| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धाला माझा नमस्कार असो. วินยปิฏเก विनयपिटकात มหาวคฺค-อฏฺฐกถา महावग्ग-अट्ठकथा ๑. มหาขนฺธกํ १. महाखन्धक โพธิกถา बोधिकथा อุภินฺนํ [Pg.233] ปาติโมกฺขานํ, สงฺคีติสมนนฺตรํ; สงฺคายึสุ มหาเถรา, ขนฺธกํ ขนฺธโกวิทา. दोन्ही प्रातिमोक्षांच्या (भिक्खू आणि भिक्खुणी प्रातिमोक्षांच्या) संगीतीनंतर (संगीती संपल्याबरोबर), खन्धकाचे ज्ञान असणाऱ्या (खन्धककोविद) महाथेरांनी खन्धकाचे (महावग्ग आणि चुळवग्ग खन्धकांचे) एकत्र गायन (संगीती) केले. ยํ ตสฺส ทานิ สมฺปตฺโต, ยสฺมา สํวณฺณนากฺกโม; ตสฺมา โหติ อยํ ตสฺส, อนุตฺตานตฺถวณฺณนา. आता त्या खन्धकाचा व्याख्याक्रम (अट्ठकथाक्रम) प्राप्त झाला असल्यामुळे, त्या खन्धकातील अस्पष्ट अर्थांचे स्पष्टीकरण करणारी ही व्याख्या (अट्ठकथा) प्रस्तुत केली जात आहे. ปทภาชนิเย อตฺถา, เยหิ เยสํ ปกาสิตา; เต เจ ปุน วเทยฺยาม, ปริโยสานํ กทา ภเว. पदभाजनियामध्ये ज्या शब्दांचे अर्थ ज्या पद्धतींनी आधीच स्पष्ट केले गेले आहेत, तेच अर्थ जर आम्ही पुन्हा सांगितले, तर या व्याख्याग्रंथाचा शेवट कधी होईल? (तो कधीच होणार नाही). อุตฺตานา เจว เย อตฺถา, เตสํ สํวณฺณนาย กึ; อธิปฺปายานุสนฺธีหิ, พฺยญฺชเนน จ เย ปน. तसेच, जे अर्थ आधीच स्पष्ट आहेत, त्यांचे स्पष्टीकरण करण्यात काय हशील? ते निरर्थकच ठरेल. परंतु, जे अर्थ अभिप्रायाच्या संबंधामुळे किंवा शब्दांच्या रचनेमुळे अस्पष्ट आहेत, อนุตฺตานา น เต ยสฺมา, สกฺกา ญาตุํ อวณฺณิตา; เตสํเยว อยํ ตสฺมา, โหติ สํวณฺณนานโยติ. आणि स्पष्टीकरण केल्याशिवाय ते समजणे शक्य नाही; म्हणूनच केवळ अशाच अस्पष्ट अर्थांचे स्पष्टीकरण करण्यासाठी ही व्याख्यापद्धती (अट्ठकथा पद्धती) आहे. ๑. เตน สมเยน พุทฺโธ ภควา อุรุเวลายํ วิหรติ นชฺชา เนรญฺชราย ตีเร โพธิรุกฺขมูเล ปฐมาภิสมฺพุทฺโธติ เอตฺถ กิญฺจาปิ ‘‘เตน สมเยน พุทฺโธ ภควา เวรญฺชาย’’นฺติอาทีสุ วิย กรณวจเน วิเสสการณํ นตฺถิ, วินยํ ปตฺวา ปน กรณวจเนเนว อยมภิลาโป อาโรปิโตติ อาทิโต ปฏฺฐาย อารุฬฺหาภิลาปวเสเนเวตํ วุตฺตนฺติ เวทิตพฺพํ. เอส นโย อญฺเญสุปิ อิโต ปเรสุ เอวรูเปสุ. १. "त्या वेळी बुद्ध भगवान उरुवेला येथे नेरंजरा नदीच्या तीरावर बोधिवृक्षाच्या मुळाशी (खाली) नुकतेच पूर्ण संबोधी प्राप्त करून विहार करत होते" या वाक्यात, "त्या वेळी बुद्ध भगवान वेरंजात..." इत्यादी वाक्यांप्रमाणे तृतीया विभक्ती (करण कारक) वापरण्याचे जरी काही विशेष कारण नसले, तरी विनयपिटकामध्ये संगीती (धर्मपरिषद) परंपरेनुसार हा शब्दप्रयोग तृतीया विभक्तीतच स्थापित केला गेला आहे. म्हणून, विनयाच्या सुरुवातीपासूनच संगीतीकारांनी संगीतीमध्ये स्थापित केलेल्या शब्दप्रयोगाच्या आधारे हे म्हटले आहे, असे समजावे. यापुढील इतर अशाच प्रकारच्या वाक्यांमध्येही हाच नियम लागू होतो. กึ ปเนตสฺส วจเน ปโยชนนฺติ? ปพฺพชฺชาทีนํ วินยกมฺมานํ อาทิโต ปฏฺฐาย นิทานทสฺสนํ. ยา หิ ภควตา ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, อิเมหิ ตีหิ [Pg.234] สรณคมเนหิ ปพฺพชฺชํ อุปสมฺปท’’นฺติ (มหาว. ๓๔) เอวํ ปพฺพชฺชา เจว อุปสมฺปทา จ อนุญฺญาตา, ยานิ จ ราชคหาทีสุ อุปชฺฌายอุปชฺฌายวตฺตอาจริยอาจริยวตฺตาทีนิ อนุญฺญาตานิ, ตานิ อภิสมฺโพธึ ปตฺวา สตฺตสตฺตาหํ โพธิมณฺเฑ วีตินาเมตฺวา พาราณสิยํ ธมฺมจกฺกํ ปวตฺเตตฺวา อิมินา อนุกฺกเมน อิทญฺจิทญฺจ ฐานํ ปตฺวา อิมสฺมิญฺจ อิมสฺมิญฺจ วตฺถุสฺมึ ปญฺญตฺตานีติ เอวเมเตสํ ปพฺพชฺชาทีนํ วินยกมฺมานํ อาทิโต ปฏฺฐาย นิทานทสฺสนํ เอตสฺส วจเน ปโยชนนฺติ เวทิตพฺพํ. पण हे (प्रस्तावना वाक्य) सांगण्याचे प्रयोजन काय? प्रव्रज्या (दीक्षा) इत्यादी विनयकर्मांचा सुरुवातीपासूनचा उगम (निदान) दाखवणे हेच याचे प्रयोजन आहे. कारण, भगवंतांनी "भिक्खूंनो, मी या तीन शरणगमनांद्वारे प्रव्रज्या आणि उपसंपदा देण्याची अनुमती देतो" अशा प्रकारे ज्या प्रव्रज्या आणि उपसंपदेची अनुमती दिली, तसेच राजगृहादी ठिकाणी उपाध्याय, उपाध्यायांचे कर्तव्य (उपाध्यायवृत्त), आचार्य, आचार्यांचे कर्तव्य (आचार्यवृत्त) इत्यादी जे विनयकर्म अनुमत केले; ते सर्व भगवंतांनी संबोधी प्राप्त केल्यानंतर, महाबोधिवृक्षाजवळ सात आठवडे (सत्तसप्ताह) व्यतीत करून, वाराणसी येथे धम्मचक्र प्रवर्तन करून, या क्रमाने वेगवेगळ्या ठिकाणी पोहोचून आणि वेगवेगळ्या कारणांवरून (वस्तूवरून) प्रज्ञप्त (नियमबद्ध) केले होते. अशा प्रकारे, या प्रव्रज्यादी विनयकर्मांचा सुरुवातीपासूनचा उगम दाखवणे हेच हे वाक्य सांगण्याचे प्रयोजन आहे, असे समजावे. ตตฺถ อุรุเวลายนฺติ มหาเวลายํ; มหนฺเต วาลิกราสิมฺหีติ อตฺโถ. อถ วา ‘‘อุรู’’ติ วาลิกา วุจฺจติ; ‘‘เวลา’’ติ มริยาทา; เวลาติกฺกมนเหตุ อาหฏา อุรุ อุรุเวลาติ เอวมฺเปตฺถ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. อตีเต กิร อนุปฺปนฺเน พุทฺเธ ทสสหสฺสกุลปุตฺตา ตาปสปพฺพชฺชํ ปพฺพชิตฺวา ตสฺมึ ปเทเส วิหรนฺตา เอกทิวสํ สนฺนิปติตฺวา กติกวตฺตํ อกํสุ – ‘‘กายกมฺมวจีกมฺมานิ นาม ปเรสมฺปิ ปากฏานิ โหนฺติ, มโนกมฺมํ ปน อปากฏํ; ตสฺมา โย กามวิตกฺกํ วา พฺยาปาทวิตกฺกํ วา วิหึสาวิตกฺกํ วา วิตกฺเกติ, ตสฺส อญฺโญ โจทโก นาม นตฺถิ, โส อตฺตนาว อตฺตานํ โจเทตฺวา ปตฺตปุเฏน วาลิกํ อาหริตฺวา อิมสฺมึ ฐาเน อากิรตุ, อิทมสฺส ทณฺฑกมฺม’’นฺติ. ตโต ปฏฺฐาย โย ตาทิสํ วิตกฺกํ วิตกฺเกติ, โส ตตฺถ ปตฺตปุเฏน วาลิกํ อากิรติ. เอวํ ตตฺถ อนุกฺกเมน มหาวาลิกราสิ ชาโต, ตโต นํ ปจฺฉิมา ชนตา ปริกฺขิปิตฺวา เจติยฏฺฐานมกาสิ. ตํ สนฺธาย วุตฺตํ – ‘‘อุรุเวลายนฺติ มหาเวลายํ; มหนฺเต วาลิกราสิมฺหีติ อตฺโถ’’ติ. ตเมว สนฺธาย วุตฺตํ – ‘‘อถ วา อุรูติ วาลิกา วุจฺจติ; เวลาติ มริยาทา; เวลาติกฺกมนเหตุ อาหฏา อุรุ อุรุเวลาติ เอวมฺเปตฺถ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ’’ติ. त्यामध्ये, 'उरुवेलायाम्' (उरुवेला येथे) म्हणजे 'महावेलायाम्' म्हणजेच मोठ्या वाळूच्या ढिगाऱ्यावर, असा अर्थ आहे. किंवा, 'उरु' म्हणजे वाळू आणि 'वेला' म्हणजे मर्यादा (सीमा); मर्यादा ओलांडल्यामुळे आणलेली वाळू म्हणजे 'उरुवेला', असाही अर्थ येथे घ्यावा. प्राचीन काळी, जेव्हा बुद्ध उत्पन्न झाले नव्हते, तेव्हा दहा हजार कुलपुत्रांनी तापस-प्रव्रज्या (तपस्वी दीक्षा) घेतली होती आणि ते त्या प्रदेशात राहत होते. एक दिवस त्यांनी एकत्र येऊन असा नियम (कतीकवत्त) केला की—"कायकर्म आणि वचीकर्म (शारीरिक आणि वाचिक कर्मे) इतरांनाही स्पष्ट दिसतात, परंतु मनोकर्म (मानसिक कर्म) स्पष्ट दिसत नाही. म्हणून, जो कोणी कामवितर्क (वासनायुक्त विचार), व्यापादवितर्क (द्वेषयुक्त विचार) किंवा विहिंसावितर्क (हिंसेचा विचार) करेल, त्याला टोकणारा दुसरा कोणी नसून, त्याने स्वतःच स्वतःला दोषी ठरवून पानांच्या द्रोणातून (पत्तपुट) वाळू आणून या ठिकाणी टाकावी; हीच त्याची शिक्षा (दंडकर्म) असेल." तेव्हापासून, जो कोणी तसा विचार करत असे, तो तिथे पानांच्या द्रोणाने वाळू आणून टाकत असे. अशा प्रकारे, तिथे हळूहळू वाळूचा एक मोठा ढीग तयार झाला. नंतरच्या लोकांनी त्याला कुंपण घालून त्याचे चैत्यस्थान (पूजनीय स्थान) बनवले. त्यालाच अनुसरून म्हटले आहे—"उरुवेलायाम् म्हणजे महावेलायाम्; मोठ्या वाळूच्या ढिगाऱ्यावर, असा अर्थ आहे." आणि त्यालाच अनुसरून हेही म्हटले आहे—"किंवा 'उरु' म्हणजे वाळू आणि 'वेला' म्हणजे मर्यादा; मर्यादा ओलांडल्यामुळे आणलेली वाळू म्हणजे 'उरुवेला', असाही अर्थ येथे घ्यावा." โพธิรุกฺขมูเลติ โพธิ วุจฺจติ จตูสุ มคฺเคสุ ญาณํ; ตํ โพธึ ภควา เอตฺถ ปตฺโตติ รุกฺโขปิ ‘‘โพธิรุกฺโข’’ตฺเวว นามํ ลภิ, ตสฺส โพธิรุกฺขสฺส มูเล โพธิรุกฺขมูเล. ปฐมาภิสมฺพุทฺโธติ ปฐมํ อภิสมฺพุทฺโธ; อภิสมฺพุทฺโธ หุตฺวา สพฺพปฐมํเยวาติ อตฺโถ. เอกปลฺลงฺเกนาติ สกิมฺปิ อนุฏฺฐหิตฺวา ยถาอาภุชิเตน เอเกเนว ปลฺลงฺเกน. วิมุตฺติสุขปฏิสํเวทีติ วิมุตฺติสุขํ ผลสมาปตฺติสุขํ ปฏิสํเวทยมาโน. 'बोधिरुक्खमूले' (बोधिवृक्षाच्या मुळाशी) यामध्ये—चार मार्गांच्या ज्ञानाला 'बोधी' म्हणतात; भगवंतांनी ती बोधी येथे प्राप्त केली, म्हणून त्या वृक्षालाही 'बोधिवृक्ष' असे नाव मिळाले. त्या बोधिवृक्षाच्या मुळाशी म्हणजेच 'बोधिरुक्खमूले'. 'पठमाभिसम्बुद्धो' म्हणजे सर्वप्रथम संबोधी प्राप्त केलेले; बुद्धत्व प्राप्त करून अगदी सुरुवातीलाच, असा अर्थ आहे. 'एकपल्लङ्केन' म्हणजे एकदाही न उठत, ज्या स्थितीत मांडी घातली होती त्याच एकाच पद्मासनात (पल्लङ्क). 'विमुत्तिसुखपटिसंवेदी' म्हणजे विमुक्तीच्या सुखाचा, म्हणजेच फलसमापत्तीच्या सुखाचा अनुभव घेत. ปฏิจฺจสมุปฺปาทนฺติ [Pg.235] ปจฺจยาการํ. ปจฺจยากาโร หิ อญฺญมญฺญํ ปฏิจฺจ สหิเต ธมฺเม อุปฺปาเทตีติ ‘‘ปฏิจฺจสมุปฺปาโท’’ติ วุจฺจติ. อยเมตฺถ สงฺเขโป. วิตฺถาโร ปน สพฺพาการสมฺปนฺนํ วินิจฺฉยํ อิจฺฉนฺเตน วิสุทฺธิมคฺคโต คเหตพฺโพ. อนุโลมปฏิโลมนฺติ อนุโลมญฺจ ปฏิโลมญฺจ. ตตฺถ ‘‘อวิชฺชาปจฺจยา สงฺขารา’’ติอาทินา นเยน วุตฺโต อวิชฺชาทิโก ปจฺจยากาโร อตฺตนา กตฺตพฺพกิจฺจกรณโต ‘‘อนุโลโม’’ติ วุจฺจติ. ‘‘อวิชฺชาย ตฺเวว อเสสวิราคนิโรธา สงฺขารนิโรโธ’’ติอาทินา นเยน วุตฺโต สฺเวว อนุปฺปาทนิโรเธน นิรุชฺฌมาโน ตํ กิจฺจํ น กโรตีติ ตสฺส อกรณโต ‘‘ปฏิโลโม’’ติ วุจฺจติ. ปุริมนเยน วา วุตฺโต ปวตฺติยา อนุโลโม, อิตโร ตสฺสา ปฏิโลโมติ เอวมฺเปตฺถ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. อาทิโต ปน ปฏฺฐาย ยาว อนฺตํ, อนฺตโต จ ปฏฺฐาย ยาว อาทึ ปาเปตฺวา อวุตฺตตฺตา อิโต อญฺเญนตฺเถน อนุโลมปฏิโลมตา น ยุชฺชติ. 'पटिच्चसमुप्पाद' म्हणजे प्रत्ययाकार (कारणांची साखळी). कारण, प्रत्ययाकार हा परस्परांवर अवलंबून असणाऱ्या धर्मांना (गोष्टींना) उत्पन्न करतो, म्हणून त्याला 'पटिच्चसमुप्पाद' (प्रतीत्यसमुत्पाद) असे म्हणतात. हा येथे संक्षेप (थोडक्यात अर्थ) आहे. परंतु, ज्यांना सर्व प्रकारांनी परिपूर्ण असा सविस्तर निर्णय हवा असेल, त्यांनी तो 'विसुद्धिमग्ग' (विशुद्धिमार्ग) ग्रंथातून घ्यावा. 'अनुलोमपटिलोम' म्हणजे अनुलोम (सरळ क्रमाने) आणि प्रतिलोम (उलट क्रमाने). त्यामध्ये, "अविद्या-प्रत्ययाने संस्कार उत्पन्न होतात" इत्यादी पद्धतीने सांगितलेला अविद्यादी प्रत्ययाकार, स्वतःचे कर्तव्य पार पाडत असल्यामुळे त्याला 'अनुलोम' असे म्हणतात. "अविद्येच्या संपूर्ण विरागाने आणि निरोधाने संस्कारांचा निरोध होतो" इत्यादी पद्धतीने सांगितलेला तोच प्रत्ययाकार, अनुत्पाद-निरोधाने (पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या नाशाने) निरुद्ध होत असताना आपले कार्य करत नाही; म्हणून कार्य न करण्याच्या या स्वरूपामुळे त्याला 'प्रतिलोम' असे म्हणतात. किंवा, पहिल्या पद्धतीने सांगितलेला प्रत्ययाकार हा संसाराच्या प्रवृत्तीला अनुकूल (अनुलोम) आहे आणि दुसरा पद्धतीचा प्रत्ययाकार हा त्या प्रवृत्तीच्या विरुद्ध (प्रतिलोम) आहे, असाही अर्थ येथे घ्यावा. परंतु, सुरुवातीपासून शेवटपर्यंत आणि शेवटापासून सुरुवातीपर्यंत न सांगता केवळ एवढेच सांगितल्यामुळे, यापेक्षा वेगळ्या अर्थाने 'अनुलोम-प्रतिलोम' असणे योग्य ठरत नाही. มนสากาสีติ มนสิ อกาสิ. ตตฺถ ยถา อนุโลมํ มนสิ อกาสิ, อิทํ ตาว ทสฺเสตุํ ‘‘อวิชฺชาปจฺจยา สงฺขารา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ อวิชฺชา จ สา ปจฺจโย จาติ อวิชฺชาปจฺจโย. ตสฺมา อวิชฺชาปจฺจยา สงฺขารา สมฺภวนฺตีติ อิมินา นเยน สพฺพปเทสุ อตฺโถ เวทิตพฺโพ. อยเมตฺถ สงฺเขโป. วิตฺถาโร ปน สพฺพาการสมฺปนฺนํ วินิจฺฉยํ อิจฺฉนฺเตน วิสุทฺธิมคฺคโตว คเหตพฺโพ. 'मनसाकासि' म्हणजे मनात आणले (चिंतन केले). त्यामध्ये, ज्या प्रकारे अनुलोम क्रमाने मनात आणले, ते आधी दाखवण्यासाठी "अविद्या-प्रत्ययाने संस्कार उत्पन्न होतात" इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये, अविद्या हीच प्रत्यय (कारण) आहे म्हणून 'अविद्या-प्रत्यय'. म्हणून, अविद्येच्या कारणाने संस्कार उत्पन्न होतात, या पद्धतीने सर्व पदांचा अर्थ समजून घ्यावा. हा येथे संक्षेप आहे. परंतु, ज्यांना सर्व प्रकारांनी परिपूर्ण असा सविस्तर निर्णय हवा असेल, त्यांनी तो 'विसुद्धिमग्ग' (विशुद्धिमार्ग) ग्रंथातूनच घ्यावा. ยถา ปน ปฏิโลมํ มนสิ อกาสิ, อิทํ ทสฺเสตุํ อวิชฺชาย ตฺเวว อเสสวิราคนิโรธา สงฺขารนิโรโธติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ อวิชฺชาย ตฺเววาติ อวิชฺชาย ตุ เอว. อเสสวิราคนิโรธาติ วิราคสงฺขาเตน มคฺเคน อเสสนิโรธา. สงฺขารนิโรโธติ สงฺขารานํ อนุปฺปาทนิโรโธ โหติ. เอวํ นิรุทฺธานํ ปน สงฺขารานํ นิโรธา วิญฺญาณํ นิรุทฺธํ, วิญฺญาณาทีนญฺจ นิโรธา นามรูปาทีนิ นิรุทฺธานิเยว โหนฺตีติ ทสฺเสตุํ สงฺขารนิโรธา วิญฺญาณนิโรโธติอาทีนิ วตฺวา เอวเมตสฺส เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส นิโรโธ โหตีติ วุตฺตํ. ตตฺถ เกวลสฺสาติ สกลสฺส; สุทฺธสฺส วา สตฺตวิรหิตสฺสาติ อตฺโถ. ทุกฺขกฺขนฺธสฺสาติ ทุกฺขราสิสฺส. นิโรโธ โหตีติ อนุปฺปาโท โหติ. परंतु ज्या प्रकारे प्रतिलोम (उलट क्रमाने) मनसिकार केला, हे दर्शवण्यासाठी 'अविज्जाय त्वेव असेसविरागनिरोधा सङ्खारनिरोधो' (अविद्येच्याच संपूर्ण विराग आणि निरोधाने संस्कारांचा निरोध होतो) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'अविज्जाय त्वेव' म्हणजे अविद्येचाच (अविज्जाय तु एव). 'असेसविरागनिरोधा' म्हणजे विराग नावाच्या मार्गाने (अर्हत् मार्गाने) संपूर्ण निरोध झाल्यामुळे. 'सङ्खारनिरोधो' म्हणजे संस्कारांचा अनुत्पाद-निरोध (पुन्हा उत्पन्न न होणारा निरोध) होतो. अशा प्रकारे निरुद्ध झालेल्या संस्कारांच्या निरोधाने विज्ञानाचा निरोध होतो, आणि विज्ञानादींच्या निरोधाने नामरूपादींचा निरोधच होतो, हे दर्शवण्यासाठी 'संस्कारनिरोधाने विज्ञानाचा निरोध होतो' इत्यादी सांगून 'अशा प्रकारे या केवळ दुःखस्कंधाचा निरोध होतो' असे म्हटले आहे. तेथे 'केवलस्स' म्हणजे संपूर्ण; किंवा शुद्ध, सत्त्वरहित (जीवविरहित) असा अर्थ आहे. 'दुक्खक्खन्धस्स' म्हणजे दुःखसमूहाचा. 'निरोधो होति' म्हणजे अनुत्पाद (पुन्हा उत्पन्न न होणे) होतो. เอตมตฺถํ [Pg.236] วิทิตฺวาติ ยฺวายํ ‘‘อวิชฺชาทิวเสน สงฺขาราทิกสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส สมุทโย จ อวิชฺชานิโรธาทิวเสน จ นิโรโธ โหตี’’ติ วุตฺโต, สพฺพากาเรน เอตมตฺถํ วิทิตฺวา. ตายํ เวลายนฺติ ตายํ ตสฺส อตฺถสฺส วิทิตเวลายํ. อิมํ อุทานํ อุทาเนสีติ อิมํ ตสฺมึ วิทิเต อตฺเถ เหตุโน จ เหตุสมุปฺปนฺนธมฺมสฺส จ ปชานนาย อานุภาวทีปกํ ‘‘ยทา หเว ปาตุภวนฺตี’’ติอาทิกํ โสมนสฺสยุตฺตญาณสมุฏฺฐานํ อุทานํ อุทาเนสิ, อตฺตมนวาจํ นิจฺฉาเรสีติ วุตฺตํ โหติ. 'एतमत्थं विदित्वा' (हा अर्थ जाणून) म्हणजे 'अविद्येच्या प्रभावाने संस्कार इत्यादी दुःखस्कंधाचा उदय होतो आणि अविद्येच्या निरोधाने त्याचा निरोध होतो' हा जो अर्थ सांगितला आहे, तो सर्व प्रकारे जाणून. 'तायं वेलायं' (त्या वेळी) म्हणजे त्या अर्थाच्या जाणण्याच्या त्या वेळी. 'इमं उदानं उदानेसि' (हे उदान उद्गारले) म्हणजे तो अर्थ जाणला असता, हेतू आणि हेतूपासून उत्पन्न झालेल्या धर्मांच्या (कार्य-कारणाच्या) विशेष ज्ञानाचा प्रभाव दर्शवणारे, 'यदा हवे पातुभवन्ति' इत्यादी सोमनस्ययुक्त ज्ञानाने उत्पन्न झालेले हे उदान उद्गारले, म्हणजेच प्रसन्न चित्ताने हे शब्द उच्चारले, असा अर्थ आहे. ตสฺสตฺโถ – ยทา หเวติ ยสฺมึ ภเว กาเล. ปาตุภวนฺตีติ อุปฺปชฺชนฺติ. ธมฺมาติ อนุโลมปจฺจยาการปฏิเวธสาธกา โพธิปกฺขิยธมฺมา. อถ วา ปาตุภวนฺตีติ ปกาสนฺติ; อภิสมยวเสน พฺยตฺตา ปากฏา โหนฺติ. ธมฺมาติ จตุอริยสจฺจธมฺมา. อาตาโป วุจฺจติ กิเลสสนฺตาปนฏฺเฐน วีริยํ; อาตาปิโนติ สมฺมปฺปธานวีริยวโต. ฌายโตติ อารมฺมณูปนิชฺฌานลกฺขเณน จ ลกฺขณูปนิชฺฌานลกฺขเณน จ ฌาเนน ฌายนฺตสฺส. พฺราหฺมณสฺสาติ พาหิตปาปสฺส ขีณาสวสฺส. อถสฺส กงฺขา วปยนฺตีติ อถสฺส เอวํ ปาตุภูตธมฺมสฺส กงฺขา วปยนฺติ. สพฺพาติ ยา เอตา ‘‘โก นุ โข ภนฺเต ผุสตีติ; โน กลฺโล ปญฺโหติ ภควา อโวจา’’ติอาทินา, ตถา ‘‘กตมํ นุ โข ภนฺเต ชรามรณํ; กสฺส จ ปนิทํ ชรามรณนฺติ; โน กลฺโล ปญฺโหติ ภควา อโวจา’’ติอาทินา จ นเยน ปจฺจยากาเร กงฺขา วุตฺตา, ยา จ ปจฺจยาการสฺเสว อปฺปฏิวิทฺธตฺตา ‘‘อโหสึ นุ โข อหํ อตีตมทฺธาน’’นฺติอาทิกา โสฬส กงฺขา อาคตา, ตา สพฺพา วปยนฺติ อปคจฺฉนฺติ นิรุชฺฌนฺติ. กสฺมา? ยโต ปชานาติ สเหตุธมฺมนฺติ ยสฺมา อวิชฺชาทิเกน เหตุนา สเหตุกํ อิมํ สงฺขาราทึ เกวลํ ทุกฺขกฺขนฺธธมฺมํ ปชานาติ อญฺญาติ ปฏิวิชฺฌตีติ. त्याचा अर्थ – 'यदा हवे' म्हणजे ज्या काळात. 'पातुभवन्ति' म्हणजे उत्पन्न होतात. 'धम्मा' म्हणजे अनुलोम प्रतीत्यसमुत्पादाचा भेद (साक्षात्कार) घडवून आणणारे बोधिपाक्षिक धर्म. अथवा, 'पातुभवन्ति' म्हणजे प्रकट होतात; साक्षात्काराच्या प्रभावाने स्पष्ट व उघड होतात. 'धम्मा' म्हणजे चार आर्यसत्य. क्लेशांना जाळण्याच्या अर्थाने वीर्याला 'आतापो' (तप) म्हटले जाते; 'आतापिनो' म्हणजे सम्यक्प्रधान वीर्य असलेल्या. 'झायतो' म्हणजे आलंबन-उपनिव्यान (चित्त एकाग्र करणे) आणि लक्षण-उपनिव्यान (अनित्य, दुःख, अनात्म लक्षणांचे ध्यान करणे) या दोन्ही प्रकारच्या ध्यानाने ध्यान करणाऱ्या. 'ब्राह्मणस्स' म्हणजे ज्याने पाप वाहून घालवले आहे अशा क्षीणास्रव (अर्हत) व्यक्तीचे. 'अथस्स कङ्खा वपयन्ति' म्हणजे अशा प्रकारे धर्म प्रकट झालेल्या त्या अर्हताच्या शंका नाहीशा होतात. 'सब्बा' (सर्व) म्हणजे ज्या 'भंते, कोण स्पर्श करतो? हा प्रश्न योग्य नाही, असे भगवंतांनी म्हटले' इत्यादी प्रकारे, तसेच 'भंते, जरामरण कोणते? आणि हे जरामरण कोणाचे आहे? हा प्रश्न योग्य नाही, असे भगवंतांनी म्हटले' इत्यादी प्रकारे प्रतीत्यसमुत्पादाविषयी ज्या शंका सांगितल्या आहेत, आणि प्रतीत्यसमुत्पादाचाच साक्षात्कार न झाल्यामुळे 'मी भूतकाळात होतो का?' इत्यादी ज्या सोळा प्रकारच्या शंका उद्भवतात, त्या सर्व नाहीशा होतात, दूर होतात, निरुद्ध होतात. का? 'यतो पजानाति सहेतुधम्मं' कारण तो (अर्हत) अविद्येसारख्या हेतूने युक्त असलेल्या या संस्कारादी केवळ दुःखस्कंध रूप धर्माला हेतूसहित जाणतो, समजतो आणि त्याचा साक्षात्कार करतो. ๒. ทุติยวาเร – อิมํ อุทานํ อุทาเนสีติ อิมํ ตสฺมึ วิทิเต อตฺเถ ‘‘อวิชฺชาย ตฺเวว อเสสวิราคนิโรธา สงฺขารนิโรโธ’’ติ เอวํ ปกาสิตสฺส นิพฺพานสงฺขาตสฺส ปจฺจยกฺขยสฺส อวโพธานุภาวทีปกํ วุตฺตปฺปการํ อุทานํ อุทาเนสีติ อตฺโถ. ตตฺรายํ สงฺเขปตฺโถ – ยสฺมา ปจฺจยานํ ขยสงฺขาตํ นิพฺพานํ อเวทิ อญฺญาสิ ปฏิวิชฺฌิ, ตสฺมา ยทาสฺส อาตาปิโน ฌายโต [Pg.237] พฺราหฺมณสฺส วุตฺตปฺปการา ธมฺมา ปาตุภวนฺติ, อถสฺส ยา นิพฺพานสฺส อวิทิตตฺตา อุปฺปชฺเชยฺยุํ, ตา สพฺพาปิ กงฺขา วปยนฺตีติ. २. दुसऱ्या वेळी – 'हे उदान उद्गारले' म्हणजे तो अर्थ जाणला असता, 'अविद्येच्याच संपूर्ण विराग आणि निरोधाने संस्कारांचा निरोध होतो' अशा प्रकारे प्रकट केलेल्या, निर्वाण नावाच्या प्रत्यय-क्षयाचा (हेतूंच्या नाशाचा) साक्षात्कार दर्शवणारे पूर्वोक्त उदान उद्गारले, असा अर्थ आहे. तेथे हा संक्षेपार्थ आहे – ज्या अर्थी त्याने प्रत्ययांचा (हेतूंचा) क्षय म्हणजेच निर्वाण जाणले, समजले आणि त्याचा साक्षात्कार केला, त्या अर्थी जेव्हा त्या उद्योगी, ध्यान करणाऱ्या ब्राह्मणाच्या (अर्हताच्या) ठिकाणी पूर्वोक्त धर्म प्रकट होतात, तेव्हा निर्वाण न जाणल्यामुळे ज्या काही शंका उत्पन्न होऊ शकल्या असत्या, त्या सर्व शंका नाहीशा होतात. ๓. ตติยวาเร – อิมํ อุทานํ อุทาเนสีติ อิมํ เยน มคฺเคน โส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส สมุทยนิโรธสงฺขาโต อตฺโถ กิจฺจวเสน จ อารมฺมณกิริยาย จ วิทิโต, ตสฺส อริยมคฺคสฺส อานุภาวทีปกํ วุตฺตปฺปการํ อุทานํ อุทาเนสีติ อตฺโถ. ตตฺราปายํ สงฺเขปตฺโถ – ยทา หเว ปาตุภวนฺติ ธมฺมา อาตาปิโน ฌายโต พฺราหฺมณสฺส, ตทา โส พฺราหฺมโณ เตหิ วา อุปฺปนฺเนหิ โพธิปกฺขิยธมฺเมหิ, ยสฺส วา อริยมคฺคสฺส จตุสจฺจธมฺมา ปาตุภูตา, เตน อริยมคฺเคน วิธูปยํ ติฏฺฐติ มารเสนํ ‘‘กามา เต ปฐมา เสนา’’ติอาทินา นเยน วุตฺตปฺปการํ มารเสนํ วิธูปยนฺโต วิธเมนฺโต วิทฺธํเสนฺโต ติฏฺฐติ. กถํ? สูริโยว โอภาสยมนฺตลิกฺขํ, ยถา สูริโย อพฺภุคฺคโต อตฺตโน ปภาย อนฺตลิกฺขํ โอภาเสนฺโตว อนฺธการํ วิธเมนฺโต ติฏฺฐติ, เอวํ โสปิ พฺราหฺมโณ เตหิ ธมฺเมหิ เตน วา มคฺเคน สจฺจานิ ปฏิวิชฺฌนฺโตว มารเสนํ วิธูปยนฺโต ติฏฺฐตีติ. ३. तिसऱ्या वेळी – 'हे उदान उद्गारले' म्हणजे ज्या मार्गाने दुःखस्कंधाचा उदय आणि निरोध रूप अर्थ कृत्यांच्या (कर्तव्यांच्या) दृष्टीने आणि आलंबन करण्याच्या क्रियेने जाणला गेला, त्या आर्यमार्गाचा प्रभाव दर्शवणारे पूर्वोक्त उदान उद्गारले, असा अर्थ आहे. तेथेही हा संक्षेपार्थ आहे – जेव्हा उद्योगी, ध्यान करणाऱ्या ब्राह्मणाच्या ठिकाणी धर्म प्रकट होतात, तेव्हा तो ब्राह्मण उत्पन्न झालेल्या त्या बोधिपाक्षिक धर्मांच्या द्वारे किंवा ज्या आर्यमार्गामुळे चार आर्यसत्य प्रकट झाले आहेत, त्या आर्यमार्गाच्या द्वारे मारसेनेचा विध्वंस करत उभा राहतो; 'काम ही तुझी पहिली सेना आहे' इत्यादी प्रकारे सुत्तनिपातात सांगितलेल्या मारसेनेचा नाश करत, तिचा विध्वंस करत उभा राहतो. कसा? जणू सूर्य आकाशाला प्रकाशित करत उभा आहे. ज्याप्रमाणे वर आलेला सूर्य आपल्या प्रकाशाने आकाशाला प्रकाशित करत अंधाराचा नाश करत उभा राहतो, त्याचप्रमाणे तो ब्राह्मणही त्या धर्मांच्या द्वारे किंवा त्या मार्गाच्या द्वारे सत्यांचा साक्षात्कार करत मारसेनेचा विध्वंस करत उभा राहतो, असा संक्षेपार्थ आहे. เอวเมตฺถ ปฐมํ อุทานํ ปจฺจยาการปจฺจเวกฺขณวเสน, ทุติยํ นิพฺพานปจฺจเวกฺขณวเสน, ตติยํ มคฺคปจฺจเวกฺขณวเสน อุปฺปนฺนนฺติ เวทิตพฺพํ. อุทาเน ปน ‘‘รตฺติยา ปฐมํ ยามํ ปฏิจฺจสมุปฺปาทํ อนุโลมํ, ทุติยํ ยามํ ปฏิโลมํ, ตติยํ ยามํ อนุโลมปฏิโลม’’นฺติ วุตฺตํ; ตํ สตฺตาหสฺส อจฺจเยน ‘‘สฺเว อาสนา วุฏฺฐหิสฺสามี’’ติ รตฺตึ อุปฺปาทิตมนสิการํ สนฺธาย วุตฺตํ. ตทา หิ ภควา ยสฺส ปจฺจยาการปชานนสฺส จ ปจฺจยกฺขยาธิคมสฺส จ อานุภาวทีปิกา ปุริมา ทฺเว อุทานคาถา, ตสฺส วเสน เอเกกเมว โกฏฺฐาสํ ปฐมยามญฺจ มชฺฌิมยามญฺจ มนสากาสิ, อิธ ปน ปาฏิปทรตฺติยา เอวํ มนสากาสิ. ภควา หิ วิสาขปุณฺณมาย รตฺติยา ปฐมยาเม ปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสริ, มชฺฌิมยาเม ทิพฺพจกฺขุํ วิโสเธสิ, ปจฺฉิมยาเม ปฏิจฺจสมุปฺปาทํ อนุโลมปฏิโลมํ มนสิ กตฺวา ‘‘อิทานิ อรุโณ อุคฺคมิสฺสตี’’ติ สพฺพญฺญุตํ ปาปุณิ. สพฺพญฺญุตปฺปตฺติสมนนฺตรเมว จ อรุโณ อุคฺคจฺฉิ. ตโต ตํ ทิวสํ เตเนว ปลฺลงฺเกน วีตินาเมตฺวา สมฺปตฺตาย ปาฏิปทรตฺติยา ตีสุ ยาเมสุ เอวํ มนสิ กตฺวา อิมานิ อุทานานิ อุทาเนสิ. อิติ [Pg.238] ปาฏิปทรตฺติยา เอวํ มนสิ กตฺวา ตํ ‘‘โพธิรุกฺขมูเล สตฺตาหํ เอกปลฺลงฺเกน นิสีที’’ติ เอวํ วุตฺตสตฺตาหํ ตตฺเถว วีตินาเมสิ. अशा प्रकारे, येथे पहिले उदान प्रत्ययाकार-प्रत्यवेक्षण (पटीच्चसमुत्पाद चिंतनाच्या) प्रभावाने, दुसरे निर्वाण-प्रत्यवेक्षण प्रभावाने आणि तिसरे मार्ग-प्रत्यवेक्षण प्रभावाने उत्पन्न झाले, असे जाणावे. परंतु उदानात "रात्रीच्या पहिल्या प्रहरात पटीच्चसमुत्पाद अनुलोम, दुसऱ्या प्रहरात प्रतिलोम आणि तिसऱ्या प्रहरात अनुलोम-प्रतिलोम" असे म्हटले आहे; ते सात दिवसांच्या समाप्तीनंतर "उद्या मी आसनावरून उठेन" अशा विचाराने रात्री उत्पन्न झालेल्या मनसिकाराला (चिंतनाला) उद्देशून म्हटले आहे. कारण त्यावेळी भगवंतांनी, ज्या प्रत्ययाकार-प्रज्ञापनाचा आणि प्रत्ययक्षय-अधिगमाचा (निर्वाणाचा) प्रभाव दर्शविणाऱ्या पहिल्या दोन उदानगाथा आहेत, त्याच्या प्रभावाने अनुक्रमे पहिल्या प्रहरात आणि मध्यम प्रहरात एकेका भागाचेच मनसिकार केले; परंतु येथे प्रतिपदा रात्री (पौर्णिमेनंतरच्या पहिल्या रात्री) अशा प्रकारे मनसिकार केला. भगवंतांनी वैशाख पूर्णिमेच्या रात्रीच्या पहिल्या प्रहरात पूर्वनिवासाचे (मागील जन्मांचे) स्मरण केले, मध्यम प्रहरात दिव्यचक्षू विशुद्ध केले, आणि अंतिम प्रहरात पटीच्चसमुत्पाद अनुलोम-प्रतिलोम मनसिकार करून "आता अरुणोदय होईल" अशा वेळी सर्वज्ञता (सर्वज्ञत्व) प्राप्त केली. आणि सर्वज्ञता प्राप्त झाल्याबरोबरच अरुणोदय झाला. त्यानंतर तो दिवस त्याच आसनावर (पल्लंकावर) व्यतीत करून, आलेल्या प्रतिपदेच्या रात्रीच्या तिन्ही प्रहरांत अशा प्रकारे मनसिकार करून ही उदाने उद्गारली. अशा प्रकारे प्रतिपदेच्या रात्री असा मनसिकार करून, "बोधीवृक्षाच्या मुळाशी सात दिवस एकाच आसनावर बसले" असे म्हटलेले ते सात दिवस त्यांनी तेथेच व्यतीत केले। โพธิกถา นิฏฺฐิตา. बोधिकथा समाप्त झाली। อชปาลกถา अजपालकथा ๔. อถ โข ภควา สตฺตาหสฺส อจฺจเยน ตมฺหา สมาธิมฺหา วุฏฺฐหิตฺวา โพธิรุกฺขมูลา เยน อชปาลนิคฺโรโธ เตนุปสงฺกมีติ เอตฺถ น ภควา ตมฺหา สมาธิมฺหา วุฏฺฐหิตฺวา อนนฺตรเมว โพธิรุกฺขมูลา เยน อชปาลนิคฺโรโธ เตนุปสงฺกมิ. ยถา ปน ‘‘ภุตฺวา สยตี’’ติ วุตฺเต น ‘‘หตฺเถ อโธวิตฺวา มุขํ อวิกฺขาเลตฺวา สยนสมีปํ อคนฺตฺวา อญฺญํ กิญฺจิ อาลาปสลฺลาปํ อกตฺวา สยติ’’จฺเจว วุตฺตํ โหติ, โภชนโต ปน ปจฺฉา สยติ, น นสยตีติ อิทเมวตฺถ ทีปิตํ โหติ. เอวมิธาปิ ‘‘น ตมฺหา สมาธิมฺหา วุฏฺฐหิตฺวา อนนฺตรเมว ปกฺกามี’’ติ วุตฺตํ โหติ, วุฏฺฐานโต จ ปน ปจฺฉา ปกฺกามิ, น นปกฺกามีติ อิทเมเวตฺถ ทีปิตํ โหติ. ४. "त्यानंतर भगवंत सात दिवसांच्या समाप्तीनंतर त्या समाधीतून उठून बोधीवृक्षाच्या मुळाकडून जेथे अजपाल वटवृक्ष होता तेथे गेले" - येथे भगवंत त्या समाधीतून उठल्याबरोबर लगेचच बोधीवृक्षाच्या मुळाकडून जेथे अजपाल वटवृक्ष होता तेथे गेले, असा अर्थ नाही. परंतु, ज्याप्रमाणे "जेवून झोपतो" असे म्हटले असता, "हात न धुता, तोंड न विसळता, बिछान्यापाशी न जाता, इतर कोणतेही संभाषण न करता लगेच झोपतो" असा अर्थ होत नाही, तर जेवणानंतर झोपतो, न झोपता राहत नाही, हाच अर्थ येथे स्पष्ट होतो. त्याचप्रमाणे येथेही "त्या समाधीतून उठल्याबरोबर लगेच निघून गेले" असे म्हटलेले नाही, तर समाधीतून उठल्यानंतर गेले, न जाता राहिले नाहीत, हाच अर्थ येथे स्पष्ट केला आहे। อนนฺตรํ ปน อปกฺกมิตฺวา ภควา กึ อกาสีติ? อปรานิปิ ตีณิ สตฺตาหานิ โพธิสมีเปเยว วีตินาเมสิ. ตตฺรายํ อนุปุพฺพิกถา – ภควติ กิร พุทฺธตฺตํ ปตฺวา สตฺตาหํ เอกปลฺลงฺเกน นิสินฺเน ‘‘น ภควา วุฏฺฐาติ; กึ นุ โข อญฺเญปิ พุทฺธตฺตกรา ธมฺมา อตฺถี’’ติ เอกจฺจานํ เทวตานํ กงฺขา อุทปาทิ. อถ ภควา อฏฺฐเม ทิวเส สมาปตฺติโต วุฏฺฐาย เทวตานํ กงฺขํ ญตฺวา กงฺขาวิธมนตฺถํ อากาเส อุปฺปติตฺวา ยมกปาฏิหาริยํ ทสฺเสตฺวา ตาสํ กงฺขํ วิธมิตฺวา ปลฺลงฺกโต อีสกํ ปาจีนนิสฺสิเต อุตฺตรทิสาภาเค ฐตฺวา จตฺตาริ อสงฺขฺเยยฺยานิ กปฺปสตสหสฺสญฺจ อุปจิตานํ ปารมีนํ พลาธิคมนฏฺฐานํ ปลฺลงฺกํ โพธิรุกฺขญฺจ อนิมิเสหิ อกฺขีหิ โอโลกยมาโน สตฺตาหํ วีตินาเมสิ, ตํ ฐานํ อนิมิสเจติยํ นาม ชาตํ. อถ ปลฺลงฺกสฺส จ ฐิตฏฺฐานสฺส จ อนฺตรา ปุรตฺถิมโต จ ปจฺฉิมโต จ อายเต รตนจงฺกเม จงฺกมนฺโต สตฺตาหํ วีตินาเมสิ, ตํ ฐานํ รตนจงฺกมเจติยํ นาม ชาตํ. ตโต ปจฺฉิมทิสาภาเค เทวตา รตนฆรํ มาปยึสุ. ตตฺถ ปลฺลงฺเกน นิสีทิตฺวา อภิธมฺมปิฏกํ วิเสสโต เจตฺถ อนนฺตนยํ สมนฺตปฏฺฐานํ [Pg.239] วิจินนฺโต สตฺตาหํ วีตินาเมสิ, ตํ ฐานํ รตนฆรเจติยํ นาม ชาตํ. परंतु लगेच न निघता भगवंतांनी काय केले? त्यांनी इतरही तीन आठवडे (सप्ताह) बोधीवृक्षाच्या जवळच व्यतीत केले. त्याविषयीची अनुक्रमिक कथा अशी आहे - भगवंतांनी बुद्धत्व प्राप्त करून सात दिवस एकाच आसनावर बसून घालवले असता, "भगवंत उठत नाहीत; बुद्धत्व प्राप्त करून देणारे आणखी काही धर्म (गुण) शिल्लक आहेत की काय?" अशी काही देवतांच्या मनात शंका उत्पन्न झाली. तेव्हा भगवंतांनी आठव्या दिवशी समापत्तीतून उठून, देवतांची शंका जाणून ती शंका दूर करण्यासाठी आकाशात उड्डाण केले आणि 'यमकप्रातिहार्य' (पाणी आणि अग्नीचे जोड चमत्कार) दाखवून त्यांची शंका दूर केली. त्यानंतर आसनापासून थोडे पूर्वेकडे झुकलेल्या उत्तर दिशेच्या भागात उभे राहून, चार असंख्येय आणि एक लाख कल्प संचित केलेल्या पारमितांच्या बळाने प्राप्त झालेल्या त्या आसनाकडे आणि बोधीवृक्षाकडे न मिटणाऱ्या डोळ्यांनी (अनिमिष नेत्रांनी) पाहत सात दिवस व्यतीत केले; ते स्थान 'अनिमिष चेतिय' (अनिमिष स्तूप) म्हणून प्रसिद्ध झाले. त्यानंतर आसन आणि उभे राहण्याचे स्थान यांच्या दरम्यान पूर्व-पश्चिम पसरलेल्या रत्नमय चंक्रमणावर (चालण्याच्या मार्गावर) चंक्रमण करत त्यांनी सात दिवस व्यतीत केले; ते स्थान 'रत्नचंक्रमण चेतिय' म्हणून प्रसिद्ध झाले. त्यानंतर पश्चिम दिशेला देवतांनी एक 'रत्नघर' (रत्नगृह) निर्माण केले. तेथे आसनावर बसून अभिधम्मपिटकाचे, विशेषतः त्यातील अनंत नय असलेल्या 'समंतपट्ठान' (महापट्ठान) ग्रंथाचे चिंतन करत त्यांनी सात दिवस व्यतीत केले; ते स्थान 'रत्नघर चेतिय' म्हणून प्रसिद्ध झाले। เอวํ โพธิสมีเปเยว จตฺตาริ สตฺตาหานิ วีตินาเมตฺวา ปญฺจเม สตฺตาเห โพธิรุกฺขมูลา เยน อชปาลนิคฺโรโธ เตนุปสงฺกมิ. ตสฺส กิร นิคฺโรธสฺส ฉายาย อชปาลกา คนฺตฺวา นิสีทนฺติ; เตนสฺส อชปาลนิคฺโรโธตฺเวว นามํ อุทปาทิ. สตฺตาหํ วิมุตฺติสุขปฏิสํเวทีติ ตตฺราปิ ธมฺมํ วิจินนฺโตเยว วิมุตฺติสุขํ ปฏิสํเวเทนฺโต นิสีทิ. โพธิโต ปุรตฺถิมทิสาภาเค เอส รุกฺโข โหติ. เอวํ นิสินฺเน จ ปเนตฺถ ภควติ เอโก พฺราหฺมโณ คนฺตฺวา ปญฺหํ ปุจฺฉิ. เตน วุตฺตํ ‘‘อถ โข อญฺญตโร’’ติอาทิ. ตตฺถ หุํหุงฺกชาติโกติ โส กิร ทิฏฺฐมงฺคลิโก นาม, มานวเสน โกธวเสน จ ‘‘หุํหุ’’นฺติ กโรนฺโต วิจรติ, ตสฺมา ‘‘หุํหุงฺกชาติโก’’ติ วุจฺจติ. ‘‘หุหุกฺกชาติโก’’ติปิ ปฐนฺติ. अशा प्रकारे बोधीवृक्षाच्या जवळच चार आठवडे व्यतीत करून, पाचव्या आठवड्यात ते बोधीवृक्षाच्या मुळाकडून जेथे अजपाल वटवृक्ष होता तेथे गेले. असे म्हणतात की, त्या वटवृक्षाच्या छायेत शेळ्या राखणारे (मेंढपाळ) येऊन बसत असत; त्यामुळेच त्याला 'अजपाल निग्रोध' (अजपाल वटवृक्ष) हे नाव पडले. "सात दिवस विमुक्तीसुखाचा अनुभव घेत" म्हणजे तेथेही धर्माचे चिंतन करतच विमुक्तीसुखाचा अनुभव घेत ते बसले. हा वृक्ष बोधीवृक्षाच्या पूर्व दिशेला आहे. भगवंत तेथे बसले असता, एक ब्राह्मण तेथे आला आणि त्याने प्रश्न विचारला. म्हणूनच संगीतिकारांनी (धम्मसंगीती करणाऱ्या थेरांनी) "अथ खो अञ्ञतरो..." इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'हुंहुंकजातिको' म्हणजे तो ब्राह्मण 'दृष्टमांगलिक' (केवळ डोळ्यांनी दिसणाऱ्या गोष्टींनाच मंगल मानणारा) होता, आणि तो मानाने व क्रोधाने "हुं हुं" असा आवाज करत फिरत असे, म्हणून त्याला 'हुंहुंकजातिक' असे म्हटले आहे. काही जण 'हुहुक्कजातिको' असाही पाठ वाचतात। เอตมตฺถํ วิทิตฺวาติ เอตํ เตน วุตฺตสฺส วจนสฺส สิขาปตฺตมตฺถํ วิทิตฺวา ตายํ เวลายํ อิมํ อุทานํ อุทาเนสิ. ตสฺสตฺโถ – โย พาหิตปาปธมฺมตาย พฺราหฺมโณ น ทิฏฺฐมงฺคลิกตาย, หุํหุงฺการกภาวาทิปาปธมฺมยุตฺโต หุตฺวา เกวลํ ชาติมตฺตเกน พฺรหฺมญฺญํ ปฏิชานาติ, โส พฺราหฺมโณ พาหิตปาปธมฺมตฺตา หุํหุงฺการปฺปหาเนน นิหุํหุงฺโก, ราคาทิกสาวาภาเวน นิกฺกสาโว, ภาวนานุโยคยุตฺตจิตฺตตาย ยตตฺโต, สีลสํวเรน วา สญฺญตจิตฺตตาย ยตตฺโต, จตุมคฺคญาณสงฺขาเตหิ เวเทหิ อนฺตํ, เวทานํ วา อนฺตํ คตตฺตา เวทนฺตคู, มคฺคพฺรหฺมจริยสฺส วุสิตตฺตา วุสิตพฺรหฺมจริโย. ธมฺเมน พฺรหฺมวาทํ วเทยฺย, ‘‘พฺราหฺมโณ, อห’’นฺติ เอตํ วาทํ ธมฺเมน วเทยฺย, ยสฺส สกเล โลกสนฺนิวาเส กุหิญฺจิ เอการมฺมเณปิ ราคุสฺสโท โทสุสฺสโท โมหุสฺสโท มานุสฺสโท ทิฏฺฐุสฺสโทติ อิเม อุสฺสทา นตฺถีติ. "एतमत्थं विदित्वा" म्हणजे त्याने विचारलेल्या प्रश्नाचा सर्वोच्च (शिखर गाठलेला, म्हणजेच अर्हत्त्वाचा) अर्थ जाणून घेऊन त्या वेळी हे उदान उद्गारले. त्याचा अर्थ असा आहे - जो पापकर्मे वाहून टाकल्यामुळे (त्याग केल्यामुळे) खरा ब्राह्मण आहे, केवळ 'दृष्टमांगलिक' असल्यामुळे किंवा "हुं हुं" असा आवाज करण्याच्या स्वभावासारख्या पापी प्रवृत्तींनी युक्त असून केवळ जन्मानेच स्वतःला ब्राह्मण म्हणवून घेणारा नाही; तो ब्राह्मण पापकर्मे वाहून टाकल्यामुळे, "हुं हुं" असा आवाज करण्याचा मान व क्रोध नष्ट केल्यामुळे 'निहुंहुंक' (अहंकाररहित) आहे, रागादी मळ (आसक्ती) नसल्यामुळे 'निक्कसाव' (निष्कलंक) आहे, भावनेच्या अभ्यासात युक्त चित्त असल्यामुळे 'यतत्त' (आत्मसंयमी) आहे, किंवा शीलसंवरणाने चित्त संयमित असल्यामुळे 'यतत्त' आहे, चार मार्गज्ञानांनी युक्त अशा वेदांमुळे (ज्ञानामुळे) अंताला (निर्वाणाला) पोहोचल्यामुळे किंवा वेदांच्या अंताला (अर्हत्त्वफलाला) पोहोचल्यामुळे 'वेदंतगू' (वेदपारंगत) आहे, आणि मार्ग-ब्रह्मचर्याचे आचरण पूर्ण केल्यामुळे 'वुसितब्रह्मचरिय' (ब्रह्मचर्य पूर्ण केलेला) आहे. तोच न्यायाने स्वतःला ब्राह्मण म्हणू शकतो, "मी ब्राह्मण आहे" असा दावा तो न्यायाने करू शकतो; ज्याच्या संपूर्ण जगात कुठेही, एकाही आलंबनात (विषयात) राग-उत्कर्ष (तीव्र राग), द्वेष-उत्कर्ष, मोह-उत्कर्ष, मान-उत्कर्ष किंवा दृष्टी-उत्कर्ष हे उत्कर्ष (क्लेश) अस्तित्वात नाहीत। อชปาลกถา นิฏฺฐิตา. अजपालकथा समाप्त झाली। มุจลินฺทกถา मुचलिंदकथा ๕. อกาลเมโฆติ อสมฺปตฺเต วสฺสกาเล อุปฺปนฺนเมโฆ. อยํ ปน คิมฺหานํ ปจฺฉิเม มาเส อุทปาทิ. สตฺตาหวทฺทลิกาติ ตสฺมึ อุปฺปนฺเน สตฺตาหํ อวิจฺฉินฺนวุฏฺฐิกา อโหสิ. สีตวาตทุทฺทินีติ สา จ ปน สตฺตาหวทฺทลิกา [Pg.240] อุทกผุสิตสมฺมิสฺเสน สีตวาเตน สมนฺตา ปริพฺภมนฺเตน ทูสิตทิวสตฺตา สีตวาตทุทฺทินี นาม อโหสิ. อถ โข มุจลินฺโท นาคราชาติ ตสฺเสว มุจลินฺทรุกฺขสฺส สมีเป โปกฺขรณิยา นิพฺพตฺโต มหานุภาโว นาคราชา. สตฺตกฺขตฺตุํ โภเคหิ ปริกฺขิปิตฺวาติ เอวํ โภเคหิ ปริกฺขิปิตฺวา อุปริมุทฺธนิ มหนฺตํ ผณํ กริตฺวาว ฐิเต; ตสฺมึ ตสฺส ปริกฺเขปพฺภนฺตรํ โลหปาสาเท ภณฺฑาคารคพฺภปฺปมาณํ อโหสิ, ตสฺมา ภควา นิวาเต ปิหิตทฺวารวาตปาเน กูฏาคาเร นิสินฺโน วิย ชาโต. มา ภควนฺตํ สีตนฺติอาทิ ตสฺส ตถา กริตฺวา ฐานการณปริทีปนํ. โส หิ ‘‘มา ภควนฺตํ สีตํ พาธยิตฺถ, มา อุณฺหํ, มา ฑํสาทิสมฺผสฺโส พาธยิตฺถา’’ติ ตถา กริตฺวา อฏฺฐาสิ. ตตฺถ กิญฺจาปิ สตฺตาหวทฺทลิกาย อุณฺหเมว นตฺถิ, สเจ ปน อนฺตรนฺตรา เมโฆ วิคจฺเฉยฺย อุณฺหํ ภเวยฺย, ตมฺปิ นํ มา พาธยิตฺถาติ เอวํ ตสฺส จินฺเตตุํ ยุตฺตํ. วิทฺธนฺติ อุพฺพิทฺธํ; เมฆวิคเมน ทูรีภูตนฺติ อตฺโถ. วิคตวลาหกนฺติ อปคตเมฆํ. เทวนฺติ อากาสํ. สกวณฺณนฺติ อตฺตโน รูปํ. ५. ‘अकालमेघ’ म्हणजे पावसाळा येण्यापूर्वीच आलेला अवेळी मेघ. हा मेघ उन्हाळ्याच्या शेवटच्या महिन्यात उत्पन्न झाला. ‘सप्ताहवद्दलिका’ म्हणजे तो मेघ उत्पन्न झाल्यावर सात दिवस सतत पडणारा पाऊस. ‘शीतवातदुद्दिनी’ म्हणजे तो सात दिवसांचा सततचा पाऊस पाण्याच्या थेंबांनी मिश्रित थंड वाऱ्यामुळे सर्व बाजूंनी घोंघावणारा आणि दिवस अंधकारमय करणारा असल्याने त्याला ‘शीतवातदुद्दिनी’ असे म्हटले गेले. ‘अथ खो मुचलिन्दो नागराजा’ म्हणजे त्याच मुचलिंद वृक्षाच्या जवळ असलेल्या सरोवरात उत्पन्न झालेला महान सामर्थ्यशाली नागराज. ‘सत्तक्खत्तुं भोगेहि परिक्खिपित्वा’ म्हणजे अशा प्रकारे आपल्या शरीराने सात वेळा वेढा घालून आणि भगवंतांच्या मस्तकावर आपला मोठा फणा धरून उभा राहिला; त्याच्या त्या वेढ्याच्या आतील भाग एखाद्या लोहप्रासादातील तिजोरीच्या खोलीसारखा झाला, त्यामुळे भगवान हे वारा नसलेल्या, दारे व खिडक्या बंद असलेल्या एखाद्या कुटागारामध्ये (शिखरयुक्त खोलीत) बसल्यासारखे झाले. ‘मा भगवन्तं सीतं’ इत्यादी शब्द नागराजाने तसे करण्याचे कारण दर्शवणारे आहेत. कारण त्याने विचार केला की, ‘भगवंतांना थंडीने त्रास होऊ नये, उष्णतेने त्रास होऊ नये, डास इत्यादींच्या स्पर्शाने त्रास होऊ नये’ म्हणून तो तसे करून उभा राहिला. जरी सात दिवसांच्या सततच्या पावसामुळे उष्णता अजिबात नव्हती, तरीही जर मध्येच मेघ निघून गेले तर उष्णता निर्माण होईल, आणि ती उष्णताही भगवंतांना त्रासदायक ठरू नये, असा विचार करणे त्याच्यासाठी योग्यच होते. ‘विद्धं’ म्हणजे वर गेलेले; ढग दूर झाल्यामुळे आकाश निरभ्र झाले असा अर्थ आहे. ‘विगतवलाहकं’ म्हणजे ढग निघून गेलेले. ‘देवं’ म्हणजे आकाश. ‘सकवण्णं’ म्हणजे स्वतःचे (नागाचे) रूप. สุโข วิเวโกติ นิพฺพานสงฺขาโต อุปธิวิเวโก สุโข. ตุฏฺฐสฺสาติ จตุมคฺคญาณสนฺโตเสน สนฺตุฏฺฐสฺส. สุตธมฺมสฺสาติ ปกาสิตธมฺมสฺส. ปสฺสโตติ ตํ วิเวกํ ยํ วา กิญฺจิ ปสฺสิตพฺพํ นาม, ตํ สพฺพํ อตฺตโน วีริยพลาธิคเตน ญาณจกฺขุนา ปสฺสนฺตสฺส. อพฺยาปชฺชนฺติ อกุปฺปนภาโว; เอเตน เมตฺตาปุพฺพภาโค ทสฺสิโต. ปาณภูเตสุ สํยโมติ สตฺเตสุ จ สํยโม; อวิหึสนภาโว สุโขติ อตฺโถ. เอเตน กรุณาปุพฺพภาโค ทสฺสิโต. สุขา วิราคตา โลเกติ วีตราคตาปิ สุขาติ ทีเปติ. กามานํ สมติกฺกโมติ ยา ‘‘กามานํ สมติกฺกโม’’ติ วุจฺจติ; สา วิราคตาปิ สุขาติ อตฺโถ. เอเตน อนาคามิมคฺโค กถิโต. อสฺมิมานสฺส โย วินโยติ อิมินา ปน อรหตฺตํ กถิตํ; อรหตฺตญฺหิ อสฺมิมานสฺส ‘‘ปสฺสทฺธิวินโย’’ติ วุจฺจติ. อิโต ปรญฺจ สุขํ นาม นตฺถิ, เตนาห ‘‘เอตํ เว ปรมํ สุข’’นฺติ. ‘सुखो विवेको’ म्हणजे निर्वाण संज्ञक उपधिविवेक (उपाधींपासून अलिप्तता) हा सुखकारक आहे. ‘तुट्ठस्स’ म्हणजे चार मार्गज्ञानांच्या संतोषाने संतुष्ट झालेल्याचे. ‘सुतधम्मस्स’ म्हणजे ज्याने प्रकाशित झालेल्या चार आर्यसत्यांच्या धर्माला जाणले आहे अशाचे. ‘पस्सतो’ म्हणजे त्या विवेकाला (निर्वाणाला) याशिवाय जे काही पाहण्यायोग्य आहे, त्या सर्वांना आपल्या वीर्यबलाने (प्रयत्नांच्या बळाने) प्राप्त केलेल्या ज्ञानचक्षूने पाहणाऱ्याचे. ‘अब्यापज्जं’ म्हणजे अक्रोध भाव (द्वेषरहितता); याद्वारे भगवंतांनी मैत्री भावनेचा पूर्वभाग (उपचार मैत्री) दर्शवला आहे. ‘पाणभूतेसु संयमो’ म्हणजे प्राण्यांविषयी संयम राखणे; अहिंसा भाव (करुणा) सुखकारक आहे असा अर्थ आहे. याद्वारे करुणेचा पूर्वभाग (उपचार करुणा) दर्शवला आहे. ‘सुखा विरागता लोके’ याद्वारे भगवंत स्पष्ट करतात की वैराग्य (रागरहित अवस्था) देखील सुखकारक आहे. ‘कामाधिनतेचे उल्लंघन’ (कामाचा समतिक्रम) ज्याला म्हटले जाते; ते वैराग्य देखील सुखकारक आहे असा अर्थ आहे. याद्वारे अनागामी मार्ग सांगितला आहे. ‘अस्मिमानस्स यो विनयो’ याद्वारे अर्हत्त्व सांगितले आहे; कारण अर्हत्त्वालाच ‘अस्मिमान’ (मीपणाचा अहंकार) नष्ट करणे (प्रसब्धि-विनय) असे म्हटले जाते. यापेक्षा अधिक श्रेष्ठ सुख दुसरे कोणतेही नाही, म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे - ‘हेच परम सुख आहे.’ มุจลินฺทกถา นิฏฺฐิตา. मुचलिन्दकथा समाप्त झाली. ราชายตนกถา राजायतनकथा. ๖. มุจลินฺทมูลาติ มหาโพธิโต ปาจีนโกเณ ฐิตมุจลินฺทรุกฺขมูลา. ราชายตนนฺติ ทกฺขิณทิสาภาเค ฐิตํ ราชายตนรุกฺขํ อุปสงฺกมิ[Pg.241]. เตน โข ปน สมเยนาติ กตเรน สมเยน. ภควโต กิร ราชายตนมูเล สตฺตาหํ เอกปลฺลงฺเกน นิสินฺนสฺส สมาธิโต วุฏฺฐานทิวเส อรุณุคฺคมนเวลายเมว ‘‘โภชนกิจฺเจน ภวิตพฺพ’’นฺติ ญตฺวา สกฺโก เทวราชา โอสธหรีตกํ อุปเนสิ. ภควา ตํ ปริภุญฺชิ, ปริภุตฺตมตฺตสฺเสว สรีรกิจฺจํ อโหสิ. สกฺโก มุโขทกํ อทาสิ. ภควา มุขํ โธวิตฺวา ตสฺมึเยว รุกฺขมูเล นิสีทิ. เอวํ อุคฺคเต อรุณมฺหิ นิสินฺเน ภควติ. ६. ‘मुचलिन्दमूला’ म्हणजे महाबोधी वृक्षाच्या पूर्व कोपऱ्यात असलेल्या मुचलिंद वृक्षाच्या मुळापासून (जवळून). ‘राजायतनं’ म्हणजे दक्षिण दिशेला असलेल्या राजायतन वृक्षाकडे भगवंत गेले. ‘तेन खो पन समयेन’ म्हणजे कोणत्या वेळी? असे म्हटले जाते की, भगवंत राजायतन वृक्षाच्या मुळाशी सात दिवस एकाच आसनावर बसले असताना, समाधीतून उठण्याच्या दिवशी पहाटेच्या वेळी (अरुणोदयाच्या वेळी) ‘आता भोजनाची वेळ झाली आहे’ हे जाणून देवराज शक्राने औषधी हिरडा अर्पण केला. भगवंतांनी त्याचे सेवन केले, आणि सेवन करताच त्यांचे शारीरिक विधी पूर्ण झाले. शक्राने मुखप्रक्षालनासाठी पाणी दिले. भगवंतांनी मुखप्रक्षालन करून त्याच वृक्षाच्या मुळाशी आसन ग्रहण केले. अशा प्रकारे अरुणोदय झाल्यावर भगवान तेथे बसले असता... เตน โข ปน สมเยน ตปุสฺสภลฺลิกา วาณิชาติ ตปุสฺโส จ ภลฺลิโก จาติ ทฺเว ภาตโร วาณิชา. อุกฺกลาติ อุกฺกลชนปทโต. ตํ เทสนฺติ ยสฺมึ เทเส ภควา วิหรติ. กตรสฺมิญฺจ เทเส ภควา วิหรติ? มชฺฌิมเทเส. ตสฺมา มชฺฌิมเทสํ คนฺตุํ อทฺธานมคฺคปฺปฏิปนฺนา โหนฺตีติ อยเมตฺถ อตฺโถ. ญาติสาโลหิตา เทวตาติ เตสํ ญาติภูตปุพฺพา เทวตา. เอตทโวจาติ สา กิร เนสํ สพฺพสกฏานิ อปฺปวตฺตีนิ อกาสิ. ตโต เต กึ อิทนฺติ มคฺคเทวตานํ พลึ อกํสุ. เตสํ พลิกมฺมกาเล สา เทวตา ทิสฺสมาเนเนว กาเยน เอตํ อโวจ. มนฺเถน จ มธุปิณฺฑิกาย จาติ อพทฺธสตฺตุนา จ สปฺปิมธุผาณิตาทีหิ โยเชตฺวา พทฺธสตฺตุนา จ. ปติมาเนถาติ อุปฏฺฐหถ. ตํ โวติ ตํ ปติมานนํ ตุมฺหากํ ภวิสฺสติ ทีฆรตฺตํ หิตาย สุขาย. ยํ อมฺหากนฺติ ยํ ปฏิคฺคหณํ อมฺหากํ อสฺส ทีฆรตฺตํ หิตาย สุขาย. ภควโต เอตทโหสีติ โย กิรสฺส ปธานานุโยคกาเล ปตฺโต อโหสิ, โส สุชาตาย ปายาสํ ทาตุํ อาคจฺฉนฺติยา เอว อนฺตรธายิ. เตนสฺส เอตทโหสิ – ‘‘ปตฺโต เม นตฺถิ, ปุริมกาปิ จ น โข ตถาคตา หตฺเถสุ ปฏิคฺคณฺหนฺติ, กิมฺหิ นุ โข อหํ ปฏิคฺคณฺเหยฺยํ มนฺถญฺจ มธุปิณฺฑกญฺจา’’ติ. ‘तेन खो पन समयेन तपुस्सभल्लिको वाणिजा’ म्हणजे त्या वेळी तपुस्स आणि भल्लिक नावाचे दोन व्यापारी भाऊ होते. ‘उक्कला’ म्हणजे उत्कल जनपदातून. ‘तं देसं’ म्हणजे ज्या प्रदेशात भगवान विहार करत होते त्या प्रदेशात. भगवान कोणत्या प्रदेशात विहार करत होते? मध्यमदेशात. म्हणून मध्यमदेशात जाण्यासाठी ते दीर्घ प्रवासाच्या मार्गाला लागले होते, असा येथे अर्थ आहे. ‘ज्ञातिसालोहिता देवता’ म्हणजे त्यांची पूर्वजन्मीची नातेवाईक असलेली एक देवता. ‘एतदवोच’ म्हणजे असे म्हटले जाते की, त्या देवतेने त्यांच्या सर्व गाड्या थांबवल्या (चालू न शकणाऱ्या केल्या). त्यानंतर त्यांनी ‘हे काय आहे?’ असा विचार करून मार्गावरील देवतांना बळी (पूजा-अर्चा) अर्पण केला. त्यांच्या या पूजेच्या वेळी ती देवता प्रत्यक्ष शरीराने प्रकट होऊन त्यांना असे म्हणाली. ‘मंथेन च मधुपिण्डिकay च’ म्हणजे न मळलेल्या पिठाच्या लाडूने (मंथ) आणि तूप, मध, गूळ इत्यादी मिसळून तयार केलेल्या मळलेल्या पिठाच्या लाडूने (मधुपिंडिका). ‘पतिमानेथ’ म्हणजे सेवा करा (दान द्या). ‘तं वो’ म्हणजे ते दान देणे तुमच्यासाठी दीर्घकाळापर्यंत हितकारक आणि सुखकारक ठरेल. ‘यं अम्हाकं’ म्हणजे जे ग्रहण करणे आमच्यासाठी दीर्घकाळापर्यंत हितकारक आणि सुखकारक ठरेल. ‘भगवतो एतदहोसि’ म्हणजे असे म्हटले जाते की, भगवंतांच्या प्रधान-साधनेच्या (तपश्चर्येच्या) काळात त्यांच्याकडे जो भिक्षापात्र होता, तो सुजाता खीर देण्यासाठी येत असतानाच अंतर्धान पावला होता. त्यामुळे भगवंतांच्या मनात असा विचार आला - ‘माझ्याकडे भिक्षापात्र नाही, आणि पूर्वीचे तथागत देखील हाताने भिक्षा ग्रहण करत नसत. मग मी हा मंथ आणि मधुपिंडिका कशामध्ये ग्रहण करू?’ ปริวิตกฺกมญฺญายาติ อิโต ปุพฺเพว ภควโต สุชาตาย ทินฺนโภชนํเยว โอชานุปฺปพนฺธนวเสน อฏฺฐาสิ, เอตฺตกํ กาลํ เนว ชิฆจฺฉา น ปิปาสา น กายทุพฺพลฺยํ อโหสิ. อิทานิ ปนสฺส อาหารํ ปฏิคฺคเหตุกามตาย ‘‘น โข ตถาคตา’’ติอาทินา นเยน ปริวิตกฺโก อุทปาทิ[Pg.242]. ตํ เอวํ อุปฺปนฺนํ อตฺตโน เจตสา ภควโต เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย. จตุทฺทิสาติ จตูหิ ทิสาหิ. เสลมเย ปตฺเตติ มุคฺควณฺณเสลมเย ปตฺเต. อิทํเยว ภควา ปฏิคฺคเหสิ, เตเยว สนฺธาย วุตฺตํ. จตฺตาโร ปน มหาราชาโน ปฐมํ อินฺทนีลมณิมเย ปตฺเต อุปนาเมสุํ, น เต ภควา อคฺคเหสิ. ตโต อิเม จตฺตาโรปิ มุคฺควณฺณสิลามเย ปตฺเต อุปนาเมสุํ, ภควา จตฺตาโรปิ ปตฺเต อคฺคเหสิ เตสํ ปสาทานุรกฺขณตฺถาย, โน มหิจฺฉตาย. คเหตฺวา จ ปน จตฺตาโรปิ ยถา เอโกว ปตฺโต โหติ ตถา อธิฏฺฐหิ, จตุนฺนมฺปิ เอกสทิโส ปุญฺญวิปาโก อโหสิ. เอวํ เอกํ กตฺวา อธิฏฺฐิเต ปฏิคฺคเหสิ ภควา ปจฺจคฺเฆ เสลมเย ปตฺเต มนฺถญฺจ มธุปิณฺฑิกญฺจ. ปจฺจคฺเฆติ ปจฺจคฺฆสฺมึ; ปาเฏกฺกํ มหคฺฆสฺมินฺติ อตฺโถ. อถ วา ปจฺจคฺเฆติ อภินเว อพฺภุณฺเห; ตงฺขเณ นิพฺพตฺตสฺมินฺติ อตฺโถ. ทฺเว วาจา เอเตสํ อเหสุนฺติ ทฺเววาจิกา. อถ วา ทฺวีหิ วาจาหิ อุปาสกภาวํ ปตฺตาติ อตฺโถ. เต เอวํ อุปาสกภาวํ ปฏิเวเทตฺวา ภควนฺตํ อาหํสุ – ‘‘กสฺส ทานิ ภนฺเต อมฺเหหิ อชฺช ปฏฺฐาย อภิวาทนปจฺจุฏฺฐานํ กาตพฺพ’’นฺติ? อถ ภควา สีสํ ปรามสิ, เกสา หตฺเถ ลคฺคึสุ. เต เตสํ อทาสิ ‘‘อิเม ตุมฺเห ปริหรถา’’ติ. เต เกสธาตุโย ลภิตฺวา อมเตเนว อภิสิตฺตา หฏฺฐตุฏฺฐา ภควนฺตํ วนฺทิตฺวา ปกฺกมึสุ. ‘परिवितक्कमञ्ञाय’ (विचार जाणून घेऊन) म्हणजे यापूर्वी भगवंतांना सुजाताने दिलेले भोजनच ओज (पोषक शक्ती) अखंड टिकवून ठेवण्याच्या सामर्थ्यामुळे एवढ्या काळापर्यंत टिकून राहिले होते; या संपूर्ण काळात त्यांना भूक, तहान किंवा शारीरिक दुर्बलता जाणवली नाही. परंतु आता त्यांना आहार ग्रहण करण्याची इच्छा झाल्यामुळे, 'तथागत कधीही रिकाम्या हाताने...' इत्यादी पद्धतीने त्यांच्या मनात विचार उत्पन्न झाला. त्यांच्या मनात अशा प्रकारे उत्पन्न झालेला विचार स्वतःच्या चित्ताने भगवंतांच्या चित्तातील विचार जाणून घेऊन. ‘चतुद्दिशा’ म्हणजे चार दिशांनी. ‘सेलमध्ये पत्ते’ म्हणजे मुगाच्या रंगाचे पाषाणाचे (दगडी) पात्र. भगवंतांनी हेच पात्र ग्रहण केले, त्यांना उद्देशूनच हे म्हटले आहे. चार महाराज (लोकपाल) यांनी सुरुवातीला इंद्रनीलमण्याचे बनलेले पात्र अर्पण केले, परंतु भगवंतांनी ते स्वीकारले नाही. त्यानंतर त्यांनी हे चारही मुगाच्या रंगाचे दगडी पात्र अर्पण केले. भगवंतांनी त्यांच्या श्रद्धेचे रक्षण करण्यासाठी (त्यांना प्रसन्न ठेवण्यासाठी) ते चारही पात्र स्वीकारले, अधिक पात्रांच्या इच्छेने नव्हे. आणि ते चारही पात्र स्वीकारून, ज्याप्रमाणे ते एकच पात्र होईल अशा प्रकारे त्यांनी अधिष्ठान केले; त्या चारही महाराजांना सारखाच पुण्यविपाक (पुण्याचे फळ) मिळाला. अशा प्रकारे एक पात्र करून अधिष्ठान केलेल्या मौल्यवान दगडी पात्रात भगवंतांनी सत्तू (मंथ) आणि मधाचा गोळा (मधुपिंडिक) स्वीकारला. ‘पच्चग्घे’ म्हणजे मौल्यवान; प्रत्येकी अत्यंत मूल्यवान असा अर्थ आहे. किंवा ‘पच्चग्घे’ म्हणजे अगदी नवीन, ताजे; त्याच क्षणी तयार झालेले असा अर्थ आहे. ‘द्वे वाचा एतेसं अहेसुं’ (ज्यांचे दोन शब्द होते) म्हणून त्यांना ‘द्वेवाचिक’ (दोन शब्दांत शरण जाणारे) म्हणतात. किंवा दोन शब्दांनी (बुद्ध आणि धम्म यांच्याद्वारे) उपासकत्व प्राप्त केले असा अर्थ आहे. त्यांनी अशा प्रकारे उपासकत्व जाहीर करून भगवंतांना विचारले – “भंते! आजपासून आम्ही कोणाला अभिवादन व प्रत्युत्थान (आदर सत्कार) करावे?” तेव्हा भगवंतांनी आपल्या मस्तकावरून हात फिरवला, तेव्हा काही केश त्यांच्या हातात आले. त्यांनी ते केश त्यांना दिले आणि म्हणाले, “तुम्ही हे जवळ बाळगा आणि याचे जतन करा.” ते केशधातू प्राप्त करून, जणू अमृतानेच सिंचित झाल्यासारखे अत्यंत हर्षित व आनंदी होऊन, त्यांनी भगवंतांना वंदन केले आणि तेथून प्रस्थान केले. ราชายตนกถา นิฏฺฐิตา. राजायतन कथा समाप्त झाली. พฺรหฺมยาจนกถา ब्रह्मयाचना कथा ๗. อถ โข ภควา สตฺตาหสฺส อจฺจเยน ตมฺหา สมาธิมฺหา วุฏฺฐหิตฺวา วุตฺตปฺปการเมตํ สพฺพํ กิจฺจํ นิฏฺฐาเปตฺวา ราชายตนมูลา ปุนปิ เยน อชปาลนิคฺโรโธ เตนุปสงฺกมิ. ปริวิตกฺโก อุทปาทีติ ตสฺมึ นิสินฺนมตฺตสฺเสว สพฺพพุทฺธานํ อาจิณฺณสมาจิณฺโณ อยํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ. กสฺมา ปนายํ สพฺพพุทฺธานํ อุปฺปชฺชตีติ? ธมฺมสฺส มหนฺตภาวํ ครุภาวํ ภาริยภาวํ ปจฺจเวกฺขณาย พฺรหฺมุนา ยาจิเต เทเสตุกามตาย จ. ชานนฺติ หิ พุทฺธา ‘‘เอวํ ปริวิตกฺกิเต พฺรหฺมา อาคนฺตฺวา ธมฺมเทสนํ ยาจิสฺสติ, ตโต สตฺตา ธมฺเม คารวํ อุปฺปาเทสฺสนฺติ, พฺรหฺมครุโก หิ โลกสนฺนิวาโส’’ติ. อิติ อิเมหิ ทฺวีหิ การเณหิ อยํ วิตกฺโก อุปฺปชฺชตีติ. ७. त्यानंतर भगवान सात दिवसांच्या समाप्तीनंतर त्या समाधीतून उठले आणि वर सांगितलेली सर्व कामे पूर्ण करून राजायतन वृक्षाच्या मुळापासून पुन्हा जेथे अजपाल वटवृक्ष होता तेथे गेले. ‘परिवितक्को उदपादि’ म्हणजे तेथे बसले असता सर्व बुद्धांच्या आचरणात असलेला हा चित्ताचा विचार त्यांच्या मनात उत्पन्न झाला. पण हा विचार सर्व बुद्धांच्या मनात का उत्पन्न होतो? धम्माची महानता, त्याचे गांभीर्य आणि त्याची गहनता (जडत्व) यांचे चिंतन करण्यासाठी आणि ब्रह्माने याचना केल्यावरच धम्म उपदेश करण्याची इच्छा असल्यामुळे. कारण बुद्ध जाणतात की, “असा विचार केल्यावर महाब्रह्मा येऊन धम्म उपदेशाची याचना करेल, त्यामुळे प्राणीमात्रांच्या मनात धम्माविषयी आदर उत्पन्न होईल, कारण हा लोकसमूह ब्रह्माला पूज्य मानणारा आहे.” अशा प्रकारे या दोन कारणांमुळे हा विचार उत्पन्न होतो. ตตฺถ [Pg.243] อธิคโต โข มฺยายนฺติ อธิคโต โข เม อยํ. อาลยรามาติ สตฺตา ปญฺจ กามคุเณ อลฺลียนฺติ, ตสฺมา เต ‘‘อาลยา’’ติ วุจฺจนฺติ. เตหิ อาลเยหิ รมนฺตีติ อาลยรามา. อาลเยสุ รตาติ อาลยรตา. อาลเยสุ สุฏฺฐุมุทิตาติ อาลยสมฺมุทิตา. ยทิทนฺติ นิปาโต. ตสฺส ฐานํ สนฺธาย ‘‘ยํ อิท’’นฺติ ปฏิจฺจสมุปฺปาทํ สนฺธาย ‘‘โย อย’’นฺติ เอวมตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. อิทปฺปจฺจยตาปฏิจฺจสมุปฺปาโทติ อิเมสํ ปจฺจยา อิทปฺปจฺจยา, อิทปฺปจฺจยาว อิทปฺปจฺจยตา, อิทปฺปจฺจยตา จ สา ปฏิจฺจสมุปฺปาโท จาติ อิทปฺปจฺจยตาปฏิจฺจสมุปฺปาโท. โส มมสฺส กิลมโถติ ยา อชานนฺตานํ เทสนา นาม, โส มม กิลมโถ อสฺส; สา มม วิเหสา อสฺสาติ อตฺโถ. ภควนฺตนฺติ ภควโต. อนจฺฉริยาติ อนุ อจฺฉริยา. ปฏิภํสูติ ปฏิภานสงฺขาตสฺส ญาณสฺส โคจรา อเหสุํ, ปริวิตกฺกยิตพฺพภาวํ ปาปุณึสุ. त्यात ‘अधिगतो खो म्यायं’ म्हणजे ‘हा (धम्म) माझ्याद्वारे प्राप्त झाला आहे’. ‘आलयारामा’ म्हणजे प्राणी पाच कामगुणांमध्ये आसक्त होतात, म्हणून त्यांना ‘आलय’ (आसक्तीची ठिकाणे) म्हटले जाते. त्या आलयात रममाण होतात म्हणून ते ‘आलयारामा’ होत. आलयात मग्न असतात म्हणून ‘आलयरता’ होत. आलयात अत्यंत आनंदित होतात म्हणून ‘आलयसम्मुदिता’ होत. ‘यदिदं’ हा निपात आहे. त्याच्या स्थानाला उद्देशून ‘यं इदं’ (जे हे) आणि पटिच्चसमुप्पादाला उद्देशून ‘यो अयं’ (जो हा) असा अर्थ समजला पाहिजे. ‘इदप्पच्चयतापटिच्चसमुप्पादो’ म्हणजे या (संस्कार इत्यादी) कारणांचे जे प्रत्यय (कारण) आहेत ते ‘इदप्पच्चया’ होत; इदप्पच्चय म्हणजेच ‘इदप्पच्चयता’ होय. आणि ती इदप्पच्चयता म्हणजेच पटिच्चसमुत्पाद होय, म्हणून ‘इदप्पच्चयतापटिच्चसमुप्पादो’ असे म्हटले आहे. ‘सो ममस्स किलमथो’ म्हणजे जे न जाणणाऱ्यांना उपदेश करणे आहे, तो माझ्यासाठी थकवणारा ठरेल; तो माझ्यासाठी त्रासदायक ठरेल असा अर्थ आहे. ‘भगवन्तं’ म्हणजे भगवंतांना. ‘अनच्छरिया’ म्हणजे वारंवार आश्चर्यकारक वाटणारे. ‘पटिभंसु’ म्हणजे प्रतिभा नावाच्या ज्ञानाचे ते विषय झाले, ते वारंवार विचार करण्याच्या स्थितीला प्राप्त झाले. หลนฺติ เอตฺถ หกาโร นิปาตมตฺโต; อลนฺติ อตฺโถ. ปกาสิตุนฺติ เทสิตุํ. อลํ ทานิ เม อิมํ กิจฺเฉน อธิคตํ ธมฺมํ เทเสตุนฺติ วุตฺตํ โหติ. ปฏิโสตคามินฺติ ปฏิโสตํ วุจฺจติ นิพฺพานํ; นิพฺพานคามินฺติ อตฺโถ. ราครตฺตาติ กามราคภวราคทิฏฺฐิราเคน รตฺตา. น ทกฺขนฺตีติ น ปสฺสิสฺสนฺติ. ตโมขนฺเธน อาวุฏาติ อวิชฺชาราสินา อชฺโฌตฺถฏา. อปฺโปสฺสุกฺกตายาติ นิรุสฺสุกฺกภาเวน; อเทเสตุกามตายาติ อตฺโถ. येथे ‘हलं’ मधील ‘ह’कार हा केवळ निपात आहे; ‘अलं’ (व्यर्थ/पुरेसे) असा याचा अर्थ आहे. ‘पकासितुं’ म्हणजे उपदेश करण्यासाठी. ‘आता मी कष्टाने प्राप्त केलेल्या या धम्माचा उपदेश करणे व्यर्थ आहे’ असे येथे म्हटले आहे. ‘पटिसोतगामिं’ म्हणजे प्रवाहाच्या विरुद्ध जाणारा; प्रवाहाच्या विरुद्ध म्हणजे ‘निब्बान’ (निर्वाण) म्हटले जाते, निब्बानाकडे जाणारा असा अर्थ आहे. ‘रागरत्ता’ म्हणजे कामराग, भवराग आणि दिठ्ठिराग (दृष्टीराग) यांनी रंगलेले (आसक्त झालेले) प्राणी. ‘न दक्खन्ति’ म्हणजे ते पाहू शकणार नाहीत. ‘तमोखन्धेन आवृता’ म्हणजे अविद्यारूपी अंधकार समूहाने झाकलेले. ‘अप्पोस्सुक्कतया’ म्हणजे निरुत्साहाने; उपदेश करण्याची इच्छा नसणे असा अर्थ आहे. ๘. ยตฺร หิ นามาติ ยสฺมึ นาม โลเก. ภควโต ปุรโต ปาตุรโหสีติ ธมฺมเทสนายาจนตฺถํ ทสสุ จกฺกวาฬสหสฺเสสุ มหาพฺรหฺมาโน คเหตฺวา อาคมฺม ภควโต ปุรโต ปาตุรโหสิ. อปฺปรชกฺขชาติกาติ ปญฺญามเย อกฺขิมฺหิ อปฺปํ ราคโทสโมหรชํ เอเตสํ เอวํสภาวาติ อปฺปรชกฺขชาติกา. ภวิสฺสนฺติ ธมฺมสฺส อญฺญาตาโรติ ปฏิวิชฺฌิตาโร. ८. ‘यत्र हि नाम’ म्हणजे ज्या जगात. ‘भगवतो पुरतो पातुरहोसि’ म्हणजे धम्म उपदेशाची याचना करण्यासाठी दहा हजार चक्रवाळांमधील महाब्रह्मांना सोबत घेऊन येऊन भगवंतांच्या समोर प्रकट झाला. ‘अप्परजक्खजातिका’ म्हणजे ज्यांच्या प्रज्ञारूपी डोळ्यांमध्ये राग, द्वेष आणि मोह रूपी धूळ अत्यंत कमी आहे, अशा स्वभावाचे प्राणी म्हणजे ‘अप्परजक्खजातिका’ होत. ‘भविसन्ति धम्मस्स अञ्ञातारो’ म्हणजे धम्माचे आकलन करणारे (जाणून घेणारे) असतील. ปาตุรโหสีติ ปาตุภวิ. สมเลหิ จินฺติโตติ ราคาทีหิ มเลหิ สมเลหิ ฉหิ สตฺถาเรหิ จินฺติโต. อปาปุเรตนฺติ วิวร เอตํ. อมตสฺส ทฺวารนฺติ อมตสฺส นิพฺพานสฺส ทฺวารภูตํ อริยมคฺคํ. สุณนฺตุ ธมฺมํ วิมเลนานุพุทฺธนฺติ [Pg.244] อิเม สตฺตา ราคาทิมลานํ อภาวโต วิมเลน สมฺมาสมฺพุทฺเธน อนุพุทฺธํ จตุสจฺจธมฺมํ สุณนฺตุ. ‘पातुरहोसि’ म्हणजे प्रकट झाला. ‘समलेहि चिन्तितो’ म्हणजे राग इत्यादी मलांनी (अशुद्धीने) युक्त असलेल्या सहा शास्त्यांनी (शिक्षकांनी, जसे की पूरण कस्सप इत्यादींनी) मिथ्या ज्ञानाने विचार केलेला. ‘अपापुरेतं’ म्हणजे हे उघड. ‘अमतस्स द्वारं’ म्हणजे अमृताचे, म्हणजेच निब्बानाचे द्वार असलेल्या आर्यमार्गाला (अरिअमग्ग). ‘सुणन्तु धम्मं विमलेनानुबुद्धं’ म्हणजे हे प्राणी राग इत्यादी मलांचा अभाव असल्यामुळे विमल (निष्कलंक) असलेल्या सम्मासम्बुद्धांनी अनुक्रमाने जाणलेल्या चतुरार्यसत्याच्या धम्माचे श्रवण करोत. เสเล ยถา ปพฺพตมุทฺธนิฏฺฐิโตติ เสลมเย เอกคฺฆเน ปพฺพตมุทฺธนิ ยถาฐิโตว ยถา จกฺขุมา ปุริโส สมนฺตโต ชนตํ ปสฺเสยฺย, ตฺวมฺปิ สุเมธ สุนฺทรปญฺญ สพฺพญฺญุตญฺญาเณน สมนฺตจกฺขุ ภควา ธมฺมมยํ ปญฺญามยํ ปาสาทมารุยฺห สยํ อเปตโสโก โสกาวติณฺณํ ชาติชราภิภูตญฺจ ชนตํ อเวกฺขสฺสุ อุปธารย. ‘सेले यथा पब्बतमुद्धनिट्ठितो’ म्हणजे ज्याप्रमाणे पाषाणमयी, अखंड अशा पर्वतशिखरावर उभा असलेला दृष्टीमान मनुष्य सभोवतालच्या लोकसमूहाला पाहू शकतो, त्याचप्रमाणे हे सुमेध! सुंदर प्रज्ञा असलेल्या, सर्वज्ञता ज्ञानामुळे समंतचक्षू (सर्वदर्शी) असलेल्या हे भगवन्! आपणही धम्ममयी, प्रज्ञामयी प्रासादावर (महालावर) आरूढ होऊन, स्वतः शोकरहित होऊन, शोकात बुडालेल्या आणि जन्म-जरेने ग्रस्त झालेल्या या लोकसमूहाकडे पहावे, त्यांचे निरीक्षण करावे. อุฏฺเฐหีติ ภควโต ธมฺมเทสนตฺถํ จาริกจรณํ ยาจนฺโต ภณติ. วีราติอาทีสุ ภควา วีริยวนฺตตาย วีโร. เทวปุตฺตมจฺจุกิเลสาภิสงฺขารมารานํ วิชิตตฺตา วิชิตสงฺคาโม. ชาติกนฺตาราทินิตฺถรณสมตฺถตาย สตฺถวาโห. กามจฺฉนฺทอิณสฺส อภาวโต อณโณ. ‘उट्ठेहि’ (उठा!) असे म्हणून तो भगवंतांना धम्म उपदेशासाठी चारिका (भ्रमण) करण्याची याचना करत म्हणतो. ‘वीरा’ इत्यादी शब्दांमध्ये, भगवान आपल्या वीर्यामुळे (प्रयत्नांमुळे) ‘वीर’ आहेत. देवपुत्तमार, मच्चुमार, किलेशमार आणि अभिसंखारमार यांना जिंकल्यामुळे ते ‘विजितसंग्राम’ (युद्ध जिंकणारे) आहेत. जन्मरूपी अरण्य इत्यादी पार करून नेण्यास समर्थ असल्यामुळे ते ‘सत्थवाहो’ (सार्थवाह - मार्गदर्शक) आहेत. कामच्छंद रूपी ऋणाचा अभाव असल्यामुळे ते ‘अणण’ (ऋणमुक्त) आहेत. ๙. อชฺเฌสนนฺติ ยาจนํ. พุทฺธจกฺขุนาติ อินฺทฺริยปโรปริยตฺตญาเณน จ อาสยานุสยญาเณน จ. อิเมสญฺหิ ทฺวินฺนํ ญาณานํ พุทฺธจกฺขูติ นามํ. อปฺปรชกฺขาติ ปญฺญาจกฺขุมฺหิ ราคาทิรชํ อปฺปํ เยสํ, เต อปฺปรชกฺขา. เยสํ ตํ มหนฺตํ เต มหารชกฺขา. เยสํ สทฺธาทีนิ อินฺทฺริยานิ ติกฺขานิ เต ติกฺขินฺทฺริยา. เยสํ ตานิ มุทูนิ เต มุทินฺทฺริยา. เยสํ เตเยว สทฺธาทโย อาการา สุนฺทรา เต สฺวาการา. เยสํ เตเยว สทฺธาทโย อาการา อสุนฺทรา เต ทฺวาการา. เย กถิตการณํ สลฺลกฺเขนฺติ, สุเขน สกฺกา โหนฺติ วิญฺญาเปตุํ เต สุวิญฺญาปยา. เย ปรโลกญฺจ วชฺชญฺจ ภยโต ปสฺสนฺติ เต ปรโลกวชฺชภยทสฺสาวิโน. อุปฺปลินิยนฺติ อุปฺปลวเน. อิตเรสุปิ เอเสว นโย. อนฺโตนิมุคฺคโปสีนีติ ยานิ อุทกสฺส อนฺโต นิมุคฺคาเนว โปสยนฺติ. สโมทกํ ฐิตานีติ อุทเกน สมํ ฐิตานิ. อุทกํ อจฺจุคฺคมฺม ฐิตานีติ อุทกํ อติกฺกมิตฺวา ฐิตานิ. ९. ‘अज्झेसना’ (अज्झेसनं) म्हणजे याचना (विनंती). ‘बुद्धचक्खु’ (बुद्धचक्खुना) म्हणजे इंद्रियपरोपरियत्त ज्ञान आणि आशयानुशय ज्ञान. कारण या दोन्ही ज्ञानांना ‘बुद्धचक्षू’ असे नाव आहे. ‘अप्परजक्ख’ (अप्परजक्खा) म्हणजे ज्यांच्या प्रज्ञाचक्षूंमध्ये रागादी रज (मळ) अल्प आहे, ते अल्प-रज-डोळे असलेले (अप्परजक्ख). ज्यांच्यामध्ये तो रज अधिक आहे, ते महा-रज-डोळे असलेले (महारजक्ख). ज्यांची श्रद्धा इत्यादी इंद्रिये तीक्ष्ण आहेत, ते तीक्ष्णेंद्रिय (तिक्खिन्द्रिया). ज्यांची ती इंद्रिये मृदू आहेत, ते मृदूंद्रिय (मुदिन्द्रिया). ज्यांचे श्रद्धा इत्यादी स्वभाव (आकार) सुंदर आहेत, ते सुआकार (स्वाकारा). ज्यांचे श्रद्धा इत्यादी स्वभाव असुंदर आहेत, ते दुराकार (द्वाकारा). जे सांगितलेले कारण नीट समजून घेतात आणि ज्यांना सहजपणे आकलन करून देणे शक्य असते, ते सुविज्ञेय (सुविञ्ञापया). जे परलोक आणि दोषांना (पापांना) भयाने पाहतात, ते परलोक-वज्ज-भय-दस्सावी (परलोकातील दोषांचे भय पाहणारे). ‘उप्पलिनी’ (उप्पलिनियं) म्हणजे कमळांच्या वनात. इतरांच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. ‘अंतोनिमुग्गपोसिनी’ (अन्तोनिमुग्गपोसीनी) म्हणजे जी कमळे पाण्याच्या आत बुडूनच वाढतात. ‘समोदकं ठितानी’ (समोदकं ठितानी) म्हणजे पाण्याबरोबर समपातळीवर राहिलेली. ‘उदकं अच्चुग्गम्म ठितानी’ (उदकं अच्चुग्गम्म ठितानी) म्हणजे पाण्याचा संसर्ग ओलांडून (पाण्याच्या वर) राहिलेली. อปารุตาติ วิวฏา. อมตสฺส ทฺวาราติ อริยมคฺโค. โส หิ อมตสงฺขาตสฺส นิพฺพานสฺส ทฺวารํ. ปมุญฺจนฺตุ สทฺธนฺติ สพฺเพ อตฺตโน สทฺธํ ปมุญฺจนฺตุ. ปจฺฉิมปททฺวเย อยมตฺโถ, อหญฺหิ อตฺตโน ปคุณํ สุปฺปวตฺติมฺปิ อิมํ [Pg.245] ปณีตํ อุตฺตมํ ธมฺมํ กายวาจากิลมถสญฺญี หุตฺวา มนุเชสุ เทวมนุสฺเสสุ น ภาสินฺติ. ‘अपारुता’ (अपारुता) म्हणजे उघडलेले. ‘अमतस्स द्वारा’ (अमतस्स द्वारा) म्हणजे आर्यमार्ग. कारण तोच अमृतरूपी निर्वाणाचा प्रवेशद्वार आहे. ‘पमुञ्चन्तु सद्धं’ (पमुञ्चन्तु सद्धं) म्हणजे सर्वांनी आपली श्रद्धा प्रकट करावी (मुक्त करावी). शेवटच्या दोन पदांचा अर्थ असा आहे: ‘मी स्वतःच्या पूर्ण अभ्यासात असलेल्या, सुप्रवृत्त, प्रणीत आणि उत्तम अशा या धर्माचा (चार आर्य सत्यांचा) उपदेश, केवळ कायिक व वाचिक थकवा येईल या विचाराने, देव आणि मनुष्यांमध्ये केला नाही (असे मी पूर्वी विचार केला होता).’ พฺรหฺมยาจนกถา นิฏฺฐิตา. ब्रह्मयाचना कथा समाप्त झाली। ปญฺจวคฺคิยกถา पंचवर्गीय कथा ๑๐. ปณฺฑิโตติ ปณฺฑิจฺเจน สมนฺนาคโต. พฺยตฺโตติ เวยฺยตฺติเยน สมนฺนาคโต. เมธาวีติ ฐานุปฺปตฺติยา ปญฺญาย สมนฺนาคโต. อปฺปรชกฺขชาติโกติ สมาปตฺติยา วิกฺขมฺภิตตฺตา นิกฺกิเลสชาติโก วิสุทฺธสตฺโต. อาชานิสฺสตีติ สลฺลกฺเขสฺสติ ปฏิวิชฺฌิสฺสติ. ภควโตปิ โข ญาณํ อุทปาทีติ สพฺพญฺญุตญฺญาณํ อุปฺปชฺชิ ‘‘อิโต สตฺตมทิวสมตฺถเก กาลํกตฺวา อากิญฺจญฺญายตเน นิพฺพตฺโต’’ติ. มหาชานิโยติ สตฺตทิวสพฺภนฺตเร ปตฺตพฺพมคฺคผลโต ปริหีนตฺตา มหตี ชานิ อสฺสาติ มหาชานิโย อกฺขเณ นิพฺพตฺตตฺตา. อภิโทสกาลํกโตติ หิยฺโย กาลํกโต, โสปิ เนวสญฺญานาสญฺญายตเน นิพฺพตฺโตติ อทฺทส. พหูการาติ พหูปการา. ปธานปหิตตฺตํ อุปฏฺฐหึสูติ ปธานตฺถาย เปสิตตฺตภาวํ มุโขทกทานาทินา อุปฏฺฐหึสุ. १०. ‘पंडितो’ (पण्डितो) म्हणजे पांडित्याने (प्रज्ञेने) युक्त असलेला. ‘ब्यत्तो’ (ब्यत्तो) म्हणजे व्याप्तिशक्तीने (कुशाग्रतेने) युक्त असलेला. ‘मेधावी’ म्हणजे प्रसंगोचित प्रज्ञेने युक्त असलेला. ‘अप्परजक्खजातितो’ (अप्परजक्खजातिको) म्हणजे समापत्तीद्वारे क्लेश दूर केल्यामुळे निष्क्लेश स्वभावाचा असलेला विशुद्ध प्राणी. ‘आजानिस्सती’ (आजानिस्सती) म्हणजे नीट लक्षात घेईल, प्रतिवेध (पूर्ण ज्ञान) करेल. ‘भगवतोपि खो ञाणं उदपादि’ (भगवतोपि खो ञाणं उदपादी) म्हणजे भगवंतांना सर्वज्ञता-ज्ञान उत्पन्न झाले की, ‘आजपासून सातव्या दिवशी मृत्यू पावून (आळार कालामांनी) आकिंचन्यायतन भूमीत जन्म घेतला आहे.’ ‘महाजानियो’ (महाजानियो) म्हणजे सात दिवसांच्या आत प्राप्त होणाऱ्या मार्ग-फळापासून वंचित झाल्यामुळे ज्याचे मोठे नुकसान झाले आहे असा; कारण अयोग्य स्थानी (अक्षणी) जन्म झाल्यामुळे त्याचे हे मोठे नुकसान झाले. ‘अभिदोसकालंकतो’ (अभिदोसकालं कतो) म्हणजे काल रात्री मृत्यू पावलेला; त्यांनी (भगवंतांनी) पाहिले की ते (उद्द्रक रामपुत्र) सुद्धा नैवसंज्ञानासंज्ञायतन भूमीत उत्पन्न झाले आहेत. ‘बहूकारा’ (बहूकारा) म्हणजे अत्यंत उपकारक. ‘पधानपहितत्तं उपट्ठहिंसु’ (पधानपहितत्तं उपट्ठहिंसु) म्हणजे ध्यानासाठी (प्रधानासाठी) स्वतःला वाहून घेतलेल्या माझ्या शरीराची मुखोदक (तोंड धुण्याचे पाणी) इत्यादी देऊन त्यांनी सेवा केली। ๑๑. อนฺตรา จ คยํ อนฺตรา จ โพธินฺติ อุปโก โพธิมณฺฑสฺส จ คยาย จ อนฺตเร ภควนฺตํ อทฺทส. อทฺธานมคฺคปฺปฏิปนฺนนฺติ อทฺธานมคฺคํ ปฏิปนฺนํ. ११. ‘अंतरा च गयं अंतरा च बोधिं’ (अन्तरा च गयं अन्तरा च बोधिं) म्हणजे उपक आजीवकाने बोधिमंड आणि गया यांच्या दरम्यान भगवंतांना पाहिले. ‘अद्धानमग्गप्पटिपन्नं’ (अद्धानमग्गप्पटिपन्नं) म्हणजे लांबच्या प्रवासाच्या मार्गाला लागलेले। สพฺพาภิภูติ สพฺพํ เตภูมกธมฺมํ อภิภวิตฺวา ฐิโต. สพฺพวิทูติ สพฺพํ จตุภูมกธมฺมํ อเวทึ อญฺญาสึ. สพฺเพสุ ธมฺเมสุ อนูปลิตฺโตติ สพฺเพสุ เตภูมกธมฺเมสุ กิเลสเลเปน อลิตฺโต. สพฺพญฺชโหติ สพฺพํ เตภูมกธมฺมํ ชหิตฺวา ฐิโต. ตณฺหกฺขเย วิมุตฺโตติ ตณฺหกฺขเย นิพฺพาเน อารมฺมณโต วิมุตฺโต. สยํ อภิญฺญายาติ สพฺพํ จตุภูมกธมฺมํ อตฺตนาว ชานิตฺวา. กมุทฺทิเสยฺยนฺติ กํ อญฺญํ ‘‘อยํ เม อาจริโย’’ติ อุทฺทิเสยฺยํ. ‘सब्बाभिभू’ (सब्बाभिभू) म्हणजे सर्व त्रैभूमिक धर्मांना पराभूत करून राहिलेला. ‘सब्बविदू’ (सब्बविदू) म्हणजे सर्व चतुर्भूमिक धर्मांना जाणणारा. ‘सब्बेसु धम्मेसु अनूपलित्तो’ (सब्बेसु धम्मेसु अनूपलित्तो) म्हणजे सर्व त्रैभूमिक धर्मांमध्ये क्लेशांच्या लेपाने अलिप्त असलेला. ‘सब्बञ्जहो’ (सब्बञ्ञहो) म्हणजे सर्व त्रैभूमिक धर्मांचा त्याग करून राहिलेला. ‘तण्हक्खये विमुत्तो’ (तण्हक्खये विमुत्तो) म्हणजे तृष्णाक्षयरूपी निर्वाणामध्ये आलंबन रूपाने विमुक्त झालेला. ‘सयं अभिञ्ञाय’ (सयं अभिञ्ञाय) म्हणजे सर्व चतुर्भूमिक धर्म स्वतःच जाणून. ‘कमुद्दिसेय्यं’ (कमुद्दिसेय्यं) म्हणजे माझ्याशिवाय इतर कोणाला ‘हे माझे आचार्य आहेत’ असे मी दर्शवू? น เม อาจริโย อตฺถีติ โลกุตฺตรธมฺเม มยฺหํ อาจริโย นาม นตฺถิ. นตฺถิ เม ปฏิปุคฺคโลติ มยฺหํ ปฏิภาคปุคฺคโล นาม นตฺถิ. สีติภูโตติ สพฺพกิเลสคฺคินิพฺพาปเนน สีติภูโต. กิเลสานํเยว นิพฺพุตตฺตา นิพฺพุโต. ‘न मे आचरियो अत्थि’ (न मे आचरियो अत्थि) म्हणजे लोकोत्तर धर्मामध्ये माझे कोणी आचार्य नावाचे नाहीत. ‘नत्थि मे पटिपुग्गलो’ (नत्थि मे पटिपुग्गलो) म्हणजे माझ्या तोडीचा (समान) दुसरा कोणी व्यक्ती नाही. ‘सीतिभूतो’ (सीतिभूतो) म्हणजे सर्व क्लेशांचे अग्नी शांत केल्यामुळे शीतल झालेला. क्लेशांच्याच शांत होण्यामुळे ‘निब्बुतो’ (शांत/मुक्त) झालेला। กาสีนํ [Pg.246] ปุรนฺติ กาสิรฏฺเฐ นครํ. อาหญฺฉํ อมตทุนฺทุภินฺติ ธมฺมจกฺกปฺปฏิลาภาย อมตเภรึ ปหริสฺสามีติ คจฺฉามิ. ‘कासीनं पुरं’ (कासीनं पुरं) म्हणजे काशी राष्ट्रातील नगर (वाराणसी). ‘आहञ्चं अमतदुन्दुभिं’ (आहञ्चं अमतदुन्दुभिं) म्हणजे धम्मचक्र प्रवर्तनासाठी मी अमृतरूपी दुंदुभी (नगारा) वाजवीन, या हेतूने मी जात आहे। อรหสิ อนนฺตชิโนติ อนนฺตชิโน ภวิตุํ ยุตฺโต. หุเปยฺยปาวุโสติ อาวุโส เอวมฺปิ นาม ภเวยฺย. สีสํ โอกมฺเปตฺวาติ สีสํ จาเลตฺวา. ‘अरहसि अनन्तजिनो’ (अरहसि अनन्तजिनो) म्हणजे आपण अनंतजीन होण्यास योग्य आहात. ‘हुपेय्यपावुसो’ (हुपेय्यपावुसो) म्हणजे ‘हे आवुसो (मित्रा), असेही असू शकते.’ ‘सीसं ओकम्पेत्वा’ (सीसं ओकम्पेत्वा) म्हणजे डोके हलवून (मान डोलावून)। ๑๒. สณฺฐเปสุนฺติ กติกํ อกํสุ. พาหุลฺลิโกติ จีวรพาหุลฺลาทีนํ อตฺถาย ปฏิปนฺโน. ปธานวิพฺภนฺโตติ ปธานโต วิพฺภนฺโต ภฏฺโฐ ปริหีโน. อาวตฺโต พาหุลฺลายาติ จีวราทิพหุลภาวตฺถาย อาวตฺโต. โอทหถ ภิกฺขเว โสตนฺติ อุปเนถ ภิกฺขเว โสตํ; โสตินฺทฺริยํ ธมฺมสวนตฺถํ อภิมุขํ กโรถาติ อตฺโถ. อมตมธิคตนฺติ อมตํ นิพฺพานํ มยา อธิคตนฺติ ทสฺเสติ. อิริยายาติ ทุกฺกรอิริยาย. ปฏิปทายาติ ทุกฺกรปฏิปทาย. อภิชานาถ เม โนติ อภิชานาถ นุ เม สมนุปสฺสถ. เอวรูปํ ภาสิตเมตนฺติ เอตํ เอวรูปํ วากฺยํ ภาสิตนฺติ อตฺโถ. อสกฺขิ โข ภควา ปญฺจวคฺคิเย ภิกฺขู สญฺญาเปตุนฺติ ‘‘อหํ พุทฺโธ’’ติ ชานาเปตุํ อสกฺขิ. १२. ‘सण्ठपेसुं’ (सण्ठपेसुं) म्हणजे त्यांनी संकेत (नियम) केला. ‘बाहुल्लिको’ (बाहुल्लिको) म्हणजे चीवर इत्यादींच्या विपुलतेसाठी प्रवृत्त झालेला. ‘पधानविब्भन्तो’ (पधानविब्भन्तो) म्हणजे ध्यानापासून (प्रधानापासून) विचलित झालेला, भ्रष्ट झालेला, पतित झालेला. ‘आवत्तो बाहुल्लाय’ (आवत्तो बाहुल्लाय) म्हणजे चीवर इत्यादींच्या विपुलतेसाठी परतलेला. ‘ओदहथ भिक्खवे सोतं’ (ओदहथ भिक्खवे सोतं) म्हणजे ‘हे भिक्खूंनो, कान द्या (लक्ष द्या)’; याचा अर्थ धम्मश्रवणासाठी श्रोत्रेंद्रिय सन्मुख करा. ‘अमतमधिगतं’ (अमतमधिगतं) म्हणजे ‘मी अमृतरूपी निर्वाण प्राप्त केले आहे’ हे दर्शविते. ‘इरियाय’ (इरियाया) म्हणजे दुष्कर चर्या (तपश्चर्या) द्वारे. ‘पटिपदाय’ (पटिपदाया) म्हणजे दुष्कर प्रतिपदेद्वारे. ‘अभिजानाथ मे नो’ (अभिजानाथ मे नो) म्हणजे ‘तुम्हाला आठवते का, मी कधी असे बोललो होतो?’ ‘एवरूपं भासितमेतं’ (एवरूपं भासितमेतं) म्हणजे ‘अशा प्रकारचे हे वाक्य बोलले गेले आहे’ असा अर्थ आहे. ‘असक्खि खो भगवा पञ्चवग्गिये भिक्खू सञ्ञापेतुं’ (असक्खि खो भगवा पञ्चवग्गिये भिक्खू सञ्ञापेतुं) म्हणजे भगवंत पंचवर्गीय भिक्खूंना ‘मी बुद्ध आहे’ हे पटवून देण्यास समर्थ झाले. ๑๓. จกฺขุกรณีติ ปญฺญาจกฺขุํ สนฺธายาห. อิโต ปรํ สพฺพํ ปทตฺถโต อุตฺตานเมว. อธิปฺปายานุสนฺธิโยชนาทิเภทโต ปน ปปญฺจสูทนิยา มชฺฌิมฏฺฐกถายํ วุตฺตนเยน เวทิตพฺพํ. อิโต ปฏฺฐาย หิ อติวิตฺถารภีรุกสฺส มหาชนสฺส จิตฺตํ อนุรกฺขนฺตา สุตฺตนฺตกถํ อวณฺณยิตฺวา วินยกถํเยว วณฺณยิสฺสาม. १३. ‘चक्खुकराणी’ (चक्खुकराणी) हे प्रज्ञाचक्षूला उद्देशून म्हटले आहे. यापुढील सर्व भाग शब्दांच्या अर्थावरून अगदी स्पष्टच आहे. परंतु अभिप्राय, अनुसंधि, योजना इत्यादींच्या भेदांनुसार ‘पपञ्चसूदनी’ नावाच्या मज्झिमनिकाय अट्ठकथेमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीने ते समजून घ्यावे. कारण येथून पुढे, अतिविस्ताराला घाबरणाऱ्या बहुसंख्य लोकांच्या चित्ताचे रक्षण करण्यासाठी, आम्ही सुत्तंत कथेचे वर्णन न करता केवळ विनय कथेचेच वर्णन करू. ๑๘. สาว ตสฺส อายสฺมโต อุปสมฺปทา อโหสีติ อาสาฬฺหีปุณฺณมาย อฏฺฐารสหิ เทวตาโกฏีหิ สทฺธึ โสตาปตฺติผเล ปติฏฺฐิตสฺส ‘‘เอหิ ภิกฺขู’’ติ ภควโต วจเนน อภินิปฺผนฺนา สาว ตสฺส อายสฺมโต เอหิภิกฺขูปสมฺปทา อโหสิ. १८. ‘साव तस्स आयस्मतो उपसम्पदा अहोसि’ (साव तस्स आयस्मतो उपसम्पदा अहोसि) म्हणजे आषाढी पौर्णिमेला अठरा कोटी देव-ब्रह्मांसह स्रोतापत्ती फलावर प्रतिष्ठित झालेल्या त्या आयुष्यमान (कोंडण्य) यांची, भगवंतांच्या ‘एहि भिक्खू’ या शब्दांमुळे संपन्न झालेली तीच ‘एहिभिक्खू उपसंपदा’ झाली. ๑๙. อถ โข อายสฺมโต จ วปฺปสฺสาติ อาทิมฺหิ วปฺปตฺเถรสฺส ปาฏิปททิวเส ธมฺมจกฺขุํ อุทปาทิ, ภทฺทิยตฺเถรสฺส ทุติยทิวเส, มหานามตฺเถรสฺส ตติยทิวเส, อสฺสชิตฺเถรสฺส จตุตฺถิยนฺติ. อิเมสญฺจ ปน [Pg.247] ภิกฺขูนํ กมฺมฏฺฐาเนสุ อุปฺปนฺนมลวิโสธนตฺถํ ภควา อนฺโตวิหาเรเยว อโหสิ. อุปฺปนฺเน อุปฺปนฺเน กมฺมฏฺฐานมเล อากาเสน คนฺตฺวา มลํ วิโนเทสิ. ปกฺขสฺส ปน ปญฺจมิยํ สพฺเพ เต เอกโต สนฺนิปาเตตฺวา อนตฺตสุตฺเตน โอวทิ. เตน วุตฺตํ ‘‘อถ โข ภควา ปญฺจวคฺคิเย’’ติอาทิ. १९. ‘अथ खो आयस्मतो च वप्पस्स’ (अथ खो आयस्मतो च वप्पस्स) इत्यादी सुरुवातीच्या वाक्यात असा निर्णय समजावा: वप्प थेरांना प्रतिपदेच्या (पाडव्याच्या) दिवशी धम्मचक्षू उत्पन्न झाला, भद्दिय थेरांना दुसऱ्या दिवशी, महानाम थेरांना तिसऱ्या दिवशी आणि अस्सजि थेरांना चौथ्या दिवशी धम्मचक्षू उत्पन्न झाला. आणि या भिक्खूंच्या कम्मट्ठानामध्ये (ध्यानामध्ये) उत्पन्न होणारे मळ दूर करण्यासाठी भगवंत विहाराच्या आतच राहिले. जेव्हा जेव्हा कम्मट्ठानाचा मळ उत्पन्न होत असे, तेव्हा तेव्हा ते आकाशाने जाऊन तो मळ दूर करत असत. परंतु पक्षाच्या पाचव्या दिवशी (पंचमीला) त्यांनी त्या सर्वांना एकत्र बोलावून ‘अनत्तलक्खण सुत्ता’द्वारे उपदेश केला. म्हणूनच ‘अथ खो भगवा पञ्चवग्गिये’ इत्यादी म्हटले गेले आहे. ๒๔. เตน โข ปน สมเยน ฉ โลเก อรหนฺโต โหนฺตีติ ปญฺจมิยา ปกฺขสฺส โลกสฺมึ ฉ มนุสฺสา อรหนฺโต โหนฺตีติ อตฺโถ. २४. "त्या वेळी जगात सहा अर्हत होते" याचा अर्थ असा की, पंधरवड्याच्या पाचव्या दिवशी जगात सहा मनुष्य अर्हत झाले होते. ปญฺจวคฺคิยกถา นิฏฺฐิตา. पंचवर्गीय कथा समाप्त झाली. ปพฺพชฺชากถา प्रव्रज्या कथा. ๓๑. ปุพฺพานุปุพฺพกานนฺติ ปเวณิวเสน โปราณานุโปราณานนฺติ อตฺโถ. เตน โข ปน สมเยน เอกสฏฺฐิ โลเก อรหนฺโต โหนฺตีติ ปุริมา ฉ อิเม จ ปญฺจปญฺญาสาติ อนฺโตวสฺสมฺหิเยว เอกสฏฺฐิ มนุสฺสา อรหนฺโต โหนฺตีติ อตฺโถ. ३१. "पुब्बानुपुब्बकानं" याचा अर्थ वंशाच्या परंपरेने प्राचीन काळापासून चालत आलेल्या कुळांचे असा आहे. "त्या वेळी जगात एकसष्ट अर्हत होते" याचा अर्थ असा की, वर्षावासाच्या दरम्यानच पूर्वीचे सहा आणि हे पंचावन्न मिळून एकूण एकसष्ट मनुष्य अर्हत झाले होते. ตตฺร ยสอาทีนํ กุลปุตฺตานํ อยํ ปุพฺพโยโค – อตีเต กิร ปญฺจปญฺญาสชนา สหายกา วคฺคพนฺเธน ปุญฺญานิ กโรนฺตา อนาถสรีรานิ ปฏิชคฺคนฺตา วิจรนฺติ, เต เอกทิวสํ คพฺภินึ อิตฺถึ กาลํกตํ ทิสฺวา ‘‘ฌาเปสฺสามา’’ติ สุสานํ นีหรึสุ. เตสุ ปญฺจ ชเน ‘‘ตุมฺเห ฌาเปถา’’ติ สุสาเน ฐเปตฺวา เสสา คามํ ปวิฏฺฐา. ยโส ทารโก ตํ สรีรํ วิชฺฌิตฺวา ปริวตฺเตตฺวา จ ฌาปยมาโน อสุภสญฺญํ ปฏิลภิ. โส อิตเรสมฺปิ จตุนฺนํ ชนานํ ‘‘ปสฺสถ โภ อิมํ อสุจึ ปฏิกูล’’นฺติ ทสฺเสสิ. เตปิ ตตฺถ อสุภสญฺญํ ปฏิลภึสุ. เต ปญฺจปิ ชนา คามํ คนฺตฺวา เสสสหายกานํ กถยึสุ. ยโส ปน ทารโก เคหมฺปิ คนฺตฺวา มาตาปิตูนฺนญฺจ ภริยาย จ กเถสิ. เต สพฺเพปิ อสุภํ ภาวยึสุ. อยเมเตสํ ปุพฺพโยโค. เตนายสฺมโต ยสสฺส นาฏกชเนสุ สุสานสญฺญาเยว อุปฺปชฺชิ, ตาเยว จ อุปนิสฺสยสมฺปตฺติยา สพฺเพสํ วิเสสาธิคโม นิพฺพตฺตีติ. त्या एकसष्ट अर्हतांमध्ये, यसादी कुलपुत्रांचा हा पूर्वयोग (पूर्वीचे पुण्यकर्म) होता – असे म्हटले जाते की, भूतकाळात पंचावन्न मित्र एकत्र येऊन संघ बनवून पुण्यकर्मे करत आणि अनाथ (बेवारस) मृतदेहांची काळजी घेत फिरत असत. एके दिवशी त्यांनी एका मृत गरोदर स्त्रीला पाहिले आणि "आपण हिचा अंत्यसंस्कार करूया" असे ठरवून तिला स्मशानात घेऊन गेले. त्यांच्यापैकी पाच जणांना "तुम्ही अंत्यसंस्कार करा" असे सांगून स्मशानात ठेवून बाकीचे गावात निघून गेले. यसा नावाच्या तरुणाने त्या मृतदेहाला लाकडाने टोचून व उलटवून अंत्यसंस्कार करत असताना 'अशुभ संज्ञा' (अशुभाची जाणीव) प्राप्त केली. त्याने इतर चार जणांनाही "मित्रांनो, हा अपवित्र व घृणास्पद मृतदेह पहा" असे म्हणून दाखवले. त्यांनीही तिथे अशुभ संज्ञा प्राप्त केली. त्या पाचही जणांनी गावात जाऊन उर्वरित मित्रांना हे सांगितले. तरुण यसाने घरी जाऊन आपल्या मातापित्यांना आणि पत्नीलाही हे सांगितले. त्या सर्वांनीच अशुभ भावनेची साधना केली. हा त्यांचा पूर्वयोग होता. यामुळेच आयुष्यमान यसाला (आपल्या महालातील नर्तकींना पाहून) स्मशानाचीच संज्ञा निर्माण झाली आणि त्याच उपनिषय-संपत्तीमुळे (प्रबळ पूर्वपुण्यामुळे) सर्वांना विशेष अधिगम (अर्हतपद) प्राप्त झाले. อถ โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสีติ ภควา ยาว ปจฺฉิมกตฺติกปุณฺณมา, ตาว พาราณสิยํ วิหรนฺโต เอกทิวสํ เต ขีณาสเว สฏฺฐิ ภิกฺขู อามนฺเตสิ. "त्यानंतर भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले" याचा अर्थ असा की, भगवंत जोपर्यंत कार्तिकी पौर्णिमा (वर्षावासाचा शेवटचा महिना) येत नाही, तोपर्यंत वाराणसीत विहार करत असताना, एके दिवशी त्या साठ क्षीणास्रव (अर्हत) भिक्खूंना संबोधित करते झाले. ๓๒. ทิพฺพา [Pg.248] นาม ทิพฺเพสุ วิสเยสุ โลภปาสา. มานุสา นาม มานุสเกสุ วิสเยสุ โลภปาสา. มา เอเกน ทฺเวติ เอเกน มคฺเคน ทฺเว มา อคมิตฺถ. อสฺสวนตาติ อสฺสวนตาย. ปริหายนฺตีติ อนธิคตํ นาธิคจฺฉนฺตา วิเสสาธิคมโต ปริหายนฺติ. ३२. "दिव्य" म्हणजे दिव्य विषयांवरील लोभाचे पाश. "मानुष" म्हणजे मानवी विषयांवरील लोभाचे पाश. "एका मार्गाने दोघांनी जाऊ नका" म्हणजे एकाच मार्गाने दोघांनी एकत्र जाऊ नका. "अस्सवणता" म्हणजे (धम्म) न ऐकल्यामुळे. "ऱ्हास पावतात" म्हणजे प्राप्त न झालेला विशेष धम्म प्राप्त न करू शकल्यामुळे ते धम्माच्या प्राप्तीपासून वंचित राहतात. ๓๓. อนฺตกาติ ลามก หีนสตฺต. อนฺตลิกฺขจโรติ ราคปาสํ สนฺธายาห. ตญฺหิ โส ‘‘อนฺตลิกฺขจโร’’ติ มนฺตฺวา อาห. ३३. "अंतक" म्हणजे हीन किंवा क्षुद्र प्राणी. "अन्तलिक्खचरो" (आकाशात फिरणारा) हे रागपाश (आसक्तीचे जाळे) लक्षात घेऊन म्हटले आहे. कारण त्याने (मार याने) त्या रागपाशाला "आकाशात फिरणारा" असे मानून तसे म्हटले होते. ๓๔. นานาทิสา นานาชนปทาติ นานาทิสโต จ นานาชนปทโต จ. อนุชานามิ ภิกฺขเว ตุมฺเหว ทานิ ตาสุ ตาสุ ทิสาสุ เตสุ เตสุ ชนปเทสุ ปพฺพาเชถาติอาทิมฺหิ ปพฺพชฺชาเปกฺขํ กุลปุตฺตํ ปพฺพาเชนฺเตน เย ปรโต ‘‘น ภิกฺขเว ปญฺจหิ อาพาเธหิ ผุฏฺโฐ ปพฺพาเชตพฺโพ’’ติอาทึ กตฺวา ยาว ‘‘น อนฺธมูคพธิโร ปพฺพาเชตพฺโพ’’ติ เอวํ ปฏิกฺขิตฺตา ปุคฺคลา, เต วชฺเชตฺวา ปพฺพชฺชาโทสวิรหิโต ปุคฺคโล ปพฺพาเชตพฺโพ. โสปิ จ มาตาปิตูหิ อนุญฺญาโตเยว. ตสฺส อนุชานนลกฺขณํ ‘‘น ภิกฺขเว อนนุญฺญาโต มาตาปิตูหิ ปุตฺโต ปพฺพาเชตพฺโพ, โย ปพฺพาเชยฺย, อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสา’’ติ เอตสฺมึ สุตฺเต วณฺณยิสฺสาม. ३४. "नानादिसा नानाजनपदा" म्हणजे वेगवेगळ्या दिशांमधून आणि वेगवेगळ्या जनपदांमधून. "भिक्खूंनो, मी तुम्हाला परवानगी देतो की तुम्हीच आता त्या त्या दिशांमध्ये आणि त्या त्या जनपदांमध्ये प्रव्रज्या द्यावी" इत्यादी पाठात, प्रव्रज्येची इच्छा असणाऱ्या कुलपुत्राला प्रव्रज्या देणाऱ्या उपाध्यायाने, पुढे येणाऱ्या "भिक्खूंनो, पाच रोगांनी ग्रस्त असलेल्याला प्रव्रज्या देऊ नये" इथपासून ते "अंध, मुका किंवा बहिरा असलेल्याला प्रव्रज्या देऊ नये" या पाठापर्यंत ज्या व्यक्तींना वर्ज्य केले आहे, त्यांना वगळून प्रव्रज्येच्या दोषांपासून मुक्त असलेल्या व्यक्तीलाच प्रव्रज्या दिली पाहिजे. आणि तो देखील मातापित्यांनी अनुमती दिलेलाच असावा. मातापित्यांच्या अनुमतीचे लक्षण "भिक्खूंनो, मातापित्यांची अनुमती नसलेल्या पुत्राला प्रव्रज्या देऊ नये, जो कोणी देईल त्याला दुक्कट (दुष्कृत) गुन्हा लागू होईल" या सूत्राच्या स्पष्टीकरणात आम्ही वर्णन करू. เอวํ ปพฺพชฺชาโทสวิรหิตํ มาตาปิตูหิ อนุญฺญาตํ ปพฺพาเชนฺเตนาปิ จ สเจ อจฺฉินฺนเกโส โหติ, เอกสีมาย จ อญฺเญปิ ภิกฺขู อตฺถิ, เกสจฺเฉทนตฺถาย ภณฺฑุกมฺมํ อาปุจฺฉิตพฺพํ. ตสฺส อาปุจฺฉนาการํ ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, สงฺฆํ อปโลเกตุํ ภณฺฑุกมฺมายา’’ติ เอตฺถ วณฺณยิสฺสาม. สเจ โอกาโส โหติ, สยํ ปพฺพาเชตพฺโพ. สเจ อุทฺเทสปริปุจฺฉาทีหิ พฺยาวโฏ โหติ, โอกาสํ น ลภติ, เอโก ทหรภิกฺขุ วตฺตพฺโพ ‘‘เอตํ ปพฺพาเชหี’’ติ. อวุตฺโตปิ เจ ทหรภิกฺขุ อุปชฺฌายํ อุทฺทิสฺส ปพฺพาเชติ, วฏฺฏติ. สเจ ทหรภิกฺขุ นตฺถิ, สามเณโรปิ วตฺตพฺโพ ‘‘เอตํ ขณฺฑสีมํ เนตฺวา ปพฺพาเชตฺวา กาสายานิ อจฺฉาเทตฺวา เอหี’’ติ. สรณานิ ปน สยํ ทาตพฺพานิ. เอวํ ภิกฺขุนาว ปพฺพชิโต โหติ. ปุริสญฺหิ ภิกฺขุโต อญฺโญ ปพฺพาเชตุํ น ลภติ, มาตุคามํ ภิกฺขุนิโต อญฺโญ. สามเณโร ปน สามเณรี วา อาณตฺติยา กาสายานิ ทาตุํ ลภติ. เกโสโรปนํ เยน เกนจิ กตํ สุกตํ. अशा प्रकारे प्रव्रज्येच्या दोषांपासून मुक्त असलेल्या आणि मातापित्यांची अनुमती असलेल्या उमेदवाराला प्रव्रज्या देताना, जर त्याचे केस कापलेले नसतील आणि एकाच सीमेमध्ये इतर भिक्खूही असतील, तर केस कापण्यासाठी (मुंडण करण्यासाठी) संघाची अनुमती घेतली पाहिजे. त्या अनुमती घेण्याच्या पद्धतीचे वर्णन "भिक्खूंनो, मुंडण करण्यासाठी संघाची अनुमती घेण्यास मी अनुमती देतो" या पाठात आम्ही करू. जर सवड असेल, तर स्वतःच प्रव्रज्या द्यावी. जर स्वतः पाठांतर, प्रश्नोत्तरे इत्यादींमध्ये व्यस्त असल्यामुळे वेळ मिळत नसेल, तर एखाद्या तरुण भिक्खूला सांगावे की, "याला प्रव्रज्या दे." जर तरुण भिक्खूला सांगितले नसले तरी त्याने उपाध्यायांना उद्देशून प्रव्रज्या दिली, तर ते योग्य ठरते. जर तरुण भिक्खू नसेल, तर सामणेरालाही सांगावे की, "याला खंडसीमेत घेऊन जा, प्रव्रज्या देऊन काषाय वस्त्रे परिधान करवून घेऊन ये." परंतु शरणगमन स्वतःच दिले पाहिजे. अशा प्रकारे तो भिक्खूकडूनच प्रव्रजित केला जातो. कारण पुरुषाला भिक्खूशिवाय इतर कोणी प्रव्रजित करू शकत नाही आणि स्त्रीला भिक्खूणीशिवाय इतर कोणी प्रव्रजित करू शकत नाही. परंतु सामणेर किंवा सामणेरी आज्ञेनुसार काषाय वस्त्रे देऊ शकतात. मुंडण कोणाकडूनही केले गेले तरी ते योग्यच मानले जाते. สเจ [Pg.249] ปน ภพฺพรูโป โหติ สเหตุโก ญาโต ยสสฺสี กุลปุตฺโต, โอกาสํ กตฺวาปิ สยเมว ปพฺพาเชตพฺโพ. ‘‘มตฺติกามุฏฺฐึ คเหตฺวา นฺหายิตฺวา เกเส เตเมตฺวา อาคจฺฉาหี’’ติ จ ปน น วิสฺสชฺเชตพฺโพ. ปพฺพชิตุกามานญฺหิ ปฐมํ พลวอุสฺสาโห โหติ, ปจฺฉา ปน กาสายานิ จ เกสหรณสตฺถกญฺจ ทิสฺวา อุตฺรสนฺติ, เอตฺโตเยว ปลายนฺติ, ตสฺมา สยเมว นหานติตฺถํ เนตฺวา สเจ นาติทหโร โหติ, ‘‘นหาหี’’ติ วตฺตพฺโพ. เกสา ปนสฺส สยเมว มตฺติกํ คเหตฺวา โธวิตพฺพา. ทหรกุมารโก ปน สยํ อุทกํ โอตริตฺวา โคมยมตฺติกาหิ ฆํสิตฺวา นหาเปตพฺโพ. สเจปิสฺส กจฺฉุ วา ปิฬกา วา โหนฺติ, ยถา มาตา ปุตฺตํ น ชิคุจฺฉติ, เอวเมว อชิคุจฺฉนฺเตน สาธุกํ หตฺถปาทสีสานิ ฆํสิตฺวา นหาเปตพฺโพ. กสฺมา? เอตฺตเกน หิ อุปกาเรน กุลปุตฺตา อาจริยุปชฺฌาเยสุ จ สาสเน จ พลวสิเนหา ติพฺพคารวา อนิวตฺติธมฺมา โหนฺติ, อุปฺปนฺนํ อนภิรตึ วิโนเทตฺวา เถรภาวํ ปาปุณนฺติ, กตญฺญู กตเวทิโน โหนฺติ. परंतु जर तो कुलपुत्र योग्य, मार्ग-फळ मिळवण्यास पात्र, प्रसिद्ध आणि यशस्वी असेल, तर वेळ काढून स्वतःच त्याला प्रव्रजित करावे. "मातीची मूठ घेऊन, स्नान करून, केस ओले करून ये" असे सांगून त्याला पाठवू नये. कारण प्रव्रज्या घेण्याची इच्छा असणाऱ्यांचा सुरुवातीला मोठा उत्साह असतो, परंतु नंतर काषाय वस्त्रे आणि मुंडण करण्याचे हत्यार पाहून ते घाबरतात आणि तिथूनच पळून जातात. म्हणून स्वतःच त्याला स्नानघाटावर घेऊन जावे आणि जर तो फार लहान नसेल, तर त्याला "स्नान कर" असे सांगावे. त्याचे केस स्वतःच माती घेऊन धुवावेत. जर तो लहान मुलगा असेल, तर स्वतः पाण्यात उतरून शेण व मातीने त्याचे शरीर घासून त्याला स्नान घालावे. जरी त्याला खाज किंवा गळू झाले असले, तरी ज्याप्रमाणे माता आपल्या पुत्राचा तिरस्कार करत नाही, त्याचप्रमाणे तिरस्कार न करता त्याचे हात, पाय आणि डोके नीट घासून त्याला स्नान घालावे. कारण काय? तर अशा उपकारामुळे ते कुलपुत्र आचार्य व उपाध्यायांवर आणि शासनावर दृढ प्रेम व तीव्र आदर ठेवणारे आणि कधीही मागे न हटणारे बनतात. मनात निर्माण झालेली अरती (उदासीनता) दूर करून ते थेरपदाला प्राप्त होतात आणि कृतज्ञ व कृतवेदी बनतात. เอวํ นหาปนกาเล ปน เกสมสฺสุํ โอโรปนกาเล วา ‘‘ตฺวํ ญาโต ยสสฺสี, อิทานิ มยํ ตํ นิสฺสาย ปจฺจเยหิ น กิลมิสฺสามา’’ติ น วตฺตพฺโพ, อญฺญาปิ อนิยฺยานิกกถา น กเถตพฺพา. อถ ขฺวสฺส ‘‘อาวุโส, สุฏฺฐุ อุปธาเรหิ สตึ อุปฏฺฐาเปหี’’ติ วตฺวา ตจปญฺจกกมฺมฏฺฐานํ อาจิกฺขิตพฺพํ, อาจิกฺขนฺเตน จ วณฺณสณฺฐานคนฺธาสโยกาสวเสน อสุจิเชคุจฺฉปฏิกูลภาวํ นิชฺชีวนิสฺสตฺตภาวํ วา ปากฏํ กโรนฺเตน อาจิกฺขิตพฺพํ. สเจ หิ โส ปุพฺเพ มทฺทิตสงฺขาโร โหติ ภาวิตภาวโน, กณฺฏกเวธาเปกฺโข วิย ปริปกฺกคณฺโฑ, สูริยุคฺคมนาเปกฺขํ วิย จ ปริณตปทุมํ, อถสฺส อารทฺธมตฺเต กมฺมฏฺฐานมนสิกาเร อินฺทาสนิ วิย ปพฺพเต กิเลสปพฺพเต จุณฺณยมานํเยว ญาณํ ปวตฺตติ, ขุรคฺเคเยว อรหตฺตํ ปาปุณาติ. เย หิ เกจิ ขุรคฺเค อรหตฺตํ ปตฺตา, สพฺเพ เต เอวรูปํ สวนํ ลภิตฺวา กลฺยาณมิตฺเตน อาจริเยน ทินฺนนยํ นิสฺสาย โน อนิสฺสาย. ตสฺมาสฺส อาทิโตว เอวรูปี กถา กเถตพฺพาติ. अशा प्रकारे, स्नान घालण्याच्या वेळी किंवा केस व दाढी काढण्याच्या वेळी, "तू प्रसिद्ध आणि यशस्वी आहेस, आता आम्ही तुझ्या आश्रयाने चतुष्प्रत्ययांच्या बाबतीत कष्ट सोसणार नाही," असे म्हणू नये; तसेच इतरही कोणतीही अनिय्यानिक कथा (संसारातून मुक्त न करणारी निरर्थक चर्चा) करू नये. त्याऐवजी त्याला, "मित्रा, नीट विचार कर, स्मृती जागृत ठेव," असे सांगून त्वचा-पंचक कर्मस्थान (तचपंचक कम्मट्ठान) उपदेशिले पाहिजे. उपदेश करणाऱ्या आचार्यांनी वर्ण, आकार, गंध, आश्रय आणि स्थान यांच्या आधारे त्याचा अशुची, घृणास्पद व प्रतिकूल भाव किंवा निर्जीव व निस्सत्त्व भाव स्पष्ट करत उपदेश केला पाहिजे. जर तो प्रव्रज्या घेणारा पूर्वीच संस्कारांचे दमन केलेला, भावना भावित केलेला, काट्याने टोचण्याची वाट पाहणाऱ्या पिकलेल्या गळवाप्रमाणे आणि सूर्योदयाची वाट पाहणाऱ्या उमललेल्या कमळाप्रमाणे (परिपक्व) असेल, तर त्याने कर्मस्थान मनसिकार सुरू करताच, ज्याप्रमाणे वज्र पर्वताला चूर्ण करते, त्याप्रमाणे क्लेशरूपी पर्वताला चूर्ण करणारे ज्ञान प्रवृत्त होते आणि तो वस्तऱ्याच्या टोकावरच (केस कापून संपण्यापूर्वीच) अर्हतपद प्राप्त करतो. कारण जे कोणी वस्तऱ्याच्या टोकावर अर्हतपद पावले आहेत, ते सर्व अशा प्रकारचा उपदेश ऐकून, कल्याणमित्र असलेल्या आचार्यांनी दाखवलेल्या मार्गाचा आश्रय घेऊनच अर्हतपद पावले आहेत, आश्रयाशिवाय नाही. म्हणून त्याला सुरुवातीपासूनच अशा प्रकारची धर्मकथा सांगितली पाहिजे. เกเสสุ ปน โอโรปิเตสุ หลิทฺทิจุณฺเณน วา คนฺธจุณฺเณน วา สีสญฺจ สรีรญฺจ อุพฺพฏฺเฏตฺวา คิหิคนฺธํ อปเนตฺวา กาสายานิ ติกฺขตฺตุํ วา ทฺวิกฺขตฺตุํ [Pg.250] วา สกึ วา ปฏิคฺคาเหตพฺโพ. อถาปิสฺส หตฺเถ อทตฺวา อาจริโย วา อุปชฺฌาโย วา สยเมว อจฺฉาเทติ, วฏฺฏติ. สเจปิ อญฺญํ ทหรํ วา สามเณรํ วา อุปาสกํ วา อาณาเปติ ‘‘อาวุโส, เอตานิ กาสายานิ คเหตฺวา เอตํ อจฺฉาเทหี’’ติ ตํเยว วา อาณาเปติ ‘‘เอตานิ คเหตฺวา อจฺฉาเทหี’’ติ สพฺพํ วฏฺฏติ. สพฺพํ เตน ภิกฺขุนาว ทินฺนํ โหติ. केस कापून झाल्यावर, हळदीच्या चूर्णाने किंवा सुगंधित चूर्णाने डोके आणि शरीर चोळून, गृहस्थाचा गंध दूर करून त्याला काषाय वस्त्रे तीन वेळा, दोन वेळा किंवा एक वेळा स्वीकारण्यास दिली पाहिजेत. किंवा त्याच्या हातात न देता आचार्यांनी किंवा उपाध्यायांनी स्वतःच त्याला ती वस्त्रे परिधान करवून दिली, तरी ते योग्य आहे. जर इतर एखाद्या तरुण भिक्खूला, सामणेराला किंवा उपासकाला अशी आज्ञा दिली की, "मित्रा, ही काषाय वस्त्रे घेऊन याला परिधान करव," किंवा त्याला स्वतःलाच आज्ञा दिली की, "ही वस्त्रे घेऊन परिधान कर," तर हे सर्व योग्य आहे. ते सर्व त्या भिक्खूनेच (आचार्य किंवा उपाध्यायानेच) दिलेले मानले जाते. ยํ ปน นิวาสนํ วา ปารุปนํ วา อนาณตฺติยา นิวาเสติ วา ปารุปติ วา, ตํ อปเนตฺวา ปุน ทาตพฺพํ. ภิกฺขุนา หิ สหตฺเถน วา อาณตฺติยา วา ทินฺนเมว กาสาวํ วฏฺฏติ, อทินฺนํ น วฏฺฏติ, สเจปิ ตสฺเสว สนฺตกํ โหติ, โก ปน วาโท อุปชฺฌายมูลเก! อยํ ‘‘ปฐมํ เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาทาเปตฺวา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ การาเปตฺวา’’ติ เอตฺถ วินิจฺฉโย. परंतु, जे अंतर्वस्त्र किंवा पांघरण्याचे वस्त्र तो आज्ञेशिवाय नेसतो किंवा पांघरतो, ते काढून घेऊन पुन्हा (आचार्यांनी किंवा उपाध्यायांनी) दिले पाहिजे. कारण भिक्खूने स्वतःच्या हाताने किंवा आज्ञा देऊन दिलेलेच काषाय वस्त्र योग्य ठरते, न दिलेले योग्य ठरत नाही; जरी ते वस्त्र त्याचे स्वतःचेच असले तरीही न दिलेले वस्त्र अयोग्यच आहे, मग उपाध्यायांच्या मालकीच्या वस्त्राबद्दल तर बोलायलाच नको! हा "प्रथम केस व दाढी काढून, काषाय वस्त्रे परिधान करवून, एका खांद्यावर उत्तरासंग ठेवून" या पाठावरील निर्णय आहे. ภิกฺขูนํ ปาเท วนฺทาเปตฺวาติ เย ตตฺถ สนฺนิปติตา ภิกฺขู, เตสํ ปาเท วนฺทาเปตฺวา; อถ สรณคฺคหณตฺถํ อุกฺกุฏิกํ นิสีทาเปตฺวา อญฺชลึ ปคฺคณฺหาเปตฺวา เอวํ วเทหีติ วตฺตพฺโพ. ‘‘ยมหํ วทามิ, ตํ วเทหี’’ติ วตฺตพฺโพ. อถสฺส อุปชฺฌาเยน วา อาจริเยน วา ‘‘พุทฺธํ สรณํ คจฺฉามี’’ติอาทินา นเยน สรณานิ ทาตพฺพานิ ยถาวุตฺตปฏิปาฏิยาว น อุปฺปฏิปาฏิยา. สเจ หิ เอกปทมฺปิ เอกกฺขรมฺปิ อุปฺปฏิปาฏิยา เทติ, พุทฺธํ สรณํเยว วา ติกฺขตฺตุํ ทตฺวา ปุน อิตเรสุ เอเกกํ ติกฺขตฺตุํ เทติ, อทินฺนานิ โหนฺติ สรณานิ. "भिक्खूंच्या चरणांचे वंदन करवून" याचा अर्थ असा की, जे भिक्खू तिथे जमलेले आहेत, त्यांच्या चरणांचे वंदन करवून; त्यानंतर शरणगमनासाठी त्याला उकडू बसवून, हात जोडायला लावून, "असे म्हण" असे सांगावे. किंवा "मी जे सांगतो ते तू म्हण" असे सांगावे. त्यानंतर त्याच्या उपाध्यायांनी किंवा आचार्यांनी "बुद्धं सरणं गच्छामि" इत्यादी पद्धतीने शरणगमन दिले पाहिजे. ते सांगितलेल्या क्रमानेच दिले पाहिजे, उलट-सुलट क्रमाने नाही. कारण जर एक पद किंवा एक अक्षर जरी उलट-सुलट क्रमाने दिले, किंवा केवळ "बुद्धं सरणं गच्छामि" हेच तीन वेळा देऊन त्यानंतर उरलेल्यांपैकी प्रत्येक शरणगमन (धम्मं सरणं गच्छामि, संघं सरणं गच्छामि) तीन-तीन वेळा दिले, तर शरणगमन दिले गेले नाही असे होते. อิมญฺจ ปน สรณคมนูปสมฺปทํ ปฏิกฺขิปิตฺวา อนุญฺญาตอุปสมฺปทา เอกโต สุทฺธิยา วฏฺฏติ. สามเณรปพฺพชฺชา ปน อุภโตสุทฺธิยาว วฏฺฏติ, โน เอกโต สุทฺธิยา. ตสฺมา อุปสมฺปทาย สเจ อาจริโย ญตฺติโทสญฺเจว กมฺมวาจาโทสญฺจ วชฺเชตฺวา กมฺมํ กโรติ, สุกตํ โหติ. ปพฺพชฺชาย ปน อิมานิ ตีณิ สรณานิ พุการธการาทีนํ พฺยญฺชนานํ ฐานกรณสมฺปทํ อหาเปนฺเตเนว อาจริเยนปิ อนฺเตวาสิเกนปิ วตฺตพฺพานิ. สเจ อาจริโย วตฺตุํ สกฺโกติ, อนฺเตวาสิโก น สกฺโกติ; อนฺเตวาสิโก วา สกฺโกติ, อาจริโย น สกฺโกติ; อุโภปิ วา น สกฺโกนฺติ, น วฏฺฏติ. สเจ ปน อุโภปิ สกฺโกนฺติ, วฏฺฏติ. आणि या शरणगमन उपसंपदेचा निषेध करून जी उपसंपदा (कम्मवाचेद्वारे) अनुमत केली गेली आहे, ती एका बाजूच्या (आचार्यांच्या) शुद्धतेने योग्य ठरते. परंतु सामणेर प्रव्रज्या दोन्ही बाजूंच्या (आचार्य आणि शिष्य या दोघांच्याही) शुद्धतेनेच योग्य ठरते, केवळ एका बाजूच्या शुद्धतेने नाही. म्हणून उपसंपदेच्या वेळी जर आचार्य ज्ञत्ति-दोष आणि कम्मवाचा-दोष वर्ज्य करून संघकर्म करतात, तर ते योग्य प्रकारे पार पडते. परंतु प्रव्रज्येच्या वेळी ही तीन शरणगमने 'बु' कार, 'ध' कार इत्यादी व्यंजनांच्या स्थान, करण आणि प्रयत्नांची परिपूर्णता न गमावता (अचूक उच्चारांसह) आचार्यांनी आणि शिष्यानेही म्हटली पाहिजेत. जर आचार्य अचूक उच्चार करू शकतात, पण शिष्य करू शकत नाही; किंवा शिष्य करू शकतो, पण आचार्य करू शकत नाहीत; किंवा दोघेही करू शकत नाहीत, तर ते अयोग्य ठरते. परंतु जर दोघेही अचूक उच्चार करू शकतात, तरच ते योग्य ठरते. อิมานิ [Pg.251] จ ปน ททมาเนน ‘‘พุทฺธํ สรณํ คจฺฉามี’’ติ เอวํ เอกสมฺพนฺธานิ อนุนาสิกนฺตานิ วา กตฺวา ทาตพฺพานิ, ‘‘พุทฺธํ สรณํ คจฺฉามี’’ติ เอวํ วิจฺฉินฺทิตฺวา มการนฺตานิ วา กตฺวา ทาตพฺพานิ. อนฺธกฏฺฐกถายํ นามํ สาเวตฺวา ‘‘อหํ ภนฺเต พุทฺธรกฺขิโต ยาวชีวํ พุทฺธํ สรณํ คจฺฉามี’’ติ วุตฺตํ, ตํ เอกอฏฺฐกถายมฺปิ นตฺถิ, ปาฬิยมฺปิ น วุตฺตํ, เตสํ รุจิมตฺตเมว, ตสฺมา น คเหตพฺพํ. น หิ ตถา อวทนฺตสฺส สรณํ กุปฺปตีติ. आणि ही शरणगमने देताना "बुद्धं सरणं गच्छामि" असे एकसंध जोडून अनुनासिक-अंत करून (उदा. बुद्धं सरणं...) दिली पाहिजेत, किंवा "बुद्धं सरणं गच्छामि" असे शब्दांची फोड करून 'म' कार अंत करून (उदा. बुद्धम सरणम...) दिली पाहिजेत. अंधक अट्ठकथेत नाव घोषित करून, "भंते, मी बुद्धरक्षित, आयुष्यभर बुद्धाला शरण जातो" असे जे म्हटले आहे, ते इतर कोणत्याही अट्ठकथेत नाही आणि पाळीमध्येही (मूळ पाठात) सांगितलेले नाही; ते केवळ त्या आचार्यांचे वैयक्तिक मत आहे, म्हणून ते स्वीकारू नये. कारण तसे न म्हणणाऱ्याचे शरणगमन खंडित होत नाही. อนุชานามิ ภิกฺขเว อิเมหิ ตีหิ สรณคมเนหิ ปพฺพชฺชํ อุปสมฺปทนฺติ อิเมหิ พุทฺธํ สรณํ คจฺฉามีติอาทีหิ เอวํ ติกฺขตฺตุํ อุภโตสุทฺธิยา วุตฺเตหิ ตีหิ สรณคมเนหิ ปพฺพชฺชญฺเจว อุปสมฺปทญฺจ อนุชานามีติ อตฺโถ. ตตฺถ ยสฺมา อุปสมฺปทา ปรโต ปฏิกฺขิตฺตา, ตสฺมา สา เอตรหิ สรณมตฺเตเนว น รุหติ. ปพฺพชฺชา ปน ยสฺมา ปรโต ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, อิเมหิ ตีหิ สรณคมเนหิ สามเณรปพฺพชฺช’’นฺติ อนุญฺญาตา เอว, ตสฺมา สา เอตรหิปิ สรณมตฺเตเนว รุหติ. เอตฺตาวตา หิ สามเณรภูมิยํ ปติฏฺฐิโต โหติ. "भिक्खूंनो, मी या तीन शरणगमनांद्वारे प्रव्रज्या आणि उपसंपदा देण्याची अनुमती देतो" याचा अर्थ असा की, या "बुद्धं सरणं गच्छामि" इत्यादी अशा प्रकारे तीन वेळा दोन्ही बाजूंच्या (आचार्य व शिष्य यांच्या) शुद्धतेने म्हटलेल्या तीन शरणगमनांद्वारे मी प्रव्रज्या आणि उपसंपदा देण्याची अनुमती देतो. त्यामध्ये, ज्या अर्थी उपसंपदेचा नंतर (शरणगमनाद्वारे देण्याचा) निषेध केला गेला आहे, त्या अर्थी ती उपसंपदा आता केवळ शरणगमनाने सिद्ध होत नाही. परंतु प्रव्रज्या, ज्या अर्थी नंतर "भिक्खूंनो, मी या तीन शरणगमनांद्वारे सामणेर प्रव्रज्या देण्याची अनुमती देतो" अशी अनुमतच ठेवली आहे, त्या अर्थी ती प्रव्रज्या आजही केवळ शरणगमनानेच सिद्ध होते. एवढ्यानेच तो सामणेर भूमीमध्ये (सामणेर पदावर) प्रतिष्ठित होतो. สเจ ปเนส มติมา โหติ ปณฺฑิตชาติโก, อถสฺส ตสฺมึเยว ฐาเน สิกฺขาปทานิ อุทฺทิสิตพฺพานิ. กถํ? ยถา ภควตา อุทฺทิฏฺฐานิ. วุตฺตญฺเหตํ – परंतु जर तो सामणेर बुद्धिमान आणि शहाणा असेल, तर त्याला त्याच ठिकाणी शिक्षानियमांचा (सिक्खापदांचा) उपदेश केला पाहिजे. कसा? ज्या प्रकारे भगवंतांनी उपदेशिले आहेत त्या प्रकारे. कारण असे म्हटले आहे - ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, สามเณรานํ ทส สิกฺขาปทานิ, เตสุ จ สามเณเรหิ สิกฺขิตุํ. ปาณาติปาตา เวรมณี, อทินฺนาทานา เวรมณี, อพฺรหฺมจริยา เวรมณี, มุสาวาทา เวรมณี, สุราเมรยมชฺชปมาทฏฺฐานา เวรมณี, วิกาลโภชนา เวรมณี, นจฺจคีตวาทิตวิสูกทสฺสนา เวรมณี, มาลาคนฺธวิเลปนธารณมณฺฑนวิภูสนฏฺฐานา เวรมณี, อุจฺจาสยนมหาสยนา เวรมณี, ชาตรูปรชตปฏิคฺคหณา เวรมณี’’ติ (มหาว. ๑๐๖). "भिक्खूंनो, मी सामणेरांसाठी दहा शिक्षानियमांची (सिक्खापदांची) अनुमती देतो आणि सामणेरांनी त्या शिक्षानियमांचे पालन करावे अशी अनुमती देतो. १. प्राणातिपातापासून (जीवहिंसेपासून) अलिप्त राहणे, २. अदत्तादानापासून (चोरीपासून) अलिप्त राहणे, ३. अब्रह्मचर्यापासून अलिप्त राहणे, ४. मृषावादापासून (असत्य बोलण्यापासून) अलिप्त राहणे, ५. सुरा, मेरय आणि मद्य या प्रमादस्थानांपासून अलिप्त राहणे, ६. विकालभोजनापासून (अवेळी जेवण्यापासून) अलिप्त राहणे, ७. नृत्य, गीत, वादन आणि तमाशा पाहण्यापासून अलिप्त राहणे, ८. माला, गंध, विलेपन धारण करणे, मंडन व विभूषण या प्रमादस्थानांपासून अलिप्त राहणे, ९. उच्चशयन आणि महाशयनापासून (उंच व विलासी बिछान्यांवर झोपण्यापासून) अलिप्त राहणे, १०. जातरूप आणि रजत (सोने-चांदी/पैसा) स्वीकारण्यापासून अलिप्त राहणे." อนฺธกฏฺฐกถายํ ปน ‘‘อหํ, ภนฺเต, อิตฺถนฺนาโม ยาวชีวํ ปาณาติปาตา เวรมณิสิกฺขาปทํ परंतु अंधक अट्ठकथेत, "भंते, मी अमुक नावाचा, आयुष्यभर प्राणातिपातापासून अलिप्त राहण्याचा शिक्षानियम..." สมาทิยามี’’ติ เอวํ สรณทานํ วิย สิกฺขาปททานมฺปิ วุตฺตํ, ตํ เนว ปาฬิยํ น อฏฺฐกถาสุ อตฺถิ, ตสฺมา ยถาปาฬิยาว อุทฺทิสิตพฺพานิ. ปพฺพชฺชา หิ สรณคมเนเหว สิทฺธา, สิกฺขาปทานิ ปน เกวลํ สิกฺขาปริปูรณตฺถํ [Pg.252] ชานิตพฺพานิ. ตสฺมา ตานิ ปาฬิยํ อาคตนเยน อุคฺคเหตุํ อสกฺโกนฺตสฺส ยาย กายจิ ภาสาย อตฺถวเสนปิ อาจิกฺขิตุํ วฏฺฏติ. ยาว ปน อตฺตนา สิกฺขิตพฺพสิกฺขาปทานิ น ชานาติ, สงฺฆาฏิปตฺตจีวรธารณฏฺฐานนิสชฺชาทีสุ ปานโภชนาทิวิธิมฺหิ จ น กุสโล โหติ, ตาว โภชนสาลํ วา สลากภาชนฏฺฐานํ วา อญฺญํ วา ตถารูปฏฺฐานํ น เปเสตพฺโพ, สนฺติกาวจโรเยว กาตพฺโพ, พาลทารโก วิย ปฏิชคฺคิตพฺโพ, สพฺพมสฺส กปฺปิยากปฺปิยํ อาจิกฺขิตพฺพํ, นิวาสนปารุปนาทีสุ อาภิสมาจาริเกสุ วิเนตพฺโพ. เตนาปิ ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, ทสหงฺเคหิ สมนฺนาคตํ สามเณรํ นาเสตุ’’นฺติ (มหาว. ๑๐๘) เอวํ ปรโต วุตฺตานิ ทส นาสนงฺคานิ อารกา ปริวชฺเชตฺวา อาภิสมาจาริกํ ปริปูเรนฺเตน ทสวิเธ สีเล สาธุกํ สิกฺขิตพฺพนฺติ. "समादियामि" (मी ग्रहण करतो) अशा प्रकारे शरण देण्याप्रमाणे शिक्षापद देणे देखील म्हटले गेले आहे, परंतु ते न तर पाळीमध्ये आहे आणि न अठ्ठकथांमध्ये आहे. म्हणून, पाळीनुसारच (मूळ पाठाप्रमाणेच) त्यांचा उद्देश केला पाहिजे. कारण प्रवज्जा केवळ शरणगमनानेच सिद्ध होते, परंतु शिक्षापदे केवळ शिक्षा (शील) परिपूर्ण करण्यासाठीच जाणली पाहिजेत. म्हणून, पाळीमध्ये आलेल्या पद्धतीने ती शिकण्यास असमर्थ असलेल्या (नवदीक्षिताला) कोणत्याही भाषेमध्ये अर्थाच्या आधारे देखील ती सांगणे योग्य आहे. जोपर्यंत तो स्वतः शिकण्यायोग्य शिक्षापदे जाणत नाही, आणि संघाटी, पात्र व चीवर धारण करणे, उभे राहणे, बसणे इत्यादींमध्ये तसेच खाण्या-पिण्याच्या विधींमध्ये कुशल होत नाही, तोपर्यंत त्याला भोजनशाळेत, शलाका-वाटपाच्या ठिकाणी किंवा इतर अशा प्रकारच्या ठिकाणी पाठवू नये. त्याला आपल्या जवळच (आचार्यांच्या किंवा उपाध्यायांच्या सन्निध) ठेवावे, लहान बालकाप्रमाणे त्याची काळजी घ्यावी, त्याला सर्व कप्पिय (योग्य) आणि अकप्पिय (अयोग्य) गोष्टी सांगाव्यात, आणि अंतर्वासक नेसणे व चीवर पांघरण्यासारख्या आभिसमाचारिक (शिष्टाचारविषयक) नियमांमध्ये त्याला प्रशिक्षित करावे. त्याने देखील "भिक्खूंनो, मी अनुमती देतो की दहा अंगांनी युक्त असलेल्या सामणेराचा नाश (हकालपट्टी) करावा" अशा प्रकारे पुढे सांगितलेल्या दहा नाशनांगांपासून (हकालपट्टीच्या कारणांपासून) दूर राहून, आभिसमाचारिक शिष्टाचार परिपूर्ण करत दहा प्रकारच्या शीलांमध्ये चांगल्या प्रकारे आचरण केले पाहिजे. ปพฺพชฺชากถา นิฏฺฐิตา. प्रवज्जाकथा समाप्त झाली. ทุติยมารกถา दुसरी मारकथा ๓๕. มยฺหํ โข ภิกฺขเวติ มยา โขติ อตฺโถ. อถ วา โย มยฺหํ โยนิโส มนสิกาโร, เตน เหตุนาติ อตฺโถ. ปุน อนุปฺปตฺตาติ เอตฺถ วิภตฺตึ ปริณาเมตฺวา มยาติ วตฺตพฺพํ. ३५. "मय्हं खो भिक्खवे" (माझ्याद्वारे खरोखर, भिक्खूंनो) याचा अर्थ "मया खो" (माझ्याद्वारे खरोखर) असा आहे. किंवा "माझा जो योनिसो मनसिकार (योग्य विचार) आहे, त्या कारणाने" असा अर्थ आहे. पुन्हा, "अनुपत्ता" येथे विभक्ती बदलून "मया" (माझ्याद्वारे) असे म्हटले पाहिजे. ทุติยมารกถา นิฏฺฐิตา. दुसरी मारकथा समाप्त झाली. ภทฺทวคฺคิยกถา भद्दवग्गियकथा ๓๖. ภทฺทวคฺคิยาติ เต กิร ราชกุมารา รูเปน จ จิตฺเตน จ ภทฺทกา วคฺคพนฺเธน จ วิจรนฺติ, ตสฺมา ‘‘ภทฺทวคฺคิยา’’ติ วุจฺจนฺติ. เตน หิ โวติ เอตฺถ โวกาโร นิปาตมตฺโต. ธมฺมจกฺขุํ อุทปาทีติ เกสญฺจิ โสตาปตฺติมคฺโค, เกสญฺจิ สกทาคามิมคฺโค, เกสญฺจิ อนาคามิมคฺโค อุทปาทิ. ตโยปิ หิ เอเต มคฺคา ‘‘ธมฺมจกฺขู’’ติ วุจฺจนฺติ. เต กิร ตุณฺฑิลชาตเก ตึสธุตฺตา อเหสุํ, อถ ตุณฺฑิโลวาทํ สุตฺวา ปญฺจสีลานิ รกฺขึสุ; อิทํ เนสํ ปุพฺพกมฺมํ. ३६. "भद्दवग्गिय" म्हणजे ते राजकुमार रूपाने आणि चित्ताने देखील भद्र (उत्कृष्ट) होते आणि समूहाने फिरत असत, म्हणून त्यांना "भद्दवग्गिय" असे म्हटले जाते. "तेन हि वो" येथे "वो" हा केवळ निपात (अव्यय) आहे. "धम्मचक्खू उत्पन्न झाले" म्हणजे काहींना सोतापत्तिमार्ग, काहींना सकदागामिमार्ग, तर काहींना अनागामिमार्ग उत्पन्न झाला. कारण हे तिन्ही मार्ग देखील "धम्मचक्खू" असे म्हटले जातात. ते पूर्वी 'तुण्डिल जातका'मध्ये तीस धूर्त (व्यसनी) होते, नंतर तुण्डिलाचा उपदेश ऐकून त्यांनी पंचशीलांचे पालन केले; हे त्यांचे पूर्वकर्म होते. ภทฺทวคฺคิยกถา นิฏฺฐิตา. भद्दवग्गियकथा समाप्त झाली. อุรุเวลปาฏิหาริยกถา उरुवेलपाटिहारियकथा ๓๗. ปมุโขติ ปุพฺพงฺคโม. ปาโมกฺโขติ อุตฺตโม วิสุทฺธปญฺโญ. ३७. "पमुखो" म्हणजे अग्रेसर (पुढे जाणारा). "पामोक्खो" म्हणजे उत्तम आणि अत्यंत शुद्ध प्रज्ञा असलेला. ๓๘. อนุปหจฺจาติ [Pg.253] อวินาเสตฺวา. เตชสา เตชนฺติ อตฺตโน เตเชน นาคสฺส เตชํ. ปริยาทิเยยฺยนฺติ อภิภเวยฺยํ, วินาเสยฺยํ วาติ. มกฺขนฺติ โกธํ. นตฺเวว จ โข อรหา ยถา อหนฺติ อตฺตานํ ‘‘อรหา อห’’นฺติ มญฺญมาโน วทติ. ३८. "अनुपहच्च" म्हणजे नष्ट न करता. "तेजसा तेजं" म्हणजे स्वतःच्या तेजाने नागाचे तेज. "परियादियेय्यं" म्हणजे मी पराभूत करावे किंवा नष्ट करावे. "मक्खं" म्हणजे क्रोध. "परंतु माझ्यासारखे ते अर्हत नाहीत" हे वाक्य तो स्वतःला "मी अर्हत आहे" असे मानून बोलतो. ๓๙. เนรญฺชรายํ ภควาติอาทิกา คาถาโย ปจฺฉา ปกฺขิตฺตา. ३९. "नेरंजरायं भगवा" इत्यादी गाथा नंतर (संगीतीच्या वेळी) समाविष्ट केल्या गेल्या आहेत. ๔๔-๙. วิสฺสชฺเชยฺยนฺติ สุกฺขาปนตฺถาย ปสาเรตฺวา ฐเปยฺยนฺติ อตฺโถ. ‘‘ภนฺเต อาหร หตฺถ’’นฺติ เอวํ วทนฺโต วิย โอณโตติ อาหรหตฺโถ. อุยฺโยเชตฺวาติ วิสฺสชฺเชตฺวา. มนฺทามุขิโยติ อคฺคิภาชนานิ วุจฺจนฺติ. ४४-९. "विस्सज्जेय्यं" म्हणजे वाळवण्यासाठी पसरवून ठेवावे असा अर्थ आहे. "भंते, आपला हात पुढे करा" असे बोलल्याप्रमाणे जो खाली झुकला, त्याला "आहरहत्थ" म्हणतात. "उय्योजेत्वा" म्हणजे सोडून देऊन (मुक्त करून). "मन्दामुखियो" म्हणजे अग्नीची भांडी (शेगड्या) यांना म्हटले जाते. ๕๑. จิรปฏิกาติ จิรกาลโต ปฏฺฐาย. ५१. "चिरपटिका" म्हणजे दीर्घकाळापासून. ๕๒. เกสมิสฺสนฺติอาทีสุ เกสา เอว เกสมิสฺสํ. เอส นโย สพฺพตฺถ. ขาริกาชนฺติ ขาริภาโร. ५२. "केसमिस्स" इत्यादी शब्दांमध्ये केस म्हणजेच "केसमिस्स" होय. हाच नियम सर्वत्र लागू होतो. "खारिकाजं" म्हणजे ऋषींच्या उपकरणांचा भार असलेली कावड. อุรุเวลปาฏิหาริยกถา นิฏฺฐิตา. उरुवेलपाटिहारियकथा समाप्त झाली. พิมฺพิสารสมาคมกถา बिंबिसारसमागमकथा ๕๕. ลฏฺฐิวเนติ ตาลุยฺยาเน. สุปฺปติฏฺเฐ เจติเยติ อญฺญตรสฺมึ วฏรุกฺเข; ตสฺส กิเรตํ นามํ. ทฺวาทสนหุเตหีติ เอตฺถ เอกํ นหุตํ ทสสหสฺสานิ. อชฺฌภาสีติ เตสํ กงฺขาจฺเฉทนตฺถํ อภาสิ. ५५. "लट्ठिवने" म्हणजे ताडवनात. "सुप्पतिट्ठे चेतिये" म्हणजे एका विशिष्ट वडाच्या झाडाजवळ; ते त्या वडाच्या झाडाचे नाव होते असे म्हणतात. "द्वादसनहुतेहि" येथे एक "नहुत" म्हणजे दहा हजार. "अज्झभासि" म्हणजे त्यांच्या शंकेचे निरसन करण्यासाठी ते बोलले. กิสโกวทาโนติ ตาปสจริยาย กิสสรีรตฺตา ‘‘กิสโก’’ติ ลทฺธนามานํ ตาปสานํ โอวาทโก อนุสาสโก สมาโนติ อตฺโถ. อถ วา สยํ กิสโก ตาปโส สมาโน วทาโน จ อญฺเญ โอวทนฺโต อนุสาสนฺโตติปิ อตฺโถ. กถํ ปหีนนฺติ เกน การเณน ปหีนํ. อิทํ วุตฺตํ โหติ – ‘‘ตฺวํ อุรุเวลวาสิอคฺคิปริจารกานํ ตาปสานํ สยํ โอวาทาจริโย สมาโน กึ ทิสฺวา ปหาสิ, ปุจฺฉามิ ตํ เอตมตฺถํ เกน การเณน ตว อคฺคิหุตฺตํ ปหีน’’นฺติ. "किसकोवदानो" म्हणजे तपस्वींच्या आचरणामुळे शरीर कृश (बारीक) झाल्याने "किसक" (कृश) असे नाव मिळालेल्या तपस्वींना उपदेश करणारा आणि मार्गदर्शन करणारा असा अर्थ आहे. किंवा स्वतः कृश तपस्वी असून, इतरांना उपदेश व मार्गदर्शन करणारा असाही अर्थ आहे. "कथं पहीणं" म्हणजे कोणत्या कारणाने सोडले? हे असे म्हटले आहे – "हे उरुवेलामध्ये राहणाऱ्या आणि अग्नीची पूजा करणाऱ्या तपस्वींचे स्वतः उपदेशक आचार्य असून, तू काय पाहून हे सोडलेस? मी तुला हाच अर्थ विचारतो की, कोणत्या कारणाने तुझी अग्निपूजा सुटली?" ทุติยคาถาย อยมตฺโถ – เอเต รูปาทิเก กาเม อิตฺถิโย จ ยญฺญา อภิวทนฺติ, สฺวาหํ เอตํ สพฺพมฺปิ รูปาทิกํ กามปฺปเภทํ ขนฺธุปธีสุ มลนฺติ ญตฺวา ยสฺมา อิเม ยิฏฺฐหุตปฺปเภทา ยญฺญา มลเมว วทนฺติ, ตสฺมา น ยิฏฺเฐ น หุเต อรญฺชึ; ยิฏฺเฐ วา หุเต วา นาภิรมินฺติ อตฺโถ. दुसऱ्या गाथेचा हा अर्थ आहे – हे यज्ञ रूप इत्यादी कामोपभोग आणि स्त्रियांचे गुणगान करतात. तो मी, या सर्व रूप इत्यादी कामप्रकारांना स्कंध आणि उपधींमधील (क्लेशांमधील) मळ (अशुद्धता) समजून, ज्याअर्थी हे मोठे व लहान यज्ञांचे प्रकार केवळ मळाचेच गुणगान करतात, म्हणून मी मोठ्या यज्ञात किंवा लहान यज्ञात रमलो नाही; मोठ्या यज्ञात किंवा लहान यज्ञात मी रममाण झालो नाही, असा अर्थ आहे. ตติยคาถาย [Pg.254] – อถ โกจรหีติ อถ กฺวจรหิ. เสสํ อุตฺตานเมว. तिसऱ्या गाथेत – "अथ कोचरहि" म्हणजे "अथ क्वचरहि" (तर मग तू कोठे रमलास?). उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. จตุตฺถคาถาย – ปทนฺติ นิพฺพานปทํ. สนฺตสภาวตาย สนฺตํ. อุปธีนํ อภาเวน อนุปธิกํ. ราคกิญฺจนาทีนํ อภาเวน อกิญฺจนํ. ตีสุ ภเวสุ อลคฺคตาย ยํ กามภวํ ยญฺญา วทนฺติ, ตสฺมิมฺปิ กามภเว อสตฺตํ. ชาติชรามรณานํ อภาเวน อนญฺญถาภาวึ. อตฺตนา ภาวิเตน มคฺเคเนว อธิคนฺตพฺพํ, น อญฺเญน เกนจิ อธิคเมตพฺพนฺติ อนญฺญเนยฺยํ. ยสฺมา อีทิสํ ปทมทฺทสํ, ตสฺมา น ยิฏฺเฐ น หุเต อรญฺชึ. เตน กึ ทสฺเสติ? โย อหํ เทวมนุสฺสโลกสมฺปตฺติสาธเก น ยิฏฺเฐ น หุเต อรญฺชึ, โส กึ วกฺขามิ ‘‘เอตฺถ นาม เม เทวมนุสฺสโลเก รโต มโน’’ติ. चौथ्या गाथेत – "पदं" म्हणजे निर्वाणपद. शांत स्वभाव असल्यामुळे "संतं" (शांत). उपधींचा (क्लेशांचा) अभाव असल्यामुळे "अनुपधिकं" (उपधीरहित). राग इत्यादी किंचनांचा (अडथळ्यांचा) अभाव असल्यामुळे "अकिंचनं". तिन्ही भावांमध्ये अनासक्त असल्यामुळे, ज्या कामभवाचे यज्ञ गुणगान करतात, त्या कामभवात देखील अनासक्त. जन्म, जरा आणि मरणाचा अभाव असल्यामुळे "अनञ्ञथाभाविं" (विकाररहित). स्वतः भावना केलेल्या (विकसित केलेल्या) मार्गानेच प्राप्त करण्यायोग्य, इतर कोणाद्वारे प्राप्त करून देण्यायोग्य नाही, म्हणून "अनञ्ञनेय्यं" (स्वतःच जाणण्यायोग्य). ज्याअर्थी मी अशा पदाला (निर्वाणाला) पाहिले, म्हणून मी मोठ्या यज्ञात किंवा लहान यज्ञात रमलो नाही. याने काय दर्शवले जाते? जो मी देव आणि मनुष्य लोकातील संपत्ती साध्य करून देणाऱ्या मोठ्या यज्ञात किंवा लहान यज्ञात रमलो नाही, तो मी "या देव आणि मनुष्य लोकात माझे मन रमले आहे" असे कसे काय सांगू शकेन? हे दर्शवले आहे. ๕๖. เอวํ สพฺพโลเก อนภิรติภาวํ ปกาเสตฺวา อถ โข อายสฺมา อุรุเวลกสฺสโป ‘‘สาวโกหมสฺมี’’ติ เอวํ ภควโต สาวกภาวํ ปกาเสสิ. ตญฺจ โข อากาเส วิวิธานิ ปาฏิหาริยานิ ทสฺเสตฺวา. ธมฺมจกฺขุนฺติ โสตาปตฺติมคฺคญาณํ. ५६. अशा प्रकारे सर्व लोकांमध्ये अनासक्ती प्रकट करून, त्यानंतर आयुष्यमान उरुवेलकस्सपांनी "मी श्रावक आहे" अशा प्रकारे भगवंतांचे श्रावकत्व प्रकट केले. आणि ते देखील आकाशात विविध प्रकारचे प्रातिहार्य (चमत्कार) दाखवून प्रकट केले. "धम्मचक्खू" म्हणजे सोतापत्तिमार्गज्ञान. ๕๗. อสฺสาสกาติ อาสีสนา; ปตฺถนาติ อตฺโถ. เอสาหํ ภนฺเตติ เอตฺถ ปน กิญฺจาปิ มคฺคปฺปฏิเวเธเนวสฺส สิทฺธํ สรณคมนํ, ตตฺถ ปน นิจฺฉยคมนเมว คโต, อิทานิ วาจาย อตฺตสนฺนิยฺยาตนํ กโรติ. มคฺควเสเนวายํ นิยตสรณตํ ปตฺโต, ตํ ปเรสํ วาจาย ปากฏํ กโรนฺโต ปณิปาตคมนญฺจ คจฺฉนฺโต เอวํ วทติ. ५७. "अस्सासका" म्हणजे आकांक्षा किंवा प्रार्थना असा अर्थ आहे. "एसाहं भन्ते" (हा मी, भंते) येथे जरी मार्गाच्या साक्षात्कारानेच त्यांचे शरणगमन सिद्ध झाले होते, तरीही तेथे ते केवळ निश्चयात्मक शरणागतीलाच प्राप्त झाले होते; आता ते वाणीने आत्मसमर्पण करत आहेत. मार्गाच्या प्रभावानेच ते निश्चित शरणभावाला प्राप्त झाले आहेत, ते इतरांना वाणीने स्पष्ट करून सांगत आणि प्रणिपात शरणगमनाला (नमस्कारपूर्वक शरणागतीला) प्राप्त होत असे म्हणतात. ๕๘. สิงฺคีนิกฺขสวณฺโณติ สิงฺคีสุวณฺณนิกฺเขน สมานวณฺโณ. ทสวาโสติ ทสสุ อริยวาเสสุ วุตฺถวาโส. ทสธมฺมวิทูติ ทสกมฺมปถวิทู. ทสภิ จุเปโตติ ทสหิ อเสกฺเขหิ องฺเคหิ อุเปโต. สพฺพธิทนฺโตติ สพฺเพสุ ทนฺโต; ภควโต หิ จกฺขุอาทีสุ กิญฺจิ อทนฺตํ นาม นตฺถิ. ५८. ‘सिंगी निक्ख सुवर्ण’ (सिङ्गीनिक्खसवण्णो) म्हणजे सिंगी सुवर्णाच्या निक्खाप्रमाणे (सोन्याच्या नाण्याप्रमाणे) समान सुवर्ण वर्ण असलेले. ‘दशवास’ (दसवासो) म्हणजे दहा आर्यवासांमध्ये (अरिहंतांच्या दहा प्रकारच्या विहारांमध्ये) वास्तव्य केलेले (आचरण केलेले). ‘दशधम्मविदू’ (दसधम्मविदू) म्हणजे दहा कर्मपथांना जाणणारे. ‘दशभि उपेतो’ (दसभि चुपेतो) म्हणजे दहा असेक्ख (अशैक्ष/अर्हत) अंगांनी (गुणांनी) युक्त असलेले. ‘सब्बधिदंतो’ (सब्बधिदंतो) म्हणजे सर्व इंद्रियांमध्ये दमन केलेले (इंद्रियसंयम केलेले); कारण भगवंतांच्या चक्षु इत्यादी इंद्रियांमध्ये कोणतेही इंद्रिय अदमन केलेले (असंयत) नाही. ๕๙. ภควนฺตํ ภุตฺตาวึ โอนีตปตฺตปาณึ เอกมนฺตํ นิสีทีติ ภควนฺตํ ภุตฺตวนฺตํ ปตฺตโต จ อปนีตปาณึ สลฺลกฺเขตฺวา เอกสฺมึ ปเทเส นิสีทีติ [Pg.255] อตฺโถ. อตฺถิกานนฺติ พุทฺธาภิวาทนคมเนน จ ธมฺมสวเนน จ อตฺถิกานํ. อภิกฺกมนียนฺติ อภิคนฺตุํ สกฺกุเณยฺยํ. อปฺปากิณฺณนฺติ อนากิณฺณํ. อปฺปสทฺทนฺติ วจนสทฺเทน อปฺปสทฺทํ. อปฺปนิคฺโฆสนฺติ นครนิคฺโฆสสทฺเทน อปฺปนิคฺโฆสํ. วิชนวาตนฺติ อนุสญฺจรณชนสฺส สรีรวาเตน วิรหิตํ. ‘‘วิชนวาท’’นฺติปิ ปาโฐ; อนฺโต ชนวาเทน รหิตนฺติ อตฺโถ. ‘‘วิชนปาต’’นฺติปิ ปาโฐ; ชนสญฺจารวิรหิตนฺติ อตฺโถ. มนุสฺสราหเสยฺยกนฺติ มนุสฺสานํ รหสฺสกิริยฏฺฐานิยํ. ปฏิสลฺลานสารุปฺปนฺติ วิเวกานุรูปํ. ५९. ‘भगवंतांनी भोजन केले असून पात्रातून हात बाजूला केला आहे हे पाहून एका बाजूला बसले’ (भगवन्तं भुत्ताविं ओनीतपत्तपाणिं एकमन्तं निसीदी) याचा अर्थ असा की, भगवंतांनी भोजन केले आहे आणि पात्रातून हात बाजूला केला आहे हे लक्षात घेऊन एका बाजूला बसले. ‘अत्थिकानं’ (अत्थिकानं) म्हणजे बुद्धांच्या वंदनासाठी जाण्याची आणि धम्मश्रवण करण्याची इच्छा असणाऱ्यांसाठी. ‘अभिक्कमनीयं’ (अभिक्कमनीयं) म्हणजे जाण्यास योग्य असलेले. ‘अप्पाकिण्णं’ (अप्पाकिण्णं) म्हणजे गर्दी नसलेले (लोकांनी न व्यापलेले). ‘अप्पसद्दं’ (अप्पसद्दं) म्हणजे संभाषणाच्या आवाजाचा अभाव केलेले. ‘अप्पनिग्घोसं’ (अप्पनिग्घोसं) म्हणजे शहराच्या कोलाहलाच्या आवाजापासून मुक्त केलेले. ‘विजनवातं’ (विजनवातं) म्हणजे ये-जा करणाऱ्या लोकांच्या शरीराच्या वाऱ्यापासून (वासापासून) विरहित असलेले. ‘विजनाव्हाद’ (विजनाव्हाद) असाही पाठ आहे; ज्याचा अर्थ अंतर्गत लोकांच्या आवाजापासून रहित असा आहे. ‘विजनपात’ (विजनपात) असाही पाठ आहे; ज्याचा अर्थ लोकांच्या येण्या-जाण्यापासून विरहित असा आहे. ‘मनुस्सराहसेय्यकं’ (मनुस्सराहसेय्यकं) म्हणजे मनुष्यांच्या एकांतात करण्याच्या कार्यासाठी योग्य असलेले स्थान. ‘पटिसल्लानसारुप्पं’ (पटिसल्लानसारुप्पं) म्हणजे प्रतिसंलयनासाठी (एकांत ध्यानासाठी) अनुरूप. สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานปพฺพชฺชากถา सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान यांच्या प्रव्रज्येची कथा (सारिपुत्तमोग्गल्लानपब्बज्जाकथा). ๖๐. สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานาติ สาริปุตฺโต จ โมคฺคลฺลาโน จ. เตหิ กติกา กตา โหติ ‘‘โย ปฐมํ อมตํ อธิคจฺฉติ, โส อาโรเจตู’’ติ เต กิร อุโภปิ คิหิกาเล อุปติสฺโส โกลิโตติ เอวํ ปญฺญายมานนามา อฑฺฒเตยฺยสตมาณวกปริวารา คิรคฺคสมชฺชํ อคมํสุ. ตตฺร เนสํ มหาชนํ ทิสฺวา เอตทโหสิ – ‘‘อยํ นาม เอวํ มหาสตฺตนิกาโย อปฺปตฺเต วสฺสสเต มรณมุเข ปติสฺสตี’’ติ. อถ อุโภปิ อุฏฺฐิตาย ปริสาย อญฺญมญฺญํ ปุจฺฉิตฺวา เอกชฺฌาสยา ปจฺจุปฏฺฐิตมรณสญฺญา สมฺมนฺตยึสุ ‘‘สมฺม มรเณ สติ อมเตนาปิ ภวิตพฺพํ, หนฺท มยํ อมตํ ปริเยสามา’’ติ อมตปริเยสนตฺถํ สญฺจยสฺส ฉนฺนปริพฺพาชกสฺส สนฺติเก สปริสา ปพฺพชิตฺวา กติปาเหเนว ตสฺส ญาณวิสเย ปารํ คนฺตฺวา อมตํ อปสฺสนฺตา ปุจฺฉึสุ ‘‘กึ นุ โข, อาจริย, อญฺโญเปตฺถ สาโร อตฺถี’’ติ? ‘‘นตฺถาวุโส, เอตฺตกเมว อิท’’นฺติ จ สุตฺวา ‘‘ตุจฺฉํ อิทํ อาวุโส นิสฺสารํ, โย ทานิ อมฺเหสุ ปฐมํ อมตํ อธิคจฺฉติ, โส อิตรสฺส อาโรเจตู’’ติ กติกํ อกํสุ. เตน วุตฺตํ – ‘‘เตหิ กติกา กตา โหตี’’ติอาทิ. ६०. ‘सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान’ (सारिपुत्तमोग्गल्लाना) म्हणजे सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान. ‘त्यांनी प्रतिज्ञा केली होती की, जो आधी अमृताला प्राप्त करेल, त्याने दुसऱ्याला सांगावे’ (तेहि कतिका कता होति...) कारण ते दोघेही गृहस्थदशेत असताना अनुक्रमे ‘उपतिस्स’ आणि ‘कोलित’ या नावांनी प्रसिद्ध होते. अडीचशे तरुण शिष्यांच्या परिवारासह ते ‘गिरग्गसमज्ज’ (गिरी-शिखर उत्सव) येथे गेले. तेथे प्रचंड जनसमुदाय पाहून त्यांच्या मनात असा विचार आला—‘हा एवढा मोठा प्राण्यांचा समूह शंभर वर्षे पूर्ण होण्यापूर्वीच मृत्यूच्या मुखात पडेल.’ नंतर तो जनसमुदाय निघून गेल्यावर, त्या दोघांनी एकमेकांना विचारले आणि एकाच विचाराचे होऊन, मृत्यूची जाणीव मनात ठेवून आपसात चर्चा केली: ‘मित्रा, जर मृत्यू निश्चित आहे, तर अमृत (अमरणता) देखील असलेच पाहिजे. चला, आपण अमृताचा शोध घेऊया.’ अमृताच्या शोधासाठी ते आपल्या परिवारासह ‘संजय’ नावाच्या परिब्राजकाकडे गेले आणि त्यांनी प्रव्रज्या घेतली. काही दिवसांतच त्यांनी त्या आचार्यांच्या ज्ञानाची सीमा गाठली, पण त्यांना अमृत सापडले नाही. त्यांनी विचारले, ‘आचार्य, या धम्मात याहून अधिक काही सार आहे का?’ ‘मित्रांनो, काही नाही, हा धम्म एवढाच आहे,’ असे ऐकून त्यांनी विचार केला, ‘मित्रा, हा धम्म पोकळ आणि निस्सार आहे. आता आपल्या दोघांपैकी जो कोणी आधी अमृताला प्राप्त करेल, त्याने दुसऱ्याला सांगावे,’ अशी त्यांनी प्रतिज्ञा केली. म्हणूनच संगीतिकारांनी ‘त्यांनी प्रतिज्ञा केली होती’ इत्यादी म्हटले आहे. ปาสาทิเกน อภิกฺกนฺเตนาติอาทีสุ อิตฺถมฺภูตลกฺขเณ กรณวจนํ เวทิตพฺพํ. อตฺถิเกหิ อุปญฺญาตํ มคฺคนฺติ เอตํ อนุพนฺธนสฺส การณวจนํ; อิทญฺหิ วุตฺตํ โหติ – ‘‘ยํนูนาหํ อิมํ ภิกฺขุํ ปิฏฺฐิโต ปิฏฺฐิโต อนุพนฺเธยฺยํ, กสฺมา[Pg.256]? ยสฺมา อิทํ ปิฏฺฐิโต ปิฏฺฐิโต อนุพนฺธนํ นาม อตฺถิเกหิ อุปญฺญาตํ มคฺคํ ญาโต เจว อุปคโต จ มคฺโค’’ติ อตฺโถ. อถ วา อตฺถิเกหิ อมฺเหหิ ‘‘มรเณ สติ อมเตนาปิ ภวิตพฺพ’’นฺติ เอวํ เกวลํ อตฺถีติ อุปญฺญาตํ นิพฺพานํ นาม, ตํ มคฺคนฺโต ปริเยสนฺโตติ เอวมฺเปตฺถ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. ‘पासादिकेन अभिक्कन्तेन’ (प्रसन्नतेने पुढे जाणे) इत्यादी शब्दांमध्ये ‘इत्थंभूतलक्षण’ अर्थात तृतीया विभक्ती (करणवचन) समजावी. ‘अत्थिकेहि उपञ्ञातं मग्गं’ (हित इच्छिणाऱ्यांनी जाणलेला मार्ग) हे मागे जाण्याचे (अनुगमन करण्याचे) कारण सांगणारे वचन आहे. येथे असे म्हटले आहे—‘मी या भिक्खूच्या मागे मागे का जाऊ नये? कारण मागे मागे जाणे हा मार्ग हित इच्छिणाऱ्यांनी जाणलेला आणि अवलंबिलेला मार्ग आहे,’ असा अर्थ आहे. किंवा, अमृत इच्छिणाऱ्या आमच्यासारख्यांनी ‘मृत्यू असताना अमृतही असलेच पाहिजे’ अशा प्रकारे केवळ अस्तित्वात आहे म्हणून जाणलेले जे निर्वाण आहे, त्याचा शोध घेताना, असाही अर्थ येथे घ्यावा. ปิณฺฑปาตํ อาทาย ปฏิกฺกมีติ สุทินฺนกณฺเฑ วุตฺตปฺปการํ อญฺญตรํ กุฏฺฏมูลํ อุปสงฺกมิตฺวา นิสีทิ. สาริปุตฺโตปิ โข ‘‘อกาโล โข ตาว ปญฺหํ ปุจฺฉิตุ’’นฺติ กาลํ อาคมยมาโน เอกมนฺตํ ฐตฺวา วตฺตปฏิปตฺติปูรณตฺถํ กตภตฺตกิจฺจสฺส เถรสฺส อตฺตโน กมณฺฑลุโต อุทกํ ทตฺวา โธตหตฺถปาเทน เถเรน สทฺธึ ปฏิสนฺถารํ กตฺวา ปญฺหํ ปุจฺฉิ. เตน วุตฺตํ – ‘‘อถ โข สาริปุตฺโต ปริพฺพาชโก’’ติอาทิ. น ตาหํ สกฺโกมีติ น เต อหํ สกฺโกมิ. เอตฺถ จ ปฏิสมฺภิทาปฺปตฺโต เถโร น เอตฺตกํ น สกฺโกติ. อถ โข อิมสฺส ธมฺมคารวํ อุปฺปาเทสฺสามีติ สพฺพากาเรน พุทฺธวิสเย อวิสยภาวํ คเหตฺวา เอวมาห. ‘पिंडपात घेऊन परतले’ (पिण्डपातं आदाय पटिक्कमी) म्हणजे सुदिन्नकांडात सांगितल्याप्रमाणे एका भिंतीच्या जवळ जाऊन बसले. सारिपुत्तांनी विचार केला, ‘प्रश्न विचारण्याची ही योग्य वेळ नाही.’ म्हणून योग्य वेळेची वाट पाहत ते एका बाजूला उभे राहिले. कर्तव्य पूर्ण करण्यासाठी, भोजन आटोपलेल्या थेरांना त्यांनी आपल्या कमंडलूतून पाणी दिले. थेरांनी हात-पाय धुतल्यावर त्यांच्याशी कुशल विचारपूस करून प्रश्न विचारला. म्हणूनच संगीतिकारांनी ‘त्यानंतर सारिपुत्त परिब्राजक...’ इत्यादी म्हटले आहे. ‘मी तुला सांगू शकत नाही’ (न ताहं सक्कोमी) म्हणजे मी तुला सविस्तर धम्म सांगण्यास समर्थ नाही. येथे प्रतिसंभिदा प्राप्त थेर एवढे सांगण्यास असमर्थ होते असे नाही; ते समर्थ होतेच. परंतु, ‘या परिब्राजकाच्या मनात धम्माबद्दल आदर निर्माण करावा’ असा विचार करून, सर्व प्रकारे बुद्धविषयात स्वतःची असमर्थता दर्शवत त्यांनी असे म्हटले. เย ธมฺมา เหตุปฺปภวาติ เหตุปฺปภวา นาม ปญฺจกฺขนฺธา; เตนสฺส ทุกฺขสจฺจํ ทสฺเสติ. เตสํ เหตุํ ตถาคโต อาหาติ เตสํ เหตุ นาม สมุทยสจฺจํ; ตญฺจ ตถาคโต อาหาติ ทสฺเสติ. เตสญฺจ โย นิโรโธติ เตสํ อุภินฺนมฺปิ สจฺจานํ โย อปฺปวตฺตินิโรโธ; ตญฺจ ตถาคโต อาหาติ อตฺโถ. เตนสฺส นิโรธสจฺจํ ทสฺเสติ. มคฺคสจฺจํ ปเนตฺถ สรูปโต อทสฺสิตมฺปิ นยโต ทสฺสิตํ โหติ, นิโรเธ หิ วุตฺเต ตสฺส สมฺปาปโก มคฺโค วุตฺโตว โหติ. อถ วา เตสญฺจ โย นิโรโธติ เอตฺถ เตสํ โย นิโรโธ จ นิโรธุปาโย จาติ เอวํ ทฺเวปิ สจฺจานิ ทสฺสิตานิ โหนฺตีติ. อิทานิ ตเมวตฺถํ ปฏิปาเทนฺโต อาห – ‘‘เอวํวาที มหาสมโณ’’ติ. ‘ये धम्मा हेतुप्पभवा’ (जे धर्म कारणापासून उत्पन्न होतात) म्हणजे कारणापासून उत्पन्न होणारे पाच स्कंध; याद्वारे त्यांना (सारिपुत्तांना) दुःखसत्य दाखवले आहे. ‘तेसं हेतुं तथागतो आहा’ (त्यांचे कारण तथागतांनी सांगितले आहे) म्हणजे त्या पाच स्कंधांचे कारण म्हणजेच समुदयसत्य; आणि ते कारण तथागतांनी सांगितले आहे, असे दाखवले आहे. ‘तेसञ्च यो निरोधो’ (आणि त्यांचा जो निरोध आहे) म्हणजे त्या दोन्ही सत्यांचा (दुःख आणि समुदय) जो निरोध (पुन्हा उत्पन्न न होणे) आहे; आणि तो निरोध तथागतांनी सांगितला आहे, असा अर्थ आहे. याद्वारे त्यांना निरोधसत्य दाखवले आहे. येथे मार्गसत्य प्रत्यक्षपणे दाखवले नसले तरी अप्रत्यक्षपणे दाखवले गेले आहे; कारण निरोधाचा उल्लेख केला असता, त्या निरोधाप्रत नेणारा मार्ग सांगितलाच जातो. किंवा, ‘तेसञ्च यो निरोधो’ यामध्ये त्यांचा निरोध आणि निरोधाचा उपाय (मार्ग) अशी दोन्ही सत्ये दाखवली आहेत, असे समजावे. आता याच अर्थाचा समारोप करताना म्हटले आहे—‘असे सांगणारे महाश्रमण आहेत’ (एवंवादी महासमणो). เอเสว ธมฺโม ยทิ ตาวเทวาติ สเจปิ อิโต อุตฺตริ นตฺถิ, เอตฺตกเมว อิทํ โสตาปตฺติผลมตฺตเมว ปตฺตพฺพํ, ตถาปิ เอโส เอว ธมฺโมติ อตฺโถ. ปจฺจพฺยตฺถ ปทมโสกนฺติ ยํ มยํ ปริเยสมานา วิจราม, ตํ ปทมโสกํ ปฏิวิทฺธาตฺถ ตุมฺเห; ปตฺตํ ตํ ตุมฺเหหีติ อตฺโถ. อทิฏฺฐํ อพฺภตีตํ พหุเกหิ กปฺปนหุเตหีติ อมฺเหหิ นาม อิทํ ปทํ พหุเกหิ [Pg.257] กปฺปนหุเตหิ อทิฏฺฐเมว อพฺภตีตํ; อิติ ตสฺส ปทสฺส อทิฏฺฐภาเวน ทีฆรตฺตํ อตฺตโน มหาชานิภาวํ ทีเปติ. ‘हाच तो धम्म आहे’ (एसेव धम्मो यदि तावदेव) म्हणजे जरी याहून अधिक काही नसले, आणि केवळ हे सोतापत्तिफळच प्राप्त करण्यासारखे असले, तरीही हाच तो धम्म आहे, असा अर्थ आहे. ‘पच्चब्यत्थ पदमसोकं’ (शोकरहित पद प्राप्त केले) म्हणजे ज्याचा शोध घेत आम्ही फिरत होतो, ते शोकरहित पद (निर्वाण) तुम्ही जाणले आहे; ते तुम्ही प्राप्त केले आहे, असा अर्थ आहे. ‘अदिट्ठं अब्भतीतं बहुकेहि कप्पनहुतेहि’ (अनेक लाख कल्पपर्यंत न पाहिलेले) म्हणजे आमच्याकडून हे पद अनेक लाख कल्पपर्यंत न पाहता आलेले राहिले; अशा प्रकारे त्या पदाच्या अदृष्टपणामुळे दीर्घकाळापासून स्वतःचे झालेले मोठे नुकसान ते दर्शवतात. ๖๒. คมฺภีเร ญาณวิสเยติ คมฺภีเร เจว คมฺภีรสฺส จ ญาณสฺส วิสยภูเต. อนุตฺตเร อุปธิสงฺขเยติ นิพฺพาเน. วิมุตฺเตติ ตทารมฺมณาย วิมุตฺติยา วิมุตฺเต. พฺยากาสีติ ‘‘เอตํ เม สาวกยุคํ ภวิสฺสติ อคฺคํ ภทฺทยุค’’นฺติ วทนฺโต สาวกปารมิญฺญาเณ พฺยากาสิ. สาว เตสํ อายสฺมนฺตานํ อุปสมฺปทา อโหสีติ สา เอหิภิกฺขูปสมฺปทาเยว เตสํ อุปสมฺปทา อโหสิ. เอวํ อุปสมฺปนฺเนสุ จ เตสุ มหาโมคฺคลฺลานตฺเถโร สตฺตหิ ทิวเสหิ อรหตฺเต ปติฏฺฐิโต, สาริปุตฺตตฺเถโร อฑฺฒมาเสน. ६२. ‘गंभीर ज्ञानविषयात’ (गम्भीरे ञाणविसये) म्हणजे गंभीर आणि गंभीर ज्ञानाचा विषय असलेल्या. ‘अनुत्तर उपधिसंक्षयात’ (अनुत्तरे उपधिसङ्खये) म्हणजे निर्वाणात. ‘विमुक्तात’ (विमुत्ते) म्हणजे त्या निर्वाणाला आलंबन करणाऱ्या विमुक्तीने विमुक्त झालेल्या. ‘व्याकरण केले’ (ब्याकासी) म्हणजे ‘हे माझे अग्र आणि भद्र श्रावकयुगल होईल’ असे सांगत श्रावकपारमीज्ञानाविषयी घोषित केले. ‘तीच त्या आयुष्मंतांची उपसंपदा झाली’ (साव तेसं आयस्मन्तानं उपसम्पदा अहोसी) म्हणजे ती ‘एहिभिक्खू’ उपसंपदाच त्या आयुष्मंतांची उपसंपदा झाली. अशा प्रकारे उपसंपन्न झालेल्या त्या थेरांमध्ये महामोग्गल्लान थेर सात दिवसांत अरहंत पदावर प्रतिष्ठित झाले, आणि सारिपुत्त थेर अर्ध्या महिन्यात (पंधरा दिवसांत). อตีเต กิร อโนมทสฺสี นาม พุทฺโธ โลเก อุทปาทิ. ตสฺส สรโท นาม ตาปโส สเก อสฺสเม นานาปุปฺเผหิ มณฺฑปํ กตฺวา ปุปฺผาสเนเยว ภควนฺตํ นิสีทาเปตฺวา ภิกฺขุสงฺฆสฺสาปิ ตเถว มณฺฑปํ กตฺวา ปุปฺผาสนานิ ปญฺญเปตฺวา อคฺคสาวกภาวํ ปตฺเถสิ. ปตฺถยิตฺวา จ สิรีวฑฺฒสฺส นาม เสฏฺฐิโน เปเสสิ ‘‘มยา อคฺคสาวกฏฺฐานํ ปตฺถิตํ, ตฺวมฺปิ อาคนฺตฺวา เอกํ ฐานํ ปตฺเถหี’’ติ. เสฏฺฐิ นีลุปฺปลมณฺฑปํ กตฺวา พุทฺธปฺปมุขํ ภิกฺขุสงฺฆํ, ตตฺถ โภเชตฺวา ทุติยสาวกภาวํ ปตฺเถสิ. เตสุ สรทตาปโส สาริปุตฺตตฺเถโร ชาโต, สิรีวฑฺโฒ มหาโมคฺคลฺลานตฺเถโรติ อิทํ เนสํ ปุพฺพกมฺมํ. असे म्हटले जाते की, भूतकाळात अनोमदस्सी नावाचे बुद्ध जगात उत्पन्न झाले. त्यांच्या काळात, सरद नावाच्या एका तापसाने आपल्या आश्रमात विविध प्रकारच्या फुलांचा मंडप तयार केला आणि भगवंतांना फुलांच्या आसनावरच विराजमान केले. तसेच भिक्खू संघासाठीही त्याचप्रमाणे मंडप तयार करून फुलांची आसने मांडली आणि अग्रश्रावक (अग्गसावक) पदाची प्रार्थना केली. अशी प्रार्थना केल्यानंतर त्यांनी सिरीवड्ढ नावाच्या श्रेष्ठींकडे निरोप पाठवला की, 'मी अग्रश्रावक पदाची प्रार्थना केली आहे, तू देखील येऊन एका (दुसऱ्या अग्रश्रावक) पदाची प्रार्थना कर.' त्या श्रेष्ठीने नीलकमळांचा मंडप तयार केला आणि बुद्धप्रमुख भिक्खू संघाला तेथे भोजन देऊन द्वितीय श्रावक पदाची प्रार्थना केली. त्यांच्यापैकी सरद तापस हे सारिपुत्त थेर झाले आणि सिरीवड्ढ हे महामोग्गल्लान थेर झाले. हे त्यांचे पूर्वकर्म होते. ๖๓. อปุตฺตกตายาติอาทีสุ เยสํ ปุตฺตา ปพฺพชนฺติ, เตสํ อปุตฺตกตาย. ยาสํ ปตี ปพฺพชนฺติ, ตาสํ เวธพฺยาย วิธวาภาวาย. อุภเยนาปิ กุลุปจฺเฉทาย. สญฺจยานีติ สญฺจยสฺส อนฺเตวาสิกานิ. มคธานํ คิริพฺพชนฺติ มคธานํ ชนปทสฺส คิริพฺพชํ นครํ. มหาวีราติ มหาวีริยวนฺโต. นยมานานนฺติ นยมาเนสุ. ภุมฺมตฺเถ สามิวจนํ, อุปโยคตฺเถ วา. กา อุสูยา วิชานตนฺติ ธมฺเมน นยนฺตีติ เอวํ วิชานนฺตานํ กา อิสฺสา. ६३. 'अपुत्तकताय' (पुत्रहीनतेसाठी) इत्यादी शब्दांमध्ये—ज्यांचे पुत्र प्रव्रजित होतात, त्यांच्या पुत्रहीनतेसाठी; ज्यांचे पती प्रव्रजित होतात, त्यांच्या वैधव्यासाठी म्हणजेच विधवा होण्यासाठी; आणि दोन्ही प्रकारे कुळाचा नाश (कुळ खंडित होणे) होण्यासाठी. 'संजयानी' म्हणजे संजयाचे अंतेवासी (शिष्य). 'मगधानं गिरिव्वजं' म्हणजे मगध जनपदाचे गिरिव्रज नगर (राजगृह). 'महावीरा' म्हणजे महान वीर्यवान (पराक्रमी). 'नयमानानं' म्हणजे घेऊन जाणाऱ्यांमध्ये (नयमानेसु); हे सप्तमी विभक्तीच्या अर्थात षष्ठी विभक्तीचे रूप आहे, किंवा द्वितीया विभक्तीच्या अर्थात षष्ठीचे रूप आहे. 'का उसूया विजानतं' म्हणजे 'ते धर्माने (योग्य मार्गाने) घेऊन जात आहेत' असे जाणणाऱ्यांच्या मनात कोणती असूया (मत्सर) असणार? สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานปพฺพชฺชากถา นิฏฺฐิตา. सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान यांच्या प्रव्रज्येची कथा समाप्त झाली. อุปชฺฌายวตฺตกถา उपज्झायवत्तकथा (उपाध्याय-कर्तव्य कथा) ๖๔-๕. อนุปชฺฌายกาติ วชฺชาวชฺชํ อุปนิชฺฌายเกน ครุนา วิรหิตา. อนากปฺปสมฺปนฺนาติ น อากปฺเปน สมฺปนฺนา; สมณสารุปฺปาจารวิรหิตาติ อตฺโถ[Pg.258]. อุปริโภชเนติ โภชนสฺส อุปริ. อุตฺติฏฺฐปตฺตนฺติ ปิณฺฑาย จรณกปตฺตํ. ตสฺมิญฺหิ มนุสฺสา อุจฺฉิฏฺฐสญฺญิโน, ตสฺมา อุตฺติฏฺฐปตฺตนฺติ วุตฺตํ. อถ วา อุฏฺฐหิตฺวา ปตฺตํ อุปนาเมนฺตีติ เอวมฺเปตฺถ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. อนุชานามิ ภิกฺขเว อุปชฺฌายนฺติ อุปชฺฌายํ คเหตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. ปุตฺตจิตฺตํ อุปฏฺฐเปสฺสตีติ ปุตฺโต เม อยนฺติ เอวํ เคหสฺสิตเปมวเสน จิตฺตํ อุปฏฺฐเปสฺสติ. เอส นโย ทุติยปเทปิ. สคารวา สปฺปติสฺสาติ ครุภาวญฺเจว เชฏฺฐกภาวญฺจ อุปฏฺฐเปตฺวา. สภาควุตฺติโนติ สภาคชีวิกา. สาหูติ วาติอาทีนิ ปญฺจ ปทานิ อุปชฺฌายภาวสมฺปฏิจฺฉนเววจนานิ. กาเยน วิญฺญาเปตีติ เอวํ สทฺธิวิหาริเกน ‘‘อุปชฺฌาโย เม ภนฺเต โหหี’’ติ ติกฺขตฺตุํ วุตฺเต สเจ อุปชฺฌาโย ‘‘สาหู’’ติอาทีสุ ปญฺจสุ ปเทสุ ยสฺส กสฺสจิ ปทสฺส วเสน กาเยน วา วาจาย วา กายวาจาหิ วา ‘‘คหิโต ตยา อุปชฺฌาโย’’ติ อุปชฺฌายคฺคหณํ วิญฺญาเปติ, คหิโต โหติ อุปชฺฌาโย. อิทเมว หิ เอตฺถ อุปชฺฌายคฺคหณํ, ยทิทํ อุปชฺฌายสฺส อิเมสุ ปญฺจสุ ปเทสุ ยสฺส กสฺสจิ ปทสฺส วาจาย วา สาวนํ กาเยน วา อตฺถวิญฺญาปนนฺติ. เกจิ ปน สาธูติ สมฺปฏิจฺฉนํ สนฺธาย วทนฺติ. น ตํ ปมาณํ, อายาจนทานมตฺเตน หิ คหิโต โหติ อุปชฺฌาโย, น เอตฺถ สมฺปฏิจฺฉนํ องฺคํ. สทฺธิวิหาริเกนาปิ น เกวลํ อิมินา เม ปเทน อุปชฺฌาโย คหิโตติ ญาตุํ วฏฺฏติ. ‘‘อชฺชตคฺเค ทานิ เถโร มยฺหํ ภาโร, อหมฺปิ เถรสฺส ภาโร’’ติ อิทมฺปิ ญาตุํ วฏฺฏติ. ६४-५. 'अनुपज्झायका' म्हणजे लहान-मोठ्या दोषांकडे लक्ष देणाऱ्या गुरूपासून विरहित (गुरू नसलेले). 'अनाकप्पसम्पन्ना' म्हणजे योग्य आचरण, चालणे-बोलणे इत्यादी शिष्टाचाराने युक्त नसलेले; श्रमणांना योग्य अशा आचरणाने विरहित, असा अर्थ आहे. 'उपरिभोजने' म्हणजे भोजनाच्या वर. 'उत्तिट्ठपत्तं' म्हणजे भिक्षेसाठी फिरवलेले पात्र. कारण लोक त्या पात्रात उष्टे अन्न आहे असे समजतात, म्हणून त्याला 'उत्तिट्ठपत्त' म्हटले आहे. किंवा उठून उभे राहून पात्र पुढे करतात, असाही अर्थ येथे घ्यावा. 'भिक्खूंनो, मी उपज्झाय (उपाध्याय) ग्रहण करण्याची अनुमती देतो,' असा अर्थ आहे. 'पुत्रासारखी भावना ठेवेल' म्हणजे 'हा माझा पुत्र आहे' अशा प्रकारे घरगुती प्रेमाच्या भावनेने चित्त प्रस्थापित करेल. हाच नियम दुसऱ्या पदालाही (पितुचित्तं - पित्यासारखी भावना) लागू होतो. 'सगारवा सप्पतिस्सा' म्हणजे आदरभाव आणि ज्येष्ठत्वाचा भाव मनात ठेवून. 'सभागवुत्तिनो' म्हणजे समान उपजीविका (समान जीवनपद्धती) असणारे. 'साहू' (चांगले आहे) इत्यादी पाच शब्द उपज्झाय पद स्वीकारण्याचे समानार्थी शब्द आहेत. 'कायेन विज्ञापेति' म्हणजे अशा प्रकारे सद्धि विहारिकाने (शिष्याने) 'भंते, आपण माझे उपज्झाय व्हावे' असे तीन वेळा म्हटल्यावर, जर उपज्झाय 'साहू' इत्यादी पाच शब्दांपैकी कोणत्याही एका शब्दाद्वारे शरीराने, वाणीने किंवा शरीर व वाणी दोन्हीने 'तू मला उपज्झाय म्हणून स्वीकारले आहेस' असे दर्शवून उपज्झाय स्वीकारल्याचे कळवतात, तर उपज्झाय स्वीकारले जातात. कारण येथे उपज्झाय ग्रहण करणे म्हणजे उपज्झायने या पाच शब्दांपैकी कोणत्याही एका शब्दाचा वाणीने उच्चार करणे किंवा शरीराने त्याचा अर्थ दर्शवणे हेच आहे. परंतु काही आचार्य 'साधू' असे म्हणून पुन्हा स्वीकारण्याला उद्देशून असे म्हणतात. ते प्रमाण मानले जात नाही; कारण केवळ याचना करणे आणि देणे यानेच उपज्झाय स्वीकारले जातात, येथे पुन्हा स्वीकारणे हे अंग (आवश्यक अट) नाही. सद्धि विहारिकाने देखील केवळ 'या शब्दाने मी उपज्झाय स्वीकारले आहेत' एवढेच जाणून घेणे पुरेसे नाही, तर 'आजपासून आता हे थेर माझी जबाबदारी आहेत आणि मी देखील थेरांची जबाबदारी आहे,' हे देखील जाणून घेणे आवश्यक आहे. ๖๖. ตตฺรายํ สมฺมาวตฺตนาติ ยํ วุตฺตํ สมฺมา วตฺติตพฺพนฺติ, ตตฺร อยํ สมฺมาวตฺตนา. กาลสฺเสว อุฏฺฐาย อุปาหนา โอมุญฺจิตฺวาติ สจสฺส ปจฺจูสกาเล จงฺกมนตฺถาย วา โธตปาทปริหรณตฺถาย วา ปฏิมุกฺกา อุปาหนา ปาทคตา โหนฺติ, ตา กาลสฺเสว อุฏฺฐาย อปเนตฺวา. ทนฺตกฏฺฐํ ทาตพฺพนฺติ มหนฺตํ มชฺฌิมํ ขุทฺทกนฺติ ตีณิ ทนฺตกฏฺฐานิ อุปเนตฺวา ตโต ยํ ตีณิ ทิวสานิ คณฺหาติ, จตุตฺถทิวสโต ปฏฺฐาย ตาทิสเมว ทาตพฺพํ. สเจ อนิยมํ กตฺวา ยํ วา ตํ วา คณฺหาติ, อถ ยาทิสํ ลภติ ตาทิสํ ทาตพฺพํ. ६६. 'तत्रायं सम्मावत्तना' म्हणजे 'योग्य प्रकारे वर्तन करावे' असे जे म्हटले आहे, त्यासंबंधी हे योग्य वर्तन आहे. 'काळस्सेव उट्ठाय उपाहना ओmuñcitvā' म्हणजे जर पहाटेच्या वेळी चंक्रमण करण्यासाठी किंवा धुतलेल्या पायांचे रक्षण करण्यासाठी पायात पादत्राणे घातलेली असतील, तर पहाटेच उठून ती काढून ठेवावीत. 'दन्तकट्ठं दातब्बं' (दंतकाष्ठ द्यावे) म्हणजे मोठे, मध्यम आणि लहान अशी three प्रकारची दंतकाष्ठे जवळ आणून ठेवावीत आणि त्यांपैकी जे दंतकाष्ठ ते सलग तीन दिवस घेतील, चौथ्या दिवसापासून तसेच दंतकाष्ठ त्यांना द्यावे. जर कोणताही नियम न ठेवता ते कोणतेही दंतकाष्ठ घेत असतील, तर जसे मिळेल तसे दंतकाष्ठ त्यांना द्यावे. มุโขทกํ ทาตพฺพนฺติ สีตญฺจ อุณฺหญฺจ อุทกํ อุปเนตฺวา ตโต ยํ ตีณิ ทิวสานิ วฬญฺเชติ, จตุตฺถทิวสโต ปฏฺฐาย ตาทิสเมว มุขโธวโนทกํ [Pg.259] ทาตพฺพํ. สเจ อนิยมํ กตฺวา ยํ วา ตํ วา คณฺหาติ, อถ ยาทิสํ ลภติ ตาทิสํ ทาตพฺพํ. สเจ ทุวิธมฺปิ วฬญฺเชติ, ทุวิธมฺปิ อุปเนตพฺพํ. อุทกํ มุขโธวนฏฺฐาเน ฐเปตฺวา วจฺจกุฏิโต ปฏฺฐาย สมฺมชฺชิตพฺพํ. เถเร วจฺจกุฏึ คเต ปริเวณํ สมฺมชฺชิตพฺพํ; เอวํ ปริเวณํ อสุญฺญํ โหติ. เถเร วจฺจกุฏิโต อนิกฺขนฺเตเยว อาสนํ ปญฺญเปตพฺพํ. สรีรกิจฺจํ กตฺวา อาคนฺตฺวา ตสฺมึ นิสินฺนสฺส ‘‘สเจ ยาคุ โหตี’’ติอาทินา นเยน วุตฺตวตฺตํ กาตพฺพํ. อุกฺลาโปติ เกนจิ กจวเรน สงฺกิณฺโณ, สเจ ปน อญฺโญ กจวโร นตฺถิ, อุทกผุสิตาเนว โหนฺติ, หตฺเถนปิ ปมชฺชิตพฺโพ. 'मुखोदकं दातब्बं' (मुखप्रक्षालनाचे पाणी द्यावे) म्हणजे थंड आणि गरम पाणी जवळ आणून ठेवावे आणि त्यांपैकी जे पाणी ते सलग तीन दिवस वापरतील, चौथ्या दिवसापासून तसेच तोंड धुण्याचे पाणी त्यांना द्यावे. जर कोणताही नियम न ठेवता ते कोणतेही पाणी घेत असतील, तर जसे मिळेल तसे पाणी त्यांना द्यावे. जर ते दोन्ही प्रकारचे पाणी वापरत असतील, तर दोन्ही प्रकारचे पाणी जवळ आणून ठेवावे. तोंड धुण्याच्या ठिकाणी पाणी ठेवून, शौचालयापासून (वच्चकुटि) झाडण्यास सुरुवात करावी. थेर शौचालयात गेले असता अंगण (परिवेण) झाडावे; यामुळे अंगण स्वच्छ राहते. थेर शौचालयातून बाहेर येण्यापूर्वीच आसन मांडून ठेवावे. शारीरिक विधी आटोपून परत आल्यावर तेथे बसलेल्या थेरांसाठी 'जर पेज (यागु) असेल तर...' इत्यादी पाळीत सांगितलेल्या नियमांनुसार कर्तव्ये पार पाडावीत. 'उक्लापो' म्हणजे कचऱ्याने माखलेला/अस्वच्छ झालेला. पण जर दुसरा कचरा नसेल आणि केवळ पाण्याचे थेंब असतील, तर हाताने देखील ते पुसून टाकावे. สคุณํ กตฺวาติ ทฺเว จีวรานิ เอกโต กตฺวา, ตา เอกโต กตา ทฺเวปิ สงฺฆาฏิโย ทาตพฺพา. สพฺพญฺหิ จีวรํ สงฺฆฏิตตฺตา ‘‘สงฺฆาฏี’’ติ วุจฺจติ. เตน วุตฺตํ – ‘‘สงฺฆาฏิโย ทาตพฺพา’’ติ. นาติทูเร คนฺตพฺพํ นาจฺจาสนฺเนติ เอตฺถ สเจ อุปชฺฌายํ นิวตฺติตฺวา โอโลเกนฺตํ เอเกน วา ทฺวีหิ วา ปทวีติหาเรหิ สมฺปาปุณาติ, เอตฺตาวตา นาติทูเร นาจฺจาสนฺเน คโต โหตีติ เวทิตพฺพํ. ปตฺตปริยาปนฺนํ ปฏิคฺคเหตพฺพนฺติ สเจ อุปชฺฌาเยน ภิกฺขาจาเร ยาคุยา วา ภตฺเต วา ลทฺเธ ปตฺโต อุณฺโห วา ภาริโก วา โหติ, อตฺตโน ปตฺตํ ตสฺส ทตฺวา โส ปตฺโต คเหตพฺโพติ อตฺโถ. น อุปชฺฌายสฺส ภณมานสฺส อนฺตรนฺตรา กถา โอปาเตตพฺพาติ อนฺตรฆเร วา อญฺญตฺร วา ภณมานสฺส อนิฏฺฐิเต ตสฺส วจเน อญฺญา กถา น สมุฏฺฐาเปตพฺพา. อิโต ปฏฺฐาย จ ปน ยตฺถ ยตฺถ นกาเรน ปฏิเสโธ กริยติ, สพฺพตฺถ ทุกฺกฏาปตฺติ เวทิตพฺพา. อยญฺหิ ขนฺธกธมฺมตา. อาปตฺติสามนฺตา ภณมาโนติ ปทโสธมฺมทุฏฺฐุลฺลาทิวเสน อาปตฺติยา อาสนฺนวาจํ ภณมาโน. นิวาเรตพฺโพติ ‘‘กึ ภนฺเต อีทิสํ นาม วตฺตุํ วฏฺฏติ, อาปตฺติ น โหตี’’ติ เอวํ ปุจฺฉนฺเตน วิย วาเรตพฺโพ. วาเรสฺสามีติ ปน กตฺวา ‘‘มหลฺลก, มา เอวํ ภณา’’ติ น วตฺตพฺโพ. Saguṇaṃ katvāti म्हणजे दोन चिवरे एकत्र करून, किंवा एकत्र केलेल्या त्या दोन्ही संघाटी द्याव्यात. कारण सर्व चिवर सांधलेले (शिवलेले) असल्यामुळे त्याला 'संघाटी' म्हटले जाते. म्हणूनच 'संघाटी द्याव्यात' असे म्हटले आहे. 'फार दूर जाऊ नये आणि फार जवळही राहू नये' यामध्ये, जर मागे वळून पाहणाऱ्या उपाध्यायांपर्यंत एक किंवा दोन पावलांच्या अंतराने पोहोचता येत असेल, तर एवढ्या अंतराने तो 'फार दूर नाही आणि फार जवळही नाही' अशा ठिकाणी गेला आहे असे समजावे. 'पात्रात आलेले ग्रहण करावे' याचा अर्थ असा की, जर भिक्षाटनाच्या वेळी उपाध्यायांना पेज किंवा भात मिळाल्यामुळे त्यांचे पात्र गरम किंवा जड झाले असेल, तर स्वतःचे पात्र त्यांना देऊन त्यांचे ते पात्र स्वतः घ्यावे. 'उपाध्याय बोलत असताना मध्येच बोलणे घुसवू नये' म्हणजे घरात किंवा इतर ठिकाणी ते बोलत असताना, त्यांचे बोलणे पूर्ण होण्यापूर्वी दुसरे संभाषण सुरू करू नये. येथून पुढे जिथे जिथे 'न' (नकारार्थी) शब्दाने निषेध केला आहे, तिथे सर्वत्र 'दुक्कट' (दुष्कृत) आपत्ती समजावी. कारण हा खंधकाचा नियम आहे. 'आपत्तीच्या जवळ जाणारे बोलणारा' म्हणजे पदसोधम्म किंवा दुट्ठुल्ल इत्यादींच्या स्वरूपात आपत्तीच्या जवळ जाणारे शब्द बोलणारा (उपाध्याय). 'त्यांना थांबवावे' म्हणजे 'भंते, असे बोलणे योग्य आहे का? याने आपत्ती येत नाही का?' अशा प्रकारे विचारणाऱ्या व्यक्तीप्रमाणे त्यांना थांबवावे. परंतु 'मी त्यांना थांबवतो' असा विचार करून 'हे वृद्ध भिक्खू, असे बोलू नका' असे म्हणू नये. ปฐมตรํ อาคนฺตฺวาติ สเจ อาสนฺเน คาโม โหติ, วิหาเร วา คิลาโน ภิกฺขุ โหติ, คามโต ปฐมตรํ อาคนฺตพฺพํ. สเจ ทูเร คาโม โหติ, อุปชฺฌาเยน สทฺธึ อาคจฺฉนฺโต นตฺถิ, เตเนว สทฺธึ คามโต นิกฺขมิตฺวา จีวเรน ปตฺตํ เวเฐตฺวา อนฺตรามคฺคโต ปฐมตรํ อาคนฺตพฺพํ[Pg.260]. เอวํ นิวตฺตนฺเตน ปฐมตรํ อาคนฺตฺวา อาสนปญฺญาปนาทิ สพฺพํ กิจฺจํ กาตพฺพํ. สินฺนํ โหตีติ ตินฺตํ เสทคฺคหิตํ. จตุรงฺคุลํ กณฺณํ อุสฺสาเรตฺวาติ กณฺณํ จตุรงฺคุลปฺปมาณํ อติเรกํ กตฺวา เอวํ จีวรํ สํหริตพฺพํ. กึ การณา? มา มชฺเฌ ภงฺโค อโหสีติ. สมํ กตฺวา สํหริตสฺส หิ มชฺเฌ ภงฺโค โหติ, ตโต นิจฺจํ ภิชฺชมานํ ทุพฺพลํ โหติ ตํ นิวารณตฺถเมตํ วุตฺตํ. ตสฺมา ยถา อชฺช ภงฺคฏฺฐาเนเยว สฺเว น ภิชฺชติ, ตถา ทิวเส ทิวเส จตุรงฺคุลํ อุสฺสาเรตฺวา สํหริตพฺพํ. โอโภเค กายพนฺธนํ กาตพฺพนฺติ กายพนฺธนํ สํหริตฺวา จีวรโภเค ปกฺขิปิตฺวา ฐเปตพฺพํ. Paṭhamataraṃ āgantvāti म्हणजे जर गाव जवळ असेल, किंवा विहारात एखादा आजारी भिक्खू असेल, तर गावामधून आधी परत यावे. जर गाव दूर असेल आणि उपाध्यायांसोबत येणारा दुसरा कोणी नसेल, तर त्यांच्यासोबतच गावातून बाहेर पडून, चिवराने पात्र गुंडाळून, मधल्या मार्गावरून आधी परत यावे. अशा प्रकारे परतणाऱ्या सद्धिंविहारिकाने आधी येऊन आसन मांडणे इत्यादी सर्व कर्तव्ये करावीत. Sinnaṃ hotīti म्हणजे घामाने ओले झालेले. Caturaṅgulaṃ kaṇṇaṃ ussāretvāti म्हणजे चिवराचा कोपरा चार बोटे जास्त बाहेर काढून चिवराची घडी घालावी. कोणत्या कारणाने? जेणेकरून चिवराच्या मध्यभागी घडीचा कायमचा डाग पडू नये. कारण दोन्ही बाजू समान करून घडी घातल्यास मध्यभागी घडी पडते आणि त्यामुळे वारंवार तिथून चिवर कमकुवत होते; ते टाळण्यासाठी हे भगवंतांनी सांगितले आहे. म्हणून, आज ज्या ठिकाणी घडी पडली आहे, उद्या नेमकी त्याच ठिकाणी घडी पडू नये, म्हणून दररोज चार बोटे अंतर बदलून घडी घालावी. Obhoge kāyabandhanaṃ kātabbanti म्हणजे कायबंधन (कमरपट्टा) गुंडाळून चिवराच्या घडीच्या आत ठेवून द्यावे. สเจ ปิณฺฑปาโต โหตีติ เอตฺถ โย คาเมเยว วา อนฺตรฆเร วา ปฏิกฺกมเน วา ภุญฺชิตฺวา อาคจฺฉติ, ปิณฺฑํ วา น ลภติ, ตสฺส ปิณฺฑปาโต น โหติ, คาเม อภุตฺตสฺส ปน ลทฺธภิกฺขสฺส วา โหติ; ตสฺมา ‘‘สเจ ปิณฺฑปาโต โหตี’’ติอาทิ วุตฺตํ. สเจปิ ตสฺส น โหติ, ภุญฺชิตุกาโม จ โหติ, อุทกํ ทตฺวา อตฺตนา ลทฺธโตปิ ปิณฺฑปาโต อุปเนตพฺโพ. ปานีเยน ปุจฺฉิตพฺโพติ ภุญฺชมาโน ติกฺขตฺตุํ ‘‘ปานียํ ภนฺเต อาหริยตู’’ติ ปานีเยน ปุจฺฉิตพฺโพ. สเจ กาโล อตฺถิ, อุปชฺฌาเย ภุตฺเต สยํ ภุญฺชิตพฺพํ. สเจ อุปกฏฺโฐ กาโล, ปานียํ อุปชฺฌายสฺส สนฺติเก ฐเปตฺวา สยมฺปิ ภุญฺชิตพฺพํ. Sace piṇḍapāto hotīti यामध्ये, जो उपाध्याय गावातच, घरात किंवा भोजनशाळेत जेवून येतो, किंवा ज्याला मुळात भिक्षाच मिळाली नाही, त्यांच्यासाठी पिंडपात नसतो. परंतु ज्यांनी गावात भोजन केले नाही किंवा ज्यांना भिक्षा मिळाली आहे, त्यांच्यासाठी पिंडपात असतो; म्हणूनच 'Sace piṇḍapāto hotī' (जर पिंडपात असेल तर) इत्यादी भगवंतांनी म्हटले आहे. जरी त्यांच्याकडे पिंडपात नसेल, पण त्यांना जेवण्याची इच्छा असेल, तर पाणी देऊन स्वतःला मिळालेल्या भिक्षेतूनही त्यांना भोजन सादर करावे. Pānīyena pucchitabboti म्हणजे भोजन करत असलेल्या उपाध्यायांना तीन वेळा विचारावे: 'भंते, पिण्याचे पाणी आणू का?' जर वेळ असेल, तर उपाध्यायांचे जेवण झाल्यावर स्वतः जेवावे. जर दुपारची वेळ जवळ आली असेल, तर पिण्याचे पाणी उपाध्यायांच्या जवळ ठेवून स्वतःही जेवायला बसावे. อนนฺตรหิตายาติ ตฏฺฏิกธมฺมขณฺฑาทีสุ เยน เกนจิ อนตฺถตาย ปํสุสกฺขรมิสฺสาย ภูมิยา ปตฺโถ น ฐเปตพฺโพติ อตฺโถ. สเจ ปน กาฬวณฺณกตา วา สุธาพทฺธา วา โหติ นิรชมตฺติกา, ตถารูปาย ภูมิยา ฐเปตุํ วฏฺฏติ. โธตวาลิกายปิ ฐเปตุํ วฏฺฏติ. ปํสุรชสกฺขราทีสุ น วฏฺฏติ. ตตฺร ปน ปณฺณํ วา อาธารกํ วา ฐเปตฺวา ตตฺร นิกฺขิปิตพฺโพ. ปารโต อนฺตํ โอรโต โภคนฺติ อิทํ จีวรวํสาทีนํ เหฏฺฐา หตฺถํ ปเวเสตฺวา อภิมุเขน หตฺเถน สณิกํ นิกฺขิปนตฺถํ วุตฺตํ. อนฺเต ปน คเหตฺวา โภเคน จีวรวํสาทีนํ อุปริ นิกฺขิปนฺตสฺส ภิตฺติยํ โภโค ปฏิหญฺญติ, ตสฺมา ตถา น กาตพฺพํ. Anantarahitāyāti म्हणजे चटई, चामड्याचा तुकडा इत्यादींपैकी कशाचाही थर न देता, धूळ आणि खडी मिश्रित जमिनीवर पात्र ठेवू नये, असा अर्थ आहे. पण जर जमीन काळ्या रंगाची केलेली असेल, किंवा गिलावा केलेली असेल आणि धुळीशिवाय स्वच्छ असेल, तर अशा जमिनीवर पात्र ठेवणे योग्य आहे. धुतलेल्या वाळूच्या जमिनीवरही पात्र ठेवणे योग्य आहे. धूळ, माती, खडी इत्यादी असलेल्या जमिनीवर ठेवणे योग्य नाही. परंतु तिथे पान किंवा पात्राचा आधार ठेवून त्यावर पात्र ठेवावे. Pārato antaṃ orato bhoganti हे चिवर टांगण्याच्या बांबूच्या खाली हात घालून, समोरच्या हाताने हळूच चिवर ठेवण्यासाठी भगवंतांनी सांगितले आहे. कारण चिवराचे टोक धरून घडीसह चिवर-वंशावर फेकल्यास चिवराची घडी भिंतीवर आदळते, म्हणून तसे करू नये. จุณฺณํ สนฺเนตพฺพนฺติ นฺหานจุณฺณํ อุทเกน เตเมตฺวา ปิณฺฑิ กาตพฺพา. เอกมนฺตํ นิกฺขิปิตพฺพนฺติ เอกสฺมึ นิทฺธูเม ฐาเน ฐเปตพฺพํ. ชนฺตาฆเร ปริกมฺมํ นาม [Pg.261] องฺคารมตฺติกอุณฺโหทกทานาทิกํ สพฺพํ กิจฺจํ. อุทเกปิ ปริกมฺมนฺติ องฺคปจฺจงฺคฆํสนาทิกํ สพฺพํ กิจฺจํ. ปานีเยน ปุจฺฉิตพฺโพติ ชนฺตาฆเร อุณฺหสนฺตาเปน ปิปาสา โหติ, ตสฺมา ปุจฺฉิตพฺโพ. Cuṇṇaṃ sannetabbanti म्हणजे अंघोळीचे साबणाचे चूर्ण पाण्याने ओले करून त्याचा गोळा बनवावा. Ekamantaṃ nikkhipitabbanti म्हणजे धूर नसलेल्या एका बाजूच्या ठिकाणी ठेवावे. जंताघरात 'परिकर्म' म्हणजे कोळसा देणे, माती देणे, गरम पाणी देणे इत्यादी सर्व कामे होत. पाण्यातही 'परिकर्म' म्हणजे शरीराचे अवयव घासून देणे इत्यादी सर्व कामे होत. Pānīyena pucchitabboti म्हणजे जंताघरातील उष्णतेमुळे तहान लागते, म्हणून त्यांना पिण्याच्या पाण्याविषयी विचारावे. สเจ อุสฺสหตีติ สเจ ปโหติ; น เกนจิ เคลญฺเญน อภิภูโต โหติ; อคิลาเนน หิ สทฺธิวิหาริเกน สฏฺฐิวสฺเสนาปิ สพฺพํ อุปชฺฌายวตฺตํ กาตพฺพํ, อนาทเรน อกโรนฺตสฺส วตฺตเภเท ทุกฺกฏํ. นการปฏิสํยุตฺเตสุ ปน ปเทสุ คิลานสฺสาปิ ปฏิกฺขิตฺตกิริยํ กโรนฺตสฺส ทุกฺกฏเมว. อปฺปฏิฆํสนฺเตนาติ ภูมิยํ อปฺปฏิฆํสนฺเตน. กวาฏปิฏฺฐนฺติ กวาฏญฺจ ปิฏฺฐสงฺฆาตญฺจ อจฺฉุปนฺเตน. สนฺตานกนฺติ ยํกิญฺจิ กีฏกุลาวกมกฺกฏกสุตฺตาทิ. อุลฺโลกา ปฐมํ โอหาเรตพฺพนฺติ อุลฺโลกโต ปฐมํ อุลฺโลกํ อาทึกตฺวา อวหริตพฺพนฺติ อตฺโถ. อาโลกสนฺธิกณฺณภาคาติ อาโลกสนฺธิภาคา จ กณฺณภาคา จ อนฺตรพาหิรวาตปานกวาฏกานิ จ คพฺภสฺส จ จตฺตาโร โกณา ปมชฺชิตพฺพาติ อตฺโถ. Sace ussahatīti म्हणजे जर तो समर्थ असेल; कोणत्याही आजाराने ग्रस्त नसेल. कारण निरोगी असलेल्या सद्धिंविहारिकाने, जरी तो साठ वर्षांचा असला तरी, उपाध्यायांचे सर्व कर्तव्य केले पाहिजे. अनादराने ते न करणाऱ्याला कर्तव्यभंगाचा दुक्कट गुन्हा होतो. परंतु 'न' (नकारार्थी) शब्दांशी संबंधित पदांमध्ये, आजारी व्यक्तीनेही निषिद्ध क्रिया केल्यास त्याला दुक्कटच होतो. Appaṭighaṃsantenāti म्हणजे जमिनीवर न घासता. Kavāṭapiṭṭhanti म्हणजे दरवाजा आणि दरवाजाची चौकट यांना स्पर्श न करता. Santānakanti म्हणजे कीटकांचे घरटे, कोळ्याचे जाळे इत्यादी काहीही. Ullokā paṭhamaṃ ohāretabbanti म्हणजे छतापासून सुरुवात करून आधी छतावरील जळमट इत्यादी दूर करावे, असा अर्थ आहे. Ālokasandhikaṇṇabhāgāti म्हणजे खिडक्यांचे भाग, खोलीचे कोपरे, आतील व बाहेरील खिडक्यांचे दरवाजे आणि खोलीचे चारही कोपरे स्वच्छ करावेत (पुसावेत), असा अर्थ आहे. ยถาปญฺญตฺตํ ปญฺญเปตพฺพนฺติ ยถา ปฐมํ ปญฺญตฺตํ อโหสิ, ตเถว ปญฺญเปตพฺพํ. เอตทตฺถเมว หิ ยถาปญฺญตฺตํ สลฺลกฺเขตฺวา นีหริตฺวา เอกมนฺตํ นิกฺขิปิตพฺพนฺติ ปุริมวตฺตํ ปญฺญตฺตํ. สเจ ปน ปฐมํ อชานนฺเตน เกนจิ ปญฺญตฺตํ อโหสิ, สมนฺตโต ภิตฺตึ ทฺวงฺคุลมตฺเตน วา ติวงฺคุลมตฺเตน วา โมเจตฺวา ปญฺญเปตพฺพํ. อิทญฺหิ ปญฺญาปนวตฺตํ. สเจ กฏสารโก โหติ อติมหนฺโต จ, ฉินฺทิตฺวา โกฏึ นิวตฺเตตฺวา พนฺธิตฺวา ปญฺญเปตพฺโพ. สเจ โกฏึ นิวตฺเตตฺวา พนฺธิตุํ น ชานาติ, น ฉินฺทิตพฺโพ. ปุรตฺถิมา วาตปานา ถเกตพฺพาติ ปุรตฺถิมาย วาตปานา ถเกตพฺพา. เอวํ เสสาปิ วาตปานา ถเกตพฺพา. ‘यथाप्रज्ञप्त मांडले पाहिजे’ (यथापञ्ञत्तं पञ्ञापेतब्बं) म्हणजे जसे आधी मांडले होते, तसेच मांडले पाहिजे. याच हेतूने ‘यथाप्रज्ञप्त लक्षात ठेवून, बाहेर काढून एका बाजूला ठेवावे’ हा पूर्वीचा नियम प्रज्ञप्त केला आहे. पण जर आधी (मांडणीची पद्धत) न जाणणाऱ्या एखाद्याने मांडणी केली असेल, तर भिंतीपासून सर्व बाजूंनी दोन बोटे किंवा तीन बोटे अंतर सोडून मांडणी करावी. कारण हा मांडणीचा नियम आहे. जर चटई खूप मोठी असेल, तर ती कापून, तिचे टोक दुमडून आणि बांधून ती मांडावी. जर टोक दुमडून बांधणे माहीत नसेल, तर ती कापली जाऊ नये. ‘पूर्वेकडील खिडक्या बंद कराव्यात’ म्हणजे पूर्वेकडील बाजूच्या खिडक्या बंद कराव्यात. याचप्रमाणे इतर खिडक्याही बंद कराव्यात. วูปกาเสตพฺโพติ อญฺญตฺถ เนตพฺโพ. วูปกาสาเปตพฺโพติ อญฺโญ ภิกฺขุ วตฺตพฺโพ ‘‘เถรํ คเหตฺวา อญฺญตฺถ คจฺฉา’’ติ วิเวเจตพฺพนฺติ วิสฺสชฺชาเปตพฺพํ. วิเวจาเปตพฺพนฺติ อญฺโญ วตฺตพฺโพ ‘‘เถรํ ทิฏฺฐิคตํ วิสฺสชฺชาเปหี’’ติ. อุสฺสุกฺกํ กาตพฺพนฺติ ปริวาสทานตฺถํ โส โส ภิกฺขุ อุปสงฺกมิตฺวา ยาจิตพฺโพ. สเจ อตฺตนา ปฏิพโล โหติ, อตฺตนาว ทาตพฺโพ. โน เจ ปฏิพโล โหติ, อญฺเญน ทาเปตพฺโพ. กินฺติ นุ โขติ เกน นุ โข อุปาเยน. เอส นโย สพฺพตฺถ. ลหุกาย วา [Pg.262] ปริณาเมยฺยาติ อุกฺเขปนียํ อกตฺวา ตชฺชนียํ วา นิยสฺสํ วา กเรยฺยาติ อตฺโถ. เตน หิ ‘‘อุปชฺฌายสฺส อุกฺเขปนียกมฺมํ กตฺตุกาโม สงฺโฆ’’ติ ญตฺวา เอกเมกํ ภิกฺขุํ อุปสงฺกมิตฺวา ‘‘มา ภนฺเต อมฺหากํ อุปชฺฌายสฺส กมฺมํ กริตฺถา’’ติ ยาจิตพฺพา. สเจ กโรนฺติเยว, ‘‘ตชฺชนียํ วา นิยสฺสํ วา กโรถา’’ติ ยาจิตพฺพา. สเจ กโรนฺติเยว, อถ อุปชฺฌาโย ‘‘สมฺมา วตฺตถ ภนฺเต’’ติ ยาจิตพฺโพ. อิติ ตํ สมฺมา วตฺตาเปตฺวา ‘‘ปฏิปฺปสฺสมฺเภถ ภนฺเต กมฺม’’นฺติ ภิกฺขู ยาจิตพฺพา. ‘दूर नेले पाहिजे’ (वूपकासेतब्बो) म्हणजे दुसऱ्या ठिकाणी नेले पाहिजे. ‘दूर नेण्यास सांगितले पाहिजे’ (वूपकासापेतब्बो) म्हणजे दुसऱ्या भिक्खूला सांगावे की, ‘स्थविरांना घेऊन दुसऱ्या ठिकाणी जा.’ ‘मुक्त केले पाहिजे’ (विवेचेतब्बं) म्हणजे त्याग करण्यास सांगावे. ‘मुक्त करण्यास सांगितले पाहिजे’ (विवेचापेतब्बं) म्हणजे दुसऱ्याला सांगावे की, ‘स्थविरांना त्यांच्या चुकीच्या दृष्टीचा (मिच्छादिट्ठीचा) त्याग करण्यास सांगा.’ ‘प्रयत्न करावा’ (उस्सुक्कं कातब्बं) म्हणजे परिवास देण्यासाठी त्या त्या भिक्खूंकडे जाऊन त्यांना विनंती करावी. जर स्वतः समर्थ असेल, तर स्वतःच परिवास द्यावा. जर समर्थ नसेल, तर दुसऱ्याकडून देववावा. ‘कसे बरे’ (किन्ति नु खो) म्हणजे कोणत्या उपायाने. हाच नियम सर्व ठिकाणी लागू होतो. ‘किंवा हलक्या कर्मात परिवर्तित करावे’ (लहुकाय वा परिणामेय्य) म्हणजे उक्खेपनीय कर्म न करता तज्जनीय कर्म किंवा नियस्स कर्म करावे का, असा अर्थ आहे. म्हणून, ‘संघ उपाध्यायांवर उक्खेपनीय कर्म करू इच्छितो’ हे जाणून, प्रत्येक भिक्खूजवळ जाऊन ‘भंते, आमच्या उपाध्यायांवर हे कर्म करू नका’ अशी विनंती करावी. जर ते नक्कीच करणार असतील, तर ‘तज्जनीय कर्म किंवा नियस्स कर्म करा’ अशी विनंती करावी. जर ते (उक्खेपनीय कर्मच) करणार असतील, तर उपाध्यायांना ‘भंते, योग्य प्रकारे वर्तन करा’ अशी विनंती करावी. अशा प्रकारे त्यांच्याकडून योग्य वर्तन करवून घेऊन, भिक्खूंना ‘भंते, हे कर्म शांत (रद्द) करा’ अशी विनंती करावी. สมฺปริวตฺตกํ สมฺปริวตฺตกนฺติ สมฺปริวตฺเตตฺวา สมฺปริวตฺเตตฺวา. น จ อจฺฉินฺเน เถเว ปกฺกมิตพฺพนฺติ ยทิ อปฺปมตฺตกมฺปิ รชนํ คฬติ, น ตาว ปกฺกมิตพฺพํ. น อุปชฺฌายํ อนาปุจฺฉา เอกจฺจสฺส ปตฺโต ทาตพฺโพติอาทิ สพฺพํ อุปชฺฌายสฺส วิสภาคปุคฺคลวเสน กถิตํ. น อุปชฺฌายํ อนาปุจฺฉา คาโม ปวิสิตพฺโพติ ปิณฺฑาย วา อญฺเญน วา กรณีเยน ปวิสิตุกาเมน อาปุจฺฉิตฺวาว ปวิสิตพฺโพ. สเจ อุปชฺฌาโย กาลสฺเสว วุฏฺฐาย ทูรํ ภิกฺขาจารํ คนฺตุกาโม โหติ, ‘‘ทหรา ปิณฺฑาย ปวิสนฺตู’’ติ วตฺวา คนฺตพฺพํ. อวตฺวา คเต ปริเวณํ คนฺตฺวา อุปชฺฌายํ อปสฺสนฺเตน คามํ ปวิสิตุํ วฏฺฏติ. สเจ คามํ ปวิสนฺโตปิ ปสฺสติ, ทิฏฺฐฏฺฐานโต ปฏฺฐาย อาปุจฺฉิตุํเยว วฏฺฏติ. ‘उलटून-पालटून’ (सम्परीवत्तकं) म्हणजे वारंवार उलटून-पालटून. ‘आणि थेंब गळणे थांबल्याशिवाय जाऊ नये’ (न च अच्छिन्ने थेवे पक्कमितब्बं) म्हणजे जर थोडेसेही रंगद्रव्य गळत असेल, तर तोपर्यंत जाऊ नये. ‘उपाध्यायांना न विचारता कोणालाही पात्र देऊ नये’ इत्यादी सर्व गोष्टी उपाध्यायांच्या विरोधी स्वभावाच्या व्यक्तीच्या संदर्भात सांगितल्या आहेत. ‘उपाध्यायांना न विचारता गावात प्रवेश करू नये’ (न उपज्झायं अनापुच्छा गामो पविसितब्बो) म्हणजे भिक्षेसाठी किंवा इतर कोणत्याही कामासाठी गावात प्रवेश करू इच्छिणाऱ्याने परवानगी घेऊनच प्रवेश करावा. जर उपाध्याय सकाळी लवकर उठून दूरवर भिक्षेसाठी जाऊ इच्छित असतील, तर त्यांनी ‘तरुण भिक्खूंनो, तुम्ही भिक्षेसाठी गावात जा’ असे सांगून जावे. न सांगता गेले असल्यास, विहारात जाऊन उपाध्यायांना न पाहिल्यास गावात प्रवेश करणे योग्य आहे. जर गावात प्रवेश करतानाही ते दिसले, तर ज्या ठिकाणी ते दिसले तिथूनच त्यांची परवानगी घेणे योग्य आहे. น สุสานํ คนฺตพฺพนฺติ วาสตฺถาย วา ทสฺสนตฺถาย วา น คนฺตพฺพํ. น ทิสา ปกฺกมิตพฺพาติ เอตฺถ ปกฺกมิตุกาเมน กมฺมํ อาจิกฺขิตฺวา ยาวตติยํ ยาจิตพฺโพ. สเจ อนุชานาติ, สาธุ; โน เจ อนุชานาติ, ตํ นิสฺสาย วสโต จสฺส อุทฺเทโส วา ปริปุจฺฉา วา กมฺมฏฺฐานํ วา น สมฺปชฺชติ, อุปชฺฌาโย พาโล โหติ อพฺยตฺโต, เกวลํ อตฺตโน สนฺติเก วสาเปตุกามตาย เอว คนฺตุํ น เทติ, เอวรูเป นิวาเรนฺเตปิ คนฺตุํ วฏฺฏติ. วุฏฺฐานมสฺส อาคเมตพฺพนฺติ เคลญฺญโต วุฏฺฐานํ อสฺส อาคเมตพฺพํ; น กตฺถจิ คนฺตพฺพํ. สเจ อญฺโญ ภิกฺขุ อุปฏฺฐาโก อตฺถิ, เภสชฺชํ ปริเยสิตฺวา ตสฺส หตฺเถ ทตฺวา ‘‘ภนฺเต อยํ อุปฏฺฐหิสฺสตี’’ติ วตฺวา คนฺตพฺพํ. ‘स्मशानात जाऊ नये’ (न सुसानं गन्तब्बं) म्हणजे राहण्यासाठी किंवा दर्शनासाठी जाऊ नये. ‘इतर दिशांना जाऊ नये’ (न दिसा पक्कमितब्बा) या संदर्भात, जाऊ इच्छिणाऱ्याने आपले काम सांगून तीन वेळा विनंती करावी. जर त्यांनी परवानगी दिली तर उत्तम; जर परवानगी दिली नाही, आणि त्यांच्यावर अवलंबून राहून राहणाऱ्या त्या सद्धिविहारिकाचे अध्ययन, प्रश्न विचारणे किंवा कर्मस्थान पूर्ण होत नसेल, आणि उपाध्याय अज्ञानी व अकुशल असतील, आणि केवळ स्वतःजवळ ठेवण्याच्या इच्छेनेच जाऊ देत नसतील, तर अशा उपाध्यायांनी विरोध केला तरी जाणे योग्य आहे. ‘त्यांच्या बरे होण्याची वाट पाहावी’ (वुट्ठानमस्स आगमेतब्बं) म्हणजे त्यांच्या आजारपणातून बरे होण्याची वाट पाहावी; कुठेही जाऊ नये. जर दुसरा कोणी परिचारक भिक्खू असेल, तर औषध शोधून त्याच्या हातात देऊन, ‘भंते, हा आपली सेवा करेल’ असे सांगून जावे. อุปชฺฌายวตฺตกถา นิฏฺฐิตา. उपाध्याय-कर्तव्यकथा (उपाध्यायवत्तकथा) समाप्त झाली. สทฺธิวิหาริกวตฺตกถา सद्धिविहारिक-कर्तव्यकथा (सद्धिविहारिकवत्तकथा) ๖๗. อุปชฺฌาเยน [Pg.263] สทฺธิวิหาริกมฺหิ สมฺมาวตฺตนายํ – สงฺคเหตพฺโพ อนุคฺคเหตพฺโพติ อุทฺเทสาทีหิสฺส สงฺคโห จ อนุคฺคโห จ กตฺตพฺโพ. ตตฺถ อุทฺเทโสติ ปาฬิวาจนํ. ปริปุจฺฉาติ ปาฬิยา อตฺถวณฺณนา. โอวาโทติ อโนติณฺเณ วตฺถุสฺมึ ‘‘อิทํ กโรหิ, อิทํ มา กริตฺถา’’ติ วจนํ. อนุสาสนีติ โอติณฺเณ วตฺถุสฺมึ. อปิ จ โอติณฺเณ วา อโนติณฺเณ วา ปฐมํ วจนํ โอวาโท; ปุนปฺปุนํ วจนํ อนุสาสนีติ. สเจ อุปชฺฌายสฺส ปตฺโต โหตีติ สเจ อติเรกปตฺโต โหติ. เอส นโย สพฺพตฺถ. ปริกฺขาโรติ อญฺโญปิ สมณปริกฺขาโร. อิธ อุสฺสุกฺกํ นาม ธมฺมิเกน นเยน อุปฺปชฺชมานอุปายปริเยสนํ. อิโต ปรํ ทนฺตกฏฺฐทานํ อาทึ กตฺวา อาจมนกุมฺภิยา อุทกาสิญฺจนปริโยสานํ วตฺตํ คิลานสฺเสว สทฺธิวิหาริกสฺส กาตพฺพํ. อนภิรติวูปกาสนาทิ ปน อคิลานสฺสาปิ กตฺตพฺพเมว. จีวรํ รชนฺเตนาติ ‘‘เอวํ รเชยฺยาสี’’ติ อุปชฺฌายโต อุปายํ สุตฺวา รชนฺเตน. เสสํ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. ६७. उपाध्यायांनी सद्धिविहारिकाशी योग्य प्रकारे वर्तन करण्याच्या संदर्भात— ‘संग्रह केला पाहिजे, अनुग्रह केला पाहिजे’ (सङ्गहेतब्बो अनुग्गहेतब्बो) म्हणजे अध्ययन इत्यादींद्वारे त्याचा संग्रह आणि अनुग्रह केला पाहिजे. त्यामध्ये ‘उद्देश’ म्हणजे पाळिचे वाचन (शिकवणे). ‘परिपृच्छा’ म्हणजे पाळिच्या अर्थाचे स्पष्टीकरण. ‘ओवाद’ (उपदेश) म्हणजे एखादी घटना घडण्यापूर्वीच ‘हे कर, हे करू नकोस’ असे सांगणे. ‘अनुशासनी’ म्हणजे घटना घडल्यानंतर सांगणे. शिवाय, घटना घडलेली असो वा नसो, पहिल्यांदा सांगणे म्हणजे ‘ओवाद’ आणि वारंवार सांगणे म्हणजे ‘अनुशासनी’ असे समजावे. ‘जर उपाध्यायांकडे पात्र असेल’ म्हणजे जर अतिरिक्त पात्र असेल. हाच नियम सर्व ठिकाणी लागू होतो. ‘परिष्कार’ म्हणजे इतरही श्रमण-परिष्कार. येथे ‘उत्सुकता’ (उस्सुक्कं) म्हणजे धार्मिक मार्गाने मिळणाऱ्या उपायांचा शोध घेणे. यानंतर, दंतकाष्ठ देण्यापासून सुरू करून आचमनकुंभात पाणी ओतण्यापर्यंतचे कर्तव्य केवळ आजारी सद्धिविहारिकासाठीच केले पाहिजे. परंतु, उदासीनता दूर करणे इत्यादी कर्तव्ये आजारी नसलेल्या सद्धिविहारिकासाठीही केलीच पाहिजेत. ‘चीवर रंगवताना’ (चीवरं रजन्तेन) म्हणजे ‘अशा प्रकारे रंगवावे’ असा उपाध्यायांकडून उपाय ऐकून रंगवणाऱ्याने. उर्वरित भाग आधी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. สทฺธิวิหาริกวตฺตกถา นิฏฺฐิตา. सद्धिविहारिक-कर्तव्यकथा समाप्त झाली. นสมฺมาวตฺตนาทิกถา अयोग्य वर्तनादी कथा (न सम्मावत्तनादिकथा) ๖๘. น สมฺมา วตฺตนฺตีติ ยถาปญฺญตฺตํ อุปชฺฌายวตฺตํ น ปูเรนฺติ. โย น สมฺมา วตฺเตยฺยาติ โย ยถาปญฺญตฺตํ วตฺตํ น ปูเรยฺย; โส ทุกฺกฏํ อาปชฺชตีติ อตฺโถ. ปณาเมตพฺโพติ อปสาเทตพฺโพ. น อธิมตฺตํ เปมํ โหตีติ อุปชฺฌายมฺหิ อธิมตฺตํ เคหสฺสิตเปมํ น โหติ. นาธิมตฺตา ภาวนา โหตีติ อธิมตฺตา เมตฺตาภาวนา น โหติ; วุตฺตปฏิปกฺขนเยน สุกฺกปกฺโข เวทิตพฺโพ. อลํ ปณาเมตุนฺติ ยุตฺโต ปณาเมตุํ. ६८. ‘योग्य प्रकारे वर्तन करत नाहीत’ (न सम्मा वत्तन्ति) म्हणजे प्रज्ञप्त केलेल्या उपाध्यायांच्या कर्तव्यांचे पालन करत नाहीत. ‘जो योग्य प्रकारे वर्तन करणार नाही’ (यो न सम्मा वत्तेय्य) म्हणजे जो प्रज्ञप्त केलेल्या कर्तव्याचे पालन करणार नाही; त्याला दुष्कृत (दुक्कट) आपत्ती येते, असा अर्थ आहे. ‘हाकलून दिले पाहिजे’ (पणामेतब्बो) म्हणजे दूर केले पाहिजे. ‘अतिशय प्रेम नसते’ (न अधिमतं पेमं होति) म्हणजे उपाध्यायांवर अतिशय गृहस्थी प्रेम नसते. ‘अतिशय भावना नसते’ (नाधिमत्ता भावना होति) म्हणजे अतिशय मैत्रीची भावना नसते; आधी सांगितलेल्या विरुद्ध पद्धतीने शुक्लपक्ष समजावा. ‘हाकलून देण्यास योग्य’ (अलं पणामेतुं) म्हणजे हाकलून देणे योग्य आहे. อปฺปณาเมนฺโต อุปชฺฌาโย สาติสาโร โหตีติ สโทโส โหติ, อาปตฺตึ อาปชฺชติ; ตสฺมา น สมฺมา วตฺตนฺโต ปณาเมตพฺโพว. น สมฺมาวตฺตนาย จ ยาว จีวรรชนํ ตาว วตฺเต อกริยมาเน อุปชฺฌายสฺส [Pg.264] ปริหานิ โหติ. ตสฺมา ตํ อกโรนฺตสฺส นิสฺสยมุตฺตกสฺสาปิ อมุตฺตกสฺสาปิ อาปตฺติเยว. เอกจฺจสฺส ปตฺตทานโต ปฏฺฐาย อมุตฺตกนิสฺสยสฺเสว อาปตฺติ. ‘हाकलून न देणारा उपाध्याय सदोष होतो’ (अप्पणामेन्तो उपज्झायो सातिसारो होति) म्हणजे तो दोषी होतो, त्याला आपत्ती येते; म्हणून योग्य प्रकारे वर्तन न करणाऱ्याला हाकलून दिलेच पाहिजे. आणि अयोग्य वर्तनामध्ये, जोपर्यंत चीवर रंगवण्याचे काम आहे तोपर्यंत कर्तव्ये न केल्यास उपाध्यायांची हानी होते. म्हणून, ते कर्तव्य न करणाऱ्या निस्सय-मुक्त (निस्रयापासून मुक्त झालेल्या) सद्धिविहारिकालाही आणि निस्सय-अमुक्त सद्धिविहारिकालाही आपत्तीच येते. काही विशिष्ट व्यक्तींच्या बाबतीत, पात्र देण्यापासून सुरू करून कर्तव्ये न करणाऱ्या केवळ निस्सय-अमुक्त सद्धिविहारिकालाच आपत्ती येते. สทฺธิวิหาริกา สมฺมา วตฺตนฺติ, อุปชฺฌาโย สมฺมา น วตฺตติ, อุปชฺฌายสฺส อาปตฺติ. อุปชฺฌาโย สมฺมา วตฺตติ, สทฺธิวิหาริกา สมฺมา น วตฺตนฺติ, เตสํ อาปตฺติ. อุปชฺฌาเย วตฺตํ สาทิยนฺเต สทฺธิวิหาริกา พหุกาปิ โหนฺติ, สพฺเพสํ อาปตฺติ. สเจ อุปชฺฌาโย ‘‘มยฺหํ อุปฏฺฐาโก อตฺถิ, ตุมฺเห อตฺตโน สชฺฌายมนสิการาทีสุ โยคํ กโรถา’’ติ วทติ, สทฺธิวิหาริกานํ อนาปตฺติ. สเจ อุปชฺฌาโย สาทิยนํ วา อสาทิยนํ วา น ชานาติ, พาโล โหติ, สทฺธิวิหาริกา พหุกา. เตสุ เอโก วตฺตสมฺปนฺโน ภิกฺขุ ‘‘อุปชฺฌายสฺส กิจฺจํ อหํ กริสฺสามิ, ตุมฺเห อปฺโปสฺสุกฺกา วิหรถา’’ติ เอวญฺเจ อตฺตโน ภารํ กตฺวา อิตเร วิสฺสชฺเชติ, ตสฺส ภารกรณโต ปฏฺฐาย เตสํ อนาปตฺติ. सद्धिविहारिक योग्य प्रकारे वर्तन करतात, आणि उपाध्याय योग्य प्रकारे वर्तन करत नाहीत, तर उपाध्यायांना आपत्ती होते. उपाध्याय योग्य प्रकारे वर्तन करतात, आणि सद्धिविहारिक योग्य प्रकारे वर्तन करत नाहीत, तर त्यांना आपत्ती होते. उपाध्यायांच्या कर्तव्याचा स्वीकार करताना सद्धिविहारिक अनेक असले तरीही, सर्वांना आपत्ती होते. जर उपाध्याय म्हणतात की, 'माझा उपस्थाक (सेवक) आहे, तुम्ही स्वतःच्या सज्झाय (पाठपठण) आणि मनसिकार (चिंतन) इत्यादींमध्ये प्रयत्न करा,' तर सद्धिविहारिकांना अनापत्ती होते. जर उपाध्याय (कर्तव्याचा) स्वीकार किंवा अस्वीकार जाणत नाहीत, ते अज्ञ (बाल) आहेत, आणि सद्धिविहारिक अनेक आहेत; त्यांच्यापैकी एक कर्तव्यसंपन्न (वत्तसंपन्न) भिक्खू जर असे म्हणतो की, 'उपाध्यायांचे कार्य मी करीन, तुम्ही काळजीमुक्त होऊन राहा,' आणि अशा प्रकारे स्वतःवर जबाबदारी घेऊन इतरांना मुक्त करतो, तर त्याने ती जबाबदारी घेतल्यापासून इतरांना अनापत्ती होते. นสมฺมาวตฺตนาทิกถา นิฏฺฐิตา. न-सम्मावत्तनादि कथा समाप्त झाली. ราธพฺราหฺมณวตฺถุกถา राध ब्राह्मण वत्थु कथा ๖๙. ราธพฺราหฺมณวตฺถุสฺมึ – กิญฺจาปิ อายสฺมา สาริปุตฺโต ภควตา พาราณสิยํ ตีหิ สรณคมเนหิ อนุญฺญาตํ ปพฺพชฺชญฺเจว อุปสมฺปทญฺจ ชานาติ, ภควา ปน ตํ ลหุกํ อุปสมฺปทํ ปฏิกฺขิปิตฺวา ญตฺติจตุตฺถกมฺเมน ครุกํ กตฺวา อุปสมฺปทํ อนุญฺญาตุกาโม. อถสฺส เถโร อชฺฌาสยํ วิทิตฺวา ‘‘กถาหํ ภนฺเต ตํ พฺราหฺมณํ ปพฺพาเชมิ อุปสมฺปาเทมี’’ติ อาห. พุทฺธานญฺหิ ปริสา อชฺฌาสยกุสลา โหนฺติ, อยญฺจ พุทฺธปริสาย อคฺโค. ६९. राध ब्राह्मण वत्थुमध्ये – जरी आयुष्मान सारिपुत्त भगवंतांनी वाराणसीमध्ये तीन शरणगमनांद्वारे अनुमत केलेली प्रवज्जा आणि उपसंपदा जाणत होते, तरी भगवंतांना ती सौम्य (लहुक) उपसंपदा नाकारून, ज्ञत्तिचतुत्थ कर्माने तिला गुरुत्व (गरुक) देऊन उपसंपदा अनुमत करण्याची इच्छा होती. तेव्हा स्थविरांनी भगवंतांचा आशय जाणून, 'भन्ते, मी त्या ब्राह्मणाला कशी प्रवज्जा देऊ, कशी उपसंपदा देऊ?' असे विचारले. कारण बुद्धांची परिषद ही बुद्धांचा आशय जाणण्यात कुशल असते, आणि हे (आयुष्मान सारिपुत्त) बुद्ध परिषदेमध्ये सर्वश्रेष्ठ आहेत. พฺยตฺเตน ภิกฺขุนา ปฏิพเลนาติ เอตฺถ พฺยตฺโต นาม ยสฺส สาฏฺฐกถํ วินยปิฏกํ วาจุคฺคตํ ปวตฺตติ, ตสฺมึ อสติ ยสฺส อนฺตมโส อิทํ ญตฺติจตุตฺถกมฺมวาจามตฺตมฺปิ สุคฺคหิตํ โหติ, วาจุคฺคตํ ปวตฺตติ, อยมฺปิ อิมสฺมึ อตฺเถ พฺยตฺโต. โย ปน กาสโสสเสมฺหาทินา วา เคลญฺเญน [Pg.265] โอฏฺฐทนฺตชิวฺหาทีนํ วา อสมฺปตฺติยา ปริยตฺติยํ วา อกตปริจยตฺตา น สกฺโกติ ปริมณฺฑเลหิ ปทพฺยญฺชเนหิ กมฺมวาจํ สาเวตุํ, พฺยญฺชนํ วา ปทํ วา หาเปติ, อญฺญถา วา วตฺตพฺพํ อญฺญถา วทติ, อยํ อปฺปฏิพโล. ตพฺพิปรีโต อิมสฺมึ อตฺเถ ‘‘ปฏิพโล’’ติ เวทิตพฺโพ. สงฺโฆ ญาเปตพฺโพติ สงฺโฆ ชานาเปตพฺโพ. ตโต ปรํ ยํ สงฺโฆ ชานาเปตพฺโพ, ตํ ทสฺเสตุํ ‘‘สุณาตุ เม ภนฺเต’’ติอาทิมาห. 'व्यत्त भिक्खूने प्रतिबल भिक्खूने' (byattena bhikkhunā paṭibalenā) यामध्ये 'व्यत्त' म्हणजे ज्याला अट्ठकथेसह विनयपिटक मुखोद्गत आहे. तो नसताना, ज्याला अगदी कमीत कमी ही ज्ञत्तिचतुत्थ कम्मवाचा देखील चांगल्या प्रकारे ग्रहण केलेली आहे आणि मुखोद्गत आहे, तो देखील या अर्थाने 'व्यत्त' होय. परंतु, जो खोकला, दमा, कफ इत्यादी आजारपणामुळे किंवा ओठ, दात, जीभ इत्यादी अवयवांच्या अपूर्णतेमुळे किंवा परिषदेमध्ये सराव नसल्यामुळे, स्पष्ट पद आणि व्यंजनांनी कम्मवाचा ऐकवण्यास असमर्थ असतो, व्यंजन किंवा पद गाळतो, किंवा वेगळ्या प्रकारे बोलायचे असताना वेगळ्याच प्रकारे बोलतो, तो 'अप्रतिबल' होय. याच्या उलट असणारा या अर्थाने 'प्रतिबल' समजावा. 'संघाला ज्ञापित करावे' म्हणजे संघाला अवगत करावे. त्यानंतर संघाला जे अवगत करायचे आहे, ते दर्शवण्यासाठी 'सुणातु मे भन्ते' (भन्ते, संघाने माझे ऐकावे) इत्यादी म्हटले आहे. ๗๑. อุปสมฺปนฺนสมนนฺตราติ อุปสมฺปนฺโน หุตฺวา สมนนฺตรา. อนาจารํ อาจรตีติ ปณฺณตฺติวีติกฺกมํ กโรติ. อุลฺลุมฺปตุ มนฺติ อุทฺธรตุ มํ, อกุสลา วุฏฺฐาเปตฺวา กุสเล ปติฏฺฐเปตุ; สามเณรภาวา วา อุทฺธริตฺวา ภิกฺขุภาเว ปติฏฺฐาเปตูติ. อนุกมฺปํ อุปาทายาติ อนุทฺทยํ ปฏิจฺจ; มยิ อนุกปฺปํ กตฺวาติ อตฺโถ. ७१. 'उपसंपन्नसमनन्तरा' म्हणजे उपसंपन्न झाल्यानंतर लगेचच. 'अनाचार आचरतो' म्हणजे विनय नियमांचे (पण्णत्ति) उल्लंघन करतो. 'उल्लुम्पतु मं' म्हणजे माझा उद्धार करा, अकुशलातून बाहेर काढून कुशलात प्रतिष्ठित करा; किंवा सामणेर भावातून उद्धार करून भिक्खू भावात प्रतिष्ठित करा, असा अर्थ आहे. 'अनुकम्पं उपादाय' म्हणजे करुणेचा आश्रय घेऊन; माझ्यावर अनुकंपा करून, असा अर्थ आहे. ๗๓. อฏฺฐิตา โหตีติ นิจฺจปฺปวตฺตินี โหติ. จตฺตาโร นิสฺสเยติ จตฺตาโร ปจฺจเย. ยสฺมา จตฺตาโร ปจฺจเย นิสฺสาย อตฺตภาโว ปวตฺตติ, ตสฺมา เต นิสฺสยาติ วุจฺจนฺติ. ७३. 'अट्ठिता होती' म्हणजे निरंतर चालणारी असते. 'चार निश्रय' म्हणजे चार प्रत्यय (गरजा). ज्या अर्थी चार प्रत्ययांवर अवलंबून राहून हा आत्मभाव (अस्तित्व) टिकून राहतो, म्हणून त्यांना 'निश्रय' असे म्हणतात. ราธพฺราหฺมณวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. राध ब्राह्मण वत्थु कथा समाप्त झाली. อาจริยวตฺตกถา आचार्य वत्त कथा ๗๕. กินฺตายํ ภิกฺขุ โหตีติ กึ เต อยํ ภิกฺขุ โหติ. อญฺเญหิ โอวทิโย อนุสาสิโยติ อญฺเญหิ โอวทิตพฺโพ เจว อนุสาสิตพฺโพ จ. พาหุลฺลาย อาวตฺโต ยทิทํ คณพนฺธิกนฺติ คณพนฺโธ เอตสฺส พาหุลฺลสฺส อตฺถีติ คณพนฺธิกํ, พาหุลฺลํ. ยํ อิทํ คณพนฺธิกํ นาม พาหุลฺลํ, ตทตฺถาย อติลหุํ ตฺวํ อาปนฺโนติ วุตฺตํ โหติ. ७५. 'किंतायं भिक्खु होती' म्हणजे हा भिक्खू तुझा काय लागतो? 'इतरांकडून ओवादावा आणि अनुशासावा' म्हणजे इतरांकडून उपदेश देण्यास आणि शिकवण्यास योग्य असा. 'बाहुल्ल्याकडे वळला जो हा गणबंधिक' म्हणजे या बाहुल्याचा (वस्तूंच्या संचयाचा) गणबंध (समूह बनवणे) आहे म्हणून तो गणबंधिक, बाहुल्य होय. जे हे गणबंधिक नावाचे बाहुल्य आहे, त्यासाठी तू अत्यंत वेगाने प्राप्त झालास, असे म्हटले आहे. ๗๖. อพฺยตฺตาติ ปญฺญาเวยฺยตฺติเยน วิรหิตา. อญฺญตฺตโรปิ อญฺญติตฺถิยปุพฺโพติ ปสูโร ปริพฺพาชโก. โส กิร ‘‘ธมฺมํ เถเนสฺสามี’’ติ [Pg.266] อุทายิตฺเถรสฺส สนฺติเก ปพฺพชิตฺวา เตน สหธมฺมิกํ วุจฺจมาโน ตสฺส วาทํ อาโรเปสิ. อนุชานามิ ภิกฺขเว พฺยตฺเตน ภิกฺขุนาติอาทิมฺหิ พฺยตฺโต ปุพฺเพ ภิกฺขุโนวาทกวณฺณนายํ วุตฺตลกฺขโณเยว. โย ปน อนฺเตวาสิโน วา สทฺธิวิหาริกสฺส วา คิลานสฺส สกฺโกติ อุปฏฺฐานาทีนิ กาตุํ, อยํ อิธ ปฏิพโลติ อธิปฺเปโต. วุตฺตมฺปิ เจตํ – ७६. 'अव्यत्त' म्हणजे प्रज्ञेच्या कुशलतेने रहित असणारे. 'दुसरा कोणी अन्यतीर्थीय पूर्व' म्हणजे पसूर नावाचा परिव्राजक. तो म्हणे, 'मी धर्माची चोरी करीन' अशा विचाराने उदायी स्थविरांच्या जवळ प्रवज्जित झाला आणि त्यांच्याकडून सहधार्मिक नियम सांगितले जात असताना, त्याने त्यांच्यावर दोषारोप केला. 'भिक्खूंनो, मी व्यत्त भिक्खूने... अनुमती देतो' इत्यादीमध्ये 'व्यत्त' म्हणजे पूर्वी भिक्खुनोवादक वर्णनामध्ये सांगितलेल्या लक्षणांचाच भिक्खू होय. परंतु, जो अंतेवासिक किंवा सद्धिविहारिक आजारी असताना त्यांची सेवा इत्यादी करण्यास समर्थ असतो, तो येथे 'प्रतिबल' म्हणून अभिप्रेत आहे. हे असे म्हटले देखील आहे – ‘‘ปญฺจหุปาลิ, องฺเคหิ สมนฺนาคเตน ภิกฺขุนา อุปสมฺปาเทตพฺพํ, นิสฺสโย ทาตพฺโพ, สามเณโร อุปฏฺฐาเปตพฺโพ. กตเมหิ ปญฺจหิ? ปฏิพโล โหติ อนฺเตวาสึ วา สทฺธิวิหารึ วา คิลานํ อุปฏฺฐาตุํ วา อุปฏฺฐาเปตุํ วา, อนภิรตํ วูปกาเสตุํ วา วูปกาสาเปตุํ วา, อุปฺปนฺนํ กุกฺกุจฺจํ ธมฺมโต วิโนเทตุํ, อภิธมฺเม วิเนตุํ, อภิวินเย วิเนตู’’นฺติ (ปริ. ๔๑๘). 'उपालि, पाच अंगांनी युक्त असलेल्या भिक्खूने उपसंपदा दिली पाहिजे, निश्रय दिला पाहिजे, सामणेराची सेवा घेतली पाहिजे. कोणत्या पाच अंगांनी? तो अंतेवासिक किंवा सद्धिविहारिक आजारी असताना स्वतः सेवा करण्यास किंवा दुसऱ्याकडून सेवा करवून घेण्यास समर्थ असतो; अनुत्साह (अनभिरती) दूर करण्यास किंवा दुसऱ्याकडून दूर करवून घेण्यास समर्थ असतो; उत्पन्न झालेली शंका धर्मानुसार दूर करण्यास समर्थ असतो; अभिधम्मामध्ये प्रशिक्षित करण्यास समर्थ असतो; अभिविनयामध्ये प्रशिक्षित करण्यास समर्थ असतो' (परि. ४१८). ๗๗. ปกฺขสงฺกนฺเตสูติ ติตฺถิยปกฺขสงฺกนฺเตสุ. อนุชานามิ ภิกฺขเว อาจริยนฺติ อาจารสมาจารสิกฺขาปนกํ อาจริยํ อนุชานามิ. อาจริโย ภิกฺขเว อนฺเตวาสิกมฺหีติอาทิ สพฺพํ ‘‘อุปชฺฌาโย ภิกฺขเว สทฺธิวิหาริกมฺหี’’ติอาทินา นเยน วุตฺตวเสเนว เวทิตพฺพํ. นามมตฺตเมว หิ เอตฺถ นานํ. ७७. 'पक्खसंकंतेसु' म्हणजे तीर्थिकांच्या पक्षात गेलेल्यांवर. 'भिक्खूंनो, मी आचार्याला अनुमती देतो' म्हणजे आचार-समाचाराची शिकवण देणाऱ्या आचार्याला मी अनुमती देतो. 'भिक्खूंनो, आचार्य अंतेवासिकाशी...' इत्यादी सर्व 'भिक्खूंनो, उपाध्याय सद्धिविहारिकाशी...' इत्यादी पद्धतीने सांगितल्याप्रमाणेच समजावे. कारण येथे केवळ नावाचाच फरक आहे. อาจริยวตฺตกถา นิฏฺฐิตา. आचार्य वत्त कथा समाप्त झाली. ปณามนาขมนากถา पणामना-खमना कथा ๘๐. อนฺเตวาสิกา อาจริเยสุ น สมฺมา วตฺตนฺตีติ เอตฺถ ปน ยํ ปุพฺเพ ‘‘นสมฺมาวตฺตนาย จ ยาว จีวรรชนํ, ตาว วตฺเต อกริยมาเน อุปชฺฌายสฺส ปริหานิ โหติ, ตสฺมา ตํ อกโรนฺตสฺส นิสฺสยมุตฺตกสฺสาปิ อมุตฺตกสฺสาปิ อาปตฺติเยวา’’ติ จ, ‘‘เอกจฺจสฺส ปตฺตทานโต ปฏฺฐาย อมุตฺตกนิสฺสยสฺเสว อาปตฺตี’’ติ จ ลกฺขณํ วุตฺตํ, น เตเนว ลกฺขเณน นิสฺสยนฺเตวาสิกสฺส อาปตฺติ เวทิตพฺพา. นิสฺสยนฺเตวาสิเกน หิ ยาว อาจริยํ นิสฺสาย วสติ, ตาว สพฺพํ อาจริยวตฺตํ กาตพฺพํ. ปพฺพชฺชาอุปสมฺปทาธมฺมนฺเตวาสิเกหิ ปน นิสฺสยมุตฺตเกหิปิ [Pg.267] อาทิโต ปฏฺฐาย ยาว จีวรรชนํ, ตาว วตฺตํ กาตพฺพํ; อนาปุจฺฉิตฺวา ปตฺตทานาทิมฺหิ ปน เอเตสํ อนาปตฺติ. เอเตสุ จ ปพฺพชฺชนฺเตวาสิโก จ อุปสมฺปทนฺเตวาสิโก จ อาจริยสฺส ยาวชีวํ ภาโร. นิสฺสยนฺเตวาสิโก จ ธมฺมนฺเตวาสิโก จ ยาว สมีเป วสนฺติ, ตาวเทว. ตสฺมา อาจริเยนาปิ เตสุ สมฺมา วตฺติตพฺพํ. อาจริยนฺเตวาสิเกสุ หิ โย โย น สมฺมา วตฺตติ, ตสฺส ตสฺส อาปตฺติ. ८०. परंतु, 'अंतेवासिक (शिष्य) आचार्यांशी योग्य प्रकारे वागत नाहीत' या संदर्भात पूर्वी जे लक्षण (नियम) सांगितले आहे की, 'योग्य प्रकारे न वागल्यामुळे आणि जोपर्यंत चीवर रंगवण्याचे काम पूर्ण होत नाही तोपर्यंत कर्तव्ये न केल्यास उपाध्यायांची हानी होते, म्हणून ते न करणाऱ्या निस्य-मुक्त (निस्य संपलेल्या) आणि अमुक्त (निस्य सुरू असलेल्या) दोघांनाही आपत्ती (दोष) येतेच' आणि 'काहींच्या मते, पात्र देण्यापासून सुरुवात करून केवळ अमुक्त-निस्य शिष्यालाच आपत्ती येते', त्या लक्षणाने निस्य-अंतेवासिकाची आपत्ती समजली जाऊ नये. कारण निस्य-अंतेवासिकाने जोपर्यंत तो आचार्यांच्या आश्रयाने राहतो, तोपर्यंत आचार्यांचे सर्व कर्तव्य केले पाहिजे. परंतु प्रवज्जा-अंतेवासिक, उपसंपदा-अंतेवासिक आणि धम्म-अंतेवासिक यांनी, जरी ते निस्य-मुक्त असले तरी, सुरुवातीपासून चीवर रंगवण्यापर्यंतचे कर्तव्य केले पाहिजे; परंतु आचार्यांना न विचारता पात्र देणे इत्यादी बाबतीत त्यांना अनापत्ती (दोष नाही) आहे. आणि या शिष्यांमध्ये प्रवज्जा-अंतेवासिक व उपसंपदा-अंतेवासिक हे आचार्यांचे आयुष्यभर दायित्व असतात. निस्य-अंतेवासिक आणि धम्म-अंतेवासिक हे जोपर्यंत जवळ राहतात, तोपर्यंतच त्यांचे दायित्व असते. म्हणून आचार्यांनीही त्यांच्याशी योग्य प्रकारे वागले पाहिजे. कारण आचार्य आणि अंतेवासिक यांच्यात जो जो योग्य प्रकारे वागत नाही, त्याला त्याला आपत्ती प्राप्त होते. ปณามนาขมนากถา นิฏฺฐิตา. प्रणामन-खमन-कथा (शिष्याला काढून टाकणे आणि क्षमा मागणे याविषयीची चर्चा) समाप्त झाली. นิสฺสยปฏิปฺปสฺสทฺธิกถา निस्य-प्रतिप्रस्रब्धी-कथा (निस्य किंवा आश्रय समाप्त होण्याविषयीची चर्चा) ๘๓. อุปชฺฌายมฺหา นิสฺสยปฏิปฺปสฺสทฺธีสุ – อุปชฺฌาโย ปกฺกนฺโต วาติอาทีสุ อยํ วินิจฺฉโย – ปกฺกนฺโตติ ตมฺหา อาวาสา วิปฺปวสิตุกาโม ปกฺกนฺโต ทิสํ คโต. เอวํ คเต จ ปน ตสฺมึ สเจ วิหาเร นิสฺสยทายโก อตฺถิ, ยสฺส สนฺติเก อญฺญทาปิ นิสฺสโย วา คหิตปุพฺโพ โหติ, โย วา เอกสมฺโภคปริโภโค, ตสฺส สนฺติเก นิสฺสโย คเหตพฺโพ, เอกทิวสมฺปิ ปริหาโร นตฺถิ. สเจ ตาทิโส นตฺถิ, อญฺโญ ลชฺชี เปสโล อตฺถิ, ตสฺส ลชฺชีเปสลภาวํ ชานนฺเตน ตทเหว นิสฺสโย ยาจิตพฺโพ. สเจ เทติ, อิจฺเจตํ กุสลํ. อถ ปน ‘‘ตุมฺหากํ อุปชฺฌาโย ลหุํ อาคมิสฺสตี’’ติ ปุจฺฉติ, อุปชฺฌาเยน จ ตถา วุตฺตํ, ‘‘อาม, ภนฺเต’’ติ วตฺตพฺพํ. สเจ วทติ ‘‘เตน หิ อุปชฺฌายสฺส อาคมนํ อาคเมถา’’ติ วฏฺฏติ. อถ ปนสฺส ปกติยา เปสลภาวํ น ชานาติ, จตฺตาริ ปญฺจ ทิวสานิ ตสฺส ภิกฺขุโน สภาคตํ โอโลเกตฺวา โอกาสํ กาเรตฺวา นิสฺสโย คเหตพฺโพ. ८३. उपाध्यायांकडून निस्य (आश्रय) समाप्त होण्याच्या बाबतीत—'उपाध्याय निघून गेले' इत्यादी वाक्यांमध्ये हा निर्णय आहे—'निघून गेले' म्हणजे त्या विहारातून बाहेर राहण्याची इच्छा धरून दुसऱ्या दिशेला निघून गेले. त्यांच्या अशा प्रकारे निघून गेल्यावर जर विहारात निस्य देण्यास समर्थ कोणी असेल, ज्यांच्याकडे पूर्वी कधी निस्य घेतला होता किंवा जे समान संभोग व परिभोग असणारे आहेत, त्यांच्याकडे निस्य घेतला पाहिजे; एक दिवसही निस्य न घेता राहण्याची सूट नाही. जर तसा कोणी नसेल, पण दुसरा कोणी लज्जावान व शीलवान भिक्खू असेल, तर त्याचा लज्जावान व शीलवान स्वभाव जाणणाऱ्या भिक्खूने त्याच दिवशी निस्य मागितला पाहिजे. जर त्यांनी निस्य दिला, तर ते उत्तम आहे. परंतु जर ते विचारतात की, 'तुमचे उपाध्याय लवकरच परत येतील का?' आणि उपाध्यायांनीही तसेच सांगितले असेल, तर 'होय, भंते' असे म्हणावे. जर ते म्हणतात की, 'तसे असेल तर उपाध्यायांच्या येण्याची वाट पाहा', तर ते योग्य आहे. परंतु जर त्यांच्या शीलवान स्वभावाविषयी माहिती नसेल, तर चार-पाच दिवस त्या भिक्खूच्या अनुकूलतेचे निरीक्षण करून, परवानगी मिळवून निस्य घेतला पाहिजे. สเจ ปน วิหาเร นิสฺสยทายโก นตฺถิ, อุปชฺฌาโย จ ‘‘อหํ กติปาเหน อาคมิสฺสามิ, มา อุกฺกณฺฐิตฺถา’’ติ วตฺวา คโต, ยาว อาคมนา ปริหาโร ลพฺภติ. อถาปิ นํ ตตฺถ มนุสฺสา ปริจฺฉินฺนกาลโต อุตฺตริปิ ปญฺจ วา ทส วา ทิวสานิ วาเสนฺติเยว, เตน วิหารํ ปวตฺติ เปเสตพฺพา ‘‘ทหรา มา อุกฺกณฺฐนฺตุ, อหํ อสุกทิวสํ นาม [Pg.268] อาคมิสฺสามี’’ติ. เอวมฺปิ ปริหาโร ลพฺภติ. อถ อาคจฺฉโต อนฺตรามคฺเค นทีปูเรน วา โจราทีหิ วา อุปทฺทโว โหติ, เถโร อุทโกสกฺกนํ วา อาคเมติ, สหาเย วา ปริเยสติ, ตญฺเจ ปวตฺตึ ทหรา สุณนฺติ, ยาว อาคมนา ปริหาโร ลพฺภติ. สเจ ปน โส ‘‘อิเธวาหํ วสิสฺสามี’’ติ ปหิณติ, ปริหาโร นตฺถิ. ยตฺถ นิสฺสโย ลพฺภติ, ตตฺถ คนฺตพฺพํ. परंतु जर विहारात निस्य देणारा कोणी नसेल आणि उपाध्याय 'मी काही दिवसांत परत येईन, कंटाळू नका' असे सांगून गेले असतील, तर त्यांच्या येईपर्यंत सूट मिळते. आणि जर तेथे लोक त्यांना ठरवलेल्या वेळेपेक्षा अधिक पाच किंवा दहा दिवस थांबवून ठेवत असतील, तर त्यांनी विहारात निरोप पाठवला पाहिजे की, 'तरुण भिक्खूंनो, कंटाळू नका, मी अमुक दिवशी परत येईन.' अशा प्रकारेही सूट मिळते. परंतु जर परत येत असताना वाटेत नदीला पूर आल्यामुळे किंवा चोरांच्या उपद्रवामुळे संकट आले, आणि स्थवीर पाणी ओसरण्याची वाट पाहत असतील किंवा सोबती शोधत असतील, आणि ही बातमी तरुण भिक्खूंनी ऐकली, तर त्यांच्या येईपर्यंत सूट मिळते. परंतु जर त्यांनी 'मी येथेच राहीन' असा निरोप पाठवला, तर सूट मिळत नाही. जेथे निस्य मिळेल, तेथे गेले पाहिजे. วิพฺภนฺเต ปน กาลงฺกเต ปกฺขสงฺกนฺเต วา เอกทิวสมฺปิ ปริหาโร นตฺถิ. ยตฺถ นิสฺสโย ลพฺภติ, ตตฺถ คนฺตพฺพํ. อาณตฺตีติ ปน นิสฺสยปณามนา วุจฺจติ. ตสฺมา ‘‘ปณาเมมิ ต’’นฺติ วา ‘‘มา อิธ ปฏิกฺกมี’’ติ วา ‘‘นีหร เต ปตฺตจีวร’’นฺติ วา ‘‘นาหํ ตยา อุปฏฺฐาตพฺโพ’’ติ วาติ อิมินา ปาฬินเยน ‘‘มา มํ คามปฺปเวสนํ อาปุจฺฉี’’ติอาทินา ปาฬิมุตฺตกนเยน วา โย นิสฺสยปณามนาย ปณามิโต โหติ, เตน อุปชฺฌาโย ขมาเปตพฺโพ. परंतु उपाध्याय गृहस्थ झाले, कालवश झाले किंवा दुसऱ्या पंथात गेले, तर एक दिवसही सूट मिळत नाही. जेथे निस्य मिळेल, तेथे गेले पाहिजे. परंतु 'आज्ञा' म्हणजे निस्य-प्रणामना (निस्य काढून टाकणे) असे म्हटले जाते. म्हणून, 'मी तुला काढून टाकतो' किंवा 'येथे येऊ नकोस' किंवा 'तुझे पात्र व चीवर घेऊन जा' किंवा 'मी तुझ्याकडून सेवा करून घेणार नाही' या पालि नियमानुसार, किंवा 'मला गावात जाण्याविषयी विचारू नकोस' इत्यादी पालि-मुक्त नियमानुसार, ज्याला निस्य-प्रणामनेद्वारे काढून टाकले गेले आहे, त्याने उपाध्यायांची क्षमा मागितली पाहिजे. สเจ อาทิโตว น ขมติ, ทณฺฑกมฺมํ อาหริตฺวา ติกฺขตฺตุํ ตาว สยเมว ขมาเปตพฺโพ. โน เจ ขมติ, ตสฺมึ วิหาเร มหาเถเร คเหตฺวา ขมาเปตพฺโพ. โน เจ ขมติ, สามนฺตวิหาเร ภิกฺขู คเหตฺวา ขมาเปตพฺโพ. สเจ เอวมฺปิ น ขมติ, อญฺญตฺถ คนฺตฺวา อุปชฺฌายสฺส สภาคานํ สนฺติเก วสิตพฺพํ ‘‘อปฺเปว นาม สภาคานํ เม สนฺติเก วสตีติ ญตฺวาปิ ขเมยฺยา’’ติ. สเจ เอวมฺปิ น ขมติ, ตตฺเรว วสิตพฺพํ. ตตฺร เจ ทุพฺภิกฺขาทิโทเสน น สกฺกา โหติ วสิตุํ, ตํเยว วิหารํ อาคนฺตฺวา อญฺญสฺส สนฺติเก นิสฺสยํ คเหตฺวา วสิตุํ วฏฺฏติ. อยมาณตฺติยํ วินิจฺฉโย. जर ते सुरुवातीलाच क्षमा करत नसतील, तर दंडकर्म करून आधी स्वतःच तीन वेळा क्षमा मागितली पाहिजे. तरीही क्षमा न केल्यास, त्या विहारातील महास्थविरांना सोबत घेऊन क्षमा मागितली पाहिजे. तरीही क्षमा न केल्यास, शेजारच्या विहारातील भिक्खूंना सोबत घेऊन क्षमा मागितली पाहिजे. जर अशा प्रकारेही क्षमा करत नसतील, तर दुसऱ्या ठिकाणी जाऊन उपाध्यायांच्या समान विचारसरणीच्या स्थविरांच्या जवळ राहिले पाहिजे, या विचाराने की—'हा माझ्या समान विचारसरणीच्या स्थविरांजवळ राहत आहे, हे जाणून कदाचित ते क्षमा करतील.' जर अशा प्रकारेही क्षमा करत नसतील, तर तेथेच राहिले पाहिजे. जर तेथे दुष्काळ इत्यादी दोषांमुळे राहणे शक्य नसेल, तर त्याच विहारात परत येऊन दुसऱ्या कोणाकडे निस्य घेऊन राहणे योग्य आहे. हा आज्ञेच्या बाबतीत निर्णय आहे. อาจริยมฺหา นิสฺสยปฏิปฺปสฺสทฺธีสุ อาจริโย ปกฺกนฺโต วา โหตีติ เอตฺถ โกจิ อาจริโย อาปุจฺฉิตฺวา ปกฺกมติ, โกจิ อนาปุจฺฉิตฺวา. อนฺเตวาสิโกปิ เอวเมว. ตตฺร สเจ อนฺเตวาสิโก อาจริยํ อาปุจฺฉติ ‘‘อสุกํ นาม ภนฺเต ฐานํ คนฺตุํ อิจฺฉามิ เกนจิเทว กรณีเยนา’’ติ, อาจริเยน จ ‘‘กทา คมิสฺสสี’’ติ วุตฺโต ‘‘สายนฺเห วา รตฺตึ วา อุฏฺฐหิตฺวา คมิสฺสามี’’ติ วทติ, อาจริโยปิ ‘‘สาธู’’ติ สมฺปฏิจฺฉติ, ตงฺขณญฺเญว นิสฺสโย ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. आचार्यांकडून निस्य समाप्त होण्याच्या बाबतीत—'आचार्य निघून गेले' या संदर्भात, काही आचार्य विचारून निघून जातात, तर काही न विचारता. अंतेवासिक देखील तसेच करतो. त्यात जर अंतेवासिक आचार्यांना विचारतो की, 'भंते, मला काही कामासाठी अमुक ठिकाणी जाण्याची इच्छा आहे', आणि आचार्यांनी 'कधी जाणार?' असे विचारल्यावर तो म्हणतो की, 'संध्याकाळी किंवा रात्री उठून जाईन', आणि आचार्यही 'ठीक आहे' असे स्वीकारतात, तर त्याच क्षणी निस्य समाप्त होतो. สเจ [Pg.269] ปน ‘‘ภนฺเต อสุกํ นาม ฐานํ คนฺตุกาโมมฺหี’’ติ วุตฺเต อาจริโย ‘‘อสุกสฺมึ นาม คาเม ปิณฺฑาย จริตฺวา ปจฺฉา ชานิสฺสสี’’ติ วทติ, โส จ ‘‘สาธู’’ติ สมฺปฏิจฺฉติ, ตโต เจ คโต, สุคโต. สเจ ปน น คจฺฉติ, นิสฺสโย น ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. อถาปิ ‘‘คจฺฉามี’’ติ วุตฺเต อาจริเยน ‘‘มา ตาว คจฺฉ, รตฺตึ มนฺเตตฺวา ชานิสฺสามา’’ติ วุตฺโต มนฺเตตฺวา คจฺฉติ, สุคโต. โน เจ คจฺฉติ, นิสฺสโย น ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. อาจริยํ อนาปุจฺฉา ปกฺกมนฺตสฺส ปน อุปจารสีมาติกฺกเม นิสฺสโย ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. อนฺโตอุปจารสีมโต ปฏินิวตฺตนฺตสฺส น ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. परंतु जर 'भंते, मला अमुक ठिकाणी जाण्याची इच्छा आहे' असे म्हटल्यावर, आचार्य म्हणतात की, 'अमुक गावात पिंडपातासाठी फिरून आल्यावर नंतर ठरवू', आणि तोही 'ठीक आहे' असे स्वीकारतो, आणि त्यानंतर तो गेला, तर ते योग्य प्रकारे जाणे होते. परंतु जर तो जात नाही, तर निस्य समाप्त होत नाही. आणि जर 'मी जातो' असे म्हटल्यावर आचार्यांनी 'आता जाऊ नकोस, रात्री चर्चा करून ठरवू' असे सांगितले, आणि तो चर्चा करून जातो, तर ते योग्य प्रकारे जाणे होते. जर तो जात नाही, तर निस्य समाप्त होत नाही. परंतु आचार्यांना न विचारता निघून जाणाऱ्या भिक्खूचा निस्य उपचार-सीमा ओलांडल्यावर समाप्त होतो. उपचार-सीमेच्या आतूनच परत येणाऱ्याचा निस्य समाप्त होत नाही. สเจ ปน อาจริโย อนฺเตวาสิกํ อาปุจฺฉติ ‘‘อาวุโส อสุกํ นาม ฐานํ คมิสฺสามี’’ติ, อนฺเตวาสิเกน จ ‘‘กทา’’ติ วุตฺเต ‘‘สายนฺเห วา รตฺติภาเค วา’’ติ วทติ, อนฺเตวาสิโกปิ ‘‘สาธู’’ติ สมฺปฏิจฺฉติ, ตงฺขณญฺเญว นิสฺสโย ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. परंतु, जर आचार्य अंतेवासिकाला विचारतात की, 'आयुष्यमान, मी अमुक ठिकाणी जाईन,' आणि अंतेवासिकाने 'कधी?' असे विचारले असता, 'संध्याकाळी किंवा रात्रीच्या वेळी' असे म्हणतात, आणि अंतेवासिक सुद्धा 'ठीक आहे' म्हणून ते स्वीकारतो, तर त्याच क्षणी निस्सय समाप्त होतो. สเจ ปน อาจริโย ‘‘สฺเว ปิณฺฑาย จริตฺวา คมิสฺสามี’’ติ วทติ, อิตโร จ ‘‘สาธู’’ติ สมฺปฏิจฺฉติ, เอกทิวสํ ตาว นิสฺสโย น ปฏิปฺปสฺสมฺภติ, ปุนทิวเส ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหติ. ‘‘อสุกสฺมึ นาม คาเม ปิณฺฑาย จริตฺวา ชานิสฺสามิ มม คมนํ วา อคมนํ วา’’ติ วตฺวา สเจ น คจฺฉติ, นิสฺสโย น ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. อถาปิ ‘‘คจฺฉามี’’ติ วุตฺเต อนฺเตวาสิเกน ‘‘มา ตาว คจฺฉถ, รตฺตึ มนฺเตตฺวา ชานิสฺสถา’’ติ วุตฺโต มนฺเตตฺวาปิ น คจฺฉติ, นิสฺสโย น ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. परंतु, जर आचार्य म्हणतात की, 'उद्या पिंडपातासाठी चारिका करून मी जाईन,' आणि दुसरा (अंतेवासिक) 'ठीक आहे' म्हणून स्वीकारतो, तर एक दिवस तरी निस्सय समाप्त होत नाही, दुसऱ्या दिवशी तो समाप्त होतो. 'अमुक गावात पिंडपातासाठी चारिका करून माझे जाणे किंवा न जाणे ठरवीन' असे बोलून जर ते गेले नाहीत, तर निस्सय समाप्त होत नाही. किंवा 'मी जातो' असे म्हटले असता, अंतेवासिकाने 'अजून जाऊ नका, रात्री विचारविनिमय करून ठरवा' असे म्हटल्यावर, विचारविनिमय करूनही जर ते गेले नाहीत, तर निस्सय समाप्त होत नाही. สเจ อุโภปิ อาจริยนฺเตวาสิกา เกนจิ กรณีเยน พหิสีมํ คจฺฉนฺติ, ตโต เจ อาจริโย คมิยจิตฺเต อุปฺปนฺเน อนาปุจฺฉาว คนฺตฺวา ทฺวินฺนํ เลฑฺฑุปาตานํ อนฺโตเยว นิวตฺตติ, นิสฺสโย น ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. สเจ ทฺเว เลฑฺฑุปาเต อติกฺกมิตฺวา นิวตฺตติ, ปฏิปฺปสฺสทฺโธ โหติ. อาจริยุปชฺฌายา ทฺเว เลฑฺฑุปาเต อติกฺกมฺม อญฺญสฺมึ วิหาเร วสนฺติ, นิสฺสโย ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. जर आचार्य आणि अंतेवासिक दोघेही काही कारणास्तव सीमेबाहेर जातात, आणि तेथून आचार्यांच्या मनात जाण्याचा विचार आल्यावर, न विचारता जाऊन दोन ढेकूळफेकीच्या अंतराच्या आतच जर ते परत येतात, तर निस्सय समाप्त होत नाही. जर दोन ढेकूळफेकीचे अंतर ओलांडून परत येतात, तर तो समाप्त होतो. जर आचार्य आणि उपाध्याय दोन ढेकूळफेकीचे अंतर ओलांडून दुसऱ्या विहारात राहतात, तर निस्सय समाप्त होतो. อาจริเย วิพฺภนฺเต กาลงฺกเต ปกฺขสงฺกนฺเต จ ตงฺขณญฺเญว ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. อาณตฺติยํ ปน สเจปิ อาจริโย มุญฺจิตุกาโมว หุตฺวา นิสฺสยปณามนาย ปณาเมติ, อนฺเตวาสิโก จ ‘‘กิญฺจาปิ มํ อาจริโย ปณาเมติ, อถ โข หทเยน มุทุโก’’ติ สาลโยว โหติ, นิสฺสโย น ปฏิปฺปสฺสมฺภติเยว. สเจปิ อาจริโย สาลโย, อนฺเตวาสิโก [Pg.270] นิราลโย, ‘‘น ทานิ อิมํ นิสฺสาย วสิสฺสามี’’ติ ธุรํ นิกฺขิปติ, เอวมฺปิ น ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. อุภินฺนํ สาลยภาเว ปน น ปฏิปฺปสฺสมฺภติเยว. อุภินฺนํ ธุรนิกฺเขเปน ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. ปณามิเตน ทณฺฑกมฺมํ อาหริตฺวา ติกฺขตฺตุํ ขมาเปตพฺโพ. โน เจ ขมติ, อุปชฺฌาเย วุตฺตนเยน ปฏิปชฺชิตพฺพํ. आचार्य गृहस्थ बनल्यास, कालवश झाल्यास किंवा दुसऱ्या पक्षात गेल्यास त्याच क्षणी निस्सय समाप्त होतो. परंतु हाकलून देण्याच्या बाबतीत, जरी आचार्य खरोखरच मुक्त करण्याची इच्छा ठेवून निस्सय समाप्त करण्यासाठी हाकलून देतात, आणि अंतेवासिक 'जरी आचार्य मला हाकलून देत असले, तरी त्यांचे हृदय माझ्याविषयी दयाळू आहे' असा विचार करून आसक्ती बाळगून राहतो, तर निस्सय मुळीच समाप्त होत नाही. जरी आचार्य आसक्ती बाळगून असतील आणि अंतेवासिक अनासक्त असेल आणि 'आता मी या आचार्यांच्या आश्रयाने राहणार नाही' असे म्हणून आपली जबाबदारी सोडून देतो, तरीही निस्सय समाप्त होत नाही. परंतु दोघांच्याही मनात आसक्ती असल्यास तो मुळीच समाप्त होत नाही. दोघांनीही जबाबदारी सोडल्यास निस्सय समाप्त होतो. हाकलून दिलेल्या शिष्याने दंडकर्म करून तीन वेळा क्षमा मागितली पाहिजे. जर ते क्षमा करत नसतील, तर उपाध्यायाच्या प्रकरणात सांगितलेल्या पद्धतीने आचरण करावे. อุปชฺฌาเยน วา สโมธานคโตติ เอตฺถ ทสฺสนสวนวเสน สโมธานํ เวทิตพฺพํ. สเจ หิ อาจริยํ นิสฺสาย วสนฺโต สทฺธิวิหาริโก เอกวิหาเร เจติยํ วา วนฺทนฺตํ เอกคาเม ปิณฺฑาย วา จรนฺตํ อุปชฺฌายํ ปสฺสติ, นิสฺสโย ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. อุปชฺฌาโย ปสฺสติ, สทฺธิวิหาริโก ปน น ปสฺสติ, น ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. มคฺคปฺปฏิปนฺนํ วา อากาเสน วา คจฺฉนฺตํ อุปชฺฌายํ ทิสฺวา ทูรตฺตา ภิกฺขูติ ชานาติ, อุปชฺฌาโยติ น ชานาติ, น ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. สเจ ชานาติ, ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. อุปริปาสาเท อุปชฺฌาโย วสติ, เหฏฺฐา สทฺธิวิหาริโก, ตํ อทิสฺวาว ยาคุํ ปิวิตฺวา ปกฺกมติ, อาสนสาลาย วา นิสินฺนํ อทิสฺวาว เอกมนฺเต ภุญฺชิตฺวา ปกฺกมติ, ธมฺมสฺสวนมณฺฑเป วา นิสินฺนมฺปิ ตํ อทิสฺวาว ธมฺมํ สุตฺวา ปกฺกมติ, นิสฺสโย น ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. เอวํ ตาว ทสฺสนวเสน สโมธานํ เวทิตพฺพํ. 'किंवा उपाध्यायाशी एकत्र येणे' या वाक्यात दर्शन (पाहणे) आणि श्रवण (ऐकणे) या दोन्ही मार्गांनी एकत्र येणे समजले पाहिजे. कारण, जर आचार्यांच्या आश्रयाने राहणारा सद्धि विहारिक एकाच विहारात चैत्याची वंदना करणाऱ्या किंवा एकाच गावात पिंडपातासाठी चारिका करणाऱ्या उपाध्यायाला पाहतो, तर निस्सय समाप्त होतो. जर उपाध्याय पाहतात, परंतु सद्धि विहारिक पाहत नाही, तर निस्सय समाप्त होत नाही. किंवा मार्गाने जाणाऱ्या किंवा आकाशातून जाणाऱ्या उपाध्यायाला पाहून, दूर असल्यामुळे 'हे एक भिक्खू आहेत' एवढेच समजतो, पण 'हे उपाध्याय आहेत' असे ओळखत नाही, तर निस्सय समाप्त होत नाही. जर ओळखतो, तर समाप्त होतो. जर प्रासादाच्या वरच्या मजल्यावर उपाध्याय राहतात आणि खाली सद्धि विहारिक राहतो, आणि त्यांना न पाहताच तो पेज पिऊन निघून जातो, किंवा भोजनशाळेत बसलेल्या उपाध्यायांना न पाहताच एका बाजूला जेवण करून निघून जातो, किंवा धर्मश्रवण मंडपात बसलेल्या त्यांना न पाहताच धर्म ऐकून निघून जातो, तर निस्सय समाप्त होत नाही. अशा प्रकारे दर्शनाच्या आधारे एकत्र येणे समजले पाहिजे. สวนวเสน ปน สเจ อุปชฺฌายสฺส วิหาเร วา อนฺตรฆเร วา ธมฺมํ กเถนฺตสฺส อนุโมทนํ วา กโรนฺตสฺส สทฺทํ สุตฺวา ‘‘อุปชฺฌายสฺส เม สทฺโท’’ติ สญฺชานาติ, นิสฺสโย ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. อสญฺชานนฺตสฺส น ปฏิปฺปสฺสมฺภตีติ อยํ สโมธาเน วินิจฺฉโย. परंतु श्रवणाच्या आधारे, जर विहारात किंवा गावात धर्मोपदेश करणाऱ्या किंवा अनुमोदना करणाऱ्या उपाध्यायांचा आवाज ऐकून 'हा माझ्या उपाध्यायांचा आवाज आहे' असे ओळखतो, तर निस्सय समाप्त होतो. न ओळखणाऱ्याचा निस्सय समाप्त होत नाही. हा एकत्र येण्याबाबतचा निर्णय आहे. นิสฺสยปฏิปฺปสฺสทฺธิกถา นิฏฺฐิตา. निस्सय समाप्तीची कथा समाप्त झाली. อุปสมฺปาเทตพฺพปญฺจกกถา उपसंपदा देण्यायोग्य पाच गोष्टींची कथा. ๘๔. อิทานิ ยํ ปุพฺเพ ‘‘อนุชานามิ ภิกฺขเว พฺยตฺเตน ภิกฺขุนา ปฏิพเลน ทสวสฺเสน วา อติเรกทสวสฺเสน วา อุปสมฺปาเทตุํ, นิสฺสยํ ทาตุ’’นฺติ สงฺเขปโต อุปชฺฌายาจริยานํ ลกฺขณํ วุตฺตํ, ตํ วิตฺถารโต ทสฺเสตุํ ‘‘ปญฺจหิ, ภิกฺขเว, องฺเคหิ สมนฺนาคเตนา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ปญฺจหิ องฺเคหีติ ปญฺจหิ อคุณงฺเคหิ. โส หิ สีลกฺขนฺธาทีหิ อสมนฺนาคตตฺตาว อคุณงฺเคหิ สมนฺนาคโต โหติ. น อุปสมฺปาเทตพฺพนฺติ อุปชฺฌาเยน [Pg.271] หุตฺวา น อุปสมฺปาเทตพฺพํ. น นิสฺสโย ทาตพฺโพติ อาจริเยน หุตฺวา นิสฺสโย น ทาตพฺโพ. เอตฺถ จ น อเสกฺเขน สีลกฺขนฺเธนาติ จ อตฺตนา น อเสกฺเขนาติ จ อสฺสทฺโธติ จ อาทีสุ ตีสุ ปญฺจเกสุ อยุตฺตวเสน ปฏิกฺเขโป กโต, น อาปตฺติองฺควเสน. โย หิ อเสกฺเขหิ สีลกฺขนฺธาทีหิ อสมนฺนาคโต ปเร จ ตตฺถ สมาทเปตุํ อสกฺโกนฺโต อสฺสทฺธิยาทิโทสยุตฺโตว หุตฺวา ปริสํ ปริหรติ, ตสฺส ปริสา สีลาทีหิ ปริหายติเยว, น วฑฺฒติ. ตสฺมา เตน น อุปสมฺปาเทตพฺพนฺติอาทิ อยุตฺตวเสน วุตฺตํ, น อาปตฺติองฺควเสน. น หิ ขีณาสวสฺเสว อุปชฺฌายาจริยภาโว ภควตา อนุญฺญาโต. ยทิ ตสฺเสว อนุญฺญาโต อภวิสฺส, ‘‘สเจ อุปชฺฌายสฺส อนภิรติ อุปฺปนฺนา โหตี’’ติอาทึ น วเทยฺย. ยสฺมา ปน ขีณาสวสฺส ปริสา สีลาทีหิ น ปริหายติ, ตสฺมา ‘‘ปญฺจหิ ภิกฺขเว องฺเคหิ สมนฺนาคเตน ภิกฺขุนา อุปสมฺปาเทตพฺพ’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. ८४. आता, पूर्वी जे संक्षेपाने 'भिक्खूंनो, मी अनुमती देतो की चतुर आणि समर्थ भिक्खूने दहा वर्षे किंवा दहा वर्षांपेक्षा जास्त काळ झाल्यावर उपसंपदा द्यावी, निस्सय द्यावा' असे उपाध्याय आणि आचार्यांचे लक्षण सांगितले होते, ते विस्ताराने दाखवण्यासाठी भगवंतांनी 'भिक्खूंनो, पाच अंगांनी युक्त असलेल्या...' इत्यादी म्हटले. तेथे 'पाच अंगांनी' म्हणजे पाच अवगुणांच्या अंगांनी. कारण तो शीलस्कंध इत्यादींनी युक्त नसल्यामुळेच अवगुणांच्या अंगांनी युक्त असतो. 'उपसंपदा देऊ नये' म्हणजे उपाध्याय बनून उपसंपदा देऊ नये. 'निस्सय देऊ नये' म्हणजे आचार्य बनून निस्सय देऊ नये. आणि येथे 'असेक्ख शीलस्कंधाने युक्त नसलेला' आणि 'स्वतः असेक्ख नसलेला' आणि 'अश्रद्ध' इत्यादी तीन पंचकांमध्ये अयोग्यतेच्या आधारे निषेध केला आहे, आपत्तीच्या अंगांच्या आधारे नाही. कारण जो असेक्ख शीलस्कंध इत्यादींनी युक्त नसतो आणि इतरांना त्यात प्रवृत्त करण्यास असमर्थ असतो, आणि अश्रद्धता इत्यादी दोषांनी युक्त होऊन परिषदेचे संचालन करतो, त्याच्या परिषदेचा शीलादी गुणांपासून ऱ्हासच होतो, वाढ होत नाही. म्हणून 'त्याने उपसंपदा देऊ नये' इत्यादी अयोग्यतेच्या आधारे म्हटले आहे, आपत्तीच्या अंगांच्या आधारे नाही. कारण भगवंतांनी केवळ क्षीणासवांनाच उपाध्याय किंवा आचार्य बनण्याची अनुमती दिली आहे असे नाही. जर केवळ त्यांनाच अनुमती असती, तर 'जर उपाध्यायाच्या मनात अनभिरती उत्पन्न झाली तर...' इत्यादी म्हटले नसते. परंतु ज्याअर्थी क्षीणासवांची परिषद शीलादी गुणांपासून घसरत नाही, म्हणून 'भिक्खूंनो, पाच अंगांनी युक्त असलेल्या भिक्खूने उपसंपदा द्यावी' इत्यादी म्हटले आहे. อธิสีเล สีลวิปนฺโนติอาทีสุ ปาราชิกญฺจ สงฺฆาทิเสสญฺจ อาปนฺโน อธิสีเล สีลวิปนฺโน นาม. อิตเร ปญฺจาปตฺติกฺขนฺเธ อาปนฺโน อชฺฌาจาเร อาจารวิปนฺโน นาม. สมฺมาทิฏฺฐึ ปหาย อนฺตคฺคาหิกาย ทิฏฺฐิยา สมนฺนาคโต อติทิฏฺฐิยา ทิฏฺฐิวิปนฺโน นาม. ยตฺตกํ สุตํ ปริสํ ปริหรนฺตสฺส อิจฺฉิตพฺพํ, เตน วิรหิตตฺตา อปฺปสฺสุโต. ยํ เตน ชานิตพฺพํ อาปตฺตาทิ, ตสฺส อชานนโต ทุปฺปญฺโญ. อิมสฺมึ ปญฺจเก ปุริมานิ ตีณิ ปทานิ อยุตฺตวเสน วุตฺตานิ, ปจฺฉิมานิ ทฺเว อาปตฺติองฺควเสน. 'अधिशीलात शीलविपन्न' इत्यादी शब्दांमध्ये, पाराजिका आणि संघादिसेसाची आपत्ती ओढवून घेतलेला मनुष्य 'अधिशीलात शीलविपन्न' म्हटला जातो. इतर पाच आपत्ती समूहांना ओढवून घेतलेला मनुष्य 'अति-आचारात आचारविपन्न' म्हटला जातो. सम्यक् दृष्टीचा त्याग करून अंतग्राहिका दृष्टीने युक्त असलेला मनुष्य 'अति-दृष्टीत दृष्टीविपन्न' म्हटला जातो. परिषदेचे संचालन करणाऱ्यासाठी जेवढे श्रुत आवश्यक आहे, त्यापासून वंचित असल्यामुळे तो 'अल्पश्रुत' म्हटला जातो. त्याने जे आपत्ती इत्यादी जाणले पाहिजे, ते न जाणल्यामुळे तो 'दुष्प्रज्ञ' म्हटला जातो. या पंचकात पहिली तीन पदे अयोग्यतेच्या आधारे सांगितली आहेत, आणि शेवटची दोन पदे आपत्तीच्या अंगांच्या आधारे सांगितली आहेत. อาปตฺตึ น ชานาตีติ ‘‘อิทํ นาม มยา กต’’นฺติ วุตฺเต ‘‘อิมํ นาม อาปตฺตึ อยํ อาปนฺโน’’ติ น ชานาติ. วุฏฺฐานํ น ชานาตีติ วุฏฺฐานคามินิโต วา เทสนาคามินิโต วา อาปตฺติโต เอวํ นาม วุฏฺฐานํ โหตีติ น ชานาติ. อิมสฺมึ ปญฺจเก ปุริมานิ ทฺเว ปทานิ อยุตฺตวเสน วุตฺตานิ, ปจฺฉิมานิ ตีณิ อาปตฺติองฺควเสน. "आपत्ती जाणत नाही" (आपत्तिं न जानाति) म्हणजे "माझ्याकडून हे अमुक कर्म झाले आहे" असे म्हटले असता, "हा भिक्खू या अमुक नावाच्या आपत्तीला प्राप्त झाला आहे" हे न जाणणे होय। "वुट्ठाण (आपत्तीतून मुक्त होणे) जाणत नाही" (वुट्ठाणं न जानाति) म्हणजे वुट्ठाणगामी आपत्तीतून किंवा देसनागामी आपत्तीतून "अशा प्रकारे वुट्ठाण (शुद्धी) होते" हे न जाणणे होय। या पंचकामध्ये पहिली दोन पदे अयोग्यतेच्या अर्थाने सांगितली आहेत आणि शेवटची तीन पदे आपत्तीच्या अंगाच्या अर्थाने सांगितली आहेत। อาภิสมาจาริกาย สิกฺขายาติ ขนฺธกวตฺเต วิเนตุํ น ปฏิพโล โหตีติ อตฺโถ. อาทิพฺรหฺมจริยกายาติ เสกฺขปณฺณตฺติยํ วิเนตุํ น ปฏิพโลติ อตฺโถ. อภิธมฺเมติ นามรูปปริจฺเฉเท วิเนตุํ น ปฏิพโลติ อตฺโถ. อภิวินเยติ สกเล วินยปิฏเก วิเนตุํ น ปฏิพโลติ อตฺโถ. วิเนตุํ น ปฏิพโลติ จ สพฺพตฺถ สิกฺขาเปตุํ น สกฺโกตีติ [Pg.272] อตฺโถ. ธมฺมโต วิเวเจตุนฺติ ธมฺเมน การเณน วิสฺสชฺชาเปตุํ. อิมสฺมิ ปญฺจเก สพฺพปเทสุ อาปตฺติ. อาปตฺตึ น ชานาตีติอาทิปญฺจกสฺมิมฺปิ สพฺพปเทสุ อาปตฺติ. อูนทสวสฺสปริโยสานปญฺจเกปิ เอเสว นโย. อิติ อาทิโต ตโย ปญฺจกา, จตุตฺเถ ตีณิ ปทานิ, ปญฺจเม ทฺเว ปทานีติ สพฺเพปิ จตฺตาโร ปญฺจกา อยุตฺตวเสน วุตฺตา. จตุตฺถปญฺจเก ทฺเว ปทานิ, ปญฺจเม ตีณิ, ฉฏฺฐสตฺตมอฏฺฐมา ตโย ปญฺจกาติ สพฺเพปิ จตฺตาโร ปญฺจกา อาปตฺติองฺควเสน วุตฺตา; สุกฺกปกฺเข อฏฺฐสุ อนาปตฺติเยวาติ. "आभिसमाचारिक शिक्षेमध्ये" (आभिसमाचारिकाय सिक्खाय) याचा अर्थ खंधकवत्त (खंधक नियमांचे आचरण) मध्ये प्रशिक्षित करण्यास समर्थ नसणे असा आहे। "आदिब्रह्मचर्यक शिक्षेमध्ये" (आदिब्रह्मचरियकाय) याचा अर्थ सेक्खपण्णत्ती (मुख्य प्रातिमोक्ष नियम) मध्ये प्रशिक्षित करण्यास समर्थ नसणे असा आहे। "अभिधम्मामध्ये" (अभिधम्मे) याचा अर्थ नाम-रूप परिच्छेदामध्ये प्रशिक्षित करण्यास समर्थ नसणे असा आहे। "अभिविनयामध्ये" (अभिविनये) याचा अर्थ संपूर्ण विनयपिटकामध्ये प्रशिक्षित करण्यास समर्थ नसणे असा आहे। "प्रशिक्षित करण्यास समर्थ नसणे" (विनेतुं न पटिबलो) याचा अर्थ सर्व ठिकाणी शिकवण्यास असमर्थ असणे असा आहे। "धम्माच्या नियमांनुसार विवेचन करणे" (धम्मतो विवेचेतुं) म्हणजे धम्माच्या कारणाने (योग्य कारणाने) शंकांचे निरसन करणे। या पंचकातील सर्व पदांमध्ये आपत्ती (दोष) होते। "आपत्ती जाणत नाही" इत्यादी पंचकामध्येही सर्व पदांमध्ये आपत्ती होते। दहा वर्षांपेक्षा कमी कालावधीच्या शेवटच्या पंचकामध्येही हाच नियम लागू होतो। अशा प्रकारे सुरुवातीचे तीन पंचक, चौथ्या पंचकातील तीन पदे आणि पाचव्या पंचकातील दोन पदे, हे सर्व चार पंचक अयोग्यतेच्या अर्थाने सांगितले आहेत। चौथ्या पंचकातील शेवटची दोन पदे, पाचव्या पंचकातील शेवटची तीन पदे आणि सहावे, सातवे व आठवे हे तीन पंचक, हे सर्व चार पंचक आपत्तीच्या अंगाच्या अर्थाने सांगितले आहेत; शुक्लपक्षात (सकारात्मक बाजूने) आठही पंचकांमध्ये अनापत्तीच (दोष नसणेच) आहे। อุปสมฺปาเทตพฺพปญฺจกกถา นิฏฺฐิตา. उपसंपदा देण्यायोग्य पंचकाची कथा समाप्त झाली। อุปสมฺปาเทตพฺพฉกฺกกถา उपसंपदा देण्यायोग्य षटकाची कथा (सहा गोष्टींचा समूह)। ๘๕. ฉกฺเกสุ อูนทสวสฺสปทํ วิเสโส, ตํ สพฺพตฺถ อาปตฺติกรํ. เสสํ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. ตตฺถ อุภยานิ โข ปนสฺส ปาติโมกฺขานิ วิตฺถาเรน น สฺวาคตานิ โหนฺตีติ อุภโตวิภงฺควเสน น สฺวาคตานิ. น สุวิภตฺตานีติ มาติกาวิภงฺควเสน. น สุปฺปวตฺตีนีติ วาจุคฺคตวเสน. น สุวินิจฺฉิตานิ สุตฺตโส อนุพฺยญฺชนโสติ มาติกาโต จ วิภงฺคโต จ น สุฏฺฐุ วินิจฺฉิตานิ. ८५. षटकांमध्ये "दहा वर्षांपेक्षा कमी" हे पद विशेष आहे, ते सर्व ठिकाणी आपत्ती (दोष) निर्माण करणारे आहे। उर्वरित भाग आधी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा। त्यामध्ये "त्याचे दोन्ही प्रातिमोक्ष विस्ताराने सु-आगत (चांगले मुखोद्गत) नसतात" याचा अर्थ उभतोविभंगानुसार (भिक्खू आणि भिक्खुनी विभंगानुसार) मुखोद्गत नसणे असा आहे। "सुविभक्त नसतात" (न सुविभत्तानि) याचा अर्थ मातिका आणि विभंगानुसार चांगले विभागलेले नसणे असा आहे। "सुप्रवृत्त नसतात" (न सुप्पवत्तीनि) याचा अर्थ पाठांतराच्या दृष्टीने सहजपणे तोंडपाठ नसणे असा आहे। "सुत्त आणि अनुव्यंजनानुसार सुविनिश्चित नसतात" (न सुविनिच्छितानि सुत्तसो अनुब्यञ्जनसो) याचा अर्थ मातिका आणि विभंग या दोन्ही दृष्टीने चांगल्या प्रकारे निश्चित केलेले नसणे असा आहे। อุปสมฺปาเทตพฺพฉกฺกกถา นิฏฺฐิตา. उपसंपदा देण्यायोग्य षटकाची कथा समाप्त झाली। อญฺญติตฺถิยปุพฺพวตฺถุกถา अन्यतीर्थीय पूर्ववृत्ताची कथा। ๘๖. อญฺญติตฺถิยปุพฺพวตฺถุสฺมึ – โย ตาว อยํ ปสูโร, โส ติตฺถิยปกฺกนฺตกตฺตา น อุปสมฺปาเทตพฺโพ. โย ปน อญฺโญปิ นยิธ ปพฺพชิตปุพฺโพ อาคจฺฉติ, ตสฺมึ ยํ กตฺตพฺพํ ตํ ทสฺเสตุํ ‘‘โย โส ภิกฺขเว อญฺโญปี’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ตสฺส จตฺตาโร มาเส ปริวาโส ทาตพฺโพติ อยํ ติตฺถิยปริวาโส นาม; อปฺปฏิจฺฉนฺนปริวาโสติปิ วุจฺจติ. อยํ ปน นคฺคปริพฺพาชกสฺเสว อาชีวกสฺส วา [Pg.273] อเจลกสฺส วา ทาตพฺโพ. สเจ โสปิ สาฏกํ วา วาฬกมฺพลาทีนํ อญฺญตรํ ติตฺถิยทฺธชํ วา นิวาเสตฺวา อาคจฺฉติ, นาสฺส ปริวาโส ทาตพฺโพ. อญฺญสฺส ปน ตาปสปณฺฑรงฺคาทิกสฺส น ทาตพฺโพว. ८६. अन्यतीर्थीय पूर्ववृत्तामध्ये – जो हा पसूर (परिव्राजक) आहे, तो तीर्थिकांच्या बाजूला गेल्यामुळे त्याला उपसंपदा दिली जाऊ नये। परंतु जो दुसरा कोणीही, ज्याने यापूर्वी या शासनात प्रव्रज्या घेतलेली नाही, तो येतो, त्याच्या बाबतीत जे कर्तव्य करायचे आहे ते दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी "हे भिक्खूंनो, जो दुसरा कोणीही..." इत्यादी म्हटले। त्यामध्ये "त्याला चार महिन्यांचा परिवास (प्रतीक्षा काळ) दिला जावा" म्हणजे याला "तीर्थीय परिवास" असे म्हणतात; याला "अप्पटिच्छन्न परिवास" असेही म्हणतात। हा परिवास केवळ नग्न परिव्राजकाला, आजीवकाला किंवा अचेलकाला (दिगंबराला) दिला जावा। जर तोसुद्धा वस्त्र किंवा केसांचे घोंगडे इत्यादींपैकी एखादे तीर्थिकांचे चिन्ह (ध्वज) परिधान करून आला, तर त्याला परिवास दिला जाऊ नये। परंतु इतर तापस (ऋषी) किंवा पांढरे वस्त्र परिधान करणाऱ्यांना (पांडुरंग इत्यादींना) तो दिलाच जाऊ नये। ปฐมํ เกสมสฺสุนฺติอาทินา ตสฺส อาทิโตว สามเณรปพฺพชฺชํ ทสฺเสติ. เอวํ ปพฺพาเชนฺเตหิ ปน ตสฺมึ สงฺฆมชฺเฌ นิสินฺเนเยว ‘‘ตฺวํ ปพฺพาเชหิ, ตฺวํ อาจริโย โหหิ, ตฺวํ อุปชฺฌาโย โหหี’’ติ เถรา ภิกฺขู น วตฺตพฺพา. เอวํ วุตฺตา หิ สเจ ตสฺส อาจริยุปชฺฌายภาเวน ชิคุจฺฉนฺตา น สมฺปฏิจฺฉนฺติ, อถ โส ‘‘นยิเม มยฺหํ สทฺทหนฺตี’’ติ กุชฺฌิตฺวาปิ คจฺเฉยฺย. ตสฺมา ตํ เอกมนฺตํ เนตฺวา ตสฺส อาจริยุปชฺฌายา ปริเยสิตพฺพา. "प्रथम केस आणि दाढी..." इत्यादी शब्दांद्वारे त्याची सुरुवातीलाच होणारी सामणेर प्रव्रज्या दर्शवली आहे। परंतु अशा प्रकारे प्रव्रज्या देणाऱ्यांनी, तो संघामध्ये बसलेला असतानाच, "तुम्ही प्रव्रज्या द्या, तुम्ही आचार्य व्हा, तुम्ही उपाध्याय व्हा" असे थेर भिक्खूंना सांगू नये। कारण असे विचारले असता जर त्याच्या आचार्य किंवा उपाध्याय होण्यास नाखूष होऊन त्यांनी ते स्वीकारले नाही, तर तो "हे लोक माझ्यावर विश्वास ठेवत नाहीत" असा विचार करून रागाने निघून जाऊ शकतो। म्हणून त्याला एका बाजूला नेऊन त्याचे आचार्य आणि उपाध्याय शोधले पाहिजेत। ๘๗. เอวํ โข ภิกฺขเว อญฺญติตฺถิยปุพฺโพ อาราธโก โหติ, เอวํ อนาราธโกติ อยมสฺส ปริวาสวตฺตทสฺสนตฺถํ มาติกา. กถญฺจ ภิกฺขเวติอาทิ ตสฺเสว วิภงฺโค. ตตฺถ อติกาเลน คามํ ปวิสตีติ ภิกฺขูนํ วตฺตกรณเวลายเมว คามํ ปิณฺฑาย ปวิสติ. อติทิวา ปฏิกฺกมตีติ กุลฆเรสุ อิตฺถิปุริสทารกทาริกาทีหิ สทฺธึ เคหสฺสิตกถํ กเถนฺโต ตตฺเถว ภุญฺชิตฺวา ภิกฺขูสุ ปตฺตจีวรํ ปฏิสาเมตฺวา อุทฺเทสปริปุจฺฉาทีนิ วา กโรนฺเตสุ ปฏิสลฺลีเนสุ วา อาคจฺฉติ; น อุปชฺฌายวตฺตํ นาจริยวตฺตํ กโรติ, อญฺญทตฺถุ วสนฏฺฐานํ ปวิสิตฺวา นิทฺทายติ. เอวมฺปิ ภิกฺขเว อญฺญติตฺถิยปุพฺโพ อนาราธโก โหตีติ เอวมฺปิ กโรนฺโต ปริวาสวตฺตสฺส สมฺปาทโก ปูรโก น โหติ. ८७. "हे भिक्खूंनो, अशा प्रकारे पूर्वी अन्यतीर्थीय असलेला भिक्खू आराधक (नियम पाळणारा) होतो आणि अशा प्रकारे अनाराधक (नियम न पाळणारा) होतो," ही त्याच्या परिवास व्रताचे दर्शन घडवणारी मातिका (मूळ रूपरेषा) आहे। "आणि हे भिक्खूंनो, कशा प्रकारे..." इत्यादी त्याचाच विभंग (सविस्तर स्पष्टीकरण) आहे। त्यामध्ये "अतिशय लवकर गावात प्रवेश करतो" म्हणजे भिक्खूंच्या कर्तव्याच्या वेळीच तो गावात पिंडपातासाठी प्रवेश करतो। "अतिशय उशिरा परत येतो" म्हणजे कुळांच्या घरांमध्ये स्त्री, पुरुष, मुले, मुली इत्यादींसोबत घरगुती गोष्टींवर गप्पा मारत, तिथेच भोजन करून, जेव्हा इतर भिक्खू पात्र आणि चीवर आवरून ठेवून पाठांतर, प्रश्नोत्तरे इत्यादी करत असतात किंवा एकांतात ध्यानस्थ बसलेले असतात, तेव्हा तो परत येतो। तो उपाध्यायांचे कर्तव्य किंवा आचार्यांचे कर्तव्य करत नाही, उलट आपल्या निवासस्थानी जाऊन झोपून राहतो। "हे भिक्खूंनो, अशा प्रकारेही पूर्वी अन्यतीर्थीय असलेला भिक्खू अनाराधक होतो," असे आचरण करणारा परिवास व्रताचे संपादन करणारा किंवा ते पूर्ण करणारा ठरत नाही। เวสิยาโคจโร วาติอาทีสุ เวสิยาติ อามิสกิญฺจิกฺขสมฺปทานาทินา สุลภชฺฌาจารา รูปูปชีวิกา อิตฺถิโย. วิธวาติ มตปติกา วา ปวุตฺถปติกา วา อิตฺถิโย; ตา เยน เกนจิ สทฺธึ มิตฺตภาวํ ปตฺเถนฺติ. ถุลฺลกุมาริกาติ โยพฺพนฺนปฺปตฺตา โยพฺพนฺนาตีตา วา กุมาริโย; ตา ปุริสาธิปฺปายาว วิจรนฺติ, เยน เกนจิ สทฺธึ มิตฺตภาวํ ปตฺเถนฺติ. ปณฺฑกาติ อุสฺสนฺนกิเลสา อวูปสนฺตปริฬาหา นปุํสกา; เต ปริฬาหเวคาภิภูตา เยน เกนจิ สทฺธึ มิตฺตภาวํ ปตฺเถนฺติ. ภิกฺขุนิโยติ สมานปพฺพชฺชา อิตฺถิโย; ตาหิ สทฺธึ ขิปฺปเมว วิสฺสาโส โหติ, ตโต สีลํ ภิชฺชติ. "वेश्यागोचर (वेश्यांच्या संपर्कात राहणारा) किंवा..." इत्यादींमध्ये, "वेश्या" म्हणजे थोड्याशा आमिषाच्या देवाणघेवाणीने सहजपणे व्यभिचार करणाऱ्या, रूपावर उपजीविका करणाऱ्या स्त्रिया (देहविक्रय करणाऱ्या स्त्रिया) होत। "विधवा" म्हणजे ज्यांचा पती मरण पावला आहे किंवा ज्यांचा पती परदेशी गेला आहे अशा स्त्रिया; त्या कोणाशीही मैत्री करण्याची इच्छा बाळगतात। "थुल्लकुमारी" (मोठ्या कुमारिका) म्हणजे तारुण्यात आलेल्या किंवा तारुण्य ओलांडलेल्या कुमारिका; त्या पुरुषाच्या आकांक्षेनेच वावरतात आणि कोणाशीही मैत्री करण्याची इच्छा बाळगतात। "पंडक" म्हणजे तीव्र वासना असलेले, वासनेचा दाह शांत न झालेले नपुंसक; ते वासनेच्या वेगाने प्रभावित होऊन कोणाशीही मैत्री करण्याची इच्छा बाळगतात। "भिक्खुनी" म्हणजे समान प्रव्रज्या घेतलेल्या स्त्रिया; त्यांच्याशी लवकरच जवळीक निर्माण होते आणि त्यामुळे शील भंग पावते। ตตฺถ [Pg.274] เวสิยานํ กุเลสุ กุลุปโก หุตฺวา ปิณฺฑปาตจริยาทีหิ วา อปทิสิตฺวา สิเนหสนฺถวชาเตน หทเยน อภิณฺหทสฺสนสลฺลาปกามตาย ตาสํ สนฺติกํ อุปสงฺกมนฺโต ‘‘เวสิยาโคจโร’’ติ วุจฺจติ, โส นจิรสฺเสว ‘‘อสุกเวสิยา สทฺธึ คโต’’ติ วตฺตพฺพตํ ปาปุณาติ. เอส นโย สพฺพตฺถ. สเจ ปน เวสิยาทโย สลากภตฺตาทีนิ เทนฺติ, ภิกฺขูหิ สทฺธึ คนฺตฺวา สทฺธึเยว ภุญฺชิตฺวา วา คเหตฺวา วา อาคนฺตุํ วฏฺฏติ. คิลานา ภิกฺขุนิโย โอวทิตุํ วา ธมฺมํ วา เทเสตุํ อุทฺเทสปริปุจฺฉาทีนิ วา ทาตุํ คจฺฉนฺเตหิ ภิกฺขูหิ สทฺธึ คนฺตุํ วฏฺฏติ. โย ปน ตถา อาคนฺตฺวา มิตฺตสนฺถววเสน คจฺฉติ, อยํ อนาราธโก โหติ. त्यामध्ये, वेश्यांच्या घरांमध्ये घरच्यासारखा वावरणारा होऊन किंवा पिंडपाताच्या निमित्ताने, स्नेहाच्या आणि परिचयाच्या भावनेने, वारंवार भेटण्याची आणि बोलण्याची इच्छा असल्यामुळे त्यांच्या जवळ जाणाऱ्याला "वेश्यागोचर" असे म्हटले जाते। तो लवकरच "तो अमुक वेश्येसोबत गेला आहे" अशा बदनामीला पात्र ठरतो। हाच नियम सर्व ठिकाणी लागू होतो। परंतु जर वेश्या इत्यादी शलाका-भोजन देत असतील, तर इतर भिक्खूंसोबत जाऊन एकत्र भोजन करून किंवा ते घेऊन परत येणे योग्य आहे। आजारी भिक्खुनींना उपदेश करण्यासाठी किंवा धम्म उपदेश करण्यासाठी, किंवा पाठांतर, प्रश्नोत्तरे इत्यादी घेण्यासाठी जाणाऱ्या भिक्खूंसोबत जाणे योग्य आहे। परंतु जो तसे न करता केवळ मैत्री आणि परिचयाच्या भावनेने जातो, तो अनाराधक ठरतो। อุจฺจาวจานิ กรณียานีติ มหนฺตขุทฺทกานิ กมฺมานิ. ตตฺถ ฆณฺฏึ ปหริตฺวา สมคฺเคน สงฺเฆน สนฺนิปติตฺวา กตฺตพฺพานิ เจติยมหาปาสาทปฏิสงฺขรณาทีนิ กมฺมานิ อุจฺจานิ นาม. จีวรโธวนรชนาทีนิ ขนฺธกปริยาปนฺนานิ จ อคฺคิสาลวตฺตาทีนิ อาภิสมาจาริกานิ อวจานิ นาม. ตตฺถ น ทกฺโข โหตีติ เตสุ กมฺเมสุ เฉโก สุสิกฺขิโต น โหติ. น อนลโสติ อุฏฺฐานวีริยสมฺปนฺโน น โหติ; ‘‘ภิกฺขุสงฺฆสฺส กมฺมํ อตฺถี’’ติ สุตฺวา ปเคว ภตฺตกิจฺจํ กตฺวา คพฺภนฺตรํ ปวิสิตฺวา ยาวทตฺถํ สุปิตฺวา สายํ นิกฺขมติ. ตตฺรุปายายาติ เตสุ กมฺเมสุ อุปายภูตาย. วีมํสายาติ ฐานุปฺปตฺติกวีมํสาย. ‘‘อิทเมวํ กตฺตพฺพํ, อิทเมวํ น กตฺตพฺพ’’นฺติ ตสฺมึเยว ขเณ อุปฺปนฺนปญฺญาย สมนฺนาคโต น โหติ. น อลํ กาตุํ น อลํ สํวิธาตุนฺติ สหตฺถาปิ กาตุํ สมตฺโถ น โหติ; ‘‘คณฺหถ ภนฺเต, คณฺห ทหร, คณฺห สามเณร, สเจ ตุมฺเห วา น กริสฺสถ, อมฺเห วา น กริสฺสาม, โก ทานิ อิมํ กริสฺสตี’’ติ เอวํ อุสฺสาหํ ชเนตฺวา สํวิธาตุํ อญฺญมญฺญํ กาเรตุมฺปิ สมตฺโถ น โหติ. ภิกฺขูหิ ‘‘กมฺมํ กริสฺสามา’’ติ วุตฺเต กิญฺจิ โรคํ อปทิสติ, ภิกฺขูนํ กมฺมํ กโรนฺตานํ สมีเปเนว วิจรติ, สีสเมว ทสฺเสติ, อยมฺปิ อนาราธโก โหติ. ‘उच्चावचानि करणीयानि’ म्हणजे मोठी आणि लहान कामे. त्यात घंटा वाजवून समग्र संघाने एकत्र येऊन करण्याजोगी चैत्य आणि महाप्रासाद दुरुस्ती इत्यादी कामे म्हणजे ‘उच्च’ (मोठी) कामे होत. चीवर धुणे, रंगवणे इत्यादी आणि खंधक वत्तामध्ये समाविष्ट असलेली तसेच अग्निशाला वत्त इत्यादी आभिसमाचारिक कर्तव्ये म्हणजे ‘अवच’ (लहान) कामे होत. ‘तथ्य न दक्खो होती’ म्हणजे त्या कामांमध्ये तो कुशल आणि सुशिक्षित (चांगले प्रशिक्षित) नसतो. ‘न अनलसो’ म्हणजे तो उद्योगी किंवा वीर्यवान नसतो; 'भिक्खू संघाचे काम आहे' असे ऐकून सकाळीच भोजन आटोपून खोलीत शिरून इच्छेनुसार झोपून संध्याकाळी बाहेर पडतो. ‘तत्रुपायया’ म्हणजे त्या त्या कामांमध्ये उपायभूत असणाऱ्या. ‘वीमंसाय’ म्हणजे प्रसंगानुरूप उत्पन्न होणाऱ्या विचारशक्तीने (मीमांसेने) किंवा 'हे असे करावे, हे असे करू नये' अशी त्याच क्षणी उत्पन्न झालेल्या प्रज्ञेने तो युक्त नसतो. ‘न अलं कातुं न अलं संविधातुं’ म्हणजे स्वतःच्या हाताने देखील करण्यास तो समर्थ नसतो; 'भंते, धरा; तरुण भिक्खू, धरा; सामणेर, धरा; जर तुम्ही करणार नाही किंवा आम्ही करणार नाही, तर आता हे कोण करणार?' असा उत्साह निर्माण करून व्यवस्था करण्यास किंवा एकमेकांकडून करून घेण्यासही तो समर्थ नसतो. भिक्खूंनी 'आम्ही काम करू' असे म्हटले असता तो काहीतरी आजाराचे कारण सांगतो, काम करणाऱ्या भिक्खूंच्या जवळच फिरतो, फक्त आपले डोके (हजेरी) दाखवतो; हा देखील आराधक नसलेला (अयोग्य) ठरतो. น ติพฺพจฺฉนฺโท โหตีติ พลวจฺฉนฺโท น โหติ. อุทฺเทเสติ ปาฬิปริยาปุณเน. ปริปุจฺฉายาติ อตฺถสวเน. อธิสีเลติ ปาติโมกฺขสีเล. อธิจิตฺเตติ โลกิยสมาธิภาวนาย. อธิปญฺญายาติ โลกุตฺตรมคฺคภาวนาย. ‘न तिब्बच्छन्दो होती’ म्हणजे तीव्र किंवा प्रबळ इच्छा नसणे. ‘उद्देसे’ म्हणजे पाळी (पाठाचे) अध्ययन करण्यात. ‘परिपूच्छाय’ म्हणजे अर्थ समजून घेण्यात (प्रश्न विचारण्यात). ‘अधिसीले’ म्हणजे प्रातिमोक्ष शीलामध्ये. ‘अधिचित्ते’ म्हणजे लौकिक समाधीच्या भावनेत. ‘अधिपञ्ञाय’ म्हणजे लोकोत्तर मार्ग भावनेत. สงฺกนฺโต [Pg.275] โหตีติ อิธาคโต โหติ. ตสฺส สตฺถุโนติ ตสฺส ติตฺถายตนสามิกสฺส. ตสฺส ทิฏฺฐิยาติ ตสฺส สนฺตกาย ลทฺธิยา. อิทานิ สาเยว ลทฺธิ ยสฺมา ตสฺส ติตฺถกรสฺส ขมติ เจว รุจฺจติ จ ‘‘อิทเมว สจฺจ’’นฺติ จ ทฬฺหคฺคาเหน คหิตา; ตสฺมา ตสฺส ขนฺติ รุจิ อาทาโยติ วุจฺจติ. เตน วุตฺตํ – ‘‘ตสฺส ขนฺติยา ตสฺส รุจิยา ตสฺส อาทายสฺสา’’ติ. อวณฺเณ ภญฺญมาเนติ ครหาย ภญฺญมานาย. อนภิรทฺโธติ อปริปุณฺณสงฺกปฺโป; โน ปคฺคหิตจิตฺโต. อุทคฺโคติ อพฺภุนฺนตกายจิตฺโต. อิทํ ภิกฺขเว สงฺฆาตนิกํ อญฺญติตฺถิยปุพฺพสฺส อนาราธนียสฺมินฺติ ภิกฺขเว ยมิทํ ตสฺส สตฺถุโน ตสฺเสว จ ลทฺธิยา อวณฺเณ ภญฺญมาเน ‘‘กึ อิเม ปรํ ครหนฺตี’’ติ กายวจีวิการนิพฺพตฺตกํ อนตฺตมนตฺตํ, พุทฺธาทีนญฺจ อวณฺเณ ภญฺญมาเน อตฺตมนตฺตํ, ยญฺจ ตสฺเสว สตฺถุโน ตสฺเสว จ ลทฺธิยา วณฺเณ ภญฺญมาเน อตฺตมนตฺตํ, พุทฺธาทีนญฺจ วณฺณภณเน อนตฺตมนตฺตํ, อิทํ อญฺญติตฺถิยปุพฺพสฺส อนาราธนียสฺมึ สงฺฆาตนิกํ, อนาราธเก ปริวาสวตฺตํ อปูรเก กมฺเม อิทํ ลิงฺคํ, อิทํ ลกฺขณํ, อิทมจลปฺปมาณนฺติ วุตฺตํ โหติ. เอวํ อนาราธโก โข ภิกฺขเว อญฺญติตฺถิยปุพฺโพ อาคโต น อุปสมฺปาเทตพฺโพติ อิโต เอเกนปิ องฺเคน สมนฺนาคโต น อุปสมฺปาเทตพฺโพ. สุกฺกปกฺเข สพฺพํ วุตฺตวิปลฺลาเสน เวทิตพฺพํ. ‘संकंतो होती’ म्हणजे येथे (शासनात) आलेला असतो. ‘तस्स सत्थुनो’ म्हणजे त्याच्या (तीर्थंकर) शास्त्याचा (गुरूचा). ‘तस्स दिट्ठिया’ म्हणजे त्याच्या हीन मताचा (दृष्टीचा). आता तेच मत ज्या अर्थी त्या तीर्थंकराला आवडते आणि रुचते, तसेच 'हेच सत्य आहे' अशा दृढ ग्रहाने स्वीकारलेले असते; म्हणून त्याला त्याची क्षंती, रुची आणि मत असे म्हटले जाते. म्हणून म्हटले आहे – ‘तस्स खंतिया तस्स रुचिया तस्स आदायस्सा’ (त्याच्या क्षंतीने, त्याच्या रुचीने, त्याच्या मताने). ‘अवण्णे भञ्ञमाने’ म्हणजे निंदा (अवर्ण) बोलली जात असताना. ‘अनभिरद्धो’ म्हणजे अपूर्ण संकल्प असलेला, प्रगृहीत (उत्साही) चित्त नसलेला. ‘उदग्गो’ म्हणजे अतिशय प्रफुल्लित काय-चित्त असलेला. ‘इदं भिक्खवे संघातनिकं अञ्ञतित्थियपुब्बस्स अनाराधनीयस्मिं’ म्हणजे हे भिक्खूंनो! त्याच्या शास्त्याची आणि त्याच्याच मताची निंदा केली जात असताना 'हे भिक्खू दुसऱ्याची निंदा का करत आहेत?' असे काया आणि वाचेचे विकार उत्पन्न करणारे जे काही अप्रसन्नत्व (नाराजी) असते, आणि बुद्ध इत्यादींची निंदा केली जात असताना जे काही प्रसन्नत्व असते; तसेच त्याच्याच शास्त्याची व त्याच्याच मताची प्रशंसा केली जात असताना जे काही प्रसन्नत्व असते, आणि बुद्ध इत्यादींची प्रशंसा केली जात असताना जे काही अप्रसन्नत्व असते; हे सर्व पूर्वी अन्यतीर्थीय असलेल्या सामणेराच्या अयोग्यतेच्या (आराधना न करण्याच्या) बाबतीत एकत्रित लक्षण आहे. आराधना न करणाऱ्याच्या परिवास व्रत पूर्ण न करण्याच्या कार्यात हे चिन्ह आहे, हे लक्षण आहे, हे अचल प्रमाण आहे, असे म्हटले आहे. अशा प्रकारे, हे भिक्खूंनो! आलेला तो आराधना न करणारा अन्यतीर्थीय पूर्व सामणेर उपसंपदा देण्यास योग्य नाही; यातील एका जरी अंगाने युक्त असेल, तर त्याला उपसंपदा देऊ नये. शुक्लपक्षात (सकारात्मक बाजूने) सर्व काही वर सांगितलेल्याच्या उलट समजून घ्यावे. เอวํ อาราธโก โข ภิกฺขเวติ เอวํ นาติกาเลน คามปฺปเวสนา นาติทิวา ปฏิกฺกมนํ, น เวสิยาทิโคจรตา, สพฺรหฺมจารีนํ กิจฺเจสุ ทกฺขตาทิ, อุทฺเทสาทีสุ ติพฺพจฺฉนฺทตา, ติตฺถิยานํ อวณฺณภณเน อตฺตมนตา, พุทฺธาทีนํ อวณฺณภณเน อนตฺตมนตา, ติตฺถิยานํ วณฺณภณเน อนตฺตมนตา, พุทฺธาทีนํ วณฺณภณเน อตฺตมนตาติ อิเมสํ อฏฺฐนฺนํ ติตฺถิยวตฺตานํ ปริปูรเณน อาราธโก ปริโตสโก ภิกฺขูนํ อญฺญติตฺถิยปุพฺโพ อาคโต อุปสมฺปาเทตพฺโพ. ‘एवं आराधको खो भिक्खवे’ म्हणजे अशा प्रकारे, हे भिक्खूंनो! आराधक (योग्य) असलेला; जसे की अतिशय लवकर गावात प्रवेश न करणे, अतिशय उशिरा परत न येणे, वेश्या इत्यादींच्या ठिकाणी न जाणे, सधर्मीयांच्या (सतीर्थ्यांच्या) कामात कुशलता इत्यादी असणे, अध्ययन इत्यादींमध्ये तीव्र इच्छा असणे, अन्यतीर्थीयांची निंदा केली असता प्रसन्न होणे, बुद्ध इत्यादींची निंदा केली असता अप्रसन्न होणे, अन्यतीर्थीयांची प्रशंसा केली असता अप्रसन्न होणे, बुद्ध इत्यादींची प्रशंसा केली असता प्रसन्न होणे; या आठ तीर्थीय व्रतांच्या परिपूर्तीने भिक्खूंना संतुष्ट करणारा (आराधक असलेला) आलेला अन्यतीर्थीय पूर्व सामणेर उपसंपदा देण्यास योग्य आहे. สเจ ปน อุปสมฺปทมาฬเกปิ เอกํ วตฺตํ ภินฺทติ, ปุน จตฺตาโร มาเส ปริวสิตพฺพํ. ยถา ปน ภินฺนสิกฺขาย สิกฺขมานาย ปุน สิกฺขาปทานิ จ สิกฺขาสมฺมุติ จ ทิยฺยติ, เอวํ นยิมสฺส กิญฺจิ ปุน ทาตพฺพมตฺถิ. ปุพฺเพ ทินฺนปริวาโสเยว หิ ตสฺส ปริวาโส. ตสฺมา ปุน จตฺตาโร มาเส ปริวสิตพฺพํ. สเจ ปริวสนฺโต อนฺตรา อฏฺฐ สมาปตฺติโย นิพฺพตฺเตติ, โลกิยธมฺโม [Pg.276] นาม กุปฺปนสภาโว, น อุปสมฺปาเทตพฺโพ. จตฺตาโร มาเส ปูริตวตฺโตว อุปสมฺปาเทตพฺโพ. สเจ ปน ปริวสนฺโต จตฺตาริ มหาภูตานิ ปริคฺคณฺหติ, อุปาทารูปานิ ปริจฺฉินฺทติ, นามรูปํ ววตฺถเปติ, ติลกฺขณํ อาโรเปตฺวา วิปสฺสนํ อารภติ, โลกิยธมฺโม นาม กุปฺปนสภาโว, เนว อุปสมฺปาเทตพฺโพ. สเจ ปน วิปสฺสนํ วฑฺเฒตฺวา โสตาปตฺติมคฺคํ ปฏิลภติ, ปริปุณฺณํเยว โหติ วตฺตํ. สมูหตานิ สพฺพทิฏฺฐิคตานิ อพฺพุฬฺหํ วิจิกิจฺฉาสลฺลํ ตํทิวสเมว อุปสมฺปาเทตพฺโพ. สเจปิ ติตฺถิยลิงฺเค ฐิโต โสตาปนฺโน โหติ, ปริวาสกิจฺจํ นตฺถิ, ตทเหว ปพฺพาเชตฺวา อุปสมฺปาเทตพฺโพ. पण जर उपसंपदा मंडपात देखील तो एका नियमाचा (व्रताचा) भंग करतो, तर पुन्हा चार महिने परिवास पाळावा लागतो. परंतु ज्याप्रमाणे शीलभंग झालेल्या शिक्खमानाला पुन्हा शिक्षापदे आणि शिक्षासंमती दिली जाते, त्याप्रमाणे या अन्यतीर्थीय पूर्व सामणेराला पुन्हा काही देण्याची गरज नसते. कारण पूर्वी दिलेला परिवास हाच त्याचा परिवास असतो. म्हणून पुन्हा चार महिने परिवास पाळावा. जर परिवास पाळत असताना मध्येच तो आठ समापत्ती प्राप्त करतो, तरी लौकिक धर्म हा नाशवंत स्वभावाचा असल्याने त्याला उपसंपदा देऊ नये. चार महिने व्रत पूर्ण केलेल्यालाच उपसंपदा द्यावी. परंतु जर परिवास पाळत असताना तो चार महाभूतांचे ग्रहण करतो, उपादाय रूपांचे परिच्छेदन करतो, नामरूपाची निश्चिती करतो, त्रिलक्षणावर ठेवून विपश्यना सुरू करतो, तरी लौकिक धर्म हा नाशवंत स्वभावाचा असल्याने त्याला उपसंपदा देऊच नये. परंतु जर विपश्यना वाढवून तो स्रोतापत्ती मार्ग प्राप्त करतो, तर त्याचे व्रत पूर्णच होते. सर्व मिथ्या दृष्टी समूळ नष्ट होतात, विचिकित्सा रूपी शल्य उपटून टाकले जाते; त्याच दिवशी त्याला उपसंपदा द्यावी. जरी तीर्थीय वेषात असतानाच तो स्रोतापन्न झाला, तरी परिवासाचे काही काम उरत नाही, त्याच दिवशी त्याला प्रव्रज्या देऊन उपसंपदा द्यावी. อุปชฺฌายมูลกํ จีวรํ ปริเยสิตพฺพนฺติ อุปชฺฌายํ อิสฺสรํ กตฺวา ตสฺส จีวรํ ปริเยสิตพฺพํ. ปตฺตมฺปิ ตเถว. ตสฺมา ยทิ อุปชฺฌายสฺส ปตฺตจีวรํ อตฺถิ, ‘‘อิมสฺส เทหี’’ติ วตฺตพฺโพ. อถ นตฺถิ, อญฺเญ ทาตุกามา โหนฺติ, เตหิปิ อุปชฺฌายสฺเสว ทาตพฺพํ ‘‘อิทํ ตุมฺหากํ กตฺวา อิมสฺส เทถา’’ติ. กสฺมา? ติตฺถิยา นาม วิโลมา โหนฺติ ‘‘สงฺเฆน เม ปตฺตจีวรํ ทินฺนํ, กึ มยฺหํ ตุมฺเหสุ อายตฺต’’นฺติ วตฺวา โอวาทานุสาสนึ น กเรยฺยุํ, อุปชฺฌาเยน ปน อายตฺตชีวิกตฺตา ตสฺส วจนกโร ภวิสฺสติ. เตนสฺส ‘‘อุปชฺฌายมูลกํ จีวรํ ปริเยสิตพฺพ’’นฺติ วุตฺตํ. ภณฺฑุกมฺมายาติ เกโสโรปนตฺถํ. ภณฺฑุกมฺมกถา ปรโต อาคมิสฺสติ. ‘उपज्झायमूलकं चीवरं परियेसितब्बं’ म्हणजे उपाध्यायांना स्वामी (मालक) बनवून त्यांच्याद्वारे चीवर शोधावे. पात्र देखील तसेच शोधावे. म्हणून जर उपाध्यायांकडे पात्र-चीवर असेल, तर 'याला द्या' असे म्हणावे. जर नसेल आणि इतर भिक्खू देण्यास इच्छुक असतील, तर त्यांनी देखील उपाध्यायांनाच ते दिले पाहिजे आणि 'हे आपले करून याला द्या' असे म्हणावे. का? कारण तीर्थीय हे विरोधी स्वभावाचे असतात; 'संघाने मला पात्र-चीवर दिले आहे, माझे तुमच्याशी काय देणेघेणे?' असे म्हणून ते उपदेश व अनुशासनाचे पालन करणार नाहीत. परंतु उपाध्यायांवर उपजीविका अवलंबून असल्यामुळे तो त्यांचे वचन ऐकणारा होईल. म्हणून त्याच्यासाठी 'उपाध्याय-मूलक चीवर शोधावे' असे म्हटले आहे. ‘भाण्डुकम्माय’ म्हणजे केशमुंडनासाठी. भांडुकर्मकथा पुढे येईल. อคฺคิกาติ อคฺคิปริจรณกา. ชฏิลกาติ ตาปสา. เอเต ภิกฺขเว กิริยวาทิโนติ เอเต กิริยํ น ปฏิพาหนฺติ, ‘‘อตฺถิ กมฺมํ, อตฺถิ กมฺมวิปาโก’’ติ เอวํทิฏฺฐิกา. สพฺพพุทฺธา หิ เนกฺขมฺมปารมึ ปูรยมานา เอตเทว ปพฺพชฺชํ ปพฺพชิตฺวา ปูเรสุํ, มยาปิ ตเถว ปูริตา, น เอเตสํ สาสเน ปพฺพชฺชา วิโลมา, ตสฺมา อุปสมฺปาเทตพฺพา, น เตสํ ปริวาโส ทาตพฺโพติ. อิมาหํ ภิกฺขเว ญาตีนํ อาเวณิกํ ปริหารํ ทมฺมีติ อิมํ อหํ เตสํ ปาเฏกฺกํ โอทิสฺสกํ ปริหารํ ททามิ. กสฺมา เอวมาห? เต หิ ติตฺถายตเน ปพฺพชิตาปิ สาสนสฺส อวณฺณกามา น โหนฺติ, อมฺหากํ ญาติเสฏฺฐสฺส สาสนนฺติ วณฺณวาทิโนว โหนฺติ, ตสฺมา เอวมาหาติ. अग्गिका म्हणजे अग्नीची परिचर्या (पूजा) करणारे. जटिला म्हणजे जटाधारी तपस्वी. 'हे भिक्खूहो, हे क्रियावादी आहेत' म्हणजे ते क्रियेचा (कर्माचा) निषेध करत नाहीत, 'कर्म आहे, कर्माचा विपाक आहे' अशी त्यांची दृष्टी असते. सर्व बुद्ध नैष्क्रम्य पारमिता पूर्ण करताना याच प्रव्रज्येत प्रव्रजित होऊन ती पूर्ण करते झाले, मीसुद्धा त्याचप्रमाणे ती पूर्ण केली आहे. त्यांच्यासाठी शासनात प्रव्रज्या प्रतिकूल नाही, म्हणून त्यांना उपसंपदा दिली जावी, त्यांना परिवास दिला जाऊ नये. 'भिक्खूहो, मी नातेवाईकांना हा विशेष परिहार (सवलत) देतो' म्हणजे मी त्यांना हा स्वतंत्र आणि विशिष्ट परिहार देत आहे. असे का म्हटले आहे? कारण ते इतर पंथात प्रव्रजित झाले असले तरी शासनाची निंदा करू इच्छित नाहीत, तर 'हे आमच्या श्रेष्ठ नातेवाईकाचे शासन आहे' असे म्हणून ते त्याचे गुणगानच करतात, म्हणून असे म्हटले आहे. อญฺญติตฺถิยปุพฺพวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. अन्यतीर्थियपूर्ववत्थुकथा समाप्त झाली. ปญฺจาพาธวตฺถุกถา पञ्चाबाधवत्थुकथा ๘๘. มคเธสุ [Pg.277] ปญฺจ อาพาธา อุสฺสนฺนา โหนฺตีติ มคธนามเก ชนปเท มนุสฺสานญฺจ อมนุสฺสานญฺจ ปญฺจ โรคา อุสฺสนฺนา วุฑฺฒิปฺปตฺตา ผาติปฺปตฺตา โหนฺติ. ชีวกโกมารภจฺจกถา จีวรกฺขนฺธเก อาวิภวิสฺสติ. น ภิกฺขเว ปญฺจหิ อาพาเธหิ ผุฏฺโฐ ปพฺพาเชตพฺโพติ เย เต กุฏฺฐาทโย ปญฺจ อาพาธา อุสฺสนฺนา, เตหิ ผุฏฺโฐ อภิภูโต น ปพฺพาเชตพฺโพ. ८८. मगध देशात पाच रोग पसरले होते म्हणजे मगध नावाच्या जनपदात मनुष्यांमध्ये आणि अमनुष्यांमध्ये पाच रोग पसरले होते, वाढले होते आणि सर्वत्र पसरले होते. जीवक कौमारभृत्य यांची कथा चीवरक्खन्धकात स्पष्ट होईल. 'भिक्खूहो, पाच रोगांनी ग्रस्त असलेल्याला प्रव्रजित करू नये' म्हणजे जे कुष्ठरोग इत्यादी पाच रोग पसरले आहेत, त्यांनी ग्रस्त आणि पीडित असलेल्या व्यक्तीला प्रव्रजित करू नये. ตตฺถ กุฏฺฐนฺติ รตฺตกุฏฺฐํ วา โหตุ กาฬกุฏฺฐํ วา, ยํกิญฺจิ กิฏิภททฺทุกจฺฉุอาทิปฺปเภทมฺปิ สพฺพํ กุฏฺฐเมวาติ วุตฺตํ. ตญฺเจ นขปิฏฺฐิปฺปมาณมฺปิ วฑฺฒนกปกฺเข ฐิตํ โหติ, น ปพฺพาเชตพฺโพ. สเจ ปน นิวาสนปารุปเนหิ ปกติปฏิจฺฉนฺเน ฐาเน นขปิฏฺฐิปฺปมาณํ อวฑฺฒนกปกฺเข ฐิตํ โหติ, วฏฺฏติ. มุเข ปน หตฺถปาทปิฏฺเฐสุ วา สเจปิ อวฑฺฒนกปกฺเข ฐิตํ นขปิฏฺฐิโต จ ขุทฺทกตรมฺปิ, น วฏฺฏติเยวาติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. ติกิจฺฉาเปตฺวา ปพฺพาเชนฺเตนาปิ ปกติวณฺเณ ชาเตเยว ปพฺพาเชตพฺโพ. โคธาปิฏฺฐิสทิสจุณฺณโอกิรณกสรีรมฺปิ ปพฺพาเชตุํ น วฏฺฏติ. त्यात 'कुष्ठ' म्हणजे तांबडे कुष्ठ असो वा काळे कुष्ठ असो, खरूज, नायटा, खाज इत्यादी प्रकारांसह सर्व काही कुष्ठच म्हटले आहे. ते जर नखाच्या पाठीच्या आकाराचे असले तरीही, जर ते वाढणाऱ्या स्थितीत असेल, तर त्याला प्रव्रजित करू नये. परंतु जर ते अंतर्वस्त्र आणि पांघरूण यांनी सामान्यतः झाकलेल्या जागी नखाच्या पाठीच्या आकाराचे असून न वाढणाऱ्या स्थितीत असेल, तर प्रव्रजित करणे योग्य आहे. परंतु चेहऱ्यावर किंवा हात-पायांच्या पाठीवर जर ते न वाढणाऱ्या स्थितीत असले आणि नखाच्या पाठीपेक्षा लहान असले तरीही, प्रव्रजित करणे मुळीच योग्य नाही, असे कुरुन्दी अठ्ठकथेत म्हटले आहे. उपचार करून घेऊन प्रव्रजित करतानाही, जेव्हा त्वचेचा मूळ रंग परत येईल तेव्हाच प्रव्रजित करावे. घोरपडीच्या पाठीसारखे चूर्ण पसरलेले शरीर असलेल्यालाही प्रव्रजित करणे योग्य नाही. คณฺโฑติ เมทคณฺโฑ วา โหตุ อญฺโญ วา โย โกจิ โกลฏฺฐิมตฺตโกปิ เจ วฑฺฒนกปกฺเข ฐิโต คณฺโฑ โหติ, น ปพฺพาเชตพฺโพ. ปฏิจฺฉนฺนฏฺฐาเน ปน โกลฏฺฐิมตฺเต อวฑฺฒนกปกฺเข ฐิโต วฏฺฏติ. มุขาทิเก อปฺปฏิจฺฉนฺนฏฺฐาเน อวฑฺฒนกปกฺเข ฐิโตปิ น วฏฺฏติ. ติกิจฺฉาเปตฺวา ปพฺพาเชนฺเตนาปิ สรีรํ สญฺฉวึ กาเรตฺวาว ปพฺพาเชตพฺโพ. อุณฺณิคณฺฑา นาม โหนฺติ โคถนา วิย องฺคุลิกา วิย จ ตตฺถ ตตฺถ ลมฺพนฺติ, เอเตปิ คณฺฑาเยว. เตสุ สติ ปพฺพาเชตุํ น วฏฺฏติ. ทหรกาเล ขีรปิฬกา โยพฺพนฺนกาเล จ มุเข ขรปิฬกา นาม โหนฺติ, มหลฺลกกาเล นสฺสนฺติ, น ตา คณฺฑสงฺขฺยํ คจฺฉนฺติ, ตาสุ สติ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. อญฺเญ ปน สรีเร ขรปิฬกา นาม อปรา ปทุมกณฺณิกา นาม โหนฺติ, อญฺญา สาสปพีชกา นาม สาสปมตฺตา เอว สกลสรีรํ ผรนฺติ, ตา สพฺพา กุฏฺฐชาติกา เอว. ตาสุ สติ น ปพฺพาเชตพฺโพ. गण्ड (गळू) म्हणजे चरबीचे गळू असो वा इतर कोणतेही असो, ते बोराच्या बियाच्या आकाराचे असले तरीही जर ते वाढणाऱ्या स्थितीत असेल, तर त्याला प्रव्रजित करू नये. परंतु झाकलेल्या जागी बोराच्या बियाच्या आकाराचे असून न वाढणाऱ्या स्थितीत असेल, तर प्रव्रजित करणे योग्य आहे. चेहरा इत्यादी न झाकलेल्या जागी न वाढणाऱ्या स्थितीत असले तरीही प्रव्रजित करणे योग्य नाही. उपचार करून घेऊन प्रव्रजित करतानाही, शरीराची त्वचा निरोगी करूनच प्रव्रजित करावे. उण्णिगण्ड नावाचे मसे असतात, जे गाईच्या आचळासारखे किंवा बोटांसारखे ठिकठिकाणी लटकतात; हे देखील गण्डच (गळूच) आहेत. ते शरीरावर असताना प्रव्रजित करणे योग्य नाही. बालपणी दुधाच्या पुरळ आणि तारुण्यात चेहऱ्यावर येणारे पुरळ (तारुण्यपिटिका) असतात, जे वृद्धपणी नाहीसे होतात; त्यांची गणना गण्डमध्ये होत नाही. ते असतानाप्रव्रजित करणे योग्य आहे. परंतु शरीरावर इतर खरपिळका नावाचे आणि दुसरे पदुमकर्णिका नावाचे गळू असतात; इतर सासपबीजक नावाचे गळू मोहरीच्या आकाराचेच असून संपूर्ण शरीरावर पसरतात; हे सर्व कुष्ठ रोगाच्याच जातीचे आहेत. ते शरीरावर असताना प्रव्रजित करू नये. กิลาโสติ [Pg.278] น ภิชฺชนกํ น ปคฺฆรณกํ ปทุมปุณฺฑรีกปตฺตวณฺณํ กุฏฺฐํ, เยน คุนฺนํ วิย สพลํ สรีรํ โหติ, ตสฺมึ กุฏฺเฐ วุตฺตนเยเนว วินิจฺฉโย เวทิตพฺโพ. โสโสติ โสสพฺยาธิ; ตสฺมึ สติ น ปพฺพาเชตพฺโพ. อปมาโรติ ปิตฺตุมฺมาโร วา ยกฺขุมฺมาโร วา; ตตฺถ ปุพฺพเวริเกน อมนุสฺเสน คหิโต ทุตฺติกิจฺโฉ โหติ. อปฺปมตฺตเกปิ ปน อปมาเร สติ น ปพฺพาเชตพฺโพ. किलास (कोड) म्हणजे न फुटणारे, स्राव न होणारे, तांबड्या किंवा पांढऱ्या कमळाच्या पानावरील रंगासारखे असणारे कुष्ठ, ज्यामुळे गाईच्या शरीरासारखे ठिपके असलेले शरीर होते; त्या कुष्ठाच्या बाबतीत वर सांगितलेल्या पद्धतीनेच निर्णय समजावा. सोस म्हणजे शोष रोग (क्षयरोग); तो असताना प्रव्रजित करू नये. अपस्मार म्हणजे पित्ताच्या बिघाडामुळे होणारा उन्माद किंवा यक्षाच्या बाधेमुळे होणारा उन्माद; त्यात पूर्ववैरी अमानुषाने ग्रासलेला आजार कठीण उपचारांचा असतो. परंतु अगदी थोड्या प्रमाणात अपस्मार असला तरीही प्रव्रजित करू नये. ปญฺจาพาธวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. पञ्चाबाधवत्थुकथा समाप्त झाली. ราชภฏวตฺถุกถา राजभटवत्थुकथा ๙๐. ราชภฏวตฺถุสฺมึ – ปจฺจนฺตํ อุจฺจินถาติ ปจฺจนฺตํ วฑฺเฒถ. โจเร ปลาเปตฺวา โจรภเยน วุฏฺฐิเต คาเม อาวาสาเปตฺวา อารกฺขํ ทตฺวา กสิกมฺมาทีนิ ปวตฺตาเปถาติ วุตฺตํ โหติ. ราชา ปน โสตาปนฺนตฺตา ‘‘โจเร ฆาเตถ, หนถา’’ติ น อาณาเปติ. อุปชฺฌายสฺส เทว สีสํ ฉินฺทิตพฺพนฺติอาทิ สพฺพํ ‘‘ปพฺพชฺชาย อุปชฺฌาโย เสฏฺโฐ, ตโต อาจริโย, ตโต คโณ’’ติ จินฺเตตฺวา อิทํ โวหาเร อฑฺฑวินิจฺฉเย อาคตนฺติ อาหํสุ. น ภิกฺขเว ราชภโฏ ปพฺพาเชตพฺโพติ เอตฺถ อมจฺโจ วา โหตุ มหามตฺโต วา เสวโก วา กิญฺจิ ฐานนฺตรํ ปตฺโต วา อปฺปตฺโต วา, โย โกจิ รญฺโญ ภตฺตเวตนภโฏ, สพฺโพ ราชภโฏติ สงฺขฺยํ คจฺฉติ, โส น ปพฺพาเชตพฺโพ. ตสฺส ปน ปุตฺตนตฺตภาตุกา เย ราชโต ภตฺตเวตนํ น คณฺหนฺติ, เต ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. โย ปน ราชโต ลทฺธํ นิพทฺธโภคํ วา มาสสํวจฺฉรปริพฺพยํ วา รญฺโญเยว นิยฺยาเตติ, ปุตฺตภาตุเก วา ตํ ฐานํ สมฺปฏิจฺฉาเปตฺวา ราชานํ ‘‘น ทานาหํ เทวสฺส ภโฏ’’ติ อาปุจฺฉติ, เยน วา ยํ กมฺมการณา เวตนํ คหิตํ, ตํ กมฺมํ กตํ โหติ, โย วา ปพฺพชสฺสูติ รญฺญา อนุญฺญาโต โหติ, ตมฺปิ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. ९०. राजभटवत्थूमध्ये - 'पच्चन्तं उच्चिनाथ' (सीमेचा विस्तार करा) म्हणजे सीमेचा विस्तार करा. चोरांना पळवून लावून, चोरांच्या भयाने ओसाड पडलेल्या गावांमध्ये लोकांना पुन्हा वसवून, त्यांना संरक्षण देऊन शेती इत्यादी कामे सुरू करवा, असा याचा अर्थ आहे. परंतु राजे स्रोतापन्न असल्यामुळे 'चोरांना ठार मारा, त्यांना नष्ट करा' अशी आज्ञा देत नाहीत. 'महाराज, उपाध्यायाचे डोके कापले पाहिजे' इत्यादी सर्व गोष्टींचा विचार करून, 'प्रव्रज्येमध्ये उपाध्याय श्रेष्ठ आहे, त्यानंतर आचार्य आणि त्यानंतर संघ श्रेष्ठ आहे' असा विचार करून, 'हे व्यवहार न्यायनिर्णय ग्रंथात आले आहे' असे त्यांनी सांगितले. 'भिक्खूहो, राजभटाची प्रव्रज्या करू नये' यात अमात्य असो, महामात्र असो, सेवक असो, कोणत्याही पदावर असलेला असो वा नसलेला असो, जो कोणी राजाकडून अन्न आणि वेतन घेणारा सेवक आहे, त्या सर्वांची गणना 'राजभट' म्हणून होते; त्याला प्रव्रजित करू नये. परंतु त्याचे मुलगे, नातू किंवा भाऊ जे राजाकडून अन्न-वेतन घेत नाहीत, त्यांना प्रव्रजित करणे योग्य आहे. परंतु जो राजाकडून मिळालेला नियमित उपभोग किंवा मासिक अथवा वार्षिक भत्ता राजालाच परत करतो, किंवा आपल्या मुलाला वा भावाला त्या पदावर नियुक्त करून राजाला 'महाराज, आता मी आपला सेवक नाही' असे सांगून परवानगी मागतो, किंवा ज्याने ज्या कामासाठी वेतन घेतले होते, ते काम पूर्ण केले आहे, किंवा ज्याला राजाने 'प्रव्रजित हो' अशी परवानगी दिली आहे, त्यालाही प्रव्रजित करणे योग्य आहे. ราชภฏวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. राजभटवत्थुकथा समाप्त झाली. โจรวตฺถุกถา चोरवत्थुकथा ๙๑. โจรวตฺถูสุ – มนุสฺสา ปสฺสิตฺวาติ เยหิ คิหิกาเล ทิฏฺฐปุพฺโพ เย จ ‘‘อยํ โส’’ติ อญฺเญสํ สุณนฺติ, เต ปสฺสิตฺวา อุพฺพิชฺชนฺติปิ…เป… ทฺวารมฺปิ [Pg.279] ถเกนฺติ. เย ปน น ชานนฺติ, เตสํ ฆเรสุ ภิกฺขํ ลภติ. น ภิกฺขเวติ ภควา สยํ ธมฺมสฺสามี, ตสฺมา อายตึ อกรณตฺถาย ภิกฺขูนํ สิกฺขาปทํ ปญฺญเปนฺโต เอวมาห. ตตฺถ ธชํ พนฺธิตฺวา วิย วิจรตีติ ธชพนฺโธ. มูลเทวาทโย วิย โลเก ปากโฏติ วุตฺตํ โหติ. ตสฺมา โย คามฆาตํ วา ปนฺถทุหนํ วา นคเร สนฺธิจฺเฉทาทิกมฺมํ วา กโรนฺโต วิจรติ, ปญฺญายติ จ ‘‘อสุโก นาม อิทํ อิทํ กโรตี’’ติ, โส น ปพฺพาเชตพฺโพ. โย ปน ราชปุตฺโต รชฺชํ ปตฺเถนฺโต คามฆาตาทีนิ กโรติ, โส ปพฺพาเชตพฺโพ. ราชาโน หิ ตสฺมึ ปพฺพชิเต ตุสฺสนฺติ, สเจ ปน น ตุสฺสนฺติ, น ปพฺพาเชตพฺโพ. ปุพฺเพ มหาชเน ปากโฏ โจโร ปจฺฉา โจรกมฺมํ ปหาย ปญฺจสีลาทีนิ สมาทิยติ, ตญฺเจ มนุสฺสา เอวํ ชานนฺติ, ปพฺพาเชตพฺโพ. เย ปน อมฺพลพุชาทิโจรกา สนฺธิจฺเฉทาทิโจรา เอว วา อทิสฺสมานา เถยฺยํ กโรนฺติ, ปจฺฉาปิ อิมินา นาม อิทํ กตนฺติ น ปญฺญายนฺติ, เตปิ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. ९१. चोरांच्या कथांमध्ये (चोरवत्थू) – 'लोकांनी पाहून' (मनुस्सा पस्सित्वा) म्हणजे ज्या लोकांनी त्याला गृहस्थावस्थेत पाहिले होते किंवा जे इतरांकडून ऐकतात की 'हा तोच (अंगुलिमाल) आहे', ते त्याला पाहून घाबरतात, थरथर कापतात, पळून जातात, तोंड फिरवतात आणि दारेही बंद करून घेतात. परंतु जे त्याला ओळखत नाहीत, त्यांच्या घरांतून त्याला भिक्षा मिळते. 'भिक्खूंनो, नाही...' असे स्वतः धर्मस्वामी असलेल्या भगवंतांनी भविष्यात असे घडू नये म्हणून भिक्खूंसाठी नियम (शिक्षापद) प्रस्थापित करताना म्हटले. त्यात 'ध्वज बांधून फिरणारा' म्हणजे 'ध्वजबंध' (प्रसिद्ध दरोडेखोर). जसे जगात मूलदेव इत्यादींसारखा प्रसिद्ध दरोडेखोर, असा याचा अर्थ आहे. म्हणून जो कोणी गाव लुटणे, रस्ता अडवून दरोडा घालणे किंवा नगरात घरफोडी करणे इत्यादी कृत्ये करत फिरतो आणि 'अमुक नावाचा माणूस हे हे कृत्य करतो' अशी त्याची ख्याती असते, त्याला प्रवज्जा देऊ नये. परंतु जो राजपुत्र राज्य मिळवण्याच्या इच्छेने गाव लुटणे इत्यादी कृत्ये करतो, त्याला प्रवज्जा द्यावी. कारण राजे लोक त्याने प्रवज्जा घेतल्यावर संतुष्ट होतात. जर राजे संतुष्ट होत नसतील, तर त्याला प्रवज्जा देऊ नये. पूर्वी लोकांमध्ये प्रसिद्ध असलेला चोर जर नंतर चोरीचे काम सोडून पंचशीलांचे पालन करू लागला आणि लोकांना हे माहीत झाले, तर त्याला प्रवज्जा द्यावी. परंतु जे आंबे, फणस इत्यादी चोरणारे लहान चोर आहेत किंवा जे न दिसता घरफोडी इत्यादी चोऱ्या करतात आणि नंतरही 'याने हे कृत्य केले आहे' असे उघड होत नाही, त्यांनाही प्रवज्जा देणे योग्य आहे। ๙๒. การํ ภินฺทิตฺวาติ อฏฺฏพนฺธนาทึ ภินฺทิตฺวา. อภยูวราติ เอตฺถ ภเยน อุปรมนฺตีติ ภยูวรา, เอเต ปน ลทฺธาภยตฺตา น ภยูวราติ อภยูวรา; ปการสฺส เจตฺถ วกาโร กโตติ เวทิตพฺโพ. น ภิกฺขเว การเภทโก ปพฺพาเชตพฺโพติ กาโร วุจฺจติ พนฺธนาคารํ. อิธ ปน อนฺทุพนฺธนํ วา โหตุ สงฺขลิกพนฺธนํ วา รชฺชุพนฺธนํ วา คามพนฺธนํ วา นิคมพนฺธนํ วา นครพนฺธนํ วา ปุริสคุตฺติ วา ชนปทพนฺธนํ วา ทีปพนฺธนํ วา, โย เอเตสุ ยํกิญฺจิ พนฺธนํ ภินฺทิตฺวา วา ฉินฺทิตฺวา วา มุญฺจิตฺวา วา วิวริตฺวา วา ปสฺสมานานํ วา อปสฺสมานานํ วา ปลายติ, โส การเภทโกติ สงฺขฺยํ คจฺฉติ. ตสฺมา อีทิโส การเภทโก โจโร ทีปพนฺธนํ ภินฺทิตฺวา ทีปนฺตรํ คโตปิ น ปพฺพาเชตพฺโพ. โย ปน น โจโร, เกวลํ หตฺถกมฺมํ อกโรนฺโต ‘‘เอวํ โน อปลายนฺโต กริสฺสตี’’ติ ราชยุตฺตาทีหิ พทฺโธ, โส การํ ภินฺทิตฺวา ปลาโตปิ ปพฺพาเชตพฺโพ. โย ปน คามนิคมปฏฺฏนาทีนิ เกณิยา คเหตฺวา ตํ อสมฺปาเทนฺโต พนฺธนาคารํ ปเวสิโต โหติ, โส ปลายิตฺวา อาคโต น ปพฺพาเชตพฺโพ. โยปิ กสิกมฺมาทีหิ ธนํ สมฺปาเทตฺวา ชีวนฺโต ‘‘นิธานํ อิมินา ลทฺธ’’นฺติ เปสุญฺญํ อุปสํหริตฺวา เกนจิ พนฺธาปิโต โหติ, ตํ ตตฺเถว ปพฺพาเชตุํ น วฏฺฏติ, ปลายิตฺวา คตํ ปน คตฏฺฐาเน ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. ९२. 'तुरुंग फोडून' (कारं भिन्दित्वा) म्हणजे बंदीगृह किंवा बेड्या इत्यादी तोडून. 'अभयूवरा' या शब्दाचा अर्थ असा समजावा: जे भयाने निवृत्त होतात (वाईट कर्मांपासून मागे हटतात) ते 'भयूवरा'. परंतु हे (भिक्खू) अभय प्राप्त झाल्यामुळे भयाने निवृत्त होणारे नाहीत, म्हणून 'अभयूवरा'. येथे 'प' अक्षराचा 'व' अक्षर झाला आहे असे समजावे. 'भिक्खूंनो, तुरुंग फोडणाऱ्याला (कारभेदक) प्रवज्जा देऊ नये' यात 'कार' म्हणजे बंदीगृह (तुरुंग) म्हटले जाते. येथे पायातील बेड्यांचे बंधन असो, साखळदंडांचे बंधन असो, दोरीचे बंधन असो, गावाचे बंधन असो, कसब्याचे (निगम) बंधन असो, नगराचे बंधन असो, पुरुषांचे पहारे असो, जनपदाचे बंधन असो किंवा बेटाचे बंधन असो; या बंधनांपैकी कोणतेही बंधन तोडून, कापून, सोडवून किंवा उघडून, पहारेकरी पाहत असताना किंवा न पाहत असताना जो पळून जातो, त्याला 'तुरुंग फोडणारा' (कारभेदक) म्हटले जाते. म्हणून असा तुरुंग फोडणारा चोर बेटाचे बंधन तोडून दुसऱ्या बेटावर गेला असला तरी त्याला प्रवज्जा देऊ नये. परंतु जो चोर नाही, केवळ शारीरिक श्रम (वेठबिगारी) न केल्यामुळे 'हा न पळता आमचे काम करेल' या विचाराने राजाच्या माणसांनी बांधून ठेवला असेल, तो तुरुंग फोडून पळून गेला तरी त्याला प्रवज्जा द्यावी. परंतु ज्याने गाव, नगर, बंदर इत्यादींचे कर गोळा करण्याचे कंत्राट घेतले आहे आणि तो कर न भरू शकल्यामुळे त्याला बंदीगृहात टाकले गेले आहे, तो पळून आला तरी त्याला प्रवज्जा देऊ नये. तसेच जो शेती इत्यादी करून प्रामाणिकपणे जगत असताना 'याला गुप्त धन सापडले आहे' अशी खोटी चहाडी करून कोणाकडून तरी बंदी बनवला गेला असेल, त्याला त्याच ठिकाणी प्रवज्जा देणे योग्य नाही, परंतु तो पळून गेल्यास, तो ज्या ठिकाणी गेला आहे तिथे त्याला प्रवज्जा देणे योग्य आहे। ๙๓. น [Pg.280] ภิกฺขเว ลิขิตโกติ เอตฺถ ลิขิตโก นาม น เกวลํ ‘‘ยตฺถ ปสฺสติ ตตฺถ หนฺตพฺโพ’’ติ, อถ โข โย โกจิ โจริกํ วา อญฺญํ วา ครุํ ราชาปราธํ กตฺวา ปลาโต, ราชา จ นํ ปณฺเณ วา โปตฺถเก วา ‘‘อิตฺถนฺนาโม ยตฺถ ทิสฺสติ, ตตฺถ คเหตฺวา มาเรตพฺโพ’’ติ วา ‘‘หตฺถปาทานิสฺส ฉินฺทิตพฺพานี’’ติ วา ‘‘เอตฺตกํ นาม ทณฺฑํ อาหราเปตพฺโพ’’ติ วา ลิขาเปติ, อยํ ลิขิตโก นาม, โส น ปพฺพาเชตพฺโพ. ९३. 'भिक्खूंनो, लिखित (ज्याचे नाव गुन्हेगार म्हणून नोंदवले आहे) व्यक्तीला प्रवज्जा देऊ नये' यात 'लिखित' म्हणजे केवळ 'जिथे दिसेल तिथे त्याला मारावे' असे लिहिलेलाच नव्हे; तर जो कोणी चोरी किंवा इतर कोणताही गंभीर राज्यापराध करून पळून गेला आहे आणि राजाने घोषणापत्रावर किंवा गुन्हेगारांच्या नोंदवहीत 'अमुक नावाचा माणूस जिथे दिसेल, तिथे त्याला पकडून मारावे' किंवा 'त्याचे हातपाय कापून टाकावेत' किंवा 'त्याच्याकडून इतका दंड वसूल करावा' असे लिहून ठेवले असेल, त्याला 'लिखित' म्हणतात. त्याला प्रवज्जा देऊ नये। ๙๔. กสาหโต กตทณฺฑกมฺโมติ เอตฺถ โย วจนเปสนาทีนิ อกโรนฺโต หญฺญติ, น โส กตทณฺฑกมฺโม. โย ปน เกณิยา วา อญฺญถา วา กิญฺจิ คเหตฺวา ขาทิตฺวา ปุน ทาตุํ อสกฺโกนฺโต ‘‘อยเมว เต ทณฺโฑ โหตู’’ติ กสาหิ หญฺญติ, อยํ กสาหโต กตทณฺฑกมฺโม. โส จ กสาหิ วา หโต โหตุ อทฺธทณฺฑกาทีนํ วา อญฺญตเรน, ยาว อลฺลวโณ โหติ, ตาว น ปพฺพาเชตพฺโพ. วเณ ปน ปากติเก กตฺวา ปพฺพาเชตพฺโพ. สเจ ปน ชาณูหิ วา กปฺปเรหิ วา นาฬิเกรปาสาณาทีหิ วา ฆาเตตฺวา มุตฺโต โหติ, สรีเร จสฺส คณฺฐิโย ปญฺญายนฺติ, น ปพฺพาเชตพฺโพ. ผาสุกํ กตฺวา เอว คณฺฐีสุ สนฺนิสินฺนาสุ ปพฺพาเชตพฺโพ. ९४. 'चाबकाने मारलेला आणि शिक्षा झालेला' (कसाहतो कतदण्डकम्मो) यात जो आज्ञा न पाळल्यामुळे किंवा काम न केल्यामुळे मार खातो, तो 'कतदण्डकम्म' (शिक्षा झालेला) नव्हे. परंतु ज्याने कर्जाने किंवा इतर मार्गाने काही घेतले, ते खर्च केले आणि नंतर ते परत करण्यास असमर्थ ठरल्यामुळे 'हीच तुझी शिक्षा असो' असे म्हणून ज्याला चाबकाने मारले जाते, तो 'चाबकाने मारलेला आणि शिक्षा झालेला' होय. त्याला चाबकाने मारले गेले असो किंवा काठी इत्यादींपैकी कोणत्याही वस्तूने मारले गेले असो, जोपर्यंत त्याच्या जखमा ओल्या (ताज्या) आहेत, तोपर्यंत त्याला प्रवज्जा देऊ नये. जखमा बऱ्या झाल्यावरच त्याला प्रवज्जा द्यावी. परंतु जर त्याला गुडघ्याने, कोपराने, नारळाच्या कवटीने किंवा दगडाने मारून सोडले असेल आणि त्याच्या शरीरावर गाठी (सूज) दिसत असतील, तर त्याला प्रवज्जा देऊ नये. त्या गाठी बऱ्या होऊन शरीर निरोगी झाल्यावरच त्याला प्रवज्जा द्यावी। ๙๕. ลกฺขณาหโต กตทณฺฑกมฺโมติ เอตฺถ กตทณฺฑกมฺมภาโว ปุริมนเยเนว เวทิตพฺโพ. ยสฺส ปน นลาเฏ วา อูรุอาทีสุ วา ตตฺเตน โลเหน ลกฺขณํ อาหตํ โหติ, โส สเจ ภุชิสฺโส ยาว อลฺลวโณ โหติ, ตาว น ปพฺพาเชตพฺโพ. สเจปิสฺส วณา รุฬฺหา โหนฺติ, ฉวิยา สมปริจฺเฉทา, ลกฺขณํ น ปญฺญายติ, ติมณฺฑลวตฺถสฺส อุตฺตราสงฺเค กเต ปฏิจฺฉนฺโนกาเส เจ โหติ, ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ, อปฺปฏิจฺฉนฺโนกาเส เจ น วฏฺฏติ. ९५. 'डाग दिलेला (चिन्हांकित) आणि शिक्षा झालेला' (लक्खणाहतो कतदण्डकम्मो) यात शिक्षा झाल्याची स्थिती पूर्वोक्त पद्धतीनेच समजावी. परंतु ज्याच्या कपाळावर किंवा मांड्यांवर गरम लोखंडाने डाग (चिन्ह) दिला गेला आहे, तो जरी स्वतंत्र (मुक्त) झाला असला, तरी जोपर्यंत त्याच्या जखमा ओल्या आहेत, तोपर्यंत त्याला प्रवज्जा देऊ नये. जरी त्याच्या जखमा बऱ्या झाल्या असल्या आणि त्वचेचा रंग सारखा झाला असला, तरी जर ते चिन्ह दिसत नसेल; किंवा तीन मंडळांचे वस्त्र नीट परिधान केल्यावर आणि उपराणे (उत्तरासंग) पांघरल्यावर जर ते चिन्ह झाकलेल्या भागात येत असेल, तर त्याला प्रवज्जा देणे योग्य आहे. जर ते न झाकलेल्या (उघड्या) भागात येत असेल, तर प्रवज्जा देणे योग्य नाही। โจรวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. चोरांची कथा समाप्त झाली। อิณายิกวตฺถุกถา कर्जदारांची कथा ๙๖. น ภิกฺขเว อิณายิโกติ เอตฺถ อิณายิโก นาม ยสฺส ปิติปิตามเหหิ วา อิณํ คหิตํ โหติ, สยํ วา อิณํ คหิตํ โหติ, ยํ วา อาถเปตฺวา มาตาปิตูหิ กิญฺจิ คหิตํ โหติ, โส ตํ [Pg.281] อิณํ ปเรสํ ธาเรตีติ อิณายิโก. ยํ ปน อญฺเญ ญาตกา อาถเปตฺวา กิญฺจิ คณฺหนฺติ, โส น อิณายิโก. น หิ เต ตํ อาถเปตุํ อิสฺสรา, ตสฺมา ตํ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ, อิตรํ น วฏฺฏติ. สเจ ปนสฺส ญาติสาโลหิตา ‘‘มยํ ทสฺสาม, ปพฺพาเชถ น’’นฺติ อิณํ อตฺตโน ภารํ กโรนฺติ, อญฺโญ วา โกจิ ตสฺส อาจารสมฺปตฺตึ ทิสฺวา ‘‘ปพฺพาเชถ นํ, อหํ อิณํ ทสฺสามี’’ติ วทติ, ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. เตสุ อสติ ภิกฺขุนา ตถารูปสฺส อุปฏฺฐากสฺสาปิ อาโรเจตพฺพํ ‘‘สเหตุโก สตฺโต อิณปลิโพเธน น ปพฺพชตี’’ติ. สเจ โส ปฏิปชฺชติ, ปพฺพาเชตพฺโพ. สเจปิ อตฺตโน กปฺปิยภณฺฑํ อตฺถิ, ‘‘เอตํ ทสฺสามี’’ติ ปพฺพาเชตพฺโพ. สเจ ปน เนว ญาตกาทโย ปฏิปชฺชนฺติ, น อตฺตโน ธนํ อตฺถิ, ‘‘ปพฺพาเชตฺวา ภิกฺขาย จริตฺวา โมเจสฺสามี’’ติ ปพฺพาเชตุํ น วฏฺฏติ. สเจ ปพฺพาเชติ ทุกฺกฏํ. ปลาโตปิ อาเนตฺวา ทาตพฺโพ. โน เจ เทติ, สพฺพํ อิณํ คีวา โหติ. อชานิตฺวา ปพฺพาชยโต อนาปตฺติ. ปสฺสนฺเตน ปน อาเนตฺวา อิณสามิกานํ ทสฺเสตพฺโพ. อปสฺสนฺตสฺส คีวา น โหติ. ९६. भिक्खून्नों, 'कर्जदाराला (प्रवज्जा देऊ नये)' या वाक्यात 'कर्जदार' म्हणजे असा व्यक्ती, ज्याच्या वडिलांनी किंवा आजोबांनी कर्ज घेतले आहे, किंवा ज्याने स्वतः कर्ज घेतले आहे, किंवा ज्याला गहाण ठेवून आई-वडिलांनी काही घेतले आहे, आणि तो ते कर्ज इतरांना फेडण्यास बांधील आहे, त्याला कर्जदार म्हणतात. परंतु, ज्याला इतर नातेवाईकांनी गहाण ठेवून काही घेतले असेल, तो कर्जदार नव्हे. कारण ते नातेवाईक त्याला गहाण ठेवण्यास सक्षम (अधिकारी) नसतात, म्हणून त्याला प्रवज्जा देणे योग्य आहे, दुसऱ्याला (आई-वडिलांनी गहाण ठेवलेल्याला) नाही. परंतु जर त्याच्या रक्ताच्या नातेवाईकांनी 'आम्ही कर्ज फेडू, याला प्रवज्जा द्या' असे म्हणून ते कर्ज स्वतःची जबाबदारी बनवले, किंवा इतर कोणी त्याच्या सदाचाराची संपन्नता पाहून 'याला प्रवज्जा द्या, मी कर्ज फेडीन' असे म्हटले, तर त्याला प्रवज्जा देणे योग्य आहे. त्यांच्या अनुपस्थितीत भिक्खूने तशा प्रकारच्या उपस्थायकाला (दायकाला) देखील सांगावे की, 'हा (मार्ग-फल मिळवण्यास पात्र असलेला) प्राणी कर्जाच्या अडथळ्यामुळे प्रवज्जित होऊ शकत नाही.' जर तो ते मान्य करतो, तर त्याला प्रवज्जा द्यावी. जर स्वतःचे कप्पियभांड (योग्य वस्तू/धन) असेल, तर 'मी हे देऊन टाकीन' असा विचार करून त्याला प्रवज्जा द्यावी. परंतु जर नातेवाईक इत्यादी जबाबदारी घेत नसतील आणि स्वतःकडेही धन नसेल, तर 'याला प्रवज्जित करून, भिक्षा मागून कर्जमुक्त करीन' असा विचार करून प्रवज्जा देणे योग्य नाही. जर प्रवज्जा दिली, तर दुक्कट आपत्ती होते. पळून गेलेल्यालाही परत आणून कर्जदात्याला सोपवावे. जर तो त्याला परत देत नाही, तर सर्व कर्ज (त्या प्रवज्जा देणाऱ्याच्या) गळ्यावर येते. न जाणता (कर्जदार असल्याचे माहीत नसताना) प्रवज्जा देणाऱ्याला आपत्ती होत नाही. परंतु (नंतर) पाहणाऱ्या (गुरूने) त्याला आणून कर्जदात्यांना दाखवावे. न पाहणाऱ्याच्या गळ्यावर जबाबदारी येत नाही. สเจ อิณายิโก อญฺญํ เทสํ คนฺตฺวา ปุจฺฉิยมาโนปิ ‘‘นาหํ กสฺสจิ กิญฺจิ ธาเรมี’’ติ วตฺวา ปพฺพชติ, อิณสามิโก จ ตํ ปริเยสนฺโต ตตฺถ คจฺฉติ, ทหโร ตํ ทิสฺวา ปลายติ, โส จ เถรํ อุปสงฺกมิตฺวา ‘‘อยํ ภนฺเต เกน ปพฺพาชิโต, มม เอตฺตกํ นาม ธนํ คเหตฺวา ปลาโต’’ติ วทติ, เถเรน วตฺตพฺพํ ‘‘มยา อุปาสก ‘อณโณ อห’นฺติ วทนฺโต ปพฺพาชิโต, กึ ทานิ กโรมิ, ปสฺส เม ปตฺตจีวรมตฺต’’นฺติ อยํ ตตฺถ สามีจิ. ปลาเต ปน คีวา น โหติ. जर कर्जदार दुसऱ्या देशात जाऊन, विचारले असताही 'मी कोणाचेही काही देणे लागत नाही' असे सांगून प्रवज्जित होतो, आणि कर्जदाता त्याचा शोध घेत तिथे येतो, आणि तो तरुण भिक्खू त्याला पाहून पळून जातो, आणि तो स्थविरांकडे जाऊन म्हणतो, 'भंते, याला कोणी प्रवज्जित केले? हा माझे इतके धन घेऊन पळून आला आहे,' तर स्थविरांनी म्हणावे, 'उपासका, 'मी कर्जमुक्त आहे' असे म्हणणाऱ्या याला मी प्रवज्जित केले आहे. आता मी काय करू? माझे फक्त पात्र आणि चीवर पहा.' ही तेथील योग्य आचारपद्धती (सामीची) आहे. परंतु, तो पळून गेल्यावर गळ्यावर जबाबदारी येत नाही. สเจ ปน นํ เถรสฺส สมฺมุขาว ทิสฺวา ‘‘อยํ มม อิณายิโก’’ติ วทติ, ‘‘ตว อิณายิกํ ตฺวเมว ชานาหี’’ติ วตฺตพฺโพ. เอวมฺปิ คีวา น โหติ. สเจปิ โส ‘‘ปพฺพชิโต อยํ อิทานิ กุหึ คมิสฺสตี’’ติ วทติ, เถเรน ‘‘ตฺวํเยว ชานาหี’’ติ วตฺตพฺโพ. เอวมฺปิสฺส ปลาเต คีวา น โหติ. สเจ ปน เถโร ‘‘กุหึ ทานิ อยํ คมิสฺสติ, อิเธว อจฺฉตู’’ติ วทติ, โส เจ ปลายติ, คีวา โหติ. สเจ โส สเหตุกสตฺโต โหติ วตฺตสมฺปนฺโน, เถเรน ‘‘อีทิโส อย’’นฺติ วตฺตพฺพํ. อิณสามิโก เจ ‘‘สาธู’’ติ วิสฺสชฺเชติ, อิจฺเจตํ กุสลํ. สเจ ปน ‘‘อุปฑฺฒุปฑฺฒํ เทถา’’ติ วทติ, ทาตพฺพํ. อปเรน สมเยน อติอาราธโก โหติ, ‘‘สพฺพํ เทถา’’ติ [Pg.282] วุตฺเตปิ ทาตพฺพเมว. สเจ ปน อุทฺเทสปริปุจฺฉาทีสุ กุสโล โหติ พหูปกาโร ภิกฺขูนํ, ภิกฺขาจารวตฺเตน ปริเยสิตฺวาปิ อิณํ ทาตพฺพเมวาติ. पण जर तो त्याला स्थविरांच्या समोरच पाहून 'हा माझा कर्जदार आहे' असे म्हणतो, तर 'तुझ्या कर्जदाराला तूच जाण' असे त्याला सांगावे. असे म्हटले तरी गळ्यावर जबाबदारी येत नाही. जर तो असेही म्हणतो की, 'हा प्रवज्जित आता कुठे जाईल?' तर स्थविरांनी 'तूच जाण' असे सांगावे. असे केल्यानेही त्याच्या पळून जाण्याने गळ्यावर जबाबदारी येत नाही. पण जर स्थवीर म्हणतात की, 'आता हा कुठे जाईल? हा इथेच राहू दे,' आणि जर तो पळून गेला, तर गळ्यावर जबाबदारी येते. जर तो हेतू असलेला प्राणी (मार्ग-फल मिळवण्यास पात्र) आणि आचारसंपन्न (वत्तसंपन्न) असेल, तर स्थविरांनी 'हा असा (गुणी) आहे' असे सांगावे. जर कर्जदाता 'ठीक आहे' असे म्हणून (कर्ज) सोडून देतो, तर ते उत्तम आहे. पण जर तो 'अर्धे-अर्धे (हप्त्याने) द्या' असे म्हणतो, तर ते द्यावे. नंतरच्या काळात जर तो अत्यंत सेवाभावी (अतिआराधक) झाला, आणि 'सर्व द्या' असे म्हटले गेले, तरी ते दिलेच पाहिजे. पण जर तो उद्देस (पाठ करणे) आणि परिपुच्छा (प्रश्न विचारणे) इत्यादींमध्ये कुशल असेल आणि भिक्खूचा मोठा उपकारक असेल, तर भिक्षाटनाच्या नियमाने (भिक्षा मागून) शोधूनही कर्ज फेडलेच पाहिजे. อิณายิกวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. कर्जदाराची कथा समाप्त झाली. ทาสวตฺถุกถา दासाची कथा ๙๗. น ภิกฺขเว ทาโสติ เอตฺถ จตฺตาโร ทาสา – อนฺโตชาโต, ธนกฺกีโต, กรมรานีโต, สามํ ทาสพฺยํ อุปคโตติ. ตตฺถ อนฺโตชาโต นาม ชาติทาโส ฆรทาสิยา ปุตฺโต. ธนกฺกีโต นาม มาตาปิตูนํ สนฺติกา ปุตฺโต วา สามิกานํ สนฺติกา ทาโส วา ธนํ ทตฺวา ทาสจาริตฺตํ อาโรเปตฺวา กีโต. เอเต ทฺเวปิ น ปพฺพาเชตพฺพา. ปพฺพาเชนฺเตน ตตฺถ ตตฺถ จาริตฺตวเสน อทาสํ กตฺวา ปพฺพาเชตพฺพา. ९७. भिक्खून्नों, 'दासाला (प्रवज्जा देऊ नये)' या वाक्यात चार प्रकारचे दास आहेत – अंतोजातो (घरात जन्मलेला), धनक्कीतो (धनाने विकत घेतलेला), करमरानीतो (युद्धात किंवा दरोड्यात पकडून आणलेला), आणि सामं दासव्यं उपगतो (स्वतःहून दासत्व पत्करलेला). त्यापैकी 'अंतोजातो' म्हणजे जन्माने दास असलेला, घरच्या दासीचा मुलगा. 'धनक्कीतो' म्हणजे आई-वडिलांकडून मुलगा किंवा मालकांकडून दास, धन देऊन आणि दासत्वाच्या नियमात ठेवून विकत घेतलेला. या दोन्ही प्रकारच्या दासांना प्रवज्जा देऊ नये. प्रवज्जा देऊ इच्छिणाऱ्याने त्या त्या ठिकाणच्या प्रथेनुसार त्यांना दासत्वातून मुक्त (अदास) करूनच प्रवज्जा द्यावी. กรมรานีโต นาม ติโรรฏฺฐํ วิโลปํ วา กตฺวา อุปลาเปตฺวา วา ติโรรฏฺฐโต ภุชิสฺสมานุสกานิ อาหรนฺติ, อนฺโตรฏฺเฐเยว วา กตาปราธํ กิญฺจิ คามํ ราชา ‘‘วิลุมฺปถา’’ติ อาณาเปติ, ตโต มานุสกานิปิ อาหรนฺติ. ตตฺถ สพฺเพ ปุริสา ทาสา, อิตฺถิโย ทาสิโย. เอวรูโป กรมรานีโต ทาโส เยหิ อานีโต, เตสํ สนฺติเก วสนฺโต วา พนฺธนาคาเร พทฺโธ วา ปุริเสหิ รกฺขิยมาโน วา น ปพฺพาเชตพฺโพ. ปลายิตฺวา ปน คโต, คตฏฺฐาเน ปพฺพาเชตพฺโพ. รญฺญา ตุฏฺเฐน ‘‘กรมรานีตเก มุญฺจถา’’ติ วตฺวา วา สพฺพสาธารเณน วา นเยน พนฺธนา โมกฺเข กเต ปพฺพาเชตพฺโพว. 'करमरानीतो' म्हणजे दुसऱ्या देशात लूटमार करून किंवा फसवून, दुसऱ्या देशातून स्वतंत्र (मुक्त) माणसांना पकडून आणतात; किंवा स्वतःच्याच देशात गुन्हा केलेल्या एखाद्या गावाला राजा 'लुटा' अशी आज्ञा देतो, आणि तेथून माणसांना पकडून आणतात. त्यामध्ये सर्व पुरुष दास आणि स्त्रिया दासी बनतात. अशा प्रकारचा 'करमरानीत' दास ज्यांनी आणला आहे, त्यांच्याकडे राहत असताना, किंवा तुरुंगात बंदिस्त असताना, किंवा रक्षकांद्वारे रक्षण केला जात असताना त्याला प्रवज्जा देऊ नये. परंतु, जर तो पळून गेला, तर गेलेल्या ठिकाणी त्याला प्रवज्जा द्यावी. राजाने प्रसन्न होऊन 'करमरानीत दासांना मुक्त करा' असे म्हटल्यास किंवा सर्वसाधारण नियमाने बंधनातून मुक्त केल्यास, त्याला नक्कीच प्रवज्जा द्यावी. สามํ ทาสพฺยํ อุปคโต นาม ชีวิตเหตุ วา อารกฺขเหตุ วา ‘‘อหํ เต ทาโส’’ติ สยเมว ทาสภาวํ อุปคโต. ราชูนํ หตฺถิอสฺสโคมหึสโคปกาทโย วิย, ตาทิโส ทาโส น ปพฺพาเชตพฺโพ. รญฺโญ วณฺณทาสีนํ ปุตฺตา โหนฺติ อมจฺจปุตฺตสทิสา, เตปิ น ปพฺพาเชตพฺพา. ภุชิสฺสิตฺถิโย อสํยตา วณฺณทาสีหิ สทฺธึ วิจรนฺติ, ตาสํ ปุตฺเต ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. สเจ สยเมว ปณฺณํ [Pg.283] อาโรเปนฺติ, น วฏฺฏติ. ภฏิปุตฺตกคณาทีนํ ทาสาปิ เตหิ อทินฺนา น ปพฺพาเชตพฺพา. วิหาเรสุ ราชูหิ อารามิกทาสา นาม ทินฺนา โหนฺติ, เตปิ ปพฺพาเชตุํ น วฏฺฏติ. ภุชิสฺเส ปน กตฺวา ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. มหาปจฺจริยํ ‘‘อนฺโตชาตธนกฺกีตเก อาเนตฺวา ภิกฺขุสงฺฆสฺส อารามิเก เทมาติ เทนฺติ, ตกฺกํ สีเส อาสิตฺตกสทิสาว โหนฺติ, เต ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏตี’’ติ วุตฺตํ. กุรุนฺทิยํ ปน ‘‘อารามิกํ เทมาติ กปฺปิยโวหาเรน เทนฺติ, เยน เกนจิ โวหาเรน ทินฺโน โหตุ, เนว ปพฺพาเชตพฺโพ’’ติ วุตฺตํ. ทุคฺคตมนุสฺสา สงฺฆํ นิสฺสาย ชีวิสฺสามาติ วิหาเร กปฺปิยการกา โหนฺติ, เอเตปิ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. ยสฺส มาตาปิตโร ทาสา, มาตา เอว วา ทาสี, ปิตา อทาโส, ตํ ปพฺพาเชตุํ น วฏฺฏติ. ยสฺส ปน มาตา อทาสี, ปิตา ทาโส, ตํ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. ภิกฺขุสฺส ญาตกา วา อุปฏฺฐากา วา ทาสํ เทนฺติ ‘‘อิมํ ปพฺพาเชถ, ตุมฺหากํ เวยฺยาวจฺจํ กริสฺสตี’’ติ อตฺตโนวาสฺส ทาโส อตฺถิ, ภุชิสฺโส กโตว ปพฺพาเชตพฺโพ. สามิกา ทาสํ เทนฺติ ‘‘อิมํ ปพฺพาเชถ, สเจ อภิรมิสฺสติ, อทาโส วิพฺภมิสฺสติ เจ, อมฺหากํ ทาโสว ภวิสฺสตีติ อยํ ตาวกาลิโก นาม, ตํ ปพฺพาเชตุํ น วฏฺฏตี’’ติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. นิสฺสามิกทาโส โหติ, โสปิ ภุชิสฺโส กโตว ปพฺพาเชตพฺโพ. อชานนฺโต ปพฺพาเชตฺวา วา อุปสมฺปาเทตฺวา วา ปจฺฉา ชานาติ, ภุชิสฺสํ กาตุเมว วฏฺฏติ. स्वतःहून गुलामगिरी पत्करलेला म्हणजे उपजीविकेसाठी किंवा संरक्षणासाठी 'मी तुमचा दास आहे' असे म्हणून स्वतःहून दासत्व स्वीकारलेला मनुष्य होय. राजांच्या हत्तीपालक, अश्वपालक, गोपाळ, म्हैसपालक इत्यादींप्रमाणे अशा दासाला प्रव्रज्या देऊ नये. राजाच्या रूपवान दासींचे (वेश्यांचे) पुत्र जे अमात्यपुत्रांसारखे असतात, त्यांनाही प्रव्रज्या देऊ नये. स्वतंत्र परंतु असंयत स्त्रिया ज्या रूपवान दासींसोबत फिरतात, त्यांच्या पुत्रांना प्रव्रजित करणे योग्य आहे. जर त्या स्वतःहून स्वतःचे नाव दासींच्या यादीत नोंदवतात, तर (त्यांच्या पुत्रांना प्रव्रजित करणे) योग्य नाही. सैनिकपुत्रांच्या समूहाचे (गणांचे) दास देखील, जर त्यांच्या मालकांनी स्वतःहून दिले नसतील, तर त्यांना प्रव्रजित करू नये. विहारांमध्ये राजांनी दिलेले 'आरामिक दास' (विहार सेवक) असतात, त्यांनाही प्रव्रजित करणे योग्य नाही. परंतु त्यांना स्वतंत्र (मुक्त) करून प्रव्रजित करणे योग्य आहे. महाप्रत्यरी (महापच्चरी) अट्टकथेत म्हटले आहे – 'घरात जन्मलेले आणि विकत घेतलेले दास आणून भिक्खू संघाला "आम्ही आरामिक (सेवक) देत आहोत" असे म्हणून दान करतात, ते डोक्यावर ताक ओतल्यासारखेच असतात, त्यांना प्रव्रजित करणे योग्य आहे.' परंतु कुरुंदी अट्टकथेत म्हटले आहे – 'आम्ही आरामिक देत आहोत असे कप्पिय (योग्य) व्यवहाराने देतात, मग ते कोणत्याही व्यवहाराने दिलेले असो, त्यांना प्रव्रजित करूच नये.' गरीब लोक संघाच्या आश्रयाने जगू या म्हणून विहारात कप्पियकारक (सेवक) होतात, त्यांना प्रव्रजित करणे योग्य आहे. ज्याचे आई-वडील दास आहेत, किंवा केवळ आईच दासी आहे आणि वडील दास नाहीत, त्याला प्रव्रजित करणे योग्य नाही. परंतु ज्याची आई दासी नाही आणि वडील दास आहेत, त्याला प्रव्रजित करणे योग्य आहे. भिक्खूचे नातेवाईक किंवा उपस्थायक (सेवक) दास देतात की, 'याला प्रव्रजित करा, हा तुमची वैयावृत्य (सेवा) करेल,' किंवा स्वतःचाच दास असेल, तर त्याला स्वतंत्र करूनच प्रव्रजित करावे. मालक दास देतात की, 'याला प्रव्रजित करा, जर तो रमला तर ठीक (तो दास राहणार नाही), आणि जर तो गृहस्थ आश्रमात परतला, तर तो आमचाच दास राहील.' याला 'तावकलिक' (तात्पुरता मुक्त) म्हणतात, त्याला प्रव्रजित करणे योग्य नाही, असे कुरुंदीत म्हटले आहे. मालक नसलेला दास असेल, त्यालाही स्वतंत्र करूनच प्रव्रजित करावे. न जाणता (तो दास आहे हे न ठाऊक असताना) प्रव्रजित किंवा उपसंपन्न केले आणि नंतर समजले, तर त्याला स्वतंत्र करणेच योग्य आहे. อิมสฺส จ อตฺถสฺส ปกาสนตฺถํ อิทํ วตฺถุํ วทนฺติ – เอกา กิร กุลทาสี เอเกน สทฺธึ อนุราธปุรา ปลายิตฺวา โรหเณ วสมานา ปุตฺตํ ปฏิลภิ, โส ปพฺพชิตฺวา อุปสมฺปนฺนกาเล ลชฺชี กุกฺกุจฺจโก อโหสิ. อเถกทิวสํ มาตรํ ปุจฺฉิ – ‘‘กึ อุปาสิเก ตุมฺหากํ ภาตา วา ภคินี วา นตฺถิ, น กญฺจิ ญาตกํ ปสฺสามี’’ติ. ‘‘ตาต, อหํ อนุราธปุเร กุลทาสี, ตว ปิตรา สทฺธึ ปลายิตฺวา อิธ วสามี’’ติ. สีลวา ภิกฺขุ ‘‘อสุทฺธา กิร เม ปพฺพชฺชา’’ติ สํเวคํ ลภิตฺวา มาตรํ ตสฺส กุลสฺส นามโคตฺตํ ปุจฺฉิตฺวา อนุราธปุรํ อาคมฺม ตสฺส กุลสฺส ฆรทฺวาเร อฏฺฐาสิ. ‘‘อติจฺฉถ ภนฺเต’’ติ วุตฺเตปิ นาติกฺกมิ, เต อาคนฺตฺวา ‘‘กึ ภนฺเต’’ติ ปุจฺฉึสุ. ‘‘ตุมฺหากํ อิตฺถนฺนามา ทาสี ปลาตา อตฺถี’’ติ? อตฺถิ ภนฺเต. อหํ ตสฺสา ปุตฺโต, สเจ มํ ตุมฺเห อนุชานาถ, ปพฺพชฺชํ ลภามิ, ตุมฺเห มยฺหํ สามิกาติ[Pg.284]. เต หฏฺฐตุฏฺฐา หุตฺวา ‘‘สุทฺธา ภนฺเต ตุมฺหากํ ปพฺพชฺชา’’ติ ตํ ภุชิสฺสํ กตฺวา มหาวิหาเร วสาเปสุํ จตูหิ ปจฺจเยหิ ปฏิชคฺคนฺตา. เถโร ตํ กุลํ นิสฺสาย วสมาโนเยว อรหตฺตํ ปาปุณีติ. या अर्थाचे स्पष्टीकरण करण्यासाठी ही कथा सांगतात – असे म्हटले जाते की, एक कुलीन घराण्याची दासी (कुलदासी) एका पुरुषासोबत अनुराधपूरहून पळून गेली आणि रोहण जनपदात राहत असताना तिला एक मुलगा झाला. तो प्रव्रजित झाला आणि उपसंपदेच्या वेळी तो लज्जाशील व साशंक (कुकुच्चक) झाला. नंतर एका दिवशी त्याने आपल्या आईला विचारले – 'उपासिके, तुमचे कोणी भाऊ किंवा बहीण नाही का? मला तुमचे कोणीच नातेवाईक दिसत नाहीत.' तिने सांगितले – 'बाळा, मी अनुराधपूरमध्ये एका कुलीन घराण्याची दासी होती. तुझ्या वडिलांसोबत पळून येऊन मी येथे राहत आहे.' त्या शीलवान भिक्खूला 'माझी प्रव्रज्या अपवित्र (अशुद्ध) आहे' असे वाटून संवेग (तीव्र वैराग्य) प्राप्त झाला. त्याने आईला त्या मालक घराण्याचे नाव व गोत्र विचारले आणि अनुराधपूरला यावे व तो त्या घराच्या दाराशी उभा राहिला. 'भंते, पुढे जा (दुसऱ्या घरी भिक्षा मागा)' असे म्हटले तरी ते तेथून हलले नाहीत. त्यांनी बाहेर येऊन विचारले – 'भंते, काय आहे?' त्याने विचारले – 'तुमची अमुक नावांची पळून गेलेली दासी आहे का?' त्यांनी उत्तर दिले – 'होय भंते, आहे.' भिक्खू म्हणाला – 'मी तिचा मुलगा आहे. जर तुम्ही मला परवानगी दिली, तर मला प्रव्रज्या लाभेल. तुम्ही माझे मालक आहात.' ते अत्यंत आनंदित व संतुष्ट झाले आणि म्हणाले – 'भंते, तुमची प्रव्रज्या शुद्ध आहे.' त्यांनी त्याला दासत्वापासून मुक्त (भुजिस्स) केले आणि महाविहारात ठेवून चार प्रत्ययांनी त्याची सेवा-शुश्रूषा करू लागले. ते थेर (स्थवीर) त्या कुळाच्या आश्रयाने राहत असतानाच अर्हत पदाला प्राप्त झाले. ทาสวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. दासांविषयीची कथा समाप्त झाली. กมฺมารภณฺฑุวตฺถาทิกถา कमारभंडू (सुवर्णकारपुत्र) इत्यादींची कथा. ๙๘-๙. กมฺมารภณฺฑูติ ตุลาธารมุณฺฑโก สุวณฺณการปุตฺโต, ปญฺจสิโข ตรุณทารโกติ วุตฺตํ โหติ. สงฺฆํ อปโลเกตุํ ภณฺฑุกมฺมายาติ สงฺฆํ ภณฺฑุกมฺมตฺถาย อาปุจฺฉิตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. ตตฺรายํ อาปุจฺฉนวิธิ – สีมาปริยาปนฺเน ภิกฺขู สนฺนิปาเตตฺวา ปพฺพชฺชาเปกฺขํ ตตฺถ เนตฺวา ‘‘สงฺฆํ ภนฺเต อิมสฺส ทารกสฺส ภณฺฑุกมฺมํ อาปุจฺฉามี’’ติ ติกฺขตฺตุํ วา ทฺวิกฺขตฺตุํ วา สกึ วา วตฺตพฺพํ. เอตฺถ จ ‘‘อิมสฺส ทารกสฺส ภณฺฑุกมฺมํ อาปุจฺฉามี’’ติปิ ‘‘อิมสฺส สมณกรณํ อาปุจฺฉามี’’ติปิ ‘‘อิมสฺส ปพฺพาชนํ อาปุจฺฉามี’’ติปิ ‘‘อยํ สมโณ โหตุกาโม’’ติปิ ‘‘อยํ ปพฺพชิตุกาโม’’ติปิ วตฺตุํ วฏฺฏติเยว. ९८-९. 'कमारभंडू' म्हणजे तराजू बाळगणाऱ्या सोनाराचा मुंडण केलेला मुलगा, जो पाच शेंड्या (शिखा) असलेला लहान मुलगा होता, असे म्हटले आहे. 'संघाला मुंडण करण्यासाठी विचारणे' (सङ्घं अपलोकेतुं भण्डुकम्माय) याचा अर्थ मुंडण करण्यासाठी संघाची अनुमती घेणे, अशी मी परवानगी देतो, असा आहे. त्यामध्ये विचारण्याची पद्धत (आपुच्छनविधी) अशी आहे – सीमेच्या अंतर्गत असलेल्या भिक्खूंना एकत्र करून, प्रव्रज्येची इच्छा असलेल्या मुलाला तेथे आणून, 'भंते, मी संघाला या मुलाच्या मुंडणाची (केस कापण्याची) अनुमती मागत आहे,' असे तीन वेळा, दोन वेळा किंवा एक वेळा म्हणावे. आणि येथे 'या मुलाच्या मुंडणाची अनुमती मागत आहे' असेही, किंवा 'याला श्रमण बनवण्याची अनुमती मागत आहे' असेही, किंवा 'याला प्रव्रजित करण्याची अनुमती मागत आहे' असेही, किंवा 'हा श्रमण होऊ इच्छितो' असेही, किंवा 'हा प्रव्रजित होऊ इच्छितो' असेही म्हणणे योग्यच आहे. สเจ สภาคฏฺฐานํ โหติ, ทส วา วีสํ วา ตึสํ วา ภิกฺขู วสนฺตีติ ปริจฺเฉโท ปญฺญายติ, เตสํ ฐิโตกาสํ วา นิสินฺโนกาสํ วา คนฺตฺวาปิ ปุริมนเยเนว อาปุจฺฉิตพฺพํ. ปพฺพชฺชาเปกฺขํ วินาว ทหรภิกฺขู วา สามเณเร วา เปเสตฺวาปิ ‘‘เอโก ภนฺเต ปพฺพชฺชาเปกฺโข อตฺถิ ตสฺส ภณฺฑุกมฺมํ อาปุจฺฉามา’’ติอาทินา นเยน อาปุจฺฉาเปตุํ วฏฺฏติ. जर ते समान निवासस्थान असेल, जेथे दहा, वीस किंवा तीस भिक्खू राहतात अशी मर्यादा स्पष्ट असेल, तर त्यांच्या उभे राहण्याच्या किंवा बसण्याच्या ठिकाणी जाऊनही पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच अनुमती मागावी. प्रव्रज्येची इच्छा असलेल्या मुलाला न नेताच, तरुण भिक्खूंना किंवा सामणेरांना पाठवूनही, 'भंते, एक प्रव्रज्येची इच्छा असलेला मुलगा आहे, त्याच्या मुंडणाची आम्ही अनुमती मागत आहोत,' या पद्धतीने अनुमती मागवणे योग्य आहे. สเจ เกจิ ภิกฺขู เสนาสนํ วา คุมฺพาทีนิ วา ปวิสิตฺวา นิทฺทายนฺติ วา สมณธมฺมํ วา กโรนฺติ, อาปุจฺฉกา จ ปริเยสนฺตาปิ อทิสฺวา ‘‘สพฺเพ อาปุจฺฉิตา อมฺเหหี’’ติ สญฺญิโน โหนฺติ, ปพฺพชฺชา นาม ลหุกํ กมฺมํ, ตสฺมา ปพฺพชิโต สุปพฺพชิโตว ปพฺพาเชนฺตสฺสาปิ อนาปตฺติ. जर काही भिक्खू विहारात किंवा झाडीत जाऊन झोपले असतील किंवा श्रमणधर्माचे आचरण करत असतील, आणि शोध घेणाऱ्यांना ते न दिसल्यामुळे 'आम्ही सर्वांची अनुमती घेतली आहे' असा समज झाला असेल, तर प्रव्रज्या हे एक सौम्य (हलके) कर्म असल्याने, तो प्रव्रजित झालेला चांगल्या प्रकारे प्रव्रजित झालेलाच मानला जातो आणि प्रव्रज्या देणाऱ्यालाही कोणताही आक्षेप (अनापत्ती) राहत नाही. สเจ ปน มหาวิหาโร โหติ อเนกภิกฺขุสหสฺสาวาโส, สพฺเพ ภิกฺขู สนฺนิปาเตตุมฺปิ ทุกฺกรํ, ปเคว ปฏิปาฏิยา อาปุจฺฉิตุํ, ขณฺฑสีมายํ วา ฐตฺวา นทีสมุทฺทาทีนิ วา คนฺตฺวา ปพฺพาเชตพฺโพ. โย ปน นวมุณฺโฑ วา โหติ วิพฺภนฺตโก วา นิคณฺฐาทีสุ อญฺญตโร วา ทฺวงฺคุลเกโส [Pg.285] วา อูนทฺวงฺคุลเกโส วา, ตสฺส เกสจฺเฉทนกิจฺจํ นตฺถิ, ตสฺมา ภณฺฑุกมฺมํ อนาปุจฺฉิตฺวาปิ ตาทิสํ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. ทฺวงฺคุลาติริตฺตเกโส ปน โย โหติ อนฺตมโส เอกสิขามตฺตธโรปิ, โส ภณฺฑุกมฺมํ อาปุจฺฉิตฺวาว ปพฺพาเชตพฺโพ. อุปาลิวตฺถุ มหาวิภงฺเค วุตฺตนยเมว. परंतु जर तो अनेक हजार भिक्खूंचा निवास असलेला महाविहार असेल, तर सर्व भिक्खूंना एकत्र करणे कठीण असते, मग एकापाठोपाठ एक अनुमती घेणे तर दूरच राहिले. अशा वेळी खंडसीमेत राहून किंवा नदी, समुद्र इत्यादी ठिकाणी जाऊन त्याला प्रव्रजित करावे. परंतु जो आधीच मुंडण केलेला असेल, किंवा नुकताच गृहस्थाश्रमातून परतलेला असेल, किंवा निग्रंथांपैकी (जैन इत्यादी) कोणी असेल, किंवा ज्याचे केस दोन बोटे किंवा त्याहून कमी लांबीचे असतील, त्याला केस कापण्याची गरज नसते. म्हणून मुंडणाची अनुमती न घेताही अशा व्यक्तीला प्रव्रजित करणे योग्य आहे. परंतु ज्याचे केस दोन बोटांपेक्षा जास्त लांबीचे असतील, अगदी किमान एक शेंडी जरी राखलेली असेल, तर मुंडणाची अनुमती घेऊनच त्याला प्रव्रजित करावे. उपालिवस्तूची कथा महाविभंगात सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहे. ๑๐๐. อหิวาตกโรเคนาติ มาริพฺยาธินา; ยตฺร หิ โส โรโค อุปฺปชฺชติ, ตํ กุลํ ทฺวิปทจตุปฺปทํ สพฺพํ นสฺสติ, โย ภิตฺตึ วา ฉทนํ วา ภินฺทิตฺวา ปลายติ, ติโรคามาทิคโต วา โหติ, โส มุจฺจติ. ตถา เจตฺถ ปิตาปุตฺตา มุจฺจึสุ. เตน วุตฺตํ – ‘‘ปิตาปุตฺตกา เสสา โหนฺตี’’ติ. १००. 'अहिवातकरोग' म्हणजे महामारीचा (प्लेगसारखा प्राणघातक) रोग; कारण जेथे हा रोग उद्भवतो, तेथील द्विपद (मनुष्य इत्यादी) आणि चतुष्पद (प्राणी इत्यादी) सर्व नष्ट होतात. जो भिंत किंवा छप्पर फोडून पळून जातो किंवा दुसऱ्या गावात निघून जातो, तो या रोगापासून वाचतो. त्याचप्रमाणे येथेही पिता-पुत्र वाचले. म्हणूनच म्हटले आहे – 'केवळ पिता आणि पुत्रच शिल्लक राहिले.' กากุฑฺเฑปกนฺติ โย วามหตฺเถน เลฑฺฑุํ คเหตฺวา นิสินฺโน สกฺโกติ อาคตาคเต กาเก อุฑฺฑาเปตฺวา ปุรโต นิกฺขิตฺตํ ภตฺตํ ภุญฺชิตุํ, อยํ กากุฑฺเฑปโก นาม, ตํ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. काकुड्डेपक म्हणजे जो डाव्या हाताने ढेकूळ पकडून, बसल्या जागी येणाऱ्या-जाणाऱ्या कावळ्यांना उडवून आपल्यासमोर ठेवलेले अन्न खाण्यास समर्थ असतो, त्याला 'काकुड्डेपक' असे म्हणतात. त्याला प्रव्रजित करणे योग्य आहे. ๑๐๒. อิตฺตโรติ อปฺปมตฺตโก; กติปาหเมว วาโส ภวิสฺสตีติ อตฺโถ. १०२. 'इत्तर' म्हणजे अल्प; काही दिवसच निवास होईल, असा अर्थ आहे. ๑๐๓. โอคเณนาติ ปริหีนคเณน; อปฺปมตฺตเกน ภิกฺขุสงฺเฆนาติ อตฺโถ. อพฺยตฺเตน ยาวชีวนฺติ เอตฺถ สจายํ วุฑฺฒตรํ อาจริยํ น ลภติ, อุปสมฺปทาย สฏฺฐิวสฺโส วา สตฺตติวสฺโส วา โหตุ, นวกตรสฺสาปิ พฺยตฺตสฺส สนฺติเก อุกฺกุฏิกํ นิสีทิตฺวา อญฺชลึ ปคฺคเหตฺวา ‘‘อาจริโย เม อาวุโส โหหิ, อายสฺมโต นิสฺสาย วจฺฉามี’’ติ เอวํ ติกฺขตฺตุํ วตฺวา นิสฺสโย คเหตพฺโพว. คามปฺปเวสนํ อาปุจฺฉนฺเตนาปิ อุกฺกุฏิกํ นิสีทิตฺวา อญฺชลึ ปคฺคเหตฺวา คามปฺปเวสนํ อาปุจฺฉามิ อาจริยา’’ติ วตฺตพฺพํ. เอส นโย สพฺพอาปุจฺฉเนสุ. ปญฺจกฉกฺเกสุ เจตฺถ ยตฺตกํ สุตํ นิสฺสยมุตฺตกสฺส อิจฺฉิตพฺพํ, ตํ ภิกฺขุโนวาทกวณฺณนายํ วุตฺตํ. ตสฺส นตฺถิตาย จ อปฺปสฺสุโต; อตฺถิตาย จ พหุสฺสุโตติ เวทิตพฺโพ. เสสํ วุตฺตนเยเนว. १०३. 'ओगणेन' म्हणजे कमी संख्या असलेल्या गणाने; म्हणजेच अल्प भिक्खू संघासह, असा अर्थ आहे. 'अव्यत्ताने आयुष्यभर' यामध्ये जर हा (अव्यत्त भिक्खू) आपल्यापेक्षा ज्येष्ठ आचार्याला मिळवू शकत नसेल, तर उपसंपदेने तो साठ वर्षांचा असो वा सत्तर वर्षांचा असो, त्याने आपल्यापेक्षा कनिष्ठ असलेल्या पण विनयात कुशल (व्यत्त) भिक्खूच्या जवळ उकिडवे बसून, हात जोडून, “हे आवुसो, तुम्ही माझे आचार्य व्हा, मी आपल्या निश्रयाने (आश्रयाने) राहीन,” असे तीन वेळा बोलून निश्रय ग्रहण केलाच पाहिजे. गावात प्रवेश करण्याची परवानगी मागताना सुद्धा उकिडवे बसून, हात जोडून, “हे आचार्य, मी गावात प्रवेश करण्याची परवानगी मागतो,” असे म्हणावे. सर्व प्रकारच्या परवानग्या मागताना हाच नियम आहे. तसेच, येथे पंचक आणि छक्क मध्ये निश्रय-मुक्त भिक्खूसाठी जितके श्रुत (ज्ञान) आवश्यक मानले गेले आहे, ते 'भिक्खुनोवादक' वर्णनात सांगितले आहे. ते श्रुत नसल्यामुळे तो 'अल्पश्रुत' आणि ते असल्यामुळे तो 'बहुश्रुत' असे समजावे. उर्वरित भाग आधी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. กมฺมารภณฺฑุวตฺถาทิกถา นิฏฺฐิตา. कम्मारभंडूची कथा इत्यादी समाप्त झाली. ราหุลวตฺถุกถา राहुलवत्थुकथा. ๑๐๕. เยน [Pg.286] กปิลวตฺถุ เตน จาริกํ ปกฺกามีติ เอตฺถ อยํ อนุปุพฺพิกถา. สุทฺโธทนมหาราชา กิร โพธิสตฺตสฺส อภินิกฺขมนทิวสโต ปฏฺฐาย ‘‘มม ปุตฺโต พุทฺโธ ภวิสฺสามีติ นิกฺขนฺโต, ชาโต นุ โข พุทฺโธ’’ติ ปวตฺติสวนตฺถํ โอหิตโสโตว วิหรติ. โส ภควโต ปธานจริยญฺจ สมฺโพธิญฺจ ธมฺมจกฺกปฺปวตฺตนาทีนิ จ สุณนฺโต ‘‘อิทานิ กิร เม ปุตฺโต ราชคหํ อุปนิสฺสาย วิหรตี’’ติ สุตฺวา เอกํ อมจฺจํ อาณาเปสิ – ‘‘อหํ ตาต วุฑฺโฒ มหลฺลโก, สาธุ เม ชีวนฺตสฺเสว ปุตฺตํ ทสฺเสหี’’ติ. โส ‘‘สาธู’’ติ ปฏิสฺสุณิตฺวา ปุริสสหสฺสปริวาโร ราชคหํ คนฺตฺวา ภควโต ปาเท วนฺทิตฺวา นิสีทิ. อถสฺส ภควา ธมฺมกถํ กเถสิ, โส ปสีทิตฺวา ปพฺพชฺชญฺเจว อุปสมฺปทญฺจ ยาจิ. ตโต นํ ภควา เอหิภิกฺขูปสมฺปทาย อุปสมฺปาเทสิ, โส สปริโส อรหตฺตํ ปตฺวา ตตฺเถว ผลสมาปตฺติสุขํ อนุภวมาโน วิหาสิ. ราชา เตเนว อุปาเยน อปเรปิ อฏฺฐ ทูเต ปหิณิ, เตปิ สพฺเพ สปริสา ตเถว อรหตฺตํ ปตฺวา ตตฺเถว วิหรึสุ. ‘‘อิมินา นาม การเณน เต นาคจฺฉนฺตี’’ติ รญฺโญ โกจิ ปวตฺติมตฺตมฺปิ อาโรเจนฺโต นตฺถิ. १०५. “ज्या दिशेला कपिलवस्तू आहे, त्या दिशेला चारिकेसाठी निघाले” यामध्ये ही अनुक्रमिक कथा आहे. असे म्हटले जाते की, महाराज शुद्धोधन हे बोधिसत्त्वांच्या महाभिनिष्क्रमणाच्या दिवसापासूनच, “माझा पुत्र ‘मी बुद्ध होईन’ असे म्हणून निघून गेला आहे, तो बुद्ध झाला आहे का?” अशी बातमी ऐकण्यासाठी नेहमी कान देऊन (उत्सुकतेने) राहत असत. त्यांनी भगवंतांची तपश्चर्या (प्रधानचर्य), संबोधी (ज्ञानप्राप्ती) आणि धर्मचक्रप्रवर्तन इत्यादींविषयी ऐकले. “आता माझा पुत्र राजगृहाचा आश्रय घेऊन राहत आहे,” असे ऐकून त्यांनी एका अमात्याला आज्ञा दिली – “हे तात, मी आता वृद्ध आणि म्हातारा झालो आहे. मी जिवंत असतानाच मला माझ्या पुत्राचे दर्शन घडव.” त्याने “फार चांगले” असे म्हणून ते मान्य केले आणि एक हजार पुरुषांच्या परिवारासह राजगृहाला जाऊन, भगवंतांच्या चरणी वंदन करून तो बसला. तेव्हा भगवंतांनी त्याला धम्मकथा सांगितली. तो प्रसन्न झाला आणि त्याने प्रव्रज्या व उपसंपदेची याचना केली. त्यानंतर भगवंतांनी त्याला ‘एहिभिक्खू’ उपसंपदेने उपसंपन्न केले. तो आपल्या परिवारासह अर्हत पदाला प्राप्त झाला आणि तिथेच फलसमापत्तीच्या सुखाचा अनुभव घेत राहू लागला. राजाने त्याच उपायाने इतर आठ दूतांना पाठवले. ते सर्वही आपल्या परिवारासह त्याचप्रमाणे अर्हत पदाला प्राप्त होऊन तिथेच राहू लागले. “या विशिष्ट कारणामुळे ते परत येत नाहीत,” अशी साधी बातमी सुद्धा राजाला सांगणारा कोणी नव्हता. อถ ราชา โพธิสตฺเตน สทฺธึ เอกทิวสํชาตํ กาฬุทายึ นาม อมจฺจํ ปหิณิตุกาโม ปุริมนเยเนว ยาจิ, โส ‘‘สเจ อหํ ปพฺพชิตุํ ลภามิ, ทสฺเสสฺสามี’’ติ อาห. ตํ ราชา ‘‘ปพฺพชิตฺวาปิ เม ปุตฺตํ ทสฺเสหี’’ติ ปหิณิ; โสปิ ปุริสสหสฺสปริวาโร คนฺตฺวา ตเถว สปริวาโร อรหตฺตํ ปาปุณิ. โส เอกทิวสํ สมฺภเตสุ สพฺพสสฺเสสุ วิสฺสฏฺฐกมฺมนฺเตสุ ชนปทมนุสฺเสสุ ปุปฺผิเตสุ ถลชชลชปุปฺเผสุ ปฏิปชฺชนกฺขเม มคฺเค ภควนฺตํ วนฺทิตฺวา สฏฺฐิมตฺตาหิ คาถาหิ คมนวณฺณํ วณฺเณสิ. ภควา ‘‘กิเมต’’นฺติ ปุจฺฉิ. ‘‘ภนฺเต ตุมฺหากํ ปิตา สุทฺโธทนมหาราชา มหลฺลโกมฺหิ, ชีวนฺตสฺเสว เม ปุตฺตํ ทสฺเสหี’’ติ มํ เปเสสิ, สาธุ ภนฺเต ภควา ญาตกานํ สงฺคหํ กโรตุ, กาโล จาริกํ ปกฺกมิตุนฺติ. เตน หิ สงฺฆสฺส อาโรเจหิ, ‘‘ภิกฺขู คมิยวตฺตํ ปูเรสฺสนฺตี’’ติ. ‘‘สาธุ ภนฺเต’’ติ เถโร ตถา อกาสิ. ภควา องฺคมคธวาสีนํ กุลปุตฺตานํ ทสหิ สหสฺเสหิ กปิลวตฺถุวาสีนํ ทสหีติ สพฺเพเหว วีสติสหสฺเสหิ [Pg.287] ขีณาสเวหิ ปริวุโต ราชคหา นิกฺขมิตฺวา ราชคหโต สฏฺฐิโยชนิกํ กปิลวตฺถุํ ทิวเส ทิวเส โยชนํ คจฺฉนฺโต ทฺวีหิ มาเสหิ ปาปุณิสฺสามีติ อตุริตจาริกํ ปกฺกามิ. เตน วุตฺตํ – ‘‘เยน กปิลวตฺถุ เตน จาริกํ ปกฺกามี’’ติ. त्यानंतर राजाने बोधिसत्त्वांसोबत एकाच दिवशी जन्मलेल्या 'काळुदायी' नावाच्या अमात्याला पाठवण्याची इच्छा धरून, पूर्वीच्याच पद्धतीने त्याला विनंती केली. तो म्हणाला, “जर मला प्रव्रजित होण्याची परवानगी मिळाली, तर मी दर्शन घडवीन.” राजाने त्याला “प्रव्रजित होऊनही मला माझ्या पुत्राचे दर्शन घडव,” असे सांगून पाठवले. तो देखील एक हजार पुरुषांच्या परिवारासह गेला आणि पूर्वीच्या लोकांप्रमाणेच आपल्या परिवारासह अर्हत पदाला प्राप्त झाला. एका दिवशी, सर्व पिके कापून गोळा केली असता, जनपदातील लोकांनी आपली कामे संपवली असता, जमिनीवरील व पाण्यातील फुले उमलली असता आणि मार्ग प्रवासासाठी योग्य झाला असता, त्याने भगवंतांना वंदन करून साठ गाथांद्वारे (कपिलवस्तूला) जाण्याच्या मार्गाच्या सौंदर्याचे वर्णन केले. भगवंतांनी विचारले, “हे काय आहे?” तो म्हणाला, “भंते, आपले पिता महाराज शुद्धोधन यांनी ‘मी म्हातारा झालो आहे, मी जिवंत असतानाच मला माझ्या पुत्राचे दर्शन घडव’ असे सांगून मला पाठवले आहे. भंते, कृपा करून भगवंतांनी आपल्या नातेवाईकांवर अनुग्रह करावा, आता चारिकेसाठी निघण्याची वेळ झाली आहे.” भगवंत म्हणाले, “तसे असेल तर संघाला सांग, भिक्खू प्रवासाची तयारी (गमियवत्त) करतील.” थेरांनी “फार चांगले, भंते,” असे म्हणून तसेच केले. भगवंत अंग आणि मगध देशातील दहा हजार कुलपुत्र आणि कपिलवस्तू येथील दहा हजार कुलपुत्र, अशा एकूण वीस हजार अर्हतांनी वेढलेले होऊन राजगृहातून निघाले. राजगृहापासून साठ योजन अंतरावर असलेल्या कपिलवस्तूकडे दररोज एक योजन चालत, दोन महिन्यांत पोहोचू अशा बेताने ते घाई न करता संथ गतीने चारिकेसाठी निघाले. म्हणूनच संगीतिकारांनी म्हटले आहे – “ज्या दिशेला कपिलवस्तू आहे, त्या दिशेला चारिकेसाठी निघाले.” เอวํ ปกฺกนฺเต จ ภควติ อุทายิตฺเถโร นิกฺขนฺตทิวสโต ปฏฺฐาย สุทฺโธทนมหาราชสฺส เคเห ภตฺตกิจฺจํ กโรติ. ราชา เถรํ ปริวิสิตฺวา ปตฺตํ คนฺธจุณฺเณน อุพฺพฏฺเฏตฺวา อุตฺตมโภชนสฺส ปูเรตฺวา ‘‘ภควโต เทหี’’ติ เถรสฺส หตฺเถ ฐเปติ. เถโรปิ ตเถว กโรติ. อิติ ภควา อนฺตรามคฺเค รญฺโญเยว ปิณฺฑปาตํ ปริภุญฺชิ. เถโรปิ จ ภตฺตกิจฺจาวสาเน ทิวเส ทิวเส รญฺโญ อาโรเจติ ‘‘อชฺช ภควา เอตฺตกํ อาคโต’’ติ, พุทฺธคุณปฏิสํยุตฺตาย จ กถาย สากิยานํ ภควติ สทฺธํ อุปฺปาเทสิ. เตเนว นํ ภควา ‘‘เอตทคฺคํ, ภิกฺขเว, มม สาวกานํ ภิกฺขูนํ กุลปฺปสาทกานํ ยทิทํ กาฬุทายี’’ติ เอตทคฺเค ฐเปสิ. अशा प्रकारे भगवंत निघाले असता, उदायी थेर (काळुदायी थेर) निघण्याच्या दिवसापासून महाराज शुद्धोधन यांच्या महालात भोजनाचे कार्य करत असत. राजा थेरांना भोजन वाढून, त्यांच्या पात्राला सुगंधी चूर्णाने घासून आणि ते उत्तम भोजनाने भरून, “हे भगवंतांना द्या,” असे सांगून थेरांच्या हातात ठेवत असे. थेर देखील तसेच करत असत. अशा प्रकारे भगवंतांनी प्रवासाच्या दरम्यान राजानेच पाठवलेल्या पिंडपाताचे ग्रहण केले. थेर देखील भोजनाच्या शेवटी दररोज राजाला सांगत असत – “आज भगवंत इतक्या अंतरावर पोहोचले आहेत.” तसेच, बुद्धगुणांशी संबंधित कथांद्वारे त्यांनी शाक्यांच्या मनात भगवंतांविषयी श्रद्धा निर्माण केली. म्हणूनच भगवंतांनी त्यांना, “हे भिक्खूंनो, माझ्या भिक्खू श्रावकांमध्ये कुलांना (नातेवाईकांना) प्रसन्न करणाऱ्यांमध्ये काळुदायी हा सर्वश्रेष्ठ आहे,” असे म्हणून सर्वश्रेष्ठ (एतदग्ग) पदावर प्रस्थापित केले. สากิยาปิ โข อนุปฺปตฺเต ภควติ ‘‘อมฺหากํ ญาติเสฏฺฐํ ปสฺสิสฺสามา’’ติ สนฺนิปติตฺวา ภควโต วสนฏฺฐานํ วีมํสมานา นิคฺโรธสกฺกสฺส อาราโม รมณีโยติ สลฺลกฺเขตฺวา ตตฺถ สพฺพํ ปฏิชคฺคนวิธึ กาเรตฺวา คนฺธปุปฺผาทิหตฺถา ปจฺจุคฺคมนํ กโรนฺตา สพฺพาลงฺการปฏิมณฺฑิเต ทหรทหเร นาคริกทารเก จ ทาริกาโย จ ปฐมํ ปหิณึสุ, ตโต ราชกุมาเร จ ราชกุมาริกาโย จ เตสํ อนนฺตรา สามํ คนฺตฺวา คนฺธปุปฺผจุณฺณาทีหิ ปูชยมานา ภควนฺตํ คเหตฺวา นิคฺโรธารามเมว อคมํสุ. ตตฺร ภควา วีสติสหสฺสขีณาสวปริวุโต ปญฺญตฺตวรพุทฺธาสเน นิสีทิ. สากิยา มานชาติกา มานถทฺธา, เต ‘‘สิทฺธตฺถกุมาโร อมฺเหหิ ทหรตโรว อมฺหากํ กนิฏฺโฐ, ภาคิเนยฺโย, ปุตฺโต, นตฺตา’’ติ จินฺเตตฺวา ทหรทหเร ราชกุมาเร อาหํสุ – ‘‘ตุมฺเห วนฺทถ, มยํ ตุมฺหากํ ปิฏฺฐิโต นิสีทิสฺสามา’’ติ. भगवंत पोहोचले असता शाक्य देखील, “आम्ही आमच्या श्रेष्ठ नातेवाईकाचे दर्शन घेऊ,” असे म्हणून एकत्र आले. भगवंतांच्या राहण्याच्या जागेचा विचार करत असताना, निग्रोध शाक्याचा आराम (उद्यान) रमणीय आहे असे ठरवून त्यांनी तिथे सर्व प्रकारची स्वच्छता व तयारी करून घेतली. हातात सुगंधी द्रव्ये, फुले इत्यादी घेऊन स्वागतासाठी जात असताना, त्यांनी सर्व अलंकारांनी नटलेल्या लहान लहान नगरवासी मुलांना व मुलींना सर्वात आधी पाठवले. त्यानंतर राजकुमार आणि राजकुमारींना पाठवले. त्यांच्या पाठीमागे ते स्वतः गेले आणि फुले, सुगंधी चूर्ण इत्यादींनी पूजा करत त्यांनी भगवंतांना सोबत घेऊन निग्रोधाराम विहाराकडेच प्रयाण केले. तिथे भगवंत वीस हजार अर्हतांनी वेढलेले होऊन, मांडलेल्या श्रेष्ठ बुद्धासनावर विराजमान झाले. शाक्य हे स्वभावाने अभिमानी व गर्विष्ठ होते. त्यांनी विचार केला, “सिद्धार्थ कुमार आमच्यापेक्षा लहानच आहे, तो आमचा धाकटा भाऊ, भाचा, मुलगा किंवा नातू आहे.” असे विचार करून त्यांनी लहान लहान राजकुमारांना सांगितले – “तुम्ही वंदन करा, आम्ही तुमच्या पाठीमागे बसू.” เตสุ เอวํ นิสินฺเนสุ ภควา เตสํ อชฺฌาสยํ โอโลเกตฺวา ‘‘น มํ ญาตี วนฺทนฺติ, หนฺท เน วนฺทาปยิสฺสามี’’ติ อภิญฺญาปาทกํ จตุตฺถชฺฌานํ สมาปชฺชิตฺวา วุฏฺฐาย อิทฺธิยา อากาสํ อพฺภุคฺคนฺตฺวา เตสํ สีเส ปาทปํสุํ โอกิรมาโน [Pg.288] วิย กณฺฑมฺพมูเล ยมกปาฏิหาริยสทิสํ ปาฏิหาริยมกาสิ. ราชา ตํ อจฺฉริยํ ทิสฺวา อาห – ‘‘ภควา ตุมฺหากํ มงฺคลทิวเส พฺราหฺมณสฺส วนฺทนตฺถํ อุปนีตานํ ปาเท โว ปริวตฺติตฺวา พฺราหฺมณสฺส มตฺถเก ปติฏฺฐิเต ทิสฺวาปิ อหํ ตุมฺเห วนฺทึ, อยํ เม ปฐมวนฺทนา. วปฺปมงฺคลทิวเส ชมฺพุจฺฉายาย สิริสยเน นิปนฺนานํ โว ชมฺพุจฺฉายาย อปริวตฺตนํ ทิสฺวาปิ ปาเท วนฺทึ, อยํ เม ทุติยวนฺทนา. อิทานิ อิมํ อทิฏฺฐปุพฺพํ ปาฏิหาริยํ ทิสฺวาปิ ตุมฺหากํ ปาเท วนฺทามิ, อยํ เม ตติยวนฺทนา’’ติ. ते (शाक्य) अशा प्रकारे बसले असता, भगवंतांनी त्यांच्या मनातील हेतू ओळखून, 'माझे नातेवाईक मला वंदन करत नाहीत, चला, आता मी त्यांना वंदन करायला लावतो,' असा विचार केला. मग त्यांनी अभिज्ञांचे अधिष्ठान असलेल्या चतुर्थ ध्यानात प्रवेश केला आणि त्यातून उठून ऋद्धीने आकाशात उड्डाण केले. त्यांच्या डोक्यावर आपल्या चरणांची धूळ शिंपडल्याप्रमाणे, त्यांनी कण्डंब वृक्षाच्या मुळाशी यमक प्रातिहार्यासारखे प्रातिहार्य दाखवले. राजाने ते आश्चर्य पाहून म्हटले, 'हे भगवन्! आपल्या नामकरण संस्काराच्या दिवशी, असित ब्राह्मणाला (ऋषीला) वंदन करण्यासाठी आपल्याला जवळ आणले असता, आपले पाय उलट फिरून त्या ब्राह्मणाच्या डोक्यावर टेकलेले पाहून मी आपल्याला वंदन केले होते. हे माझे पहिले वंदन होते. पेरणीच्या मंगल दिवशी (वप्पमंगल दिवशी), जांभळाच्या झाडाच्या छायेत लावलेल्या सुंदर शय्येवर आपण निजलेले असताना, जांभळाच्या झाडाची सावली न बदलल्याचे पाहूनही मी आपल्या चरणांना वंदन केले होते. हे माझे दुसरे वंदन होते. आता हे पूर्वी कधीही न पाहिलेले प्रातिहार्य पाहून मी आपल्या चरणांना वंदन करत आहे. हे माझे तिसरे वंदन आहे.' สุทฺโธทนมหาราเชน ปน วนฺทิเต ภควติ อวนฺทิตฺวา ฐิโต นาม เอกสากิโยปิ นาโหสิ, สพฺเพเยว วนฺทึสุ. อิติ ภควา ญาตโย วนฺทาเปตฺวา อากาสโต โอรุยฺห ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. นิสินฺเน ภควติ สิขาปฺปตฺโต ญาติสมาคโม อโหสิ, สพฺเพ เอกคฺคา สนฺนิปตึสุ. ตโต มหาเมโฆ โปกฺขรวสฺสํ วสฺสิ, ตมฺพวณฺณมุทกํ เหฏฺฐา วิรวนฺตํ คจฺฉติ. กสฺสจิ สรีเร เอกพินฺทุมตฺตมฺปิ น ปตติ, ตํ ทิสฺวา สพฺเพ อจฺฉริยพฺภุตชาตา อเหสุํ. ภควา ‘‘น อิทาเนว มยฺหํ ญาติสมาคเม โปกฺขรวสฺสํ วสฺสติ, อตีเตปิ วสฺสี’’ติ อิมิสฺสา อฏฺฐุปฺปตฺติยา เวสฺสนฺตรชาตกํ กเถสิ. ธมฺมเทสนํ สุตฺวา สพฺเพ อุฏฺฐาย วนฺทิตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกมึสุ. เอโกปิ ราชา วา ราชมหามตฺโต วา ‘‘สฺเว อมฺหากํ ภิกฺขํ คณฺหถา’’ติ วตฺวา คโต นาม นตฺถิ. महाराज शुद्धोदनाने भगवंतांना वंदन केले असता, वंदन न करता उभा राहिलेला एकही शाक्य उरला नाही; सर्वांनीच वंदन केले. अशा प्रकारे भगवंतांनी नातेवाईकांना वंदन करायला लावून आकाशातून खाली उतरून मांडलेल्या आसनावर ते बसले. भगवंत बसले असता, नातेवाईकांचा अत्यंत भव्य असा मेळावा झाला आणि सर्व जण एकाग्र चित्ताने एकत्र जमले. त्यानंतर महामेघाने 'पोक्खरवस्स' (ज्याला भिजण्याची इच्छा आहे तोच भिजतो असा पाऊस) पाडला. तांबड्या रंगाचे पाणी आवाज करत खाली वाहू लागले. कोणाच्याही शरीरावर पाण्याचा एक थेंबही पडला नाही. ते पाहून सर्व जण अत्यंत आश्चर्यचकित व विस्मित झाले. भगवंतांनी, 'माझ्या नातेवाईकांच्या मेळाव्यात असा पोक्खरवस्स पाऊस केवळ आताच पडला आहे असे नाही, तर भूतकाळातही पडला होता,' असे सांगून या प्रसंगाच्या निमित्ताने 'वेस्संतर जातक' सांगितले. ती धम्मदेशना ऐकून सर्व जण उठले, त्यांनी वंदन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि ते निघून गेले. परंतु, 'उद्या आमच्याकडून भिक्षा ग्रहण करावी,' असे सांगून गेलेला एकही राजा किंवा राजमंत्री नव्हता. ภควา ทุติยทิวเส วีสติภิกฺขุสหสฺสปริวาโร กปิลวตฺถุํ ปิณฺฑาย ปาวิสิ, น โกจิ ปจฺจุคฺคนฺตฺวา นิมนฺเตสิ วา ปตฺตํ วา อคฺคเหสิ. ภควา อินฺทขีเล ฐิโต อาวชฺเชสิ – ‘‘กถํ นุ โข ปุพฺเพ พุทฺธา กุลนคเร ปิณฺฑาย จรึสุ, กึ อุปฺปฏิปาฏิยา อิสฺสรชนานํ ฆรานิ อคมํสุ, อุทาหุ สปทานจาริกํ จรึสู’’ติ. ตโต เอกพุทฺธสฺสปิ อุปฺปฏิปาฏิยา คมนํ อทิสฺวา ‘‘มยาปิ อิทานิ อยเมว วํโส อยํ ปเวณี ปคฺคเหตพฺพา, อายติญฺจ เม สาวกาปิ มเมว อนุสิกฺขนฺตา ปิณฺฑจาริยวตฺตํ ปูเรสฺสนฺตี’’ติ โกฏิยํ นิวิฏฺฐเคหโต ปฏฺฐาย สปทานํ ปิณฺฑาย จรติ. ‘‘อยฺโย กิร สิทฺธตฺถกุมาโร ปิณฺฑาย จรตี’’ติ จตุภูมกาทีสุ ปาสาเทสุ สีหปญฺชรํ วิวริตฺวา มหาชโน ทสฺสนพฺยาวโฏ อโหสิ. ราหุลมาตาปิ เทวี ‘‘อยฺยปุตฺโต กิร อิมสฺมึเยว นคเร มหตา ราชานุภาเวน [Pg.289] สุวณฺณสิวิกาทีหิ วิจริตฺวา อิทานิ เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายวตฺถวสโน กปาลหตฺโถ ปิณฺฑาย จรติ, ‘‘โสภติ นุ โข โน วา’’ติ สีหปญฺชรํ วิวริตฺวา โอโลกยมานา ภควนฺตํ นานาวิราคสมุชฺชลาย สรีรปฺปภาย นครวีถิโย โอภาเสตฺวา พุทฺธสิริยา วิโรจมานํ ทิสฺวา อุณฺหีสโต ปฏฺฐาย ยาว ปาทตลา นรสีหคาถาหิ นาม อฏฺฐหิ คาถาหิ อภิตฺถวิตฺวา รญฺโญ สนฺติกํ คนฺตฺวา ‘‘ตุมฺหากํ ปุตฺโต ปิณฺฑาย จรตี’’ติ รญฺโญ อาโรเจสิ. ราชา สํวิคฺคหทโย หตฺเถน สาฏกํ สณฺฐาปยมาโน ตุริตตุริตํ นิกฺขมิตฺวา เวเคน คนฺตฺวา ภควโต ปุรโต ฐตฺวา อาห – ‘‘กึ ภนฺเต อมฺเห ลชฺชาเปถ, กิมตฺถํ ปิณฺฑาย จรถ, กึ เอตฺตกานํ ภิกฺขูนํ น สกฺกา ภตฺตํ ลทฺธุนฺติ เอวํสญฺญิโน อหุวตฺถา’’ติ. วํสจาริตฺตเมตํ มหาราช อมฺหากนฺติ. นนุ ภนฺเต อมฺหากํ มหาสมฺมตขตฺติยวํโส นาม วํโส, ตตฺถ จ เอกขตฺติโยปิ ภิกฺขาจาโร นาม นตฺถีติ. อยํ มหาราช วํโส นาม ตว วํโส, อมฺหากํ ปน พุทฺธวํโส วํโส นาม, สพฺพพุทฺธา จ ปิณฺฑจาริกา อเหสุนฺติ อนฺตรวีถิยํ ฐิโตว – दुसऱ्या दिवशी भगवंत वीस हजार भिक्खूंच्या परिवारासह कपिलवस्तू नगरात भिक्षेसाठी शिरले. कोणीही सामोरे येऊन त्यांना निमंत्रित केले नाही किंवा त्यांचे भिक्षापात्रही हातात घेतले नाही. भगवंतांनी नगरद्वाराच्या उंबरठ्यावर उभे राहून विचार केला, 'पूर्वीचे बुद्ध आपल्या नातेवाईकांच्या नगरात भिक्षेसाठी कसे फिरत असत? ते थेट श्रीमंत लोकांच्या घरी जात असत की घरांच्या क्रमाने (सपादनचारिका) फिरत असत?' त्यानंतर एकाही बुद्धाचे थेट श्रीमंतांच्या घरी जाणे न पाहून त्यांनी विचार केला, 'मीसुद्धा आता याच परंपरेचे, याच वंशाचे पालन केले पाहिजे. भविष्यात माझे श्रावकही माझेच अनुकरण करून भिक्षाटनाच्या नियमांचे पालन करतील.' असे ठरवून त्यांनी टोकाच्या पहिल्या घरापासून सुरुवात करून घरांच्या क्रमाने भिक्षेसाठी फिरण्यास सुरुवात केली. 'आर्य सिद्धार्थकुमार भिक्षेसाठी फिरत आहेत!' असे ऐकून चार मजली इत्यादी प्रासादांच्या खिडक्या उघडून लोक त्यांना पाहण्यात मग्न झाले. राहुलमाता देवी यशोधरेनेही विचार केला, 'माझे स्वामी याच नगरात पूर्वी मोठ्या राजवैभवाने, सोन्याच्या पालखीतून फिरत असत, आणि आता केस-दाढी कापून, काषाय वस्त्रे परिधान करून, हातात भिक्षापात्र घेऊन भिक्षेसाठी फिरत आहेत. हे त्यांना शोभून दिसते की नाही?' असे म्हणून तिने खिडकी उघडून पाहिले. विविध रंगांनी देदीप्यमान अशा शरीराच्या प्रभेने नगराचे रस्ते उजळवून टाकणाऱ्या आणि बुद्धतेजाने तळपणाऱ्या भगवंतांना पाहून, डोक्यावरील उष्णीषापासून चरणांच्या तळव्यांपर्यंत त्यांचे वर्णन करणाऱ्या 'नरसिंह गाथा' नावाच्या आठ गाथांनी तिने त्यांची स्तुती केली. नंतर राजाकडे जाऊन, 'आपला पुत्र भिक्षेसाठी फिरत आहे,' असे राजाला सांगितले. राजा अत्यंत व्याकुळ अंतःकरणाने, हाताने आपले वस्त्र सावरत घाईघाईने बाहेर पडला आणि वेगाने जाऊन भगवंतांच्या समोर उभा राहून म्हणाला, 'हे भंते! आपण आम्हाला का लज्जित करत आहात? आपण भिक्षेसाठी का फिरत आहात? एवढ्या भिक्खूंना भोजन मिळणे शक्य नाही, असा विचार आपण केला होता काय?' भगवंतांनी सांगितले, 'महाराज, हा आमच्या वंशाचा आचार आहे.' राजा म्हणाला, 'पण भंते, आपला वंश तर महासंमत क्षत्रिय वंश आहे ना? आणि त्या वंशात एकही क्षत्रिय कधी भिक्षेसाठी फिरलेला नाही.' भगवंतांनी रस्त्याच्या मध्यभागी उभे राहूनच सांगितले, 'महाराज, तो वंश आपल्या घराण्याचा वंश आहे. आमचा वंश तर बुद्धवंश आहे. सर्व बुद्ध भिक्षेसाठीच फिरणारे होते.' आणि त्यांनी ही गाथा म्हटली – ‘‘อุตฺติฏฺเฐ นปฺปมชฺเชยฺย, ธมฺมํ สุจริตํ จเร; ธมฺมจารี สุขํ เสติ, อสฺมึ โลเก ปรมฺหิ จา’’ติ. भिक्षेसाठी उभे राहण्याच्या कर्तव्यात आळस करू नये, धम्माचे सुचारू रूपाने आचरण करावे. धम्माचे आचरण करणारा या लोकात आणि परलोकातही सुखाने राहतो. อิมํ คาถมาห. คาถาปริโยสาเน ราชา โสตาปตฺติผลํ สจฺฉากาสิ. भगवंतांनी ही गाथा म्हटली. गाथेच्या शेवटी राजाने स्रोतापत्ती फल प्राप्त केले. ‘‘ธมฺมํ จเร สุจริตํ, น นํ ทุจฺจริตํ จเร; ธมฺมจารี สุขํ เสติ, อสฺมึ โลเก ปรมฺหิ จา’’ติ. धम्माचे सुचारू रूपाने आचरण करावे, दुराचाराचे आचरण करू नये. धम्माचे आचरण करणारा या लोकात आणि परलोकातही सुखाने राहतो. อิมํ ปน คาถํ สุตฺวา สกทาคามิผเล ปติฏฺฐาสิ, ธมฺมปาลชาตกํ สุตฺวา อนาคามิผเล ปติฏฺฐาสิ, มรณสมเย เสตจฺฉตฺตสฺส เหฏฺฐา สิริสยเน นิปนฺโนเยว อรหตฺตํ ปาปุณิ. อรญฺญวาเสน ปธานานุโยคกิจฺจํ รญฺโญ นาโหสิ. ही गाथा ऐकून राजा सकृदागामी फलावर प्रतिष्ठित झाला. 'धम्मपाल जातक' ऐकून तो अनागामी फलावर प्रतिष्ठित झाला आणि मृत्यूसमयी श्वेतछत्राखाली सुंदर शय्येवर निजलेले असतानाच त्याने अर्हतपद प्राप्त केले. राजाला अरण्यात राहून कठीण तपश्चर्या करण्याची गरज पडली नाही. โสตาปตฺติผลญฺจ สจฺฉิกตฺวา เอว ปน ภควโต ปตฺตํ คเหตฺวา สปริสํ ภควนฺตํ มหาปาสาทํ อาโรเปตฺวา ปณีเตน ขาทนีเยน โภชนีเยน ปริวิสิ. ภตฺตกิจฺจาวสาเน สพฺพํ อิตฺถาคารํ อาคนฺตฺวา ภควนฺตํ วนฺทิ ฐเปตฺวา ราหุลมาตรํ. สา ปน ‘‘คจฺฉ อยฺยปุตฺตํ วนฺทาหี’’ติ ปริชเนน วุจฺจมานาปิ ‘‘สเจ มยฺหํ คุโณ อตฺถิ, สยเมว อยฺยปุตฺโต อาคมิสฺสติ[Pg.290], อาคตํ นํ วนฺทิสฺสามี’’ติ วตฺวา น อคมาสิ. อถ ภควา ราชานํ ปตฺตํ คาหาเปตฺวา ทฺวีหิ อคฺคสาวเกหิ สทฺธึ ราชธีตาย สิริคพฺภํ คนฺตฺวา ‘‘ราชธีตา ยถารุจิยา วนฺทมานา น กิญฺจิ วตฺตพฺพา’’ติ วตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. สา เวเคน อาคนฺตฺวา โคปฺผเกสุ คเหตฺวา ปาทปิฏฺฐิยํ สีสํ ปริวตฺเตตฺวา ปริวตฺเตตฺวา ยถาชฺฌาสยํ วนฺทิ. राजाने स्रोतापत्ती फल प्राप्त केल्यानंतर भगवंतांचे भिक्षापात्र हातात घेतले आणि आपल्या परिवारासह भगवंतांना भव्य राजप्रासादात घेऊन गेला. तेथे त्याने त्यांना उत्तम खाद्य व भोज्य पदार्थांनी तृप्त केले. भोजन आटोपल्यावर, राहुलमातेला (यशोधरेला) सोडून अंतःपुरातील सर्व स्त्रिया तेथे आल्या आणि त्यांनी भगवंतांना वंदन केले. तिला तिच्या परिजनांनी 'जा आणि आपल्या स्वामींना वंदन कर,' असे सांगितले तरी, 'जर माझ्यात काही गुण असतील, तर स्वामी स्वतःच येथे यावे. ते आल्यावर मी त्यांना वंदन करेन,' असे म्हणून ती गेली नाही. तेव्हा भगवंतांनी राजाला आपले भिक्षापात्र घ्यायला लावले आणि दोन अग्रश्रावकांसह ते राजकन्येच्या सुंदर कक्षात गेले. 'राजकन्या आपल्या इच्छेनुसार वंदन करत असताना तिला कोणीही काही बोलू नये,' असे सांगून ते मांडलेल्या आसनावर बसले. ती वेगाने धावत आली, तिने भगवंतांचे घोटे पकडले आणि त्यांचे पाय आपल्या डोक्यावर ठेवून आपल्या इच्छेनुसार वारंवार वंदन केले. ราชา ราชธีตาย ภควติ สิเนหพหุมานาทิคุณสมฺปตฺตึ กเถสิ. ภควา ‘‘อนจฺฉริยํ มหาราช ยํ อิทานิ ปริปกฺเก ญาเณ ตยา รกฺขิยมานา ราชธีตา อตฺตานํ รกฺขิ, สา ปุพฺเพ อนารกฺขา ปพฺพตปาเท วิจรมานา อปริปกฺเก ญาเณ อตฺตานํ รกฺขี’’ติ วตฺวา จนฺทกินฺนรีชาตกํ กเถสิ. राजाने राजकन्येच्या (यशोधरेच्या) भगवंतांविषयीच्या प्रेम, आदर इत्यादी गुणांच्या परिपूर्णतेचे वर्णन केले. भगवान म्हणाले, "महाराज, आता ज्ञान परिपक्व झाले असताना, तुमच्याद्वारे रक्षण केली जात असलेली ही राजकन्या स्वतःचे रक्षण करू शकली, यात काही आश्चर्य नाही. पूर्वी जेव्हा ती चंद्रकिन्नरी होती, तेव्हा तिचे रक्षण करणारे कोणी नसताना, पर्वताच्या पायथ्याशी फिरत असताना, ज्ञान अपरिपक्व असतानाही तिने स्वतःचे रक्षण केले होते." असे सांगून भगवंतांनी 'चंद्रकिन्नरी जातक' सांगितले. ตํทิวสเมว จ นนฺทราชกุมารสฺส เกสวิสฺสชฺชนํ ปฏฺฏพนฺโธ ฆรมงฺคลํ อาวาหมงฺคลํ ฉตฺตมงฺคลนฺติ ปญฺจ มหามงฺคลานิ โหนฺติ. ภควา นนฺทํ ปตฺตํ คาหาเปตฺวา มงฺคลํ วตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกามิ. ชนปทกลฺยาณี กุมารํ คจฺฉนฺตํ ทิสฺวา ‘‘ตุวฏํ โข อยฺยปุตฺต อาคจฺเฉยฺยาสี’’ติ วตฺวา คีวํ ปสาเรตฺวา โอโลเกสิ. โสปิ ภควนฺตํ ‘‘ปตฺตํ คณฺหถา’’ติ วตฺตุํ อวิสหมาโน วิหารํเยว อคมาสิ. ตํ อนิจฺฉมานํเยว ภควา ปพฺพาเชสิ. อิติ ภควา กปิลปุรํ อาคนฺตฺวา ทุติยทิวเส นนฺทํ ปพฺพาเชสิ. त्याच दिवशी नंद राजकुमाराचे केस मोकळे करणे (केश विसर्जन), मुकुट धारण करणे (पट्टबंध), गृहप्रवेश (घरमंगल), विवाह सोहळा (आवाह सोहळा) आणि छत्र धारण करणे (छत्रमंगल) असे पाच महामंगल सोहळे होते. भगवंतांनी नंदाच्या हातात भिक्षापात्र दिले, मंगलवचन सांगितले आणि आसनावरून उठून ते निघून गेले. जनपदकल्याणीने राजकुमाराला (भगवंतांच्या मागे) जाताना पाहून, "आर्यपुत्र, लवकर परत या!" असे म्हणून मान उंचावून पाहिले. तो (नंद) देखील भगवंतांना "आपले पात्र परत घ्या" असे म्हणण्याचे धैर्य करू न शकल्याने विहारापर्यंतच गेला. त्याची इच्छा नसतानाही भगवंतांनी त्याला प्रव्रजित केले (दीक्षा दिली). अशा प्रकारे भगवंतांनी कपिलवस्तूला आल्यावर दुसऱ्याच दिवशी नंदाला प्रव्रजित केले. สตฺตเม ทิวเส ราหุลมาตา กุมารํ อลงฺกริตฺวา ภควโต สนฺติกํ เปเสสิ – ‘‘ปสฺส ตาต เอตํ วีสติสหสฺสสมณปริวุตํ สุวณฺณวณฺณํ พฺรหฺมรูปวณฺณํ สมณํ, อยํ เต ปิตา, เอตสฺส มหนฺตา นิธโย อเหสุํ, ตฺยสฺส นิกฺขมนโต ปฏฺฐาย น ปสฺสาม, คจฺฉ นํ ทายชฺชํ ยาจ, อหํ ตาต กุมาโร ฉตฺตํ อุสฺสาเปตฺวา จกฺกวตฺตี ภวิสฺสามิ, ธเนน เม อตฺโถ, ธนํ เม เทหิ, สามิโก หิ ปุตฺโต ปิตุสนฺตกสฺสา’’ติ. ราหุลกุมาโร ภควโต สนฺติกํ คนฺตฺวาว ปิตุสิเนหํ ปฏิลภิตฺวา หฏฺฐจิตฺโต ‘‘สุขา เต สมณ ฉายา’’ติ วตฺวา อญฺญมฺปิ พหุํ อตฺตโน อนุรูปํ วทนฺโต อฏฺฐาสิ. ภควา กตภตฺตกิจฺโจ อนุโมทนํ กตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกามิ. กุมาโรปิ ‘‘ทายชฺชํ เม สมณ เทหิ, ทายชฺชํ เม สมณ เทหี’’ติ ภควนฺตํ อนุพนฺธิ. เตน วุตฺตํ – ‘‘อนุปุพฺเพน จาริกํ จรมาโน เยน กปิลวตฺถุ…เป… ทายชฺชํ เม สมณ เทหี’’ติ. सातव्या दिवशी राहुलच्या मातेने (यशोधरेने) राजकुमाराला सजवून भगवंतांच्या जवळ पाठवले आणि सांगितले— "बाळा, वीस हजार श्रमणांनी वेढलेल्या, सुवर्णवर्णी आणि ब्रह्मदेवासारखे रूप असलेल्या या श्रमणाला पहा. हे तुझे पिता आहेत. त्यांच्याकडे मोठे गुप्त धन (निधी) होते, जे त्यांच्या गृहत्यागाच्या दिवसापासून आम्ही पाहिलेले नाही. तू त्यांच्याकडे जा आणि आपला वारसा माग. 'पिताजी, मी राजकुमार असून छत्र उभारून चक्रवर्ती राजा होणार आहे. मला धनाची गरज आहे, मला धन द्या. कारण पुत्र हा पित्याच्या संपत्तीचा मालक असतो.' असे म्हणून वारसा माग." राहुल राजकुमार भगवंतांच्या जवळ जाताच, पितृप्रेम जागृत झाल्याने आनंदित मनाने म्हणाला, "हे श्रमण, तुमची सावली खूप सुखद आहे!" असे म्हणून तो स्वतःला योग्य अशा इतरही अनेक गोष्टी बोलत उभा राहिला. भगवंतांनी भोजनकर्म आटोपून अनुमोदन केले आणि आसनावरून उठून ते निघाले. राजकुमार देखील "हे श्रमण, मला वारसा द्या! हे श्रमण, मला वारसा द्या!" असे म्हणत भगवंतांच्या मागे मागे गेला. म्हणूनच संगीतिकारांनी म्हटले आहे— "अनुक्रमाने चारिका करत कपिलवस्तूला... 'हे श्रमण, मला वारसा द्या' असे म्हटले आहे." อถ [Pg.291] โข ภควา อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ อามนฺเตสีติ ภควา กุมารํ น นิวตฺตาเปสิ, ปริชโนปิ ภควตา สทฺธึ คจฺฉนฺตํ นิวตฺเตตุํ น วิสหติ. อถ อารามํ คนฺตฺวา ‘‘ยํ อยํ ปิตุสนฺตกํ ธนํ อิจฺฉติ, ตํ วฏฺฏานุคตํ สวิฆาตกํ, หนฺทสฺส โพธิมณฺเฑ ปฏิลทฺธํ สตฺตวิธํ อริยธนํ เทมิ, โลกุตฺตรทายชฺชสฺส นํ สามิกํ กโรมี’’ติ อายสฺมนฺตํ สาริปุตฺตํ อามนฺเตสิ. อามนฺเตตฺวา จ ปนาห – ‘‘เตน หิ ตฺวํ สาริปุตฺต ราหุลกุมารํ ปพฺพาเชหี’’ติ. ยสฺมา อยํ ทายชฺชํ ยาจติ, ตสฺมา นํ โลกุตฺตรทายชฺชปฏิลาภาย ปพฺพาเชหีติ อตฺโถ. "त्यानंतर भगवंतांनी आयुष्यमान सारिपुत्तांना बोलावले" याचा अर्थ भगवंतांनी राजकुमाराला परत पाठवले नाही, आणि सेवकवर्ग देखील भगवंतांसोबत जाणाऱ्या राजकुमाराला परत फिरवण्याचे धैर्य करू शकला नाही. त्यानंतर विहारात पोहोचल्यावर भगवंतांनी विचार केला, "हा ज्या पितृधनाची इच्छा करत आहे, ते संसाराला अनुसरणारे आणि दुःखदायक आहे. चला, मी याला बोधिमंडळावर प्राप्त केलेले सात प्रकारचे 'आर्यधन' देतो आणि याला लोकोत्तर वारशाचा मालक बनवतो." असा विचार करून त्यांनी आयुष्यमान सारिपुत्तांना बोलावले. बोलावून ते म्हणाले, "सारिपुत्ता, तर मग तू राहुल राजकुमाराला प्रव्रजित कर." ज्या अर्थी हा वारसा मागत आहे, त्या अर्थी याला लोकोत्तर वारसा मिळवून देण्यासाठी प्रव्रजित कर, असा याचा अर्थ आहे. อิทานิ ยา สา ภควตา พาราณสิยํ ตีหิ สรณคมเนหิ ปพฺพชฺชา จ อุปสมฺปทา จ อนุญฺญาตา, ตโต ยสฺมา อุปสมฺปทํ ปฏิกฺขิปิตฺวา ครุภาเว ฐเปตฺวา ญตฺติจตุตฺเถน กมฺเมน อุปสมฺปทา อนุญฺญาตา, ปพฺพชฺชา ปน เนว ปฏิกฺขิตฺตา, น ปุน อนุญฺญาตา, ตสฺมา อนาคเต ภิกฺขูนํ วิมติ อุปฺปชฺชิสฺสติ – ‘‘อยํ ปพฺพชฺชา นาม ปุพฺเพ อุปสมฺปทาสทิสา, กึ นุ โข อิทานิปิ อุปสมฺปทา วิย กมฺมวาจาย เอว กตฺตพฺพา, อุทาหุ สรณคมเนหี’’ติ. อิมญฺจ ปนตฺถํ วิทิตฺวา ภควา ปุน ตีหิ สรณคมเนหิ สามเณรปพฺพชฺชํ อนุชานิตุกาโม, ตสฺมา ธมฺมเสนาปติ ตํ ภควโต อชฺฌาสยํ วิทิตฺวา ภควนฺตํ ปุน ปพฺพชฺชํ อนุชานาเปตุกาโม อาห – ‘‘กถาหํ ภนฺเต ราหุลกุมารํ ปพฺพาเชมี’’ติ. पूर्वी भगवंतांनी वाराणसीमध्ये तीन शरणगमनांद्वारे जी प्रव्रज्या आणि उपसंपदा अनुमत केली होती, त्यानंतर उपसंपदेचा तो विधी बदलून, तिचे गांभीर्य लक्षात घेऊन ज्ञत्तिचतुर्थ कम्मवाचेद्वारे उपसंपदा देण्यास अनुमती दिली गेली. परंतु प्रव्रज्या मात्र नाकारलीही गेली नव्हती आणि पुन्हा नव्याने अनुमतही केली गेली नव्हती. त्यामुळे भविष्यात भिक्षूंच्या मनात शंका निर्माण होईल की, "प्रव्रज्या ही पूर्वी उपसंपदेसारखीच होती, तर मग आता देखील ती उपसंपदेप्रमाणे कम्मवाचेनेच केली पाहिजे की शरणगमनांद्वारे केली पाहिजे?" हा हेतू जाणून भगवंतांना पुन्हा तीन शरणगमनांद्वारे 'सामणेर प्रव्रज्या' अनुमत करायची होती. म्हणूनच धम्मसेनापती (सारिपुत्तांनी) भगवंतांचा हा मनोभाव जाणून, भगवंतांकडून पुन्हा प्रव्रज्येची अनुमती मिळवून घेण्याच्या इच्छेने विचारले, "भंते, मी राहुल राजकुमाराला कशी दीक्षा देऊ (प्रव्रजित करू)?" อถ โข อายสฺมา สาริปุตฺโต ราหุลกุมารํ ปพฺพาเชสีติ กุมารสฺส มหาโมคฺคลฺลานตฺเถโร เกเส ฉินฺทิตฺวา กาสายานิ ทตฺวา สรณานิ อทาสิ. มหากสฺสปตฺเถโร โอวาทาจริโย อโหสิ. ยสฺมา ปน อุปชฺฌายมูลกา ปพฺพชฺชา จ อุปสมฺปทา จ, อุปชฺฌาโยว ตตฺถ อิสฺสโร, น อาจริโย, ตสฺมา วุตฺตํ – ‘‘อถ โข อายสฺมา สาริปุตฺโต ราหุลกุมารํ ปพฺพาเชสี’’ติ. "त्यानंतर आयुष्यमान सारिपुत्तांनी राहुल राजकुमाराला प्रव्रजित केले" याचा अर्थ असा की, महामोग्गल्लान थेरांनी राजकुमाराचे केस कापले, त्याला काषाय वस्त्रे (चीवर) दिली आणि शरणगमन दिले. महाकस्सप थेर हे त्याचे ओवादाचार्य (उपदेश देणारे आचार्य) झाले. परंतु, ज्या अर्थी प्रव्रज्या आणि उपसंपदा ही उपाध्यायांवर आधारित असते आणि त्यात उपाध्यायच मुख्य अधिकारी असतात, आचार्य नव्हे, म्हणूनच संगीतिकारांनी म्हटले आहे— "त्यानंतर आयुष्यमान सारिपुत्तांनी राहुल राजकुमाराला प्रव्रजित केले." เอวํ ‘‘กุมาโร ปพฺพชิโต’’ติ สุตฺวา อุปฺปนฺนสํเวเคน หทเยน อถ โข สุทฺโธทโน สกฺโกติ สพฺพํ วตฺตพฺพํ. ตตฺถ ยสฺมา อุญฺฉาจริยาย ชีวโต ปพฺพชิตสฺส อวิเสเสน ‘‘วรํ ยาจามี’’ติ วุตฺเต ‘‘ยาจสฺสู’’ติ วจนํ อปฺปติรูปํ, น จ พุทฺธานํ อาจิณฺณํ, ตสฺมา ‘‘อติกฺกนฺตวรา โข โคตม ตถาคตา’’ติ วุตฺตํ. ยญฺจ ภนฺเต กปฺปติ ยญฺจ อนวชฺชนฺติ ยํ ตุมฺหากญฺเจว ทาตุํ กปฺปติ, อนวชฺชญฺจ โหติ, มม จ สมฺปฏิจฺฉนปจฺจยา วิญฺญูหิ น ครหิตพฺพํ, ตํ ยาจามีติ อตฺโถ. ตถา นนฺเท อธิมตฺตํ ราหุเลติ [Pg.292] ยเถว กิร โพธิสตฺตํ เอวํ นนฺทมฺปิ ราหุลมฺปิ มงฺคลทิวเส เนมิตฺตกา ‘‘จกฺกวตฺตี ภวิสฺสตี’’ติ พฺยากรึสุ. อถ ราชา ‘‘ปุตฺตสฺส จกฺกวตฺติสิรึ ปสฺสิสฺสามี’’ติ อุสฺสาหชาโต ภควโต ปพฺพชฺชาย มหนฺตํ อิจฺฉาวิฆาตํ ปาปุณิ. ตโต ‘‘นนฺทสฺส จกฺกวตฺติสิรึ ปสฺสิสฺสามี’’ติ อุสฺสาหํ ชเนสิ, ตมฺปิ ภควา ปพฺพาเชสิ. อิติ ตมฺปิ ทุกฺขํ อธิวาเสตฺวา ‘‘อิทานิ ราหุลสฺส จกฺกวตฺติสิรึ ปสฺสิสฺสามี’’ติ อุสฺสาหํ ชเนสิ, ตมฺปิ ภควา ปพฺพาเชสิ. เตนสฺส ‘‘อิทานิ กุลวํโสปิ ปจฺฉินฺโน, กุโต จกฺกวตฺติสิรี’’ติ อธิกตรํ ทุกฺขํ อุปฺปชฺชิ. เตน วุตฺตํ – ‘‘ตถา นนฺเท อธิมตฺตํ ราหุเล’’ติ. รญฺโญ ปน อิโต ปจฺฉา อนาคามิผลปฺปตฺติ เวทิตพฺพา. अशा प्रकारे "राजकुमार प्रव्रजित झाला" हे ऐकून हृदय हेलावून गेलेल्या (तीव्र संवेग उत्पन्न झालेल्या) राजा शुद्धोदनाने जे काही म्हटले, ते सर्व "त्यानंतर शाक्य शुद्धोदन..." या संदर्भात सांगितले पाहिजे. त्यात, ज्या अर्थी भिक्षेवर जगणाऱ्या प्रव्रजिताला विशिष्ट उल्लेख न करता सामान्यपणे "मी वर मागतो" असे म्हटल्यावर "माग" असे म्हणणे अयोग्य आहे आणि बुद्धांच्या परंपरेला धरून नाही, म्हणूनच भगवंतांनी "हे गौतम, तथागत वरांच्या पलीकडे गेले आहेत" असे म्हटले. "आणि भंते, जे योग्य आहे आणि जे निर्दोष आहे" याचा अर्थ असा की, जे तुम्हाला देणे योग्य आहे आणि जे निर्दोष आहे, तसेच माझ्यासाठी देखील ते स्वीकारल्यामुळे विद्वानांकडून निंदनीय ठरणार नाही, असा वर मी मागतो. "त्याचप्रमाणे नंदापेक्षा राहुलवर अधिक प्रेम होते" या संदर्भात, ज्याप्रमाणे बोधिसत्त्वाविषयी भविष्य वर्तवले होते, त्याचप्रमाणे नंदाविषयी आणि राहुलविषयी देखील मंगलदिनी भविष्यवेत्त्यांनी "हा चक्रवर्ती राजा होईल" असे भविष्य वर्तवले होते. त्यानंतर राजा शुद्धोदनाने "मी पुत्राचे चक्रवर्ती वैभव पाहीन" अशा उत्साहाने भरलेला असताना, भगवंतांच्या प्रव्रज्येमुळे त्याला मोठा इच्छाभंग (धक्का) सहन करावा लागला. त्यानंतर "मी नंदाचे चक्रवर्ती वैभव पाहीन" अशी आशा त्याने बाळगली, पण त्यालाही भगवंतांनी प्रव्रजित केले. अशा प्रकारे ते दुःख देखील सहन करून त्याने "आता मी राहुलचे चक्रवर्ती वैभव पाहीन" अशी आशा बाळगली, पण त्यालाही भगवंतांनी प्रव्रजित केले. त्यामुळे त्याला "आता तर कुळवंश देखील खंडित झाला, मग चक्रवर्ती वैभव कोठून असणार?" असे वाटून पूर्वीपेक्षाही अधिक तीव्र दुःख झाले. म्हणूनच म्हटले आहे— "त्याचप्रमाणे नंदापेक्षा राहुलवर अधिक प्रेम होते." परंतु यानंतर राजा शुद्धोदनाला 'अनागामी फल' प्राप्त झाले, असे समजावे. สาธุ ภนฺเต อยฺยาติ อิทํ กสฺมา อาห? โส กิร จินฺเตสิ – ‘‘ยตฺร หิ นาม อหมฺปิ พุทฺธมามโก ธมฺมมามโก สงฺฆมามโก สมาโน อตฺตโน ปิยตรปุตฺเต ปพฺพาชิยมาเน ญาติวิโยคทุกฺขํ อธิวาเสตุํ น สกฺโกมิ, อญฺเญ ชนา ปุตฺตนตฺตเกสุ ปพฺพาชิเตสุ กถํ อธิวาเสสฺสนฺติ, ตสฺมา อญฺเญสมฺปิ ตาว เอวรูปํ ทุกฺขํ มา อโหสี’’ติ อาห. ภควา ‘‘สาสเน นิยฺยานิกการณํ ราชา วทตี’’ติ ธมฺมกถํ กตฺวา ‘‘น ภิกฺขเว อนนุญฺญาโต มาตาปิตูหิ ปุตฺโต ปพฺพาเชตพฺโพ’’ติ สิกฺขาปทํ ปญฺญเปสิ. "हे भन्ते, आर्य! हे चांगले आहे" असे त्याने (राजा शुद्धोदनाने) का म्हटले? असे म्हटले जाते की त्याने असा विचार केला— "जेव्हा मी स्वतः बुद्ध-प्रेमी, धम्म-प्रेमी आणि संघ-प्रेमी असूनही, माझ्या अत्यंत प्रिय पुत्राला प्रवज्जित केले जात असताना नातेवाईकांच्या विरहाचे दुःख सहन करू शकत नाही, तेव्हा इतर लोक त्यांच्या मुला-नातवांना प्रवज्जित केले असता हे दुःख कसे सहन करू शकतील? म्हणून इतरांनाही असे दुःख होऊ नये." असा विचार करून त्याने असे म्हटले. भगवंतांनी "राजा शासनातील मुक्तीच्या कारणाविषयी बोलत आहे" असा विचार करून धम्मोपदेश केला आणि "भिक्खूंनो, आई-वडिलांच्या परवानगीशिवाय पुत्राला प्रवज्जित करू नये" असा नियम (सिक्खापद) प्रस्थापित केला. ตตฺถ มาตาปิตูหีติ ชนนิชนเก สนฺธาย วุตฺตํ. สเจ ทฺเว อตฺถิ, ทฺเวปิ อาปุจฺฉิตพฺพา. สเจ ปิตา มโต มาตา วา, โย ชีวติ โส อาปุจฺฉิตพฺโพ. ปพฺพชิตาปิ อาปุจฺฉิตพฺพาว. อาปุจฺฉนฺเตน สยํ วา คนฺตฺวา อาปุจฺฉิตพฺพํ, อญฺโญ วา เปเสตพฺโพ, โส เอว วา เปเสตพฺโพ ‘‘คจฺฉ มาตาปิตโร อาปุจฺฉิตฺวา เอหี’’ติ. สเจ ‘‘อนุญฺญาโตมฺหี’’ติ วทติ, สทฺทหนฺเตน ปพฺพาเชตพฺโพ. ปิตา สยํ ปพฺพชิโต ปุตฺตมฺปิ ปพฺพาเชตุกาโม โหติ, มาตรํ อาปุจฺฉิตฺวาว ปพฺพาเชตุ. มาตา วา ธีตรํ ปพฺพาเชตุกามา, ปิตรํ อาปุจฺฉิตฺวาว ปพฺพาเชตุ. ปิตา ปุตฺตทาเรน อนตฺถิโก ปลายิ, มาตา ‘‘อิมํ ปพฺพาเชถา’’ติ ปุตฺตํ ภิกฺขูนํ เทติ, ‘‘ปิตาสฺส กุหิ’’นฺติ วุตฺเต ‘‘จิตฺตเกฬิยํ กีฬิตุํ ปลาโต’’ติ วทติ, ตํ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. มาตา เกนจิ ปุริเสน สทฺธึ ปลาตา โหติ, ปิตา ปน ‘‘ปพฺพาเชถา’’ติ เทติ, เอตฺถาปิ เอเสว นโย. ปิตา วิปฺปวุตฺโถ โหติ, มาตา ปุตฺตํ ‘‘ปพฺพาเชถา’’ติ อนุชานาติ, ‘‘ปิตา [Pg.293] ตสฺส กุหิ’’นฺติ วุตฺเต ‘‘กึ ตุมฺหากํ ปิตรา, อหํ ชานิสฺสามี’’ติ วทติ, ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏตีติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. त्या नियमात 'आई-वडील' हा शब्द जन्मदात्री माता आणि जन्मदाता पिता यांच्या संदर्भात वापरला आहे. जर दोघेही हयात असतील, तर दोघांचीही परवानगी घेतली पाहिजे. जर पिता किंवा माता मृत असेल, तर जो जिवंत असेल त्याची परवानगी घेतली पाहिजे. जर ते स्वतः प्रवज्जित झाले असतील, तरीही त्यांची परवानगी घेतलीच पाहिजे. परवानगी मागणाऱ्या उपाध्यायाने स्वतः जाऊन विचारले पाहिजे, किंवा दुसऱ्या कोणाला पाठवले पाहिजे, किंवा त्या मुलालाच "जा, आई-वडिलांची परवानगी घेऊन ये" असे सांगून पाठवले पाहिजे. जर तो मुलगा "मला परवानगी मिळाली आहे" असे म्हणत असेल, तर त्याच्यावर विश्वास ठेवून त्याला प्रवज्जित करावे. जर पिता स्वतः प्रवज्जित झाला असेल आणि त्याला आपल्या पुत्रालाही प्रवज्जित करायचे असेल, तर त्याने मातेची परवानगी घेऊनच त्याला प्रवज्जित करावे. किंवा जर मातेला आपल्या कन्येला प्रवज्जित करायचे असेल, तर तिने पित्याची परवानगी घेऊनच तिला प्रवज्जित करावे. जर पिता पत्नी आणि मुलांची पर्वा न करता पळून गेला असेल, आणि मातेने "याला प्रवज्जित करा" असे म्हणून पुत्राला भिक्खूंच्या स्वाधीन केले, आणि भिक्खूंनी "याचा पिता कुठे आहे?" असे विचारल्यावर तिने "तो आपल्या मर्जीने मौजमजा करण्यासाठी पळून गेला आहे" असे सांगितले, तर त्याला प्रवज्जित करणे योग्य आहे. जर माता एखाद्या पुरुषासोबत पळून गेली असेल आणि पित्याने "याला प्रवज्जित करा" असे म्हणून मुलाला दिले, तर येथेही हाच नियम लागू होतो. जर पिता परदेशी गेला असेल आणि मातेने पुत्राला "याला प्रवज्जित करा" अशी परवानगी दिली, आणि "याचा पिता कुठे आहे?" असे विचारल्यावर तिने "तुम्हाला त्याच्या पित्याशी काय देणेघेणे? मी ते पाहून घेईन" असे म्हटले, तर त्याला प्रवज्जित करणे योग्य आहे, असे 'कुरुन्दी' अट्ठकथेत म्हटले आहे. มาตาปิตโร มตา, ทารโก จูฬมาตาทีนํ สนฺติเก สํวทฺโธ, ตสฺมึ ปพฺพาชิยมาเน ญาตกา กลหํ วา กโรนฺติ, ขิยฺยนฺติ วา, ตสฺมา วิวาทุปจฺเฉทนตฺถํ อาปุจฺฉิตฺวาว ปพฺพาเชตพฺโพ. อนาปุจฺฉา ปพฺพาเชนฺตสฺส ปน อาปตฺติ นตฺถิ. ทหรกาเล คเหตฺวา โปสนกา มาตาปิตโร นาม โหนฺติ, เตสุปิ เอเสว นโย. ปุตฺโต อตฺตานํ นิสฺสาย ชีวติ, น มาตาปิตโร. สเจปิ ราชา โหติ, อาปุจฺฉิตฺวาว ปพฺพาเชตพฺโพ. มาตาปิตูหิ อนุญฺญาโต ปพฺพชิตฺวา ปุน วิพฺภมติ, สเจปิ สตกฺขตฺตุํ ปพฺพชิตฺวา วิพฺภมติ, อาคตาคตกาเล ปุนปฺปุนํ อาปุจฺฉิตฺวาว ปพฺพาเชตพฺโพ. สเจ เอวํ วทนฺติ – ‘‘อยํ วิพฺภมิตฺวา เคหํ อาคโต อมฺหากํ กมฺมํ น กโรติ, ปพฺพชิตฺวา ตุมฺหากํ วตฺตํ น ปูเรติ, นตฺถิ อิมสฺสาปุจฺฉนกิจฺจํ, อาคตาคตํ ปพฺพาเชยฺยาถา’’ติ เอวํ นิสฺสฏฺฐํ ปุน อนาปุจฺฉาปิ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. जर आई-वडील मृत झाले असतील आणि तो मुलगा मावशी इत्यादींच्या जवळ वाढला असेल, आणि त्याला प्रवज्जित करताना नातेवाईक भांडण करत असतील किंवा निंदा करत असतील, तर वाद मिटवण्यासाठी त्यांची परवानगी घेऊनच त्याला प्रवज्जित करावे. परंतु, परवानगी न घेता प्रवज्जित करणाऱ्या उपाध्यायाला कोणताही दोष (आपत्ती) लागत नाही. लहानपणी दत्तक घेऊन सांभाळणारे जे पालक (आई-वडील) असतात, त्यांच्या बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. जर मुलगा स्वतःच्या बळावर जगत असेल, आई-वडिलांवर अवलंबून नसेल, आणि तो जरी राजा असला, तरीही परवानगी घेऊनच त्याला प्रवज्जित करावे. आई-वडिलांच्या परवानगीने प्रवज्जित झालेला मुलगा जर पुन्हा गृहस्थ बनला, आणि असे जर त्याने सात वेळा प्रवज्जित होऊन पुन्हा गृहस्थ बनून केले, तरीही तो जेव्हा जेव्हा परत येईल, तेव्हा तेव्हा पुन्हा पुन्हा परवानगी घेऊनच त्याला प्रवज्जित करावे. जर आई-वडील असे म्हणत असतील की— "हा गृहस्थ बनून घरी आल्यावर आमचे काम करत नाही, आणि प्रवज्जित झाल्यावर तुमचे नियम पाळत नाही. त्यामुळे याच्यासाठी परवानगी घेण्याची काही गरज नाही. हा जेव्हा जेव्हा येईल, तेव्हा तेव्हा तुम्ही याला प्रवज्जित करावे." अशा प्रकारे त्यांनी त्याला सोडून दिले असल्यास, पुन्हा परवानगी न घेताही त्याला प्रवज्जित करणे योग्य आहे. โยปิ ทหรกาเลเยว ‘‘อยํ ตุมฺหากํ ทินฺโน, ยทา อิจฺฉถ, ตทา ปพฺพาเชยฺยาถา’’ติ เอวํ ทินฺโน โหติ, โสปิ อาคตาคโต ปุน อนาปุจฺฉาว ปพฺพาเชตพฺโพ. ยํ ปน ทหรกาเลเยว ‘‘อิมํ ภนฺเต ปพฺพาเชยฺยาถา’’ติ อนุชานิตฺวา ปจฺฉา วุฑฺฒิปฺปตฺตกาเล นานุชานนฺติ, อยํ น อนาปุจฺฉา ปพฺพาเชตพฺโพ. เอโก มาตาปิตูหิ สทฺธึ ภณฺฑิตฺวา ‘‘ปพฺพาเชถ ม’’นฺติ อาคจฺฉติ, ‘‘อาปุจฺฉิตฺวา เอหี’’ติ จ วุตฺโต ‘‘นาหํ คจฺฉามิ, สเจ มํ น ปพฺพาเชถ, วิหารํ วา ฌาเปมิ, สตฺเถน วา ตุมฺเห ปหรามิ, ตุมฺหากํ ญาตกอุปฏฺฐากานํ วา อารามจฺเฉทนาทีหิ อนตฺถํ อุปฺปาเทมิ, รุกฺขา วา ปติตฺวา มรามิ, โจรมชฺฌํ วา ปวิสามิ, เทสนฺตรํ วา คจฺฉามี’’ติ วทติ, ตํ ชีวสฺเสว รกฺขณตฺถาย ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. สเจ ปนสฺส มาตาปิตโร อาคนฺตฺวา ‘‘กสฺมา อมฺหากํ ปุตฺตํ ปพฺพาชยิตฺถา’’ติ วทนฺติ, เตสํ ตมตฺถํ อาโรเจตฺวา ‘‘รกฺขณตฺถาย นํ ปพฺพาชยิมฺห, ปญฺญายถ ตุมฺเห ปุตฺเตนา’’ติ วตฺตพฺพา. ‘‘รุกฺขา ปติสฺสามี’’ติ อารุหิตฺวา ปน หตฺถปาเท มุญฺจนฺตํ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติเยว. ज्या मुलाला लहानपणीच "हा तुम्हाला दिला आहे, जेव्हा तुमची इच्छा असेल तेव्हा याला प्रवज्जित करावे" असे म्हणून सोपवले गेले असेल, तो जेव्हा जेव्हा परत येईल तेव्हा त्याला पुन्हा परवानगी न घेताही प्रवज्जित करावे. परंतु, ज्या मुलाला लहानपणी "भन्ते, याला प्रवज्जित करावे" अशी परवानगी दिली होती, पण नंतर तो मोठा झाल्यावर आई-वडील परवानगी देत नसतील, तर त्याला परवानगीशिवाय प्रवज्जित करू नये. जर एखादा मुलगा आई-वडिलांशी भांडून "मला प्रवज्जित करा" असे म्हणत येतो, आणि त्याला "परवानगी घेऊन ये" असे सांगितले असता तो म्हणतो— "मी जाणार नाही. जर तुम्ही मला प्रवज्जित केले नाही, तर मी विहाराला आग लावीन, किंवा शस्त्राने तुमच्यावर हल्ला करीन, किंवा तुमच्या नातेवाईकांच्या व सेवकांच्या बागा तोडून त्यांचे नुकसान करीन, किंवा झाडावरून उडी मारून जीव देईन, किंवा चोरांच्या टोळीत सामील होईन, किंवा परदेशी निघून जाईन." तर केवळ त्याचा जीव वाचवण्यासाठी त्याला प्रवज्जित करणे योग्य आहे. पण जर त्याचे आई-वडील येऊन "तुम्ही आमच्या मुलाला का प्रवज्जित केले?" असे विचारतील, तर त्यांना ती परिस्थिती सांगून म्हणावे— "आम्ही त्याचा जीव वाचवण्यासाठी त्याला प्रवज्जित केले आहे. आता तुम्ही तुमच्या पुत्राच्या माध्यमातून ओळखले जाल." आणि "मी झाडावरून उडी मारून जीव देईन" असे म्हणून झाडावर चढून हात-पाय सोडणाऱ्या मुलाला तर नक्कीच प्रवज्जित करणे योग्य आहे. เอโกปิ [Pg.294] วิเทสํ คนฺตฺวา ปพฺพชฺชํ ยาจติ, อาปุจฺฉิตฺวา เจ คโต, ปพฺพาเชตพฺโพ. โน เจ ทหรภิกฺขุํ เปเสตฺวา อาปุจฺฉาเปตฺวา ปพฺพาเชตพฺโพ, อติทูรญฺเจ โหติ; ปพฺพาเชตฺวาปิ ภิกฺขูหิ สทฺธึ เปเสตฺวา ทสฺเสตุํ วฏฺฏติ. กุรุนฺทิยํ ปน วุตฺตํ – ‘‘สเจ ทูรํ โหติ มคฺโค จ มหากนฺตาโร, ‘คนฺตฺวา อาปุจฺฉิสฺสามา’ติ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏตี’’ติ. สเจ ปน มาตาปิตูนํ พหู ปุตฺตา โหนฺติ, เอวญฺจ วทนฺติ – ‘‘ภนฺเต เอเตสํ ทารกานํ ยํ อิจฺฉถ, ตํ ปพฺพาเชยฺยาถา’’ติ. ทารเก วีมํสิตฺวา ยํ อิจฺฉติ, โส ปพฺพาเชตพฺโพ. สเจปิ สกเลน กุเลน วา คาเมน วา อนุญฺญาตํ โหติ ‘‘ภนฺเต อิมสฺมึ กุเล วา คาเม วา ยํ อิจฺฉถ, ตํ ปพฺพาเชยฺยาถา’’ติ. ยํ อิจฺฉติ, โส ปพฺพาเชตพฺโพติ. जर एखादा व्यक्ती परदेशी जाऊन प्रवज्जेची याचना करतो, आणि तो परवानगी घेऊन आला असेल, तर त्याला प्रवज्जित करावे. जर तो परवानगी न घेता आला असेल, तर एखाद्या तरुण भिक्खूला पाठवून परवानगी मागवून घ्यावी आणि मगच त्याला प्रवज्जित करावे. जर ते ठिकाण अत्यंत दूर असेल, तर त्याला प्रवज्जित करूनही इतर भिक्खूंसोबत पाठवून आई-वडिलांना दाखवणे योग्य आहे. परंतु 'कुरुन्दी' अट्ठकथेत म्हटले आहे— "जर अंतर खूप दूर असेल आणि रस्ता अत्यंत दुर्गम असेल, तर 'नंतर जाऊन परवानगी मागू' असा विचार करून त्याला प्रवज्जित करणे योग्य आहे." जर आई-वडिलांना अनेक मुले असतील आणि ते असे म्हणत असतील की— "भन्ते, या मुलांपैकी ज्याला तुमची इच्छा असेल त्याला प्रवज्जित करावे." तर मुलांची परीक्षा घेऊन ज्याला प्रवज्जित करण्याची इच्छा असेल, त्याला प्रवज्जित करावे. जर संपूर्ण कुळाने किंवा गावाने अशी परवानगी दिली असेल की— "भन्ते, या कुळातील किंवा गावातील ज्या मुलाला तुमची इच्छा असेल त्याला प्रवज्जित करावे." तर ज्याला प्रवज्जित करण्याची इच्छा असेल, त्याला प्रवज्जित करावे. ยาวตเก วา ปน อุสฺสหตีติ ยตฺตเก สกฺโกติ. "किंवा जितक्यांना तो सांभाळू शकतो" याचा अर्थ "जितक्यांना तो उपदेश व अनुशासने देण्यास समर्थ आहे." ราหุลวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. राहुलवस्तूची कथा समाप्त झाली। สิกฺขาปททณฺฑกมฺมวตฺถุกถา सिक्खापद-दंडकम्म-वस्तूची कथा। ๑๐๖. ทสสุ สิกฺขาปเทสุ ปุริมานํ ปญฺจนฺนํ อติกฺกโม นาสนวตฺถุ, ปจฺฉิมานํ อติกฺกโม ทณฺฑกมฺมวตฺถุ. १०६. दहा सिक्खापदांपैकी पहिल्या पाच सिक्खापदांचे उल्लंघन करणे हे नासनेचे (संघातून निष्कासित करण्याचे) कारण आहे, आणि नंतरच्या पाच सिक्खापदांचे उल्लंघन करणे हे दंडकम्माचे (शिक्षेचे) कारण आहे। ๑๐๗. อปฺปติสฺสาติ ภิกฺขู เชฏฺฐกฏฺฐาเน อิสฺสริยฏฺฐาเน น ฐเปนฺติ. อสภาควุตฺติกาติ สมานชีวิกา น ภวนฺติ, วิสภาคชีวิกาติ อตฺโถ. อลาภาย ปริสกฺกตีติ ยถา ลาภํ น ลภนฺติ; เอวํ ปรกฺกมติ. อนตฺถายาติ อุปทฺทวาย. อวาสายาติ ‘‘กินฺติ อิมสฺมึ อาวาเส น วเสยฺยุ’’นฺติ ปรกฺกมติ. อกฺโกสติ ปริภาสตีติ อกฺโกสติ เจว ภยทสฺสเนน จ ตชฺเชติ. เภเทตีติ เปสุญฺญํ อุปสํหริตฺวา เภเทติ. อาวรณํ กาตุนฺติ ‘‘มา อิธ ปวิสา’’ติ นิวารณํ กาตุํ. ยตฺถ วา วสติ ยตฺถ วา ปฏิกฺกมตีติ ยตฺถ วสติ วา ปวิสติ วา; อุภเยนาปิ อตฺตโน ปริเวณญฺจ วสฺสคฺเคน ปตฺตเสนาสนญฺจ วุตฺตํ. १०७. 'अप्पतिस्स' (आदर न राखणारे) म्हणजे भिक्खूंना ज्येष्ठ किंवा श्रेष्ठ स्थानावर न मानणे. 'असभागवृत्तिक' म्हणजे ज्यांची उपजीविका समान नसते, म्हणजेच भिन्न उपजीविका असणारे असा अर्थ आहे. 'अलाभाय परिसक्कति' (लाभापासून वंचित ठेवण्याचा प्रयत्न करणे) म्हणजे त्यांना लाभ मिळू नये म्हणून प्रयत्न करणे. 'अनत्थाय' म्हणजे उपद्रव किंवा हानी पोहोचवण्यासाठी. 'अवासाय' म्हणजे "ते या विहारात कसे राहू शकणार नाहीत" यासाठी प्रयत्न करणे. 'अक्कोसति परिभासति' म्हणजे शिवीगाळ करणे आणि भीती दाखवून धमकावणे. 'भेदेति' म्हणजे चहाडी करून फूट पाडणे. 'आवरणं कातुं' म्हणजे "येथे प्रवेश करू नकोस" असा प्रतिबंध करणे. 'यत्थ वा वसति यत्थ वा पटिक्कमति' (जिथे राहतो किंवा जिथे प्रवेश करतो) म्हणजे जिथे तो राहतो किंवा प्रवेश करतो; या दोन्ही शब्दांनी स्वतःचे निवासस्थान (परिवेण) आणि वर्षावासाच्या क्रमानुसार मिळालेले शयनासन (पत्तसेनासन) दर्शवले आहे। มุขทฺวาริกํ อาหารํ อาวรณํ กโรนฺตีติ ‘‘อชฺช มา ขาท, มา ภุญฺชา’’ติ เอวํ นิวาเรนฺติ. น ภิกฺขเว มุขทฺวาริโก อาหาโร อาวรณํ กาตพฺโพติ [Pg.295] เอตฺถ ‘‘มา ขาท, มา ภุญฺชา’’ติ วทโตปิ ‘‘อาหารํ นิวาเรสฺสามี’’ติ ปตฺตจีวรํ อนฺโต นิกฺขิปโตปิ สพฺพปโยเคสุ ทุกฺกฏํ. อนาจารสฺส ปน ทุพฺพจสามเณรสฺส ทณฺฑกมฺมํ กตฺวา ยาคุํ วา ภตฺตํ วา ปตฺตจีวรํ วา ทสฺเสตฺวา ‘‘เอตฺตเก นาม ทณฺฑกมฺเม อาหเฏ อิทํ ลจฺฉสี’’ติ วตฺตุํ วฏฺฏติ. ภควตา หิ อาวรณเมว ทณฺฑกมฺมํ วุตฺตํ. ธมฺมสงฺคาหกตฺเถเรหิ ปน อปราธานุรูปํ อุทกทารุวาลิกาทีนํ อาหราปนมฺปิ กาตพฺพนฺติ วุตฺตํ, ตสฺมา ตมฺปิ กาตพฺพํ. ตญฺจ โข ‘‘โอรมิสฺสติ วิรมิสฺสตี’’ติ อนุกมฺปาย, น ‘‘นสฺสิสฺสติ วิพฺภมิสฺสตี’’ติอาทินยปฺปวตฺเตน ปาปชฺฌาสเยน ‘‘ทณฺฑกมฺมํ กโรมี’’ติ จ อุณฺหปาสาเณ วา นิปชฺชาเปตุํ ปาสาณิฏฺฐกาทีนิ วา สีเส นิกฺขิปาเปตุํ อุทกํ วา ปเวเสตุํ น วฏฺฏติ. मुखद्वाराने आहार घेण्यास प्रतिबंध करतात म्हणजे 'आज खाऊ नकोस, जेवू नकोस' असे अडवतात. 'भिक्खून्नों, मुखद्वाराने घेणाऱ्या आहारावर प्रतिबंध करू नये' या पाठात, 'खाऊ नकोस, जेवू नकोस' असे बोलणाऱ्या भिक्षूलाही आणि 'मी आहाराला रोखेन' असा विचार करून (सामणेराचे) पात्र व चीवर खोलीत ठेवून देणाऱ्या भिक्षूलाही, अशा सर्व प्रकारच्या कृतींमध्ये 'दुक्कट' (दुष्कृत) दोष होतो. परंतु, अनाचारी व उद्धट सामणेराला दंडकर्म करून, पेज, भात किंवा पात्र-चीवर दाखवून 'एवढे दंडकर्म पूर्ण केल्यावर तुला हे मिळेल' असे सांगणे योग्य आहे. कारण भगवंतांनी प्रतिबंधालाच दंडकर्म म्हटले आहे. परंतु, धम्मसंगीतिकाकार थेरांनी अपराधानुसार पाणी, लाकूड, वाळू इत्यादी आणायला लावणे हे देखील करावे असे म्हटले आहे, म्हणून ते देखील करावे. आणि ते देखील 'हा पापापासून परावृत्त होईल, विन्मुख होईल' या अनुकंपेने करावे; 'हा नष्ट होईल किंवा गृहस्थ होईल' अशा वाईट हेतूने करू नये. तसेच 'मी दंडकर्म करतो' असे म्हणून गरम दगडावर झोपवणे, डोक्यावर दगड किंवा विटा इत्यादी ठेवणे किंवा पाण्यात उतरवणे योग्य नाही. สิกฺขาปททณฺฑกมฺมวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. शिक्षापद-दंडकर्म कथेची समाप्ती झाली। อนาปุจฺฉาวรณวตฺถุอาทิกถา न विचारता प्रतिबंध करण्याच्या प्रकरणाची आदि-कथा ๑๐๘. น ภิกฺขเว อุปชฺฌายํ อนาปุจฺฉาติ เอตฺถ ‘‘ตุมฺหากํ สามเณรสฺส อยํ นาม อปราโธ, ทณฺฑกมฺมมสฺส กโรถา’’ติ ติกฺขตฺตุํ วุตฺเต, สเจ อุปชฺฌาโย ทณฺฑกมฺมํ น กโรติ, สยํ กาตุํ วฏฺฏติ. สเจปิ อาทิโตว อุปชฺฌาโย วทติ ‘‘มยฺหํ สามเณรานํ โทเส สติ ตุมฺเห ทณฺฑกมฺมํ กโรถา’’ติ กาตุํ วฏฺฏติเยว. ยถา จ สามเณรานํ เอวํ สทฺธิวิหาริกนฺเตวาสิกานมฺปิ ทณฺฑกมฺมํ กาตุํ วฏฺฏติ. १०८. ‘भिक्खून्नों, उपाध्यायांना न विचारता (दंडकर्म करू नये)’ या पाठात, ‘तुमच्या सामणेराचा हा अपराध आहे, त्याला दंडकर्म करा’ असे तीन वेळा सांगितले असता, जर उपाध्याय दंडकर्म करत नसतील, तर स्वतः करणे योग्य आहे. किंवा जर उपाध्यायांनी सुरुवातीलाच सांगितले असेल की, ‘माझ्या सामणेरांचा दोष असल्यास तुम्ही स्वतः दंडकर्म करा’, तरीही दंडकर्म करणे योग्यच आहे. आणि ज्याप्रमाणे सामणेरांना, त्याचप्रमाणे सद्धि विहारिक आणि अंतेवासिकांना देखील दंडकर्म करणे योग्य आहे। อปลาเฬนฺตีติ ‘‘ตุมฺหากํ ปตฺตํ ทสฺสาม, จีวรํ ทสฺสามา’’ติ อตฺตโน อุปฏฺฐานกรณตฺถํ สงฺคณฺหนฺติ. น ภิกฺขเว อญฺญสฺส ปริสา อปลาเฬตพฺพาติ เอตฺถ สามเณรา วา โหนฺตุ อุปสมฺปนฺนา วา, อนฺตมโส ทุสฺสีลภิกฺขุสฺสาปิ ปรสฺส ปริสภูเต ภินฺทิตฺวา คณฺหิตุํ น วฏฺฏติ, อาทีนวํ ปน วตฺตุํ วฏฺฏติ ‘‘ตยา นฺหายิตุํ อาคเตน คูถมกฺขนํ วิย กตํ ทุสฺสีลํ นิสฺสาย วิหรนฺเตนา’’ติ. สเจ โส สยเมว ชานิตฺวา อุปชฺฌํ วา นิสฺสยํ วา ยาจติ, ทาตุํ วฏฺฏติ. ‘अपलाळेंति’ म्हणजे ‘आम्ही तुम्हाला पात्र देऊ, चीवर देऊ’ असे सांगून स्वतःची सेवा करून घेण्यासाठी आपल्याकडे आकर्षित करतात. ‘भिक्खून्नों, दुसऱ्याच्या परिषदेला आकर्षित करू नये’ या पाठात, मग ते sauमणेर असोत वा उपसंपन्न भिक्षू असोत, अगदी दुःशील भिक्षूच्या देखील परिषदेतील लोकांना फोडून आपल्याकडे घेणे योग्य नाही. परंतु दोष दाखवून देणे योग्य आहे की, ‘तू आंघोळ करायला येऊन स्वतःला विष्ठेने माखून घेण्यासारखे या दुःशील भिक्षूचा आश्रय घेऊन राहत आहेस.’ जर तो स्वतःहून हे समजून उपाध्याय किंवा निश्रय मागू लागला, तर देणे योग्य आहे। อนุชานามิ ภิกฺขเว ทสหงฺเคหิ สมนฺนาคตํ สามเณรํ นาเสตุนฺติ เอตฺถ กณฺฏกสิกฺขาปทวณฺณนายํ วุตฺตาสุ ตีสุ นาสนาสุ ลิงฺคนาสนาว อธิปฺเปตา, ตสฺมา โย ปาณาติปาตาทีสุ เอกมฺปิ กมฺมํ กโรติ, โส ลิงฺคนาสนาย นาเสตพฺโพ. ยถา จ ภิกฺขูนํ ปาณาติปาตาทีสุ นานาอาปตฺติโย โหนฺติ, น ตถา สามเณรานํ. สามเณโร หิ กุนฺถกิปิลฺลิกมฺปิ มาเรตฺวา มงฺคุรณฺฑกมฺปิ ภินฺทิตฺวา นาเสตพฺพตํเยว [Pg.296] ปาปุณาติ, ตาวเทวสฺส สรณคมนานิ จ อุปชฺฌายคฺคหณญฺจ เสนาสนคฺคาโห จ ปฏิปฺปสฺสมฺภติ, สงฺฆลาภํ น ลภติ, ลิงฺคมตฺตเมว เอกํ อวสิฏฺฐํ โหติ. โส สเจ อากิณฺณโทโสว โหติ, อายตึ สํวเร น ติฏฺฐติ, นิกฺกฑฺฒิตพฺโพ. อถ สหสา วิรชฺฌิตฺวา ‘‘ทุฏฺฐุ มยา กต’’นฺติ ปุน สํวเร ฐาตุกาโม โหติ, ลิงฺคนาสนกิจฺจํ นตฺถิ. ยถานิวตฺถปารุตสฺเสว สรณานิ ทาตพฺพานิ, อุปชฺฌาโย ทาตพฺโพ, สิกฺขาปทานิ ปน สรณคมเนเนว อิชฺฌนฺติ. สามเณรานญฺหิ สรณคมนํ ภิกฺขูนํ อุปสมฺปทกมฺมวาจาสทิสํ, ตสฺมา ภิกฺขูนํ วิย จตุปาริสุทฺธิสีลํ, อิมินาปิ ทสสีลานิ สมาทินฺนาเนว โหนฺติ, เอวํ สนฺเตปิ ทฬฺหีกรณตฺถํ อายตึ สํวเร ปติฏฺฐาปนตฺถํ ปุน ทาตพฺพานิ. สเจ ปุริมิกาย ปุน สรณานิ คหิตานิ, ปจฺฉิมิกาย วสฺสาวาสิกํ ลจฺฉติ. สเจ ปจฺฉิมิกาย คหิตานิ, สงฺเฆน อปโลเกตฺวา ลาโภ ทาตพฺโพ. ‘भिक्खून्नों, दहा अंगांनी युक्त असलेल्या सामणेराचा नाश (निष्कासन) करण्याची मी अनुमती देतो’ या पाठात, कंटक-शिक्षापदाच्या वर्णनात सांगितलेल्या तीन प्रकारच्या नाशांपैकी ‘लिंग-नासना’ (वेष-नाश) हीच अभिप्रेत आहे. म्हणून जो सामणेर प्राणातिपात इत्यादींपैकी एकही कर्म करतो, त्याला ling-नासनेद्वारे निष्कासित करावे. आणि ज्याप्रमाणे भिक्षूंना प्राणातिपात इत्यादींमध्ये वेगवेगळ्या आपत्ती होतात, तसे सामणेरांच्या बाबतीत नाही. कारण सामणेराने अगदी लहान मुंगी किंवा कीटक मारला किंवा अंड्याचा भेद केला तरी तो निष्कासनास पात्र ठरतो. त्याच वेळी त्याचे शरणगमन, उपाध्यायांचे ग्रहण आणि शयनासन ग्रहण करणे संपुष्टात येते, त्याला संघलाभ मिळत नाही, केवळ लिंग (सामणेराचा वेष) मात्र शिल्लक राहते. जर तो अत्यंत दोषयुक्त असेल आणि भविष्यात संयमात राहत नसेल, तर त्याला हाकलून द्यावे. परंतु जर तो अचानक पश्चात्ताप पावून ‘माझ्याकडून वाईट कृत्य झाले’ असे म्हणून पुन्हा संयमात राहू इच्छित असेल, तर लिंग-नासनेची आवश्यकता नाही. त्याने जसे वस्त्र परिधान केले आहे तसेच त्याला शरणगमन द्यावे आणि उपाध्याय द्यावेत. कारण शिक्षापदे तर शरणगमनानेच सिद्ध होतात. सामणेरांचे शरणगमन हे भिक्षूंच्या उपसंपदा-कर्मवाचेसारखेच आहे, म्हणून भिक्षूंच्या चतुपारिसुद्धि-शीलाप्रमाणे, याने देखील दहा शील ग्रहण केलेलेच असतात. असे असले तरी दृढीकरणासाठी आणि भविष्यात संयमात प्रतिष्ठित करण्यासाठी ते पुन्हा दिले पाहिजेत. जर पहिल्या वर्षावासाच्या वेळी पुन्हा शरण घेतले, तर तो नंतरच्या वर्षावासाचा लाभ मिळवतो. जर नंतरच्या वर्षावासाच्या वेळी शरण घेतले, तर संघाने विचार करून त्याला लाभ दिला पाहिजे। อทินฺนาทาเน ติณสลากมตฺเตนาปิ วตฺถุนา, อพฺรหฺมจริเย ตีสุ มคฺเคสุ ยตฺถ กตฺถจิ วิปฺปฏิปตฺติยา, มุสาวาเท หสฺสาธิปฺปายตายปิ มุสา ภณิเต อสฺสมโณ โหติ, นาเสตพฺพตํ อาปชฺชติ. มชฺชปาเน ปน ภิกฺขุโน อชานิตฺวาปิ พีชโต ปฏฺฐาย มชฺชํ ปิวนฺตสฺส ปาจิตฺติยํ. สามเณโร ชานิตฺวา ปิวนฺโต สีลเภทํ อาปชฺชติ, น อชานิตฺวา. ยานิ ปนสฺส อิตรานิ ปญฺจ สิกฺขาปทานิ, เตสุ ภินฺเนสุ น นาเสตพฺโพ, ทณฺฑกมฺมํ กาตพฺพํ. สิกฺขาปเท ปน ปุน ทินฺเนปิ อทินฺเนปิ วฏฺฏติ. ทณฺฑกมฺเมน ปน ปีเฬตฺวา อายตึ สํวเร ฐปนตฺถาย ทาตพฺพเมว. สามเณรานํ มชฺชปานํ สจิตฺตกํ ปาราชิกวตฺถุ, อยํ วิเสโส. अदत्तादानात (चोरीत) अगदी गवताच्या काडीइतकी वस्तू घेतली तरी, अब्रह्मचर्यात तीन मार्गांपैकी कोणत्याही एका मार्गाने गैरवर्तन केल्यास, आणि मृषावादात अगदी थट्टामस्करीच्या उद्देशाने जरी खोटे बोलले तरी तो अश्रमण होतो आणि निष्कासनास पात्र ठरतो. परंतु मद्यपानाच्या बाबतीत, भिक्षूने न जाणताही बीजापासून बनवलेले मद्य प्यायल्यास 'पाचित्तिय' दोष होतो. सामणेराने जाणूनबुजून मद्य प्यायल्यास त्याचा शीलभंग होतो, न जाणता प्यायल्यास नाही. परंतु त्याची जी इतर पाच शिक्षापदे आहेत, ती भंग पावली असता त्याला निष्कासित करू नये, तर दंडकर्म करावे. शिक्षापद पुन्हा दिले तरी किंवा न दिले तरी चालते. परंतु दंडकर्माने ताकीद देऊन भविष्यात संयमात ठेवण्यासाठी ते पुन्हा दिलेच पाहिजे. सामणेरांचे जाणूनबुजून केलेले मद्यपान हे पाराजिकासारखे (वेष नष्ट करण्याचे) कारण ठरते, हा विशेष फरक आहे। อวณฺณภาสเน ปน อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธติอาทีนํ ปฏิปกฺขวเสน พุทฺธสฺส วา, สฺวากฺขาโตติอาทีนํ ปฏิปกฺขวเสน ธมฺมสฺส วา, สุปฺปฏิปนฺโนติอาทีนํ ปฏิปกฺขวเสน สงฺฆสฺส วา อวณฺณํ ภาสนฺโต รตนตฺตยํ นินฺทนฺโต ครหนฺโต อาจริยุปชฺฌายาทีหิ ‘‘มา เอวํ อวจา’’ติ อวณฺณภาสเน อาทีนวํ ทสฺเสตฺวา นิวาเรตพฺโพ. สเจ ยาวตติยํ วุจฺจมาโน น โอรมติ, กณฺฏกนาสนาย นาเสตพฺโพติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. มหาอฏฺฐกถายํ ปน ‘‘สเจ เอวํ วุจฺจมาโน ตํ ลทฺธึ นิสฺสชฺชติ, ทณฺฑกมฺมํ กาเรตฺวา อจฺจยํ เทสาเปตพฺโพ. สเจ น นิสฺสชฺชติ, ตเถว อาทาย ปคฺคยฺห [Pg.297] ติฏฺฐติ, ลิงฺคนาสนาย นาเสตพฺโพ’’ติ วุตฺตํ, ตํ ยุตฺตํ. อยเมว หิ นาสนา อิธ อธิปฺเปตาติ. अवर्णभाषण (निंदा करणे) याविषयीचा निर्णय असा समजावा - 'अरहं सम्मासम्बुद्ध' इत्यादी गुणांच्या विरुद्ध जाऊन बुद्धांची, 'स्वाक्खातो' इत्यादी गुणांच्या विरुद्ध जाऊन धम्माची, किंवा 'सुप्पटिपन्नो' इत्यादी गुणांच्या विरुद्ध जाऊन संघाची निंदा करत असताना, किंवा त्रिरत्नांची निंदा व निर्भत्सना करत असताना, आचार्य आणि उपाध्यायांनी 'असे बोलू नकोस' असे सांगून निंदा करण्याचे दुष्परिणाम दाखवून त्याला रोखले पाहिजे. जर तीन वेळा सांगूनही तो थांबला नाही, तर त्याला 'कंटक-नासने'द्वारे निष्कासित करावे, असे कुरुंदीमध्ये म्हटले आहे. परंतु महाअट्ठकथेमध्ये म्हटले आहे की - 'जर असे सांगितले असता तो त्या चुकीच्या मताचा त्याग करतो, तर त्याला दंडकर्म देऊन अपराधाची क्षमा मागण्यास सांगावे. जर तो त्याग करत नाही आणि त्याच मताचा आग्रह धरून राहतो, तर त्याला लिंग-नासनेद्वारे निष्कासित करावे.' हे योग्य आहे, कारण येथे हीच नासना अभिप्रेत आहे। มิจฺฉาทิฏฺฐิเกปิ เอเสว นโย. สสฺสตุจฺเฉทานญฺหิ อญฺญตรทิฏฺฐิโก สเจ อาจริยาทีหิ โอวทิยมาโน นิสฺสชฺชติ, ทณฺฑกมฺมํ กาเรตฺวา อจฺจยํ เทสาเปตพฺโพ. อปฺปฏินิสฺสชฺชนฺโตว นาเสตพฺโพติ. ภิกฺขุนิทูสโก เจตฺถ กามํ อพฺรหฺมจาริคฺคหเณน คหิโตว อพฺรหฺมจารึ ปน อายตึ สํวเร ฐาตุกามํ สรณานิ ทตฺวา อุปสมฺปาเทตุํ วฏฺฏติ. ภิกฺขุนิทูสโก อายตึ สํวเร ฐาตุกาโมปิ ปพฺพชฺชมฺปิ น ลภติ, ปเคว อุปสมฺปทนฺติ เอตมตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘ภิกฺขุนิทูสโก’’ติ อิทํ วิสุํ ทสมํ องฺคํ วุตฺตนฺติ เวทิตพฺพํ. मिथ्यादृष्टी (अयोग्य मत असणाऱ्या) व्यक्तीच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. शाश्वत आणि उच्छेद दृष्टींपैकी कोणत्याही एका दृष्टीचा श्रामणेर जर आचार्यादींद्वारे उपदेश केला जात असताना ती दृष्टी सोडून देत असेल, तर त्याला दंडकर्म देऊन अपराधाची क्षमा मागण्यास सांगावे. जर तो ती दृष्टी सोडत नसेल, तर त्याला निष्कासित करावे. आणि येथे भिक्खुणीचा विनयभंग करणारा (भिक्खुणीदूषक) हा जरी 'अब्रह्मचारी' या शब्दाच्या ग्रहणाने समाविष्ट होत असला, तरीही भविष्यात संयमात राहू इच्छिणाऱ्या अब्रह्मचाऱ्याला शरणगमन देऊन उपसंपदा देणे योग्य ठरते. परंतु, भिक्खुणीचा विनयभंग करणारा भविष्यात संयमात राहू इच्छित असला तरीही त्याला प्रवज्जा देखील मिळत नाही, मग उपसंपदेचा तर प्रश्नच उद्भवत नाही. हाच अर्थ दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी 'भिक्खुणीदूषक' हे दहावे अंग स्वतंत्रपणे सांगितले आहे, असे समजावे. อนาปุจฺฉาวรณวตฺถุอาทิกถา นิฏฺฐิตา. परवानगी न घेता प्रवेश करण्याच्या प्रतिबंधाची कथा समाप्त झाली. ปณฺฑกวตฺถุกถา पंडकवस्तूची कथा ๑๐๙. ทหเร ทหเรติ ตรุเณ ตรุเณ. โมฬิคลฺเลติ ถูลสรีเร. หตฺถิภณฺเฑ อสฺสภณฺเฑติ หตฺถิโคปเก จ อสฺสโคปเก จ. १०९. 'दहरे दहरे' म्हणजे तरुण-तरुण (लहान वयाचे). 'मोळिगल्ले' म्हणजे स्थूल शरीराचे (जाडजूड शरीराचे). 'हत्थिभंडे अस्सभंडे' म्हणजे हत्तीचे रक्षक आणि घोड्यांचे रक्षक. ปณฺฑโก ภิกฺขเวติ เอตฺถ อาสิตฺตปณฺฑโก อุสูยปณฺฑโก โอปกฺกมิกปณฺฑโก ปกฺขปณฺฑโก นปุํสกปณฺฑโกติ ปญฺจ ปณฺฑกา. ตตฺถ ยสฺส ปเรสํ องฺคชาตํ มุเขน คเหตฺวา อสุจินา อาสิตฺตสฺส ปริฬาโห วูปสมฺมติ, อยํ อาสิตฺตปณฺฑโก. ยสฺส ปเรสํ อชฺฌาจารํ ปสฺสโต อุสูยาย อุปฺปนฺนาย ปริฬาโห วูปสมฺมติ, อยํ อุสูยปณฺฑโก. ยสฺส อุปกฺกเมน พีชานิ อปนีตานิ, อยํ โอปกฺกมิกปณฺฑโก. เอกจฺโจ ปน อกุสลวิปากานุภาเวน กาฬปกฺเข ปณฺฑโก โหติ, ชุณฺหปกฺเข ปนสฺส ปริฬาโห วูปสมฺมติ, อยํ ปกฺขปณฺฑโก. โย ปน ปฏิสนฺธิยํเยว อภาวโก อุปฺปนฺโน, อยํ นปุํสกปณฺฑโกติ. เตสุ อาสิตฺตปณฺฑกสฺส จ อุสูยปณฺฑกสฺส จ ปพฺพชฺชา น วาริตา, อิตเรสํ ติณฺณํ วาริตา. เตสุปิ ปกฺขปณฺฑกสฺส ยสฺมึ ปกฺเข ปณฺฑโก โหติ, ตสฺมึเยวสฺส ปกฺเข ปพฺพชฺชา วาริตาติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. ยสฺส เจตฺถ ปพฺพชฺชา วาริตา, ตํ สนฺธาย อิทํ วุตฺตํ – ‘‘อนุปสมฺปนฺโน น อุปสมฺปาเทตพฺโพ อุปสมฺปนฺโน นาเสตพฺโพ’’ติ. โสปิ [Pg.298] ลิงฺคนาสเนเนว นาเสตพฺโพ. อิโต ปรํ ‘‘นาเสตพฺโพ’’ติ วุตฺเตสุปิ เอเสว นโย. 'भिक्खूहो, पंडक' या संदर्भात पाच प्रकारचे पंडक असतात: आसित्तपंडक, उसूयपंडक, ओपक्कमिकपंडक, पक्खपंडक आणि नपुंसकपंडक. त्यापैकी, ज्याला इतरांचे जननेंद्रिय मुखात धरून, वीर्य सिंचन झाल्यावर कामवासनेचा दाह शांत होतो, तो 'आसित्तपंडक' होय. ज्याला इतरांचे मैथुन पाहताना मत्सर उत्पन्न होऊन कामवासनेचा दाह शांत होतो, तो 'उसूयपंडक' होय. ज्याचे प्रयत्नपूर्वक (शस्त्रक्रियेने) अंडकोष काढून टाकले गेले आहेत, तो 'ओपक्कमिकपंडक' होय. काही व्यक्ती अकुशल विपाकाच्या प्रभावामुळे कृष्ण पक्षात पंडक असतात आणि शुक्ल पक्षात त्यांचा कामदाह शांत होतो, तो 'पक्खपंडक' होय. जो गर्भाधान समयापासूनच (प्रतिसंधीच्या वेळीच) लिंगरहित (भावशून्य) जन्माला येतो, तो 'नपुंसकपंडक' होय. यापैकी आसित्तपंडक आणि उसूयपंडक यांच्या प्रवज्जेला प्रतिबंध नाही; उर्वरित तिघांच्या प्रवज्जेला प्रतिबंध आहे. त्या तिघांमध्येही, पक्खपंडकाच्या बाबतीत ज्या पक्षात तो पंडक असतो, त्याच पक्षात त्याची प्रवज्जा प्रतिबंधित असते, असे कुरुंदी अट्ठकथेत म्हटले आहे. आणि येथे ज्याची प्रवज्जा प्रतिबंधित आहे, त्याला उद्देशूनच हे म्हटले आहे – 'ज्याची उपसंपदा झाली नसेल त्याला उपसंपदा देऊ नये, आणि ज्याची उपसंपदा झाली असेल त्याला निष्कासित करावे.' त्याला लिंगनाशनानेच (भिक्खूचा वेष नष्ट करून) निष्कासित करावे. यापुढे जिथे जिथे 'निष्कासित करावे' असे म्हटले आहे, तिथे हाच नियम समजावा. ปณฺฑวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. पंडकवस्तूची कथा समाप्त झाली. เถยฺยสํวาสกวตฺถุกถา थेय्यसंवासकवस्तूची कथा ๑๑๐. ปุราณกุลปุตฺโตติ ปุราณสฺส อนุกฺกเมน ปาริชุญฺญํ ปตฺตสฺส กุลสฺส ปุตฺโต. มาติปกฺขปิติปกฺขโต โกลญฺญา ขีณา วินฏฺฐา มตา อสฺสาติ ขีณโกลญฺโญ. อนธิคตนฺติ อปฺปตฺตํ. ผาตึกาตุนฺติ วฑฺเฒตุํ. อิงฺฆาติ อุยฺโยชนตฺเถ นิปาโต. อนุยุญฺชิยมาโนติ เอกมนฺตํ เนตฺวา เกสมสฺสุโอโรปนกาสายปฏิคฺคหณสรณคมนอุปชฺฌายคฺคหณกมฺมวาจานิสฺสยธมฺเม ปุจฺฉิยมาโน. เอตมตฺถํ อาโรเจสีติ เอตํ สยํ ปพฺพชิตภาวํ อาทิโต ปฏฺฐาย อาจิกฺขิ. ११०. 'पुराणकुलपुत्तो' म्हणजे पूर्वी समृद्ध असलेल्या परंतु काळाच्या ओघात ऱ्हास पावलेल्या कुळातील मुलगा. ज्याचे मातृपक्ष आणि पितृपक्ष या दोन्ही बाजूंचे नातेवाईक नष्ट झाले आहेत, मृत झाले आहेत, त्याला 'खीणकोलञ्ञो' म्हणतात. 'अनधिगतं' म्हणजे जे प्राप्त झाले नाही ते. 'फातिंकातुं' म्हणजे वृद्धी करणे. 'इङ्घ' हा शब्द प्रोत्साहन देण्याच्या अर्थातील निपात (अव्यय) आहे. 'अनुयुञ्जियमानो' म्हणजे एका बाजूला नेऊन डोक्याचे केस व दाढी काढणे, काषाय वस्त्र स्वीकारणे, शरणगमन करणे, उपाध्यायांचे ग्रहण करणे, कम्मवाचा आणि निस्सय धर्म याविषयी विचारपूस केली जात असलेला. 'एतमत्थं आरोचेसि' म्हणजे त्याने स्वतः सुरुवातीपासून आपल्या प्रव्रजित होण्याच्या स्थितीविषयी सांगितले. เถยฺยสํวาสโก ภิกฺขเวติ เอตฺถ ตโย เถยฺยสํวาสกา – ลิงฺคตฺเถนโก, สํวาสตฺเถนโก, อุภยตฺเถนโกติ. ตตฺถ โย สยํ ปพฺพชิตฺวา วิหารํ คนฺตฺวา น ภิกฺขุวสฺสานิ คเณติ, น ยถาวุฑฺฒํ วนฺทนํ สาทิยติ, น อาสเนน ปฏิพาหติ, น อุโปสถปวารณาทีสุ สนฺทิสฺสติ, อยํ ลิงฺคมตฺตสฺเสว เถนิตตฺตา ลิงฺคตฺเถนโก นาม. 'भिक्खूहो, थेय्यसंवासक' या संदर्भात तीन प्रकारचे थेय्यसंवासक असतात – लिंगत्थेनक, संवासत्थेनक आणि उभयत्थेनक. त्यापैकी, जो स्वतःच प्रव्रजित होऊन विहारात जातो, परंतु भिक्खूंच्या वर्षावासाची गणना करत नाही, ज्येष्ठतेनुसार वंदन स्वीकारत नाही, आसनावरून कनिष्ठांना अडवत नाही, उपोसथ आणि पवारणा इत्यादी संघकर्मांमध्ये उपस्थित राहत नाही; तो केवळ वेषाची चोरी केल्यामुळे 'लिंगत्थेनक' या नावाचा चोर ठरतो. โย ปน ภิกฺขูหิ ปพฺพาชิโต สามเณโร สมาโนปิ วิเทสํ คนฺตฺวา ‘‘อหํ ทสวสฺโส วา วีสติวสฺโส วา’’ติ มุสา วตฺวา ภิกฺขุวสฺสานิ คเณติ, ยถาวุฑฺฒํ วนฺทนํ สาทิยติ, อาสเนน ปฏิพาหติ, อุโปสถปวารณาทีสุ สนฺทิสฺสติ, อยํ สํวาสมตฺตสฺเสว เถนิตตฺตา สํวาสตฺเถนโก นาม. ภิกฺขุวสฺสคณนาทิโก หิ สพฺโพปิ กิริยเภโท อิมสฺมึ อตฺเถ ‘‘สํวาโส’’ติ เวทิตพฺโพ. สิกฺขํ ปจฺจกฺขาย ‘‘น มํ โกจิ ชานาตี’’ติ เอวํ ปฏิปชฺชนฺเตปิ เอเสว นโย. परंतु, जो भिक्खूंद्वारे प्रव्रजित केलेला श्रामणेर असूनही दुसऱ्या देशात जाऊन 'माझा दहा वर्षांचा किंवा वीस वर्षांचा वर्षावास झाला आहे' असे असत्य बोलून भिक्खूंच्या वर्षावासाची गणना करतो, ज्येष्ठतेनुसार वंदन स्वीकारतो, आसनावरून कनिष्ठांना अडवतो, उपोसथ आणि पवारणा इत्यादींमध्ये उपस्थित राहतो; तो केवळ सहवासाची (संवासाची) चोरी केल्यामुळे 'संवासत्थेनक' या नावाचा चोर ठरतो. कारण भिक्खूंच्या वर्षावासाची गणना करणे इत्यादी सर्व क्रियांचे प्रकार या अर्थामध्ये 'संवास' (सहवास) म्हणून समजले पाहिजेत. शिक्षापदे सोडून देऊन 'मला कोणी ओळखत नाही' अशा प्रकारे वागणाऱ्या व्यक्तीच्या बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. โย ปน สยํ ปพฺพชิตฺวา วิหารํ คนฺตฺวา ภิกฺขุวสฺสานิ คเณติ, ยถาวุฑฺฒํ วนฺทนํ สาทิยติ, อาสเนน ปฏิพาหติ, อุโปสถปวารณาทีสุ สนฺทิสฺสติ, อยํ ลิงฺคสฺส เจว สํวาสสฺส จ เถนิตตฺตา อุภยตฺเถนโก นาม. อยํ ติวิโธปิ เถยฺยสํวาสโก อนุปสมฺปนฺโน น อุปสมฺปาเทตพฺโพ, อุปสมฺปนฺโน นาเสตพฺโพ, ปุน ปพฺพชฺชํ ยาจนฺโตปิ น ปพฺพาเชตพฺโพ. परंतु, जो स्वतःच प्रव्रजित होऊन विहारात जातो आणि भिक्खूंच्या वर्षावासाची गणना करतो, ज्येष्ठतेनुसार वंदन स्वीकारतो, आसनावरून कनिष्ठांना अडवतो, उपोसथ आणि पवारणा इत्यादींमध्ये उपस्थित राहतो; तो वेष आणि सहवास या दोन्ही गोष्टींची चोरी केल्यामुळे 'उभयत्थेनक' या नावाचा चोर ठरतो. या तिन्ही प्रकारच्या थेय्यसंवासकांपैकी ज्याची उपसंपदा झाली नसेल, त्याला उपसंपदा देऊ नये; आणि ज्याची उपसंपदा झाली असेल, त्याला निष्कासित करावे. त्याने पुन्हा प्रवज्जेची याचना केली तरीही त्याला प्रव्रजित करू नये. เอตฺถ [Pg.299] จ อสมฺโมหตฺถํ อิทํ ปกิณฺณกํ เวทิตพฺพํ – आणि या संदर्भात संभ्रम टाळण्यासाठी ही संकीर्ण माहिती समजून घ्यावी – ‘‘ราชทุพฺภิกฺขกนฺตาร-โรคเวริภเยหิ วา; จีวราหรณตฺถํ วา, ลิงฺคํ อาทิยตีธ โย. 'जो मनुष्य राजाचे भय, दुष्काळाचे भय, दुर्गम मार्गाचे भय, रोगाचे भय किंवा शत्रूचे भय यांमुळे अथवा केवळ चीवर मिळवण्यासाठी येथे प्रव्रजित वेष धारण करतो, สํวาสํ นาธิวาเสติ, ยาว โส สุทฺธมานโส; เถยฺยสํวาสโก นาม, ตาว เอส น วุจฺจตี’’ติ. परंतु जोपर्यंत त्याचे मन शुद्ध असते आणि तो संवासाचा स्वीकार करत नाही, तोपर्यंत त्याला 'थेय्यसंवासक' म्हटले जात नाही.' ตตฺรายํ วิตฺถารนโย – อิเธกจฺจสฺส ราชา กุทฺโธ โหติ, โส ‘‘เอวํ เม โสตฺถิ ภวิสฺสตี’’ติ สยเมว ลิงฺคํ คเหตฺวา ปลายติ. ตํ ทิสฺวา รญฺโญ อาโรเจนฺติ. ราชา ‘‘สเจ ปพฺพชิโต, น ตํ ลพฺภา กิญฺจิ กาตุ’’นฺติ ตสฺมึ โกธํ ปฏิวิเนติ, โส ‘‘วูปสนฺตํ เม ราชภย’’นฺติ สงฺฆมชฺฌํ อโนสริตฺวาว คิหิลิงฺคํ คเหตฺวา อาคโต ปพฺพาเชตพฺโพ. อถาปิ ‘‘สาสนํ นิสฺสาย มยา ชีวิตํ ลทฺธํ, หนฺท ทานิ อหํ ปพฺพชามี’’ติ อุปฺปนฺนสํเวโค เตเนว ลิงฺเคน อาคนฺตฺวา อาคนฺตุกวตฺตํ น สาทิยติ, ภิกฺขูหิ ปุฏฺโฐ วา อปุฏฺโฐ วา ยถาภูตมตฺตานํ อาวิกตฺวา ปพฺพชฺชํ ยาจติ, ลิงฺคํ อปเนตฺวา ปพฺพาเชตพฺโพ. สเจ ปน วตฺตํ สาทิยติ, ปพฺพชิตาลยํ ทสฺเสติ, สพฺพํ ปุพฺเพ วุตฺตํ วสฺสคณนาทิเภทํ วิธึ ปฏิปชฺชติ, อยํ น ปพฺพาเชตพฺโพ. याचा सविस्तर तपशील असा आहे – समजा, येथे एखाद्या व्यक्तीवर राजा क्रुद्ध होतो. तो विचार करतो की, 'अशा प्रकारे माझे कल्याण होईल.' तो स्वतःच वेष धारण करून पळून जातो. त्याला पाहून लोक राजाला सांगतात. राजा म्हणतो, 'जर तो प्रव्रजित झाला असेल, तर त्याच्यावर कोणतीही कारवाई करता येणार नाही.' असे म्हणून राजा आपला राग शांत करतो. तो मनुष्य 'माझे राजाचे भय शांत झाले आहे' असा विचार करून, संघामध्ये प्रवेश न करताच गृहस्थ वेष धारण करून परत येतो, तर त्याला प्रव्रजित करावे. किंवा जर त्याला असा संवेग उत्पन्न झाला की, 'शासनाचा आश्रय घेतल्यामुळे माझे प्राण वाचले आहेत, चला तर मग आता मी खरोखरच प्रव्रजित होतो.' आणि तो त्याच वेषात येऊन आगंतुक भिक्खूचे कर्तव्य स्वीकारत नाही, भिक्खूंनी विचारले असता किंवा न विचारताही स्वतःची खरी परिस्थिती प्रकट करतो आणि प्रवज्जेची याचना करतो, तर त्याचा तो वेष काढून त्याला प्रव्रजित करावे. परंतु, जर तो भिक्खूची कर्तव्ये स्वीकारतो, प्रव्रजितासारखे वर्तन दाखवतो आणि पूर्वी सांगितलेल्या वर्षावास गणनेच्या सर्व नियमांचे पालन करतो, तर त्याला प्रव्रजित करू नये. อิธ ปเนกจฺโจ ทุพฺภิกฺเข ชีวิตุํ อสกฺโกนฺโต สยเมว ลิงฺคํ คเหตฺวา สพฺพปาสณฺฑิยภตฺตานิ ภุญฺชนฺโต ทุพฺภิกฺเข วีติวตฺเต สงฺฆมชฺฌํ อโนสริตฺวาว คิหิลิงฺคํ คเหตฺวา อาคโตติ สพฺพํ ปุริมสทิสเมว. तसेच, जर एखादी व्यक्ती दुष्काळात उपजीविका करण्यास असमर्थ असल्यामुळे स्वतःच वेष धारण करते आणि सर्व पाखंडी लोकांचे अन्न ग्रहण करते; दुष्काळ संपल्यावर संघामध्ये प्रवेश न करताच गृहस्थ वेष धारण करून परत येते, तर सर्व विधी पूर्वीप्रमाणेच समजावा. อปโร มหากนฺตารํ นิตฺถริตุกาโม โหติ, สตฺถวาโห จ ปพฺพชิเต คเหตฺวา คจฺฉติ. โส ‘‘เอวํ มํ สตฺถวาโห คเหตฺวา คมิสฺสตี’’ติ สยเมว ลิงฺคํ คเหตฺวา สตฺถวาเหน สทฺธึ กนฺตารํ นิตฺถริตฺวา เขมนฺตํ ปตฺวา สงฺฆมชฺฌํ อโนสริตฺวาว คิหิลิงฺคํ คเหตฺวา อาคโตติ สพฺพํ ปุริมสทิสเมว. दुसरा एक मनुष्य मोठा दुर्गम मार्ग पार करू इच्छितो. एक सार्थवाह (व्यापाऱ्यांचा प्रमुख) प्रव्रजितांना सोबत घेऊन जात असतो. तो मनुष्य विचार करतो, 'अशा प्रकारे (प्रव्रजिताचे रूप घेतल्यास) सार्थवाह मला सोबत घेऊन जाईल.' असे विचार करून तो स्वतःच (प्रव्रजिताचा) वेष धारण करतो आणि सार्थवाहाच्या सोबत दुर्गम मार्ग पार करून सुरक्षित ठिकाणी पोहोचतो. तेथे संघाच्या मध्ये प्रवेश न करताच पुन्हा गृहस्थाचा वेष धारण करून परत येतो. अशा वेळी त्याला प्रव्रजित करावे की नाही, हा सर्व विधी पूर्वी सांगितलेल्या (राजभयाच्या) प्रकरणाप्रमाणेच समजावा. อปโร โรคภเย อุปฺปนฺเน ชีวิตุํ อสกฺโกนฺโต สยเมว ลิงฺคํ คเหตฺวา สพฺพปาสณฺฑิยภตฺตานิ ภุญฺชนฺโต โรคภเย วูปสนฺเต สงฺฆมชฺฌํ [Pg.300] อโนสริตฺวาว คิหิลิงฺคํ คเหตฺวา อาคโตติ สพฺพํ ปุริมสทิสเมว. दुसरा एक मनुष्य रोगाचे भय उत्पन्न झाले असता, जिवंत राहण्यास असमर्थ होऊन स्वतःच (प्रव्रजिताचा) वेष धारण करतो आणि सर्व पाखंडी लोकांचे (इतर पंथांच्या लोकांचे) अन्न ग्रहण करतो. रोगाचे भय शांत झाल्यावर, संघाच्या मध्ये प्रवेश न करताच पुन्हा गृहस्थाचा वेष धारण करून परत येतो. अशा वेळी त्याला प्रव्रजित करावे की नाही, हा सर्व विधी पूर्वीप्रमाणेच (राजभयाच्या प्रकरणाप्रमाणेच) समजावा. อปรสฺส เอโก เวริโก กุทฺโธ โหติ, ฆาเตตุกาโม นํ วิจรติ, โส ‘‘เอวํ เม โสตฺถิ ภวิสฺสตี’’ติ สยเมว ลิงฺคํ คเหตฺวา ปลายติ. เวริโก ‘‘กุหึ โส’’ติ ปริเยสนฺโต ‘‘ปพฺพชิตฺวา ปลาโต’’ติ สุตฺวา ‘‘สเจ ปพฺพชิโต, น ตํ ลพฺภา กิญฺจิ กาตุ’’นฺติ ตสฺมึ โกธํ ปฏิวิเนติ. โส ‘‘วูปสนฺตํ เม เวริภย’’นฺติ สงฺฆมชฺฌํ อโนสริตฺวาว คิหิลิงฺคํ คเหตฺวา อาคโตติ สพฺพํ ปุริมสทิสเมว. दुसऱ्या एका मनुष्यावर त्याचा एक शत्रू क्रुद्ध होतो आणि त्याला मारण्याच्या उद्देशाने शोधत फिरतो. तो मनुष्य विचार करतो, 'अशा प्रकारे (प्रव्रजिताचा वेष घेतल्यास) माझे रक्षण होईल.' असे विचार करून तो स्वतःच (प्रव्रजिताचा) वेष धारण करून पळून जातो. शत्रू 'तो कुठे आहे?' असे शोधत असताना, 'तो प्रव्रजित होऊन पळून गेला आहे' असे ऐकतो. 'जर तो प्रव्रजित झाला असेल, तर त्याला काहीही करणे शक्य नाही,' असे म्हणून तो आपला राग शांत करतो. तो मनुष्य 'माझे शत्रूचे भय शांत झाले आहे' असे समजून, संघाच्या मध्ये प्रवेश न करताच गृहस्थाचा वेष धारण करून परत येतो. अशा वेळी त्याला प्रव्रजित करावे की नाही, हा सर्व विधी पूर्वीप्रमाणेच (राजभयाच्या प्रकरणाप्रमाणेच) समजावा. อปโร ญาติกุลํ คนฺตฺวา สิกฺขํ ปจฺจกฺขาย คิหิ หุตฺวา ‘‘อิมานิ จีวรานิ อิธ วินสฺสิสฺสนฺติ, สเจปิ อิมานิ คเหตฺวา วิหารํ คมิสฺสามิ, อนฺตรามคฺเค มํ ‘โจโร’ติ คเหสฺสนฺติ, ยํนูนาหํ กายปริหาริยานิ กตฺวา คจฺเฉยฺย’’นฺติ จีวราหรณตฺถํ นิวาเสตฺวา จ ปารุปิตฺวา จ วิหารํ คจฺฉติ. ตํ ทูรโตว อาคจฺฉนฺตํ ทิสฺวา สามเณรา จ ทหรา จ อพฺภุคฺคจฺฉนฺติ, วตฺตํ ทสฺเสนฺติ. โส น สาทิยติ, ยถาภูตมตฺตานํ อาวิกโรติ. สเจ ภิกฺขู ‘‘น ทานิ มยํ ตํ มุญฺจิสฺสามา’’ติ พลกฺกาเรน ปพฺพาเชตุกามา โหนฺติ, กาสายานิ อปเนตฺวา ปุน ปพฺพาเชตพฺโพ. สเจ ปน ‘‘นยิเม มม หีนายาวตฺตภาวํ ชานนฺตี’’ติ ตํเยว ภิกฺขุภาวํ ปฏิชานิตฺวา สพฺพํ ปุพฺเพ วุตฺตํ วสฺสคณนาทิเภทํ วิธึ ปฏิปชฺชติ, อยํ น ปพฺพาเชตพฺโพ. दुसरा एक मनुष्य नातलगांच्या घरी जाऊन सिक्खेचा (शिक्षेचा) त्याग करतो आणि गृहस्थ बनतो. नंतर तो विचार करतो, 'ही चीवरे येथेच नष्ट होतील. जर मी ही चीवरे हातात घेऊन विहारात गेलो, तर वाटेत लोक मला "चोर" म्हणून पकडतील. त्यापेक्षा मी ही चीवरे अंगावर परिधान करून गेलो तर बरे होईल.' असे विचार करून चीवरे नेण्याच्या उद्देशाने तो अंतर्वासक (नेसूचे वस्त्र) नेसून आणि उत्तरासंग (ओढण्याचे वस्त्र) पांघरून विहाराकडे निघतो. त्याला लांबूनच येत असताना पाहून सामणेर आणि तरुण भिक्खू त्याच्या स्वागतासाठी पुढे जातात आणि आदर-सत्कार दाखवतात. तो त्याचा स्वीकार करत नाही आणि स्वतःची खरी परिस्थिती प्रकट करतो. जर भिक्खू "आता आम्ही तुला सोडणार नाही" असे म्हणून बळजबरीने त्याला प्रव्रजित करू इच्छितात, तर ती काषाय वस्त्रे काढून त्याला पुन्हा प्रव्रजित करावे. परंतु, जर तो विचार करतो की, "या भिक्खूंना मी पुन्हा गृहस्थ झालो आहे हे माहीत नाही," आणि तो स्वतः भिक्खू असल्याचाच दावा करतो आणि पूर्वी (संवासत्थेनक प्रकरणात) सांगितलेल्या वर्षांच्या गणनेनुसार सर्व विधींचे आचरण करतो, तर त्याला प्रव्रजित करू नये. อปโร มหาสามเณโร ญาติกุลํ คนฺตฺวา อุปฺปพฺพชิตฺวา กมฺมนฺตานุฏฺฐาเนน อุพฺพาฬฺโห หุตฺวา ปุน ‘‘ทานิ อหํ สมโณว ภวิสฺสามิ, เถโรปิ เม อุปฺปพฺพชิตภาวํ น ชานาตี’’ติ ตเทว ปตฺตจีวรํ อาทาย วิหารํ อาคจฺฉติ, นาปิ ตมตฺถํ ภิกฺขูนํ อาโรเจติ, สามเณรภาวํ ปฏิชานาติ, อยํ เถยฺยสํวาสโกเยว ปพฺพชฺชํ น ลภติ. สเจปิสฺส ลิงฺคคฺคหณกาเล เอวํ โหติ, ‘‘นาหํ กสฺสจิ อาโรเจสฺสามี’’ติ วิหารญฺจ คโต อาโรเจติ, คหเณเนว เถยฺยสํวาสโก. อถาปิสฺส ‘‘คหณกาเล อาจิกฺขิสฺสามี’’ติ จิตฺตํ อุปฺปนฺนํ โหติ, วิหารญฺจ คนฺตฺวา ‘‘กุหึ ตฺวํ อาวุโส คโต’’ติ วุตฺโต ‘‘น ทานิ มํ อิเม ชานนฺตี’’ติ วญฺเจตฺวา นาจิกฺขติ, ‘‘นาจิกฺขิสฺสามี’’ติ สห ธุรนิกฺเขเปน อยมฺปิ เถยฺยสํวาสโกว. สเจ ปนสฺส คหณกาเลปิ ‘‘อาจิกฺขิสฺสามี’’ติ จิตฺตํ อุปฺปนฺนํ โหติ, วิหารํ คนฺตฺวาปิ อาจิกฺขติ, อยํ ปุน ปพฺพชฺชํ ลภติ. दुसरा एक मोठा सामणेर नातलगांच्या घरी जाऊन गृहस्थ होतो. परंतु घरच्या कामांच्या त्रासामुळे कंटाळून तो पुन्हा विचार करतो, 'आता मी श्रमणच बनेन. माझे उपाध्याय थेर देखील मी गृहस्थ झाल्याचे जाणत नाहीत.' असे विचार करून तो तेच पात्र आणि चीवर घेऊन विहारात येतो. तो ती गोष्ट भिक्खूंना सांगत नाही आणि स्वतः सामणेर असल्याचाच दावा करतो. हा मनुष्य 'थेय्यसंवासक' (चोरीने संघात राहणारा) ठरतो, त्याला प्रव्रज्या मिळत नाही. जर वेष धारण करताना त्याच्या मनात असा विचार आला की, 'मी कोणालाही सांगणार नाही,' आणि विहारात गेल्यावर जरी त्याने सांगितले, तरी वेष धारण करण्याच्या कृतीनेच तो थेय्यसंवासक ठरतो. परंतु, जर वेष धारण करताना त्याच्या मनात 'मी सांगेन' असा विचार आला असेल, आणि विहारात गेल्यावर 'आयुष्यमान, तू कुठे गेला होतास?' असे विचारले असता, 'आता हे लोक मला ओळखत नाहीत' असा विचार करून तो फसवणूक करतो आणि सांगत नाही, आणि 'मी सांगणार नाही' असे म्हणून सांगण्याचा प्रयत्न सोडून देतो, तर तो देखील थेय्यसंवासकच ठरतो. परंतु, जर वेष धारण करतानाही त्याच्या मनात 'मी सांगेन' असा विचार आला असेल आणि विहारात गेल्यावरही तो सांगतो, तर त्याला पुन्हा प्रव्रज्या मिळते. อปโร [Pg.301] ทหรสามเณโร มหนฺโต วา ปน อพฺยตฺโต, โส ปุริมนเยเนว อุปฺปพฺพชิตฺวา ฆเร วจฺฉกรกฺขณาทีนิ กมฺมานิ กาตุํ น อิจฺฉติ, ตเมนํ ญาตกา ตานิเยว กาสายานิ อจฺฉาเทตฺวา ถาลกํ วา ปตฺตํ วา หตฺเถ ทตฺวา ‘‘คจฺฉ สมโณว โหหี’’ติ ฆรา นีหรนฺติ. โส วิหารํ คจฺฉติ, เนว นํ ภิกฺขู ชานนฺติ ‘‘อยํ อุปฺปพฺพชิตฺวา ปุน สยเมว ปพฺพชิโต’’ติ, นาปิ สยํ ชานาติ, ‘‘โย เอวํ ปพฺพชติ, โส เถยฺยสํวาสโก นาม โหตี’’ติ. สเจ ตํ ปริปุณฺณวสฺสํ อุปสมฺปาเทนฺติ, สูปสมฺปนฺโน. สเจ ปน อนุปสมฺปนฺนกาเลเยว วินยวินิจฺฉเย วตฺตมาเน สุณาติ, ‘‘โย เอวํ ปพฺพชติ, โส เถยฺยสํวาสโก นาม โหตี’’ติ. เตน ‘‘มยา เอวํ กต’’นฺติ ภิกฺขูนํ อาจิกฺขิตพฺพํ, เอวํ ปุน ปพฺพชฺชํ ลภติ. สเจ ‘‘น ทานิ มํ โกจิ ชานาตี’’ติ นาโรเจติ, ธุรํ นิกฺขิตฺตมตฺเต เถยฺยสํวาสโก. दुसरा एक लहान सामणेर किंवा वयाने मोठा असूनही विनय नियमांमध्ये अज्ञानी असलेला सामणेर पूर्वीच्या पद्धतीप्रमाणेच गृहस्थ होतो. परंतु घरी वासरे राखणे इत्यादी कामे करण्याची त्याची इच्छा नसते. त्यामुळे त्याचे नातलग त्याला तीच काषाय वस्त्रे नेसवून आणि हातात वाटी किंवा पात्र देऊन 'जा, श्रमणच बन!' असे सांगून घरातून बाहेर काढतात. तो विहारात जातो. भिक्खूंना हे माहीत नसते की, 'हा गृहस्थ होऊन पुन्हा स्वतःच प्रव्रजित झाला आहे,' आणि त्याला स्वतःलाही हे माहीत नसते की, 'जो अशा प्रकारे प्रव्रजित होतो, तो थेय्यसंवासक ठरतो.' जर त्याचे वय वीस वर्षे पूर्ण झाल्यावर भिक्खू त्याला उपसंपदा देतात, तर त्याची उपसंपदा वैध ठरते. परंतु, उपसंपदा मिळण्यापूर्वीच, विनय नियमांच्या चर्चेच्या वेळी जर तो ऐकतो की, 'जो अशा प्रकारे प्रव्रजित होतो, तो थेय्यसंवासक ठरतो,' तर त्याने 'मी असे केले आहे' हे भिक्खूंना सांगितले पाहिजे. असे सांगितल्यास त्याला पुन्हा प्रव्रज्या मिळते. परंतु जर तो विचार करतो की, 'आता मला कोणी ओळखत नाही' आणि सांगत नाही, तर सांगण्याचा प्रयत्न सोडल्याबरोबरच तो थेय्यसंवासक ठरतो. ภิกฺขุ สิกฺขํ ปจฺจกฺขาย ลิงฺคํ อนปเนตฺวา ทุสฺสีลกมฺมํ กตฺวา วา อกตฺวา วา ปุน สพฺพํ ปุพฺเพ วุตฺตํ วสฺสคณนาทิเภทํ วิธึ ปฏิปชฺชติ, เถยฺยสํวาสโก โหติ. สิกฺขํ อปฺปจฺจกฺขาย สลิงฺเค ฐิโต เมถุนํ ปฏิเสวิตฺวา วสฺสคณนาทิเภทํ วิธึ อาปชฺชนฺโต เถยฺยสํวาสโก น โหติ, ปพฺพชฺชามตฺตํ ลภติ. อนฺธกฏฺฐกถายํ ปน เอโส เถยฺยสํวาสโกติ วุตฺตํ, ตํ น คเหตพฺพํ. एखादा भिक्खू सिक्खेचा त्याग करून, भिक्खू वेष न काढता, दुःशील कर्म करून किंवा न करता, पुन्हा पूर्वी सांगितलेल्या वर्षांच्या गणनेनुसार सर्व विधींचे आचरण करतो, तर तो थेय्यसंवासक ठरतो. परंतु, सिक्खेचा त्याग न करता, स्वतःच्या भिक्खू वेषात राहून मैथुन धर्म आचरून वर्षांच्या गणनेनुसार विधींचे आचरण करतो, तर तो थेय्यसंवासक ठरत नाही; त्याला केवळ प्रव्रज्या मिळते. अंधक अट्ठकथेत मात्र 'हा थेय्यसंवासक आहे' असे म्हटले आहे, परंतु ते मत स्वीकारू नये. เอโก ภิกฺขุ กาสาเย สอุสฺสาโหว โอทาตํ นิวาเสตฺวา เมถุนํ ปฏิเสวิตฺวา ปุน กาสายานิ นิวาเสตฺวา วสฺสคณนาทิเภทํ สพฺพํ วิธึ อาปชฺชติ, อยมฺปิ เถยฺยสํวาสโก น โหติ, ปพฺพชฺชามตฺตํ ลภติ. สเจ ปน กาสาเย ธุรํ นิกฺขิปิตฺวา โอทาตํ นิวาเสตฺวา เมถุนํ ปฏิเสวิตฺวา ปุน กาสายานิ นิวาเสตฺวา วสฺสคณนาทิเภทํ สพฺพํ วิธึ อาปชฺชติ, เถยฺยสํวาสโก โหติ. एखादा भिक्खू काषाय वस्त्रांविषयी उत्साही (पुन्हा परिधान करण्याची इच्छा असलेला) राहूनच, पांढरे वस्त्र नेसून मैथुन धर्म आचरतो आणि पुन्हा काषाय वस्त्रे नेसून वर्षांच्या गणनेनुसार सर्व विधींचे आचरण करतो, तर हा देखील थेय्यसंवासक ठरत नाही; त्याला केवळ प्रव्रज्या मिळते. परंतु, जर काषाय वस्त्रांविषयीचा उत्साह सोडून देऊन, पांढरे वस्त्र नेसून मैथुन धर्म आचरतो आणि पुन्हा काषाय वस्त्रे नेसून वर्षांच्या गणनेनुसार सर्व विधींचे आचरण करतो, तर तो थेय्यसंवासक ठरतो. สามเณโร สลิงฺเค ฐิโต เมถุนาทิอสฺสมณกรณธมฺมํ อาปชฺชิตฺวาปิ เถยฺยสํวาสโก น โหติ. สเจปิ กาสาเย สอุสฺสาโหว กาสายานิ อปเนตฺวา เมถุนํ ปฏิเสวิตฺวา ปุน กาสายานิ นิวาเสติ, เนว เถยฺยสํวาสโก โหติ. สเจ ปน กาสาเย ธุรํ นิกฺขิปิตฺวา นคฺโค วา โอทาตนิวตฺโถ วา เมถุนเสวนาทีหิ อสฺสมโณ [Pg.302] หุตฺวา กาสายํ นิวาเสติ, เถยฺยสํวาสโก โหติ. สเจปิ คิหิภาวํ ปตฺถยมาโน กาสาวํ โอวฏฺฏิกํ วา กตฺวา อญฺเญน วา อากาเรน คิหินิวาสเนน นิวาเสติ ‘‘โสภติ นุ โข เม คิหิลิงฺคํ, น โสภตี’’ติ วีมํสนตฺถํ, รกฺขติ ตาว. ‘‘โสภตี’’ติ สมฺปฏิจฺฉิตฺวา ปน ปุน ลิงฺคํ สาทิยนฺโต เถยฺยสํวาสโก โหติ. โอทาตํ นิวาเสตฺวา วีมํสนสมฺปฏิจฺฉเนสุปิ เอเสว นโย. सामणेर स्वतःच्या वेषात राहून मैथुन इत्यादी अश्रमणकारक (श्रमण नसलेल्यांचे) धर्म आचरून देखील थेय्यसंवासक ठरत नाही. जरी काषाय वस्त्रांविषयी उत्साही राहूनच, काषाय वस्त्रे काढून मैथुन धर्म आचरतो आणि पुन्हा काषाय वस्त्रे नेसतो, तरी तो थेय्यसंवासक ठरत नाही. परंतु, जर काषाय वस्त्रांविषयीचा उत्साह सोडून देऊन, नग्न होऊन किंवा पांढरे वस्त्र नेसून मैथुन आचरण इत्यादींमुळे अश्रमण होऊन पुन्हा काषाय वस्त्र नेसतो, तर तो थेय्यसंवासक ठरतो. जरी गृहस्थ होण्याची इच्छा धरून, काषाय वस्त्राची कास घालून (कासोटा मारून) किंवा इतर प्रकारे गृहस्थाप्रमाणे वस्त्र परिधान करून 'माझा गृहस्थाचा वेष शोभून दिसतो की नाही?' हे तपासण्यासाठी वस्त्र नेसतो, तर तोपर्यंत त्याचे रक्षण होते (तो थेय्यसंवासक ठरत नाही). परंतु 'शोभून दिसतो' असे स्वीकारून पुन्हा सामणेर वेषाचा स्वीकार करतो, तर तो थेय्यसंवासक ठरतो. पांढरे वस्त्र नेसून तपासणे आणि स्वीकारणे या बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. สเจ ปน นิวตฺถกาสายสฺส อุปริ โอทาตํ นิวาเสตฺวา วีมํสติ วา สมฺปฏิจฺฉติ วา, รกฺขติเยว. ภิกฺขุนิยาปิ เอเสว นโย. สาปิ หิ คิหิภาวํ ปตฺถยมานา สเจ กาสายํ คิหินิวาสนํ นิวาเสติ, ‘‘โสภติ นุ โข เม คิหิลิงฺคํ, น โสภตี’’ติ วีมํสนตฺถํ, รกฺขติ ตาว. สเจ ‘‘โสภตี’’ติ สมฺปฏิจฺฉติ, น รกฺขติ. โอทาตํ นิวาเสตฺวา วีมํสนสมฺปฏิจฺฉเนสุปิ เอเสว นโย. นิวตฺถกาสายสฺส ปน อุปริ โอทาตํ นิวาเสตฺวา วีมํสตุ วา สมฺปฏิจฺฉตุ วา, รกฺขติเยว. परंतु, जर परिधान केलेल्या काषाय वस्त्रावर पांढरे वस्त्र परिधान करून परीक्षा करतो किंवा स्वीकार करतो, तर (भिक्खूत्व) सुरक्षितच राहते. भिक्खुणीच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. कारण ती देखील गृहस्थ होण्याची इच्छा करत असताना, जर काषाय वस्त्रावर गृहस्थांचे वस्त्र परिधान करते—'माझे गृहस्थ रूप शोभून दिसते की नाही?' अशी परीक्षा करण्यासाठी, तर तोपर्यंत (तिचे भिक्खुणीत्व) सुरक्षित राहते. जर 'शोभून दिसते' असे स्वीकारते, तर सुरक्षित राहत नाही. पांढरे वस्त्र परिधान करून परीक्षा करणे आणि स्वीकार करणे या बाबतीतही हाच नियम आहे. परंतु परिधान केलेल्या काषाय वस्त्रावर पांढरे वस्त्र परिधान करून परीक्षा करो किंवा स्वीकार करो, (भिक्खूत्व) सुरक्षितच राहते. สเจ โกจิ วุฑฺฒปพฺพชิโต วสฺสานิ อคเณตฺวา ปาฬิยมฺปิ อฏฺฐตฺวา เอกปสฺเสนาคนฺตฺวา มหาเปฬาทีสุ กฏจฺฉุนา อุกฺขิตฺเต ภตฺตปิณฺเฑ ปตฺตํ อุปนาเมตฺวา เสโน วิย มํสเปสึ คเหตฺวา คจฺฉติ, เถยฺยสํวาสโก น โหติ. ภิกฺขุวสฺสานิ ปน คเณตฺวา คณฺหนฺโต เถยฺยสํวาสโก โหติ. जर कोणी वृद्धावस्थेत प्रवज्जित झालेला भिक्खू आपल्या दीक्षा वर्षांची गणना न करता, भिक्खूंच्या पंक्तीतही न बसता, एका बाजूने येऊन, मोठ्या टोपल्यांमधून पळीने भाताचा गोळा वाढला जात असताना आपले पात्र पुढे करून, जणू ससाणा मांसाचा तुकडा घेऊन जातो त्याप्रमाणे घेऊन निघून जातो, तर तो थेय्यसंवासक (चोरीने संघात राहणारा) होत नाही. परंतु, भिक्खू वर्षांची गणना करून (लाभांश) घेणारा मात्र थेय्यसंवासक होतो. สยํ สามเณโรว สามเณรปฏิปาฏิยา กูฏวสฺสานิ คเณตฺวา คณฺหนฺโต เถยฺยสํวาสโก น โหติ. ภิกฺขุ ภิกฺขุปฏิปาฏิยา กูฏวสฺสานิ คเณตฺวา คณฺหนฺโต ภณฺฑคฺเฆน กาเรตพฺโพติ. स्वतः सामणेर असतानाच, सामणेरांच्या क्रमाने खोट्या वर्षांची गणना करून (लाभांश) घेणारा सामणेर थेय्यसंवासक होत नाही. परंतु, भिक्खूंच्या क्रमाने खोट्या वर्षांची गणना करून घेणाऱ्या भिक्खूला वस्तूच्या मूल्याच्या आधारे दंडास पात्र ठरवले पाहिजे. เถยฺยสํวาสกวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. थेय्यसंवासक कथेचे निरूपण समाप्त झाले. ติตฺถิยปกฺกนฺตกกถา तित्थियपक्कंतक कथा (तीर्थिकांच्या पंथात गेलेल्या भिक्खूची कथा) ติตฺถิยปกฺกนฺตโก ภิกฺขเวติ เอตฺถ ปน ติตฺถิเยสุ ปกฺกนฺโต ปวิฏฺโฐติ ติตฺถิยปกฺกนฺตโก. โส น เกวลํ น อุปสมฺปาเทตพฺโพ, อถ โข น ปพฺพาเชตพฺโพปิ. ตตฺรายํ วินิจฺฉโย – อุปสมฺปนฺโน ภิกฺขุ ติตฺถิโย ภวิสฺสามีติ สลิงฺเคเนว เตสํ อุปสฺสยํ คจฺฉติ, ปทวาเร ปทวาเร ทุกฺกฏํ. เตสํ ลิงฺเค อาทินฺนมตฺเต ติตฺถิยปกฺกนฺตโก โหติ. โยปิ [Pg.303] สยเมว ‘‘ติตฺถิโย ภวิสฺสามี’’ติ กุสจีราทีนิ นิวาเสติ, ติตฺถิยปกฺกนฺตโก โหติเยว. โย ปน นคฺโค นฺหายนฺโต อตฺตานํ โอโลเกตฺวา ‘‘โสภติ เม อาชีวกภาโว, อาชีวโก ภวิสฺสามี’’ติ กาสายานิ อนาทาย นคฺโคว อาชีวกานํ อุปสฺสยํ คจฺฉติ, ปทวาเร ปทวาเร ทุกฺกฏํ. สเจ ปนสฺส อนฺตรามคฺเค หิโรตฺตปฺปํ อุปฺปชฺชติ, ทุกฺกฏานิ เทเสตฺวา มุจฺจติ. เตสํ อุปสฺสยํ คนฺตฺวาปิ เตหิ วา โอวทิโต อตฺตนา วา ‘‘อิเมสํ ปพฺพชฺชา อติทุกฺขา’’ติ นิวตฺตนฺโตปิ มุจฺจติเยว. 'भिक्खूंनो, तित्थियपक्कंतक' या संदर्भात, तीर्थिकांच्या (इतर पंथांच्या) कडे गेलेला किंवा त्यांच्यात प्रवेश केलेला तो 'तित्थियपक्कंतक' (तीर्थिकांच्या पंथात गेलेला) होय. त्याला केवळ उपसंपदाच दिली जाऊ नये असे नाही, तर त्याला प्रवज्जाही दिली जाऊ नये. त्याबाबत हा निर्णय आहे— उपसंपन्न भिक्खू 'मी तीर्थिक होईन' असा विचार करून आपल्या भिक्खू वेषातच त्यांच्या आश्रमात जातो, तर प्रत्येक पावलावर त्याला दुक्कट (दुष्कृत) दोष लागतो. त्यांचे चिन्ह (वेष) धारण करताच तो तित्थियपक्कंतक होतो. जो स्वतःच 'मी तीर्थिक होईन' असे म्हणून कुशाचे (गवताचे) वस्त्र इत्यादी परिधान करतो, तो देखील तित्थियपक्कंतक होतोच. परंतु जो नग्न होऊन स्नान करताना स्वतःकडे पाहून 'माझा आजीवक भाव शोभून दिसतो, मी आजीवक होईन' असा विचार करून, काषाय वस्त्रे न घेता नग्न अवस्थेतच आजीवकांच्या आश्रमात जातो, त्याला प्रत्येक पावलावर दुक्कट दोष लागतो. परंतु जर त्याला वाटेतच 'हिरोत्तप्प' (पापभीरुता व लज्जा) उत्पन्न होते, तर तो दुक्कट दोषाची देशना करून मुक्त होतो. त्यांच्या आश्रमात जाऊनही, त्यांनी उपदेश केल्यामुळे किंवा स्वतः पाहून 'यांची दीक्षा अत्यंत कठीण आहे' असा विचार करून परत फिरणारा देखील मुक्त होतोच. สเจ ปน ‘‘กึ ตุมฺหากํ ปพฺพชฺชาย อุกฺกฏฺฐ’’นฺติ ปุจฺฉิตฺวา ‘‘เกสมสฺสุลุญฺจนาทีนี’’ติ วุตฺโต เอกเกสมฺปิ ลุญฺจาเปติ, อุกฺกุฏิกปฺปธานาทีนิ วา วตฺตานิ อาทิยติ, โมรปิญฺฉาทีนิ วา นิวาเสติ, เตสํ ลิงฺคํ คณฺหาติ, ‘‘อยํ ปพฺพชฺชา เสฏฺฐา’’ติ เสฏฺฐภาวํ วา อุปคจฺฉติ, น มุจฺจติ, ติตฺถิยปกฺกนฺตโก โหติ. สเจ ปน ‘‘โสภติ นุ โข เม ติตฺถิยปพฺพชฺชา, นนุ โข โสภตี’’ติ วีมํสนตฺถํ กุสจีราทีนิ วา นิวาเสติ, ชฏํ วา พนฺธติ, ขาริกาชํ วา อาทิยติ, ยาว น สมฺปฏิจฺฉติ, ตาว นํ ลทฺธิ รกฺขติ, สมฺปฏิจฺฉิตมตฺเต ติตฺถิยปกฺกนฺตโก โหติ. อจฺฉินฺนจีวโร ปน กุสจีราทีนิ นิวาเสนฺโต ราชภยาทีหิ วา ติตฺถิยลิงฺคํ คณฺหนฺโต ลทฺธิยา อภาเวน เนว ติตฺถิยปกฺกนฺตโก โหติ. परंतु जर 'तुमच्या दीक्षेत सर्वात श्रेष्ठ काय आहे?' असे विचारून, 'केस आणि दाढी उपटणे इत्यादी' असे उत्तर मिळाल्यावर जर तो एक जरी केस उपटून घेतो, किंवा उकिडवे बसून तपश्चर्या करणे इत्यादी व्रतांचे आचरण करतो, किंवा मोराची पिसे इत्यादी परिधान करतो, त्यांचे चिन्ह ग्रहण करतो, 'ही दीक्षा श्रेष्ठ आहे' असे मानून श्रेष्ठत्वाला स्वीकारतो, तर तो मुक्त होत नाही, तो तित्थियपक्कंतक होतो. परंतु जर 'मला तीर्थिकांची दीक्षा शोभून दिसते की नाही?' अशी परीक्षा करण्यासाठी कुशाचे वस्त्र इत्यादी परिधान करतो, किंवा जटा बांधतो, किंवा कावड धारण करतो, तर जोपर्यंत तो स्वीकार करत नाही, तोपर्यंत त्याचे मत (भिक्खूत्व) त्याचे रक्षण करते; स्वीकार करताच तो तित्थियपक्कंतक होतो. परंतु ज्याचे चीवर हिरावून घेतले गेले आहे असा भिक्खू कुशाचे वस्त्र इत्यादी परिधान करत असेल, किंवा राजाच्या भयामुळे इत्यादी कारणांनी तीर्थिकांचे चिन्ह धारण करत असेल, तर (तीर्थिकांच्या) मताचा अभाव असल्यामुळे तो तित्थियपक्कंतक होतच नाही. อยญฺจ ติตฺถิยปกฺกนฺตโก นาม อุปสมฺปนฺนภิกฺขุนา กถิโต, ตสฺมา สามเณโร สลิงฺเคน ติตฺถายตนํ คโตปิ ปุน ปพฺพชฺชญฺจ อุปสมฺปทญฺจ ลภตีติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. ปุริโม ปน เถยฺยสํวาสโก อนุปสมฺปนฺเนน กถิโต; ตสฺมา อุปสมฺปนฺโน กูฏวสฺสํ คเณนฺโตปิ อสฺสมโณ น โหติ. ลิงฺเค สอุสฺสาโห ปาราชิกํ อาปชฺชิตฺวา ภิกฺขุวสฺสาทีนิ คเณนฺโตปิ เถยฺยสํวาสโก น โหตีติ. आणि हा 'तित्थियपक्कंतक' उपसंपन्न भिक्खूच्या संदर्भात सांगितला आहे; म्हणून सामणेर आपल्या वेषात तीर्थिकांच्या स्थानावर गेला तरीही पुन्हा प्रवज्जा आणि उपसंपदा प्राप्त करू शकतो, असे कुरुंदी अट्ठकथेत म्हटले आहे. परंतु पूर्वी सांगितलेला 'थेय्यसंवासक' हा अनुपसंपन्नाच्या संदर्भात सांगितला आहे; म्हणून उपसंपन्न भिक्खू खोट्या वर्षांची गणना करत असला तरी तो अश्रमण होत नाही. आपल्या वेषात उत्साही राहून, पाराजिका पत्तीला प्राप्त होऊन देखील भिक्खू वर्षांची गणना करत असला तरी तो थेय्यसंवासक होत नाही. ติตฺถิยปกฺกนฺตกกถา นิฏฺฐิตา. तित्थियपक्कंतक कथेचे निरूपण समाप्त झाले. ติรจฺฉานคตวตฺถุกถา तिरच्छानगत (तिर्यकयोनीतील प्राण्यांच्या) कथेचे निरूपण ๑๑๑. นาคโยนิยา อฏฺฏียตีติ เอตฺถ กิญฺจาปิ โส ปวตฺติยํ กุสลวิปาเกน เทวสมฺปตฺติสทิสํ อิสฺสริยสมฺปตฺตึ อนุโภติ, อกุสลวิปากปฏิสนฺธิกสฺส [Pg.304] ปน ตสฺส สชาติยา เมถุนปฏิเสวเน จ วิสฺสฏฺฐนิทฺโทกฺกมเน จ นาคสรีรํ ปาตุภวติ อุทกสญฺจาริกํ มณฺฑูกภกฺขํ, ตสฺมา โส ตาย นาคโยนิยา อฏฺฏียติ. หรายตีติ ลชฺชติ. ชิคุจฺฉตีติ อตฺตภาวํ ชิคุจฺฉติ. ตสฺส ภิกฺขุโน นิกฺขนฺเตติ ตสฺมึ ภิกฺขุสฺมึ นิกฺขนฺเต. อถ วา ตสฺส ภิกฺขุโน นิกฺขมเนติ อตฺโถ. วิสฺสฏฺโฐ นิทฺทํ โอกฺกมีติ ตสฺมึ อนิกฺขนฺเต วิสฺสรภเยน สตึ อวิสฺสชฺชิตฺวา กปิมิทฺธวเสเนว นิทฺทายนฺโต นิกฺขนฺเต สตึ วิสฺสชฺชิตฺวา วิสฺสฏฺโฐ นิราสงฺโก มหานิทฺทํ ปฏิปชฺชิ. วิสฺสรมกาสีติ ภยวเสน สมณสญฺญํ ปหาย วิรูปํ มหาสทฺทมกาสิ. १११. 'नागयोनीमुळे पीडित होतो' या संदर्भात— जरी तो आपल्या जीवनात कुशल विपाकामुळे देवसंपत्तीसारख्या ऐश्वर्यसंपत्तीचा अनुभव घेत असला, तरी अकुशल विपाकाची प्रतिसंधी असलेल्या त्या नागाचे, आपल्याच जातीच्या नागिणीशी मैथुन करताना आणि गाढ झोपेत असताना, पाण्यात फिरणारे आणि बेडूक खाणारे नाग शरीर प्रकट होते; म्हणून तो त्या नागयोनीमुळे पीडित होतो (कंटाळतो). 'हरायति' म्हणजे लज्जित होतो. 'जिगुच्छति' म्हणजे आपल्या शरीराचा तिरस्कार करतो. 'तस्स भिक्खुनो निक्खंते' म्हणजे तो भिक्खू बाहेर गेल्यावर; किंवा 'त्या भिक्खूच्या बाहेर जाण्यामुळे' असा अर्थ आहे. 'विस्सट्ठो निद्दं ओक्कमि' म्हणजे तो भिक्खू बाहेर न गेल्यामुळे, विकृत आवाज निघण्याच्या भयाने स्मृती न सोडता, माकडाच्या डुलकीप्रमाणे झोपत असताना, तो भिक्खू बाहेर गेल्यावर स्मृती सोडून, निश्चिंत व शंकारहित होऊन गाढ झोपेत गेला. 'विस्सरमकासि' म्हणजे भयामुळे श्रमणसंज्ञा सोडून विकृत व मोठा आवाज केला. ตุมฺเห โขตฺถาติ ตุมฺเห โข อตฺถ; อการสฺส โลปํ กตฺวา วุตฺตํ. ตุมฺเห โข นาคา ฌานวิปสฺสนามคฺคผลานํ อภพฺพตฺตา อิมสฺมึ ธมฺมวินเย อวิรุฬฺหิธมฺมา อตฺถ, วิรุฬฺหิธมฺมา น ภวถาติ อยเมตฺถ สงฺเขปตฺโถ. สชาติยาติ นาคิยา เอว. ยทา ปน มนุสฺสิตฺถิอาทิเภทาย อญฺญชาติยา ปฏิเสวติ, ตทา เทวปุตฺโต วิย โหติ. เอตฺถ จ ปวตฺติยํ อภิณฺหํ สภาวปาตุกมฺมทสฺสนวเสน ‘‘ทฺเว ปจฺจยา’’ติ วุตฺตํ. นาคสฺส ปน ปญฺจสุ กาเลสุ สภาวปาตุกมฺมํ โหติ – ปฏิสนฺธิกาเล, ตจชหนกาเล, สชาติยา เมถุนกาเล, วิสฺสฏฺฐนิทฺโทกฺกมนกาเล, จุติกาเลติ. 'तुम्हे खोत्थ' म्हणजे 'तुम्हे खो अत्थ' होय; 'अ' अक्षराचा लोप करून असे म्हटले आहे. 'तुम्ही नाग ध्यान, विपश्यना, मार्ग आणि फल प्राप्त करण्यास असमर्थ असल्यामुळे या धम्म-विनयात वृद्धी न पावणारे आहात, वृद्धी पावणारे नाही आहात' हा येथे संक्षेपार्थ आहे. 'सजातिया' म्हणजे नागिणीशीच. परंतु जेव्हा मनुष्य स्त्री इत्यादी भिन्न जातीच्या स्त्रीशी मैथुन करतो, तेव्हा तो देवपुत्रासारखा असतो. आणि येथे जीवनात वारंवार मूळ स्वभाव प्रकट होण्याच्या संदर्भात भगवंतांनी 'दोन प्रत्यय' असे म्हटले आहे. परंतु नागाचा मूळ स्वभाव पाच प्रसंगी प्रकट होतो— प्रतिसंधीच्या वेळी, कात टाकण्याच्या वेळी, आपल्याच जातीच्या नागिणीशी मैथुन करताना, गाढ झोपेत असताना आणि च्युतीच्या (मृत्यूच्या) वेळी. ติรจฺฉานคโต ภิกฺขเวติ เอตฺถ นาโค วา โหตุ สุปณฺณมาณวกาทีนํ วา อญฺญตโร, อนฺตมโส สกฺกํ เทวราชานํ อุปาทาย โย โกจิ อมนุสฺสชาติโย, สพฺโพว อิมสฺมึ อตฺเถ ติรจฺฉานคโตติ เวทิตพฺโพ. โส เนว อุปสมฺปาเทตพฺโพ, น ปพฺพาเชตพฺโพ, อุปสมฺปนฺโนปิ นาเสตพฺโพติ. 'भिक्खूंनो, तिर्यकयोनीतील प्राणी' या संदर्भात— नाग असो किंवा गरुडपुत्र इत्यादींपैकी कोणीही असो, अगदी देवराज शक्रापासून घेऊन जो कोणी अमनुष्य जातीचा आहे, तो सर्वच या अर्थाने 'तिरच्छानगत' (तिर्यकयोनीतील) समजावा. त्याला उपसंपदा दिली जाऊ नये, प्रवज्जाही दिली जाऊ नये आणि जर उपसंपन्न झाला असेल तर त्याचे भिक्खूत्व नष्ट केले पाहिजे. ติรจฺฉานคตวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. तिरच्छानगत कथेचे निरूपण समाप्त झाले. มาตุฆาตกาทิวตฺถุกถา मातृघातक (आईची हत्या करणाऱ्या) इत्यादींच्या कथेचे निरूपण ๑๑๒. มาตุฆาตกาทิวตฺถูสุ – นิกฺขนฺตึ กเรยฺยนฺติ นิกฺขมนํ นิคฺคมนํ อปวาหนํ กเรยฺยนฺติ อตฺโถ. มาตุฆาตโก ภิกฺขเวติ เอตฺถ เยน มนุสฺสิตฺถิภูตา [Pg.305] ชนิกา มาตา สยมฺปิ มนุสฺสชาติเกเนว สตา สญฺจิจฺจ ชีวิตา โวโรปิตา, อยํ อานนฺตริเยน มาตุฆาตกกมฺเมน มาตุฆาตโก, เอตสฺส ปพฺพชฺชา จ อุปสมฺปทา จ ปฏิกฺขิตฺตา. เยน ปน มนุสฺสิตฺถิภูตาปิ อชนิกา โปสาวนิกา มาตา วา มหามาตา วา จูฬมาตา วา ชนิกาปิ วา น มนุสฺสิตฺถิภูตา มาตา ฆาติตา, ตสฺส ปพฺพชฺชา น วาริตา, น จ อานนฺตริโก โหติ. เยน สยํ ติรจฺฉานภูเตน มนุสฺสิตฺถิภูตา มาตา ฆาติตา, โสปิ อานนฺตริโก น โหติ, ติรจฺฉานคตตฺตา ปนสฺส ปพฺพชฺชา ปฏิกฺขิตฺตา. เสสํ อุตฺตานเมว. ปิตุฆาตเกปิ เอเสว นโย. สเจปิ หิ เวสิยา ปุตฺโต โหติ, ‘‘อยํ เม ปิตา’’ติ น ชานาติ, ยสฺส สมฺภเวน นิพฺพตฺโต, โส เจ อเนน ฆาติโต, ปิตุฆาตโกตฺเวว สงฺขฺยํ คจฺฉติ, อานนฺตริยญฺจ ผุสติ. ११२. मातृघातक इत्यादी कथांमध्ये – 'निक्खन्तिं करेय्युं' (बाहेर पडावे) याचा अर्थ 'निक्खमनं' (बाहेर पडणे), 'निग्गमनं' (निघून जाणे), 'अपवाहनं' (निवारण करणे) करावे असा आहे. "भिक्खूहो, मातृघातक" यामध्ये, ज्या मनुष्याने स्वतः मनुष्य जातीचा असताना, मनुष्य स्त्री असलेल्या आपल्या जन्मदात्या आईला जाणूनबुजून जीवे मारले आहे, तो आनंतरीय मातृघातक कर्मामुळे 'मातृघातक' ठरतो. त्याची प्रव्रज्या आणि उपसंपदा वर्ज्य (प्रतिबंधित) करण्यात आली आहे. परंतु, ज्याने मनुष्य स्त्री असूनही जन्मदात्री नसलेली सावत्र आई (किंवा दत्तक आई), आजी, मावशी किंवा जन्मदात्री असूनही मनुष्य स्त्री नसलेली आई हिची हत्या केली असेल, त्याची प्रव्रज्या प्रतिबंधित नाही आणि तो आनंतरीय कर्माचा भागीदार होत नाही. ज्याने स्वतः तिर्यंच (प्राणी) योनीमध्ये असताना मनुष्य स्त्री असलेल्या आईची हत्या केली, तो देखील आनंतरीय कर्माचा भागीदार होत नाही; परंतु तिर्यंच असल्यामुळे त्याची प्रव्रज्या वर्ज्य आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. पितृघातकाच्या बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. जर एखादा वेश्येचा मुलगा असेल आणि "हा माझा पिता आहे" हे त्याला माहीत नसेल, तरीही ज्याच्या वीर्यापासून त्याचा जन्म झाला आहे, त्याची जर त्याने हत्या केली, तर तो 'पितृघातक' म्हणूनच गणला जातो आणि त्याला आनंतरीय कर्माचे पाप लागते. ๑๑๔. อรหนฺตฆาตโกปิ มนุสฺสอรหนฺตวเสเนว เวทิตพฺโพ. มนุสฺสชาติยญฺหิ อนฺตมโส อปพฺพชิตมฺปิ ขีณาสวํ ทารกํ ทาริกํ วา สญฺจิจฺจ ชีวิตา โวโรเปนฺโต อรหนฺตฆาตโกว โหติ, อานนฺตริยญฺจ ผุสติ, ปพฺพชฺชา จสฺส วาริตา. อมนุสฺสชาติกํ ปน อรหนฺตํ มนุสฺสชาติกํ วา อวเสสํ อริยปุคฺคลํ ฆาเตตฺวา อานนฺตริโย น โหติ, ปพฺพชฺชาปิสฺส น วาริตา, กมฺมํ ปน พลวํ โหติ. ติรจฺฉาโน มนุสฺสอรหนฺตมฺปิ ฆาเตตฺวา อานนฺตริโย น โหติ, กมฺมํ ปน ภาริยนฺติ อยเมตฺถ วินิจฺฉโย. เต วธาย โอนียนฺตีติ วธตฺถาย โอนียนฺติ, มาเรตุํ นียนฺตีติ อตฺโถ. ยํ ปน ปาฬิยํ ‘‘สจา จ มย’’นฺติ วุตฺตํ, ตสฺส สเจ มยนฺติ อยเมวตฺโถ. ‘‘สเจ’’ติ หิ วตฺตพฺเพ เอตฺถ ‘‘สจา จ’’ อิติ อยํ นิปาโต วุตฺโต. ‘‘สเจ จ’’ อิจฺเจว วา ปาโฐ. ตตฺถ สเจติ สมฺภาวนตฺเถ นิปาโต; จ อิติ ปทปูรณมตฺเต. ‘‘สจชฺช มย’’นฺติปิ ปาโฐ. ตสฺส สเจ อชฺช มยนฺติ อตฺโถ. ११४. अरहंतघातक देखील मनुष्य-अरहंताच्या संदर्भातच समजला पाहिजे. कारण मनुष्य जातीमध्ये जन्मलेल्या, अगदी प्रव्रज्या न घेतलेल्या (गृहस्थ असलेल्या) देखील क्षीणासव (अरहंत) अशा लहान मुलाची किंवा मुलीची जाणूनबुजून हत्या करणारा 'अरहंतघातक'च ठरतो, त्याला आनंतरीय कर्माचे पाप लागते आणि त्याची प्रव्रज्या प्रतिबंधित केली जाते. परंतु, अमनुष्य जातीच्या अरहंताची किंवा मनुष्य जातीच्या इतर (अरहंत नसलेल्या) आर्य पुद्गलाची हत्या केल्यास मनुष्य आनंतरीय कर्माचा भागीदार होत नाही आणि त्याची प्रव्रज्याही प्रतिबंधित होत नाही; परंतु ते कर्म अत्यंत बलवान (गंभीर) असते. तिर्यंच (प्राणी) जर मनुष्य-अरहंताची हत्या करत असेल, तर तो आनंतरीय कर्माचा भागीदार होत नाही, परंतु ते कर्म अत्यंत जड (गंभीर) असते, असा येथे निर्णय आहे. "ते वधाय ओनीयन्ति" याचा अर्थ वधासाठी (मारण्यासाठी) बाहेर काढले जातात, मारण्यासाठी नेले जातात असा आहे. पाळीमध्ये जे "सचा च मयं" असे म्हटले आहे, त्याचा अर्थ "सचे मयं" (जर आम्ही) असाच आहे. कारण "सचे" असे म्हणायचे असताना येथे "सचा च" हा निपात वापरला आहे. किंवा "सचे च" असाही पाठ आढळतो. त्यामध्ये "सचे" हा संभावनेच्या अर्थातील निपात आहे आणि "च" हा केवळ पदपूर्तीसाठी आहे. "ससज्ज मयं" असाही पाठ आहे. त्याचा अर्थ "सचे अज्ज मयं" (जर आज आम्ही) असा आहे. ๑๑๕. ภิกฺขุนิทูสโก ภิกฺขเวติ เอตฺถ โย ปกตตฺตํ ภิกฺขุนึ ติณฺณํ มคฺคานํ อญฺญตรสฺมึ ทูเสติ, อยํ ภิกฺขุนิทูสโก นาม. เอตสฺส ปพฺพชฺชา จ อุปสมฺปทา จ วาริตา. โย ปน กายสํสคฺเคน สีลวินาสํ ปาเปติ, ตสฺส ปพฺพชฺชา จ อุปสมฺปทา จ น วาริตา. พลกฺกาเรน โอทาตวตฺถวสนํ กตฺวา อนิจฺฉมานํเยว ทูเสนฺโตปิ ภิกฺขุนิทูสโกเยว. พลกฺกาเรน ปน โอทาตวตฺถวสนํ กตฺวา อิจฺฉมานํ ทูเสนฺโต ภิกฺขุนิทูสโก [Pg.306] น โหติ. กสฺมา? ยสฺมา คิหิภาเว สมฺปฏิจฺฉิตมตฺเตเยว สา อภิกฺขุนี โหติ. สกึ สีลวิปนฺนํ ปน ปจฺฉา ทูเสนฺโต สิกฺขมานาสามเณรีสุ จ วิปฺปฏิปชฺชนฺโต เนว ภิกฺขุนิทูสโก โหติ, ปพฺพชฺชมฺปิ อุปสมฺปทมฺปิ ลภติ. ११५. "भिक्खूहो, भिक्खुनीदूषक" यामध्ये, जो मनुष्य मूळ शीलवान (पकतत्त) असलेल्या भिक्खुनीला तीन मार्गांपैकी (मैथुन मार्गांपैकी) कोणत्याही एका मार्गाने दूषित करतो, त्याला 'भिक्खुनीदूषक' म्हणतात. त्याची प्रव्रज्या आणि उपसंपदा प्रतिबंधित आहे. परंतु, जो केवळ कायसंसर्गाने (शारीरिक स्पर्शाने) शीलभंग करतो, त्याची प्रव्रज्या आणि उपसंपदा प्रतिबंधित नाही. बळजबरीने पांढरे वस्त्र परिधान करायला लावून, तिची इच्छा नसतानाही तिला दूषित करणारा पुरुष देखील 'भिक्खुनीदूषक'च ठरतो. परंतु, बळजबरीने पांढरे वस्त्र परिधान करायला लावून, तिच्या इच्छेने तिला दूषित करणारा पुरुष 'भिक्खुनीदूषक' ठरत नाही. कारण काय? कारण गृहस्थभाव स्वीकारल्याबरोबरच ती 'अभिक्खुनी' (भिक्खुनी नसलेली) बनते. तसेच, एकदा शीलभ्रष्ट झालेल्या भिक्खुनीला नंतर दूषित करणारा किंवा सिक्खमाना आणि सामणेरी यांच्याशी गैरवर्तन करणारा पुरुष 'भिक्खुनीदूषक' ठरत नाही; त्याला प्रव्रज्या आणि उपसंपदा दोन्ही मिळू शकते. สงฺฆเภทโก ภิกฺขเวติ เอตฺถ โย เทวทตฺโต วิย สาสนํ อุทฺธมฺมํ อุพฺพินยํ กตฺวา จตุนฺนํ กมฺมานํ อญฺญตรวเสน สงฺฆํ ภินฺทติ, อยํ สงฺฆเภทโก นาม. เอตสฺส ปพฺพชฺชา จ อุปสมฺปทา จ วาริตา. "भिक्खूहो, संघभेदक" यामध्ये, जो भिक्खू देवदत्ताप्रमाणे शासनाला अधम्म आणि अविनय बनवून, चार कर्मांपैकी (संघ कर्मांपैकी) कोणत्याही एका कर्माच्या आधारे संघात फूट पाडतो, त्याला 'संघभेदक' म्हणतात. त्याची प्रव्रज्या आणि उपसंपदा प्रतिबंधित आहे. โลหิตุปฺปาทโก ภิกฺขเวติ เอตฺถาปิ โย เทวทตฺโต วิย ทุฏฺฐจิตฺเตน วธกจิตฺเตน ตถาคตสฺส ชีวมานกสรีเร ขุทฺทกมกฺขิกาย ปิวนกมตฺตมฺปิ โลหิตํ อุปฺปาเทติ, อยํ โลหิตุปฺปาทโก นาม. เอตสฺส ปพฺพชฺชา จ อุปสมฺปทา จ วาริตา. โย ปน โรควูปสมนตฺถํ ชีวโก วิย สตฺเถน ผาเลตฺวา ปูติมํสญฺจ โลหิตญฺจ นีหริตฺวา ผาสุํ กโรติ, พหุํ โส ปุญฺญํ ปสวตีติ. "लोहितुप्पादक (रक्त काढणारा)" यामध्ये देखील, जो देवदत्ताप्रमाणे दुष्ट बुद्धीने किंवा वध करण्याच्या उद्देशाने तथागतांच्या जिवंत शरीरातून लहान माशीने पिण्याइतके जरी रक्त काढतो, त्याला 'लोहितुप्पादक' म्हणतात. त्याची प्रव्रज्या आणि उपसंपदा प्रतिबंधित आहे. परंतु, जो रोगाच्या निवारणासाठी जीवकाप्रमाणे शस्त्रक्रियेने (शस्त्राने) कापून, कुजलेले मांस आणि रक्त बाहेर काढून आराम मिळवून देतो, तो मोठ्या प्रमाणावर पुण्य संपादन करतो. มาตุฆาตกาทิวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. मातृघातक इत्यादी कथा समाप्त झाली. อุภโตพฺยญฺชนกวตฺถุกถา उभतोब्यंजनक (उभयलिंगी) कथा. ๑๑๖. อุภโตพฺยญฺชนโก ภิกฺขเวติ อิตฺถินิมิตฺตุปฺปาทนกมฺมโต จ ปุริสนิมิตฺตุปฺปาทนกมฺมโต จ อุภโต พฺยญฺชนมสฺส อตฺถีติ อุภโตพฺยญฺชนโก. กโรตีติ ปุริสนิมิตฺเตน อิตฺถีสุ เมถุนวีติกฺกมํ กโรติ. การาเปตีติ ปรํ สมาทเปตฺวา อตฺตโน อิตฺถินิมิตฺเต การาเปติ, โส ทุวิโธ โหติ – อิตฺถิอุภโตพฺยญฺชนโก, ปุริสอุภโตพฺยญฺชนโกติ. ११६. "भिक्खूहो, उभतोब्यंजनक" म्हणजे स्त्री-चिन्ह उत्पन्न करणाऱ्या कर्मामुळे आणि पुरुष-चिन्ह उत्पन्न करणाऱ्या कर्मामुळे ज्याच्याकडे दोन्ही चिन्हे (व्यंजने) असतात, तो 'उभतोब्यंजनक' (उभयलिंगी) होय. "करतो" म्हणजे पुरुष-चिन्हाने स्त्रियांमध्ये मैथुन कर्माचे उल्लंघन करतो. "करवून घेतो" म्हणजे दुसऱ्याला प्रवृत्त करून स्वतःच्या स्त्री-चिन्हामध्ये मैथुन करवून घेतो. तो दोन प्रकारचा असतो – स्त्री-उभतोब्यंजनक आणि पुरुष-उभतोब्यंजनक. ตตฺถ อิตฺถิอุภโตพฺยญฺชนกสฺส อิตฺถินิมิตฺตํ ปากฏํ โหติ, ปุริสนิมิตฺตํ ปฏิจฺฉนฺนํ. ปุริสอุภโตพฺยญฺชนกสฺส ปุริสนิมิตฺตํ ปากฏํ, อิตฺถินิมิตฺตํ ปฏิจฺฉนฺนํ. อิตฺถิอุภโตพฺยญฺชนกสฺส อิตฺถีสุ ปุริสตฺตํ กโรนฺตสฺส อิตฺถินิมิตฺตํ ปฏิจฺฉนฺนํ โหติ, ปุริสนิมิตฺตํ ปากฏํ โหติ. ปุริสอุภโตพฺยญฺชนกสฺส ปุริสานํ อิตฺถิภาวํ อุปคจฺฉนฺตสฺส ปุริสนิมิตฺตํ ปฏิจฺฉนฺนํ โหติ, อิตฺถินิมิตฺตํ ปากฏํ โหติ. อิตฺถิอุภโตพฺยญฺชนโก สยญฺจ คพฺภํ คณฺหาติ, ปรญฺจ คณฺหาเปติ. ปุริสอุภโตพฺยญฺชนโก ปน สยํ น คณฺหาติ, ปรํ คณฺหาเปตีติ, อิทเมเตสํ นานากรณํ. กุรุนฺทิยํ ปน วุตฺตํ – ‘‘ยทิ ปฏิสนฺธิยํ ปุริสลิงฺคํ ปวตฺเต อิตฺถิลิงฺคํ นิพฺพตฺตติ, ยทิ ปฏิสนฺธิยํ อิตฺถิลิงฺคํ ปวตฺเต ปุริสลิงฺคํ นิพฺพตฺตตี’’ติ[Pg.307]. ตตฺถ วิจารณกฺกโม วิตฺถารโต อฏฺฐสาลินิยา ธมฺมสงฺคหฏฺฐกถาย เวทิตพฺโพ. อิมสฺส ปน ทุวิธสฺสาปิ อุภโตพฺยญฺชนกสฺส เนว ปพฺพชฺชา อตฺถิ, น อุปสมฺปทาติ อิทมิธ เวทิตพฺพํ. त्यामध्ये, स्त्री-उभतोब्यंजनकाचे स्त्री-चिन्ह प्रकट असते आणि पुरुष-चिन्ह अप्रकट (झाकलेले) असते. पुरुष-उभतोब्यंजनकाचे पुरुष-चिन्ह प्रकट असते आणि स्त्री-चिन्ह अप्रकट असते. स्त्री-उभतोब्यंजनक जेव्हा स्त्रियांमध्ये पुरुषत्वाचे कार्य करतो, तेव्हा त्याचे स्त्री-चिन्ह अप्रकट होते आणि पुरुष-चिन्ह प्रकट होते. पुरुष-उभतोब्यंजनक जेव्हा पुरुषांसोबत स्त्रीभावाला प्राप्त होतो, तेव्हा त्याचे पुरुष-चिन्ह अप्रकट होते आणि स्त्री-चिन्ह प्रकट होते. स्त्री-उभतोब्यंजनक स्वतः देखील गर्भ धारण करू शकतो आणि दुसऱ्यालाही गर्भ धारण करवू शकतो. परंतु, पुरुष-उभतोब्यंजनक स्वतः गर्भ धारण करू शकत नाही, केवळ दुसऱ्याला गर्भ धारण करवू शकतो; हा या दोघांमधील फरक आहे. कुरुंदी अट्ठकथेत म्हटले आहे – "जर प्रतिसंधीच्या वेळी पुरुषलिंग असेल, तर प्रवृत्तीच्या (जीवनाच्या) काळात स्त्रीलिंग उत्पन्न होते; जर प्रतिसंधीच्या वेळी स्त्रीलिंग असेल, तर प्रवृत्तीच्या काळात पुरुषलिंग उत्पन्न होते." याविषयीच्या विश्लेषणाचा क्रम धम्मसंगणीची अट्ठकथा असलेल्या 'अट्ठसालिनी'मध्ये सविस्तरपणे समजून घ्यावा. परंतु, या दोन्ही प्रकारच्या उभतोब्यंजनकांसाठी प्रव्रज्या देखील नाही आणि उपसंपदा देखील नाही, हे येथे लक्षात घ्यावे. อุภโตพฺยชฺชนกวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. उभतोब्यंजनक कथा समाप्त झाली. อนุปชฺฌายกาทิวตฺถุกถา अनुपज्झायक (उपाध्याय नसलेले) इत्यादी कथा. ๑๑๗. เตน โข ปน สมเยนาติ เยน สมเยน ภควตา สิกฺขาปทํ อปญฺญตฺตํ โหติ, เตน สมเยน. อนุปชฺฌายกนฺติ อุปชฺฌํ อคาหาเปตฺวา สพฺเพน สพฺพํ อุปชฺฌายวิรหิตํ. เอวํ อุปสมฺปนฺนา เนว ธมฺมโต น อามิสโต สงฺคหํ ลภนฺติ, เต ปริหายนฺติเยว, น วฑฺฒนฺติ. น ภิกฺขเว อนุปชฺฌายโกติ อุปชฺฌํ อคาหาเปตฺวา นิรุปชฺฌายโก น อุปสมฺปาเทตพฺโพ. โย อุปสมฺปาเทยฺย อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ สิกฺขาปทปญฺญตฺติโต ปฏฺฐาย เอวํ อุปสมฺปาเทนฺตสฺส อาปตฺติ โหติ; กมฺมํ ปน น กุปฺปติ. เกจิ กุปฺปตีติ วทนฺติ, ตํ น คเหตพฺพํ. สงฺเฆน อุปชฺฌาเยนาติอาทีสุปิ อุภโตพฺยญฺชนกุปชฺฌายปริโยสาเนสุ เอเสว นโย. ११७. "त्या वेळी" म्हणजे "ज्या वेळी भगवंतांनी शिक्षापद प्रज्ञप्त केले नव्हते, त्या वेळी." "अनुपाध्यायक" म्हणजे उपाध्यायांचे ग्रहण न करता, सर्व प्रकारे उपाध्यायाशिवाय राहिलेला. अशा प्रकारे उपसंपदा प्राप्त झालेल्यांना धर्माच्या दृष्टीने किंवा आमिषाच्या (भौतिक गरजांच्या) दृष्टीने कोणतेही साहाय्य मिळत नाही; त्यांची केवळ हानीच होते, प्रगती होत नाही. "भिक्खूंनो, उपाध्यायाशिवाय (अनुपाध्यायक) उपसंपदा देऊ नये" म्हणजे उपाध्यायाचे ग्रहण न करता, उपाध्यायरहित असलेल्याला उपसंपदा देऊ नये. "जो उपसंपदा देईल, त्याला दुक्कट (दुष्कृत) आपत्ती प्राप्त होते" म्हणजे शिक्षापद प्रज्ञप्त झाल्यापासून अशा प्रकारे उपसंपदा देणाऱ्याला आपत्ती प्राप्त होते; परंतु उपसंपदेचे कर्म अमान्य (कुपित) होत नाही. काही आचार्य म्हणतात की कर्म अमान्य होते, पण ते मत स्वीकारू नये. "संघाने, उपाध्यायाने" इत्यादी उभतोब्यंजन आणि उपाध्यायापर्यंतच्या सर्व शिक्षापदांमध्ये हाच नियम लागू होतो. อนุปชฺฌายกาทิวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. "अनुपाध्यायक इत्यादींची कथा समाप्त झाली." อปตฺตกาทิวตฺถุกถา "अपात्रक (पात्र नसलेले) इत्यादींची कथा." ๑๑๘. หตฺเถสุ ปิณฺฑาย จรนฺตีติ โย หตฺเถสุ ปิณฺโฑ ลพฺภติ, ตทตฺถาย จรนฺติ. เสยฺยถาปิ ติตฺถิยาติ ยถา อาชีวกนามกา ติตฺถิยา; สูปพฺยญฺชเนหิ มิสฺเสตฺวา หตฺเถสุ ฐปิตปิณฺฑเมว หิ เต ภุญฺชนฺติ. อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ เอวํ อุปสมฺปาเทนฺตสฺเสว อาปตฺติ โหติ, กมฺมํ ปน น กุปฺปติ. อจีวรกาทิวตฺถูสุปิ เอเสว นโย. ११८. "हातामध्ये भिक्षेसाठी फिरतात" म्हणजे हातामध्ये जी भिक्षा मिळते, त्यासाठी ते फिरतात. "जसे की तीर्थक" म्हणजे आजीवक नावाचे तीर्थक; कारण ते आमटी आणि व्यंजनांनी मिश्रित करून हातावर ठेवलेलेच अन्न खातात. "दुक्कट आपत्ती प्राप्त होते" म्हणजे अशा प्रकारे (पात्र नसताना) उपसंपदा देणाऱ्यालाच आपत्ती प्राप्त होते, परंतु उपसंपदेचे कर्म अमान्य होत नाही. चीवर नसलेल्यांच्या (अचीवरक) बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. ยาจิตเกนาติ ‘‘ยาว อุปสมฺปทํ กโรม, ตาว เทถา’’ติ ยาจิตฺวา คหิเตน; ตาวกาลิเกนาติ อตฺโถ. อีทิเสน หิ ปตฺเตน วา จีวเรน วา ปตฺตจีวเรน วา อุปสมฺปาเทนฺตสฺเสว อาปตฺติ โหติ, กมฺมํ ปน น กุปฺปติ, ตสฺมา ปริปุณฺณปตฺตจีวโรว อุปสมฺปาเทตพฺโพ. สเจ ตสฺส นตฺถิ, อาจริยุปชฺฌายา จสฺส ทาตุกามา โหนฺติ, อญฺเญ วา ภิกฺขู นิรเปกฺเขหิ นิสฺสชฺชิตฺวา อธิฏฺฐานุปคํ ปตฺตจีวรํ ทาตพฺพํ. ปพฺพชฺชาเปกฺขํ ปน ปณฺฑุปลาสํ ยาจิตเกนาปิ ปตฺตจีวเรน ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ, สภาคฏฺฐาเน วิสฺสาเสน คเหตฺวาปิ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. "मागून घेतलेल्याने" म्हणजे "जोपर्यंत आम्ही उपसंपदा करतो, तोपर्यंत द्या" असे मागून घेतलेल्याने; तात्पुरते उसने घेतलेल्याने असा अर्थ आहे. कारण अशा प्रकारच्या पात्राने किंवा चीवराने किंवा पात्र-चीवराने उपसंपदा देणाऱ्यालाच आपत्ती प्राप्त होते, परंतु कर्म अमान्य होत नाही; म्हणून पूर्ण पात्र आणि चीवर असलेल्यालाच उपसंपदा दिली पाहिजे. जर उमेदवाराकडे ते नसेल आणि आचार्य व उपाध्याय त्याला देऊ इच्छित असतील, किंवा इतर भिक्खू देऊ इच्छित असतील, तर त्यांनी आसक्ती न ठेवता त्याग करून अधिष्ठानयोग्य पात्र-चीवर दिले पाहिजे. परंतु प्रव्रज्येची इच्छा असलेल्या उमेदवाराला (पांडुपलासाला) उसने घेतलेल्या पात्र-चीवरानेही प्रव्रज्या देणे योग्य आहे, किंवा योग्य ठिकाणी विश्वासाने घेऊनही प्रव्रज्या देणे योग्य आहे. สเจ ปน อปกฺกํ ปตฺตํ จีวรูปคานิ จ วตฺถานิ คเหตฺวา อาคโต โหติ, ยาว ปตฺโต ปจฺจติ, จีวรานิ จ กริยนฺติ, ตาว วิหาเร วสนฺตสฺส [Pg.308] อนามฏฺฐปิณฺฑปาตํ ทาตุํ วฏฺฏติ, ถาลเก ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ, ปุเรภตฺตํ สามเณรภาคสมโก อามิสภาโค ทาตุํ วฏฺฏติ. เสนาสนคฺคาโห ปน สลากภตฺตอุทฺเทสภตฺตนิมนฺตนาทีนิ จ น วฏฺฏนฺติ. ปจฺฉาภตฺตมฺปิ สามเณรภาคสโม เตลมธุผาณิตาทิเภสชฺชภาโค วฏฺฏติ. สเจ คิลาโน โหติ, เภสชฺชมสฺส กาตุํ วฏฺฏติ, สามเณรสฺส วิย จ สพฺพํ ปฏิชคฺคนกมฺมนฺติ. परंतु जर तो न भाजलेले पात्र आणि चीवरासाठी योग्य असलेले कापड घेऊन आला असेल, तर जोपर्यंत पात्र भाजले जात नाही आणि चीवर तयार केले जात नाही, तोपर्यंत विहारात राहणाऱ्या त्याला न स्पर्श केलेले (उत्कृष्ट) अन्न देणे योग्य आहे, थाळीत जेवणे योग्य आहे, आणि दुपारच्या जेवणापूर्वी सामणेराच्या वाट्याइतका अन्नाचा भाग देणे योग्य आहे. परंतु शयनासन ग्रहण करणे, शलाका-भक्त, उद्देश-भक्त, निमंत्रण इत्यादी गोष्टी योग्य नाहीत. दुपारच्या जेवणानंतरही सामणेराच्या वाट्याइतका तेल, मध, गूळ इत्यादी औषधांचा भाग देणे योग्य आहे. जर तो आजारी असेल, तर त्याच्यासाठी औषधोपचार करणे योग्य आहे आणि सामणेराप्रमाणेच त्याची सर्व प्रकारची काळजी घेणे योग्य आहे. อปตฺตกาทิวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. "अपात्रक इत्यादींची कथा समाप्त झाली." หตฺถจฺฉินฺนาทิวตฺถุกถา "हात कापलेले (हस्तच्छिन्न) इत्यादींची कथा." ๑๑๙. หตฺถจฺฉินฺนาทิวตฺถูสุ – หตฺถจฺฉินฺโนติ ยสฺส หตฺถตเล วา มณิพนฺเธ วา กปฺปเร วา ยตฺถ กตฺถจิ เอโก วา ทฺเว วา หตฺถา ฉินฺนา โหนฺติ. ปาทจฺฉินฺโนติ ยสฺส อคฺคปาเท วา โคปฺผเกสุ วา ชงฺฆาย วา ยตฺถ กตฺถจิ เอโก วา ทฺเว วา ปาทา ฉินฺนา โหนฺติ. หตฺถปาทจฺฉินฺโนติ ยสฺส วุตฺตปฺปกาเรเนว จตูสุ หตฺถปาเทสุ ทฺเว วา ตโย วา สพฺเพ วา หตฺถปาทา ฉินฺนา โหนฺติ. กณฺณจฺฉินฺโนติ ยสฺส กณฺณมูเล วา กณฺณสกฺขลิกาย วา เอโก วา ทฺเว วา กณฺณา ฉินฺนา โหนฺติ. ยสฺส ปน กณฺณาวิทฺเธ ฉิชฺชนฺติ, สกฺกา จ โหติ สงฺฆาเฏตุํ, โส กณฺณํ สงฺฆาเฏตฺวา ปพฺพาเชตพฺโพ. นาสจฺฉินฺโนติ ยสฺส อชปทเก วา อคฺเค วา เอกปุเฏ วา ยตฺถ กตฺถจิ นาสา ฉินฺนา โหติ. ยสฺส ปน นาสิกา สกฺกา โหติ สนฺเธตุํ, โส ตํ ผาสุกํ กตฺวา ปพฺพาเชตพฺโพ. กณฺณนาสจฺฉินฺโน อุภยวเสน เวทิตพฺโพ. องฺคุลิจฺฉินฺโนติ ยสฺส นขเสสํ อทสฺเสตฺวา เอกา วา พหู วา องฺคุลิโย ฉินฺนา โหนฺติ. ยสฺส ปน สุตฺตตนฺตุมตฺตมฺปิ นขเสสํ ปญฺญายติ, ตํ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. อฬจฺฉินฺโนติ ยสฺส จตูสุ องฺคุฏฺฐเกสุ องฺคุลิยํ วุตฺตนเยเนว เอโก วา พหู วา องฺคุฏฺฐกา ฉินฺนา โหนฺติ. กณฺฑรจฺฉินฺโนติ ยสฺส กณฺฑรนามกา มหานฺหารู ปุรโต วา ปจฺฉโต วา ฉินฺนา โหนฺติ; เยสุ เอกสฺสปิ ฉินฺนตฺตา อคฺคปาเทน วา จงฺกมติ, มูเลน วา จงฺกมติ, น วา ปาทํ ปติฏฺฐาเปตุํ สกฺโกติ. ११९. हात कापलेले इत्यादींच्या बाबतीत निर्णय असा समजावा: "हस्तच्छिन्न" (हात कापलेला) म्हणजे ज्याचे तळहातापासून, मनगटापासून, कोपरापासून किंवा इतर कोणत्याही ठिकाणाहून एक किंवा दोन्ही हात कापलेले असतात. "पादच्छिन्न" (पाय कापलेला) म्हणजे ज्याचे पायाच्या बोटांपासून, घोट्यापासून, नडगीपासून किंवा इतर कोणत्याही ठिकाणाहून एक किंवा दोन्ही पाय कापलेले असतात. "हस्तपादच्छिन्न" (हात आणि पाय कापलेला) म्हणजे ज्याचे वर सांगितलेल्या प्रकारेच चार हात-पायांपैकी दोन, तीन किंवा सर्व हात-पाय कापलेले असतात. "कर्णच्छिन्न" (कान कापलेला) म्हणजे ज्याचे कानाच्या मुळापासून किंवा कानाच्या पाळीपासून एक किंवा दोन्ही कान कापलेले असतात. परंतु ज्याचे कान टोचलेल्या ठिकाणी कापलेले असतात आणि ते जोडणे शक्य असते, त्याचे कान जोडून त्याला प्रव्रज्या द्यावी. "नासाच्छिन्न" (नाक कापलेला) म्हणजे ज्याचे नाक शेळीच्या खुरासारख्या भागातून, शेंड्याकडून, एका नाकपुडीतून किंवा इतर कोणत्याही ठिकाणाहून कापलेले असते. परंतु ज्याचे नाक जोडणे शक्य असते, त्याचे नाक बरे करून त्याला प्रव्रज्या द्यावी. "कर्णनासाच्छिन्न" (कान आणि नाक कापलेला) हा दोन्ही नियमांच्या आधारे समजावा. "अंगुलिच्छिन्न" (बोट कापलेला) म्हणजे ज्याचे नखाचा कोणताही भाग न दिसता एक किंवा अनेक बोटे कापलेली असतात. परंतु ज्याच्या नखाचा अगदी सुताच्या धाग्याइतकाही भाग शिल्लक दिसतो, त्याला प्रव्रज्या देणे योग्य आहे. "अळच्छिन्न" (अंगठा कापलेला) म्हणजे ज्याचे चार अंगठ्यांपैकी वर सांगितलेल्या पद्धतीनेच एक किंवा अनेक अंगठे कापलेले असतात. "कंडराच्छिन्न" (स्नायू कापलेला) म्हणजे ज्याचे 'कंडरा' नावाचे मोठे स्नायू पुढून किंवा मागून कापलेले असतात; ज्यांपैकी एकाही स्नायूच्या कापल्यामुळे तो पायाच्या बोटांवर चालतो किंवा टाचेवर चालतो, अथवा पाय जमिनीवर नीट टेकवू शकत नाही. ผณหตฺถโกติ ยสฺส วคฺคุลิปกฺขกา วิย องฺคุลิโย สมฺพทฺธา โหนฺติ; เอตํ ปพฺพาเชตุกาเมน องฺคุลนฺตริกาโย ผาเลตฺวา สพฺพํ อนฺตรจมฺมํ อปเนตฺวา ผาสุกํ กตฺวา ปพฺพาเชตพฺโพ. ยสฺสปิ ฉ องฺคุลิโย [Pg.309] โหนฺติ, ตํ ปพฺพาเชตุกาเมน อธิกองฺคุลึ ฉินฺทิตฺวา ผาสุกํ กตฺวา ปพฺพาเชตพฺโพ. "फणहस्तक" म्हणजे ज्याची बोटे वटवाघळाच्या पंखासारखी एकमेकांना जोडलेली असतात; त्याला प्रव्रज्या देऊ इच्छिणाऱ्याने बोटांमधील त्वचा कापून, बोटांमधील सर्व कातडी काढून टाकून, हात नीट करून त्याला प्रव्रज्या द्यावी. ज्याला सहा बोटे असतात, त्याला प्रव्रज्या देऊ इच्छिणाऱ्याने जास्तीचे बोट कापून, हात नीट करून त्याला प्रव्रज्या द्यावी. ขุชฺโชติ โย อุรสฺส วา ปิฏฺฐิยา วา ปสฺสสฺส วา นิกฺขนฺตตฺตา ขุชฺชสรีโร. ยสฺส ปน กิญฺจิ กิญฺจิ องฺคปจฺจงฺคํ อีสกํ วงฺกํ, ตํ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. มหาปุริโส เอว หิ พฺรหฺมุชฺชุคตฺโต, อวเสโส สตฺโต อขุชฺโช นาม นตฺถิ. "खुज्ज" (कुबडा) म्हणजे जो छाती, पाठ किंवा कुशीचा भाग बाहेर आल्यामुळे वाकलेल्या शरीराचा असतो. परंतु ज्याचे एखादे अंग किंवा प्रत्यंग थोडेसे वाकडे असते, त्याला प्रव्रज्या देणे योग्य आहे. कारण केवळ महापुरुषच ब्रह्मदेवासारख्या सरळ शरीराचे असतात; त्यांच्याव्यतिरिक्त इतर कोणताही प्राणी पूर्णपणे सरळ नसतो. วามโนติ ชงฺฆวามโน วา กฏิวามโน วา อุภยวามโน วา. ชงฺฆวามนสฺส กฏิโต ปฏฺฐาย เหฏฺฐิมกาโย รสฺโส โหติ, อุปริมกาโย ปริปุณฺโณ. กฏิวามนสฺส กฏิโต ปฏฺฐาย อุปริมกาโย รสฺโส โหติ, เหฏฺฐิมกาโย ปริปุณฺโณ. อุภยวามนสฺส อุโภปิ กายา รสฺสา โหนฺติ, เยสํ รสฺสตฺตา ภูตานํ วิย ปริวฏุโม มหากุจฺฉิฆฏสทิโส อตฺตภาโว โหติ, ตํ ติวิธมฺปิ ปพฺพาเชตุํ น วฏฺฏติ. "वामन" (बुटका) म्हणजे जंघा-वामन (पायाने बुटका), कटि-वामन (कमरेने बुटका) किंवा उभय-वामन (दोन्ही प्रकारे बुटका). जंघा-वामनाचा कमरेपासून खालचा भाग बुटका असतो आणि वरचा भाग सामान्य असतो. कटि-वामनाचा कमरेपासून वरचा भाग बुटका असतो आणि खालचा भाग सामान्य असतो. उभय-वामनाचे दोन्ही भाग बुटके असतात; ते बुटके असल्यामुळे भुतांप्रमाणे त्यांचे शरीर गोल आणि मोठ्या पोटाच्या घागरीसारखे असते. अशा तिन्ही प्रकारच्या बुटक्यांना प्रव्रज्या देणे योग्य नाही. คลคณฺฑีติ ยสฺส กุมฺภณฺฑํ วิย คเล คณฺโฑ โหติ. เทสนามตฺตเมว เจตํ, ยสฺมึ กิสฺมิญฺจิ ปน ปเทเส คณฺเฑ สติ น ปพฺพาเชตพฺโพ. ตตฺถ วินิจฺฉโย – ‘‘น ภิกฺขเว ปญฺจหิ อาพาเธหิ ผุฏฺโฐ ปพฺพาเชตพฺโพ’’ติ เอตฺถ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. ลกฺขณาหตกสาหตลิขิตเกสุ ยํ วตฺตพฺพํ, ตํ ‘‘น ภิกฺขเว ลกฺขณาหโต’’ติอาทีสุ วุตฺตเมว. "गलगंडी" म्हणजे ज्याच्या गळ्यावर कोहळ्यासारखी मोठी गाठ असते. हे केवळ उदाहरणादाखल सांगितले आहे; वास्तविक पाहता शरीराच्या कोणत्याही भागात गाठ असेल तर त्याला प्रव्रज्या देऊ नये. त्याबाबतचा निर्णय "भिक्खूंनो, पाच रोगांनी ग्रस्त असलेल्याला प्रव्रज्या देऊ नये" या शिक्षापदात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. डाग दिलेले (लक्षणाहत), चाबकाने मारलेले (कसाहत) आणि गुन्हेगार म्हणून घोषित केलेले (लिखितक) यांच्याविषयी जे सांगायचे आहे, ते "भिक्खूंनो, डाग दिलेल्याला प्रव्रज्या देऊ नये" इत्यादी शिक्षापदांमध्ये सांगितलेच आहे. สีปทีติ ภารปาโท วุจฺจติ. ยสฺส ปาโท ถูโล โหติ สญฺชาตปิฬโก ขโร, โส น ปพฺพาเชตพฺโพ. ยสฺส ปน น ตาว ขรภาวํ คณฺหาติ, สกฺกา โหติ อุปนาหํ พนฺธิตฺวา อุทกอาวาเฏ ปเวเสตฺวา อุทกวาลิกาย ปูเรตฺวา ยถา สิรา ปญฺญายนฺติ, ชงฺฆา จ เตลนาฬิกา วิย โหติ, เอวํ มิลาเปตุํ สกฺกา, ตสฺส ปาทํ อีทิสํ กตฺวา ตํ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. สเจ ปุน วฑฺฒติ, อุปสมฺปาเทนฺเตนาปิ ตถา กตฺวาว อุปสมฺปาเทตพฺโพ. ज्या व्यक्तीचे पाय जड आहेत किंवा जे पाय ओढत चालतात, त्यांना 'सीपदी' (हत्तीरोग असलेला) असे म्हणतात. ज्याचा पाय जाड, अत्यंत गाठी असलेला आणि खडबडीत असतो, त्याला प्रव्रजित करू नये. परंतु, जोपर्यंत पायाला असा खडबडीतपणा येत नाही, तोपर्यंत पायाला घट्ट पट्टी बांधून, पाण्याने भरलेल्या खड्ड्यात ठेवून, ओल्या वाळूने भरून, ज्यायोगे शिरा स्पष्ट दिसू लागतील आणि पोटरी तेलाच्या नळीसारखी (बारीक) होईल, अशा प्रकारे जर तो सूज कमी करण्यास सक्षम असेल, तर त्याचा पाय तसा करून त्याला प्रव्रजित करणे योग्य आहे. जर पुन्हा सूज वाढली, तर उपसंपदा देणाऱ्याने देखील तसेच करूनच त्याला उपसंपदा द्यावी. ปาปโรคีติ อริสภคนฺทรปิตฺตเสมฺหกาสโสสาทีสุ เยน เกนจิ โรเคน นิจฺจาตุโร อเตกิจฺฉโรโค เชคุจฺโฉ อมนาโป; อยํ น ปพฺพาเชตพฺโพ. मूळव्याध, भगंदर, पित्तविकार, कफविकार, खोकला, क्षयरोग इत्यादींपैकी कोणत्याही आजाराने जो सतत आजारी असतो, ज्याचा आजार असाध्य आहे, जो किळसवाणा आणि अप्रिय वाटतो, त्याला 'पापरोगी' असे म्हणतात. अशा व्यक्तीला प्रव्रजित करू नये. ปริสทูสโกติ โย อตฺตโน วิรูปตาย ปริสํ ทูเสติ; อติทีโฆ วา โหติ อญฺเญสํ สีสปฺปมาณนาภิปฺปเทโส, อติรสฺโส [Pg.310] วา อุภยวามนภูตรูปํ วิย, อติกาโฬ วา ฌาปิตเขตฺเต ขาณุโก วิย, อจฺโจทาโต วา ทธิตกฺกาทีหิ ปมชฺชิตมฏฺฐตมฺพโลหวณฺโณ, อติกิโส วา มนฺทมํสโลหิโต อฏฺฐิสิราจมฺมสรีโร วิย, อติถูโล วา ภาริยมํโส, มโหทโร วา มหาภูตสทิโส, อติมหนฺตสีโส วา ปจฺฉึ สีเส กตฺวา ฐิโต วิย, อติขุทฺทกสีโส วา สรีรสฺส อนนุรูเปน อติขุทฺทเกน สีเสน สมนฺนาคโต, กูฏกูฏสีโส วา ตาลผลปิณฺฑิสทิเสน สีเสน สมนฺนาคโต, สิขรสีโส วา อุทฺธํ อนุปุพฺพตนุเกน สีเสน สมนฺนาคโต, นาฬิสีโส วา มหาเวฬุปพฺพสทิเสน สีเสน สมนฺนาคโต, กปฺปสีโส วา ปพฺภารสีโส วา จตูสุ ปสฺเสสุ เยน เกนจิ ปสฺเสน โอณเตน สีเสน สมนฺนาคโต, วณสีโส วา ปูติสีโส วา กณฺณิกเกโส วา ปาณเกหิ ขายิตเกทาเร สสฺสสทิเสหิ ตหึ ตหึ อุฏฺฐิเตหิ เกเสหิ สมนฺนาคโต, นิลฺโลมสีโส วา ถูลถทฺธเกโส วา ตาลหีรสทิเสหิ เกเสหิ สมนฺนาคโต, ชาติปลิเตหิ ปณฺฑรสีโส วา ปกติตมฺพเกโส วา อาทิตฺเตหิ วิย เกเสหิ สมนฺนาคโต, อาวฏฺฏสีโส วา คุนฺนํ สรีเร อาวฏฺฏสทิเสหิ อุทฺธคฺเคหิ เกสาวฏฺเฏหิ สมนฺนาคโต, สีสโลเมหิ สทฺธึ เอกาพทฺธภมุกโลโม วา ชาลพทฺเธน วิย นลาเฏน สมนฺนาคโต. जो आपल्या विद्रूपतेमुळे परिषदेची शोभा बिघडवतो, त्याला 'परिषददूषक' (परिषद दूषित करणारा) म्हणतात. तो इतरांच्या डोक्याच्या उंचीएवढी बेंबी असलेला अत्यंत उंच असतो; किंवा वरचा व खालचा भाग दोन्ही बाजूंनी बुटका असलेल्या पिशाचासारखा अत्यंत ठेंगू असतो; किंवा जळलेल्या शेतातील खुंटासारखा अत्यंत काळा असतो; याशिवाय दही, ताक इत्यादींनी घासलेल्या गुळगुळीत तांब्यासारखा अत्यंत पांढरा (फिका) असतो; किंवा अत्यंत कृश, कमी मांस व रक्त असलेला, केवळ हाडे, शिरा आणि कातडे उरलेल्या शरीरासारखा असतो; किंवा जड मांस असलेला अत्यंत स्थूल असतो; किंवा महापिशाचासारखे मोठे पोट असलेला असतो; किंवा डोक्यावर टोपली ठेवून उभा असल्यासारखे अत्यंत मोठे डोके असलेला असतो; किंवा शरीराला न शोभणारे अत्यंत लहान डोके असलेला असतो; किंवा ताडाच्या फळांच्या घडासारखे गाठीगाठींचे डोके असलेला असतो; किंवा वरच्या बाजूला निमुळते होत गेलेले शिखरासारखे डोके असलेला असतो; किंवा मोठ्या बांबूच्या पेरासारखे नळीसारखे डोके असलेला असतो; किंवा चारही बाजूंपैकी कोणत्याही एका बाजूला झुकलेले, दुभंगलेले किंवा कललेले डोके असलेला असतो; किंवा जखमा असलेले डोके असलेला असतो; किंवा सडलेले डोके असलेला असतो; किंवा कीटकांनी खाल्लेल्या शेतातील पिकासारखे ठिकठिकाणी उगवलेले केस असलेला (कमळाच्या बोंडासारखे केस असलेला) असतो; किंवा डोक्यावर केस नसलेला (टक्कल असलेला) असतो; किंवा ताडाच्या धाग्यांसारखे जाड व राठ केस असलेला असतो; किंवा जन्मापासूनच पांढरे केस असलेले पांढरे डोके असलेला असतो; किंवा पेटलेल्या आगीसारखे नैसर्गिक तांबडे केस असलेला असतो; किंवा गाईच्या शरीरावरील आवर्ताप्रमाणे वरच्या बाजूला टोक असलेले केसांचे आवर्त (भोवरे) असलेले डोके असलेला असतो; किंवा जाळीदार कपाळ असल्यासारखे डोक्याच्या केसांशी जोडलेल्या सलग भुवया असलेला असतो. สมฺพทฺธภมุโก วา นิลฺโลมภมุโก วา มกฺกฏภมุโก วา อติมหนฺตกฺขิ วา อติขุทฺทกกฺขิ วา มหึสจมฺเม วาสิโกเณน ปหริตฺวา กตฉิทฺทสทิเสหิ อกฺขีหิ สมนฺนาคโต, วิสมกฺขิ วา เอเกน มหนฺเตน เอเกน ขุทฺทเกน อกฺขินา สมนฺนาคโต, วิสมจกฺกโล วา เอเกน อุทฺธํ เอเกน อโธติ เอวํ วิสมชาเตหิ อกฺขิจกฺกเลหิ สมนฺนาคโต, เกกโร วา คมฺภีรกฺขิ วา ยสฺส คมฺภีเร อุทปาเน อุทกตารกา วิย อกฺขิตารกา ปญฺญายนฺติ; นิกฺขนฺตกฺขิ วา ยสฺส กกฺกฏกสฺเสว อกฺขิตารกา นิกฺขนฺตา โหนฺติ; หตฺถิกณฺโณ วา มหตีหิ กณฺณสกฺขลิกาหิ สมนฺนาคโต, มูสิกกณฺโณ วา ชฏุกกณฺโณ วา ขุทฺทิกาหิ กณฺณสกฺขลิกาหิ สมนฺนาคโต, ฉิทฺทมตฺตกณฺโณ วา ยสฺส วินา กณฺณสกฺขลิกาหิ [Pg.311] กณฺณฉิทฺทมตฺตเมว โหติ; อวิทฺธกณฺโณ วา โยนกชาติโก ปน ปริสทูสโก น โหติ; สภาโวเยว หิ โส ตสฺส กณฺณภคนฺทริโก วา นิจฺจปูตินา กณฺเณน สมนฺนาคโต, คณฺฑกณฺโณ วา สทาปคฺฆริตปุพฺเพน กณฺเณน สมนฺนาคโต, ฏงฺกิตกณฺโณ วา โคภตฺตนาฬิกาย อคฺคสทิเสหิ กณฺเณหิ สมนฺนาคโต, อติปิงฺคลกฺขิ วา มธุปิงฺคลํ ปน ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. นิปฺปขุมกฺขิ วา อสฺสุปคฺฆรณกฺขิ วา ปุปฺผิตกฺขิ วา อกฺขิปาเกน สมนฺนาคตกฺขิ วา. किंवा परस्परांना जोडलेल्या भुवया असलेला; किंवा भुवयांवर केस नसलेला; किंवा माकडाच्या भुवयांसारख्या भुवया असलेला; किंवा अत्यंत मोठे डोळे असलेला; किंवा म्हशीच्या कातड्यावर कुऱ्हाडीच्या कोपऱ्याने मारून केलेल्या छिद्रासारखे अत्यंत लहान डोळे असलेला; किंवा एक डोळा मोठा व एक लहान असलेला विषम डोळ्यांचा असलेला; किंवा एक डोळा वर आणि एक खाली अशा विषम बाहुल्या असलेला; किंवा तिरळा असलेला; किंवा खोल डोळे असलेला, ज्याच्या डोळ्यांच्या बाहुल्या खोल विहिरीतील पाण्याच्या प्रतिबिंबासारख्या दिसतात; किंवा खेकड्याच्या डोळ्यांसारखे बाहेर आलेले डोळे असलेला; किंवा मोठ्या कानशिलांमुळे हत्तीसारखे कान असलेला; किंवा लहान कानशिलांमुळे उंदरासारखे किंवा वटवाघळासारखे कान असलेला; किंवा कानशिले नसून केवळ कानाचे छिद्र असलेला; किंवा कान न टोचलेला असतो. परंतु, यवन (ग्रीक) वंशाचा माणूस कान न टोचलेला असला तरी परिषददूषक मानला जात नाही, कारण तो त्याचा नैसर्गिक स्वभावच असतो. किंवा कानाचा भगंदर असलेला, सतत दुर्गंधीयुक्त कान असलेला; किंवा सतत पू वाहणारा जखम असलेला कान असलेला; याशिवाय, गुरांना चारा देण्याच्या नळीच्या टोकासारखे कान असलेला; किंवा अत्यंत पिवळे (मांजरडोळे) असलेला असतो. परंतु, मधासारखे पिवळे डोळे असलेल्याला प्रव्रजित करणे योग्य आहे. किंवा पापण्यांचे केस नसलेला; किंवा सतत अश्रू वाहणारे डोळे असलेला; किंवा डोळ्यात फूल पडलेला (मोतीबिंदू असलेला); किंवा पापण्यांच्या सुजेने ग्रस्त डोळे असलेला असतो. อติมหนฺตนาสิโก วา อติขุทฺทกนาสิโก วา จิปิฏนาสิโก วา มชฺเฌ อปฺปติฏฺฐหิตฺวา เอกปสฺเส ฐิตวงฺกนาสิโก วา, ทีฆนาสิโก วา สุกตุณฺฑสทิสาย ชิวฺหาย เลหิตุํ สกฺกุเณยฺยาย นาสิกาย สมนฺนาคโต, นิจฺจปคฺฆริตสิงฺฆาณิกนาโส วา. किंवा अत्यंत मोठे नाक असलेला; किंवा अत्यंत लहान नाक असलेला; याशिवाय चपटे नाक असलेला; किंवा मध्यभागी नसून एका बाजूला झुकलेले वाकडे नाक असलेला; किंवा पोपटाच्या चोचीसारखे नाक असलेला किंवा जिभेने चाटता येईल इतके लांब नाक असलेला; किंवा सतत शेंबूड वाहणारे नाक असलेला असतो. มหามุโข วา ยสฺส ปฏงฺคมณฺฑูกสฺเสว มุขนิมิตฺตํเยว มหนฺตํ โหติ, มุขํ ปน ลาพุสทิสํ อติขุทฺทกํ, ภินฺนมุโข วา วงฺกมุโข วา มหาโอฏฺโฐ วา อุกฺขลิมุขวฏฺฏิสทิเสหิ โอฏฺเฐหิ สมนฺนาคโต, ตนุกโอฏฺโฐ วา เภริจมฺมสทิเสหิ ทนฺเต ปิทหิตุํ อสมตฺเถหิ โอฏฺเฐหิ สมนฺนาคโต, มหาธโรฏฺโฐ วา ตนุกอุตฺตโรฏฺโฐ วา ตนุกอธโรฏฺโฐ วา มหาอุตฺตโรฏฺโฐ วา โอฏฺฐฉินฺนโก วา เอฬมุโข วา อุปฺปกฺกมุโข วา สงฺขตุณฺฑโก วา พหิเสเตหิ อนฺโต อติรตฺเตหิ โอฏฺเฐหิ สมนฺนาคโต, ทุคฺคนฺธกุณปมุโข วา. किंवा मोठे तोंड असलेला, ज्याच्या तोंडाचा आकार 'पतंग' नावाच्या बेडकासारखा मोठा असतो, परंतु तोंड मात्र भोपळ्याच्या छिद्रासारखे अत्यंत लहान असते; किंवा दुभंगलेले तोंड असलेला; किंवा वाकडे तोंड असलेला; किंवा मातीच्या मडक्याच्या काठासारखे पसरलेले मोठे ओठ असलेला; किंवा नगाऱ्याच्या चामड्यासारखे दात झाकण्यास असमर्थ असलेले लहान ओठ असलेला; किंवा खालचा ओठ मोठा व वरचा ओठ लहान असलेला; किंवा खालचा ओठ लहान व वरचा ओठ मोठा असलेला; याशिवाय ओठ कापलेला; किंवा सतत लाळ गळणारे तोंड असलेला; किंवा तोंडात फोड आलेला; किंवा बाहेरून पांढरे आणि आतून अत्यंत लाल असलेले शंखासारखे ओठ असलेला; किंवा सडलेल्या शवासारखा दुर्गंधीयुक्त श्वास असलेला असतो. มหาทนฺโต วา อฏฺฐกทนฺตสทิเสหิ ทนฺเตหิ สมนฺนาคโต อสุรทนฺโต วา เหฏฺฐา วา อุปริ วา พหินิกฺขนฺตทนฺโต, ยสฺส ปน สกฺกา โหติ โอฏฺเฐหิ ปิทหิตุํ กเถนฺตสฺเสว ปญฺญายติ โน อกเถนฺตสฺส, ตํ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. ปูติทนฺโต วา นิทฺทนฺโต วา ยสฺส ปน ทนฺตนฺตเร กลนฺทกทนฺโต วิย สุขุมทนฺโต โหติ, ตํ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. किंवा नांगराच्या आठ फाळांसारखे मोठे दात असलेला; किंवा वरचे किंवा खालचे दात बाहेर आलेले राक्षसी दात असलेला असतो. परंतु, जर तो आपले दात ओठांनी झाकू शकत असेल आणि ते केवळ बोलतानाच दिसत असतील, न बोलताना दिसत नसतील, तर त्याला प्रव्रजित करणे योग्य आहे. किंवा सडलेले दात असलेला; किंवा दात नसलेला असतो. परंतु, ज्याच्या दातांच्या मध्ये खारीच्या दातासारखा लहान दात असेल, त्याला प्रव्रजित करणे योग्य आहे. มหาหนุโก วา โคหนุสทิเสน หนุนา สมนฺนาคโต, ทีฆหนุโก วา จิปิฏหนุโก วา อนฺโตปวิฏฺเฐน วิย อติรสฺเสน หนุเกน สมนฺนาคโต, ภินฺนหนุโก วา วงฺกหนุโก วา นิมฺมสฺสุทาฐิโก วา ภิกฺขุนิสทิสมุโข ทีฆคโล วา พกคลสทิเสน คเลน สมนฺนาคโต, รสฺสคโล วา อนฺโตปวิฏฺเฐน วิย คเลน สมนฺนาคโต, ภินฺนคโล วา ภฏฺฐอํสกูโฏ วา อหตฺโถ วา เอกหตฺโถ วา อติรสฺสหตฺโถ [Pg.312] วา อติทีฆหตฺโถ วา ภินฺนอุโร วา ภินฺนปิฏฺฐิ วา กจฺฉุคตฺโต วา กณฺฑุคตฺโต วา ททฺทุคตฺโต วา โคธาคตฺโต วา, ยสฺส โคธาย วิย คตฺตโต จุณฺณานิ ปตนฺติ, สพฺพญฺเจตํ วิรูปกรณํ สนฺธาย วิตฺถาริกวเสน วุตฺตํ. วินิจฺฉโย ปเนตฺถ ‘‘น ภิกฺขเว ปญฺจหิ อาพาเธหี’’ติ เอตฺถ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. किंवा गाईच्या जबड्यासारखा मोठा जबडा असलेला; किंवा लांब जबडा असलेला; किंवा आत गेलेल्या अत्यंत लहान जबड्यामुळे चपटा जबडा असलेला; याशिवाय दुभंगलेला जबडा असलेला; किंवा वाकडा जबडा असलेला; किंवा दाढी-मिशा नसलेला भिक्षुणीसारखा चेहरा असलेला; किंवा बगळ्याच्या मानेसारखी लांब मान असलेला; किंवा आत गेलेल्या मानेसारखी लहान मान असलेला; किंवा वाकडी मान असलेला; किंवा खांदे झुकलेला; किंवा हात नसलेला; किंवा एकच हात असलेला; किंवा अत्यंत लहान हात असलेला; किंवा अत्यंत लांब हात असलेला; किंवा छाती दुभंगलेला; किंवा पाठीचा कणा वाकलेला (कुबडा); किंवा खरूज असलेला; किंवा खाज असलेला; किंवा गजकर्ण असलेला; किंवा घोरपडीसारखी त्वचा असलेला, ज्याच्या शरीरातून घोरपडीसारखे पांढरे पापुद्रे (किंवा कोंडा) गळतात, असा असतो. हे सर्व विद्रूप करणाऱ्या रोगांच्या संदर्भात सविस्तरपणे सांगितले आहे. याविषयीचा निर्णय "न भिक्खवे पञ्चहि आबाधेहि" (भिक्खूंनो, पाच आजार असलेल्यांना उपसंपदा देऊ नये) या नियमात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा. ภฏฺฐกฏิโก วา มหาอานิสโท วา อุทฺธนกูฏสทิเสหิ อานิสทมํเสหิ อจฺจุคฺคเตหิ สมนฺนาคโต, มหาอูรุโก วา วาตณฺฑิโก วา มหาชาณุโก วา สงฺฆฏฺฏนชาณุโก วา ทีฆชงฺโฆ วา ยฏฺฐิสทิสชงฺโฆ วิกโฏ วา ปณฺโห วา อุพฺพทฺธปิณฺฑิโก วา, โส ทุวิโธ เหฏฺฐา โอรุฬฺหาหิ วา อุปริ อารุฬฺหาหิ วา มหตีหิ ชงฺฆปิณฺฑิกาหิ สมนฺนาคโต, มหาชงฺโฆ วา ถูลชงฺฆปิณฺฑิโก วา มหาปาโท วา มหาปณฺหิ วา ปิฏฺฐิกปาโท วา ปาทเวมชฺฌโต อุฏฺฐิตชงฺโฆ วงฺกปาโท วา โส ทุวิโธ – อนฺโต วา พหิ วา ปริวตฺตปาโท คณฺฐิกงฺคุลิ วา สิงฺคิเวรผณสทิสาหิ องฺคุลีหิ สมนฺนาคโต, อนฺธนโข วา กาฬวณฺเณหิ ปูตินเขหิ สมนฺนาคโต, สพฺโพปิ เอส ปริสทูสโก. เอวรูโป ปริสทูสโก น ปพฺพาเชตพฺโพ. लचकलेली कंबर असलेला किंवा मोठे नितंब असलेला (जो चुलीच्या कोनासारख्या वर आलेल्या नितंबाच्या मांसाने युक्त असतो), जाड मांड्या असलेला, अंडवृद्धी (वातवृद्धी) झालेला, मोठे गुडघे असलेला, एकमेकांना घासणारे गुडघे असलेला, लांब नडग्या असलेला, काठीसारख्या नडग्या असलेला, वाकडे पाऊल असलेला, मागे वळलेले पाऊल असलेला किंवा फुगलेल्या पिंडऱ्या असलेला (तो दोन प्रकारचा असतो: खाली उतरलेल्या किंवा वर चढलेल्या मोठ्या पिंडऱ्यांनी युक्त असलेला), मोठ्या नडग्या असलेला, जाड पिंडऱ्या असलेला, मोठे पाय असलेला, मोठ्या टाचा असलेला, पायाच्या मध्यभागातून वर आलेली नडगी असलेला, किंवा वाकडे पाय असलेला (तो दोन प्रकारचा असतो: आत वळलेला किंवा बाहेर वळलेला पाय असलेला), आल्याच्या तुकड्यासारख्या गाठी असलेल्या बोटांनी युक्त असलेला, किंवा काळ्या रंगाची सडलेली नखे असलेला (अंध नखे असलेला) – हे सर्व 'परिषदूषक' (संघाची शोभा बिघडवणारे) आहेत. अशा प्रकारच्या परिषदूषकाला प्रवज्जा देऊ नये. กาโณติ ปสนฺนนฺโธ วา โหตุ ปุปฺผาทีหิ วา อุปหตปสาโท. โย ทฺวีหิ วา เอเกน วา อกฺขินา น ปสฺสติ, โส น ปพฺพาเชตพฺโพ. มหาปจฺจริยํ ปน เอกกฺขิกาโณ กาโณติ วุตฺโต, ทฺวิอกฺขิกาโณ อนฺเธน สงฺคหิโต. มหาอฏฺฐกถายํ ชจฺจนฺโธ อนฺโธติ วุตฺโต, ตสฺมา อุภยมฺปิ ปริยาเยน ยุชฺชติ. กุณีติ หตฺถกุณี วา ปาทกุณี วา องฺคุลิกุณี วา; ยสฺส เอเตสุ หตฺถาทีสุ ยํกิญฺจิ วงฺกํ ปญฺญายติ, โส กุณี นาม. ขญฺโชติ นตชาณุโก วา ภินฺนชงฺโฆ วา มชฺเฌ สงฺกุฏิตปาทตฺตา กุณฺฑปาทโก วา ปิฏฺฐิปาทมชฺเฌน จงฺกมนฺโต อคฺเค สงฺกุฏิตปาทตฺตา กุณฺฑปาทโก วา ปิฏฺฐิปาทคฺเคน จงฺกมนฺโต อคฺคปาเทเนว จงฺกมนขญฺโช วา ปณฺหิกาย จงฺกมนขญฺโช วา ปาทสฺส พาหิรนฺเตน จงฺกมนขญฺโช วา ปาทสฺส อพฺภนฺตรนฺเตน จงฺกมนขญฺโช วา โคปฺผกานํ อุปริ ภคฺคตฺตา สกเลน ปิฏฺฐิปาเทน จงฺกมนขญฺโช วา; สพฺโพเปส ขญฺโชเยว, โส น ปพฺพาเชตพฺโพ. 'काणा' म्हणजे डोळ्याची दृष्टी गेलेला किंवा पू इत्यादींमुळे दृष्टी नष्ट झालेला होय. जो दोन्ही किंवा एका डोळ्याने पाहत नाही, त्याला प्रवज्जा देऊ नये. परंतु 'महाप्रत्यरी' मध्ये एका डोळ्याने अंध असलेल्याला 'काणा' म्हटले आहे आणि दोन्ही डोळ्यांनी अंध असलेल्याचा 'अंध' मध्ये समावेश केला आहे. 'महाअट्ठकथा' मध्ये जन्मांधाला 'अंध' म्हटले आहे, म्हणून दोन्ही मते पर्यायाने योग्य आहेत. 'कुणी' म्हणजे हात लुळा असलेला, पाय लुळा असलेला किंवा बोटे लुळी असलेला होय; ज्याचे हात इत्यादी अवयवांपैकी कोणतेही अवयव वाकडे दिसते, त्याला 'कुणी' म्हणतात. 'खंज' (लंगडा) म्हणजे वाकलेले गुडघे असलेला, किंवा मोडलेली नडगी असलेला, किंवा मध्यभागी पाय आकुंचन पावल्यामुळे पायाच्या पाठीच्या मध्यभागाने चालणारा, किंवा पुढच्या भागात पाय आकुंचन पावल्यामुळे पायाच्या पाठीच्या पुढच्या भागाने चालणारा, किंवा केवळ पायाच्या पुढच्या भागाने लंगडत चालणारा, किंवा टाचेने लंगडत चालणारा, किंवा पायाच्या बाहेरील बाजूने लंगडत चालणारा, किंवा पायाच्या आतील बाजूने लंगडत चालणारा, किंवा घोट्याच्या वरचा भाग मोडल्यामुळे संपूर्ण पायाच्या पाठीने लंगडत चालणारा होय; हे सर्व 'खंज' (लंगडे) आहेत. त्याला प्रवज्जा देऊ नये. ปกฺขหโตติ [Pg.313] ยสฺส เอโก หตฺโถ วา ปาโท วา อฑฺฒสรีรํ วา สุขํ น วหติ. ฉินฺนิริยาปโถติ ปีฐสปฺปิ วุจฺจติ. ชราทุพฺพโลติ ชิณฺณภาเวน ทุพฺพโล อตฺตโน จีวรรชนาทิกมฺมํ กาตุมฺปิ อสมตฺโถ. โย ปน มหลฺลโกปิ พลวา โหติ, อตฺตานํ ปฏิชคฺคิตุํ สกฺโกติ, โส ปพฺพาเชตพฺโพ. อนฺโธติ ชจฺจนฺโธ วุจฺจติ. มูโคติ ยสฺส วจีเภโท นปฺปวตฺตติ; ยสฺสาปิ ปวตฺตติ, สรณคมนํ ปน ปริปุณฺณํ ภาสิตุํ น สกฺโกติ, ตาทิสํ มมฺมนมฺปิ ปพฺพาเชตุํ น วฏฺฏติ. โย ปน สรณคมนมตฺตํ ปริปุณฺณํ ภาสิตุํ สกฺโกติ, ตํ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. 'पक्षघात' (अर्धांगवायू) झालेला म्हणजे ज्याचा एक हात, एक पाय किंवा अर्धे शरीर नीट काम करत नाही. 'छिन्न-इरियापथ' (ज्याची हालचाल खुंटली आहे) त्याला 'पीठसर्पी' (सरपटणारा) म्हटले जाते. 'जरादुर्बल' म्हणजे वृद्धत्वामुळे दुर्बल झालेला, जो स्वतःचे चीवर रंगवणे इत्यादी कामे करण्यासही असमर्थ असतो. परंतु जो वृद्ध असूनही बलवान असतो आणि स्वतःची काळजी घेण्यास समर्थ असतो, त्याला प्रवज्जा द्यावी. 'अंध' जन्मांधाला म्हटले जाते. 'मुका' म्हणजे ज्याची वाचा फुटत नाही; आणि ज्याची वाचा फुटते पण तो शरणगमन पूर्णपणे म्हणू शकत नाही, अशा तोत्र्या (अडखळणाऱ्या) माणसालाही प्रवज्जा देणे योग्य नाही. परंतु जो केवळ शरणगमन पूर्णपणे म्हणू शकतो, त्याला प्रवज्जा देणे योग्य आहे. พธิโรติ โย สพฺเพน สพฺพํ น สุณาติ. โย ปน มหาสทฺทํ สุณาติ, ตํ ปพฺพาเชตุํ วฏฺฏติ. อนฺธมูคาทโย อุภยโทสวเสน วุตฺตา. เยสญฺจ ปพฺพชฺชา ปฏิกฺขิตฺตา, อุปสมฺปทาปิ เตสํ ปฏิกฺขิตฺตาว. สเจ ปน เต สงฺโฆ อุปสมฺปาเทติ, สพฺเพปิ หตฺถจฺฉินฺนาทโย สูปสมฺปนฺนา, การกสงฺโฆ ปน อาจริยุปชฺฌายา จ อาปตฺติโต น มุจฺจนฺติ. วกฺขติ จ – ‘‘อตฺถิ ภิกฺขเว ปุคฺคโล อปฺปตฺโต โอสารณํ, ตญฺเจ สงฺโฆ โอสาเรติ, เอกจฺโจ สุโอสาริโต, เอกจฺโจ ทุโอสาริโต’’ติ ตสฺสตฺโถ อาคตฏฺฐาเนเยว อาวิ ภวิสฺสตีติ. 'बहिरा' म्हणजे जो पूर्णपणे काहीही ऐकू शकत नाही. परंतु जो मोठा आवाज ऐकू शकतो, त्याला प्रवज्जा देणे योग्य आहे. अंध-मुके इत्यादी दोन्ही दोषांच्या आधारे सांगितले आहेत. आणि ज्याची प्रवज्जा वर्ज्य केली आहे, त्यांची उपसंपदा देखील वर्ज्यच आहे. परंतु जर संघाने त्यांना उपसंपदा दिली, तर हात कापलेले इत्यादी सर्वजण योग्य प्रकारे उपसंपन्न होतात, परंतु कर्म करणारा संघ आणि आचार्य व उपाध्याय हे आपत्तीतून मुक्त होत नाहीत. आणि पुढे म्हटले जाईल - 'भिक्खूहो, असा एखादा पुद्गल असतो जो ओसारणा (पुनःप्रवेश) मिळण्यास पात्र नसतो, तरीही जर संघाने त्याला ओसारित केले, तर काही जण सु-ओसारित होतात आणि काही जण दु-ओसारित होतात.' याचा अर्थ ज्या ठिकाणी हा पाठ आला आहे तिथेच स्पष्ट होईल. หตฺถจฺฉินฺนาทิวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. हात कापलेले इत्यादींची वत्थुकथा (कथा) समाप्त झाली. อลชฺชีนิสฺสยวตฺถุกถา अलज्जी-निस्सय-वत्थुकथा ๑๒๐. อลชฺชีนํ นิสฺสาย วสนฺตีติ อุปโยคตฺเถ สามิวจนํ; อลชฺชิปุคฺคเล นิสฺสาย วสนฺตีติ อตฺโถ. ยาว ภิกฺขุสภาคตํ ชานามีติ นิสฺสยทายกสฺส ภิกฺขุโน ภิกฺขูหิ สภาคตํ ลชฺชิภาวํ ยาว ชานามีติ อตฺโถ. ตสฺมา นวํ ฐานํ คเตน ‘‘เอหิ ภิกฺขุ, นิสฺสยํ คณฺหาหี’’ติ วุจฺจมาเนนาปิ จตูหปญฺจาหํ นิสฺสยทายกสฺส ลชฺชิภาวํ อุปปริกฺขิตฺวา นิสฺสโย คเหตพฺโพ. १२०. 'अलज्जींना निश्रय करून राहतात' (अलज्जीनं निस्साय वसन्ति) यामध्ये द्वितीयेच्या अर्थात षष्ठी विभक्ती वापरली आहे; म्हणजेच 'अलज्जी पुद्गलांचा निश्रय करून राहतात' असा अर्थ आहे. 'जोपर्यंत भिक्खूंचे सभागत्व जाणतो' याचा अर्थ निश्रय देणाऱ्या भिक्खूचे इतर भिक्खूंसोबत असलेले सभागत्व म्हणजेच त्याचा लज्जीभाव (शीलवान असणे) जोपर्यंत जाणतो असा अर्थ आहे. म्हणून नवीन ठिकाणी गेलेल्या भिक्खूने 'ये भिक्खू, निश्रय घे' असे म्हटले गेले तरीही, चार-पाच दिवस निश्रय देणाऱ्याच्या लज्जीभावाची परीक्षा करूनच निश्रय घ्यावा. สเจ ‘‘เถโร ลชฺชี’’ติ ภิกฺขูนํ สนฺติเก สุตฺวา อาคตทิวเสเยว คเหตุกาโม โหติ, เถโร ปน ‘‘อาคเมหิ ตาว, วสนฺโต ชานิสฺสสี’’ติ กติปาหํ อาจารํ อุปปริกฺขิตฺวา นิสฺสยํ เทติ, วฏฺฏติ. ปกติยา นิสฺสยคฺคหณฏฺฐานํ คเตน ตทเหว คเหตพฺโพ, เอกทิวสมฺปิ ปริหาโร [Pg.314] นตฺถิ. สเจ ปฐมยาเม อาจริยสฺส โอกาโส นตฺถิ, โอกาสํ อลภนฺโต ‘‘ปจฺจูสสมเย คเหสฺสามี’’ติ สยติ, อรุณํ อุคฺคตมฺปิ น ชานาติ, อนาปตฺติ. สเจ ปน ‘‘คณฺหิสฺสามี’’ติ อาโภคํ อกตฺวา สยติ, อรุณุคฺคมเน ทุกฺกฏํ. อคตปุพฺพํ ฐานํ คเตน ทฺเว ตีณิ ทิวสานิ วสิตฺวา คนฺตุกาเมน อนิสฺสิเตน วสิตพฺพํ. ‘‘สตฺตาหํ วสิสฺสามี’’ติ อาลยํ กโรนฺเตน ปน นิสฺสโย คเหตพฺโพ. สเจ เถโร ‘‘กึ สตฺตาหํ วสนฺตสฺส นิสฺสเยนา’’ติ วทติ, ปฏิกฺขิตฺตกาลโต ปฏฺฐาย ลทฺธปริหาโร โหติ. जर 'थेर शीलवान आहेत' असे भिक्खूंच्या जवळ ऐकून आल्याच्या दिवशीच निश्रय घेण्याची इच्छा असेल, परंतु थेर जर 'तू आधी थांब, राहता राहता तुला समजेल' असे म्हणून काही दिवस त्याच्या आचरणाची परीक्षा करून निश्रय देतात, तर ते योग्य आहे. सामान्यतः निश्रय घेण्याच्या ठिकाणी गेलेल्या भिक्खूने त्याच दिवशी निश्रय घ्यावा, एका दिवसाचीही सूट नाही. जर पहिल्या प्रहरात आचार्यांना वेळ नसेल, आणि वेळ न मिळाल्यामुळे 'मी पहाटेच्या वेळी निश्रय घेईन' असा विचार करून तो झोपला आणि अरुणोदय झाल्याचे त्याला समजले नाही, तर ती अनापत्ती आहे. परंतु जर 'मी निश्रय घेईन' असा विचार न करता तो झोपला, तर अरुणोदयाच्या वेळी दुक्कट दोष होतो. पूर्वी कधीही न गेलेल्या ठिकाणी गेलेल्या आणि दोन-तीन दिवस राहून जाऊ इच्छिणाऱ्या भिक्खूने निश्रय न घेता राहावे. परंतु 'मी सात दिवस राहीन' अशी इच्छा धरणाऱ्याने निश्रय घेतला पाहिजे. जर थेर म्हणाले की, 'सात दिवस राहणाऱ्याला निश्रयाची काय गरज?' तर नकार दिल्या गेलेल्या वेळेपासून त्याला सूट मिळते. อลชฺชีนิสฺสยวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. अलज्जी-निस्सय-वत्थुकथा समाप्त झाली. คมิกาทินิสฺสยวตฺถุกถา गमिकादी-निस्सय-वत्थुकथा ๑๒๑. นิสฺสยกรณีโยติ กรณียนิสฺสโย, กรณีโย มยา นิสฺสโย; คเหตพฺโพติ อตฺโถ. นิสฺสยํ อลภมาเนนาติ อตฺตนา สทฺธึ อทฺธานมคฺคปฺปฏิปนฺเนสุ นิสฺสยทายเก อสติ นิสฺสยํ น ลภติ นาม. เอวํ อลภนฺเตน อนิสฺสิเตน พหูนิปิ ทิวสานิ คนฺตพฺพํ. สเจ ปุพฺเพปิ นิสฺสยํ คเหตฺวา วุตฺถปุพฺพํ กญฺจิ อาวาสํ ปวิสติ, เอกรตฺตํ วสนฺเตนาปิ นิสฺสโย คเหตพฺโพ. อนฺตรามคฺเค วิสฺสมนฺโต วา สตฺถํ ปริเยสนฺโต วา กติปาหํ วสติ, อนาปตฺติ. อนฺโตวสฺเส ปน นิพทฺธวาสํ วสิตพฺพํ, นิสฺสโย จ คเหตพฺโพ. นาวาย คจฺฉนฺตสฺส ปน วสฺสาเน อาคเตปิ นิสฺสยํ อลภนฺตสฺส อนาปตฺติ. १२१. 'निश्रयकरणीय' म्हणजे निश्रय करणे आवश्यक असणे, माझ्याद्वारे निश्रय केला पाहिजे; म्हणजेच निश्रय घेतला पाहिजे असा अर्थ आहे. 'निश्रय न मिळणे' म्हणजे स्वतःसोबत लांबच्या प्रवासाला निघालेल्यांमध्ये निश्रय देणारा कोणी नसल्यामुळे निश्रय न मिळणे होय. अशा प्रकारे निश्रय न मिळाल्यास, निश्रय न घेताही अनेक दिवस प्रवास करता येतो. जर पूर्वी कधी निश्रय घेऊन राहिलेल्या एखाद्या विहारात तो प्रवेश करतो, तर एका रात्रीसाठी राहणाऱ्यानेही निश्रय घेतला पाहिजे. प्रवासाच्या दरम्यान विश्रांती घेत असताना किंवा व्यापारी तांड्याचा शोध घेत असताना काही दिवस राहिल्यास अनापत्ती आहे. परंतु वर्षावासात नियमित निवासस्थानी राहिले पाहिजे आणि निश्रय घेतला पाहिजे. परंतु नौकेने प्रवास करणाऱ्याला वर्षावास आला तरीही निश्रय न मिळाल्यास अनापत्ती आहे. ยาจิยมาเนนาติ เตน คิลาเนน ยาจิยมาเนน อนิสฺสิเตน วสิตพฺพํ. สเจ ‘‘ยาจาหิ ม’’นฺติ วุจฺจมาโนปิ คิลาโน มาเนน น ยาจติ, คนฺตพฺพํ. 'याचना केली असता' म्हणजे त्या आजारी भिक्खूने राहण्यासाठी विनंती केली असता, निश्रय न घेता राहता येते. जर 'मला विनंती कर' असे सांगितले गेले तरीही आजारी भिक्खू गर्वामुळे विनंती करत नसेल, तर निघून जावे. ผาสุ โหตีติ สมถวิปสฺสนานํ ปฏิลาภวเสน ผาสุ โหติ. อิมญฺหิ ปริหารํ เนว โสตาปนฺโน น สกทาคามี อนาคามี อรหนฺโต ลภนฺติ; น ถามคตสฺส สมาธิโน วา วิปสฺสนาย วา ลาภี, วิสฺสฏฺฐกมฺมฏฺฐาเน ปน พาลปุถุชฺชเน กถาว นตฺถิ. ยสฺส โข ปน สมโถ วา วิปสฺสนา วา ตรุโณ โหติ, อยํ อิมํ ปริหารํ ลภติ, ปวารณสงฺคโหปิ เอตสฺเสว อนุญฺญาโต. ตสฺมา อิมินา ปุคฺคเลน อาจริเย ปวาเรตฺวา คเตปิ ‘‘ยทา ปติรูโป นิสฺสยทายโก อาคจฺฉิสฺสติ, ตสฺส นิสฺสาย วสิสฺสามี’’ติ อาโภคํ กตฺวา ปุน ยาว [Pg.315] อาสาฬฺหีปุณฺณมา, ตาว อนิสฺสิเตน วตฺถุํ วฏฺฏติ. สเจ ปน อาสาฬฺหีมาเส อาจริโย นาคจฺฉติ, ยตฺถ นิสฺสโย ลพฺภติ, ตตฺถ คนฺตพฺพํ. ‘फासु होति’ (सुखकारक होते) म्हणजे समथ आणि विपश्यनेच्या प्राप्तीमुळे सुखकारक होते. कारण हा परिहार (नियम पाळण्याची सवलत) सोतापन्न (स्रोतापन्न) मिळवत नाही, सकदागामी, अनागामी आणि अर्हत देखील मिळवत नाहीत; तसेच दृढ समाधी किंवा विपश्यना प्राप्त केलेला साधकही हा मिळवत नाही. परंतु ज्याने कम्मट्ठान (कर्मस्थान) सोडून दिले आहे अशा अज्ञानी पृथग्जनाच्या (बालपुथुज्जन) बाबतीत तर बोलण्याची गरजच नाही. ज्याची समथ किंवा विपश्यना अजून प्राथमिक (तरुण) अवस्थेत आहे, त्यालाच हा परिहार मिळतो आणि पवारणा-संग्रह देखील याच व्यक्तीसाठी अनुज्ञात (मान्य) आहे. म्हणून या साधकाने आचार्यांनी पवारणा करून निघून गेल्यावरही, “जेव्हा योग्य निस्सयदायक (आश्रय देणारे आचार्य) येतील, तेव्हा त्यांच्या आश्रयाने मी राहीन” असा संकल्प करून, पुन्हा आषाढी पौर्णिमेपर्यंत आश्रयाशिवाय राहणे योग्य आहे. परंतु जर आषाढ महिन्यात आचार्य आले नाहीत, तर जेथे निस्सय (आश्रय) मिळतो, तेथे जावे. ๑๒๒. โคตฺเตนปิ อนุสฺสาเวตุนฺติ มหากสฺสปสฺส อุปสมฺปทาเปกฺโขติ เอวํ โคตฺตํ วตฺวา อนุสฺสาเวตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. १२२. ‘गोत्तेनपि अनुस्सावेतुं’ (गोत्राने देखील घोषित करावे) म्हणजे “महाकस्सपांचे उपसंपदापेक्षक (उपसंपदेची इच्छा करणारे)” अशा प्रकारे गोत्राचा (कुळाचा) उल्लेख करून घोषित करण्याची मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. ๑๒๓. ทฺเว เอกานุสฺสาวเนติ ทฺเว เอกโต อนุสฺสาวเน; เอเกน เอกสฺส อญฺเญน อิตรสฺสาติ เอวํ ทฺวีหิ วา อาจริเยหิ เอเกน วา เอกกฺขเณ กมฺมวาจํ อนุสฺสาเวนฺเตหิ อุปสมฺปาเทตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. १२३. ‘द्वे एकानुस्सावने’ (दोघांची एकत्र घोषणा करणे) म्हणजे दोन उमेदवारांची एकत्र घोषणा करणे; एका आचार्याने एकासाठी आणि दुसऱ्या आचार्याने दुसऱ्यासाठी, अशा प्रकारे दोन आचार्यांद्वारे किंवा एकाच आचार्याद्वारे एकाच वेळी (एकाच क्षणी) कम्मवाचा (कर्मवाचा) घोषित करून उपसंपदा देण्याची मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. ทฺเว ตโย เอกานุสฺสาวเน กาตุํ ตญฺจ โข เอเกน อุปชฺฌาเยนาติ ทฺเว วา ตโย วา ชเน ปุริมนเยเนว เอกโต อนุสฺสาวเน กาตุํ อนุชานามิ; ตญฺจ โข อนุสฺสาวนกิริยํ เอเกน อุปชฺฌาเยน อนุชานามีติ อตฺโถ. ตสฺมา เอเกน อาจริเยน ทฺเว วา ตโย วา อนุสฺสาเวตพฺพา. ทฺวีหิ วา ตีหิ วา อาจริเยหิ วิสุํ วิสุํ เอเกน เอกสฺสาติ เอวํ เอกปฺปหาเรเนว ทฺเว ติสฺโส วา กมฺมวาจา กาตพฺพา. สเจ ปน นานาจริยา นานุปชฺฌายา โหนฺติ, ติสฺสตฺเถโร สุมนตฺเถรสฺส สทฺธิวิหาริกํ, สุมนตฺเถโร ติสฺสตฺเถรสฺส สทฺธิวิหาริกํ อนุสฺสาเวติ, อญฺญมญฺญญฺจ คณปูรกา โหนฺติ, วฏฺฏติ. สเจ ปน นานาอุปชฺฌายา โหนฺติ, เอโก อาจริโย โหติ, ‘‘นตฺเวว นานุปชฺฌาเยนา’’ติ ปฏิกฺขิตฺตตฺตา น วฏฺฏติ. อิทํ สนฺธาย หิ เอส ปฏิกฺเขโป. ‘दोघांची किंवा तिघांची एकत्र घोषणा करावी आणि ती एकाच उपाध्यायांच्या उपस्थितीत करावी’ म्हणजे दोन किंवा तीन व्यक्तींची पूर्वोक्त पद्धतीनेच एकत्र घोषणा करण्याची मी अनुमती देतो; आणि ती घोषणा करण्याची क्रिया एकाच उपाध्यायांच्या उपस्थितीत करण्याची मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. म्हणून, एका आचार्याने दोन किंवा तीन उमेदवारांची घोषणा करावी. किंवा दोन अथवा तीन आचार्यांनी स्वतंत्रपणे एकासाठी एक याप्रमाणे एकाच वेळी दोन किंवा तीन कम्मवाचा कराव्यात. परंतु जर वेगवेगळे आचार्य आणि वेगवेगळे उपाध्याय असतील, जसे की तिस्स थेर हे सुमन थेरांच्या सद्धि विहारिकाची (शिष्याची) घोषणा करतात आणि सुमन थेर हे तिस्स थेरांच्या सद्धि विहारिकाची घोषणा करतात, आणि ते एकमेकांचे गणपूरक (संघाची संख्या पूर्ण करणारे) बनतात, तर ते योग्य आहे. परंतु जर वेगवेगळे उपाध्याय असतील आणि आचार्य एकच असेल, तर “वेगवेगळ्या उपाध्यायांच्या बाबतीत असे करू नये” या निषेधामुळे ते योग्य नाही. हा निषेध याच गोष्टीला उद्देशून आहे. คมิกาทินิสฺสยวตฺถุกถา นิฏฺฐิตา. गमिकादी-निस्सय-वस्तूची कथा समाप्त झाली. อุปสมฺปทาวิธิกถา उपसंपदा विधीची कथा ๑๒๖. ปฐมํ อุปชฺฌํ คาหาเปตพฺโพติ เอตฺถ วชฺชาวชฺชํ อุปนิชฺฌายตีติ อุปชฺฌา, ตํ อุปชฺฌํ; ‘‘อุปชฺฌาโย เม ภนฺเต โหหี’’ติ เอวํ วทาเปตฺวา คาหาเปตพฺโพ. วิตฺถายนฺตีติ วิตฺถทฺธคตฺตา โหนฺติ. ยํ ชาตนฺติ ยํ ตว สรีเร ชาตํ นิพฺพตฺตํ วิชฺชมานํ, ตํ สงฺฆมชฺเฌ ปุจฺฉนฺเต สนฺตํ อตฺถีติ วตฺตพฺพนฺติอาทิ. อุลฺลุมฺปตุ มนฺติ อุทฺธรตุ มํ. १२६. ‘प्रथम उपाध्यायांचे ग्रहण करावे’ (उपाध्याय स्वीकारावेत) यामध्ये—जो दोषांकडे आणि गुणांकडे (लहान-मोठ्या दोषांकडे) लक्षपूर्वक पाहतो, तो ‘उपाध्याय’ होय; त्या उपाध्यायांना, “भन्ते, आपण माझे उपाध्याय व्हावे” असे म्हणवून घेऊन उमेदवाराकडून स्वीकारण्यास सांगावे. ‘वित्थायन्ति’ म्हणजे त्यांचे शरीर ताठरलेले असते. ‘यं जातं’ म्हणजे जे तुझ्या शरीरावर उत्पन्न झाले आहे, निर्माण झाले आहे किंवा अस्तित्वात आहे, संघामध्ये विचारले असता, जे अस्तित्वात आहे त्याला “आहे” (अत्थि) असे म्हणावे, इत्यादी. ‘उल्लुम्पतु मं’ म्हणजे माझा उद्धार करा. อุปสมฺปทาวิธิกถา นิฏฺฐิตา. उपसंपदा विधीची कथा समाप्त झाली. จตฺตาโรนิสฺสยาทิกถา चार निस्सय (आश्रय) इत्यादींची कथा ๑๒๘. ตาวเทวาติ [Pg.316] อุปสมฺปนฺนสมนนฺตรเมว. ฉายา เมตพฺพาติ เอกโปริสา วา ทฺวิโปริสา วาติ ฉายา เมตพฺพา. อุตุปฺปมาณํ อาจิกฺขิตพฺพนฺติ ‘‘วสฺสาโน เหมนฺโต คิมฺโห’’ติ เอวํ อุตุปฺปมาณํ อาจิกฺขิตพฺพํ. เอตฺถ จ อุตุเยว อุตุปฺปมาณํ. สเจ วสฺสานาทโย อปริปุณฺณา โหนฺติ, ยตฺตเกหิ ทิวเสหิ ยสฺส โย อุตุ อปริปุณฺโณ, เต ทิวเส สลฺลกฺเขตฺวา โส ทิวสภาโค อาจิกฺขิตพฺโพ. อถ วา ‘‘อยํ นาม อุตุ, โส จ โข ปริปุณฺโณ วา อปริปุณฺโณ วา’’ติ เอวํ อุตุปฺปมาณํ อาจิกฺขิตพฺพํ. ‘‘ปุพฺพณฺโห วา สายนฺโห วา’’ติ เอวํ ทิวสภาโค อาจิกฺขิตพฺโพ. สงฺคีตีติ อิทเมว สพฺพํ เอกโต กตฺวา ‘‘ตฺวํ กึ ลภสิ, กา เต ฉายา, กึ อุตุปฺปมาณํ, โก ทิวสภาโค’’ติ ปุฏฺโฐ ‘‘อิทํ นาม ลภามิ – วสฺสํ วา เหมนฺตํ วา คิมฺหํ วา, อยํ เม ฉายา, อิทํ อุตุปฺปมาณํ, อยํ ทิวสภาโคติ วเทยฺยาสี’’ติ เอวํ อาจิกฺขิตพฺพํ. १२८. ‘तावदेव’ म्हणजे उपसंपदा प्राप्त झाल्याबरोबर लगेचच. ‘छाया मेतब्बा’ (सावली मोजावी) म्हणजे एका पुरुषाच्या उंचीएवढी किंवा दोन पुरुषांच्या उंचीएवढी सावली मोजावी. ‘उतुप्पमाणं आचिक्खितब्बं’ (ऋतूचे प्रमाण सांगावे) म्हणजे “वर्षा ऋतू, हेमंत ऋतू, ग्रीष्म ऋतू” अशा प्रकारे ऋतूचे प्रमाण सांगावे. आणि येथे ऋतू म्हणजेच ऋतूचे प्रमाण होय. जर वर्षा इत्यादी ऋतू अपूर्ण असतील, तर जितक्या दिवसांनी जो ऋतू अपूर्ण आहे, ते दिवस लक्षात घेऊन तो दिवसाचा भाग सांगावा. किंवा “हा अमुक ऋतू आहे आणि तो पूर्ण आहे की अपूर्ण आहे” अशा प्रकारे ऋतूचे प्रमाण सांगावे. “पूर्वाह्न (सकाळ) आहे की सायाह्न (संध्याकाळ) आहे” अशा प्रकारे दिवसाचा भाग सांगावा. ‘संगीती’ म्हणजे या सर्व गोष्टी एकत्र करून, “तुला काय मिळाले? तुझी सावली किती आहे? ऋतूचे प्रमाण काय आहे? दिवसाचा कोणता भाग आहे?” असे विचारले असता, “मला हा अमुक ऋतू मिळाला आहे—वर्षा, हेमंत किंवा ग्रीष्म; ही माझी सावली आहे; हे ऋतूचे प्रमाण आहे; हा दिवसाचा भाग आहे, असे म्हणावे,” अशा प्रकारे सांगावे. ๑๒๙. โอหายาติ ฉฑฺเฑตฺวา. ทุติยํ ทาตุนฺติ อุปสมฺปทมาฬกโต ปริเวณํ คจฺฉนฺตสฺส ทุติยกํ ทาตุํ อนุชานามิ, จตฺตาริ จ อกรณียานิ อาจิกฺขิตุนฺติ อตฺโถ. ปณฺฑุปลาโสติ ปณฺฑุวณฺโณ ปตฺโต. พนฺธนา ปวุตฺโตติ วณฺฏโต ปติโต. อภพฺโพ หริตตฺถายาติ ปุน หริโต ภวิตุํ อภพฺโพ. ปุถุสิลาติ มหาสิลา. १२९. ‘ओहाय’ म्हणजे सोडून (टाकून). ‘दुतियं दातुं’ (दुसरा सोबती देणे) म्हणजे उपसंपदा मंडपातून विहाराच्या आवारात (परिवेणात) जाणाऱ्या नवीन भिक्खूला दुसरा सोबती देण्याची आणि चार अकरणीय (न करण्याजोग्या गोष्टी) सांगण्याची मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. ‘पण्डुपालसो’ म्हणजे पिवळे पडलेले पान. ‘बन्धना पवुत्तो’ म्हणजे देठापासून गळून पडलेले. ‘अभब्बो हरितत्थाय’ म्हणजे पुन्हा हिरवे होण्यास असमर्थ. ‘पुथुसिला’ म्हणजे मोठी शिळा. ๑๓๐. อลพฺภมานาย สามคฺคิยา อนาปตฺติ สมฺโภเค สํวาเสติ ยาว ตสฺส อุกฺเขปนียกมฺมกรณตฺถาย สามคฺคี น ลพฺภติ, ตาว เตน สทฺธึ สมฺโภเค จ อุโปสถปวารณาทิกรณเภเท สํวาเส จ อนาปตฺตีติ. เสสํ สพฺพตฺถ มหาวิภงฺเค วุตฺตานุสาเรน สุวิญฺเญยฺยตฺตา ปากฏเมวาติ. १३०. ‘संघाची एकता न मिळाल्यामुळे संभोग आणि संवासात आपत्ती होत नाही’ म्हणजे जोपर्यंत त्या भिक्खूवर उक्खेपनीय कम्म (बहिष्कार कर्म) करण्यासाठी संघाची एकता मिळत नाही, तोपर्यंत त्याच्यासोबत संभोग (एकत्र उपभोग) आणि उपोसथ, पवारणा इत्यादी कर्मांच्या स्वरूपातील संवासात कोणतीही आपत्ती (दोष) होत नाही. उर्वरित सर्व भाग महाविभंगात सांगितलेल्या पद्धतीनुसार सहज समजण्यासारखा असल्याने स्पष्टच आहे. จตฺตาโรนิสฺสยาทิกถา นิฏฺฐิตา. चार निस्सय (आश्रय) इत्यादींची कथा समाप्त झाली. สมนฺตปาสาทิกาย วินยสํวณฺณนาย समन्तपासादिका नावाच्या विनय-अट्ठकथेमध्ये ทฺวาสตฺตติอธิกวตฺถุสตปฏิมณฺฑิตสฺส มหาขนฺธกสฺส एकशे बहात्तर वस्तूंनी सुशोभित केलेल्या महाखंधकाची อตฺถวณฺณนา นิฏฺฐิตา. अर्थवर्णना समाप्त झाली. มหาขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. महाखंधक-वर्णना समाप्त झाली. ๒. อุโปสถกฺขนฺธกํ २. उपोसथखंधक สนฺนิปาตานุชานนาทิกถา सन्निपात (एकत्र येणे) अनुमती इत्यादींची कथा ๑๓๒. อุโปสถกฺขนฺธเก [Pg.317] – อญฺญติตฺถิยาติ เอตฺถ ติตฺถํ วุจฺจติ ลทฺธิ; อญฺญํ ติตฺถํ อญฺญติตฺถํ; อญฺญติตฺถํ เอเตสํ อตฺถีติ อญฺญติตฺถิยา; อิโต อญฺญลทฺธิกาติ วุตฺตํ โหติ. ธมฺมํ ภาสนฺตีติ ยํ เตสํ กตฺตพฺพากตฺตพฺพํ, ตํ กเถนฺติ. เต ลภนฺตีติ เต มนุสฺสา ลภนฺติ. มูคสูกราติ ถูลสรีรสูกรา. १३२. उपोसथखंधकामध्ये—‘अञ्ञतित्थिया’ (अन्यतीर्थीय) यात ‘तित्थ’ (तीर्थ) म्हणजे मत किंवा पंथ म्हटले जाते; अन्य तीर्थ म्हणजे अन्य पंथ; ज्यांचा पंथ अन्य आहे ते अन्यतीर्थीय होत; या (शासनाव्यतिरिक्त) अन्य मताचे अनुयायी, असा याचा अर्थ आहे. ‘धम्मं भासन्ति’ (धर्माचा उपदेश करतात) म्हणजे जे त्यांचे कर्तव्य आणि अकर्तव्य आहे, ते सांगतात. ‘ते लभन्ति’ म्हणजे ते मनुष्य प्राप्त करतात. ‘मूकसूकरा’ म्हणजे धष्टपुष्ट शरीराचे डुक्कर. ๑๓๕. อนชฺฌาปนฺโน วา โหติ อาปชฺชิตฺวา วา วุฏฺฐิโตติ เอตฺถ ยํ อาปตฺตึ ภิกฺขุ อนชฺฌาปนฺโน วา โหติ, อาปชฺชิตฺวา วา วุฏฺฐิโต, อยํ อสนฺตี นาม อาปตฺตีติ เอวมตฺโถ เวทิตพฺโพ. สมฺปชานมุสาวาเท กึ โหตีติ ยฺวายํ สมฺปชานมุสาวาโท อสฺส โหตีติ วุตฺโต, โส อาปตฺติโต กึ โหติ, กตรา อาปตฺติ โหตีติ อตฺโถ. ทุกฺกฏํ โหตีติ ทุกฺกฏาปตฺติ โหติ; สา จ โข น มุสาวาทลกฺขเณน; ภควโต ปน วจเนน วจีทฺวาเร อกิริยสมุฏฺฐานา อาปตฺติ โหตีติ เวทิตพฺพา. วกฺขติ หิ – १३५. ‘अनापन्न किंवा आपत्तीतून उठलेला असतो’ यामध्ये—ज्या आपत्तीमध्ये भिक्खू अनापन्न (दोष न लागलेला) असतो किंवा आपत्तीत पडून त्यातून मुक्त झालेला असतो, ती ‘असन्ती’ (अविद्यमान) आपत्ती होय, असा अर्थ समजला पाहिजे. ‘जाणूनबुजून खोटे बोलल्यास काय होते?’ म्हणजे जो हा जाणूनबुजून खोटे बोलण्याचा दोष सांगितला आहे, तो आपत्तीच्या दृष्टीने काय होतो, म्हणजे कोणती आपत्ती होते, असा अर्थ आहे. ‘दुक्कट होते’ म्हणजे दुक्कट आपत्ती होते; आणि ती खोटे बोलण्याच्या लक्षणाने होत नाही, तर भगवंतांच्या वचनानुसार, वाचेच्या द्वारे कर्तव्य न करण्यामुळे (अक्रिया-समुत्थानाने) होणारी आपत्ती आहे, असे समजले पाहिजे. कारण पुढे सांगितले जाईल— ‘‘อนาลปนฺโต มนุเชน เกนจิ,วาจาคิรํ โน จ ปเร ภเณยฺย; อาปชฺเชยฺย วาจสิกํ น กายิกํ,ปญฺหา เมสา กุสเลหิ จินฺติตา’’ติ. (ปริ. ๔๗๙); “कोणत्याही मनुष्याशी न बोलता, आणि इतरांना उद्देशून वाणीने शब्द न बोलल्यास, तो वाचेचा दोष प्राप्त करतो, कायेचा नाही; हा प्रश्न विधीत कुशल असलेल्यांनी विचारपूर्वक सोडवला आहे.” อนฺตรายิโกติ อนฺตรายกโร. กิสฺส ผาสุ โหตีติ กิมตฺถาย ผาสุ โหติ. ปฐมสฺส ฌานสฺส อธิคมายาติ ปฐมสฺส ฌานสฺส อธิคมนตฺถาย ตสฺส ภิกฺขุโน ผาสุ โหติ สุขํ โหติ. เอส นโย สพฺพตฺถ. อิติ ภควา อุทฺเทสโต จ นิทฺเทสโต จ ปฐมํ ปาติโมกฺขุทฺเทสํ ทสฺเสสิ. "अंतरायिको" (antarāyiko) म्हणजे अंतराय (अडथळा) निर्माण करणारा. "किस्स फासु होतीति" (kissa phāsu hotīti) म्हणजे कोणत्या हेतूने किंवा कशासाठी सुखकारक (अनुकूल) होते? "पठमस्स झानस्स अधिगमयाति" (paṭhamassa jhānassa adhigamāyāti) म्हणजे पहिल्या ध्यानाच्या (प्रथम ध्यानाच्या) प्राप्तीसाठी त्या भिक्षूला सुखकारक किंवा सुलभ होते. सर्व ठिकाणी हाच नियम (नय) समजावा. अशा प्रकारे भगवंतांनी संक्षेपाने (उद्देशतः) आणि विस्ताराने (निर्देशतः) सर्वप्रथम पातिमोक्ख उद्देश (पातिमोक्खाचे पठण) दर्शविला. ๑๓๖. เทวสิกนฺติ ทิวเส ทิวเส. จาตุทฺทเส วา ปนฺนรเส วาติ เอกสฺส อุตุโน ตติเย จ สตฺตเม จ ปกฺเข ทฺวิกฺขตฺตุํ จาตุทฺทเส อวเสเส ฉกฺขตฺตุํ ปนฺนรเส; อยํ ตาว เอโก อตฺโถ. อยํ ปน ปกติจาริตฺตวเสน [Pg.318] วุตฺโต ‘‘สกึ ปกฺขสฺส จาตุทฺทเส วา ปนฺนรเส วา’’ติ วจนโต ปน ตถารูเป ปจฺจเย สติ ยสฺมึ ตสฺมึ จาตุทฺทเส วา ปนฺนรเส วา อุทฺทิสิตุํ วฏฺฏติ, อาวาสิกานํ ภิกฺขูนํ จาตุทฺทโส โหติ, อาคนฺตุกานํ ปนฺนรโส. สเจ อาวาสิกา พหุตรา โหนฺติ, อาคนฺตุเกหิ อาวาสิกานํ อนุวตฺติตพฺพ’’นฺติ วจนโตปิ เจตํ เวทิตพฺพํ. १३६. "देवसिकं" (devasikaṃ) म्हणजे दररोज (दिवसेंदिवस). "चातुद्दसे वा पन्नरसे वा" (cātuddase vā pannarase vā) म्हणजे एका ऋतूच्या तिसऱ्या आणि सातव्या पक्षात दोन वेळा चौदाव्या दिवशी (चतुर्दशीला) आणि उर्वरित पक्षात सहा वेळा पंधराव्या दिवशी (पौर्णिमेला/अमावास्येला); हा पहिला अर्थ आहे. हा अर्थ सामान्य प्रथेनुसार (प्रकृतीचारित्रानुसार) सांगितला आहे. परंतु, "पक्षात एकदा चौदाव्या किंवा पंधराव्या दिवशी" या वचनानुसार, तशा प्रकारची परिस्थिती (कारण) उद्भवल्यास, कोणत्याही चौदाव्या किंवा पंधराव्या दिवशी पातिमोक्ख पठण करणे योग्य ठरते. "निवासी भिक्षूंसाठी चौदावा दिवस असेल आणि आगंतुक (बाहेरून आलेल्या) भिक्षूंसाठी पंधरावा दिवस असेल. जर निवासी भिक्षू बहुसंख्य असतील, तर आगंतुक भिक्षूंनी निवासी भिक्षूंच्या अनुषंगाने वागावे," या वचनावरूनही हे समजून घ्यावे. สีมานุชานนกถา सीमा अनुज्ञान कथा ๑๓๘. ปฐมํ นิมิตฺตา กิตฺเตตพฺพาติ วินยธเรน ปุจฺฉิตพฺพํ ‘‘ปุรตฺถิมาย ทิสาย กึ นิมิตฺต’’นฺติ? ปพฺพโต ภนฺเตติ. ปุน วินยธเรน ‘‘เอโส ปพฺพโต นิมิตฺต’’นฺติ เอวํ นิมิตฺตํ กิตฺเตตพฺพํ. ‘‘เอตํ ปพฺพตํ นิมิตฺตํ กโรม, กริสฺสาม, นิมิตฺตํ กโต, นิมิตฺตํ โหตุ, โหติ ภวิสฺสตี’’ติ เอวํ ปน กิตฺเตตุํ น วฏฺฏติ. ปาสาณาทีสุปิ เอเสว นโย. ปุรตฺถิมาย อนุทิสาย, ทกฺขิณาย ทิสาย, ทกฺขิณาย อนุทิสาย, ปจฺฉิมาย ทิสาย, ปจฺฉิมาย อนุทิสาย, อุตฺตราย ทิสาย, อุตฺตราย อนุทิสาย, กึ นิมิตฺตํ? อุทกํ ภนฺเต. เอตํ อุทกํ นิมิตฺตนฺติ เอตฺถ ปน อฏฺฐตฺวา ปุน ปุรตฺถิมาย ทิสาย กึ นิมิตฺตํ. ปพฺพโต ภนฺเต. เอโส ปพฺพโต นิมิตฺตนฺติ เอวํ ปฐมํ กิตฺติตนิมิตฺตํ กิตฺเตตฺวาว ฐเปตพฺพํ. เอวญฺหิ นิมิตฺเตน นิมิตฺตํ ฆฏิตํ โหติ. เอวํ นิมิตฺตานิ กิตฺเตตฺวา อถานนฺตรํ วุตฺตาย กมฺมวาจาย สีมา สมฺมนฺนิตพฺพา. กมฺมวาจาปริโยสาเน นิมิตฺตานํ อนฺโต สีมา โหติ, นิมิตฺตานิ สีมโต พหิ โหนฺติ. ตตฺถ นิมิตฺตานิ สกึ กิตฺติตานิปิ กิตฺติตาเนว โหนฺติ. อนฺธกฏฺฐกถายํ ปน ติกฺขตฺตุํ สีมมณฺฑลํ สมฺพนฺธนฺเตน นิมิตฺตํ กิตฺเตตพฺพนฺติ วุตฺตํ. ‘‘ปพฺพโต ภนฺเตติ…เป… อุทกํ ภนฺเต’’ติ เอวํ ปน อุปสมฺปนฺโน วา อาจิกฺขตุ อนุปสมฺปนฺโน วา วฏฺฏติเยว. १३८. "प्रथमं निमित्ता कित्तेतब्बा" (paṭhamaṃ nimittā kittetabbā) म्हणजे प्रथम सीमाचिन्हे (निमित्त) घोषित करावीत. विनयधराने (विनय तज्ज्ञाने) विचारावे, "पूर्व दिशेला कोणते निमित्त (चिन्ह) आहे?" उत्तर द्यावे, "भंते, पर्वत आहे." पुन्हा विनयधराने "हा पर्वत निमित्त आहे" अशा प्रकारे निमित्ताची घोषणा करावी. "आम्ही या पर्वताला निमित्त करतो, करू, निमित्त केले गेले आहे, हा पर्वत निमित्त होवो, निमित्त आहे, निमित्त होईल" अशा प्रकारे घोषणा करणे योग्य नाही. दगड (पाषाण) इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. पूर्व-दक्षिण कोपऱ्यात (आग्नेय दिशेला), दक्षिण दिशेला, दक्षिण-पश्चिम कोपऱ्यात (नैऋत्य दिशेला), पश्चिम洍ेला, पश्चिम-उत्तर कोपऱ्यात (वायव्य दिशेला), उत्तर दिशेला, उत्तर-पूर्व कोपऱ्यात (ईशान्य दिशेला) कोणते निमित्त आहे? "भंते, पाणी आहे." "हे पाणी निमित्त आहे." येथे न थांबता, पुन्हा "पूर्व दिशेला कोणते निमित्त आहे? भंते, पर्वत आहे. हा पर्वत निमित्त आहे" अशा प्रकारे प्रथम घोषित केलेल्या निमित्ताची पुन्हा घोषणा करूनच विनयधराने थांबावे. कारण अशा प्रकारे एका निमित्ताशी दुसरे निमित्त जोडले जाते. अशा प्रकारे निमित्तांची घोषणा केल्यानंतर, लगेचच पाठात सांगितलेल्या कम्मवाचेद्वारे (कर्मवाचेद्वारे) सीमेची संमती (स्थापना) करावी. कम्मवाचेच्या समाप्तीनंतर, निमित्तांच्या आत सीमा (सीमा क्षेत्र) असते आणि निमित्त सीमेच्या बाहेर असतात. तेथे निमित्त एकदाच घोषित केले तरी ते घोषित मानले जाते. परंतु, अंधकअट्ठकथेत (अंधक अट्ठकथा) असे म्हटले आहे की, सीमामंडळ जोडताना निमित्ताची तीन वेळा घोषणा करावी. "भंते, पर्वत आहे... पे... भंते, पाणी आहे" अशा प्रकारे उपसंपन्न (भिक्षू) किंवा अनुपसंपन्न (सामणेर किंवा गृहस्थ) कोणीही निमित्त दाखवले तरी ते योग्यच आहे. อิทานิ ปพฺพตนิมิตฺตาทีสุ เอวํ วินิจฺฉโย เวทิตพฺโพ – ติวิโธ ปพฺพโต, สุทฺธปํสุปพฺพโต, สุทฺธปาสาณปพฺพโต, อุภยมิสฺสโกติ. โส ติวิโธปิ วฏฺฏติ. วาลิกราสิ ปน น วฏฺฏติ. อิตโรปิ หตฺถิปฺปมาณโต โอมกตโร น วฏฺฏติ. หตฺถิปฺปมาณโต ปน ปฏฺฐาย สิเนรุปฺปมาโณปิ วฏฺฏติ. สเจ จตูสุ ทิสาสุ จตฺตาโร ตีสุ วา ตโย ปพฺพตา โหนฺติ, จตูหิ วา ตีหิ วา ปพฺพตนิมิตฺเตหิ เอว สมฺมนฺนิตุํ วฏฺฏติ. ทฺวีหิ ปน นิมิตฺเตหิ เอเกน [Pg.319] วา สมฺมนฺนิตุํ น วฏฺฏติ. อิโต ปเรสุ ปาสาณนิมิตฺตาทีสุปิ เอเสว นโย. ตสฺมา ปพฺพตนิมิตฺตํ กโรนฺเตน ปุจฺฉิตพฺพํ ‘‘เอกาพทฺโธ น เอกาพทฺโธ’’ติ. สเจ เอกาพทฺโธ โหติ, น กาตพฺโพ. ตญฺหิ จตูสุ วา อฏฺฐสุ วา ทิสาสุ กิตฺเตนฺเตนาปิ เอกเมว นิมิตฺตํ กิตฺติตํ โหติ, ตสฺมา โย เอวํ จกฺกสณฺฐาเนน วิหารํ ปริกฺขิปิตฺวา ฐิโต ปพฺพโต, ตํ เอกทิสาย กิตฺเตตฺวา อญฺญาสุ ทิสาสุ ตํ พหิทฺธา กตฺวา อนฺโต อญฺญานิ นิมิตฺตานิ กิตฺเตตพฺพานิ. आता पर्वत-निमित्त इत्यादींच्या बाबतीत असा निर्णय समजून घ्यावा – पर्वत तीन प्रकारचे असतात: केवळ मातीचा पर्वत (मृत्तिका पर्वत), केवळ दगडाचा पर्वत (पाषाण पर्वत) आणि दोन्ही मिश्रित असलेला पर्वत. हे तिन्ही प्रकारचे पर्वत योग्य आहेत. परंतु, वाळूचा ढीग (वाळूची रास) निमित्त म्हणून योग्य नाही. इतर पर्वतही हत्तीच्या आकारापेक्षा लहान असल्यास योग्य नाहीत. हत्तीच्या आकारापासून सुरू करून सुमेरू पर्वताच्या आकारापर्यंतचा पर्वतही निमित्त म्हणून योग्य आहे. जर चार दिशांना चार किंवा तीन दिशांना तीन पर्वत असतील, तर चार किंवा तीन पर्वत-निमित्तांनीच सीमेची स्थापना करणे योग्य आहे. परंतु, दोन निमित्तांनी किंवा एका निमित्ताने सीमेची स्थापना करणे योग्य नाही. यानंतरच्या पाषाण-निमित्त इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. म्हणून, पर्वताला निमित्त करताना विचारले पाहिजे, "हा पर्वत सलग (एकसंध) जोडलेला आहे की नाही?" जर तो सलग जोडलेला असेल, तर त्याला निमित्त करू नये. कारण चार किंवा आठ दिशांना त्याची घोषणा केली तरी ते एकच निमित्त घोषित केल्यासारखे होते. म्हणून, जो पर्वत चक्राकार (वर्तुळाकार) पद्धतीने विहाराला वेढून उभा आहे, त्याची एका दिशेला घोषणा करून, इतर दिशांना तो पर्वत बाहेर ठेवून आत इतर निमित्तांची घोषणा करावी. สเจ ปพฺพตสฺส ตติยภาคํ วา อุปฑฺฒํ วา อนฺโตสีมาย กตฺตุกามา โหนฺติ, ปพฺพตํ อกิตฺเตตฺวา ยตฺตกํ ปเทสํ อนฺโต กตฺตุกามา, ตสฺส ปรโต ตสฺมึเยว ปพฺพเต ชาตรุกฺขวมฺมิกาทีสุ อญฺญตรํ นิมิตฺตํ กิตฺเตตพฺพํ. สเจ เอกโยชนทฺวิโยชนปฺปมาณํ สพฺพํ ปพฺพตํ อนฺโต กตฺตุกามา โหนฺติ, ปพฺพตสฺส ปรโต ภูมิยํ ชาตรุกฺขวมฺมิกาทีนิ นิมิตฺตานิ กิตฺเตตพฺพานิ. जर पर्वताचा एक तृतीयांश (तिसरा भाग) किंवा अर्धा भाग सीमेच्या आत घ्यावयाचा असेल, तर पर्वताची घोषणा न करता, जितका भाग आत घ्यावयाचा आहे, त्याच्या पलीकडे त्याच पर्वतावर उगवलेले झाड, वारूळ इत्यादींपैकी कोणतेही एक निमित्त म्हणून घोषित करावे. जर एक किंवा दोन योजन आकाराचा संपूर्ण पर्वत सीमेच्या आत घ्यावयाचा असेल, तर पर्वताच्या पलीकडे जमिनीवर उगवलेले झाड, वारूळ इत्यादी निमित्त म्हणून घोषित करावेत. ปาสาณนิมิตฺเต – อยคุโฬปิ ปาสาณสงฺขฺยเมว คจฺฉติ, ตสฺมา โย โกจิ ปาสาโณ วฏฺฏติ. ปมาณโต ปน หตฺถิปฺปมาโณ ปพฺพตสงฺขฺยํ คโต, ตสฺมา โส น วฏฺฏติ. มหาโคณมหามหึสปฺปมาโณ ปน วฏฺฏติ. เหฏฺฐิมปริจฺเฉเทน ทฺวตฺตึสปลคุฬปิณฺฑปริมาโณ วฏฺฏติ. ตโต ขุทฺทกตโร อิฏฺฐกา วา มหนฺตีปิ น วฏฺฏติ. อนิมิตฺตุปคปาสาณราสิปิ น วฏฺฏติ, ปเคว ปํสุวาลิกราสิ. ภูมิสโม ขลมณฺฑลสทิโส ปิฏฺฐิปาสาโณ วา ภูมิโต ขาณุโก วิย อุฏฺฐิตปาสาโณ วา โหติ, โสปิ ปมาณุปโค เจ วฏฺฏติ. ปิฏฺฐิปาสาโณ อติมหนฺโตปิ ปาสาณสงฺขฺยเมว คจฺฉติ, ตสฺมา สเจ มหโต ปิฏฺฐิปาสาณสฺส เอกปฺปเทสํ อนฺโตสีมาย กตฺตุกามา โหนฺติ, ตํ อกิตฺเตตฺวา ตสฺสุปริ อญฺโญ ปาสาโณ กิตฺเตตพฺโพ. สเจ ปิฏฺฐิปาสาณุปริ วิหารํ กโรนฺติ, วิหารมชฺเฌน วา ปิฏฺฐิปาสาโณ วินิวิชฺฌิตฺวา คจฺฉติ, เอวรูโป ปิฏฺฐิปาสาโณ น วฏฺฏติ. สเจ หิ ตํ กิตฺเตนฺติ, นิมิตฺตสฺส อุปริ วิหาโร โหติ, นิมิตฺตญฺจ นาม พหิสีมาย โหติ, วิหาโรปิ พหิสีมายํ อาปชฺชติ. วิหารํ ปริกฺขิปิตฺวา ฐิตปิฏฺฐิปาสาโณ เอกตฺถ กิตฺเตตฺวา อญฺญตฺถ น กิตฺเตตพฺโพ. दगडाच्या निमित्ताच्या (पाषाण-निमित्त) बाबतीत – लोखंडाचा गोळा देखील दगडाच्याच संख्येत (वर्गात) येतो, म्हणून कोणताही दगड योग्य ठरतो. परंतु, आकाराच्या दृष्टीने हत्तीच्या आकाराचा दगड पर्वताच्या संख्येत जातो, म्हणून तो योग्य नाही. परंतु, मोठ्या बैलाच्या किंवा मोठ्या म्हशीच्या आकाराचा दगड योग्य ठरतो. किमान मर्यादेनुसार, ३२ पल वजनाच्या गुळाच्या ढेपेच्या आकाराचा दगड योग्य ठरतो. त्यापेक्षा लहान दगड किंवा मोठी वीट देखील योग्य नाही. निमित्त म्हणून अयोग्य असलेल्या दगडांचा ढीग देखील योग्य नाही, मग मातीचा किंवा वाळूचा ढीग तर मुळीच योग्य नाही. जमिनीशी समतल असलेला, खळ्यासमान (कणगीच्या वर्तुळासारखा) असलेला सपाट दगड (पाषाण शिला) किंवा जमिनीतून खुंटासारखा वर आलेला दगड, जर तो योग्य आकाराचा असेल तर योग्य ठरतो. सपाट दगड (पाषाण शिला) अतिशय मोठा असला तरी तो दगडाच्याच संख्येत येतो. म्हणून, जर मोठ्या सपाट दगडाचा एखादा भाग सीमेच्या आत घ्यावयाचा असेल, तर त्याची घोषणा न करता, त्याच्यावर असलेला दुसरा दगड निमित्त म्हणून घोषित करावा. जर सपाट दगडावर विहार बांधला असेल किंवा सपाट दगड विहाराच्या मध्यभागातून आरपार जात असेल, तर असा सपाट दगड योग्य नाही. कारण जर त्याची घोषणा केली, तर निमित्तावर विहार येईल, आणि निमित्त हे सीमेच्या बाहेर असते, त्यामुळे विहार देखील सीमेच्या बाहेर जाईल. विहाराला वेढून असलेला सपाट दगड एका ठिकाणी घोषित केल्यानंतर दुसऱ्या ठिकाणी घोषित करू नये. วนนิมิตฺเต – ติณวนํ วา ตจสารตาลนาฬิเกราทิรุกฺขวนํ วา น วฏฺฏติ. อนฺโตสารานํ ปน สากสาลาทีนํ อนฺโตสารมิสฺสกานํ วา รุกฺขานํ [Pg.320] วนํ วฏฺฏติ, ตญฺจ โข เหฏฺฐิมปริจฺเฉเทน จตุปญฺจรุกฺขมตฺตมฺปิ ตโต โอรํ น วฏฺฏติ, ปรํ โยชนสติกมฺปิ วฏฺฏติ. สเจ ปน วนมชฺเฌ วิหารํ กโรนฺติ, วนํ น กิตฺเตตพฺพํ. เอกเทสํ อนฺโตสีมาย กตฺตุกาเมหิปิ วนํ อกิตฺเตตฺวา ตตฺถ รุกฺขปาสาณาทโย กิตฺเตตพฺพา. วิหารํ ปริกฺขิปิตฺวา ฐิตวนํ เอกตฺถ กิตฺเตตฺวา อญฺญตฺถ น กิตฺเตตพฺพํ. वननिमित्ताच्या (अरण्याच्या) बाबतीत – गवत असलेले वन (कुरण) किंवा बाहेरील सालच ज्यांचे सार आहे अशा ताड, नारळ इत्यादी वृक्षांचे वन (निमित्त म्हणून) योग्य नाही. परंतु, ज्यांच्या आत गाभा (सार) असतो अशा सागवान, साल इत्यादी वृक्षांचे वन किंवा अंतर्गत गाभा असलेल्या वृक्षांनी मिश्रित असलेले वन योग्य आहे. आणि ते वन किमान मर्यादेनुसार कमीत कमी चार किंवा पाच वृक्षांचे असावे, त्यापेक्षा कमी वृक्षांचे वन योग्य नाही; कमाल मर्यादेत शंभर योजन विस्तृत असलेले वनही योग्य आहे. जर वनाच्या मध्यभागी विहार बांधला असेल, तर वनाचा (निमित्त म्हणून) उच्चार करू नये. सीमेच्या आत वनाचा काही भाग समाविष्ट करू इच्छिणाऱ्यांनीही वनाचा उच्चार न करता, तेथील वृक्ष, पाषाण इत्यादींचा उच्चार करावा. विहाराला वेढून असलेल्या वनाचा एका ठिकाणी उच्चार केल्यानंतर दुसऱ्या ठिकाणी उच्चार करू नये. รุกฺขนิมิตฺเต – ตจสาโร ตาลนาฬิเกราทิรุกฺโข น วฏฺฏติ, อนฺโตสาโร ชีวมานโก อนฺตมโส อุพฺเพธโต อฏฺฐงฺคุโล ปริณาหโต สูจิทณฺฑกปฺปมาโณปิ วฏฺฏติ, ตโต โอรํ น วฏฺฏติ, ปรํ ทฺวาทสโยชโน สุปฺปติฏฺฐิตนิคฺโรโธปิ วฏฺฏติ. วํสนฬกสราวาทีสุ พีชํ โรเปตฺวา วฑฺฒาปิโต ปมาณุปโคปิ น วฏฺฏติ. ตโต อปเนตฺวา ปน ตงฺขณมฺปิ ภูมิยํ โรเปตฺวา โกฏฺฐกํ กตฺวา อุทกํ อาสิญฺจิตฺวา กิตฺเตตุํ วฏฺฏติ. นวมูลสาขานิคฺคมนํ อการณํ. ขนฺธํ ฉินฺทิตฺวา โรปิเต ปน เอตํ ยุชฺชติ. กิตฺเตนฺเตน จ ‘‘รุกฺโข’’ติปิ วตฺตุํ วฏฺฏติ, ‘‘สากรุกฺโขติปิ สาลรุกฺโข’’ติปิ. เอกาพทฺธํ ปน สุปฺปติฏฺฐิตนิคฺโรธสทิสํ เอกตฺถ กิตฺเตตฺวา อญฺญตฺถ กิตฺเตตุํ น วฏฺฏติ. वृक्षनिमित्ताच्या बाबतीत – बाहेरील सालच ज्यांचे सार आहे असा ताड, नारळ इत्यादी वृक्ष योग्य नाही. अंतर्गत गाभा असलेला, जिवंत असलेला आणि किमान उंचीने आठ बोटे व परिघाने (गोलाईने) लेखणीच्या (सुईच्या दांड्यासारख्या) आकाराचा असलेला वृक्षही योग्य आहे. त्यापेक्षा लहान वृक्ष योग्य नाही; कमाल मर्यादेत बारा योजन पसरलेला सुप्रतिष्ठित वटवृक्षही योग्य आहे. बांबू, लव्हाळा किंवा मातीचे भांडे इत्यादींमध्ये बी पेरून वाढवलेला आणि योग्य आकाराचा झालेला वृक्षही योग्य नाही. परंतु, तेथून काढून त्याच क्षणी (सीमा निश्चितीच्या वेळी) तो जमिनीत लावून, भोवती मातीचा भराव करून व पाणी घालून त्याचा निमित्त म्हणून उच्चार करणे योग्य आहे. (अशा वृक्षाला) नवीन मुळे आणि फांद्या फुटणे हे (नैसर्गिक वृक्षासाठी) आवश्यक कारण नाही. परंतु, खोड कापून लावलेल्या वृक्षाच्या बाबतीत हे योग्य ठरते. निमित्ताचा उच्चार करताना 'वृक्ष' असाही उच्चार करणे योग्य आहे, किंवा 'सागवान वृक्ष' अथवा 'साल वृक्ष' असाही उच्चार करता येतो. परंतु, सुप्रतिष्ठित वटवृक्षासारख्या एकाच सलग पसरलेल्या वृक्षाचा एका ठिकाणी उच्चार केल्यानंतर दुसऱ्या ठिकाणी उच्चार करणे योग्य नाही. มคฺคนิมิตฺเต – อรญฺญเขตฺตนทีตฬากมคฺคาทโย น วฏฺฏนฺติ, ชงฺฆมคฺโค วา สกฏมคฺโค วา วฏฺฏติ, โย นิพฺพิชฺฌิตฺวา ทฺเว ตีณิ คามนฺตรานิ คจฺฉติ. โย ปน ชงฺฆมคฺโค สกฏมคฺคโต โอกฺกมิตฺวา ปุน สกฏมคฺคเมว โอตรติ, เย วา ชงฺฆมคฺคสกฏมคฺคา อวฬญฺชา, เต น วฏฺฏนฺติ. ชงฺฆสตฺถสกฏสตฺเถหิ วฬญฺชิยมานาเยว วฏฺฏนฺติ. สเจ ทฺเว มคฺคา นิกฺขมิตฺวา ปจฺฉา สกฏธุรมิว เอกีภวนฺติ, ทฺวิธา ภินฺนฏฺฐาเน วา สมฺพนฺธฏฺฐาเน วา สกึ กิตฺเตตฺวา ปุน น กิตฺเตตพฺพา, เอกาพทฺธนิมิตฺตญฺเหตํ โหติ. मार्गनिमित्ताच्या बाबतीत – जंगलातील वाट, शेतातील वाट, नदीकाठचा मार्ग, तलावाचा मार्ग इत्यादी योग्य नाहीत. पादचारी मार्ग (पाऊलवाट) किंवा बैलगाडीचा मार्ग योग्य आहे, जो दोन किंवा तीन गावांना जोडत पुढे जातो. परंतु, जो पादचारी मार्ग बैलगाडीच्या मार्गापासून वेगळा होऊन पुन्हा बैलगाडीच्या मार्गालाच मिळतो, किंवा जे पादचारी मार्ग व बैलगाडीचे मार्ग वापरात नसतात, ते योग्य नाहीत. पादचारी व्यापारी आणि बैलगाडीचे तांडे यांच्याद्वारे सतत वापरात असलेले मार्गच योग्य आहेत. जर दोन मार्ग निघून पुढे जाऊन बैलगाडीच्या जुवाप्रमाणे (किंवा पुढच्या भागाप्रमाणे) एकत्र येत असतील, तर दोन भागात विभागलेल्या ठिकाणी किंवा जोडलेल्या ठिकाणी एकदाच उच्चार करावा, पुन्हा उच्चार करू नये; कारण ते एकच सलग जोडलेले निमित्त असते. สเจ วิหารํ ปริกฺขิปิตฺวา จตฺตาโร มคฺคา จตูสุ ทิสาสุ คจฺฉนฺติ, มชฺเฌ เอกํ กิตฺเตตฺวา อปรํ กิตฺเตตุํ น วฏฺฏติ. เอกาพทฺธนิมิตฺตญฺเหตํ โหติ. โกณํ นิพฺพิชฺฌิตฺวา คตมคฺคํ ปน ปรภาเค กิตฺเตตุํ วฏฺฏติ. วิหารมชฺเฌน นิพฺพิชฺฌิตฺวา คตมคฺโค ปน น กิตฺเตตพฺโพ. กิตฺติเต นิมิตฺตสฺส อุปริ วิหาโร โหติ. สเจ สกฏมคฺคสฺส อนฺติมจกฺกมคฺคํ นิมิตฺตํ กโรนฺติ, มคฺโค พหิสีมาย โหติ. สเจ พาหิรจกฺกมคฺคํ นิมิตฺตํ กโรนฺติ, พาหิรจกฺกมคฺโคว พหิสีมาย โหติ, เสสํ อนฺโตสีมํ ภชติ. มคฺคํ [Pg.321] กิตฺเตนฺเตน ‘‘มคฺโค ปนฺโถ ปโถ ปชฺโช’’ติ ทสสุ เยน เกนจิ นาเมน กิตฺเตตุํ วฏฺฏติ. ปริขาสณฺฐาเนน วิหารํ ปริกฺขิปิตฺวา คตมคฺโค เอกตฺถ กิตฺเตตฺวา อญฺญตฺถ กิตฺเตตุํ น วฏฺฏติ. जर विहाराला वेढून चार मार्ग चार दिशांना जात असतील, तर त्यांच्या मध्यभागी एकाचा उच्चार करून दुसऱ्याचा उच्चार करणे योग्य नाही; कारण ते एकच सलग जोडलेले निमित्त असते. परंतु, विहाराच्या कोपऱ्याला छेदून बाहेर जाणाऱ्या मार्गाचा बाहेरील भागात उच्चार करणे योग्य आहे. विहाराच्या मध्यभागातून छेदून जाणाऱ्या मार्गाचा मात्र निमित्त म्हणून उच्चार करू नये. तसा उच्चार केल्यास निमित्ताच्या वर विहार येईल. जर बैलगाडीच्या मार्गाचा आतील चाकाचा मार्ग (चाकोरी) निमित्त केला, तर संपूर्ण मार्ग सीमेच्या बाहेर राहतो. जर बाहेरील चाकाचा मार्ग निमित्त केला, तर केवळ बाहेरील चाकाचा मार्गच सीमेबाहेर राहतो आणि उर्वरित मार्ग सीमेच्या आत येतो. मार्गाचा उच्चार करताना 'मग्गो', 'पन्थो', 'पथो', 'पज्जो' यांसारख्या (मार्गाच्या) दहा नावांपैकी कोणत्याही एका नावाने उच्चार करणे योग्य आहे. विहाराभोवती खंदकासारखा वेढून गेलेल्या मार्गाचा एका ठिकाणी उच्चार केल्यानंतर दुसऱ्या ठिकाणी उच्चार करणे योग्य नाही. วมฺมิกนิมิตฺเต – เหฏฺฐิมปริจฺเฉเทน ตํ ทิวสํ ชาโต อฏฺฐงฺคุลุพฺเพโธ โควิสาณปฺปมาโณปิ วมฺมิโก วฏฺฏติ, ตโต โอรํ น วฏฺฏติ, ปรํ หิมวนฺตปพฺพตสทิโสปิ วฏฺฏติ. วิหารํ ปริกฺขิปิตฺวา ฐิตํ ปน เอกาพทฺธํ เอกตฺถ กิตฺเตตฺวา อญฺญตฺถ กิตฺเตตุํ น วฏฺฏติ. वारूळनिमित्ताच्या बाबतीत – किमान मर्यादेनुसार त्याच दिवशी तयार झालेले, आठ बोटे उंचीचे आणि गायीच्या शिंगाच्या आकाराचे असलेले वारूळही योग्य आहे. त्यापेक्षा लहान वारूळ योग्य नाही; कमाल मर्यादेत हिमालयासारखे प्रचंड मोठे वारूळही योग्य आहे. परंतु, विहाराला वेढून असलेल्या एकाच सलग जोडलेल्या वारुळाचा एका ठिकाणी उच्चार केल्यानंतर दुसऱ्या ठिकाणी उच्चार करणे योग्य नाही. นทีนิมิตฺเต – ยสฺสา ธมฺมิกานํ ราชูนํ กาเล อนฺวทฺธมาสํ อนุทสาหํ อนุปญฺจาหนฺติ เอวํ อนติกฺกมิตฺวา เทเว วสฺสนฺเต วลาหเกสุ วิคตมตฺเตสุ โสตํ ปจฺฉิชฺชติ, อยํ นทีสงฺขฺยํ น คจฺฉติ. ยสฺสา ปน อีทิเส สุวุฏฺฐิกาเล วสฺสานสฺส จาตุมาเส โสตํ น ปจฺฉิชฺชติ, ติมณฺฑลํ ปฏิจฺฉาเทตฺวา ยตฺถ กตฺถจิ อุตฺตรนฺติยา ภิกฺขุนิยา อนฺตรวาสโก เตมิยติ, อยํ นทีสงฺขฺยํ คจฺฉติ, สีมํ พนฺธนฺตานํ นิมิตฺตํ โหติ. ภิกฺขุนิยา นทีปารคมเนปิ อุโปสถาทิสงฺฆกมฺมกรเณปิ นทีปารสีมสมฺมนฺนเนปิ อยเมว นที. नदीनिमित्ताच्या बाबतीत – ज्या नदीचा प्रवाह, धार्मिक राजांच्या काळात दर पंधरवड्याला, दर दहा दिवसांनी किंवा दर पाच दिवसांनी नियमित पाऊस पडत असतानाही, ढग विरळ होताच खंडित होतो, ती नदी या संज्ञेस पात्र ठरत नाही. परंतु, अशा चांगल्या पावसाच्या काळात वर्षा ऋतूच्या चार महिन्यांत जिचा प्रवाह खंडित होत नाही आणि कोणत्याही ठिकाणी ती नदी पायी ओलांडताना भिक्खुणीचे अंतर्वस्त्र (तिन्ही मंडले म्हणजेच गुडघे व नाभी झाकणारे वस्त्र) ओले होते, ती नदी या संज्ञेस पात्र ठरते आणि सीमा निश्चित करणाऱ्यांसाठी निमित्त बनते. भिक्खुणीने नदीच्या पलीकडच्या तीरावर जाण्याच्या बाबतीत, उपोसथ इत्यादी संघकर्म करण्याच्या बाबतीत आणि नदीपलीकडील सीमेच्या निश्चितीच्या बाबतीत हीच खरी नदी मानली जाते. ยา ปน มคฺโค วิย สกฏธุรสณฺฐาเนน วา ปริขาสณฺฐาเนน วา วิหารํ ปริกฺขิปิตฺวา คตา, ตํ เอกตฺถ กิตฺเตตฺวา อญฺญตฺถ กิตฺเตตุํ น วฏฺฏติ. วิหารสฺส จตูสุ ทิสาสุ อญฺญมญฺญํ วินิพฺพิชฺฌิตฺวา คเต นทิจตุกฺเกปิ เอเสว นโย. อสมฺมิสฺสนทิโย ปน จตสฺโสปิ กิตฺเตตุํ วฏฺฏติ. สเจ วตึ กโรนฺโต วิย รุกฺขปาเท นิขณิตฺวา วลฺลิปลาลาทีหิ นทิโสตํ รุมฺภนฺติ, อุทกญฺจ อชฺโฌตฺถริตฺวา อาวรณํ ปวตฺตติเยว, นิมิตฺตํ กาตุํ วฏฺฏติ. ยถา ปน อุทกํ นปฺปวตฺตติ, เอวํ เสตุมฺหิ กเต อปฺปวตฺตมานา นที นิมิตฺตํ กาตุํ น วฏฺฏติ. ปวตฺตนฏฺฐาเน นทินิมิตฺตํ, อปฺปวตฺตนฏฺฐาเน อุทกนิมิตฺตํ กาตุํ วฏฺฏติ. परंतु, जी नदी एखाद्या मार्गाप्रमाणे बैलगाडीच्या जुवाच्या आकाराने किंवा खंदकाच्या आकाराने विहाराला वेढून वाहते, तिचा एका ठिकाणी उच्चार केल्यानंतर दुसऱ्या ठिकाणी उच्चार करणे योग्य नाही. विहाराच्या चार दिशांना एकमेकांना छेदून वाहणाऱ्या चार नद्यांच्या समूहाच्या बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. मात्र, परस्परांशी न जोडलेल्या चार वेगवेगळ्या नद्यांचा निमित्त म्हणून उच्चार करणे योग्य आहे. जर कुंपण घालण्याप्रमाणे लाकडी खांब जमिनीत रोवून, वेली व पेंढा इत्यादींनी नदीचा प्रवाह अडवला, तरीही पाणी त्या अडथळ्यावरून वाहून पुढे वाहतच राहिले, तर तिला निमित्त करणे योग्य आहे. परंतु, ज्या प्रकारे पाणी अजिबात वाहणार नाही अशा प्रकारे धरण किंवा पूल बांधला गेल्यास, न वाहणारी नदी निमित्त म्हणून वापरणे योग्य नाही. जेथे पाणी वाहत असेल तेथे 'नदीनिमित्त' आणि जेथे पाणी वाहत नसेल तेथे 'जलनिमित्त' (उदकनिमित्त) करणे योग्य आहे. ยา ปน ทุพฺพุฏฺฐิกาเล วา คิมฺเห วา นิรุทกภาเวน นปฺปวตฺตติ, สา วฏฺฏติ. มหานทิโต อุทกมาติกํ นีหรนฺติ, สา กุนฺนทิสทิสา หุตฺวา ตีณิ สสฺสานิ สมฺปาเทนฺตี นิจฺจํ ปวตฺตติ, กิญฺจาปิ ปวตฺตติ, นิมิตฺตํ กาตุํ น วฏฺฏติ. ยา ปน มูเล มหานทิโต นิคฺคตาปิ กาลนฺตเรน เตเนว นิคฺคตมคฺเคน [Pg.322] นทึ ภินฺทิตฺวา สยญฺจ คจฺฉติ, คจฺฉนฺตี ปรโต สุสุมาราทิสมากิณฺณา นาวาทีหิ สญฺจริตพฺพา นที โหติ, ตํ นิมิตฺตํ กาตุํ วฏฺฏติ. परंतु, जी नदी दुष्काळाच्या वेळी किंवा उन्हाळ्यात पाणी नसल्यामुळे वाहत नाही, ती (निमित्त म्हणून) योग्य आहे. मोठ्या नदीतून पाण्याचा कालवा काढतात, तो कालवा लहान नदीसारखा होऊन तीन पिके पिकवण्यास मदत करतो आणि निरंतर वाहत राहतो; तो जरी वाहत असला, तरी त्याला निमित्त करणे योग्य नाही. परंतु, जो कालवा सुरुवातीला मोठ्या नदीतून निघालेला असूनही, काही काळानंतर त्याच प्रवाहमार्गाने मूळ नदीचा काठ फोडून स्वतः स्वतंत्रपणे वाहू लागतो आणि पुढे जाऊन सुसर इत्यादी जलचरांनी युक्त व नौका इत्यादींनी प्रवास करण्यायोग्य नदी बनतो, त्याला निमित्त करणे योग्य आहे. อุทกนิมิตฺเต – นิรุทเก ฐาเน นาวาย วา จาฏิอาทีสุ วา อุทกํ ปูเรตฺวา อุทกนิมิตฺตํ กิตฺเตตุํ น วฏฺฏติ, ภูมิคตเมว วฏฺฏติ. ตญฺจ โข อปฺปวตฺตนอุทกํ อาวาฏโปกฺขรณิตฬากชาตสฺสรโลณิสมุทฺทาทีสุ ฐิตํ, อฏฺฐิตํ ปน โอฆนทิอุทกวาหกมาติกาทีสุ อุทกํ น วฏฺฏติ. อนฺธกฏฺฐกถายํ ปน ‘‘คมฺภีเรสุ อาวาฏาทีสุ อุกฺเขปิมํ อุทกํ นิมิตฺตํ น กาตพฺพ’’นฺติ วุตฺตํ, ตํ ทุวุตฺตํ อตฺตโนมติมตฺตเมว. ฐิตํ ปน อนฺตมโส สูกรขตายปิ คามทารกานํ กีฬนวาปิยมฺปิ ตงฺขณญฺเญว ปถวิยํ อาวาฏกํ กตฺวา กุเฏหิ อาหริตฺวา ปูริตอุทกมฺปิ สเจ ยาว กมฺมวาจาปริโยสานา ติฏฺฐติ, อปฺปํ วา โหตุ พหุ วา, วฏฺฏติ. ตสฺมึ ปน ฐาเน นิมิตฺตสญฺญากรณตฺถํ ปาสาณวาลิกาปํสุอาทิราสิ วา ปาสาณตฺถมฺโภ วา ทารุตฺถมฺโภ วา กาตพฺโพ. ตํ กาตุญฺจ กาเรตุญฺจ ภิกฺขุสฺส วฏฺฏติ. ลาภสีมายํ ปน น วฏฺฏติ. สมานสํวาสกสีมา กสฺสจิ ปีฬนํ น กโรติ, เกวลํ ภิกฺขูนํ วินยกมฺมเมว สาเธติ, ตสฺมา เอตฺถ วฏฺฏติ. जलनिमित्ताच्या बाबतीत – पाणी नसलेल्या ठिकाणी, नावेत किंवा मातीच्या मोठ्या भांड्यात (घड्या इत्यादीत) पाणी भरून त्याला जलनिमित्त म्हणून घोषित करणे योग्य नाही; केवळ भूमीवर असलेले (जमिनीत असलेले) पाणीच निमित्त म्हणून वापरणे योग्य आहे. आणि ते पाणी न वाहणारे (स्थिर) असावे, जे विहीर, पुष्करणी (तळे), तलाव, नैसर्गिक जलाशय (जातस्सर), खाऱ्या पाण्याचा समुद्र इत्यादींमध्ये स्थित आहे. परंतु, न थांबणारे (वाहणारे) पाणी, जसे की पुराचे पाणी, नदीचे पाणी, पाण्याचे पाट किंवा कालवे इत्यादींमधील पाणी निमित्त म्हणून योग्य नाही. अंधक-अट्ठकथेत मात्र असे म्हटले आहे की, 'खोल विहिरी इत्यादींमधून बादलीने उपसलेले पाणी निमित्त म्हणून वापरू नये'; परंतु ते चुकीचे म्हटले आहे, ते केवळ त्यांचे वैयक्तिक मत आहे. याउलट, स्थिर असलेले पाणी, अगदी डुकराने खोदलेल्या खड्ड्यातील पाणी असो किंवा गावातील मुलांच्या खेळण्याच्या तलावातील पाणी असो, किंवा त्याच क्षणी जमिनीत खड्डा करून, घागरीने पाणी आणून भरलेले पाणी असो, जर ते संघकर्माची कम्मवाचा पूर्ण होईपर्यंत टिकून राहिले, तर ते कमी असो वा जास्त, निमित्त म्हणून वापरणे योग्य ठरते. परंतु त्या ठिकाणी निमित्ताची ओळख पटवण्यासाठी दगड, वाळू, माती इत्यादींचा ढीग किंवा दगडाचा खांब किंवा लाकडाचा खांब उभा करावा. ते स्वतः करणे किंवा इतरांकडून करून घेणे भिक्खूला योग्य आहे. परंतु लाभसीमेमध्ये असे करणे भिक्खूला योग्य नाही. समानसंवासक सीमा कोणालाही त्रास देत नाही, ती केवळ भिक्खूंचे विनय कर्मच सिद्ध करते, म्हणून येथे असे करणे योग्य आहे। อิเมหิ จ อฏฺฐหิ นิมิตฺเตหิ อสมฺมิสฺเสหิปิ อญฺญมญฺญํ สมฺมิสฺเสหิปิ สีมํ สมฺมนฺนิตุํ วฏฺฏติเยว. สา เอวํ สมฺมนฺนิตฺวา พชฺฌมานา เอเกน ทฺวีหิ วา นิมิตฺเตหิ อพทฺธา โหติ, ตีณิ ปน อาทึ กตฺวา วุตฺตปฺปการานํ นิมิตฺตานํ สเตนาปิ พทฺธา โหติ. สา ตีหิ สิงฺฆาฏกสณฺฐานา โหติ, จตูหิ จตุรสฺสา วา สิงฺฆาฏกอฑฺฒจนฺทมุทิงฺคาทิสณฺฐานา วา, ตโต อธิเกหิ นานาสณฺฐานา. ตํ พนฺธิตุกาเมหิ สามนฺตวิหาเรสุ ภิกฺขู ตสฺส ตสฺส วิหารสฺส สีมาปริจฺเฉทํ ปุจฺฉิตฺวา, พทฺธสีมวิหารานํ สีมาย สีมนฺตริกํ, อพทฺธสีมวิหารานํ สีมาย อุปจารํ ฐเปตฺวา ทิสาจาริกภิกฺขูนํ นิสฺสญฺจารสมเย สเจ เอกสฺมึ คามเขตฺเต สีมํ พนฺธิตุกามา, เย ตตฺถ พทฺธสีมวิหารา, เตสุ ภิกฺขูนํ ‘‘มยํ อชฺช สีมํ พนฺธิสฺสาม, ตุมฺเห สกสีมาปริจฺเฉทโต มา นิกฺขมิตฺถา’’ติ เปเสตพฺพํ. เย อพทฺธสีมวิหารา, เตสุ ภิกฺขู เอกชฺฌํ สนฺนิปาเตตพฺพา, ฉนฺทารหานํ ฉนฺโท อาหราเปตพฺโพ. สเจ อญฺญานิปิ คามกฺเขตฺตานิ อนฺโตกาตุกามา[Pg.323], เตสุ คาเมสุ เย ภิกฺขู วสนฺติ, เตหิปิ อาคนฺตพฺพํ. อนาคจฺฉนฺตานํ ฉนฺโท อาหริตพฺโพติ มหาสุมตฺเถโร อาห. มหาปทุมตฺเถโร ปน ‘‘นานาคามเขตฺตานิ นาม ปาเฏกฺกํ พทฺธสีมาสทิสานิ, น ตโต ฉนฺทปาริสุทฺธิ อาคจฺฉติ. อนฺโตนิมิตฺตคเตหิ ปน ภิกฺขูหิ อาคนฺตพฺพ’’นฺติ วตฺวา ปุน อาห – ‘‘สมานสํวาสกสีมาสมฺมนฺนนกาเล อาคมนมฺปิ อนาคมนมฺปิ วฏฺฏติ. อวิปฺปวาสสีมาสมฺมนฺนนกาเล ปน อนฺโตนิมิตฺตคเตหิ อาคนฺตพฺพํ, อนาคจฺฉนฺตานํ ฉนฺโท อาหริตพฺโพ’’ติ. आणि या आठ निमित्तांनी, मग ती एकमेकांत न मिसळलेली असोत किंवा परस्परांमध्ये मिसळलेली असोत, सीमा निश्चित करणे योग्यच आहे. अशा प्रकारे निश्चित केली जाणारी सीमा एका किंवा दोन निमित्तांनी बांधली जाऊ शकत नाही (अबद्ध असते), परंतु तीन निमित्तांपासून सुरुवात करून वर सांगितलेल्या प्रकारच्या शंभर निमित्तांनीही ती बांधली जाऊ शकते. ती तीन निमित्तांनी बांधल्यास ती त्रिकोणी आकाराची (शिंगाड्याच्या आकाराची) होते; चार निमित्तांनी बांधल्यास ती चौकोनी किंवा त्रिकोणी, अर्धचंद्राकृती, मृदंगाच्या आकाराची इत्यादी होते; आणि त्यापेक्षा जास्त निमित्तांनी बांधल्यास ती विविध आकारांची होते. ती सीमा बांधण्याची इच्छा असणाऱ्या भिक्खूंनी शेजारच्या विहारांमधील भिक्खूंना त्या त्या विहाराच्या सीमेच्या मर्यादेविषयी विचारून, बद्धसीमा असलेल्या विहारांच्या सीमेमधील अंतराळ (सीमान्तरिक) आणि अबद्धसीमा असलेल्या विहारांच्या सीमेचा परिसर (उपचार) सोडून, दिशाचारी (भटकंती करणाऱ्या) भिक्खूंच्या येण्या-जाण्याची वेळ नसताना, जर त्यांना एकाच ग्रामक्षेत्रात सीमा बांधायची असेल, तर तेथे जे बद्धसीमा असलेले विहार आहेत, त्यांमधील भिक्खूंना 'आम्ही आज सीमा बांधणार आहोत, तुम्ही तुमच्या सीमेच्या मर्यादेबाहेर पडू नका' असा निरोप पाठवावा. जे अबद्धसीमा असलेले विहार आहेत, त्यांमधील भिक्खूंना एका ठिकाणी एकत्र जमवावे आणि जे येण्यास असमर्थ आहेत (छंद देण्यास पात्र आहेत) त्यांचा छंद (संमती) मागवून घ्यावा. जर इतर ग्रामक्षेत्रेही सीमेच्या आत समाविष्ट करायची असतील, तर त्या गावांमध्ये राहणाऱ्या भिक्खूंनीही यावे. जे येत नाहीत त्यांचा छंद आणला पाहिजे, असे महासुमा थेर म्हणाले. परंतु महापदुम थेर म्हणाले की, 'विविध ग्रामक्षेत्रे ही स्वतंत्रपणे बद्धसीमेसारखीच असतात, त्यामुळे तेथून छंदपारिसुद्धि आणण्याची गरज नसते. परंतु निमित्ताच्या आत असलेल्या भिक्खूंनी मात्र आले पाहिजे.' आणि त्यांनी पुन्हा सांगितले की, 'समानसंवासक सीमा निश्चित करताना (इतर ग्रामक्षेत्रातील भिक्खूंचे) येणे किंवा न येणे दोन्ही योग्य आहे. परंतु अविप्पवास सीमा निश्चित करताना मात्र निमित्ताच्या आत असलेल्या भिक्खूंनी आलेच पाहिजे आणि न येणाऱ्यांचा छंद आणला पाहिजे.' เอวํ สนฺนิปติเตสุ ปน ภิกฺขูสุ ฉนฺทารหานํ ฉนฺเท อาหเฏ เตสุ เตสุ มคฺเคสุ นทีติตฺถคามทฺวาราทีสุ จ อาคนฺตุกภิกฺขูนํ สีฆํ สีฆํ หตฺถปาสานยนตฺถญฺจ พหิสีมากรณตฺถญฺจ อารามิเก เจว สมณุทฺเทเส จ ฐเปตฺวา เภริสญฺญํ วา สงฺขสญฺญํ วา กตฺวา นิมิตฺตกิตฺตนานนฺตรํ วุตฺตาย ‘‘สุณาตุ เม ภนฺเต สงฺโฆ’’ติอาทิกาย กมฺมวาจาย สีมา พนฺธิตพฺพา. กมฺมวาจาปริโยสาเนเยว นิมิตฺตานิ พหิ กตฺวา เหฏฺฐา ปถวิสนฺธารกํ อุทกํ ปริยนฺตํ กตฺวา สีมา คตา โหติ. अशा प्रकारे भिक्खू एकत्र जमल्यावर आणि छंद देण्यास पात्र असणाऱ्यांचा छंद आणल्यावर, त्या त्या मार्गांवर, नदीच्या घाटांवर, गावाच्या वेशींवर इत्यादी ठिकाणी येणाऱ्या आगंतुक भिक्खूंना त्वरित हस्तपासात आणण्यासाठी किंवा त्यांना सीमेबाहेर ठेवण्यासाठी आरामिक (विहार सेवक) आणि समणुद्देस (सामणेर) यांना पहऱ्यावर ठेवून, ढोल वाजवून किंवा शंख फुंकून खूण करावी, आणि निमित्तांची घोषणा केल्यानंतर, पाळिमध्ये सांगितलेल्या 'सुणातु मे भन्ते सङ्घो' (भन्ते, संघाने माझे ऐकावे) इत्यादी कम्मवाचेने सीमा बांधावी. कम्मवाचेच्या समाप्तीनंतरच निमित्तांना बाहेर ठेवून, खाली पृथ्वीला आधार देणाऱ्या पाण्याला मर्यादा मानून सीमा प्रस्थापित होते. อิมํ ปน สมานสํวาสกสีมํ สมฺมนฺนนฺเตหิ ปพฺพชฺชุปสมฺปทาทีนํ สงฺฆกมฺมานํ สุขกรณตฺถํ ปฐมํ ขณฺฑสีมา พนฺธิตพฺพา. ตํ ปน พนฺธนฺเตหิ วตฺตํ ชานิตพฺพํ. สเจ หิ โพธิเจติยภตฺตสาลาทีนิ สพฺพวตฺถูนิ ปติฏฺฐาเปตฺวา กตวิหาเร พนฺธนฺติ, วิหารมชฺเฌ พหูนํ สโมสรณฏฺฐาเน อพนฺธิตฺวา วิหารปจฺจนฺเต วิวิตฺโตกาเส พนฺธิตพฺพา. อกตวิหาเร พนฺธนฺเตหิ โพธิเจติยาทีนํ สพฺพวตฺถูนํ ฐานํ สลฺลกฺเขตฺวา ยถา ปติฏฺฐิเตสุ วตฺถูสุ วิหารปจฺจนฺเต วิวิตฺโตกาเส โหติ, เอวํ พนฺธิตพฺพา. สา เหฏฺฐิมปริจฺเฉเทน สเจ เอกวีสติ ภิกฺขู คณฺหาติ, วฏฺฏติ. ตโต โอรํ น วฏฺฏติ, ปรํ ภิกฺขุสหสฺสํ คณฺหนฺตีปิ วฏฺฏติ. ตํ พนฺธนฺเตหิ สีมามาฬกสฺส สมนฺตา นิมิตฺตุปคา ปาสาณา ฐเปตพฺพา, น ขณฺฑสีมาย ฐิเตหิ มหาสีมา พนฺธิตพฺพา, น มหาสีมาย ฐิเตหิ ขณฺฑสีมา, ขณฺฑสีมายเมว ปน ฐตฺวา ขณฺฑสีมา พนฺธิตพฺพา, มหาสีมายเมว ฐตฺวา มหาสีมา. ही समानसंवासक सीमा निश्चित करणाऱ्यांनी, प्रवज्जा, उपसंपदा इत्यादी संघकर्मे सुलभतेने करण्यासाठी, प्रथम खंडसीमा बांधावी. ती बांधताना योग्य पद्धत (नियम) माहीत असावी. जर बोधिवृक्ष, चैत्य, भोजनशाळा इत्यादी सर्व वास्तूंची स्थापना करून तयार केलेल्या विहारात ती बांधायची असेल, तर विहाराच्या मध्यभागी जेथे अनेक भिक्खू एकत्र जमतात अशा ठिकाणी न बांधता, विहाराच्या एका कोपऱ्यात शांत व निर्जन ठिकाणी ती बांधावी. अद्याप न बांधलेल्या विहारात ती बांधताना, बोधिवृक्ष, चैत्य इत्यादी सर्व वास्तूंच्या जागा निश्चित करून, जेणेकरून त्या वास्तूंची स्थापना झाल्यावरही ती सीमा विहाराच्या कोपऱ्यात शांत व निर्जन ठिकाणी राहील, अशा प्रकारे ती बांधावी. ती सीमा किमान मर्यादेनुसार जर २१ भिक्खूंना सामावून घेऊ शकत असेल, तर ती योग्य आहे. त्यापेक्षा कमी क्षमतेची सीमा योग्य नाही, परंतु त्यापेक्षा जास्त, अगदी हजार भिक्खूंना सामावून घेणारी असली तरीही योग्य आहे. ती बांधताना सीमा-माळकाच्या सभोवताली निमित्त म्हणून वापरता येतील असे दगड ठेवावेत. खंडसीमेमध्ये उभे राहून महासीमा बांधू नये, आणि महासीमेमध्ये उभे राहून खंडसीमा बांधू नये. तर खंडसीमेतच उभे राहून खंडसीमा बांधावी, आणि महासीमेतच उभे राहून महासीमा बांधावी. ตตฺรายํ พนฺธนวิธิ – สมนฺตา ‘‘เอโส ปาสาโณ นิมิตฺต’’นฺติ เอวํ นิมิตฺตานิ กิตฺเตตฺวา กมฺมวาจาย สีมา สมฺมนฺนิตพฺพา. อถ ตสฺสา เอว ทฬฺหีกมฺมตฺถํ อวิปฺปวาสกมฺมวาจา กาตพฺพา. เอวญฺหิ สีมํ สมูหนิสฺสามาติ อาคตา [Pg.324] สมูหนิตุํ น สกฺขิสฺสนฺติ. สีมํ สมฺมนฺนิตฺวา พหิสีมนฺตริกปาสาณา ฐเปตพฺพา. สีมนฺตริกา ปจฺฉิมโกฏิยา เอกรตนปฺปมาณา วฏฺฏติ. วิทตฺถิปฺปมาณาปิ วฏฺฏตีติ กุรุนฺทิยํ, จตุรงฺคุลปฺปมาณาปิ วฏฺฏตีติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. สเจ ปน วิหาโร มหา โหติ, ทฺเวปิ ติสฺโสปิ ตตุตฺตริปิ ขณฺฑสีมาโย พนฺธิตพฺพา. त्यामध्ये सीमा बांधण्याची पद्धत अशी आहे – सभोवताली 'हा दगड निमित्त आहे' अशा प्रकारे निमित्तांची घोषणा करून कम्मवाचेद्वारे सीमा निश्चित करावी. त्यानंतर ती सीमा अधिक दृढ करण्यासाठी अविप्पवास कम्मवाचा म्हणावी. कारण असे केल्यास, 'आम्ही ही सीमा नष्ट करू' या विचाराने आलेले (शत्रू भिक्खू) ती नष्ट करू शकणार नाहीत. सीमा निश्चित केल्यानंतर सीमेच्या बाहेर सीमान्तरिक (दोन सीमांमधील अंतर दर्शवणारे) दगड ठेवावेत. सीमान्तरिक अंतिम मर्यादेनुसार एक हात प्रमाणाची असावी, ती योग्य आहे. ती एक वीत प्रमाणाची असली तरीही योग्य आहे, असे 'कुरुन्दी' अट्ठकथेत म्हटले आहे. ती चार बोटे प्रमाणाची असली तरीही योग्य आहे, असे 'महापच्चरी' अट्ठकथेत म्हटले आहे. जर विहार मोठा असेल, तर दोन, तीन किंवा त्याहून अधिक खंडसीमा देखील बांधता येतात। เอวํ ขณฺฑสีมํ สมฺมนฺนิตฺวา มหาสีมาสมฺมุติกาเล ขณฺฑสีมโต นิกฺขมิตฺวา มหาสีมาย ฐตฺวา สมนฺตา อนุปริยายนฺเตหิ สีมนฺตริกปาสาณา กิตฺเตตพฺพา. ตโต อวเสสนิมิตฺตานิ กิตฺเตตฺวา หตฺถปาสํ อวิชหนฺเตหิ กมฺมวาจาย สมานสํวาสกสีมํ สมฺมนฺนิตฺวา ตสฺสา ทฬฺหีกมฺมตฺถํ อวิปฺปวาสกมฺมวาจาปิ กาตพฺพา. เอวญฺหิ ‘‘สีมํ สมูหนิสฺสามา’’ติ อาคตา สมูหนิตุํ น สกฺขิสฺสนฺติ. สเจ ปน ขณฺฑสีมาย นิมิตฺตานิ กิตฺเตตฺวา ตโต สีมนฺตริกาย นิมิตฺตานิ กิตฺเตตฺวา มหาสีมาย นิมิตฺตานิ กิตฺเตนฺติ, เอวํ ตีสุ ฐาเนสุ นิมิตฺตานิ กิตฺเตตฺวา ยํ สีมํ อิจฺฉนฺติ, ตํ ปฐมํ พนฺธิตุํ วฏฺฏติ. เอวํ สนฺเตปิ ยถาวุตฺเตนเยน ขณฺฑสีมโตว ปฏฺฐาย พนฺธิตพฺพา. เอวํ พทฺธาสุ ปน สีมาสุ ขณฺฑสีมาย ฐิตา ภิกฺขู มหาสีมาย กมฺมํ กโรนฺตานํ น โกเปนฺติ, มหาสีมาย วา ฐิตา ขณฺฑสีมาย กมฺมํ กโรนฺตานํ สีมนฺตริกาย ปน ฐิตา อุภินฺนมฺปิ น โกเปนฺติ. คามเขตฺเต ฐตฺวา กมฺมํ กโรนฺตานํ ปน สีมนฺตริกาย ฐิตา โกเปนฺติ. สีมนฺตริกา หิ คามเขตฺตํ ภชติ. अशा प्रकारे खंडसीमा संमत करून, महासीमा संमत करण्याच्या वेळी खंडसीमेतून बाहेर पडून महासीमेत (किंवा महासीमा संमत करावयाच्या जागेत) उभे राहून, सभोवताली अनुक्रमे फिरत असताना सीमंतरीक (सीमेच्या अंतराळातील) दगडांची घोषणा करावी. त्यानंतर उर्वरित महासीमेच्या निमित्तांची (चिन्हांची) घोषणा करून, हस्तपास न सोडता कम्मवाचेद्वारे समानसंवासक महासीमा संमत करावी आणि तिच्या दृढीकरणासाठी अविप्पवास कम्मवाचा देखील करावी. कारण अशा प्रकारे (अविप्पवास कम्मवाचा) केली असता, "आम्ही सीमा नष्ट करू" अशा विचाराने आलेले विरोधी भिक्खू ती सीमा नष्ट करण्यास समर्थ होणार नाहीत. परंतु जर खंडसीमेच्या निमित्तांची घोषणा करून, त्यानंतर सीमंतरीकेच्या निमित्तांची घोषणा करून, महासीमेच्या निमित्तांची घोषणा केली, तर अशा प्रकारे तीनही ठिकाणी निमित्तांची घोषणा करून ज्या सीमेला बांधण्याची त्यांची इच्छा आहे, ती आधी बांधणे योग्य आहे. असे असले तरी, वर सांगितलेल्या पद्धतीने खंडसीमेपासूनच सुरुवात करून ती बांधावी. अशा प्रकारे सीमा बांधल्या गेल्यावर, खंडसीमेत असलेले भिक्खू महासीमेत कम्म करणाऱ्या भिक्खूंच्या कम्माला बाधा आणत नाहीत, किंवा महासीमेत असलेले भिक्खू खंडसीमेत कम्म करणाऱ्यांच्या कम्माला बाधा आणत नाहीत; आणि सीमंतरीकेत असलेले भिक्खू तर दोन्ही बाजूंच्या कम्माला बाधा आणत नाहीत. परंतु ग्रामक्षेत्रात उभे राहून कम्म करणाऱ्यांच्या कम्माला सीमंतरीकेत असलेले भिक्खू बाधा आणतात. कारण सीमंतरीका ही ग्रामक्षेत्राशी जोडलेली असते (किंवा ग्रामक्षेत्राचाच भाग बनते)। สีมา จ นาเมสา น เกวลํ ปถวิตเลเยว พทฺธา พทฺธา นาม โหติ. อถ โข ปิฏฺฐิปาสาเณปิ กุฏิเคเหปิ เลเณปิ ปาสาเทปิ ปพฺพตมตฺถเกปิ พทฺธา พทฺธาเยว โหติ. ตตฺถ ปิฏฺฐิปาสาเณ พนฺธนฺเตหิ ปาสาณปิฏฺฐิยํ ราชึ วา โกฏฺเฏตฺวา อุทุกฺขลํ วา ขณิตฺวา นิมิตฺตํ น กาตพฺพํ, นิมิตฺตุปคปาสาเณ ฐเปตฺวา นิมิตฺตานิ กิตฺเตตพฺพานิ. กมฺมวาจาปริโยสาเน สีมา ปถวิสนฺธารกํ อุทกํ ปริยนฺตํ กตฺวา โอตรติ. นิมิตฺตปาสาณา ยถาฐาเน น ติฏฺฐนฺติ, ตสฺมา สมนฺตโต ราชิ วา อุฏฺฐาเปตพฺพา, จตูสุ วา โกเณสุ ปาสาณา วิชฺฌิตพฺพา, ‘‘อยํ สีมาปริจฺเฉโท’’ติ วตฺวา อกฺขรานิ วา ฉินฺทิตพฺพานิ. เกจิ อุสูยกา สีมํ ฌาเปสฺสามาติ อคฺคึ เทนฺติ, ปาสาณาว ฌายนฺติ, น สีมา. आणि ही सीमा नावाची गोष्ट केवळ जमिनीवरच बांधली असता बांधली गेली असे होत नाही; तर सपाट खडकावर, कुटीमध्ये, लेण्यात (गुहेत), प्रासादात (महालात) आणि पर्वताच्या शिखरावर देखील बांधली असता ती बांधली गेलेलीच असते. त्यापैकी सपाट खडकावर सीमा बांधणाऱ्यांनी खडकाच्या पृष्ठभागावर रेषा कोरून किंवा खड्डा खणून निमित्त (चिन्ह) बनवू नये; तर निमित्त म्हणून योग्य असलेले दगड त्यावर ठेवून निमित्तांची घोषणा करावी. कम्मवाचेच्या समाप्तीनंतर सीमा पृथ्वीला धारण करणाऱ्या पाण्यापर्यंत खाली उतरते. निमित्त म्हणून ठेवलेले दगड आपल्या मूळ जागी कायम राहत नाहीत, म्हणून सभोवताली रेषा स्पष्ट करावी किंवा चारही कोपऱ्यांतील दगड कोरून घ्यावेत आणि "ही सीमेची मर्यादा आहे" असे लिहून अक्षरे कोरून ठेवावीत. काही द्वेषी लोक "आम्ही सीमा जाळून टाकू" असे म्हणून आग लावतात, पण केवळ दगडच जळतात, सीमा जळत नाही। กุฏิเคเหปิ [Pg.325] พนฺธนฺเตหิ ภิตฺตึ อกิตฺเตตฺวา เอกวีสติยา ภิกฺขูนํ โอกาสฏฺฐานํ อนฺโต กริตฺวา ปาสาณนิมิตฺตานิ ฐเปตฺวา สีมา สมฺมนฺนิตพฺพา, อนฺโตกุฏฺฏเมว สีมา โหติ. สเจ อนฺโตกุฏฺเฏ เอกวีสติยา ภิกฺขูนํ โอกาโส นตฺถิ, ปมุเข นิมิตฺตปาสาเณ ฐเปตฺวา สมฺมนฺนิตพฺพา. สเจ เอวมฺปิ นปฺปโหติ, พหินิพฺโพทกปตนฏฺฐาเนปิ นิมิตฺตานิ ฐเปตฺวา สมฺมนฺนิตพฺพา. เอวํ สมฺมตาย ปน สพฺพํ กุฏิเคหํ สีมฏฺฐเมว โหติ. कुटीमध्ये देखील सीमा बांधणाऱ्यांनी भिंतीची घोषणा न करता, एकवीस भिक्खूंना बसण्यासाठी पुरेशी जागा आत घेऊन, दगडांची निमित्ते ठेवून सीमा संमत करावी; अशा वेळी भिंतीच्या आतील भागच सीमा बनते. जर भिंतीच्या आत एकवीस भिक्खूंना बसण्यासाठी जागा नसेल, तर कुटीच्या समोरील भागात (ओसरीवर) निमित्त म्हणून दगड ठेवून सीमा संमत करावी. जर अशानेही जागा पुरेशी नसेल, तर बाहेर छपराचे पाणी पडण्याच्या जागी देखील निमित्त ठेवून सीमा संमत करावी. अशा प्रकारे संमत केली असता, ती संपूर्ण कुटी सीमेच्या आतच येते। จตุภิตฺติยเลเณปิ พนฺธนฺเตหิ กุฏฺฏํ อกิตฺเตตฺวา ปาสาณาว กิตฺเตตพฺพา. สเจ อนฺโต โอกาโส นตฺถิ, ปมุเขปิ นิมิตฺตานิ ฐเปตพฺพานิ. สเจ นปฺปโหติ, พหิ นิพฺโพทกปตนฏฺฐาเนปิ นิมิตฺตปาสาเณ ฐเปตฺวา นิมิตฺตานิ กิตฺเตตฺวา สีมา สมฺมนฺนิตพฺพา. เอวํ เลณสฺส อนฺโต จ พหิ จ สีมา โหติ. चार भिंती असलेल्या लेण्यात (गुहेत) देखील सीमा बांधणाऱ्यांनी भिंतीची घोषणा न करता, दगडांचीच घोषणा करावी. जर आत जागा नसेल, तर समोरील भागात देखील निमित्त ठेवावे. जर जागा पुरेशी नसेल, तर बाहेर छपराचे पाणी पडण्याच्या जागी देखील निमित्त म्हणून दगड ठेवून, निमित्तांची घोषणा करून सीमा संमत करावी. अशा प्रकारे लेण्याच्या आत आणि बाहेर देखील सीमा बनते। อุปริปาสาเทปิ ภิตฺตึ อกิตฺเตตฺวา อนฺโต ปาสาเณ ฐเปตฺวา สีมา สมฺมนฺนิตพฺพา. สเจ นปฺปโหติ, ปมุเขปิ ปาสาเณ ฐเปตฺวา สมฺมนฺนิตพฺพา. เอวํ สมฺมตา อุปริปาสาเทเยว โหติ, เหฏฺฐา น โอตรติ. สเจ ปน พหูสุ ถมฺเภสุ ตุลานํ อุปริ กตปาสาทสฺส เหฏฺฐิมตเล กุฏฺโฏ ยถา นิมิตฺตานํ อนฺโต โหติ, เอวํ อุฏฺฐหิตฺวา ตุลารุกฺเขหิ เอกสมฺพทฺโธ ฐิโต, เหฏฺฐาปิ โอตรติ. เอกถมฺภปาสาทสฺส ปน อุปริมตเล พทฺธา สีมา สเจ ถมฺภมตฺถเก เอกวีสติยา ภิกฺขูนํ โอกาโส โหติ, เหฏฺฐา โอตรติ. สเจ ปาสาทภิตฺติโต นิคฺคเตสุ นิยฺยูหกาทีสุ ปาสาเณ ฐเปตฺวา สีมํ พนฺธนฺติ, ปาสาทภิตฺติ อนฺโตสีมายํ โหติ. เหฏฺฐา ปนสฺสา โอตรณาโนตรณํ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. เหฏฺฐาปาสาเท กิตฺเตนฺเตหิปิ ภิตฺติ จ รุกฺขตฺถมฺภา จ น กิตฺเตตพฺพา. ภิตฺติลคฺเค ปน ปาสาณตฺถมฺเภ กิตฺเตตุํ วฏฺฏติ. เอวํ กิตฺติตา สีมา เหฏฺฐา ปาสาทสฺส ปริยนฺตถมฺภานํ อนฺโตเยว โหติ. สเจ ปน เหฏฺฐาปาสาทสฺส กุฑฺโฑ อุปริมตเลน สมฺพทฺโธ โหติ, อุปริปาสาทมฺปิ อภิรุหติ. สเจ ปาสาทสฺส พหิ นิพฺโพทกปตนฏฺฐาเน นิมิตฺตานิ กโรนฺติ, สพฺโพ ปาสาโท สีมฏฺโฐ โหติ. प्रासादाच्या (महालाच्या) वरच्या मजल्यावर देखील भिंतीची घोषणा न करता, आत दगड ठेवून सीमा संमत करावी. जर जागा पुरेशी नसेल, तर समोरील भागात देखील दगड ठेवून सीमा संमत करावी. अशा प्रकारे संमत केलेली सीमा प्रासादाच्या वरच्या मजल्यावरच राहते, खाली उतरत नाही. परंतु जर अनेक खांबांवर तुळयांच्या वर बांधलेल्या प्रासादाच्या खालच्या मजल्यावरील भिंत, जशी निमित्तांच्या आत येईल तशी उभी राहून, तुळयांच्या लाकडांशी जोडलेली असेल, तर ती खाली देखील उतरते. परंतु एका खांबावर बांधलेल्या प्रासादाच्या वरच्या मजल्यावर बांधलेली सीमा, जर खांबाच्या वरच्या टोकावर एकवीस भिक्खूंना बसण्यासाठी जागा असेल, तर खाली उतरते. जर प्रासादाच्या भिंतीतून बाहेर आलेल्या सज्जा (किंवा हस्तिदंती कोरीव कामांवर) इत्यादींवर दगड ठेवून सीमा बांधतात, तर प्रासादाची भिंत सीमेच्या आत येते. परंतु तिचे खाली उतरणे किंवा न उतरणे वर सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावे. खालच्या मजल्यावर निमित्तांची घोषणा करणाऱ्यांनी देखील भिंत आणि लाकडी खांब यांची घोषणा करू नये. परंतु भिंतीला लागून असलेल्या दगडाच्या खांबांची घोषणा करणे योग्य आहे. अशा प्रकारे घोषित केलेली सीमा खाली प्रासादाच्या शेवटच्या खांबांच्या आतच राहते. परंतु जर खालच्या मजल्यावरील भिंत वरच्या मजल्याशी जोडलेली असेल, तर ती वरच्या मजल्यावर देखील चढते. जर प्रासादाच्या बाहेर छपराचे पाणी पडण्याच्या जागी निमित्त बनवतात, तर संपूर्ण प्रासाद सीमेच्या आत येतो। ปพฺพตมตฺถเก [Pg.326] ตลํ โหติ เอกวีสติยา ภิกฺขูนํ โอกาสารหํ, ตตฺถ ปิฏฺฐิปาสาเณ วิย สีมํ พนฺธนฺติ. เหฏฺฐาปพฺพเตปิ เตเนว ปริจฺเฉเทน สีมา โอตรติ. ตาลมูลกปพฺพเตปิ อุปริ สีมา พทฺธา เหฏฺฐา โอตรเตว. โย ปน วิตานสณฺฐาโน โหติ, อุปริ เอกวีสติยา ภิกฺขูนํ โอกาโส อตฺถิ, เหฏฺฐา นตฺถิ, ตสฺส อุปริ พทฺธา สีมา เหฏฺฐา น โอตรติ. เอวํ มุทิงฺคสณฺฐาโน วา โหตุ ปณวสณฺฐาโน วา, ยสฺส เหฏฺฐา วา มชฺเฌ วา สีมปฺปมาณํ นตฺถิ, ตสฺสุปริ พทฺธา สีมา เหฏฺฐา เนว โอตรติ. ยสฺส ปน ทฺเว กูฏานิ อาสนฺเน ฐิตานิ, เอกสฺสปิ อุปริ สีมปฺปมาณํ นปฺปโหติ, ตสฺส กูฏนฺตรํ จินิตฺวา วา ปูเรตฺวา วา เอกาพทฺธํ กตฺวา อุปริ สีมา สมฺมนฺนิตพฺพา. पर्वताच्या शिखरावर सपाट जागा असते, जी एकवीस भिक्खूंना बसण्यासाठी योग्य असते; तिथे सपाट खडकाप्रमाणे सीमा बांधतात. पर्वताच्या खाली देखील त्याच मर्यादेने सीमा खाली उतरते. ताडवृक्षाच्या मुळासारख्या (किंवा ताडाच्या आकाराच्या) पर्वतावर देखील वर बांधलेली सीमा खाली उतरतेच. परंतु जो पर्वत चांदव्याच्या (छताच्या) आकाराचा असतो, ज्याच्या वर एकवीस भिक्खूंना बसण्यासाठी जागा असते पण खाली नसते, त्याच्या वर बांधलेली सीमा खाली उतरत नाही. अशा प्रकारे तो मृदंगाच्या आकाराचा असो किंवा पणवाच्या (ढोलाच्या) आकाराचा असो, ज्याच्या खाली किंवा मध्ये सीमेसाठी पुरेशी जागा नसते, त्याच्या वर बांधलेली सीमा खाली मुळीच उतरत नाही. परंतु ज्या पर्वताची दोन शिखरे जवळजवळ असतात आणि एकाही शिखरावर सीमेसाठी पुरेशी जागा नसते, त्या दोन शिखरांमधील अंतर विटा-दगड रचून किंवा माती-दगड भरून एकसंध करावे आणि त्यावर सीमा संमत करावी। เอโก สปฺปผณสทิโส ปพฺพโต, ตสฺสุปริ สีมปฺปมาณสฺส อตฺถิตาย สีมํ พนฺธนฺติ, ตสฺส เจ เหฏฺฐา อากาสปพฺภารํ โหติ, สีมา น โอตรติ. สเจ ปนสฺส เวมชฺเฌ สีมปฺปมาโณ สุสิรปาสาโณ โหติ, โอตรติ. โส จ ปาสาโณ สีมฏฺโฐเยว โหติ. อถาปิสฺส เหฏฺฐา เลณสฺส กุฏฺโฏ อคฺคโกฏึ อาหจฺจ ติฏฺฐติ, โอตรติ, เหฏฺฐา จ อุปริ จ สีมาเยว โหติ. สเจ ปน เหฏฺฐา อุปริมสฺส สีมาปริจฺเฉทสฺส ปารโต อนฺโต-เลณํ โหติ, พหิ สีมา น โอตรติ. อถาปิ อุปริมสฺส สีมาปริจฺเฉทสฺส โอรโต พหิเลณํ โหติ, อนฺโต สีมา น โอตรติ. อถาปิ อุปริ สีมาย ปริจฺเฉโท ขุทฺทโก, เหฏฺฐา เลณํ มหนฺตํ สีมาปริจฺเฉทมติกฺกมิตฺวา ฐิตํ, สีมา อุปริเยว โหติ, เหฏฺฐา น โอตรติ. ยทิ ปน เลณํ ขุทฺทกํ สพฺพปจฺฉิมสีมาปริมาณํ, อุปริ สีมา มหตี ตํ อชฺโฌตฺถริตฺวา ฐิตา, สีมา โอตรติ. อถ เลณํ อติขุทฺทกํ สีมปฺปมาณํ น โหติ, สีมา อุปริเยว โหติ, เหฏฺฐา น โอตรติ. สเจ ตโต อุปฑฺฒํ ภิชฺชิตฺวา ปตติ, สีมปฺปมาณํ เจปิ โหติ, พหิ ปติตํ อสีมา. อปติตํ ปน ยทิ สีมปฺปมาณํ, สีมา โหติเยว. एक सापाच्या फण्यासारखा पर्वत आहे. त्याच्यावर सीमाप्रमाण (सीमेसाठी आवश्यक जागा) असल्यामुळे सीमा बांधतात. जर त्याच्या खाली पोकळ दरी (आकाश-घळ) असेल, तर सीमा खाली उतरत नाही. पण जर त्याच्या मध्यभागी सीमाप्रमाण असलेला सच्छिद्र दगड असेल, तर ती खाली उतरते. आणि तो दगड सीमेमध्येच स्थित असतो. आणि जर त्याच्या खाली असलेल्या गुहेची भिंत पर्वताच्या टोकाला स्पर्श करून उभी असेल, तर ती खाली उतरते, आणि खाली व वर दोन्हीकडे सीमाच असते. पण जर खाली, वरच्या सीमा-मर्यादेच्या पलीकडे आतमध्ये गुहा असेल, तर बाहेर सीमा खाली उतरत नाही. आणि जर वरच्या सीमा-मर्यादेच्या अलीकडे बाहेर गुहा असेल, तर आतमध्ये सीमा खाली उतरत नाही. आणि जर वर सीमेची मर्यादा लहान असेल आणि खाली गुहा मोठी असून सीमेच्या मर्यादेचे उल्लंघन करून स्थित असेल, तर सीमा वरच राहते, खाली उतरत नाही. पण जर गुहा लहान असेल (किमान सीमाप्रमाणाची) आणि वरची सीमा मोठी असून तिला व्यापून स्थित असेल, तर सीमा खाली उतरते. जर गुहा अत्यंत लहान असेल आणि सीमाप्रमाणाची नसेल, तर सीमा वरच राहते, खाली उतरत नाही. जर त्या पर्वताचा अर्धा भाग तुटून खाली पडला, आणि तो जरी सीमाप्रमाण असला, तरी बाहेर पडलेला भाग अ-सीमा (सीमा नसलेला) होतो. पण न पडलेला भाग जर सीमाप्रमाण असेल, तर ती सीमाच राहते. ขณฺฑสีมา นีจวตฺถุกา โหติ, ตํ ปูเรตฺวา อุจฺจวตฺถุกํ กโรนฺติ, สีมาเยว. สีมาย เคหํ กโรนฺติ, สีมฏฺฐกเมว โหติ. สีมาย โปกฺขรณึ ขณนฺติ, สีมาเยว. โอโฆ สีมามณฺฑลํ โอตฺถริตฺวา คจฺฉติ, สีมามาฬเก อฏฺฏํ พนฺธิตฺวา กมฺมํ กาตุํ วฏฺฏติ. สีมาย เหฏฺฐา อุมงฺคนที โหติ, อิทฺธิมา ภิกฺขุ ตตฺถ นิสีทติ, สเจ สา นที ปฐมํ คตา, สีมา ปจฺฉา พทฺธา[Pg.327], กมฺมํ น โกเปติ. อถ ปฐมํ สีมา พทฺธา, ปจฺฉา นที คตา, กมฺมํ โกเปติ. เหฏฺฐาปถวิตเล ฐิโต ปน โกเปติเยว. खंडसीमा जर सखल (खालच्या पातळीवरची) असेल, आणि तिला भरून उंच केले, तरी ती सीमाच राहते. सीमेवर घर बांधले, तर ते सीमेतच स्थित असते. सीमेमध्ये तलाव खोदला, तरी ती सीमाच राहते. जर पाण्याचा पूर सीमेच्या क्षेत्राला व्यापून वाहत असेल, तर सीमा-माळकावर मचाण बांधून संघकर्म करणे योग्य ठरते. सीमेच्या खाली भुयारी नदी असेल आणि ऋद्धीवान भिक्खू तेथे बसला असेल; जर ती नदी आधीपासून वाहत असेल आणि सीमा नंतर बांधली गेली असेल, तर ते संघकर्म बाधित होत नाही. पण जर आधी सीमा बांधली गेली असेल आणि नंतर नदी वाहू लागली असेल, तर ते संघकर्म बाधित होते. परंतु खाली जमिनीवर असलेला भिक्खू तर संघकर्म नक्कीच बाधित करतो. สีมามาฬเก วฏรุกฺโข โหติ, ตสฺส สาขา วา ตโต นิคฺคตปาโรโห วา มหาสีมาย ปถวิตลํ วา ตตฺถชาตรุกฺขาทีนิ วา อาหจฺจ ติฏฺฐติ, มหาสีมํ โสเธตฺวา วา กมฺมํ กาตพฺพํ, เต วา สาขาปาโรหา ฉินฺทิตฺวา พหิฏฺฐกา กาตพฺพา. อนาหจฺจ ฐิตสาขาทีสุ อารุฬฺหภิกฺขุ หตฺถปาสํ อาเนตพฺโพ. เอวํ มหาสีมาย ชาตรุกฺขสฺส สาขา วา ปาโรโห วา วุตฺตนเยเนว สีมามาฬเก ปติฏฺฐาติ, วุตฺตนเยเนว สีมํ โสเธตฺวา วา กมฺมํ กาตพฺพํ, เต วา สาขาปาโรหา ฉินฺทิตฺวา พหิฏฺฐกา กาตพฺพา. सीमा-माळकावर वडाचे झाड असेल, आणि त्याची फांदी किंवा त्यापासून निघालेली पारंबी महासीमेच्या जमिनीला किंवा तेथे उगवलेल्या झाडांना स्पर्श करून उभी असेल, तर महासीमा शुद्ध करून संघकर्म करावे, किंवा त्या फांद्या व पारंब्या कापून बाहेर कराव्यात. स्पर्श न करता वर असलेल्या फांद्यांवर चढलेल्या भिक्खूला हस्तपासात आणावे. याचप्रमाणे, महासीमेत उगवलेल्या झाडाची फांदी किंवा पारंबी वर सांगितलेल्या पद्धतीनेच सीमा-माळकाच्या जमिनीवर टेकलेली असेल, तर वर सांगितलेल्या पद्धतीनेच सीमा शुद्ध करून संघकर्म करावे, किंवा त्या फांद्या व पारंब्या कापून बाहेर कराव्यात. สเจ สีมามาฬเก กมฺเม กริยมาเน โกจิ ภิกฺขุ สีมามาฬกสฺส อนฺโต ปวิสิตฺวา เวหาสฏฺฐิตสาขาย นิสีทติ, ปาทา วาสฺส ภูมิคตา โหนฺติ, นิวาสนปารุปนํ วา ภูมึ ผุสติ, กมฺมํ กาตุํ น วฏฺฏติ. ปาเท ปน นิวาสนปารุปนญฺจ อุกฺขิปาเปตฺวา กาตุํ วฏฺฏติ. อิทญฺจ ลกฺขณํ ปุริมนเยปิ เวทิตพฺพํ. อยํ ปน วิเสโส – ตตฺร อุกฺขิปาเปตฺวา กาตุํ น วฏฺฏติ, หตฺถปาสเมว อาเนตพฺโพ. สเจ อนฺโตสีมโต ปพฺพโต อพฺภุคจฺฉติ, ตตฺรฏฺโฐ ภิกฺขุ หตฺถปาสํ อาเนตพฺโพ. อิทฺธิยา อนฺโตปพฺพตํ ปวิฏฺเฐปิ เอเสว นโย. พชฺฌมานา เอว หิ สีมา ปมาณรหิตํ ปเทสํ น โอตรติ. พทฺธสีมาย ชาตํ ยํกิญฺจิ ยตฺถ กตฺถจิ เอกสมฺพทฺเธน คตํ สีมาสงฺขฺยเมว คจฺฉตีติ. जर सीमा-माळकावर संघकर्म होत असताना एखादा भिक्खू सीमा-माळकाच्या आत येऊन हवेत लटकणाऱ्या फांदीवर बसला, आणि त्याचे पाय जमिनीला टेकलेले असतील किंवा त्याचे अंतर्वस्त्र व पांघरलेले वस्त्र जमिनीला स्पर्श करत असेल, तर संघकर्म करणे योग्य नाही. परंतु पाय आणि वस्त्र वर उचलून घेऊन संघकर्म करणे योग्य ठरते. आणि हे लक्षण पूर्वीच्या पद्धतीतही समजून घ्यावे. पण हा विशेष फरक आहे - तेथे वर उचलून घेऊन संघकर्म करणे योग्य नाही, तर त्याला हस्तपासातच आणले पाहिजे. जर सीमेच्या आतून पर्वत वर आला असेल, तर त्यावर असलेल्या भिक्खूला हस्तपासात आणावे. ऋद्धीने पर्वताच्या आत प्रवेश केलेल्या भिक्खूच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. कारण बांधली जाणारी सीमा ही प्रमाण नसलेल्या (अमर्याद) प्रदेशात उतरत नाही. बांधलेल्या सीमेमध्ये निर्माण झालेली कोणतीही गोष्ट, जी कुठेही एकाच संबंधाने जोडलेली गेली असेल, ती सीमेच्याच संज्ञेला प्राप्त होते. ๑๔๐. ติโยชนปรมนฺติ เอตฺถ ติโยชนํ ปรมํ ปมาณเมติสฺสาติ ติโยชนปรมา; ตํ ติโยชนปรมํ. สมฺมนฺนนฺเตน ปน มชฺเฌ ฐตฺวา ยถา จตูสุปิ ทิสาสุ ทิยฑฺฒทิยฑฺฒโยชนํ โหติ, เอวํ สมฺมนฺนิตพฺพา. สเจ ปน มชฺเฌ ฐตฺวา เอเกกทิสโต ติโยชนํ กโรนฺติ, ฉโยชนํ โหตีติ น วฏฺฏติ. จตุรสฺสํ วา ติโกณํ วา สมฺมนฺนนฺเตน ยถา โกณโต โกณํ ติโยชนํ โหติ, เอวํ สมฺมนฺนิตพฺพา. สเจ หิ เยน เกนจิ ปริยนฺเตน เกสคฺคมตฺตมฺปิ ติโยชนํ อติกฺกาเมติ, อาปตฺติญฺจ อาปชฺชติ สีมา จ อสีมา โหติ. १४०. 'तियोजनपरमं' म्हणजे जिचे कमाल प्रमाण तीन योजन आहे, ती 'तियोजनपरमा' (तीन योजन मर्यादेची सीमा) होय; ती तीन योजन मर्यादेची सीमा. सीमा निश्चित करणाऱ्याने मध्यभागी उभे राहून, चारही दिशांना दीड-दीड योजन अंतर होईल अशा प्रकारे ती निश्चित करावी. पण जर मध्यभागी उभे राहून प्रत्येक दिशेला तीन योजन केले, तर ती सहा योजन होईल, जे योग्य नाही. चौकोनी किंवा त्रिकोणी सीमा निश्चित करताना, एका कोपऱ्यापासून दुसऱ्या कोपऱ्यापर्यंतचे अंतर तीन योजन होईल अशा प्रकारे ती निश्चित करावी. कारण जर कोणत्याही मर्यादेने केसाच्या अग्राएवढेही अंतर तीन योजनेपेक्षा जास्त ओलांडले, तर तो भिक्खू आपत्तीला प्राप्त होतो आणि ती सीमा देखील अ-सीमा होते. นทีปารนฺติ เอตฺถ ปารยตีติ ปารา. กึ ปารยติ? นทึ. นทิยา ปารา นทีปารา, ตํ นทีปารํ; นทึ อชฺโฌตฺถรมานนฺติ อตฺโถ. เอตฺถ จ นทิยา ลกฺขณํ [Pg.328] นทีนิมิตฺเต วุตฺตนยเมว. ยตฺถสฺส ธุวนาวา วาติ ยตฺถ นทิยา สีมาพนฺธนฏฺฐานคเตสุ ติตฺเถสุ นิจฺจสญฺจรณนาวา อสฺส, ยา สพฺพนฺติเมน ปริจฺเฉเทน ปาชนปุริเสน สทฺธึ ตโย ชเน วหติ. สเจ ปน สา นาวา อุทฺธํ วา อโธ วา เกนจิเทว กรณีเยน ปุน อาคมนตฺถาย นีตา, โจเรหิ วา หฏา, อวสฺสํ ลพฺภเนยฺยา, ยา ปน วาเตน วา ฉินฺนพนฺธนา วีจีหิ นทิมชฺฌํ นีตา อวสฺสํ อาหริตพฺพา, ปุน ธุวนาวาว โหติ. อุทเก โอคเต ถลํ อุสฺสาริตาปิ สุธากสฏาทีหิ ปูเรตฺวา ฐปิตาปิ ธุวนาวาว. สเจ ภินฺนา วา วิสงฺขตปทรา วา น วฏฺฏติ. มหาปทุมตฺเถโร ปนาห – ‘‘สเจปิ ตาวกาลิกํ นาวํ อาเนตฺวา สีมาพนฺธนฏฺฐาเน ฐเปตฺวา นิมิตฺตานิ กิตฺเตนฺติ, ธุวนาวาว โหตี’’ติ. ตตฺร มหาสุมตฺเถโร อาห – ‘‘นิมิตฺตํ วา สีมา วา กมฺมวาจาย คจฺฉติ น นาวาย. ภควตา จ ธุวนาวา อนุญฺญาตา, ตสฺมา นิพทฺธนาวาเยว วฏฺฏตี’’ติ. 'नदीपारं' यामध्ये जी पार करते ती 'पारा' होय. ती कशाला पार करते? नदीला. नदीला पार करणारी ती 'नदीपारा' (नदीपार सीमा), ती नदीपार सीमा; म्हणजेच नदीला व्यापून असणारी, असा अर्थ आहे. आणि येथे नदीचे लक्षण 'नदी-निमित्त' मध्ये सांगितलेल्या पद्धतीचेच आहे. 'जिथे कायमस्वरूपी नौका (धुवनावा) असेल' म्हणजे ज्या नदीत, सीमा बांधण्याच्या ठिकाणी असलेल्या घाटांवर नेहमी चालणारी नौका असेल, जी किमान मर्यादेनुसार नावाड्यासोबत तीन माणसांना वाहून नेऊ शकते. पण जर ती नौका वरच्या किंवा खालच्या प्रवाहात काही कामासाठी परत येण्याच्या उद्देशाने नेली असेल, किंवा चोरांनी चोरून नेली असेल आणि ती नक्कीच परत मिळण्याजोगी असेल, किंवा जी वाऱ्यामुळे दोर तुटून लाटांद्वारे नदीच्या मध्यभागी वाहून गेली असेल आणि ती नक्कीच परत आणता येण्याजोगी असेल, तर ती पुन्हा 'धुवनावा'च मानली जाते. पाणी ओसरल्यावर जमिनीवर ओढून ठेवलेली किंवा चुना, काषाय इत्यादींनी भरून ठेवलेली नौका देखील 'धुवनावा'च असते. जर ती फुटलेली असेल किंवा तिचे फळके निखळलेले असतील, तर ती चालणार नाही. परंतु महापदुम थेर म्हणाले - 'जरी तात्पुरती नौका आणून सीमा बांधण्याच्या ठिकाणी ठेवून निमित्तांची घोषणा केली, तरी ती धुवनावाच होते.' त्यावर महासुमा थेर म्हणाले - 'निमित्त किंवा सीमा ही कर्मवाचेने सिद्ध होते, नौकेने नाही. आणि भगवंतांनी धुवनावा अनुमत केली आहे, म्हणून नेहमीची नौकाच योग्य ठरते.' ธุวเสตุ วาติ ยตฺถ รุกฺขสงฺฆาฏมโย วา ปทรพทฺโธ วา ชงฺฆสตฺถเสตุ วา หตฺถิสฺสาทีนํ สญฺจรณโยคฺโค มหาเสตุ วา อตฺถิ; อนฺตมโส ตงฺขณญฺเญว รุกฺขํ ฉินฺทิตฺวา มนุสฺสานํ สญฺจรณโยคฺโค เอกปทิกเสตุปิ ธุวเสตุตฺเวว สงฺขฺยํ คจฺฉติ. สเจ ปน อุปริ พทฺธานิ เวตฺตลตาทีนิ หตฺเถน คเหตฺวาปิ น สกฺกา โหติ เตน สญฺจริตุํ, น วฏฺฏติ. 'धुवसेतू' (कायमस्वरूपी पूल) म्हणजे ज्या नदीवर लाकडाच्या ओंडक्यांचा बनवलेला, किंवा फळ्यांनी बांधलेला, किंवा पादचारी व व्यापाऱ्यांच्या जाण्या-येण्याचा पूल, याशिवाय हत्ती-घोडे इत्यादींच्या जाण्या-येण्यास योग्य असा मोठा पूल असेल; अगदी त्याच क्षणी झाड कापून माणसांच्या जाण्या-येण्यासाठी तयार केलेला एकपात्री पूल देखील 'धुवसेतू' याच संज्ञेस प्राप्त होतो. पण जर वर बांधलेल्या वेताच्या वेली इत्यादींना हाताने पकडूनही त्यावरून चालणे शक्य नसेल, तर तो पूल योग्य नाही. เอวรูปํ นทีปารสีมํ สมฺมนฺนิตุนฺติ ยตฺถายํ วุตฺตปฺปการา ธุวนาวา วา ธุวเสตุ วา อภิมุขติตฺเถเยว อตฺถิ, เอวรูปํ นทีปารสีมํ สมฺมนฺนิตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. สเจ ธุวนาวา วา ธุวเสตุ วา อภิมุขติตฺเถ นตฺถิ, อีสกํ อุทฺธํ อภิรุหิตฺวา อโธ วา โอโรหิตฺวา อตฺถิ, เอวมฺปิ วฏฺฏติ. กรวีกติสฺสตฺเถโร ปน ‘‘คาวุตมตฺตพฺภนฺตเรปิ วฏฺฏตี’’ติ อาห. ‘अशा प्रकारच्या नदीपारसीमेचे निर्धारण करावे’ (एवरूपं नदीपारसीमं सम्मन्नितुं) याचा अर्थ असा आहे की, ज्या नदीमध्ये पूर्वोक्त प्रकारची कायमस्वरूपी नौका किंवा कायमस्वरूपी पूल समोरील घाटावरच उपलब्ध असेल, अशा प्रकारच्या नदीपारसीमेचे निर्धारण करण्यास मी अनुमती देतो. जर कायमस्वरूपी नौका किंवा कायमस्वरूपी पूल समोरील घाटावर नसेल, परंतु थोडं वरच्या बाजूला जाऊन किंवा खालच्या बाजूला उतरून उपलब्ध असेल, तरीही ते योग्य ठरते. परंतु, करवीकतिस्स थेरांनी म्हटले आहे की, 'एक गावुत अंतराच्या आत जरी असले तरी चालते.' อิมญฺจ ปน นทีปารสีมํ สมฺมนฺนนฺเตน เอกสฺมึ ตีเร ฐตฺวา อุปริโสเต นทีตีเร นิมิตฺตํ กิตฺเตตฺวา ตโต ปฏฺฐาย อตฺตานํ ปริกฺขิปนฺเตน ยตฺตกํ ปริจฺเฉทํ อิจฺฉติ, ตสฺส ปริโยสาเน อโธโสเตปิ นทีตีเร นิมิตฺตํ กิตฺเตตฺวา ปรตีเร สมฺมุขฏฺฐาเน นทีตีเร นิมิตฺตํ กิตฺเตตพฺพํ. ตโต ปฏฺฐาย ยตฺตกํ ปริจฺเฉทํ อิจฺฉติ, ตสฺส วเสน ยาว อุปริโสเต ปฐมกิตฺติตนิมิตฺตสฺส สมฺมุขา นทีตีเร นิมิตฺตํ, ตาว กิตฺเตตฺวา ปจฺจาหริตฺวา ปฐมกิตฺติตนิมิตฺเตน [Pg.329] สทฺธึ ฆเฏตพฺพํ. อถ สพฺพนิมิตฺตานํ อนฺโต ฐิเต ภิกฺขู หตฺถปาสคเต กตฺวา กมฺมวาจาย สีมา สมฺมนฺนิตพฺพา. นทิยํ ฐิตา อนาคตาปิ กมฺมํ น โกเปนฺติ. สมฺมุติปริโยสาเน ฐเปตฺวา นทึ นิมิตฺตานํ อนฺโต ปารตีเร จ โอริมตีเร จ เอกสีมา โหติ. นที ปน พทฺธสีมาสงฺขฺยํ น คจฺฉติ, วิสุํ นทิสีมา เอว หิ สา. आणि या नदीपारसीमेचे निर्धारण करणाऱ्या भिक्खूने एका किनाऱ्यावर उभे राहून, प्रवाहाच्या वरच्या दिशेला नदीच्या किनाऱ्यावर निमित्ताची (चिन्हाची) घोषणा करावी. तिथून सुरुवात करून स्वतःला वेढत (परिक्रमण करत) जितकी सीमा त्याला हवी आहे, त्याच्या समाप्तीवर प्रवाहाच्या खालच्या दिशेलाही नदीच्या किनाऱ्यावर निमित्ताची घोषणा करावी आणि पलीकडच्या किनाऱ्यावर समोरील ठिकाणी नदीच्या किनाऱ्यावर निमित्ताची घोषणा करावी. तिथून सुरुवात करून जितकी सीमा हवी आहे त्यानुसार, प्रवाहाच्या वरच्या दिशेला पहिल्यांदा घोषित केलेल्या निमित्ताच्या समोर नदीच्या किनाऱ्यावर जोपर्यंत निमित्त आहे, तोपर्यंत घोषणा करून, परत आणून पहिल्या घोषित केलेल्या निमित्ताशी ते जोडले पाहिजे. त्यानंतर सर्व निमित्तांच्या आत असलेल्या भिक्खूंना हस्तपासात आणून कम्मवाचेद्वारे सीमेचे निर्धारण करावे. नदीमध्ये उभे असलेले भिक्खू आले नाहीत तरी ते संघाच्या कर्माला बाधित करत नाहीत. सीमेच्या निर्धारणाच्या शेवटी, नदी वगळून, निमित्तांच्या आत पलीकडच्या किनाऱ्यावर आणि अलीकडच्या किनाऱ्यावर एकच सीमा होते. परंतु नदी ही बद्धसीमेच्या संज्ञेत येत नाही, कारण ती स्वतंत्रपणे नदीसीमाच असते. สเจ อนฺโตนทิยํ ทีปโก โหติ, ตํ อนฺโตสีมาย กาตุกาเมน ปุริมนเยเนว อตฺตนา ฐิตตีเร นิมิตฺตานิ กิตฺเตตฺวา ทีปกสฺส โอริมนฺเต จ ปาริมนฺเต จ นิมิตฺตํ กิตฺเตตพฺพํ. อถ ปรตีเร นทิยา โอริมตีเร นิมิตฺตสฺส สมฺมุขฏฺฐาเน นิมิตฺตํ กิตฺเตตฺวา ตโต ปฏฺฐาย ปุริมนเยเนว ยาว อุปริโสเต ปฐมกิตฺติตนิมิตฺตสฺส สมฺมุขา นิมิตฺตํ, ตาว กิตฺเตตพฺพํ. อถ ทีปกสฺส ปาริมนฺเต จ โอริมนฺเต จ นิมิตฺตํ กิตฺเตตฺวา ปจฺจาหริตฺวา ปฐมกิตฺติตนิมิตฺเตน สทฺธึ ฆเฏตพฺพํ. อถ ทฺวีสุ ตีเรสุ ทีปเก จ ภิกฺขู สพฺเพว หตฺถปาสคเต กตฺวา กมฺมวาจาย สีมา สมฺมนฺนิตพฺพา. นทิยํ ฐิตา อนาคจฺฉนฺตาปิ กมฺมํ น โกเปนฺติ. สมฺมุติปริโยสาเน ฐเปตฺวา นทึ นิมิตฺตานํ อนฺโต ตีรทฺวยญฺจ ทีปโก จ เอกสีมา โหติ, นที ปน นทิสีมาเยว. जर नदीच्या आत एखादा लहान बेट (दीपक) असेल आणि त्याला सीमेच्या आत समाविष्ट करण्याची इच्छा असेल तर, पूर्वीच्या पद्धतीनुसारच स्वतः उभे असलेल्या किनाऱ्यावर निमित्तांची घोषणा करून, बेटाच्या अलीकडच्या टोकावर आणि पलीकडच्या टोकावर निमित्ताची घोषणा करावी. त्यानंतर पलीकडच्या किनाऱ्यावर, नदीच्या अलीकडच्या किनाऱ्यावरील निमित्ताच्या समोरील ठिकाणी निमित्ताची घोषणा करून, तिथून सुरुवात करून पूर्वीच्या पद्धतीनुसारच प्रवाहाच्या वरच्या दिशेला पहिल्या घोषित केलेल्या निमित्ताच्या समोर जोपर्यंत निमित्त आहे, तोपर्यंत घोषणा करावी. त्यानंतर बेटाच्या पलीकडच्या आणि अलीकडच्या टोकावर निमित्ताची घोषणा करून, परत आणून पहिल्या घोषित केलेल्या निमित्ताशी जोडले पाहिजे. त्यानंतर दोन्ही किनाऱ्यांवर आणि बेटावर असलेल्या सर्व भिक्खूंना हस्तपासात आणून कम्मवाचेद्वारे सीमेचे निर्धारण करावे. नदीमध्ये उभे असलेले भिक्खू आले नाहीत तरी ते संघाच्या कर्माला बाधित करत नाहीत. सीमेच्या निर्धारणाच्या शेवटी, नदी वगळून, निमित्तांच्या आत दोन्ही किनारे आणि बेट मिळून एकच सीमा होते, परंतु नदी ही नदीसीमाच असते. สเจ ปน ทีปโก วิหารสีมาปริจฺเฉทโต อุทฺธํ วา อโธ วา อธิกตโร โหติ, อถ วิหารสีมาปริจฺเฉทนิมิตฺตสฺส อุชุกเมว สมฺมุขิภูเต ทีปกสฺส โสริมนฺเต นิมิตฺตํ กิตฺเตตฺวา ตโต ปฏฺฐาย ทีปกสิขรํ ปริกฺขิปนฺโตน ปุน ทีปกสฺส โสริมนฺเต นิมิตฺตสมฺมุเข ปาริมนฺเต นิมิตฺตํ กิตฺเตตพฺพํ. ตโต ปรํ ปุริมนเยเนว ปารตีเร สมฺมุขนิมีตฺตมาทึกตฺวา ปารตีรนิมิตฺตานิ จ ทีปกสฺส ปาริมนฺตโสริมนฺตนิมิตฺตานิ จ กิตฺเตตฺวา ปฐมกิตฺติตนิมิตฺเตน สทฺธึ ฆฏนา กาตพฺพา. เอวํ กิตฺเตตฺวา สมฺมตา สีมา ปพฺพตสณฺฑานา โหติ. पण जर बेट विहारसीमेच्या मर्यादेपेक्षा वरच्या किंवा खालच्या बाजूला अधिक पसरलेले असेल, तर विहारसीमेच्या मर्यादेच्या निमित्ताच्या अगदी सरळ समोर असलेल्या बेटाच्या अलीकडच्या टोकावर निमित्ताची घोषणा करावी. तिथून सुरुवात करून बेटाच्या शिखराला (टोकाला) प्रदक्षिणा घालत, पुन्हा बेटाच्या अलीकडच्या टोकावरील निमित्ताच्या समोरील पलीकडच्या टोकावर निमित्ताची घोषणा करावी. त्यानंतर पूर्वीच्या पद्धतीनुसारच पलीकडच्या किनाऱ्यावरील समोरील निमित्ताला आरंभ करून, पलीकडच्या किनाऱ्यावरील निमित्तांची आणि बेटाच्या पलीकडच्या व अलीकडच्या टोकावरील निमित्तांची घोषणा करून, पहिल्या घोषित केलेल्या निमित्ताशी जोडणी करावी. अशा प्रकारे घोषित करून निर्धारित केलेली सीमा पर्वताच्या आकाराची (पब्बतसण्ठाना) होते. สเจ ปน ทีปโก วิหารสีมาปริจฺเฉทโต อุทฺธมฺปิ อโธปิ อธิกตโร โหติ. ปุริมนเยเนว ทีปกสฺส อุโภปิ สีขรานิ ปริกฺขิปิตฺวา นิมิตฺตานิ กิตฺเตนฺเตน นิมิตฺตฆฏนา กาตพฺพา. เอวํ กิตฺเตตฺวา สมฺมตา สีมา มุทิงฺคสณฺฐานา โหติ. पण जर बेट विहारसीमेच्या मर्यादेपेक्षा वरच्या आणि खालच्या दोन्ही बाजूंनी अधिक पसरलेले असेल, तर पूर्वीच्या पद्धतीनुसारच बेटाच्या दोन्ही शिखरांना (टोकांना) वेढून, निमित्तांची घोषणा करत निमित्तांची जोडणी करावी. अशा प्रकारे घोषित करून निर्धारित केलेली सीमा मृदंगाच्या आकाराची (मुदिंगसण्ठाना) होते. สเจ [Pg.330] ทีปโก วิหารสีมาปริจฺเฉทสฺส อนฺโต ขุทฺทโก โหติ, สพฺพปฐมนเยน ทีปเก นิมิตฺตานิ กิตฺเตตพฺพานิ. เอวํ กิตฺเตตฺวา สมฺมตา สีมา ปณวสณฺฐานา โหติ. जर बेट विहारसीमेच्या मर्यादेच्या आत लहान असेल, तर सर्वात पहिल्या पद्धतीनुसार बेटावर निमित्तांची घोषणा करावी. अशा प्रकारे घोषित करून निर्धारित केलेली सीमा पणवाच्या (एक प्रकारच्या लहान ढोलाच्या) आकाराची (पणवसण्ठाना) होते. สีมานุชานนกถา นิฏฺฐิตา. सीमेच्या अनुमतीची कथा समाप्त झाली. อุโปสถาคาราทิกถา उपोसाथगृह इत्यादींची कथा. ๑๔๑. อนุปริเวณิยนฺติ เอกสีมมหาวิหาเร ตสฺมึ ตสฺมึ ปริเวเณ. อสงฺเกเตนาติ สงฺเกตํ อกตฺวา. เอกํ สมูหนิตฺวาติ กมฺมวาจาย สมูหนิตฺวา. १४१. ‘अनुपरिवेणियं’ म्हणजे एकाच सीमेमध्ये असलेल्या महाविहारामध्ये त्या त्या परिवेणात (परिसरात). ‘असंकेतेन’ म्हणजे संकेत (निश्चिती) न करता. ‘एकं समूहनित्वा’ म्हणजे कम्मवाचेद्वारे (सीमेचे) निरसन (उच्छेदन) करून. ๑๔๒. ยโต ปาติโมกฺขํ สุณาตีติ ยตฺถ กตฺถจิ ภิกฺขูนํ หตฺถปาเส นิสินฺโน ยสฺมา ปาติโมกฺขํ สุณาติ; กโตวสฺส อุโปสโถติ อตฺโถ. อิทญฺจ วตฺถุวเสน วุตฺตํ, หตฺถปาเส นิสินฺนสฺส ปน อสุณนฺตสฺสาปิ กโตว โหติ อุโปสโถ. นิมิตฺตา กิตฺเตตพฺพาติ อุโปสถปมุขสฺส ขุทฺทกานิ วา มหนฺตานิ วา ปาสาณอิฏฺฐกทารุขณฺฑทณฺฑกาทีนิ ยานิ กานิจิ นิมิตฺตานิ อพฺโภกาเส วา มาฬกาทีสุ วา ยตฺถ กตฺถจิ สญฺญํ กตฺวา กิตฺเตตุํ วฏฺฏติ. อถ วา นิมิตฺตา กิตฺเตตพฺพาติ นิมิตฺตุปคา วา อนิมิตฺตุปคา วา ปริจฺเฉทชานนตฺถํ กิตฺเตตพฺพา. १४२. ‘यतो पातिमोक्खं सुणाति’ (ज्या ठिकाणाहून पातिमोक्ख ऐकतो) याचा अर्थ असा आहे की, ज्या कोणत्याही ठिकाणी भिक्खूंच्या हस्तपासात बसून ज्याअर्थी तो पातिमोक्ख ऐकतो, त्याअर्थी त्याचा उपोसाथ केला गेला आहे. आणि हे एखाद्या विशिष्ट प्रसंगाच्या संदर्भाने म्हटले गेले आहे; परंतु हस्तपासात बसलेल्या भिक्खूला ऐकू आले नाही तरी त्याचा उपोसाथ केला गेला आहे असेच मानले जाते. ‘निमित्ता कित्तेतब्बा’ (निमित्तांची घोषणा करावी) म्हणजे उपोसाथगृहाच्या समोर लहान किंवा मोठे दगड, विटा, लाकडाचे तुकडे, काठ्या इत्यादींपैकी कोणतीही निमित्ते उघड्या जागेत किंवा माळका (मंडप) इत्यादींमध्ये कोणत्याही ठिकाणी खूण करून घोषित करणे योग्य आहे. अथवा ‘निमित्ता कित्तेतब्बा’ म्हणजे सीमेची मर्यादा समजण्यासाठी निमित्त म्हणून योग्य किंवा अयोग्य असलेले दगड इत्यादी घोषित करावेत. เถเรหิ ภิกฺขูหิ ปฐมตรํ สนฺนิปติตุนฺติ เอตฺถ สเจ มหาเถโร ปฐมตรํ น อาคจฺฉติ, ทุกฺกฏํ. สพฺเพเหว เอกชฺฌํ สนฺนิปติตฺวา อุโปสโถ กาตพฺโพติ เอตฺถ สเจ โปราณโก อาวาโส มชฺเฌ วิหารสฺส โหติ, ปโหติ เจตฺถ ภิกฺขูนํ นิสชฺชฏฺฐานํ, ตตฺถ สนฺนิปติตฺวา อุโปสโถ กาตพฺโพ. สเจ โปราณโก ปริทุพฺพโล เจว สมฺพาโธ จ อญฺโญ ปจฺฉา อุฏฺฐิตาวาโส อสมฺพาโธ, ตตฺถ อุโปสโถ กาตพฺโพ. ‘थेरेहि भिक्खूहि पठमतरं सन्निपतितुं’ (स्थवीर भिक्खूंनी आधी एकत्र यावे) याविषयी, जर महाथेर आधी आले नाहीत, तर दुक्कट दोष होतो. ‘सर्वांनी एकत्र येऊन उपोसाथ करावा’ याविषयी निर्णय असा समजावा की, जर जुना आवास विहाराच्या मध्यभागी असेल आणि तिथे भिक्खूंना बसण्यासाठी पुरेशी जागा असेल, तर तिथे एकत्र येऊन उपोसाथ करावा. जर जुना आवास मोडकळीस आलेला आणि अरुंद असेल, आणि नंतर बांधलेला दुसरा आवास प्रशस्त असेल, तर तिथे उपोसाथ करावा. ยตฺถ วา ปน เถโร ภิกฺขุ วิหรตีติ เอตฺถาปิ สเจ เถรสฺส วิหาโร สพฺเพสํ ปโหติ, ผาสุโก โหติ, ตตฺถ อุโปสโถ กาตพฺโพ. สเจ ปน โส ปจฺจนฺเต วิสมปฺปเทเส โหติ, เถรสฺส วตฺตพฺพํ – ‘‘ภนฺเต, ตุมฺหากํ วิหาโร อผาสุกเทโส, นตฺถิ เอตฺถ สพฺเพสํ โอกาโส[Pg.331], อสุกสฺมึ นาม อาวาเส โอกาโส อตฺถิ, ตตฺถ คนฺตุํ วฏฺฏตี’’ติ. สเจ เถโร นาคจฺฉติ, ตสฺส ฉนฺทปาริสุทฺธึ อาเนตฺวา สพฺเพสํ ปโหนเก ผาสุกฏฺฐาเน อุโปสโถ กาตพฺโพ. ‘किंवा ज्या ठिकाणी थेर भिक्खू राहतात’ याविषयी देखील निर्णय असा समजावा की, जर थेरांचा विहार सर्वांसाठी पुरेसा आणि सोयीचा असेल, तर तिथे उपोसाथ करावा. पण जर तो विहार अगदी टोकाला दुर्गम ठिकाणी असेल, तर थेरांना म्हणावे – 'भंते, आपला विहार गैरसोयीच्या ठिकाणी आहे, इथे सर्वांसाठी पुरेशी जागा नाही. अमुक नावाच्या आवासात पुरेशी जागा आहे, तिथे जाणे योग्य होईल.' जर थेर आले नाहीत, तर त्यांची संमती आणि परिशुद्धी (छंदपारिसुद्धि) आणून, सर्वांसाठी पुरेशा आणि सोयीच्या ठिकाणी उपोसाथ करावा. อวิปฺปวาสสีมานุชานนกถา अविप्पवाससीमेच्या अनुमतीची कथा. ๑๔๓. อนฺธกวินฺทาติ ราชคหโต คาวุตตฺตเย อนฺธกวินฺทํ นาม, ตํ อุปนิสฺสาย เถโร วสติ; ตโต ราชคหํ อุโปสถํ อาคจฺฉนฺโต. ราชคหญฺหิ ปริกฺขิปิตฺวา อฏฺฐารส มหาวิหารา สพฺเพ เอกสีมา, ธมฺมเสนาปตินา เนสํ สีมา พทฺธา, ตสฺมา เวฬุวเน สงฺฆสฺส สามคฺคีทานตฺถํ อาคจฺฉนฺโตติ อตฺโถ. นทึ ตรนฺโตติ สิปฺปินิยํ นาม นทึ อติกฺกมนฺโต. มนํ วุฬฺโห อโหสีติ อีสกํ อปฺปตฺตวุฬฺหภาโว อโหสิ. สา กิร นที คิชฺฌกูฏโต โอตริตฺวา จณฺเฑน โสเตน วหติ. ตตฺถ เวเคน อาคจฺฉนฺตํ อุทกํ อมนสิกโรนฺโต เถโร มนํ วุฬฺโห อโหสิ, น ปน วุฬฺโห, อุทกพฺภาหตานิสฺส จีวรานิ อลฺลานิ ชาตานิ. १४३. "अन्धकविन्द" म्हणजे राजगृहापासून तीन गावुत अंतरावर अंधकविन्द नावाचे गाव आहे, ज्याचा आश्रय घेऊन थेर (महाकस्सप) राहत असत; तेथून राजगृहाला उपोसथासाठी येत असताना. कारण राजगृहाला वेढून अठरा महाविहार आहेत आणि ते सर्व एकाच सीमेत (एकसीमा) आहेत, धर्मसेनापतींनी त्यांची सीमा निश्चित केली होती, म्हणून वेळुवनात संघाला सामग्गी (एकता) देण्यासाठी येत असताना, असा अर्थ आहे. "नदी पार करताना" म्हणजे सिप्पिनी नावाच्या नदीला ओलांडताना. "किंचित वाहून गेले" म्हणजे थोडेसे, पूर्णपणे वाहून न जाता (वाहून जाण्याच्या बेतात आले). ती नदी गिज्झकूट पर्वतावरून खाली उतरून तीव्र प्रवाहाने वाहते. तेथे वेगाने येणाऱ्या पाण्याकडे दुर्लक्ष झाल्यामुळे थेर थोडेसे वाहून गेले, पण प्रत्यक्षात वाहून गेले नाहीत, पाण्याने आदळल्यामुळे त्यांचे चीवर ओले झाले होते. ๑๔๔. สมฺมตา สา สีมา สงฺเฆน ติจีวเรน อวิปฺปวาสา ฐเปตฺวา คามญฺจ คามูปจารญฺจาติ อิมิสฺสา กมฺมวาจาย อุปฺปนฺนกาลโต ปฏฺฐาย ภิกฺขูนํ ปุริมกมฺมวาจา น วฏฺฏติ. อยเมว หิ ถาวรา โหติ. ภิกฺขุนีนํ ปน อยํ น วฏฺฏติ, ปุริมาเยว วฏฺฏติ. กสฺมา? ภิกฺขุนิสงฺโฆ หิ อนฺโตคาเม วสติ. ยทิ เอวํ สิยา, โส เอตาย กมฺมวาจาย ติจีวรปริหารํ น ลเภยฺย, อตฺถิ จสฺส ปริหาโร, ตสฺมา ปุริมาเยว วฏฺฏติ. ภิกฺขุนิสงฺฆสฺส หิ ทฺเวปิ สีมาโย ลพฺภนฺติ. ตตฺถ ภิกฺขูนํ สีมํ อชฺโฌตฺถริตฺวาปิ ตสฺสา อนฺโตปิ ภิกฺขุนีนํ สีมํ สมฺมนฺนิตุํ วฏฺฏติ. ภิกฺขูนมฺปิ ภิกฺขุนิสีมาย เอเสว นโย. น หิ เต อญฺญมญฺญสฺส กมฺเม คณปูรกา โหนฺติ, น กมฺมวาจํ วคฺคํ กโรนฺติ. เอตฺถ จ นิคมนครานมฺปิ คาเมเนว สงฺคโห เวทิตพฺโพ. १४४. "संघाने ती सीमा गाव आणि गावाचा परिसर वगळून त्रिचीवराने अविप्रवास म्हणून संमत केली आहे" या कम्मवाचेच्या उत्पत्तीच्या काळापासून भिक्खूंसाठी पूर्वीची कम्मवाचा योग्य ठरत नाही. कारण हीच कम्मवाचा स्थायी असते. परंतु भिक्खुनींसाठी ही योग्य ठरत नाही, पूर्वीचीच योग्य ठरते. का? कारण भिक्खुनीसंघ गावाच्या आत राहतो. जर असे झाले, तर तो या कम्मवाचेमुळे त्रिचीवर-परिहाराचा लाभ घेऊ शकणार नाही, आणि त्यांना हा परिहार मिळणे आवश्यक आहे, म्हणून पूर्वीचीच कम्मवाचा योग्य ठरते. कारण भिक्खुनीसंघाला दोन्ही सीमा प्राप्त होतात. त्यामध्ये भिक्खूंच्या सीमेला व्यापून किंवा तिच्या आत देखील भिक्खुनींची सीमा संमत करणे योग्य ठरते. भिक्खूंच्या बाबतीतही भिक्खुनींच्या सीमेमध्ये हाच नियम लागू होतो. कारण ते एकमेकांच्या कर्मामध्ये गणपूरक होत नाहीत आणि कम्मवाचेला विभक्त करत नाहीत. आणि येथे 'गाव' या शब्दानेच निगम आणि नगरांचाही समावेश समजला पाहिजे. คามูปจาโรติ ปริกฺขิตฺตสฺส ปริกฺเขโป, อปริกฺขิตฺตสฺส ปริกฺเขโปกาโส. เตสุ อธิฏฺฐิตเตจีวริโก ภิกฺขุ ปริหารํ น ลภติ. อิติ [Pg.332] ภิกฺขูนํ อวิปฺปวาสสีมา คามญฺจ คามูปจารญฺจ น โอตฺถรติ, สมานสํวาสกสีมาว โอตฺถรติ. สมานสํวาสกสีมา เจตฺถ อตฺตโน ธมฺมตาย คจฺฉติ. อวิปฺปวาสสีมา ปน ยตฺถ สมานสํวาสกสีมา, ตตฺเถว คจฺฉติ. น หิ ตสฺสา วิสุํ นิมิตฺตกิตฺตนํ อตฺถิ, ตตฺถ สเจ อวิปฺปวาสาย สมฺมุติกาเล คาโม อตฺถิ, ตํ สา น โอตฺถรติ. สเจ ปน สมฺมตาย สีมาย ปจฺฉา คาโม นิวิสติ, โสปิ สีมาสงฺขฺยเมว คจฺฉติ. ยถา จ ปจฺฉา นิวิฏฺโฐ, เอวํ ปฐมํ นิวิฏฺฐสฺส ปจฺฉา วฑฺฒิตปฺปเทโสปิ สีมาสงฺขฺยเมว คจฺฉติ. สเจปิ สีมาสมฺมุติกาเล เคหานิ กตานิ, ปวิสิสฺสามาติ อาลโยปิ อตฺถิ, มนุสฺสา ปน อปฺปวิฏฺฐา, โปราณกคามํ วา สเคหเมว ฉฑฺเฑตฺวา อญฺญตฺถ คตา, อคาโมเยว เอส, สีมา โอตฺถรติ. สเจ ปน เอกมฺปิ กุลํ ปวิฏฺฐํ วา อาคตํ วา อตฺถิ, คาโมเยว สีมา น โอตฺถรติ. "गावाचा परिसर" (गामूपचार) म्हणजे कुंपण घातलेल्या गावाचे कुंपण आणि कुंपण नसलेल्या गावाच्या कुंपणाची जागा. त्यामध्ये अधिष्ठित त्रिचीवर असलेला भिक्खू परिहार मिळवू शकत नाही. अशा प्रकारे भिक्खूंची अविप्रवास सीमा गाव आणि गावपरिसराला व्यापत नाही, केवळ समानसंवासक सीमाच व्यापते. आणि येथे समानसंवासक सीमा स्वतःच्या स्वभावानुसार जाते. परंतु अविप्रवास सीमा जेथे समानसंवासक सीमा असते, तेथेच जाते. कारण तिच्यासाठी स्वतंत्रपणे निमित्त सांगण्याची गरज नसते. त्यामध्ये जर अविप्रवास सीमेच्या संमतीच्या वेळी गाव अस्तित्वात असेल, तर ती सीमा त्याला व्यापत नाही. परंतु जर सीमा संमत झाल्यानंतर तेथे गाव वसला, तर तो देखील सीमेच्याच संख्येत समाविष्ट होतो. आणि ज्याप्रमाणे नंतर वसलेला गाव सीमेत समाविष्ट होतो, त्याचप्रमाणे आधीच वसलेल्या गावाचा नंतर वाढवलेला भाग देखील सीमेच्याच संख्येत समाविष्ट होतो. जरी सीमा संमतीच्या वेळी घरे बांधलेली असली आणि 'आम्ही प्रवेश करू' अशी इच्छा असली, परंतु लोक अजून त्यात प्रवेशलेले नसतील, किंवा जुने गाव घरांसह सोडून लोक इतरत्र गेले असतील, तर ते गाव नसलेलेच मानले जाते आणि सीमा त्याला व्यापते. परंतु जर एक जरी कुटुंब त्यात प्रवेशलेले असेल किंवा तेथून बाहेर गेले नसेल, तर ते गावच मानले जाते आणि सीमा त्याला व्यापत नाही. เอวญฺจ ปน ภิกฺขเว ติจีวเรน อวิปฺปวาโส สมูหนฺตพฺโพติ เอตฺถ สมูหนนฺเตน ภิกฺขุนา วตฺตํ ชานิตพฺพํ. ตตฺริทํ วตฺตํ – ขณฺฑสีมาย ฐตฺวา อวิปฺปวาสสีมา น สมูหนฺตพฺพา, ตถา อวิปฺปวาสสีมาย ฐตฺวา ขณฺฑสีมาปิ. ขณฺฑสีมายํ ปน ฐิเตน ขณฺฑสีมาว สมูหนิตพฺพา, ตถา อิตราย ฐิเตน อิตรา. สีมํ นาม ทฺวีหิ การเณหิ สมูหนนฺติ ปกติยา ขุทฺทกํ ปุน อาวาสวฑฺฒนตฺถาย มหตึ วา กาตุํ; ปกติยา มหตึ ปุน อญฺเญสํ วิหาโรกาสทานตฺถาย ขุทฺทกํ วา กาตุํ. ตตฺถ สเจ ขณฺฑสีมญฺจ อวิปฺปวาสสีมญฺจ ชานนฺติ, สมูหนิตุญฺเจว พนฺธิตุญฺจ สกฺขิสฺสนฺติ. ขณฺฑสีมํ ปน ชานนฺตา อวิปฺปวาสํ อชานนฺตาปิ สมูหนิตุญฺเจว พนฺธิตุญฺจ สกฺขิสฺสนฺติ. ขณฺฑสีมํ อชานนฺตา อวิปฺปวาสํเยว ชานนฺตา เจติยงฺคณโพธิยงฺคณอุโปสถาคาราทีสุ นิราสงฺกฏฺฐาเนสุ ฐตฺวา อปฺเปว นาม สมูหนิตุํ สกฺขิสฺสนฺติ, ปฏิพนฺธิตุํ ปน น สกฺขิสฺสนฺเตว. สเจ พนฺเธยฺยุํ, สีมาสมฺเภทํ กตฺวา วิหารํ อวิหารํ กเรยฺยุํ, ตสฺมา น สมูหนิตพฺพา. เย ปน อุโภปิ น ชานนฺติ, เตเนว สมูหนิตุํ น พนฺธิตุํ สกฺขิสฺสนฺติ. อยญฺหิ สีมา นาม กมฺมวาจาย วา อสีมา โหติ สาสนนฺตรธาเนน วา, น จ สกฺกา สีมํ อชานนฺเตหิ กมฺมวาจา กาตุํ, ตสฺมา น สมูหนิตพฺพา. สาธุกํ ปน ญตฺวาเยว สมูหนิตพฺพา จ พนฺธิตพฺพา จาติ. "आणि भिक्खूंनो, अशा प्रकारे त्रिचीवराने अविप्रवास सीमा रद्द करावी" यामध्ये सीमा रद्द करणाऱ्या भिक्खूने कर्तव्य जाणले पाहिजे. त्यामध्ये हे कर्तव्य आहे - खंडसीमेमध्ये उभे राहून अविप्रवास सीमा रद्द करू नये, तसेच अविप्रवास सीमेमध्ये उभे राहून खंडसीमा देखील रद्द करू नये. परंतु खंडसीमेमध्ये उभे असलेल्या भिक्खूने खंडसीमाच रद्द करावी, तसेच दुसऱ्या सीमेमध्ये उभे असलेल्याने दुसरीच सीमा रद्द करावी. सीमा दोन कारणांमुळे रद्द केली जाते - मूळची लहान असलेली सीमा पुन्हा विहाराच्या विस्तारासाठी मोठी करण्यासाठी; किंवा मूळची मोठी असलेली सीमा इतरांना विहारासाठी जागा देण्यासाठी लहान करण्यासाठी. त्यामध्ये जर ते खंडसीमा आणि अविप्रवास सीमा दोन्ही जाणत असतील, तर ते ती रद्द करण्यास आणि पुन्हा बांधण्यास समर्थ होतील. परंतु खंडसीमा जाणणारे आणि अविप्रवास सीमा न जाणणारे देखील ती रद्द करण्यास आणि पुन्हा बांधण्यास समर्थ होतील. खंडसीमा न जाणणारे आणि केवळ अविप्रवास सीमाच जाणणारे चैत्य-अंगण, बोधी-अंगण, उपोसथ-गृह इत्यादी शंकारहित ठिकाणी उभे राहून कदाचित रद्द करण्यास समर्थ होतील, परंतु पुन्हा बांधण्यास मात्र मुळीच समर्थ होणार नाहीत. जर त्यांनी ती बांधली, तर सीमेचा संकर करून ते विहाराला अविहार बनवतील, म्हणून ती रद्द करू नये. परंतु जे दोन्ही सीमा जाणत नाहीत, ते रद्द करण्यास किंवा बांधण्यास मुळीच समर्थ होणार नाहीत. कारण ही सीमा कम्मवाचेने किंवा शासनाच्या अंतर्धानाने असीमा होते, आणि सीमा न जाणणाऱ्यांकडून कम्मवाचा करणे शक्य नाही, म्हणून ती रद्द करू नये. परंतु चांगल्या प्रकारे जाणूनच ती रद्द करावी आणि पुन्हा बांधावी. คามสีมาทิกถา ग्रामसीमादिकाथा. ๑๔๗. เอวํ [Pg.333] พทฺธสีมาวเสน สมานสํวาสญฺจ เอกูโปสถภาวญฺจ ทสฺเสตฺวา อิทานิ อพทฺธสีเมสุปิ โอกาเสสุ ตํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อสมฺมตาย, ภิกฺขเว, สีมาย อฏฺฐปิตายา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ อฏฺฐปิตายาติ อปริจฺฉินฺนาย. คามคฺคหเณน เจตฺถ นครมฺปิ คหิตเมว โหติ. ตตฺถ ยตฺตเก ปเทเส ตสฺส คามสฺส โภชกา พลึ ลภนฺติ, โส ปเทโส อปฺโป วา โหตุ มหนฺโต วา, คามสีมาตฺเวว สงฺขฺยํ คจฺฉติ. นครนิคมสีมาสุปิ เอเสว นโย. ยมฺปิ เอกสฺมึเยว คามเขตฺเต เอกํ ปเทสํ ‘‘อยํ วิสุํ คาโม โหตู’’ติ ปริจฺฉินฺทิตฺวา ราชา กสฺสจิ เทติ, โสปิ วิสุํคามสีมา โหติเยว. ตสฺมา สา จ อิตรา จ ปกติคามนครนิคมสีมา พทฺธสีมาสทิสาเยว โหนฺติ, เกวลํ ปน ติจีวรวิปฺปวาสปริหารํ น ลภนฺติ. १४७. अशा प्रकारे बद्धसीमेच्या आधारे समानसंवास आणि एक-उपोसथ भाव दर्शवून, आता अबद्धसीमा असलेल्या ठिकाणी देखील ते दर्शवण्यासाठी "भिक्खूंनो, असंमत आणि अस्थापित सीमेमध्ये" इत्यादी म्हणाले. तेथे 'अस्थापित' म्हणजे अपरिच्छिन्न (निश्चित न केलेली). आणि येथे 'गाव' या शब्दाच्या ग्रहणाने नगराचाही समावेश झालेलाच आहे. त्यामध्ये जितक्या प्रदेशात त्या गावाचे भोगी (अधिकारी) कर मिळवतात, तो प्रदेश लहान असो वा मोठा, तो 'ग्रामसीमा' याच संज्ञेस प्राप्त होतो. नगर आणि निगम यांच्या सीमांच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. एकाच ग्रामक्षेत्रात एखाद्या प्रदेशाला "हा स्वतंत्र गाव असो" असे निश्चित करून राजा जर कोणाला देत असेल, तर ती देखील स्वतंत्र ग्रामसीमाच होते. म्हणून ती आणि इतर सामान्य ग्राम, नगर व निगम यांच्या सीमा बद्धसीमेसारख्याच असतात, परंतु केवळ त्रिचीवर-विप्रवास परिहार त्यांना मिळत नाही। เอวํ คามนฺตวาสีนํ สีมาปริจฺเฉทํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ อารญฺญกานํ สีมาปริจฺเฉทํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อคามเก เจ’’ติอาทิมาห. ตตฺถ อคามเก เจติ คามนิคมนครสีมาหิ อปริจฺฉินฺเน อฏวิปฺปเทเส. อถ วา อคามเก เจติ วิชฺฌาฏวิสทิเส อรญฺเญ ภิกฺขุ วสติ, อถสฺส ฐิโตกาสโต สมนฺตา สตฺตพฺภนฺตรา สมานสํวาสกสีมาติ อตฺโถ. อยํ สีมา ติจีวรวิปฺปวาสปริหารมฺปิ ลภติ. ตตฺถ เอกํ อพฺภนฺตรํ อฏฺฐวีสติ หตฺถปฺปมาณํ โหติ. มชฺเฌ ฐิตสฺส สมนฺตา สตฺตพฺภนฺตรา วินิพฺเพเธน จุทฺทส โหนฺติ. สเจ ทฺเว สงฺฆา วิสุํ วินยกมฺมานิ กโรนฺติ, ทฺวินฺนํ สตฺตพฺภนฺตรานํ อนฺตเร อญฺญํ เอกํ สตฺตพฺภนฺตรํ อุปจารตฺถาย ฐเปตพฺพํ. เสสา สตฺตพฺภนฺตรสีมกถา มหาวิภงฺเค อุโทสิตสิกฺขาปทวณฺณนายํ วุตฺตนเยน คเหตพฺพา. अशा प्रकारे गावाजवळ राहणाऱ्या भिक्खूंच्या सीमेची मर्यादा दाखवून, आता अरण्यात राहणाऱ्या भिक्खूंच्या सीमेची मर्यादा दाखवताना 'अगामके चे' (जर निर्जन अरण्यात) इत्यादी म्हणाले. तेथे 'अगामके चे' म्हणजे गाव, निगम किंवा नगर यांच्या सीमांनी मर्यादित नसलेल्या अरण्य प्रदेशात. किंवा 'अगामके चे' म्हणजे विंध्यारण्यासारख्या मोठ्या अरण्यात जर भिक्खू राहत असेल, तर त्याच्या राहण्याच्या ठिकाणापासून चहूबाजूंनी सात 'अब्भन्तर' (अंतरे) ही 'समानसंवासक सीमा' (एकत्र राहण्याची सीमा) होते, असा अर्थ आहे. या सीमेला तिचीवर-विप्पवास (तीन चिंवरांपासून दूर राहण्याची) सूट देखील मिळते. तेथे एक 'अब्भन्तर' म्हणजे अठ्ठावीस हात प्रमाणाचे असते. मध्यभागी राहिलेल्या भिक्खूच्या चहूबाजूंनी सात अब्भन्तर म्हणजे आरपार चौदा अब्भन्तर होतात. जर दोन संघ वेगवेगळ्या प्रकारे विनय कर्मे करत असतील, तर त्या दोन सात-अब्भन्तर सीमांच्या मध्ये उपचारासाठी (सीमांतरालासाठी) आणखी एक सात-अब्भन्तर अंतर सोडले पाहिजे. उर्वरित सात-अब्भन्तर सीमेची कथा महाविभंगातील 'उदोसित सिक्खापद' वर्णनात सांगितलेल्या पद्धतीने समजून घ्यावी. สพฺพา ภิกฺขเว นที อสีมาติ ยา กาจิ นทีลกฺขณปฺปตฺตา นที นิมิตฺตานิ กิตฺเตตฺวา ‘‘เอตํ พทฺธสีมํ กโรมา’’ติ กตาปิ อสีมาว โหติ, สา ปน อตฺตโน สภาเวเนว พทฺธสีมาสทิสา, สพฺพเมตฺถ สงฺฆกมฺมํ กาตุํ วฏฺฏติ. สมุทฺทชาตสฺสเรสุปิ เอเสว นโย. เอตฺถ จ ชาตสฺสโร นาม เยน เกนจิ ขณิตฺวา อกโต สยํชาตโสพฺโภ สมนฺตโต อาคเตน อุทเกน ปูริโต ติฏฺฐติ. भिक्खूंनो, 'सर्व नद्या अबद्धसीमा आहेत' याचा अर्थ असा की, नदीचे लक्षण प्राप्त झालेली कोणतीही नदी, तिच्यातील पाषाण इत्यादी निमित्तांचे उच्चारण करून 'आम्ही हिला बद्धसीमा करू या' असे ठरवून सीमा निश्चित केली तरीही ती अबद्धसीमाच राहते. परंतु ती नदी स्वतःच्या स्वभावानेच बद्धसीमेसारखी असते, तेथे सर्व प्रकारचे संघकर्म करणे योग्य ठरते. समुद्र आणि जातस्सर (नैसर्गिक तलाव) यांच्या बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. आणि येथे 'जातस्सर' म्हणजे जो कोणाकडूनही खणून तयार केलेला नसून, स्वतःच निर्माण झालेला जलाशय असून चहूबाजूंनी आलेल्या पाण्याने भरलेला असतो. เอวํ [Pg.334] นทีสมุทฺทชาตสฺสรานํ พทฺธสีมาภาวํ ปฏิกฺขิปิตฺวา ปุน ตตฺถ อพทฺธสีมาปอจฺเฉทํ ทสฺเสนฺโต ‘‘นทิยา วา ภิกฺขเว’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ยํ มชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส สมนฺตา อุทกุกฺเขปาติ ยํ ฐานํ มชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส สมนฺตโต อุทกุกฺเขเปน ปริจฺฉินฺนํ. กถํ ปน อุทกํ อุกฺขิปิตพฺพํ? ยถา อกฺขธุตฺตา ทารุคุฬํ ขิปนฺติ, เอวํ อุทกํ วา วาลิกํ วา หตฺเถน คเหตฺวา ถามมชฺฌิเมน ปุริเสน สพฺพถาเมน ขิปิตพฺพํ. ยตฺถ เอวํ ขิตฺตํ อุทกํ วา วาลิกา วา ปตติ, อยเมโก อุทกุกฺเขโป. ตสฺส อนฺโต หตฺถปาสํ วิชหิตฺวา ฐิโต กมฺมํ โกเปติ. ยาว ปริสา วฑฺฒติ, ตาว สีมาปิ วฑฺฒติ. ปริสปริยนฺตโต อุทกุกฺเขโปเยว ปมาณํ. ชาตสฺสรสมุทฺเทสุปิ เอเสว นโย. अशा प्रकारे नदी, समुद्र आणि जातस्सर यांचा बद्धसीमा असण्याचा नकार करून, पुन्हा तेथे अबद्धसीमेची मर्यादा दाखवण्यासाठी भगवंतांनी 'नदीया वा भिक्खवे' (किंवा नदीमध्ये, भिक्खूंनो) इत्यादी म्हटले. तेथे 'मध्यम पुरुषाच्या चहूबाजूंनी पाणी फेकणे (उदकक्षेप)' म्हणजे जे ठिकाण मध्यम शक्तीच्या पुरुषाने चहूबाजूंनी पाणी फेकून मर्यादित केले आहे. पण पाणी कसे फेकावे? ज्याप्रमाणे जुगारी लाकडी सोंगटी फेकतात, त्याप्रमाणे पाणी किंवा वाळू हातात घेऊन मध्यम शक्तीच्या पुरुषाने आपल्या पूर्ण ताकदीने फेकावी. जेथे अशा प्रकारे फेकलेले पाणी किंवा वाळू पडते, तो एक 'उदकक्षेप' होय. त्याच्या आत हस्तपाश सोडून उभा राहिलेला भिक्खू संघकर्मात बाधा आणतो. जोपर्यंत परिषद वाढते, तोपर्यंत सीमा देखील वाढते. परिषदेच्या शेवटच्या टोकापासून उदकक्षेप हेच प्रमाण मानले जाते. जातस्सर आणि समुद्राच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. เอตฺถ จ สเจ นที นาติทีฆา โหติ, ปภวโต ปฏฺฐาย ยาว มุขทฺวารา สพฺพตฺถ สงฺโฆ นิสีทติ, อุทกุกฺเขปสีมากมฺมํ นตฺถิ, สกลาปิ นที เอเตสํเยว ภิกฺขูนํ ปโหติ. ยํ ปน มหาสุมตฺเถเรน วุตฺตํ ‘‘โยชนํ ปวตฺตมานาเยว นที, ตตฺราปิ อุปริ อทฺธโยชนํ ปหาย เหฏฺฐา อทฺธโยชเน กมฺมํ กาตุํ วฏฺฏตี’’ติ, ตํ มหาปทุมตฺเถเรเนว ปฏิกฺขิตฺตํ. ภควตา หิ ‘‘ติมณฺฑลํ ปฏิจฺฉาเทตฺวา ยตฺถ กตฺถจิ อุตฺตรนฺติยา ภิกฺขุนิยา อนฺตรวาสโก เตมิยตี’’ติ อิทํ นทิยา ปมาณํ วุตฺตํ, น โยชนํ วา อทฺธโยชนํ วา. ตสฺมา ยา อิมสฺส สุตฺตสฺส วเสน ปุพฺเพ วุตฺตลกฺขณา นที, ตสฺสา ปภวโต ปฏฺฐาย สงฺฆกมฺมํ กาตุํ วฏฺฏตีติ. สเจ ปเนตฺถ พหู ภิกฺขู วิสุํ วิสุํ กมฺมํ กโรนฺติ, สพฺเพหิ อตฺตโน จ อญฺเญสญฺจ อุทกุกฺเขปปริจฺเฉทสฺส อนฺตรา อญฺโญ อุทกุกฺเขโป สีมนฺตริกตฺถาย ฐเปตพฺโพ. ตโต อธิกํ วฏฺฏติเยว, อูนกํ ปน น วฏฺฏตีติ วุตฺตํ. ชาตสฺสรสมุทฺเทสุปิ เอเสว นโย. आणि येथे जर नदी फार लांब नसेल आणि तिच्या उगमस्थानापासून मुखापर्यंत सर्व ठिकाणी संघ बसला असेल, तर उदकक्षेप सीमेचे कार्य करण्याची गरज नसते; संपूर्ण नदीच त्या भिक्खूंसाठी पुरेशी होते. परंतु महासुम स्थविरांनी जे म्हटले होते की, 'एक योजन वाहणारी तीच नदी होय, आणि तेथेही वरचे अर्धे योजन सोडून खालच्या अर्ध्या योजनात कर्म करणे योग्य आहे', त्याचे महापदुम स्थविरांनीच खंडन केले आहे. कारण भगवंतांनी 'तिन्ही मंडळांना (गुडघे आणि नाभी) झाकून कोणत्याही ठिकाणी नदी ओलांडणाऱ्या भिक्खुणीचे अंतर्वासक ओले होते' हे नदीचे प्रमाण सांगितले आहे, एक योजन किंवा अर्धे योजन असे सांगितलेले नाही. म्हणून या सूत्राच्या आधारे पूर्वी सांगितलेली लक्षणे असणाऱ्या नदीच्या उगमापासूनच संघकर्म करणे योग्य ठरते. जर येथे अनेक भिक्खू वेगवेगळे कर्म करत असतील, तर सर्वांनी स्वतःच्या आणि इतरांच्या उदकक्षेप मर्यादेच्या मध्ये सीमांतरालासाठी दुसरा एक उदकक्षेप सोडला पाहिजे. त्यापेक्षा जास्त अंतर ठेवणे योग्यच आहे, परंतु कमी अंतर ठेवणे योग्य नाही, असे म्हटले आहे. जातस्सर आणि समुद्राच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. นทิยา ปน กมฺมํ กริสฺสามาติ คเตหิ สเจ นที ปริปุณฺณา โหติ สมติตฺติกา, อุทกสาฏิกํ นิวาเสตฺวาปิ อนฺโตนทิยํเยว กมฺมํ กาตพฺพํ. สเจ น สกฺโกนฺติ, นาวายปิ ฐตฺวา กาตพฺพํ. คจฺฉนฺติยา ปน นาวาย กาตุํ น วฏฺฏติ. กสฺมา? อุทกุกฺเขปมตฺตเมว หิ สีมา, ตํ นาวา สีฆเมว อติกฺกาเมติ. เอวํ สติ อญฺญิสฺสา สีมาย ญตฺติ อญฺญิสฺสา อนุสาวนา โหติ, ตสฺมา นาวํ อริตฺเตน วา ฐเปตฺวา ปาสาเณ วา ลมฺพิตฺวา [Pg.335] อนฺโตนทิยํ ชาตรุกฺเข วา พนฺธิตฺวา กมฺมํ กาตพฺพํ. อนฺโตนทิยํ พทฺธอฏฺฏเกปิ อนฺโตนทิยํ ชาตรุกฺเขปิ ฐิเตหิ กาตุํ วฏฺฏติ. जर 'नदीमध्ये कर्म करू या' असे म्हणून गेलेल्या भिक्खूंना नदी पाण्याने पूर्ण भरलेली आणि काठोकाठ वाहणारी आढळली, तर जल-शाटी (पाण्यात नेसण्याचे वस्त्र) नेसूनही नदीच्या आतच कर्म केले पाहिजे. जर ते शक्य नसेल, तर नौकेवर राहूनही कर्म करावे. परंतु चालत्या नौकेवर कर्म करणे योग्य नाही. का? कारण उदकक्षेप एवढीच सीमा असते आणि नौका ती सीमा वेगाने ओलांडून जाते. असे झाल्यास एका सीमेमध्ये ज्ञप्ति (प्रस्ताव) आणि दुसऱ्या सीमेमध्ये अनुसावन (घोषणा) होईल. म्हणून नौकेला वल्ह्याने स्थिर करून, किंवा दगडाला बांधून पाण्यात सोडून, किंवा नदीच्या आत उगवलेल्या झाडाला बांधून कर्म केले पाहिजे. नदीच्या आत बांधलेल्या मचाणावर किंवा नदीच्या आत उगवलेल्या झाडावर राहून कर्म करणे योग्य ठरते. สเจ ปน รุกฺขสฺส สาขา วา ตโต นิกฺขนฺตปาโรโห วา พหินทีตีเร วิหารสีมาย วา คามสีมาย วา ปติฏฺฐิโต, สีมํ วา โสเธตฺวา สาขํ วา ฉินฺทิตฺวา กมฺมํ กาตพฺพํ. พหินทีตีเร ชาตรุกฺขสฺส อนฺโตนทิยํ ปวิฏฺฐสาขาย วา ปาโรเห วา นาวํ พนฺธิตฺวา กมฺมํ กาตุํ น วฏฺฏติ. กโรนฺเตหิ สีมา วา โสเธตพฺพา, ฉินฺทิตฺวา วาสฺส พหิปติฏฺฐิตภาโว นาเสตพฺโพ. นทีตีเร ปน ขาณุกํ โกฏฺเฏตฺวา ตตฺถ พทฺธนาวาย น วฏฺฏติเยว. परंतु जर झाडाची फांदी किंवा त्यातून निघालेली पारंबी नदीच्या काठाबाहेर विहार-सीमेवर किंवा ग्राम-सीमेवर टेकलेली असेल, तर सीमा शुद्ध करून किंवा ती फांदी कापून कर्म केले पाहिजे. नदीच्या काठाबाहेर उगवलेल्या झाडाच्या नदीच्या आत आलेल्या फांदीला किंवा पारंबीला नौका बांधून कर्म करणे योग्य नाही. कर्म करणाऱ्यांनी एकतर सीमा शुद्ध करावी किंवा ती फांदी कापून तिचा बाहेर टेकलेला भाग नष्ट करावा. नदीच्या काठावर मेढ ठोकून त्याला बांधलेल्या नौकेवर कर्म करणे मुळीच योग्य नाही. นทิยํ เสตุํ กโรนฺติ, สเจ อนฺโตนทิยํเยว เสตุ วา เสตุปาทา วา, เสตุมฺหิ ฐิเตหิ กมฺมํ กาตุํ วฏฺฏติ. สเจ ปน เสตุ วา เสตุปาทา วา พหิตีเร ปติฏฺฐิตา, กมฺมํ กาตุํ น วฏฺฏติ, สีมํ โสเธตฺวา กาตพฺพํ. อถ เสตุปาทา อนฺโต, เสตุ ปน อุภินฺนมฺปิ ตีรานํ อุปริอากาเส ฐิโต, วฏฺฏติ. อนฺโตนทิยํ ปาสาโณ วา ทีปโก วา โหติ, ตสฺส ยตฺตกํ ปเทสํ ปุพฺเพ วุตฺตปฺปกาเร ปกติวสฺสกาเล วสฺสานสฺส จตูสุ มาเสสุ อุทกํ โอตฺถรติ, โส นทีสงฺขฺยเมว คจฺฉติ. อติวุฏฺฐิกาเล ปน โอเฆน โอตฺถโฏกาโส น คเหตพฺโพ, โส หิ คามสีมาสงฺขฺยเมว คจฺฉติ. नदीवर पूल बांधतात; जर तो पूल किंवा पुलाचे खांब नदीच्या आतच असतील, तर पुलावर राहून कर्म करणे योग्य ठरते. परंतु जर पूल किंवा पुलाचे खांब नदीच्या बाहेर काठावर टेकलेले असतील, तर कर्म करणे योग्य नाही; सीमा शुद्ध करून कर्म करावे. जर पुलाचे खांब नदीच्या आत असतील, परंतु पूल दोन्ही काठांच्या वर आकाशात असेल, तर कर्म करणे योग्य ठरते. नदीच्या आत एखादा दगड किंवा बेट असते, त्याच्या जितक्या भागावर पूर्वी सांगितल्याप्रमाणे सामान्य पावसाळ्यात, पावसाळ्याच्या चार महिन्यांत पाणी पसरते, तो भाग नदीच्या संज्ञेतच मानला जातो. परंतु अतिवृष्टीच्या वेळी पुराच्या पाण्याने व्यापलेला भाग गृहीत धरू नये, कारण तो भाग ग्राम-सीमेच्या संज्ञेतच जातो. นทิโต มาติกํ นีหรนฺตา นทิยํ อาวรณํ กโรนฺติ, ตญฺเจ โอตฺถริตฺวา วา วินิพฺพิชฺฌิตฺวา วา อุทกํ คจฺฉติ, สพฺพตฺถ ปวตฺตนฏฺฐาเน กมฺมํ กาตุํ วฏฺฏติ. สเจ ปน อาวรเณน วา โกฏฺฏกพนฺธเนน วา โสตํ ปจฺฉิชฺชติ, อุทกํ นปฺปวตฺตติ, อปฺปวตฺตนฏฺฐาเน กมฺมํ กาตุํ น วฏฺฏติ. อาวรณมตฺถเกปิ กาตุํ น วฏฺฏติ. สเจ โกจิ อาวรณปฺปเทโส ปุพฺเพ วุตฺตปาสาณทีปกปฺปเทโส วิย อุทเกน อชฺโฌตฺถริยติ, ตตฺถ วฏฺฏติ. โส หิ นทีสงฺขฺยเมว คจฺฉติ. นทึ วินาเสตฺวา ตฬากํ กโรนฺติ, เหฏฺฐา ปาฬิ พทฺธา, อุทกํ อาคนฺตฺวา ตฬากํ ปูเรตฺวา ติฏฺฐติ, เอตฺถ กมฺมํ กาตุํ น วฏฺฏติ. อุปริ ปวตฺตนฏฺฐาเน เหฏฺฐา จ ฉฑฺฑิตโมทกํ นทึ โอตฺถริตฺวา สนฺทนฏฺฐานโต ปฏฺฐาย วฏฺฏติ. เทเว อวสฺสนฺเต เหมนฺตคิมฺเหสุ วา สุกฺขนทิยาปิ วฏฺฏติ. นทิโต นีหฏมาติกาย น วฏฺฏติ. สเจ [Pg.336] สา กาลนฺตเรน ภิชฺชิตฺวา นที โหติ, วฏฺฏติ. กาจิ นที กาลนฺตเรน อุปฺปติตฺวา คามนิคมสีมํ โอตฺถริตฺวา ปวตฺตติ, นทีเยว โหติ, กมฺมํ กาตุํ วฏฺฏติ. สเจ ปน วิหารสีมํ โอตฺถรติ, วิหารสีมาตฺเวว สงฺขฺยํ คจฺฉติ. नदीतून कालवा काढू इच्छिणारे नदीमध्ये धरण (बंधारा) बांधतात. जर पाणी त्या धरणावरून वाहून किंवा त्याला फोडून पुढे जात असेल, तर सर्व ठिकाणी जेथे पाणी वाहते, तेथे संघकर्म करणे योग्य आहे. पण जर धरणाने किंवा मातीच्या बंधाऱ्याने पाण्याचा प्रवाह खंडित झाला आणि पाणी वाहत नसेल, तर पाणी न वाहणाऱ्या ठिकाणी कर्म करणे योग्य नाही. धरणाच्या वरच्या भागावरही कर्म करणे योग्य नाही. जर धरणाचा एखादा भाग पूर्वी सांगितलेल्या खडकाळ बेटासारखा पाण्याने व्यापलेला असेल, तर तेथे कर्म करणे योग्य आहे; कारण तो भाग नदीमध्येच गणला जातो. नदी नष्ट करून (तिचा प्रवाह अडवून) तलाव बनवला जातो, खाली बांध घातला जातो, पाणी येऊन तलाव भरून राहते, अशा ठिकाणी कर्म करणे योग्य नाही. वरच्या वाहत्या भागात आणि खाली सोडलेले पाणी नदीत उतरून जेथून वाहू लागते, तेथून पुढे कर्म करणे योग्य आहे. पाऊस पडत नसताना, हेमंत किंवा उन्हाळ्यात सुकलेल्या नदीतही कर्म करणे योग्य आहे. नदीतून काढलेल्या लहान कालव्यात कर्म करणे योग्य नाही. जर तो कालवा कालांतराने फुटून नदी बनला, तर योग्य आहे. एखादी नदी कालांतराने ओसंडून वाहून गाव किंवा नगराच्या सीमेला व्यापून वाहू लागली, तर ती नदीच असते, तेथे कर्म करणे योग्य आहे. पण जर ती विहाराच्या सीमेला व्यापत असेल, तर ती विहाराची सीमा म्हणूनच गणली जाते. สมุทฺเทปิ กมฺมํ กโรนฺเตหิ ยํ ปเทสํ อุทฺธํ วฑฺฒนอุทกํ วา ปกติวีจิ วา เวเคน อาคนฺตฺวา โอตฺถรติ, ตตฺถ กาตุํ น วฏฺฏติ. ยสฺมึ ปน ปเทเส ปกติวีจิโย โอตฺถริตฺวา สณฺฐหนฺติ, โส อุทกนฺตโต ปฏฺฐาย อนฺโตสมุทฺโท นาม, ตตฺถ ฐิเตหิ กมฺมํ กาตพฺพํ. สเจ อูมิเวโค พาธติ, นาวาย วา อฏฺฏเก วา ฐตฺวา กาตพฺพํ. เตสุ วินิจฺฉโย นทิยํ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. สมุทฺเท ปิฏฺฐิปาสาโณ โหติ, ตํ กทาจิ อูมิโย อาคนฺตฺวา โอตฺถรนฺติ, กทาจิ น โอตฺถรนฺติ, ตตฺถ กมฺมํ กาตุํ น วฏฺฏติ, โส หิ คามสีมาสงฺขฺยเมว คจฺฉติ. สเจ ปน วีจีสุ อาคตาสุปิ อนาคตาสุปิ ปกติอุทเกเนว โอตฺถริยติ, วฏฺฏติ. ทีปโก วา ปพฺพโต วา โหติ, โส เจ ทูเร โหติ มจฺฉพนฺธานํ อคมนปเถ, อรญฺญสีมาสงฺขฺยเมว คจฺฉติ. เตสํ คมนปริยนฺตสฺส โอรโต ปน คามสีมาสงฺขฺยํ คจฺฉติ. ตตฺถ คามสีมํ อโสเธตฺวา กมฺมํ กาตุํ น วฏฺฏติ. สมุทฺโท คามสีมํ วา นิคมสีมํ วา โอตฺถริตฺวา ติฏฺฐติ, สมุทฺโทว โหติ, ตตฺถ กมฺมํ กาตุํ วฏฺฏติ. สเจ ปน วิหารสีมํ โอตฺถรติ, วิหารสีมาตฺเวว สงฺขฺยํ คจฺฉติ. समुद्रातही कर्म करणाऱ्या भिक्खूंनी, ज्या भागावर भरतीचे पाणी किंवा नैसर्गिक लाटा वेगाने येऊन पसरतात, तेथे कर्म करणे योग्य नाही. पण ज्या भागात नैसर्गिक लाटा पसरून स्थिर राहतात, तो पाण्याचा शेवट जेथून सुरू होतो तेथून 'अंतःसमुद्र' (समुद्राचा आतील भाग) म्हटला जातो, तेथे राहून कर्म करावे. जर लाटांचा वेग त्रास देत असेल, तर नौकेवर किंवा मचाणावर उभे राहून कर्म करावे. त्यांच्याविषयीचा निर्णय नदीच्या संदर्भात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. समुद्रात सपाट खडक असतो, ज्याला कधी लाटा येऊन व्यापतात तर कधी व्यापत नाहीत, तेथे कर्म करणे योग्य नाही; कारण तो गावच्या सीमेतच गणला जातो. पण जर लाटा आल्या किंवा न आल्या तरी तो नेहमीच्या पाण्यानेच व्यापलेला राहत असेल, तर तेथे कर्म करणे योग्य आहे. जर एखादे बेट किंवा पर्वत असेल, आणि तो कोळ्यांच्या येण्या-जाण्याच्या मार्गापासून दूर असेल, तर तो अरण्य सीमेतच गणला जातो. पण त्यांच्या जाण्याच्या मर्यादेच्या अलीकडचा भाग असेल, तर तो गावच्या सीमेत गणला जातो. तेथे गावची सीमा शुद्ध केल्याशिवाय कर्म करणे योग्य नाही. समुद्र गावच्या सीमेला किंवा नगराच्या सीमेला व्यापून राहिला असेल, तर तो समुद्रच मानला जातो, तेथे कर्म करणे योग्य आहे. पण जर तो विहाराच्या सीमेला व्यापत असेल, तर ती विहाराची सीमा म्हणूनच गणली जाते. ชาตสฺสเร กมฺมํ กโรนฺเตหิปิ ยตฺถ ปุพฺเพ วุตฺตปฺปกาเร วสฺสกาเล วสฺเส ปจฺฉินฺนมตฺเต ปิวิตุํ วา หตฺถปาเท วา โธวิตุํ อุทกํ น โหติ, สุกฺขติ, อยํ น ชาตสฺสโร, คามเขตฺตสงฺขฺยเมว คจฺฉติ, ตตฺถ กมฺมํ น กาตพฺพํ. ยตฺถ ปน วุตฺตปฺปกาเร วสฺสกาเล อุทกํ สนฺติฏฺฐติ, อยเมว ชาตสฺสโร. ตสฺส ยตฺตเก ปเทเส วสฺสานํ จาตุมาเส อุทกํ ติฏฺฐติ, ตตฺถ กมฺมํ กาตุํ วฏฺฏติ. สเจ คมฺภีรํ อุทกํ, อฏฺฏกํ พนฺธิตฺวา ตตฺถ ฐิเตหิปิ ชาตสฺสรสฺส อนฺโต ชาตรุกฺขมฺหิ พทฺธอฏฺฏเกปิ กาตุํ วฏฺฏติ. ปิฏฺฐิปาสาณทีปเกสุ ปเนตฺถ นทิยํ วุตฺตสทิโสว วินิจฺฉโย. สมวสฺสเทวกาเล ปโหนกชาตสฺสโร ปน สเจปิ ทุพฺพุฏฺฐิกาเล วา คิมฺหเหมนฺเตสุ วา สุกฺขติ, นิรุทโก โหติ, ตตฺถ สงฺฆกมฺมํ กาตุํ วฏฺฏติ. ยํ อนฺธกฏฺฐกถายํ วุตฺตํ ‘‘สพฺโพ ชาตสฺสโร สุกฺโข อโนทโก[Pg.337], คามเขตฺตํเยว ภชตี’’ติ, ตํ น คเหตพฺพํ. สเจ ปเนตฺถ อุทกตฺถาย อาวาฏํ วา โปกฺขรณีอาทีนิ วา ขณนฺติ, ตํ ฐานํ อชาตสฺสโร โหติ, คามสีมาสงฺขฺยํ คจฺฉติ. ลาพุติปุสกาทิวปฺเป กเตปิ เอเสว นโย. नैसर्गिक सरोवरात कर्म करणाऱ्यांनीही हे लक्षात घ्यावे की, जेथे पूर्वी सांगितल्याप्रमाणे पावसाळ्यात पाऊस थांबल्याबरोबर पिण्यासाठी किंवा हात-पाय धुण्यासाठी पाणी उरत नाही आणि ते सुकते, ते नैसर्गिक सरोवर नाही; ते गावच्या शेतजमिनीतच गणले जाते, तेथे कर्म करू नये. पण जेथे पूर्वी सांगितल्याप्रमाणे पावसाळ्यात पाणी टिकून राहते, तेच नैसर्गिक सरोवर होय. त्याच्या जेवढ्या भागात पावसाळ्याच्या चार महिन्यांत पाणी टिकून राहते, तेथे कर्म करणे योग्य आहे. जर पाणी खोल असेल, तर मचाण बांधून त्यावर उभे राहून, किंवा सरोवराच्या आत उगवलेल्या झाडावर बांधलेल्या मचाणावर उभे राहूनही कर्म करणे योग्य आहे. येथील सपाट खडक आणि बेटांच्या बाबतीत नदीच्या संदर्भात सांगितल्याप्रमाणेच निर्णय आहे. सामान्य पावसाच्या काळात जे नैसर्गिक सरोवर बनण्यास पुरेसे असते, ते जर दुष्काळाच्या वेळी किंवा उन्हाळ्यात व हिवाळ्यात सुकले आणि पाणी नसलेले झाले, तरीही तेथे संघकर्म करणे योग्य आहे. अंधकअट्ठकथेत जे म्हटले आहे की, 'सर्व सुकलेले आणि पाणी नसलेले नैसर्गिक सरोवर गावच्या शेतजमिनीतच समाविष्ट होते,' ते स्वीकारू नये. जर तेथे पाण्यासाठी खड्डा किंवा पुष्करणी (तलाव) इत्यादी खोदले, तर ते स्थान नैसर्गिक सरोवर राहत नाही, ते गावच्या सीमेत गणले जाते. भोपळा, काकडी इत्यादींची लागवड केली तरी हाच नियम लागू होतो. สเจ ปน ตํ ปูเรตฺวา ถลํ วา กโรนฺติ, เอกสฺมึ ทิสาภาเค ปาฬึ พนฺธิตฺวา สพฺพเมว ตํ มหาตฬากํ วา กโรนฺติ, สพฺโพปิ อชาตสฺสโร โหติ, คามสีมาสงฺขฺยเมว คจฺฉติ. โลณีปิ ชาตสฺสรสงฺขฺยเมว คจฺฉติ. วสฺสิเก จตฺตาโร มาเส อุทกฏฺฐาโนกาเส กมฺมํ กาตุํ วฏฺฏตีติ. पण जर ते सरोवर मातीने भरून कोरडी जमीन बनवली, किंवा एका बाजूला बांध घालून त्या संपूर्ण सरोवराला मोठा तलाव बनवले, तर ते सर्व नैसर्गिक सरोवर राहत नाही, ते गावच्या सीमेतच गणले जाते. खाडी देखील नैसर्गिक सरोवराच्या श्रेणीतच गणली जाते. पावसाळ्याच्या चार महिन्यांत जेथे पाणी असते, अशा ठिकाणी कर्म करणे योग्य आहे. ๑๔๘. สีมาย สีมํ สมฺภินฺทนฺตีติ อตฺตโน สีมาย ปเรสํ พทฺธสีมํ สมฺภินฺทนฺติ. สเจ หิ โปราณกสฺส วิหารสฺส ปุรตฺถิมาย ทิสาย อมฺโพ เจว ชมฺพู จาติ ทฺเว รุกฺขา อญฺญมญฺญํ สํสฏฺฐวิฏปา โหนฺติ, เตสุ อมฺพสฺส ปจฺฉิมทิสาภาเค ชมฺพู. วิหารสีมา จ ชมฺพุํ อนฺโต กตฺวา อมฺพํ กิตฺเตตฺวา พทฺธา โหติ, อถ ปจฺฉา ตสฺส วิหารสฺส ปุรตฺถิมาย ทิสาย วิหารํ กตฺวา สีมํ พนฺธนฺตา ตํ อมฺพํ อนฺโต กตฺวา ชมฺพุํ กิตฺเตตฺวา พนฺธนฺติ, สีมาย สีมา สมฺภินฺนา โหติ. เอวํ ฉพฺพคฺคิยา อกํสุ, เตนาห – ‘‘สีมาย สีมํ สมฺภินฺทนฺตี’’ติ. १४८. 'सीमेने सीमा संमिश्रित करतात' म्हणजे स्वतःच्या सीमेने इतरांच्या बद्धसीमेला संमिश्रित करतात. जर जुन्या विहाराच्या पूर्व दिशेला आंबा आणि जांभूळ अशी दोन झाडे असतील, ज्यांच्या फांद्या एकमेकांत गुंतलेल्या आहेत, त्यापैकी आंब्याच्या पश्चिम बाजूला जांभूळ आहे. आणि विहाराची सीमा जांभळाला आत घेऊन व आंब्याला वगळून बांधलेली असते. त्यानंतर त्या विहाराच्या पूर्व दिशेला नवीन विहार बनवून सीमा निश्चित करताना, जर त्या आंब्याला आत घेऊन आणि जांभळाला वगळून सीमा बांधली, तर सीमेने सीमा संमिश्रित होते. षड्वर्गीय भिक्खूंनी असे केले होते, म्हणूनच म्हटले आहे - 'सीमेने सीमा संमिश्रित करतात.' สีมาย สีมํ อชฺโฌตฺถรนฺตีติ อตฺตโน สีมาย ปเรสํ พทฺธสีมํ อชฺโฌตฺถรนฺติ; 'सीमेने सीमा आच्छादित करतात' म्हणजे स्वतःच्या सीमेने इतरांच्या बद्धसीमेला आच्छादित करतात. ปเรสํ พทฺธสีมํ สกลํ วา ตสฺสา ปเทสํ วา อนฺโต กตฺวา อตฺตโน สีมํ พนฺธนฺติ. สีมนฺตริกํ ฐเปตฺวา สีมํ สมฺมนฺนิตุนฺติ เอตฺถ สเจ ปฐมตรํ กตสฺส วิหารสฺส สีมา อสมฺมตา โหติ, สีมาย อุปจาโร ฐเปตพฺโพ. สเจ สมฺมตา โหติ, ปจฺฉิมโกฏิยา หตฺถมตฺตา สีมนฺตริกา ฐเปตพฺพา. กุรุนฺทิยํ วิทตฺถิมตฺตมฺปิ, มหาปจฺจริยํ จตุรงฺคุลมตฺตมฺปิ วฏฺฏตีติ วุตฺตํ. เอกรุกฺโขปิ จ ทฺวินฺนํ สีมานํ นิมิตฺตํ โหติ, โส ปน วฑฺฒนฺโต สีมาสงฺกรํ กโรติ, ตสฺมา น กาตพฺโพ. इतरांच्या बद्धसीमेला पूर्णपणे किंवा तिचा काही भाग आत घेऊन स्वतःची सीमा बांधतात. 'सीमान्तरिक ठेवून सीमा संमत करावी' याविषयी निर्णय असा आहे की, जर आधी बांधलेल्या विहाराची सीमा अजून संमत झालेली नसेल, तर सीमेचा उपचार (सीमा परिसर) सोडला पाहिजे. जर ती संमत झालेली असेल, तर किमान एक हात रुंद सीमान्तरिक सोडले पाहिजे. कुरुन्दी अट्ठकथेत एक वीतभर आणि महापंचरी अट्ठकथेत चार बोटे रुंद अंतरही योग्य असल्याचे म्हटले आहे. एकच झाड दोन सीमांचे चिन्ह असू शकते, परंतु ते वाढताना सीमांचे संमिश्रण करू शकते, म्हणून तसे करू नये. อุโปสถเภทาทิกถา उपोसथ भेद इत्यादींची चर्चा. ๑๔๙. จาตุทฺทสิโก จ ปนฺนรสิโก จาติ เอตฺถ จาตุทฺทสิกสฺส ปุพฺพกิจฺเจ ‘‘อชฺชุโปสโถ จาตุทฺทโส’’ติ วตฺตพฺพํ. १४९. 'चौदावीचा आणि पंधरावीचा (उपोसथ)' या संदर्भात, चौदावीच्या उपोसथाच्या पूर्वकृत्यामध्ये 'आज चौदावीचा उपोसथ आहे' असे म्हणावे. อธมฺเมน วคฺคนฺติอาทีสุ [Pg.338] สเจ เอกสฺมึ วิหาเร จตูสุ ภิกฺขูสุ วสนฺเตสุ เอกสฺส ฉนฺทปาริสุทฺธึ อาหริตฺวา ตโย ปาริสุทฺธิอุโปสถํ กโรนฺติ, ตีสุ วา วสนฺเตสุ เอกสฺส ฉนฺทปาริสุทฺธึ อาหริตฺวา ทฺเว ปาติโมกฺขํ อุทฺทิสนฺติ, อธมฺเมน วคฺคํ อุโปสถกมฺมํ โหติ. สเจ ปน จตฺตาโรปิ สนฺนิปติตฺวา ปาริสุทฺธิอุโปสถํ กโรนฺติ, ตโย วา ทฺเว วา ปาติโมกฺขํ อุทฺทิสนฺติ, อธมฺเมน สมคฺคํ นาม โหติ. สเจ จตูสุ ชเนสุ เอกสฺส ปาริสุทฺธึ อาหริตฺวา ตโย ปาติโมกฺขํ อุทฺทิสนฺติ, ตีสุ วา ชเนสุ เอกสฺส ปาริสุทฺธึ อาหริตฺวา ทฺเว ปาริสุทฺธิอุโปสถํ กโรนฺติ, ธมฺเมน วคฺคํ นาม โหติ. สเจ ปน จตฺตาโร เอกตฺถ วสนฺตา สพฺเพว สนฺนิปติตฺวา ปาติโมกฺขํ อุทฺทิสนฺติ, ตโย ปาริสุทฺธิอุโปสถํ กโรนฺติ, ทฺเว อญฺญมญฺญํ ปาริสุทฺธิอุโปสถํ กโรนฺติ, ธมฺเมน สมคฺคํ นาม โหตีติ. 'अधम्मेन वग्गं' इत्यादींमध्ये निर्णय असा समजावा: जर एका विहारात चार भिक्खू राहत असताना, एकाची छंदपारिसुद्धि (संमती व शुद्धता) आणून तिघे पारिसुद्धि-उपोसाथ करतात, किंवा तिघे भिक्खू राहत असताना एकाची छंदपारिसुद्धि आणून दोघे पातिमोक्ख उद्दिष्ट (पठण) करतात, तर ते अधर्माने वर्ग (विभक्त) उपोसथकर्म होते. पण जर चारही जण एकत्र येऊन पारिसुद्धि-उपोसाथ करतात, किंवा तिघे अथवा दोघे पातिमोक्ख उद्दिष्ट करतात, तर ते अधर्माने समग्र (एकत्रित) कर्म होते. जर चार भिक्खूंमध्ये एकाची पारिसुद्धि आणून तिघे पातिमोक्ख उद्दिष्ट करतात, किंवा तिघांमध्ये एकाची पारिसुद्धि आणून दोघे पारिसुद्धि-उपोसाथ करतात, तर ते धर्माने वर्ग (विभक्त) कर्म होते. पण जर चारही जण एकाच ठिकाणी राहत असताना सर्व एकत्र येऊन पातिमोक्ख उद्दिष्ट करतात, किंवा तिघे पारिसुद्धि-उपोसाथ करतात, अथवा दोघे परस्परांमध्ये पारिसुद्धि-उपोसाथ करतात, तर ते धर्माने समग्र कर्म होते. ปาติโมกฺขุทฺเทสกถา पातिमोक्ख-उद्देस-कथा (पातिमोक्ख पठणाची कथा) ๑๕๐. นิทานํ อุทฺทิสิตฺวา อวเสสํ สุเตน สาเวตพฺพนฺติ ‘‘สุณาตุ เม ภนฺเต สงฺโฆ…เป… อาวิกตา หิสฺส ผาสุ โหตี’’ติ อิมํ นิทานํ อุทฺทิสิตฺวา ‘‘อุทฺทิฏฺฐํ โข อายสฺมนฺโต นิทานํ, ตตฺถายสฺมนฺเต ปุจฺฉามิ – กจฺจิตฺถ ปริสุทฺธา, ทุติยมฺปิ ปุจฺฉามิ…เป… เอวเมตํ ธารยามีติ. สุตา โข ปนายสฺมนฺเตหิ จตฺตาโร ปาราชิกา ธมฺมา…เป… อวิวทมาเนหิ สิกฺขิตพฺพ’’นฺติ เอวํ อวเสสํ สุเตน สาเวตพฺพํ. เอเตน นเยน เสสาปิ จตฺตาโร ปาติโมกฺขุทฺเทสา เวทิตพฺพา. १५०. 'निदान' (प्रस्तावना) उद्दिष्ट (पठण) करून उर्वरित भाग श्रवणाने (ऐकवून) घोषित करावा, जसे की— "सुणातु मे भन्ते सङ्घो... आविकता हिस्स फासु होती" (हे भन्ते, संघाने माझे ऐकावे... कारण प्रकट केल्याने त्याला सुख होते) या निदानाचे पठण करून, "उद्दिठ्ठं खो आयस्मन्तो निदानं, तत्थायस्मन्ते पुच्छामि – कच्चित्थ परिसुद्धा, दुतियम्पि पुच्छामि... एवमेतं धारयामि" (आयुष्यमानांनो, निदानाचे पठण झाले आहे. त्याविषयी मी आयुष्यमानांना विचारतो— तुम्ही शुद्ध आहात काय? दुसऱ्यांदाही विचारतो... हे मी असेच धारण करतो) आणि "सुता खो पनायस्मन्तेहि चत्तारो पाराजिका धम्मा... अविवादमानेहि सिक्खितब्बं" (आयुष्यमानांनी चार पाराजिका धर्म ऐकले आहेत... वाद न घालता याचे शिक्षण घेतले पाहिजे) अशा प्रकारे उर्वरित पातिमोक्ख श्रवणाने ऐकवावे. या पद्धतीने उर्वरित चार पातिमोक्ख-उद्देश देखील समजावेत. สวรภยนฺติ อฏวิมนุสฺสภยํ. ราชนฺตราโยติอาทีสุ สเจ ภิกฺขูสุ ‘‘อุโปสถํ กริสฺสามา’’ติ นิสินฺเนสุ ราชา อาคจฺฉติ, อยํ ราชนฺตราโย. โจรา อาคจฺฉนฺติ, อยํ โจรนฺตราโย. ทวทาโห วา อาคจฺฉติ, อาวาเส วา อคฺคิ อุฏฺฐหติ, อยํ อคฺคนฺตราโย. เมโฆ วา อุฏฺเฐติ, โอโฆ วา อาคจฺฉติ, อยํ อุทกนฺตราโย. พหู มนุสฺสา อาคจฺฉนฺติ, อยํ มนุสฺสนฺตราโย. ภิกฺขุํ ยกฺโข คณฺหาติ, อยํ อมนุสฺสนฺตราโย. พฺยคฺฆาทโย จณฺฑมิคา อาคจฺฉนฺติ, อยํ วาฬนฺตราโย. ภิกฺขุํ สปฺปาทโย ฑํสนฺติ, อยํ สรีสปนฺตราโย. ภิกฺขุ คิลาโน วา โหติ, กาลํ วา กโรติ, เวริโน วา ตํ มาเรตุกามา คณฺหนฺติ, อยํ [Pg.339] ชีวิตนฺตราโย. มนุสฺสา เอกํ วา พหู วา ภิกฺขู พฺรหฺมจริยา จาเวตุกามา คณฺหนฺติ, อยํ พฺรหฺมจริยนฺตราโย. เอวรูเปสุ อนฺตราเยสุ สํขิตฺเตน ปาติโมกฺโข อุทฺทิสิตพฺโพ, ปฐโม วา อุทฺเทโส อุทฺทิสิตพฺโพ, อาทิมฺหิ ทฺเว ตโย จตฺตาโร วา. เอตฺถ จ ทุติยาทีสุ อุทฺเทเสสุ ยสฺมึ อปริโยสิเต อนฺตราโย โหติ, โสปิ สุเตเนว สาเวตพฺโพ. 'सवरभय' म्हणजे रानटी लोकांचे (जंगलातील माणसांचे) भय. 'राजन्तरायो' (राजाचा अडथळा) इत्यादींमध्ये निर्णय असा समजावा: जर भिक्खू "आम्ही उपोसथ करू" असे म्हणून बसले असताना राजा येतो, तर हा 'राज-अंतराय' होय. जर चोर येतात, तर हा 'चोर-अंतराय' होय. जर वणवा येतो किंवा विहारात आग लागते, तर हा 'अग्नि-अंतराय' होय. जर मेघ (वादळ-पाऊस) उठतो किंवा पुराचा लोंढा येतो, तर हा 'उदक-अंतराय' (पाण्याचा अडथळा) होय. जर पुष्कळ लोक येतात, तर हा 'मनुष्य-अंतराय' होय. जर भिक्खूला यक्ष (किंवा पिशाच) पकडतो, तर हा 'अमनुष्य-अंतराय' होय. जर वाघ इत्यादी हिंस्र श्वापद येतात, तर हा 'व्याळ-अंतराय' (हिंस्र श्वापदांचा अडथळा) होय. जर भिक्खूला साप इत्यादी सरपटणारे प्राणी चावतात, तर हा 'सरीसृप-अंतराय' होय. जर भिक्खू आजारी पडतो, किंवा काळ करतो (मृत्यू पावतो), किंवा शत्रू त्याला मारण्याच्या इच्छेने पकडतात, तर हा 'जीवित-अंतराय' (प्राणाचा अडथळा) होय. जर लोक एका किंवा अनेक भिक्खूंना ब्रह्मचर्यापासून च्युत करण्याच्या इच्छेने पकडतात, तर हा 'ब्रह्मचर्य-अंतराय' होय. अशा प्रकारच्या अंतरायांमध्ये संक्षेपाने पातिमोक्ख उद्दिष्ट करावे, किंवा पहिला उद्देश उद्दिष्ट करावा, अथवा सुरुवातीचे दोन, तीन किंवा चार उद्देश उद्दिष्ट करावेत. आणि येथे दुसऱ्या इत्यादी उद्देशांपैकी जो उद्देश पूर्ण होण्यापूर्वीच अंतराय येतो, तो देखील श्रवणानेच (ऐकवून) घोषित करावा. อนชฺฌิฏฺฐาติ อนาณตฺตา อยาจิตา วา. อชฺเฌสนา เจตฺถ สงฺเฆน สมฺมตธมฺมชฺเฌสกายตฺตา วา สงฺฆตฺเถรายตฺตา วา, ตสฺมึ ธมฺมชฺเฌสเก อสติ สงฺฆตฺเถรํ อาปุจฺฉิตฺวา วา เตน ยาจิโต วา ภาสิตุํ ลภติ. สงฺฆตฺเถเรนาปิ สเจ วิหาเร พหู ธมฺมกถิกา โหนฺติ, วารปฏิปาฏิยา วตฺตพฺพา – ‘‘ตฺวํ ธมฺมํ ภณ, ธมฺมํ กเถหิ, ธมฺมทานํ เทหี’’ติ วา วุตฺเตน ตีหิปิ วิธีหิ ธมฺโม ภาสิตพฺโพ. ‘‘โอสาเรหี’’ติ วุตฺโต ปน โอสาเรตุเมว ลภติ, ‘‘กเถหี’’ติ วุตฺโต กเถตุเมว, ‘‘สรภญฺญํ ภณาหี’’ติ วุตฺโต สรภญฺญเมว. สงฺฆตฺเถโรปิ จ อุจฺจตเร อาสเน นิสินฺโน ยาจิตุํ น ลภติ. สเจ อุปชฺฌาโย เจว สทฺธิวิหาริโก จ โหนฺติ, อุปชฺฌาโย จ นํ อุจฺจาสเน นิสินฺโน ‘‘ภณาหี’’ติ วทติ, สชฺฌายํ อธิฏฺฐหิตฺวา ภณิตพฺพํ. สเจ ปเนตฺถ ทหรา ภิกฺขู โหนฺติ, เตสํ ‘‘ภณามี’’ติ ภณิตพฺพํ. 'अनज्झिट्ठा' म्हणजे आज्ञा न दिलेले किंवा विनंती न केलेले. येथे अध्येषणा (विनंती) ही संघाने संमत केलेल्या धम्मज्झेसक (धर्म-याचक) भिक्खूच्या अधीन असते किंवा संघथेराच्या अधीन असते. तो धम्मज्झेसक भिक्खू नसताना, संघथेरांना विचारून किंवा त्यांनी विनंती केल्यावर बोलण्याची परवानगी मिळते. जर विहारात अनेक धम्मकथिक (धर्मोपदेशक) असतील, तर संघथेरांनी देखील पाळीनुसार सांगावे— "तू धम्म सांग, धम्म प्रवचन कर, किंवा धम्मदान दे." असे सांगितल्यावर, त्या तिन्ही पद्धतींनी धम्म सांगावा. पण जर "ओसारेहि" (पठण कर) असे सांगितले असेल, तर केवळ पठण करण्याचीच परवानगी मिळते; "कथेहि" (अर्थ सांग) असे सांगितले असेल, तर केवळ अर्थ सांगण्याचीच; आणि "सरभञ्ञं भणाहि" (स्वराने पठण कर) असे सांगितले असेल, तर केवळ स्वराने पठण करण्याचीच परवानगी मिळते. संघथेरांनी देखील उच्च आसनावर बसून विनंती करू नये. जर उपाध्याय आणि सद्धिविहारिक (शिष्य) असतील, आणि उच्च आसनावर बसलेले उपाध्याय त्याला "पठण कर" असे म्हणतात, तर सज्झाय (स्वाध्याय) अधिष्ठित करून पठण करावे. आणि जर येथे तरुण भिक्खू असतील, तर "मी त्यांच्यासाठी पठण करतो" असा विचार करून पठण करावे. สเจ วิหาเร สงฺฆตฺเถโร อตฺตโนเยว นิสฺสิตเก ภณาเปติ, อญฺเญ มธุรภาณเกปิ นาชฺเฌสติ, โส อญฺเญหิ วตฺตพฺโพ – ‘‘ภนฺเต อสุกํ นาม ภณาเปมา’’ติ. สเจ ‘‘ภณาเปถา’’ติ วา วทติ, ตุณฺหี วา โหติ, ภณาเปตุํ วฏฺฏติ. สเจ ปน ปฏิพาหติ, น ภณาเปตพฺพํ. ยทิ อนาคเตเยว สงฺฆตฺเถเร ธมฺมสวนํ อารทฺธํ, ปุน อาคเต ฐเปตฺวา อาปุจฺฉนกิจฺจํ นตฺถิ. โอสาเรตฺวา ปน กเถนฺเตน อาปุจฺฉิตฺวา วา อฏฺฐเปตฺวาเยว วา กเถตพฺพํ, กเถนฺตสฺส ปุน อาคเตปิ เอเสว นโย. जर विहारात संघथेर केवळ स्वतःच्याच आश्रित शिष्यांना प्रवचन करायला लावतात आणि इतर मधुर बोलणाऱ्या धम्मकथिकांना विनंती करत नाहीत, तर इतर भिक्खूंनी त्यांना सांगावे— "भन्ते, अमुक नावाच्या भिक्खूंकडून प्रवचन करून घेऊया का?" जर ते "प्रवचन करून घ्या" असे म्हणतात किंवा शांत राहतात, तर प्रवचन करून घेणे योग्य आहे. पण जर ते मज्जाव करतात, तर प्रवचन करून घेऊ नये. जर संघथेर येण्यापूर्वीच धम्मश्रवण सुरू झाले असेल, तर ते आल्यावर प्रवचन थांबवून त्यांना विचारण्याची गरज नाही. पण पठण संपवून अर्थ सांगू इच्छिणाऱ्याने विचारून किंवा न थांबताच अर्थ सांगावा; अर्थ सांगत असताना संघथेर आले तरी हाच नियम लागू होतो. อุปนิสินฺนกถายปิ สงฺฆตฺเถโรว สามี, ตสฺมา เตน สยํ วา กเถตพฺพํ, อญฺโญ วา ภิกฺขุ ‘‘กเถหี’’ติ วตฺตพฺโพ, โน จ โข อุจฺจตเร อาสเน นิสินฺเนน. มนุสฺสานํ ปน ‘‘ภณาหี’’ติ วตฺตุํ วฏฺฏติ. มนุสฺสา อตฺตโน ชานนกภิกฺขุํ อาปุจฺฉนฺติ, เตน เถรํ อาปุจฺฉิตฺวา กเถตพฺพํ. สเจ สงฺฆตฺเถโร ‘‘ภนฺเต อิเม ปญฺหํ ปุจฺฉนฺตี’’ติ ปุฏฺโฐ ‘‘กเถหี’’ติ [Pg.340] วา ภณติ, ตุณฺหี วา โหติ, กเถตุํ วฏฺฏติ. อนฺตรฆเร อนุโมทนาทีสุปิ เอเสว นโย. สเจ สงฺฆตฺเถโร วิหาเร วา อนฺตรฆเร วา ‘‘มํ อนาปุจฺฉิตฺวาปิ กเถยฺยาสี’’ติ อนุชานาติ, ลทฺธกปฺปิยํ โหติ, สพฺพตฺถ วตฺตุํ วฏฺฏติ. जवळ बसलेल्यांना सांगायच्या धम्मकथेत देखील संघथेरच स्वामी (अधिकारी) असतात; म्हणून त्यांनी स्वतः धम्म सांगावा किंवा दुसऱ्या भिक्खूला "तू सांग" असे सांगावे, परंतु उच्च आसनावर बसून सांगू नये. पण लोकांना "धम्म सांगा" असे सांगणे योग्य आहे. लोक आपल्या ओळखीच्या भिक्खूला विचारतात, तेव्हा त्या भिक्खूने थेरांना विचारून धम्म सांगावा. जर संघथेरांना "भन्ते, हे लोक प्रश्न विचारत आहेत" असे विचारल्यावर ते "सांग" असे म्हणतात किंवा शांत राहतात, तर सांगणे योग्य आहे. घराच्या आत (गृहस्थांच्या घरी) अनुमोदन इत्यादींमध्ये देखील हाच नियम आहे. जर संघथेर विहारात किंवा घराच्या आत "मला न विचारताही तू धम्म सांगू शकतोस" अशी परवानगी देतात, तर ती योग्य सवलत ठरते आणि सर्व ठिकाणी सांगणे योग्य होते. สชฺฌายํ กโรนฺเตนาปิ เถโร อาปุจฺฉิตพฺโพเยว. เอกํ อาปุจฺฉิตฺวา สชฺฌายนฺตสฺส อปโร อาคจฺฉติ, ปุน อาปุจฺฉนกิจฺจํ นตฺถิ. สเจ วิสฺสมิสฺสามีติ ฐปิตสฺส อาคจฺฉติ, ปุน อารภนฺเตนาปิ อาปุจฺฉิตพฺพํ. สงฺฆตฺเถเร อนาคเตเยว อารทฺธํ สชฺฌายนฺตสฺสาปิ เอเสว นโย. เอเกน สงฺฆตฺเถเรน ‘‘มํ อนาปุจฺฉาปิ ยถาสุขํ สชฺฌายาหี’’ติ อนุญฺญาเต ยถาสุขํ สชฺฌายิตุํ วฏฺฏติ. อญฺญสฺมึ ปน อาคเต ตํ อาปุจฺฉิตฺวาว สชฺฌายิตพฺพํ. सज्झाय (स्वाध्याय/पठण) करणाऱ्याने देखील थेरांना विचारलेच पाहिजे. एका थेरांना विचारून पठण करत असताना दुसरा थेर येतो, तर पुन्हा विचारण्याची गरज नाही. जर "मी विश्रांती घेईन" असे म्हणून थांबवलेले असताना थेर येतात, तर पुन्हा सुरुवात करणाऱ्याने देखील विचारले पाहिजे. संघथेर जोपर्यंत आले नाहीत तोपर्यंत सुरू केलेल्या पठणाचा अभ्यास करणाऱ्यासाठी देखील हाच नियम आहे. एका संघथेरांनी "मला न विचारताही सुखपूर्वक सज्झाय (पठण) कर" अशी परवानगी दिली असल्यास सुखपूर्वक पठण करणे योग्य आहे. पण दुसरा थेर आल्यावर त्यांना विचारूनच पठण करावे. ๑๕๑. อตฺตนา วา อตฺตานํ สมฺมนฺนิตพฺพํติ อตฺตนา วา อตฺตา สมฺมนฺนิตพฺโพ; ปุจฺฉนฺเตน ปน ปริสํ โอโลเกตฺวา สเจ อตฺตโน อุปทฺทโว นตฺถิ, วินโย ปุจฺฉิตพฺโพ. १५१. 'अत्तना वा अत्तानं सम्मन्नितब्बं' म्हणजे स्वतःच स्वतःची संमती (निवड) करावी; पण विचारणाऱ्याने परिषदेकडे पाहून, जर स्वतःला काही उपद्रव (अडचण) नसेल, तर विनय विचारावा. ๑๕๓. กเตปิ โอกาเส ปุคฺคลํ ตุลยิตฺวาติ ‘‘อตฺถิ นุ โข เม อิโต อุปทฺทโว, นตฺถี’’ติ เอวํ อุปปริกฺขิตฺวา. ปุรมฺหากนฺติ ปฐมํ อมฺหากํ. ปฏิกจฺเจวาติ ปฐมตรเมว. ปุคฺคลํ ตุลยิตฺวา โอกาสํ กาตุนฺติ ‘‘ภูตเมว นุ โข อาปตฺตึ วทติ, อภูต’’นฺติ เอวํ อุปปริกฺขิตฺวา โอกาสํ กาตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. १५३. "कतेपि ओकासे पुग्गलं तुलयित्वा" (अवकाश दिला असताही पुद्गलाचे/व्यक्तीचे मूल्यमापन करून) म्हणजे "या व्यक्तीपासून मला काही उपद्रव आहे की नाही?" अशा प्रकारे चौकशी करून। "पुरम्हाकं" म्हणजे सर्वप्रथम आमचे। "पटिकच्चेव" म्हणजे आधीच/पूर्वीच। "पुग्गलं तुलयित्वा ओकासं कातुं" (पुद्गलाचे मूल्यमापन करून अवकाश देणे) म्हणजे "तो खरोखरच घडलेली आपत्ती (दोष) सांगत आहे की न घडलेली?" अशा प्रकारे पडताळणी करून अवकाश देण्यास मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे। อธมฺมกมฺมปฏิกฺโกสนาทิกถา अधम्मकम्मपटिक्कोसनादिकाथा (अधार्मिक कर्माचा निषेध इत्यादींविषयीची कथा) ๑๕๔. อธมฺมกมฺมํ วุตฺตนยเมว. ปฏิกฺโกสิตุนฺติ วาเรตุํ. ทิฏฺฐิมฺปิ อาวิกาตุนฺติ ‘‘อธมฺมกมฺมํ อิทํ น เม ขมตี’’ติ เอวํ อญฺญสฺส สนฺติเก อตฺตโน ทิฏฺฐึ ปกาเสตุํ. จตูหิ ปญฺจหีติอาทิ เตสํ อนุปทฺทวตฺถาย วุตฺตํ. สญฺจิจฺจ น สาเวนฺตีติ ยถา น สุณนฺติ เอวํ ภณิสฺสามาติ สญฺจิจฺจ สณิกํ อุทฺทิสนฺติ. १५४. "अधम्मकम्मं" हे पूर्वोक्त पद्धतीनेच समजावे। "पटिक्कोसितुं" म्हणजे विरोध करणे/प्रतिबंध करणे। "दिट्ठिम्पि आविकातुं" म्हणजे "हे अधार्मिक कर्म मला मान्य नाही" अशा प्रकारे दुसऱ्या भिक्खूच्या जवळ स्वतःचे मत प्रकट करणे। "चार किंवा पाच जणांनी" इत्यादी शब्द त्यांच्या सुरक्षिततेसाठी (उपद्रव न होण्यासाठी) सांगितले आहेत। "सञ्चिच्च न सावेन्ति" म्हणजे इतरांना ऐकू जाणार नाही अशा प्रकारे आम्ही पाठ करू, असा विचार करून जाणूनबुजून हळू आवाजात पाठ करतात। ๑๕๕. เถราธิกนฺติ เถราธีนํ; เถรายตฺตํ ภวิตุนฺติ อตฺโถ. ‘‘เถราเธยฺย’’นฺติปิ ปาโฐ, ตสฺมา เถเรน สยํ วา อุทฺทิสิตพฺพํ, อญฺโญ วา อชฺเฌสิตพฺโพ. อชฺเฌสนวิธานญฺเจตฺถ ธมฺมชฺเฌสเน วุตฺตนยเมว. โส น [Pg.341] ชานาติ อุโปสถํ วาติอาทีสุ จาตุทฺทสิกปนฺนรสิกเภเทน ทุวิธํ, สงฺฆอุโปสถาทิเภเทน นววิธญฺจ อุโปสถํ น ชานาติ, จตุพฺพิธํ อุโปสถกมฺมํ น ชานาติ, ทุวิธํ ปาติโมกฺขํ น ชานาติ, นววิธํ ปาติโมกฺขุทฺเทสํ น ชานาติ. โย ตตฺถ ภิกฺขุ พฺยตฺโต ปฏิพโลติ เอตฺถ กิญฺจาปิ ทหรสฺสาปิ พฺยตฺตสฺส ปาติโมกฺโข อนุญฺญาโต. อถ โข เอตฺถ อยมธิปฺปาโย. สเจ เถรสฺส ปญฺจ วา จตฺตาโร วา ตโย วา ปาติโมกฺขุทฺเทสา นาคจฺฉนฺติ; ทฺเว ปน อขณฺฑา สุวิสทา วาจุคฺคตา โหนฺติ, เถรายตฺโตว ปาติโมกฺขา. สเจ ปน เอตฺตกมฺปิ วิสทํ กาตุํ น สกฺโกติ, พฺยตฺตสฺส ภิกฺขุโน อายตฺโต โหติ. १५५. "थेराधिकं" म्हणजे थेरांच्या अधीन असलेले, थेरांच्या अधिकारातील असणे असा अर्थ आहे। "थेराधेय्यं" असाही पाठ आढळतो, म्हणून थेरांनी स्वतः पाठ करावा किंवा दुसऱ्याला विनंती करावी। येथे विनंती करण्याची पद्धत धम्मदेशनेच्या विनंतीच्या पूर्वोक्त पद्धतीप्रमाणेच आहे। "सो न जानाति उपोसथं वा" इत्यादी वाक्यांमध्ये—चातुर्दशी आणि पन्नरसी (१४ वा आणि १५ वा दिवस) या भेदाने दोन प्रकारचा, आणि संघ-उपोसथ इत्यादी भेदाने नऊ प्रकारचा उपोसथ तो जाणत नाही; चार प्रकारचे उपोसथकर्म जाणत नाही; दोन प्रकारचे पातिमोक्ख जाणत नाही; नऊ प्रकारचे पातिमोक्खुद्देस जाणत नाही। "यो तत्थ भिक्खु ब्यत्तो पटिबलो" (तेथे जो भिक्खू चतुर आणि सक्षम असेल) यामध्ये—जरी तरुण परंतु चतुर भिक्खूला पातिमोक्ख पठण करण्याची अनुमती असली, तरी येथे असा अभिप्राय आहे: जर थेरांना पाच, चार किंवा तीन पातिमोक्खुद्देस मुखोद्गत नसतील, परंतु दोन उद्देस अखंड, अत्यंत स्पष्ट आणि कंठस्थ असतील, तर पातिमोक्ख पठण थेरांच्याच अधिकारात राहते। परंतु जर थेर एवढेही स्पष्टपणे करण्यास असमर्थ असतील, तर ते चतुर भिक्खूच्या अधिकारात जाते। สามนฺตา อาวาสาติ สามนฺตํ อาวาสํ. สชฺชุกนฺติ ตทเหว อาคมนตฺถาย. นวํ ภิกฺขุํ อาณาเปตุนฺติ เอตฺถ โย สกฺโกติ อุคฺคเหตุํ, เอวรูโป อาณาเปตพฺโพ, น พาโล. "सामन्ता आवासा" म्हणजे जवळचा आवास (विहार)। "सज्जुकं" म्हणजे त्याच दिवशी परत येण्यासाठी। "नवं भिक्खुं आणापेतुं" (नवीन/तरुण भिक्खूला आज्ञा देणे) यामध्ये—जो शिकण्यास (ग्रहण करण्यास) सक्षम आहे, अशा तरुण भिक्खूला आज्ञा द्यावी, अज्ञानी (मूर्ख) भिक्खूला नाही। ปกฺขคณนาทิอุคฺคหณานุชานนกถา पक्खगणणादिउग्गहणानुजाननकथा (पंधरवड्याची गणना इत्यादी शिकण्यास अनुमती देण्याविषयीची कथा) ๑๕๖. กติมี ภนฺเตติ เอตฺถ กตีนํ ปูรณีติ กติมี. กาลวโตติ กาลสฺเสว; ปเควาติ อตฺโถ. १५६. "कतिमी भन्ते" यामध्ये—किती दिवसांनी पूर्ण होणारी तिथी ती 'कतिमी'। "कालवतो" म्हणजे वेळेवरच, म्हणजेच आधीच/लवकरच असा अर्थ आहे। ๑๕๘. ยํ กาลํ สรตีติ เอตฺถ สายมฺปิ ‘‘อชฺชุโปสโถ สมนฺนาหรถา’’ติ อาโรเจตุํ วฏฺฏติ. १५८. "यं कालं सरति" (ज्या वेळी आठवण येईल) यामध्ये—संध्याकाळी सुद्धा "आज उपोसथ आहे, लक्ष द्या/मन एकाग्र करा" असे घोषित करणे योग्य आहे। ๑๕๙. เถเรน ภิกฺขุนา นวํ ภิกฺขุํ อาณาเปตุนฺติ เอตฺถาปิ กิญฺจิ กมฺมํ กโรนฺโต วา สทากาลเมว เอโก วา ภารนิตฺถรณโก วา สรภาณกธมฺมกถิกาทีสุ อญฺญตโร วา น อุโปสถาคารสมฺมชฺชนตฺถํ อาณาเปตพฺโพ, อวเสสา ปน วาเรน อาณาเปตพฺพา. สเจ อาณตฺโต สมฺมุญฺชนึ ตาวกาลิกมฺปิ น ลภติ, สาขาภงฺคํ กปฺปิยํ กาเรตฺวา สมฺมชฺชิตพฺพํ, ตมฺปิ อลภนฺตสฺส ลทฺธกปฺปิยํ โหติ. १५९. "थेरेन भिक्खुना नवं भिक्खुं आणापेतुं" (थेर भिक्खूने तरुण भिक्खूला आज्ञा देणे) यामध्ये देखील—काही काम करत असलेला, किंवा नेहमी एकटा राहणारा, किंवा संघाची जबाबदारी सांभाळणारा, किंवा सरभाणक (स्वरयुक्त पाठ करणारा), धम्मकथिकांपैकी (धम्मप्रवचनकार) कोणी एक असेल, तर त्याला उपोसथगृहाची झाडलोट करण्यासाठी आज्ञा देऊ नये। उर्वरित भिक्खूंना पाळीप्रमाणे आज्ञा द्यावी। आज्ञा दिलेल्या भिक्खूला तात्पुरती देखील झाडू मिळाली नाही, तर कप्पिय (योग्य/विहित) अशी झाडाची फांदी तोडून झाडून घ्यावे। तेही न मिळाल्यास, जे काही कप्पिय मिळेल ते ग्राह्य ठरते। ๑๖๐. อาสนปญฺญาปนาณตฺติยมฺปิ วุตฺตนเยเนว อาณาเปตพฺโพ. อาณตฺเตน จ สเจ อุโปสถาคาเร อาสนานิ นตฺถิ, สงฺฆิกาวาสโตปิ อาหริตฺวา ปญฺญเปตฺวา ปุน อาหริตพฺพานิ. อาสเนสุ อสติ กฏสารเกปิ ตฏฺฏิกาโยปิ ปญฺญเปตุํ วฏฺฏติ, ตฏฺฏิกาสุปิ อสติ สาขาภงฺคานิ กปฺปิยํ [Pg.342] กาเรตฺวา ปญฺญเปตพฺพานิ, กปฺปิยการกํ อลภนฺตสฺส ลทฺธกปฺปิยํ โหติ. १६०. आसने मांडण्याची आज्ञा देण्याच्या बाबतीतही पूर्वोक्त पद्धतीनेच आज्ञा द्यावी। आज्ञा दिलेल्या भिक्खूने, जर उपोसथगृहात आसने नसतील, तर सांघिक आवासातून (विहारातून) आणून ती मांडावीत आणि नंतर परत नेऊन ठेवावीत। आसने नसतील तर चटया (कटसारक) किंवा चटईचे तुकडे मांडणे योग्य आहे। चटया देखील नसतील तर कप्पिय (योग्य) अशा झाडाच्या फांद्या तोडून त्या मांडायला हव्यात। फांद्या तोडून देणारा कप्पियकारक (सेवक) न मिळाल्यास, जे काही कप्पिय मिळेल ते ग्राह्य ठरते। ๑๖๑. ปทีปกรเณปิ วุตฺตนเยเนว อาณาเปตพฺโพ. อาณาเปนฺเตน จ ‘‘อมุกสฺมึ นาม โอกาเส เตลํ วา วฏฺฏิ วา กปลฺลิกา วา อตฺถิ, ตํ คเหตฺวา กโรหี’’ติ วตฺตพฺโพ. สเจ เตลาทีนิ นตฺถิ, ปริเยสิตพฺพานิ, ปริเยสิตฺวา อลภนฺตสฺส ลทฺธกปฺปิยํ โหติ. อปิจ กปาเล อคฺคิปิ ชาเลตพฺโพ. १६१. दिवा लावण्याच्या (प्रदीप प्रज्वलित करण्याच्या) बाबतीतही पूर्वोक्त पद्धतीनेच आज्ञा द्यावी। आज्ञा देणाऱ्याने "अमुक ठिकाणी तेल, वात किंवा पणती आहे, ती घेऊन दिवा लाव" असे सांगावे। जर तेल इत्यादी गोष्टी नसतील, तर त्यांचा शोध घ्यावा। शोध घेऊनही न मिळाल्यास, जे काही कप्पिय मिळेल ते ग्राह्य ठरते। शिवाय, खापरावर (मातीच्या भांड्यात) अग्नी देखील पेटवावा। ทิสํคมิกาทิวตฺถุกถา दिसंगमिकादिवत्थुकथा (दिशांना जाणाऱ्या भिक्खूंविषयीची कथा) ๑๖๓. สงฺคเหตพฺโพติ ‘‘สาธุ ภนฺเต อาคตาตฺถ, อิธ ภิกฺขา สุลภา สูปพฺยญฺชนํ อตฺถิ, วสถ อนุกฺกณฺฐมานา’’ติ เอวํ ปิยวจเนน สงฺคเหตพฺโพ. ปุนปฺปุนํ ตถากรณวเสน อนุคฺคเหตพฺโพ. ‘‘อาม วสิสฺสามี’’ติ ปฏิวจนทาปเนน อุปลาเปตพฺโพ. อถ วา จตูหิ ปจฺจเยหิ สงฺคเหตพฺโพ เจว อนุคฺคเหตพฺโพ จ. ปิยวจเนน อุปลาเปตพฺโพ, กณฺณสุขํ อาลปิตพฺโพติ อตฺโถ. จุณฺณาทีหิ อุปฏฺฐาเปตพฺโพ. อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ สเจ สกโลปิ สงฺโฆ น กโรติ, สพฺเพสํ ทุกฺกฏํ. อิธ เนว เถรา น ทหรา มุจฺจนฺติ, สพฺเพหิ วาเรน อุปฏฺฐาเปตพฺโพ. อตฺตโน วาเร อนุปฏฺฐหนฺตสฺส อาปตฺติ. เตน ปน มหาเถรานํ ปริเวณสมฺมชฺชนทนฺตกฏฺฐทานาทีนิ น สาทิตพฺพานิ. เอวมฺปิ สติ มหาเถเรหิ สายํปาตํ อุปฏฺฐานํ อาคนฺตพฺพํ. เตน ปน เตสํ อาคมนํ ญตฺวา ปฐมตรํ มหาเถรานํ อุปฏฺฐานํ คนฺตพฺพํ. สจสฺส สทฺธึจรา ภิกฺขุอุปฏฺฐากา อตฺถิ, ‘‘มยฺหํ อุปฏฺฐากา อตฺถิ, ตุมฺเห อปฺโปสฺสุกฺกา วิหรถา’’ติ วตฺตพฺพํ. อถาปิสฺส สทฺธึจรา นตฺถิ, ตสฺมึเยว ปน วิหาเร เอโก วา ทฺเว วา วตฺตสมฺปนฺนา วทนฺติ ‘‘มยํ เถรสฺส กตฺตพฺพํ กริสฺสาม, อวเสสา ผาสุ วิหรนฺตู’’ติ สพฺเพสํ อนาปตฺติ. १६३. "संगहेतब्बो" (संग्रह/स्वागत करावा) म्हणजे "भन्ते, आपले येणे सुखावह झाले। येथे भिक्षा सहज मिळते, सूप आणि व्यंजन (भाजी-आमटी) उपलब्ध आहे, आपण येथे कोणतीही चिंता न करता राहावे" अशा प्रिय शब्दांनी स्वागत करावे। वारंवार तसे करून त्याला पाठबळ (अनुग्रह) द्यावे। "होय, मी राहीन" असे उत्तर मिळवून त्याला राहण्यास प्रवृत्त करावे। किंवा, चार प्रत्ययांनी (जीवनावश्यक वस्तूंनी) त्याचा संग्रह आणि अनुग्रह करावा। प्रिय शब्दांनी त्याला आश्वस्त करावे, कानाला सुखावह वाटेल असे बोलावे, असा अर्थ आहे। उटणे (चूर्ण) इत्यादींनी त्याची सेवा करावी। "आपत्ति दुक्कटस्स" (दुक्कट आपत्ती/दोष) म्हणजे जर संपूर्ण संघाने असे केले नाही, तर सर्वांना दुक्कट दोष लागतो। येथे थेर किंवा तरुण भिक्खू कोणीही सुटू शकत नाही; सर्वांनी पाळीप्रमाणे त्याची सेवा करावी। स्वतःच्या पाळीत सेवा न करणाऱ्याला आपत्ती (दोष) प्राप्त होते। परंतु, त्या (आगंतुक बहुश्रुत) भिक्खूने महाथेरांकडून स्वतःच्या निवासस्थानाची झाडलोट करून घेणे, दंतकाष्ठ (दातून) देणे इत्यादी सेवा स्वीकारू नयेत। असे असले तरी, महाथेरांनी सकाळी व संध्याकाळी त्याच्या भेटीसाठी यावे। परंतु, त्याने त्यांचे येणे जाणून घेऊन सर्वप्रथम स्वतः महाथेरांच्या भेटीसाठी जावे। जर त्याच्यासोबत त्याचे सेवक भिक्खू असतील, तर त्याने "माझ्यासोबत माझे सेवक आहेत, आपण काळजी करू नका" असे सांगावे। जर त्याच्यासोबत सेवक नसतील, परंतु त्याच विहारात एक किंवा दोन कर्तव्यदक्ष भिक्खू म्हणाले की, "आम्ही थेरांचे आवश्यक ते काम करू, उर्वरित भिक्खूंनी सुखाने राहावे," तर सर्वांना अनापत्ती (दोष नाही) होते। โส อาวาโส คนฺตพฺโพติ อุโปสถกรณตฺถาย อนฺวทฺธมาสํ คนฺตพฺโพ. โส จ โข อุตุวสฺเสเยว, วสฺสาเน ปน ยํ กตฺตพฺพํ, ตํ ทสฺเสตุํ ‘‘วสฺสํ วสนฺติ พาลา อพฺยตฺตา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ น ภิกฺขเว เตหิ ภิกฺขูหิ ตสฺมึ อาวาเส วสฺสํ วสิตพฺพนฺติ ปุริมิกาย ปาติโมกฺขุทฺเทสเกน วินา น วสฺสํ อุปคนฺตพฺพํ. สเจ โส วสฺสูปคตานํ ปกฺกมติ [Pg.343] วา, วิพฺภมติ วา, กาลํ วา กโรติ, อญฺญสฺมึ สติเยว ปจฺฉิมิกาย วสิตุํ วฏฺฏติ, อสติ อญฺญตฺถ คนฺตพฺพํ, อคจฺฉนฺตานํ ทุกฺกฏํ. สเจ ปน ปจฺฉิมิกาย ปกฺกมติ วา วิพฺภมติ วา กาลํ วา กโรติ, มาสทฺวยํ วสิตพฺพํ. "सो आवासो गंतब्बो" (त्या आवासात जावे) म्हणजे उपोसथ करण्यासाठी दर पंधरवड्याला तेथे जावे। आणि ते केवळ हिवाळा व उन्हाळा या ऋतूंमध्येच करावे। परंतु पावसाळ्यात जे करावे, ते दर्शवण्यासाठी "वस्सं वसन्ति बाला अब्यत्ता" इत्यादी म्हटले आहे। त्यामध्ये, "भिक्खूंनो, त्या भिक्खूंनी त्या आवासात वर्षावास करू नये" याचा अर्थ असा की, पहिल्या वर्षावासात (पुरिमिका) पातिमोक्ख पठण करणाऱ्या भिक्खूशिवाय वर्षावास स्वीकारू नये। जर वर्षावास स्वीकारल्यानंतर तो (पठण करणारा) निघून गेला, गृहस्थ झाला किंवा मरण पावला, तर दुसरा पठण करणारा उपलब्ध असेल तरच दुसऱ्या वर्षावासात (पच्छिमिका) राहणे योग्य आहे। जर दुसरा नसेल, तर दुसऱ्या ठिकाणी जावे; न जाणाऱ्यांना दुक्कट दोष लागतो। परंतु, जर दुसऱ्या वर्षावासात तो निघून गेला, गृहस्थ झाला किंवा मरण पावला, तर दोन महिने तेथेच राहावे। ปาริสุทฺธิทานกถา पारिसुद्धिदानकथा (परिशुद्धी देण्याविषयीची कथा) ๑๖๔. กาเยน วิญฺญาเปตีติ ปาริสุทฺธิทานํ เยน เกนจิ องฺคปจฺจงฺเคน วิญฺญาเปติ ชานาเปติ; วาจํ ปน นิจฺฉาเรตุํ สกฺโกนฺโต วาจาย วิญฺญาเปติ; อุภยถา สกฺโกนฺโต กายวาจาหิ. สงฺเฆน ตตฺถ คนฺตฺวา อุโปสโถ กาตพฺโพติ สเจ พหู ตาทิสา คิลานา โหนฺติ, สงฺเฆน ปฏิปาฏิยา ฐตฺวา สพฺเพ หตฺถปาเส กาตพฺพา. สเจ ทูเร ทูเร โหนฺติ, สงฺโฆ นปฺปโหติ, ตํ ทิวสํ อุโปสโถ น กาตพฺโพ, นตฺเวว วคฺเคน สงฺเฆน อุโปสโถ กาตพฺโพ. १६४. ‘कायेन विञ्ञापेति’ (शरीराने कळवतो) म्हणजे पारिसुद्धि देणे कोणत्याही एका अंग-प्रत्यंगाने (अवयवाने) कळवणे किंवा जाणवून देणे होय; पण जर वाणी उच्चारण्यास समर्थ असेल, तर वाणीने कळवतो; आणि दोन्ही प्रकारे समर्थ असल्यास शरीर व वाणी या दोन्हीद्वारे कळवतो. ‘संघाने तिथे जाऊन उपोसथ करावा’ म्हणजे जर असे अनेक आजारी (ग्लान) भिक्खू असतील, तर संघाने क्रमाने उभे राहून सर्वांना हस्तपाशामध्ये (हात पोहोचेल एवढ्या अंतरात) घ्यावे. जर ते दूर दूर असतील आणि संघ पुरेसा नसेल, तर त्या दिवशी उपोसथ करू नये, परंतु अपूर्ण (वर्ग) संघाने उपोसथ मुळीच करू नये. ตตฺเถว ปกฺกมตีติ สงฺฆมชฺฌํ อนาคนฺตฺวา ตโตว กตฺถจิ คจฺฉติ. สามเณโร ปฏิชานาตีติ ‘‘สามเณโร อห’’นฺติ เอวํ ปฏิชานาติ; ภูตํเยว วา สามเณรภาวํ อาโรเจติ, ปจฺฉา วา สามเณรภูมิยํ ติฏฺฐตีติ อตฺโถ. เอส นโย สพฺพตฺถ. ‘तथैव पक्कमति’ (तिथूनच निघून जातो) म्हणजे संघाच्या मध्यभागी न येता तिथूनच कुठेतरी निघून जाणे. ‘सामणेरो पटिजानाति’ (सामणेर असल्याचे मान्य करतो) म्हणजे ‘मी सामणेर आहे’ असे मान्य करतो; किंवा सत्य अशा सामणेरभावाची घोषणा करतो, याशिवाय नंतर सामणेर भूमीमध्ये (सामणेर अवस्थेत) स्थिर राहतो, असा अर्थ आहे. हाच नियम सर्व ठिकाणी लागू होतो. สงฺฆปฺปตฺโต ปกฺกมตีติ สพฺพนฺติเมน ปริจฺเฉเทน อุโปสถตฺถาย สนฺนิปติตานํ จตุนฺนํ ภิกฺขูนํ หตฺถปาสํ ปตฺวา ปกฺกมติ. เอส นโย สพฺพตฺถ. เอตฺถ จ เอเกน พหูนมฺปิ อาหฏา ปาริสุทฺธิ อาหฏาว โหติ. สเจ ปน โส อนฺตรามคฺเค อญฺญํ ภิกฺขุํ ทิสฺวา เยสํ อเนน ปาริสุทฺธิ คหิตา, เตสญฺจ อตฺตโน จ ปาริสุทฺธึ เทติ, ตสฺเสว ปาริสุทฺธิ อาคจฺฉติ, อิตรา ปน พิลาฬสงฺขลิกปาริสุทฺธิ นาม โหติ. สา น อาคจฺฉติ. ‘संघप्पत्तो पक्कमति’ (संघापर्यंत पोहोचून निघून जातो) म्हणजे अत्यंत अंतिम मर्यादेने उपोसथासाठी एकत्रित आलेल्या चार भिक्खूंच्या हस्तपाशात पोहोचून निघून जाणे. हाच नियम सर्व ठिकाणी लागू होतो. आणि येथे एका भिक्खूने अनेकांची आणलेली पारिसुद्धि देखील आणलेलीच मानली जाते. पण जर तो भिक्खू वाटेत दुसऱ्या भिक्खूला पाहून, ज्यांची पारिसुद्धि त्याने घेतली आहे त्यांची आणि स्वतःची पारिसुद्धि त्याला देतो, तर केवळ त्याच (दुसऱ्या) भिक्खूची पारिसुद्धि संघापर्यंत पोहोचते; परंतु इतर पारिसुद्धि ‘बिळालसंखलिक पारिसुद्धि’ (मांजराच्या साखळीसारखी पारिसुद्धि) नावाची होते. ती संघापर्यंत पोहोचत नाही. สุตฺโต น อาโรเจตีติ อาคนฺตฺวา สุปติ, ‘‘อสุเกน ปาริสุทฺธิ ทินฺนา’’ติ น อาโรเจติ. ปาริสุทฺธิหารกสฺส อนาปตฺตีติ เอตฺถ สเจ สญฺจิจฺจ นาโรเจติ, ทุกฺกฏํ อาปชฺชติ, ปาริสุทฺธิ ปน อาหฏาว โหติ. อสญฺจิจฺจ อนาโรจิตตฺตา ปนสฺส อนาปตฺติ, อุภินฺนมฺปิ จ อุโปสโถ กโตเยว โหติ. ‘सुत्तो न आरोचेति’ (झोपल्यामुळे सांगत नाही) म्हणजे येऊन झोपून जातो आणि ‘अमुक भिक्खूने पारिसुद्धि दिली आहे’ असे सांगत नाही. ‘पारिसुद्धि वाहून आणणाऱ्याला आपत्ती नाही’ याविषयी निर्णय असा समजावा की, जर तो जाणूनबुजून सांगत नाही, तर त्याला दुक्कट आपत्ती प्राप्त होते, परंतु पारिसुद्धि मात्र आणलेलीच मानली जाते. नकळत न सांगितल्यामुळे त्याला आपत्ती होत नाही आणि त्या दोघांचाही उपोसथ झालेलाच असतो. ฉนฺททานกถา छन्ददानकथा ๑๖๕. ฉนฺททาเนปิ [Pg.344] ปาริสุทฺธิทาเน วุตฺตสทิโสเยว วินิจฺฉโย. ปาริสุทฺธึ เทนฺเตน ฉนฺทมฺปิ ทาตุนฺติ เอตฺถ สเจ ปาริสุทฺธิเมว เทติ น ฉนฺทํ, อุโปสโถ กโต โหติ. ยํ ปน สงฺโฆ อญฺญํ กมฺมํ กโรติ, ตํ อกตํ โหติ. ฉนฺทเมว เทติ น ปาริสุทฺธึ, ภิกฺขุสงฺฆสฺส อุโปสโถปิ กมฺมมฺปิ กตเมว โหติ, ฉนฺททายกสฺส ปน อุโปสโถ อกโต โหติ. สเจปิ โกจิ ภิกฺขุ นทิยา วา สีมาย วา อุโปสถํ อธิฏฺฐหิตฺวา อาคจฺฉติ, ‘‘กโต มยา อุโปสโถ’’ติ อจฺฉิตุํ น ลภติ, สามคฺคี วา ฉนฺโท วา ทาตพฺโพ. १६५. छंद देण्यामध्ये सुद्धा पारिसुद्धि देण्यामध्ये सांगितल्याप्रमाणेच निर्णय असतो. ‘पारिसुद्धि देणाऱ्याने छंद देखील द्यावा’ याविषयी जर तो केवळ पारिसुद्धिच देतो, छंद देत नाही, तर त्याचा उपोसथ झालेला असतो; पण संघ जे इतर कर्म करतो, ते न केलेले (अकृत) होते. जर तो केवळ छंदच देतो, पारिसुद्धि देत नाही, तर भिक्खू संघाचा उपोसथ आणि कर्म दोन्ही झालेलेच असते, परंतु छंद देणाऱ्या भिक्खूचा उपोसथ झालेला नसतो. जर एखादा भिक्खू नदीत किंवा सीमेमध्ये उपोसथ अधिष्ठित करून येतो, तरीही ‘माझ्याकडून उपोसथ केला गेला आहे’ असे म्हणून तो राहू शकत नाही; त्याने सामग्गी (ऐक्य) किंवा छंद दिलाच पाहिजे. ๑๖๗. สรติปิ อุโปสถํ นปิ สรตีติ เอกทา สรติ, เอกทา น สรติ. อตฺถิ เนว สรตีติ โย เอกนฺตํ เนว สรติ, ตสฺส สมฺมุติทานกิจฺจํ นตฺถิ. อนาคจฺฉนฺโตปิ กมฺมํ น โกเปติ. १६७. ‘सरतिपि उपोसथं नपि सरति’ (उपोसथ आठवतो आणि आठवतही नाही) म्हणजे कधी आठवतो, तर कधी आठवत नाही. ‘अत्थि नेव सरति’ (असाही आहे ज्याला आठवतच नाही) म्हणजे जो पूर्णपणे आठवतच नाही, त्याला संमुति (संमती) देण्याचे कार्य नसते. तो न आला तरी कर्माचा बिघाड करत नाही. สงฺฆุโปสถาทิกถา संघुपोसथादिकथा ๑๖๘. โส เทโส สมฺมชฺชิตฺวาติ ตํ เทสํ สมฺมชฺชิตฺวา, อุปโยคตฺเถ ปจฺจตฺตํ. ปานียํ ปริโภชนียนฺติอาทิ ปน อุตฺตานตฺถเมว. กสฺมา ปเนตํ วุตฺตํ? อุโปสถสฺส ปุพฺพกรณาทิทสฺสนตฺถํ. เตนาหุ อฏฺฐกถาจริยา – १६८. ‘सो देसो सम्मज्जित्वा’ (ती जागा झाडून) म्हणजे त्या जागेला झाडून; येथे द्वितीया विभक्तीच्या अर्थात प्रथमा विभक्तीचा प्रयोग आहे. ‘पानीय परिभोजनीय’ (पिण्याचे पाणी, वापरण्याचे पाणी) इत्यादी शब्द तर स्पष्ट अर्थाचेच आहेत. पण भगवंतांनी हे कशासाठी सांगितले आहे? उपोसथाचे पूर्वकरण (पूर्व-तयारी) इत्यादी दाखवण्यासाठी हे सांगितले आहे. म्हणूनच अट्ठकथाचार्यांनी म्हटले आहे – ‘‘สมฺมชฺชนี ปทีโป จ, อุทกํ อาสเนน จ; อุโปสถสฺส เอตานิ, ปุพฺพกรณนฺติ วุจฺจติ’’. “झाडणे, दिवा लावणे, पाणी ठेवणे आणि आसनांची व्यवस्था करणे; या चार गोष्टींना उपोसथाचे ‘पूर्वकरण’ असे म्हटले जाते.” อิติ อิมานิ จตฺตาริ ‘‘ปุพฺพกรณ’’นฺติ อกฺขาตานิ. अशा प्रकारे या चार गोष्टींना ‘पूर्वकरण’ असे म्हटले गेले आहे. ‘‘ฉนฺทปาริสุทฺธิอุตุกฺขานํ, ภิกฺขุคณนา จ โอวาโท; อุโปสถสฺส เอตานิ, ปุพฺพกิจฺจนฺติ วุจฺจติ. “छंद आणणे, पारिसुद्धि आणणे, ऋतू सांगणे, भिक्खूंची गणना करणे आणि ओवाद (उपदेश); या पाच गोष्टींना उपोसथाचे ‘पूर्वकृत्य’ असे म्हटले जाते.” อิติ อิมานิ ปญฺจ ปุพฺพกรณโต ปจฺฉา กตฺตพฺพานิ ‘‘ปุพฺพกิจฺจ’’นฺติ อกฺขาตานิ. अशा प्रकारे या पाच गोष्टींना, पूर्वकरणानंतर करावयाच्या असल्या तरी, उपोसथ कर्माच्या आधी करावयाच्या असल्यामुळे ‘पूर्वकृत्य’ असे म्हटले गेले आहे. ‘‘อุโปสโถ ยาวติกา จ ภิกฺขู กมฺมปฺปตฺตา,สภาคาปตฺติโย จ น วิชฺชนฺติ; วชฺชนียา จ ปุคฺคลา ตสฺมึ น โหนฺติ,ปตฺตกลฺลนฺติ วุจฺจติ’’. “उपोसथ कर्माला पात्र असणारे जेवढे भिक्खू आहेत ते हस्तपाश न सोडता एकाच सीमेमध्ये उपस्थित असतील, सभागापत्ती (समान स्वरूपाच्या आपत्ती) नसतील आणि वर्जनीय व्यक्ती त्या हस्तपाशात नसतील, तर या चार अंगांनी युक्त असलेल्या कर्माला ‘पत्तकल्ल’ (योग्य वेळ किंवा अनुकूलता) असे म्हटले जाते.” อิติ อิมานิ จตฺตาริ ‘‘ปตฺตกลฺล’’นฺติ อกฺขาตานีติ. अशा प्रकारे या चार अंगांना ‘पत्तकल्ल’ असे म्हटले गेले आहे. เตหิ [Pg.345] สทฺธินฺติ เตหิ อาคเตหิ สทฺธึ เอตานิ ปุพฺพกรณาทีนิ กตฺวา อุโปสโถ กาตพฺโพ. อชฺช เม อุโปสโถติ เอตฺถ สเจ ปนฺนรโส โหติ, ‘‘อชฺช เม อุโปสโถ ปนฺนรโส’’ติปิ อธิฏฺฐาตุํ วฏฺฏติ. จาตุทฺทสิเกปิ เอเสว นโย. ‘तेहि सद्धिं’ (त्यांच्यासोबत) म्हणजे आलेल्या त्या भिक्खूंसोबत ही पूर्वकरण इत्यादी कामे करून उपोसथ करावा. ‘अज्ज मे उपोसतो’ (आज माझा उपोसथ आहे) याविषयी जर पंधरावा दिवस असेल, तर ‘आज माझा पंधरावा उपोसथ आहे’ असे अधिष्ठित करणे योग्य आहे. चौदाव्या दिवशीच्या उपोसथातही हाच नियम आहे. อาปตฺติปฏิกมฺมวิธิกถา आपत्तिपटिकम्मविधिकथा ๑๖๙. ภควตา ปญฺญตฺตํ ‘‘น สาปตฺติเกน อุโปสโถ กาตพฺโพ’’ติ อิทํ ‘‘ยสฺส สิยา อาปตฺตี’’ติอาทิวจเนเนว ปาริสุทฺธิทานปญฺญาปเนน จ ปาริสุทฺธิอุโปสถปญฺญาปเนน จ ปญฺญตฺตํ โหตีติ เวทิตพฺพํ. อิตฺถนฺนามํ อาปตฺตินฺติ ถุลฺลจฺจยาทีสุ เอกิสฺสา นามํ คเหตฺวา ‘‘ถุลฺลจฺจยํ อาปตฺตึ ปาจิตฺติยํ อาปตฺติ’’นฺติ เอวํ วตฺตพฺพํ. ตํ ปฏิเทเสมีติ อิทํ ‘‘ตํ ตุมฺหมูเล, ตํ ตุยฺหมูเล ปฏิเทเสมี’’ติ วุตฺเตปิ สุวุตฺตเมว โหติ. ปสฺสสีติ อิทญฺจ ‘‘ปสฺสสิ อาวุโส ตํ อาปตฺตึ, ปสฺสถ ภนฺเต ตํ อาปตฺติ’’นฺติ เอวํ วตฺตพฺพํ. อาม ปสฺสามีติ อิทํ ปน ‘‘อาม ภนฺเต ปสฺสามิ, อาม อาวุโส ปสฺสามี’’ติ เอวํ วุตฺตมฺปิ สุวุตฺตเมว โหติ. อายตึ สํวเรยฺยาสีติ เอตฺถ ปน สเจ วุฑฺฒตโร ‘‘อายตึ สํวเรยฺยาถา’’ติ วตฺตพฺโพ. เอวํ วุตฺเตน ปน ‘‘สาธุ สุฏฺฐุ สํวริสฺสามี’’ติ วตฺตพฺพเมว. १६९. भगवंतांनी जे ‘ना सापत्तिकेन उपोसतो कातब्बो’ (आपत्तीयुक्त भिक्खूने उपोसथ करू नये) असे प्रज्ञप्त केले आहे, ते ‘यस्स सिया आपत्ति’ (ज्याला आपत्ती असेल...) इत्यादी वचनांद्वारे, पारिसुद्धि देण्याच्या प्रज्ञप्तीद्वारे आणि पारिसुद्धि उपोसथाच्या प्रज्ञप्तीद्वारे प्रज्ञप्त केले गेले आहे असे समजावे. ‘इत्थंनामं आपत्तिं’ (अमुक नावाची आपत्ती) म्हणजे थुल्लच्चय इत्यादी आपत्तींपैकी एका आपत्तीचे नाव घेऊन ‘थुल्लच्चय आपत्ती’ किंवा ‘पाचित्तिय आपत्ती’ असे म्हणावे. ‘तं पटिदेसेमि’ (ती मी देशित करतो) हे वाक्य ‘तं तुम्हमूले’ किंवा ‘तं तुय्हमूले पटिदेसेमि’ (ते मी आपल्यासमोर देशित करतो) असे म्हटले तरी योग्य प्रकारे म्हटलेलेच होते. ‘पस्ससि’ (तू पाहतोस का?) हे वाक्य ‘पस्ससि आवुसो तं आपत्तिं’ (आवुसो, तू ती आपत्ती पाहतोस का?) किंवा ‘पस्सथ भन्ते तं आपत्तिं’ (भन्ते, आपण ती आपत्ती पाहता का?) असे म्हणावे. ‘आम पस्सामि’ (होय, मी पाहतो) हे वाक्य ‘आम भन्ते पस्सामि’ (होय भन्ते, मी पाहतो) किंवा ‘आम आवुसो पस्सामि’ (होय आवुसो, मी पाहतो) असे म्हटले तरी योग्य प्रकारे म्हटलेलेच होते. ‘आयतिं संवरेय्यासि’ (भविष्यात संयम राख) याविषयी जर तो ज्येष्ठ असेल, तर त्याने ‘आयतिं संवरेय्याथ’ (भविष्यात संयम राखावा) असे म्हणावे. असे म्हटल्यावर दुसऱ्याने ‘साधू, मी चांगल्या प्रकारे संयम राखेन’ असेच म्हणावे. ยทา นิพฺเพมติโกติ เอตฺถ สเจ ปเนส นิพฺเพมติโก น โหติ, วตฺถุํ กิตฺเตตฺวาว เทเสตุํ วฏฺฏตีติ อนฺธกฏฺฐกถายํ วุตฺตํ. ตตฺรายํ เทสนาวิธิ – สเจ เมฆจฺฉนฺเน สูริเย ‘‘กาโล นุ โข โน’’ติ เวมติโก ภุญฺชติ, เตน ภิกฺขุนา ‘‘อหํ ภนฺเต เวมติโก ภุญฺชึ’’, สเจ กาโล อตฺถิ, ‘‘สมฺพหุลา ทุกฺกฏา อาปตฺติโย อาปนฺโนมฺหิ, โน เจ อตฺถิ, ‘‘สมฺพหุลา ปาจิตฺติยา อาปนฺโนมฺหี’’ติ เอวํ วตฺถุํ กิตฺเตตฺวา ‘‘อหํ ภนฺเต ยา ตสฺมึ วตฺถุสฺมึ สมฺพหุลา ทุกฺกฏา วา ปาจิตฺติยา วา อาปตฺติโย อาปนฺโน, ตา ตุมฺหมูเล ปฏิเทเสมี’’ติ วตฺตพฺพํ. เอส นโย สพฺพาปตฺตีสุ. ‘यदा निब्बेमतिको’ (जेव्हा संशयरहित असेल) याविषयी जर तो संशयरहित नसेल, तर घटनेचा उल्लेख करूनच देशना करणे योग्य आहे, असे अंधकट्ठकथेमध्ये म्हटले आहे. त्याविषयी देशनाविधी असा आहे – जर ढगाळलेल्या आकाशात सूर्य झाकला गेला असताना ‘वेळ झाली आहे की नाही?’ अशा संशयाने भिक्खू भोजन करतो, तर त्या भिक्खूने ‘भन्ते, मी संशयाने भोजन केले; जर वेळ झाली असेल, तर मला अनेक दुक्कट आपत्ती प्राप्त झाल्या आहेत, आणि जर वेळ झाली नसेल, तर मला अनेक पाचित्तिय आपत्ती प्राप्त झाल्या आहेत’ अशा प्रकारे घटनेचा उल्लेख करून ‘भन्ते, त्या घटनेत मला ज्या अनेक दुक्कट किंवा पाचित्तिय आपत्ती प्राप्त झाल्या आहेत, त्या मी आपल्यासमोर देशित करतो’ असे म्हणावे. हाच नियम सर्व आपत्तींच्या बाबतीत लागू होतो. น ภิกฺขเว สภาคา อาปตฺตีติ เอตฺถ ยํ ทฺเวปิ ชนา วิกาลโภชนาทินา สภาควตฺถุนา อาปตฺตึ อาปชฺชนฺติ, เอวรูปา วตฺถุสภาคา ‘‘สภาคา’’ติ [Pg.346] วุจฺจติ. วิกาลโภชนปฺปจฺจยา อาปนฺนํ ปน อนติริตฺตโภชนปจฺจยา อาปนฺนสฺส สนฺติเก เทเสตุํ วฏฺฏติ. ยาปิ จายํ วตฺถุสภาคา, สาปิ เทสิตา สุเทสิตาว. อญฺญํ ปน เทสนปจฺจยา เทสโก, ปฏิคฺคหณปฺปจฺจยา ปฏิคฺคหโก จาติ อุโภปิ ทุกฺกฏํ อาปชฺชนฺติ, ตํ นานาวตฺถุกํ โหติ, ตสฺมา อญฺญมญฺญํ เทเสตุํ วฏฺฏติ. “हे भिक्खूहो, साभाग (समान) आपत्ती नाही” याविषयी: जेव्हा दोन व्यक्ती विकालभोजन इत्यादी समान वस्तूमुळे (कारणामुळे) आपत्तीला प्राप्त होतात, अशा प्रकारच्या वस्तू-समानतेला 'सभाग' (सभाग आपत्ती) म्हटले जाते. परंतु, विकालभोजनाच्या प्रत्ययाने (कारणाने) आपत्ती प्राप्त झालेल्या भिक्खूने, अनतिरिक्त भोजनाच्या प्रत्ययाने आपत्ती प्राप्त झालेल्या भिक्खूच्या जवळ (आपत्ती) देशना करणे योग्य आहे. जी ही वस्तू-सभाग आपत्ती आहे, ती देखील देशना केली असता सुदेशितच (योग्य प्रकारे देशना केलेली) होते. परंतु, दुसऱ्या (समान आपत्तीच्या) बाबतीत, देशना करण्याच्या प्रत्ययाने देशना करणारा आणि ग्रहण करण्याच्या प्रत्ययाने ग्रहण करणारा, हे दोन्ही भिक्खू दुक्कट (दुष्कृत) आपत्तीला प्राप्त होतात. ती (आपत्ती) नाना-वस्तू (भिन्न वस्तू) असलेली असते, म्हणून एकमेकांजवळ देशना करणे योग्य आहे. ๑๗๐. สามนฺโต ภิกฺขุ เอวมสฺส วจนีโยติ เอตฺถ สภาโคเยว วตฺตพฺโพ. วิสภาคสฺส หิ วุจฺจมาเน ภณฺฑนกลหสงฺฆเภทาทีนิปิ โหนฺติ, ตสฺมา ตสฺส อวตฺวา ‘‘อิโต วุฏฺฐหิตฺวา ปฏิกริสฺสามี’’ติ อาโภคํ กตฺวา อุโปสโถ กาตพฺโพติ อนฺธกฏฺฐกถายํ วุตฺตํ. १७०. “जवळ असलेल्या भिक्खूला असे म्हणावे” याविषयी: सभाग (समान आपत्ती नसलेल्या) भिक्खूलाच सांगावे. कारण विसभाग (भिन्न आपत्ती असलेल्या) भिक्खूला सांगितले असता भांडण, कलह, संघभेद इत्यादी देखील होतात. म्हणून त्याला न सांगता, “इथून उठून मी याचे प्रायश्चित्त करीन” असा संकल्प करून उपोसथ करावा, असे अंधकअट्ठकथेत म्हटले आहे. อนาปตฺติปนฺนรสกาทิกถา अनापत्तिपन्नरसक-आदि कथा (अनापत्तीच्या पंधरा प्रकरणांची कथा) ๑๗๒. อนาปตฺติปนฺนรสเก – เต น ชานึสูติ สีมํ โอกฺกนฺตาติ วา โอกฺกมนฺตีติ วาติ น ชานึสุ. อถญฺเญ อาวาสิกา ภิกฺขู อาคจฺฉนฺตีติ คามํ วา อรญฺญํ วา เกนจิ กรณีเยน คนฺตฺวา เตสํ นิสินฺนฏฺฐานํ อาคจฺฉนฺติ. วคฺคา สมคฺคสญฺญิโนติ เตสํ สีมํ โอกฺกนฺตตฺตา วคฺคา; สีมํ โอกฺกนฺตภาวสฺส อชานนโต สมคฺคสญฺญิโน. १७२. अनापत्तिपन्नरसक (अनापत्तीच्या पंधरा प्रकरणांमध्ये) – 'ते न जाणिंसु' (त्यांना माहीत नव्हते) म्हणजे ते सीमेत आले आहेत किंवा येत आहेत, हे त्यांना माहीत नव्हते. नंतर इतर निवासी (आवासिक) भिक्खू येत आहेत, असे समजून गावाकडे किंवा अरण्याकडे कोणत्याही कारणाने जाऊन त्यांच्या बसण्याच्या ठिकाणी येतात. 'वग्गा समग्गसञ्ञिनो' (समग्र संज्ञेने युक्त असलेले भिन्न गट) म्हणजे त्यांच्या सीमेत प्रवेश केल्यामुळे ते भिन्न गट (वग्ग) आहेत; परंतु सीमेत प्रवेश केल्याची माहिती नसल्यामुळे ते स्वतःला समग्र (एकत्रित) मानतात. ๑๗๓. วคฺคาวคฺคสญฺญิปนฺนรสเก – เต ชานนฺตีติ ปพฺพเต วา ถเล วา ฐิตา สีมํ โอกฺกนฺเต วา โอกฺกมนฺเต วา ปสฺสนฺติ. เวมติกปนฺนรสกํ อุตฺตานเมว. १७३. वग्गावग्गसञ्ञिपन्नरसक (भिन्न गट आणि अभिन्न गटाच्या संज्ञेच्या पंधरा प्रकरणांमध्ये) – 'ते जानन्ति' (ते जाणतात) म्हणजे पर्वतावर किंवा जमिनीवर उभे राहून सीमेत प्रवेश केलेल्या किंवा प्रवेश करत असलेल्या भिक्खूंना पाहतात. वेमतिकपन्नरसक (शंकेच्या पंधरा प्रकरणांची कथा) अगदी स्पष्टच आहे. ๑๗๕. กุกฺกุจฺจปกตปนฺนรสเก – ยถา อิจฺฉาย อภิภูโต ‘‘อิจฺฉาปกโต’’ติ วุจฺจติ, เอวํ ปุพฺพภาเค สนฺนิฏฺฐานํ กตฺวาปิ กรณกฺขเณ อกปฺปิเย อกปฺปิยสญฺญิตาสงฺขาเตน กุกฺกุจฺเจน อภิภูตา ‘‘กุกฺกุจฺจปกตา’’ติ เวทิตพฺพา. १७५. कुक्कुच्चपकतपन्नरसक (शंकेने ग्रासलेल्यांच्या पंधरा प्रकरणांमध्ये) – ज्याप्रमाणे इच्छेने ग्रासलेल्याला 'इच्छापकत' म्हटले जाते, त्याचप्रमाणे पूर्वभागात (आधीच) निर्णय घेऊनही, उपोसथ करण्याच्या वेळी अकल्पिय (अयोग्य) गोष्टीमध्ये अकल्पिय संज्ञेच्या स्वरूपातील शंकेने (कुक्कुच्च) जे ग्रासलेले असतात, त्यांना 'कुक्कुच्चपकत' (शंकेने ग्रासलेले) असे समजावे. ๑๗๖. เภทปุเรกฺขารปนฺนรสเก – อกุสลพลวตาย ถุลฺลจฺจยํ วุตฺตํ. १७६. भेदपुरेक्खारपन्नरसक (संघभेदाला पुढे ठेवणाऱ्यांच्या पंधरा प्रकरणांमध्ये) – अकुशल चित्ताच्या प्रबळतेमुळे थुल्लच्चय (स्थूलदोष) आपत्ती सांगितली आहे. สีโมกฺกนฺติกเปยฺยาลกถา सीमोक्कन्तिकपेय्यालकथा (सीमेत प्रवेश करण्याच्या संदर्भातील पेय्याल कथा) ๑๗๗. อาวาสิเกนอาคนฺตุกเปยฺยาเล – ยถา ปุริเม อาวาสิเกนอาวาสิกเปยฺยาเล ‘‘เต น ชานนฺติ อถญฺเญ อาวาสิกา’’ติอาทิ วุตฺตํ, เอวํ ‘‘เต น ชานนฺติ อถญฺเญ อาคนฺตุกา’’ติอาทินา นเยน [Pg.347] สพฺพํ เวทิตพฺพํ. อาคนฺตุเกนอาวาสิกเปยฺยาเล ปน – ยถา ปุริมเปยฺยาเล ‘‘อาวาสิกา ภิกฺขู สนฺนิปตนฺตี’’ติ อาคตํ, เอวํ ‘‘อาคนฺตุกา ภิกฺขู สนฺนิปตนฺตี’’ติ อาเนตพฺพํ. อาคนฺตุเกนอาคนฺตุกเปยฺยาเล ปน – อุภยปเทสุ อาคนฺตุกวเสน โยเชตพฺโพติ. १७७. आवासिकेनआगन्तुकपेय्यालात – ज्याप्रमाणे पूर्वीच्या आवासिकेनआवासिकपेय्यालात “ते न जानन्ति अथञ्ञे आवासिका” (त्यांना माहीत नव्हते की इतर निवासी भिक्खू येत आहेत) इत्यादी म्हटले आहे, त्याचप्रमाणे “ते न जानन्ति अथञ्ञे आगन्तुका” (त्यांना माहीत नव्हते की इतर आगंतुक भिक्खू येत आहेत) इत्यादी पद्धतीने सर्व समजून घ्यावे. परंतु आगन्तुकने आवासिकपेय्यालात – ज्याप्रमाणे पूर्वीच्या पेय्यालात “आवासिक भिक्खू एकत्र येतात” असे आले आहे, त्याचप्रमाणे “आगंतुक भिक्खू एकत्र येतात” असे आणावे (योजित करावे). आगन्तुकने आगन्तुकपेय्यालात – दोन्ही पदांमध्ये आगंतुकच्या दृष्टीने योजना करावी. ๑๗๘. อาวาสิกานํ ภิกฺขูนํ จาตุทฺทโส โหติ, อาคนฺตุกานํ ปนฺนรโสติ เอตฺถ เยสํ ปนฺนรโส, เต ติโรรฏฺฐโต วา อาคตา, อตีตํ วา อุโปสถํ จาตุทฺทสิกํ อกํสูติ เวทิตพฺพา. อาวาสิกานํ อนุวตฺติตพฺพนฺติ อาวาสิเกหิ ‘‘อชฺชุโปสโถ จาตุทฺทโส’’ติ ปุพฺพกิจฺเจ กริยมาเน อนุวตฺติตพฺพํ, น ปฏิกฺโกสิตพฺพํ. น อกามา ทาตพฺพาติ น อนิจฺฉาย ทาตพฺพา. १७८. “निवासी भिक्खूंचा चौदावा (दिवस) असतो, आगंतुक भिक्खूंचा पंधरावा असतो” याविषयी: ज्या आगंतुक भिक्खूंचा पंधरावा दिवस असतो, ते दुसऱ्या देशातून आलेले आहेत किंवा त्यांनी मागील चौदाव्या दिवसाचा उपोसथ केला आहे, असे समजावे. “निवासी भिक्खूंचे अनुवर्तन करावे” म्हणजे निवासी भिक्खूंद्वारे “आज चौदाव्या दिवसाचा उपोसथ आहे” असे पूर्वकृत्य केले जात असताना, त्यांचे अनुकरण करावे, त्याचा विरोध करू नये. “इच्छेविरुद्ध देऊ नये” म्हणजे अनिच्छेने (संघाची) सामग्री देऊ नये. ลิงฺคาทิทสฺสนกถา लिंगादिदस्सनकथा (लिंग इत्यादींच्या दर्शनाची कथा) ๑๗๙. อาวาสิกาการนฺติ อาวาสิกานํ อาการํ. เอส นโย สพฺพตฺถ. อากาโร นาม เยน เตสํ วตฺตสมฺปนฺนา วา น วาติ อาจารสณฺฐานํ คยฺหติ. ลิงฺคํ นาม ยํ เต ตตฺถ ตตฺถ ลีเน คมยติ; อทิสฺสมาเนปิ ชานาเปตีติ อตฺโถ. นิมิตฺตํ นาม ยํ ทิสฺวา เต อตฺถีติ ญายนฺติ. อุทฺเทโส นาม เยน เต เอวรูปปริกฺขาราติ อุทฺทิสนฺติ; อปเทสํ ลภนฺตีติ อตฺโถ. สพฺพเมตํ สุปญฺญตฺตมญฺจปีฐาทีนญฺเจว ปทสทฺทาทีนญฺจ อธิวจนํ, ยถาโยคํ ปน โยเชตพฺพํ. อาคนฺตุกาการาทีสุปิ เอเสว นโย. ตตฺถ อญฺญาตกนฺติ อญฺเญสํ สนฺตกํ. ปาทานํ โธตํ อุทกนิสฺเสกนฺติ ปาทานํ โธตานํ อุทกนิสฺเสกํ. พหุวจนสฺส เอกวจนํ เวทิตพฺพํ. ‘‘ปาทานํ โธตอุทกนิสฺเสก’’นฺติ วา ปาโฐ; ปาทานํ โธวนอุทกนิสฺเสกนฺติ อตฺโถ. १७९. 'आवासिकाकारं' म्हणजे निवासी भिक्खूंचा आकार (चिन्हे). हाच नियम सर्वत्र लागू होतो. 'आकार' म्हणजे ज्याद्वारे त्यांचे आचरण योग्य आहे की नाही, हे त्यांच्या वर्तणुकीवरून समजते. 'लिंग' म्हणजे जे तेथे लपून राहिलेल्या भिक्खूंची माहिती करून देते; ते दिसत नसतानाही त्यांच्या उपस्थितीची जाणीव करून देते, असा याचा अर्थ आहे. 'निमित्त' म्हणजे जे पाहून ते (भिक्खू) तेथे आहेत, हे समजते. 'उद्देस' म्हणजे ज्याद्वारे ते अशा प्रकारच्या परिष्कारांनी (साहित्याने) युक्त आहेत, हे दर्शवले जाते; म्हणजेच ते निर्देश प्राप्त करतात, असा याचा अर्थ आहे. हे सर्व व्यवस्थित मांडलेले मंच, पीठ (आसन) इत्यादी आणि पावलांचे आवाज इत्यादींचे वाचक शब्द आहेत, परंतु योग्यतेनुसार त्यांचे योजन करावे. आगंतुक-आकार इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. तेथे 'अञ्ञातकं' म्हणजे इतरांच्या मालकीचे. 'पादानं धोतं उदकनिस्सेकं' म्हणजे धुवून घेतलेल्या पायांचे उरलेले पाणी. येथे बहुवचनाऐवजी एकवचन समजावे. “पादानं धोतोदकनिस्सेकं” असाही पाठ आढळतो; पायांच्या धुण्याचे उरलेले पाणी, असा याचा अर्थ आहे. ๑๘๐. นานาสํวาสกาทิวตฺถูสุ – สมานสํวาสกทิฏฺฐินฺติ ‘‘สมานสํวาสกา เอเต’’ติ ทิฏฺฐึ. น ปุจฺฉนฺตีติ เตสํ ลทฺธึ น ปุจฺฉนฺติ; อปุจฺฉิตฺวาว วตฺตปฏิวตฺตึ กตฺวา เอกโต อุโปสถํ กโรนฺติ. นาภิวิตรนฺตีติ นานาสํวาสกภาวํ มทฺทิตุํ อภิภวิตุํ น สกฺโกนฺติ; ตํ ทิฏฺฐึ น นิสฺสชฺชาเปนฺตีติ อตฺโถ. १८०. नानासंवासक इत्यादी वस्तूंच्या बाबतीत – 'समानसंवासकदिठ्ठिं' म्हणजे “हे समान संवासाचे (एकाच संघाचे) आहेत” अशी दृष्टी (समजूत). 'ना पुच्छन्ति' म्हणजे ते त्यांच्या मताविषयी विचारत नाहीत; न विचारताच वत्त-प्रतिपत्ती (कर्तव्ये) करून एकत्र उपोसथ करतात. 'नाभिवितरन्ति' म्हणजे नानासंवासक भावाला दाबून टाकण्यास किंवा त्यावर मात करण्यास ते समर्थ नसतात; त्या दृष्टीचा (मताचा) त्याग करवून घेऊ शकत नाहीत, असा याचा अर्थ आहे. นคนฺตพฺพคนฺตพฺพวารกถา नगन्तब्बगन्तब्बवारकथा (जाण्यायोग्य आणि न जाण्यायोग्य स्थानांच्या प्रकरणाची कथा) ๑๘๑. สภิกฺขุกา อาวาสาติ ยสฺมึ อาวาเส อุโปสถการกา ภิกฺขู อตฺถิ, ตมฺหา อาวาสา ยํ น สกฺโกติ ตทเหว อาคนฺตุํ[Pg.348], โส อาวาโส อุโปสถํ อกตฺวา น คนฺตพฺโพ. อญฺญตฺร สงฺเฆนาติ สงฺฆปฺปโหนเกหิ ภิกฺขูหิ วินา. อญฺญตฺร อนฺตรายาติ ปุพฺเพ วุตฺตํ ทสวิธํ อนฺตรายํ วินา. สพฺพนฺติเมน ปน ปริจฺเฉเทน อตฺตจตุตฺเถน อนฺตราเย วา สติ คนฺตุํ วฏฺฏติ. อนาวาโสติ นวกมฺมสาลาทิโก โย โกจิ ปเทโส. ยถา จ อาวาสาทโย น คนฺตพฺพา; เอวํ สเจ วิหาเร อุโปสถํ กโรนฺติ, อุโปสถาธิฏฺฐานตฺถํ สีมาปิ นทีปิ น คนฺตพฺพา. สเจ ปเนตฺถ โกจิ ภิกฺขุ โหติ, ตสฺส สนฺติกํ คนฺตุํ วฏฺฏติ. วิสฺสฏฺฐอุโปสถาปิ อาวาสา คนฺตุํ วฏฺฏติ; เอวํ คโต อธิฏฺฐาตุมฺปิ ลภติ. อารญฺญเกนาปิ ภิกฺขุนา อุโปสถทิวเส คาเม ปิณฺฑาย จริตฺวา อตฺตโน วิหารเมว อาคนฺตพฺพํ. สเจ อญฺญํ วิหารํ โอกฺกมติ, ตตฺถ อุโปสถํ กตฺวาว อาคนฺตพฺพํ, อกตฺวา น วฏฺฏติ. १८१. 'सभिक्खुका आवासा' म्हणजे ज्या विहारामध्ये उपोसथ करणारे भिक्खू उपस्थित आहेत, त्या विहारातून ज्या विहारात त्याच दिवशी परत येणे शक्य नाही, अशा विहारात उपोसथ केल्याशिवाय जाऊ नये. 'अञ्ञत्र सङ्घेन' म्हणजे संघ पूर्ण करणाऱ्या भिक्खूंशिवाय. 'अञ्ञत्र अन्तराया' म्हणजे पूर्वी सांगितलेल्या दहा प्रकारच्या अंतरायांशिवाय (अडथळ्यांशिवाय). परंतु अत्यंत निकडीच्या प्रसंगी स्वतःसह चार भिक्खू (अत्तचतुत्थ) किंवा स्वतःसह पाच भिक्खू (अत्तपञ्चम) होऊन, किंवा अंतराय (संकट) असताना जाणे योग्य आहे. 'अनावासो' म्हणजे नवकर्मशाळा (नवीन बांधकामाची जागा) इत्यादी कोणताही प्रदेश. आणि ज्याप्रमाणे आवास इत्यादी ठिकाणी जाऊ नये; त्याचप्रमाणे जर विहारामध्ये उपोसथ करत असतील, तर उपोसथाच्या अधिष्ठानासाठी सीमेमध्ये किंवा नदीवर देखील जाऊ नये. परंतु जर तेथे कोणी भिक्खू असेल, तर त्याच्याजवळ जाणे योग्य आहे. उपोसथ सोडून दिलेल्या विहारातूनही जाणे योग्य आहे; अशा प्रकारे गेलेला भिक्खू अधिष्ठान करण्यासही प्राप्त करतो. आरण्यक (अरण्यात राहणाऱ्या) भिक्खूने देखील उपोसथाच्या दिवशी गावात पिंडपातासाठी (भिक्षेसाठी) फिरून आपल्या स्वतःच्या विहारातच परत यावे. जर तो दुसऱ्या विहारात प्रवेश करतो, तर तेथे उपोसथ करूनच परत यावे, उपोसथ केल्याशिवाय परत येणे योग्य नाही. ๑๘๒. ยํ ชญฺญา สกฺโกมิ อชฺเชว คนฺตุนฺติ ยํ ชาเนยฺย อชฺเชว ตตฺถ คนฺตุํ สกฺโกมีติ; เอวรูโป อาวาโส คนฺตพฺโพ. ตตฺถ ภิกฺขูหิ สทฺธึ อุโปสถํ กโรนฺเตนาปิ หิ อิมินา เนว อุโปสถนฺตราโย กโต ภวิสฺสตีติ. १८२. “ज्या विहारात आजच पोहोचणे शक्य आहे असे जाणावे” म्हणजे ज्या विहाराविषयी असे माहीत असेल की आजच तेथे पोहोचणे शक्य आहे; अशा विहारात जावे. कारण तेथे भिक्खूंसोबत उपोसथ करणाऱ्या या भिक्खूने स्वतःच्या उपोसथाचा अंतराय (अडथळा) केलेला नसतो. วชฺชนียปุคฺคลสนฺทสฺสนกถา वज्जनीयपुग्गलसन्दस्सनकथा (वर्ज करण्यायोग्य व्यक्तींच्या निर्देशनाची कथा) ๑๘๓. ภิกฺขุนิยา นิสินฺนปริสายาติอาทีสุ หตฺถปาสุปคมนเมว ปมาณํ. อญฺญตฺร อวุฏฺฐิตาย ปริสายาติ อิทญฺหิ ปาริวาสิยปาริสุทฺธิทานํ นาม ปริสาย วุฏฺฐิตกาลโต ปฏฺฐาย น วฏฺฏติ, อวุฏฺฐิตาย ปน วฏฺฏติ. เตนาห – ‘‘อญฺญตฺร อวุฏฺฐิตาย ปริสายา’’ติ. ตสฺส ลกฺขณํ ภิกฺขุนิวิภงฺเค ปริวาสิยฉนฺททานวณฺณนโต คเหตพฺพํ. อนุโปสเถติ จาตุทฺทสิโก จ ปนฺนรสิโก จาติ อิเม ทฺเว อุโปสเถ ฐเปตฺวา อญฺญสฺมึ ทิวเส. อญฺญตฺร สงฺฆสามคฺคิยาติ ยา โกสมฺพกภิกฺขูนํ วิย ภินฺเน สงฺเฆ ปุน สงฺฆสามคฺคี กริยติ, ตถารูปึ สงฺฆสามคฺคึ ฐเปตฺวา. ตทา จ ‘‘สุณาตุ เม ภนฺเต สงฺโฆ อชฺชุโปสโถ สามคฺคี’’ติ วตฺวา กาตพฺโพ. เย ปน กิสฺมิญฺจิเทว อปฺปมตฺตเก อุโปสถํ ฐเปตฺวา ปุน สมคฺคา โหนฺติ, เตหิ อุโปสเถเยว กาตพฺโพติ. १८३. भिक्षुणी बसलेल्या परिषदेत इत्यादी शब्दांमध्ये हस्तपाशामध्ये (हातभर अंतरावर) जवळ जाणे हेच प्रमाण आहे. 'परिषद उठलेली नसताना' याविषयी - हे पारिवासिय पारिशुद्धि देणे नावाचे कर्म परिषद उठल्याच्या वेळेपासून योग्य ठरत नाही, परंतु परिषद न उठल्यास योग्य ठरते. म्हणूनच म्हटले आहे - 'परिषद उठलेली नसताना'. त्याचे लक्षण भिक्षुणीविभंगातील 'पारिवासिय छन्ददान' वर्णनातून (टीकेतून) ग्रहण करावे. 'अनुपोसथ' म्हणजे चातुर्दशी (१४ वा दिवस) आणि पन्नरसी (१५ वा दिवस) हे दोन उपोसथ सोडून इतर दिवशी. 'संघसामग्री (संघाची एकजूट) सोडून' म्हणजे जसे कौशाम्बीच्या भिक्षूंप्रमाणे संघात फूट पडली असता पुन्हा संघाची जी एकजूट केली जाते, तशा प्रकारची संघसामग्री सोडून. आणि त्यावेळी 'भन्ते, संघाने माझे ऐकावे, आज उपोसथ सामग्री आहे' असे बोलून तो (उपोसथ) करावा. परंतु जे भिक्षू काही अगदी क्षुल्लक कारणास्तव उपोसथ तहकूब करून पुन्हा एकत्र येतात, त्यांनी उपोसथ दिवशीच उपोसथ करावा. อุโปสถกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. उपोसथक्खन्धक-वर्णना (टीका) समाप्त झाली. ๓. วสฺสูปนายิกกฺขนฺธกํ ३. वस्सूपनायिकक्खन्धक (वर्षावास प्रवेशाचे प्रकरण) วสฺสูปนายิกานุชานนกถา वर्षावास प्रवेशाच्या अनुमतीची कथा ๑๘๔. วสฺสูปนายิกกฺขนฺธเก [Pg.349] – อปญฺญตฺโตติ อนนุญฺญาโต อสํวิหิโต วา. เต อิธ ภิกฺขูติ เต ภิกฺขู, อิธสทฺโท นิปาตมตฺโต. สงฺฆาตํ อาปาเทนฺตาติ วินาสํ อาปาเทนฺตา. สงฺกสายิสฺสนฺตีติ อปฺโปสฺสุกฺกา นิพทฺธวาสํ วสิสฺสนฺติ. สกุนฺตกาติ สกุณา. วสฺสาเน วสฺสํ อุปคนฺตุนฺติ วสฺสานนามเก เตมาเส วสฺสํ อุปคนฺตพฺพนฺติ อตฺโถ. กติ นุ โข วสฺสูปนายิกาติ กติ นุ โข วสฺสูปคมนานิ. อปรชฺชุคตายาติ เอตฺถ อปรชฺชุคตาย อสฺสาติ อปรชฺชุคตา, ตสฺสา อปรชฺชุคตาย; อติกฺกนฺตาย อปรสฺมึ ทิวเสติ อตฺโถ. ทุติยนเยปิ มาโส คตาย อสฺสาติ มาสคตา, ตสฺสา มาสคตาย; อติกฺกนฺตาย มาเส ปริปุณฺเณติ อตฺโถ. ตสฺมา อาสาฬฺหีปุณฺณมาย อนนฺตเร ปาฏิปททิวเส, อาสาฬฺหีปุณฺณมิโต วา อปราย ปุณฺณมาย อนนฺตเร ปาฏิปททิวเสเยว วิหารํ ปฏิชคฺคิตฺวา ปานียํ ปริโภชนียํ อุปฏฺฐเปตฺวา สพฺพํ เจติยวนฺทนาทิสามีจิกมฺมํ นิฏฺฐาเปตฺวา ‘‘อิมสฺมึ วิหาเร อิมํ เตมาสํ วสฺสํ อุเปมี’’ติ สกึ วา ทฺวตฺติกฺขตฺตุํ วา วาจํ นิจฺฉาเรตฺวา วสฺสํ อุปคนฺตพฺพํ. १८४. वस्सूपनायिकक्खन्धकामध्ये - 'अपञ्ञत्तो' (अपज्ञप्त) म्हणजे अनुमती न दिलेला किंवा व्यवस्था न केलेला. 'ते इध भिक्खू' म्हणजे ते भिक्षू; येथे 'इध' हा शब्द केवळ निपात (अव्यय) आहे. 'संघातं आपादेन्ता' म्हणजे विनाश घडवून आणणारे. 'संकसायिस्सन्ति' म्हणजे निष्काळजी होऊन एकाच ठिकाणी कायमचे वास्तव्य करतील. 'सकुन्तका' म्हणजे पक्षी. 'वस्साने वस्सं उपगन्तुं' म्हणजे वर्षा ऋतू नावाच्या तीन महिन्यांत वर्षावासासाठी जावे, असा अर्थ आहे. 'कति नु खो वस्सूपनायिका' म्हणजे वर्षावासाचे प्रवेश किती आहेत? 'अपरज्जुगताय' यामध्ये - जिचा दुसरा दिवस निघून गेला आहे ती 'अपरज्जुगता' (आषाढ पौर्णिमेचा दुसरा दिवस); तिच्या निघून गेल्यावर, म्हणजेच दुसऱ्या दिवशी (आषाढ प्रतिपदेला) असा अर्थ आहे. दुसऱ्या पद्धतीतही - जिचा एक महिना निघून गेला आहे ती 'मासगता' (आषाढ पौर्णिमेनंतर एक महिना); तिच्या निघून गेल्यावर, म्हणजेच एक महिना पूर्ण झाल्यावर (श्रावण पौर्णिमेनंतरच्या प्रतिपदेला) असा अर्थ आहे. म्हणून आषाढ पौर्णिमेच्या लगेचच नंतरच्या प्रतिपदेच्या दिवशी, किंवा आषाढ पौर्णिमेनंतरच्या दुसऱ्या पौर्णिमेच्या (श्रावण पौर्णिमेच्या) लगेचच नंतरच्या प्रतिपदेच्या दिवशीच विहाराची स्वच्छता करून, पिण्याचे व वापरण्याचे पाणी ठेवून, चैत्यवंदना इत्यादी सर्व आदरयुक्त कर्तव्ये पूर्ण करून 'या विहारात मी या तीन महिन्यांच्या वर्षावासासाठी प्रवेश करत आहे' असे एकदा किंवा दोन-तीन वेळा वाणीने उच्चारून वर्षावासात प्रवेश करावा. วาจํ นิจฺฉาเรตฺวา วสฺสํ อุปคนฺตพฺพํ. वाणीने उच्चार करून वर्षावासात प्रवेश करावा. วสฺสาเนจาริกาปฏิกฺเขปาทิกถา वर्षावासात चारिका (भ्रमण) करण्यास मनाई इत्यादींची कथा ๑๘๕-๖. โย ปกฺกเมยฺยาติ เอตฺถ อนเปกฺขคมเนน วา อญฺญตฺถ อรุณํ อุฏฺฐาปเนน วา อาปตฺติ เวทิตพฺพา. โย อติกฺกเมยฺยาติ เอตฺถ วิหารคณนาย อาปตฺติโย เวทิตพฺพา. สเจ หิ ตํ ทิวสํ วิหารสตสฺส อุปจารํ โอกฺกมิตฺวา อติกฺกมติ, สตํ อาปตฺติโย. สเจ ปน วิหารูปจารํ อติกฺกมิตฺวา อญฺญสฺส วิหารสฺส อุปจารํ อโนกฺกมิตฺวาว นิวตฺตติ, เอกา เอว อาปตฺติ. เกนจิ อนฺตราเยน ปุริมิกํ อนุปคเตน ปจฺฉิมิกา อุปคนฺตพฺพา. १८५-६. 'जो निघून जाईल' यामध्ये - परत येण्याची इच्छा न ठेवता जाण्याने किंवा दुसऱ्या ठिकाणी अरुणोदय (पहाट) होऊ देण्याने आपत्ती (दोष) समजावी. 'जो उल्लंघन करेल' यामध्ये विहारांच्या संख्येनुसार आपत्ती समजाव्यात. कारण जर तो त्या दिवशी शंभर विहारांच्या हद्दीचे उल्लंघन करतो, तर शंभर आपत्ती होतात. परंतु जर तो आपल्या विहाराच्या हद्दीचे उल्लंघन करून, दुसऱ्या विहाराच्या हद्दीत प्रवेश न करताच परत फिरतो, तर एकच आपत्ती होते. काही संकटामुळे पूर्व वर्षावासात (पुरिमिका) प्रवेश न करू शकलेल्या भिक्षूने पश्चिमोत्तर वर्षावासात (पच्छिमिका) प्रवेश करावा. วสฺสํ อุกฺกฑฺฒิตุกาโมติ วสฺสนามกํ ปฐมมาสํ อุกฺกฑฺฒิตุกาโม, สาวณมาสํ อกตฺวา ปุน อาสาฬฺหีมาสเมว กตฺตุกาโมติ อตฺโถ. อาคเม ชุณฺเหติ อาคเม มาเสติ อตฺโถ. อนุชานามิ ภิกฺขเว ราชูนํ อนุวตฺติตุนฺติ เอตฺถ วสฺสุกฺกฑฺฒเน ภิกฺขูนํ กาจิ ปริหานิ นาม นตฺถีติ อนุวตฺติตุํ [Pg.350] อนุญฺญาตํ, ตสฺมา อญฺญสฺมิมฺปิ ธมฺมิเก กมฺเม อนุวตฺติตพฺพํ. อธมฺมิเก ปน น กสฺสจิ อนุวตฺติตพฺพํ. 'वर्षावास पुढे ढकलण्याची इच्छा असणारा' म्हणजे वर्षा ऋतूचा पहिला महिना (आषाढ) पुढे ढकलण्याची इच्छा असणारा, श्रावण महिना न करता पुन्हा आषाढ महिनाच करण्याची इच्छा असणारा, असा अर्थ आहे. 'आगमे जुण्हे' म्हणजे येणाऱ्या महिन्यात, असा अर्थ आहे. 'भिक्षूंनो, मी राजांच्या आज्ञेचे पालन करण्याची अनुमती देतो' यामध्ये - वर्षावास पुढे ढकलल्याने भिक्षूंचे काही नुकसान होत नाही, म्हणून राजांच्या आज्ञेचे पालन करण्याची अनुमती दिली आहे. म्हणून इतरही धार्मिक कार्यात राजांच्या आज्ञेचे पालन करावे. परंतु अधार्मिक कार्यात मात्र कोणाचेही पालन करू नये. สตฺตาหกรณียานุชานนกถา सप्ताहाकरणीय (सात दिवसांच्या आत करावयाच्या कामासाठी जाण्याची) अनुमतीची कथा ๑๘๗-๘. สตฺตาหกรณีเยสุ – สตฺตาหกรณีเยน คนฺตุนฺติ สตฺตาหพฺภนฺตเร ยํ กตฺตพฺพํ ตํ สตฺตาหกรณียํ, เตน สตฺตาหกรณีเยน กรณภูเตน คนฺตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. ปหิเต คนฺตุนฺติ อิเมหิ สตฺตหิ ภิกฺขุอาทีหิ ทูเต ปหิเตเยว คนฺตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. สตฺตาหํ สนฺนิวตฺโต กาตพฺโพติ สตฺตาเหเยว สนฺนิวตฺติตพฺโพ, อฏฺฐโม อรุโณ ตตฺเถว น อุฏฺฐาเปตพฺโพติ อตฺโถ. १८७-८. सप्ताहाकरणीयांमध्ये - 'सप्ताहाकरणीयाने जावे' म्हणजे सात दिवसांच्या आत जे कार्य केले पाहिजे, त्याला 'सप्ताहाकरणीय' म्हणतात; त्या सप्ताहाकरणीय कार्याच्या निमित्ताने जाण्याची मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. 'पाठविल्यावर जावे' म्हणजे भिक्षू इत्यादी या सात जणांनी दूत पाठविल्यावरच जाण्याची मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. 'सात दिवसांत परत यावे' म्हणजे सात दिवसांच्या आतच परत यावे, आठवा अरुणोदय तेथेच होऊ देऊ नये, असा अर्थ आहे. ภิกฺขุนิสงฺฆํ อุทฺทิสฺสาติ อิโต ปฏฺฐาย วจฺจกุฏิ ชนฺตาฆรํ ชนฺตาฆรสาลาติ อิมานิ ตีณิ ปริหีนานิ. 'भिक्षुणीसंघाला उद्देशून' येथून पुढे - शौचालय (वच्चकुटि), जंतघर (स्नानगृह) आणि जंतघरशाळा (स्नानगृहाची शाळा) या तीन गोष्टी वगळल्या आहेत. ๑๘๙. อุโทสิตาทีนิ อุโทสิตสิกฺขาปทาทีสุ วุตฺตาเนว. รสวตีติ ภตฺตเคหํ วุจฺจติ. วาเรยฺยํ สญฺจริตฺตสิกฺขาปเท วุตฺตเมว. ปุรายํ สุตฺตนฺโต ปลุชฺชตีติ ยาว อยํ สุตฺตนฺโต น ปลุชฺชติ, ยาว อยํ สุตฺตนฺโต น วินสฺสติ. อญฺญตรํ วา ปนสฺส กิจฺจํ โหติ กรณียํ วาติ เอเตน ปริสงฺขตํ ยํกิญฺจิ กรณียํ สงฺคหิตํ โหติ. สพฺพตฺถ จ ‘‘อิจฺฉามิ ทานญฺจ ทาตุํ ธมฺมญฺจ โสตุํ ภิกฺขู จ ปสฺสิตุ’’นฺติ อิมินาว กปฺปิยวจเนน เปสิเต คนฺตพฺพํ, เอเตสํ วา เววจเนน. เปยฺยาลกฺกโม ปน เอวํ เวทิตพฺโพ, ยถา ‘‘อุปาสเกน สงฺฆํ อุทฺทิสฺส วิหาราทโย การาปิตา โหนฺติ, สมฺพหุเล ภิกฺขู อุทฺทิสฺส, เอกํ ภิกฺขุํ อุทฺทิสฺส, ภิกฺขุนิสงฺฆํ อุทฺทิสฺส, สมฺพหุลา ภิกฺขุนิโย, เอกํ ภิกฺขุนึ, สมฺพหุลา สิกฺขมานาโย, เอกํ สิกฺขมานํ, สมฺพหุเล สามเณเร, เอกํ สามเณรํ, สมฺพหุลา สามเณริโย, เอกํ สามเณรึ อุทฺทิสฺส อตฺตโน อตฺถาย นิเวสนํ การาปิตํ โหตี’’ติ วุตฺตํ; เอวเมว ‘‘อุปาสิกาย, ภิกฺขุนา, ภิกฺขุนิยา, สิกฺขมานาย, สามเณเรน, สามเณริยา สงฺฆํ อุทฺทิสฺสา’’ติ สพฺพํ วตฺตพฺพํ. เอเตสุ สตฺตปฺปกาเรสุ กรณีเยสุ ปหิเต คนฺตพฺพํ. १८९. उदोसित (धान्य कोठार) इत्यादींचे वर्णन उदोसित सिक्खापदांमध्ये आधीच सांगितले आहे. 'रसवती' म्हणजे स्वयंपाकघर म्हटले जाते. 'वारेय्य' (विवाह जुळवणे) संचरित्त सिक्खापदामध्ये आधीच सांगितले आहे. 'हा सुत्तंत नष्ट होण्यापूर्वी' म्हणजे जोपर्यंत हा सुत्तंत नष्ट होत नाही, जोपर्यंत हा सुत्तंत नष्ट होत नाही (तोपर्यंत ते शिकतील). 'किंवा त्याचे इतर काही कर्तव्य किंवा कार्य असेल तर' या वाक्याने तयार केलेले कोणतेही कार्य समाविष्ट केले जाते. आणि सर्व ठिकाणी 'मला दान देण्याची, धम्म ऐकण्याची आणि भिक्षूंचे दर्शन घेण्याची इच्छा आहे' या कप्पिय (योग्य) शब्दांनी दूत पाठविला असता जावे, किंवा त्यांच्या समानार्थी शब्दांनी दूत पाठविला असता जावे. पेयालाचा (संक्षिप्त रूपाचा) क्रम असा समजावा, जसे 'उपासकाने संघाला उद्देशून विहार इत्यादी बांधले आहेत, अनेक भिक्षूंना उद्देशून, एका भिक्षूला उद्देशून, भिक्षुणीसंघाला उद्देशून, अनेक भिक्षुणींना उद्देशून, एका भिक्षुणीला उद्देशून, अनेक सिक्खमानांना उद्देशून, एका सिक्खमानाला उद्देशून, अनेक सामणेरांना उद्देशून, एका सामणेराला उद्देशून, अनेक सामणेरींना उद्देशून, एका सामणेरीला उद्देशून स्वतःच्या उपयोगासाठी घर इत्यादी बांधले आहे' असे म्हटले आहे; तसेच 'उपासिकेने, भिक्षूने, भिक्षुणीने, सिक्खमानाने, सामणेराने, सामणेरीने संघाला उद्देशून...' असे सर्व म्हणावे. या सात प्रकारच्या कार्यात दूत पाठविला असता जावे. ปญฺจนฺนํอปฺปหิเตปิอนุชานนกถา पाच जणांनी दूत न पाठविताही जाण्याची अनुमती देण्याची कथा ๑๙๓. ปญฺจนฺนํ สตฺตาหกรณีเยนาติ เอเตสํ ภิกฺขุอาทีนํ สหธมฺมิกานํ ‘‘คิลานภตฺตํ วา คิลานุปฏฺฐากภตฺตํ วา เภสชฺชํ วา ปริเยสิสฺสามิ[Pg.351], ปุจฺฉิสฺสามิ วา, อุปฏฺฐหิสฺสามิ วา’’ติ เอวมาทินา ปรโต วิตฺถาเรตฺวา ทสฺสิเตน การเณน อปฺปหิเตปิ คนฺตพฺพํ, ปเคว ปหิเต. ภิกฺขุ คิลาโน โหติ, อนภิรติ อุปฺปนฺนา โหติ, กุกฺกุจฺจํ อุปฺปนฺนํ โหติ, ทิฏฺฐิคตํ อุปฺปนฺนํ โหติ, ครุธมฺมํ อชฺฌาปนฺโน โหติ ปริวาสารโห, มูลาย ปฏิกสฺสนารโห โหติ, มานตฺตารโห, อพฺภานารโห, สงฺโฆ กมฺมํ กตฺตุกาโม โหติ, กตํ วา สงฺเฆน กมฺมํ โหตีติ เอเตหิ ทสหิ การเณหิ ภิกฺขุสฺส สนฺติกํ คนฺตพฺพํ. ภิกฺขุนิยา สนฺติกํ นวหิ การเณหิ คนฺตพฺพํ, สิกฺขมานาย สนฺติกํ ฉหิ – อาทิโต จตูหิ, สิกฺขา กุปฺปิตา โหติ, อุปสมฺปชฺชิตุกามา โหตีติ. สามเณรสฺสาปิ ฉหิ – อาทิโต จตูหิ, วสฺสํ ปุจฺฉิตุกาโม อุปสมฺปชฺชิตุกาโม โหตีติ. สามเณริยา อุปสมฺปทํ อปเนตฺวา สิกฺขาปทํ ทาตุกาโม โหตีติ อิมินา สทฺธึ ปญฺจหิ. ปรโต มาตาปิตูนํ อนุญฺญาตฏฺฐาเนปิ เอเสว นโย. อนฺธกฏฺฐกถายํ ปน ‘‘เย มาตาปิตูนํ อุปฏฺฐากา ญาตกา วา อญฺญาตกา วา เตสมฺปิ อปฺปหิเต คนฺตุํ วฏฺฏตี’’ติ วุตฺตํ, ตํ เนว อฏฺฐกถายํ, น ปาฬิยา วุตฺตํ, ตสฺมา น คเหตพฺพํ. १९३. पाच जणांच्या सात दिवसांच्या कारणासाठी म्हणजे या भिक्खू इत्यादी सहधार्मिकांच्या कारणासाठी - 'मी आजारी व्यक्तीसाठी अन्न किंवा आजारी व्यक्तीच्या शुश्रूषा करणाऱ्यासाठी अन्न किंवा औषध शोधेन, किंवा विचारपूस करेन, किंवा स्वतः सेवा करेन' अशा प्रकारे पुढे विस्ताराने दाखवलेल्या कारणांमुळे निरोप पाठवला नसला तरीही जावे, मग निरोप पाठवला असल्यास काय सांगावे! भिक्खू आजारी असतो, अरती (उदासीनता) उत्पन्न झालेली असते, कुकुच्च (संशय) उत्पन्न झालेला असतो, मिथ्यादृष्टी उत्पन्न झालेली असते, गुरूधर्माला (संघादिसेस आपत्तीला) प्राप्त होऊन परिवासास पात्र असतो, मूळ खेचण्यास (मूलपटिकस्सना) पात्र असतो, मानत्तास पात्र असतो, अब्भान (पुनर्वसन) पात्र असतो, संघ कर्म करू इच्छितो, किंवा संघाने कर्म केलेले असते - या दहा कारणांमुळे भिक्खूच्या जवळ जावे. भिक्खुणीच्या जवळ नऊ कारणांमुळे जावे. सिक्खमानाच्या जवळ सहा कारणांमुळे जावे - सुरुवातीच्या चार कारणांमुळे आणि 'शिक्षा खंडित झाली आहे' व 'उपसंपदा घेण्याची इच्छा आहे' या कारणांमुळे. सामणेराच्या जवळही सहा कारणांमुळे जावे - सुरुवातीच्या चार कारणांमुळे आणि 'वर्षावास विचारण्याची इच्छा आहे' व 'उपसंपदा घेण्याची इच्छा आहे' या कारणांमुळे. सामणेरीच्या जवळ - उपसंपदा वगळून, 'शिक्षापद देण्याची इच्छा आहे' या कारणासह पाच कारणांमुळे जावे. पुढे मातापित्यांच्या बाबतीत परवानगी दिलेल्या ठिकाणीही हाच नियम लागू होतो. परंतु अंधक-अट्ठकथेत म्हटले आहे की, 'जे मातापित्यांचे सेवक आहेत, मग ते नातेवाईक असोत वा परके, त्यांच्याकडे निरोप न पाठवला असला तरीही जाणे योग्य आहे'. ते जुन्या अट्ठकथेत किंवा पाळीमध्ये सांगितलेले नाही, म्हणून ते स्वीकारू नये. ปหิเตเยวอนุชานนกถา निरोप पाठवल्यावरच जाण्याची परवानगी देण्याबाबतची कथा ๑๙๙. ภิกฺขุคติโกติ เอกสฺมึ วิหาเร ภิกฺขูหิ สทฺธึ วสนกปุริโส. อุนฺทฺริยตีติ ปลุชฺชติ. ภณฺฑํ เฉทาปิตนฺติ ทพฺพสมฺภารภณฺฑํ เฉทาปิตํ. อาวหาเปยฺยุนฺติ อาหราเปยฺยุํ. ทชฺชาหนฺติ ทชฺเช อหํ. สงฺฆกรณีเยนาติ เอตฺถ ยํกิญฺจิ อุโปสถาคาราทีสุ เสนาสเนสุ เจติยฉตฺตเวทิกาทีสุ วา กตฺตพฺพํ, อนฺตมโส ภิกฺขุโน ปุคฺคลิกเสนาสนมฺปิ, สพฺพํ สงฺฆกรณียเมว. ตสฺมา ตสฺส นิปฺผาทนตฺถํ ทพฺพสมฺภาราทีนิ วา อาหริตุํ วฑฺฒกีปฺปภุตีนํ ภตฺตเวตนาทีนิ วา ทาเปตุํ คนฺตพฺพํ. १९९. 'भिक्खूगतिक' म्हणजे एकाच विहारात भिक्खूंसोबत राहणारा पुरुष. 'उन्द्रियति' म्हणजे नष्ट होणे किंवा कोसळणे. 'भांडं छेदापितं' म्हणजे लाकूड इत्यादी बांधकाम साहित्य कापून तयार करून घेणे. 'आव्हापेय्युं' म्हणजे आणवून घेणे. 'दज्जाहं' म्हणजे मी द्यावे (दज्जे अहं). येथे 'संघकरणीय' (संघाचे कार्य) म्हणजे उपोसथागार इत्यादी सेनासनांमध्ये किंवा चैत्य, छत्र, वेदिका इत्यादींमध्ये जे काही करायचे काम असेल, अगदी शेवटी एखाद्या भिक्खूचे वैयक्तिक सेनासन जरी असले तरी, ते सर्व संघकरणीयच मानले जाते. म्हणून ते कार्य पूर्ण करण्यासाठी लाकूड इत्यादी बांधकाम साहित्य आणण्यासाठी किंवा सुतार इत्यादींना अन्न व वेतन देववण्यासाठी जावे. อยํ ปเนตฺถ ปาฬิมุตฺตกรตฺติจฺเฉทวินิจฺฉโย – ธมฺมสวนตฺถาย อนิมนฺติเตน คนฺตุํ น วฏฺฏติ. สเจ เอกสฺมึ มหาวาเส ปฐมํเยว กติกา กตา โหติ – ‘‘อสุกทิวสํ นาม สนฺนิปติตพฺพ’’นฺติ, นิมนฺติโตเยว นาม โหติ, คนฺตุํ วฏฺฏติ. ‘‘ภณฺฑกํ โธวิสฺสามี’’ติ คนฺตุํ น วฏฺฏติ. สเจ ปน [Pg.352] อาจริยุปชฺฌายา ปหิณนฺติ, วฏฺฏติ. นาติทูเร วิหาโร โหติ, ตตฺถ คนฺตฺวา อชฺเชว อาคมิสฺสามีติ สมฺปาปุณิตุํ น สกฺโกติ, วฏฺฏติ. อุทฺเทสปริปุจฺฉาทีนํ อตฺถายปิ คนฺตุํ น วฏฺฏติ. ‘‘อาจริยํ ปสฺสิสฺสามี’’ติ ปน คนฺตุํ ลภติ. สเจ ปน นํ อาจริโย ‘‘อชฺช มา คจฺฉา’’ติ วทติ, วฏฺฏติ. อุปฏฺฐากกุลํ วา ญาติกุลํ วา ทสฺสนาย คนฺตุํ น ลภตีติ. या बाबतीत पाळी-मुक्त (सूत्राबाहेरील) रात्रीच्या नियमाचा निर्णय असा आहे - धर्मश्रवणासाठी निमंत्रित न केलेल्या भिक्खूने जाणे योग्य नाही. जर एखाद्या मोठ्या विहारात आधीच असा करार केला असेल की, 'अमुक दिवशी एकत्र जमावे', तर तो निमंत्रितच मानला जातो आणि जाणे योग्य ठरते. 'मी माझे कपडे धुवेन' असा विचार करून जाणे योग्य नाही. परंतु जर आचार्य किंवा उपाध्यायांनी पाठवले, तर जाणे योग्य आहे. फार दूर नसलेल्या विहारात 'तिथे जाऊन आजच परत येईन' असा विचार करून निघाला, पण परत पोहोचू शकला नाही, तरीही ते योग्य आहे. पाठ शिकण्यासाठी किंवा प्रश्न विचारण्यासाठी जाणे योग्य नाही. परंतु 'मी आचार्यांचे दर्शन घेईन' या विचाराने जाण्याची परवानगी मिळते. आणि जर आचार्यांनी त्याला म्हटले की, 'आज जाऊ नकोस', तर तिथे राहणे योग्य आहे. उपासक कुटुंबाला किंवा नातेवाईकांच्या कुटुंबाला भेटण्यासाठी जाण्याची परवानगी मिळत नाही. อนฺตราเยอนาปตฺติวสฺสจฺเฉทกถา अडथळा आल्यास वर्षावास खंडित होण्यात आपत्ती न होण्याबाबतची कथा ๒๐๑. เยน คาโม เตน คนฺตุนฺติอาทีสุ สเจ คาโม อวิทูรํ คโต โหติ, ตตฺถ ปิณฺฑาย จริตฺวา วิหารเมว อาคนฺตฺวา วสิตพฺพํ. สเจ ทูรํ คโต, สตฺตาหวาเรน อรุโณ อุฏฺฐาเปตพฺโพ. น สกฺกา เจ โหติ, ตตฺเรว สภาคฏฺฐาเน วสิตพฺพํ. สเจ มนุสฺสา ยถาปวตฺตานิ สลากภตฺตาทีนิ เทนฺติ, ‘‘น มยํ ตสฺมึ วิหาเร วสิมฺหา’’ติ วตฺตพฺพา. ‘‘มยํ วิหารสฺส วา ปาสาทสฺส วา น เทม, ตุมฺหากํ เทม, ยตฺถ กตฺถจิ วสิตฺวา ภุญฺชถา’’ติ วุตฺเต ปน ยถาสุขํ ภุญฺชิตพฺพํ, เตสํเยว ตํ ปาปุณาติ. ‘‘ตุมฺหากํ วสนฏฺฐาเน ปาปุณาเปตฺวา ภุญฺชถา’’ติ วุตฺเต ปน ยตฺถ วสนฺติ, ตตฺถ เนตฺวา วสฺสคฺเคน ปาปุณาเปตฺวา ภุญฺชิตพฺพํ. २०१. 'ज्या दिशेला गाव गेले असेल, त्या दिशेला जावे' इत्यादी पाठांमध्ये निर्णय असा समजावा - जर गाव जवळच स्थलांतरित झाले असेल, तर तिथे पिंडपातासाठी जाऊन पुन्हा विहारातच येऊन राहावे. जर गाव दूर गेले असेल, तर सात दिवसांच्या मर्यादेत अरुणोदय घडवून आणावा (सात दिवसांत परत यावे). जर तसे करणे शक्य नसेल, तर तिथेच अनुकूल ठिकाणी राहावे. जर लोक पूर्वीप्रमाणेच शलाका-भोजन इत्यादी देत असतील, तर त्यांना सांगावे की, 'आम्ही आता त्या विहारात राहत नाही'. परंतु जर त्यांनी म्हटले की, 'आम्ही विहाराला किंवा प्रासादाला देत नाही, तर आम्ही तुम्हाला देत आहोत; तुम्ही कुठेही राहून ते ग्रहण करा', तर सुखपूर्वक त्याचे सेवन करावे, ते भोजन त्यांनाच मिळते. आणि जर त्यांनी म्हटले की, 'तुमच्या राहण्याच्या ठिकाणी ते पोहोचवून तुम्ही ग्रहण करा', तर ते ज्या ठिकाणी राहत असतील, तिथे ते अन्न नेऊन, वर्षा-ज्येष्ठतेनुसार वाटप करून ग्रहण करावे. สเจ ปวาริตกาเล วสฺสาวาสิกํ เทนฺติ, ยทิ สตฺตาหวาเรน อรุณํ อุฏฺฐาปยึสุ, คเหตพฺพํ. ฉินฺนวสฺเสหิ ปน ‘‘น มยํ ตตฺถ วสิมฺห, ฉินฺนวสฺสา มย’’นฺติ วตฺตพฺพํ. ยทิ ‘‘เยสํ อมฺหากํ เสนาสนํ ปาปิตํ, เต คณฺหนฺตู’’ติ วทนฺติ, คเหตพฺพํ. ยํ ปน วิหาเร อุปนิกฺขิตฺตกํ มา วินสฺสีติ อิธ อาหฏํ จีวราทิเวภงฺคิยภณฺฑํ, ตํ ตตฺเถว คนฺตฺวา อปโลเกตฺวา ภาเชตพฺพํ. ‘‘อิโต อยฺยานํ จตฺตาโร ปจฺจเย เทถา’’ติ กปฺปิยการกานํ ทินฺเน เขตฺตวตฺถุอาทิเก ตตฺรุปฺปาเทปิ เอเสว นโย. สงฺฆิกญฺหิ เวภงฺคิยภณฺฑํ อนฺโตวิหาเร วา พหิสีมาย วา โหตุ, พหิสีมาย ฐิตานํ อปโลเกตฺวา ภาเชตุํ น วฏฺฏติ. อุภยตฺถ ฐิตมฺปิ ปน อนฺโตสีมาย ฐิตานํ อปโลเกตฺวา ภาเชตุํ วฏฺฏติเยว. जर पवारणा काळात वर्षावासिक वस्त्र दिले जात असेल, आणि जर त्यांनी सात दिवसांच्या आत अरुणोदय घडवून आणला असेल, तर ते स्वीकारणे योग्य आहे. परंतु ज्यांचा वर्षावास खंडित झाला आहे, त्यांनी सांगावे की, 'आम्ही तिथे राहिलो नाही, आमचा वर्षावास खंडित झाला आहे'. जर दायक म्हणाले की, 'ज्या भिक्खूंना आमचे सेनासन मिळाले आहे, त्यांनी ते स्वीकारावे', तर ते स्वीकारणे योग्य आहे. परंतु विहारात ठेवलेले साहित्य नष्ट होऊ नये म्हणून जे चीवर इत्यादी विभाजनीय साहित्य येथे आणले गेले आहे, ते मूळ विहारातच जाऊन, संघाची अनुमती घेऊन विभाजित करावे. 'यातून पूजनीय भिक्खूंना चार प्रत्यय द्या' असे सांगून कप्पियकारकांना शेतजमीन इत्यादी वस्तू दिल्या असतील, तर त्यातून उत्पन्न होणाऱ्या वस्तूंबाबतही हाच नियम आहे. कारण संघाचे विभाजनीय साहित्य विहाराच्या आत असो वा सीमेच्या बाहेर असो, सीमेबाहेर राहिलेल्या भिक्खूंना विचारून त्याचे विभाजन करणे योग्य नाही. परंतु दोन्ही ठिकाणी असलेले साहित्य सीमेच्या आत असलेल्या भिक्खूंची अनुमती घेऊन विभाजित करणे योग्यच आहे. สงฺฆเภเทอนาปตฺติวสฺสจฺเฉทกถา संघभेद झाल्यास वर्षावास खंडित होण्यात आपत्ती न होण्याबाबतची कथा ๒๐๒. สงฺโฆ [Pg.353] ภินฺโนติ เอตฺถ ภินฺเน สงฺเฆ คนฺตฺวา กรณียํ นตฺถิ, โย ปน ‘‘ภิชฺชิสฺสตี’’ติ อาสงฺกิโต, ตํ สนฺธาย ‘‘ภินฺโน’’ติ วุตฺตํ. สมฺพหุลาหิ ภิกฺขุนีหิ สงฺโฆ ภินฺโนติ เอตฺถ น ภิกฺขุนีหิ สงฺโฆ ภินฺโนติ ทฏฺฐพฺโพ. วุตฺตญฺเหตํ ‘‘น โข อุปาลิ ภิกฺขุนี สงฺฆํ ภินฺทตี’’ติ. เอตา ปน นิสฺสาย อนุพลํ กตฺวา ยํ สงฺฆํ ‘‘ภิกฺขู ภินฺเทยฺยุ’’นฺติ อาสงฺกา โหติ, ตํ สนฺธาเยตํ วุตฺตํ. २०२. येथे 'संघ भिन्न झाला' या संदर्भात - संघ दुभंगल्यावर तिथे जाऊन करण्याचे काही कार्य उरत नाही, परंतु 'संघ दुभंगणार आहे' अशी शंका ज्या संघाबद्दल असते, त्याला उद्देशून भगवंतांनी 'भिन्न झाला' असे म्हटले आहे. येथे 'अनेक भिक्खुणींनी संघ दुभंगला' या संदर्भात - भिक्खुणींनी संघ दुभंगला असे मानू नये. कारण असे म्हटले आहे की, 'हे उपाली! भिक्खुणी संघाचा भेद करत नाही'. परंतु त्यांचा आश्रय घेऊन आणि त्यांना पाठबळ देऊन भिक्खू ज्या संघाचा भेद करतील अशी शंका असते, त्याला उद्देशून हे म्हटले आहे. วชาทีสุวสฺสูปคมนกถา गोठा इत्यादी ठिकाणी वर्षावास स्वीकारण्याबाबतची कथा ๒๐๓. วโชติ โคปาลกานํ นิวาสฏฺฐานํ. เยน วโชติ เอตฺถ วเชน สทฺธึ คตสฺส วสฺสจฺเฉเท อนาปตฺติ. २०३. 'वज' म्हणजे गोपाळांचे राहण्याचे ठिकाण. येथे 'ज्या दिशेला गोठा असेल' या संदर्भात - त्या गोठ्यासोबत गेलेल्या भिक्खूचा वर्षावास खंडित झाला तरी त्याला आपत्ती होत नाही. อุปกฏฺฐายาติ อาสนฺนาย. สตฺเถ วสฺสํ อุปคนฺตุนฺติ เอตฺถ วสฺสูปนายิกทิวเส เตน ภิกฺขุนา อุปาสกา วตฺตพฺพา ‘‘กุฏิกา ลทฺธุํ วฏฺฏตี’’ติ. สเจ กริตฺวา เทนฺติ, ตตฺถ ปวิสิตฺวา ‘‘อิธ วสฺสํ อุเปมี’’ติ ติกฺขตฺตุํ วตฺตพฺพํ. โน เจ เทนฺติ, สาลาสงฺเขเปน ฐิตสกฏสฺส เหฏฺฐา อุปคนฺตพฺพํ. ตมฺปิ อลภนฺเตน อาลโย กาตพฺโพ. สตฺเถ ปน วสฺสํ อุปคนฺตุํ น วฏฺฏติ. อาลโย นาม ‘‘อิธ วสฺสํ วสิสฺสามี’’ติ จิตฺตุปฺปาทมตฺตํ. สเจ มคฺคปฺปฏิปนฺเนเยว สตฺเถ ปวารณทิวโส โหติ, ตตฺเถว ปวาเรตพฺพํ. อถ สตฺโถ อนฺโตวสฺเสเยว ภิกฺขุนา ปตฺถิตฏฺฐานํ ปตฺวา อติกฺกมติ, ปตฺถิตฏฺฐาเน วสิตฺวา ตตฺถ ภิกฺขูหิ สทฺธึ ปวาเรตพฺพํ. อถาปิ สตฺโถ อนฺโตวสฺเสเยว อนฺตรา เอกสฺมึ คาเม ติฏฺฐติ วา วิปฺปกิรติ วา, ตสฺมึเยว คาเม ภิกฺขูหิ สทฺธึ วสิตฺวา ปวาเรตพฺพํ, อปวาเรตฺวา ตโต ปรํ คนฺตุํ น วฏฺฏติ. ‘उपकठ्ठाय’ म्हणजे जवळ आले असता. ‘सत्थे वस्सं उपगन्तुं’ (तांड्यामध्ये वर्षावास स्वीकारणे) या संदर्भात, वर्षावास सुरू होण्याच्या दिवशी त्या भिक्खूने उपासकांना सांगावे की, 'एक लहान कुटी मिळणे योग्य होईल.' जर त्यांनी ती बनवून दिली, तर तिथे प्रवेश करून 'मी येथे वर्षावास स्वीकारतो' असे तीन वेळा म्हणावे. जर त्यांनी दिली नाही, तर धर्मशाळेच्या स्वरूपात उभ्या असलेल्या गाडीच्या खाली वर्षावास स्वीकारावा. तेही न मिळाल्यास भिक्खूने 'आलय' (संकल्प) करावा. परंतु तांड्यामध्ये थेट वर्षावास स्वीकारणे योग्य नाही. 'आलय' म्हणजे 'मी येथे वर्षावास व्यतीत करीन' असा केवळ चित्ताचा संकल्प होय. जर तांडा मार्गावर असतानाच पवारणा दिवस आला, तर तिथेच पवारणा करावी. आणि जर वर्षावासाच्या दरम्यानच तांडा भिक्खूच्या इच्छित स्थळी पोहोचून पुढे निघून गेला, तर इच्छित स्थळीच राहून तेथील भिक्खूंसोबत पवारणा करावी. किंवा जर वर्षावासाच्या दरम्यानच तांडा वाटेत एखाद्या गावात थांबला किंवा विखुरला, तर त्याच गावात भिक्खूंसोबत राहून पवारणा करावी; पवारणा केल्याशिवाय तेथून पुढे जाणे योग्य नाही. นาวายํ วสฺสํ อุปคจฺฉนฺเตนาปิ กุฏิยํเยว อุปคนฺตพฺพํ. ปริเยสิตฺวา อลภนฺเตน อาลโย กาตพฺโพ. สเจ อนฺโตเตมาสํ นาวา สมุทฺเทเยว โหติ, ตตฺเถว ปวาเรตพฺพํ. อถ นาวา กูลํ ลภติ, อยญฺจ ปรโต คนฺตุกาโม โหติ, คนฺตุํ น วฏฺฏติ. นาวาย ลทฺธคาเมเยว วสิตฺวา ภิกฺขูหิ สทฺธึ ปวาเรตพฺพํ. สเจปิ นาวา อนุตีรเมว อญฺญตฺถ คจฺฉติ, ภิกฺขุ จ ปฐมํ ลทฺธคาเมเยว วสิตุกาโม, นาวา คจฺฉตุ ภิกฺขุนา ตตฺเถว วสิตฺวา ภิกฺขูหิ สทฺธึ ปวาเรตพฺพํ. नौकेमध्ये वर्षावास स्वीकारणाऱ्या भिक्खूने सुद्धा कुटीमध्येच वर्षावास स्वीकारावा. शोध घेऊनही ती न मिळाल्यास 'आलय' (संकल्प) करावा. जर वर्षावासाच्या तीन महिन्यांच्या दरम्यान नौका समुद्रातच असेल, तर तिथेच पवारणा करावी. आणि जर नौकेला किनारा मिळाला आणि या भिक्खूला पुढे जाण्याची इच्छा असेल, तर पुढे जाणे योग्य नाही. नौकेला मिळालेल्या गावातच राहून भिक्खूंसोबत पवारणा करावी. जरी नौका किनाऱ्याने दुसऱ्या ठिकाणी जात असली आणि भिक्खूची पहिल्यांदा पोहोचलेल्या गावातच राहण्याची इच्छा असेल, तर नौकेला जाऊ द्यावे, भिक्खूने तिथेच राहून भिक्खूंसोबत पवारणा करावी. อิติ [Pg.354] วเช สตฺเถ นาวายนฺติ ตีสุ ฐาเนสุ นตฺถิ วสฺสจฺเฉเท อาปตฺติ, ปวาเรตุญฺจ ลภติ. ปุริเมสุ ปน ‘‘วาเฬหิ อุพฺพาฬฺหา โหนฺตี’’ติอาทีสุ สงฺฆเภทปริยนฺเตสุ วตฺถูสุ เกวลํ อนาปตฺติ โหติ, ปวาเรตุํ ปน น ลภติ. अशा प्रकारे गोशाळेत (गोकुळात), तांड्यात आणि नौकेत या तीन ठिकाणी वर्षावास खंडित झाल्यामुळे आपत्ती येत नाही आणि पवारणा करण्याची संधीही मिळते. परंतु पूर्वी सांगितलेल्या 'हिंस्र श्वापदांनी उपद्रव केला असता' इत्यादींपासून ते संघभेदापर्यंतच्या प्रकरणांमध्ये केवळ अनापत्ती (दोषमुक्ती) होते, परंतु पवारणा करण्याची संधी मिळत नाही. ๒๐๔. น ภิกฺขเว รุกฺขสุสิเรติ เอตฺถ สุทฺเธ รุกฺขสุสิเรเยว น วฏฺฏติ; มหนฺตสฺส ปน รุกฺขสุสิรสฺส อนฺโต ปทรจฺฉทนํ กุฏิกํ กตฺวา ปวิสนทฺวารํ โยเชตฺวา อุปคนฺตุํ วฏฺฏติ. รูกฺขํ ฉินฺทิตฺวา ขาณุกมตฺถเก ปทรจฺฉทนํ กุฏิกํ กตฺวาปิ วฏฺฏติเยว. รุกฺขวิฏภิยาติ เอตฺถาปิ สุทฺเธ วิฏปมตฺเต น วฏฺฏติ. มหาวิฏเป ปน อฏฺฏกํ พนฺธิตฺวา ตตฺถ ปทรจฺฉทนํ กุฏิกํ กตฺวา อุปคนฺตพฺพํ. อเสนาสนิเกนาติ ยสฺส ปญฺจนฺนํ ฉทนานํ อญฺญตเรน ฉนฺนํ โยชิตทฺวารพนฺธนํ เสนาสนํ นตฺถิ, เตน น อุปคนฺตพฺพํ. น ภิกฺขเว ฉวกุฏิกายนฺติ ฉวกุฏิกา นาม ฏงฺกิตมญฺจาทิเภทา กุฏิ, ตตฺถ อุปคนฺตุํ น วฏฺฏติ. สุสาเน ปน อญฺญํ กุฏิกํ กตฺวา อุปคนฺตุํ วฏฺฏติ. น ภิกฺขเว ฉตฺเตติ เอตฺถาปิ จตูสุ ถมฺเภสุ ฉตฺตํ ฐเปตฺวา อาวรณํ กตฺวา ทฺวารํ โยเชตฺวา อุปคนฺตุํ วฏฺฏติ, ฉตฺตกุฏิกา นาเมสา โหติ. จาฏิยาติ เอตฺถาปิ มหนฺเตน กปลฺเลน ฉตฺเต วุตฺตนเยน กุฏึ กตฺวา อุปคนฺตุํ วฏฺฏติ. २०४. ‘भिक्खूंनो, झाडाच्या ढोलीत वर्षावास स्वीकारू नये’ या संदर्भात, केवळ उघड्या झाडाच्या ढोलीत वर्षावास स्वीकारणे योग्य नाही; परंतु मोठ्या झाडाच्या ढोलीच्या आत लाकडी फळ्यांचे छप्पर असलेली कुटी बनवून आणि प्रवेशद्वार लावून वर्षावास स्वीकारणे योग्य आहे. झाड कापून त्याच्या बुंध्यावर लाकडी फळ्यांचे छप्पर असलेली कुटी बनवून वर्षावास स्वीकारणे सुद्धा योग्यच आहे. ‘झाडाच्या फांदीवर’ या संदर्भात सुद्धा केवळ उघड्या फांदीवर वर्षावास स्वीकारणे योग्य नाही. परंतु मोठ्या फांदीवर माचा बांधून, त्यावर लाकडी फळ्यांचे छप्पर असलेली कुटी बनवून वर्षावास स्वीकारावा. ‘असेनासनिकेन’ (सेनासन नसलेल्याने) म्हणजे ज्याच्याकडे पाच प्रकारच्या छप्परांपैकी कोणत्याही एका छप्पराने शाकारलेले आणि दार-चौकट लावलेले सेनासन नाही, त्याने वर्षावास स्वीकारू नये. ‘भिक्खूंनो, प्रेत-कुटीत वर्षावास स्वीकारू नये’ या संदर्भात, प्रेत-कुटी म्हणजे खाटा इत्यादींचे पाय लावून बनवलेली कुटी होय, तिथे वर्षावास स्वीकारणे योग्य नाही. परंतु स्मशानात दुसरी कुटी बनवून वर्षावास स्वीकारणे योग्य आहे. ‘भिक्खूंनो, छत्रीत वर्षावास स्वीकारू नये’ या संदर्भात सुद्धा, चार खांबांवर छत्री ठेवून, बाजूने आडोसा करून आणि दार लावून वर्षावास स्वीकारणे योग्य आहे, याला ‘छत्र-कुटी’ असे म्हणतात. ‘मोठ्या मातीच्या भांड्यात’ या संदर्भात सुद्धा मोठ्या मातीच्या भांड्याला छत्रीप्रमाणे वर ठेवून, आधी सांगितलेल्या पद्धतीने कुटी बनवून वर्षावास स्वीकारणे योग्य आहे. อธมฺมิกกติกาทิกถา अधार्मिक कराराविषयीची (अधार्मिक कतिका) कथा. ๒๐๕. เอวรูปา กติกาติ เอตฺถ อญฺญาปิ ยา อีทิสี อธมฺมิกา กติกา โหติ, สา น กาตพฺพาติ อตฺโถ. ตสฺสา ลกฺขณํ มหาวิภงฺเค วุตฺตํ. २०५. ‘अशा प्रकारचा करार’ या संदर्भात, इतरही जो असा अधार्मिक करार असेल, तो करू नये, असा अर्थ आहे. त्याचे लक्षण महाविभंगामध्ये सांगितले आहे. ๒๐๗-๘. ปฏิสฺสเว จ อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ เอตฺถ น เกวลํ ‘‘อิมํ เตมาสํ อิธ วสฺสํ วสถา’’ติ เอตสฺเสว ปฏิสฺสเว อาปตฺติ, ‘‘อิมํ เตมาสํ ภิกฺขํ คณฺหถ, อุโภปิ มยํ อิธ วสฺสํ วสิสฺสาม, เอกโต อุทฺทิสาเปสฺสามา’’ติ เอวมาทินาปิ ตสฺส ตสฺส ปฏิสฺสเว ทุกฺกฏํ. ตญฺจ โข ปฐมํ สุทฺธจิตฺตสฺส ปจฺฉา วิสํวาทนปจฺจยา, ปฐมมฺปิ อสุทฺธจิตฺตสฺส ปน ปฏิสฺสเว ปาจิตฺติยํ, วิสํวาทเน ทุกฺกฏนฺติ ปาจิตฺติเยน สทฺธึ ทุกฺกฏํ ยุชฺชติ. २०७-८. ‘आणि वचन दिल्यास दुक्कट आपत्ती येते’ या संदर्भात, केवळ 'या तीन महिन्यांत येथे वर्षावास करा' एवढ्याच वचनाचा भंग केल्याने आपत्ती येते असे नाही, तर 'या तीन महिन्यांत भिक्षा ग्रहण करा, आपण दोघेही येथे वर्षावास करू, एकत्र मिळून पाठांतर करू' इत्यादी प्रकारच्या त्या त्या वचनाचा भंग केल्याने दुक्कट दोष होतो. आणि तो (दुक्कट दोष) सुरुवातीला शुद्ध चित्त असलेल्या परंतु नंतर वचनभंग करणाऱ्या भिक्खूला होतो. परंतु सुरुवातीपासूनच अशुद्ध चित्त असलेल्या भिक्खूने वचन दिल्यास पाचित्तिय दोष होतो आणि वचनभंग केल्यास दुक्कट दोष होतो; अशा प्रकारे पाचित्तिय दोषासोबत दुक्कट दोषही लागू होतो. โส [Pg.355] ตทเหว อกรณีโยติอาทีสุ สเจ วสฺสํ อนุปคนฺตฺวา วา ปกฺกมติ, อุปคนฺตฺวา วา สตฺตาหํ พหิทฺธา วีตินาเมติ, ปุริมิกา จ น ปญฺญายติ, ปฏิสฺสเว จ อาปตฺติ. วสฺสํ อุปคนฺตฺวา ปน อรุณํ อนุฏฺฐาเปตฺวา ตทเหว สตฺตาหกรณีเยน ปกฺกมนฺตสฺสาปิ อนฺโตสตฺตาเห นิวตฺตนฺตสฺส อนาปตฺติ, โก ปน วาโท ทฺวีหตีหํ วสิตฺวา อนฺโตสตฺตาเห นิวตฺตนฺตสฺส. ทฺวีหตีหํ วสิตฺวาติ เอตฺถาปิ นิรเปกฺเขเนว อุปจาราติกฺกเม วสฺสจฺเฉโท เวทิตพฺโพ. สเจ อิธ วสิสฺสามีติ อาลโย อตฺถิ, อสติยา ปน วสฺสํ น อุเปติ, คหิตเสนาสนํ สุคฺคหิตํ, ฉินฺนวสฺโส น โหติ, ปวาเรตุํ ลภติเยว. ‘तो त्याच दिवशी अकरणीय’ इत्यादी पाठांमध्ये, जर वर्षावास न स्वीकारताच निघून गेला, किंवा वर्षावास स्वीकारून सात दिवस बाहेर घालवले, आणि पूर्व-वर्षावास स्पष्ट होत नसेल, तर वचनभंगामुळे आपत्ती येते. परंतु वर्षावास स्वीकारून, अरुणोदय न होऊ देता त्याच दिवशी सात दिवसांच्या आवश्यक कामासाठी बाहेर जाणाऱ्या आणि सात दिवसांच्या आत परत येणाऱ्या भिक्खूला अनापत्ती आहे. मग दोन-तीन दिवस राहून सात दिवसांच्या आत परत येणाऱ्या भिक्खूबाबत काय सांगावे! ‘दोन-तीन दिवस राहून’ या संदर्भात सुद्धा, पूर्णपणे निरपेक्ष होऊन सीमेचे उल्लंघन केल्यास वर्षावास खंडित होतो, असे समजावे. जर 'मी येथेच राहीन' असा संकल्प असेल, परंतु विस्मरणामुळे वर्षावास स्वीकारला नाही, तरी स्वीकारलेले सेनासन योग्य प्रकारे स्वीकारलेले मानले जाते, त्याचा वर्षावास खंडित होत नाही आणि त्याला पवारणा करण्याची संधी मिळतेच. สตฺตาหํ อนาคตาย ปวารณายาติ เอตฺถ นวมิโต ปฏฺฐาย คนฺตุํ วฏฺฏติ, อาคจฺฉตุ วา มา วา, อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมวาติ. ‘पवारणेला सात दिवस शिल्लक असताना’ या संदर्भात, नवव्या दिवसापासून जाणे योग्य आहे; तो परत येवो वा न येवो, अनापत्ती आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. วสฺสูปนายิกกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. वर्षावास स्वीकारण्यासंबंधीच्या खंधकाचे वर्णन (वस्सूनायिकक्खंधकवण्णना) समाप्त झाले. ๔. ปวารณากฺขนฺธกํ ४. पवारणा खंधक (पवारणाक्खंधक). อผาสุกวิหารกถา अफासुकविहार (असुखकारक निवास) कथा. ๒๐๙. ปวารณากฺขนฺธเก [Pg.356] – เนว อาลเปยฺยาม น สลฺลเปยฺยามาติ เอตฺถ อาลาโป นาม ปฐมวจนํ; สลฺลาโป ปจฺฉิมวจนํ. หตฺถวิลงฺฆเกนาติ หตฺถุกฺเขปเกน. ปสุสํวาสนฺติ ปสูนํ วิย สํวาสํ. ปสโวปิ หิ อตฺตโน อุปฺปนฺนํ สุขทุกฺขํ อญฺญมญฺญสฺส น อาโรเจนฺติ, ปฏิสนฺถารํ น กโรนฺติ, ตถา เอเตปิ น อกํสุ; ตสฺมา เนสํ สํวาโส ‘‘ปสุสํวาโส’’ติ วุจฺจติ. เอส นโย สพฺพตฺถ. น ภิกฺขเว มูคพฺพตํ ติตฺถิยสมาทานนฺติ ‘‘อิมํ เตมาสํ น กเถตพฺพ’’นฺติ เอวรูปํ วตสมาทานํ น กาตพฺพํ; อธมฺมกติกา เหสา. อญฺญมญฺญานุโลมตาติ อญฺญมญฺญํ วตฺตุํ อนุโลมภาโว. ‘‘วทนฺตุ มํ อายสฺมนฺโต’’ติ หิ วทนฺตํ สกฺกา โหติ กิญฺจิ วตฺตุํ; น อิตรํ. อาปตฺติวุฏฺฐานตา วินยปุเรกฺขารตาติ อาปตฺตีหิ วุฏฺฐานภาโว วินยํ ปุรโต กตฺวา จรณภาโว. ‘‘วทนฺตุ มํ อายสฺมนฺโต’’ติ หิ เอวํ วทนฺโต อาปตฺตีหิ วุฏฺฐหิสฺสติ, วินยญฺจ ปุรกฺขตฺวา วิหริสฺสตีติ วุจฺจติ. २०९. पवारणाखन्धकामध्ये – 'नेव आलपेय्याम न सल्लपेय्याम' (आम्ही एकमेकांशी बोलणार नाही, संभाषण करणार नाही) यामध्ये 'आलाप' म्हणजे पहिले बोलणे आणि 'सल्लाप' म्हणजे नंतरचे बोलणे होय. 'हत्थविलङ्घकेन' म्हणजे हात उंचावून (हातवारे करून). 'पसुसंवासं' म्हणजे पशूंप्रमाणे एकत्र राहणे. कारण पशू देखील स्वतःला झालेले सुख-दुःख एकमेकांना सांगू शकत नाहीत आणि एकमेकांशी आदराचे संभाषण (प्रतिसंथार) करू शकत नाहीत; त्याचप्रमाणे या भिक्खूंनीही केले नाही. म्हणून त्यांच्या एकत्र राहण्याला 'पसुसंवास' (पशूंसारखा सहवास) असे म्हटले जाते. हाच नियम सर्वत्र लागू होतो. 'न भिक्खवे मूगब्बतं तित्थियसमादानं' म्हणजे 'भिक्खूंनो, तीर्थिक (अन्यधर्मीय) स्वीकारतात तसे मुक्या प्राण्यासारखे व्रत (मूकव्रत) धारण करू नये.' 'या तीन महिन्यांत बोलायचे नाही' अशा प्रकारचे व्रत धारण करू नये; कारण हा अधार्मिक करार आहे. 'अञ्ञमञ्ञानुलमता' म्हणजे एकमेकांशी बोलण्यास अनुकूल असणे. कारण 'आयुष्मंतांनो, मला (माझ्या दोषांबद्दल) सांगा' असे म्हणणाऱ्या व्यक्तीला काही सांगणे शक्य होते; इतरांना नाही. 'आपत्तिवुट्ठानता विनयपुरेक्खारता' म्हणजे आपत्तींमधून (चुकांमधून) मुक्त होणे आणि विनयाला पुढे ठेवून आचरण करणे. कारण 'आयुष्मंतांनो, मला सांगा' असे म्हणणारा भिक्खू आपत्तींमधून मुक्त होईल आणि विनयाला अग्रभागी ठेवून विहार करेल, असे म्हटले जाते. ๒๑๐. สุณาตุ เม ภนฺเต สงฺโฆ อชฺช ปวารณา, ยทิ สงฺฆสฺส ปตฺตกลฺลํ, สงฺโฆ ปวาเรยฺยาติ อยํ สพฺพสงฺคาหิกา นาม ญตฺติ; เอวญฺหิ วุตฺเต เตวาจิกํ ทฺเววาจิกํ เอกวาจิกญฺจ ปวาเรตุํ วฏฺฏติ. สมานวสฺสิกํ น วฏฺฏติ. ‘‘เตวาจิกํ ปวาเรยฺยา’’ติ วุตฺเต ปน เตวาจิกเมว วฏฺฏติ, อญฺญํ น วฏฺฏติ. ‘‘ทฺเววาจิกํ ปวาเรยฺยา’’ติ วุตฺเต ทฺเววาจิกญฺจ เตวาจิกญฺจ วฏฺฏติ, เอกวาจิกญฺจ สมานวสฺสิกญฺจ น วฏฺฏติ. ‘‘เอกวาจิกํ ปวาเรยฺยา’’ติ วุตฺเต ปน เอกวาจิก-ทฺเววาจิก-เตวาจิกานิ วฏฺฏนฺติ, สมานวสฺสิกเมว น วฏฺฏติ. ‘‘สมานวสฺสิก’’นฺติ วุตฺเต สพฺพํ วฏฺฏติ. २१०. 'भन्ते, संघाने माझे ऐकावे. आज पवारणा आहे. जर संघासाठी योग्य वेळ असेल, तर संघाने पवारणा करावी' – ही 'सब्बसङ्ग्राहिका' (सर्वसमावेशक) नावाची ज्ञप्ति (घोषणा) आहे. कारण असे म्हटले असता, तेवाचिक (तीन वेळा बोलून), द्वेवाचिक (दोन वेळा बोलून) आणि एकवाचिक (एक वेळा बोलून) पवारणा करणे योग्य ठरते; परंतु समानवस्सिक (समान वर्षावास असलेल्यांनी एकत्र) पवारणा करणे योग्य ठरत नाही. जर 'तेवाचिक पवारणा करावी' असे म्हटले, तर केवळ तेवाचिक पवारणा करणेच योग्य ठरते, इतर नाही. जर 'द्वेवाचिक पवारणा करावी' असे म्हटले, तर द्वेवाचिक आणि तेवाचिक पवारणा करणे योग्य ठरते, परंतु एकवाचिक आणि समानवस्सिक पवारणा करणे योग्य ठरत नाही. जर 'एकवाचिक पवारणा करावी' असे म्हटले, तर एकवाचिक, द्वेवाचिक आणि तेवाचिक पवारणा करणे योग्य ठरते, केवळ समानवस्सिक पवारणा करणे योग्य ठरत नाही. आणि जर 'समानवस्सिक' असे म्हटले, तर सर्व प्रकारची पवारणा करणे योग्य ठरते. ๒๑๑. อจฺฉนฺตีติ นิสินฺนาว โหนฺติ, น อุฏฺฐหนฺติ. ตทมนฺตราติ ตทนฺตรา; ตาวตกํ กาลนฺติ อตฺโถ. २११. 'अच्छन्ति' म्हणजे बसलेलेच राहतात, उठत नाहीत. 'तदमन्तरा' म्हणजे त्याच्या लगेचच नंतर; तोपर्यंतचा काळ, असा अर्थ आहे. ปวารณาเภทกถา पवारणाभेदकथा ๒๑๒. จาตุทฺทสิกา [Pg.357] จ ปนฺนรสิกา จาติ เอตฺถ จาตุทฺทสิกาย ‘‘อชฺช ปวารณา จาตุทฺทสี’’ติ เอวํ ปุพฺพกิจฺจํ กาตพฺพํ, ปนฺนรสิกาย ‘‘อชฺช ปวารณา ปนฺนรสี’’ติ. २१२. 'चातुद्दसिका च पन्नरसिका च' (चौदावीची आणि पंधरावीची पवारणा) यामध्ये, चौदावीच्या दिवशी 'आज चौदावीची पवारणा आहे' असे पूर्वकृत्य करावे, आणि पंधरावीच्या दिवशी 'आज पंधरावीची पवारणा आहे' असे पूर्वकृत्य करावे. ปวารณกมฺเมสุ สเจ เอกสฺมึ วิหาเร ปญฺจสุ ภิกฺขูสุ วสนฺเตสุ เอกสฺส ปวารณํ อาหริตฺวา จตฺตาโร คณญตฺตึ ฐเปตฺวา ปวาเรนฺติ, จตูสุ ตีสุ วา วสนฺเตสุ เอกสฺส ปวารณํ อาหริตฺวา ตโย วา ทฺเว วา สงฺฆญตฺตึ ฐเปตฺวา ปวาเรนฺติ, สพฺพเมตํ อธมฺเมนวคฺคํ ปวารณกมฺมํ. पवारणा कर्मांमध्ये, जर एका विहारात पाच भिक्खू राहत असताना, एका भिक्खूची पवारणा आणून चार भिक्खूंनी गणज्ञप्ति मांडून पवारणा केली; किंवा चार अथवा तीन भिक्खू राहत असताना, एकाची पवारणा आणून तीन किंवा दोन भिक्खूंनी संघज्ञप्ति मांडून पवारणा केली, तर हे सर्व अधार्मिक आणि वर्ग (विभक्त) पवारणा कर्म आहे. สเจ ปน สพฺเพปิ ปญฺจ ชนา เอกโต สนฺนิปติตฺวา คณญตฺตึ ฐเปตฺวา ปวาเรนฺติ, จตฺตาโร ตโย วา ทฺเว วา วสนฺตา เอกโต สนฺนิปติตฺวา สงฺฆญตฺตึ ฐเปตฺวา ปวาเรนฺติ, สพฺพเมตํ อธมฺเมนสมคฺคํ ปวารณกมฺมํ. पण जर सर्व पाचही जण एकत्र येऊन, गणज्ञप्ति मांडून पवारणा करतात; किंवा चार, तीन अथवा दोन राहणारे भिक्खू एकत्र येऊन, संघज्ञप्ति मांडून पवारणा करतात, तर हे सर्व अधार्मिक परंतु समग्र (एकत्रित) पवारणा कर्म आहे. สเจ ปญฺจสุ ชเนสุ เอกสฺส ปวารณํ อาหริตฺวา จตฺตาโร สงฺฆญตฺตึ ฐเปตฺวา ปวาเรนฺติ, จตูสุ ตีสุ วา เอกสฺส ปวารณํ อาหริตฺวา ตโย วา ทฺเว วา คณญตฺตึ ฐเปตฺวา ปวาเรนฺติ, สพฺพเมตํ ธมฺเมนวคฺคํ ปวารณกมฺมํ. जर पाच जणांमध्ये एकाची पवारणा आणून चार भिक्खूंनी संघज्ञप्ति मांडून पवारणा केली; किंवा चार अथवा तीन जणांमध्ये एकाची पवारणा आणून तीन किंवा दोन भिक्खूंनी गणज्ञप्ति मांडून पवारणा केली, तर हे सर्व धार्मिक परंतु वर्ग (विभक्त) पवारणा कर्म आहे. สเจ ปน สพฺเพปิ ปญฺจ ชนา เอกโต สนฺนิปติตฺวา สงฺฆญตฺตึ ฐเปตฺวา ปวาเรนฺติ, จตฺตาโร วา ตโย วา เอกโต สนฺนิปติตฺวา คณญตฺตึ ฐเปตฺวา ปวาเรนฺติ, ทฺเว อญฺญมญฺญํ ปวาเรนฺติ, เอกโก วสนฺโต อธิฏฺฐานปวารณํ กโรติ, สพฺพเมตํ ธมฺเมนสมคฺคํ นาม ปวารณกมฺมนฺติ. पण जर सर्व पाचही जण एकत्र येऊन, संघज्ञप्ति मांडून पवारणा करतात; किंवा चार अथवा तीन जण एकत्र येऊन, गणज्ञप्ति मांडून पवारणा करतात; दोन जण एकमेकांसोबत पवारणा करतात; किंवा एकटाच राहणारा भिक्खू अधिष्ठान-पवारणा करतो, तर हे सर्व धार्मिक आणि समग्र नावाचे पवारणा कर्म आहे, असे समजावे. ปวารณาทานานุชานนกถา पवारणादान-अनुज्ञान-कथा ๒๑๓. ทินฺนา โหติ ปวารณาติ เอตฺถ เอวํ ทินฺนาย ปวารณาย ปวารณาหารเกน สงฺฆํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวํ ปวาเรตพฺพํ – ‘‘ติสฺโส ภนฺเต ภิกฺขุ สงฺฆํ ปวาเรติ ทิฏฺเฐน วา สุเตน วา ปริสงฺกาย วา, วทตุ ตํ ภนฺเต สงฺโฆ อนุกมฺปํ อุปาทาย, ปสฺสนฺโต ปฏิกริสฺสติ. ทุติยมฺปิ…เป… ตติยมฺปิ ภนฺเต ติสฺโส ภิกฺขุ สงฺฆํ ปวาเรติ…เป… ปฏิกริสฺสตี’’ติ. สเจ ปน วุฑฺฒตโร โหติ, ‘‘อายสฺมา ภนฺเต ติสฺโส’’ติ วตฺตพฺพํ; เอวญฺหิ เตน ตสฺสตฺถาย ปวาริตํ โหตีติ. २१३. 'दिन्ना होति पवारणा' (पवारणा दिली गेली आहे) यामध्ये, अशा प्रकारे पवारणा दिली असता, पवारणा वाहून आणणाऱ्या भिक्खूने संघाकडे जाऊन याप्रमाणे पवारणा करावी – 'भन्ते, तिस्स भिक्खू संघाकडे पवारणा करतो – पाहिलेल्या, ऐकलेल्या किंवा शंका घेतलेल्या (दोषांविषयी). भन्ते, संघाने अनुकंपा करून त्याला सांगावे, तो दोष पाहून त्याचे निवारण करेल. दुसऱ्यांदाही... तिसऱ्यांदाही, भन्ते, तिस्स भिक्खू संघाकडे पवारणा करतो... निवारण करेल.' पण जर तो ज्येष्ठ असेल, तर 'भन्ते, आयुष्यमान तिस्स' असे म्हणावे; कारण अशा प्रकारे त्याने त्याच्या कल्याणासाठी पवारणा केलेली असते, असे समजावे. ปวารณํ [Pg.358] เทนฺเตน ฉนฺทมฺปิ ทาตุนฺติ เอตฺถ ฉนฺททานํ อุโปสถกฺขนฺธเก วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. อิธาปิ จ ฉนฺททานํ อวเสสกมฺมตฺถาย. ตสฺมา สเจ ปวารณํ เทนฺโต ฉนฺทํ เทติ, วุตฺตนเยน อาหฏาย ปวารณาย เตน จ ภิกฺขุนา สงฺเฆน จ ปวาริตเมว โหติ. อถ ปวารณเมว เทติ, น ฉนฺทํ, ตสฺส จ ปวารณาย อาโรจิตาย สงฺเฆน จ ปวาริเต สพฺเพสํ สุปฺปวาริตํ โหติ, อญฺญํ ปน กมฺมํ กุปฺปติ. สเจ ฉนฺทเมว เทติ น ปวารณํ, สงฺฆสฺส ปวารณา จ เสสกมฺมานิ จ น กุปฺปนฺติ, เตน ปน ภิกฺขุนา อปฺปวาริตํ โหติ. ปวารณทิวเส ปน พหิสีมายํ ปวารณํ อธิฏฺฐหิตฺวา อาคเตนปิ ฉนฺโท ทาตพฺโพ, เตน สงฺฆสฺส ปวารณกมฺมํ น กุปฺปติ. 'पवारणं देन्तेन छन्दम्पि दातुं' (पवारणा देणाऱ्याने छंद देखील द्यावा) यामध्ये, छंद देण्याची पद्धत उपोसथखन्धकामध्ये सांगितलेल्या नियमाप्रमाणेच समजावी. आणि येथेही छंद देणे हे उर्वरित कर्मांच्या उद्देशासाठी असते. म्हणून जर पवारणा देणारा छंद देखील देतो, तर सांगितलेल्या पद्धतीने पवारणा आणली असता, त्या भिक्खूने आणि संघाने पवारणा केलेलीच असते. जर तो केवळ पवारणा देतो, छंद देत नाही, तर त्याची पवारणा जाहीर केली असता व संघाने पवारणा केली असता, सर्वांची पवारणा चांगल्या प्रकारे पार पडते, परंतु इतर कर्म बिघडते. जर तो केवळ छंद देतो, पवारणा देत नाही, तर संघाची पवारणा आणि उर्वरित कर्मे बिघडत नाहीत, परंतु त्या भिक्खूने पवारणा केलेली नसते. पवारणेच्या दिवशी सीमेबाहेर पवारणेचे अधिष्ठान करून आलेल्या भिक्खूने देखील छंद दिला पाहिजे, त्यामुळे संघाचे पवारणा कर्म बिघडत नाही. ๒๑๘. อชฺช เม ปวารณาติ เอตฺถ สเจ จาตุทฺทสิกา โหติ, ‘‘อชฺช เม ปวารณา จาตุทฺทสี’’ติ สเจ ปนฺนรสิกา ‘‘อชฺช เม ปวารณา ปนฺนรสี’’ติ เอวํ อธิฏฺฐาตพฺพํ. २१८. 'अज्ज मे पवारणा' (आज माझी पवारणा आहे) यामध्ये, जर चौदावीची पवारणा असेल, तर 'आज माझी चौदावीची पवारणा आहे' असे, आणि जर पंधरावीची असेल, तर 'आज माझी पंधरावीची पवारणा आहे' असे याप्रमाणे अधिष्ठान करावे. ๒๑๙. ตทหุปวารณาย อาปตฺตินฺติอาทิ วุตฺตนยเมว. २१९. 'तदहुपवारणाय आपत्तिं' इत्यादी वाक्ये आधी सांगितलेल्या नियमाप्रमाणेच आहेत. อนาปตฺติปนฺนรสกาทิกถา अनापत्ति-पन्नरसक-आदि-कथा ๒๒๒. ปุน ปวาเรตพฺพนฺติ ปุน ปุพฺพกิจฺจํ กตฺวา ญตฺตึ ฐเปตฺวา สงฺฆตฺเถรโต ปฏฺฐาย ปวาเรตพฺพํ. เสสํ อุโปสถกฺขนฺธกวณฺณนายํ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. २२२. 'पुन पवारेतब्बं' म्हणजे पुन्हा पूर्वकृत्य करून, ज्ञप्ति मांडून, संघस्थविरापासून (संघातील सर्वात ज्येष्ठ भिक्खूपासून) सुरुवात करून पवारणा करावी. उर्वरित भाग उपोसथखन्धकाच्या वर्णनात सांगितलेल्या नियमाप्रमाणेच समजावा. ๒๒๘. อาคนฺตุเกหิ อาวาสิกานํ อนุวตฺติตพฺพนฺติ ‘‘อชฺช ปวารณา จาตุทฺทสี’’ติ เอตเทว ปุพฺพกิจฺจํ กาตพฺพํ. ปนฺนรสิกวาเรปิ เอเสว นโย. อาวาสิเกหิ นิสฺสีมํ คนฺตฺวา ปวาเรตพฺพนฺติ อสฺสาวสาเน อยํ ปาฬิมุตฺตกวินิจฺฉโย – สเจ ปุริมิกาย ปญฺจ ภิกฺขู วสฺสํ อุปคตา, ปจฺฉิมิกายปิ ปญฺจ, ปุริเมหิ ญตฺตึ ฐเปตฺวา ปวาริเต ปจฺฉิเมหิ เตสํ สนฺติเก ปาริสุทฺธิอุโปสโถ กาตพฺโพ, น เอกสฺมึ อุโปสถคฺเค ทฺเว ญตฺติโย ฐเปตพฺพา. สเจปิ ปจฺฉิมิกาย อุปคตา จตฺตาโร ตโย ทฺเว เอโก วา โหติ, เอเสว นโย. อถ ปุริมิกาย จตฺตาโร ปจฺฉิมิกายปิ จตฺตาโร ตโย ทฺเว เอโก วา เอเสว นโย. อถาปิ ปุริมิกาย ตโย, ปจฺฉิมิกายปิ ตโย ทฺเว วา, เอเสว นโย. อิทญฺเหตฺถ ลกฺขณํ – สเจ ปุริมิกาย อุปคเตหิ ปจฺฉิมิกาย อุปคตา โถกตรา [Pg.359] เจว โหนฺติ สมสมา จ, สงฺฆปวารณาย คณํ ปูเรนฺติ, สงฺฆปวารณาวเสน ญตฺติ ฐเปตพฺพาติ. २२८. आगंतुकांनी (बाहेरून आलेल्या भिक्खूंनी) निवासी भिक्खूंचे अनुकरण करावे की 'आज चतुर्दशीची पवारणा आहे', हेच पूर्वकृत्य करावे. पंचदशीच्या वारीतही (पंधरवड्याच्या दिवशीही) हाच नियम आहे. 'निवासी भिक्खूंनी सीमेबाहेर जाऊन पवारणा करावी' या वाक्याच्या शेवटी हा पाळिमुक्तकविनिच्छय (पाळी ग्रंथाबाहेरील निर्णय) आहे— जर पहिल्या वर्षावासात (पुरिमिका) पाच भिक्खू वर्षावास राहिले असतील, आणि दुसऱ्या वर्षावासातही (पच्छिमिका) पाच भिक्खू राहिले असतील, तर पहिल्या भिक्खूंनी ज्ञप्ति (प्रस्ताव) मांडून पवारणा केल्यानंतर, दुसऱ्या भिक्खूंनी त्यांच्या सन्निध पारिसुद्धि-उपोसाथ करावा. एकाच उपोसथागारात दोन ज्ञप्ति मांडू नयेत. जरी दुसऱ्या वर्षावासात राहिलेले भिक्खू चार, तीन, दोन किंवा एक असतील, तरीही हाच नियम आहे. तसेच जर पहिल्या वर्षावासात चार भिक्खू असतील आणि दुसऱ्या वर्षावासातही चार, तीन, दोन किंवा एक असतील, तरीही हाच नियम आहे. तसेच जर पहिल्या वर्षावासात तीन भिक्खू असतील आणि दुसऱ्या वर्षावासातही तीन किंवा दोन असतील, तरीही हाच नियम आहे. येथे हे लक्षण (नियम) आहे— जर पहिल्या वर्षावासात राहिलेल्या भिक्खूंपेक्षा दुसऱ्या वर्षावासात राहिलेले भिक्खू कमी किंवा समान असतील आणि ते संघपवारणेसाठी गण (संख्या) पूर्ण करत असतील, तर संघपवारणेच्या नियमाने ज्ञप्ति मांडावी. สเจ ปน ปุริมิกาย ตโย, ปจฺฉิมิกาย เอโก โหติ, เตน สทฺธึ เต จตฺตาโร โหนฺติ, จตุนฺนํ สงฺฆญตฺตึ ฐเปตฺวา ปวาเรตุํ น วฏฺฏติ. คณญตฺติยา ปน โส คณปูรโก โหติ, ตสฺมา คณวเสน ญตฺตึ ฐเปตฺวา ปุริเมหิ ปวาเรตพฺพํ. อิตเรน เตสํ สนฺติเก ปาริสุทฺธิอุโปสโถ กาตพฺโพ. สเจ ปุริมิกาย ทฺเว ปจฺฉิมิกาย ทฺเว วา เอโก วา โหติ, เอเสว นโย. สเจ ปุริมิกาย เอโก, ปจฺฉิมิกายปิ เอโก โหติ, เอเกน เอกสฺส สนฺติเก ปวาเรตพฺพํ, เอเกน ปาริสุทฺธิอุโปสโถ กาตพฺโพ. สเจ ปน ปุริมวสฺสูปคเตหิ ปจฺฉิมวสฺสูปคตา เอเกนปิ อธิกตรา โหนฺติ, ปฐมํ ปาติโมกฺขํ อุทฺทิสิตฺวา ปจฺฉา โถกตเรหิ เตสํ สนฺติเก ปวาเรตพฺพํ. पण जर पहिल्या वर्षावासात तीन भिक्खू असतील आणि दुसऱ्या वर्षावासात एक असेल, तर त्याच्यासह ते चार होतात. चार भिक्खूंसाठी संघज्ञप्ति मांडून पवारणा करणे योग्य नाही. परंतु गणज्ञप्तीसाठी तो गणपूरक (संख्या पूर्ण करणारा) होतो. म्हणून गणाच्या नियमाने ज्ञप्ति मांडून पहिल्या भिक्खूंनी पवारणा करावी. दुसऱ्याने (त्या एका भिक्खूने) त्यांच्या सन्निध पारिसुद्धि-उपोसाथ करावा. जर पहिल्या वर्षावासात दोन भिक्खू असतील आणि दुसऱ्या वर्षावासात दोन किंवा एक असेल, तरीही हाच नियम आहे. जर पहिल्या वर्षावासात एक भिक्खू असेल आणि दुसऱ्या वर्षावासातही एक असेल, तर एकाने दुसऱ्याच्या सन्निध पवारणा करावी आणि एकाने पारिसुद्धि-उपोसाथ करावा. पण जर पहिल्या वर्षावासात राहिलेल्या भिक्खूंपेक्षा दुसऱ्या वर्षावासात राहिलेले भिक्खू एकानेही अधिक असतील, तर प्रथम पातिमोक्खाचे वाचन करून, नंतर कमी संख्या असलेल्या पहिल्या भिक्खूंनी त्यांच्या सन्निध पवारणा करावी. กตฺติกจาตุมาสินิยา ปวารณาย ปน สเจ ปฐมํ วสฺสูปคเตหิ มหาปวารณาย ปวาริเตหิ ปจฺฉา อุปคตา อธิกตรา วา สมสมา วา โหนฺติ, ปวารณาญตฺตึ ฐเปตฺวา ปวาเรตพฺพํ. เตหิ ปวาริเต ปจฺฉา อิตเรหิ ปาริสุทฺธิอุโปสโถ กาตพฺโพ. อถ มหาปวารณาย ปวาริตา พหู ภิกฺขู โหนฺติ, ปจฺฉิมวสฺสูปคตา โถกตรา วา เอโก วา, ปาติโมกฺเข อุทฺทิฏฺเฐ ปจฺฉา เตสํ สนฺติเก เตน ปวาเรตพฺพํ. परंतु कार्तिक चातुर्मासाच्या (कार्तिक पौर्णिमेच्या) पवारणेच्या दिवशी, जर पहिल्या वर्षावासात राहिलेल्या आणि महापवारणेत पवारणा केलेल्या भिक्खूंपेक्षा नंतर वर्षावास राहिलेले भिक्खू अधिक किंवा समान असतील, तर पवारणा-ज्ञप्ति मांडून पवारणा करावी. त्यांनी पवारणा केल्यानंतर, नंतर इतरांनी (पहिल्या भिक्खूंनी) पारिसुद्धि-उपोसाथ करावा. जर महापवारणेत पवारणा केलेले भिक्खू पुष्कळ असतील आणि दुसऱ्या वर्षावासात राहिलेले भिक्खू कमी किंवा एक असतील, तर पातिमोक्खाचे वाचन झाल्यावर, नंतर त्याने (त्या दुसऱ्या वर्षावासातील भिक्खूने) त्यांच्या सन्निध पवारणा करावी. हा पाळिमुक्तकविनिच्छय आहे. ๒๓๓. น จ ภิกฺขเว อปฺปวารณาย ปวาเรตพฺพํ, อญฺญตฺร สงฺฆสามคฺคิยาติ เอตฺถ โกสมฺพกสามคฺคีสทิสาว สามคฺคี เวทิตพฺพา. ‘‘อชฺช ปวารณา สามคฺคี’’ติ เอวญฺเจตฺถ ปุพฺพกิจฺจํ กาตพฺพํ. เย ปน กิสฺมิญฺจิเทว อปฺปมตฺตเก ปวารณํ ฐเปตฺวา สมคฺคา โหนฺติ, เตหิ ปวารณายเมว ปวารณา กาตพฺพา. สามคฺคีปวารณํ กโรนฺเตหิ จ ปฐมปวารณํ ฐเปตฺวา ปาฏิปทโต ปฏฺฐาย ยาว กตฺติกจาตุมาสินี ปุณฺณมา, เอตฺถนฺตเร กาตพฺพา, ตโต ปจฺฉา วา ปุเร วา น วฏฺฏติ. २३३. “हे भिक्खूंनो, संघसामग्रीशिवाय (संघाच्या एकतेशिवाय) अपवारणेत (पवारणा नसलेल्या दिवशी) पवारणा करू नये,” येथे कोसाम्बक खंधकात सांगितलेल्या सामग्रीसारखीच सामग्री समजावी. आणि येथे 'आज सामग्री पवारणा आहे' असे पूर्वकृत्य करावे. परंतु जे भिक्खू एखाद्या अगदी लहान कारणावरून पवारणा बाजूला ठेवून एकत्र (एकजूट) होतात, त्यांनी पवारणेच्या दिवशीच पवारणा करावी. आणि सामग्री पवारणा करणाऱ्यांनी पहिली पवारणा सोडून प्रतिपदेपासून (पाडव्यापासून) सुरू करून कार्तिक चातुर्मासाच्या पौर्णिमेपर्यंतच्या काळात ती करावी. त्यापूर्वी किंवा त्यानंतर सामग्री पवारणा करणे योग्य नाही. ทฺเววาจิกาทิปวารณากถา द्विवाचिक इत्यादी पवारणेची कथा ๒๓๔. ทฺเววาจิกํ ปวาเรตุนฺติ เอตฺถ ญตฺตึ ฐเปนฺเตนาปิ ‘‘ยทิ สงฺฆสฺส ปตฺตกลฺลํ สงฺโฆ ทฺเววาจิกํ ปวาเรยฺยา’’ติ วตฺตพฺพํ, เอกวาจิเก ‘‘เอกวาจิกํ [Pg.360] ปวาเรยฺยา’’ติ, สมานวสฺสิเกปิ ‘‘สมานวสฺสิกํ ปวาเรยฺยา’’ติ วตฺตพฺพํ, เอตฺถ จ พหูปิ สมานวสฺสา เอกโต ปวาเรตุํ ลภนฺติ. २३४. ‘द्विवाचिक पवारणा करावी’ यामध्ये ज्ञप्ति मांडणाऱ्यानेही ‘जर संघाला योग्य वाटत असेल, तर संघाने द्विवाचिक पवारणा करावी’ असे म्हणावे. एकवाचिक पवारणेत ‘एकवाचिक पवारणा करावी’ असे म्हणावे. समानवर्षिक पवारणेतही ‘समानवर्षिक पवारणा करावी’ असे म्हणावे. आणि येथे समान वर्षावास असलेले अनेक भिक्खू एकत्र पवारणा करू शकतात. ปวารณาฐปนกถา पवारणा स्थगित करण्याची (पवारणा-ठपना) कथा ๒๓๖. ภาสิตาย ลปิตาย อปริโยสิตายาติ เอตฺถ สพฺพสงฺคาหิกญฺจ ปุคฺคลิกญฺจาติ ทุวิธํ ปวารณาฐปนํ. ตตฺถ สพฺพสงฺคาหิเก ‘‘สุณาตุ เม ภนฺเต สงฺโฆ…เป… สงฺโฆ เตวาจิกํ ปวาเร’’ อิติ สุการโต ยาว เรกาโร, ตาว ภาสิตา ลปิตา อปริโยสิตาว โหติ ปวารณา. เอตฺถนฺตเร เอกปเทปิ ฐเปนฺเตน ฐปิตา โหติ ปวารณา. ‘ยฺย’กาเร ปน ปตฺเต ปริโยสิตา โหติ, ตสฺมา ตโต ปฏฺฐาย ฐเปนฺเตน ฐปิตาปิ อฏฺฐปิตา โหติ. ปุคฺคลิกฐปเน ปน – ‘‘สงฺฆํ ภนฺเต ปวาเรมิ…เป… ตติยมฺปิ ภนฺเต สงฺฆํ ปวาเรมิ ทิฏฺเฐน วา…เป… ปสฺสนฺโต ปฏี’’ติ สงฺการโต ยาว อยํ สพฺพปจฺฉิโม ‘ฏิ’กาโร ตาว ภาสิตา ลปิตา อปริโยสิตาว โหติ ปวารณา, เอตฺถนฺตเร เอกปเทปิ ฐเปนฺเตน ฐปิตา โหติ ปวารณา, ‘‘กริสฺสามี’’ติ วุตฺเต ปน ปริโยสิตา โหติ, ตสฺมา ‘‘กริสฺสามี’’ติ เอตสฺมึ ปเท ปตฺเต ฐปิตาปิ อฏฺฐปิตา โหติ. เอส นโย ทฺเววาจิกเอกวาจิกสมานวสฺสิกาสุปิ. เอตาสุปิ หิ ฏิการาวสานํเยว ฐปนเขตฺตนฺติ. २३६. ‘भासिताय लपिताय अपरियोसिताय’ (बोलले गेले, उच्चारले गेले पण पूर्ण झाले नाही) यामध्ये विनिच्छय असा समजावा— सर्वसंग्राहक (सब्बसंगाहिक) आणि पुद्गलिक (पुग्गलिक) असे दोन प्रकारचे पवारणा-ठपन (स्थगित करणे) आहे. त्यात सर्वसंग्राहक पवारणा-ठपनामध्ये ‘सुणातु मे भन्ते संघो...पे... संघो तेवाचिकं पवारे’ यातील ‘सु’ अक्षरापासून ‘रे’ अक्षरापर्यंत पवारणा बोलली गेली, उच्चारली गेली पण अपूर्णच असते. या दरम्यान एका पदावरही स्थगित करणाऱ्याने पवारणा स्थगित केली तर ती स्थगित होते. परंतु ‘य्य’ अक्षरावर पोहोचल्यावर ती पूर्ण होते. म्हणून त्या अक्षरापासून पुढे स्थगित करणाऱ्याने स्थगित केली तरी ती स्थगित न केल्यासारखीच असते. पुद्गलिक पवारणा-ठपनामध्ये तर— ‘संघं भन्ते पवारेमि...पे... ततियम्पि भन्ते संघं पवारेमि दिट्ठेन वा...पे... पस्सन्तो पटी’ यातील ‘सं’ अक्षरापासून शेवटच्या ‘टि’ अक्षरापर्यंत पवारणा बोलली गेली, उच्चारली गेली पण अपूर्णच असते. या दरम्यान एका पदावरही स्थगित करणाऱ्याने पवारणा स्थगित केली तर ती स्थगित होते. परंतु ‘करिस्सामि’ असे म्हटल्यावर ती पूर्ण होते. म्हणून ‘करिस्सामि’ या पदावर पोहोचल्यावर स्थगित केली तरी ती स्थगित न केल्यासारखीच असते. हाच नियम द्विवाचिक, एकवाचिक आणि समानवर्षिक पवारणांमध्येही आहे. कारण यांमध्येही ‘टि’ अक्षराचा शेवट हाच स्थगित करण्याचा काळ (क्षेत्र) आहे. ๒๓๗. อนุยุญฺชิยมาโนติ ‘‘กิมฺหิ นํ ฐเปสี’’ติ ปรโต วุตฺตนเยน ปุจฺฉิยมาโน. โอมทฺทิตฺวาติ เอตานิ ‘‘อลํ ภิกฺขุ มา ภณฺฑน’’นฺติอาทีนิ วจนานิ วตฺวา, วจโนมทฺทนา หิ อิธ โอมทฺทนาติ อธิปฺเปตา. อนุทฺธํสิตํ ปฏิชานาตีติ ‘‘อมูลเกน ปาราชิเกน อนุทฺธํสิโต อยํ มยา’’ติ เอวํ ปฏิชานาติ. ยถาธมฺมนฺติ สงฺฆาทิเสเสน อนุทฺธํสเน ปาจิตฺติยํ; อิตเรหิ ทุกฺกฏํ. นาเสตฺวาติ ลิงฺคนาสนาย นาเสตฺวา. २३७. ‘अनुयुंजियमानो’ म्हणजे ‘तू ही पवारणा कशासाठी स्थगित केलीस?’ अशा प्रकारे पुढे सांगितलेल्या पद्धतीने विचारले जात असताना. ‘ओमद्दित्वा’ म्हणजे ‘बस कर भिक्खू, भांडू नकोस’ इत्यादी शब्द बोलून; येथे शब्दांनी दाबून टाकणे (वचनोमद्दन) यालाच ‘ओमद्दन’ असे अभिप्रेत आहे. ‘अनुद्धंसितं पटिजानाति’ म्हणजे ‘मी या भिक्खूवर अमूलक (निराधारी) पाराजिकाचा आरोप करून त्याला त्रास दिला आहे’ असे कबूल करणे. ‘यथाधम्मं’ म्हणजे संघादिसेसाने आरोप केल्यास पाचित्तिय होते; इतर आपत्तींनी आरोप केल्यास दुक्कट होते. ‘नासेत्वा’ म्हणजे लिंगनाशनाने (भिक्खू वेषातून) निष्कासित करून. ๒๓๘. สาสฺส ยถาธมฺมํ ปฏิกตาติ เอตฺตกเมว วตฺวา ปวาเรถาติ วตฺตพฺพา, อสุกา นาม อาปตฺตีติ อิทํ ปน น วตฺตพฺพํ, เอตญฺหิ กลหสฺส มุขํ โหติ. २३८. ‘सास्स यथाधम्मं पटिकता’ (त्याची ती आपत्ती धर्मानुसार दुरुस्त केली गेली आहे) एवढेच बोलून ‘पवारणा करा’ असे म्हणावे. परंतु ‘अमुक नावाची आपत्ती आहे’ असे म्हणू नये, कारण हे भांडणाचे कारण बनते. วตฺถุฐปนาทิกถา वस्तू स्थगित करणे (वत्थु-ठपना) इत्यादींची कथा ๒๓๙. อิทํ วตฺถุ ปญฺญายติ น ปุคฺคโลติ เอตฺถ โจรา กิร อรญฺญวิหาเร โปกฺขรณิโต มจฺเฉ คเหตฺวา ปจิตฺวา ขาทิตฺวา อคมํสุ. โส [Pg.361] ตํ วิปฺปการํ ทิสฺวา อาราเม วา กิญฺจิ ธุตฺเตน กตํ วิปฺปการํ ทิสฺวา ‘‘ภิกฺขุสฺส อิมินา กมฺเมน ภวิตพฺพ’’นฺติ สลฺลกฺเขตฺวา เอวมาห. วตฺถุํ ฐเปตฺวา สงฺโฆ ปวาเรยฺยาติ ‘‘ยทา ตํ ปุคฺคลํ ชานิสฺสาม, ตทา นํ โจเทสฺสาม. อิทานิ ปน สงฺโฆ ปวาเรตู’’ติ อยเมตฺถ อตฺโถ. อิทาเนว นํ วเทหีติ สเจ อิมินา วตฺถุนา กญฺจิ ปุคฺคลํ ปริสงฺกสิ, อิทาเนว นํ อปทิสาหีติ อตฺโถ. สเจ อปทิสติ, ตํ ปุคฺคลํ อนุวิชฺชิตฺวา ปวาเรตพฺพํ; โน เจ อปทิสติ, อุปปริกฺขิตฺวา ชานิสฺสามาติ ปวาเรตพฺพํ. २३९. येथे 'ही घटना (वस्तू) समजते, व्यक्ती नाही' याविषयी असे ऐकिवात आहे की, चोरांनी अरण्यविहारात तलावातून मासे पकडले, ते शिजवले, खाल्ले आणि निघून गेले. त्या (पवारणा स्थगित करणाऱ्या) भिक्खूने तो विस्कळीतपणा पाहून किंवा आरामात एखाद्या धूर्ताने केलेले ते कृत्य पाहून, 'हे कृत्य भिक्खूचेच असले पाहिजे' असा विचार करून असे म्हटले. 'घटनेला स्थगित ठेवून संघाने पवारणा करावी' याचा अर्थ असा आहे की, 'जेव्हा आपण त्या व्यक्तीला ओळखू, तेव्हा आपण त्याला चोदना (दोषारोप) करू. परंतु आता संघाने पवारणा करावी.' 'आत्ताच त्याला सांगावे' याचा अर्थ असा आहे की, जर तुम्हाला या घटनेवरून एखाद्या व्यक्तीवर शंका असेल, तर आत्ताच त्याचे नाव सांगावे (निर्देश करावा). जर तो निर्देश करत असेल, तर त्या व्यक्तीची चौकशी करून पवारणा करावी; जर तो निर्देश करत नसेल, तर 'तपासून पाहू आणि नंतर जाणून घेऊ' असे म्हणून पवारणा करावी. อยํ ปุคฺคโล ปญฺญายติ น วตฺถูติ เอตฺถ เอโก ภิกฺขุ มาลาคนฺธวิเลปเนหิ เจติยํ วา ปูเชสิ, อริฏฺฐํ วา ปิวิ, ตสฺส ตทนุรูโป สรีรคนฺโธ อโหสิ; โส ตํ คนฺธํ สนฺธาย ‘‘อิมสฺส ภิกฺขุโน เอวรูโป สรีรคนฺโธ’’ติ วตฺถุํ ปกาเสนฺโต เอวมาห. ปุคฺคลํ ฐเปตฺวา สงฺโฆ ปวาเรยฺยาติ เอตํ ปุคฺคลํ ฐเปตฺวา สงฺโฆ ปวาเรตุ. อิทาเนว นํ วเทหีติ ยํ ตฺวํ ปุคฺคลํ ฐเปสิ, ตสฺส ปุคฺคลสฺส อิทาเนว โทสํ วท. สเจ อยมสฺส โทโสติ วทติ, ตํ ปุคฺคลํ โสเธตฺวา ปวาเรตพฺพํ. อถ นาหํ ชานามีติ วทติ, อุปปริกฺขิตฺวา ชานิสฺสามาติ ปวาเรตพฺพํ. येथे 'ही व्यक्ती समजते, घटना (वस्तू) नाही' याविषयी असा निर्णय समजावा: एका भिक्खूने पुष्प, गंध आणि विलेपनाने चेतियाची (स्तूपाची) पूजा केली किंवा अरिष्ट (औषधी काढा) प्यायले, त्यामुळे त्यांच्या शरीराला तसाच सुवास आला. त्या (पवारणा स्थगित करणाऱ्या) भिक्खूने त्या सुवासाचा संदर्भ घेऊन, 'या भिक्खूच्या शरीराला असा सुवास येत आहे' असे म्हणून ती घटना उघड करत असे म्हटले. 'व्यक्तीला स्थगित ठेवून संघाने पवारणा करावी' म्हणजे त्या व्यक्तीला वगळून संघाने पवारणा करावी. 'आत्ताच त्याला सांगावे' म्हणजे तुम्ही ज्या व्यक्तीला स्थगित केले आहे, त्या व्यक्तीचा दोष आत्ताच सांगावा. जर तो 'हा त्याचा दोष आहे' असे सांगत असेल, तर त्या व्यक्तीचे शुद्धीकरण करून पवारणा करावी. आणि जर तो 'मी जाणत नाही' असे म्हणत असेल, तर 'तपासून पाहू आणि नंतर जाणून घेऊ' असे म्हणून पवारणा करावी. อิทํ วตฺถุ จ ปุคฺคโล จ ปญฺญายตีติ ปุริมนเยเนว โจเรหิ มจฺเฉ คเหตฺวา ปจิตฺวา ปริภุตฺตฏฺฐานญฺจ คนฺธาทีหิ นหานฏฺฐานญฺจ ทิสฺวา ‘‘ปพฺพชิตสฺส กมฺม’’นฺติ มญฺญมาโน โส เอวมาห. อิทาเนว นํ วเทหีติ อิทาเนว เตน วตฺถุนา ปริสงฺกิตํ ปุคฺคลํ วเทหิ; อิทํ ปน อุภยมฺปิ ทิสฺวา ทิฏฺฐกาลโต ปฏฺฐาย วินิจฺฉินิตฺวาว ปวาเรตพฺพํ. กลฺลํ วจนายาติ กลฺลํ โจทนาย; โจเทตุํ วฏฺฏตีติ อตฺโถ. กสฺมา? ปวารณโต ปุพฺเพ อวินิจฺฉิตตฺตา ปจฺฉา จ ทิสฺวา โจทิตตฺตาติ. อุกฺโกฏนกํ ปาจิตฺติยนฺติ อิทญฺหิ อุภยํ ปุพฺเพ ปวารณาย ทิสฺวา วินิจฺฉินิตฺวาว ภิกฺขู ปวาเรนฺติ, ตสฺมา ปุน ตํ อุกฺโกเฏนฺตสฺส อาปตฺติ. 'ही घटना आणि व्यक्ती दोन्ही समजतात' याविषयी पूर्वीच्याच पद्धतीने समजावे. चोरांनी मासे पकडून, शिजवून खाल्लेली जागा आणि गंध इत्यादी लावून स्नान केलेली जागा पाहून, 'हे एखाद्या प्रव्रजिताचे (भिक्खूचे) कृत्य आहे' असे मानून त्याने असे म्हटले. 'आत्ताच त्याला सांगावे' म्हणजे आत्ताच त्या घटनेवरून शंका घेतलेल्या व्यक्तीचे नाव सांगावे. परंतु हे दोन्ही पाहून, ते दिसल्याच्या वेळेपासून निर्णय करूनच पवारणा करावी. 'बोलण्यास योग्य' म्हणजे चोदना (दोषारोप) करण्यास योग्य; चोदना करणे योग्य आहे असा अर्थ आहे. का? कारण पवारणेपूर्वी निर्णय न झाल्यामुळे आणि नंतर पाहून चोदना केल्यामुळे. 'उक्कोटनक पाचित्तिय' म्हणजे, कारण भिक्खू पवारणेपूर्वी या दोन्ही गोष्टी पाहून आणि निर्णय करूनच पवारणा करतात, म्हणून पुन्हा तो निर्णय फिरवणाऱ्याला (उक्कोटन करणाऱ्याला) आपत्ती (दोष) प्राप्त होते. ภณฺฑนการกวตฺถุกถา भांडण करणाऱ्या (भिक्खूंच्या) घटनेची कथा (भण्डनकारकवत्थुकथा). ๒๔๐. ทฺเว ตโย อุโปสเถ จาตุทฺทสิเก กาตุนฺติ เอตฺถ จตุตฺถปญฺจมา ทฺเว, ตติโย ปน ปกติยาปิ จตุทฺทสิโกเยวาติ. ตสฺมา [Pg.362] ตติยจตุตฺถา วา ตติยจตุตฺถปญฺจมา วา ทฺเว ตโย จาตุทฺทสิกา กาตพฺพา. อถ จตุตฺเถ กเต สุณนฺติ, ปญฺจโม จาตุทฺทสิโก กาตพฺโพ. เอวมฺปิ ทฺเว จาตุทฺทสิกา โหนฺติ. เอวํ กโรนฺตา ภณฺฑนการกานํ เตรเส วา จาตุทฺทเส วา อิเม ปนฺนรสีปวารณํ ปวาเรสฺสนฺติ. เอวํ ปวาเรนฺเตหิ จ พหิสีมาย สามเณเร ฐเปตฺวา ‘‘เต อาคจฺฉนฺตี’’ติ สุตฺวา ลหุํ ลหุํ สนฺนิปติตฺวา ปวาเรตพฺพํ. เอตมตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘เต เจ ภิกฺขเว…เป… ตถา กโรนฺตู’’ติ วุตฺตํ. २४०. येथे 'दोन किंवा तीन चातुर्दशी उपोसथ करावेत' याविषयी असा निर्णय समजावा: चौथे आणि पाचवे हे दोन, तर तिसरा उपोसथ हा स्वाभाविकपणेच चातुर्दशीचाच असतो. त्यामुळे तिसरा व चौथा, किंवा तिसरा, चौथा व पाचवा असे दोन किंवा तीन चातुर्दशी उपोसथ करावेत. जर चौथा उपोसथ केल्यावर ते ऐकतात, तर पाचवा चातुर्दशी उपोसथ करावा. अशा प्रकारे देखील दोन चातुर्दशी उपोसथ होतात. असे केल्याने, भांडण करणाऱ्या भिक्खूंच्या त्रयोदशी किंवा चतुर्दशीच्या दिवशी, हे भिक्खू पौर्णिमेची पवारणा करतील. आणि अशा प्रकारे पवारणा करताना, सीमेच्या बाहेर सामणेरांना ठेवून, 'ते येत आहेत' असे ऐकल्यावर घाईघाईने एकत्र येऊन पवारणा करावी. हाच अर्थ दर्शवण्यासाठी 'जर ते, भिक्खूंनो... पे... तसेच करावे' असे म्हटले आहे. อสํวิหิตาติ สํวิทหนรหิตา อาคมนชานนตฺถาย อกตสํวิทหิตา; อวิญฺญาตาว หุตฺวาติ อตฺโถ. เตสํ วิกฺขิตฺวาติ ‘‘กิลนฺตตฺถ มุหุตฺตํ วิสฺสมถา’’ติอาทินา นเยน สมฺโมหํ กตฺวาติ อตฺโถ. โน เจ ลเภถาติ โน เจ พหิสีมํ คนฺตุํ ลเภยฺยุํ; ภณฺฑนการกานํ สามเณเรหิ จ ทหรภิกฺขูหิ จ นิรนฺตรํ อนุพทฺธาว โหนฺติ. อาคเม ชุณฺเหติ ยํ สนฺธาย อาคเม ชุณฺเห ปวาเรยฺยามาติ ญตฺตึ ฐเปสุํ, ตสฺมึ อาคเม ชุณฺเห โกมุทิยา จาตุมาสินิยา อกามา ปวาเรตพฺพํ, อวสฺสํ ปวาเรตพฺพํ, น หิ ตํ อติกฺกมิตฺวา ปวาเรตุํ ลพฺภติ. เตหิ เจ ภิกฺขเว ภิกฺขูหิ ปวาริยมาเนติ เอวํ จาตุมาสินิยา ปวาริยมาเน. 'असंविहिता' म्हणजे व्यवस्था न केलेले, त्यांच्या येण्याची माहिती मिळवण्यासाठी कोणतीही व्यवस्था न केलेले; म्हणजेच अज्ञात राहून असा अर्थ आहे. 'त्यांना विचलित करून' म्हणजे 'तुम्ही थकले आहात, क्षणभर विश्रांती घ्या' इत्यादी प्रकारे संभ्रम निर्माण करून असा अर्थ आहे. 'जर त्यांना मिळाले नाही' म्हणजे जर त्यांना सीमेबाहेर जाण्याची संधी मिळाली नाही; कारण भांडण करणाऱ्या भिक्खूंचे सामणेर आणि तरुण भिक्खू सतत त्यांच्या पाळतीवर असतात. 'पुढील चांदण्या रात्रीत' म्हणजे ज्याचा संदर्भ घेऊन 'पुढील चांदण्या रात्रीत पवारणा करू' अशी ज्ञप्ति (घोषणा) मांडली होती, त्या पुढील चांदण्या रात्रीत म्हणजेच कार्तिक पौर्णिमेला (कोमुदी चातुमासिनीला) अनिच्छेने का होईना, पण अनिवार्यपणे पवारणा करावीच लागते; कारण ती ओलांडून पवारणा करण्याची परवानगी नसते. 'जर त्या भिक्खूंकडून, भिक्खूंनो, पवारणा केली जात असेल तर' म्हणजे अशा प्रकारे चातुमासिनीला पवारणा केली जात असताना. ปวารณาสงฺคหกถา पवारणा-संग्रहाची कथा (पवारणासंग्रहकथा). ๒๔๑. อญฺญตโร ผาสุวิหาโรติ ตรุณสมโถ วา ตรุณวิปสฺสนา วา. ปริพาหิรา ภวิสฺสามาติ อนิพทฺธรตฺติฏฺฐานทิวาฏฺฐานาทิภาเวน ภาวนานุโยคํ สมฺปาเทตุํ อสกฺโกนฺตา พาหิรา ภวิสฺสาม. สพฺเพเหว เอกชฺฌํ สนฺนิปติตพฺพนฺติ อิมินา ฉนฺททานํ ปฏิกฺขิปติ. ภินฺนสฺส หิ สงฺฆสฺส สมคฺคกรณกาเล ติณวตฺถารกสมเถ อิมสฺมิญฺจ ปวารณาสงฺคเหติ อิเมสุ ตีสุ ฐาเนสุ ฉนฺทํ ทาตุํ น วฏฺฏติ. ปวารณาสงฺคโห นามายํ วิสฺสฏฺฐกมฺมฏฺฐานานํ ถามคตสมถวิปสฺสนานํ โสตาปนฺนาทีนญฺจ น ทาตพฺโพ. ตรุณสมถวิปสฺสนาลาภิโน ปน สพฺเพ วา โหนฺตุ, อุปฑฺฒา วา, เอกปุคฺคโล วา เอกสฺสปิ วเสน ทาตพฺโพเยว. ทินฺเน ปวารณาสงฺคเห [Pg.363] อนฺโตวสฺเส ปริหาโรว โหติ, อาคนฺตุกา เตสํ เสนาสนํ คเหตุํ น ลภนฺติ. เตหิปิ ฉินฺนวสฺเสหิ น ภวิตพฺพํ, ปวาเรตฺวา ปน อนฺตราปิ จาริกํ ปกฺกมิตุํ ลภนฺตีติ ทสฺสนตฺถํ ‘‘เตหิ เจ ภิกฺขเว’’ติอาทิมาห. เสสํ สพฺพตฺถ อุตฺตานเมวาติ. २४१. 'दुसरा एखादा सुखावह विहार' म्हणजे प्राथमिक शमथ (समथ) किंवा प्राथमिक विपश्यना (विपस्सना). 'आम्ही बाहेरचे होऊ' म्हणजे रात्रीचे स्थान, दिवसाचे स्थान इत्यादी निश्चित नसल्यामुळे भावनेचा अभ्यास (भावनानुयोग) पूर्ण करण्यास असमर्थ ठरून आम्ही बाह्य होऊ. 'सर्वांनी मिळून एकाच ठिकाणी एकत्र यावे' याद्वारे छंदाचे दान (संमती देणे) नाकारले आहे. कारण दुभंगलेल्या संघाला एकत्र आणताना, तिणवत्थारक समथाच्या वेळी आणि या पवारणा-संग्रहाच्या वेळी, या तीन प्रसंगी छंद (संमती) देणे योग्य नाही. हा 'पवारणा-संग्रह' ज्यांनी कम्मट्ठानाचा (कर्मस्थानाचा) त्याग केला आहे, ज्यांची शमथ व विपश्यना दृढ झाली आहे आणि जे सोतापन्न (श्रोतआपन्न) इत्यादी आहेत, त्यांना दिला जाऊ नये. परंतु प्राथमिक शमथ व विपश्यना प्राप्त करणारे सर्व असोत, अर्धे असोत किंवा एकच व्यक्ती असो, एकाच्याही निमित्ताने तो दिलाच पाहिजे. पवारणा-संग्रह दिला असता, वर्षावासाच्या आत तो एका संरक्षणासारखा (परिहारासारखा) होतो; आगंतुक भिक्खूंना त्यांचे शयनासन (सेनासन) घेण्याचा अधिकार मिळत नाही. त्यांनी देखील खंडित वर्षावास (छिन्नवस्स) असणारे होऊ नये. परंतु पवारणा करून मध्यंतरीच्या काळात देखील ते चारिकेसाठी (प्रवासासाठी) निघून जाऊ शकतात, हे दर्शवण्यासाठी 'जर ते, भिक्खूंनो' इत्यादी म्हटले आहे. उर्वरित सर्व ठिकाणी उरलेला भाग स्पष्टच आहे. ปวารณากฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. पवारणा-स्कंधकाची वर्णना (टीका) समाप्त झाली. ๕. จมฺมกฺขนฺธกํ ५. चम्मस्कंधक (चर्मस्कंधक). โสณโกฬิวิสวตฺถุกถา सोण कोळिविस याच्या घटनेची कथा (सोणकोळिविसवत्थुकथा). ๒๔๒. จมฺมกฺขนฺธเก [Pg.364] – อิสฺสริยาธิปจฺจนฺติ อิสฺสรภาเวน จ อธิปติภาเวน จ สมนฺนาคตํ. รชฺชนฺติ ราชภาวํ, รญฺญา กตฺตพฺพกิจฺจํ วา. โสโณ นาม โกฬิวิโสติ เอตฺถ โสโณติ ตสฺส นามํ; โกฬิวิโสติ โคตฺตํ. ปาทตเลสุ โลมานีติ รตฺเตสุ ปาทตเลสุ สุขุมานิ อญฺชนวณฺณานิ กมฺมจิตฺตีกตานิ โลมานิ ชาตานิ โหนฺติ. โส กิร ปุพฺเพ อสีติสหสฺสานํ ปุริสานํ เชฏฺฐปุริโส หุตฺวา เตหิ สทฺธึ ปจฺเจกพุทฺธสฺส วสนฏฺฐาเน ปณฺณสาลํ กตฺวา อตฺตโน สสฺสิริกํ อุณฺณปาวารกํ ปจฺเจกพุทฺธสฺส ปาเทหิ อกฺกมนฏฺฐาเน ปาทปุญฺฉนิกํ กตฺวา ฐเปสิ. เตมาสํ ปน สพฺเพว ปจฺเจกพุทฺธํ อุปฏฺฐหึสุ. อยํ ตสฺส จ เตสญฺจ อสีติยา คามิกสหสฺสานํ ปุพฺพโยโค. २४२. चम्मस्कंधकामध्ये – 'इस्स्रियाधिपच्चं' म्हणजे ऐश्वर्यभाव (ईश्वरभाव) आणि अधिपतीभाव यांनी युक्त असणे. 'रज्जं' म्हणजे राजभाव किंवा राजाने करावयाचे कर्तव्य. 'सोण नावाचा कोळिविस' येथे 'सोण' हे त्यांचे नाव आहे आणि 'कोळिविस' हे त्यांचे गोत्र आहे. 'पावलांच्या तळव्यांवर केस' म्हणजे त्यांच्या लाल रंगाच्या पावलांच्या तळव्यांवर काजळाच्या रंगाचे, सुकुमार आणि कर्माच्या प्रभावाने चित्रविचित्र झालेले केस उगवले होते. असे ऐकिवात आहे की, ते पूर्वी ऐंशी हजार पुरुषांचे प्रमुख (जेष्ठ पुरुष) होते. त्यांनी त्यांच्यासह प्रत्येकबुद्धाच्या राहण्याच्या ठिकाणी पर्णशाळा (पर्णकुटी) बांधली आणि स्वतःचे सुंदर लोकरीचे पांघरूण (उण्णपावारक) प्रत्येकबुद्धाच्या पाऊल ठेवण्याच्या ठिकाणी पायपुसणे म्हणून ठेवले. आणि तीन महिने त्या सर्वांनी प्रत्येकबुद्धाची सेवा (उपस्थान) केली. हा त्यांचा आणि त्या ऐंशी हजार ग्रामप्रमुखांचा पूर्वयोग (पूर्वपुण्यकर्म) होता. อสีติคามิกสหสฺสานีติ เตสุ คาเมสุ วสนฺตานํ กุลปุตฺตานํ อสีติสหสฺสานิ. เกนจิเทว กรณีเยนาติ เกนจิ กรณีเยน วิย; น ปนสฺส กิญฺจิ กรณียํ อตฺถิ อญฺญตฺร ตสฺส ทสฺสนา. ราชา กิร ตานิปิ อสีติกุลปุตฺตสหสฺสานิ สนฺนิปาตาเปนฺโต ‘‘เอวํ อปริสงฺกนฺโต โสโณ อาคมิสฺสตี’’ติ สนฺนิปาตาเปสิ. ทิฏฺฐธมฺมิเก อตฺเถติ ‘‘กสิวณิชฺชาทีนิ ธมฺเมน กตฺตพฺพานิ, มาตาปิตโร ธมฺเมน โปสิตพฺพา’’ติ เอวมาทินา นเยน อิธโลกหิเต อตฺเถ อนุสาสิตฺวา. โส โน ภควาติ โส อมฺหากํ ภควา ตุมฺเห สมฺปรายิเก อตฺเถ อนุสาสิสฺสตีติ อตฺโถ. "असीतिगामिकसहस्सानी" म्हणजे त्या गावांमध्ये राहणाऱ्या कुलपुत्रांचे ऐंशी हजार. "केनचिदेव करणीयेन" म्हणजे जणू काही एखाद्या कामासाठी; परंतु त्यांना (भगवंतांच्या) दर्शनाशिवाय दुसरे कोणतेही काम नव्हते. राजाने खरोखरच त्या ऐंशी हजार कुलपुत्रांना एकत्र बोलावताना असा विचार करून एकत्र बोलावले की, "अशा प्रकारे सोण शंकेशिवाय येईल." "दिट्ठधम्मिके अत्थे" म्हणजे "शेती, व्यापार इत्यादी गोष्टी धर्माने (न्यायाने) कराव्यात, माता-पित्यांचे पालनपोषण धर्माने करावे" इत्यादी पद्धतीने या लोकातील हिताच्या गोष्टींचा उपदेश करून. "सो नो भगवा" म्हणजे ते आमचे भगवान तुम्हाला परलोकातील हिताचा उपदेश करतील, असा अर्थ आहे. ภควนฺตํ ปฏิเวเทมีติ ภควนฺตํ ชานาเปมิ. ปาฏิกาย นิมุชฺชิตฺวาติ โสปานสฺส เหฏฺฐา อฑฺฒจนฺทปาสาเณ นิมุชฺชิตฺวา. ยสฺส ทานิ ภนฺเต ภควา กาลํ มญฺญตีติ ยสฺส เตสํ หิตกิริยตฺถสฺส ภควา กาลํ ชานาติ. วิหารปจฺฉายายนฺติ วิหารปจฺจนฺเต ฉายายํ. สมนฺนาหรนฺตีติ ปสาทวเสน ปุนปฺปุนํ มนสิ กโรนฺติ. ภิยฺโยโสมตฺตายาติ ภิยฺโยโสมตฺตาย ปุน วิสิฏฺฐตรํ ทสฺเสหีติ อตฺโถ. อนฺตรธายตีติ อทสฺสนํ โหติ. "भगवन्तं पटिवेदेमि" म्हणजे भगवंतांना अवगत करतो (माहिती देतो). "पाटिकाय निमुज्जित्वा" म्हणजे पायऱ्यांच्या खालील अर्धचंद्रकृती दगडावर (चंद्रशिलेवर) अदृश्य होऊन. "यस्स दानि भन्ते भगवा कालं मञ्ञति" म्हणजे ज्या हितकारक कार्यासाठी भगवान योग्य वेळ जाणतात. "विहारपच्छायायं" म्हणजे विहाराच्या शेवटी असलेल्या छायेत (सावलीत). "समन्नाहरन्ति" म्हणजे श्रद्धेमुळे वारंवार मनात आणतात. "भिय्योसोमत्ताय" म्हणजे आणखी उत्कृष्ट प्रकारे दाखवावे, असा अर्थ आहे. "अन्तरधायति" म्हणजे अदृश्य होते. โสณสฺส ปพฺพชฺชากถา सोणाची प्रव्रज्याकथा. ๒๔๓. โลหิเตน [Pg.365] ผุโฏ โหตีติ โลหิเตน มกฺขิโต โหติ. ควาฆาตนนฺติ ยตฺถ คาโว หญฺญนฺติ, ตาทิโสติ อตฺโถ. กุสโล นาม วีณาย วาทนกุสโล. วีณาย ตนฺติสฺสเรติ วีณาย ตนฺติยา สเร. อจฺจายตาติ อติอายตา ขรมุจฺฉิตา. สรวตีติ สรสมฺปนฺนา. กมฺมญฺญาติ กมฺมกฺขมา. อติสิถิลาติ มนฺทมุจฺฉนา. สเม คุเณ ปติฏฺฐิตาติ มชฺฌิเม สเร ฐเปตฺวา มุจฺฉิตา. วีริยสมตํ อธิฏฺฐหาติ วีริยสมฺปยุตฺตสมตํ อธิฏฺฐาหิ, วีริยํ สมเถน โยเชหีติ อตฺโถ. อินฺทฺริยานญฺจ สมตํ ปฏิวิชฺฌาติ สทฺธาทีนํ อินฺทฺริยานํ สมตํ สมภาวํ. ตตฺถ สทฺธํ ปญฺญาย, ปญฺญญฺจ สทฺธาย, วีริยํ สมาธินา, สมาธิญฺจ วีริเยน โยชยมาโน อินฺทฺริยานํ สมตํ ปฏิวิชฺฌ. ตตฺถ จ นิมิตฺตํ คณฺหาหีติ ตสฺมึ สมเถ สติ, เยน อาทาเส มุขพิมฺเพเนว นิมิตฺเตน อุปฺปชฺชิตพฺพํ, ตํ สมถนิมิตฺตํ วิปสฺสนานิมิตฺตํ มคฺคนิมิตฺตํ ผลนิมิตฺตญฺจ คณฺหาหิ, นิพฺพตฺเตหีติ อตฺโถ. २४३. "लोहितेन फुटो होति" म्हणजे रक्ताने माखलेला असतो. "गवाघातनं" म्हणजे जेथे गाई मारल्या जातात, तशी जागा असा अर्थ आहे. "कुसलो" म्हणजे विणा वाजवण्यात कुशल. "विणाय तन्तिस्सरे" म्हणजे विणेच्या तारेच्या स्वरात. "अच्चायता" म्हणजे अतिशय ताणलेली, कर्कश वाजणारी. "सरवती" म्हणजे सुस्वर (स्वराने समृद्ध). "कम्मञ्ञा" म्हणजे वाजवण्यास योग्य (कार्यक्षम). "अतिसिथिला" म्हणजे अतिशय सैल, मंद वाजणारी. "समे गुणे पतिट्ठिता" म्हणजे मध्यम स्वरात ठेवून वाजवलेली. "वीरियसमतं अधिट्ठहा" म्हणजे वीर्याशी (ऊर्जेशी) युक्त असलेल्या समतेची (शमथाची) स्थापना कर, वीर्याला शमथाशी जोड, असा अर्थ आहे. "इन्द्रियानञ्च समतं पटिविज्झा" म्हणजे श्रद्धा इत्यादी इंद्रियांची समता, समभाव. त्यामध्ये श्रद्धेला प्रज्ञेशी आणि प्रज्ञेला श्रद्धेशी, वीर्याला समाधीशी आणि समाधीला वीर्याशी जोडत इंद्रियांच्या समतेचा वेध घे (ती जाण). "तत्थ च निमित्तं गण्हाहि" म्हणजे त्या शमथामध्ये, जसे आरशात चेहऱ्याचे प्रतिबिंब निर्माण होते, तसे ज्या निमित्ताने ते उत्पन्न व्हावे, ते शमथनिमित्त, विपश्यनानिमित्त, मार्गनिमित्त आणि फलनिमित्त ग्रहण कर, म्हणजेच ते उत्पन्न कर, असा अर्थ आहे. ๒๔๔. อญฺญํ พฺยากเรยฺยนฺติ อรหา อหนฺติ ชานาเปยฺยํ. ฉ ฐานานีติ ฉ การณานิ. อธิมุตฺโต โหตีติ ปฏิวิชฺฌิตฺวา ปจฺจกฺขํ กตฺวา ฐิโต โหติ. เนกฺขมฺมาธิมุตฺโตติอาทิ สพฺพํ อรหตฺตวเสน วุตฺตํ. อรหตฺตญฺหิ สพฺพกิเลเสหิ นิกฺขนฺตตฺตา เนกฺขมฺมํ, เตเหว ปวิวิตฺตตฺตา ปวิเวโก, พฺยาปชฺชาภาวโต อพฺยาปชฺชํ, อุปาทานสฺส ขยนฺเต อุปฺปนฺนตฺตา อุปาทานกฺขโย, ตณฺหากฺขยนฺเต อุปฺปนฺนตฺตา ตณฺหกฺขโย, สมฺโมหาภาวโต อสมฺโมโหติ จ วุจฺจติ. २४४. "अञ्ञं ब्याकरेय्यं" म्हणजे "मी अर्हत आहे" असे जाहीर करीन. "छ ठानानि" म्हणजे सहा कारणे. "अधिमुत्तो होति" म्हणजे वेध घेऊन (पूर्णपणे जाणून) प्रत्यक्ष करून स्थित असतो. "नेक्खम्माधिमुत्तो" इत्यादी सर्व अर्हतत्वाच्या संदर्भात म्हटले आहे. कारण सर्व क्लेशांमधून बाहेर पडल्यामुळे अर्हतत्वाला "नेक्खम्म" (नैष्क्रम्य/निष्क्रमण) म्हटले जाते; त्यांच्यापासूनच विलग झाल्यामुळे "पविवेक" (प्रविवेक/एकांत) म्हटले जाते; व्यापादाच्या (द्वेषाच्या) अभावामुळे "अब्यापज्ज" (अव्यापाद) म्हटले जाते; उपादानाच्या क्षयाच्या शेवटी उत्पन्न झाल्यामुळे "उपादानक्खय" (उपादानक्षय) म्हटले जाते; तृष्णेच्या क्षयाच्या शेवटी उत्पन्न झाल्यामुळे "तण्हक्खय" (तृष्णाक्षय) म्हटले जाते; आणि संमोहाच्या (मोहाच्या) अभावामुळे "असंमोह" असे म्हटले जाते. เกวลํ สทฺธามตฺตกนฺติ ปฏิเวธรหิตํ เกวลํ ปฏิเวธปญฺญาย อสมฺมิสฺสํ สทฺธามตฺตกํ. ปฏิจยนฺติ ปุนปฺปุนํ กรเณน วุฑฺฒึ. วีตราคตฺตาติ มคฺคปฺปฏิเวเธน ราคสฺส วิคตตฺตาเยว เนกฺขมฺมสงฺขาตํ อรหตฺตํ ปฏิวิชฺฌิตฺวา ฐิโต โหติ. ผลสมาปตฺติวิหาเรเนว วิหรติ, ตนฺนินฺนมานโสเยว โหตีติ อตฺโถ. เสสปเทสุปิ เอเสว นโย. "केवलं सद्धामत्तकं" म्हणजे वेधविरहित (साक्षात्काराशिवाय), केवळ वेधप्रज्ञेशी (साक्षात्कार करणाऱ्या प्रज्ञेशी) अमिश्रित अशी केवळ श्रद्धा. "पटिचयन्ति" म्हणजे वारंवार करण्याने वाढवणे. "वीतरागत्ता" म्हणजे मार्गाच्या वेधामुळे (साक्षात्कारामुळे) रागाचा नाश झाल्यामुळेच, "नेक्खम्म" संज्ञक अर्हतत्वाचा वेध घेऊन तो स्थित असतो. तो फलसमापत्तीच्या विहारानेच विहार करतो, त्याचे मन त्याच दिशेने झुकलेले असते, असा अर्थ आहे. उर्वरित पदांमध्येही हाच नियम लागू होतो. ลาภสกฺการสิโลกนฺติ [Pg.366] จตุปจฺจยลาภญฺจ เตสํเยว สุกตภาวญฺจ วณฺณภณนญฺจ. นิกามยมาโนติ อิจฺฉมาโน ปตฺถยมาโน. ปวิเวกาธิมุตฺโตติ วิเวเก อธิมุตฺโต อหนฺติ เอวํ อรหตฺตํ พฺยากโรตีติ อตฺโถ. "लाभसक्कारसिलोकं" म्हणजे चार प्रत्ययांचा (गरजांचा) लाभ, त्यांचीच उत्तमता आणि स्तुती करणे. "निकामयमानो" म्हणजे इच्छा करणारा, आकांक्षा करणारा. "पविवेकाधिमुत्तो" म्हणजे "मी विवेकात (एकांतात) अधिमुक्त (लीन) आहे" अशा प्रकारे तो अर्हतत्व प्रकट करतो, असा अर्थ आहे. สีลพฺพตปรามาสนฺติ สีลญฺจ วตญฺจ ปรามสิตฺวา คหิตคหณมตฺตํ. สารโต ปจฺจาคจฺฉนฺโตติ สารภาเวน ชานนฺโต. อพฺยาปชฺชาธิมุตฺโตติ อพฺยาปชฺชํ อรหตฺตํ พฺยากโรตีติ อตฺโถ. อิมินาว นเยน สพฺพวาเรสุ อตฺโถ เวทิตพฺโพ. "सीलब्बतपरामासं" म्हणजे शील आणि व्रत यांचे चुकीच्या पद्धतीने आकलन करून केवळ धरून ठेवलेले मत. "सारतो पच्चागच्छन्तो" म्हणजे साररूपाने (अमृत रूपाने) जाणणारा. "अब्यापज्जाधिमुत्तो" म्हणजे अव्यापाद अशा अर्हतत्वाला प्रकट करतो, असा अर्थ आहे. याच पद्धतीने सर्व वारांमध्ये (प्रसंगांमध्ये) अर्थ समजून घ्यावा. ภุสาติ พลวนฺโต. เนวสฺส จิตฺตํ ปริยาทิยนฺตีติ เอตสฺส ขีณาสวสฺส จิตฺตํ คเหตฺวา ฐาตุํ น สกฺโกนฺติ. อมิสฺสีกตนฺติ อมิสฺสกตํ. กิเลสาหิ อารมฺมเณน สทฺธึ จิตฺตํ มิสฺสํ กโรนฺติ, เตสํ อภาวา อมิสฺสีกตํ. ฐิตนฺติ ปติฏฺฐิตํ. อาเนญฺชปฺปตฺตนฺติ อจลนปฺปตฺตํ. วยญฺจสฺสานุปสฺสตีติ ตสฺส จิตฺตสฺส อุปฺปาทมฺปิ วยมฺปิ ปสฺสติ. "भुसा" म्हणजे बलवान. "नेवस्स चित्तं परियादियन्ति" म्हणजे या क्षीणासवाच्या (अर्हताच्या) चित्ताला ताब्यात घेऊन राहू शकत नाहीत. "अमिस्सीकतं" म्हणजे अमिश्रित केलेले. कारण क्लेश हे आलंबनासह (विषयांसह) चित्ताला मिश्रित करतात, त्यांच्या अभावामुळे ते अमिश्रित असते. "ठितं" म्हणजे प्रतिष्ठित (स्थिर). "आनेञ्जप्पत्तं" म्हणजे अचलता प्राप्त झालेले. "वयञ्चस्सानुपस्सति" म्हणजे तो त्या चित्ताची उत्पत्ती आणि विनाश दोन्ही पाहतो. เนกฺขมฺมํ อธิมุตฺตสฺสาติ อรหตฺตํ ปฏิวิชฺฌิตฺวา ฐิตสฺส. เสสปเทหิปิ อรหตฺตเมว กถิตํ. อุปาทานกฺขยสฺสาติ อุปโยคตฺเถ สามิวจนํ. อสมฺโมหญฺจ เจตโสติ จิตฺตสฺส จ อสมฺโมหํ อธิมุตฺตสฺส. ทิสฺวา อายตนุปฺปาทนฺติ อายตนานํ อุปฺปาทญฺจ วยญฺจ ทิสฺวา. สมฺมา จิตฺตํ วิมุจฺจตีติ สมฺมา เหตุนา นเยน อิมาย วิปสฺสนาย ปฏิปตฺติยา ผลสมาปตฺติวเสน จิตฺตํ วิมุจฺจติ, นิพฺพานารมฺมเณ อธิมุจฺจติ. สนฺตจิตฺตสฺสาติ นิพฺพุตจิตฺตสฺส. ตาทิโนติ อิฏฺฐานิฏฺเฐ อนุนยปฏิเฆหิ อกมฺปิยตฺตา ตาที, ตสฺส ตาทิโน. "नेक्खम्मं अधिमुत्तस्स" म्हणजे अर्हतत्वाचा वेध घेऊन स्थित असलेल्याचे. उर्वरित पदांद्वारेही अर्हतत्वच सांगितले आहे. "उपादानक्खयस्स" हा द्वितीया विभक्तीच्या अर्थात षष्ठी विभक्तीचा प्रयोग आहे. "असंमोहञ्च चेतसो" म्हणजे चित्ताच्या असंमोहात (मोहरहित अवस्थेत) अधिमुक्त असलेल्याचे. "दिस्वा आयतनुप्पादं" म्हणजे आयतनांची उत्पत्ती आणि विनाश पाहून. "सम्मा चित्तं विमुच्चति" म्हणजे योग्य कारणाने आणि पद्धतीने, या विपश्यना साधनाद्वारे, फलसमापत्तीच्या प्रभावाने चित्त विमुक्त होते, निर्वाणरूपी आलंबनात लीन होते. "सन्तचित्तस्स" म्हणजे शांत (निवांत/मुक्त) चित्त असलेल्याचे. "तादिनो" म्हणजे इष्ट आणि अनिष्ट गोष्टींमध्ये अनुनय (आकर्षण) आणि प्रतिघाने (द्वेषाने) कंपित न होणारा तो 'तादी' (तथाभावी), त्या तादी पुरुषाचे. ทิคุณาทิอุปาหนปฏิกฺเขปกถา दुहेरी इत्यादी पादत्राणे नाकारण्याची कथा. ๒๔๕. อญฺญํ พฺยากโรนฺตีติ อรหตฺตํ พฺยากโรนฺติ. อตฺโถ จ วุตฺโตติ เยน อรหาติ ญายติ, โส อตฺโถ วุตฺโต. สุตฺตตฺโถ ปน สุตฺตวณฺณนโตเยว คเหตพฺโพ. อตฺตา จ อนุปนีโตติ อหํ อรหาติ เอวํ พฺยญฺชนวเสน อตฺตา น อุปนีโต. อถ จ ปนิเธกจฺเจ โมฆปุริสาติ อญฺเญ ปน ตุจฺฉปุริสา หสมานา วิย อสนฺตเมว อญฺญํ วจนมตฺเตน สนฺตํ กตฺวา พฺยากโรนฺติ. เอกปลาสิกนฺติ เอกปฏลํ[Pg.367]. อสีติสกฏวาเหติ เอตฺถ ทฺเว สกฏภารา เอโก วาโหติ เวทิตพฺโพ. สตฺตหตฺถิกญฺจ อนีกนฺติ เอตฺถ ฉ หตฺถินิโย เอโก จ หตฺถีติ อิทเมกํ อนีกํ. อีทิสานิ สตฺต อนีกานิ สตฺตหตฺถิกํ อนีกํ นาม. ทิคุณาติ ทฺวิปฏลา. ติคุณาติ ติปฏลา. คณงฺคุณูปาหนาติ จตุปฏลโต ปฏฺฐาย วุจฺจติ. २४५. "अञ्ञं ब्याकरोन्ति" म्हणजे अर्हतत्व प्रकट करतात. "अत्थो च वुत्तो" म्हणजे ज्या अर्थाने 'अर्हत' असे जाणले जाते, तो अर्थ सांगितले आहे. परंतु सुत्ताचा अर्थ सुत्तवर्णनेतूनच (अट्ठकथेतूनच) ग्रहण करावा. "अत्ता च अनुपनीतो" म्हणजे "मी अर्हत आहे" अशा शब्दांच्या द्वारे स्वतःला पुढे आणले नाही. "अथ च पनिधेकच्चे मोघपुरिसा" म्हणजे परंतु येथे काही मूर्ख (व्यर्थ) लोक जणू थट्टा करत, नसलेलेच अर्हतत्व केवळ शब्दांच्या द्वारे असल्यासारखे करून सांगतात. "एकपलासिकं" म्हणजे एक पदर (एक थर) केलेले. "असीतिसकटवाहे" यामध्ये दोन गाड्यांचे ओझे म्हणजे एक 'वाह' असे समजावे. "सत्तहत्थिकञ्च अनीकं" यामध्ये सहा हत्तिणी आणि एक हत्ती मिळून हे एक 'अनीक' (सैन्य/हत्तींचा समूह) होते. अशा प्रकारची सात अनीके म्हणजे 'सत्तहत्थिक अनीक' होय. "दिगुणा" म्हणजे दोन पदरी (दुहेरी). "तिगुणा" म्हणजे तीन पदरी (तिहेरी). "गुणङ्गुणूपाहना" हे चार पदरांपासून सुरू होणाऱ्या पादत्राणांना म्हटले जाते. สพฺพนีลิกาทิปฏิกฺเขปกถา पूर्णपणे निळ्या रंगाची इत्यादी पादत्राणे नाकारण्याची कथा. ๒๔๖. สพฺพนีลิกาติ สพฺพาว นีลิกา. เอส นโย สพฺพปีติกาทีสุปิ. ตตฺถ จ นีลิกา อุมาปุปฺผวณฺณา โหติ, ปีติกา กณิการปุปฺผวณฺณา, โลหิติกา ชยสุมนปุปฺผวณฺณา, มญฺชิฏฺฐิกา มญฺชิฏฺฐวณฺณา เอว, กณฺหา อทฺทาริฏฺฐกวณฺณา, มหารงฺครตฺตา สตปทิปิฏฺฐิวณฺณา, มหานามรตฺตา สมฺภินฺนวณฺณา โหติ ปณฺฑุปลาสวณฺณา. กุรุนฺทิยํ ปน ‘‘ปทุมปุปฺผวณฺณา’’ติ วุตฺตา. เอตาสุ ยํกิญฺจิ ลภิตฺวา รชนํ โจฬเกน ปุญฺฉิตฺวา วณฺณํ ภินฺทิตฺวา ธาเรตุํ วฏฺฏติ. อปฺปมตฺตเกปิ ภินฺเน วฏฺฏติเยว. २४६. ‘सब्बनीलिका’ म्हणजे सर्वच निळी (पूर्णपणे निळ्या रंगाची). हाच नियम ‘सब्बपीतिका’ (पूर्णपणे पिवळी) इत्यादी शब्दांच्या बाबतीतही लागू होतो. त्यामध्ये, निळी पादत्राणे ही जवसाच्या (अळशीच्या) फुलाच्या रंगाची असतात; पिवळी पादत्राणे ही कण्हेरीच्या फुलाच्या रंगाची असतात; लाल पादत्राणे ही जास्वंदाच्या फुलाच्या रंगाची असतात; मंजिष्ठा रंगाची पादत्राणे ही मंजिष्ठाच्या रंगाचीच असतात; काळी पादत्राणे ही ओल्या रिठ्ठ्याच्या रंगासारखी असतात; मोठ्या रंगाने रंगवलेली (महारंगरत्ता) पादत्राणे ही गोमेच्या पाठीच्या रंगासारखी असतात; आणि महानाम रंगाने रंगवलेली (महानामरत्ता) पादत्राणे ही संमिश्र रंगाची किंवा सुकलेल्या पिवळसर पानाच्या रंगाची असतात. परंतु, कुरुन्दी अट्ठकथेत ती ‘कमळाच्या फुलाच्या रंगाची’ अशी सांगितली आहे. या पादत्राणांपैकी कोणतीही पादत्राणे मिळाल्यास, त्याचा रंग कापडाने पुसून, रंग विद्रूप करून (बदलून) ती वापरणे योग्य आहे. अगदी थोडा जरी रंग बदलला तरी ती वापरणे योग्यच ठरते. นีลกวทฺธิกาติ ยาสํ วทฺธาเยว นีลา. เอเสว นโย สพฺพตฺถ. เอตาปิ วณฺณเภทํ กตฺวา ธาเรตพฺพา. ขลฺลกพทฺธาติ ปณฺหิปิธานตฺถํ ตเล ขลฺลกํ พนฺธิตฺวา กตา. ปุฏพทฺธาติ โยนกอุปาหนา วุจฺจติ, ยา ยาวชงฺฆโต สพฺพปาทํ ปฏิจฺฉาเทติ. ปาลิคุณฺฐิมาติ ปลิคุณฺฐิตฺวา กตา; ยา อุปริ ปาทมตฺตเมว ปฏิจฺฉาเทติ, น ชงฺฆํ. ตูลปุณฺณิกาติ ตูลปิจุนา ปูเรตฺวา กตา. ติตฺติรปตฺติกาติ ติตฺติรปตฺตสทิสา วิจิตฺตพทฺธา. เมณฺฑวิสาณวทฺธิกาติ กณฺณิกฏฺฐาเน เมณฺฑกสิงฺคสณฺฐาเน วทฺเธ โยเชตฺวา กตา. อชวิสาณวทฺธิกาทีสุปิ เอเสว นโย. วิจฺฉิกาฬิกาปิ ตตฺเถว วิจฺฉิกนงฺคุฏฺฐสณฺฐาเน วทฺเธ โยเชตฺวา กตา. โมรปิญฺฉปริสิพฺพิตาติ ตเลสุ วา วทฺเธสุ วา โมรปิญฺเฉหิ สุตฺตกสทิเสหิ ปริสิพฺพิตา. จิตฺราติ วิจิตฺรา; เอตาสุ ยํกิญฺจิ ลภิตฺวา, สเจ ตานิ ขลฺลกาทีนิ อปเนตฺวา สกฺกา โหนฺติ วฬญฺชิตุํ, วฬญฺเชตพฺพา. เตสุ ปน สติ วฬญฺชนฺตสฺส ทุกฺกฏํ. สีหจมฺมปริกฺขฏา นาม ปริยนฺเตสุ จีวเร อนุวาตํ วิย สีหจมฺมํ โยเชตฺวา กตา. ลูวกจมฺมปริกฺขฏาติ ปกฺขิพิฬาลจมฺมปริกฺขฏา[Pg.368]. เอตาสุปิ ยา กาจิ ลภิตฺวา ตํ จมฺมํ อปเนตฺวา ธาเรตพฺพา. ‘नीलकवद्धिका’ म्हणजे ज्यांच्या पट्ट्याच निळ्या रंगाच्या असतात. हाच नियम सर्वत्र (पिवळ्या पट्ट्या इत्यादींच्या बाबतीत) लागू होतो. या पादत्राणांचाही रंग बदलून (विद्रूप करून) ती वापरली पाहिजेत. ‘खल्लकबद्धा’ म्हणजे टाच झाकण्यासाठी तळव्याला टाचेचे कव्हर बांधून तयार केलेली पादत्राणे. ‘पुटबद्धा’ म्हणजे यवनांची (ग्रीकांची) पादत्राणे, जी घोट्यापर्यंत संपूर्ण पाऊल झाकून टाकतात. ‘पालिगुण्ठिमा’ म्हणजे गुंडाळून तयार केलेली पादत्राणे; जी केवळ पावलाचा वरचा भाग झाकतात, पिंढरी (घोटा) नाही. ‘तुलपुण्णिका’ म्हणजे कापूस भरून तयार केलेली पादत्राणे. ‘तित्तिरपत्तिका’ म्हणजे तितर पक्षाच्या पंखांसारख्या चित्रविचित्र पट्ट्या असलेली पादत्राणे. ‘मेण्डविसाणवद्धिका’ म्हणजे अंगठ्याच्या जागी मेंढ्याच्या शिंगाच्या आकाराच्या पट्ट्या जोडून तयार केलेली पादत्राणे. शेळीच्या शिंगाच्या आकाराच्या पट्ट्या इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. ‘विच्छिकालिका’ पादत्राणे देखील त्याच जागी विंचवाच्या शेपटीच्या आकाराच्या पट्ट्या जोडून तयार केलेली असतात. ‘मोरपिंच्छपरिसिब्बिता’ म्हणजे तळव्यावर किंवा पट्ट्यांवर सुतासारख्या मोराच्या पिसांनी शिवलेली पादत्राणे. ‘चित्रा’ म्हणजे चित्रविचित्र (विविध नक्षीकाम केलेली). या पादत्राणांपैकी कोणतीही पादत्राणे मिळाल्यास, जर ती टाचेचे कव्हर इत्यादी काढून वापरणे शक्य असेल, तर ती (काढून) वापरली पाहिजेत. परंतु, ती तशीच असताना वापरल्यास भिक्खूला दुक्कट (दुष्कृत) गुन्हा होतो. ‘सिंहचम्मपरिक्खता’ म्हणजे पादत्राणांच्या कडांवर, चीवराच्या पट्टीप्रमाणे (अनुवात), सिंहाचे चामडे जोडून तयार केलेली पादत्राणे. ‘लूवकचम्मपरिक्खता’ म्हणजे उडणाऱ्या खारीच्या (किंवा रानमांजराच्या) चामड्याने कडा मढवलेली पादत्राणे. या पादत्राणांपैकी कोणतीही पादत्राणे मिळाल्यास, ते चामडे काढून टाकून ती वापरली पाहिजेत. ๒๔๗. โอมุกฺกนฺติ ปฏิมุญฺจิตฺวา อปนีตํ. นวาติ อปริภุตฺตา. २४७. ‘ओमुक्क’ म्हणजे पायात घालून नंतर काढलेली (वापरलेली). ‘नवा’ म्हणजे न वापरलेली (नवीन). อชฺฌาราเมอุปาหนปฏิกฺเขปกถา विहाराच्या (आरामाच्या) आत पादत्राणे वापरण्यास मनाई करण्याबाबतची चर्चा. ๒๔๘. อภิชีวนิกสฺสาติ เยน สิปฺเปน อภิชีวนฺติ, ชีวิกํ กปฺเปนฺติ, ตสฺส การณาติ อตฺโถ. อิธ โข ตํ ภิกฺขเวติ เอตฺถ ตนฺติ นิปาตมตฺตํ, อิธ โข ภิกฺขเว โสเภยฺยาถาติ อตฺโถ. ยํ ตุมฺเหติ เย ตุมฺเห. อถ วา ยทิ ตุมฺเหติ วุตฺตํ โหติ. ยทิสทฺทสฺส หิ อตฺเถ อยํ นิปาโต. อาจริเยสูติอาทิมฺหิ ปพฺพชฺชาจริโย, อุปสมฺปทาจริโย, นิสฺสยาจาริโย, อุทฺเทสาจริโยติ อิเม จตฺตาโรปิ อิธ อาจริยา เอว. อวสฺสิกสฺส ฉพฺพสฺโส อาจริยมตฺโต. โส หิ จตุวสฺสกาเล ตํ นิสฺสาย วจฺฉติ; เอวํ เอกวสฺสสฺส สตฺตวสฺโส, ทุวสฺสสฺส อฏฺฐวสฺโส, ติวสฺสสฺส นววสฺโส, จตุวสฺสสฺส ทสวสฺโส. อิเมปิ อาจริยมตฺตา เอว. อุปชฺฌายสฺส สนฺทิฏฺฐสมฺภตฺตา ปน สหายภิกฺขู, เย วา ปน เกจิ ทสหิ วสฺเสหิ มหนฺตตรา เต สพฺเพปิ อุปชฺฌายมตฺตา นาม. เอตฺตเกสุ ภิกฺขูสุ อนุปาหเนสุ จงฺกมนฺเตสุ สอุปาหนสฺส จงฺกมโต อาปตฺติ. २४८. ‘अभिजीवनिकस्स’ म्हणजे ज्या कलेने (किंवा कौशल्याने) उपजीविका करतात, जीवन जगतात, त्या कारणाने, असा अर्थ आहे. ‘इध खो तं भिक्खवे’ या वाक्यात ‘तं’ हा केवळ एक निपात (अव्यय) आहे. ‘हे भिक्खूंनो, तुम्ही या शासनात शोभून दिसाल का?’ असा याचा अर्थ आहे. ‘यं तुम्हे’ म्हणजे जे तुम्ही. किंवा ‘जर तुम्ही’ (यदी तुम्हे) असा अर्थ सांगितला आहे. कारण ‘यम्’ हा निपात ‘यदी’ (जर) या अर्थी वापरला जातो. ‘आचरियेसु’ इत्यादी पाठात - प्रव्रज्या-आचार्य (पब्बज्जाचरियो), उपसंपदा-आचार्य (उपसम्पदाचरियो), निश्रय-आचार्य (निस्सयाचरियो) आणि उद्देश-आचार्य (उद्देसाचरियो) हे चारही या शासनात ‘आचार्य’च आहेत. वर्षावास नसलेल्या (नवीन) भिक्खूसाठी सहा वर्षावास असलेला भिक्खू हा ‘आचार्यतुल्य’ असतो. कारण तो नवीन भिक्खू आपल्या चौथ्या वर्षावासाच्या काळात त्याच्यावर विसंबून (निश्रय घेऊन) राहील. याचप्रमाणे, एक वर्षावास असलेल्या भिक्खूसाठी सात वर्षावास असलेला, दोन वर्षावास असलेल्यासाठी आठ वर्षावास असलेला, तीन वर्षावास असलेल्यासाठी नऊ वर्षावास असलेला आणि चार वर्षावास असलेल्यासाठी दहा वर्षावास असलेला भिक्खू आचार्यतुल्य असतो. हे सर्व देखील आचार्यतुल्यच आहेत. उपाध्यायांचे परिचित व स्नेही असलेले सोबती भिक्खू, किंवा जे कोणी स्वतःपेक्षा दहा वर्षावासांनी मोठे आहेत, ते सर्व ‘उपाध्याय-तुल्य’ मानले जातात. अशा आदरणीय भिक्खूंनी पादत्राणांशिवाय चंक्रमण करत असताना, एखाद्या भिक्खूने पादत्राणे घालून चंक्रमण केल्यास त्याला आपत्ती (दुक्कट गुन्हा) होते. ๒๔๙. ปาทขีลาพาโธ นาม ปาทโต ขีลสทิสํ มํสํ นิกฺขนฺตํ โหติ. २४९. ‘पादखिलाबाध’ (पायातील कुरूप किंवा खिळ्यासारखा आजार) म्हणजे पायातून खिळ्यासारखे मांस बाहेर आलेले असणे. ๒๕๑. ติณปาทุกาติ เยน เกนจิ ติเณน กตปาทุกา. หินฺตาลปาทุกาติ ขชฺชูรีปตฺเตหิ กตปาทุกา; หินฺตาลปตฺเตหิปิ น วฏฺฏติเยว. กมลปาทุกาติ กมลติณํ นาม อตฺถิ, เตน กตปาทุกา; อุสีรปาทุกาติปิ วทนฺติ. กมฺพลปาทุกาติ อุณฺณาหิ กตปาทุกา. อสงฺกมนียาติ ภูมิยํ สุปฺปติฏฺฐิตา นิจฺจลา อสํหาริยา. २५१. ‘तिणपादुका’ म्हणजे कोणत्याही तृणाने (घासाने) बनवलेली पादत्राणे. ‘हिंतालपादुका’ म्हणजे खजुराच्या पानांनी बनवलेली पादत्राणे; हिनताल (ताड) पानांनी बनवलेली पादत्राणे देखील अजिबात चालत नाहीत. ‘कमलपादुका’ म्हणजे ‘कमल-तृण’ नावाचे एक गवत असते, त्याने बनवलेली पादत्राणे; याला ‘उशीर-पादुका’ (वाळ्याची पादत्राणे) असेही म्हणतात. ‘कम्बलपादुका’ म्हणजे लोकरीने (प्राण्यांच्या केसांनी) बनवलेली पादत्राणे. ‘असंकमनीया’ म्हणजे जमिनीवर चांगल्या प्रकारे स्थिर असलेली, न हलणारी आणि दुसऱ्या ठिकाणी वाहून न नेता येणारी (अचल). ๒๕๒. องฺคชาตํ ฉุปนฺตีติ องฺคชาเตเนว องฺคชาตํ ฉุปนฺติ. โอคาเหตฺวา มาเรนฺตีติ อนฺโต อุทเก ทฬฺหํ คเหตฺวา มาเรนฺติ. २५२. ‘अंगजातं छुपन्ति’ म्हणजे जननेंद्रियानेच (दुसऱ्याच्या) जननेंद्रियाला स्पर्श करतात. ‘ओगाहेत्वा मारेन्ति’ म्हणजे पाण्यात पूर्णपणे बुडवून (घट्ट धरून) मारतात. ยานาทิปฏิกฺเขปกถา वाहने इत्यादींचा वापर करण्यास मनाई करण्याबाबतची चर्चा. ๒๕๓. อิตฺถิยุตฺเตนาติ [Pg.369] เธนุยุตฺเตน. ปุริสนฺตเรนาติ ปุริสสารถินา. ปุริสยุตฺเตนาติ โคณยุตฺเตน. อิตฺถนฺตเรนาติ อิตฺถิสารถินา. คงฺคามหิยายาติ คงฺคามหกีฬิกาย. ปุริสยุตฺตํ หตฺถวฏฺฏกนฺติ เอตฺถ ปุริสยุตฺตํ อิตฺถิสารถิ วา โหตุ, ปุริสสารถิ วา วฏฺฏติ. หตฺถวฏฺฏกํ ปน อิตฺถิโย วา วฏฺเฏนฺตุ ปุริสา วา, วฏฺฏติเยว. ยานุคฺฆาเตนาติ ยานํ อภิรุหนฺตสฺส สพฺโพ กาโย จลติ ตปฺปจฺจยา. สิวิกนฺติ ปีฐกสิวิกํ. ปาฏงฺกินฺติ วํเส ลคฺเคตฺวา กตํ ปฏโปตลิกํ. २५३. ‘इत्थियुत्तेन’ म्हणजे मादी प्राण्याने (गाईने) जोडलेले वाहन. ‘पुरिसन्तरेन’ म्हणजे पुरुष सारथी असलेले वाहन. ‘पुरिसयुत्तेन’ म्हणजे नर प्राण्याने (बैल किंवा घोड्याने) जोडलेले वाहन. ‘इत्थन्तरेन’ म्हणजे स्त्री सारथी असलेले वाहन. ‘गंगामाहियाय’ म्हणजे गंगा नदीच्या उत्सवाच्या खेळाच्या वेळच्या प्रसंगासारखे. ‘पुरिसयुत्तं हत्थवट्टकं’ या वाक्यात, नर प्राण्याने जोडलेल्या वाहनाचा सारथी स्त्री असो वा पुरुष, ते योग्य आहे. परंतु, हाताने ओढायचे वाहन (हातगाडी) स्त्रियांनी ओढावे किंवा पुरुषांनी, ते योग्यच ठरते. ‘यानूग्घातेन’ म्हणजे वाहनावर चढणाऱ्या भिक्खूचे संपूर्ण शरीर हलते, त्या कारणाने (होणारा त्रास). ‘सिविका’ म्हणजे पाटाची पालखी. ‘पाटङ्कि’ म्हणजे बांबूवर टांगून तयार केलेली कापडी झोळी (कापडी पालखी). ๒๕๔. อุจฺจาสยนมหาสยนนานีติ เอตฺถ อุจฺจาสยนนฺติ ปมาณาติกฺกนฺตํ มญฺจํ. มหาสยนนฺติ อกปฺปิยตฺถรณํ, อาสนฺทีอาทีสุ อาสนฺทีติ ปมาณาติกฺกนฺตาสนํ. ปลฺลงฺโกติ ปาเทสุ วาฬรูปานิ ฐเปตฺวา กโต. โคนโกติ ทีฆโลมโก มหาโกชโว; จตุรงฺคุลาธิกานิ กิร ตสฺส โลมานิ. จิตฺตกาติ วานจิตฺโร อุณฺณามยตฺถรโณ. ปฏิกาติ อุณฺณามโย เสตตฺถรโณ. ปฏลิกาติ ฆนปุปฺผโก อุณฺณามยโลหิตตฺถรโณ; โย อามลกปฏฺโฏติปิ วุจฺจติ. ตูลิกาติ ปกติตูลิกาเยว. วิกติกาติ สีหพฺยคฺฆาทิรูปวิจิตฺโร อุณฺณามยตฺถรโณ. อุทฺทโลมีติ เอกโต อุคฺคตโลมํ อุณฺณามยตฺถรณํ; ‘‘อุทฺธโลมี’’ติปิ ปาโฐ. เอกนฺตโลมีติ อุภโต อุคฺคตโลมํ อุณฺณามยตฺถรณํ. กฏฺฏิสฺสนฺติ รตนปริสิพฺพิตํ โกเสยฺยกฏฺฏิสฺสมยํ ปจฺจตฺถรณํ. โกเสยฺยนฺติ รตนปริสิพฺพิตํ โกสิยสุตฺตมยํ ปจฺจตฺถรณํ; สุทฺธโกเสยฺยํ ปน วฏฺฏติ. २५४. ‘उच्चाशयनमहाशयनानि’ या वाक्यात, ‘उच्चाशयन’ म्हणजे प्रमाणाबाहेर (मंच सिक्खापदात सांगितलेल्या प्रमाणापेक्षा जास्त) उंचीची खाट (मंच). ‘महाशयन’ म्हणजे अकल्पनीय (अयोग्य) बिछाना. ‘आसंदी’ इत्यादींमध्ये, ‘आसंदी’ म्हणजे प्रमाणाबाहेर उंचीचे आसन. ‘पल्लङ्क’ (पलंग) म्हणजे पायांवर सिंह, वाघ इत्यादी हिंस्र प्राण्यांचे आकार कोरून तयार केलेले आसन. ‘गोणक’ म्हणजे लांब केस असलेला मोठा गालिचा; त्याचे केस चार बोटांपेक्षा जास्त लांबीचे असतात असे म्हणतात. ‘चित्तक’ म्हणजे विणकामामुळे चित्रविचित्र दिसणारे लोकरीचे अंथरूण. ‘पटिका’ म्हणजे लोकरीचे पांढरे अंथरूण. ‘पटलिका’ म्हणजे दाट फुलांची नक्षी असलेले लोकरीचे लाल अंथरूण; याला ‘आमलक-पट्ट’ असेही म्हणतात. ‘तुलिका’ म्हणजे नेहमीची कापूस भरलेली गादी. ‘विकतिका’ म्हणजे सिंह, वाघ इत्यादींच्या चित्रांनी सुशोभित केलेले लोकरीचे अंथरूण. ‘उद्दलोमी’ म्हणजे एकाच बाजूला लांब केस असलेले लोकरीचे अंथरूण; याचा पाठ ‘उद्धलोमी’ असाही आढळतो. ‘एकन्तलोमी’ म्हणजे दोन्ही बाजूंना लांब केस असलेले लोकरीचे अंथरूण. ‘कट्ठिस्स’ म्हणजे रत्नांनी शिवलेले, रेशमी धाग्यांमध्ये सोन्याचे धागे विणून तयार केलेले अंथरूण. ‘कोसेय्य’ म्हणजे रत्नांनी शिवलेले, रेशमी धाग्यांचे अंथरूण; परंतु केवळ साधे रेशमी अंथरूण (सुद्धकोसेय्य) वापरणे योग्य आहे. กุตฺตกนฺติ โสฬสนฺนํ นาฏกิตฺถีนํ ฐตฺวา นจฺจนโยคฺคํ อุณฺณามยอตฺถรณํ. หตฺถตฺถรอสฺสตฺถราติ หตฺถิอสฺสปิฏฺฐีสุ อตฺถรณกอตฺถรณา เอว. รถตฺถเรปิ เอเสว นโย. อชินปฺปเวณีติ อชินจมฺเมหิ มญฺจปฺปมาเณน สิพฺพิตฺวา กตา ปเวณี. กทลีมิคปวรปจฺจตฺถรณนฺติ กทลีมิคจมฺมํ นาม อตฺถิ, เตน กตํ ปวรปจฺจตฺถรณํ, อุตฺตมปจฺจตฺถรณนฺติ อตฺโถ. ตํ กิร เสตวตฺถสฺส อุปริ กทลีมิคจมฺมํ ปตฺถริตฺวา สิพฺพิตฺวา กโรนฺติ. สอุตฺตรจฺฉทนฺติ สห อุตฺตรจฺฉทเนน; อุปริพทฺเธน รตฺตวิตาเนน สทฺธินฺติ อตฺโถ[Pg.370]. เสตวิตานมฺปิ เหฏฺฐา อกปฺปิยปจฺจตฺถรเณ สติ น วฏฺฏติ, อสติ ปน วฏฺฏติ. อุภโตโลหิตกูปธานนฺติ สีสูปธานญฺจ ปาทูปธานญฺจาติ มญฺจสฺส อุภโตโลหิตกูปธานํ, เอตํ น กปฺปติ. ยํ ปน เอกเมว อุปธานํ อุโภสุ ปสฺเสสุ รตฺตํ วา โหติ, ปทุมวณฺณํ วา จิตฺรํ วา, สเจ ปมาณยุตฺตํ, วฏฺฏติ. มหาอุปธานํ ปน ปฏิกฺขิตฺตํ. कुत्तक म्हणजे सोळा नर्तकींना उभे राहून नाचण्यास योग्य असे लोकरीचे अंथरूण. हत्थत्थर-अस्सत्थर म्हणजे हत्ती आणि घोड्यांच्या पाठीवर घालण्याची अंथरूणेच होत. रथावरील अंथरूणाबाबतही (रथत्थर) हाच नियम आहे. अजिनप्पवेणी म्हणजे काळवीटाच्या कातड्याने पलंगाच्या आकाराचे शिवून तयार केलेले अंथरूण. कदलीमिगपवरपच्चत्थरण म्हणजे 'कदली' नावाचा मृग असतो, त्याच्या कातड्यापासून बनवलेले श्रेष्ठ अंथरूण, म्हणजेच उत्तम अंथरूण असा अर्थ आहे. ते पांढऱ्या वस्त्रावर कदली मृगाचे कातडे पसरवून व शिवून तयार करतात असे म्हणतात. सउत्तरच्छद म्हणजे वर पांघरण्याच्या वस्त्रासह; म्हणजेच वर बांधलेल्या लाल रंगाच्या चांदव्या (वितान) सह असा अर्थ आहे. पांढरा चांदवा देखील खाली अयोग्य (अकप्पिय) अंथरूण असताना वापरणे योग्य नाही, परंतु ते नसल्यास वापरणे योग्य आहे. उभतोलोहितकूपधान म्हणजे डोक्याकडील उशी आणि पायाकडील उशी अशा प्रकारे पलंगाच्या दोन्ही बाजूंना लाल उशा असणे; हे अयोग्य आहे. परंतु जी एकच उशी दोन्ही बाजूंनी लाल किंवा कमळाच्या रंगाची किंवा चित्रविचित्र असते, जर ती योग्य आकाराची असेल, तर ती वापरणे योग्य आहे. परंतु मोठी उशी (महाउपधान) निषिद्ध केली आहे. สพฺพจมฺมปฏิกฺเขปาทิกถา सर्व प्रकारच्या चामड्यांच्या निषेधाची कथा. ๒๕๕. ทีปิจฺฉาโปติ ทีปิโปตโก. โอคุมฺผิยนฺตีติ ภิตฺติทณฺฑกาทีสุ เวเฐตฺวา พนฺธนฺติ. २५५. दीपिच्छाप म्हणजे बिबट्याचे पिल्लू. ओगुम्फियन्ति म्हणजे भिंतीच्या लाकडी दांड्या इत्यादींवर गुंडाळून बांधतात. ๒๕๖. อภินิสีทิตุนฺติ อภินิสฺสาย นิสีทิตุํ; อปสฺสยํ กตฺวา นิสีทิตุนฺติ อตฺโถ. คิลาเนน ภิกฺขุนา สอุปาหเนนาติ เอตฺถ คิลาโน นาม โย น สกฺโกติ อนุปาหโน คามํ ปวิสิตุํ. २५६. अभिनिसीदितुं म्हणजे आधार घेऊन बसणे; टेकून बसणे असा अर्थ आहे. 'गिलानेन भिक्खुना सउपाहनेन' (आजारी भिक्खूने पादत्राणांसह) यामध्ये 'ग्लान' (आजारी) म्हणजे जो पादत्राणे न घालता गावात प्रवेश करू शकत नाही असा भिक्खू होय. ๒๕๗. กุรรฆเรติ เอวํนามเก นคเร; เอเตนสฺส โคจรคาโม วุตฺโต. ปปตเก ปพฺพเตติ ปปตนามเก ปพฺพเต; เอเตนสฺส นิวาสนฏฺฐานํ วุตฺตํ. โสโณติ ตสฺส นามํ. โกฏิอคฺฆนกํ ปน กณฺณปิฬนฺธนกํ ธาเรติ, ตสฺมา ‘‘กุฏิกณฺโณ’’ติ วุจฺจติ; โกฏิกณฺโณติ อตฺโถ. ปาสาทิกนฺติ ปสาทชนกํ. ปสาทนียนฺติ อิทํ ตสฺเสว อตฺถเววจนํ. อุตฺตมทมถสมถนฺติ อุตฺตมํ ทมถญฺจ สมถญฺจ ปญฺญญฺจ สมาธิญฺจ กายูปสมญฺจ จิตฺตูปสมญฺจาติปิ อตฺโถ. ทนฺตนฺติ สพฺเพสํ วิสูกายิกวิปฺผนฺทิตานํ อุปจฺฉินฺนตฺตา ทนฺตํ; ขีณกิเลสนฺติ อตฺโถ. คุตฺตนฺติ สํวรคุตฺติยา คุตฺตํ. สนฺตินฺทฺริยนฺติ ยตินฺทฺริยํ. นาคนฺติ อาคุวิรหิตํ. ติณฺณํ เม วสฺสานํ อจฺจเยนาติ มม ปพฺพชฺชาทิวสโต ปฏฺฐาย ติณฺณํ วสฺสานํ อจฺจเยน. อุปสมฺปทํ อลตฺถนฺติ อหํ อุปสมฺปทํ อลภึ. กณฺหุตฺตราติ กณฺหมตฺติกุตฺตรา; อุปริ วฑฺฒิตกณฺหมตฺติกาติ อตฺโถ. โคกณฺฏกหตาติ คุนฺนํ ขุเรหิ อกฺกนฺตภูมิโต สมุฏฺฐิเตหิ โคกณฺฏเกหิ อุปหตา. เต กิร โคกณฺฏเก เอกปฏลิกา อุปาหนา รกฺขิตุํ น สกฺโกนฺติ; เอวํ ขรา โหนฺติ. เอรคู, โมรคู, มชฺชารู, ชนฺตูติ อิมา จตสฺโสปิ ติณชาติโย; เอเตหิ กฏสารเก จ ตฏฺฏิกาโย จ กโรนฺติ. เอตฺถ เอรคูติ [Pg.371] เอรกติณํ; ตํ โอฬาริกํ. โมรคูติณํ ตมฺพสีสํ มุทุกํ สุขสมฺผสฺสํ, เตน กตตฏฺฏิกา นิปชฺชิตฺวา วุฏฺฐิตมตฺเต ปุน อุทฺธุมาตา หุตฺวา ติฏฺฐติ. มชฺชารุนา สาฏเกปิ กโรนฺติ. ชนฺตุสฺส มณิสทิโส วณฺโณ โหติ. เสนาสนํ ปญฺญเปสีติ ภิสึ วา กฏสารกํ วา ปญฺญเปสิ; ปญฺญเปตฺวา จ ปน โสณสฺส อาโรเจติ – ‘‘อาวุโส สตฺถา ตยา สทฺธึ เอกาวาเส วสิตุกาโม, คนฺธกุฏิยํเยว เต เสนาสนํ ปญฺญตฺต’’นฺติ. २५७. कुररघरे म्हणजे या नावाच्या नगरात; या शब्दाने त्यांचा (महाकच्चायनांचा) गोचरग्राम (भिक्षेचे गाव) सांगितला आहे. पपतके पब्बते म्हणजे पपत नावाच्या पर्वतावर; या शब्दाने त्यांचे निवासस्थान सांगितले आहे. सोण हे त्याचे नाव आहे. तो एक कोटी मूल्याचे कानाचे आभूषण घालत असे, म्हणून त्याला 'कुटिकण्ण' (कोटिकर्ण) म्हटले जाते; कोटिकर्ण असा अर्थ आहे. पासादिक म्हणजे प्रसन्नता निर्माण करणारे. पसादनीय हा शब्द 'पासादिक' या शब्दाचाच समानार्थी शब्द आहे. उत्तमदमथसमथ म्हणजे उत्तम दमन (इंद्रियनिग्रह) आणि शम (शांती), किंवा प्रज्ञा आणि समाधी, किंवा कायिक शांती आणि मानसिक शांती असाही अर्थ होतो. दन्त म्हणजे सर्व प्रकारच्या चंचल हालचाली नष्ट झाल्यामुळे दमन झालेला (शांत झालेला); क्षीणक्लेश (ज्याचे क्लेश नष्ट झाले आहेत) असा अर्थ आहे. गुत्त म्हणजे संवर-गुप्तीने (इंद्रिय संयमाने) सुरक्षित असलेला. सन्तिन्द्रिय म्हणजे संयमित इंद्रिये असलेला. नाग म्हणजे पापापासून मुक्त असलेला. तिण्णं मे वस्सानं अच्चयेन म्हणजे माझ्या प्रव्रज्या दिवसापासून तीन वर्षे उलटून गेल्यावर. उपसम्पदं अलत्थं म्हणजे मी उपसंपदा प्राप्त केली. कण्हुत्तरा म्हणजे काळी माती वर आलेली; वर काळी माती पसरलेली असा अर्थ आहे. गोकण्टकहत म्हणजे बैलांच्या खुरांनी तुडवलेल्या जमिनीवरून वर आलेल्या मातीच्या कडक ढेकळांनी (किंवा काट्यांनी) युक्त असलेली. त्या कडक ढेकळांपासून एका थराची पादत्राणे संरक्षण करू शकत नाहीत; ती इतकी कठीण असतात. एरगू, मोरगू, मज्जारू, जन्तू या चारही गवताच्या जाती आहेत; या गवतांपासून चटया आणि आसने बनवतात. येथे एरगू म्हणजे एरका गवत; ते खडबडीत असते. मोरगू गवत तांबड्या टोकाचे, मऊ आणि सुखद स्पर्श असणारे असते; त्याने बनवलेल्या चटईवर झोपून उठल्याबरोबर ती चटई पुन्हा फुगून पूर्ववत होते. मज्जारू गवतापासून वस्त्रे देखील बनवतात. जन्तू गवताचा रंग मण्यासारखा असतो. सेनासनं पञ्ञापेसि म्हणजे गादी किंवा चटई अंथरली; आणि अंथरून सोणाला सांगितले - 'आयुष्यमान, शास्ता तुमच्यासोबत एकाच विहारात राहू इच्छितात, गंधकुटीमध्येच तुमच्यासाठी आसन अंथरले आहे.' ๒๕๘. อยํ ขฺวสฺส กาโลติ อยํ โข กาโล ภเวยฺย. ปริทสฺสีติ ปริทสฺเสสิ. ‘‘อิทญฺจิทญฺจ วเทยฺยาสีติ ยํ เม อุปชฺฌาโย ชานาเปสิ, ตสฺส อยํ กาโล ภเวยฺย, หนฺท ทานิ อาโรเจมิ ตํ สาสน’’นฺติ อยเมตฺถ อธิปฺปาโย. २५८. अयं ख्वस्स कालो म्हणजे हाच योग्य वेळ असावी. परिदस्सी म्हणजे दर्शविले. 'हे आणि हे सांगावे, जे माझ्या उपाध्यायांनी मला कळवले आहे, त्यासाठी हाच योग्य वेळ असावी, चला आता मी तो संदेश सांगतो' असा येथे अभिप्राय आहे. ๒๕๙. วินยธรปญฺจเมนาติ อนุสฺสาวนาจริยปญฺจเมน. อนุชานามิ ภิกฺขเว สพฺพปจฺจนฺติเมสุ ชนปเทสุ คุณงฺคุณูปาหนนฺติ เอตฺถ มนุสฺสจมฺมํ ฐเปตฺวา เยน เกนจิ จมฺเมน อุปาหนา วฏฺฏติ. อุปาหนโกสกสตฺถโกสกกุญฺจิกโกสเกสุปิ เอเสว นโย. จมฺมานิ อตฺถรณานีติ เอตฺถ ปน ยํกิญฺจิ เอฬกจมฺมํ อชจมฺมญฺจ อตฺถริตฺวา นิปชฺชิตุํ วา นิสีทิตุํ วา วฏฺฏติ. มิคจมฺเม เอณีมิโค วาตมิโค ปสทมิโค กุรงฺคมิโค มิคมาตุโก โรหิตมิโคติ เอเตสํเยว จมฺมานิ วฏฺฏนฺติ. อญฺเญสํ ปน – २५९. विनयधरपञ्चमेन म्हणजे अनुश्रावण आचार्य पाचवा असलेल्या गणाने. 'भिक्खूंनो, मी सर्व सीमावर्ती देशांमध्ये अनेक थरांच्या पादत्राणांना अनुमती देतो' यामध्ये मानवी चामडे वगळता इतर कोणत्याही चामड्याची पादत्राणे वापरणे योग्य आहे. पादत्राणांचे कव्हर, तलवारीचे म्यान आणि चावीचे कव्हर यांबाबतही हाच नियम आहे. 'चामड्याची अंथरूणे' यामध्ये मेंढीचे चामडे किंवा शेळीचे चामडे अंथरून त्यावर झोपणे किंवा बसणे योग्य आहे. मृगांच्या चामड्यांमध्ये एणीमृग, वातमृग, पसदमृग, कुरंगमृग, मृगमातृक, रोहितमृग यांच्याच चामड्यांचा वापर करणे योग्य आहे. इतरांचे मात्र - มกฺกโฏ กาฬสีโห จ, สรโภ กทลีมิโค; เย จ วาฬมิคา เกจิ, เตสํ จมฺมํ น วฏฺฏติ. माकड, काळा सिंह (किंवा काळा वानर), सरभ, कदली मृग आणि जे काही हिंस्त्र पशू आहेत, त्यांचे चामडे वापरणे योग्य नाही. ตตฺถ วาฬมิคาติ สีหพฺยคฺฆอจฺฉตรจฺฉา; น เกวลญฺจ เอเตสํเยว, เยสํ ปน จมฺมํ วฏฺฏตีติ วุตฺตํ, เต ฐเปตฺวา อวเสสา อนฺตมโส โคมหึสสสพิฬาราทโยปิ สพฺเพ อิมสฺมึ อตฺเถ วาฬมิคาตฺเวว เวทิตพฺพา. เอเตสญฺหิ สพฺเพสํ จมฺมํ น วฏฺฏติ. น ตาว ตํ คณนูปคํ ยาว น หตฺถํ คจฺฉตีติ ยาว อาหริตฺวา วา น ทินฺนํ, ตุมฺหากํ ภนฺเต จีวรํ อุปฺปนฺนนฺติ ปหิณิตฺวา วา นาโรจิตํ, ตาว คณนํ น อุเปติ. สเจ อนธิฏฺฐิตํ, วฏฺฏติ; อธิฏฺฐิตญฺจ คณนํ น อุเปตีติ อตฺโถ. ยทา ปน อาเนตฺวา วา ทินฺนํ โหติ, อุปฺปนฺนนฺติ วา สุตํ, ตโต ปฏฺฐาย ทสาหเมว ปริหารํ ลภตีติ. त्यामध्ये हिंस्त्र पशू म्हणजे सिंह, वाघ, अस्वल, तरस; आणि केवळ यांचेच नव्हे, तर ज्यांचे चामडे वापरणे योग्य आहे असे सांगितले आहे, त्यांना वगळून उरलेले अगदी गाय, म्हैस, ससा, मांजर इत्यादी सर्व प्राणी या अर्थाने 'हिंस्त्र पशू' (वाळमृग) म्हणूनच समजावेत. कारण या सर्वांचे चामडे वापरणे योग्य नाही. 'जोपर्यंत ते हातात येत नाही, तोपर्यंत त्याची गणना होत नाही' म्हणजे जोपर्यंत ते आणून दिले जात नाही किंवा 'भंते, तुमच्यासाठी चीवर प्राप्त झाले आहे' असा निरोप पाठवून सांगितले जात नाही, तोपर्यंत त्याची गणना होत नाही. जर ते अनधिष्ठित (अधिष्ठान न केलेले) असेल तर चालते; आणि अधिष्ठित केलेले देखील गणनेत येत नाही असा अर्थ आहे. परंतु जेव्हा ते आणून दिले जाते किंवा प्राप्त झाल्याचे ऐकले जाते, तेव्हापासून केवळ दहा दिवसच ते जवळ ठेवण्याची सवलत मिळते. จมฺมกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. चम्मक्खन्धक-वर्णना समाप्त झाली. ๖. เภสชฺชกฺขนฺธกํ ६. भेषज्जक्खन्धक (भेषज्ज स्कंधक) ปญฺจเภสชฺชาทิกถา पंचभेषज्ज-आदि कथा (पाच औषधांची कथा) ๒๖๐. เภสชฺชกฺขนฺธเก [Pg.372] – สารทิเกน อาพาเธนาติ สรทกาเล อุปฺปนฺเนน ปิตฺตาพาเธน, ตสฺมิญฺหิ กาเล วสฺโสทเกนปิ เตเมนฺติ, กทฺทมมฺปิ มทฺทนฺติ, อนฺตรนฺตรา อาตโปปิ ขโร โหติ, เตน เตสํ ปิตฺตํ โกฏฺฐพฺภนฺตรคตํ โหติ. อาหารตฺถญฺจ ผเรยฺยาติ อาหารตฺถํ สาเธยฺย. २६०. भेषज्जक्खन्धकामध्ये – 'सारदिकेन आबाधेन' म्हणजे शरद ऋतूत उत्पन्न होणाऱ्या पित्तविकाराने. कारण त्या काळात भिक्खू पावसाच्या पाण्याने भिजतात, चिखल तुडवतात आणि मधूनमधून कडक ऊनही असते, त्यामुळे त्यांचे पित्त कोठ्यात (उदरात) जाते. 'आहारत्थञ्च फरेय्य' म्हणजे आहाराचे कार्य पूर्ण करू शकेल. ๒๖๑. นจฺฉาเทนฺตีติ น ชิรนฺติ, น วาตโรคํ ปฏิปฺปสฺสมฺเภตุํ สกฺโกนฺติ. เสเนสิตานีติ สินิทฺธานิ. ภตฺตาจฺฉาทเกนาติ ภตฺตํ อโรจิเกน. २६१. नच्छादेन्ति म्हणजे पचत नाहीत, किंवा वातविकार शांत करू शकत नाहीत. सेनेसितानि म्हणजे स्निग्ध (तेलकट/तुपकट). भत्ताच्छादकेन म्हणजे अन्नाची अरुची निर्माण करणाऱ्या औषधाने. ๒๖๒. อจฺฉวสนฺติอาทีสุ นิสฺสคฺคิยวณฺณนายํ วุตฺตนเยเนว วินิจฺฉโย เวทิตพฺโพ. กาเล ปฏิคฺคหิตนฺติอาทีสุ มชฺฌนฺหิเก อวีติวตฺเต ปฏิคฺคเหตฺวา ปจิตฺวา ปริสฺสาเวตฺวา จาติ อตฺโถ. เตลปริโภเคน ปริภุญฺชิตุนฺติ สตฺตาหกาลิกเตลปริโภเคน ปริภุญฺชิตุํ. २६२. "अच्छवसन्ति" इत्यादी शब्दांच्या बाबतीत, निस्सग्गिय (निसर्गिय) नियमांच्या स्पष्टीकरणात (निस्सग्गियवण्णना) सांगितलेल्या पद्धतीनेच निर्णय (विनिच्छय) समजून घ्यावा. "काले पटिग्गहितं" इत्यादी शब्दांचा अर्थ असा आहे की, दुपारची वेळ टळून जाण्यापूर्वी (मज्झन्हिके अवीतिवत्ते) ग्रहण करून, शिजवून आणि गाळून घेणे. "तेलपरिभोगेन परिभुञ्जितुं" म्हणजे सप्ताहापुरते मर्यादित असणाऱ्या तेलाच्या उपयोगाच्या (सत्ताहकालिकतेलपरिभोगेन) पद्धतीने उपभोग घेणे. ๒๖๓. มูลเภสชฺชาทิ วินิจฺฉโยปิ ขุทฺทกวณฺณนายํ วุตฺโตเยว. ตสฺมา อิธ ยํ ยํ ปุพฺเพ อวุตฺตํ ตํ ตเทว วณฺณยิสฺสาม. วจตฺตนฺติ เสตวจํ. นิสทํ นิสทโปตกนฺติ ปิสนสิลา จ ปิสนโปโต จ. ผคฺควนฺติ ลตาชาติ. นตฺตมาลนฺติ กรญฺชํ. หิงฺคุหิงฺคุชตุหิงฺคุสิปาฏิกา หิงฺคุชาติโยเยว. ตกตกปตฺติตกปณฺณิโย ลาขาชาติโย. २६३. मूळ औषधी (मूलभेसज्ज) इत्यादींचा निर्णय देखील खुद्दक-वण्णना (लहान नियमांचे स्पष्टीकरण) मध्ये सांगितलेलाच आहे. म्हणून, येथे जे जे पूर्वी सांगितले गेले नाही, केवळ त्याचेच स्पष्टीकरण आम्ही करू. "वचत्तं" म्हणजे पांढऱ्या रंगाचे वच (वेखंड). "निसदं निसदपोतकं" म्हणजे पाटा (औषध वाटण्याचा दगड) आणि वरवंटा (वाटण्याचा लहान दगड). "फग्गवं" म्हणजे एका प्रकारची वेल (लताजाती). "नत्तमालं" म्हणजे करंज. "हिंगु, हिंगुजतु, हिंगुसिपाटिका" हे हिंगाचेच प्रकार आहेत. "तकतक, पत्तितक, पण्णिय" हे लाखेचेच (लाख) प्रकार आहेत. สามุทฺทนฺติ สมุทฺทตีเร วาลุกา วิย สนฺติฏฺฐติ. กาฬโลณนฺติ ปกติโลณํ. สินฺธวนฺติ เสตวณฺณํ ปพฺพเต อุฏฺฐหติ. อุพฺภิทนฺติ ภูมิโต องฺกุรํ อุฏฺฐหติ. พิลนฺติ ทพฺพสมฺภาเรหิ สทฺธึ ปจิตํ, ตํ รตฺตวณฺณํ. "सामुद्दं" म्हणजे जे मीठ समुद्राच्या किनाऱ्यावर वाळूसारखे साचते. "काळलोणं" म्हणजे नैसर्गिक काळे मीठ (जे प्रक्रिया न केलेले असते). "सिंधवं" (सेंधव मीठ) म्हणजे जे पांढऱ्या रंगाचे असून पर्वतावर (सिंधू पर्वतावर) आढळते. "उब्भिदं" म्हणजे जे मीठ जमिनीतून अंकुराप्रमाणे वर येते. "बिळं" (बिडलोण) म्हणजे जे विविध द्रव्यांसह शिजवून तयार केले जाते आणि ते तांबड्या रंगाचे असते. ๒๖๔-๖. กาโย วา ทุคฺคนฺโธติ กสฺสจิ อสฺสาทีนํ วิย กายคนฺโธ โหติ, ตสฺสาปิ สิรีสโกสุมฺพาทิจุณฺณานิ วา คนฺธจุณฺณานิ วา สพฺพานิ วฏฺฏนฺติ. ฉกณนฺติ โคมยํ. รชนนิปฺปกฺกนฺติ รชนกสฏํ. ปากติกจุณฺณมฺปิ โกฏฺเฏตฺวา อุทเกน เตเมตฺวา นฺหายิตุํ วฏฺฏติ; เอตมฺปิ รชนนิปฺปกฺกสงฺเขปเมว คจฺฉติ. २६४-६. "कायो वा दुग्गन्धो" म्हणजे ज्याच्या शरीराचा वास घोड्यासारखा दुर्गंधीयुक्त असतो, अशा भिक्खूसाठी शिरीष (शिरस), कुसुंभ इत्यादींचे चूर्ण किंवा सुगंधी चूर्ण, हे सर्व वापरणे योग्य आहे. "छकणं" म्हणजे शेण. "रजननिप्पक्कं" म्हणजे रंगवण्याच्या द्रव्याचा उरलेला चोथा (रंग गाळल्यानंतर उरलेला भाग). साधे चूर्ण देखील कुटून, पाण्यात भिजवून स्नान करण्यासाठी वापरणे योग्य आहे; हे देखील शिजवलेल्या रंगाच्या चूर्णाच्या श्रेणीतच समाविष्ट होते. อามกมํสญฺจ [Pg.373] ขาทิ อามกโลหิตญฺจ ปิวีติ น ตํ ภิกฺขุ ขาทิ น ปิวิ, อมนุสฺโส ขาทิตฺวา จ ปิวิตฺวา จ ปกฺกนฺโต, เตน วุตฺตํ – ‘‘ตสฺส โส อมนุสฺสิกาพาโธ ปฏิปฺปสฺสมฺภี’’ติ. "आमकमांसञ्च खादि आमकलोहितञ्च पिवी" (कच्चे मांस खाल्ले आणि कच्चे रक्त प्यायले) याचा अर्थ असा नाही की त्या भिक्खूने ते खाल्ले किंवा प्यायले, तर त्यांच्या शरीरात शिरलेल्या अमनुष्याने (पिशाचाने) ते खाल्ले व प्यायले आणि तो निघून गेला. म्हणूनच संगीतिकारांनी (धम्म संगीती करणाऱ्यांनी) म्हटले आहे - "तस्स सो अमनुस्सिकाबाधो पटिप्पस्सम्भी" (त्यामुळे त्याचा तो अमनुष्यजन्य आजार शांत झाला). อญฺชนนฺติ สพฺพสงฺคาหิกวจนเมตํ. กาฬญฺชนนฺติ เอกา อญฺชนชาติ. รสญฺชนํ นานาสมฺภาเรหิ กตํ. โสตญฺชนนฺติ นทีโสตาทีสุ อุปฺปชฺชนกํ อญฺชนํ. เครุโก นาม สุวณฺณเครุโก. กปลฺลนฺติ ทีปสิขโต คหิตมสิ. อญฺชนูปปึสเนหีติ อญฺชเนน สทฺธึ เอกโต ปึสิตพฺเพหิ, น หิ กิญฺจิ อญฺญนูปปึสนํ น วฏฺฏติ. จนฺทนนฺติ โลหิตจนฺทนาทิกํ ยํกิญฺจิ. ตคราทีนิ ปากฏานิ, อญฺญานิปิ นีลุปฺปลาทีนิ วฏฺฏนฺติเยว. "अञ्जनं" (अंजन) हा शब्द सर्व प्रकारच्या काजळांचा/अंजनांचा समावेश करणारा व्यापक शब्द आहे. "काळञ्जनं" म्हणजे एका प्रकारचे काळे अंजन. "रसञ्जनं" म्हणजे विविध द्रव्यांपासून बनवलेले अंजन. "सोतञ्जनं" म्हणजे नदीच्या प्रवाहात इत्यादी ठिकाणी उत्पन्न होणारे अंजन. "गेरुको" म्हणजे सुवर्णगेरू (सोन्यासारखा पिवळसर गेरू). "कपालं" म्हणजे दिव्याच्या ज्योतीपासून घेतलेली काजळी (मषी). "अञ्जनূপपिंसनेहि" म्हणजे अंजनासोबत एकत्र वाटून घेण्याचे औषध; कारण अंजनासोबत वाटून घेण्याचे कोणतेही औषध अयोग्य आहे असे नाही, तर ते योग्यच आहे. "चन्दनं" म्हणजे लाल चंदनासारखे कोणतेही चंदन. "तगर" इत्यादी प्रसिद्ध आहेत. याशिवाय नीलकमळ (नीलुप्पल) इत्यादी देखील योग्यच आहेत. อฏฺฐิมยนฺติ มนุสฺสฏฺฐึ ฐเปตฺวา อวเสสอฏฺฐิมยํ. ทนฺตมยนฺติ หตฺถิทนฺตาทิสพฺพทนฺตมยํ. วิสาณมเยปิ อกปฺปิยํ นาม นตฺถิ, นฬมยาทโย เอกนฺตกปฺปิยาเยว. สลากฏฺฐานิยนฺติ ยตฺถ สลากํ โอทหนฺติ, ตํ สุสิรทณฺฑกํ วา ถวิกํ วา อนุชานามีติ อตฺโถ. อํสพทฺธโกติ อญฺชนิตฺถวิกาย อํสพทฺธโก. ยมกนตฺถุกรณินฺติ สมโสตาหิ ทฺวีหิ ปนาฬิกาหิ เอกํ นตฺถุกรณึ. "अट्ठिमयं" म्हणजे मानवी हाड वगळता इतर प्राण्यांच्या हाडांपासून बनवलेली अंजनाची डबी. "दन्तमयं" म्हणजे हत्तीच्या दातासारख्या (हस्तिदंत) कोणत्याही दातापासून बनवलेली डबी. शिंगापासून बनवलेल्या डबीत देखील काही अयोग्य (अकप्पिय) नाही. नळ (वेळू/बांबू) इत्यादींपासून बनवलेल्या डब्या पूर्णपणे योग्यच (एकन्तकप्पिय) आहेत. "सलाकट्ठानीय" म्हणजे ज्या ठिकाणी अंजन घालण्याची सळई (सलाका) ठेवली जाते; ती पोकळ काठी किंवा लहान पिशवी वापरण्यास मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. "अंसबद्धको" म्हणजे अंजन ठेवण्याच्या पिशवीची खांद्याला अडकवण्याची दोरी (खांद्याचा पट्टा). "यमकनत्थुकरणिं" म्हणजे दोन्ही नाकपुड्यांमध्ये समान प्रमाणात औषध सोडण्यासाठी दोन नळ्या असलेले एकच नस्ययंत्र (नत्थुकरणि). ๒๖๗. อนุชานามิ ภิกฺขเว เตลปากนฺติ ยํกิญฺจิ เภสชฺชปกฺขิตฺตํ สพฺพํ อนุญฺญาตเมว โหติ. อติปกฺขิตฺตมชฺชานีติ อติวิย ขิตฺตมชฺชานิ; พหุํ มชฺชํ ปกฺขิปิตฺวา โยชิตานีติ อตฺโถ. २६७. "अनुजानामि भिक्खवे तेलपाकं" म्हणजे औषध टाकून शिजवलेले कोणतेही तेल वापरण्यास अनुमती दिलेलीच आहे. "अतिपक्खित्तमज्जानि" म्हणजे ज्यामध्ये अतिप्रमाणात मद्य टाकले गेले आहे; खूप जास्त मद्य टाकून तयार केलेले औषध, असा अर्थ आहे. องฺควาโตติ หตฺถปาเท วาโต. สมฺภารเสทนฺติ นานาวิธปณฺณภงฺคเสทํ. มหาเสทนฺติ มหนฺตํ เสทํ; โปริสปฺปมาณํ อาวาฏํ องฺคารานํ ปูเรตฺวา ปํสุวาลิกาทีหิ ปิทหิตฺวา ตตฺถ นานาวิธานิ วาตหรณปณฺณานิ สนฺถริตฺวา เตลมกฺขิเตน คตฺเตน ตตฺถ นิปชฺชิตฺวา สมฺปริวตฺตนฺเตน สรีรํ เสเทตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. ภงฺโคทกนฺติ นานาปณฺณภงฺคกุถิตํ อุทกํ; เตหิ ปณฺเณหิ จ อุทเกน จ สิญฺจิตฺวา สิญฺจิตฺวา เสเทตพฺโพ. อุทกโกฏฺฐกนฺติ อุทกโกฏฺเฐ จาฏึ วา โทณึ วา อุณฺโหทกสฺส ปูเรตฺวา ตตฺถ ปวิสิตฺวา เสทกมฺมกรณํ อนุชานามีติ อตฺโถ. "अङ्गवातो" म्हणजे हात आणि पायांमधील वायूचा विकार. "सम्भारसेदं" म्हणजे विविध प्रकारच्या पानांच्या उकळलेल्या काढ्याने वाफ देणे (स्वेदन). "महासेदं" म्हणजे मोठा स्वेद (वाफ देणे); माणसाच्या उंचीएवढा खड्डा कोळशांनी भरून, तो माती व वाळूने झाकून, त्यावर वायूचा नाश करणारी विविध पाने पसरून, अंगाला तेल लावून त्यावर झोपून आणि कूस बदलत शरीराला वाफ देण्यास मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. "भङ्गोदकं" म्हणजे विविध पानांनी उकळलेले पाणी; त्या पानांनी आणि गरम पाण्याने वारंवार सिंचन करून वाफ दिली पाहिजे. "उदककोट्ठकं" म्हणजे स्नानगृहात (उदककोट्ठ) रांजण किंवा कुंड गरम पाण्याने भरून, त्यात उतरून वाफ घेण्यास मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. ปพฺพวาโต [Pg.374] โหตีติ ปพฺเพ ปพฺเพ วาโต วิชฺฌติ. โลหิตํ โมเจตุนฺติ สตฺถเกน โลหิตํ โมเจตุํ. ปชฺชํ อภิสงฺขริตุนฺติ เยน ผาลิตปาทา ปากติกา โหนฺติ; ตํ นาฬิเกราทีสุ นานาเภสชฺชานิ ปกฺขิปิตฺวา ปชฺชํ อภิสงฺขริตุํ; ปาทานํ สปฺปายเภสชฺชํ ปจิตุนฺติ อตฺโถ. ติลกกฺเกน อตฺโถติ ปิฏฺเฐหิ ติเลหิ อตฺโถ. กพฬิกนฺติ วณมุเข สตฺตุปิณฺฑํ ปกฺขิปิตุํ. สาสปกุฑฺเฑนาติ สาสปปิฏฺเฐน. วฑฺฒมํสนฺติ อธิกมํสํ อาณิ วิย อุฏฺฐหติ. โลณสกฺขริกาย ฉินฺทิตุนฺติ ขุเรน ฉินฺทิตุํ. วิกาสิกนฺติ เตลรุนฺธนปิโลติกํ. สพฺพํ วณปฏิกมฺมนฺติ ยํกิญฺจิ วณปริกมฺมํ นาม อตฺถิ; สพฺพํ อนุชานามีติ อตฺโถ. "पब्बवातो होती" म्हणजे प्रत्येक सांध्यामध्ये वायूमुळे वेदना होणे (टोचल्यासारखे वाटणे). "लोहितं मोचेतुं" म्हणजे लहान शस्त्राने (सत्थक) रक्त काढणे (रक्तमोक्षण). "पज्जं अभिसङ्खरितुं" म्हणजे ज्या औषधाने फाटलेले पाय पूर्ववत बरे होतात; नारळ इत्यादींमध्ये विविध औषधे टाकून ते औषध तयार करणे, म्हणजेच पायांसाठी योग्य औषध शिजवणे, असा अर्थ आहे. "तिलकक्केन अत्तो" म्हणजे वाटलेल्या तिळांची गरज असणे. "कवळिकं" म्हणजे जखमेच्या तोंडावर पिठाचा गोळा ठेवणे. "सासपकुड्डेना" म्हणजे मोहरीच्या पिठाने. "वड्ढमंसं" म्हणजे वाढलेले अतिरिक्त मांस जे खुंटीसारखे वर येते. "लोणसक्खरिकाय छिन्दितुं" म्हणजे वस्तऱ्याने (खुर) ते कापून टाकणे. "विकासिकं" म्हणजे तेल रोखण्यासाठी कापडाची पट्टी (विकामिका). "सब्बं वणपटिकम्मं" म्हणजे जखमेवर करावयाचे जे काही उपचार (वणपरिकम्म) आहेत, त्या सर्वांना मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. ๒๖๘. สามํ คเหตฺวาติ อิทํ น เกวลํ สปฺปทฏฺฐสฺเสว, อญฺญสฺมิมฺปิ ทฏฺฐวิเส สติ สามํ คเหตฺวา ปริภุญฺชิตพฺพํ; อญฺเญสุ ปน การเณสุ ปฏิคฺคหิตเมว วฏฺฏติ. กโต น ปุน ปฏิคฺคเหตพฺโพติ สเจ ภูมิปฺปตฺโต, ปฏิคฺคเหตพฺโพ; อปฺปตฺตํ ปน คเหตุํ วฏฺฏติ. २६८. "सामं गहेत्वा" (स्वतः घेऊन) म्हणजे हे (महाविकट औषध) केवळ सर्पदंश झालेल्यानेच वापरावे असे नाही, तर इतर कोणत्याही विषारी प्राण्याने चावा घेतला असता स्वतः घेऊन ते वापरावे; परंतु इतर कारणांसाठी मात्र दुसऱ्याने दिलेले (पटिग्गहित) औषधच योग्य ठरते. "कतो न पुन पटिग्गहेतब्बो" म्हणजे जर मलमूत्र (गूथ) जमिनीवर पडले असेल किंवा भांड्यात पडले असेल, तर ते दुसऱ्याकडून ग्रहण करावे; परंतु जर ते जमिनीवर पडले नसेल, तर ते स्वतः घेण्यास हरकत नाही. ๒๖๙. ฆรทินฺนกาพาโธติ วสีกรณปานกสมุฏฺฐิตโรโค. สีตาโลฬินฺติ นงฺคเลน กสนฺตสฺส ผาเล ลคฺคมตฺติกํ อุทเกน อาโลเฬตฺวา ปาเยตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. २६९. "घरदिन्नकाबाधो" म्हणजे वशीकरणासाठी दिलेल्या पेयामुळे उद्भवलेला आजार. "सीतालोळिं" म्हणजे नांगरणाऱ्याच्या नांगराच्या फाळाला लागलेली माती पाण्यात विरघळवून पाजण्यास मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. ทุฏฺฐคหณิโกติ วิปนฺนคหณิโก; กิจฺเฉน อุจฺจาโร นิกฺขมตีติ อตฺโถ. อามิสขารนฺติ สุกฺโขทนํ ฌาเปตฺวา ตาย ฉาริกาย ปคฺฆริตํ ขาโรทกํ. มุตฺตหรีตกนฺติ โคมุตฺตปริภาวิตํ หรีตกํ. อภิสนฺนกาโยติ อุสฺสนฺนโทสกาโย. อจฺฉกญฺชิยนฺติ ตณฺฑุโลทกมณฺโฑ. อกฏยุสนฺติ อสินิทฺโธ มุคฺคปจิตปานีโย. กฏากฏนฺติ โสว โธตสินิทฺโธ. ปฏิจฺฉาทนีเยนาติ มํสรเสน. "दुट्ठगहणिको" म्हणजे बिघडलेली पचनशक्ती (ग्रहणी रोग) असलेला; ज्याला कष्टाने शौचास होते, असा अर्थ आहे. "आमिसखारं" म्हणजे सुका भात जाळून त्याच्या राखेतून गाळलेले खारट पाणी (क्षारोदक). "मुत्तहरीतकं" म्हणजे गोमूत्रात भिजवलेले हिरडे (हरीतकी). "अभिसन्नकायो" म्हणजे शरीरात दोषांचे (वात-पित्त-कफ) प्रमाण वाढलेले शरीर. "अच्छकञ्जियं" म्हणजे तांदूळ धुवून काढलेले स्वच्छ पाणी (पेज). "अकटयुसं" म्हणजे तेल-तूप न घालता शिजवलेले मूग डाळीचे वरण (कढण). "कटाकटं" म्हणजे स्वच्छ धुवून आणि तेल-तूप घालून शिजवलेले तेच मुगाचे वरण. "पटिच्छादनीयेन" म्हणजे मांसाच्या रसाने (सूप). คุฬาทิอนุชานนกถา गुळादिअनुजाननकथा (गुळ इत्यादींच्या वापरास अनुमती देण्याविषयीची कथा). ๒๗๒. สเจ ภิกฺขเว ปกฺกาปิ มุคฺคา ชายนฺตีติ ปกฺกา มุคฺคา สเจปิ ชายนฺติ, ยถาสุขํ ปริภุญฺชิตพฺพา. ปกฺกตฺตา หิ เต กปฺปิยา เอว. २७२. "सचे भिक्खवे पक्कापि मुग्गा जायन्ती" म्हणजे "हे भिक्खूंनो, शिजवलेले मूग जरी उगवले, तरी ते आपल्या इच्छेनुसार आनंदाने खावेत. कारण शिजवलेले असल्यामुळे ते योग्य (कप्पिय) च आहेत." ๒๗๔. อนฺโตวุตฺถนฺติ [Pg.375] อกปฺปิยกุฏิยํ วุตฺถํ. สามํ ปกฺกนฺติ เอตฺถ ยํกิญฺจิ อามิสํ ภิกฺขุโน ปจิตุํ น วฏฺฏติ. สเจปิสฺส อุณฺหยาคุยา สุลสิปณฺณานิ วา สิงฺคิเวรํ วา โลณํ วา ปกฺขิปนฺติ, ตมฺปิ จาเลตุํ น วฏฺฏติ, ‘‘ยาคุํ นิพฺพาเปมี’’ติ ปน จาเลตุํ วฏฺฏติ. อุตฺตณฺฑุลภตฺตํ ลภิตฺวาปิ ปิทหิตุํ น วฏฺฏติ. สเจ ปน มนุสฺสา ปิทหิตฺวาว เทนฺติ, วฏฺฏติ; ‘‘ภตฺตํ วา มา นิพฺพายตู’’ติ ปิทหิตุํ วฏฺฏติ. ขีรตกฺกาทีสุ ปน สกึ กุถิเตสุ อคฺคึ ทาตุํ วฏฺฏติ, ปุนปากสฺส อนุญฺญาตตฺตา. อุกฺกปิณฺฑกาปิ ขาทนฺตีติ พิฬามูสิกโคธามงฺคุสา ขาทนฺติ. ทมกาติ วิฆาสาทา. २७४. अन्तोवुत्थं म्हणजे अकप्पिय कुटीत (विहारात) ठेवलेले. सामं पक्कं या संदर्भात भिक्खूने कोणतेही आमिष (अन्न) स्वतः शिजवणे योग्य नाही. जर त्याच्या गरम यागूमध्ये लोकांनी तुळशीची पाने, आले किंवा मीठ टाकले, तर ते ढवळणे देखील योग्य नाही; परंतु 'मी यागू थंड करतो' अशा विचाराने ढवळणे योग्य आहे. अर्धवट शिजलेला भात मिळाला तरी पात्र झाकणे योग्य नाही. परंतु जर लोकांनी ते झाकून दिले तर चालते; किंवा 'भात थंड होऊ नये' या विचाराने झाकणे योग्य आहे. दूध, ताक इत्यादी एकदा उकळल्यानंतर पुन्हा अग्नी देणे योग्य आहे, कारण पुन्हा शिजवण्यास अनुमती दिली आहे. उक्कपिण्डकापि खादन्ति म्हणजे मांजर, उंदीर, घोरपड आणि मुंगूस खातात. दमका म्हणजे उष्टे किंवा उरलेले अन्न खाणारे. ๒๗๖. ตโต นีหฏนฺติ ยตฺถ นิมนฺติตา ภุญฺชนฺติ, ตโต นีหฏํ. २७६. ततो नीहटं म्हणजे जेथे निमंत्रित केले असता भोजन करतात, तेथून बाहेर काढलेले (खाद्य). ๒๗๘. วนฏฺฐํ โปกฺขรฏฺฐนฺติ วเน เจว ปทุมินิคจฺเฉ จ ชาตํ. อพีชนฺติ ตรุณผลํ, ยสฺส พีชํ น องฺกุรํ ชเนติ. นิพฺพฏฺฏพีชนฺติ พีชํ นิพฺพฏฺเฏตฺวา อปเนตฺวา ปริภุญฺชิตพฺพกํ อมฺพปนสาทิ. २७८. वनट्ठं पोक्खरेट्ठं म्हणजे वनात आणि कमळाच्या झाडीत उगवलेले. अबीजं म्हणजे कोवळे फळ, ज्याचे बी अंकुर निर्माण करत नाही. निब्बट्टबीजं म्हणजे बी काढून टाकून उपभोग घेण्यायोग्य आंबा, फणस इत्यादी फळे. ๒๗๙. ทุโรปโย วโณติ ทุกฺเขน รุหติ, ทุกฺเขน ปากติโก โหตีติ อตฺโถ. ทุปฺปริหารํ สตฺถนฺติ สมฺพาเธ ทุกฺเขน สตฺถํ ปริหเรยฺยํ. สตฺถกมฺมํ วา วตฺถิกมฺมํ วาติ ยถาปริจฺฉินฺเน โอกาเส เยน เกนจิ สตฺเถน วา สูจิยา วา กณฺฏเกน วา สตฺติกาย วา ปาสาณสกฺขลิกาย วา นเขน วา ฉินฺทนํ วา ผาลนํ วา วิชฺฌนํ วา เลขนํ วา น กาตพฺพํ; สพฺพญฺเหตํ สตฺถกมฺมเมว โหติ. เยน เกนจิ ปน จมฺเมน วา วตฺเถน วา วตฺถิปีฬนมฺปิ น กาตพฺพํ; สพฺพญฺเหตํ วตฺถิกมฺมเมว โหติ. เอตฺถ จ สมฺพาธสฺส สามนฺตา ทฺวงฺคุลาติ อิทํ สตฺถกมฺมํเยว สนฺธาย วุตฺตํ. วตฺถิกมฺมํ ปน สมฺพาเธเยว ปฏิกฺขิตฺตํ. ตตฺถ ปน ขารํ อาทาตุํ เยน เกนจิ รชฺชุเกน วา พนฺธิตุํ วฏฺฏติ. ยทิ เตน ฉิชฺชติ, สุจฺฉินฺนํ. อณฺฑวุฑฺฒิโรเคปิ สตฺถกมฺมํ น วฏฺฏติ, ตสฺมา อณฺฑํ ผาเลตฺวา พีชานิ อุทฺธริตฺวา ‘‘อโรคํ กริสฺสามี’’ติ น กตฺตพฺพํ. อคฺคิตาปนเภสชฺชาลิมฺปเนสุ ปน ปฏิกฺเขโป นตฺถิ. วจฺจมคฺเค เภสชฺชมกฺขิตา อาทานวฏฺฏิ วา เวฬุนาฬิกา วา วฏฺฏติ, ยาย ขารกมฺมํ วา กโรนฺติ, เตลํ วา ปเวเสนฺติ. २७९. दुरोपयो वणो म्हणजे कष्टाने भरणारी जखम, कष्टाने पूर्ववत होणारी जखम असा अर्थ आहे. दुप्परीहारं सत्थं म्हणजे गुप्तभागात कष्टाने शस्त्र चालवावे. सत्थकम्मं वा वत्थिकम्मं वा म्हणजे निश्चित केलेल्या जागेवर कोणत्याही शस्त्राने, सुईने, काट्याने, लहान भाल्याने, दगडाच्या कपचीने किंवा नखाने कापणे, चिरणे, टोचणे किंवा खरवडणे करू नये; हे सर्व शस्त्रकर्मच (शस्त्रक्रिया) आहे. कोणत्याही चामड्याने किंवा कापडाने वस्ती (मूत्राशय) दाबणे देखील करू नये; हे सर्व वस्तीकर्मच आहे. आणि येथे 'गुप्तभागाच्या सभोवताली दोन बोटे' हे केवळ शस्त्रकर्माचा संदर्भ देऊन सांगितले आहे. वस्तीकर्म मात्र गुप्तभागातच निषिद्ध आहे. परंतु तेथे क्षार लावण्यासाठी किंवा कोणत्याही दोरीने बांधण्यासाठी योग्य आहे. जर त्याने कापले गेले, तर ते नीट कापले गेले असे होते. अंडवृद्धीच्या आजारातही शस्त्रकर्म योग्य नाही, म्हणून अंडकोष चिरून, बीजे बाहेर काढून 'मी निरोगी करीन' असे करू नये. शेकणे (अग्नीने तापवणे) आणि औषध लावणे याला मात्र मनाई नाही. गुदद्वारात औषध लावलेली वात किंवा बांबूची नळी वापरणे योग्य आहे, ज्याद्वारे क्षारकर्म करतात किंवा तेल आत सोडतात. ๒๘๐. ปวตฺตมํสนฺติ [Pg.376] มตสฺส มํสํ. มาฆาโตติ ตํ ทิวสํ น ลพฺภา เกนจิ กิญฺจิ ชีวิตา โวโรเปตุํ. โปตฺถนิกนฺติ มํสจฺเฉทนสตฺถกํ วุจฺจติ. กิมฺปิมายาติ กิมฺปิ อิมาย. น ภควา อุสฺสหตีติ น ภควา สกฺโกติ. ยตฺร หิ นามาติ ยสฺมา นาม. ปฏิเวกฺขีติ วีมํสิ; ปฏิปุจฺฉีติ วุตฺตํ โหติ. อปฺปฏิเวกฺขิตฺวาติ อปฺปฏิปุจฺฉิตฺวา. สเจ ปน อสุกมํสนฺติ ชานาติ, ปฏิปุจฺฉนกิจฺจํ นตฺถิ, อชานนฺเตน ปน ปุจฺฉิตฺวาว ขาทิตพฺพํ. २८०. पवत्तमांसं म्हणजे मृत प्राण्याचे मांस. माघातो म्हणजे त्या दिवशी कोणालाही कोणत्याही प्राण्याचा जीव घेण्याची परवानगी नसते. पोत्थनिकं म्हणजे मांस कापण्याचा लहान सुरा (चाकू) याला म्हणतात. किम्पिमाय म्हणजे हिच्याकडून काहीही. न भगवा उस्स हती म्हणजे भगवान असमर्थ आहेत (करू शकत नाहीत). यत्र हि नाम म्हणजे ज्या अर्थी. पटिवेक्खी म्हणजे तपासणी केली; विचारपूस केली असा अर्थ आहे. अप्पटिवेक्खित्वा म्हणजे विचारपूस न करता. परंतु जर हे अमुक मांस आहे हे माहीत असेल, तर विचारपूस करण्याची गरज नाही; न जाणणाऱ्या भिक्खूने मात्र विचारपूस करूनच खावे. หตฺถิมํสาทิปฏิกฺเขปกถา हत्थिमांसादिपटिक्खेपकथा (हत्तीचे मांस इत्यादींच्या निषेधाची कथा). ๒๘๑. สุนขมํสนฺติ เอตฺถ อรญฺญโกกา นาม สุนขสทิสา โหนฺติ, เตสํ มํสํ วฏฺฏติ. โย ปน คามสุนขิยา วา โกเกน โกกสุนขิยา วา คามสุนเขน สํโยคา อุปฺปนฺโน, ตสฺส มํสํ น วฏฺฏติ, โส หิ อุภยํ ภชตีติ. อหิมํสนฺติ กสฺสจิ อปาทกสฺส ทีฆชาติกสฺส มํสํ น วฏฺฏติ. สีหมํสาทีนิ ปากฏาเนว. २८१. सुनखमांसं या संदर्भात 'अरण्यकोक' (रानटी लांडगे) नावाचे कुत्र्यासारखे प्राणी असतात, त्यांचे मांस योग्य आहे. परंतु जो गावठी कुत्री आणि लांडगा यांच्या संयोगातून किंवा लांडगी आणि गावठी कुत्रा यांच्या संयोगातून जन्माला आला आहे, त्याचे मांस योग्य नाही, कारण तो दोन्ही बाजूंचे गुणधर्म घेतो. अहिमांसं म्हणजे कोणत्याही पाय नसलेल्या लांब शरीराच्या प्राण्याचे (सापाचे) मांस योग्य नाही. सिंहाचे मांस इत्यादींचे (निषिद्ध असणे) उघडच आहे. เอตฺถ จ มนุสฺสมํสํ สชาติตาย ปฏิกฺขิตฺตํ, หตฺถิอสฺสมํสํ ราชงฺคตาย, สุนขมํสญฺจ อหิมํสญฺจ ปฏิกูลตาย, สีหมํสาทีนิ ปญฺจ อตฺตโน อนุปทฺทวตฺถายาติ. อิเมสํ มนุสฺสาทีนํ ทสนฺนํ มํสมฺปิ อฏฺฐิปิ โลหิตมฺปิ จมฺมมฺปิ โลมมฺปิ สพฺพํ น วฏฺฏติ, ยํกิญฺจิ ญตฺวา วา อญตฺวา วา ขาทนฺตสฺส อาปตฺติเยว. ยทา ชานาติ, ตทา เทเสตพฺพา. ‘‘อปุจฺฉิตฺวา ขาทิสฺสามี’’ติ คณฺหโต ปฏิคฺคหเณ ทุกฺกฏํ, ‘‘ปุจฺฉิตฺวา ขาทิสฺสามี’’ติ คณฺหโต อนาปตฺติ. อุทฺทิสฺส กตํ ปน ชานิตฺวา ขาทนฺตสฺเสว อาปตฺติ, ปจฺฉา ชานนฺโต อาปตฺติยา น กาเรตพฺโพติ. आणि येथे मानवी मांस हे सजातीय (स्वतःच्याच जातीचे) असल्यामुळे निषिद्ध केले आहे; हत्ती आणि घोड्याचे मांस हे राजाचे अंग (राजकीय वाहन) असल्यामुळे निषिद्ध केले आहे; कुत्र्याचे आणि सापाचे मांस हे घृणास्पद असल्यामुळे निषिद्ध केले आहे; सिंहाचे मांस इत्यादी पाच प्रकारचे मांस स्वतःच्या सुरक्षेसाठी निषिद्ध केले आहे. या मनुष्य इत्यादी दहा प्रकारच्या प्राण्यांचे मांस, हाडे, रक्त, चामडे आणि केस हे सर्व काही अयोग्य आहे. जाणून किंवा न जाणून यांपैकी काहीही खाणाऱ्याला आपत्तीच (दोषच) होते. जेव्हा समजेल, तेव्हा देशना (प्रायश्चित्त) करावी. 'न विचारता खाईन' अशा विचाराने घेणाऱ्याला ते स्वीकारताना दुक्कट (दुष्कृत) दोष होतो. 'विचारून खाईन' अशा विचाराने घेणाऱ्याला दोष होत नाही. उद्देशून (आपल्यासाठीच मारले आहे असे) केलेले मांस जाणून खाणाऱ्यालाच दोष होतो; नंतर समजल्यास त्याला दोषी ठरवू नये. ยาคุมธุโคฬกาทิกถา यागुमधुगोळकादिकथा (यागू, मध आणि गुळाचे गोळे इत्यादींची कथा). ๒๘๒. เอกตฺตโกติ เอกโก, นตฺถิ เม ทุติโยติ อตฺโถ. ปหูตํ ยาคุญฺจ มธุโคฬกญฺจ ปฏิยาทาเปตฺวาติ โส กิร สตสหสฺสํ วยํ กตฺวา ปฏิยาทาเปสิ. อนุโมทนาคาถาปริโยสาเน ‘‘ปตฺถยตํ อิจฺฉต’’นฺติ ปทานํ ‘‘อลเมว ทาตุ’’นฺติ อิมินา สมฺพนฺโธ. สเจ ปน ‘‘ปตฺถยตา อิจฺฉตา’’ติ ปาโฐ อตฺถิ, โสเยว คเหตพฺโพ. २८२. एकत्तको म्हणजे एकटाच, 'माझा दुसरा कोणी सोबती नाही' असा अर्थ आहे. पहूतं यागुञ्च मधुगोळकञ्च पटियादापेत्वा म्हणजे भरपूर यागू आणि गुळाचे गोळे तयार करवून; त्याने एक लाख खर्च करून ते तयार करवले होते. अनुमोदनाच्या गाथांच्या शेवटी 'पत्तयतं इच्छतं' या पदांचा 'अलमेव दातुं' या पदाशी संबंध आहे. परंतु जर 'पत्थयता इच्छता' असा पाठ असेल, तर तोच स्वीकारावा. ๒๘๓. โภชฺชยาคุนฺติ ยา ปวารณํ ชเนติ. ยทคฺเคนาติ ยํ อาทึ กตฺวา. สคฺคา เต อารทฺธาติ สคฺคนิพฺพตฺตกปุญฺญํ อุปจิตนฺติ อตฺโถ. ยถาธมฺโม [Pg.377] กาเรตพฺโพติ ปรมฺปรโภชเนน กาเรตพฺโพ, โภชฺชยาคุยา หิ ปวารณา โหตีติ. २८३. भोज्जयागुं म्हणजे जी यागू पवाराणा (भोजन नकारण्याचा नियम) उत्पन्न करते. यदग्गेन म्हणजे ज्या काळापासून सुरुवात करून. सग्गा ते आरद्धा म्हणजे स्वर्गात उत्पन्न करणारे पुण्य त्यांनी गोळा केले आहे असा अर्थ आहे. यथाधम्मो कारेतब्बो म्हणजे नियमानुसार (परंपरभोजन नियमाने) प्रायश्चित्त द्यावे; कारण भोज्य यागूने पवाराणा होते. ๒๘๔. นาหํ ตํ กจฺจานาติ ตสฺมึ กิร อวสิฏฺฐคุเฬ เทวตา สุขุโมชํ ปกฺขิปึสุ, สา อญฺเญสํ ปริณามํ น คจฺฉติ, ตสฺมา เอวมาห. คิลานสฺส คุฬนฺติ ตถารูเปน พฺยาธินา คิลานสฺส ปจฺฉาภตฺตํ คุฬํ อนุชานามีติ อตฺโถ. २८४. नाहं तं कच्चान म्हणजे 'हे कच्यान, मी ते (पचवू शकत नाही)...' कारण त्या उरलेल्या गुळामध्ये देवतांनी सूक्ष्म ओज टाकला होता, तो इतरांच्या शरीरात पचू शकत नाही, म्हणून असे म्हटले. गिलानस्स गुळं म्हणजे अशा प्रकारच्या आजाराने आजारी असलेल्या व्यक्तीला दुपारनंतर गूळ खाण्याची अनुमती देतो असा अर्थ आहे. ปาฏลิคามวตฺถุกถา पाटलिगामवत्थुकथा (पाटलिग्रामच्या घटनेची कथा). ๒๘๕. สพฺพสนฺถรินฺติ ยถา สพฺพํ สนฺถตํ โหติ, เอวํ. २८५. सब्बसन्थरिं म्हणजे ज्याप्रमाणे सर्व काही अंथरले जाते, त्याप्रमाणे. ๒๘๖. สุนิธวสฺสการาติ สุนิโธ จ วสฺสกาโร จ ทฺเว พฺราหฺมณา มคธรญฺโญ มหามตฺตา มหามจฺจา. วชฺชีนํ ปฏิพาหายาติ วชฺชิราชกุลานํ อายมุขปจฺฉินฺทนตฺถํ. วตฺถูนีติ ฆรวตฺถูนิ. จิตฺตานิ นมนฺติ นิเวสนานิ มาเปตุนฺติ ตา กิร เทวตา วตฺถุวิชฺชาปาฐกานํ สรีเร อธิมุจฺจิตฺวา เอวํ จิตฺตานิ นาเมนฺติ. กสฺมา? อมฺหากํ ยถานุรูปํ สกฺการํ กริสฺสนฺตีติ อตฺโถ. ตาวตึเสหีติ โลเก กิร สกฺกํ เทวราชานํ วิสฺสกมฺมญฺจ อุปาทาย ตาวตึสา ปณฺฑิตาติ สทฺโท อพฺภุคฺคโต, เตเนวาห ตาวตึเสหีติ, ตาวตึเสหิ สทฺธึ มนฺเตตฺวา วิย มาเปนฺตีติ อตฺโถ. ยาวตา อริยํ อายตนนฺติ ยตฺตกํ อริยมนุสฺสานํ โอสรณฏฺฐานํ นาม อตฺถิ. ยาวตา วณิปฺปโถติ ยตฺตกํ วาณิชานํ อาภตภณฺฑสฺส ราสิวเสเนว กยวิกฺกยฏฺฐานํ นาม อตฺถิ. อิทํ อคฺคนครนฺติ เตสํ อริยายตนวณิปฺปถานํ อิทํ อคฺคนครํ ภวิสฺสติ. ปุฏเภทนนฺติ ปุฏเภทนฏฺฐานํ โมจนฏฺฐานนฺติ วุตฺตํ โหติ. อคฺคิโต วาติอาทีสุ สมุจฺจยตฺโถ วา สทฺโท. ตตฺร หิ เอกสฺส โกฏฺฐาสสฺส อคฺคิโต, เอกสฺส อุทกโต, เอกสฺส อพฺภนฺตรโต, อญฺญมญฺญเภทา อนฺตราโย ภวิสฺสติ. อุฬุมฺปนฺติ ปารคมนตฺถาย อาณิโย อาโกเฏตฺวา กตํ. กุลฺลนฺติ วลฺลิอาทีหิ พนฺธิตฺวา กตํ. २८६. सुनिध आणि वस्सकार म्हणजे सुनिध आणि वस्सकार हे दोन ब्राह्मण, जे मगध राजाचे महामात्र (मुख्य मंत्री) होते. 'वज्जीनां पटिबाहय' म्हणजे वज्जी राजकुलांच्या उत्पन्नाचे मार्ग रोखण्यासाठी. 'वत्थूनि' म्हणजे घराच्या जागा (गृहवास्तू). 'चित्तानि नमन्ति निवेसनानि मापेतुं' म्हणजे त्या देवता वास्तूविद्या जाणणाऱ्यांच्या शरीरात प्रवेश करून त्यांची मने वळवतात. कशासाठी? 'ते आमचा योग्य आदर-सत्कार करतील' या उद्देशाने. 'तावतींसेहि' म्हणजे जगात देवराज शक्र आणि विश्वकर्मा यांना धरून 'तावतींस देव अत्यंत बुद्धिमान आहेत' अशी कीर्ती पसरली आहे, म्हणूनच भगवंतांनी 'तावतींस देवांप्रमाणे' असे म्हटले आहे. म्हणजे तावतींस देवांसोबत सल्लामसलत करून निर्माण केल्यासारखे ते निर्माण करतात, असा अर्थ आहे. 'यावता अरियं आयतनं' म्हणजे जिथपर्यंत आर्य मनुष्यांचे निवासस्थान आहे. 'यावता वणिप्पथो' जिथपर्यंत व्यापाऱ्यांच्या आणलेल्या मालाच्या साठ्यामुळे खरेदी-विक्रीचे ठिकाण आहे. 'इदं अग्गनगरं' म्हणजे त्या आर्य निवासस्थानांमध्ये आणि व्यापार मार्गांमध्ये हे पाटलिपुत्र सर्वश्रेष्ठ शहर (अग्रनगर) होईल. 'पुटभेदनं' म्हणजे मालाचे गाठोडे सोडण्याचे ठिकाण (व्यापाराचे केंद्र) होईल, असे सांगितले आहे. 'अग्गितो वा' इत्यादींमध्ये 'वा' (किंवा) हा शब्द समुच्चय दर्शवणारा आहे. कारण तिथे एका भागाला अग्नीपासून, एका भागाला पाण्यापासून आणि एका भागाला अंतर्गत आपापसातील फुटीमुळे धोका निर्माण होईल. 'उळुम्पं' म्हणजे पलीकडे जाण्यासाठी लाकडी ओंडके किंवा फळ्या ठोकून तयार केलेला तराफा. 'कुल्लं' म्हणजे वेली इत्यादींनी बांधून तयार केलेला बांबूचा तराफा. อณฺณวนฺติ สพฺพนฺติเมน ปริจฺเฉเทน โยชนมตฺตํ คมฺภีรสฺส จ ปุถุลฺลสฺส จ อุทกฏฺฐานสฺเสตํ อธิวจนํ. สรนฺติ อิธ นที อธิปฺเปตา. อิทํ วุตฺตํ โหติ – เย [Pg.378] คมฺภีรํ วิตฺถตํ ตณฺหาสรํ ตรนฺติ, เต อริยมคฺคสงฺขาตํ เสตุํ กตฺวาน วิสชฺช ปลฺลลานิ อนามสิตฺวาว อุทกภริตานิ นินฺนฏฺฐานานิ; อยํ ปน อิทํ อปฺปมตฺตกํ อุทกํ อุตฺตริตุกาโมปิ กุลฺลญฺหิ ปริชโน พนฺธติ, พุทฺธา ปน พุทฺธสาวกา จ วินา เอว กุลฺเลน ติณฺณา เมธาวิโน ชนาติ. 'अण्णवं' हे अत्यंत अंतिम मर्यादेने एक योजन खोल आणि रुंद अशा पाण्याच्या जलाशयाचे नाव आहे. 'सरन्ति' येथे 'नदी' असा अर्थ अभिप्रेत आहे. हे सांगितले आहे की - जे खोल आणि विस्तीर्ण अशा तृष्णारूपी नदीला पार करतात, ते आर्यमार्गरूपी पूल बांधून, चिखल सोडून आणि पाण्याने भरलेल्या सखल भागांना स्पर्श न करताच पार करतात; परंतु हे सामान्य लोक या थोड्याशा पाण्याला (गंगा नदीला) पार करण्याची इच्छा असूनही तराफा बांधतात, तर बुद्ध आणि बुद्धश्रावक हे प्रज्ञावंत लोक तराफ्याशिवायच पार गेले आहेत. ๒๘๗. อนนุโพธาติ อพุชฺฌเนน. สนฺธาวิตนฺติ ภวโต ภวํ คมนวเสน สนฺธาวิตํ. สํสริตนฺติ ปุนปฺปุนํ คมนวเสน สํสริตํ. มมญฺเจว ตุมฺหากญฺจาติ มยา จ ตุมฺเหหิ จ. อถ วา สนฺธาวิตํ สํสริตนฺติ สนฺธาวนํ สํสรณํ มมญฺเจว ตุมฺหากญฺจ อโหสีติ เอวเมตฺถ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. สํสิตนฺติ สํสริตํ. ภวเนตฺติ สมูหตาติ ภวโต ภวคมนา สนฺธาวนา ตณฺหารชฺชุ สุฏฺฐุ หตา ฉินฺนา อปฺปวตฺติกตา. २८७. 'अननुबोधा' म्हणजे न समजल्यामुळे (अज्ञानामुळे). 'सन्धावितं' म्हणजे एका भवातून दुसऱ्या भवात जाण्याच्या रूपाने सतत धावणे. 'संसरितं' म्हणजे पुन्हा पुन्हा जन्म-मरणाच्या चक्रात फिरणे. 'ममञ्चेव तुम्हाकञ्च' म्हणजे माझ्याद्वारे आणि तुमच्याद्वारे. किंवा 'धावणे आणि संसरण करणे हे माझे आणि तुमचे झाले', असा येथे अर्थ समजला पाहिजे. 'संसितं' म्हणजे संसरण केले. 'भवनित्ती समूहत' म्हणजे एका भवातून दुसऱ्या भवात नेणारी, धावण्यास कारणीभूत असणारी तृष्णारूपी दोरी पूर्णपणे नष्ट केली आहे, तोडली आहे आणि पुन्हा उत्पन्न न होणारी केली आहे. ๒๘๙. นีลาติ อิทํ สพฺพสงฺคาหกํ. นีลวณฺณาติอาทิ ตสฺเสว วิภาคทสฺสนตฺถํ. ตตฺถ น เตสํ ปกติวณฺณา นีลา, นีลวิเลปนานํ วิจิตฺตตาวเสเนตํ วุตฺตํ. ปฏิวฏฺเฏสีติ ปหาเรสิ. สาหารํ ทชฺเชยฺยาถาติ สชนปทํ ทเทยฺยาถ. องฺคุลึ โผเฏสุนฺติ องฺคุลึ จาเลสุํ. อมฺพกายาติ อิตฺถิกาย. โอโลเกถาติ ปสฺสถ. อปโลเกถาติ ปุนปฺปุนํ ปสฺสถ. อุปสํหรถาติ อุปเนถ. อิมํ ลิจฺฉวิปริสํ ตุมฺหากํ จิตฺเตน ตาวตึสปริสํ หรถ, ตาวตึสสฺส สมกํ กตฺวา ปสฺสถาติ อตฺโถ. २८९. 'नीला' हा शब्द सर्व प्रकारच्या निळ्या रंगाचा संग्रह करणारा आहे. 'नीलवण्णा' इत्यादी शब्द त्याच रंगाचे वर्गीकरण दाखवण्यासाठी आहेत. त्यात, त्यांचा नैसर्गिक रंग निळा नव्हता, तर निळ्या रंगाच्या सुगंधी लेपनांच्या विविधतेमुळे असे म्हटले आहे. 'पटिवट्टेसि' म्हणजे धक्का दिला (आघात केला). 'साहारं दज्जेय्याथ' म्हणजे जनपदासह (वैशाली नगर) द्यावे. 'अङ्गुलिं फोटेसुं' म्हणजे बोटे हलवली (चुटकी वाजवली). 'अम्बकाया' म्हणजे स्त्रीने. 'ओलोकेथ' म्हणजे पहा. 'अपलोकेथ' म्हणजे पुन्हा पुन्हा पहा. 'उपसंहरथ' म्हणजे जवळ आणा. या लिच्छवी परिषदेला तुमच्या मनाने तावतींस देवपरिषदेसारखे समजा, तावतींस देवांच्या समान करून पहा, असा अर्थ आहे. สีหเสนาปติวตฺถุอาทิกถา सिंह सेनापती कथेची सुरुवात (प्रारंभिक कथा). ๒๙๐. ธมฺมสฺส จ อนุธมฺมํ พฺยากโรนฺตีติ ภควตา วุตฺตการณสฺส อนุการณํ กเถนฺติ. สหธมฺมิโก วาทานุวาโทติ อปเรหิ วุตฺตการเณน สการโณ หุตฺวา ตุมฺหากํ วาโท วิญฺญุครหิตพฺพํ การณํ โกจิ อปฺปมตฺตโกปิ กึ น อาคจฺฉติ. อิทํ วุตฺตํ โหติ ‘‘กึ สพฺพกาเรนาปิ ตุมฺหากํ วาเท คารยฺหการณํ นตฺถี’’ติ. อนพฺภกฺขาตุกามาติ อภิภวิตฺวา น อาจิกฺขิตุกามา. २९०. 'धम्मस्स च अनुधम्मं ब्याकरोन्ति' म्हणजे भगवंतांनी सांगितलेल्या कारणाला सुसंगत असे कारण ते सांगतात. 'सहधम्मिको वादानुवादो' म्हणजे इतरांनी सांगितलेल्या कारणासह सकारण होऊन तुमचा वाद (प्रतिपादन) विद्वानांकडून निंदनीय ठरेल अशा कोणत्याही अगदी लहान कारणाप्रत तर येत नाही ना? याचा अर्थ असा आहे: 'काय सर्व प्रकारे तुमच्या वादात निंदनीय असे काहीच कारण नाही ना?' 'अनब्भक्खातुकामा' म्हणजे खोटा आरोप न करण्याची इच्छा असणारे (आरोप न करू इच्छिणारे). ๒๙๓. อนุวิจฺจการนฺติ อนุวิทิตฺวา จินฺเตตฺวา ตุลยิตฺวา กาตพฺพํ กโรหีติ วุตฺตํ โหติ. ญาตมนุสฺสานนฺติ โลเก ปากฏานํ. สาธุ โหตีติ [Pg.379] สุนฺทรํ โหติ. ปฏากํ ปริหเรยฺยุนฺติ ปฏากํ อุกฺขิปิตฺวา นคเร โฆสนฺตา อาหิณฺเฑยฺยุํ. กสฺมา? ‘‘เอวํ โน อมฺหากํ มหนฺตภาโว ภวิสฺสตี’’ติ. โอปานภูตนฺติ ปฏิยตฺตอุทปาโน วิย ฐิตํ. กุลนฺติ นิเวสนํ. ทาตพฺพํ มญฺเญยฺยาสีติ มา อิเมสํ เทยฺยธมฺมํ อุปจฺฉินฺทิตฺถ, สมฺปตฺตานญฺหิ ทาตพฺพเมวาติ โอวทติ. โอกาโรติ อวกาโร ลามกภาโว. สามุกฺกํสิกาติ อตฺตนาเยว อุทฺธริตฺวา คหิตา; อสาธารณํ อญฺเญสนฺติ อตฺโถ. อุทฺทิสฺส กตนฺติ อุทฺทิสิตฺวา กตํ. २९३. 'अनुविच्चकारं' म्हणजे नीट जाणून घेऊन, विचार करून आणि तोलून-मापून जे करायचे ते कर, असे सांगितले आहे. 'ञातमनुस्सानं' म्हणजे जगात प्रसिद्ध असलेल्या लोकांचे. 'साधु होती' म्हणजे चांगले (उत्तम) असते. 'पटाकं परिहरेय्युं' म्हणजे ध्वज उभारून नगरात घोषणा करत फिरावे. कशासाठी? 'अशाने आमचा मोठेपणा वाढेल' म्हणून. 'ओपानभूतं' म्हणजे तयार केलेल्या विहिरीप्रमाणे असलेले. 'कुलं' म्हणजे घर (कुळ). 'दातब्बं मञ्ञेय्यासि' म्हणजे यांना देयधर्म (दान) देणे बंद करू नका, कारण आलेल्या याचक लोकांना दान दिलेच पाहिजे, असा उपदेश करतात. 'ओकारो' म्हणजे हीन अवस्था, तुच्छता. 'सामुक्कंसिका' म्हणजे स्वतःच शोधून काढलेली (स्वतःच ग्रहण केलेली), जी इतरांसाठी सामायिक नाही (असाधारण), असा अर्थ आहे. 'उद्दिस्स कतं' म्हणजे उद्देशून (लक्ष्य करून) केलेले. ๒๙๔. ปฏิจฺจกมฺมนฺติ อตฺตานํ ปฏิจฺจ กตนฺติ อตฺโถ. อถ วา ปฏิจฺจกมฺมนฺติ นิมิตฺตกมฺมสฺเสตํ อธิวจนํ, ตํ ปฏิจฺจกมฺมํ เอตฺถ อตฺถีติ มํสมฺปิ ปฏิจฺจกมฺมนฺติ วุตฺตํ. โย หิ เอวรูปํ มํสํ ปริภุญฺชติ, โสปิ ตสฺส กมฺมสฺส ทายาโท โหติ, วธกสฺส วิย ตสฺสาปิ ปาณฆาตกมฺมํ โหตีติ อธิปฺปาโย. ชิริทนฺติติ ชิรนฺติ อพฺภาจิกฺขนฺตา น ชิรนฺติ, อพฺภกฺขานสฺส อนฺตํ น คจฺฉนฺตีติ อตฺโถ. ติโกฏิปริสุทฺธกถา สงฺฆเภทสิกฺขาปทวณฺณนายํ วุตฺตา. २९४. 'पटिच्चकम्मं' म्हणजे स्वतःला उद्देशून (निमित्त करून) केलेले, असा अर्थ आहे. किंवा 'पटिच्चकम्म' हे निमित्त कर्माचे (प्राणघाताचे) नाव आहे. ते निमित्त कर्म यात समाविष्ट असल्याने मांसालाही 'पटिच्चकम्म' म्हटले आहे. जो कोणी अशा प्रकारचे मांस खातो, तो देखील त्या कर्माचा वाटेकरी (दायाद) होतो; मारणाऱ्याप्रमाणेच खाणाऱ्यालाही प्राणिहत्येचे पाप लागते, असा (निग्रंथांचा) अभिप्राय आहे. 'जिरिदन्ति' म्हणजे झिजतात (नष्ट होतात). खोटा आरोप करणारे नष्ट होत नाहीत, ते आरोपाच्या अंतापर्यंत पोहोचू शकत नाहीत, असा अर्थ आहे. 'तिकोटिपारिसुद्धिकथा' (तीन प्रकारे शुद्ध असण्याची चर्चा) संघभेद शिक्षापदाच्या वर्णनात माझ्याकडून सांगितली गेली आहे. กปฺปิยภูมิอนุชานนกถา कप्पियभूमी (योग्य भूमी) अनुमती देण्याची कथा. ๒๙๕. สกฏปริวฏฺฏนฺติ สกเฏหิ ปริกฺเขปํ วิย กตฺวา อจฺฉนฺติ. ปจฺจนฺติมนฺติ อภิลาปมตฺตเมตํ ‘‘ยํ สงฺโฆ อากงฺขตี’’ติ วุตฺตตฺตา ปน ธุรวิหาโรปิ สมฺมนฺนิตุํ วฏฺฏติ, กมฺมวาจํ อวตฺวา อปโลกเนนาปิ วฏฺฏติเยว. กาโกรวสทฺทนฺติ ตตฺถ ตตฺถ ปวิฏฺฐานํ อามิสขาทนตฺถาย อนุปฺปเคเยว สนฺนิปติตานํ กากานํ โอรวสทฺทํ. ยโสโช นาม กปิลสุตฺตปริโยสาเน ปพฺพชิตานํ ปญฺจนฺนํ สตานํ อคฺคปุริโส. २९५. 'सकटपरिवट्टं' म्हणजे गाड्यांनी वेढल्यासारखे करून राहतात. 'पच्चन्तिमं' हे केवळ बोलण्याचा शब्द आहे. परंतु 'संघाला जे हवे असेल' असे म्हटल्यामुळे मुख्य विहारालाही सीमा निश्चित करणे योग्य आहे. संघकर्म न वाचता केवळ संमतीने (अपलोकन करून) देखील ते करणे योग्यच आहे. 'काकोरवसद्दं' म्हणजे तिथे तिथे प्रवेश केलेल्या, अन्न खाण्यासाठी पहाटेच एकत्र आलेल्या कावळ्यांचा मोठा ओरडण्याचा आवाज. 'यसोजो नाम' म्हणजे यसोझ नावाचा थेर, जो कपिल सुत्ताच्या शेवटी प्रव्रजित झालेल्या पाचशे पुरुषांमध्ये सर्वश्रेष्ठ (प्रमुख) पुरुष होता. อุสฺสาวนนฺติกนฺติอาทีสุ อุสฺสาวนนฺติกา ตาว เอวํ กตฺตพฺพา. โย ถมฺภานํ วา อุปริ ภิตฺติปาเท วา นิขนิตฺวา วิหาโร กริยติ, ตสฺส เหฏฺฐา ถมฺภปฏิจฺฉกา ปาสาณา ภูมิคติกา เอว. ปฐมถมฺภํ ปน ปฐมภิตฺติปาทํ วา ปติฏฺฐาเปนฺเตหิ พหูหิ สมฺปริวาเรตฺวา ‘‘กปฺปิยกุฏึ กโรม, กปฺปิยกุฏึ กโรมา’’ติ วาจํ นิจฺฉาเรนฺเตหิ มนุสฺเสสุ อุกฺขิปิตฺวา ปติฏฺฐาเปนฺเตสุ อามสิตฺวา วา สยํ อุกฺขิปิตฺวา วา ถมฺเภ วา ภิตฺติปาโท วา ปติฏฺฐาเปตพฺโพ. กุรุนฺทิมหาปจฺจรีสุ ปน ‘‘กปฺปิยกุฏิ กปฺปิยกุฏี’’ติ วตฺวา ปติฏฺฐาเปตพฺพนฺติ วุตฺตํ. อนฺธกฏฺฐกถายํ ‘‘สงฺฆสฺส กปฺปิยกุฏึ อธิฏฺฐามี’’ติ วุตฺตํ. ตํ ปน อวตฺวาปิ อฏฺฐกถาสุ วุตฺตนเยน วุตฺเต [Pg.380] โทโส นตฺถิ. อิทํ ปเนตฺถ สาธารณลกฺขณํ, ถมฺภปติฏฺฐานญฺจ วจนปริโยสานญฺจ สมกาลํ วฏฺฏติ. สเจ หิ อนิฏฺฐิเต วจเน ถมฺโภ ปติฏฺฐาติ, อปฺปติฏฺฐิเต วา ตสฺมึ วจนํ นิฏฺฐาติ, อกตา โหติ กปฺปิยกุฏิ. เตเนว มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ – ‘‘พหูหิ สมฺปริวาเรตฺวา วตฺตพฺพํ, อวสฺสญฺหิ เอตฺถ เอกสฺสปิ วจนนิฏฺฐานญฺจ ถมฺภปติฏฺฐานญฺจ เอกโต ภวิสฺสตี’’ติ. ‘उस्सावनन्तिका’ इत्यादी शब्दांच्या संबंधात, प्रथम ‘उस्सावनन्तिका’ कुटी अशा प्रकारे बनवली पाहिजे. जो विहार खांबांच्या वर किंवा भिंतीचा पाया खोडून (मातीत रोवून) बनवला जातो, त्याच्या खाली खांबांना आधार देणारे दगड हे जमिनीच्या स्वरूपाचेच (जमिनीशी जोडलेलेच) असतात. परंतु, पहिला खांब किंवा भिंतीचा पहिला पाया स्थापित करताना, अनेक भिक्खूंनी एकत्र जमून ‘आम्ही कप्पियकुटी बनवत आहोत, आम्ही कप्पियकुटी बनवत आहोत’ असे शब्द उच्चारत असताना, कारागिरांनी तो उचलून स्थापित करत असताना, भिक्खूंनी त्याला स्पर्श करून किंवा स्वतः उचलून तो खांब किंवा भिंतीचा पाया स्थापित केला पाहिजे. कुरुन्दी आणि महापच्चरी अट्ठकथांमध्ये मात्र ‘कप्पियकुटी कप्पियकुटी’ असे म्हणून तो स्थापित करावा, असे म्हटले आहे. अंधक अट्ठकथेमध्ये ‘मी संघासाठी कप्पियकुटी अधिष्ठित करतो’ असे म्हटले आहे. परंतु, ते न म्हणताही अट्ठकथांमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीने म्हटल्यास काही दोष नाही. येथे हे सामान्य लक्षण आहे की, खांब स्थापित होणे आणि शब्दांचा उच्चार समाप्त होणे हे एकाच वेळी झाले पाहिजे. कारण जर शब्द पूर्ण होण्यापूर्वीच खांब स्थापित झाला, किंवा खांब स्थापित होण्यापूर्वीच शब्द पूर्ण झाले, तर ती कप्पियकुटी बनत नाही. म्हणूनच महापच्चरीमध्ये म्हटले आहे – ‘अनेकांनी मिळून वेढून (एकत्र जमून) हे म्हटले पाहिजे. कारण येथे निश्चितपणे कोणा एकाचे शब्द पूर्ण होणे आणि खांब स्थापित होणे एकाच वेळी घडून येईल.’ อิฏฺฐกสิลามตฺติกากุฏฺฏิกาสุ ปน กุฏีสุ เหฏฺฐา จยํ พนฺธิตฺวา วา อพนฺธิตฺวา วา กโรนฺตุ, ยโต ปฏฺฐาย ภิตฺตึ อุฏฺฐาเปตุกามา โหนฺติ, ตํ สพฺพปฐมํ อิฏฺฐกํ วา สิลํ วา มตฺติกาปิณฺฑํ วา คเหตฺวา วุตฺตนเยเนว กปฺปิยกุฏิ กาตพฺพา. อิฏฺฐกาทโย หิ ภิตฺติยา ปฐมิฏฺฐกาทีนํ เหฏฺฐา น วฏฺฏนฺติ, ถมฺภา ปน อุปริ อุคฺคจฺฉนฺติ, ตสฺมา วฏฺฏนฺติ. อนฺธกฏฺฐกถายํ ‘‘ถมฺเภหิ กริยมาเน จตูสุ โกเณสุ จตฺตาโร ถมฺภา อิฏฺฐกาทิกุฏฺเฏ จตูสุ โกเณสุ ทฺเว ติสฺโส อิฏฺฐกา อธิฏฺฐาตพฺพา’’ติ วุตฺตํ. ตถา ปน อกตายปิ โทโส นตฺถิ, อฏฺฐกถาสุ หิ วุตฺตเมว ปมาณํ. विटा, दगड किंवा मातीच्या भिंती असलेल्या कुटींच्या बाबतीत, खाली पाया (ओटा) बांधून किंवा न बांधता ती तयार करोत, ज्या ठिकाणापासून भिंत उभी करण्याची इच्छा असेल, ती सर्वात पहिली वीट, दगड किंवा मातीचा गोळा घेऊन आधी सांगितलेल्या पद्धतीनेच कप्पियकुटी बनवली पाहिजे. कारण पहिल्या विटा इत्यादींच्या खाली असलेल्या विटा इत्यादी भिंतीसाठी योग्य ठरत नाहीत, परंतु खांब वरच्या दिशेने जातात, म्हणून ते योग्य ठरतात. अंधक अट्ठकथेमध्ये म्हटले आहे – ‘खांबांनी बनवल्या जाणाऱ्या कुटीमध्ये चार कोपऱ्यांत चार खांब, आणि विटा इत्यादींच्या भिंती असलेल्या कुटीमध्ये चार कोपऱ्यांत दोन किंवा तीन विटा अधिष्ठित केल्या पाहिजेत.’ परंतु, तसे न केल्यासही काही दोष नाही, कारण अट्ठकथांमध्ये जे सांगितले आहे तेच प्रमाण आहे. โคนิสาทิกา ทุวิธา – อารามโคนิสาทิกา, วิหารโคนิสาทิกาติ. ตาสุ ยตฺถ เนว อาราโม น เสนาสนานิ ปริกฺขิตฺตานิ โหนฺติ, อยํ ‘‘อารามโคนิสาทิกา’’ นาม. ยตฺถ เสนาสนานิ สพฺพานิ วา เอกจฺจานิ วา ปริกฺขิตฺตานิ, อาราโม อปริกฺขิตฺโต, อยํ ‘‘วิหารโคนิสาทิกา’’ นาม. อิติ อุภยตฺราปิ อารามสฺส อปริกฺขิตฺตภาโวเยว ปมาณํ. อาราโม ปน อุปฑฺฒปริกฺขิตฺโตปิ พหุตรํ ปริกฺขิตฺโตปิ ปริกฺขิตฺโตเยว นามาติ กุรุนฺทิมหอาปจฺจริยาทีสุ วุตฺตํ. เอตฺถ กปฺปิยกุฏึ ลทฺธุํ วฏฺฏติ. गोनिसाधिका कुटी दोन प्रकारची आहे – आरामगोनिसाधिका आणि विहारगोनिसाधिका. त्यापैकी, ज्या कुटीमध्ये ना आराम (परिसर) कुंपणाने वेढलेला असतो, ना सेनासने (निवासस्थाने) वेढलेली असतात, तिला ‘आरामगोनिसाधिका’ म्हणतात. ज्या कुटीमध्ये सर्व किंवा काही सेनासने वेढलेली असतात, परंतु आराम वेढलेला नसतो, तिला ‘विहारगोनिसाधिका’ म्हणतात. अशा प्रकारे, दोन्ही ठिकाणी आरामाचे कुंपण नसणे (अपरिक्खित्त असणे) हेच प्रमाण आहे. परंतु आराम अर्धा वेढलेला असला किंवा बहुतांश वेढलेला असला, तरी तो वेढलेलाच (परिक्खित्त) मानला जातो, असे कुरुन्दी आणि महापच्चरी इत्यादींमध्ये म्हटले आहे. येथे कप्पियकुटी मिळवणे योग्य आहे. คหปตีติ มนุสฺสา อาวาสํ กตฺวา ‘‘กปฺปิยกุฏึ เทม, ปริภุญฺชถา’’ติ วทนฺติ, เอสา คหปติ นาม. ‘‘กปฺปิยกุฏึ กาตุํ เทมา’’ติ วุตฺเตปิ วฏฺฏติเยว. อนฺธกฏฺฐกถายํ ปน ‘‘ยสฺมา ภิกฺขุํ ฐเปตฺวา เสสสหธมฺมิกานํ สพฺเพสญฺจ เทวมนุสฺสานํ หตฺถโต ปฏิคฺคโห จ สนฺนิธิ จ อนฺโตวุตฺถญฺจ เตสํ สนฺตกํ ภิกฺขุสฺส วฏฺฏติ, ตสฺมา เตสํ เคหานิ วา เตหิ ทินฺนา กปฺปิยกุฏิ วา คหปตีติ วุจฺจตี’’ติ วุตฺตํ. ปุนปิ วุตฺตํ – ‘‘ภิกฺขุสงฺฆสฺส วิหารํ ฐเปตฺวา ภิกฺขุนุปสฺสโย วา อารามิกานํ วา ติตฺถิยานํ วา เทวตานํ วา นาคานํ วา อปิ พฺรหฺมานํ วิมานํ กปฺปิยกุฏิ โหตี’’ติ, ตํ สุวุตฺตํ; สงฺฆสนฺตกเมว [Pg.381] หิ ภิกฺขุสนฺตกํ วา เคหํ คหปติกุฏิกา น โหติ. สมฺมุติกา นาม กมฺมวาจํ สาเวตฺวา กตาติ. ‘गहपति’ म्हणजे जेव्हा लोक निवासस्थान बनवून ‘आम्ही कप्पियकुटी देत आहोत, आपण हिचा उपभोग घ्यावा’ असे म्हणतात, ती ‘गहपति’ कुटी होय. ‘आम्ही कप्पियकुटी बनवण्यासाठी देत आहोत’ असे म्हटले तरीही ते योग्यच ठरते. परंतु अंधक अट्ठकथेमध्ये म्हटले आहे – ‘ज्याअर्थी भिक्खूला सोडून इतर सर्व सहधर्मीय आणि सर्व देव-मनुष्यांच्या हातून दान स्वीकारणे (पतिग्गह), साठा करणे (सन्निधि) आणि आत ठेवलेले अन्न (अन्तोवुत्थ) हे त्यांचे मालकीचे अन्न भिक्खूला कल्प्य (योग्य) ठरते, म्हणून त्यांची घरे किंवा त्यांनी दिलेली कप्पियकुटी याला गहपति म्हटले जाते.’ पुन्हा असेही म्हटले आहे – ‘भिक्खू संघाचा विहार सोडून, भिक्खुनींचे निवासस्थान, आरामिकांचे (आराम रक्षकांचे) घर, तित्थियांचे (तीर्थिकांचे) निवासस्थान, किंवा देवतांचे, नागांचे अथवा ब्रह्मांचे विमान देखील कप्पियकुटी होऊ शकते.’ हे योग्यच म्हटले आहे; कारण संघाच्या मालकीचे किंवा भिक्खूच्या वैयक्तिक मालकीचे घर हे गहपतिकुटी होऊ शकत नाही. ‘सम्मतिका’ म्हणजे कम्मवाचा ऐकवून (घोषित करून) बनवलेली कुटी होय. ยํ อิมาสุ จตูสุ กปฺปิยภูมีสุ วุตฺถํ อามิสํ, ตํ สพฺพํ อนฺโตวุตฺถสงฺขฺยํ น คจฺฉติ. ภิกฺขูนญฺจ ภิกฺขุนีนญฺจ อนฺโตวุตฺถอนฺโตปกฺกโมจนตฺถญฺหิ กปฺปิยกุฏิโย อนุญฺญาตา. ยํ ปน อกปฺปิยภูมิยํ สหเสยฺยปฺปโหนเก เคเห วุตฺถํ สงฺฆิกํ วา ปุคฺคลิกํ วา ภิกฺขุสฺส ภิกฺขุนิยา วา สนฺตกํ เอกรตฺตมฺปิ ฐปิตํ, ตํ อนฺโตวุตฺถํ; ตตฺถ ปกฺกญฺจ อนฺโตปกฺกํ นาม โหติ, เอตํ น กปฺปติ. สตฺตาหกาลิกํ ปน ยาวชีวิกญฺจ วฏฺฏติ. या चार कप्पियभूमींमध्ये ठेवलेले जे काही आमिष (अन्न) आहे, ते सर्व ‘अन्तोवुत्थ’ (आत साठवलेले) या संज्ञेस पात्र ठरत नाही. कारण भिक्खू आणि भिक्खुनींना ‘अन्तोवुत्थ’ आणि ‘अन्तोपक्क’ (आत शिजवलेले) या दोषांपासून मुक्त करण्यासाठीच भगवंतांनी कप्पियकुटींना अनुमती दिली आहे. परंतु, जे अकप्पियभूमीवर असलेल्या आणि सहशय्येसाठी (एकत्र झोपण्यासाठी) पुरेशा असलेल्या घरात ठेवलेले असते, मग ते संघाचे असो किंवा वैयक्तिक असो, भिक्खूचे असो किंवा भिक्खुनीचे असो, जर ते एक रात्र जरी ठेवले गेले, तर ते ‘अन्तोवुत्थ’ होते; आणि तेथे शिजवलेले अन्न ‘अन्तोपक्क’ होते, जे कल्प्य (योग्य) नसते. परंतु सत्ताहकालिक आणि यावजीविक मात्र चालते (योग्य ठरते). ตตฺรายํ วินิจฺฉโย – สามเณโร ภิกฺขุสฺส ตณฺฑุลาทิกํ อามิสํ อาหริตฺวา กปฺปิยกุฏิยํ นิกฺขิปิตฺวา ปุนทิวเส ปจิตฺวา เทติ, อนฺโตวุตฺถํ น โหติ. ตตฺถ อกปฺปิยกุฏิยํ นิกฺขิตฺตสปฺปิอาทีสุ ยํกิญฺจิ ปกฺขิปิตฺวา เทติ, มุขสนฺนิธิ นาม โหติ. มหาปจฺจริยํ ปน ‘‘อนฺโตวุตฺถํ โหตี’’ติ วุตฺตํ. ตตฺถ นามมตฺตเมว นานากรณํ. ภิกฺขุ อกปฺปิยกุฏิยํ ฐปิตสปฺปิญฺจ ยาวชีวิกปณฺณญฺจ เอกโต ปจิตฺวา ปริภุญฺชติ, สตฺตาหํ นิรามิสํ วฏฺฏติ. สเจ อามิสสํสฏฺฐํ กตฺวา ปริภุญฺชติ, อนฺโตวุตฺถญฺเจว สามํปากญฺจ โหติ. เอเตนุปาเยน สพฺพสํสคฺคา เวทิตพฺพา. याविषयीचा निर्णय असा आहे – जर सामणेराने भिक्खूसाठी तांदूळ इत्यादी आमिष आणून कप्पियकुटीमध्ये ठेवले आणि दुसऱ्या दिवशी ते शिजवून दिले, तर ते ‘अन्तोवुत्थ’ होत नाही. तेथे, अकप्पियकुटीमध्ये ठेवलेल्या तुपासारख्या (सप्पि इत्यादी) पदार्थांपैकी काही पदार्थ त्यात टाकून दिले, तर त्याला ‘मुखसन्निधि’ म्हटले जाते. परंतु महापच्चरीमध्ये ‘ते अन्तोवुत्थ होते’ असे म्हटले आहे. तेथे केवळ नावाचाच फरक आहे. जर भिक्खू अकप्पियकुटीमध्ये ठेवलेले तूप आणि यावजीविक पाने एकत्र शिजवून सेवन करतो, तर ते सात दिवसांपर्यंत आमिषरहित म्हणून योग्य ठरते. जर ते आमिषाशी मिश्रित करून सेवन केले, तर ते ‘अन्तोवुत्थ’ आणि ‘सामंपाक’ (स्वतः शिजवलेले) दोन्ही ठरते. या पद्धतीने सर्व प्रकारचे संसर्ग (मिश्रण) समजून घ्यावेत. อิมา ปน กปฺปิยกุฏิโย กทา ชหิตวตฺถุกา โหนฺติ? อุสฺสาวนนฺติกา ตาว ยา ถมฺภานํ อุปริ ภิตฺติปาเท วา นิขณิตฺวา กตา, สา สพฺเพสุ ถมฺเภสุ จ ภิตฺติปาเทสุ จ อปนีเตสุ ชหิตวตฺถุกา โหติ. สเจ ปน ถมฺเภ วา ภิตฺติปาเท วา ปริวตฺเตนฺติ, โย โย ฐิโต ตตฺถ ตตฺถ ปติฏฺฐาติ, สพฺเพสุปิ ปริวตฺติเตสุ อชหิตวตฺถุกาว โหติ. อิฏฺฐกาทีหิ กตา จยสฺส อุปริ ภิตฺติอตฺถาย ฐปิตํ อิฏฺฐกํ วา สิลํ วา มตฺติกาปิณฺฑํ วา อาทึกตฺวา วินาสิตกาเล ชหิตวตฺถุกา โหติ. เยหิ ปน อิฏฺฐกาทีหิ อธิฏฺฐิตา, เตสุ อปนีเตสุปิ ตทญฺญาสุ ปติฏฺฐิตาสุ อชหิตวตฺถุกาว โหติ. परंतु या कप्पियकुटी कधी ‘जहितवत्थुका’ (त्यांचे मूळ स्थान सोडलेल्या) होतात? प्रथम ‘उस्सावनन्तिका’ कुटी, जी खांबांच्या वर किंवा भिंतीचा पाया खोडून बनवली गेली आहे, ती सर्व खांब आणि भिंतीचे पाया काढून टाकल्यावर ‘जहितवत्थुका’ होते. परंतु जर खांब किंवा भिंतीचा पाया बदलला, तर जो जो खांब किंवा पाया उभा राहील, तिथे तिथे कप्पियकुटीचे अस्तित्व टिकून राहते, आणि सर्व खांब बदलले तरीही ती ‘अजहितवत्थुका’ (पाया न सोडलेली) राहते. विटा इत्यादींनी बनवलेली कुटी, ओट्यावर भिंतीसाठी ठेवलेली वीट, दगड किंवा मातीचा गोळा इत्यादी नष्ट केल्याच्या वेळी ‘जहितवत्थुका’ होते. परंतु ज्या विटा इत्यादींनी ती अधिष्ठित केली होती, त्या काढून टाकल्या तरीही त्यांच्या जागी इतर विटा स्थापित केल्यास ती ‘अजहितवत्थुका’ राहते. โคนิสาทิกา ปาการาทีหิ ปริกฺเขเป กเต ชหิตวตฺถุกา โหติ. ปุน ตสฺมึ อาราเม กปฺปิยกุฏิ ลทฺธุํ วฏฺฏติ. สเจ ปน ปุนปิ ปาการาทโย ตตฺถ ตตฺถ ขณฺฑา โหนฺติ, ตโต ตโต คาโว ปวิสนฺติ, ปุน กปฺปิยกุฏิ โหติ. อิตรา ปน ทฺเว โคปานสีมตฺตํ ฐเปตฺวา [Pg.382] สพฺพสฺมึ ฉทเน วินฏฺเฐ ชหิตวตฺถุกา โหนฺติ. สเจ โคปานสีนํ อุปริ เอกมฺปิ ปกฺขปาสกมณฺฑลํ อตฺถิ, รกฺขติ. तटबंदी इत्यादींनी वेढली असता गोनिसाधिका कुटी आपले मूळ स्थान (कप्पियकुटीचे स्वरूप) सोडते. पुन्हा त्या आरामात कप्पियकुटी बनवणे योग्य ठरते. पण जर पुन्हा तटबंदी इत्यादी ठिकठिकाणी तुटली आणि तिथून गाई आत प्रवेश करू लागल्या, तर ती पुन्हा कप्पियकुटी बनते. इतर दोन कुटी (गहपति आणि सम्मुति) वळचणीचे लाकूड सोडून सर्व छप्पर नष्ट झाले असता आपले मूळ स्थान सोडतात. जर वळचणीच्या लाकडांवर एक जरी छपराचा सांगाडा शिल्लक असेल, तर तो कप्पियकुटीचे रक्षण करतो (तिचे स्वरूप टिकवून ठेवतो). ยตฺร ปนิมา จตสฺโสปิ กปฺปิยภูมิโย นตฺถิ, ตตฺถ กึ กาตพฺพํ? อนุปสมฺปนฺนสฺส ทตฺวา ตสฺส สนฺตกํ กตฺวา ปริภุญฺชิตพฺพํ. ตตฺริทํ วตฺถุ – กรวิกติสฺสตฺเถโร กิร วินยธรปาโมกฺโข มหาสีวตฺเถรสฺส สนฺติกํ อคมาสิ. โส ทีปาโลเกน สปฺปิกุมฺภํ ปสฺสิตฺวา ‘‘ภนฺเต กิเมต’’นฺติ ปุจฺฉิ. เถโร ‘‘อาวุโส คามโต สปฺปิกุมฺโภ อาภโต, ลูขทิวเส สปฺปินา ภุญฺชนตฺถายา’’ติ อาห. ตโต นํ ติสฺสตฺเถโร ‘‘น วฏฺฏติ ภนฺเต’’ติ อาห. เถโร ปุนทิวเส ปมุเข นิกฺขิปาเปสิ. ติสฺสตฺเถโร ปุน เอกทิวเส อาคโต ตํ ทิสฺวา ตเถว ปุจฺฉิตฺวา ‘‘ภนฺเต สหเสยฺยปฺปโหนกฏฺฐาเน ฐเปตุํ น วฏฺฏตี’’ติ อาห. เถโร ปุนทิวเส พหิ นีหราเปตฺวา นิกฺขิปาเปสิ, ตํ โจรา หรึสุ. โส ปุน เอกทิวสํ อาคตํ ติสฺสตฺเถรํ อาห – ‘‘อาวุโส ตยา ‘น วฏฺฏตี’ติ วุตฺโต โส กุมฺโภ พหิ นิกฺขิตฺโต โจเรหิ อวหโต’’ติ. ตโต นํ ติสฺสตฺเถโร อาห – ‘‘นนุ ภนฺเต อนุปสมฺปนฺนสฺส ทาตพฺโพ อสฺส, อนุปสมฺปนฺนสฺส หิ ทตฺวา ตสฺส สนฺตกํ กตฺวา ปริภุญฺชิตุํ วฏฺฏตี’’ติ. पण ज्या ठिकाणी या चारही कप्पियभूमी नसतील, तिथे काय करावे? अनुपसंपन्नाला (गृहस्थ किंवा सामणेराला) देऊन, त्याची मालकी करून तिचा उपभोग घ्यावा. याविषयी ही कथा आहे – विनयधरांमध्ये प्रमुख असलेले करविकतिस्स थेर हे महासीव थेरांच्या जवळ गेले. त्यांनी दिव्याच्या प्रकाशात तुपाचा घडा पाहून विचारले, “भंते, हे काय आहे?” थेर म्हणाले, “आयुष्यमान, कठीण दिवसांत तुपासह जेवण करण्यासाठी गावातून तुपाचा घडा आणला आहे.” त्यावर तिस्स थेर त्यांना म्हणाले, “भंते, हे कप्पिय (योग्य) नाही.” थेरांनी दुसऱ्या दिवशी तो घडा ओसरीवर ठेवला. तिस्स थेर पुन्हा एका दिवशी आले आणि तो घडा पाहून तसेच विचारले आणि म्हणाले, “भंते, सहशय्या (एकत्र झोपण्याच्या) योग्य ठिकाणी हा ठेवणे अयोग्य आहे.” थेरांनी दुसऱ्या दिवशी तो बाहेर काढून ठेवला, तो चोरांनी चोरून नेला. त्यांनी पुन्हा एका दिवशी आलेल्या तिस्स थेरांना सांगितले, “आयुष्यमान, तुम्ही ‘अयोग्य आहे’ असे म्हटल्यामुळे तो घडा बाहेर ठेवला होता, तो चोरांनी चोरून नेला.” त्यावर तिस्स थेर त्यांना म्हणाले, “भंते, तो अनुपसंपन्नाला द्यायला हवा होता की नाही? कारण अनुपसंपन्नाला देऊन, त्याची मालकी करून त्याचा उपभोग घेणे योग्य ठरते.” ๒๙๖-๙. เมณฺฑกวตฺถุ อุตฺตานเมว. อปิ เจตฺถ อนุชานามิ ภิกฺขเว ปญฺจ โครเสติ อิเม ปญฺจ โครเส วิสุํ ปริโภเคน ปริภุญฺชิตุมฺปิ อนุชานามีติ อตฺโถ. ปาเถยฺยํ ปริเยสิตุนฺติ เอตฺถ สเจ เกจิ สยเมว ญตฺวา เทนฺติ, อิจฺเจตํ กุสลํ; โน เจ เทนฺติ, ญาติปวาริตฏฺฐานโต วา ภิกฺขาจารวตฺเตน วา ปริเยสิตพฺพํ. ตถา อลภนฺเตน อญฺญาติกอปวาริตฏฺฐานโต ยาจิตฺวาปิ คเหตพฺพํ. เอกทิวเสน คมนีเย มคฺเค เอกภตฺตตฺถาย ปริเยสิตพฺพํ. ทีเฆ อทฺธาเน ยตฺตเกน กนฺตารํ นิตฺถรติ, ตตฺตกํ ปริเยสิตพฺพํ. २९६-९. मेंडक गृहपतीची कथा स्पष्टच आहे. तरीही येथे – “भिक्खून्नों, मी पाच गोरसांना अनुमती देतो” याचा अर्थ असा आहे की, या पाच गोरसांचे स्वतंत्रपणे उपभोग घेण्यासाठी देखील मी अनुमती देतो. “प्रवासासाठी शिदोरी शोधणे” याविषयी – जर काही लोक स्वतःहून जाणून दान देतात, तर ते उत्तम आहे; जर ते देत नसतील, तर नातेवाईक किंवा निमंत्रित केलेल्यांच्या ठिकाणाहून किंवा भिक्षाटनाच्या नियमाने ती मिळवावी. तसेच न मिळाल्यास, नातेवाईक नसलेल्या व निमंत्रण न दिलेल्या लोकांकडूनही मागून ती घ्यावी. एका दिवसात पार करण्यासारख्या मार्गावर एका वेळच्या भोजनासाठी शिदोरी मिळवावी. लांबच्या प्रवासात ज्या शिदोरीने दुर्गम मार्ग पार करता येईल, तितकी शिदोरी मिळवावी. เกณิยชฏิลวตฺถุกถา केणिय जटिल कथा ๓๐๐. กาเชหิ คาหาเปตฺวาติ ปญฺจหิ กาชสเตหิ สุสงฺขตสฺส พทรปานสฺส กุฏสหสฺสํ คาหาเปตฺวา. เอตสฺมึ นิทาเน เอตสฺมึ ปกรเณ ธมฺมึ กถํ กตฺวาติ ‘‘สาธุ ภิกฺขเว ปานํ อปิวนฺตา สมณสฺส โคตมสฺส [Pg.383] สาวกา ปจฺจยพาหุลฺลิกาติ วาทํ น อุปฺปาทยิตฺถ, มยิ จ คารวํ อกตฺถ, มม จ ตุมฺเหสุ คารวํ ชนยิตฺถ, อิติ โว อหํ อิมินา การเณน สุฏฺฐุ ปสนฺโน’’ติอาทินา นเยน ธมฺมึ กถํ กตฺวา อนุชานามิ ภิกฺขเว อฏฺฐ ปานานีติอาทิมาห. ३००. “कावडीने वाहून नेणे” म्हणजे पाचशे कावडींद्वारे चांगल्या प्रकारे तयार केलेल्या बोरांच्या रसाचे एक हजार घडे वाहून नेणे. “या संदर्भात, या प्रकरणात धम्मचर्चा करून” म्हणजे – “साधू भिक्खून्नों! पेय न पिता, तुम्ही ‘श्रमण गोतमांचे श्रावक प्रत्यय-बाहुल्य (साधनांची रेलचेल) असणारे आहेत’ असा वाद निर्माण होऊ दिला नाही, आणि माझ्याविषयी आदर दाखवला, आणि माझ्या मनात तुमच्याविषयी आदर निर्माण केला, या कारणाने मी तुमच्यावर अत्यंत प्रसन्न आहे” इत्यादी प्रकारे धम्मचर्चा करून, “भिक्खून्नों, मी आठ प्रकारच्या पेयांना अनुमती देतो” इत्यादी म्हणाले. ตตฺถ อมฺพปานนฺติ อาเมหิ วา ปกฺเกหิ วา อมฺเพหิ กตปานํ. ตตฺถ อาเมหิ กโรนฺเตน อมฺพตรุณานิ ภินฺทิตฺวา อุทเก ปกฺขิปิตฺวา อาตเป อาทิจฺจปาเกน ปจิตฺวา ปริสฺสาเวตฺวา ตทหุปฏิคฺคหิเตหิ มธุสกฺกรกปฺปูราทีหิ โยเชตฺวา กาตพฺพํ. เอวํ กตํ ปุเรภตฺตเมว กปฺปติ. อนุปสมฺปนฺเนหิ กตํ ลภิตฺวา ปน ปุเรภตฺตํ ปฏิคฺคหิตํ ปุเรภตฺตํ สามิสปริโภเคนาปิ วฏฺฏติ, ปจฺฉาภตฺตํ นิรามิสปริโภเคน ยาว อรุณุคฺคมนา วฏฺฏติเยว. เอส นโย สพฺพปาเนสุ. त्यामध्ये ‘अम्बपान’ (आंब्याचे पेय) म्हणजे कच्च्या किंवा पिकलेल्या आंब्यांपासून बनवलेले पेय. त्यापैकी कच्च्या आंब्यांपासून बनवताना, कोवळे आंबे कापून, पाण्यात टाकून, उन्हात सूर्याच्या उष्णतेने शिजवून, गाळून घेऊन, त्याच दिवशी ग्रहण केलेल्या मध, साखर, कापूर इत्यादी मिसळून ते तयार करावे. अशा प्रकारे तयार केलेले पेय केवळ दुपारपूर्वीच योग्य ठरते. पण अनुपसंपन्नांनी तयार केलेले पेय मिळवून जर ते दुपारपूर्वी ग्रहण केले असेल, तर दुपारपूर्वी ते आमिषासह (अन्नासह) उपभोगणे योग्य ठरते, आणि दुपारनंतर आमिषविरहित केवळ पेय म्हणून पहाटेपर्यंत उपभोगणे योग्यच ठरते. हाच नियम सर्व पेयांच्या बाबतीत लागू होतो. เตสุ ปน ชมฺพุปานนฺติ ชมฺพุผเลหิ กตปานํ. โจจปานนฺติ อฏฺฐิเกหิ กทลิผเลหิ กตปานํ. โมจปานนฺติ อนฏฺฐิเกหิ กทลิผเลหิ กตปานํ. มธุกปานนฺติ มธุกานํ ชาติรเสน กตปานํ; ตํ ปน อุทกสมฺภินฺนํ วฏฺฏติ, สุทฺธํ น วฏฺฏติ. มุทฺทิกปานนฺติ มุทฺทิกา อุทเก มทฺทิตฺวา อมฺพปานํ วิย กตปานํ. สาลูกปานนฺติ รตฺตุปฺปลนีลุปฺปลาทีนํ สาลูเก มทฺทิตฺวา กตปานํ. ผารุสกปานนฺติ ผารุสกผเลหิ อมฺพปานํ วิย กตปานํ. อิมานิ อฏฺฐ ปานานิ สีตานิปิ อาทิจฺจปากานิปิ วฏฺฏนฺติ, อคฺคิปากานิ น วฏฺฏนฺติ. ธญฺญผลรสนฺติ สตฺตนฺนํ ธญฺญานํ ผลรสํ. ฑากรสนฺติ ปกฺกฑากรสํ. ยาวกาลิกปตฺตานญฺหิ ปุเรภตฺตํเยว รโส กปฺปติ. ยาวชีวิกานํ ปฏิคฺคเหตฺวา ฐปิตสปฺปิอาทีหิ สทฺธึ ปกฺกานํ สตฺตาหํ กปฺปติ. สเจ ปน สุทฺธอุทเกน ปจติ, ยาวชีวมฺปิ วฏฺฏติ. ขีราทีหิ ปน สทฺธึ ปจิตุํ น วฏฺฏติ. อญฺเญหิ ปกฺกมฺปิ ฑากรสสงฺขฺยเมว คจฺฉติ. กุรุนฺทิยํ ปน ‘‘ยาวกาลิกปตฺตานมฺปิ สีโตทเกน มทฺทิตฺวา กตรโส วา อาทิจฺจปาโก วา วฏฺฏตี’’ติ วุตฺตํ. ฐเปตฺวา มธุกปุปฺผรสนฺติ เอตฺถ มธุกปุปฺผรโส อคฺคิปาโก วา โหตุ อาทิจฺจปาโก วา, ปจฺฉาภตฺตํ น วฏฺฏติ. ปุเรภตฺตมฺปิ ยํ ปานํ คเหตฺวา มชฺชํ กโรนฺติ, โส อาทิโต ปฏฺฐาย น วฏฺฏติ. มธุกปุปฺผํ ปน อลฺลํ วา สุกฺขํ วา ภชฺชิตํ วา เตน กตผาณิตํ วา ยโต ปฏฺฐาย มชฺชํ น กโรนฺติ, ตํ สพฺพํ ปุเรภตฺตํ วฏฺฏติ. อุจฺฉุรโส นิกสโฏ ปจฺฉาภตฺตํ วฏฺฏติ[Pg.384]. อิติ ปานานิ อนุชานนฺเตน อิเมปิ จตฺตาโร รสา อนุญฺญาตาติ. อคฺคิหุตฺตมุขา ยญฺญาติอาทีสุ อคฺคิหุตํ เสฏฺฐํ, อคฺคิหุตํ มุขนฺติ วุตฺตํ โหติ. त्यापैकी ‘जम्बुपाण’ म्हणजे जांभळाच्या फळांपासून बनवलेले पेय. ‘चोचपाण’ म्हणजे बिया असलेल्या रानकेळीच्या फळांपासून बनवलेले पेय. ‘मोचपाण’ म्हणजे बिया नसलेल्या घरगुती केळीच्या फळांपासून बनवलेले पेय. ‘मधुकपाण’ म्हणजे मोहाच्या फळांच्या मूळ रसापासून बनवलेले पेय; पण ते पाण्यात मिसळलेले असेल तरच योग्य ठरते, शुद्ध (पाणी न मिसळलेले) अयोग्य ठरते. ‘मुद्दिकपाण’ म्हणजे द्राक्षे पाण्यात कुस्करून आंब्याच्या पेयाप्रमाणे बनवलेले पेय. ‘सालूकपाण’ म्हणजे लाल कमळ, निळे कमळ इत्यादींच्या कंदांना कुस्करून बनवलेले पेय. ‘फारुसकपाण’ म्हणजे फालसाच्या फळांपासून आंब्याच्या पेयाप्रमाणे बनवलेले पेय. ही आठ पेये थंड पाण्यात बनवलेली असोत किंवा उन्हात शिजवलेली असोत, ती योग्य ठरतात; पण अग्नीवर शिजवलेली पेये अयोग्य ठरतात. ‘धञ्ञफलरस’ म्हणजे सात प्रकारच्या धान्यांच्या फळांचा रस. ‘डाकरस’ म्हणजे शिजवलेल्या पालेभाज्यांचा रस. कारण यावकालिक पानांचा रस केवळ दुपारपूर्वीच योग्य ठरतो. यावजीविक ग्रहण केलेल्या तूप इत्यादींसह शिजवलेल्या पानांचा रस सात दिवसांपर्यंत योग्य ठरतो. पण जर केवळ शुद्ध पाण्यात शिजवले, तर ते आयुष्यभर योग्य ठरते. पण दूध इत्यादींसह शिजवणे अयोग्य आहे. इतर गोष्टींसह शिजवलेले देखील ‘डाकरस’ या संज्ञेतच समाविष्ट होते. कुरुंदी अट्ठकथेत म्हटले आहे की, “यावकालिक पानांचा देखील थंड पाण्यात कुस्करून बनवलेला रस किंवा उन्हात शिजवलेला रस योग्य ठरतो.” “मोहाच्या फुलांचा रस वगळून” या संदर्भात, मोहाच्या फुलांचा रस अग्नीवर शिजवलेला असो वा उन्हात शिजवलेला असो, तो दुपारनंतर अयोग्य ठरतो. दुपारपूर्वी देखील ज्या पेयाचा वापर करून मद्य बनवले जाते, ते सुरुवातीपासूनच अयोग्य ठरते. पण मोहाचे फूल ओले असो, सुके असो वा भाजलेले असो, किंवा त्यापासून बनवलेली काकवी असो, जोपर्यंत त्यापासून मद्य बनवले जात नाही, तोपर्यंत ते सर्व दुपारपूर्वी योग्य ठरते. उसाचा रस गाळलेला असेल तर दुपारनंतरही योग्य ठरतो. अशा प्रकारे पेयांना अनुमती देताना भगवंतांनी या चार रसांनाही अनुमती दिली आहे, असे समजावे. “अग्निहोत्रमुखा यञ्ञा” इत्यादी गाथांमध्ये “अग्निहोत्र श्रेष्ठ आहे, अग्निहोत्र हे मुख्य आहे” असे म्हटले आहे. โรชมลฺลาทิวตฺถุกถา रोज मल्ल इत्यादींची कथा ๓๐๑-๒. โรชวตฺถุ อุตฺตานตฺถเมว. ตตฺถ สงฺกรํ อกํสูติ กติกํ อกํสุ. อุฬารํ โข เต อิทนฺติ สุนฺทรํ โข เต อิทํ. นาหํ ภนฺเต อานนฺท พหุกโตติ นาหํ พุทฺธาทิคตปสาทพหุมาเนน อิธาคโตติ ทสฺเสติ. สพฺพญฺจ ฑากนฺติ สปฺปิอาทีหิ ปกฺกํ วา อปกฺกํ วา ยํกิญฺจิ ฑากํ. ปิฏฺฐขาทนียนฺติ ปิฏฺฐมยํ ขาทนียํ; โรโช กิร อิทํ อุภยมฺปิ สตสหสฺสํ วยํ กตฺวา ปฏิยาทาเปสิ. ३०१-२. रोजवत्थु (रोजाची कथा) स्पष्ट अर्थाचीच आहे. तेथे 'संकरं अकंसु' म्हणजे त्यांनी करार (नियम) केला. 'उळारं खो ते इदं' म्हणजे 'तुझे हे खरोखर सुंदर आहे'. 'नाहं भन्ते आनन्द बहुकतो' या पाठाने 'मी बुद्ध इत्यादींविषयीच्या श्रद्धा व आदरामुळे येथे आलो नाही' हे दर्शवितात. 'सब्बञ्च डाकं' म्हणजे तुपाने शिजवलेली किंवा न शिजवलेली कोणतीही भाजी. 'पिट्ठखादनीयं' म्हणजे पिठापासून बनविलेले खाद्य; रोजाने हे दोन्ही पदार्थ एक लाख खर्च करून तयार करवून घेतले होते. ๓๐๓. มญฺชุกาติ มธุรวจนา. ปฏิภาเนยฺยกาติ สเก สิปฺเป ปฏิภานสมฺปนฺนา. ทกฺขาติ เฉกา, อนลสา วา. ปริโยทาตสิปฺปาติ นิทฺโทสสิปฺปา. นาฬิยาวาปเกนาติ นาฬิยา จ อาวาปเกน จ. อาวาปโก นาม ยตฺถ ลทฺธํ ลทฺธํ อาวปนฺติ, ปกฺขิปนฺตีติ วุตฺตํ โหติ. น จ ภิกฺขเว นหาปิตปุพฺเพน ขุรภณฺฑนฺติ เอตฺถ คเหตฺวา ปริหริตุเมว น วฏฺฏติ, อญฺญสฺส สนฺตเกน เกเส เฉเทตุํ วฏฺฏติ. สเจ เวตนํ คเหตฺวา ฉินฺทติ, น วฏฺฏติ. โย อนหาปิตปุพฺโพ ตสฺส ปริหริตุมฺปิ วฏฺฏติ, ตํ วา อญฺญํ วา คเหตฺวา เกเส เฉเทตุมฺปิ วฏฺฏติ. ३०३. 'मंजुका' म्हणजे मधुर बोलणारे. 'पटिभानेय्यका' म्हणजे स्वतःच्या कलेत प्रतिभावान (कुशल). 'दक्खा' म्हणजे चतुर किंवा आळशी नसलेले. 'परियोदातसिप्पा' म्हणजे निर्दोष कला असलेले. 'नाळियावापकेन' म्हणजे नळीने (पेटीने) आणि आवापकाने (भांड्याने). 'आवापक' म्हणजे ज्यामध्ये जे काही मिळेल ते टाकतात (ठेवतात), असे म्हटले आहे. 'न च भिक्खवे नहापितपुब्बेन खुरभण्डं' यामध्ये ते स्वतःचे म्हणून घेऊन फिरणे योग्य नाही, परंतु दुसऱ्याच्या मालकीच्या वस्तऱ्याने केस कापणे योग्य आहे. जर मोबदला घेऊन केस कापले, तर ते योग्य नाही. जो पूर्वी न्हावी नव्हता, त्याला ते साहित्य बाळगणेही योग्य आहे, आणि ते किंवा दुसरे साहित्य घेऊन केस कापणेही योग्य आहे. ๓๐๔. ภาคํ ทตฺวาติ ทสมภาคํ ทตฺวา; อิทํ กิร ชมฺพุทีเป โปราณกจาริตฺตํ, ตสฺมา ทสโกฏฺฐาเส กตฺวา เอโก โกฏฺฐาโส ภูมิสามิกานํ ทาตพฺโพ. ३०४. 'भागं दत्वा' म्हणजे दहावा भाग देऊन; ही जंबुद्विपातील जुनी परंपरा आहे असे म्हणतात, म्हणून दहा भाग करून एक भाग जमिनीच्या मालकांना दिला पाहिजे. จตุมหาปเทสกถา चतुमहापदेश कथा ๓๐๕. ยํ ภิกฺขเว มยา อิทํ น กปฺปตีติ อิเม จตฺตาโร มหาปเทเส ภควา ภิกฺขูนํ นยคฺคหณตฺถาย อาห. ตตฺถ ธมฺมสงฺคาหกตฺเถรา สุตฺตํ คเหตฺวา ปริมทฺทนฺตา อิทํ อทฺทสํสุ. ฐเปตฺวา ธญฺญผลรสนฺติ สตฺตธญฺญรสานิ ปจฺฉาภตฺตํ น กปฺปนฺตีติ ปฏิกฺขิตฺตานิ. ตาลนาฬิเกรปนสลพุชอลาพุกุมฺภณฺฑปุสฺสผลติปุสผลเอฬาลุกานิ, นว มหาผลานิ สพฺพญฺจ อปรณฺณํ, ธญฺญคติกเมว. ตํ กิญฺจาปิ น ปฏิกฺขิตฺตํ, อถ โข อกปฺปิยํ อนุโลเมติ, ตสฺมา ปจฺฉาภตฺตํ น กปฺปติ. อฏฺฐ [Pg.385] ปานานิ อนุญฺญาตานิ. อวเสสานิ เวตฺตตินฺติณิกมาตุลุงฺคกปิตฺถโกสมฺพกรมนฺทาทิขุทฺทกผลปานานิ อฏฺฐปานคติกาเนว, ตานิ กิญฺจาปิ น อนุญฺญาตานิ, อถ โข กปฺปิยํ อนุโลเมนฺติ, ตสฺมา กปฺปนฺติ. ฐเปตฺวา หิ สานุโลมํ ธญฺญผลรสํ อญฺญํ ผลปานํ นาม อกปฺปิยํ นตฺถิ, สพฺพํ ยามกาลิกํเยวาติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. ३०५. “भिक्खूंनो, माझ्याद्वारे जे हे अयोग्य आहे...” हे चार महापदेश भगवंतांनी भिक्खूंना नियम समजून घेण्यासाठी सांगितले. तेथे धम्मसंगीत करणाऱ्या थेरांनी सूत्रांचे ग्रहण करून, त्यावर विचारमंथन करून हे पाहिले. 'ठपेत्वा धञ्ञफलरसं' म्हणजे सात प्रकारच्या धान्यांचे रस दुपारनंतर अयोग्य आहेत, असे नाकारले आहे. ताड, नारळ, फणस, बडहर, दुधी भोपळा, तांबडा भोपळा, काकडी, चिबूड, वाळूक ही नऊ मोठी फळे आणि सर्व कडधान्ये धान्यासारखीच आहेत. जरी त्यांचा थेट निषेध केला नसला, तरी ते अयोग्य गोष्टींशी सुसंगत आहेत, म्हणून दुपारनंतर ते अयोग्य आहेत. आठ प्रकारच्या पेयांना परवानगी दिली आहे. उर्वरित वेत, चिंच, महाळुंग, कवट, कोळिंजन, करवंद इत्यादी लहान फळांचे रस हे आठ पेयांसारखेच आहेत; जरी त्यांना थेट परवानगी दिली नसली, तरी ते योग्य गोष्टींशी सुसंगत आहेत, म्हणून ते योग्य आहेत. कारण धान्याच्या रसाव्यतिरिक्त इतर कोणतेही फळांचे रस अयोग्य नाहीत, ते सर्व यामकालिकच आहेत, असे कुरुंदी अठ्ठकथेत म्हटले आहे. ภควตา ฉ จีวรานิ อนุญฺญาตานิ. ธมฺมสงฺคาหกตฺเถเรหิ เตสํ อนุโลมานิ ทุกูลํ, ปตฺตุณฺณํ, จีนปฏฺฏํ, โสมารปฏฺฏํ, อิทฺธิมยิกํ, เทวทตฺติยนฺติ อปรานิ ฉ อนุญฺญาตานิ. ตตฺถ ‘‘ปตฺตุณฺณ’’นฺติ ปตฺตุณฺณเทเส ปาณเกหิ สญฺชาตวตฺถํ. ทฺเว ปฏา เทสนาเมเนว วุตฺตา. ตานิ ตีณิ โกเสยฺยสฺสานุโลมานิ. ทุกูลํ สาณสฺส, อิตรานิ ทฺเว กปฺปาสิกสฺส วา สพฺเพสํ วา. भगवंतांनी सहा प्रकारच्या चीवरांना परवानगी दिली आहे. धम्मसंगीत करणाऱ्या थेरांनी त्यांच्याशी सुसंगत अशी दुकूल, पत्तुण्ण, चीनपट्ट, सोमारपट्ट, इद्धिमयिक आणि देवदत्तिय या इतर सहा प्रकारच्या वस्त्रांना परवानगी दिली. त्यामध्ये 'पत्तुण्ण' म्हणजे पत्तुण्ण देशात कीटकांद्वारे उत्पन्न झालेले वस्त्र. दोन वस्त्रे केवळ देशाच्या नावानेच सांगितली आहेत. ती तिन्ही रेशमी वस्त्राशी सुसंगत आहेत. दुकूल हे तागाच्या वस्त्राशी सुसंगत आहे, आणि इतर दोन सुती वस्त्राशी किंवा सर्व सहा प्रकारच्या वस्त्रांशी सुसंगत आहेत. ภควตา เอกาทส ปตฺเต ปฏิกฺขิปิตฺวา ทฺเว ปตฺตา อนุญฺญาตา – โลหปตฺโต เจว มตฺติกาปตฺโต จ. โลหถาลกํ, มตฺติกาถาลกํ, ตมฺพโลหถาลกนฺติ เตสํเยว อนุโลมานิ. ภควตา ตโย ตุมฺพา อนุญฺญาตา – โลหตุมฺโพ, กฏฺฐตุมฺโพ, ผลตุมฺโพติ. กุณฺฑิกา, กญฺจนโก, อุทกตุมฺโพติ เตสํเยว อนุโลมานิ. กุรุนฺทิยํ ปน ‘‘ปานียสงฺขปานียสราวกานิ เอเตสํ อนุโลมานี’’ติ วุตฺตํ. ปฏฺฏิกา, สูกรนฺตนฺติ ทฺเว กายพนฺธนานิ อนุญฺญาตานิ, ทุสฺสปฏฺเฏน รชฺชุเกน จ กตกายพนฺธนานิ เตสํ อนุโลมานิ. เสตจฺฉตฺตํ, กิลญฺชจฺฉตฺตํ, ปณฺณจฺฉตฺตนฺติ ตีณิ ฉตฺตานิ อนุญฺญาตานิ. เอกปณฺณจฺฉตฺตํ เตสํเยว อนุโลมนฺติ อิมินา นเยน ปาฬิญฺจ อฏฺฐกถญฺจ อนุเปกฺขิตฺวา อญฺญานิปิ กปฺปิยากปฺปิยานํ อนุโลมานิ เวทิตพฺพานิ. भगवंतांनी अकरा प्रकारच्या पात्रांचा निषेध करून दोन पात्रांना परवानगी दिली - लोहपात्र (लोखंडी पात्र) आणि मृत्तिकापात्र (मातीचे पात्र). लोखंडी थाळी, मातीची थाळी आणि तांब्याची थाळी ही त्यांच्याशीच सुसंगत आहेत. भगवंतांनी तीन प्रकारच्या कुप्यांना (तुम्ब) परवानगी दिली - लोखंडी कुपी, लाकडी कुपी आणि फळाची कुपी. कुंडी (कमंडलू), कांचनक आणि पाण्याची कुपी ही त्यांच्याशीच सुसंगत आहेत. कुरुंदीमध्ये तर “पाणी पिण्याचा शंख आणि पाणी पिण्याची वाटी ही यांच्याशी सुसंगत आहेत” असे म्हटले आहे. पट्टिका आणि सूकरंत या दोन कंबरपट्ट्यांना परवानगी दिली आहे; कापडी पट्टीने आणि दोरीने बनविलेले कंबरपट्टे त्यांच्याशी सुसंगत आहेत. श्वेतछत्र, बांबूची छत्री आणि पानांची छत्री या तीन छत्र्यांना परवानगी दिली आहे. एका पानाची छत्री ही त्यांच्याशीच सुसंगत आहे. या पद्धतीने पाळी आणि अठ्ठकथा यांचे वारंवार अवलोकन करून इतरही योग्य व अयोग्य गोष्टींशी सुसंगत असणाऱ्या गोष्टी जाणून घ्याव्यात. ตทหุปฏิคฺคหิตํ กาเล กปฺปตีติอาทิ สพฺพํ สมฺภินฺนรสํ สนฺธาย วุตฺตํ. สเจ หิ ฉลฺลิมฺปิ อนปเนตฺวา สกเลเนว นาฬิเกรผเลน สทฺธึ ปานกํ ปฏิคฺคหิตํ โหติ, นาฬิเกรํ อปเนตฺวา ตํ วิกาเลปิ กปฺปติ. อุปริ สปฺปิปิณฺฑํ ฐเปตฺวา สีตลปายาสํ เทนฺติ, ยํ ปายาเสน อสํสฏฺฐํ สปฺปิ, ตํ อปเนตฺวา สตฺตาหํ ปริภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. พทฺธมธุผาณิตาทีสุปิ เอเสว นโย. ตกฺโกลชาติผลาทีหิ อลงฺกริตฺวา ปิณฺฑปาตํ เทนฺติ, ตานิ อุทฺธริตฺวา โธวิตฺวา ยาวชีวํ ปริภุญฺชิตพฺพานิ. ยาคุยํ ปกฺขิปิตฺวา ทินฺนสิงฺคิเวราทีสุปิ เตลาทีสุ ปกฺขิปิตฺวา ทินฺนลฏฺฐิมธุกาทีสุปิ เอเสว นโย. เอวํ ยํ ยํ อสมฺภินฺนรสํ โหติ, ตํ ตํ เอกโต ปฏิคฺคหิตมฺปิ ยถา [Pg.386] สุทฺธํ โหติ, ตถา โธวิตฺวา วา ตจฺเฉตฺวา วา ตสฺส ตสฺส กาลวเสน ปริภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. “त्याच दिवशी स्वीकारलेले योग्य वेळी योग्य असते” इत्यादी सर्व विधाने मिश्रित रस असलेल्या पदार्थांच्या संदर्भात भगवंतांनी म्हटले आहे. कारण जर साल न काढता संपूर्ण नारळासह पेय स्वीकारले गेले असेल, तर नारळ बाजूला करून ते पेय विकालच्या वेळी (दुपारनंतर) देखील योग्य ठरते. वर तुपाचा गोळा ठेवून थंड खीर दान करतात; जे तूप खिरीशी मिश्रित झालेले नाही, ते बाजूला करून सात दिवसांपर्यंत उपभोगणे योग्य आहे. मध, गूळ इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. तक्कोल, जायफळ इत्यादींनी सजवून भिक्षा देतात; ती फळे बाहेर काढून, धुवून जन्मभर उपभोगता येतात. पेजमध्ये टाकून दिलेले आले इत्यादींच्या बाबतीत, आणि तेलात टाकून दिलेली ज्येष्ठमध इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. अशा प्रकारे, जे जे अमिश्रित रस असलेले असते, ते एकत्र स्वीकारले गेले असले तरी, जसे ते शुद्ध होईल तसे धुवून किंवा तासून त्या त्या कालावधीनुसार उपभोगणे योग्य आहे. สเจ ปน สมฺภินฺนรสํ โหติ สํสฏฺฐํ, น วฏฺฏติ. ยาวกาลิกญฺหิ อตฺตนา สทฺธึ สมฺภินฺนรสานิ ตีณิปิ ยามกาลิกาทีนิ อตฺตโน สภาวํ อุปเนติ, ยามกาลิกํ ทฺเวปิ สตฺตาหกาลิกาทีนิ อตฺตโน สภาวํ อุปเนติ, สตฺตาหกาลิกมฺปิ อตฺตนา สทฺธึ สํสฏฺฐํ ยาวชีวิกํ อตฺตโน สภาวญฺเญว อุปเนติ; ตสฺมา เตน ตทหุปฏิคฺคหิเตน สทฺธึ ตทหุปฏิคฺคหิตํ วา ปุเรปฏิคฺคหิตํ วา ยาวชีวิกํ สตฺตาหํ กปฺปติ ทฺวีหปฏิคฺคหิเตน ฉาหํ, ตีหปฏิคฺคหิเตน ปญฺจาหํ…เป… สตฺตาหปฏิคฺคหิเตน ตทเหว กปฺปตีติ เวทิตพฺพํ. ตสฺมาเยว หิ ‘‘สตฺตาหกาลิเกน ภิกฺขเว ยาวชีวิกํ ตทหุปฏิคฺคหิต’’นฺติ อวตฺวา ‘‘ปฏิคฺคหิตํ สตฺตาหํ กปฺปตี’’ติ วุตฺตํ. पण जर ते मिश्रित रस असलेले आणि एकमेकांत मिसळलेले असेल, तर ते योग्य नाही. कारण यावकालिक हे स्वतःशी मिश्रित रस असलेल्या यामकालिक इत्यादी तिन्ही प्रकारच्या पदार्थांना स्वतःच्या स्वभावाकडे (यावकालिकत्वाकडे) नेते. यामकालिक हे दोन्ही सप्ताहाकालिक इत्यादी पदार्थांना स्वतःच्या स्वभावाकडे नेते. सप्ताहाकालिक देखील स्वतःशी मिश्रित असलेल्या यावजीविक पदार्थाला स्वतःच्या स्वभावाकडेच नेते; म्हणून, त्याच दिवशी स्वीकारलेल्या त्या सप्ताहाकालिक पदार्थासोबत त्याच दिवशी स्वीकारलेले किंवा पूर्वी स्वीकारलेले यावजीविक औषध सात दिवस योग्य ठरते. दोन दिवस आधी स्वीकारलेल्या सप्ताहाकालिक पदार्थासोबत ते सहा दिवस, three दिवस आधी स्वीकारलेल्यासोबत पाच दिवस... आणि सात दिवस आधी स्वीकारलेल्यासोबत त्याच दिवशी योग्य ठरते, असे समजावे. म्हणूनच “भिक्खूंनो, सप्ताहाकालिक पदार्थासोबत यावजीविक औषध त्याच दिवशी स्वीकारावे” असे न म्हणता, भगवंतांनी “स्वीकारलेले सात दिवस योग्य ठरते” असे म्हटले आहे. กาลยามสตฺตาหาติกฺกเมสุ เจตฺถ วิกาลโภชนสนฺนิธิเภสชฺชสิกฺขาปทานํ วเสน อาปตฺติโย เวทิตพฺพา. อิเมสุ จ ปน จตูสุ กาลิเกสุ ยาวกาลิกํ ยามกาลิกนฺติ อิทเมว ทฺวยํ อนฺโตวุตฺถกญฺเจว สนฺนิธิการกญฺจ โหติ, สตฺตาหกาลิกญฺจ ยาวชีวิกญฺจ อกปฺปิยกุฏิยํ นิกฺขิปิตุมฺปิ วฏฺฏติ, สนฺนิธิมฺปิ น ชเนตีติ. เสสํ สพฺพตฺถ อุตฺตานเมวาติ. आणि येथे, काळ (मध्यान्हपूर्व), रात्रीचे प्रहर आणि सात दिवसांच्या उल्लंघनामध्ये विकालभोजन, सन्निधि (साठा करणे) आणि भेषज्ज (औषध) या शिक्षापदांच्या नियमांनुसार आपत्ती (दोष) समजून घ्याव्यात. आणि या चार कालिकांमध्ये 'यावकालिक' आणि 'यामकालिक' हे दोनच 'अंतोवुत्थक' (अकप्पिय कुटीत ठेवण्याचा दोष) आणि 'सन्निधिकारक' (साठा करण्याचा दोष) उत्पन्न करणारे ठरतात. सप्ताहकालिक आणि यावजीविक हे अकप्पिय कुटीमध्ये ठेवण्यास देखील योग्य आहेत आणि ते सन्निधि (साठा करण्याचा दोष) उत्पन्न करत नाहीत. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. เภสชฺชกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. भेषज्जखन्धक-वर्णना समाप्त झाली. ๗. กถินกฺขนฺธกํ ७. कठिनखन्धक กถินานุชานนกถา कठिन-अनुज्ञान-कथा ๓๐๖. กถินกฺขนฺธเก [Pg.387] – ปาเวยฺยกาติ ปาเวยฺยรฏฺฐวาสิโน. ปาเวยฺยํ นาม โกสเลสุ ปจฺฉิมทิสาภาเค รฏฺฐํ; ตตฺถ วาสิโนติ วุตฺตํ โหติ. โกสลรญฺโญ เอกปิตุกภาตูนํ ภทฺทวคฺคิยตฺเถรานํ เอตํ อธิวจนํ. เตสุ สพฺพเชฏฺฐโก อนาคามี, สพฺพปจฺฉิมโก โสตาปนฺโน, เอโกปิ อรหา วา ปุถุชฺชโน วา นตฺถิ. อารญฺญิกาติ ธุตงฺคสมาทานวเสน อารญฺญิกา; น อรญฺญวาสมตฺเตน. ปิณฺฑปาติกาทิภาเวปิ เตสํ เอเสว นโย. สีสวเสน เจตํ วุตฺตํ. อิเม ปน เตรสาปิ ธุตงฺคานิ สมาทาเยว วตฺตนฺติ. อุทกสงฺคเหติ อุทเกน สงฺคหิเต ฆฏิเต สํสฏฺเฐ; ถเล จ นินฺเน จ เอโกทกีภูเตติ อตฺโถ. ३०६. कठिनखन्धकामध्ये – 'पावेय्यका' म्हणजे पावेय्य देशातील रहिवासी. पावेय्य नावाचा देश कोसल देशाच्या पश्चिम भागात आहे; तेथे राहणारे, असा याचा अर्थ आहे. कोसल राजाच्या एकाच पित्यापासून जन्मलेल्या बंधू असलेल्या 'भद्रवर्गीय' थेरांचे हे नाव (अधिवचन) आहे. त्यांच्यामध्ये सर्वात ज्येष्ठ 'अनागामी' होते आणि सर्वात कनिष्ठ 'सोतापन्न' होते; त्यांच्यात एकही अरहंत किंवा पृथग्जन नव्हता. 'आरण्यक' म्हणजे धुतंगाचे समादान केल्यामुळे आरण्यक झालेले; केवळ अरण्यात राहण्याने नव्हे. पिंडपातिक इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. आणि हे मुख्यत्वाच्या दृष्टीने सांगितले आहे. परंतु हे सर्व तेराही धुतंगांचे समादान करूनच आचरण करत असत. 'उदकसंग्रह' म्हणजे पाण्याने वेढलेले, जोडलेले, मिश्रित झालेले; कोरड्या जमिनीवर आणि सखल भागात सर्वत्र पाणीच पाणी होऊन एकरूप झालेला प्रदेश, असा अर्थ आहे. อุทกจิกฺขลฺเลติ อกฺกนฺตอกฺกนฺตฏฺฐาเน อุทกจิกฺขลฺโล อุฏฺฐหิตฺวา ยาว อานิสทา ปหรติ, อีทิเส จิกฺขลฺเลติ อตฺโถ. โอกปุณฺเณหีติ อุทกปุณฺเณหิ. เตสํ กิร จีวรานิ ฆนานิ, เตสุ ปติตํ อุทกํ น ปคฺฆรติ ฆนตฺตา ปุฏพทฺธํ วิย ติฏฺฐติ. เตน วุตฺตํ – ‘‘โอกปุณฺเณหิ จีวเรหี’’ติ. ‘‘โอฆปุณฺเณหี’’ติปิ ปาโฐ. 'उदकचिखल' म्हणजे पाऊल टाकलेल्या प्रत्येक ठिकाणी पाण्याचा चिखल उडून नितंबापर्यंत (कमरेपर्यंत) उडतो, अशा चिखलात, असा अर्थ आहे. 'ओकपुण्ण' म्हणजे पाण्याने भरलेले. त्यांचे चीवर अत्यंत जाड होते असे म्हणतात; त्यावर पडलेले पाणी जाडपणामुळे खाली गळत नव्हते, तर गाठोड्यात बांधल्यासारखे साठून राहत असे. म्हणूनच "पाण्याने भरलेल्या चीवरांसह" (ओकपुण्णेहि चीवरेहि) असे म्हटले आहे. "ओघपुण्णेहि" असाही पाठ आढळतो. อวิวทมานา วสฺสํ วสิมฺหาติ เอตฺถ อาคนฺตุกฏฺฐาเน เสนาสนผาสุตาย อภาเวน จ ภควโต ทสฺสนาลาเภน อุกฺกณฺฐิตตาย จ เต ภิกฺขู ผาสุํ น วสึสุ, ตสฺมา ‘‘อวิวทมานา ผาสุกํ วสฺสํ วสิมฺหา’’ติ นาโวจุํ. ธมฺมึ กถํ กตฺวาติ ภควา เตสํ ภิกฺขูนํ อนมตคฺคิยกถํ กเถสิ. เต สพฺเพปิ กถาปริโยสาเน อรหตฺตํ ปาปุณิตฺวา นิสินฺนฏฺฐานโตเยว อากาเส อุปฺปติตฺวา อคมํสุ, ตํ สนฺธาย วุตฺตํ – ‘‘ธมฺมึ กถํ กตฺวา’’ติ. ตโต ภควา ‘‘สเจ กถินตฺถาโร ปญฺญตฺโต อภวิสฺส, เอเต ภิกฺขู เอกํ จีวรํ ฐเปตฺวา สนฺตรุตฺตเรน อาคจฺฉนฺตา น เอวํ กิลนฺตา อสฺสุ, กถินตฺถาโร จ นาเมส สพฺพพุทฺเธหิ อนุญฺญาโต’’ติ จินฺเตตฺวา กถินตฺถารํ อนุชานิตุกาโม ภิกฺขู อามนฺเตสิ, อามนฺเตตฺวา จ ปน ‘‘อนุชานามิ ภิกฺขเว’’ติอาทิมาห. “भांडण न करता आम्ही वर्षावास घालवला” या वाक्यात – अनोळखी ठिकाणी शयनासनाची (राहण्याची) सोय नसल्यामुळे आणि भगवंतांचे दर्शन न मिळाल्यामुळे व्याकुळ झाल्याने ते भिक्खू सुखाने राहू शकले नाहीत; म्हणून त्यांनी “आम्ही भांडण न करता सुखाने वर्षावास घालवला” असे म्हटले नाही. “धार्मिक चर्चा करून” म्हणजे भगवंतांनी त्या भिक्खूंना 'अनमतग्गिय-कथा' (संसाराच्या अनादी अनंतेविषयीचे प्रवचन) सांगितली. ते सर्वच जण कथेच्या शेवटी अरहंत पदाला प्राप्त झाले आणि बसलेल्या जागेवरूनच आकाशात उडून निघून गेले; त्याला अनुसरूनच “धार्मिक चर्चा करून” असे म्हटले आहे. त्यानंतर भगवंतांनी विचार केला की, “जर कठिन-प्रस्तार (कठिन वस्त्र स्वीकारणे) प्रज्ञप्त केलेला असता, तर या भिक्खूंनी आपले एक चीवर मागे ठेवून, केवळ अंतरीक आणि उत्तरीक चीवरांसह प्रवास केला असता आणि ते अशा प्रकारे थकले नसते. तसेच हा कठिन-प्रस्तार सर्व बुद्धांनी अनुमत केला आहे.” असा विचार करून कठिन-प्रस्ताराची अनुमती देण्याची इच्छा धरून त्यांनी भिक्खूंना संबोधित केले आणि संबोधित करून “हे भिक्खूंनो, मी अनुमती देतो...” इत्यादी वचन म्हटले. ตตฺถ [Pg.388] อตฺถตกถินานํ โวติ นิปาตมตฺตํ โวกาโร; อตฺถตกถินานนฺติ อตฺโถ. เอวญฺหิ สติ ปรโต ‘‘โส เนสํ ภวิสฺสตี’’ติ ยุชฺชติ. อถ วา โวติ สามิวจนเมเวตํ. โส เนสนฺติ เอตฺถ ปน โส จีวรุปฺปาโท เย อตฺถตกถินา, เตสํ ภวิสฺสตีติ อตฺโถ. त्यामध्ये, “अत्थतकठिनानां वो” या वाक्यात – 'वो' हा शब्द केवळ एक निपात (अव्यय) आहे; 'अत्थतकठिनानां' (ज्यांनी कठिन वस्त्र स्वीकारले आहे अशा भिक्खूंचे) असा याचा अर्थ आहे. असे मानल्यास, पुढे येणारे “तो त्यांचा होईल” (सो नेसं भविस्सति) हे वाक्य योग्य ठरते. किंवा, 'वो' हा शब्द षष्ठी विभक्तीचेच रूप आहे. “तो त्यांचा” या वाक्यात, तो चीवराचा लाभ ज्यांनी कठिन वस्त्र स्वीकारले आहे, त्यांचा होईल, असा अर्थ आहे. ตตฺถ อนามนฺตจาโรติ ยาว กถินํ น อุทฺธริยติ, ตาว อนามนฺเตตฺวา จรณํ กปฺปิสฺสติ, จาริตฺตสิกฺขาปเทน อนาปตฺติ ภวิสฺสตีติ อตฺโถ. อสมาทานจาโรติ ติจีวรํ อสมาทาย จรณํ; จีวรวิปฺปวาโส กปฺปิสฺสตีติ อตฺโถ. คณโภชนนฺติ คณโภชนมฺปิ กปฺปิสฺสติ. ยาวทตฺถจีวรนฺติ ยาวตฺตเกน จีวเรน อตฺโถ, ตาวตฺตกํ อนธิฏฺฐิตํ อวิกปฺปิตํ กปฺปิสฺสตีติ อตฺโถ. โย จ ตตฺถ จีวรุปฺปาโทติ ตตฺถ กถินตฺถตสีมายํ มตกจีวรํ วา โหตุ สงฺฆํ อุทฺทิสฺส ทินฺนํ วา สงฺฆิเกน ตตฺรุปฺปาเทน อาภตํ วา, เยน เกนจิ อากาเรน ยํ สงฺฆิกจีวรํ อุปฺปชฺชติ, ตํ เตสํ ภวิสฺสตีติ อตฺโถ. त्यामध्ये, 'अनामंतचार' म्हणजे जोपर्यंत कठिन वस्त्र काढले (उद्धृत केले) जात नाही, तोपर्यंत न विचारता घरांमध्ये जाणे कल्पेल (योग्य ठरेल); चारित्र्य-शिक्षापदानुसार दोष लागणार नाही, असा अर्थ आहे. 'असमादानचार' म्हणजे तिन्ही चीवरे सोबत न घेता फिरणे; चीवरापासून वेगळे राहणे कल्पेल, असा अर्थ आहे. 'गणभोजन' म्हणजे गणभोजन करणे देखील कल्पेल. 'यावदत्थचीवर' म्हणजे जेवढ्या चीवरांची आवश्यकता असेल, तेवढे चीवर अधिष्ठित किंवा विकल्पित न करताही ठेवणे कल्पेल, असा अर्थ आहे. “आणि तेथे जो चीवराचा लाभ होईल” म्हणजे त्या कठिन वस्त्र स्वीकारलेल्या सीमेमध्ये मृत व्यक्तीचे चीवर असो, संघाला उद्देशून दिलेले असो, किंवा संघाच्या मालकीच्या तेथे उत्पन्न झालेल्या वस्तूद्वारे आणलेले असो; कोणत्याही मार्गाने जे संघिक चीवर प्राप्त होईल, ते त्यांचेच होईल, असा अर्थ आहे. เอวญฺจ ปน ภิกฺขเว กถินํ อตฺถริตพฺพนฺติ เอตฺถ กถินตฺถารํ เก ลภนฺติ, เก น ลภนฺตีติ? คณนวเสน ตาว ปจฺฉิมโกฏิยา ปญฺจ ชนา ลภนฺติ, อุทฺธํ สตสหสฺสมฺปิ, ปญฺจนฺนํ เหฏฺฐา น ลภนฺติ. วุตฺถวสฺสวเสน ปุริมิกาย วสฺสํ อุปคนฺตฺวา ปฐมปวารณาย ปวาริตา ลภนฺติ, ฉินฺนวสฺสา วา ปจฺฉิมิกาย อุปคตา วา น ลภนฺติ, อญฺญสฺมึ วิหาเร วุตฺถวสฺสาปิ น ลภนฺตีติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. ปุริมิกาย อุปคตานํ ปน สพฺเพ คณปูรกา โหนฺติ, อานิสํสํ น ลภนฺติ, อานิสํโส อิตเรสํเยว โหติ. สเจ ปุริมิกาย อุปคตา จตฺตาโร วา โหนฺติ ตโย วา ทฺเว วา เอโก วา, อิตเร คณปูรเก กตฺวา กถินํ อตฺถริตพฺพํ. อถ จตฺตาโร ภิกฺขู อุปคตา, เอโก ปริปุณฺณวสฺโส สามเณโร, โส เจ ปจฺฉิมิกาย อุปสมฺปชฺชติ, คณปูรโก เจว โหติ, อานิสํสญฺจ ลภติ. ตโย ภิกฺขู ทฺเว สามเณรา, ทฺเว ภิกฺขู ตโย สามเณรา, เอโก ภิกฺขุ จตฺตาโร สามเณราติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. สเจ ปุริมิกาย อุปคตา กถินตฺถารกุสลา น โหนฺติ, อตฺถารกุสลา ขนฺธกภาณกเถรา ปริเยสิตฺวา อาเนตพฺพา. กมฺมวาจํ สาเวตฺวา กถินํ อตฺถราเปตฺวา ทานญฺจ ภุญฺชิตฺวา คมิสฺสนฺติ. อานิสํโส ปน อิตเรสํเยว โหติ. “आणि हे भिक्खूंनो, अशा प्रकारे कठिन वस्त्र स्वीकारावे” या वाक्यात – कठिन-प्रस्तार कोणाला मिळतो आणि कोणाला मिळत नाही? संख्येच्या दृष्टीने, किमान मर्यादेत पाच भिक्खूंना तो मिळतो, जास्तीत जास्त एक लाखापर्यंतही भिक्खूंना तो मिळू शकतो; पाचपेक्षा कमी असल्यास तो मिळत नाही. वर्षावासाच्या नियमानुसार, पूर्व-वर्षावासात प्रवेश करून पहिल्या प्रवारणेने प्रवारणा केलेले भिक्खू तो मिळवू शकतात; ज्यांचा वर्षावास खंडित झाला आहे किंवा ज्यांनी उत्तर-वर्षावास स्वीकारला आहे, त्यांना तो मिळत नाही. दुसऱ्या विहारात वर्षावास घालवलेल्या भिक्खूंना देखील तो मिळत नाही, असे 'महापच्चरी' मध्ये म्हटले आहे. परंतु पूर्व-वर्षावास स्वीकारलेले सर्व भिक्खू गणपूरक (संघाची संख्या पूर्ण करणारे) ठरतात, पण त्यांना कठीण वस्त्राचे लाभ (आनिसंस) मिळत नाहीत; तो लाभ इतरांनाच होतो. जर पूर्व-वर्षावास स्वीकारलेले चार, तीन, दोन किंवा एकच भिक्खू असतील, तर इतरांना गणपूरक बनवून कठिन वस्त्र स्वीकारावे. समजा चार भिक्खूंनी वर्षावास स्वीकारला आहे आणि एक वीस वर्षे पूर्ण झालेला सामणेर आहे; जर तो उत्तर-वर्षावासात उपसंपदा प्राप्त करतो, तर तो गणपूरकही ठरतो आणि लाभही मिळवतो. तीन भिक्खू व दोन सामणेर, दोन भिक्खू व तीन सामणेर, एक भिक्खू व चार सामणेर यांच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. जर पूर्व-वर्षावास स्वीकारलेले भिक्खू कठिन-प्रस्ताराच्या विधीमध्ये कुशल नसतील, तर विधीमध्ये कुशल असलेल्या खन्धक-भाणक (खन्धक पाठ करणारे) थेरांचा शोध घेऊन त्यांना आमंत्रित करावे. ते कम्मवाचा ऐकवून, कठिन वस्त्र स्वीकारायला लावून आणि दान ग्रहण करून निघून जातील. परंतु लाभ मात्र इतरांनाच मिळतो. กถินํ [Pg.389] เกน ทินฺนํ วฏฺฏติ? เยน เกนจิ เทเวน วา มนุสฺเสน วา ปญฺจนฺนํ วา สหธมฺมิกานํ อญฺญตเรน ทินฺนํ วฏฺฏติ. กถินทายกสฺส วตฺตํ อตฺถิ, สเจ โส ตํ อชานนฺโต ปุจฺฉติ – ‘‘ภนฺเต กถํ กถินํ ทาตพฺพ’’นฺติ ตสฺส เอวํ อาจิกฺขิตพฺพํ – ‘‘ติณฺณํ จีวรานํ อญฺญตรปฺปโหนกํ สูริยุคฺคมนสมเย วตฺถํ ‘กถินจีวรํ เทมา’ติ ทาตุํ วฏฺฏติ, ตสฺส ปริกมฺมตฺถํ เอตฺตกา นาม สูจิโย, เอตฺตกํ สุตฺตํ, เอตฺตกํ รชนํ, ปริกมฺมํ กโรนฺตานํ เอตฺตกานํ ภิกฺขูนํ ยาคุภตฺตญฺจ ทาตุํ วฏฺฏตี’’ติ. कठिन वस्त्र कोणी दिलेले योग्य ठरते? कोणत्याही देवाने किंवा मनुष्याने, किंवा पाच सहधार्मिकांपैकी कोणीही दिलेले योग्य ठरते. कठिन वस्त्र देणाऱ्याचे (दायकाचे) काही कर्तव्य असते; जर तो ते न जाणता विचारतो – “भंते, कठिन वस्त्र कसे द्यावे?” तर त्याला असे सांगावे – “तिन्ही चीवरांपैकी कोणत्याही एकासाठी पुरेसे असणारे वस्त्र सूर्योदयाच्या वेळी 'आम्ही कठिन चीवर देत आहोत' असे म्हणून देणे योग्य आहे. तसेच त्याच्या शिवणकामासाठी (परिकर्मासाठी) एवढ्या सुया, एवढा दोरा, एवढा रंग आणि शिवणकाम करणाऱ्या भिक्खूंसाठी पेज (यागू) व भोजन देणे योग्य आहे.” กถินตฺถารเกนาปิ ธมฺเมน สเมน อุปฺปนฺนํ กถินํ อตฺถรนฺเตน วตฺตํ ชานิตพฺพํ. ตนฺตวายเคหโต หิ อาภตสนฺตาเนเนว ขลิมกฺขิตสาฏโก น วฏฺฏติ, มลีนสาฏโกปิ น วฏฺฏติ, ตสฺมา กถินตฺถารสาฏกํ ลภิตฺวา สุฏฺฐุ โธวิตฺวา สูจิอาทีนิ จีวรกมฺมูปกรณานิ สชฺเชตฺวา พหูหิ ภิกฺขูหิ สทฺธึ ตทเหว สิพฺพิตฺวา นิฏฺฐิตสูจิกมฺมํ รชิตฺวา กปฺปพินฺทุํ ทตฺวา กถินํ อตฺถริตพฺพํ. สเจ ตสฺมึ อนตฺถเตเยว อญฺญํ กถินสาฏกํ อาหรติ, อญฺญานิ จ พหูนิ กถินานิสํสวตฺถานิ เทติ, โย อานิสํสํ พหุํ เทติ, ตสฺส สนฺตเกเนว อตฺถริตพฺพํ. อิตโร ยถา ตถา โอวทิตฺวา สญฺญาเปตพฺโพ. कठीण आस्तरण करणाऱ्या भिक्खूने सुद्धा धर्माने व न्यायाने प्राप्त झालेल्या कठिनाचे आस्तरण करताना योग्य ते कर्तव्य (वत्त) जाणले पाहिजे. विणकराच्या घरातून थेट आणलेले, खळ लावलेले कापड योग्य ठरत नाही, तसेच मळलेले कापडही चालत नाही. म्हणून, कठीण आस्तरणासाठी कापड मिळाल्यावर ते चांगले धुवून, सुई इत्यादी चीवर बनवण्याची साधने तयार करून, अनेक भिक्खूंसोबत त्याच दिवशी ते शिवून, शिवणकाम पूर्ण झाल्यावर ते रंगवून आणि कप्पबिंदू देऊन कठिनाचे आस्तरण करावे. जर ते आस्तरण करण्यापूर्वीच दुसरे कठीण कापड आणले गेले आणि इतर अनेक कठीण-आनुषंगिक वस्त्रे दिली गेली, तर जो दाता अधिक आनुषंगिक वस्त्रे देतो, त्याने दिलेल्या कापडानेच कठिनाचे आस्तरण करावे. दुसऱ्या दात्याला योग्य प्रकारे उपदेश करून समजावून सांगावे. กถินํ ปน เกน อตฺถริตพฺพํ? ยสฺส สงฺโฆ กถินจีวรํ เทติ. สงฺเฆน ปน กสฺส ทาตพฺพํ? โย ชิณฺณจีวโร โหติ. สเจ พหู ชิณฺณจีวรา โหนฺติ, วุฑฺฒสฺส ทาตพฺพํ. วุฑฺเฒสุปิ โย มหาปริโส ตทเหว จีวรํ กตฺวา อตฺถริตุํ สกฺโกติ, ตสฺส ทาตพฺพํ. สเจ วุฑฺโฒ น สกฺโกติ นวกตโร สกฺโกติ, ตสฺส ทาตพฺพํ. อปิจ สงฺเฆน มหาเถรสฺส สงฺคหํ กาตุํ วฏฺฏติ, ตสฺมา ‘‘ตุมฺเห ภนฺเต คณฺหถ, มยํ กตฺวา ทสฺสามา’’ติ วตฺตพฺพํ. ตีสุ จีวเรสุ ยํ ชิณฺณํ โหติ, ตทตฺถาย ทาตพฺพํ. ปกติยา ทุปฏฺฏจีวรสฺส ทุปฏฺฏตฺถาเยว ทาตพฺพํ. สเจปิสฺส เอกปฏฺฏจีวรํ ฆนํ โหติ, กถินสาฏโก จ เปลโว, สารุปฺปตฺถาย ทุปฏฺฏปฺปโหนกเมว ทาตพฺพํ, ‘‘อหํ อลภนฺโต เอกปฏฺฏํ ปารุปามี’’ติ วทนฺตสฺสาปิ ทุปฏฺฏํ ทาตุํ วฏฺฏติ. โย ปน โลภปกติโก โหติ, ตสฺส น ทาตพฺพํ. เตนาปิ ‘‘กถินํ อตฺถริตฺวา ปจฺฉา สิพฺพิตฺวา ทฺเว จีวรานิ กริสฺสามี’’ติ น คเหตพฺพํ. ยสฺส ปน ทียติ, ตสฺส เยน วิธินา ทาตพฺพํ, ตํ [Pg.390] ทสฺเสตุํ ‘‘เอวญฺจ ปน ภิกฺขเว กถินํ อตฺถริตพฺพ’’นฺติ อารภิตฺวา สุณาตุ เม ภนฺเตติอาทิกา ทานกมฺมวาจา ตาว วุตฺตา. पण कठिनाचे आस्तरण कोणी करावे? ज्याला संघ कठीण चीवर देतो त्याने करावे. पण संघाने ते कोणाला द्यावे? ज्याचे चीवर जीर्ण झाले आहे त्याला द्यावे. जर अनेक भिक्खूंचे चीवर जीर्ण असेल, तर ज्येष्ठ भिक्खूला द्यावे. ज्येष्ठांमध्येही ज्याच्याकडे मोठा परिवार आहे आणि जो त्याच दिवशी चीवर तयार करून आस्तरण करण्यास समर्थ आहे, त्याला द्यावे. जर ज्येष्ठ भिक्खू समर्थ नसेल आणि कनिष्ठ भिक्खू समर्थ असेल, तर कनिष्ठ भिक्खूला द्यावे. तरीही संघाने महाथेरांचा आदर व साहाय्य करणे योग्य आहे, म्हणून 'भंते, आपण हे स्वीकारावे, आम्ही ते तयार करून देऊ' असे म्हणावे. तीन चीवरांपैकी जे जीर्ण असेल, त्याच्यासाठी ते द्यावे. सामान्यतः दुहेरी चीवर असणाऱ्याला दुहेरी चीवरासाठीच ते द्यावे. जरी त्याचे एकेरी चीवर जाड असेल आणि कठीण कापड पातळ असेल, तरी योग्यतेसाठी दुहेरी चीवरासाठी पुरेसे कापडच दिले पाहिजे. 'मला दुहेरी न मिळाल्यास मी एकेरीच पांघरेन' असे म्हणणाऱ्या भिक्खूला सुद्धा दुहेरी चीवर देणेच योग्य आहे. पण जो लोभी स्वभावाचा आहे, त्याला ते देऊ नये. त्याने सुद्धा 'कठिनाचे आस्तरण करून नंतर ते शिवून दोन चीवरे बनवीन' असा विचार करून ते घेऊ नये. परंतु ज्याला दिले जाते, त्याला कोणत्या विधीने दिले पाहिजे, हे दर्शवण्यासाठी 'आणि भिक्खूंनो, कठिनाचे आस्तरण अशा प्रकारे करावे' यापासून सुरुवात करून 'सुणातु मे भन्ते' इत्यादी दान-कम्मवाचा भगवंतांनी सांगितली आहे. เอวํ ทินฺเน ปน กถิเน สเจ ตํ กถินทุสฺสํ นิฏฺฐิตปริกมฺมเมว โหติ, อิจฺเจตํ กุสลํ. โน เจ นิฏฺฐิตปริกมฺมํ โหติ, ‘‘อหํ เถโร’’ติ วา ‘‘พหุสฺสุโต’’ติ วา เอเกนาปิ อกาตุํ น ลพฺภติ, สพฺเพเหว สนฺนิปติตฺวา โธวนสิพฺพนรชนานิ นิฏฺฐาเปตพฺพานิ. อิทญฺหิ กถินวตฺตํ นาม พุทฺธปฺปสตฺถํ. อตีเต ปทุมุตฺตโรปิ ภควา กถินวตฺตํ อกาสิ. ตสฺส กิร อคฺคสาวโก สุชาตตฺเถโร นาม กถินํ คณฺหิ, ตํ สตฺถา อฏฺฐสฏฺฐิยา ภิกฺขุสตสหสฺเสหิ สทฺธึ นิสีทิตฺวา อกาสิ. अशा प्रकारे कठीण कापड दिले असता, जर ते कठीण कापड आधीच पूर्ण पूर्वतयारी केलेले असेल, तर ते उत्तम आहे. जर त्याची पूर्वतयारी पूर्ण झालेली नसेल, तर 'मी थेर आहे' किंवा 'मी बहुश्रुत आहे' असे म्हणून कोणत्याही एका भिक्खूला काम न करता राहता येत नाही. सर्वांनीच एकत्र येऊन धुणे, शिवणे आणि रंगवणे ही कामे पूर्ण केली पाहिजेत. कारण हे कठीण-कर्तव्य (कठिनवत्त) बुद्धांनी प्रशंसिलेले आहे. भूतकाळात पदुमुत्तर भगवंतांनी सुद्धा कठीण-कर्तव्य केले होते. असे ऐकिवात आहे की, त्यांच्या सुजात थेर नावाच्या अग्रश्रावकाने कठीण चीवर स्वीकारले होते आणि शास्त्यांनी अडुसष्ट लाख भिक्खूंसोबत एकत्र बसून ते काम केले होते. กตปริโยสิตํ ปน กถินํ คเหตฺวา อตฺถารเกน ภิกฺขุนา ‘‘สเจ สงฺฆาฏิยา กถินํ อตฺถริตุกาโม โหติ, โปราณิกา สงฺฆาฏิ ปจฺจุทฺธริตพฺพา, นวา สงฺฆาฏิ อธิฏฺฐาตพฺพา. ‘อิมาย สงฺฆาฏิยา กถินํ อตฺถรามี’ติ วาจา ภินฺทิตพฺพา’’ติอาทินา ปริวาเร วุตฺตวิธาเนน กถินํ อตฺถริตพฺพํ. อตฺถริตฺวา จ ปน ‘‘เตน กถินตฺถารเกน ภิกฺขุนา สงฺฆํ อุปสงฺกมิตฺวา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา อญฺชลึ ปคฺคเหตฺวา เอวมสฺส วจนีโย – ‘อตฺถตํ ภนฺเต สงฺฆสฺส กถินํ, ธมฺมิโก กถินตฺถาโร, อนุโมทถา’ติ เตหิ อนุโมทเกหิ ภิกฺขูหิ เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา อญฺชลึ ปคฺคเหตฺวา เอวมสฺส วจนีโย – ‘อตฺถตํ อาวุโส สงฺฆสฺส กถินํ, ธมฺมิโก กถินตฺถาโร, อนุโมทามา’’ติ เอวมาทินา ปริวาเร วุตฺตวิธาเนเนว อนุโมทาเปตพฺพํ, อิตเรหิ จ อนุโมทิตพฺพํ. เอวํ สพฺเพสํ อตฺถตํ โหติ กถินํ. วุตฺตญฺเหตํ ปริวาเร ‘‘ทฺวินฺนํ ปุคฺคลานํ อตฺถตํ โหติ กถินํ – อตฺถารกสฺส จ อนุโมทกสฺส จา’’ติ (ปริ. ๔๐๓). ปุนปิ วุตฺตํ – ‘‘น สงฺโฆ กถินํ อตฺถรติ, น คโณ กถินํ อตฺถรติ, ปุคฺคโล กถินํ อตฺถรติ, สงฺฆสฺส อนุโมทนา คณสฺส อนุโมทนา ปุคฺคลสฺส อตฺถารา สงฺฆสฺส อตฺถตํ โหติ กถินํ, คณสฺส อตฺถตํ โหติ กถินํ, ปุคฺคลสฺส อตฺถตํ โหติ กถินํ’’ติ (ปริ. ๔๑๔). तयार झालेले कठीण चीवर घेऊन आस्तरण करणाऱ्या भिक्खूने – 'जर संघातिकेने कठिनाचे आस्तरण करायचे असेल, तर जुन्या संघातिकेचा त्याग (पच्चुद्धार) करावा आणि नवीन संघातिकेचे अधिष्ठान करावे. मी या संघातिकेने कठिनाचे आस्तरण करतो असे शब्द उच्चारावेत' – इत्यादी प्रकारे 'परिवार' पाठात सांगितलेल्या विधीनुसार कठिनाचे आस्तरण करावे. आस्तरण केल्यावर, 'त्या कठीण आस्तरण करणाऱ्या भिक्खूने संघाकडे जाऊन, एका खांद्यावर उत्तरासंग ठेवून, हात जोडून असे म्हणावे – भंते, संघाचे कठीण आस्तरण झाले आहे, कठीण आस्तरण धर्मसंगत आहे, आपण याचे अनुमोदन करावे. त्यावर त्या अनुमोदन करणाऱ्या भिक्खूंनी एका खांद्यावर उत्तरासंग ठेवून, हात जोडून असे म्हणावे – आयुष्यमान, संघाचे कठीण आस्तरण झाले आहे, कठीण आस्तरण धर्मसंगत आहे, आम्ही याचे अनुमोदन करतो' – अशा प्रकारे 'परिवार' पाठात सांगितलेल्या विधीनुसारच अनुमोदन करवून घ्यावे आणि इतर भिक्खूंनीही अनुमोदन करावे. अशा प्रकारे सर्वांचे कठीण आस्तरण पूर्ण होते. 'परिवार' पाठात असे म्हटले आहे की – 'दोन व्यक्तींचे कठीण आस्तरण पूर्ण होते – आस्तरण करणाऱ्याचे आणि अनुमोदन करणाऱ्याचे.' पुन्हा असे म्हटले आहे की – 'संघ कठिनाचे आस्तरण करत नाही, गण कठिनाचे आस्तरण करत नाही, तर व्यक्ती कठिनाचे आस्तरण करते. संघाच्या अनुमोदनाने, गणाच्या अनुमोदनाने आणि व्यक्तीच्या आस्तरणाने संघाचे कठीण आस्तरण पूर्ण होते, गणाचे कठीण आस्तरण पूर्ण होते आणि व्यक्तीचे कठीण आस्तरण पूर्ण होते.' เอวํ อตฺถเต ปน กถิเน สเจ กถินจีวเรน สทฺธึ อาภตํ อานิสํสํ ทายกา ‘‘เยน อมฺหากํ กถินํ คหิตํ, ตสฺเสว เทมา’’ติ เทนฺติ[Pg.391], ภิกฺขุสงฺโฆ อนิสฺสโร. อถ อวิจาเรตฺวาว ทตฺวา คจฺฉนฺติ, ภิกฺขุสงฺโฆ อิสฺสโร. ตสฺมา สเจ กถินตฺถารกสฺส เสสจีวรานิปิ ทุพฺพลานิ โหนฺติ, สงฺเฆน อปโลเกตฺวา เตสมฺปิ อตฺถาย วตฺถานิ ทาตพฺพานิ. กมฺมวาจา ปน เอกาเยว วฏฺฏติ. อวเสเส กถินานิสํเส พลววตฺถานิ วสฺสาวาสิกฏฺฐิติกาย ทาตพฺพานิ, ฐิติกาย อภาเว เถราสนโต ปฏฺฐาย ทาตพฺพานิ, ครุภณฺฑํ น ภาเชตพฺพํ. สเจ ปน เอกสีมาย พหู วิหารา โหนฺติ, สพฺเพ ภิกฺขู สนฺนิปาเตตฺวา เอกตฺถ กถินํ อตฺถริตพฺพํ, วิสุํ วิสุํ อตฺถริตุํ น วฏฺฏติ. अशा प्रकारे कठिनाचे आस्तरण झाल्यावर, जर कठीण चीवरासोबत आणलेले आनुषंगिक वस्त्र दाते 'ज्याने आमचे कठीण स्वीकारले आहे, त्यालाच आम्ही हे देतो' असे म्हणून देतात, तर भिक्खू संघाचा त्यावर अधिकार नसतो. परंतु जर ते कोणताही विचार न करता देऊन जातात, तर भिक्खू संघ त्यावर अधिकार बाळगतो. म्हणून, जर कठीण आस्तरण करणाऱ्या भिक्खूची इतर चीवरे सुद्धा जीर्ण झाली असतील, तर संघाने परवानगी घेऊन त्याच्यासाठी सुद्धा ती वस्त्रे दिली पाहिजेत. कम्मवाचा मात्र एकदाच करणे योग्य आहे. उरलेली कठीण-आनुषंगिक चांगली वस्त्रे वर्षावास करणाऱ्या भिक्खूंच्या ज्येष्ठतेनुसार दिली पाहिजेत. जर अशी ज्येष्ठता-यादी नसेल, तर थेरांच्या आसनापासून सुरुवात करून ती दिली पाहिजेत. गरूभांड वाटले जाऊ नये. जर एकाच सीमेमध्ये अनेक विहार असतील, तर सर्व भिक्खूंना एकत्र बोलावून एकाच ठिकाणी कठिनाचे आस्तरण करावे, वेगवेगळ्या ठिकाणी आस्तरण करणे योग्य नाही. ๓๐๘. อิทานิ ยถา จ กถินํ อตฺถตํ โหติ, ยถา จ อนตฺถตํ, ตํ วิธึ วิตฺถารโต ทสฺเสตุํ เอวญฺจ ปน ภิกฺขเว อตฺถตํ โหติ กถินํ เอวํ อนตฺถตนฺติ วตฺวา อกรณียญฺเจว มหาภูมิกญฺจ อนตฺถตลกฺขณํ ตาว ทสฺเสนฺโต น อุลฺลิขิตมตฺเตนาติอาทิเก จตุวีสติ อากาเร ทสฺเสสิ. ตโต ปรํ อตฺถตลกฺขณํ ทสฺเสนฺโต อหเตน อตฺถตนฺติอาทิเก สตฺตรส อากาเร ทสฺเสสิ. ปริวาเรปิ หิ ‘‘จตุวีสติยา อากาเรหิ อนตฺถตํ โหติ กถินํ, สตฺตรสหิ อากาเรหิ อตฺถตํ โหติ กถิน’’นฺติ อิทเมว ลกฺขณํ วุตฺตํ. ३०८. आता, कठिनाचे आस्तरण कशा प्रकारे पूर्ण होते आणि कशा प्रकारे अपूर्ण राहते, तो विधी सविस्तरपणे दर्शवण्यासाठी 'आणि भिक्खूंनो, कठिनाचे आस्तरण अशा प्रकारे पूर्ण होते आणि अशा प्रकारे अपूर्ण राहते' असे सांगून, न करण्याजोगे आणि व्यापक असणारे अपूर्ण आस्तरणाचे लक्षण आधी दर्शवताना, 'केवळ रेषा ओढल्याने होत नाही' इत्यादी चोवीस प्रकार भगवंतांनी दर्शवले. त्यानंतर पूर्ण आस्तरणाचे लक्षण दर्शवताना, 'नवीन कापडाने आस्तरण केले जाते' इत्यादी सतरा प्रकार भगवंतांनी दर्शवले. कारण 'परिवार' पाठात सुद्धा 'चोवीस प्रकारांनी कठिनाचे आस्तरण अपूर्ण राहते आणि सतरा प्रकारांनी कठिनाचे आस्तरण पूर्ण होते' असे हेच लक्षण सांगितले आहे. ตตฺถ อุลฺลิขิตมตฺเตนาติ ทีฆโต จ ปุถุลโต จ ปมาณคฺคหณมตฺเตน. ปมาณญฺหิ คณฺหนฺโต ตสฺส ตสฺส ปเทสสฺส สญฺชานนตฺถํ นขาทีหิ วา ปริจฺเฉทํ ทสฺเสนฺโต อุลฺลิขติ, นลาฏาทีสุ วา ฆํสติ, ตสฺมา ตํ ปมาณคฺคหณํ ‘‘อุลฺลิขิตมตฺต’’นฺติ วุจฺจติ. โธวนมตฺเตนาติ กถินทุสฺสโธวนมตฺเตน. จีวรวิจารณมตฺเตนาติ ‘‘ปญฺจกํ วา สตฺตกํ วา นวกํ วา เอกาทสกํ วา โหตู’’ติ เอวํ วิจาริตมตฺเตน. เฉทนมตฺเตนาติ ยถาวิจาริตสฺส วตฺถสฺส เฉทนมตฺเตน. พนฺธนมตฺเตนาติ โมฆสุตฺตกาโรปนมตฺเตน. โอวฏฺฏิยกรณมตฺเตนาติ โมฆสุตฺตกานุสาเรน ทีฆสิพฺพิตมตฺเตน. กณฺฑุสกรณมตฺเตนาติ มุทฺธิยปตฺตพนฺธนมตฺเตน. ทฬฺหีกมฺมกรณมตฺเตนาติ ทฺเว จิมิลิกาโย เอกโต กตฺวา สิพฺพิตมตฺเตน. อถ วา ปฐมจิมิลิกา ฆเฏตฺวา ฐปิตา โหติ, กถินสาฏกํ ตสฺสา กุจฺฉิจิมิลิกํ กตฺวา สิพฺพิตมตฺเตนาติปิ อตฺโถ. มหาปจฺจริยํ [Pg.392] ‘‘ปกติจีวรสฺส อุปสฺสยทาเนนา’’ติ วุตฺตํ. กุรุนฺทิยํ ปน ‘‘ปกติปตฺตพทฺธจีวรํ ทุปฏฺฏํ กาตุํ กุจฺฉิจิมิลิกํ อลฺลิยาปนมตฺเตนา’’ติ วุตฺตํ. อนุวาตกรณมตฺเตนาติ ปิฏฺฐิอนุวาตาโรปนมตฺเตน. ปริภณฺฑกรณมตฺเตนาติ กุจฺฉิอนอุวาตาโรปนมตฺเตน. โอวทฺเธยฺยกรณมตฺเตนาติ อาคนฺตุกปตฺตาโรปนมตฺเตน. กถินจีวรโต วา ปตฺตํ คเหตฺวา อญฺญสฺมึ อกถินจีวเร ปตฺตาโรปนมตฺเตน. त्यात, 'उल्लिखितमत्तेन' (केवळ रेखण्याने) म्हणजे लांबी आणि रुंदीच्या मापनाचे केवळ ग्रहण करण्याने. कारण माप घेणारा मनुष्य त्या त्या भागाच्या ओळखीसाठी नखांनी किंवा इतर साधनांनी मर्यादा दाखवत (वस्त्रावर) रेखतो किंवा कपाळ इत्यादींवर घासतो, म्हणून त्या मापनाला 'उल्लिखितमत्त' असे म्हणतात. 'धोवनमत्तेन' म्हणजे कठीण वस्त्राला केवळ धुण्याने. 'चीवरविचारणमत्तेन' म्हणजे 'पाच कप्प्यांचे, सात कप्प्यांचे, नऊ कप्प्यांचे किंवा अकरा कप्प्यांचे चीवर असो' अशा केवळ नियोजनाने (कठीण होत नाही). 'छेदनमत्तेन' म्हणजे नियोजित केलेल्या वस्त्राला केवळ कापण्याने. 'बंधनमत्तेन' म्हणजे तात्पुरता दोरा (मोघसुत्तक) केवळ लावण्याने. 'ओवट्टियकरणमत्तेन' म्हणजे तात्पुरत्या दोऱ्याच्या अनुषंगाने केवळ लांब शिवण घालण्याने. 'कण्डुसुकरणमत्तेन' म्हणजे कप्प्यांच्या सांध्यांची केवळ शिवण घालण्याने. 'दळ्हीकम्मकरणमत्तेन' म्हणजे दोन वस्त्रांचे थर एकत्र करून केवळ शिवण्याने. किंवा पहिले वस्त्र जोडून ठेवलेले असते, कठीण वस्त्राला त्याच्या आतील बाजूचे वस्त्र करून केवळ शिवण्याने, असाही अर्थ आहे. महाप्रत्यरीमध्ये म्हटले आहे— 'सामान्य चीवरावर दुसरे वस्त्र वरून जोडण्याने (कठीण होत नाही).' कुरुन्दीमध्ये तर म्हटले आहे— 'सामान्यपणे जोडलेले दुहेरी चीवर करण्यासाठी आतील बाजूचे वस्त्र केवळ जोडण्याने (कठीण होत नाही).' 'अनुवातकरणमत्तेन' म्हणजे पाठीमागील बाजूला केवळ अनुवात (काठ) लावण्याने. 'परिभण्डकरणमत्तेन' म्हणजे पोटाकडील बाजूला केवळ अनुवात लावण्याने. 'ओवद्धेय्यकरणमत्तेन' म्हणजे बाहेरील पट्टी केवळ लावण्याने; किंवा कठीण चीवरामधून पट्टी घेऊन दुसऱ्या अकठीण चीवरावर केवळ पट्टी लावण्याने (कठीण होत नाही). กมฺพลมทฺทนมตฺเตนาติ เอกวารํเยว รชเน ปกฺขิตฺเตน ทนฺตวณฺเณน ปณฺฑุปลาสวณฺเณน วา. สเจ ปน สกึ วา ทฺวิกฺขตฺตุํ วา รตฺตมฺปิ สารุปฺปํ โหติ, วฏฺฏติ. นิมิตฺตกเตนาติ ‘‘อิมินา ทุสฺเสน กถินํ อตฺถริสฺสามี’’ติ เอวํ นิมิตฺตกเตน. เอตฺตกเมว หิ ปริวาเร วุตฺตํ. อฏฺฐกถาสุ ปน ‘‘อยํ สาฏโก สุนฺทโร, สกฺกา อิมินา กถินํ อตฺถริตุ’นฺติ เอวํ นิมิตฺตกมฺมํ กตฺวา ลทฺเธนา’’ติ วุตฺตํ. ปริกถากเตนาติ ‘‘กถินํ นาม ทาตุํ วฏฺฏติ, กถินทายโก พหุํ ปุญฺญํ ปสวตี’’ติ เอวํ ปริกถาย อุปฺปาทิเตน. กถินํ นาม อติอุกฺกฏฺฐํ วฏฺฏติ, มาตรมฺปิ วิญฺญาเปตุํ น วฏฺฏติ, อากาสโต โอติณฺณสทิสเมว วฏฺฏตีติ. กุกฺกุกเตนาติ ตาวกาลิเกน. สนฺนิธิกเตนาติ เอตฺถ ทุวิโธ สนฺนิธิ กรณสนฺนิธิ จ นิจยสนฺนิธิ จ. ตตฺถ ตทเหว อกตฺวา ฐเปตฺวา กรณํ กรณสนฺนิธิ. สงฺโฆ อชฺช กถินทุสฺสํ ลภิตฺวา ปุนทิวเส เทติ, อยํ นิจยสนฺนิธิ. 'कम्बलमद्दनमत्तेन' (केवळ रंग मळण्याने) म्हणजे केवळ एकदाच रंगात टाकलेल्या हस्तिदंती रंगाच्या किंवा पिवळसर पांढऱ्या (पांडुपलास) रंगाच्या वस्त्राने (कठीण होत नाही). पण जर एकदा किंवा दोनदा रंगवलेले वस्त्र देखील योग्य (नेसण्यास योग्य) असेल, तर ते चालते. 'निमित्तकतेन' म्हणजे 'या वस्त्राने मी कठीण अंथरीन' अशा प्रकारे निमित्त करून मिळवलेल्या वस्त्राने (कठीण होत नाही). कारण परिवारात एवढेच म्हटले आहे. परंतु अट्ठकथांमध्ये तर म्हटले आहे— 'हे वस्त्र सुंदर आहे, याने कठीण अंथरता येऊ शकते, अशा प्रकारे निमित्तकर्म करून मिळवलेल्या वस्त्राने (कठीण होत नाही).' 'परिकथाकतेन' म्हणजे 'कठीण दान देणे योग्य आहे, कठीण देणारा खूप पुण्य मिळवतो' अशा प्रकारे परिकथेने (अप्रत्यक्ष बोलण्याने) मिळवलेल्या वस्त्राने (कठीण होत नाही). कठीण चीवर हे अत्यंत उत्कृष्ट असावे लागते, आईकडे देखील त्याची मागणी करणे योग्य नाही, ते जणू आकाशातून उतरल्यासारखेच असावे लागते. 'कुक्कुकतेन' म्हणजे तात्पुरते उसने घेतलेल्या वस्त्राने (कठीण होत नाही). 'संनिधिकतेन' यामध्ये दोन प्रकारचे संनिधि आहेत— करण-संनिधि आणि निश्चय-संनिधि. त्यापैकी, त्याच दिवशी (शिवण-रंगण) न करता राखून ठेवून नंतर करणे म्हणजे 'करण-संनिधि' होय. संघाने आज कठीण वस्त्र मिळवून दुसऱ्या दिवशी ते देणे, हा 'निश्चय-संनिधि' होय. นิสฺสคฺคิเยนาติ รตฺตินิสฺสคฺคิเยน. ปริวาเรปิ วุตฺตํ – ‘‘นิสฺสคฺคิยํ นาม กริยมาเน อรุณํ อุฏฺฐหตี’’ติ. อกปฺปกเตนาติ อนาทินฺนกปฺปพินฺทุนา. อญฺญตฺร สงฺฆาฏิยาติอาทีสุ ฐเปตฺวา สงฺฆาฏิอุตฺตราสงฺคอนฺตรวาสเก อญฺเญน ปจฺจตฺถรณาทินา อตฺถตํ อนตฺถตํ โหตีติ. อญฺญตฺร ปญฺจเกน วา อติเรกปญฺจเกน วาติ ปญฺจ วา อติเรกานิ วา ขณฺฑานิ กตฺวา มหามณฺฑลอฑฺฒมณฺฑลานิ ทสฺเสตฺวา กเตเนว วฏฺฏติ. เอวญฺหิ สมณฺฑลิกตํ โหติ, ตํ ฐเปตฺวา อญฺเญน อจฺฉินฺนเกน วา ทฺวตฺติจตุขณฺเฑน วา น วฏฺฏติ. อญฺญตฺร ปุคฺคลสฺส อตฺถาราติ ปุคฺคลสฺส อตฺถารํ ฐเปตฺวา น อญฺเญน สงฺฆสฺส วา คณสฺส วา อตฺถาเรน อตฺถตํ โหติ. นิสฺสีมฏฺโฐ อนุโมทตีติ พหิอุปจารสีมาย ฐิโต อนุโมทติ. 'निसग्गियेन' म्हणजे रात्रीचा काळ उलटून गेल्याने निसग्गिय झालेल्या वस्त्राने (कठीण होत नाही). परिवारातही म्हटले आहे— 'कठीण करत असतानाच अरुणोदय झाला तर ते निसग्गिय होते.' 'अकप्पकतेन' म्हणजे कप्पबिंदू (चिन्ह) न लावलेल्या वस्त्राने (कठीण होत नाही). 'संघाटी इत्यादींशिवाय' या पाठात— संघाटी, उत्तरासंग आणि अंतरवासक सोडून इतर अंथरूण इत्यादी वस्त्रांनी अंथरलेले कठीण हे 'अंथरलेले' मानले जात नाही, असा अर्थ आहे. 'पाच किंवा पाचपेक्षा अधिक कप्प्यांच्या वस्त्राशिवाय' म्हणजे पाच किंवा पाचपेक्षा अधिक कप्पे करून, महामंडळ आणि अर्धमंडळ दाखवून तयार केलेल्या वस्त्रानेच कठीण अंथरणे योग्य आहे. कारण अशा प्रकारे ते मंडलयुक्त होते. ते सोडून इतर न कापलेल्या किंवा दोन, तीन, चार कप्प्यांच्या वस्त्राने कठीण अंथरणे योग्य नाही. 'पुद्गलाच्या अंथरण्याशिवाय' म्हणजे एका व्यक्तीचे अंथरणे सोडून, इतर संघ किंवा गण यांच्या अंथरण्याने कठीण अंथरलेले होत नाही. 'सीमाबाहेर असलेला अनुमोदित करतो' म्हणजे उपचार-सीमेच्या बाहेर उभा असलेला भिक्खू अनुमोदन करतो. ๓๐๙. อหเตนาติ [Pg.393] อปริภุตฺเตน. อหตกปฺเปนาติ อหตสทิเสน เอกวารํ วา ทฺวิกฺขตฺตุํ วา โธเตน. ปิโลติกายาติ หตวตฺถกสาฏเกน. ปํสุกูเลนาติ เตวีสติยา เขตฺเตสุ อุปฺปนฺนปํสุกูเลน. ปํสุกูลิกภิกฺขุนา โจฬกภิกฺขํ อาหิณฺฑิตฺวา ลทฺธโจฬเกหิ กตจีวเรนาติปิ กุรุนฺทิมหาปจฺจรีสุ วุตฺตํ. ปาปณิเกนาติ อาปณทฺวาเร ปติตปิโลติกํ คเหตฺวา กถินตฺถาย เทติ, เตนาปิ วฏฺฏตีติ อตฺโถ. เสสํ วุตฺตวิปลฺลาเสเนว เวทิตพฺพํ. อิมสฺมึ ปน ฐาเน ‘‘สห กถินสฺส อตฺถารา กติ ธมฺมา ชายนฺตี’’ติอาทิ พหุอฏฺฐกถาสุ วุตฺตํ, ตํ สพฺพํ ปริวาเร ปาฬิอารูฬฺหเมว, ตสฺมา ตตฺถ อาคตนเยเนว เวทิตพฺพํ. น หิ เตน อิธ อวุจฺจมาเนน กถินตฺถารกสฺส กิญฺจิ ปริหายติ. ३०९. 'अहतेन' म्हणजे न वापरलेल्या (नवीन) वस्त्राने. 'अहतकल्पेन' म्हणजे नवीन वस्त्रासारख्या, एकदा किंवा दोनदा धुवून घेतलेल्या वस्त्राने. 'पिलोटिकाय' म्हणजे जुन्या धुवून घेतलेल्या वस्त्राने. 'पांसुकूलेन' म्हणजे तेवीस प्रकारच्या क्षेत्रांमधून मिळालेल्या पांसुकूल वस्त्राने. पांसुकूलिक भिक्खूने चिंध्या गोळा करण्यासाठी फिरून मिळवलेल्या चिंध्यांपासून तयार केलेल्या चीवराने देखील (कठीण अंथरता येते), असे कुरुन्दी आणि महाप्रत्यरीमध्ये म्हटले आहे. 'पापणिकेन' म्हणजे बाजाराच्या दाराजवळ पडलेली चिंधी घेऊन कठीणसाठी देणे; त्याने देखील कठीण अंथरणे योग्य आहे, असा अर्थ आहे. उर्वरित भाग आधी सांगितलेल्या अर्थाच्या उलट करून समजून घ्यावा. परंतु या ठिकाणी 'कठीण अंथरण्यासोबत किती धर्म उत्पन्न होतात' इत्यादी अनेक गोष्टी अट्ठकथांमध्ये सांगितल्या आहेत, त्या सर्व परिवारात पाळीमध्ये समाविष्ट आहेत. म्हणून तेथे आलेल्या पद्धतीनेच त्या समजून घ्याव्यात. कारण येथे त्या थेट न सांगितल्याने कठीण अंथरणाऱ्या भिक्खूचे काहीही नुकसान होत नाही. ๓๑๐. เอวํ กถินตฺถารํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ อุพฺภารํ ทสฺเสตุํ กถญฺจ ภิกฺขเว อุพฺภตํ โหติ กถินนฺติอาทิมาห. ตตฺถ มาติกาติ มาตโร; ชเนตฺติโยติ อตฺโถ. กถินุพฺภารญฺหิ เอตา อฏฺฐ ชเนตฺติโย. ตาสุ ปกฺกมนํ อนฺโต อสฺสาติ ปกฺกมนนฺติกา. เอวํ เสสาปิ เวทิตพฺพา. ३१०. अशा प्रकारे कठीण अंथरणे दाखवून, आता कठीण काढणे (उद्धार) दाखवण्यासाठी भगवंतांनी 'कथञ्च भिक्खवे उब्भतं होति कठिनं' (भिक्खूंनो, कठीण कसे काढले जाते?) इत्यादी म्हटले. त्यामध्ये 'मातिका' म्हणजे माता; जन्म देणारी माता असा अर्थ आहे. कारण कठीण काढण्याला जन्म देणाऱ्या या आठ मातिका आहेत. त्यापैकी, जिच्या शेवटी प्रस्थान (निघून जाणे) आहे, ती 'पक्कमनंतिका' (प्रस्थान-अंता) होय. याचप्रमाणे उर्वरित मातिका देखील समजून घ्याव्यात. อาทายสตฺตกกถา आदायसत्तककथा (घेऊन जाण्याच्या सात बाबींची कथा) ๓๑๑. น ปจฺเจสฺสนฺติ น ปุน อาคมิสฺสํ. เอตสฺมึ ปน ปกฺกมนนฺติเก กถินุทฺธาเร ปฐมํ จีวรปลิโพโธ ฉิชฺชติ, ปจฺฉา อาวาสปลิโพโธ. เอวํ ปกฺกมโต หิ จีวรปลิโพโธ อนฺโตสีมายเมว ฉิชฺชติ, อาวาสปลิโพโธ สีมาติกฺกเม. วุตฺตมฺปิ เจตํ ปริวาเร – ३११. 'परत येणार नाही' म्हणजे पुन्हा परत येणार नाही. परंतु या पक्कमनंतिका कठीण उद्धारामध्ये आधी चीवर-पलिबोध तुटतो, नंतर आवास-पलिबोध तुटतो. कारण अशा प्रकारे निघून जाणाऱ्या भिक्खूचा चीवर-पलिबोध सीमेच्या आतच तुटतो आणि आवास-पलिबोध सीमा ओलांडल्यावर तुटतो. परिवारातही हे म्हटले आहे— ‘‘ปกฺกมนนฺติโก กถินุทฺธาโร, วุตฺโต อาทิจฺจพนฺธุนา; เอตญฺจ ตาหํ วิสฺสชฺชิสฺสํ, จีวรปลิโพโธ ปฐมํ ฉิชฺชติ; ปจฺฉา อาวาสปลิโพโธ ฉิชฺชตี’’ติ. (ปริ. ๔๑๕); 'प्रस्थान-अंता (पक्कमनंतिका) कठीण उद्धार आदित्यबंधूंनी (बुद्धांनी) सांगितला आहे; आणि या प्रश्नाचे मी उत्तर देईन की, आधी चीवर-पलिबोध तुटतो आणि नंतर आवास-पलिबोध तुटतो.' จีวรํ อาทายาติ อกตจีวรํ อาทาย. พหิสีมคตสฺสาติ อญฺญํ สามนฺตวิหารํ คตสฺส. เอวํ โหตีติ ตสฺมึ วิหาเร เสนาสนผาสุกํ วา สหายสมฺปตฺตึ วา ทิสฺวา เอวํ โหติ. เอตสฺมึ ปน นิฏฺฐานนฺติเก กถินุทฺธาเร อาวาสปลิโพโธ ปฐมํ ฉิชฺชติ, โส หิ ‘‘น ปจฺเจสฺส’’นฺติ จิตฺเต อุปฺปนฺนมตฺเตเยว ฉิชฺชติ. วุตฺตมฺปิ เจตํ – 'चीवर घेऊन' म्हणजे न शिवलेले चीवर घेऊन. 'सीमेबाहेर गेलेल्याला' म्हणजे दुसऱ्या जवळच्या विहारात गेलेल्याला. 'असे होते' म्हणजे त्या विहारात शयनासन सुकर असल्याचे किंवा चांगल्या मित्रांची सोबत असल्याचे पाहून असा विचार येतो. परंतु या निट्ठानंतिका कठीण उद्धारामध्ये आवास-पलिबोध आधी तुटतो. कारण 'मी परत येणार नाही' असा विचार मनात उत्पन्न होताच तो तुटतो. हे देखील म्हटले आहे— ‘‘นิฏฺฐานนฺติโก [Pg.394] กถินุทฺธาโร, วุตฺโต อาทิจฺจพนฺธุนา; เอตญฺจ ตาหํ วิสฺสชฺชิสฺสํ, อาวาสปลิโพโธ ปฐมํ ฉิชฺชติ; จีวเร นิฏฺฐิเต จีวรปลิโพโธ ฉิชฺชตี’’ติ. "कार्य पूर्ण होणे हाच अंत असलेला कठीण उद्धार (कठिन निष्कासन) आदित्यबंधूंनी (सूर्याचे बांधव असलेल्या भगवंतांनी) सांगितला आहे. आणि तुझ्या या प्रश्नाचे मी उत्तर देईन; प्रथम आवास-पलिबोध (विहाराची आसक्ती) नष्ट होतो, आणि चीवर पूर्ण झाल्यावर चीवर-पलिबोध नष्ट होतो." เอเตน นเยน เสสมาติกาวิภชเนปิ อตฺโถ เวทิตพฺโพ. อยํ ปน วิเสโส – ‘‘สนฺนิฏฺฐานนฺติเก ทฺเวปิ ปลิโพธา เนวิมํ จีวรํ กาเรสฺสํ, น ปจฺเจสฺสนฺติ จิตฺเต อุปฺปนฺนมตฺเตเยว เอกโต ฉิชฺชนฺตีติ. วุตฺตญฺเหตํ – "याच पद्धतीने उर्वरित मातृकांच्या विभाजनातही अर्थ समजून घ्यावा. परंतु हा विशेष आहे की—'निश्चय करणे हाच अंत असलेल्या' (सन्निष्ठानांतिक) कठीण उद्धारात, 'मी हे चीवर बनवणार नाही आणि परत येणार नाही' असा विचार चित्तात उत्पन्न होताच दोन्हीही पलिबोध एकाच वेळी नष्ट होतात. कारण असे म्हटले आहे—" ‘‘สนฺนิฏฺฐานนฺติโก กถินุทฺธาโร, วุตฺโต อาทิจฺจพนฺธุนา; เอตญฺจ ตาหํ วิสฺสชฺชิสฺสํ, ทฺเว ปลิโพธา อปุพฺพํ อจริมํ ฉิชฺชนฺตี’’ติ. "'निश्चय करणे हाच अंत असलेला कठीण उद्धार आदित्यबंधूंनी सांगितला आहे. आणि तुझ्या या प्रश्नाचे मी उत्तर देईन; दोन्ही पलिबोध मागे-पुढे न होता (एकाच वेळी) नष्ट होतात.'" เอวํ สพฺพกถินุทฺธาเรสุ ปลิโพธุปจฺเฉโท เวทิตพฺโพ. โส ปน ยสฺมา อิมินา จ วุตฺตนเยน ปริวาเร จ อาคตภาเวน สกฺกา ชานิตุํ, ตสฺมา วิตฺถารโต น วุตฺโต. อยํ ปเนตฺถ สงฺเขโป – นาสนนฺติเก อาวาสปลิโพโธ ปฐมํ ฉิชฺชติ, จีวเร นฏฺเฐ จีวรปลิโพโธ ฉิชฺชติ. ยสฺมา จีวเร นฏฺเฐ จีวรปลิโพโธ ฉิชฺชติ, ตสฺมา ‘‘นาสนนฺติโก’’ติ วุตฺตํ. "अशा प्रकारे सर्व कठीण उद्धारांमध्ये पलिबोधांचा उच्छेद समजून घ्यावा. तो पलिबोध-उच्छेद ज्या अर्थी या सांगितलेल्या पद्धतीने आणि 'परिवार' ग्रंथात आलेल्या उल्लेखावरून जाणून घेणे शक्य आहे, म्हणून तो माझ्याकडून सविस्तरपणे सांगितलेला नाही. परंतु येथे हा संक्षेप आहे—'चीवर नष्ट होणे हाच अंत असलेल्या' (नासनांतिक) कठीण उद्धारात प्रथम आवास-पलिबोध नष्ट होतो, आणि चीवर नष्ट झाल्यावर चीवर-पलिबोध नष्ट होतो. ज्या अर्थी चीवर नष्ट झाल्यावर चीवर-पलिबोध नष्ट होतो, म्हणूनच त्याला 'नासनांतिक' असे म्हटले आहे." สวนนฺติเก จีวรปลิโพโธ ปฐมํ ฉิชฺชติ, ตสฺมา ตสฺส สห สวเนน อาวาสปลิโพโธ ฉิชฺชติ. "ऐकणे हाच अंत असलेल्या (सवनांतिक) कठीण उद्धारात प्रथम चीवर-पलिबोध नष्ट होतो, म्हणून त्या भिक्खूच्या ऐकण्यासोबतच आवास-पलिबोध नष्ट होतो." อาสาวจฺเฉทิเก อาวาสปลิโพโธ ปฐมํ ฉิชฺชติ. จีวราสาย อุปจฺฉินฺนาย จีวรปลิโพโธ ฉิชฺชติ. อยํ ปน ยสฺมา ‘‘อนาสาย ลภติ; อาสาย น ลภติ; ตสฺส เอวํ โหติ ‘อิเธวิมํ จีวรํ กาเรสฺสํ, น ปจฺเจสฺส’’’นฺติอาทินา นเยน อิตเรหิ อุทฺธาเรหิ สทฺธึ โวมิสฺสกเทสโน อเนกปฺปเภโท โหติ, ตสฺมา ปรโต วิสุํ วิตฺถาเรตฺวา วุตฺโต, อิธ น วุตฺโต. อิธ ปน สวนนฺติกสฺส อนนฺตรํ สีมาติกฺกนฺติโก วุตฺโต. ตตฺถ จีวรปลิโพโธ ปฐมํ ฉิชฺชติ, ตสฺส พหิสีเม อาวาสปลิโพโธ ฉิชฺชติ. สหุพฺภาเร ทฺเว ปลิโพธา อปุพฺพํ อจริมํ ฉิชฺชนฺตีติ. "आशावच्छेदिक (चीवराची आशा तुटणे हाच अंत असलेल्या) कठीण उद्धारात प्रथम आवास-पलिबोध नष्ट होतो. चीवराची आशा नष्ट झाल्यावर चीवर-पलिबोध नष्ट होतो. परंतु हा आशावच्छेदिक कठीण उद्धार ज्या अर्थी 'आशेविना मिळतो, आशेने मिळत नाही; त्याला असे वाटते की—मी येथेच हे चीवर बनवीन, परत जाणार नाही' इत्यादी पद्धतीने इतर कठीण उद्धारांसोबत मिश्रित उपदेश असलेला आणि अनेक प्रकारचा आहे, म्हणून तो पुढे स्वतंत्रपणे सविस्तरपणे भगवंतांनी सांगितला आहे, येथे सांगितलेला नाही. परंतु येथे सवनांतिकाच्या लगेच नंतर सीमातिकांतिक (सीमा ओलांडणे हाच अंत असलेला) कठीण उद्धार सांगितला आहे. त्यात प्रथम चीवर-पलिबोध नष्ट होतो, आणि सीमेच्या बाहेर गेल्यावर त्याचा आवास-पलिबोध नष्ट होतो. सहुब्भार (एकत्रित) कठीण उद्धारात दोन्ही पलिबोध मागे-पुढे न होता (एकाच वेळी) नष्ट होतात; हा संक्षेप आहे." ๓๑๖-๓๒๕. เอวํ [Pg.395] อาทายวาเร สตฺตกถินุทฺธาเร ทสฺเสตฺวา ปุน สมาทายวาเรปิ วิปฺปกตจีวรสฺส อาทายสมาทายวาเรสุปิ ยถาสมฺภวํ เตเยว ทสฺสิตา. ตโต ปรํ อนฺโตสีมายํ ‘‘ปจฺเจสฺสํ น ปจฺเจสฺส’’นฺติ อิมํ วิธึ อนามสิตฺวาว ‘‘น ปจฺเจสฺส’’นฺติ อิมเมว อามสิตฺวา อนธิฏฺฐิเตนา’’ติอาทินา นเยน จ เย เย ยุชฺชนฺติ, เต เต ทสฺสิตา. ตโต ปรํ ‘‘จีวราสาย ปกฺกมตี’’ติอาทินา นเยน อิตเรหิ สทฺธึ โวมิสฺสกนเยน อเนกกฺขตฺตุํ อาสาวจฺเฉทิกํ ทสฺเสตฺวา ปุน ทิสํคมิยวเสน จ ผาสุวิหาริกวเสน จ นิฏฺฐานนฺติเกสุ ยุชฺชมานา กถินุทฺธารา ทสฺสิตา. เอวํ ปเภทโต กถินุทฺธารํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ เย เตน เตน กถินุทฺธาเรน ปลิโพธา ฉิชฺชนฺตีติ วุตฺตา, เตสํ ปฏิปกฺเข ทสฺเสนฺโต ทฺเวเม ภิกฺขเว กถินสฺส ปลิโพธาติอาทิมาห. ตตฺถ จตฺเตนาติ เยน จิตฺเตน โส อาวาโส จตฺโต โหติ, ตํ จตฺตํ นาม, เตน จตฺเตน. วนฺตมุตฺเตสุปิ เอเสว นโย. เสสํ สพฺพตฺถ อุตฺตานเมวาติ. ३१६-३२५. "अशा प्रकारे आदाय-वारामध्ये सात कठीण उद्धार दाखवून, पुन्हा समादाय-वारामध्ये देखील आणि अपूर्ण राहिलेल्या चीवराच्या आदाय-समादाय वारामध्ये देखील यथासंभव तेच सात कठीण उद्धार भगवंतांनी दाखवले आहेत. त्यानंतर सीमेच्या आत 'मी परत येईन, मी परत येणार नाही' या विधीचा उल्लेख न करताच, 'मी परत येणार नाही' याच विधीचा उल्लेख करून आणि 'अनाधिष्ठित' इत्यादी पद्धतीने जे जे योग्य आहेत, ते ते वार भगवंतांनी दाखवले आहेत. त्यानंतर 'चीवराच्या आशेने निघून जातो' इत्यादी पद्धतीने इतरांसोबत मिश्रित रूपाने अनेक वेळा आशावच्छेदिक कठीण उद्धार दाखवून, पुन्हा दुसऱ्या ठिकाणी जाणाऱ्या भिक्खूच्या दृष्टीने आणि सुखाने विहार करू इच्छिणाऱ्या भिक्खूच्या दृष्टीने निष्ठानांतिक कठीण उद्धारांमध्ये जे योग्य आहेत ते कठीण उद्धार भगवंतांनी दाखवले आहेत. अशा प्रकारे भेदानुसार कठीण उद्धार दाखवून, आता त्या त्या कठीण उद्धाराने जे पलिबोध नष्ट होतात असे सांगितले आहे, त्यांच्या विरोधी पक्षाला दाखवताना भगवंतांनी 'हे भिक्खूंनो, कठीणचे हे दोन पलिबोध आहेत' इत्यादी म्हटले आहे. त्यात 'चत्त' (त्यागलेला) म्हणजे ज्या चित्ताने तो आवास त्यागलेला असतो, त्याला 'चत्त' असे म्हणतात, त्या त्यागलेल्या चित्ताने. ओकलेल्या आणि सोडलेल्या गोष्टींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ अगदी स्पष्टच आहे." กถินกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. "कठिनस्कंधक-वर्णना समाप्त झाली." ๘. จีวรกฺขนฺธกํ ८. "चीवरस्कंधक" ชีวกวตฺถุกถา "जीवकवस्तू-कथा (जीवक वैद्य यांची कथा)" ๓๒๖. จีวรกฺขนฺธเก [Pg.396] – ปทกฺขิณาติ เฉกา กุสลา. อภิสฏาติ อภิคตา. เกหิ อภิคตาติ? อตฺถิเกหิ อตฺถิเกหิ มนุสฺเสหิ; กรณตฺเถ ปน สามิวจนํ กตฺวา ‘‘อตฺถิกานํ อตฺถิกานํ มนุสฺสาน’’นฺติ วุตฺตํ. ปญฺญาสาย จ รตฺตึ คจฺฉตีติ ปญฺญาส กหาปเณ คเหตฺวา รตฺตึ คจฺฉติ. เนคโมติ กุฏุมฺพิยคโณ. ३२६. "चीवरस्कंधकात—'पदक्खिणा' म्हणजे चतुर, कुशल. 'अभिसटा' म्हणजे पोहोचलेली. कोणाद्वारे पोहोचलेली? गरजू गरजू माणसांद्वारे; परंतु करण अर्थात षष्ठी विभक्ती करून संगीतिकारांनी 'गरजू गरजू माणसांचे' (अत्थिकानं अत्थिकानं मनुस्सानं) असे म्हटले आहे. 'पन्नास घेऊन रात्री जाते' म्हणजे पन्नास कहापण घेऊन रात्री जाते. 'नेगम' म्हणजे श्रेष्ठींचा किंवा व्यापाऱ्यांचा समूह." ๓๒๗. สาลวตึ กุมารึ คณิกํ วุฏฺฐาเปสีติ นาครา ทฺเว สตสหสฺสานิ, ราชา สตสหสฺสนฺติ ตีณิ สตสหสฺสานิ, อญฺญญฺจ อารามุยฺยานวาหนาทิปริจฺเฉทํ ทตฺวา วุฏฺฐาเปสุํ; คณิกฏฺฐาเน ฐเปสุนฺติ อตฺโถ. ปฏิสเตน จ รตฺตึ คจฺฉตีติ รตฺตึ ปฏิสเตน คจฺฉติ. คิลานํ ปฏิเวเทยฺยนฺติ คิลานภาวํ ชานาเปยฺยํ. กตฺตรสุปฺเปติ ชิณฺณสุปฺเป. ३२७. "'सालावती कुमारीला गणिका म्हणून प्रस्थापित केले' म्हणजे नगरवासीयांनी दोन लाख आणि राजाने एक लाख मिळून तीन लाख दिले, तसेच इतर बाग, उद्यान, वाहन इत्यादींच्या मर्यादा देऊन तिला प्रस्थापित केले; म्हणजेच गणिकेच्या स्थानावर नियुक्त केले असा अर्थ आहे. 'प्रत्येक शंभर घेऊन रात्री जाते' म्हणजे रात्री शंभर शंभर घेऊन जाते. 'आजारी असल्याचे कळवावे' म्हणजे आजारी असल्याची माहिती द्यावी. 'कत्तरसुप्प' म्हणजे जुन्या किंवा जीर्ण सुपात." ๓๒๘. กา เม เทว มาตา, โก ปิตาติ กสฺมา ปุจฺฉิ? ตํ กิร อญฺเญ ราชทารกา กีฬนฺตา กลเห อุฏฺฐิเต ‘‘นิมฺมาติโก นิปฺปิติโก’’ติ วทนฺติ. ยถา จ อญฺเญสํ ทารกานํ ฉณาทีสุ จุฬมาตามหามาตาทโย กิญฺจิ ปณฺณาการํ เปเสนฺติ, ตถา ตสฺส น โกจิ กิญฺจิ เปเสติ. อิติ โส ตํ สพฺพํ จินฺเตตฺวา ‘‘นิมฺมาติโกเยว นุ โข อห’’นฺติ ชานนตฺถํ ‘‘กา เม เทว มาตา, โก ปิตา’’ติ ปุจฺฉิ. ३२८. "'हे देव, माझी आई कोण, माझा पिता कोण?' असे त्याने का विचारले? असे ऐकिवात आहे की, इतर राजपुत्र खेळताना भांडण झाल्यावर त्याला 'आई नसलेला, बाप नसलेला' असे म्हणत असत. तसेच, ज्याप्रमाणे इतर मुलांच्या बाबतीत उत्सव इत्यादी प्रसंगी मावशी, मोठी आई इत्यादी काहीतरी भेटवस्तू पाठवत असत, त्याप्रमाणे त्याला कोणीही काहीही पाठवत नसे. म्हणून त्याने त्या सर्वांचा विचार केला आणि 'मी खरोखरच आई नसलेला आहे काय?' हे जाणून घेण्यासाठी 'हे देव, माझी आई कोण, माझा पिता कोण?' असे विचारले." ยนฺนูนาหํ สิปฺปํ สิกฺเขยฺยนฺติ ยํนูน อหํ เวชฺชสิปฺปํ สิกฺเขยฺยนฺติ จินฺเตสิ. ตสฺส กิร เอตทโหสิ – ‘‘อิมานิ โข หตฺถิอสฺสสิปฺปาทีนิ ปรูปฆาตปฏิสํยุตฺตานิ, เวชฺชสิปฺปํ เมตฺตาปุพฺพภาคํ สตฺตานํ หิตปฏิสํยุตฺต’’นฺติ. ตสฺมา เวชฺชสิปฺปเมว สนฺธาย ‘‘ยํนูนาหํ สิปฺปํ สิกฺเขยฺย’’นฺติ จินฺเตสิ. อปิจายํ อิโต กปฺปสตสหสฺสสฺส อุปริ ปทุมุตฺตรสฺส ภควโต อุปฏฺฐากํ ‘‘พุทฺธุปฏฺฐาโก อย’’นฺติ จตุปริสนฺตเร ปตฺถตคุณํ เวชฺชํ ทิสฺวา ‘‘อโห วตาหมฺปิ เอวรูปํ ฐานนฺตรํ ปาปุเณยฺย’’นฺติ จินฺเตตฺวา สตฺตาหํ พุทฺธปฺปมุขสฺส สงฺฆสฺส ทานํ ทตฺวา ภควนฺตํ วนฺทิตฺวา ‘‘อหมฺปิ ภควา ตุมฺหากํ [Pg.397] อุปฏฺฐาโก อสุกเวชฺโช วิย อนาคเต พุทฺธุปฏฺฐาโก ภเวยฺย’’นฺติ ปตฺถนมกาสิ. ตาย ปุริมปตฺถนาย โจทิยมาโนเปส เวชฺชสิปฺปเมว สนฺธาย ‘‘ยํนูนาหํ สิปฺปํ สิกฺเขยฺย’’นฺติ จินฺเตสิ. "'मी एखादी कला शिकावी का?' म्हणजे 'मी वैद्यकीय कला (वैद्यशास्त्र) शिकावी का?' असा त्याने विचार केला. त्याच्या मनात असा विचार आला होता की—'या हत्ती आणि घोड्यांच्या कला इत्यादी इतरांना इजा पोहचवण्याशी संबंधित आहेत, तर वैद्यकीय कला ही सुरुवातीलाच मैत्रीपूर्ण भावना असलेली असून प्राण्यांच्या हिताशी संबंधित आहे.' म्हणून वैद्यकीय कलेचाच विचार करून त्याने 'मी एखादी कला शिकावी' असा विचार केला. शिवाय, हा जीवक या कल्पेपासून एक लाख कल्प मागे पदुमुत्तर भगवंतांच्या काळात, 'हा बुद्धांचा उपस्थायक (सेवक) आहे' अशा प्रकारे चारही परिषदांच्या मध्ये ज्याची कीर्ती पसरली आहे अशा वैद्याला पाहून, 'अरेरे! मलाही असेच स्थान मिळावे' असा विचार करून, सात दिवस बुद्धप्रमुख संघाला दान देऊन आणि भगवंतांना वंदन करून, 'हे भगवंत, मी देखील भविष्यात आपल्या उपस्थायकाप्रमाणे, त्या वैद्याप्रमाणे बुद्धांचा उपस्थायक व्हावे' अशी प्रार्थना केली होती. त्या पूर्व प्रार्थनेने प्रेरित होऊन देखील त्याने वैद्यकीय कलेचाच विचार करून 'मी एखादी कला शिकावी' असा विचार केला." ๓๒๙. ทิสาปาโมกฺโขติ สพฺพทิสาสุ วิทิโต ปากโฏ ปธาโน วาติ อตฺโถ. ตสฺมิญฺจ สมเย ตกฺกสีลโต วาณิชา อภยราชกุมารํ ทสฺสนาย อคมํสุ. เต ชีวโก ‘‘กุโต ตุมฺเห อาคตา’’ติ ปุจฺฉิ. ‘‘ตกฺกสีลโต’’ติ วุตฺเต ‘‘อตฺถิ ตตฺถ เวชฺชสิปฺปาจริโย’’ติ ปุจฺฉิ. ‘‘อาม กุมาร, ตกฺกสีลายํ ทิสาปาโมกฺโข เวชฺโช ปฏิวสตี’’ติ สุตฺวา ‘‘เตน หิ ยทา คจฺฉถ, มยฺหํ อาโรเจยฺยาถา’’ติ อาห. เต ตถา อกํสุ. โส ปิตรํ อนาปุจฺฉา เตหิ สทฺธึ ตกฺกสีลํ อคมาสิ. เตน วุตฺตํ – ‘‘อภยํ ราชกุมารํ อนาปุจฺฉา’’ติอาทิ. ३२९. ‘दिसापामोक्खो’ (दिशाप्रसिद्ध) म्हणजे सर्व दिशांमध्ये ज्ञात असलेला, प्रसिद्ध असलेला किंवा प्रमुख असलेला, असा अर्थ आहे. त्या वेळी तक्षशिलेहून व्यापारी अभय राजकुमाराला भेटण्यासाठी आले. जीवकने त्यांना विचारले, “तुम्ही कोठून आला आहात?” “तक्षशिलेहून,” असे उत्तर दिल्यावर त्याने विचारले, “तेथे वैद्यकीय विद्या शिकवणारे आचार्य आहेत का?” “होय कुमारा, तक्षशिलेमध्ये एक दिशाप्रसिद्ध वैद्य राहतात,” हे ऐकून तो म्हणाला, “तसे असेल तर जेव्हा तुम्ही परत जाल, तेव्हा मला सांगा.” त्यांनी त्याप्रमाणेच केले. तो आपल्या पित्याला (अभय राजकुमाराला) न विचारता त्यांच्यासोबत तक्षशिलेला गेला. म्हणूनच संगीतिकारांनी म्हटले आहे – “अभय राजकुमाराला न विचारता” इत्यादी. อิจฺฉามหํ อาจริย สิปฺปํ สิกฺขิตุนฺติ ตํ กิร อุปสงฺกมนฺตํ ทิสฺวา โส เวชฺโช ‘‘โกสิ ตฺวํ ตาตา’’ติ ปุจฺฉิ. โส ‘‘พิมฺพิสารมหาราชสฺส นตฺตา อภยกุมารสฺส ปุตฺโตมฺหี’’ติ อาห. ‘‘กสฺมา ปน ตฺวมสิ ตาต อิธาคโต’’ติ, ตโต โส ‘‘ตุมฺหากํ สนฺติเก สิปฺปํ สิกฺขิตุ’’นฺติ วตฺวา อิจฺฉามหํ อาจริย สิปฺปํ สิกฺขิตุนฺติ อาห. พหุญฺจ คณฺหาตีติ ยถา อญฺเญ ขตฺติยกุมาราทโย อาจริยสฺส ธนํ ทตฺวา กิญฺจิ กมฺมํ อกตฺวา สิกฺขนฺติเยว, น โส เอวํ. โส ปน กิญฺจิ ธนํ อทตฺวา ธมฺมนฺเตวาสิโกว หุตฺวา เอกํ กาลํ อุปชฺฌายสฺส กมฺมํ กโรติ, เอกํ กาลํ สิกฺขติ. เอวํ สนฺเตปิ อภินีหารสมฺปนฺโน กุลปุตฺโต อตฺตโน เมธาวิตาย พหุญฺจ คณฺหาติ, ลหุญฺจ คณฺหาติ, สุฏฺฐุ จ อุปธาเรติ, คหิตญฺจสฺส น สมฺมุสฺสติ. “हे आचार्य, मला विद्या शिकण्याची इच्छा आहे” यावर: त्याला जवळ येताना पाहून त्या वैद्याने विचारले, “बाळा, तू कोण आहेस?” तो म्हणाला, “मी महाराज बिंबिसारांचा नातू आणि अभय राजकुमाराचा मुलगा आहे.” “पण बाळा, तू येथे कशासाठी आला आहेस?” असे विचारल्यावर त्याने “आपल्याजवळ विद्या शिकण्यासाठी” असे सांगून “हे आचार्य, मला विद्या शिकण्याची इच्छा आहे” असे म्हटले. ‘पुष्कळ ग्रहण करतो’ (बहुञ्च गण्हाति) म्हणजे: जसे इतर क्षत्रियकुमार इत्यादी आचार्यांना धन देऊन, कोणतेही काम न करता केवळ शिकतात, तसा तो नव्हता. त्याने कोणतेही धन न देता ‘धम्मंतेवासिक’ (सेवा करून शिकणारा शिष्य) होऊन, एका वेळी उपाध्यायांचे काम केले आणि एका वेळी विद्या ग्रहण केली. असे असूनही, पूर्वपुण्याईने युक्त (अभिनीहारसंपन्न) असलेल्या त्या कुलपुत्राने आपल्या कुशाग्र बुद्धिमत्तेमुळे पुष्कळ ग्रहण केले, लवकर ग्रहण केले, उत्तम प्रकारे मनन केले आणि ग्रहण केलेली विद्या तो विसरला नाही. สตฺต จ เม วสฺสานิ อธียนฺตสฺส นยิมสฺส สิปฺปสฺส อนฺโต ปญฺญายตีติ เอตฺถ อยํ กิร ชีวโก ยตฺตกํ อาจริโย ชานาติ, ยํ อญฺเญ โสฬสหิ วสฺเสหิ อุคฺคณฺหนฺติ, ตํ สพฺพํ สตฺตหิ วสฺเสหิ อุคฺคเหสิ. สกฺกสฺส ปน เทวรญฺโญ เอตทโหสิ – ‘‘อยํ พุทฺธานํ อุปฏฺฐาโก อคฺควิสฺสาสโก ภวิสฺสติ, หนฺท นํ เภสชฺชโยชนํ สิกฺขาเปมี’’ติ อาจริยสฺส สรีเร อชฺฌาวสิตฺวา ยถา ฐเปตฺวา กมฺมวิปากํ อวเสสโรคํ เอเกเนว เภสชฺชโยเคน ติกิจฺฉิตุํ สกฺโกติ, ตถา นํ เภสชฺชโยชนํ สิกฺขาเปสิ. โส ปน ‘‘อาจริยสฺส สนฺติเก สิกฺขามี’’ติ มญฺญติ, ตสฺมา ‘‘สมตฺโถ อิทานิ ชีวโก ติกิจฺฉิตุ’’นฺติ [Pg.398] สกฺเกน วิสฺสฏฺฐมตฺเต เอวํ จินฺเตตฺวา อาจริยํ ปุจฺฉิ. อาจริโย ปน ‘‘น อิมินา มมานุภาเวน อุคฺคหิตํ, เทวตานุภาเวน อุคฺคหิต’’นฺติ ญตฺวาว เตน หิ ภเณติอาทิมาห. สมนฺตา โยชนํ อาหิณฺฑนฺโตติ ทิวเส ทิวเส เอเกเกน ทฺวาเรน นิกฺขมิตฺวา จตฺตาโร ทิวเส อาหิณฺฑนฺโต. ปริตฺตํ ปาเถยฺยํ ปาทาสีติ อปฺปมตฺตกํ อทาสิ. กสฺมา? ตสฺส กิร เอตทโหสิ – ‘‘อยํ มหากุลสฺส ปุตฺโต คตมตฺโตเยว ปิติปิตามหานํ สนฺติกา มหาสกฺการํ ลภิสฺสติ, ตโต มยฺหํ วา สิปฺปสฺส วา คุณํ น ชานิสฺสติ, อนฺตรามคฺเค ปน ขีณปาเถยฺโย สิปฺปํ ปโยเชตฺวา อวสฺสํ มยฺหญฺจ สิปฺปสฺส จ คุณํ ชานิสฺสตี’’ติ ปริตฺตํ ทาเปสิ. “मी सात वर्षे शिकत आहे तरी या विद्येचा अंत दिसत नाही” यावर: जीवकाने आचार्यांना जेवढी विद्या अवगत होती, जी इतर शिष्य सोळा वर्षांत शिकतात, ती सर्व सात वर्षांत शिकून घेतली. परंतु देवराज शक्राच्या मनात असा विचार आला – “हा बुद्धांचा उपस्थायक (सेवक) आणि परम विश्वासू बनेल. चला, मी याला औषधोपचार (भेषज्ज-योजन) शिकवतो.” असे विचार करून आचार्यांच्या शरीरात प्रवेश करून, कर्मविपाक (कर्माचे फळ) सोडून इतर सर्व रोग केवळ एकाच औषधोपचाराने बरे करता येतील अशा प्रकारे त्याला औषधोपचार शिकवला. परंतु तो (जीवक) “मी आचार्यांच्या जवळच शिकत आहे” असे समजत होता. म्हणून “आता जीवक औषधोपचार करण्यास समर्थ झाला आहे” असे समजून शक्राने त्याला मुक्त केल्यावर, त्याने असा विचार करून आचार्यांना विचारले. आचार्यांनी “याने हे माझ्या प्रभावाने शिकलेले नाही, तर देवतेच्या प्रभावाने शिकले आहे” हे जाणून “तेन हि भणे” इत्यादी म्हटले. ‘भोवताली एक योजन फिरताना’ (समन्ता योजनं आहिण्डन्तो) म्हणजे: रोज एका एका दाराने बाहेर पडून चार दिवस फिरताना. ‘थोडीशी शिदोरी दिली’ (परित्तं पाथेय्यं पादासि) म्हणजे: अगदी अल्प प्रमाणात शिदोरी दिली. का दिली? कारण आचार्यांच्या मनात विचार आला – “हा मोठ्या कुळातील मुलगा आहे. घरी पोहोचताच हा आपल्या आई-वडिलांकडून आणि आजोबांकडून मोठा सत्कार प्राप्त करेल. त्यामुळे त्याला माझा किंवा मेरे विद्येचा गुण समजणार नाही. परंतु वाटेत शिदोरी संपल्यावर तो आपल्या विद्येचा उपयोग करेल आणि निश्चितच माझा व माझ्या विद्येचा गुण ओळखेल.” म्हणून त्यांनी थोडीच शिदोरी दिली. เสฏฺฐิภริยาทิวตฺถุกถา श्रेष्ठिपत्नीची कथा. ๓๓๐. ปสเตนาติ เอกหตฺถปุเฏน. ปิจุนาติ กปฺปาสปฏเลน. ยตฺรหิ นามาติ ยา นาม. กิมฺปิมายนฺติ กิมฺปิ เม อยํ. อุปชานาเมตสฺส สํยมสฺสาติ กตสฺส จ โรคูปสมสฺส จ อุปการํ ชานามาติ อธิปฺปาโย. ३३०. ‘पसतेन’ म्हणजे एका हाताच्या ओंजळीने. ‘पिचुना’ म्हणजे कापसाच्या बोळ्याने. ‘यत्र हि नाम’ म्हणजे जी कोणी. ‘किम्पिमायं’ म्हणजे ही मला काय देणार? ‘उपजानामेतस्स संयमस्स’ म्हणजे केलेल्या उपचाराचा आणि रोगमुक्तीचा उपकार आम्ही जाणतो, असा अर्थ आहे. ๓๓๑. สพฺพาลงฺการํ ตุยฺหํ โหตูติ ราชา กิร ‘‘สเจ อิมํ คณฺหิสฺสติ, ปมาณยุตฺเต ฐาเน นํ ฐเปสฺสามิ. สเจ น คณฺหิสฺสติ, อพฺภนฺตริกํ นํ วิสฺสาสกํ กริสฺสามี’’ติ จินฺเตตฺวา เอวมาห. อภยกุมารสฺสาปิ นาฏกานมฺปิ จิตฺตํ อุปฺปชฺชิ ‘‘อโห วต น คณฺเหยฺยา’’ติ. โสปิ เตสํ จิตฺตํ ญตฺวา วิย ‘‘อิทํ เม เทว อยฺยิกานํ อาภรณํ, นยิทํ มยฺหํ คณฺหิตุํ ปติรูป’’นฺติ วตฺวา อลํ เทวาติอาทิมาห. อธิการํ เม เทโว สรตูติ กตสฺส อุปการํ เม เทโว สรตูติ อตฺโถ. ราชา ปสนฺโน สพฺพาการสมฺปนฺนํ เคหญฺจ อมฺพวนุยฺยานญฺจ อนุสํวจฺฉรํ สตสหสฺสอุฏฺฐานกํ คามญฺจ มหาสกฺการญฺจ ทตฺวา เตน หิ ภเณติอาทิมาห. ३३१. “हे सर्व अलंकार तुझेच असोत” असे राजाने म्हटले, कारण राजाने विचार केला – “जर हा हे अलंकार स्वीकारेल, तर मी त्याला योग्य पदावर नियुक्त करीन. जर स्वीकारणार नाही, तर मी त्याला माझा अंतर्गत विश्वासू सेवक बनवीन.” असा विचार करून राजाने असे म्हटले. अभय राजकुमार आणि नर्तकी यांच्या मनातही विचार आला – “अरेरे! याने हे स्वीकारू नये.” त्यानेही जणू त्यांचे मन ओळखून, “महाराज, हे माझ्या आजीचे दागिने आहेत, हे स्वीकारणे माझ्यासाठी योग्य नाही” असे सांगून “नको महाराज” इत्यादी म्हटले. ‘माझ्या अधिकाराचे महाराज स्मरण ठेवोत’ (अधिकारं मे देवो सरतु) म्हणजे: मी केलेल्या उपचाराच्या उपकाराचे महाराजांनी स्मरण ठेवावे, असा अर्थ आहे. राजाने प्रसन्न होऊन सर्व सोयींनी युक्त घर, आम्रवन (आंब्याची बाग), दरवर्षी एक लाख उत्पन्न देणारे गाव आणि मोठा सत्कार देऊन “तेन हि भणे” इत्यादी म्हटले. ราชคหเสฏฺฐิวตฺถุกถา राजगृह श्रेष्ठीची कथा. ๓๓๒. สกฺขิสฺสสิ ปน ตฺวํ คหปตีติ กสฺมา อาห? อิริยาปถสมฺปริวตฺตเนน กิร มตฺถลุงฺคํ น สณฺฐาติ, อสฺส จ ตีหิ สตฺตาเหหิ นิจฺจลสฺส [Pg.399] นิปนฺนสฺส มตฺถลุงฺคํ สณฺฐหิสฺสตีติ ญตฺวา อปฺเปว นาม สตฺตสตฺตมาเส ปฏิชานิตฺวา สตฺตสตฺตทิวเสปิ นิปชฺเชยฺยาติ นํ เอวมาห. เตเนว ปรโต วุตฺตํ ‘‘อปิ จ ปฏิกจฺเจว มยา ญาโต’’ติ. สีสจฺฉวึ อุปฺปาเฏตฺวาติ สีสจมฺมํ อปเนตฺวา. สิพฺพินึ วินาเมตฺวาติ สิพฺพินึ วิวริตฺวา. นาหํ อาจริย สกฺโกมีติ ตสฺส กิร สรีเร มหาฑาโห อุปฺปชฺชิ, ตสฺมา เอวมาห. ตีหิ สตฺตาเหหีติ ตีหิ ปสฺเสหิ เอเกเกน สตฺตาเหน. ३३२. “हे गृहपती, तू समर्थ होशील का?” असे का म्हटले? कारण हालचाल केल्याने मेंदू स्थिर राहत नाही. जर तो तीन आठवडे न हालता पडून राहिला, तर त्याचा मेंदू स्थिर होईल, हे जाणून सात-सात महिने कबूल करून घेऊन, तो सात-सात दिवस तरी पडून राहील, या विचाराने त्याला असे म्हटले. म्हणूनच पुढे म्हटले आहे – “पण मी आधीच ओळखले होते.” ‘डोक्याची त्वचा सोलून’ (सीसच्छविं उप्पाटेत्वा) म्हणजे: डोक्याची त्वचा बाजूला करून. ‘शिवण बाजूला करून’ (सिब्बिनिं विनामेत्वा) म्हणजे: शिवण उघडून. “हे आचार्य, मी समर्थ नाही” असे त्याने म्हटले, कारण त्याच्या शरीरात मोठा दाह (जळजळ) निर्माण झाला होता, म्हणून तो असे म्हणाला. ‘तीन आठवड्यांनी’ (तीहि सत्ताहेहि) म्हणजे: तीन बाजूंनी, प्रत्येक बाजूने एकेक आठवडा. ๓๓๓. ชนํ อุสฺสาเรตฺวาติ ชนํ นีหราเปตฺวา. ३३३. ‘लोकांना बाजूला करून’ (जनं उस्सारेत्वा) म्हणजे: लोकांना बाहेर घालवून. ปชฺโชตราชวตฺถุกถา प्रद्योत राजाची कथा. ๓๓๔. เชคุจฺฉํ เม สปฺปีติ อยํ กิร ราชา วิจฺฉิกสฺส ชาโต, วิจฺฉิกวิสปฏิฆาตาย จ สปฺปิ เภสชฺชํ โหติ วิจฺฉิกานํ ปฏิกูลํ, ตสฺมา เอวมาห. อุทฺเทกํ ทสฺสตีติ อุคฺคารํ ทสฺสติ. ปญฺญาส โยชนิกา โหตีติ ปญฺญาส โยชนานิ คนฺตุํ สมตฺถา โหติ. น เกวลญฺจสฺส รญฺโญ หตฺถินีเยว, นาฬาคิริ นาม หตฺถี โยชนสตํ คจฺฉติ, เจลกณฺโณ จ มุญฺจเกโส จาติ ทฺเว อสฺสา วีสโยชนสตํ คจฺฉนฺติ, กาโก ทาโส สฏฺฐิโยชนานิ คจฺฉติ. ३३४. “तूप माझ्यासाठी घृणास्पद आहे” असे राजाने म्हटले, कारण हा राजा विंचवाच्या अंशापासून जन्मला होता. विंचवाचे विष नष्ट करण्यासाठी तूप हे औषध आहे, जे विंचवांसाठी प्रतिकूल (घृणास्पद) असते, म्हणून त्याने असे म्हटले. ‘उद्रेक देईल’ (उद्देकं दस्सति) म्हणजे: ढेकर देईल. ‘पन्नास योजने जाणारी आहे’ (पञ्ञास योज निका होति) म्हणजे: पन्नास योजने जाण्यास समर्थ आहे. केवळ त्या राजाची हत्तीणच नाही, तर ‘नाळागिरी’ नावाचा हत्ती शंभर योजने जातो. ‘चेलकण्ण’ आणि ‘मुंचकेस’ नावाचे दोन घोडे एकशे वीस योजने जातात. ‘काक’ नावाचा दास साठ योजने जातो. เอกสฺส กิร กุลปุตฺตสฺส อนุปฺปนฺเน พุทฺเธ เอกทิวสํ ภุญฺชิตุํ นิสินฺนสฺส ปจฺเจกพุทฺโธ ทฺวาเร ฐตฺวา อคมาสิ, ตสฺเสโก ปุริโส ‘‘ปจฺเจกพุทฺโธ อาคนฺตฺวา คโต’’ติ อาโรเจสิ. โส สุตฺวา ‘‘คจฺฉ, เวเคน ปตฺตํ อาหรา’’ติ อาหราเปตฺวา อตฺตโน สชฺชิตํ ภตฺตํ สพฺพํ ทตฺวา เปเสสิ. อิตโร ตํ อาหริตฺวา ปจฺเจกพุทฺธสฺส หตฺเถ ฐเปตฺวา ‘‘อหํ ภนฺเต ตุมฺหากํ กเตน อิมินา กายเวยฺยาวติเกน ยตฺถ ยตฺถ นิพฺพตฺโตปิ วาหนสมฺปนฺโน โหมี’’ติ ปตฺถนํ อกาสิ. โส อยํ เอตรหิ ปชฺโชโต นาม ราชา ชาโต, ตาย ปตฺถนาย อยํ วาหนสมฺปตฺติ. असे म्हणतात की, बुद्धांच्या अनुत्पत्ती काळात, एका दिवशी एक कुलपुत्र जेवण्यासाठी बसला असताना, एक प्रत्येकबुद्ध त्याच्या दारात उभे राहून निघून गेले. एका माणसाने त्याला सांगितले, "प्रत्येकबुद्ध येऊन गेले." त्याने ते ऐकून, "जा, त्वरेने त्यांचे पात्र घेऊन ये," असे सांगून पात्र मागवून घेतले आणि स्वतःसाठी तयार केलेले सर्व अन्न त्यात देऊन ते पाठवले. दुसऱ्या माणसाने ते पात्र आणून प्रत्येकबुद्धांच्या हातात दिले आणि प्रार्थना केली, "भंते! मी आपल्यासाठी केलेल्या या शारीरिक सेवेमुळे (वैय्यावच्चामुळे) ज्या ज्या ठिकाणी जन्म घेईन, तिथे तिथे मी वाहनांनी संपन्न होईन." तोच हा मनुष्य सध्या 'पज्जोत' नावाचा राजा झाला आहे. त्या प्रार्थनेमुळेच त्याला ही वाहनसंपत्ती प्राप्त झाली आहे. สปฺปึ ปาเยตฺวาติ สปฺปิญฺจ ปาเยตฺวา; ปริจาริกานญฺจ อาหาราจาเร วิธึ อาจิกฺขิตฺวา. นเขน เภสชฺชํ โอลุมฺเปตฺวาติ นเขน เภสชฺชํ โอทหิตฺวา; ปกฺขิปิตฺวาติ อตฺโถ. นิจฺฉาเรสีติ วิเรเจสิ. 'सप्पिं पायेत्वा' (तूप पाजून) म्हणजे तूप पाजून आणि परिचारकांना आहाराच्या सेवनाविषयीची पद्धत समजावून सांगून. 'नखेन भेषज्जं ओलुम्पेत्वा' (नखाने औषध लावून) म्हणजे नखाने औषध ठेवून; म्हणजेच (औषध) टाकून, असा अर्थ आहे. 'निच्छारेसि' म्हणजे विरेचन करवले (जुलाब करवले). สิเวยฺยกทุสฺสยุคกถา सिवैय्यक-वस्त्रयुग-कथा (सिवैय्यक वस्त्रजोडीची कथा). ๓๓๕. สิเวยฺยกํ [Pg.400] นาม อุตฺตรกุรูสุ สิวถิกํ อวมงฺคลวตฺถํ. ตตฺถ กิร มนุสฺสา มตํ เตน วตฺเถน เวเฐตฺวา นิกฺขิปนฺติ, ตํ ‘‘มํสเปสี’’ติ สลฺลกฺเขตฺวา หตฺถิโสณฺฑกสกุณา อุกฺขิปิตฺวา หิมวนฺตกูเฏ ฐเปตฺวา วตฺถํ อปเนตฺวา ขาทนฺติ. อถ วนจรกา วตฺถํ ทิสฺวา รญฺโญ อาหรนฺติ. เอวมิทํ ปชฺโชเตน ลทฺธํ. สิวิรฏฺเฐ กุสลา อิตฺถิโย ตีหิ อํสูหิ สุตฺตํ กนฺตนฺติ, เตน สุตฺเตน วายิตวตฺถํ เอตนฺติปิ วทนฺติ. ३३५. 'सिवैय्यक' नावाचे वस्त्र म्हणजे उत्तरकुरुमधील स्मशानातील एक अमंगल (अशुभ) वस्त्र होय. असे म्हणतात की, तिथे लोक मृतदेहाला त्या वस्त्राने गुंडाळून टाकून देतात. त्याला 'मांसाचा तुकडा' समजून हत्तीच्या सोंडेसारखी चोच असलेले पक्षी ते उचलून हिमालयाच्या शिखरावर नेतात आणि वस्त्र बाजूला करून तो मृतदेह खातात. त्यानंतर वनचर (शिकारी) ते वस्त्र पाहून राजासाठी घेऊन येतात. अशा प्रकारे हे वस्त्र राजा पज्जोताला मिळाले होते. काही लोक असेही म्हणतात की, सिबी देशातील कुशल स्त्रिया तीन धाग्यांनी सूत काततात आणि त्या सुताने विणलेले हे वस्त्र आहे. สมตฺตึสวิเรจนกถา समत्तिंस-विरेचन-कथा (तीस विरेचनांची कथा). ๓๓๖. สิเนเหถาติ กึ ปน ภควโต กาโย ลูโขติ น ลูโข? ภควโต หิ อาหาเร สทา เทวตา ทิพฺโพชํ ปกฺขิปนฺติ, สิเนหปานํ ปน สพฺพตฺถ โทเส เตเมติ, สิรา มุทุกา กโรติ, เตนายํ เอวมาห. ตีณิ อุปฺปลหตฺถานีติ เอกํ โอฬาริกโทสหรณตฺถํ, เอกํ มชฺฌิมโทสหรณตฺถํ, เอกํ สุขุมโทสหรณตฺถํ. นจิรสฺเสว ปกตตฺโต อโหสีติ เอวํ ปกตตฺเต ปน กาเย นาครา ทานํ สมฺปาเทสุํ. ชีวโก อาคนฺตฺวา ภควนฺตํ เอตทโวจ – ‘‘ภควา อชฺช นาครา ตุมฺหากํ ทานํ ทาตุกามา, มา อนฺโตคามํ ปิณฺฑาย ปวิสถา’’ติ. มหาโมคฺคลฺลานตฺเถโร จินฺเตสิ – ‘‘กุโต นุ โข อชฺช ภควโต ปฐมํ ปิณฺฑปาโต ลทฺธุํ วฏฺฏตี’’ติ. ตโต จินฺเตสิ – ‘‘โสโณ เสฏฺฐิปุตฺโต เขตฺตปริกมฺมโต ปฏฺฐาย อญฺเญหิ อสาธารณานํ ขีโรทกเสจนสํวทฺธานํ คนฺธสาลีนํ โอทนํ ภุญฺชติ, ตโต ภควโต ปิณฺฑปาตํ อาหริสฺสามี’’ติ อิทฺธิยา คนฺตฺวา ตสฺส ปาสาทตเล อตฺตานํ ทสฺเสสิ. โส เถรสฺส ปตฺตํ คเหตฺวา ปณีตํ ปิณฺฑปาตํ อทาสิ. เถรสฺส จ คมนาการํ ทิสฺวา ‘‘ภุญฺชถ ภนฺเต’’ติ อาห. เถโร ตมตฺถํ อาโรเจสิ ‘‘ภุญฺชถ ภนฺเต, อหํ อญฺญํ ภควโต ทสฺสามี’’ติ เถรํ โภเชตฺวา คนฺเธหิ ปตฺตํ อุพฺพฏฺเฏตฺวา ปิณฺฑปาตสฺส ปูเรตฺวา อทาสิ, ตํ เถโร อาหริตฺวา ภควโต อทาสิ. ३३६. 'सिनेहेथ' (स्नेहन करावे) म्हणजे काय? भगवंतांचे शरीर कोरडे (रूक्ष) झाले होते काय? नाही, कोरडे झाले नव्हते. कारण देव नेहमी भगवंतांच्या आहारात दिव्य ओज (दिव्य रस) टाकत असत. परंतु स्नेहन केल्याने शरीरातील सर्व दोष ओले होतात आणि शिरा मऊ होतात, म्हणून या जीवकाने असे म्हटले. 'तीणि उप्पलहत्थानि' (तीन कमळांचे गुच्छ) म्हणजे: एक स्थूल दोषांचे निवारण करण्यासाठी, एक मध्यम दोषांचे निवारण करण्यासाठी आणि एक सूक्ष्म दोषांचे निवारण करण्यासाठी दिले. 'नचिरस्सेव पकतत्तो अहोसि' (लवकरच ते पूर्ववत झाले) म्हणजे: अशा प्रकारे शरीर पूर्ववत (निरोगी) झाल्यावर नगरातील लोकांनी दानाची तयारी केली. जीवकाने येऊन भगवंतांना असे सांगितले— "भगवंत! आज नगरातील लोक आपल्याला दान देऊ इच्छितात, म्हणून आपण भिक्षेसाठी गावात प्रवेश करू नये." महामोग्गल्लान थेरांनी विचार केला— "आज भगवंतांसाठी पहिला पिंडपात कुठून मिळणे योग्य होईल?" त्यानंतर त्यांनी विचार केला— "सोण नावाचा श्रेष्ठिपुत्र शेतीच्या कामाच्या सुरुवातीपासूनच इतरांपेक्षा वेगळ्या, दुधाच्या पाण्याने सिंचन करून वाढवलेल्या सुगंधी शाली तांदळाचा भात खातो. म्हणून मी तिथून भगवंतांसाठी पिंडपात आणीन." असा विचार करून ते ऋद्धीने जाऊन त्याच्या प्रासादाच्या छतावर प्रकट झाले. त्याने थेरांचे पात्र घेऊन त्यांना उत्तम पिंडपात दिला. आणि थेरांच्या जाण्याची तयारी पाहून तो म्हणाला, "भंते, आपण भोजन करावे." थेरांनी त्याला कारण सांगितले. तो म्हणाला, "भंते, आपण भोजन करावे, मी भगवंतांसाठी दुसरा पिंडपात देईन." असे सांगून त्याने थेरांना भोजन करवले आणि पात्राला सुगंधी द्रव्यांनी घासून ते पिंडपाताने भरून दिले. थेरांनी ते आणून भगवंतांना दिले. ราชาปิ โข พิมฺพิสาโร ‘‘อชฺช ภควา กึ ภุญฺชิสฺสตี’’ติ วิหารํ อาคนฺตฺวา ปวิสมาโนว ปิณฺฑปาตคนฺธํ ฆายิตฺวา ภุญฺชิตุกาโม อโหสิ. ภควโต [Pg.401] ทฺวีสุเยว ปิณฺฑปาเตสุ ภาชนคเตสุ เทวตา โอชํ ปกฺขิปึสุ – ยญฺจ สุชาตา อทาสิ; ยญฺจ ปรินิพฺพานกาเล จุนฺโท กมฺมารปุตฺโต; อญฺเญสุ กพเฬ กพเฬ ปกฺขิปึสุ, ตสฺมา ภควา รญฺโญ อิจฺฉํ ชานิตฺวา อปกฺขิตฺโตชเมว โถกํ ปิณฺฑปาตํ รญฺโญ ทาเปสิ. โส ปริภุญฺชิตฺวา ปุจฺฉิ – ‘‘กึ ภนฺเต, อุตฺตรกุรุโต อาภตํ โภชน’’นฺติ? ‘‘น มหาราช, อุตฺตรกุรุโต; อปิจ โข ตเวว รฏฺฐวาสิโน คหปติปุตฺตสฺส โภชนํ เอต’’นฺติ วตฺวา โสณสฺส สมฺปตฺตึ อาจิกฺขิ. ตํ สุตฺวา ราชา โสณํ ทฏฺฐุกาโม หุตฺวา จมฺมกฺขนฺธเก วุตฺตนเยน อสีติยา กุลปุตฺตสหสฺเสหิ สทฺธึ โสณสฺส อาคมนํ อกาสิ. เต ภควโต ธมฺมเทสนํ สุตฺวา โสตาปนฺนา ชาตา. โสโณ ปน ปพฺพชิตฺวา อรหตฺเต ปติฏฺฐิโต. ภควาปิ เอตทตฺถเมว รญฺโญ ปิณฺฑปาตํ ทาเปสิ. राजा बिंबिसारने सुद्धा "आज भगवंत काय भोजन करणार?" असा विचार करून विहारात येऊन, प्रवेश करताच पिंडपाताचा सुगंध घेऊन त्यालाही भोजन करण्याची इच्छा झाली. भगवंतांच्या केवळ दोनच पिंडपातांमध्ये ते पात्रात आले असताना देवांनी ओज टाकले होते— एक जे सुजाताने दिले होते आणिे दुसरे जे परिनिर्वाण काळात सुवर्णकारपुत्र चुंदाने दिले होते. इतर पिंडपातांमध्ये मात्र प्रत्येक घासाघासाला देवांनी ओज टाकले होते. म्हणून भगवंतांनी राजाची इच्छा जाणून, ज्यामध्ये देवांनी ओज टाकले नव्हते असा थोडासा पिंडपात राजाला देववला. त्याने तो ग्रहण करून विचारले— "भंते, हे उत्तरकुरुमधून आणलेले भोजन आहे काय?" भगवंत म्हणाले— "नाही महाराजा, हे उत्तरकुरुमधून आणलेले नाही; तर हे तुमच्याच राज्यातील एका गृहपतीपुत्राचे भोजन आहे," असे सांगून त्यांनी सोणाच्या संपत्तीचे वर्णन केले. ते ऐकून राजाला सोणाला पाहण्याची इच्छा झाली आणि त्याने चम्मक्खंधकात सांगितलेल्या पद्धतीने ऐंशी हजार कुलपुत्रांसह सोणाला बोलावले. त्यांनी भगवंतांची धम्मदेशना ऐकून सोतापन्न अवस्था प्राप्त केली. सोणाने मात्र प्रवज्जा घेऊन अर्हतपद प्राप्त केले. भगवंतांनी सुद्धा याच हेतूने राजाला तो पिंडपात देववला होता. วรยาจนกถา वरयाचना-कथा (वर मागण्याची कथा). ๓๓๗. เอวํ กตภตฺตกิจฺเจ ภควติ อถ โข ชีวโก โกมารภจฺโจ ตํ สิเวยฺยกํ ทุสฺสยุคํ อาทาย…เป… เอตทโวจ. อติกฺกนฺตวราติ เอตฺถ วินิจฺฉโย มหาขนฺธเก วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. ภควา ภนฺเต ปํสุกูลิโก ภิกฺขุสงฺโฆ จาติ ภควโต หิ พุทฺธตฺตํ ปตฺตโต ปฏฺฐาย ยาว อิทํ วตฺถํ, เอตฺถนฺตเร วีสติ วสฺสานิ น โกจิ คหปติจีวรํ สาทิยิ, สพฺเพ ปํสุกูลิกาว อเหสุํ. เตนายํ เอวมาห. คหปติจีวรนฺติ คหปตีหิ ทินฺนจีวรํ. ธมฺมิยา กถายาติ วตฺถทานานิสํสปฏิสํยุตฺตาย กถาย. อิตรีตเรนาปีติ อปฺปคฺเฆนปิ มหคฺเฆนปิ; เยน เกนจีติ อตฺโถ. ปาวาโรติ สโลมโก กปฺปาสาทิเภโท. อนุชานามิ ภิกฺขเว โกชวนฺติ เอตฺถ ปกติโกชวเมว วฏฺฏติ, มหาปิฏฺฐิยโกชวํ น วฏฺฏติ. มหาปิฏฺฐิยโกชวนฺติ อุณฺณามโย ปาวารสทิโส โกชโว. ३३७. अशा प्रकारे भगवंतांचे भोजन आटोपल्यावर, जीवक कौमारभच्चाने ते सिवैय्यक वस्त्रयुग घेऊन... पे... असे म्हटले. 'अतिक्कन्तवरा' या शब्दाचा निर्णय महाखंधकात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. 'भगवा भन्ते पंसुकूलिको भिक्खुसङ्घो च' (भंते, भगवंत आणि भिक्खू संघ पांसुकूलिक आहेत) याविषयी: भगवंतांना बुद्धत्व प्राप्त झाल्यापासून ते हे वस्त्र मिळेपर्यंत, या दरम्यानच्या वीस वर्षांत कोणत्याही भिक्खूने गृहपतीने दिलेले चीवर स्वीकारले नव्हते; सर्वजण पांसुकूलिकच होते. म्हणून जीवकाने असे म्हटले. 'गहपतिचीवरं' म्हणजे गृहपतींनी दिलेले चीवर. 'धम्मिया कथाय' म्हणजे वस्त्रदानाच्या शंसेशी (फायद्यांशी) संबंधित धम्मचर्चेने. 'इतरीतरेन' म्हणजे कमी मूल्याचे किंवा अधिक मूल्याचे; कोणत्याही चीवराने, असा अर्थ आहे. 'पावारो' म्हणजे लोकरीचे (केसाळ) कापसाचे वस्त्र इत्यादी प्रकारची शाल. 'अनुजानामि भिक्खवे कोजवं' (भिक्खूंनो, मी कोजवाचा स्वीकार करण्याची अनुमती देतो) यामध्ये: सामान्य कोजवाच (गालिचा) योग्य आहे, 'महापिठ्ठियकोजव' (हत्तीच्या पाठीवर घालण्याचा मोठा गालिचा) योग्य नाही. 'महापिठ्ठियकोजव' म्हणजे लोकरीचा बनवलेला, शालीसारखा मोठा गालिचा. กมฺพลานุชานนาทิกถา कम्बल-अनुजानन-आदि-कथा (कंबलाच्या अनुमतीची कथा). ๓๓๘. กาสิราชาติ กาสีนํ ราชา; ปเสนทิสฺส เอกปิติกภาตา เอส. อฑฺฒกาสิยนฺติ เอตฺถ กาสีติ สหสฺสํ วุจฺจติ ตํ อคฺฆนโก กาสิโย[Pg.402]. อยํ ปน ปญฺจสตานิ อคฺฆติ, ตสฺมา ‘‘อฑฺฒกาสิโย’’ติ วุตฺโต. เตเนวาห – ‘‘อุปฑฺฒกาสีนํ ขมมาน’’นฺติ. ३३८. 'कासिराजा' म्हणजे काशीचा राजा; हा राजा पसेनदीचा सावत्र भाऊ (एकाच पित्याचा भाऊ) होता. 'अड्ढकासियं' यामध्ये: 'कासी' म्हणजे एक हजार (कार्षापण) म्हटले जाते, त्या मूल्याच्या वस्त्राला 'कासिय' म्हणतात. परंतु हे वस्त्र पाचशे (कार्षापण) मूल्याचे होते, म्हणून याला 'अड्ढकासिय' (अर्ध-कासिय) म्हटले गेले. म्हणूनच संगीतिकारांनी म्हटले आहे— "उपाड्ढकासीनं खममानं" (अर्ध्या काशीच्या मूल्याचे). ๓๓๙. อุจฺจาวจานีติ สุนฺทรานิ จ อสุนฺทรานิ จ. ภงฺคํ นาม โขมาทีหิ ปญฺจหิ สุตฺเตหิ มิสฺเสตฺวา กตํ; วากมยเมวาติปิ วทนฺติ. ३३९. 'उच्चावचानि' म्हणजे चांगले आणि वाईट (उत्कृष्ट आणि निकृष्ट). 'भङ्गं' नावाचे वस्त्र म्हणजे क्षौम (ताग) इत्यादी पाच प्रकारच्या सुतांचे मिश्रण करून बनवलेले वस्त्र होय; काही लोक याला केवळ वल्कलाचे (झाडाच्या सालीचे) बनवलेले वस्त्र असेही म्हणतात. ๓๔๐. เอกํเยว ภควตา จีวรํ อนุญฺญาตํ น ทฺเวติ เต กิร อิตรีตเรน จีวเรนาติ เอตสฺส ‘‘คหปติเกน วา ปํสุกูเลน วา’’ติ เอวํ อตฺถํ สลฺลกฺขึสุ. นาคเมสุนฺติ ยาว เต สุสานโต อาคจฺฉนฺติ, ตาว เต น อจฺฉึสุ; ปกฺกมึสุเยว. นากามา ภาคํ ทาตุนฺติ น อนิจฺฉาย ทาตุํ; ยทิ ปน อิจฺฉนฺติ, ทาตพฺโพ. อาคเมสุนฺติ อุปจาเร อจฺฉึสุ. เตนาห ภควา อาห – ‘‘อนุชานามิ ภิกฺขเว อาคเมนฺตานํ อกามา ภาคํ ทาตุ’’นฺติ. ยทิ ปน มนุสฺสา ‘‘อิธาคตา เอว คณฺหนฺตู’’ติ เทนฺติ, สญฺญาณํ วา กตฺวา คจฺฉนฺติ ‘‘สมฺปตฺตา คณฺหนฺตู’’ติ สมฺปตฺตานํ สพฺเพสมฺปิ ปาปุณนฺติ. สเจ ฉฑฺเฑตฺวา คตา, เยน คหิตํ, โส เอว สามี. สทิสา สุสานํ โอกฺกมึสูติ สพฺเพ สมํ โอกฺกมึสุ; เอกทิสาย วา โอกฺกมึสูติปิ อตฺโถ. เต กติกํ กตฺวาติ ลทฺธํ ปํสุกูลํ สพฺเพ ภาเชตฺวา คณฺหิสฺสามาติ พหิเมว กติกํ กตฺวา. ३४०. भगवंतांनी केवळ एकच चीवर अनुमत केले आहे, दोन नाही, असे समजून त्या भिक्खूंनी 'इतरीतरेन चीवरेन' (इतर कोणत्याही चीवराने) या पाठाचा अर्थ 'गृहपतीने दिलेले किंवा पांसुकूल चीवर' असा घेतला. 'नागमेसुं' म्हणजे जोपर्यंत ते भिक्खू स्मशानातून परत येत नाहीत, तोपर्यंत ते थांबले नाहीत; ते निघूनच गेले. 'नाकामा भागं दातुं' म्हणजे अनिच्छेने न देणे; परंतु जर त्यांची इच्छा असेल, तर भाग दिला जाऊ शकतो. 'आगमेसुं' म्हणजे स्मशानाच्या परिसरात थांबले. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले – 'भिक्खूंनो, मी अनुमती देतो की, वाट पाहणाऱ्यांना अनिच्छेने भाग देऊ नये (इच्छा असेल तरच द्यावा).' परंतु जर लोकांनी 'येथे आलेल्या भिक्खूंनीच ते घ्यावे' असे म्हणून दिले, किंवा 'जे आले आहेत त्यांनी घ्यावे' अशी खूण करून ते गेले, तर आलेल्या सर्व भिक्खूंना ते प्राप्त होते. जर ते टाकून निघून गेले, तर ज्याने ते घेतले, तोच त्याचा मालक होतो. 'सदिसा सुसानं ओक्कमिंसु' म्हणजे सर्वजण एकत्रच उतरले; किंवा एकाच दिशेने उतरले असाही अर्थ होतो. 'ते कतिकं कत्वा' म्हणजे मिळालेले पांसुकूल चीवर आपण सर्वजण वाटून घेऊ, असा स्मशानाच्या बाहेरच नियम करून. ๓๔๒. จีวรปฏิคฺคาหกนฺติ โย คหปติเกหิ สงฺฆสฺส ทียมานํ จีวรํ คณฺหาติ. โย น ฉนฺทาคตึ คจฺเฉยฺยาติอาทีสุ จีวรปฏิคฺคาหเกสุ ปจฺฉา อาคตานมฺปิ อตฺตโน ญาตกาทีนํ ปฐมตรํ ปฏิคฺคณฺหนฺโต วา เอกจฺจสฺมึ เปมํ ทสฺเสตฺวา คณฺหนฺโต วา โลภปกติกตาย อตฺตโน ปริณาเมนฺโต วา ฉนฺทาคตึ คจฺฉติ นาม. ปฐมตรํ อาคตสฺสาปิ โกธวเสน ปจฺฉา คณฺหนฺโต วา ทุคฺคตมนุสฺเสสุ อวมญฺญํ กตฺวา คณฺหนฺโต วา ‘‘กึ โว ฆเร ฐปโนกาโส นตฺถิ, ตุมฺหากํ สนฺตกํ คเหตฺวา คจฺฉถา’’ติ เอวํ สงฺฆสฺส ลาภนฺตรายํ กโรนฺโต วา โทสาคตึ คจฺฉติ นาม. โย ปน มุฏฺฐสฺสติ อสมฺปชาโน, อยํ โมหาคตึ คจฺฉติ นาม. ปจฺฉา อาคตานมฺปิ อิสฺสรานมฺปิ ภเยน ปฐมตรํ ปฏิคฺคณฺหนฺโต วา ‘‘จีวรปฏิคฺคาหกฏฺฐานํ นาเมตํ ภาริย’’นฺติ สนฺตสนฺโต วา ภยาคตึ คจฺฉติ นาม. ‘‘มยา อิทญฺจิทญฺจ คหิตํ, อิทญฺจึทญฺจ น คหิต’’นฺติ เอวํ ชานนฺโต คหิตาคหิตํ ชานาติ นาม. ตสฺมา โย น ฉนฺทาคติอาทิวเสน คจฺฉติ, ญาตกอญฺญาตกอฑฺฒทุคฺคเตสุ วิเสสํ อกตฺวา [Pg.403] อาคตปอปาฏิยา คณฺหาติ, สีลาจารปฏิปตฺติยุตฺโต โหติ, สติมา เมธาวี พหุสฺสุโต, สกฺโกติ ทายกานํ วิสฺสฏฺฐวาจาย ปริมณฺฑเลหิ ปทพฺยญฺชเนหิ อนุโมทนํ กโรนฺโต ปสาทํ ชเนตุํ, เอวรูโป สมฺมนฺนิตพฺโพ. ३४२. 'चीवरपटिग्गाहक' म्हणजे जो गृहपतींनी संघाला दिलेले चीवर स्वीकारतो. 'जो छंदागतीला जाणार नाही' इत्यादी वाक्यांमध्ये, चीवर स्वीकारणाऱ्या भिक्खूंमध्ये – जो नंतर आलेल्या आपल्या नातेवाईक इत्यादींचे चीवर आधी स्वीकारतो, किंवा एखाद्यावर प्रेम दाखवून स्वीकारतो, किंवा लोभी स्वभावामुळे ते स्वतःकडे वळवतो, तो 'छंदागती' (पक्षपात) करतो असे म्हणतात. जो आधी आलेल्याचे चीवर क्रोधापोटी नंतर स्वीकारतो, किंवा गरीब लोकांचा अनादर करून स्वीकारतो, किंवा 'तुमच्या घरात ठेवण्यास जागा नाही का? तुमचे साहित्य घेऊन निघून जा' असे म्हणून संघाच्या लाभाला बाधा आणतो, तो 'दोषागती' (द्वेषाने वागणे) करतो असे म्हणतात. जो विसरभोळा आणि असंप्रजन्य असतो, तो 'मोहागती' (अज्ञानाने वागणे) करतो असे म्हणतात. जो नंतर आलेल्या प्रभावशाली लोकांच्या भयाने त्यांचे चीवर आधी स्वीकारतो, किंवा 'हे चीवर स्वीकारण्याचे स्थान अत्यंत कठीण आहे' असे म्हणून घाबरतो, तो 'भयागती' (भयाने वागणे) करतो असे म्हणतात. 'मी हे आणि हे चीवर स्वीकारले आहे, आणि हे आणि हे स्वीकारले नाही' असे जाणणारा 'स्वीकारलेले आणि न स्वीकारलेले जाणणारा' असे म्हणतात. म्हणून, जो छंदागती इत्यादींच्या प्रभावाखाली जात नाही, नातेवाईक-अनातेवाईक, श्रीमंत-गरीब असा भेद न करता आलेल्या क्रमानुसार चीवर स्वीकारतो, जो शीलाचार आणि प्रतिपत्तीने युक्त असतो, स्मृतिमान, बुद्धिमान, बहुश्रुत असतो, आणि जो दात्यांना स्पष्ट वाणीने, परिपूर्ण पद आणि व्यंजनांसह अनुमोदन देऊन त्यांच्यात श्रद्धा निर्माण करण्यास समर्थ असतो, अशा भिक्खूची निवड करावी. เอวญฺจ ปน ภิกฺขเว สมฺมนฺนิตพฺโพติ เอตฺถ ปน เอตาย ยถาวุตฺตาย กมฺมวาจายปิ อปโลกเนนาปิ อนฺโตวิหาเร สพฺพสงฺฆมชฺเฌปิ ขณฺฑสีมายปิ สมฺมนฺนิตุํ วฏฺฏติเยว. เอวํ สมฺมเตน จ วิหารปจฺจนฺเต วา ปธานฆเร วา น อจฺฉิตพฺพํ. ยตฺถ ปน อาคตาคตา มนุสฺสา สุขํ ปสฺสนฺติ, ตาทิเส ธุรวิหารฏฺฐาเน พีชนึ ปสฺเส ฐเปตฺวา สุนิวตฺเถน สุปารุเตน นิสีทิตพฺพนฺติ. 'भिक्खूंनो, अशा प्रकारे निवड करावी' यामध्ये हा निर्णय समजावा: वर सांगितलेल्या कम्मवाचेने किंवा अपलोकन कर्माने विहाराच्या आत, संपूर्ण संघाच्या मध्ये किंवा खंडसीमेमध्येही निवड करणे योग्यच आहे. अशा प्रकारे निवडलेल्या भिक्खूने विहाराच्या कोपऱ्यात किंवा ध्यानगृहात बसू नये. तर ज्या ठिकाणी येणारे-जाणारे लोक सहजपणे पाहू शकतील, अशा मुख्य विहाराच्या ठिकाणी बाजूला पंखा ठेवून, व्यवस्थित वस्त्र परिधान करून बसावे. ตตฺเถว อุชฺฌิตฺวาติ ‘‘ปฏิคฺคหณเมว อมฺหากํ ภาโร’’ติ วตฺวา คหิตฏฺฐาเนเยว ฉฑฺเฑตฺวา คจฺฉนฺติ. จีวรนิทหกนฺติ จีวรปฏิสามกํ. โย น ฉนฺทาคตึ คจฺเฉยฺยาติอาทีสุ เจตฺถ อิโต ปรญฺจ สพฺพตฺถ วุตฺตนเยเนว วินิจฺฉโย เวทิตพฺโพ. สมฺมุติวินิจฺฉโยปิ กถิตานุสาเรเนว ชานิตพฺโพ. 'तत्येव उज्झित्वा' म्हणजे 'केवळ स्वीकारणे हाच आमचा भार आहे' असे म्हणून स्वीकारलेल्या ठिकाणीच टाकून निघून जातात. 'चीवरनिदहक' म्हणजे चीवर साठवणारा भिक्खू. 'जो छंदागतीला जाणार नाही' इत्यादी वाक्यांमध्ये आणि यानंतरच्या सर्व ठिकाणी सांगितलेल्या पद्धतीनेच निर्णय समजावा. संमतीचा निर्णयही सांगितलेल्या अनुषंगानेच जाणावा. ภณฺฑาคารสมฺมุติอาทิกถา भांडारगृह संमती इत्यादी कथा. ๓๔๓. วิหารํ วาติอาทีสุ โย อารามมชฺเฌ อารามิกสามเณราทีหิ อวิวิตฺโต สพฺเพสํ สโมสรณฏฺฐาเน วิหาโร วา อฑฺฒโยโค วา โหติ, โส สมฺมนฺนิตพฺโพ. ปจฺจนฺตเสนาสนํ ปน น สมฺมนฺนิตพฺพํ. อิทํ ปน ภณฺฑาคารํ ขณฺฑสีมํ คนฺตฺวา ขณฺฑสีมาย นิสินฺเนหิ สมฺมนฺนิตุํ น วฏฺฏติ, วิหารมชฺเฌเยว สมฺมนฺนิตพฺพํ. ३४३. 'विहारं वा' इत्यादी वाक्यांमध्ये निर्णय असा समजावा: जो विहाराच्या मध्यभागी, विहार सेवक आणि श्रामणेर इत्यादींनी गजबजलेला, सर्वांच्या एकत्र येण्याचा मार्ग असलेला विहार किंवा अढ्ढयोग असेल, त्याची निवड करावी. परंतु विहाराच्या टोकाचे शयनासन निवडू नये. हे भांडारगृह खंडसीमेत जाऊन, खंडसीमेत बसलेल्या भिक्खूंनी निवडणे योग्य नाही; ते विहाराच्या मध्यभागीच निवडले पाहिजे. คุตฺตาคุตฺตญฺจ ชาเนยฺยาติ เอตฺถ ยสฺส ตาว ฉทนาทีสุ โกจิ โทโส นตฺถิ, ตํ คุตฺตํ. ยสฺส ปน ฉทนติณํ วา ฉทนิฏฺฐกา วา ยตฺถ กตฺถจิ ปติตา, เยน โอวสฺสติ วา, มูสิกาทีนํ วา ปเวโส โหติ, ภิตฺติอาทีสุ วา กตฺถจิ ฉิทฺทํ โหติ, อุปจิกา วา อุฏฺฐหนฺติ, ตํ สพฺพํ อคุตฺตํ นาม. ตํ สลฺลกฺเขตฺวา ปฏิสงฺขริตพฺพํ. สีตสมเย ทฺวารญฺจ วาตปานญฺจ สุปิหิตํ กาตพฺพํ, สีเตน หิ จีวรานิ กณฺณกิตานิ โหนฺติ. อุณฺหสมเย อนฺตรนฺตรา วาตปฺปเวสนตฺถํ วิวริตพฺพํ. เอวํ กโรนฺโต หิ คุตฺตาคุตฺตํ ชานาติ นาม. 'गुत्तागुत्तञ्च जानेय्य' (सुरक्षित आणि असुरक्षित जाणावे) यामध्ये: ज्याच्या छप्पर इत्यादींमध्ये कोणताही दोष नाही, ते सुरक्षित होय. परंतु ज्याच्या छपराचे गवत किंवा छपराच्या विटा कोठेही पडल्या असतील, ज्यामुळे पाऊस गळतो, किंवा उंदीर इत्यादींचा प्रवेश होतो, किंवा भिंती इत्यादींमध्ये कोठे छिद्र असते, किंवा वाळवी लागते, ते सर्व असुरक्षित होय. ते लक्षात घेऊन त्याची दुरुस्ती करावी. थंडीच्या दिवसांत दारे आणि खिडक्या नीट बंद कराव्यात, कारण थंडीमुळे चीवरांना बुरशी लागते. उष्णतेच्या दिवसांत हवा येण्यासाठी वेळोवेळी खिडक्या उघड्या ठेवाव्यात. असे करणारा भिक्खू 'सुरक्षित आणि असुरक्षित जाणणारा' असे म्हणतात. อิเมหิ [Pg.404] ปน จีวรปฏิคฺคาหกาทีหิ ตีหิปิ อตฺตโน วตฺตํ ชานิตพฺพํ. ตตฺถ จีวรปฏิคฺคาหเกน ตาว ยํ ยํ มนุสฺสา ‘‘กาลจีวร’’นฺติ วา ‘‘อกาลจีวร’’นฺติ วา ‘‘อจฺเจกจีวร’’นฺติ วา ‘‘วสฺสิกสาฏิก’’นฺติ วา ‘‘นิสีทน’’นฺติ วา ‘‘ปจฺจตฺถรณ’’นฺติ วา ‘‘มุขปุญฺฉนโจฬ’’นฺติ วา เทนฺติ, ตํ สพฺพํ เอกราสึ กตฺวา มิสฺเสตฺวา น คณฺหิตพฺพํ, วิสุํ วิสุํ กตฺวาว คณฺหิตฺวา จีวรนิทหกสฺส ตเถว อาจิกฺขิตฺวา ทาตพฺพํ. จีวรนิทหเกนาปิ ภณฺฑาคาริกสฺส ททมาเนน อิทํ กาลจีวรํ…เป… อิทํ มุขปุญฺฉนโจฬนฺติ อาจิกฺขิตฺวาว ทาตพฺพํ. ภณฺฑาคาริเกนาปิ ตเถว วิสุํ วิสุํ วิย สญฺญาณํ กตฺวา ฐเปตพฺพํ. ตโต สงฺเฆน ‘‘กาลจีวรํ อาหรา’’ติ วุตฺเต กาลจีวรเมว ทาตพฺพํ…เป… มุขปุญฺฉนโจฬกํ อาหราติ วุตฺเต ตเทว ทาตพฺพํ. या तिन्ही भिक्खूंनी (चीवर स्वीकारक, चीवर साठवणारा आणि भंडारपाल) आपापले कर्तव्य जाणावे. त्यात प्रथम, चीवर स्वीकारणाऱ्या भिक्खूने लोकांनी दिलेले जे जे चीवर 'कालचीवर', 'अकालचीवर', 'अच्चेकचीवर', 'वर्षावास वस्त्र' (वस्सिकासोटिक), 'आसन' (निसीदन), 'अंथरूण' (पच्चत्थरण), किंवा 'हातरुमाल' (मुखपुंछनचोळ) म्हणून दिले असेल, ते सर्व एकत्र करून किंवा मिसळून स्वीकारू नये. ते वेगवेगळे करूनच स्वीकारावे आणि चीवर साठवणाऱ्या भिक्खूला दात्यांनी सांगितल्याप्रमाणेच सांगून द्यावे. चीवर साठवणाऱ्या भिक्खूनेही भांडारपालास देताना 'हे कालचीवर आहे... पे... हे हातरुमाल आहे' असे सांगूनच द्यावे. भांडारपालानेही तसेच वेगवेगळे करून त्यावर खूण करून ठेवावे. त्यानंतर संघाने 'कालचीवर घेऊन येत' असे म्हटल्यावर कालचीवरच द्यावे... पे... 'हातरुमाल घेऊन ये' असे म्हटल्यावर तेच द्यावे. อิติ ภควตา จีวรปฏิคฺคาหโก อนุญฺญาโต, จีวรนิทหโก อนุญฺญาโต, ภณฺฑาคารํ อนุญฺญาตํ, ภณฺฑาคาริโก อนุญฺญาโต, น พาหุลิกตาย น อสนฺตุฏฺฐิยา; อปิจ โข สงฺฆสฺสานุคฺคหาย. สเจ หิ อาหฏาหฏํ คเหตฺวา ภิกฺขู ภาเชยฺยุํ, เนว อาหฏํ น อนาหฏํ น ทินฺนํ นาทินฺนํ น ลทฺธํ นาลทฺธํ ชาเนยฺยุํ, อาหฏาหฏํ เถราสเน วา ทเทยฺยุํ, ขณฺฑาขณฺฑํ วา ฉินฺทิตฺวา คณฺเหยฺยุํ; เอวํ สติ อยุตฺตปริโภโค จ โหติ, น จ สพฺเพสํ สงฺคโห กโต โหติ. ภณฺฑาคาเร ปน จีวรํ ฐเปตฺวา อุสฺสนฺนกาเล เอเกกสฺส ภิกฺขุโน ติจีวรํ วา ทฺเว ทฺเว วา เอเกกํ วา จีวรํ ทสฺสนฺติ, ลทฺธาลทฺธํ ชานิสฺสนฺติ, อลทฺธภาวํ ญตฺวา สงฺคหํ กาตุํ มญฺญิสฺสนฺตีติ. अशा प्रकारे भगवंतांनी चीवर स्वीकारणाऱ्या भिक्खूला अनुमती दिली, चीवर साठवून ठेवणाऱ्या भिक्खूला अनुमती दिली, भांडारगृहाला अनुमती दिली आणि भांडारिकाला (भांडार सांभाळणाऱ्या भिक्खूला) अनुमती दिली. हे चीवरांच्या अतिरेकासाठी किंवा असंतोषासाठी अनुमत केलेले नाही, तर केवळ संघाच्या कल्याणासाठी (अनुग्रहासाठी) अनुमत केले आहे. कारण जर लोकांनी आणून दिलेले चीवर घेऊन भिक्खूंनी स्वतःच वाटून घेतले, तर त्यांना काय आणले गेले आहे आणि काय आणले गेले नाही, काय दिले गेले आहे आणि काय दिले गेले नाही, कोणाला मिळाले आहे आणि कोणाला मिळाले नाही, हे समजणार नाही. ते आणलेले चीवर थेरांच्या आसनावर ठेवून देतील किंवा त्याचे तुकडे-तुकडे करून कापून घेतील. असे झाल्यास अयोग्य उपभोग होईल आणि सर्वांचा योग्य संग्रह (कल्याण) होणार नाही. परंतु भांडारगृहात चीवर सुरक्षित ठेवून, ते मुबलक प्रमाणात उपलब्ध झाल्यावर प्रत्येक भिक्खूला तीन चीवरे, किंवा दोन-दोन चीवरे, किंवा एक-एक चीवर दिले जाईल. यामुळे कोणाला मिळाले आहे आणि कोणाला मिळाले नाही हे समजेल, आणि ज्यांना मिळाले नाही हे जाणून त्यांचा संग्रह (कल्याण) करणे शक्य होईल, असे समजावे। น ภิกฺขเว ภณฺฑาคาริโก วุฏฺฐาเปตพฺโพติ เอตฺถ อญฺเญปิ อวุฏฺฐาปนียา ชานิตพฺพา. จตฺตาโร หิ น วุฏฺฐาเปตพฺพา – วุฑฺฒตโร, ภณฺฑาคาริโก, คิลาโน, สงฺฆโต ลทฺธเสนาสโนติ. ตตฺถ วุฑฺฒตโร อตฺตโน วุฑฺฒตาย นวกตเรน น วุฏฺฐาเปตพฺโพ, ภณฺฑาคาริโก สงฺเฆน สมฺมนฺนิตฺวา ภณฺฑาคารสฺส ทินฺนตาย, คิลาโน อตฺตโน คิลานตาย, สงฺโฆ ปน พหุสฺสุตสฺส อุทฺเทสปริปุจฺฉาทีหิ พหุปการสฺส ภารนิตฺถารกสฺส ผาสุกํ อาวาสํ อนุฏฺฐาปนียํ กตฺวา เทติ, ตสฺมา โส อุปการตาย จ สงฺฆโต ลทฺธตาย จ น วุฏฺฐาเปตพฺโพติ. “भिक्खूंनो, भांडारिकाला उठवू नये,” या संदर्भात इतरही न उठवण्यायोग्य व्यक्तींविषयी जाणून घेतले पाहिजे. चार प्रकारच्या व्यक्तींना उठवू नये – ज्येष्ठ भिक्खू, भांडारिक, आजारी (ग्लान) भिक्खू, आणि संघाकडून निवासस्थान मिळालेला भिक्खू. त्यापैकी, ज्येष्ठ भिक्खूला त्याच्या ज्येष्ठतेमुळे कनिष्ठ भिक्खूने उठवू नये; भांडारिकाला संघाने नियुक्त करून भांडारगृह सोपवले असल्यामुळे उठवू नये; आजारी भिक्खूला त्याच्या आजारपणामुळे उठवू नये; आणि संघ बहुश्रुत भिक्खूला—जो पाठांतर, प्रश्न विचारणे इत्यादींद्वारे अत्यंत उपकारक असतो आणि जबाबदारी सांभाळणारा असतो—त्याला सुखकर आणि न उठवण्यायोग्य असा निवासस्थान देतो, म्हणून त्याच्या उपकारकतेमुळे आणि संघाकडून मिळालेल्या निवासस्थानामुळे त्याला उठवू नये. हा निर्णय आहे। อุสฺสนฺนํ [Pg.405] โหตีติ พหุ ราสิกตํ โหติ, ภณฺฑาคารํ น คณฺหาติ. สมฺมุขีภูเตนาติ อนฺโตอุปจารสีมายํ ฐิเตน. ภาเชตุนฺติ กาลํ โฆเสตฺวา ปฏิปาฏิยา ภาเชตุํ. โกลาหลํ อกาสีติ ‘‘อมฺหากํ อาจริยสฺส เทถ, อุปชฺฌายสฺส เทถา’’ติ เอวํ มหาสทฺทํ อกาสิ. จีวรภาชนกงฺเคสุ สภาคานํ ภิกฺขูนํ อปาปุณนฺตมฺปิ มหคฺฆํ จีวรํ เทนฺโต ฉนฺทาคตึ คจฺฉติ นาม. อญฺเญสํ วุฑฺฒตรานํ ปาปุณนฺตมฺปิ มหคฺฆํ จีวรํ อทตฺวา อปฺปคฺฆํ เทนฺโต โทสาคตึ คจฺฉติ นาม. โมหมูฬฺโห จีวรทานวตฺตํ อชานนฺโต โมหาคตึ คจฺฉติ นาม. มุขรานํ นวกานมฺปิ ภเยน อปาปุณนฺตเมว มหคฺฆํ จีวรํ เทนฺโต ภยาคตึ คจฺฉติ นาม. โย เอวํ น คจฺฉติ, สพฺเพสํ ตุลาภูโต ปมาณภูโต มชฺฌตฺโต โหติ, โส สมฺมนฺนิตพฺโพ. ภาชิตาภาชิตนฺติ ‘‘เอตฺตกานิ วตฺถานิ ภาชิตานิ, เอตฺตกานิ อภาชิตานี’’ติ ชานนฺโต ‘‘ภาชิตาภาชิตญฺจ ชาเนยฺยา’’ติ วุจฺจติ. ‘उस्सन्नं होति’ (मुबलक असणे) म्हणजे पुष्कळ प्रमाणात साठलेले असणे, जे भांडारगृहात मावत नाही. ‘सम्मुखीभूतेन’ म्हणजे उपचार सीमेच्या आत उपस्थित असलेल्या संघाने. ‘भाजेतुं’ म्हणजे वाटपाची वेळ घोषित करून अनुक्रमे वाटप करणे. ‘कोलाहलं अकासि’ म्हणजे “आमच्या आचार्यांना द्या, आमच्या उपाध्यायांना द्या” असे म्हणून मोठा गोंधळ करणे. चीवर वाटप करणाऱ्या भिक्खूच्या गुणांमध्ये—आपल्या आवडीच्या भिक्खूंना, त्यांना मिळणे योग्य नसतानाही, मौल्यवान चीवर देणे याला ‘छंदागति’ (पक्षपात) म्हणतात. इतर ज्येष्ठ भिक्खूंना, त्यांना मिळणे योग्य असतानाही, मौल्यवान चीवर न देता कमी मूल्याचे चीवर देणे याला ‘दोषागति’ (द्वेषबुद्धीने वागणे) म्हणतात. मोहाने ग्रस्त होऊन चीवर वाटपाचे नियम न जाणता वाटप करणे याला ‘मोहागति’ (अज्ञानाने वागणे) म्हणतात. भांडखोर कनिष्ठ भिक्खूंच्या भयापोटी, त्यांना मिळणे योग्य नसतानाही मौल्यवान चीवर देणे याला ‘भयागति’ (भयाने वागणे) म्हणतात. जो या चार अगततींच्या आहारी जात नाही, सर्वांसाठी तराजूसारखा निष्पक्ष, प्रमाणभूत आणि तटस्थ असतो, त्याचीच नियुक्ती करावी. ‘भाजिताभाजितं’ म्हणजे “एवढे कपडे वाटले गेले आहेत आणि एवढे कपडे वाटायचे बाकी आहेत” हे जाणणारा; म्हणून “त्याने वाटलेले आणि न वाटलेले जाणावे” असे म्हटले आहे। อุจฺจินิตฺวาติ ‘‘อิทํ ถูลํ, อิทํ สณฺหํ, อิทํ ฆนํ, อิทํ ตนุกํ, อิทํ ปริภุตฺตํ, อิทํ อปริภุตฺตํ, อิทํ ทีฆโต เอตฺตกํ ปุถุลโต เอตฺตก’’นฺติ เอวํ วตฺถานิ วิจินิตฺวา. ตุลยิตฺวาติ ‘‘อิทํ เอตฺตกํ อคฺฆติ, อิทํ เอตฺตก’’นฺติ เอวํ อคฺฆปริจฺเฉทํ กตฺวา. วณฺณาวณฺณํ กตฺวาติ สเจ สพฺเพสํ เอเกกเมว ทสคฺฆนกํ ปาปุณาติ, อิจฺเจตํ กุสลํ; โน เจ ปาปุณาติ, ยํ นว วา อฏฺฐ วา อคฺฆติ, ตํ อญฺเญน เอกอคฺฆนเกน จ ทฺวิอคฺฆนเกน จ สทฺธึ พนฺธิตฺวา เอเตน อุปาเยน สเม ปฏิวีเส ฐเปตฺวาติ อตฺโถ. ภิกฺขู คเณตฺวา วคฺคํ พนฺธิตฺวาติ สเจ เอเกกสฺส ทิยมาเน ทิวโส นปฺปโหติ, ทส ทส ภิกฺขู คเณตฺวา ทส ทส จีวรปฏิวีเส เอกวคฺคํ พนฺธิตฺวา เอกํ ภณฺฑิกํ กตฺวา เอวํ จีวรปฏิวีสํ ฐเปตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. เอวํ ฐปิเตสุ จีวรปฏิวีเสสุ กุโส ปาเตตพฺโพ. เตหิปิ ภิกฺขูหิ ปุน กุสปาตํ กตฺวา ภาเชตพฺพํ. ‘उच्चिनित्वा’ (निवड करून) म्हणजे “हे जाड आहे, हे मऊ आहे, हे दाट आहे, हे पातळ आहे, हे वापरलेले आहे, हे न वापरलेले आहे, हे लांबीला एवढे आहे, रुंदीला एवढे आहे” अशा प्रकारे कपड्यांची निवड करून. ‘तुलयित्वा’ (मूल्य ठरवून) म्हणजे “याची किंमत एवढी आहे, याची किंमत एवढी आहे” अशा प्रकारे मूल्याचे वर्गीकरण करून. ‘वण्णावण्णं कत्वा’ (समान मूल्य करून) म्हणजे जर सर्वांना प्रत्येकी दहा नाणी मूल्याचे एक-एक चीवर मिळाले, तर ते उत्तम आहे; जर तसे मिळाले नाही, तर जे नऊ किंवा आठ नाणी मूल्याचे आहे, ते इतर एक किंवा दोन नाणी मूल्याच्या वस्तूंसोबत एकत्र बांधून, या उपायाने समान वाटे तयार करून ठेवणे, असा अर्थ आहे. ‘भिक्खू गणेत्वा वग्गं बंधित्वा’ (भिक्खू मोजून गट तयार करणे) म्हणजे जर प्रत्येकाला स्वतंत्रपणे वाटप करताना दिवस अपुरा पडत असेल, तर दहा-दहा भिक्खू मोजून, दहा-दहा चीवरांचे वाटे एकत्र बांधून, एक गाठोडे तयार करून, अशा प्रकारे चीवरांचे वाटे ठेवण्यास मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. अशा प्रकारे चीवरांचे वाटे ठेवल्यावर चिठ्ठ्या (मैल) टाकाव्यात. त्या भिक्खूंनीही आपापसात पुन्हा चिठ्ठ्या टाकून त्याचे वाटप करावे। สามเณรานํ อุปฑฺฒปฏิวีสนฺติ เอตฺถ เย สามเณรา อตฺติสฺสรา ภิกฺขุสงฺฆสฺส กตฺตพฺพกมฺมํ น กโรนฺติ, อุทฺเทสปริปุจฺฉาสุ ยุตฺตา อาจริยุปชฺฌายานํเยว วตฺตปฏิปตฺตึ กโรนฺติ, อญฺเญสํ น กโรนฺติ, เอเตสํเยว อุปฑฺฒภาโค ทาตพฺโพ. เย ปน ปุเรภตฺตญฺจ ปจฺฉาภตฺตญฺจ ภิกฺขุสงฺฆสฺเสว กตฺตพฺพกิจฺจํ กโรนฺติ, เตสํ สมโก ทาตพฺโพ. อิทญฺจ ปิฏฺฐิสมเย [Pg.406] อุปฺปนฺเนน ภณฺฑาคาเร ฐปิเตน อกาลจีวเรเนว กถิตํ. กาลจีวรํ ปน สมกเมว ทาตพฺพํ. ตตฺรุปฺปาทวสฺสาวาสิกํ สมฺมุญฺชนีพนฺธนาทิ สงฺฆสฺส ผาติกมฺมํ กตฺวา คเหตพฺพํ. เอตญฺเหตฺถ สพฺเพสํ วตฺตํ. ภณฺฑาคาริกจีวเรปิ สเจ สามเณรา อาคนฺตฺวา ‘‘ภนฺเต มยํ ยาคุํ ปจาม, ภตฺตํ ปจาม, ขชฺชกํ ปจาม, อปฺปหริตกํ กโรม, ทนฺตกฏฺฐํ อาหราม, รงฺคฉลฺลึ กปฺปิยํ กตฺวา เทม, กึ อมฺเหหิ น กตํ นามา’’ติ อุกฺกุฏฺฐึ กโรนฺติ, สมภาโคว ทาตพฺโพ. เอตํ เย จ วิรชฺฌิตฺวา กโรนฺติ, เยสญฺจ กรณภาโว น ปญฺญายติ, เต สนฺธาย วุตฺตํ. กุรุนฺทิยํ ปน ‘‘สเจ สามเณรา ‘กสฺมา มยํ ภนฺเต สงฺฆกมฺมํ น กโรม, กริสฺสามา’ติ ยาจนฺติ, สมปฏิวีโส ทาตพฺโพ’’ติ วุตฺตํ. “सामणेरांना अर्धा वाटा” या संदर्भात असा निर्णय समजावा: जे सामणेर स्वतंत्र वृत्तीचे आहेत आणि भिक्खू संघाचे आवश्यक काम करत नाहीत, केवळ पाठांतर आणि प्रश्न विचारण्यात मग्न राहून फक्त आपल्या आचार्य आणि उपाध्यायांचीच सेवा करतात, इतरांची करत नाहीत, केवळ अशाच सामणेरांना अर्धा वाटा दिला पाहिजे. परंतु जे सामणेर जेवणापूर्वी आणि जेवणानंतरही भिक्खू संघाचीच आवश्यक कामे करतात, त्यांना समान वाटा दिला पाहिजे. आणि हे चीवर काळाच्या नंतर (अकाल काळात) मिळालेल्या आणि भांडारगृहात ठेवलेल्या ‘अकाल चीवरा’च्या बाबतीत सांगितले आहे. परंतु ‘काल चीवर’ सर्वांना समानच दिले पाहिजे. तेथे उत्पन्न होणारे वर्षावासिक चीवर हे झाडू बांधणे इत्यादी संघाच्या वृद्धीची कामे करूनच घेतले पाहिजे. कारण हे तेथील सर्व भिक्खू आणि सामणेरांचे कर्तव्य आहे. भांडारगृहातील चीवराच्या बाबतीतही जर सामणेरांनी येऊन गोंधळ घातला की, “भंते, आम्ही पेज शिजवतो, भात शिजवतो, खाद्यपदार्थ तयार करतो, हिरवे गवत काढून जागा स्वच्छ करतो, दंतकाष्ठ आणतो, रंगकामाची साल योग्य प्रकारे तयार करून देतो; आम्ही कोणते काम केले नाही?” तर त्यांना समान वाटाच दिला पाहिजे. हे (अर्धा वाटा देण्याचे नियम) अशा सामणेरांच्या संदर्भात सांगितले आहे जे कामे करण्यात कसूर करतात किंवा ज्यांचे काम करणे दिसून येत नाही. परंतु कुरुंदी अट्ठकथेत म्हटले आहे की, “जर सामणेरांनी अशी विनंती केली की, ‘भंते, आम्ही संघाचे काम का करणार नाही? आम्ही नक्कीच करू,’ तर त्यांना समान वाटा दिला पाहिजे.” อุตฺตริตุกาโมติ นทึ วา กนฺตารํ วา อุตฺตริตุกาโม; สตฺถํ ลภิตฺวา ทิสา ปกฺกมิตุกาโมติ อตฺโถ. สกํ ภาคํ ทาตุนฺติ อิทํ ภณฺฑาคารโต จีวรานิ นีหริตฺวา ปุญฺเช กเต ฆณฺฏิยา ปหฏาย ภิกฺขุสงฺเฆ สนฺนิปติเต สตฺถํ ลภิตฺวา คนฺตุกาโม ‘‘สตฺถโต มา ปริหายี’’ติ เอตมตฺถํ สนฺธาย วุตฺตํ. ตสฺมา อนีหเตสุ วา จีวเรสุ อปฺปหฏาย วา ฆณฺฏิยา อสนฺนิปติเต วา สงฺเฆ ทาตุํ น วฏฺฏติ. จีวเรสุ ปน นีหเตสุ ฆณฺฏึ ปหริตฺวา ภิกฺขุสงฺเฆ สนฺนิปติเต จีวรภาชเกน ‘‘อิมสฺส ภิกฺขุโน โกฏฺฐาเสน เอตฺตเกน ภวิตพฺพ’’นฺติ ตกฺเกตฺวา นยคฺคาเหน จีวรํ ทาตพฺพํ. ตุลาย ตุลิตมิว หิ สมสมํ ทาตุํ น สกฺกา, ตสฺมา อูนํ วา โหตุ อธิกํ วา, เอวํ ตกฺเกน นเยน ทินฺนํ สุทินฺนํ. เนว อูนกํ ปุน ทาตพฺพํ, นาติริตฺตํ ปฏิคฺคณฺหิตพฺพนฺติ. ‘उत्तरीतुकामो’ (पार करण्याची इच्छा असलेला) म्हणजे नदी किंवा दुर्गम मार्ग (कांतार) पार करण्याची इच्छा असलेला; सार्थ (सोबत/व्यापाऱ्यांचा तांडा) मिळवून इतर दिशांना निघून जाऊ इच्छिणारा, असा अर्थ आहे. ‘सकं भागं दातुं’ (स्वतःचा हिस्सा देणे) हे जे म्हटले आहे, ते भांडारातून चीवरे बाहेर काढून, त्यांचा ढीग केल्यावर, घंटा वाजवून भिक्खू संघ एकत्रित झाल्यावर, सार्थ मिळवून जाऊ इच्छिणाऱ्या भिक्खूने “मी सार्थापासून मागे राहू नये” या उद्देशाला मनात ठेवून भगवंतांनी म्हटले आहे. त्यामुळे, चीवरे बाहेर काढली नसताना, किंवा घंटा वाजवली नसताना, किंवा संघ एकत्रित झाला नसताना (हिस्सा) देणे योग्य नाही. परंतु चीवरे बाहेर काढल्यावर, घंटा वाजवून भिक्खू संघ एकत्रित झाल्यावर, चीवर-वाटप करणाऱ्या भिक्खूने (चीवरभाजकाने) “या भिक्खूचा हिस्सा एवढा असावा” असा अंदाज करून योग्य पद्धतीने चीवर दिले पाहिजे. कारण तराजूने तोलल्याप्रमाणे तंतोतंत समान देणे शक्य नाही, म्हणून ते कमी असो वा जास्त, अशा प्रकारे अंदाजाने व योग्य पद्धतीने दिलेले चीवर सुदिन्न (योग्य प्रकारे दिलेले) असते. कमी असलेला हिस्सा पुन्हा देऊ नये आणि जास्त असलेला हिस्सा परत घेऊ नये. อติเรกภาเคนาติ ทส ภิกฺขู โหนฺติ, สาฏกาปิ ทเสว, เตสุ เอโก ทฺวาทส อคฺฆติ, เสสา ทสคฺฆนกา. สพฺเพสุ ทสคฺฆนกวเสน กุเส ปาติเต ยสฺส ภิกฺขุโน ทฺวาทสคฺฆนโก กุโส ปาติโต, โส ‘‘เอตฺตเกน มม จีวรํ ปโหตี’’ติ เตน อติเรกภาเคน คนฺตุกาโม โหติ. ภิกฺขู ‘‘อติเรกํ อาวุโส สงฺฆสฺส สนฺตก’’นฺติ วทนฺติ, ตํ สุตฺวา ภควา ‘‘สงฺฆิเก จ คณสนฺตเก จ อปฺปกํ นาม นตฺถิ, สพฺพตฺถ สํยโม กาตพฺโพ, คณฺหนฺเตนาปิ กุกฺกุจฺจายิตพฺพ’’นฺติ ทสฺเสตุํ ‘‘อนุชานามิ ภิกฺขเว อนุกฺเขเป ทินฺเน’’ติ อาห. ตตฺถ อนุกฺเขโป นาม ยํกิญฺจิ อนุกฺขิปิตพฺพํ อนุปฺปทาตพฺพํ กปฺปิยภณฺฑํ; ยตฺตกํ [Pg.407] ตสฺส ปฏิวีเส อธิกํ, ตตฺตเก อคฺฆนเก ยสฺมึ กิสฺมิญฺจิ กปฺปิยภณฺเฑ ทินฺเนติ อตฺโถ. ‘अतिरेकभागेन’ (अतिरिक्त हिश्श्याने) म्हणजे समजा दहा भिक्खू आहेत आणि वस्त्रे (शाटक) देखील दहाच आहेत. त्यांपैकी एका वस्त्राची किंमत बारा आहे आणि उरलेली नऊ वस्त्रे दहा किमतीची आहेत. सर्व वस्त्रांवर दहा किमतीचे मानून चिठ्ठ्या (कुस) टाकल्या असता, ज्या भिक्खूला बारा किमतीच्या वस्त्राची चिठ्ठी मिळते, तो “एवढ्या वस्त्राने माझे चीवर पुरेसे होईल” असे म्हणून त्या अतिरिक्त हिश्श्यासह जाऊ इच्छितो. इतर भिक्खू म्हणतात, “आयुष्यमाना, हे अतिरिक्त मूल्य संघाचे आहे.” ते ऐकून भगवंतांनी “संघाच्या आणि गणाच्या मालकीच्या वस्तूंमध्ये ‘अल्प’ असे काही नसते, सर्व बाबतीत संयम राखला पाहिजे, आणि अतिरिक्त घेणाऱ्यानेही संकोच (कुक्कुच्च) बाळगला पाहिजे” हे दर्शवण्यासाठी “भिक्खूंनो, मी अनुमती देतो की अनुक्षेप (भरपाई) दिली असता (ते घेता येईल)” असे म्हटले. तेथे ‘अनुक्षेप’ म्हणजे अतिरिक्त जोडण्याजोगी किंवा नंतर देण्याजोगी कोणतीही कप्पिय (योग्य) वस्तू होय. त्याच्या हिश्श्यामध्ये जेवढे मूल्य अधिक आहे, तेवढ्या मूल्याची कोणतीही कप्पिय वस्तू दिली असता, असा याचा अर्थ आहे. วิกลเก โตเสตฺวาติ เอตฺถ จีวรวิกลกํ ปุคฺคลวิกลกนฺติ ทฺเว วิกลกา. จีวรวิกลกํ นาม สพฺเพสํ ปญฺจ ปญฺจ วตฺถานิ ปตฺตานิ, เสสานิปิ อตฺถิ, เอเกกํ ปน น ปาปุณาติ, ฉินฺทิตฺวา ทาตพฺพานิ. ฉินฺทนฺเตหิ จ อฑฺฒมณฺฑลาทีนํ วา อุปาหนตฺถวิกาทีนํ วา ปโหนกานิ ขณฺฑานิ กตฺวา ทาตพฺพานิ, เหฏฺฐิมปริจฺเฉเทน จตุรงฺคุลวิตฺถารมฺปิ อนุวาตปฺปโหนกายามํ ขณฺฑํ กตฺวา ทาตุํ วฏฺฏติ, อปริโภคํ ปน น กาตพฺพนฺติ เอวเมตฺถ จีวรสฺส อปฺปโหนกภาโว จีวรวิกลกํ. ฉินฺทิตฺวา ทินฺเน ปน ตํ โตสิตํ โหติ, อถ กุสปาโต กาตพฺโพ. สเจปิ เอกสฺส ภิกฺขุโน โกฏฺฐาเส เอกํ วา ทฺเว วา วตฺถานิ นปฺปโหนฺติ, ตตฺถ อญฺญํ สามณกํ ปริกฺขารํ ฐเปตฺวา โย เตน ตุสฺสติ, ตสฺส ตํ ภาคํ ทตฺวา ปจฺฉา กุสปาโต กาตพฺโพ. อิทมฺปิ จีวรวิกลกนฺติ อนฺธกฏฺฐกถายํ วุตฺตํ. ‘विकलके तोसेत्वा’ (विकलकांचे समाधान करून) यामध्ये चीवरविकलक आणि पुग्गलविकलक (व्यक्तींची कमतरता) असे दोन विकलक आहेत. चीवरविकलक म्हणजे सर्वांना पाच-पाच वस्त्रे मिळाली आहेत आणि उरलेली वस्त्रेही शिल्लक आहेत, पण ती प्रत्येकाला एक-एक मिळत नाहीत, तेव्हा ती कापून दिली पाहिजेत. कापताना भिक्खूंनी अर्धमंडळ इत्यादींसाठी किंवा पादत्राणांच्या पिशव्या इत्यादींसाठी पुरेसे असणारे तुकडे करून दिले पाहिजेत. किमान मर्यादेत चार बोटे रुंद आणि काठ (अनुवात) लावण्यासाठी पुरेशी लांबी असलेला तुकडा करून देणे योग्य आहे, परंतु ते निरुपयोगी होणार नाही याची काळजी घ्यावी. अशा प्रकारे चीवराची कमतरता असणे म्हणजे ‘चीवरविकलक’ होय. कापून दिल्यावर ते समाधानकारक होते, त्यानंतर चिठ्ठ्या टाकाव्यात. जर एका भिक्खूच्या हिश्श्यात एक किंवा दोन वस्त्रे कमी पडत असतील, तर तेथे भिक्खूंच्या उपयोगाचे इतर परिष्कार (साहित्य) ठेवून, जो भिक्खू त्याने समाधानी होईल, त्याला तो हिस्सा देऊन नंतर चिठ्ठ्या टाकाव्यात. यालाही ‘चीवरविकलक’ म्हणतात, असे अंधक-अट्ठकथेत म्हटले आहे. ปุคฺคลวิกลกํ นาม ทส ทส ภิกฺขู คเณตฺวา วคฺคํ กโรนฺตานํ เอโก วคฺโค น ปูรติ, อฏฺฐ วา นว วา โหนฺติ, เตสํ อฏฺฐ วา นว วา โกฏฺฐาสา ‘‘ตุมฺเห อิเม คเหตฺวา วิสุํ ภาเชถา’’ติ ทาตพฺพา. เอวมยํ ปุคฺคลานํ อปฺปโหนกภาโว ปุคฺคลวิกลกํ. วิสุํ ทินฺเน ปน ตํ โตสิตํ โหติ, เอวํ โตเสตฺวา กุสปาโต กาตพฺโพติ. อถ วา วิกลเก โตเสตฺวาติ โย จีวรวิภาโค อูนโก, ตํ อญฺเญน ปริกฺขาเรน สมํ กตฺวา กุสปาโต กาตพฺโพ. ‘पुग्गलविकलक’ म्हणजे दहा-दहा भिक्खू मोजून गट करताना एखादा गट पूर्ण होत नाही, आठ किंवा नऊ भिक्खू असतात. त्यांना आठ किंवा नऊ हिस्से “तुम्ही हे घेऊन आपापसात वाटून घ्या” असे सांगून दिले पाहिजेत. अशा प्रकारे व्यक्तींची कमतरता असणे म्हणजे ‘पुग्गलविकलक’ होय. स्वतंत्रपणे दिल्यावर ते समाधानकारक होते, अशा प्रकारे समाधान करून चिठ्ठ्या टाकाव्यात. किंवा ‘विकलके तोसेत्वा’ म्हणजे जो चीवर विभाग कमी आहे, तो इतर परिष्काराने समान करून चिठ्ठ्या टाकाव्यात. จีวรรชนกถา चीवर रंगवण्याची कथा (चीवररजनकथा) ๓๔๔. ฉกเณนาติ โคมเยน. ปณฺฑุมตฺติกายาติ ตมฺพมตฺติกาย. มูลรชนาทีสุ หลิทฺทึ ฐเปตฺวา สพฺพํ มูลรชนํ วฏฺฏติ. มญฺชิฏฺฐิญฺจ ตุงฺคหารญฺจ ฐเปตฺวา สพฺพํ ขนฺธรชนํ วฏฺฏติ. ตุงฺคหาโร นาม เอโก สกณฺฏกรุกฺโข, ตสฺส หริตาลวณฺณํ ขนฺธรชนํ โหติ. โลทฺทญฺจ กณฺฑุลญฺจ ฐเปตฺวา สพฺพํ ตจรชนํ วฏฺฏติ. อลฺลิปตฺตํ นีลิปตฺตญฺจ ฐเปตฺวา สพฺพํ ปตฺตรชนํ วฏฺฏติ. คิหิปริภุตฺตํ ปน อลฺลิปตฺเตน เอกวารํ รชิตุํ วฏฺฏติ. กึสุกปุปฺผญฺจ กุสุมฺภปุปฺผญฺจ ฐเปตฺวา สพฺพํ ปุปฺผรชนํ วฏฺฏติ. ผลรชเน ปน น กิญฺจิ น วฏฺฏติ. ३४४. ‘छकणेन’ म्हणजे शेणाने. ‘पंडुमत्तिकाय’ म्हणजे तांबड्या मातीने. मुळांपासून बनवलेल्या रंगांमध्ये हळद वगळून इतर सर्व मुळांचे रंग योग्य आहेत. मंजिष्ठा आणि तुंगहार वगळून सर्व खोडांचे रंग योग्य आहेत. तुंगहार नावाचे एक काटेरी झाड आहे, त्याच्या खोडाचा रंग हरिताल (पिवळ्या) रंगाचा असतो. लोध्र आणि कण्डुल वगळून सर्व सालींचे रंग योग्य आहेत. ओले पान (मेंदीचे पान) आणि नीळीचे पान वगळून सर्व पानांचे रंग योग्य आहेत. परंतु गृहस्थांनी वापरलेले वस्त्र ओल्या पानाने एकदा रंगवणे योग्य आहे. पळसाचे फूल आणि कुसुंभाचे फूल वगळून सर्व फुलांचे रंग योग्य आहेत. फळांच्या रंगांमध्ये मात्र अयोग्य असे काहीही नाही (अर्थात सर्व योग्य आहेत). สีตุทกาติ [Pg.408] อปกฺกรชนํ วุจฺจติ. อุตฺตราฬุมฺปนฺติ วฏฺฏาธารกํ, รชนกุมฺภิยา มชฺเฌ ฐเปตฺวา ตํ อาธารกํ ปริกฺขิปิตฺวา รชนํ ปกฺขิปิตุํ อนุชานามีติ อตฺโถ. เอวญฺหิ กเต รชนํ น อุตฺตรติ. อุทเก วา นขปิฏฺฐิกาย วาติ สเจ ปริปกฺกํ โหติ, อุทกปาติยา ทินฺโน เถโว สหสา น วิสรติ, นขปิฏฺฐิยมฺปิ อวิสรนฺโต ติฏฺฐติ. รชนุฬุงฺกนฺติ รชนอุฬุงฺกํ. ทณฺฑกถาลกนฺติ ตเมว สทณฺฑกํ. รชนโกลมฺพนฺติ รชนกุณฺฑํ. โอมทฺทนฺตีติ สมฺมทฺทนฺติ. น จ อจฺฉินฺเน เถเว ปกฺกมิตุนฺติ ยาว รชนพินฺทุ คฬิตํ น ฉิชฺชติ, ตาว น อญฺญตฺร คนฺตพฺพํ. ปตฺถินฺนนฺติ อติรชิตตฺตา ถทฺธํ. อุทเก โอสาเรตุนฺติ อุทเก ปกฺขิปิตฺวา ฐเปตุํ. รชเน ปน นิกฺขนฺเต ตํ อุทกํ ฉฑฺเฑตฺวา จีวรํ มทฺทิตพฺพํ. ทนฺตกาสาวานีติ เอกํ วา ทฺเว วา วาเร รชิตฺวา ทนฺตวณฺณานิ ธาเรนฺติ. ‘सीतुदका’ म्हणजे न शिजवलेला रंग. ‘उत्तराळुम्पं’ म्हणजे गोल कडे (वर्तुळाकार आधार), रंगवण्याच्या भांड्याच्या (रजनकंभीच्या) मध्ये ठेवून, त्या आधाराने वेढून रंग टाकण्यास मी अनुमती देतो, असा अर्थ आहे. असे केल्याने रंग उतू जात नाही. ‘उदके वा नखपिट्ठिकाय वा’ म्हणजे जर रंग पूर्ण शिजला असेल, तर पाण्याच्या पात्रात टाकलेला रंगाचा थेंब लगेच पसरत नाही, आणि नखाच्या पाठीवर टाकलेला थेंबही न पसरता स्थिर राहतो. ‘रजनुळुङ्कं’ म्हणजे रंग काढण्याचे भांडे (पळी). ‘दण्डकथालकं’ म्हणजे दांडा असलेले तेच भांडे. ‘रजनकोलम्बं’ म्हणजे रंग ठेवण्याचे भांडे (कुंडी). ‘ओमद्दन्ति’ म्हणजे चांगल्या प्रकारे चोळतात. ‘न च अच्छिन्ने थेवे पक्कमितुं’ म्हणजे जोपर्यंत रंगाचा थेंब गळणे थांबत नाही, तोपर्यंत इतरत्र जाऊ नये. ‘पत्थिन्नं’ म्हणजे अतिशय रंगवल्यामुळे कडक झालेले. ‘उदके ओसारेतुं’ म्हणजे पाण्यात टाकून ठेवणे. परंतु रंग निघून गेल्यावर ते पाणी फेकून देऊन चीवर चोळावे. ‘दन्तकासावानि’ म्हणजे एकदा किंवा दोनदा रंगवून हस्तिदंताच्या रंगाचे चीवर परिधान करतात. ฉินฺนกจีวรานุชานนกถา छिन्नक चीवर (तुकडे करून शिवलेले चीवर) मंजूर करण्याची कथा (छिन्नकचीवरानुजाननकथा) ๓๔๕. อจฺฉิพทฺธนฺติ จตุรสฺสเกทารกพทฺธํ. ปาฬิพทฺธนฺติ อายามโต จ วิตฺถารโต จ ทีฆมริยาทพทฺธํ. มริยาทพทฺธนฺติ อนฺตรนฺตรา รสฺสมริยาทพทฺธํ. สิงฺฆาฏกพทฺธนฺติ มริยาทาย มริยาทํ วินิวิชฺฌิตฺวา คตฏฺฐาเน สิงฺฆาฏกพทฺธํ; จตุกฺกสณฺฐานนฺติ อตฺโถ. สํวิทหิตุนฺติ กาตุํ. อุสฺสหสิ ตฺวํ อานนฺทาติ สกฺโกสิ ตฺวํ อานนฺท. อุสฺสหามิ ภควาติ ตุมฺเหหิ ทินฺนนเยน สกฺโกมีติ ทสฺเสติ. ยตฺร หิ นามาติ โย นาม. กุสิมฺปิ นามาติอาทีสุ กุสีติ อายามโต จ วิตฺถารโต จ อนุวาตาทีนํ ทีฆปตฺตานเมตํ อธิวจนํ. อฑฺฒกุสีติ อนฺตรนฺตรา รสฺสปตฺตานํ นามํ. มณฺฑลนฺติ ปญฺจขณฺฑิกจีวรสฺส เอเกกสฺมึ ขณฺเฑ มหามณฺฑลํ. อฑฺฒมณฺฑลนฺติ ขุทฺทกมณฺฑลํ. วิวฏฺฏนฺติ มณฺฑลญฺจ อฑฺฒมณฺฑลญฺจ เอกโต กตฺวา สิพฺพิตํ มชฺฌิมขณฺฑํ. ३४५. ‘अच्छिबद्धं’ म्हणजे चारकोनी शेताच्या आकाराचे बांधलेले. ‘पाळिबद्धं’ म्हणजे लांबी आणि रुंदीने लांब बांध घातलेले. ‘मरियादबद्धं’ म्हणजे मध्ये-मध्ये लहान बांध घातलेले. ‘सिंघाटकबद्धं’ म्हणजे एका बांधाने दुसऱ्या बांधाला छेदून गेलेल्या ठिकाणी चौकासारखे (चौफुलीसारखे) बांधलेले; असा अर्थ आहे. ‘संविदहितुं’ म्हणजे करण्यासाठी. ‘उस्सहसि त्वं आनन्दा’ म्हणजे ‘आनंदा, तू समर्थ आहेस का?’ ‘उस्सहामि भगवा’ याने ‘आपण (भगवंतांनी) दिलेल्या पद्धतीने मी करण्यास समर्थ आहे’ हे दर्शवितात. ‘यत्र हि नाम’ म्हणजे जो कोणी. ‘कुसिम्पि नाम’ इत्यादींमध्ये ‘कुसी’ हे लांबी आणि रुंदीने अनुवात इत्यादींच्या लांब पट्ट्यांचे नाव आहे. ‘अड्ढकुसी’ हे मध्ये-मध्ये असलेल्या लहान पट्ट्यांचे नाव आहे. ‘मण्डलं’ म्हणजे पाच खंडांच्या चीवराच्या प्रत्येक खंडामधील मोठे मंडल. ‘अड्ढमण्डलं’ म्हणजे लहान मंडल. ‘विवट्टं’ म्हणजे मोठे मंडल आणि लहान मंडल एकत्र करून शिवलेला मधला खंड. อนุวิวฏฺฏนฺติ ตสฺส อุโภสุ ปสฺเสสุ ทฺเว ขณฺฑานิ. คีเวยฺยกนฺติ คีวาเวฐนฏฺฐาเน ทฬฺหีกรณตฺถํ อญฺญํ สุตฺตสํสิพฺพิตํ อาคนฺตุกปตฺตํ. ชงฺเฆยฺยกนฺติ ชงฺฆปาปุณนฏฺฐาเน ตเถว สํสิพฺพิตํ ปตฺตํ. คีวฏฺฐาเน จ ชงฺฆฏฺฐาเน จ ปตฺตานเมเวตํ นามนฺติปิ วทนฺติ. พาหนฺตนฺติ อนุวิวฏฺฏานํ พหิ เอเกกํ ขณฺฑํ. อิติ ปญฺจขณฺฑิกจีวเรเนตํ วิจาริตนฺติ. อถ วา อนุวิวฏฺฏนฺติ วิวฏฺฏสฺส [Pg.409] เอกปสฺสโต ทฺวินฺนํ เอกปสฺสโต ทฺวินฺนนฺติ จตุนฺนมฺปิ ขณฺฑานเมตํ นามํ. พาหนฺตนฺติ สุปฺปมาณํ จีวรํ ปารุปนฺเตน สํหริตฺวา พาหาย อุปริ ฐปิตา อุโภ อนฺตา พหิมุขา ติฏฺฐนฺติ, เตสํ เอตํ นามํ. อยเมว หิ นโย มหาอฏฺฐกถายํ วุตฺโตติ. ‘अनुविवट्टं’ म्हणजे त्या मधल्या खंडाच्या दोन्ही बाजूंना असलेले दोन खंड. ‘गीवेय्यकं’ म्हणजे गळ्याभोवती गुंडाळण्याच्या ठिकाणी मजबुतीसाठी सुताने शिवलेली दुसरी अतिरिक्त पट्टी. ‘जंघेय्यकं’ म्हणजे पिंढरीच्या ठिकाणी त्याचप्रमाणे शिवलेली पट्टी. गळ्याच्या ठिकाणी आणि पिंढरीच्या ठिकाणी असलेल्या पट्ट्यांचे हे नाव आहे असेही म्हणतात. ‘बाहन्तं’ म्हणजे अनुविवट्टाच्या बाहेर असलेला एकेक खंड. अशा प्रकारे हे पाच खंडांच्या चीवराच्या रचनेने स्पष्ट केले आहे. अथवा, ‘अनुविवट्टं’ म्हणजे विवट्टाच्या एका बाजूला दोन आणि दुसऱ्या बाजूला दोन अशा चारही खंडांचे नाव आहे. ‘बाहन्तं’ म्हणजे योग्य प्रमाणाचे चीवर पांघरताना ते एकत्र करून हाताच्या वर ठेवलेले दोन्ही टोक जे बाहेरच्या बाजूला राहतात, त्यांचे हे नाव आहे. हाच नियम महाअट्ठकथेत सांगितला आहे. ติจีวรานุชานนกถา तिचीवर (तीन चीवरे) अनुमती देण्याची कथा. ๓๔๖. จีวเรหิ อุพฺภณฺฑิเกติ จีวเรหิ อุพฺภณฺเฑ กเต; ยถา อุกฺขิตฺตภณฺฑา โหนฺติ เอวํ กเต; อุกฺขิตฺตภณฺฑิกภาวํ อาปาทิเตติ อตฺโถ. จีวรภิสินฺติ เอตฺถ ภิสีติ ทฺเว ตีณิ เอกโต กตฺวา ภิสิสงฺเขเปน สํหริตจีวรานิ วุตฺตานิ. เต กิร ภิกฺขู ‘‘ทกฺขิณาคิริโต ภควา ลหุํ ปฏินิวตฺติสฺสตี’’ติ ตตฺถ คจฺฉนฺตา ชีวกวตฺถุสฺมึ ลทฺธจีวรานิ ฐเปตฺวา อคมํสุ. อิทานิ ปน จิเรน อาคมิสฺสตีติ มญฺญมานา อาทาย ปกฺกมึสุ. อนฺตรฏฺฐกาสูติ มาฆสฺส จ ผคฺคุณสฺส จ อนฺตรา อฏฺฐสุ. น ภควนฺตํ สีตํ อโหสีติ ภควโต สีตํ นาโหสิ. เอตทโหสิ เยปิ โข เต กุลปุตฺตาติ น ภควา อชฺโฌกาเส อนิสีทิตฺวา เอตมตฺถํ น ชานาติ, มหาชนสญฺญาปนตฺถํ ปน เอวมกาสิ. สีตาลุกาติ สีตปกติกา; เย ปกติยาว สีเตน กิลมนฺติ. ทิคุณํ สงฺฆาฏินฺติ ทุปฏฺฏํ สงฺฆาฏึ. เอกจฺจิยนฺติ เอกปฏฺฏํ. อิติ ‘‘ภควา อตฺตนา จตูหิ จีวเรหิ ยาเปติ, อมฺหากํ ปน ติจีวรํ อนุชานาตี’’ติ วจนสฺส โอกาสํ อุปจฺฉินฺทิตุํ ทิคุณํ สงฺฆาฏึ อนุชานาติ, เอกจฺจิเก อิตเร. เอวญฺหิ เนสํ จตฺตาริ ภวิสฺสนฺตีติ. ३४६. ‘चीवरेहि उब्भण्डिके’ म्हणजे चीवरांचे गाठोडे वर उचलून बांधले असता; जसे गाठोडे वर उचलून ठेवले जाते तसे केले असता; गाठोडे वर उचलल्याची अवस्था प्राप्त करून दिली असा अर्थ आहे. ‘चीवरभिसिं’ यामध्ये ‘भिसी’ म्हणजे दोन किंवा तीन चीवरे एकत्र करून गादीसारखी घडी केलेली चीवरे असे म्हटले आहे. ते भिक्खू ‘भगवान दक्खिणागिरीहून लवकरच परत yeतील’ असा विचार करून तेथे जाताना जीवकवस्तूमध्ये मिळालेली चीवरे ठेवून गेले. परंतु आता ते उशिराने परत येतील असे मानून ती चीवरे घेऊन निघून गेले. ‘अन्तरट्ठकासू’ म्हणजे माघ आणि फाल्गुन महिन्यांच्या मधील आठ दिवसांत. ‘न भगवन्तं सीतं अहोसि’ म्हणजे भगवंतांना थंडी वाजली नाही. ‘एतदहोसि yeपि खो ते कुलपुत्ता’ यामध्ये भगवंतांनी उघड्या जागेत न बसता ही गोष्ट जाणली नाही असे नाही, ते जाणतच होते; परंतु बहुजनांना समजण्यासाठी त्यांनी असे केले. ‘सीतालुका’ म्हणजे थंडी वाजण्याची प्रवृत्ती असलेले; जे स्वभावतःच थंडीने त्रस्त होतात. ‘दिगुणं संघाटिं’ म्हणजे दोन पदरी संघाती. ‘एकच्चियं’ म्हणजे एक पदरी. अशा प्रकारे ‘भगवान स्वतः चार चीवरांनी काळ घालवतात, परंतु आम्हाला मात्र तीनच चीवरांची अनुमती देतात’ या बोलण्याची संधी नष्ट करण्यासाठी दोन पदरी संघातीची अनुमती दिली, आणि इतर (चीवरे) एक पदरी ठेवले. कारण असे केल्याने त्यांच्याकडे चार चीवरे होतील. อติเรกจีวราทิกถา अतिरिक्त चीवर इत्यादींची कथा. ๓๔๘. อคฺคฬํ อจฺฉุเปยฺยนฺติ ฉิทฺทฏฺฐาเน ปิโลติกขณฺฑํ ลคฺคาเปยฺยํ. อหตกปฺปานนฺติ เอกวารํ โธตานํ. อุตุทฺธฏานนฺติ อุตุโต ทีฆกาลโต อุทฺธฏานํ หตวตฺถกานํ, ปิโลติกานนฺติ วุตฺตํ โหติ. ปาปณิเกติ อนฺตราปณโต ปติตปิโลติกจีวเร. อุสฺสาโห กรณีโยติ ปริเยสนา กาตพฺพา. ปริจฺเฉโท ปเนตฺถ นตฺถิ, ปฏฺฏสตมฺปิ วฏฺฏติ. สพฺพมิทํ สาทิยนฺตสฺส ภิกฺขุโน วเสน วุตฺตํ. อคฺคฬํ ตุนฺนนฺติ เอตฺถ อุทฺธริตฺวา อลฺลียาปนขณฺฑํ อคฺคฬํ, สุตฺเตน สํสิพฺพิตํ ตุนฺนํ; วฏฺเฏตฺวา กรณํ โอวฏฺฏิกํ [Pg.410] . กณฺฑุสกํ วุจฺจติ มุทฺทิกา. ทฬฺหีกมฺมนฺติ อนุทฺธริตฺวาว อุปสฺสยํ กตฺวา อลฺลียาปนกํ วตฺถขณฺฑํ. ३४८. ‘अग्गळं अच्छुपेय्यं’ म्हणजे छिद्र असलेल्या ठिकाणी कापडाचा तुकडा जोडणे (ठिगळ लावणे). ‘अहतकप्पानं’ म्हणजे एकदा धुवून घेतलेले. ‘उतुद्धटानं’ म्हणजे ऋतूनुसार दीर्घकाळानंतर बाहेर काढलेले, धुतलेले जुने कापड, असा अर्थ आहे. ‘पापणिके’ म्हणजे बाजारातून पडलेल्या कापडाच्या तुकड्याचे चीवर. ‘उस्साहो करणीयो’ म्हणजे शोध घेतला पाहिजे. येथे कोणतीही मर्यादा नाही, शंभर पदर असले तरी चालतात. हे सर्व स्वीकारणाऱ्या भिक्खूच्या संदर्भात भगवंतांनी सांगितले आहे. ‘अग्गळं तुन्नं’ यामध्ये खराब झालेला भाग काढून टाकून जोडलेला कापडाचा तुकडा म्हणजे ‘अग्गळ’ (ठिगळ), सुताने शिवलेले ते ‘तुन्न’ (शिवण); गोल करून शिवणे म्हणजे ‘ओवट्टिक’. ‘कण्डुसक’ याला ‘मुद्दिका’ असे म्हणतात. ‘दळ्हीकम्मं’ म्हणजे खराब झालेला भाग न काढता वरून कापडाचा तुकडा लावून मजबूत करणे. ๓๔๙-๓๕๑. วิสาขาวตฺถุ อุตฺตานตฺถํ. ตโต ปรํ ปุพฺเพ วินิจฺฉิตเมว. โสวคฺคิกนฺติ สคฺคปฺปตฺตเหตุกํ. เตเนวาห ‘‘โสวคฺคิก’’นฺติ. โสกํ อปเนตีติ โสกนุทํ. อนามยาติ อโรคา. สคฺคมฺหิ กายมฺหีติ สคฺโคปปนฺนา. ३४९-३५१. विशाखाची कथा स्पष्ट अर्थाची आहे. त्यानंतरचे शब्द पूर्वीच निश्चित केलेले आहेत. ‘सोवग्गिकं’ म्हणजे स्वर्गप्राप्तीचे कारण असलेले. त्यामुळेच भगवंतांनी ‘सोवग्गिकं’ असे म्हटले आहे. शोक दूर करणारे म्हणून ‘शोकनुद’. ‘अनामया’ म्हणजे निरोगी. ‘सग्गम्हि कायम्हि’ म्हणजे स्वर्गात उत्पन्न झालेले. ๓๕๓. ปุถุชฺชนา กาเมสุ วีตราคาติ ฌานลาภิโน. ३५३. ‘पुथुज्जना कामेसु वीतरागा’ म्हणजे ध्यान प्राप्त केलेले (ध्यानलाभी) व्यक्ती. ๓๕๖. สนฺทิฏฺโฐติ ทิฏฺฐมตฺตกมิตฺโต. สมฺภตฺโตติ เอกสมฺโภโค ทฬฺหมิตฺโต. อาลปิโตติ ‘‘มม สนฺตกํ ยํ อิจฺเฉยฺยาสิ, ตํ คณฺหาหี’’ติ เอวํ วุตฺโต. เอเตสุ ตีสุ อญฺญตรนาเมน สทฺธึ ชีวติ, คหิเต อตฺตมโน โหตีติ อิเมหิ คหิตวิสฺสาโส รุหติ. ३५६. ‘सन्दिट्ठो’ म्हणजे केवळ पाहिलेला मित्र. ‘सम्भत्तो’ म्हणजे एकत्र उपभोग घेणारा दृढ मित्र. ‘आलपितो’ म्हणजे ‘माझ्या मालकीचे जे काही तुला हवे असेल, ते तू घे’ असे ज्याला म्हटले गेले आहे. या तिन्हींपैकी कोणत्याही एका नावाने सोबत राहणारा, आणि वस्तू घेतली असता जो आनंदी होतो, या लक्षणांनी विश्वास दृढ होतो. ปจฺฉิมวิกปฺปนุปคจีวราทิกถา शेवटच्या विकल्पन (पर्यायी) चीवर इत्यादींची कथा. ๓๕๙. ปํสุกูลกโตติ กตปํสุกูโล. ครุโก โหตีติ ชิณฺณชิณฺณฏฺฐาเน อคฺคฬาโรปเนน ครุโก โหติ. สุตฺตลูขํ กาตุนฺติ สุตฺเตเนว อคฺคฬํ กาตุนฺติ อตฺโถ. วิกณฺโณ โหตีติ สุตฺตํ อจฺเฉตฺวา อจฺเฉตฺวา สิพฺพนฺตานํ เอโก สงฺฆาฏิโกโณ ทีโฆ โหติ. วิกณฺณํ อุทฺธริตุนฺติ ทีฆโกณํ ฉินฺทิตุํ. โอกิริยนฺตีติ ฉินฺนโกณโต คฬนฺติ. อนุวาตํ ปริภณฺฑนฺติ อนุวาตญฺเจว ปริภณฺฑญฺจ. ปตฺตา ลุชฺชนฺตีติ มหนฺเตสุ ปตฺตมุเขสุ ทินฺนานิ สุตฺตานิ คฬนฺติ, ตโต ปตฺตา ลุชฺชนฺติ. อฏฺฐปทกํ กาตุนฺติ อฏฺฐปทกจฺฉนฺเนน ปตฺตมุขํ สิพฺพิตุํ. ३५९. ‘पंसुकूलकतो’ म्हणजे पांसुकूल केलेले. ‘गरुको होति’ म्हणजे जीर्ण झालेल्या ठिकाणी ठिगळ लावल्यामुळे जड होणे. ‘सुत्तलूखं कातुं’ म्हणजे केवळ सुतानेच ठिगळ लावणे असा अर्थ आहे. ‘विकण्णो होति’ म्हणजे सूत ओढून-ओढून शिवणाऱ्यांचे संघातीचे एक टोक लांब होते. ‘विकण्णं उद्धरितुं’ म्हणजे लांब झालेले टोक कापून टाकणे. ‘ओकिरियन्ति’ म्हणजे कापलेल्या टोकातून सूत गळणे. ‘अनुवातं परिभण्डं’ म्हणजे अनुवात (लांबीची किनार) आणि परिभंड (रुंदीची किनार). ‘पत्ता लुज्जन्ति’ म्हणजे मोठ्या किनाऱ्यांच्या टोकांवर दिलेले सूत गळते, त्यामुळे किनाऱ्या खराब होतात. ‘अट्ठपदकं कातुं’ म्हणजे आठ कप्प्यांच्या (बुद्धिबळाच्या पटासारख्या) रचनेने किनाऱ्याचे टोक शिवणे. ๓๖๐. อนฺวาธิกมฺปิ อาโรเปตุนฺติ อาคนฺตุกปตฺตมฺปิ ทาตุํ. อิทํ ปน อปฺปโหนเก อาโรเปตพฺพํ. สเจ ปโหติ, อาคนฺตุกปตฺตํ น วฏฺฏติ, ฉินฺทิตพฺพเมว. ३६०. ‘अन्वाधिकम्पि आरोपेतुं’ म्हणजे अतिरिक्त (आगंतुक) पट्टी लावणे. परंतु हे अपुऱ्या पडणाऱ्या चीवरात लावले पाहिजे. जर चीवर पुरेसे असेल, तर अतिरिक्त पट्टी लावणे योग्य नाही, ती कापूनच टाकली पाहिजे. ๓๖๑. น จ ภิกฺขเว สทฺธาเทยฺยนฺติ เอตฺถ เสสญาตีนํ เทนฺโต วินิปาเตติเยว. มาตาปิตโร ปน สเจ รชฺเช ฐิตา ปตฺถยนฺติ, ทาตพฺพํ. ३६१. ‘न च भिक्खवे सद्धादेय्यं’ यामध्ये आई-वडिलांशिवाय इतर नातेवाईकांना चीवर देणारा भिक्खू श्रद्धादेयाचा अपव्यय करतो. परंतु आई-वडील जर राज्यावर (वैभवात) असले तरीही त्यांनी इच्छा व्यक्त केल्यास त्यांना दिले पाहिजे. ๓๖๒. คิลาโนติ [Pg.411] คิลานตาย คเหตฺวา คนฺตุํ อสมตฺโถ. วสฺสิกสงฺเกตนฺติ วสฺสิเก จตฺตาโร มาเส. นทีปารนฺติ นทิยา ปาเร ภตฺตํ ภุญฺชิตพฺพํ โหติ. อคฺคฬคุตฺติวิหาโรติ สพฺเพสฺเวว เจเตสุ คิลานวสฺสิกสงฺเกตนทีปารคมนอตฺถตกถินภาเวสุ อคฺคฬคุตฺติเยว ปมาณํ. คุตฺเต เอว หิ วิหาเร เอเตสุ การเณสุ นิกฺขิปิตฺวา พหิ คนฺตุํ วฏฺฏติ, น อคุตฺเต. อารญฺญกสฺส ปน วิหาโร น สุคุตฺโต โหติ, เตน ภณฺฑุกฺขลิกาย ปกฺขิปิตฺวา ปาสาณสุสิร รุกฺขสุสิราทีสุ สุปฺปฏิจฺฉนฺเนสุ ฐเปตฺวา คนฺตพฺพํ. ३६२. "गिलाणो (आजारी)" म्हणजे आजारपणामुळे (चीवर) घेऊन जाण्यास असमर्थ असलेला. "वस्सिकसंकेत" म्हणजे वर्षाऋतूचे चार महिने. "नदीपार" म्हणजे नदीच्या पलीकडे भोजन करावे लागते. "अग्गळगुत्तिविहार" म्हणजे आजारपण, वर्षाऋतूचे संकेत, नदीपलीकडे जाणे आणि कठीण अत्थार (विस्तार) या सर्व प्रसंगी दाराची कडी लावून विहार सुरक्षित करणे हेच प्रमाण आहे. कारण सुरक्षित विहारामध्येच या कारणांमुळे चीवर ठेवून बाहेर जाणे योग्य आहे, असुरक्षित विहारामध्ये नाही. परंतु आरण्यक (अरण्यात राहणाऱ्या) भिक्खूचा विहार चांगला सुरक्षित नसतो, म्हणून त्याने चीवर भांड्यात (पेटीत) ठेवून, दगडाच्या कपारीत किंवा झाडाच्या ढोलीत चांगल्या प्रकारे लपवून ठेवून जावे. สงฺฆิกจีวรุปฺปาทกถา संघिक चीवर उत्पत्ती कथा ๓๖๓. ตุยฺเหว ภิกฺขุ ตานิ จีวรานีติ อญฺญตฺถ คเหตฺวา หฏานิปิ ตุยฺเหว; น เตสํ อญฺโญ โกจิ อิสฺสโรติ. เอวญฺจ ปน วตฺวา อนาคเตปิ นิกฺกุกฺกุจฺจา คณฺหิสฺสนฺตีติ ทสฺเสตุํ อิธ ปนาติอาทิมาห. ตสฺเสว ตานิ จีวรานิ ยาว กถินสฺส อุพฺภาราติ สเจ คณปูรเก ภิกฺขู ลภิตฺวา กถินํ อตฺถตํ โหติ, ปญฺจมาเส; โน เจ อตฺถตํ โหติ, เอกํ จีวรมาสเมว. ยํ ‘‘สงฺฆสฺส เทมา’’ติ วา เทนฺติ, ‘‘สงฺฆํ อุทฺทิสฺส เทมา’’ติ วา เทนฺติ, ‘‘วสฺสํวุตฺถสงฺฆสฺส เทมา’’ติ วา เทนฺติ, ‘‘วสฺสาวาสิกํ เทมา’’ติ วา เทนฺติ, สเจปิ มตกจีวรํ อวิภชิตฺวา ตํ วิหารํ ปวิสนฺติ, ตํ สพฺพํ ตสฺเสว ภิกฺขุโน โหติ. ยมฺปิ โส วสฺสาวาสตฺถาย วฑฺฒึ ปโยเชตฺวา ฐปิตอุปนิกฺเขปโต วา ตตฺรุปฺปาทโต วา วสฺสาวาสิกํ คณฺหาติ, สพฺพํ สุคฺคหิตเมว โหติ. อิทเมตฺถ ลกฺขณํ, เยน เตนากาเรน สงฺฆสฺส อุปฺปนฺนํ วตฺถํ อตฺถตกถินสฺส ปญฺจมาเส, อนตฺถตกถินสฺส เอกํ จีวรมาสํ ปาปุณาตีติ. ยํ ปน ‘‘อิทํ อิธ วสฺสํวุตฺถสงฺฆสฺส เทมา’’ติ วา ‘‘วสฺสาวาสิกํ เทมา’’ติ วา วตฺวา ทินฺนํ, ตํ อนตฺถตกถินสฺสาปิ ปญฺจมาเส ปาปุณาติ. ตโต ปรํ ปน อุปฺปนฺนํ วสฺสาวาสิกํ ปุจฺฉิตพฺพํ – ‘‘กึ อตีตวสฺเส อิทํ วสฺสาวาสิกํ, อุทาหุ อนาคตวสฺเส’’ติ! กสฺมา? ปิฏฺฐิสมเย อุปฺปนฺนตฺตา. ३६३. "हे भिक्खू, ती चीवरे तुझीच आहेत" याचा अर्थ असा की, जरी ती इतर ठिकाणाहून आणली असली तरी ती तुझीच आहेत; त्यावर इतर कोणत्याही भिक्खूचा अधिकार नाही. असे सांगून, भविष्यातही भिक्खू संकोच न बाळगता ती ग्रहण करतील, हे दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी "इध पन" इत्यादी म्हटले. "कठीण चीवराचा उद्धार होईपर्यंत ती चीवरे त्याचीच राहतात" याचा अर्थ असा की, जर गणपूरक भिक्खू मिळून कठीण अत्थार केला असेल, तर पाच महिने; जर अत्थार केला नसेल, तर केवळ एक चीवर-मास (एक महिना) ती त्याचीच राहतात. जे "आम्ही संघाला देत आहोत" असे म्हणून देतात, किंवा "संघाला उद्देशून देत आहोत" असे म्हणून देतात, किंवा "वर्षावास पूर्ण केलेल्या संघाला देत आहोत" असे म्हणून देतात, किंवा "वर्षावासिक चीवर देत आहोत" असे म्हणून देतात; जरी मृत भिक्खूचे चीवर न वाटता त्या विहारात प्रवेश केला, तरी ते सर्व त्या (एकट्या राहणाऱ्या) भिक्खूचेच होते. आणि जो तो भिक्खू वर्षावासासाठी ठेवलेल्या ठेवीतून किंवा तेथील उत्पन्नातून वर्षावासिक चीवर ग्रहण करतो, ते सर्व योग्य प्रकारे ग्रहण केलेलेच असते. येथे हे लक्षण (नियम) आहे - ज्या कोणत्याही प्रकारे संघासाठी उत्पन्न झालेले वस्त्र, कठीण अत्थार केलेल्या भिक्खूच्या वाट्याला पाच महिने, आणि कठीण अत्थार न केलेल्या भिक्खूच्या वाट्याला एक चीवर-मास मिळते. परंतु जे "हे आम्ही येथे वर्षावास पूर्ण केलेल्या संघाला देत आहोत" किंवा "वर्षावासिक देत आहोत" असे म्हणून दिले जाते, ते कठीण अत्थार न केलेल्या भिक्खूलाही पाच महिने मिळते. त्यानंतर उत्पन्न झालेल्या वर्षावासिक चीवराविषयी विचारले पाहिजे - "हे वर्षावासिक चीवर गेलेल्या वर्षावासातील आहे की येणाऱ्या वर्षावासातील?" का? कारण ते चीवर-मासाच्या नंतरच्या काळात उत्पन्न झाले आहे. อุตุกาลนฺติ วสฺสานโต อญฺญํ กาลํ. ตานิ จีวรานิ อาทาย สาวตฺถึ คนฺตฺวาติ เอตฺถ ตานิ จีวรานิ คตคตฏฺฐาเน สงฺฆิกาเนว โหนฺติ, ภิกฺขูหิ ทิฏฺฐมตฺตเมเวตฺถ ปมาณํ. ตสฺมา สเจ เกจิ ปฏิปถํ อาคจฺฉนฺตา ‘‘กุหึ [Pg.412] อาวุโส คจฺฉสี’’ติ ปุจฺฉิตฺวา ตมตฺถํ สุตฺวา ‘‘กึ อาวุโส มยํ สงฺโฆ น โหมา’’ติ ตตฺเถว ภาเชตฺวา คณฺหนฺติ, สุคฺคหิตานิ. สเจปิ เอส มคฺคา โอกฺกมิตฺวา กญฺจิ วิหารํ วา อาสนสาลํ วา ปิณฺฑาย จรนฺโต เอกํ เคหเมว วา ปวิสติ, ตตฺร จ นํ ภิกฺขู ทิสฺวา ตมตฺถํ ปุจฺฉิตฺวา ภาเชตฺวา คณฺหนฺติ, สุคฺคหิตาเนว. "ऋतूकाळ" म्हणजे वर्षाऋतू व्यतिरिक्त इतर काळ. "ती चीवरे घेऊन सावत्थीला जाणे" यावर असा निर्णय समजून घ्यावा - ती चीवरे ज्या ज्या ठिकाणी नेली जातील, तिथे ती संघिकच राहतात. येथे भिक्खूंनी केवळ पाहणे हेच प्रमाण आहे. म्हणून, जर समोरून येणारे काही भिक्खू "आवुसो, कुठे चालला आहात?" असे विचारून ती हकीकत ऐकतात आणि "आवुसो, काय आम्ही संघ नाही का?" असे म्हणून तिथेच वाटून घेतात, तर ते योग्य प्रकारे ग्रहण केलेले मानले जाईल. जरी तो भिक्खू मार्गावरून बाजूला होऊन एखाद्या विहारात, आसनशाळेत किंवा भिक्षेसाठी फिरताना एखाद्या घरात प्रवेश करतो, आणि तेथे भिक्खू त्याला पाहून ती हकीकत विचारून वाटून घेतात, तर तेही योग्य प्रकारे ग्रहण केलेलेच मानले जाईल. อธิฏฺฐาตุนฺติ เอตฺถ อธิฏฺฐหนฺเตน วตฺตํ ชานิตพฺพํ. เตน หิ ภิกฺขุนา ฆณฺฏึ ปหริตฺวา กาลํ โฆเสตฺวา โถกํ อาคเมตฺวา สเจ ฆณฺฏิสญฺญาย วา กาลสญฺญาย วา ภิกฺขู อาคจฺฉนฺติ, เตหิ สทฺธึ ภาเชตพฺพานิ. โน เจ อาคจฺฉนฺติ, ‘‘มยฺหิมานิ จีวรานิ ปาปุณนฺตี’’ติ อธิฏฺฐาตพฺพานิ. เอวํ อธิฏฺฐิเต สพฺพานิ ตสฺเสว โหนฺติ, ฐิติกา ปน น ติฏฺฐติ. "अधिष्ठान करणे" यावर असा निर्णय समजून घ्यावा - अधिष्ठान करणाऱ्याने नियम (कर्तव्य) जाणले पाहिजे. त्या भिक्खूने घंटा वाजवून, वेळ घोषित करून, थोडी वाट पाहावी. जर घंटेच्या आवाजाने किंवा वेळेच्या माहितीने भिक्खू आले, तर त्यांच्यासोबत वाटणी करावी. जर ते आले नाहीत, तर "ही चीवरे माझ्या वाट्याला येतात" असे म्हणून अधिष्ठान करावे. असे अधिष्ठान केल्यावर सर्व चीवरे त्याचीच होतात, परंतु वाटणीची मर्यादा कायम राहत नाही. สเจ เอเกกํ อุทฺธริตฺวา ‘‘อยํ ปฐมภาโค มยฺหํ ปาปุณาติ, อยํ ทุติยภาโค’’ติ เอวํ คณฺหาติ, คหิตานิ จ สุคฺคหิตานิ โหนฺติ, ฐิติกา จ ติฏฺฐติ. เอวํ ปาเปตฺวา คณฺหนฺเตนาปิ อธิฏฺฐิตเมว โหติ. สเจ ปน ฆณฺฏึ ปหริตฺวา วา อปฺปหริตฺวา วา กาลมฺปิ โฆเสตฺวา วา อโฆเสตฺวา วา ‘‘อหเมเวตฺถ มยฺหเมว อิมานิ จีวรานี’’ติ คณฺหาติ, ทุคฺคหิตานิ โหนฺติ. อถ ‘‘อญฺโญ โกจิ อิธ นตฺถิ, มยฺหํ เอตานิ ปาปุณนฺตี’’ติ คณฺหาติ, สุคฺคหิตานิ. जर तो एकेक चीवर काढून "हा पहिला भाग माझ्या वाट्याला येतो, हा दुसरा भाग माझ्या वाट्याला येतो" अशा प्रकारे ग्रहण करतो, तर ग्रहण केलेली चीवरे योग्य प्रकारे ग्रहण केलेली असतात आणि वाटणीची मर्यादाही कायम राहते. अशा प्रकारे वाटणी करून ग्रहण करणाऱ्याचेही ते अधिष्ठानच असते. परंतु जर घंटा वाजवून किंवा न वाजवता, वेळ घोषित करून किंवा न करता, "येथे मी एकटाच आहे, ही चीवरे माझीच आहेत" असा विचार करून ग्रहण करतो, तर ते अयोग्य प्रकारे ग्रहण केलेले मानले जाईल. आणि जर "येथे दुसरा कोणी नाही, ही मलाच मिळतात" असा विचार करून ग्रहण करतो, तर ते योग्य प्रकारे ग्रहण केलेले मानले जाईल. ปาติเต กุเสติ เอกโกฏฺฐาเส กุสทณฺฑเก ปาติตมตฺเต สเจปิ ภิกฺขุสหสฺสํ โหติ, คหิตเมว นาม จีวรํ. นากามา ภาโค ทาตพฺโพ. สเจ ปน อตฺตโน รุจิยา ทาตุกามา โหนฺติ, เทนฺตุ. อนุภาเคปิ เอเสว นโย. "कुस (शलाका) टाकली असता" म्हणजे एका भागावर शलाका टाकली की, जरी तेथे हजार भिक्खू असले तरी ते चीवर ग्रहण केले गेले असेच मानले जाते. इच्छेविरुद्ध भाग दिला जाऊ नये. परंतु जर ते स्वतःच्या इच्छेने देऊ इच्छित असतील, तर त्यांनी द्यावे. अनुभागाच्या (पुढील वाटणीच्या) बाबतीतही हाच नियम आहे. สจีวรานีติ ‘‘กาลจีวรมฺปิ สงฺฆสฺส อิโตว ทสฺสาม, วิสุํ สชฺชิยมาเน อติจิรํ โหตี’’ติ ขิปฺปํเยว สจีวรานิ ภตฺตานิ อกํสุ. เถเร อาคมฺม อุปฺปนฺนานีติ ตุมฺเหสุ ปสาเทน ขิปฺปํ อุปฺปนฺนานิ. "चीवरासहित" म्हणजे "आम्ही संघाला काल-चीवरही यातूनच देऊ, वेगळे तयार केल्यास खूप वेळ लागेल" असा विचार करून त्यांनी लवकरच चीवरासहित भोजन तयार केले. "स्थविरांना उद्देशून उत्पन्न झालेली" म्हणजे तुमच्यावरील श्रद्धेमुळे ती लवकरच उत्पन्न झाली. สงฺฆสฺส เทมาติ จีวรานิ เทนฺตีติ สกลมฺปิ จีวรกาลํ สณิกํ สณิกํ เทนฺติเยว. ปุริเมสุ ปน ทฺวีสุ วตฺถูสุ ปจฺฉินฺนทานตฺตา อทํสูติ วุตฺตํ. สมฺพหุลา เถราติ วินยธรปาโมกฺขเถรา. อิทํ ปน วตฺถุํ สทฺธึ ปุริเมน ทฺเวภาติกวตฺถุนา ปรินิพฺพุเต ภควติ อุปฺปนฺนํ, อิเม จ เถรา ทิฏฺฐปุพฺพา ตถาคตํ, ตสฺมา ปุริเมสุ วตฺถูสุ ตถาคเตน ปญฺญตฺตนเยเนว กเถสุํ. "आम्ही संघाला देत आहोत" असे म्हणून चीवरे देतात, म्हणजे ते संपूर्ण चीवर-काळात हळूहळू देतच राहतात. परंतु पूर्वीच्या दोन वस्तूंमध्ये (कथांमध्ये) दान पूर्ण झाल्यामुळे "दिले" असे संगीतिकारांनी म्हटले आहे. "अनेक स्थवीर" म्हणजे विनयधर प्रमुख स्थवीर. परंतु ही चौथी कथा पूर्वीच्या दोन भावांच्या कथेसोबत भगवंतांच्या परिनिर्वाणानंतर घडली. आणि या स्थविरांनी पूर्वी तथागतांचे दर्शन घेतले होते. म्हणून त्यांनी पूर्वीच्या वस्तूंमध्ये तथागतांनी प्रज्ञप्त केलेल्या (सांगितलेल्या) नियमांनुसारच सांगितले. อุปนนฺทสกฺยปุตฺตวตฺถุกถา उपनंद शाक्यपुत्र कथा ๓๖๔. คามกาวาสํ [Pg.413] อคมาสีติ อปฺเปว นาม จีวรานิ ภาเชนฺตา มยฺหมฺปิ สงฺคหํ กเรยฺยุนฺติ จีวรภาชนกาลํ สลฺลกฺเขตฺวาว อคมาสิ. สาทิยิสฺสสีติ คณฺหิสฺสสิ. เอตฺถ จ กิญฺจาปิ ตสฺส ภาโค น ปาปุณาติ. อถ โข ‘‘นครวาสิโก อยํ มุขโร ธมฺมกถิโก’’ติ เต ภิกฺขู ‘‘สาทิยิสฺสสี’’ติ อาหํสุ. โย สาทิเยยฺย อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ เอตฺถ ปน กิญฺจาปิ ลหุกา อาปตฺติ, อถ โข คหิตานิ คหิตฏฺฐาเน ทาตพฺพานิ. สเจปิ นฏฺฐานิ วา ชิณฺณานิ วา โหนฺติ, ตสฺเสว คีวา. เทหีติ วุตฺเต อเทนฺโต ธุรนิกฺเขเป ภณฺฑคฺเฆน กาเรตพฺโพ. ३६४. "ग्राम-आवासात गेले" म्हणजे "चीवरे वाटताना कदाचित मलाही काही भाग देतील" असा विचार करून, चीवर वाटपाची वेळ लक्षात ठेवूनच ते गेले. "तू स्वीकारशील का?" म्हणजे तू ग्रहण करशील का? आणि येथे जरी त्यांचा काही भाग येत नव्हता, तरीही "हा नगरात राहणारा, बोलका आणि धर्मकथिक आहे" असा विचार करून त्या भिक्खूंनी "तू स्वीकारशील का?" असे विचारले. "जो स्वीकारेल त्याला दुक्कट आपत्ती होते" येथे जरी ती हलकी आपत्ती असली, तरी घेतलेली चीवरे घेतलेल्या ठिकाणीच परत दिली पाहिजेत. जरी ती हरवली किंवा जीर्ण झाली असली, तरी ती त्याच्याच गळ्यात पडतात (त्यालाच भरपाई द्यावी लागते). "दे" असे म्हटले असता न देणाऱ्या भिक्खूला जबाबदारी टाळल्यामुळे वस्तूच्या मूल्यावरून दंड किंवा प्रायश्चित्त दिले पाहिजे. เอกาธิปฺปายนฺติ เอกํ อธิปฺปายํ; เอกํ ปุคฺคลปฏิวีสเมว เทถาติ อตฺโถ. อิทานิ ยถา โส ทาตพฺโพ, ตํ ทสฺเสตุํ ตนฺตึ ฐเปนฺโต อิธ ปนาติอาทิมาห. ตตฺถ สเจ อมุตฺร อุปฑฺฒํ อมุตฺร อุปฑฺฒนฺติ เอเกกสฺมึ เอกาหเมกาหํ วา สตฺตาหํ สตฺตาหํ วา สเจ วสติ, เอเกกสฺมึ วิหาเร ยํ เอโก ปุคฺคโล ลภติ, ตโต ตโต อุปฑฺฒํ อุปฑฺฒํ ทาตพฺพํ. เอวํ เอกาธิปฺปาโย ทินฺโน โหติ. ยตฺถ วา ปน พหุตรนฺติ สเจ เอกสฺมึ วิหาเร วสนฺโต อิตรสฺมึ สตฺตาหวาเรน อรุณเมว อุฏฺฐาเปติ, เอวํ ปุริมสฺมึ พหุตรํ วสติ นาม. ตสฺมา ตโต พหุตรํ วสิตวิหารโต ตสฺส ปฏิวีโส ทาตพฺโพ. เอวมฺปิ เอกาธิปฺปาโย ทินฺโน โหติ. อิทญฺจ นานาลาเภหิ นานูปจาเรหิ เอกสีมวิหาเรหิ กถิตํ, นานาสีมวิหาเร ปน เสนาสนคฺคาโห ปฏิปฺปสฺสมฺภติ. ตสฺมา ตตฺถ จีวรปฏิวีโส น ปาปุณาติ. เสสํ ปน อามิสเภสชฺชาทิ สพฺพํ สพฺพตฺถ อนฺโตสีมคตสฺส ปาปุณาติ. ‘एकाधिप्पायं’ म्हणजे एकच इच्छा; किंवा ‘एकाच व्यक्तीचा वाटा द्यावा’ असा अर्थ आहे. आता तो कसा दिला जावा, हे दर्शवण्यासाठी पाठाची मांडणी करत भगवंतांनी ‘इध पन’ (इथे पुन्हा) इत्यादी म्हटले आहे. त्यात जर ‘तिथे अर्धा, तिथे अर्धा’ म्हणजे प्रत्येक विहारात एकेक दिवस किंवा सात-सात दिवस जर तो राहतो, तर प्रत्येक विहारात एका व्यक्तीला जो वाटा मिळतो, त्यातून अर्धा-अर्धा वाटा दिला जावा. अशा प्रकारे एकच इच्छा (वाटा) पूर्ण केली जाते. ‘किंवा जिथे जास्त वेळ राहतो’ म्हणजे जर एका विहारात राहत असताना दुसऱ्या विहारात सात दिवसांच्या अंतराने केवळ अरुणोदय घालवतो, तर अशा प्रकारे तो पहिल्या विहारात जास्त काळ राहतो असे म्हटले जाते. म्हणून, त्या जास्त काळ राहिलेल्या विहारातून त्याला वाटा दिला जावा. अशानेही एकच इच्छा (वाटा) पूर्ण होते. आणि हे विविध लाभ आणि विविध उपचारांनी युक्त अशा एकाच सीमेतील विहारांच्या बाबतीत सांगितले आहे. परंतु वेगवेगळ्या सीमा असलेल्या विहारांमध्ये शयनासन ग्रहण करणे रद्द होते. म्हणून तिथे चीवर-वाटा प्राप्त होत नाही. परंतु उर्वरित सर्व आमिष, औषध इत्यादी अंतःसीमेत असलेल्या भिक्खूला सर्वत्र प्राप्त होते. คิลานวตฺถุกถา ग्लानवत्थुकथा ๓๖๕. มญฺจเก นิปาเตสุนฺติ เอวํ โธวิตฺวา อญฺญํ กาสาวํ นิวาเสตฺวา มญฺจเก นิปชฺชาเปสุํ; นิปชฺชาเปตฺวา จ ปนายสฺมา อานนฺโท มุตฺตกรีสกิลิฏฺฐํ กาสาวํ โธวิตฺวา ภูมิยํ ปริภณฺฑํ อกาสิ. โย ภิกฺขเว มํ อุปฏฺฐเหยฺย, โส คิลานํ อุปฏฺฐเหยฺยาติ โย มํ โอวาทานุสาสนีกรเณน อุปฏฺฐเหยฺย, โส คิลานํ อุปฏฺฐเหยฺย; มม โอวาทการเกน คิลาโน อุปฏฺฐาตพฺโพติ อยเมเวตฺถ อตฺโถ. ภควโต จ คิลานสฺส จ อุปฏฺฐานํ เอกสทิสนฺติ เอวํ ปเนตฺถ อตฺโถ น คเหตพฺโพ. สงฺเฆน อุปฏฺฐาตพฺโพติ ยสฺเสเต อุปชฺฌาทโย ตสฺมึ วิหาเร นตฺถิ, อาคนฺตุโก โหติ เอกจาริโก ภิกฺขุ, โส สงฺฆสฺส ภาโร, ตสฺมา สงฺเฆน [Pg.414] อุปฏฺฐาตพฺโพ. โน เจ อุปฏฺฐเหยฺย, สกลสฺส สงฺฆสฺส อาปตฺติ. วารํ ฐเปตฺวา ชคฺคนฺเตสุ ปน โย อตฺตโน วาเร น ชคฺคติ, ตสฺเสว อาปตฺติ. สงฺฆตฺเถโรปิ วารโก น มุจฺจติ. สเจ สกโล สงฺโฆ เอกสฺส ภารํ กโรติ, เอโก วา วตฺตสมฺปนฺโน ภิกฺขุ อหเมว ชคฺคิสฺสามีติ ปฏิชคฺคติ, สงฺโฆ อาปตฺติโต มุจฺจติ. ३६५. ‘मंचावर निजवले’ म्हणजे अशा प्रकारे धुवून, दुसरे काषाय वस्त्र नेसवून मंचावर (खाटेवर) निजवले; आणि निजवल्यानंतर आयुष्यमान आनंदांनी मलमूत्राने माखलेले काषाय वस्त्र धुवून जमिनीवर सारवण केले (स्वच्छ केले). ‘भिक्खूंनो, जो माझी सेवा करेल, त्याने ग्लानाची सेवा करावी’ याचा अर्थ असा की, जो माझ्या उपदेशाचे (ओवाद) व अनुशासनाचे पालन करून माझी सेवा करेल, त्याने ग्लानाची सेवा करावी; माझ्या उपदेशाचे पालन करणाऱ्याने ग्लानाची सेवा करावी, हाच येथे अर्थ आहे. भगवंतांची सेवा आणि ग्लानाची सेवा अगदी एकसमान आहे, असा अर्थ येथे घेऊ नये. ‘संघाने सेवा करावी’ म्हणजे ज्याचे उपाध्याय इत्यादी त्या विहारात नाहीत, जो आगंतुक आणि एकाकी विहार करणारा भिक्खू आहे, तो संघाची जबाबदारी आहे, म्हणून संघाद्वारे त्याची सेवा केली जावी. जर सेवा केली नाही, तर संपूर्ण संघाला आपत्ती प्राप्त होते. परंतु पाळी ठरवून सेवा करत असताना जो आपल्या पाळीच्या वेळी सेवा करत नाही, त्यालाच आपत्ती प्राप्त होते. संघस्थवीर देखील पाळीतून मुक्त होत नाही. जर संपूर्ण संघ एकाची जबाबदारी घेतो, किंवा एखादा कर्तव्यदक्ष (वत्तसंपन्न) भिक्खू ‘मीच सेवा करीन’ असे म्हणून सेवा करतो, तर संघ आपत्तीतून मुक्त होतो. ๓๖๖. อภิกฺกมนฺตํ วา อภิกฺกมตีติอาทีสุ วฑฺฒนฺตํ วา อาพาธํ ‘‘อิทํ นาม เม ปริภุญฺชนฺตสฺส วฑฺฒติ, อิทํ ปริภุญฺชนฺตสฺส ปริหายติ, อิทํ ปริภุญฺชนฺตสฺส ติฏฺฐตี’’ติ ยถาภูตํ นาวิกโรตีติ เอวมตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. นาลนฺติ น ปติรูโป, น ยุตฺโต อุปฏฺฐาตุํ. เภสชฺชํ สํวิธาตุนฺติ เภสชฺชํ โยเชตุํ อสมตฺโถ โหติ. อามิสนฺตโรติ อามิสํ อสฺส อนฺตรนฺติ อามิสนฺตโร. อนฺตรนฺติ การณํ วุจฺจติ; อามิสการณา ยาคุภตฺตปตฺตจีวรานิ ปตฺเถนฺโต อุปฏฺฐาตีติ อตฺโถ. ३६६. ‘वाढत आहे किंवा कमी होत आहे’ इत्यादी वाक्यांमध्ये, वाढणाऱ्या आजाराविषयी ‘हे सेवन केल्याने माझा आजार वाढतो, हे सेवन केल्याने कमी होतो, हे सेवन केल्याने स्थिर राहतो’ असे जे आहे तसे स्पष्ट न करणे, असा अर्थ समजला पाहिजे. ‘नालं’ म्हणजे सेवा करण्यास अयोग्य, अयोग्य. ‘औषधाची व्यवस्था करणे’ म्हणजे औषध योजना करण्यास असमर्थ असणे. ‘आमिषंतरो’ म्हणजे ज्याच्या मनात आमिष हेच कारण आहे. ‘अंतर’ म्हणजे कारण म्हटले जाते; आमिषाच्या कारणाने पेज, भात, पात्र आणि चीवर यांची इच्छा धरून जो सेवा करतो, असा अर्थ आहे. มตสนฺตกกถา मतसन्तककथा ๓๖๗. กาลงฺกเตติ กาลกิริยาย. คิลานุปฏฺฐากานํ ทาตุนฺติ เอตฺถ อนนฺตรํ วุตฺตาย กมฺมวาจาย ทินฺนมฺปิ อปโลเกตฺวา ทินฺนมฺปิ ทินฺนเมว โหติ, วฏฺฏติ. ३६७. ‘कालङ्कते’ म्हणजे मृत्यू पावल्यावर. ‘ग्लान-सेवकांना देणे’ या संदर्भात, नंतर सांगितलेल्या कम्मवाचेद्वारे दिलेले किंवा अपलोकन करून (परवानगी घेऊन) दिलेले देखील दिलेलेच मानले जाते, ते योग्य आहे. ๓๖๙. ยํ ตตฺถ ลหุภณฺฑํ ยํ ตตฺถ ครุภณฺฑนฺติ เอตฺถ ลหุภณฺฑครุภณฺฑานํ นานากรณํ ปรโต วณฺณยิสฺสาม. คิลานุปฏฺฐากลาเภ ปน อยํ อาทิโต ปฏฺฐาย วินิจฺฉโย – ३६९. ‘जे तिथे लघुभांड (हलकी वस्तू) आहे आणि जे तिथे गुरूभांड (जड वस्तू) आहे’ या संदर्भात, लघुभांड आणि गुरूभांड यांमधील फरक पुढे स्पष्ट करू. परंतु ग्लान-सेवकांना मिळणाऱ्या लाभाच्या बाबतीत सुरुवातीपासूनचा निर्णय असा आहे – สเจ สกเล ภิกฺขุสงฺเฆ อุปฏฺฐหนฺเต กาลํ กโรติ, สพฺเพปิ สามิกา. อถ เอกจฺเจหิ วาเร กเต เอกจฺเจหิ อกเตเยว กาลํ กโรติ, ตตฺถ เอกจฺเจ อาจริยา วทนฺติ – ‘‘สพฺเพปิ อตฺตโน วาเร สมฺปตฺเต กเรยฺยุํ, ตสฺมา สพฺเพปิ สามิโน’’ติ. เอกจฺเจ วทนฺติ – ‘‘เยหิ ชคฺคิโต เต เอว ลภนฺติ, อิตเร น ลภนฺตี’’ติ. สามเณเร กาลงฺกเต สเจ จีวรํ อตฺถิ, คิลานุปฏฺฐากานํ ทาตพฺพํ. โน เจ อตฺถิ ยํ อตฺถิ, ตํ ทาตพฺพํ. อญฺญสฺมึ ปริกฺขาเร สติ จีวรภาคํ กตฺวา ทาตพฺพํ. जर संपूर्ण भिक्खू संघ सेवा करत असताना तो मृत्यू पावला, तर सर्वच जण मालक ठरतात. जर काहींनी आपली पाळी पूर्ण केली असताना आणि काहींची पाळी येण्यापूर्वीच तो मृत्यू पावला, तर त्याविषयी काही आचार्य म्हणतात – ‘सर्वच जण आपली पाळी आल्यावर सेवा करणारच होते, म्हणून सर्वच जण मालक आहेत.’ काही जण म्हणतात – ‘ज्यांनी सेवा केली आहे, त्यांनाच ते मिळते, इतरांना मिळत नाही.’ सामणेर मृत्यू पावल्यावर जर चीवर असेल, तर ते ग्लान-सेवकांना दिले जावे. जर चीवर नसेल, तर जे काही साहित्य असेल, ते दिले जावे. इतर परिष्कार असल्यास, चीवराचा वाटा करून तो दिला जावा. ภิกฺขุ [Pg.415] จ สามเณโร จ สเจ สมํ อุปฏฺฐหึสุ, สมโก ภาโค ทาตพฺโพ. อถ สามเณโรว อุปฏฺฐหติ, ภิกฺขุสฺส สํวิทหนมตฺตเมว โหติ, สามเณรสฺส เชฏฺฐกภาโค ทาตพฺโพ. สเจ สามเณโร ภิกฺขุนา อานีตอุทเกน ยาคุํ ปจิตฺวา ปฏิคฺคาหาปนมตฺตเมว กโรติ, ภิกฺขุ อุปฏฺฐหติ, ภิกฺขุสฺส เชฏฺฐกภาโค ทาตพฺโพ. जर भिक्खू आणि सामणेर दोघांनी समान सेवा केली असेल, तर समान वाटा दिला जावा. जर केवळ सामणेरच सेवा करतो आणि भिक्खूचे केवळ नियोजन असते, तर सामणेराला मोठा वाटा दिला जावा. जर सामणेर भिक्खूने आणलेल्या पाण्याने पेज शिजवून ती केवळ स्वीकारायला लावतो आणि भिक्खू सेवा करतो, तर भिक्खूला मोठा वाटा दिला जावा. พหู ภิกฺขู สมคฺคา หุตฺวา อุปฏฺฐหนฺติ, สพฺเพสํ สมโก ภาโค ทาตพฺโพ. โย ปเนตฺถ วิเสเสน อุปฏฺฐหติ, ตสฺส วิเสโส กาตพฺโพ. เยน ปน เอกทิวสมฺปิ คิลานุปฏฺฐากวเสน ยาคุภตฺตํ วา ปจิตฺวา ทินฺนํ, นหานํ วา ปฏิยาทิตํ, โสปิ คิลานุปฏฺฐาโกว. โย สมีปํ อนาคนฺตฺวา เภสชฺชตณฺฑุลาทีนิ เปเสติ, อยํ คิลานุปฏฺฐาโก น โหติ. โย ปริเยสิตฺวา คาหาเปตฺวา อาคจฺฉติ, อยํ คิลานุปฏฺฐาโกว. जर अनेक भिक्खू एकत्र येऊन सेवा करतात, तर सर्वांना समान वाटा दिला जावा. परंतु जो यात विशेष सेवा करतो, त्याला विशेष वाटा दिला जावा. ज्याने एक दिवस देखील ग्लान-सेवक म्हणून पेज किंवा भात शिजवून दिला आहे, किंवा स्नानाची व्यवस्था केली आहे, तो देखील ग्लान-सेवकच आहे. जो जवळ न येता केवळ औषध, तांदूळ इत्यादी पाठवतो, तो ग्लान-सेवक होत नाही. जो शोध घेऊन, साहित्य मिळवून स्वतः येतो, तो ग्लान-सेवकच आहे. เอโก วตฺตสีเสน ชคฺคติ; เอโก ปจฺจาสาย, มตกาเล อุโภปิ ปจฺจาสีสนฺติ, อุภินฺนมฺปิ ทาตพฺพํ. เอโก อุปฏฺฐหิตฺวา คิลานสฺส วา กมฺเมน อตฺตโน วา กมฺเมน กตฺถจิ คโต ‘‘ปุน อาคนฺตฺวา ชคฺคิสฺสามี’’ติ, เอตสฺสปิ ทาตพฺพํ. เอโก จิรํ อุปฏฺฐหิตฺวา ‘‘อิทานิ น สกฺโกมี’’ติ ธุรํ นิกฺขิปิตฺวา คจฺฉติ, สเจปิ ตํทิวสเมว คิลาโน กาลํกโรติ, อุปฏฺฐากภาโค น ทาตพฺโพ. एक जण कर्तव्यापोटी सेवा करतो; दुसरा आशेने सेवा करतो. मृत्यूच्या वेळी जर दोघेही वाटा मिळण्याची आशा धरतात, तर दोघांनाही दिला जावा. एक जण सेवा करून ग्लानाच्या कामासाठी किंवा स्वतःच्या कामासाठी कुठे गेला आहे आणि ‘पुन्हा येऊन सेवा करीन’ असा विचार करून गेला आहे, तर त्यालाही दिला जावा. एक जण दीर्घकाळ सेवा करून ‘आता मी करू शकत नाही’ असे म्हणून प्रयत्न सोडून निघून जातो, आणि जर त्याच दिवशी ग्लान मृत्यू पावला, तरीही त्याला सेवकाचा वाटा दिला जाऊ नये. คิลานุปฏฺฐาโก นาม คิหิ วา โหตุ ปพฺพชิโต วา, อนฺตมโส มาตุคาโมปิ, สพฺเพ ภาคํ ลภนฺติ. สเจ ตสฺส ภิกฺขุโน ปตฺตจีวรมตฺตเมว โหติ, อญฺญํ นตฺถิ; สพฺพํ คิลานุปฏฺฐากานํเยว ทาตพฺพํ. สเจปิ สหสฺสํ อคฺฆติ, อญฺญํ ปน พหุมฺปิ ปริกฺขารํ เต น ลภนฺติ; สงฺฆสฺเสว โหติ. อวเสสํ ภณฺฑํ พหุกญฺเจว มหคฺฆญฺจ, ติจีวรํ อปฺปคฺฆํ; ตโต คเหตฺวา ติจีวรปริกฺขาโร ทาตพฺโพ. สพฺพญฺเจตํ สงฺฆิกโตว ลพฺภติ. ग्लान-सेवक गृहस्थ असो वा प्रव्रजित, अगदी स्त्री जरी असली, तरी सर्वांना वाटा मिळतो. जर त्या भिक्खूचे केवळ पात्र आणि चीवरच असेल, इतर काही नसेल, तर ते सर्व ग्लान-सेवकांनाच दिले जावे. जरी त्याची किंमत एक हजार असली तरीही. परंतु इतर पुष्कळ परिष्कार त्यांना मिळत नाही; तो संघाचाच होतो. जर उर्वरित साहित्य पुष्कळ आणि मौल्यवान असेल, आणि त्रिचीवर कमी मूल्याचे असेल, तर त्यातून घेऊन त्रिचीवराचा परिष्कार दिला जावा. आणि हे सर्व संघाच्या मालकीतूनच मिळते. สเจ ปน โส ชีวมาโนเยว สพฺพํ อตฺตโน ปริกฺขารํ นิสฺสชฺชิตฺวา กสฺสจิ อทาสิ, โกจิ วา วิสฺสาสํ อคฺคเหสิ, ยสฺส ทินฺนํ, เยน จ คหิตํ, ตสฺเสว โหติ. ตสฺส รุจิยา เอว คิลานุปฏฺฐากา ลภนฺติ, อญฺเญสํ อทตฺวา ทูเร ฐปิตปริกฺขาราปิ ตตฺถ ตตฺถ สงฺฆสฺเสว โหนฺติ. ทฺวินฺนํ สนฺตกํ โหติ อวิภตฺตํ, เอกสฺมึ กาลงฺกเต อิตโร สามี[Pg.416]. พหูนมฺปิ สนฺตเก เอเสว นโย. สพฺเพสุ มเตสุ สงฺฆิกํ โหติ. สเจปิ อวิภชิตฺวา สทฺธิวิหาริกาทีนํ เทนฺติ อทินฺนเมว โหติ. วิภชิตฺวา ทินฺนํ ปน สุทินฺนํ. ตํ เตสุ มเตสุปิ สทฺธิวิหาริกาทีนํเยว โหติ, น สงฺฆสฺส. परंतु, जर तो भिक्षू जिवंत असतानाच आपले सर्व परिष्कार सोडून कोणाला देत असेल, किंवा कोणी विश्वासाने ते घेतले असेल, तर ज्याला दिले आहे किंवा ज्याने घेतले आहे, त्याचेच ते होते. त्याच्या इच्छेनुसारच ग्लानोपस्थापक ते मिळवतात. इतरांना न देता दूर ठेवलेले परिष्कार देखील त्या त्या विहारात संघाचेच होतात. जर दोघांची सामायिक मालमत्ता अविभक्त असेल, तर एकाचा काळ झाल्यावर दुसरा त्याचा मालक होतो. अनेकांच्या सामायिक मालमत्तेच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. सर्व जण मृत झाल्यावर ती सांघिक होते. जर न वाटता सद्धिविहारिकादींना दिले, तरी ते न दिल्यासारखेच होते. परंतु वाटून दिलेले नीट दिलेले होते. ते मालक मृत झाल्यावरही सद्धिविहारिकांचेच होते, संघाचे नाही. กุสจีราทิปฏิกฺเขปกถา कुसचीर इत्यादींच्या निषेधाची कथा. ๓๗๑. กุสจีราทีสุ อกฺกนาฬนฺติ อกฺกนาฬมยํ. โปตฺถโกติ มกจิมโย วุจฺจติ. เสสานิ ปฐมปาราชิกวณฺณนายํ วุตฺตานิ. เตสุ โปตฺถเก เอว ทุกฺกฏํ. เสเสสุ ถุลฺลจฺจยานีติ. อกฺกทุสฺสกทลิทุสฺสเอรกทุสฺสานิ ปน โปตฺถกคติกาเนว. ३७१. कुसचीर इत्यादींमध्ये 'अक्कनाळ' म्हणजे मदारच्या धाग्यांपासून बनवलेले वस्त्र. 'पोत्थक' म्हणजे तागाच्या धाग्यांपासून बनवलेले वस्त्र म्हटले जाते. उर्वरित वस्त्रांविषयी पहिल्या पाराजिकाच्या वर्णनात सांगितले आहे. त्यापैकी पोत्थक परिधान केल्यास दुक्कट दोष होतो. उर्वरित वस्त्रांच्या बाबतीत थुल्लच्चय दोष होतो. मदारचे वस्त्र, केळीच्या पानांचे वस्त्र आणि एरका गवताचे वस्त्र हे पोत्थकच्या वर्गातच येतात. ๓๗๒. สพฺพนีลกาทีนิ รชนํ โธวิตฺวา ปุน รชิตฺวา ธาเรตพฺพานิ. น สกฺกา เจ โหนฺติ โธวิตุํ, ปจฺจตฺถรณานิ วา กาตพฺพานิ. ทุปฏฺฏจีวรสฺส วา มชฺเฌ ทาตพฺพานิ. เตสํ วณฺณนานตฺตํ อุปาหนาสุ วุตฺตนยเมว. อจฺฉินฺนทสทีฆทสานิ ทสา ฉินฺทิตฺวา ธาเรตพฺพานิ. กญฺจุกํ ลภิตฺวา ผาเลตฺวา รชิตฺวา ปริภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. เวฐเนปิ เอเสว นโย. ติรีฏกํ ปน รุกฺขฉลฺลิมยํ; ตํ ปาทปุญฺฉนํ กาตุํ วฏฺฏติ. ३७२. पूर्णपणे निळे इत्यादी वस्त्रे रंग धुवून टाकून, पुन्हा रंगवून परिधान करावीत. जर धुणे शक्य नसेल, तर त्यांचे बिछाने करावेत किंवा दुपदरी चीवराच्या मध्ये घालावे. त्यांच्या रंगाच्या विविधतेचा नियम पादत्राणांच्या संदर्भात सांगितल्याप्रमाणेच आहे. न कापलेल्या किंवा लांब दशा असलेली चीवरे दशा कापून परिधान करावीत. कंचुक मिळाल्यास तो फाडून, रंगवून वापरणे योग्य आहे. डोक्याला गुंडाळण्याच्या वस्त्राच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. परंतु 'तिरीटक' म्हणजे झाडाच्या सालीपासून बनवलेले वस्त्र; त्याचा पायपुसणे म्हणून वापर करणे योग्य आहे. ๓๗๔. ปติรูเป คาหเกติ สเจ โกจิ ภิกฺขุ ‘‘อหํ ตสฺส คณฺหามี’’ติ คณฺหาติ, ทาตพฺพนฺติ อตฺโถ. เอวเมเตสุ เตวีสติยา ปุคฺคเลสุ โสฬส ชนา น ลภนฺติ, สตฺต ชนา ลภนฺตีติ. ३७४. 'योग्य स्वीकारणारा' या संदर्भात: जर एखादा भिक्षू 'मी त्याच्यासाठी घेत आहे' असे म्हणून घेतो, तर ते दिले पाहिजे, असा अर्थ आहे. अशा प्रकारे या तेवीस व्यक्तींपैकी सोळा व्यक्तींना मिळत नाही आणि सात व्यक्तींना मिळते. สงฺเฆภินฺเนจีวรุปฺปาทกถา संघ भेद झाल्यावर चीवर उत्पत्तीची कथा. ๓๗๖. สงฺโฆ ภิชฺชตีติ ภิชฺชิตฺวา โกสมฺพกภิกฺขู วิย ทฺเว โกฏฺฐาสา โหนฺติ. เอกสฺมึ ปกฺเขติ เอกสฺมึ โกฏฺฐาเส ทกฺขิโณทกญฺจ คนฺธาทีนิ จ เทนฺติ, เอกสฺมึ จีวรานิ. สงฺฆสฺเสเวตนฺติ สกลสฺส สงฺฆสฺส ทฺวินฺนมฺปิ โกฏฺฐาสานํ เอตํ โหติ, ฆณฺฏึ ปหริตฺวา ทฺวีหิปิ ปกฺเขหิ เอกโต ภาเชตพฺพํ. ปกฺขสฺเสเวตนฺติ เอวํ ทินฺเน ยสฺส โกฏฺฐาสสฺส อุทกํ ทินฺนํ, ตสฺส อุทกเมว โหติ; ยสฺส จีวรํ ทินฺนํ, ตสฺเสว จีวรํ. ยตฺถ ปน ทกฺขิโณทกํ ปมาณํ โหติ, ตตฺถ เอโก ปกฺโข ทกฺขิโณทกสฺส [Pg.417] ลทฺธตฺตา จีวรานิ ลภติ, เอโก จีวรานเมว ลทฺธตฺตาติ อุโภหิปิ เอกโต หุตฺวา ยถาวุฑฺฒํ ภาเชตพฺพํ. อิทํ กิร ปรสมุทฺเท ลกฺขณนฺติ มหาอฏฺฐกถายํ วุตฺตํ. ตสฺมึเยว ปกฺเขติ เอตฺถ ปน อิตโร ปกฺโข อนิสฺสโรเยว. จีวรเปสนวตฺถูนิ ปากฏาเนว. ३७६. संघ भेद होतो म्हणजे भेद होऊन कौसाम्बीच्या भिक्षूंप्रमाणे दोन गट होतात. 'एका पक्षात' म्हणजे एका गटाला दानोदक आणि सुगंधी द्रव्ये इत्यादी देतात, आणि दुसऱ्या गटाला चीवरे देतात. 'संघाचेच हे आहे' याचा अर्थ हे संपूर्ण संघाचे म्हणजेच दोन्ही गटांचे सामायिक असते; घंटा वाजवून दोन्ही पक्षांनी एकत्र येऊन त्याचे वाटप करावे. 'पक्षाचेच हे आहे' याचा अर्थ असे दिले असता, ज्या गटाला पाणी दिले आहे, त्यांचे पाणीच होते; ज्याला चीवर दिले आहे, त्याचेच चीवर होते. परंतु जेथे दानोदक हेच प्रमाण मानले जाते, तेथे एका पक्षाला दानोदक मिळाल्यामुळे चीवरे मिळतात, आणि दुसऱ्या पक्षाला चीवरेच मिळाल्यामुळे चीवरे मिळतात. म्हणून दोन्ही पक्षांनी एकत्र येऊन ज्येष्ठतेनुसार वाटप करावे. हे लक्षण महासमुद्राच्या पलीकडे पाळले जाते, असे महाअट्ठकथेत म्हटले आहे. 'त्याच पक्षात' या संदर्भात दुसरा पक्ष त्यावर अधिकार नसलेलाच असतो. चीवर पाठवण्याच्या बाबी स्पष्टच आहेत. อฏฺฐจีวรมาติกากถา आठ चीवर मातृकांची कथा. ๓๗๙. อิทานิ อาทิโต ปฏฺฐาย วุตฺตจีวรานํ ปฏิลาภเขตฺตํ ทสฺเสตุํ ‘‘อฏฺฐิมา ภิกฺขเว มาติกา’’ติอาทิมาห. สีมาย เทตีติอาทิ ปุคฺคลาธิฏฺฐานนเยน วุตฺตํ. เอตฺถ ปน สีมาย ทานํ เอกา มาติกา, กติกาย ทานํ ทุติยา…เป… ปุคฺคลสฺส ทานํ อฏฺฐมา. ตตฺถ สีมาย ทมฺมีติ เอวํ สีมํ ปรามสิตฺวา เทนฺโต สีมาย เทติ นาม. เอส นโย สพฺพตฺถ. ३७९. आता सुरुवातीपासून सांगितलेल्या चीवरांच्या प्राप्तीचे क्षेत्र दाखवण्यासाठी भगवंतांनी 'भिक्षूंनो, या आठ मातृका आहेत' इत्यादी म्हटले आहे. 'सीमेला देतो' इत्यादी पुद्गलाधिष्ठान पद्धतीने सांगितले आहे. येथे सीमेला दान देणे ही पहिली मातृका आहे, कराराला देणे ही दुसरी... आणि व्यक्तीला देणे ही आठवी मातृका आहे. त्यापैकी 'मी सीमेला देतो' असे सीमेचा उल्लेख करून देणारा 'सीमेला देतो' असे म्हटले जाते. हाच नियम सर्वत्र लागू होतो. สีมาย เทติ, ยาวติกา ภิกฺขู อนฺโตสีมคตา เตหิ ภาเชตพฺพนฺติอาทิมฺหิ ปน มาติกานิทฺเทเส สีมาย เทตีติ เอตฺถ ตาว ขณฺฑสีมา, อุปจารสีมา, สมานสํวาสสีมา, อวิปฺปวาสสีมา, ลาภสีมา, คามสีมา, นิคมสีมา, นครสีมา, อพฺภนฺตรสีมา, อุทกุกฺเขปสีมา, ชนปทสีมา, รฏฺฐสีมา, รชฺชสีมา, ทีปสีมา, จกฺกวาฬสีมาติ ปนฺนรส สีมา เวทิตพฺพา. 'सीमेला देतो, सीमेच्या आत जितके भिक्षू आहेत त्यांनी ते वाटून घ्यावे' इत्यादी मातृकांच्या स्पष्टीकरणात, 'सीमेला देतो' या संदर्भात प्रथम: खंडसीमा, उपचारसीमा, समानसंवाससीमा, अविप्पवाससीमा, लाभसीमा, gramसीमा, निगमसीमा, नगरसीमा, अभ्यंतरसीमा, उदकुक्खेपसीमा, जनपदसीमा, राष्ट्रसीमा, राज्यसीमा, द्वीपसीमा आणि चक्रवाळसीमा अशा पंधरा सीमा समजाव्यात. ตตฺถ ขณฺฑสีมา สีมากถายํ วุตฺตาว. อุปจารสีมา ปริกฺขิตฺตสฺส วิหารสฺส ปริกฺเขเปน อปริกฺขิตฺตสฺส ปริกฺเขปารหฏฺฐาเนน ปริจฺฉินฺนา โหติ. อปิจ ภิกฺขูนํ ธุวสนฺนิปาตฏฺฐานโต วา ปริยนฺเต ฐิตโภชนสาลโต วา นิพทฺธวสนกอาวาสโต วา ถามมชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส ทฺวินฺนํ เลฑฺฑุปาตานํ อนฺโต อุปจารสีมา เวทิตพฺพา, สา ปน อาวาเสสุ วฑฺฒนฺเตสุ วฑฺฒติ, ปริหายนฺเตสุ ปริหายติ. มหาปจฺจริยํ ปน ‘‘ภิกฺขูสุปิ วฑฺฒนฺเตสุ วฑฺฒตี’’ติ วุตฺตํ. ตสฺมา สเจ วิหาเร สนฺนิปติตภิกฺขูหิ สทฺธึ เอกาพทฺธา หุตฺวา โยชนสตมฺปิ ปูเรตฺวา นิสีทนฺติ, โยชนสตมฺปิ อุปจารสีมาว โหติ, สพฺเพสํ ลาโภ ปาปุณาติ. สมานสํวาสอวิปฺปวาสสีมาทฺวยมฺปิ วุตฺตเมว. त्यापैकी खंडसीमा ही सीमाकथेत सांगितलीच आहे. उपचारसीमा ही कुंपण असलेल्या विहाराच्या कुंपणाने आणि कुंपण नसलेल्या विहाराच्या कुंपण घालण्यायोग्य जागेने मर्यादित असते. शिवाय, भिक्षूंच्या नियमित एकत्र येण्याच्या ठिकाणापासून, किंवा विहाराच्या टोकाला असलेल्या भोजनशाळेपासून, किंवा त्यांच्या नियमित राहण्याच्या आवासापासून, मध्यम शक्तीच्या माणसाने दोनदा ढेकूळ फेकण्याच्या अंतराच्या आतली जागा ही उपचारसीमा समजावी. ती आवासी वाढल्यास वाढते आणि कमी झाल्यास कमी होते. परंतु महापंचरी अट्ठकथेत 'भिक्षूंची संख्या वाढल्यास ती वाढते' असे म्हटले आहे. म्हणून, जर विहारात जमलेल्या भिक्षूंसह सलगपणे शंभर योजने व्यापून भिक्षू बसले, तर शंभर योजने देखील उपचारसीमाच होते आणि सर्वांना लाभ मिळतो. समानसंवास आणि अविप्पवास या दोन्ही सीमांविषयी आधीच सांगितले आहे. ลาภสีมา [Pg.418] นาม เนว สมฺมาสมฺพุทฺเธน อนุญฺญาตา, น ธมฺมสงฺคาหกตฺเถเรหิ ฐปิตา; อปิจ โข ราชราชมหามตฺตา วิหารํ กาเรตฺวา คาวุตํ วา อฑฺฒโยชนํ วา โยชนํ วา สมนฺตโต ปริจฺฉินฺทิตฺวา ‘‘อยํ อมฺหากํ วิหารสฺส ลาภสีมา’’ติ นามลิขิตเก ถมฺเภ นิขณิตฺวา ‘‘ยํ เอตฺถนฺตเร อุปฺปชฺชติ, สพฺพํ ตํ อมฺหากํ วิหารสฺส เทมา’’ติ สีมํ ฐเปนฺติ, อยํ ลาภสีมา นาม. คามนิคมนครอพฺภนฺตรอุทกุกฺเขปสีมาปิ วุตฺตา เอว. ชนปทสีมา นาม – กาสิโกสลรฏฺฐาทีนํ อนฺโต พหู ชนปทา โหนฺติ, ตตฺถ เอเกโก ชนปทปริจฺเฉโท ชนปทสีมา. รฏฺฐสีมา นาม กาสิโกสลาทิรฏฺฐปริจฺเฉโท. รชฺชสีมา นาม ‘‘โจฬโภโค เกรฬโภโค’’ติ เอวํ เอเกกสฺส รญฺโญ อาณาปวตฺติฏฺฐานํ. ทีปสีมา นาม สมุทฺทนฺเตน ปริจฺฉินฺนมหาทีปา จ อนฺตรทีปา จ. จกฺกวาฬสีมา นาม จกฺกวาฬปพฺพเตเนว ปริจฺฉินฺนา. लाभसीमा ही सम्यक्संबुद्धांनी अनुमत केलेली नाही आणि धर्मसंगीतकार थेरांनीही प्रस्थापित केलेली नाही. परंतु राजे आणि राजांचे महामात्य विहार बांधून, विहाराच्या सभोवताली एक गाऊत, अर्धा योजन किंवा एक योजन क्षेत्र मर्यादित करून, 'ही आमच्या विहाराची लाभसीमा आहे' असे नाव कोरलेले खांब रोवून, 'या मर्यादेच्या आत जे काही उत्पन्न होईल, ते सर्व आम्ही आमच्या विहाराला दान करतो' अशी सीमा ठरवतात, याला लाभसीमा म्हणतात. ग्रामसीमा, निगमसीमा, नगरसीमा, अभ्यंतरसीमा आणि उदकुक्खेपसीमा या देखील सांगितल्याच आहेत. जनपदसीमा म्हणजे - काशी, कोसल इत्यादी राष्ट्रांच्या आत अनेक जनपद असतात, त्यापैकी प्रत्येक जनपदाची सीमा ही जनपदसीमा होय. राष्ट्रसीमा म्हणजे काशी, कोसल इत्यादी राष्ट्रांची सीमा होय. राज्यसीमा म्हणजे 'चोळ साम्राज्य, केरळ साम्राज्य' याप्रमाणे प्रत्येक राजाच्या आज्ञेचे क्षेत्र होय. द्वीपसीमा म्हणजे समुद्राने वेढलेले महाद्वीप आणि अंतरीप होत. चक्रवाळसीमा म्हणजे चक्रवाळ पर्वतानेच मर्यादित केलेले क्षेत्र होय. เอวเมตาสุ สีมาสุ ขณฺฑสีมาย เกนจิ กมฺเมน สนฺนิปติตํ สงฺฆํ ทิสฺวา ‘‘เอตฺเถว สีมาย สงฺฆสฺส เทมี’’ติ วุตฺเต ยาวติกา ภิกฺขู อนฺโตขณฺฑสีมคตา, เตหิ ภาเชตพฺพํ. เตสํเยว หิ ตํ ปาปุณาติ. อญฺเญสํ สีมนฺตริกาย วา อุปจารสีมาย วา ฐิตานมฺปิ น ปาปุณาติ. ขณฺฑสีมาย ฐิเต ปน รุกฺเข วา ปพฺพเต วา ฐิตสฺส เหฏฺฐา วา ปถวีเวมชฺฌคตสฺส ปาปุณาติเยว. ‘‘อิมิสฺสา อุปจารสีมาย สงฺฆสฺส ทมฺมี’’ติ ทินฺนํ ปน ขณฺฑสีมาสีมนฺตริกาสุ ฐิตานมฺปิ ปาปุณาติ. ‘‘สมานสํวาสสีมาย ทมฺมี’’ติ ทินฺนํ ปน ขณฺฑสีมาสีมนฺตริกาสุ ฐิตานํ น ปาปุณาติ. อวิปฺปวาสสีมาลาภสีมาสุ ทินฺนํ ตาสุ สีมาสุ อนฺโตคตานํ ปาปุณาติ. คามสีมาทีสุ ทินฺนํ ตาสํ สีมานํ อพฺภนฺตเร พทฺธสีมาย ฐิตานมฺปิ ปาปุณาติ. อพฺภนฺตรสีมาอุทกุกฺเขปสีมาสุ ทินฺนํ ตตฺถ อนฺโตคตานํเยว ปาปุณาติ. ชนปทรฏฺฐรชฺชทีปจกฺกวาฬสีมาสุปิ คามสีมาทีสุ วุตฺตสทิโสเยว วินิจฺฉโย. अशा प्रकारे या सीमांमध्ये, खंडसीमेमध्ये कोणत्यातरी कर्मासाठी एकत्रित आलेल्या संघाला पाहून, 'याच सीमेमध्ये मी संघाला दान देतो' असे म्हटले असता, जितके भिक्खू खंडसीमेच्या आत आलेले असतात, त्यांनीच ते वाटून घेतले पाहिजे. कारण ते दान केवळ त्याच भिक्खूंना प्राप्त होते. इतर जे सीमंतरीकेमध्ये किंवा उपचारसीमेमध्ये उभे आहेत, त्यांना ते प्राप्त होत नाही. परंतु, खंडसीमेमध्ये असलेल्या झाडावर किंवा पर्वतावर असलेल्या भिक्खूला, किंवा खाली जमिनीच्या आत असलेल्या भिक्खूला देखील ते नक्कीच प्राप्त होते. 'या उपचारसीमेतील संघाला मी दान देतो' असे म्हणून दिलेले दान मात्र खंडसीमा आणि सीमंतरीकेमध्ये असलेल्या भिक्खूंना देखील प्राप्त होते. परंतु, 'समानसंवास सीमेला मी दान देतो' असे म्हणून दिलेले दान खंडसीमा आणि सीमंतरीकेमध्ये असलेल्या भिक्खूंना प्राप्त होत नाही. अविप्पवास सीमा आणि लाभसीमेमध्ये दिलेले दान त्या सीमांच्या आत असलेल्या भिक्खूंना प्राप्त होते. ग्रामसीमा इत्यादींमध्ये दिलेले दान त्या सीमांच्या आत असलेल्या बद्धसीमेमध्ये राहिलेल्या भिक्खूंना देखील प्राप्त होते. अब्भंतरसीमा आणि उदकुक्खेपसीमेमध्ये दिलेले दान तेथे केवळ आत असलेल्या भिक्खूंनाच प्राप्त होते. जनपद, राष्ट्र, राज्य, द्वीप आणि चक्रवाळ सीमांमध्ये देखील ग्रामसीमा इत्यादींच्या बाबतीत सांगितल्याप्रमाणेच निर्णय समजावा. สเจ ปน ชมฺพุทีเป ฐิโต ‘‘ตมฺพปณฺณิทีเป สงฺฆสฺส ทมฺมี’’ติ เทติ, ตมฺพปณฺณิทีปโต เอโกปิ คนฺตฺวา สพฺเพสํ คณฺหิตุํ ลภติ. สเจปิ ตตฺเรว เอโก สภาคภิกฺขุ สภาคานํ ภาคํ คณฺหาติ, น วาเรตพฺโพ. เอวํ ตาว โย สีมํ ปรามสิตฺวา เทติ, ตสฺส ทาเน วินิจฺฉโย เวทิตพฺโพ. परंतु, जर जम्बुद्वीपात असलेला एखादा दाता 'मी तांबपण्णिद्वीपातील संघाला दान देतो' असे म्हणून दान देतो, तर तांबपण्णिद्वीपातून एक जरी भिक्खू जाऊन सर्वांच्या वतीने ते ग्रहण करू शकतो. जर तेथेच असलेला एखादा सभागभिक्खू तांबपण्णिद्वीपातील सभागभिक्खूंच्या वाट्याचा भाग ग्रहण करत असेल, तर त्याला रोखले जाऊ नये. अशा प्रकारे, जो दाता सीमेचा उल्लेख करून दान देतो, त्याच्या दानाच्या बाबतीत हा निर्णय समजावा. โย [Pg.419] ปน อสุกสีมายาติ วตฺตุํ น ชานาติ, เกวลํ สีมาติ วจนมตฺตเมว ชานนฺโต วิหารํ คนฺตฺวา ‘‘สีมาย ทมฺมี’’ติ วา ‘‘สีมฏฺฐกสงฺฆสฺส ทมฺมี’’ติ วา ภณติ, โส ปุจฺฉิตพฺโพ – ‘‘สีมา นาม พหุวิธา, กตรสีมํ สนฺธาย ภณสี’’ติ? สเจ วทติ – ‘‘อหํ อสุกสีมาติ น ชานามิ, สีมฏฺฐกสงฺโฆ ภาเชตฺวา คณฺหาตู’’ติ กตรสีมาย ภาเชตพฺพํ? มหาสีวตฺเถโร กิราห – ‘‘อวิปฺปวาสสีมายา’’ติ. ตโต นํ อาหํสุ – ‘‘อวิปฺปวาสสีมา นาม ติโยชนาปิ โหติ, เอวํ สนฺเต ติโยชเน ฐิตา ลาภํ คณฺหิสฺสนฺติ, ติโยชเน ฐตฺวา อาคนฺตุกวตฺตํ ปูเรตฺวา อารามํ ปวิสิตพฺพํ ภวิสฺสติ, คมิโก ติโยชนํ คนฺตฺวา เสนาสนํ อาปุจฺฉิสฺสติ, นิสฺสยปฏิปนฺนสฺส ติโยชนาติกฺกเม นิสฺสโย ปฏิปฺปสฺสมฺภิสฺสติ, ปาริวาสิเกน ติโยชนํ อติกฺกมิตฺวา อรุณํ อุฏฺฐาเปตพฺพํ ภวิสฺสติ, ภิกฺขุนิยา ติโยชเน ฐตฺวา อารามปฺปเวสนํ อาปุจฺฉิตพฺพํ ภวิสฺสติ, สพฺพมฺเปตํ อุปจารสีมาย ปริจฺเฉทวเสเนว กาตุํ วฏฺฏติ. ตสฺมา อุปจารสีมายเมว ภาเชตพฺพ’’นฺติ. परंतु, जो दाता 'अमुक सीमेमध्ये' असे म्हणण्यास जाणत नाही, केवळ 'सीमा' एवढाच शब्द जाणणारा असून विहारात जाऊन 'मी सीमेला दान देतो' किंवा 'मी सीमेत राहणाऱ्या संघाला दान देतो' असे म्हणतो, त्याला विचारले पाहिजे—'सीमा अनेक प्रकारची असते, आपण कोणत्या सीमेचा उद्देश करून बोलत आहात?' जर तो म्हणाला—'मी अमुक सीमा असे जाणत नाही, सीमेत राहणाऱ्या संघानेच ते वाटून घ्यावे,' तर कोणत्या सीमेनुसार ते वाटले पाहिजे? महासीव थेरांनी असे म्हटले आहे की—'अविप्पवास सीमेनुसार.' त्यावर त्यांना इतर थेरांनी म्हटले—'अविप्पवास सीमा ही तीन योजने एवढी मोठी देखील असू शकते. असे असल्यास, तीन योजनेच्या परिघात राहणारे भिक्खू देखील लाभ ग्रहण करतील. तीन योजनेच्या अंतरावर राहून आगंतुक कर्तव्य पूर्ण करून आरामात प्रवेश करावा लागेल. प्रवास करणाऱ्या भिक्खूला तीन योजने जाऊन सेनासनाविषयी विचारपूस करावी लागेल. निस्सय घेऊन राहणाऱ्या भिक्खूचा तीन योजने ओलांडल्यावर निस्सय समाप्त होईल. परिवास करणाऱ्या भिक्खूला तीन योजने ओलांडून अरुणोदय करावा लागेल. भिक्खुणीला तीन योजने अंतरावर राहून आरामात प्रवेश करण्याची परवानगी मागावी लागेल. हे सर्व उपचारसीमेच्या मर्यादेनुसारच करणे योग्य आहे. म्हणून उपचारसीमेमध्येच ते वाटले पाहिजे.' กติกายาติ สมานลาภกติกาย. เตเนวาห – ‘‘สมฺพหุลา อาวาสา สมานลาภา โหนฺตี’’ติ. ตตฺเรวํ กติกา กาตพฺพา, เอกสฺมึ วิหาเร สนฺนิปติเตหิ ภิกฺขูหิ ยํ วิหารํ สงฺคณฺหิตุกามา สมานลาภํ กาตุํ อิจฺฉนฺติ, ตสฺส นามํ คเหตฺวา อสุโก นาม วิหาโร โปราณโกติ วา พุทฺธาธิวุตฺโถติ วา อปฺปลาโภติ วา ยํกิญฺจิ การณํ วตฺวา ตํ วิหารํ อิมินา วิหาเรน สทฺธึ เอกลาภํ กาตุํ สงฺฆสฺส รุจฺจตีติ ติกฺขตฺตุํ สาเวตพฺพํ. เอตฺตาวตา ตสฺมึ วิหาเร นิสินฺโนปิ อิธ นิสินฺโนว โหติ, ตสฺมึ วิหาเรปิ สงฺเฆน เอวเมว กาตพฺพํ. เอตฺตาวตา อิธ นิสินฺโนปิ ตสฺมึ นิสินฺโนว โหติ. เอกสฺมึ ลาเภ ภาชิยมาเน อิตรสฺมึ ฐิตสฺส ภาคํ คเหตุํ วฏฺฏติ. เอวํ เอเกน วิหาเรน สทฺธึ พหูปิ อาวาสา เอกลาภา กาตพฺพา. ‘कतिकाय’ म्हणजे समान लाभ मिळण्याविषयी केलेल्या कराराने (कतिकेने). म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे—‘अनेक आवास समान लाभ असणारे होतात.’ त्या बाबतीत अशी कतिका करावी—एका विहारात एकत्र आलेल्या भिक्खूंनी, ज्या विहाराला साहाय्य करण्याची इच्छा ठेवून समान लाभ असणारा करण्याची इच्छा आहे, त्याचे नाव घेऊन, ‘अमुक नावाचा विहार हा जुना आहे’ किंवा ‘येथे बुद्ध राहिले होते’ किंवा ‘येथे कमी लाभ मिळतो’ असे कोणतेही कारण सांगून, ‘त्या विहाराला या विहारासोबत समान लाभ असणारा करणे संघाला संमत आहे का?’ असे तीन वेळा घोषित करावे. एवढ्या घोषणेने, त्या विहारात बसलेला भिक्खू देखील येथेच बसलेला आहे असे मानले जाते. त्या विहारात देखील संघाने अशाच प्रकारे केले पाहिजे. एवढ्या करण्याने, येथे बसलेला भिक्खू देखील त्या विहारात बसलेला आहे असे मानले जाते. एका विहारात लाभाचे वाटप केले जात असताना, दुसऱ्या विहारात असलेल्या भिक्खूचा भाग ग्रहण करणे योग्य ठरते. अशा प्रकारे, एका विहारासोबत अनेक आवास देखील समान लाभ असणारे केले जाऊ शकतात. ภิกฺขาปญฺญตฺติยาติ อตฺตโน ปริจฺจาคปญฺญาปนฏฺฐาเน. เตเนวาห – ‘‘ยตฺถ สงฺฆสฺส ธุวการา กริยนฺตี’’ติ. ตสฺสตฺโถ – ยสฺมึ วิหาเร อิมสฺส จีวรทายกสฺส สนฺตกํ สงฺฆสฺส ปากวฏฺฏํ วา วตฺตติ, ยสฺมึ วา วิหาเร ภิกฺขู อตฺตโน ภารํ กตฺวา สทา เคเห โภเชติ, ยตฺถ วา [Pg.420] อเนน อาวาโส การิโต, สลากภตฺตาทีนิ วา นิพทฺธานิ, เยน ปน สกโลปิ วิหาโร ปติฏฺฐาปิโต, ตตฺถ วตฺตพฺพเมว นตฺถิ, อิเม ธุวการา นาม. ตสฺมา สเจ โส ‘‘ยตฺถ มยฺหํ ธุวการา กรียนฺติ, ตตฺถ ทมฺมี’’ติ วา ‘‘ตตฺถ เทถา’’ติ วา ภณติ, พหูสุ เจปิ ฐาเนสุ ธุวการา โหนฺติ, สพฺพตฺถ ทินฺนเมว โหติ. ‘भिक्खापञ्ञत्ति’ म्हणजे स्वतःच्या दानाच्या (भोजनाच्या) व्यवस्थेच्या ठिकाणी. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे—‘जिथे संघासाठी ध्रुवकार (नियमित दान) केले जातात.’ त्याचा अर्थ असा समजावा—ज्या विहारात या चीवरदात्याचे स्वतःचे संघासाठी शिजवलेल्या अन्नाची (पाकवट्ट) व्यवस्था चालू असते, किंवा ज्या विहारातील भिक्खूंना स्वतःची जबाबदारी मानून तो नेहमी आपल्या घरी भोजन देतो, किंवा जेथे या दात्याने आवास बांधून दिला आहे, किंवा शलाकाभक्त इत्यादी नियमितपणे सुरू केले आहे, किंवा ज्याने संपूर्ण विहारच स्थापित केला आहे, त्याच्या बाबतीत तर काही बोलण्याची गरजच नाही, या सर्वांना ‘ध्रुवकार’ असे म्हणतात. म्हणून जर तो दाता ‘जिथे माझे ध्रुवकार केले जातात, तेथे मी दान देतो’ किंवा ‘तेथे दान द्या’ असे म्हणतो, आणि जर अनेक ठिकाणी त्याचे ध्रुवकार असतील, तरीही ते सर्व ठिकाणी दिलेले दानच मानले जाते. สเจ ปน เอกสฺมึ วิหาเร ภิกฺขู พหุตรา โหนฺติ, เตหิ วตฺตพฺพํ – ‘‘ตุมฺหากํ ธุวกาเร เอกตฺถ ภิกฺขู พหู เอกตฺถ อปฺปกา’’ติ. สเจ ‘‘ภิกฺขุคณนาย คณฺหถา’’ติ ภณติ, ตถา ภาเชตฺวา คณฺหิตุํ วฏฺฏติ. เอตฺถ จ วตฺถเภสชฺชาทิ อปฺปกมฺปิ สุเขน ภาชิยติ. ยทิ ปน มญฺโจ วา ปีฐกํ วา เอกเมว โหติ, ตํ ปุจฺฉิตฺวา ยสฺส วา วิหารสฺส เอกวิหาเรปิ วา ยสฺส เสนาสนสฺส โส วิจาเรติ, ตตฺถ ทาตพฺพํ. สเจ ‘‘อสุกภิกฺขุ คณฺหาตู’’ติ วทติ, วฏฺฏติ. อถ ‘‘มยฺหํ ธุวกาเร เทถา’’ติ วตฺวา อวิจาเรตฺวาว คจฺฉติ, สงฺฆสฺสาปิ วิจาเรตุํ วฏฺฏติ. เอวํ ปน วิจาเรตพฺพํ – ‘‘สงฺฆตฺเถรสฺส วสนฏฺฐาเน เทถา’’ติ วตฺตพฺพํ. สเจ ตสฺส เสนาสนํ ปริปุณฺณํ โหติ, ยตฺถ นปฺปโหติ, ตตฺถ ทาตพฺพํ. สเจ เอโก ภิกฺขุ ‘‘มยฺหํ วสนฏฺฐาเน เสนาสนปริโภคภณฺฑํ นตฺถี’’ติ วทติ, ตตฺถ ทาตพฺพํ. परंतु, जर एका विहारात भिक्खूंची संख्या जास्त असेल, तर त्यांनी सांगितले पाहिजे—‘आपल्या ध्रुवकार असलेल्या विहारांपैकी एका ठिकाणी भिक्खू जास्त आहेत आणि एका ठिकाणी कमी आहेत.’ जर तो म्हणाला—‘भिक्खूंच्या संख्येनुसार ते ग्रहण करा,’ तर त्याप्रमाणे वाटून घेणे योग्य ठरते. आणि यामध्ये वस्त्र, औषध इत्यादी अल्प प्रमाणात असले तरी सहजपणे वाटले जाऊ शकते. परंतु, जर पलंग किंवा पाट एकच असेल, तर त्याला विचारून, ज्या विहारासाठी किंवा एका विहारातील ज्या सेनासनासाठी तो व्यवस्था करतो, तेथे ते दिले पाहिजे. जर तो म्हणाला—‘अमुक भिक्खूने ते घ्यावे,’ तर ते योग्य ठरते. जर तो ‘माझ्या ध्रुवकार असलेल्या ठिकाणी द्या’ असे म्हणून कोणतीही व्यवस्था न करता निघून गेला, तर संघाने देखील त्यावर विचार करणे योग्य ठरते. आणि अशा प्रकारे विचार केला पाहिजे—‘संघाच्या थेरांच्या राहण्याच्या ठिकाणी द्या’ असे म्हटले पाहिजे. जर त्यांचे सेनासन पूर्णपणे सुसज्ज असेल, तर जेथे अपुरे पडत असेल तेथे दिले पाहिजे. जर एखादा भिक्खू म्हणाला—‘माझ्या राहण्याच्या ठिकाणी सेनासनाचा उपभोग घेण्याचे साहित्य नाही,’ तर तेथे दिले पाहिजे। สงฺฆสฺส เทตีติ วิหารํ ปวิสิตฺวา ‘‘อิมานิ จีวรานิ สงฺฆสฺส ทมฺมี’’ติ เทติ. สมฺมุขีภูเตนาติ อุปจารสีมาย ฐิเตน สงฺเฆน ฆณฺฏึ ปหริตฺวา กาลํ โฆเสตฺวา ภาเชตพฺพํ. สีมฏฺฐสฺส อสมฺปตฺตสฺสาปิ ภาคํ คณฺหนฺโต น วาเรตพฺโพ. วิหาโร มหา โหติ, เถราสนโต ปฏฺฐาย วตฺเถสุ ทิยฺยมาเนสุ อลสชาติกา มหาเถรา ปจฺฉา อาคจฺฉนฺติ, ‘‘ภนฺเต วีสติวสฺสานํ ทิยฺยติ, ตุมฺหากํ ฐิติกา อติกฺกนฺตา’’ติ น วตฺตพฺพา, ฐิติกํ ฐเปตฺวา เตสํ ทตฺวา ปจฺฉา ฐิติกาย ทาตพฺพํ. "संघाला देतो" म्हणजे विहारात प्रवेश करून "ही चीवरे मी संघाला अर्पण करतो" असे म्हणून देणे होय। "संमुख झालेल्या" म्हणजे उपचारसीमेमध्ये उपस्थित असलेल्या संघाने घंटा वाजवून आणि चीवर वाटपाची वेळ घोषित करून वाटप केले पाहिजे। उपचारसीमेच्या आत असलेल्या परंतु वाटपाच्या ठिकाणी न पोहोचलेल्या भिक्खूचा हिस्सा घेणाऱ्या भिक्खूला रोखू नये। विहार मोठा असेल आणि थेरांच्या आसनापासून सुरुवात करून चीवरांचे कापड वाटले जात असताना, आळशी स्वभावाचे महाथेर नंतर आले, तर त्यांना "भंते, वीस वर्षांच्या (दीक्षा असलेल्या) भिक्खूंना वाटप केले जात आहे, आपली पाळी निघून गेली आहे" असे म्हणू नये। वाटपाचा क्रम थांबवून त्यांना चीवर देऊन नंतर क्रमानुसार वाटप करावे। อสุกวิหาเร กิร พหุํ จีวรํ อุปฺปนฺนนฺติ สุตฺวา โยชนนฺตริกวิหารโตปิ ภิกฺขู อาคจฺฉนฺติ, สมฺปตฺตสมฺปตฺตานํ ฐิตฏฺฐานโต ปฏฺฐาย ทาตพฺพํ. อสมฺปตฺตานมฺปิ อุปจารสีมํ ปวิฏฺฐานํ อนฺเตวาสิกาทีสุ คณฺหนฺเตสุ ทาตพฺพเมว. ‘‘พหิอุปจารสีมาย ฐิตานํ เทถา’’ติ วทนฺติ, น ทาตพฺพํ. สเจ ปน อุปจารสีมํ โอกฺกนฺเตหิ เอกาพทฺธา หุตฺวา อตฺตโน วิหารทฺวาเร วา อนฺโตวิหาเรเยว วา โหนฺติ, ปริสวเสน วฑฺฒิตา นาม โหติ สีมา[Pg.421], ตสฺมา ทาตพฺพํ. สงฺฆนวกสฺส ทินฺเนปิ ปจฺฉา อาคตานํ ทาตพฺพเมว. ทุติยภาเค ปน เถราสนํ อารุฬฺเห อาคตานํ ปฐมภาโค น ปาปุณาติ, ทุติยภาคโต วสฺสคฺเคน ทาตพฺพํ. "अमुक विहारात पुष्कळ चीवरे उत्पन्न झाली आहेत" असे ऐकून एक योजन अंतरावरील विहारातूनही भिक्खू येतात। जे जे भिक्खू आले आहेत त्यांना त्यांच्या स्थानानुसार (क्रमानुसार) वाटप करावे। जे अजून वाटपाच्या ठिकाणी पोहोचले नाहीत परंतु उपचारसीमेत प्रवेश केला आहे, त्यांच्यासाठी त्यांचे अंतेवासिक (शिष्य) इत्यादींनी हिस्सा घेतला असता तो दिलाच पाहिजे। "उपचारसीमेच्या बाहेर असलेल्यांना द्या" असे म्हटले तर देऊ नये। परंतु जर उपचारसीमेत प्रवेश केलेल्या भिक्खूंशी सलग जोडले जाऊन स्वतःच्या विहारद्वारावर किंवा विहाराच्या आतच ते असतील, तर परिषदेच्या विस्तारामुळे सीमा वाढली असे मानले जाते, म्हणून त्यांना दिले पाहिजे। संघातील सर्वात कनिष्ठ भिक्खूला दिले गेले असले तरीही, नंतर आलेल्या भिक्खूंना दिलेच पाहिजे। परंतु दुसऱ्या वाटपाच्या वेळी थेरांच्या आसनावर आरूढ झाल्यावर जे नंतर येतात, त्यांना पहिल्या वाटपाचा हिस्सा मिळत नाही। त्यांना दुसऱ्या वाटपातून वर्षांच्या (दीक्षेच्या) क्रमानुसार दिले पाहिजे। เอกสฺมึ วิหาเร ทส ภิกฺขู โหนฺติ, ‘‘ทส วตฺถานิ สงฺฆสฺส เทมา’’ติ เทนฺติ, ปาเฏกฺกํ ภาเชตพฺพานิ. สเจ ‘‘สพฺพาเนว อมฺหากํ ปาปุณนฺตี’’ติ คเหตฺวา คจฺฉนฺติ, ทุปฺปาปิตานิ เจว ทุคฺคหิตานิ จ คตคตฏฺฐาเน สงฺฆิกาเนว โหนฺติ. เอกํ ปน อุทฺธริตฺวา ‘‘อิทํ ตุมฺหากํ ปาปุณาตี’’ติ สงฺฆตฺเถรสฺส ทตฺวา ‘‘เสสานิ อมฺหากํ ปาปุณนฺตี’’ติ คเหตุํ วฏฺฏติ. एका विहारात दहा भिक्खू आहेत। "आम्ही दहा वस्त्रे संघाला देत आहोत" असे म्हणून दाते वस्त्रे देतात, तेव्हा ती स्वतंत्रपणे वाटली पाहिजेत। जर "ही सर्व वस्त्रे आमच्याच वाट्याला येतात" असे म्हणून ते सर्व वस्त्रे घेऊन गेले, तर ते अयोग्य वाटप आणि अयोग्य ग्रहण ठरते, आणि ते ज्या ज्या ठिकाणी जातील तिथे ती वस्त्रे सांघिकच राहतात। परंतु, एक वस्त्र बाजूला काढून "हे आपल्या वाट्याला येते" असे संघथेरांना देऊन, "उरलेली वस्त्रे आमच्या वाट्याला येतात" असे म्हणून ती घेणे योग्य आहे। เอกเมว วตฺถํ สงฺฆสฺส เทมาติ อาหรนฺติ, อภาเชตฺวาว อมฺหากํ ปาปุณนฺตีติ คณฺหนฺติ, ทุปฺปาปิตญฺเจว ทุคฺคหิตญฺจ. สตฺถเกน ปน หลิทฺทิอาทินา วา เลขํ กตฺวา เอกํ โกฏฺฐาสํ ‘‘อิมํ ฐานํ ตุมฺหากํ ปาปุณาตี’’ติ สงฺฆตฺเถรสฺส ปาเปตฺวา ‘‘เสสํ อมฺหากํ ปาปุณาตี’’ติ คเหตุํ วฏฺฏติ. ยํ ปน วตฺถสฺเสว ปุปฺผํ วา วลิ วา, เตน ปริจฺเฉทํ กาตุํ น วฏฺฏติ. สเจ เอกํ ตนฺตํ อุทฺธริตฺวา ‘‘อิทํ ฐานํ ตุมฺหากํ ปาปุณาตี’’ติ สงฺฆตฺเถรสฺส ทตฺวา ‘‘เสสํ อมฺหากํ ปาปุณาตี’’ติ คณฺหนฺติ, วฏฺฏติ. ขณฺฑํ ขณฺฑํ ฉินฺทิตฺวา ภาชิยมานํ วฏฺฏติเยว. "आम्ही संघाला एकच वस्त्र देत आहोत" असे म्हणून दाते वस्त्र आणतात, तेव्हा त्याचे वाटप न करताच "हे आमच्या वाट्याला येते" असे म्हणून जर ते घेतात, तर ते अयोग्य वाटप आणि अयोग्य ग्रहण ठरते। परंतु लहान चाकूने किंवा हळद इत्यादीने रेघ ओढून एका भागाला "हा भाग आपल्या वाट्याला येतो" असे संघथेरांना देऊन, "उरलेला भाग आमच्या वाट्याला येतो" असे म्हणून घेणे योग्य आहे। परंतु वस्त्रावरील जे फूल किंवा घडी असते, त्याने सीमा ठरवणे योग्य नाही। जर एक धागा बाहेर काढून "हा भाग आपल्या वाट्याला येतो" असे संघथेरांना देऊन "उरलेला भाग आमच्या वाट्याला येतो" असे म्हणून ते घेतात, तर ते योग्य आहे। तुकडे-तुकडे करून कापून वाटप करणे देखील योग्यच आहे। เอกภิกฺขุเก วิหาเร สงฺฆสฺส จีวเรสุ อุปฺปนฺเนสุ สเจ ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว โส ภิกฺขุ ‘‘สพฺพานิ มยฺหํ ปาปุณนฺตี’’ติ คณฺหาติ, สุคฺคหิตานิ, ฐิติกา ปน น ติฏฺฐติ. สเจ เอเกกํ อุทฺธริตฺวา ‘‘อิทํ มยฺหํ ปาปุณาตี’’ติ คณฺหาติ, ฐิติกา ติฏฺฐติ. ตตฺถ อฏฺฐิตาย ฐิติกาย ปุน อญฺญสฺมึ จีวเร อุปฺปนฺเน สเจ เอโก ภิกฺขุ อาคจฺฉติ, มชฺเฌ ฉินฺทิตฺวา ทฺวีหิปิ คเหตพฺพํ. ฐิตาย ฐิติกาย ปุน อญฺญสฺมึ จีวเร อุปฺปนฺเน สเจ นวกตโร อาคจฺฉติ, ฐิติกา เหฏฺฐา โอโรหติ. สเจ วุฑฺฒตโร อาคจฺฉติ, ฐิติกา อุทฺธํ อาโรหติ. อถญฺโญ นตฺถิ, ปุน อตฺตโน ปาเปตฺวา คเหตพฺพํ. एकाच भिक्खू असलेल्या विहारात संघासाठी चीवरे उत्पन्न झाली असता, जर पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच तो भिक्खू "ही सर्व माझ्या वाट्याला येतात" असे म्हणून घेतो, तर ते योग्य ग्रहण ठरते, परंतु वाटपाचा क्रम (ठितिका) राहत नाही। जर एक-एक वस्त्र बाजूला काढून "हे माझ्या वाट्याला येते" असे म्हणून तो घेतो, तर वाटपाचा क्रम राहतो। त्यामध्ये, वाटपाचा क्रम न राहिल्यास, पुन्हा दुसरे चीवर उत्पन्न झाल्यावर जर एक भिक्खू आला, तर ते मध्ये कापून दोघांनीही घेतले पाहिजे। वाटपाचा क्रम राहिल्यास, पुन्हा दुसरे चीवर उत्पन्न झाल्यावर जर कनिष्ठ भिक्खू आला, तर वाटपाचा क्रम खाली उतरतो। जर ज्येष्ठ भिक्खू आला, तर वाटपाचा क्रम वर चढतो। जर दुसरा कोणी नसेल, तर पुन्हा स्वतःच्या वाट्याला आणून ते ग्रहण करावे। ‘‘สงฺฆสฺส เทมา’’ติ วา ‘‘ภิกฺขุสงฺฆสฺส เทมา’’ติ วา เยน เกนจิ อากาเรน สงฺฆํ อามสิตฺวา ทินฺนํ ปน ปํสุกูลิกานํ น วฏฺฏติ, ‘‘คหปติจีวรํ ปฏิกฺขิปามิ ปํสุกูลิกงฺคํ สมาทิยามี’’ติ วุตฺตตฺตา, น ปน อกปฺปิยตฺตา[Pg.422]. ภิกฺขุสงฺเฆน อปโลเกตฺวา ทินฺนมฺปิ น คเหตพฺพํ. ยํ ปน ภิกฺขุ อตฺตโน สนฺตกํ เทติ, ตํ ภิกฺขุทตฺติยํ นาม วฏฺฏติ, ปํสุกูลํ ปน น โหติ. เอวํ สนฺเตปิ ธุตงฺคํ น ภิชฺชติ. ‘‘ภิกฺขูนํ เทม, เถรานํ เทมา’’ติ วุตฺเต ปน ปํสุกูลิกานมฺปิ วฏฺฏติ. ‘‘อิทํ วตฺถํ สงฺฆสฺส เทม, อิมินา อุปาหนตฺถวิกปตฺตตฺถวิกอาโยคอํสพทฺธกาทีนิ กโรนฺตู’’ติ ทินฺนมฺปิ วฏฺฏติ. "आम्ही संघाला देत आहोत" किंवा "भिक्खू संघाला देत आहोत" अशा कोणत्याही प्रकारे संघाचा उल्लेख करून दिलेले वस्त्र पांसुकूलिक (पांसुकूल धुतंग पाळणाऱ्या) भिक्खूंना कल्पत नाही; कारण "मी गृहपतीने दिलेले चीवर नाकारतो आणि पांसुकूलिक अंग समादान करतो" असे म्हटलेले असल्यामुळे होय, ते अकल्पनीय (अयोग्य) असल्यामुळे नव्हे। भिक्खू संघाने अनुमती देऊन दिलेले देखील त्यांनी घेऊ नये। परंतु जो भिक्खू स्वतःची वस्तू देतो, त्याला 'भिक्खूने दिलेले' (भिक्खुदत्तिय) म्हणतात आणि ते पांसुकूलिक भिक्खूंना कल्पते, परंतु ते पांसुकूल चीवर होत नाही। असे असले तरी धुतंग भंग पावत नाही। परंतु "आम्ही भिक्खूंना देत आहोत, थेरांना देत आहोत" असे म्हटले असता पांसुकूलिक भिक्खूंनाही ते कल्पते। "हे वस्त्र आम्ही संघाला देत आहोत, याने त्यांनी पादत्राण पिशवी, पात्र पिशवी, कटिबंध आणि खांद्याची पट्टी इत्यादी बनवावे" असे म्हणून दिलेले वस्त्र देखील कल्पते। ปตฺตตฺถวิกาทีนํ อตฺถาย ทินฺนานิ พหูนิปิ โหนฺติ, จีวรตฺถายปิ ปโหนฺติ, ตโต จีวรํ กตฺวา ปารุปิตุํ วฏฺฏติ. สเจ ปน สงฺโฆ ภาชิตาติริตฺตานิ วตฺถานิ ฉินฺทิตฺวา อุปาหนตฺถวิกาทีนํ อตฺถาย ภาเชติ, ตโต คเหตุํ น วฏฺฏติ. สามิเกหิ วิจาริตเมว หิ วฏฺฏติ, น อิตรํ. पात्र पिशवी इत्यादींसाठी दिलेली वस्त्रे पुष्कळ असतील आणि ती चीवरासाठी देखील पुरेशी असतील, तर त्यापासून चीवर बनवून ते परिधान करणे कल्पते। परंतु जर संघाने वाटप करून उरलेली वस्त्रे कापून पादत्राण पिशवी इत्यादींसाठी वाटली, तर त्यातून घेणे कल्पत नाही। कारण दायकांनी ज्या उद्देशाने योजना केली आहे, तसेच घेणे कल्पते, इतर नाही। ‘‘ปํสุกูลิกสงฺฆสฺส ธมกรณปฏาทีนํ อตฺถาย เทมา’’ติ วุตฺเตปิ คเหตุํ วฏฺฏติ, ปริกฺขาโร นาม ปํสุกูลิกานมฺปิ อิจฺฉิตพฺโพ. ยํ ตตฺถ อติเรกํ โหติ, ตํ จีวเรปิ อุปเนตุํ วฏฺฏติ. สุตฺตํ สงฺฆสฺส เทนฺติ, ปํสุกูลิเกหิปิ คเหตพฺพํ. อยํ ตาว วิหารํ ปวิสิตฺวา ‘‘อิมานิ จีวรานิ สงฺฆสฺส ทมฺมี’’ติ ทินฺเนสุ วินิจฺฉโย. "आम्ही पांसुकूलिक संघाला जलगाळणीचे कापड इत्यादींसाठी देत आहोत" असे म्हटले तरीही ते घेणे कल्पते; कारण परिष्कार पांसुकूलिक भिक्खूंनाही आवश्यक असतात। त्यामध्ये जे अतिरिक्त उरेल, ते चीवरासाठी देखील वापरणे कल्पते। जर ते संघाला सूत देतात, तर पांसुकूलिक भिक्खूंनी देखील ते ग्रहण करावे। विहारात प्रवेश करून "ही चीवरे मी संघाला अर्पण करतो" असे म्हणून दिलेल्या चीवरांबाबतचा हा निर्णय आहे। สเจ ปน พหิอุปจารสีมายํ อทฺธานปฺปฏิปนฺเน ภิกฺขู ทิสฺวา ‘‘สงฺฆสฺส ทมฺมี’’ติ สงฺฆตฺเถรสฺส วา สงฺฆนวกสฺส วา อาโรเจติ, สเจปิ โยชนํ ผริตฺวา ปริสา ฐิตา โหติ, เอกพทฺธา เจ, สพฺเพสํ ปาปุณาติ. เย ปน ทฺวาทสหิ หตฺเถหิ ปริสํ อสมฺปตฺตา, เตสํ น ปาปุณาติ. परंतु जर उपचारसीमेच्या बाहेर, प्रवासाला निघालेल्या भिक्खूंना पाहून "मी संघाला देत आहे" असे संघथेरांना किंवा संघातील कनिष्ठ भिक्खूला सांगितले, आणि जरी एक योजन अंतरापर्यंत परिषद पसरलेली असली, आणि ती सलग जोडलेली असेल, तर ती सर्वांच्या वाट्याला येते। परंतु जे बारा हातांच्या अंतराने परिषदेपर्यंत पोहोचले नाहीत, त्यांच्या वाट्याला ते येत नाही। อุภโตสงฺฆสฺส เทตีติ เอตฺถ ‘‘อุภโตสงฺฆสฺส ทมฺมี’’ติ วุตฺเตปิ ‘‘ทฺวิธา สงฺฆสฺส ทมฺมิ, ทฺวินฺนํ สงฺฆานํ ทมฺมิ, ภิกฺขุสงฺฆสฺส จ ภิกฺขุนิสงฺฆสฺส จ ทมฺมี’’ติ วุตฺเตปิ อุภโตสงฺฆสฺส ทินฺนเมว โหติ. อุปฑฺฒํ ทาตพฺพนฺติ ทฺเวภาเค สเม กตฺวา เอโก ทาตพฺโพ. ‘‘อุภโตสงฺฆสฺส จ ตุยฺหญฺจ ทมฺมี’’ติ วุตฺเต สเจ ทส ทส ภิกฺขู จ ภิกฺขุนิโย จ โหนฺติ, เอกวีสติ ปฏิวีเส กตฺวา เอโก ปุคฺคลสฺส ทาตพฺโพ, ทส ภิกฺขุสงฺฆสฺส, ทส ภิกฺขุนิสงฺฆสฺส เยน ปุคฺคลิโก ลทฺโธ โส สงฺฆโตปิ อตฺตโน วสฺสคฺเคน คเหตุํ ลภติ. กสฺมา? อุภโตสงฺฆคฺคหเณน คหิตตฺตา. "उभय संघाला देतो" याविषयी निर्णय असा समजावा: "मी उभय संघाला देत आहे" असे म्हटले तरीही, किंवा "मी द्विधा संघाला देत आहे, दोन संघांना देत आहे, भिक्खू संघाला आणि भिक्खुणी संघाला देत आहे" असे म्हटले तरीही ते उभय संघालाच दिलेले ठरते। "अर्धे दिले पाहिजे" म्हणजे दोन समान भाग करून एक भाग (प्रत्येक संघाला) दिला पाहिजे। "मी उभय संघाला आणि आपल्याला देत आहे" असे म्हटले असता, जर दहा भिक्खू आणि दहा भिक्खुणी असतील, तर एकवीस समान भाग करून एक भाग त्या व्यक्तीला दिला पाहिजे, दहा भाग भिक्खू संघाला आणि दहा भाग भिक्खुणी संघाला दिले पाहिजेत। ज्याला वैयक्तिक हिस्सा मिळाला आहे, त्याला संघाकडून देखील स्वतःच्या वर्षांच्या (दीक्षेच्या) क्रमानुसार हिस्सा मिळतो। कारण काय? 'उभय संघ' या शब्दाच्या ग्रहणाने त्याचा समावेश झालेला असल्यामुळे होय। ‘‘อุภโตสงฺฆสฺส [Pg.423] จ เจติยสฺส จ ทมฺมี’’ติ วุตฺเตปิ เอเสว นโย. อิธ ปน เจติยสฺส สงฺฆโต ปาปุณนโกฏฺฐาโส นาม นตฺถิ, เอกปุคฺคลสฺส ปตฺตโกฏฺฐาสสโมว โกฏฺฐาโส โหติ. “दोन्ही संघांना (उभतोसंघाला) आणि चैत्याला मी दान देतो” असे म्हटले तरीही हाच नियम लागू होतो. परंतु, येथे चैत्यासाठी संघातून मिळणारा हिस्सा (भाग) नसतो; तर एका व्यक्तीला मिळणाऱ्या हिश्श्यासारखाच तो हिस्सा असतो. ‘‘อุภโตสงฺฆสฺส จ ตุยฺหญฺจ เจติยสฺส จา’’ติ วุตฺเต ปน ทฺวาวีสติ โกฏฺฐาเส กตฺวา ทส ภิกฺขูนํ, ทส ภิกฺขุนีนํ, เอโก ปุคฺคลสฺส, เอโก เจติยสฺส ทาตพฺโพ. ตตฺถ ปุคฺคโล สงฺฆโตปิ อตฺตโน วสฺสคฺเคน ปุน คเหตุํ ลภติ, เจติยสฺส เอโกเยว. परंतु, “दोन्ही संघांना, तुम्हाला आणि चैत्याला मी दान देतो” असे म्हटले असता, बावीस भाग करून, दहा भाग भिक्षूंना, दहा भाग भिक्षुणींना, एक भाग त्या व्यक्तीला आणि एक भाग चैत्याला दिला पाहिजे. त्यामध्ये ती व्यक्ती संघाकडूनही आपल्या वर्षासंख्येनुसार (ज्येष्ठतेनुसार) पुन्हा भाग मिळवू शकते, परंतु चैत्याला केवळ एकच भाग मिळतो. ‘‘ภิกฺขุสงฺฆสฺส จ ภิกฺขุนีนญฺจ ทมฺมี’’ติ วุตฺเต ปน น มชฺเฌ ภินฺทิตฺวา ทาตพฺพํ, ภิกฺขู จ ภิกฺขุนิโย จ คเณตฺวา ทาตพฺพํ. ‘‘ภิกฺขุสงฺฆสฺส จ ภิกฺขุนีนญฺจ ตุยฺหญฺจา’’ติ วุตฺเต ปน ปุคฺคโล วิสุํ น ลภติ, ปาปุณนฏฺฐานโต เอกเมว ลภติ. กสฺมา? ภิกฺขุสงฺฆคฺคหเณน คหิตตฺตา. ‘‘ภิกฺขุสงฺฆสฺส จ ภิกฺขุนีนญฺจ ตุยฺหญฺจ เจติยสฺส จา’’ติ วุตฺเตปิ เจติยสฺส เอกปุคฺคลปฏิวีโส ลพฺภติ, ปุคฺคลสฺส วิสุํ น ลพฺภติ, ตสฺมา เอกํ เจติยสฺส ทตฺวา อวเสสํ ภิกฺขู จ ภิกฺขุนิโย จ คเณตฺวา ภาเชตพฺพํ. परंतु, “भिक्षुसंघाला आणि भिक्षुणींना मी दान देतो” असे म्हटले असता, मध्यभागी विभागून देऊ नये, तर भिक्षू आणि भिक्षुणींची संख्या मोजून दिले पाहिजे. “भिक्षुसंघाला, भिक्षुणींना आणि तुम्हाला मी दान देतो” असे म्हटले असता, त्या व्यक्तीला स्वतंत्र भाग मिळत नाही, तर त्याला मिळणाऱ्या स्थानावरून केवळ एकच भाग मिळतो. असे का? कारण ‘भिक्षुसंघ’ या शब्दाच्या ग्रहणाने त्या व्यक्तीचा समावेश आधीच झालेला असतो. “भिक्षुसंघाला, भिक्षुणींना, तुम्हाला आणि चैत्याला मी दान देतो” असे म्हटले तरीही चैत्याला एका व्यक्तीचा हिस्सा मिळतो, परंतु त्या व्यक्तीला स्वतंत्र हिस्सा मिळत नाही. म्हणून, एक भाग चैत्याला देऊन उर्वरित भाग भिक्षू आणि भिक्षुणींची संख्या मोजून विभागून दिला पाहिजे. ‘‘ภิกฺขูนญฺจ ภิกฺขุนีนญฺจ ทมฺมี’’ติ วุตฺเตปิ มชฺเฌ ภินฺทิตฺวา น ทาตพฺพํ, ปุคฺคลคณนาย เอว วิภชิตพฺพํ. ‘‘ภิกฺขูนญฺจ ภิกฺขุนีนญฺจ ตุยฺหญฺจ เจติยสฺส จา’’ติ เอวํ วุตฺเตปิ เจติยสฺส เอกปุคฺคลปฏิวีโส ลพฺภติ, ปุคฺคลสฺส วิสุํ นตฺถิ, ภิกฺขู จ ภิกฺขุนิโย จ คเณตฺวา เอว ภาเชตพฺพํ. ยถา จ ภิกฺขุสงฺฆํ อาทึ กตฺวา นโย นีโต, เอวํ ภิกฺขุนิสงฺฆํ อาทึ กตฺวาปิ เนตพฺโพ. ‘‘ภิกฺขุสงฺฆสฺส จ ตุยฺหญฺจา’’ติ วุตฺเต ปุคฺคลสฺส วิสุํ น ลพฺภติ, วสฺสคฺเคเนว คเหตพฺพํ. ‘‘ภิกฺขุสงฺฆสฺส จ เจติยสฺส จา’’ติ วุตฺเต ปน เจติยสฺส วิสุํ ปฏิวีโส ลพฺภติ. ‘‘ภิกฺขุสงฺฆสฺส จ ตุยฺหญฺจ เจติยสฺส จา’’ติ วุตฺเตปิ เจติยสฺเสว ลพฺภติ, น ปุคฺคลสฺส. “भिक्षूंना आणि भिक्षुणींना मी दान देतो” असे म्हटले तरीही मध्यभागी विभागून देऊ नये, तर व्यक्तींच्या संख्येनुसारच विभागणी केली पाहिजे. “भिक्षूंना, भिक्षुणींना, तुम्हाला आणि चैत्याला मी दान देतो” असे म्हटले तरीही चैत्याला एका व्यक्तीचा हिस्सा मिळतो, त्या व्यक्तीला स्वतंत्र हिस्सा मिळत नाही; भिक्षू आणि भिक्षुणींची संख्या मोजूनच विभागणी केली पाहिजे. ज्याप्रमाणे भिक्षुसंघाला प्राधान्य देऊन हा नियम सांगितला आहे, त्याचप्रमाणे भिक्षुणीसंघाला प्राधान्य देऊनही हा नियम लागू केला पाहिजे. “भिक्षुसंघाला आणि तुम्हाला मी दान देतो” असे म्हटले असता, त्या व्यक्तीला स्वतंत्र हिस्सा मिळत नाही, तर त्याने आपल्या वर्षासंख्येनुसारच हिस्सा घेतला पाहिजे. “भिक्षुसंघाला आणि चैत्याला मी दान देतो” असे म्हटले असता, चैत्याला स्वतंत्र हिस्सा मिळतो. “भिक्षुसंघाला, तुम्हाला आणि चैत्याला मी दान देतो” असे म्हटले तरीही चैत्यालाच हिस्सा मिळतो, त्या व्यक्तीला स्वतंत्र हिस्सा मिळत नाही. ‘‘ภิกฺขูนญฺจ ตุยฺหญฺจา’’ติ วุตฺเตปิ วิสุํ น ลพฺภติ. ‘‘ภิกฺขูนญฺจ เจติยสฺส จา’’ติ วุตฺเต ปน เจติยสฺส ลพฺภติ. ‘‘ภิกฺขูนญฺจ ตุยฺหญฺจ เจติยสฺส จา’’ติ วุตฺเตปิ เจติยสฺเสว วิสุํ ลพฺภติ, น ปุคฺคลสฺส. ภิกฺขุนิสงฺฆํ อาทึ กตฺวาปิ เอวเมว โยเชตพฺพํ. “भिक्षूंना आणि तुम्हाला मी दान देतो” असे म्हटले तरीही स्वतंत्र हिस्सा मिळत नाही. परंतु “भिक्षूंना आणि चैत्याला मी दान देतो” असे म्हटले असता चैत्याला हिस्सा मिळतो. “भिक्षूंना, तुम्हाला आणि चैत्याला मी दान देतो” असे म्हटले तरीही चैत्यालाच स्वतंत्र हिस्सा मिळतो, त्या व्यक्तीला स्वतंत्र हिस्सा मिळत नाही. भिक्षुणीसंघाला प्राधान्य देऊनही याच प्रकारे योजना करावी. ปุพฺเพ พุทฺธปฺปมุขสฺส อุภโตสงฺฆสฺส ทานํ เทนฺติ, ภควา มชฺเฌ นิสีทติ, ทกฺขิณโต ภิกฺขู วามโต ภิกฺขุนิโย นิสีทนฺติ, ภควา อุภินฺนํ สงฺฆตฺเถโร, ตทา ภควา อตฺตนา ลทฺธปจฺจเย อตฺตนาปิ ปริภุญฺชติ, ภิกฺขูนมฺปิ [Pg.424] ทาเปติ. เอตรหิ ปน ปณฺฑิตมนุสฺสา สธาตุกํ ปฏิมํ วา เจติยํ วา ฐเปตฺวา พุทฺธปฺปมุขสฺส อุภโตสงฺฆสฺส ทานํ เทนฺติ. ปฏิมาย วา เจติยสฺส วา ปุรโต อาธารเก ปตฺตํ ฐเปตฺวา ทกฺขิโณทกํ ทตฺวา พุทฺธานํ เทมาติ, ตตฺถ ยํ ปฐมํ ขาทนียํ โภชนียํ เทนฺติ, วิหารํ วา อาหริตฺวา อิทํ เจติยสฺส เทมาติ ปิณฺฑปาตญฺจ มาลาคนฺธาทีนิ จ เทนฺติ, ตตฺถ กถํ ปฏิปชฺชิตพฺพนฺติ? มาลาคนฺธาทีนิ ตาว เจติเย อาโรเปตพฺพานิ, วตฺเถหิ ปฏากา, เตเลน ปทีปา กาตพฺพา, ปิณฺฑปาตมธุผาณิตาทีนิ ปน โย นิพทฺธเจติยชคฺคโก โหติ ปพฺพชิโต วา คหฏฺโฐ วา, ตสฺเสว ทาตพฺพานิ. นิพทฺธชคฺคเก อสติ อาหฏภตฺตํ ฐเปตฺวา วตฺตํ กตฺวา ปริภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. อุปกฏฺเฐ กาเล ภุญฺชิตฺวา ปจฺฉาปิ วตฺตํ กาตุํ วฏฺฏติเยว. पूर्वीच्या काळी, बुद्धप्रमुख उभतोसंघाला दान दिले जात असे. भगवान मध्ये बसत असत, उजव्या बाजूला भिक्षू आणि डाव्या बाजूला भिक्षुणी बसत असत. भगवान दोन्ही संघांचे संघस्थवीर होते. त्या वेळी भगवान स्वतःला मिळालेल्या वस्तू स्वतःही वापरत असत आणि भिक्षूंनाही देववत असत. परंतु आताच्या काळात, सुज्ञ लोक सधातू (धातूयुक्त) बुद्धबिंब (मूर्ती) किंवा चैत्य ठेवून बुद्धप्रमुख उभतोसंघाला दान देतात. मूर्ती किंवा चैत्याच्या समोर पात्राच्या आधारावर पात्र ठेवून, दानोदक अर्पण करून ‘आम्ही बुद्धांना दान देतो’ असे म्हणून दान देतात. त्यामध्ये जे काही खाद्य किंवा भोज्य प्रथम देतात, किंवा विहारात आणून ‘हे आम्ही चैत्याला देतो’ असे म्हणून पिंडपात आणि पुष्प-गंध इत्यादी अर्पण करतात, त्या बाबतीत कसे वर्तन करावे? प्रथम पुष्प, गंध इत्यादी चैत्यावर अर्पण करावेत. वस्त्रांपासून पताका बनवाव्यात आणि तेलाने दीप प्रज्वलित करावेत. परंतु पिंडपात, मध, गुळ-काकवी इत्यादी गोष्टी जो कोणी चैत्याची नियमित काळजी घेणारा असेल—मग तो प्रव्रजित असो वा गृहस्थ असो—त्यालाच दिल्या पाहिजेत. नियमित काळजी घेणारा कोणी नसल्यास, आणलेले अन्न ठेवून, योग्य तो विधी करून ते ग्रहण करणे योग्य आहे. दुपारची वेळ जवळ आली असल्यास, भोजन करून नंतरही विधी करणे योग्यच आहे. มาลาคนฺธาทีสุ จ ยํ กิญฺจิ ‘‘อิทํ หริตฺวา เจติยสฺสปูชํ กโรถา’’ติ วุตฺเต ทูรมฺปิ หริตฺวา ปูเชตพฺพํ. ‘‘ภิกฺขํ สงฺฆสฺส หรา’’ติ วุตฺเตปิ หริตพฺพํ. สเจ ปน ‘‘อหํ ปิณฺฑาย จรามิ, อาสนสาลาย ภิกฺขู อตฺถิ, เต อาหริสฺสนฺตี’’ติ วุตฺเต ‘‘ภนฺเต ตุยฺหํเยว ทมฺมี’’ติ วทติ, ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. อถ ปน ‘‘ภิกฺขุสงฺฆสฺส ทสฺสามี’’ติ หรนฺตสฺส คจฺฉโต อนฺตราว กาโล อุปกฏฺโฐ โหติ, อตฺตโน ปาเปตฺวา ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. पुष्प-गंध इत्यादींमध्ये जे काही असेल, “हे घेऊन जाऊन चैत्याची पूजा करा” असे लोकांनी म्हटले असता, दूरवर घेऊन जाऊनही पूजा केली पाहिजे. “भिक्षा संघाकडे घेऊन जा” असे म्हटले तरीही ती घेऊन गेली पाहिजे. परंतु जर “मी भिक्षेसाठी फिरत आहे, आसनशाळेत भिक्षू आहेत, ते घेऊन येतील” असे म्हटले असता, “भंते, मी तुम्हालाच देतो” असे जर तो म्हणाला, तर ते ग्रहण करणे योग्य आहे. परंतु जर “मी भिक्षुसंघाला देईन” असे मनात ठेवून ते घेऊन जात असताना, वाटेतच दुपारची वेळ जवळ आली, तर ते स्वतःकडे घेऊन ग्रहण करणे योग्य आहे. วสฺสํวุฏฺฐสงฺฆสฺส เทตีติ วิหารํ ปวิสิตฺวา ‘‘อิมานิ จีวรานิ วสฺสํวุฏฺฐสงฺฆสฺส ทมฺมี’’ติ เทติ. ยาวติกา ภิกฺขู ตสฺมึ อาวาเส วสฺสํวุฏฺฐาติ ยตฺตกา วสฺสจฺเฉทํ อกตฺวา ปุริมวสฺสํวุฏฺฐา, เตหิ ภาเชตพฺพํ, อญฺเญสํ น ปาปุณาติ. ทิสาปกฺกนฺตสฺสาปิ สติ ปฏิคฺคาหเก ยาว กถินสฺสุพฺภารา ทาตพฺพํ, อนตฺถเต ปน กถิเน อนฺโตเหมนฺเต เอวญฺจ วตฺวา ทินฺนํ, ปจฺฉิมวสฺสํวุฏฺฐานมฺปิ ปาปุณาตีติ ลกฺขณญฺญู วทนฺติ. อฏฺฐกถาสุ ปเนตํ น วิจาริตํ. “वर्षावास पूर्ण केलेल्या संघाला देतो” याचा अर्थ विहारात प्रवेश करून “मी ही चिवरे वर्षावास पूर्ण केलेल्या संघाला देतो” असे म्हणून दान देणे होय. त्या विहारात जितके भिक्षू वर्षावास पूर्ण करून राहिले आहेत, ज्यांनी वर्षावास खंडित न करता पूर्व-वर्षावास पूर्ण केला आहे, त्यांनीच ते विभागून घेतले पाहिजे, इतरांना ते मिळत नाही. दुसऱ्या ठिकाणी निघून गेलेल्या भिक्षूलाही, जर त्याचा स्वीकार करणारा प्रतिनिधी असेल, तर कठीण संस्काराच्या समाप्तीपर्यंत (कठीण-उद्धारापर्यंत) ते दिले पाहिजे. परंतु, कठीण संस्कार केला नसताना, हिवाळ्याच्या काळात असे म्हणून दिलेले चिवर पश्चिमोत्तर-वर्षावास पूर्ण केलेल्या भिक्षूंनाही मिळते, असे विनय-लक्षणांचे जाणकार म्हणतात. परंतु अट्ठकथांमध्ये यावर विशेष चर्चा केलेली नाही. สเจ ปน พหิอุปจารสีมายํ ฐิโต ‘‘วสฺสํวุฏฺฐสงฺฆสฺส ทมฺมี’’ติ วทติ, สมฺปตฺตานํ สพฺเพสํ ปาปุณาติ. อถ ‘‘อสุกวิหาเร วสฺสํวุฏฺฐสงฺฆสฺสา’’ติ วทติ, ตตฺร วสฺสํวุฏฺฐานเมว ยาว กถินสฺสุพฺภารา ปาปุณาติ. สเจ ปน คิมฺหานํ ปฐมทิวสโต ปฏฺฐาย เอวํ วทติ, ตตฺร สมฺมุขีภูตานํ สพฺเพสํ ปาปุณาติ. กสฺมา? ปิฏฺฐิสมเย อุปฺปนฺนตฺตา. อนฺโตวสฺเสเยว ‘‘วสฺสํ วสนฺตานํ ทมฺมี’’ติ วุตฺเต ฉินฺนวสฺสา น ลภนฺติ, วสฺสํ วสนฺตาว ลภนฺติ. จีวรมาเส [Pg.425] ปน ‘‘วสฺสํ วสนฺตานํ ทมฺมี’’ติ วุตฺเต ปจฺฉิมิกาย วสฺสูปคตานํเยว ปาปุณาติ, ปุริมิกาย วสฺสูปคตานญฺจ ฉินฺนวสฺสานญฺจ น ปาปุณาติ. परंतु, जर बाह्य उपचार सीमेच्या बाहेर उभा असलेला दाता “मी वर्षावास पूर्ण केलेल्या संघाला देतो” असे म्हणाला, तर तेथे उपस्थित असलेल्या सर्व भिक्षूंना ते मिळते. किंवा जर तो “अमुक विहारात वर्षावास पूर्ण केलेल्या संघाला देतो” असे म्हणाला, तर त्या विहारात वर्षावास पूर्ण केलेल्या भिक्षूंनाच कठीण संस्काराच्या समाप्तीपर्यंत ते मिळते. परंतु जर तो उन्हाळ्याच्या पहिल्या दिवसापासून असे म्हणत असेल, तर तेथे उपस्थित असलेल्या सर्व भिक्षूंना ते मिळते. असे का? कारण ते चिवर-काळाच्या नंतरच्या काळात (पिठ्ठिसमयात) उत्पन्न झालेले असते. वर्षावासाच्या दरम्यानच “वर्षावास करत असलेल्यांना मी देतो” असे म्हटले असता, ज्यांचा वर्षावास खंडित झाला आहे त्यांना ते मिळत नाही, तर जे वर्षावास करत आहेत त्यांनाच ते मिळते. परंतु चिवर-मासात “वर्षावास करत असलेल्यांना मी देतो” असे म्हटले असता, पश्चिमोत्तर-वर्षावास स्वीकारलेल्या भिक्षूंनाच ते मिळते; पूर्व-वर्षावास स्वीकारलेल्या आणि ज्यांचा वर्षावास खंडित झाला आहे अशा भिक्षूंना ते मिळत नाही. จีวรมาสโต ปฏฺฐาย ยาว เหมนฺตสฺส ปจฺฉิโม ทิวโส, ตาว วสฺสาวาสิกํ เทมาติ วุตฺเต กถินํ อตฺถตํ วา โหตุ อนตฺถตํ วา อตีตวสฺสํวุฏฺฐานเมว ปาปุณาติ. คิมฺหานํ ปฐมทิวสโต ปฏฺฐาย วุตฺเต ปน มาติกา อาโรเปตพฺพา – ‘‘อตีตวสฺสาวาสสฺส ปญฺจ มาสา อติกฺกนฺตา, อนาคโต จตุมาสจฺจเยน ภวิสฺสติ, กตรวสฺสาวาสสฺส เทตี’’ติ? สเจ ‘‘อตีตวสฺสํวุฏฺฐานํ ทมฺมี’’ติ วทติ, ตํอนฺโตวสฺสํวุฏฺฐานเมว ปาปุณาติ, ทิสาปกฺกนฺตานมฺปิ สภาคา คณฺหิตุํ ลภนฺติ. चीवर महिन्यापासून सुरू करून जोपर्यंत हेमंत ऋतूचा शेवटचा दिवस (फाल्गुन पौर्णिमा) आहे, तोपर्यंत 'आम्ही वर्षावासिक (चीवर) देत आहोत' असे म्हटले असता, कठिन (चीवर) आस्तृत (पसरलेले) असो वा अनास्तृत असो, ते केवळ भूतकाळातील वर्षावास पूर्ण केलेल्या भिक्खूंनाच प्राप्त होते. परंतु, जर ग्रीष्माच्या (उन्हाळ्याच्या) पहिल्या दिवसापासून सुरू करून असे म्हटले असेल, तर मातृका (प्रश्नावली) मांडली पाहिजे की— 'गेलेल्या वर्षावासाचे पाच महिने उलटून गेले आहेत, आणि आगामी वर्षावास चार महिन्यांनंतर सुरू होईल, तर तुम्ही कोणत्या वर्षावासातील भिक्खूंना हे देत आहात?' जर तो म्हणतो की, 'मी भूतकाळातील वर्षावास पूर्ण केलेल्यांना देत आहे,' तर ते केवळ वर्षावासाच्या आत राहून वर्षावास पूर्ण केलेल्यांनाच प्राप्त होते, आणि इतर दिशांना निघून गेलेल्या भिक्खूंच्या वतीने त्यांचे सभाग (समान भागीदार) भिक्खू देखील ते ग्रहण करू शकतात. สเจ ‘‘อนาคเต วสฺสาวาสิกํ ทมฺมี’’ติ วทติ, ตํ ฐเปตฺวา วสฺสูปนายิกทิวเส คเหตพฺพํ. อถ ‘‘อคุตฺโต วิหาโร, โจรภยํ อตฺถิ, น สกฺกา ฐเปตุํ, คณฺหิตฺวา วา อาหิณฺฑิตุ’’นฺติ วุตฺเต ‘‘สมฺปตฺตานํ ทมฺมี’’ติ วทติ, ภาเชตฺวา คเหตพฺพํ. สเจ วทติ ‘‘อิโต เม ภนฺเต ตติเย วสฺเส วสฺสาวาสิกํ น ทินฺนํ, ตํ ทมฺมี’’ติ, ตสฺมึ อนฺโตวสฺเส วุฏฺฐภิกฺขูนํ ปาปุณาติ. สเจ เต ทิสา ปกฺกนฺตา, อญฺโญ วิสฺสาสิโก คณฺหาติ, ทาตพฺพํ. อถ เอโกเยว อวสิฏฺโฐ, เสสา กาลงฺกตา, สพฺพํ เอกสฺเสว ปาปุณาติ. สเจ เอโกปิ นตฺถิ, สงฺฆิกํ โหติ, สมฺมุขีภูเตหิ ภาเชตพฺพํ. जर तो म्हणतो की, 'मी आगामी वर्षावासासाठी वर्षावासिक देत आहे,' तर ते राखून ठेवून वर्षावासाला आरंभ होण्याच्या दिवशी ग्रहण केले पाहिजे. किंवा जर 'विहार सुरक्षित नाही, चोरांचे भय आहे, ते राखून ठेवणे शक्य नाही, किंवा ते घेऊन फिरणेही शक्य नाही' असे म्हटले असता, जर तो म्हणतो की, 'मी उपस्थित असलेल्यांना देत आहे,' तर ते वाटून घेऊन ग्रहण केले पाहिजे. जर तो म्हणतो की, 'भंते, या वर्षापासून तिसऱ्या वर्षी मी वर्षावासिक दिले नव्हते, ते मी आता देत आहे,' तर ते त्या वर्षावासात राहिलेल्या भिक्खूंना प्राप्त होते. जर ते इतर दिशांना निघून गेले असतील आणि दुसरा एखादा विश्वासू भिक्खू ते ग्रहण करत असेल, तर त्याला दिले पाहिजे. किंवा जर केवळ एकच भिक्खू शिल्लक राहिला असेल आणि बाकीचे कालवश झाले असतील, तर ते सर्व एकालाच प्राप्त होते. जर एकही भिक्खू नसेल, तर ते सांघिक होते आणि उपस्थित असलेल्या भिक्खूंनी ते वाटून घेतले पाहिजे. อาทิสฺส เทตีติ อาทิสิตฺวา ปริจฺฉินฺทิตฺวา เทติ; ยาคุยา วาติอาทีสุ อยมตฺโถ – ยาคุยา วา…เป… เภสชฺเช วา อาทิสฺส เทติ. ตตฺรายํ โยชนา – ภิกฺขู อชฺชตนาย วา สฺวาตนาย วา ยาคุยา นิมนฺเตตฺวา เตสํ ฆรํ ปวิฏฺฐานํ ยาคุํ เทติ, ยาคุํ ทตฺวา ปีตาย ยาคุยา ‘‘อิมานิ จีวรานิ, เยหิ มยฺหํ ยาคุ ปีตา, เตสํ ทมฺมี’’ติ เทติ, เยหิ นิมนฺติเตหิ ยาคุ ปีตา, เตสํเยว ปาปุณาติ. เยหิ ปน ภิกฺขาจารวตฺเตน ฆรทฺวาเรน คจฺฉนฺเตหิ วา ฆรํ ปวิฏฺเฐหิ วา ยาคุ ลทฺธา, เยสํ วา อาสนสาลโต ปตฺตํ อาหริตฺวา มนุสฺเสหิ นีตา, เยสํ วา เถเรหิ เปสิตา, เตสํ น ปาปุณาติ. สเจ ปน นิมนฺติตภิกฺขูหิ สทฺธึ อญฺเญปิ พหู อาคนฺตฺวา อนฺโตเคหญฺจ พหิเคหญฺจ ปูเรตฺวา นิสินฺนา, ทายโก จ เอวํ วทติ – ‘‘นิมนฺติตา วา โหนฺตุ อนิมนฺติตา วา, เยสํ มยา ยาคุ ทินฺนา, สพฺเพสํ อิมานิ วตฺถานิ โหนฺตู’’ติ สพฺเพสํ ปาปุณนฺติ. เยหิ ปน เถรานํ หตฺถโต ยาคุ ลทฺธา[Pg.426], เตสํ น ปาปุณนฺติ. อถ โส ‘‘เยหิ มยฺหํ ยาคุ ปีตา, สพฺเพสํ โหนฺตู’’ติ วทติ, สพฺเพสํ ปาปุณนฺติ. ภตฺตขาทนีเยสุปิ เอเสว นโย. 'आदिस्य देति' (उद्देश करून देणे) म्हणजे उद्देश करून, निश्चित करून देणे. 'यागुया वा' (किंवा यागूसाठी) इत्यादी वाक्यांमध्ये हा अर्थ आहे— यागूसाठी किंवा... पे... औषधासाठी उद्देश करून देणे. तेथे हा संबंध आहे— भिक्खूंना आजच्या किंवा उद्याच्या यागूसाठी आमंत्रित करून, घरात प्रवेश केलेल्या त्या भिक्खूंना यागू देतो, आणि त्यांनी ती यागू प्यायल्यानंतर, 'ज्यांनी माझी यागू प्यायली आहे, त्यांना मी ही चीवरे देत आहे' असे म्हणून देतो, तर ज्या आमंत्रित भिक्खूंनी यागू प्यायली आहे, त्यांनाच ती प्राप्त होतात. परंतु, ज्यांनी भिक्षाटनाच्या नियमाने घराच्या दारावरून जाताना किंवा घरात प्रवेश केल्यावर यागू मिळवली आहे, किंवा ज्यांचे पात्र आसनशाळेतून आणून लोकांनी यागू नेली आहे, किंवा ज्यांच्याकडे स्थविरांनी यागू पाठवली आहे, त्यांना ती प्राप्त होत नाही. परंतु, जर आमंत्रित भिक्खूंसोबत इतरही अनेक भिक्खू येऊन घराच्या आत आणि बाहेर गर्दी करून बसले असतील, आणि दाता असे म्हणतो की— 'आमंत्रित असोत वा आमंत्रित नसूत, ज्यांना मी यागू दिली आहे, त्या सर्वांना ही वस्त्रे मिळोत,' तर ती सर्वांना प्राप्त होतात. परंतु, ज्यांनी स्थविरांच्या हाताने यागू मिळवली आहे, त्यांना ती प्राप्त होत नाही. किंवा जर तो म्हणतो की, 'ज्यांनी माझी यागू प्यायली आहे, त्या सर्वांना ती मिळोत,' तर ती सर्वांना प्राप्त होतात. भोजन आणि खाद्यान्नाच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. จีวเร วาติ ปุพฺเพปิ เยน วสฺสํ วาเสตฺวา ภิกฺขูนํ จีวรํ ทินฺนปุพฺพํ โหติ, โส เจ ภิกฺขู โภเชตฺวา วทติ – ‘‘เยสํ มยา ปุพฺเพ จีวรํ ทินฺนํ, เตสํเยว อิมํ จีวรํ วา สุตฺตํ วา สปฺปิมธุผาณิตาทีนิ วา โหนฺตู’’ติ, สพฺพํ เตสํเยว ปาปุณาติ. เสนาสเน วาติ โย มยา การิเต วิหาเร วา ปริเวเณ วา วสติ, ตสฺสิทํ โหตู’’ติ วุตฺเต ตสฺเสว โหติ. เภสชฺเช วาติ ‘‘มยํ กาเลน กาลํ เถรานํ สปฺปิอาทีนิ เภสชฺชานิ เทม, เยหิ ตานิ ลทฺธานิ, เตสํเยวิทํ โหตู’’ติ วุตฺเต เตสํเยว โหติ. 'चीवरे वा' (किंवा चीवराच्या बाबतीत) म्हणजे— पूर्वी ज्या दात्याने भिक्खूंना वर्षावास करवून घेऊन चीवर दिले होते, तो जर भिक्खूंना भोजन देऊन असे म्हणतो की— 'ज्यांना मी पूर्वी चीवर दिले होते, त्यांनाच हे चीवर किंवा सूत किंवा तूप, मध, गुळ इत्यादी मिळोत,' तर ते सर्व त्यांनाच प्राप्त होते. 'सेनासने वा' (किंवा सेनासनाच्या बाबतीत) म्हणजे— 'मी बांधलेल्या विहारात किंवा परिवेणात जो राहतो, त्याला हे मिळो' असे म्हटले असता, ते त्यालाच प्राप्त होते. 'भेसज्जे वा' (किंवा औषधाच्या बाबतीत) म्हणजे— 'आम्ही वेळोवेळी स्थविरांना तूप इत्यादी औषधे देतो, ज्यांना ती मिळाली आहेत, त्यांनाच हे मिळो' असे म्हटले असता, ते त्यांनाच प्राप्त होते. ปุคฺคลสฺส เทตีติ ‘‘อิมํ จีวรํ อิตฺถนฺนามสฺส ทมฺมี’’ติ เอวํ ปรมฺมุขา วา ปาทมูเล ฐเปตฺวา ‘‘อิมํ ภนฺเต ตุมฺหากํ ทมฺมี’’ติ เอวํ สมฺมุขา วา เทติ. สเจ ปน ‘‘อิทํ ตุมฺหากญฺจ ตุมฺหากํ อนฺเตวาสิกานญฺจ ทมฺมี’’ติ เอวํ วทติ, เถรสฺส จ อนฺเตวาสิกานญฺจ ปาปุณาติ. อุทฺเทสํ คเหตุํ อาคโต คเหตฺวา คจฺฉนฺโต จ อตฺถิ, ตสฺสาปิ ปาปุณาติ. ‘‘ตุมฺเหหิ สทฺธึ นิพทฺธจาริกภิกฺขูนํ ทมฺมี’’ติ วุตฺเต อุทฺเทสนฺเตวาสิกานํ วตฺตํ กตฺวา อุทฺเทสปริปุจฺฉาทีนิ คเหตฺวา วิจรนฺตานํ สพฺเพสํ ปาปุณาติ. อยํ ปุคฺคลสฺส เทตีติ อิมสฺมึ ปเท วินิจฺฉโย. เสสํ สพฺพตฺถ อุตฺตานเมวาติ. 'पुग्गलस्स देति' (व्यक्तीला देणे) म्हणजे— 'मी हे चीवर अमुक नावाच्या भिक्खूला देत आहे' असे परोक्षपणे म्हणणे, किंवा पायांजवळ ठेवून 'भंते, मी हे आपल्याला देत आहे' असे प्रत्यक्षपणे देणे. परंतु, जर तो म्हणतो की, 'हे आपल्याला आणि आपल्या अंतेवासिकांना (शिष्यांना) देत आहे,' तर ते स्थविराला आणि त्यांच्या अंतेवासिकांना प्राप्त होते. उद्देश (पाठ) शिकण्यासाठी आलेला किंवा शिकून जाणारा जो शिष्य असेल, त्यालाही ते प्राप्त होते. 'आपल्यासोबत नेहमी फिरणाऱ्या भिक्खूंना देत आहे' असे म्हटले असता, उद्देश शिकणाऱ्या अंतेवासिकांना, कर्तव्ये करून उद्देश-परिपृच्छा इत्यादी ग्रहण करून फिरणाऱ्या सर्व भिक्खूंना ते प्राप्त होते. 'पुग्गलस्स देति' या पदाचा हा निर्णय आहे. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. จีวรกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. चीवरक्खंधक-वर्णना समाप्त झाली. ๙. จมฺเปยฺยกฺขนฺธกํ ९. चम्पेय्यक्खंधक กสฺสปโคตฺตภิกฺขุวตฺถุกถา कस्सपगोत्त भिक्खूची कथा ๓๘๐. จมฺเปยฺยกฺขนฺธเก [Pg.427] – คคฺคราย โปกฺขรณิยา ตีเรติ คคฺครานามิกาย อิตฺถิยา การิตโปกฺขรณิยา ตีเร. ตนฺติพทฺโธติ ตสฺมึ อาวาเส กตฺตพฺพตาตนฺติปฏิพทฺโธ. อุสฺสุกฺกมฺปิ อกาสิ ยาคุยาติอาทีสุ มนุสฺเสหิ อาคนฺตุเกสุ อาคเตสุ อาจิกฺเขยฺยาถาติ วุตฺตฏฺฐาเนเยว อุสฺสุกฺกํ กาตุํ วฏฺฏติ; น อวุตฺตฏฺฐาเน. คจฺฉ ตฺวํ ภิกฺขูติ สตฺถา ตสฺส ภิกฺขุโน ตตฺเถว เสนาสนํ สปฺปายนฺติ อทฺทส, เตเนวมาห. ३८०. चम्पेय्यक्खंधकामध्ये— 'गग्गराय पोक्खरणिया तीरे' म्हणजे गग्गरा नावाच्या स्त्रीने बांधलेल्या तलावाच्या काठावर. 'तन्तिबद्धो' म्हणजे त्या आवासामध्ये करावयाच्या कर्तव्यांच्या बंधनाशी बांधलेला (काळजी घेणारा). 'उस्सुक्कम्पि अकासि यागुया' इत्यादी वाक्यांमध्ये— लोकांनी 'आगंतुक (नवीन आलेले भिक्खू) आले असता आम्हाला सांगावे' असे सांगितलेल्या ठिकाणीच उत्सुकता (काळजी) करणे योग्य आहे; न सांगितलेल्या ठिकाणी नाही. 'जा तू, भिक्खू' (गच्छ त्वं भिक्खु) असे शास्त्यांनी (बुद्धांनी) त्या भिक्खूसाठी तेथीलच सेनासन अनुकूल असल्याचे पाहिले, म्हणून त्यांनी असे म्हटले. ๓๘๒. อธมฺเมน วคฺคกมฺมํ กโรนฺตีติอาทีนํ ปรโต ปาฬิยํเยว นานากรณํ อาคมิสฺสติ. ३८२. 'अधम्मेन वग्गकम्मं करोन्ति' (अधर्माने वर्गकर्म करतात) इत्यादींचे वर्गीकरण पुढे पाळीमध्येच (मूळ पाठातच) येईल. ๓๘๕. อญฺญตฺราปิ ธมฺมา กมฺมํ กโรนฺตีติ อญฺญตฺราปิ ธมฺมํ กมฺมํ กโรนฺติ, อยเมว วา ปาโฐ. ภูเตน วตฺถุนา กตํ ธมฺเมน กตํ นาม โหติ, ตถา น กโรนฺตีติ อตฺโถ. อญฺญตฺราปิ วินยา กมฺมํ, อญฺญตฺราปิ สตฺถุสาสนา กมฺมนฺติ เอเตสุปิ เอเสว นโย. เอตฺถ ปน วินโยติ โจทนา จ สารณา จ. สตฺถุสาสนนฺติ ญตฺติสมฺปทา อนุสฺสาวนสมฺปทา จ; ตาหิ วินา กมฺมํ กโรนฺตีติ อตฺโถ. ปฏิกุฏฺฐกตนฺติ ปฏิกุฏฺฐญฺเจว กตญฺจ; ยํ อญฺเญสุ ปฏิกฺโกสนฺเตสุ กตํ ตํ ปฏิกุฏฺฐญฺเจว โหติ กตญฺจ; ตาทิสมฺปิ กมฺมํ กโรนฺตีติ อตฺโถ. ३८५. 'अञ्ञत्रापि धम्मा कम्मं करोन्ति' म्हणजे धर्माला सोडूनही कर्म करतात, किंवा हाच पाठ आहे. सत्य कारणाने केलेले कर्म 'धर्माने केलेले' (धम्मेन कत) असे म्हटले जाते, ते तसे करत नाहीत, असा अर्थ आहे. 'अञ्ञत्रापि विनया कम्मं' (विनयाशिवाय कर्म) आणि 'अञ्ञत्रापि सत्थुशासना कम्मं' (शास्त्यांच्या शासनाशिवाय कर्म) यांमध्येही हाच नियम आहे. येथे 'विनय' म्हणजे चोदना (दोष दाखवणे) आणि सारणा (स्मरण करून देणे) होय. 'सत्थुसासन' (शास्त्यांचे शासन) म्हणजे ज्ञत्ति-संपदा आणि अनुस्सावन-संपदा होय; त्यांच्याशिवाय कर्म करतात, असा अर्थ आहे. 'पटिकुट्ठकतं' म्हणजे निषिद्ध केलेले आणि केलेले; जे इतरांनी विरोध करत असताना केले गेले, ते निषिद्धही असते आणि केलेलेही असते; तशा प्रकारचेही कर्म करतात, असा अर्थ आहे. ๓๘๗. ฉยิมานิ ภิกฺขเว กมฺมานิ อธมฺมกมฺมนฺติอาทีสุ ปน ‘‘ธมฺโม’’ติ ปาฬิยา อธิวจนํ. ตสฺมา ยํ ยถาวุตฺตาย ปาฬิยา น กริยติ, ตํ อธมฺมกมฺมนฺติ เวทิตพฺพํ. อยเมตฺถ สงฺเขโป, วิตฺถาโร ปน ปาฬิยํเยว อาคโต. โส จ โข ญตฺติทุติยญตฺติจตุตฺถกมฺมานํเยว วเสน. ยสฺมา ปน ญตฺติกมฺเม ญตฺติทุติยญตฺติจตุตฺเถสุ วิย หาปนํ วา อญฺญถา กรณํ วา นตฺถิ, อปโลกนกมฺมญฺจ สาเวตฺวาว กริยติ, ตสฺมา ตานิ ปาฬิยํ น ทสฺสิตานิ, เตสํ สพฺเพสมฺปิ กมฺมานํ วินิจฺฉยํ ปรโต วณฺณยิสฺสาม. ३८७. 'भिक्खूंनो, ही सहा कर्मे अधर्मकर्मे आहेत' इत्यादी वाक्यांमध्ये, 'धम्म' हे पाळीचे (पाठाचे) नाव आहे. म्हणून, जे वर सांगितलेल्या पाळीनुसार केले जात नाही, ते 'अधर्मकर्म' समजावे. हा येथे संक्षेप आहे, विस्तार तर पाळीमध्येच आला आहे. आणि तो केवळ ज्ञत्ति-दुतीय आणि ज्ञत्ति-चतुत्थ कर्मांच्या संदर्भातच आहे. परंतु, ज्या अर्थी ज्ञत्ति-कर्मामध्ये, ज्ञत्ति-दुतीय आणि ज्ञत्ति-चतुत्थ कर्मांप्रमाणे काही कमी करणे किंवा बदल करणे शक्य नाही, आणि अपलोकन-कर्म देखील ऐकवूनच केले जाते, म्हणून ते पाळीमध्ये विस्ताराने दाखवले गेले नाहीत. त्या सर्व कर्मांचा निर्णय आम्ही पुढे स्पष्ट करू. จตุวคฺคกรณาทิกถา चतुवग्गकरण-आदि-कथा ๓๘๘. อิทานิ [Pg.428] ยทิทํ ฉฏฺฐํ ธมฺเมน สมคฺคกมฺมํ นาม, ตํ เยหิ สงฺเฆหิ กาตพฺพํ, เตสํ ปเภทํ ทสฺเสตุํ ‘‘ปญฺจ สงฺฆา’’ติอาทิ วุตฺตํ. กมฺมปฺปตฺโตติ กมฺมํ ปตฺโต, กมฺมยุตฺโต กมฺมารโห; น กิญฺจิ กมฺมํ กาตุํ นารหตีติ อตฺโถ. ३८८. आता, जे हे सहावे 'धम्माने समग्रकर्म' (धम्मेन समग्गकम्म) नावाचे कर्म आहे, ते ज्या संघांनी केले पाहिजे, त्यांचे प्रकार दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी 'पंच संघा' (पंच संघा) इत्यादी वचन म्हटले आहे. 'कम्मप्पत्तो' (कर्मप्राप्त) म्हणजे कर्माप्रत पोहोचलेला, कर्मयुक्त, कर्मार्ह (कर्मासाठी योग्य); तो कोणतेही कर्म करण्यास अयोग्य नाही (अर्थात तो योग्यच आहे), असा अर्थ आहे. ๓๘๙. จตุวคฺคกรณญฺเจ ภิกฺขเว กมฺมํ ภิกฺขุนิจตุตฺโถติอาทิ ปริสโต กมฺมวิปตฺติทสฺสนตฺถํ วุตฺตํ. ตตฺถ อุกฺขิตฺตกคฺคหเณน กมฺมนานาสํวาสโก คหิโต, นานาสํวาสกคฺคหเณน ลทฺธินานาสํวาสโก. นานาสีมาย ฐิตจตุตฺโถติ สีมนฺตริกาย วา พหิสีมาย วา หตฺถปาเส ฐิเตนาปิ สทฺธึ จตุวคฺโค หุตฺวาติ อตฺโถ. ३८९. भगवंतांनी 'हे भिक्खूंनो, चार वर्गांच्या समूहाने करायचे कर्म आणि भिक्खुणी चौथी असलेली' इत्यादी वचन परिषदेच्या (उपस्थितीच्या) कारणाने कर्माची विपत्ती (अयशस्वीता) दर्शवण्यासाठी म्हटले आहे. त्यामध्ये, 'उक्खित्तक' (उत्क्षिप्तक - बहिष्कृत) या शब्दाच्या ग्रहणाने कर्मामुळे नानासंवासक (वेगळा संवास असलेला) भिक्खू घेतला आहे, आणि 'नानासंवासक' या शब्दाच्या ग्रहणाने मतामुळे (दृष्टीमुळे) नानासंवासक झालेला भिक्खू घेतला आहे. 'नानासीमांमध्ये स्थित असलेला चौथा' म्हणजे सीमेच्या अंतराळात (सीमान्तरिकेत) किंवा सीमेबाहेर हातभर अंतरावर (हत्थपासामध्ये) राहिलेल्या भिक्खूसह मिळून चार जणांचा वर्ग (समूह) बनणे, असा अर्थ आहे. ๓๙๓. ปาริวาสิกจตุตฺโถติอาทิ ปริวาสาทิกมฺมานํเยว ปริสโต วิปตฺติทสฺสนตฺถํ วุตฺตํ, เตสํ วินิจฺฉยํ ปรโต วณฺณยิสฺสาม. ३९३. 'पारिवासिक चौथा' इत्यादी वचन परिवास इत्यादी कर्मांच्याच परिषदेच्या कारणाने होणारी विपत्ती दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी म्हटले आहे; त्यांचा निर्णय आम्ही पुढे (चुलवग्गात) स्पष्ट करू. ๓๙๔. เอกจฺจสฺส ภิกฺขเว สงฺฆมชฺเฌ ปฏิกฺโกสนา รุหตีติอาทิ ปฏิกุฏฺฐกตกมฺมสฺส กุปฺปากุปฺปภาวทสฺสนตฺถํ วุตฺตํ. ปกตตฺตสฺสาติ อวิปนฺนสีลสฺส ปาราชิกํ อนชฺฌาปนฺนสฺส. อานนฺตริกสฺสาติ อตฺตโน อนนฺตรํ นิสินฺนสฺส. ३९४. 'हे भिक्खूंनो, संघामध्ये काही एकाचा निषेध प्रभावी ठरतो' इत्यादी वचन निषिद्ध केलेल्या आणि केलेल्या कर्माची वैधता किंवा अवैधता (कुप्प-अकुप्प भाव) दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी म्हटले आहे. 'पकतत्तस्स' (प्रकृतात्म्याचा) म्हणजे ज्याचे शील खंडित झाले नाही अशा आणि पाराजिकापत्तीत न पडलेल्या भिक्खूचे. 'आनन्तरिकस्स' (लगतच्या) म्हणजे स्वतःच्या अगदी जवळ (लगत) बसलेल्या भिक्खूचे. ทฺเวนิสฺสารณาทิกถา द्वेनिस्सारण-आदि-कथा ๓๙๕. ทฺเวมา ภิกฺขเว นิสฺสารณาติอาทิ วตฺถุโต กมฺมานํ กุปฺปากุปฺปภาวทสฺสนตฺถํ วุตฺตํ. ตตฺถ ‘‘อปฺปตฺโต นิสฺสารณํ, ตญฺเจ สงฺโฆ นิสฺสาเรติ, สุนิสฺสาริโต’’ติ อิทํ ปพฺพาชนียกมฺมํ สนฺธาย วุตฺตํ. ปพฺพาชนียกมฺเมน หิ วิหารโต นิสฺสาเรนฺติ, ตสฺมา ตํ ‘‘นิสฺสารณา’’ติ วุจฺจติ. ตญฺเจส ยสฺมา กุลทูสโก น โหติ, ตสฺมา อาเวณิเกน ลกฺขเณน อปฺปตฺโต. ยสฺมา ปนสฺส อากงฺขมาโน สงฺโฆ ปพฺพาชนียกมฺมํ กเรยฺยาติ วุตฺตํ, ตสฺมา สุนิสฺสาริโต โหติ. ตญฺเจ สงฺโฆ นิสฺสาเรตีติ สเจ สงฺโฆ ตชฺชนียกมฺมาทิวเสน นิสฺสาเรติ, โส ยสฺมา ตตฺถ ‘‘ติณฺณํ ภิกฺขเว ภิกฺขูนํ อากงฺขมาโน สงฺโฆ ตชฺชนียกมฺมํ กเรยฺย – เอโก ภณฺฑนการโก โหติ กลหการโก วิวาทการโก ภสฺสการโก สงฺเฆ อธิกรณการโก, เอโก พาโล [Pg.429] โหติ อพฺยตฺโต อาปตฺติพหุโล อนปทาโน, เอโก คิหิสํสฏฺโฐ วิหรติ อนนุโลมิเกหิ คิหิสํสคฺเคหี’’ติ (จูฬว. ๓๙๕) เอวํ เอเกเกนปิ องฺเคน นิสฺสารณา อนุญฺญาตา, ตสฺมา สุนิสฺสาริโต. ३९५. 'हे भिक्खूंनो, ही दोन निष्कासने (निस्सारण) आहेत' इत्यादी वचन व्यक्तीच्या (वस्तूच्या) कारणाने कर्मांची वैधता किंवा अवैधता दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी म्हटले आहे. त्यामध्ये, 'जो निष्कासनास पात्र नाही, तरीही संघाने त्याला निष्कासित केले तर तो सुनिष्कासित (योग्य प्रकारे निष्कासित) आहे' हे वचन प्रव्राजनीय कर्माला (पब्बापनीयकम्म) उद्देशून म्हटले आहे. कारण प्रव्राजनीय कर्माद्वारे विहारातून निष्कासित केले जाते, म्हणून त्याला 'निस्सारण' असे म्हणतात. आणि तो भिक्खू ज्या अर्थी कुलदूषक (कुळांना दूषित करणारा) नाही, त्या अर्थी तो प्रव्राजनीय कर्माच्या विशिष्ट लक्षणाने निष्कासनास अप्राप्त (अपात्र) आहे. परंतु, ज्या अर्थी संघाने इच्छिले तर त्याच्यावर प्रव्राजनीय कर्म करावे, असे म्हटले आहे, त्यामुळे तो सुनिष्कासित ठरतो. 'आणि जर संघ त्याला निष्कासित करतो' म्हणजे जर संघ तर्जनीय कर्म इत्यादींच्या द्वारे निष्कासित करतो, तर तो ज्या अर्थी तिथे 'हे भिक्खूंनो, तीन प्रकारच्या भिक्खूंच्या बाबतीत संघाने इच्छिले तर तर्जनीय कर्म करावे – एक जो भांडखोर, कलह करणारा, वाद घालणारा, बडबड करणारा, संघात अधिकरण निर्माण करणारा असतो; एक जो अज्ञानी, अव्यक्त (अकुशल), अनेक आपत्तींनी युक्त आणि मर्यादा नसलेला असतो; आणि एक जो गृहस्थांशी अयोग्य संबंध ठेवून गृहस्थ-संसर्गात राहतो' अशा प्रकारे एका-एका कारणाने (अंगाने) देखील निष्कासन अनुमत केले आहे, म्हणून तो सुनिष्कासित ठरतो. ๓๙๖. โอสารณาติ ปเวสนา. ตตฺถ ตญฺเจ สงฺโฆ โอสาเรตีติ อุปสมฺปทกมฺมวเสน ปเวเสติ. โทสาริโตติ ทุโอสาริโต. สหสฺสกฺขตฺตุมฺปิ อุปสมฺปาทิโต อนุปสมฺปนฺโนว โหติ อาจริยุปชฺฌายา จ สาติสารา, ตถา เสโส การกสงฺโฆ, น โกจิ อาปตฺติโต มุจฺจติ. อิติ อิเม เอกาทส อภพฺพปุคฺคลา โทสาริตา. หตฺถจฺฉินฺนาทโย ปน ทฺวตฺตึส สุโอสาริตา, อุปสมฺปาทิตา อุปสมฺปนฺนาว โหนฺติ, น เต ลพฺภา กิญฺจิ วตฺตุํ. อาจริยุปชฺฌายา ปน การกสงฺโฆ จ สาติสารา, น โกจิ อาปตฺติโต มุจฺจติ. ३९६. 'ओसारणा' म्हणजे प्रवेश देणे (समाविष्ट करणे). त्यामध्ये 'जर संघ त्याला ओसारित करतो' म्हणजे उपसंपदा कर्माच्या द्वारे प्रवेश देतो. 'दोसारित' म्हणजे चुकीच्या पद्धतीने प्रवेश दिलेला. हजार वेळा उपसंपदा दिली तरीही तो अनुपसंपन्नच (उपसंपदा न मिळालेलाच) राहतो, आणि आचार्य व उपाध्याय हे दोघेही दोषासह (सातिसार) होतात; तसेच उर्वरित कार्य करणारा संघ देखील सातिसार होतो, कोणीही आपत्तीतून मुक्त होत नाही. अशा प्रकारे हे अकरा अभव्य पुद्गल (अपात्र व्यक्ती) चुकीच्या पद्धतीने प्रवेश दिलेले (दोसारित) आहेत. परंतु हात कापलेले इत्यादी बत्तीस पुद्गल हे सुओसारित (योग्य प्रकारे प्रवेश दिलेले) आहेत; त्यांना उपसंपदा दिली असता ते उपसंपन्नच होतात, त्यांच्याविषयी काहीही दोष बोलता येत नाही. परंतु आचार्य, उपाध्याय आणि कार्य करणारा संघ हे सातिसार (दोषयुक्त) होतात, आणि कोणीही आपत्तीतून मुक्त होत नाही. ๓๙๗. อิธ ปน ภิกฺขเว ภิกฺขุสฺส น โหติ อาปตฺติ ทฏฺฐพฺพาติอาทิ อภูตวตฺถุวเสน อธมฺมกมฺมํ, ภูตวตฺถุวเสน ธมฺมกมฺมญฺจ ทสฺเสตุํ วุตฺตํ. ตตฺถ ปฏินิสฺสชฺชิตาติ ปฏินิสฺสชฺชิตพฺพา. ३९७. 'परंतु येथे, हे भिक्खूंनो, भिक्खूची आपत्ती पाहिली जाऊ नये' इत्यादी वचन असत्य (अविद्यमान) घटनेच्या आधारे अधर्मकर्म दर्शवण्यासाठी, आणि सत्य (विद्यमान) घटनेच्या आधारे धर्मकर्म दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी म्हटले आहे. त्यामध्ये 'पटिनिस्सज्जिता' म्हणजे त्याग करण्यास योग्य (त्याज्य). อุปาลิปุจฺฉากถา उपालि-पृच्छा-कथा ๔๐๐. อุปาลิปญฺเหสุปิ วตฺถุวเสเนว ธมฺมาธมฺมกมฺมํ วิภตฺตํ. ตตฺถ ทฺเว นยา – เอกมูลโก จ ทฺวิมูลโก จ. เอกมูลโก อุตฺตาโนเยว. ทฺวิมูลเก ยถา สติวินโย อมูฬฺหวินเยน สทฺธึ เอกา ปุจฺฉา กตา, เอวํ อมูฬฺหวินยาทโยปิ ตสฺสปาปิยฺยสิกาทีหิ. อวสาเน ปน อุปสมฺปทารหํ อุปสมฺปาเทตีติ เอกเมว ปทํ โหติ. ปรโต ภิกฺขูนมฺปิ สติวินยํ อาทึ กตฺวา เอเกเกน สทฺธึ เสสปทานิ โยเชตพฺพานิ. ४००. उपालिच्या प्रश्नांमध्ये देखील भगवंतांनी घटनेच्या (वस्तूच्या) आधारेच धर्मकर्म आणि अधर्मकर्म यांचे विभाजन केले आहे. त्यामध्ये दोन पद्धती (नय) आहेत – एकमूलक आणि द्विमूलक. एकमूलक पद्धत अगदी स्पष्टच आहे. द्विमूलक पद्धतीमध्ये ज्याप्रमाणे 'सतिविनय' हा 'अमूळ्हविनया'सोबत मिळून एक प्रश्न विचारला गेला आहे, त्याचप्रमाणे 'अमूळ्हविनय' इत्यादी देखील 'तस्सपापिय्यसिक' इत्यादींसोबत मिळून एकेक प्रश्न विचारले गेले आहेत. परंतु शेवटी 'उपसंपदेस योग्य असलेल्याला उपसंपदा देतो' हे एकच पद उरते. त्यानंतर भिक्खूंच्या बाबतीत देखील 'सतिविनया'पासून सुरुवात करून एकेका पदासोबत उर्वरित पदे जोडली पाहिजेत. ตชฺชนียกมฺมกถา तज्जनीय-कर्म-कथा ๔๐๗. อิธ ปน ภิกฺขเว ภิกฺขุ ภณฺฑนการโกติอาทิ ‘‘อธมฺเมนวคฺคํ, อธมฺเมนสมคฺคํ; ธมฺเมนวคฺคํ, ธมฺมปติรูปเกนวคฺคํ, ธมฺมปติรูปเกนสมคฺค’’นฺติ อิเมสํ วเสน จกฺกํ พนฺธิตฺวา ตชฺชนียาทีสุ สตฺตสุ กมฺเมสุ ปฏิปสฺสทฺธีสุ จ [Pg.430] วิปตฺติทสฺสนตฺถํ วุตฺตํ. ตตฺถ อนปทาโนติ อปทานวิรหิโต. อปทานํ วุจฺจติ ปริจฺเฉโท; อาปตฺติปริจฺเฉทวิรหิโตติ อตฺโถ. ตโต ปรํ ปฏิกุฏฺฐกตกมฺมปฺปเภทํ ทสฺเสตุํ สาเยว ปาฬิ ‘‘อกตํ กมฺม’’นฺติอาทีหิ สํสนฺทิตฺวา วุตฺตา. ตตฺถ น กิญฺจิ ปาฬิอนุสาเรน น สกฺกา วิทิตุํ, ตสฺมา วณฺณนํ น วิตฺถารยิมฺหาติ. ४०७. 'परंतु येथे, हे भिक्खूंनो, भिक्खू भांडखोर असतो' इत्यादी वचन 'अधर्माने वर्ग (असमग्र), अधर्माने समग्र; धर्माने वर्ग, धर्मप्रतिरूपकाने वर्ग, धर्मप्रतिरूपकाने समग्र' यांच्या आधारे चक्र तयार करून, तर्जनीय इत्यादी सात कर्मांमध्ये आणि त्यांच्या शांत होण्याच्या कर्मांमध्ये देखील विपत्ती दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी म्हटले आहे. त्यामध्ये 'अनपदानो' म्हणजे अपदानरहित. अपदान म्हणजे मर्यादा (परिच्छेद); आपत्तीच्या मर्यादेपासून रहित असलेला, असा अर्थ आहे. त्यानंतर, निषिद्ध केलेल्या आणि केलेल्या कर्माचे प्रकार दर्शवण्यासाठी तीच पाळी 'अकते कम्मं' इत्यादी वचनांशी जोडून भगवंतांनी सांगितली आहे. त्यामध्ये पाळीच्या अनुषंगाने समजून घेता येणार नाही असे काहीही नाही, म्हणून आम्ही या वर्णनाचा विस्तार केला नाही. จมฺเปยฺยกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. चम्पेय्य-खन्धक-वर्णना समाप्त झाली. ๑๐. โกสมฺพกกฺขนฺธกํ १०. कोसम्बक-खन्धक โกสมฺพกวิวาทกถา कोसम्बक-विवाद-कथा ๔๕๑. โกสมฺพกกฺขนฺธเก [Pg.431] – ตํ ภิกฺขุํ อาปตฺติยา อทสฺสเน อุกฺขิปึสูติ เอตฺถ อยมนุปุพฺพิกถา – ทฺเว กิร ภิกฺขู เอกสฺมึ อาวาเส วสนฺติ วินยธโร จ สุตฺตนฺติโก จ. เตสุ สุตฺตนฺติโก ภิกฺขุ เอกทิวสํ วจฺจกุฏึ ปวิฏฺโฐ อาจมนอุทกาวเสสํ ภาชเน ฐเปตฺวาว นิกฺขมิ. วินยธโร ปจฺฉา ปวิฏฺโฐ ตํ อุทกํ ทิสฺวา นิกฺขมิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ ปุจฺฉิ – ‘‘อาวุโส, ตยา อิทํ อุทกํ ฐปิต’’นฺติ? ‘‘อามาวุโส’’ติ. ‘‘กึ ตฺวํ เอตฺถ อาปตฺติภาวํ น ชานาสี’’ติ? ‘‘อาม, น ชานามี’’ติ. ‘‘โหติ, อาวุโส เอตฺถ อาปตฺตี’’ติ? ‘‘สเจ โหติ, เทสิสฺสามี’’ติ. ‘‘สเจ ปน เต, อาวุโส, อสญฺจิจฺจ อสติยา กตํ, นตฺถิ อาปตฺตี’’ติ. โส ตสฺสา อาปตฺติยา อนาปตฺติทิฏฺฐิ อโหสิ. ४५१. कोसम्बक खन्धकामध्ये – 'त्या भिक्खूला आपत्ती न मानल्यामुळे बहिष्कृत केले' या संदर्भात ही अनुक्रमिक कथा आहे – असे म्हटले जाते की, एका विहारात दोन भिक्खू राहत होते, एक विनयधर (विनयपिटक जाणणारा) आणि एक सुत्तन्तिक (सुत्तपिटक जाणणारा). त्यांच्यापैकी सुत्तन्तिक भिक्खू एके दिवशी शौचालयात गेला आणि आचमनाचे (शौचविधीनंतरचे) उरलेले पाणी पात्रात तसेच ठेवून बाहेर आला. त्यानंतर विनयधर भिक्खू आत गेला, त्याने ते पाणी पाहिले आणि बाहेर येऊन त्या भिक्खूला विचारले – 'आयुष्यमान, हे पाणी आपण ठेवले आहे का?' 'होय, आयुष्यमान.' 'यात आपत्ती (दोष) होते हे आपल्याला माहीत नाही का?' 'होय, मला माहीत नाही.' 'आयुष्यमान, यात आपत्ती होते.' 'जर आपत्ती होत असेल, तर मी देशना (प्रायश्चित्त) करीन.' 'परंतु आयुष्यमान, जर आपल्याकडून हे नकळत आणि विस्मरणामुळे झाले असेल, तर आपत्ती होत नाही.' त्यामुळे त्या भिक्खूची त्या आपत्तीच्या बाबतीत 'अनापत्ती' (दोष नाही) अशी दृष्टी झाली. วินยธโรปิ อตฺตโน นิสฺสิตกานํ ‘‘อยํ สุตฺตนฺติโก อาปตฺตึ อาปชฺชมาโนปิ น ชานาตี’’ติ อาโรเจสิ. เต ตสฺส นิสฺสิตเก ทิสฺวา ‘‘ตุมฺหากํ อุปชฺฌาโย อาปตฺตึ อาปชฺชิตฺวาปิ อาปตฺติภาวํ น ชานาตี’’ติ อาหํสุ. เต คนฺตฺวา อตฺตโน อุปชฺฌายสฺส อาโรเจสุํ. โส เอวมาห – ‘‘อยํ วินยธโร ปุพฺเพ อนาปตฺตี’’ติ วตฺวา ‘‘อิทานิ อาปตฺตี’’ติ วทติ. มุสาวาที เอโสติ. เต คนฺตฺวา ‘‘ตุมฺหากํ อุปชฺฌาโย มุสาวาที’’ติ เอวํ อญฺญมญฺญํ กลหํ วฑฺฒยึสุ. ตโต วินยธโร โอกาสํ ลภิตฺวา ตสฺส อาปตฺติยา อทสฺสเน อุกฺเขปนียกมฺมํ อกาสิ. เตน วุตฺตํ – ‘‘ตํ ภิกฺขุํ อาปตฺติยา อทสฺสเน อุกฺขิปึสู’’ติ. विनयधर भिक्खूनेही आपल्या आश्रित भिक्खूंना सांगितले की, 'हा सुत्तंतिक (सूत्रांचे अध्ययन करणारा) आपत्तीला (नियमाच्या उल्लंघनाला) प्राप्त होऊनही ते जाणत नाही.' त्यांनी (विनयधराच्या शिष्यांनी) त्या सुत्तंतिकाच्या आश्रित भिक्खूंना पाहून म्हटले, 'तुमचे उपाध्याय आपत्तीला प्राप्त होऊनही आपत्तीची स्थिती जाणत नाहीत.' त्यांनी जाऊन आपल्या उपाध्यायांना हे सांगितले. ते (सुत्तंतिक) असे म्हणाले, 'हा विनयधर पूर्वी 'आपत्ती नाही' असे म्हणून आता 'आपत्ती आहे' असे म्हणत आहे. हा खोटा बोलणारा (मृषावादी) आहे.' त्यांनी जाऊन 'तुमचे उपाध्याय खोटे बोलणारे आहेत' असे म्हणून आपापसात भांडण वाढवले. त्यानंतर विनयधराने संधी मिळवून, त्या सुत्तंतिक भिक्खूने आपली आपत्ती न स्वीकारल्यामुळे (अदर्शनामुळे) त्याच्यावर उक्खेपनीय कम्म (संघातून बहिष्कृत करण्याचे कर्म) केले. म्हणूनच संगीतिकारांनी म्हटले आहे— 'त्या भिक्खूला आपत्ती न स्वीकारल्यामुळे संघातून बहिष्कृत केले.' ๔๕๓. ภินฺโน ภิกฺขุสงฺโฆ ภินฺโน ภิกฺขุสงฺโฆติ เอตฺถ น ตาว ภินฺโน; อปิจ โข ยถา เทเว วุฏฺเฐ ‘‘อิทานิ สสฺสํ นิปฺผนฺน’’นฺติ วุจฺจติ, อวสฺสญฺหิ ตํ นิปฺผชฺชิสฺสติ, เอวเมว อิมินา การเณน อายตึ อวสฺสํ ภิชฺชิสฺสติ, โส จ โข กลหวเสน น สงฺฆเภทวเสน, ตสฺมา ‘‘ภินฺโน’’ติ วุตฺตํ. สมฺภมอตฺถวเสน เจตฺถ อาเมฑิตํ เวทิตพฺพํ. ४५३. 'भिक्खू संघ दुभंगला, भिक्खू संघ दुभंगला' या वाक्यात संघ अजून खरोखरच दुभंगलेला नाही. परंतु, जसे पाऊस पडल्यावर 'आता पीक तयार झाले आहे' असे म्हटले जाते, कारण ते पीक नक्कीच तयार होणार असते; त्याचप्रमाणे, या कारणामुळे भविष्यात संघ नक्कीच दुभंगणार आहे. आणि तो कलहाच्या (भांडणाच्या) प्रभावाने दुभंगेल, संघभेदाच्या कर्माने नाही. म्हणूनच भगवंतांनी 'दुभंगला' असे म्हटले आहे. येथे घाई किंवा चिंतेच्या अर्थाने शब्दाची पुनरावृत्ती (आमेडित) झाली आहे असे समजावे. ๔๕๔. เอตมตฺถํ [Pg.432] ภาสิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกามีติ กสฺมา เอวํ ภาสิตฺวา ปกฺกามิ? สเจ หิ ภควา อุกฺเขปเก วา ‘‘อการเณ ตุมฺเหหิ โส ภิกฺขุ อุกฺขิตฺโต’’ติ วเทยฺย, อุกฺขิตฺตานุวตฺตเก วา ‘‘ตุมฺเห อาปตฺตึ อาปนฺนา’’ติ วเทยฺย, ‘‘เอเตสํ ภควา ปกฺโข, เอเตสํ ภควา ปกฺโข’’ติ วตฺวา อาฆาตํ พนฺเธยฺยุํ, ตสฺมา ตนฺติเมว ฐเปตฺวา เอตมตฺถํ ภาสิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ปกฺกามิ. ४५४. 'हा अर्थ सांगून आसनावरून उठून निघून गेले'—भगवंत असे बोलून का निघून गेले? कारण जर भगवंतांनी बहिष्कृत करणाऱ्या (उक्खेपक) भिक्खूंना म्हटले असते की, 'तुम्ही विनाकारण त्या भिक्खूला बहिष्कृत केले आहे,' किंवा बहिष्कृत भिक्खूचे समर्थन करणाऱ्यांना (उक्खित्तानुवत्तक) म्हटले असते की, 'तुम्ही आपत्तीला प्राप्त झाला आहात,' तर 'भगवंत यांच्या बाजूचे आहेत, भगवंत त्यांच्या बाजूचे आहेत' असे म्हणून त्यांनी मनात द्वेष धरला असता. म्हणूनच, केवळ पाठाचा नियम प्रस्थापित करून, हा अर्थ सांगून भगवंत आसनावरून उठून निघून गेले. ๔๕๕. อตฺตนา วา อตฺตานนฺติ เอตฺถ โย สงฺเฆน อุกฺเขปนียกตานํ อธมฺมวาทีนํ ปกฺเข นิสินฺโน ‘‘ตุมฺเห กึ ภณถา’’ติ เตสญฺจ อิตเรสญฺจ ลทฺธึ สุตฺวา ‘‘อิเม อธมฺมวาทิโน, อิตเร ธมฺมวาทิโน’’ติ จิตฺตํ อุปฺปาเทติ, อยํ เตสํ มชฺเฌ นิสินฺโนว เตสํ นานาสํวาสโก โหติ, กมฺมํ โกเปติ, อิตเรสมฺปิ หตฺถปาสํ อนาคตตฺตา โกเปติ. เอวํ อตฺตนา วา อตฺตานํ นานาสํวาสกํ กโรติ. สมานสํวาสกนฺติ เอตฺถาปิ โย อธมฺมวาทีนํ ปกฺเข นิสินฺโน ‘‘อธมฺมวาทิโน อิเม, อิตเร ธมฺมวาทิโน’’ติ เตสํ มชฺฌํ ปวิสติ, ยตฺถ วา ตตฺถ วา ปน ปกฺเข นิสินฺโน ‘‘อิเม ธมฺมวาทิโน’’ติ คณฺหาติ, อยํ อตฺตนา วา อตฺตานํ สมานสํวาสกํ กโรตีติ เวทิตพฺโพ. ४५५. 'स्वतःच स्वतःला' या वाक्याचा अर्थ असा समजावा: जो भिक्खू संघाने उक्खेपनीय कम्म केलेल्या अधम्मवादी भिक्खूंच्या बाजूला बसून 'तुम्ही काय म्हणत आहात?' असे विचारतो, आणि त्यांचे व इतरांचे मत ऐकून 'हे अधम्मवादी आहेत आणि इतर धम्मवादी आहेत' असा विचार मनात आणतो, तो त्यांच्यामध्ये बसलेला असूनही त्यांच्यासाठी 'नानासंवासक' (वेगळ्या संवासाचा) बनतो आणि कर्माला बिघडवतो, तसेच इतरांच्या हस्तपासात (शारीरिक मर्यादेत) न आल्यामुळे त्यांचेही कर्म बिघडवतो. अशा प्रकारे तो स्वतःच स्वतःला 'नानासंवासक' बनवतो. 'समानसंवासक' या संदर्भातही: जो अधम्मवादी लोकांच्या बाजूला बसून 'हे अधम्मवादी आहेत आणि इतर धम्मवादी आहेत' असे जाणून त्या धम्मवादी लोकांच्या मध्ये प्रवेश करतो, किंवा कोणत्याही बाजूला बसून 'हे धम्मवादी आहेत' असे स्वीकारतो, तो स्वतःच स्वतःला 'समानसंवासक' बनवतो असे समजावे. ๔๕๖. กายกมฺมํ วจีกมฺมนฺติ เอตฺถ กาเยน ปหรนฺตา กายกมฺมํ อุปทํเสนฺติ, ผรุสํ วทนฺตา วจีกมฺมํ อุปทํเสนฺตีติ เวทิตพฺพา. หตฺถปรามาสํ กโรนฺตีติ โกธวเสน หตฺเถหิ อญฺญมญฺญํ ปรามสนํ กโรนฺติ. อธมฺมิยายมาเนติ อธมฺมิยานิ กิจฺจานิ กุรุมาเน. อสมฺโมทิกาวตฺตมานายาติ อสมฺโมทิกาย วตฺตมานาย. อยเมว วา ปาโฐ. สมฺโมทนกถาย อวตฺตมานายาติ อตฺโถ. เอตฺตาวตา น อญฺญมญฺญนฺติ เอตฺถ ทฺเว ปนฺติโย กตฺวา อุปจารํ มุญฺจิตฺวา นิสีทิตพฺพํ, ธมฺมิยายมาเน ปน สมฺโมทิกาย วตฺตมานาย อาสนนฺตริกาย นิสีทิตพฺพํ, เอเกกํ อาสนํ อนฺตรํ กตฺวา นิสีทิตพฺพํ. ४५६. 'कायकर्म आणि वचीकर्म' या संदर्भात: शरीराने प्रहार करणारे कायकर्म दर्शवतात, आणि कठोर बोलणारे वचीकर्म दर्शवतात, असे समजावे. 'हस्तपरामर्श करतात' म्हणजे क्रोधाच्या भरात हाताने एकमेकांना स्पर्श करतात. 'अधम्मियायमाने' म्हणजे अधार्मिक कृत्ये करत असताना. 'असंमोदिका वत्तमानाय' म्हणजे आनंद न देणारे संभाषण चालू असताना. हाच मूळ पाठ आहे. याचा अर्थ 'आनंददायी संभाषण चालू नसताना' असा आहे. 'एवढ्याने एकमेकांना नाही' या संदर्भात दोन ओळी करून, योग्य अंतराची जागा सोडून बसावे. परंतु, धार्मिक कृत्य करत असताना आणि आनंददायी संभाषण चालू असताना, आसनांच्या दरम्यान अंतर ठेवून बसावे, म्हणजेच प्रत्येक आसनामध्ये एक आसन रिकामे सोडून बसावे. ๔๕๗-๔๕๘. มา ภณฺฑนนฺติอาทีสุ ‘‘อกตฺถา’’ติ ปาฐเสสํ คเหตฺวา ‘‘มา ภณฺฑนํ อกตฺถา’’ติ เอวมตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. อธมฺมวาทีติ อุกฺขิตฺตานุวตฺตเกสุ อญฺญตโร. อยํ ปน ภิกฺขุ ภควโต อตฺถกาโม, อยํ กิรสฺส อธิปฺปาโย [Pg.433] ‘‘อิเม ภิกฺขู โกธาภิภูตา สตฺถุ วจนํ น คณฺหนฺติ, มา ภควา เอเต โอวทนฺโต กิลมิตฺถา’’ติ ตสฺมา เอวมาห. ภควา ปน ‘‘ปจฺฉาปิ สญฺญํ ลภิตฺวา โอรมิสฺสนฺตี’’ติ เตสํ อนุกมฺปาย อตีตวตฺถุํ อาหริตฺวา กเถสิ. ตตฺถ อนตฺถโตติ อนตฺโถ อโต; เอตสฺมา เม ปุริสา อนตฺโถติ วุตฺตํ โหติ. อถ วา อนตฺถโตติ อนตฺถโท. เสสํ ปากฏเมว. ४५७-४५८. 'मा भंडनं' (भांडण करू नका) इत्यादी वाक्यांमध्ये, 'अकत्था' (करू नका) हा उरलेला पाठ घेऊन 'भांडण करू नका' असा अर्थ समजावा. 'अधम्मवादी' म्हणजे बहिष्कृत भिक्खूंचे समर्थन करणाऱ्यांपैकी एक. परंतु हा भिक्खू भगवंतांचे कल्याण इच्छिणारा होता. त्याचा असा हेतू होता की, 'हे भिक्खू क्रोधाने ग्रासलेले आहेत आणि शास्त्यांचे (बुद्धांचे) वचन ऐकत नाहीत. भगवंतांनी यांना उपदेश करून स्वतःला त्रास करून घेऊ नये.' म्हणूनच तो असे म्हणाला. परंतु भगवंतांनी विचार केला की, 'हे नंतर तरी समज मिळवून शांत होतील,' आणि त्यांच्यावरील अनुकंपेपोटी भूतकाळातील कथा सांगून उपदेश केला. त्या कथेमध्ये 'अनत्थतो' म्हणजे 'या माणसापासून माझे अहित होईल.' या माणसापासून माझे अहित होईल, असा याचा अर्थ आहे. किंवा 'अनत्थतो' म्हणजे अहित करणारा. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ๔๖๔. ปุถุสทฺโทติอาทิคาถาสุ ปน ปุถุ มหา สทฺโท อสฺสาติ ปุถุสทฺโท. สมชโนติ สมาโน เอกสทิโส ชโน; สพฺโพ จายํ ภณฺฑนการโกชโน สมนฺตโต สทฺทนิจฺฉารเณน ปุถุสทฺโท เจว สทิโส จาติ วุตฺตํ โหติ. น พาโล โกจิ มญฺญถาติ ตตฺถ โกจิ เอโกปิ ‘‘อหํ พาโล’’ติ น มญฺญิตฺถ; สพฺเพปิ ปณฺฑิตมานิโนเยว. นาญฺญํ ภิยฺโย อมญฺญรุนฺติ โกจิ เอโกปิ ‘‘อหํ พาโล’’ติ จ น มญฺญิตฺถ; ภิยฺโย จ สงฺฆสฺมึ ภิชฺชมาเน อญฺญมฺปิ เอกํ ‘‘มยฺหํ การณา สงฺโฆ ภิชฺชตี’’ติ อิทํ การณํ น มญฺญิตฺถาติ อตฺโถ. ४६४. 'पुथुसद्दो' इत्यादी गाथांमध्ये: ज्याचा मोठा (पुथु) आवाज (सद्दो) आहे, तो 'पुथुसद्दो' (मोठ्या आवाजाचा). 'समजनो' म्हणजे समान किंवा एकसारखा स्वभाव असलेला लोकसमूह. भांडण करणारे हे सर्व लोक चहूबाजूंनी आवाज करत असल्यामुळे मोठ्या आवाजाचे आणि भांडखोर स्वभावामुळे एकसारखेच आहेत, असा याचा अर्थ आहे. 'कोणीही स्वतःला मूर्ख मानत नाही' या संदर्भात: त्यांच्यापैकी एकानेही 'मी मूर्ख आहे' असे मानले नाही; सर्वजण स्वतःला पंडितच मानत होते. 'त्याहून अधिक काही जाणले नाही' म्हणजे कोणी एकानेही 'मी मूर्ख आहे' असे मानले नाही; आणि त्याहून अधिक म्हणजे, संघ दुभंगत असताना, 'माझ्यामुळे संघ दुभंगत आहे' हे दुसरे कोणतेही कारण त्यांनी जाणले नाही, असा अर्थ आहे. ปริมุฏฺฐาติ ปริมุฏฺฐสฺสติโน. วาจาโคจรภาณิโนติ ราการสฺส รสฺสาเทโส กโต, วาจาโคจรา น สติปฏฺฐานาทิโคจรา. ภาณิโน จ กถํ ภาณิโน? ยาวิจฺฉนฺติ มุขายามํ ยาว มุขํ ปสาเรตุํ อิจฺฉนฺติ, ตาว ปสาเรตฺวา ภาณิโน, เอโกปิ สงฺฆคารเวน มุขสงฺโกจํ น กโรตีติ อตฺโถ. เยน นีตาติ เยน กลเหน อิมํ นิลฺลชฺชภาวํ นีตา. น ตํ วิทูติ น ตํ ชานนฺติ, ‘‘เอวํ สาทีนโว อย’’นฺติ. 'परिमुट्ठा' म्हणजे ज्यांची स्मृती नष्ट झाली आहे असे (स्मृतिभ्रष्ट). 'वाचागोचरभाणिनो' या शब्दात 'रा' या अक्षराचा र्हस्व आदेश केला आहे. केवळ बोलणे हाच ज्यांचा विषय आहे, सतिपट्ठान (स्मृतिप्रस्थान) इत्यादी ज्यांचा विषय नाही. आणि ते बोलणारे आहेत, पण कसे बोलणारे? 'याविच्छन्ति मुखायामं' म्हणजे जितके तोंड उघडण्याची त्यांची इच्छा असते, तितके तोंड उघडून ते बोलतात. संघाच्या आदरापोटी कोणी एकही आपले तोंड आवरत नाही, असा अर्थ आहे. 'येन नीता' म्हणजे ज्या कलहाने त्यांना या निर्लज्जपणाच्या स्थितीला आणले आहे. 'ते जाणत नाहीत' म्हणजे 'हा कलह अशा दोषांनी युक्त आहे' हे ते जाणत नाहीत. เย จ ตํ อุปนยฺหนฺตีติ ตํ ‘‘อกฺโกจฺฉิ มํ, อวธิ ม’’นฺติอาทิกํ อาการํ เย จ อุปนยฺหนฺติ. สนนฺตโนติ โปราโณ. 'आणि जे मनात वैर धरतात' म्हणजे 'त्याने मला शिवी दिली, त्याने मला मारले' इत्यादी प्रकारच्या द्वेषाला जे मनात धरून ठेवतात. 'सनंतनो' म्हणजे सनातन, म्हणजेच जुना किंवा प्राचीन नियम. ปเรติ ปณฺฑิเต ฐเปตฺวา ตโต อญฺเญ ภณฺฑนการกา ปเร นาม. เต เอตฺถ สงฺฆมชฺเฌ กลหํ กโรนฺตา ‘‘มยํ ยมามเส อุปยมาม; สตตํ สมิตํ มจฺจุสนฺติกํ คจฺฉามา’’ติ น ชานนฺติ. เย จ ตตฺถ วิชานนฺตีติ เย ตตฺถ ปณฺฑิตา ‘‘มยํ มจฺจุสมีปํ คจฺฉามา’’ติ วิชานนฺติ. ตโต [Pg.434] สมฺมนฺติ เมธคาติ เอวญฺหิ เต ชานนฺตา โยนิโสมนสิการํ อุปฺปาเทตฺวา เมธคานํ กลหานํ วูปสมาย ปฏิปชฺชนฺติ. 'परे' म्हणजे पंडितांना सोडून, त्यांच्याव्यतिरिक्त इतर भांडण करणारे लोक. ते या संघामध्ये भांडण करताना, 'आम्ही नष्ट होत आहोत; आम्ही सतत मृत्यूच्या जवळ जात आहोत' हे जाणत नाहीत. 'आणि जे तेथे जाणतात' म्हणजे जे तेथे पंडित आहेत आणि 'आम्ही मृत्यूच्या जवळ जात आहोत' हे जाणतात. 'त्यामुळे भांडणे शांत होतात' म्हणजे असे जाणणारे ते पंडित योग्य विचार (योनिसो मनसिकार) उत्पन्न करून भांडणे शांत करण्यासाठी प्रयत्न करतात. อฏฺฐิจฺฉินฺนาติ อยํ คาถา พฺรหฺมทตฺตญฺจ ทีฆาวุกุมารญฺจ สนฺธาย วุตฺตา. เตสมฺปิ โหติ สงฺคติ, กสฺมา ตุมฺหากํ น โหติ, เยสํ โว เนว มาตาปิตูนํ อฏฺฐีนิ ฉินฺนานิ, น ปาณา หตา, น ควาสฺสธนานิ หฏานีติ. 'अट्ठिच्छिन्ना' (ज्यांची हाडे तोडली गेली आहेत) ही गाथा ब्रह्मदत्त राजा आणि दीघावू कुमार यांना उद्देशून भगवंतांनी म्हटली आहे. 'त्यांच्यामध्येही सलोखा प्रस्थापित झाला, तर मग तुमच्यामध्ये का होऊ शकत नाही? ज्यांच्या आई-वडिलांची हाडे तोडली गेली नाहीत, ज्यांचे प्राण घेतले गेले नाहीत आणि ज्यांचे गायी, घोडे व धन लुटले गेले नाही!' असा याचा अर्थ आहे. สเจ ลเภถาติอาทิคาถา ปณฺฑิตสหายสฺส จ พาลสหายสฺส จ วณฺณาวณฺณทีปนตฺถํ วุตฺตา. อภิภุยฺย สพฺพานิ ปริสฺสยานีติ ปากฏปริสฺสเย จ ปฏิจฺฉนฺนปริสฺสเย จ อภิภวิตฺวา เตน สทฺธึ อตฺตมโน สติมา จเรยฺย. 'सचे लभेथ' (जर योग्य सोबती मिळाला तर) इत्यादी गाथा सुज्ञ सोबत्याचे आणि मूर्ख सोबत्याचे गुण-दोष दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी सांगितली आहे. 'अभिभुय्य सब्बानि परिस्सयानि' (सर्व संकटांवर मात करून) म्हणजे प्रकट संकटांवर (जसे की सिंह, वाघ इत्यादी) आणि अप्रकट संकटांवर (जसे की राग, द्वेष इत्यादी) मात करून, त्या सुज्ञ सोबत्यासह प्रसन्न चित्ताने आणि स्मृतिमान (जागरूक) होऊन विहरावे. ราชาว รฏฺฐํ วิชิตนฺติ ยถา อตฺตโน วิชิตํ รฏฺฐํ มหาชนกราชา จ อรินฺทมมหาราชา จ ปหาย เอกกา จรึสุ; เอวํ จเรยฺยาติ อตฺโถ. มาตงฺครญฺเญว นาโคติ มาตงฺโค อรญฺเญ นาโคว. มาตงฺโคติ หตฺถี วุจฺจติ; นาโคติ มหนฺตาธิวจนเมตํ. ยถา หิ มาตุโปสโก มาตงฺคนาโค อรญฺเญ เอโก จริ, น จ ปาปานิ อกาสิ. ยถา จ ปาลิเลยฺยโก, เอวํ เอโก จเร, น จ ปาปานิ กยิราติ วุตฺตํ โหติ. 'राजाव रट्ठं विजितं' (जिंकलेले राज्य सोडून जाणाऱ्या राजाप्रमाणे) याचा अर्थ असा आहे की, ज्याप्रमाणे राजा महाजनक आणि महाराज अरिंदम आपले जिंकलेले राज्य सोडून एकटेच विहरले; त्याचप्रमाणे विहरावे. 'मातङ्गरञ्ञेव नागो' म्हणजे अरण्यातील मातंग नावाच्या श्रेष्ठ हत्तीप्रमाणे. 'मातंग' म्हणजे हत्ती; 'नाग' हा मोठेपणा दर्शवणारा शब्द आहे. ज्याप्रमाणे मातृपोषक (आईचे पालनपोषण करणारा) मातंग हत्ती अरण्यात एकटाच विहरला आणि त्याने कोणतीही पापे केली नाहीत, आणि ज्याप्रमाणे पालिलेय्यक हत्ती विहरला, त्याचप्रमाणे माणसाने एकटेच विहरावे आणि पापकर्मे करू नयेत, असा याचा अर्थ आहे. ปาลิเลยฺยกคมนกถา पालिलेय्यक वनात जाण्याची कथा. ๔๖๗. ปาลิเลยฺยเก วิหรติ รกฺขิตวนสณฺเฑติ ปาลิเลยฺยกํ อุปนิสฺสาย รกฺขิตวนสณฺเฑ วิหรติ. หตฺถินาโคติ มหาหตฺถี. หตฺถิกลเภหีติ หตฺถิโปตเกหิ. หตฺถิจฺฉาเปหีติ ขีรูปเกหิ ทหรโปตเกหิ. ฉินฺนคฺคานีติ เตหิ ปุรโต ปุรโต คจฺฉนฺเตหิ ฉินฺนคฺคานิ ขายิตาวเสสานิ ขาณุสทิสานิ ติณานิ ขาทติ. โอภคฺโคภคฺคนฺติ เตน หตฺถินาเคน อุจฺจฏฺฐานโต ภญฺชิตฺวา ภญฺชิตฺวา ปาติตํ. อสฺส สาขาภงฺคนฺติ เอตสฺส สนฺตกํ สาขาภงฺคํ เต ขาทนฺติ. อาวิลานีติ เตหิ ปฐมตรํ โอตริตฺวา ปิวนฺเตหิ อาลุลิตานิ กทฺทโมทกานิ ปิวติ. โอคาหาติ ติตฺถโต. ४६७. 'पालिलेय्यके विहरति रक्खितवनसण्डे' म्हणजे पालिलेय्यक ग्रामाचा आश्रय घेऊन रक्खितवन नावाच्या अरण्यात भगवंत विहार करत होते. 'हत्थिनागो' म्हणजे मोठा हत्ती. 'हत्थिकळभेहि' म्हणजे हत्तीच्या पिल्लांसह. 'हत्थिच्छापेहि' म्हणजे आईचे दूध पिणाऱ्या लहान पिल्लांसह. 'छिन्नग्गानि' म्हणजे त्यांच्या पुढे पुढे चालणाऱ्या हत्तींनी अग्रभाग तोडलेले, खाऊन उरलेले आणि खुंटासारखे झालेले गवत त्याला खावे लागे. 'ओभग्गोभग्गं' म्हणजे त्या मोठ्या हत्तीने उंचावरून मोडून मोडून खाली पाडलेले. 'अस्स साखाभङ्गं' म्हणजे त्याने मोडलेल्या फांद्या ते (इतर हत्ती) खात असत. 'आविलानि' म्हणजे त्यांच्या आधी पाण्यात उतरून पाणी पिण्यामुळे गढूळ झालेले चिखलमिश्रित पाणी त्याला प्यावे लागे. 'ओगाहाति' म्हणजे घाटावरून (पाण्यात उतरणे). นาคสฺส นาเคนาติ หตฺถินาคสฺส พุทฺธนาเคน. อีสาทนฺตสฺสาติ รถอีสาสทิสทนฺตสฺส. ยเทโก รมตี วเนติ ยสฺมา พุทฺธนาโค วิย อยมฺปิ หตฺถินาโค เอโก ปวิวิตฺโต วเน รมติ; ตสฺมาสฺส นาคสฺส [Pg.435] นาเคน จิตฺตํ สเมติ, เอกีภาวรติยา เอกสทิสํ โหตีติ อตฺโถ. 'नागस्स नागेन' म्हणजे हत्तीच्या श्रेष्ठ राजाचे (हत्तीचे) बुद्धरूपी श्रेष्ठ नागाशी (बुद्धांशी). 'ईसादन्तस्स' म्हणजे रथाच्या दांड्यासारखे (ईषा) सुळे असलेल्याचे. 'यदेको रमती वने' म्हणजे ज्याप्रमाणे बुद्धरूपी नाग (बुद्ध) अरण्यात एकटेच रमतात, त्याचप्रमाणे हा हत्ती देखील एकटाच, समूहापासून दूर अरण्यात रमतो; म्हणून त्या हत्तीचे चित्त बुद्धरूपी नागाच्या चित्ताशी जुळते, म्हणजेच एकांतात रमण्याच्या बाबतीत ते अगदी एकसारखेच असते, असा याचा अर्थ आहे. ยถาภิรนฺตํ วิหริตฺวาติ เอตฺถ เตมาสํ ภควา ตตฺถ วิหาสีติ เวทิตพฺโพ. เอตฺตาวตา โกสมฺพเกหิ กิร อุพฺพาฬฺโห ภควา เตมาสํ อรญฺญํ ปวิสิตฺวา วสีติ สพฺพตฺถ กถา ปตฺถฏา อโหสิ. 'यथाभिरन्तं विहरित्वा' यामध्ये हे समजून घ्यावे की, भगवंत तेथे तीन महिने राहिले. एवढ्या काळात सर्वत्र ही चर्चा पसरली की, कौशाम्बीच्या भिक्खूंनी त्रास दिल्यामुळे भगवंत तीन महिने अरण्यात जाऊन राहिले आहेत. อถ โข โกสมฺพกา อุปาสกาติ อถ โข อิมํ กถาสลฺลาปํ สุตฺวา โกสมฺพิวาสิโน อุปาสกา. 'अथ खो कोसम्बका उपासका' म्हणजे त्यानंतर हे संभाषण ऐकून कौशाम्बीमध्ये राहणारे उपासक... อฏฺฐารสวตฺถุกถา अठरा वस्तूंची (मुद्द्यांची) कथा. ๔๖๘. อธมฺมํ ธมฺโมติอาทีนิ อฏฺฐารส เภทกรวตฺถูนิ สงฺฆเภทกกฺขนฺธเก วณฺณยิสฺสาม. ४६८. 'अधम्माला धम्म म्हणणे' इत्यादी संघात फूट पाडणाऱ्या अठरा कारणांचे (भेदात्मक वस्तूंचे) स्पष्टीकरण आम्ही 'संघभेदक खन्धक' मध्ये करू. ๔๗๕. ตํ อุกฺขิตฺตกํ ภิกฺขุํ โอสาเรตฺวาติ ตํ คเหตฺวา สีมํ คนฺตฺวา อาปตฺตึ เทสาเปตฺวา กมฺมวาจาย โอสาเรตฺวา. ตาวเทว อุโปสโถติ ตํทิวสเมว อุโปสถกฺขนฺธเก วุตฺตนเยเนว สามคฺคีอุโปสโถ กาตพฺโพ. ४७५. 'तं उक्खित्तकं भिक्खुं ओसारेत्वा' म्हणजे त्या बहिष्कृत भिक्खूला सोबत घेऊन, सीमेमध्ये जाऊन, त्याच्याकडून आपत्तीची (चुकीची) कबुली देऊन, कम्मवाचेद्वारे त्याला संघात पुन्हा समाविष्ट करून घेणे. 'तावदेव उपोसतो' म्हणजे त्याच दिवशी 'उपोसथ खन्धक' मध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच 'सामग्गी उपोसथ' (संघ-एकता उपोसथ) केला पाहिजे. ๔๗๖. อมูลา มูลํ คนฺตฺวาติ น มูลา มูลํ คนฺตฺวา; ตํ วตฺถุํ อวินิจฺฉินิตฺวาติ อตฺโถ. อยํ วุจฺจติ อุปาลิ สงฺฆสามคฺคี อตฺถาเปตา พฺยญฺชนูเปตาติ อตฺถโต อปคตา, ‘‘สงฺฆสามคฺคี’’ติ อิมํ ปน พฺยญฺชนมตฺตํ อุเปตา. ४७६. 'अमूला मूलं गन्त्वा' म्हणजे मुळापासून मुळापर्यंत न जाता; म्हणजेच त्या प्रकरणाचा (वस्तूचा) निवाडा न करता, असा अर्थ आहे. 'अयं वुच्चति उपालि सङ्घसामग्गी अत्थापेता ब्यञ्जनूपेता' म्हणजे, 'हे उपाली! याला अशी संघ-एकता म्हणतात जी अर्थापासून दूर गेलेली असते, परंतु केवळ संघसामग्गी (संघ-एकता) या शब्दापुरतीच मर्यादित असते.' ๔๗๗. สงฺฆสฺส กิจฺเจสูติ สงฺฆสฺส กรณีเยสุ อุปฺปนฺเนสุ. มนฺตนาสูติ วินยมนฺตนาสุ. อตฺเถสุ ชาเตสูติ วินยอตฺเถสุ อุปฺปนฺเนสุ. วินิจฺฉเยสูติ เตสํเยว อตฺถานํ วินิจฺฉเยสุ. มหตฺถิโกติ มหาอุปกาโร. ปคฺคหารโหติ ปคฺคณฺหิตุํ วุตฺโต. ४७७. 'सङ्घस्स किच्चेसु' म्हणजे संघाची कर्तव्ये (कार्ये) उपस्थित झाली असता. 'मन्तनासु' म्हणजे विनयविषयक सल्लामसलत (चर्चा) उपस्थित झाली असता. 'अत्थेसु जातेसु' म्हणजे विनयाच्या अर्थांविषयी प्रश्न निर्माण झाले असता. 'विनिच्छयेसु' म्हणजे त्याच अर्थांच्या निर्णयांच्या बाबतीत. 'महत्थिको' म्हणजे मोठा उपकार करणारा (अतिशय उपकारक). 'पग्गहारहो' म्हणजे सन्मान किंवा पाठिंबा देण्यास योग्य असलेला. อนานุวชฺโช ปฐเมน สีลโตติอาทิมฺหิเยว ตาว สีลโต น อุปวชฺโช. อเวกฺขิตาจาโรติ อเปกฺขิตาจาโร; อาโลกิเต วิโลกิเต สมฺปชานการีติอาทินา นเยน อุปปริกฺขิตาจาโร. อฏฺฐกถาสุ ปน ‘‘อปฺปฏิจฺฉนฺนาจาโร’’ติ วุตฺตํ. 'अनानुवज्जो पठमेन सीलतो' म्हणजे सर्वप्रथम सुरुवातीलाच शीलदृष्ट्या दोषरहित (निंदनीय नसलेला). 'अवेक्खिताचारो' म्हणजे विचारपूर्वक आचरण करणारा; पुढे पाहण्यात आणि आजूबाजूला पाहण्यात संपजन्य (जागरूकता) बाळगून आचरण तपासणारा. परंतु अट्ठकथांमध्ये 'अप्पटिच्छन्नाचारो' (न लपवलेले आचरण असलेला) असे म्हटले आहे. วิสยฺหาติ [Pg.436] อภิภวิตฺวา. อนุยฺยุตํ ภณนฺติ อนุญฺญาตํ อนปคตํ ภณนฺโต. ยสฺมา หิ โส อนุยฺยุตํ ภณติ, อุสูยาย วา อคติคมนวเสน วา การณาปคตํ น ภณติ, ตสฺมา อตฺถํ น หาเปติ. อุสูยาย ปน อคติคมนวเสน วา ภณนฺโต อตฺถํ หาเปติ, การณํ น เทติ, ตสฺมา โส ปริสคโต ฉมฺภติ เจว เวธติ จ. โย อีทิโส น โหติ, อยํ ‘‘ปคฺคหารโห’’ติ ทสฺเสติ. 'विसय्हा' म्हणजे पराभूत करून (मात करून). 'अनुय्युतं भणन्ति' म्हणजे अनुमती असलेले आणि कारणाशी सुसंगत असलेले बोलणारा. कारण, तो अनुमती असलेलेच बोलतो, मत्सर किंवा अगतिकतेमुळे (पक्षपातामुळे) तर्कहीन बोलत नाही, म्हणून तो अर्थाची हानी करत नाही. परंतु, मत्सर किंवा पक्षपातामुळे बोलणारा माणूस अर्थाची हानी करतो, योग्य कारण देऊ शकत नाही, आणि म्हणूनच तो सभेत गेल्यावर स्तब्ध होतो आणि थरथर कापतो. जो असा नसतो, तोच 'सन्मानास पात्र' (पग्गहारहो) आहे, असे हे दर्शवते. กิญฺจ ภิยฺโย ‘‘ตเถว ปญฺห’’นฺติ คาถา, ตสฺสตฺโถ – ยถา จ อนุยฺยุตํ ภณนฺโต อตฺถํ น หาเปติ, ตเถว ปริสาย มชฺเฌ ปญฺหํ ปุจฺฉิโต สมาโน น เจว ปชฺฌายติ, น จ มงฺกุ โหติ. โย หิ อตฺถํ น ชานาติ, โส ปชฺฌายติ. โย วตฺตุํ น สกฺโกติ, โส มงฺกุ โหติ. โย ปน อตฺถญฺจ ชานาติ, วตฺตุญฺจ สกฺโกติ; โส น ปชฺฌายติ, น มงฺกุ โหติ. กาลาคตนฺติ กเถตพฺพยุตฺตกาเล อาคตํ. พฺยากรณารหนฺติ ปญฺหสฺส อตฺถานุโลมตาย พฺยากรณานุจฺฉวิกํ. วโจติ วทนฺโต; เอวรูปํ วจนํ ภณนฺโตติ อตฺโถ. รญฺเชตีติ โตเสติ. วิญฺญูปริสนฺติ วิญฺญูนํ ปริสํ. आणखी काय सांगावे? 'तथेव पञ्हं' ही गाथा आहे, तिचा अर्थ असा आहे – ज्याप्रमाणे अनुमती असलेले बोलणारा अर्थाची हानी करत नाही, त्याचप्रमाणे सभेच्या मध्यभागी प्रश्न विचारला असता, तो विचारमग्न (उदास) होऊन बसत नाही आणि त्याचा चेहराही पडत नाही (तो गोंधळत नाही). कारण ज्याला अर्थ माहीत नसतो, तो विचारमग्न होऊन बसतो. जो उत्तर देऊ शकत नाही, तो गोंधळतो (त्याचा चेहरा पडतो). परंतु जो अर्थही जाणतो आणि उत्तर देण्यासही समर्थ असतो; तो विचारमग्न होत नाही आणि गोंधळतही नाही. 'कालागतं' म्हणजे बोलण्याच्या योग्य वेळी आलेले. 'ब्याकरणा रहं' म्हणजे प्रश्नाच्या अर्थाला अनुसरून योग्य उत्तर देण्यास योग्य असलेले. 'वचो' म्हणजे बोलणारा; अशा प्रकारचे वचन बोलणारा असा याचा अर्थ आहे. 'रञ्जेति' म्हणजे संतुष्ट करतो. 'विञ्ञूपरिसं' म्हणजे विद्वानांची (सुज्ञांची) सभा. อาเจรกมฺหิ จ สเกติ อตฺตโน อาจริยวาเท. อลํ ปเมตุนฺติ วีมํสิตุํ ตํ ตํ การณํ ปญฺญาย ตุลยิตุํ สมตฺโถ. ปคุโณติ กตปริจโย ลทฺธาเสวโน. กเถตเวติ กเถตพฺเพ. วิรทฺธิโกวิโทติ วิรทฺธฏฺฐานกุสโล. 'आचेरकम्हि च सके' म्हणजे स्वतःच्या आचार्यांच्या वादात (मतामध्ये). 'अलं पमेतुं' म्हणजे तपासण्यास आणि त्या त्या कारणांचे प्रज्ञेने मोजमाप (तुलना) करण्यास समर्थ असलेला. 'पगुणो' म्हणजे सराव केलेला (अनुभवी) किंवा वारंवार सेवा घेतलेला. 'कथेतवे' म्हणजे बोलण्यायोग्य विषयामध्ये. 'विरद्धिकोविदो' चुकांच्या किंवा त्रुटींच्या बाबतीत कुशल असलेला (त्रुटी ओळखण्यात चतुर). ปจฺจตฺถิกา เยน วชนฺตีติ อยํ คาถา ยาทิเส กเถตพฺเพ ปคุโณ, ตํ ทสฺเสตุํ วุตฺตา. อยญฺเหตฺถ อตฺโถ – ยาทิเสน กถิเตน ปจฺจตฺถิกา จ นิคฺคหํ คจฺฉนฺติ, มหาชโน จ สญฺญปนํ คจฺฉติ; สญฺญตฺตึ อวโพธนํ คจฺฉตีติ อตฺโถ. ยญฺจ กเถนฺโต สกํ อาทายํ อตฺตโน อาจริยวาทํ น หาเปติ, ยสฺมึ วตฺถุสฺมึ อธิกรณํ อุปฺปนฺนํ, ตทนุรูปํ อนุปฆาตกรํ ปญฺหํ พฺยากรมาโน ตาทิเส กเถตพฺเพ ปคุโณ โหตีติ. 'पच्चत्थिका येन वजन्ति' इत्यादी गाथा, कशा प्रकारच्या भाषणात तो कुशल आहे, हे दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी सांगितली आहे. याचा अर्थ असा आहे – ज्या प्रकारच्या भाषणाने विरोधक निरुत्तर होतात (पराभूत होतात) आणि बहुजन समाज समजून घेतो (बोध प्राप्त करतो), असा याचा अर्थ आहे. आणि जे बोलताना तो स्वतःचे मत किंवा स्वतःच्या आचार्यांचा वाद सोडत नाही, ज्या विषयावरून वाद (अधिकरण) निर्माण झाला आहे, त्याला अनुरूप आणि कोणालाही इजा न पोहोचवणारे (अविघातक) उत्तर देत असताना, अशा प्रकारच्या भाषणात तो कुशल असतो. ทูเตยฺยกมฺเมสุ อลนฺติ อฏฺฐหิ ทูตงฺเคหิ สมนฺนาคตตฺตา สงฺฆสฺส ทูเตยฺยกมฺเมสุ สมตฺโถ. สุฏฺฐุ อุคฺคณฺหาตีติ สมุคฺคโห. อิทํ วุตฺตํ โหติ [Pg.437] – ยถา นาม อาหุนํ อาหุติปิณฺฑํ สมุคฺคณฺหนฺติ, เอวํ ปีติโสมนสฺสชาเตเนว เจตสา สงฺฆสฺส กิจฺเจสุ สมุคฺคโห, สงฺฆสฺสกิจฺเจสุ ตสฺส ตสฺส กิจฺจสฺส ปฏิคฺคาหโกติ อตฺโถ. กรํ วโจติ วจนํ กโรนฺโต. น เตน มญฺญตีติ เตน วจนกรเณน ‘‘อหํ กโรมิ, สงฺฆภารํ นิตฺถรามี’’ติ น มานาติมานํ ชปฺเปติ. "दूतेय्यकम्मेसु अलन्ति" (दूताच्या कामात समर्थ) म्हणजे आठ दूत-अंगांनी (दूताच्या गुणांनी) युक्त असल्यामुळे संघाच्या दूताच्या कामात समर्थ असणे. "सुट्ठु उग्गण्हातीति समुग्गह" (चांगल्या प्रकारे ग्रहण करतो म्हणून समुग्गह) याचा अर्थ असा आहे - ज्याप्रमाणे अर्पण केलेले अन्न (आहुतिपिंड) चांगल्या प्रकारे ग्रहण केले जाते, त्याचप्रमाणे प्रीती आणि सोमनस्य (आनंद) उत्पन्न झालेल्या चित्ताने संघाच्या कार्यात स्वतःला समर्पित करणे, म्हणजेच संघाच्या कार्यात त्या त्या कर्तव्याचा स्वीकार करणे असा अर्थ आहे. "करं वचो" म्हणजे वचनाचे पालन करणारा (आज्ञाधारक). "न तेन मञ्ञतीति" म्हणजे त्या वचनाचे पालन केल्यामुळे "मी हे करतो, मी संघाचा भार वाहतो" असा मान किंवा अतिमान (अहंकार) मनात उत्पन्न न करणे. อาปชฺชติ ยาวตเกสุ วตฺถูสูติ ยตฺตเกสุ วตฺถูสุ อาปตฺตึ อาปชฺชมาโน อาปชฺชติ. โหติ ยถา จ วุฏฺฐิตีติ ตสฺสา จ อาปตฺติยา ยถา วุฏฺฐานํ โหติ. เอเต วิภงฺคาติ เยสุ วตฺถูสุ อาปชฺชติ, ยถา จ วุฏฺฐานํ โหติ, อิเมสํ อตฺถานํ โชตกา เอเต วิภงฺคา. อุภยสฺสาติ อุภเย อสฺส. สฺวาคตาติ สุฏฺฐุ อาคตา. อาปตฺติวุฏฺฐานปทสฺส โกวิโทติ อาปตฺติวุฏฺฐานการณกุสโล. "आपज्जति यावतकेसु वत्थूसूति" म्हणजे ज्या ज्या वस्तूंमुळे (मैथुन इत्यादी कारणांमुळे) आपत्तीला (नियमांच्या उल्लंघनाला) प्राप्त होतो. "होति यथा च वुट्ठितीति" म्हणजे त्या आपत्तीमधून ज्या प्रकारे (परिवर्तन, देशना इत्यादींद्वारे) मुक्तता (वुट्ठाण) होते. "एते विभङ्गाति" म्हणजे ज्या वस्तूंमुळे आपत्ती प्राप्त होते आणि ज्या प्रकारे त्यातून मुक्तता होते, या अर्थांचे स्पष्टीकरण करणारे हे विभंग (नियम-विभाग) आहेत. "उभयस्साति" म्हणजे दोन्ही (विभंग) त्याच्यासाठी. "स्वागताति" म्हणजे चांगल्या प्रकारे आलेले (कंठस्थ असलेले). "आपत्तिवुट्ठानपदस्स कोविदोति" म्हणजे आपत्तीमधून मुक्त होण्याच्या कारणांमध्ये कुशल असलेला. ยานิ จาจรนฺติ ยานิ จ ภณฺฑนการณาทีนิ อาจรนฺโต ตชฺชนียกมฺมาทิวเสน นิสฺสารณํ คจฺฉติ. โอสารณํ ตํวุสิตสฺส ชนฺตุโนติ ตํ วตฺตํ วุสิตสฺส ชนฺตุโน, ยา โอสารณา กาตพฺพา, เอตมฺปิ ชานาติ. เสสํ สพฺพตฺถ อุตฺตานเมวาติ. "यानि चाचरन्ति" म्हणजे भांडण इत्यादी कारणे आचरणात आणल्यामुळे तज्जनीय-कर्म इत्यादींद्वारे जो हद्दपारीला (निसारण - संघातून बाहेर काढले जाण्याला) प्राप्त होतो. "ओसारणं तंवुसितस्स जन्तुनोति" म्हणजे त्या व्रताचे पालन केलेल्या व्यक्तीला (भिक्खूला) पुन्हा संघात समाविष्ट करणे (ओसारण) जे केले पाहिजे, हे देखील तो जाणतो. "सेसं सब्बत्थ उत्तानमेवाति" म्हणजे उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ अगदी स्पष्ट आहे. โกสมฺพกกฺขนฺธกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. कोसम्बक खन्धकची वर्णना (टीका) समाप्त झाली. สมนฺตปาสาทิกาย วินยสํวณฺณนาย समन्तपासादिका नावाच्या विनय-वर्णनेतील (विनयटीकेतील) มหาวคฺควณฺณนา สมตฺตา. महावग्ग-वर्णना (महावग्गाची टीका) समाप्त झाली. มหาวคฺค-อฏฺฐกถา นิฏฺฐิตา. महावग्ग-अट्ठकथा समाप्त झाली. | |||
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
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| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |