา คาเหตพฺพา. ตญฺเจ น คณฺหาติ, ตโต ปฏฺฐาย ตสฺส อญฺญํ สลากํ ทาตุํ น วฏฺฏติ, ทณฺฑกมฺมํ ปน คาฬฺหํ กาตพฺพํ, สฏฺฐิโต วา ปณฺณาสโต วา น ปริหาเปตพฺพํ. วารคาเม คาเหตฺวา วิหารวาโร คาเหตพฺโพ, ‘‘ตุยฺหํ วิหารวาโร ปาปุณาตี’’ติ วตฺตพฺพํ. วิหารวาริกสฺส ทฺเว ติสฺโส ยาคุสลากาโย ติสฺโส จตสฺโส วา ภตฺตสลากาโย จ ทาตพฺพา, นิพทฺธํ กตฺวา ปน น ทาตพฺพา. ยาคุภตฺตทายกา หิ ‘‘อมฺหากํ ยาคุภตฺตํ วิหารโคปกาว ภุญฺชนฺตี’’ติ อญฺญถตฺตํ อาปชฺเชยฺยุํ, ตสฺมา อญฺเญสุ กุเลสุ ทาตพฺพา. जर गाव एक गावुतापेक्षा अधिक अंतरावर असेल आणि त्या दिवशी जाताना भिक्खू थकतील असे वाटत असेल, तर "उद्या आपल्याला पाळीच्या गावात शलाका मिळेल" असे सांगून आजच ती ग्रहण करायला दिली पाहिजे. जो भिक्खू पाळीच्या गावात पाठवला असता जात नाही आणि दुसरी शलाका मागतो, त्याला ती दिली जाऊ नये. कारण यामुळे श्रद्धाळू लोकांच्या पुण्याचा ऱ्हास होतो आणि संघाच्या लाभाचे नुकसान होते. म्हणून त्याला दुसऱ्या किंवा तिसऱ्या दिवशी देखील दुसरी शलाका दिली जाऊ नये. "आपल्या वाट्याला आलेल्या ठिकाणी जाऊन भोजन करा," असे त्याला सांगितले पाहिजे. परंतु, तीन दिवस न जाणाऱ्या भिक्खूला पाळीच्या गावाऐवजी या बाजूच्या पाळीच्या गावातील शलाका दिली पाहिजे. जर तो ती देखील घेत नसेल, तर तेव्हापासून त्याला दुसरी शलाका देणे योग्य नाही. उलट, त्याला कडक दंड केला पाहिजे; साठ किंवा पन्नास घागरी पाणी भरण्याच्या दंडापासून त्याला सूट दिली जाऊ नये. पाळीच्या गावात शलाका दिल्यानंतर विहाराच्या पाळीचे वाटप केले पाहिजे आणि "आपल्याकडे विहाराची पाळी आली आहे," असे सांगितले पाहिजे. विहाराची पाळी असलेल्या भिक्खूला दोन किंवा तीन यागूच्या शलाका आणि तीन किंवा चार भोजनाच्या शलाका दिल्या पाहिजेत. परंतु, त्या कायमस्वरूपी करून देऊ नयेत. कारण, यागू आणि भोजन देणारे दायक "आमची यागू आणि भोजन केवळ विहाराचे राखणदारच जेवतात" असा विचार करून त्यांची श्रद्धा विचलित होऊ शकते. म्हणून इतर कुटुंबांमध्ये त्या दिल्या पाहिजेत. สเจ วิหารวาริกานํ สภาคา อาหริตฺวา เทนฺติ, อิจฺเจตํ กุสลํ; โน เจ, วารํ คาเหตฺวา เตสํ ยาคุภตฺตํ อาหราเปตพฺพํ. ตาว เนสํ สลากา ผาติกมฺมเมว ภวนฺติ, วสฺสคฺเคน ปตฺตฏฺฐาเน ปน อญฺญมฺปิ ปณีตภตฺตสลากํ คณฺหิตุํ ลภนฺติเยว. อติเรกอุตฺตริภงฺคสฺส เอกจาริกภตฺตสฺส วิสุํ ฐิติกํ กตฺวา สลากา ทาตพฺพา. जर विहाराची पाळी असलेल्या भिक्खूंना त्यांचे सहकारी भिक्खू भोजन आणून देत असतील, तर ते उत्तम आहे. जर देत नसतील, तर पाळी ठरवून देऊन त्यांच्यासाठी यागू आणि भोजन आणवले पाहिजे. तोपर्यंत त्यांच्या शलाका वाढीव लाभ देणाऱ्याच ठरतात. वर्षावासाच्या ज्येष्ठतेनुसार वाट्याला आलेल्या ठिकाणी मात्र त्यांना इतर देखील उत्तम भोजनाची शलाका ग्रहण करण्याचा अधिकार मिळतोच. अतिरिक्त व्यंजनांसह असलेल्या एकाच ठिकाणी मिळणाऱ्या भोजनाची स्वतंत्र व्यवस्था करून शलाका दिली पाहिजे. สเจ เยน สลากา ลทฺธา, โส ตํทิวสํ ตํ ภตฺตํ น ลภติ, ปุนทิวเส คาเหตพฺพํ. ภตฺตเมว ลภติ, น อุตฺตริภงฺคํ; เอวมฺปิ ปุน คาเหตพฺพํ. ขีรภตฺตสฺส สลากายปิ เอเสว นโย. สเจ ปน ขีรเมว ลภติ, น ภตฺตํ; ขีรลาภโต ปฏฺฐาย ปุน น คาเหตพฺพํ. ทฺเว ตีณิ เอกจาริกภตฺตานิ เอกสฺเสว ปาปุณนฺติ, ทุพฺภิกฺขสมเย สงฺฆนวเกน ลทฺธกาเล วิชเฏตฺวา วิสุํ คาเหตพฺพานิ, ปากติกสลากภตฺตํ อลทฺธสฺสาปิ ปุนทิวเส คาเหตพฺพํ. ज्या भिक्खूला शलाका मिळाली आहे, त्याला जर त्या दिवशी ते भोजन मिळाले नाही, तर त्याने ते दुसऱ्या दिवशी ग्रहण करावे. जर केवळ भोजन मिळाले पण अतिरिक्त व्यंजन मिळाले नाही, तरी देखील त्याने पुन्हा ते ग्रहण करावे. खीर-भोजनाच्या शलाकेच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. परंतु जर केवळ दूध मिळाले आणि भात मिळाला नाही, तर दूध मिळाल्यापासून पुढे त्याने पुन्हा ते ग्रहण करू नये. दुष्काळाच्या वेळी जर दोन किंवा तीन एकाच ठिकाणी मिळणारी भोजने एकाच भिक्खूच्या वाट्याला आली, तर नवशिक्या भिक्खूने ती मिळाल्यावर त्यांची विभागणी करून स्वतंत्रपणे ग्रहण करावीत. सामान्य शलाकाभक्त न मिळालेल्या भिक्खूने देखील दुसऱ्या दिवशी ते ग्रहण करावे. สเจ ขุทฺทโก วิหาโร โหติ, สพฺเพ ภิกฺขู เอกสมฺโภคา, อุจฺฉุสลากํ คาเหนฺเตน ยสฺส กสฺสจิ สมฺมุขีภูตสฺส ปาเปตฺวา มหาเถราทีนํ ทิวา ตจฺเฉตฺวา ทาตุํ วฏฺฏติ. รสสลากํ ปาเปตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ ปริสฺสาเวตฺวา วา ผาณิตํ วา กาเรตฺวา ปิณฺฑปาติกาทีนมฺปิ ทาตพฺพํ[Pg.101]. อาคนฺตุกานํ อาคตานาคตภาวํ ญตฺวา คาเหตพฺพา, มหาอาวาเส ฐิติกํ กตฺวา คาเหตพฺพา. जर लहान विहार असेल आणि सर्व भिक्खू एकत्र भोजन करणारे असतील, तर उसाची शलाका वाटप करणाऱ्याने समोर आलेल्या कोणत्याही भिक्खूकडे ती पाठवून, महाथेर इत्यादींना दिवसा तो ऊस सोलून देणे योग्य आहे. उसाच्या रसाची शलाका पाठवून, भोजनानंतर तो रस गाळून किंवा त्याची काकवी बनवून पिंडपातिक इत्यादी भिक्खूंना देखील दिली पाहिजे. आगंतुक भिक्खूंच्या येण्या-न येण्याची स्थिती जाणून घेऊन ती दिली पाहिजे. मोठ्या महाविहारात मात्र क्रम ठरवून ती दिली पाहिजे. ตกฺกสลากมฺปิ สภาคฏฺฐาเน ปาเปตฺวา วา ปจาเปตฺวา วา ธูมาเปตฺวา วา เถรานํ ทาตุํ วฏฺฏติ. มหาอาวาเส วุตฺตนเยเนว ปฏิปชฺชิตพฺพํ ผลสลากปูวสลากเภสชฺชคนฺธมาลสลากาโยปิ วิสุํ ฐิติกาย คาเหตพฺพา. เภสชฺชาทิสลากาโย เจตฺถ กิญฺจาปิ ปิณฺฑปาติกานมฺปิ วฏฺฏนฺติ, สลากวเสน คาหิตตฺตา ปน น สาทิตพฺพา. อคฺคภิกฺขามตฺตํ สลากภตฺตํ เทนฺติ, ฐิติกํ ปุจฺฉิตฺวา คาเหตพฺพํ. อสติยา ฐิติกาย เถราสนโต ปฏฺฐาย คาเหตพฺพํ. สเจ ตาทิสานิ ภตฺตานิ พหูนิ โหนฺติ, เอเกกสฺส ภิกฺขุโน ทฺเว ตีณิ ทาตพฺพานิ; โน เจ, เอเกกเมว ทตฺวา ปฏิปาฏิยา คตาย ปุน เถราสนโต ปฏฺฐาย ทาตพฺพํ. สเจ อนฺตราว อุปจฺฉิชฺชติ, ฐิติกา สลฺลกฺเขตพฺพา. ยทิ ปน ตาทิสํ ภตฺตํ นิพทฺธเมว โหติ, ยสฺส ปาปุณาติ, โส วตฺตพฺโพ ‘‘ลทฺธา วา อลทฺธา วา สฺเวปิ คณฺเหยฺยาสี’’ติ. เอกํ อนิพทฺธํ โหติ, ลภนทิวเส ปน ยาวทตฺถํ ลภติ, อลภนทิวสา พหุตรา โหนฺติ, ตํ ยสฺส ปาปุณาติ, โส อลภิตฺวา ‘‘สฺเว คณฺเหยฺยาสี’’ติ วตฺตพฺโพ. ताकाची शलाका देखील अनुकूल भिक्खूंच्या ठिकाणी पाठवून, किंवा ती शिजवून (कढी करून) किंवा तिला फोडणी देऊन थेर भिक्खूंना देणे योग्य आहे. महाविहारात पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच आचरण केले पाहिजे. फळांची शलाका, पक्वान्नाची शलाका, औषधांची शलाका आणि गंध-पुष्पांची शलाका देखील स्वतंत्र नियमाने ग्रहण केली पाहिजे. येथे औषध इत्यादींच्या शलाका जरी पिंडपातिक भिक्खूंना देखील चालत असल्या, तरी शलाकेच्या रूपाने ग्रहण केल्यामुळे त्यांनी त्याचा लोभ धरू नये. जेव्हा केवळ अग्रभिक्षा शलाकाभक्त म्हणून दिली जाते, तेव्हा क्रम विचारून ती ग्रहण केली पाहिजे. जर क्रम ठरलेला नसेल, तर थेरांच्या आसनापासून सुरुवात करून ती ग्रहण केली पाहिजे. जर तशी भोजने पुष्कळ असतील, तर प्रत्येक भिक्खूला दोन किंवा तीन दिली पाहिजेत; जर नसतील, तर एकेकच देऊन, पाळी संपल्यावर पुन्हा थेरांच्या आसनापासून सुरुवात करून दिली पाहिजे. जर मध्येच ती संपली, तर तो क्रम लक्षात ठेवला पाहिजे. जर तसे भोजन नियमितच असेल आणि ज्याच्या वाट्याला ते येते, त्याला "मिळो वा न मिळो, उद्या देखील आपणच ते ग्रहण करावे," असे सांगितले पाहिजे. काही भोजन अनियमित असते, परंतु ज्या दिवशी ते मिळते, त्या दिवशी इच्छेनुसार मिळते आणि न मिळण्याचे दिवस जास्त असतात. ते ज्याच्या वाट्याला येते, त्याला ते न मिळाल्यास, "उद्या आपण ते ग्रहण करावे," असे सांगितले पाहिजे. โย สลากาสุ คาหิตาสุ ปจฺฉา อาคจฺฉติ, ตสฺส อติกฺกนฺตาว สลากา น อุปฏฺฐาเปตฺวา ทาตพฺพา. สลากํ นาม ฆณฺฏิปฺปหรณโต ปฏฺฐาย อาคนฺตฺวา หตฺถํ ปสาเรนฺโตว ลภติ. อญฺญสฺส อาคนฺตฺวา สมีเป ฐิตสฺสาปิ อติกฺกนฺตา อติกฺกนฺตาว โหติ. สเจ ปนสฺส อญฺโญ คณฺหนฺโต อตฺถิ, สยํ อนาคโตปิ ลภติ. สภาคฏฺฐาเน อสุโก อนาคโตติ ญตฺวา ‘‘อยํ ตสฺส สลากา’’ติ ฐเปตุํ วฏฺฏติ. สเจ ‘‘อนาคตสฺส น ทาตพฺพา’’ติ กติกํ กโรนฺติ, อธมฺมิกา โหติ. อนฺโตอุปจาเร ฐิตสฺส หิ ภาชนียภณฺฑํ ปาปุณาติ. สเจ ปน ‘‘อนาคตสฺส เทถา’’ติ มหาสทฺทํ กโรนฺติ, ทณฺฑกมฺมํ ฐเปตพฺพํ, ‘‘อาคนฺตฺวา คณฺหนฺตู’’ติ วตฺตพฺพํ. जो भिक्खू शलाकांचे वाटप पूर्ण झाल्यावर नंतर येतो, त्याला वेळ निघून गेलेली शलाका राखून ठेवून देऊ नये. शलाका ही घंटा वाजवल्यापासून येऊन हात पसरणाऱ्यालाच मिळते. दुसऱ्या एखाद्या भिक्खूने येऊन जवळ उभे राहिले तरी वेळ निघून गेलेली शलाका निघून गेलेलीच असते. पण जर त्याच्यासाठी दुसरा कोणी शलाका घेणारा असेल, तर तो स्वतः आलेला नसला तरी त्याला ती मिळते. समान शील असलेल्या भिक्खूंच्या ठिकाणी 'अमुक एक भिक्खू आलेला नाही' असे जाणून 'ही त्याची शलाका आहे' असे म्हणून ती बाजूला ठेवणे योग्य आहे. जर 'न आलेल्याला शलाका देऊ नये' असा नियम केला, तर तो नियम अधार्मिक ठरतो. कारण उपचार-सीमेच्या आत असलेल्या भिक्खूला वाटणीचे साहित्य मिळते. पण जर 'न आलेल्याला द्या' असा मोठा आरडाओरडा केला, तर दंडकर्म लागू केले पाहिजे आणि 'येऊन घेऊन जावे' असे म्हटले पाहिजे। ฉปฺปญฺจสลากา นฏฺฐา โหนฺติ, ภตฺตุทฺเทสโก ทายกานํ นามํ นสฺสรติ, โส เจ นฏฺฐสลากา มหาเถรสฺส วา อตฺตโน วา ปาเปตฺวา ภิกฺขู วเทยฺย, ‘‘มยา อสุกคาเม สลากภตฺตํ มยฺหํ ปาปิตํ, ตุมฺเห ตตฺถ ลทฺธํ สลากภตฺตํ ภุญฺเชยฺยาถา’’ติ, วฏฺฏติ. วิหาเร อปาปิตํ ปน อาสนสาลาย ตํ ภตฺตํ ลภิตฺวา ตตฺเถว ปาเปตฺวา ภุญฺชิตุํ [Pg.102] น วฏฺฏติ. ‘‘อชฺช ปฏฺฐาย มยฺหํ สลากภตฺตํ คณฺหถา’’ติ วุตฺเต ตตฺร อาสนสาลาย คาเหตุํ น วฏฺฏติ, วิหารํ อาเนตฺวา คาเหตพฺพํ. ‘‘สฺเว ปฏฺฐายา’’ติ วุตฺเต ปน ภตฺตุทฺเทสกสฺส อาจิกฺขิตพฺพํ ‘‘สฺเว ปฏฺฐาย อสุกกุลํ นาม สลากภตฺตํ เทติ, สลากคฺคาหณกาเล สเรยฺยาสี’’ติ. ทุพฺภิกฺเข สลากภตฺตํ ปจฺฉินฺทิตฺวา สุภิกฺเข ชาเต กิญฺจิ ทิสฺวา ‘‘อชฺช ปฏฺฐาย อมฺหากํ สลากภตฺตํ คณฺหถา’’ติ ปุน ปฏฺฐเปนฺติ, อนฺโตคาเม อคาเหตฺวา วิหารํ อาเนตฺวาว คาเหตพฺพํ. อิทญฺหิ ‘‘สลากภตฺตํ’’ นาม. อุทฺเทสภตฺตสทิสํ น โหติ, วิหารเมว สนฺธาย ทิยฺยติ, ตสฺมา พหิอุปจาเร คาเหตุํ น วฏฺฏติ. ‘‘สฺเว ปฏฺฐายา’’ติ วุตฺเต ปน วิหาเร คาเหตพฺพเมว. जर पाच-सहा शलाका हरवल्या असतील आणि भत्तुद्देशक दात्यांचे नाव विसरला असेल, तर त्याने त्या हरवलेल्या शलाका महाथेरांकडे किंवा स्वतःकडे आणून भिक्खूंना असे म्हटले की, 'मी अमुक गावात माझ्या वाटणीचे शलाका-भोजन मिळवले आहे, तुम्ही तिथे मिळालेले शलाका-भोजन ग्रहण करावे,' तर ते योग्य आहे. पण जे भोजन विहारात आणले गेले नाही, ते आसनशाळेत मिळवून तिथेच आणून जेवणे योग्य नाही. 'आजपासून माझे शलाका-भोजन स्वीकारावे' असे दात्याने म्हटले असता, तिथे आसनशाळेत ते स्वीकारणे योग्य नाही, तर ते विहारात आणूनच स्वीकारले पाहिजे. पण 'उद्यापासून' असे म्हटले असता, भत्तुद्देशकाला सांगावे की, 'उद्यापासून अमुक कुटुंब शलाका-भोजन देणार आहे, शलाका स्वीकारण्याच्या वेळी आठवण ठेवावी.' दुष्काळात शलाका-भोजन बंद करून सुकाळ झाल्यावर एखाद्या भिक्खूला पाहून 'आजपासून आमचे शलाका-भोजन स्वीकारावे' असे म्हणून जर ते पुन्हा सुरू करत असतील, तर ते गावाच्या आत न स्वीकारता विहारात आणूनच स्वीकारले पाहिजे. कारण हे 'शलाका-भोजन' उद्देश-भोजनासारखे नसते, ते विहारालाच उद्देशून दिले जाते; म्हणून उपचार-सीमेच्या बाहेर ते स्वीकारणे योग्य नाही. पण 'उद्यापासून' असे म्हटले असता, ते विहारातच स्वीकारले पाहिजे। คมิโก ภิกฺขุ ยํ ทิสาภาคํ คนฺตุกาโม, ตตฺถ อญฺเญน วารคามสลากา ลทฺธา โหติ, ตํ คเหตฺวา อิตรํ ภิกฺขุํ ‘‘มยฺหํ ปตฺตสลากํ ตฺวํ คณฺหาหี’’ติ วตฺวา คนฺตุํ วฏฺฏติ. เตน ปน อุปจารสีมํ อนติกฺกนฺเตเยว ตสฺมึ ตสฺส สลากา คาเหตพฺพา. प्रवासाला निघणारा भिक्खू ज्या देशात किंवा दिशेला जाऊ इच्छितो, तिथे जर दुसऱ्या एखाद्या भिक्खूला वळणानुसार मिळणाऱ्या गावाची शलाका मिळालेली असेल, तर ती घेऊन दुसऱ्या भिक्खूला 'माझ्या वाट्याला आलेली शलाका तू घे' असे सांगून जाणे योग्य आहे. पण त्या दुसऱ्या भिक्खूने, तो प्रवासाला निघणारा भिक्खू उपचार-सीमा ओलांडण्यापूर्वीच त्याची शलाका स्वीकारली पाहिजे। ฉฑฺฑิตวิหาเร มนุสฺสา โพธิเจติยาทีนิ ชคฺคิตฺวา ภุญฺชนฺตูติ สลากภตฺตํ ปฏฺฐเปนฺติ, ภิกฺขู สกฏฺฐาเนสุ วสิตฺวา กาลสฺเสว คนฺตฺวา ตตฺถ วตฺตํ กริตฺวา ตํ ภตฺตํ ภุญฺชนฺติ, วฏฺฏติ. สเจ เตสุ สฺวาตนาย อตฺตโน ปาเปตฺวา คเตสุ อาคนฺตุโก ภิกฺขุ ฉฑฺฑิตวิหาเร วสิตฺวา กาลสฺเสว วตฺตํ กตฺวา ฆณฺฏึ ปหริตฺวา สลากภตฺตํ อตฺตโน ปาเปตฺวา อาสนสาลํ คจฺฉติ, โสว ตสฺส ภตฺตสฺส อิสฺสโร. โย ปน ภิกฺขูสุ วตฺตํ กโรนฺเตสุเยว ภูมิยํ ทฺเว ตโย สมฺมุญฺชนิปฺปหาเร ทตฺวา ฆณฺฏึ ปหริตฺวา ‘‘ธุรคาเม สลากภตฺตํ มยฺหํ ปาปุณาตี’’ติ คจฺฉติ, ตสฺส ตํ โจริกาย คหิตตฺตา น ปาปุณาติ, วตฺตํ กตฺวา ปาเปตฺวา ปจฺฉา คตภิกฺขูนํเยว โหติ. परित्यक्त विहारात लोकांनी बोधिवृक्ष, चैत्य इत्यादींची निगा राखून 'भिक्खूंनी भोजन करावे' म्हणून शलाका-भोजन सुरू केले असेल, आणि भिक्खू आपापल्या ठिकाणी राहून सकाळी लवकर जाऊन तिथे कर्तव्य करून ते भोजन ग्रहण करत असतील, तर ते योग्य आहे. जर त्यांच्यापैकी काही जण दुसऱ्या दिवशीच्या भोजनासाठी स्वतःचे नाव नोंदवून निघून गेले असता, एखादा आगंतुक भिक्खू त्या परित्यक्त विहारात राहून सकाळी लवकर कर्तव्य करून, घंटा वाजवून, शलाका-भोजन स्वतःसाठी मिळवून आसनशाळेत जातो, तर तोच त्या भोजनाचा स्वामी ठरतो. पण जो भिक्खू इतर भिक्खू कर्तव्य करत असतानाच जमिनीवर दोन-तीन वेळा झाडू मारून, घंटा वाजवून 'मुख्य गावातील शलाका-भोजन मला मिळते' असे म्हणून निघून जातो, त्याला ते चोरीच्या मार्गाने घेतल्यामुळे मिळत नाही; तर ते कर्तव्य पूर्ण करून, भोजन मिळवून नंतर गेलेल्या भिक्खूंचेच होते। เอโก คาโม อติทูเร โหติ, ภิกฺขู นิจฺจํ คนฺตุํ น อิจฺฉนฺติ, มนุสฺสา ‘‘มยํ ปุญฺเญน ปริพาหิรา โหมา’’ติ วทนฺติ, เย ตสฺส คามสฺส อาสนฺนวิหาเร สภาคภิกฺขู, เต วตฺตพฺพา ‘‘อิเมสํ ภิกฺขูนํ อนาคตทิวเส ตุมฺเห ภุญฺชถา’’ติ. สลากา ปน เทวสิกํ ปาเปตพฺพา, ตา จ โข ปน ฆณฺฏิปฺปหรณมตฺเตน วา ปจฺฉิจาลนมตฺเตน วา ปาปิตา น โหนฺติ, ปจฺฉึ ปน คเหตฺวา [Pg.103] สลากา ปีฐเก อากิริตพฺพา, ปจฺฉิ ปน มุขวฏฺฏิยํ น คเหตพฺพา. สเจ หิ ตตฺถ อหิ วา วิจฺฉิโก วา ภเวยฺย, ทุกฺขํ อุปฺปาเทยฺย; ตสฺมา เหฏฺฐา คเหตฺวา ปจฺฉึ ปรมฺมุขํ กตฺวา สลากา อากิริตพฺพา ‘‘สเจปิ สปฺโป ภวิสฺสติ, เอตฺโตว ปลายิสฺสตี’’ติ. เอวํ สลากา อากิริตฺวา คามาทิวเสน ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว คาเหตพฺพา. อปิจ เอกํ มหาเถรสฺส ปาเปตฺวา ‘‘อวเสสา มยฺหํ ปาปุณนฺตี’’ติ อตฺตโน ปาเปตฺวา วตฺตํ กตฺวา เจติยํ วนฺทิตฺวา วิตกฺกมาฬเก ฐิเตหิ ภิกฺขูหิ ‘‘ปาปิตา, อาวุโส, สลากา’’ติ วุตฺเต ‘‘อาม, ภนฺเต, ตุมฺเห คตคตคาเม สลากภตฺตํ คณฺหถา’’ติ วตฺตพฺพํ; เอวํ ปาปิตาปิ หิ สุปาปิตาว โหนฺติ. एक गाव खूप दूर असते, भिक्खू तिथे रोज जाण्यास इच्छित नाहीत. लोक म्हणतात, 'आम्ही पुण्यापासून वंचित होत आहोत.' त्या गावाच्या जवळच्या विहारात जे समान शील असलेले भिक्खू राहतात, त्यांना सांगावे की, 'हे भिक्खू न येतील त्या दिवशी तुम्ही भोजन करावे.' पण शलाका रोज पाठवली पाहिजे. आणि ती केवळ घंटा वाजवून किंवा टोपली हलवून पाठवली जात नाही, तर टोपली घेऊन शलाका पाटावर ओतल्या पाहिजेत. पण टोपली तिच्या काठाला धरून पकडू नये. कारण जर त्यात साप किंवा विंचू असेल, तर तो इजा पोहोचवू शकतो; म्हणून खाली धरून, टोपलीचे तोंड विरुद्ध दिशेला करून शलाका ओतल्या पाहिजेत, 'जरी साप असला तरी तो इथूनच पळून जाईल' असा विचार करून. अशा प्रकारे शलाका ओतून, गावाच्या क्रमानुसार पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच त्या स्वीकारल्या पाहिजेत. शिवाय, एक शलाका महाथेरांकडे पाठवून 'उरलेल्या माझ्या वाट्याला येतात' असे स्वतःसाठी मिळवून, कर्तव्य करून, चैत्याला वंदन करून विचार-मंडपात उभे असलेल्या भिक्खूंनी 'आयुष्यमान, शलाका पाठवल्या का?' असे विचारले असता, 'होय भंते, तुम्ही आपापल्या गेलेल्या गावात शलाका-भोजन स्वीकारू शकता' असे सांगावे; कारण अशा प्रकारे पाठवलेल्या शलाका देखील चांगल्या प्रकारे पाठवलेल्याच ठरतात। ภิกฺขู สพฺพรตฺตึ ธมฺมสวนตฺถํ อญฺญํ วิหารํ คจฺฉนฺตา ‘‘มยํ ตตฺถ ทานํ อคฺคเหตฺวาว อมฺหากํ โคจรคาเมว ปิณฺฑาย จริตฺวา อาคมิสฺสามา’’ติ สลากา อคฺคเหตฺวาว คตา, วิหาเร เถรสฺส ปตฺตสลากภตฺตํ ภุญฺชิตุํ อาคจฺฉนฺติ, วฏฺฏติ. อถ มหาเถโรปิ ‘‘อหํ อิธ กึ กโรมี’’ติ เตหิเยว สทฺธึ คจฺฉติ, เตหิ คตวิหาเร อภุญฺชิตฺวาว โคจรคามํ อนุปฺปตฺเตหิ ‘‘เทถ, ภนฺเต, ปตฺเต สลากยาคุอาทีนิ อาหริสฺสามา’’ติ วุตฺเต ปตฺตา น ทาตพฺพา. ‘‘กสฺมา, ภนฺเต, น เทถา’’ติ ‘‘วิหารฏฺฐกํ ภตฺตํ วิหาเร วุตฺถานํ ปาปุณาติ, มยํ อญฺญสฺมึ วิหาเร วุตฺถา’’ติ. ‘‘เทถ, ภนฺเต, น มยํ วิหาเร ปาลิกาย เทม, ตุมฺหากํ เทม, คณฺหถ อมฺหากํ ภิกฺข’’นฺติ วุตฺเต ปน วฏฺฏติ. भिक्खू रात्रभर धम्मश्रवणासाठी दुसऱ्या विहारात जात असताना 'आम्ही तिथे दान न स्वीकारताच आमच्या गोचर-गावातच पिंडपातासाठी फिरून परत येऊ' असे सांगून शलाका न घेताच गेले, आणि नंतर विहारात थेरांच्या वाट्याला आलेले शलाका-भोजन जेवण्यासाठी येतात, तर ते योग्य आहे. नंतर महाथेर देखील 'मी इथे काय करू?' असे म्हणून त्यांच्यासोबतच जातात. त्यांनी गेलेल्या विहारात न जेवताच गोचर-गावात पोहोचल्यावर दात्यांनी 'भंते, पात्र द्या, आम्ही शलाका-पेज इत्यादी घेऊन येतो' असे म्हटले असता पात्र देऊ नयेत. 'भंते, का देत नाही?' असे विचारले असता 'विहारासाठी असलेले भोजन विहारात राहणाऱ्या भिक्खूंना मिळते, आम्ही दुसऱ्या विहारात राहिलो होतो' असे सांगावे. पण जर 'भंते, द्या, आम्ही विहाराच्या रक्षणासाठी देत नाही, तर आम्ही तुम्हाला देत आहोत, आमची भिक्षा स्वीकारा' असे म्हटले असता पात्र देणे योग्य आहे। สลากภตฺตกถา นิฏฺฐิตา. शलाका-भोजन कथा समाप्त झाली। ปกฺขิกภตฺตาทิกถา पाक्षिक-भोजन इत्यादी कथा ปกฺขิกาทีสุ ปน ยํ อภิลกฺขิเตสุ จาตุทฺทสี ปญฺจทสี ปญฺจมี อฏฺฐมีติ อิเมสุ ปกฺเขสุ กมฺมปฺปสุเตหิ อุโปสถํ กาตุํ สติกรณตฺถาย ทิยฺยติ, ตํ ปกฺขิกํ นาม. ตํ สลากภตฺตคติกเมว โหติ, คาเหตฺวา ภุญฺชิตพฺพํ. สเจ สลากภตฺตมฺปิ ปกฺขิกภตฺตมฺปิ พหุ สพฺเพสํ วินิวิชฺฌิตฺวา คจฺฉติ, ทฺเวปิ ภตฺตานิ วิสุํ วิสุํ คาเหตพฺพานิ. สเจ ภิกฺขุสงฺโฆ มหา, ปกฺขิกํ คาเหตฺวา ตสฺส ฐิติกาย สลากภตฺตํ คาเหตพฺพํ[Pg.104], สลากภตฺตํ วา คาหาเปตฺวา ตสฺส ฐิติกาย ปกฺขิกํ คาเหตพฺพํ. เยสํ น ปาปุณาติ, เต ปิณฺฑาย จริสฺสนฺติ. สเจ ทฺเวปิ ภตฺตานิ พหูนิ, ภิกฺขู มนฺทา; สลากภตฺตํ นาม เทวสิกํ ลพฺภติ, ตสฺมา ตํ ฐเปตฺวา ‘‘ปกฺขิกํ อาวุโส ภุญฺชถา’’ติ ปกฺขิกเมว คาเหตพฺพํ. ปกฺขิกํ ปณีตํ เทนฺติ, วิสุํ ฐิติกา กาตพฺพา. ‘‘สฺเว ปกฺโข’’ติ อชฺช ปกฺขิกํ น คาเหตพฺพํ. สเจ ปน ทายกา วทนฺติ ‘‘สฺเว อมฺหากํ ฆเร ลูขภตฺตํ ภวิสฺสติ, อชฺเชว ปกฺขิกภตฺตํ อุทฺทิสถา’’ติ, เอวํ วฏฺฏติ. पक्खिक (पक्षिक) भात इत्यादींमध्ये, चतुर्दशी, पंचदशी, पंचमी आणि अष्टमी या निश्चित केलेल्या पक्षाच्या (पंधरवड्याच्या) दिवसांमध्ये, कामात व्यस्त असणाऱ्या लोकांनी उपोसथ करण्यासाठी आणि स्मरणात ठेवण्याच्या हेतूने जो भात दिला जातो, त्याला 'पक्षिक-भात' म्हणतात. तो शलाका-भातासारखाच असतो, तो स्वीकारून ग्रहण करावा. जर शलाका-भात आणि पक्षिक-भात दोन्ही भरपूर प्रमाणात असतील आणि सर्वांना पुरून उरत असतील, तर दोन्ही भात स्वतंत्रपणे स्वीकारले पाहिजेत. जर भिक्खू संघ मोठा असेल, तर आधी पक्षिक-भात स्वीकारून त्याच्या क्रमाने (पाळीनुसार) शलाका-भात स्वीकारावा, किंवा आधी शलाका-भात स्वीकारायला लावून त्याच्या क्रमाने पक्षिक-भात स्वीकारावा. ज्यांच्यापर्यंत तो पोहोचत नाही, ते पिंडपातासाठी (भिक्षेसाठी) फिरतील. जर दोन्ही भात भरपूर असतील आणि भिक्खू कमी असतील; शलाका-भात तर रोजच मिळतो, म्हणून तो बाजूला ठेवून 'आयुष्यमानहो, पक्षिक-भात ग्रहण करा' असे सांगून पक्षिक-भातच स्वीकारला पाहिजे. जर पक्षिक-भात उत्तम दर्जाचा देत असतील, तर स्वतंत्र क्रमानुसारी वाटप करावे. 'उद्या पक्ष आहे' म्हणून आजच पक्षिक-भात स्वीकारू नये. पण जर दायक (दाते) असे म्हणत असतील की, 'उद्या आमच्या घरी साधा भात असेल, आजच पक्षिक-भाताचा स्वीकार करा,' तर असे करणे योग्य आहे। อุโปสถิกํ นาม อนฺวฑฺฒมาเส อุโปสถงฺคานิ สมาทิยิตฺวา ยํ อตฺตนา ภุญฺชติ, ตเทว ทิยฺยติ. ปาฏิปทิกํ นาม ‘‘อุโปสเถ พหู สทฺธา ปสนฺนา ภิกฺขูนํ สกฺการํ กโรนฺติ, ปาฏิปเท ปน ภิกฺขู กิลมนฺติ, ปาฏิปเท ทินฺนํ ทุพฺภิกฺขทานสทิสํ มหปฺผลํ โหติ, อุโปสถกมฺเมน วา ปริสุทฺธสีลานํ ทุติยทิวเส ทินฺนํ มหปฺผลํ โหตี’’ติ สลฺลกฺเขตฺวา ปาฏิปเท ทิยฺยนกทานํ, ตมฺปิ อุภยํ สลากภตฺตคติกเมว. อิติ อิมานิ สตฺตปิ ภตฺตานิ ปิณฺฑปาติกานํ น วฏฺฏนฺติ, ธุตงฺคเภทํ กโรนฺติเยว. 'उपोसथिक' भात म्हणजे प्रत्येक पंधरवड्याला उपोसथाचे नियम धारण करून जो भात स्वतः खाल्ला जातो, तोच दान दिला जातो. 'पाटीपदिक' (प्रतिपदेचा) भात म्हणजे 'उपोसथाच्या दिवशी अनेक श्रद्धावान व प्रसन्न दाते भिक्खूंचा सत्कार करतात, पण प्रतिपदेच्या दिवशी भिक्खूंना त्रास होतो. प्रतिपदेच्या दिवशी दिलेले दान हे दुष्काळातील दानासारखे महाफळ देणारे असते, किंवा उपोसथाच्या कर्मामुळे शुद्ध शील असणाऱ्यांना दुसऱ्या दिवशी दिलेले दान महाफळ देणारे असते,' असा विचार करून प्रतिपदेच्या दिवशी दिले जाणारे दान होय. ते दोन्ही (उपोसथिक आणि पाटीपदिक भात) शलाका-भातासारखेच आहेत. अशा प्रकारे, हे सातही प्रकारचे भात पिंडपातिक (केवळ भिक्षेवर राहणाऱ्या) भिक्खूंसाठी योग्य नाहीत, कारण ते त्यांच्या धुतांगाचा भंग करतात। อปรานิปิ จีวรกฺขนฺธเก วิสาขาย วรํ ยาจิตฺวา ทินฺนานิ อาคนฺตุกภตฺตํ คมิยภตฺตํ คิลานภตฺตํ คิลานุปฏฺฐากภตฺตนฺติ จตฺตาริ ภตฺตานิ ปาฬิยํ อาคตาเนว, ตตฺถ อาคนฺตุกานํ ทินฺนํ ภตฺตํ ‘‘อาคนฺตุกภตฺตํ’’. เอส นโย เสเสสุ. สเจ ปเนตฺถ อาคนฺตุกภตฺตานิปิ อาคนฺตุกาปิ พหู โหนฺติ, สพฺเพสํ เอเกกํ คาเหตพฺพํ, ภตฺเตสุ อปฺปโหนฺเตสุ ฐิติกาย คาเหตพฺพํ. เอโก อาคนฺตุโก ปฐมเมว อาคนฺตฺวา สพฺพํ อาคนฺตุกภตฺตํ อตฺตโน คาเหตฺวา นิสีทติ, สพฺพํ ตสฺเสว โหติ, ปจฺฉา อาคเตหิ อาคนฺตุเกหิ เตน ทินฺนานิ ปริภุญฺชิตพฺพานิ. เตนปิ เอกํ อตฺตโน คเหตฺวา เสสานิ ทาตพฺพานิ. อยํ อุฬาโร. इतरही, चीवरक्खंधकात विशाखेने वर मागून घेतल्यामुळे दिलेले आगंतुक-भात, गमिक-भात, ग्लान-भात आणि ग्लान-उपस्थायक-भात हे चार प्रकारचे भात पाळीमध्ये (त्रिपिटकात) आलेलेच आहेत. त्यापैकी, आगंतुकांना (बाहेरून आलेल्यांना) दिलेला भात म्हणजे 'आगंतुक-भात' होय. उर्वरित भातांच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. जर येथे आगंतुक-भात आणि आगंतुक भिक्खू दोन्ही पुष्कळ असतील, तर सर्वांनी एकेक स्वीकारला पाहिजे. जर भात अपुरा असेल, तर क्रमाने (पाळीनुसार) स्वीकारला पाहिजे. जर एखादा आगंतुक भिक्खू आधीच येऊन सर्व आगंतुक-भात स्वतःसाठी स्वीकारून बसला, तर तो सर्व भात त्याचाच होतो. नंतर आलेल्या आगंतुकांनी त्याने दिलेला भात ग्रहण करावा. त्यानेही स्वतःसाठी एक ठेवून उर्वरित भात इतरांना दिला पाहिजे. हा मार्ग अत्यंत उदार (श्रेष्ठ) आहे। สเจ ปน โย ปฐมํ อาคนฺตฺวาปิ อตฺตโน อคฺคเหตฺวา ตุณฺหีภูโต นิสีทติ, ปจฺฉา อาคเตหิ สทฺธึ ปฏิปาฏิยา คณฺหิตพฺพํ. สเจ นิจฺจํ อาคนฺตุกา อาคจฺฉนฺติ, อาคตทิวเสเยว ภุญฺชิตพฺพํ, อนฺตรนฺตรา เจ อาคจฺฉนฺติ, ทฺเว ตีณิ ทิวสานิ ภุญฺชิตพฺพํ. มหาปจฺจริยํ ปน ‘‘สตฺต ทิวสานิ ภุญฺชิตุํ วฏฺฏตี’’ติ วุตฺตํ. पण जर जो आधी येऊनही स्वतःसाठी न घेता शांत बसून राहतो, तर त्याने नंतर आलेल्यांसोबत क्रमाने तो स्वीकारला पाहिजे. जर आगंतुक रोजच येत असतील, तर आल्याच्या दिवशीच तो ग्रहण करावा. जर ते कधीकधी येत असतील, तर दोन-तीन दिवस तो ग्रहण करता येतो. महाप्रत्यरी (महापच्चरी) अट्ठकथेत मात्र 'सात दिवसांपर्यंत ग्रहण करणे योग्य आहे' असे म्हटले आहे। อาวาสิโก [Pg.105] กตฺถจิ คนฺตฺวา อาคโต, เตนาปิ อาคนฺตุกภตฺตํ ปริภุญฺชิตพฺพํ. สเจ ปน ตํ วิหาเร นิพนฺธาปิตํ โหติ, วิหาเร คาเหตพฺพํ. อถ วิหาโร ทูเร โหติ, อาสนสาลาย นิพนฺธาปิตํ อาสนสาลาย คาเหตพฺพํ. สเจ ปน ทายกา ‘‘อาคนฺตุเกสุ อสติ อาวาสิกาปิ ปริภุญฺชนฺตู’’ติ วทนฺติ, วฏฺฏติ. एखादा निवासी (आवासिक) भिक्खू कुठे जाऊन परत आला असेल, तर त्यानेही आगंतुक-भात ग्रहण करावा. पण जर तो (भात) विहारातच नियमितपणे देण्याचे ठरले असेल, तर तो विहारातच स्वीकारला पाहिजे. जर विहार दूर असेल आणि आसनशाळेत नियमित देण्याचे ठरले असेल, तर तो आसनशाळेत स्वीकारला पाहिजे. पण जर दायक असे म्हणत असतील की, 'आगंतुक भिक्खू नसतील तेव्हा निवासी भिक्खूंनीही तो ग्रहण करावा,' तर ते योग्य आहे। คมิยภตฺเตปิ อยเมว กถามคฺโค. อยํ ปน วิเสโส – อาคนฺตุโก อาคนฺตุกภตฺตเมว ลภติ, คมิโก อาคนฺตุกภตฺตมฺปิ คมิยภตฺตมฺปิ. อาวาสิโกปิ ปกฺกมิตุกาโม คมิโก โหติ; คมิยภตฺตํ ลภติ. ยถา ปน อาคนฺตุกภตฺตํ; เอวมิทํ ทฺเว วา ตีณิ วา สตฺต วา ทิวสานิ น ลพฺภติ. ‘‘คมิสฺสามี’’ติ ภุตฺโต ตํทิวสํ เกนจิเทว การเณน น คโต, ปุนทิวเสปิ ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ, สอุสฺสาหตฺตา. ‘‘คมิสฺสามี’’ติ ภุตฺตสฺส โจรา วา ปนฺถํ รุนฺธนฺติ อุทกํ วา, เทโว วา วสฺสติ, สตฺโถ วา น คจฺฉติ, สอุสฺสาเหน ภุญฺชิตพฺพํ. เอเต อุปทฺทเว โอโลเกนฺเตน ‘‘ทฺเว ตโย ทิวเส ภุญฺชิตุํ วฏฺฏตี’’ติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. ‘‘คมิสฺสามี’’ติ ปน เลสํ โอฑฺเฑตฺวา ภุญฺชิตุํ น ลภติ. गमिक-भाताच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. पण हा विशेष फरक आहे - आगंतुक भिक्खूला केवळ आगंतुक-भातच मिळतो, तर गमिक (प्रवासाला जाणाऱ्या) भिक्खूला आगंतुक-भात आणि गमिक-भात दोन्ही मिळतात. निवासी भिक्खू देखील जर बाहेर जाण्याची इच्छा ठेवणारा असेल, तर तो 'गमिक' होतो; त्याला गमिक-भात मिळतो. पण जसा आगंतुक-भात मिळतो, तसा हा गमिक-भात दोन, तीन किंवा सात दिवस मिळत नाही. 'मी जाईन' असा विचार करून भोजन केले, पण त्या दिवशी काही कारणास्तव तो गेला नाही, तर प्रवासाची तयारी चालू असल्यामुळे दुसऱ्या दिवशीही तो ग्रहण करणे योग्य आहे. 'मी जाईन' असा विचार करून भोजन केलेल्या भिक्खूचा मार्ग चोरांनी किंवा पाण्याने अडवला असेल, किंवा पाऊस पडत असेल, किंवा व्यापारी तांडा जात नसेल, तर प्रवासाच्या तयारीसह तो ग्रहण करू शकतो. या संकटांकडे पाहत असताना 'दोन-तीन दिवस ग्रहण करणे योग्य आहे' असे महाप्रत्यरीमध्ये म्हटले आहे. पण 'मी जाईन' असे केवळ निमित्त पुढे करून तो ग्रहण करता येत नाही। คิลานภตฺตมฺปิ สเจ สพฺเพสํ คิลานานํ ปโหติ, สพฺเพสํ ทาตพฺพํ; โน เจ, ฐิติกํ กตฺวา คาเหตพฺพํ. เอโก คิลาโน อโรครูโป สกฺโกติ อนฺโตคามํ คนฺตุํ, เอโก น สกฺโกติ, อยํ ‘‘มหาคิลาโน’’ นาม. เอตสฺส คิลานภตฺตํ ทาตพฺพํ. ทฺเว มหาคิลานา – เอโก ลาภี อภิญฺญาโต พหุํ ขาทนียํ โภชนียํ ลภติ, เอโก อนาโถ อปฺปลาภตาย อนฺโตคามํ ปวิสติ – เอตสฺส คิลานภตฺตํ ทาตพฺพํ. คิลานภตฺเต ปน ทิวสปริจฺเฉโท นตฺถิ. ยาว โรโค น วูปสมฺมติ, สปฺปายโภชนํ อภุญฺชนฺโต น ยาเปติ, ตาว ภุญฺชิตพฺพํ. ยทา ปน มิสฺสกยาคุํ วา มิสฺสกภตฺตํ วา ภุตฺตสฺสาปิ โรโค น กุปฺปติ, ตโต ปฏฺฐาย น ภุญฺชิตพฺพํ. ग्लान-भात (आजारी भिक्खूंचा भात) देखील जर सर्व आजारी भिक्खूंना पुरत असेल, तर सर्वांना द्यावा; जर पुरत नसेल, तर क्रमाने वाटप करून स्वीकारावा. एक आजारी भिक्खू जो बरा झाल्यासारखा आहे आणि गावात जाण्यास समर्थ आहे, आणि दुसरा जो गावात जाण्यास असमर्थ आहे; या असमर्थ भिक्खूला 'महाग्लान' म्हणतात. त्याला ग्लान-भात दिला पाहिजे. जर दोन महाग्लान असतील - एक ज्याला भरपूर लाभ मिळतो, जो प्रसिद्ध आहे आणि ज्याला पुष्कळ खाण्यापिण्याच्या वस्तू मिळतात; आणि दुसरा जो अनाथ आहे, ज्याला कमी लाभ मिळतो आणि त्याला गावात जावे लागते - तर या अनाथ महाग्लान भिक्खूला ग्लान-भात दिला पाहिजे. ग्लान-भाताच्या बाबतीत दिवसांची मर्यादा नाही. जोपर्यंत आजार बरा होत नाही आणि पथ्यकर भोजन न मिळाल्यास तो प्रकृती टिकवू शकत नाही, तोपर्यंत तो ग्रहण करावा. पण जेव्हा मिश्र पेज किंवा मिश्र भात खाल्ल्यावरही आजार बळावत नाही, तेव्हापासून तो ग्रहण करू नये। คิลานุปฏฺฐากภตฺตมฺปิ ยํ สพฺเพสํ ปโหติ, ตํ สพฺเพสํ ทาตพฺพํ; โน เจ ปโหติ, ฐิติกํ กตฺวา คาเหตพฺพํ. อิทมฺปิ ทฺวีสุ คิลาเนสุ มหาคิลานุปฏฺฐากสฺส คาเหตพฺพํ, ทฺวีสุ มหาคิลาเนสุ อนาถคิลานุปฏฺฐากสฺส. ยํ กุลํ คิลานภตฺตมฺปิ เทติ คิลานุปฏฺฐากภตฺตมฺปิ, ตตฺถ [Pg.106] ยสฺส คิลานสฺส ภตฺตํ ปาปุณาติ ตทุปฏฺฐากสฺสาปิ ตตฺเถว คาเหตพฺพํ. คิลานุปฏฺฐากภตฺเตปิ ทิวสปริจฺเฉโท นตฺถิ, ยาว คิลาโน ลภติ, ตาวสฺส อุปฏฺฐาโกปิ ลภตีติ. อิมานิ จตฺตาริ ภตฺตานิ สเจ เอวํ ทินฺนานิ โหนฺติ ‘‘อาคนฺตุกคมิกคิลานุปฏฺฐากา มม ภิกฺขํ คณฺหนฺตู’’ติ, ปิณฺฑปาติกานมฺปิ วฏฺฏติ. สเจ ปน อาคนฺตุกาทีนํ ภตฺตํ นิพนฺธาเปมิ, ‘‘มม ภตฺตํ คณฺหนฺตู’’ติ เอวํ ทินฺนานิ โหนฺติ, ปิณฺฑปาติกานํ น วฏฺฏติ. ग्लान-उपस्थायक-भात देखील जर सर्व सेवकांना पुरत असेल, तर सर्वांना द्यावा; जर पुरत नसेल, तर क्रमाने वाटप करून स्वीकारावा. हा भात देखील दोन आजारी भिक्खूंपैकी महाग्लान भिक्खूची सेवा करणाऱ्याला दिला पाहिजे; आणि दोन महाग्लान भिक्खूंपैकी अनाथ महाग्लान भिक्खूची सेवा करणाऱ्याला दिला पाहिजे. जे कुटुंब ग्लान-भात आणि ग्लान-उपस्थायक-भात दोन्ही देते, त्या कुटुंबाकडून ज्या आजारी भिक्खूला भात मिळतो, त्याच्या सेवकासाठी देखील त्याच कुटुंबाकडून भात स्वीकारला पाहिजे. ग्लान-उपस्थायक-भाताच्या बाबतीतही दिवसांची मर्यादा नाही; जोपर्यंत आजारी भिक्खूला भात मिळतो, तोपर्यंत त्याच्या सेवकालाही तो मिळतो. जर हे चार प्रकारचे भात 'आगंतुक, गमिक आणि ग्लान-उपस्थायक भिक्खूंनी माझी भिक्षा ग्रहण करावी' असे म्हणून दिले गेले असतील, तर ते पिंडपातिक भिक्खूंसाठीही योग्य आहेत. पण जर 'मी आगंतुक इत्यादींसाठी भात नियमितपणे देण्याचे ठरवतो, त्यांनी माझा भात ग्रहण करावा' असे म्हणून दिले गेले असतील, तर ते पिंडपातिक भिक्खूंसाठी योग्य नाहीत। อปรานิปิ ‘‘ธุรภตฺตํ, กุฏิภตฺตํ, วารภตฺต’’นฺติ ตีณิ ภตฺตานิ. ตตฺถ ธุรภตฺตนฺติ นิจฺจภตฺตํ วุจฺจติ, ตํ ทุวิธํ – สงฺฆิกํ ปุคฺคลิกญฺจ. ตตฺถ ยํ ‘‘สงฺฆสฺส ธุรภตฺตํ เทมา’’ติ นิพนฺธาปิตํ, ตํ สลากภตฺตคติกํ. ‘‘มม นิพทฺธํ ภิกฺขํ คณฺหนฺตู’’ติ วตฺวา ทินฺนํ ปน ปิณฺฑปาติกานมฺปิ วฏฺฏติ. ปุคฺคลิเกปิ ‘‘ตุมฺหากํ ธุรภตฺตํ ทมฺมี’’ติ วุตฺเต ปิณฺฑปาติโก เจ, น วฏฺฏติ. ‘‘มม นิพทฺธํ ภิกฺขํ คณฺหถา’’ติ วุตฺเต ปน วฏฺฏติ, สาทิตพฺพํ. สเจปิ ปจฺฉา กติปาเห วีติวตฺเต ‘‘ธุรภตฺตํ คณฺหถา’’ติ วทติ, มูเล สุฏฺฐุ สมฺปฏิจฺฉิตตฺตา วฏฺฏติ. इतरही 'धुरभक्त' (नियमित भोजन), 'कुटिभक्त' (कुटीसाठीचे भोजन) आणि 'वारभक्त' (आळीपाळीने दिलेले भोजन) अशी तीन भक्ते (भोजने) आहेत. त्यापैकी धुरभक्त म्हणजे नित्यभक्त (नेहमी दिले जाणारे भोजन) असे म्हटले जाते. ते दोन प्रकारचे असते - सांघिक आणि पुद्गलिक (वैयक्तिक). त्यापैकी जे "आम्ही संघाला धुरभक्त देतो" असे म्हणून निश्चित केले जाते, ते शलाकाभक्तासारखे (सलाकाभक्त) मानले जाते. परंतु, "माझी नियमित भिक्षा स्वीकारावी" असे म्हणून दिलेले भोजन पिंडपातिक (केवळ भिक्षेवर राहणाऱ्या) भिक्खूंनाही चालते. वैयक्तिक भक्तामध्ये देखील जर "मी आपल्याला धुरभक्त देतो" असे म्हटले आणि तो पिंडपातिक भिक्खू असेल, तर ते चालत नाही. परंतु, "माझी नियमित भिक्षा ग्रहण करा" असे म्हटले असता ते चालते आणि ते स्वीकारण्यास योग्य आहे. नंतर काही दिवस उलटून गेल्यावर जरी तो "धुरभक्त ग्रहण करा" असे म्हणत असला, तरी सुरुवातीला योग्य प्रकारे स्वीकारले गेल्यामुळे ते चालते. กุฏิภตฺตํ นาม ยํ สงฺฆสฺส อาวาสํ กาเรตฺวา ‘‘อมฺหากํ เสนาสนวาสิโน อมฺหากํเยว ภตฺตํ คณฺหนฺตู’’ติ เอวํ นิพนฺธาปิตํ, ตํ สลากภตฺตคติกเมว โหติ, คเหตฺวา ภุญฺชิตพฺพํ. ‘‘อมฺหากํ เสนาสนวาสิโน อมฺหากํเยว ภิกฺขํ คณฺหนฺตู’’ติ วุตฺเต ปน ปิณฺฑปาติกานมฺปิ วฏฺฏติ. ยํ ปน ปุคฺคเล ปสีทิตฺวา ตสฺส วา อาวาสํ กตฺวา ‘‘ตุมฺหากํ เทมา’’ติ ทินฺนํ, ตํ ตสฺเสว โหติ, ตสฺมึ กตฺถจิ คเต นิสฺสิตเกหิ ภุญฺชิตพฺพํ. कुटिभक्त म्हणजे संघासाठी विहार (आवास) बांधून "आमच्या विहारात राहणारे भिक्खू आमचेच भोजन ग्रहण करोत" असे म्हणून जे निश्चित केले जाते. ते शलाकाभक्तासारखेच असते, ते घेऊन ग्रहण करावे. परंतु, "आमच्या विहारात राहणारे भिक्खू आमचीच भिक्षा ग्रहण करोत" असे म्हटले असता पिंडपातिक भिक्खूंनाही ते चालते. परंतु, एखाद्या व्यक्तीवर प्रसन्न होऊन, त्याच्यासाठी विहार बांधून "आम्ही आपल्याला देतो" असे म्हणून जे दिले जाते, ते त्याच्यासाठीच असते. तो भिक्खू इतरत्र कोठे गेला असता, त्याच्यावर आश्रित असलेल्या शिष्यांनी ते ग्रहण करावे. วารภตฺตํ นาม ทุพฺภิกฺขสมเย ‘‘วาเรน ภิกฺขู ชคฺคิสฺสามา’’ติ ธุรเคหโต ปฏฺฐาย ทินฺนํ, ตมฺปิ ภิกฺขาวจเนน ทินฺนํ ปิณฺฑปาติกานํ วฏฺฏติ. ‘‘วารภตฺต’’นฺติ วุตฺเต ปน สลากภตฺตคติกํ โหติ. สเจ ตณฺฑุลาทีนิ เปเสนฺติ, ‘‘สามเณรา ปจิตฺวา เทนฺตู’’ติ, ปิณฺฑปาติกานํ วฏฺฏติ. อิติ อิมานิ จ ตีณิ อาคนฺตุกภตฺตาทีนิ จ จตฺตารีติ สตฺต, ตานิ สงฺฆภตฺตาทีหิ สห จุทฺทส ภตฺตานิ โหนฺติ. वारभक्त म्हणजे दुष्काळाच्या वेळी "आम्ही आळीपाळीने भिक्खूंची काळजी घेऊ" असा विचार करून मुख्य घरापासून सुरुवात करून दिलेले भोजन होय. ते देखील 'भिक्षा' या शब्दाने दिले गेले असता पिंडपातिक भिक्खूंना चालते. परंतु, "वारभक्त" असे म्हटले असता ते शलाकाभक्तासारखे होते. जर ते तांदूळ इत्यादी पाठवत असतील आणि "सामणेरांनी ते शिजवून द्यावे" असे म्हणत असतील, तर ते पिंडपातिक भिक्खूंना चालते. अशा प्रकारे ही तीन आणि आगंतुकभक्तादी चार मिळून सात भक्ते होतात. ती संघभक्तादींसोबत मिळून चौदा भक्ते होतात. อฏฺฐกถายํ ปน วิหารภตฺตํ, อฏฺฐกภตฺตํ, จตุกฺกภตฺตํ, คุฬฺหกภตฺตนฺติ อญฺญานิปิ จตฺตาริ ภตฺตานิ วุตฺตานิ. ตตฺถ วิหารภตฺตํ นาม วิหาเร ตตฺรุปฺปาทภตฺตํ, ตํ สงฺฆภตฺเตน คหิตํ. ตํ ปน ติสฺสมหาวิหารจิตฺตลปพฺพตาทีสุ ปฏิสมฺภิทาปตฺเตหิ ขีณาสเวหิ ยถา ปิณฺฑปาติกานมฺปิ สกฺกา [Pg.107] โหติ ปริภุญฺชิตุํ, ตถา ปฏิคฺคหิตตฺตา ตาทิเสสุ ฐาเนสุ ปิณฺฑปาติกานมฺปิ วฏฺฏติ. ‘‘อฏฺฐนฺนํ ภิกฺขูนํ เทม, จตุนฺนํ เทมา’’ติ เอวํ ทินฺนํ ปน อฏฺฐกภตฺตญฺเจว จตุกฺกภตฺตญฺจ; ตมฺปิ ภิกฺขาวจเนน ทินฺนํ ปิณฺฑปาติกานํ วฏฺฏติ. มหาภิสงฺขาริเกน อติรสกปูเวน ปตฺตํ ปูเรตฺวา ถเกตฺวา ทินฺนํ คุฬฺหกภตฺตํ นาม. อิมานิ ตีณิ สลากภตฺตคติกาเนว. परंतु अट्ठकथेत विहारभक्त, अष्टकभक्त, चतुष्कभक्त आणि गुळ्हकभक्त (गुप्तभक्त) अशी इतर चार भक्तेही सांगितली आहेत. त्यापैकी विहारभक्त म्हणजे विहारात उत्पन्न होणारे भोजन होय. त्याचा समावेश संघभक्तामध्येच केला जातो. परंतु, तिस्समहाविहार, चित्तलपब्बत इत्यादी विहारांमध्ये प्रतिसंभिदा प्राप्त क्षीणास्र (अर्हत) भिक्खूंनी ज्या प्रकारे ते स्वीकारले होते, जेणेकरून पिंडपातिक भिक्खूंनाही ते ग्रहण करणे शक्य व्हावे, त्या प्रकारे स्वीकारले गेल्यामुळे अशा ठिकाणी पिंडपातिक भिक्खूंनाही ते चालते. "आम्ही आठ भिक्खूंना देतो, चार भिक्खूंना देतो" अशा प्रकारे दिलेले भोजन अनुक्रमे अष्टकभक्त आणि चतुष्कभक्त असते. ते देखील 'भिक्षा' या शब्दाने दिले गेले असता पिंडपातिक भिक्खूंना चालते. मोठ्या प्रमाणावर तयार केलेल्या अत्यंत चवदार पुऱ्यांनी (किंवा गोड पदार्थांनी) पात्र भरून, ते झाकून दिलेले भोजन म्हणजे 'गुळ्हकभक्त' होय. ही तिन्ही भक्ते शलाकाभक्तासारखीच असतात. อปรมฺปิ คุฬกภตฺตํ นาม อตฺถิ, อิเธกจฺเจ มนุสฺสา มหาธมฺมสวนญฺจ วิหารปูชญฺจ กาเรตฺวา สกลสงฺฆสฺส ทาตุํ น สกฺโกมาติ, ‘‘ทฺเว ตีณิ ภิกฺขุสตานิ อมฺหากํ ภิกฺขํ คณฺหนฺตู’’ติ ภิกฺขุปริจฺเฉทชานนตฺถํ คุฬเก เทนฺติ, อิทํ ปิณฺฑปาติกานมฺปิ วฏฺฏติ. อิติ จีวรกฺขนฺธเก จีวรภาชนียํ, อิมสฺมึ ปน เสนาสนกฺขนฺธเก เสนาสนภาชนียญฺเจว ปิณฺฑปาตภาชนียญฺจ วุตฺตํ. आणकी एक 'गुळभक्त' (गुळकाभक्त) नावाचे भोजन आहे. येथे काही लोक मोठा धर्मश्रवण सोहळा आणि विहारपूजा करून "आम्ही संपूर्ण संघाला दान देण्यास असमर्थ आहोत" असा विचार करतात आणि "दोन-तीनशे भिक्खूंनी आमची भिक्षा स्वीकारावी" असे म्हणून भिक्खूंची संख्या निश्चित करण्यासाठी गुळाचे खडे (गुळके) देतात. हे पिंडपातिक भिक्खूंनाही चालते. अशा प्रकारे चीवरस्कंधकात चीवर वाटप पद्धती (चीवरभाजन), आणि या सेनासनस्कंधकात सेनासन वाटप पद्धती (सेनासनभाजन) व पिंडपात वाटप पद्धती (पिंडपातभाजन) सांगितली आहे. คิลานปจฺจยภาชนียํ ปน เอวํ เวทิตพฺพํ – สปฺปิอาทีสุ เภสชฺเชสุ ราชราชมหามตฺตา สปฺปิสฺส ตาว กุมฺภสตมฺปิ กุมฺภสหสฺสมฺปิ วิหารํ เปเสนฺติ, ฆณฺฏึ ปหริตฺวา เถราสนโต ปฏฺฐาย คหิตภาชนํ ปูเรตฺวา ทาตพฺพํ, ปิณฺฑปาติกานมฺปิ วฏฺฏติ. สเจ อลสชาติกา มหาเถรา ปจฺฉา อาคจฺฉนฺติ, ‘‘ภนฺเต, วีสติวสฺสานํ ทิยฺยติ, ตุมฺหากํ ฐิติกา อติกฺกนฺตา’’ติ น วตฺตพฺพา, ฐิติกํ ฐเปตฺวา เตสํ ทตฺวา ปจฺฉา ฐิติกาย ทาตพฺพํ. ग्लानप्रत्यय (आजारी भिक्खूंसाठीची औषधे) वाटप पद्धती या प्रकारे समजून घ्यावी - तूप इत्यादी औषधांमध्ये, राजे आणि राजमहामात्र तुपाचे शंभर किंवा हजार घडे विहारात पाठवतात. घंटा वाजवून, थेरांच्या आसनापासून सुरुवात करून, आणलेले भांडे भरून ते दिले पाहिजे. हे पिंडपातिक भिक्खूंनाही चालते. जर आळशी स्वभावाचे महाथेर नंतर आले, तर "भंते, वीस वर्षांच्या (दीक्षा घेतलेल्या) भिक्खूंना दिले जात आहे, आपली पाळी निघून गेली आहे" असे त्यांना म्हणू नये. वाटपाचा क्रम थांबवून, आधी त्या महाथेरांना देऊन, नंतर क्रमानुसार वाटप करावे. ‘‘อสุกวิหาเร พหุ สปฺปิ อุปฺปนฺน’’นฺติ สุตฺวา โยชนนฺตรวิหารโตปิ ภิกฺขู อาคจฺฉนฺติ, สมฺปตฺตสมฺปตฺตานํ ฐิตฏฺฐานโต ปฏฺฐาย ทาตพฺพํ. อสมฺปตฺตานมฺปิ อุปจารสีมํ ปวิฏฺฐานํ อนฺเตวาสิกาทีสุ คณฺหนฺเตสุ ทาตพฺพเมว. ‘‘พหิอุปจารสีมาย ฐิตานํ เทถา’’ติ วทนฺติ, น ทาตพฺพํ. สเจ ปน อุปจารสีมํ โอกฺกนฺเตหิ เอกาพทฺธา หุตฺวา อตฺตโน วิหารทฺวาเร วา อนฺโตวิหาเรเยว วา โหนฺติ, ปริสาวเสน วฑฺฒิตา นาม สีมา โหติ, ตสฺมา ทาตพฺพํ. สงฺฆนวกสฺส ทินฺเนปิ ปจฺฉา อาคตานํ ทาตพฺพเมว. ทุติยภาเค ปน เถราสนํ อารุฬฺเห ปจฺฉา อาคตานํ ปฐมภาโค น ปาปุณาติ, ทุติยภาคโต วสฺสคฺเคน ทาตพฺพํ. อุปจารสีมํ ปวิสิตฺวา ยตฺถ กตฺถจิ ทินฺนํ โหติ, สพฺพสนฺนิปาตฏฺฐาเนเยว ภาเชตพฺพํ. "अमुक विहारात पुष्कळ तूप आले आहे" असे ऐकून एक योजन अंतरावरील विहारातूनही भिक्खू येतात. अशा वेळी जे जे भिक्खू आले असतील, त्यांना ते जेथे उभे असतील तेथून सुरुवात करून दिले पाहिजे. जे प्रत्यक्ष वाटपाच्या ठिकाणी आले नसतील, परंतु उपचारसीमेत प्रवेश केलेले असतील, त्यांच्यासाठी त्यांचे अंतेवासिक (शिष्य) इत्यादी घेत असतील तर ते दिलेच पाहिजे. जर ते "उपचारसीमेच्या बाहेर असलेल्यांना द्या" असे म्हणत असतील, तर देऊ नये. परंतु, जर ते उपचारसीमेत प्रवेश केलेल्या भिक्खूंशी सलग जोडलेले राहून स्वतःच्या विहारद्वारावर किंवा विहाराच्या आतच असतील, तर परिषदेच्या प्रभावामुळे सीमा वाढली असे मानले जाते, म्हणून त्यांना दिले पाहिजे. नवदीक्षित भिक्खूला दिले गेले असले तरी नंतर आलेल्या भिक्खूंना दिलेच पाहिजे. परंतु, दुसऱ्या वाटपाच्या वेळी जेव्हा थेरांच्या आसनावर वाटप सुरू होते, तेव्हा नंतर आलेल्यांना पहिल्या वाटपातील भाग मिळत नाही, त्यांना दुसऱ्या वाटपातून वर्षांच्या (दीक्षेच्या) ज्येष्ठतेनुसार दिले पाहिजे. उपचारसीमेत प्रवेश करून जेथे कोठे दान दिले गेले असेल, ते सर्व भिक्खू एकत्र जमण्याच्या ठिकाणीच वाटले पाहिजे. ยสฺมึ วิหาเร ทส ภิกฺขู, ทเสว จ สปฺปิกุมฺภา ทิยฺยนฺติ, เอเกกกุมฺภวเสเนว ภาเชตพฺพํ. เอโก สปฺปิกุมฺโภ โหติ, ทส ภิกฺขูหิ ภาเชตฺวา [Pg.108] คเหตพฺพํ. สเจ ยถาฐิตํเยว ‘‘อมฺหากํ ปาปุณาตี’’ติ คณฺหนฺติ, ทุคฺคหิตํ; คตคตฏฺฐาเน สงฺฆิกเมว โหติ. กุมฺภํ ปน อาวชฺเชตฺวา ถาลเก โถกํ สปฺปึ กตฺวา ‘‘อิทํ มหาเถรสฺส ปาปุณาติ, อวเสสํ อมฺหากํ ปาปุณาตี’’ติ วตฺวา ตมฺปิ กุมฺเภเยว อากิริตฺวา ยถิจฺฉิตํ คเหตฺวา คนฺตุํ วฏฺฏติ. สเจ ถินํ สปฺปิ โหติ, เลขํ กตฺวา ‘‘เลขโต ปรภาโค มหาเถรสฺส ปาปุณาติ, อวเสสํ อมฺหาก’’นฺติ คหิตมฺปิ สุคฺคหิตํ, วุตฺตปริจฺเฉทโต อูนาธิเกสุปิ ภิกฺขูสุ จ สปฺปิกุมฺเภสุ จ เอเตเนวุปาเยน ภาเชตพฺพํ. ज्या विहारात दहा भिक्खू असतील आणि दहाच तुपाचे घडे दिले जात असतील, तर प्रत्येकाला एक-एक घडा याप्रमाणे वाटप करावे. जर तुपाचा एकच घडा असेल, तर दहा भिक्खूंनी तो वाटून घेतला पाहिजे. जर ते जसा आहे तसाच घडा "हा आमच्या वाट्याला आला आहे" असे म्हणून घेत असतील, तर ते अयोग्य प्रकारे घेतले गेले आहे; तो घडा जेथे जेथे जाईल तेथे तो सांघिकच राहील. परंतु, घडा कलता करून एका लहान वाटीत थोडे तूप काढून "हे महाथेरांच्या वाट्याला आले आहे आणि उरलेले आमच्या नऊ जणांच्या वाट्याला आले आहे" असे म्हणून, ते तूप पुन्हा घड्यामध्येच ओतून, इच्छित स्थळी घेऊन जाणे योग्य आहे. जर तूप घट्ट (गोठलेले) असेल, तर त्यावर रेघ ओढून "या रेघेच्या पलीकडचा भाग महाथेरांच्या वाट्याला आला आहे आणि उरलेला भाग आमच्या वाट्याला आला आहे" असे म्हणून घेतलेले देखील योग्य प्रकारे घेतलेले मानले जाते. सांगितलेल्या संख्येपेक्षा कमी-अधिक भिक्खू आणि तुपाचे घडे असतील, तरी याच उपायाने (पद्धतीने) वाटप करावे. สเจ ปเนโก ภิกฺขุ, เอโกปิ กุมฺโภ โหติ, ฆณฺฏึ ปหริตฺวา ‘‘อยํ มยฺหํ ปาปุณาตี’’ติปิ คเหตุํ วฏฺฏติ. ‘‘อยํ ปฐมภาโค มยฺหํ ปาปุณาติ, อยํ ทุติยภาโค’’ติ เอวํ โถกํ โถกมฺปิ ปาเปตุํ วฏฺฏติ. เอส นโย นวนีตาทีสุปิ. ยสฺมึ ปน วิปฺปสนฺเน ติลเตลาทิมฺหิ เลขา น สนฺติฏฺฐติ, ตํ อุทฺธริตฺวา ภาเชตพฺพํ. สิงฺคิเวรมริจาทิเภสชฺชมฺปิ อวเสสปตฺตถาลกาทิสมณปริกฺขาโรปิ สพฺโพ วุตฺตานุรูเปเนว นเยน สุฏฺฐุ สลฺลกฺเขตฺวา ภาเชตพฺโพติ. पण जर एकच भिक्खू असेल आणि तुपाचा घडा देखील एकच असेल, तर घंटा वाजवून 'हा मला प्राप्त होतो' असे म्हणून तो घेणे योग्य आहे. 'हा पहिला भाग मला मिळतो, हा दुसरा भाग मला मिळतो' अशा प्रकारे थोडे थोडे देखील प्राप्त करून देणे योग्य आहे. हाच नियम लोणी इत्यादींच्या बाबतीतही लागू होतो. परंतु, ज्या स्वच्छ तीळ तेल इत्यादींमध्ये रेषा उमटत नाहीत (स्थिर राहत नाहीत), ते (भांड्यातून) काढून वाटप करावे. आले, मिरी इत्यादी औषधे आणि उर्वरित पात्र, वाट्या इत्यादी श्रमण-परिष्कार (श्रमणांचे उपयोगी साहित्य) या सर्वांचेही आधी सांगितलेल्या पद्धतीनुसारच चांगल्या प्रकारे निरीक्षण करून वाटप करावे. ปาฬึ อฏฺฐกถญฺเจว, โอโลเกตฺวา วิจกฺขโณ; สงฺฆิเก ปจฺจเย เอวํ, อปฺปมตฺโตว ภาชเยติ. पाळी आणि अट्ठकथा दोन्ही पाहून, बुद्धिमान भिक्खूने संघाच्या वस्तूंचे (संघिक प्रत्ययांचे) अशा प्रकारे जागरूक (अप्रमत्त) राहूनच वाटप करावे. อิติ สพฺพากาเรน ปจฺจยภาชนียกถา นิฏฺฐิตา. अशा प्रकारे सर्व बाजूंनी प्रत्यय-भाजन-कथा (वस्तूंच्या वाटपाची चर्चा) समाप्त झाली. สมฺมนฺนิตฺวา ฐปิตยาคุภาชกาทีหิ ภาชนียฏฺฐานํ อาคตมนุสฺสานํ อนาปุจฺฉิตฺวาว อุปฑฺฒภาโค ทาตพฺโพ, อสมฺมเตหิ ปน อปโลเกตฺวา ทาตพฺโพ. สมฺมเตน อปฺปมตฺตกวิสฺสชฺชนเกน ภิกฺขุนา จีวรกมฺมํ กโรนฺตสฺส ‘‘สูจึ เทหี’’ติ วทโต เอกา ทีฆา, เอกา รสฺสาติ ทฺเว สูจิโย ทาตพฺพา. ‘‘อวิภตฺตํ สงฺฆิกํ ภณฺฑ’’นฺติ ปุจฺฉิตพฺพกิจฺจํ นตฺถิ. ปิปฺผลกตฺถิกสฺส เอโก ปิปฺผลโก, อทฺธานกนฺตารํ ปฏิปชฺชิตุกามสฺส อุปาหนยุคฬํ, กายพนฺธนตฺถิกสฺส กายพนฺธนํ, ‘‘อํสพทฺธโก เม ชิณฺโณ’’ติ อาคตสฺส อํสพทฺธโก, ปริสฺสาวนตฺถิกสฺส ปริสฺสาวนํ ทาตพฺพํ. ธมฺมกรณตฺถิกสฺส ธมฺมกรโณ. สเจ ปฏโก น โหติ, ธมฺมกรโณ ปฏเกน สทฺธึ ทาตพฺโพ. ‘‘อาคนฺตุกปฏฺฏํ อาโรเปสฺสามี’’ติ ยาจนฺตสฺส [Pg.109] กุสิยา จ อฑฺฒกุสิยา จ ปโหนกํ ทาตพฺพํ. ‘‘มณฺฑลํ นปฺปโหตี’’ติ อาคตสฺส มณฺฑลํ เอกํ ทาตพฺพํ, อฑฺฒมณฺฑลานิ ทฺเว ทาตพฺพานิ. ทฺเว มณฺฑลานิ ยาจนฺตสฺส น ทาตพฺพานิ. อนุวาตปริภณฺฑตฺถิกสฺส เอกสฺส จีวรสฺส ปโหนกํ ทาตพฺพํ. สปฺปินวนีตาทิอตฺถิกสฺส คิลานสฺส เอกํ เภสชฺชํ นาฬิมตฺตํ กตฺวา ตโต ตติยโกฏฺฐาโส ทาตพฺโพ. เอวํ ตีณิ ทิวสานิ ทตฺวา นาฬิยา ปริปุณฺณาย จตุตฺถทิวสโต ปฏฺฐาย สงฺฆํ ปุจฺฉิตฺวา ทาตพฺพํ. คุฬปิณฺเฑปิ เอกทิวสํ ตติยภาโค ทาตพฺโพ. เอวํ ตีหิ ทิวเสหิ นิฏฺฐิเต ปิณฺเฑ ตโต ปรํ สงฺฆํ ปุจฺฉิตฺวา ทาตพฺพํ. เสสํ สพฺพตฺถ อุตฺตานเมวาติ. नियुक्त केलेल्या यागू-भाजक (पेज वाटप करणारे) इत्यादींनी वाटपाच्या ठिकाणी आलेल्या लोकांना संघाला न विचारताच अर्धा भाग द्यावा; परंतु जे नियुक्त केलेले नाहीत त्यांनी संघाची अनुमती घेऊनच द्यावा. अल्पमूल्य वस्तूंचे वाटप करण्यासाठी नियुक्त केलेल्या भिक्खूने चीवर शिवण्याचे काम करत असलेल्या आणि 'सुई द्या' असे म्हणणाऱ्या भिक्खूला एक लांब आणि एक लहान अशा दोन सुया द्याव्यात. 'हे न वाटलेले संघिक भांड (साहित्य) आहे का?' असे विचारण्याची काही गरज नाही. लहान सुरीची गरज असलेल्याला एक लहान सुरी, लांबच्या प्रवासाला जाण्याची इच्छा असलेल्याला एक जोडी पादत्राणे, कमरपट्ट्याची गरज असलेल्याला कमरपट्टा, 'माझा खांद्याचा पट्टा झिजला आहे' असे म्हणत आलेल्याला खांद्याचा पट्टा आणि पाणी गाळण्याच्या कापडाची गरज असलेल्याला पाणी गाळण्याचे कापड द्यावे. धमकरक (पाणी गाळण्याचे साधन) हवे असलेल्याला धमकरक द्यावा. जर कापड नसेल, तर धमकरक कापडासह द्यावा. 'मी आगंतुक पट्ट लावीन' अशी याचना करणाऱ्याला कुसी आणि अर्ध्या कुसीसाठी पुरेसे कापड द्यावे. 'मंडळ पुरत नाही' असे म्हणत आलेल्याला एक मंडळ द्यावे आणि दोन अर्धी मंडळे द्यावीत. दोन मंडळांची याचना करणाऱ्याला ती देऊ नयेत. अनुवात आणि परिभांड (चीवराची किनार) हवे असलेल्याला एका चीवरासाठी पुरेसे कापड द्यावे. तूप, लोणी इत्यादींची गरज असलेल्या आजारी भिक्खूला एक नाळी (माप) एवढे औषध करून त्यातील तिसरा भाग द्यावा. अशा प्रकारे तीन दिवस देऊन, एक नाळी पूर्ण झाल्यावर चौथ्या दिवसापासून संघाला विचारून द्यावे. गुळाच्या ढेपेच्या बाबतीतही एका दिवसात तिसरा भाग द्यावा. अशा प्रकारे तीन दिवसांत गुळाची ढेप संपल्यावर, त्यानंतर संघाला विचारून द्यावे. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. ปกฺขิกภตฺตาทิกถา นิฏฺฐิตา. पक्खिक-भक्त (पाक्षिक भोजन) इत्यादींची चर्चा समाप्त झाली. เสนาสนกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. सेनासन-खंधक-वर्णना (सेनासन खंधकाची टीका) समाप्त झाली. ๗. สงฺฆเภทกกฺขนฺธกํ ७. संघभेदक-खंधक ฉสกฺยปพฺพชฺชากถา सहा शाक्यपुत्रांच्या प्रव्रज्येची कथा ๓๓๐. สงฺฆเภทกกฺขนฺธเก [Pg.110] อภิญฺญาตา อภิญฺญาตาติ ปากฏา ปากฏา. สกฺยกุมารา นาม กาฬุทายิปฺปภุตโย ทส ทูตา สทฺธึ ปริวาเรหิ อญฺเญ จ พหู ชนา. อมฺหากนฺติ อมฺเหสุ; อมฺหากํ กุลโตติ วา วุตฺตํ โหติ. ฆราวาสตฺถํ อนุสาสิสฺสามีติ ฆราวาเส ยํ กตฺตพฺพํ, ตํ ชานาเปสฺสามิ. อุทกํ นินฺเนตพฺพนฺติ ยถา อุทกํ สพฺพฏฺฐาเน สมํ โหติ, เอวํ กาตพฺพํ. นิทฺธาเปตพฺพนฺติ ติณานิ อุทฺธริตพฺพานิ. ภุสิกา อุทฺธราเปตพฺพาติ สุขุมปลาลมิสฺสธญฺญา ปลาลิกา ปลาเปตพฺพา. โอปุนาเปตพฺพนฺติ สุขุมปลาลํ อปเนตพฺพํ. ตฺวญฺเญว ฆราวาสตฺเถน อุปชานาหีติ ตฺวญฺเญว ฆราวาสตฺถํ ชานาหิ. อหํ ตยา ยถาสุขํ ปพฺพชาหีติ เอตฺถ อหํ ตยา สทฺธึ ปพฺพชิสฺสามีติ สหายสิเนเหน สหสา วตฺตุกาโม หุตฺวา ปุน รชฺชสิริโลเภน ปริกฑฺฒิยมานหทโย ‘‘อหํ ตยา’’ติ เอตฺตกเมว วตฺวา เสสํ วตฺตุํ นาสกฺขีติ เอวมตฺโถ เวทิตพฺโพ. ३३०. संघभेदक खंधकामध्ये 'अभिञ्ञाता अभिञ्ञाता' (अभिज्ञात अभिज्ञात) म्हणजे प्रसिद्ध, प्रसिद्ध (प्रख्यात). 'शाक्यकुमार' म्हणजे काळुदायी इत्यादी दहा दूत, त्यांच्या परिवारासह आणि इतर अनेक लोक. 'अम्हाकं' (आमच्या) म्हणजे आमच्यामध्ये किंवा आमच्या कुळातून असे म्हटले आहे. 'घरावासत्थं अनुसासिस्सामि' (गृहस्थाश्रमाच्या बाबतीत मी उपदेश करीन) म्हणजे गृहस्थाश्रमात जे काही करायचे आहे, ते मी समजावून सांगेन. 'उदकं निन्नेतब्बं' (पाणी वाहून नेले पाहिजे) म्हणजे पाणी सर्व ठिकाणी समप्रमाणात राहील, अशा प्रकारे केले पाहिजे. 'निद्धापेतब्बं' (तण उपटले पाहिजे) म्हणजे गवत/तण उपटून टाकले पाहिजे. 'भुसिका उद्धरापेतब्बा' (भुसा बाहेर काढला पाहिजे) म्हणजे बारीक पेंढ्याशी मिश्रित असलेले धान्याचे देठ बाहेर काढले पाहिजेत. 'ओपुनापेतब्बं' (पाखडले पाहिजे) म्हणजे बारीक पेंढा दूर केला पाहिजे. 'त्वञ्ञेव घरावासत्थेन उपजानाहि' (तूच गृहस्थाश्रमाच्या कामांकडे लक्ष दे) म्हणजे तूच गृहस्थाश्रमाचे काम सांभाळ. 'अहं तया यथासुखं पब्बजाहि' (मी तुझ्यासोबत सुखपूर्वक प्रव्रजित होईन) येथे 'मी तुझ्यासोबत प्रव्रजित होईन' असे मित्रावरील प्रेमापोटी घाईघाईने बोलण्याची इच्छा असणारा होऊन, पुन्हा राजवैभवाच्या लोभाने त्याचे हृदय ओढले गेल्यामुळे 'मी तुझ्यासोबत' एवढेच बोलून उर्वरित भाग बोलू शकला नाही, असा अर्थ समजला पाहिजे. ๓๓๑. นิปฺปาติตาติ นิกฺขมิตา. มานสฺสิโนติ มานสฺสยิโน; มานนิสฺสิตาติ วุตฺตํ โหติ. ३३१. 'निप्पातिता' म्हणजे बाहेर पडलेले. 'मानस्सिनो' म्हणजे मानी (अभिमान बाळगणारे); अभिमानाचा आश्रय घेतलेले असे म्हटले आहे. ๓๓๒. ยสฺสนฺตรโต น สนฺติ โกปาติ ตติยมคฺเคน สมูหตตฺตา ยสฺส จิตฺเต โกปา น สนฺติ. ยสฺมา ปน ภโวติ สมฺปตฺติ, วิภโวติ วิปตฺติ; ตถา ภโวติ วุฑฺฒิ, วิภโวติ หานิ; ภโวติ สสฺสตํ, วิภโวติ อุจฺเฉโท; ภโวติ ปุญฺญํ, วิภโวติ ปาปํ; วิภโวติ จ อภโวติ จ อตฺถโต เอกเมว, ตสฺมา อิติภวาภวตญฺจ วีติวตฺโตติ เอตฺถ ยา เอสา สมฺปตฺติวิปตฺติวุฑฺฒิหานิสสฺสตุจฺเฉทปุญฺญปาปวเสน อิติ อเนกปฺปการา ภวาภวตา วุจฺจติ; จตูหิปิ มคฺเคหิ ยถาสมฺภวํ เตน เตน นเยน ตํ อิติภวาภวตญฺจ วีติวตฺโตติ เอวมตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. นานุภวนฺตีติ น สมฺปาปุณนฺติ; ตสฺส ทสฺสนํ เทวานมฺปิ ทุลฺลภนฺติ อธิปฺปาโย. ३३२. 'यस्संतरतो न सन्ति कोपा' (ज्याच्या अंतरात क्रोध नाही) म्हणजे तिसऱ्या मार्गाने (अनागामी मार्गाने) पूर्णपणे नष्ट केल्यामुळे ज्याच्या चित्तात क्रोध नसतो. कारण 'भव' म्हणजे समृद्धी आणि 'विभव' म्हणजे आपत्ती; तसेच 'भव' म्हणजे वृद्धी आणि 'विभव' म्हणजे हानी; 'भव' म्हणजे शाश्वतता आणि 'विभव' म्हणजे उच्छेद; 'भव' म्हणजे पुण्य आणि 'विभव' म्हणजे पाप; आणि 'विभव' व 'अभव' हे अर्थाच्या दृष्टीने एकच आहेत. म्हणून 'इतिभवाभवतञ्च वीतिवत्तो' (अशा प्रकारे भव आणि अभव ओलांडून गेलेला) येथे जी ही समृद्धी-आपत्ती, वृद्धी-हानी, शाश्वत-उच्छेद, पुण्य-पाप यांच्या स्वरूपातील अनेक प्रकारची 'भवाभवता' (भव आणि अभव) म्हटली जाते; चारही मार्गांद्वारे योग्य त्या पद्धतीने त्या भव आणि अभवला ओलांडून गेलेला, असा अर्थ समजला पाहिजे. 'नानुभवन्ति' (अनुभवत नाहीत) म्हणजे प्राप्त करत नाहीत; त्याचे दर्शन देवांनाही दुर्लभ आहे, असा (भगवंतांचा) अभिप्राय आहे. ๓๓๓. อหิเมขลิกาติ อหึ กฏิยํ พนฺธิตฺวา. อุจฺฉงฺเคติ องฺเก. ३३३. 'अहिमेखलिका' म्हणजे कमरेला साप बांधून. 'उच्छङ्गे' म्हणजे मांडीवर (कुशीत). ๓๓๔. สมฺมนฺนตีติ [Pg.111] สมฺมาเนติ. ยํ ตุโม กริสฺสตีติ ยํ โส กริสฺสติ. ३३४. 'सम्मदन्ति' (किंवा सम्मन्नति) म्हणजे आदर करतो (सन्मान करतो). 'यं तुमो करिस्सति' म्हणजे जे तो करेल. ฉสกฺยปพฺพชฺชากถา นิฏฺฐิตา. सहा शाक्यपुत्रांच्या प्रव्रज्येची कथा समाप्त झाली. ปกาสนียกมฺมาทิกถา प्रकासनीय-कर्म इत्यादींची कथा ๓๓๖. เขฬาสกสฺสาติ เอตฺถ มิจฺฉาชีเวน อุปฺปนฺนปจฺจยา อริเยหิ วนฺตพฺพา เขฬสทิสา, ตถารูเป ปจฺจเย อยํ อชฺโฌหรตีติ กตฺวา เขฬาสโกติ ภควตา วุตฺโต. ३३६. येथे 'खेळासकस्स' (थुंकी खाणारा) या शब्दात - मिथ्या आजीविकेने उत्पन्न झालेले प्रत्यय (वस्तू) आर्यांनी थुंकून टाकण्याजोगे (ओकून टाकण्याजोगे) म्हणजेच थुंकीसारखे असतात; अशा प्रकारच्या वस्तूंचे हा (देवदत्त) भक्षण करतो, असा विचार करून भगवंतांनी त्याला 'खेळासक' (थुंकी खाणारा) असे म्हटले आहे. ๓๔๐. ปตฺถทฺเธน กาเยนาติ โปตฺถกรูปสทิเสน นิจฺจเลน กาเยน. ३४०. 'पत्थद्धेन कायेन' (ताठरलेल्या शरीराने) म्हणजे पुतळ्यासारख्या निश्चल शरीराने. ๓๔๒. มยํ โข ภเณ ราชญาตกา นามาติ ราชา อมฺเห ชานาตีติ ราชญาตกสฺส ภาเวน อตฺตานํ อุกฺกํสนฺโต อาห. ปหฏฺฐกณฺณวาโลติ พนฺธเน นิจฺจเล กตฺวา. ३४२. 'मयं खो भणे राज्ञातका नाम' (अरे मित्रा, आम्ही राजाचे ओळखीचे आहोत) म्हणजे 'राजा आम्हाला ओळखतो' अशा प्रकारे राजाचा ओळखीचा असल्याच्या भावनेने स्वतःची बढाई मारत तो म्हणाला. 'पहट्ठकण्णवालो' (कान आणि शेपूट ताठ करून) म्हणजे त्यांना निश्चल (ताठ) करून. ทุกฺขญฺหิ กุญฺชร นาคมาสโทติ โภ กุญฺชร พุทฺธนาคํ อาสาทนํ วธกจิตฺเตน อุปคมนํ นาม ทุกฺขํ. นาคหตสฺสาติ พุทฺธนาคํ ฆาตกสฺส. 'दुक्खञ्हि कुञ्जर नागमासदो' म्हणजे 'हे हत्ती! बुद्धरूपी हत्तीवर हल्ला करणे म्हणजेच वध करण्याच्या बुद्धीने त्यांच्याजवळ जाणे दुःखदायक आहे.' 'नागहतस्स' म्हणजे बुद्धरूपी हत्तीचा घात करणाऱ्याचे (सुगती होत नाही). ปฏิกุฏิโยว โอสกฺกีติ ตถาคตาภิมุโขเยว ปิฏฺฐิเมหิ ปาเทหิ อวสกฺกิ. อลกฺขิโกติ เอตฺถ น ลกฺเขตีติ อลกฺขิโก; น ชานาตีติ อตฺโถ, อหํ ปาปกมฺมํ กโรมีติ น ชานาติ. น ลกฺขิตพฺโพติ วา อลกฺขิโก; น ปสฺสิตพฺโพติ อตฺโถ. 'पटिकुटियोव ओसक्की' म्हणजे तथागतांकडे तोंड करूनच मागच्या पायांनी मागे मागे सरकला. 'अलक्खिको' येथे जो लक्षात घेत नाही तो 'अलक्खिको'; म्हणजेच 'जाणत नाही' असा अर्थ आहे, 'मी पापकृत्य करत आहे' हे तो जाणत नाही. किंवा ज्याच्याकडे लक्ष देऊ नये तो 'अलक्खिको'; म्हणजेच 'पाहू नये' असा अर्थ आहे. ๓๔๓. ติกโภชนนฺติ เอตฺถ ตีหิ ชเนหิ ภุญฺชิตพฺพโภชนํ. ตํ ปญฺญาเปสฺสามีติ ตํ อนุชานิสฺสามิ. คณโภชเน ปน ยถาธมฺโม กาเรตพฺโพติ. ปญฺจวตฺถุยาจนกถา สงฺฆาทิเสสวณฺณนายํ วุตฺตา. กปฺปนฺติ อายุกปฺปํ. พฺรหฺมํ ปุญฺญนฺติ เสฏฺฐํ ปุญฺญํ. กปฺปํ สคฺคมฺหีติ อายุกปฺปเมว. ३४३. ‘तिकभोजन’ (तिकभोजनन्ति) येथे तीन व्यक्तींनी (भिक्खूंनी) ग्रहण करण्यायोग्य भोजन असा अर्थ समजला पाहिजे. ‘ते मी प्रज्ञप्त करीन’ (तं पञ्ञापेस्सामीति) म्हणजे ‘त्याला मी अनुमती देईन’. ‘गणभोजनात मात्र नियमानुसार (यथाधम्मो) आचरण केले पाहिजे’ (गणभोजने पन यथाधम्मो कारेतब्बोति). पाच वस्तूंच्या याचनेची कथा (पञ्चवत्थुयाचनकथा) संघादिशेष वर्णनात (संघादिसेसवण्णनायं) सांगितली आहे. ‘कल्प’ (कप्पन्ति) म्हणजे आयु-कल्प (नरकातील आयु-कल्प). ‘ब्रह्म पुण्य’ (ब्रह्मं पुञ्ञन्ति) म्हणजे श्रेष्ठ पुण्य. ‘स्वर्गात कल्पभर’ (कप्पं सग्गम्हीति) म्हणजे स्वर्गातील आयु-कल्पभरच आनंदित होतो. ปกาสนียกมฺมาทิกถา นิฏฺฐิตา. प्रकासनीय कर्मादी कथा समाप्त झाली. สงฺฆเภทกกถา संघभेदक कथा ๓๔๔. อถ โข เทวทตฺโต สงฺฆํ ภินฺทิตฺวาติ โส กิร เอวํ สลากํ คาเหตฺวา ตตฺเถว อาเวณิกํ อุโปสถํ กตฺวา คโต, เตเนตํ วุตฺตํ. ३४४. ‘त्यानंतर देवदत्ताने संघ भेदून’ (अथ खो देवदत्तो संघं भिन्दित्वाति) याचा अर्थ असा की, त्याने अशा प्रकारे शलाका ग्रहण करायला लावून, त्याच ठिकाणी स्वतंत्र उपोसाथ करून तो निघून गेला; म्हणूनच असे म्हटले आहे. ๓๔๕. ปิฏฺฐิ [Pg.112] เม อาคิลายตีติ จิรนิสชฺชาย เวทนาภิภูตา พาธติ. ตมหํ อายมิสฺสามีติ ตํ อหํ ปสาเรสฺสามิ. อาเทสนาปาฏิหาริยานุสาสนี นาม ‘‘เอวมฺปิ เต มโน, ตถาปิ เต มโน’’ติ เอวํ ปรสฺส จิตฺตํ ชานิตฺวา ตทนุรูปา ธมฺมเทสนา. ३४५. ‘माझी पाठ दुखत आहे’ (पिट्ठि मे आगिलायतीति) म्हणजे दीर्घकाळ बसून राहिल्यामुळे वेदनेने ग्रस्त झालेली पाठ त्रास देत आहे. ‘ती मी सरळ करीन’ (तमहं आयमिस्सामीति) म्हणजे ‘मी पाठीला ताण देईन (सरळ करीन)’. ‘आदेशना-प्रातिहार्य अनुशासन’ (आदेसनापाटिहारियानुसासनी नाम) म्हणजे ‘तुझे मन असे आहे, तुझे मन तसे आहे’ अशा प्रकारे दुसऱ्याचे चित्त जाणून त्याला अनुरूप केलेली धम्मदेशना होय. ๓๔๖. มมานุกุพฺพนฺติ มมานุกิริยํ กุรุมาโน. กปโณติ ทุกฺขิโต. มหาวราหสฺสาติ มหานาคสฺส. มหึ วิกุพฺพโตติ ปถวึ ปทาเลนฺตสฺส. ภิสํ ฆสมานสฺสาติ ภิสํ ขาทนฺตสฺส. นทีสุ ชคฺคโตติ เอตฺถ โส กิร หตฺถินาโค สายนฺหสมยํ ตํ นทินามกํ โปกฺขรณึ โอคาเหตฺวา กิลนฺโต สพฺพรตฺตึ วีตินาเมสิ, ชาลิกํ กโรติ, เตน วุตฺตํ ‘‘นทีสุ ชคฺคโต’’ติ. ३४६. ‘माझे अनुकरण करणारा’ (ममानुकुब्बन्ति) म्हणजे माझे अनुकरण करत (मरेल). ‘दीन’ (कपणोति) म्हणजे दुःखी (होऊन मरेल). ‘महावराहाचे’ (महावराहस्साति) म्हणजे महानागाचे (महान हत्तीचे). ‘पृथ्वी विदीर्ण करणाऱ्याचे’ (महिं विकुब्बतोति) म्हणजे जमिनीला उकरणाऱ्याचे. ‘कमळ-देठ खाणाऱ्याचे’ (भिसं घसमानस्साति) म्हणजे कमळाचे कंद खाणाऱ्याचे. ‘नद्यांमध्ये जागृत राहणारा’ (नदीसु जग्गतोति) येथे तो महाकाय हत्ती संध्याकाळच्या वेळी ‘नदी’ नावाच्या त्या पुष्करणीत (तलावात) उतरून, क्रीडा करत संपूर्ण रात्र व्यतीत करत असे आणि जाळ्याप्रमाणे इकडेतिकडे फिरत असे; म्हणूनच ‘नद्यांमध्ये जागृत राहणारा’ असे म्हटले आहे. ๓๔๗. สุตาติ โสตา. อสนฺทิทฺโธ จ อกฺขาตีติ นิสฺสนฺเทโห หุตฺวา อกฺขาติ อนุสนฺธิวเสน โยเชตฺวา โยเชตฺวา. ३४७. ‘ऐकणारा’ (सुताति) म्हणजे श्रोता. ‘निःसंदिग्धपणे सांगणारा’ (असंदिद्धो च अक्खातीति) म्हणजे संशयरहित होऊन, पूर्वापार संबंधांशी सुसंगतपणे जोडून जोडून सांगणारा. ๓๕๐. อปาเย นิพฺพตฺติสฺสตีติ อาปายิโก. เอวํ เนรยิโก. กปฺปํ ฐสฺสตีติ กปฺปฏฺโฐ. อิทานิ พุทฺธสหสฺเสนาปิ ติกิจฺฉิตุํ น สกฺกาติ อเตกิจฺโฉ. ३५०. ‘अपाय लोकामध्ये (दुर्गतीत) उत्पन्न होईल’ म्हणून तो ‘आपाविक’ (आपाियको) होय. याचप्रमाणे ‘नैरयिक’ (नरकात उत्पन्न होणारा) होय. ‘कल्पभर राहील’ म्हणून तो ‘कल्पस्थ’ (कप्पट्ठो) होय. आता (संघभेद केल्यानंतर) हजार बुद्धांद्वारे सुद्धा त्याची चिकित्सा करणे शक्य नाही, म्हणून तो ‘अचिकित्स्य’ (अतेकिच्छो) होय. มา ชาตุ โกจิ โลกสฺมินฺติ มา กทาจิปิ โกจิ สตฺโต โลกสฺมึ. อุทปชฺชถาติ อุปปชฺชถ. ชลํว ยสสา อฏฺฐาติ ยสสา ชลนฺโต วิย ฐิโต. เทวทตฺโตติ เม สุตนฺติ ‘‘อีทิโส เทวทตฺโต’’ติ ภควตา สุตมฺปิ อตฺถิ, ตเทว คเหตฺวา อิทํ วุตฺตํ. โส ปมาทมนุจิณฺโณติ เอตฺถ ปมาทํ อนุจินาตีติ อนุจิณฺโณ, ปมาโท อปฺปหีโนติ อตฺโถ. อาสชฺช นนฺติ ปาปเกน จิตฺเตน ปตฺวา, วิโสเสตฺวาติ วา อตฺโถ. อวีจินิรยํ ปตฺโตติ อิทํ ปน อาสีสายํ อตีตวจนํ. เภสฺมาติ ภยานโก. ‘या जगात कधीही कोणीही’ (मा जातु कोचि लोकस्मिन्ति) म्हणजे या जगात कधीही कोणताही प्राणी (उत्पन्न होऊ नये). ‘उदपज्जथ’ (उदपज्जथाति) म्हणजे उत्पन्न होऊ नये. ‘यशाने प्रज्वलित झाल्याप्रमाणे स्थित झाला’ (जलं व यससा अट्ठाति) म्हणजे यशाने (कीर्तीने) तळपणाऱ्याप्रमाणे स्थित झाला. ‘देवदत्त असे मी ऐकले आहे’ (देवदत्तोति मे सुतन्ति) म्हणजे ‘देवदत्त असा आहे’ असे भगवंतांनी ऐकलेले देखील आहे, तेच घेऊन भगवंतांनी हे म्हटले आहे. ‘तो प्रमादाचे आचरण करणारा’ (सो पमादमनुचिण्णोति) येथे जो प्रमादाचे (गाफीलपणाचे) पुन्हा पुन्हा आचरण करतो तो ‘अनुचिर्ण’ होय; प्रमाद नष्ट केला नाही, असा याचा अर्थ आहे. ‘त्याच्यावर आघात करून’ (आसज्ज नन्ति) म्हणजे पापी चित्ताने जवळ जाऊन किंवा त्याला शुष्क करून, असा अर्थ आहे. ‘अवीची नरकात पोहोचला’ (अवीचिनिरयं पत्तोति) हा शब्द मात्र नक्कीच घडेल या अर्थी भूतकाळाचे रूप आहे. ‘भेस्मा’ (भेस्माति) म्हणजे भयानक. สงฺฆเภทกกถา นิฏฺฐิตา. संघभेदक कथा समाप्त झाली. อุปาลิปญฺหากถา उपाळीप्रश्न कथा ๓๕๑. เอกโต อุปาลิ เอโกติ ธมฺมวาทิปกฺเข เอโก. เอกโต ทฺเวติ อธมฺมวาทิปกฺเข ทฺเว. จตุตฺโถ อนุสฺสาเวตีติ สงฺฆํ ภินฺทิสฺสามีติ อธมฺมวาทิจตุตฺโถ [Pg.113] หุตฺวา อนุสฺสาเวติ; อนุนยนฺโต สาเวติ ‘‘น ตุมฺหากํเยว นรกภยํ อตฺถิ, อมฺหากมฺปิ อตฺถิ, น อมฺหากํ อวีจิมคฺโค ปิหิโต, น มยํ อกุสลา น ภายาม. ยทิ หิ อยํ อธมฺโม อวินโย อสตฺถุสาสนํ วา ภเวยฺย, น มยํ คณฺเหยฺยามา’’ติอาทินา นเยน ‘‘อธมฺมํ ธมฺโม’’ติ เอวํ อฏฺฐารส เภทกรวตฺถูนิ โพเธตีติ อตฺโถ. สลากํ คาเหตีติ เอวํ อนุสฺสาเวตฺวา ปน ‘‘อิทํ คณฺหถ, อิทํ โรเจถา’’ติ วทนฺโต สลากํ คาเหติ. ३५१. ‘एका बाजूला उपाळी, एक’ (एकतो उपाळि एकोति) म्हणजे धम्मवादी पक्षाच्या बाजूने एक भिक्खू असतो. ‘एका बाजूला दोन’ (एकतो द्वेति) म्हणजे अधम्मवादी पक्षाच्या बाजूने दोन भिक्खू असतात. ‘चौथा घोषणा करतो’ (चतुत्थो अनुस्सावेतीति) म्हणजे ‘मी संघ भेदून टाकीन’ असा विचार करून अधम्मवादी भिक्खू चौथा होऊन घोषणा करतो; तो मन वळवत ऐकवतो की, ‘केवळ तुम्हा लोकांनाच नरकाचे भय आहे असे नाही, आम्हाला देखील आहे; आमच्यासाठी अवीचीचा मार्ग बंद केलेला नाही; आम्ही अकुशलाला भीत नाही असे नाही. जर खरोखर हा अधम्म, अविनय किंवा शास्त्यांचे शासन नसलेले असते, तर आम्ही हे स्वीकारले नसते’ अशा प्रकारे ‘अधम्माला धम्म’ म्हणून घोषित करतो आणि अशा प्रकारे अठरा भेद निर्माण करणाऱ्या गोष्टी (भेदकरवत्थु) पटवून देतो, असा अर्थ आहे. ‘शलाका स्वीकारायला लावतो’ (सलाकं गाहेतीति) म्हणजे अशा प्रकारे घोषणा करून ‘हे स्वीकारा, हे पसंत करा’ असे म्हणत शलाका स्वीकारायला लावतो. เอกโต อุปาลิ ทฺเว โหนฺตีติอาทีสุปิ เอเสว นโย. เอวํ โข อุปาลิ สงฺฆราชิ เจว โหติ สงฺฆเภโท จาติ เอวํ โหติ; น ปน เอตฺตาวตา สงฺโฆ ภินฺโน โหติ. ‘एका बाजूला उपाळी, दोन असतात’ (एकतो उपाळि द्वे होन्तीति) इत्यादी पाठांमध्ये देखील हाच नियम आहे. ‘अशा प्रकारे उपाळी, संघातील फूट आणि संघभेद देखील होतो’ (एवं kho उपाळि संघराजी चेव होति संघभेदो चाति) म्हणजे अशा प्रकारे होते; परंतु केवळ एवढ्या शलाका स्वीकारायला लावण्यानेच संघ भेदित होत नाही. ภิกฺขุ โข อุปาลิ ปกตตฺโต สมานสํวาสโก สมานสีมายํ ฐิโต สงฺฆํ ภินฺทตีติ เอตฺถ สิยา เอวํ ‘‘เทวทตฺโต กถํ ปกตตฺโต’’ติ. กถํ ตาว น ปกตตฺโต, รญฺโญ ฆาตาปิตตฺตา รุหิรุปฺปาทสฺส จ กตตฺตาติ? ตตฺถ วทาม – อาณตฺติยา ตาว วิรทฺธตฺตา รญฺโญ ฆาตาปนํ นตฺถิ. ‘‘เตน หิ ตฺวํ, กุมาร, ปิตรํ หนฺตฺวา ราชา โหหิ, อหํ ภควนฺตํ หนฺตฺวา พุทฺโธ ภวิสฺสามี’’ติ เอวญฺหิ ตสฺส อาณตฺติ. กุมาโร ปน ราชา หุตฺวา ปจฺฉา ปิตรํ มาเรสิ; เอวํ ตาว อาณตฺติยา วิรทฺธตฺตา รญฺโญ ฆาตาปนํ นตฺถิ. รุหิรุปฺปาเท ปน กตมตฺเตเยว รุหิรุปฺปาทปจฺจยา ภควตา อภพฺพตา น วุตฺตา, น จ สกฺกา ภควโต วจนํ วินาเยว ตสฺส อภพฺพตา อาโรเปตุํ. ‘उपाळी! प्रकृतत्व (शुद्ध), समानसंवासक आणि समानसीमेत स्थित असलेला भिक्खूच संघभेद करतो’ (भिक्खु खो उपाळि पकतत्तो समानसंवासको समानसीमायं ठितो संघं भिन्दतीति) येथे एखाद्या चोदकाचा (आक्षेप घेणाऱ्याचा) असा आक्षेप असू शकतो: ‘देवदत्त कसा काय प्रकृतत्व (शुद्ध भिक्खू) असू शकतो?’ (उत्तर देण्यापूर्वी) प्रथम मी तुला (चोदकाला) विचारतो: ‘देवदत्त प्रकृतत्व का नाही?’ जर तू असे उत्तर दिलेस की, ‘त्याने राजाला मारण्यास प्रवृत्त केल्यामुळे आणि भगवंतांच्या शरीरातून रक्त काढल्यामुळे तो प्रकृतत्व नाही.’ त्यावर आम्ही सांगतो – आज्ञेच्या विसंगतीमुळे राजाला मारण्यास प्रवृत्त करणे सिद्ध होत नाही. कारण त्याची आज्ञा अशी होती: ‘हे कुमारा! तू पित्याला मारून राजा हो, आणि मी भगवंतांना मारून बुद्ध होईन.’ परंतु कुमाराने स्वतः राजा झाल्यानंतर नंतर पित्याला मारले; अशा प्रकारे आज्ञेच्या विसंगतीमुळे राजाला मारण्यास प्रवृत्त करणे सिद्ध होत नाही. दुसरीकडे, केवळ रक्त काढल्यामुळेच भगवंतांनी त्याला ‘अभव्य’ (दीक्षेसाठी अपात्र) घोषित केलेले नाही, आणि भगवंतांच्या वचनाशिवाय त्याच्यावर अभव्यत्व लादणे शक्य नाही. ‘‘รุหิรุปฺปาทโก, ภิกฺขเว, อนุปสมฺปนฺโน น อุปสมฺปาเทตพฺโพ, อุปสมฺปนฺโน นาเสตพฺโพ’’ติ – ‘भिक्खूंनो! ज्याने (भगवंतांच्या शरीरातून) रक्त काढले आहे, अशा अनुपसंपन्नाला (ज्याची उपसंपदा झाली नाही त्याला) उपसंपदा देऊ नये, आणि उपसंपन्नाचा नाश (संघातून निष्कासन) करावा’ – อิทํ ปน ภควตา สงฺฆเภทโต ปจฺฉา วุตฺตํ, ตสฺมา ปกตตฺเตเนว เตน สงฺโฆ ภินฺโนติ. हे वचन मात्र भगवंतांनी संघभेदानंतर सांगितले आहे; त्यामुळे प्रकृतत्व (शुद्ध भिक्खू) असतानाच त्याने संघ भेदिला आहे, असे आम्ही सांगतो. อธมฺมํ ธมฺโมติ ทีเปนฺตีติอาทีสุ อฏฺฐารสสุ เภทกรวตฺถูสุ สุตฺตนฺตปริยาเยน ตาว ทส กุสลกมฺมปถา ธมฺโม, ทส อกุสลกมฺมปถา อธมฺโม. ตถา จตฺตาโร สติปฏฺฐานา, จตฺตาโร สมฺมปฺปธานา, จตฺตาโร อิทฺธิปาทา, ปญฺจินฺทฺริยานิ, ปญฺจ พลานิ, สตฺต โพชฺฌงฺคา, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโคติ สตฺตตึส โพธิปกฺขิยธมฺมา ธมฺโม นาม; ตโย สติปฏฺฐานา[Pg.114], ตโย สมฺมปฺปธานา, ตโย อิทฺธิปาทา, ฉ อินฺทฺริยานิ, ฉ พลานิ, อฏฺฐ โพชฺฌงฺคา, นวงฺคิโก มคฺโคติ จ จตฺตาโร อุปาทานา, ปญฺจ นีวรณา, สตฺต อนุสยา, อฏฺฐ มิจฺฉตฺตาติ จ อยํ อธมฺโม. ‘अधम्माला धम्म म्हणून दाखवणे’ (अधम्मं धम्मोति दीपेन्तीति) इत्यादी अठरा भेद निर्माण करणाऱ्या गोष्टींमध्ये (भेदकरवत्थु), प्रथम सुत्तंत पर्यायानुसार (सुत्तन्तपरियायेन) – दहा कुशल कर्मपथ (कुसलकम्मपथा) म्हणजे धम्म होय, आणि दहा अकुशल कर्मपथ म्हणजे अधम्म होय. त्याचप्रमाणे, चार सतीपट्ठान, चार सम्मप्पधान, चार इद्धिपाद, पाच इंद्रिये, पाच बले, सात बोज्झंग आणि अष्टांगिक मार्ग – हे सदतीस बोधिपक्खिय धम्म म्हणजे ‘धम्म’ होय; आणि तीन सतीपट्ठान, तीन सम्मप्पधान, तीन इद्धिपाद, सहा इंद्रिये, सहा बले, आठ बोज्झंग, नवांगिक मार्ग, तसेच चार उपादान, पाच नीवरण, सात अनुशय आणि आठ मिच्छत्त (मिथ्यात्व) – हा सर्व समूह ‘अधम्म’ होय. ตตฺถ ยํกิญฺจิ เอกํ อธมฺมโกฏฺฐาสํ คเหตฺวา ‘‘อิมํ อธมฺมํ ธมฺโมติ กริสฺสาม; เอวํ อมฺหากํ อาจริยกุลํ นิสฺสาย นิยฺยานิกํ ภวิสฺสติ, มยญฺจ โลเก ปากฏา ภวิสฺสามา’’ติ ตํ อธมฺมํ ‘‘ธมฺโม อย’’นฺติ กถยนฺตา อธมฺมํ ธมฺโมติ ทีเปนฺติ นาม. ตเถว ธมฺมโกฏฺฐาเสสุ จ เอกํ คเหตฺวา อยํ อธมฺโมติ กเถนฺตา ธมฺมํ อธมฺโมติ ทีเปนฺติ นาม. วินยปริยาเยน ปน ภูเตน วตฺถุนา โจเทตฺวา สาเรตฺวา ยถาปฏิญฺญาย กาตพฺพํ กมฺมํ ธมฺโม นาม, อภูเตน วตฺถุนา อโจเทตฺวา อสาเรตฺวา อปฏิญฺญาย กาตพฺพํ กมฺมํ อธมฺโม นาม. त्यामध्ये, कोणत्याही एका अधम्म भागाला घेऊन ‘आम्ही या अधम्माला धम्म बनवू; असे केल्याने आमचे आचार्यकुळ मुक्ती देणारे (श्रेष्ठ) होईल आणि आम्ही देखील जगात प्रसिद्ध होऊ’ असा विचार करून, त्या अधम्माला ‘हा धम्म आहे’ असे सांगणारे लोक ‘अधम्माला धम्म म्हणून दाखवणारे’ ठरतात. त्याचप्रमाणे, धम्म भागांमधील एका भागाला घेऊन ‘हा अधम्म आहे’ असे सांगणारे लोक ‘धम्माला अधम्म म्हणून दाखवणारे’ ठरतात. दुसरीकडे, विनय पर्यायानुसार (विनयपरियायेन) – सत्य कारणाने आरोप ठेवून, स्मरण करून देऊन आणि कबुलीनुसार जे कर्म केले जाते, ते ‘धम्म’ होय; आणि असत्य कारणाने आरोप न ठेवता, स्मरण करून न देता आणि कबुलीशिवाय जे कर्म केले जाते, ते ‘अधम्म’ होय. สุตฺตนฺตปริยาเยน ราควินโย โทสวินโย โมหวินโย สํวโร ปหานํ ปฏิสงฺขาติ อยํ วินโย นาม, ราคาทีนํ อวินโย อสํวโร อปฺปหานํ อปฺปฏิสงฺขาติ อยํ อวินโย นาม. วินยปริยาเยน วตฺถุสมฺปตฺติ ญตฺติสมฺปตฺติ อนุสฺสาวนสมฺปตฺติ สีมาสมฺปตฺติ ปริสาสมฺปตฺตีติ อยํ วินโย นาม, วตฺถุวิปตฺติ…เป… ปริสาวิปตฺตีติ อยํ อวินโย นาม. सुत्तन्त-पर्यायाने (सुत्तान्त पद्धतीनुसार) राग-विनय (रागाचे दमन), दोष-विनय (द्वेषाचे दमन), मोह-विनय (मोहाचे दमन), संवर (संयम), प्रहाण (त्याग) आणि प्रतिसंख्या (विचारपूर्वक ज्ञान) याला 'विनय' असे म्हणतात; आणि रागादींचे अनिवारण (अविनय), असंवर (असंयम), अप्रहाण (त्याग न करणे) आणि अप्रतिसंख्या (विचार न करणे) याला 'अविनय' असे म्हणतात. विनय-पर्यायाने (विनय पद्धतीनुसार) वस्तू-संपत्ती (वस्तूची परिपूर्णता), ज्ञप्ती-संपत्ती (प्रस्तावाची परिपूर्णता), अनुश्रावण-संपत्ती (घोषणा करण्याची परिपूर्णता), सीमा-संपत्ती (सीमेची परिपूर्णता) आणि परिषद-संपत्ती (परिषदेची परिपूर्णता) याला 'विनय' असे म्हणतात; आणि वस्तू-विपत्ती...पे... परिषद-विपत्ती याला 'अविनय' असे म्हणतात। สุตฺตนฺตปริยาเยน จตฺตาโร สติปฏฺฐานา… อฏฺฐงฺคิโก มคฺโคติ อิทํ ภาสิตํ ลปิตํ ตถาคเตน; ตโย สติปฏฺฐานา, ตโย สมฺมปฺปธานา, ตโย อิทฺธิปาทา, ฉ อินฺทฺริยานิ, ฉ พลานิ, อฏฺฐ โพชฺฌงฺคา, นวงฺคิโก มคฺโคติ อิทํ อภาสิตํ อลปิตํ ตถาคเตน. วินยปริยาเยน จตฺตาโร ปาราชิกา, เตรส สงฺฆาทิเสสา, ทฺเว อนิยตา, ตึส นิสฺสคฺคิยา ปาจิตฺติยาติ อิทํ ภาสิตํ ลปิตํ ตถาคเตน; ตโย ปาราชิกา, จุทฺทส สงฺฆาทิเสสา, ตโย อนิยตา, เอกตฺตึส นิสฺสคฺคิยา ปาจิตฺติยาติ อิทํ อภาสิตํ อลปิตํ ตถาคเตน. सुत्तन्त-पर्यायाने चार सतिपट्ठान... अष्टांगिक मार्ग हे तथागतांनी भाषिले आहे, उच्चारले आहे; तीन सतिपट्ठान, तीन सम्मप्पधान, तीन इद्धिपाद, सहा इंद्रिये, सहा बले, आठ बोज्झंग, नऊ अंगांचा मार्ग हे तथागतांनी भाषिले नाही, उच्चारले नाही. विनय-पर्यायाने चार पाराजिक, तेरा संघादिसेस, दोन अनियत, तीस निस्सग्गिय पाचित्तिय हे तथागतांनी भाषिले आहे, उच्चारले आहे; तीन पाराजिक, चौदा संघादिसेस, तीन अनियत, एकतीस निस्सग्गिय पाचित्तिय हे तथागतांनी भाषिले नाही, उच्चारले नाही। สุตฺตนฺตปริยาเยน เทวสิกํ ผลสมาปตฺติสมาปชฺชนํ, มหากรุณาสมาปตฺติสมาปชฺชนํ, พุทฺธจกฺขุนา โลกโวโลกนํ, อฏฺฐุปฺปตฺติวเสน สุตฺตนฺตเทสนา, ชาตกกถาติ อิทํ อาจิณฺณํ; น เทวสิกํ ผลสมาปตฺติสมาปชฺชนํ…เป… น ชาตกกถาติ อิทํ อนาจิณฺณํ. วินยปริยาเยน นิมนฺติตสฺส [Pg.115] วสฺสาวาสํ วสิตฺวา อปโลเกตฺวา จาริยปกฺกมนํ, ปวาเรตฺวา จาริยปกฺกมนํ, อาคนฺตุเกหิ สทฺธึ ปฐมํ ปฏิสนฺถารกรณนฺติ อิทํ อาจิณฺณํ; ตสฺเสว อาจิณฺณสฺส อกรณํ อนาจิณฺณํ นาม. सुत्तन्त-पर्यायाने दररोज फलसमापत्तीमध्ये समापन्न होणे, महाकरुणासमापत्तीमध्ये समापन्न होणे, बुद्धचक्षूने जगाचे अवलोकन करणे, प्रसंगानुरूप सुत्तन्त देशना देणे आणि जातक कथा सांगणे, हे (बुद्धांचे) आचरलेले (नित्य आचरण) आहे; दररोज फलसमापत्तीमध्ये समापन्न न होणे...पे... जातक कथा न सांगणे, हे अनाचरित (न आचरलेले) आहे. विनय-पर्यायाने निमंत्रित केलेल्या (बुद्धांनी) वर्षावास पूर्ण करून, निमंत्रकाचा निरोप घेऊन चारिकेसाठी निघून जाणे, पवारणा करून चारिकेसाठी निघून जाणे आणि आगंतुक भिक्खूंसोबत प्रथम कुशल-विचारपूस (प्रतिसंथार) करणे, हे आचरलेले आहे; याच आचरलेल्या गोष्टी न करणे म्हणजे 'अनाचरित' (न आचरलेले) होय। สุตฺตนฺตปริยาเยน จตฺตาโร สติปฏฺฐานา…เป… อฏฺฐงฺคิโก มคฺโคติ อิทํ ปญฺญตฺตํ นาม; ตโย สติปฏฺฐานา…เป… นวงฺคิโก มคฺโคติ อิทํ อปญฺญตฺตํ นาม. วินยปริยาเยน จตฺตาโร ปาราชิกา…เป… ตึส นิสฺสคฺคิยา ปาจิตฺติยาติ อิทํ ปญฺญตฺตํ นาม; ตโย ปาราชิกา…เป… เอกตฺตึส นิสฺสคฺคิยา ปาจิตฺติยาติ อิทํ อปญฺญตฺตํ นาม. सुत्तन्त-पर्यायाने चार सतिपट्ठान...पे... अष्टांगिक मार्ग हे प्रज्ञप्त (नियमबद्ध केलेले) आहे; तीन सतिपट्ठान...पे... नऊ अंगांचा मार्ग हे अप्रज्ञप्त (नियमबद्ध न केलेले) आहे. विनय-पर्यायाने चार पाराजिक...पे... तीस निस्सग्गिय पाचित्तिय हे प्रज्ञप्त आहे; तीन पाराजिक...पे... एकतीस निस्सग्गिय पाचित्तिय हे अप्रज्ञप्त आहे। ‘‘อนาปตฺติ อชานนฺตสฺส, อเถยฺยจิตฺตสฺส, น มรณาธิปฺปายสฺส, อนุลฺลปนาธิปฺปายสฺส, น โมจนาธิปฺปายสฺสา’’ติ ตตฺถ ตตฺถ วุตฺตา อนาปตฺติ อนาปตฺติ นาม. ‘‘ชานนฺตสฺส, เถยฺยจิตฺตสฺสา’’ติอาทินา นเยน วุตฺตา อาปตฺติ อาปตฺติ นาม. ปญฺจาปตฺติกฺขนฺธา ลหุกาปตฺติ นาม, ทฺเว อาปตฺติกฺขนฺธา ครุกาปตฺติ นาม. ฉ อาปตฺติกฺขนฺธา สาวเสสาปตฺติ นาม, เอโก ปาราชิกาปตฺติกฺขนฺโธ อนวเสสาปตฺติ นาม. ทฺเว อาปตฺติกฺขนฺธา ทุฏฺฐุลฺลาปตฺติ นาม, ปญฺจาปตฺติกฺขนฺธา อทุฏฺฐุลฺลาปตฺติ นาม. “न जाणणाऱ्याला अनापत्ती (दोष नाही), चोरीचा हेतू नसणाऱ्याला अनापत्ती, मारण्याचा उद्देश नसणाऱ्याला अनापत्ती, खोटे बोलण्याचा उद्देश नसणाऱ्याला अनापत्ती, वीर्य मोचन करण्याचा उद्देश नसणाऱ्याला अनापत्ती,” अशा प्रकारे त्या त्या ठिकाणी सांगितलेली अनापत्ती म्हणजे 'अनापत्ती' होय. “जाणणाऱ्याला आपत्ती (दोष) होते, चोरीचा हेतू असणाऱ्याला आपत्ती होते” इत्यादी पद्धतीने सांगितलेली आपत्ती म्हणजे 'आपत्ती' होय. पाच आपत्ती-स्कंध म्हणजे 'लघुकापत्ती' (सौम्य दोष) होय; दोन आपत्ती-स्कंध म्हणजे 'गुरुकापत्ती' (गंभीर दोष) होय. सहा आपत्ती-स्कंध म्हणजे 'सावशेषापत्ती' (प्रायश्चित्ताने शुद्ध होणारा दोष) होय; एक पाराजिक आपत्ती-स्कंध म्हणजे 'अनवशेषापत्ती' (संघातून कायमचे निष्कासन करणारा दोष) होय. दोन आपत्ती-स्कंध म्हणजे 'दुट्ठुल्लापत्ती' (अतिगंभीर दोष) होय; पाच आपत्ती-स्कंध म्हणजे 'अदुट्ठुल्लापत्ती' (अ-गंभीर दोष) होय। ปุริมนเยเนว ปเนตฺถ วุตฺตปฺปการํ ธมฺมํ ‘‘อธมฺโม อย’’นฺติ กถยนฺตา ‘‘ธมฺมํ อธมฺโม’’ติ ทีเปนฺติ นาม. อวินยํ ‘‘วินโย อย’’นฺติ…เป… อทุฏฺฐุลฺลาปตฺตึ ‘‘ทุฏฺฐุลฺลาปตฺติ อย’’นฺติ กถยนฺตา ‘‘อทุฏฺฐุลฺลาปตฺตึ ทุฏฺฐุลฺลาปตฺตี’’ติ ทีเปนฺติ นาม. เอวํ ‘‘อธมฺมํ ธมฺโม’’ติ วา…เป… ‘‘อทุฏฺฐุลฺลาปตฺตึ ทุฏฺฐุลฺลาปตฺตี’’ติ วา ทีเปตฺวา ปกฺขํ ลภิตฺวา จตุนฺนํ สงฺฆกมฺมานํ อญฺญตรํ สงฺฆกมฺมํ เอกสีมายํ วิสุํ กโรนฺเตหิ สงฺโฆ ภินฺโน นาม โหติ. เตน วุตฺตํ – ‘‘เต อิเมหิ อฏฺฐารสหิ วตฺถูหิ อปกสฺสนฺตี’’ติอาทิ. येथे पूर्वीच्याच पद्धतीने सांगितलेल्या प्रकारच्या धम्माला “हा अधम्म आहे” असे म्हणणारे लोक 'धम्माला अधम्म' म्हणून दाखवतात. अविनयाला “हा विनय आहे”...पे... अदुट्ठुल्लापत्तीला “हा दुट्ठुल्लापत्ती आहे” असे म्हणणारे लोक 'अदुट्ठुल्लापत्तीला दुट्ठुल्लापत्ती' म्हणून दाखवतात. अशा प्रकारे “अधम्माला धम्म” किंवा...पे... “अदुट्ठुल्लापत्तीला दुट्ठुल्लापत्ती” असे दाखवून, स्वतःचा पक्ष मिळवून, चार संघकर्मांपैकी कोणतेही एक संघकर्म एकाच सीमेमध्ये स्वतंत्रपणे करणाऱ्या भिक्खूंद्वारे संघात फूट पडते (संघ भिन्न होतो). म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे – “ते या अठरा कारणांनी (संघाला) खेचतात (वेगळे करतात)” इत्यादी। ตตฺถ อปกสฺสนฺตีติ ปริสํ อากฑฺฒนฺติ, วิชเฏนฺติ, เอกมนฺตํ อุสฺสาเรนฺติ จ. อวปกาสนฺตีติ อติ วิย ปกาเสนฺติ ยถา วิสํสฏฺฐาว โหนฺติ, เอวํ กโรนฺติ. อาเวนินฺติ วิสุํ. เอตฺตาวตา โข อุปาลิ สงฺโฆ ภินฺโน โหตีติ เอวํ อฏฺฐารสสุ เภทกรวตฺถูสุ ยํกิญฺจิ เอกมฺปิ วตฺถุํ ทีเปตฺวา เตน เตน การเณน ‘‘อิมํ คณฺหถ, อิมํ โรเจถา’’ติ สญฺญาเปตฺวา สลากํ คาหาเปตฺวา วิสุํ สงฺฆกมฺเม กเต สงฺโฆ ภินฺโน โหติ. ปริวาเร [Pg.116] ปน ‘‘ปญฺจหิ อุปาลิ อากาเรหิ สงฺโฆ ภิชฺชตี’’ติอาทิ วุตฺตํ, ตสฺส อิมินา อิธ วุตฺเตน สงฺฆเภทลกฺขเณน อตฺถโต นานากรณํ นตฺถิ. ตํ ปนสฺส นานากรณาภาวํ ตตฺเถว ปกาสยิสฺสาม. เสสํ สพฺพตฺถ อุตฺตานเมวาติ. त्यात 'अपकस्सन्ति' (खेचतात) म्हणजे परिषदेला आकर्षित करतात, विस्कळीत करतात आणि एका बाजूला सारतात. 'अवपकासन्ति' म्हणजे ते अतिशय स्पष्टपणे दाखवतात, जेणेकरून ते एकमेकांपासून वेगळे राहतील, असे करतात. 'आवेनिन्ति' म्हणजे स्वतंत्रपणे (वेगळे). “एवढ्यानेच, हे उपाली, संघात फूट पडते” – अशा प्रकारे अठरा भेदकर कारणांपैकी कोणतेही एक कारण दाखवून, त्या त्या कारणाने “हे स्वीकारा, हे पसंत करा” असे पटवून देऊन, शलाका (मतपत्रिका) ग्रहण करायला लावून, स्वतंत्रपणे संघकर्म केले असता संघात फूट पडते. परंतु, परिवारात “पाच प्रकारांनी, हे उपाली, संघात फूट पडते” इत्यादी जे म्हटले आहे, त्याचा येथे सांगितलेल्या संघभेदाच्या लक्षणाशी अर्थाच्या दृष्टीने काहीही फरक नाही. तो फरक नसणे आम्ही तेथेच (परिवारातच) स्पष्ट करू. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे। อุปาลิปญฺหากถา นิฏฺฐิตา. उपाली-प्रश्न-कथा समाप्त झाली। สงฺฆเภทกกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. संघभेदक-खंधक-वर्णना समाप्त झाली। ๘. วตฺตกฺขนฺธกํ ८. वत्त-खंधक (कर्तव्य-स्कंधक) อาคนฺตุกวตฺตกถา आगंतुक-वत्त-कथा (आगंतुक भिक्खूंची कर्तव्ये) ๓๕๗. วตฺตกฺขนฺธเก [Pg.117] อิทานิ อารามํ ปวิสิสฺสามีติ อิมินา อุปจารสีมสมีปํ ทสฺเสติ; ตสฺมา อุปจารสีมํ ปตฺวา อุปาหนาโอมุญฺจนาทิ สพฺพํ กาตพฺพํ. คเหตฺวาติ อุปาหนทณฺฑเกน คเหตฺวา. ปฏิกฺกมนฺตีติ สนฺนิปตนฺติ. วิสฺสชฺเชตพฺพนฺติ ปตฺถริตพฺพํ. โคจโร ปุจฺฉิตพฺโพติ ‘‘โคจรคาโม อาสนฺเน อุทาหุ ทูเร, กาลสฺเสว ปิณฺฑาย จริตพฺพํ อุทาหุ ทิวา’’ติ เอวํ ภิกฺขาจาโร ปุจฺฉิตพฺโพ. อโคจโร นาม มิจฺฉาทิฏฺฐิกานํ วา คาโม ปริจฺฉินฺนภิกฺโข วา คาโม; ยตฺถ เอกสฺส วา ทฺวินฺนํ วา ภิกฺขา ทิยฺยติ, โสปิ ปุจฺฉิตพฺโพ. ปานียํ ปุจฺฉิตพฺพนฺติ ‘‘กึ อิมิสฺสา โปกฺขรณิยา ปานียํเยว ปิวนฺติ, นหานาทิปริโภคมฺปิ กโรนฺตี’’ติ เอวํ ปานียญฺเจว ปริโภชนียญฺจ ปุจฺฉิตพฺพํ. เกสุจิ ฐาเนสุ วาฬมิคา วา อมนุสฺสา วา โหนฺติ, ตสฺมา ‘‘กํ กาลํ ปวิสิตพฺพํ, กํ กาลํ นิกฺขมิตพฺพ’’นฺติ ปุจฺฉิตพฺพํ. ३५७. वत्त-खंधकात “आता मी आरामात प्रवेश करीन” या वाक्याने उपचार-सीमेचे समीपत्व (जवळ असणे) दर्शवले आहे; म्हणून उपचार-सीमेवर पोहोचल्यावर पादत्राणे (पायताण) काढणे इत्यादी सर्व कर्तव्ये केली पाहिजेत. 'गहेत्वा' (घेऊन) म्हणजे पादत्राणे अडकवण्याच्या काठीने पादत्राणे घेऊन. 'पटिक्कमन्ति' म्हणजे एकत्र येतात. 'विस्सज्जेतब्बं' म्हणजे पसरवून ठेवावे (अंथरावे). 'गोचरो पुच्छितब्बो' (गोचर विचारावे) म्हणजे “भिक्षा मिळणारे गाव जवळ आहे की दूर? भिक्षेसाठी सकाळीच जावे की दिवसा जावे?” अशा प्रकारे भिक्षाटनाविषयी विचारावे. 'अगोचर' म्हणजे मिथ्यादृष्टी लोकांचे गाव किंवा मर्यादित भिक्षा असणारे गाव; जेथे केवळ एका किंवा दोन भिक्खूंनाच भिक्षा दिली जाते, त्या गावाविषयी देखील विचारावे. 'पानीयं पुच्छितब्बं' (पिण्याच्या पाण्याविषयी विचारावे) म्हणजे “या तलावातील केवळ पिण्याचेच पाणी पितात की स्नान इत्यादीसाठी देखील त्याचा वापर करतात?” अशा प्रकारे पिण्याचे पाणी आणि वापरण्याचे पाणी या दोन्हीविषयी विचारावे. काही ठिकाणी हिंस्त्र श्वापदे किंवा अमानुष (भूत-पिशाच) असतात, म्हणून “कोणत्या वेळी प्रवेश करावा आणि कोणत्या वेळी बाहेर पडावे?” हे विचारावे। พหิ ฐิเตนาติ พหิ นิกฺขมนฺตสฺส อหิโน วา อมนุสฺสสฺส วา มคฺคํ ทตฺวา ฐิเตน นิลฺโลเกตพฺโพ. สเจ อุสฺสหติ โสเธตพฺโพติ ยทิ สกฺโกติ, สพฺโพ วิหาโร โสเธตพฺโพ. อสกฺโกนฺเตน อตฺตโน วสโนกาโส ชคฺคิตพฺโพ. สพฺพํ โสเธตุํ สกฺโกนฺตสฺส ปน ทสฺสิเต วิหารโสธนวตฺเต วินิจฺฉโย มหาขนฺธเก วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. 'बहि ठितेन' (बाहेर उभे राहून) म्हणजे बाहेर पडणाऱ्या सर्पाला किंवा अमानुषाला वाट देऊन, बाहेर उभे राहून आत पाहावे. 'सचे उस्सहित सोधेतब्बो' (जर उत्साह असेल तर स्वच्छ करावे) म्हणजे जर शक्य असेल, तर संपूर्ण विहार स्वच्छ करावा. असमर्थ असल्यास स्वतःच्या राहण्याची जागा स्वच्छ करावी. परंतु, संपूर्ण विहार स्वच्छ करण्यास समर्थ असणाऱ्या भिक्खूसाठी दर्शवलेल्या विहार-स्वच्छतेच्या कर्तव्याचा निर्णय महाखंधकात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा। อาคนฺตุกวตฺตกถา นิฏฺฐิตา. आगंतुक-वत्त-कथा समाप्त झाली। อาวาสิกวตฺตกถา आवासिक-वत्त-कथा (स्थानिक भिक्खूंची कर्तव्ये) ๓๕๙. อาวาสิกวตฺเต – อาสนํ ปญฺญเปตพฺพนฺติ เอวมาทิ สพฺพํ วุฑฺฒตเร อาคเต จีวรกมฺมํ วา นวกมฺมํ วา ฐเปตฺวาปิ กาตพฺพํ. เจติยงฺคณํ สมฺมชฺชนฺเตน สมฺมชฺชนึ นิกฺขิปิตฺวา ตสฺส วตฺตํ กาตุํ อารภิตพฺพํ. ปณฺฑิโต หิ [Pg.118] อาคนฺตุโก ‘‘สมฺมชฺชาหิ ตาว เจติยงฺคณ’’นฺติ วกฺขติ. คิลานเภสชฺชํ กโรนฺเตน ปน สเจ นาติอาตุโร คิลาโน โหติ, เภสชฺชํ อกตฺวา วตฺตเมว กาตพฺพํ. มหาคิลานสฺส ปน เภสชฺชเมว กาตพฺพํ. ปณฺฑิโต หิ อาคนฺตุโก ‘‘กโรหิ ตาว เภสชฺช’’นฺติ วกฺขติ. ปานีเยน ปุจฺฉนฺเตน สเจ สกึ อานีตํ ปานียํ สพฺพํ ปิวติ, ‘‘ปุน อาเนมี’’ติ ปุจฺฉิตพฺโพเยว. อปิจ พีชเนนปิ พีชิตพฺโพ, พีชนฺเตน สกึ ปาทปิฏฺฐิยํ พีชิตฺวา สกึ มชฺเฌ สกึ สีเส พีชิตพฺพํ, ‘‘อลํ โหตู’’ติ วุตฺเตน ตโต มนฺทตรํ พีชิตพฺพํ. ปุน ‘‘อล’’นฺติ วุตฺเตน ตโต มนฺทตรํ พีชิตพฺพํ. ตติยวารํ วุตฺเตน พีชนี ฐเปตพฺพา. ปาทาปิสฺส โธวิตพฺพา, โธวิตฺวา สเจ อตฺตโน เตลํ อตฺถิ, เตน มกฺเขตพฺพา. โน เจ อตฺถิ, ตสฺส สนฺตเกน มกฺเขตพฺพา. อุปาหนาปุญฺฉนํ ปน อตฺตโน รุจิวเสน กาตพฺพํ. เตเนว เหตฺถ ‘‘สเจ อุสฺสหตี’’ติ วุตฺตํ. ตสฺมา อุปาหนา อปุญฺฉนฺตสฺสาปิ อนาปตฺติ. ‘‘กตฺถ มยฺหํ เสนาสนํ ปาปุณาตี’’ติ ปุจฺฉิเตน เสนาสนํ ปญฺญเปตพฺพํ, ‘‘เอตํ ตุมฺหากํ เสนาสนํ ปาปุณาตี’’ติ เอวํ อาจิกฺขิตพฺพนฺติ อตฺโถ. ปปฺโผเฏตฺวา หิ ปตฺถริตุํ ปน วฏฺฏติเยว. ३५९. आवासिक वतात (निवासी भिक्खूच्या कर्तव्यात) – 'आसन मांडावे' इत्यादी सर्व कर्तव्ये ज्येष्ठ भिक्खू आले असता, चीवर शिवण्याचे काम किंवा नवीन बांधकाम (नवकम्म) थांबवूनही केले पाहिजे. चैत्य प्रांगण झाडत असलेल्या भिक्खूने झाडू बाजूला ठेवून त्या आगंतुक भिक्खूचे कर्तव्य (आदरातिथ्य) करण्यास सुरुवात करावी. कारण सुज्ञ आगंतुक भिक्खू 'आधी चैत्य प्रांगण झाडून घ्या' असे म्हणेल. आजारी भिक्खूला औषधोपचार करत असताना, जर तो फार गंभीर आजारी नसेल, तर औषधोपचार थांबवून (आगंतुकाचे) कर्तव्यच केले पाहिजे. परंतु जर तो अतिशय गंभीर आजारी असेल, तर औषधोपचारच केला पाहिजे. कारण सुज्ञ आगंतुक भिक्खू 'आधी औषधोपचार करा' असे म्हणेल. पिण्याच्या पाण्याविषयी विचारताना, जर आणलेले सर्व पाणी त्याने एकदाच प्यायले, तर 'पुन्हा आणू का?' असे विचारलेच पाहिजे. तसेच पंख्याने वाराही घातला पाहिजे. वारा घालणाऱ्या भिक्खूने एकदा पायाच्या घोट्यावर, एकदा मध्यभागी आणि एकदा डोक्यावर वारा घालावा. 'पुरे झाले' असे म्हटल्यावर त्यापेक्षा हळूवारपणे वारा घालावा. पुन्हा 'पुरे' म्हटल्यावर त्यापेक्षाही हळूवारपणे वारा घालावा. तिसऱ्यांदा म्हटल्यावर पंखा खाली ठेवावा. त्याचे पायही धुतले पाहिजेत. पाय धुवून जर स्वतःचे तेल असेल, तर त्याने ते चोळावे. जर स्वतःचे नसेल, तर त्याच्याच तेलाने चोळावे. पादत्राणे पुसणे हे स्वतःच्या इच्छेनुसार करावे. म्हणूनच येथे 'जर उत्साह असेल तर' असे भगवंतांनी म्हटले आहे. त्यामुळे पादत्राणे न पुसणाऱ्यालाही आपत्ती होत नाही. 'माझे शयन-आसन कोठे आहे?' असे विचारले असता, शयन-आसन दाखवून दिले पाहिजे. 'हे आपले शयन-आसन आहे' असे सांगावे, असा याचा अर्थ आहे. ते झटकून पसरणे योग्यच आहे. นวกสฺส วตฺเต – ปานียํ อาจิกฺขิตพฺพนฺติ ‘‘เอตํ ปานียํ คเหตฺวา ปิวาหี’’ติ อาจิกฺขิตพฺพํ. ปริโภชนีเยปิ เอเสว นโย. เสสํ ปุริมสทิสเมว. มหาอาวาเสปิ อตฺตโน สนฺติกํ สมฺปตฺตสฺส อาคนฺตุกสฺส วตฺตํ อกาตุํ น ลภติ. कनिष्ठ भिक्खूच्या कर्तव्यात – 'पिण्याचे पाणी दाखवावे' म्हणजे 'हे पिण्याचे पाणी आहे, घेऊन प्या' असे सांगावे. वापरण्याच्या पाण्याबाबतही हाच नियम आहे. उर्वरित सर्व पूर्वीप्रमाणेच आहे. मोठ्या विहारातही स्वतःकडे आलेल्या आगंतुक भिक्खूचे कर्तव्य न करणे योग्य नाही (ते केलेच पाहिजे). อาวาสิกวตฺตกถา นิฏฺฐิตา. आवासिकवत्तकथा समाप्त झाली. คมิกวตฺตกถา गमिकवत्तकथा (प्रवासाला जाणाऱ्या भिक्खूच्या कर्तव्याची कथा) ๓๖๐. คมิกวตฺเตสุ ทารุภณฺฑนฺติ เสนาสนกฺขนฺธเก วุตฺตํ มญฺจปีฐาทิ. มตฺติกาภณฺฑมฺปิ รชนภาชนาทิ สพฺพํ ตตฺถ วุตฺตปฺปเภทเมว. ตํ สพฺพํ อคฺคิสาลาย วา อญฺญตรสฺมึ วา คุตฺตฏฺฐาเน ปฏิสาเมตฺวา คนฺตพฺพํ. อโนวสฺสเก ปพฺภาเรปิ ฐเปตุํ วฏฺฏติ. เสนาสนํ อาปุจฺฉิตพฺพนฺติ เอตฺถ ยํ ปาสาณปิฏฺฐิยํ วา ปาสาณตฺถมฺเภสุ วา กตเสนาสนํ, ยตฺถ อุปจิกา นาโรหนฺติ, ตํ อนาปุจฺฉนฺตสฺสาปิ อนาปตฺติ. จตูสุ ปาสาณเกสูติอาทิ อุปจิกานํ อุปฺปตฺติฏฺฐาเน ปณฺณสาลาทิเสนาสเน กตฺตพฺพาการทสฺสนตฺถํ วุตฺตํ. อปฺเปว นาม องฺคานิปิ เสเสยฺยุนฺติ อยํ อชฺโฌกาเส ฐปิตมฺหิ อานิสํโส. โอวสฺสกเคเห ปน ติเณสุ จ มตฺติกาปิณฺเฑสุ จ อุปริ ปตนฺเตสุ มญฺจปีฐานํ องฺคานิปิ วินสฺสนฺติ. ३६०. प्रवासाला जाणाऱ्या भिक्खूच्या कर्तव्यात (गमिकवत्तात) – 'दारुभांड' (लाकडी वस्तू) म्हणजे सेनासनक्खंधकात सांगितलेले खाट, पाट इत्यादी होय. 'मत्तिकाभांड' (मातीची भांडी) म्हणजे रंग उकळण्याचे भांडे इत्यादी सर्व, जे तेथे विविध प्रकारांत सांगितले आहे. ते सर्व अग्निशाळेत किंवा इतर कोणत्याही सुरक्षित ठिकाणी व्यवस्थित ठेवून मगच प्रवासाला जावे. पाऊस न पडणाऱ्या डोंगराच्या कपारीतही ते ठेवणे योग्य आहे. 'शयन-आसनाची परवानगी घेणे' या संदर्भात, जे शयन-आसन दगडाच्या शिळेवर किंवा दगडाच्या खांबांवर बनवलेले आहे, जेथे वाळवी चढू शकत नाही, त्याची परवानगी न घेता गेल्यासही आपत्ती होत नाही. 'चार दगडांवर' इत्यादी शब्द वाळवी लागण्याच्या ठिकाणी असलेल्या पर्णकुटी इत्यादी शयन-आसनांमध्ये काय करावे हे दाखवण्यासाठी भगवंतांनी सांगितले आहे. 'कदाचित अवयव तरी शिल्लक राहतील' हा उघड्या जागेत ठेवलेल्या खाट-पाटाचा फायदा (आनिसंस) आहे. परंतु पाऊस गळणाऱ्या घरात वरून गवत आणि मातीचे ढेकूळ पडल्यास खाट-पाटाचे अवयवही नष्ट होतात. คมิกวตฺตกถา นิฏฺฐิตา. गमिकवत्तकथा समाप्त झाली. อนุโมทนวตฺตกถา अनुमोदनवत्तकथा (भोजनानंतर कृतज्ञता व्यक्त करण्याच्या कर्तव्याची कथा) ๓๖๒. อนุโมทนวตฺถุสฺมึ [Pg.119] อิทฺธํ อโหสีติ สมฺปนฺนํ อโหสิ. จตูหิ ปญฺจหีติ สงฺฆตฺเถเรน อนุโมทนตฺถาย นิสินฺเน เหฏฺฐา ปฏิปาฏิยา จตูหิ นิสีทิตพฺพํ. อนุเถเร นิสินฺเน มหาเถเรน จ เหฏฺฐา จ ตีหิ นิสีทิตพฺพํ. ปญฺจเม นิสินฺเน อุปริ จตูหิ นิสีทิตพฺพํ. สงฺฆตฺเถเรน เหฏฺฐา ทหรภิกฺขุสฺมึ อชฺฌิฏฺเฐปิ สงฺฆตฺเถรโต ปฏฺฐาย จตูหิ นิสีทิตพฺพเมว. สเจ ปน อนุโมทโก ภิกฺขุ ‘‘คจฺฉถ ภนฺเต, อาคเมตพฺพกิจฺจํ นตฺถี’’ติ วทติ, คนฺตุํ วฏฺฏติ. มหาเถเรน ‘‘คจฺฉาม อาวุโส’’ติ วุตฺเต ‘‘คจฺฉถา’’ติ วทติ, เอวมฺปิ วฏฺฏติ. ‘‘พหิคาเม อาคเมสฺสามา’’ติ อาโภคํ กตฺวาปิ พหิคามํ คนฺตฺวา อตฺตโน นิสฺสิตเก ‘‘ตุมฺเห ตสฺส อาคมนํ อาคเมถา’’ติ วตฺวาปิ คนฺตุํ วฏฺฏติเยว. สเจ ปน มนุสฺสา อตฺตโน รุจิเกน เอเกน อนุโมทนํ กาเรนฺติ, เนว ตสฺส อนุโมทโต อาปตฺติ, น มหาเถรสฺส ภาโร โหติ. อุปนิสินฺนกถายเมว หิ มนุสฺเสสุ กถาเปนฺเตสุ มหาเถโร อาปุจฺฉิตพฺโพ, มหาเถเรน จ อนุโมทนาย อชฺฌิฏฺโฐว อาคเมตพฺโพติ อิทเมตฺถ ลกฺขณํ. วจฺจิโตติ สญฺชาตวจฺโจ; วจฺจปีฬิโตติ อธิปฺปาโย. ३६२. अनुमोदनाच्या विषयात – 'इद्धं अहोसि' म्हणजे संपन्न झाले. 'चार किंवा पाच जणांनी' म्हणजे संघस्थेवीर अनुमोदनासाठी बसले असता, त्यांच्या खाली अनुक्रमे चार जणांनी बसावे. अनुस्थेवीर अनुमोदनासाठी बसले असता, महास्थेविरांनी आणि त्यांच्या खाली तीन जणांनी बसावे. पाचवे स्थेवीर अनुमोदनासाठी बसले असता, त्यांच्या वर चार जणांनी बसावे. संघस्थेविरांनी खालील कनिष्ठ भिक्खूला प्रेरित केले तरीही, संघस्थेविरांपासून सुरुवात करून चार जणांनी बसलेच पाहिजे. परंतु जर अनुमोदन करणारा भिक्खू 'भन्ते, आपण जावे, थांबण्याची काही गरज नाही' असे म्हणत असेल, तर जाणे योग्य आहे. महास्थेविरांनी 'आवुसो, आम्ही जातो' असे म्हटल्यावर जर तो 'जावे' असे म्हणत असेल, तर अशा वेळीही जाणे योग्य आहे. 'आम्ही गावाबाहेर वाट पाहू' असा विचार करून गावाबाहेर जाऊन, आपल्या शिष्यांना 'तुम्ही त्या अनुमोदन करणाऱ्या भिक्खूची वाट पाहा' असे सांगूनही जाणे योग्यच आहे. परंतु जर लोकांनी आपल्या आवडीच्या एकाच भिक्खूकडून अनुमोदन करवून घेतले, तर त्या अनुमोदन करणाऱ्या भिक्खूला आपत्ती होत नाही आणि महास्थेविरांवरही जबाबदारी राहत नाही. कारण लोकांनी जवळ बसून धर्मचर्चा (उपनिषिन्नकथा) करवून घेतली असता, महास्थेविरांना विचारले पाहिजे आणि महास्थेविरांनी अनुमोदनासाठी नियुक्त केलेल्या भिक्खूचीच वाट पाहिली पाहिजे, हा येथील नियम आहे. 'वच्चितो' म्हणजे तीव्र मलवेग निर्माण झालेला; 'वच्चपीडितो' (मलाने पीडित असलेला) असा याचा अभिप्राय आहे. อนุโมทนวตฺตกถา นิฏฺฐิตา. अनुमोदनवत्तकथा समाप्त झाली. ภตฺตคฺควตฺตกถา भत्तग्गवत्तकथा (भोजनशाळेतील कर्तव्याची कथा) ๓๖๔. ภตฺตคฺควตฺเต ‘‘อนฺโตคาโม วา โหตุ วิหาโร วา, มนุสฺสานํ ปริเวสนฏฺฐานํ คจฺฉนฺเตน จีวรํ ปารุปิตฺวา กายพนฺธนํ พนฺธนเมว วฏฺฏตี’’ติ อฏฺฐกถาสุ วุตฺตํ. น เถเร ภิกฺขู อนุปขชฺชาติ เถเร ภิกฺขู อติอลฺลียิตฺวา น นิสีทิตพฺพํ. สเจ มหาเถรสฺส นิสินฺนาสเนน สมกํ อาสนํ โหติ, พหูสุ อาสเนสุ สติ เอกํ ทฺเว อาสนานิ ฐเปตฺวา นิสีทิตพฺพํ. ภิกฺขู คเณตฺวา ปญฺญตฺตาสเนสุ อนิสีทิตฺวา มหาเถเรน นิสีทาติ วุตฺเตน นิสีทิตพฺพํ. โน เจ มหาเถโร วทติ, ‘‘อิทํ, ภนฺเต, อาสนํ อุจฺจ’’นฺติ วตฺตพฺพํ. ‘‘นิสีทา’’ติ วุตฺเต นิสีทิตพฺพํ. สเจ ปน เอวํ อาปุจฺฉิเตปิ น วทติ, นิสีทนฺตสฺส อนาปตฺติ; มหาเถรสฺเสว อาปตฺติ. นวโก หิ เอวรูเป อาสเน อนาปุจฺฉา นิสีทนฺโต อาปชฺชติ, เถโร อาปุจฺฉิเต อนนุชานนฺโต. น สงฺฆาฏึ โอตฺถริตฺวาติ น สงฺฆาฏึ อวตฺถริตฺวา นิสีทิตพฺพํ. ३६४. भोजनशाळेतील कर्तव्यात (भत्तग्गवत्तात) – 'गाव असो वा विहार, लोकांच्या भोजन वाढण्याच्या ठिकाणी जाताना चीवर पांघरून आणि कायबंधन (कमरपट्टा) बांधूनच जाणे योग्य आहे' असे अट्ठकथांमध्ये सांगितले आहे. 'स्थेवीर भिक्खूंना खेटून बसू नये' म्हणजे स्थेवीर भिक्खूंच्या अगदी जवळ किंवा त्यांना स्पर्श करून बसू नये. जर महास्थेविरांच्या बसण्याच्या आसनासारखेच समान आसन असेल, तर अनेक आसने असताना एक किंवा दोन आसने सोडून बसावे. भिक्खूंची गणना करून मांडलेल्या आसनांवर न बसता, महास्थेविरांनी 'बसा' असे म्हटल्यावरच बसावे. जर महास्थेवीर काही बोलले नाहीत, तर 'भन्ते, हे आसन उंच आहे' असे म्हणावे. 'बसा' असे म्हटल्यावर बसावे. परंतु जर असे विचारूनही ते काही बोलले नाहीत, तर बसणाऱ्याला आपत्ती होत नाही; महास्थेविरांनाच आपत्ती होते. कारण कनिष्ठ भिक्खू अशा आसनावर न विचारता बसल्यास आपत्तीला प्राप्त होतो, आणि स्थेवीर विचारले असता परवानगी न दिल्यास आपत्तीला प्राप्त होतात. 'संघाटी पसरून बसू नये' म्हणजे संघाटी खाली पसरून त्यावर बसू नये. อุโภหิ [Pg.120] หตฺเถหีติ ปตฺตโธวนอุทกํ สนฺธาย วุตฺตํ. ทกฺขิโณทกํ ปน ปุรโต อาธารเก ปตฺตํ ฐเปตฺวา คเหตพฺพํ. สาธุกนฺติ อุทกสทฺทํ อกโรนฺเตน. 'दोन्ही हातांनी' हे पात्र धुण्याच्या पाण्याला उद्देशून भगवंतांनी म्हटले आहे. परंतु दान देण्याचे पाणी समोर पात्राच्या आधारावर पात्र ठेवून स्वीकारावे. 'साधुकं' म्हणजे पाण्याचा आवाज न करता. สูปสฺส โอกาโสติ ยถา สูปสฺส โอกาโส โหติ; เอวํ มตฺตาย โอทโน คณฺหิตพฺโพติ อตฺโถ. สมกํ สมฺปาเทหีติ อิทํ น เกวลํ สปฺปิอาทีสุเยว โอทเนปิ วตฺตพฺพํ. สปฺปิอาทีสุ ปน ยํ อปฺปํ โหติ เอกสฺส วา ทฺวินฺนํ วา อนุรูปกํ, ตํ สพฺเพสํ สมกํ สมฺปาเทหีติ วุตฺเต มนุสฺสานํ วิหสา โหติ, ตสฺมา ตาทิสํ สกึ วา ทฺวิกฺขตฺตุํ วา คเหตฺวา เสสํ น คเหตพฺพํ. 'वरणासाठी जागा' म्हणजे ज्या प्रकारे वरणासाठी जागा राहील, अशा प्रमाणात भात घ्यावा, असा याचा अर्थ आहे. 'समान प्रमाणात वाढावे' हे केवळ तूप इत्यादींच्या बाबतीतच नव्हे, तर भाताच्या बाबतीतही म्हटले पाहिजे. परंतु तूप इत्यादींमध्ये जे थोडे असते, जे एका किंवा दोघांसाठीच पुरेसे असते, ते 'सर्वांना समान प्रमाणात वाढावे' असे म्हटल्यास लोकांची दमछाक (त्रास) होते. म्हणून तशा वस्तू एकदा किंवा दोनदा घेऊन उर्वरित घेऊ नयेत. น ตาว เถเรน ภุญฺชิตพฺพนฺติ อิทํ ยํ ปริจฺฉินฺนภิกฺขุกํ ภตฺตคฺคํ, ยตฺถ มนุสฺสา สพฺเพสํ ปาเปตฺวา ทาตุกามา โหนฺติ, ตํ สนฺธาย วุตฺตํ. ยํ ปน มหาภตฺตคฺคํ โหติ, ยตฺถ เอกสฺมึ ปเทเส ภุญฺชนฺติ, เอกสฺมึ ปเทเส อุทกํ ทิยฺยติ, ตตฺถ ยถาสุขํ ภุญฺชิตพฺพํ. ‘तोपर्यंत थेराने (ज्येष्ठ भिक्खूने) भोजन करू नये’ हे (वचन) ज्या भोजनशाळेत (भत्तग्ग) भिक्खूंची संख्या मर्यादित असते आणि जेथे लोक सर्व भिक्खूंच्या पात्रात अन्न वाढून मगच दान देण्याची इच्छा ठेवतात, त्या भोजनशाळेच्या संदर्भात भगवंतांनी म्हटले आहे. परंतु, जी मोठी भोजनशाळा (महाभत्तग्ग) असते, जेथे एका भागात भिक्खू भोजन करतात आणि दुसऱ्या भागात पाणी दिले जाते, तेथे आपल्या सुविधेनुसार भोजन करावे. น ตาว อุทกนฺติ อิทํ หตฺถโธวนอุทกํ สนฺธาย วุตฺตํ. อนฺตรา ปิปาสิเตน ปน คเล วิลคฺคามิเสน วา ปานียํ ปิวิตฺวา หตฺถา น โธวิตพฺพา. สเจ มนุสฺสา ‘‘โธวถ ภนฺเต ปตฺตญฺจ หตฺเถ จา’’ติ วทนฺติ, ภิกฺขู วา ‘‘ตุมฺเห อุทกํ คณฺหถา’’ติ วทนฺติ, วฏฺฏติ. ‘तोपर्यंत पाणी स्वीकारू नये’ हे (वचन) हात धुण्याच्या पाण्याच्या संदर्भात भगवंतांनी म्हटले आहे. परंतु, भोजन चालू असताना मध्येच तहान लागलेल्या भिक्खूने किंवा गळ्यात अन्न अडकलेल्या भिक्खूने पाणी पिऊन आपले हात धुवावेत. जर लोकांनी ‘भंते, पात्र आणि हात धुवा’ असे म्हटले, किंवा भिक्खूंनी ‘तुम्ही पाणी घ्या’ असे म्हटले, तर ते योग्य (विहित) आहे. นิวตฺตนฺเตนาติ ภตฺตคฺคโต อุฏฺฐาย นิวตฺตนฺเตน สงฺเฆน เอวํ นิวตฺติตพฺพนฺติ ทสฺเสติ. กถํ? ‘‘นวเกหี’’ติ สพฺพํ ทฏฺฐพฺพํ. สมฺพาเธสุ หิ ฆเรสุ มหาเถรานํ นิกฺขมโนกาโส น โหติ, ตสฺมา เอวํ วุตฺตํ. เอวํ นิวตฺตนฺเตหิ ปน นวเกหิ เคหทฺวาเร ฐตฺวา เถเรสุ นิกฺขนฺเตสุ ปฏิปาฏิยา คนฺตพฺพํ. สเจ ปน มหาเถรา ธุเร นิสินฺนา โหนฺติ, นวกา อนฺโตเคเห, เถราสนโต ปฏฺฐาย ปฏิปาฏิยา เอว นิกฺขมิตพฺพํ. กาเยน กายํ อฆฏฺเฏนฺเตน ยถา อนฺตเรน มนุสฺสา คนฺตุํ สกฺโกนฺติ, เอวํ วิรฬาย ปฏิปาฏิยา คนฺตพฺพํ. ‘परतताना’ (निवत्तन्तेन) या शब्दाने भोजनशाळेतून उठून परतणाऱ्या संघाने अशा प्रकारे परतावे, हे दर्शवले आहे. कसे? ‘नवकैः’ (कनिष्ठ भिक्खूंद्वारे) इत्यादी सर्व विधी समजून घ्यावा. कारण अरुंद घरांमध्ये महाथेरांना बाहेर पडण्यास जागा नसते, म्हणून भगवंतांनी असे म्हटले आहे. अशा प्रकारे प्रथम उठून परतणाऱ्या कनिष्ठ भिक्खूंनी घराच्या दारापाशी उभे राहावे आणि थेर (ज्येष्ठ भिक्खू) बाहेर पडल्यावर अनुक्रमे जावे. परंतु, जर महाथेर दाराजवळ बसले असतील आणि कनिष्ठ भिक्खू घराच्या आत बसले असतील, तर थेरांच्या आसनापासून सुरुवात करून अनुक्रमेच बाहेर पडावे. शरीराने शरीराला स्पर्श न करता (न घासता), जेणेकरून लोक त्यांच्या मधून जाऊ शकतील, अशा प्रकारे अंतर ठेवून एका रांगेत जावे. ภตฺตคฺควตฺตกถา นิฏฺฐิตา. भोजनशाळेच्या कर्तव्यासंबंधीची कथा (भत्तग्गवत्तकथा) समाप्त झाली. ปิณฺฑจาริกวตฺตกถา पिंडचारिकाच्या (भिक्षाटनाच्या) कर्तव्यासंबंधीची कथा (पिंडचारिकवत्तकथा) ๓๖๖. ปิณฺฑจาริกวตฺเต – กมฺมํ วา นิกฺขิปตีติ กปฺปาสํ วา สุปฺปํ วา มุสลํ วา ยํ คเหตฺวา กมฺมํ กโรนฺติ, ฐิตา วา นิสินฺนา วา โหนฺติ, ตํ นิกฺขิปติ[Pg.121]. น จ ภิกฺขาทายิกายาติ อิตฺถี วา โหตุ ปุริโส วา, ภิกฺขาทานสมเย มุขํ น อุลฺโลเกตพฺพํ. ३६६. पिंडचारिकवत्त (भिक्षाटनाचे कर्तव्य) मध्ये – ‘काम बाजूला ठेवते’ (कम्मं वा निक्खिपति) म्हणजे कापूस, सूप किंवा मुसळ यांपैकी जे काही हातात धरून ती उभी राहून किंवा बसून काम करत असेल, ते ती बाजूला ठेवते. ‘आणि भिक्षा देणाऱ्या स्त्रीकडे...’ (न च भिक्खादायिकाया) म्हणजे ती स्त्री असो वा पुरुष, भिक्षा देण्याच्या वेळी त्यांच्या चेहऱ्याकडे वर करून पाहू नये. ปิณฺฑจาริกวตฺตกถา นิฏฺฐิตา. पिंडचारिकाच्या कर्तव्यासंबंधीची कथा समाप्त झाली. อารญฺญิกวตฺตกถา आरण्यक (अरण्यात राहणाऱ्या) भिक्खूंच्या कर्तव्यासंबंधीची कथा (आरण्यकवत्तकथा) ๓๖๘. อารญฺญิกวตฺเต – เสนาสนา โอตริตพฺพนฺติ วสนฏฺฐานโต นิกฺขมิตพฺพํ. ३६८. आरण्यकवत्त (अरण्यातील कर्तव्य) मध्ये – ‘शयनासनातून उतरावे’ (सेनासना ओतरितब्बं) म्हणजे राहण्याच्या ठिकाणाहून बाहेर पडावे. ปตฺตํ ถวิกาย ปกฺขิปิตฺวาติ เอตฺถ สเจ พหิคาเม อุทกํ นตฺถิ, อนฺโตคาเมเยว ภตฺตกิจฺจํ กตฺวา อถ พหิคาเม อตฺถิ, พหิคาเม ภตฺตกิจฺจํ กตฺวา ปตฺโต โธวิตฺวา โวทโก กตฺวา ถวิกาย ปกฺขิปิตพฺโพ. ‘पात्र पिशवीत ठेवून’ (पत्तं थविकाय पक्खिपित्वा) या संदर्भात, जर गावाबाहेर पाणी नसेल, तर गावाच्या आतच भोजन विधी (भत्तकिच्च) आटोपून घ्यावा. आणि जर गावाबाहेर पाणी असेल, तर गावाबाहेर भोजन विधी करून, पात्र धुवून, ते कोरडे करून पिशवीत ठेवावे. ปริโภชนียํ อุปฏฺฐาเปตพฺพนฺติ สเจ ภาชนานิ นปฺปโหนฺติ, ปานียเมว ปริโภชนียมฺปิ กตฺวา อุปฏฺฐาเปตพฺพํ. ภาชนํ อลภนฺเตน เวฬุนาฬิกายปิ อุปฏฺฐาเปตพฺพํ. ตมฺปิ อลภนฺตสฺส ยถา สมีเป อุทกอาวาโฏ โหติ, เอวํ กาตพฺพํ. อรณิสหิเต สติ อคฺคึ อกาตุมฺปิ วฏฺฏติ. ยถา จ อารญฺญิกสฺส, เอวํ กนฺตารปฺปฏิปนฺนสฺสาปิ อรณิสหิตํ อิจฺฉิตพฺพํ. คณวาสิโน ปน เตน วินาปิ วฏฺฏติ. นกฺขตฺตาเนว นกฺขตฺตปทานิ. ‘वापरण्याचे पाणी (परिभोजनीय उदक) तयार ठेवावे’ म्हणजे जर भांडी पुरेशी नसतील, तर पिण्याचे पाणीच वापरण्याचे पाणी म्हणूनही तयार ठेवावे. भांडे न मिळाल्यास बांबूच्या नळीत (वेळुनाळिका) पाणी ठेवावे. तेही न मिळाल्यास, जवळच पाण्याचा खड्डा (विहीर) असेल अशी व्यवस्था करावी. अरणी (अग्नि-मंथन काष्ठ) जवळ असल्यास अग्नी प्रज्वलित न करणे देखील योग्य आहे. जसे आरण्यक भिक्खूसाठी अरणी आवश्यक आहे, तसेच दुर्गम मार्गाने जाणाऱ्या प्रवाशासाठीही (कंतारप्पटिपन्न) अरणी आवश्यक मानली जाते. परंतु, संघात राहणाऱ्या (गणवासी) भिक्खूला त्याशिवायही चालते. नक्षत्रे म्हणजेच नक्षत्रपदे होत. อารญฺญิกวตฺตกถา นิฏฺฐิตา. आरण्यक भिक्खूंच्या कर्तव्यासंबंधीची कथा समाप्त झाली. เสนาสนวตฺตกถา शयनासनाच्या कर्तव्यासंबंधीची कथा (सेनासनवत्तकथा) ๓๖๙. เสนาสนวตฺเต – ทฺวารํ นาม ยสฺมา มหาวฬญฺชํ, ตสฺมา ตตฺถ อาปุจฺฉนกิจฺจํ นตฺถิ, เสสานิ ปน อุทฺเทสทานาทีนิ อาปุจฺฉิตฺวาว กาตพฺพานิ. เทวสิกมฺปิ อาปุจฺฉิตุํ วฏฺฏติ. อถาปิ ‘‘ภนฺเต อาปุจฺฉิตเมว โหตู’’ติ วุตฺเต วุฑฺฒตโร ‘‘สาธู’’ติ สมฺปฏิจฺฉติ, สยเมว วา ‘‘ตฺวํ ยถาสุขํ วิหราหี’’ติ วทติ; เอวมฺปิ วฏฺฏติ. สภาคสฺส วิสฺสาเสนาปิ วฏฺฏติเยว. เยน วุฑฺโฒ เตน ปริวตฺติตพฺพนฺติ วุฑฺฒาภิมุเขน ปริวตฺติตพฺพํ. โภชนสาลาทีสุปิ เอวเมว ปฏิปชฺชิตพฺพํ. ३६९. सेनासनवत्त (शयनासनाचे कर्तव्य) मध्ये – मुख्य दरवाजा हा सर्वांच्या वापराचा असल्याने, तो उघडण्या-बंद करण्यासाठी परवानगी घेण्याची गरज नाही. परंतु, इतर गोष्टी जसे की उद्देशदान (उद्देसदान) इत्यादी गोष्टी परवानगी घेऊनच कराव्यात. दररोज परवानगी घेणे देखील योग्य आहे. किंवा जर ‘भंते, परवानगी घेतलेलीच मानली जावी’ असे म्हटलेल्यावर ज्येष्ठ भिक्खूने ‘ठीक आहे’ (साधु) म्हणून स्वीकारले, किंवा स्वतःच ‘तू तुझ्या सुविधेनुसार राहा’ असे म्हटले, तरीही ते योग्य आहे. समान विचारसरणीच्या (सभाग) ज्येष्ठ भिक्खूच्या विश्वासाने देखील ते योग्यच ठरते. ‘ज्या बाजूला ज्येष्ठ भिक्खू असतील, त्या बाजूने वळावे’ (येन वुड्ढो तेन परिवत्तितब्बं) म्हणजे ज्येष्ठांकडे तोंड करून वळावे. भोजनशाळा इत्यादी ठिकाणी देखील याच प्रकारे आचरण करावे. เสนาสนวตฺตกถา นิฏฺฐิตา. शयनासनाच्या कर्तव्यासंबंधीची कथा समाप्त झाली. ชนฺตาฆรวตฺตาทิกถา जंताघर (स्नानगृह/उष्ण स्नानगृह) इत्यादींच्या कर्तव्यासंबंधीची कथा (जंताघरवत्तकथा) ๓๗๑. ชนฺตาฆรวตฺเต – ปริภณฺฑนฺติ พหิชคติ. ३७१. जंताघरवत्त (स्नानगृहाचे कर्तव्य) मध्ये – ‘परिभंड’ (परिभण्ड) म्हणजे स्नानगृहाच्या बाहेरील ओटा (जगती). ๓๗๓. อาจมนวตฺถุสฺมึ [Pg.122] – สติ อุทเกติ เอตฺถ สเจ อุทกํ อตฺถิ, ปฏิจฺฉนฺนฏฺฐานํ ปน นตฺถิ, ภาชเนน นีหริตฺวา อาจมิตพฺพํ. ภาชเน อสติ ปตฺเตน นีหริตพฺพํ. ปตฺเตปิ อสติ อสนฺตํ นาม โหติ. ‘‘อิทํ อติวิวฏํ ปุรโต อญฺญํ อุทกํ ภวิสฺสตี’’ติ คตสฺส อุทกํ อลภนฺตสฺเสว ภิกฺขาจารเวลา โหติ, กฏฺเฐน วา เกนจิ วา ปุญฺฉิตฺวา คนฺตพฺพํ, ภุญฺชิตุมฺปิ อนุโมทนมฺปิ กาตุํ วฏฺฏติ. อาคตปฏิปาฏิยาติ วจฺจกุฏิยํ ปสฺสาวฏฺฐาเน นฺหานติตฺเถติ ตีสุปิ อาคตปฏิปาฏิเยว ปมาณํ. ३७३. आचमनवत्थु (शौचविधीनंतर स्वच्छ होणे) मध्ये – ‘पाणी उपलब्ध असताना’ (सति उदके) या संदर्भात, जर पाणी असेल पण आडोशाची जागा नसेल, तर भांड्याने पाणी बाहेर आणून शौचविधी करावा. भांडे नसल्यास पात्राने पाणी आणावे. पात्रही नसल्यास ती अनुपलब्धता (असन्त) मानली जाते. ‘ही जागा अत्यंत उघडी आहे, पुढे दुसरे पाणी मिळेल’ असा विचार करून जाणाऱ्या भिक्खूला पाणी मिळण्यापूर्वीच जर भिक्षाटनाची वेळ झाली, तर त्याने लाकडाने किंवा इतर कशाने पुसून जावे; भोजन करणे आणि अनुमोदन देणे देखील योग्य आहे. ‘आलेल्या क्रमानुसार’ (आगतपटिपाटिया) म्हणजे शौचालय (वच्चकुटी), मूत्रविसर्जनाची जागा आणि स्नानघाट या तिन्ही ठिकाणी भिक्खूंच्या येण्याचा क्रमच प्रमाण मानला जातो. ๓๗๔. วจฺจกุฏิวตฺเต – น ทนฺตกฏฺฐํ ขาทนฺเตนาติ อยํ วจฺจกุฏิยาปิ อวจฺจกุฏิยาปิ สพฺพตฺเถว ปฏิกฺเขโป. น ผรุเสน กฏฺเฐนาติ ผาลิตกฏฺเฐน วา ขเรน วา คณฺฐิเกน วา กณฺฏเกน วา สุสิเรน วา ปูตินา วา น อวเลขิตพฺพํ. อวเลขนกฏฺฐํ ปน อคฺคเหตฺวา ปวิฏฺฐสฺส อาปตฺติ นตฺถิ. ३७४. वच्चकुटीवत्त (शौचालयाचे कर्तव्य) मध्ये – ‘दातून घासताना शौचास बसू नये’ (न दन्तकट्ठं खादन्तेन) हा निषेध शौचालयात आणि शौचालयाबाहेर सर्वच मलविसर्जनाच्या ठिकाणी लागू होतो. ‘खरखरीत लाकडाने पुसू नये’ (न फरुसेन कट्ठेन) म्हणजे चिरलेल्या बांबूने, खरखरीत, गाठी असलेल्या, काटेरी, पोकळ किंवा सडलेल्या लाकडाने (काठीने) पुसू नये. परंतु, पुसण्याची काठी न घेता आत गेलेल्या भिक्खूला कोणतीही आपत्ती (दोष) लागत नाही. น อาจมนสราวเกติ สพฺพสาธารณฏฺฐานํ สนฺธาเยตํ วุตฺตํ. ตตฺร หิ อญฺเญ อญฺเญ อาคจฺฉนฺติ, ตสฺมา อุทกํ น เสเสตพฺพํ. ยํ ปน สงฺฆิเกปิ วิหาเร เอกเทเส นิพทฺธคมนตฺถาย กตํ ฐานํ โหติ ปุคฺคลิกฏฺฐานํ วา, ตสฺมึ วฏฺฏติ. วิเรจนํ ปิวิตฺวา ปุนปฺปุนํ ปวิสนฺตสฺสาปิ วฏฺฏติเยว. ‘आचमन पात्रात पाणी उरवू नये’ (न आचमनसरावके) हे सर्वसाधारण (सार्वजनिक) शौचालयाच्या संदर्भात भगवंतांनी म्हटले आहे. कारण तेणेकरून तेथे इतर अनेक भिक्खू येतात, म्हणून पाणी शिल्लक ठेवू नये. परंतु, जे संघिक विहारात देखील एखाद्या भागात स्वतःच्या नियमित वापरासाठी बनवलेले ठिकाण असते किंवा वैयक्तिक (पुग्गलिक) ठिकाण असते, तेथे पाणी शिल्लक ठेवणे योग्य आहे. जुलाबाचे औषध (विरेचन) घेऊन वारंवार शौचालयात जाणाऱ्या भिक्खूसाठी देखील हे योग्यच आहे. อูหตาติ อูหทิตา; พหิ วจฺจมกฺขิตาติ อตฺโถ. โธวิตพฺพาติ อุทกํ อาหริตฺวา โธวิตพฺพา. อุทกํ อตฺถิ, ภาชนํ นตฺถิ, อสนฺตํ นาม โหติ. ภาชนํ อตฺถิ, อุทกํ นตฺถิ, เอตมฺปิ อสนฺตํ. อุภเย ปน อสติ อสนฺตเมว, กฏฺเฐน วา เกนจิ วา ปุญฺฉิตฺวา คนฺตพฺพํ. เสสํ สพฺพตฺถ อุตฺตานเมวาติ. ‘ऊहता’ (ऊहता) म्हणजे मलमूत्राने माखलेले; पात्राच्या बाहेर मलमूत्र लागलेले असा अर्थ आहे. ‘धुवावे’ (धोवितब्बा) म्हणजे पाणी आणून धुवावे. पाणी आहे पण भांडे नाही, तर ती अनुपलब्धताच (असन्त) मानली जाते. भांडे आहे पण पाणी नाही, तर ती देखील अनुपलब्धताच आहे. परंतु, दोन्ही नसतील तर ती पूर्णपणे अनुपलब्धताच आहे; अशा वेळी लाकडाने किंवा इतर कशाने पुसून जावे. उर्वरित सर्व नियम सर्व ठिकाणी स्पष्टच आहेत. ชนฺตาฆรวตฺตาทิกถา นิฏฺฐิตา. जंताघर इत्यादींच्या कर्तव्यासंबंधीची कथा समाप्त झाली. วตฺตกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. वत्तक्खन्धकाची वर्णना (टीका) समाप्त झाली. ๙. ปาติโมกฺขฏฺฐปนกฺขนฺธกํ ९. पातिमोक्खट्ठपनक्खन्धक (पातिमोक्ष स्थगित करण्याचा खंधक) ปาติโมกฺขุทฺเทสยาจนกถา पातिमोक्ष उद्देशाच्या (पाठाच्या) याचनेसंबंधीची कथा (पातिमोक्खुद्देसयाचनकथा) ๓๘๓. ปาติโมกฺขฏฺฐปนกฺขนฺธเก [Pg.123] – (นนฺทิมุขิยา รตฺติยาติ อรุณุฏฺฐิตกาเลปิ หิ นนฺทิมุขา วิย รตฺติ ขายติ. เตนาห ‘‘นนฺทิมุขิยา รตฺติยา’’ติ. อนฺโตปูตินฺติ อตฺตจิตฺตสนฺตาเน กิเลสปูติภาเวน อนฺโตปูตึ. อวสฺสุตนฺติ กิเลสวสฺสนวเสน อวสฺสุตํ. กสมฺพุกชาตนฺติ อากิณฺณโทสตาย สํกิลิฏฺฐชาตํ.) ยาว พาหาคหณาปิ นามาติ ‘‘อปริสุทฺธา อานนฺท ปริสา’’ติ วจนํ สุตฺวาเยว หิ เตน ปกฺกมิตพฺพํ สิยา, เอวํ อปกฺกมิตฺวา ยาว พาหาคหณาปิ นาม โส โมฆปุริโส อาคเมสฺสติ, อจฺฉริยมิทนฺติ ทสฺเสติ. ३८३. पातिमोक्खट्ठपनक्खन्धकामध्ये – 'नन्दिमुखिया रत्तिया' म्हणजे अरुणोदयाच्या वेळी सुद्धा रात्र जणू आनंदी चेहऱ्यासारखी दिसते. म्हणूनच संगीतिकारांनी "नन्दिमुखिया रत्तिया" (आनंदी चेहऱ्यासारखी रात्र) असे म्हटले आहे. 'अन्तोपूति' म्हणजे स्वतःच्या चित्तसंतानामध्ये क्लेशांच्या कुजटपणामुळे आतून कुजलेला. 'अवस्सुत' म्हणजे क्लेशांच्या वर्षावामुळे ओला झालेला. 'कसम्बुकजात' म्हणजे दोषांच्या संमिश्रणामुळे मलीन झालेला. 'याव बाहागहणापि नामा' (हात धरून बाहेर काढण्यापर्यंत सुद्धा) म्हणजे "आनंदा, परिषद अपवित्र आहे" हे वचन ऐकूनच त्याने निघून जायला हवे होते, परंतु तसे न करता तो मोघपुरुष हात धरून बाहेर काढण्यापर्यंत थांबून राहिला, हे अत्यंत आश्चर्यकारक आहे, असे दर्शविते. ๓๘๔. น อายตเกเนว ปปาโตติ น ปฐมเมว คมฺภีโร; อนุปุพฺเพน คมฺภีโรติ อตฺโถ. ฐิตธมฺโม เวลํ นาติวตฺตตีติ วีจีนํ โอสกฺกนกนฺทรํ มริยาทเวลํ นาติกฺกมติ. ตีรํ วาเหตีติ ตีรโต อปฺเปติ; อุสฺสาเรตีติ อตฺโถ. อญฺญาปฏิเวโธติ อรหตฺตปฺปตฺติ. ३८४. 'न आयतकेनेव प्रपातो' म्हणजे सुरुवातीलाच एकदम खोल नसलेला, तर अनुक्रमे खोल होत जाणारा असा अर्थ आहे. 'ठितधम्मो वेलं नातिवत्तति' म्हणजे लाटांच्या मागे हटण्याच्या मर्यादेचे (किनाऱ्याचे) उल्लंघन न करणे. 'तीरं वाहेति' म्हणजे किनाऱ्यावर आणून टाकणे किंवा वर चढवणे असा अर्थ आहे. 'अञ्ञापटिवेध' म्हणजे अर्हत्त्वफलाची प्राप्ती होय. ๓๘๕. ฉนฺนมติวสฺสตีติ อาปตฺตึ อาปชฺชิตฺวา ปฏิจฺฉาเทนฺโต อญฺญํ นวํ อาปตฺตึ อาปชฺชติ อิทเมตํ สนฺธาย วุตฺตํ. วิวฏํ นาติวสฺสตีติ อาปตฺตึ อาปชฺชิตฺวา วิวรนฺโต อญฺญํ นาปชฺชติ อิทเมตํ สนฺธาย วุตฺตํ. ३८५. 'छन्नमतिवस्सति' (झाकलेल्यावर जास्त पाऊस पडतो) म्हणजे आपत्तीला प्राप्त होऊन ती लपवून ठेवणारा भिक्खू दुसऱ्या नवीन आपत्तीला प्राप्त होतो, हे या संदर्भात भगवंतांनी म्हटले आहे. 'विवटं नातिवस्सति' (उघड्यावर पाऊस पडत नाही) म्हणजे आपत्तीला प्राप्त होऊन ती उघड करणारा भिक्खू दुसऱ्या नवीन आपत्तीला प्राप्त होत नाही, हे या संदर्भात भगवंतांनी म्हटले आहे. ปาติโมกฺขุทฺเทสยาจนกถา นิฏฺฐิตา. Pātimokkhuddesayācanakathā niṭṭhitā. ปาติโมกฺขสวนารหกถา पातिमोक्खसवनारहकथा (पातिमोक्ख ऐकण्यास पात्र असण्याविषयीची कथा). ๓๘๖. ฐปิตํ โหติ ปาติโมกฺขนฺติ เอตฺถ ปุเร วา ปจฺฉา วา ฐปิตมฺปิ อฏฺฐปิตํ โหติ, เขตฺเต ฐปิตเมว ปน ฐปิตํ นาม โหติ. ตสฺมา ‘‘สุณาตุ เม, ภนฺเต สงฺโฆ, อชฺชุโปสโถ ปนฺนรโส, ยทิ สงฺฆสฺส ปตฺตกลฺลํ, สงฺโฆ อุโปสถํ กเรยฺยา’’ติ เอตฺถ ยาว เร-การํ ภณติ, ตาว ฐเปตพฺพํ, อิทญฺหิ เขตฺตํ. ยฺย-กาเร ปน วุตฺเต ฐเปนฺเตน ปจฺฉา ฐปิตํ นาม โหติ. ‘‘สุณาตุ เม’’ติ อนารทฺเธเยว ฐเปนฺเตน ปุเร ฐปิตํ โหติ. ३८६. 'ठपितं होति पातिमोक्खं' (पातिमोक्ख स्थगित केले जाते) यामध्ये निर्णय असा समजावा की, ज्ञत्तीच्या आधी किंवा नंतर स्थगित केले तरी ते स्थगित केलेले मानले जात नाही, परंतु पातिमोक्ख स्थगित करण्याच्या योग्य क्षेत्रात (काळात) स्थगित केले तरच ते स्थगित केलेले मानले जाते. म्हणून, "सुणातु मे, भन्ते सङ्घो, अज्जुुपोसथो पन्नरसो, यदि सङ्घस्स पत्तकल्लं, सङ्घो उपोसथं करेय्या" या ज्ञत्तीमध्ये जोपर्यंत 'रे' (करेय्या मधील 'रे') अक्षराचा उच्चार केला जातो, तोपर्यंत स्थगित केले पाहिजे, कारण हाच स्थगित करण्याचा योग्य काळ आहे. परंतु 'य्य' (करेय्या मधील 'य्य') अक्षराचा उच्चार केल्यानंतर स्थगित करणाऱ्या भिक्खूने 'नंतर स्थगित केले' असे मानले जाते. "सुणातु मे" असे सुरू करण्यापूर्वीच स्थगित करणाऱ्या भिक्खूने 'आधीच स्थगित केले' असे मानले जाते. ปาติโมกฺขสวนารหกถา นิฏฺฐิตา. पातिमोक्खसवनारहकथा समाप्त झाली. ธมฺมิกาธมฺมิกปาติโมกฺขฏฺฐปนกถา धम्मिकाधम्मिकपातिमोक्खट्ठपनकथा (धार्मिक आणि अधार्मिक पातिमोक्ख स्थगन कथा). ๓๘๗. อมูลิกาย [Pg.124] สีลวิปตฺติยา ปาติโมกฺขํ ฐเปติ อกตายาติ เตน ปุคฺคเลน สา วิปตฺติ กตา วา โหตุ อกตา วา, ปาติโมกฺขฏฺฐปนกสฺส สญฺญาอมูลิกวเสน อมูลิกา โหติ. กตากตายาติ กตญฺจ อกตญฺจ อุภยํ คเหตฺวา วุตฺตํ. ३८७. 'अमूलिकाय सीलविपत्तिया पातिमोक्खं ठपेति अकताया' म्हणजे त्या पुद्गलाने ती शीलविपत्ती केलेली असो वा नसो, पातिमोक्ख स्थगित करणाऱ्या भिक्खूच्या निराधार समजुतीमुळे ती अमूलिक (निराधार) ठरते. 'कताकताया' हे केलेली आणि न केलेली या दोन्ही गोष्टींना गूहीत धरून भगवंतांनी म्हटले आहे. ธมฺมิกํ สามคฺคึ น อุเปตีติ กมฺมํ โกเปตุกามตาย สงฺฆสฺส กมฺเม กรียมาเน เนว อาคจฺฉติ, น ฉนฺทํ เทติ, สมฺมุขีภูโตว ปฏิกฺโกสติ, เตน ทุกฺกฏํ อาปชฺชติ. อิจฺจสฺสาปิ สาปตฺติกสฺเสว ปาติโมกฺขํ ฐปิตํ โหติ. ปจฺจาทิยตีติ ‘‘ปุน กาตพฺพํ กมฺม’’นฺติ ปจฺจาทิยติ, เตน อุกฺโกฏนเกน ปาจิตฺติยํ อาปชฺชติ. อิจฺจสฺสาปิ สาปตฺติกสฺเสว ปาติโมกฺขํ ฐปิตํ โหติ. 'धम्मिकं सामग्गिं न उपेति' म्हणजे संघाचे कर्म बिघडवण्याच्या इच्छेने, संघाचे कर्म केले जात असताना तो स्वतः येतही नाही, संमतीही (छंद) देत नाही, किंवा प्रत्यक्ष उपस्थित राहून विरोध करतो; त्यामुळे तो दुक्कट आपत्तीला प्राप्त होतो. अशा प्रकारे, आपत्तीयुक्त असलेल्या त्या भिक्खूच्या बाबतीतही पातिमोक्ख स्थगित केले जाते. 'पच्चादियति' म्हणजे "हे कर्म पुन्हा केले पाहिजे" असे म्हणून पुन्हा आक्षेप घेतो, त्या आक्षेप घेण्यामुळे तो पाचित्तिय आपत्तीला प्राप्त होतो. अशा प्रकारे, आपत्तीयुक्त असलेल्या त्या भिक्खूच्या बाबतीतही पातिमोक्ख स्थगित केले जाते. ธมฺมิกาธมฺมิกปาติโมกฺขฏฺฐปนกถา นิฏฺฐิตา. धम्मिकाधम्मिकपातिमोक्खट्ठपनकथा समाप्त झाली. ธมฺมิกปาติโมกฺขฏฺฐปนกถา धम्मिकपातिमोक्खट्ठपनकथा (धार्मिक पातिमोक्ख स्थगन कथा). ๓๘๘. เยหิ อากาเรหิ เยหิ ลิงฺเคหิ เยหิ นิมิตฺเตหีติ เอตฺถ มคฺเคนมคฺคปฏิปาทนาทีสุ อาการาทิสญฺญา เวทิตพฺพา. เตน ทิฏฺเฐน เตน สุเตน ตาย ปริสงฺกายาติ เอตฺถ ทิฏฺฐญฺจ สุตญฺจ ปาฬิยํ อาคตเมว. สเจ ปน เตหิ ทิฏฺฐสุเตหิ ปริสงฺกํ อุปฺปาเทยฺย, ตํ สนฺธาย วุตฺตํ ‘‘ตาย ปริสงฺกายา’’ติ. ३८८. 'येहि आकारेहि येहि लिङ्गेहि येहि निमित्तेहि' यामध्ये मार्गाने किंवा अमार्गाने प्रतिपादन करणे इत्यादींमध्ये आकार इत्यादींच्या संज्ञा समजून घ्याव्यात. 'तेन दिट्ठेन तेन सुतेन ताय परिसङ्काय' यामध्ये पाहिलेले आणि ऐकलेले हे पाळीमध्ये आलेलेच आहे. परंतु जर त्या पाहिलेल्या आणि ऐकलेल्या गोष्टींमुळे शंका उत्पन्न झाली, तर त्या शंकेला उद्देशून भगवंतांनी "ताय परिसङ्काय" (त्या शंकेमुळे) असे म्हटले आहे. ธมฺมิกปาติโมกฺขฏฺฐปนกถา นิฏฺฐิตา. धम्मिकपातिमोक्खट्ठपनकथा समाप्त झाली. อตฺตาทานองฺคกถา अत्तादानअङ्गकथा (स्वतः अधिकरण स्वीकारण्याच्या अंगांविषयीची कथा). ๓๙๘. อตฺตาทานํ อาทาตุกาเมนาติ เอตฺถ สาสนํ โสเธตุกาโม ภิกฺขุ ยํ อธิกรณํ อตฺตนา อาทิยติ, ตํ อตฺตาทานนฺติ วุจฺจติ. อกาโล อิมํ อตฺตาทานํ อาทาตุนฺติ เอตฺถ ราชภยํ โจรภยํ ทุพฺภิกฺขภยํ วสฺสารตฺโตติ อยํ อกาโล, วิปรีโต กาโล. ३९८. 'अत्तादानं आदातुकामेन' यामध्ये शासनाला शुद्ध करण्याची इच्छा असणाऱ्या भिक्खूने ज्या अधिकरणाचा स्वतः स्वीकार केला आहे, त्याला 'अत्तादान' असे म्हटले जाते. 'अकालो इमं अत्तादानं आदातुं' यामध्ये राजाचे भय, चोरांचे भय, दुष्काळाचे भय आणि पावसाळ्यातील रात्रीची वेळ हा अयोग्य काळ (अकाल) आहे; आणि याच्या विपरीत असलेला काळ हा योग्य काळ (काल) आहे. อภูตํ อิทํ อตฺตาทานนฺติ อสนฺตมิทํ, มยา อธมฺโม วา ธมฺโมติ, ธมฺโม วา อธมฺโมติ, อวินโย วา วินโยติ, วินโย วา อวินโยติ, ทุสฺสีโล วา ปุคฺคโล สีลวาติ, สีลวา วา ทุสฺสีโลติ คหิโตติ อตฺโถ; วิปริยาเยน ภูตํ เวทิตพฺพํ. อนตฺถสํหิตํ อิทํ อตฺตาทานนฺติ เอตฺถ [Pg.125] ยํ ชีวิตนฺตรายาย วา พฺรหฺมจริยนฺตรายาย วา สํวตฺตติ, อิทํ อนตฺถสํหิตํ, วิปรีตํ อตฺถสํหิตํ นาม. 'अभूतं इदं अत्तादानं' म्हणजे हे असत्य आहे; "मी अधम्माला धम्म म्हणून, किंवा धम्माला अधम्म म्हणून, अविनाला विनय म्हणून, किंवा विनयाला अविनय म्हणून, दुःशीलाला शीलवान म्हणून, किंवा शीलवानाला दुःशील म्हणून ग्रहण केले आहे", असा अर्थ आहे; याच्या उलट असेल तर ते 'भूत' (सत्य) समजावे. 'अनत्थसंहितं इदं अत्तादानं' यामध्ये जे जीवाच्या अंतरायासाठी (जीव धोक्यात आणण्यासाठी) किंवा ब्रह्मचर्याच्या अंतरायासाठी कारणीभूत ठरते, ते 'अनर्थसंहित' (अनर्थकारक) आहे; आणि याच्या विपरीत असलेले 'अर्थसंहित' (कल्याणकारक) मानले जाते. น ลภิสฺสามิ สนฺทิฏฺเฐ สมฺภตฺเต ภิกฺขูติ อปฺเปกทา หิ ราชภยาทีสุ เอวรูปา อตฺตโน ปกฺขสฺส อุปตฺถมฺภกา ภิกฺขู ลทฺธุํ น สกฺกา โหนฺติ, ตํ สนฺธาย วุตฺตํ ‘‘น ลภิสฺสามี’’ติ. อปฺเปกทา ปน เขมสุภิกฺขาทีสุ ลทฺธุํ สกฺกา โหนฺติ, ตํ สนฺธาย ‘‘ลภิสฺสามี’’ติ วุตฺตํ. 'न लभिस्सामि संदिट्ठे संभत्ते भिक्खू' यामध्ये कधीकधी राजाचे भय इत्यादींमुळे अशा प्रकारचे आपल्या पक्षाचे समर्थन करणारे भिक्खू मिळणे शक्य नसते, ते लक्षात घेऊन भगवंतांनी "न लभिस्सामि" (मला मिळणार नाहीत) असे म्हटले आहे. परंतु कधीकधी क्षेम आणि सुभिक्ष (शांतता व सुबत्ता) इत्यादी काळात ते मिळणे शक्य असते, ते लक्षात घेऊन "लभिस्सामि" (मला मिळतील) असे म्हटले आहे. ภวิสฺสติ สงฺฆสฺส ตโตนิทานํ ภณฺฑนนฺติ โกสมฺพกานํ วิย ภณฺฑนํ กลโห วิคฺคโห วิวาโท สงฺฆเภโท จ ภวิสฺสตีติ. ปจฺฉาปิ อวิปฺปฏิสารกรํ ภวิสฺสตีติ สุภทฺทํ วุฑฺฒปพฺพชิตํ นิคฺคเหตฺวา ปญฺจสติกสงฺคีตึ กโรนฺตสฺส มหากสฺสปตฺเถรสฺเสว, ทสวตฺถุเก อธิกรเณ ทสภิกฺขุสหสฺสานิ นิคฺคเหตฺวา สตฺตสติกสงฺคีตึ กโรนฺตสฺส อายสฺมโต ยสสฺเสว, สฏฺฐิภิกฺขุสหสฺสานิ นิคฺคเหตฺวา สหสฺสิกสงฺคีตึ กโรนฺตสฺส โมคฺคลิปุตฺตติสฺสตฺเถรสฺเสว จ ปจฺฉา สมนุสฺสรณกรณํ โหติ, สาสนสฺส จ วิคตุปกฺกิเลสจนฺทิมสูริยสสฺสิริกตาย สํวตฺตติ. 'भविस्सति सङ्घस्स ततोनिदानं भण्डनं' म्हणजे कोसाम्बिक भिक्खूंप्रमाणे भांडण, कलह, विग्रह, विवाद आणि संघभेद होईल. 'पच्छापि अविप्पटिसारकरं भविस्सति' म्हणजे वृद्धपणी प्रव्रजित झालेल्या सुभद्दास दमन करून पाचशे भिक्खूंची संगीती (प्रथम संगीती) करणाऱ्या महाकस्सप थेरांप्रमाणे, दशवस्तूच्या अधिकरणामध्ये दहा हजार भिक्खूंचे दमन करून सातशे भिक्खूंची संगीती (द्वितीय संगीती) करणाऱ्या आयुष्यमान यसांप्रमाणे, आणि साठ हजार भिक्खूंचे दमन करून हजार भिक्खूंची संगीती (तृतीय संगीती) करणाऱ्या मोग्गलिपुत्त तिस्स थेरांप्रमाणे नंतर पश्चात्तापरहित स्मरण करणारे होते; आणि ते शासनाला उपक्लेशांपासून मुक्त करून चंद्र-सूर्यासारखे तेजस्वी बनवण्यासाठी कारणीभूत ठरते. อตฺตาทานองฺคกถา นิฏฺฐิตา. अत्तादानअङ्गकथा समाप्त झाली. โจทเกนปจฺจเวกฺขิตพฺพธมฺมกถา चोदकेनपच्चवेक्खितब्बधम्मकथा (आरोप करणाऱ्या भिक्खूने स्वतःचे परीक्षण करण्याच्या धर्मांविषयीची कथा). ๓๙๙. อจฺฉิทฺเทน อปฺปฏิมํเสนาติอาทีสุ เยน คหฏฺฐปพฺพชิเตสุ โย โกจิ ปหโฏ วา โหติ, คิหีนํ คณฺฑผาลนาทีนิ เวชฺชกมฺมานิ วา กตานิ, ตสฺส กายสมาจาโร อุปจิกาหิ ขายิตตาลปณฺณมิว ฉิทฺโท จ ปฏิมาสิตุํ ยตฺถ กตฺถจิ คเหตฺวา อากฑฺฒิตุํ สกฺกุเณยฺยตาย สปฺปฏิมํโส จ โหติ, วิปรีโต อจฺฉิทฺโท อปฺปฏิมํโสติ เวทิตพฺโพติ. วจีสมาจาโร ปน มุสาวาทโอมสวาทเปสุญฺญอมูลกานุทฺธํสนาทีหิ ฉิทฺโท จ สปฺปฏิมํโส จ โหติ, วิปรีโต อจฺฉิทฺโท อปฺปฏิมํโส. ३९९. 'अच्छिद्देन अप्पटिमंसेन' इत्यादींमध्ये, ज्या भिक्खूने गृहस्थ किंवा प्रव्रजितांपैकी कोणालाही मारहाण केली असेल, किंवा गृहस्थांचे गळू फोडणे इत्यादी वैद्यकीय कामे केली असतील, त्याचा कायिक सदाचार (कायसमाचार) वाळवीने खाल्लेल्या ताडपत्राप्रमाणे छिद्रयुक्त (दोषयुक्त) असतो, आणि कुठेही पकडून ओढता येण्यासारखा असल्यामुळे तो दोषारोप ठेवण्याजोगा असतो; याच्या विपरीत असलेला कायसमाचार 'अच्छिद्र' (दोषरहित) आणि 'अप्पटिमंस' (दोषारोपरहित) समजावा. परंतु वाचिक सदाचार (वचीसमाचार) असत्य बोलणे, अपमानकारक बोलणे, चहाडी करणे, निराधार आरोप करणे इत्यादींमुळे छिद्रयुक्त आणि दोषारोप ठेवण्याजोगा होतो; याच्या विपरीत असलेला वचीसमाचार 'अच्छिद्र' आणि 'अप्पटिमंस' समजावा. เมตฺตํ นุ โข เม จิตฺตนฺติ ปลิโพเธ ฉินฺทิตฺวา กมฺมฏฺฐานภาวนานุโยเคน อธิคตํ เมตฺตจิตฺตํ. อนาฆาตนฺติ อาฆาตวิรหิตํ, วิกฺขมฺภนวเสน วิหตาฆาตนฺติ อตฺโถ. อิทํ ปนาวุโส กตฺถ วุตฺตํ ภควตาติ อิทํ สิกฺขาปทํ กตรสฺมึ นคเร วุตฺตนฺติ อตฺโถ. “माझे चित्त मैत्रीपूर्ण आहे काय?” म्हणजे अडथळे (पलिबोध) तोडून कर्मस्थान-भावनेच्या अभ्यासाने प्राप्त झालेले मैत्रीचे चित्त समोर उपस्थित झाले आहे काय? “अनाघात” म्हणजे आघातापासून (द्वेषापासून) रहित किंवा विक्खंभन (दडपून टाकणे) द्वारे नष्ट केलेला आघात असलेला, असा अर्थ आहे. “हे पुन्हा, आवुसो, भगवंतांनी कोठे म्हटले आहे?” याचा अर्थ हा शिक्षापद कोणत्या नगरात सांगितला गेला आहे, असा अर्थ आहे. โจทเกนปจฺจเวกฺขิตพฺพธมฺมกถา นิฏฺฐิตา. चोदकाने (आरोप करणाऱ्याने) प्रत्यवेक्षण करण्याच्या धर्माची कथा समाप्त झाली. โจทเกนอุปฏฺฐาเปตพฺพกถา चोदकाने उपस्थित करावयाच्या गुणांची कथा ๔๐๐. กาเลน [Pg.126] วกฺขามีติอาทีสุ เอโก เอกํ โอกาสํ กาเรตฺวา โจเทนฺโต กาเลน วทติ นาม. สงฺฆมชฺฌคณมชฺฌสลากคฺคยาคุอคฺควิตกฺกมาฬกภิกฺขาจารมคฺคอาสนสาลาทีสุ อุปฏฺฐาเกหิ ปริวาริตกฺขเณ วา โจเทนฺโต อกาเลน วทติ นาม. ตจฺเฉน วทนฺโต ภูเตน วทติ นาม. ‘‘อมฺโภ มหลฺลก, ปริสาวจร, ปํสุกูลิก, ธมฺมกถิก, ปติรูปํ ตว อิท’’นฺติ วทนฺโต ผรุเสน วทติ นาม. การณนิสฺสิตํ ปน กตฺวา ‘‘ภนฺเต มหลฺลกตฺถ, ปริสาวจรา, ปํสุกูลิกา, ธมฺมกถิกตฺถ, ปติรูปํ ตุมฺหากํ อิท’’นฺติ วทนฺโต สณฺเหน วทติ นาม. การณนิสฺสิตํ กตฺวา วทนฺโต อตฺถสํหิเตน วทติ นาม. เมตฺตจิตฺโต วกฺขามิ โน โทสนฺตโรติ เมตฺตจิตฺตํ อุปฏฺฐเปตฺวา วกฺขามิ, น ทุฏฺฐจิตฺโต หุตฺวา. ४००. “योग्य वेळी बोलेन” इत्यादी शब्दांमध्ये, एका चोदक भिक्षूने दुसऱ्या चोदित (आरोपित) भिक्षूकडून परवानगी घेऊन आरोप केला तर तो “योग्य वेळी बोलतो” असे म्हटले जाते. संघामध्ये, गणांच्या मध्ये, शलाका घेण्याच्या ठिकाणी, पेज वाटपाच्या ठिकाणी, कर्मस्थानाचा विचार करण्याच्या मंडपात, भिक्षाटनाच्या मार्गावर, आसनशाळेत इत्यादी ठिकाणी किंवा सेवकांनी वेढलेले असताना आरोप केला तर तो “अवेळी बोलतो” असे म्हटले जाते. सत्य गोष्टीने बोलणारा “खऱ्या गोष्टीने बोलतो” असे म्हटले जाते. “हे वृद्ध! हे परिषदेत वावरणारे! हे पांसुकूलिक! हे धम्मकथिक! हे तुला योग्य आहे काय?” असे बोलणारा “कठोर शब्दांत बोलतो” असे म्हटले जाते. परंतु, कारणाचा आश्रय घेऊन “भंते, आपण वृद्ध आहात, परिषदेत वावरणारे आहात, पांसुकूलिक आहात, धम्मकथिक आहात; हे आपल्याला योग्य आहे काय?” असे बोलणारा “मृदू शब्दांत बोलतो” असे म्हटले जाते. कारणाचा आश्रय घेऊन बोलणारा “कल्याणाशी (अर्थाशी) युक्त बोलतो” असे म्हटले जाते. “मैत्रीपूर्ण चित्ताने बोलेन, द्वेषयुक्त चित्ताने नाही” म्हणजे मैत्रीचे चित्त जागृत करून बोलेन, दुष्ट चित्त ठेवून नाही. โจทเกนอุปฏฺฐาเปตพฺพกถา นิฏฺฐิตา. चोदकाने उपस्थित करावयाच्या गुणांची कथा समाप्त झाली. โจทกจุทิตกปฏิสํยุตฺตกถา चोदक आणि चोदित यांच्याशी संबंधित कथा ๔๐๑. อชฺฌตฺตํ มนสิกริตฺวาติ อตฺตโน จิตฺเต อุปฺปาเทตฺวา. การุญฺญตาติ กรุณาภาโว. อิมินา กรุณญฺจ กรุณาปุพฺพภาคญฺจ ทสฺเสติ. หิเตสิตาติ หิตคเวสนตา. อนุกมฺปิตาติ เตน หิเตน สํโยชนตา. ทฺวีหิปิ เมตฺตญฺจ เมตฺตาปุพฺพภาคญฺจ ทสฺเสติ. อาปตฺติวุฏฺฐานตาติ อาปตฺติโต วุฏฺฐาเปตฺวา สุทฺธนฺเต ปติฏฺฐาปนา. วตฺถุํ โจเทตฺวา สาเรตฺวา ปฏิญฺญํ อาโรเปตฺวา ยถาปฏิญฺญาย กมฺมกรณํ วินยปุเรกฺขารตา นาม. อิเม ปญฺจ ธมฺเมติ เย เอเต การุญฺญตาติอาทินา นเยน วุตฺตา, อิเม ปญฺจ ธมฺเม อชฺฌตฺตํ มนสิ กริตฺวา ปโร โจเทตพฺโพติ. ४०१. “अध्यात्म मनात आणून” म्हणजे स्वतःच्या चित्तात उत्पन्न करून. “कारुण्यता” म्हणजे करुणेचा भाव. याने अर्पणा अवस्थेला पोहोचलेले करुणा ध्यान आणि करुणेच्या पूर्वभागातील करुणा दर्शविली आहे. “हितेषिता” म्हणजे हिताचा शोध घेणे. “अनुकंपिता” म्हणजे त्या हिताशी जोडणे. या दोन्ही शब्दांनी मैत्री ध्यान आणि मैत्रीच्या पूर्वभागातील मैत्री दर्शविली आहे. “आपत्तीतून उठवणे” म्हणजे आपत्तीतून (गुन्ह्यातून) बाहेर काढून शुद्धतेमध्ये प्रस्थापित करणे. विषयावर आरोप करून, आठवण करून देऊन, कबुली घेऊन आणि कबुली दिल्याप्रमाणे कर्म करणे याला “विनयाला समोर ठेवणारा” असे म्हणतात. “हे पाच धर्म” म्हणजे जे कारुण्यता इत्यादी पद्धतीने सांगितले आहेत, या पाच धर्मांना स्वतःच्या मनात आणून दुसऱ्यावर आरोप केला पाहिजे. สจฺเจ จ อกุปฺเป จาติ วจีสจฺเจ จ อกุปฺปนตาย จ. จุทิตเกน หิ สจฺจญฺจ วตฺตพฺพํ, โกโป จ น กาตพฺโพ. เนว อตฺตนา กุชฺฌิตพฺโพ, น ปโร ฆฏฺเฏตพฺโพติ อตฺโถ. เสสํ สพฺพตฺถ อุตฺตานเมวาติ. “सत्यावर आणि अक्रोधावर” म्हणजे वाणीच्या सत्यावर आणि क्रोध न करण्यावर प्रस्थापित व्हावे. कारण आरोपित व्यक्तीने सत्यच बोलले पाहिजे आणि क्रोध करू नये. स्वतःही रागवू नये आणि दुसऱ्यालाही दुखावू नये, असा अर्थ आहे. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. โจทกจุทิตกปฏิสํยุตฺตกถา นิฏฺฐิตา. चोदक आणि चोदित यांच्याशी संबंधित कथा समाप्त झाली. ปาติโมกฺขฏฺฐปนกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. पातिमोक्ख-ठपन-खंधक (प्रातिमोक्ष स्थगन स्कंधक) ची वर्णना समाप्त झाली. ๑๐. ภิกฺขุนิกฺขนฺธกํ १०. भिक्खुनी स्कंधक มหาปชาปติโคตมีวตฺถุกถา महाप्रजापती गौतमीची कथा ๔๐๒. ภิกฺขุนิกฺขนฺธเก [Pg.127] – อลํ โคตมิ มา เต รุจฺจีติ กสฺมา ปฏิกฺขิปติ, นนุ สพฺเพสมฺปิ พุทฺธานํ จตสฺโส ปริสา โหนฺตีติ? กามํ โหนฺติ, กิลเมตฺวา ปน อเนกกฺขตฺตุํ ยาจิเตน อนุญฺญาตํ ปพฺพชฺชํ ‘‘ทุกฺเขน ลทฺธา อยํ อมฺเหหี’’ติ สมฺมา ปริปาเลสฺสนฺตีติ ภทฺทกํ กตฺวา อนุชานิตุกาโม ปฏิกฺขิปติ. อฏฺฐครุธมฺมกถา มหาวิภงฺเคเยว กถิตา. ४०२. भिक्खुनी स्कंधकामध्ये – “बस कर गौतमी, तुला हे आवडणार नाही” असे म्हणून भगवंत का नकार देतात? सर्वच बुद्धांच्या चार परिषदा असतातच की नाही? नक्कीच असतात. परंतु, कष्ट सोसून अनेक वेळा याचना केल्यावर अनुमती मिळालेल्या प्रव्रज्येबद्दल “आम्ही ही प्रव्रज्या मोठ्या कष्टाने मिळवली आहे” असा विचार करून त्या तिचे चांगल्या प्रकारे रक्षण करतील, असे कल्याणकारी नियोजन करून, अनुमती देण्याची इच्छा असल्यामुळेच ते नकार देतात. आठ गरूधर्मांची कथा महाविभंगामध्येच सांगितली गेली आहे. ๔๐๓. กุมฺภเถนเกหีติ กุมฺเภ ทีปํ ชาเลตฺวา เตน อาโลเกน ปรฆเร ภณฺฑํ วิจินิตฺวา เถนกโจเรหิ. ४०३. “कुंभथेनक” म्हणजे घागरीत दिवा लावून त्या प्रकाशात दुसऱ्याच्या घरात वस्तू शोधून चोरी करणाऱ्या चोरांद्वारे. เสตฏฺฐิกา นาม โรคชาตีติ เอโก ปาณโก นาฬิมชฺฌคตํ กณฺฑํ วิชฺฌติ, เยน วิทฺธตฺตา นิกฺขนฺตมฺปิ สาลิสีสํ ขีรํ คเหตุํ น สกฺโกติ. “सेतट्टिका” (पांढरी कीड) नावाचा रोग म्हणजे एक लहान कीटक धानाच्या नळीच्या मध्यभागी असलेल्या कोंबाला छिद्र पाडतो, ज्या छिद्र पाडल्यामुळे बाहेर आलेली भाताची लोंबी देखील दूध (रस) ग्रहण करण्यास असमर्थ ठरते. มญฺชิฏฺฐิกา นาม โรคชาตีติ อุจฺฉูนํ อนฺโตรตฺตภาโว. มหโต ตฬากสฺส ปฏิกจฺเจว อาฬินฺติ อิมินา ปน เอตมตฺถํ ทสฺเสติ – ยถา มหโต ตฬากสฺส อาฬิยา อพทฺธายปิ กิญฺจิ อุทกํ ติฏฺเฐยฺย, ปฐมเมว พทฺธาย ปน ยํ อพทฺธปจฺจยา น ติฏฺเฐยฺย, ตมฺปิ ติฏฺเฐยฺย; เอวเมว เย อิเม อนุปฺปนฺเน วตฺถุสฺมึ ปฏิกจฺเจว อวีติกฺกมนตฺถาย ครุธมฺมา ปญฺญตฺตา. เตสุ อปญฺญตฺเตสุปิ มาตุคามสฺส ปพฺพชิตตฺตา ปญฺเจว วสฺสสตานิ สทฺธมฺโม ติฏฺเฐยฺย. ปฏิกจฺเจว ปญฺญตฺตตฺตา ปน อปรานิปิ ปญฺจวสฺสสตานิ ฐสฺสตีติ เอวํ ปฐมํ วุตฺตํ วสฺสสหสฺสเมว ฐสฺสตีติ. วสฺสสหสฺสนฺติ เจตํ ปฏิสมฺภิทาปเภทปฺปตฺตขีณาสววเสเนว วุตฺตํ. ตโต ปน อุตฺตริมฺปิ สุกฺขวิปสฺสกขีณาสววเสน วสฺสสหสฺสํ, อนาคามิวเสน วสฺสสหสฺสํ, สกทาคามิวเสน วสฺสสหสฺสํ, โสตาปนฺนวเสน วสฺสสหสฺสนฺติ เอวํ ปญฺจวสฺสสหสฺสานิ ปฏิเวธสทฺธมฺโม ฐสฺสติ. ปริยตฺติธมฺโมปิ ตานิเยว. น หิ ปริยตฺติยา อสติ ปฏิเวโธ [Pg.128] อตฺถิ, นาปิ ปริยตฺติยา สติ ปฏิเวโธ น โหติ; ลิงฺคํ ปน ปริยตฺติยา อนฺตรหิตายปิ จิรํ ปวตฺติสฺสตีติ. “मंजिट्ठिका” नावाचा रोग म्हणजे उसाच्या आतील लालसरपणा. “मोठ्या तलावाचा बांध आधीच बांधावा” या वाक्याने हा अर्थ दर्शविला आहे – ज्याप्रमाणे मोठ्या तलावाचा बांध न बांधताही थोडे पाणी टिकून राहू शकते, परंतु आधीच बांध बांधल्यास, जे पाणी बांध न बांधल्यामुळे टिकून राहिले नसते, ते देखील टिकून राहते; त्याचप्रमाणे, कोणतीही घटना घडण्यापूर्वीच, नियमांचे उल्लंघन न व्हावे म्हणून जे हे गरूधर्म प्रज्ञप्त (नियमबद्ध) केले गेले आहेत. ते प्रज्ञप्त केले नसले तरीही, स्त्रियांच्या प्रव्रज्येमुळे सद्धम्म केवळ पाचशे वर्षेच टिकला असता. परंतु आधीच प्रज्ञप्त केल्यामुळे आणखी पाचशे वर्षे टिकून राहील. अशा प्रकारे सुरुवातीला सांगितल्याप्रमाणे तो एक हजार वर्षेच टिकेल, असा अर्थ दर्शविला आहे. ‘एक हजार वर्षे’ हे प्रतिसंभिदा इत्यादी भेद प्राप्त केलेल्या क्षीणासवांच्या (अर्हतांच्या) प्रभावानेच म्हटले आहे. त्यानंतरही, शुष्कविपश्यक क्षीणासवांच्या प्रभावाने एक हजार वर्षे, अनागामींच्या प्रभावाने एक हजार वर्षे, सकदागामींच्या प्रभावाने एक हजार वर्षे, आणि स्रोतापन्नांच्या प्रभावाने एक हजार वर्षे, अशा प्रकारे पाच हजार वर्षे प्रतिवेध-सद्धम्म (साक्षात्कार रूप सद्धम्म) टिकून राहील. परियत्ति-धम्म (ग्रंथ रूप धम्म) देखील तितकीच वर्षे टिकेल. कारण परियत्ति नसताना प्रतिवेध असू शकत नाही, आणि परियत्ति असताना प्रतिवेध होणार नाही असे नाही; परंतु परियत्ति लुप्त झाल्यावरही भिक्षूंचे बाह्य रूप (लिंग) दीर्घकाळ टिकून राहील, असे समजावे. มหาปชาปติโคตมีวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. महाप्रजापती गौतमीची कथा समाप्त झाली. ภิกฺขุนีอุปสมฺปทานุชานนกถา भिक्खुनी उपसंपदा अनुमतीची कथा ๔๐๔. อนุชานามิ ภิกฺขเว ภิกฺขูหิ ภิกฺขุนิโย อุปสมฺปาเทตุนฺติ อิมาย อนุปญฺญตฺติยา ภิกฺขู ปญฺจสตา สากิยานิโย มหาปชาปติยา สทฺธิวิหารินิโย กตฺวา อุปสมฺปาเทสุํ. อิติ ตา สพฺพาปิ เอกโตอุปสมฺปนฺนา นาม อเหสุํ. เย โข ตฺวํ โคตมีติ อิมินา โอวาเทน โคตมี อรหตฺตํ ปตฺตา. ४०४. “भिक्षूंनो, मी भिक्षूंद्वारे भिक्खुनींना उपसंपदा देण्याची अनुमती देतो” या अनुप्रज्ञप्तीमुळे भिक्षूंनी पाचशे शाक्य स्त्रियांना महाप्रजापती गौतमीच्या सार्धविहारिणी बनवून उपसंपदा दिली. अशा प्रकारे त्या सर्व ‘एकतो-उपसंपन्न’ (एका बाजूने उपसंपदा प्राप्त केलेल्या) झाल्या. “हे गौतमी, जे तू...” या उपदेशामुळे गौतमीने अर्हत्त्व प्राप्त केले. ๔๐๙. กมฺมํ น กรียตีติ ตชฺชนียาทิ สตฺตวิธมฺปิ กมฺมํ น กรียติ. ขมาเปนฺตีติ น ปุน เอวํ กริสฺสามีติ ขมาเปนฺติ. ४०९. “कर्म केले जात नाही” म्हणजे तर्जनीय इत्यादी सात प्रकारचे कर्म केले जात नाही. “क्षमा मागतात” म्हणजे “पुन्हा असे करणार नाही” असे म्हणून क्षमा मागतात. ๔๑๐. อนุชานามิ, ภิกฺขเว, ภิกฺขูหิ ภิกฺขุนีนํ กมฺมํ โรเปตฺวา นิยฺยาเทตุนฺติ เอตฺถ ตชฺชนียาทีสุ ‘‘อิทํ นาม กมฺมํ เอติสฺสา กาตพฺพ’’นฺติ เอวํ โรเปตฺวา ‘‘ตํ ทานิ ตุมฺเหว กโรถา’’ติ นิยฺยาเทตพฺพํ. สเจ ปน อญฺญสฺมึ โรปิเต อญฺญํ กโรนฺติ, ‘‘ตชฺชนียกมฺมารหสฺส นิยสฺสกมฺมํ กโรตี’’ติ เอตฺถ วุตฺตนเยน กาเรตพฺพตํ อาปชฺชนฺติ. ४१०. “भिक्षूंनो, मी भिक्षूंद्वारे भिक्खुनींवर कर्म आरोपित करून ते सोपवण्याची अनुमती देतो” यामध्ये, तर्जनीय इत्यादी कर्मांमध्ये “या भिक्खुनीवर अमुक कर्म केले पाहिजे” असे आरोपित करून, “ते आता तुम्हीच करा” असे म्हणून ते सोपवले पाहिजे. परंतु जर एका कर्माचा आरोप केला असताना दुसरेच कर्म केले, तर “तर्जनीय कर्मास पात्र असलेल्यावर निसर्ग-कर्म करतो” यामध्ये सांगितलेल्या पद्धतीने ते प्रायश्चित्तास पात्र ठरतात. ๔๑๑. กทฺทโมทเกนาติ เอตฺถ น เกวลํ กทฺทโมทเกน, วิปฺปสนฺนอุทกรชนกทฺทมาทีสุปิ เยน เกนจิ โอสิญฺจนฺตสฺส ทุกฺกฏเมว. อวนฺทิโย โส ภิกฺขเว ภิกฺขุ ภิกฺขุนิสงฺเฆน กาตพฺโพติ ภิกฺขุนุปสฺสเย สนฺนิปติตฺวา ‘‘อสุโก นาม อยฺโย ภิกฺขุนีนํ อปสาทนียํ ทสฺเสติ, เอตสฺส อยฺยสฺส อวนฺทิยกรณํ รุจฺจตี’’ติ เอวํ ติกฺขตฺตุํ สาเวตพฺพํ. เอตฺตาวตา อวนฺทิโย กโต โหติ. ตโต ปฏฺฐาย ยถา สามเณเร ทิสฺวา น วนฺทนฺติ; เอวเมว ทิสฺวาปิ น วนฺทิตพฺโพ. เตน ภิกฺขุนา สมฺมา วตฺตนฺเตน ภิกฺขุนุปสฺสยํ อาคนฺตฺวา วิหาเรเยว สงฺฆํ วา คณํ วา เอกปุคฺคลํ วา อุปสงฺกมิตฺวา อุกฺกุฏิกํ นิสีทิตฺวา อญฺชลึ ปคฺคเหตฺวา ‘‘ภิกฺขุนิสงฺโฆ มยฺหํ ขมตู’’ติ ขมาเปตพฺพํ. เตน ภิกฺขุนา ภิกฺขุนีนํ สนฺติกํ อาคนฺตฺวา ‘‘เอโส ภิกฺขุ ตุมฺเห ขมาเปตี’’ติ วตฺตพฺพํ. ตโต ปฏฺฐาย โส วนฺทิตพฺโพ. อยเมตฺถ สงฺเขโป, วิตฺถารํ ปน กมฺมวิภงฺเค วกฺขาม. ४११. ‘कद्दमोदकेन’ (चिखलाच्या पाण्याने) याविषयी - केवळ चिखलाच्या पाण्यानेच नाही, तर स्वच्छ पाणी, रंगीत पाणी, चिखल इत्यादींपैकी कोणत्याही गोष्टीने (भिक्षूवर) शिंपडणाऱ्याला दुक्कट (दुष्कृत) आपत्तीच होते. 'भिक्षूंनो, भिक्षुणीसंघाने त्या भिक्षूला अवंदनीय करावे' यासाठी भिक्षुणींच्या विहारात एकत्र येऊन, 'अमुक नावाचे आर्य भिक्षुणींचा अनादर करत आहेत, या आर्यांना अवंदनीय करणे आपल्याला संमत आहे काय?' असे तीन वेळा घोषित करावे. एवढ्याने तो अवंदनीय केला जातो. तेव्हापासून, ज्याप्रमाणे श्रामणेरांना पाहून वंदन केले जात नाही, त्याचप्रमाणे त्यांना पाहूनही वंदन करू नये. त्या भिक्षूने योग्य वर्तन करत, भिक्षुणींच्या विहारात न जाता, आपल्या विहारातच संघ, गण किंवा एका भिक्षूजवळ जाऊन, उकिडवे बसून, हात जोडून 'भिक्षुणीसंघाने मला क्षमा करावी' अशी क्षमा मागावी. त्यानंतर (दुसऱ्या) भिक्षूने भिक्षुणींच्या जवळ जाऊन 'हा भिक्षू आपली क्षमा मागत आहे' असे सांगावे. तेव्हापासून तो वंदनीय होतो. हा येथे संक्षेप आहे, सविस्तर माहिती आपण 'कम्मविभंग' मध्ये सांगू. โอภาเสนฺตีติ [Pg.129] อสทฺธมฺเมน โอภาเสนฺติ. ภิกฺขุนีหิ สทฺธึ สมฺปโยเชนฺตีติ ภิกฺขุนีหิ สทฺธึ ปุริเส อสทฺธมฺเมน สมฺปโยเชนฺติ. อวนฺทิยกรณํ วุตฺตนยเมว. อาวรณนฺติ วิหารปฺปเวสเน นิวารณํ. โอวาทํ ฐเปตุนฺติ เอตฺถ น ภิกฺขุนุปสฺสยํ คนฺตฺวา ฐเปตพฺโพ. โอวาทตฺถาย ปน อาคตา ภิกฺขุนิโย วตฺตพฺพา ‘‘อสุกา นาม ภิกฺขุนี สาปตฺติกา, ตสฺสา โอวาทํ ฐเปมิ, มา ตาย สทฺธึ อุโปสถํ กริตฺถา’’ติ. กายวิวรณาทีสุปิ ทณฺฑกมฺมํ วุตฺตนยเมว. ‘ओभासेन्ति’ म्हणजे असद्धर्माने (अनैतिकतेने) निंदा करतात किंवा वाईट बोलतात. ‘भिक्षुणीहि सद्धिं संपयोजेन्ति’ म्हणजे भिक्षुणींसोबत पुरुषांना असद्धर्माने जोडतात. अवंदनीय करणे हे आधी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावे. ‘आवरणं’ म्हणजे विहारात प्रवेश करण्यास प्रतिबंध करणे. ‘ओवादं ठपेतुं’ (उपदेश थांबवणे) याविषयी - भिक्षुणींच्या विहारात जाऊन उपदेश थांबवू नये. परंतु उपदेशासाठी आलेल्या भिक्षुणींना असे सांगावे की, 'अमुक नावाची भिक्षुणी आपत्तीयुक्त आहे, मी तिचा उपदेश थांबवत आहे, तुम्ही तिच्यासोबत उपोसथ करू नका.' शरीर उघडे करणे इत्यादी प्रकरणांमध्येही दंडकर्म आधी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावे. ๔๑๓. น ภิกฺขเว ภิกฺขุนิยา โอวาโท น คนฺตพฺโพติอาทิ ภิกฺขุนิวิภงฺควณฺณนายํ วุตฺตเมว. ४१३. ‘भिक्षूंनो, भिक्षुणीला उपदेश करण्यासाठी जाऊ नये’ इत्यादी वाक्य भिक्षुणीविभंग-वर्णनेमध्ये (अट्ठकथेत) आधीच सांगितले आहे. ๔๑๖. ผาสุกา นเมนฺตีติ คิหิทาริกาโย วิย ฆนปฏฺฏเกน กายพนฺธเนน ผาสุกา นมนตฺถาย พนฺธนฺติ. เอกปริยากตนฺติ เอกวารํ ปริกฺขิปนกํ. ४१६. ‘फासुका नमेन्ति’ म्हणजे गृहस्थ मुलींप्रमाणे बरगड्यांना आकार देण्यासाठी घट्ट पट्ट्याच्या कंबरपट्ट्याने बरगड्या बांधतात. ‘एकपरियाकतं’ म्हणजे एकदाच गुंडाळलेला (कंबरपट्टा). วิลีเวน ปฏฺเฏนาติ สณฺเหหิ เวฬุวิลีเวหิ กตปฏฺเฏน. ทุสฺสปฏฺเฏนาติ เสตวตฺถปฏฺเฏน. ทุสฺสเวณิยาติ ทุสฺเสน กตเวณิยา. ทุสฺสวฏฺฏิยาติ ทุสฺเสน กตวฏฺฏิยา. โจฬปฏฺฏาทีสุ โจฬกาสาวํ โจฬนฺติ เวทิตพฺพํ. ‘विलीवेन पट्टेन’ म्हणजे बांबूच्या बारीक कामट्यांनी बनवलेला पट्टा. ‘दुस्सपट्टेन’ म्हणजे पांढऱ्या कपड्याचा पट्टा. ‘दुस्सवेणिया’ म्हणजे कपड्याची बनवलेली वेणी. ‘दुस्सवट्ठिया’ म्हणजे कपड्याची बनवलेली गुंडाळी. चोळपट्ट इत्यादींमध्ये 'चोळ' म्हणजे काषाय रंगाचा जाडाभरडा कपडा असे समजावे. อฏฺฐิลฺเลนาติ โคชงฺฆฏฺฐิเกน. ชฆนนฺติ กฏิปฺปเทโส วุจฺจติ. หตฺถํ โกฏฺฏาเปนฺตีติ อคฺคพาหํ โกฏฺฏาเปตฺวา โมรปตฺตาทีหิ จิตฺตาลงฺการํ กโรนฺติ. หตฺถโกจฺฉนฺติ ปิฏฺฐิหตฺถํ. ปาทนฺติ ชงฺฆํ. ปาทโกจฺฉนฺติ ปิฏฺฐิปาทํ. ‘अट्ठिल्लेन’ म्हणजे गाईच्या पायाच्या नळीच्या हाडाने घासणे. ‘जघन’ म्हणजे कंबरेचा भाग म्हटला जातो. ‘हत्थं कोट्टापेन्ति’ म्हणजे हाताच्या बाहूंवर गोंदवून घेऊन मोराची पिसे इत्यादींनी सुंदर नक्षीकाम करतात. ‘हत्थकोच्छं’ म्हणजे हाताची पाठ. ‘पादं’ म्हणजे पायाची नळी. ‘पादकोच्छं’ म्हणजे पायाची पाठ. ๔๑๗. มุขลิมฺปนาทีนิ วุตฺตนยาเนว. อวงฺคํ กโรนฺตีติ อกฺขี อญฺชนฺติโย อวงฺคเทเส อโธมุขํ เลขํ กโรนฺติ. วิเสสกนฺติ คณฺฑปฺปเทเส วิจิตฺรสณฺฐานํ วิเสสกํ กโรนฺติ. โอโลเกนฺตีติ วาตปานํ วิวริตฺวา วีถึ โอโลเกนฺติ. สาโลเก ติฏฺฐนฺตีติ ทฺวารํ วิวริตฺวา อุปฑฺฒกายํ ทสฺเสนฺติโย ติฏฺฐนฺติ. นจฺจนฺติ นฏสมชฺชํ กาเรนฺติ. เวสึ วุฏฺฐาเปนฺตีติ คณิกํ วุฏฺฐาเปนฺติ. ปานาคารํ ฐเปนฺตีติ สุรํ วิกฺกิณนฺติ. สูนํ ฐเปนฺตีติ มํสํ วิกฺกิณนฺติ. อาปณนฺติ นานาภณฺฑานํ อเนกวิธํ อาปณํ ปสาเรนฺติ. ทาสํ อุปฏฺฐาเปนฺตีติ ทาสํ คเหตฺวา เตน อตฺตโน เวยฺยาวจฺจํ กาเรนฺติ. ทาสีอาทีสุปิ เอเสว นโย. หริตกปกฺกิกํ [Pg.130] ปกิณนฺตีติ หริตกญฺเจว ปกฺกญฺจ ปกิณนฺติ; ปกิณฺณกาปณํ ปสาเรนฺตีติ วุตฺตํ โหติ. ४१७. चेहऱ्याला लेप लावणे इत्यादी गोष्टी आधी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजाव्यात. ‘अवंगं करोन्ति’ म्हणजे डोळ्यांत काजळ घालताना डोळ्यांच्या कोपऱ्यात खाली जाणारी रेघ ओढतात. ‘विसेसकं’ म्हणजे गालावर विविध आकारांचे तीळ किंवा नक्षी काढतात. ‘ओलोकेन्ति’ म्हणजे खिडकी उघडून रस्ता पाहतात. ‘सालोके तिट्ठन्ति’ म्हणजे दरवाजा उघडून अर्धे शरीर दाखवत उभे राहतात. ‘नच्चन्ति’ म्हणजे नटांचे खेळ किंवा नाचगाण्याचे कार्यक्रम आयोजित करतात. ‘वेसिं वुट्ठापेन्ति’ म्हणजे गणिकेला (वेश्येला) प्रव्रज्या देतात. ‘पानागारं ठपेन्ति’ म्हणजे दारू विकतात. ‘सूनं ठपेन्ति’ म्हणजे मांस विकतात. ‘आपणं’ म्हणजे विविध वस्तूंचे अनेक प्रकारचे दुकान मांडतात. ‘दासं उपट्ठापेन्ति’ म्हणजे दास ठेवून त्याच्याकडून स्वतःची सेवा करून घेतात. दासी इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. ‘हरितक पक्खिकं पकिणन्ति’ म्हणजे हिरव्या भाज्या आणि शिजवलेल्या भाज्या विकतात; याचा अर्थ संकीर्ण (सर्व प्रकारच्या वस्तूंचे) दुकान मांडतात असा आहे. ๔๑๘. สพฺพนีลกาทิกถา กถิตาเยว. ४१८. पूर्णपणे निळ्या रंगाचे वस्त्र इत्यादींविषयीची चर्चा आधीच सांगितली आहे. ๔๑๙. ภิกฺขุนี เจ, ภิกฺขเว, กาลํ กโรนฺตีติอาทีสุ อยํ ปาฬิมุตฺตกวินิจฺฉโย – สเจ หิ ปญฺจสุ สหธมฺมิเกสุ โย โกจิ กาลํ กโรนฺโต ‘‘มมจฺจเยน มยฺหํ ปริกฺขาโร อุปชฺฌายสฺส โหตุ, อาจริยสฺส โหตุ, สทฺธิวิหาริกสฺส โหตุ, อนฺเตวาสิกสฺส โหตุ, มาตุ โหตุ, ปิตุ โหตุ, อญฺญสฺส วา ยสฺส กสฺสจิ โหตู’’ติ วทติ เตสํ น โหติ, สงฺฆสฺเสว โหติ. น หิ ปญฺจนฺนํ สหธมฺมิกานํ อจฺจยทานํ รุหติ, คิหีนํ ปน รุหติ. ภิกฺขุ หิ ภิกฺขุนิวิหาเร กาลํ กโรติ, ตสฺส ปริกฺขาโร ภิกฺขูนํเยว โหติ. ภิกฺขุนี ภิกฺขุวิหาเร กาลํ กโรติ, ตสฺสา ปริกฺขาโร ภิกฺขุนีนํเยว โหติ. ४१९. ‘भिक्षूंनो, जर भिक्षुणी मरण पावली तर’ इत्यादी वाक्यांमध्ये हा पालि-मुक्त (ग्रंथाबाहेरील) निर्णय आहे - जर पाच सहधार्मिकांपैकी कोणीही मरण पावताना असे म्हणाला की, 'माझ्या मृत्यूनंतर माझे परिष्कार उपाध्यायांचे होवोत, आचार्यांचे होवोत, सद्धिविहारिकाचे होवोत, अंतेवासिकाचे होवोत, आईचे होवोत, वडिलांचे होवोत किंवा इतर कोणत्याही व्यक्तीचे होवोत,' तर ते त्यांचे होत नाही, तर ते संघाचेच होते. कारण पाच सहधार्मिकांचे मरणोत्तर दान वैध ठरत नाही, परंतु गृहस्थांचे मरणोत्तर दान वैध ठरते. जर भिक्षू भिक्षुणींच्या विहारात मरण पावला, तर त्याचे परिष्कार भिक्षूंचेच होतात. जर भिक्षुणी भिक्षूंच्या विहारात मरण पावली, तर तिचे परिष्कार भिक्षुणींचेच होतात. ๔๒๐. ปุราณมลฺลีติ ปุราเณ คิหิกาเล มลฺลกสฺส ภริยา. ปุริสพฺยญฺชนนฺติ ปุริสนิมิตฺตํ, ฉินฺนํ วา โหตุ อจฺฉินฺนํ วา, ปฏิจฺฉนฺนํ วา อปฺปฏิจฺฉนฺนํ วา. สเจ เอตสฺมึ ฐาเน ปุริสพฺยญฺชนนฺติ จิตฺตํ อุปฺปาเทตฺวา อุปนิชฺฌายติ, ทุกฺกฏํ. ४२०. ‘पुराणमल्ली’ म्हणजे पूर्वी गृहस्थावस्थेत असताना मल्लाची (कुस्तीगिराची) पत्नी असलेली. ‘पुरिसब्यंजनं’ म्हणजे पुरुषाचे जननेंद्रिय; ते कापलेले असो वा नसो, झाकलेले असो वा उघडे असो. जर त्या ठिकाणी 'हे पुरुषाचे जननेंद्रिय आहे' असा विचार मनात आणून ती निरखून पाहते, तर दुक्कट आपत्ती होते. ๔๒๑. อตฺตโน ปริโภคตฺถาย ทินฺนํ นาม ยํ ‘‘ตุมฺเหเยว ปริภุญฺชถา’’ติ วตฺวา ทินฺนํ, ตํ อญฺญสฺส ททโต ทุกฺกฏํ. อคฺคํ คเหตฺวา ปน ทาตุํ วฏฺฏติ. สเจ อสปฺปายํ, สพฺพํ อปเนตุํ วฏฺฏติ. จีวรํ เอกาหํ วา ทฺวีหํ วา ปริภุญฺชิตฺวา ทาตุํ วฏฺฏติ. ปตฺตาทีสุปิ เอเสว นโย. ४२१. स्वतःच्या उपभोगासाठी दिलेले म्हणजे जे 'तुम्हीच याचा उपभोग घ्या' असे म्हणून दिले गेले आहे, ते दुसऱ्याला देणाऱ्या भिक्षूला दुक्कट आपत्ती होते. परंतु त्यातील काही भाग स्वतः घेऊन उरलेले देणे योग्य आहे. जर ते अयोग्य असेल, तर ते सर्वच्या सर्व काढून देणे योग्य आहे. जर ते चीवर असेल, तर एक किंवा दोन दिवस वापरून ते देणे योग्य आहे. पात्र इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. ภิกฺขูนํ สนฺนิธึ ภิกฺขุนีหิ ปฏิคฺคาหาเปตฺวาติ หิยฺโย ปฏิคฺคเหตฺวา ฐปิตมํสํ อชฺช อญฺญสฺมึ อนุปสมฺปนฺเน อสติ ภิกฺขูหิ ปฏิคฺคาหาเปตฺวา ภิกฺขุนีหิ ปริภุญฺชิตพฺพํ. ภิกฺขูหิ ปฏิคฺคหิตญฺหิ ภิกฺขุนีนํ อปฺปฏิคฺคหิตกฏฺฐาเน ติฏฺฐติ, ภิกฺขุนีนํ ปฏิคฺคหิตมฺปิ ภิกฺขูสุ เอเสว นโย. ‘भिक्षूंच्या संनिधीत भिक्षुणींकडून ग्रहण करवून’ म्हणजे काल ग्रहण करून ठेवलेले मांस आज दुसरा कोणी अनुपसंपन्न नसल्यास, भिक्षूंकडून पुन्हा ग्रहण करवून भिक्षुणींनी त्याचा उपभोग घ्यावा. कारण भिक्षूंनी ग्रहण केलेले अन्न भिक्षुणींसाठी न ग्रहण केलेल्या अन्नासारखेच असते, आणि भिक्षुणींनी ग्रहण केलेल्या अन्नाच्या बाबतीत भिक्षूंसाठीही हाच नियम आहे. ๔๒๖. อาสนํ สํกสายนฺติโย กาลํ วีตินาเมสุนฺติ อญฺญํ วุฏฺฐาเปตฺวา อญฺญํ นิสีทาเปนฺติโย โภชนกาลํ อติกฺกาเมสุํ. ४२६. ‘आसनं संकसायन्तियो कालं वीतिनामेसुं’ म्हणजे एका भिक्षुणीला उठवून दुसऱ्या भिक्षुणीला बसवत त्यांनी भोजनाची वेळ घालवून दिली. อฏฺฐนฺนํ [Pg.131] ภิกฺขุนีนํ ยถาวุฑฺฒนฺติ เอตฺถ สเจ ปุเร อฏฺฐสุ นิสินฺนาสุ ตาสํ อพฺภนฺตริมา อญฺญา อาคจฺฉติ, สา อตฺตโน นวกํ อุฏฺฐาเปตฺวา นิสีทิตุํ ลภติ. ยา ปน อฏฺฐหิปิ นวกตรา, สา สเจปิ สฏฺฐิวสฺสา โหติ, อาคตปฏิปาฏิยาว นิสีทิตุํ ลภติ. อญฺญตฺถ สพฺพตฺถ ยถาวุฑฺฒํ น ปฏิพาหิตพฺพนฺติ ฐเปตฺวา ภตฺตคฺคํ อญฺญสฺมึ จตุปจฺจยภาชนียฏฺฐาเน ‘‘อหํ ปุพฺเพ อาคตา’’ติ วุฑฺฒํ ปฏิพาหิตฺวา กิญฺจิ น คเหตพฺพํ; ยถาวุฑฺฒเมว วฏฺฏติ. ปวารณากถา กถิตาเยว. येथे 'आठ भिक्षुणींच्या ज्येष्ठतेनुसार' याविषयीचा निर्णय असा समजावा: पूर्वी आठ भिक्षुणी बसलेल्या असताना, जर त्यांच्या अंतर्गत असलेली दुसरी एखादी भिक्षुणी आली, तर ती आपल्यापेक्षा कनिष्ठ भिक्षुणीला उठवून बसण्यास जागा मिळवू शकते. परंतु, जी भिक्षुणी त्या आठही भिक्षुणींपेक्षा कनिष्ठ आहे, ती जरी साठ वर्षांची (दीक्षित) असली तरी, आलेल्या क्रमानुसारच तिला बसण्यास जागा मिळते. 'इतर सर्व ठिकाणी ज्येष्ठतेनुसार अडवू नये' याचा अर्थ भोजनशाळा वगळता इतर चार प्रत्ययांचे वाटप करण्याच्या ठिकाणी 'मी आधी आले आहे' असे म्हणून ज्येष्ठ भिक्षुणीला अडवून काहीही घेऊ नये; ज्येष्ठतेनुसारच घेणे योग्य आहे. पवारणासंबंधीची कथा आधीच सांगितली आहे. ๔๒๙. อิตฺถิยุตฺตนฺติอาทีหิ สพฺพยานานิ อนุญฺญาตานิ. ปาฏงฺกินฺติ ปฏโปฏฺฏลิกํ. ४२९. 'इत्थियुत्त' इत्यादी शब्दांद्वारे सर्व प्रकारच्या वाहनांना परवानगी दिली आहे. 'पाटङ्कि' म्हणजे कपड्याने बनवलेली पालखी (किंवा डोली). ๔๓๐. ทูเตน อุปสมฺปทา ทสนฺนํ อนฺตรายานํ เยน เกนจิ วฏฺฏติ. กมฺมวาจาปริโยสาเน สา ภิกฺขุนี ภิกฺขุนุปสฺสเย ฐิตา วา โหตุ นิปนฺนา วา ชาครา วา นิทฺทํ โอกฺกนฺตา วา, อุปสมฺปนฺนาว โหติ. ตาวเทว ฉายาทีนิ อาคตาย ทูตภิกฺขุนิยา อาจิกฺขิตพฺพานิ. ४३०. दहा अंतरायांपैकी (अडथळ्यांपैकी) कोणत्याही एका अंतरायामुळे दूताद्वारे उपसंपदा देणे योग्य ठरते. कम्मवाचेच्या समाप्तीनंतर ती भिक्षुणी भिक्षुणी-विहारात उभी असो, पडलेली असो, जागी असो किंवा गाढ निद्रेत असो, ती उपसंपन्नच होते. त्याच क्षणी आलेल्या दूत-भिक्षुणीला छाया (सावलीचे मोजमाप) इत्यादी गोष्टी सांगितल्या पाहिजेत. ๔๓๑. อุโทสิโตติ ภณฺฑสาลา. น สมฺมตีติ นปฺปโหติ. อุปสฺสยนฺติ ฆรํ. นวกมฺมนฺติ สงฺฆสฺสตฺถาย ภิกฺขุนิยา นวกมฺมมฺปิ กาตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. ४३१. 'उदोसित' म्हणजे भांडारगृह. 'न सम्मति' म्हणजे अपुरे पडणे. 'उपस्सय' म्हणजे घर (निवासस्थान). 'नवकम्म' म्हणजे संघाच्या हितासाठी भिक्षुणीला नवीन बांधकाम (नवकम्म) करण्याचीही मी परवानगी देतो, असा अर्थ आहे. ๔๓๒. ตสฺสา ปพฺพชิตายาติ ตสฺสา ปพฺพชิตกาเล. ยาว โส ทารโก วิญฺญุตํ ปาปุณาตีติ ยาว ขาทิตุํ ภุญฺชิตุํ นหายิตุญฺจ มณฺฑิตุญฺจ อตฺตโน ธมฺมตาย สกฺโกตีติ อตฺโถ. ४३२. 'तस्सा पब्बजिताय' म्हणजे तिच्या प्रव्रजित होण्याच्या काळात (तिचा गर्भ वाढला). 'जोपर्यंत तो मुलगा समजूतदारपणाला प्राप्त होत नाही' याचा अर्थ जोपर्यंत तो स्वतःहून खाणे, जेवणे, स्नान करणे आणि स्वतःला सजवणे या गोष्टी करण्यास समर्थ होत नाही, असा आहे. ฐเปตฺวา สาคารนฺติ สหคารเสยฺยมตฺตํ ฐเปตฺวา. ยถา อญฺญสฺมึ ปุริเส; เอวํ ทุติยิกาย ภิกฺขุนิยา ตสฺมึ ทารเก ปฏิปชฺชิตพฺพนฺติ ทสฺเสติ. มาตา ปน นหาเปตุํ ปาเยตุํ โภเชตุํ มณฺเฑตุํ อุเร กตฺวา สยิตุญฺจ ลภติ. 'ठपेत्वा सागारं' म्हणजे एकाच घरात एकत्र झोपणे वगळता. जसे इतर पुरुषांच्या बाबतीत वागावे, तसेच दुसऱ्या भिक्षुणीने त्या मुलाच्या बाबतीत वागावे, हे दर्शविले आहे. परंतु आई असलेल्या भिक्षुणीला त्याला स्नान घालणे, दूध पाजणे, जेवू घालणे, सजवणे आणि छातीशी धरून झोपवणे या गोष्टी करण्याची परवानगी मिळते. ๔๓๔. ยเทว สา วิพฺภนฺตาติ ยสฺมา สา วิพฺภนฺตา อตฺตโน รุจิยา ขนฺติยา โอทาตานิ วตฺถานิ นิวตฺถา, ตสฺมาเยว สา อภิกฺขุนี, น สิกฺขาปจฺจกฺขาเนนาติ ทสฺเสติ. สา ปุน อุปสมฺปทํ น ลภติ. ४३४. 'यदेव सा विब्भन्ता' या पाठाने हे दर्शविले आहे की, ज्या अर्थी ती गृहस्थ जीवनात परतली आणि स्वतःच्या इच्छेने व आवडीने पांढरी वस्त्रे परिधान केली, त्यामुळेच ती अभिक्षुणी (भिक्षुणी नसलेली) झाली आहे, शिक्षेचा (सिक्खाचा) त्याग केल्यामुळे नाही. ती पुन्हा उपसंपदा मिळवू शकत नाही. สา [Pg.132] อาคตา น อุปสมฺปาเทตพฺพาติ น เกวลํ น อุปสมฺปาเทตพฺพา, ปพฺพชฺชมฺปิ น ลภติ. โอทาตานิ คเหตฺวา วิพฺภนฺตา ปน ปพฺพชฺชามตฺตํ ลภติ. 'ती परत आल्यावर तिला उपसंपदा देऊ नये' म्हणजे केवळ उपसंपदाच देऊ नये असे नाही, तर तिला प्रव्रज्याही मिळत नाही. परंतु पांढरी वस्त्रे परिधान करून गृहस्थ जीवनात परतलेली भिक्षुणी केवळ प्रव्रज्या मिळवू शकते. อภิวาทนนฺติอาทีสุ ปุริสา ปาเท สมฺพาหนฺตา วนฺทนฺติ, เกเส ฉินฺทนฺติ, นเข ฉินฺทนฺติ, วณปฏิกมฺมํ กโรนฺติ, ตํ สพฺพํ กุกฺกุจฺจายนฺตา น สาทิยนฺตีติ อตฺโถ. ตตฺเรเก อาจริยา ‘‘สเจ เอกโต วา อุภโต วา อวสฺสุตา โหนฺติ สารตฺตา, ยถาวตฺถุกเมว’’. เอเก อาจริยา ‘‘นตฺถิ เอตฺถ อาปตฺตี’’ติ วทนฺติ. เอวํ อาจริยวาทํ ทสฺเสตฺวา อิทํ โอทิสฺส อนุญฺญาตํ วฏฺฏตีติ อฏฺฐกถาสุ วุตฺตํ. ตํ ปมาณํ. ‘‘อนุชานามิ ภิกฺขเว สาทิตุ’’นฺติ หิ วจเนเนว ตํ กปฺปิยํ. 'अभिवादन' इत्यादी पाठांमध्ये पुरुष पाय चेपत वंदन करतात, केस कापतात, नखे कापतात, जखमेवर उपचार करतात, त्या सर्व गोष्टींचा संकोच वाटल्यामुळे त्या स्वीकारत नाहीत, असा अर्थ आहे. त्या बाबतीत काही आचार्य म्हणतात की, 'जर एका बाजूने किंवा दोन्ही बाजूंनी रागयुक्त (आसक्त) असतील, तर त्या त्या वस्तूच्या स्वरूपानुसारच आपत्ती होते.' काही आचार्य म्हणतात की, 'यात कोणतीही आपत्ती नाही.' अशा प्रकारे आचार्यांचे मत दर्शवून, 'या गोष्टींना उद्देशून परवानगी दिली असल्याने हे योग्य आहे,' असे अट्ठकथांमध्ये म्हटले आहे. तेच प्रमाण आहे. कारण 'हे भिक्षूंनो, मी स्वीकारण्याची परवानगी देतो' या वचनामुळेच ते कप्पिय (योग्य) ठरते. ๔๓๕. ปลฺลงฺเกน นิสีทนฺตีติ ปลฺลงฺกํ อาภุชิตฺวา นิสีทนฺติ. อฑฺฒปลฺลงฺกนฺติ เอกํ ปาทํ อาภุชิตฺวา กตปลฺลงฺกํ. เหฏฺฐา วิวเฏ อุปริ ปฏิจฺฉนฺเนติ เอตฺถ สเจ กูโป ขโต โหติ, อุปริ ปน ปทรมตฺตเมว สพฺพทิสาสุ ปญฺญายติ, เอวรูเปปิ วฏฺฏติ. ४३५. 'पल्लङ्केन निसीदन्ति' म्हणजे मांडी घालून बसतात. 'अड्ढpल्लङ्क' म्हणजे एक पाय दुमडून घातलेली अर्ध-मांडी. 'खाली उघडे आणि वर झाकलेले' याविषयीचा निर्णय असा समजावा: जर खड्डा खणलेला असेल आणि वर केवळ लाकडी फळीच असेल, आणि सर्व दिशांना ते उघडे दिसत असेल, तरी अशा प्रकारच्या शौचालयातही शौचविधी करणे योग्य आहे. ๔๓๖. กุกฺกุสํ มตฺติกนฺติ กุณฺฑกญฺเจว มตฺติกญฺจ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมวาติ. ४३६. 'कुक्कुसं मत्तिकां' म्हणजे तांदळाचा कोंडा आणि मऊ माती. येथील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ภิกฺขุนีอุปสมฺปทานุชานนกถา นิฏฺฐิตา. भिक्षुणींच्या उपसंपदेला परवानगी देण्याची कथा समाप्त झाली. ภิกฺขุนิกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. भिक्षुणीस्कंधकाची वर्णना समाप्त झाली. ๑๑. ปญฺจสติกกฺขนฺธกํ ११. पंचसतिक स्कंधक (पाचशे भिक्षूंची संगीती) ขุทฺทานุขุทฺทกสิกฺขาปทกถา क्षुद्र आणि अनुक्षुद्र (लहान-सहान) शिक्षापदांची कथा ๔๔๑. ปญฺจสติกกฺขนฺธเก [Pg.133] – จตฺตาริ ปาราชิกานิ ฐเปตฺวา อวเสสานิ ขุทฺทานุขุทฺทกานีติ เอวมาทิ เอกสิกฺขาปทมฺปิ อปริจฺจชิตฺวา สพฺเพสํ สงฺคเหตพฺพภาวทสฺสนตฺถํ ปริยาเยน วุตฺตํ. อิทํ โว สมณานนฺติ อิทํ สมณานํ. ปทปูรณมตฺเต โวกาโร. ४४१. पंचसतिक स्कंधकात - 'चार पाराजिका वगळता उर्वरित सर्व क्षुद्र आणि अनुक्षुद्र शिक्षापदे आहेत' इत्यादी वचन एकही शिक्षापद न सोडता सर्व शिक्षापदांचा संग्रह केला पाहिजे हे दर्शवण्यासाठी पर्यायाने सांगितले आहे. 'इदं वो समणानं' म्हणजे हे श्रमणांसाठी योग्य आहे. येथे 'वो' हा शब्द केवळ पादपूर्तीसाठी आलेला निपात आहे. ๔๔๓. อิทมฺปิ เต อาวุโส อานนฺท ทุกฺกฏนฺติ ‘‘อิทํ ตยา ทุฏฺฐุ กต’’นฺติ เกวลํ ครหนฺเตหิ เถเรหิ วุตฺตํ, น อาปตฺตึ สนฺธาย วุตฺตํ. น หิ เต อาปตฺตานาปตฺตึ น ชานนฺติ. อิทาเนว เจตํ อนุสฺสาวิตํ – ‘‘สงฺโฆ อปญฺญตฺตํ น ปญฺญเปติ, ปญฺญตฺตํ น สมุจฺฉินฺทตี’’ติ. เทเสหิ ตํ ทุกฺกฏนฺติ อิทมฺปิ จ ‘‘อาม, ภนฺเต, ทุฏฺฐุ มยา กต’’นฺติ เอวํ ปฏิชานาหิ, ตํ ทุกฺกฏนฺติ อิทํ สนฺธาย วุตฺตํ, น อาปตฺติเทสนํ. เถโร ปน ยสฺมา อสติยา น ปุจฺฉิ น อนาทเรน, ตสฺมา ตตฺถ ทุฏฺฐุกตภาวมฺปิ อสลฺลกฺเขนฺโต ‘‘นาหํ ตํ ทุกฺกฏํ ปสฺสามี’’ติ วตฺวา เถเรสุ คารวํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อปิจายสฺมนฺตานํ สนฺธาย เทเสมิ ตํ ทุกฺกฏ’’นฺติ อาห. ยถา ตุมฺเห วทถ, ตถา ปฏิชานามีติ วุตฺตํ โหติ. เอเสว นโย อวเสเสสุ จตูสุ ฐาเนสุ. เสสเมตฺถ ยํ วตฺตพฺพํ สิยา, ตํ นิทานวณฺณนายเมว วุตฺตํ. ४४३. 'हे देखील, हे आयुष्यमान आनंद, तुझ्याकडून दुष्कृत झाले' हे वचन 'हे तुझ्याकडून वाईट झाले' अशा केवळ टीका करणाऱ्या थेरांनी म्हटले आहे, ते आपत्तीला उद्देशून म्हटलेले नाही. कारण ते थेर आपत्ती आणि अनापत्ती जाणत नव्हते असे नाही. आणि आताच हे घोषित केले गेले आहे की - 'संघाने न प्रज्ञप्त केलेले नियम प्रज्ञप्त करू नयेत आणि प्रज्ञप्त केलेले नियम नष्ट करू नयेत.' 'त्या दुष्कृताची कबुली दे' हे वचन देखील 'होय भंते, माझ्याकडून हे वाईट झाले' अशी कबुली दे, या दुष्कृताच्या कबुलीला उद्देशून म्हटले आहे, आपत्तीच्या देशनेला उद्देशून नाही. परंतु थेर (आनंद) यांनी ज्या अर्थी विस्मरणामुळे विचारले नाही, अनादरामुळे नाही, म्हणून तेथे दुष्कृत झाले आहे असे न मानणारे असूनही, 'मला त्यात माझे दुष्कृत दिसत नाही' असे म्हणून, थेरांबद्दल आदर दर्शवण्यासाठी, 'तरीही, आयुष्यमानांच्या श्रद्धेखातर मी त्या दुष्कृताची कबुली देतो' असे म्हणाले. म्हणजे 'जसे आपण सांगत आहात, तसेच मी मान्य करतो' असा याचा अर्थ आहे. उर्वरित चार स्थानांच्या बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. येथे जे काही अधिक सांगण्यासारखे आहे, ते निदानवर्णनेमध्येच सांगितले गेले आहे. ขุทฺทานุขุทฺทกสิกฺขาปทกถา นิฏฺฐิตา. क्षुद्र आणि अनुक्षुद्र शिक्षापदांची कथा समाप्त झाली. ปญฺจสติกกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. पंचसतिक स्कंधकाची वर्णना समाप्त झाली. ๑๒. สตฺตสติกกฺขนฺธกํ १२. सत्तसतिक स्कंधक (सातशे भिक्षूंची संगीती) ทสวตฺถุกถา दहा वस्तूंची (मुद्द्यांची) कथा ๔๔๖. สตฺตสติกกฺขนฺธเก [Pg.134] – ภิกฺขคฺเคนาติ ภิกฺขุอคฺเคน, ภิกฺขู คเณตฺวา ตตฺตเก ปฏิวีเส ฐเปสุนฺติ อตฺโถ. มหิยาติ หิมปาตสมเย หิมวลาหกา. ४४६. सत्तसतिक स्कंधकात - 'भिक्खग्गेन' म्हणजे भिक्षूंच्या संख्येनुसार भिक्षूंची गणना करून त्या प्रमाणात वाटे (भाग) ठेवले, असा अर्थ आहे. 'महिया' म्हणजे बर्फवृष्टीच्या वेळी बर्फाचे ढग. ๔๔๗. อวิชฺชานิวุฏาติ อวิชฺชาปฏิจฺฉนฺนา. โปสาติ ปุริสา. ปิยรูปํ อภินนฺทนฺติ ปตฺเถนฺตีติ ปิยรูปาภินนฺทิโน. อวิทฺทสูติ อวิชานนฺตา. ราครเชหิ สรชา. มคสทิสาติ มคา. สห เนตฺติยาติ สเนตฺติกา. วฑฺเฒนฺติ กฏสินฺติ ปุนปฺปุนํ กเฬวรํ นิกฺขิปมานา ภูมึ วฑฺเฒนฺติ. เอวํ วฑฺเฒนฺตาว โฆรํ อาทิยนฺติ ปุนพฺภวํ. ४४७. 'अविज्जानिवुता' म्हणजे अविद्येने (अज्ञानाने) झाकलेले. 'पोसा' म्हणजे मनुष्य. जे प्रिय रूपाचे अभिनंदन करतात आणि त्याची इच्छा करतात, ते 'पियरूपाभिनन्दिनो' होत. 'अविद्दसू' म्हणजे न जाणणारे (अज्ञानी). रागरूपी धुळीने माखलेले. पशूंसारखे म्हणून 'मगा' (पशू). तृष्णेसह असणारे म्हणजे 'सनेत्तिका'. 'स्मशानभूमी वाढवतात' म्हणजे पुन्हा पुन्हा मृतदेह टाकून स्मशानभूमी वाढवतात. अशा प्रकारे वाढवत राहून ते भयानक पुनर्जन्म ग्रहण करतात. ๔๕๔. ปาปกํ โน อาวุโส กตนฺติ อาวุโส อมฺเหหิ ปาปกํ กตนฺติ อตฺโถ. ४५४. 'हे आयुष्यमान, आमच्याकडून वाईट कृत्य झाले' याचा अर्थ 'हे आयुष्यमान, आमच्यावर अन्याय (वाईट कृत्य) केला गेला आहे' असा आहे. ๔๕๕. กตเมน ตฺวํ ภูมิ วิหาเรนาติ เอตฺถ ภูมีติ ปิยวจนเมตํ. ปิยํ วตฺตุกาโม กิร อายสฺมา สพฺพกามี นวเก ภิกฺขู เอวํ อามนฺเตติ. กุลฺลกวิหาเรนาติ อุตฺตานวิหาเรน. ४५५. 'तू कोणत्या विहाराने राहतोस, हे भूमी!' येथे 'भूमी' हा शब्द प्रिय व्यक्तीला संबोधण्याचा शब्द आहे. प्रिय बोलण्याची इच्छा असणारे आयुष्यमान सब्बकामी कनिष्ठ भिक्षूंना अशा प्रकारे संबोधित करत असत. 'कुल्लकविहारेन' म्हणजे उघड्या किंवा सहज विहाराने (स्थितीने). ๔๕๗. สาวตฺถิยา สุตฺตวิภงฺเคติ กถํ สุตฺตวิภงฺเค ปฏิกฺขิตฺตํ โหติ? ตตฺร หิ ‘‘สนฺนิธิ นาม อชฺช ปฏิคฺคหิตํ อปรชฺชู’’ติ วตฺวา ปุน ‘‘สนฺนิธิการเก อสนฺนิธิการกสญฺญี ขาทนียํ วา โภชนียํ วา ขาทติ วา ภุญฺชติ วา อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสา’’ติ อาปตฺตึ วทนฺเตน ปฏิกฺขิตฺตํ โหติ. ตตฺเรเก มญฺญนฺติ ‘‘โย ปน ภิกฺขุ สนฺนิธิการกํ ขาทนียํ วา โภชนียํ วา’’ติ หิ วุตฺตํ, อิทญฺจ โลณํ นาม ยาวชีวิกตฺตา สนฺนิธิภาวํ นาปชฺชติ. ยมฺปิ อโลณกํ อามิสํ ปฏิคฺคเหตฺวา เตน สทฺธึ ปริภุญฺชติ, ตํ ตทหุปฏิคฺคหิตเมว, ตสฺมา ‘‘‘ยาวกาลิเกน, ภิกฺขเว, ยาวชีวิกํ ตทหุปฏิคฺคหิตํ กาเล กปฺปติ, วิกาเล น กปฺปตี’ติ วจนโต ทุกฺกเฏเนตฺถ ภวิตพฺพ’’นฺติ. เต วตฺตพฺพา – ‘‘ตุมฺหากํ มเตน ทุกฺกเฏนปิ น ภวิตพฺพํ, น หิ เอตฺถ ยาวชีวิกํ ตทหุปฏิคฺคหิตํ, ยาวกาลิกเมว [Pg.135] ตทหุปฏิคฺคหิตํ, น จ ตํ วิกาเล ปริภุตฺตํ. ยทิ วา ‘‘วิกาเล น กปฺปตี’’ติ วจเนน ตุมฺเห ทุกฺกฏํ มญฺเญถ, ยาวชีวิกมิสฺสํ ยาวกาลิกํ วิกาเล ภุญฺชนฺตสฺส วิกาลโภชนปาจิตฺติยํ น ภเวยฺย. ตสฺมา น พฺยญฺชนมตฺตํ คเหตพฺพํ, อตฺโถ อุปปริกฺขิตพฺโพ. ४५७. श्रावस्तीमध्ये, सुत्तविभंगामध्ये कशा प्रकारे (याचा) निषेध केला गेला आहे? कारण तेथे (सुत्तविभंगामध्ये) 'सन्निधि (साठा) म्हणजे आज ग्रहण केलेले आणि दुसऱ्या दिवशी (वापरलेले)' असे सांगून, पुन्हा 'साठा करणाऱ्या वस्तूंमध्ये साठा न केल्याची संज्ञा असणाऱ्याने खाद्यान्न किंवा भोज्यान्न खाल्ले किंवा सेवन केले तर पाचित्तिय आपत्ती होते' असे आपत्तीचे प्रतिपादन करणाऱ्या भगवंतांनी याचा निषेध केला आहे. तेथे काही आचार्य असे मानतात की, 'जो भिक्खू साठा केलेले खाद्यान्न किंवा भोज्यान्न...' असे भगवंतांनी म्हटले आहे, आणि हे मीठ (लोण) नावाचे द्रव्य यावजीविक (आयुष्यभर ठेवता येणारे) असल्यामुळे साठवण्याच्या (सन्निधि) अवस्थेला प्राप्त होत नाही. जे काही अळणी (मीठ नसलेले) आमिष (अन्न) ग्रहण करून, त्या (पूर्वी ग्रहण केलेल्या) मिठासोबत सेवन केले जाते, ते त्याच दिवशी ग्रहण केलेले मानले जाते. म्हणून, 'हे भिक्खूंनो, यावकालिक अन्नासोबत त्याच दिवशी ग्रहण केलेले यावजीविक अन्न योग्य वेळी (काळात) कल्पते (योग्य आहे), अवेळी (विकालच्या वेळी) कल्पत नाही (अयोग्य आहे)' या वचनानुसार येथे दुक्कट आपत्ती असायला हवी. त्यांना असे म्हटले पाहिजे - तुमच्या मतानुसार दुक्कट आपत्ती देखील असू नये. कारण येथे यावजीविक अन्न त्याच दिवशी ग्रहण केलेले नाही, तर केवळ यावकालिक अन्नच त्याच दिवशी ग्रहण केलेले आहे, आणि त्याचे अवेळी (विकालच्या वेळी) सेवन केलेले नाही. किंवा जर 'विकालच्या वेळी कल्पत नाही' या वचनामुळे तुम्ही दुक्कट आपत्ती मानता, तर यावजीविक मिश्रित यावकालिक अन्न विकालच्या वेळी सेवन करणाऱ्याला 'विकालभोजन पाचित्तिय' आपत्ती होणार नाही. म्हणून केवळ शब्दांचे बाह्य रूप (व्यंजनमात्र) ग्रहण करू नये, तर अर्थाचे परीक्षण केले पाहिजे. อยญฺเหตฺถ อตฺโถ – ยาวกาลิเกน ยาวชีวิกํ ตทหุปฏิคฺคหิตํ ยทิ สมฺภินฺนรสํ โหติ, ยาวกาลิกคติกเมว โหติ. ตสฺมา ‘‘โย ปน ภิกฺขุ วิกาเล ขาทนียํ วา โภชนียํ วา’’ติ อิมินา สิกฺขาปเทน กาเล กปฺปติ, วิกาเล น กปฺปติ. น อิธ ‘‘น กปฺปตี’’ติ วจนมตฺเตเนตฺถ ทุกฺกฏํ โหติ. ยเถว ยาวชีวิกํ ตทหุปฏิคฺคหิตํ ยาวกาลิเกน สมฺภินฺนรสํ วิกาเล น กปฺปติ, วิกาลโภชนปาจิตฺติยาวหํ โหติ. เอวํ อชฺช ปฏิคฺคหิตมฺปิ อปรชฺชุ ยาวกาลิเกน สมฺภินฺนรสํ น กปฺปติ, สนฺนิธิโภชนปาจิตฺติยาวหํ โหติ. ตํ ‘‘สนฺนิธิกตํ อิท’’นฺติ อชานนฺโตปิ น มุจฺจติ. วุตฺตญฺเหตํ – ‘‘สนฺนิธิการเก อสนฺนิธิการกสญฺญี ขาทนียํ วา โภชนียํ วา ขาทติ วา ภุญฺชติ วา อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสา’’ติ. ตสฺมา ‘‘กตฺถ ปฏิกฺขิตฺต’’นฺติ อิมิสฺสา ปุจฺฉาย ‘‘ปริสุทฺธมิทํ พฺยากรณํ สาวตฺถิยา สุตฺตวิภงฺเค’’ติ. येथे हा अर्थ आहे - जर यावकालिक अन्नासोबत त्याच दिवशी ग्रहण केलेले यावजीविक अन्न मिश्रित रसाचे (सम्भिन्नरस) झाले, तर ते यावकालिकाच्या गतीचेच (स्वभावाचेच) होते. म्हणून 'जो भिक्खू विकालच्या वेळी खाद्यान्न किंवा भोज्यान्न...' या शिक्षापदाने ते योग्य वेळी (काळात) कल्पते, अवेळी (विकालच्या वेळी) कल्पत नाही. येथे केवळ 'कल्पत नाही' या वचनामुळे दुक्कट आपत्ती होत नाही. ज्याप्रमाणे त्याच दिवशी ग्रहण केलेले यावजीविक अन्न यावकालिक अन्नासोबत मिश्रित रसाचे होऊन विकालच्या वेळी कल्पत नाही आणि विकालभोजन पाचित्तिय आपत्ती आणणारे ठरते, त्याचप्रमाणे आज ग्रहण केलेले (यावजीविक अन्न) दुसऱ्या दिवशी यावकालिक अन्नासोबत मिश्रित रसाचे झाले असता कल्पत नाही आणि सन्निधिभोजन पाचित्तिय आपत्ती आणणारे ठरते. 'हे साठवलेले अन्न आहे' हे माहीत नसले तरीही तो (भिक्खू) आपत्तीतून मुक्त होत नाही. कारण हे म्हटले गेले आहे - 'साठा केलेल्या वस्तूंमध्ये साठा न केल्याची संज्ञा असणाऱ्याने खाद्यान्न किंवा भोज्यान्न खाल्ले किंवा सेवन केले तर पाचित्तिय आपत्ती होते.' म्हणून 'कुठे निषेध केला आहे?' या प्रश्नाचे 'श्रावस्तीमध्ये, सुत्तविभंगामध्ये' हे उत्तर पूर्णपणे शुद्ध (दोषरहित) आहे. ราชคเห อุโปสถสํยุตฺเตติ อิทํ ‘‘น ภิกฺขเว เอกสฺมึ อาวาเส ทฺเว อุโปสถาคารานิ สมฺมนฺนิตพฺพานิ; โย สมฺมนฺเนยฺย, อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสา’’ติ เอตํ สนฺธาย วุตฺตํ. วินยาติสาเร ทุกฺกฏนฺติ ‘‘น ภิกฺขเว เอกสฺมึ อาวาเส ทฺเว อุโปสถาคารานิ สมฺมนฺนิตพฺพานี’’ติ เอตสฺส วินยสฺส อติสาเร ทุกฺกฏํ. จมฺเปยฺยเก วินยวตฺถุสฺมินฺติ อิทํ ‘‘อธมฺเมน เจ ภิกฺขเว วคฺคกมฺมํ, อกมฺมํ น จ กรณีย’’นฺติ เอวมาทึ กตฺวา จมฺเปยฺยกฺขนฺธเก อาคตํ วินยวตฺถุํ สนฺธาย วุตฺตํ. राजगृहामध्ये उपोसथ संयुक्तामध्ये हे वचन 'हे भिक्खूंनो, एकाच आरामात (आवासात) दोन उपोसथगृहे संमत करू नयेत; जो संमत करेल, त्याला दुक्कट आपत्ती होईल' या सूत्राला उद्देशून (आयुष्यमान सब्बकामी थेरांनी) म्हटले आहे. 'विनयाच्या उल्लंघनामुळे दुक्कट आपत्ती होते' म्हणजे 'हे भिक्खूंनो, एकाच आरामात दोन उपोसथगृहे संमत करू नयेत' या विनयाच्या उल्लंघनामुळे दुक्कट आपत्ती होते. 'चम्पेय्यक विनयवस्तूमध्ये' हे वचन 'हे भिक्खूंनो, जर अधर्माने वर्गकर्म (गणाचे कर्म) केले असेल, तर ते अकर्म आहे आणि ते करू नये' इत्यादीपासून सुरू करून चम्पेय्यक खंधकामध्ये आलेल्या विनयवस्तूला उद्देशून म्हटले आहे. เอกจฺโจ กปฺปตีติ อิทํ ธมฺมิกํ อาจิณฺณํ สนฺธาย วุตฺตํ. เฉทนเก ปาจิตฺติยนฺติ สุตฺตวิภงฺเค หิ ‘‘นิสีทนํ นาม สทสํ วุจฺจตี’’ติ อาคตํ, ตสฺมา ทฺวินฺนํ สุคตวิทตฺถีนํ อุปริ ทสาเยว วิทตฺถิมตฺตา ลพฺภติ. ทสาย วินา ตํ ปมาณํ กโรนฺตสฺส อิทํ อาคตเมว โหติ – ‘‘ตํ อติกฺกามยโต เฉทนกํ ปาจิตฺติย’’นฺติ. ตสฺมา ‘‘กึ อาปชฺชตี’’ติ ปุฏฺโฐ ‘‘เฉทนเก [Pg.136] ปาจิตฺติย’’นฺติ อาห. เฉทนกสิกฺขาปเท วุตฺตปาจิตฺติยํ อาปชฺชตีติ อตฺโถ. เสสํ สพฺพตฺถ อุตฺตานเมวาติ. काही अंशी कल्पते (योग्य आहे) हे वचन धर्मसंगत आचरणाला (धम्मिक आचिण्ण) उद्देशून म्हटले आहे. 'छेदनक पाचित्तिय' म्हणजे सुत्तविभंगामध्ये 'निसीदन (बसण्याचे आसन) म्हणजे दशा (झालर) असलेले म्हटले जाते' असे आले आहे. म्हणून सुगतांच्या (बुद्धांच्या) दोन विथस्तींच्या (वितस्ती - वीत) वर केवळ एक वीत प्रमाणाचीच दशा (झालर) असावी लागते. दशेविना (झालरेशिवाय) त्या प्रमाणाचे (आसन) बनवणाऱ्याला ही आपत्ती थेट लागू होते - 'त्या प्रमाणाचे उल्लंघन करणाऱ्याला छेदनक पाचित्तिय आपत्ती होते.' म्हणून 'कोणती आपत्ती होते?' असे विचारले असता थेरांनी 'छेदनक पाचित्तिय' असे म्हटले. छेदनक शिक्षापदामध्ये सांगितलेली पाचित्तिय आपत्ती प्राप्त होते, असा याचा अर्थ आहे. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. ทสวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. दहा वस्तूंची कथा समाप्त झाली. สมนฺตปาสาทิกาย วินยสํวณฺณนาย समंतपासादिका नामक विनय-टीकेमध्ये สตฺตสติกกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. सत्तसतिक खंधकाची वर्णना (टीका) समाप्त झाली. ทฺวิวคฺคสงฺคหา วุตฺตา, ทฺวาวีสติปเภทนา; ขนฺธกา สาสเน ปญฺจกฺขนฺธทุกฺขปฺปหายิโน. दोन वर्गांचे संग्रह (महावग्ग आणि चुलवग्ग) आणि बावीस विभाग (प्रभेद) केलेले, पंचस्कंधांच्या दुःखाचा नाश करणाऱ्या शासनातील (बुद्धशासनातील) खंधक सांगितले गेले आहेत. ยา เตสํ วณฺณนา เอสา, อนฺตรายํ วินา ยถา; สิทฺธา สิชฺฌนฺตุ กลฺยาณา, เอวํ อาสาปิ ปาณินนฺติ. त्यांची ही जी वर्णना (टीका) आहे, ती ज्याप्रमाणे कोणत्याही विघ्नाशिवाय (अंतरायाशिवाय) पूर्ण झाली आहे, त्याचप्रमाणे सर्व प्राण्यांच्या कल्याणकारी इच्छा पूर्ण होवोत! จูฬวคฺค-อฏฺฐกถา นิฏฺฐิตา. चुलवग्ग-अट्ठकथा समाप्त झाली. | |||
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |