| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
1 නමො තස්ස භගවතො අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස उस भगवन्, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध को नमस्कार। විනයපිටකෙ विनयपिटक में। මහාවග්ග-අට්ඨකථා महावग्ग-अट्ठकथा। 1. මහාඛන්ධකං १. महाखन्धक। බොධිකථා बोधिकथा। උභින්නං [Pg.233] පාතිමොක්ඛානං, සඞ්ගීතිසමනන්තරං; සඞ්ගායිංසු මහාථෙරා, ඛන්ධකං ඛන්ධකොවිදා. दोनों पातिमोक्ख (भिक्खु और भिक्खुनी) के संगायन के तुरंत बाद, खन्धक के अर्थ में कुशल महास्थविरों ने जिस खन्धक (महावग्ग और चुल्लवग्ग) का संगायन किया। යං තස්ස දානි සම්පත්තො, යස්මා සංවණ්ණනාක්කමො; තස්මා හොති අයං තස්ස, අනුත්තානත්ථවණ්ණනා. चूँकि अब उस (खन्धक) की व्याख्या का क्रम प्राप्त हो गया है, इसलिए उस (खन्धक) के जो अर्थ स्पष्ट नहीं हैं, उनकी यह व्याख्या होगी। පදභාජනියෙ අත්ථා, යෙහි යෙසං පකාසිතා; තෙ චෙ පුන වදෙය්යාම, පරියොසානං කදා භවෙ. पदभाानीय में जिन शब्दों के जो अर्थ जिन (व्याख्या पद्धतियों) के द्वारा प्रकाशित किए जा चुके हैं, यदि हम उन्हें फिर से कहें, तो (इस व्याख्या का) अंत कब होगा? (अर्थात् कभी नहीं होगा)। උත්තානා චෙව යෙ අත්ථා, තෙසං සංවණ්ණනාය කිං; අධිප්පායානුසන්ධීහි, බ්යඤ්ජනෙන ච යෙ පන. और जो अर्थ स्वयं ही स्पष्ट हैं, उनकी व्याख्या करने से क्या लाभ? (वह निष्प्रयोजन ही है)। किन्तु जो अर्थ अभिप्राय, अनुसन्धि और व्यंजनों (शब्दों) के कारण स्पष्ट नहीं हैं। අනුත්තානා න තෙ යස්මා, සක්කා ඤාතුං අවණ්ණිතා; තෙසංයෙව අයං තස්මා, හොති සංවණ්ණනානයොති. चूँकि उन अस्पष्ट अर्थों को बिना व्याख्या के जानना संभव नहीं है, इसलिए केवल उन्हीं (अस्पष्ट अर्थों) के लिए यह व्याख्या की पद्धति है। 1. තෙන සමයෙන බුද්ධො භගවා උරුවෙලායං විහරති නජ්ජා නෙරඤ්ජරාය තීරෙ බොධිරුක්ඛමූලෙ පඨමාභිසම්බුද්ධොති එත්ථ කිඤ්චාපි ‘‘තෙන සමයෙන බුද්ධො භගවා වෙරඤ්ජාය’’න්තිආදීසු විය කරණවචනෙ විසෙසකාරණං නත්ථි, විනයං පත්වා පන කරණවචනෙනෙව අයමභිලාපො ආරොපිතොති ආදිතො පට්ඨාය ආරුළ්හාභිලාපවසෙනෙවෙතං වුත්තන්ති වෙදිතබ්බං. එස නයො අඤ්ඤෙසුපි ඉතො පරෙසු එවරූපෙසු. १. "तेन समयेन बुद्धो भगवा उरुवेलायं विहरati नज्जा नेरञ्जराय तीरे बोधिरुक्खमूले पठमाभिसम्बुद्धो" - यहाँ यद्यपि "तेन समयेन बुद्धो भगवा वेरञ्जायं" आदि के समान करण कारक (instrumental case) के प्रयोग में कोई विशेष कारण नहीं है, फिर भी विनय (पिटक) के संगायन के क्रम में पहुँचने पर करण कारक के द्वारा ही यह कथन स्थापित किया गया है; अतः आदि से लेकर संगायन में आरूढ़ शब्द-शैली के वश ही ऐसा कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। इसके बाद आने वाले अन्य इसी प्रकार के पाठों में भी यही नियम समझना चाहिए। කිං පනෙතස්ස වචනෙ පයොජනන්ති? පබ්බජ්ජාදීනං විනයකම්මානං ආදිතො පට්ඨාය නිදානදස්සනං. යා හි භගවතා ‘‘අනුජානාමි, භික්ඛවෙ, ඉමෙහි තීහි [Pg.234] සරණගමනෙහි පබ්බජ්ජං උපසම්පද’’න්ති (මහාව. 34) එවං පබ්බජ්ජා චෙව උපසම්පදා ච අනුඤ්ඤාතා, යානි ච රාජගහාදීසු උපජ්ඣායඋපජ්ඣායවත්තආචරියආචරියවත්තාදීනි අනුඤ්ඤාතානි, තානි අභිසම්බොධිං පත්වා සත්තසත්තාහං බොධිමණ්ඩෙ වීතිනාමෙත්වා බාරාණසියං ධම්මචක්කං පවත්තෙත්වා ඉමිනා අනුක්කමෙන ඉදඤ්චිදඤ්ච ඨානං පත්වා ඉමස්මිඤ්ච ඉමස්මිඤ්ච වත්ථුස්මිං පඤ්ඤත්තානීති එවමෙතෙසං පබ්බජ්ජාදීනං විනයකම්මානං ආදිතො පට්ඨාය නිදානදස්සනං එතස්ස වචනෙ පයොජනන්ති වෙදිතබ්බං. इस (निदान) को कहने का क्या प्रयोजन है? प्रव्रज्या आदि विनय-कर्मों का आरम्भ से ही निदान (मूल कारण) दिखाना ही प्रयोजन है। क्योंकि भगवान् द्वारा "भिक्षुओं! मैं इन तीन शरणागतियों द्वारा प्रव्रज्या और उपसम्पदा की अनुमति देता हूँ" - इस प्रकार जो प्रव्रज्या और उपसम्पदा अनुमत की गई है, तथा राजगृह आदि में जो उपाध्याय, उपाध्याय-वत्त (कर्तव्य), आचार्य, आचार्य-वत्त आदि अनुमत किए गए हैं; वे सब (भगवान् द्वारा) सम्बोधि प्राप्त करने के बाद, बोधिमण्ड में सात सप्ताह व्यतीत कर, वाराणसी में धर्मचक्र प्रवर्तन कर, इस क्रम से इस-इस स्थान पर पहुँचकर और इस-इस विषय में प्रज्ञप्त किए गए हैं - इस प्रकार इन प्रव्रज्या आदि विनय-कर्मों का आरम्भ से निदान दिखाना ही इस कथन का प्रयोजन है, ऐसा समझना चाहिए। තත්ථ උරුවෙලායන්ති මහාවෙලායං; මහන්තෙ වාලිකරාසිම්හීති අත්ථො. අථ වා ‘‘උරූ’’ති වාලිකා වුච්චති; ‘‘වෙලා’’ති මරියාදා; වෙලාතික්කමනහෙතු ආහටා උරු උරුවෙලාති එවම්පෙත්ථ අත්ථො දට්ඨබ්බො. අතීතෙ කිර අනුප්පන්නෙ බුද්ධෙ දසසහස්සකුලපුත්තා තාපසපබ්බජ්ජං පබ්බජිත්වා තස්මිං පදෙසෙ විහරන්තා එකදිවසං සන්නිපතිත්වා කතිකවත්තං අකංසු – ‘‘කායකම්මවචීකම්මානි නාම පරෙසම්පි පාකටානි හොන්ති, මනොකම්මං පන අපාකටං; තස්මා යො කාමවිතක්කං වා බ්යාපාදවිතක්කං වා විහිංසාවිතක්කං වා විතක්කෙති, තස්ස අඤ්ඤො චොදකො නාම නත්ථි, සො අත්තනාව අත්තානං චොදෙත්වා පත්තපුටෙන වාලිකං ආහරිත්වා ඉමස්මිං ඨානෙ ආකිරතු, ඉදමස්ස දණ්ඩකම්ම’’න්ති. තතො පට්ඨාය යො තාදිසං විතක්කං විතක්කෙති, සො තත්ථ පත්තපුටෙන වාලිකං ආකිරති. එවං තත්ථ අනුක්කමෙන මහාවාලිකරාසි ජාතො, තතො නං පච්ඡිමා ජනතා පරික්ඛිපිත්වා චෙතියට්ඨානමකාසි. තං සන්ධාය වුත්තං – ‘‘උරුවෙලායන්ති මහාවෙලායං; මහන්තෙ වාලිකරාසිම්හීති අත්ථො’’ති. තමෙව සන්ධාය වුත්තං – ‘‘අථ වා උරූති වාලිකා වුච්චති; වෙලාති මරියාදා; වෙලාතික්කමනහෙතු ආහටා උරු උරුවෙලාති එවම්පෙත්ථ අත්ථො දට්ඨබ්බො’’ති. वहाँ 'उरुवेलायं' का अर्थ है - 'महावेला' में, अर्थात् रेत के विशाल ढेर में। अथवा 'उरु' रेत को कहा जाता है और 'वेला' मर्यादा (सीमा) को; मर्यादा का उल्लंघन करने के कारण लाई गई रेत 'उरुवेला' है - इस प्रकार भी यहाँ अर्थ समझना चाहिए। कहा जाता है कि अतीत में, जब बुद्ध उत्पन्न नहीं हुए थे, तब दस हजार कुलपुत्रों ने तापस-प्रव्रज्या ग्रहण की और उस प्रदेश में विहार करते हुए एक दिन एकत्रित होकर यह नियम (कतिकवत्त) बनाया - "काय-कर्म और वची-कर्म तो दूसरों को भी प्रकट होते हैं, किन्तु मन-कर्म अप्रकट रहता है; इसलिए जो कोई काम-वितर्क, व्यापाद-वितर्क या विहिंसा-वितर्क करता है, उसका दूसरा कोई निन्दक (चोदक) नहीं है, वह स्वयं ही स्वयं को दोष देकर पत्तों के दोने (पत्तपुट) से रेत लाकर इस स्थान पर डाले, यह उसका दण्ड-कर्म होगा।" तब से जो कोई वैसा वितर्क करता, वह वहाँ पत्तों के दोने से रेत डालता। इस प्रकार वहाँ क्रमशः रेत का एक विशाल ढेर बन गया, जिसे बाद में लोगों ने घेरकर चैत्य-स्थान बना दिया। उसी के सन्दर्भ में कहा गया है - "उरुवेलायं अर्थात् महावेला में; रेत के विशाल ढेर में।" उसी को लक्ष्य कर कहा गया है - "अथवा उरु रेत को कहा जाता है; वेला मर्यादा को; मर्यादा उल्लंघन के कारण लाई गई रेत उरुवेला है - इस प्रकार भी यहाँ अर्थ समझना चाहिए।" බොධිරුක්ඛමූලෙති බොධි වුච්චති චතූසු මග්ගෙසු ඤාණං; තං බොධිං භගවා එත්ථ පත්තොති රුක්ඛොපි ‘‘බොධිරුක්ඛො’’ත්වෙව නාමං ලභි, තස්ස බොධිරුක්ඛස්ස මූලෙ බොධිරුක්ඛමූලෙ. පඨමාභිසම්බුද්ධොති පඨමං අභිසම්බුද්ධො; අභිසම්බුද්ධො හුත්වා සබ්බපඨමංයෙවාති අත්ථො. එකපල්ලඞ්කෙනාති සකිම්පි අනුට්ඨහිත්වා යථාආභුජිතෙන එකෙනෙව පල්ලඞ්කෙන. විමුත්තිසුඛපටිසංවෙදීති විමුත්තිසුඛං ඵලසමාපත්තිසුඛං පටිසංවෙදයමානො. 'बोधिरुक्खमूले' में - चार आर्यमार्गों के ज्ञान को 'बोधि' कहा जाता है; भगवान् ने यहाँ उस बोधि को प्राप्त किया, इसलिए वृक्ष ने भी 'बोधिवृक्ष' नाम प्राप्त किया, उस बोधिवृक्ष की जड़ में (समीप) 'बोधिरुक्खमूले' है। 'पठमाभिसम्बुद्धो' का अर्थ है - प्रथम बार अभिसम्बुद्ध (पूर्ण ज्ञान प्राप्त); अर्थात् अभिसम्बुद्ध होकर सबसे पहले। 'एकपल्लङ्केन' का अर्थ है - एक बार भी बिना उठे, जिस प्रकार (पद्मासन) लगाया था, उसी एक ही पालथी (आसन) से। 'विमुत्तिसुखपटिसंवेदी' का अर्थ है - विमुक्ति-सुख अर्थात् फल-समापत्ति के सुख का अनुभव करते हुए। පටිච්චසමුප්පාදන්ති [Pg.235] පච්චයාකාරං. පච්චයාකාරො හි අඤ්ඤමඤ්ඤං පටිච්ච සහිතෙ ධම්මෙ උප්පාදෙතීති ‘‘පටිච්චසමුප්පාදො’’ති වුච්චති. අයමෙත්ථ සඞ්ඛෙපො. විත්ථාරො පන සබ්බාකාරසම්පන්නං විනිච්ඡයං ඉච්ඡන්තෙන විසුද්ධිමග්ගතො ගහෙතබ්බො. අනුලොමපටිලොමන්ති අනුලොමඤ්ච පටිලොමඤ්ච. තත්ථ ‘‘අවිජ්ජාපච්චයා සඞ්ඛාරා’’තිආදිනා නයෙන වුත්තො අවිජ්ජාදිකො පච්චයාකාරො අත්තනා කත්තබ්බකිච්චකරණතො ‘‘අනුලොමො’’ති වුච්චති. ‘‘අවිජ්ජාය ත්වෙව අසෙසවිරාගනිරොධා සඞ්ඛාරනිරොධො’’තිආදිනා නයෙන වුත්තො ස්වෙව අනුප්පාදනිරොධෙන නිරුජ්ඣමානො තං කිච්චං න කරොතීති තස්ස අකරණතො ‘‘පටිලොමො’’ති වුච්චති. පුරිමනයෙන වා වුත්තො පවත්තියා අනුලොමො, ඉතරො තස්සා පටිලොමොති එවම්පෙත්ථ අත්ථො දට්ඨබ්බො. ආදිතො පන පට්ඨාය යාව අන්තං, අන්තතො ච පට්ඨාය යාව ආදිං පාපෙත්වා අවුත්තත්තා ඉතො අඤ්ඤෙනත්ථෙන අනුලොමපටිලොමතා න යුජ්ජති. 'पटिच्चसमुप्पादं' का अर्थ है - प्रत्ययाकार (कारणों की कार्य-प्रणाली)। क्योंकि प्रत्ययाकार एक-दूसरे पर आश्रित होकर साथ रहने वाले धर्मों को उत्पन्न करता है, इसलिए इसे 'प्रतीत्यसमुत्पाद' कहा जाता है। यहाँ यह संक्षेप है। विस्तार से सभी प्रकार से पूर्ण निर्णय की इच्छा रखने वाले को 'विशुद्धिमग्ग' से (इसे) ग्रहण करना चाहिए। 'अनुलोमपटिलोमं' का अर्थ है - अनुलोम और प्रतिलोम। वहाँ "अविद्या के प्रत्यय से संस्कार" आदि विधि से कहा गया अविद्या आदि प्रत्ययाकार, स्वयं के द्वारा किए जाने योग्य कार्य को करने के कारण 'अनुलोम' कहा जाता है। "अविद्या के ही पूर्ण वैराग्य और निरोध से संस्कारों का निरोध" आदि विधि से कहा गया वही (प्रत्ययाकार), अनुत्पाद-निरोध (पुनः उत्पन्न न होने वाले निरोध) द्वारा निरुद्ध होते हुए उस कार्य को नहीं करता है, इसलिए उस कार्य को न करने के कारण वह 'प्रतिलोम' कहा जाता है। अथवा, पूर्व विधि से कहा गया (प्रतीत्यसमुत्पाद) प्रवृत्ति (संसार चक्र) के अनुकूल होने से 'अनुलोम' है, और दूसरा (निरोध पक्ष) उस प्रवृत्ति के विपरीत होने से 'प्रतिलोम' है - इस प्रकार भी यहाँ अर्थ समझना चाहिए। किन्तु आदि (अविद्या) से लेकर अन्त (जरा-मरण) तक, और अन्त से लेकर आदि तक पहुँचाकर (यहाँ) नहीं कहा गया है, इसलिए इस बताए गए अर्थ के अतिरिक्त अन्य अर्थ में अनुलोम-प्रतिलोमता उचित नहीं है। මනසාකාසීති මනසි අකාසි. තත්ථ යථා අනුලොමං මනසි අකාසි, ඉදං තාව දස්සෙතුං ‘‘අවිජ්ජාපච්චයා සඞ්ඛාරා’’තිආදි වුත්තං. තත්ථ අවිජ්ජා ච සා පච්චයො චාති අවිජ්ජාපච්චයො. තස්මා අවිජ්ජාපච්චයා සඞ්ඛාරා සම්භවන්තීති ඉමිනා නයෙන සබ්බපදෙසු අත්ථො වෙදිතබ්බො. අයමෙත්ථ සඞ්ඛෙපො. විත්ථාරො පන සබ්බාකාරසම්පන්නං විනිච්ඡයං ඉච්ඡන්තෙන විසුද්ධිමග්ගතොව ගහෙතබ්බො. "मनसाकासीति" का अर्थ है "मनसि अकासि" (मन में किया/चिंतन किया)। वहाँ, जिस प्रकार अनुलोम क्रम से मन में चिंतन किया, इसे पहले दिखाने के लिए "अविज्जापच्चया संखारा" (अविद्या के प्रत्यय से संस्कार होते हैं) आदि कहा गया है। वहाँ अविद्या ही प्रत्यय (कारण) है, इसलिए वह "अविज्जापच्चयो" है। अतः अविद्या रूपी प्रत्यय से संस्कार उत्पन्न होते हैं—इस पद्धति से सभी पदों में अर्थ समझना चाहिए। यहाँ यह संक्षेप है। विस्तार से सभी प्रकार से पूर्ण निर्णय की इच्छा रखने वाले को विसुद्धिमग्ग से ही इसे ग्रहण करना चाहिए। යථා පන පටිලොමං මනසි අකාසි, ඉදං දස්සෙතුං අවිජ්ජාය ත්වෙව අසෙසවිරාගනිරොධා සඞ්ඛාරනිරොධොතිආදි වුත්තං. තත්ථ අවිජ්ජාය ත්වෙවාති අවිජ්ජාය තු එව. අසෙසවිරාගනිරොධාති විරාගසඞ්ඛාතෙන මග්ගෙන අසෙසනිරොධා. සඞ්ඛාරනිරොධොති සඞ්ඛාරානං අනුප්පාදනිරොධො හොති. එවං නිරුද්ධානං පන සඞ්ඛාරානං නිරොධා විඤ්ඤාණං නිරුද්ධං, විඤ්ඤාණාදීනඤ්ච නිරොධා නාමරූපාදීනි නිරුද්ධානියෙව හොන්තීති දස්සෙතුං සඞ්ඛාරනිරොධා විඤ්ඤාණනිරොධොතිආදීනි වත්වා එවමෙතස්ස කෙවලස්ස දුක්ඛක්ඛන්ධස්ස නිරොධො හොතීති වුත්තං. තත්ථ කෙවලස්සාති සකලස්ස; සුද්ධස්ස වා සත්තවිරහිතස්සාති අත්ථො. දුක්ඛක්ඛන්ධස්සාති දුක්ඛරාසිස්ස. නිරොධො හොතීති අනුප්පාදො හොති. और जिस प्रकार प्रतिलोम क्रम से मन में चिंतन किया, इसे दिखाने के लिए "अविज्जाय त्वेव असेसविरागनिरोधा संख्वारनिरोधो" (अविद्या के ही पूर्ण विराग और निरोध से संस्कारों का निरोध होता है) आदि कहा गया है। वहाँ "अविज्जाय त्वेव" का अर्थ है "अविद्या का ही"। "असेसविरागनिरोधा" का अर्थ है विराग संज्ञक (अर्हत्) मार्ग के द्वारा अवशेषरहित निरोध से। "संखारनिरोधो" का अर्थ है संस्कारों का अनुत्पाद-निरोध (पुनः उत्पन्न न होना) होता है। इस प्रकार निरुद्ध हुए संस्कारों के निरोध से विज्ञान निरुद्ध होता है, और विज्ञान आदि के निरोध से नाम-रूप आदि निरुद्ध ही हो जाते हैं—यह दिखाने के लिए "संखारनिरोधा विञ्ञाणनिरोधो" आदि कहकर "एवमेतस्स केवलस्स दुक्खक्खन्धस्स निरोधो होति" (इस प्रकार इस संपूर्ण दुःख-स्कंध का निरोध होता है) कहा गया है। वहाँ "केवलस्स" का अर्थ है 'सकल' (संपूर्ण); अथवा 'शुद्ध' या 'सत्व-रहित'। "दुक्खक्खन्धस्स" का अर्थ है 'दुःख की राशि का'। "निरोधो होति" का अर्थ है 'अनुत्पाद' (पुनः उत्पन्न न होना) होता है। එතමත්ථං [Pg.236] විදිත්වාති ය්වායං ‘‘අවිජ්ජාදිවසෙන සඞ්ඛාරාදිකස්ස දුක්ඛක්ඛන්ධස්ස සමුදයො ච අවිජ්ජානිරොධාදිවසෙන ච නිරොධො හොතී’’ති වුත්තො, සබ්බාකාරෙන එතමත්ථං විදිත්වා. තායං වෙලායන්ති තායං තස්ස අත්ථස්ස විදිතවෙලායං. ඉමං උදානං උදානෙසීති ඉමං තස්මිං විදිතෙ අත්ථෙ හෙතුනො ච හෙතුසමුප්පන්නධම්මස්ස ච පජානනාය ආනුභාවදීපකං ‘‘යදා හවෙ පාතුභවන්තී’’තිආදිකං සොමනස්සයුත්තඤාණසමුට්ඨානං උදානං උදානෙසි, අත්තමනවාචං නිච්ඡාරෙසීති වුත්තං හොති. "एतमत्थं विदित्वा" का अर्थ है—जो यह कहा गया है कि "अविद्या आदि के कारण संस्कार आदि दुःख-स्कंध का समुदय होता है और अविद्या के निरोध आदि से निरोध होता है", इस अर्थ को सभी प्रकार से जानकर। "तायं वेलायं" का अर्थ है उस अर्थ को जानने के समय में। "इमं उदानं उदानेसि" का अर्थ है—उस अर्थ के जान लिए जाने पर, हेतु और हेतु से उत्पन्न धर्मों के प्रज्ञान के अनुभाव को प्रकाशित करने वाले "यदा हवे पातुभवन्ति" आदि, सौमनस्य-युक्त ज्ञान से उत्पन्न इस उदान को कहा, अर्थात् प्रसन्न मन वाली वाणी को प्रकट किया—यह अर्थ है। තස්සත්ථො – යදා හවෙති යස්මිං භවෙ කාලෙ. පාතුභවන්තීති උප්පජ්ජන්ති. ධම්මාති අනුලොමපච්චයාකාරපටිවෙධසාධකා බොධිපක්ඛියධම්මා. අථ වා පාතුභවන්තීති පකාසන්ති; අභිසමයවසෙන බ්යත්තා පාකටා හොන්ති. ධම්මාති චතුඅරියසච්චධම්මා. ආතාපො වුච්චති කිලෙසසන්තාපනට්ඨෙන වීරියං; ආතාපිනොති සම්මප්පධානවීරියවතො. ඣායතොති ආරම්මණූපනිජ්ඣානලක්ඛණෙන ච ලක්ඛණූපනිජ්ඣානලක්ඛණෙන ච ඣානෙන ඣායන්තස්ස. බ්රාහ්මණස්සාති බාහිතපාපස්ස ඛීණාසවස්ස. අථස්ස කඞ්ඛා වපයන්තීති අථස්ස එවං පාතුභූතධම්මස්ස කඞ්ඛා වපයන්ති. සබ්බාති යා එතා ‘‘කො නු ඛො භන්තෙ ඵුසතීති; නො කල්ලො පඤ්හොති භගවා අවොචා’’තිආදිනා, තථා ‘‘කතමං නු ඛො භන්තෙ ජරාමරණං; කස්ස ච පනිදං ජරාමරණන්ති; නො කල්ලො පඤ්හොති භගවා අවොචා’’තිආදිනා ච නයෙන පච්චයාකාරෙ කඞ්ඛා වුත්තා, යා ච පච්චයාකාරස්සෙව අප්පටිවිද්ධත්තා ‘‘අහොසිං නු ඛො අහං අතීතමද්ධාන’’න්තිආදිකා සොළස කඞ්ඛා ආගතා, තා සබ්බා වපයන්ති අපගච්ඡන්ති නිරුජ්ඣන්ති. කස්මා? යතො පජානාති සහෙතුධම්මන්ති යස්මා අවිජ්ජාදිකෙන හෙතුනා සහෙතුකං ඉමං සඞ්ඛාරාදිං කෙවලං දුක්ඛක්ඛන්ධධම්මං පජානාති අඤ්ඤාති පටිවිජ්ඣතීති. उसका अर्थ है—"यदा हवे" अर्थात् जिस समय में। "पातुभवन्ति" अर्थात् उत्पन्न होते हैं। "धम्मा" अर्थात् अनुलोम प्रत्ययाकार (प्रतीत्यसमुत्पाद) के प्रतिवेध को सिद्ध करने वाले बोधिपाक्षिक धर्म। अथवा "पातुभवन्ति" का अर्थ है प्रकाशित होते हैं; अभिसमय के कारण स्पष्ट और प्रकट होते हैं। "धम्मा" का अर्थ है चार आर्य सत्य धर्म। क्लेशों को तपाने के अर्थ में वीर्य को "आतापो" कहा जाता है; "आतापिनो" का अर्थ है सम्यक् प्रधान वीर्य वाले के। "झायतो" का अर्थ है आलम्बन-उपनिध्यान लक्षण और लक्षण-उपनिध्यान लक्षण वाले ध्यान से ध्यान करने वाले के। "ब्राह्मणस्स" का अर्थ है पापों को बाहर निकाल देने वाले क्षीणास्त्रव (अर्हत्) के। "अथस्स कङ्खा वपयन्ति" का अर्थ है—तब उस प्रकार प्रकट हुए धर्मों वाले (योगी) की शंकाएँ दूर हो जाती हैं। "सब्बा" अर्थात् जो ये शंकाएँ "भन्ते! कौन स्पर्श करता है? यह प्रश्न उचित नहीं है—ऐसा भगवान् ने कहा" आदि पद्धति से, तथा "भन्ते! जरामरण क्या है? और यह जरामरण किसका है? यह प्रश्न उचित नहीं है—ऐसा भगवान् ने कहा" आदि पद्धति से प्रतीत्यसमुत्पाद के विषय में कही गई हैं, और प्रतीत्यसमुत्पाद का प्रतिवेध न होने के कारण जो "क्या मैं अतीत काल में था?" आदि सोलह प्रकार की शंकाएँ आई हैं, वे सभी दूर हो जाती हैं, चली जाती हैं, निरुद्ध हो जाती हैं। किसलिए? "यतो पजानाति सहेतुधम्मं" क्योंकि वह अविद्या आदि हेतु से हेतु-सहित इस संस्कार आदि संपूर्ण दुःख-स्कंध रूपी धर्म को प्रजानता है, जानता है, प्रतिवेध करता है। 2. දුතියවාරෙ – ඉමං උදානං උදානෙසීති ඉමං තස්මිං විදිතෙ අත්ථෙ ‘‘අවිජ්ජාය ත්වෙව අසෙසවිරාගනිරොධා සඞ්ඛාරනිරොධො’’ති එවං පකාසිතස්ස නිබ්බානසඞ්ඛාතස්ස පච්චයක්ඛයස්ස අවබොධානුභාවදීපකං වුත්තප්පකාරං උදානං උදානෙසීති අත්ථො. තත්රායං සඞ්ඛෙපත්ථො – යස්මා පච්චයානං ඛයසඞ්ඛාතං නිබ්බානං අවෙදි අඤ්ඤාසි පටිවිජ්ඣි, තස්මා යදාස්ස ආතාපිනො ඣායතො [Pg.237] බ්රාහ්මණස්ස වුත්තප්පකාරා ධම්මා පාතුභවන්ති, අථස්ස යා නිබ්බානස්ස අවිදිතත්තා උප්පජ්ජෙය්යුං, තා සබ්බාපි කඞ්ඛා වපයන්තීති. २. द्वितीय वार (दूसरे अवसर) में—"इमं उदानं उदानेसि" का अर्थ है—उस अर्थ के जान लिए जाने पर, "अविद्या के ही पूर्ण विराग और निरोध से संस्कारों का निरोध होता है" इस प्रकार प्रकाशित, निर्वाण संज्ञक 'प्रत्ययों के क्षय' के बोध के अनुभाव को दिखाने वाले पूर्वोक्त प्रकार के उदान को कहा। वहाँ यह संक्षेप अर्थ है—चूँकि उसने प्रत्ययों के क्षय संज्ञक निर्वाण को जान लिया, समझ लिया, प्रतिवेध कर लिया, इसलिए जब उस आतापी, ध्यानी ब्राह्मण के पूर्वोक्त धर्म प्रकट होते हैं, तब उसकी वे सभी शंकाएँ दूर हो जाती हैं जो निर्वाण को न जानने के कारण उत्पन्न हो सकती थीं। 3. තතියවාරෙ – ඉමං උදානං උදානෙසීති ඉමං යෙන මග්ගෙන සො දුක්ඛක්ඛන්ධස්ස සමුදයනිරොධසඞ්ඛාතො අත්ථො කිච්චවසෙන ච ආරම්මණකිරියාය ච විදිතො, තස්ස අරියමග්ගස්ස ආනුභාවදීපකං වුත්තප්පකාරං උදානං උදානෙසීති අත්ථො. තත්රාපායං සඞ්ඛෙපත්ථො – යදා හවෙ පාතුභවන්ති ධම්මා ආතාපිනො ඣායතො බ්රාහ්මණස්ස, තදා සො බ්රාහ්මණො තෙහි වා උප්පන්නෙහි බොධිපක්ඛියධම්මෙහි, යස්ස වා අරියමග්ගස්ස චතුසච්චධම්මා පාතුභූතා, තෙන අරියමග්ගෙන විධූපයං තිට්ඨති මාරසෙනං ‘‘කාමා තෙ පඨමා සෙනා’’තිආදිනා නයෙන වුත්තප්පකාරං මාරසෙනං විධූපයන්තො විධමෙන්තො විද්ධංසෙන්තො තිට්ඨති. කථං? සූරියොව ඔභාසයමන්තලික්ඛං, යථා සූරියො අබ්භුග්ගතො අත්තනො පභාය අන්තලික්ඛං ඔභාසෙන්තොව අන්ධකාරං විධමෙන්තො තිට්ඨති, එවං සොපි බ්රාහ්මණො තෙහි ධම්මෙහි තෙන වා මග්ගෙන සච්චානි පටිවිජ්ඣන්තොව මාරසෙනං විධූපයන්තො තිට්ඨතීති. ३. तृतीय वार (तीसरे अवसर) में—"इमं उदानं उदानेसि" का अर्थ है—जिस मार्ग से वह दुःख-स्कंध के समुदय और निरोध संज्ञक अर्थ, कृत्य के वश से और आलम्बन-क्रिया के द्वारा जान लिया गया है, उस आर्यमार्ग के अनुभाव को दिखाने वाले पूर्वोक्त प्रकार के उदान को कहा। वहाँ भी यह संक्षेप अर्थ है—जब आतापी, ध्यानी ब्राह्मण के धर्म (बोधिपाक्षिक धर्म) प्रकट होते हैं, तब वह ब्राह्मण उन उत्पन्न हुए बोधिपाक्षिक धर्मों से, अथवा जिस आर्यमार्ग के द्वारा चार आर्य सत्य धर्म प्रकट हुए हैं, उस आर्यमार्ग से मार-सेना को विध्वस्त करता हुआ स्थित रहता है; "काम तुम्हारी पहली सेना है" आदि पद्धति से (सुत्तनिपात में) कहे गए प्रकार की मार-सेना को कँपाता हुआ, नष्ट करता हुआ, विध्वंस करता हुआ स्थित रहता है। कैसे? "सूरियोव ओभासयमन्तलिक्खं" जैसे सूर्य आकाश को प्रकाशित करता है; जैसे उदित हुआ सूर्य अपनी प्रभा से आकाश को प्रकाशित करता हुआ ही अंधकार को नष्ट करता हुआ स्थित रहता है, वैसे ही वह ब्राह्मण भी उन धर्मों से अथवा उस मार्ग से सत्यों का प्रतिवेध करता हुआ ही मार-सेना को विध्वस्त करता हुआ स्थित रहता है। එවමෙත්ථ පඨමං උදානං පච්චයාකාරපච්චවෙක්ඛණවසෙන, දුතියං නිබ්බානපච්චවෙක්ඛණවසෙන, තතියං මග්ගපච්චවෙක්ඛණවසෙන උප්පන්නන්ති වෙදිතබ්බං. උදානෙ පන ‘‘රත්තියා පඨමං යාමං පටිච්චසමුප්පාදං අනුලොමං, දුතියං යාමං පටිලොමං, තතියං යාමං අනුලොමපටිලොම’’න්ති වුත්තං; තං සත්තාහස්ස අච්චයෙන ‘‘ස්වෙ ආසනා වුට්ඨහිස්සාමී’’ති රත්තිං උප්පාදිතමනසිකාරං සන්ධාය වුත්තං. තදා හි භගවා යස්ස පච්චයාකාරපජානනස්ස ච පච්චයක්ඛයාධිගමස්ස ච ආනුභාවදීපිකා පුරිමා ද්වෙ උදානගාථා, තස්ස වසෙන එකෙකමෙව කොට්ඨාසං පඨමයාමඤ්ච මජ්ඣිමයාමඤ්ච මනසාකාසි, ඉධ පන පාටිපදරත්තියා එවං මනසාකාසි. භගවා හි විසාඛපුණ්ණමාය රත්තියා පඨමයාමෙ පුබ්බෙනිවාසං අනුස්සරි, මජ්ඣිමයාමෙ දිබ්බචක්ඛුං විසොධෙසි, පච්ඡිමයාමෙ පටිච්චසමුප්පාදං අනුලොමපටිලොමං මනසි කත්වා ‘‘ඉදානි අරුණො උග්ගමිස්සතී’’ති සබ්බඤ්ඤුතං පාපුණි. සබ්බඤ්ඤුතප්පත්තිසමනන්තරමෙව ච අරුණො උග්ගච්ඡි. තතො තං දිවසං තෙනෙව පල්ලඞ්කෙන වීතිනාමෙත්වා සම්පත්තාය පාටිපදරත්තියා තීසු යාමෙසු එවං මනසි කත්වා ඉමානි උදානානි උදානෙසි. ඉති [Pg.238] පාටිපදරත්තියා එවං මනසි කත්වා තං ‘‘බොධිරුක්ඛමූලෙ සත්තාහං එකපල්ලඞ්කෙන නිසීදී’’ති එවං වුත්තසත්තාහං තත්ථෙව වීතිනාමෙසි. इस प्रकार, यहाँ यह समझना चाहिए कि प्रथम उदान प्रतीत्यसमुत्पाद के प्रत्यवेक्षण (चिन्तन) के कारण, द्वितीय निर्वाण के प्रत्यवेक्षण के कारण और तृतीय मार्ग के प्रत्यवेक्षण के कारण उत्पन्न हुआ। उदान में जो कहा गया है कि "रात्रि के प्रथम पहर में प्रतीत्यसमुत्पाद का अनुलोम, द्वितीय पहर में प्रतिलोम और तृतीय पहर में अनुलोम-प्रतिलोम", वह सात दिनों के बीतने पर "कल मैं आसन से उठूँगा" इस विचार से रात्रि में किए गए मनस्कार के संदर्भ में कहा गया है। क्योंकि तब भगवान ने, जिनके प्रभाव को पहले की दो उदान गाथाएँ प्रकाशित करती हैं, उस प्रतीत्यसमुत्पाद के प्रजानन (विशेष ज्ञान) और प्रत्यय-क्षय (निर्वाण) की प्राप्ति के अनुसार, एक-एक भाग का प्रथम और मध्यम पहर में मनस्कार किया; किन्तु यहाँ प्रतिपदा की रात्रि में इस प्रकार मनस्कार किया। वास्तव में, भगवान ने वैशाख पूर्णिमा की रात्रि के प्रथम पहर में पूर्व-निवास (पिछले जन्मों) का अनुस्मरण किया, मध्यम पहर में दिव्य-चक्षु को विशुद्ध किया, और पिछले पहर में प्रतीत्यसमुत्पाद का अनुलोम-प्रतिलोम मनस्कार करते हुए "अब अरुणोदय होगा" इस समय सर्वज्ञता (बुद्धत्व) प्राप्त की। सर्वज्ञता प्राप्ति के तुरंत बाद ही अरुणोदय हुआ। उसके बाद उस दिन को उसी पल्यंक (आसन) पर बिताकर, आई हुई प्रतिपदा की रात्रि के तीनों पहरों में इस प्रकार मनस्कार करके इन उदानों को प्रकट किया। इस प्रकार प्रतिपदा की रात्रि में ऐसा मनस्कार करके, "बोधिवृक्ष के मूल में सात दिनों तक एक ही आसन पर बैठे रहे" इस प्रकार कहे गए सात दिनों को वहीं व्यतीत किया। බොධිකථා නිට්ඨිතා. बोधिकथा समाप्त हुई। අජපාලකථා अजपालकथा 4. අථ ඛො භගවා සත්තාහස්ස අච්චයෙන තම්හා සමාධිම්හා වුට්ඨහිත්වා බොධිරුක්ඛමූලා යෙන අජපාලනිග්රොධො තෙනුපසඞ්කමීති එත්ථ න භගවා තම්හා සමාධිම්හා වුට්ඨහිත්වා අනන්තරමෙව බොධිරුක්ඛමූලා යෙන අජපාලනිග්රොධො තෙනුපසඞ්කමි. යථා පන ‘‘භුත්වා සයතී’’ති වුත්තෙ න ‘‘හත්ථෙ අධොවිත්වා මුඛං අවික්ඛාලෙත්වා සයනසමීපං අගන්ත්වා අඤ්ඤං කිඤ්චි ආලාපසල්ලාපං අකත්වා සයති’’ච්චෙව වුත්තං හොති, භොජනතො පන පච්ඡා සයති, න නසයතීති ඉදමෙවත්ථ දීපිතං හොති. එවමිධාපි ‘‘න තම්හා සමාධිම්හා වුට්ඨහිත්වා අනන්තරමෙව පක්කාමී’’ති වුත්තං හොති, වුට්ඨානතො ච පන පච්ඡා පක්කාමි, න නපක්කාමීති ඉදමෙවෙත්ථ දීපිතං හොති. ४. "तब भगवान सात दिनों के बीतने पर उस समाधि से उठकर बोधिवृक्ष के मूल से जहाँ अजपाल निग्रोध (बरगद) था, वहाँ गए" - यहाँ इसका अर्थ यह नहीं है कि भगवान उस समाधि से उठकर तुरंत ही बोधिवृक्ष के मूल से अजपाल निग्रोध की ओर चले गए। जैसे "खाकर सोता है" कहने पर यह अर्थ नहीं होता कि "हाथ धोए बिना, मुँह साफ किए बिना, शय्या के पास जाए बिना और कोई अन्य बातचीत किए बिना ही सो जाता है", बल्कि भोजन के बाद सोता है, न सोता हो ऐसा नहीं है - यही यहाँ स्पष्ट किया गया है। इसी प्रकार यहाँ भी "उस समाधि से उठकर तुरंत ही नहीं चले गए" यह कहा गया है, बल्कि उठने के बाद गए, न गए हों ऐसा नहीं है - यही यहाँ स्पष्ट किया गया है। අනන්තරං පන අපක්කමිත්වා භගවා කිං අකාසීති? අපරානිපි තීණි සත්තාහානි බොධිසමීපෙයෙව වීතිනාමෙසි. තත්රායං අනුපුබ්බිකථා – භගවති කිර බුද්ධත්තං පත්වා සත්තාහං එකපල්ලඞ්කෙන නිසින්නෙ ‘‘න භගවා වුට්ඨාති; කිං නු ඛො අඤ්ඤෙපි බුද්ධත්තකරා ධම්මා අත්ථී’’ති එකච්චානං දෙවතානං කඞ්ඛා උදපාදි. අථ භගවා අට්ඨමෙ දිවසෙ සමාපත්තිතො වුට්ඨාය දෙවතානං කඞ්ඛං ඤත්වා කඞ්ඛාවිධමනත්ථං ආකාසෙ උප්පතිත්වා යමකපාටිහාරියං දස්සෙත්වා තාසං කඞ්ඛං විධමිත්වා පල්ලඞ්කතො ඊසකං පාචීනනිස්සිතෙ උත්තරදිසාභාගෙ ඨත්වා චත්තාරි අසඞ්ඛ්යෙය්යානි කප්පසතසහස්සඤ්ච උපචිතානං පාරමීනං බලාධිගමනට්ඨානං පල්ලඞ්කං බොධිරුක්ඛඤ්ච අනිමිසෙහි අක්ඛීහි ඔලොකයමානො සත්තාහං වීතිනාමෙසි, තං ඨානං අනිමිසචෙතියං නාම ජාතං. අථ පල්ලඞ්කස්ස ච ඨිතට්ඨානස්ස ච අන්තරා පුරත්ථිමතො ච පච්ඡිමතො ච ආයතෙ රතනචඞ්කමෙ චඞ්කමන්තො සත්තාහං වීතිනාමෙසි, තං ඨානං රතනචඞ්කමචෙතියං නාම ජාතං. තතො පච්ඡිමදිසාභාගෙ දෙවතා රතනඝරං මාපයිංසු. තත්ථ පල්ලඞ්කෙන නිසීදිත්වා අභිධම්මපිටකං විසෙසතො චෙත්ථ අනන්තනයං සමන්තපට්ඨානං [Pg.239] විචිනන්තො සත්තාහං වීතිනාමෙසි, තං ඨානං රතනඝරචෙතියං නාම ජාතං. तुरंत न जाकर भगवान ने क्या किया? अन्य तीन सप्ताह भी बोधिवृक्ष के समीप ही व्यतीत किए। यहाँ यह अनुक्रमिक कथा है - कहते हैं कि भगवान के बुद्धत्व प्राप्त कर सात दिनों तक एक ही आसन पर बैठे रहने पर, कुछ देवताओं को यह शंका हुई कि "भगवान (आसन से) नहीं उठ रहे हैं; क्या बुद्धत्व प्राप्त कराने वाले कुछ अन्य धर्म भी शेष हैं?" तब भगवान ने आठवें दिन समापत्ति से उठकर देवताओं की शंका जानकर, शंका दूर करने के लिए आकाश में जाकर यमक-प्रातिहार्य दिखाया और उनकी शंका दूर की। फिर पल्यंक (आसन) से थोड़ा पूर्व की ओर झुके हुए उत्तर दिशा के भाग में खड़े होकर, चार असंख्येय और एक लाख कल्पों तक संचित पारमिताओं के बल की प्राप्ति के स्थान उस पल्यंक और बोधिवृक्ष को बिना पलक झपकाए आँखों से देखते हुए सात दिन व्यतीत किए; वह स्थान 'अनिमिष चेतिय' कहलाया। फिर पल्यंक और खड़े होने के स्थान के बीच पूर्व से पश्चिम तक लंबे 'रत्न-चंक्रमण' में चंक्रमण (टहलते) करते हुए सात दिन व्यतीत किए; वह स्थान 'रत्नचंक्रमण चेतिय' कहलाया। उसके बाद पश्चिम दिशा के भाग में देवताओं ने 'रत्न-घर' का निर्माण किया। वहाँ पल्यंक लगाकर बैठकर अभिधम्मपिटक का, विशेष रूप से उसमें अनंत नयों वाले 'समन्तपट्टान' का विचार करते हुए सात दिन व्यतीत किए; वह स्थान 'रत्नघर चेतिय' कहलाया। එවං බොධිසමීපෙයෙව චත්තාරි සත්තාහානි වීතිනාමෙත්වා පඤ්චමෙ සත්තාහෙ බොධිරුක්ඛමූලා යෙන අජපාලනිග්රොධො තෙනුපසඞ්කමි. තස්ස කිර නිග්රොධස්ස ඡායාය අජපාලකා ගන්ත්වා නිසීදන්ති; තෙනස්ස අජපාලනිග්රොධොත්වෙව නාමං උදපාදි. සත්තාහං විමුත්තිසුඛපටිසංවෙදීති තත්රාපි ධම්මං විචිනන්තොයෙව විමුත්තිසුඛං පටිසංවෙදෙන්තො නිසීදි. බොධිතො පුරත්ථිමදිසාභාගෙ එස රුක්ඛො හොති. එවං නිසින්නෙ ච පනෙත්ථ භගවති එකො බ්රාහ්මණො ගන්ත්වා පඤ්හං පුච්ඡි. තෙන වුත්තං ‘‘අථ ඛො අඤ්ඤතරො’’තිආදි. තත්ථ හුංහුඞ්කජාතිකොති සො කිර දිට්ඨමඞ්ගලිකො නාම, මානවසෙන කොධවසෙන ච ‘‘හුංහු’’න්ති කරොන්තො විචරති, තස්මා ‘‘හුංහුඞ්කජාතිකො’’ති වුච්චති. ‘‘හුහුක්කජාතිකො’’තිපි පඨන්ති. इस प्रकार बोधिवृक्ष के समीप ही चार सप्ताह व्यतीत कर, पाँचवें सप्ताह में बोधिवृक्ष के मूल से जहाँ अजपाल निग्रोध था, वहाँ गए। कहते हैं कि उस निग्रोध (बरगद) की छाया में चरवाहे (अजपाल) जाकर बैठते थे; इसलिए उसका नाम 'अजपाल निग्रोध' पड़ा। "सात दिनों तक विमुक्ति-सुख का अनुभव करते हुए" - वहाँ भी धर्म का विचार करते हुए ही विमुक्ति-सुख का अनुभव करते हुए बैठे रहे। यह वृक्ष बोधिवृक्ष से पूर्व दिशा के भाग में है। इस प्रकार भगवान के वहाँ बैठे होने पर एक ब्राह्मण ने जाकर प्रश्न पूछा। इसलिए "अथ खो अञ्ञतरो" आदि कहा गया है। वहाँ 'हुंहुंकजातिको' का अर्थ है - वह ब्राह्मण 'दृष्ट-मांगलिक' (देखी गई वस्तुओं को मंगल मानने वाला) था, जो मान और क्रोध के कारण "हुं-हुं" करता हुआ घूमता था, इसलिए उसे 'हुंहुंकजातिक' कहा जाता है। कुछ लोग इसे 'हुहुक्कजातिक' भी पढ़ते हैं। එතමත්ථං විදිත්වාති එතං තෙන වුත්තස්ස වචනස්ස සිඛාපත්තමත්ථං විදිත්වා තායං වෙලායං ඉමං උදානං උදානෙසි. තස්සත්ථො – යො බාහිතපාපධම්මතාය බ්රාහ්මණො න දිට්ඨමඞ්ගලිකතාය, හුංහුඞ්කාරකභාවාදිපාපධම්මයුත්තො හුත්වා කෙවලං ජාතිමත්තකෙන බ්රහ්මඤ්ඤං පටිජානාති, සො බ්රාහ්මණො බාහිතපාපධම්මත්තා හුංහුඞ්කාරප්පහානෙන නිහුංහුඞ්කො, රාගාදිකසාවාභාවෙන නික්කසාවො, භාවනානුයොගයුත්තචිත්තතාය යතත්තො, සීලසංවරෙන වා සඤ්ඤතචිත්තතාය යතත්තො, චතුමග්ගඤාණසඞ්ඛාතෙහි වෙදෙහි අන්තං, වෙදානං වා අන්තං ගතත්තා වෙදන්තගූ, මග්ගබ්රහ්මචරියස්ස වුසිතත්තා වුසිතබ්රහ්මචරියො. ධම්මෙන බ්රහ්මවාදං වදෙය්ය, ‘‘බ්රාහ්මණො, අහ’’න්ති එතං වාදං ධම්මෙන වදෙය්ය, යස්ස සකලෙ ලොකසන්නිවාසෙ කුහිඤ්චි එකාරම්මණෙපි රාගුස්සදො දොසුස්සදො මොහුස්සදො මානුස්සදො දිට්ඨුස්සදොති ඉමෙ උස්සදා නත්ථීති. "इस अर्थ को जानकर" (एतमत्थं विदित्वा) का अर्थ है उस ब्राह्मण द्वारा कहे गए वचनों के सर्वोच्च अर्थ (अर्हत्व) को जानकर उस समय यह उदान कहा। इसका अर्थ है—जो पापों को धो देने के कारण 'ब्राह्मण' है, न कि केवल जन्म मात्र से या मिथ्या धारणाओं से। वह अहंकार और क्रोध से रहित (निहुंहुंको), राग आदि मलों से मुक्त (निक्कसावो), भावना में संलग्न चित्त वाला (यतत्तो), चार आर्य मार्गों के ज्ञान से अंत (निर्वाण) तक पहुँचा हुआ (वेदान्तगू), और ब्रह्मचर्य का पालन पूर्ण कर चुका (वुसितब्रह्मचरियो) है। वह धर्म के अनुसार स्वयं को 'ब्राह्मण' कह सकता है, जिसके संपूर्ण लोक में कहीं भी किसी भी आलम्बन में राग, द्वेष, मोह, मान या दृष्टि का उभार (उस्सदा) नहीं है। අජපාලකථා නිට්ඨිතා. अजपाल कथा समाप्त हुई। මුචලින්දකථා मुचलिन्द कथा। 5. අකාලමෙඝොති අසම්පත්තෙ වස්සකාලෙ උප්පන්නමෙඝො. අයං පන ගිම්හානං පච්ඡිමෙ මාසෙ උදපාදි. සත්තාහවද්දලිකාති තස්මිං උප්පන්නෙ සත්තාහං අවිච්ඡින්නවුට්ඨිකා අහොසි. සීතවාතදුද්දිනීති සා ච පන සත්තාහවද්දලිකා [Pg.240] උදකඵුසිතසම්මිස්සෙන සීතවාතෙන සමන්තා පරිබ්භමන්තෙන දූසිතදිවසත්තා සීතවාතදුද්දිනී නාම අහොසි. අථ ඛො මුචලින්දො නාගරාජාති තස්සෙව මුචලින්දරුක්ඛස්ස සමීපෙ පොක්ඛරණියා නිබ්බත්තො මහානුභාවො නාගරාජා. සත්තක්ඛත්තුං භොගෙහි පරික්ඛිපිත්වාති එවං භොගෙහි පරික්ඛිපිත්වා උපරිමුද්ධනි මහන්තං ඵණං කරිත්වාව ඨිතෙ; තස්මිං තස්ස පරික්ඛෙපබ්භන්තරං ලොහපාසාදෙ භණ්ඩාගාරගබ්භප්පමාණං අහොසි, තස්මා භගවා නිවාතෙ පිහිතද්වාරවාතපානෙ කූටාගාරෙ නිසින්නො විය ජාතො. මා භගවන්තං සීතන්තිආදි තස්ස තථා කරිත්වා ඨානකාරණපරිදීපනං. සො හි ‘‘මා භගවන්තං සීතං බාධයිත්ථ, මා උණ්හං, මා ඩංසාදිසම්ඵස්සො බාධයිත්ථා’’ති තථා කරිත්වා අට්ඨාසි. තත්ථ කිඤ්චාපි සත්තාහවද්දලිකාය උණ්හමෙව නත්ථි, සචෙ පන අන්තරන්තරා මෙඝො විගච්ඡෙය්ය උණ්හං භවෙය්ය, තම්පි නං මා බාධයිත්ථාති එවං තස්ස චින්තෙතුං යුත්තං. විද්ධන්ති උබ්බිද්ධං; මෙඝවිගමෙන දූරීභූතන්ති අත්ථො. විගතවලාහකන්ති අපගතමෙඝං. දෙවන්ති ආකාසං. සකවණ්ණන්ති අත්තනො රූපං. ५. "अकाल मेघ" का अर्थ है वर्षा ऋतु आने से पूर्व उठा हुआ मेघ। यह ग्रीष्म ऋतु के अंतिम महीने में उत्पन्न हुआ। "सात दिनों की झड़ी" (सप्ताहवद्दलिका) का अर्थ है सात दिनों तक निरंतर होने वाली वर्षा। "शीतल वायु और दुर्दिन" का अर्थ है वह सात दिनों की वर्षा जो जल की बूंदों और चारों ओर बहने वाली ठंडी हवा के कारण कष्टकारी दिन वाली थी। "तब मुचलिन्द नागराज" का अर्थ है उसी मुचलिन्द वृक्ष के समीप की पुष्करिणी में उत्पन्न महान प्रभावशाली नागराज। "सात बार कुंडलियों से लपेटकर" का अर्थ है इस प्रकार सात बार लपेटकर और ऊपर मस्तक पर बड़ा फण तानकर स्थित होने पर; उसके घेरे के भीतर का स्थान लोह-प्रासाद के भंडार कक्ष के समान सुरक्षित हो गया, जिससे भगवान निर्वात और बंद द्वार-खिड़कियों वाले कूटागार में बैठे हुए के समान हो गए। "भगवान को शीत न लगे" आदि शब्द उस नागराज द्वारा इस प्रकार किए जाने के कारण को स्पष्ट करते हैं। उसने सोचा "भगवान को ठंड न लगे, गर्मी न लगे, डाँस-मच्छर आदि का स्पर्श न सताए"। यद्यपि सात दिनों की झड़ी में गर्मी नहीं थी, फिर भी यदि बीच-बीच में बादल हट जाते तो गर्मी हो सकती थी, इसलिए उसने ऐसा सोचा। "विद्धं" का अर्थ है ऊपर की ओर खुला हुआ या बादलों के हटने से दूर हुआ। "विगतवलाहकं" का अर्थ है बादलों से रहित। "देवं" का अर्थ है आकाश। "सकवण्णं" का अर्थ है अपना (नाग का) रूप। සුඛො විවෙකොති නිබ්බානසඞ්ඛාතො උපධිවිවෙකො සුඛො. තුට්ඨස්සාති චතුමග්ගඤාණසන්තොසෙන සන්තුට්ඨස්ස. සුතධම්මස්සාති පකාසිතධම්මස්ස. පස්සතොති තං විවෙකං යං වා කිඤ්චි පස්සිතබ්බං නාම, තං සබ්බං අත්තනො වීරියබලාධිගතෙන ඤාණචක්ඛුනා පස්සන්තස්ස. අබ්යාපජ්ජන්ති අකුප්පනභාවො; එතෙන මෙත්තාපුබ්බභාගො දස්සිතො. පාණභූතෙසු සංයමොති සත්තෙසු ච සංයමො; අවිහිංසනභාවො සුඛොති අත්ථො. එතෙන කරුණාපුබ්බභාගො දස්සිතො. සුඛා විරාගතා ලොකෙති වීතරාගතාපි සුඛාති දීපෙති. කාමානං සමතික්කමොති යා ‘‘කාමානං සමතික්කමො’’ති වුච්චති; සා විරාගතාපි සුඛාති අත්ථො. එතෙන අනාගාමිමග්ගො කථිතො. අස්මිමානස්ස යො විනයොති ඉමිනා පන අරහත්තං කථිතං; අරහත්තඤ්හි අස්මිමානස්ස ‘‘පස්සද්ධිවිනයො’’ති වුච්චති. ඉතො පරඤ්ච සුඛං නාම නත්ථි, තෙනාහ ‘‘එතං වෙ පරමං සුඛ’’න්ති. "विवेक सुखद है" का अर्थ है निर्वाण रूपी उपधि-विवेक सुखद है। "संतुष्ट के लिए" का अर्थ है चार मार्ग-ज्ञान की संतुष्टि से युक्त व्यक्ति के लिए। "श्रुतधर्म के लिए" का अर्थ है जिसके लिए चार आर्य सत्य प्रकाशित हो चुके हैं। "देखने वाले के लिए" का अर्थ है उस विवेक को या जो कुछ भी देखने योग्य है, उस सबको अपने वीर्य के बल से प्राप्त ज्ञान-चक्षु से देखने वाले के लिए। "अव्यापज्झं" का अर्थ है अक्रोध का भाव; इससे 'मैत्री' के पूर्वभाग को दर्शाया गया है। "प्राणियों के प्रति संयम" का अर्थ है प्राणियों के प्रति संयम और अहिंसा का भाव (करुणा) सुखद है। इससे 'करुणा' के पूर्वभाग को दर्शाया गया है। "लोक में विरागता सुखद है" से भगवान यह दर्शाते हैं कि वीतरागता (अनागामी मार्ग) भी सुखद है। "कामों का अतिक्रमण" जिसे कहा जाता है, वह विरागता भी सुखद है। इससे 'अनागामी मार्ग' कहा गया है। "अस्मि-मान का जो विनय (त्याग) है" इससे 'अर्हत्व' कहा गया है; क्योंकि अर्हत्व को ही अस्मि-मान का 'प्रसब्धि-विनय' कहा जाता है। इससे परे कोई अन्य सुख नहीं है, इसलिए कहा गया "यही परम सुख है"। මුචලින්දකථා නිට්ඨිතා. मुचलिन्द कथा समाप्त हुई। රාජායතනකථා राजायतन कथा। 6. මුචලින්දමූලාති මහාබොධිතො පාචීනකොණෙ ඨිතමුචලින්දරුක්ඛමූලා. රාජායතනන්ති දක්ඛිණදිසාභාගෙ ඨිතං රාජායතනරුක්ඛං උපසඞ්කමි[Pg.241]. තෙන ඛො පන සමයෙනාති කතරෙන සමයෙන. භගවතො කිර රාජායතනමූලෙ සත්තාහං එකපල්ලඞ්කෙන නිසින්නස්ස සමාධිතො වුට්ඨානදිවසෙ අරුණුග්ගමනවෙලායමෙව ‘‘භොජනකිච්චෙන භවිතබ්බ’’න්ති ඤත්වා සක්කො දෙවරාජා ඔසධහරීතකං උපනෙසි. භගවා තං පරිභුඤ්ජි, පරිභුත්තමත්තස්සෙව සරීරකිච්චං අහොසි. සක්කො මුඛොදකං අදාසි. භගවා මුඛං ධොවිත්වා තස්මිංයෙව රුක්ඛමූලෙ නිසීදි. එවං උග්ගතෙ අරුණම්හි නිසින්නෙ භගවති. ६. "मुचलिन्द मूल से" का अर्थ है महाबोधि वृक्ष के पूर्वी कोने (या दक्षिण-पूर्व) में स्थित मुचलिन्द वृक्ष के नीचे से। "राजायतन" का अर्थ है दक्षिण दिशा में स्थित राजायतन वृक्ष के पास गए। "उस समय" का अर्थ है किस समय? कहा जाता है कि जब भगवान राजायतन वृक्ष के नीचे सात दिनों तक एक ही आसन में बैठे थे, तब समाधि से उठने के दिन अरुणोदय के समय "भोजन का समय हो गया है" यह जानकर देवराज शक्र ने औषधि रूपी हरीतकी (हड़) अर्पित की। भगवान ने उसका सेवन किया, जिससे शरीर की शुद्धि हुई। शक्र ने मुख धोने के लिए जल दिया। भगवान मुख धोकर उसी वृक्ष के नीचे बैठ गए। इस प्रकार अरुणोदय होने पर जब भगवान बैठे थे। තෙන ඛො පන සමයෙන තපුස්සභල්ලිකා වාණිජාති තපුස්සො ච භල්ලිකො චාති ද්වෙ භාතරො වාණිජා. උක්කලාති උක්කලජනපදතො. තං දෙසන්ති යස්මිං දෙසෙ භගවා විහරති. කතරස්මිඤ්ච දෙසෙ භගවා විහරති? මජ්ඣිමදෙසෙ. තස්මා මජ්ඣිමදෙසං ගන්තුං අද්ධානමග්ගප්පටිපන්නා හොන්තීති අයමෙත්ථ අත්ථො. ඤාතිසාලොහිතා දෙවතාති තෙසං ඤාතිභූතපුබ්බා දෙවතා. එතදවොචාති සා කිර නෙසං සබ්බසකටානි අප්පවත්තීනි අකාසි. තතො තෙ කිං ඉදන්ති මග්ගදෙවතානං බලිං අකංසු. තෙසං බලිකම්මකාලෙ සා දෙවතා දිස්සමානෙනෙව කායෙන එතං අවොච. මන්ථෙන ච මධුපිණ්ඩිකාය චාති අබද්ධසත්තුනා ච සප්පිමධුඵාණිතාදීහි යොජෙත්වා බද්ධසත්තුනා ච. පතිමානෙථාති උපට්ඨහථ. තං වොති තං පතිමානනං තුම්හාකං භවිස්සති දීඝරත්තං හිතාය සුඛාය. යං අම්හාකන්ති යං පටිග්ගහණං අම්හාකං අස්ස දීඝරත්තං හිතාය සුඛාය. භගවතො එතදහොසීති යො කිරස්ස පධානානුයොගකාලෙ පත්තො අහොසි, සො සුජාතාය පායාසං දාතුං ආගච්ඡන්තියා එව අන්තරධායි. තෙනස්ස එතදහොසි – ‘‘පත්තො මෙ නත්ථි, පුරිමකාපි ච න ඛො තථාගතා හත්ථෙසු පටිග්ගණ්හන්ති, කිම්හි නු ඛො අහං පටිග්ගණ්හෙය්යං මන්ථඤ්ච මධුපිණ්ඩකඤ්චා’’ති. उस समय तपस्सु और भल्लिक नाम के दो भाई व्यापारी थे। 'उक्कल' से तात्पर्य उक्कल जनपद से है। 'उस देश' का अर्थ है जहाँ भगवान विहार कर रहे थे। भगवान किस देश में विहार कर रहे थे? मध्यदेश में। इसलिए मध्यदेश जाने के लिए वे लंबी यात्रा पर निकले थे। 'ज्ञातिसालोहित देवता' का अर्थ है उनकी पूर्व संबंधी देवता। 'यह कहा' का अर्थ है कि उस देवता ने उनके सभी छकड़ों (बैलगाड़ियों) को रोक दिया। तब उन्होंने सोचा कि यह क्या है और मार्ग के देवताओं को बलि (पूजा) अर्पित की। बलि कर्म के समय उस देवता ने दृश्य शरीर से यह कहा। 'मन्थ और मधुपिण्डिक' का अर्थ है बिना गुँधे हुए सत्तू और घी-शहद-गुड़ आदि से बने लड्डू। 'प्रतिमानय' का अर्थ है सेवा करो। 'वह तुम्हारे लिए' का अर्थ है कि वह सत्कार तुम्हारे लिए दीर्घकाल तक हित और सुख के लिए होगा। 'जो हमारे लिए' का अर्थ है कि जो ग्रहण करना हमारे लिए दीर्घकाल तक हित और सुख के लिए हो। भगवान को यह विचार आया - उनके पास जो प्रधान (तपस्या) के समय पात्र था, वह सुजाता द्वारा खीर देने के लिए आते समय ही अंतर्धान हो गया था। इसलिए उन्हें यह विचार आया - "मेरे पास पात्र नहीं है, और पूर्व के तथागत भी हाथों में ग्रहण नहीं करते थे, तो मैं किसमें मन्थ और मधुपिण्डिक ग्रहण करूँ?" පරිවිතක්කමඤ්ඤායාති ඉතො පුබ්බෙව භගවතො සුජාතාය දින්නභොජනංයෙව ඔජානුප්පබන්ධනවසෙන අට්ඨාසි, එත්තකං කාලං නෙව ජිඝච්ඡා න පිපාසා න කායදුබ්බල්යං අහොසි. ඉදානි පනස්ස ආහාරං පටිග්ගහෙතුකාමතාය ‘‘න ඛො තථාගතා’’තිආදිනා නයෙන පරිවිතක්කො උදපාදි[Pg.242]. තං එවං උප්පන්නං අත්තනො චෙතසා භගවතො චෙතොපරිවිතක්කමඤ්ඤාය. චතුද්දිසාති චතූහි දිසාහි. සෙලමයෙ පත්තෙති මුග්ගවණ්ණසෙලමයෙ පත්තෙ. ඉදංයෙව භගවා පටිග්ගහෙසි, තෙයෙව සන්ධාය වුත්තං. චත්තාරො පන මහාරාජානො පඨමං ඉන්දනීලමණිමයෙ පත්තෙ උපනාමෙසුං, න තෙ භගවා අග්ගහෙසි. තතො ඉමෙ චත්තාරොපි මුග්ගවණ්ණසිලාමයෙ පත්තෙ උපනාමෙසුං, භගවා චත්තාරොපි පත්තෙ අග්ගහෙසි තෙසං පසාදානුරක්ඛණත්ථාය, නො මහිච්ඡතාය. ගහෙත්වා ච පන චත්තාරොපි යථා එකොව පත්තො හොති තථා අධිට්ඨහි, චතුන්නම්පි එකසදිසො පුඤ්ඤවිපාකො අහොසි. එවං එකං කත්වා අධිට්ඨිතෙ පටිග්ගහෙසි භගවා පච්චග්ඝෙ සෙලමයෙ පත්තෙ මන්ථඤ්ච මධුපිණ්ඩිකඤ්ච. පච්චග්ඝෙති පච්චග්ඝස්මිං; පාටෙක්කං මහග්ඝස්මින්ති අත්ථො. අථ වා පච්චග්ඝෙති අභිනවෙ අබ්භුණ්හෙ; තඞ්ඛණෙ නිබ්බත්තස්මින්ති අත්ථො. ද්වෙ වාචා එතෙසං අහෙසුන්ති ද්වෙවාචිකා. අථ වා ද්වීහි වාචාහි උපාසකභාවං පත්තාති අත්ථො. තෙ එවං උපාසකභාවං පටිවෙදෙත්වා භගවන්තං ආහංසු – ‘‘කස්ස දානි භන්තෙ අම්හෙහි අජ්ජ පට්ඨාය අභිවාදනපච්චුට්ඨානං කාතබ්බ’’න්ති? අථ භගවා සීසං පරාමසි, කෙසා හත්ථෙ ලග්ගිංසු. තෙ තෙසං අදාසි ‘‘ඉමෙ තුම්හෙ පරිහරථා’’ති. තෙ කෙසධාතුයො ලභිත්වා අමතෙනෙව අභිසිත්තා හට්ඨතුට්ඨා භගවන්තං වන්දිත්වා පක්කමිංසු. 'परिवितर्क जानकर' का अर्थ है कि इससे पहले भगवान को सुजाता द्वारा दिया गया भोजन ही ओज (शक्ति) के निरंतर प्रवाह के कारण बना रहा, इतने समय (49 दिन) तक न भूख लगी, न प्यास और न ही शारीरिक दुर्बलता हुई। अब भोजन ग्रहण करने की इच्छा होने पर "तथागत हाथों में ग्रहण नहीं करते" आदि प्रकार से विचार उत्पन्न हुआ। उस उत्पन्न विचार को अपने चित्त से जानकर (चारों लोकपालों ने)। 'चारों दिशाओं' से तात्पर्य चार दिशाओं से है। 'शैलमय पात्र' का अर्थ है मूंग के रंग के पत्थर के पात्र। भगवान ने इन्हें ही ग्रहण किया, उन्हीं के संदर्भ में यह कहा गया है। चार महाराज्यों ने पहले इंद्रनील मणि के पात्र भेंट किए, जिन्हें भगवान ने स्वीकार नहीं किया। फिर उन्होंने ये चार मूंग के रंग के पत्थर के पात्र भेंट किए, भगवान ने उनकी श्रद्धा की रक्षा के लिए चारों पात्रों को ग्रहण किया, न कि अत्यधिक इच्छा के कारण। ग्रहण करने के बाद चारों को इस प्रकार अधिष्ठित किया कि वे एक ही पात्र बन गए; चारों का पुण्य फल एक समान हुआ। इस प्रकार एक करके अधिष्ठित किए गए बहुमूल्य पत्थर के पात्र में भगवान ने मन्थ और मधुपिण्डिक ग्रहण किया। 'पच्चग्घे' का अर्थ है बहुमूल्य या नया, उसी क्षण उत्पन्न। उन दोनों के 'दो वचन' थे, इसलिए वे 'द्वेवाचिक' कहलाए। अथवा दो वचनों (बुद्ध और धम्म) से उपासक बने। उन्होंने उपासक भाव प्रकट कर भगवान से पूछा - "भन्ते! आज से हमें किसकी वंदना और सेवा करनी चाहिए?" तब भगवान ने अपने सिर का स्पर्श किया, बाल हाथों में आ गए। उन्हें वे बाल दिए और कहा - "इन्हें तुम ले जाओ।" वे केश-धातु प्राप्त कर अमृत से सिंचित के समान हर्षित और संतुष्ट होकर भगवान को वंदना कर चले गए। රාජායතනකථා නිට්ඨිතා. राजायतन कथा समाप्त हुई। බ්රහ්මයාචනකථා ब्रह्म-याचना कथा। 7. අථ ඛො භගවා සත්තාහස්ස අච්චයෙන තම්හා සමාධිම්හා වුට්ඨහිත්වා වුත්තප්පකාරමෙතං සබ්බං කිච්චං නිට්ඨාපෙත්වා රාජායතනමූලා පුනපි යෙන අජපාලනිග්රොධො තෙනුපසඞ්කමි. පරිවිතක්කො උදපාදීති තස්මිං නිසින්නමත්තස්සෙව සබ්බබුද්ධානං ආචිණ්ණසමාචිණ්ණො අයං චෙතසො පරිවිතක්කො උදපාදි. කස්මා පනායං සබ්බබුද්ධානං උප්පජ්ජතීති? ධම්මස්ස මහන්තභාවං ගරුභාවං භාරියභාවං පච්චවෙක්ඛණාය බ්රහ්මුනා යාචිතෙ දෙසෙතුකාමතාය ච. ජානන්ති හි බුද්ධා ‘‘එවං පරිවිතක්කිතෙ බ්රහ්මා ආගන්ත්වා ධම්මදෙසනං යාචිස්සති, තතො සත්තා ධම්මෙ ගාරවං උප්පාදෙස්සන්ති, බ්රහ්මගරුකො හි ලොකසන්නිවාසො’’ති. ඉති ඉමෙහි ද්වීහි කාරණෙහි අයං විතක්කො උප්පජ්ජතීති. ७. तब भगवान सात दिन के बाद उस समाधि से उठकर, उक्त सभी कार्यों को पूरा कर, राजायतन वृक्ष के मूल से पुनः जहाँ अजपाल निग्रोध वृक्ष था, वहाँ गए। 'विचार उत्पन्न हुआ' का अर्थ है कि वहाँ बैठते ही सभी बुद्धों के अभ्यास में आने वाला यह मानसिक विचार उत्पन्न हुआ। यह सभी बुद्धों को क्यों उत्पन्न होता है? धर्म की महानता, गुरुता (गंभीरता) और भार (कठिनाई) का प्रत्यवेक्षण करने के लिए और ब्रह्मा द्वारा याचना किए जाने पर ही उपदेश देने की इच्छा के कारण। बुद्ध जानते हैं कि "इस प्रकार विचार करने पर ब्रह्मा आकर धर्मोपदेश की याचना करेंगे, जिससे प्राणी धर्म के प्रति गौरव (आदर) उत्पन्न करेंगे, क्योंकि यह लोक ब्रह्मा का आदर करने वाला है।" इन दो कारणों से यह विचार उत्पन्न होता है। තත්ථ [Pg.243] අධිගතො ඛො ම්යායන්ති අධිගතො ඛො මෙ අයං. ආලයරාමාති සත්තා පඤ්ච කාමගුණෙ අල්ලීයන්ති, තස්මා තෙ ‘‘ආලයා’’ති වුච්චන්ති. තෙහි ආලයෙහි රමන්තීති ආලයරාමා. ආලයෙසු රතාති ආලයරතා. ආලයෙසු සුට්ඨුමුදිතාති ආලයසම්මුදිතා. යදිදන්ති නිපාතො. තස්ස ඨානං සන්ධාය ‘‘යං ඉද’’න්ති පටිච්චසමුප්පාදං සන්ධාය ‘‘යො අය’’න්ති එවමත්ථො දට්ඨබ්බො. ඉදප්පච්චයතාපටිච්චසමුප්පාදොති ඉමෙසං පච්චයා ඉදප්පච්චයා, ඉදප්පච්චයාව ඉදප්පච්චයතා, ඉදප්පච්චයතා ච සා පටිච්චසමුප්පාදො චාති ඉදප්පච්චයතාපටිච්චසමුප්පාදො. සො මමස්ස කිලමථොති යා අජානන්තානං දෙසනා නාම, සො මම කිලමථො අස්ස; සා මම විහෙසා අස්සාති අත්ථො. භගවන්තන්ති භගවතො. අනච්ඡරියාති අනු අච්ඡරියා. පටිභංසූති පටිභානසඞ්ඛාතස්ස ඤාණස්ස ගොචරා අහෙසුං, පරිවිතක්කයිතබ්බභාවං පාපුණිංසු. वहाँ 'अधिगतो खो म्यायं' का अर्थ है 'मेरे द्वारा यह प्राप्त किया गया'। 'आलयरामा' का अर्थ है कि प्राणी पाँच कामगुणों में आसक्त होते हैं, इसलिए उन्हें 'आलय' कहा जाता है। उन आलयों में रमण करने के कारण वे 'आलयरामा' हैं। आलयों में रत होने के कारण 'आलयरता' हैं। आलयों में भली-भांति प्रसन्न होने के कारण 'आलयसम्मूदिता' हैं। 'यदिदं' एक निपात है। उसके स्थान के संदर्भ में 'यं इदं' और प्रतीत्यसमुत्पाद के संदर्भ में 'यो अयं' इस प्रकार अर्थ देखना चाहिए। 'इदप्पच्चयता-प्रतीत्यसमुत्पाद' का अर्थ है - इन (संस्कार आदि) के प्रत्यय (कारण) 'इदप्पच्चया' (अविद्या आदि) हैं; 'इदप्पच्चया' ही 'इदप्पच्चयता' है; और वह 'इदप्पच्चयता' ही 'प्रतीत्यसमुत्पाद' है। 'वह मेरे लिए थकान होगी' का अर्थ है कि न जानने वालों को जो उपदेश देना है, वह मेरे लिए शारीरिक थकान होगी; वह मेरे लिए कष्ट होगा। 'भगवन्तं' का अर्थ है 'भगवान को'। 'अनच्छरिया' का अर्थ है 'पुनः-पुनः आश्चर्यजनक'। 'प्रतिभांशु' का अर्थ है कि वे प्रतिभान नामक ज्ञान के विषय बने, वे बार-बार विचार करने योग्य अवस्था को प्राप्त हुए। හලන්ති එත්ථ හකාරො නිපාතමත්තො; අලන්ති අත්ථො. පකාසිතුන්ති දෙසිතුං. අලං දානි මෙ ඉමං කිච්ඡෙන අධිගතං ධම්මං දෙසෙතුන්ති වුත්තං හොති. පටිසොතගාමින්ති පටිසොතං වුච්චති නිබ්බානං; නිබ්බානගාමින්ති අත්ථො. රාගරත්තාති කාමරාගභවරාගදිට්ඨිරාගෙන රත්තා. න දක්ඛන්තීති න පස්සිස්සන්ති. තමොඛන්ධෙන ආවුටාති අවිජ්ජාරාසිනා අජ්ඣොත්ථටා. අප්පොස්සුක්කතායාති නිරුස්සුක්කභාවෙන; අදෙසෙතුකාමතායාති අත්ථො. यहाँ 'हल' में 'ह' अक्षर मात्र एक निपात है; इसका अर्थ 'अलम्' (पर्याप्त/व्यर्थ) है। 'पकासितुं' का अर्थ 'देसेतुं' (उपदेश देना) है। 'अलम् दानि मे...' का अर्थ है कि 'कठिनाई से प्राप्त इस धर्म का उपदेश देना अब मेरे लिए व्यर्थ है'। 'पटिसोतगामिं' में 'पटिसोत' निर्वाण को कहा जाता है; इसका अर्थ 'निर्वाण की ओर जाने वाला' है। 'रागसत्ता' का अर्थ है काम-राग, भव-राग और दृष्टि-राग से रंगे हुए प्राणी। 'न दक्खन्ति' का अर्थ है 'नहीं देखेंगे'। 'तमोखन्धेन आवुटा' का अर्थ है अविद्या के समूह से ढके हुए। 'अप्पोसुकताय' का अर्थ है निरुत्साह भाव से, अर्थात् उपदेश देने की इच्छा न होना। 8. යත්ර හි නාමාති යස්මිං නාම ලොකෙ. භගවතො පුරතො පාතුරහොසීති ධම්මදෙසනායාචනත්ථං දසසු චක්කවාළසහස්සෙසු මහාබ්රහ්මානො ගහෙත්වා ආගම්ම භගවතො පුරතො පාතුරහොසි. අප්පරජක්ඛජාතිකාති පඤ්ඤාමයෙ අක්ඛිම්හි අප්පං රාගදොසමොහරජං එතෙසං එවංසභාවාති අප්පරජක්ඛජාතිකා. භවිස්සන්ති ධම්මස්ස අඤ්ඤාතාරොති පටිවිජ්ඣිතාරො. ८. 'यत्र हि नाम' का अर्थ है 'जिस लोक में'। 'भगवतो पुरतो पातुरहोसि' का अर्थ है—धर्म-देशना की याचना के लिए दस हजार चक्रवातों के महाब्रह्माओं को लेकर आकर भगवान के सम्मुख प्रकट हुए। 'अप्परजक्खजातिका' का अर्थ है—जिनके प्रज्ञामय नेत्रों में राग, द्वेष और मोह रूपी रज (धूल) अल्प है, ऐसे स्वभाव वाले प्राणी। 'भविस्सन्ति धम्मस्स अञ्ञातारो' का अर्थ है—(धर्म को) समझने वाले या भेदने वाले होंगे। පාතුරහොසීති පාතුභවි. සමලෙහි චින්තිතොති රාගාදීහි මලෙහි සමලෙහි ඡහි සත්ථාරෙහි චින්තිතො. අපාපුරෙතන්ති විවර එතං. අමතස්ස ද්වාරන්ති අමතස්ස නිබ්බානස්ස ද්වාරභූතං අරියමග්ගං. සුණන්තු ධම්මං විමලෙනානුබුද්ධන්ති [Pg.244] ඉමෙ සත්තා රාගාදිමලානං අභාවතො විමලෙන සම්මාසම්බුද්ධෙන අනුබුද්ධං චතුසච්චධම්මං සුණන්තු. 'पातुरहोसि' का अर्थ है 'प्रकट हुए'। 'समलेहि चिन्तितो' का अर्थ है—राग आदि मलों से युक्त छह (कु)शास्तओं (पूरण कस्सप आदि) द्वारा (मिथ्या ज्ञान से) सोचा गया। 'अपापुरेतं' का अर्थ है 'इसे खोलें'। 'अमतस्स द्वारं' का अर्थ है—अमृत स्वरूप निर्वाण का द्वार-रूपी आर्यमार्ग। 'सुणन्तु धम्मं विमलेनानुबुद्धं' का अर्थ है—ये प्राणी राग आदि मलों के अभाव के कारण निर्मल सम्यक्सम्बुद्ध द्वारा अनुबुद्ध (साक्षात्कृत) चार आर्य सत्यों के धर्म को सुनें। සෙලෙ යථා පබ්බතමුද්ධනිට්ඨිතොති සෙලමයෙ එකග්ඝනෙ පබ්බතමුද්ධනි යථාඨිතොව යථා චක්ඛුමා පුරිසො සමන්තතො ජනතං පස්සෙය්ය, ත්වම්පි සුමෙධ සුන්දරපඤ්ඤ සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණෙන සමන්තචක්ඛු භගවා ධම්මමයං පඤ්ඤාමයං පාසාදමාරුය්හ සයං අපෙතසොකො සොකාවතිණ්ණං ජාතිජරාභිභූතඤ්ච ජනතං අවෙක්ඛස්සු උපධාරය. 'सेले यथा पब्बतमुद्धनिट्ठितो' का अर्थ है—जैसे पत्थर से बने ठोस पर्वत के शिखर पर स्थित होकर चक्षुमान पुरुष चारों ओर के जन-समूह को देखता है, वैसे ही हे सुमेध (सुन्दर प्रज्ञा वाले)! सर्वज्ञता-ज्ञान के कारण 'समन्तचक्खु' (सब ओर देखने वाले) भगवान! आप भी धर्ममय एवं प्रज्ञामय प्रासाद (महल) पर चढ़कर, स्वयं शोक-रहित होकर, शोक में डूबे हुए तथा जाति (जन्म) और जरा (बुढ़ापे) से दबे हुए जन-समूह को देखें और उन पर विचार करें। උට්ඨෙහීති භගවතො ධම්මදෙසනත්ථං චාරිකචරණං යාචන්තො භණති. වීරාතිආදීසු භගවා වීරියවන්තතාය වීරො. දෙවපුත්තමච්චුකිලෙසාභිසඞ්ඛාරමාරානං විජිතත්තා විජිතසඞ්ගාමො. ජාතිකන්තාරාදිනිත්ථරණසමත්ථතාය සත්ථවාහො. කාමච්ඡන්දඉණස්ස අභාවතො අණණො. 'उट्ठेहि' (उठें) शब्द से वह भगवान से धर्म-देशना के लिए चारिका (भ्रमण) करने की याचना करते हुए कहता है। 'वीरा' आदि पदों में—भगवान वीर्यवान होने के कारण 'वीर' हैं। देवपुत्र-मार, मृत्यु-मार, क्लेश-मार और अभिसंस्कार-मार को जीतने के कारण 'विजितसंग्राम' हैं। जन्म-रूपी मरुस्थल आदि से पार ले जाने में समर्थ होने के कारण 'सत्थवाहो' (सार्थवाह) हैं। कामच्छन्द-रूपी ऋण के अभाव के कारण 'अणणो' (ऋण-मुक्त) हैं। 9. අජ්ඣෙසනන්ති යාචනං. බුද්ධචක්ඛුනාති ඉන්ද්රියපරොපරියත්තඤාණෙන ච ආසයානුසයඤාණෙන ච. ඉමෙසඤ්හි ද්වින්නං ඤාණානං බුද්ධචක්ඛූති නාමං. අප්පරජක්ඛාති පඤ්ඤාචක්ඛුම්හි රාගාදිරජං අප්පං යෙසං, තෙ අප්පරජක්ඛා. යෙසං තං මහන්තං තෙ මහාරජක්ඛා. යෙසං සද්ධාදීනි ඉන්ද්රියානි තික්ඛානි තෙ තික්ඛින්ද්රියා. යෙසං තානි මුදූනි තෙ මුදින්ද්රියා. යෙසං තෙයෙව සද්ධාදයො ආකාරා සුන්දරා තෙ ස්වාකාරා. යෙසං තෙයෙව සද්ධාදයො ආකාරා අසුන්දරා තෙ ද්වාකාරා. යෙ කථිතකාරණං සල්ලක්ඛෙන්ති, සුඛෙන සක්කා හොන්ති විඤ්ඤාපෙතුං තෙ සුවිඤ්ඤාපයා. යෙ පරලොකඤ්ච වජ්ජඤ්ච භයතො පස්සන්ති තෙ පරලොකවජ්ජභයදස්සාවිනො. උප්පලිනියන්ති උප්පලවනෙ. ඉතරෙසුපි එසෙව නයො. අන්තොනිමුග්ගපොසීනීති යානි උදකස්ස අන්තො නිමුග්ගානෙව පොසයන්ති. සමොදකං ඨිතානීති උදකෙන සමං ඨිතානි. උදකං අච්චුග්ගම්ම ඨිතානීති උදකං අතික්කමිත්වා ඨිතානි. ९. 'अज्झेसनं' का अर्थ है याचना। 'बुद्धचक्खुना' का अर्थ है—इन्द्रियपरोपरियत्त ज्ञान और आशयानुशय ज्ञान द्वारा; इन दो ज्ञानों का नाम ही 'बुद्ध-चक्षु' है। 'अप्परजक्खा'—जिनके प्रज्ञा-चक्षु में राग आदि रज अल्प है, वे 'अप्परजक्खा' हैं। जिनमें वह रज अधिक है, वे 'महाराजक्खा' हैं। जिनकी श्रद्धा आदि इन्द्रियाँ तीक्ष्ण हैं, वे 'तिक्खिन्द्रिया' हैं। जिनकी वे इन्द्रियाँ मृदु (कोमल) हैं, वे 'मुदिन्द्रिया' हैं। जिनकी श्रद्धा आदि के वे ही आकार (अवस्थाएँ) सुन्दर हैं, वे 'स्वाकारा' हैं। जिनकी वे ही अवस्थाएँ असुन्दर हैं, वे 'द्वाकारा' हैं। जो कही गई बात को अच्छी तरह समझते हैं और जिन्हें आसानी से समझाया जा सकता है, वे 'सुविञ्ञापया' हैं। जो परलोक और पाप को भय के रूप में देखते हैं, वे 'परलोकवज्जभयदस्साविनो' हैं। 'उप्पलिनियं' का अर्थ है उत्पल (नीलकमल) के वन में; अन्य पदों में भी यही विधि है। 'अन्तोनिमुग्गपोसीनि' का अर्थ है—जो जल के भीतर ही डूबे रहकर बढ़ते हैं। 'समोदकं ठितानि' का अर्थ है—जल के बराबर स्थित। 'उदकं अच्चुग्गम्म ठितानि' का अर्थ है—जल के ऊपर निकलकर स्थित। අපාරුතාති විවටා. අමතස්ස ද්වාරාති අරියමග්ගො. සො හි අමතසඞ්ඛාතස්ස නිබ්බානස්ස ද්වාරං. පමුඤ්චන්තු සද්ධන්ති සබ්බෙ අත්තනො සද්ධං පමුඤ්චන්තු. පච්ඡිමපදද්වයෙ අයමත්ථො, අහඤ්හි අත්තනො පගුණං සුප්පවත්තිම්පි ඉමං [Pg.245] පණීතං උත්තමං ධම්මං කායවාචාකිලමථසඤ්ඤී හුත්වා මනුජෙසු දෙවමනුස්සෙසු න භාසින්ති. 'अपाुता' का अर्थ है 'खुले हुए'। 'अमतस्स द्वारा' का अर्थ है 'आर्यमार्ग'; क्योंकि वह अमृत कहे जाने वाले निर्वाण का द्वार है। 'पमुञ्चन्तु सद्धं' का अर्थ है—सभी अपने भीतर की श्रद्धा को प्रकट करें। अंतिम दो पदों का अर्थ यह है—'मैंने अपने द्वारा भली-भाँति अभ्यस्त इस प्रणीत और उत्तम धर्म को, शरीर और वाणी की थकान मात्र समझकर, मनुष्यों और देव-मनुष्यों के बीच नहीं कहा था' (अर्थात् न कहने का विचार किया था)। බ්රහ්මයාචනකථා නිට්ඨිතා. ब्रह्म-याचना कथा समाप्त हुई। පඤ්චවග්ගියකථා पञ्चवर्गीय कथा 10. පණ්ඩිතොති පණ්ඩිච්චෙන සමන්නාගතො. බ්යත්තොති වෙය්යත්තියෙන සමන්නාගතො. මෙධාවීති ඨානුප්පත්තියා පඤ්ඤාය සමන්නාගතො. අප්පරජක්ඛජාතිකොති සමාපත්තියා වික්ඛම්භිතත්තා නික්කිලෙසජාතිකො විසුද්ධසත්තො. ආජානිස්සතීති සල්ලක්ඛෙස්සති පටිවිජ්ඣිස්සති. භගවතොපි ඛො ඤාණං උදපාදීති සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණං උප්පජ්ජි ‘‘ඉතො සත්තමදිවසමත්ථකෙ කාලංකත්වා ආකිඤ්චඤ්ඤායතනෙ නිබ්බත්තො’’ති. මහාජානියොති සත්තදිවසබ්භන්තරෙ පත්තබ්බමග්ගඵලතො පරිහීනත්තා මහතී ජානි අස්සාති මහාජානියො අක්ඛණෙ නිබ්බත්තත්තා. අභිදොසකාලංකතොති හිය්යො කාලංකතො, සොපි නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනෙ නිබ්බත්තොති අද්දස. බහූකාරාති බහූපකාරා. පධානපහිතත්තං උපට්ඨහිංසූති පධානත්ථාය පෙසිතත්තභාවං මුඛොදකදානාදිනා උපට්ඨහිංසු. १०. 'पण्डितो' का अर्थ है पाण्डित्य (प्रज्ञा) से युक्त। 'ब्यत्तो' का अर्थ है निपुणता से युक्त। 'मेधावी' का अर्थ है तात्कालिक प्रज्ञा (प्रत्युत्पन्नमति) से युक्त। 'अप्परजक्खजातिको' का अर्थ है—समापत्ति (ध्यान) द्वारा क्लेशों को दबा देने के कारण क्लेश-रहित स्वभाव वाला विशुद्ध प्राणी। 'आजानिस्सति' का अर्थ है—समझेगा या भेदन करेगा। भगवान को भी यह ज्ञान उत्पन्न हुआ—'आज से सात दिन पहले काल-कवलित होकर वह (आलार कालाम) आकिञ्चन्यायतन लोक में उत्पन्न हुआ है'। 'महाजानियो' का अर्थ है—सात दिनों के भीतर प्राप्त होने वाले मार्ग-फल से वंचित रह जाने के कारण उसकी 'बड़ी हानि' हुई है, क्योंकि वह अक्षण (अनुपयुक्त स्थान) में उत्पन्न हुआ है। 'अभिदोसकालं कतो' का अर्थ है—कल रात काल-कवलित हुआ; वह (उदक रामपुत्त) भी नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन लोक में उत्पन्न हुआ है, ऐसा (भगवान ने) देखा। 'बहूकारा' का अर्थ है—बहुत उपकारी। 'पधानपहितत्तं उपट्ठहिंसु' का अर्थ है—प्रधान (तपस्या) के लिए समर्पित मुझको मुख-प्रक्षालन जल आदि देने की सेवा द्वारा परिचर्या की। 11. අන්තරා ච ගයං අන්තරා ච බොධින්ති උපකො බොධිමණ්ඩස්ස ච ගයාය ච අන්තරෙ භගවන්තං අද්දස. අද්ධානමග්ගප්පටිපන්නන්ති අද්ධානමග්ගං පටිපන්නං. ११. 'अन्तरा च गयां अन्तरा च बोधिं' का अर्थ है—उपक ने बोधिमण्ड और गया के बीच में भगवान को देखा। 'अद्धानमग्गप्पटिपन्नं' का अर्थ है—लम्बे मार्ग (अध्वान-मार्ग) पर चलते हुए। සබ්බාභිභූති සබ්බං තෙභූමකධම්මං අභිභවිත්වා ඨිතො. සබ්බවිදූති සබ්බං චතුභූමකධම්මං අවෙදිං අඤ්ඤාසිං. සබ්බෙසු ධම්මෙසු අනූපලිත්තොති සබ්බෙසු තෙභූමකධම්මෙසු කිලෙසලෙපෙන අලිත්තො. සබ්බඤ්ජහොති සබ්බං තෙභූමකධම්මං ජහිත්වා ඨිතො. තණ්හක්ඛයෙ විමුත්තොති තණ්හක්ඛයෙ නිබ්බානෙ ආරම්මණතො විමුත්තො. සයං අභිඤ්ඤායාති සබ්බං චතුභූමකධම්මං අත්තනාව ජානිත්වා. කමුද්දිසෙය්යන්ති කං අඤ්ඤං ‘‘අයං මෙ ආචරියො’’ති උද්දිසෙය්යං. 'सब्बाभिभू' का अर्थ है—सभी त्रैभूमिक धर्मों को अभिभूत (पराजित) करके स्थित। 'सब्बविदू' का अर्थ है—सभी चतुर्भूमिक धर्मों को जान लिया। 'सब्बेसु धम्मेसु अनूपलित्तो' का अर्थ है—सभी त्रैभूमिक धर्मों में क्लेश-रूपी लेप से अलिप्त। 'सब्बञ्जहो' का अर्थ है—सभी त्रैभूमिक धर्मों को त्याग कर स्थित। 'तण्हक्खये विमुत्तो' का अर्थ है—तृष्णा के क्षय-स्वरूप निर्वाण में आलम्बन (ध्यान) के माध्यम से विमुक्त। 'सयं अभिञ्ञाय' का अर्थ है—सभी चतुर्भूमिक धर्मों को स्वयं ही जानकर। 'कमुद्दिसय्यं' का अर्थ है—अपने से भिन्न और किसे 'यह मेरा आचार्य है' ऐसा कहकर निर्दिष्ट करूँ? න මෙ ආචරියො අත්ථීති ලොකුත්තරධම්මෙ මය්හං ආචරියො නාම නත්ථි. නත්ථි මෙ පටිපුග්ගලොති මය්හං පටිභාගපුග්ගලො නාම නත්ථි. සීතිභූතොති සබ්බකිලෙසග්ගිනිබ්බාපනෙන සීතිභූතො. කිලෙසානංයෙව නිබ්බුතත්තා නිබ්බුතො. ‘मेरा कोई आचार्य नहीं है’ का अर्थ है कि लोकोत्तर धर्म में मेरा कोई आचार्य नहीं है। ‘मेरा कोई प्रतिपुद्गल (समान व्यक्ति) नहीं है’ का अर्थ है कि मेरे समान कोई दूसरा व्यक्ति नहीं है। ‘शीतीभूत’ का अर्थ है कि सभी क्लेश रूपी अग्नि को शांत कर देने के कारण मैं शीतल हो गया हूँ। क्लेशों के ही बुझ जाने के कारण मैं ‘निर्वृत’ (शांत) हूँ। කාසීනං [Pg.246] පුරන්ති කාසිරට්ඨෙ නගරං. ආහඤ්ඡං අමතදුන්දුභින්ති ධම්මචක්කප්පටිලාභාය අමතභෙරිං පහරිස්සාමීති ගච්ඡාමි. ‘कासियों के पुर’ का अर्थ है कासि राष्ट्र का (वाराणसी) नगर। ‘अमृत-दुन्दुभि बजाऊँगा’ का अर्थ है कि धर्मचक्र की प्राप्ति के लिए मैं अमृत-भेरी बजाऊँगा, ऐसा विचार कर मैं जा रहा हूँ। අරහසි අනන්තජිනොති අනන්තජිනො භවිතුං යුත්තො. හුපෙය්යපාවුසොති ආවුසො එවම්පි නාම භවෙය්ය. සීසං ඔකම්පෙත්වාති සීසං චාලෙත්වා. ‘आप अनंतजिन होने के योग्य हैं’ का अर्थ है कि आप अनंतजिन होने के लिए उपयुक्त हैं। ‘आयुष्मान्, ऐसा हो सकता है’ का अर्थ है कि हे मित्र, ऐसा भी हो सकता है। ‘सिर हिलाकर’ का अर्थ है सिर को हिलाकर (सहमति में सिर झुकाकर)। 12. සණ්ඨපෙසුන්ති කතිකං අකංසු. බාහුල්ලිකොති චීවරබාහුල්ලාදීනං අත්ථාය පටිපන්නො. පධානවිබ්භන්තොති පධානතො විබ්භන්තො භට්ඨො පරිහීනො. ආවත්තො බාහුල්ලායාති චීවරාදිබහුලභාවත්ථාය ආවත්තො. ඔදහථ භික්ඛවෙ සොතන්ති උපනෙථ භික්ඛවෙ සොතං; සොතින්ද්රියං ධම්මසවනත්ථං අභිමුඛං කරොථාති අත්ථො. අමතමධිගතන්ති අමතං නිබ්බානං මයා අධිගතන්ති දස්සෙති. ඉරියායාති දුක්කරඉරියාය. පටිපදායාති දුක්කරපටිපදාය. අභිජානාථ මෙ නොති අභිජානාථ නු මෙ සමනුපස්සථ. එවරූපං භාසිතමෙතන්ති එතං එවරූපං වාක්යං භාසිතන්ති අත්ථො. අසක්ඛි ඛො භගවා පඤ්චවග්ගියෙ භික්ඛූ සඤ්ඤාපෙතුන්ති ‘‘අහං බුද්ධො’’ති ජානාපෙතුං අසක්ඛි. १२. ‘संस्थापित किया’ का अर्थ है कि उन्होंने प्रतिज्ञा (नियम) की। ‘बाहुलिक’ का अर्थ है जो चीवर आदि की प्रचुरता के लिए प्रवृत्त है। ‘प्रधान-विभ्रान्त’ का अर्थ है जो प्रधान (साधना) से विचलित, भ्रष्ट और हीन हो गया है। ‘बाहुल्य के लिए लौट आया’ का अर्थ है चीवर आदि की प्रचुरता के लाभ के लिए लौट आया। ‘भिक्षुओं, कान लगाओ’ का अर्थ है कि हे भिक्षुओं, कान दो; धर्म-श्रवण के लिए श्रोत्रेन्द्रिय को उन्मुख करो। ‘अमृत प्राप्त कर लिया है’ यह दर्शाता है कि मैंने अमृत रूपी निर्वाण प्राप्त कर लिया है। ‘इर्या’ का अर्थ है दुष्कर चर्या (कठिन तपस्या)। ‘प्रतिपदा’ का अर्थ है दुष्कर प्रतिपदा। ‘क्या तुम मुझे जानते हो’ का अर्थ है क्या तुम मुझे पहचानते हो या देखते हो। ‘इस प्रकार का भाषण’ का अर्थ है कि क्या तुमने पहले कभी इस प्रकार का वाक्य सुना है। ‘भगवान पंचवर्गीय भिक्षुओं को समझाने में समर्थ हुए’ का अर्थ है कि वे यह जनाने में समर्थ हुए कि ‘मैं बुद्ध हूँ’। 13. චක්ඛුකරණීති පඤ්ඤාචක්ඛුං සන්ධායාහ. ඉතො පරං සබ්බං පදත්ථතො උත්තානමෙව. අධිප්පායානුසන්ධියොජනාදිභෙදතො පන පපඤ්චසූදනියා මජ්ඣිමට්ඨකථායං වුත්තනයෙන වෙදිතබ්බං. ඉතො පට්ඨාය හි අතිවිත්ථාරභීරුකස්ස මහාජනස්ස චිත්තං අනුරක්ඛන්තා සුත්තන්තකථං අවණ්ණයිත්වා විනයකථංයෙව වණ්ණයිස්සාම. १३. ‘चक्षु-करणी’ शब्द प्रज्ञा-चक्षु के संदर्भ में कहा गया है। इसके बाद के सभी शब्द अर्थ की दृष्टि से स्पष्ट ही हैं। अभिप्राय, अनुसन्धि और योजना आदि के भेद को ‘पपञ्चसूदनी’ नामक मज्झिम-निकाय की अट्ठकथा में बताए गए तरीके से समझना चाहिए। यहाँ से आगे, विस्तार से डरने वाले जन-समूह के चित्त की रक्षा करते हुए, हम सुत्तन्त-कथा की व्याख्या न करके केवल विनय-कथा की ही व्याख्या करेंगे। 18. සාව තස්ස ආයස්මතො උපසම්පදා අහොසීති ආසාළ්හීපුණ්ණමාය අට්ඨාරසහි දෙවතාකොටීහි සද්ධිං සොතාපත්තිඵලෙ පතිට්ඨිතස්ස ‘‘එහි භික්ඛූ’’ති භගවතො වචනෙන අභිනිප්ඵන්නා සාව තස්ස ආයස්මතො එහිභික්ඛූපසම්පදා අහොසි. १८. ‘वही उन आयुष्मान् की उपसम्पदा हुई’ का अर्थ है कि आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन अठारह करोड़ देवताओं के साथ स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित उन आयुष्मान् (कौण्डिन्य) की, भगवान के ‘एहि भिक्खु’ (आओ भिक्षु) इन शब्दों से जो उपसम्पदा संपन्न हुई, वही उनकी ‘एहि-भिक्खु उपसम्पदा’ थी। 19. අථ ඛො ආයස්මතො ච වප්පස්සාති ආදිම්හි වප්පත්ථෙරස්ස පාටිපදදිවසෙ ධම්මචක්ඛුං උදපාදි, භද්දියත්ථෙරස්ස දුතියදිවසෙ, මහානාමත්ථෙරස්ස තතියදිවසෙ, අස්සජිත්ථෙරස්ස චතුත්ථියන්ති. ඉමෙසඤ්ච පන [Pg.247] භික්ඛූනං කම්මට්ඨානෙසු උප්පන්නමලවිසොධනත්ථං භගවා අන්තොවිහාරෙයෙව අහොසි. උප්පන්නෙ උප්පන්නෙ කම්මට්ඨානමලෙ ආකාසෙන ගන්ත්වා මලං විනොදෙසි. පක්ඛස්ස පන පඤ්චමියං සබ්බෙ තෙ එකතො සන්නිපාතෙත්වා අනත්තසුත්තෙන ඔවදි. තෙන වුත්තං ‘‘අථ ඛො භගවා පඤ්චවග්ගියෙ’’තිආදි. १९. ‘तब आयुष्मान् वप्प के...’ इत्यादि में, स्थविर वप्प को प्रतिपदा के दिन धर्म-चक्षु उत्पन्न हुआ, स्थविर भद्दिय को दूसरे दिन, स्थविर महानाम को तीसरे दिन और स्थविर अस्सजि को चौथे दिन। इन भिक्षुओं के कर्मस्थान में उत्पन्न दोषों के शोधन के लिए भगवान विहार के भीतर ही रहे। जब-जब कर्मस्थान में दोष उत्पन्न हुए, तब-तब उन्होंने आकाश मार्ग से जाकर उन दोषों को दूर किया। पक्ष की पंचमी तिथि को उन सभी को एक साथ एकत्रित कर ‘अनत्तलक्खण सुत्त’ द्वारा उपदेश दिया। इसीलिए कहा गया है— ‘तब भगवान ने पंचवर्गीय भिक्षुओं को...’ इत्यादि। 24. තෙන ඛො පන සමයෙන ඡ ලොකෙ අරහන්තො හොන්තීති පඤ්චමියා පක්ඛස්ස ලොකස්මිං ඡ මනුස්සා අරහන්තො හොන්තීති අත්ථො. २४. ‘उस समय लोक में छह अर्हत् थे’ का अर्थ है कि पक्ष की पंचमी तिथि को संसार में छह मनुष्य अर्हत् हुए। පඤ්චවග්ගියකථා නිට්ඨිතා. पंचवर्गीय कथा समाप्त हुई। පබ්බජ්ජාකථා प्रव्रज्या कथा 31. පුබ්බානුපුබ්බකානන්ති පවෙණිවසෙන පොරාණානුපොරාණානන්ති අත්ථො. තෙන ඛො පන සමයෙන එකසට්ඨි ලොකෙ අරහන්තො හොන්තීති පුරිමා ඡ ඉමෙ ච පඤ්චපඤ්ඤාසාති අන්තොවස්සම්හියෙව එකසට්ඨි මනුස්සා අරහන්තො හොන්තීති අත්ථො. ३१. ‘पूर्व-अनुपूर्वकों का’ का अर्थ है परंपरा के अनुसार प्राचीन कुलों के वंशज। ‘उस समय लोक में इकसठ अर्हत् थे’ का अर्थ है कि पहले के छह और ये पचपन—इस प्रकार वर्षावास के भीतर ही इकसठ मनुष्य अर्हत् हुए। තත්ර යසආදීනං කුලපුත්තානං අයං පුබ්බයොගො – අතීතෙ කිර පඤ්චපඤ්ඤාසජනා සහායකා වග්ගබන්ධෙන පුඤ්ඤානි කරොන්තා අනාථසරීරානි පටිජග්ගන්තා විචරන්ති, තෙ එකදිවසං ගබ්භිනිං ඉත්ථිං කාලංකතං දිස්වා ‘‘ඣාපෙස්සාමා’’ති සුසානං නීහරිංසු. තෙසු පඤ්ච ජනෙ ‘‘තුම්හෙ ඣාපෙථා’’ති සුසානෙ ඨපෙත්වා සෙසා ගාමං පවිට්ඨා. යසො දාරකො තං සරීරං විජ්ඣිත්වා පරිවත්තෙත්වා ච ඣාපයමානො අසුභසඤ්ඤං පටිලභි. සො ඉතරෙසම්පි චතුන්නං ජනානං ‘‘පස්සථ භො ඉමං අසුචිං පටිකූල’’න්ති දස්සෙසි. තෙපි තත්ථ අසුභසඤ්ඤං පටිලභිංසු. තෙ පඤ්චපි ජනා ගාමං ගන්ත්වා සෙසසහායකානං කථයිංසු. යසො පන දාරකො ගෙහම්පි ගන්ත්වා මාතාපිතූන්නඤ්ච භරියාය ච කථෙසි. තෙ සබ්බෙපි අසුභං භාවයිංසු. අයමෙතෙසං පුබ්බයොගො. තෙනායස්මතො යසස්ස නාටකජනෙසු සුසානසඤ්ඤායෙව උප්පජ්ජි, තායෙව ච උපනිස්සයසම්පත්තියා සබ්බෙසං විසෙසාධිගමො නිබ්බත්තීති. उनमें यश आदि कुलपुत्रों का यह पूर्व-योग (पूर्व पुण्य) है—कहा जाता है कि अतीत में पचपन मित्र एक समूह बनाकर पुण्य कर्म करते हुए और लावारिस शवों का संस्कार करते हुए विचरण करते थे। एक दिन उन्होंने एक मृत गर्भवती स्त्री को देखा और ‘हम इसका दाह-संस्कार करेंगे’ ऐसा सोचकर उसे श्मशान ले गए। उनमें से पाँच व्यक्तियों को ‘तुम दाह-संस्कार करो’ कहकर श्मशान में छोड़कर शेष गाँव चले गए। यश नामक बालक ने उस शरीर को चीरकर और उलट-पलट कर जलाते समय ‘अशुभ संज्ञा’ प्राप्त की। उसने अन्य चार व्यक्तियों को भी दिखाया— ‘देखो मित्रों, इस अशुचि और प्रतिकूल शरीर को।’ उन्होंने भी वहाँ अशुभ संज्ञा प्राप्त की। वे पाँचों व्यक्ति गाँव जाकर शेष मित्रों को यह बताया। यश बालक ने घर जाकर अपने माता-पिता और पत्नी को भी बताया। उन सभी ने अशुभ भावना का अभ्यास किया। यह उनका पूर्व-योग था। इसी कारण आयुष्मान् यश को नर्तकियों के बीच श्मशान जैसी संज्ञा उत्पन्न हुई, और उसी उपनिसम्पत्ति के कारण उन सभी को विशिष्ट ज्ञान की प्राप्ति हुई। අථ ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසීති භගවා යාව පච්ඡිමකත්තිකපුණ්ණමා, තාව බාරාණසියං විහරන්තො එකදිවසං තෙ ඛීණාසවෙ සට්ඨි භික්ඛූ ආමන්තෙසි. ‘तब भगवान ने भिक्षुओं को आमंत्रित किया’ का अर्थ है कि भगवान ने कार्तिक की अंतिम पूर्णिमा तक वाराणसी में विहार करते हुए, एक दिन उन साठ क्षीणास्त्रव भिक्षुओं को संबोधित किया। 32. දිබ්බා [Pg.248] නාම දිබ්බෙසු විසයෙසු ලොභපාසා. මානුසා නාම මානුසකෙසු විසයෙසු ලොභපාසා. මා එකෙන ද්වෙති එකෙන මග්ගෙන ද්වෙ මා අගමිත්ථ. අස්සවනතාති අස්සවනතාය. පරිහායන්තීති අනධිගතං නාධිගච්ඡන්තා විසෙසාධිගමතො පරිහායන්ති. ३२. ‘दिव्य’ का अर्थ है दिव्य विषयों में लोभ रूपी पाश। ‘मानुष’ का अर्थ है मानुषी विषयों में लोभ रूपी पाश। ‘एक मार्ग से दो मत जाओ’ का अर्थ है कि एक ही रास्ते पर दो व्यक्ति मत जाओ। ‘अश्रवणता के कारण’ का अर्थ है न सुन पाने के कारण। ‘परिहीण होते हैं’ का अर्थ है कि अप्राप्त विशिष्ट ज्ञान को प्राप्त न कर पाने के कारण वे विशेष उपलब्धि से वंचित रह जाते हैं। 33. අන්තකාති ලාමක හීනසත්ත. අන්තලික්ඛචරොති රාගපාසං සන්ධායාහ. තඤ්හි සො ‘‘අන්තලික්ඛචරො’’ති මන්ත්වා ආහ. ३३. ‘अन्तक’ का अर्थ है अधम या नीच प्राणी। ‘अन्तरिक्षचर’ शब्द राग रूपी पाश के संदर्भ में कहा गया है। क्योंकि उसने उसे ‘अन्तरिक्ष में विचरण करने वाला’ मानकर ऐसा कहा था। 34. නානාදිසා නානාජනපදාති නානාදිසතො ච නානාජනපදතො ච. අනුජානාමි භික්ඛවෙ තුම්හෙව දානි තාසු තාසු දිසාසු තෙසු තෙසු ජනපදෙසු පබ්බාජෙථාතිආදිම්හි පබ්බජ්ජාපෙක්ඛං කුලපුත්තං පබ්බාජෙන්තෙන යෙ පරතො ‘‘න භික්ඛවෙ පඤ්චහි ආබාධෙහි ඵුට්ඨො පබ්බාජෙතබ්බො’’තිආදිං කත්වා යාව ‘‘න අන්ධමූගබධිරො පබ්බාජෙතබ්බො’’ති එවං පටික්ඛිත්තා පුග්ගලා, තෙ වජ්ජෙත්වා පබ්බජ්ජාදොසවිරහිතො පුග්ගලො පබ්බාජෙතබ්බො. සොපි ච මාතාපිතූහි අනුඤ්ඤාතොයෙව. තස්ස අනුජානනලක්ඛණං ‘‘න භික්ඛවෙ අනනුඤ්ඤාතො මාතාපිතූහි පුත්තො පබ්බාජෙතබ්බො, යො පබ්බාජෙය්ය, ආපත්ති දුක්කටස්සා’’ති එතස්මිං සුත්තෙ වණ්ණයිස්සාම. ३४. "विभिन्न दिशाओं और विभिन्न जनपदों से" का अर्थ है विभिन्न दिशाओं से और विभिन्न जनपदों से। "हे भिक्षुओं, मैं अनुमति देता हूँ कि अब तुम ही उन-उन दिशाओं और उन-उन जनपदों में प्रव्रज्या दो" आदि वचनों में यह निश्चय समझना चाहिए: प्रव्रज्या की इच्छा रखने वाले कुलपुत्र को प्रव्रजित करते समय, जो आगे "हे भिक्षुओं, पाँच रोगों से ग्रस्त व्यक्ति को प्रव्रजित नहीं करना चाहिए" आदि से लेकर "अंधे, गूंगे और बहरे को प्रव्रजित नहीं करना चाहिए" तक इस प्रकार वर्जित किए गए व्यक्ति हैं, उन्हें छोड़कर प्रव्रज्या के दोषों से रहित व्यक्ति को ही प्रव्रजित करना चाहिए। और वह भी माता-पिता द्वारा अनुमत ही होना चाहिए। उसकी अनुमति का लक्षण "हे भिक्षुओं, माता-पिता द्वारा अनुमत न किए गए पुत्र को प्रव्रजित नहीं करना चाहिए, जो प्रव्रजित करे उसे दुक्कट का दोष होता है" इस सूत्र की व्याख्या में हम कहेंगे। එවං පබ්බජ්ජාදොසවිරහිතං මාතාපිතූහි අනුඤ්ඤාතං පබ්බාජෙන්තෙනාපි ච සචෙ අච්ඡින්නකෙසො හොති, එකසීමාය ච අඤ්ඤෙපි භික්ඛූ අත්ථි, කෙසච්ඡෙදනත්ථාය භණ්ඩුකම්මං ආපුච්ඡිතබ්බං. තස්ස ආපුච්ඡනාකාරං ‘‘අනුජානාමි, භික්ඛවෙ, සඞ්ඝං අපලොකෙතුං භණ්ඩුකම්මායා’’ති එත්ථ වණ්ණයිස්සාම. සචෙ ඔකාසො හොති, සයං පබ්බාජෙතබ්බො. සචෙ උද්දෙසපරිපුච්ඡාදීහි බ්යාවටො හොති, ඔකාසං න ලභති, එකො දහරභික්ඛු වත්තබ්බො ‘‘එතං පබ්බාජෙහී’’ති. අවුත්තොපි චෙ දහරභික්ඛු උපජ්ඣායං උද්දිස්ස පබ්බාජෙති, වට්ටති. සචෙ දහරභික්ඛු නත්ථි, සාමණෙරොපි වත්තබ්බො ‘‘එතං ඛණ්ඩසීමං නෙත්වා පබ්බාජෙත්වා කාසායානි අච්ඡාදෙත්වා එහී’’ති. සරණානි පන සයං දාතබ්බානි. එවං භික්ඛුනාව පබ්බජිතො හොති. පුරිසඤ්හි භික්ඛුතො අඤ්ඤො පබ්බාජෙතුං න ලභති, මාතුගාමං භික්ඛුනිතො අඤ්ඤො. සාමණෙරො පන සාමණෙරී වා ආණත්තියා කාසායානි දාතුං ලභති. කෙසොරොපනං යෙන කෙනචි කතං සුකතං. इस प्रकार प्रव्रज्या के दोषों से रहित और माता-पिता द्वारा अनुमत व्यक्ति को प्रव्रजित करते समय भी, यदि उसके बाल नहीं कटे हैं और उसी सीमा में अन्य भिक्षु भी हैं, तो बाल काटने के लिए 'भण्डुकम्म' (मुंडन) की अनुमति लेनी चाहिए। उस अनुमति माँगने के तरीके की व्याख्या हम "हे भिक्षुओं, मैं मुंडन के लिए संघ से अनुमति लेने की आज्ञा देता हूँ" यहाँ करेंगे। यदि अवसर हो, तो स्वयं प्रव्रजित करना चाहिए। यदि स्वाध्याय या प्रश्नोत्तर आदि में व्यस्त होने के कारण अवसर न मिले, तो किसी युवा भिक्षु से कहना चाहिए— "इसे प्रव्रजित करो।" यदि बिना कहे भी युवा भिक्षु उपाध्याय को उद्देश्य कर प्रव्रजित करता है, तो वह कल्प्य है। यदि युवा भिक्षु न हो, तो श्रामणेर से भी कहना चाहिए— "इसे खण्ड-सीमा में ले जाकर, प्रव्रजित कर और काषाय वस्त्र पहनाकर ले आओ।" परंतु शरणगमन स्वयं ही देना चाहिए। इस प्रकार भिक्षु द्वारा ही वह प्रव्रजित होता है। क्योंकि पुरुष को भिक्षु के अतिरिक्त अन्य कोई प्रव्रजित नहीं कर सकता, और स्त्री को भिक्षुणी के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं। परंतु श्रामणेर या श्रामणेरी आज्ञा मिलने पर काषाय वस्त्र दे सकते हैं। बालों का मुंडन किसी के भी द्वारा किया गया हो, वह सुकृत (ठीक) है। සචෙ [Pg.249] පන භබ්බරූපො හොති සහෙතුකො ඤාතො යසස්සී කුලපුත්තො, ඔකාසං කත්වාපි සයමෙව පබ්බාජෙතබ්බො. ‘‘මත්තිකාමුට්ඨිං ගහෙත්වා න්හායිත්වා කෙසෙ තෙමෙත්වා ආගච්ඡාහී’’ති ච පන න විස්සජ්ජෙතබ්බො. පබ්බජිතුකාමානඤ්හි පඨමං බලවඋස්සාහො හොති, පච්ඡා පන කාසායානි ච කෙසහරණසත්ථකඤ්ච දිස්වා උත්රසන්ති, එත්තොයෙව පලායන්ති, තස්මා සයමෙව නහානතිත්ථං නෙත්වා සචෙ නාතිදහරො හොති, ‘‘නහාහී’’ති වත්තබ්බො. කෙසා පනස්ස සයමෙව මත්තිකං ගහෙත්වා ධොවිතබ්බා. දහරකුමාරකො පන සයං උදකං ඔතරිත්වා ගොමයමත්තිකාහි ඝංසිත්වා නහාපෙතබ්බො. සචෙපිස්ස කච්ඡු වා පිළකා වා හොන්ති, යථා මාතා පුත්තං න ජිගුච්ඡති, එවමෙව අජිගුච්ඡන්තෙන සාධුකං හත්ථපාදසීසානි ඝංසිත්වා නහාපෙතබ්බො. කස්මා? එත්තකෙන හි උපකාරෙන කුලපුත්තා ආචරියුපජ්ඣායෙසු ච සාසනෙ ච බලවසිනෙහා තිබ්බගාරවා අනිවත්තිධම්මා හොන්ති, උප්පන්නං අනභිරතිං විනොදෙත්වා ථෙරභාවං පාපුණන්ති, කතඤ්ඤූ කතවෙදිනො හොන්ති. यदि वह कुलपुत्र भव्य (निर्वाण के योग्य), हेतु-युक्त (मग्ग-फल प्राप्ति के सामर्थ्य वाला), प्रसिद्ध और यशस्वी हो, तो अवसर निकालकर स्वयं ही उसे प्रव्रजित करना चाहिए। उसे यह कहकर नहीं भेजना चाहिए कि "मिट्टी की मुट्ठी लेकर, स्नान कर और बालों को गीला करके आओ।" क्योंकि प्रव्रज्या के इच्छुक व्यक्तियों में पहले तो प्रबल उत्साह होता है, परंतु बाद में काषाय वस्त्रों और बाल काटने के शस्त्र (उस्तरे) को देखकर वे डर जाते हैं और वहीं से भाग जाते हैं। इसलिए स्वयं ही स्नान-घाट पर ले जाकर, यदि वह बहुत छोटा न हो, तो कहना चाहिए— "स्नान करो।" उसके बालों को स्वयं ही मिट्टी लेकर धोना चाहिए। छोटे बालक को तो स्वयं पानी में उतरकर, गोबर और मिट्टी से रगड़कर स्नान कराना चाहिए। यदि उसे खुजली या फुंसियाँ भी हों, तो जैसे माता पुत्र से घृणा नहीं करती, वैसे ही घृणा न करते हुए अच्छी तरह हाथ, पैर और सिर को रगड़कर स्नान कराना चाहिए। क्यों? क्योंकि इस प्रकार के उपकार से कुलपुत्रों का आचार्य-उपाध्याय और शासन में प्रबल स्नेह, तीव्र गौरव और न लौटने वाला स्वभाव हो जाता है; वे उत्पन्न हुई अरति को दूर कर स्थविर भाव को प्राप्त करते हैं, और कृतज्ञ एवं कृतवेदी होते हैं। එවං නහාපනකාලෙ පන කෙසමස්සුං ඔරොපනකාලෙ වා ‘‘ත්වං ඤාතො යසස්සී, ඉදානි මයං තං නිස්සාය පච්චයෙහි න කිලමිස්සාමා’’ති න වත්තබ්බො, අඤ්ඤාපි අනිය්යානිකකථා න කථෙතබ්බා. අථ ඛ්වස්ස ‘‘ආවුසො, සුට්ඨු උපධාරෙහි සතිං උපට්ඨාපෙහී’’ති වත්වා තචපඤ්චකකම්මට්ඨානං ආචික්ඛිතබ්බං, ආචික්ඛන්තෙන ච වණ්ණසණ්ඨානගන්ධාසයොකාසවසෙන අසුචිජෙගුච්ඡපටිකූලභාවං නිජ්ජීවනිස්සත්තභාවං වා පාකටං කරොන්තෙන ආචික්ඛිතබ්බං. සචෙ හි සො පුබ්බෙ මද්දිතසඞ්ඛාරො හොති භාවිතභාවනො, කණ්ටකවෙධාපෙක්ඛො විය පරිපක්කගණ්ඩො, සූරියුග්ගමනාපෙක්ඛං විය ච පරිණතපදුමං, අථස්ස ආරද්ධමත්තෙ කම්මට්ඨානමනසිකාරෙ ඉන්දාසනි විය පබ්බතෙ කිලෙසපබ්බතෙ චුණ්ණයමානංයෙව ඤාණං පවත්තති, ඛුරග්ගෙයෙව අරහත්තං පාපුණාති. යෙ හි කෙචි ඛුරග්ගෙ අරහත්තං පත්තා, සබ්බෙ තෙ එවරූපං සවනං ලභිත්වා කල්යාණමිත්තෙන ආචරියෙන දින්නනයං නිස්සාය නො අනිස්සාය. තස්මාස්ස ආදිතොව එවරූපී කථා කථෙතබ්බාති. इस प्रकार स्नान कराते समय या दाढ़ी-बाल काटते समय उसे यह नहीं कहना चाहिए कि "तुम प्रसिद्ध और यशस्वी हो, अब हम तुम्हारे आश्रय से प्रत्ययों के लिए कष्ट नहीं पाएंगे," और न ही अन्य कोई संसार से न निकालने वाली कथा कहनी चाहिए। बल्कि उससे "आयुष्मान, अच्छी तरह विचार करो, स्मृति उपस्थित करो" ऐसा कहकर 'त्वचा-पंचक कर्मस्थान' बताना चाहिए। और कर्मस्थान बताते समय वर्ण, संस्थान, गंध, आश्रय और स्थान के वश से उसकी अशुचिता, जुगुप्सा और प्रतिकूलता को अथवा उसके निर्जीव और निस्सत्व भाव को स्पष्ट करते हुए बताना चाहिए। क्योंकि यदि वह पूर्व में संस्कारों को मर्दन कर चुका हो, भावना भा चुका हो, जैसे सुई चुभाने की प्रतीक्षा में पका हुआ फोड़ा हो, या सूर्योदय की प्रतीक्षा में विकसित कमल हो, तो कर्मस्थान के मनस्कार के आरंभ मात्र से ही, जैसे इंद्र का वज्र पर्वतों को चूर्ण कर देता है, वैसे ही क्लेश-पर्वतों को चूर्ण करता हुआ ज्ञान प्रवृत्त होता है और उस्तरे की धार पर ही वह अर्हत्व प्राप्त कर लेता है। जो कोई भी उस्तरे की धार पर अर्हत्व को प्राप्त हुए हैं, वे सभी इस प्रकार के श्रवण को प्राप्त कर, कल्याणमित्र आचार्य द्वारा दी गई विधि के आश्रय से ही प्राप्त हुए हैं, बिना आश्रय के नहीं। इसलिए उसे आरंभ से ही इस प्रकार की कथा कहनी चाहिए—ऐसा समझना चाहिए। කෙසෙසු පන ඔරොපිතෙසු හලිද්දිචුණ්ණෙන වා ගන්ධචුණ්ණෙන වා සීසඤ්ච සරීරඤ්ච උබ්බට්ටෙත්වා ගිහිගන්ධං අපනෙත්වා කාසායානි තික්ඛත්තුං වා ද්වික්ඛත්තුං [Pg.250] වා සකිං වා පටිග්ගාහෙතබ්බො. අථාපිස්ස හත්ථෙ අදත්වා ආචරියො වා උපජ්ඣායො වා සයමෙව අච්ඡාදෙති, වට්ටති. සචෙපි අඤ්ඤං දහරං වා සාමණෙරං වා උපාසකං වා ආණාපෙති ‘‘ආවුසො, එතානි කාසායානි ගහෙත්වා එතං අච්ඡාදෙහී’’ති තංයෙව වා ආණාපෙති ‘‘එතානි ගහෙත්වා අච්ඡාදෙහී’’ති සබ්බං වට්ටති. සබ්බං තෙන භික්ඛුනාව දින්නං හොති. बाल कट जाने पर हल्दी के चूर्ण या गंध-चूर्ण से सिर और शरीर को मलकर, गृहस्थ की गंध को दूर कर, काषाय वस्त्रों को तीन बार, दो बार या एक बार ग्रहण कराना चाहिए। अथवा यदि आचार्य या उपाध्याय उसके हाथ में न देकर स्वयं ही उसे पहना देते हैं, तो वह भी कल्प्य है। यदि किसी अन्य युवा भिक्षु, श्रामणेर या उपासक को आज्ञा देते हैं— "आयुष्मान, इन काषाय वस्त्रों को लेकर इसे पहना दो," या उसी को आज्ञा देते हैं— "इन्हें लेकर पहन लो," तो सब कल्प्य है। वह सब उस भिक्षु द्वारा ही दिया हुआ माना जाता है। යං පන නිවාසනං වා පාරුපනං වා අනාණත්තියා නිවාසෙති වා පාරුපති වා, තං අපනෙත්වා පුන දාතබ්බං. භික්ඛුනා හි සහත්ථෙන වා ආණත්තියා වා දින්නමෙව කාසාවං වට්ටති, අදින්නං න වට්ටති, සචෙපි තස්සෙව සන්තකං හොති, කො පන වාදො උපජ්ඣායමූලකෙ! අයං ‘‘පඨමං කෙසමස්සුං ඔහාරෙත්වා කාසායානි වත්ථානි අච්ඡාදාපෙත්වා එකංසං උත්තරාසඞ්ගං කාරාපෙත්වා’’ති එත්ථ විනිච්ඡයො. परंतु जो अंतर्वासक या उत्तरासंग वह बिना आज्ञा के पहन लेता है या ओढ़ लेता है, उसे उतारकर पुनः दिया जाना चाहिए। क्योंकि भिक्षु द्वारा अपने हाथ से या आज्ञा देकर दिया गया काषाय वस्त्र ही कल्प्य है, बिना दिया हुआ नहीं। यदि वह उसका अपना ही हो, तब भी बिना दिया हुआ कल्प्य नहीं है, फिर उपाध्याय के स्वामित्व वाले वस्त्र के विषय में तो कहना ही क्या! यह "पहले दाढ़ी-बाल कटवाकर, काषाय वस्त्र पहनाकर, एक कंधे पर उत्तरासंग करवाकर" इस पाठ का निश्चय है। භික්ඛූනං පාදෙ වන්දාපෙත්වාති යෙ තත්ථ සන්නිපතිතා භික්ඛූ, තෙසං පාදෙ වන්දාපෙත්වා; අථ සරණග්ගහණත්ථං උක්කුටිකං නිසීදාපෙත්වා අඤ්ජලිං පග්ගණ්හාපෙත්වා එවං වදෙහීති වත්තබ්බො. ‘‘යමහං වදාමි, තං වදෙහී’’ති වත්තබ්බො. අථස්ස උපජ්ඣායෙන වා ආචරියෙන වා ‘‘බුද්ධං සරණං ගච්ඡාමී’’තිආදිනා නයෙන සරණානි දාතබ්බානි යථාවුත්තපටිපාටියාව න උප්පටිපාටියා. සචෙ හි එකපදම්පි එකක්ඛරම්පි උප්පටිපාටියා දෙති, බුද්ධං සරණංයෙව වා තික්ඛත්තුං දත්වා පුන ඉතරෙසු එකෙකං තික්ඛත්තුං දෙති, අදින්නානි හොන්ති සරණානි. "भिक्षुओं के चरणों में वन्दना कराकर" का अर्थ है कि वहाँ जो भिक्षु एकत्रित हुए हैं, उनके चरणों में वन्दना कराकर; फिर शरण ग्रहण करने के लिए उकड़ू (ukkuṭika) बिठाकर, अंजलिबद्ध कराकर "ऐसा कहो" ऐसा कहना चाहिए। "जो मैं कहता हूँ, वह कहो" ऐसा कहना चाहिए। फिर उसके उपाध्याय या आचार्य द्वारा "बुद्धं सरणं गच्छामि" आदि विधि से शरण (त्रिशरण) उसी क्रम से दिए जाने चाहिए जो बताया गया है, न कि उल्टे क्रम से। यदि कोई एक पद या एक अक्षर भी उल्टे क्रम से देता है, अथवा केवल "बुद्धं सरणं" ही तीन बार देकर फिर शेष में से एक-एक को तीन-तीन बार देता है, तो शरण नहीं दिए गए (अमान्य) होते हैं। ඉමඤ්ච පන සරණගමනූපසම්පදං පටික්ඛිපිත්වා අනුඤ්ඤාතඋපසම්පදා එකතො සුද්ධියා වට්ටති. සාමණෙරපබ්බජ්ජා පන උභතොසුද්ධියාව වට්ටති, නො එකතො සුද්ධියා. තස්මා උපසම්පදාය සචෙ ආචරියො ඤත්තිදොසඤ්චෙව කම්මවාචාදොසඤ්ච වජ්ජෙත්වා කම්මං කරොති, සුකතං හොති. පබ්බජ්ජාය පන ඉමානි තීණි සරණානි බුකාරධකාරාදීනං බ්යඤ්ජනානං ඨානකරණසම්පදං අහාපෙන්තෙනෙව ආචරියෙනපි අන්තෙවාසිකෙනපි වත්තබ්බානි. සචෙ ආචරියො වත්තුං සක්කොති, අන්තෙවාසිකො න සක්කොති; අන්තෙවාසිකො වා සක්කොති, ආචරියො න සක්කොති; උභොපි වා න සක්කොන්ති, න වට්ටති. සචෙ පන උභොපි සක්කොන්ති, වට්ටති. और इस शरणगमन उपसम्पदा को अस्वीकार कर जो [बाद में] अनुमत उपसम्पदा है, वह एक पक्ष (आचार्य/संघ) की शुद्धता से सिद्ध होती है। किन्तु सामणेर प्रव्रज्या दोनों पक्षों (आचार्य और अन्तेवासी) की शुद्धता से ही सिद्ध होती है, न कि केवल एक पक्ष की शुद्धता से। इसलिए उपसम्पदा में यदि आचार्य ज्ञप्ति-दोष और कर्मवाचा-दोष को त्यागकर कर्म करता है, तो वह सुकृत (सफल) होता है। प्रव्रज्या में तो इन तीन शरणों को 'बु' और 'ध' आदि व्यंजनों के उच्चारण-स्थान और करण की पूर्णता को बनाए रखते हुए ही आचार्य और अन्तेवासी दोनों के द्वारा बोला जाना चाहिए। यदि आचार्य बोल सकता है, अन्तेवासी नहीं; या अन्तेवासी बोल सकता है, आचार्य नहीं; या दोनों ही नहीं बोल सकते, तो वह मान्य नहीं है। यदि दोनों बोल सकते हैं, तो मान्य है। ඉමානි [Pg.251] ච පන දදමානෙන ‘‘බුද්ධං සරණං ගච්ඡාමී’’ති එවං එකසම්බන්ධානි අනුනාසිකන්තානි වා කත්වා දාතබ්බානි, ‘‘බුද්ධං සරණං ගච්ඡාමී’’ති එවං විච්ඡින්දිත්වා මකාරන්තානි වා කත්වා දාතබ්බානි. අන්ධකට්ඨකථායං නාමං සාවෙත්වා ‘‘අහං භන්තෙ බුද්ධරක්ඛිතො යාවජීවං බුද්ධං සරණං ගච්ඡාමී’’ති වුත්තං, තං එකඅට්ඨකථායම්පි නත්ථි, පාළියම්පි න වුත්තං, තෙසං රුචිමත්තමෙව, තස්මා න ගහෙතබ්බං. න හි තථා අවදන්තස්ස සරණං කුප්පතීති. और इन्हें देते समय "बुद्धं सरणं गच्छामि" इस प्रकार एक साथ जोड़कर अनुनासिक अन्त वाले करके दिया जा सकता है, अथवा "बुद्धं सरणं गच्छामि" इस प्रकार अलग-अलग करके 'म'कार अन्त वाले करके दिया जा सकता है। अन्धक-अट्ठकथा में नाम की घोषणा करते हुए "भन्ते, मैं बुद्धरक्षित जीवनभर के लिए बुद्ध की शरण जाता हूँ" ऐसा कहा गया है, वह किसी अन्य अट्ठकथा में नहीं है और न ही पालि में कहा गया है, वह केवल उनकी अपनी रुचि मात्र है, इसलिए उसे ग्रहण नहीं करना चाहिए। क्योंकि उस प्रकार न कहने वाले का शरण नष्ट नहीं होता। අනුජානාමි භික්ඛවෙ ඉමෙහි තීහි සරණගමනෙහි පබ්බජ්ජං උපසම්පදන්ති ඉමෙහි බුද්ධං සරණං ගච්ඡාමීතිආදීහි එවං තික්ඛත්තුං උභතොසුද්ධියා වුත්තෙහි තීහි සරණගමනෙහි පබ්බජ්ජඤ්චෙව උපසම්පදඤ්ච අනුජානාමීති අත්ථො. තත්ථ යස්මා උපසම්පදා පරතො පටික්ඛිත්තා, තස්මා සා එතරහි සරණමත්තෙනෙව න රුහති. පබ්බජ්ජා පන යස්මා පරතො ‘‘අනුජානාමි, භික්ඛවෙ, ඉමෙහි තීහි සරණගමනෙහි සාමණෙරපබ්බජ්ජ’’න්ති අනුඤ්ඤාතා එව, තස්මා සා එතරහිපි සරණමත්තෙනෙව රුහති. එත්තාවතා හි සාමණෙරභූමියං පතිට්ඨිතො හොති. "भिक्षुओं, मैं इन तीन शरणगमनों द्वारा प्रव्रज्या और उपसम्पदा की अनुमति देता हूँ" का अर्थ है कि "बुद्धं सरणं गच्छामि" आदि इन तीन शरणगमनों को दोनों पक्षों की शुद्धता के साथ तीन बार कहने से प्रव्रज्या और उपसम्पदा की अनुमति देता हूँ। वहाँ, चूँकि उपसम्पदा को बाद में [इस विधि से] निषिद्ध कर दिया गया, इसलिए वह अब केवल शरण मात्र से सिद्ध नहीं होती। किन्तु प्रव्रज्या चूँकि बाद में "भिक्षुओं, मैं इन तीन शरणगमनों द्वारा सामणेर प्रव्रज्या की अनुमति देता हूँ" इस प्रकार अनुमत ही रही, इसलिए वह अब भी केवल शरण मात्र से सिद्ध होती है। इतने से ही वह सामणेर की भूमि (अवस्था) में प्रतिष्ठित हो जाता है। සචෙ පනෙස මතිමා හොති පණ්ඩිතජාතිකො, අථස්ස තස්මිංයෙව ඨානෙ සික්ඛාපදානි උද්දිසිතබ්බානි. කථං? යථා භගවතා උද්දිට්ඨානි. වුත්තඤ්හෙතං – यदि वह बुद्धिमान और समझदार स्वभाव का है, तो उसे उसी स्थान पर शिक्षापदों का उपदेश देना चाहिए। कैसे? जैसे भगवान द्वारा उपदिष्ट हैं। क्योंकि यह कहा गया है - ‘‘අනුජානාමි, භික්ඛවෙ, සාමණෙරානං දස සික්ඛාපදානි, තෙසු ච සාමණෙරෙහි සික්ඛිතුං. පාණාතිපාතා වෙරමණී, අදින්නාදානා වෙරමණී, අබ්රහ්මචරියා වෙරමණී, මුසාවාදා වෙරමණී, සුරාමෙරයමජ්ජපමාදට්ඨානා වෙරමණී, විකාලභොජනා වෙරමණී, නච්චගීතවාදිතවිසූකදස්සනා වෙරමණී, මාලාගන්ධවිලෙපනධාරණමණ්ඩනවිභූසනට්ඨානා වෙරමණී, උච්චාසයනමහාසයනා වෙරමණී, ජාතරූපරජතපටිග්ගහණා වෙරමණී’’ති (මහාව. 106). "भिक्षुओं, मैं सामणेरों के लिए दस शिक्षापदों की और सामणेरों द्वारा उनमें शिक्षित होने की अनुमति देता हूँ। प्राणातिपात (जीव-हत्या) से विरति, अदत्तादान (चोरी) से विरति, अब्रह्मचर्य से विरति, मृषावाद (झूठ) से विरति, सुरा-मेरय-मज्ज-प्रमादस्थान (नशीले पदार्थों) से विरति, विकाल-भोजन (असमय भोजन) से विरति, नृत्य-गीत-वादित-विशूकदर्शन (नाच-गाना-बजाना और तमाशा देखना) से विरति, माला-गन्ध-विलेपन-धारण-मण्डन-विभूषणस्थान (माला, सुगन्ध और अलंकरण) से विरति, उच्चशयन-महाशयन (ऊँचे और बड़े बिस्तरों) से विरति, और जातरूप-रजत-प्रतिग्रहण (सोना-चाँदी स्वीकार करने) से विरति।" අන්ධකට්ඨකථායං පන ‘‘අහං, භන්තෙ, ඉත්ථන්නාමො යාවජීවං පාණාතිපාතා වෙරමණිසික්ඛාපදං किन्तु अन्धक-अट्ठकथा में "भन्ते, मैं अमुक नाम वाला जीवनभर के लिए प्राणातिपात से विरति रूपी शिक्षापद को... සමාදියාමී’’ති එවං සරණදානං විය සික්ඛාපදදානම්පි වුත්තං, තං නෙව පාළියං න අට්ඨකථාසු අත්ථි, තස්මා යථාපාළියාව උද්දිසිතබ්බානි. පබ්බජ්ජා හි සරණගමනෙහෙව සිද්ධා, සික්ඛාපදානි පන කෙවලං සික්ඛාපරිපූරණත්ථං [Pg.252] ජානිතබ්බානි. තස්මා තානි පාළියං ආගතනයෙන උග්ගහෙතුං අසක්කොන්තස්ස යාය කායචි භාසාය අත්ථවසෙනපි ආචික්ඛිතුං වට්ටති. යාව පන අත්තනා සික්ඛිතබ්බසික්ඛාපදානි න ජානාති, සඞ්ඝාටිපත්තචීවරධාරණට්ඨානනිසජ්ජාදීසු පානභොජනාදිවිධිම්හි ච න කුසලො හොති, තාව භොජනසාලං වා සලාකභාජනට්ඨානං වා අඤ්ඤං වා තථාරූපට්ඨානං න පෙසෙතබ්බො, සන්තිකාවචරොයෙව කාතබ්බො, බාලදාරකො විය පටිජග්ගිතබ්බො, සබ්බමස්ස කප්පියාකප්පියං ආචික්ඛිතබ්බං, නිවාසනපාරුපනාදීසු ආභිසමාචාරිකෙසු විනෙතබ්බො. තෙනාපි ‘‘අනුජානාමි, භික්ඛවෙ, දසහඞ්ගෙහි සමන්නාගතං සාමණෙරං නාසෙතු’’න්ති (මහාව. 108) එවං පරතො වුත්තානි දස නාසනඞ්ගානි ආරකා පරිවජ්ජෙත්වා ආභිසමාචාරිකං පරිපූරෙන්තෙන දසවිධෙ සීලෙ සාධුකං සික්ඛිතබ්බන්ති. ग्रहण करता हूँ" इस प्रकार शरण देने के समान शिक्षापद देना भी कहा गया है, वह न तो पालि में है और न ही अट्ठकथाओं में है, इसलिए पालि के अनुसार ही उपदेश देना चाहिए। प्रव्रज्या तो शरणगमनों से ही सिद्ध हो जाती है, शिक्षापद तो केवल शिक्षा की परिपूर्णता के लिए जानने चाहिए। इसलिए, जो उन्हें पालि में आए हुए तरीके से सीखने में असमर्थ है, उसे किसी भी भाषा में अर्थ के माध्यम से भी बताना उचित है। जब तक वह स्वयं सीखने योग्य शिक्षापदों को नहीं जानता, और संघाटी, पात्र एवं चीवर धारण करने, खड़े होने, बैठने आदि में तथा खान-पान आदि की विधि में कुशल नहीं हो जाता, तब तक उसे भोजनशाला, शलाका-वितरण स्थान या अन्य किसी वैसे स्थान पर नहीं भेजना चाहिए। उसे अपने पास ही रखना चाहिए, छोटे बालक की तरह उसकी देखभाल करनी चाहिए, उसे सब कुछ कल्पनीय (उचित) और अकल्पनीय (अनुचित) बताना चाहिए, और निवास (अधोवस्त्र) तथा पारुपण (उत्तरासंग) आदि आभिसमाचारिक नियमों में प्रशिक्षित करना चाहिए। उसे भी, "भिक्षुओं, मैं दस अंगों से युक्त सामणेर को निष्कासित करने की अनुमति देता हूँ" इस प्रकार आगे कहे गए दस निष्कासन के कारणों (नासन-अंगों) को दूर से ही त्यागकर, आभिसमाचारिक कर्तव्यों को पूरा करते हुए दस प्रकार के शील में भली-भाँति शिक्षित होना चाहिए। පබ්බජ්ජාකථා නිට්ඨිතා. प्रव्रज्या-कथा समाप्त। දුතියමාරකථා द्वितीय मार-कथा। 35. මය්හං ඛො භික්ඛවෙති මයා ඛොති අත්ථො. අථ වා යො මය්හං යොනිසො මනසිකාරො, තෙන හෙතුනාති අත්ථො. පුන අනුප්පත්තාති එත්ථ විභත්තිං පරිණාමෙත්වා මයාති වත්තබ්බං. ३५. "मय्हं खो भिक्खवे" का अर्थ है "मेरे द्वारा"। अथवा, "जो मेरा योनिशो मनसिकार है, उस कारण से" यह अर्थ है। पुनः "अनुप्पत्ता" यहाँ विभक्ति बदलकर "मया" (मेरे द्वारा) ऐसा कहना चाहिए। දුතියමාරකථා නිට්ඨිතා. द्वितीय मार-कथा समाप्त। භද්දවග්ගියකථා भद्दवग्गीय-कथा। 36. භද්දවග්ගියාති තෙ කිර රාජකුමාරා රූපෙන ච චිත්තෙන ච භද්දකා වග්ගබන්ධෙන ච විචරන්ති, තස්මා ‘‘භද්දවග්ගියා’’ති වුච්චන්ති. තෙන හි වොති එත්ථ වොකාරො නිපාතමත්තො. ධම්මචක්ඛුං උදපාදීති කෙසඤ්චි සොතාපත්තිමග්ගො, කෙසඤ්චි සකදාගාමිමග්ගො, කෙසඤ්චි අනාගාමිමග්ගො උදපාදි. තයොපි හි එතෙ මග්ගා ‘‘ධම්මචක්ඛූ’’ති වුච්චන්ති. තෙ කිර තුණ්ඩිලජාතකෙ තිංසධුත්තා අහෙසුං, අථ තුණ්ඩිලොවාදං සුත්වා පඤ්චසීලානි රක්ඛිංසු; ඉදං නෙසං පුබ්බකම්මං. ३६. "भद्दवग्गिया" (भद्रवर्गीय) का अर्थ है कि वे राजकुमार रूप और चित्त दोनों से अच्छे (भद्र) थे और वे एक समूह (वर्ग) बनाकर विचरण करते थे, इसलिए उन्हें "भद्दवग्गिया" कहा जाता है। "तेन हि वो" (tena hi vo) में "वो" (vo) केवल एक निपात (अव्यय) है। "धम्मचक्खुं उदापादि" (धर्मचक्षु उत्पन्न हुआ) का अर्थ है कि किन्हीं को स्रोतापत्ति मार्ग, किन्हीं को सकदागामी मार्ग और किन्हीं को अनागामी मार्ग प्राप्त हुआ। इन तीनों ही मार्गों को "धर्मचक्षु" कहा जाता है। वे (राजकुमार) तुण्डिल जातक में तीस धूर्त (शराबी) थे, फिर तुण्डिल के उपदेश को सुनकर उन्होंने पंचशीलों का पालन किया; यह उनका पूर्व कर्म (पुण्य) था। භද්දවග්ගියකථා නිට්ඨිතා. भद्रवर्गीय कथा समाप्त हुई। උරුවෙලපාටිහාරියකථා उरुवेला प्रातिहार्य कथा। 37. පමුඛොති පුබ්බඞ්ගමො. පාමොක්ඛොති උත්තමො විසුද්ධපඤ්ඤො. ३७. "पमुखो" (प्रमुख) का अर्थ है अग्रणी (आगे चलने वाला)। "पामोक्खो" (प्रामुख्य) का अर्थ है उत्तम और विशुद्ध प्रज्ञा वाला। 38. අනුපහච්චාති [Pg.253] අවිනාසෙත්වා. තෙජසා තෙජන්ති අත්තනො තෙජෙන නාගස්ස තෙජං. පරියාදියෙය්යන්ති අභිභවෙය්යං, විනාසෙය්යං වාති. මක්ඛන්ති කොධං. නත්වෙව ච ඛො අරහා යථා අහන්ති අත්තානං ‘‘අරහා අහ’’න්ති මඤ්ඤමානො වදති. ३८. "अनुपहच्चा" का अर्थ है बिना विनाश किए। "तेजसा तेजं" का अर्थ है अपने तेज (प्रताप) से नाग के तेज को। "परियादियेय्युं" का अर्थ है अभिभूत करूँ या विनाश करूँ। "मक्खं" का अर्थ है क्रोध। "नत्वेव च खो अरहा यथा अहं" - वह स्वयं को "मैं अर्हन्त हूँ" ऐसा मानते हुए कहता है। 39. නෙරඤ්ජරායං භගවාතිආදිකා ගාථායො පච්ඡා පක්ඛිත්තා. ३९. "नेरञ्जरायं भगवा" आदि गाथाएँ बाद में (संगायना के समय) सम्मिलित की गई हैं। 44-9. විස්සජ්ජෙය්යන්ති සුක්ඛාපනත්ථාය පසාරෙත්වා ඨපෙය්යන්ති අත්ථො. ‘‘භන්තෙ ආහර හත්ථ’’න්ති එවං වදන්තො විය ඔණතොති ආහරහත්ථො. උය්යොජෙත්වාති විස්සජ්ජෙත්වා. මන්දාමුඛියොති අග්ගිභාජනානි වුච්චන්ති. "विस्सज्जेय्युं" का अर्थ है सुखाने के लिए फैलाकर रखना। "भन्ते आहर हत्थं" (भन्ते, हाथ बढ़ाएँ) - ऐसा कहते हुए के समान वह नीचे झुका, इसलिए उसे "आहरहत्थो" कहा गया। "उय्योजेत्वा" का अर्थ है छोड़कर या विसर्जित कर। "मन्दामुखियो" अग्नि-पात्रों (अंगीठियों) को कहा जाता है। 51. චිරපටිකාති චිරකාලතො පට්ඨාය. ५१. "चिरपटिका" का अर्थ है बहुत समय पहले से। 52. කෙසමිස්සන්තිආදීසු කෙසා එව කෙසමිස්සං. එස නයො සබ්බත්ථ. ඛාරිකාජන්ති ඛාරිභාරො. ५२. "केसमिस्सं" आदि में केश ही "केसमिस्स" हैं। यही नियम सब जगह (जटामिस्स आदि में) लागू होता है। "खारिकाजं" का अर्थ है तपस्वी के उपकरणों का भार ढोने वाला काँवर (बहँगी)। උරුවෙලපාටිහාරියකථා නිට්ඨිතා. उरुवेला प्रातिहार्य कथा समाप्त हुई। බිම්බිසාරසමාගමකථා बिम्बिसार समागम कथा। 55. ලට්ඨිවනෙති තාලුය්යානෙ. සුප්පතිට්ඨෙ චෙතියෙති අඤ්ඤතරස්මිං වටරුක්ඛෙ; තස්ස කිරෙතං නාමං. ද්වාදසනහුතෙහීති එත්ථ එකං නහුතං දසසහස්සානි. අජ්ඣභාසීති තෙසං කඞ්ඛාච්ඡෙදනත්ථං අභාසි. ५५. "लट्ठिवने" का अर्थ है ताड़ के वन (उद्यान) में। "सुप्पतिट्ठे चेतिये" का अर्थ है एक विशेष बरगद के वृक्ष के पास; यह उस वृक्ष का नाम था। "द्वादसनहुतेहि" यहाँ एक 'नहुत' का अर्थ दस हजार है। "अज्झभासि" का अर्थ है उनकी शंकाओं को दूर करने के लिए कहा। කිසකොවදානොති තාපසචරියාය කිසසරීරත්තා ‘‘කිසකො’’ති ලද්ධනාමානං තාපසානං ඔවාදකො අනුසාසකො සමානොති අත්ථො. අථ වා සයං කිසකො තාපසො සමානො වදානො ච අඤ්ඤෙ ඔවදන්තො අනුසාසන්තොතිපි අත්ථො. කථං පහීනන්ති කෙන කාරණෙන පහීනං. ඉදං වුත්තං හොති – ‘‘ත්වං උරුවෙලවාසිඅග්ගිපරිචාරකානං තාපසානං සයං ඔවාදාචරියො සමානො කිං දිස්වා පහාසි, පුච්ඡාමි තං එතමත්ථං කෙන කාරණෙන තව අග්ගිහුත්තං පහීන’’න්ති. "किसकोवदानो" का अर्थ है तपस्या के कारण कृश (दुबले) शरीर वाले होने से "किसक" नाम प्राप्त तपस्वियों को उपदेश देने वाला और अनुशासित करने वाला आचार्य। अथवा, स्वयं कृश तपस्वी होते हुए दूसरों को उपदेश और अनुशासन देने वाला। "कथं पहीनं" का अर्थ है किस कारण से त्याग दिया? इसका अर्थ यह है— "उरुवेला में रहने वाले अग्नि-परिचारक तपस्वियों के स्वयं उपदेशक आचार्य होते हुए तुमने क्या देखकर इसे त्याग दिया? मैं तुमसे यह बात पूछता हूँ कि किस कारण से तुम्हारा अग्नि-होत्र (अग्नि-पूजा) छूट गया?" දුතියගාථාය අයමත්ථො – එතෙ රූපාදිකෙ කාමෙ ඉත්ථියො ච යඤ්ඤා අභිවදන්ති, ස්වාහං එතං සබ්බම්පි රූපාදිකං කාමප්පභෙදං ඛන්ධුපධීසු මලන්ති ඤත්වා යස්මා ඉමෙ යිට්ඨහුතප්පභෙදා යඤ්ඤා මලමෙව වදන්ති, තස්මා න යිට්ඨෙ න හුතෙ අරඤ්ජිං; යිට්ඨෙ වා හුතෙ වා නාභිරමින්ති අත්ථො. दूसरी गाथा का अर्थ यह है— ये यज्ञ इन रूपादि काम-भोगों और स्त्रियों की प्रशंसा करते हैं। मैंने उन सभी रूपादि काम-प्रकारों को स्कन्ध-उपधियों में 'मल' (गंदगी) के रूप में जानकर, और चूँकि ये विभिन्न प्रकार के यज्ञ केवल मल (काम आदि) की ही प्रशंसा करते हैं, इसलिए मैंने न तो बड़े यज्ञों (यिट्ठ) में और न ही छोटे यज्ञों (हुत) में रुचि ली; अर्थात् यज्ञों में मेरा मन नहीं रमा। තතියගාථාය [Pg.254] – අථ කොචරහීති අථ ක්වචරහි. සෙසං උත්තානමෙව. तीसरी गाथा में— "अथ कोचरहि" का अर्थ है "तो फिर कहाँ?" शेष भाग स्पष्ट ही है। චතුත්ථගාථාය – පදන්ති නිබ්බානපදං. සන්තසභාවතාය සන්තං. උපධීනං අභාවෙන අනුපධිකං. රාගකිඤ්චනාදීනං අභාවෙන අකිඤ්චනං. තීසු භවෙසු අලග්ගතාය යං කාමභවං යඤ්ඤා වදන්ති, තස්මිම්පි කාමභවෙ අසත්තං. ජාතිජරාමරණානං අභාවෙන අනඤ්ඤථාභාවිං. අත්තනා භාවිතෙන මග්ගෙනෙව අධිගන්තබ්බං, න අඤ්ඤෙන කෙනචි අධිගමෙතබ්බන්ති අනඤ්ඤනෙය්යං. යස්මා ඊදිසං පදමද්දසං, තස්මා න යිට්ඨෙ න හුතෙ අරඤ්ජිං. තෙන කිං දස්සෙති? යො අහං දෙවමනුස්සලොකසම්පත්තිසාධකෙ න යිට්ඨෙ න හුතෙ අරඤ්ජිං, සො කිං වක්ඛාමි ‘‘එත්ථ නාම මෙ දෙවමනුස්සලොකෙ රතො මනො’’ති. चौथी गाथा में— "पदं" का अर्थ है निर्वाण-पद। शान्त स्वभाव होने के कारण "सन्तं" (शान्त)। उपधियों के अभाव के कारण "अनुपधिकं"। राग आदि क्लेशों के अभाव के कारण "अकिञ्चनं"। तीनों भवों में आसक्त न होने के कारण, जिस काम-भव की यज्ञ प्रशंसा करते हैं, उस काम-भव में भी जो अनासक्त (असत्तं) है। जाति, जरा और मरण के अभाव के कारण जो विकृति-रहित (अनञ्ञथाभाविं) है। स्वयं के द्वारा भावित मार्ग से ही प्राप्त करने योग्य होने के कारण, जिसे किसी अन्य के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता, वह "अनञ्ञनेय्यं" (स्वयं जानने योग्य) है। चूँकि मैंने ऐसे पद (निर्वाण) को देख लिया है, इसलिए मैंने यज्ञों में रुचि नहीं ली। इससे क्या प्रदर्शित होता है? कि जिस मैंने देव और मनुष्य लोक की सम्पत्ति सिद्ध करने वाले यज्ञों में रुचि नहीं ली, वह मैं यह कैसे कह सकता हूँ कि "इस देव-मनुष्य लोक में मेरा मन रमा हुआ है"। 56. එවං සබ්බලොකෙ අනභිරතිභාවං පකාසෙත්වා අථ ඛො ආයස්මා උරුවෙලකස්සපො ‘‘සාවකොහමස්මී’’ති එවං භගවතො සාවකභාවං පකාසෙසි. තඤ්ච ඛො ආකාසෙ විවිධානි පාටිහාරියානි දස්සෙත්වා. ධම්මචක්ඛුන්ති සොතාපත්තිමග්ගඤාණං. ५६. इस प्रकार समस्त लोक के प्रति अनासक्ति प्रकट कर, आयुष्मान उरुवेल कस्सप ने "मैं (भगवान का) श्रावक हूँ" ऐसा कहकर भगवान के प्रति अपने श्रावक-भाव को प्रकट किया। और उन्होंने आकाश में विभिन्न प्रकार के प्रातिहार्य (चमत्कार) दिखाकर इसे स्पष्ट किया। "धम्मचक्खु" का अर्थ है स्रोतापत्ति-मार्ग-ज्ञान। 57. අස්සාසකාති ආසීසනා; පත්ථනාති අත්ථො. එසාහං භන්තෙති එත්ථ පන කිඤ්චාපි මග්ගප්පටිවෙධෙනෙවස්ස සිද්ධං සරණගමනං, තත්ථ පන නිච්ඡයගමනමෙව ගතො, ඉදානි වාචාය අත්තසන්නිය්යාතනං කරොති. මග්ගවසෙනෙවායං නියතසරණතං පත්තො, තං පරෙසං වාචාය පාකටං කරොන්තො පණිපාතගමනඤ්ච ගච්ඡන්තො එවං වදති. ५७. "अस्सासका" का अर्थ है आशाएँ या प्रार्थनाएँ। "एसाहं भन्ते" यहाँ यद्यपि मार्ग-साक्षात्कार से ही उनका शरण-गमन सिद्ध हो चुका था, फिर भी वे दृढ़ निश्चय की स्थिति को प्राप्त हुए और अब वाणी द्वारा आत्म-समर्पण रूपी शरण-गमन कर रहे हैं। मार्ग के प्रभाव से ही वे इस निश्चित शरण-गति को प्राप्त हुए हैं, उसे दूसरों के सामने वाणी से प्रकट करने के लिए और 'प्रणिपात-शरण-गमन' (नमन पूर्वक शरण जाना) करते हुए वे ऐसा कहते हैं। 58. සිඞ්ගීනික්ඛසවණ්ණොති සිඞ්ගීසුවණ්ණනික්ඛෙන සමානවණ්ණො. දසවාසොති දසසු අරියවාසෙසු වුත්ථවාසො. දසධම්මවිදූති දසකම්මපථවිදූ. දසභි චුපෙතොති දසහි අසෙක්ඛෙහි අඞ්ගෙහි උපෙතො. සබ්බධිදන්තොති සබ්බෙසු දන්තො; භගවතො හි චක්ඛුආදීසු කිඤ්චි අදන්තං නාම නත්ථි. ५८. "सिङ्गीनिक्खसवण्णो" का अर्थ है सिङ्गी स्वर्ण के सिक्के (निक्ख) के समान वर्ण वाले। "दसावासो" का अर्थ है दस आर्य-वासों (अर्हन्तों के निवास/आचरण) में निवास करने वाले। "दसधम्मविदू" का अर्थ है दस कर्म-पथों को जानने वाले। "दसभि चुपेतो" का अर्थ है (अशैक्ष के) दस अंगों से युक्त। "सब्बधिदन्तो" का अर्थ है सभी (इन्द्रियों) में दमित (संयमित); क्योंकि भगवान की चक्षु आदि इन्द्रियों में कुछ भी असंयमित नहीं है। 59. භගවන්තං භුත්තාවිං ඔනීතපත්තපාණිං එකමන්තං නිසීදීති භගවන්තං භුත්තවන්තං පත්තතො ච අපනීතපාණිං සල්ලක්ඛෙත්වා එකස්මිං පදෙසෙ නිසීදීති [Pg.255] අත්ථො. අත්ථිකානන්ති බුද්ධාභිවාදනගමනෙන ච ධම්මසවනෙන ච අත්ථිකානං. අභික්කමනීයන්ති අභිගන්තුං සක්කුණෙය්යං. අප්පාකිණ්ණන්ති අනාකිණ්ණං. අප්පසද්දන්ති වචනසද්දෙන අප්පසද්දං. අප්පනිග්ඝොසන්ති නගරනිග්ඝොසසද්දෙන අප්පනිග්ඝොසං. විජනවාතන්ති අනුසඤ්චරණජනස්ස සරීරවාතෙන විරහිතං. ‘‘විජනවාද’’න්තිපි පාඨො; අන්තො ජනවාදෙන රහිතන්ති අත්ථො. ‘‘විජනපාත’’න්තිපි පාඨො; ජනසඤ්චාරවිරහිතන්ති අත්ථො. මනුස්සරාහසෙය්යකන්ති මනුස්සානං රහස්සකිරියට්ඨානියං. පටිසල්ලානසාරුප්පන්ති විවෙකානුරූපං. ५९. भगवान को भोजन कर चुकने और पात्र से हाथ हटा लेने के बाद, यह देखकर कि वे एक स्थान पर बैठ गए हैं, इसका अर्थ है कि वह एक ओर बैठ गया। 'अत्थिकानं' का अर्थ है बुद्ध के अभिवादन और धर्म श्रवण के इच्छुक लोगों के लिए। 'अभिक्कमनीयं' का अर्थ है जहाँ पहुँचा जा सके। 'अप्पाकिण्णं' का अर्थ है जो भीड़भाड़ से रहित हो। 'अप्पसद्दं' का अर्थ है वचनों के शब्द से रहित। 'अप्पनिग्घोस' का अर्थ है नगर के शोर-शराबे से रहित। 'विजनवातं' का अर्थ है लोगों के आने-जाने से उत्पन्न शरीर की वायु (गंध) से रहित। 'विजनवादं' और 'विजनपातं' भी पाठ हैं, जिनका अर्थ है लोगों की आवाज़ या उनके आने-जाने से रहित। 'मनुस्सराहसेय्यकं' का अर्थ है मनुष्यों के एकांत कार्यों के लिए उपयुक्त स्थान। 'पटिसल्लानसारुप्पं' का अर्थ है विवेक (एकांत) के अनुरूप। සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානපබ්බජ්ජාකථා सारिपुत्र और मोग्गल्लान के प्रव्रज्या की कथा। 60. සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානාති සාරිපුත්තො ච මොග්ගල්ලානො ච. තෙහි කතිකා කතා හොති ‘‘යො පඨමං අමතං අධිගච්ඡති, සො ආරොචෙතූ’’ති තෙ කිර උභොපි ගිහිකාලෙ උපතිස්සො කොලිතොති එවං පඤ්ඤායමානනාමා අඩ්ඪතෙය්යසතමාණවකපරිවාරා ගිරග්ගසමජ්ජං අගමංසු. තත්ර නෙසං මහාජනං දිස්වා එතදහොසි – ‘‘අයං නාම එවං මහාසත්තනිකායො අප්පත්තෙ වස්සසතෙ මරණමුඛෙ පතිස්සතී’’ති. අථ උභොපි උට්ඨිතාය පරිසාය අඤ්ඤමඤ්ඤං පුච්ඡිත්වා එකජ්ඣාසයා පච්චුපට්ඨිතමරණසඤ්ඤා සම්මන්තයිංසු ‘‘සම්ම මරණෙ සති අමතෙනාපි භවිතබ්බං, හන්ද මයං අමතං පරියෙසාමා’’ති අමතපරියෙසනත්ථං සඤ්චයස්ස ඡන්නපරිබ්බාජකස්ස සන්තිකෙ සපරිසා පබ්බජිත්වා කතිපාහෙනෙව තස්ස ඤාණවිසයෙ පාරං ගන්ත්වා අමතං අපස්සන්තා පුච්ඡිංසු ‘‘කිං නු ඛො, ආචරිය, අඤ්ඤොපෙත්ථ සාරො අත්ථී’’ති? ‘‘නත්ථාවුසො, එත්තකමෙව ඉද’’න්ති ච සුත්වා ‘‘තුච්ඡං ඉදං ආවුසො නිස්සාරං, යො දානි අම්හෙසු පඨමං අමතං අධිගච්ඡති, සො ඉතරස්ස ආරොචෙතූ’’ති කතිකං අකංසු. තෙන වුත්තං – ‘‘තෙහි කතිකා කතා හොතී’’තිආදි. ६०. 'सारिपुत्तमोग्गल्लाना' का अर्थ है सारिपुत्र और मोग्गल्लान। उन्होंने यह प्रतिज्ञा की थी कि 'जो पहले अमृत (निर्वाण) को प्राप्त करेगा, वह दूसरे को सूचित करेगा'। वे दोनों गृहस्थ जीवन में उपतिस्स और कोलित के नाम से जाने जाते थे। ढाई सौ माणवकों (शिष्यों) के साथ वे 'गिरग्गसमज्ज' (पर्वत-उत्सव) में गए। वहाँ विशाल जनसमूह को देखकर उन्हें यह विचार आया— 'यह इतना बड़ा प्राणी-समूह सौ वर्ष बीतने से पहले ही मृत्यु के मुख में समा जाएगा'। तब, सभा के समाप्त होने पर, एक-दूसरे से पूछकर और समान विचार वाले होकर, मृत्यु की संज्ञा उपस्थित होने पर उन्होंने मंत्रणा की— 'हे मित्र, यदि मृत्यु है, तो अमृत भी होना चाहिए; आओ, हम अमृत की खोज करें'। अमृत की खोज के लिए वे अपने अनुयायियों के साथ संजय नामक परिव्राजक के पास प्रव्रजित हुए। कुछ ही दिनों में उसके ज्ञान की सीमा तक पहुँचकर और अमृत को न पाकर उन्होंने पूछा— 'हे आचार्य, क्या इसमें कोई और सार है?' 'नहीं आयुष्मान, यह इतना ही है'—यह सुनकर उन्होंने विचार किया— 'हे आयुष्मान, यह (शिक्षा) रिक्त और निस्सार है। अब हममें से जो पहले अमृत को प्राप्त करेगा, वह दूसरे को सूचित करेगा'—ऐसी उन्होंने प्रतिज्ञा की। इसीलिए कहा गया है— 'तेहि कतिका कता होती' आदि। පාසාදිකෙන අභික්කන්තෙනාතිආදීසු ඉත්ථම්භූතලක්ඛණෙ කරණවචනං වෙදිතබ්බං. අත්ථිකෙහි උපඤ්ඤාතං මග්ගන්ති එතං අනුබන්ධනස්ස කාරණවචනං; ඉදඤ්හි වුත්තං හොති – ‘‘යංනූනාහං ඉමං භික්ඛුං පිට්ඨිතො පිට්ඨිතො අනුබන්ධෙය්යං, කස්මා[Pg.256]? යස්මා ඉදං පිට්ඨිතො පිට්ඨිතො අනුබන්ධනං නාම අත්ථිකෙහි උපඤ්ඤාතං මග්ගං ඤාතො චෙව උපගතො ච මග්ගො’’ති අත්ථො. අථ වා අත්ථිකෙහි අම්හෙහි ‘‘මරණෙ සති අමතෙනාපි භවිතබ්බ’’න්ති එවං කෙවලං අත්ථීති උපඤ්ඤාතං නිබ්බානං නාම, තං මග්ගන්තො පරියෙසන්තොති එවම්පෙත්ථ අත්ථො දට්ඨබ්බො. 'पासादिकेन अभिक्कन्तेन' आदि में 'इत्थंभूतलक्षण' के अर्थ में करण विभक्ति (तृतीया) समझनी चाहिए। 'अत्थिकेहि उपञ्ञातं मग्गं' यह पीछे चलने (अनुगमन) का कारण बताने वाला वचन है; इसका अर्थ यह है— 'क्यों न मैं इस भिक्षु के पीछे-पीछे चलूँ? क्योंकि पीछे-पीछे चलना उन लोगों द्वारा ज्ञात मार्ग है जो किसी उद्देश्य के इच्छुक हैं'। अथवा, 'अमृत' के इच्छुक हमारे जैसे लोगों द्वारा 'मृत्यु होने पर अमृत भी होना चाहिए' इस प्रकार केवल 'है' के रूप में जाना गया जो निर्वाण है, उसकी खोज करते हुए—यहाँ ऐसा अर्थ भी देखा जाना चाहिए। පිණ්ඩපාතං ආදාය පටික්කමීති සුදින්නකණ්ඩෙ වුත්තප්පකාරං අඤ්ඤතරං කුට්ටමූලං උපසඞ්කමිත්වා නිසීදි. සාරිපුත්තොපි ඛො ‘‘අකාලො ඛො තාව පඤ්හං පුච්ඡිතු’’න්ති කාලං ආගමයමානො එකමන්තං ඨත්වා වත්තපටිපත්තිපූරණත්ථං කතභත්තකිච්චස්ස ථෙරස්ස අත්තනො කමණ්ඩලුතො උදකං දත්වා ධොතහත්ථපාදෙන ථෙරෙන සද්ධිං පටිසන්ථාරං කත්වා පඤ්හං පුච්ඡි. තෙන වුත්තං – ‘‘අථ ඛො සාරිපුත්තො පරිබ්බාජකො’’තිආදි. න තාහං සක්කොමීති න තෙ අහං සක්කොමි. එත්ථ ච පටිසම්භිදාප්පත්තො ථෙරො න එත්තකං න සක්කොති. අථ ඛො ඉමස්ස ධම්මගාරවං උප්පාදෙස්සාමීති සබ්බාකාරෙන බුද්ධවිසයෙ අවිසයභාවං ගහෙත්වා එවමාහ. 'पिण्डपातं आदाय पटिक्कमी' का अर्थ है सुदिन्न-काण्ड में बताए गए प्रकार से किसी दीवार के मूल (नीचे) जाकर बैठ गए। सारिपुत्र ने भी 'अभी प्रश्न पूछने का समय नहीं है' ऐसा सोचकर समय की प्रतीक्षा की और एक ओर खड़े रहे। शिष्टाचार का पालन करने के लिए, भोजन कर चुके स्थविर को अपने कमंडलु से जल दिया और हाथ-पैर धो चुके स्थविर के साथ कुशल-क्षेम पूछकर प्रश्न किया। इसीलिए कहा गया— 'अथ खो सारिपुत्तो परिब्बाजको' आदि। 'न ताहं सक्कोमि' का अर्थ है 'मैं तुम्हें (विस्तार से) बताने में समर्थ नहीं हूँ'। यहाँ प्रतिसंभिदा प्राप्त स्थविर इतना (छोटा प्रश्न) बताने में असमर्थ हों, ऐसा नहीं है; वे समर्थ थे। किंतु 'इस (परिव्राजक) के मन में धर्म के प्रति गौरव उत्पन्न करूँ' ऐसा सोचकर, बुद्ध के विषय को सर्वथा अपना विषय न मानते हुए उन्होंने ऐसा कहा। යෙ ධම්මා හෙතුප්පභවාති හෙතුප්පභවා නාම පඤ්චක්ඛන්ධා; තෙනස්ස දුක්ඛසච්චං දස්සෙති. තෙසං හෙතුං තථාගතො ආහාති තෙසං හෙතු නාම සමුදයසච්චං; තඤ්ච තථාගතො ආහාති දස්සෙති. තෙසඤ්ච යො නිරොධොති තෙසං උභින්නම්පි සච්චානං යො අප්පවත්තිනිරොධො; තඤ්ච තථාගතො ආහාති අත්ථො. තෙනස්ස නිරොධසච්චං දස්සෙති. මග්ගසච්චං පනෙත්ථ සරූපතො අදස්සිතම්පි නයතො දස්සිතං හොති, නිරොධෙ හි වුත්තෙ තස්ස සම්පාපකො මග්ගො වුත්තොව හොති. අථ වා තෙසඤ්ච යො නිරොධොති එත්ථ තෙසං යො නිරොධො ච නිරොධුපායො චාති එවං ද්වෙපි සච්චානි දස්සිතානි හොන්තීති. ඉදානි තමෙවත්ථං පටිපාදෙන්තො ආහ – ‘‘එවංවාදී මහාසමණො’’ති. 'ये धम्मा हेतुप्पभवा' में 'हेतुप्पभवा' का अर्थ पाँच स्कंध हैं; इसके द्वारा वे उसे 'दुःख सत्य' दिखाते हैं। 'तेसं हेतुं तथागतो आहा' का अर्थ है उन (पाँच स्कंधों) का हेतु 'समुदय सत्य' है; और उसे तथागत ने कहा है—यह अर्थ दिखाते हैं। 'तेसञ्च यो निरोधो' का अर्थ है उन दोनों सत्यों (दुःख और समुदय) का जो पुनरावृत्ति-रहित निरोध है; उसे भी तथागत ने कहा है। इसके द्वारा वे उसे 'निरोध सत्य' दिखाते हैं। यहाँ 'मार्ग सत्य' का यद्यपि साक्षात् उल्लेख नहीं है, फिर भी विधि (नय) से वह दिखाया गया है, क्योंकि निरोध के कहे जाने पर उस तक पहुँचाने वाला मार्ग भी कह दिया जाता है। अथवा, 'तेसञ्च यो निरोधो' यहाँ उन दोनों का जो निरोध है और निरोध का उपाय है—इस प्रकार दोनों सत्य दिखाए गए हैं। अब उसी अर्थ को प्रतिपादित करते हुए कहा— 'एवंवादी महासमणो'। එසෙව ධම්මො යදි තාවදෙවාති සචෙපි ඉතො උත්තරි නත්ථි, එත්තකමෙව ඉදං සොතාපත්තිඵලමත්තමෙව පත්තබ්බං, තථාපි එසො එව ධම්මොති අත්ථො. පච්චබ්යත්ථ පදමසොකන්ති යං මයං පරියෙසමානා විචරාම, තං පදමසොකං පටිවිද්ධාත්ථ තුම්හෙ; පත්තං තං තුම්හෙහීති අත්ථො. අදිට්ඨං අබ්භතීතං බහුකෙහි කප්පනහුතෙහීති අම්හෙහි නාම ඉදං පදං බහුකෙහි [Pg.257] කප්පනහුතෙහි අදිට්ඨමෙව අබ්භතීතං; ඉති තස්ස පදස්ස අදිට්ඨභාවෙන දීඝරත්තං අත්තනො මහාජානිභාවං දීපෙති. 'एसेव धम्मो यदि तावदेव' का अर्थ है कि यदि इससे श्रेष्ठ और कुछ न भी हो, तो भी केवल यह स्रोतापत्ति-फल मात्र ही प्राप्त करने योग्य है, तब भी यही वह धर्म है (जिसे हम खोज रहे थे)। 'पच्चब्यत्थ पदमसोकं' का अर्थ है जिस निर्वाण की खोज में हम भटक रहे थे, उस शोक-रहित पद को आपने जान लिया है; आपने उसे प्राप्त कर लिया है। 'अदिट्ठं अब्भतीतं बहुकेहि कप्पनहुतेहि' का अर्थ है हमारे द्वारा यह पद बहुत से कल्प-नहुतों (असंख्य कल्पों) से न देखे जाने के कारण बीत गया था; इस प्रकार उस पद को न देख पाने के कारण लंबे समय तक अपनी महान हानि होने को वे प्रकट करते हैं। 62. ගම්භීරෙ ඤාණවිසයෙති ගම්භීරෙ චෙව ගම්භීරස්ස ච ඤාණස්ස විසයභූතෙ. අනුත්තරෙ උපධිසඞ්ඛයෙති නිබ්බානෙ. විමුත්තෙති තදාරම්මණාය විමුත්තියා විමුත්තෙ. බ්යාකාසීති ‘‘එතං මෙ සාවකයුගං භවිස්සති අග්ගං භද්දයුග’’න්ති වදන්තො සාවකපාරමිඤ්ඤාණෙ බ්යාකාසි. සාව තෙසං ආයස්මන්තානං උපසම්පදා අහොසීති සා එහිභික්ඛූපසම්පදායෙව තෙසං උපසම්පදා අහොසි. එවං උපසම්පන්නෙසු ච තෙසු මහාමොග්ගල්ලානත්ථෙරො සත්තහි දිවසෙහි අරහත්තෙ පතිට්ඨිතො, සාරිපුත්තත්ථෙරො අඩ්ඪමාසෙන. ६२. "गम्भीरे ज्ञानविसये" का अर्थ है—गम्भीर और गम्भीर ज्ञान का विषयभूत। "अनुत्तरे उपधिसङ्खये" का अर्थ है—निर्वाण में। "विमुत्ते" का अर्थ है—उस (निर्वाण) को आलम्बन बनाने वाली विमुक्ति (स्रोतापत्ति-फल-समापत्ति) के द्वारा विमुक्त। "ब्याकासी" का अर्थ है—"यह मेरा अग्र श्रावक-युगल, श्रेष्ठ युगल होगा"—ऐसा कहते हुए श्रावक-पारमी-ज्ञान के विषय में भविष्यवाणी की। "साव तेसं... उपसम्पदा अहोसि" का अर्थ है—वही 'एहि भिक्खु' उपसम्पदा ही उन आयुष्मानों की उपसम्पदा हुई। इस प्रकार उपसम्पन्न होने पर, उनमें से महामौद्गल्यायन स्थविर सात दिनों में अर्हत् पद पर प्रतिष्ठित हुए और सारिपुत्र स्थविर आधे महीने (पन्द्रह दिन) में। අතීතෙ කිර අනොමදස්සී නාම බුද්ධො ලොකෙ උදපාදි. තස්ස සරදො නාම තාපසො සකෙ අස්සමෙ නානාපුප්ඵෙහි මණ්ඩපං කත්වා පුප්ඵාසනෙයෙව භගවන්තං නිසීදාපෙත්වා භික්ඛුසඞ්ඝස්සාපි තථෙව මණ්ඩපං කත්වා පුප්ඵාසනානි පඤ්ඤපෙත්වා අග්ගසාවකභාවං පත්ථෙසි. පත්ථයිත්වා ච සිරීවඩ්ඪස්ස නාම සෙට්ඨිනො පෙසෙසි ‘‘මයා අග්ගසාවකට්ඨානං පත්ථිතං, ත්වම්පි ආගන්ත්වා එකං ඨානං පත්ථෙහී’’ති. සෙට්ඨි නීලුප්පලමණ්ඩපං කත්වා බුද්ධප්පමුඛං භික්ඛුසඞ්ඝං, තත්ථ භොජෙත්වා දුතියසාවකභාවං පත්ථෙසි. තෙසු සරදතාපසො සාරිපුත්තත්ථෙරො ජාතො, සිරීවඩ්ඪො මහාමොග්ගල්ලානත්ථෙරොති ඉදං නෙසං පුබ්බකම්මං. कहा जाता है कि अतीत में अनोमदस्सी नामक बुद्ध लोक में उत्पन्न हुए। उनके समय में, शरद नामक एक तापस ने अपने आश्रम में विभिन्न प्रकार के पुष्पों से मण्डप बनाकर, भगवान को पुष्प-आसन पर ही बिठाया और भिक्षु-संघ के लिए भी उसी प्रकार मण्डप बनाकर पुष्प-आसन बिछाए और अग्र-श्रावक पद की प्रार्थना की। प्रार्थना करने के बाद उन्होंने श्रीवर्द्धन नामक श्रेष्ठी के पास संदेश भेजा—"मैंने अग्र-श्रावक पद की प्रार्थना की है, तुम भी आकर एक पद की प्रार्थना करो।" श्रेष्ठी ने नील-कमल का मण्डप बनाकर बुद्ध-प्रमुख भिक्षु-संघ को वहाँ भोजन कराया और द्वितीय-श्रावक पद की प्रार्थना की। उनमें से शरद तापस सारिपुत्र स्थविर हुए और श्रीवर्द्धन महामौद्गल्यायन स्थविर हुए—यह उनका पूर्व-कर्म है। 63. අපුත්තකතායාතිආදීසු යෙසං පුත්තා පබ්බජන්ති, තෙසං අපුත්තකතාය. යාසං පතී පබ්බජන්ති, තාසං වෙධබ්යාය විධවාභාවාය. උභයෙනාපි කුලුපච්ඡෙදාය. සඤ්චයානීති සඤ්චයස්ස අන්තෙවාසිකානි. මගධානං ගිරිබ්බජන්ති මගධානං ජනපදස්ස ගිරිබ්බජං නගරං. මහාවීරාති මහාවීරියවන්තො. නයමානානන්ති නයමානෙසු. භුම්මත්ථෙ සාමිවචනං, උපයොගත්ථෙ වා. කා උසූයා විජානතන්ති ධම්මෙන නයන්තීති එවං විජානන්තානං කා ඉස්සා. ६३. "अपुत्तकताय" आदि पदों में—जिनके पुत्र प्रव्रजित होते हैं, उनके लिए पुत्रहीनता के लिए। जिनकी पत्नियाँ (पति) प्रव्रजित होते हैं, उनके लिए वैधव्य (विधवा-भाव) के लिए। दोनों ही कारणों से कुल के उच्छेद के लिए। "सञ्जयानि" का अर्थ है—सञ्जय के अन्तेवासी (शिष्य)। "मगधानं गिरिव्वजं" का अर्थ है—मगध जनपद के गिरिव्रज नगर (राजगृह) को। "महावीरा" का अर्थ है—महावीर्यवान्। "नयमानानं" का अर्थ है—ले जाते हुओं में (यहाँ षष्ठी विभक्ति सप्तमी या द्वितीया के अर्थ में है)। "का असूया विजानतं" का अर्थ है—"वे धर्मपूर्वक ले जा रहे हैं"—ऐसा जानने वालों के मन में कैसी ईर्ष्या (डाह) हो सकती है? සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානපබ්බජ්ජාකථා නිට්ඨිතා. सारिपुत्र और मौद्गल्यायन की प्रव्रज्या की कथा समाप्त हुई। උපජ්ඣායවත්තකථා उपाध्याय-वृत्त कथा 64-5. අනුපජ්ඣායකාති වජ්ජාවජ්ජං උපනිජ්ඣායකෙන ගරුනා විරහිතා. අනාකප්පසම්පන්නාති න ආකප්පෙන සම්පන්නා; සමණසාරුප්පාචාරවිරහිතාති අත්ථො[Pg.258]. උපරිභොජනෙති භොජනස්ස උපරි. උත්තිට්ඨපත්තන්ති පිණ්ඩාය චරණකපත්තං. තස්මිඤ්හි මනුස්සා උච්ඡිට්ඨසඤ්ඤිනො, තස්මා උත්තිට්ඨපත්තන්ති වුත්තං. අථ වා උට්ඨහිත්වා පත්තං උපනාමෙන්තීති එවම්පෙත්ථ අත්ථො දට්ඨබ්බො. අනුජානාමි භික්ඛවෙ උපජ්ඣායන්ති උපජ්ඣායං ගහෙතුං අනුජානාමීති අත්ථො. පුත්තචිත්තං උපට්ඨපෙස්සතීති පුත්තො මෙ අයන්ති එවං ගෙහස්සිතපෙමවසෙන චිත්තං උපට්ඨපෙස්සති. එස නයො දුතියපදෙපි. සගාරවා සප්පතිස්සාති ගරුභාවඤ්චෙව ජෙට්ඨකභාවඤ්ච උපට්ඨපෙත්වා. සභාගවුත්තිනොති සභාගජීවිකා. සාහූති වාතිආදීනි පඤ්ච පදානි උපජ්ඣායභාවසම්පටිච්ඡනවෙවචනානි. කායෙන විඤ්ඤාපෙතීති එවං සද්ධිවිහාරිකෙන ‘‘උපජ්ඣායො මෙ භන්තෙ හොහී’’ති තික්ඛත්තුං වුත්තෙ සචෙ උපජ්ඣායො ‘‘සාහූ’’තිආදීසු පඤ්චසු පදෙසු යස්ස කස්සචි පදස්ස වසෙන කායෙන වා වාචාය වා කායවාචාහි වා ‘‘ගහිතො තයා උපජ්ඣායො’’ති උපජ්ඣායග්ගහණං විඤ්ඤාපෙති, ගහිතො හොති උපජ්ඣායො. ඉදමෙව හි එත්ථ උපජ්ඣායග්ගහණං, යදිදං උපජ්ඣායස්ස ඉමෙසු පඤ්චසු පදෙසු යස්ස කස්සචි පදස්ස වාචාය වා සාවනං කායෙන වා අත්ථවිඤ්ඤාපනන්ති. කෙචි පන සාධූති සම්පටිච්ඡනං සන්ධාය වදන්ති. න තං පමාණං, ආයාචනදානමත්තෙන හි ගහිතො හොති උපජ්ඣායො, න එත්ථ සම්පටිච්ඡනං අඞ්ගං. සද්ධිවිහාරිකෙනාපි න කෙවලං ඉමිනා මෙ පදෙන උපජ්ඣායො ගහිතොති ඤාතුං වට්ටති. ‘‘අජ්ජතග්ගෙ දානි ථෙරො මය්හං භාරො, අහම්පි ථෙරස්ස භාරො’’ති ඉදම්පි ඤාතුං වට්ටති. ६४-५. "अनुपज्झायका" का अर्थ है—छोटे-बड़े दोषों को ध्यान से देखने वाले गुरु से रहित। "अनाकप्पसम्पन्ना" का अर्थ है—आकल्प (चाल-ढाल आदि) से सम्पन्न न होना; अर्थात् श्रमणों के योग्य आचरण से रहित। "उपरिभोजने" का अर्थ है—भोजन के ऊपर। "उत्तिट्ठपत्तं" का अर्थ है—पिण्डपात के लिए भ्रमण करने वाला पात्र। क्योंकि उसमें लोग जूठन (उच्छिष्ट) होने की शंका करते हैं, इसलिए उसे "उत्तिट्ठपत्त" कहा गया है। अथवा, खड़े होकर पात्र को सामने झुकाते हैं—इस प्रकार भी यहाँ अर्थ देखना चाहिए। "अनुजानामि भिक्खवे उपज्झायं" का अर्थ है—उपाध्याय ग्रहण करने की अनुमति देता हूँ। "पुत्तचित्तं उपट्ठपेस्सति" का अर्थ है—"यह मेरा पुत्र है"—इस प्रकार गृहस्थ-प्रेम के वश में होकर चित्त को स्थापित करेगा। यही नियम दूसरे पद (पितुचित्तं) में भी है। "सगारवा सप्पतिस्सा" का अर्थ है—गुरु-भाव और ज्येष्ठ-भाव को स्थापित करके। "सभागवुत्तिनो" का अर्थ है—समान आजीविका वाले। "साहू" आदि पाँच पद उपाध्याय-भाव को स्वीकार करने के पर्यायवाची शब्द हैं। "कायेन विञ्ञापेति" का अर्थ है—इस प्रकार सार्धविहारिक (शिष्य) द्वारा "भन्ते! आप मेरे उपाध्याय बनें" ऐसा तीन बार कहे जाने पर, यदि उपाध्याय "साहू" आदि पाँच पदों में से किसी भी पद के द्वारा, काया से या वाणी से या काया-वाणी दोनों से "तुमने उपाध्याय ग्रहण कर लिया है"—ऐसा सूचित करता है, तो उपाध्याय ग्रहण कर लिया गया होता है। यहाँ उपाध्याय-ग्रहण यही है—जो उपाध्याय द्वारा इन पाँच पदों में से किसी भी पद का वाणी से उच्चारण करना या काया से अर्थ सूचित करना है। कुछ आचार्य "साधु" कहकर (शिष्य द्वारा) पुनः स्वीकार करने के सन्दर्भ में कहते हैं। वह प्रमाण नहीं है, क्योंकि केवल याचना और दान मात्र से ही उपाध्याय ग्रहण हो जाता है, यहाँ (शिष्य का) पुनः स्वीकार करना अंग नहीं है। सार्धविहारिक को भी केवल इतना ही नहीं जानना चाहिए कि "इस पद से मैंने उपाध्याय ग्रहण कर लिया है", बल्कि "आज से यह स्थविर मेरा उत्तरदायित्व हैं और मैं भी स्थविर का उत्तरदायित्व हूँ"—यह भी जानना चाहिए। 66. තත්රායං සම්මාවත්තනාති යං වුත්තං සම්මා වත්තිතබ්බන්ති, තත්ර අයං සම්මාවත්තනා. කාලස්සෙව උට්ඨාය උපාහනා ඔමුඤ්චිත්වාති සචස්ස පච්චූසකාලෙ චඞ්කමනත්ථාය වා ධොතපාදපරිහරණත්ථාය වා පටිමුක්කා උපාහනා පාදගතා හොන්ති, තා කාලස්සෙව උට්ඨාය අපනෙත්වා. දන්තකට්ඨං දාතබ්බන්ති මහන්තං මජ්ඣිමං ඛුද්දකන්ති තීණි දන්තකට්ඨානි උපනෙත්වා තතො යං තීණි දිවසානි ගණ්හාති, චතුත්ථදිවසතො පට්ඨාය තාදිසමෙව දාතබ්බං. සචෙ අනියමං කත්වා යං වා තං වා ගණ්හාති, අථ යාදිසං ලභති තාදිසං දාතබ්බං. ६६. ६६. "तत्रायं सम्मावत्तना" का अर्थ है—जो कहा गया है कि "सम्यक् वर्तना (आचरण) चाहिए", उस विषय में यह सम्यक् आचरण है। "कालस्सेव उट्ठाय उपाहना ओमुञ्चित्वा" का अर्थ है—यदि उसके (सार्धविहारिक के) प्रत्युष काल (भोर) में चंक्रमण के लिए या धोए हुए पैरों की रक्षा के लिए पहनी हुई खड़ाऊँ पैरों में हों, तो उन्हें सुबह जल्दी उठकर उतारकर। "दन्तकट्ठं दातब्बं" का अर्थ है—बड़ी, मध्यम और छोटी—इन तीन प्रकार की दातूनों को पास लाकर, उनमें से जिसे वह तीन दिनों तक लेता है, चौथे दिन से वैसा ही (दातून) देना चाहिए। यदि वह बिना किसी नियम के जो भी मिले उसे ले लेता है, तो जैसा प्राप्त हो वैसा ही देना चाहिए। මුඛොදකං දාතබ්බන්ති සීතඤ්ච උණ්හඤ්ච උදකං උපනෙත්වා තතො යං තීණි දිවසානි වළඤ්ජෙති, චතුත්ථදිවසතො පට්ඨාය තාදිසමෙව මුඛධොවනොදකං [Pg.259] දාතබ්බං. සචෙ අනියමං කත්වා යං වා තං වා ගණ්හාති, අථ යාදිසං ලභති තාදිසං දාතබ්බං. සචෙ දුවිධම්පි වළඤ්ජෙති, දුවිධම්පි උපනෙතබ්බං. උදකං මුඛධොවනට්ඨානෙ ඨපෙත්වා වච්චකුටිතො පට්ඨාය සම්මජ්ජිතබ්බං. ථෙරෙ වච්චකුටිං ගතෙ පරිවෙණං සම්මජ්ජිතබ්බං; එවං පරිවෙණං අසුඤ්ඤං හොති. ථෙරෙ වච්චකුටිතො අනික්ඛන්තෙයෙව ආසනං පඤ්ඤපෙතබ්බං. සරීරකිච්චං කත්වා ආගන්ත්වා තස්මිං නිසින්නස්ස ‘‘සචෙ යාගු හොතී’’තිආදිනා නයෙන වුත්තවත්තං කාතබ්බං. උක්ලාපොති කෙනචි කචවරෙන සඞ්කිණ්ණො, සචෙ පන අඤ්ඤො කචවරො නත්ථි, උදකඵුසිතානෙව හොන්ති, හත්ථෙනපි පමජ්ජිතබ්බො. "मुखोदकं दातब्बं" का अर्थ है कि शीतल और उष्ण जल लाकर, उनमें से जिस जल का वह तीन दिनों तक उपयोग करता है, चौथे दिन से वैसा ही मुख धोने का जल देना चाहिए। यदि बिना किसी नियम के जो भी मिले उसे वह ग्रहण करता है, तो जैसा प्राप्त हो वैसा ही देना चाहिए। यदि वह दोनों प्रकार के जल का उपयोग करता है, तो दोनों ही लाने चाहिए। मुख धोने के स्थान पर जल रखकर शौचालय (वच्चकुटि) से लेकर झाड़ू लगानी चाहिए। जब स्थविर शौचालय जाएँ, तब आँगन (परिवेण) में झाड़ू लगानी चाहिए; इस प्रकार आँगन असुरक्षित नहीं रहता। स्थविर के शौचालय से निकलने से पहले ही आसन बिछा देना चाहिए। शारीरिक कृत्य (शौच आदि) करके आने पर वहाँ बैठे हुए उनके लिए "यदि यवागू (कांजी) हो" आदि विधि से बताए गए कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। "उक्लापो" का अर्थ है किसी कूड़े-करकट से युक्त; यदि अन्य कोई कूड़ा न हो और केवल जल की बूँदें हों, तो हाथ से भी पोंछ देना चाहिए। සගුණං කත්වාති ද්වෙ චීවරානි එකතො කත්වා, තා එකතො කතා ද්වෙපි සඞ්ඝාටියො දාතබ්බා. සබ්බඤ්හි චීවරං සඞ්ඝටිතත්තා ‘‘සඞ්ඝාටී’’ති වුච්චති. තෙන වුත්තං – ‘‘සඞ්ඝාටියො දාතබ්බා’’ති. නාතිදූරෙ ගන්තබ්බං නාච්චාසන්නෙති එත්ථ සචෙ උපජ්ඣායං නිවත්තිත්වා ඔලොකෙන්තං එකෙන වා ද්වීහි වා පදවීතිහාරෙහි සම්පාපුණාති, එත්තාවතා නාතිදූරෙ නාච්චාසන්නෙ ගතො හොතීති වෙදිතබ්බං. පත්තපරියාපන්නං පටිග්ගහෙතබ්බන්ති සචෙ උපජ්ඣායෙන භික්ඛාචාරෙ යාගුයා වා භත්තෙ වා ලද්ධෙ පත්තො උණ්හො වා භාරිකො වා හොති, අත්තනො පත්තං තස්ස දත්වා සො පත්තො ගහෙතබ්බොති අත්ථො. න උපජ්ඣායස්ස භණමානස්ස අන්තරන්තරා කථා ඔපාතෙතබ්බාති අන්තරඝරෙ වා අඤ්ඤත්ර වා භණමානස්ස අනිට්ඨිතෙ තස්ස වචනෙ අඤ්ඤා කථා න සමුට්ඨාපෙතබ්බා. ඉතො පට්ඨාය ච පන යත්ථ යත්ථ නකාරෙන පටිසෙධො කරියති, සබ්බත්ථ දුක්කටාපත්ති වෙදිතබ්බා. අයඤ්හි ඛන්ධකධම්මතා. ආපත්තිසාමන්තා භණමානොති පදසොධම්මදුට්ඨුල්ලාදිවසෙන ආපත්තියා ආසන්නවාචං භණමානො. නිවාරෙතබ්බොති ‘‘කිං භන්තෙ ඊදිසං නාම වත්තුං වට්ටති, ආපත්ති න හොතී’’ති එවං පුච්ඡන්තෙන විය වාරෙතබ්බො. වාරෙස්සාමීති පන කත්වා ‘‘මහල්ලක, මා එවං භණා’’ති න වත්තබ්බො. "सगुणं कत्वा" का अर्थ है दो चीवरों को एक साथ करके; उन एक साथ किए गए दोनों संघातियों (संघाटी) को देना चाहिए। क्योंकि सभी चीवर सिले हुए होने के कारण "संघाटी" कहलाते हैं। इसीलिए कहा गया है - "संघातियों को देना चाहिए"। "न अतिदूरे गन्तब्बं न अच्चासन्ने" (न बहुत दूर जाना चाहिए न बहुत पास) यहाँ यदि वह मुड़कर देखते हुए उपाध्याय के पास एक या दो कदमों में पहुँच जाता है, तो इतने से ही वह न बहुत दूर और न बहुत पास गया है, ऐसा समझना चाहिए। "पत्तपरियापन्नं पटिग्गहेतब्बं" का अर्थ है कि यदि भिक्षाटन के समय उपाध्याय द्वारा यवागू या भात प्राप्त करने पर पात्र गर्म या भारी हो जाए, तो अपना पात्र उन्हें देकर उनका पात्र ले लेना चाहिए। "न उपज्झायस्स भणमानस्स अन्तरन्तरा कथा ओपातेतब्बा" का अर्थ है कि गाँव के भीतर या अन्यत्र बोलते हुए उपाध्याय की बात पूरी होने से पहले दूसरी बात शुरू नहीं करनी चाहिए। यहाँ से लेकर जहाँ-जहाँ 'न' शब्द से निषेध किया गया है, वहाँ-वहाँ 'दुक्कट' आपत्ति समझनी चाहिए। यह खन्धकों की धर्मता (नियम) है। "आपत्तिसामन्ता भणमानो" का अर्थ है पदसोधम्म, दुट्ठुल्ला आदि के वश से आपत्ति के निकट की वाणी बोलने वाला। "निवारेतब्बो" का अर्थ है कि "भन्ते! क्या ऐसा कहना उचित है? क्या इससे आपत्ति नहीं होगी?" इस प्रकार पूछते हुए के समान उन्हें रोकना चाहिए। "मैं रोकूँगा" ऐसा मानकर "ओ बूढ़े! ऐसा मत बोलो" ऐसा नहीं कहना चाहिए। පඨමතරං ආගන්ත්වාති සචෙ ආසන්නෙ ගාමො හොති, විහාරෙ වා ගිලානො භික්ඛු හොති, ගාමතො පඨමතරං ආගන්තබ්බං. සචෙ දූරෙ ගාමො හොති, උපජ්ඣායෙන සද්ධිං ආගච්ඡන්තො නත්ථි, තෙනෙව සද්ධිං ගාමතො නික්ඛමිත්වා චීවරෙන පත්තං වෙඨෙත්වා අන්තරාමග්ගතො පඨමතරං ආගන්තබ්බං[Pg.260]. එවං නිවත්තන්තෙන පඨමතරං ආගන්ත්වා ආසනපඤ්ඤාපනාදි සබ්බං කිච්චං කාතබ්බං. සින්නං හොතීති තින්තං සෙදග්ගහිතං. චතුරඞ්ගුලං කණ්ණං උස්සාරෙත්වාති කණ්ණං චතුරඞ්ගුලප්පමාණං අතිරෙකං කත්වා එවං චීවරං සංහරිතබ්බං. කිං කාරණා? මා මජ්ඣෙ භඞ්ගො අහොසීති. සමං කත්වා සංහරිතස්ස හි මජ්ඣෙ භඞ්ගො හොති, තතො නිච්චං භිජ්ජමානං දුබ්බලං හොති තං නිවාරණත්ථමෙතං වුත්තං. තස්මා යථා අජ්ජ භඞ්ගට්ඨානෙයෙව ස්වෙ න භිජ්ජති, තථා දිවසෙ දිවසෙ චතුරඞ්ගුලං උස්සාරෙත්වා සංහරිතබ්බං. ඔභොගෙ කායබන්ධනං කාතබ්බන්ති කායබන්ධනං සංහරිත්වා චීවරභොගෙ පක්ඛිපිත්වා ඨපෙතබ්බං. "पठमतरं आगन्त्वा" का अर्थ है कि यदि गाँव पास में हो, या विहार में कोई बीमार भिक्षु हो, तो गाँव से पहले ही आ जाना चाहिए। यदि गाँव दूर हो और उपाध्याय के साथ आने वाला कोई दूसरा न हो, तो उन्हीं के साथ गाँव से निकलकर, चीवर से पात्र को लपेटकर रास्ते के बीच से पहले ही आ जाना चाहिए। इस प्रकार लौटकर पहले आकर आसन बिछाने आदि सभी कार्य करने चाहिए। "सिन्नं होति" का अर्थ है पसीने से भीगा हुआ। "चतुरङ्गुलं कण्णं उस्सारेत्वा" का अर्थ है चीवर के कोने को चार अंगुल अधिक बढ़ाकर चीवर को तह करना चाहिए। किस कारण से? ताकि बीच में मोड़ (निशान) न पड़े। यदि बराबर करके तह किया जाए तो बीच में मोड़ पड़ जाता है, जिससे वह हमेशा वहाँ से टूटकर कमजोर हो जाता है; उसे रोकने के लिए यह कहा गया है। इसलिए, जिस प्रकार आज के मोड़ वाले स्थान पर ही कल न मुड़े, उसी प्रकार प्रतिदिन चार अंगुल बढ़ाकर तह करना चाहिए। "ओभोगे कायबन्धनं कातब्बं" का अर्थ है कायबन्धन (कमरबंद) को लपेटकर चीवर की तह के भीतर रखकर छोड़ देना चाहिए। සචෙ පිණ්ඩපාතො හොතීති එත්ථ යො ගාමෙයෙව වා අන්තරඝරෙ වා පටික්කමනෙ වා භුඤ්ජිත්වා ආගච්ඡති, පිණ්ඩං වා න ලභති, තස්ස පිණ්ඩපාතො න හොති, ගාමෙ අභුත්තස්ස පන ලද්ධභික්ඛස්ස වා හොති; තස්මා ‘‘සචෙ පිණ්ඩපාතො හොතී’’තිආදි වුත්තං. සචෙපි තස්ස න හොති, භුඤ්ජිතුකාමො ච හොති, උදකං දත්වා අත්තනා ලද්ධතොපි පිණ්ඩපාතො උපනෙතබ්බො. පානීයෙන පුච්ඡිතබ්බොති භුඤ්ජමානො තික්ඛත්තුං ‘‘පානීයං භන්තෙ ආහරියතූ’’ති පානීයෙන පුච්ඡිතබ්බො. සචෙ කාලො අත්ථි, උපජ්ඣායෙ භුත්තෙ සයං භුඤ්ජිතබ්බං. සචෙ උපකට්ඨො කාලො, පානීයං උපජ්ඣායස්ස සන්තිකෙ ඨපෙත්වා සයම්පි භුඤ්ජිතබ්බං. "सचे पिण्डपातो होति" यहाँ जो गाँव में या घर में या भोजनशाला में खाकर आता है, या जिसे भिक्षा ही नहीं मिलती, उसके लिए 'पिण्डपात' (भोजन अर्पण) नहीं होता; किन्तु गाँव में न खाने वाले या भिक्षा प्राप्त करने वाले के लिए होता है; इसीलिए "यदि पिण्डपात हो" आदि कहा गया है। यदि उनके पास न भी हो और वे खाने के इच्छुक हों, तो जल देकर स्वयं को प्राप्त भिक्षा से भी पिण्डपात अर्पित करना चाहिए। "पानीयोन पुच्छितब्बो" का अर्थ है कि भोजन करते समय तीन बार "भन्ते! क्या पीने का पानी लाया जाए?" इस प्रकार पानी के लिए पूछना चाहिए। यदि समय हो, तो उपाध्याय के भोजन कर लेने के बाद स्वयं भोजन करना चाहिए। यदि समय (दोपहर का) निकट हो, तो उपाध्याय के पास पानी रखकर स्वयं भी भोजन कर लेना चाहिए। අනන්තරහිතායාති තට්ටිකධම්මඛණ්ඩාදීසු යෙන කෙනචි අනත්ථතාය පංසුසක්ඛරමිස්සාය භූමියා පත්ථො න ඨපෙතබ්බොති අත්ථො. සචෙ පන කාළවණ්ණකතා වා සුධාබද්ධා වා හොති නිරජමත්තිකා, තථාරූපාය භූමියා ඨපෙතුං වට්ටති. ධොතවාලිකායපි ඨපෙතුං වට්ටති. පංසුරජසක්ඛරාදීසු න වට්ටති. තත්ර පන පණ්ණං වා ආධාරකං වා ඨපෙත්වා තත්ර නික්ඛිපිතබ්බො. පාරතො අන්තං ඔරතො භොගන්ති ඉදං චීවරවංසාදීනං හෙට්ඨා හත්ථං පවෙසෙත්වා අභිමුඛෙන හත්ථෙන සණිකං නික්ඛිපනත්ථං වුත්තං. අන්තෙ පන ගහෙත්වා භොගෙන චීවරවංසාදීනං උපරි නික්ඛිපන්තස්ස භිත්තියං භොගො පටිහඤ්ඤති, තස්මා තථා න කාතබ්බං. "अनन्तरहिताय" का अर्थ है कि चटाई, चमड़े के टुकड़े आदि किसी भी बिछावन के बिना धूल और कंकड़ मिश्रित भूमि पर पात्र नहीं रखना चाहिए। यदि भूमि काली की हुई हो या चूने से पुती हुई हो और धूल रहित हो, तो वैसी भूमि पर रखना उचित है। धुली हुई बालू पर भी रखना उचित है। धूल, मिट्टी, कंकड़ आदि पर रखना उचित नहीं है। वहाँ पत्ता या पात्र-स्टैंड (आधारक) रखकर उस पर पात्र रखना चाहिए। "पारतो अन्तं ओरतो भोगं" यह चीवर टाँगने के डंडे आदि के नीचे हाथ डालकर अपनी ओर मुख किए हुए हाथ से धीरे से रखने के लिए कहा गया है। यदि कोनों को पकड़कर तह को चीवर-डंडे के ऊपर फेंका जाए तो वह दीवार से टकराती है, इसलिए वैसा नहीं करना चाहिए। චුණ්ණං සන්නෙතබ්බන්ති න්හානචුණ්ණං උදකෙන තෙමෙත්වා පිණ්ඩි කාතබ්බා. එකමන්තං නික්ඛිපිතබ්බන්ති එකස්මිං නිද්ධූමෙ ඨානෙ ඨපෙතබ්බං. ජන්තාඝරෙ පරිකම්මං නාම [Pg.261] අඞ්ගාරමත්තිකඋණ්හොදකදානාදිකං සබ්බං කිච්චං. උදකෙපි පරිකම්මන්ති අඞ්ගපච්චඞ්ගඝංසනාදිකං සබ්බං කිච්චං. පානීයෙන පුච්ඡිතබ්බොති ජන්තාඝරෙ උණ්හසන්තාපෙන පිපාසා හොති, තස්මා පුච්ඡිතබ්බො. "चूर्ण सानना चाहिए" का अर्थ है स्नान-चूर्ण को जल से भिगोकर पिण्ड (गोला) बनाना चाहिए। "एक ओर रख देना चाहिए" का अर्थ है एक धुआँ-रहित स्थान पर रखना चाहिए। जन्ताघर (स्नानागार) में 'परिकर्म' का अर्थ है अंगार, मिट्टी, गर्म जल देना आदि सभी कार्य। जल में भी 'परिकर्म' का अर्थ है अंगों और प्रत्यंगों को मलना आदि सभी कार्य। "पानी के लिए पूछना चाहिए" का अर्थ है कि जन्ताघर में गर्मी के कारण प्यास लगती है, इसलिए पूछना चाहिए। සචෙ උස්සහතීති සචෙ පහොති; න කෙනචි ගෙලඤ්ඤෙන අභිභූතො හොති; අගිලානෙන හි සද්ධිවිහාරිකෙන සට්ඨිවස්සෙනාපි සබ්බං උපජ්ඣායවත්තං කාතබ්බං, අනාදරෙන අකරොන්තස්ස වත්තභෙදෙ දුක්කටං. නකාරපටිසංයුත්තෙසු පන පදෙසු ගිලානස්සාපි පටික්ඛිත්තකිරියං කරොන්තස්ස දුක්කටමෙව. අප්පටිඝංසන්තෙනාති භූමියං අප්පටිඝංසන්තෙන. කවාටපිට්ඨන්ති කවාටඤ්ච පිට්ඨසඞ්ඝාතඤ්ච අච්ඡුපන්තෙන. සන්තානකන්ති යංකිඤ්චි කීටකුලාවකමක්කටකසුත්තාදි. උල්ලොකා පඨමං ඔහාරෙතබ්බන්ති උල්ලොකතො පඨමං උල්ලොකං ආදිංකත්වා අවහරිතබ්බන්ති අත්ථො. ආලොකසන්ධිකණ්ණභාගාති ආලොකසන්ධිභාගා ච කණ්ණභාගා ච අන්තරබාහිරවාතපානකවාටකානි ච ගබ්භස්ස ච චත්තාරො කොණා පමජ්ජිතබ්බාති අත්ථො. "यदि समर्थ हो" का अर्थ है यदि वह सक्षम हो; किसी बीमारी से अभिभूत न हो। अस्वस्थ न होने पर सार्धविहारिक को, चाहे वह साठ वर्ष (दीक्षा) का ही क्यों न हो, उपाध्याय के प्रति सभी कर्तव्यों का पालन करना चाहिए; अनादरवश न करने पर कर्तव्य-भंग के कारण दुष्कृत (दुक्कट) अपराध होता है। 'न' अक्षर से युक्त पदों में, बीमार व्यक्ति के लिए भी निषिद्ध क्रिया करने पर दुष्कृत ही होता है। "बिना रगड़े" का अर्थ है भूमि पर बिना रगड़े। "कवाट-पृष्ठ" का अर्थ है किवाड़ और चौखट को बिना छुए। "सन्तानक" का अर्थ है कीड़ों के घोंसले, मकड़ी के जाले आदि। "छत से पहले उतारना चाहिए" का अर्थ है छत से शुरू करके ऊपर से नीचे की ओर हटाना चाहिए। "आलोक-सन्धि और कोण-भाग" का अर्थ है कि प्रकाश के झरोखे, कोने, भीतर और बाहर के खिड़की-कपाट और कमरे के चारों कोनों को पोंछना चाहिए। යථාපඤ්ඤත්තං පඤ්ඤපෙතබ්බන්ති යථා පඨමං පඤ්ඤත්තං අහොසි, තථෙව පඤ්ඤපෙතබ්බං. එතදත්ථමෙව හි යථාපඤ්ඤත්තං සල්ලක්ඛෙත්වා නීහරිත්වා එකමන්තං නික්ඛිපිතබ්බන්ති පුරිමවත්තං පඤ්ඤත්තං. සචෙ පන පඨමං අජානන්තෙන කෙනචි පඤ්ඤත්තං අහොසි, සමන්තතො භිත්තිං ද්වඞ්ගුලමත්තෙන වා තිවඞ්ගුලමත්තෙන වා මොචෙත්වා පඤ්ඤපෙතබ්බං. ඉදඤ්හි පඤ්ඤාපනවත්තං. සචෙ කටසාරකො හොති අතිමහන්තො ච, ඡින්දිත්වා කොටිං නිවත්තෙත්වා බන්ධිත්වා පඤ්ඤපෙතබ්බො. සචෙ කොටිං නිවත්තෙත්වා බන්ධිතුං න ජානාති, න ඡින්දිතබ්බො. පුරත්ථිමා වාතපානා ථකෙතබ්බාති පුරත්ථිමාය වාතපානා ථකෙතබ්බා. එවං සෙසාපි වාතපානා ථකෙතබ්බා. "जैसे बिछाया गया था, वैसे ही बिछाना चाहिए" का अर्थ है जैसे पहले बिछाया गया था, वैसे ही बिछाना चाहिए। इसी प्रयोजन के लिए पिछला कर्तव्य बताया गया था कि "जैसे बिछाया गया है उसे ध्यान में रखकर, बाहर निकालकर एक ओर रख देना चाहिए।" यदि पहले किसी अनभिज्ञ व्यक्ति द्वारा बिछाया गया हो, तो चारों ओर की दीवार से दो अंगुल या तीन अंगुल की दूरी छोड़कर बिछाना चाहिए। यह बिछाने का कर्तव्य है। यदि चटाई बहुत बड़ी हो, तो उसे काटकर या उसके किनारे को मोड़कर और बाँधकर बिछाना चाहिए। यदि किनारे को मोड़कर बाँधना नहीं आता हो, तो उसे काटना नहीं चाहिए। "पूर्वी खिड़कियाँ बंद करनी चाहिए" का अर्थ है पूर्व दिशा की खिड़कियाँ बंद करनी चाहिए। इसी प्रकार शेष खिड़कियाँ भी बंद करनी चाहिए। වූපකාසෙතබ්බොති අඤ්ඤත්ථ නෙතබ්බො. වූපකාසාපෙතබ්බොති අඤ්ඤො භික්ඛු වත්තබ්බො ‘‘ථෙරං ගහෙත්වා අඤ්ඤත්ථ ගච්ඡා’’ති විවෙචෙතබ්බන්ති විස්සජ්ජාපෙතබ්බං. විවෙචාපෙතබ්බන්ති අඤ්ඤො වත්තබ්බො ‘‘ථෙරං දිට්ඨිගතං විස්සජ්ජාපෙහී’’ති. උස්සුක්කං කාතබ්බන්ති පරිවාසදානත්ථං සො සො භික්ඛු උපසඞ්කමිත්වා යාචිතබ්බො. සචෙ අත්තනා පටිබලො හොති, අත්තනාව දාතබ්බො. නො චෙ පටිබලො හොති, අඤ්ඤෙන දාපෙතබ්බො. කින්ති නු ඛොති කෙන නු ඛො උපායෙන. එස නයො සබ්බත්ථ. ලහුකාය වා [Pg.262] පරිණාමෙය්යාති උක්ඛෙපනීයං අකත්වා තජ්ජනීයං වා නියස්සං වා කරෙය්යාති අත්ථො. තෙන හි ‘‘උපජ්ඣායස්ස උක්ඛෙපනීයකම්මං කත්තුකාමො සඞ්ඝො’’ති ඤත්වා එකමෙකං භික්ඛුං උපසඞ්කමිත්වා ‘‘මා භන්තෙ අම්හාකං උපජ්ඣායස්ස කම්මං කරිත්ථා’’ති යාචිතබ්බා. සචෙ කරොන්තියෙව, ‘‘තජ්ජනීයං වා නියස්සං වා කරොථා’’ති යාචිතබ්බා. සචෙ කරොන්තියෙව, අථ උපජ්ඣායො ‘‘සම්මා වත්තථ භන්තෙ’’ති යාචිතබ්බො. ඉති තං සම්මා වත්තාපෙත්වා ‘‘පටිප්පස්සම්භෙථ භන්තෙ කම්ම’’න්ති භික්ඛූ යාචිතබ්බා. "पृथक करना चाहिए" का अर्थ है दूसरी जगह ले जाना चाहिए। "पृथक करवाना चाहिए" का अर्थ है दूसरे भिक्षु से कहना चाहिए— "स्थविर को लेकर दूसरी जगह जाएँ।" "विवेचन करना चाहिए" का अर्थ है (गलत दृष्टि) छुड़वानी चाहिए। "विवेचन करवाना चाहिए" का अर्थ है दूसरे से कहना चाहिए— "स्थविर से मिथ्या दृष्टि छुड़वाएँ।" "उत्सुकता (प्रयत्न) करनी चाहिए" का अर्थ है परिवास देने के लिए उन-उन भिक्षुओं के पास जाकर याचना करनी चाहिए। यदि स्वयं समर्थ हो, तो स्वयं देना चाहिए। यदि समर्थ न हो, तो दूसरे से दिलवाना चाहिए। "कैसे हो सकता है" का अर्थ है किस उपाय से। यही नियम सर्वत्र है। "लघु (हल्के दंड) में परिवर्तित करना चाहिए" का अर्थ है उत्क्षेपणीय कर्म न करके तर्जनीय या निश्रय कर्म करना चाहिए। इसलिए, "संघ उपाध्याय पर उत्क्षेपणीय कर्म करना चाहता है" यह जानकर एक-एक भिक्षु के पास जाकर याचना करनी चाहिए— "भन्ते! हमारे उपाध्याय पर यह कर्म न करें।" यदि वे करते ही हैं, तो याचना करनी चाहिए— "तर्जनीय या निश्रय कर्म करें।" यदि वे (उत्क्षेपणीय) ही करते हैं, तो उपाध्याय से याचना करनी चाहिए— "भन्ते! सम्यक् आचरण करें।" इस प्रकार उन्हें सम्यक् आचरण करवाकर भिक्षुओं से याचना करनी चाहिए— "भन्ते! कर्म को शांत (रद्द) करें।" සම්පරිවත්තකං සම්පරිවත්තකන්ති සම්පරිවත්තෙත්වා සම්පරිවත්තෙත්වා. න ච අච්ඡින්නෙ ථෙවෙ පක්කමිතබ්බන්ති යදි අප්පමත්තකම්පි රජනං ගළති, න තාව පක්කමිතබ්බං. න උපජ්ඣායං අනාපුච්ඡා එකච්චස්ස පත්තො දාතබ්බොතිආදි සබ්බං උපජ්ඣායස්ස විසභාගපුග්ගලවසෙන කථිතං. න උපජ්ඣායං අනාපුච්ඡා ගාමො පවිසිතබ්බොති පිණ්ඩාය වා අඤ්ඤෙන වා කරණීයෙන පවිසිතුකාමෙන ආපුච්ඡිත්වාව පවිසිතබ්බො. සචෙ උපජ්ඣායො කාලස්සෙව වුට්ඨාය දූරං භික්ඛාචාරං ගන්තුකාමො හොති, ‘‘දහරා පිණ්ඩාය පවිසන්තූ’’ති වත්වා ගන්තබ්බං. අවත්වා ගතෙ පරිවෙණං ගන්ත්වා උපජ්ඣායං අපස්සන්තෙන ගාමං පවිසිතුං වට්ටති. සචෙ ගාමං පවිසන්තොපි පස්සති, දිට්ඨට්ඨානතො පට්ඨාය ආපුච්ඡිතුංයෙව වට්ටති. "सम्परावर्तक" का अर्थ है उलट-पलट कर। "बूँदें गिरना बंद न होने पर नहीं जाना चाहिए" का अर्थ है यदि थोड़ा सा भी रंग टपक रहा हो, तो तब तक नहीं जाना चाहिए। "उपाध्याय से बिना पूछे किसी को पात्र नहीं देना चाहिए" आदि सब उपाध्याय के साथ प्रतिकूल स्वभाव वाले व्यक्ति के संदर्भ में कहा गया है। "उपाध्याय से बिना पूछे गाँव में प्रवेश नहीं करना चाहिए" का अर्थ है कि पिण्डपात या अन्य किसी कार्य के लिए प्रवेश करने के इच्छुक को पूछकर ही प्रवेश करना चाहिए। यदि उपाध्याय जल्दी उठकर दूर भिक्षाटन के लिए जाना चाहते हों, तो "नवदीक्षित भिक्षु पिण्डपात के लिए प्रवेश करें" ऐसा कहकर जाना चाहिए। बिना कहे चले जाने पर, उनके निवास स्थान पर जाकर उपाध्याय को न देखने पर गाँव में प्रवेश करना उचित है। यदि गाँव में प्रवेश करते समय वे दिख जाएँ, तो जहाँ वे दिखें वहीं से पूछना उचित है। න සුසානං ගන්තබ්බන්ති වාසත්ථාය වා දස්සනත්ථාය වා න ගන්තබ්බං. න දිසා පක්කමිතබ්බාති එත්ථ පක්කමිතුකාමෙන කම්මං ආචික්ඛිත්වා යාවතතියං යාචිතබ්බො. සචෙ අනුජානාති, සාධු; නො චෙ අනුජානාති, තං නිස්සාය වසතො චස්ස උද්දෙසො වා පරිපුච්ඡා වා කම්මට්ඨානං වා න සම්පජ්ජති, උපජ්ඣායො බාලො හොති අබ්යත්තො, කෙවලං අත්තනො සන්තිකෙ වසාපෙතුකාමතාය එව ගන්තුං න දෙති, එවරූපෙ නිවාරෙන්තෙපි ගන්තුං වට්ටති. වුට්ඨානමස්ස ආගමෙතබ්බන්ති ගෙලඤ්ඤතො වුට්ඨානං අස්ස ආගමෙතබ්බං; න කත්ථචි ගන්තබ්බං. සචෙ අඤ්ඤො භික්ඛු උපට්ඨාකො අත්ථි, භෙසජ්ජං පරියෙසිත්වා තස්ස හත්ථෙ දත්වා ‘‘භන්තෙ අයං උපට්ඨහිස්සතී’’ති වත්වා ගන්තබ්බං. "श्मशान नहीं जाना चाहिए" का अर्थ है निवास के लिए या (अशुभ) दर्शन के लिए नहीं जाना चाहिए। "दिशाओं में (बाहर) नहीं जाना चाहिए" के विषय में, जाने के इच्छुक को अपने कार्य के बारे में बताकर तीन बार तक याचना करनी चाहिए। यदि वे अनुमति दे दें, तो अच्छा है; यदि अनुमति न दें, और उनके पास रहने से पाठ (उद्देश), प्रश्न (परिपृच्छा) या कर्मस्थान सिद्ध न होता हो, उपाध्याय अज्ञानी और अकुशल हों, और केवल अपने पास रखने की इच्छा से ही जाने न देते हों, तो ऐसे उपाध्याय के मना करने पर भी जाना उचित है। "उनके स्वस्थ होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए" का अर्थ है बीमारी से उनके उठने (स्वस्थ होने) की प्रतीक्षा करनी चाहिए; कहीं नहीं जाना चाहिए। यदि कोई अन्य परिचारक भिक्षु हो, तो औषधि खोजकर उसके हाथ में देकर, "भन्ते! यह परिचर्या करेगा" ऐसा कहकर जाना चाहिए। උපජ්ඣායවත්තකථා නිට්ඨිතා. उपाध्याय-कर्तव्य-कथा समाप्त हुई। සද්ධිවිහාරිකවත්තකථා सार्धविहारिक-कर्तव्य-कथा 67. උපජ්ඣායෙන [Pg.263] සද්ධිවිහාරිකම්හි සම්මාවත්තනායං – සඞ්ගහෙතබ්බො අනුග්ගහෙතබ්බොති උද්දෙසාදීහිස්ස සඞ්ගහො ච අනුග්ගහො ච කත්තබ්බො. තත්ථ උද්දෙසොති පාළිවාචනං. පරිපුච්ඡාති පාළියා අත්ථවණ්ණනා. ඔවාදොති අනොතිණ්ණෙ වත්ථුස්මිං ‘‘ඉදං කරොහි, ඉදං මා කරිත්ථා’’ති වචනං. අනුසාසනීති ඔතිණ්ණෙ වත්ථුස්මිං. අපි ච ඔතිණ්ණෙ වා අනොතිණ්ණෙ වා පඨමං වචනං ඔවාදො; පුනප්පුනං වචනං අනුසාසනීති. සචෙ උපජ්ඣායස්ස පත්තො හොතීති සචෙ අතිරෙකපත්තො හොති. එස නයො සබ්බත්ථ. පරික්ඛාරොති අඤ්ඤොපි සමණපරික්ඛාරො. ඉධ උස්සුක්කං නාම ධම්මිකෙන නයෙන උප්පජ්ජමානඋපායපරියෙසනං. ඉතො පරං දන්තකට්ඨදානං ආදිං කත්වා ආචමනකුම්භියා උදකාසිඤ්චනපරියොසානං වත්තං ගිලානස්සෙව සද්ධිවිහාරිකස්ස කාතබ්බං. අනභිරතිවූපකාසනාදි පන අගිලානස්සාපි කත්තබ්බමෙව. චීවරං රජන්තෙනාති ‘‘එවං රජෙය්යාසී’’ති උපජ්ඣායතො උපායං සුත්වා රජන්තෙන. සෙසං වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බං. ६७. उपाध्याय द्वारा सार्धविहारिक के प्रति सम्यक व्यवहार के विषय में—उद्देश (पाठ पढ़ाना) आदि के द्वारा उसका संग्रह (ग्रहण) और अनुग्रह (उपकार) करना चाहिए। वहाँ 'उद्देश' का अर्थ है पालि का पाठ कराना। 'परिपृच्छा' का अर्थ है पालि की अर्थ-व्याख्या करना। 'ओवाद' (अववाद) का अर्थ है किसी घटना के घटने से पूर्व यह कहना कि "यह करो, यह मत करो"। 'अनुशासनी' का अर्थ है घटना के घट जाने पर कहना। इसके अतिरिक्त, घटना घटी हो या न घटी हो, प्रथम बार कहना 'ओवाद' है और बार-बार कहना 'अनुशासनी' है। "यदि उपाध्याय के पास पात्र हो" का अर्थ है यदि अतिरिक्त पात्र हो। यही नियम सभी जगह (चीवर आदि में) लागू होता है। 'परिष्कार' का अर्थ है अन्य श्रमण-परिष्कार (जैसे छाता, जूते आदि)। यहाँ 'उत्सुक्य' का अर्थ है धार्मिक विधि से उपलब्ध होने वाले उपायों की खोज करना। इसके बाद, दन्तकाष्ठ देने से लेकर आचमन-कुम्भी में जल भरने तक का कर्तव्य केवल बीमार सार्धविहारिक के लिए करना चाहिए। किन्तु अनभिरति (अरुचि) को दूर करना आदि कार्य अस्वस्थ न होने पर भी (स्वस्थ सार्धविहारिक के लिए भी) अवश्य करना चाहिए। "चीवर रंगते हुए" का अर्थ है "इस प्रकार रंगो"—ऐसा उपाध्याय से विधि सुनकर रंगते हुए। शेष बातें पूर्वोक्त विधि के अनुसार ही समझनी चाहिए। සද්ධිවිහාරිකවත්තකථා නිට්ඨිතා. सार्धविहारिक-वत्त-कथा समाप्त। නසම්මාවත්තනාදිකථා न-सम्यक-व्यवहार आदि की कथा। 68. න සම්මා වත්තන්තීති යථාපඤ්ඤත්තං උපජ්ඣායවත්තං න පූරෙන්ති. යො න සම්මා වත්තෙය්යාති යො යථාපඤ්ඤත්තං වත්තං න පූරෙය්ය; සො දුක්කටං ආපජ්ජතීති අත්ථො. පණාමෙතබ්බොති අපසාදෙතබ්බො. න අධිමත්තං පෙමං හොතීති උපජ්ඣායම්හි අධිමත්තං ගෙහස්සිතපෙමං න හොති. නාධිමත්තා භාවනා හොතීති අධිමත්තා මෙත්තාභාවනා න හොති; වුත්තපටිපක්ඛනයෙන සුක්කපක්ඛො වෙදිතබ්බො. අලං පණාමෙතුන්ති යුත්තො පණාමෙතුං. ६८. "सम्यक व्यवहार नहीं करते" का अर्थ है कि वे प्रज्ञप्त किए गए उपाध्याय-कर्तव्यों को पूरा नहीं करते। "जो सम्यक व्यवहार न करे" का अर्थ है जो प्रज्ञप्त कर्तव्य को पूरा न करे; उसे 'दुक्कट' (दुष्कृत) का दोष लगता है—यह अर्थ है। "पणामेतब्बो" का अर्थ है उसे निकाल देना चाहिए। "अत्यधिक प्रेम नहीं होता" का अर्थ है उपाध्याय के प्रति घर के प्रति होने वाले प्रेम जैसा अत्यधिक प्रेम नहीं होता। "अत्यधिक भावना नहीं होती" का अर्थ है अत्यधिक मैत्री-भावना नहीं होती; कहे गए प्रतिपक्ष के नियम से शुक्ल पक्ष (सकारात्मक पक्ष) को समझना चाहिए। "पणामेतुं अलं" का अर्थ है निकाल देने के योग्य। අප්පණාමෙන්තො උපජ්ඣායො සාතිසාරො හොතීති සදොසො හොති, ආපත්තිං ආපජ්ජති; තස්මා න සම්මා වත්තන්තො පණාමෙතබ්බොව. න සම්මාවත්තනාය ච යාව චීවරරජනං තාව වත්තෙ අකරියමානෙ උපජ්ඣායස්ස [Pg.264] පරිහානි හොති. තස්මා තං අකරොන්තස්ස නිස්සයමුත්තකස්සාපි අමුත්තකස්සාපි ආපත්තියෙව. එකච්චස්ස පත්තදානතො පට්ඨාය අමුත්තකනිස්සයස්සෙව ආපත්ති. "न निकालने वाला उपाध्याय सातिसार (दोषी) होता है" का अर्थ है वह सदोष होता है, उसे आपत्ति (दोष) लगती है; इसलिए सम्यक व्यवहार न करने वाले को निकाल ही देना चाहिए। और सम्यक व्यवहार न करने पर, जब तक चीवर रंगने तक के कर्तव्यों का पालन नहीं किया जाता, तब तक उपाध्याय की हानि होती है। इसलिए, उन कर्तव्यों को न करने वाले सार्धविहारिक को, चाहे वह निश्रय-मुक्त हो या न हो, आपत्ति लगती ही है। किसी के लिए पात्र देने से लेकर (कर्तव्य न करने पर) केवल निश्रय-अमुक्त को ही आपत्ति होती है। සද්ධිවිහාරිකා සම්මා වත්තන්ති, උපජ්ඣායො සම්මා න වත්තති, උපජ්ඣායස්ස ආපත්ති. උපජ්ඣායො සම්මා වත්තති, සද්ධිවිහාරිකා සම්මා න වත්තන්ති, තෙසං ආපත්ති. උපජ්ඣායෙ වත්තං සාදියන්තෙ සද්ධිවිහාරිකා බහුකාපි හොන්ති, සබ්බෙසං ආපත්ති. සචෙ උපජ්ඣායො ‘‘මය්හං උපට්ඨාකො අත්ථි, තුම්හෙ අත්තනො සජ්ඣායමනසිකාරාදීසු යොගං කරොථා’’ති වදති, සද්ධිවිහාරිකානං අනාපත්ති. සචෙ උපජ්ඣායො සාදියනං වා අසාදියනං වා න ජානාති, බාලො හොති, සද්ධිවිහාරිකා බහුකා. තෙසු එකො වත්තසම්පන්නො භික්ඛු ‘‘උපජ්ඣායස්ස කිච්චං අහං කරිස්සාමි, තුම්හෙ අප්පොස්සුක්කා විහරථා’’ති එවඤ්චෙ අත්තනො භාරං කත්වා ඉතරෙ විස්සජ්ජෙති, තස්ස භාරකරණතො පට්ඨාය තෙසං අනාපත්ති. यदि सार्धविहारिक सम्यक व्यवहार करते हैं और उपाध्याय सम्यक व्यवहार नहीं करता, तो उपाध्याय को आपत्ति होती है। यदि उपाध्याय सम्यक व्यवहार करता है और सार्धविहारिक सम्यक व्यवहार नहीं करते, तो उन्हें आपत्ति होती है। यदि उपाध्याय कर्तव्य की अपेक्षा रखता है और सार्धविहारिक बहुत अधिक हों, तो सभी को आपत्ति होती है। यदि उपाध्याय कहता है—"मेरे पास सेवा करने वाला है, तुम अपने स्वाध्याय और मनस्कार आदि में लगो", तो सार्धविहारिकों को आपत्ति नहीं होती। यदि उपाध्याय (कर्तव्य की) स्वीकृति या अस्वीकृति को नहीं जानता, वह अज्ञानी (बाल) है, और सार्धविहारिक बहुत अधिक हैं। उनमें से यदि एक कर्तव्य-सम्पन्न भिक्षु यह कहे—"उपाध्याय का कार्य मैं करूँगा, आप लोग निश्चिंत होकर रहें" और इस प्रकार स्वयं उत्तरदायित्व लेकर दूसरों को मुक्त कर दे, तो उसके उत्तरदायित्व लेने के समय से अन्य भिक्षुओं को आपत्ति नहीं होती। නසම්මාවත්තනාදිකථා නිට්ඨිතා. न-सम्यक-व्यवहार आदि की कथा समाप्त। රාධබ්රාහ්මණවත්ථුකථා राध ब्राह्मण की कथा। 69. රාධබ්රාහ්මණවත්ථුස්මිං – කිඤ්චාපි ආයස්මා සාරිපුත්තො භගවතා බාරාණසියං තීහි සරණගමනෙහි අනුඤ්ඤාතං පබ්බජ්ජඤ්චෙව උපසම්පදඤ්ච ජානාති, භගවා පන තං ලහුකං උපසම්පදං පටික්ඛිපිත්වා ඤත්තිචතුත්ථකම්මෙන ගරුකං කත්වා උපසම්පදං අනුඤ්ඤාතුකාමො. අථස්ස ථෙරො අජ්ඣාසයං විදිත්වා ‘‘කථාහං භන්තෙ තං බ්රාහ්මණං පබ්බාජෙමි උපසම්පාදෙමී’’ති ආහ. බුද්ධානඤ්හි පරිසා අජ්ඣාසයකුසලා හොන්ති, අයඤ්ච බුද්ධපරිසාය අග්ගො. ६९. राध ब्राह्मण की कथा में—यद्यपि आयुष्मान सारिपुत्र भगवान द्वारा वाराणसी में तीन शरणगमनों द्वारा अनुमत प्रव्रज्या और उपसम्पदा को जानते थे, फिर भी भगवान उस लघु उपसम्पदा को अस्वीकार कर 'ज्ञप्ति-चतुर्थ-कर्म' द्वारा उसे गुरु (महत्वपूर्ण) बनाकर उपसम्पदा की अनुमति देना चाहते थे। तब स्थविर ने भगवान के आशय को जानकर कहा—"भन्ते! मैं उस ब्राह्मण को कैसे प्रव्रजित और उपसम्पन्न करूँ?" क्योंकि बुद्धों के परिषद (शिष्य) उनके आशय को समझने में कुशल होते हैं, और ये (सारिपुत्र) बुद्ध-परिषद में अग्रगण्य हैं। බ්යත්තෙන භික්ඛුනා පටිබලෙනාති එත්ථ බ්යත්තො නාම යස්ස සාට්ඨකථං විනයපිටකං වාචුග්ගතං පවත්තති, තස්මිං අසති යස්ස අන්තමසො ඉදං ඤත්තිචතුත්ථකම්මවාචාමත්තම්පි සුග්ගහිතං හොති, වාචුග්ගතං පවත්තති, අයම්පි ඉමස්මිං අත්ථෙ බ්යත්තො. යො පන කාසසොසසෙම්හාදිනා වා ගෙලඤ්ඤෙන [Pg.265] ඔට්ඨදන්තජිව්හාදීනං වා අසම්පත්තියා පරියත්තියං වා අකතපරිචයත්තා න සක්කොති පරිමණ්ඩලෙහි පදබ්යඤ්ජනෙහි කම්මවාචං සාවෙතුං, බ්යඤ්ජනං වා පදං වා හාපෙති, අඤ්ඤථා වා වත්තබ්බං අඤ්ඤථා වදති, අයං අප්පටිබලො. තබ්බිපරීතො ඉමස්මිං අත්ථෙ ‘‘පටිබලො’’ති වෙදිතබ්බො. සඞ්ඝො ඤාපෙතබ්බොති සඞ්ඝො ජානාපෙතබ්බො. තතො පරං යං සඞ්ඝො ජානාපෙතබ්බො, තං දස්සෙතුං ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ’’තිආදිමාහ. "व्यत्त (विद्वान) और प्रतिबल भिक्षु द्वारा"—यहाँ 'व्यत्त' उसे कहते हैं जिसे अट्ठकथा सहित विनयपिटक कंठस्थ हो। उसके अभाव में, जिसे कम से कम यह ज्ञप्ति-चतुर्थ-कर्मवाचा मात्र भी भली-भाँति सीखी हुई और कंठस्थ हो, वह भी इस अर्थ में 'व्यत्त' है। किन्तु जो खाँसी, श्वास, कफ आदि की बीमारी के कारण, अथवा होंठ, दाँत, जीभ आदि अंगों की विकृति के कारण, अथवा परिषद में अभ्यास न होने के कारण, परिपूर्ण पदों और व्यंजनों के साथ कर्मवाचा सुनाने में समर्थ नहीं है, जो व्यंजन या पद को कम कर देता है, या जिसे जिस प्रकार कहना चाहिए उसे अन्यथा (गलत) कहता है, वह 'अप्रतिबल' है। इसके विपरीत जो है, उसे इस अर्थ में 'प्रतिबल' समझना चाहिए। "संघ को सूचित करना चाहिए" का अर्थ है संघ को ज्ञात कराना चाहिए। उसके बाद, संघ को जो ज्ञात कराना है, उसे दिखाने के लिए "सुणातु मे भन्ते" (भन्ते! संघ मेरी बात सुने) आदि कहा गया है। 71. උපසම්පන්නසමනන්තරාති උපසම්පන්නො හුත්වා සමනන්තරා. අනාචාරං ආචරතීති පණ්ණත්තිවීතික්කමං කරොති. උල්ලුම්පතු මන්ති උද්ධරතු මං, අකුසලා වුට්ඨාපෙත්වා කුසලෙ පතිට්ඨපෙතු; සාමණෙරභාවා වා උද්ධරිත්වා භික්ඛුභාවෙ පතිට්ඨාපෙතූති. අනුකම්පං උපාදායාති අනුද්දයං පටිච්ච; මයි අනුකප්පං කත්වාති අත්ථො. ७१. "उपसम्पन्न होने के तुरंत बाद" का अर्थ है उपसम्पन्न होकर उसके ठीक बाद। "अनाचार का आचरण करता है" का अर्थ है प्रज्ञप्ति (नियम) का उल्लंघन करता है। "उल्लुम्पतु मं" का अर्थ है मेरा उद्धार करें, मुझे अकुशल से निकालकर कुशल में प्रतिष्ठित करें; अथवा सामणेर भाव से निकालकर भिक्षु भाव में प्रतिष्ठित करें—यह अर्थ है। "अनुकम्पा को लेकर" का अर्थ है दया के कारण; मुझ पर अनुकम्पा करके—यह अर्थ है। 73. අට්ඨිතා හොතීති නිච්චප්පවත්තිනී හොති. චත්තාරො නිස්සයෙති චත්තාරො පච්චයෙ. යස්මා චත්තාරො පච්චයෙ නිස්සාය අත්තභාවො පවත්තති, තස්මා තෙ නිස්සයාති වුච්චන්ති. ७३. "अट्ठिता होती है" का अर्थ है नित्य प्रवृत्त (निरंतर) होती है। "चार निश्रय" का अर्थ है चार प्रत्यय। चूँकि चार प्रत्ययों के आश्रय से ही आत्मभाव (शरीर/जीवन) चलता है, इसलिए उन्हें 'निश्रय' कहा जाता है। රාධබ්රාහ්මණවත්ථුකථා නිට්ඨිතා. राध ब्राह्मण की कथा समाप्त। ආචරියවත්තකථා आचार्य-वत्त-कथा। 75. කින්තායං භික්ඛු හොතීති කිං තෙ අයං භික්ඛු හොති. අඤ්ඤෙහි ඔවදියො අනුසාසියොති අඤ්ඤෙහි ඔවදිතබ්බො චෙව අනුසාසිතබ්බො ච. බාහුල්ලාය ආවත්තො යදිදං ගණබන්ධිකන්ති ගණබන්ධො එතස්ස බාහුල්ලස්ස අත්ථීති ගණබන්ධිකං, බාහුල්ලං. යං ඉදං ගණබන්ධිකං නාම බාහුල්ලං, තදත්ථාය අතිලහුං ත්වං ආපන්නොති වුත්තං හොති. ७५. "यह भिक्षु तुम्हारा क्या लगता है?" (Kintāyaṃ bhikkhu hotīti) का अर्थ है "यह भिक्षु तुम्हारा क्या है?"। "दूसरों द्वारा उपदेश और अनुशासन के योग्य" (Aññehi ovadiyo anusāsiyo) का अर्थ है कि वह दूसरों द्वारा उपदेश देने और अनुशासित करने योग्य है। "बाहुल्य के लिए प्रवृत्त, जो यह गण-बंधन है" (Bāhullāya āvatto yadidaṃ gaṇabandhikanti) का अर्थ है कि इस बाहुल्य (प्रचुरता) में गण-बंधन (समूह बनाना) है, इसलिए इसे 'गण-बंधिक' कहा जाता है। जो यह गण-बंधिक नामक बाहुल्य है, उसके लिए तुम बहुत शीघ्र ही प्रवृत्त हो गए हो, ऐसा कहा गया है। 76. අබ්යත්තාති පඤ්ඤාවෙය්යත්තියෙන විරහිතා. අඤ්ඤත්තරොපි අඤ්ඤතිත්ථියපුබ්බොති පසූරො පරිබ්බාජකො. සො කිර ‘‘ධම්මං ථෙනෙස්සාමී’’ති [Pg.266] උදායිත්ථෙරස්ස සන්තිකෙ පබ්බජිත්වා තෙන සහධම්මිකං වුච්චමානො තස්ස වාදං ආරොපෙසි. අනුජානාමි භික්ඛවෙ බ්යත්තෙන භික්ඛුනාතිආදිම්හි බ්යත්තො පුබ්බෙ භික්ඛුනොවාදකවණ්ණනායං වුත්තලක්ඛණොයෙව. යො පන අන්තෙවාසිනො වා සද්ධිවිහාරිකස්ස වා ගිලානස්ස සක්කොති උපට්ඨානාදීනි කාතුං, අයං ඉධ පටිබලොති අධිප්පෙතො. වුත්තම්පි චෙතං – ७६. "अव्यक्त" (Abyattā) का अर्थ है प्रज्ञा की निपुणता से रहित। "कोई अन्य पूर्व-अन्यतीर्थिक" (Aññattaropi aññatitthiyapubbo) का अर्थ है पसूर नामक परिव्राजक। उसने "मैं धर्म की चोरी करूँगा" ऐसा सोचकर स्थविर उदायी के पास प्रव्रज्या ली और उनके द्वारा सधार्मिक (नियमों) के विषय में कहे जाने पर उन पर दोषारोपण किया। "भिक्षुओं, मैं व्यक्त भिक्षु द्वारा (अनुशासन) की अनुमति देता हूँ" आदि में 'व्यक्त' का वही लक्षण है जो पहले भिक्षु-ओवादक की व्याख्या में कहा गया है। जो भिक्षु अपने अन्तेवासी या सद्धिविहारिक रोगी की सेवा आदि करने में समर्थ है, उसे यहाँ 'प्रतिबल' (सक्षम) माना गया है। यह कहा भी गया है - ‘‘පඤ්චහුපාලි, අඞ්ගෙහි සමන්නාගතෙන භික්ඛුනා උපසම්පාදෙතබ්බං, නිස්සයො දාතබ්බො, සාමණෙරො උපට්ඨාපෙතබ්බො. කතමෙහි පඤ්චහි? පටිබලො හොති අන්තෙවාසිං වා සද්ධිවිහාරිං වා ගිලානං උපට්ඨාතුං වා උපට්ඨාපෙතුං වා, අනභිරතං වූපකාසෙතුං වා වූපකාසාපෙතුං වා, උප්පන්නං කුක්කුච්චං ධම්මතො විනොදෙතුං, අභිධම්මෙ විනෙතුං, අභිවිනයෙ විනෙතූ’’න්ති (පරි. 418). "हे उपालि! पाँच अंगों से युक्त भिक्षु को उपसम्पदा देनी चाहिए, निश्रय (निसय) देना चाहिए और श्रामणेर से सेवा लेनी चाहिए। किन पाँच से? वह अपने अन्तेवासी या सद्धिविहारिक रोगी की स्वयं सेवा करने या दूसरों से सेवा कराने में सक्षम हो; अरति (असंतोष) को स्वयं दूर करने या दूसरों से दूर कराने में सक्षम हो; उत्पन्न हुए कौकृत्य (पछतावे) को धर्म के अनुसार दूर करने में सक्षम हो; अभिधर्म में प्रशिक्षित करने में और अभिविनय में प्रशिक्षित करने में सक्षम हो।" 77. පක්ඛසඞ්කන්තෙසූති තිත්ථියපක්ඛසඞ්කන්තෙසු. අනුජානාමි භික්ඛවෙ ආචරියන්ති ආචාරසමාචාරසික්ඛාපනකං ආචරියං අනුජානාමි. ආචරියො භික්ඛවෙ අන්තෙවාසිකම්හීතිආදි සබ්බං ‘‘උපජ්ඣායො භික්ඛවෙ සද්ධිවිහාරිකම්හී’’තිආදිනා නයෙන වුත්තවසෙනෙව වෙදිතබ්බං. නාමමත්තමෙව හි එත්ථ නානං. ७७. "पक्ष-संक्रान्तों में" (Pakkhasaṅkantesu) का अर्थ है अन्यतीर्थिकों के पक्ष में चले जाने पर। "भिक्षुओं, मैं आचार्य की अनुमति देता हूँ" का अर्थ है कि मैं आचार-समाचार की शिक्षा देने वाले आचार्य की अनुमति देता हूँ। "भिक्षुओं, आचार्य अन्तेवासी के प्रति..." आदि सब कुछ "भिक्षुओं, उपाध्याय सद्धिविहारिक के प्रति..." आदि के समान ही समझना चाहिए। यहाँ केवल नाम मात्र का ही अंतर है। ආචරියවත්තකථා නිට්ඨිතා. आचार्य-वृत्त कथा समाप्त हुई। පණාමනාඛමනාකථා प्रणामना-क्षमना कथा 80. අන්තෙවාසිකා ආචරියෙසු න සම්මා වත්තන්තීති එත්ථ පන යං පුබ්බෙ ‘‘නසම්මාවත්තනාය ච යාව චීවරරජනං, තාව වත්තෙ අකරියමානෙ උපජ්ඣායස්ස පරිහානි හොති, තස්මා තං අකරොන්තස්ස නිස්සයමුත්තකස්සාපි අමුත්තකස්සාපි ආපත්තියෙවා’’ති ච, ‘‘එකච්චස්ස පත්තදානතො පට්ඨාය අමුත්තකනිස්සයස්සෙව ආපත්තී’’ති ච ලක්ඛණං වුත්තං, න තෙනෙව ලක්ඛණෙන නිස්සයන්තෙවාසිකස්ස ආපත්ති වෙදිතබ්බා. නිස්සයන්තෙවාසිකෙන හි යාව ආචරියං නිස්සාය වසති, තාව සබ්බං ආචරියවත්තං කාතබ්බං. පබ්බජ්ජාඋපසම්පදාධම්මන්තෙවාසිකෙහි පන නිස්සයමුත්තකෙහිපි [Pg.267] ආදිතො පට්ඨාය යාව චීවරරජනං, තාව වත්තං කාතබ්බං; අනාපුච්ඡිත්වා පත්තදානාදිම්හි පන එතෙසං අනාපත්ති. එතෙසු ච පබ්බජ්ජන්තෙවාසිකො ච උපසම්පදන්තෙවාසිකො ච ආචරියස්ස යාවජීවං භාරො. නිස්සයන්තෙවාසිකො ච ධම්මන්තෙවාසිකො ච යාව සමීපෙ වසන්ති, තාවදෙව. තස්මා ආචරියෙනාපි තෙසු සම්මා වත්තිතබ්බං. ආචරියන්තෙවාසිකෙසු හි යො යො න සම්මා වත්තති, තස්ස තස්ස ආපත්ති. ८०. "अन्तेवासी आचार्यों के प्रति सम्यक् व्यवहार नहीं करते" - यहाँ जो पहले कहा गया है कि "सम्यक् व्यवहार न करने पर और चीवर रंगने तक के कर्तव्यों को न करने पर उपाध्याय की हानि होती है, इसलिए उसे न करने वाले निश्रय-मुक्त या अमुक्त भिक्षु को आपत्ति (दोष) होती है" और "किसी को पात्र देने आदि से केवल निश्रय-अमुक्त को ही आपत्ति होती है" - इस लक्षण से निश्रय-अन्तेवासी की आपत्ति नहीं समझनी चाहिए। क्योंकि निश्रय-अन्तेवासी जब तक आचार्य के निश्रय में रहता है, तब तक उसे आचार्य के सभी कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। किन्तु प्रव्रज्या, उपसम्पदा और धर्म-अन्तेवासियों को, जो निश्रय से मुक्त हैं, उन्हें भी आरम्भ से लेकर चीवर रंगने तक के कर्तव्यों का पालन करना चाहिए; बिना पूछे पात्र देने आदि में उन्हें आपत्ति नहीं होती। इन चारों में से प्रव्रज्या-अन्तेवासी और उपसम्पदा-अन्तेवासी आचार्य के लिए जीवन भर का उत्तरदायित्व हैं। निश्रय-अन्तेवासी और धर्म-अन्तेवासी केवल तब तक उत्तरदायित्व हैं जब तक वे पास में रहते हैं। इसलिए आचार्य को भी उनके प्रति सम्यक् व्यवहार करना चाहिए। आचार्य और अन्तेवासियों में से जो भी सम्यक् व्यवहार नहीं करता, उसे आपत्ति होती है। පණාමනාඛමනාකථා නිට්ඨිතා. प्रणामना-क्षमना कथा समाप्त हुई। නිස්සයපටිප්පස්සද්ධිකථා निश्रय-प्रतिप्रश्रब्धि कथा 83. උපජ්ඣායම්හා නිස්සයපටිප්පස්සද්ධීසු – උපජ්ඣායො පක්කන්තො වාතිආදීසු අයං විනිච්ඡයො – පක්කන්තොති තම්හා ආවාසා විප්පවසිතුකාමො පක්කන්තො දිසං ගතො. එවං ගතෙ ච පන තස්මිං සචෙ විහාරෙ නිස්සයදායකො අත්ථි, යස්ස සන්තිකෙ අඤ්ඤදාපි නිස්සයො වා ගහිතපුබ්බො හොති, යො වා එකසම්භොගපරිභොගො, තස්ස සන්තිකෙ නිස්සයො ගහෙතබ්බො, එකදිවසම්පි පරිහාරො නත්ථි. සචෙ තාදිසො නත්ථි, අඤ්ඤො ලජ්ජී පෙසලො අත්ථි, තස්ස ලජ්ජීපෙසලභාවං ජානන්තෙන තදහෙව නිස්සයො යාචිතබ්බො. සචෙ දෙති, ඉච්චෙතං කුසලං. අථ පන ‘‘තුම්හාකං උපජ්ඣායො ලහුං ආගමිස්සතී’’ති පුච්ඡති, උපජ්ඣායෙන ච තථා වුත්තං, ‘‘ආම, භන්තෙ’’ති වත්තබ්බං. සචෙ වදති ‘‘තෙන හි උපජ්ඣායස්ස ආගමනං ආගමෙථා’’ති වට්ටති. අථ පනස්ස පකතියා පෙසලභාවං න ජානාති, චත්තාරි පඤ්ච දිවසානි තස්ස භික්ඛුනො සභාගතං ඔලොකෙත්වා ඔකාසං කාරෙත්වා නිස්සයො ගහෙතබ්බො. ८३. "उपाध्याय से निश्रय की समाप्ति" के विषय में - "उपाध्याय प्रस्थान कर गए हों" आदि में यह विनिश्चय है - 'प्रक्रान्त' (पक्कन्तो) का अर्थ है उस आवास से बाहर रहने की इच्छा से किसी दूसरी दिशा में चले जाना। उनके चले जाने पर यदि विहार में कोई निश्रय देने वाला आचार्य हो, जिससे पहले भी निश्रय लिया गया हो या जो समान उपभोग वाला हो, तो उसके पास निश्रय लेना चाहिए; एक दिन का भी विलम्ब नहीं करना चाहिए। यदि वैसा कोई न हो, और कोई अन्य लज्जी (पाप से डरने वाला) और शीलवान भिक्षु हो, तो उसके लज्जी-शीलवान होने को जानकर उसी दिन निश्रय की याचना करनी चाहिए। यदि वह दे दे, तो अच्छा है। यदि वह पूछे कि "क्या तुम्हारे उपाध्याय शीघ्र लौटेंगे?" और उपाध्याय ने ऐसा कहा हो, तो "हाँ, भन्ते" कहना चाहिए। यदि वह कहे "तो उपाध्याय के आने की प्रतीक्षा करो", तो यह उचित है। यदि उसके स्वभावगत शीलवान होने का पता न हो, तो चार-पाँच दिन उस भिक्षु की अनुकूलता को देखकर और अवसर पाकर निश्रय लेना चाहिए। සචෙ පන විහාරෙ නිස්සයදායකො නත්ථි, උපජ්ඣායො ච ‘‘අහං කතිපාහෙන ආගමිස්සාමි, මා උක්කණ්ඨිත්ථා’’ති වත්වා ගතො, යාව ආගමනා පරිහාරො ලබ්භති. අථාපි නං තත්ථ මනුස්සා පරිච්ඡින්නකාලතො උත්තරිපි පඤ්ච වා දස වා දිවසානි වාසෙන්තියෙව, තෙන විහාරං පවත්ති පෙසෙතබ්බා ‘‘දහරා මා උක්කණ්ඨන්තු, අහං අසුකදිවසං නාම [Pg.268] ආගමිස්සාමී’’ති. එවම්පි පරිහාරො ලබ්භති. අථ ආගච්ඡතො අන්තරාමග්ගෙ නදීපූරෙන වා චොරාදීහි වා උපද්දවො හොති, ථෙරො උදකොසක්කනං වා ආගමෙති, සහායෙ වා පරියෙසති, තඤ්චෙ පවත්තිං දහරා සුණන්ති, යාව ආගමනා පරිහාරො ලබ්භති. සචෙ පන සො ‘‘ඉධෙවාහං වසිස්සාමී’’ති පහිණති, පරිහාරො නත්ථි. යත්ථ නිස්සයො ලබ්භති, තත්ථ ගන්තබ්බං. यदि विहार में कोई निश्रय देने वाला न हो और उपाध्याय यह कहकर गए हों कि "मैं कुछ दिनों में लौट आऊँगा, तुम उत्कंठित (परेशान) न होना", तो उनके आने तक प्रतीक्षा करने की अनुमति है। यदि वहाँ के लोग उन्हें निर्धारित समय से अधिक, पाँच या दस दिन और रोक लें, तो उन्हें विहार में संदेश भेजना चाहिए कि "युवा भिक्षु उत्कंठित न हों, मैं अमुक दिन लौटूँगा"। ऐसे में भी प्रतीक्षा की अनुमति है। यदि लौटते समय रास्ते में नदी की बाढ़ या डाकुओं आदि के कारण बाधा आ जाए, और स्थविर जल के उतरने की प्रतीक्षा करें या साथियों की खोज करें, और यदि युवा भिक्षु यह समाचार सुन लें, तो उनके आने तक प्रतीक्षा की अनुमति है। लेकिन यदि वह संदेश भेजें कि "मैं यहीं रहूँगा", तो प्रतीक्षा की अनुमति नहीं है। जहाँ निश्रय मिल सके, वहाँ चले जाना चाहिए। විබ්භන්තෙ පන කාලඞ්කතෙ පක්ඛසඞ්කන්තෙ වා එකදිවසම්පි පරිහාරො නත්ථි. යත්ථ නිස්සයො ලබ්භති, තත්ථ ගන්තබ්බං. ආණත්තීති පන නිස්සයපණාමනා වුච්චති. තස්මා ‘‘පණාමෙමි ත’’න්ති වා ‘‘මා ඉධ පටික්කමී’’ති වා ‘‘නීහර තෙ පත්තචීවර’’න්ති වා ‘‘නාහං තයා උපට්ඨාතබ්බො’’ති වාති ඉමිනා පාළිනයෙන ‘‘මා මං ගාමප්පවෙසනං ආපුච්ඡී’’තිආදිනා පාළිමුත්තකනයෙන වා යො නිස්සයපණාමනාය පණාමිතො හොති, තෙන උපජ්ඣායො ඛමාපෙතබ්බො. लेकिन (उपाध्याय के) गृहस्थ हो जाने पर, मृत्यु हो जाने पर या दूसरे मत में चले जाने पर एक दिन की भी छूट नहीं है। जहाँ निश्रय (निसय) प्राप्त हो, वहाँ जाना चाहिए। 'आणत्ति' (आज्ञा) का अर्थ निश्रय से निष्कासन (निसय-पणामना) कहा जाता है। इसलिए, "मैं तुम्हें निकालता हूँ" या "यहाँ मत आओ" या "अपना पात्र-चीवर ले जाओ" या "मुझे तुम्हारी सेवा की आवश्यकता नहीं है" - इस पालि पद्धति से, अथवा "मुझसे गाँव में प्रवेश करने की अनुमति मत माँगो" आदि पालि-मुक्त (सामान्य) पद्धति से जिसे निश्रय से निष्कासित किया गया हो, उसे उपाध्याय से क्षमा माँगनी चाहिए। සචෙ ආදිතොව න ඛමති, දණ්ඩකම්මං ආහරිත්වා තික්ඛත්තුං තාව සයමෙව ඛමාපෙතබ්බො. නො චෙ ඛමති, තස්මිං විහාරෙ මහාථෙරෙ ගහෙත්වා ඛමාපෙතබ්බො. නො චෙ ඛමති, සාමන්තවිහාරෙ භික්ඛූ ගහෙත්වා ඛමාපෙතබ්බො. සචෙ එවම්පි න ඛමති, අඤ්ඤත්ථ ගන්ත්වා උපජ්ඣායස්ස සභාගානං සන්තිකෙ වසිතබ්බං ‘‘අප්පෙව නාම සභාගානං මෙ සන්තිකෙ වසතීති ඤත්වාපි ඛමෙය්යා’’ති. සචෙ එවම්පි න ඛමති, තත්රෙව වසිතබ්බං. තත්ර චෙ දුබ්භික්ඛාදිදොසෙන න සක්කා හොති වසිතුං, තංයෙව විහාරං ආගන්ත්වා අඤ්ඤස්ස සන්තිකෙ නිස්සයං ගහෙත්වා වසිතුං වට්ටති. අයමාණත්තියං විනිච්ඡයො. यदि वह प्रारंभ में क्षमा न करें, तो दंड-कर्म (प्रायश्चित) करके तीन बार स्वयं ही क्षमा माँगनी चाहिए। यदि वे क्षमा न करें, तो उस विहार के महास्थविरों को साथ लेकर क्षमा माँगनी चाहिए। यदि फिर भी क्षमा न करें, तो पास के विहार के भिक्षुओं को साथ लेकर क्षमा माँगनी चाहिए। यदि इस प्रकार भी क्षमा न करें, तो अन्यत्र जाकर उपाध्याय के समान विचार वाले मित्रों (सभागों) के पास रहना चाहिए, यह सोचकर कि "शायद यह जानकर कि मैं उनके मित्रों के पास रह रहा हूँ, वे क्षमा कर दें।" यदि फिर भी क्षमा न करें, तो वहीं रहना चाहिए। यदि वहाँ अकाल आदि दोषों के कारण रहना संभव न हो, तो उसी विहार में लौटकर किसी अन्य (आचार्य) के पास निश्रय लेकर रहना उचित है। यह 'आणत्ति' (आज्ञा) के विषय में विनिश्चय है। ආචරියම්හා නිස්සයපටිප්පස්සද්ධීසු ආචරියො පක්කන්තො වා හොතීති එත්ථ කොචි ආචරියො ආපුච්ඡිත්වා පක්කමති, කොචි අනාපුච්ඡිත්වා. අන්තෙවාසිකොපි එවමෙව. තත්ර සචෙ අන්තෙවාසිකො ආචරියං ආපුච්ඡති ‘‘අසුකං නාම භන්තෙ ඨානං ගන්තුං ඉච්ඡාමි කෙනචිදෙව කරණීයෙනා’’ති, ආචරියෙන ච ‘‘කදා ගමිස්සසී’’ති වුත්තො ‘‘සායන්හෙ වා රත්තිං වා උට්ඨහිත්වා ගමිස්සාමී’’ති වදති, ආචරියොපි ‘‘සාධූ’’ති සම්පටිච්ඡති, තඞ්ඛණඤ්ඤෙව නිස්සයො පටිප්පස්සම්භති. आचार्य से निश्रय की समाप्ति (निसय-पटिप्पस्सद्धि) के विषय में, "आचार्य प्रस्थान कर गए हैं" यहाँ कोई आचार्य पूछकर (सूचित कर) प्रस्थान करते हैं, कोई बिना पूछे। अन्तेवासी (शिष्य) के लिए भी ऐसा ही है। वहाँ यदि अन्तेवासी आचार्य से पूछता है— "भन्ते! मैं किसी कार्यवश अमुक स्थान पर जाना चाहता हूँ," और आचार्य द्वारा "कब जाओगे?" पूछे जाने पर वह कहता है— "शाम को या रात में उठकर जाऊँगा," और आचार्य "ठीक है" कहकर स्वीकार कर लेते हैं, तो उसी क्षण निश्रय समाप्त हो जाता है। සචෙ [Pg.269] පන ‘‘භන්තෙ අසුකං නාම ඨානං ගන්තුකාමොම්හී’’ති වුත්තෙ ආචරියො ‘‘අසුකස්මිං නාම ගාමෙ පිණ්ඩාය චරිත්වා පච්ඡා ජානිස්සසී’’ති වදති, සො ච ‘‘සාධූ’’ති සම්පටිච්ඡති, තතො චෙ ගතො, සුගතො. සචෙ පන න ගච්ඡති, නිස්සයො න පටිප්පස්සම්භති. අථාපි ‘‘ගච්ඡාමී’’ති වුත්තෙ ආචරියෙන ‘‘මා තාව ගච්ඡ, රත්තිං මන්තෙත්වා ජානිස්සාමා’’ති වුත්තො මන්තෙත්වා ගච්ඡති, සුගතො. නො චෙ ගච්ඡති, නිස්සයො න පටිප්පස්සම්භති. ආචරියං අනාපුච්ඡා පක්කමන්තස්ස පන උපචාරසීමාතික්කමෙ නිස්සයො පටිප්පස්සම්භති. අන්තොඋපචාරසීමතො පටිනිවත්තන්තස්ස න පටිප්පස්සම්භති. लेकिन यदि "भन्ते! मैं अमुक स्थान पर जाना चाहता हूँ" कहने पर आचार्य कहते हैं— "अमुक गाँव में भिक्षाटन करके बाद में (जाने या न जाने का) निर्णय करना," और वह "ठीक है" कहकर स्वीकार कर लेता है, तो यदि वह वहाँ से चला जाता है, तो वह सुगत (भली-भाँति गया हुआ) है (निश्रय समाप्त हो जाता है)। लेकिन यदि वह नहीं जाता है, तो निश्रय समाप्त नहीं होता। और यदि "मैं जा रहा हूँ" कहने पर आचार्य द्वारा "अभी मत जाओ, रात में विचार-विमर्श करके निर्णय करेंगे" कहे जाने पर वह विचार-विमर्श के बाद जाता है, तो वह सुगत है। यदि वह नहीं जाता है, तो निश्रय समाप्त नहीं होता। आचार्य को बिना सूचित किए प्रस्थान करने वाले का निश्रय 'उपचार-सीमा' पार करने पर समाप्त हो जाता है। उपचार-सीमा के भीतर से लौट आने वाले का निश्रय समाप्त नहीं होता। සචෙ පන ආචරියො අන්තෙවාසිකං ආපුච්ඡති ‘‘ආවුසො අසුකං නාම ඨානං ගමිස්සාමී’’ති, අන්තෙවාසිකෙන ච ‘‘කදා’’ති වුත්තෙ ‘‘සායන්හෙ වා රත්තිභාගෙ වා’’ති වදති, අන්තෙවාසිකොපි ‘‘සාධූ’’ති සම්පටිච්ඡති, තඞ්ඛණඤ්ඤෙව නිස්සයො පටිප්පස්සම්භති. लेकिन यदि आचार्य अन्तेवासी से पूछते हैं— "आयुष्मान्! मैं अमुक स्थान पर जाऊँगा," और अन्तेवासी द्वारा "कब?" पूछे जाने पर वे कहते हैं— "शाम को या रात के समय," और अन्तेवासी भी "ठीक है" कहकर स्वीकार कर लेता है, तो उसी क्षण निश्रय समाप्त हो जाता है। සචෙ පන ආචරියො ‘‘ස්වෙ පිණ්ඩාය චරිත්වා ගමිස්සාමී’’ති වදති, ඉතරො ච ‘‘සාධූ’’ති සම්පටිච්ඡති, එකදිවසං තාව නිස්සයො න පටිප්පස්සම්භති, පුනදිවසෙ පටිප්පස්සද්ධො හොති. ‘‘අසුකස්මිං නාම ගාමෙ පිණ්ඩාය චරිත්වා ජානිස්සාමි මම ගමනං වා අගමනං වා’’ති වත්වා සචෙ න ගච්ඡති, නිස්සයො න පටිප්පස්සම්භති. අථාපි ‘‘ගච්ඡාමී’’ති වුත්තෙ අන්තෙවාසිකෙන ‘‘මා තාව ගච්ඡථ, රත්තිං මන්තෙත්වා ජානිස්සථා’’ති වුත්තො මන්තෙත්වාපි න ගච්ඡති, නිස්සයො න පටිප්පස්සම්භති. लेकिन यदि आचार्य कहते हैं— "कल भिक्षाटन करके जाऊँगा," और दूसरा (शिष्य) "ठीक है" कहकर स्वीकार कर लेता है, तो एक दिन तक निश्रय समाप्त नहीं होता, अगले दिन समाप्त हो जाता है। "अमुक गाँव में भिक्षाटन करके मैं अपने जाने या न जाने का निर्णय करूँगा" ऐसा कहकर यदि वे नहीं जाते हैं, तो निश्रय समाप्त नहीं होता। और यदि "मैं जा रहा हूँ" कहने पर अन्तेवासी द्वारा "अभी मत जाइए, रात में विचार-विमर्श करके निर्णय कीजिएगा" कहे जाने पर, विचार-विमर्श करने के बाद भी यदि वे नहीं जाते हैं, तो निश्रय समाप्त नहीं होता। සචෙ උභොපි ආචරියන්තෙවාසිකා කෙනචි කරණීයෙන බහිසීමං ගච්ඡන්ති, තතො චෙ ආචරියො ගමියචිත්තෙ උප්පන්නෙ අනාපුච්ඡාව ගන්ත්වා ද්වින්නං ලෙඩ්ඩුපාතානං අන්තොයෙව නිවත්තති, නිස්සයො න පටිප්පස්සම්භති. සචෙ ද්වෙ ලෙඩ්ඩුපාතෙ අතික්කමිත්වා නිවත්තති, පටිප්පස්සද්ධො හොති. ආචරියුපජ්ඣායා ද්වෙ ලෙඩ්ඩුපාතෙ අතික්කම්ම අඤ්ඤස්මිං විහාරෙ වසන්ති, නිස්සයො පටිප්පස්සම්භති. यदि आचार्य और अन्तेवासी दोनों किसी कार्यवश सीमा के बाहर जाते हैं, और वहाँ से आचार्य के मन में जाने का विचार उत्पन्न होने पर वे बिना बताए चले जाते हैं और दो ढेले फेंकने की दूरी (लेड्डुपात) के भीतर ही लौट आते हैं, तो निश्रय समाप्त नहीं होता। यदि वे दो ढेले फेंकने की दूरी को पार करके लौटते हैं, तो निश्रय समाप्त हो जाता है। यदि आचार्य या उपाध्याय दो ढेले फेंकने की दूरी को पार करके किसी अन्य विहार में रहने लगते हैं, तो निश्रय समाप्त हो जाता है। ආචරියෙ විබ්භන්තෙ කාලඞ්කතෙ පක්ඛසඞ්කන්තෙ ච තඞ්ඛණඤ්ඤෙව පටිප්පස්සම්භති. ආණත්තියං පන සචෙපි ආචරියො මුඤ්චිතුකාමොව හුත්වා නිස්සයපණාමනාය පණාමෙති, අන්තෙවාසිකො ච ‘‘කිඤ්චාපි මං ආචරියො පණාමෙති, අථ ඛො හදයෙන මුදුකො’’ති සාලයොව හොති, නිස්සයො න පටිප්පස්සම්භතියෙව. සචෙපි ආචරියො සාලයො, අන්තෙවාසිකො [Pg.270] නිරාලයො, ‘‘න දානි ඉමං නිස්සාය වසිස්සාමී’’ති ධුරං නික්ඛිපති, එවම්පි න පටිප්පස්සම්භති. උභින්නං සාලයභාවෙ පන න පටිප්පස්සම්භතියෙව. උභින්නං ධුරනික්ඛෙපෙන පටිප්පස්සම්භති. පණාමිතෙන දණ්ඩකම්මං ආහරිත්වා තික්ඛත්තුං ඛමාපෙතබ්බො. නො චෙ ඛමති, උපජ්ඣායෙ වුත්තනයෙන පටිපජ්ජිතබ්බං. आचार्य के गृहस्थ हो जाने पर, मृत्यु हो जाने पर या दूसरे मत में चले जाने पर उसी क्षण निश्रय समाप्त हो जाता है। 'आणत्ति' (निष्कासन) के विषय में, यदि आचार्य वास्तव में मुक्त करने की इच्छा से निश्रय से निष्कासित करते हैं, और अन्तेवासी यह सोचकर कि "भले ही आचार्य मुझे निकाल रहे हैं, लेकिन वे हृदय से कोमल हैं" आसक्ति (सालय) रखता है, तो निश्रय समाप्त नहीं होता। यदि आचार्य आसक्ति रखते हों और अन्तेवासी अनासक्त (निरालय) होकर "अब मैं इनके आश्रय में नहीं रहूँगा" ऐसा सोचकर अपना उत्तरदायित्व (धुर) छोड़ देता है, तो भी निश्रय समाप्त नहीं होता। दोनों के आसक्ति रखने पर तो निश्रय निश्चित रूप से समाप्त नहीं होता। दोनों के द्वारा उत्तरदायित्व छोड़ देने पर ही निश्रय समाप्त होता है। निष्कासित शिष्य को दंड-कर्म करके तीन बार क्षमा माँगनी चाहिए। यदि वे क्षमा न करें, तो उपाध्याय के प्रकरण में बताई गई विधि के अनुसार आचरण करना चाहिए। උපජ්ඣායෙන වා සමොධානගතොති එත්ථ දස්සනසවනවසෙන සමොධානං වෙදිතබ්බං. සචෙ හි ආචරියං නිස්සාය වසන්තො සද්ධිවිහාරිකො එකවිහාරෙ චෙතියං වා වන්දන්තං එකගාමෙ පිණ්ඩාය වා චරන්තං උපජ්ඣායං පස්සති, නිස්සයො පටිප්පස්සම්භති. උපජ්ඣායො පස්සති, සද්ධිවිහාරිකො පන න පස්සති, න පටිප්පස්සම්භති. මග්ගප්පටිපන්නං වා ආකාසෙන වා ගච්ඡන්තං උපජ්ඣායං දිස්වා දූරත්තා භික්ඛූති ජානාති, උපජ්ඣායොති න ජානාති, න පටිප්පස්සම්භති. සචෙ ජානාති, පටිප්පස්සම්භති. උපරිපාසාදෙ උපජ්ඣායො වසති, හෙට්ඨා සද්ධිවිහාරිකො, තං අදිස්වාව යාගුං පිවිත්වා පක්කමති, ආසනසාලාය වා නිසින්නං අදිස්වාව එකමන්තෙ භුඤ්ජිත්වා පක්කමති, ධම්මස්සවනමණ්ඩපෙ වා නිසින්නම්පි තං අදිස්වාව ධම්මං සුත්වා පක්කමති, නිස්සයො න පටිප්පස්සම්භති. එවං තාව දස්සනවසෙන සමොධානං වෙදිතබ්බං. "उपाध्याय के साथ मिलन (समोधान)" के विषय में यहाँ दर्शन और श्रवण के माध्यम से मिलन को समझना चाहिए। यदि आचार्य के आश्रय में रहने वाला सार्धविहारिक एक ही विहार में चैत्य की वन्दना करते हुए या एक ही गाँव में पिण्डपात के लिए घूमते हुए उपाध्याय को देखता है, तो निश्रय (निसय) पुनः स्थापित हो जाता है। यदि उपाध्याय देखता है, परन्तु सार्धविहारिक नहीं देखता, तो वह पुनः स्थापित नहीं होता। मार्ग पर चलते हुए या आकाश से जाते हुए उपाध्याय को देखकर दूरी के कारण यदि वह केवल 'भिक्षु है' ऐसा जानता है, 'उपाध्याय है' ऐसा नहीं जानता, तो वह पुनः स्थापित नहीं होता। यदि जानता है, तो पुनः स्थापित हो जाता है। यदि उपाध्याय प्रासाद के ऊपर रहता है और सार्धविहारिक नीचे, और उसे बिना देखे ही यवागू पीकर चला जाता है, या आसनशाला में बैठे हुए को बिना देखे ही एक ओर भोजन करके चला जाता है, या धर्मश्रवण मण्डप में बैठे हुए भी उन्हें बिना देखे ही धर्म सुनकर चला जाता है, तो निश्रय पुनः स्थापित नहीं होता। इस प्रकार पहले दर्शन के माध्यम से मिलन को समझना चाहिए। සවනවසෙන පන සචෙ උපජ්ඣායස්ස විහාරෙ වා අන්තරඝරෙ වා ධම්මං කථෙන්තස්ස අනුමොදනං වා කරොන්තස්ස සද්දං සුත්වා ‘‘උපජ්ඣායස්ස මෙ සද්දො’’ති සඤ්ජානාති, නිස්සයො පටිප්පස්සම්භති. අසඤ්ජානන්තස්ස න පටිප්පස්සම්භතීති අයං සමොධානෙ විනිච්ඡයො. श्रवण के माध्यम से, यदि विहार में या गाँव के भीतर धर्मोपदेश देते हुए या अनुमोदना करते हुए उपाध्याय के शब्द को सुनकर वह पहचान लेता है कि "यह मेरे उपाध्याय की आवाज़ है", तो निश्रय पुनः स्थापित हो जाता है। न पहचानने वाले के लिए वह पुनः स्थापित नहीं होता—यह मिलन के विषय में विनिश्चय है। නිස්සයපටිප්පස්සද්ධිකථා නිට්ඨිතා. निश्रय-प्रतिप्रश्रब्धि (निश्रय की समाप्ति/पुनः स्थापना) की कथा समाप्त हुई। උපසම්පාදෙතබ්බපඤ්චකකථා उपसम्पदा प्रदान करने योग्य पाँच गुणों (पञ्चक) की कथा। 84. ඉදානි යං පුබ්බෙ ‘‘අනුජානාමි භික්ඛවෙ බ්යත්තෙන භික්ඛුනා පටිබලෙන දසවස්සෙන වා අතිරෙකදසවස්සෙන වා උපසම්පාදෙතුං, නිස්සයං දාතු’’න්ති සඞ්ඛෙපතො උපජ්ඣායාචරියානං ලක්ඛණං වුත්තං, තං විත්ථාරතො දස්සෙතුං ‘‘පඤ්චහි, භික්ඛවෙ, අඞ්ගෙහි සමන්නාගතෙනා’’තිආදිමාහ. තත්ථ පඤ්චහි අඞ්ගෙහීති පඤ්චහි අගුණඞ්ගෙහි. සො හි සීලක්ඛන්ධාදීහි අසමන්නාගතත්තාව අගුණඞ්ගෙහි සමන්නාගතො හොති. න උපසම්පාදෙතබ්බන්ති උපජ්ඣායෙන [Pg.271] හුත්වා න උපසම්පාදෙතබ්බං. න නිස්සයො දාතබ්බොති ආචරියෙන හුත්වා නිස්සයො න දාතබ්බො. එත්ථ ච න අසෙක්ඛෙන සීලක්ඛන්ධෙනාති ච අත්තනා න අසෙක්ඛෙනාති ච අස්සද්ධොති ච ආදීසු තීසු පඤ්චකෙසු අයුත්තවසෙන පටික්ඛෙපො කතො, න ආපත්තිඅඞ්ගවසෙන. යො හි අසෙක්ඛෙහි සීලක්ඛන්ධාදීහි අසමන්නාගතො පරෙ ච තත්ථ සමාදපෙතුං අසක්කොන්තො අස්සද්ධියාදිදොසයුත්තොව හුත්වා පරිසං පරිහරති, තස්ස පරිසා සීලාදීහි පරිහායතියෙව, න වඩ්ඪති. තස්මා තෙන න උපසම්පාදෙතබ්බන්තිආදි අයුත්තවසෙන වුත්තං, න ආපත්තිඅඞ්ගවසෙන. න හි ඛීණාසවස්සෙව උපජ්ඣායාචරියභාවො භගවතා අනුඤ්ඤාතො. යදි තස්සෙව අනුඤ්ඤාතො අභවිස්ස, ‘‘සචෙ උපජ්ඣායස්ස අනභිරති උප්පන්නා හොතී’’තිආදිං න වදෙය්ය. යස්මා පන ඛීණාසවස්ස පරිසා සීලාදීහි න පරිහායති, තස්මා ‘‘පඤ්චහි භික්ඛවෙ අඞ්ගෙහි සමන්නාගතෙන භික්ඛුනා උපසම්පාදෙතබ්බ’’න්තිආදි වුත්තං. ८४. अब, जो पहले संक्षेप में उपाध्याय और आचार्य के लक्षण कहे गए थे कि "भिक्षुओं! मैं एक विद्वान, समर्थ, दस वर्ष या दस वर्ष से अधिक पुराने भिक्षु को उपसम्पदा देने और निश्रय देने की अनुमति देता हूँ", उसे विस्तार से दिखाने के लिए "भिक्षुओं! पाँच अंगों से युक्त..." आदि कहा गया है। वहाँ 'पाँच अंगों' से तात्पर्य पाँच अवगुणों (अगुण-अंगों) से है। वह शील-स्कन्ध आदि से रहित होने के कारण ही अवगुणों से युक्त होता है। "उपसम्पदा नहीं देनी चाहिए" का अर्थ है कि उपाध्याय बनकर उपसम्पदा नहीं देनी चाहिए। "निश्रय नहीं देना चाहिए" का अर्थ है कि आचार्य बनकर निश्रय नहीं देना चाहिए। यहाँ "अशैक्ष शील-स्कन्ध से रहित" आदि तीन पञ्चकों में अयोग्यता (अयुक्त) के कारण निषेध किया गया है, न कि आपत्ति के अंग के रूप में। जो अशैक्ष शील-स्कन्ध आदि से रहित होकर और दूसरों को उनमें समाहित करने में असमर्थ होकर, अश्रद्धा आदि दोषों से युक्त होकर परिषद का संचालन करता है, उसकी परिषद शील आदि से घटती ही है, बढ़ती नहीं। इसलिए उसके द्वारा "उपसम्पदा नहीं देनी चाहिए" आदि अयोग्यता के कारण कहा गया है, आपत्ति के कारण नहीं। भगवान ने केवल क्षीणाश्रव (अर्हन्त) को ही उपाध्याय या आचार्य होने की अनुमति दी हो, ऐसा नहीं है। यदि केवल उन्हीं को अनुमति होती, तो "यदि उपाध्याय को अनभिरति (अरुचि) उत्पन्न हो जाए" आदि नहीं कहते। चूँकि क्षीणाश्रव की परिषद शील आदि से कम नहीं होती, इसलिए "भिक्षुओं! पाँच अंगों से युक्त भिक्षु द्वारा उपसम्पदा दी जानी चाहिए" आदि कहा गया है। අධිසීලෙ සීලවිපන්නොතිආදීසු පාරාජිකඤ්ච සඞ්ඝාදිසෙසඤ්ච ආපන්නො අධිසීලෙ සීලවිපන්නො නාම. ඉතරෙ පඤ්චාපත්තික්ඛන්ධෙ ආපන්නො අජ්ඣාචාරෙ ආචාරවිපන්නො නාම. සම්මාදිට්ඨිං පහාය අන්තග්ගාහිකාය දිට්ඨියා සමන්නාගතො අතිදිට්ඨියා දිට්ඨිවිපන්නො නාම. යත්තකං සුතං පරිසං පරිහරන්තස්ස ඉච්ඡිතබ්බං, තෙන විරහිතත්තා අප්පස්සුතො. යං තෙන ජානිතබ්බං ආපත්තාදි, තස්ස අජානනතො දුප්පඤ්ඤො. ඉමස්මිං පඤ්චකෙ පුරිමානි තීණි පදානි අයුත්තවසෙන වුත්තානි, පච්ඡිමානි ද්වෙ ආපත්තිඅඞ්ගවසෙන. "अधिशील में शील-विपन्न" आदि में, पाराजिक और संघादिशेष आपत्ति को प्राप्त व्यक्ति 'अधिशील में शील-विपन्न' कहलाता है। अन्य पाँच आपत्ति-निकायों (आपात्ति-स्कन्धों) को प्राप्त व्यक्ति 'अध्याचार में आचार-विपन्न' कहलाता है। सम्यक् दृष्टि को छोड़कर अन्तग्राही (अतिवादी) दृष्टि से युक्त व्यक्ति 'अतिदृष्टि में दृष्टि-विपन्न' कहलाता है। परिषद का संचालन करने वाले आचार्य के लिए जितना श्रुत (ज्ञान) अपेक्षित है, उससे रहित होने के कारण वह 'अल्पश्रुत' है। उसे जो आपत्ति आदि जानना चाहिए, उसे न जानने के कारण वह 'दुष्प्रज्ञ' (मन्दबुद्धि) है। इस पञ्चक में पहले तीन पद अयोग्यता के कारण कहे गए हैं, और अंतिम दो आपत्ति के अंग के रूप में। ආපත්තිං න ජානාතීති ‘‘ඉදං නාම මයා කත’’න්ති වුත්තෙ ‘‘ඉමං නාම ආපත්තිං අයං ආපන්නො’’ති න ජානාති. වුට්ඨානං න ජානාතීති වුට්ඨානගාමිනිතො වා දෙසනාගාමිනිතො වා ආපත්තිතො එවං නාම වුට්ඨානං හොතීති න ජානාති. ඉමස්මිං පඤ්චකෙ පුරිමානි ද්වෙ පදානි අයුත්තවසෙන වුත්තානි, පච්ඡිමානි තීණි ආපත්තිඅඞ්ගවසෙන. "आपत्ति को नहीं जानता" का अर्थ है कि "मैंने यह कार्य किया है" ऐसा कहने पर, "यह भिक्षु इस नाम की आपत्ति को प्राप्त हुआ है" ऐसा वह नहीं जानता। "वुत्थान (आपत्ति से निकलना) को नहीं जानता" का अर्थ है कि वुत्थानगामी आपत्ति से या देशनागामी आपत्ति से इस प्रकार वुत्थान होता है, यह वह नहीं जानता। इस पञ्चक में पहले दो पद अयोग्यता के कारण कहे गए हैं, और अंतिम तीन आपत्ति के अंग के रूप में। ආභිසමාචාරිකාය සික්ඛායාති ඛන්ධකවත්තෙ විනෙතුං න පටිබලො හොතීති අත්ථො. ආදිබ්රහ්මචරියකායාති සෙක්ඛපණ්ණත්තියං විනෙතුං න පටිබලොති අත්ථො. අභිධම්මෙති නාමරූපපරිච්ඡෙදෙ විනෙතුං න පටිබලොති අත්ථො. අභිවිනයෙති සකලෙ විනයපිටකෙ විනෙතුං න පටිබලොති අත්ථො. විනෙතුං න පටිබලොති ච සබ්බත්ථ සික්ඛාපෙතුං න සක්කොතීති [Pg.272] අත්ථො. ධම්මතො විවෙචෙතුන්ති ධම්මෙන කාරණෙන විස්සජ්ජාපෙතුං. ඉමස්මි පඤ්චකෙ සබ්බපදෙසු ආපත්ති. ආපත්තිං න ජානාතීතිආදිපඤ්චකස්මිම්පි සබ්බපදෙසු ආපත්ති. ඌනදසවස්සපරියොසානපඤ්චකෙපි එසෙව නයො. ඉති ආදිතො තයො පඤ්චකා, චතුත්ථෙ තීණි පදානි, පඤ්චමෙ ද්වෙ පදානීති සබ්බෙපි චත්තාරො පඤ්චකා අයුත්තවසෙන වුත්තා. චතුත්ථපඤ්චකෙ ද්වෙ පදානි, පඤ්චමෙ තීණි, ඡට්ඨසත්තමඅට්ඨමා තයො පඤ්චකාති සබ්බෙපි චත්තාරො පඤ්චකා ආපත්තිඅඞ්ගවසෙන වුත්තා; සුක්කපක්ඛෙ අට්ඨසු අනාපත්තියෙවාති. "आभिसमाचारिक शिक्षा में" का अर्थ है कि वह खन्धक-वत्त (कर्तव्यों) में प्रशिक्षित करने में समर्थ नहीं है। "आदिब्रह्मचर्यक में" का अर्थ है कि वह शैक्ष्य-प्रज्ञप्ति (सिक्खापदों) में प्रशिक्षित करने में समर्थ नहीं है। "अभिधम्म में" का अर्थ है कि वह नाम-रूप के परिच्छेद (विश्लेषण) में प्रशिक्षित करने में समर्थ नहीं है। "अभिविनय में" का अर्थ है कि वह सम्पूर्ण विनयपिटक में प्रशिक्षित करने में समर्थ नहीं है। "प्रशिक्षित करने में समर्थ नहीं है" का अर्थ सभी स्थानों पर यह है कि वह सिखाने में सक्षम नहीं है। "धर्म के अनुसार विवेचन करना" का अर्थ है धर्म या कारण के द्वारा (आपत्ति को) छुड़वाना। इस पञ्चक के सभी पदों में आपत्ति होती है। "आपत्ति को नहीं जानता" आदि पञ्चक में भी सभी पदों में आपत्ति होती है। "दस वर्ष से कम वाले" पञ्चक में भी यही नियम है। इस प्रकार, आरम्भ के तीन पञ्चक, चौथे में तीन पद, और पाँचवें में दो पद—ये सभी चारों पञ्चक अयोग्यता के कारण कहे गए हैं। चौथे पञ्चक के (अंतिम) दो पद, पाँचवें के (अंतिम) तीन पद, और छठे, सातवें तथा आठवें—ये तीन पञ्चक—इस प्रकार ये सभी चारों पञ्चक आपत्ति के अंग के रूप में कहे गए हैं; शुक्लपक्ष (सकारात्मक पक्ष) के आठों पञ्चकों में अनापत्ति ही है। උපසම්පාදෙතබ්බපඤ්චකකථා නිට්ඨිතා. उपसम्पदा प्रदान करने योग्य पाँच गुणों (पञ्चक) की कथा समाप्त हुई। උපසම්පාදෙතබ්බඡක්කකථා उपसम्पदा प्रदान करने योग्य छह गुणों (छक्क) की कथा। 85. ඡක්කෙසු ඌනදසවස්සපදං විසෙසො, තං සබ්බත්ථ ආපත්තිකරං. සෙසං වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බං. තත්ථ උභයානි ඛො පනස්ස පාතිමොක්ඛානි විත්ථාරෙන න ස්වාගතානි හොන්තීති උභතොවිභඞ්ගවසෙන න ස්වාගතානි. න සුවිභත්තානීති මාතිකාවිභඞ්ගවසෙන. න සුප්පවත්තීනීති වාචුග්ගතවසෙන. න සුවිනිච්ඡිතානි සුත්තසො අනුබ්යඤ්ජනසොති මාතිකාතො ච විභඞ්ගතො ච න සුට්ඨු විනිච්ඡිතානි. ८५. छक्कों (छह के समूहों) में, 'दस वर्ष से कम' (ऊनदसवस्स) पद ही विशेषता है, जो पाँच के समूहों से अलग है; वह सभी छक्कों में आपत्ति उत्पन्न करने वाला है। शेष को पहले बताए गए तरीके से ही समझना चाहिए। वहाँ 'उसके दोनों पातिमोक्ख विस्तार से सुआगत (कण्ठस्थ) नहीं होते' का अर्थ है कि उभतोविभंग (दोनों विभंगों) के अनुसार वे सुआगत नहीं हैं। 'सुविभक्त नहीं हैं' का अर्थ है मातिका और विभंग के अनुसार। 'सुपवत्ति (प्रवाहपूर्ण) नहीं हैं' का अर्थ है वाचन (बोलने) के अभ्यास की दृष्टि से। 'सुविनिच्छित (भली-भाँति निश्चित) नहीं हैं सुत्त और अनुव्यंजन के अनुसार' का अर्थ है कि मातिका और विभंग दोनों से अच्छी तरह निश्चित नहीं किए गए हैं। උපසම්පාදෙතබ්බඡක්කකථා නිට්ඨිතා. उपसम्पदा के योग्य छक्कों की कथा समाप्त हुई। අඤ්ඤතිත්ථියපුබ්බවත්ථුකථා अन्यतीर्थिक पूर्व-वृत्तान्त कथा (अन्य मत से आए हुए व्यक्तियों की कथा)। 86. අඤ්ඤතිත්ථියපුබ්බවත්ථුස්මිං – යො තාව අයං පසූරො, සො තිත්ථියපක්කන්තකත්තා න උපසම්පාදෙතබ්බො. යො පන අඤ්ඤොපි නයිධ පබ්බජිතපුබ්බො ආගච්ඡති, තස්මිං යං කත්තබ්බං තං දස්සෙතුං ‘‘යො සො භික්ඛවෙ අඤ්ඤොපී’’තිආදිමාහ. තත්ථ තස්ස චත්තාරො මාසෙ පරිවාසො දාතබ්බොති අයං තිත්ථියපරිවාසො නාම; අප්පටිච්ඡන්නපරිවාසොතිපි වුච්චති. අයං පන නග්ගපරිබ්බාජකස්සෙව ආජීවකස්ස වා [Pg.273] අචෙලකස්ස වා දාතබ්බො. සචෙ සොපි සාටකං වා වාළකම්බලාදීනං අඤ්ඤතරං තිත්ථියද්ධජං වා නිවාසෙත්වා ආගච්ඡති, නාස්ස පරිවාසො දාතබ්බො. අඤ්ඤස්ස පන තාපසපණ්ඩරඞ්ගාදිකස්ස න දාතබ්බොව. ८६. अन्यतीर्थिक पूर्व-वृत्तान्त में — जहाँ तक इस पसूर (परिव्राजक) का प्रश्न है, वह तीर्थिकों के पक्ष में चले जाने के कारण उपसम्पदा के योग्य नहीं है। किन्तु जो कोई अन्य व्यक्ति, जिसने यहाँ (इस शासन में) पहले प्रव्रज्या नहीं ली है, आता है, उसके प्रति जो कर्तव्य है उसे दिखाने के लिए 'हे भिक्षुओं, जो वह अन्य भी है' इत्यादि कहा गया है। वहाँ 'उसे चार महीने का परिवास (परिवीक्षा) देना चाहिए' — इसे 'तीर्थिक परिवास' कहा जाता है; इसे 'अप्पटिच्छन्न परिवास' (बिना छिपाया हुआ परिवास) भी कहते हैं। यह परिवास केवल नग्न परिव्राजकों, आजीवकों या अचेलकों को ही दिया जाना चाहिए। यदि वह भी शाटक (वस्त्र) या मृग-रोम आदि से बने तीर्थिकों के ध्वज रूप किसी वस्त्र को पहनकर आता है, तो उसे परिवास नहीं देना चाहिए। अन्य तपस्वियों या श्वेत वस्त्र धारियों (पाण्डरंग) आदि को तो परिवास देना ही नहीं चाहिए। පඨමං කෙසමස්සුන්තිආදිනා තස්ස ආදිතොව සාමණෙරපබ්බජ්ජං දස්සෙති. එවං පබ්බාජෙන්තෙහි පන තස්මිං සඞ්ඝමජ්ඣෙ නිසින්නෙයෙව ‘‘ත්වං පබ්බාජෙහි, ත්වං ආචරියො හොහි, ත්වං උපජ්ඣායො හොහී’’ති ථෙරා භික්ඛූ න වත්තබ්බා. එවං වුත්තා හි සචෙ තස්ස ආචරියුපජ්ඣායභාවෙන ජිගුච්ඡන්තා න සම්පටිච්ඡන්ති, අථ සො ‘‘නයිමෙ මය්හං සද්දහන්තී’’ති කුජ්ඣිත්වාපි ගච්ඡෙය්ය. තස්මා තං එකමන්තං නෙත්වා තස්ස ආචරියුපජ්ඣායා පරියෙසිතබ්බා. 'पहले केश और दाढ़ी' इत्यादि के द्वारा उसके आरम्भ से ही सामणेर प्रव्रज्या को दिखाया गया है। इस प्रकार प्रव्रजित करते समय, जब वह संघ के बीच बैठा हो, तब स्थविर भिक्षुओं से यह नहीं कहना चाहिए कि 'आप प्रव्रजित करें, आप आचार्य बनें, आप उपाध्याय बनें'। क्योंकि ऐसा कहने पर, यदि वे उसके आचार्य या उपाध्याय बनने से घृणा करते हुए स्वीकार नहीं करते, तो वह यह सोचकर कि 'ये मुझ पर विश्वास नहीं करते', क्रोधित होकर जा भी सकता है। इसलिए उसे एक ओर ले जाकर उसके लिए आचार्य और उपाध्याय की खोज करनी चाहिए। 87. එවං ඛො භික්ඛවෙ අඤ්ඤතිත්ථියපුබ්බො ආරාධකො හොති, එවං අනාරාධකොති අයමස්ස පරිවාසවත්තදස්සනත්ථං මාතිකා. කථඤ්ච භික්ඛවෙතිආදි තස්සෙව විභඞ්ගො. තත්ථ අතිකාලෙන ගාමං පවිසතීති භික්ඛූනං වත්තකරණවෙලායමෙව ගාමං පිණ්ඩාය පවිසති. අතිදිවා පටික්කමතීති කුලඝරෙසු ඉත්ථිපුරිසදාරකදාරිකාදීහි සද්ධිං ගෙහස්සිතකථං කථෙන්තො තත්ථෙව භුඤ්ජිත්වා භික්ඛූසු පත්තචීවරං පටිසාමෙත්වා උද්දෙසපරිපුච්ඡාදීනි වා කරොන්තෙසු පටිසල්ලීනෙසු වා ආගච්ඡති; න උපජ්ඣායවත්තං නාචරියවත්තං කරොති, අඤ්ඤදත්ථු වසනට්ඨානං පවිසිත්වා නිද්දායති. එවම්පි භික්ඛවෙ අඤ්ඤතිත්ථියපුබ්බො අනාරාධකො හොතීති එවම්පි කරොන්තො පරිවාසවත්තස්ස සම්පාදකො පූරකො න හොති. ८७. 'हे भिक्षुओं, इस प्रकार अन्यतीर्थिक पूर्व (साधक) आराधक (सफल) होता है, और इस प्रकार अनाराधक' — यह उसके परिवास के व्रतों को दिखाने के लिए मातिका (संक्षेप) है। 'और कैसे, हे भिक्षुओं' इत्यादि उसी का विभंग (विस्तार) है। वहाँ 'अति-काल (बहुत जल्दी) गाँव में प्रवेश करता है' का अर्थ है कि भिक्षुओं के कर्तव्य पालन के समय ही वह भिक्षा के लिए गाँव में प्रवेश करता है। 'अति-दिवा (बहुत देर से) लौटता है' का अर्थ है कि कुलीन घरों में स्त्रियों, पुरुषों, बालकों, बालिकाओं आदि के साथ घर-गृहस्थी की बातें करते हुए, वहीं भोजन करके, तब लौटता है जब भिक्षु पात्र-चीवर संभाल चुके होते हैं या स्वाध्याय और प्रश्नोत्तर आदि कर रहे होते हैं या ध्यान में लीन होते हैं। वह न उपाध्याय के प्रति कर्तव्य करता है और न आचार्य के प्रति, बल्कि केवल निवास स्थान में जाकर सो जाता है। 'इस प्रकार भी, हे भिक्षुओं, अन्यतीर्थिक पूर्व अनाराधक होता है' का अर्थ है कि इस प्रकार आचरण करने वाला परिवास के व्रतों को पूरा करने वाला नहीं होता। වෙසියාගොචරො වාතිආදීසු වෙසියාති ආමිසකිඤ්චික්ඛසම්පදානාදිනා සුලභජ්ඣාචාරා රූපූපජීවිකා ඉත්ථියො. විධවාති මතපතිකා වා පවුත්ථපතිකා වා ඉත්ථියො; තා යෙන කෙනචි සද්ධිං මිත්තභාවං පත්ථෙන්ති. ථුල්ලකුමාරිකාති යොබ්බන්නප්පත්තා යොබ්බන්නාතීතා වා කුමාරියො; තා පුරිසාධිප්පායාව විචරන්ති, යෙන කෙනචි සද්ධිං මිත්තභාවං පත්ථෙන්ති. පණ්ඩකාති උස්සන්නකිලෙසා අවූපසන්තපරිළාහා නපුංසකා; තෙ පරිළාහවෙගාභිභූතා යෙන කෙනචි සද්ධිං මිත්තභාවං පත්ථෙන්ති. භික්ඛුනියොති සමානපබ්බජ්ජා ඉත්ථියො; තාහි සද්ධිං ඛිප්පමෙව විස්සාසො හොති, තතො සීලං භිජ්ජති. 'वेश्यागोचर' इत्यादि में 'वेश्या' वे स्त्रियाँ हैं जो थोड़े से आमिष (धन आदि) के बदले सुलभ दुराचार वाली और रूप-जीवी (वेश्या) होती हैं। 'विधवा' वे स्त्रियाँ हैं जिनके पति मर चुके हैं या कहीं बाहर गए हुए हैं; वे किसी के भी साथ मित्रता की इच्छा रखती हैं। 'थुल्लकुमारिका' (बड़ी कुमारी) वे कुमारियाँ हैं जो युवावस्था को प्राप्त कर चुकी हैं या उसे पार कर चुकी हैं; वे पुरुषों की अभिलाषा में ही घूमती हैं और किसी के भी साथ मित्रता चाहती हैं। 'पण्डक' वे नपुंसक हैं जिनमें क्लेशों की अधिकता होती है और जिनकी काम-वासना शांत नहीं होती; वे वासना के वेग से अभिभूत होकर किसी के भी साथ मित्रता चाहते हैं। 'भिक्षुणियाँ' वे स्त्रियाँ हैं जिनकी प्रव्रज्या समान है; उनके साथ शीघ्र ही विश्वास (घनिष्ठता) हो जाता है, जिससे शील भंग हो जाता है। තත්ථ [Pg.274] වෙසියානං කුලෙසු කුලුපකො හුත්වා පිණ්ඩපාතචරියාදීහි වා අපදිසිත්වා සිනෙහසන්ථවජාතෙන හදයෙන අභිණ්හදස්සනසල්ලාපකාමතාය තාසං සන්තිකං උපසඞ්කමන්තො ‘‘වෙසියාගොචරො’’ති වුච්චති, සො නචිරස්සෙව ‘‘අසුකවෙසියා සද්ධිං ගතො’’ති වත්තබ්බතං පාපුණාති. එස නයො සබ්බත්ථ. සචෙ පන වෙසියාදයො සලාකභත්තාදීනි දෙන්ති, භික්ඛූහි සද්ධිං ගන්ත්වා සද්ධිංයෙව භුඤ්ජිත්වා වා ගහෙත්වා වා ආගන්තුං වට්ටති. ගිලානා භික්ඛුනියො ඔවදිතුං වා ධම්මං වා දෙසෙතුං උද්දෙසපරිපුච්ඡාදීනි වා දාතුං ගච්ඡන්තෙහි භික්ඛූහි සද්ධිං ගන්තුං වට්ටති. යො පන තථා ආගන්ත්වා මිත්තසන්ථවවසෙන ගච්ඡති, අයං අනාරාධකො හොති. वहाँ वेश्याओं के घरों में कुलूपक (नियमित जाने वाला) बनकर, या भिक्षाटन आदि का बहाना बनाकर, स्नेह और परिचय के कारण मन में बार-बार देखने और बात करने की इच्छा से उनके पास जाने वाले को 'वेश्यागोचर' कहा जाता है। वह शीघ्र ही इस बदनामी को प्राप्त होता है कि 'वह अमुक वेश्या के साथ गया है'। यही नियम सब पर लागू होता है। किन्तु यदि वेश्या आदि शलाका-भक्त (पर्ची वाला भोजन) आदि देती हैं, तो भिक्षुओं के साथ जाकर, साथ ही भोजन करके या लेकर आना उचित है। बीमार भिक्षुणियों को उपदेश देने या धर्म-देशना देने या स्वाध्याय-प्रश्नोत्तर आदि के लिए जाने वाले भिक्षुओं के साथ जाना उचित है। किन्तु जो वैसा न करके मित्रता और परिचय के वश में होकर जाता है, वह अनाराधक होता है। උච්චාවචානි කරණීයානීති මහන්තඛුද්දකානි කම්මානි. තත්ථ ඝණ්ටිං පහරිත්වා සමග්ගෙන සඞ්ඝෙන සන්නිපතිත්වා කත්තබ්බානි චෙතියමහාපාසාදපටිසඞ්ඛරණාදීනි කම්මානි උච්චානි නාම. චීවරධොවනරජනාදීනි ඛන්ධකපරියාපන්නානි ච අග්ගිසාලවත්තාදීනි ආභිසමාචාරිකානි අවචානි නාම. තත්ථ න දක්ඛො හොතීති තෙසු කම්මෙසු ඡෙකො සුසික්ඛිතො න හොති. න අනලසොති උට්ඨානවීරියසම්පන්නො න හොති; ‘‘භික්ඛුසඞ්ඝස්ස කම්මං අත්ථී’’ති සුත්වා පගෙව භත්තකිච්චං කත්වා ගබ්භන්තරං පවිසිත්වා යාවදත්ථං සුපිත්වා සායං නික්ඛමති. තත්රුපායායාති තෙසු කම්මෙසු උපායභූතාය. වීමංසායාති ඨානුප්පත්තිකවීමංසාය. ‘‘ඉදමෙවං කත්තබ්බං, ඉදමෙවං න කත්තබ්බ’’න්ති තස්මිංයෙව ඛණෙ උප්පන්නපඤ්ඤාය සමන්නාගතො න හොති. න අලං කාතුං න අලං සංවිධාතුන්ති සහත්ථාපි කාතුං සමත්ථො න හොති; ‘‘ගණ්හථ භන්තෙ, ගණ්හ දහර, ගණ්හ සාමණෙර, සචෙ තුම්හෙ වා න කරිස්සථ, අම්හෙ වා න කරිස්සාම, කො දානි ඉමං කරිස්සතී’’ති එවං උස්සාහං ජනෙත්වා සංවිධාතුං අඤ්ඤමඤ්ඤං කාරෙතුම්පි සමත්ථො න හොති. භික්ඛූහි ‘‘කම්මං කරිස්සාමා’’ති වුත්තෙ කිඤ්චි රොගං අපදිසති, භික්ඛූනං කම්මං කරොන්තානං සමීපෙනෙව විචරති, සීසමෙව දස්සෙති, අයම්පි අනාරාධකො හොති. "उच्चावचानी करणीयानी" का अर्थ है बड़े और छोटे कार्य। उनमें से, घंटा बजाकर समग्र संघ के एकत्रित होने पर किए जाने वाले कार्य, जैसे चैत्य या महाप्रासाद की मरम्मत आदि, 'उच्च' (बड़े) कार्य कहलाते हैं। चीवर धोना, रंगना आदि, जो खन्धक के कर्तव्यों के अंतर्गत आते हैं, और अग्निशाला (रसोई/अलाव घर) के कर्तव्य आदि आभिसमाचारिक कार्य 'अवच' (छोटे) कार्य कहलाते हैं। "वहाँ दक्ष नहीं होता" का अर्थ है कि वह उन कार्यों में चतुर और सुशिक्षित नहीं होता। "आलसी नहीं होता" (यहाँ इसका अर्थ है कि वह आलसी होता है) का अर्थ है कि वह उत्थान-वीर्य (परिश्रम) से संपन्न नहीं होता; "भिक्षु संघ का कार्य है" यह सुनकर, वह पहले ही भोजन कर लेता है, कमरे के भीतर जाकर इच्छानुसार सोता है और शाम को बाहर निकलता है। "तत्रुपायाय" का अर्थ है उन कार्यों के उपायों के विषय में। "वीमंसाय" का अर्थ है परिस्थिति के अनुसार उत्पन्न होने वाली विचार-बुद्धि (जाँच-परख)। "यह इस प्रकार करना चाहिए, यह इस प्रकार नहीं करना चाहिए" - उस क्षण उत्पन्न होने वाली ऐसी प्रज्ञा से वह युक्त नहीं होता। "न करने में समर्थ है, न प्रबंध करने में समर्थ है" का अर्थ है कि वह स्वयं अपने हाथों से कार्य करने में समर्थ नहीं होता; "भन्ते! इसे पकड़िये; ओ युवा भिक्षु! इसे पकड़ो; ओ श्रामणेर! इसे पकड़ो; यदि आप लोग नहीं करेंगे, और हम भी नहीं करेंगे, तो अब इसे कौन करेगा?" - इस प्रकार उत्साह जगाकर प्रबंध करने या दूसरों से कार्य कराने में भी वह समर्थ नहीं होता। जब भिक्षुओं द्वारा कहा जाता है कि "हम कार्य करेंगे", तो वह किसी बीमारी का बहाना बनाता है, कार्य करते हुए भिक्षुओं के पास ही घूमता रहता है और केवल अपना सिर दिखाता है (दिखावा करता है); ऐसा व्यक्ति भी 'अनाराधक' (संतुष्ट न करने वाला) होता है। න තිබ්බච්ඡන්දො හොතීති බලවච්ඡන්දො න හොති. උද්දෙසෙති පාළිපරියාපුණනෙ. පරිපුච්ඡායාති අත්ථසවනෙ. අධිසීලෙති පාතිමොක්ඛසීලෙ. අධිචිත්තෙති ලොකියසමාධිභාවනාය. අධිපඤ්ඤායාති ලොකුත්තරමග්ගභාවනාය. "तीव्र छंद वाला नहीं होता" का अर्थ है कि उसमें प्रबल उत्साह नहीं होता। "उद्देश" का अर्थ है पालि सीखना। "परिपृच्छा" का अर्थ है अर्थ सुनना (समझना)। "अधिशील" का अर्थ है पातिमोक्ख संवर शील। "अधिचित्त" का अर्थ है लौकिक समाधि की भावना। "अधिप्रज्ञा" का अर्थ है लोकोत्तर मार्ग की भावना। සඞ්කන්තො [Pg.275] හොතීති ඉධාගතො හොති. තස්ස සත්ථුනොති තස්ස තිත්ථායතනසාමිකස්ස. තස්ස දිට්ඨියාති තස්ස සන්තකාය ලද්ධියා. ඉදානි සායෙව ලද්ධි යස්මා තස්ස තිත්ථකරස්ස ඛමති චෙව රුච්චති ච ‘‘ඉදමෙව සච්ච’’න්ති ච දළ්හග්ගාහෙන ගහිතා; තස්මා තස්ස ඛන්ති රුචි ආදායොති වුච්චති. තෙන වුත්තං – ‘‘තස්ස ඛන්තියා තස්ස රුචියා තස්ස ආදායස්සා’’ති. අවණ්ණෙ භඤ්ඤමානෙති ගරහාය භඤ්ඤමානාය. අනභිරද්ධොති අපරිපුණ්ණසඞ්කප්පො; නො පග්ගහිතචිත්තො. උදග්ගොති අබ්භුන්නතකායචිත්තො. ඉදං භික්ඛවෙ සඞ්ඝාතනිකං අඤ්ඤතිත්ථියපුබ්බස්ස අනාරාධනීයස්මින්ති භික්ඛවෙ යමිදං තස්ස සත්ථුනො තස්සෙව ච ලද්ධියා අවණ්ණෙ භඤ්ඤමානෙ ‘‘කිං ඉමෙ පරං ගරහන්තී’’ති කායවචීවිකාරනිබ්බත්තකං අනත්තමනත්තං, බුද්ධාදීනඤ්ච අවණ්ණෙ භඤ්ඤමානෙ අත්තමනත්තං, යඤ්ච තස්සෙව සත්ථුනො තස්සෙව ච ලද්ධියා වණ්ණෙ භඤ්ඤමානෙ අත්තමනත්තං, බුද්ධාදීනඤ්ච වණ්ණභණනෙ අනත්තමනත්තං, ඉදං අඤ්ඤතිත්ථියපුබ්බස්ස අනාරාධනීයස්මිං සඞ්ඝාතනිකං, අනාරාධකෙ පරිවාසවත්තං අපූරකෙ කම්මෙ ඉදං ලිඞ්ගං, ඉදං ලක්ඛණං, ඉදමචලප්පමාණන්ති වුත්තං හොති. එවං අනාරාධකො ඛො භික්ඛවෙ අඤ්ඤතිත්ථියපුබ්බො ආගතො න උපසම්පාදෙතබ්බොති ඉතො එකෙනපි අඞ්ගෙන සමන්නාගතො න උපසම්පාදෙතබ්බො. සුක්කපක්ඛෙ සබ්බං වුත්තවිපල්ලාසෙන වෙදිතබ්බං. "संक्रान्त होता है" का अर्थ है यहाँ (इस शासन में) आया हुआ। "उस शास्ता का" का अर्थ है उस तीर्थायतन (अन्य मत) के स्वामी का। "उसकी दृष्टि का" का अर्थ है उसके अपने मत (सिद्धांत) का। चूँकि वह मत उस तीर्थंकर (मत प्रवर्तक) को प्रिय है और उसे रुचता है, और "यही सत्य है" इस प्रकार दृढ़ता से ग्रहण किया गया है; इसलिए उसे उसकी 'क्षान्ति, रुचि और ग्रहण' (आदाय) कहा जाता है। इसीलिए कहा गया है - "उसकी क्षान्ति से, उसकी रुचि से, उसके ग्रहण से"। "अवर्ण (निंदा) कहे जाने पर" का अर्थ है निंदात्मक वचन कहे जाने पर। "अनभिरद्ध" का अर्थ है अपूर्ण संकल्प वाला; जिसका चित्त उत्साहित नहीं है। "उदग्र" का अर्थ है अत्यंत प्रफुल्लित शरीर और चित्त वाला। "हे भिक्षुओं! यह अन्यतीर्थिक-पूर्व (श्रामणेर) के अनाराधनीय होने का संघातनिक (लक्षणों का समूह) है" - इसका अर्थ है कि जब उस शास्ता और उसके मत की निंदा की जाती है, तब "ये लोग दूसरों की निंदा क्यों कर रहे हैं?" इस प्रकार का कायिक और वाचिक विकार उत्पन्न करने वाला जो 'अनत्तमनता' (अप्रसन्नता) है, और बुद्ध आदि की निंदा किए जाने पर जो 'अत्तमनता' (प्रसन्नता) है; तथा उस शास्ता और उसके मत की प्रशंसा किए जाने पर जो प्रसन्नता है, और बुद्ध आदि की प्रशंसा किए जाने पर जो अप्रसन्नता है - यह सब अन्यतीर्थिक-पूर्व के अनाराधनीय होने का समूह है। संतुष्ट न करने वाले और परिवास के कर्तव्यों को पूरा न करने वाले के कार्य में यह चिह्न है, यह लक्षण है, यह अटल प्रमाण है - ऐसा कहा गया है। "हे भिक्षुओं! इस प्रकार अनाराधक अन्यतीर्थिक-पूर्व का उपसंपदा नहीं करनी चाहिए" - इनमें से एक भी अंग से युक्त होने पर उसकी उपसंपदा नहीं करनी चाहिए। शुक्ल पक्ष (सकारात्मक पक्ष) में सब कुछ कहे गए के विपरीत समझना चाहिए। එවං ආරාධකො ඛො භික්ඛවෙති එවං නාතිකාලෙන ගාමප්පවෙසනා නාතිදිවා පටික්කමනං, න වෙසියාදිගොචරතා, සබ්රහ්මචාරීනං කිච්චෙසු දක්ඛතාදි, උද්දෙසාදීසු තිබ්බච්ඡන්දතා, තිත්ථියානං අවණ්ණභණනෙ අත්තමනතා, බුද්ධාදීනං අවණ්ණභණනෙ අනත්තමනතා, තිත්ථියානං වණ්ණභණනෙ අනත්තමනතා, බුද්ධාදීනං වණ්ණභණනෙ අත්තමනතාති ඉමෙසං අට්ඨන්නං තිත්ථියවත්තානං පරිපූරණෙන ආරාධකො පරිතොසකො භික්ඛූනං අඤ්ඤතිත්ථියපුබ්බො ආගතො උපසම්පාදෙතබ්බො. "हे भिक्षुओं! इस प्रकार आराधक (संतुष्ट करने वाला)" - इस प्रकार बहुत जल्दी गाँव में प्रवेश न करना, बहुत देर से वापस न आना, वेश्या आदि के स्थानों पर न जाना, सब्रह्मचारियों के कार्यों में दक्षता आदि, उद्देश (सीखने) आदि में तीव्र उत्साह, तीर्थंकरों की निंदा होने पर प्रसन्नता, बुद्ध आदि की निंदा होने पर अप्रसन्नता, तीर्थंकरों की प्रशंसा होने पर अप्रसन्नता, और बुद्ध आदि की प्रशंसा होने पर प्रसन्नता - इन आठ तीर्थिक-कर्तव्यों की परिपूर्णता से भिक्षुओं को संतुष्ट करने वाले अन्यतीर्थिक-पूर्व की उपसंपदा करनी चाहिए। සචෙ පන උපසම්පදමාළකෙපි එකං වත්තං භින්දති, පුන චත්තාරො මාසෙ පරිවසිතබ්බං. යථා පන භින්නසික්ඛාය සික්ඛමානාය පුන සික්ඛාපදානි ච සික්ඛාසම්මුති ච දිය්යති, එවං නයිමස්ස කිඤ්චි පුන දාතබ්බමත්ථි. පුබ්බෙ දින්නපරිවාසොයෙව හි තස්ස පරිවාසො. තස්මා පුන චත්තාරො මාසෙ පරිවසිතබ්බං. සචෙ පරිවසන්තො අන්තරා අට්ඨ සමාපත්තියො නිබ්බත්තෙති, ලොකියධම්මො [Pg.276] නාම කුප්පනසභාවො, න උපසම්පාදෙතබ්බො. චත්තාරො මාසෙ පූරිතවත්තොව උපසම්පාදෙතබ්බො. සචෙ පන පරිවසන්තො චත්තාරි මහාභූතානි පරිග්ගණ්හති, උපාදාරූපානි පරිච්ඡින්දති, නාමරූපං වවත්ථපෙති, තිලක්ඛණං ආරොපෙත්වා විපස්සනං ආරභති, ලොකියධම්මො නාම කුප්පනසභාවො, නෙව උපසම්පාදෙතබ්බො. සචෙ පන විපස්සනං වඩ්ඪෙත්වා සොතාපත්තිමග්ගං පටිලභති, පරිපුණ්ණංයෙව හොති වත්තං. සමූහතානි සබ්බදිට්ඨිගතානි අබ්බුළ්හං විචිකිච්ඡාසල්ලං තංදිවසමෙව උපසම්පාදෙතබ්බො. සචෙපි තිත්ථියලිඞ්ගෙ ඨිතො සොතාපන්නො හොති, පරිවාසකිච්චං නත්ථි, තදහෙව පබ්බාජෙත්වා උපසම්පාදෙතබ්බො. यदि वह उपसंपदा-मण्डप में भी एक भी कर्तव्य को भंग करता है, तो उसे फिर से चार महीने का परिवास करना चाहिए। जैसे शिक्षा भंग करने वाली शिक्षमाणा को पुनः शिक्षापद और शिक्षा-सम्मति दी जाती है, वैसे इसे पुनः कुछ देने की आवश्यकता नहीं है। पहले दिया गया परिवास ही उसका परिवास है। इसलिए उसे पुनः चार महीने परिवास करना चाहिए। यदि परिवास करते समय बीच में वह आठ समापत्तियाँ प्राप्त कर लेता है, तो चूँकि लौकिक धर्म विनाशशील स्वभाव के होते हैं, इसलिए उसकी उपसंपदा नहीं करनी चाहिए। चार महीने का कर्तव्य पूरा करने वाले की ही उपसंपदा करनी चाहिए। यदि परिवास करते समय वह चार महाभूतों को ग्रहण करता है, उपादा-रूपों का परिच्छेद करता है, नाम-रूप का निर्धारण करता है, और त्रिलक्षणों पर आरोपित कर विपश्यना आरंभ करता है, तो चूँकि लौकिक धर्म विनाशशील स्वभाव के होते हैं, इसलिए उसकी उपसंपदा नहीं करनी चाहिए। यदि वह विपश्यना को बढ़ाकर स्रोतापत्ति मार्ग प्राप्त कर लेता है, तो उसका कर्तव्य पूर्ण हो जाता है। सभी दृष्टिगत (मिथ्या दृष्टियाँ) समूल नष्ट हो जाती हैं और विचिकित्सा रूपी शल्य निकल जाता है; अतः उसी दिन उसकी उपसंपदा कर देनी चाहिए। यदि वह तीर्थिक के वेश में रहते हुए भी स्रोतापन्न हो जाता है, तो परिवास का कोई कार्य शेष नहीं रहता; उसी दिन उसे प्रव्रजित कर उपसंपदा दे देनी चाहिए। උපජ්ඣායමූලකං චීවරං පරියෙසිතබ්බන්ති උපජ්ඣායං ඉස්සරං කත්වා තස්ස චීවරං පරියෙසිතබ්බං. පත්තම්පි තථෙව. තස්මා යදි උපජ්ඣායස්ස පත්තචීවරං අත්ථි, ‘‘ඉමස්ස දෙහී’’ති වත්තබ්බො. අථ නත්ථි, අඤ්ඤෙ දාතුකාමා හොන්ති, තෙහිපි උපජ්ඣායස්සෙව දාතබ්බං ‘‘ඉදං තුම්හාකං කත්වා ඉමස්ස දෙථා’’ති. කස්මා? තිත්ථියා නාම විලොමා හොන්ති ‘‘සඞ්ඝෙන මෙ පත්තචීවරං දින්නං, කිං මය්හං තුම්හෙසු ආයත්ත’’න්ති වත්වා ඔවාදානුසාසනිං න කරෙය්යුං, උපජ්ඣායෙන පන ආයත්තජීවිකත්තා තස්ස වචනකරො භවිස්සති. තෙනස්ස ‘‘උපජ්ඣායමූලකං චීවරං පරියෙසිතබ්බ’’න්ති වුත්තං. භණ්ඩුකම්මායාති කෙසොරොපනත්ථං. භණ්ඩුකම්මකථා පරතො ආගමිස්සති. "उपाध्याय-मूलक चीवर खोजना चाहिए" का अर्थ है उपाध्याय को स्वामी (अधिकारी) बनाकर उनके लिए चीवर खोजना चाहिए। पात्र के लिए भी वैसा ही है। इसलिए यदि उपाध्याय के पास पात्र-चीवर हो, तो कहना चाहिए, "इसे इस (शामणेर) को दे दें।" यदि नहीं है और अन्य लोग देना चाहते हैं, तो उन्हें भी उपाध्याय को ही देना चाहिए, यह कहकर कि "इसे अपना बनाकर इसे (शामणेर को) दे दें।" क्यों? क्योंकि अन्यतीर्थिक स्वभाव से प्रतिकूल होते हैं, वे कह सकते हैं कि "संघ ने मुझे पात्र-चीवर दिया है, मेरा आपसे क्या लेना-देना?" और वे उपदेश-अनुशासन का पालन नहीं करेंगे। परंतु उपाध्याय पर आजीविका के लिए आश्रित होने के कारण वे उनकी बात मानेंगे। इसीलिए कहा गया है "उपाध्याय-मूलक चीवर खोजना चाहिए"। "भण्डुकम्माय" का अर्थ है सिर मुँडाने के प्रयोजन के लिए। भण्डुकर्म की कथा आगे आएगी। අග්ගිකාති අග්ගිපරිචරණකා. ජටිලකාති තාපසා. එතෙ භික්ඛවෙ කිරියවාදිනොති එතෙ කිරියං න පටිබාහන්ති, ‘‘අත්ථි කම්මං, අත්ථි කම්මවිපාකො’’ති එවංදිට්ඨිකා. සබ්බබුද්ධා හි නෙක්ඛම්මපාරමිං පූරයමානා එතදෙව පබ්බජ්ජං පබ්බජිත්වා පූරෙසුං, මයාපි තථෙව පූරිතා, න එතෙසං සාසනෙ පබ්බජ්ජා විලොමා, තස්මා උපසම්පාදෙතබ්බා, න තෙසං පරිවාසො දාතබ්බොති. ඉමාහං භික්ඛවෙ ඤාතීනං ආවෙණිකං පරිහාරං දම්මීති ඉමං අහං තෙසං පාටෙක්කං ඔදිස්සකං පරිහාරං දදාමි. කස්මා එවමාහ? තෙ හි තිත්ථායතනෙ පබ්බජිතාපි සාසනස්ස අවණ්ණකාමා න හොන්ති, අම්හාකං ඤාතිසෙට්ඨස්ස සාසනන්ති වණ්ණවාදිනොව හොන්ති, තස්මා එවමාහාති. "अग्गिक" का अर्थ है अग्नि की परिचर्या करने वाले। "जटिलक" का अर्थ है तपस्वी। "हे भिक्षुओं, ये क्रियावादी हैं" का अर्थ है कि ये क्रिया (कर्म) का निषेध नहीं करते, "कर्म है, कर्म का विपाक है" ऐसी दृष्टि वाले हैं। सभी बुद्धों ने नैष्क्रम्य पारमिता पूर्ण करते समय इसी प्रव्रज्या को ग्रहण कर उसे पूर्ण किया, मैंने भी वैसे ही पूर्ण किया। इनके शासन में प्रव्रज्या प्रतिकूल नहीं है, इसलिए इन्हें उपसंपदा देनी चाहिए, इन्हें परिवास नहीं देना चाहिए। "हे भिक्षुओं, मैं इन ज्ञातियों (रिश्तेदारों) को यह विशेष छूट देता हूँ" का अर्थ है कि मैं उन्हें यह पृथक और विशिष्ट परिहार देता हूँ। ऐसा क्यों कहा? क्योंकि वे अन्य मतों में प्रव्रजित होने पर भी शासन की निंदा नहीं करते, बल्कि "यह हमारे श्रेष्ठ ज्ञाति का शासन है" ऐसा कहकर गुणगान ही करते हैं, इसलिए ऐसा कहा। අඤ්ඤතිත්ථියපුබ්බවත්ථුකථා නිට්ඨිතා. अन्यतीर्थिक-पूर्व की कथा समाप्त हुई। පඤ්චාබාධවත්ථුකථා पंच-आबाध (पाँच रोगों) की कथा। 88. මගධෙසු [Pg.277] පඤ්ච ආබාධා උස්සන්නා හොන්තීති මගධනාමකෙ ජනපදෙ මනුස්සානඤ්ච අමනුස්සානඤ්ච පඤ්ච රොගා උස්සන්නා වුඩ්ඪිප්පත්තා ඵාතිප්පත්තා හොන්ති. ජීවකකොමාරභච්චකථා චීවරක්ඛන්ධකෙ ආවිභවිස්සති. න භික්ඛවෙ පඤ්චහි ආබාධෙහි ඵුට්ඨො පබ්බාජෙතබ්බොති යෙ තෙ කුට්ඨාදයො පඤ්ච ආබාධා උස්සන්නා, තෙහි ඵුට්ඨො අභිභූතො න පබ්බාජෙතබ්බො. ८८. "मगध में पाँच रोग फैले हुए थे" का अर्थ है मगध नामक जनपद में मनुष्यों और अमनुष्यों में पाँच रोग बहुत बढ़ गए थे, वृद्धि और विस्तार को प्राप्त हो गए थे। जीवक कौमारभृत्य की कथा चीवर स्कन्धक में स्पष्ट होगी। "हे भिक्षुओं, पाँच रोगों से ग्रस्त व्यक्ति को प्रव्रजित नहीं करना चाहिए" का अर्थ है कि जो कुष्ठ आदि पाँच रोग फैले हुए हैं, उनसे ग्रस्त और अभिभूत व्यक्ति को प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। තත්ථ කුට්ඨන්ති රත්තකුට්ඨං වා හොතු කාළකුට්ඨං වා, යංකිඤ්චි කිටිභදද්දුකච්ඡුආදිප්පභෙදම්පි සබ්බං කුට්ඨමෙවාති වුත්තං. තඤ්චෙ නඛපිට්ඨිප්පමාණම්පි වඩ්ඪනකපක්ඛෙ ඨිතං හොති, න පබ්බාජෙතබ්බො. සචෙ පන නිවාසනපාරුපනෙහි පකතිපටිච්ඡන්නෙ ඨානෙ නඛපිට්ඨිප්පමාණං අවඩ්ඪනකපක්ඛෙ ඨිතං හොති, වට්ටති. මුඛෙ පන හත්ථපාදපිට්ඨෙසු වා සචෙපි අවඩ්ඪනකපක්ඛෙ ඨිතං නඛපිට්ඨිතො ච ඛුද්දකතරම්පි, න වට්ටතියෙවාති කුරුන්දියං වුත්තං. තිකිච්ඡාපෙත්වා පබ්බාජෙන්තෙනාපි පකතිවණ්ණෙ ජාතෙයෙව පබ්බාජෙතබ්බො. ගොධාපිට්ඨිසදිසචුණ්ණඔකිරණකසරීරම්පි පබ්බාජෙතුං න වට්ටති. वहाँ "कुष्ठ" का अर्थ है चाहे वह रक्त-कुष्ठ (लाल) हो या काल-कुष्ठ (काला), या कोई भी किटिभ (दाद), दद्रु (खुजली), कच्छु (खाज) आदि के भेद वाला हो, वह सब कुष्ठ ही कहा गया है। यदि वह नाखून के अग्रभाग के बराबर भी हो और बढ़ने वाला हो, तो प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। यदि वह अंतर्वासक और उत्तरासंग (चीवरों) से ढके जाने वाले स्थान पर हो, नाखून के अग्रभाग के बराबर हो और बढ़ने वाला न हो, तो प्रव्रजित करना कल्प्य है। परंतु यदि चेहरे पर या हाथ-पैर के ऊपरी भाग पर हो, भले ही वह बढ़ने वाला न हो और नाखून के अग्रभाग से भी छोटा हो, तो भी प्रव्रजित करना कल्प्य नहीं है - ऐसा कुरुन्दी अट्ठकथा में कहा गया है। चिकित्सा कराकर प्रव्रजित करते समय भी जब त्वचा का रंग सामान्य हो जाए, तभी प्रव्रजित करना चाहिए। गोह की पीठ के समान चूर्ण बिखरे हुए शरीर वाले को भी प्रव्रजित करना कल्प्य नहीं है। ගණ්ඩොති මෙදගණ්ඩො වා හොතු අඤ්ඤො වා යො කොචි කොලට්ඨිමත්තකොපි චෙ වඩ්ඪනකපක්ඛෙ ඨිතො ගණ්ඩො හොති, න පබ්බාජෙතබ්බො. පටිච්ඡන්නට්ඨානෙ පන කොලට්ඨිමත්තෙ අවඩ්ඪනකපක්ඛෙ ඨිතො වට්ටති. මුඛාදිකෙ අප්පටිච්ඡන්නට්ඨානෙ අවඩ්ඪනකපක්ඛෙ ඨිතොපි න වට්ටති. තිකිච්ඡාපෙත්වා පබ්බාජෙන්තෙනාපි සරීරං සඤ්ඡවිං කාරෙත්වාව පබ්බාජෙතබ්බො. උණ්ණිගණ්ඩා නාම හොන්ති ගොථනා විය අඞ්ගුලිකා විය ච තත්ථ තත්ථ ලම්බන්ති, එතෙපි ගණ්ඩායෙව. තෙසු සති පබ්බාජෙතුං න වට්ටති. දහරකාලෙ ඛීරපිළකා යොබ්බන්නකාලෙ ච මුඛෙ ඛරපිළකා නාම හොන්ති, මහල්ලකකාලෙ නස්සන්ති, න තා ගණ්ඩසඞ්ඛ්යං ගච්ඡන්ති, තාසු සති පබ්බාජෙතුං වට්ටති. අඤ්ඤෙ පන සරීරෙ ඛරපිළකා නාම අපරා පදුමකණ්ණිකා නාම හොන්ති, අඤ්ඤා සාසපබීජකා නාම සාසපමත්තා එව සකලසරීරං ඵරන්ති, තා සබ්බා කුට්ඨජාතිකා එව. තාසු සති න පබ්බාජෙතබ්බො. "गण्ड" (फोड़ा) का अर्थ है चाहे वह मेद-गण्ड (चर्बी वाला फोड़ा) हो या कोई अन्य, यदि वह बेर की गुठली के बराबर भी हो और बढ़ने वाला हो, तो प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। ढके हुए स्थान पर यदि बेर की गुठली के बराबर हो और बढ़ने वाला न हो, तो कल्प्य है। चेहरे आदि न ढके जाने वाले स्थानों पर यदि बढ़ने वाला न भी हो, तो भी कल्प्य नहीं है। चिकित्सा कराकर प्रव्रजित करते समय भी शरीर की त्वचा को ठीक कराकर ही प्रव्रजित करना चाहिए। "उण्णिगण्ड" (मस्से) होते हैं जो गाय के थन के समान या उँगलियों के समान यहाँ-वहाँ लटकते हैं, ये भी गण्ड ही हैं। इनके होने पर प्रव्रजित करना कल्प्य नहीं है। बचपन में दूध की फुंसियाँ और युवावस्था में चेहरे पर "खरपिळका" (मुँहासे) होते हैं, जो वृद्धावस्था में नष्ट हो जाते हैं, उनकी गणना गण्ड में नहीं होती; उनके होने पर प्रव्रजित करना कल्प्य है। परंतु शरीर पर अन्य "खरपिळका" नामक फुंसियाँ, या "पदुमकण्णिका" (कमल की पंखुड़ी जैसी) नामक फोड़े, या "सासपबीजक" (सरसों के दाने जैसी) नामक फुंसियाँ जो सरसों के दाने के बराबर होकर पूरे शरीर में फैल जाती हैं, वे सब कुष्ठ की श्रेणी में ही आती हैं। उनके होने पर प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। කිලාසොති [Pg.278] න භිජ්ජනකං න පග්ඝරණකං පදුමපුණ්ඩරීකපත්තවණ්ණං කුට්ඨං, යෙන ගුන්නං විය සබලං සරීරං හොති, තස්මිං කුට්ඨෙ වුත්තනයෙනෙව විනිච්ඡයො වෙදිතබ්බො. සොසොති සොසබ්යාධි; තස්මිං සති න පබ්බාජෙතබ්බො. අපමාරොති පිත්තුම්මාරො වා යක්ඛුම්මාරො වා; තත්ථ පුබ්බවෙරිකෙන අමනුස්සෙන ගහිතො දුත්තිකිච්ඡො හොති. අප්පමත්තකෙපි පන අපමාරෙ සති න පබ්බාජෙතබ්බො. "किलास" (सफ़ेद दाग) का अर्थ है वह कुष्ठ जो न फटता है और न ही जिससे स्राव होता है, जो लाल या सफ़ेद कमल के पत्ते के रंग का होता है, जिससे शरीर गाय के समान चितकबरा हो जाता है; उस कुष्ठ के विषय में पूर्वोक्त विधि से ही निर्णय समझना चाहिए। "शोष" का अर्थ है शोष व्याधि (क्षय रोग); उसके होने पर प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। "अपस्मार" (मिर्गी) का अर्थ है पित्त-उन्माद या यक्ष-उन्माद; उनमें से पूर्व-वैरी अमनुष्य (यक्ष) द्वारा पकड़ा गया व्यक्ति कठिनता से ठीक होने वाला होता है। थोड़ा सा भी अपस्मार होने पर प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। පඤ්චාබාධවත්ථුකථා නිට්ඨිතා. पंच-आबाध की कथा समाप्त हुई। රාජභටවත්ථුකථා राजभट (राजसेवक) की कथा। 90. රාජභටවත්ථුස්මිං – පච්චන්තං උච්චිනථාති පච්චන්තං වඩ්ඪෙථ. චොරෙ පලාපෙත්වා චොරභයෙන වුට්ඨිතෙ ගාමෙ ආවාසාපෙත්වා ආරක්ඛං දත්වා කසිකම්මාදීනි පවත්තාපෙථාති වුත්තං හොති. රාජා පන සොතාපන්නත්තා ‘‘චොරෙ ඝාතෙථ, හනථා’’ති න ආණාපෙති. උපජ්ඣායස්ස දෙව සීසං ඡින්දිතබ්බන්තිආදි සබ්බං ‘‘පබ්බජ්ජාය උපජ්ඣායො සෙට්ඨො, තතො ආචරියො, තතො ගණො’’ති චින්තෙත්වා ඉදං වොහාරෙ අඩ්ඩවිනිච්ඡයෙ ආගතන්ති ආහංසු. න භික්ඛවෙ රාජභටො පබ්බාජෙතබ්බොති එත්ථ අමච්චො වා හොතු මහාමත්තො වා සෙවකො වා කිඤ්චි ඨානන්තරං පත්තො වා අප්පත්තො වා, යො කොචි රඤ්ඤො භත්තවෙතනභටො, සබ්බො රාජභටොති සඞ්ඛ්යං ගච්ඡති, සො න පබ්බාජෙතබ්බො. තස්ස පන පුත්තනත්තභාතුකා යෙ රාජතො භත්තවෙතනං න ගණ්හන්ති, තෙ පබ්බාජෙතුං වට්ටති. යො පන රාජතො ලද්ධං නිබද්ධභොගං වා මාසසංවච්ඡරපරිබ්බයං වා රඤ්ඤොයෙව නිය්යාතෙති, පුත්තභාතුකෙ වා තං ඨානං සම්පටිච්ඡාපෙත්වා රාජානං ‘‘න දානාහං දෙවස්ස භටො’’ති ආපුච්ඡති, යෙන වා යං කම්මකාරණා වෙතනං ගහිතං, තං කම්මං කතං හොති, යො වා පබ්බජස්සූති රඤ්ඤා අනුඤ්ඤාතො හොති, තම්පි පබ්බාජෙතුං වට්ටති. ९०. राजभटवत्थुस्मिं (राजभृत्य की कथा) में - 'पच्चन्तं उच्छिनाथ' का अर्थ है 'प्रत्यन्त (सीमावर्ती क्षेत्रों) का विस्तार करो'। इसका अर्थ यह है कि विद्रोहियों को भगाकर, विद्रोहियों के भय से उजड़े हुए गाँवों को फिर से बसाकर, सुरक्षा प्रदान कर, कृषि आदि कार्यों को पुनः प्रारम्भ करवाओ। राजा (बिम्बिसार) ने सोतापन्न होने के कारण यह आज्ञा नहीं दी कि 'विद्रोहियों को मार डालो या उन्हें प्रताड़ित करो'। 'हे देव! उपाध्याय का सिर काट देना चाहिए' आदि सभी बातों पर यह विचार कर कि 'प्रव्रज्या में उपाध्याय श्रेष्ठ है, उसके बाद आचार्य, और उसके बाद गण (संघ) श्रेष्ठ है', उन्होंने कहा कि यह निर्णय 'वोहार अढविनिच्छय' (न्यायिक ग्रन्थ) में आया है। 'भिक्खुओं, राजभृत्य (सरकारी सेवक) को प्रव्रजित नहीं करना चाहिए' - यहाँ चाहे वह अमात्य हो, महामात्र हो, सेवक हो, किसी पद पर आसीन हो या न हो, जो कोई भी राजा से भोजन और वेतन प्राप्त करने वाला भृत्य है, वह 'राजभट' (राजभृत्य) कहलाता है; उसे प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। परन्तु उसके पुत्र, पौत्र या भाई जो राजा से वेतन नहीं लेते, उन्हें प्रव्रजित करना उचित है। जो व्यक्ति राजा से प्राप्त होने वाले नियमित भोग या मासिक/वार्षिक भत्ते को राजा को ही लौटा देता है, या अपने पुत्रों/भाइयों को उस पद पर नियुक्त करवाकर राजा से अनुमति लेता है कि 'अब मैं देव का भृत्य नहीं हूँ', अथवा जिस कार्य के लिए वेतन लिया गया था वह कार्य पूर्ण हो चुका हो, अथवा जिसे राजा ने 'प्रव्रजित हो जाओ' कहकर अनुमति दे दी हो, उसे भी प्रव्रजित करना उचित है। රාජභටවත්ථුකථා නිට්ඨිතා. राजभटवत्थुकथा (राजभृत्य की कथा) समाप्त हुई। චොරවත්ථුකථා चोरवत्थुकथा (चोर की कथा) 91. චොරවත්ථූසු – මනුස්සා පස්සිත්වාති යෙහි ගිහිකාලෙ දිට්ඨපුබ්බො යෙ ච ‘‘අයං සො’’ති අඤ්ඤෙසං සුණන්ති, තෙ පස්සිත්වා උබ්බිජ්ජන්තිපි…පෙ… ද්වාරම්පි [Pg.279] ථකෙන්ති. යෙ පන න ජානන්ති, තෙසං ඝරෙසු භික්ඛං ලභති. න භික්ඛවෙති භගවා සයං ධම්මස්සාමී, තස්මා ආයතිං අකරණත්ථාය භික්ඛූනං සික්ඛාපදං පඤ්ඤපෙන්තො එවමාහ. තත්ථ ධජං බන්ධිත්වා විය විචරතීති ධජබන්ධො. මූලදෙවාදයො විය ලොකෙ පාකටොති වුත්තං හොති. තස්මා යො ගාමඝාතං වා පන්ථදුහනං වා නගරෙ සන්ධිච්ඡෙදාදිකම්මං වා කරොන්තො විචරති, පඤ්ඤායති ච ‘‘අසුකො නාම ඉදං ඉදං කරොතී’’ති, සො න පබ්බාජෙතබ්බො. යො පන රාජපුත්තො රජ්ජං පත්ථෙන්තො ගාමඝාතාදීනි කරොති, සො පබ්බාජෙතබ්බො. රාජානො හි තස්මිං පබ්බජිතෙ තුස්සන්ති, සචෙ පන න තුස්සන්ති, න පබ්බාජෙතබ්බො. පුබ්බෙ මහාජනෙ පාකටො චොරො පච්ඡා චොරකම්මං පහාය පඤ්චසීලාදීනි සමාදියති, තඤ්චෙ මනුස්සා එවං ජානන්ති, පබ්බාජෙතබ්බො. යෙ පන අම්බලබුජාදිචොරකා සන්ධිච්ඡෙදාදිචොරා එව වා අදිස්සමානා ථෙය්යං කරොන්ති, පච්ඡාපි ඉමිනා නාම ඉදං කතන්ති න පඤ්ඤායන්ති, තෙපි පබ්බාජෙතුං වට්ටති. ९१. चोरवत्थुसु (चोरों की कथाओं) में - 'मनुस्सा पस्सित्वा' का अर्थ है कि जिन लोगों ने उसे गृहस्थ काल में पहले देखा था और जो दूसरों से सुनते हैं कि 'यह वही (अंगुलिमाल) है', वे उसे देखकर कांपने लगते हैं... (पेय्याल)... यहाँ तक कि द्वार भी बन्द कर लेते हैं। परन्तु जो नहीं जानते, उनके घरों से वह भिक्षा प्राप्त करता है। 'न भिक्खवे' - भगवान स्वयं धर्म के स्वामी हैं, इसलिए भविष्य में ऐसा न होने के लिए भिक्खुओं हेतु शिक्षापद प्रज्ञप्त करते हुए उन्होंने ऐसा कहा। वहाँ 'ध्वज बाँधकर घूमने वाले के समान' का अर्थ है 'ध्वजबन्ध' (प्रसिद्ध डाकू)। इसका अर्थ है कि वह मूलदेव आदि के समान लोक में प्रसिद्ध विद्रोही है। इसलिए जो गाँवों को नष्ट करता हुआ, मार्गों को लूटता हुआ या नगरों में सेंधमारी आदि करता हुआ घूमता है, और यह प्रसिद्ध हो जाता है कि 'अमुक व्यक्ति यह-यह कार्य करता है', उसे प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। परन्तु जो राजकुमार राज्य की इच्छा से गाँवों को नष्ट करने आदि के कार्य करता है, उसे प्रव्रजित करना चाहिए। क्योंकि राजा लोग उसके प्रव्रजित होने पर प्रसन्न होते हैं; यदि वे प्रसन्न न हों, तो उसे प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। जो चोर पहले जनसमूह में प्रसिद्ध था, परन्तु बाद में चोरी का काम छोड़कर पंचशील आदि ग्रहण कर लेता है, और यदि लोग यह जान जाते हैं, तो उसे प्रव्रजित करना चाहिए। जो आम या कटहल आदि चुराने वाले छोटे चोर हैं, या जो सेंधमार चोर अदृश्य रहकर चोरी करते हैं और बाद में भी यह प्रकट नहीं होता कि 'इस व्यक्ति ने यह कार्य किया है', उन्हें भी प्रव्रजित करना उचित है। 92. කාරං භින්දිත්වාති අට්ටබන්ධනාදිං භින්දිත්වා. අභයූවරාති එත්ථ භයෙන උපරමන්තීති භයූවරා, එතෙ පන ලද්ධාභයත්තා න භයූවරාති අභයූවරා; පකාරස්ස චෙත්ථ වකාරො කතොති වෙදිතබ්බො. න භික්ඛවෙ කාරභෙදකො පබ්බාජෙතබ්බොති කාරො වුච්චති බන්ධනාගාරං. ඉධ පන අන්දුබන්ධනං වා හොතු සඞ්ඛලිකබන්ධනං වා රජ්ජුබන්ධනං වා ගාමබන්ධනං වා නිගමබන්ධනං වා නගරබන්ධනං වා පුරිසගුත්ති වා ජනපදබන්ධනං වා දීපබන්ධනං වා, යො එතෙසු යංකිඤ්චි බන්ධනං භින්දිත්වා වා ඡින්දිත්වා වා මුඤ්චිත්වා වා විවරිත්වා වා පස්සමානානං වා අපස්සමානානං වා පලායති, සො කාරභෙදකොති සඞ්ඛ්යං ගච්ඡති. තස්මා ඊදිසො කාරභෙදකො චොරො දීපබන්ධනං භින්දිත්වා දීපන්තරං ගතොපි න පබ්බාජෙතබ්බො. යො පන න චොරො, කෙවලං හත්ථකම්මං අකරොන්තො ‘‘එවං නො අපලායන්තො කරිස්සතී’’ති රාජයුත්තාදීහි බද්ධො, සො කාරං භින්දිත්වා පලාතොපි පබ්බාජෙතබ්බො. යො පන ගාමනිගමපට්ටනාදීනි කෙණියා ගහෙත්වා තං අසම්පාදෙන්තො බන්ධනාගාරං පවෙසිතො හොති, සො පලායිත්වා ආගතො න පබ්බාජෙතබ්බො. යොපි කසිකම්මාදීහි ධනං සම්පාදෙත්වා ජීවන්තො ‘‘නිධානං ඉමිනා ලද්ධ’’න්ති පෙසුඤ්ඤං උපසංහරිත්වා කෙනචි බන්ධාපිතො හොති, තං තත්ථෙව පබ්බාජෙතුං න වට්ටති, පලායිත්වා ගතං පන ගතට්ඨානෙ පබ්බාජෙතුං වට්ටති. ९२. 'कारं भिन्दित्वा' का अर्थ है कारागार के बन्धनों आदि को तोड़कर। 'अभयूवरा' - यहाँ जो भय के कारण रुक जाते हैं, वे 'भयूवर' कहलाते हैं; परन्तु ये (भिक्खु) अभय प्राप्त होने के कारण 'भयूवर' नहीं हैं, इसलिए 'अभयूवर' कहलाते हैं; यहाँ 'प' के स्थान पर 'व' आदेश समझना चाहिए। 'भिक्खुओं, कारागार तोड़ने वाले को प्रव्रजित नहीं करना चाहिए' - यहाँ 'कार' का अर्थ कारागार (जेल) है। यहाँ चाहे बेड़ियों का बन्धन हो, जंजीरों का बन्धन हो, रस्सी का बन्धन हो, गाँव का बन्धन हो, कस्बे का बन्धन हो, नगर का बन्धन हो, पुरुषों का पहरा हो, जनपद का बन्धन हो या द्वीप का बन्धन हो - जो इनमें से किसी भी बन्धन को तोड़कर, काटकर, खोलकर या उघाड़कर, रक्षकों के देखते हुए या बिना देखे भाग जाता है, वह 'कारभेदक' (जेल तोड़ने वाला) कहलाता है। इसलिए ऐसा कारागार तोड़ने वाला चोर, द्वीप के बन्धन को तोड़कर दूसरे द्वीप में चला गया हो तब भी, उसे प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। परन्तु जो चोर नहीं है, केवल शारीरिक श्रम (बेगारी) न करने के कारण 'यह भाग न जाए इसलिए काम करेगा' ऐसा सोचकर राजपुरुषों आदि द्वारा बाँधा गया है, वह कारागार तोड़कर भागने पर भी प्रव्रजित किया जा सकता है। जो व्यक्ति गाँव, कस्बे या पत्तन आदि को ठेके पर लेकर उसे पूरा न कर पाने के कारण कारागार में डाला गया हो, वह भागकर आने पर प्रव्रजित नहीं किया जाना चाहिए। जो खेती आदि से धन कमाकर जीवन यापन कर रहा हो, परन्तु 'इसने खजाना पाया है' ऐसी चुगली करने पर किसी के द्वारा बन्दी बनाया गया हो, उसे वहीं प्रव्रजित करना उचित नहीं है; परन्तु भागकर चले जाने पर, पहुँचे हुए स्थान पर उसे प्रव्रजित करना उचित है। 93. න [Pg.280] භික්ඛවෙ ලිඛිතකොති එත්ථ ලිඛිතකො නාම න කෙවලං ‘‘යත්ථ පස්සති තත්ථ හන්තබ්බො’’ති, අථ ඛො යො කොචි චොරිකං වා අඤ්ඤං වා ගරුං රාජාපරාධං කත්වා පලාතො, රාජා ච නං පණ්ණෙ වා පොත්ථකෙ වා ‘‘ඉත්ථන්නාමො යත්ථ දිස්සති, තත්ථ ගහෙත්වා මාරෙතබ්බො’’ති වා ‘‘හත්ථපාදානිස්ස ඡින්දිතබ්බානී’’ති වා ‘‘එත්තකං නාම දණ්ඩං ආහරාපෙතබ්බො’’ති වා ලිඛාපෙති, අයං ලිඛිතකො නාම, සො න පබ්බාජෙතබ්බො. ९३. 'भिक्खुओं, लिखित (घोषित अपराधी) को...' - यहाँ 'लिखित' का अर्थ केवल यह नहीं है कि 'जहाँ दिखे वहीं मार दिया जाए', बल्कि जो कोई चोरी या अन्य कोई गम्भीर राज-अपराध करके भाग गया हो, और राजा ने पत्र या पुस्तक में लिखवा दिया हो कि 'इस नाम का व्यक्ति जहाँ दिखे, वहाँ पकड़कर मार दिया जाए' या 'इसके हाथ-पैर काट दिए जाएँ' या 'इससे इतना दण्ड वसूल किया जाए', वह 'लिखित' कहलाता है; उसे प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। 94. කසාහතො කතදණ්ඩකම්මොති එත්ථ යො වචනපෙසනාදීනි අකරොන්තො හඤ්ඤති, න සො කතදණ්ඩකම්මො. යො පන කෙණියා වා අඤ්ඤථා වා කිඤ්චි ගහෙත්වා ඛාදිත්වා පුන දාතුං අසක්කොන්තො ‘‘අයමෙව තෙ දණ්ඩො හොතූ’’ති කසාහි හඤ්ඤති, අයං කසාහතො කතදණ්ඩකම්මො. සො ච කසාහි වා හතො හොතු අද්ධදණ්ඩකාදීනං වා අඤ්ඤතරෙන, යාව අල්ලවණො හොති, තාව න පබ්බාජෙතබ්බො. වණෙ පන පාකතිකෙ කත්වා පබ්බාජෙතබ්බො. සචෙ පන ජාණූහි වා කප්පරෙහි වා නාළිකෙරපාසාණාදීහි වා ඝාතෙත්වා මුත්තො හොති, සරීරෙ චස්ස ගණ්ඨියො පඤ්ඤායන්ති, න පබ්බාජෙතබ්බො. ඵාසුකං කත්වා එව ගණ්ඨීසු සන්නිසින්නාසු පබ්බාජෙතබ්බො. ९४. "कसाहतो कतदण्डकम्मो" (कोड़ों से पीटा गया और जिसे दण्ड दिया गया हो) के विषय में: जो व्यक्ति आज्ञा पालन न करने आदि के कारण पीटा जाता है, वह 'कतदण्डकम्मो' नहीं है। परन्तु, जो व्यक्ति ऋण या किसी अन्य रूप में कुछ लेकर उसे चुकाने में असमर्थ होने पर, "यही तुम्हारा दण्ड है" कहकर कोड़ों से पीटा जाता है, वह 'कसाहतो कतदण्डकम्मो' है। वह चाहे कोड़ों से पीटा गया हो या लाठी आदि से, जब तक घाव ताज़ा (गीला) है, तब तक उसे प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। घाव के ठीक हो जाने पर ही प्रव्रजित करना चाहिए। यदि घुटनों, कोहनियों या नारियल के खोल, पत्थर आदि से पीटे जाने पर शरीर में गाँठें (सूजन) दिखाई दें, तो उसे प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। गाँठों के बैठ जाने और स्वस्थ हो जाने पर ही प्रव्रजित करना चाहिए। 95. ලක්ඛණාහතො කතදණ්ඩකම්මොති එත්ථ කතදණ්ඩකම්මභාවො පුරිමනයෙනෙව වෙදිතබ්බො. යස්ස පන නලාටෙ වා ඌරුආදීසු වා තත්තෙන ලොහෙන ලක්ඛණං ආහතං හොති, සො සචෙ භුජිස්සො යාව අල්ලවණො හොති, තාව න පබ්බාජෙතබ්බො. සචෙපිස්ස වණා රුළ්හා හොන්ති, ඡවියා සමපරිච්ඡෙදා, ලක්ඛණං න පඤ්ඤායති, තිමණ්ඩලවත්ථස්ස උත්තරාසඞ්ගෙ කතෙ පටිච්ඡන්නොකාසෙ චෙ හොති, පබ්බාජෙතුං වට්ටති, අප්පටිච්ඡන්නොකාසෙ චෙ න වට්ටති. ९५. "लक्खणाहतो कतदण्डकम्मो" (तप्त लोहे से दागा गया और जिसे दण्ड दिया गया हो) के विषय में: 'कतदण्डकम्म' होने का भाव पूर्ववत ही समझना चाहिए। जिसके माथे या जाँघ आदि पर तप्त लोहे से निशान दागा गया हो, वह यदि स्वतंत्र (मुक्त) भी हो, तो भी जब तक घाव ताज़ा है, उसे प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। यदि घाव भर गया हो, त्वचा के समान हो गया हो और निशान दिखाई न देता हो, तथा यदि वह निशान चीवर को ठीक से पहनने (ति-मण्डल) पर ढके हुए स्थान में हो, तो प्रव्रजित करना उचित है; यदि वह न ढके हुए स्थान में हो, तो उचित नहीं है। චොරවත්ථුකථා නිට්ඨිතා. चोर-वस्तु की कथा समाप्त हुई। ඉණායිකවත්ථුකථා ऋणी (कर्जदार) की कथा। 96. න භික්ඛවෙ ඉණායිකොති එත්ථ ඉණායිකො නාම යස්ස පිතිපිතාමහෙහි වා ඉණං ගහිතං හොති, සයං වා ඉණං ගහිතං හොති, යං වා ආථපෙත්වා මාතාපිතූහි කිඤ්චි ගහිතං හොති, සො තං [Pg.281] ඉණං පරෙසං ධාරෙතීති ඉණායිකො. යං පන අඤ්ඤෙ ඤාතකා ආථපෙත්වා කිඤ්චි ගණ්හන්ති, සො න ඉණායිකො. න හි තෙ තං ආථපෙතුං ඉස්සරා, තස්මා තං පබ්බාජෙතුං වට්ටති, ඉතරං න වට්ටති. සචෙ පනස්ස ඤාතිසාලොහිතා ‘‘මයං දස්සාම, පබ්බාජෙථ න’’න්ති ඉණං අත්තනො භාරං කරොන්ති, අඤ්ඤො වා කොචි තස්ස ආචාරසම්පත්තිං දිස්වා ‘‘පබ්බාජෙථ නං, අහං ඉණං දස්සාමී’’ති වදති, පබ්බාජෙතුං වට්ටති. තෙසු අසති භික්ඛුනා තථාරූපස්ස උපට්ඨාකස්සාපි ආරොචෙතබ්බං ‘‘සහෙතුකො සත්තො ඉණපලිබොධෙන න පබ්බජතී’’ති. සචෙ සො පටිපජ්ජති, පබ්බාජෙතබ්බො. සචෙපි අත්තනො කප්පියභණ්ඩං අත්ථි, ‘‘එතං දස්සාමී’’ති පබ්බාජෙතබ්බො. සචෙ පන නෙව ඤාතකාදයො පටිපජ්ජන්ති, න අත්තනො ධනං අත්ථි, ‘‘පබ්බාජෙත්වා භික්ඛාය චරිත්වා මොචෙස්සාමී’’ති පබ්බාජෙතුං න වට්ටති. සචෙ පබ්බාජෙති දුක්කටං. පලාතොපි ආනෙත්වා දාතබ්බො. නො චෙ දෙති, සබ්බං ඉණං ගීවා හොති. අජානිත්වා පබ්බාජයතො අනාපත්ති. පස්සන්තෙන පන ආනෙත්වා ඉණසාමිකානං දස්සෙතබ්බො. අපස්සන්තස්ස ගීවා න හොති. ९६. "भिक्षुओं, ऋणी (कर्जदार) को प्रव्रजित नहीं करना चाहिए" - यहाँ 'ऋणी' वह है जिसके माता-पिता या दादा-परदादा ने ऋण लिया हो, या जिसने स्वयं ऋण लिया हो, या जिसे माता-पिता ने गिरवी रखकर कुछ लिया हो; वह व्यक्ति दूसरों का ऋणी कहलाता है। परन्तु जिसे अन्य रिश्तेदारों ने गिरवी रखकर कुछ लिया हो, वह ऋणी नहीं है, क्योंकि उन्हें उसे गिरवी रखने का अधिकार नहीं है; इसलिए उसे प्रव्रजित करना उचित है, दूसरों को नहीं। यदि उसके सगे-संबंधी कहें कि "हम ऋण चुका देंगे, आप इसे प्रव्रजित करें" और ऋण का भार स्वयं ले लें, या कोई अन्य व्यक्ति उसके सदाचार को देखकर कहे कि "इसे प्रव्रजित करें, मैं ऋण चुका दूँगा", तो प्रव्रजित करना उचित है। उनके न होने पर भिक्षु को किसी योग्य उपासक (सेवक) से कहना चाहिए कि "यह हेतु-सम्पन्न प्राणी ऋण की बाधा के कारण प्रव्रजित नहीं हो पा रहा है।" यदि वह उपासक स्वीकार कर ले, तो प्रव्रजित करना चाहिए। यदि भिक्षु के पास स्वयं की कप्पिय-वस्तु (अनुमत सामग्री) हो, तो "मैं इसे दे दूँगा" ऐसा सोचकर प्रव्रजित किया जा सकता है। परन्तु यदि न तो संबंधी स्वीकार करें और न ही स्वयं के पास धन हो, तो "प्रव्रजित करके भिक्षाटन द्वारा इसे ऋणमुक्त करा दूँगा" ऐसा सोचकर प्रव्रजित करना उचित नहीं है। यदि प्रव्रजित करता है, तो दुष्कृत (दुक्कट) अपराध होता है। यदि वह भाग जाए, तो भी उसे लाकर ऋणदाताओं को सौंप देना चाहिए। यदि नहीं सौंपता, तो सारा ऋण भिक्षु के गले (जिम्मे) आ जाता है। अनजाने में प्रव्रजित करने वाले को आपत्ति नहीं होती। परन्तु यदि वह (भागा हुआ) दिखाई दे, तो उसे लाकर ऋणदाताओं को दिखाना चाहिए। न दिखने पर भिक्षु पर जिम्मेदारी नहीं होती। සචෙ ඉණායිකො අඤ්ඤං දෙසං ගන්ත්වා පුච්ඡියමානොපි ‘‘නාහං කස්සචි කිඤ්චි ධාරෙමී’’ති වත්වා පබ්බජති, ඉණසාමිකො ච තං පරියෙසන්තො තත්ථ ගච්ඡති, දහරො තං දිස්වා පලායති, සො ච ථෙරං උපසඞ්කමිත්වා ‘‘අයං භන්තෙ කෙන පබ්බාජිතො, මම එත්තකං නාම ධනං ගහෙත්වා පලාතො’’ති වදති, ථෙරෙන වත්තබ්බං ‘‘මයා උපාසක ‘අණණො අහ’න්ති වදන්තො පබ්බාජිතො, කිං දානි කරොමි, පස්ස මෙ පත්තචීවරමත්ත’’න්ති අයං තත්ථ සාමීචි. පලාතෙ පන ගීවා න හොති. यदि कोई ऋणी दूसरे देश में जाकर, पूछे जाने पर भी "मैं किसी का ऋणी नहीं हूँ" कहकर प्रव्रजित हो जाता है, और ऋणदाता उसे खोजते हुए वहाँ पहुँच जाता है, और वह नवोदित भिक्षु उसे देखकर भाग जाता है, और वह ऋणदाता स्थविर के पास जाकर कहता है— "भन्ते, इसे किसने प्रव्रजित किया है? यह मेरा इतना धन लेकर भागा है", तो स्थविर को कहना चाहिए— "हे उपासक, इसने 'मैं ऋणमुक्त हूँ' ऐसा कहा था, तब मैंने इसे प्रव्रजित किया; अब मैं क्या करूँ? मेरे पास तो केवल यह पात्र और चीवर ही है, देख लो।" यह वहाँ उचित व्यवहार (सामीचि) है। उसके भाग जाने पर स्थविर पर ऋण का भार नहीं आता। සචෙ පන නං ථෙරස්ස සම්මුඛාව දිස්වා ‘‘අයං මම ඉණායිකො’’ති වදති, ‘‘තව ඉණායිකං ත්වමෙව ජානාහී’’ති වත්තබ්බො. එවම්පි ගීවා න හොති. සචෙපි සො ‘‘පබ්බජිතො අයං ඉදානි කුහිං ගමිස්සතී’’ති වදති, ථෙරෙන ‘‘ත්වංයෙව ජානාහී’’ති වත්තබ්බො. එවම්පිස්ස පලාතෙ ගීවා න හොති. සචෙ පන ථෙරො ‘‘කුහිං දානි අයං ගමිස්සති, ඉධෙව අච්ඡතූ’’ති වදති, සො චෙ පලායති, ගීවා හොති. සචෙ සො සහෙතුකසත්තො හොති වත්තසම්පන්නො, ථෙරෙන ‘‘ඊදිසො අය’’න්ති වත්තබ්බං. ඉණසාමිකො චෙ ‘‘සාධූ’’ති විස්සජ්ජෙති, ඉච්චෙතං කුසලං. සචෙ පන ‘‘උපඩ්ඪුපඩ්ඪං දෙථා’’ති වදති, දාතබ්බං. අපරෙන සමයෙන අතිආරාධකො හොති, ‘‘සබ්බං දෙථා’’ති [Pg.282] වුත්තෙපි දාතබ්බමෙව. සචෙ පන උද්දෙසපරිපුච්ඡාදීසු කුසලො හොති බහූපකාරො භික්ඛූනං, භික්ඛාචාරවත්තෙන පරියෙසිත්වාපි ඉණං දාතබ්බමෙවාති. यदि वह ऋणदाता उसे स्थविर के सामने ही देखकर कहता है— "यह मेरा ऋणी है", तो उसे कहना चाहिए— "तुम अपने ऋणी को स्वयं ही जानो (संभालो)।" ऐसा कहने पर भी ऋण का भार स्थविर पर नहीं आता। यदि वह कहता है— "यह प्रव्रजित हो गया है, अब यह कहाँ जाएगा?", तो स्थविर को कहना चाहिए— "तुम स्वयं ही जानो।" ऐसा कहने पर भी उसके भाग जाने पर स्थविर पर ऋण का भार नहीं आता। परन्तु यदि स्थविर कहता है— "अब यह कहाँ जाएगा, यहीं रहने दो", और यदि वह भाग जाता है, तो ऋण का भार स्थविर पर आ जाता है। यदि वह (शिष्य) हेतु-सम्पन्न और कर्तव्यनिष्ठ (वत्तसम्पन्न) प्राणी है, तो स्थविर को कहना चाहिए— "यह ऐसा (योग्य) व्यक्ति है।" यदि ऋणदाता "ठीक है" कहकर ऋण छोड़ देता है, तो यह अच्छा है। परन्तु यदि वह कहता है— "आधा-आधा (किस्तों में) दे दो", तो देना चाहिए। बाद में यदि वह बहुत सेवाभावी हो जाए और ऋणदाता कहे कि "पूरा दे दो", तो भी देना ही चाहिए। यदि वह पाठ (उद्देस) और प्रश्न (परिपृच्छा) आदि में कुशल हो और भिक्षुओं के लिए बहुत उपकारी हो, तो भिक्षाटन के नियम से खोजकर (जुटाकर) भी ऋण चुकाना ही चाहिए। ඉණායිකවත්ථුකථා නිට්ඨිතා. ऋणी की कथा समाप्त हुई। දාසවත්ථුකථා दास (गुलाम) की कथा। 97. න භික්ඛවෙ දාසොති එත්ථ චත්තාරො දාසා – අන්තොජාතො, ධනක්කීතො, කරමරානීතො, සාමං දාසබ්යං උපගතොති. තත්ථ අන්තොජාතො නාම ජාතිදාසො ඝරදාසියා පුත්තො. ධනක්කීතො නාම මාතාපිතූනං සන්තිකා පුත්තො වා සාමිකානං සන්තිකා දාසො වා ධනං දත්වා දාසචාරිත්තං ආරොපෙත්වා කීතො. එතෙ ද්වෙපි න පබ්බාජෙතබ්බා. පබ්බාජෙන්තෙන තත්ථ තත්ථ චාරිත්තවසෙන අදාසං කත්වා පබ්බාජෙතබ්බා. ९७. "भिक्षुओं, दास को प्रव्रजित नहीं करना चाहिए" - यहाँ चार प्रकार के दास हैं: अन्तोजातो (घर में जन्मा), धनक्कीतो (धन से खरीदा गया), करमरानीतो (युद्ध में बंदी बनाया गया), और सामं दासव्यं उपगतो (स्वयं दासता स्वीकार करने वाला)। उनमें 'अन्तोजातो' वह है जो जन्म से दास हो, यानी घर की दासी का पुत्र। 'धनक्कीतो' वह है जिसे माता-पिता से पुत्र के रूप में या स्वामियों से दास के रूप में धन देकर दासता की प्रथा के अनुसार खरीदा गया हो। इन दोनों को प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। प्रव्रजित करने वाले को चाहिए कि वह उस-उस स्थान की प्रथा के अनुसार उन्हें दासता से मुक्त कराकर ही प्रव्रजित करे। කරමරානීතො නාම තිරොරට්ඨං විලොපං වා කත්වා උපලාපෙත්වා වා තිරොරට්ඨතො භුජිස්සමානුසකානි ආහරන්ති, අන්තොරට්ඨෙයෙව වා කතාපරාධං කිඤ්චි ගාමං රාජා ‘‘විලුම්පථා’’ති ආණාපෙති, තතො මානුසකානිපි ආහරන්ති. තත්ථ සබ්බෙ පුරිසා දාසා, ඉත්ථියො දාසියො. එවරූපො කරමරානීතො දාසො යෙහි ආනීතො, තෙසං සන්තිකෙ වසන්තො වා බන්ධනාගාරෙ බද්ධො වා පුරිසෙහි රක්ඛියමානො වා න පබ්බාජෙතබ්බො. පලායිත්වා පන ගතො, ගතට්ඨානෙ පබ්බාජෙතබ්බො. රඤ්ඤා තුට්ඨෙන ‘‘කරමරානීතකෙ මුඤ්චථා’’ති වත්වා වා සබ්බසාධාරණෙන වා නයෙන බන්ධනා මොක්ඛෙ කතෙ පබ්බාජෙතබ්බොව. 'करमरानीत' (युद्ध में बंदी बनाकर लाया गया) उसे कहते हैं जो दूसरे देश में लूटपाट करके या फुसलाकर वहाँ के स्वतंत्र मनुष्यों को लाया जाता है, अथवा अपने ही देश के भीतर किसी अपराध करने वाले गाँव को राजा 'लूट लो' ऐसा आदेश देता है, और वहाँ से मनुष्यों को लाया जाता है। वहाँ सभी पुरुष दास और स्त्रियाँ दासियाँ होती हैं। इस प्रकार के करमरानीत दास को, जो उसे लाए हैं, उनके पास रहते हुए, या कारागार में बंद होने पर, या पुरुषों (पहरेदारों) द्वारा रक्षित होने पर प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। लेकिन यदि वह भाग गया हो, तो पहुँचने के स्थान पर उसे प्रव्रजित किया जा सकता है। यदि राजा प्रसन्न होकर 'करमरानीत दासों को मुक्त कर दो' ऐसा कहे, या सामान्य रूप से बंधन से मुक्त कर दिए जाने पर, उसे अवश्य ही प्रव्रजित करना चाहिए। සාමං දාසබ්යං උපගතො නාම ජීවිතහෙතු වා ආරක්ඛහෙතු වා ‘‘අහං තෙ දාසො’’ති සයමෙව දාසභාවං උපගතො. රාජූනං හත්ථිඅස්සගොමහිංසගොපකාදයො විය, තාදිසො දාසො න පබ්බාජෙතබ්බො. රඤ්ඤො වණ්ණදාසීනං පුත්තා හොන්ති අමච්චපුත්තසදිසා, තෙපි න පබ්බාජෙතබ්බා. භුජිස්සිත්ථියො අසංයතා වණ්ණදාසීහි සද්ධිං විචරන්ති, තාසං පුත්තෙ පබ්බාජෙතුං වට්ටති. සචෙ සයමෙව පණ්ණං [Pg.283] ආරොපෙන්ති, න වට්ටති. භටිපුත්තකගණාදීනං දාසාපි තෙහි අදින්නා න පබ්බාජෙතබ්බා. විහාරෙසු රාජූහි ආරාමිකදාසා නාම දින්නා හොන්ති, තෙපි පබ්බාජෙතුං න වට්ටති. භුජිස්සෙ පන කත්වා පබ්බාජෙතුං වට්ටති. මහාපච්චරියං ‘‘අන්තොජාතධනක්කීතකෙ ආනෙත්වා භික්ඛුසඞ්ඝස්ස ආරාමිකෙ දෙමාති දෙන්ති, තක්කං සීසෙ ආසිත්තකසදිසාව හොන්ති, තෙ පබ්බාජෙතුං වට්ටතී’’ති වුත්තං. කුරුන්දියං පන ‘‘ආරාමිකං දෙමාති කප්පියවොහාරෙන දෙන්ති, යෙන කෙනචි වොහාරෙන දින්නො හොතු, නෙව පබ්බාජෙතබ්බො’’ති වුත්තං. දුග්ගතමනුස්සා සඞ්ඝං නිස්සාය ජීවිස්සාමාති විහාරෙ කප්පියකාරකා හොන්ති, එතෙපි පබ්බාජෙතුං වට්ටති. යස්ස මාතාපිතරො දාසා, මාතා එව වා දාසී, පිතා අදාසො, තං පබ්බාජෙතුං න වට්ටති. යස්ස පන මාතා අදාසී, පිතා දාසො, තං පබ්බාජෙතුං වට්ටති. භික්ඛුස්ස ඤාතකා වා උපට්ඨාකා වා දාසං දෙන්ති ‘‘ඉමං පබ්බාජෙථ, තුම්හාකං වෙය්යාවච්චං කරිස්සතී’’ති අත්තනොවාස්ස දාසො අත්ථි, භුජිස්සො කතොව පබ්බාජෙතබ්බො. සාමිකා දාසං දෙන්ති ‘‘ඉමං පබ්බාජෙථ, සචෙ අභිරමිස්සති, අදාසො විබ්භමිස්සති චෙ, අම්හාකං දාසොව භවිස්සතීති අයං තාවකාලිකො නාම, තං පබ්බාජෙතුං න වට්ටතී’’ති කුරුන්දියං වුත්තං. නිස්සාමිකදාසො හොති, සොපි භුජිස්සො කතොව පබ්බාජෙතබ්බො. අජානන්තො පබ්බාජෙත්වා වා උපසම්පාදෙත්වා වා පච්ඡා ජානාති, භුජිස්සං කාතුමෙව වට්ටති. 'स्वयं दासत्व को प्राप्त' उसे कहते हैं जो आजीविका के लिए या सुरक्षा के लिए 'मैं आपका दास हूँ' ऐसा कहकर स्वयं ही दास भाव को प्राप्त हुआ हो। जैसे राजाओं के हाथी, घोड़े, गाय, भैंस चराने वाले आदि होते हैं, वैसे दास को प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। राजा की गणिकाओं (वर्णदासियों) के पुत्र मंत्रियों के पुत्रों के समान होते हैं, उन्हें भी प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। जो स्वतंत्र स्त्रियाँ असंयत होकर गणिकाओं के साथ घूमती हैं, उनके पुत्रों को प्रव्रजित करना उचित है। यदि वे स्वयं को (गणिकाओं की) सूची में दर्ज करा लेती हैं, तो उचित नहीं है। भटपुत्तक गण आदि के दासों को भी, यदि उनके द्वारा नहीं दिए गए हों, तो प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। विहारों में राजाओं द्वारा 'आरामिक दास' दिए जाते हैं, उन्हें भी प्रव्रजित करना उचित नहीं है। उन्हें स्वतंत्र करने के बाद ही प्रव्रजित करना उचित है। महाप्रत्यरी (अट्ठकथा) में कहा गया है— "घर में जन्मे या धन से खरीदे गए दासों को लाकर भिक्षु संघ को 'हम आरामिक देते हैं' ऐसा कहकर देते हैं, तो वे सिर पर छाछ छिड़कने के समान (निष्प्रभावी) होते हैं, उन्हें प्रव्रजित करना उचित है।" कुरुन्दी (अट्ठकथा) में कहा गया है— "'आरामिक देते हैं' इस प्रकार कल्पनीय शब्दावली (कप्पिय वोहार) से देते हैं, तो चाहे किसी भी शब्दावली से दिया गया हो, उसे प्रव्रजित नहीं ही करना चाहिए।" निर्धन मनुष्य 'संघ के आश्रय में जीवित रहेंगे' ऐसा सोचकर विहार में कप्पियकारक (सेवक) बनते हैं, इन्हें भी प्रव्रजित करना उचित है। जिसके माता-पिता दास हों, या केवल माता दासी हो और पिता स्वतंत्र हो, उसे प्रव्रजित करना उचित नहीं है। लेकिन जिसकी माता स्वतंत्र हो और पिता दास हो, उसे प्रव्रजित करना उचित है। भिक्षु के संबंधी या उपासक दास देते हैं कि 'इसे प्रव्रजित करें, यह आपकी वैयावृत्य (सेवा) करेगा' अथवा यदि भिक्षु का अपना दास हो, तो उसे स्वतंत्र करने के बाद ही प्रव्रजित करना चाहिए। स्वामी दास को देते हैं कि 'इसे प्रव्रजित करें, यदि यह (प्रव्रज्या में) रमण करेगा तो स्वतंत्र रहेगा, यदि गृहस्थ बनेगा तो हमारा दास ही रहेगा', इसे 'तावकालिक' (अस्थायी) कहते हैं, उसे प्रव्रजित करना उचित नहीं है—ऐसा कुरुन्दी में कहा गया है। यदि कोई बिना स्वामी वाला दास हो, उसे भी स्वतंत्र करने के बाद ही प्रव्रजित करना चाहिए। यदि अनजाने में प्रव्रजित या उपसंपन्न कर दिया हो और बाद में पता चले, तो उसे स्वतंत्र करना ही उचित है। ඉමස්ස ච අත්ථස්ස පකාසනත්ථං ඉදං වත්ථුං වදන්ති – එකා කිර කුලදාසී එකෙන සද්ධිං අනුරාධපුරා පලායිත්වා රොහණෙ වසමානා පුත්තං පටිලභි, සො පබ්බජිත්වා උපසම්පන්නකාලෙ ලජ්ජී කුක්කුච්චකො අහොසි. අථෙකදිවසං මාතරං පුච්ඡි – ‘‘කිං උපාසිකෙ තුම්හාකං භාතා වා භගිනී වා නත්ථි, න කඤ්චි ඤාතකං පස්සාමී’’ති. ‘‘තාත, අහං අනුරාධපුරෙ කුලදාසී, තව පිතරා සද්ධිං පලායිත්වා ඉධ වසාමී’’ති. සීලවා භික්ඛු ‘‘අසුද්ධා කිර මෙ පබ්බජ්ජා’’ති සංවෙගං ලභිත්වා මාතරං තස්ස කුලස්ස නාමගොත්තං පුච්ඡිත්වා අනුරාධපුරං ආගම්ම තස්ස කුලස්ස ඝරද්වාරෙ අට්ඨාසි. ‘‘අතිච්ඡථ භන්තෙ’’ති වුත්තෙපි නාතික්කමි, තෙ ආගන්ත්වා ‘‘කිං භන්තෙ’’ති පුච්ඡිංසු. ‘‘තුම්හාකං ඉත්ථන්නාමා දාසී පලාතා අත්ථී’’ති? අත්ථි භන්තෙ. අහං තස්සා පුත්තො, සචෙ මං තුම්හෙ අනුජානාථ, පබ්බජ්ජං ලභාමි, තුම්හෙ මය්හං සාමිකාති[Pg.284]. තෙ හට්ඨතුට්ඨා හුත්වා ‘‘සුද්ධා භන්තෙ තුම්හාකං පබ්බජ්ජා’’ති තං භුජිස්සං කත්වා මහාවිහාරෙ වසාපෙසුං චතූහි පච්චයෙහි පටිජග්ගන්තා. ථෙරො තං කුලං නිස්සාය වසමානොයෙව අරහත්තං පාපුණීති. इस अर्थ को स्पष्ट करने के लिए यह कथा कहते हैं—कहते हैं कि एक कुलदासी किसी पुरुष के साथ अनुराधापुर से भागकर रोहण जनपद में रहते हुए एक पुत्र को प्राप्त हुई। वह पुत्र प्रव्रजित होकर उपसंपदा के समय लज्जाशील और संशयी (कुकुच्चक) हुआ। तब एक दिन उसने माता से पूछा— "हे उपासिका! क्या आपका कोई भाई या बहन नहीं है? मैं किसी संबंधी को नहीं देखता हूँ।" "तात! मैं अनुराधापुर में एक कुलदासी थी, तुम्हारे पिता के साथ भागकर यहाँ रह रही हूँ।" शीलवान भिक्षु ने 'मेरी प्रव्रज्या अशुद्ध है' ऐसा सोचकर संवेग प्राप्त किया और माता से उस कुल का नाम-गोत्र पूछकर अनुराधापुर आकर उस कुल के घर के द्वार पर खड़ा हो गया। "भन्ते! आगे बढ़िए" ऐसा कहे जाने पर भी वह नहीं गया। उन्होंने आकर पूछा— "भन्ते! क्या बात है?" "क्या आपकी अमुक नाम वाली दासी भाग गई थी?" "हाँ भन्ते, थी।" "मैं उसका पुत्र हूँ, यदि आप मुझे अनुमति दें, तो मुझे प्रव्रज्या प्राप्त होगी, आप मेरे स्वामी हैं।" वे हर्षित और प्रसन्न होकर बोले— "भन्ते! आपकी प्रव्रज्या शुद्ध है" और उसे स्वतंत्र करके महाविहार में रहने दिया और चारों प्रत्ययों से उसकी सेवा करने लगे। वह स्थविर उस कुल के आश्रय में रहते हुए ही अर्हत्व को प्राप्त हुए। දාසවත්ථුකථා නිට්ඨිතා. दास-वस्तु कथा समाप्त हुई। කම්මාරභණ්ඩුවත්ථාදිකථා कम्मारभण्डु-वस्तु आदि की कथा। 98-9. කම්මාරභණ්ඩූති තුලාධාරමුණ්ඩකො සුවණ්ණකාරපුත්තො, පඤ්චසිඛො තරුණදාරකොති වුත්තං හොති. සඞ්ඝං අපලොකෙතුං භණ්ඩුකම්මායාති සඞ්ඝං භණ්ඩුකම්මත්ථාය ආපුච්ඡිතුං අනුජානාමීති අත්ථො. තත්රායං ආපුච්ඡනවිධි – සීමාපරියාපන්නෙ භික්ඛූ සන්නිපාතෙත්වා පබ්බජ්ජාපෙක්ඛං තත්ථ නෙත්වා ‘‘සඞ්ඝං භන්තෙ ඉමස්ස දාරකස්ස භණ්ඩුකම්මං ආපුච්ඡාමී’’ති තික්ඛත්තුං වා ද්වික්ඛත්තුං වා සකිං වා වත්තබ්බං. එත්ථ ච ‘‘ඉමස්ස දාරකස්ස භණ්ඩුකම්මං ආපුච්ඡාමී’’තිපි ‘‘ඉමස්ස සමණකරණං ආපුච්ඡාමී’’තිපි ‘‘ඉමස්ස පබ්බාජනං ආපුච්ඡාමී’’තිපි ‘‘අයං සමණො හොතුකාමො’’තිපි ‘‘අයං පබ්බජිතුකාමො’’තිපි වත්තුං වට්ටතියෙව. ९८-९. 'कम्मारभण्डु' का अर्थ है—तराजू धारण करने वाले स्वर्णकार का मुण्डित सिर वाला पुत्र, जो पाँच शिखाओं वाला छोटा बालक था—ऐसा कहा गया है। 'संघं अपलोकेतुं भण्डुकम्माय' का अर्थ है—संघ से मुण्डन कार्य के लिए पूछने (अनुमति लेने) की आज्ञा देता हूँ। वहाँ यह पूछने की विधि है—सीमा के भीतर स्थित भिक्षुओं को एकत्रित कर, प्रव्रज्या के इच्छुक बालक को वहाँ लाकर, "भन्ते! संघ से इस बालक के मुण्डन कार्य के लिए पूछता हूँ" ऐसा तीन बार, दो बार या एक बार कहना चाहिए। और यहाँ "इस बालक के मुण्डन के लिए पूछता हूँ", "इस बालक को श्रमण बनाने के लिए पूछता हूँ", "इस बालक की प्रव्रज्या के लिए पूछता हूँ", "यह श्रमण होना चाहता है" या "यह प्रव्रजित होना चाहता है"—ऐसा कहना भी उचित ही है। සචෙ සභාගට්ඨානං හොති, දස වා වීසං වා තිංසං වා භික්ඛූ වසන්තීති පරිච්ඡෙදො පඤ්ඤායති, තෙසං ඨිතොකාසං වා නිසින්නොකාසං වා ගන්ත්වාපි පුරිමනයෙනෙව ආපුච්ඡිතබ්බං. පබ්බජ්ජාපෙක්ඛං විනාව දහරභික්ඛූ වා සාමණෙරෙ වා පෙසෙත්වාපි ‘‘එකො භන්තෙ පබ්බජ්ජාපෙක්ඛො අත්ථි තස්ස භණ්ඩුකම්මං ආපුච්ඡාමා’’තිආදිනා නයෙන ආපුච්ඡාපෙතුං වට්ටති. यदि वह एक समान स्थान है, और यदि यह ज्ञात है कि वहाँ दस, बीस या तीस भिक्षु रहते हैं, तो उनके खड़े होने या बैठने के स्थान पर जाकर पहले की तरह ही अनुमति लेनी चाहिए। प्रव्रज्या के इच्छुक व्यक्ति को छोड़कर, युवा भिक्षुओं या श्रमणेरों को भेजकर भी इस प्रकार अनुमति माँगनी चाहिए: "भन्ते, एक प्रव्रज्या का इच्छुक व्यक्ति है, हम उसके मुंडन (भण्डुकम्म) के लिए अनुमति माँगते हैं।" සචෙ කෙචි භික්ඛූ සෙනාසනං වා ගුම්බාදීනි වා පවිසිත්වා නිද්දායන්ති වා සමණධම්මං වා කරොන්ති, ආපුච්ඡකා ච පරියෙසන්තාපි අදිස්වා ‘‘සබ්බෙ ආපුච්ඡිතා අම්හෙහී’’ති සඤ්ඤිනො හොන්ති, පබ්බජ්ජා නාම ලහුකං කම්මං, තස්මා පබ්බජිතො සුපබ්බජිතොව පබ්බාජෙන්තස්සාපි අනාපත්ති. यदि कुछ भिक्षु आवासों या झाड़ियों आदि में प्रवेश कर सो रहे हों या श्रमण-धर्म का पालन कर रहे हों, और अनुमति माँगने वाले उन्हें ढूँढने पर भी न पाकर यह समझें कि "हमने सभी से अनुमति ले ली है," तो चूँकि प्रव्रज्या एक लघु कर्म है, इसलिए वह प्रव्रजित व्यक्ति सु-प्रव्रजित ही है और प्रव्रज्या देने वाले को भी कोई आपत्ति (अनापत्ति) नहीं होती। සචෙ පන මහාවිහාරො හොති අනෙකභික්ඛුසහස්සාවාසො, සබ්බෙ භික්ඛූ සන්නිපාතෙතුම්පි දුක්කරං, පගෙව පටිපාටියා ආපුච්ඡිතුං, ඛණ්ඩසීමායං වා ඨත්වා නදීසමුද්දාදීනි වා ගන්ත්වා පබ්බාජෙතබ්බො. යො පන නවමුණ්ඩො වා හොති විබ්භන්තකො වා නිගණ්ඨාදීසු අඤ්ඤතරො වා ද්වඞ්ගුලකෙසො [Pg.285] වා ඌනද්වඞ්ගුලකෙසො වා, තස්ස කෙසච්ඡෙදනකිච්චං නත්ථි, තස්මා භණ්ඩුකම්මං අනාපුච්ඡිත්වාපි තාදිසං පබ්බාජෙතුං වට්ටති. ද්වඞ්ගුලාතිරිත්තකෙසො පන යො හොති අන්තමසො එකසිඛාමත්තධරොපි, සො භණ්ඩුකම්මං ආපුච්ඡිත්වාව පබ්බාජෙතබ්බො. උපාලිවත්ථු මහාවිභඞ්ගෙ වුත්තනයමෙව. यदि वह अनेक हजार भिक्षुओं के आवास वाला महाविहार हो, तो सभी भिक्षुओं को एकत्रित करना कठिन है, फिर एक-एक करके अनुमति माँगना तो और भी कठिन है। ऐसी स्थिति में खण्ड-सीमा में खड़े होकर या नदी-समुद्र आदि पर जाकर प्रव्रज्या देनी चाहिए। जो व्यक्ति नया मुंडित हो, या जो अभी-अभी प्रव्रज्या छोड़कर लौटा हो, या निग्रंथ आदि अन्य मतों का हो, जिसके बाल दो अंगुल के हों या दो अंगुल से कम हों, उसके लिए बाल काटने का कार्य शेष नहीं है; इसलिए मुंडन की अनुमति लिए बिना भी उसे प्रव्रजित करना उचित है। परंतु जिसके बाल दो अंगुल से अधिक हों, यहाँ तक कि यदि एक शिखा मात्र भी हो, तो मुंडन की अनुमति लेकर ही उसे प्रव्रजित करना चाहिए। उपालि की कथा महाविभंग में वर्णित पद्धति के अनुसार ही है। 100. අහිවාතකරොගෙනාති මාරිබ්යාධිනා; යත්ර හි සො රොගො උප්පජ්ජති, තං කුලං ද්විපදචතුප්පදං සබ්බං නස්සති, යො භිත්තිං වා ඡදනං වා භින්දිත්වා පලායති, තිරොගාමාදිගතො වා හොති, සො මුච්චති. තථා චෙත්ථ පිතාපුත්තා මුච්චිංසු. තෙන වුත්තං – ‘‘පිතාපුත්තකා සෙසා හොන්තී’’ති. १००. 'अहिवातकरोग' का अर्थ है प्राणघातक महामारी (मारिव्याधि); जहाँ कहीं यह रोग उत्पन्न होता है, वहाँ वह कुल, दो पैरों वाले (मनुष्य आदि) और चार पैरों वाले (पशु आदि) सभी नष्ट हो जाते हैं। जो व्यक्ति दीवार या छत तोड़कर भाग जाता है, या दूसरे गाँव आदि चला जाता है, वह बच जाता है। इसी प्रकार यहाँ पिता और पुत्र बच गए। इसीलिए कहा गया है - "पिता और पुत्र शेष रह गए।" කාකුඩ්ඩෙපකන්ති යො වාමහත්ථෙන ලෙඩ්ඩුං ගහෙත්වා නිසින්නො සක්කොති ආගතාගතෙ කාකෙ උඩ්ඩාපෙත්වා පුරතො නික්ඛිත්තං භත්තං භුඤ්ජිතුං, අයං කාකුඩ්ඩෙපකො නාම, තං පබ්බාජෙතුං වට්ටති. 'काकुड्डेपक' (कौवे उड़ाने वाला) वह है जो बाएं हाथ में ढेला लेकर बैठा हुआ, आने वाले कौवों को उड़ाकर अपने सामने रखे हुए भोजन को खाने में समर्थ हो; ऐसे बालक को प्रव्रजित करना उचित है। 102. ඉත්තරොති අප්පමත්තකො; කතිපාහමෙව වාසො භවිස්සතීති අත්ථො. १०२. 'इत्तरो' का अर्थ है अल्प (थोड़ा); इसका अर्थ है कि निवास केवल कुछ ही दिनों का होगा। 103. ඔගණෙනාති පරිහීනගණෙන; අප්පමත්තකෙන භික්ඛුසඞ්ඝෙනාති අත්ථො. අබ්යත්තෙන යාවජීවන්ති එත්ථ සචායං වුඩ්ඪතරං ආචරියං න ලභති, උපසම්පදාය සට්ඨිවස්සො වා සත්තතිවස්සො වා හොතු, නවකතරස්සාපි බ්යත්තස්ස සන්තිකෙ උක්කුටිකං නිසීදිත්වා අඤ්ජලිං පග්ගහෙත්වා ‘‘ආචරියො මෙ ආවුසො හොහි, ආයස්මතො නිස්සාය වච්ඡාමී’’ති එවං තික්ඛත්තුං වත්වා නිස්සයො ගහෙතබ්බොව. ගාමප්පවෙසනං ආපුච්ඡන්තෙනාපි උක්කුටිකං නිසීදිත්වා අඤ්ජලිං පග්ගහෙත්වා ගාමප්පවෙසනං ආපුච්ඡාමි ආචරියා’’ති වත්තබ්බං. එස නයො සබ්බආපුච්ඡනෙසු. පඤ්චකඡක්කෙසු චෙත්ථ යත්තකං සුතං නිස්සයමුත්තකස්ස ඉච්ඡිතබ්බං, තං භික්ඛුනොවාදකවණ්ණනායං වුත්තං. තස්ස නත්ථිතාය ච අප්පස්සුතො; අත්ථිතාය ච බහුස්සුතොති වෙදිතබ්බො. සෙසං වුත්තනයෙනෙව. १०३. 'ओगणेन' का अर्थ है हीन गण वाला; अर्थात् अल्प भिक्षु संघ के साथ। 'अव्यत्त (अकुशल) द्वारा जीवन भर' के विषय में यहाँ यह है कि यदि वह अपने से बड़े आचार्य को प्राप्त नहीं करता है, तो चाहे वह उपसंपदा से साठ वर्ष का हो या सत्तर वर्ष का, उसे अपने से कनिष्ठ (छोटे) किंतु कुशल भिक्षु के पास उकड़ू बैठकर, अंजलिबद्ध होकर "आयुष्मान् मेरे आचार्य बनें, मैं आयुष्मान् के निश्रय (निसय) में रहूँगा" - ऐसा तीन बार कहकर निश्रय ग्रहण करना ही चाहिए। गाँव में प्रवेश की अनुमति माँगते समय भी उकड़ू बैठकर और अंजलिबद्ध होकर "आचार्य, मैं गाँव में प्रवेश की अनुमति माँगता हूँ" - ऐसा कहना चाहिए। सभी प्रकार की अनुमतियों में यही विधि है। निश्रय-मुक्त होने के लिए जितने श्रुत (ज्ञान) की आवश्यकता होती है, वह भिक्खुनोवादक-वर्णना में कहा गया है। उसके अभाव में 'अल्पश्रुत' और उसकी उपस्थिति में 'बहुश्रुत' समझना चाहिए। शेष सब पूर्वोक्त विधि के अनुसार ही है। කම්මාරභණ්ඩුවත්ථාදිකථා නිට්ඨිතා. कर्मारभण्डु (लुहार के संबंधी) आदि की कथा समाप्त हुई। රාහුලවත්ථුකථා राहुल-वस्तु की कथा। 105. යෙන [Pg.286] කපිලවත්ථු තෙන චාරිකං පක්කාමීති එත්ථ අයං අනුපුබ්බිකථා. සුද්ධොදනමහාරාජා කිර බොධිසත්තස්ස අභිනික්ඛමනදිවසතො පට්ඨාය ‘‘මම පුත්තො බුද්ධො භවිස්සාමීති නික්ඛන්තො, ජාතො නු ඛො බුද්ධො’’ති පවත්තිසවනත්ථං ඔහිතසොතොව විහරති. සො භගවතො පධානචරියඤ්ච සම්බොධිඤ්ච ධම්මචක්කප්පවත්තනාදීනි ච සුණන්තො ‘‘ඉදානි කිර මෙ පුත්තො රාජගහං උපනිස්සාය විහරතී’’ති සුත්වා එකං අමච්චං ආණාපෙසි – ‘‘අහං තාත වුඩ්ඪො මහල්ලකො, සාධු මෙ ජීවන්තස්සෙව පුත්තං දස්සෙහී’’ති. සො ‘‘සාධූ’’ති පටිස්සුණිත්වා පුරිසසහස්සපරිවාරො රාජගහං ගන්ත්වා භගවතො පාදෙ වන්දිත්වා නිසීදි. අථස්ස භගවා ධම්මකථං කථෙසි, සො පසීදිත්වා පබ්බජ්ජඤ්චෙව උපසම්පදඤ්ච යාචි. තතො නං භගවා එහිභික්ඛූපසම්පදාය උපසම්පාදෙසි, සො සපරිසො අරහත්තං පත්වා තත්ථෙව ඵලසමාපත්තිසුඛං අනුභවමානො විහාසි. රාජා තෙනෙව උපායෙන අපරෙපි අට්ඨ දූතෙ පහිණි, තෙපි සබ්බෙ සපරිසා තථෙව අරහත්තං පත්වා තත්ථෙව විහරිංසු. ‘‘ඉමිනා නාම කාරණෙන තෙ නාගච්ඡන්තී’’ති රඤ්ඤො කොචි පවත්තිමත්තම්පි ආරොචෙන්තො නත්ථි. १०५. "जिस ओर कपिलवस्तु था, उस ओर चारिका के लिए प्रस्थान किया" - यहाँ यह अनुक्रमिक कथा है। सुना जाता है कि महाराज शुद्धोदन बोधिसत्व के महाभिनिष्क्रमण के दिन से ही "मेरा पुत्र बुद्ध बनने के लिए निकला है, क्या वह बुद्ध हो गया है?" - यह समाचार सुनने के लिए उत्सुक रहते थे। वे भगवान की प्रधान-चर्या (तपस्या), संबोधि और धर्मचक्रप्रवर्तन आदि के बारे में सुनते हुए, जब उन्होंने सुना कि "अब मेरा पुत्र राजगृह के समीप रह रहा है," तो उन्होंने एक अमात्य को आज्ञा दी - "तात, मैं वृद्ध और बूढ़ा हो गया हूँ, अच्छा हो कि मेरे जीवित रहते ही मुझे पुत्र के दर्शन करा दो।" उसने "बहुत अच्छा" कहकर स्वीकार किया और एक हजार पुरुषों के साथ राजगृह जाकर भगवान के चरणों में वंदना कर बैठ गया। तब भगवान ने उसे धर्म-कथा सुनाई, उसने प्रसन्न होकर प्रव्रज्या और उपसंपदा की याचना की। तब भगवान ने उसे 'एहि भिक्खु' उपसंपदा से उपसंपन्न किया। वह अपने परिचारकों सहित अर्हत्व प्राप्त कर वहीं फल-समापत्ति के सुख का अनुभव करते हुए रहने लगा। राजा ने उसी उपाय से अन्य आठ दूतों को भी भेजा, वे भी सभी अपने परिचारकों सहित उसी प्रकार अर्हत्व प्राप्त कर वहीं रहने लगे। राजा को यह बताने वाला कोई नहीं था कि "इस कारण से वे नहीं आ रहे हैं।" අථ රාජා බොධිසත්තෙන සද්ධිං එකදිවසංජාතං කාළුදායිං නාම අමච්චං පහිණිතුකාමො පුරිමනයෙනෙව යාචි, සො ‘‘සචෙ අහං පබ්බජිතුං ලභාමි, දස්සෙස්සාමී’’ති ආහ. තං රාජා ‘‘පබ්බජිත්වාපි මෙ පුත්තං දස්සෙහී’’ති පහිණි; සොපි පුරිසසහස්සපරිවාරො ගන්ත්වා තථෙව සපරිවාරො අරහත්තං පාපුණි. සො එකදිවසං සම්භතෙසු සබ්බසස්සෙසු විස්සට්ඨකම්මන්තෙසු ජනපදමනුස්සෙසු පුප්ඵිතෙසු ථලජජලජපුප්ඵෙසු පටිපජ්ජනක්ඛමෙ මග්ගෙ භගවන්තං වන්දිත්වා සට්ඨිමත්තාහි ගාථාහි ගමනවණ්ණං වණ්ණෙසි. භගවා ‘‘කිමෙත’’න්ති පුච්ඡි. ‘‘භන්තෙ තුම්හාකං පිතා සුද්ධොදනමහාරාජා මහල්ලකොම්හි, ජීවන්තස්සෙව මෙ පුත්තං දස්සෙහී’’ති මං පෙසෙසි, සාධු භන්තෙ භගවා ඤාතකානං සඞ්ගහං කරොතු, කාලො චාරිකං පක්කමිතුන්ති. තෙන හි සඞ්ඝස්ස ආරොචෙහි, ‘‘භික්ඛූ ගමියවත්තං පූරෙස්සන්තී’’ති. ‘‘සාධු භන්තෙ’’ති ථෙරො තථා අකාසි. භගවා අඞ්ගමගධවාසීනං කුලපුත්තානං දසහි සහස්සෙහි කපිලවත්ථුවාසීනං දසහීති සබ්බෙහෙව වීසතිසහස්සෙහි [Pg.287] ඛීණාසවෙහි පරිවුතො රාජගහා නික්ඛමිත්වා රාජගහතො සට්ඨියොජනිකං කපිලවත්ථුං දිවසෙ දිවසෙ යොජනං ගච්ඡන්තො ද්වීහි මාසෙහි පාපුණිස්සාමීති අතුරිතචාරිකං පක්කාමි. තෙන වුත්තං – ‘‘යෙන කපිලවත්ථු තෙන චාරිකං පක්කාමී’’ති. इसके बाद, राजा ने बोधिसत्व के साथ एक ही दिन जन्मे कालुदायी नामक अमात्य को भेजने की इच्छा से पहले की तरह ही प्रार्थना की। उसने कहा, "यदि मुझे प्रव्रजित होने की अनुमति मिले, तो मैं उन्हें ले आऊँगा।" राजा ने उसे यह कहकर भेजा, "प्रव्रजित होकर भी मुझे मेरे पुत्र के दर्शन कराना।" वह भी एक हजार पुरुषों के साथ गया और पहले के अमात्यों की तरह ही सपरिवार अर्हत्व को प्राप्त हुआ। एक दिन, जब सारी फसलें कट चुकी थीं, जनपद के लोग काम से मुक्त हो चुके थे, स्थल और जल के पुष्प खिले हुए थे और मार्ग यात्रा के योग्य था, तब उसने भगवान की वंदना की और साठ गाथाओं में कपिलवस्तु जाने की प्रशंसा की। भगवान ने पूछा, "यह क्या है?" उसने कहा, "भन्ते! आपके पिता महाराज शुद्धोदन वृद्ध हो गए हैं, उन्होंने मुझे यह कहकर भेजा है कि 'मेरे जीवित रहते ही मुझे मेरे पुत्र के दर्शन कराओ'। भन्ते! अच्छा हो कि भगवान अपने ज्ञातियों पर अनुग्रह करें, अब चारिका पर प्रस्थान करने का समय है।" भगवान ने कहा, "तो फिर संघ को सूचित करो, भिक्षु यात्रा की तैयारी करेंगे।" स्थविर ने वैसा ही किया। भगवान अंग और मगध के दस हजार कुलपुत्रों और कपिलवस्तु के दस हजार कुलपुत्रों, इस प्रकार कुल बीस हजार क्षीणास्त्रव (अर्हतों) से घिरे हुए राजगृह से निकले और राजगृह से साठ योजन दूर कपिलवस्तु की ओर प्रतिदिन एक योजन चलते हुए, दो महीने में पहुँचने के विचार से मंद गति से चारिका पर प्रस्थान किया। इसीलिए कहा गया है— 'जिस ओर कपिलवस्तु था, उस ओर चारिका के लिए प्रस्थान किया'। එවං පක්කන්තෙ ච භගවති උදායිත්ථෙරො නික්ඛන්තදිවසතො පට්ඨාය සුද්ධොදනමහාරාජස්ස ගෙහෙ භත්තකිච්චං කරොති. රාජා ථෙරං පරිවිසිත්වා පත්තං ගන්ධචුණ්ණෙන උබ්බට්ටෙත්වා උත්තමභොජනස්ස පූරෙත්වා ‘‘භගවතො දෙහී’’ති ථෙරස්ස හත්ථෙ ඨපෙති. ථෙරොපි තථෙව කරොති. ඉති භගවා අන්තරාමග්ගෙ රඤ්ඤොයෙව පිණ්ඩපාතං පරිභුඤ්ජි. ථෙරොපි ච භත්තකිච්චාවසානෙ දිවසෙ දිවසෙ රඤ්ඤො ආරොචෙති ‘‘අජ්ජ භගවා එත්තකං ආගතො’’ති, බුද්ධගුණපටිසංයුත්තාය ච කථාය සාකියානං භගවති සද්ධං උප්පාදෙසි. තෙනෙව නං භගවා ‘‘එතදග්ගං, භික්ඛවෙ, මම සාවකානං භික්ඛූනං කුලප්පසාදකානං යදිදං කාළුදායී’’ති එතදග්ගෙ ඨපෙසි. भगवान के प्रस्थान करने पर, उदायी स्थविर प्रस्थान के दिन से ही महाराज शुद्धोदन के महल में भोजन करते थे। राजा स्थविर को भोजन कराकर, उनके पात्र को सुगंधित चूर्ण से मांजकर और उत्तम भोजन से भरकर, "यह भगवान को दें" कहकर स्थविर के हाथ में देते थे। स्थविर भी वैसा ही करते थे। इस प्रकार भगवान ने मार्ग में राजा द्वारा दिए गए पिंडपात का ही उपभोग किया। स्थविर भी भोजन के अंत में प्रतिदिन राजा को सूचित करते थे कि "आज भगवान इतनी दूर आ गए हैं", और बुद्ध के गुणों से संबंधित कथाओं के माध्यम से शाक्यों के मन में भगवान के प्रति श्रद्धा उत्पन्न की। इसी कारण भगवान ने उन्हें यह कहते हुए एतदग्र पद पर प्रतिष्ठित किया— "भिक्षुओं! मेरे श्रावक भिक्षुओं में कुलों को प्रसन्न करने वालों में यह कालुदायी सर्वश्रेष्ठ है।" සාකියාපි ඛො අනුප්පත්තෙ භගවති ‘‘අම්හාකං ඤාතිසෙට්ඨං පස්සිස්සාමා’’ති සන්නිපතිත්වා භගවතො වසනට්ඨානං වීමංසමානා නිග්රොධසක්කස්ස ආරාමො රමණීයොති සල්ලක්ඛෙත්වා තත්ථ සබ්බං පටිජග්ගනවිධිං කාරෙත්වා ගන්ධපුප්ඵාදිහත්ථා පච්චුග්ගමනං කරොන්තා සබ්බාලඞ්කාරපටිමණ්ඩිතෙ දහරදහරෙ නාගරිකදාරකෙ ච දාරිකායො ච පඨමං පහිණිංසු, තතො රාජකුමාරෙ ච රාජකුමාරිකායො ච තෙසං අනන්තරා සාමං ගන්ත්වා ගන්ධපුප්ඵචුණ්ණාදීහි පූජයමානා භගවන්තං ගහෙත්වා නිග්රොධාරාමමෙව අගමංසු. තත්ර භගවා වීසතිසහස්සඛීණාසවපරිවුතො පඤ්ඤත්තවරබුද්ධාසනෙ නිසීදි. සාකියා මානජාතිකා මානථද්ධා, තෙ ‘‘සිද්ධත්ථකුමාරො අම්හෙහි දහරතරොව අම්හාකං කනිට්ඨො, භාගිනෙය්යො, පුත්තො, නත්තා’’ති චින්තෙත්වා දහරදහරෙ රාජකුමාරෙ ආහංසු – ‘‘තුම්හෙ වන්දථ, මයං තුම්හාකං පිට්ඨිතො නිසීදිස්සාමා’’ති. भगवान के पहुँचने पर शाक्य भी "हम अपने श्रेष्ठ संबंधी के दर्शन करेंगे" ऐसा सोचकर एकत्रित हुए और भगवान के रहने के स्थान पर विचार करते हुए उन्होंने निग्रोध शाक्य के उद्यान को रमणीय पाया। वहाँ उन्होंने ठहरने की सारी व्यवस्था की और हाथों में सुगंधित पुष्प आदि लेकर अगवानी करते हुए, सबसे पहले सभी अलंकारों से सुसज्जित नगर के छोटे-छोटे बालकों और बालिकाओं को भेजा। उसके बाद राजकुमारों और राजकुमारियों को भेजा, और उनके पीछे स्वयं जाकर पुष्प, गंध और चूर्ण आदि से पूजा करते हुए भगवान को निग्रोधाराम ले गए। वहाँ भगवान बीस हजार क्षीणास्त्रवों से घिरे हुए बिछाए गए श्रेष्ठ बुद्धासन पर विराजमान हुए। शाक्य स्वभाव से अभिमानी और जिद्दी थे। उन्होंने सोचा, "सिद्धार्थ कुमार हमसे छोटा है, हमारा छोटा भाई, भांजा, पुत्र या पोता है।" ऐसा सोचकर उन्होंने छोटे राजकुमारों से कहा— "तुम वंदना करो, हम तुम्हारे पीछे बैठेंगे।" තෙසු එවං නිසින්නෙසු භගවා තෙසං අජ්ඣාසයං ඔලොකෙත්වා ‘‘න මං ඤාතී වන්දන්ති, හන්ද නෙ වන්දාපයිස්සාමී’’ති අභිඤ්ඤාපාදකං චතුත්ථජ්ඣානං සමාපජ්ජිත්වා වුට්ඨාය ඉද්ධියා ආකාසං අබ්භුග්ගන්ත්වා තෙසං සීසෙ පාදපංසුං ඔකිරමානො [Pg.288] විය කණ්ඩම්බමූලෙ යමකපාටිහාරියසදිසං පාටිහාරියමකාසි. රාජා තං අච්ඡරියං දිස්වා ආහ – ‘‘භගවා තුම්හාකං මඞ්ගලදිවසෙ බ්රාහ්මණස්ස වන්දනත්ථං උපනීතානං පාදෙ වො පරිවත්තිත්වා බ්රාහ්මණස්ස මත්ථකෙ පතිට්ඨිතෙ දිස්වාපි අහං තුම්හෙ වන්දිං, අයං මෙ පඨමවන්දනා. වප්පමඞ්ගලදිවසෙ ජම්බුච්ඡායාය සිරිසයනෙ නිපන්නානං වො ජම්බුච්ඡායාය අපරිවත්තනං දිස්වාපි පාදෙ වන්දිං, අයං මෙ දුතියවන්දනා. ඉදානි ඉමං අදිට්ඨපුබ්බං පාටිහාරියං දිස්වාපි තුම්හාකං පාදෙ වන්දාමි, අයං මෙ තතියවන්දනා’’ති. उनके इस प्रकार बैठने पर भगवान ने उनके अभिप्राय को जानकर सोचा, "मेरे संबंधी मुझे वंदना नहीं कर रहे हैं, अब मैं इनसे वंदना करवाऊँगा।" उन्होंने अभिज्ञा के आधारभूत चतुर्थ ध्यान में समाधिस्थ होकर, उससे उठकर ऋद्धि से आकाश में गमन किया और उनके सिरों पर चरणों की धूल छिड़कते हुए काण्डम्ब वृक्ष के नीचे यमक प्रातिहार्य के समान प्रातिहार्य दिखाया। राजा ने उस आश्चर्य को देखकर कहा— "भगवान! आपके मंगल दिवस के दिन जब आपको ब्राह्मण की वंदना के लिए ले जाया गया था, तब आपके चरणों को उलटकर ब्राह्मण के मस्तक पर स्थित देखकर मैंने आपको वंदना की थी, वह मेरी पहली वंदना थी। वप्प-मंगल के दिन जामुन के वृक्ष की छाया में श्रेष्ठ शय्या पर लेटे हुए आपके ऊपर जामुन की छाया को न बदलते देख मैंने आपके चरणों की वंदना की थी, वह मेरी दूसरी वंदना थी। अब इस पहले कभी न देखे गए प्रातिहार्य को देखकर मैं आपके चरणों की वंदना करता हूँ, यह मेरी तीसरी वंदना है।" සුද්ධොදනමහාරාජෙන පන වන්දිතෙ භගවති අවන්දිත්වා ඨිතො නාම එකසාකියොපි නාහොසි, සබ්බෙයෙව වන්දිංසු. ඉති භගවා ඤාතයො වන්දාපෙත්වා ආකාසතො ඔරුය්හ පඤ්ඤත්තෙ ආසනෙ නිසීදි. නිසින්නෙ භගවති සිඛාප්පත්තො ඤාතිසමාගමො අහොසි, සබ්බෙ එකග්ගා සන්නිපතිංසු. තතො මහාමෙඝො පොක්ඛරවස්සං වස්සි, තම්බවණ්ණමුදකං හෙට්ඨා විරවන්තං ගච්ඡති. කස්සචි සරීරෙ එකබින්දුමත්තම්පි න පතති, තං දිස්වා සබ්බෙ අච්ඡරියබ්භුතජාතා අහෙසුං. භගවා ‘‘න ඉදානෙව මය්හං ඤාතිසමාගමෙ පොක්ඛරවස්සං වස්සති, අතීතෙපි වස්සී’’ති ඉමිස්සා අට්ඨුප්පත්තියා වෙස්සන්තරජාතකං කථෙසි. ධම්මදෙසනං සුත්වා සබ්බෙ උට්ඨාය වන්දිත්වා පදක්ඛිණං කත්වා පක්කමිංසු. එකොපි රාජා වා රාජමහාමත්තො වා ‘‘ස්වෙ අම්හාකං භික්ඛං ගණ්හථා’’ති වත්වා ගතො නාම නත්ථි. महाराज शुद्धोदन द्वारा भगवान की वंदना किए जाने पर, एक भी शाक्य ऐसा नहीं बचा जिसने वंदना न की हो; सभी ने वंदना की। इस प्रकार भगवान ने संबंधियों से वंदना करवाकर आकाश से उतरकर बिछाए गए आसन पर विराजमान हुए। भगवान के विराजमान होने पर संबंधियों का वह समागम अपनी पराकाष्ठा पर था, सभी एकाग्र होकर एकत्रित हुए। तब महामेघ से पुष्कर-वर्षा हुई, जिसमें तांबे के रंग का जल नीचे गर्जना करता हुआ बह रहा था। किसी के शरीर पर एक बूंद भी जल नहीं गिरता था। उसे देखकर सभी आश्चर्यचकित रह गए। भगवान ने कहा— "केवल अभी मेरे ज्ञाति-समागम में पुष्कर-वर्षा नहीं हुई है, अतीत में भी हुई थी", और इस घटना के संदर्भ में वेस्सन्तर जातक सुनाया। धर्मोपदेश सुनकर सभी उठकर, वंदना और प्रदक्षिणा करके चले गए। एक भी राजा या राज-अमात्य ऐसा नहीं था जिसने यह कहा हो कि "कल हमारे यहाँ भिक्षा ग्रहण करें।" භගවා දුතියදිවසෙ වීසතිභික්ඛුසහස්සපරිවාරො කපිලවත්ථුං පිණ්ඩාය පාවිසි, න කොචි පච්චුග්ගන්ත්වා නිමන්තෙසි වා පත්තං වා අග්ගහෙසි. භගවා ඉන්දඛීලෙ ඨිතො ආවජ්ජෙසි – ‘‘කථං නු ඛො පුබ්බෙ බුද්ධා කුලනගරෙ පිණ්ඩාය චරිංසු, කිං උප්පටිපාටියා ඉස්සරජනානං ඝරානි අගමංසු, උදාහු සපදානචාරිකං චරිංසූ’’ති. තතො එකබුද්ධස්සපි උප්පටිපාටියා ගමනං අදිස්වා ‘‘මයාපි ඉදානි අයමෙව වංසො අයං පවෙණී පග්ගහෙතබ්බා, ආයතිඤ්ච මෙ සාවකාපි මමෙව අනුසික්ඛන්තා පිණ්ඩචාරියවත්තං පූරෙස්සන්තී’’ති කොටියං නිවිට්ඨගෙහතො පට්ඨාය සපදානං පිණ්ඩාය චරති. ‘‘අය්යො කිර සිද්ධත්ථකුමාරො පිණ්ඩාය චරතී’’ති චතුභූමකාදීසු පාසාදෙසු සීහපඤ්ජරං විවරිත්වා මහාජනො දස්සනබ්යාවටො අහොසි. රාහුලමාතාපි දෙවී ‘‘අය්යපුත්තො කිර ඉමස්මිංයෙව නගරෙ මහතා රාජානුභාවෙන [Pg.289] සුවණ්ණසිවිකාදීහි විචරිත්වා ඉදානි කෙසමස්සුං ඔහාරෙත්වා කාසායවත්ථවසනො කපාලහත්ථො පිණ්ඩාය චරති, ‘‘සොභති නු ඛො නො වා’’ති සීහපඤ්ජරං විවරිත්වා ඔලොකයමානා භගවන්තං නානාවිරාගසමුජ්ජලාය සරීරප්පභාය නගරවීථියො ඔභාසෙත්වා බුද්ධසිරියා විරොචමානං දිස්වා උණ්හීසතො පට්ඨාය යාව පාදතලා නරසීහගාථාහි නාම අට්ඨහි ගාථාහි අභිත්ථවිත්වා රඤ්ඤො සන්තිකං ගන්ත්වා ‘‘තුම්හාකං පුත්තො පිණ්ඩාය චරතී’’ති රඤ්ඤො ආරොචෙසි. රාජා සංවිග්ගහදයො හත්ථෙන සාටකං සණ්ඨාපයමානො තුරිතතුරිතං නික්ඛමිත්වා වෙගෙන ගන්ත්වා භගවතො පුරතො ඨත්වා ආහ – ‘‘කිං භන්තෙ අම්හෙ ලජ්ජාපෙථ, කිමත්ථං පිණ්ඩාය චරථ, කිං එත්තකානං භික්ඛූනං න සක්කා භත්තං ලද්ධුන්ති එවංසඤ්ඤිනො අහුවත්ථා’’ති. වංසචාරිත්තමෙතං මහාරාජ අම්හාකන්ති. නනු භන්තෙ අම්හාකං මහාසම්මතඛත්තියවංසො නාම වංසො, තත්ථ ච එකඛත්තියොපි භික්ඛාචාරො නාම නත්ථීති. අයං මහාරාජ වංසො නාම තව වංසො, අම්හාකං පන බුද්ධවංසො වංසො නාම, සබ්බබුද්ධා ච පිණ්ඩචාරිකා අහෙසුන්ති අන්තරවීථියං ඨිතොව – भगवान ने दूसरे दिन बीस हजार भिक्षुओं के साथ कपिलवस्तु में भिक्षा के लिए प्रवेश किया। किसी ने भी आगे आकर न तो उन्हें आमंत्रित किया और न ही उनका पात्र ग्रहण किया। भगवान ने नगर के द्वार (इन्द्रकील) पर खड़े होकर विचार किया— “अतीत में बुद्धों ने अपने कुल के नगर में भिक्षा के लिए कैसे चर्या की थी? क्या वे प्रभावशाली लोगों के घरों में बिना किसी क्रम के गए थे, अथवा उन्होंने व्यवस्थित रूप से (सपदानचारिका) चर्या की थी?” तब किसी भी बुद्ध को बिना क्रम के जाते न देखकर उन्होंने विचार किया— “मुझे भी अब इसी वंश और इसी परंपरा का पालन करना चाहिए। भविष्य में मेरे श्रावक भी मेरा अनुसरण करते हुए भिक्षाटन के व्रत को पूरा करेंगे।” ऐसा सोचकर उन्होंने किनारे पर स्थित घर से आरंभ करके व्यवस्थित रूप से भिक्षा चर्या की। “आर्य सिद्धार्थ कुमार भिक्षा के लिए चर्या कर रहे हैं”—यह सुनकर चार मंजिला महलों के झरोखों को खोलकर जनसमूह उन्हें देखने में लग गया। राहुल की माता देवी (यशोधरा) ने भी सोचा— “आर्यपुत्र इसी नगर में महान राजसी वैभव के साथ स्वर्ण पालकियों आदि में घूमा करते थे, और अब वे केश-दाढ़ी मुंडवाकर, काषाय वस्त्र धारण किए, हाथ में पात्र लिए भिक्षा चर्या कर रहे हैं। क्या यह शोभा देता है या नहीं?” उन्होंने झरोखा खोलकर देखते हुए भगवान को उनके शरीर की विभिन्न रंगों से चमकती आभा से नगर की गलियों को आलोकित करते हुए और बुद्ध-श्री से सुशोभित होते देखा। मस्तक से लेकर पैरों के तलवों तक 'नरसिंह गाथा' नामक आठ गाथाओं से उनकी स्तुति की और राजा (शुद्धोदन) के पास जाकर कहा— “आपका पुत्र भिक्षा चर्या कर रहा है।” राजा उद्विग्न हृदय से, हाथ से अपने वस्त्र को संभालते हुए, अत्यंत शीघ्रता से महल से निकले और भगवान के सामने खड़े होकर बोले— “भन्ते! आप हमें क्यों लज्जित कर रहे हैं? आप भिक्षा चर्या क्यों कर रहे हैं? क्या आपको लगा कि इतने भिक्षुओं के लिए भोजन प्राप्त करना संभव नहीं होगा?” भगवान ने कहा— “महाराज! यह हमारे वंश का आचरण है।” राजा ने कहा— “भन्ते! क्या हमारा वंश महासम्मत क्षत्रिय वंश नहीं है? उस वंश में एक भी क्षत्रिय ऐसा नहीं हुआ जिसने भिक्षा चर्या की हो।” भगवान ने कहा— “महाराज! वह वंश आपका वंश है। हमारा वंश तो बुद्ध-वंश है। सभी बुद्धों ने भिक्षा चर्या की है।” ऐसा कहकर गली के बीच में खड़े होकर ही— ‘‘උත්තිට්ඨෙ නප්පමජ්ජෙය්ය, ධම්මං සුචරිතං චරෙ; ධම්මචාරී සුඛං සෙති, අස්මිං ලොකෙ පරම්හි චා’’ති. “भिक्षा चर्या (उत्थान) में प्रमाद न करे, धर्म का सुचरित (भली-भांति) आचरण करे। धर्म का पालन करने वाला इस लोक और परलोक में सुखपूर्वक रहता है।” ඉමං ගාථමාහ. ගාථාපරියොසානෙ රාජා සොතාපත්තිඵලං සච්ඡාකාසි. उन्होंने यह गाथा कही। गाथा के अंत में राजा ने स्रोतापत्ति फल का साक्षात्कार किया। ‘‘ධම්මං චරෙ සුචරිතං, න නං දුච්චරිතං චරෙ; ධම්මචාරී සුඛං සෙති, අස්මිං ලොකෙ පරම්හි චා’’ති. “धर्म का सुचरित आचरण करे, उसका दुश्चरित आचरण न करे। धर्म का पालन करने वाला इस लोक और परलोक में सुखपूर्वक रहता है।” ඉමං පන ගාථං සුත්වා සකදාගාමිඵලෙ පතිට්ඨාසි, ධම්මපාලජාතකං සුත්වා අනාගාමිඵලෙ පතිට්ඨාසි, මරණසමයෙ සෙතච්ඡත්තස්ස හෙට්ඨා සිරිසයනෙ නිපන්නොයෙව අරහත්තං පාපුණි. අරඤ්ඤවාසෙන පධානානුයොගකිච්චං රඤ්ඤො නාහොසි. इस गाथा को सुनकर वे सकदागामी फल में प्रतिष्ठित हुए। 'धम्मपाल जातक' सुनकर अनागामी फल में प्रतिष्ठित हुए। मृत्यु के समय श्वेत छत्र के नीचे शोभायमान शय्या पर लेटे हुए ही उन्होंने अर्हत्व प्राप्त किया। राजा के लिए वन में रहकर साधना करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। සොතාපත්තිඵලඤ්ච සච්ඡිකත්වා එව පන භගවතො පත්තං ගහෙත්වා සපරිසං භගවන්තං මහාපාසාදං ආරොපෙත්වා පණීතෙන ඛාදනීයෙන භොජනීයෙන පරිවිසි. භත්තකිච්චාවසානෙ සබ්බං ඉත්ථාගාරං ආගන්ත්වා භගවන්තං වන්දි ඨපෙත්වා රාහුලමාතරං. සා පන ‘‘ගච්ඡ අය්යපුත්තං වන්දාහී’’ති පරිජනෙන වුච්චමානාපි ‘‘සචෙ මය්හං ගුණො අත්ථි, සයමෙව අය්යපුත්තො ආගමිස්සති[Pg.290], ආගතං නං වන්දිස්සාමී’’ති වත්වා න අගමාසි. අථ භගවා රාජානං පත්තං ගාහාපෙත්වා ද්වීහි අග්ගසාවකෙහි සද්ධිං රාජධීතාය සිරිගබ්භං ගන්ත්වා ‘‘රාජධීතා යථාරුචියා වන්දමානා න කිඤ්චි වත්තබ්බා’’ති වත්වා පඤ්ඤත්තෙ ආසනෙ නිසීදි. සා වෙගෙන ආගන්ත්වා ගොප්ඵකෙසු ගහෙත්වා පාදපිට්ඨියං සීසං පරිවත්තෙත්වා පරිවත්තෙත්වා යථාජ්ඣාසයං වන්දි. स्रोतापत्ति फल का साक्षात्कार करने के बाद, राजा ने भगवान का पात्र लिया और परिषद सहित भगवान को महान प्रासाद (महल) में ले गए और उत्तम खाद्य एवं भोज्य पदार्थों से उनकी सेवा की। भोजन के अंत में, राहुल की माता को छोड़कर सारा अंतःपुर आया और भगवान की वंदना की। राहुल की माता ने परिचारकों द्वारा “जाओ और आर्यपुत्र की वंदना करो” कहे जाने पर भी कहा— “यदि मुझमें कोई गुण है, तो आर्यपुत्र स्वयं ही आएंगे। जब वे आएंगे, तब मैं उनकी वंदना करूंगी।” और वे नहीं गईं। तब भगवान ने राजा से पात्र पकड़वाया और दो अग्रश्रावकों के साथ राजकुमारी (यशोधरा) के कक्ष में गए और कहा— “राजकुमारी अपनी इच्छा के अनुसार वंदना करे, उसे कुछ न कहा जाए।” ऐसा कहकर वे बिछाए गए आसन पर बैठ गए। वह शीघ्रता से आईं, उनके टखनों को पकड़ा और अपने सिर को उनके चरणों पर बार-बार घुमाते हुए अपनी इच्छानुसार वंदना की। රාජා රාජධීතාය භගවති සිනෙහබහුමානාදිගුණසම්පත්තිං කථෙසි. භගවා ‘‘අනච්ඡරියං මහාරාජ යං ඉදානි පරිපක්කෙ ඤාණෙ තයා රක්ඛියමානා රාජධීතා අත්තානං රක්ඛි, සා පුබ්බෙ අනාරක්ඛා පබ්බතපාදෙ විචරමානා අපරිපක්කෙ ඤාණෙ අත්තානං රක්ඛී’’ති වත්වා චන්දකින්නරීජාතකං කථෙසි. राजा ने भगवान के प्रति राजकुमारी के प्रेम और सम्मान आदि गुणों की पूर्णता के बारे में बताया। भगवान ने कहा— “महाराज! यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि अब ज्ञान के परिपक्व होने पर आपके द्वारा सुरक्षित रहते हुए राजकुमारी ने स्वयं की रक्षा की। पूर्व में भी, जब वह असुरक्षित थी और पर्वत की तलहटी में घूम रही थी, तब ज्ञान के अपरिपक्व होने पर भी उसने अपनी रक्षा की थी।” ऐसा कहकर उन्होंने 'चन्दकिन्नरी जातक' सुनाया। තංදිවසමෙව ච නන්දරාජකුමාරස්ස කෙසවිස්සජ්ජනං පට්ටබන්ධො ඝරමඞ්ගලං ආවාහමඞ්ගලං ඡත්තමඞ්ගලන්ති පඤ්ච මහාමඞ්ගලානි හොන්ති. භගවා නන්දං පත්තං ගාහාපෙත්වා මඞ්ගලං වත්වා උට්ඨායාසනා පක්කාමි. ජනපදකල්යාණී කුමාරං ගච්ඡන්තං දිස්වා ‘‘තුවටං ඛො අය්යපුත්ත ආගච්ඡෙය්යාසී’’ති වත්වා ගීවං පසාරෙත්වා ඔලොකෙසි. සොපි භගවන්තං ‘‘පත්තං ගණ්හථා’’ති වත්තුං අවිසහමානො විහාරංයෙව අගමාසි. තං අනිච්ඡමානංයෙව භගවා පබ්බාජෙසි. ඉති භගවා කපිලපුරං ආගන්ත්වා දුතියදිවසෙ නන්දං පබ්බාජෙසි. उसी दिन राजकुमार नन्द के पाँच महान मंगल उत्सव थे— केश विसर्जन, पट्ट-बंधन, गृह-मंगल, विवाह-मंगल और छत्र-मंगल। भगवान ने नन्द से पात्र पकड़वाया, मंगल वचन कहे और आसन से उठकर चल दिए। जनपदकल्याणी ने राजकुमार को जाते हुए देखकर अपनी गर्दन झुकाकर देखा और कहा— “आर्यपुत्र! शीघ्र लौट आना।” वह (नन्द) भी भगवान से “पात्र ले लीजिए” कहने का साहस न कर पाने के कारण विहार तक ही चला गया। उनकी इच्छा न होने पर भी भगवान ने उन्हें प्रव्रजित (दीक्षित) कर दिया। इस प्रकार भगवान ने कपिलवस्तु आकर दूसरे दिन नन्द को प्रव्रजित किया। සත්තමෙ දිවසෙ රාහුලමාතා කුමාරං අලඞ්කරිත්වා භගවතො සන්තිකං පෙසෙසි – ‘‘පස්ස තාත එතං වීසතිසහස්සසමණපරිවුතං සුවණ්ණවණ්ණං බ්රහ්මරූපවණ්ණං සමණං, අයං තෙ පිතා, එතස්ස මහන්තා නිධයො අහෙසුං, ත්යස්ස නික්ඛමනතො පට්ඨාය න පස්සාම, ගච්ඡ නං දායජ්ජං යාච, අහං තාත කුමාරො ඡත්තං උස්සාපෙත්වා චක්කවත්තී භවිස්සාමි, ධනෙන මෙ අත්ථො, ධනං මෙ දෙහි, සාමිකො හි පුත්තො පිතුසන්තකස්සා’’ති. රාහුලකුමාරො භගවතො සන්තිකං ගන්ත්වාව පිතුසිනෙහං පටිලභිත්වා හට්ඨචිත්තො ‘‘සුඛා තෙ සමණ ඡායා’’ති වත්වා අඤ්ඤම්පි බහුං අත්තනො අනුරූපං වදන්තො අට්ඨාසි. භගවා කතභත්තකිච්චො අනුමොදනං කත්වා උට්ඨායාසනා පක්කාමි. කුමාරොපි ‘‘දායජ්ජං මෙ සමණ දෙහි, දායජ්ජං මෙ සමණ දෙහී’’ති භගවන්තං අනුබන්ධි. තෙන වුත්තං – ‘‘අනුපුබ්බෙන චාරිකං චරමානො යෙන කපිලවත්ථු…පෙ… දායජ්ජං මෙ සමණ දෙහී’’ති. सातवें दिन, राहुल की माता ने राजकुमार को अलंकृत कर भगवान के पास भेजा— “पुत्र! बीस हजार भिक्षुओं से घिरे हुए, स्वर्ण वर्ण वाले और ब्रह्मा के समान रूप वाले इस श्रमण को देखो। यह तुम्हारे पिता हैं। इनके पास महान निधियाँ (खजाने) थीं। उनके गृह-त्याग के समय से ही हम उन्हें नहीं देख पा रहे हैं। जाओ और उनसे अपनी विरासत (दायाद) माँगो। हे तात! मैं राजकुमार हूँ, छत्र धारण कर चक्रवर्ती राजा बनूँगा। मुझे धन की आवश्यकता है। मुझे धन दो। क्योंकि पुत्र ही पिता की संपत्ति का स्वामी होता है।” राजकुमार राहुल भगवान के पास जाकर, पिता के प्रति स्नेह प्राप्त कर, प्रसन्न चित्त होकर बोले— “हे श्रमण! आपकी छाया सुखद है।” ऐसा कहकर वे अपने अनुरूप अन्य बहुत सी बातें कहते हुए वहीं खड़े रहे। भगवान भोजन के पश्चात अनुमोदन कर आसन से उठकर चल दिए। राजकुमार भी “हे श्रमण! मुझे विरासत दो, हे श्रमण! मुझे विरासत दो” कहते हुए भगवान के पीछे-पीछे चल पड़ा। इसीलिए कहा गया है— “क्रमशः चारिका करते हुए जहाँ कपिलवस्तु है... (पे)... हे श्रमण! मुझे विरासत दो।” අථ [Pg.291] ඛො භගවා ආයස්මන්තං සාරිපුත්තං ආමන්තෙසීති භගවා කුමාරං න නිවත්තාපෙසි, පරිජනොපි භගවතා සද්ධිං ගච්ඡන්තං නිවත්තෙතුං න විසහති. අථ ආරාමං ගන්ත්වා ‘‘යං අයං පිතුසන්තකං ධනං ඉච්ඡති, තං වට්ටානුගතං සවිඝාතකං, හන්දස්ස බොධිමණ්ඩෙ පටිලද්ධං සත්තවිධං අරියධනං දෙමි, ලොකුත්තරදායජ්ජස්ස නං සාමිකං කරොමී’’ති ආයස්මන්තං සාරිපුත්තං ආමන්තෙසි. ආමන්තෙත්වා ච පනාහ – ‘‘තෙන හි ත්වං සාරිපුත්ත රාහුලකුමාරං පබ්බාජෙහී’’ති. යස්මා අයං දායජ්ජං යාචති, තස්මා නං ලොකුත්තරදායජ්ජපටිලාභාය පබ්බාජෙහීති අත්ථො. तब भगवान ने आयुष्मान सारिपुत्र को आमंत्रित किया। भगवान ने राजकुमार को वापस नहीं लौटाया, और परिचारक भी भगवान के साथ जाते हुए राजकुमार को रोकने का साहस नहीं कर सके। फिर विहार (आराम) पहुँचकर भगवान ने विचार किया— “यह राजकुमार अपने पिता की जिस संपत्ति को चाहता है, वह संसार (वट) के अधीन है और दुखों से युक्त है। अब मैं इसे बोधिमण्डप में प्राप्त सात प्रकार के आर्य-धन को देता हूँ और इसे लोकोत्तर विरासत का स्वामी बनाता हूँ।” ऐसा सोचकर उन्होंने आयुष्मान सारिपुत्र को बुलाया। बुलाकर उन्होंने कहा— “तो फिर सारिपुत्र! तुम राजकुमार राहुल को प्रव्रजित करो।” चूँकि यह विरासत माँग रहा है, इसलिए इसे लोकोत्तर विरासत की प्राप्ति के लिए प्रव्रजित करो—यही इसका अर्थ है। ඉදානි යා සා භගවතා බාරාණසියං තීහි සරණගමනෙහි පබ්බජ්ජා ච උපසම්පදා ච අනුඤ්ඤාතා, තතො යස්මා උපසම්පදං පටික්ඛිපිත්වා ගරුභාවෙ ඨපෙත්වා ඤත්තිචතුත්ථෙන කම්මෙන උපසම්පදා අනුඤ්ඤාතා, පබ්බජ්ජා පන නෙව පටික්ඛිත්තා, න පුන අනුඤ්ඤාතා, තස්මා අනාගතෙ භික්ඛූනං විමති උප්පජ්ජිස්සති – ‘‘අයං පබ්බජ්ජා නාම පුබ්බෙ උපසම්පදාසදිසා, කිං නු ඛො ඉදානිපි උපසම්පදා විය කම්මවාචාය එව කත්තබ්බා, උදාහු සරණගමනෙහී’’ති. ඉමඤ්ච පනත්ථං විදිත්වා භගවා පුන තීහි සරණගමනෙහි සාමණෙරපබ්බජ්ජං අනුජානිතුකාමො, තස්මා ධම්මසෙනාපති තං භගවතො අජ්ඣාසයං විදිත්වා භගවන්තං පුන පබ්බජ්ජං අනුජානාපෙතුකාමො ආහ – ‘‘කථාහං භන්තෙ රාහුලකුමාරං පබ්බාජෙමී’’ති. अब, भगवान ने वाराणसी में तीन शरणगमनों के माध्यम से जिस प्रव्रज्या और उपसंपदा की अनुमति दी थी, उसके बाद चूँकि उपसंपदा को (उस रूप में) अस्वीकार कर और उसे गरिमामय स्थिति में रखकर 'ज्ञप्ति-चतुर्थ' कर्म द्वारा उपसंपदा की अनुमति दी गई थी, किंतु प्रव्रज्या को न तो अस्वीकार किया गया था और न ही पुनः अनुमति दी गई थी, इसलिए भविष्य में भिक्षुओं को यह संदेह उत्पन्न होगा— “यह प्रव्रज्या पहले उपसंपदा के समान थी; क्या अब भी इसे उपसंपदा की तरह कर्मवाच्य (औपचारिक प्रक्रिया) से ही करना चाहिए या शरणगमनों के द्वारा?” इस बात को जानकर भगवान पुनः तीन शरणगमनों द्वारा सामणेर-प्रव्रज्या की अनुमति देना चाहते थे। इसलिए धर्मसेनापति (सारिपुत्र) ने भगवान के उस आशय को जानकर, भगवान से पुनः प्रव्रज्या की अनुमति प्राप्त करने की इच्छा से पूछा— “भन्ते! मैं राजकुमार राहुल को कैसे प्रव्रजित करूँ?” අථ ඛො ආයස්මා සාරිපුත්තො රාහුලකුමාරං පබ්බාජෙසීති කුමාරස්ස මහාමොග්ගල්ලානත්ථෙරො කෙසෙ ඡින්දිත්වා කාසායානි දත්වා සරණානි අදාසි. මහාකස්සපත්ථෙරො ඔවාදාචරියො අහොසි. යස්මා පන උපජ්ඣායමූලකා පබ්බජ්ජා ච උපසම්පදා ච, උපජ්ඣායොව තත්ථ ඉස්සරො, න ආචරියො, තස්මා වුත්තං – ‘‘අථ ඛො ආයස්මා සාරිපුත්තො රාහුලකුමාරං පබ්බාජෙසී’’ති. तब आयुष्मान सारिपुत्र ने राजकुमार राहुल को प्रव्रजित किया। राजकुमार के बाल काटकर और काषाय वस्त्र देकर महामौद्गल्यायन स्थविर ने उन्हें शरणगमन प्रदान किया। महाकाश्यप स्थविर उनके ओवादाचार्य (उपदेशक आचार्य) हुए। चूँकि प्रव्रज्या और उपसंपदा उपाध्याय-मूलक होती हैं और वहाँ उपाध्याय ही प्रधान होता है, आचार्य नहीं, इसलिए कहा गया है— “तब आयुष्मान सारिपुत्र ने राजकुमार राहुल को प्रव्रजित किया।” එවං ‘‘කුමාරො පබ්බජිතො’’ති සුත්වා උප්පන්නසංවෙගෙන හදයෙන අථ ඛො සුද්ධොදනො සක්කොති සබ්බං වත්තබ්බං. තත්ථ යස්මා උඤ්ඡාචරියාය ජීවතො පබ්බජිතස්ස අවිසෙසෙන ‘‘වරං යාචාමී’’ති වුත්තෙ ‘‘යාචස්සූ’’ති වචනං අප්පතිරූපං, න ච බුද්ධානං ආචිණ්ණං, තස්මා ‘‘අතික්කන්තවරා ඛො ගොතම තථාගතා’’ති වුත්තං. යඤ්ච භන්තෙ කප්පති යඤ්ච අනවජ්ජන්ති යං තුම්හාකඤ්චෙව දාතුං කප්පති, අනවජ්ජඤ්ච හොති, මම ච සම්පටිච්ඡනපච්චයා විඤ්ඤූහි න ගරහිතබ්බං, තං යාචාමීති අත්ථො. තථා නන්දෙ අධිමත්තං රාහුලෙති [Pg.292] යථෙව කිර බොධිසත්තං එවං නන්දම්පි රාහුලම්පි මඞ්ගලදිවසෙ නෙමිත්තකා ‘‘චක්කවත්තී භවිස්සතී’’ති බ්යාකරිංසු. අථ රාජා ‘‘පුත්තස්ස චක්කවත්තිසිරිං පස්සිස්සාමී’’ති උස්සාහජාතො භගවතො පබ්බජ්ජාය මහන්තං ඉච්ඡාවිඝාතං පාපුණි. තතො ‘‘නන්දස්ස චක්කවත්තිසිරිං පස්සිස්සාමී’’ති උස්සාහං ජනෙසි, තම්පි භගවා පබ්බාජෙසි. ඉති තම්පි දුක්ඛං අධිවාසෙත්වා ‘‘ඉදානි රාහුලස්ස චක්කවත්තිසිරිං පස්සිස්සාමී’’ති උස්සාහං ජනෙසි, තම්පි භගවා පබ්බාජෙසි. තෙනස්ස ‘‘ඉදානි කුලවංසොපි පච්ඡින්නො, කුතො චක්කවත්තිසිරී’’ති අධිකතරං දුක්ඛං උප්පජ්ජි. තෙන වුත්තං – ‘‘තථා නන්දෙ අධිමත්තං රාහුලෙ’’ති. රඤ්ඤො පන ඉතො පච්ඡා අනාගාමිඵලප්පත්ති වෙදිතබ්බා. इस प्रकार “राजकुमार प्रव्रजित हो गया” यह सुनकर उद्विग्न हृदय से राजा शुद्धोदन शाक्य ने जो कुछ कहा, वह सब यहाँ कहना चाहिए। वहाँ, चूँकि भिक्षाटन (उञ्छाचर्या) से जीविका चलाने वाले प्रव्रजित व्यक्ति के लिए सामान्य रूप से “मैं वर माँगता हूँ” कहने पर “वर माँगो” कहना अनुपयुक्त है और यह बुद्धों का आचरण भी नहीं है, इसलिए कहा गया— “हे गौतम! तथागत वरों से परे हैं।” “जो उचित और निर्दोष हो” का अर्थ है—जो आपको देने योग्य हो, निर्दोष हो और मेरे द्वारा उसे स्वीकार करने के कारण विद्वानों द्वारा निंदनीय न हो, मैं वह वर माँगता हूँ। “जैसे नन्द के प्रति, वैसे ही राहुल के प्रति अत्यधिक (दुःख हुआ)”—जैसे बोधिसत्व के विषय में, वैसे ही नन्द और राहुल के विषय में भी मंगल-दिवस पर निमित्तज्ञों (ज्योतिषियों) ने भविष्यवाणी की थी कि “ये चक्रवर्ती राजा बनेंगे।” तब राजा ने सोचा कि “मैं पुत्र की चक्रवर्ती लक्ष्मी (वैभव) को देखूँगा,” किंतु भगवान के प्रव्रजित होने पर उनकी इच्छा भंग हुई और उन्हें भारी दुःख हुआ। उसके बाद उन्होंने सोचा कि “नन्द की चक्रवर्ती लक्ष्मी को देखूँगा,” उसे भी भगवान ने प्रव्रजित कर दिया। इस प्रकार उस दुःख को सहकर उन्होंने सोचा कि “अब राहुल की चक्रवर्ती लक्ष्मी को देखूँगा,” उसे भी भगवान ने प्रव्रजित कर दिया। इससे उन्हें और भी अधिक दुःख हुआ कि “अब तो कुल-वंश ही कट गया, अब चक्रवर्ती वैभव कहाँ?” इसीलिए कहा गया— “जैसे नन्द के प्रति, वैसे ही राहुल के प्रति।” इसके बाद राजा को अनागामी फल की प्राप्ति हुई, ऐसा समझना चाहिए। සාධු භන්තෙ අය්යාති ඉදං කස්මා ආහ? සො කිර චින්තෙසි – ‘‘යත්ර හි නාම අහම්පි බුද්ධමාමකො ධම්මමාමකො සඞ්ඝමාමකො සමානො අත්තනො පියතරපුත්තෙ පබ්බාජියමානෙ ඤාතිවියොගදුක්ඛං අධිවාසෙතුං න සක්කොමි, අඤ්ඤෙ ජනා පුත්තනත්තකෙසු පබ්බාජිතෙසු කථං අධිවාසෙස්සන්ති, තස්මා අඤ්ඤෙසම්පි තාව එවරූපං දුක්ඛං මා අහොසී’’ති ආහ. භගවා ‘‘සාසනෙ නිය්යානිකකාරණං රාජා වදතී’’ති ධම්මකථං කත්වා ‘‘න භික්ඛවෙ අනනුඤ්ඤාතො මාතාපිතූහි පුත්තො පබ්බාජෙතබ්බො’’ති සික්ඛාපදං පඤ්ඤපෙසි. “साधु भन्ते! आर्य!”—यह उन्होंने क्यों कहा? उन्होंने सोचा— “जब मुझ जैसा बुद्ध-भक्त, धम्म-भक्त और संघ-भक्त होने पर भी अपने अत्यंत प्रिय पुत्र के प्रव्रजित होने पर सगे-संबंधियों के वियोग के दुःख को सहन नहीं कर पा रहा हूँ, तो अन्य लोग अपने पुत्र-पौत्रों के प्रव्रजित होने पर उसे कैसे सहन करेंगे? इसलिए दूसरों को कम से कम ऐसा दुःख न हो।” भगवान ने यह सोचकर कि “राजा शासन में कल्याणकारी (निर्याणिक) बात कह रहे हैं,” धर्मोपदेश दिया और यह शिक्षापद (नियम) निर्धारित किया— “भिक्षुओं! माता-पिता की अनुमति के बिना पुत्र को प्रव्रजित नहीं करना चाहिए।” තත්ථ මාතාපිතූහීති ජනනිජනකෙ සන්ධාය වුත්තං. සචෙ ද්වෙ අත්ථි, ද්වෙපි ආපුච්ඡිතබ්බා. සචෙ පිතා මතො මාතා වා, යො ජීවති සො ආපුච්ඡිතබ්බො. පබ්බජිතාපි ආපුච්ඡිතබ්බාව. ආපුච්ඡන්තෙන සයං වා ගන්ත්වා ආපුච්ඡිතබ්බං, අඤ්ඤො වා පෙසෙතබ්බො, සො එව වා පෙසෙතබ්බො ‘‘ගච්ඡ මාතාපිතරො ආපුච්ඡිත්වා එහී’’ති. සචෙ ‘‘අනුඤ්ඤාතොම්හී’’ති වදති, සද්දහන්තෙන පබ්බාජෙතබ්බො. පිතා සයං පබ්බජිතො පුත්තම්පි පබ්බාජෙතුකාමො හොති, මාතරං ආපුච්ඡිත්වාව පබ්බාජෙතු. මාතා වා ධීතරං පබ්බාජෙතුකාමා, පිතරං ආපුච්ඡිත්වාව පබ්බාජෙතු. පිතා පුත්තදාරෙන අනත්ථිකො පලායි, මාතා ‘‘ඉමං පබ්බාජෙථා’’ති පුත්තං භික්ඛූනං දෙති, ‘‘පිතාස්ස කුහි’’න්ති වුත්තෙ ‘‘චිත්තකෙළියං කීළිතුං පලාතො’’ති වදති, තං පබ්බාජෙතුං වට්ටති. මාතා කෙනචි පුරිසෙන සද්ධිං පලාතා හොති, පිතා පන ‘‘පබ්බාජෙථා’’ති දෙති, එත්ථාපි එසෙව නයො. පිතා විප්පවුත්ථො හොති, මාතා පුත්තං ‘‘පබ්බාජෙථා’’ති අනුජානාති, ‘‘පිතා [Pg.293] තස්ස කුහි’’න්ති වුත්තෙ ‘‘කිං තුම්හාකං පිතරා, අහං ජානිස්සාමී’’ති වදති, පබ්බාජෙතුං වට්ටතීති කුරුන්දියං වුත්තං. वहाँ 'माता-पिता' (मातापितु) शब्द जन्म देने वाली माता और जन्म देने वाले पिता के संदर्भ में कहा गया है। यदि दोनों जीवित हैं, तो दोनों से अनुमति लेनी चाहिए। यदि पिता या माता की मृत्यु हो गई हो, तो जो जीवित है उससे अनुमति लेनी चाहिए। यदि वे प्रव्रजित भी हों, तो भी उनसे अनुमति लेनी ही चाहिए। अनुमति माँगने वाले को स्वयं जाकर पूछना चाहिए, या किसी अन्य को भेजना चाहिए, या उसी (प्रत्याशी) को यह कहकर भेजना चाहिए कि 'जाओ, माता-पिता से पूछकर आओ'। यदि वह कहता है कि 'मुझे अनुमति मिल गई है', तो विश्वास होने पर उसे प्रव्रजित करना चाहिए। यदि पिता स्वयं प्रव्रजित है और पुत्र को भी प्रव्रजित करना चाहता है, तो माता से पूछकर ही प्रव्रजित करे। यदि माता पुत्री को प्रव्रजित करना चाहती है, तो पिता से पूछकर ही प्रव्रजित करे। यदि पिता स्त्री-पुत्र से विरक्त होकर भाग गया हो और माता 'इसे प्रव्रजित करें' कहकर पुत्र को भिक्षुओं को सौंप दे, और पूछने पर कि 'इसका पिता कहाँ है?' वह कहे कि 'वह अपनी मौज-मस्ती के लिए भाग गया है', तो उसे प्रव्रजित करना उचित है। यदि माता किसी पुरुष के साथ भाग गई हो और पिता 'इसे प्रव्रजित करें' कहकर सौंप दे, तो यहाँ भी यही नियम है। यदि पिता कहीं दूर गया हो और माता पुत्र को 'प्रव्रजित करें' कहकर अनुमति दे दे, और पूछने पर कि 'उसका पिता कहाँ है?' वह कहे कि 'आपको पिता से क्या प्रयोजन? मैं देख लूँगी', तो उसे प्रव्रजित करना उचित है—ऐसा कुरुन्दी में कहा गया है। මාතාපිතරො මතා, දාරකො චූළමාතාදීනං සන්තිකෙ සංවද්ධො, තස්මිං පබ්බාජියමානෙ ඤාතකා කලහං වා කරොන්ති, ඛිය්යන්ති වා, තස්මා විවාදුපච්ඡෙදනත්ථං ආපුච්ඡිත්වාව පබ්බාජෙතබ්බො. අනාපුච්ඡා පබ්බාජෙන්තස්ස පන ආපත්ති නත්ථි. දහරකාලෙ ගහෙත්වා පොසනකා මාතාපිතරො නාම හොන්ති, තෙසුපි එසෙව නයො. පුත්තො අත්තානං නිස්සාය ජීවති, න මාතාපිතරො. සචෙපි රාජා හොති, ආපුච්ඡිත්වාව පබ්බාජෙතබ්බො. මාතාපිතූහි අනුඤ්ඤාතො පබ්බජිත්වා පුන විබ්භමති, සචෙපි සතක්ඛත්තුං පබ්බජිත්වා විබ්භමති, ආගතාගතකාලෙ පුනප්පුනං ආපුච්ඡිත්වාව පබ්බාජෙතබ්බො. සචෙ එවං වදන්ති – ‘‘අයං විබ්භමිත්වා ගෙහං ආගතො අම්හාකං කම්මං න කරොති, පබ්බජිත්වා තුම්හාකං වත්තං න පූරෙති, නත්ථි ඉමස්සාපුච්ඡනකිච්චං, ආගතාගතං පබ්බාජෙය්යාථා’’ති එවං නිස්සට්ඨං පුන අනාපුච්ඡාපි පබ්බාජෙතුං වට්ටති. यदि माता-पिता की मृत्यु हो गई हो और बालक मौसी आदि के पास पला-बढ़ा हो, और उसे प्रव्रजित करते समय यदि संबंधी झगड़ा करें या निंदा करें, तो विवाद को समाप्त करने के लिए उनसे पूछकर ही प्रव्रजित करना चाहिए। लेकिन बिना पूछे प्रव्रजित करने वाले को कोई आपत्ति नहीं होती। बचपन में गोद लेकर पालने वाले भी माता-पिता ही कहलाते हैं, उनके विषय में भी यही नियम है। यदि पुत्र स्वयं पर निर्भर होकर जीता है, माता-पिता पर नहीं, यहाँ तक कि यदि वह राजा भी हो, तो भी पूछकर ही प्रव्रजित करना चाहिए। माता-पिता द्वारा अनुमत होकर प्रव्रजित होने के बाद यदि वह पुनः गृहस्थ हो जाता है, और यदि वह सात बार भी प्रव्रजित होकर गृहस्थ होता है, तो हर बार आने पर बार-बार पूछकर ही उसे प्रव्रजित करना चाहिए। यदि वे ऐसा कहें—'यह गृहस्थ होकर घर आता है तो हमारा काम नहीं करता, और प्रव्रजित होकर आपके कर्तव्यों को पूरा नहीं करता; इसके लिए पूछने की कोई आवश्यकता नहीं है, जब-जब यह आए तब-तब इसे प्रव्रजित कर दें'—इस प्रकार त्याग दिए गए बालक को पुनः बिना पूछे भी प्रव्रजित करना उचित है। යොපි දහරකාලෙයෙව ‘‘අයං තුම්හාකං දින්නො, යදා ඉච්ඡථ, තදා පබ්බාජෙය්යාථා’’ති එවං දින්නො හොති, සොපි ආගතාගතො පුන අනාපුච්ඡාව පබ්බාජෙතබ්බො. යං පන දහරකාලෙයෙව ‘‘ඉමං භන්තෙ පබ්බාජෙය්යාථා’’ති අනුජානිත්වා පච්ඡා වුඩ්ඪිප්පත්තකාලෙ නානුජානන්ති, අයං න අනාපුච්ඡා පබ්බාජෙතබ්බො. එකො මාතාපිතූහි සද්ධිං භණ්ඩිත්වා ‘‘පබ්බාජෙථ ම’’න්ති ආගච්ඡති, ‘‘ආපුච්ඡිත්වා එහී’’ති ච වුත්තො ‘‘නාහං ගච්ඡාමි, සචෙ මං න පබ්බාජෙථ, විහාරං වා ඣාපෙමි, සත්ථෙන වා තුම්හෙ පහරාමි, තුම්හාකං ඤාතකඋපට්ඨාකානං වා ආරාමච්ඡෙදනාදීහි අනත්ථං උප්පාදෙමි, රුක්ඛා වා පතිත්වා මරාමි, චොරමජ්ඣං වා පවිසාමි, දෙසන්තරං වා ගච්ඡාමී’’ති වදති, තං ජීවස්සෙව රක්ඛණත්ථාය පබ්බාජෙතුං වට්ටති. සචෙ පනස්ස මාතාපිතරො ආගන්ත්වා ‘‘කස්මා අම්හාකං පුත්තං පබ්බාජයිත්ථා’’ති වදන්ති, තෙසං තමත්ථං ආරොචෙත්වා ‘‘රක්ඛණත්ථාය නං පබ්බාජයිම්හ, පඤ්ඤායථ තුම්හෙ පුත්තෙනා’’ති වත්තබ්බා. ‘‘රුක්ඛා පතිස්සාමී’’ති ආරුහිත්වා පන හත්ථපාදෙ මුඤ්චන්තං පබ්බාජෙතුං වට්ටතියෙව. जिस बालक को बचपन में ही यह कहकर दे दिया गया हो कि 'यह आपको दिया गया है, जब आप चाहें तब इसे प्रव्रजित कर दें', उसे भी बार-बार आने पर पुनः बिना पूछे ही प्रव्रजित करना चाहिए। लेकिन जिसे बचपन में ही 'भन्ते, इसे प्रव्रजित करें' कहकर अनुमति दी गई थी, परंतु बाद में वयस्क होने पर वे अनुमति नहीं देते, उसे बिना पूछे प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। यदि कोई बालक माता-पिता से झगड़कर 'मुझे प्रव्रजित करें' कहकर आता है, और 'पूछकर आओ' कहे जाने पर कहता है—'मैं नहीं जाऊँगा; यदि आप मुझे प्रव्रजित नहीं करेंगे, तो मैं विहार जला दूँगा, या शस्त्र से आप पर प्रहार करूँगा, या आपके संबंधियों और उपस्थायकों के उद्यानों को काटने आदि से उनका अनिष्ट करूँगा, या पेड़ से गिरकर मर जाऊँगा, या चोरों के बीच चला जाऊँगा, या दूसरे देश चला जाऊँगा', तो उसके जीवन की रक्षा के लिए उसे प्रव्रजित करना उचित है। यदि उसके माता-पिता आकर कहें कि 'आपने हमारे पुत्र को क्यों प्रव्रजित किया?', तो उन्हें वह कारण बताकर कहना चाहिए—'हमने उसकी रक्षा के लिए उसे प्रव्रजित किया है, आप अपने पुत्र के कारण ही पहचाने जाएँगे।' यदि कोई 'पेड़ से गिर जाऊँगा' कहकर चढ़कर हाथ-पैर छोड़ रहा हो, तो उसे प्रव्रजित करना उचित ही है। එකොපි [Pg.294] විදෙසං ගන්ත්වා පබ්බජ්ජං යාචති, ආපුච්ඡිත්වා චෙ ගතො, පබ්බාජෙතබ්බො. නො චෙ දහරභික්ඛුං පෙසෙත්වා ආපුච්ඡාපෙත්වා පබ්බාජෙතබ්බො, අතිදූරඤ්චෙ හොති; පබ්බාජෙත්වාපි භික්ඛූහි සද්ධිං පෙසෙත්වා දස්සෙතුං වට්ටති. කුරුන්දියං පන වුත්තං – ‘‘සචෙ දූරං හොති මග්ගො ච මහාකන්තාරො, ‘ගන්ත්වා ආපුච්ඡිස්සාමා’ති පබ්බාජෙතුං වට්ටතී’’ති. සචෙ පන මාතාපිතූනං බහූ පුත්තා හොන්ති, එවඤ්ච වදන්ති – ‘‘භන්තෙ එතෙසං දාරකානං යං ඉච්ඡථ, තං පබ්බාජෙය්යාථා’’ති. දාරකෙ වීමංසිත්වා යං ඉච්ඡති, සො පබ්බාජෙතබ්බො. සචෙපි සකලෙන කුලෙන වා ගාමෙන වා අනුඤ්ඤාතං හොති ‘‘භන්තෙ ඉමස්මිං කුලෙ වා ගාමෙ වා යං ඉච්ඡථ, තං පබ්බාජෙය්යාථා’’ති. යං ඉච්ඡති, සො පබ්බාජෙතබ්බොති. यदि कोई व्यक्ति दूसरे देश जाकर प्रव्रज्या माँगता है, और यदि वह पूछकर गया है, तो उसे प्रव्रजित करना चाहिए। यदि नहीं, तो किसी युवा भिक्षु को भेजकर अनुमति मँगवाकर उसे प्रव्रजित करना चाहिए; यदि बहुत दूर हो, तो प्रव्रजित करके भी भिक्षुओं के साथ भेजकर (माता-पिता को) दिखाना उचित है। कुरुन्दी में कहा गया है—'यदि दूरी अधिक हो और मार्ग महाकांतार हो, तो 'जाकर पूछ लेंगे' ऐसा विचार करके प्रव्रजित करना उचित है।' यदि माता-पिता के बहुत से पुत्र हों और वे ऐसा कहें—'भन्ते, इन बालकों में से जिसे आप चाहें, उसे प्रव्रजित कर दें', तो बालकों की परीक्षा करके जिसे वह चाहे, उसे प्रव्रजित करना चाहिए। यदि पूरे कुल या गाँव द्वारा अनुमति दी गई हो कि 'भन्ते, इस कुल या गाँव में से जिसे आप चाहें, उसे प्रव्रजित कर दें', तो जिसे वह चाहे, उसे प्रव्रजित करना चाहिए। යාවතකෙ වා පන උස්සහතීති යත්තකෙ සක්කොති. 'जितनों के लिए वह उत्साहित हो' का अर्थ है—जितनों के लिए वह (अनुशासन करने में) सक्षम हो। රාහුලවත්ථුකථා නිට්ඨිතා. राहुल-वस्तु की कथा समाप्त हुई। සික්ඛාපදදණ්ඩකම්මවත්ථුකථා शिक्षापद-दण्डकर्म-वस्तु की कथा 106. දසසු සික්ඛාපදෙසු පුරිමානං පඤ්චන්නං අතික්කමො නාසනවත්ථු, පච්ඡිමානං අතික්කමො දණ්ඩකම්මවත්ථු. १०६. दस शिक्षापदों में से पहले पाँच का उल्लंघन 'नासन' (निष्कासन) का कारण है, और अंतिम पाँच का उल्लंघन 'दण्डकर्म' का कारण है। 107. අප්පතිස්සාති භික්ඛූ ජෙට්ඨකට්ඨානෙ ඉස්සරියට්ඨානෙ න ඨපෙන්ති. අසභාගවුත්තිකාති සමානජීවිකා න භවන්ති, විසභාගජීවිකාති අත්ථො. අලාභාය පරිසක්කතීති යථා ලාභං න ලභන්ති; එවං පරක්කමති. අනත්ථායාති උපද්දවාය. අවාසායාති ‘‘කින්ති ඉමස්මිං ආවාසෙ න වසෙය්යු’’න්ති පරක්කමති. අක්කොසති පරිභාසතීති අක්කොසති චෙව භයදස්සනෙන ච තජ්ජෙති. භෙදෙතීති පෙසුඤ්ඤං උපසංහරිත්වා භෙදෙති. ආවරණං කාතුන්ති ‘‘මා ඉධ පවිසා’’ති නිවාරණං කාතුං. යත්ථ වා වසති යත්ථ වා පටික්කමතීති යත්ථ වසති වා පවිසති වා; උභයෙනාපි අත්තනො පරිවෙණඤ්ච වස්සග්ගෙන පත්තසෙනාසනඤ්ච වුත්තං. १०७. "अप्पतिस्सा (अनादर करने वाले)" का अर्थ है कि वे भिक्षुओं को ज्येष्ठता के स्थान पर या अधिकार के स्थान पर नहीं रखते हैं। "असभागवृत्तिका" का अर्थ है कि उनकी आजीविका समान नहीं होती, अर्थात् वे असमान आजीविका वाले होकर विहार करते हैं। "अलाभाय परिसक्कति" का अर्थ है कि जिस प्रकार उन्हें लाभ प्राप्त न हो, उस प्रकार प्रयत्न करना। "अनत्थाय" का अर्थ है उपद्रव (अहित) के लिए। "अवासाय" का अर्थ है कि "कैसे वे इस आवास में न रह सकें", ऐसा प्रयत्न करना। "अक्कोसति परिभासति" का अर्थ है गाली देना और भय दिखाकर धमकाना। "भेदेति" का अर्थ है चुगली (पिशुन वचन) का प्रयोग कर उनमें फूट डालना। "आवरणं कातुं" का अर्थ है "यहाँ प्रवेश मत करो", ऐसा कहकर रोकना। "यत्थ वा वसति यत्थ वा पटिक्कमति" का अर्थ है जहाँ वह रहता है या जहाँ वह प्रवेश करता है; इन दोनों पदों से अपने (आचार्य के) विहार-क्षेत्र और वरिष्ठता के अनुसार प्राप्त शयनासन का कथन किया गया है। මුඛද්වාරිකං ආහාරං ආවරණං කරොන්තීති ‘‘අජ්ජ මා ඛාද, මා භුඤ්ජා’’ති එවං නිවාරෙන්ති. න භික්ඛවෙ මුඛද්වාරිකො ආහාරො ආවරණං කාතබ්බොති [Pg.295] එත්ථ ‘‘මා ඛාද, මා භුඤ්ජා’’ති වදතොපි ‘‘ආහාරං නිවාරෙස්සාමී’’ති පත්තචීවරං අන්තො නික්ඛිපතොපි සබ්බපයොගෙසු දුක්කටං. අනාචාරස්ස පන දුබ්බචසාමණෙරස්ස දණ්ඩකම්මං කත්වා යාගුං වා භත්තං වා පත්තචීවරං වා දස්සෙත්වා ‘‘එත්තකෙ නාම දණ්ඩකම්මෙ ආහටෙ ඉදං ලච්ඡසී’’ති වත්තුං වට්ටති. භගවතා හි ආවරණමෙව දණ්ඩකම්මං වුත්තං. ධම්මසඞ්ගාහකත්ථෙරෙහි පන අපරාධානුරූපං උදකදාරුවාලිකාදීනං ආහරාපනම්පි කාතබ්බන්ති වුත්තං, තස්මා තම්පි කාතබ්බං. තඤ්ච ඛො ‘‘ඔරමිස්සති විරමිස්සතී’’ති අනුකම්පාය, න ‘‘නස්සිස්සති විබ්භමිස්සතී’’තිආදිනයප්පවත්තෙන පාපජ්ඣාසයෙන ‘‘දණ්ඩකම්මං කරොමී’’ති ච උණ්හපාසාණෙ වා නිපජ්ජාපෙතුං පාසාණිට්ඨකාදීනි වා සීසෙ නික්ඛිපාපෙතුං උදකං වා පවෙසෙතුං න වට්ටති. "मुखद्वारिक आहार का आवरण (रोक) करते हैं" का अर्थ है कि "आज मत खाओ, भोजन मत करो", इस प्रकार वे रोकते हैं। "भिक्षुओं, मुखद्वारिक आहार का आवरण नहीं करना चाहिए" - यहाँ "मत खाओ, मत पियो" ऐसा कहने वाले भिक्षु को भी, और "आहार रोकूँगा" इस विचार से पात्र-चीवर को भीतर रख देने वाले भिक्षु को भी सभी प्रयोगों में दुक्कट (दोष) होता है। किन्तु, दुराचारी और दुर्बच (कठिनता से मानने वाले) सामणेर को दण्डकर्म देकर, उसे यागु, भात या पात्र-चीवर दिखाकर यह कहना उचित है कि "इतना दण्डकर्म पूरा करने पर तुम्हें यह प्राप्त होगा"। क्योंकि भगवान ने आवरण (रोकना) ही दण्डकर्म कहा है। धर्मसंग्राहक स्थविरों ने अपराध के अनुरूप जल, लकड़ी, बालू आदि मँगवाने का दण्डकर्म भी करने को कहा है, इसलिए वह भी करना चाहिए। और वह दण्डकर्म "यह (बुराई से) उपराम होगा, विरत होगा" इस प्रकार की अनुकम्पा से करना चाहिए; "यह नष्ट हो जाएगा, भ्रष्ट (चीवर त्याग) हो जाएगा" इस प्रकार के पापपूर्ण आशय से नहीं। "दण्डकर्म करता हूँ" ऐसा सोचकर गर्म पत्थर पर लेटाना, सिर पर पत्थर या ईंट आदि रखना, या पानी में उतारना उचित नहीं है। සික්ඛාපදදණ්ඩකම්මවත්ථුකථා නිට්ඨිතා. शिक्षापद-दण्डकर्म सम्बन्धी कथा समाप्त हुई। අනාපුච්ඡාවරණවත්ථුආදිකථා बिना पूछे (आहार आदि) रोकने की कथा का आरम्भ। 108. න භික්ඛවෙ උපජ්ඣායං අනාපුච්ඡාති එත්ථ ‘‘තුම්හාකං සාමණෙරස්ස අයං නාම අපරාධො, දණ්ඩකම්මමස්ස කරොථා’’ති තික්ඛත්තුං වුත්තෙ, සචෙ උපජ්ඣායො දණ්ඩකම්මං න කරොති, සයං කාතුං වට්ටති. සචෙපි ආදිතොව උපජ්ඣායො වදති ‘‘මය්හං සාමණෙරානං දොසෙ සති තුම්හෙ දණ්ඩකම්මං කරොථා’’ති කාතුං වට්ටතියෙව. යථා ච සාමණෙරානං එවං සද්ධිවිහාරිකන්තෙවාසිකානම්පි දණ්ඩකම්මං කාතුං වට්ටති. १०८. "भिक्षुओं, उपाध्याय से बिना पूछे नहीं" - यहाँ यदि "आपके सामणेर का यह अपराध है, इसे दण्डकर्म दें" ऐसा तीन बार कहने पर भी यदि उपाध्याय दण्डकर्म नहीं देता है, तो स्वयं (दण्डकर्म) करना उचित है। यदि उपाध्याय आरम्भ से ही कह दे कि "मेरे सामणेरों के दोष होने पर आप स्वयं दण्डकर्म करें", तो भी करना उचित ही है। जैसे सामणेरों के लिए, वैसे ही सद्धिविहारिक और अन्तेवासिकों के लिए भी दण्डकर्म करना उचित है। අපලාළෙන්තීති ‘‘තුම්හාකං පත්තං දස්සාම, චීවරං දස්සාමා’’ති අත්තනො උපට්ඨානකරණත්ථං සඞ්ගණ්හන්ති. න භික්ඛවෙ අඤ්ඤස්ස පරිසා අපලාළෙතබ්බාති එත්ථ සාමණෙරා වා හොන්තු උපසම්පන්නා වා, අන්තමසො දුස්සීලභික්ඛුස්සාපි පරස්ස පරිසභූතෙ භින්දිත්වා ගණ්හිතුං න වට්ටති, ආදීනවං පන වත්තුං වට්ටති ‘‘තයා න්හායිතුං ආගතෙන ගූථමක්ඛනං විය කතං දුස්සීලං නිස්සාය විහරන්තෙනා’’ති. සචෙ සො සයමෙව ජානිත්වා උපජ්ඣං වා නිස්සයං වා යාචති, දාතුං වට්ටති. "अपलाळेन्ति" का अर्थ है "हम तुम्हें पात्र देंगे, चीवर देंगे" ऐसा कहकर अपनी सेवा करवाने के लिए (दूसरों के शिष्यों को) अपनी ओर मिलाना। "भिक्षुओं, दूसरे की परिषद को नहीं फुसलाना चाहिए" - यहाँ चाहे सामणेर हों या उपसम्पन्न, यहाँ तक कि दुःशील भिक्षु की परिषद को भी तोड़कर अपने साथ मिलाना उचित नहीं है। किन्तु दोष बताना उचित है कि "जैसे स्नान करने आए व्यक्ति का शरीर विष्ठा से लिप्त हो जाए, वैसे ही तुम इस दुःशील के आश्रय में रहकर कर रहे हो"। यदि वह स्वयं जानकर उपाध्याय या निश्रय (आश्रय) की याचना करता है, तो देना उचित है। අනුජානාමි භික්ඛවෙ දසහඞ්ගෙහි සමන්නාගතං සාමණෙරං නාසෙතුන්ති එත්ථ කණ්ටකසික්ඛාපදවණ්ණනායං වුත්තාසු තීසු නාසනාසු ලිඞ්ගනාසනාව අධිප්පෙතා, තස්මා යො පාණාතිපාතාදීසු එකම්පි කම්මං කරොති, සො ලිඞ්ගනාසනාය නාසෙතබ්බො. යථා ච භික්ඛූනං පාණාතිපාතාදීසු නානාආපත්තියො හොන්ති, න තථා සාමණෙරානං. සාමණෙරො හි කුන්ථකිපිල්ලිකම්පි මාරෙත්වා මඞ්ගුරණ්ඩකම්පි භින්දිත්වා නාසෙතබ්බතංයෙව [Pg.296] පාපුණාති, තාවදෙවස්ස සරණගමනානි ච උපජ්ඣායග්ගහණඤ්ච සෙනාසනග්ගාහො ච පටිප්පස්සම්භති, සඞ්ඝලාභං න ලභති, ලිඞ්ගමත්තමෙව එකං අවසිට්ඨං හොති. සො සචෙ ආකිණ්ණදොසොව හොති, ආයතිං සංවරෙ න තිට්ඨති, නික්කඩ්ඪිතබ්බො. අථ සහසා විරජ්ඣිත්වා ‘‘දුට්ඨු මයා කත’’න්ති පුන සංවරෙ ඨාතුකාමො හොති, ලිඞ්ගනාසනකිච්චං නත්ථි. යථානිවත්ථපාරුතස්සෙව සරණානි දාතබ්බානි, උපජ්ඣායො දාතබ්බො, සික්ඛාපදානි පන සරණගමනෙනෙව ඉජ්ඣන්ති. සාමණෙරානඤ්හි සරණගමනං භික්ඛූනං උපසම්පදකම්මවාචාසදිසං, තස්මා භික්ඛූනං විය චතුපාරිසුද්ධිසීලං, ඉමිනාපි දසසීලානි සමාදින්නානෙව හොන්ති, එවං සන්තෙපි දළ්හීකරණත්ථං ආයතිං සංවරෙ පතිට්ඨාපනත්ථං පුන දාතබ්බානි. සචෙ පුරිමිකාය පුන සරණානි ගහිතානි, පච්ඡිමිකාය වස්සාවාසිකං ලච්ඡති. සචෙ පච්ඡිමිකාය ගහිතානි, සඞ්ඝෙන අපලොකෙත්වා ලාභො දාතබ්බො. "भिक्षुओं, मैं दस अंगों से युक्त सामणेर को नाश (निष्कासित) करने की अनुमति देता हूँ" - यहाँ कण्टक-शिक्षापद की व्याख्या में कही गई तीन प्रकार की नासनाओं (निष्कासनों) में से 'लिंग-नासना' (वेष का निष्कासन) ही अभिप्रेत है। इसलिए जो प्राणातिपात आदि में से एक भी कर्म करता है, उसे लिंग-नासना द्वारा निष्कासित करना चाहिए। जैसे भिक्षुओं के लिए प्राणातिपात आदि में विभिन्न आपत्तियाँ होती हैं, सामणेरों के लिए वैसा नहीं है। सामणेर तो छोटे कीड़े-मकोड़े को भी मारकर या पक्षी के अण्डे को भी फोड़कर निष्कासन के ही योग्य हो जाता है। उसी समय उसके शरणागमन, उपाध्याय-ग्रहण और शयनासन-ग्रहण समाप्त हो जाते हैं, उसे संघ का लाभ नहीं मिलता, केवल लिंग (वेष) मात्र शेष रह जाता है। यदि वह अत्यधिक दोषों वाला हो और भविष्य में संयम में न रहे, तो उसे निकाल देना चाहिए। किन्तु यदि अचानक अपराध हो जाने पर वह "मैंने बुरा किया" ऐसा सोचकर पुनः संयम में स्थित होना चाहता है, तो लिंग-नासना की आवश्यकता नहीं है। जैसे वह वस्त्र पहने हुए है, वैसे ही उसे (पुनः) शरणें देनी चाहिए, उपाध्याय देना चाहिए; शिक्षापद तो शरणागमन से ही सिद्ध हो जाते हैं। सामणेरों का शरणागमन भिक्षुओं की उपसम्पदा-कर्मवाचा के समान है, इसलिए भिक्षुओं के चतुपारिशुद्धि शील की भाँति इससे भी दस शील ग्रहण हो ही जाते हैं। ऐसा होने पर भी, दृढ़ करने के लिए और भविष्य में संयम में प्रतिष्ठित करने के लिए पुनः (शरणें) देनी चाहिए। यदि पहले के (समय के) अनुसार पुनः शरणें ग्रहण की जाती हैं, तो वह पिछले समय के अनुसार वर्षावास का लाभ प्राप्त करेगा। यदि बाद के (समय के) अनुसार ग्रहण की जाती हैं, तो संघ द्वारा अनुमति लेकर लाभ देना चाहिए। අදින්නාදානෙ තිණසලාකමත්තෙනාපි වත්ථුනා, අබ්රහ්මචරියෙ තීසු මග්ගෙසු යත්ථ කත්ථචි විප්පටිපත්තියා, මුසාවාදෙ හස්සාධිප්පායතායපි මුසා භණිතෙ අස්සමණො හොති, නාසෙතබ්බතං ආපජ්ජති. මජ්ජපානෙ පන භික්ඛුනො අජානිත්වාපි බීජතො පට්ඨාය මජ්ජං පිවන්තස්ස පාචිත්තියං. සාමණෙරො ජානිත්වා පිවන්තො සීලභෙදං ආපජ්ජති, න අජානිත්වා. යානි පනස්ස ඉතරානි පඤ්ච සික්ඛාපදානි, තෙසු භින්නෙසු න නාසෙතබ්බො, දණ්ඩකම්මං කාතබ්බං. සික්ඛාපදෙ පන පුන දින්නෙපි අදින්නෙපි වට්ටති. දණ්ඩකම්මෙන පන පීළෙත්වා ආයතිං සංවරෙ ඨපනත්ථාය දාතබ්බමෙව. සාමණෙරානං මජ්ජපානං සචිත්තකං පාරාජිකවත්ථු, අයං විසෙසො. अदत्तादान (चोरी) में तिनके के बराबर वस्तु के लिए भी, अब्रह्मचर्य में तीन मार्गों में से किसी में भी व्यभिचार करने से, और मृषावाद (झूठ) में हँसी-मजाक के उद्देश्य से भी झूठ बोलने पर वह 'अश्रमण' (श्रमण नहीं) हो जाता है और निष्कासन (नाशना) का पात्र हो जाता है। मद्यपान के विषय में, भिक्षु के लिए अनजाने में भी बीज आदि से बने मद्य को पीने पर पाचित्तिय होता है। सामणेर यदि जानकर पीता है तो शील-भंग होता है, अनजाने में नहीं। उसके अन्य जो पाँच शिक्षापद हैं, उनके टूटने पर निष्कासन नहीं करना चाहिए, बल्कि दण्डकर्म करना चाहिए। शिक्षापद को पुनः देने या न देने पर भी वह (सामणेर बना रहना) उचित है। किन्तु दण्डकर्म द्वारा अनुशासित कर भविष्य में संयम में स्थित करने के लिए (शिक्षापद) देना ही चाहिए। सामणेरों के लिए सचेतन (जानबूझकर) मद्यपान करना पाराजिक के समान (लिंग-नाशना का) कारण है, यही (भिक्षुओं से) विशेषता है। අවණ්ණභාසනෙ පන අරහං සම්මාසම්බුද්ධොතිආදීනං පටිපක්ඛවසෙන බුද්ධස්ස වා, ස්වාක්ඛාතොතිආදීනං පටිපක්ඛවසෙන ධම්මස්ස වා, සුප්පටිපන්නොතිආදීනං පටිපක්ඛවසෙන සඞ්ඝස්ස වා අවණ්ණං භාසන්තො රතනත්තයං නින්දන්තො ගරහන්තො ආචරියුපජ්ඣායාදීහි ‘‘මා එවං අවචා’’ති අවණ්ණභාසනෙ ආදීනවං දස්සෙත්වා නිවාරෙතබ්බො. සචෙ යාවතතියං වුච්චමානො න ඔරමති, කණ්ටකනාසනාය නාසෙතබ්බොති කුරුන්දියං වුත්තං. මහාඅට්ඨකථායං පන ‘‘සචෙ එවං වුච්චමානො තං ලද්ධිං නිස්සජ්ජති, දණ්ඩකම්මං කාරෙත්වා අච්චයං දෙසාපෙතබ්බො. සචෙ න නිස්සජ්ජති, තථෙව ආදාය පග්ගය්හ [Pg.297] තිට්ඨති, ලිඞ්ගනාසනාය නාසෙතබ්බො’’ති වුත්තං, තං යුත්තං. අයමෙව හි නාසනා ඉධ අධිප්පෙතාති. अवर्णवाद (बुराई करने) के विषय में, 'अरहं सम्मासम्बुद्ध' आदि गुणों के विपरीत बुद्ध का, 'स्वाक्खात' आदि गुणों के विपरीत धम्म का, या 'सुप्पटिपन्न' आदि गुणों के विपरीत संघ का अवर्णवाद करने वाले, रत्नत्रय की निंदा या गर्हा करने वाले (सामणेर) को आचार्य और उपाध्याय आदि द्वारा "ऐसा मत कहो" कहकर अवर्णवाद के दोष दिखाकर रोकना चाहिए। यदि तीन बार कहे जाने पर भी वह नहीं रुकता, तो 'कण्टक-नाशना' (निष्कासन) करना चाहिए, ऐसा कुरुन्दी में कहा गया है। महाअट्ठकथा में कहा गया है कि "यदि ऐसा कहे जाने पर वह उस (गलत) धारणा को त्याग देता है, तो दण्डकर्म कराकर दोष-देशना (क्षमा-याचना) करानी चाहिए। यदि नहीं त्यागता और उसी को लेकर अडिग रहता है, तो 'लिंग-नाशना' (भेष छीनकर निष्कासन) करना चाहिए।" यही उचित है। क्योंकि यहाँ यही निष्कासन अभिप्रेत है। මිච්ඡාදිට්ඨිකෙපි එසෙව නයො. සස්සතුච්ඡෙදානඤ්හි අඤ්ඤතරදිට්ඨිකො සචෙ ආචරියාදීහි ඔවදියමානො නිස්සජ්ජති, දණ්ඩකම්මං කාරෙත්වා අච්චයං දෙසාපෙතබ්බො. අප්පටිනිස්සජ්ජන්තොව නාසෙතබ්බොති. භික්ඛුනිදූසකො චෙත්ථ කාමං අබ්රහ්මචාරිග්ගහණෙන ගහිතොව අබ්රහ්මචාරිං පන ආයතිං සංවරෙ ඨාතුකාමං සරණානි දත්වා උපසම්පාදෙතුං වට්ටති. භික්ඛුනිදූසකො ආයතිං සංවරෙ ඨාතුකාමොපි පබ්බජ්ජම්පි න ලභති, පගෙව උපසම්පදන්ති එතමත්ථං දස්සෙතුං ‘‘භික්ඛුනිදූසකො’’ති ඉදං විසුං දසමං අඞ්ගං වුත්තන්ති වෙදිතබ්බං. मिथ्यादृष्टि के विषय में भी यही नियम है। शाश्वत या उच्छेद दृष्टि में से किसी एक दृष्टि वाले सामणेर को यदि आचार्य आदि द्वारा उपदेश दिए जाने पर वह उसे त्याग देता है, तो दण्डकर्म कराकर दोष-देशना करानी चाहिए। न त्यागने वाले का ही निष्कासन करना चाहिए। यहाँ 'भिक्षुणी-दूषक' (भिक्षुणी को दूषित करने वाला) भी अब्रह्मचर्य के ग्रहण से ही गृहीत है, किन्तु अब्रह्मचारी यदि भविष्य में संयम में रहने का इच्छुक हो, तो उसे शरण (तिसरण) देकर उपसम्पदा दी जा सकती है। (परन्तु) भिक्षुणी-दूषक भविष्य में संयम में रहने का इच्छुक होने पर भी प्रव्रज्या भी प्राप्त नहीं करता, उपसम्पदा की तो बात ही क्या—इसी अर्थ को दर्शाने के लिए 'भिक्षुणी-दूषक' यह दसवां अंग अलग से कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। අනාපුච්ඡාවරණවත්ථුආදිකථා නිට්ඨිතා. बिना पूछे जाने (अनापुच्छावारण) आदि की कथा समाप्त हुई। පණ්ඩකවත්ථුකථා पण्डक (नपुंसक) वस्तु की कथा। 109. දහරෙ දහරෙති තරුණෙ තරුණෙ. මොළිගල්ලෙති ථූලසරීරෙ. හත්ථිභණ්ඩෙ අස්සභණ්ඩෙති හත්ථිගොපකෙ ච අස්සගොපකෙ ච. १०९. 'दहरे दहरे' का अर्थ है तरुण (युवा)। 'मोळिगल्ले' का अर्थ है स्थूल शरीर वाले। 'हत्थिभण्डे अस्सभण्डे' का अर्थ है हाथी के रक्षक और घोड़े के रक्षक। පණ්ඩකො භික්ඛවෙති එත්ථ ආසිත්තපණ්ඩකො උසූයපණ්ඩකො ඔපක්කමිකපණ්ඩකො පක්ඛපණ්ඩකො නපුංසකපණ්ඩකොති පඤ්ච පණ්ඩකා. තත්ථ යස්ස පරෙසං අඞ්ගජාතං මුඛෙන ගහෙත්වා අසුචිනා ආසිත්තස්ස පරිළාහො වූපසම්මති, අයං ආසිත්තපණ්ඩකො. යස්ස පරෙසං අජ්ඣාචාරං පස්සතො උසූයාය උප්පන්නාය පරිළාහො වූපසම්මති, අයං උසූයපණ්ඩකො. යස්ස උපක්කමෙන බීජානි අපනීතානි, අයං ඔපක්කමිකපණ්ඩකො. එකච්චො පන අකුසලවිපාකානුභාවෙන කාළපක්ඛෙ පණ්ඩකො හොති, ජුණ්හපක්ඛෙ පනස්ස පරිළාහො වූපසම්මති, අයං පක්ඛපණ්ඩකො. යො පන පටිසන්ධියංයෙව අභාවකො උප්පන්නො, අයං නපුංසකපණ්ඩකොති. තෙසු ආසිත්තපණ්ඩකස්ස ච උසූයපණ්ඩකස්ස ච පබ්බජ්ජා න වාරිතා, ඉතරෙසං තිණ්ණං වාරිතා. තෙසුපි පක්ඛපණ්ඩකස්ස යස්මිං පක්ඛෙ පණ්ඩකො හොති, තස්මිංයෙවස්ස පක්ඛෙ පබ්බජ්ජා වාරිතාති කුරුන්දියං වුත්තං. යස්ස චෙත්ථ පබ්බජ්ජා වාරිතා, තං සන්ධාය ඉදං වුත්තං – ‘‘අනුපසම්පන්නො න උපසම්පාදෙතබ්බො උපසම්පන්නො නාසෙතබ්බො’’ති. සොපි [Pg.298] ලිඞ්ගනාසනෙනෙව නාසෙතබ්බො. ඉතො පරං ‘‘නාසෙතබ්බො’’ති වුත්තෙසුපි එසෙව නයො. 'पण्डको भिक्खवे' यहाँ आसित्त-पण्डक, उसूय-पण्डक, ओपक्कमिक-पण्डक, पक्ख-पण्डक और नपुंसक-पण्डक—ये पाँच प्रकार के पण्डक हैं। उनमें, जिसके दूसरे के अंग को मुख से ग्रहण करने पर अशुचि (वीर्य) के सिंचन से (कामुक) जलन शांत होती है, वह 'आसित्त-पण्डक' है। जिसके दूसरों के मैथुन-आचरण को देखने पर ईर्ष्या उत्पन्न होने से जलन शांत होती है, वह 'उसूय-पण्डक' है। जिसके पुरुषत्व के बीज (अंडकोष) शल्य-क्रिया (उपक्रम) से निकाल दिए गए हों, वह 'ओपक्कमिक-पण्डक' है। कोई अकुशल विपाक के प्रभाव से कृष्ण पक्ष में पण्डक होता है और शुक्ल पक्ष में उसकी जलन शांत हो जाती है, वह 'पक्ख-पण्डक' है। जो प्रतिसन्धि (जन्म) के समय ही लिंग-रहित उत्पन्न हुआ हो, वह 'नपुंसक-पण्डक' है। इनमें से आसित्त-पण्डक और उसूय-पण्डक की प्रव्रज्या वर्जित नहीं है, शेष तीन की वर्जित है। उनमें भी पक्ख-पण्डक के लिए जिस पक्ष में वह पण्डक होता है, उसी पक्ष में प्रव्रज्या वर्जित है, ऐसा कुरुन्दी में कहा गया है। यहाँ जिसकी प्रव्रज्या वर्जित है, उसके संदर्भ में यह कहा गया है— "अनुपसम्पन्न को उपसम्पदा नहीं देनी चाहिए, और यदि उपसम्पन्न हो गया हो तो निष्कासित कर देना चाहिए।" उसका भी लिंग-नाशना (भेष छीनकर) ही निष्कासन करना चाहिए। इसके बाद जहाँ भी "निष्कासित करना चाहिए" कहा गया है, वहाँ यही नियम समझना चाहिए। පණ්ඩවත්ථුකථා නිට්ඨිතා. पण्डक वस्तु की कथा समाप्त हुई। ථෙය්යසංවාසකවත්ථුකථා थेय्यसंवासक (चोरी से संघ में रहने वाला) वस्तु की कथा। 110. පුරාණකුලපුත්තොති පුරාණස්ස අනුක්කමෙන පාරිජුඤ්ඤං පත්තස්ස කුලස්ස පුත්තො. මාතිපක්ඛපිතිපක්ඛතො කොලඤ්ඤා ඛීණා විනට්ඨා මතා අස්සාති ඛීණකොලඤ්ඤො. අනධිගතන්ති අප්පත්තං. ඵාතිංකාතුන්ති වඩ්ඪෙතුං. ඉඞ්ඝාති උය්යොජනත්ථෙ නිපාතො. අනුයුඤ්ජියමානොති එකමන්තං නෙත්වා කෙසමස්සුඔරොපනකාසායපටිග්ගහණසරණගමනඋපජ්ඣායග්ගහණකම්මවාචානිස්සයධම්මෙ පුච්ඡියමානො. එතමත්ථං ආරොචෙසීති එතං සයං පබ්බජිතභාවං ආදිතො පට්ඨාය ආචික්ඛි. ११०. 'पुराणकुलपुत्तो' का अर्थ है पुराने समृद्ध कुल का पुत्र जो धीरे-धीरे विनाश को प्राप्त हो गया हो। जिसके माता और पिता दोनों पक्षों के संबंधी समाप्त, नष्ट या मृत हो गए हों, वह 'खीणकोलञ्ञो' है। 'अनधिगतं' का अर्थ है अप्राप्त। 'फातिं कातुं' का अर्थ है वृद्धि करने के लिए। 'इङ्घ' शब्द प्रोत्साहन (प्रेरणा) के अर्थ में निपात है। 'अनुयुञ्जियमानो' का अर्थ है एक ओर ले जाकर बाल-दाढ़ी काटने, काषाय वस्त्र ग्रहण करने, शरणगमन, उपाध्याय ग्रहण, कम्मवाचा और निस्सय धर्मों के विषय में पूछे जाने पर। 'एतमत्थं आरोचेसि' का अर्थ है उसने स्वयं के प्रव्रजित होने की बात आदि से विस्तारपूर्वक बताई। ථෙය්යසංවාසකො භික්ඛවෙති එත්ථ තයො ථෙය්යසංවාසකා – ලිඞ්ගත්ථෙනකො, සංවාසත්ථෙනකො, උභයත්ථෙනකොති. තත්ථ යො සයං පබ්බජිත්වා විහාරං ගන්ත්වා න භික්ඛුවස්සානි ගණෙති, න යථාවුඩ්ඪං වන්දනං සාදියති, න ආසනෙන පටිබාහති, න උපොසථපවාරණාදීසු සන්දිස්සති, අයං ලිඞ්ගමත්තස්සෙව ථෙනිතත්තා ලිඞ්ගත්ථෙනකො නාම. 'थेय्यसंवासको भिक्खवे' यहाँ तीन प्रकार के थेय्यसंवासक हैं— लिंग-त्थेनक (भेष चोर), संवास-त्थेनक (संवास चोर), और उभय-त्थेनक (दोनों का चोर)। उनमें, जो स्वयं प्रव्रजित होकर विहार जाकर भिक्षु-वर्षों (वरसा) की गणना नहीं करता, वरिष्ठता के अनुसार वंदना स्वीकार नहीं करता, आसन के लिए (कनिष्ठों को) नहीं रोकता, और उपोसथ-पवारणा आदि संघ-कर्मों में दिखाई नहीं देता (सम्मिलित नहीं होता), वह केवल श्रमण-भेष की चोरी करने के कारण 'लिंग-त्थेनक' कहलाता है। යො පන භික්ඛූහි පබ්බාජිතො සාමණෙරො සමානොපි විදෙසං ගන්ත්වා ‘‘අහං දසවස්සො වා වීසතිවස්සො වා’’ති මුසා වත්වා භික්ඛුවස්සානි ගණෙති, යථාවුඩ්ඪං වන්දනං සාදියති, ආසනෙන පටිබාහති, උපොසථපවාරණාදීසු සන්දිස්සති, අයං සංවාසමත්තස්සෙව ථෙනිතත්තා සංවාසත්ථෙනකො නාම. භික්ඛුවස්සගණනාදිකො හි සබ්බොපි කිරියභෙදො ඉමස්මිං අත්ථෙ ‘‘සංවාසො’’ති වෙදිතබ්බො. සික්ඛං පච්චක්ඛාය ‘‘න මං කොචි ජානාතී’’ති එවං පටිපජ්ජන්තෙපි එසෙව නයො. जो श्रमण भिक्षुओं द्वारा प्रव्रजित होने पर भी दूसरे स्थान पर जाकर 'मैं दस वर्ष का हूँ' या 'मैं बीस वर्ष का हूँ' ऐसा झूठ बोलकर भिक्षु-वर्षों (वस्स) की गणना करता है, वरिष्ठता के अनुसार वंदना स्वीकार करता है, आसन ग्रहण करता है, उपोसथ-पवारणा आदि में सम्मिलित होता है, वह केवल संवास (साथ रहने) की चोरी करने के कारण 'संवास-स्तेनक' (संवासत्थेनको) कहलाता है। भिक्षु-वर्षों की गणना आदि सभी क्रिया-भेद इस अर्थ में 'संवास' ही समझने चाहिए। शिक्षा (सिक्खा) का त्याग कर 'मुझे कोई नहीं जानता' इस प्रकार आचरण करने वाले के विषय में भी यही नियम है। යො පන සයං පබ්බජිත්වා විහාරං ගන්ත්වා භික්ඛුවස්සානි ගණෙති, යථාවුඩ්ඪං වන්දනං සාදියති, ආසනෙන පටිබාහති, උපොසථපවාරණාදීසු සන්දිස්සති, අයං ලිඞ්ගස්ස චෙව සංවාසස්ස ච ථෙනිතත්තා උභයත්ථෙනකො නාම. අයං තිවිධොපි ථෙය්යසංවාසකො අනුපසම්පන්නො න උපසම්පාදෙතබ්බො, උපසම්පන්නො නාසෙතබ්බො, පුන පබ්බජ්ජං යාචන්තොපි න පබ්බාජෙතබ්බො. जो स्वयं प्रव्रजित होकर विहार जाकर भिक्षु-वर्षों की गणना करता है, वरिष्ठता के अनुसार वंदना स्वीकार करता है, आसन ग्रहण करता है, उपोसथ-पवारणा आदि में सम्मिलित होता है, वह लिंग (वेष) और संवास दोनों की चोरी करने के कारण 'उभय-स्तेनक' (उभयत्थेनको) कहलाता है। यह तीनों प्रकार का 'थेय्यसंवासक' (चोरी से संवास करने वाला) यदि अनुपसम्पन्न (श्रमण) है तो उसे उपसम्पदा नहीं देनी चाहिए, यदि उपसम्पन्न (भिक्षु) है तो उसे निकाल देना चाहिए, और पुनः प्रव्रज्या की याचना करने पर भी उसे प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। එත්ථ [Pg.299] ච අසම්මොහත්ථං ඉදං පකිණ්ණකං වෙදිතබ්බං – और यहाँ भ्रम दूर करने के लिए यह प्रकीर्णक (विविध विषय) समझना चाहिए— ‘‘රාජදුබ්භික්ඛකන්තාර-රොගවෙරිභයෙහි වා; චීවරාහරණත්ථං වා, ලිඞ්ගං ආදියතීධ යො. 'जो राजा, अकाल, दुर्गम मार्ग (कान्तार), रोग या शत्रु के भय से, अथवा चीवर ले जाने के लिए यहाँ (शासन में) लिंग (वेष) धारण करता है। සංවාසං නාධිවාසෙති, යාව සො සුද්ධමානසො; ථෙය්යසංවාසකො නාම, තාව එස න වුච්චතී’’ති. जब तक वह शुद्ध मन वाला होकर संवास (भिक्षु-अधिकारों) को स्वीकार नहीं करता, तब तक उसे 'थेय्यसंवासक' नहीं कहा जाता।' තත්රායං විත්ථාරනයො – ඉධෙකච්චස්ස රාජා කුද්ධො හොති, සො ‘‘එවං මෙ සොත්ථි භවිස්සතී’’ති සයමෙව ලිඞ්ගං ගහෙත්වා පලායති. තං දිස්වා රඤ්ඤො ආරොචෙන්ති. රාජා ‘‘සචෙ පබ්බජිතො, න තං ලබ්භා කිඤ්චි කාතු’’න්ති තස්මිං කොධං පටිවිනෙති, සො ‘‘වූපසන්තං මෙ රාජභය’’න්ති සඞ්ඝමජ්ඣං අනොසරිත්වාව ගිහිලිඞ්ගං ගහෙත්වා ආගතො පබ්බාජෙතබ්බො. අථාපි ‘‘සාසනං නිස්සාය මයා ජීවිතං ලද්ධං, හන්ද දානි අහං පබ්බජාමී’’ති උප්පන්නසංවෙගො තෙනෙව ලිඞ්ගෙන ආගන්ත්වා ආගන්තුකවත්තං න සාදියති, භික්ඛූහි පුට්ඨො වා අපුට්ඨො වා යථාභූතමත්තානං ආවිකත්වා පබ්බජ්ජං යාචති, ලිඞ්ගං අපනෙත්වා පබ්බාජෙතබ්බො. සචෙ පන වත්තං සාදියති, පබ්බජිතාලයං දස්සෙති, සබ්බං පුබ්බෙ වුත්තං වස්සගණනාදිභෙදං විධිං පටිපජ්ජති, අයං න පබ්බාජෙතබ්බො. वहाँ विस्तार से नियम यह है—यहाँ किसी व्यक्ति पर राजा क्रोधित होता है, वह 'इस प्रकार मेरा कल्याण होगा' ऐसा सोचकर स्वयं ही लिंग (वेष) धारण कर भाग जाता है। उसे देखकर लोग राजा को सूचित करते हैं। राजा 'यदि वह प्रव्रजित हो गया है, तो उसे कुछ नहीं किया जा सकता' ऐसा कहकर उस पर क्रोध त्याग देता है। वह 'मेरा राज-भय शांत हो गया है' ऐसा सोचकर संघ के बीच में आए बिना ही गृहस्थ लिंग (वेष) धारण कर आता है, तो उसे प्रव्रजित करना चाहिए। अथवा 'शासन के आश्रय से मुझे जीवन मिला है, अब मैं प्रव्रजित होता हूँ' ऐसा संवेग उत्पन्न होने पर उसी वेष में आकर आगन्तुक-व्रत को स्वीकार नहीं करता, भिक्षुओं द्वारा पूछे जाने पर या बिना पूछे ही यथाभूत (सच्चाई) प्रकट कर प्रव्रज्या की याचना करता है, तो उस वेष को हटाकर उसे प्रव्रजित करना चाहिए। लेकिन यदि वह व्रत (सेवा-सत्कार) स्वीकार करता है, प्रव्रजित होने का दिखावा करता है, और पहले बताए गए वर्षों की गणना आदि सभी विधियों का पालन करता है, तो उसे प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। ඉධ පනෙකච්චො දුබ්භික්ඛෙ ජීවිතුං අසක්කොන්තො සයමෙව ලිඞ්ගං ගහෙත්වා සබ්බපාසණ්ඩියභත්තානි භුඤ්ජන්තො දුබ්භික්ඛෙ වීතිවත්තෙ සඞ්ඝමජ්ඣං අනොසරිත්වාව ගිහිලිඞ්ගං ගහෙත්වා ආගතොති සබ්බං පුරිමසදිසමෙව. यहाँ कोई अकाल में जीवित रहने में असमर्थ होकर स्वयं लिंग धारण कर सभी पाखण्डियों (अन्य मतों) का भोजन करता है, और अकाल बीत जाने पर संघ के बीच में आए बिना ही गृहस्थ वेष धारण कर आता है, तो सब कुछ पहले (राज-भय) के समान ही है। අපරො මහාකන්තාරං නිත්ථරිතුකාමො හොති, සත්ථවාහො ච පබ්බජිතෙ ගහෙත්වා ගච්ඡති. සො ‘‘එවං මං සත්ථවාහො ගහෙත්වා ගමිස්සතී’’ති සයමෙව ලිඞ්ගං ගහෙත්වා සත්ථවාහෙන සද්ධිං කන්තාරං නිත්ථරිත්වා ඛෙමන්තං පත්වා සඞ්ඝමජ්ඣං අනොසරිත්වාව ගිහිලිඞ්ගං ගහෙත්වා ආගතොති සබ්බං පුරිමසදිසමෙව. दूसरा कोई महाकान्तार (दुर्गम मार्ग) पार करना चाहता है, और सार्थवाह (व्यापारी) प्रव्रजितों को साथ लेकर जाता है। वह 'इस प्रकार सार्थवाह मुझे साथ ले जाएगा' ऐसा सोचकर स्वयं लिंग धारण कर सार्थवाह के साथ कान्तार पार कर सुरक्षित स्थान पर पहुँचकर संघ के बीच में आए बिना ही गृहस्थ वेष धारण कर आता है, तो सब कुछ पहले के समान ही है। අපරො රොගභයෙ උප්පන්නෙ ජීවිතුං අසක්කොන්තො සයමෙව ලිඞ්ගං ගහෙත්වා සබ්බපාසණ්ඩියභත්තානි භුඤ්ජන්තො රොගභයෙ වූපසන්තෙ සඞ්ඝමජ්ඣං [Pg.300] අනොසරිත්වාව ගිහිලිඞ්ගං ගහෙත්වා ආගතොති සබ්බං පුරිමසදිසමෙව. दूसरा कोई रोग का भय उत्पन्न होने पर जीवित रहने में असमर्थ होकर स्वयं लिंग धारण कर सभी पाखण्डियों का भोजन करता है, और रोग का भय शांत होने पर संघ के बीच में आए बिना ही गृहस्थ वेष धारण कर आता है, तो सब कुछ पहले के समान ही है। අපරස්ස එකො වෙරිකො කුද්ධො හොති, ඝාතෙතුකාමො නං විචරති, සො ‘‘එවං මෙ සොත්ථි භවිස්සතී’’ති සයමෙව ලිඞ්ගං ගහෙත්වා පලායති. වෙරිකො ‘‘කුහිං සො’’ති පරියෙසන්තො ‘‘පබ්බජිත්වා පලාතො’’ති සුත්වා ‘‘සචෙ පබ්බජිතො, න තං ලබ්භා කිඤ්චි කාතු’’න්ති තස්මිං කොධං පටිවිනෙති. සො ‘‘වූපසන්තං මෙ වෙරිභය’’න්ති සඞ්ඝමජ්ඣං අනොසරිත්වාව ගිහිලිඞ්ගං ගහෙත්වා ආගතොති සබ්බං පුරිමසදිසමෙව. किसी दूसरे का कोई शत्रु क्रोधित होता है, वह उसे मारने की इच्छा से घूमता है। वह 'इस प्रकार मेरा कल्याण होगा' ऐसा सोचकर स्वयं लिंग धारण कर भाग जाता है। शत्रु 'वह कहाँ है' ऐसा खोजते हुए 'प्रव्रजित होकर भाग गया है' ऐसा सुनकर 'यदि वह प्रव्रजित हो गया है, तो उसे कुछ नहीं किया जा सकता' ऐसा कहकर उस पर क्रोध त्याग देता है। वह 'मेरा शत्रु-भय शांत हो गया है' ऐसा सोचकर संघ के बीच में आए बिना ही गृहस्थ वेष धारण कर आता है, तो सब कुछ पहले के समान ही है। අපරො ඤාතිකුලං ගන්ත්වා සික්ඛං පච්චක්ඛාය ගිහි හුත්වා ‘‘ඉමානි චීවරානි ඉධ විනස්සිස්සන්ති, සචෙපි ඉමානි ගහෙත්වා විහාරං ගමිස්සාමි, අන්තරාමග්ගෙ මං ‘චොරො’ති ගහෙස්සන්ති, යංනූනාහං කායපරිහාරියානි කත්වා ගච්ඡෙය්ය’’න්ති චීවරාහරණත්ථං නිවාසෙත්වා ච පාරුපිත්වා ච විහාරං ගච්ඡති. තං දූරතොව ආගච්ඡන්තං දිස්වා සාමණෙරා ච දහරා ච අබ්භුග්ගච්ඡන්ති, වත්තං දස්සෙන්ති. සො න සාදියති, යථාභූතමත්තානං ආවිකරොති. සචෙ භික්ඛූ ‘‘න දානි මයං තං මුඤ්චිස්සාමා’’ති බලක්කාරෙන පබ්බාජෙතුකාමා හොන්ති, කාසායානි අපනෙත්වා පුන පබ්බාජෙතබ්බො. සචෙ පන ‘‘නයිමෙ මම හීනායාවත්තභාවං ජානන්තී’’ති තංයෙව භික්ඛුභාවං පටිජානිත්වා සබ්බං පුබ්බෙ වුත්තං වස්සගණනාදිභෙදං විධිං පටිපජ්ජති, අයං න පබ්බාජෙතබ්බො. दूसरा कोई ज्ञाति-कुल (रिश्तेदारों के घर) जाकर शिक्षा का त्याग कर गृहस्थ हो जाता है और 'ये चीवर यहाँ नष्ट हो जाएंगे, यदि मैं इन्हें लेकर विहार जाऊँगा तो रास्ते में लोग मुझे 'चोर' कहकर पकड़ लेंगे, क्यों न मैं इन्हें शरीर पर धारण कर जाऊँ' ऐसा सोचकर चीवर ले जाने के लिए उन्हें पहनकर और ओढ़कर विहार जाता है। उसे दूर से ही आते देखकर श्रमण और युवा भिक्षु अगवानी करते हैं और व्रत (सत्कार) दिखाते हैं। वह उसे स्वीकार नहीं करता और यथाभूत (सच्चाई) प्रकट कर देता है। यदि भिक्षु 'अब हम तुम्हें नहीं छोड़ेंगे' ऐसा कहकर बलपूर्वक उसे प्रव्रजित करना चाहते हैं, तो उन काषाय वस्त्रों को हटाकर उसे पुनः प्रव्रजित करना चाहिए। लेकिन यदि वह 'ये मेरे हीन (गृहस्थ) होने की बात नहीं जानते' ऐसा सोचकर उसी भिक्षु-भाव को स्वीकार कर पहले बताई गई वर्षों की गणना आदि सभी विधियों का पालन करता है, तो उसे प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। අපරො මහාසාමණෙරො ඤාතිකුලං ගන්ත්වා උප්පබ්බජිත්වා කම්මන්තානුට්ඨානෙන උබ්බාළ්හො හුත්වා පුන ‘‘දානි අහං සමණොව භවිස්සාමි, ථෙරොපි මෙ උප්පබ්බජිතභාවං න ජානාතී’’ති තදෙව පත්තචීවරං ආදාය විහාරං ආගච්ඡති, නාපි තමත්ථං භික්ඛූනං ආරොචෙති, සාමණෙරභාවං පටිජානාති, අයං ථෙය්යසංවාසකොයෙව පබ්බජ්ජං න ලභති. සචෙපිස්ස ලිඞ්ගග්ගහණකාලෙ එවං හොති, ‘‘නාහං කස්සචි ආරොචෙස්සාමී’’ති විහාරඤ්ච ගතො ආරොචෙති, ගහණෙනෙව ථෙය්යසංවාසකො. අථාපිස්ස ‘‘ගහණකාලෙ ආචික්ඛිස්සාමී’’ති චිත්තං උප්පන්නං හොති, විහාරඤ්ච ගන්ත්වා ‘‘කුහිං ත්වං ආවුසො ගතො’’ති වුත්තො ‘‘න දානි මං ඉමෙ ජානන්තී’’ති වඤ්චෙත්වා නාචික්ඛති, ‘‘නාචික්ඛිස්සාමී’’ති සහ ධුරනික්ඛෙපෙන අයම්පි ථෙය්යසංවාසකොව. සචෙ පනස්ස ගහණකාලෙපි ‘‘ආචික්ඛිස්සාමී’’ති චිත්තං උප්පන්නං හොති, විහාරං ගන්ත්වාපි ආචික්ඛති, අයං පුන පබ්බජ්ජං ලභති. एक अन्य वरिष्ठ श्रामणेर अपने परिवार के पास जाकर गृहस्थ बन गया, किन्तु काम के बोझ से परेशान होकर उसने सोचा, "अब मैं फिर से श्रमण ही बनूँगा, स्थविर भी मेरे गृहस्थ बनने की बात नहीं जानते।" ऐसा सोचकर वह उन्हीं पात्र-चीवरों को लेकर विहार आता है, भिक्षुओं को वह बात नहीं बताता और श्रामणेर होने का दावा करता है। वह 'थेय्यसंवासक' (चोरी से संघ में रहने वाला) ही है और प्रव्रज्या प्राप्त नहीं कर सकता। यदि लिंग (वेष) ग्रहण करते समय उसका ऐसा विचार हो कि "मैं किसी को नहीं बताऊँगा" और विहार जाकर बता भी दे, तो ग्रहण करने मात्र से ही वह थेय्यसंवासक हो जाता है। यदि ग्रहण करते समय उसका विचार "बता दूँगा" ऐसा हो, किन्तु विहार जाकर "कहाँ गए थे?" पूछे जाने पर "ये मुझे नहीं जानते" ऐसा सोचकर छल करता है और नहीं बताता, तो "नहीं बताऊँगा" इस संकल्प के साथ ही वह थेय्यसंवासक हो जाता है। यदि ग्रहण करते समय "बता दूँगा" ऐसा विचार हो और विहार जाकर बता दे, तो वह पुनः प्रव्रज्या प्राप्त कर सकता है। අපරො [Pg.301] දහරසාමණෙරො මහන්තො වා පන අබ්යත්තො, සො පුරිමනයෙනෙව උප්පබ්බජිත්වා ඝරෙ වච්ඡකරක්ඛණාදීනි කම්මානි කාතුං න ඉච්ඡති, තමෙනං ඤාතකා තානියෙව කාසායානි අච්ඡාදෙත්වා ථාලකං වා පත්තං වා හත්ථෙ දත්වා ‘‘ගච්ඡ සමණොව හොහී’’ති ඝරා නීහරන්ති. සො විහාරං ගච්ඡති, නෙව නං භික්ඛූ ජානන්ති ‘‘අයං උප්පබ්බජිත්වා පුන සයමෙව පබ්බජිතො’’ති, නාපි සයං ජානාති, ‘‘යො එවං පබ්බජති, සො ථෙය්යසංවාසකො නාම හොතී’’ති. සචෙ තං පරිපුණ්ණවස්සං උපසම්පාදෙන්ති, සූපසම්පන්නො. සචෙ පන අනුපසම්පන්නකාලෙයෙව විනයවිනිච්ඡයෙ වත්තමානෙ සුණාති, ‘‘යො එවං පබ්බජති, සො ථෙය්යසංවාසකො නාම හොතී’’ති. තෙන ‘‘මයා එවං කත’’න්ති භික්ඛූනං ආචික්ඛිතබ්බං, එවං පුන පබ්බජ්ජං ලභති. සචෙ ‘‘න දානි මං කොචි ජානාතී’’ති නාරොචෙති, ධුරං නික්ඛිත්තමත්තෙ ථෙය්යසංවාසකො. एक अन्य युवा श्रामणेर या बड़ा होने पर भी जो अकुशल (अज्ञानी) है, वह पूर्ववत गृहस्थ बनकर घर में बछड़े चराने आदि का काम नहीं करना चाहता। उसके सम्बन्धी उसे उन्हीं काषाय वस्त्रों को पहनाकर, हाथ में पात्र देकर "जाओ, श्रमण ही बनो" कहकर घर से निकाल देते हैं। वह विहार जाता है। भिक्षु यह नहीं जानते कि "यह गृहस्थ बनकर पुनः स्वयं ही प्रव्रजित हुआ है", और न ही वह स्वयं जानता है कि "जो इस प्रकार प्रव्रजित होता है, वह थेय्यसंवासक कहलाता है।" यदि वे उसे पूर्ण आयु होने पर उपसम्पदा दे देते हैं, तो वह सु-उपसम्पन्न (वैध रूप से उपसम्पन्न) है। किन्तु यदि उपसम्पदा से पूर्व ही विनय-निश्चय की चर्चा होने पर वह सुनता है कि "जो इस प्रकार प्रव्रजित होता है, वह थेय्यसंवासक कहलाता है", तो उसे भिक्षुओं को बताना चाहिए कि "मैंने ऐसा किया है।" इस प्रकार वह पुनः प्रव्रज्या प्राप्त कर सकता है। यदि वह "अब मुझे कोई नहीं जानता" ऐसा सोचकर नहीं बताता, तो बताने के कर्तव्य को त्यागते ही वह थेय्यसंवासक हो जाता है। භික්ඛු සික්ඛං පච්චක්ඛාය ලිඞ්ගං අනපනෙත්වා දුස්සීලකම්මං කත්වා වා අකත්වා වා පුන සබ්බං පුබ්බෙ වුත්තං වස්සගණනාදිභෙදං විධිං පටිපජ්ජති, ථෙය්යසංවාසකො හොති. සික්ඛං අප්පච්චක්ඛාය සලිඞ්ගෙ ඨිතො මෙථුනං පටිසෙවිත්වා වස්සගණනාදිභෙදං විධිං ආපජ්ජන්තො ථෙය්යසංවාසකො න හොති, පබ්බජ්ජාමත්තං ලභති. අන්ධකට්ඨකථායං පන එසො ථෙය්යසංවාසකොති වුත්තං, තං න ගහෙතබ්බං. एक भिक्षु शिक्षा का प्रत्याख्यान (त्याग) कर, लिंग (वेष) को बिना हटाए, दुशील कर्म करके या बिना किए, पुनः पहले की तरह वर्षा-गणना आदि विधि का पालन करता है, तो वह थेय्यसंवासक होता है। शिक्षा का प्रत्याख्यान किए बिना, अपने लिंग में स्थित रहते हुए मैथुन सेवन कर वर्षा-गणना आदि विधि को प्राप्त करने वाला थेय्यसंवासक नहीं होता, वह केवल प्रव्रज्या मात्र (श्रामणेर पद) प्राप्त करता है। अन्धक-अट्ठकथा में तो उसे थेय्यसंवासक कहा गया है, किन्तु उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। එකො භික්ඛු කාසායෙ සඋස්සාහොව ඔදාතං නිවාසෙත්වා මෙථුනං පටිසෙවිත්වා පුන කාසායානි නිවාසෙත්වා වස්සගණනාදිභෙදං සබ්බං විධිං ආපජ්ජති, අයම්පි ථෙය්යසංවාසකො න හොති, පබ්බජ්ජාමත්තං ලභති. සචෙ පන කාසායෙ ධුරං නික්ඛිපිත්වා ඔදාතං නිවාසෙත්වා මෙථුනං පටිසෙවිත්වා පුන කාසායානි නිවාසෙත්වා වස්සගණනාදිභෙදං සබ්බං විධිං ආපජ්ජති, ථෙය්යසංවාසකො හොති. एक भिक्षु काषाय वस्त्रों के प्रति उत्साह रखते हुए ही (पुनः पहनने की इच्छा से) श्वेत वस्त्र पहनकर मैथुन सेवन करता है और पुनः काषाय वस्त्र पहनकर वर्षा-गणना आदि सभी विधि का पालन करता है, तो वह भी थेय्यसंवासक नहीं होता, केवल प्रव्रज्या मात्र प्राप्त करता है। किन्तु यदि काषाय वस्त्रों के प्रति उत्साह (कर्तव्य) त्यागकर श्वेत वस्त्र पहनकर मैथुन सेवन करता है और पुनः काषाय वस्त्र पहनकर वर्षा-गणना आदि सभी विधि का पालन करता है, तो वह थेय्यसंवासक होता है। සාමණෙරො සලිඞ්ගෙ ඨිතො මෙථුනාදිඅස්සමණකරණධම්මං ආපජ්ජිත්වාපි ථෙය්යසංවාසකො න හොති. සචෙපි කාසායෙ සඋස්සාහොව කාසායානි අපනෙත්වා මෙථුනං පටිසෙවිත්වා පුන කාසායානි නිවාසෙති, නෙව ථෙය්යසංවාසකො හොති. සචෙ පන කාසායෙ ධුරං නික්ඛිපිත්වා නග්ගො වා ඔදාතනිවත්ථො වා මෙථුනසෙවනාදීහි අස්සමණො [Pg.302] හුත්වා කාසායං නිවාසෙති, ථෙය්යසංවාසකො හොති. සචෙපි ගිහිභාවං පත්ථයමානො කාසාවං ඔවට්ටිකං වා කත්වා අඤ්ඤෙන වා ආකාරෙන ගිහිනිවාසනෙන නිවාසෙති ‘‘සොභති නු ඛො මෙ ගිහිලිඞ්ගං, න සොභතී’’ති වීමංසනත්ථං, රක්ඛති තාව. ‘‘සොභතී’’ති සම්පටිච්ඡිත්වා පන පුන ලිඞ්ගං සාදියන්තො ථෙය්යසංවාසකො හොති. ඔදාතං නිවාසෙත්වා වීමංසනසම්පටිච්ඡනෙසුපි එසෙව නයො. श्रामणेर अपने लिंग (वेष) में स्थित रहते हुए मैथुन आदि अश्रमणोचित धर्मों का सेवन करने पर भी थेय्यसंवासक नहीं होता। यदि काषाय वस्त्रों के प्रति उत्साह रखते हुए ही वस्त्र हटाकर मैथुन सेवन करता है और पुनः काषाय वस्त्र पहनता है, तो भी वह थेय्यसंवासक नहीं होता। किन्तु यदि काषाय वस्त्रों के प्रति उत्साह त्यागकर, नग्न होकर या श्वेत वस्त्र पहनकर मैथुन सेवन आदि से अश्रमण होकर काषाय वस्त्र पहनता है, तो वह थेय्यसंवासक होता है। यदि गृहस्थ भाव की इच्छा करते हुए काषाय वस्त्र को धोती की तरह लपेटकर या अन्य किसी गृहस्थ के पहनने के तरीके से "क्या मुझ पर गृहस्थ वेष शोभा देता है या नहीं?" इस प्रकार जाँचने के लिए पहनता है, तो वह तब तक सुरक्षित है। किन्तु "शोभा देता है" ऐसा स्वीकार कर लेने के बाद पुनः लिंग (श्रामणेर वेष) को स्वीकार करता है, तो वह थेय्यसंवासक होता है। श्वेत वस्त्र पहनकर जाँचने और स्वीकार करने में भी यही नियम है। සචෙ පන නිවත්ථකාසායස්ස උපරි ඔදාතං නිවාසෙත්වා වීමංසති වා සම්පටිච්ඡති වා, රක්ඛතියෙව. භික්ඛුනියාපි එසෙව නයො. සාපි හි ගිහිභාවං පත්ථයමානා සචෙ කාසායං ගිහිනිවාසනං නිවාසෙති, ‘‘සොභති නු ඛො මෙ ගිහිලිඞ්ගං, න සොභතී’’ති වීමංසනත්ථං, රක්ඛති තාව. සචෙ ‘‘සොභතී’’ති සම්පටිච්ඡති, න රක්ඛති. ඔදාතං නිවාසෙත්වා වීමංසනසම්පටිච්ඡනෙසුපි එසෙව නයො. නිවත්ථකාසායස්ස පන උපරි ඔදාතං නිවාසෙත්වා වීමංසතු වා සම්පටිච්ඡතු වා, රක්ඛතියෙව. किन्तु यदि पहने हुए काषाय वस्त्रों के ऊपर श्वेत वस्त्र पहनकर जाँचता है या स्वीकार करता है, तो वह सुरक्षित ही है। भिक्षुणी के विषय में भी यही नियम है। वह भी यदि गृहस्थ भाव की इच्छा करते हुए "क्या मुझ पर गृहस्थ वेष शोभा देता है या नहीं?" इस प्रकार जाँचने के लिए काषाय वस्त्र को गृहस्थ की तरह पहनती है, तो वह तब तक सुरक्षित है। यदि "शोभा देता है" ऐसा स्वीकार करती है, तो वह सुरक्षित नहीं है। श्वेत वस्त्र पहनकर जाँचने और स्वीकार करने में भी यही नियम है। किन्तु पहने हुए काषाय वस्त्रों के ऊपर श्वेत वस्त्र पहनकर चाहे वह जाँचे या स्वीकार करे, वह सुरक्षित ही है। සචෙ කොචි වුඩ්ඪපබ්බජිතො වස්සානි අගණෙත්වා පාළියම්පි අට්ඨත්වා එකපස්සෙනාගන්ත්වා මහාපෙළාදීසු කටච්ඡුනා උක්ඛිත්තෙ භත්තපිණ්ඩෙ පත්තං උපනාමෙත්වා සෙනො විය මංසපෙසිං ගහෙත්වා ගච්ඡති, ථෙය්යසංවාසකො න හොති. භික්ඛුවස්සානි පන ගණෙත්වා ගණ්හන්තො ථෙය්යසංවාසකො හොති. यदि कोई वृद्ध प्रव्रजित (वृद्ध अवस्था में दीक्षित) वर्षा-गणना किए बिना, संघ की पंक्ति में न बैठकर, एक ओर से आकर बड़ी टोकरियों आदि से कलछी द्वारा परोसे जाते हुए भात के पिण्ड के सामने पात्र बढ़ाकर, मांस के टुकड़े को झपटकर ले जाने वाले बाज की तरह लेकर चला जाता है, तो वह थेय्यसंवासक नहीं होता। किन्तु यदि भिक्षु-वर्षा की गणना करके (भिक्षु के रूप में) ग्रहण करता है, तो वह थेय्यसंवासक होता है। සයං සාමණෙරොව සාමණෙරපටිපාටියා කූටවස්සානි ගණෙත්වා ගණ්හන්තො ථෙය්යසංවාසකො න හොති. භික්ඛු භික්ඛුපටිපාටියා කූටවස්සානි ගණෙත්වා ගණ්හන්තො භණ්ඩග්ඝෙන කාරෙතබ්බොති. स्वयं श्रामणेर होते हुए श्रामणेरों की पंक्ति में झूठी वर्षा-गणना करके (लाभ) ग्रहण करने वाला श्रामणेर थेय्यसंवासक नहीं होता। भिक्षु यदि भिक्षुओं की पंक्ति में झूठी वर्षा-गणना करके (लाभ) ग्रहण करता है, तो उसे वस्तु के मूल्य के अनुसार (चोरी के नियम से) दण्डित करना चाहिए। ථෙය්යසංවාසකවත්ථුකථා නිට්ඨිතා. थेय्यसंवासक सम्बन्धी कथा समाप्त हुई। තිත්ථියපක්කන්තකකථා तित्थियपक्कन्तक कथा (अन्यतीर्थियों में चले जाने वालों की कथा) තිත්ථියපක්කන්තකො භික්ඛවෙති එත්ථ පන තිත්ථියෙසු පක්කන්තො පවිට්ඨොති තිත්ථියපක්කන්තකො. සො න කෙවලං න උපසම්පාදෙතබ්බො, අථ ඛො න පබ්බාජෙතබ්බොපි. තත්රායං විනිච්ඡයො – උපසම්පන්නො භික්ඛු තිත්ථියො භවිස්සාමීති සලිඞ්ගෙනෙව තෙසං උපස්සයං ගච්ඡති, පදවාරෙ පදවාරෙ දුක්කටං. තෙසං ලිඞ්ගෙ ආදින්නමත්තෙ තිත්ථියපක්කන්තකො හොති. යොපි [Pg.303] සයමෙව ‘‘තිත්ථියො භවිස්සාමී’’ති කුසචීරාදීනි නිවාසෙති, තිත්ථියපක්කන්තකො හොතියෙව. යො පන නග්ගො න්හායන්තො අත්තානං ඔලොකෙත්වා ‘‘සොභති මෙ ආජීවකභාවො, ආජීවකො භවිස්සාමී’’ති කාසායානි අනාදාය නග්ගොව ආජීවකානං උපස්සයං ගච්ඡති, පදවාරෙ පදවාරෙ දුක්කටං. සචෙ පනස්ස අන්තරාමග්ගෙ හිරොත්තප්පං උප්පජ්ජති, දුක්කටානි දෙසෙත්වා මුච්චති. තෙසං උපස්සයං ගන්ත්වාපි තෙහි වා ඔවදිතො අත්තනා වා ‘‘ඉමෙසං පබ්බජ්ජා අතිදුක්ඛා’’ති නිවත්තන්තොපි මුච්චතියෙව. हे भिक्षुओं, 'तित्थियपक्कन्तको' (तीर्थकों के पास गया हुआ) यहाँ तीर्थकों के पास गया हुआ या उनमें प्रविष्ट हुआ व्यक्ति 'तित्थियपक्कन्तक' कहलाता है। उसे न केवल उपसम्पदा नहीं देनी चाहिए, बल्कि प्रव्रज्या भी नहीं देनी चाहिए। यहाँ यह निश्चय है - यदि उपसम्पन्न भिक्षु 'मैं तीर्थक बनूँगा' ऐसा सोचकर अपने भिक्षु वेष में ही उनके निवास स्थान पर जाता है, तो प्रत्येक कदम पर उसे दुक्कट (दुष्कृत) अपराध होता है। उनके वेष को धारण करते ही वह 'तित्थियपक्कन्तक' हो जाता है। जो स्वयं ही 'मैं तीर्थक बनूँगा' ऐसा सोचकर कुशा के वस्त्र आदि धारण करता है, वह भी 'तित्थियपक्कन्तक' ही होता है। परन्तु जो नग्न होकर स्नान करते समय स्वयं को देखकर 'मेरा आजीवक रूप शोभित होता है, मैं आजीवक बनूँगा' ऐसा सोचकर काषाय वस्त्रों को न लेकर नग्न ही आजीवकों के निवास स्थान पर जाता है, उसे प्रत्येक कदम पर दुक्कट होता है। यदि मार्ग में उसे ह्री और ओत्तप्प (लज्जा और भय) उत्पन्न हो जाए, तो वह दुक्कट अपराधों की देशना करके मुक्त हो जाता है। उनके निवास स्थान पर जाकर भी, उनके द्वारा उपदेश दिए जाने पर या स्वयं देखकर 'इनकी प्रव्रज्या अत्यंत दुखदायी है' ऐसा सोचकर लौटने वाला भी मुक्त हो जाता है। සචෙ පන ‘‘කිං තුම්හාකං පබ්බජ්ජාය උක්කට්ඨ’’න්ති පුච්ඡිත්වා ‘‘කෙසමස්සුලුඤ්චනාදීනී’’ති වුත්තො එකකෙසම්පි ලුඤ්චාපෙති, උක්කුටිකප්පධානාදීනි වා වත්තානි ආදියති, මොරපිඤ්ඡාදීනි වා නිවාසෙති, තෙසං ලිඞ්ගං ගණ්හාති, ‘‘අයං පබ්බජ්ජා සෙට්ඨා’’ති සෙට්ඨභාවං වා උපගච්ඡති, න මුච්චති, තිත්ථියපක්කන්තකො හොති. සචෙ පන ‘‘සොභති නු ඛො මෙ තිත්ථියපබ්බජ්ජා, නනු ඛො සොභතී’’ති වීමංසනත්ථං කුසචීරාදීනි වා නිවාසෙති, ජටං වා බන්ධති, ඛාරිකාජං වා ආදියති, යාව න සම්පටිච්ඡති, තාව නං ලද්ධි රක්ඛති, සම්පටිච්ඡිතමත්තෙ තිත්ථියපක්කන්තකො හොති. අච්ඡින්නචීවරො පන කුසචීරාදීනි නිවාසෙන්තො රාජභයාදීහි වා තිත්ථියලිඞ්ගං ගණ්හන්තො ලද්ධියා අභාවෙන නෙව තිත්ථියපක්කන්තකො හොති. परन्तु यदि वह 'आपकी प्रव्रज्या में सबसे श्रेष्ठ क्या है?' ऐसा पूछकर, 'केश और श्मश्रु उखाड़ना आदि श्रेष्ठ है' ऐसा कहे जाने पर यदि एक बाल भी उखड़वाता है, या उक्कुटिक (उकड़ूँ बैठना) प्रधान आदि व्रतों को स्वीकार करता है, या मोरपंख आदि धारण करता है, उनका वेष ग्रहण करता है, 'यह प्रव्रज्या श्रेष्ठ है' ऐसा सोचकर श्रेष्ठता को प्राप्त होता है, तो वह मुक्त नहीं होता, वह 'तित्थियपक्कन्तक' होता है। परन्तु यदि 'क्या मेरी तीर्थक प्रव्रज्या शोभित होती है या नहीं?' इस प्रकार परीक्षा के लिए कुशा के वस्त्र आदि धारण करता है, जटा बाँधता है, या खारीकाज (भार ढोने का डंडा) लेता है, जब तक वह उसे स्वीकार नहीं करता, तब तक उसकी लब्धि (सिद्धांत) उसकी रक्षा करती है; स्वीकार करते ही वह 'तित्थियपक्कन्तक' हो जाता है। परन्तु जिसका चीवर छीन लिया गया हो, वह कुशा के वस्त्र आदि पहनते हुए या राजा के भय आदि के कारण तीर्थक वेष धारण करते हुए, तीर्थक लब्धि के अभाव के कारण 'तित्थियपक्कन्तक' नहीं होता। අයඤ්ච තිත්ථියපක්කන්තකො නාම උපසම්පන්නභික්ඛුනා කථිතො, තස්මා සාමණෙරො සලිඞ්ගෙන තිත්ථායතනං ගතොපි පුන පබ්බජ්ජඤ්ච උපසම්පදඤ්ච ලභතීති කුරුන්දියං වුත්තං. පුරිමො පන ථෙය්යසංවාසකො අනුපසම්පන්නෙන කථිතො; තස්මා උපසම්පන්නො කූටවස්සං ගණෙන්තොපි අස්සමණො න හොති. ලිඞ්ගෙ සඋස්සාහො පාරාජිකං ආපජ්ජිත්වා භික්ඛුවස්සාදීනි ගණෙන්තොපි ථෙය්යසංවාසකො න හොතීති. और यह 'तित्थियपक्कन्तक' उपसम्पन्न भिक्षु के विषय में कहा गया है, इसलिए यदि सामणेर अपने वेष में तीर्थकों के स्थान पर जाता है, तो वह पुनः प्रव्रज्या और उपसम्पदा प्राप्त कर सकता है, ऐसा कुरुन्दी में कहा गया है। पिछला 'थेय्यसंवासक' (चोरी से साथ रहने वाला) अनुपसम्पन्न के विषय में कहा गया था; इसलिए उपसम्पन्न भिक्षु यदि कपटपूर्ण वर्षावास की गणना करता है, तो भी वह अश्रमण नहीं होता। अपने वेष में उत्साह रखते हुए पाराजिक आपत्ति को प्राप्त होकर भिक्षु-वर्ष आदि की गणना करने वाला भी 'थेय्यसंवासक' नहीं होता। තිත්ථියපක්කන්තකකථා නිට්ඨිතා. तित्थियपक्कन्तक की कथा समाप्त हुई। තිරච්ඡානගතවත්ථුකථා तिर्यक-योनि (पशु-योनि) में उत्पन्न प्राणी की कथा। 111. නාගයොනියා අට්ටීයතීති එත්ථ කිඤ්චාපි සො පවත්තියං කුසලවිපාකෙන දෙවසම්පත්තිසදිසං ඉස්සරියසම්පත්තිං අනුභොති, අකුසලවිපාකපටිසන්ධිකස්ස [Pg.304] පන තස්ස සජාතියා මෙථුනපටිසෙවනෙ ච විස්සට්ඨනිද්දොක්කමනෙ ච නාගසරීරං පාතුභවති උදකසඤ්චාරිකං මණ්ඩූකභක්ඛං, තස්මා සො තාය නාගයොනියා අට්ටීයති. හරායතීති ලජ්ජති. ජිගුච්ඡතීති අත්තභාවං ජිගුච්ඡති. තස්ස භික්ඛුනො නික්ඛන්තෙති තස්මිං භික්ඛුස්මිං නික්ඛන්තෙ. අථ වා තස්ස භික්ඛුනො නික්ඛමනෙති අත්ථො. විස්සට්ඨො නිද්දං ඔක්කමීති තස්මිං අනික්ඛන්තෙ විස්සරභයෙන සතිං අවිස්සජ්ජිත්වා කපිමිද්ධවසෙනෙව නිද්දායන්තො නික්ඛන්තෙ සතිං විස්සජ්ජිත්වා විස්සට්ඨො නිරාසඞ්කො මහානිද්දං පටිපජ්ජි. විස්සරමකාසීති භයවසෙන සමණසඤ්ඤං පහාය විරූපං මහාසද්දමකාසි. १११. 'नागयोनि से पीड़ित होता है' यहाँ यद्यपि वह नाग प्रवृत्ति काल में कुशल विपाक के कारण देव-सम्पत्ति के समान ऐश्वर्य-सम्पत्ति का अनुभव करता है, फिर भी अकुशल विपाक वाली प्रतिसन्धि के कारण, अपनी ही जाति की नागिन के साथ मैथुन सेवन के समय और गहरी नींद में सोने के समय, उसका जल में विचरने वाला और मेंढक खाने वाला नाग-शरीर प्रकट हो जाता है, इसलिए वह उस नागयोनि से पीड़ित होता है। 'हरायति' का अर्थ है लज्जित होना। 'जिगुच्छति' का अर्थ है अपने आत्मभाव से घृणा करना। 'तस्स भिक्खुनो निक्खन्ते' का अर्थ है उस भिक्षु के निकल जाने पर। अथवा उस भिक्षु के निकलने के कारण, यह अर्थ है। 'विस्सट्ठो निद्दं ओक्कमी' का अर्थ है उस भिक्षु के न निकलने तक विकृत स्वर के भय से स्मृति को न छोड़ते हुए बंदर की नींद के समान सोते हुए, उसके निकल जाने पर स्मृति को छोड़कर निश्चिंत और निडर होकर गहरी नींद में सो गया। 'विस्सरमकासि' का अर्थ है भय के कारण श्रमण-संज्ञा को त्यागकर विकृत और ऊँचा शब्द किया। තුම්හෙ ඛොත්ථාති තුම්හෙ ඛො අත්ථ; අකාරස්ස ලොපං කත්වා වුත්තං. තුම්හෙ ඛො නාගා ඣානවිපස්සනාමග්ගඵලානං අභබ්බත්තා ඉමස්මිං ධම්මවිනයෙ අවිරුළ්හිධම්මා අත්ථ, විරුළ්හිධම්මා න භවථාති අයමෙත්ථ සඞ්ඛෙපත්ථො. සජාතියාති නාගියා එව. යදා පන මනුස්සිත්ථිආදිභෙදාය අඤ්ඤජාතියා පටිසෙවති, තදා දෙවපුත්තො විය හොති. එත්ථ ච පවත්තියං අභිණ්හං සභාවපාතුකම්මදස්සනවසෙන ‘‘ද්වෙ පච්චයා’’ති වුත්තං. නාගස්ස පන පඤ්චසු කාලෙසු සභාවපාතුකම්මං හොති – පටිසන්ධිකාලෙ, තචජහනකාලෙ, සජාතියා මෙථුනකාලෙ, විස්සට්ඨනිද්දොක්කමනකාලෙ, චුතිකාලෙති. 'तुम्हे खोत्थ' का अर्थ है 'तुम्हे खो अत्थ'; 'अ' कार का लोप करके कहा गया है। हे नागों! तुम ध्यान, विपश्यना, मार्ग और फल के अयोग्य होने के कारण इस धर्म-विनय में वृद्धि के स्वभाव वाले नहीं हो, वृद्धि वाले नहीं होते - यह यहाँ संक्षिप्त अर्थ है। 'सजातिया' का अर्थ है नागिन में ही। परन्तु जब वह मनुष्य स्त्री आदि अन्य जाति की स्त्री के साथ सेवन करता है, तब वह देवपुत्र के समान होता है। और यहाँ प्रवृत्ति काल में निरंतर या प्रायः स्वभाव के प्रकट होने को दिखाने के लिए भगवान ने 'दो प्रत्यय' कहे हैं। नाग का स्वभाव पाँच समयों में प्रकट होता है - प्रतिसन्धि के समय, केंचुल छोड़ते समय, अपनी जाति की नागिन के साथ मैथुन के समय, गहरी नींद में सोने के समय और च्युति के समय। තිරච්ඡානගතො භික්ඛවෙති එත්ථ නාගො වා හොතු සුපණ්ණමාණවකාදීනං වා අඤ්ඤතරො, අන්තමසො සක්කං දෙවරාජානං උපාදාය යො කොචි අමනුස්සජාතියො, සබ්බොව ඉමස්මිං අත්ථෙ තිරච්ඡානගතොති වෙදිතබ්බො. සො නෙව උපසම්පාදෙතබ්බො, න පබ්බාජෙතබ්බො, උපසම්පන්නොපි නාසෙතබ්බොති. हे भिक्षुओं, 'तिर्यक-योनि में गया हुआ' यहाँ चाहे नाग हो या सुपर्ण युवक आदि में से कोई अन्य, यहाँ तक कि देवराज शक्र से लेकर जो कोई भी अमनुष्य जाति का है, उन सभी को इस अर्थ में 'तिरच्छानगत' समझना चाहिए। उसे न तो उपसम्पदा देनी चाहिए, न प्रव्रज्या देनी चाहिए, और यदि उपसम्पन्न हो गया हो, तो उसे निकाल देना चाहिए। තිරච්ඡානගතවත්ථුකථා නිට්ඨිතා. तिर्यक-योनिगत प्राणी की कथा समाप्त हुई। මාතුඝාතකාදිවත්ථුකථා मातृघातक आदि की कथा। 112. මාතුඝාතකාදිවත්ථූසු – නික්ඛන්තිං කරෙය්යන්ති නික්ඛමනං නිග්ගමනං අපවාහනං කරෙය්යන්ති අත්ථො. මාතුඝාතකො භික්ඛවෙති එත්ථ යෙන මනුස්සිත්ථිභූතා [Pg.305] ජනිකා මාතා සයම්පි මනුස්සජාතිකෙනෙව සතා සඤ්චිච්ච ජීවිතා වොරොපිතා, අයං ආනන්තරියෙන මාතුඝාතකකම්මෙන මාතුඝාතකො, එතස්ස පබ්බජ්ජා ච උපසම්පදා ච පටික්ඛිත්තා. යෙන පන මනුස්සිත්ථිභූතාපි අජනිකා පොසාවනිකා මාතා වා මහාමාතා වා චූළමාතා වා ජනිකාපි වා න මනුස්සිත්ථිභූතා මාතා ඝාතිතා, තස්ස පබ්බජ්ජා න වාරිතා, න ච ආනන්තරිකො හොති. යෙන සයං තිරච්ඡානභූතෙන මනුස්සිත්ථිභූතා මාතා ඝාතිතා, සොපි ආනන්තරිකො න හොති, තිරච්ඡානගතත්තා පනස්ස පබ්බජ්ජා පටික්ඛිත්තා. සෙසං උත්තානමෙව. පිතුඝාතකෙපි එසෙව නයො. සචෙපි හි වෙසියා පුත්තො හොති, ‘‘අයං මෙ පිතා’’ති න ජානාති, යස්ස සම්භවෙන නිබ්බත්තො, සො චෙ අනෙන ඝාතිතො, පිතුඝාතකොත්වෙව සඞ්ඛ්යං ගච්ඡති, ආනන්තරියඤ්ච ඵුසති. ११२. मातृघातक आदि की कथाओं में - 'निक्खन्तिं करेय्युं' (निकासी करें) का अर्थ है निष्क्रमण (निकलना), निर्गमन या निवारण (प्रतिकार) करना। 'भिक्षुओं, मातृघातक' यहाँ जिस मनुष्य जाति के व्यक्ति ने स्वयं मनुष्य रूपी अपनी जन्मदात्री माता को जानबूझकर जीवन से वंचित कर दिया है, वह आनंतर्य मातृघातक कर्म के कारण 'मातृघातक' कहलाता है; उसकी प्रव्रज्या और उपसंपदा निषिद्ध है। परंतु जिसने मनुष्य रूपी होने पर भी जो जन्मदात्री नहीं है ऐसी पालक माता, या बड़ी माता (मौसी/चाची), या छोटी माता की हत्या की है, अथवा जन्मदात्री होने पर भी जो मनुष्य रूपी नहीं है ऐसी माता की हत्या की है, उसकी प्रव्रज्या वर्जित नहीं है और वह आनंतर्य (पाप का भागी) नहीं होता। जिसने स्वयं तिर्यंच (पशु) होकर मनुष्य रूपी माता की हत्या की है, वह भी आनंतर्य (पापी) नहीं होता, किंतु तिर्यंच होने के कारण उसकी प्रव्रज्या निषिद्ध है। शेष स्पष्ट ही है। पितृघातक के विषय में भी यही नियम है। यदि कोई वेश्या का पुत्र हो और वह नहीं जानता हो कि 'यह मेरा पिता है', फिर भी जिसके वीर्य से वह उत्पन्न हुआ है, यदि उसने उसकी हत्या की है, तो वह 'पितृघातक' ही माना जाता है और आनंतर्य पाप को प्राप्त करता है। 114. අරහන්තඝාතකොපි මනුස්සඅරහන්තවසෙනෙව වෙදිතබ්බො. මනුස්සජාතියඤ්හි අන්තමසො අපබ්බජිතම්පි ඛීණාසවං දාරකං දාරිකං වා සඤ්චිච්ච ජීවිතා වොරොපෙන්තො අරහන්තඝාතකොව හොති, ආනන්තරියඤ්ච ඵුසති, පබ්බජ්ජා චස්ස වාරිතා. අමනුස්සජාතිකං පන අරහන්තං මනුස්සජාතිකං වා අවසෙසං අරියපුග්ගලං ඝාතෙත්වා ආනන්තරියො න හොති, පබ්බජ්ජාපිස්ස න වාරිතා, කම්මං පන බලවං හොති. තිරච්ඡානො මනුස්සඅරහන්තම්පි ඝාතෙත්වා ආනන්තරියො න හොති, කම්මං පන භාරියන්ති අයමෙත්ථ විනිච්ඡයො. තෙ වධාය ඔනීයන්තීති වධත්ථාය ඔනීයන්ති, මාරෙතුං නීයන්තීති අත්ථො. යං පන පාළියං ‘‘සචා ච මය’’න්ති වුත්තං, තස්ස සචෙ මයන්ති අයමෙවත්ථො. ‘‘සචෙ’’ති හි වත්තබ්බෙ එත්ථ ‘‘සචා ච’’ ඉති අයං නිපාතො වුත්තො. ‘‘සචෙ ච’’ ඉච්චෙව වා පාඨො. තත්ථ සචෙති සම්භාවනත්ථෙ නිපාතො; ච ඉති පදපූරණමත්තෙ. ‘‘සචජ්ජ මය’’න්තිපි පාඨො. තස්ස සචෙ අජ්ජ මයන්ති අත්ථො. ११४. अर्हन्त-घातक को भी मनुष्य-अर्हन्त के संदर्भ में ही समझना चाहिए। मनुष्य जाति में उत्पन्न, यहाँ तक कि जो प्रव्रजित नहीं है ऐसे क्षीणासव (अर्हन्त) बालक या बालिका को भी जानबूझकर जीवन से वंचित करने वाला अर्हन्त-घातक ही होता है, वह आनंतर्य पाप को प्राप्त करता है और उसकी प्रव्रज्या वर्जित है। परंतु अमनुष्य जाति के अर्हन्त की, या मनुष्य जाति के शेष (अर्हन्त के अलावा) आर्य पुद्गलों की हत्या करने पर वह आनंतर्य (पापी) नहीं होता, और उसकी प्रव्रज्या भी वर्जित नहीं है, किंतु वह कर्म अत्यंत भारी (बलवान) होता है। तिर्यंच (पशु) मनुष्य-अर्हन्त की हत्या करके भी आनंतर्य (पापी) नहीं होता, किंतु कर्म भारी होता है - यह यहाँ निर्णय है। 'वे वध के लिए ले जाए जाते हैं' (ते वधाय ओनीयन्ति) का अर्थ है वध के निमित्त ले जाए जाना, मारने के लिए ले जाना। पालि में जो 'सचा च मयं' कहा गया है, उसका अर्थ 'सचे मयं' (यदि हम) ही है। यहाँ 'सचे' कहना चाहिए था, किंतु 'सचा च' इस निपात का प्रयोग किया गया है। अथवा 'सचे च' ऐसा भी पाठ है। वहाँ 'सचे' संभावना के अर्थ में निपात है और 'च' केवल पद-पूरक है। 'सचज्ज मयं' ऐसा भी पाठ है, जिसका अर्थ 'सचे अज्ज मयं' (यदि आज हम) है। 115. භික්ඛුනිදූසකො භික්ඛවෙති එත්ථ යො පකතත්තං භික්ඛුනිං තිණ්ණං මග්ගානං අඤ්ඤතරස්මිං දූසෙති, අයං භික්ඛුනිදූසකො නාම. එතස්ස පබ්බජ්ජා ච උපසම්පදා ච වාරිතා. යො පන කායසංසග්ගෙන සීලවිනාසං පාපෙති, තස්ස පබ්බජ්ජා ච උපසම්පදා ච න වාරිතා. බලක්කාරෙන ඔදාතවත්ථවසනං කත්වා අනිච්ඡමානංයෙව දූසෙන්තොපි භික්ඛුනිදූසකොයෙව. බලක්කාරෙන පන ඔදාතවත්ථවසනං කත්වා ඉච්ඡමානං දූසෙන්තො භික්ඛුනිදූසකො [Pg.306] න හොති. කස්මා? යස්මා ගිහිභාවෙ සම්පටිච්ඡිතමත්තෙයෙව සා අභික්ඛුනී හොති. සකිං සීලවිපන්නං පන පච්ඡා දූසෙන්තො සික්ඛමානාසාමණෙරීසු ච විප්පටිපජ්ජන්තො නෙව භික්ඛුනිදූසකො හොති, පබ්බජ්ජම්පි උපසම්පදම්පි ලභති. ११५. 'भिक्षुओं, भिक्षुणी-दूषक' यहाँ जो शीलवान (प्रकृतस्थ) भिक्षुणी को तीन मार्गों (मैथुन द्वारों) में से किसी एक में दूषित करता है, वह 'भिक्षुणी-दूषक' कहलाता है। उसकी प्रव्रज्या और उपसंपदा वर्जित है। परंतु जो केवल काय-संसर्ग (शारीरिक स्पर्श) से शील-विनाश को प्राप्त कराता है, उसकी प्रव्रज्या और उपसंपदा वर्जित नहीं है। बलपूर्वक सफेद वस्त्र पहनाकर, अनिच्छुक भिक्षुणी को दूषित करने वाला भी भिक्षुणी-दूषक ही है। परंतु बलपूर्वक सफेद वस्त्र पहनाकर, (बाद में) इच्छुक भिक्षुणी को दूषित करने वाला भिक्षुणी-दूषक नहीं होता। क्यों? क्योंकि गृहस्थ भाव को स्वीकार करते ही वह 'अ-भिक्षुणी' हो जाती है। एक बार शील-भ्रष्ट हुई भिक्षुणी को बाद में दूषित करने वाला, तथा शिक्षमाणाओं और श्रमणेरियों के साथ दुराचार करने वाला भिक्षुणी-दूषक नहीं होता; वह प्रव्रज्या और उपसंपदा प्राप्त कर सकता है। සඞ්ඝභෙදකො භික්ඛවෙති එත්ථ යො දෙවදත්තො විය සාසනං උද්ධම්මං උබ්බිනයං කත්වා චතුන්නං කම්මානං අඤ්ඤතරවසෙන සඞ්ඝං භින්දති, අයං සඞ්ඝභෙදකො නාම. එතස්ස පබ්බජ්ජා ච උපසම්පදා ච වාරිතා. 'भिक्षुओं, संघ-भेदक' यहाँ जो देवदत्त के समान शासन को अधर्म और अविनयपूर्ण बनाकर चार (संघ) कर्मों में से किसी एक के द्वारा संघ में भेद डालता है, वह 'संघ-भेदक' कहलाता है। उसकी प्रव्रज्या और उपसंपदा वर्जित है। ලොහිතුප්පාදකො භික්ඛවෙති එත්ථාපි යො දෙවදත්තො විය දුට්ඨචිත්තෙන වධකචිත්තෙන තථාගතස්ස ජීවමානකසරීරෙ ඛුද්දකමක්ඛිකාය පිවනකමත්තම්පි ලොහිතං උප්පාදෙති, අයං ලොහිතුප්පාදකො නාම. එතස්ස පබ්බජ්ජා ච උපසම්පදා ච වාරිතා. යො පන රොගවූපසමනත්ථං ජීවකො විය සත්ථෙන ඵාලෙත්වා පූතිමංසඤ්ච ලොහිතඤ්ච නීහරිත්වා ඵාසුං කරොති, බහුං සො පුඤ්ඤං පසවතීති. 'भिक्षुओं, लोहितुत्पादक' यहाँ भी जो देवदत्त के समान दुष्ट चित्त से, वध करने की इच्छा से तथागत के जीवित शरीर से एक छोटी मक्खी द्वारा पिए जाने योग्य मात्रा में भी रक्त निकालता है, वह 'लोहितुत्पादक' कहलाता है। उसकी प्रव्रज्या और उपसंपदा वर्जित है। परंतु जो रोग की शांति के लिए जीवक के समान शस्त्र से चीरा लगाकर सड़े हुए मांस और रक्त को निकालकर (तथागत को) स्वस्थ करता है, वह बहुत पुण्य अर्जित करता है। මාතුඝාතකාදිවත්ථුකථා නිට්ඨිතා. मातृघातक आदि की कथा समाप्त हुई। උභතොබ්යඤ්ජනකවත්ථුකථා उभतोब्यञ्जनक (उभय-लिंगी) की कथा 116. උභතොබ්යඤ්ජනකො භික්ඛවෙති ඉත්ථිනිමිත්තුප්පාදනකම්මතො ච පුරිසනිමිත්තුප්පාදනකම්මතො ච උභතො බ්යඤ්ජනමස්ස අත්ථීති උභතොබ්යඤ්ජනකො. කරොතීති පුරිසනිමිත්තෙන ඉත්ථීසු මෙථුනවීතික්කමං කරොති. කාරාපෙතීති පරං සමාදපෙත්වා අත්තනො ඉත්ථිනිමිත්තෙ කාරාපෙති, සො දුවිධො හොති – ඉත්ථිඋභතොබ්යඤ්ජනකො, පුරිසඋභතොබ්යඤ්ජනකොති. ११६. 'भिक्षुओं, उभतोब्यञ्जनक' - स्त्री-लिंग उत्पन्न करने वाले कर्म और पुरुष-लिंग उत्पन्न करने वाले कर्म, इन दोनों कर्मों के कारण जिसके दोनों लिंग (व्यंजन) होते हैं, वह 'उभतोब्यञ्जनक' कहलाता है। 'करता है' का अर्थ है पुरुष-लिंग से स्त्रियों में मैथुन का उल्लंघन करता है। 'कराता है' का अर्थ है दूसरे को प्रेरित कर अपने स्त्री-लिंग में (मैथुन) कराता है। वह दो प्रकार का होता है - स्त्री-उभतोब्यञ्जनक और पुरुष-उभतोब्यञ्जनक। තත්ථ ඉත්ථිඋභතොබ්යඤ්ජනකස්ස ඉත්ථිනිමිත්තං පාකටං හොති, පුරිසනිමිත්තං පටිච්ඡන්නං. පුරිසඋභතොබ්යඤ්ජනකස්ස පුරිසනිමිත්තං පාකටං, ඉත්ථිනිමිත්තං පටිච්ඡන්නං. ඉත්ථිඋභතොබ්යඤ්ජනකස්ස ඉත්ථීසු පුරිසත්තං කරොන්තස්ස ඉත්ථිනිමිත්තං පටිච්ඡන්නං හොති, පුරිසනිමිත්තං පාකටං හොති. පුරිසඋභතොබ්යඤ්ජනකස්ස පුරිසානං ඉත්ථිභාවං උපගච්ඡන්තස්ස පුරිසනිමිත්තං පටිච්ඡන්නං හොති, ඉත්ථිනිමිත්තං පාකටං හොති. ඉත්ථිඋභතොබ්යඤ්ජනකො සයඤ්ච ගබ්භං ගණ්හාති, පරඤ්ච ගණ්හාපෙති. පුරිසඋභතොබ්යඤ්ජනකො පන සයං න ගණ්හාති, පරං ගණ්හාපෙතීති, ඉදමෙතෙසං නානාකරණං. කුරුන්දියං පන වුත්තං – ‘‘යදි පටිසන්ධියං පුරිසලිඞ්ගං පවත්තෙ ඉත්ථිලිඞ්ගං නිබ්බත්තති, යදි පටිසන්ධියං ඉත්ථිලිඞ්ගං පවත්තෙ පුරිසලිඞ්ගං නිබ්බත්තතී’’ති[Pg.307]. තත්ථ විචාරණක්කමො විත්ථාරතො අට්ඨසාලිනියා ධම්මසඞ්ගහට්ඨකථාය වෙදිතබ්බො. ඉමස්ස පන දුවිධස්සාපි උභතොබ්යඤ්ජනකස්ස නෙව පබ්බජ්ජා අත්ථි, න උපසම්පදාති ඉදමිධ වෙදිතබ්බං. वहाँ, स्त्री-उभतोब्यञ्जनक के मामले में स्त्री-चिह्न प्रकट होता है और पुरुष-चिह्न छिपा रहता है। पुरुष-उभतोब्यञ्जनक के मामले में पुरुष-चिह्न प्रकट होता है और स्त्री-चिह्न छिपा रहता है। जब स्त्री-उभतोब्यञ्जनक स्त्रियों के साथ पुरुष का कार्य करती है, तब उसका स्त्री-चिह्न छिप जाता है और पुरुष-चिह्न प्रकट हो जाता है। जब पुरुष-उभतोब्यञ्जनक पुरुषों के साथ स्त्री-भाव को प्राप्त होता है, तब उसका पुरुष-चिह्न छिप जाता है और स्त्री-चिह्न प्रकट हो जाता है। स्त्री-उभतोब्यञ्जनक स्वयं भी गर्भ धारण करती है और दूसरों को भी गर्भ धारण कराती है। लेकिन पुरुष-उभतोब्यञ्जनक स्वयं गर्भ धारण नहीं करता, केवल दूसरों को गर्भ धारण कराता है; यही इनमें अंतर है। कुरुन्दी में कहा गया है - 'यदि प्रतिसन्धि के समय पुरुष-लिंग हो, तो जीवन काल में स्त्री-लिंग उत्पन्न होता है; यदि प्रतिसन्धि के समय स्त्री-लिंग हो, तो जीवन काल में पुरुष-लिंग उत्पन्न होता है।' इस विषय में विचार करने का क्रम विस्तार से धम्मसंगणि की अट्ठकथा 'अट्ठसालिनी' में समझना चाहिए। इन दोनों प्रकार के उभतोब्यञ्जनकों के लिए न तो प्रव्रज्या है और न ही उपसम्पदा, यह यहाँ जानना चाहिए। උභතොබ්යජ්ජනකවත්ථුකථා නිට්ඨිතා. उभतोब्यञ्जनक की कथा समाप्त हुई। අනුපජ්ඣායකාදිවත්ථුකථා अनुपज्झायक (बिना उपाध्याय वाले) आदि की कथा। 117. තෙන ඛො පන සමයෙනාති යෙන සමයෙන භගවතා සික්ඛාපදං අපඤ්ඤත්තං හොති, තෙන සමයෙන. අනුපජ්ඣායකන්ති උපජ්ඣං අගාහාපෙත්වා සබ්බෙන සබ්බං උපජ්ඣායවිරහිතං. එවං උපසම්පන්නා නෙව ධම්මතො න ආමිසතො සඞ්ගහං ලභන්ති, තෙ පරිහායන්තියෙව, න වඩ්ඪන්ති. න භික්ඛවෙ අනුපජ්ඣායකොති උපජ්ඣං අගාහාපෙත්වා නිරුපජ්ඣායකො න උපසම්පාදෙතබ්බො. යො උපසම්පාදෙය්ය ආපත්ති දුක්කටස්සාති සික්ඛාපදපඤ්ඤත්තිතො පට්ඨාය එවං උපසම්පාදෙන්තස්ස ආපත්ති හොති; කම්මං පන න කුප්පති. කෙචි කුප්පතීති වදන්ති, තං න ගහෙතබ්බං. සඞ්ඝෙන උපජ්ඣායෙනාතිආදීසුපි උභතොබ්යඤ්ජනකුපජ්ඣායපරියොසානෙසු එසෙව නයො. ११७. 'उस समय' का अर्थ है - जिस समय भगवान द्वारा शिक्षापद प्रज्ञप्त नहीं किया गया था, उस समय। 'अनुपज्झायक' का अर्थ है - उपाध्याय को ग्रहण किए बिना, पूरी तरह से उपाध्याय से रहित। इस प्रकार उपसम्पन्न हुए व्यक्ति न तो धर्म के अनुसार और न ही आमिष के अनुसार सहायता प्राप्त करते हैं; वे केवल अवनति को प्राप्त होते हैं, उन्नति नहीं करते। 'भिक्षुओं, बिना उपाध्याय वाले को (उपसम्पदा नहीं देनी चाहिए)' का अर्थ है - उपाध्याय को ग्रहण कराए बिना, उपाध्याय-रहित व्यक्ति को उपसम्पदा नहीं देनी चाहिए। 'जो उपसम्पदा दे, उसे दुक्कट का दोष होता है' - शिक्षापद की प्रज्ञप्ति के समय से लेकर, इस प्रकार उपसम्पदा देने वाले को आपत्ति होती है; लेकिन कर्म अमान्य नहीं होता। कुछ आचार्य कहते हैं कि कर्म अमान्य हो जाता है, लेकिन उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। 'संघ द्वारा, उपाध्याय द्वारा' आदि सूत्रों में, उभतोब्यञ्जनक और उपाध्याय के अंत तक के शिक्षापदों में भी यही नियम है। අනුපජ්ඣායකාදිවත්ථුකථා නිට්ඨිතා. अनुपज्झायक आदि की कथा समाप्त हुई। අපත්තකාදිවත්ථුකථා अपात्तक (बिना पात्र वाले) आदि की कथा। 118. හත්ථෙසු පිණ්ඩාය චරන්තීති යො හත්ථෙසු පිණ්ඩො ලබ්භති, තදත්ථාය චරන්ති. සෙය්යථාපි තිත්ථියාති යථා ආජීවකනාමකා තිත්ථියා; සූපබ්යඤ්ජනෙහි මිස්සෙත්වා හත්ථෙසු ඨපිතපිණ්ඩමෙව හි තෙ භුඤ්ජන්ති. ආපත්ති දුක්කටස්සාති එවං උපසම්පාදෙන්තස්සෙව ආපත්ති හොති, කම්මං පන න කුප්පති. අචීවරකාදිවත්ථූසුපි එසෙව නයො. ११८. 'हाथों में पिण्ड के लिए विचरण करते हैं' का अर्थ है - जो भोजन हाथों में प्राप्त होता है, उसके लिए विचरण करते हैं। 'जैसे तीर्थिक' का अर्थ है - जैसे आजीवक नामक तीर्थिक; क्योंकि वे दाल और व्यंजनों के साथ मिलाकर हाथों में रखे हुए भोजन को ही खाते हैं। 'दुक्कट की आपत्ति' का अर्थ है - इस प्रकार उपसम्पदा देने वाले को ही आपत्ति होती है, लेकिन कर्म अमान्य नहीं होता। अचीवरक आदि के विषयों में भी यही नियम है। යාචිතකෙනාති ‘‘යාව උපසම්පදං කරොම, තාව දෙථා’’ති යාචිත්වා ගහිතෙන; තාවකාලිකෙනාති අත්ථො. ඊදිසෙන හි පත්තෙන වා චීවරෙන වා පත්තචීවරෙන වා උපසම්පාදෙන්තස්සෙව ආපත්ති හොති, කම්මං පන න කුප්පති, තස්මා පරිපුණ්ණපත්තචීවරොව උපසම්පාදෙතබ්බො. සචෙ තස්ස නත්ථි, ආචරියුපජ්ඣායා චස්ස දාතුකාමා හොන්ති, අඤ්ඤෙ වා භික්ඛූ නිරපෙක්ඛෙහි නිස්සජ්ජිත්වා අධිට්ඨානුපගං පත්තචීවරං දාතබ්බං. පබ්බජ්ජාපෙක්ඛං පන පණ්ඩුපලාසං යාචිතකෙනාපි පත්තචීවරෙන පබ්බාජෙතුං වට්ටති, සභාගට්ඨානෙ විස්සාසෙන ගහෙත්වාපි පබ්බාජෙතුං වට්ටති. 'याचितक' का अर्थ है - 'जब तक उपसम्पदा करते हैं, तब तक के लिए दे दें' - ऐसा माँगकर ग्रहण किया हुआ; अर्थात् अस्थायी रूप से लिया हुआ। क्योंकि इस प्रकार के पात्र या चीवर, अथवा पात्र और चीवर दोनों के साथ उपसम्पदा देने वाले को ही आपत्ति होती है, कर्म अमान्य नहीं होता; इसलिए पूर्ण पात्र और चीवर वाले को ही उपसम्पदा देनी चाहिए। यदि उसके पास नहीं हैं, और आचार्य तथा उपाध्याय उसे देना चाहते हैं, या अन्य भिक्षु देना चाहते हैं, तो उन्हें बिना किसी अपेक्षा के त्याग कर अधिष्ठान के योग्य पात्र और चीवर देने चाहिए। लेकिन प्रव्रज्या के इच्छुक पाण्डुपलास को माँगे हुए पात्र और चीवर से भी प्रव्रजित करना उचित है, अथवा समान विचार वाले स्थान पर विश्वास के साथ लेकर भी प्रव्रजित करना उचित है। සචෙ පන අපක්කං පත්තං චීවරූපගානි ච වත්ථානි ගහෙත්වා ආගතො හොති, යාව පත්තො පච්චති, චීවරානි ච කරියන්ති, තාව විහාරෙ වසන්තස්ස [Pg.308] අනාමට්ඨපිණ්ඩපාතං දාතුං වට්ටති, ථාලකෙ භුඤ්ජිතුං වට්ටති, පුරෙභත්තං සාමණෙරභාගසමකො ආමිසභාගො දාතුං වට්ටති. සෙනාසනග්ගාහො පන සලාකභත්තඋද්දෙසභත්තනිමන්තනාදීනි ච න වට්ටන්ති. පච්ඡාභත්තම්පි සාමණෙරභාගසමො තෙලමධුඵාණිතාදිභෙසජ්ජභාගො වට්ටති. සචෙ ගිලානො හොති, භෙසජ්ජමස්ස කාතුං වට්ටති, සාමණෙරස්ස විය ච සබ්බං පටිජග්ගනකම්මන්ති. यदि वह बिना पका हुआ पात्र और चीवर के योग्य वस्त्र लेकर आया हो, तो जब तक पात्र पकाया जाता है और चीवर बनाए जाते हैं, तब तक विहार में रहने वाले उस व्यक्ति को अछूता (अनामट्ट) पिण्डपात देना उचित है, थाली में भोजन करना उचित है, और भोजन से पूर्व श्रामणेर के हिस्से के बराबर भोजन का अंश देना उचित है। लेकिन शयनासन ग्रहण करना, शलाका-भक्त, उद्देस-भक्त, निमंत्रण आदि उचित नहीं हैं। भोजन के बाद भी श्रामणेर के हिस्से के बराबर तेल, मधु, गुड़ आदि औषधियों का भाग देना उचित है। यदि वह बीमार हो, तो उसके लिए औषधि करना उचित है, और श्रामणेर की तरह उसकी पूरी देखभाल करना उचित है। අපත්තකාදිවත්ථුකථා නිට්ඨිතා. अपात्तक आदि की कथा समाप्त हुई। හත්ථච්ඡින්නාදිවත්ථුකථා हत्थच्छिन्न आदि की कथा। 119. හත්ථච්ඡින්නාදිවත්ථූසු – හත්ථච්ඡින්නොති යස්ස හත්ථතලෙ වා මණිබන්ධෙ වා කප්පරෙ වා යත්ථ කත්ථචි එකො වා ද්වෙ වා හත්ථා ඡින්නා හොන්ති. පාදච්ඡින්නොති යස්ස අග්ගපාදෙ වා ගොප්ඵකෙසු වා ජඞ්ඝාය වා යත්ථ කත්ථචි එකො වා ද්වෙ වා පාදා ඡින්නා හොන්ති. හත්ථපාදච්ඡින්නොති යස්ස වුත්තප්පකාරෙනෙව චතූසු හත්ථපාදෙසු ද්වෙ වා තයො වා සබ්බෙ වා හත්ථපාදා ඡින්නා හොන්ති. කණ්ණච්ඡින්නොති යස්ස කණ්ණමූලෙ වා කණ්ණසක්ඛලිකාය වා එකො වා ද්වෙ වා කණ්ණා ඡින්නා හොන්ති. යස්ස පන කණ්ණාවිද්ධෙ ඡිජ්ජන්ති, සක්කා ච හොති සඞ්ඝාටෙතුං, සො කණ්ණං සඞ්ඝාටෙත්වා පබ්බාජෙතබ්බො. නාසච්ඡින්නොති යස්ස අජපදකෙ වා අග්ගෙ වා එකපුටෙ වා යත්ථ කත්ථචි නාසා ඡින්නා හොති. යස්ස පන නාසිකා සක්කා හොති සන්ධෙතුං, සො තං ඵාසුකං කත්වා පබ්බාජෙතබ්බො. කණ්ණනාසච්ඡින්නො උභයවසෙන වෙදිතබ්බො. අඞ්ගුලිච්ඡින්නොති යස්ස නඛසෙසං අදස්සෙත්වා එකා වා බහූ වා අඞ්ගුලියො ඡින්නා හොන්ති. යස්ස පන සුත්තතන්තුමත්තම්පි නඛසෙසං පඤ්ඤායති, තං පබ්බාජෙතුං වට්ටති. අළච්ඡින්නොති යස්ස චතූසු අඞ්ගුට්ඨකෙසු අඞ්ගුලියං වුත්තනයෙනෙව එකො වා බහූ වා අඞ්ගුට්ඨකා ඡින්නා හොන්ති. කණ්ඩරච්ඡින්නොති යස්ස කණ්ඩරනාමකා මහාන්හාරූ පුරතො වා පච්ඡතො වා ඡින්නා හොන්ති; යෙසු එකස්සපි ඡින්නත්තා අග්ගපාදෙන වා චඞ්කමති, මූලෙන වා චඞ්කමති, න වා පාදං පතිට්ඨාපෙතුං සක්කොති. ११९. हत्थच्छिन्न (हाथ कटा हुआ) आदि की कथाओं में - 'हत्थच्छिन्न' वह कहलाता है जिसके हथेली, कलाई या कोहनी से, कहीं से भी एक या दोनों हाथ कटे हों। 'पादच्छिन्न' (पैर कटा हुआ) वह है जिसके पैर के अग्रभाग, टखने या पिंडली से, कहीं से भी एक या दोनों पैर कटे हों। 'हत्थपादच्छिन्न' वह है जिसके बताए गए प्रकार से चारों हाथ-पैरों में से दो, तीन या सभी कटे हों। 'कण्णच्छिन्न' (कान कटा हुआ) वह है जिसके कान की जड़ या कान की बाली से एक या दोनों कान कटे हों। लेकिन जिसके कान छेदने के स्थान से कटे हों और उन्हें जोड़ा जा सकता हो, तो उसे जोड़कर प्रव्रजित करना चाहिए। 'नासच्छिन्न' (नाक कटा हुआ) वह है जिसकी नाक के छिद्रों के बीच के भाग, अग्रभाग या एक नथुने से, कहीं से भी नाक कटी हो। लेकिन जिसकी नाक जोड़ी जा सकती हो, उसे ठीक करके प्रव्रजित करना चाहिए। 'कण्णनासच्छिन्न' को दोनों के संदर्भ में समझना चाहिए। 'अङ्गुलिच्छिन्न' (उंगली कटा हुआ) वह है जिसकी नाखून का अवशेष दिखे बिना एक या अनेक उंगलियाँ कटी हों। लेकिन यदि सूत के धागे के बराबर भी नाखून का अवशेष दिखाई देता है, तो उसे प्रव्रजित करना उचित है। 'अळच्छिन्न' वह है जिसके चारों अंगूठों में से, उंगलियों के लिए बताए गए नियम के अनुसार ही, एक या अनेक अंगूठे कटे हों। 'कण्डरच्छिन्न' वह है जिसकी 'कण्डर' नामक मुख्य नसें आगे या पीछे से कटी हों; जिनमें से एक के भी कट जाने के कारण वह या तो पैर के अग्रभाग से चलता है या एड़ी के बल चलता है, अथवा पैर को जमीन पर टिकाने में समर्थ नहीं होता। ඵණහත්ථකොති යස්ස වග්ගුලිපක්ඛකා විය අඞ්ගුලියො සම්බද්ධා හොන්ති; එතං පබ්බාජෙතුකාමෙන අඞ්ගුලන්තරිකායො ඵාලෙත්වා සබ්බං අන්තරචම්මං අපනෙත්වා ඵාසුකං කත්වා පබ්බාජෙතබ්බො. යස්සපි ඡ අඞ්ගුලියො [Pg.309] හොන්ති, තං පබ්බාජෙතුකාමෙන අධිකඅඞ්ගුලිං ඡින්දිත්වා ඵාසුකං කත්වා පබ්බාජෙතබ්බො. 'फणहत्थक' वह है जिसकी उंगलियाँ चमगादड़ के पंख की तरह आपस में जुड़ी हों; उसे प्रव्रजित करने की इच्छा रखने वाले को उंगलियों के बीच के भाग को चीरकर, बीच की सारी त्वचा को हटाकर और उसे ठीक करके प्रव्रजित करना चाहिए। जिसके छह उंगलियाँ हों, उसे भी प्रव्रजित करने की इच्छा रखने वाले को अतिरिक्त उंगली को काटकर और उसे ठीक करके प्रव्रजित करना चाहिए। ඛුජ්ජොති යො උරස්ස වා පිට්ඨියා වා පස්සස්ස වා නික්ඛන්තත්තා ඛුජ්ජසරීරො. යස්ස පන කිඤ්චි කිඤ්චි අඞ්ගපච්චඞ්ගං ඊසකං වඞ්කං, තං පබ්බාජෙතුං වට්ටති. මහාපුරිසො එව හි බ්රහ්මුජ්ජුගත්තො, අවසෙසො සත්තො අඛුජ්ජො නාම නත්ථි. 'खुज्ज' (कुबड़ा) वह है जिसका शरीर छाती, पीठ या बगल के बाहर निकले होने के कारण टेढ़ा हो। लेकिन जिसके अंग-प्रत्यंग थोड़े-बहुत टेढ़े हों, उसे प्रव्रजित करना उचित है। क्योंकि केवल महापुरुष ही ब्रह्मा के समान सीधे शरीर वाले होते हैं, उनके अतिरिक्त कोई भी प्राणी पूर्णतः 'अखुज्ज' (बिना किसी टेढ़ेपन वाला) नहीं होता। වාමනොති ජඞ්ඝවාමනො වා කටිවාමනො වා උභයවාමනො වා. ජඞ්ඝවාමනස්ස කටිතො පට්ඨාය හෙට්ඨිමකායො රස්සො හොති, උපරිමකායො පරිපුණ්ණො. කටිවාමනස්ස කටිතො පට්ඨාය උපරිමකායො රස්සො හොති, හෙට්ඨිමකායො පරිපුණ්ණො. උභයවාමනස්ස උභොපි කායා රස්සා හොන්ති, යෙසං රස්සත්තා භූතානං විය පරිවටුමො මහාකුච්ඡිඝටසදිසො අත්තභාවො හොති, තං තිවිධම්පි පබ්බාජෙතුං න වට්ටති. 'वामन' (बौना) वह है जो या तो पिंडली से बौना हो, या कमर से बौना हो, या दोनों से बौना हो। पिंडली से बौने व्यक्ति का कमर से नीचे का शरीर छोटा होता है और ऊपर का शरीर पूर्ण होता है। कमर से बौने व्यक्ति का कमर से ऊपर का शरीर छोटा होता है और नीचे का शरीर पूर्ण होता है। दोनों ओर से बौने व्यक्ति के शरीर के दोनों भाग छोटे होते हैं, जिनके छोटा होने के कारण उसका शरीर पिशाचों की तरह चारों ओर से गोल और बड़े पेट वाले घड़े के समान होता है; इन तीनों प्रकार के व्यक्तियों को प्रव्रजित करना उचित नहीं है। ගලගණ්ඩීති යස්ස කුම්භණ්ඩං විය ගලෙ ගණ්ඩො හොති. දෙසනාමත්තමෙව චෙතං, යස්මිං කිස්මිඤ්චි පන පදෙසෙ ගණ්ඩෙ සති න පබ්බාජෙතබ්බො. තත්ථ විනිච්ඡයො – ‘‘න භික්ඛවෙ පඤ්චහි ආබාධෙහි ඵුට්ඨො පබ්බාජෙතබ්බො’’ති එත්ථ වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බො. ලක්ඛණාහතකසාහතලිඛිතකෙසු යං වත්තබ්බං, තං ‘‘න භික්ඛවෙ ලක්ඛණාහතො’’තිආදීසු වුත්තමෙව. 'गलगण्डी' वह है जिसके गले में कुम्हड़े (कद्दू) के समान गाँठ हो। यह केवल एक उदाहरण मात्र है, वास्तव में शरीर के किसी भी भाग में गाँठ होने पर उसे प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। इस विषय में निर्णय 'भिक्षुओं, पाँच रोगों से ग्रस्त व्यक्ति को प्रव्रजित नहीं करना चाहिए' - इस शिक्षापद में बताए गए नियम के अनुसार ही समझना चाहिए। 'लक्खणाहतक' (चिह्नित), 'कसाहतक' (कोड़े से पीटा गया) और 'लिखितक' (विज्ञापित अपराधी) के विषय में जो कहना है, वह 'भिक्षुओं, चिह्नित व्यक्ति को नहीं...' आदि शिक्षापदों में कहा ही गया है। සීපදීති භාරපාදො වුච්චති. යස්ස පාදො ථූලො හොති සඤ්ජාතපිළකො ඛරො, සො න පබ්බාජෙතබ්බො. යස්ස පන න තාව ඛරභාවං ගණ්හාති, සක්කා හොති උපනාහං බන්ධිත්වා උදකආවාටෙ පවෙසෙත්වා උදකවාලිකාය පූරෙත්වා යථා සිරා පඤ්ඤායන්ති, ජඞ්ඝා ච තෙලනාළිකා විය හොති, එවං මිලාපෙතුං සක්කා, තස්ස පාදං ඊදිසං කත්වා තං පබ්බාජෙතුං වට්ටති. සචෙ පුන වඩ්ඪති, උපසම්පාදෙන්තෙනාපි තථා කත්වාව උපසම්පාදෙතබ්බො. 'सीपदी' (हाथीपाँव) उसे कहा जाता है जिसका पैर भारी हो। जिसका पैर मोटा हो, जिसमें गाँठें पड़ गई हों और जो कठोर हो, उसे प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। लेकिन जिसका पैर अभी उतना कठोर नहीं हुआ है और जिसे पट्टी बाँधकर, पानी वाले गड्ढे में डालकर, गीली रेत से भरकर इस प्रकार सुखाया जा सकता हो कि नसें दिखाई देने लगें और पिंडली तेल की नली के समान पतली हो जाए, तो उसके पैर को ऐसा बनाकर उसे प्रव्रजित करना उचित है। यदि वह फिर से बढ़ जाए, तो उपसंपदा देने वाले को भी उसी प्रकार ठीक करके ही उपसंपदा देनी चाहिए। පාපරොගීති අරිසභගන්දරපිත්තසෙම්හකාසසොසාදීසු යෙන කෙනචි රොගෙන නිච්චාතුරො අතෙකිච්ඡරොගො ජෙගුච්ඡො අමනාපො; අයං න පබ්බාජෙතබ්බො. 'पापरोगी' वह है जो बवासीर, भगंदर, पित्त-रोग, कफ-रोग, खाँसी, क्षय-रोग आदि में से किसी भी रोग से निरंतर पीड़ित हो, जिसका रोग असाध्य हो, जो घृणास्पद हो और अप्रिय हो; ऐसे व्यक्ति को प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। පරිසදූසකොති යො අත්තනො විරූපතාය පරිසං දූසෙති; අතිදීඝො වා හොති අඤ්ඤෙසං සීසප්පමාණනාභිප්පදෙසො, අතිරස්සො [Pg.310] වා උභයවාමනභූතරූපං විය, අතිකාළො වා ඣාපිතඛෙත්තෙ ඛාණුකො විය, අච්චොදාතො වා දධිතක්කාදීහි පමජ්ජිතමට්ඨතම්බලොහවණ්ණො, අතිකිසො වා මන්දමංසලොහිතො අට්ඨිසිරාචම්මසරීරො විය, අතිථූලො වා භාරියමංසො, මහොදරො වා මහාභූතසදිසො, අතිමහන්තසීසො වා පච්ඡිං සීසෙ කත්වා ඨිතො විය, අතිඛුද්දකසීසො වා සරීරස්ස අනනුරූපෙන අතිඛුද්දකෙන සීසෙන සමන්නාගතො, කූටකූටසීසො වා තාලඵලපිණ්ඩිසදිසෙන සීසෙන සමන්නාගතො, සිඛරසීසො වා උද්ධං අනුපුබ්බතනුකෙන සීසෙන සමන්නාගතො, නාළිසීසො වා මහාවෙළුපබ්බසදිසෙන සීසෙන සමන්නාගතො, කප්පසීසො වා පබ්භාරසීසො වා චතූසු පස්සෙසු යෙන කෙනචි පස්සෙන ඔණතෙන සීසෙන සමන්නාගතො, වණසීසො වා පූතිසීසො වා කණ්ණිකකෙසො වා පාණකෙහි ඛායිතකෙදාරෙ සස්සසදිසෙහි තහිං තහිං උට්ඨිතෙහි කෙසෙහි සමන්නාගතො, නිල්ලොමසීසො වා ථූලථද්ධකෙසො වා තාලහීරසදිසෙහි කෙසෙහි සමන්නාගතො, ජාතිපලිතෙහි පණ්ඩරසීසො වා පකතිතම්බකෙසො වා ආදිත්තෙහි විය කෙසෙහි සමන්නාගතො, ආවට්ටසීසො වා ගුන්නං සරීරෙ ආවට්ටසදිසෙහි උද්ධග්ගෙහි කෙසාවට්ටෙහි සමන්නාගතො, සීසලොමෙහි සද්ධිං එකාබද්ධභමුකලොමො වා ජාලබද්ධෙන විය නලාටෙන සමන්නාගතො. ‘परिषदूषक’ (परिसादूसको) वह है जो अपनी विरूपता के कारण परिषद को दूषित करता है; वह दूसरों के सिर के परिमाण के बराबर नाभि वाला होने से बहुत लंबा होता है, या ऊपर और नीचे दोनों ओर से कुबड़े प्रेत के रूप की तरह बहुत छोटा होता है, या जले हुए खेत के ठूँठ की तरह बहुत काला होता है, या दही-मट्ठा आदि से मांजे हुए चिकने तांबे के रंग की तरह बहुत सफेद होता है, या कम मांस और रक्त वाला होने से केवल हड्डी, नस और त्वचा के शरीर वाले की तरह बहुत दुबला होता है, या भारी मांस वाला होने से बहुत मोटा होता है, या महाभूत (प्रेत) के समान बड़े पेट वाला होता है, या सिर पर टोकरी रखकर खड़े हुए व्यक्ति की तरह बहुत बड़े सिर वाला होता है, या शरीर के अनुपयुक्त बहुत छोटे सिर से युक्त होने के कारण बहुत छोटे सिर वाला होता है, या खजूर के फल के गुच्छे के समान सिर से युक्त होने के कारण ऊबड़-खाबड़ सिर वाला होता है, या ऊपर की ओर क्रमशः पतले होते हुए सिर से युक्त होने के कारण शिखर के समान सिर वाला होता है, या बड़े बांस के पोर के समान सिर से युक्त होने के कारण नली जैसे सिर वाला होता है, या चारों दिशाओं में से किसी एक ओर झुके हुए सिर से युक्त होने के कारण दोफांक सिर वाला या झुके हुए सिर वाला होता है, या घावयुक्त सिर वाला या सड़े हुए सिर वाला होता है, या कीड़ों द्वारा खाए गए खेत में अनाज के पौधों के समान यहाँ-वहाँ उगे हुए बालों से युक्त होने के कारण छितरे हुए बालों वाला होता है, या बिना बालों वाला होता है, या खजूर के रेशों के समान बालों से युक्त होने के कारण मोटे और कड़े बालों वाला होता है, या जन्मजात सफेद बालों के कारण सफेद सिर वाला होता है, या आग से जले हुए के समान बालों से युक्त होने के कारण प्राकृतिक रूप से लाल बालों वाला होता है, या गायों के शरीर पर भंवर के समान ऊपर की ओर मुड़े हुए बालों के भंवरों से युक्त होने के कारण भंवर वाले सिर वाला होता है, या जाल से बंधे हुए के समान ललाट से युक्त होकर सिर के बालों के साथ एक में जुड़ी हुई भौंहों वाला होता है। සම්බද්ධභමුකො වා නිල්ලොමභමුකො වා මක්කටභමුකො වා අතිමහන්තක්ඛි වා අතිඛුද්දකක්ඛි වා මහිංසචම්මෙ වාසිකොණෙන පහරිත්වා කතඡිද්දසදිසෙහි අක්ඛීහි සමන්නාගතො, විසමක්ඛි වා එකෙන මහන්තෙන එකෙන ඛුද්දකෙන අක්ඛිනා සමන්නාගතො, විසමචක්කලො වා එකෙන උද්ධං එකෙන අධොති එවං විසමජාතෙහි අක්ඛිචක්කලෙහි සමන්නාගතො, කෙකරො වා ගම්භීරක්ඛි වා යස්ස ගම්භීරෙ උදපානෙ උදකතාරකා විය අක්ඛිතාරකා පඤ්ඤායන්ති; නික්ඛන්තක්ඛි වා යස්ස කක්කටකස්සෙව අක්ඛිතාරකා නික්ඛන්තා හොන්ති; හත්ථිකණ්ණො වා මහතීහි කණ්ණසක්ඛලිකාහි සමන්නාගතො, මූසිකකණ්ණො වා ජටුකකණ්ණො වා ඛුද්දිකාහි කණ්ණසක්ඛලිකාහි සමන්නාගතො, ඡිද්දමත්තකණ්ණො වා යස්ස විනා කණ්ණසක්ඛලිකාහි [Pg.311] කණ්ණඡිද්දමත්තමෙව හොති; අවිද්ධකණ්ණො වා යොනකජාතිකො පන පරිසදූසකො න හොති; සභාවොයෙව හි සො තස්ස කණ්ණභගන්දරිකො වා නිච්චපූතිනා කණ්ණෙන සමන්නාගතො, ගණ්ඩකණ්ණො වා සදාපග්ඝරිතපුබ්බෙන කණ්ණෙන සමන්නාගතො, ටඞ්කිතකණ්ණො වා ගොභත්තනාළිකාය අග්ගසදිසෙහි කණ්ණෙහි සමන්නාගතො, අතිපිඞ්ගලක්ඛි වා මධුපිඞ්ගලං පන පබ්බාජෙතුං වට්ටති. නිප්පඛුමක්ඛි වා අස්සුපග්ඝරණක්ඛි වා පුප්ඵිතක්ඛි වා අක්ඛිපාකෙන සමන්නාගතක්ඛි වා. वह जुड़ी हुई भौंहों वाला, या बिना बालों वाली भौंहों वाला, या बंदर की भौंहों के समान भौंहों वाला होता है। वह बहुत बड़ी आँखों वाला होता है, या भैंस की खाल में बसूले की नोक से मारकर किए गए छेद के समान आँखों से युक्त होने के कारण बहुत छोटी आँखों वाला होता है, या एक बड़ी और एक छोटी आँख से युक्त होने के कारण विषम आँखों वाला होता है, या एक ऊपर और एक नीचे—इस प्रकार विषम रूप से स्थित पुतलियों से युक्त होने के कारण विषम पुतलियों वाला होता है, या भेंगा होता है, या धंसी हुई आँखों वाला होता है, जिसकी आँखों की पुतलियाँ गहरे कुएं में जल के प्रतिबिंब की तरह दिखाई देती हैं; या उभरी हुई आँखों वाला होता है, जिसकी आँखों की पुतलियाँ केकड़े की आँखों की तरह बाहर निकली होती हैं; या बड़े कान के पर्दों से युक्त होने के कारण हाथी के समान कान वाला होता है, या छोटे कान के पर्दों से युक्त होने के कारण चूहे के कान जैसा या चमगादड़ के कान जैसा होता है, या छोटे कान के पर्दों से युक्त होने के कारण केवल छेद मात्र कान वाला होता है, जिसके कान के पर्दों के बिना केवल कान का छेद मात्र होता है; या बिना छिदे कान वाला होता है, किंतु योनक जाति का व्यक्ति (कान न छिदा होने पर भी) परिषदूषक नहीं होता क्योंकि वह उसका स्वभाव ही है; या वह कान के भगंदर वाला होता है जो निरंतर सड़ते हुए कान से युक्त होता है, या हमेशा मवाद बहने वाले कान से युक्त होने के कारण गांठ वाले कान वाला होता है, या गाय को चारा खिलाने वाली नली के अग्र भाग के समान कानों से युक्त होने के कारण छिदे हुए कानों वाला होता है, या बहुत पीली आँखों वाला होता है, किंतु शहद जैसी पीली आँखों वाले को प्रव्रजित करना उचित है। वह बिना पलकों वाली आँखों वाला, या आँसू बहने वाली आँखों वाला, या फूली हुई आँखों वाला, या आँखों के पकने (नेत्रशोथ) से युक्त आँखों वाला होता है। අතිමහන්තනාසිකො වා අතිඛුද්දකනාසිකො වා චිපිටනාසිකො වා මජ්ඣෙ අප්පතිට්ඨහිත්වා එකපස්සෙ ඨිතවඞ්කනාසිකො වා, දීඝනාසිකො වා සුකතුණ්ඩසදිසාය ජිව්හාය ලෙහිතුං සක්කුණෙය්යාය නාසිකාය සමන්නාගතො, නිච්චපග්ඝරිතසිඞ්ඝාණිකනාසො වා. वह बहुत बड़ी नाक वाला, या बहुत छोटी नाक वाला, या चपटी नाक वाला, या बीच में स्थित न होकर एक ओर झुकी हुई टेढ़ी नाक वाला होता है, या तोते की चोंच के समान जीभ से चाटने योग्य नाक से युक्त होने के कारण लंबी नाक वाला होता है, या निरंतर बहती हुई नाक वाला होता है। මහාමුඛො වා යස්ස පටඞ්ගමණ්ඩූකස්සෙව මුඛනිමිත්තංයෙව මහන්තං හොති, මුඛං පන ලාබුසදිසං අතිඛුද්දකං, භින්නමුඛො වා වඞ්කමුඛො වා මහාඔට්ඨො වා උක්ඛලිමුඛවට්ටිසදිසෙහි ඔට්ඨෙහි සමන්නාගතො, තනුකඔට්ඨො වා භෙරිචම්මසදිසෙහි දන්තෙ පිදහිතුං අසමත්ථෙහි ඔට්ඨෙහි සමන්නාගතො, මහාධරොට්ඨො වා තනුකඋත්තරොට්ඨො වා තනුකඅධරොට්ඨො වා මහාඋත්තරොට්ඨො වා ඔට්ඨඡින්නකො වා එළමුඛො වා උප්පක්කමුඛො වා සඞ්ඛතුණ්ඩකො වා බහිසෙතෙහි අන්තො අතිරත්තෙහි ඔට්ඨෙහි සමන්නාගතො, දුග්ගන්ධකුණපමුඛො වා. वह बड़े मुख वाला होता है, जिसका मुख-चिह्न पतंग (मेंढक विशेष) के मुख-चिह्न की तरह बड़ा होता है, किंतु मुख का द्वार लौकी के छेद की तरह बहुत छोटा होता है; या वह फटे हुए मुख वाला, या टेढ़े मुख वाला, या मिट्टी की हांडी के घेरे के समान होंठों से युक्त होने के कारण बड़े होंठों वाला होता है, या नगाड़े की खाल के समान दांतों को ढंकने में असमर्थ होंठों से युक्त होने के कारण पतले होंठों वाला होता है, या बड़े निचले होंठ और पतले ऊपरी होंठ वाला, या पतले निचले होंठ और बड़े ऊपरी होंठ वाला, या कटे हुए होंठ वाला, या लार बहने वाले मुख वाला, या फुंसियों वाले मुख वाला, या बाहर से सफेद और भीतर से अत्यंत लाल होंठों से युक्त होने के कारण शंख के समान मुख वाला, या दुर्गंधयुक्त मुर्दे के समान मुख वाला होता है। මහාදන්තො වා අට්ඨකදන්තසදිසෙහි දන්තෙහි සමන්නාගතො අසුරදන්තො වා හෙට්ඨා වා උපරි වා බහිනික්ඛන්තදන්තො, යස්ස පන සක්කා හොති ඔට්ඨෙහි පිදහිතුං කථෙන්තස්සෙව පඤ්ඤායති නො අකථෙන්තස්ස, තං පබ්බාජෙතුං වට්ටති. පූතිදන්තො වා නිද්දන්තො වා යස්ස පන දන්තන්තරෙ කලන්දකදන්තො විය සුඛුමදන්තො හොති, තං පබ්බාජෙතුං වට්ටති. वह आठ दांतों वाले हल के फल के समान दांतों से युक्त होने के कारण बड़े दांतों वाला होता है, या नीचे या ऊपर बाहर की ओर निकले हुए दांतों वाला होने से असुर-दांत वाला होता है; किंतु जिसे होंठों से ढंकना संभव हो और जो केवल बोलते समय दिखाई दे, न बोलते समय नहीं, उसे प्रव्रजित करना उचित है। वह सड़े हुए दांतों वाला या बिना दांतों वाला होता है; किंतु जिसके दांतों के बीच गिलहरी के दांत की तरह सूक्ष्म दांत हो, उसे प्रव्रजित करना उचित है। මහාහනුකො වා ගොහනුසදිසෙන හනුනා සමන්නාගතො, දීඝහනුකො වා චිපිටහනුකො වා අන්තොපවිට්ඨෙන විය අතිරස්සෙන හනුකෙන සමන්නාගතො, භින්නහනුකො වා වඞ්කහනුකො වා නිම්මස්සුදාඨිකො වා භික්ඛුනිසදිසමුඛො දීඝගලො වා බකගලසදිසෙන ගලෙන සමන්නාගතො, රස්සගලො වා අන්තොපවිට්ඨෙන විය ගලෙන සමන්නාගතො, භින්නගලො වා භට්ඨඅංසකූටො වා අහත්ථො වා එකහත්ථො වා අතිරස්සහත්ථො [Pg.312] වා අතිදීඝහත්ථො වා භින්නඋරො වා භින්නපිට්ඨි වා කච්ඡුගත්තො වා කණ්ඩුගත්තො වා දද්දුගත්තො වා ගොධාගත්තො වා, යස්ස ගොධාය විය ගත්තතො චුණ්ණානි පතන්ති, සබ්බඤ්චෙතං විරූපකරණං සන්ධාය විත්ථාරිකවසෙන වුත්තං. විනිච්ඡයො පනෙත්ථ ‘‘න භික්ඛවෙ පඤ්චහි ආබාධෙහී’’ති එත්ථ වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බො. वह गाय की ठुड्डी के समान ठुड्डी से युक्त होने के कारण बड़ी ठुड्डी वाला होता है, या लंबी ठुड्डी वाला, या भीतर धंसी हुई सी अत्यंत छोटी ठुड्डी से युक्त होने के कारण चपटी ठुड्डी वाला होता है, या टूटी हुई ठुड्डी वाला, या टेढ़ी ठुड्डी वाला, या बिना दाढ़ी-मूंछ वाला भिक्षुणी के समान मुख वाला होता है, या बगुले की गर्दन के समान गर्दन से युक्त होने के कारण लंबी गर्दन वाला होता है, या भीतर धंसी हुई सी गर्दन से युक्त होने के कारण छोटी गर्दन वाला होता है, या टूटी हुई गर्दन वाला, या झुके हुए कंधों वाला, या बिना हाथ वाला, या एक हाथ वाला, या अत्यंत छोटे हाथ वाला, या अत्यंत लंबे हाथ वाला, या फटी हुई छाती वाला, या फटी हुई पीठ वाला, या खुजली वाले शरीर वाला, या दाद वाले शरीर वाला होता है। वह गोह (छिपकली विशेष) के समान शरीर वाला होता है, जिसके शरीर से गोह की तरह पपड़ियाँ गिरती हैं; और यह सब विरूपता उत्पन्न करने वाले रोगों के संदर्भ में विस्तार से कहा गया है। यहाँ इसका निर्णय ‘भिक्षुओं, पाँच रोगों से ग्रस्त को (प्रव्रजित न करें)’ इस शिक्षापद में बताए गए तरीके से ही समझना चाहिए। භට්ඨකටිකො වා මහාආනිසදො වා උද්ධනකූටසදිසෙහි ආනිසදමංසෙහි අච්චුග්ගතෙහි සමන්නාගතො, මහාඌරුකො වා වාතණ්ඩිකො වා මහාජාණුකො වා සඞ්ඝට්ටනජාණුකො වා දීඝජඞ්ඝො වා යට්ඨිසදිසජඞ්ඝො විකටො වා පණ්හො වා උබ්බද්ධපිණ්ඩිකො වා, සො දුවිධො හෙට්ඨා ඔරුළ්හාහි වා උපරි ආරුළ්හාහි වා මහතීහි ජඞ්ඝපිණ්ඩිකාහි සමන්නාගතො, මහාජඞ්ඝො වා ථූලජඞ්ඝපිණ්ඩිකො වා මහාපාදො වා මහාපණ්හි වා පිට්ඨිකපාදො වා පාදවෙමජ්ඣතො උට්ඨිතජඞ්ඝො වඞ්කපාදො වා සො දුවිධො – අන්තො වා බහි වා පරිවත්තපාදො ගණ්ඨිකඞ්ගුලි වා සිඞ්ගිවෙරඵණසදිසාහි අඞ්ගුලීහි සමන්නාගතො, අන්ධනඛො වා කාළවණ්ණෙහි පූතිනඛෙහි සමන්නාගතො, සබ්බොපි එස පරිසදූසකො. එවරූපො පරිසදූසකො න පබ්බාජෙතබ්බො. झुकी हुई कमर वाला, या बड़े नितम्बों वाला, जो चूल्हे के कोनों के समान बहुत ऊँचे नितम्ब-मांस से युक्त हो; अथवा मोटे जांघों वाला, अंडवृद्धि (हर्निया) वाला, बड़े घुटनों वाला, आपस में टकराने वाले घुटनों वाला, लंबी पिंडलियों वाला, लाठी जैसी पिंडलियों वाला, टेढ़े-मेढ़े पैरों वाला, पीछे की ओर मुड़े हुए पैरों वाला, या उभरी हुई पिंडलियों वाला—वह दो प्रकार का होता है: नीचे की ओर लटकी हुई या ऊपर की ओर चढ़ी हुई बड़ी पिंडलियों के मांस से युक्त; अथवा बड़ी पिंडलियों वाला, स्थूल पिंडलियों वाला, बड़े पैरों वाला, बड़ी एड़ी वाला, या पैर के मध्य भाग से निकली हुई पिंडलियों वाला (पिठ्ठिकपाद), अथवा टेढ़े पैरों वाला—वह भी दो प्रकार का होता है: भीतर की ओर या बाहर की ओर मुड़े हुए पैरों वाला; अथवा अदरक की गांठ के समान गांठदार उंगलियों वाला, काले रंग के सड़े हुए नाखूनों वाला—यह सभी 'परिषद को दूषित करने वाले' (परिसदूसक) कहलाते हैं। इस प्रकार के परिषद को दूषित करने वाले व्यक्ति को प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। කාණොති පසන්නන්ධො වා හොතු පුප්ඵාදීහි වා උපහතපසාදො. යො ද්වීහි වා එකෙන වා අක්ඛිනා න පස්සති, සො න පබ්බාජෙතබ්බො. මහාපච්චරියං පන එකක්ඛිකාණො කාණොති වුත්තො, ද්විඅක්ඛිකාණො අන්ධෙන සඞ්ගහිතො. මහාඅට්ඨකථායං ජච්චන්ධො අන්ධොති වුත්තො, තස්මා උභයම්පි පරියායෙන යුජ්ජති. කුණීති හත්ථකුණී වා පාදකුණී වා අඞ්ගුලිකුණී වා; යස්ස එතෙසු හත්ථාදීසු යංකිඤ්චි වඞ්කං පඤ්ඤායති, සො කුණී නාම. ඛඤ්ජොති නතජාණුකො වා භින්නජඞ්ඝො වා මජ්ඣෙ සඞ්කුටිතපාදත්තා කුණ්ඩපාදකො වා පිට්ඨිපාදමජ්ඣෙන චඞ්කමන්තො අග්ගෙ සඞ්කුටිතපාදත්තා කුණ්ඩපාදකො වා පිට්ඨිපාදග්ගෙන චඞ්කමන්තො අග්ගපාදෙනෙව චඞ්කමනඛඤ්ජො වා පණ්හිකාය චඞ්කමනඛඤ්ජො වා පාදස්ස බාහිරන්තෙන චඞ්කමනඛඤ්ජො වා පාදස්ස අබ්භන්තරන්තෙන චඞ්කමනඛඤ්ජො වා ගොප්ඵකානං උපරි භග්ගත්තා සකලෙන පිට්ඨිපාදෙන චඞ්කමනඛඤ්ජො වා; සබ්බොපෙස ඛඤ්ජොයෙව, සො න පබ්බාජෙතබ්බො. 'काण' (काना) वह है जो चाहे स्वच्छ आँखों वाला अंधा हो या पीप आदि के कारण जिसकी दृष्टि नष्ट हो गई हो। जो दोनों आँखों से या एक आँख से नहीं देखता, उसे प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। 'महापच्चरी' में तो एक आँख से अंधे को 'काण' कहा गया है, और दोनों आँखों से अंधे को 'अंध' शब्द में सम्मिलित किया गया है। 'महाअट्ठकथा' में जन्म से अंधे को 'अंध' कहा गया है, इसलिए दोनों ही बातें पर्याय से उचित हैं। 'कुणि' का अर्थ है—हाथ से टेढ़ा, पैर से टेढ़ा या उंगलियों से टेढ़ा; जिसके इन हाथ आदि अंगों में से कोई भी अंग टेढ़ा दिखाई देता है, वह 'कुणि' कहलाता है। 'खञ्ज' (लंगड़ा) वह है जिसके घुटने झुके हुए हों, या जिसकी पिंडली की हड्डी टूटी हुई हो, या पैर के बीच में सिकुड़न होने के कारण जो पैर के ऊपरी मध्य भाग से चलता हो और 'कुण्डपादक' (विकलांग पैर वाला) हो, या पैर के अग्रभाग में सिकुड़न होने के कारण जो पैर के ऊपरी अग्रभाग से चलता हो और 'कुण्डपादक' हो, अथवा जो केवल पैर के अग्रभाग से ही लंगड़ाकर चलता हो, या एड़ी से लंगड़ाकर चलता हो, या पैर के बाहरी किनारे से लंगड़ाकर चलता हो, या पैर के भीतरी किनारे से लंगड़ाकर चलता हो, अथवा टखनों के ऊपर की हड्डी टूटने के कारण पूरे पैर के ऊपरी हिस्से से लंगड़ाकर चलता हो; यह सभी 'खञ्ज' ही हैं, इन्हें प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। පක්ඛහතොති [Pg.313] යස්ස එකො හත්ථො වා පාදො වා අඩ්ඪසරීරං වා සුඛං න වහති. ඡින්නිරියාපථොති පීඨසප්පි වුච්චති. ජරාදුබ්බලොති ජිණ්ණභාවෙන දුබ්බලො අත්තනො චීවරරජනාදිකම්මං කාතුම්පි අසමත්ථො. යො පන මහල්ලකොපි බලවා හොති, අත්තානං පටිජග්ගිතුං සක්කොති, සො පබ්බාජෙතබ්බො. අන්ධොති ජච්චන්ධො වුච්චති. මූගොති යස්ස වචීභෙදො නප්පවත්තති; යස්සාපි පවත්තති, සරණගමනං පන පරිපුණ්ණං භාසිතුං න සක්කොති, තාදිසං මම්මනම්පි පබ්බාජෙතුං න වට්ටති. යො පන සරණගමනමත්තං පරිපුණ්ණං භාසිතුං සක්කොති, තං පබ්බාජෙතුං වට්ටති. 'पक्षहत' (पक्षाघात/लकवाग्रस्त) वह है जिसका एक हाथ, एक पैर या आधा शरीर ठीक से काम नहीं करता। 'छिन्न-इरियापथ' उसे कहा जाता है जो पीढ़िया (स्टूल) के सहारे घिसटकर चलता है। 'जरा-दुर्बल' वह है जो बुढ़ापे के कारण इतना कमजोर हो गया हो कि अपने चीवर को रंगने आदि का कार्य भी करने में असमर्थ हो। लेकिन जो वृद्ध होने पर भी बलवान हो और अपनी देखभाल स्वयं कर सकता हो, उसे प्रव्रजित किया जा सकता है। जन्म से अंधे को 'अंध' कहा जाता है। 'मूक' (गूंगा) वह है जिसकी वाणी स्पष्ट नहीं होती; जिसकी वाणी स्पष्ट तो होती है, किंतु वह शरणागमन को पूर्ण रूप से बोलने में समर्थ नहीं है, ऐसे हकलाने वाले (मम्मन) को भी प्रव्रजित करना उचित नहीं है। परंतु जो कम से कम शरणागमन को पूर्ण रूप से बोल सकता है, उसे प्रव्रजित करना उचित है। බධිරොති යො සබ්බෙන සබ්බං න සුණාති. යො පන මහාසද්දං සුණාති, තං පබ්බාජෙතුං වට්ටති. අන්ධමූගාදයො උභයදොසවසෙන වුත්තා. යෙසඤ්ච පබ්බජ්ජා පටික්ඛිත්තා, උපසම්පදාපි තෙසං පටික්ඛිත්තාව. සචෙ පන තෙ සඞ්ඝො උපසම්පාදෙති, සබ්බෙපි හත්ථච්ඡින්නාදයො සූපසම්පන්නා, කාරකසඞ්ඝො පන ආචරියුපජ්ඣායා ච ආපත්තිතො න මුච්චන්ති. වක්ඛති ච – ‘‘අත්ථි භික්ඛවෙ පුග්ගලො අප්පත්තො ඔසාරණං, තඤ්චෙ සඞ්ඝො ඔසාරෙති, එකච්චො සුඔසාරිතො, එකච්චො දුඔසාරිතො’’ති තස්සත්ථො ආගතට්ඨානෙයෙව ආවි භවිස්සතීති. 'बधिर' (बहरा) वह है जो बिल्कुल भी नहीं सुनता। परंतु जो ऊँची आवाज सुन सकता है, उसे प्रव्रजित करना उचित है। 'अंध-मूक' आदि शब्दों का प्रयोग दोनों दोषों (अंधापन और गूंगापन) की प्रधानता के कारण किया गया है। और जिनकी प्रव्रज्या निषिद्ध है, उनकी उपसम्पदा भी निषिद्ध ही है। यदि संघ उन्हें उपसम्पदा दे देता है, तो हाथ-कटे आदि वे सभी व्यक्ति 'सु-उपसम्पन्न' (वैध रूप से उपसम्पन्न) तो हो जाते हैं, किंतु कर्म करने वाला संघ और आचार्य-उपाध्याय दुष्कृत (दुक्कट) आपत्ति से मुक्त नहीं होते। आगे कहा जाएगा—'हे भिक्षुओं, ऐसा पुद्गल होता है जो ओसारणा (पुनर्स्थापन) के योग्य नहीं होता, यदि संघ उसे ओसारित करता है, तो कोई सु-ओसारित होता है और कोई दु-ओसारित।' इसका अर्थ यथास्थान स्पष्ट होगा। හත්ථච්ඡින්නාදිවත්ථුකථා නිට්ඨිතා. हाथ-कटे आदि व्यक्तियों की कथा समाप्त हुई। අලජ්ජීනිස්සයවත්ථුකථා अलज्जी-निश्रय-वस्तु-कथा 120. අලජ්ජීනං නිස්සාය වසන්තීති උපයොගත්ථෙ සාමිවචනං; අලජ්ජිපුග්ගලෙ නිස්සාය වසන්තීති අත්ථො. යාව භික්ඛුසභාගතං ජානාමීති නිස්සයදායකස්ස භික්ඛුනො භික්ඛූහි සභාගතං ලජ්ජිභාවං යාව ජානාමීති අත්ථො. තස්මා නවං ඨානං ගතෙන ‘‘එහි භික්ඛු, නිස්සයං ගණ්හාහී’’ති වුච්චමානෙනාපි චතූහපඤ්චාහං නිස්සයදායකස්ස ලජ්ජිභාවං උපපරික්ඛිත්වා නිස්සයො ගහෙතබ්බො. १२०. 'अलज्जीनं निस्साय वसन्ति' यहाँ षष्ठी विभक्ति का प्रयोग द्वितीया (कर्म) के अर्थ में हुआ है; इसका अर्थ है—'अलज्जी व्यक्तियों के आश्रय में रहते हैं'। 'याव भिक्खुसभागतं जानामि' का अर्थ है—जब तक निश्रय देने वाले भिक्षु की अन्य भिक्षुओं के साथ समानता, अर्थात उसके 'लज्जी' (शीलवान) होने के स्वभाव को जान न लिया जाए। इसलिए नए स्थान पर गए हुए भिक्षु को, 'आओ भिक्षु, निश्रय ग्रहण करो' ऐसा कहे जाने पर भी, चार-पांच दिन तक निश्रय देने वाले के लज्जी-भाव की परीक्षा करके ही निश्रय ग्रहण करना चाहिए। සචෙ ‘‘ථෙරො ලජ්ජී’’ති භික්ඛූනං සන්තිකෙ සුත්වා ආගතදිවසෙයෙව ගහෙතුකාමො හොති, ථෙරො පන ‘‘ආගමෙහි තාව, වසන්තො ජානිස්සසී’’ති කතිපාහං ආචාරං උපපරික්ඛිත්වා නිස්සයං දෙති, වට්ටති. පකතියා නිස්සයග්ගහණට්ඨානං ගතෙන තදහෙව ගහෙතබ්බො, එකදිවසම්පි පරිහාරො [Pg.314] නත්ථි. සචෙ පඨමයාමෙ ආචරියස්ස ඔකාසො නත්ථි, ඔකාසං අලභන්තො ‘‘පච්චූසසමයෙ ගහෙස්සාමී’’ති සයති, අරුණං උග්ගතම්පි න ජානාති, අනාපත්ති. සචෙ පන ‘‘ගණ්හිස්සාමී’’ති ආභොගං අකත්වා සයති, අරුණුග්ගමනෙ දුක්කටං. අගතපුබ්බං ඨානං ගතෙන ද්වෙ තීණි දිවසානි වසිත්වා ගන්තුකාමෙන අනිස්සිතෙන වසිතබ්බං. ‘‘සත්තාහං වසිස්සාමී’’ති ආලයං කරොන්තෙන පන නිස්සයො ගහෙතබ්බො. සචෙ ථෙරො ‘‘කිං සත්තාහං වසන්තස්ස නිස්සයෙනා’’ති වදති, පටික්ඛිත්තකාලතො පට්ඨාය ලද්ධපරිහාරො හොති. यदि 'स्थविर लज्जी हैं' ऐसा अन्य भिक्षुओं से सुनकर आने के दिन ही निश्रय लेने की इच्छा हो, और स्थविर कहें कि 'अभी ठहरो, रहते हुए जान जाओगे' और कुछ दिन आचरण की परीक्षा करके निश्रय दें, तो यह उचित है। सामान्यतः निश्रय लेने के स्थान पर पहुँचे हुए भिक्षु को उसी दिन निश्रय ले लेना चाहिए, एक दिन की भी छूट नहीं है। यदि प्रथम याम में आचार्य को अवकाश न हो, और अवकाश न मिलने के कारण वह यह सोचकर सो जाए कि 'प्रातःकाल निश्रय लूँगा', और उसे अरुणोदय का पता न चले, तो अनापत्ति है। परंतु यदि 'निश्रय लूँगा' ऐसा संकल्प किए बिना सो जाता है, तो अरुणोदय होने पर दुष्कृत (दुक्कट) आपत्ति होती है। अपरिचित स्थान पर गए हुए भिक्षु को, यदि वह दो-तीन दिन रहकर जाना चाहता है, तो बिना निश्रय लिए रहा जा सकता है। परंतु 'सात दिन रहूँगा' ऐसा विचार कर रुकने वाले को निश्रय लेना ही चाहिए। यदि स्थविर कहें कि 'सात दिन रहने वाले को निश्रय से क्या लाभ?', तो उस निषेध के समय से ही उसे छूट (प़रिहार) मिल जाती है। අලජ්ජීනිස්සයවත්ථුකථා නිට්ඨිතා. अलज्जी-निश्रय-वस्तु-कथा समाप्त हुई। ගමිකාදිනිස්සයවත්ථුකථා गमिक-आदि-निश्रय-वस्तु-कथा 121. නිස්සයකරණීයොති කරණීයනිස්සයො, කරණීයො මයා නිස්සයො; ගහෙතබ්බොති අත්ථො. නිස්සයං අලභමානෙනාති අත්තනා සද්ධිං අද්ධානමග්ගප්පටිපන්නෙසු නිස්සයදායකෙ අසති නිස්සයං න ලභති නාම. එවං අලභන්තෙන අනිස්සිතෙන බහූනිපි දිවසානි ගන්තබ්බං. සචෙ පුබ්බෙපි නිස්සයං ගහෙත්වා වුත්ථපුබ්බං කඤ්චි ආවාසං පවිසති, එකරත්තං වසන්තෙනාපි නිස්සයො ගහෙතබ්බො. අන්තරාමග්ගෙ විස්සමන්තො වා සත්ථං පරියෙසන්තො වා කතිපාහං වසති, අනාපත්ති. අන්තොවස්සෙ පන නිබද්ධවාසං වසිතබ්බං, නිස්සයො ච ගහෙතබ්බො. නාවාය ගච්ඡන්තස්ස පන වස්සානෙ ආගතෙපි නිස්සයං අලභන්තස්ස අනාපත්ති. १२१. 'निस्यकरणीय' का अर्थ है कि निस्य (आश्रय) लेना चाहिए, अर्थात् मेरे द्वारा निस्य लिया जाना चाहिए; आश्रय ग्रहण करना चाहिए - यह अर्थ है। 'निस्य न मिलने पर' का अर्थ है कि स्वयं के साथ लंबी यात्रा पर जाने वालों में यदि निस्य देने वाला (आचार्य) न हो, तो उसे निस्य न मिलना कहते हैं। इस प्रकार निस्य न मिलने पर, बिना निस्य के भी कई दिनों तक यात्रा की जा सकती है। यदि पहले निस्य लेकर किसी ऐसे आवास में प्रवेश करता है जहाँ वह पहले रह चुका है, तो वहाँ एक रात रुकने पर भी निस्य लेना चाहिए। मार्ग के बीच में विश्राम करते हुए या किसी काफिले की खोज करते हुए यदि कुछ दिन रुकता है, तो आपत्ति नहीं होती। किन्तु वर्षावास के भीतर स्थायी निवास में रहना चाहिए और निस्य भी लेना चाहिए। नाव से यात्रा करने वाले भिक्षु के लिए वर्षा ऋतु आने पर भी यदि निस्य न मिले, तो आपत्ति नहीं होती। යාචියමානෙනාති තෙන ගිලානෙන යාචියමානෙන අනිස්සිතෙන වසිතබ්බං. සචෙ ‘‘යාචාහි ම’’න්ති වුච්චමානොපි ගිලානො මානෙන න යාචති, ගන්තබ්බං. 'याच्यमान' का अर्थ है कि उस बीमार भिक्षु द्वारा (रहने के लिए) प्रार्थना किए जाने पर, वह बिना निस्य के रह सकता है। यदि 'मुझसे प्रार्थना करो' ऐसा कहे जाने पर भी बीमार भिक्षु मान (अहंकार) के कारण प्रार्थना नहीं करता, तो उसे चले जाना चाहिए। ඵාසු හොතීති සමථවිපස්සනානං පටිලාභවසෙන ඵාසු හොති. ඉමඤ්හි පරිහාරං නෙව සොතාපන්නො න සකදාගාමී අනාගාමී අරහන්තො ලභන්ති; න ථාමගතස්ස සමාධිනො වා විපස්සනාය වා ලාභී, විස්සට්ඨකම්මට්ඨානෙ පන බාලපුථුජ්ජනෙ කථාව නත්ථි. යස්ස ඛො පන සමථො වා විපස්සනා වා තරුණො හොති, අයං ඉමං පරිහාරං ලභති, පවාරණසඞ්ගහොපි එතස්සෙව අනුඤ්ඤාතො. තස්මා ඉමිනා පුග්ගලෙන ආචරියෙ පවාරෙත්වා ගතෙපි ‘‘යදා පතිරූපො නිස්සයදායකො ආගච්ඡිස්සති, තස්ස නිස්සාය වසිස්සාමී’’ති ආභොගං කත්වා පුන යාව [Pg.315] ආසාළ්හීපුණ්ණමා, තාව අනිස්සිතෙන වත්ථුං වට්ටති. සචෙ පන ආසාළ්හීමාසෙ ආචරියො නාගච්ඡති, යත්ථ නිස්සයො ලබ්භති, තත්ථ ගන්තබ්බං. 'फासु होति' का अर्थ है कि शमथ और विपश्यना की प्राप्ति के कारण सुख होता है। यह छूट न तो स्रोतआपन्न को मिलती है, न सकृदागामी, अनागामी या अर्हतों को; न ही उसे जिसे सुदृढ़ समाधि या विपश्यना प्राप्त है। किन्तु जिसने कर्मस्थान (ध्यान) छोड़ दिया है, उस अज्ञानी पृथग्जन के विषय में तो कहना ही क्या (उसे यह छूट नहीं मिलती)। जिसकी शमथ या विपश्यना अभी 'तरुण' (कच्ची) है, उसे यह छूट मिलती है; प्रवारणा के बाद साथ रहने की अनुमति भी केवल इसी के लिए है। इसलिए, इस व्यक्ति द्वारा आचार्य के चले जाने पर भी 'जब कोई उपयुक्त निस्यदाता आएगा, मैं उसके आश्रय में रहूँगा' ऐसा संकल्प करके पुनः आषाढ़ी पूर्णिमा तक बिना निस्य के रहना कल्प्य है। किन्तु यदि आषाढ़ मास में आचार्य नहीं आते, तो जहाँ निस्य प्राप्त हो सके, वहाँ चले जाना चाहिए। 122. ගොත්තෙනපි අනුස්සාවෙතුන්ති මහාකස්සපස්ස උපසම්පදාපෙක්ඛොති එවං ගොත්තං වත්වා අනුස්සාවෙතුං අනුජානාමීති අත්ථො. १२२. 'गोत्र से भी सूचित करना' का अर्थ है 'महाकश्यप का उपसंपदा-अपेक्षी' इस प्रकार गोत्र कहकर सूचित करने की अनुमति देता हूँ - यह अर्थ है। 123. ද්වෙ එකානුස්සාවනෙති ද්වෙ එකතො අනුස්සාවනෙ; එකෙන එකස්ස අඤ්ඤෙන ඉතරස්සාති එවං ද්වීහි වා ආචරියෙහි එකෙන වා එකක්ඛණෙ කම්මවාචං අනුස්සාවෙන්තෙහි උපසම්පාදෙතුං අනුජානාමීති අත්ථො. १२३. 'दो एक ही अनुसावन में' का अर्थ है दो (उम्मीदवारों) को एक साथ अनुसावन (घोषणा) में; एक के लिए एक (आचार्य) द्वारा और दूसरे के लिए दूसरे द्वारा, इस प्रकार दो आचार्यों द्वारा या एक ही आचार्य द्वारा एक ही क्षण में कर्मवाच्य का पाठ करते हुए उपसंपदा देने की अनुमति देता हूँ - यह अर्थ है। ද්වෙ තයො එකානුස්සාවනෙ කාතුං තඤ්ච ඛො එකෙන උපජ්ඣායෙනාති ද්වෙ වා තයො වා ජනෙ පුරිමනයෙනෙව එකතො අනුස්සාවනෙ කාතුං අනුජානාමි; තඤ්ච ඛො අනුස්සාවනකිරියං එකෙන උපජ්ඣායෙන අනුජානාමීති අත්ථො. තස්මා එකෙන ආචරියෙන ද්වෙ වා තයො වා අනුස්සාවෙතබ්බා. ද්වීහි වා තීහි වා ආචරියෙහි විසුං විසුං එකෙන එකස්සාති එවං එකප්පහාරෙනෙව ද්වෙ තිස්සො වා කම්මවාචා කාතබ්බා. සචෙ පන නානාචරියා නානුපජ්ඣායා හොන්ති, තිස්සත්ථෙරො සුමනත්ථෙරස්ස සද්ධිවිහාරිකං, සුමනත්ථෙරො තිස්සත්ථෙරස්ස සද්ධිවිහාරිකං අනුස්සාවෙති, අඤ්ඤමඤ්ඤඤ්ච ගණපූරකා හොන්ති, වට්ටති. සචෙ පන නානාඋපජ්ඣායා හොන්ති, එකො ආචරියො හොති, ‘‘නත්වෙව නානුපජ්ඣායෙනා’’ති පටික්ඛිත්තත්තා න වට්ටති. ඉදං සන්ධාය හි එස පටික්ඛෙපො. 'दो या तीन को एक ही अनुसावन में करना और वह भी एक ही उपाध्याय के साथ' का अर्थ है कि पूर्व विधि के अनुसार ही दो या तीन व्यक्तियों को एक साथ अनुसावन में करने की अनुमति देता हूँ; और वह अनुसावन की क्रिया एक ही उपाध्याय के अधीन हो - यह अर्थ है। इसलिए एक आचार्य द्वारा दो या तीन को अनुसावन कराया जा सकता है। अथवा दो या तीन आचार्यों द्वारा अलग-अलग, एक के लिए एक, इस प्रकार एक ही समय में दो या तीन कर्मवाच्य किए जाने चाहिए। किन्तु यदि अलग-अलग आचार्य और अलग-अलग उपाध्याय हों, जैसे तिस्स स्थविर सुमन स्थविर के सार्धविहारिक को और सुमन स्थविर तिस्स स्थविर के सार्धविहारिक को अनुसावन कराते हैं, और वे एक-दूसरे के गण-पूरक होते हैं, तो यह कल्प्य है। किन्तु यदि उपाध्याय अलग-अलग हों और आचार्य एक ही हो, तो 'अलग-अलग उपाध्याय होने पर नहीं' इस निषेध के कारण यह कल्प्य नहीं है। इसी संदर्भ में यह निषेध किया गया है। ගමිකාදිනිස්සයවත්ථුකථා නිට්ඨිතා. गमिक (यात्री) आदि के निस्य की कथा समाप्त हुई। උපසම්පදාවිධිකථා उपसंपदा विधि की कथा 126. පඨමං උපජ්ඣං ගාහාපෙතබ්බොති එත්ථ වජ්ජාවජ්ජං උපනිජ්ඣායතීති උපජ්ඣා, තං උපජ්ඣං; ‘‘උපජ්ඣායො මෙ භන්තෙ හොහී’’ති එවං වදාපෙත්වා ගාහාපෙතබ්බො. විත්ථායන්තීති විත්ථද්ධගත්තා හොන්ති. යං ජාතන්ති යං තව සරීරෙ ජාතං නිබ්බත්තං විජ්ජමානං, තං සඞ්ඝමජ්ඣෙ පුච්ඡන්තෙ සන්තං අත්ථීති වත්තබ්බන්තිආදි. උල්ලුම්පතු මන්ති උද්ධරතු මං. १२६. 'पहले उपाध्याय ग्रहण कराना चाहिए' यहाँ जो दोष और अदोष का सूक्ष्म निरीक्षण करता है, वह 'उपाध्याय' है। 'भन्ते, आप मेरे उपाध्याय बनें' ऐसा कहलाकर उस उपाध्याय को ग्रहण कराना चाहिए। 'वित्थायन्ति' का अर्थ है शरीर का जकड़ जाना। 'यं जातं' का अर्थ है जो तुम्हारे शरीर में उत्पन्न हुआ है, विद्यमान है, उसे संघ के बीच पूछे जाने पर 'है' ऐसा कहना चाहिए आदि। 'उल्लुम्पतु मं' का अर्थ है मेरा उद्धार करें। උපසම්පදාවිධිකථා නිට්ඨිතා. उपसंपदा विधि की कथा समाप्त हुई। චත්තාරොනිස්සයාදිකථා चार निस्य आदि की कथा 128. තාවදෙවාති [Pg.316] උපසම්පන්නසමනන්තරමෙව. ඡායා මෙතබ්බාති එකපොරිසා වා ද්විපොරිසා වාති ඡායා මෙතබ්බා. උතුප්පමාණං ආචික්ඛිතබ්බන්ති ‘‘වස්සානො හෙමන්තො ගිම්හො’’ති එවං උතුප්පමාණං ආචික්ඛිතබ්බං. එත්ථ ච උතුයෙව උතුප්පමාණං. සචෙ වස්සානාදයො අපරිපුණ්ණා හොන්ති, යත්තකෙහි දිවසෙහි යස්ස යො උතු අපරිපුණ්ණො, තෙ දිවසෙ සල්ලක්ඛෙත්වා සො දිවසභාගො ආචික්ඛිතබ්බො. අථ වා ‘‘අයං නාම උතු, සො ච ඛො පරිපුණ්ණො වා අපරිපුණ්ණො වා’’ති එවං උතුප්පමාණං ආචික්ඛිතබ්බං. ‘‘පුබ්බණ්හො වා සායන්හො වා’’ති එවං දිවසභාගො ආචික්ඛිතබ්බො. සඞ්ගීතීති ඉදමෙව සබ්බං එකතො කත්වා ‘‘ත්වං කිං ලභසි, කා තෙ ඡායා, කිං උතුප්පමාණං, කො දිවසභාගො’’ති පුට්ඨො ‘‘ඉදං නාම ලභාමි – වස්සං වා හෙමන්තං වා ගිම්හං වා, අයං මෙ ඡායා, ඉදං උතුප්පමාණං, අයං දිවසභාගොති වදෙය්යාසී’’ති එවං ආචික්ඛිතබ්බං. १२८. 'तावेव' का अर्थ है उपसंपन्न होने के तुरंत बाद। 'छाया मापनी चाहिए' का अर्थ है एक पुरुष या दो पुरुष के बराबर छाया मापनी चाहिए। 'ऋतु का प्रमाण बताना चाहिए' का अर्थ है 'वर्षा, हेमंत, ग्रीष्म' इस प्रकार ऋतु का प्रमाण बताना चाहिए। यहाँ ऋतु ही ऋतु-प्रमाण है। यदि वर्षा आदि ऋतुएँ अपूर्ण हों, तो जितने दिनों से जो ऋतु अपूर्ण है, उन दिनों को लक्षित कर वह दिन का भाग बताना चाहिए। अथवा 'यह अमुक ऋतु है, और वह पूर्ण है या अपूर्ण' इस प्रकार ऋतु-प्रमाण बताना चाहिए। 'पूर्वाह्न है या अपराह्न' इस प्रकार दिन का भाग बताना चाहिए। 'संगीति' का अर्थ है इन सबको एक साथ करके—'तुम्हें क्या (ऋतु) मिली, तुम्हारी छाया क्या है, ऋतु-प्रमाण क्या है, दिन का भाग क्या है?' ऐसा पूछे जाने पर 'मुझे यह ऋतु मिली—वर्षा या हेमंत या ग्रीष्म, यह मेरी छाया है, यह ऋतु-प्रमाण है, यह दिन का भाग है' ऐसा कहना चाहिए, यह बताना चाहिए। 129. ඔහායාති ඡඩ්ඩෙත්වා. දුතියං දාතුන්ති උපසම්පදමාළකතො පරිවෙණං ගච්ඡන්තස්ස දුතියකං දාතුං අනුජානාමි, චත්තාරි ච අකරණීයානි ආචික්ඛිතුන්ති අත්ථො. පණ්ඩුපලාසොති පණ්ඩුවණ්ණො පත්තො. බන්ධනා පවුත්තොති වණ්ටතො පතිතො. අභබ්බො හරිතත්ථායාති පුන හරිතො භවිතුං අභබ්බො. පුථුසිලාති මහාසිලා. १२९. 'ओहाय' का अर्थ है छोड़कर। 'दूसरा देने के लिए' का अर्थ है उपसंपदा मालक (मंडप) से विहार की ओर जाने वाले के लिए दूसरा साथी देने की और चार अकरणीय (न करने योग्य कार्य) बताने की अनुमति देता हूँ - यह अर्थ है। 'पाण्डुपलास' का अर्थ है पीले रंग का पत्ता। 'बन्धना पवुत्तो' का अर्थ है डंठल से गिरा हुआ। 'अभब्बो हरितत्थाय' का अर्थ है पुनः हरा होने में असमर्थ। 'पुथुसिला' का अर्थ है बड़ी शिला। 130. අලබ්භමානාය සාමග්ගියා අනාපත්ති සම්භොගෙ සංවාසෙති යාව තස්ස උක්ඛෙපනීයකම්මකරණත්ථාය සාමග්ගී න ලබ්භති, තාව තෙන සද්ධිං සම්භොගෙ ච උපොසථපවාරණාදිකරණභෙදෙ සංවාසෙ ච අනාපත්තීති. සෙසං සබ්බත්ථ මහාවිභඞ්ගෙ වුත්තානුසාරෙන සුවිඤ්ඤෙය්යත්තා පාකටමෙවාති. १३०. जब तक उस (उत्क्षेपणीय कर्म के योग्य) भिक्षु के विरुद्ध उत्क्षेपणीय कर्म करने के लिए संघ की एकता (सामग्री) प्राप्त नहीं होती, तब तक उसके साथ उपभोग (आमिष सम्भोग) और संवास (उपोसथ, पवारणा आदि कर्मों) में कोई आपत्ति नहीं होती। शेष सभी स्थानों पर महाविभंग में बताए गए अनुसार सुविज्ञ होने के कारण स्पष्ट ही है। චත්තාරොනිස්සයාදිකථා නිට්ඨිතා. चार निश्रय आदि की कथा समाप्त हुई। සමන්තපාසාදිකාය විනයසංවණ්ණනාය समन्तपासादिका नामक विनय-अट्ठकथा में। ද්වාසත්තතිඅධිකවත්ථුසතපටිමණ්ඩිතස්ස මහාඛන්ධකස්ස एक सौ बहत्तर (172) वस्तुओं से अलंकृत महाखन्धक की। අත්ථවණ්ණනා නිට්ඨිතා. अर्थ-वर्णना (व्याख्या) समाप्त हुई। මහාඛන්ධකවණ්ණනා නිට්ඨිතා. महाखन्धक-वर्णना समाप्त हुई। 2. උපොසථක්ඛන්ධකං २. उपोसथखन्धक සන්නිපාතානුජානනාදිකථා सन्निपात (सभा) की अनुज्ञा आदि की कथा 132. උපොසථක්ඛන්ධකෙ [Pg.317] – අඤ්ඤතිත්ථියාති එත්ථ තිත්ථං වුච්චති ලද්ධි; අඤ්ඤං තිත්ථං අඤ්ඤතිත්ථං; අඤ්ඤතිත්ථං එතෙසං අත්ථීති අඤ්ඤතිත්ථියා; ඉතො අඤ්ඤලද්ධිකාති වුත්තං හොති. ධම්මං භාසන්තීති යං තෙසං කත්තබ්බාකත්තබ්බං, තං කථෙන්ති. තෙ ලභන්තීති තෙ මනුස්සා ලභන්ති. මූගසූකරාති ථූලසරීරසූකරා. १३२. उपोसथखन्धक में— 'अञ्ञतित्थिया' (अन्यतीर्थिक) यहाँ 'तित्थ' का अर्थ 'लब्धि' (मत/सिद्धांत) कहा गया है; अन्य मत ही 'अञ्ञतित्थ' है; जिनका यह अन्य मत है, वे 'अञ्ञतित्थिया' हैं; इसका अर्थ है 'इस (शासन) से भिन्न मत वाले'। 'धम्मं भासन्ति' का अर्थ है कि वे उनके लिए जो करणीय और अकरणीय है, उसे कहते हैं। 'ते लभन्ति' का अर्थ है कि वे मनुष्य प्राप्त करते हैं। 'मूगसूकरा' का अर्थ है स्थूल शरीर वाले सूअर। 135. අනජ්ඣාපන්නො වා හොති ආපජ්ජිත්වා වා වුට්ඨිතොති එත්ථ යං ආපත්තිං භික්ඛු අනජ්ඣාපන්නො වා හොති, ආපජ්ජිත්වා වා වුට්ඨිතො, අයං අසන්තී නාම ආපත්තීති එවමත්ථො වෙදිතබ්බො. සම්පජානමුසාවාදෙ කිං හොතීති ය්වායං සම්පජානමුසාවාදො අස්ස හොතීති වුත්තො, සො ආපත්තිතො කිං හොති, කතරා ආපත්ති හොතීති අත්ථො. දුක්කටං හොතීති දුක්කටාපත්ති හොති; සා ච ඛො න මුසාවාදලක්ඛණෙන; භගවතො පන වචනෙන වචීද්වාරෙ අකිරියසමුට්ඨානා ආපත්ති හොතීති වෙදිතබ්බා. වක්ඛති හි – १३५. 'अनज्झापन्नो वा होति आपज्जित्वा वा वुट्ठितो' यहाँ जिस आपत्ति को भिक्षु ने प्राप्त नहीं किया है, या प्राप्त करके उससे निकल गया है, वह 'असन्ती' नामक आपत्ति है—ऐसा अर्थ समझना चाहिए। 'सम्पजानमुसावादे किं होति' का अर्थ है कि जो यह सम्प्रजान-मृषावाद कहा गया है, वह आपत्ति की दृष्टि से क्या है, कौन सी आपत्ति है? 'दुक्कटं होति' का अर्थ है कि दुष्कृत आपत्ति होती है; और वह मृषावाद के लक्षण के कारण नहीं, बल्कि भगवान के वचन के अनुसार वचन-द्वार में 'अक्रिया-समुत्थान' (न बोलने रूपी क्रिया) से होने वाली आपत्ति है, ऐसा समझना चाहिए। क्योंकि आगे कहेंगे— ‘‘අනාලපන්තො මනුජෙන කෙනචි,වාචාගිරං නො ච පරෙ භණෙය්ය; ආපජ්ජෙය්ය වාචසිකං න කායිකං,පඤ්හා මෙසා කුසලෙහි චින්තිතා’’ති. (පරි. 479); "जो किसी मनुष्य के साथ बातचीत नहीं करता, और दूसरों के प्रति वाणी का उच्चारण नहीं करता; वह वाचिक आपत्ति को प्राप्त होता है, कायिक को नहीं—यह प्रश्न कुशल (विद्वानों) द्वारा विचारित है।" අන්තරායිකොති අන්තරායකරො. කිස්ස ඵාසු හොතීති කිමත්ථාය ඵාසු හොති. පඨමස්ස ඣානස්ස අධිගමායාති පඨමස්ස ඣානස්ස අධිගමනත්ථාය තස්ස භික්ඛුනො ඵාසු හොති සුඛං හොති. එස නයො සබ්බත්ථ. ඉති භගවා උද්දෙසතො ච නිද්දෙසතො ච පඨමං පාතිමොක්ඛුද්දෙසං දස්සෙසි. 'अन्तरायिको' का अर्थ है अन्तराय (बाधा) करने वाला। 'किस्स फासु होति' का अर्थ है किस प्रयोजन के लिए सुखकारी होता है? 'पठमस्स झानस्स अधिगमाया' का अर्थ है प्रथम ध्यान की प्राप्ति के लिए उस भिक्षु को सुख (सुगमता) होती है। यही नियम सर्वत्र (द्वितीय ध्यान आदि में) है। इस प्रकार भगवान ने संक्षेप (उद्देश) और विस्तार (निर्देश) से पहले पातिमोक्ख-उद्देश को दिखाया। 136. දෙවසිකන්ති දිවසෙ දිවසෙ. චාතුද්දසෙ වා පන්නරසෙ වාති එකස්ස උතුනො තතියෙ ච සත්තමෙ ච පක්ඛෙ ද්වික්ඛත්තුං චාතුද්දසෙ අවසෙසෙ ඡක්ඛත්තුං පන්නරසෙ; අයං තාව එකො අත්ථො. අයං පන පකතිචාරිත්තවසෙන [Pg.318] වුත්තො ‘‘සකිං පක්ඛස්ස චාතුද්දසෙ වා පන්නරසෙ වා’’ති වචනතො පන තථාරූපෙ පච්චයෙ සති යස්මිං තස්මිං චාතුද්දසෙ වා පන්නරසෙ වා උද්දිසිතුං වට්ටති, ආවාසිකානං භික්ඛූනං චාතුද්දසො හොති, ආගන්තුකානං පන්නරසො. සචෙ ආවාසිකා බහුතරා හොන්ති, ආගන්තුකෙහි ආවාසිකානං අනුවත්තිතබ්බ’’න්ති වචනතොපි චෙතං වෙදිතබ්බං. १३६. 'देवसिकं' का अर्थ है प्रतिदिन। 'चातुद्दसे वा पन्नरसे वा' का अर्थ है एक ऋतु के तीसरे और सातवें पक्ष में दो बार चतुर्दशी को, और शेष छह बार पूर्णिमा (पञ्चदशी) को; यह एक अर्थ है। यह सामान्य आचरण (प्रकृति-चारित्र) के वश से कहा गया है। 'पक्ष में एक बार चतुर्दशी या पूर्णिमा को' इस वचन के कारण, वैसा कारण होने पर किसी भी चतुर्दशी या पूर्णिमा को पाठ करना कल्पता है। 'आवासिक भिक्षुओं के लिए चतुर्दशी है, आगन्तुकों के लिए पूर्णिमा। यदि आवासिक अधिक हों, तो आगन्तुकों को आवासिकों के अनुसार चलना चाहिए'—इस वचन से भी यह जानना चाहिए। සීමානුජානනකථා सीमा की अनुज्ञा की कथा 138. පඨමං නිමිත්තා කිත්තෙතබ්බාති විනයධරෙන පුච්ඡිතබ්බං ‘‘පුරත්ථිමාය දිසාය කිං නිමිත්ත’’න්ති? පබ්බතො භන්තෙති. පුන විනයධරෙන ‘‘එසො පබ්බතො නිමිත්ත’’න්ති එවං නිමිත්තං කිත්තෙතබ්බං. ‘‘එතං පබ්බතං නිමිත්තං කරොම, කරිස්සාම, නිමිත්තං කතො, නිමිත්තං හොතු, හොති භවිස්සතී’’ති එවං පන කිත්තෙතුං න වට්ටති. පාසාණාදීසුපි එසෙව නයො. පුරත්ථිමාය අනුදිසාය, දක්ඛිණාය දිසාය, දක්ඛිණාය අනුදිසාය, පච්ඡිමාය දිසාය, පච්ඡිමාය අනුදිසාය, උත්තරාය දිසාය, උත්තරාය අනුදිසාය, කිං නිමිත්තං? උදකං භන්තෙ. එතං උදකං නිමිත්තන්ති එත්ථ පන අට්ඨත්වා පුන පුරත්ථිමාය දිසාය කිං නිමිත්තං. පබ්බතො භන්තෙ. එසො පබ්බතො නිමිත්තන්ති එවං පඨමං කිත්තිතනිමිත්තං කිත්තෙත්වාව ඨපෙතබ්බං. එවඤ්හි නිමිත්තෙන නිමිත්තං ඝටිතං හොති. එවං නිමිත්තානි කිත්තෙත්වා අථානන්තරං වුත්තාය කම්මවාචාය සීමා සම්මන්නිතබ්බා. කම්මවාචාපරියොසානෙ නිමිත්තානං අන්තො සීමා හොති, නිමිත්තානි සීමතො බහි හොන්ති. තත්ථ නිමිත්තානි සකිං කිත්තිතානිපි කිත්තිතානෙව හොන්ති. අන්ධකට්ඨකථායං පන තික්ඛත්තුං සීමමණ්ඩලං සම්බන්ධන්තෙන නිමිත්තං කිත්තෙතබ්බන්ති වුත්තං. ‘‘පබ්බතො භන්තෙති…පෙ… උදකං භන්තෙ’’ති එවං පන උපසම්පන්නො වා ආචික්ඛතු අනුපසම්පන්නො වා වට්ටතියෙව. १३८. 'पहले निमित्तों की घोषणा करनी चाहिए'—विनयधर द्वारा पूछा जाना चाहिए 'पूर्व दिशा में क्या निमित्त है?' 'भन्ते! पर्वत है।' फिर विनयधर द्वारा 'यह पर्वत निमित्त है'—इस प्रकार निमित्त की घोषणा करनी चाहिए। 'इस पर्वत को निमित्त बनाते हैं, बनाएंगे, निमित्त बनाया गया है, निमित्त हो, होता है, होगा'—इस प्रकार घोषणा करना उचित नहीं है। पाषाण आदि (अन्य निमित्तों) में भी यही नियम है। पूर्व की अनुदिशा (कोण), दक्षिण दिशा, दक्षिण की अनुदिशा, पश्चिम दिशा, पश्चिम की अनुदिशा, उत्तर दिशा, उत्तर की अनुदिशा में 'क्या निमित्त है?' 'भन्ते! जल है।' 'यह जल निमित्त है'—यहाँ न रुककर फिर से 'पूर्व दिशा में क्या निमित्त है? भन्ते! पर्वत है। यह पर्वत निमित्त है'—इस प्रकार पहले घोषित निमित्त को फिर से घोषित करके ही रुकना चाहिए। क्योंकि इस प्रकार निमित्त से निमित्त जुड़ जाता है। इस प्रकार निमित्तों की घोषणा करके उसके बाद कही गई कर्मवाचा द्वारा सीमा सम्मत (निर्धारित) करनी चाहिए। कर्मवाचा की समाप्ति पर निमित्तों के भीतर सीमा होती है, और निमित्त सीमा से बाहर होते हैं। वहाँ निमित्त एक बार घोषित होने पर भी घोषित ही माने जाते हैं। किन्तु अन्धक-अट्ठकथा में कहा गया है कि सीमा-मण्डल को जोड़ते हुए तीन बार निमित्त की घोषणा करनी चाहिए। 'भन्ते! पर्वत है... आदि... भन्ते! जल है'—इस प्रकार चाहे उपसम्पन्न (भिक्षु) बताए या अनुपसम्पन्न (श्रामणेर/गृहस्थ), यह उचित ही है। ඉදානි පබ්බතනිමිත්තාදීසු එවං විනිච්ඡයො වෙදිතබ්බො – තිවිධො පබ්බතො, සුද්ධපංසුපබ්බතො, සුද්ධපාසාණපබ්බතො, උභයමිස්සකොති. සො තිවිධොපි වට්ටති. වාලිකරාසි පන න වට්ටති. ඉතරොපි හත්ථිප්පමාණතො ඔමකතරො න වට්ටති. හත්ථිප්පමාණතො පන පට්ඨාය සිනෙරුප්පමාණොපි වට්ටති. සචෙ චතූසු දිසාසු චත්තාරො තීසු වා තයො පබ්බතා හොන්ති, චතූහි වා තීහි වා පබ්බතනිමිත්තෙහි එව සම්මන්නිතුං වට්ටති. ද්වීහි පන නිමිත්තෙහි එකෙන [Pg.319] වා සම්මන්නිතුං න වට්ටති. ඉතො පරෙසු පාසාණනිමිත්තාදීසුපි එසෙව නයො. තස්මා පබ්බතනිමිත්තං කරොන්තෙන පුච්ඡිතබ්බං ‘‘එකාබද්ධො න එකාබද්ධො’’ති. සචෙ එකාබද්ධො හොති, න කාතබ්බො. තඤ්හි චතූසු වා අට්ඨසු වා දිසාසු කිත්තෙන්තෙනාපි එකමෙව නිමිත්තං කිත්තිතං හොති, තස්මා යො එවං චක්කසණ්ඨානෙන විහාරං පරික්ඛිපිත්වා ඨිතො පබ්බතො, තං එකදිසාය කිත්තෙත්වා අඤ්ඤාසු දිසාසු තං බහිද්ධා කත්වා අන්තො අඤ්ඤානි නිමිත්තානි කිත්තෙතබ්බානි. अब पर्वत-निमित्त आदि के विषय में यह विनिश्चय समझना चाहिए - पर्वत तीन प्रकार के होते हैं: शुद्ध मिट्टी का पर्वत, शुद्ध पाषाण (पत्थर) का पर्वत और दोनों का मिश्रित पर्वत। ये तीनों प्रकार के पर्वत निमित्त के रूप में मान्य हैं। किन्तु बालू का ढेर मान्य नहीं है। अन्य मिट्टी आदि के पर्वत भी यदि हाथी के परिमाण से छोटे हों, तो मान्य नहीं हैं। हाथी के परिमाण से लेकर सुमेरु पर्वत के परिमाण तक का पर्वत मान्य है। यदि चारों दिशाओं में चार या तीन दिशाओं में तीन पर्वत हों, तो चार या तीन पर्वत-निमित्तों द्वारा सीमा सम्मत करना कल्प्य है। किन्तु दो निमित्तों या एक निमित्त से सम्मत करना कल्प्य नहीं है। इसके बाद आने वाले पाषाण-निमित्त आदि में भी यही नियम है। इसलिए पर्वत-निमित्त बनाते समय यह पूछना चाहिए - "क्या यह पर्वत एक-बद्ध (जुड़ा हुआ) है या नहीं?" यदि वह एक-बद्ध है, तो उसे अनेक निमित्त नहीं बनाना चाहिए। क्योंकि उसे चार या आठ दिशाओं में घोषित करने पर भी वह एक ही निमित्त घोषित होता है। इसलिए जो पर्वत चक्र के आकार में विहार को घेर कर स्थित हो, उसे एक दिशा में घोषित करके, अन्य दिशाओं में उसे बाहर रखते हुए भीतर अन्य निमित्तों की घोषणा करनी चाहिए। සචෙ පබ්බතස්ස තතියභාගං වා උපඩ්ඪං වා අන්තොසීමාය කත්තුකාමා හොන්ති, පබ්බතං අකිත්තෙත්වා යත්තකං පදෙසං අන්තො කත්තුකාමා, තස්ස පරතො තස්මිංයෙව පබ්බතෙ ජාතරුක්ඛවම්මිකාදීසු අඤ්ඤතරං නිමිත්තං කිත්තෙතබ්බං. සචෙ එකයොජනද්වියොජනප්පමාණං සබ්බං පබ්බතං අන්තො කත්තුකාමා හොන්ති, පබ්බතස්ස පරතො භූමියං ජාතරුක්ඛවම්මිකාදීනි නිමිත්තානි කිත්තෙතබ්බානි. यदि पर्वत के तीसरे भाग या आधे भाग को सीमा के भीतर करना चाहते हों, तो पर्वत को निमित्त के रूप में घोषित न करके, जितने प्रदेश को भीतर करना चाहते हैं, उसके आगे उसी पर्वत पर स्थित वृक्ष या दीमक की बांबी (वम्मीक) आदि में से किसी एक को निमित्त घोषित करना चाहिए। यदि एक योजन या दो योजन परिमाण वाले सम्पूर्ण पर्वत को भीतर करना चाहते हों, तो पर्वत के आगे भूमि पर स्थित वृक्ष, वम्मीक आदि निमित्तों की घोषणा करनी चाहिए। පාසාණනිමිත්තෙ – අයගුළොපි පාසාණසඞ්ඛ්යමෙව ගච්ඡති, තස්මා යො කොචි පාසාණො වට්ටති. පමාණතො පන හත්ථිප්පමාණො පබ්බතසඞ්ඛ්යං ගතො, තස්මා සො න වට්ටති. මහාගොණමහාමහිංසප්පමාණො පන වට්ටති. හෙට්ඨිමපරිච්ඡෙදෙන ද්වත්තිංසපලගුළපිණ්ඩපරිමාණො වට්ටති. තතො ඛුද්දකතරො ඉට්ඨකා වා මහන්තීපි න වට්ටති. අනිමිත්තුපගපාසාණරාසිපි න වට්ටති, පගෙව පංසුවාලිකරාසි. භූමිසමො ඛලමණ්ඩලසදිසො පිට්ඨිපාසාණො වා භූමිතො ඛාණුකො විය උට්ඨිතපාසාණො වා හොති, සොපි පමාණුපගො චෙ වට්ටති. පිට්ඨිපාසාණො අතිමහන්තොපි පාසාණසඞ්ඛ්යමෙව ගච්ඡති, තස්මා සචෙ මහතො පිට්ඨිපාසාණස්ස එකප්පදෙසං අන්තොසීමාය කත්තුකාමා හොන්ති, තං අකිත්තෙත්වා තස්සුපරි අඤ්ඤො පාසාණො කිත්තෙතබ්බො. සචෙ පිට්ඨිපාසාණුපරි විහාරං කරොන්ති, විහාරමජ්ඣෙන වා පිට්ඨිපාසාණො විනිවිජ්ඣිත්වා ගච්ඡති, එවරූපො පිට්ඨිපාසාණො න වට්ටති. සචෙ හි තං කිත්තෙන්ති, නිමිත්තස්ස උපරි විහාරො හොති, නිමිත්තඤ්ච නාම බහිසීමාය හොති, විහාරොපි බහිසීමායං ආපජ්ජති. විහාරං පරික්ඛිපිත්වා ඨිතපිට්ඨිපාසාණො එකත්ථ කිත්තෙත්වා අඤ්ඤත්ථ න කිත්තෙතබ්බො. पाषाण-निमित्त में - लोहे का गोला भी पाषाण की श्रेणी में ही आता है, इसलिए कोई भी पाषाण मान्य है। परिमाण की दृष्टि से, हाथी के समान बड़ा पाषाण 'पर्वत' की श्रेणी में आ जाता है, इसलिए वह मान्य नहीं है। किन्तु बड़े बैल या बड़े भैंसे के परिमाण वाला पाषाण मान्य है। न्यूनतम सीमा के रूप में बत्तीस पल के गुड़ के पिण्ड के परिमाण वाला पाषाण मान्य है। उससे छोटा पाषाण या बड़ी ईंट भी मान्य नहीं है। निमित्त के अयोग्य पत्थरों का ढेर भी मान्य नहीं है, और मिट्टी या बालू का ढेर तो पहले से ही अमान्य है। भूमि के समान, खलिहान के मण्डल जैसा समतल पाषाण (शिलाखण्ड) हो या भूमि से खूँटे की तरह निकला हुआ पाषाण हो, वह भी यदि परिमाण के अनुरूप हो तो मान्य है। विशाल शिलाखण्ड (पिट्ठिपासाण) बहुत बड़ा होने पर भी पाषाण की श्रेणी में ही आता है, इसलिए यदि उस बड़े शिलाखण्ड के एक भाग को सीमा के भीतर करना चाहते हों, तो उसे घोषित न करके उसके ऊपर स्थित किसी अन्य पाषाण को घोषित करना चाहिए। यदि शिलाखण्ड के ऊपर विहार बनाते हैं, या विहार के मध्य से शिलाखण्ड आर-पार निकलता है, तो ऐसा शिलाखण्ड मान्य नहीं है। क्योंकि यदि उसे घोषित करते हैं, तो निमित्त के ऊपर विहार हो जाता है, जबकि निमित्त सीमा के बाहर होना चाहिए, और विहार भी बहिःसीमा में आ जाता है। विहार को घेर कर स्थित शिलाखण्ड को एक स्थान पर घोषित करके अन्य स्थान पर घोषित नहीं करना चाहिए। වනනිමිත්තෙ – තිණවනං වා තචසාරතාලනාළිකෙරාදිරුක්ඛවනං වා න වට්ටති. අන්තොසාරානං පන සාකසාලාදීනං අන්තොසාරමිස්සකානං වා රුක්ඛානං [Pg.320] වනං වට්ටති, තඤ්ච ඛො හෙට්ඨිමපරිච්ඡෙදෙන චතුපඤ්චරුක්ඛමත්තම්පි තතො ඔරං න වට්ටති, පරං යොජනසතිකම්පි වට්ටති. සචෙ පන වනමජ්ඣෙ විහාරං කරොන්ති, වනං න කිත්තෙතබ්බං. එකදෙසං අන්තොසීමාය කත්තුකාමෙහිපි වනං අකිත්තෙත්වා තත්ථ රුක්ඛපාසාණාදයො කිත්තෙතබ්බා. විහාරං පරික්ඛිපිත්වා ඨිතවනං එකත්ථ කිත්තෙත්වා අඤ්ඤත්ථ න කිත්තෙතබ්බං. वन-निमित्त में - घास का वन या छाल-सार वाले ताड़, नारियल आदि वृक्षों का वन मान्य नहीं है। किन्तु अन्तःसार वाले सागौन, साल आदि वृक्षों का वन या अन्तःसार-मिश्रित वृक्षों का वन मान्य है। वह भी न्यूनतम सीमा के रूप में कम से कम चार-पांच वृक्षों का होना चाहिए, उससे कम मान्य नहीं है; अधिकतम सौ योजन तक का वन भी मान्य है। यदि वन के मध्य में विहार बनाते हैं, तो वन को निमित्त घोषित नहीं करना चाहिए। वन के एक भाग को सीमा के भीतर करने की इच्छा रखने वालों को भी वन को घोषित न करके वहाँ स्थित वृक्ष, पाषाण आदि को घोषित करना चाहिए। विहार को घेर कर स्थित वन को एक स्थान पर घोषित करके अन्य स्थान पर घोषित नहीं करना चाहिए। රුක්ඛනිමිත්තෙ – තචසාරො තාලනාළිකෙරාදිරුක්ඛො න වට්ටති, අන්තොසාරො ජීවමානකො අන්තමසො උබ්බෙධතො අට්ඨඞ්ගුලො පරිණාහතො සූචිදණ්ඩකප්පමාණොපි වට්ටති, තතො ඔරං න වට්ටති, පරං ද්වාදසයොජනො සුප්පතිට්ඨිතනිග්රොධොපි වට්ටති. වංසනළකසරාවාදීසු බීජං රොපෙත්වා වඩ්ඪාපිතො පමාණුපගොපි න වට්ටති. තතො අපනෙත්වා පන තඞ්ඛණම්පි භූමියං රොපෙත්වා කොට්ඨකං කත්වා උදකං ආසිඤ්චිත්වා කිත්තෙතුං වට්ටති. නවමූලසාඛානිග්ගමනං අකාරණං. ඛන්ධං ඡින්දිත්වා රොපිතෙ පන එතං යුජ්ජති. කිත්තෙන්තෙන ච ‘‘රුක්ඛො’’තිපි වත්තුං වට්ටති, ‘‘සාකරුක්ඛොතිපි සාලරුක්ඛො’’තිපි. එකාබද්ධං පන සුප්පතිට්ඨිතනිග්රොධසදිසං එකත්ථ කිත්තෙත්වා අඤ්ඤත්ථ කිත්තෙතුං න වට්ටති. वृक्ष-निमित्त में - छाल-सार वाला ताड़, नारियल आदि का वृक्ष मान्य नहीं है। अन्तःसार वाला जीवित वृक्ष, जो कम से कम ऊँचाई में आठ अंगुल और मोटाई में सुई की शलाका (सूचिदण्डक) के परिमाण वाला हो, वह भी मान्य है। उससे छोटा मान्य नहीं है; अधिकतम बारह योजन वाला सुप्रतिष्ठित न्यग्रोध (बरगद) भी मान्य है। बाँस, नल या सराव (मिट्टी के पात्र) आदि में बीज बोकर उगाया गया वृक्ष, परिमाण के अनुरूप होने पर भी मान्य नहीं है। किन्तु उसे वहाँ से हटाकर, सीमा-सम्मत करते समय भूमि में रोपकर, थावला (कोट्टक) बनाकर और जल सींचकर निमित्त घोषित करना कल्प्य है। नई जड़ों या शाखाओं का निकलना अनिवार्य कारण नहीं है। किन्तु तने को काटकर रोपे गए वृक्ष के मामले में यह उचित है। घोषणा करते समय "वृक्ष" भी कहा जा सकता है, और "सागौन का वृक्ष" या "साल का वृक्ष" भी कहा जा सकता है। किन्तु एक-बद्ध (जुड़ा हुआ) सुप्रतिष्ठित बरगद जैसे वृक्ष को एक स्थान पर घोषित करके अन्य स्थान पर घोषित करना कल्प्य नहीं है। මග්ගනිමිත්තෙ – අරඤ්ඤඛෙත්තනදීතළාකමග්ගාදයො න වට්ටන්ති, ජඞ්ඝමග්ගො වා සකටමග්ගො වා වට්ටති, යො නිබ්බිජ්ඣිත්වා ද්වෙ තීණි ගාමන්තරානි ගච්ඡති. යො පන ජඞ්ඝමග්ගො සකටමග්ගතො ඔක්කමිත්වා පුන සකටමග්ගමෙව ඔතරති, යෙ වා ජඞ්ඝමග්ගසකටමග්ගා අවළඤ්ජා, තෙ න වට්ටන්ති. ජඞ්ඝසත්ථසකටසත්ථෙහි වළඤ්ජියමානායෙව වට්ටන්ති. සචෙ ද්වෙ මග්ගා නික්ඛමිත්වා පච්ඡා සකටධුරමිව එකීභවන්ති, ද්විධා භින්නට්ඨානෙ වා සම්බන්ධට්ඨානෙ වා සකිං කිත්තෙත්වා පුන න කිත්තෙතබ්බා, එකාබද්ධනිමිත්තඤ්හෙතං හොති. मार्ग-निमित्त में - जंगल, खेत, नदी या तालाब के मार्ग आदि मान्य नहीं हैं। पैदल मार्ग (जंघमग्ग) या छकड़ा मार्ग (सकटमग्ग) मान्य है, जो दो या तीन गाँवों के बीच तक जाता हो। किन्तु जो पैदल मार्ग छकड़ा मार्ग से अलग होकर पुनः छकड़ा मार्ग में ही मिल जाता है, या जो पैदल मार्ग और छकड़ा मार्ग उपयोग में नहीं हैं, वे मान्य नहीं हैं। पैदल यात्रियों के समूह या छकड़ा-काफिलों द्वारा उपयोग किए जा रहे मार्ग ही मान्य हैं। यदि दो मार्ग निकलकर बाद में छकड़े के जुए (सकटधुर) की तरह एक हो जाते हैं, तो दो भागों में विभक्त स्थान पर या जुड़ने के स्थान पर एक बार घोषित करके पुनः घोषित नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह एक-बद्ध निमित्त होता है। සචෙ විහාරං පරික්ඛිපිත්වා චත්තාරො මග්ගා චතූසු දිසාසු ගච්ඡන්ති, මජ්ඣෙ එකං කිත්තෙත්වා අපරං කිත්තෙතුං න වට්ටති. එකාබද්ධනිමිත්තඤ්හෙතං හොති. කොණං නිබ්බිජ්ඣිත්වා ගතමග්ගං පන පරභාගෙ කිත්තෙතුං වට්ටති. විහාරමජ්ඣෙන නිබ්බිජ්ඣිත්වා ගතමග්ගො පන න කිත්තෙතබ්බො. කිත්තිතෙ නිමිත්තස්ස උපරි විහාරො හොති. සචෙ සකටමග්ගස්ස අන්තිමචක්කමග්ගං නිමිත්තං කරොන්ති, මග්ගො බහිසීමාය හොති. සචෙ බාහිරචක්කමග්ගං නිමිත්තං කරොන්ති, බාහිරචක්කමග්ගොව බහිසීමාය හොති, සෙසං අන්තොසීමං භජති. මග්ගං [Pg.321] කිත්තෙන්තෙන ‘‘මග්ගො පන්ථො පථො පජ්ජො’’ති දසසු යෙන කෙනචි නාමෙන කිත්තෙතුං වට්ටති. පරිඛාසණ්ඨානෙන විහාරං පරික්ඛිපිත්වා ගතමග්ගො එකත්ථ කිත්තෙත්වා අඤ්ඤත්ථ කිත්තෙතුං න වට්ටති. यदि विहार को घेरते हुए चार दिशाओं में चार मार्ग जाते हैं, तो मध्य में एक का कीर्तन (घोषणा) करके दूसरे का कीर्तन करना उचित नहीं है। क्योंकि यह एक ही निरंतर निमित्त (एकबद्धनिमित्त) है। यदि कोई मार्ग कोने को काटकर बाहर की ओर जाता है, तो उसे बाहरी भाग में कीर्तन करना उचित है। किन्तु विहार के मध्य से होकर जाने वाले मार्ग का कीर्तन नहीं करना चाहिए। यदि कीर्तन किया जाता है, तो विहार निमित्त के ऊपर हो जाता है। यदि बैलगाड़ी के मार्ग के भीतरी पहिये के मार्ग को निमित्त बनाते हैं, तो पूरा मार्ग सीमा के बाहर होता है। यदि बाहरी पहिये के मार्ग को निमित्त बनाते हैं, तो केवल बाहरी पहिये का मार्ग ही सीमा के बाहर होता है, शेष भाग सीमा के भीतर आता है। मार्ग का कीर्तन करते समय 'मग्गो, पन्थो, पथो, पज्जो' आदि दस नामों में से किसी भी नाम से कीर्तन करना उचित है। खाई के आकार में विहार को घेरकर जाने वाले मार्ग को एक स्थान पर कीर्तन करके दूसरे स्थान पर कीर्तन करना उचित नहीं है। වම්මිකනිමිත්තෙ – හෙට්ඨිමපරිච්ඡෙදෙන තං දිවසං ජාතො අට්ඨඞ්ගුලුබ්බෙධො ගොවිසාණප්පමාණොපි වම්මිකො වට්ටති, තතො ඔරං න වට්ටති, පරං හිමවන්තපබ්බතසදිසොපි වට්ටති. විහාරං පරික්ඛිපිත්වා ඨිතං පන එකාබද්ධං එකත්ථ කිත්තෙත්වා අඤ්ඤත්ථ කිත්තෙතුං න වට්ටති. बाँबी (वम्मीक) के निमित्त के विषय में - न्यूनतम सीमा के रूप में, उस दिन उत्पन्न हुई आठ अंगुल ऊँची, बैल के सींग के परिमाण वाली बाँबी भी उचित है; उससे छोटी उचित नहीं है, उससे बड़ी हिमालय पर्वत के समान भी उचित है। किन्तु विहार को घेरकर स्थित एक ही निरंतर (एकबद्ध) बाँबी को एक स्थान पर कीर्तन करके दूसरे स्थान पर कीर्तन करना उचित नहीं है। නදීනිමිත්තෙ – යස්සා ධම්මිකානං රාජූනං කාලෙ අන්වද්ධමාසං අනුදසාහං අනුපඤ්චාහන්ති එවං අනතික්කමිත්වා දෙවෙ වස්සන්තෙ වලාහකෙසු විගතමත්තෙසු සොතං පච්ඡිජ්ජති, අයං නදීසඞ්ඛ්යං න ගච්ඡති. යස්සා පන ඊදිසෙ සුවුට්ඨිකාලෙ වස්සානස්ස චාතුමාසෙ සොතං න පච්ඡිජ්ජති, තිමණ්ඩලං පටිච්ඡාදෙත්වා යත්ථ කත්ථචි උත්තරන්තියා භික්ඛුනියා අන්තරවාසකො තෙමියති, අයං නදීසඞ්ඛ්යං ගච්ඡති, සීමං බන්ධන්තානං නිමිත්තං හොති. භික්ඛුනියා නදීපාරගමනෙපි උපොසථාදිසඞ්ඝකම්මකරණෙපි නදීපාරසීමසම්මන්නනෙපි අයමෙව නදී. नदी के निमित्त के विषय में - जिस नदी का प्रवाह, धार्मिक राजाओं के काल में हर पखवाड़े, हर दस दिन या हर पाँच दिन में वर्षा होने पर भी, बादलों के छँटते ही रुक जाता है, वह 'नदी' की श्रेणी में नहीं आती। किन्तु जिस नदी का प्रवाह ऐसी अच्छी वर्षा के समय वर्षा ऋतु के चार महीनों में नहीं रुकता, और जिसे किसी भी स्थान से पार करते समय (घुटनों और नाभि मण्डल को ढँकने वाली) भिक्षुणी का अन्तर्वासक भीग जाता है, वह 'नदी' की श्रेणी में आती है और सीमा बाँधने वालों के लिए निमित्त होती है। भिक्षुणी के नदी पार जाने में, उपोसथ आदि संघ-कर्म करने में और नदी के पार सीमा निर्धारण करने में भी यही 'नदी' मानी जाती है। යා පන මග්ගො විය සකටධුරසණ්ඨානෙන වා පරිඛාසණ්ඨානෙන වා විහාරං පරික්ඛිපිත්වා ගතා, තං එකත්ථ කිත්තෙත්වා අඤ්ඤත්ථ කිත්තෙතුං න වට්ටති. විහාරස්ස චතූසු දිසාසු අඤ්ඤමඤ්ඤං විනිබ්බිජ්ඣිත්වා ගතෙ නදිචතුක්කෙපි එසෙව නයො. අසම්මිස්සනදියො පන චතස්සොපි කිත්තෙතුං වට්ටති. සචෙ වතිං කරොන්තො විය රුක්ඛපාදෙ නිඛණිත්වා වල්ලිපලාලාදීහි නදිසොතං රුම්භන්ති, උදකඤ්ච අජ්ඣොත්ථරිත්වා ආවරණං පවත්තතියෙව, නිමිත්තං කාතුං වට්ටති. යථා පන උදකං නප්පවත්තති, එවං සෙතුම්හි කතෙ අප්පවත්තමානා නදී නිමිත්තං කාතුං න වට්ටති. පවත්තනට්ඨානෙ නදිනිමිත්තං, අප්පවත්තනට්ඨානෙ උදකනිමිත්තං කාතුං වට්ටති. जो नदी मार्ग की भाँति, बैलगाड़ी के जुए के आकार में या खाई के आकार में विहार को घेरकर बहती है, उसे एक स्थान पर कीर्तन करके दूसरे स्थान पर कीर्तन करना उचित नहीं है। विहार की चारों दिशाओं में एक-दूसरे को काटती हुई जाने वाली चार नदियों के समूह के विषय में भी यही नियम है। किन्तु आपस में न मिलने वाली (पृथक) चारों नदियों का कीर्तन करना उचित है। यदि बाड़ बनाने के समान लकड़ी के खूँटे गाड़कर और लताओं एवं पुआल आदि से नदी के प्रवाह को रोक दिया जाए, और फिर भी जल उस अवरोध के ऊपर से होकर बहता ही रहे, तो उसे निमित्त बनाना उचित है। किन्तु जिस प्रकार जल न बहे, उस प्रकार बाँध बना देने पर, न बहने वाली नदी को निमित्त बनाना उचित नहीं है। जहाँ जल बहता है वहाँ 'नदी-निमित्त' और जहाँ जल नहीं बहता वहाँ 'जल-निमित्त' कहना उचित है। යා පන දුබ්බුට්ඨිකාලෙ වා ගිම්හෙ වා නිරුදකභාවෙන නප්පවත්තති, සා වට්ටති. මහානදිතො උදකමාතිකං නීහරන්ති, සා කුන්නදිසදිසා හුත්වා තීණි සස්සානි සම්පාදෙන්තී නිච්චං පවත්තති, කිඤ්චාපි පවත්තති, නිමිත්තං කාතුං න වට්ටති. යා පන මූලෙ මහානදිතො නිග්ගතාපි කාලන්තරෙන තෙනෙව නිග්ගතමග්ගෙන [Pg.322] නදිං භින්දිත්වා සයඤ්ච ගච්ඡති, ගච්ඡන්තී පරතො සුසුමාරාදිසමාකිණ්ණා නාවාදීහි සඤ්චරිතබ්බා නදී හොති, තං නිමිත්තං කාතුං වට්ටති. जो नदी अल्प वर्षा के समय या ग्रीष्म ऋतु में जल के अभाव के कारण नहीं बहती, वह भी (निमित्त के रूप में) उचित है। बड़ी नदी से जो जल-नहर निकाली जाती है, वह छोटी नदी के समान होकर तीन फसलों को सींचती हुई निरंतर बहती रहती है, फिर भी उसे निमित्त बनाना उचित नहीं है। किन्तु जो नहर मूल रूप से बड़ी नदी से निकली हो, पर कालांतर में उसी निकास मार्ग से नदी के तट को तोड़कर स्वयं बहने लगे, और आगे चलकर मगरमच्छों आदि से युक्त तथा नौकाओं आदि के चलने योग्य नदी बन जाए, उसे निमित्त बनाना उचित है। උදකනිමිත්තෙ – නිරුදකෙ ඨානෙ නාවාය වා චාටිආදීසු වා උදකං පූරෙත්වා උදකනිමිත්තං කිත්තෙතුං න වට්ටති, භූමිගතමෙව වට්ටති. තඤ්ච ඛො අප්පවත්තනඋදකං ආවාටපොක්ඛරණිතළාකජාතස්සරලොණිසමුද්දාදීසු ඨිතං, අට්ඨිතං පන ඔඝනදිඋදකවාහකමාතිකාදීසු උදකං න වට්ටති. අන්ධකට්ඨකථායං පන ‘‘ගම්භීරෙසු ආවාටාදීසු උක්ඛෙපිමං උදකං නිමිත්තං න කාතබ්බ’’න්ති වුත්තං, තං දුවුත්තං අත්තනොමතිමත්තමෙව. ඨිතං පන අන්තමසො සූකරඛතායපි ගාමදාරකානං කීළනවාපියම්පි තඞ්ඛණඤ්ඤෙව පථවියං ආවාටකං කත්වා කුටෙහි ආහරිත්වා පූරිතඋදකම්පි සචෙ යාව කම්මවාචාපරියොසානා තිට්ඨති, අප්පං වා හොතු බහු වා, වට්ටති. තස්මිං පන ඨානෙ නිමිත්තසඤ්ඤාකරණත්ථං පාසාණවාලිකාපංසුආදිරාසි වා පාසාණත්ථම්භො වා දාරුත්ථම්භො වා කාතබ්බො. තං කාතුඤ්ච කාරෙතුඤ්ච භික්ඛුස්ස වට්ටති. ලාභසීමායං පන න වට්ටති. සමානසංවාසකසීමා කස්සචි පීළනං න කරොති, කෙවලං භික්ඛූනං විනයකම්මමෙව සාධෙති, තස්මා එත්ථ වට්ටති. जल के निमित्त के विषय में - जलरहित स्थान पर नौका में या घड़ों आदि में जल भरकर उसे 'जल-निमित्त' के रूप में कीर्तन करना उचित नहीं है, केवल भूमिगत जल ही उचित है। वह भी गड्ढों, पुष्करिणियों (पोखरों), तालाबों, प्राकृतिक झीलों, खारे समुद्र आदि में स्थित न बहने वाला जल होना चाहिए; बाढ़ की नदी या जल ले जाने वाली नहरों आदि का अस्थिर जल उचित नहीं है। अन्धक-अट्ठकथा में कहा गया है कि "गहरे कुओं आदि से निकालकर रखे गए जल को निमित्त नहीं बनाना चाहिए", वह कथन अनुचित है और केवल लेखक का अपना मत मात्र है। स्थिर जल, चाहे वह सुअर द्वारा खोदे गए गड्ढे में हो या गाँव के बच्चों के खेलने के तालाब में हो, अथवा उसी क्षण भूमि में गड्ढा खोदकर घड़ों से लाकर भरा गया जल ही क्यों न हो, यदि वह कर्मवाचा की समाप्ति तक बना रहता है, तो चाहे वह थोड़ा हो या बहुत, उचित है। उस स्थान पर निमित्त की पहचान के लिए पत्थर, बालू या मिट्टी आदि का ढेर, अथवा पत्थर का खंभा या लकड़ी का खंभा लगाना चाहिए। उसे स्वयं बनाना या दूसरों से बनवाना भिक्षु के लिए उचित है। किन्तु लाभ-सीमा (लाभांश की सीमा) में ऐसा करना उचित नहीं है। समान-संवासक सीमा किसी को पीड़ा नहीं पहुँचाती, वह केवल भिक्षुओं के विनय-कर्म को सिद्ध करती है, इसलिए यहाँ (ऐसा करना) उचित है। ඉමෙහි ච අට්ඨහි නිමිත්තෙහි අසම්මිස්සෙහිපි අඤ්ඤමඤ්ඤං සම්මිස්සෙහිපි සීමං සම්මන්නිතුං වට්ටතියෙව. සා එවං සම්මන්නිත්වා බජ්ඣමානා එකෙන ද්වීහි වා නිමිත්තෙහි අබද්ධා හොති, තීණි පන ආදිං කත්වා වුත්තප්පකාරානං නිමිත්තානං සතෙනාපි බද්ධා හොති. සා තීහි සිඞ්ඝාටකසණ්ඨානා හොති, චතූහි චතුරස්සා වා සිඞ්ඝාටකඅඩ්ඪචන්දමුදිඞ්ගාදිසණ්ඨානා වා, තතො අධිකෙහි නානාසණ්ඨානා. තං බන්ධිතුකාමෙහි සාමන්තවිහාරෙසු භික්ඛූ තස්ස තස්ස විහාරස්ස සීමාපරිච්ඡෙදං පුච්ඡිත්වා, බද්ධසීමවිහාරානං සීමාය සීමන්තරිකං, අබද්ධසීමවිහාරානං සීමාය උපචාරං ඨපෙත්වා දිසාචාරිකභික්ඛූනං නිස්සඤ්චාරසමයෙ සචෙ එකස්මිං ගාමඛෙත්තෙ සීමං බන්ධිතුකාමා, යෙ තත්ථ බද්ධසීමවිහාරා, තෙසු භික්ඛූනං ‘‘මයං අජ්ජ සීමං බන්ධිස්සාම, තුම්හෙ සකසීමාපරිච්ඡෙදතො මා නික්ඛමිත්ථා’’ති පෙසෙතබ්බං. යෙ අබද්ධසීමවිහාරා, තෙසු භික්ඛූ එකජ්ඣං සන්නිපාතෙතබ්බා, ඡන්දාරහානං ඡන්දො ආහරාපෙතබ්බො. සචෙ අඤ්ඤානිපි ගාමක්ඛෙත්තානි අන්තොකාතුකාමා[Pg.323], තෙසු ගාමෙසු යෙ භික්ඛූ වසන්ති, තෙහිපි ආගන්තබ්බං. අනාගච්ඡන්තානං ඡන්දො ආහරිතබ්බොති මහාසුමත්ථෙරො ආහ. මහාපදුමත්ථෙරො පන ‘‘නානාගාමඛෙත්තානි නාම පාටෙක්කං බද්ධසීමාසදිසානි, න තතො ඡන්දපාරිසුද්ධි ආගච්ඡති. අන්තොනිමිත්තගතෙහි පන භික්ඛූහි ආගන්තබ්බ’’න්ති වත්වා පුන ආහ – ‘‘සමානසංවාසකසීමාසම්මන්නනකාලෙ ආගමනම්පි අනාගමනම්පි වට්ටති. අවිප්පවාසසීමාසම්මන්නනකාලෙ පන අන්තොනිමිත්තගතෙහි ආගන්තබ්බං, අනාගච්ඡන්තානං ඡන්දො ආහරිතබ්බො’’ති. इन आठ प्रकार के निमित्तों (चिह्नों) के द्वारा, चाहे वे अमिश्रित हों या एक-दूसरे के साथ मिश्रित, सीमा का निर्धारण करना निश्चित रूप से उचित है। इस प्रकार निर्धारित की जाने वाली वह सीमा एक या दो निमित्तों से नहीं बांधी जा सकती; बल्कि तीन से लेकर सौ निमित्तों तक से बांधी जा सकती है। तीन निमित्तों से वह त्रिकोणीय (शृंगाटक) आकार की होती है, चार से वह चौकोर या अर्धचन्द्राकार या मृदंग आदि के आकार की होती है, और उससे अधिक निमित्तों से वह विभिन्न आकारों की होती है। सीमा बांधने की इच्छा रखने वालों को समीपवर्ती विहारों के भिक्षुओं से उन-उन विहारों की सीमा-मर्यादा पूछकर, बद्ध-सीमा वाले विहारों की सीमा के बीच का अंतराल (सीमन्तरिक) और अबद्ध-सीमा वाले विहारों की सीमा का उपचार (Buffer zone) छोड़कर, जब भिक्षुओं का आवागमन न हो रहा हो, तब यदि वे एक गाँव के क्षेत्र में सीमा बांधना चाहते हैं, तो वहाँ जो बद्ध-सीमा वाले विहार हैं, उनमें भिक्षुओं को यह संदेश भेजना चाहिए कि "हम आज सीमा बांधेंगे, आप अपनी सीमा की मर्यादा से बाहर न निकलें।" जो अबद्ध-सीमा वाले विहार हैं, वहाँ के भिक्षुओं को एक स्थान पर एकत्रित करना चाहिए और जो आने में असमर्थ हैं उनका छंद (सहमति) मँगाना चाहिए। यदि अन्य गाँव के क्षेत्रों को भी सीमा के भीतर करना चाहते हैं, तो उन गाँवों में रहने वाले भिक्षुओं को भी आना चाहिए; न आने वालों का छंद मँगाना चाहिए - ऐसा महासुमत स्थविर ने कहा है। महापदुम स्थविर ने कहा है कि "विभिन्न गाँव के क्षेत्र अलग-अलग बद्ध-सीमा के समान ही होते हैं, अतः वहाँ से छंद-पारिशुद्धि की आवश्यकता नहीं होती। किन्तु निमित्तों के भीतर स्थित भिक्षुओं को अवश्य आना चाहिए।" उन्होंने पुनः कहा - "समान-संवासक सीमा के निर्धारण के समय आना या न आना दोनों उचित है, किन्तु अविप्रवास सीमा के निर्धारण के समय निमित्तों के भीतर रहने वालों को आना चाहिए और न आने वालों का छंद मँगाना चाहिए।" එවං සන්නිපතිතෙසු පන භික්ඛූසු ඡන්දාරහානං ඡන්දෙ ආහටෙ තෙසු තෙසු මග්ගෙසු නදීතිත්ථගාමද්වාරාදීසු ච ආගන්තුකභික්ඛූනං සීඝං සීඝං හත්ථපාසානයනත්ථඤ්ච බහිසීමාකරණත්ථඤ්ච ආරාමිකෙ චෙව සමණුද්දෙසෙ ච ඨපෙත්වා භෙරිසඤ්ඤං වා සඞ්ඛසඤ්ඤං වා කත්වා නිමිත්තකිත්තනානන්තරං වුත්තාය ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො’’තිආදිකාය කම්මවාචාය සීමා බන්ධිතබ්බා. කම්මවාචාපරියොසානෙයෙව නිමිත්තානි බහි කත්වා හෙට්ඨා පථවිසන්ධාරකං උදකං පරියන්තං කත්වා සීමා ගතා හොති. इस प्रकार भिक्षुओं के एकत्रित होने पर और छंद के योग्य भिक्षुओं का छंद प्राप्त हो जाने पर, उन-उन मार्गों, नदी-घाटों और गाँव के द्वारों आदि पर नवागंतुक भिक्षुओं को शीघ्रता से हस्तपास में लाने के लिए या उन्हें सीमा से बाहर रखने के लिए आरामिकों (विहार-सेवकों) और श्रामणेरों को नियुक्त कर, भेरी या शंख का संकेत करके, निमित्तों की घोषणा के तुरंत बाद "सुणातु मे भन्ते सङ्घो" आदि कर्मवाचा के द्वारा सीमा बांधी जानी चाहिए। कर्मवाचा की समाप्ति पर ही, निमित्तों को बाहर रखते हुए और नीचे पृथ्वी को धारण करने वाले जल को सीमा मानकर सीमा स्थापित हो जाती है। ඉමං පන සමානසංවාසකසීමං සම්මන්නන්තෙහි පබ්බජ්ජුපසම්පදාදීනං සඞ්ඝකම්මානං සුඛකරණත්ථං පඨමං ඛණ්ඩසීමා බන්ධිතබ්බා. තං පන බන්ධන්තෙහි වත්තං ජානිතබ්බං. සචෙ හි බොධිචෙතියභත්තසාලාදීනි සබ්බවත්ථූනි පතිට්ඨාපෙත්වා කතවිහාරෙ බන්ධන්ති, විහාරමජ්ඣෙ බහූනං සමොසරණට්ඨානෙ අබන්ධිත්වා විහාරපච්චන්තෙ විවිත්තොකාසෙ බන්ධිතබ්බා. අකතවිහාරෙ බන්ධන්තෙහි බොධිචෙතියාදීනං සබ්බවත්ථූනං ඨානං සල්ලක්ඛෙත්වා යථා පතිට්ඨිතෙසු වත්ථූසු විහාරපච්චන්තෙ විවිත්තොකාසෙ හොති, එවං බන්ධිතබ්බා. සා හෙට්ඨිමපරිච්ඡෙදෙන සචෙ එකවීසති භික්ඛූ ගණ්හාති, වට්ටති. තතො ඔරං න වට්ටති, පරං භික්ඛුසහස්සං ගණ්හන්තීපි වට්ටති. තං බන්ධන්තෙහි සීමාමාළකස්ස සමන්තා නිමිත්තුපගා පාසාණා ඨපෙතබ්බා, න ඛණ්ඩසීමාය ඨිතෙහි මහාසීමා බන්ධිතබ්බා, න මහාසීමාය ඨිතෙහි ඛණ්ඩසීමා, ඛණ්ඩසීමායමෙව පන ඨත්වා ඛණ්ඩසීමා බන්ධිතබ්බා, මහාසීමායමෙව ඨත්වා මහාසීමා. इस समान-संवासक सीमा का निर्धारण करते समय, प्रव्रज्या और उपसंपदा आदि संघ-कर्मों की सुगमता के लिए पहले खण्ड-सीमा बांधी जानी चाहिए। उसे बांधते समय परंपरा को जानना चाहिए। यदि बोधि-वृक्ष, चैत्य, भोजन-शाला आदि सभी वस्तुओं की स्थापना के बाद बने हुए विहार में सीमा बांधते हैं, तो विहार के मध्य में जहाँ बहुत से भिक्षु एकत्रित होते हैं, वहाँ न बांधकर विहार के एक कोने में एकांत स्थान पर बांधनी चाहिए। यदि विहार अभी नहीं बना है, तो बोधि-वृक्ष, चैत्य आदि सभी वस्तुओं के स्थानों को चिह्नित कर इस प्रकार बांधना चाहिए कि उन वस्तुओं की स्थापना के बाद सीमा विहार के अंत में एकांत स्थान पर रहे। यदि वह खण्ड-सीमा न्यूनतम इक्कीस भिक्षुओं को समाहित कर सकती है, तो वह उचित है। उससे कम के लिए उचित नहीं है; उससे अधिक एक हजार भिक्षुओं को समाहित करने वाली भी उचित है। उसे बांधते समय सीमा-मालक के चारों ओर निमित्त के योग्य पत्थर रखने चाहिए। खण्ड-सीमा में स्थित होकर महा-सीमा नहीं बांधनी चाहिए और न ही महा-सीमा में स्थित होकर खण्ड-सीमा बांधनी चाहिए। खण्ड-सीमा में ही स्थित होकर खण्ड-सीमा बांधनी चाहिए और महा-सीमा में ही स्थित होकर महा-सीमा बांधनी चाहिए। තත්රායං බන්ධනවිධි – සමන්තා ‘‘එසො පාසාණො නිමිත්ත’’න්ති එවං නිමිත්තානි කිත්තෙත්වා කම්මවාචාය සීමා සම්මන්නිතබ්බා. අථ තස්සා එව දළ්හීකම්මත්ථං අවිප්පවාසකම්මවාචා කාතබ්බා. එවඤ්හි සීමං සමූහනිස්සාමාති ආගතා [Pg.324] සමූහනිතුං න සක්ඛිස්සන්ති. සීමං සම්මන්නිත්වා බහිසීමන්තරිකපාසාණා ඨපෙතබ්බා. සීමන්තරිකා පච්ඡිමකොටියා එකරතනප්පමාණා වට්ටති. විදත්ථිප්පමාණාපි වට්ටතීති කුරුන්දියං, චතුරඞ්ගුලප්පමාණාපි වට්ටතීති මහාපච්චරියං වුත්තං. සචෙ පන විහාරො මහා හොති, ද්වෙපි තිස්සොපි තතුත්තරිපි ඛණ්ඩසීමායො බන්ධිතබ්බා. वहाँ सीमा बांधने की विधि यह है - चारों ओर "यह पत्थर निमित्त है" इस प्रकार निमित्तों की घोषणा करके कर्मवाचा के द्वारा सीमा निर्धारित करनी चाहिए। उसके बाद, उसी सीमा को सुदृढ़ करने के लिए अविप्रवास-कर्मवाचा करनी चाहिए। ऐसा करने पर "हम सीमा को हटा देंगे" इस विचार से आए हुए विरोधी उसे हटाने में समर्थ नहीं होंगे। सीमा निर्धारित करने के बाद सीमा के बाहर सीमन्तरिक के पत्थर रखने चाहिए। सीमन्तरिक न्यूनतम एक हाथ (रतन) प्रमाण की होनी चाहिए। कुरुन्दी अट्ठकथा में कहा गया है कि एक बित्ता (विदत्थि) प्रमाण की भी उचित है, और महापच्चरी में कहा गया है कि चार अंगुल प्रमाण की भी उचित है। यदि विहार बड़ा हो, तो दो, तीन या उससे भी अधिक खण्ड-सीमाएँ बांधी जा सकती हैं। එවං ඛණ්ඩසීමං සම්මන්නිත්වා මහාසීමාසම්මුතිකාලෙ ඛණ්ඩසීමතො නික්ඛමිත්වා මහාසීමාය ඨත්වා සමන්තා අනුපරියායන්තෙහි සීමන්තරිකපාසාණා කිත්තෙතබ්බා. තතො අවසෙසනිමිත්තානි කිත්තෙත්වා හත්ථපාසං අවිජහන්තෙහි කම්මවාචාය සමානසංවාසකසීමං සම්මන්නිත්වා තස්සා දළ්හීකම්මත්ථං අවිප්පවාසකම්මවාචාපි කාතබ්බා. එවඤ්හි ‘‘සීමං සමූහනිස්සාමා’’ති ආගතා සමූහනිතුං න සක්ඛිස්සන්ති. සචෙ පන ඛණ්ඩසීමාය නිමිත්තානි කිත්තෙත්වා තතො සීමන්තරිකාය නිමිත්තානි කිත්තෙත්වා මහාසීමාය නිමිත්තානි කිත්තෙන්ති, එවං තීසු ඨානෙසු නිමිත්තානි කිත්තෙත්වා යං සීමං ඉච්ඡන්ති, තං පඨමං බන්ධිතුං වට්ටති. එවං සන්තෙපි යථාවුත්තෙනයෙන ඛණ්ඩසීමතොව පට්ඨාය බන්ධිතබ්බා. එවං බද්ධාසු පන සීමාසු ඛණ්ඩසීමාය ඨිතා භික්ඛූ මහාසීමාය කම්මං කරොන්තානං න කොපෙන්ති, මහාසීමාය වා ඨිතා ඛණ්ඩසීමාය කම්මං කරොන්තානං සීමන්තරිකාය පන ඨිතා උභින්නම්පි න කොපෙන්ති. ගාමඛෙත්තෙ ඨත්වා කම්මං කරොන්තානං පන සීමන්තරිකාය ඨිතා කොපෙන්ති. සීමන්තරිකා හි ගාමඛෙත්තං භජති. इस प्रकार खण्डसीमा को सम्मत (निश्चित) करके, महासीमा की सम्मति के समय खण्डसीमा से बाहर निकलकर, महासीमा में (या जहाँ महासीमा सम्मत की जानी है वहाँ) स्थित होकर, चारों ओर क्रमशः घूमते हुए सीमान्तरिक पत्थरों की घोषणा करनी चाहिए। उसके बाद शेष निमित्तों की घोषणा करके, हस्तपाश को न छोड़ते हुए कर्मवाचा के द्वारा समानसंवसक सीमा को सम्मत करके, उसकी दृढ़ता के लिए अविप्रवास कर्मवाचा भी करनी चाहिए। क्योंकि इस प्रकार (अविप्रवास कर्मवाचा) करने पर, "हम सीमा का समुद्घात (विनाश) करेंगे" ऐसा सोचकर आए हुए शत्रु भिक्षु उसे समुद्घात करने में समर्थ नहीं होंगे। यदि खण्डसीमा के निमित्तों की घोषणा करके, उसके बाद सीमान्तरिक के निमित्तों की घोषणा करके, फिर महासीमा के निमित्तों की घोषणा करते हैं, तो इस प्रकार तीन स्थानों पर निमित्तों की घोषणा करके जिस सीमा को बाँधना चाहते हैं, उसे पहले बाँधना उचित है। ऐसा होने पर भी, पूर्वोक्त विधि के अनुसार खण्डसीमा से ही आरम्भ करके (सीमा) बाँधनी चाहिए। इस प्रकार बाँधी गई सीमाओं में, खण्डसीमा में स्थित भिक्षु महासीमा में कर्म करने वालों के कर्म को दूषित (विफल) नहीं करते, और महासीमा में स्थित भिक्षु खण्डसीमा में कर्म करने वालों के कर्म को दूषित नहीं करते। सीमान्तरिक में स्थित भिक्षु भी दोनों के कर्म को दूषित नहीं करते। किन्तु ग्रामक्षेत्र में स्थित होकर कर्म करने वालों के कर्म को सीमान्तरिक में स्थित भिक्षु दूषित करते हैं। क्योंकि सीमान्तरिक ग्रामक्षेत्र के अंतर्गत आती है। සීමා ච නාමෙසා න කෙවලං පථවිතලෙයෙව බද්ධා බද්ධා නාම හොති. අථ ඛො පිට්ඨිපාසාණෙපි කුටිගෙහෙපි ලෙණෙපි පාසාදෙපි පබ්බතමත්ථකෙපි බද්ධා බද්ධායෙව හොති. තත්ථ පිට්ඨිපාසාණෙ බන්ධන්තෙහි පාසාණපිට්ඨියං රාජිං වා කොට්ටෙත්වා උදුක්ඛලං වා ඛණිත්වා නිමිත්තං න කාතබ්බං, නිමිත්තුපගපාසාණෙ ඨපෙත්වා නිමිත්තානි කිත්තෙතබ්බානි. කම්මවාචාපරියොසානෙ සීමා පථවිසන්ධාරකං උදකං පරියන්තං කත්වා ඔතරති. නිමිත්තපාසාණා යථාඨානෙ න තිට්ඨන්ති, තස්මා සමන්තතො රාජි වා උට්ඨාපෙතබ්බා, චතූසු වා කොණෙසු පාසාණා විජ්ඣිතබ්බා, ‘‘අයං සීමාපරිච්ඡෙදො’’ති වත්වා අක්ඛරානි වා ඡින්දිතබ්බානි. කෙචි උසූයකා සීමං ඣාපෙස්සාමාති අග්ගිං දෙන්ති, පාසාණාව ඣායන්ති, න සීමා. और यह सीमा न केवल पृथ्वी तल पर ही बाँधी जाने पर 'बाँधी गई' कहलाती है, बल्कि शिलातल (चट्टान) पर, कुटीर में, गुफा में, प्रासाद (भवन) में और पर्वत के शिखर पर भी बाँधी जाने पर वह 'बाँधी गई' ही होती है। वहाँ शिलातल पर सीमा बाँधते समय, शिला के ऊपर लकीर खींचकर या गड्ढा खोदकर निमित्त नहीं बनाना चाहिए, बल्कि निमित्त के योग्य पत्थरों को रखकर निमित्तों की घोषणा करनी चाहिए। कर्मवाचा की समाप्ति पर सीमा पृथ्वी को धारण करने वाले जल तक नीचे पहुँच जाती है। निमित्त के पत्थर अपने स्थान पर स्थिर नहीं रहते, इसलिए चारों ओर लकीर स्पष्ट कर देनी चाहिए, या चारों कोनों पर पत्थरों को छेद देना चाहिए, अथवा "यह सीमा की मर्यादा है" ऐसा कहकर अक्षर खोद देने चाहिए। कुछ ईर्ष्यालु भिक्षु "हम सीमा को जला देंगे" ऐसा सोचकर आग लगा देते हैं, तो केवल पत्थर ही जलते हैं, सीमा नहीं जलती। කුටිගෙහෙපි [Pg.325] බන්ධන්තෙහි භිත්තිං අකිත්තෙත්වා එකවීසතියා භික්ඛූනං ඔකාසට්ඨානං අන්තො කරිත්වා පාසාණනිමිත්තානි ඨපෙත්වා සීමා සම්මන්නිතබ්බා, අන්තොකුට්ටමෙව සීමා හොති. සචෙ අන්තොකුට්ටෙ එකවීසතියා භික්ඛූනං ඔකාසො නත්ථි, පමුඛෙ නිමිත්තපාසාණෙ ඨපෙත්වා සම්මන්නිතබ්බා. සචෙ එවම්පි නප්පහොති, බහිනිබ්බොදකපතනට්ඨානෙපි නිමිත්තානි ඨපෙත්වා සම්මන්නිතබ්බා. එවං සම්මතාය පන සබ්බං කුටිගෙහං සීමට්ඨමෙව හොති. कुटीर में भी सीमा बाँधते समय, दीवार की घोषणा न करके, इक्कीस भिक्षुओं के बैठने योग्य स्थान को भीतर रखकर, पत्थर के निमित्तों को स्थापित कर सीमा सम्मत करनी चाहिए; दीवार का भीतरी भाग ही सीमा होता है। यदि दीवार के भीतर इक्कीस भिक्षुओं के लिए स्थान नहीं है, तो बरामदे (मुखमण्डप) में निमित्त पत्थरों को रखकर सीमा सम्मत करनी चाहिए। यदि ऐसा करने पर भी पर्याप्त स्थान न हो, तो बाहर जहाँ छत का पानी गिरता है, वहाँ भी निमित्तों को रखकर सीमा सम्मत करनी चाहिए। इस प्रकार सम्मत करने पर पूरा कुटीर सीमा के भीतर ही होता है। චතුභිත්තියලෙණෙපි බන්ධන්තෙහි කුට්ටං අකිත්තෙත්වා පාසාණාව කිත්තෙතබ්බා. සචෙ අන්තො ඔකාසො නත්ථි, පමුඛෙපි නිමිත්තානි ඨපෙතබ්බානි. සචෙ නප්පහොති, බහි නිබ්බොදකපතනට්ඨානෙපි නිමිත්තපාසාණෙ ඨපෙත්වා නිමිත්තානි කිත්තෙත්වා සීමා සම්මන්නිතබ්බා. එවං ලෙණස්ස අන්තො ච බහි ච සීමා හොති. चार दीवारों वाली गुफा में भी सीमा बाँधते समय, दीवार की घोषणा न करके केवल पत्थरों की ही घोषणा करनी चाहिए। यदि भीतर स्थान नहीं है, तो बरामदे में भी निमित्त रखने चाहिए। यदि (वहाँ भी) पर्याप्त न हो, तो बाहर जहाँ छत का पानी गिरता है, वहाँ भी निमित्त पत्थरों को रखकर और निमित्तों की घोषणा करके सीमा सम्मत करनी चाहिए। इस प्रकार गुफा के भीतर और बाहर (दोनों ओर) सीमा होती है। උපරිපාසාදෙපි භිත්තිං අකිත්තෙත්වා අන්තො පාසාණෙ ඨපෙත්වා සීමා සම්මන්නිතබ්බා. සචෙ නප්පහොති, පමුඛෙපි පාසාණෙ ඨපෙත්වා සම්මන්නිතබ්බා. එවං සම්මතා උපරිපාසාදෙයෙව හොති, හෙට්ඨා න ඔතරති. සචෙ පන බහූසු ථම්භෙසු තුලානං උපරි කතපාසාදස්ස හෙට්ඨිමතලෙ කුට්ටො යථා නිමිත්තානං අන්තො හොති, එවං උට්ඨහිත්වා තුලාරුක්ඛෙහි එකසම්බද්ධො ඨිතො, හෙට්ඨාපි ඔතරති. එකථම්භපාසාදස්ස පන උපරිමතලෙ බද්ධා සීමා සචෙ ථම්භමත්ථකෙ එකවීසතියා භික්ඛූනං ඔකාසො හොති, හෙට්ඨා ඔතරති. සචෙ පාසාදභිත්තිතො නිග්ගතෙසු නිය්යූහකාදීසු පාසාණෙ ඨපෙත්වා සීමං බන්ධන්ති, පාසාදභිත්ති අන්තොසීමායං හොති. හෙට්ඨා පනස්සා ඔතරණානොතරණං වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බං. හෙට්ඨාපාසාදෙ කිත්තෙන්තෙහිපි භිත්ති ච රුක්ඛත්ථම්භා ච න කිත්තෙතබ්බා. භිත්තිලග්ගෙ පන පාසාණත්ථම්භෙ කිත්තෙතුං වට්ටති. එවං කිත්තිතා සීමා හෙට්ඨා පාසාදස්ස පරියන්තථම්භානං අන්තොයෙව හොති. සචෙ පන හෙට්ඨාපාසාදස්ස කුඩ්ඩො උපරිමතලෙන සම්බද්ධො හොති, උපරිපාසාදම්පි අභිරුහති. සචෙ පාසාදස්ස බහි නිබ්බොදකපතනට්ඨානෙ නිමිත්තානි කරොන්ති, සබ්බො පාසාදො සීමට්ඨො හොති. प्रासाद (भवन) की ऊपरी मंजिल पर भी दीवार की घोषणा न करके, भीतर पत्थर रखकर सीमा सम्मत करनी चाहिए। यदि स्थान पर्याप्त न हो, तो बरामदे में भी पत्थर रखकर सम्मत करनी चाहिए। इस प्रकार सम्मत की गई सीमा ऊपरी मंजिल पर ही होती है, नीचे नहीं उतरती। किन्तु यदि अनेक खम्भों पर कड़ियों (beams) के ऊपर बने प्रासाद के निचले तल की दीवार इस प्रकार खड़ी की गई हो कि वह निमित्तों के भीतर हो, और कड़ियों की लकड़ियों के साथ एक ही जुड़ाव में स्थित हो, तो वह नीचे भी उतरती है। एक खम्भे वाले प्रासाद की ऊपरी मंजिल पर बाँधी गई सीमा, यदि खम्भे के ऊपरी भाग में इक्कीस भिक्षुओं के बैठने का स्थान हो, तो नीचे उतरती है। यदि प्रासाद की दीवार से बाहर निकले हुए छज्जों (niyyūhaka) आदि पर पत्थर रखकर सीमा बाँधते हैं, तो प्रासाद की दीवार सीमा के भीतर होती है। इसके नीचे उतरने या न उतरने के विषय में पूर्वोक्त विधि के अनुसार ही समझना चाहिए। निचले प्रासाद में निमित्त घोषित करने वालों को दीवार और लकड़ी के खम्भों की घोषणा नहीं करनी चाहिए। किन्तु दीवार से सटे हुए पत्थर के खम्भों की घोषणा करना उचित है। इस प्रकार घोषित निमित्तों वाली सीमा नीचे प्रासाद के बाहरी खम्भों के भीतर ही होती है। यदि निचले प्रासाद की दीवार ऊपरी मंजिल से जुड़ी हुई हो, तो वह ऊपरी प्रासाद तक भी चढ़ती है। यदि प्रासाद के बाहर जहाँ छत का पानी गिरता है, वहाँ निमित्त बनाते हैं, तो पूरा प्रासाद सीमा के भीतर स्थित होता है। පබ්බතමත්ථකෙ [Pg.326] තලං හොති එකවීසතියා භික්ඛූනං ඔකාසාරහං, තත්ථ පිට්ඨිපාසාණෙ විය සීමං බන්ධන්ති. හෙට්ඨාපබ්බතෙපි තෙනෙව පරිච්ඡෙදෙන සීමා ඔතරති. තාලමූලකපබ්බතෙපි උපරි සීමා බද්ධා හෙට්ඨා ඔතරතෙව. යො පන විතානසණ්ඨානො හොති, උපරි එකවීසතියා භික්ඛූනං ඔකාසො අත්ථි, හෙට්ඨා නත්ථි, තස්ස උපරි බද්ධා සීමා හෙට්ඨා න ඔතරති. එවං මුදිඞ්ගසණ්ඨානො වා හොතු පණවසණ්ඨානො වා, යස්ස හෙට්ඨා වා මජ්ඣෙ වා සීමප්පමාණං නත්ථි, තස්සුපරි බද්ධා සීමා හෙට්ඨා නෙව ඔතරති. යස්ස පන ද්වෙ කූටානි ආසන්නෙ ඨිතානි, එකස්සපි උපරි සීමප්පමාණං නප්පහොති, තස්ස කූටන්තරං චිනිත්වා වා පූරෙත්වා වා එකාබද්ධං කත්වා උපරි සීමා සම්මන්නිතබ්බා. पर्वत के शिखर पर यदि इक्कीस भिक्षुओं के बैठने योग्य समतल भूमि हो, तो वहाँ शिलातल की भाँति सीमा बाँधते हैं। पर्वत के नीचे भी उसी मर्यादा (परिच्छेद) से सीमा नीचे उतरती है। ताड़ की जड़ के समान आकार वाले पर्वत पर भी ऊपर बाँधी गई सीमा नीचे उतरती ही है। किन्तु जो पर्वत वितान (चंदोवे) के आकार का हो, जिसके ऊपर इक्कीस भिक्षुओं के बैठने का स्थान हो किन्तु नीचे न हो, उस पर ऊपर बाँधी गई सीमा नीचे नहीं उतरती। इसी प्रकार मृदंग के आकार का हो या पणव (ढोल) के आकार का हो, जिसके नीचे या मध्य में सीमा के परिमाण का स्थान न हो, उसके ऊपर बाँधी गई सीमा नीचे नहीं उतरती। जिस पर्वत के दो शिखर पास-पास स्थित हों और एक शिखर के ऊपर सीमा के परिमाण का स्थान पर्याप्त न हो, तो उन दोनों शिखरों के बीच के अंतराल को (ईंट-पत्थर आदि से) चुनकर या (मिट्टी-कंकड़ से) भरकर एक साथ जोड़कर, ऊपर सीमा सम्मत करनी चाहिए। එකො සප්පඵණසදිසො පබ්බතො, තස්සුපරි සීමප්පමාණස්ස අත්ථිතාය සීමං බන්ධන්ති, තස්ස චෙ හෙට්ඨා ආකාසපබ්භාරං හොති, සීමා න ඔතරති. සචෙ පනස්ස වෙමජ්ඣෙ සීමප්පමාණො සුසිරපාසාණො හොති, ඔතරති. සො ච පාසාණො සීමට්ඨොයෙව හොති. අථාපිස්ස හෙට්ඨා ලෙණස්ස කුට්ටො අග්ගකොටිං ආහච්ච තිට්ඨති, ඔතරති, හෙට්ඨා ච උපරි ච සීමායෙව හොති. සචෙ පන හෙට්ඨා උපරිමස්ස සීමාපරිච්ඡෙදස්ස පාරතො අන්තො-ලෙණං හොති, බහි සීමා න ඔතරති. අථාපි උපරිමස්ස සීමාපරිච්ඡෙදස්ස ඔරතො බහිලෙණං හොති, අන්තො සීමා න ඔතරති. අථාපි උපරි සීමාය පරිච්ඡෙදො ඛුද්දකො, හෙට්ඨා ලෙණං මහන්තං සීමාපරිච්ඡෙදමතික්කමිත්වා ඨිතං, සීමා උපරියෙව හොති, හෙට්ඨා න ඔතරති. යදි පන ලෙණං ඛුද්දකං සබ්බපච්ඡිමසීමාපරිමාණං, උපරි සීමා මහතී තං අජ්ඣොත්ථරිත්වා ඨිතා, සීමා ඔතරති. අථ ලෙණං අතිඛුද්දකං සීමප්පමාණං න හොති, සීමා උපරියෙව හොති, හෙට්ඨා න ඔතරති. සචෙ තතො උපඩ්ඪං භිජ්ජිත්වා පතති, සීමප්පමාණං චෙපි හොති, බහි පතිතං අසීමා. අපතිතං පන යදි සීමප්පමාණං, සීමා හොතියෙව. एक सर्प के फण के समान पर्वत है, उसके ऊपर सीमा के प्रमाण की उपस्थिति के कारण वे सीमा बांधते हैं। यदि उसके नीचे आकाश-प्रपात्र (खुली घाटी) हो, तो सीमा नीचे नहीं उतरती। यदि उसके मध्य में सीमा के प्रमाण का कोई छिद्रयुक्त पत्थर हो, तो वह नीचे उतरती है। और वह पत्थर सीमा के भीतर ही होता है। यदि उसके नीचे किसी गुफा की दीवार पर्वत के अग्र भाग को छूती हुई स्थित हो, तो वह नीचे उतरती है, और नीचे तथा ऊपर दोनों ओर सीमा ही होती है। यदि नीचे ऊपरी सीमा के परिच्छेद के परे गुफा का भीतरी भाग हो, तो बाहर सीमा नीचे नहीं उतरती। यदि ऊपरी सीमा के परिच्छेद के इस ओर गुफा का बाहरी भाग हो, तो भीतर सीमा नीचे नहीं उतरती। यदि ऊपर सीमा का परिच्छेद छोटा हो और नीचे गुफा बड़ी होकर सीमा के परिच्छेद को लांघकर स्थित हो, तो सीमा ऊपर ही होती है, नीचे नहीं उतरती। यदि गुफा छोटी हो और न्यूनतम सीमा के परिमाण वाली हो, और ऊपर की सीमा बड़ी होकर उसे ढककर स्थित हो, तो सीमा नीचे उतरती है। यदि गुफा अत्यंत छोटी हो और सीमा के प्रमाण की न हो, तो सीमा ऊपर ही होती है, नीचे नहीं उतरती। यदि वहां से आधा भाग टूटकर गिर जाए, और वह सीमा के प्रमाण का भी हो, तो बाहर गिरा हुआ भाग अ-सीमा है। यदि न गिरा हुआ भाग सीमा के प्रमाण का हो, तो वह सीमा ही होती है। ඛණ්ඩසීමා නීචවත්ථුකා හොති, තං පූරෙත්වා උච්චවත්ථුකං කරොන්ති, සීමායෙව. සීමාය ගෙහං කරොන්ති, සීමට්ඨකමෙව හොති. සීමාය පොක්ඛරණිං ඛණන්ති, සීමායෙව. ඔඝො සීමාමණ්ඩලං ඔත්ථරිත්වා ගච්ඡති, සීමාමාළකෙ අට්ටං බන්ධිත්වා කම්මං කාතුං වට්ටති. සීමාය හෙට්ඨා උමඞ්ගනදී හොති, ඉද්ධිමා භික්ඛු තත්ථ නිසීදති, සචෙ සා නදී පඨමං ගතා, සීමා පච්ඡා බද්ධා[Pg.327], කම්මං න කොපෙති. අථ පඨමං සීමා බද්ධා, පච්ඡා නදී ගතා, කම්මං කොපෙති. හෙට්ඨාපථවිතලෙ ඨිතො පන කොපෙතියෙව. खण्ड-सीमा नीचे धरातल वाली होती है, उसे भरकर यदि ऊंचे धरातल वाला बना दिया जाए, तो वह सीमा ही रहती है। सीमा में घर बनाते हैं, तो वह सीमा में स्थित ही होता है। सीमा में पोखर (तालाब) खोदते हैं, तो वह सीमा ही रहती है। यदि जल का प्रवाह सीमा-मण्डल को ढककर बहता है, तो सीमा-मालक में मचान (अट्ट) बांधकर कर्म करना कल्पनीय है। सीमा के नीचे यदि सुरंग-नदी हो और कोई ऋद्धिमान भिक्षु वहां बैठे, यदि वह नदी पहले से बह रही थी और सीमा बाद में बांधी गई, तो वह कर्म को दूषित नहीं करती। यदि पहले सीमा बांधी गई और बाद में नदी बही, तो वह कर्म को दूषित करती है। परंतु नीचे पृथ्वी तल पर स्थित भिक्षु तो कर्म को दूषित ही करता है। සීමාමාළකෙ වටරුක්ඛො හොති, තස්ස සාඛා වා තතො නිග්ගතපාරොහො වා මහාසීමාය පථවිතලං වා තත්ථජාතරුක්ඛාදීනි වා ආහච්ච තිට්ඨති, මහාසීමං සොධෙත්වා වා කම්මං කාතබ්බං, තෙ වා සාඛාපාරොහා ඡින්දිත්වා බහිට්ඨකා කාතබ්බා. අනාහච්ච ඨිතසාඛාදීසු ආරුළ්හභික්ඛු හත්ථපාසං ආනෙතබ්බො. එවං මහාසීමාය ජාතරුක්ඛස්ස සාඛා වා පාරොහො වා වුත්තනයෙනෙව සීමාමාළකෙ පතිට්ඨාති, වුත්තනයෙනෙව සීමං සොධෙත්වා වා කම්මං කාතබ්බං, තෙ වා සාඛාපාරොහා ඡින්දිත්වා බහිට්ඨකා කාතබ්බා. सीमा-मालक में यदि बरगद का वृक्ष हो, उसकी शाखा या उससे निकली हुई जटा (हवाई जड़) महासीमा के पृथ्वी तल को या वहां उगे हुए वृक्षों आदि को छूकर स्थित हो, तो महासीमा का शोधन करके कर्म करना चाहिए, अथवा उन शाखाओं और जटाओं को काटकर बाहर स्थित कर देना चाहिए। बिना छुए स्थित शाखाओं आदि पर चढ़े हुए भिक्षु को हाथ-पासे (हस्तपाश) में लाना चाहिए। इसी प्रकार महासीमा में उगे वृक्ष की शाखा या जटा उक्त विधि से ही यदि सीमा-मालक के पृथ्वी तल पर स्थित हो, तो उक्त विधि से ही सीमा का शोधन करके कर्म करना चाहिए, अथवा उन शाखाओं और जटाओं को काटकर बाहर स्थित कर देना चाहिए। සචෙ සීමාමාළකෙ කම්මෙ කරියමානෙ කොචි භික්ඛු සීමාමාළකස්ස අන්තො පවිසිත්වා වෙහාසට්ඨිතසාඛාය නිසීදති, පාදා වාස්ස භූමිගතා හොන්ති, නිවාසනපාරුපනං වා භූමිං ඵුසති, කම්මං කාතුං න වට්ටති. පාදෙ පන නිවාසනපාරුපනඤ්ච උක්ඛිපාපෙත්වා කාතුං වට්ටති. ඉදඤ්ච ලක්ඛණං පුරිමනයෙපි වෙදිතබ්බං. අයං පන විසෙසො – තත්ර උක්ඛිපාපෙත්වා කාතුං න වට්ටති, හත්ථපාසමෙව ආනෙතබ්බො. සචෙ අන්තොසීමතො පබ්බතො අබ්භුගච්ඡති, තත්රට්ඨො භික්ඛු හත්ථපාසං ආනෙතබ්බො. ඉද්ධියා අන්තොපබ්බතං පවිට්ඨෙපි එසෙව නයො. බජ්ඣමානා එව හි සීමා පමාණරහිතං පදෙසං න ඔතරති. බද්ධසීමාය ජාතං යංකිඤ්චි යත්ථ කත්ථචි එකසම්බද්ධෙන ගතං සීමාසඞ්ඛ්යමෙව ගච්ඡතීති. यदि सीमा-मालक में कर्म किए जाते समय कोई भिक्षु सीमा-मालक के भीतर प्रवेश कर आकाश में स्थित शाखा पर बैठता है, और यदि उसके पैर भूमि पर हों या उसका चीवर भूमि को छूता हो, तो कर्म करना कल्पनीय नहीं है। परंतु पैरों और चीवर को ऊपर उठवाकर कर्म करना कल्पनीय है। और यह लक्षण पिछले नियम में भी समझना चाहिए। परंतु यह विशेषता है—वहां (पिछले नियम में) ऊपर उठवाकर कर्म करना कल्पनीय नहीं है, उसे हस्तपाश में ही लाना चाहिए। यदि सीमा के भीतर से पर्वत ऊपर निकलता है, तो वहां स्थित भिक्षु को हस्तपाश में लाना चाहिए। ऋद्धि से पर्वत के भीतर प्रविष्ट होने पर भी यही नियम है। क्योंकि बांधी जा रही सीमा प्रमाण-रहित प्रदेश में नहीं उतरती। बद्ध-सीमा में उत्पन्न कोई भी वस्तु जो कहीं भी एक-सम्बद्ध होकर गई हो, वह सीमा की श्रेणी में ही आती है—ऐसा समझना चाहिए। 140. තියොජනපරමන්ති එත්ථ තියොජනං පරමං පමාණමෙතිස්සාති තියොජනපරමා; තං තියොජනපරමං. සම්මන්නන්තෙන පන මජ්ඣෙ ඨත්වා යථා චතූසුපි දිසාසු දියඩ්ඪදියඩ්ඪයොජනං හොති, එවං සම්මන්නිතබ්බා. සචෙ පන මජ්ඣෙ ඨත්වා එකෙකදිසතො තියොජනං කරොන්ති, ඡයොජනං හොතීති න වට්ටති. චතුරස්සං වා තිකොණං වා සම්මන්නන්තෙන යථා කොණතො කොණං තියොජනං හොති, එවං සම්මන්නිතබ්බා. සචෙ හි යෙන කෙනචි පරියන්තෙන කෙසග්ගමත්තම්පි තියොජනං අතික්කාමෙති, ආපත්තිඤ්ච ආපජ්ජති සීමා ච අසීමා හොති. १४०. 'तियोजनपरमं' (अधिकतम तीन योजन) यहाँ इसका अर्थ है कि इस सीमा का अधिकतम परिमाण तीन योजन है, इसलिए यह 'तियोजनपरमा' कहलाती है। सीमा का निर्धारण करते समय मध्य में खड़े होकर इस प्रकार निर्धारण करना चाहिए कि चारों दिशाओं में डेढ़-डेढ़ योजन हो। यदि मध्य में खड़े होकर प्रत्येक दिशा में तीन योजन करते हैं, तो वह छह योजन हो जाता है, इसलिए यह कल्पनीय नहीं है। चतुष्कोण या त्रिकोण सीमा का निर्धारण करते समय इस प्रकार करना चाहिए कि एक कोने से दूसरे कोने तक तीन योजन हो। क्योंकि यदि किसी भी छोर से बाल के अग्र भाग के बराबर भी तीन योजन का उल्लंघन होता है, तो आपत्ति होती है और सीमा अ-सीमा हो जाती है। නදීපාරන්ති එත්ථ පාරයතීති පාරා. කිං පාරයති? නදිං. නදියා පාරා නදීපාරා, තං නදීපාරං; නදිං අජ්ඣොත්ථරමානන්ති අත්ථො. එත්ථ ච නදියා ලක්ඛණං [Pg.328] නදීනිමිත්තෙ වුත්තනයමෙව. යත්ථස්ස ධුවනාවා වාති යත්ථ නදියා සීමාබන්ධනට්ඨානගතෙසු තිත්ථෙසු නිච්චසඤ්චරණනාවා අස්ස, යා සබ්බන්තිමෙන පරිච්ඡෙදෙන පාජනපුරිසෙන සද්ධිං තයො ජනෙ වහති. සචෙ පන සා නාවා උද්ධං වා අධො වා කෙනචිදෙව කරණීයෙන පුන ආගමනත්ථාය නීතා, චොරෙහි වා හටා, අවස්සං ලබ්භනෙය්යා, යා පන වාතෙන වා ඡින්නබන්ධනා වීචීහි නදිමජ්ඣං නීතා අවස්සං ආහරිතබ්බා, පුන ධුවනාවාව හොති. උදකෙ ඔගතෙ ථලං උස්සාරිතාපි සුධාකසටාදීහි පූරෙත්වා ඨපිතාපි ධුවනාවාව. සචෙ භින්නා වා විසඞ්ඛතපදරා වා න වට්ටති. මහාපදුමත්ථෙරො පනාහ – ‘‘සචෙපි තාවකාලිකං නාවං ආනෙත්වා සීමාබන්ධනට්ඨානෙ ඨපෙත්වා නිමිත්තානි කිත්තෙන්ති, ධුවනාවාව හොතී’’ති. තත්ර මහාසුමත්ථෙරො ආහ – ‘‘නිමිත්තං වා සීමා වා කම්මවාචාය ගච්ඡති න නාවාය. භගවතා ච ධුවනාවා අනුඤ්ඤාතා, තස්මා නිබද්ධනාවායෙව වට්ටතී’’ති. 'नदी पार' यहाँ 'पारा' का अर्थ है जो पार करती है। क्या पार करती है? नदी को। नदी को पार करने वाली 'नदी-पारा' सीमा है। यहाँ नदी का लक्षण वही है जो नदी-निमित्त में कहा गया है। 'जहाँ स्थायी नौका हो' का अर्थ है जहाँ नदी के घाटों पर, जहाँ सीमा बांधी जानी है, निरंतर चलने वाली नौका हो, जो कम से कम मल्लाह सहित तीन व्यक्तियों को ले जा सके। यदि वह नौका किसी कार्यवश ऊपर या नीचे ले जाई गई हो, या चोरों द्वारा चुरा ली गई हो पर निश्चित रूप से वापस मिल जाए, या हवा से रस्सी टूटकर बीच नदी में चली गई हो पर वापस लाई जा सके, तो वह 'स्थायी नौका' ही रहती है। पानी कम होने पर किनारे पर रखी गई या मरम्मत के लिए रखी गई नौका भी स्थायी ही मानी जाती है। यदि वह टूट गई हो या उसके तख्ते अलग हो गए हों, तो वह मान्य नहीं है। महापदुम स्थविर कहते हैं कि यदि अस्थायी नौका लाकर सीमा बांधने के स्थान पर रखकर निमित्त घोषित किए जाएं, तो भी वह स्थायी नौका ही होती है। वहाँ महासुम स्थविर कहते हैं कि निमित्त या सीमा कम्मवाचा से सिद्ध होती है, नौका से नहीं। भगवान ने स्थायी नौका की अनुमति दी है, इसलिए केवल स्थायी नौका ही मान्य है। ධුවසෙතු වාති යත්ථ රුක්ඛසඞ්ඝාටමයො වා පදරබද්ධො වා ජඞ්ඝසත්ථසෙතු වා හත්ථිස්සාදීනං සඤ්චරණයොග්ගො මහාසෙතු වා අත්ථි; අන්තමසො තඞ්ඛණඤ්ඤෙව රුක්ඛං ඡින්දිත්වා මනුස්සානං සඤ්චරණයොග්ගො එකපදිකසෙතුපි ධුවසෙතුත්වෙව සඞ්ඛ්යං ගච්ඡති. සචෙ පන උපරි බද්ධානි වෙත්තලතාදීනි හත්ථෙන ගහෙත්වාපි න සක්කා හොති තෙන සඤ්චරිතුං, න වට්ටති. 'स्थायी सेतु' (पुल) वह है जहाँ लकड़ी के लट्ठों से बना, या तख्तों से जुड़ा, या पैदल यात्रियों और सार्थों के लिए, या हाथी-घोड़ों के चलने योग्य बड़ा पुल हो। यहाँ तक कि उसी क्षण पेड़ काटकर बनाया गया मनुष्यों के चलने योग्य एक-पैर वाला (सकरा) पुल भी 'स्थायी सेतु' की गणना में आता है। लेकिन यदि ऊपर बंधी हुई बेंत या लताओं को हाथ से पकड़े बिना उस पर चलना संभव न हो, तो वह मान्य नहीं है। එවරූපං නදීපාරසීමං සම්මන්නිතුන්ති යත්ථායං වුත්තප්පකාරා ධුවනාවා වා ධුවසෙතු වා අභිමුඛතිත්ථෙයෙව අත්ථි, එවරූපං නදීපාරසීමං සම්මන්නිතුං අනුජානාමීති අත්ථො. සචෙ ධුවනාවා වා ධුවසෙතු වා අභිමුඛතිත්ථෙ නත්ථි, ඊසකං උද්ධං අභිරුහිත්වා අධො වා ඔරොහිත්වා අත්ථි, එවම්පි වට්ටති. කරවීකතිස්සත්ථෙරො පන ‘‘ගාවුතමත්තබ්භන්තරෙපි වට්ටතී’’ති ආහ. 'इस प्रकार की नदी-पारा सीमा का सम्मनन (निर्धारण) करना' का अर्थ है कि जहाँ उक्त प्रकार की स्थायी नौका या स्थायी सेतु ठीक सामने वाले घाट पर हो, वहाँ ऐसी नदी-पारा सीमा निर्धारित करने की अनुमति देता हूँ। यदि स्थायी नौका या सेतु ठीक सामने न हो, थोड़ा ऊपर या थोड़ा नीचे हो, तो भी मान्य है। करवीकतिस्स स्थविर कहते हैं कि एक गावुत के भीतर होने पर भी मान्य है। ඉමඤ්ච පන නදීපාරසීමං සම්මන්නන්තෙන එකස්මිං තීරෙ ඨත්වා උපරිසොතෙ නදීතීරෙ නිමිත්තං කිත්තෙත්වා තතො පට්ඨාය අත්තානං පරික්ඛිපන්තෙන යත්තකං පරිච්ඡෙදං ඉච්ඡති, තස්ස පරියොසානෙ අධොසොතෙපි නදීතීරෙ නිමිත්තං කිත්තෙත්වා පරතීරෙ සම්මුඛට්ඨානෙ නදීතීරෙ නිමිත්තං කිත්තෙතබ්බං. තතො පට්ඨාය යත්තකං පරිච්ඡෙදං ඉච්ඡති, තස්ස වසෙන යාව උපරිසොතෙ පඨමකිත්තිතනිමිත්තස්ස සම්මුඛා නදීතීරෙ නිමිත්තං, තාව කිත්තෙත්වා පච්චාහරිත්වා පඨමකිත්තිතනිමිත්තෙන [Pg.329] සද්ධිං ඝටෙතබ්බං. අථ සබ්බනිමිත්තානං අන්තො ඨිතෙ භික්ඛූ හත්ථපාසගතෙ කත්වා කම්මවාචාය සීමා සම්මන්නිතබ්බා. නදියං ඨිතා අනාගතාපි කම්මං න කොපෙන්ති. සම්මුතිපරියොසානෙ ඨපෙත්වා නදිං නිමිත්තානං අන්තො පාරතීරෙ ච ඔරිමතීරෙ ච එකසීමා හොති. නදී පන බද්ධසීමාසඞ්ඛ්යං න ගච්ඡති, විසුං නදිසීමා එව හි සා. इस नदी-पारा सीमा का निर्धारण करते समय, एक किनारे पर खड़े होकर नदी के ऊपरी प्रवाह की ओर निमित्त घोषित करना चाहिए, फिर वहाँ से स्वयं को घेरते हुए जितनी सीमा चाहिए, उसके अंत में निचले प्रवाह की ओर निमित्त घोषित करना चाहिए। फिर दूसरे किनारे पर ठीक सामने निमित्त घोषित करना चाहिए। वहाँ से जितनी सीमा चाहिए, उसके अनुसार ऊपरी प्रवाह के पहले निमित्त के सामने तक निमित्त घोषित कर, वापस लाकर पहले निमित्त से जोड़ देना चाहिए। फिर सभी निमित्तों के भीतर स्थित भिक्षुओं को हत्थपास में करके कम्मवाचा द्वारा सीमा निर्धारित करनी चाहिए। नदी में स्थित भिक्षु यदि नहीं भी आते, तो भी कर्म निष्फल नहीं होता। निर्धारण के अंत में, नदी को छोड़कर निमित्तों के भीतर दोनों किनारों पर एक ही सीमा होती है। नदी 'बद्ध सीमा' की गणना में नहीं आती, क्योंकि वह अलग से 'नदी सीमा' ही है। සචෙ අන්තොනදියං දීපකො හොති, තං අන්තොසීමාය කාතුකාමෙන පුරිමනයෙනෙව අත්තනා ඨිතතීරෙ නිමිත්තානි කිත්තෙත්වා දීපකස්ස ඔරිමන්තෙ ච පාරිමන්තෙ ච නිමිත්තං කිත්තෙතබ්බං. අථ පරතීරෙ නදියා ඔරිමතීරෙ නිමිත්තස්ස සම්මුඛට්ඨානෙ නිමිත්තං කිත්තෙත්වා තතො පට්ඨාය පුරිමනයෙනෙව යාව උපරිසොතෙ පඨමකිත්තිතනිමිත්තස්ස සම්මුඛා නිමිත්තං, තාව කිත්තෙතබ්බං. අථ දීපකස්ස පාරිමන්තෙ ච ඔරිමන්තෙ ච නිමිත්තං කිත්තෙත්වා පච්චාහරිත්වා පඨමකිත්තිතනිමිත්තෙන සද්ධිං ඝටෙතබ්බං. අථ ද්වීසු තීරෙසු දීපකෙ ච භික්ඛූ සබ්බෙව හත්ථපාසගතෙ කත්වා කම්මවාචාය සීමා සම්මන්නිතබ්බා. නදියං ඨිතා අනාගච්ඡන්තාපි කම්මං න කොපෙන්ති. සම්මුතිපරියොසානෙ ඨපෙත්වා නදිං නිමිත්තානං අන්තො තීරද්වයඤ්ච දීපකො ච එකසීමා හොති, නදී පන නදිසීමායෙව. यदि नदी के भीतर कोई छोटा द्वीप हो और उसे सीमा के भीतर करना हो, तो पूर्व विधि के अनुसार ही अपने खड़े होने वाले किनारे पर निमित्त घोषित कर, द्वीप के इस छोर और उस छोर पर निमित्त घोषित करना चाहिए। फिर दूसरे किनारे पर, पहले किनारे के निमित्त के सामने निमित्त घोषित कर, वहाँ से पूर्व विधि के अनुसार ऊपरी प्रवाह के पहले निमित्त के सामने तक निमित्त घोषित करना चाहिए। फिर द्वीप के उस छोर और इस छोर पर निमित्त घोषित कर, वापस लाकर पहले निमित्त से जोड़ देना चाहिए। फिर दोनों किनारों और द्वीप पर स्थित सभी भिक्षुओं को हत्थपास में करके कम्मवाचा से सीमा निर्धारित करनी चाहिए। नदी में स्थित भिक्षु न आने पर भी कर्म दूषित नहीं होता। निर्धारण के अंत में, नदी को छोड़कर निमित्तों के भीतर दोनों किनारे और द्वीप मिलकर एक ही सीमा होते हैं, और नदी तो नदी-सीमा ही है। සචෙ පන දීපකො විහාරසීමාපරිච්ඡෙදතො උද්ධං වා අධො වා අධිකතරො හොති, අථ විහාරසීමාපරිච්ඡෙදනිමිත්තස්ස උජුකමෙව සම්මුඛිභූතෙ දීපකස්ස සොරිමන්තෙ නිමිත්තං කිත්තෙත්වා තතො පට්ඨාය දීපකසිඛරං පරික්ඛිපන්තොන පුන දීපකස්ස සොරිමන්තෙ නිමිත්තසම්මුඛෙ පාරිමන්තෙ නිමිත්තං කිත්තෙතබ්බං. තතො පරං පුරිමනයෙනෙව පාරතීරෙ සම්මුඛනිමීත්තමාදිංකත්වා පාරතීරනිමිත්තානි ච දීපකස්ස පාරිමන්තසොරිමන්තනිමිත්තානි ච කිත්තෙත්වා පඨමකිත්තිතනිමිත්තෙන සද්ධිං ඝටනා කාතබ්බා. එවං කිත්තෙත්වා සම්මතා සීමා පබ්බතසණ්ඩානා හොති. यदि द्वीप विहार-सीमा के विस्तार से ऊपर या नीचे की ओर अधिक लंबा हो, तो विहार-सीमा के निमित्त के ठीक सामने द्वीप के इस छोर पर निमित्त घोषित कर, वहाँ से द्वीप के शिखर को घेरते हुए पुनः द्वीप के इस छोर पर निमित्त के सामने वाले उस छोर पर निमित्त घोषित करना चाहिए। उसके बाद पूर्व विधि के अनुसार दूसरे किनारे के सम्मुख निमित्त से आरंभ कर, दूसरे किनारे के निमित्तों और द्वीप के छोरों के निमित्तों को घोषित कर पहले निमित्त से जोड़ देना चाहिए। इस प्रकार घोषित और निर्धारित सीमा पर्वत के आकार (पर्वत-संस्थान) की होती है। සචෙ පන දීපකො විහාරසීමාපරිච්ඡෙදතො උද්ධම්පි අධොපි අධිකතරො හොති. පුරිමනයෙනෙව දීපකස්ස උභොපි සීඛරානි පරික්ඛිපිත්වා නිමිත්තානි කිත්තෙන්තෙන නිමිත්තඝටනා කාතබ්බා. එවං කිත්තෙත්වා සම්මතා සීමා මුදිඞ්ගසණ්ඨානා හොති. यदि द्वीप विहार-सीमा के विस्तार से ऊपर और नीचे दोनों ओर अधिक लंबा हो, तो पूर्व विधि के अनुसार ही द्वीप के दोनों शिखरों को घेरते हुए निमित्त घोषित कर निमित्तों को जोड़ना चाहिए। इस प्रकार घोषित और निर्धारित सीमा मृदंग के आकार (मृदंग-संस्थान) की होती है। සචෙ [Pg.330] දීපකො විහාරසීමාපරිච්ඡෙදස්ස අන්තො ඛුද්දකො හොති, සබ්බපඨමනයෙන දීපකෙ නිමිත්තානි කිත්තෙතබ්බානි. එවං කිත්තෙත්වා සම්මතා සීමා පණවසණ්ඨානා හොති. यदि विहार की सीमा के निर्धारण के भीतर कोई छोटा द्वीप है, तो सबसे पहली विधि के अनुसार उस द्वीप पर निमित्तों की घोषणा करनी चाहिए। इस प्रकार घोषित की गई सीमा ढोलक (पणव) के आकार की होती है। සීමානුජානනකථා නිට්ඨිතා. सीमा की अनुमति संबंधी कथा समाप्त हुई। උපොසථාගාරාදිකථා उपोसथ-भवन आदि की कथा। 141. අනුපරිවෙණියන්ති එකසීමමහාවිහාරෙ තස්මිං තස්මිං පරිවෙණෙ. අසඞ්කෙතෙනාති සඞ්කෙතං අකත්වා. එකං සමූහනිත්වාති කම්මවාචාය සමූහනිත්වා. १४१. 'अनुपरिवेणियं' का अर्थ है एक ही सीमा वाले महाविहार के उन-उन परिवेणों (आंगनों) में। 'असंकेतेन' का अर्थ है बिना कोई संकेत (नियत स्थान) किए। 'एकं समूहनित्वा' का अर्थ है कर्मवाचा के द्वारा (पुरानी सीमा को) हटाकर। 142. යතො පාතිමොක්ඛං සුණාතීති යත්ථ කත්ථචි භික්ඛූනං හත්ථපාසෙ නිසින්නො යස්මා පාතිමොක්ඛං සුණාති; කතොවස්ස උපොසථොති අත්ථො. ඉදඤ්ච වත්ථුවසෙන වුත්තං, හත්ථපාසෙ නිසින්නස්ස පන අසුණන්තස්සාපි කතොව හොති උපොසථො. නිමිත්තා කිත්තෙතබ්බාති උපොසථපමුඛස්ස ඛුද්දකානි වා මහන්තානි වා පාසාණඉට්ඨකදාරුඛණ්ඩදණ්ඩකාදීනි යානි කානිචි නිමිත්තානි අබ්භොකාසෙ වා මාළකාදීසු වා යත්ථ කත්ථචි සඤ්ඤං කත්වා කිත්තෙතුං වට්ටති. අථ වා නිමිත්තා කිත්තෙතබ්බාති නිමිත්තුපගා වා අනිමිත්තුපගා වා පරිච්ඡෙදජානනත්ථං කිත්තෙතබ්බා. १४२. 'यतो पातिमोक्खं सुणाति' का अर्थ है कि जहाँ कहीं भी भिक्षुओं के हस्तपाश (हाथ की पहुँच) में बैठकर चूँकि वह पातिमोक्ख सुनता है; इसलिए उसका उपोसथ संपन्न हुआ—यह अर्थ है। और यह बात वस्तु (घटना) के वश से कही गई है, परंतु हस्तपाश में बैठे हुए भिक्षु के लिए, न सुनने पर भी उपोसथ संपन्न ही होता है। 'निमित्ता कित्तेतब्बा' का अर्थ है उपोसथ-भवन के सामने छोटे या बड़े पत्थर, ईंट, लकड़ी के टुकड़े, डंडे आदि जो कोई भी निमित्त हों, खुले आकाश में या माळक आदि में, जहाँ कहीं भी चिह्न बनाकर घोषणा करना उचित है। अथवा, 'निमित्ता कित्तेतब्बा' का अर्थ है कि सीमा के निर्धारण को जानने के लिए निमित्त के योग्य या अयोग्य (पत्थर आदि) की घोषणा करनी चाहिए। ථෙරෙහි භික්ඛූහි පඨමතරං සන්නිපතිතුන්ති එත්ථ සචෙ මහාථෙරො පඨමතරං න ආගච්ඡති, දුක්කටං. සබ්බෙහෙව එකජ්ඣං සන්නිපතිත්වා උපොසථො කාතබ්බොති එත්ථ සචෙ පොරාණකො ආවාසො මජ්ඣෙ විහාරස්ස හොති, පහොති චෙත්ථ භික්ඛූනං නිසජ්ජට්ඨානං, තත්ථ සන්නිපතිත්වා උපොසථො කාතබ්බො. සචෙ පොරාණකො පරිදුබ්බලො චෙව සම්බාධො ච අඤ්ඤො පච්ඡා උට්ඨිතාවාසො අසම්බාධො, තත්ථ උපොසථො කාතබ්බො. 'स्थविर भिक्षुओं द्वारा पहले एकत्रित होना चाहिए'—यहाँ यदि महास्थविर पहले नहीं आते हैं, तो दुष्कृत (दुक्कट) अपराध होता है। 'सभी को एक साथ एकत्रित होकर उपोसथ करना चाहिए'—यहाँ यदि पुराना आवास विहार के मध्य में है और वहाँ भिक्षुओं के बैठने के लिए पर्याप्त स्थान है, तो वहाँ एकत्रित होकर उपोसथ करना चाहिए। यदि पुराना आवास जर्जर और संकीर्ण (तंग) है और बाद में बना दूसरा आवास संकीर्ण नहीं है, तो वहाँ उपोसथ करना चाहिए। යත්ථ වා පන ථෙරො භික්ඛු විහරතීති එත්ථාපි සචෙ ථෙරස්ස විහාරො සබ්බෙසං පහොති, ඵාසුකො හොති, තත්ථ උපොසථො කාතබ්බො. සචෙ පන සො පච්චන්තෙ විසමප්පදෙසෙ හොති, ථෙරස්ස වත්තබ්බං – ‘‘භන්තෙ, තුම්හාකං විහාරො අඵාසුකදෙසො, නත්ථි එත්ථ සබ්බෙසං ඔකාසො[Pg.331], අසුකස්මිං නාම ආවාසෙ ඔකාසො අත්ථි, තත්ථ ගන්තුං වට්ටතී’’ති. සචෙ ථෙරො නාගච්ඡති, තස්ස ඡන්දපාරිසුද්ධිං ආනෙත්වා සබ්බෙසං පහොනකෙ ඵාසුකට්ඨානෙ උපොසථො කාතබ්බො. 'अथवा जहाँ स्थविर भिक्षु विहार करते हैं'—यहाँ भी यदि स्थविर का विहार सभी के लिए पर्याप्त और सुखद है, तो वहाँ उपोसथ करना चाहिए। यदि वह विहार सीमा के अंत में विषम स्थान पर है, तो स्थविर से कहना चाहिए—"भन्ते! आपका विहार असुविधाजनक स्थान पर है, यहाँ सबके लिए स्थान नहीं है, अमुक नामक आवास में स्थान है, वहाँ चलना उचित है।" यदि स्थविर नहीं आते हैं, तो उनका छंद और पारिशुद्धि लाकर, सबके लिए पर्याप्त सुखद स्थान पर उपोसथ करना चाहिए। අවිප්පවාසසීමානුජානනකථා अविप्पवास-सीमा की अनुमति संबंधी कथा। 143. අන්ධකවින්දාති රාජගහතො ගාවුතත්තයෙ අන්ධකවින්දං නාම, තං උපනිස්සාය ථෙරො වසති; තතො රාජගහං උපොසථං ආගච්ඡන්තො. රාජගහඤ්හි පරික්ඛිපිත්වා අට්ඨාරස මහාවිහාරා සබ්බෙ එකසීමා, ධම්මසෙනාපතිනා නෙසං සීමා බද්ධා, තස්මා වෙළුවනෙ සඞ්ඝස්ස සාමග්ගීදානත්ථං ආගච්ඡන්තොති අත්ථො. නදිං තරන්තොති සිප්පිනියං නාම නදිං අතික්කමන්තො. මනං වුළ්හො අහොසීති ඊසකං අප්පත්තවුළ්හභාවො අහොසි. සා කිර නදී ගිජ්ඣකූටතො ඔතරිත්වා චණ්ඩෙන සොතෙන වහති. තත්ථ වෙගෙන ආගච්ඡන්තං උදකං අමනසිකරොන්තො ථෙරො මනං වුළ්හො අහොසි, න පන වුළ්හො, උදකබ්භාහතානිස්ස චීවරානි අල්ලානි ජාතානි. १४३. 'अन्धकविन्द' का अर्थ है राजगृह से तीन गावुत की दूरी पर अन्धकविन्द नामक गाँव है, उसके समीप स्थविर रहते थे; वहाँ से वे उपोसथ के लिए राजगृह आ रहे थे। राजगृह को घेरकर अठारह महाविहार हैं, वे सभी एक ही सीमा वाले हैं, धर्मसेनापति (सारिपुत्र) द्वारा उनकी सीमा बांधी गई थी, इसलिए वेणुवन में संघ को साम्रगी (एकता) देने के लिए आ रहे थे—यह अर्थ है। 'नदी पार करते हुए' का अर्थ है सिप्पिनी नामक नदी को पार करते हुए। 'लगभग बह गए' का अर्थ है कि वे थोड़ा बहने की स्थिति में आ गए थे। वह नदी गृध्रकूट पर्वत से उतरकर तीव्र धारा के साथ बहती है। वहाँ वेग से आते हुए जल का ध्यान न रहने के कारण स्थविर लगभग बह गए थे, किंतु वास्तव में बहे नहीं थे, जल के थपेड़ों से उनके चीवर भीग गए थे। 144. සම්මතා සා සීමා සඞ්ඝෙන තිචීවරෙන අවිප්පවාසා ඨපෙත්වා ගාමඤ්ච ගාමූපචාරඤ්චාති ඉමිස්සා කම්මවාචාය උප්පන්නකාලතො පට්ඨාය භික්ඛූනං පුරිමකම්මවාචා න වට්ටති. අයමෙව හි ථාවරා හොති. භික්ඛුනීනං පන අයං න වට්ටති, පුරිමායෙව වට්ටති. කස්මා? භික්ඛුනිසඞ්ඝො හි අන්තොගාමෙ වසති. යදි එවං සියා, සො එතාය කම්මවාචාය තිචීවරපරිහාරං න ලභෙය්ය, අත්ථි චස්ස පරිහාරො, තස්මා පුරිමායෙව වට්ටති. භික්ඛුනිසඞ්ඝස්ස හි ද්වෙපි සීමායො ලබ්භන්ති. තත්ථ භික්ඛූනං සීමං අජ්ඣොත්ථරිත්වාපි තස්සා අන්තොපි භික්ඛුනීනං සීමං සම්මන්නිතුං වට්ටති. භික්ඛූනම්පි භික්ඛුනිසීමාය එසෙව නයො. න හි තෙ අඤ්ඤමඤ්ඤස්ස කම්මෙ ගණපූරකා හොන්ති, න කම්මවාචං වග්ගං කරොන්ති. එත්ථ ච නිගමනගරානම්පි ගාමෙනෙව සඞ්ගහො වෙදිතබ්බො. १४४. "संघ द्वारा वह सीमा गाँव और गाँव के उपनगरीय क्षेत्र (उपचार) को छोड़कर तीन चीवरों के साथ अविप्पवास (बिना अलग हुए रहने वाली) घोषित की गई है"—इस कर्मवाचा के उत्पन्न होने के समय से भिक्षुओं के लिए पिछली कर्मवाचा मान्य नहीं होती। यही कर्मवाचा स्थायी होती है। किंतु भिक्षुणियों के लिए यह मान्य नहीं है, उनके लिए पिछली ही मान्य है। क्यों? क्योंकि भिक्षुणी संघ गाँव के भीतर रहता है। यदि ऐसा (नई कर्मवाचा) होता, तो वे इस कर्मवाचा के कारण त्रि-चीवर के संरक्षण को प्राप्त नहीं कर पातीं, जबकि उन्हें वह संरक्षण प्राप्त है; इसलिए उनके लिए पिछली ही मान्य है। भिक्षुणी संघ के लिए दोनों ही सीमाएँ प्राप्त होती हैं। वहाँ भिक्षुओं की सीमा को आच्छादित करके या उसके भीतर भी भिक्षुणियों की सीमा निर्धारित करना उचित है। भिक्षुणियों की सीमा में भिक्षुओं के लिए भी यही नियम है। वे एक-दूसरे के कर्म में गण-पूरक (कोरम पूरा करने वाले) नहीं होते और न ही कर्मवाचा को खंडित (वग्ग) करते हैं। यहाँ 'गाँव' शब्द से ही निगमों और नगरों का भी संग्रह समझना चाहिए। ගාමූපචාරොති පරික්ඛිත්තස්ස පරික්ඛෙපො, අපරික්ඛිත්තස්ස පරික්ඛෙපොකාසො. තෙසු අධිට්ඨිතතෙචීවරිකො භික්ඛු පරිහාරං න ලභති. ඉති [Pg.332] භික්ඛූනං අවිප්පවාසසීමා ගාමඤ්ච ගාමූපචාරඤ්ච න ඔත්ථරති, සමානසංවාසකසීමාව ඔත්ථරති. සමානසංවාසකසීමා චෙත්ථ අත්තනො ධම්මතාය ගච්ඡති. අවිප්පවාසසීමා පන යත්ථ සමානසංවාසකසීමා, තත්ථෙව ගච්ඡති. න හි තස්සා විසුං නිමිත්තකිත්තනං අත්ථි, තත්ථ සචෙ අවිප්පවාසාය සම්මුතිකාලෙ ගාමො අත්ථි, තං සා න ඔත්ථරති. සචෙ පන සම්මතාය සීමාය පච්ඡා ගාමො නිවිසති, සොපි සීමාසඞ්ඛ්යමෙව ගච්ඡති. යථා ච පච්ඡා නිවිට්ඨො, එවං පඨමං නිවිට්ඨස්ස පච්ඡා වඩ්ඪිතප්පදෙසොපි සීමාසඞ්ඛ්යමෙව ගච්ඡති. සචෙපි සීමාසම්මුතිකාලෙ ගෙහානි කතානි, පවිසිස්සාමාති ආලයොපි අත්ථි, මනුස්සා පන අප්පවිට්ඨා, පොරාණකගාමං වා සගෙහමෙව ඡඩ්ඩෙත්වා අඤ්ඤත්ථ ගතා, අගාමොයෙව එස, සීමා ඔත්ථරති. සචෙ පන එකම්පි කුලං පවිට්ඨං වා ආගතං වා අත්ථි, ගාමොයෙව සීමා න ඔත්ථරති. 'गामूपचार' का अर्थ है घेरे हुए गाँव का घेरा, और बिना घेरे हुए गाँव के घेरे के योग्य स्थान। उनमें अधिष्ठित त्रि-चीवर वाला भिक्षु (चीवर से अलग होने के दोष से) बचाव प्राप्त नहीं करता। इस प्रकार भिक्षुओं की अविप्पवास-सीमा गाँव और गाँव के उपचार को आच्छादित नहीं करती, केवल समान-संवासक सीमा ही आच्छादित करती है। यहाँ समान-संवासक सीमा अपने स्वभाव से व्याप्त होती है। किंतु अविप्पवास-सीमा वहीं व्याप्त होती है जहाँ समान-संवासक सीमा होती है। क्योंकि उसके लिए अलग से निमित्तों की घोषणा नहीं होती। वहाँ यदि अविप्पवास-सीमा के निर्धारण के समय गाँव विद्यमान है, तो वह उसे आच्छादित नहीं करती। किंतु यदि सीमा निर्धारित होने के बाद गाँव बसता है, तो वह भी सीमा की श्रेणी में ही आता है। जैसे बाद में बसा हुआ गाँव, वैसे ही पहले से बसे हुए गाँव का बाद में विस्तारित क्षेत्र भी सीमा की श्रेणी में ही आता है। यदि सीमा निर्धारण के समय घर बने हुए हों और 'हम प्रवेश करेंगे' ऐसी इच्छा भी हो, किंतु मनुष्यों ने प्रवेश न किया हो, अथवा पुराने गाँव को घरों सहित छोड़कर अन्यत्र चले गए हों, तो वह 'अ-गाँव' (गाँव नहीं) ही है और सीमा उसे आच्छादित करती है। किंतु यदि एक भी कुल (परिवार) प्रविष्ट हुआ हो या वहाँ उपस्थित हो, तो वह 'गाँव' ही है और सीमा उसे आच्छादित नहीं करती। එවඤ්ච පන භික්ඛවෙ තිචීවරෙන අවිප්පවාසො සමූහන්තබ්බොති එත්ථ සමූහනන්තෙන භික්ඛුනා වත්තං ජානිතබ්බං. තත්රිදං වත්තං – ඛණ්ඩසීමාය ඨත්වා අවිප්පවාසසීමා න සමූහන්තබ්බා, තථා අවිප්පවාසසීමාය ඨත්වා ඛණ්ඩසීමාපි. ඛණ්ඩසීමායං පන ඨිතෙන ඛණ්ඩසීමාව සමූහනිතබ්බා, තථා ඉතරාය ඨිතෙන ඉතරා. සීමං නාම ද්වීහි කාරණෙහි සමූහනන්ති පකතියා ඛුද්දකං පුන ආවාසවඩ්ඪනත්ථාය මහතිං වා කාතුං; පකතියා මහතිං පුන අඤ්ඤෙසං විහාරොකාසදානත්ථාය ඛුද්දකං වා කාතුං. තත්ථ සචෙ ඛණ්ඩසීමඤ්ච අවිප්පවාසසීමඤ්ච ජානන්ති, සමූහනිතුඤ්චෙව බන්ධිතුඤ්ච සක්ඛිස්සන්ති. ඛණ්ඩසීමං පන ජානන්තා අවිප්පවාසං අජානන්තාපි සමූහනිතුඤ්චෙව බන්ධිතුඤ්ච සක්ඛිස්සන්ති. ඛණ්ඩසීමං අජානන්තා අවිප්පවාසංයෙව ජානන්තා චෙතියඞ්ගණබොධියඞ්ගණඋපොසථාගාරාදීසු නිරාසඞ්කට්ඨානෙසු ඨත්වා අප්පෙව නාම සමූහනිතුං සක්ඛිස්සන්ති, පටිබන්ධිතුං පන න සක්ඛිස්සන්තෙව. සචෙ බන්ධෙය්යුං, සීමාසම්භෙදං කත්වා විහාරං අවිහාරං කරෙය්යුං, තස්මා න සමූහනිතබ්බා. යෙ පන උභොපි න ජානන්ති, තෙනෙව සමූහනිතුං න බන්ධිතුං සක්ඛිස්සන්ති. අයඤ්හි සීමා නාම කම්මවාචාය වා අසීමා හොති සාසනන්තරධානෙන වා, න ච සක්කා සීමං අජානන්තෙහි කම්මවාචා කාතුං, තස්මා න සමූහනිතබ්බා. සාධුකං පන ඤත්වායෙව සමූහනිතබ්බා ච බන්ධිතබ්බා චාති. हे भिक्षुओं! इस प्रकार तीन चीवरों से अविप्रवास (चीवरों से अलग न रहने की सीमा) का समुद्धात (निवारण) करना चाहिए, यहाँ समुद्धात करने वाले भिक्षु को कर्तव्य (वत्त) जानना चाहिए। वहाँ यह कर्तव्य है—खण्ड-सीमा में खड़े होकर अविप्रवास-सीमा का समुद्धात नहीं करना चाहिए, उसी प्रकार अविप्रवास-सीमा में खड़े होकर खण्ड-सीमा का भी (समुद्धात नहीं करना चाहिए)। परन्तु खण्ड-सीमा में स्थित भिक्षु द्वारा खण्ड-सीमा का ही समुद्धात करना चाहिए, उसी प्रकार दूसरी (अविप्रवास-सीमा) में स्थित द्वारा दूसरी का। सीमा का समुद्धात दो कारणों से किया जाता है—मूलतः छोटी सीमा को पुनः आवास (विहार) बढ़ाने के लिए बड़ी करने हेतु; अथवा मूलतः बड़ी सीमा को पुनः दूसरों को विहार के लिए स्थान देने के उद्देश्य से छोटी करने हेतु। वहाँ यदि वे खण्ड-सीमा और अविप्रवास-सीमा (दोनों) को जानते हैं, तो वे समुद्धात करने और (नई सीमा) बाँधने में समर्थ होंगे। परन्तु खण्ड-सीमा को जानते हुए, अविप्रवास-सीमा को न जानते हुए भी वे समुद्धात करने और बाँधने में समर्थ होंगे। जो खण्ड-सीमा को नहीं जानते किन्तु केवल अविप्रवास-सीमा को ही जानते हैं, वे चैत्य-प्रांगण, बोधि-प्रांगण, उपोसथ-भवन आदि शंकारहित स्थानों में खड़े होकर शायद समुद्धात करने में समर्थ हो जाएँ, किन्तु पुनः बाँधने में समर्थ नहीं होंगे। यदि वे बाँधें, तो सीमा-संकर (सीमाओं का आपस में मिल जाना) करके विहार को अविहार (दोषपूर्ण) बना देंगे, इसलिए (ऐसी स्थिति में) समुद्धात नहीं करना चाहिए। जो दोनों को ही नहीं जानते, वे न तो समुद्धात कर सकेंगे और न ही बाँध सकेंगे। क्योंकि यह सीमा कर्मवाच्य द्वारा अथवा शासन के अन्तर्धान (लुप्त होने) से असीमा (सीमा-रहित) होती है, और सीमा को न जानने वालों द्वारा कर्मवाच्य करना संभव नहीं है, इसलिए समुद्धात नहीं करना चाहिए। भली-भाँति जानकर ही समुद्धात करना चाहिए और बाँधना चाहिए। ගාමසීමාදිකථා ग्राम-सीमा आदि की कथा। 147. එවං [Pg.333] බද්ධසීමාවසෙන සමානසංවාසඤ්ච එකූපොසථභාවඤ්ච දස්සෙත්වා ඉදානි අබද්ධසීමෙසුපි ඔකාසෙසු තං දස්සෙන්තො ‘‘අසම්මතාය, භික්ඛවෙ, සීමාය අට්ඨපිතායා’’තිආදිමාහ. තත්ථ අට්ඨපිතායාති අපරිච්ඡින්නාය. ගාමග්ගහණෙන චෙත්ථ නගරම්පි ගහිතමෙව හොති. තත්ථ යත්තකෙ පදෙසෙ තස්ස ගාමස්ස භොජකා බලිං ලභන්ති, සො පදෙසො අප්පො වා හොතු මහන්තො වා, ගාමසීමාත්වෙව සඞ්ඛ්යං ගච්ඡති. නගරනිගමසීමාසුපි එසෙව නයො. යම්පි එකස්මිංයෙව ගාමඛෙත්තෙ එකං පදෙසං ‘‘අයං විසුං ගාමො හොතූ’’ති පරිච්ඡින්දිත්වා රාජා කස්සචි දෙති, සොපි විසුංගාමසීමා හොතියෙව. තස්මා සා ච ඉතරා ච පකතිගාමනගරනිගමසීමා බද්ධසීමාසදිසායෙව හොන්ති, කෙවලං පන තිචීවරවිප්පවාසපරිහාරං න ලභන්ති. १४७. इस प्रकार बद्ध-सीमा के प्रभाव से समान संवास और एक उपोसथ भाव को दिखाकर, अब अबद्ध-सीमा वाले स्थानों में भी उसे दिखाते हुए 'हे भिक्षुओं! असंमत और अस्थापित सीमा में' इत्यादि कहा। वहाँ 'अस्थापित' का अर्थ है—अपरिच्छिन्न (अनिर्धारित)। यहाँ 'ग्राम' शब्द के ग्रहण से 'नगर' का भी ग्रहण हो जाता है। वहाँ जितने प्रदेश में उस-उस ग्राम के भोजक (शासक/मुखिया) कर (बलि) प्राप्त करते हैं, वह प्रदेश चाहे छोटा हो या बड़ा, वह 'ग्राम-सीमा' की ही संज्ञा प्राप्त करता है। नगर और निगम की सीमाओं में भी यही नियम है। एक ही ग्राम-क्षेत्र में जिस किसी प्रदेश को 'यह अलग ग्राम हो' ऐसा निर्धारित कर राजा किसी को देता है, वह भी अलग ग्राम-सीमा ही होती है। इसलिए वह (विशुं-ग्राम सीमा) और अन्य प्राकृतिक ग्राम-नगर-निगम सीमाएँ बद्ध-सीमा के समान ही होती हैं, केवल वे तीन चीवरों के अविप्रवास के परिहार (दोष-मुक्ति) को प्राप्त नहीं करतीं। එවං ගාමන්තවාසීනං සීමාපරිච්ඡෙදං දස්සෙත්වා ඉදානි ආරඤ්ඤකානං සීමාපරිච්ඡෙදං දස්සෙන්තො ‘‘අගාමකෙ චෙ’’තිආදිමාහ. තත්ථ අගාමකෙ චෙති ගාමනිගමනගරසීමාහි අපරිච්ඡින්නෙ අටවිප්පදෙසෙ. අථ වා අගාමකෙ චෙති විජ්ඣාටවිසදිසෙ අරඤ්ඤෙ භික්ඛු වසති, අථස්ස ඨිතොකාසතො සමන්තා සත්තබ්භන්තරා සමානසංවාසකසීමාති අත්ථො. අයං සීමා තිචීවරවිප්පවාසපරිහාරම්පි ලභති. තත්ථ එකං අබ්භන්තරං අට්ඨවීසති හත්ථප්පමාණං හොති. මජ්ඣෙ ඨිතස්ස සමන්තා සත්තබ්භන්තරා විනිබ්බෙධෙන චුද්දස හොන්ති. සචෙ ද්වෙ සඞ්ඝා විසුං විනයකම්මානි කරොන්ති, ද්වින්නං සත්තබ්භන්තරානං අන්තරෙ අඤ්ඤං එකං සත්තබ්භන්තරං උපචාරත්ථාය ඨපෙතබ්බං. සෙසා සත්තබ්භන්තරසීමකථා මහාවිභඞ්ගෙ උදොසිතසික්ඛාපදවණ්ණනායං වුත්තනයෙන ගහෙතබ්බා. इस प्रकार ग्रामवासियों की सीमा का निर्धारण दिखाकर, अब अरण्यवासियों (वनवासियों) की सीमा का निर्धारण दिखाते हुए 'यदि ग्राम-रहित (वन) में' इत्यादि कहा। वहाँ 'अग़ामके' का अर्थ है—ग्राम, निगम और नगर की सीमाओं से अपरिच्छिन्न वन-प्रदेश में। अथवा 'अग़ामके' का अर्थ है—विन्ध्याचल के वन के समान अरण्य में यदि भिक्षु रहता है, तो उसके खड़े होने के स्थान से चारों ओर सात 'अब्भन्तर' (की दूरी) 'समान संवासक सीमा' है, यह अर्थ है। यह सीमा तीन चीवरों के अविप्रवास के परिहार को भी प्राप्त करती है। वहाँ एक अब्भन्तर अट्ठाईस हाथ (२८ हाथ) के परिमाण का होता है। मध्य में स्थित भिक्षु के चारों ओर सात अब्भन्तर, व्यास (आर-पार) में चौदह होते हैं। यदि दो संघ अलग-अलग विनय-कर्म करते हैं, तो दो सात-अब्भन्तरों के बीच में एक अन्य अब्भन्तर उपचार (सीमाओं के बीच की दूरी) के लिए रखना चाहिए। शेष सात-अब्भन्तर सीमा की कथा महाविभंग में उदोसित-शिक्षापद के वर्णन में कहे गए नियम के अनुसार ग्रहण करनी चाहिए। සබ්බා භික්ඛවෙ නදී අසීමාති යා කාචි නදීලක්ඛණප්පත්තා නදී නිමිත්තානි කිත්තෙත්වා ‘‘එතං බද්ධසීමං කරොමා’’ති කතාපි අසීමාව හොති, සා පන අත්තනො සභාවෙනෙව බද්ධසීමාසදිසා, සබ්බමෙත්ථ සඞ්ඝකම්මං කාතුං වට්ටති. සමුද්දජාතස්සරෙසුපි එසෙව නයො. එත්ථ ච ජාතස්සරො නාම යෙන කෙනචි ඛණිත්වා අකතො සයංජාතසොබ්භො සමන්තතො ආගතෙන උදකෙන පූරිතො තිට්ඨති. 'हे भिक्षुओं! सभी नदियाँ असीमा (अबद्ध-सीमा) हैं'—जो कोई भी नदी के लक्षणों से युक्त नदी है, उसे निमित्तों (चिह्नों) का कीर्तन कर 'इसे बद्ध-सीमा बनाएँ' ऐसा करके बनाया गया हो, तो भी वह असीमा (अबद्ध-सीमा) ही होती है, परन्तु वह अपने स्वभाव से ही बद्ध-सीमा के समान होती है, वहाँ सभी संघ-कर्म करना उचित है। समुद्र और जातस्सर (प्राकृतिक झील) में भी यही नियम है। यहाँ 'जातस्सर' उसे कहते हैं जो किसी के द्वारा खोदकर न बनाया गया हो, स्वयं उत्पन्न गड्ढा हो और चारों ओर से आए हुए जल से भरा रहता हो। එවං [Pg.334] නදීසමුද්දජාතස්සරානං බද්ධසීමාභාවං පටික්ඛිපිත්වා පුන තත්ථ අබද්ධසීමාපඅච්ඡෙදං දස්සෙන්තො ‘‘නදියා වා භික්ඛවෙ’’තිආදිමාහ. තත්ථ යං මජ්ඣිමස්ස පුරිසස්ස සමන්තා උදකුක්ඛෙපාති යං ඨානං මජ්ඣිමස්ස පුරිසස්ස සමන්තතො උදකුක්ඛෙපෙන පරිච්ඡින්නං. කථං පන උදකං උක්ඛිපිතබ්බං? යථා අක්ඛධුත්තා දාරුගුළං ඛිපන්ති, එවං උදකං වා වාලිකං වා හත්ථෙන ගහෙත්වා ථාමමජ්ඣිමෙන පුරිසෙන සබ්බථාමෙන ඛිපිතබ්බං. යත්ථ එවං ඛිත්තං උදකං වා වාලිකා වා පතති, අයමෙකො උදකුක්ඛෙපො. තස්ස අන්තො හත්ථපාසං විජහිත්වා ඨිතො කම්මං කොපෙති. යාව පරිසා වඩ්ඪති, තාව සීමාපි වඩ්ඪති. පරිසපරියන්තතො උදකුක්ඛෙපොයෙව පමාණං. ජාතස්සරසමුද්දෙසුපි එසෙව නයො. इस प्रकार नदी, समुद्र और जातस्सर के बद्ध-सीमा होने का निषेध कर, पुनः वहाँ अबद्ध-सीमा के परिच्छेद (सीमा-निर्धारण) को दिखाते हुए 'नदी में अथवा हे भिक्षुओं' इत्यादि कहा। वहाँ 'जो मध्यम पुरुष के चारों ओर जल-प्रक्षेप (पानी फेंकने की दूरी) है'—अर्थात जो स्थान मध्यम पुरुष के चारों ओर जल फेंकने से निर्धारित होता है। जल कैसे फेंकना चाहिए? जैसे जुआरी लकड़ी की गोली (गोट) फेंकते हैं, वैसे ही जल या बालू को हाथ में लेकर मध्यम शक्ति वाले पुरुष द्वारा पूरी शक्ति से फेंकना चाहिए। जहाँ इस प्रकार फेंका गया जल या बालू गिरता है, वह एक 'उदकुक्खेप' (जल-प्रक्षेप) है। उसके भीतर हस्तपाश को छोड़कर खड़ा हुआ भिक्षु कर्म को बिगाड़ देता है। जितनी परिषद् (सभा) बढ़ती है, उतनी ही सीमा भी बढ़ती है। परिषद् के छोर से जल-प्रक्षेप (की दूरी) ही प्रमाण है। जातस्सर और समुद्र में भी यही नियम है। එත්ථ ච සචෙ නදී නාතිදීඝා හොති, පභවතො පට්ඨාය යාව මුඛද්වාරා සබ්බත්ථ සඞ්ඝො නිසීදති, උදකුක්ඛෙපසීමාකම්මං නත්ථි, සකලාපි නදී එතෙසංයෙව භික්ඛූනං පහොති. යං පන මහාසුමත්ථෙරෙන වුත්තං ‘‘යොජනං පවත්තමානායෙව නදී, තත්රාපි උපරි අද්ධයොජනං පහාය හෙට්ඨා අද්ධයොජනෙ කම්මං කාතුං වට්ටතී’’ති, තං මහාපදුමත්ථෙරෙනෙව පටික්ඛිත්තං. භගවතා හි ‘‘තිමණ්ඩලං පටිච්ඡාදෙත්වා යත්ථ කත්ථචි උත්තරන්තියා භික්ඛුනියා අන්තරවාසකො තෙමියතී’’ති ඉදං නදියා පමාණං වුත්තං, න යොජනං වා අද්ධයොජනං වා. තස්මා යා ඉමස්ස සුත්තස්ස වසෙන පුබ්බෙ වුත්තලක්ඛණා නදී, තස්සා පභවතො පට්ඨාය සඞ්ඝකම්මං කාතුං වට්ටතීති. සචෙ පනෙත්ථ බහූ භික්ඛූ විසුං විසුං කම්මං කරොන්ති, සබ්බෙහි අත්තනො ච අඤ්ඤෙසඤ්ච උදකුක්ඛෙපපරිච්ඡෙදස්ස අන්තරා අඤ්ඤො උදකුක්ඛෙපො සීමන්තරිකත්ථාය ඨපෙතබ්බො. තතො අධිකං වට්ටතියෙව, ඌනකං පන න වට්ටතීති වුත්තං. ජාතස්සරසමුද්දෙසුපි එසෙව නයො. और यहाँ यदि नदी बहुत लंबी नहीं है, तो उद्गम से लेकर मुहाने तक सभी स्थानों पर यदि संघ बैठता है, तो उदकुक्खेप-सीमा कर्म की आवश्यकता नहीं है; पूरी नदी ही इन भिक्षुओं के लिए पर्याप्त है। महासुमतथेर ने जो कहा था कि "नदी केवल एक योजन तक बहने वाली ही होती है, और वहाँ भी ऊपर के आधे योजन को छोड़कर नीचे के आधे योजन में कर्म करना उचित है", उसे महापदमतथेर ने ही अस्वीकार कर दिया है। क्योंकि भगवान ने कहा है कि "तीन मण्डलों को ढँककर जहाँ कहीं भी पार करती हुई भिक्षुणी का अंतरवासक (तहतबंद) भीग जाता है", यह नदी का प्रमाण बताया गया है, न कि एक योजन या आधा योजन। इसलिए इस सूत्र के अनुसार जो पहले बताए गए लक्षणों वाली नदी है, उसके उद्गम से लेकर संघकर्म करना उचित है। यदि यहाँ बहुत से भिक्षु अलग-अलग कर्म करते हैं, तो सभी को अपने और दूसरों के उदकुक्खेप की सीमा के बीच सीमान्तरिक के लिए एक अन्य उदकुक्खेप छोड़ना चाहिए। उससे अधिक होना उचित ही है, किन्तु कम होना उचित नहीं है - ऐसा कहा गया है। प्राकृतिक झील (जातस्सर) और समुद्र के विषय में भी यही नियम है। නදියා පන කම්මං කරිස්සාමාති ගතෙහි සචෙ නදී පරිපුණ්ණා හොති සමතිත්තිකා, උදකසාටිකං නිවාසෙත්වාපි අන්තොනදියංයෙව කම්මං කාතබ්බං. සචෙ න සක්කොන්ති, නාවායපි ඨත්වා කාතබ්බං. ගච්ඡන්තියා පන නාවාය කාතුං න වට්ටති. කස්මා? උදකුක්ඛෙපමත්තමෙව හි සීමා, තං නාවා සීඝමෙව අතික්කාමෙති. එවං සති අඤ්ඤිස්සා සීමාය ඤත්ති අඤ්ඤිස්සා අනුසාවනා හොති, තස්මා නාවං අරිත්තෙන වා ඨපෙත්වා පාසාණෙ වා ලම්බිත්වා [Pg.335] අන්තොනදියං ජාතරුක්ඛෙ වා බන්ධිත්වා කම්මං කාතබ්බං. අන්තොනදියං බද්ධඅට්ටකෙපි අන්තොනදියං ජාතරුක්ඛෙපි ඨිතෙහි කාතුං වට්ටති. यदि नदी में कर्म करने के विचार से गए भिक्षुओं को नदी जल से भरी हुई और किनारों के बराबर मिले, तो जल-शाटिका (नहाने का वस्त्र) पहनकर भी नदी के भीतर ही कर्म करना चाहिए। यदि वे समर्थ न हों, तो नाव पर स्थित होकर भी कर्म करना चाहिए। किन्तु चलती हुई नाव पर कर्म करना उचित नहीं है। क्यों? क्योंकि उदकुक्खेप (जल-प्रक्षेप) की मात्रा ही सीमा है, और नाव उसे शीघ्र ही पार कर जाती है। ऐसा होने पर ज्ञप्ति एक सीमा में और अनुसावन दूसरी सीमा में हो जाता है, इसलिए नाव को चप्पू (या बल्ली) से रोककर, या पत्थरों से बाँधकर लटकाकर, अथवा नदी के भीतर उगे हुए वृक्ष से बाँधकर कर्म करना चाहिए। नदी के भीतर बने हुए मचान (अट्टक) पर या नदी के भीतर उगे हुए वृक्ष पर स्थित होकर कर्म करना उचित है। සචෙ පන රුක්ඛස්ස සාඛා වා තතො නික්ඛන්තපාරොහො වා බහිනදීතීරෙ විහාරසීමාය වා ගාමසීමාය වා පතිට්ඨිතො, සීමං වා සොධෙත්වා සාඛං වා ඡින්දිත්වා කම්මං කාතබ්බං. බහිනදීතීරෙ ජාතරුක්ඛස්ස අන්තොනදියං පවිට්ඨසාඛාය වා පාරොහෙ වා නාවං බන්ධිත්වා කම්මං කාතුං න වට්ටති. කරොන්තෙහි සීමා වා සොධෙතබ්බා, ඡින්දිත්වා වාස්ස බහිපතිට්ඨිතභාවො නාසෙතබ්බො. නදීතීරෙ පන ඛාණුකං කොට්ටෙත්වා තත්ථ බද්ධනාවාය න වට්ටතියෙව. यदि वृक्ष की शाखा या उससे निकली हुई जटा (परोह) नदी के किनारे से बाहर विहार-सीमा या ग्राम-सीमा में स्थित हो, तो सीमा का शोधन करके या शाखा को काटकर कर्म करना चाहिए। नदी के किनारे से बाहर उगे हुए वृक्ष की नदी के भीतर प्रविष्ट शाखा या जटा में नाव को बाँधकर कर्म करना उचित नहीं है। कर्म करने वालों को या तो सीमा का शोधन करना चाहिए, या उसे काटकर उसके बाहर स्थित होने के भाव को नष्ट कर देना चाहिए। नदी के किनारे खूँटा गाड़कर उसमें बँधी हुई नाव पर कर्म करना सर्वथा अनुचित है। නදියං සෙතුං කරොන්ති, සචෙ අන්තොනදියංයෙව සෙතු වා සෙතුපාදා වා, සෙතුම්හි ඨිතෙහි කම්මං කාතුං වට්ටති. සචෙ පන සෙතු වා සෙතුපාදා වා බහිතීරෙ පතිට්ඨිතා, කම්මං කාතුං න වට්ටති, සීමං සොධෙත්වා කාතබ්බං. අථ සෙතුපාදා අන්තො, සෙතු පන උභින්නම්පි තීරානං උපරිආකාසෙ ඨිතො, වට්ටති. අන්තොනදියං පාසාණො වා දීපකො වා හොති, තස්ස යත්තකං පදෙසං පුබ්බෙ වුත්තප්පකාරෙ පකතිවස්සකාලෙ වස්සානස්ස චතූසු මාසෙසු උදකං ඔත්ථරති, සො නදීසඞ්ඛ්යමෙව ගච්ඡති. අතිවුට්ඨිකාලෙ පන ඔඝෙන ඔත්ථටොකාසො න ගහෙතබ්බො, සො හි ගාමසීමාසඞ්ඛ්යමෙව ගච්ඡති. नदी में पुल बनाते हैं; यदि पुल या पुल के खंभे नदी के भीतर ही हों, तो पुल पर स्थित होकर कर्म करना उचित है। यदि पुल या पुल के खंभे किनारे के बाहर स्थित हों, तो कर्म करना उचित नहीं है; सीमा का शोधन करके ही कर्म करना चाहिए। यदि पुल के खंभे भीतर हों, किन्तु पुल दोनों किनारों के ऊपर आकाश में स्थित हो, तो उचित है। नदी के भीतर पत्थर या द्वीप होता है; उसके जितने भाग को पहले बताए गए प्रकार से सामान्य वर्षा काल के चार महीनों में जल ढँक लेता है, वह नदी की श्रेणी में ही आता है। किन्तु अत्यधिक वर्षा के समय बाढ़ के पानी से ढँके हुए स्थान को नहीं लेना चाहिए, क्योंकि वह ग्राम-सीमा की श्रेणी में ही आता है। නදිතො මාතිකං නීහරන්තා නදියං ආවරණං කරොන්ති, තඤ්චෙ ඔත්ථරිත්වා වා විනිබ්බිජ්ඣිත්වා වා උදකං ගච්ඡති, සබ්බත්ථ පවත්තනට්ඨානෙ කම්මං කාතුං වට්ටති. සචෙ පන ආවරණෙන වා කොට්ටකබන්ධනෙන වා සොතං පච්ඡිජ්ජති, උදකං නප්පවත්තති, අප්පවත්තනට්ඨානෙ කම්මං කාතුං න වට්ටති. ආවරණමත්ථකෙපි කාතුං න වට්ටති. සචෙ කොචි ආවරණප්පදෙසො පුබ්බෙ වුත්තපාසාණදීපකප්පදෙසො විය උදකෙන අජ්ඣොත්ථරියති, තත්ථ වට්ටති. සො හි නදීසඞ්ඛ්යමෙව ගච්ඡති. නදිං විනාසෙත්වා තළාකං කරොන්ති, හෙට්ඨා පාළි බද්ධා, උදකං ආගන්ත්වා තළාකං පූරෙත්වා තිට්ඨති, එත්ථ කම්මං කාතුං න වට්ටති. උපරි පවත්තනට්ඨානෙ හෙට්ඨා ච ඡඩ්ඩිතමොදකං නදිං ඔත්ථරිත්වා සන්දනට්ඨානතො පට්ඨාය වට්ටති. දෙවෙ අවස්සන්තෙ හෙමන්තගිම්හෙසු වා සුක්ඛනදියාපි වට්ටති. නදිතො නීහටමාතිකාය න වට්ටති. සචෙ [Pg.336] සා කාලන්තරෙන භිජ්ජිත්වා නදී හොති, වට්ටති. කාචි නදී කාලන්තරෙන උප්පතිත්වා ගාමනිගමසීමං ඔත්ථරිත්වා පවත්තති, නදීයෙව හොති, කම්මං කාතුං වට්ටති. සචෙ පන විහාරසීමං ඔත්ථරති, විහාරසීමාත්වෙව සඞ්ඛ්යං ගච්ඡති. नदी से नहर निकालते समय नदी में बाँध (आवरण) बनाते हैं; यदि जल उसे ऊपर से ढँककर या उसे भेदकर बहता है, तो सभी बहने वाले स्थानों पर कर्म करना उचित है। यदि बाँध या मिट्टी के टीले (कोट्टक-बन्ध) से जल की धारा कट जाती है और जल नहीं बहता है, तो न बहने वाले स्थान पर कर्म करना उचित नहीं है। बाँध के ऊपर भी कर्म करना उचित नहीं है। यदि बाँध का कोई भाग पहले बताए गए पत्थर या द्वीप के समान जल से ढँक जाता है, तो वहाँ कर्म करना उचित है। क्योंकि वह नदी की श्रेणी में ही आता है। नदी को नष्ट करके तालाब बनाते हैं, नीचे की ओर मेड़ (पालि) बँधी होती है, जल आकर तालाब को भरकर ठहर जाता है, तो यहाँ कर्म करना उचित नहीं है। ऊपर बहने वाले स्थान पर और नीचे छोड़े गए जल के नदी में उतरकर बहने के स्थान से लेकर कर्म करना उचित है। वर्षा न होने पर हेमन्त और ग्रीष्म ऋतु में सूखी नदी में भी कर्म करना उचित है। नदी से निकाली गई नहर में उचित नहीं है। यदि वह नहर समय बीतने पर (किनारा) टूटकर नदी बन जाती है, तो उचित है। कोई नदी समय बीतने पर उमड़कर ग्राम या निगम की सीमा को ढँककर बहती है, तो वह नदी ही होती है, वहाँ कर्म करना उचित है। किन्तु यदि वह विहार-सीमा को ढँक लेती है, तो वह विहार-सीमा की श्रेणी में ही आती है। සමුද්දෙපි කම්මං කරොන්තෙහි යං පදෙසං උද්ධං වඩ්ඪනඋදකං වා පකතිවීචි වා වෙගෙන ආගන්ත්වා ඔත්ථරති, තත්ථ කාතුං න වට්ටති. යස්මිං පන පදෙසෙ පකතිවීචියො ඔත්ථරිත්වා සණ්ඨහන්ති, සො උදකන්තතො පට්ඨාය අන්තොසමුද්දො නාම, තත්ථ ඨිතෙහි කම්මං කාතබ්බං. සචෙ ඌමිවෙගො බාධති, නාවාය වා අට්ටකෙ වා ඨත්වා කාතබ්බං. තෙසු විනිච්ඡයො නදියං වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බො. සමුද්දෙ පිට්ඨිපාසාණො හොති, තං කදාචි ඌමියො ආගන්ත්වා ඔත්ථරන්ති, කදාචි න ඔත්ථරන්ති, තත්ථ කම්මං කාතුං න වට්ටති, සො හි ගාමසීමාසඞ්ඛ්යමෙව ගච්ඡති. සචෙ පන වීචීසු ආගතාසුපි අනාගතාසුපි පකතිඋදකෙනෙව ඔත්ථරියති, වට්ටති. දීපකො වා පබ්බතො වා හොති, සො චෙ දූරෙ හොති මච්ඡබන්ධානං අගමනපථෙ, අරඤ්ඤසීමාසඞ්ඛ්යමෙව ගච්ඡති. තෙසං ගමනපරියන්තස්ස ඔරතො පන ගාමසීමාසඞ්ඛ්යං ගච්ඡති. තත්ථ ගාමසීමං අසොධෙත්වා කම්මං කාතුං න වට්ටති. සමුද්දො ගාමසීමං වා නිගමසීමං වා ඔත්ථරිත්වා තිට්ඨති, සමුද්දොව හොති, තත්ථ කම්මං කාතුං වට්ටති. සචෙ පන විහාරසීමං ඔත්ථරති, විහාරසීමාත්වෙව සඞ්ඛ්යං ගච්ඡති. समुद्र में भी संघकर्म करते हुए भिक्षुओं को, जिस स्थान पर ऊपर चढ़ता हुआ जल (ज्वार) या प्राकृतिक लहरें वेग से आकर ढक लेती हैं, वहाँ कर्म करना उचित नहीं है। परन्तु जिस स्थान पर प्राकृतिक लहरें ढककर स्थिर हो जाती हैं, वह जल के किनारे से लेकर 'अन्तःसमुद्र' कहलाता है; वहाँ स्थित होकर कर्म करना चाहिए। यदि लहरों का वेग बाधा डालता है, तो नाव या मचान (अट्टक) पर स्थित होकर कर्म करना चाहिए। उनके विषय में विनिश्चय नदी के प्रकरण में कहे गए नियम के अनुसार ही समझना चाहिए। समुद्र में शिलातल (पीठपाषाण) होता है, जिसे कभी लहरें आकर ढक लेती हैं और कभी नहीं ढकतीं; वहाँ कर्म करना उचित नहीं है, क्योंकि वह ग्राम-सीमा की श्रेणी में ही आता है। परन्तु यदि लहरों के आने या न आने पर भी वह प्राकृतिक जल से ही ढका रहता है, तो वहाँ कर्म करना उचित है। यदि कोई द्वीप या पर्वत हो, और वह मछुआरों के आने-जाने के मार्ग से दूर हो, तो वह अरण्य-सीमा की श्रेणी में आता है। परन्तु उनके (मछुआरों के) गमन की सीमा के इस ओर (भीतर) होने पर वह ग्राम-सीमा की श्रेणी में आता है। वहाँ ग्राम-सीमा का शोधन किए बिना कर्म करना उचित नहीं है। यदि समुद्र ग्राम-सीमा या निगम-सीमा को ढककर स्थित रहता है, तो वह समुद्र ही होता है, वहाँ कर्म करना उचित है। परन्तु यदि वह विहार-सीमा को ढकता है, तो वह विहार-सीमा की ही श्रेणी में आता है। ජාතස්සරෙ කම්මං කරොන්තෙහිපි යත්ථ පුබ්බෙ වුත්තප්පකාරෙ වස්සකාලෙ වස්සෙ පච්ඡින්නමත්තෙ පිවිතුං වා හත්ථපාදෙ වා ධොවිතුං උදකං න හොති, සුක්ඛති, අයං න ජාතස්සරො, ගාමඛෙත්තසඞ්ඛ්යමෙව ගච්ඡති, තත්ථ කම්මං න කාතබ්බං. යත්ථ පන වුත්තප්පකාරෙ වස්සකාලෙ උදකං සන්තිට්ඨති, අයමෙව ජාතස්සරො. තස්ස යත්තකෙ පදෙසෙ වස්සානං චාතුමාසෙ උදකං තිට්ඨති, තත්ථ කම්මං කාතුං වට්ටති. සචෙ ගම්භීරං උදකං, අට්ටකං බන්ධිත්වා තත්ථ ඨිතෙහිපි ජාතස්සරස්ස අන්තො ජාතරුක්ඛම්හි බද්ධඅට්ටකෙපි කාතුං වට්ටති. පිට්ඨිපාසාණදීපකෙසු පනෙත්ථ නදියං වුත්තසදිසොව විනිච්ඡයො. සමවස්සදෙවකාලෙ පහොනකජාතස්සරො පන සචෙපි දුබ්බුට්ඨිකාලෙ වා ගිම්හහෙමන්තෙසු වා සුක්ඛති, නිරුදකො හොති, තත්ථ සඞ්ඝකම්මං කාතුං වට්ටති. යං අන්ධකට්ඨකථායං වුත්තං ‘‘සබ්බො ජාතස්සරො සුක්ඛො අනොදකො[Pg.337], ගාමඛෙත්තංයෙව භජතී’’ති, තං න ගහෙතබ්බං. සචෙ පනෙත්ථ උදකත්ථාය ආවාටං වා පොක්ඛරණීආදීනි වා ඛණන්ති, තං ඨානං අජාතස්සරො හොති, ගාමසීමාසඞ්ඛ්යං ගච්ඡති. ලාබුතිපුසකාදිවප්පෙ කතෙපි එසෙව නයො. जातस्सर (प्राकृतिक झील) में कर्म करने वालों के लिए भी, जहाँ पहले बताए गए वर्षाकाल में वर्षा के रुकते ही पीने के लिए या हाथ-पैर धोने के लिए जल नहीं रहता और वह सूख जाता है, तो वह जातस्सर नहीं है; वह ग्राम-क्षेत्र की श्रेणी में ही आता है, वहाँ कर्म नहीं करना चाहिए। परन्तु जहाँ पूर्वोक्त वर्षाकाल में जल बना रहता है, वही जातस्सर है। उसके जितने भाग में वर्षा के चार महीनों तक जल रहता है, वहाँ कर्म करना उचित है। यदि जल गहरा हो, तो मचान बाँधकर उस पर स्थित होकर, या जातस्सर के भीतर उगे हुए वृक्ष पर बँधे मचान पर स्थित होकर भी कर्म करना उचित है। यहाँ शिलातलों और द्वीपों के विषय में नदी के प्रकरण में कहे गए समान ही विनिश्चय है। सामान्य वर्षा के समय जो जातस्सर होने योग्य है, वह यदि अकाल (सूखे) के समय या ग्रीष्म और हेमन्त ऋतुओं में सूख जाता है और जलरहित हो जाता है, तो भी वहाँ संघकर्म करना उचित है। अन्धक-अट्ठकथा में जो कहा गया है कि 'सभी जातस्सर सूखने और जलरहित होने पर ग्राम-क्षेत्र के ही अंतर्गत हो जाते हैं', उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। परन्तु यदि यहाँ जल के लिए गड्ढा या पुष्करिणी आदि खोदते हैं, तो वह स्थान अ-जातस्सर (कृत्रिम) हो जाता है और ग्राम-सीमा की श्रेणी में आता है। लौकी, ककड़ी आदि की खेती करने पर भी यही नियम है। සචෙ පන තං පූරෙත්වා ථලං වා කරොන්ති, එකස්මිං දිසාභාගෙ පාළිං බන්ධිත්වා සබ්බමෙව තං මහාතළාකං වා කරොන්ති, සබ්බොපි අජාතස්සරො හොති, ගාමසීමාසඞ්ඛ්යමෙව ගච්ඡති. ලොණීපි ජාතස්සරසඞ්ඛ්යමෙව ගච්ඡති. වස්සිකෙ චත්තාරො මාසෙ උදකට්ඨානොකාසෙ කම්මං කාතුං වට්ටතීති. परन्तु यदि उसे भरकर स्थल बना देते हैं, या एक दिशा में मेढ़ (पालि) बाँधकर उस पूरे को विशाल तालाब (तड़ाग) बना देते हैं, तो वह सब अ-जातस्सर हो जाता है और ग्राम-सीमा की श्रेणी में ही आता है। खारी नदी (लोणी) भी जातस्सर की श्रेणी में ही आती है। वर्षा के चार महीनों में जल के स्थान वाले क्षेत्र में कर्म करना उचित है। 148. සීමාය සීමං සම්භින්දන්තීති අත්තනො සීමාය පරෙසං බද්ධසීමං සම්භින්දන්ති. සචෙ හි පොරාණකස්ස විහාරස්ස පුරත්ථිමාය දිසාය අම්බො චෙව ජම්බූ චාති ද්වෙ රුක්ඛා අඤ්ඤමඤ්ඤං සංසට්ඨවිටපා හොන්ති, තෙසු අම්බස්ස පච්ඡිමදිසාභාගෙ ජම්බූ. විහාරසීමා ච ජම්බුං අන්තො කත්වා අම්බං කිත්තෙත්වා බද්ධා හොති, අථ පච්ඡා තස්ස විහාරස්ස පුරත්ථිමාය දිසාය විහාරං කත්වා සීමං බන්ධන්තා තං අම්බං අන්තො කත්වා ජම්බුං කිත්තෙත්වා බන්ධන්ති, සීමාය සීමා සම්භින්නා හොති. එවං ඡබ්බග්ගියා අකංසු, තෙනාහ – ‘‘සීමාය සීමං සම්භින්දන්තී’’ති. १४८. 'सीमा से सीमा को मिलाते हैं' का अर्थ है अपनी सीमा से दूसरों की बद्ध-सीमा को मिला देना। यदि किसी पुराने विहार की पूर्व दिशा में आम और जामुन के दो वृक्ष हों जिनकी शाखाएँ आपस में मिली हुई हों, उनमें से आम के पश्चिम भाग में जामुन का वृक्ष हो; और विहार की सीमा जामुन को भीतर रखकर और आम को बाहर छोड़कर बाँधी गई हो; फिर बाद में उस विहार की पूर्व दिशा में नया विहार बनाकर सीमा बाँधने वाले भिक्षु उस आम को भीतर रखकर और जामुन को बाहर छोड़कर सीमा बाँधते हैं, तो सीमा से सीमा मिल जाती है। छब्बग्गीय भिक्षुओं ने ऐसा ही किया था, इसीलिए कहा गया है - 'सीमा से सीमा को मिलाते हैं'। සීමාය සීමං අජ්ඣොත්ථරන්තීති අත්තනො සීමාය පරෙසං බද්ධසීමං අජ්ඣොත්ථරන්ති; 'सीमा से सीमा को आच्छादित करते हैं' का अर्थ है अपनी सीमा से दूसरों की बद्ध-सीमा को ढक लेना (अतिक्रमण करना)। පරෙසං බද්ධසීමං සකලං වා තස්සා පදෙසං වා අන්තො කත්වා අත්තනො සීමං බන්ධන්ති. සීමන්තරිකං ඨපෙත්වා සීමං සම්මන්නිතුන්ති එත්ථ සචෙ පඨමතරං කතස්ස විහාරස්ස සීමා අසම්මතා හොති, සීමාය උපචාරො ඨපෙතබ්බො. සචෙ සම්මතා හොති, පච්ඡිමකොටියා හත්ථමත්තා සීමන්තරිකා ඨපෙතබ්බා. කුරුන්දියං විදත්ථිමත්තම්පි, මහාපච්චරියං චතුරඞ්ගුලමත්තම්පි වට්ටතීති වුත්තං. එකරුක්ඛොපි ච ද්වින්නං සීමානං නිමිත්තං හොති, සො පන වඩ්ඪන්තො සීමාසඞ්කරං කරොති, තස්මා න කාතබ්බො. दूसरों की बद्ध-सीमा को पूर्ण रूप से या उसके एक भाग को भीतर रखकर अपनी सीमा बाँधते हैं। 'सीमान्तरिका छोड़कर सीमा सम्मत करनी चाहिए' - यहाँ यदि पहले बने हुए विहार की सीमा अभी सम्मत (निर्धारित) नहीं हुई है, तो सीमा का उपचार (परिसर) छोड़ना चाहिए। यदि वह सम्मत हो चुकी है, तो अंतिम सीमा से एक हाथ की सीमान्तरिका छोड़नी चाहिए। कुरुन्दी अट्ठकथा में एक बित्ता (विदत्थि) मात्र भी, और महाप्रत्यय अट्ठकथा में चार अंगुल मात्र भी उचित बताया गया है। एक वृक्ष भी दो सीमाओं का निमित्त (चिह्न) हो सकता है, किन्तु वह बढ़ते हुए सीमाओं के संकर (मिश्रण) का कारण बनता है, इसलिए उसे निमित्त नहीं बनाना चाहिए। උපොසථභෙදාදිකථා उपोसथ-भेद आदि की कथा 149. චාතුද්දසිකො ච පන්නරසිකො චාති එත්ථ චාතුද්දසිකස්ස පුබ්බකිච්චෙ ‘‘අජ්ජුපොසථො චාතුද්දසො’’ති වත්තබ්බං. १४९. 'चातुर्दशी और पञ्चदशी' - यहाँ चातुर्दशी उपोसथ के पूर्वकृत्य में 'आज चौदस का उपोसथ है' (अज्जुपोसथो चातुद्दसो) ऐसा कहना चाहिए। අධම්මෙන වග්ගන්තිආදීසු [Pg.338] සචෙ එකස්මිං විහාරෙ චතූසු භික්ඛූසු වසන්තෙසු එකස්ස ඡන්දපාරිසුද්ධිං ආහරිත්වා තයො පාරිසුද්ධිඋපොසථං කරොන්ති, තීසු වා වසන්තෙසු එකස්ස ඡන්දපාරිසුද්ධිං ආහරිත්වා ද්වෙ පාතිමොක්ඛං උද්දිසන්ති, අධම්මෙන වග්ගං උපොසථකම්මං හොති. සචෙ පන චත්තාරොපි සන්නිපතිත්වා පාරිසුද්ධිඋපොසථං කරොන්ති, තයො වා ද්වෙ වා පාතිමොක්ඛං උද්දිසන්ති, අධම්මෙන සමග්ගං නාම හොති. සචෙ චතූසු ජනෙසු එකස්ස පාරිසුද්ධිං ආහරිත්වා තයො පාතිමොක්ඛං උද්දිසන්ති, තීසු වා ජනෙසු එකස්ස පාරිසුද්ධිං ආහරිත්වා ද්වෙ පාරිසුද්ධිඋපොසථං කරොන්ති, ධම්මෙන වග්ගං නාම හොති. සචෙ පන චත්තාරො එකත්ථ වසන්තා සබ්බෙව සන්නිපතිත්වා පාතිමොක්ඛං උද්දිසන්ති, තයො පාරිසුද්ධිඋපොසථං කරොන්ති, ද්වෙ අඤ්ඤමඤ්ඤං පාරිසුද්ධිඋපොසථං කරොන්ති, ධම්මෙන සමග්ගං නාම හොතීති. 'अधम्मेन वग्गं' आदि में विनिश्चय इस प्रकार समझना चाहिए। यदि एक विहार में चार भिक्षु रहते हों और एक की छन्द-पारिशुद्धि लाकर तीन भिक्षु पारिशुद्धि-उपोसथ करते हैं, या तीन के रहने पर एक की छन्द-पारिशुद्धि लाकर दो भिक्षु पातिमोक्ख का पाठ करते हैं, तो वह 'अधर्म से वर्ग' (अधम्मेन वग्ग) उपोसथ-कर्म होता है। लेकिन यदि चारों ही एकत्रित होकर पारिशुद्धि-उपोसथ करते हैं, या तीन अथवा दो पातिमोक्ख का पाठ करते हैं, तो वह 'अधर्म से समग्र' (अधम्मेन समग्ग) कहलाता है। यदि चार व्यक्तियों में से एक की पारिशुद्धि लाकर तीन पातिमोक्ख का पाठ करते हैं, या तीन व्यक्तियों में से एक की पारिशुद्धि लाकर दो पारिशुद्धि-उपोसथ करते हैं, तो वह 'धर्म से वर्ग' (धम्मेन वग्ग) कहलाता है। यदि चारों एक ही स्थान पर रहते हुए सभी एकत्रित होकर पातिमोक्ख का पाठ करते हैं, या तीन पारिशुद्धि-उपोसथ करते हैं, या दो परस्पर पारिशुद्धि-उपोसथ करते हैं, तो वह 'धर्म से समग्र' (धम्मेन समग्ग) होता है। පාතිමොක්ඛුද්දෙසකථා पातिमोक्खुद्देसकथा (पातिमोक्ख के पाठ की कथा)। 150. නිදානං උද්දිසිත්වා අවසෙසං සුතෙන සාවෙතබ්බන්ති ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො…පෙ… ආවිකතා හිස්ස ඵාසු හොතී’’ති ඉමං නිදානං උද්දිසිත්වා ‘‘උද්දිට්ඨං ඛො ආයස්මන්තො නිදානං, තත්ථායස්මන්තෙ පුච්ඡාමි – කච්චිත්ථ පරිසුද්ධා, දුතියම්පි පුච්ඡාමි…පෙ… එවමෙතං ධාරයාමීති. සුතා ඛො පනායස්මන්තෙහි චත්තාරො පාරාජිකා ධම්මා…පෙ… අවිවදමානෙහි සික්ඛිතබ්බ’’න්ති එවං අවසෙසං සුතෙන සාවෙතබ්බං. එතෙන නයෙන සෙසාපි චත්තාරො පාතිමොක්ඛුද්දෙසා වෙදිතබ්බා. १५०. निदान का पाठ करके शेष को 'सुतेन' (सुना गया) पद से सुनाना चाहिए— "भन्ते! संघ मेरी बात सुने... प्रकट करने से उसे सुख होता है"—इस निदान का पाठ करके, "आयुष्मानों! निदान का पाठ कर दिया गया है, वहाँ मैं आयुष्मानों से पूछता हूँ—क्या आप शुद्ध हैं? दूसरी बार भी पूछता हूँ... इस प्रकार मैं इसे धारण करता हूँ।" तथा "आयुष्मानों द्वारा चार पाराजिक धर्म सुने गए हैं... बिना विवाद किए सीखना चाहिए"—इस प्रकार शेष पातिमोक्ख को 'सुतेन' पद से सुनाना चाहिए। इसी विधि से शेष चार पातिमोक्ख-उद्देशों को भी जानना चाहिए। සවරභයන්ති අටවිමනුස්සභයං. රාජන්තරායොතිආදීසු සචෙ භික්ඛූසු ‘‘උපොසථං කරිස්සාමා’’ති නිසින්නෙසු රාජා ආගච්ඡති, අයං රාජන්තරායො. චොරා ආගච්ඡන්ති, අයං චොරන්තරායො. දවදාහො වා ආගච්ඡති, ආවාසෙ වා අග්ගි උට්ඨහති, අයං අග්ගන්තරායො. මෙඝො වා උට්ඨෙති, ඔඝො වා ආගච්ඡති, අයං උදකන්තරායො. බහූ මනුස්සා ආගච්ඡන්ති, අයං මනුස්සන්තරායො. භික්ඛුං යක්ඛො ගණ්හාති, අයං අමනුස්සන්තරායො. බ්යග්ඝාදයො චණ්ඩමිගා ආගච්ඡන්ති, අයං වාළන්තරායො. භික්ඛුං සප්පාදයො ඩංසන්ති, අයං සරීසපන්තරායො. භික්ඛු ගිලානො වා හොති, කාලං වා කරොති, වෙරිනො වා තං මාරෙතුකාමා ගණ්හන්ති, අයං [Pg.339] ජීවිතන්තරායො. මනුස්සා එකං වා බහූ වා භික්ඛූ බ්රහ්මචරියා චාවෙතුකාමා ගණ්හන්ති, අයං බ්රහ්මචරියන්තරායො. එවරූපෙසු අන්තරායෙසු සංඛිත්තෙන පාතිමොක්ඛො උද්දිසිතබ්බො, පඨමො වා උද්දෙසො උද්දිසිතබ්බො, ආදිම්හි ද්වෙ තයො චත්තාරො වා. එත්ථ ච දුතියාදීසු උද්දෙසෙසු යස්මිං අපරියොසිතෙ අන්තරායො හොති, සොපි සුතෙනෙව සාවෙතබ්බො. 'सवरभय' का अर्थ है वन-मनुष्यों (डाकुओं) का भय। 'राजन्तरायो' आदि में विनिश्चय इस प्रकार जानना चाहिए: यदि भिक्षुओं के "हम उपोसथ करेंगे" कहकर बैठने पर राजा आ जाता है, तो यह 'राज-अन्तराय' है। यदि चोर आ जाते हैं, तो यह 'चोर-अन्तराय' है। यदि दावानल आ जाए या आवास में आग लग जाए, तो यह 'अग्नि-अन्तराय' है। यदि बादल घिर आएँ या बाढ़ आ जाए, तो यह 'उदक-अन्तराय' है। यदि बहुत से मनुष्य आ जाएँ, तो यह 'मनुष्य-अन्तराय' है। यदि किसी भिक्षु को यक्ष पकड़ ले, तो यह 'अमनुष्य-अन्तराय' है। यदि व्याघ्र आदि हिंसक पशु आ जाएँ, तो यह 'व्याल-अन्तराय' है। यदि भिक्षु को सर्प आदि डस लें, तो यह 'सरीसृप-अन्तराय' है। यदि भिक्षु बीमार हो जाए, या उसकी मृत्यु हो जाए, या शत्रु उसे मारने की इच्छा से पकड़ लें, तो यह 'जीवित-अन्तराय' है। यदि मनुष्य एक या अनेक भिक्षुओं को ब्रह्मचर्य से भ्रष्ट करने की इच्छा से पकड़ लें, तो यह 'ब्रह्मचर्य-अन्तराय' है। ऐसे अन्तरायों के होने पर संक्षेप में पातिमोक्ख का पाठ करना चाहिए, या तो पहला उद्देश, या आदि के दो, तीन या चार उद्देशों का पाठ करना चाहिए। और यहाँ दूसरे आदि उद्देशों में से जिसके समाप्त होने से पहले अन्तराय आ जाए, उसे भी 'सुतेन' पद से ही सुनाना चाहिए। අනජ්ඣිට්ඨාති අනාණත්තා අයාචිතා වා. අජ්ඣෙසනා චෙත්ථ සඞ්ඝෙන සම්මතධම්මජ්ඣෙසකායත්තා වා සඞ්ඝත්ථෙරායත්තා වා, තස්මිං ධම්මජ්ඣෙසකෙ අසති සඞ්ඝත්ථෙරං ආපුච්ඡිත්වා වා තෙන යාචිතො වා භාසිතුං ලභති. සඞ්ඝත්ථෙරෙනාපි සචෙ විහාරෙ බහූ ධම්මකථිකා හොන්ති, වාරපටිපාටියා වත්තබ්බා – ‘‘ත්වං ධම්මං භණ, ධම්මං කථෙහි, ධම්මදානං දෙහී’’ති වා වුත්තෙන තීහිපි විධීහි ධම්මො භාසිතබ්බො. ‘‘ඔසාරෙහී’’ති වුත්තො පන ඔසාරෙතුමෙව ලභති, ‘‘කථෙහී’’ති වුත්තො කථෙතුමෙව, ‘‘සරභඤ්ඤං භණාහී’’ති වුත්තො සරභඤ්ඤමෙව. සඞ්ඝත්ථෙරොපි ච උච්චතරෙ ආසනෙ නිසින්නො යාචිතුං න ලභති. සචෙ උපජ්ඣායො චෙව සද්ධිවිහාරිකො ච හොන්ති, උපජ්ඣායො ච නං උච්චාසනෙ නිසින්නො ‘‘භණාහී’’ති වදති, සජ්ඣායං අධිට්ඨහිත්වා භණිතබ්බං. සචෙ පනෙත්ථ දහරා භික්ඛූ හොන්ති, තෙසං ‘‘භණාමී’’ති භණිතබ්බං. 'अनज्झिट्ठा' का अर्थ है बिना आज्ञा दिए या बिना प्रार्थना किए। यहाँ 'अज्झेसना' (प्रेरणा) या तो संघ द्वारा सम्मत धर्म-उपदेशक के अधीन होती है या संघ-स्थविर के अधीन। उस धर्म-उपदेशक के न होने पर, संघ-स्थविर से पूछकर या उनके द्वारा प्रार्थना किए जाने पर बोलने का अवसर मिलता है। संघ-स्थविर को भी, यदि विहार में बहुत से धर्म-कथक हों, तो बारी-बारी से कहना चाहिए— "तुम धर्म का पाठ करो", "धर्म की कथा करो", या "धर्म-दान दो"। इस प्रकार कहे जाने पर तीनों विधियों से धर्म का उपदेश करना चाहिए। लेकिन यदि "ओसारेहि" (पाठ करो) कहा जाए, तो केवल पाठ करने का अधिकार मिलता है; "कथेहि" (कथा करो) कहा जाए, तो केवल कथा करने का; "सरभञ्ञं भणाहि" (स्वर से पाठ करो) कहा जाए, तो केवल स्वर-पाठ का। संघ-स्थविर को भी ऊँचे आसन पर बैठकर प्रार्थना नहीं करनी चाहिए। यदि उपाध्याय और सार्धविहारिक (शिष्य) हों, और उपाध्याय ऊँचे आसन पर बैठकर "पाठ करो" कहें, तो स्वाध्याय का संकल्प करके पाठ करना चाहिए। यदि वहाँ नवोदित (दहर) भिक्षु हों, तो "मैं उनके लिए कहता हूँ" ऐसा सोचकर पाठ करना चाहिए। සචෙ විහාරෙ සඞ්ඝත්ථෙරො අත්තනොයෙව නිස්සිතකෙ භණාපෙති, අඤ්ඤෙ මධුරභාණකෙපි නාජ්ඣෙසති, සො අඤ්ඤෙහි වත්තබ්බො – ‘‘භන්තෙ අසුකං නාම භණාපෙමා’’ති. සචෙ ‘‘භණාපෙථා’’ති වා වදති, තුණ්හී වා හොති, භණාපෙතුං වට්ටති. සචෙ පන පටිබාහති, න භණාපෙතබ්බං. යදි අනාගතෙයෙව සඞ්ඝත්ථෙරෙ ධම්මසවනං ආරද්ධං, පුන ආගතෙ ඨපෙත්වා ආපුච්ඡනකිච්චං නත්ථි. ඔසාරෙත්වා පන කථෙන්තෙන ආපුච්ඡිත්වා වා අට්ඨපෙත්වායෙව වා කථෙතබ්බං, කථෙන්තස්ස පුන ආගතෙපි එසෙව නයො. यदि विहार में संघ-स्थविर केवल अपने ही आश्रित शिष्यों से पाठ करवाते हैं और अन्य मधुर-भाषी धर्म-कथकों को आमंत्रित नहीं करते, तो अन्य भिक्षुओं को उनसे कहना चाहिए— "भन्ते! अमुक नाम के भिक्षु से पाठ करवाते हैं।" यदि वे "पाठ करवाओ" कहें या मौन रहें, तो पाठ करवाना उचित है। लेकिन यदि वे मना करें, तो पाठ नहीं करवाना चाहिए। यदि संघ-स्थविर के आने से पहले ही धर्म-श्रवण आरम्भ हो चुका हो, तो उनके आने पर रुककर पूछने की आवश्यकता नहीं है। पाठ समाप्त करके कथा करने वाले को पूछकर या बिना रुके ही कथा करनी चाहिए; कथा करते समय पुनः स्थविर के आने पर भी यही विधि है। උපනිසින්නකථායපි සඞ්ඝත්ථෙරොව සාමී, තස්මා තෙන සයං වා කථෙතබ්බං, අඤ්ඤො වා භික්ඛු ‘‘කථෙහී’’ති වත්තබ්බො, නො ච ඛො උච්චතරෙ ආසනෙ නිසින්නෙන. මනුස්සානං පන ‘‘භණාහී’’ති වත්තුං වට්ටති. මනුස්සා අත්තනො ජානනකභික්ඛුං ආපුච්ඡන්ති, තෙන ථෙරං ආපුච්ඡිත්වා කථෙතබ්බං. සචෙ සඞ්ඝත්ථෙරො ‘‘භන්තෙ ඉමෙ පඤ්හං පුච්ඡන්තී’’ති පුට්ඨො ‘‘කථෙහී’’ති [Pg.340] වා භණති, තුණ්හී වා හොති, කථෙතුං වට්ටති. අන්තරඝරෙ අනුමොදනාදීසුපි එසෙව නයො. සචෙ සඞ්ඝත්ථෙරො විහාරෙ වා අන්තරඝරෙ වා ‘‘මං අනාපුච්ඡිත්වාපි කථෙය්යාසී’’ති අනුජානාති, ලද්ධකප්පියං හොති, සබ්බත්ථ වත්තුං වට්ටති. पास बैठे लोगों को दी जाने वाली कथा (उपनिपन्नकथा) में भी संघ-स्थविर ही स्वामी होते हैं, इसलिए उन्हें स्वयं कथा करनी चाहिए या अन्य भिक्षु से "कथा करो" कहना चाहिए, किन्तु ऊँचे आसन पर बैठकर नहीं। मनुष्यों (गृहस्थों) से "धर्म कहो" कहना उचित है। यदि मनुष्य अपने परिचित भिक्षु से प्रार्थना करते हैं, तो उसे स्थविर से पूछकर कथा करनी चाहिए। यदि संघ-स्थविर से "भन्ते! ये प्रश्न पूछ रहे हैं" ऐसा पूछे जाने पर वे "कहो" कहें या मौन रहें, तो कथा करना उचित है। घर के भीतर अनुमोदना आदि में भी यही विधि है। यदि संघ-स्थविर विहार में या घर के भीतर "मुझसे बिना पूछे भी कथा कर सकते हो" ऐसी अनुमति दे देते हैं, तो वह कल्पनीय (उचित) हो जाता है और सभी स्थानों पर बोलना उचित होता है। සජ්ඣායං කරොන්තෙනාපි ථෙරො ආපුච්ඡිතබ්බොයෙව. එකං ආපුච්ඡිත්වා සජ්ඣායන්තස්ස අපරො ආගච්ඡති, පුන ආපුච්ඡනකිච්චං නත්ථි. සචෙ විස්සමිස්සාමීති ඨපිතස්ස ආගච්ඡති, පුන ආරභන්තෙනාපි ආපුච්ඡිතබ්බං. සඞ්ඝත්ථෙරෙ අනාගතෙයෙව ආරද්ධං සජ්ඣායන්තස්සාපි එසෙව නයො. එකෙන සඞ්ඝත්ථෙරෙන ‘‘මං අනාපුච්ඡාපි යථාසුඛං සජ්ඣායාහී’’ති අනුඤ්ඤාතෙ යථාසුඛං සජ්ඣායිතුං වට්ටති. අඤ්ඤස්මිං පන ආගතෙ තං ආපුච්ඡිත්වාව සජ්ඣායිතබ්බං. स्वाध्याय (सज्झाय) करने वाले भिक्षु को भी स्थविर (थेर) से अनुमति लेनी ही चाहिए। एक स्थविर से अनुमति लेकर स्वाध्याय करते समय यदि दूसरा स्थविर आ जाए, तो पुनः अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। यदि 'मैं विश्राम करूँगा' ऐसा सोचकर रुकने के बाद पुनः आरम्भ करता है, तो फिर से अनुमति लेनी चाहिए। संघस्थविर के आने से पहले ही स्वाध्याय आरम्भ करने वाले के लिए भी यही नियम है। यदि एक संघस्थविर ने यह कह दिया हो कि 'मुझसे बिना पूछे अपनी सुविधानुसार स्वाध्याय करो', तो सुविधानुसार स्वाध्याय करना उचित है। किन्तु यदि कोई अन्य स्थविर आ जाए, तो उनसे अनुमति लेकर ही स्वाध्याय करना चाहिए। 151. අත්තනා වා අත්තානං සම්මන්නිතබ්බංති අත්තනා වා අත්තා සම්මන්නිතබ්බො; පුච්ඡන්තෙන පන පරිසං ඔලොකෙත්වා සචෙ අත්තනො උපද්දවො නත්ථි, විනයො පුච්ඡිතබ්බො. १५१. 'स्वयं ही स्वयं को सम्मत करना चाहिए' का अर्थ है कि स्वयं ही स्वयं को नियुक्त कर सकता है। विनय पूछने वाले को परिषद को देखकर, यदि अपने लिए कोई संकट न हो, तो विनय पूछना चाहिए। 153. කතෙපි ඔකාසෙ පුග්ගලං තුලයිත්වාති ‘‘අත්ථි නු ඛො මෙ ඉතො උපද්දවො, නත්ථී’’ති එවං උපපරික්ඛිත්වා. පුරම්හාකන්ති පඨමං අම්හාකං. පටිකච්චෙවාති පඨමතරමෙව. පුග්ගලං තුලයිත්වා ඔකාසං කාතුන්ති ‘‘භූතමෙව නු ඛො ආපත්තිං වදති, අභූත’’න්ති එවං උපපරික්ඛිත්වා ඔකාසං කාතුං අනුජානාමීති අත්ථො. १५३. 'अवकाश (अनुमति) मिलने पर भी व्यक्ति की तुलना (जाँच) करके' का अर्थ है—'क्या इससे मुझे कोई संकट होगा या नहीं', इस प्रकार जाँच करके। 'पुरम्हाकं' का अर्थ है पहले हमारे लिए। 'पटिकच्चेव' का अर्थ है पहले से ही। 'व्यक्ति की जाँच करके अवकाश देना' का अर्थ है—'क्या यह वास्तविक आपत्ति कह रहा है या अवास्तविक', इस प्रकार जाँच करके अवकाश देने की अनुमति देता हूँ। අධම්මකම්මපටික්කොසනාදිකථා अधर्म-कर्म के प्रतिक्रोश (विरोध) आदि की कथा। 154. අධම්මකම්මං වුත්තනයමෙව. පටික්කොසිතුන්ති වාරෙතුං. දිට්ඨිම්පි ආවිකාතුන්ති ‘‘අධම්මකම්මං ඉදං න මෙ ඛමතී’’ති එවං අඤ්ඤස්ස සන්තිකෙ අත්තනො දිට්ඨිං පකාසෙතුං. චතූහි පඤ්චහීතිආදි තෙසං අනුපද්දවත්ථාය වුත්තං. සඤ්චිච්ච න සාවෙන්තීති යථා න සුණන්ති එවං භණිස්සාමාති සඤ්චිච්ච සණිකං උද්දිසන්ති. १५४. अधर्म-कर्म का अर्थ वही है जो पहले कहा गया है। 'पटिक्कोसितुं' का अर्थ है रोकना। 'दृष्टि को प्रकट करना' का अर्थ है—'यह अधर्म-कर्म मुझे स्वीकार नहीं है', इस प्रकार दूसरे के पास अपनी दृष्टि (विचार) प्रकट करना। चार या पाँच (भिक्षुओं) आदि की बात उनके संकट से बचाव के लिए कही गई है। 'जानबूझकर नहीं सुनाते' का अर्थ है कि वे इस प्रकार बोलेंगे कि सुनाई न दे, वे जानबूझकर धीरे से पाठ करते हैं। 155. ථෙරාධිකන්ති ථෙරාධීනං; ථෙරායත්තං භවිතුන්ති අත්ථො. ‘‘ථෙරාධෙය්ය’’න්තිපි පාඨො, තස්මා ථෙරෙන සයං වා උද්දිසිතබ්බං, අඤ්ඤො වා අජ්ඣෙසිතබ්බො. අජ්ඣෙසනවිධානඤ්චෙත්ථ ධම්මජ්ඣෙසනෙ වුත්තනයමෙව. සො න [Pg.341] ජානාති උපොසථං වාතිආදීසු චාතුද්දසිකපන්නරසිකභෙදෙන දුවිධං, සඞ්ඝඋපොසථාදිභෙදෙන නවවිධඤ්ච උපොසථං න ජානාති, චතුබ්බිධං උපොසථකම්මං න ජානාති, දුවිධං පාතිමොක්ඛං න ජානාති, නවවිධං පාතිමොක්ඛුද්දෙසං න ජානාති. යො තත්ථ භික්ඛු බ්යත්තො පටිබලොති එත්ථ කිඤ්චාපි දහරස්සාපි බ්යත්තස්ස පාතිමොක්ඛො අනුඤ්ඤාතො. අථ ඛො එත්ථ අයමධිප්පායො. සචෙ ථෙරස්ස පඤ්ච වා චත්තාරො වා තයො වා පාතිමොක්ඛුද්දෙසා නාගච්ඡන්ති; ද්වෙ පන අඛණ්ඩා සුවිසදා වාචුග්ගතා හොන්ති, ථෙරායත්තොව පාතිමොක්ඛා. සචෙ පන එත්තකම්පි විසදං කාතුං න සක්කොති, බ්යත්තස්ස භික්ඛුනො ආයත්තො හොති. १५५. 'थेराधिकं' का अर्थ है स्थविर के अधीन; स्थविर के अधिकार में होना। 'थेराधेय्यं' ऐसा भी पाठ है, इसलिए स्थविर को स्वयं पाठ करना चाहिए या दूसरे से अनुरोध करना चाहिए। यहाँ अनुरोध करने की विधि वही है जो धर्म-देशना के अनुरोध के लिए कही गई है। 'वह उपोसथ को नहीं जानता' आदि में—चौदहवीं और पन्द्रहवीं के भेद से दो प्रकार के, और संघ-उपोसथ आदि के भेद से नौ प्रकार के उपोसथ को नहीं जानता; चार प्रकार के उपोसथ-कर्म को नहीं जानता; दो प्रकार के पातिमोक्ख को नहीं जानता; नौ प्रकार के पातिमोक्ख-उद्देश को नहीं जानता। 'वहाँ जो भिक्षु चतुर और समर्थ है'—यहाँ यद्यपि नवोदित (दहर) भिक्षु भी यदि चतुर हो तो उसे पातिमोक्ख (पाठ) की अनुमति है। फिर भी, यहाँ यह अभिप्राय है: यदि स्थविर को पातिमोक्ख के पाँच, चार या तीन उद्देश याद नहीं आते, किन्तु दो उद्देश अखण्ड, स्पष्ट और कण्ठस्थ हैं, तो पातिमोक्ख स्थविर के ही अधिकार में है। यदि वह इतना भी स्पष्ट नहीं कर सकता, तो वह चतुर भिक्षु के अधिकार में होता है। සාමන්තා ආවාසාති සාමන්තං ආවාසං. සජ්ජුකන්ති තදහෙව ආගමනත්ථාය. නවං භික්ඛුං ආණාපෙතුන්ති එත්ථ යො සක්කොති උග්ගහෙතුං, එවරූපො ආණාපෙතබ්බො, න බාලො. 'सामन्ता आवासा' का अर्थ है समीप का आवास। 'सज्जुकं' का अर्थ है उसी दिन लौटने के लिए। 'नये भिक्षु को आज्ञा देना'—यहाँ जो सीखने में समर्थ हो, ऐसे नये भिक्षु को आज्ञा देनी चाहिए, मूर्ख को नहीं। පක්ඛගණනාදිඋග්ගහණානුජානනකථා पक्ष-गणना आदि सीखने की अनुमति की कथा। 156. කතිමී භන්තෙති එත්ථ කතීනං පූරණීති කතිමී. කාලවතොති කාලස්සෙව; පගෙවාති අත්ථො. १५६. 'कतिमी भन्ते'—यहाँ कितने दिनों में पूर्ण होता है, इसलिए 'कतिमी' है। 'कालवतो' का अर्थ है समय से ही, यानी पहले से ही। 158. යං කාලං සරතීති එත්ථ සායම්පි ‘‘අජ්ජුපොසථො සමන්නාහරථා’’ති ආරොචෙතුං වට්ටති. १५८. 'जिस समय याद आए'—यहाँ शाम को भी 'आज उपोसथ है, ध्यान दें' ऐसा सूचित करना उचित है। 159. ථෙරෙන භික්ඛුනා නවං භික්ඛුං ආණාපෙතුන්ති එත්ථාපි කිඤ්චි කම්මං කරොන්තො වා සදාකාලමෙව එකො වා භාරනිත්ථරණකො වා සරභාණකධම්මකථිකාදීසු අඤ්ඤතරො වා න උපොසථාගාරසම්මජ්ජනත්ථං ආණාපෙතබ්බො, අවසෙසා පන වාරෙන ආණාපෙතබ්බා. සචෙ ආණත්තො සම්මුඤ්ජනිං තාවකාලිකම්පි න ලභති, සාඛාභඞ්ගං කප්පියං කාරෙත්වා සම්මජ්ජිතබ්බං, තම්පි අලභන්තස්ස ලද්ධකප්පියං හොති. १५९. 'स्थविर भिक्षु द्वारा नये भिक्षु को आज्ञा देना'—यहाँ भी जो कोई कार्य कर रहा हो, या जो सदा अकेला रहता हो, या जो संघ का भार वहन कर रहा हो, या जो सरभणक (मधुर स्वर में पाठ करने वाला) या धर्मकथक आदि में से कोई हो, उसे उपोसथ-गृह की सफाई के लिए आज्ञा नहीं देनी चाहिए। शेष भिक्षुओं को बारी-बारी से आज्ञा देनी चाहिए। यदि आज्ञा दिए जाने पर अस्थायी रूप से भी झाड़ू न मिले, तो कल्पनीय (उचित) वृक्ष की टहनी तोड़कर सफाई करनी चाहिए। यदि वह भी न मिले, तो जो प्राप्त हो वही कल्पनीय (स्वीकार्य) होता है। 160. ආසනපඤ්ඤාපනාණත්තියම්පි වුත්තනයෙනෙව ආණාපෙතබ්බො. ආණත්තෙන ච සචෙ උපොසථාගාරෙ ආසනානි නත්ථි, සඞ්ඝිකාවාසතොපි ආහරිත්වා පඤ්ඤපෙත්වා පුන ආහරිතබ්බානි. ආසනෙසු අසති කටසාරකෙපි තට්ටිකායොපි පඤ්ඤපෙතුං වට්ටති, තට්ටිකාසුපි අසති සාඛාභඞ්ගානි කප්පියං [Pg.342] කාරෙත්වා පඤ්ඤපෙතබ්බානි, කප්පියකාරකං අලභන්තස්ස ලද්ධකප්පියං හොති. १६०. आसन बिछाने की आज्ञा में भी पूर्वोक्त विधि से ही आज्ञा देनी चाहिए। आज्ञा दिए गए भिक्षु को यदि उपोसथ-गृह में आसन न मिलें, तो संघ के आवास से लाकर बिछाने चाहिए और पुनः वापस पहुँचा देने चाहिए। आसन न होने पर चटाई या टाट बिछाना भी उचित है। यदि चटाई भी न हो, तो कल्पनीय वृक्ष की टहनियाँ बिछानी चाहिए। यदि कल्पनीय कार्य करने वाला (कप्पियकारक) न मिले, तो जो प्राप्त हो वही कल्पनीय होता है। 161. පදීපකරණෙපි වුත්තනයෙනෙව ආණාපෙතබ්බො. ආණාපෙන්තෙන ච ‘‘අමුකස්මිං නාම ඔකාසෙ තෙලං වා වට්ටි වා කපල්ලිකා වා අත්ථි, තං ගහෙත්වා කරොහී’’ති වත්තබ්බො. සචෙ තෙලාදීනි නත්ථි, පරියෙසිතබ්බානි, පරියෙසිත්වා අලභන්තස්ස ලද්ධකප්පියං හොති. අපිච කපාලෙ අග්ගිපි ජාලෙතබ්බො. १६१. दीपक जलाने में भी पूर्वोक्त विधि से ही आज्ञा देनी चाहिए। आज्ञा देने वाले को कहना चाहिए—'अमुक स्थान पर तेल, बत्ती या दीपक है, उसे लेकर जलाओ।' यदि तेल आदि न हो, तो खोजना चाहिए। खोजने पर भी न मिलने वाले के लिए जो प्राप्त हो वही कल्पनीय है। इसके अतिरिक्त, खप्पर (मिट्टी के बर्तन के टुकड़े) में अग्नि भी जलाई जा सकती है। දිසංගමිකාදිවත්ථුකථා दिशागामी (विभिन्न दिशाओं में जाने वाले) आदि की कथा। 163. සඞ්ගහෙතබ්බොති ‘‘සාධු භන්තෙ ආගතාත්ථ, ඉධ භික්ඛා සුලභා සූපබ්යඤ්ජනං අත්ථි, වසථ අනුක්කණ්ඨමානා’’ති එවං පියවචනෙන සඞ්ගහෙතබ්බො. පුනප්පුනං තථාකරණවසෙන අනුග්ගහෙතබ්බො. ‘‘ආම වසිස්සාමී’’ති පටිවචනදාපනෙන උපලාපෙතබ්බො. අථ වා චතූහි පච්චයෙහි සඞ්ගහෙතබ්බො චෙව අනුග්ගහෙතබ්බො ච. පියවචනෙන උපලාපෙතබ්බො, කණ්ණසුඛං ආලපිතබ්බොති අත්ථො. චුණ්ණාදීහි උපට්ඨාපෙතබ්බො. ආපත්ති දුක්කටස්සාති සචෙ සකලොපි සඞ්ඝො න කරොති, සබ්බෙසං දුක්කටං. ඉධ නෙව ථෙරා න දහරා මුච්චන්ති, සබ්බෙහි වාරෙන උපට්ඨාපෙතබ්බො. අත්තනො වාරෙ අනුපට්ඨහන්තස්ස ආපත්ති. තෙන පන මහාථෙරානං පරිවෙණසම්මජ්ජනදන්තකට්ඨදානාදීනි න සාදිතබ්බානි. එවම්පි සති මහාථෙරෙහි සායංපාතං උපට්ඨානං ආගන්තබ්බං. තෙන පන තෙසං ආගමනං ඤත්වා පඨමතරං මහාථෙරානං උපට්ඨානං ගන්තබ්බං. සචස්ස සද්ධිංචරා භික්ඛුඋපට්ඨාකා අත්ථි, ‘‘මය්හං උපට්ඨාකා අත්ථි, තුම්හෙ අප්පොස්සුක්කා විහරථා’’ති වත්තබ්බං. අථාපිස්ස සද්ධිංචරා නත්ථි, තස්මිංයෙව පන විහාරෙ එකො වා ද්වෙ වා වත්තසම්පන්නා වදන්ති ‘‘මයං ථෙරස්ස කත්තබ්බං කරිස්සාම, අවසෙසා ඵාසු විහරන්තූ’’ති සබ්බෙසං අනාපත්ති. १६३. ‘संग्रह करना चाहिए’ (सङ्गहेतब्बो) का अर्थ है— ‘भन्ते! आपका स्वागत है, यहाँ भिक्षा सुलभ है, सूप-व्यंजन (दाल-सब्जी) उपलब्ध है, आप बिना खिन्न हुए यहाँ निवास करें’—इस प्रकार प्रिय वचनों से उसका सत्कार करना चाहिए। बार-बार वैसा करने के माध्यम से उसका अनुग्रह करना चाहिए। ‘हाँ, मैं रहूँगा’—इस प्रकार का उत्तर दिलवाकर उसे निवास के लिए राजी करना चाहिए। अथवा चार प्रत्ययों (चीवर, पिण्डपात, शयनासन, भेषज) के द्वारा उसका संग्रह और अनुग्रह दोनों करना चाहिए। प्रिय वचनों से उसे प्रसन्न करना चाहिए, कानों को सुख देने वाले वचन बोलने चाहिए—यह अर्थ है। चूर्ण (साबुन) आदि के द्वारा उसकी सेवा करनी चाहिए। ‘दुक्कट की आपत्ति’ का अर्थ है—यदि सम्पूर्ण संघ ऐसा नहीं करता है, तो सभी को दुक्कट दोष होता है। यहाँ न तो स्थविर और न ही नवोदित भिक्षु मुक्त होते हैं; सभी को बारी-बारी से सेवा करनी चाहिए। अपनी बारी में सेवा न करने वाले को आपत्ति होती है। किन्तु उस (विद्वान आगंतुक भिक्षु) को महास्थविरों द्वारा अपने परिवेण (आंगन) की सफाई करवाने या दातून आदि देने की सेवा स्वीकार नहीं करनी चाहिए। ऐसा होने पर भी महास्थविरों को सुबह-शाम उसके निवास स्थान पर जाना चाहिए। किन्तु उसे उनके आने का जानकर पहले ही महास्थविरों की सेवा में उपस्थित होना चाहिए। यदि उसके साथ रहने वाले सेवक भिक्षु हों, तो कहना चाहिए— ‘मेरे पास सेवक हैं, आप लोग निश्चिंत होकर रहें।’ यदि उसके साथ रहने वाले सेवक नहीं हैं, किन्तु उसी विहार के एक या दो कर्तव्यनिष्ठ भिक्षु कहते हैं— ‘हम स्थविर का आवश्यक कार्य करेंगे, शेष भिक्षु सुखपूर्वक रहें’, तो सभी को आपत्ति नहीं होती। සො ආවාසො ගන්තබ්බොති උපොසථකරණත්ථාය අන්වද්ධමාසං ගන්තබ්බො. සො ච ඛො උතුවස්සෙයෙව, වස්සානෙ පන යං කත්තබ්බං, තං දස්සෙතුං ‘‘වස්සං වසන්ති බාලා අබ්යත්තා’’තිආදිමාහ. තත්ථ න භික්ඛවෙ තෙහි භික්ඛූහි තස්මිං ආවාසෙ වස්සං වසිතබ්බන්ති පුරිමිකාය පාතිමොක්ඛුද්දෙසකෙන විනා න වස්සං උපගන්තබ්බං. සචෙ සො වස්සූපගතානං පක්කමති [Pg.343] වා, විබ්භමති වා, කාලං වා කරොති, අඤ්ඤස්මිං සතියෙව පච්ඡිමිකාය වසිතුං වට්ටති, අසති අඤ්ඤත්ථ ගන්තබ්බං, අගච්ඡන්තානං දුක්කටං. සචෙ පන පච්ඡිමිකාය පක්කමති වා විබ්භමති වා කාලං වා කරොති, මාසද්වයං වසිතබ්බං. ‘उस आवास में जाना चाहिए’ का अर्थ है—उपोसथ करने के लिए प्रत्येक पखवाड़े (पक्ष) में जाना चाहिए। और वह भी केवल हेमंत और ग्रीष्म ऋतु में ही; वर्षा ऋतु में जो करना चाहिए, उसे दिखाने के लिए भगवान ने ‘वस्सं वसन्ति बाला अब्यत्ता’ आदि कहा है। वहाँ ‘भिक्षुओं! उन भिक्षुओं को उस आवास में वर्षावास नहीं करना चाहिए’ का अर्थ है—पूर्विका (प्रथम वर्षावास) में पातिमोक्ख का पाठ करने वाले (पातिमोक्खुद्देसक) के बिना वर्षावास नहीं करना चाहिए। यदि वह वर्षावास के दौरान चला जाता है, गृहस्थ बन जाता है या काल कर जाता है, तो किसी अन्य (पाठक) के होने पर ही पश्चिमिक (द्वितीय वर्षावास) में रहना कल्पता है; अन्य के न होने पर अन्यत्र चले जाना चाहिए, न जाने वालों को दुक्कट होता है। यदि वह पश्चिमिक में चला जाता है, गृहस्थ बन जाता है या काल कर जाता है, तो दो महीने तक (वहाँ) रहा जा सकता है। පාරිසුද්ධිදානකථා पारिसुद्धि दान की कथा 164. කායෙන විඤ්ඤාපෙතීති පාරිසුද්ධිදානං යෙන කෙනචි අඞ්ගපච්චඞ්ගෙන විඤ්ඤාපෙති ජානාපෙති; වාචං පන නිච්ඡාරෙතුං සක්කොන්තො වාචාය විඤ්ඤාපෙති; උභයථා සක්කොන්තො කායවාචාහි. සඞ්ඝෙන තත්ථ ගන්ත්වා උපොසථො කාතබ්බොති සචෙ බහූ තාදිසා ගිලානා හොන්ති, සඞ්ඝෙන පටිපාටියා ඨත්වා සබ්බෙ හත්ථපාසෙ කාතබ්බා. සචෙ දූරෙ දූරෙ හොන්ති, සඞ්ඝො නප්පහොති, තං දිවසං උපොසථො න කාතබ්බො, නත්වෙව වග්ගෙන සඞ්ඝෙන උපොසථො කාතබ්බො. १६४. ‘काया से सूचित करता है’ का अर्थ है—पारिसुद्धि देने को शरीर के किसी भी अंग-प्रत्यंग द्वारा सूचित करता है या जनाता है; यदि वाणी निकालने में समर्थ हो तो वाणी से सूचित करता है; यदि दोनों प्रकार से समर्थ हो तो काया और वाणी दोनों से। ‘संघ को वहाँ जाकर उपोसथ करना चाहिए’ का अर्थ है—यदि वैसे बहुत से ग्लान (रोगी) हों, तो संघ को पंक्तिबद्ध होकर सभी ग्लानों को हत्थपास (हाथ की पहुँच) में रखकर उपोसथ करना चाहिए। यदि वे दूर-दूर हों और संघ पर्याप्त न हो, तो उस दिन उपोसथ नहीं करना चाहिए, किन्तु अलग-अलग (वर्ग बनाकर) संघ द्वारा उपोसथ नहीं किया जाना चाहिए। තත්ථෙව පක්කමතීති සඞ්ඝමජ්ඣං අනාගන්ත්වා තතොව කත්ථචි ගච්ඡති. සාමණෙරො පටිජානාතීති ‘‘සාමණෙරො අහ’’න්ති එවං පටිජානාති; භූතංයෙව වා සාමණෙරභාවං ආරොචෙති, පච්ඡා වා සාමණෙරභූමියං තිට්ඨතීති අත්ථො. එස නයො සබ්බත්ථ. ‘वहीं से चला जाता है’ का अर्थ है—संघ के बीच न आकर वहीं से कहीं और चला जाता है। ‘सामणेर स्वीकार करता है’ का अर्थ है— ‘मैं सामणेर हूँ’—इस प्रकार स्वीकार करता है; अथवा वास्तविक सामणेर भाव को बताता है, या बाद में सामणेर की भूमि (अवस्था) में स्थित रहता है—यह अर्थ है। यही नियम सर्वत्र (सिख्खापच्चक्खातक आदि में) लागू होता है। සඞ්ඝප්පත්තො පක්කමතීති සබ්බන්තිමෙන පරිච්ඡෙදෙන උපොසථත්ථාය සන්නිපතිතානං චතුන්නං භික්ඛූනං හත්ථපාසං පත්වා පක්කමති. එස නයො සබ්බත්ථ. එත්ථ ච එකෙන බහූනම්පි ආහටා පාරිසුද්ධි ආහටාව හොති. සචෙ පන සො අන්තරාමග්ගෙ අඤ්ඤං භික්ඛුං දිස්වා යෙසං අනෙන පාරිසුද්ධි ගහිතා, තෙසඤ්ච අත්තනො ච පාරිසුද්ධිං දෙති, තස්සෙව පාරිසුද්ධි ආගච්ඡති, ඉතරා පන බිලාළසඞ්ඛලිකපාරිසුද්ධි නාම හොති. සා න ආගච්ඡති. ‘संघ को प्राप्त होकर चला जाता है’ का अर्थ है—न्यूनतम सीमा के अनुसार उपोसथ के लिए एकत्रित हुए चार भिक्षुओं के हत्थपास में पहुँचकर चला जाता है। यही नियम सर्वत्र है। और यहाँ एक भिक्षु द्वारा बहुतों की लाई गई पारिसुद्धि भी लाई गई ही मानी जाती है। किन्तु यदि वह रास्ते में किसी अन्य भिक्षु को देखकर, जिनकी पारिसुद्धि उसने ली है उनकी और अपनी पारिसुद्धि उसे दे देता है, तो केवल उसी (एक) भिक्षु की पारिसुद्धि संघ तक पहुँचती है, शेष ‘बिड़ाल-शृंखला पारिसुद्धि’ (बिल्ली की सांकल जैसी टूटी हुई पारिसुद्धि) कहलाती है। वह संघ तक नहीं पहुँचती। සුත්තො න ආරොචෙතීති ආගන්ත්වා සුපති, ‘‘අසුකෙන පාරිසුද්ධි දින්නා’’ති න ආරොචෙති. පාරිසුද්ධිහාරකස්ස අනාපත්තීති එත්ථ සචෙ සඤ්චිච්ච නාරොචෙති, දුක්කටං ආපජ්ජති, පාරිසුද්ධි පන ආහටාව හොති. අසඤ්චිච්ච අනාරොචිතත්තා පනස්ස අනාපත්ති, උභින්නම්පි ච උපොසථො කතොයෙව හොති. ‘सोया हुआ सूचित नहीं करता’ का अर्थ है—आकर सो जाता है और ‘अमुक ने पारिसुद्धि दी है’—ऐसा सूचित नहीं करता। ‘पारिसुद्धि लाने वाले को आपत्ति नहीं’—यहाँ यह निर्णय समझना चाहिए: यदि वह जानबूझकर सूचित नहीं करता, तो दुक्कट की आपत्ति होती है, किन्तु पारिसुद्धि तो लाई गई ही मानी जाती है। अनजाने में सूचित न करने के कारण उसे आपत्ति नहीं होती, और दोनों का ही उपोसथ संपन्न माना जाता है। ඡන්දදානකථා छन्द दान की कथा 165. ඡන්දදානෙපි [Pg.344] පාරිසුද්ධිදානෙ වුත්තසදිසොයෙව විනිච්ඡයො. පාරිසුද්ධිං දෙන්තෙන ඡන්දම්පි දාතුන්ති එත්ථ සචෙ පාරිසුද්ධිමෙව දෙති න ඡන්දං, උපොසථො කතො හොති. යං පන සඞ්ඝො අඤ්ඤං කම්මං කරොති, තං අකතං හොති. ඡන්දමෙව දෙති න පාරිසුද්ධිං, භික්ඛුසඞ්ඝස්ස උපොසථොපි කම්මම්පි කතමෙව හොති, ඡන්දදායකස්ස පන උපොසථො අකතො හොති. සචෙපි කොචි භික්ඛු නදියා වා සීමාය වා උපොසථං අධිට්ඨහිත්වා ආගච්ඡති, ‘‘කතො මයා උපොසථො’’ති අච්ඡිතුං න ලභති, සාමග්ගී වා ඡන්දො වා දාතබ්බො. १६५. छन्द दान में भी पारिसुद्धि दान में कहे गए समान ही निर्णय है। ‘पारिसुद्धि देते हुए छन्द भी देना चाहिए’—यहाँ यदि केवल पारिसुद्धि देता है छन्द नहीं, तो उपोसथ तो हो जाता है, किन्तु संघ जो अन्य (विनायकर्म आदि) कार्य करता है, वह (उसके लिए) नहीं हुआ माना जाता। यदि केवल छन्द देता है पारिसुद्धि नहीं, तो भिक्षु संघ का उपोसथ और कर्म दोनों संपन्न हो जाते हैं, किन्तु छन्द देने वाले का उपोसथ नहीं हुआ माना जाता। यदि कोई भिक्षु नदी में या सीमा में उपोसथ का अधिष्ठान करके आता है, तो भी वह ‘मैंने उपोसथ कर लिया है’—ऐसा कहकर बैठने का अधिकार नहीं पाता, उसे सामग्गी (एकता) या छन्द देना ही चाहिए। 167. සරතිපි උපොසථං නපි සරතීති එකදා සරති, එකදා න සරති. අත්ථි නෙව සරතීති යො එකන්තං නෙව සරති, තස්ස සම්මුතිදානකිච්චං නත්ථි. අනාගච්ඡන්තොපි කම්මං න කොපෙති. १६७. ‘उपोसथ को याद भी करता है और नहीं भी याद करता’ का अर्थ है—कभी याद करता है, कभी नहीं। ‘कोई बिल्कुल याद नहीं करता’ का अर्थ है—जो पूर्णतः याद नहीं करता, उसके लिए सम्मति देने का कार्य नहीं है। उसके न आने पर भी संघ का कर्म बाधित नहीं होता। සඞ්ඝුපොසථාදිකථා संघ उपोसथ आदि की कथा 168. සො දෙසො සම්මජ්ජිත්වාති තං දෙසං සම්මජ්ජිත්වා, උපයොගත්ථෙ පච්චත්තං. පානීයං පරිභොජනීයන්තිආදි පන උත්තානත්ථමෙව. කස්මා පනෙතං වුත්තං? උපොසථස්ස පුබ්බකරණාදිදස්සනත්ථං. තෙනාහු අට්ඨකථාචරියා – १६८. ‘उस स्थान की सफाई करके’ (सो देसो सम्मज्जित्वा) का अर्थ है—उस स्थान को बुहार कर; यहाँ ‘सो देसो’ शब्द द्वितीया विभक्ति के अर्थ में प्रथमा विभक्ति है। ‘पानीय परिभोजनीय’ आदि पद स्पष्ट अर्थ वाले ही हैं। किन्तु यह क्यों कहा गया है? उपोसथ के पूर्वकृत्य (पुब्बकरण) आदि को दिखाने के लिए। इसीलिए अट्ठकथाचार्यों ने कहा है— ‘‘සම්මජ්ජනී පදීපො ච, උදකං ආසනෙන ච; උපොසථස්ස එතානි, පුබ්බකරණන්ති වුච්චති’’. “बुहारना (सफाई), दीपक जलाना, जल की व्यवस्था और आसन बिछाना—ये उपोसथ के पूर्वकृत्य कहे जाते हैं।” ඉති ඉමානි චත්තාරි ‘‘පුබ්බකරණ’’න්ති අක්ඛාතානි. इस प्रकार ये चार कार्य ‘पूर्वकृत्य’ (पुब्बकरण) के रूप में बताए गए हैं। ‘‘ඡන්දපාරිසුද්ධිඋතුක්ඛානං, භික්ඛුගණනා ච ඔවාදො; උපොසථස්ස එතානි, පුබ්බකිච්චන්ති වුච්චති. "छन्द (सहमति), पारिशुद्धि (शुद्धता), ऋतु (मौसम) की घोषणा, भिक्षुओं की गणना और (भिक्षुणियों को) ओवाद (उपदेश); उपोसथ के इन (पाँच) कार्यों को 'पूर्वकृत्य' (पुब्बकिच्च) कहा जाता है।" ඉති ඉමානි පඤ්ච පුබ්බකරණතො පච්ඡා කත්තබ්බානි ‘‘පුබ්බකිච්ච’’න්ති අක්ඛාතානි. इस प्रकार, इन पाँचों को चार 'पूर्वकरण' (पुब्बकरण) के बाद किया जाना चाहिए, फिर भी उपोसथ कर्म से पहले किए जाने के कारण इन्हें 'पूर्वकृत्य' (पुब्बकिच्च) कहा गया है। ‘‘උපොසථො යාවතිකා ච භික්ඛූ කම්මප්පත්තා,සභාගාපත්තියො ච න විජ්ජන්ති; වජ්ජනීයා ච පුග්ගලා තස්මිං න හොන්ති,පත්තකල්ලන්ති වුච්චති’’. "उपोसथ तब 'पत्तकल्ल' (उपयुक्त/समय-प्राप्त) कहा जाता है जब: जितने भिक्षु कर्म के योग्य हैं (वे उपस्थित हों), कोई सभाग-आपत्ति न हो, और वर्जित व्यक्ति उस (संघ) में न हों।" ඉති ඉමානි චත්තාරි ‘‘පත්තකල්ල’’න්ති අක්ඛාතානීති. इस प्रकार, इन चार (अंगों) को 'पत्तकल्ल' कहा गया है। තෙහි [Pg.345] සද්ධින්ති තෙහි ආගතෙහි සද්ධිං එතානි පුබ්බකරණාදීනි කත්වා උපොසථො කාතබ්බො. අජ්ජ මෙ උපොසථොති එත්ථ සචෙ පන්නරසො හොති, ‘‘අජ්ජ මෙ උපොසථො පන්නරසො’’තිපි අධිට්ඨාතුං වට්ටති. චාතුද්දසිකෙපි එසෙව නයො. उनके साथ, अर्थात् आए हुए उन भिक्षुओं के साथ, इन पूर्वकरण आदि को करके उपोसथ करना चाहिए। 'आज मेरा उपोसथ है'—यहाँ यदि पन्द्रहवीं तिथि (पन्नरसो) हो, तो 'आज मेरा पन्द्रहवीं का उपोसथ है' ऐसा अधिष्ठान करना भी उचित है। चौदहवीं (चातुद्दसिक) के लिए भी यही विधि है। ආපත්තිපටිකම්මවිධිකථා आपत्ति-प्रतिकर्म-विधि की कथा 169. භගවතා පඤ්ඤත්තං ‘‘න සාපත්තිකෙන උපොසථො කාතබ්බො’’ති ඉදං ‘‘යස්ස සියා ආපත්තී’’තිආදිවචනෙනෙව පාරිසුද්ධිදානපඤ්ඤාපනෙන ච පාරිසුද්ධිඋපොසථපඤ්ඤාපනෙන ච පඤ්ඤත්තං හොතීති වෙදිතබ්බං. ඉත්ථන්නාමං ආපත්තින්ති ථුල්ලච්චයාදීසු එකිස්සා නාමං ගහෙත්වා ‘‘ථුල්ලච්චයං ආපත්තිං පාචිත්තියං ආපත්ති’’න්ති එවං වත්තබ්බං. තං පටිදෙසෙමීති ඉදං ‘‘තං තුම්හමූලෙ, තං තුය්හමූලෙ පටිදෙසෙමී’’ති වුත්තෙපි සුවුත්තමෙව හොති. පස්සසීති ඉදඤ්ච ‘‘පස්සසි ආවුසො තං ආපත්තිං, පස්සථ භන්තෙ තං ආපත්ති’’න්ති එවං වත්තබ්බං. ආම පස්සාමීති ඉදං පන ‘‘ආම භන්තෙ පස්සාමි, ආම ආවුසො පස්සාමී’’ති එවං වුත්තම්පි සුවුත්තමෙව හොති. ආයතිං සංවරෙය්යාසීති එත්ථ පන සචෙ වුඩ්ඪතරො ‘‘ආයතිං සංවරෙය්යාථා’’ති වත්තබ්බො. එවං වුත්තෙන පන ‘‘සාධු සුට්ඨු සංවරිස්සාමී’’ති වත්තබ්බමෙව. १६९. भगवान द्वारा प्रज्ञप्त 'आपत्ति सहित भिक्षु को उपोसथ नहीं करना चाहिए'—यह 'जिसे आपत्ति हो' आदि वचनों से, पारिशुद्धि देने की प्रज्ञप्ति से और पारिशुद्धि-उपोसथ की प्रज्ञप्ति से प्रज्ञप्त है, ऐसा जानना चाहिए। 'अमुक नाम की आपत्ति'—यहाँ थुल्लच्चय आदि (पाँच) आपत्तियों में से एक का नाम लेकर 'थुल्लच्चय आपत्ति' या 'पाचित्तिय आपत्ति' इस प्रकार कहना चाहिए। 'उसे मैं प्रतिदेशित (स्वीकार) करता हूँ'—यह 'उसे आपके पास (तुय्हमूले/तुम्हमूले) प्रतिदेशित करता हूँ' कहने पर भी सुभाषित ही है। 'क्या आप देखते हैं?'—इसे 'आयुष्मान, क्या आप उस आपत्ति को देखते हैं?' या 'भन्ते, क्या आप उस आपत्ति को देखते हैं?' इस प्रकार कहना चाहिए। 'हाँ, देखता हूँ'—यह 'हाँ भन्ते, देखता हूँ' या 'हाँ आयुष्मान, देखता हूँ' इस प्रकार कहने पर भी सुभाषित ही है। 'भविष्य में संयम रखें'—यहाँ यदि (सामने वाला) वृद्ध हो, तो 'भविष्य में संयम रखें (संवरय्याथ)' ऐसा कहना चाहिए। ऐसा कहे जाने पर (अपराधी भिक्षु को) 'साधु, अच्छी तरह संयम रखूँगा' ऐसा ही कहना चाहिए। යදා නිබ්බෙමතිකොති එත්ථ සචෙ පනෙස නිබ්බෙමතිකො න හොති, වත්ථුං කිත්තෙත්වාව දෙසෙතුං වට්ටතීති අන්ධකට්ඨකථායං වුත්තං. තත්රායං දෙසනාවිධි – සචෙ මෙඝච්ඡන්නෙ සූරියෙ ‘‘කාලො නු ඛො නො’’ති වෙමතිකො භුඤ්ජති, තෙන භික්ඛුනා ‘‘අහං භන්තෙ වෙමතිකො භුඤ්ජිං’’, සචෙ කාලො අත්ථි, ‘‘සම්බහුලා දුක්කටා ආපත්තියො ආපන්නොම්හි, නො චෙ අත්ථි, ‘‘සම්බහුලා පාචිත්තියා ආපන්නොම්හී’’ති එවං වත්ථුං කිත්තෙත්වා ‘‘අහං භන්තෙ යා තස්මිං වත්ථුස්මිං සම්බහුලා දුක්කටා වා පාචිත්තියා වා ආපත්තියො ආපන්නො, තා තුම්හමූලෙ පටිදෙසෙමී’’ති වත්තබ්බං. එස නයො සබ්බාපත්තීසු. 'जब वह संशय-रहित (निब्बेमतिको) हो'—यहाँ यदि वह संशय-रहित नहीं है, तो वस्तु (घटना) का कीर्तन करके ही देशना (स्वीकारोक्ति) करना उचित है, ऐसा अन्धक-अट्ठकथा में कहा गया है। वहाँ देशना की विधि यह है—यदि बादलों से ढके सूर्य के समय 'क्या हमारे लिए (भोजन का) समय है या नहीं' इस प्रकार संशय में भोजन करता है, तो उस भिक्षु को 'भन्ते, मैंने संशय में भोजन किया'—यदि समय था, तो 'मुझे अनेक दुक्कट आपत्तियाँ हुई हैं', यदि समय नहीं था, तो 'मुझे अनेक पाचित्तिय आपत्तियाँ हुई हैं'—इस प्रकार वस्तु का कीर्तन करके 'भन्ते, उस वस्तु के संबंध में मुझे जो अनेक दुक्कट या पाचित्तिय आपत्तियाँ हुई हैं, उन्हें मैं आपके पास प्रतिदेशित करता हूँ' ऐसा कहना चाहिए। यही विधि सभी आपत्तियों में है। න භික්ඛවෙ සභාගා ආපත්තීති එත්ථ යං ද්වෙපි ජනා විකාලභොජනාදිනා සභාගවත්ථුනා ආපත්තිං ආපජ්ජන්ති, එවරූපා වත්ථුසභාගා ‘‘සභාගා’’ති [Pg.346] වුච්චති. විකාලභොජනප්පච්චයා ආපන්නං පන අනතිරිත්තභොජනපච්චයා ආපන්නස්ස සන්තිකෙ දෙසෙතුං වට්ටති. යාපි චායං වත්ථුසභාගා, සාපි දෙසිතා සුදෙසිතාව. අඤ්ඤං පන දෙසනපච්චයා දෙසකො, පටිග්ගහණප්පච්චයා පටිග්ගහකො චාති උභොපි දුක්කටං ආපජ්ජන්ති, තං නානාවත්ථුකං හොති, තස්මා අඤ්ඤමඤ්ඤං දෙසෙතුං වට්ටති. 'भिक्षुओं, सभाग-आपत्ति (साझा अपराध) की देशना नहीं होती'—यहाँ जब दो व्यक्ति विकाल-भोजन आदि समान वस्तु के कारण आपत्ति को प्राप्त होते हैं, तो ऐसी वस्तु-समानता को 'सभाग' कहा जाता है। विकाल-भोजन के कारण आपत्ति प्राप्त भिक्षु, अनतिरिक्त-भोजन के कारण आपत्ति प्राप्त भिक्षु के पास देशना कर सकता है। जो यह वस्तु-सभाग (आपत्ति) है, वह भी देशित होने पर सुदेशित ही है। किन्तु देशना के कारण देशक (कहने वाला) और प्रतिग्रहण के कारण प्रतिग्राहक (सुनने वाला)—दोनों ही दुक्कट आपत्ति को प्राप्त होते हैं; वह (दुक्कट) भिन्न वस्तु वाली होती है, इसलिए एक-दूसरे के पास देशना करना उचित है। 170. සාමන්තො භික්ඛු එවමස්ස වචනීයොති එත්ථ සභාගොයෙව වත්තබ්බො. විසභාගස්ස හි වුච්චමානෙ භණ්ඩනකලහසඞ්ඝභෙදාදීනිපි හොන්ති, තස්මා තස්ස අවත්වා ‘‘ඉතො වුට්ඨහිත්වා පටිකරිස්සාමී’’ති ආභොගං කත්වා උපොසථො කාතබ්බොති අන්ධකට්ඨකථායං වුත්තං. १७०. 'समीपवर्ती भिक्षु को ऐसा कहना चाहिए'—यहाँ सभाग (समान विचार वाले) को ही कहना चाहिए। क्योंकि विसभाग (असमान/विरोधी) को कहने पर विवाद, कलह और संघ-भेद आदि भी हो सकते हैं, इसलिए उसे न कहकर 'यहाँ से उठकर (बाद में) प्रतिकार करूँगा' ऐसा संकल्प (आभोग) करके उपोसथ करना चाहिए, ऐसा अन्धक-अट्ठकथा में कहा गया है। අනාපත්තිපන්නරසකාදිකථා अनापत्ति-पन्नरसक आदि की कथा 172. අනාපත්තිපන්නරසකෙ – තෙ න ජානිංසූති සීමං ඔක්කන්තාති වා ඔක්කමන්තීති වාති න ජානිංසු. අථඤ්ඤෙ ආවාසිකා භික්ඛූ ආගච්ඡන්තීති ගාමං වා අරඤ්ඤං වා කෙනචි කරණීයෙන ගන්ත්වා තෙසං නිසින්නට්ඨානං ආගච්ඡන්ති. වග්ගා සමග්ගසඤ්ඤිනොති තෙසං සීමං ඔක්කන්තත්තා වග්ගා; සීමං ඔක්කන්තභාවස්ස අජානනතො සමග්ගසඤ්ඤිනො. १७२. अनापत्ति-पन्नरसक में—'वे नहीं जानते थे' का अर्थ है कि वे नहीं जानते थे कि (अन्य भिक्षु) सीमा में प्रविष्ट हो गए हैं या प्रविष्ट हो रहे हैं। 'अन्य निवासी (आवासिक) भिक्षु आ रहे हैं'—अर्थात गाँव या अरण्य में किसी कार्य से जाकर उनके बैठने के स्थान पर आते हैं। 'समग्र-संज्ञी वर्ग'—उनके सीमा में प्रविष्ट होने के कारण वे 'वर्ग' (अलग समूह) हैं; सीमा में प्रवेश के तथ्य को न जानने के कारण वे 'समग्र-संज्ञी' (एकजुट होने की धारणा वाले) हैं। 173. වග්ගාවග්ගසඤ්ඤිපන්නරසකෙ – තෙ ජානන්තීති පබ්බතෙ වා ථලෙ වා ඨිතා සීමං ඔක්කන්තෙ වා ඔක්කමන්තෙ වා පස්සන්ති. වෙමතිකපන්නරසකං උත්තානමෙව. १७३. वग्गावग्ग-संज्ञी-पन्नरसक में—'वे जानते हैं' का अर्थ है कि पर्वत या ऊँचे स्थान पर स्थित होकर वे सीमा में प्रविष्ट हुए या प्रविष्ट हो रहे भिक्षुओं को देखते हैं। वेमतिक-पन्नरसक (संशय वाला) स्पष्ट ही है। 175. කුක්කුච්චපකතපන්නරසකෙ – යථා ඉච්ඡාය අභිභූතො ‘‘ඉච්ඡාපකතො’’ති වුච්චති, එවං පුබ්බභාගෙ සන්නිට්ඨානං කත්වාපි කරණක්ඛණෙ අකප්පියෙ අකප්පියසඤ්ඤිතාසඞ්ඛාතෙන කුක්කුච්චෙන අභිභූතා ‘‘කුක්කුච්චපකතා’’ති වෙදිතබ්බා. १७५. कुक्कुच्च-पकत-पन्नरसक में—जैसे इच्छा से अभिभूत व्यक्ति को 'इच्छा-पकत' कहा जाता है, वैसे ही पूर्व भाग में निश्चय करने पर भी, (उपोसथ) करने के क्षण में अकल्पनीय (अनुचित) में अकल्पनीय-संज्ञा रूपी कौकृत्य (पछतावे/संशय) से अभिभूत व्यक्तियों को 'कुक्कुच्च-पकत' समझना चाहिए। 176. භෙදපුරෙක්ඛාරපන්නරසකෙ – අකුසලබලවතාය ථුල්ලච්චයං වුත්තං. १७६. भेद-पुरेक्खार-पन्नरसक में—अकुशल (चित्त) की प्रबलता के कारण 'थुल्लच्चय' (आपत्ति) कही गई है। සීමොක්කන්තිකපෙය්යාලකථා सीमोक्कन्तिक-पेय्याल की कथा 177. ආවාසිකෙනආගන්තුකපෙය්යාලෙ – යථා පුරිමෙ ආවාසිකෙනආවාසිකපෙය්යාලෙ ‘‘තෙ න ජානන්ති අථඤ්ඤෙ ආවාසිකා’’තිආදි වුත්තං, එවං ‘‘තෙ න ජානන්ති අථඤ්ඤෙ ආගන්තුකා’’තිආදිනා නයෙන [Pg.347] සබ්බං වෙදිතබ්බං. ආගන්තුකෙනආවාසිකපෙය්යාලෙ පන – යථා පුරිමපෙය්යාලෙ ‘‘ආවාසිකා භික්ඛූ සන්නිපතන්තී’’ති ආගතං, එවං ‘‘ආගන්තුකා භික්ඛූ සන්නිපතන්තී’’ති ආනෙතබ්බං. ආගන්තුකෙනආගන්තුකපෙය්යාලෙ පන – උභයපදෙසු ආගන්තුකවසෙන යොජෙතබ්බොති. १७७. आवासिक-आगन्तुक-पेय्याल में—जैसे पहले आवासिक-आवासिक-पेय्याल में 'वे नहीं जानते, अन्य आवासिक...' आदि कहा गया है, वैसे ही 'वे नहीं जानते, अन्य आगन्तुक...' आदि विधि से सब समझना चाहिए। आगन्तुक-आवासिक-पेय्याल में—जैसे पिछले पेय्याल में 'आवासिक भिक्षु एकत्रित होते हैं' ऐसा आया है, वैसे ही 'आगन्तुक भिक्षु एकत्रित होते हैं' ऐसा लाना (जोड़ना) चाहिए। आगन्तुक-आगन्तुक-पेय्याल में—दोनों पदों में आगन्तुक के अनुसार योजना करनी चाहिए। 178. ආවාසිකානං භික්ඛූනං චාතුද්දසො හොති, ආගන්තුකානං පන්නරසොති එත්ථ යෙසං පන්නරසො, තෙ තිරොරට්ඨතො වා ආගතා, අතීතං වා උපොසථං චාතුද්දසිකං අකංසූති වෙදිතබ්බා. ආවාසිකානං අනුවත්තිතබ්බන්ති ආවාසිකෙහි ‘‘අජ්ජුපොසථො චාතුද්දසො’’ති පුබ්බකිච්චෙ කරියමානෙ අනුවත්තිතබ්බං, න පටික්කොසිතබ්බං. න අකාමා දාතබ්බාති න අනිච්ඡාය දාතබ්බා. १७८. आवासिक भिक्षुओं के लिए चौदहवीं (चातुद्दसी) होती है, आगंतुकों के लिए पंद्रहवीं (पन्नरसी) होती है - यहाँ जिनके लिए पंद्रहवीं है, उन्हें या तो दूसरे देश से आया हुआ समझना चाहिए, या उन्होंने पिछला उपोसथ चौदहवीं को किया था। 'आवासिकों का अनुसरण करना चाहिए' का अर्थ है कि जब आवासिक भिक्षु 'आज चौदहवीं का उपोसथ है' ऐसा कहकर पूर्वकृत्य कर रहे हों, तो उनका अनुसरण करना चाहिए, विरोध नहीं करना चाहिए। 'बिना इच्छा के नहीं देना चाहिए' का अर्थ है कि अनिच्छा से (सामग्री/एकता) नहीं देनी चाहिए। ලිඞ්ගාදිදස්සනකථා लिंग आदि के दर्शन की कथा 179. ආවාසිකාකාරන්ති ආවාසිකානං ආකාරං. එස නයො සබ්බත්ථ. ආකාරො නාම යෙන තෙසං වත්තසම්පන්නා වා න වාති ආචාරසණ්ඨානං ගය්හති. ලිඞ්ගං නාම යං තෙ තත්ථ තත්ථ ලීනෙ ගමයති; අදිස්සමානෙපි ජානාපෙතීති අත්ථො. නිමිත්තං නාම යං දිස්වා තෙ අත්ථීති ඤායන්ති. උද්දෙසො නාම යෙන තෙ එවරූපපරික්ඛාරාති උද්දිසන්ති; අපදෙසං ලභන්තීති අත්ථො. සබ්බමෙතං සුපඤ්ඤත්තමඤ්චපීඨාදීනඤ්චෙව පදසද්දාදීනඤ්ච අධිවචනං, යථායොගං පන යොජෙතබ්බං. ආගන්තුකාකාරාදීසුපි එසෙව නයො. තත්ථ අඤ්ඤාතකන්ති අඤ්ඤෙසං සන්තකං. පාදානං ධොතං උදකනිස්සෙකන්ති පාදානං ධොතානං උදකනිස්සෙකං. බහුවචනස්ස එකවචනං වෙදිතබ්බං. ‘‘පාදානං ධොතඋදකනිස්සෙක’’න්ති වා පාඨො; පාදානං ධොවනඋදකනිස්සෙකන්ති අත්ථො. १७९. 'आवासिकाकारं' का अर्थ है आवासिकों का आकार (आचरण/प्रकार)। यही नियम सर्वत्र लागू होता है। 'आकार' उसे कहते हैं जिससे उनके आचरण की स्थिति का पता चलता है कि वे कर्तव्य-सम्पन्न हैं या नहीं। 'लिंग' उसे कहते हैं जो वहाँ छिपे हुए उन (भिक्षुओं) का ज्ञान कराता है; इसका अर्थ है कि न दिखने पर भी ज्ञान कराता है। 'निमित्त' उसे कहते हैं जिसे देखकर यह ज्ञात होता है कि वे 'यहाँ हैं'। 'उद्देश' उसे कहते हैं जिससे उनके इस प्रकार के परिष्कारों (उपकरणों) का निर्देश किया जाता है; इसका अर्थ है कि वे निर्देश प्राप्त करते हैं। यह सब अच्छी तरह बिछाए गए मंच-पीठ (बिस्तर-चौकी) आदि और पद-शब्द (पैरों की आहट) आदि के पर्यायवाची हैं, जिन्हें यथायोग्य जोड़ना चाहिए। आगंतुक-आकार आदि में भी यही नियम है। वहाँ 'अज्ञातं' का अर्थ है दूसरों का स्वामित्व। 'पादानं धोतं उदकनिस्सेकं' का अर्थ है पैरों के धोए हुए जल का अवशेष। यहाँ बहुवचन के स्थान पर एकवचन समझना चाहिए। 'पादानं धोतउदकनिस्सेकं' ऐसा भी पाठ है; इसका अर्थ है पैरों को धोने के जल का अवशेष। 180. නානාසංවාසකාදිවත්ථූසු – සමානසංවාසකදිට්ඨින්ති ‘‘සමානසංවාසකා එතෙ’’ති දිට්ඨිං. න පුච්ඡන්තීති තෙසං ලද්ධිං න පුච්ඡන්ති; අපුච්ඡිත්වාව වත්තපටිවත්තිං කත්වා එකතො උපොසථං කරොන්ති. නාභිවිතරන්තීති නානාසංවාසකභාවං මද්දිතුං අභිභවිතුං න සක්කොන්ති; තං දිට්ඨිං න නිස්සජ්ජාපෙන්තීති අත්ථො. १८०. नाना-संवासक आदि के विषयों में - 'समान-संवासक दृष्टि' का अर्थ है 'ये समान-संवासक हैं' ऐसी दृष्टि। 'नहीं पूछते हैं' का अर्थ है कि वे उनके मत (लब्धि) को नहीं पूछते; बिना पूछे ही कर्तव्यों का पालन कर एक साथ उपोसथ करते हैं। 'अभिभूत नहीं करते' का अर्थ है कि वे नाना-संवासक भाव को दबाने या अभिभूत करने में समर्थ नहीं होते; अर्थात् उस दृष्टि को छुड़ा नहीं पाते। නගන්තබ්බගන්තබ්බවාරකථා न जाने योग्य और जाने योग्य के विभाग की कथा 181. සභික්ඛුකා ආවාසාති යස්මිං ආවාසෙ උපොසථකාරකා භික්ඛූ අත්ථි, තම්හා ආවාසා යං න සක්කොති තදහෙව ආගන්තුං[Pg.348], සො ආවාසො උපොසථං අකත්වා න ගන්තබ්බො. අඤ්ඤත්ර සඞ්ඝෙනාති සඞ්ඝප්පහොනකෙහි භික්ඛූහි විනා. අඤ්ඤත්ර අන්තරායාති පුබ්බෙ වුත්තං දසවිධං අන්තරායං විනා. සබ්බන්තිමෙන පන පරිච්ඡෙදෙන අත්තචතුත්ථෙන අන්තරායෙ වා සති ගන්තුං වට්ටති. අනාවාසොති නවකම්මසාලාදිකො යො කොචි පදෙසො. යථා ච ආවාසාදයො න ගන්තබ්බා; එවං සචෙ විහාරෙ උපොසථං කරොන්ති, උපොසථාධිට්ඨානත්ථං සීමාපි නදීපි න ගන්තබ්බා. සචෙ පනෙත්ථ කොචි භික්ඛු හොති, තස්ස සන්තිකං ගන්තුං වට්ටති. විස්සට්ඨඋපොසථාපි ආවාසා ගන්තුං වට්ටති; එවං ගතො අධිට්ඨාතුම්පි ලභති. ආරඤ්ඤකෙනාපි භික්ඛුනා උපොසථදිවසෙ ගාමෙ පිණ්ඩාය චරිත්වා අත්තනො විහාරමෙව ආගන්තබ්බං. සචෙ අඤ්ඤං විහාරං ඔක්කමති, තත්ථ උපොසථං කත්වාව ආගන්තබ්බං, අකත්වා න වට්ටති. १८१. 'सभिक्षुक आवास' का अर्थ है जिस आवास में उपोसथ करने वाले भिक्षु हों, उस आवास से जहाँ उसी दिन वापस आना संभव न हो, वहाँ उपोसथ किए बिना नहीं जाना चाहिए। 'संघ के बिना' का अर्थ है संघ के लिए पर्याप्त भिक्षुओं के बिना। 'अंतराय के बिना' का अर्थ है पहले बताए गए दस प्रकार के अंतरायों (बाधाओं) के बिना। किंतु अंतिम सीमा के रूप में, स्वयं चौथे (चार भिक्षु) होकर या अंतराय होने पर जाना उचित है। 'अनावास' का अर्थ है नवकर्म-शाला (निर्माण स्थल) आदि जैसा कोई भी स्थान। जैसे आवास आदि में नहीं जाना चाहिए; वैसे ही यदि विहार में उपोसथ करते हैं, तो उपोसथ के अधिष्ठान के लिए सीमा या नदी पर भी नहीं जाना चाहिए। यदि वहाँ कोई भिक्षु हो, तो उसके पास जाना उचित है। छोड़े हुए उपोसथ वाले आवास से भी जाना उचित है; इस प्रकार गया हुआ भिक्षु अधिष्ठान भी प्राप्त कर सकता है। आरण्यक (वनवासी) भिक्षु को भी उपोसथ के दिन गाँव में भिक्षाटन कर अपने विहार ही लौट आना चाहिए। यदि वह किसी दूसरे विहार में प्रवेश करता है, तो वहाँ उपोसथ करके ही लौटना चाहिए, बिना किए लौटना उचित नहीं है। 182. යං ජඤ්ඤා සක්කොමි අජ්ජෙව ගන්තුන්ති යං ජානෙය්ය අජ්ජෙව තත්ථ ගන්තුං සක්කොමීති; එවරූපො ආවාසො ගන්තබ්බො. තත්ථ භික්ඛූහි සද්ධිං උපොසථං කරොන්තෙනාපි හි ඉමිනා නෙව උපොසථන්තරායො කතො භවිස්සතීති. १८२. 'जिसे जाने कि आज ही वहाँ पहुँच सकता हूँ' का अर्थ है जिसे यह ज्ञात हो कि आज ही वहाँ पहुँच सकता हूँ; ऐसे आवास में जाना चाहिए। क्योंकि वहाँ भिक्षुओं के साथ उपोसथ करते हुए भी, इस (भिक्षु) के द्वारा अपने उपोसथ में कोई बाधा (अंतराय) उत्पन्न नहीं होगी। වජ්ජනීයපුග්ගලසන්දස්සනකථා वर्जनीय व्यक्तियों के निर्देश की कथा 183. භික්ඛුනියා නිසින්නපරිසායාතිආදීසු හත්ථපාසුපගමනමෙව පමාණං. අඤ්ඤත්ර අවුට්ඨිතාය පරිසායාති ඉදඤ්හි පාරිවාසියපාරිසුද්ධිදානං නාම පරිසාය වුට්ඨිතකාලතො පට්ඨාය න වට්ටති, අවුට්ඨිතාය පන වට්ටති. තෙනාහ – ‘‘අඤ්ඤත්ර අවුට්ඨිතාය පරිසායා’’ති. තස්ස ලක්ඛණං භික්ඛුනිවිභඞ්ගෙ පරිවාසියඡන්දදානවණ්ණනතො ගහෙතබ්බං. අනුපොසථෙති චාතුද්දසිකො ච පන්නරසිකො චාති ඉමෙ ද්වෙ උපොසථෙ ඨපෙත්වා අඤ්ඤස්මිං දිවසෙ. අඤ්ඤත්ර සඞ්ඝසාමග්ගියාති යා කොසම්බකභික්ඛූනං විය භින්නෙ සඞ්ඝෙ පුන සඞ්ඝසාමග්ගී කරියති, තථාරූපිං සඞ්ඝසාමග්ගිං ඨපෙත්වා. තදා ච ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො අජ්ජුපොසථො සාමග්ගී’’ති වත්වා කාතබ්බො. යෙ පන කිස්මිඤ්චිදෙව අප්පමත්තකෙ උපොසථං ඨපෙත්වා පුන සමග්ගා හොන්ති, තෙහි උපොසථෙයෙව කාතබ්බොති. १८३. 'भिक्षुणी की बैठी हुई परिषद में' आदि में हस्तपाश (हाथ की पहुँच) के भीतर जाना ही प्रमाण है। 'बिना उठी हुई परिषद के' यहाँ यह पारिवासिक-पारिशुद्धि दान परिषद के उठने के समय से मान्य नहीं होता, किंतु जब तक परिषद नहीं उठी है, तब तक मान्य है। इसीलिए कहा गया है - 'बिना उठी हुई परिषद के'। इसका लक्षण भिक्षुणी-विभंग में पारिवासिक-छन्द-दान की व्याख्या से ग्रहण करना चाहिए। 'अनुपोसथ में' का अर्थ है चौदहवीं और पंद्रहवीं - इन दो उपोसथों को छोड़कर किसी अन्य दिन। 'संघ-सामग्री के बिना' का अर्थ है जैसे कौशाम्बी के भिक्षुओं के समान संघ के विभाजित होने पर पुनः जो संघ की एकता की जाती है, वैसी संघ-सामग्री को छोड़कर। और तब 'भन्ते! संघ मेरी सुने, आज एकता का उपोसथ है' ऐसा कहकर (उपोसथ) करना चाहिए। जो भिक्षु किसी बहुत छोटे कारण से उपोसथ को रोककर पुनः एकजुट होते हैं, उन्हें उपोसथ के दिन ही उपोसथ करना चाहिए। උපොසථක්ඛන්ධකවණ්ණනා නිට්ඨිතා. उपोसथ-स्कन्धक की व्याख्या समाप्त हुई। 3. වස්සූපනායිකක්ඛන්ධකං ३. वर्षूपनायिका-स्कन्धक වස්සූපනායිකානුජානනකථා वर्षावास की अनुमति की कथा 184. වස්සූපනායිකක්ඛන්ධකෙ [Pg.349] – අපඤ්ඤත්තොති අනනුඤ්ඤාතො අසංවිහිතො වා. තෙ ඉධ භික්ඛූති තෙ භික්ඛූ, ඉධසද්දො නිපාතමත්තො. සඞ්ඝාතං ආපාදෙන්තාති විනාසං ආපාදෙන්තා. සඞ්කසායිස්සන්තීති අප්පොස්සුක්කා නිබද්ධවාසං වසිස්සන්ති. සකුන්තකාති සකුණා. වස්සානෙ වස්සං උපගන්තුන්ති වස්සානනාමකෙ තෙමාසෙ වස්සං උපගන්තබ්බන්ති අත්ථො. කති නු ඛො වස්සූපනායිකාති කති නු ඛො වස්සූපගමනානි. අපරජ්ජුගතායාති එත්ථ අපරජ්ජුගතාය අස්සාති අපරජ්ජුගතා, තස්සා අපරජ්ජුගතාය; අතික්කන්තාය අපරස්මිං දිවසෙති අත්ථො. දුතියනයෙපි මාසො ගතාය අස්සාති මාසගතා, තස්සා මාසගතාය; අතික්කන්තාය මාසෙ පරිපුණ්ණෙති අත්ථො. තස්මා ආසාළ්හීපුණ්ණමාය අනන්තරෙ පාටිපදදිවසෙ, ආසාළ්හීපුණ්ණමිතො වා අපරාය පුණ්ණමාය අනන්තරෙ පාටිපදදිවසෙයෙව විහාරං පටිජග්ගිත්වා පානීයං පරිභොජනීයං උපට්ඨපෙත්වා සබ්බං චෙතියවන්දනාදිසාමීචිකම්මං නිට්ඨාපෙත්වා ‘‘ඉමස්මිං විහාරෙ ඉමං තෙමාසං වස්සං උපෙමී’’ති සකිං වා ද්වත්තික්ඛත්තුං වා වාචං නිච්ඡාරෙත්වා වස්සං උපගන්තබ්බං. १८४. 'वस्सूपनायिका खन्धक' में - 'अपञ्ञत्तो' का अर्थ है अनुमति न दिया गया या प्रबंध न किया गया। 'ते इध भिक्खू' का अर्थ है वे भिक्षु, यहाँ 'इध' शब्द केवल एक निपात है। 'सङ्घातं आपादेन्ता' का अर्थ है विनाश को प्राप्त करते हुए। 'सङ्कसायिस्सन्ति' का अर्थ है बिना किसी प्रयास के स्थायी रूप से निवास करेंगे। 'सकुन्तका' का अर्थ है पक्षी। 'वस्साने वस्सं उपगन्तुं' का अर्थ है वर्षा ऋतु नामक तीन महीनों में वर्षावास करना चाहिए। 'कति नु खो वस्सूपनायिका' का अर्थ है वर्षावास के कितने प्रकार हैं? 'अपरज्जुगताया' यहाँ 'अपरज्जुगताया अस्सा' का अर्थ है 'अपरज्जुगता', उस 'अपरज्जुगता' के बीत जाने पर; अर्थात् अगले दिन। दूसरे अर्थ में भी 'मासो गताया अस्सा' का अर्थ है 'मासगता', उस 'मासगता' के बीत जाने पर; अर्थात् एक महीना पूरा होने पर। इसलिए आषाढ़ी पूर्णिमा के ठीक बाद प्रतिपदा के दिन, या आषाढ़ी पूर्णिमा से अगली पूर्णिमा (श्रावणी पूर्णिमा) के ठीक बाद प्रतिपदा के दिन ही विहार की सफाई करके, पीने और उपयोग के पानी की व्यवस्था करके, चैत्य वंदना आदि सभी औपचारिक कार्यों को पूरा करके, "मैं इस विहार में इन तीन महीनों के लिए वर्षावास करता हूँ" - ऐसा एक बार या दो-तीन बार बोलकर वर्षावास ग्रहण करना चाहिए। වාචං නිච්ඡාරෙත්වා වස්සං උපගන්තබ්බං. वाणी का उच्चारण करके वर्षावास ग्रहण करना चाहिए। වස්සානෙචාරිකාපටික්ඛෙපාදිකථා वर्षा ऋतु में चारिका (भ्रमण) के निषेध आदि की कथा। 185-6. යො පක්කමෙය්යාති එත්ථ අනපෙක්ඛගමනෙන වා අඤ්ඤත්ථ අරුණං උට්ඨාපනෙන වා ආපත්ති වෙදිතබ්බා. යො අතික්කමෙය්යාති එත්ථ විහාරගණනාය ආපත්තියො වෙදිතබ්බා. සචෙ හි තං දිවසං විහාරසතස්ස උපචාරං ඔක්කමිත්වා අතික්කමති, සතං ආපත්තියො. සචෙ පන විහාරූපචාරං අතික්කමිත්වා අඤ්ඤස්ස විහාරස්ස උපචාරං අනොක්කමිත්වාව නිවත්තති, එකා එව ආපත්ති. කෙනචි අන්තරායෙන පුරිමිකං අනුපගතෙන පච්ඡිමිකා උපගන්තබ්බා. १८५-६. 'यो पक्कमेय्य' (जो प्रस्थान करे) यहाँ बिना किसी अपेक्षा के जाने से या अन्य स्थान पर अरुणोदय (सूर्योदय) होने देने से आपत्ति समझनी चाहिए। 'यो अतिक्कमेय्य' (जो उल्लंघन करे) यहाँ विहारों की संख्या के अनुसार आपत्तियाँ समझनी चाहिए। यदि उस दिन सौ विहारों की सीमा में प्रवेश करके उन्हें पार करता है, तो सौ आपत्तियाँ होती हैं। लेकिन यदि अपने विहार की सीमा को पार करके दूसरे विहार की सीमा में प्रवेश किए बिना ही लौट आता है, तो केवल एक ही आपत्ति होती है। किसी अंतराय (बाधा) के कारण यदि कोई 'पुरिमिका' (प्रथम वर्षावास) में प्रवेश नहीं कर पाता है, तो उसे 'पच्छिमिका' (द्वितीय वर्षावास) में प्रवेश करना चाहिए। වස්සං උක්කඩ්ඪිතුකාමොති වස්සනාමකං පඨමමාසං උක්කඩ්ඪිතුකාමො, සාවණමාසං අකත්වා පුන ආසාළ්හීමාසමෙව කත්තුකාමොති අත්ථො. ආගමෙ ජුණ්හෙති ආගමෙ මාසෙති අත්ථො. අනුජානාමි භික්ඛවෙ රාජූනං අනුවත්තිතුන්ති එත්ථ වස්සුක්කඩ්ඪනෙ භික්ඛූනං කාචි පරිහානි නාම නත්ථීති අනුවත්තිතුං [Pg.350] අනුඤ්ඤාතං, තස්මා අඤ්ඤස්මිම්පි ධම්මිකෙ කම්මෙ අනුවත්තිතබ්බං. අධම්මිකෙ පන න කස්සචි අනුවත්තිතබ්බං. 'वस्सं उक्कड्ढितुकामो' का अर्थ है वर्षा ऋतु के प्रथम मास (आषाढ़) को आगे बढ़ाना चाहना, अर्थात् श्रावण मास को (वर्षावास का महीना) न मानकर पुनः आषाढ़ मास को ही (वर्षावास का महीना) बनाना चाहना। 'आगमे जुण्हि' का अर्थ है आने वाले महीने में। "भिक्षुओं, मैं राजाओं के आदेश का पालन करने की अनुमति देता हूँ" - यहाँ वर्षावास को आगे बढ़ाने में भिक्षुओं की कोई हानि नहीं है, इसलिए पालन करने की अनुमति दी गई है। अतः अन्य धार्मिक कार्यों में भी (राजा का) अनुसरण करना चाहिए। परंतु अधार्मिक कार्यों में किसी का भी अनुसरण नहीं करना चाहिए। සත්තාහකරණීයානුජානනකථා सात दिनों के लिए करणीय (कार्यों) की अनुमति की कथा। 187-8. සත්තාහකරණීයෙසු – සත්තාහකරණීයෙන ගන්තුන්ති සත්තාහබ්භන්තරෙ යං කත්තබ්බං තං සත්තාහකරණීයං, තෙන සත්තාහකරණීයෙන කරණභූතෙන ගන්තුං අනුජානාමීති අත්ථො. පහිතෙ ගන්තුන්ති ඉමෙහි සත්තහි භික්ඛුආදීහි දූතෙ පහිතෙයෙව ගන්තුං අනුජානාමීති අත්ථො. සත්තාහං සන්නිවත්තො කාතබ්බොති සත්තාහෙයෙව සන්නිවත්තිතබ්බො, අට්ඨමො අරුණො තත්ථෙව න උට්ඨාපෙතබ්බොති අත්ථො. १८७-८. 'सत्ताहकरणीयेसु' (सात दिनों के करणीय कार्यों में) - 'सत्ताहकरणीयेन गन्तुं' का अर्थ है सात दिनों के भीतर जो कार्य किया जाना चाहिए वह 'सत्ताहकरणीय' है, उस सत्ताहकरणीय कार्य के कारण जाने की अनुमति देता हूँ। 'पहिते गन्तुं' का अर्थ है इन सात (प्रकार के) भिक्षु आदि व्यक्तियों द्वारा दूत भेजे जाने पर ही जाने की अनुमति देता हूँ। 'सत्ताहं सन्निवत्तो कातब्बो' का अर्थ है सात दिनों के भीतर ही लौट आना चाहिए, आठवाँ अरुणोदय (सूर्योदय) वहीं नहीं होने देना चाहिए। භික්ඛුනිසඞ්ඝං උද්දිස්සාති ඉතො පට්ඨාය වච්චකුටි ජන්තාඝරං ජන්තාඝරසාලාති ඉමානි තීණි පරිහීනානි. 'भिक्खुनीसङ्घं उद्दिस्स' (भिक्षुणी संघ के उद्देश्य से) - यहाँ से आगे शौचालय, जंताघर (स्नान गृह) और जंताघर-शाला - ये तीन (शब्द) छोड़ दिए गए हैं। 189. උදොසිතාදීනි උදොසිතසික්ඛාපදාදීසු වුත්තානෙව. රසවතීති භත්තගෙහං වුච්චති. වාරෙය්යං සඤ්චරිත්තසික්ඛාපදෙ වුත්තමෙව. පුරායං සුත්තන්තො පලුජ්ජතීති යාව අයං සුත්තන්තො න පලුජ්ජති, යාව අයං සුත්තන්තො න විනස්සති. අඤ්ඤතරං වා පනස්ස කිච්චං හොති කරණීයං වාති එතෙන පරිසඞ්ඛතං යංකිඤ්චි කරණීයං සඞ්ගහිතං හොති. සබ්බත්ථ ච ‘‘ඉච්ඡාමි දානඤ්ච දාතුං ධම්මඤ්ච සොතුං භික්ඛූ ච පස්සිතු’’න්ති ඉමිනාව කප්පියවචනෙන පෙසිතෙ ගන්තබ්බං, එතෙසං වා වෙවචනෙන. පෙය්යාලක්කමො පන එවං වෙදිතබ්බො, යථා ‘‘උපාසකෙන සඞ්ඝං උද්දිස්ස විහාරාදයො කාරාපිතා හොන්ති, සම්බහුලෙ භික්ඛූ උද්දිස්ස, එකං භික්ඛුං උද්දිස්ස, භික්ඛුනිසඞ්ඝං උද්දිස්ස, සම්බහුලා භික්ඛුනියො, එකං භික්ඛුනිං, සම්බහුලා සික්ඛමානායො, එකං සික්ඛමානං, සම්බහුලෙ සාමණෙරෙ, එකං සාමණෙරං, සම්බහුලා සාමණෙරියො, එකං සාමණෙරිං උද්දිස්ස අත්තනො අත්ථාය නිවෙසනං කාරාපිතං හොතී’’ති වුත්තං; එවමෙව ‘‘උපාසිකාය, භික්ඛුනා, භික්ඛුනියා, සික්ඛමානාය, සාමණෙරෙන, සාමණෙරියා සඞ්ඝං උද්දිස්සා’’ති සබ්බං වත්තබ්බං. එතෙසු සත්තප්පකාරෙසු කරණීයෙසු පහිතෙ ගන්තබ්බං. १८९. 'उदोसित' आदि शब्द 'उदोसित सिक्खापद' आदि में कहे ही गए हैं। 'रसवती' रसोई घर को कहा जाता है। 'वारेय्यं' (विवाह) 'सञ्चरित्त सिक्खापद' में कहा ही गया है। 'पुरायं सुत्तन्तो पलुज्जति' का अर्थ है जब तक यह सुत्तंत नष्ट नहीं होता, जब तक यह सुत्तंत विनष्ट नहीं होता। 'अञ्ञतरं वा पनस्स किच्चं होति करणीयं वा' - इसके द्वारा अच्छी तरह से तैयार किया गया कोई भी करणीय कार्य सम्मिलित है। और सभी स्थितियों में "मैं दान देना चाहता हूँ, धर्म सुनना चाहता हूँ और भिक्षुओं के दर्शन करना चाहता हूँ" - इस कल्पनीय (उचित) वचन के साथ दूत भेजे जाने पर ही जाना चाहिए, या इनके पर्यायवाची शब्दों के साथ। 'पेय्याल' (संक्षेप) का क्रम इस प्रकार समझना चाहिए, जैसे - "उपासक द्वारा संघ के उद्देश्य से विहार आदि बनवाए गए हों, बहुत से भिक्षुओं के लिए, एक भिक्षु के लिए, भिक्षुणी संघ के लिए, बहुत सी भिक्षुणियों के लिए, एक भिक्षुणी के लिए, बहुत सी शिक्षमाणाओं के लिए, एक शिक्षमाणा के लिए, बहुत से श्रामणेरों के लिए, एक श्रामणेर के लिए, बहुत सी श्रामणेरियों के लिए, एक श्रामणेरी के लिए, या अपने स्वयं के लाभ के लिए घर बनवाया गया हो" - ऐसा कहा गया है; वैसे ही "उपासिका द्वारा, भिक्षु द्वारा, भिक्षुणी द्वारा, शिक्षमाणा द्वारा, श्रामणेर द्वारा, श्रामणेरी द्वारा संघ के उद्देश्य से" - यह सब कहना चाहिए। इन सात प्रकार के करणीय कार्यों के लिए दूत भेजे जाने पर जाना चाहिए। පඤ්චන්නංඅප්පහිතෙපිඅනුජානනකථා पाँच (प्रकार के व्यक्तियों) द्वारा दूत न भेजे जाने पर भी (जाने की) अनुमति की कथा। 193. පඤ්චන්නං සත්තාහකරණීයෙනාති එතෙසං භික්ඛුආදීනං සහධම්මිකානං ‘‘ගිලානභත්තං වා ගිලානුපට්ඨාකභත්තං වා භෙසජ්ජං වා පරියෙසිස්සාමි[Pg.351], පුච්ඡිස්සාමි වා, උපට්ඨහිස්සාමි වා’’ති එවමාදිනා පරතො විත්ථාරෙත්වා දස්සිතෙන කාරණෙන අප්පහිතෙපි ගන්තබ්බං, පගෙව පහිතෙ. භික්ඛු ගිලානො හොති, අනභිරති උප්පන්නා හොති, කුක්කුච්චං උප්පන්නං හොති, දිට්ඨිගතං උප්පන්නං හොති, ගරුධම්මං අජ්ඣාපන්නො හොති පරිවාසාරහො, මූලාය පටිකස්සනාරහො හොති, මානත්තාරහො, අබ්භානාරහො, සඞ්ඝො කම්මං කත්තුකාමො හොති, කතං වා සඞ්ඝෙන කම්මං හොතීති එතෙහි දසහි කාරණෙහි භික්ඛුස්ස සන්තිකං ගන්තබ්බං. භික්ඛුනියා සන්තිකං නවහි කාරණෙහි ගන්තබ්බං, සික්ඛමානාය සන්තිකං ඡහි – ආදිතො චතූහි, සික්ඛා කුප්පිතා හොති, උපසම්පජ්ජිතුකාමා හොතීති. සාමණෙරස්සාපි ඡහි – ආදිතො චතූහි, වස්සං පුච්ඡිතුකාමො උපසම්පජ්ජිතුකාමො හොතීති. සාමණෙරියා උපසම්පදං අපනෙත්වා සික්ඛාපදං දාතුකාමො හොතීති ඉමිනා සද්ධිං පඤ්චහි. පරතො මාතාපිතූනං අනුඤ්ඤාතට්ඨානෙපි එසෙව නයො. අන්ධකට්ඨකථායං පන ‘‘යෙ මාතාපිතූනං උපට්ඨාකා ඤාතකා වා අඤ්ඤාතකා වා තෙසම්පි අප්පහිතෙ ගන්තුං වට්ටතී’’ති වුත්තං, තං නෙව අට්ඨකථායං, න පාළියා වුත්තං, තස්මා න ගහෙතබ්බං. १९३. 'पाँच प्रकार के व्यक्तियों के लिए सात-दिवसीय कार्य (सप्ताह-करणीय) के द्वारा' - यहाँ इन भिक्षु आदि सधार्मिकों (सहधार्मिकों) के लिए 'बीमार के लिए भोजन, या बीमार की सेवा करने वाले के लिए भोजन, या औषधि खोजूँगा, या (बीमार के बारे में) पूछूँगा, या स्वयं सेवा करूँगा' - इस प्रकार आगे विस्तार से बताए गए कारणों से, दूत न भेजे जाने पर भी जाना चाहिए, और यदि दूत भेजा गया हो तो कहना ही क्या। भिक्षु बीमार हो, (शासन में) अरुचि उत्पन्न हुई हो, कुक्कुच्च (पश्चाताप/संदेह) उत्पन्न हुआ हो, मिथ्या दृष्टि उत्पन्न हुई हो, वह भारी आपत्ति (संघादिशेष) में पड़ा हो और परिवास के योग्य हो, मूल-प्रतिकर्षण के योग्य हो, मानत्त के योग्य हो, या अब्भान के योग्य हो; संघ कोई कर्म (विधिकर्म) करना चाहता हो, या संघ द्वारा कर्म किया गया हो - इन दस कारणों से भिक्षु के पास जाना चाहिए। भिक्षुणी के पास नौ कारणों से जाना चाहिए। शिक्षमाणा के पास छह कारणों से - आदि के चार कारणों से, और यदि उसकी शिक्षा (प्रशिक्षण) क्षुब्ध (नष्ट) हो गई हो, या वह उपसंपदा की इच्छुक हो। सामणेर के पास भी छह कारणों से - आदि के चार कारणों से, और यदि वह वर्षा-वास के बारे में पूछना चाहता हो या उपसंपदा का इच्छुक हो। सामणेरी के पास (सामणेर के कारणों में से) उपसंपदा को हटाकर 'शिक्षापद देना चाहता है' - इस कारण के साथ पाँच कारणों से जाना चाहिए। आगे माता-पिता के लिए अनुमत स्थान पर भी यही नियम है। किन्तु अन्धक-अट्ठकथा में कहा गया है कि 'जो माता-पिता के सेवक हैं, चाहे वे संबंधी हों या न हों, उनके पास भी दूत न भेजने पर जाना कल्प्य है', वह न तो अट्ठकथा में कहा गया है और न ही पालि में, इसलिए उसे ग्रहण नहीं करना चाहिए। පහිතෙයෙවඅනුජානනකථා भेजे जाने पर ही अनुमति का कथन 199. භික්ඛුගතිකොති එකස්මිං විහාරෙ භික්ඛූහි සද්ධිං වසනකපුරිසො. උන්ද්රියතීති පලුජ්ජති. භණ්ඩං ඡෙදාපිතන්ති දබ්බසම්භාරභණ්ඩං ඡෙදාපිතං. ආවහාපෙය්යුන්ති ආහරාපෙය්යුං. දජ්ජාහන්ති දජ්ජෙ අහං. සඞ්ඝකරණීයෙනාති එත්ථ යංකිඤ්චි උපොසථාගාරාදීසු සෙනාසනෙසු චෙතියඡත්තවෙදිකාදීසු වා කත්තබ්බං, අන්තමසො භික්ඛුනො පුග්ගලිකසෙනාසනම්පි, සබ්බං සඞ්ඝකරණීයමෙව. තස්මා තස්ස නිප්ඵාදනත්ථං දබ්බසම්භාරාදීනි වා ආහරිතුං වඩ්ඪකීප්පභුතීනං භත්තවෙතනාදීනි වා දාපෙතුං ගන්තබ්බං. १९९. 'भिक्खुगतिको' का अर्थ है एक ही विहार में भिक्षुओं के साथ रहने वाला पुरुष। 'उन्द्रियति' का अर्थ है टूट-फूट जाना या जीर्ण होना। 'भाण्डं छेदापितं' का अर्थ है इमारती लकड़ी आदि की सामग्री कटवाई गई है। 'आवाहापेय्युं' का अर्थ है यदि वे मँगवाएँ। 'दज्जाहं' पद का पद-विच्छेद 'दज्जे अहं' (मैं दूँ) करना चाहिए। 'संघकरणीयेन' (संघ के कार्य से) यहाँ उपोसथ-भवन आदि सेनासनों में, या चैत्य, छत्र, वेदिका आदि में जो कुछ भी करना शेष है, यहाँ तक कि भिक्षु का व्यक्तिगत सेनासन भी हो, वह सब संघ-करणीय ही है। इसलिए उसकी सिद्धि के लिए इमारती लकड़ी आदि लाने के लिए, या बढ़ई आदि को भोजन-मजदूरी आदि दिलाने के लिए जाना चाहिए। අයං පනෙත්ථ පාළිමුත්තකරත්තිච්ඡෙදවිනිච්ඡයො – ධම්මසවනත්ථාය අනිමන්තිතෙන ගන්තුං න වට්ටති. සචෙ එකස්මිං මහාවාසෙ පඨමංයෙව කතිකා කතා හොති – ‘‘අසුකදිවසං නාම සන්නිපතිතබ්බ’’න්ති, නිමන්තිතොයෙව නාම හොති, ගන්තුං වට්ටති. ‘‘භණ්ඩකං ධොවිස්සාමී’’ති ගන්තුං න වට්ටති. සචෙ පන [Pg.352] ආචරියුපජ්ඣායා පහිණන්ති, වට්ටති. නාතිදූරෙ විහාරො හොති, තත්ථ ගන්ත්වා අජ්ජෙව ආගමිස්සාමීති සම්පාපුණිතුං න සක්කොති, වට්ටති. උද්දෙසපරිපුච්ඡාදීනං අත්ථායපි ගන්තුං න වට්ටති. ‘‘ආචරියං පස්සිස්සාමී’’ති පන ගන්තුං ලභති. සචෙ පන නං ආචරියො ‘‘අජ්ජ මා ගච්ඡා’’ති වදති, වට්ටති. උපට්ඨාකකුලං වා ඤාතිකුලං වා දස්සනාය ගන්තුං න ලභතීති. यहाँ पालि-मुक्त रात्रि-च्छेद (वर्षा-वास के दौरान रात बिताने) का विनिश्चय इस प्रकार है - धर्म-श्रवण के लिए बिना निमंत्रित किए जाना कल्प्य नहीं है। यदि किसी बड़े आवास में पहले से ही यह नियम (कत्तिका) बना हो कि 'अमुक दिन एकत्रित होना चाहिए', तो वह निमंत्रित ही माना जाता है, वहाँ जाना कल्प्य है। 'सामग्री (चीवर आदि) धोऊँगा' - ऐसा सोचकर जाना कल्प्य नहीं है। किन्तु यदि आचार्य या उपाध्याय भेजते हैं, तो कल्प्य है। यदि विहार बहुत दूर न हो और यह सोचकर जाए कि 'आज ही लौट आऊँगा', किन्तु (अरुणोदय से पहले) पहुँचने में समर्थ न हो पाए, तो भी कल्प्य है। पालि-पाठ (उद्देश) या अट्ठकथा पूछने आदि के लिए भी जाना कल्प्य नहीं है। किन्तु 'आचार्य के दर्शन करूँगा' - ऐसा सोचकर जाने की अनुमति है। यदि आचार्य उसे कहें कि 'आज मत जाओ', तो रुकना कल्प्य है। उपस्थापक कुल (सेवक परिवार) या ज्ञाति कुल (रिश्तेदारों) को देखने के लिए जाने की अनुमति नहीं है - यह पालि-मुक्त रात्रि-च्छेद का विनिश्चय है। අන්තරායෙඅනාපත්තිවස්සච්ඡෙදකථා अंतराय (बाधा) होने पर अनापत्ति और वर्षा-वास भंग होने का कथन 201. යෙන ගාමො තෙන ගන්තුන්තිආදීසු සචෙ ගාමො අවිදූරං ගතො හොති, තත්ථ පිණ්ඩාය චරිත්වා විහාරමෙව ආගන්ත්වා වසිතබ්බං. සචෙ දූරං ගතො, සත්තාහවාරෙන අරුණො උට්ඨාපෙතබ්බො. න සක්කා චෙ හොති, තත්රෙව සභාගට්ඨානෙ වසිතබ්බං. සචෙ මනුස්සා යථාපවත්තානි සලාකභත්තාදීනි දෙන්ති, ‘‘න මයං තස්මිං විහාරෙ වසිම්හා’’ති වත්තබ්බා. ‘‘මයං විහාරස්ස වා පාසාදස්ස වා න දෙම, තුම්හාකං දෙම, යත්ථ කත්ථචි වසිත්වා භුඤ්ජථා’’ති වුත්තෙ පන යථාසුඛං භුඤ්ජිතබ්බං, තෙසංයෙව තං පාපුණාති. ‘‘තුම්හාකං වසනට්ඨානෙ පාපුණාපෙත්වා භුඤ්ජථා’’ති වුත්තෙ පන යත්ථ වසන්ති, තත්ථ නෙත්වා වස්සග්ගෙන පාපුණාපෙත්වා භුඤ්ජිතබ්බං. २०१. 'जिधर गाँव गया हो, उधर जाना चाहिए' आदि पालि पदों में विनिश्चय इस प्रकार समझना चाहिए - यदि गाँव पास ही गया हो, तो वहाँ भिक्षाटन करके विहार में ही लौटकर रहना चाहिए। यदि दूर गया हो, तो सात-सात दिन के अंतराल पर (विहार लौटकर) अरुणोदय कराना चाहिए। यदि ऐसा करना संभव न हो, तो वहीं (गाँव में) सधार्मिकों (समान विचार वाले भिक्षुओं) के स्थान पर रहना चाहिए। यदि मनुष्य पहले की तरह ही शलाका-भोजन आदि देते हैं, तो उनसे कहना चाहिए कि 'हम उस विहार में नहीं रह रहे हैं'। किन्तु यदि वे कहें कि 'हम विहार या प्रासाद को नहीं दे रहे हैं, हम आप लोगों को दे रहे हैं, आप कहीं भी रहकर इसे ग्रहण करें', तो सुखपूर्वक उसे ग्रहण करना चाहिए, वह उन्हीं (स्थानांतरित भिक्षुओं) को प्राप्त होता है। यदि वे कहें कि 'आपके रहने के स्थान पर पहुँचाकर ग्रहण करें', तो जहाँ वे रहते हैं, वहाँ ले जाकर वर्षा-क्रम (वरिष्ठता) के अनुसार पहुँचाकर ग्रहण करना चाहिए। සචෙ පවාරිතකාලෙ වස්සාවාසිකං දෙන්ති, යදි සත්තාහවාරෙන අරුණං උට්ඨාපයිංසු, ගහෙතබ්බං. ඡින්නවස්සෙහි පන ‘‘න මයං තත්ථ වසිම්හ, ඡින්නවස්සා මය’’න්ති වත්තබ්බං. යදි ‘‘යෙසං අම්හාකං සෙනාසනං පාපිතං, තෙ ගණ්හන්තූ’’ති වදන්ති, ගහෙතබ්බං. යං පන විහාරෙ උපනික්ඛිත්තකං මා විනස්සීති ඉධ ආහටං චීවරාදිවෙභඞ්ගියභණ්ඩං, තං තත්ථෙව ගන්ත්වා අපලොකෙත්වා භාජෙතබ්බං. ‘‘ඉතො අය්යානං චත්තාරො පච්චයෙ දෙථා’’ති කප්පියකාරකානං දින්නෙ ඛෙත්තවත්ථුආදිකෙ තත්රුප්පාදෙපි එසෙව නයො. සඞ්ඝිකඤ්හි වෙභඞ්ගියභණ්ඩං අන්තොවිහාරෙ වා බහිසීමාය වා හොතු, බහිසීමාය ඨිතානං අපලොකෙත්වා භාජෙතුං න වට්ටති. උභයත්ථ ඨිතම්පි පන අන්තොසීමාය ඨිතානං අපලොකෙත්වා භාජෙතුං වට්ටතියෙව. यदि प्रवारणा के समय वर्षावासिक (चीवर) देते हैं, और यदि उन्होंने सात-सात दिन के अंतराल पर अरुणोदय कराया है, तो उसे ग्रहण करना चाहिए। किन्तु जिनका वर्षा-वास भंग हो गया है, उन्हें कहना चाहिए कि 'हम वहाँ (पूरे समय) नहीं रहे, हमारा वर्षा-वास भंग हो गया है'। यदि वे कहें कि 'जिनके पास हमारा सेनासन पहुँचा है, वे ही इसे ग्रहण करें', तो ग्रहण करना चाहिए। जो सामग्री विहार में सुरक्षित रखने के लिए रखी गई थी कि 'नष्ट न हो जाए' और यहाँ (गाँव में) लाई गई है, जो चीवर आदि विभाजनीय सामग्री (वेभंगिय-भाण्ड) है, उसे उसी मूल विहार में जाकर, अनुमति लेकर विभाजित करना चाहिए। 'यहाँ (खेत आदि) से आर्यों को चार प्रत्यय दें' - इस प्रकार कप्पियकारकों को खेत-वास्तु आदि दिए जाने पर, वहाँ उत्पन्न होने वाली सामग्री के विषय में भी यही नियम है। क्योंकि संघ की विभाजनीय सामग्री चाहे विहार के भीतर हो या सीमा के बाहर, सीमा के बाहर स्थित भिक्षुओं को बिना अनुमति लिए उसे विभाजित करना कल्प्य नहीं है। किन्तु दोनों स्थानों पर स्थित सामग्री को अंतःसीमा में स्थित भिक्षुओं द्वारा अनुमति लेकर विभाजित करना कल्प्य ही है। සඞ්ඝභෙදෙඅනාපත්තිවස්සච්ඡෙදකථා संघ-भेद होने पर अनापत्ति और वर्षा-वास भंग होने का कथन 202. සඞ්ඝො [Pg.353] භින්නොති එත්ථ භින්නෙ සඞ්ඝෙ ගන්ත්වා කරණීයං නත්ථි, යො පන ‘‘භිජ්ජිස්සතී’’ති ආසඞ්කිතො, තං සන්ධාය ‘‘භින්නො’’ති වුත්තං. සම්බහුලාහි භික්ඛුනීහි සඞ්ඝො භින්නොති එත්ථ න භික්ඛුනීහි සඞ්ඝො භින්නොති දට්ඨබ්බො. වුත්තඤ්හෙතං ‘‘න ඛො උපාලි භික්ඛුනී සඞ්ඝං භින්දතී’’ති. එතා පන නිස්සාය අනුබලං කත්වා යං සඞ්ඝං ‘‘භික්ඛූ භින්දෙය්යු’’න්ති ආසඞ්කා හොති, තං සන්ධායෙතං වුත්තං. २०२. 'संघ विभाजित है' - यहाँ यदि संघ विभाजित हो चुका हो, तो जाकर कुछ करने योग्य नहीं है। किन्तु जिसके बारे में यह आशंका हो कि 'यह विभाजित हो जाएगा', उसे लक्ष्य करके भगवान ने 'विभाजित' कहा है। 'बहुत सी भिक्षुणियों द्वारा संघ विभाजित है' - यहाँ यह नहीं समझना चाहिए कि भिक्षुणियों ने संघ को विभाजित किया है। क्योंकि यह कहा गया है - 'हे उपालि! भिक्षुणी संघ का भेद नहीं करती'। किन्तु उन्हें (भिक्षुणियों को) आधार बनाकर और उन्हें बल प्रदान करके यदि भिक्षु संघ का भेद करें - ऐसी आशंका होने पर, उसे लक्ष्य करके यह कहा गया है। වජාදීසුවස්සූපගමනකථා गोशाला आदि में वर्षा-वास करने का कथन 203. වජොති ගොපාලකානං නිවාසට්ඨානං. යෙන වජොති එත්ථ වජෙන සද්ධිං ගතස්ස වස්සච්ඡෙදෙ අනාපත්ති. २०३. 'वज' (Vaja) का अर्थ है ग्वालों के रहने का स्थान। 'येन वज' यहाँ वज (ग्वालों के समूह) के साथ जाने वाले भिक्षु के लिए वर्षावास भंग होने पर भी आपत्ति नहीं होती है। උපකට්ඨායාති ආසන්නාය. සත්ථෙ වස්සං උපගන්තුන්ති එත්ථ වස්සූපනායිකදිවසෙ තෙන භික්ඛුනා උපාසකා වත්තබ්බා ‘‘කුටිකා ලද්ධුං වට්ටතී’’ති. සචෙ කරිත්වා දෙන්ති, තත්ථ පවිසිත්වා ‘‘ඉධ වස්සං උපෙමී’’ති තික්ඛත්තුං වත්තබ්බං. නො චෙ දෙන්ති, සාලාසඞ්ඛෙපෙන ඨිතසකටස්ස හෙට්ඨා උපගන්තබ්බං. තම්පි අලභන්තෙන ආලයො කාතබ්බො. සත්ථෙ පන වස්සං උපගන්තුං න වට්ටති. ආලයො නාම ‘‘ඉධ වස්සං වසිස්සාමී’’ති චිත්තුප්පාදමත්තං. සචෙ මග්ගප්පටිපන්නෙයෙව සත්ථෙ පවාරණදිවසො හොති, තත්ථෙව පවාරෙතබ්බං. අථ සත්ථො අන්තොවස්සෙයෙව භික්ඛුනා පත්ථිතට්ඨානං පත්වා අතික්කමති, පත්ථිතට්ඨානෙ වසිත්වා තත්ථ භික්ඛූහි සද්ධිං පවාරෙතබ්බං. අථාපි සත්ථො අන්තොවස්සෙයෙව අන්තරා එකස්මිං ගාමෙ තිට්ඨති වා විප්පකිරති වා, තස්මිංයෙව ගාමෙ භික්ඛූහි සද්ධිං වසිත්වා පවාරෙතබ්බං, අපවාරෙත්වා තතො පරං ගන්තුං න වට්ටති. 'उपकट्ठाय' का अर्थ है समीप आने पर। 'सत्थ' (सार्थ/काफिले) में वर्षावास ग्रहण करने के विषय में, वर्षावास के दिन उस भिक्षु को उपासकों से कहना चाहिए— "एक कुटी मिलना उचित है।" यदि वे बनाकर देते हैं, तो वहाँ प्रवेश कर "इध वस्सं उपेमि" (यहाँ मैं वर्षावास ग्रहण करता हूँ) ऐसा तीन बार कहना चाहिए। यदि वे नहीं देते हैं, तो शाला के समान खड़े हुए छकड़े (गाड़ी) के नीचे वर्षावास ग्रहण करना चाहिए। यदि वह भी न मिले, तो 'आलय' (संकल्प) करना चाहिए। सार्थ में वर्षावास ग्रहण करना उचित नहीं है। 'आलय' का अर्थ है केवल यह चित्त का उत्पाद कि "यहाँ मैं वर्षावास व्यतीत करूँगा।" यदि मार्ग में चलते हुए सार्थ में ही प्रवारणा का दिन आ जाए, तो वहीं प्रवारणा करनी चाहिए। यदि सार्थ वर्षावास के भीतर ही भिक्षु के इच्छित स्थान पर पहुँचकर आगे निकल जाता है, तो इच्छित स्थान पर रहकर वहाँ भिक्षुओं के साथ प्रवारणा करनी चाहिए। यदि सार्थ वर्षावास के दौरान बीच में ही किसी गाँव में रुक जाता है या बिखर जाता है, तो उसी गाँव में भिक्षुओं के साथ रहकर प्रवारणा करनी चाहिए; बिना प्रवारणा किए वहाँ से आगे जाना उचित नहीं है। නාවායං වස්සං උපගච්ඡන්තෙනාපි කුටියංයෙව උපගන්තබ්බං. පරියෙසිත්වා අලභන්තෙන ආලයො කාතබ්බො. සචෙ අන්තොතෙමාසං නාවා සමුද්දෙයෙව හොති, තත්ථෙව පවාරෙතබ්බං. අථ නාවා කූලං ලභති, අයඤ්ච පරතො ගන්තුකාමො හොති, ගන්තුං න වට්ටති. නාවාය ලද්ධගාමෙයෙව වසිත්වා භික්ඛූහි සද්ධිං පවාරෙතබ්බං. සචෙපි නාවා අනුතීරමෙව අඤ්ඤත්ථ ගච්ඡති, භික්ඛු ච පඨමං ලද්ධගාමෙයෙව වසිතුකාමො, නාවා ගච්ඡතු භික්ඛුනා තත්ථෙව වසිත්වා භික්ඛූහි සද්ධිං පවාරෙතබ්බං. नौका में वर्षावास ग्रहण करने वाले को भी कुटी में ही वर्षावास ग्रहण करना चाहिए। खोजने पर भी कुटी न मिलने पर 'आलय' करना चाहिए। यदि तीन महीने के भीतर नौका समुद्र में ही रहती है, तो वहीं प्रवारणा करनी चाहिए। यदि नौका किनारे पर पहुँचती है और यह भिक्षु आगे जाना चाहता है, तो जाना उचित नहीं है। नौका द्वारा प्राप्त गाँव में ही रहकर भिक्षुओं के साथ प्रवारणा करनी चाहिए। यदि नौका तट के साथ-साथ अन्यत्र जाती है और भिक्षु पहले प्राप्त गाँव में ही रहना चाहता है, तो नौका भले ही चली जाए, भिक्षु को वहीं रहकर भिक्षुओं के साथ प्रवारणा करनी चाहिए। ඉති [Pg.354] වජෙ සත්ථෙ නාවායන්ති තීසු ඨානෙසු නත්ථි වස්සච්ඡෙදෙ ආපත්ති, පවාරෙතුඤ්ච ලභති. පුරිමෙසු පන ‘‘වාළෙහි උබ්බාළ්හා හොන්තී’’තිආදීසු සඞ්ඝභෙදපරියන්තෙසු වත්ථූසු කෙවලං අනාපත්ති හොති, පවාරෙතුං පන න ලභති. इस प्रकार वज (ग्वाल-टोली), सार्थ (काफिला) और नौका—इन तीन स्थानों में वर्षावास भंग होने पर आपत्ति नहीं होती और प्रवारणा करने का अवसर भी मिलता है। किन्तु पूर्वोक्त "हिंसक पशुओं से पीड़ित होने" आदि से लेकर संघ-भेद तक के विषयों में केवल 'अनापत्ति' (दोष का अभाव) होती है, किन्तु प्रवारणा करने का अवसर नहीं मिलता। 204. න භික්ඛවෙ රුක්ඛසුසිරෙති එත්ථ සුද්ධෙ රුක්ඛසුසිරෙයෙව න වට්ටති; මහන්තස්ස පන රුක්ඛසුසිරස්ස අන්තො පදරච්ඡදනං කුටිකං කත්වා පවිසනද්වාරං යොජෙත්වා උපගන්තුං වට්ටති. රූක්ඛං ඡින්දිත්වා ඛාණුකමත්ථකෙ පදරච්ඡදනං කුටිකං කත්වාපි වට්ටතියෙව. රුක්ඛවිටභියාති එත්ථාපි සුද්ධෙ විටපමත්තෙ න වට්ටති. මහාවිටපෙ පන අට්ටකං බන්ධිත්වා තත්ථ පදරච්ඡදනං කුටිකං කත්වා උපගන්තබ්බං. අසෙනාසනිකෙනාති යස්ස පඤ්චන්නං ඡදනානං අඤ්ඤතරෙන ඡන්නං යොජිතද්වාරබන්ධනං සෙනාසනං නත්ථි, තෙන න උපගන්තබ්බං. න භික්ඛවෙ ඡවකුටිකායන්ති ඡවකුටිකා නාම ටඞ්කිතමඤ්චාදිභෙදා කුටි, තත්ථ උපගන්තුං න වට්ටති. සුසානෙ පන අඤ්ඤං කුටිකං කත්වා උපගන්තුං වට්ටති. න භික්ඛවෙ ඡත්තෙති එත්ථාපි චතූසු ථම්භෙසු ඡත්තං ඨපෙත්වා ආවරණං කත්වා ද්වාරං යොජෙත්වා උපගන්තුං වට්ටති, ඡත්තකුටිකා නාමෙසා හොති. චාටියාති එත්ථාපි මහන්තෙන කපල්ලෙන ඡත්තෙ වුත්තනයෙන කුටිං කත්වා උපගන්තුං වට්ටති. २०४. "हे भिक्षुओं, वृक्ष के कोटर (खोखल) में नहीं" यहाँ केवल शुद्ध वृक्ष-कोटर में वर्षावास करना उचित नहीं है; किन्तु बड़े वृक्ष-कोटर के भीतर तख्तों की छत वाली कुटी बनाकर और प्रवेश द्वार लगाकर वर्षावास करना उचित है। वृक्ष को काटकर ठूँठ के ऊपर तख्तों की छत वाली कुटी बनाकर भी वर्षावास करना उचित ही है। "वृक्ष की शाखाओं के बीच (विटप)" यहाँ भी केवल शाखाओं के बीच वर्षावास करना उचित नहीं है। किन्तु बड़ी शाखाओं पर मचान (अट्टक) बाँधकर वहाँ तख्तों की छत वाली कुटी बनाकर वर्षावास करना चाहिए। "असेनासनिकेन" का अर्थ है—जिसके पास पाँच प्रकार की छतों में से किसी एक से ढका हुआ और द्वार-युक्त सेनासन (आवास) नहीं है, उसे वर्षावास नहीं करना चाहिए। "हे भिक्षुओं, शव-कुटी में नहीं"—शव-कुटी का अर्थ है नक्काशीदार मंच आदि से युक्त कुटी, वहाँ वर्षावास करना उचित नहीं है। किन्तु श्मशान में दूसरी साधारण कुटी बनाकर वर्षावास करना उचित है। "हे भिक्षुओं, छत्र (छाते) के नीचे नहीं"—यहाँ भी चार खंभों पर छत्र रखकर, आवरण (दीवार) बनाकर और द्वार लगाकर वर्षावास करना उचित है, इसे 'छत्र-कुटी' कहा जाता है। "चाटी (बड़े मटके) में"—यहाँ भी बड़े मटके के टुकड़े (खप्पर) से छत्र के समान विधि से कुटी बनाकर वर्षावास करना उचित है। අධම්මිකකතිකාදිකථා अधार्मिक प्रतिज्ञा (कतिक) आदि की कथा। 205. එවරූපා කතිකාති එත්ථ අඤ්ඤාපි යා ඊදිසී අධම්මිකා කතිකා හොති, සා න කාතබ්බාති අත්ථො. තස්සා ලක්ඛණං මහාවිභඞ්ගෙ වුත්තං. २०५. 'एवरूपा कतिका' यहाँ अर्थ यह है कि अन्य भी जो इस प्रकार की अधार्मिक प्रतिज्ञा हो, वह नहीं करनी चाहिए। उसके लक्षण महाविभंग में कहे गए हैं। 207-8. පටිස්සවෙ ච ආපත්ති දුක්කටස්සාති එත්ථ න කෙවලං ‘‘ඉමං තෙමාසං ඉධ වස්සං වසථා’’ති එතස්සෙව පටිස්සවෙ ආපත්ති, ‘‘ඉමං තෙමාසං භික්ඛං ගණ්හථ, උභොපි මයං ඉධ වස්සං වසිස්සාම, එකතො උද්දිසාපෙස්සාමා’’ති එවමාදිනාපි තස්ස තස්ස පටිස්සවෙ දුක්කටං. තඤ්ච ඛො පඨමං සුද්ධචිත්තස්ස පච්ඡා විසංවාදනපච්චයා, පඨමම්පි අසුද්ධචිත්තස්ස පන පටිස්සවෙ පාචිත්තියං, විසංවාදනෙ දුක්කටන්ති පාචිත්තියෙන සද්ධිං දුක්කටං යුජ්ජති. २०७-२०८. "प्रतिज्ञा करने पर दुक्कट की आपत्ति" यहाँ केवल "इन तीन महीनों में यहाँ वर्षावास करो" इस प्रतिज्ञा के भंग होने पर ही आपत्ति नहीं होती, बल्कि "इन तीन महीनों में भिक्षा ग्रहण करो, हम दोनों यहाँ वर्षावास करेंगे, साथ मिलकर पाठ करेंगे" इत्यादि प्रकार की प्रतिज्ञाओं के भंग होने पर भी दुक्कट होता है। और वह दुक्कट पहले शुद्ध चित्त वाले भिक्षु के बाद में प्रतिज्ञा भंग करने के कारण होता है। किन्तु पहले से ही अशुद्ध चित्त वाले भिक्षु के प्रतिज्ञा करने पर पाचित्तिय होता है और प्रतिज्ञा भंग करने पर दुक्कट होता है; इस प्रकार पाचित्तिय के साथ दुक्कट युक्त होता है। සො [Pg.355] තදහෙව අකරණීයොතිආදීසු සචෙ වස්සං අනුපගන්ත්වා වා පක්කමති, උපගන්ත්වා වා සත්තාහං බහිද්ධා වීතිනාමෙති, පුරිමිකා ච න පඤ්ඤායති, පටිස්සවෙ ච ආපත්ති. වස්සං උපගන්ත්වා පන අරුණං අනුට්ඨාපෙත්වා තදහෙව සත්තාහකරණීයෙන පක්කමන්තස්සාපි අන්තොසත්තාහෙ නිවත්තන්තස්ස අනාපත්ති, කො පන වාදො ද්වීහතීහං වසිත්වා අන්තොසත්තාහෙ නිවත්තන්තස්ස. ද්වීහතීහං වසිත්වාති එත්ථාපි නිරපෙක්ඛෙනෙව උපචාරාතික්කමෙ වස්සච්ඡෙදො වෙදිතබ්බො. සචෙ ඉධ වසිස්සාමීති ආලයො අත්ථි, අසතියා පන වස්සං න උපෙති, ගහිතසෙනාසනං සුග්ගහිතං, ඡින්නවස්සො න හොති, පවාරෙතුං ලභතියෙව. "वह उसी दिन अकरणीय है" इत्यादि में यदि वर्षावास ग्रहण किए बिना ही चला जाता है, या ग्रहण करके सात दिन बाहर बिताता है, तो 'पुरिमिका' (प्रथम वर्षावास) सिद्ध नहीं होती और प्रतिज्ञा भंग की आपत्ति होती है। किन्तु वर्षावास ग्रहण करके, अरुणोदय से पहले ही उसी दिन सात दिन के करणीय कार्य से जाने वाले और सात दिन के भीतर लौट आने वाले के लिए अनापत्ति है; फिर दो-तीन दिन रहकर सात दिन के भीतर लौटने वाले के विषय में तो कहना ही क्या! "दो-तीन दिन रहकर" यहाँ भी लौटने की अपेक्षा के बिना ही सीमा (उपचार) लाँघने पर वर्षावास भंग समझना चाहिए। यदि "यहाँ रहूँगा" ऐसा संकल्प (आलय) है, किन्तु स्मृति न रहने के कारण वर्षावास ग्रहण नहीं करता है, तो लिया गया सेनासन सुगृहीत है, उसका वर्षावास भंग नहीं होता और वह प्रवारणा करने का अधिकारी होता है। සත්තාහං අනාගතාය පවාරණායාති එත්ථ නවමිතො පට්ඨාය ගන්තුං වට්ටති, ආගච්ඡතු වා මා වා, අනාපත්ති. සෙසං උත්තානමෙවාති. "प्रवारणा के सात दिन शेष रहने पर" यहाँ नौवें दिन से जाना उचित है; वह वापस आए या न आए, अनापत्ति है। शेष अर्थ स्पष्ट ही है। වස්සූපනායිකක්ඛන්ධකවණ්ණනා නිට්ඨිතා. वर्षावास-ग्रहण-स्कन्धक की व्याख्या समाप्त हुई। 4. පවාරණාක්ඛන්ධකං ४. प्रवारणा स्कन्धक। අඵාසුකවිහාරකථා अफासुक-विहार (असुविधाजनक निवास) की कथा। 209. පවාරණාක්ඛන්ධකෙ [Pg.356] – නෙව ආලපෙය්යාම න සල්ලපෙය්යාමාති එත්ථ ආලාපො නාම පඨමවචනං; සල්ලාපො පච්ඡිමවචනං. හත්ථවිලඞ්ඝකෙනාති හත්ථුක්ඛෙපකෙන. පසුසංවාසන්ති පසූනං විය සංවාසං. පසවොපි හි අත්තනො උප්පන්නං සුඛදුක්ඛං අඤ්ඤමඤ්ඤස්ස න ආරොචෙන්ති, පටිසන්ථාරං න කරොන්ති, තථා එතෙපි න අකංසු; තස්මා නෙසං සංවාසො ‘‘පසුසංවාසො’’ති වුච්චති. එස නයො සබ්බත්ථ. න භික්ඛවෙ මූගබ්බතං තිත්ථියසමාදානන්ති ‘‘ඉමං තෙමාසං න කථෙතබ්බ’’න්ති එවරූපං වතසමාදානං න කාතබ්බං; අධම්මකතිකා හෙසා. අඤ්ඤමඤ්ඤානුලොමතාති අඤ්ඤමඤ්ඤං වත්තුං අනුලොමභාවො. ‘‘වදන්තු මං ආයස්මන්තො’’ති හි වදන්තං සක්කා හොති කිඤ්චි වත්තුං; න ඉතරං. ආපත්තිවුට්ඨානතා විනයපුරෙක්ඛාරතාති ආපත්තීහි වුට්ඨානභාවො විනයං පුරතො කත්වා චරණභාවො. ‘‘වදන්තු මං ආයස්මන්තො’’ති හි එවං වදන්තො ආපත්තීහි වුට්ඨහිස්සති, විනයඤ්ච පුරක්ඛත්වා විහරිස්සතීති වුච්චති. २०९. पवारणा खन्धक में - 'न ही हम आलाप करेंगे और न ही संलाप करेंगे' यहाँ 'आलाप' का अर्थ प्रथम वचन है और 'संलाप' का अर्थ बाद का वचन है। 'हत्थविलङ्घकेन' का अर्थ हाथों को उठाने के द्वारा है। 'पसुसंवासं' का अर्थ पशुओं के समान निवास करना है। क्योंकि पशु भी अपने भीतर उत्पन्न सुख-दुःख को एक-दूसरे को नहीं बताते, न ही वे शिष्टाचार (प्रतिसन्थार) करते हैं; वैसे ही इन भिक्षुओं ने भी नहीं किया; इसलिए उनके निवास को 'पशु-निवास' कहा जाता है। यही नियम सर्वत्र लागू होता है। 'हे भिक्षुओं, गूंगे का व्रत (मूकव्रत) तित्थियों (अन्य मतवलम्बियों) का ग्रहण है' - 'इन तीन महीनों तक बात नहीं करनी चाहिए' इस प्रकार का व्रत धारण नहीं करना चाहिए; क्योंकि यह अधार्मिक समझौता है। 'अञ्ञमञ्ञानुलौमता' का अर्थ एक-दूसरे से बोलने के लिए अनुकूल होना है। 'आयुष्मान् मुझे कहें' ऐसा कहने वाले व्यक्ति से कुछ कहना संभव होता है; दूसरे से नहीं। 'आपत्तिवुट्ठानता विनयपुरेक्खारता' का अर्थ आपत्तियों से उठना और विनय को आगे रखकर आचरण करना है। 'आयुष्मान् मुझे कहें' ऐसा कहने वाला व्यक्ति आपत्तियों से उठेगा और विनय को सामने रखकर विहार करेगा, ऐसा कहा जाता है। 210. සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො අජ්ජ පවාරණා, යදි සඞ්ඝස්ස පත්තකල්ලං, සඞ්ඝො පවාරෙය්යාති අයං සබ්බසඞ්ගාහිකා නාම ඤත්ති; එවඤ්හි වුත්තෙ තෙවාචිකං ද්වෙවාචිකං එකවාචිකඤ්ච පවාරෙතුං වට්ටති. සමානවස්සිකං න වට්ටති. ‘‘තෙවාචිකං පවාරෙය්යා’’ති වුත්තෙ පන තෙවාචිකමෙව වට්ටති, අඤ්ඤං න වට්ටති. ‘‘ද්වෙවාචිකං පවාරෙය්යා’’ති වුත්තෙ ද්වෙවාචිකඤ්ච තෙවාචිකඤ්ච වට්ටති, එකවාචිකඤ්ච සමානවස්සිකඤ්ච න වට්ටති. ‘‘එකවාචිකං පවාරෙය්යා’’ති වුත්තෙ පන එකවාචික-ද්වෙවාචික-තෙවාචිකානි වට්ටන්ති, සමානවස්සිකමෙව න වට්ටති. ‘‘සමානවස්සික’’න්ති වුත්තෙ සබ්බං වට්ටති. २१०. 'भन्ते, संघ मेरी बात सुने, आज पवारणा है, यदि संघ के लिए उचित समय हो, तो संघ पवारणा करे' - यह 'सब्बसङ्गाहिका' (सबको समाहित करने वाली) नामक ज्ञप्ति है; क्योंकि ऐसा कहने पर तीन बार (तेवाचिक), दो बार (द्वेवाचिक) और एक बार (एकवाचिक) पवारणा करना उचित है। समान वर्ष वालों (समानवस्सिक) की पवारणा उचित नहीं है। यदि 'तेवाचिक पवारणा करे' ऐसा कहा जाए, तो केवल तेवाचिक ही उचित है, अन्य नहीं। यदि 'द्वेवाचिक पवारणा करे' ऐसा कहा जाए, तो द्वेवाचिक और तेवाचिक उचित हैं, एकवाचिक और समानवस्सिक उचित नहीं हैं। यदि 'एकवाचिक पवारणा करे' ऐसा कहा जाए, तो एकवाचिक, द्वेवाचिक और तेवाचिक उचित हैं, केवल समानवस्सिक उचित नहीं है। यदि 'समानवस्सिक' कहा जाए, तो सब उचित है। 211. අච්ඡන්තීති නිසින්නාව හොන්ති, න උට්ඨහන්ති. තදමන්තරාති තදන්තරා; තාවතකං කාලන්ති අත්ථො. २११. 'अच्छन्ति' का अर्थ है बैठे ही रहते हैं, उठते नहीं हैं। 'तदमन्तरा' का अर्थ है उसके बीच में; अर्थात् उस पवारणा काल के समय तक। පවාරණාභෙදකථා पवारणा-भेद की कथा 212. චාතුද්දසිකා [Pg.357] ච පන්නරසිකා චාති එත්ථ චාතුද්දසිකාය ‘‘අජ්ජ පවාරණා චාතුද්දසී’’ති එවං පුබ්බකිච්චං කාතබ්බං, පන්නරසිකාය ‘‘අජ්ජ පවාරණා පන්නරසී’’ති. २१२. 'चातुद्दसिका और पन्नरसिका' यहाँ चौदहवीं के दिन 'आज चौदहवीं की पवारणा है' इस प्रकार पूर्वकृत्य करना चाहिए, और पन्द्रहवीं के दिन 'आज पन्द्रहवीं की पवारणा है'। පවාරණකම්මෙසු සචෙ එකස්මිං විහාරෙ පඤ්චසු භික්ඛූසු වසන්තෙසු එකස්ස පවාරණං ආහරිත්වා චත්තාරො ගණඤත්තිං ඨපෙත්වා පවාරෙන්ති, චතූසු තීසු වා වසන්තෙසු එකස්ස පවාරණං ආහරිත්වා තයො වා ද්වෙ වා සඞ්ඝඤත්තිං ඨපෙත්වා පවාරෙන්ති, සබ්බමෙතං අධම්මෙනවග්ගං පවාරණකම්මං. पवारणा कर्मों में, यदि एक विहार में पाँच भिक्षु रह रहे हों और एक की पवारणा लाकर, चार भिक्षु गण-ज्ञप्ति को छोड़कर पवारणा करते हैं; अथवा चार या तीन भिक्षुओं के रहने पर एक की पवारणा लाकर, तीन या दो भिक्षु संघ-ज्ञप्ति को छोड़कर पवारणा करते हैं, तो यह सब 'अधर्म से वर्ग' (अधम्मेन वग्ग) पवारणा कर्म है। සචෙ පන සබ්බෙපි පඤ්ච ජනා එකතො සන්නිපතිත්වා ගණඤත්තිං ඨපෙත්වා පවාරෙන්ති, චත්තාරො තයො වා ද්වෙ වා වසන්තා එකතො සන්නිපතිත්වා සඞ්ඝඤත්තිං ඨපෙත්වා පවාරෙන්ති, සබ්බමෙතං අධම්මෙනසමග්ගං පවාරණකම්මං. लेकिन यदि सभी पाँचों व्यक्ति एक साथ इकट्ठा होकर गण-ज्ञप्ति छोड़कर पवारणा करते हैं; अथवा चार, तीन या दो रहने वाले एक साथ इकट्ठा होकर संघ-ज्ञप्ति छोड़कर पवारणा करते हैं, तो यह सब 'अधर्म से समग्र' (अधम्मेन समग्ग) पवारणा कर्म है। සචෙ පඤ්චසු ජනෙසු එකස්ස පවාරණං ආහරිත්වා චත්තාරො සඞ්ඝඤත්තිං ඨපෙත්වා පවාරෙන්ති, චතූසු තීසු වා එකස්ස පවාරණං ආහරිත්වා තයො වා ද්වෙ වා ගණඤත්තිං ඨපෙත්වා පවාරෙන්ති, සබ්බමෙතං ධම්මෙනවග්ගං පවාරණකම්මං. यदि पाँच व्यक्तियों में से एक की पवारणा लाकर चार भिक्षु संघ-ज्ञप्ति रखकर पवारणा करते हैं; अथवा चार या तीन में से एक की पवारणा लाकर तीन या दो भिक्षु गण-ज्ञप्ति रखकर पवारणा करते हैं, तो यह सब 'धर्म से वर्ग' (धम्मेन वग्ग) पवारणा कर्म है। සචෙ පන සබ්බෙපි පඤ්ච ජනා එකතො සන්නිපතිත්වා සඞ්ඝඤත්තිං ඨපෙත්වා පවාරෙන්ති, චත්තාරො වා තයො වා එකතො සන්නිපතිත්වා ගණඤත්තිං ඨපෙත්වා පවාරෙන්ති, ද්වෙ අඤ්ඤමඤ්ඤං පවාරෙන්ති, එකකො වසන්තො අධිට්ඨානපවාරණං කරොති, සබ්බමෙතං ධම්මෙනසමග්ගං නාම පවාරණකම්මන්ති. लेकिन यदि सभी पाँचों व्यक्ति एक साथ इकट्ठा होकर संघ-ज्ञप्ति रखकर पवारणा करते हैं; अथवा चार या तीन एक साथ इकट्ठा होकर गण-ज्ञप्ति रखकर पवारणा करते हैं; अथवा दो एक-दूसरे से पवारणा करते हैं; अथवा अकेला रहने वाला अधिष्ठान-पवारणा करता है, तो यह सब 'धर्म से समग्र' (धम्मेन समग्ग) नामक पवारणा कर्म है। ऐसा समझना चाहिए। පවාරණාදානානුජානනකථා पवारणा देने की अनुमति की कथा 213. දින්නා හොති පවාරණාති එත්ථ එවං දින්නාය පවාරණාය පවාරණාහාරකෙන සඞ්ඝං උපසඞ්කමිත්වා එවං පවාරෙතබ්බං – ‘‘තිස්සො භන්තෙ භික්ඛු සඞ්ඝං පවාරෙති දිට්ඨෙන වා සුතෙන වා පරිසඞ්කාය වා, වදතු තං භන්තෙ සඞ්ඝො අනුකම්පං උපාදාය, පස්සන්තො පටිකරිස්සති. දුතියම්පි…පෙ… තතියම්පි භන්තෙ තිස්සො භික්ඛු සඞ්ඝං පවාරෙති…පෙ… පටිකරිස්සතී’’ති. සචෙ පන වුඩ්ඪතරො හොති, ‘‘ආයස්මා භන්තෙ තිස්සො’’ති වත්තබ්බං; එවඤ්හි තෙන තස්සත්ථාය පවාරිතං හොතීති. २१३. 'पवारणा दी गई होती है' यहाँ इस प्रकार पवारणा दिए जाने पर, पवारणा लाने वाले को संघ के पास जाकर इस प्रकार पवारणा करनी चाहिए - 'भन्ते, तिस्स भिक्षु संघ से पवारणा करता है - देखे हुए, सुने हुए या शंका किए हुए दोषों के आधार पर। भन्ते, संघ अनुकम्पा करके उसे कहे, वह देखते हुए (दोष को जानते हुए) प्रतिकार करेगा। दूसरी बार भी... तीसरी बार भी भन्ते, तिस्स भिक्षु संघ से पवारणा करता है... प्रतिकार करेगा।' यदि वह (पवारणा भेजने वाला) बड़ा (वृद्ध) हो, तो 'भन्ते, आयुष्मान् तिस्स' ऐसा कहना चाहिए; इस प्रकार उसके द्वारा उसके निमित्त पवारणा की गई होती है। පවාරණං [Pg.358] දෙන්තෙන ඡන්දම්පි දාතුන්ති එත්ථ ඡන්දදානං උපොසථක්ඛන්ධකෙ වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බං. ඉධාපි ච ඡන්දදානං අවසෙසකම්මත්ථාය. තස්මා සචෙ පවාරණං දෙන්තො ඡන්දං දෙති, වුත්තනයෙන ආහටාය පවාරණාය තෙන ච භික්ඛුනා සඞ්ඝෙන ච පවාරිතමෙව හොති. අථ පවාරණමෙව දෙති, න ඡන්දං, තස්ස ච පවාරණාය ආරොචිතාය සඞ්ඝෙන ච පවාරිතෙ සබ්බෙසං සුප්පවාරිතං හොති, අඤ්ඤං පන කම්මං කුප්පති. සචෙ ඡන්දමෙව දෙති න පවාරණං, සඞ්ඝස්ස පවාරණා ච සෙසකම්මානි ච න කුප්පන්ති, තෙන පන භික්ඛුනා අප්පවාරිතං හොති. පවාරණදිවසෙ පන බහිසීමායං පවාරණං අධිට්ඨහිත්වා ආගතෙනපි ඡන්දො දාතබ්බො, තෙන සඞ්ඝස්ස පවාරණකම්මං න කුප්පති. 'पवारणा देने वाले को छन्द भी देना चाहिए' यहाँ छन्द-दान को उपोसथ खन्धक में कहे गए नियम के अनुसार ही समझना चाहिए। और यहाँ भी छन्द-दान शेष कर्मों के लिए होता है। इसलिए यदि पवारणा देने वाला छन्द देता है, तो बताए गए नियम के अनुसार पवारणा लाए जाने पर उस भिक्षु और संघ द्वारा पवारणा की गई ही होती है। यदि वह केवल पवारणा देता है, छन्द नहीं, और उसकी पवारणा सूचित कर दी जाती है और संघ द्वारा पवारणा कर ली जाती है, तो सभी की पवारणा भली-भांति संपन्न (सुप्पवारित) होती है, लेकिन अन्य कर्म बिगड़ (कुप्पति) जाते हैं। यदि वह केवल छन्द देता है, पवारणा नहीं, तो संघ की पवारणा और शेष कर्म नहीं बिगड़ते, लेकिन उस भिक्षु की पवारणा नहीं हुई होती है। पवारणा के दिन सीमा के बाहर पवारणा का अधिष्ठान करके आए हुए भिक्षु को भी छन्द देना चाहिए, उससे संघ का पवारणा कर्म नहीं बिगड़ता। 218. අජ්ජ මෙ පවාරණාති එත්ථ සචෙ චාතුද්දසිකා හොති, ‘‘අජ්ජ මෙ පවාරණා චාතුද්දසී’’ති සචෙ පන්නරසිකා ‘‘අජ්ජ මෙ පවාරණා පන්නරසී’’ති එවං අධිට්ඨාතබ්බං. २१८. 'आज मेरी पवारणा है' यहाँ यदि चौदहवीं हो, तो 'आज मेरी चौदहवीं की पवारणा है' और यदि पन्द्रहवीं हो, तो 'आज मेरी पन्द्रहवीं की पवारणा है' - इस प्रकार अधिष्ठान करना चाहिए। 219. තදහුපවාරණාය ආපත්තින්තිආදි වුත්තනයමෙව. २१९. 'तदहुपवारणाय आपत्तिं' आदि शब्द कहे गए नियम के अनुसार ही हैं। අනාපත්තිපන්නරසකාදිකථා अनापत्ति-पन्नरसक आदि की कथा 222. පුන පවාරෙතබ්බන්ති පුන පුබ්බකිච්චං කත්වා ඤත්තිං ඨපෙත්වා සඞ්ඝත්ථෙරතො පට්ඨාය පවාරෙතබ්බං. සෙසං උපොසථක්ඛන්ධකවණ්ණනායං වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බං. २२२. ‘पुनः प्रवारणा करनी चाहिए’ का अर्थ है कि पुनः पूर्वकृत्य करके, ज्ञप्ति (प्रस्ताव) रखकर, संघ के स्थविर से आरंभ कर प्रवारणा करनी चाहिए। शेष विधि उपोसथक्खन्धक की व्याख्या में बताए गए तरीके से ही जाननी चाहिए। 228. ආගන්තුකෙහි ආවාසිකානං අනුවත්තිතබ්බන්ති ‘‘අජ්ජ පවාරණා චාතුද්දසී’’ති එතදෙව පුබ්බකිච්චං කාතබ්බං. පන්නරසිකවාරෙපි එසෙව නයො. ආවාසිකෙහි නිස්සීමං ගන්ත්වා පවාරෙතබ්බන්ති අස්සාවසානෙ අයං පාළිමුත්තකවිනිච්ඡයො – සචෙ පුරිමිකාය පඤ්ච භික්ඛූ වස්සං උපගතා, පච්ඡිමිකායපි පඤ්ච, පුරිමෙහි ඤත්තිං ඨපෙත්වා පවාරිතෙ පච්ඡිමෙහි තෙසං සන්තිකෙ පාරිසුද්ධිඋපොසථො කාතබ්බො, න එකස්මිං උපොසථග්ගෙ ද්වෙ ඤත්තියො ඨපෙතබ්බා. සචෙපි පච්ඡිමිකාය උපගතා චත්තාරො තයො ද්වෙ එකො වා හොති, එසෙව නයො. අථ පුරිමිකාය චත්තාරො පච්ඡිමිකායපි චත්තාරො තයො ද්වෙ එකො වා එසෙව නයො. අථාපි පුරිමිකාය තයො, පච්ඡිමිකායපි තයො ද්වෙ වා, එසෙව නයො. ඉදඤ්හෙත්ථ ලක්ඛණං – සචෙ පුරිමිකාය උපගතෙහි පච්ඡිමිකාය උපගතා ථොකතරා [Pg.359] චෙව හොන්ති සමසමා ච, සඞ්ඝපවාරණාය ගණං පූරෙන්ති, සඞ්ඝපවාරණාවසෙන ඤත්ති ඨපෙතබ්බාති. २२८. ‘आगंतुकों को आवासिकों का अनुसरण करना चाहिए’ का अर्थ है कि ‘आज चतुर्दशी की प्रवारणा है’—यही पूर्वकृत्य करना चाहिए। पञ्चदशी के अवसर पर भी यही नियम है। ‘आवासिकों द्वारा सीमा से बाहर जाकर प्रवारणा करनी चाहिए’—इसके अंत में यह पालि-मुक्त विनिश्चय (निर्णय) है: यदि पूर्व वर्षावास (पुरिमिका) में पाँच भिक्षु रहे हों और पश्चिम वर्षावास (पच्छिमिका) में भी पाँच, तो पूर्व वालों द्वारा ज्ञप्ति रखकर प्रवारणा कर लेने पर, पश्चिम वालों को उनके पास पारिशुद्धि-उपोसथ करना चाहिए; एक ही उपोसथ-भवन में दो ज्ञप्तियाँ नहीं रखनी चाहिए। यदि पश्चिम वर्षावास वाले चार, तीन, दो या एक हों, तो भी यही नियम है। यदि पूर्व वर्षावास वाले चार हों और पश्चिम वाले भी चार, तीन, दो या एक हों, तो भी यही नियम है। यदि पूर्व वाले तीन हों और पश्चिम वाले तीन या दो हों, तो भी यही नियम है। यहाँ यह लक्षण (नियम) है—यदि पूर्व वर्षावास वालों की तुलना में पश्चिम वर्षावास वाले कम या बराबर हों और वे संघ-प्रवारणा के लिए गण (संख्या) को पूरा करते हों, तो संघ-प्रवारणा के अनुसार ज्ञप्ति रखनी चाहिए। සචෙ පන පුරිමිකාය තයො, පච්ඡිමිකාය එකො හොති, තෙන සද්ධිං තෙ චත්තාරො හොන්ති, චතුන්නං සඞ්ඝඤත්තිං ඨපෙත්වා පවාරෙතුං න වට්ටති. ගණඤත්තියා පන සො ගණපූරකො හොති, තස්මා ගණවසෙන ඤත්තිං ඨපෙත්වා පුරිමෙහි පවාරෙතබ්බං. ඉතරෙන තෙසං සන්තිකෙ පාරිසුද්ධිඋපොසථො කාතබ්බො. සචෙ පුරිමිකාය ද්වෙ පච්ඡිමිකාය ද්වෙ වා එකො වා හොති, එසෙව නයො. සචෙ පුරිමිකාය එකො, පච්ඡිමිකායපි එකො හොති, එකෙන එකස්ස සන්තිකෙ පවාරෙතබ්බං, එකෙන පාරිසුද්ධිඋපොසථො කාතබ්බො. සචෙ පන පුරිමවස්සූපගතෙහි පච්ඡිමවස්සූපගතා එකෙනපි අධිකතරා හොන්ති, පඨමං පාතිමොක්ඛං උද්දිසිත්වා පච්ඡා ථොකතරෙහි තෙසං සන්තිකෙ පවාරෙතබ්බං. लेकिन यदि पूर्व वर्षावास वाले तीन हों और पश्चिम वर्षावास वाला एक हो, तो उसके साथ वे चार हो जाते हैं; चार भिक्षुओं के लिए संघ-ज्ञप्ति रखकर प्रवारणा करना उचित नहीं है। किंतु गण-ज्ञप्ति के लिए वह गण-पूरक (संख्या पूरा करने वाला) होता है, इसलिए गण के अनुसार ज्ञप्ति रखकर पूर्व वालों को प्रवारणा करनी चाहिए। दूसरे (पश्चिम वाले) को उनके पास पारिशुद्धि-उपोसथ करना चाहिए। यदि पूर्व वाले दो हों और पश्चिम वाले दो या एक हों, तो भी यही नियम है। यदि पूर्व वाला एक हो और पश्चिम वाला भी एक हो, तो एक को दूसरे के पास प्रवारणा करनी चाहिए और दूसरे को पारिशुद्धि-उपोसथ करना चाहिए। लेकिन यदि पूर्व वर्षावास वालों से पश्चिम वर्षावास वाले एक भी अधिक हों, तो पहले प्रातिमोक्ष का पाठ करके बाद में कम संख्या वाले पूर्व वर्षावास वालों को उनके पास प्रवारणा करनी चाहिए। කත්තිකචාතුමාසිනියා පවාරණාය පන සචෙ පඨමං වස්සූපගතෙහි මහාපවාරණාය පවාරිතෙහි පච්ඡා උපගතා අධිකතරා වා සමසමා වා හොන්ති, පවාරණාඤත්තිං ඨපෙත්වා පවාරෙතබ්බං. තෙහි පවාරිතෙ පච්ඡා ඉතරෙහි පාරිසුද්ධිඋපොසථො කාතබ්බො. අථ මහාපවාරණාය පවාරිතා බහූ භික්ඛූ හොන්ති, පච්ඡිමවස්සූපගතා ථොකතරා වා එකො වා, පාතිමොක්ඛෙ උද්දිට්ඨෙ පච්ඡා තෙසං සන්තිකෙ තෙන පවාරෙතබ්බං. कार्तिक चतुर्मासी (कार्तिक पूर्णिमा) की प्रवारणा में, यदि प्रथम वर्षावास (महाप्रवारणा) करने वालों से बाद में वर्षावास करने वाले अधिक या बराबर हों, तो प्रवारणा-ज्ञप्ति रखकर प्रवारणा करनी चाहिए। उनके द्वारा प्रवारणा कर लेने के बाद दूसरों को पारिशुद्धि-उपोसथ करना चाहिए। यदि महाप्रवारणा करने वाले भिक्षु बहुत हों और पश्चिम वर्षावास वाले कम या एक हों, तो प्रातिमोक्ष का पाठ होने के बाद उसे (पश्चिम वाले को) उनके पास प्रवारणा करनी चाहिए। यह पालि-मुक्त विनिश्चय है। 233. න ච භික්ඛවෙ අප්පවාරණාය පවාරෙතබ්බං, අඤ්ඤත්ර සඞ්ඝසාමග්ගියාති එත්ථ කොසම්බකසාමග්ගීසදිසාව සාමග්ගී වෙදිතබ්බා. ‘‘අජ්ජ පවාරණා සාමග්ගී’’ති එවඤ්චෙත්ථ පුබ්බකිච්චං කාතබ්බං. යෙ පන කිස්මිඤ්චිදෙව අප්පමත්තකෙ පවාරණං ඨපෙත්වා සමග්ගා හොන්ති, තෙහි පවාරණායමෙව පවාරණා කාතබ්බා. සාමග්ගීපවාරණං කරොන්තෙහි ච පඨමපවාරණං ඨපෙත්වා පාටිපදතො පට්ඨාය යාව කත්තිකචාතුමාසිනී පුණ්ණමා, එත්ථන්තරෙ කාතබ්බා, තතො පච්ඡා වා පුරෙ වා න වට්ටති. २३३. ‘हे भिक्षुओं, बिना प्रवारणा के प्रवारणा नहीं करनी चाहिए, सिवाय संघ-सामग्री (संघ की एकता) के’—यहाँ कौशाम्बक-सामग्री के समान ही सामग्री समझनी चाहिए। ‘आज सामग्री प्रवारणा है’—इस प्रकार यहाँ पूर्वकृत्य करना चाहिए। जो भिक्षु किसी अल्प कारण से प्रवारणा को स्थगित कर एकजुट होते हैं, उन्हें प्रवारणा के दिन ही प्रवारणा करनी चाहिए। सामग्री प्रवारणा करने वालों को प्रथम प्रवारणा को छोड़कर प्रतिपदा से लेकर कार्तिक चतुर्मासी पूर्णिमा तक के अंतराल में प्रवारणा करनी चाहिए; उसके बाद या पहले करना उचित नहीं है। ද්වෙවාචිකාදිපවාරණාකථා द्विवाचिक आदि प्रवारणा की कथा। 234. ද්වෙවාචිකං පවාරෙතුන්ති එත්ථ ඤත්තිං ඨපෙන්තෙනාපි ‘‘යදි සඞ්ඝස්ස පත්තකල්ලං සඞ්ඝො ද්වෙවාචිකං පවාරෙය්යා’’ති වත්තබ්බං, එකවාචිකෙ ‘‘එකවාචිකං [Pg.360] පවාරෙය්යා’’ති, සමානවස්සිකෙපි ‘‘සමානවස්සිකං පවාරෙය්යා’’ති වත්තබ්බං, එත්ථ ච බහූපි සමානවස්සා එකතො පවාරෙතුං ලභන්ති. २३४. ‘द्विवाचिक प्रवारणा करना’—यहाँ ज्ञप्ति रखने वाले को भी ‘यदि संघ के लिए उचित हो, तो संघ द्विवाचिक प्रवारणा करे’ ऐसा कहना चाहिए। एकवाचिक में ‘एकवाचिक प्रवारणा करे’ और समानवर्षिक में भी ‘समानवर्षिक प्रवारणा करे’ ऐसा कहना चाहिए। यहाँ बहुत से समान वर्ष वाले (दीक्षा काल वाले) एक साथ प्रवारणा कर सकते हैं। පවාරණාඨපනකථා प्रवारणा-स्थगन की कथा। 236. භාසිතාය ලපිතාය අපරියොසිතායාති එත්ථ සබ්බසඞ්ගාහිකඤ්ච පුග්ගලිකඤ්චාති දුවිධං පවාරණාඨපනං. තත්ථ සබ්බසඞ්ගාහිකෙ ‘‘සුණාතු මෙ භන්තෙ සඞ්ඝො…පෙ… සඞ්ඝො තෙවාචිකං පවාරෙ’’ ඉති සුකාරතො යාව රෙකාරො, තාව භාසිතා ලපිතා අපරියොසිතාව හොති පවාරණා. එත්ථන්තරෙ එකපදෙපි ඨපෙන්තෙන ඨපිතා හොති පවාරණා. ‘ය්ය’කාරෙ පන පත්තෙ පරියොසිතා හොති, තස්මා තතො පට්ඨාය ඨපෙන්තෙන ඨපිතාපි අට්ඨපිතා හොති. පුග්ගලිකඨපනෙ පන – ‘‘සඞ්ඝං භන්තෙ පවාරෙමි…පෙ… තතියම්පි භන්තෙ සඞ්ඝං පවාරෙමි දිට්ඨෙන වා…පෙ… පස්සන්තො පටී’’ති සඞ්කාරතො යාව අයං සබ්බපච්ඡිමො ‘ටි’කාරො තාව භාසිතා ලපිතා අපරියොසිතාව හොති පවාරණා, එත්ථන්තරෙ එකපදෙපි ඨපෙන්තෙන ඨපිතා හොති පවාරණා, ‘‘කරිස්සාමී’’ති වුත්තෙ පන පරියොසිතා හොති, තස්මා ‘‘කරිස්සාමී’’ති එතස්මිං පදෙ පත්තෙ ඨපිතාපි අට්ඨපිතා හොති. එස නයො ද්වෙවාචිකඑකවාචිකසමානවස්සිකාසුපි. එතාසුපි හි ටිකාරාවසානංයෙව ඨපනඛෙත්තන්ති. २३६. ‘कही गई, उच्चारित की गई, किंतु समाप्त नहीं हुई’—यहाँ प्रवारणा का स्थगन दो प्रकार का है: सर्व-संग्राहक और पुद्गलिक। वहाँ सर्व-संग्राहक में ‘सुणातु मे भन्ते संघो... संघो तेवाचिकं पवारे’—यहाँ ‘सु’ अक्षर से लेकर ‘रे’ अक्षर तक प्रवारणा कही गई, उच्चारित की गई, किंतु समाप्त नहीं हुई होती है। इस बीच एक पद पर भी रोकने वाले द्वारा प्रवारणा स्थगित हो जाती है। ‘य्य’ अक्षर पर पहुँचने पर वह समाप्त हो जाती है, इसलिए उसके बाद रोकने वाले द्वारा रोका गया भी नहीं रोका गया माना जाता है। पुद्गलिक स्थगन में—‘संघं भन्ते पवारेमि... पस्सन्तो पटी’—यहाँ ‘सं’ अक्षर से लेकर अंतिम ‘टि’ अक्षर तक प्रवारणा कही गई, उच्चारित की गई, किंतु समाप्त नहीं हुई होती है; इस बीच एक पद पर भी रोकने वाले द्वारा प्रवारणा स्थगित हो जाती है। ‘करिस्सामि’ कहने पर वह समाप्त हो जाती है, इसलिए ‘करिस्सामि’ पद पर पहुँचने पर रोका गया भी नहीं रोका गया माना जाता है। यही नियम द्विवाचिक, एकवाचिक और समानवर्षिक प्रवारणाओं में भी है। क्योंकि इनमें भी ‘टि’ अक्षर की समाप्ति ही स्थगन का क्षेत्र है। 237. අනුයුඤ්ජියමානොති ‘‘කිම්හි නං ඨපෙසී’’ති පරතො වුත්තනයෙන පුච්ඡියමානො. ඔමද්දිත්වාති එතානි ‘‘අලං භික්ඛු මා භණ්ඩන’’න්තිආදීනි වචනානි වත්වා, වචනොමද්දනා හි ඉධ ඔමද්දනාති අධිප්පෙතා. අනුද්ධංසිතං පටිජානාතීති ‘‘අමූලකෙන පාරාජිකෙන අනුද්ධංසිතො අයං මයා’’ති එවං පටිජානාති. යථාධම්මන්ති සඞ්ඝාදිසෙසෙන අනුද්ධංසනෙ පාචිත්තියං; ඉතරෙහි දුක්කටං. නාසෙත්වාති ලිඞ්ගනාසනාය නාසෙත්වා. २३७. ‘पूछे जाने पर’ का अर्थ है—‘किस कारण से इसे रोका?’ इस प्रकार आगे बताए गए तरीके से पूछे जाने पर। ‘दबाकर (ओमद्दित्वा)’ का अर्थ है—‘बस भिक्षु, झगड़ा मत करो’ आदि वचन कहकर; यहाँ वचनों से दबाना ही ‘ओमद्दना’ अभिप्रेत है। ‘झूठा आरोप स्वीकार करता है’ का अर्थ है—‘मैंने इस भिक्षु पर निराधार पाराजिक का आरोप लगाया है’—ऐसा स्वीकार करता है। ‘यथाधर्म’ का अर्थ है—संघादिशेष से आरोप लगाने पर पाचित्तिय होता है; अन्यों से दुक्कट होता है। ‘नाश करके’ का अर्थ है—लिंग-नासन (भिक्षु वेष छीनना) द्वारा नाश करके। 238. සාස්ස යථාධම්මං පටිකතාති එත්තකමෙව වත්වා පවාරෙථාති වත්තබ්බා, අසුකා නාම ආපත්තීති ඉදං පන න වත්තබ්බං, එතඤ්හි කලහස්ස මුඛං හොති. २३८. 'उसे धर्म के अनुसार प्रतिकृत (ठीक) कर लिया गया है', इतना ही कहकर 'प्रवारणा करें' ऐसा कहना चाहिए; 'अमुक नाम की आपत्ति है' ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि यह कलह का मुख (कारण) होता है। වත්ථුඨපනාදිකථා वस्तु-स्थापन आदि की कथा 239. ඉදං වත්ථු පඤ්ඤායති න පුග්ගලොති එත්ථ චොරා කිර අරඤ්ඤවිහාරෙ පොක්ඛරණිතො මච්ඡෙ ගහෙත්වා පචිත්වා ඛාදිත්වා අගමංසු. සො [Pg.361] තං විප්පකාරං දිස්වා ආරාමෙ වා කිඤ්චි ධුත්තෙන කතං විප්පකාරං දිස්වා ‘‘භික්ඛුස්ස ඉමිනා කම්මෙන භවිතබ්බ’’න්ති සල්ලක්ඛෙත්වා එවමාහ. වත්ථුං ඨපෙත්වා සඞ්ඝො පවාරෙය්යාති ‘‘යදා තං පුග්ගලං ජානිස්සාම, තදා නං චොදෙස්සාම. ඉදානි පන සඞ්ඝො පවාරෙතූ’’ති අයමෙත්ථ අත්ථො. ඉදානෙව නං වදෙහීති සචෙ ඉමිනා වත්ථුනා කඤ්චි පුග්ගලං පරිසඞ්කසි, ඉදානෙව නං අපදිසාහීති අත්ථො. සචෙ අපදිසති, තං පුග්ගලං අනුවිජ්ජිත්වා පවාරෙතබ්බං; නො චෙ අපදිසති, උපපරික්ඛිත්වා ජානිස්සාමාති පවාරෙතබ්බං. २३९. 'यह वस्तु (अपराध) ज्ञात है, किन्तु पुद्गल (व्यक्ति) नहीं' - यहाँ कथा यह है कि चोरों ने अरण्य विहार के पोखर से मछलियाँ पकड़ीं, उन्हें पकाया, खाया और चले गए। उस (प्रवारणा रोकने वाले) भिक्षु ने उस विकार (चिह्न) को देखकर या आराम में किसी धूर्त द्वारा किए गए विकार को देखकर यह विचार किया कि 'यह किसी भिक्षु का ही काम होना चाहिए' और ऐसा कहा। 'वस्तु को स्थगित कर संघ प्रवारणा करे' - इसका अर्थ यहाँ यह है कि 'जब हम उस व्यक्ति को जान लेंगे, तब उसे चोदना (दोषारोपण) करेंगे। अभी संघ प्रवारणा करे।' 'अभी उसे बताओ' - इसका अर्थ है कि यदि इस वस्तु (घटना) से किसी व्यक्ति पर शंका है, तो अभी उसे निर्दिष्ट करो। यदि वह निर्दिष्ट करता है, तो उस व्यक्ति की जाँच कर प्रवारणा करनी चाहिए; यदि निर्दिष्ट नहीं करता है, तो 'जाँच कर जान लेंगे' ऐसा कहकर प्रवारणा करनी चाहिए। අයං පුග්ගලො පඤ්ඤායති න වත්ථූති එත්ථ එකො භික්ඛු මාලාගන්ධවිලෙපනෙහි චෙතියං වා පූජෙසි, අරිට්ඨං වා පිවි, තස්ස තදනුරූපො සරීරගන්ධො අහොසි; සො තං ගන්ධං සන්ධාය ‘‘ඉමස්ස භික්ඛුනො එවරූපො සරීරගන්ධො’’ති වත්ථුං පකාසෙන්තො එවමාහ. පුග්ගලං ඨපෙත්වා සඞ්ඝො පවාරෙය්යාති එතං පුග්ගලං ඨපෙත්වා සඞ්ඝො පවාරෙතු. ඉදානෙව නං වදෙහීති යං ත්වං පුග්ගලං ඨපෙසි, තස්ස පුග්ගලස්ස ඉදානෙව දොසං වද. සචෙ අයමස්ස දොසොති වදති, තං පුග්ගලං සොධෙත්වා පවාරෙතබ්බං. අථ නාහං ජානාමීති වදති, උපපරික්ඛිත්වා ජානිස්සාමාති පවාරෙතබ්බං. 'यह पुद्गल ज्ञात है, किन्तु वस्तु नहीं' - यहाँ निश्चय इस प्रकार जानना चाहिए: एक भिक्षु ने माला, गंध और विलेपन से चैत्य की पूजा की, या अरिष्ट (औषधि/मद्य) पिया, जिससे उसके शरीर से वैसी ही गंध आने लगी। उस (प्रवारणा रोकने वाले) भिक्षु ने उस गंध के आधार पर 'इस भिक्षु के शरीर की ऐसी गंध है' इस प्रकार वस्तु को प्रकट करते हुए ऐसा कहा। 'पुद्गल को स्थगित कर संघ प्रवारणा करे' - अर्थात् इस व्यक्ति को छोड़कर संघ प्रवारणा करे। 'अभी उसे बताओ' - अर्थात् जिस व्यक्ति को तुमने स्थगित किया है, उसका दोष अभी बताओ। यदि वह कहता है कि 'यह इसका दोष है', तो उस व्यक्ति का शोधन कर प्रवारणा करनी चाहिए। यदि वह कहता है कि 'मैं नहीं जानता', तो 'जाँच कर जान लेंगे' ऐसा कहकर प्रवारणा करनी चाहिए। ඉදං වත්ථු ච පුග්ගලො ච පඤ්ඤායතීති පුරිමනයෙනෙව චොරෙහි මච්ඡෙ ගහෙත්වා පචිත්වා පරිභුත්තට්ඨානඤ්ච ගන්ධාදීහි නහානට්ඨානඤ්ච දිස්වා ‘‘පබ්බජිතස්ස කම්ම’’න්ති මඤ්ඤමානො සො එවමාහ. ඉදානෙව නං වදෙහීති ඉදානෙව තෙන වත්ථුනා පරිසඞ්කිතං පුග්ගලං වදෙහි; ඉදං පන උභයම්පි දිස්වා දිට්ඨකාලතො පට්ඨාය විනිච්ඡිනිත්වාව පවාරෙතබ්බං. කල්ලං වචනායාති කල්ලං චොදනාය; චොදෙතුං වට්ටතීති අත්ථො. කස්මා? පවාරණතො පුබ්බෙ අවිනිච්ඡිතත්තා පච්ඡා ච දිස්වා චොදිතත්තාති. උක්කොටනකං පාචිත්තියන්ති ඉදඤ්හි උභයං පුබ්බෙ පවාරණාය දිස්වා විනිච්ඡිනිත්වාව භික්ඛූ පවාරෙන්ති, තස්මා පුන තං උක්කොටෙන්තස්ස ආපත්ති. 'यह वस्तु और पुद्गल दोनों ज्ञात हैं' - पूर्व न्याय के अनुसार ही, चोरों द्वारा मछलियाँ पकड़कर पकाने और खाने के स्थान को तथा गंध आदि से स्नान करने के स्थान को देखकर, 'यह किसी प्रव्रजित का कार्य है' ऐसा मानते हुए उसने ऐसा कहा। 'अभी उसे बताओ' - अर्थात् अभी उस वस्तु के आधार पर शंकित व्यक्ति के बारे में बताओ; किन्तु इन दोनों को देखकर, देखने के समय से ही निर्णय करके ही प्रवारणा करनी चाहिए। 'कहने के लिए उचित है' - अर्थात् चोदना (दोषारोपण) के लिए उचित है; चोदना करना कल्प्य है, यह अर्थ है। क्यों? क्योंकि प्रवारणा से पूर्व निर्णय नहीं हुआ था और बाद में देखकर चोदना की गई है। 'उक्कोटनक पाचित्तिय' - क्योंकि इन दोनों (वस्तु और पुद्गल) को प्रवारणा से पूर्व देखकर और निर्णय करके ही भिक्षु प्रवारणा करते हैं, इसलिए पुनः उसे उखाड़ने (विवाद खड़ा करने) वाले को आपत्ति होती है। භණ්ඩනකාරකවත්ථුකථා कलहकारी (भिक्षुओं) की वस्तु की कथा 240. ද්වෙ තයො උපොසථෙ චාතුද්දසිකෙ කාතුන්ති එත්ථ චතුත්ථපඤ්චමා ද්වෙ, තතියො පන පකතියාපි චතුද්දසිකොයෙවාති. තස්මා [Pg.362] තතියචතුත්ථා වා තතියචතුත්ථපඤ්චමා වා ද්වෙ තයො චාතුද්දසිකා කාතබ්බා. අථ චතුත්ථෙ කතෙ සුණන්ති, පඤ්චමො චාතුද්දසිකො කාතබ්බො. එවම්පි ද්වෙ චාතුද්දසිකා හොන්ති. එවං කරොන්තා භණ්ඩනකාරකානං තෙරසෙ වා චාතුද්දසෙ වා ඉමෙ පන්නරසීපවාරණං පවාරෙස්සන්ති. එවං පවාරෙන්තෙහි ච බහිසීමාය සාමණෙරෙ ඨපෙත්වා ‘‘තෙ ආගච්ඡන්තී’’ති සුත්වා ලහුං ලහුං සන්නිපතිත්වා පවාරෙතබ්බං. එතමත්ථං දස්සෙතුං ‘‘තෙ චෙ භික්ඛවෙ…පෙ… තථා කරොන්තූ’’ති වුත්තං. २४०. 'दो या तीन चतुर्दशी उपोसथ करने चाहिए' - यहाँ चौथी और पाँचवीं दो हैं, और तीसरी तो स्वभाव से ही चतुर्दशी है। इसलिए तीसरी-चौथी, या तीसरी-चौथी-पाँचवीं, ये दो या तीन चतुर्दशी (उपोसथ) करने चाहिए। यदि चौथी करने पर वे सुनते हैं, तो पाँचवीं चतुर्दशी करनी चाहिए। इस प्रकार भी दो चतुर्दशी होती हैं। ऐसा करने से कलहकारियों के लिए तेरहवीं या चौदहवीं को, वे इस पूर्णिमा की प्रवारणा करेंगे। इस प्रकार प्रवारणा करने वालों को सीमा के बाहर श्रमणेरों को रखकर, 'वे आ रहे हैं' ऐसा सुनकर शीघ्रता से एकत्रित होकर प्रवारणा करनी चाहिए। इसी अर्थ को दिखाने के लिए 'ते चे भिक्खवे... पे... तथा करोंतु' ऐसा कहा गया है। අසංවිහිතාති සංවිදහනරහිතා ආගමනජානනත්ථාය අකතසංවිදහිතා; අවිඤ්ඤාතාව හුත්වාති අත්ථො. තෙසං වික්ඛිත්වාති ‘‘කිලන්තත්ථ මුහුත්තං විස්සමථා’’තිආදිනා නයෙන සම්මොහං කත්වාති අත්ථො. නො චෙ ලභෙථාති නො චෙ බහිසීමං ගන්තුං ලභෙය්යුං; භණ්ඩනකාරකානං සාමණෙරෙහි ච දහරභික්ඛූහි ච නිරන්තරං අනුබද්ධාව හොන්ති. ආගමෙ ජුණ්හෙති යං සන්ධාය ආගමෙ ජුණ්හෙ පවාරෙය්යාමාති ඤත්තිං ඨපෙසුං, තස්මිං ආගමෙ ජුණ්හෙ කොමුදියා චාතුමාසිනියා අකාමා පවාරෙතබ්බං, අවස්සං පවාරෙතබ්බං, න හි තං අතික්කමිත්වා පවාරෙතුං ලබ්භති. තෙහි චෙ භික්ඛවෙ භික්ඛූහි පවාරියමානෙති එවං චාතුමාසිනියා පවාරියමානෙ. 'असंविहिता' - अर्थात् प्रबंध रहित, आने की जानकारी के लिए प्रबंध न किया गया; बिना जाने ही, यह अर्थ है। 'तेसं विक्खित्वा' - अर्थात् 'आप थक गए हैं, मुहूर्त भर विश्राम करें' आदि विधि से उन्हें भ्रमित (विचलित) करके, यह अर्थ है। 'नो चे लभेथ' - अर्थात् यदि सीमा के बाहर जाने का अवसर न मिले; क्योंकि कलहकारी श्रमणेरों और युवा भिक्षुओं द्वारा निरंतर पीछे लगे रहते हैं। 'आगमे जुण्हे' - जिसके संबंध में 'आगामी शुक्ल पक्ष में प्रवारणा करेंगे' ऐसी ज्ञप्ति (सूचना) रखी थी, उस आगामी शुक्ल पक्ष की कौमुदी (कार्तिक) चतुर्मासी पूर्णिमा को अनिच्छा होते हुए भी प्रवारणा करनी चाहिए, अवश्य प्रवारणा करनी चाहिए, क्योंकि उसका उल्लंघन कर प्रवारणा करना संभव नहीं है। 'तेहि चे भिक्खवे भिक्खूहि पवारीयमाने' - अर्थात् इस प्रकार चतुर्मासी में प्रवारणा किए जाने पर। පවාරණාසඞ්ගහකථා प्रवारणा-संग्रह की कथा 241. අඤ්ඤතරො ඵාසුවිහාරොති තරුණසමථො වා තරුණවිපස්සනා වා. පරිබාහිරා භවිස්සාමාති අනිබද්ධරත්තිට්ඨානදිවාට්ඨානාදිභාවෙන භාවනානුයොගං සම්පාදෙතුං අසක්කොන්තා බාහිරා භවිස්සාම. සබ්බෙහෙව එකජ්ඣං සන්නිපතිතබ්බන්ති ඉමිනා ඡන්දදානං පටික්ඛිපති. භින්නස්ස හි සඞ්ඝස්ස සමග්ගකරණකාලෙ තිණවත්ථාරකසමථෙ ඉමස්මිඤ්ච පවාරණාසඞ්ගහෙති ඉමෙසු තීසු ඨානෙසු ඡන්දං දාතුං න වට්ටති. පවාරණාසඞ්ගහො නාමායං විස්සට්ඨකම්මට්ඨානානං ථාමගතසමථවිපස්සනානං සොතාපන්නාදීනඤ්ච න දාතබ්බො. තරුණසමථවිපස්සනාලාභිනො පන සබ්බෙ වා හොන්තු, උපඩ්ඪා වා, එකපුග්ගලො වා එකස්සපි වසෙන දාතබ්බොයෙව. දින්නෙ පවාරණාසඞ්ගහෙ [Pg.363] අන්තොවස්සෙ පරිහාරොව හොති, ආගන්තුකා තෙසං සෙනාසනං ගහෙතුං න ලභන්ති. තෙහිපි ඡින්නවස්සෙහි න භවිතබ්බං, පවාරෙත්වා පන අන්තරාපි චාරිකං පක්කමිතුං ලභන්තීති දස්සනත්ථං ‘‘තෙහි චෙ භික්ඛවෙ’’තිආදිමාහ. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. २४१. 'कोई अन्य फासुविहार' - अर्थात् नवीन शमथ या नवीन विपश्यना। 'परिबाहिरा भविस्साम' - अर्थात् रात-दिन के निश्चित स्थान आदि के अभाव में भावना के अभ्यास को पूर्ण करने में असमर्थ होकर हम बाहरी हो जाएँगे। 'सभी को एक साथ एकत्रित होना चाहिए' - इससे छंद-दान (सहमति भेजना) का निषेध किया गया है। संघ के भेद होने पर उसे समग्र करने के समय, तृणप्रस्तारक शमथ में और इस प्रवारणा-संग्रह में - इन तीन स्थानों पर छंद देना उचित नहीं है। यह प्रवारणा-संग्रह उन लोगों को नहीं देना चाहिए जिन्होंने कर्मस्थान छोड़ दिया है, या जो शमथ-विपश्यना में दृढ़ हैं, या जो स्रोतापन्न आदि हैं। किन्तु नवीन शमथ-विपश्यना प्राप्त करने वाले चाहे सभी हों, आधे हों, या एक व्यक्ति हो, एक के लिए भी (प्रवारणा-संग्रह) देना ही चाहिए। प्रवारणा-संग्रह दिए जाने पर वर्षा के भीतर वह सुरक्षा (परिहार) के समान होता है, आगंतुक उनके द्वारा ग्रहण किए गए शयनासन को नहीं ले सकते। उन्हें भी खंडित वर्षा वाला नहीं होना चाहिए, किन्तु प्रवारणा करके बीच में भी चारिका के लिए प्रस्थान कर सकते हैं - यह दिखाने के लिए 'तेहि चे भिक्खवे' आदि कहा गया है। शेष सभी स्थानों पर अर्थ स्पष्ट ही है। පවාරණාක්ඛන්ධකවණ්ණනා නිට්ඨිතා. प्रवारणा स्कन्धक की व्याख्या समाप्त हुई। 5. චම්මක්ඛන්ධකං ५. चर्म स्कन्धक සොණකොළිවිසවත්ථුකථා सोण कोळिविस की कथा 242. චම්මක්ඛන්ධකෙ [Pg.364] – ඉස්සරියාධිපච්චන්ති ඉස්සරභාවෙන ච අධිපතිභාවෙන ච සමන්නාගතං. රජ්ජන්ති රාජභාවං, රඤ්ඤා කත්තබ්බකිච්චං වා. සොණො නාම කොළිවිසොති එත්ථ සොණොති තස්ස නාමං; කොළිවිසොති ගොත්තං. පාදතලෙසු ලොමානීති රත්තෙසු පාදතලෙසු සුඛුමානි අඤ්ජනවණ්ණානි කම්මචිත්තීකතානි ලොමානි ජාතානි හොන්ති. සො කිර පුබ්බෙ අසීතිසහස්සානං පුරිසානං ජෙට්ඨපුරිසො හුත්වා තෙහි සද්ධිං පච්චෙකබුද්ධස්ස වසනට්ඨානෙ පණ්ණසාලං කත්වා අත්තනො සස්සිරිකං උණ්ණපාවාරකං පච්චෙකබුද්ධස්ස පාදෙහි අක්කමනට්ඨානෙ පාදපුඤ්ඡනිකං කත්වා ඨපෙසි. තෙමාසං පන සබ්බෙව පච්චෙකබුද්ධං උපට්ඨහිංසු. අයං තස්ස ච තෙසඤ්ච අසීතියා ගාමිකසහස්සානං පුබ්බයොගො. २४२. चम्मक्खन्धक में - 'इस्सरियाधिपच्चं' का अर्थ है ऐश्वर्य भाव और आधिपत्य भाव से युक्त होना। 'रज्जं' का अर्थ है राज-भाव या राजा द्वारा किए जाने वाले कार्य। 'सोणो नाम कोळिविसो' यहाँ 'सोण' उसका नाम है और 'कोळिविस' उसका गोत्र है। 'पादतलेसु लोमानि' का अर्थ है कि उसके लाल तलवों पर कोमल, अंजन के रंग के और कलात्मक रूप से व्यवस्थित रोम उत्पन्न हुए थे। कहा जाता है कि पूर्व जन्म में वह अस्सी हजार पुरुषों का प्रधान था और उनके साथ मिलकर उसने एक प्रत्येकबुद्ध के निवास स्थान पर पर्णशाला बनाई थी, और अपने वैभवशाली ऊनी वस्त्र को प्रत्येकबुद्ध के चरणों के नीचे पाद-पोंछन (पायदान) के रूप में रखा था। उन सभी ने तीन महीने तक प्रत्येकबुद्ध की सेवा की। यह उसका और उन अस्सी हजार ग्रामवासियों का पूर्व-योग (पुण्य कर्म) था। අසීතිගාමිකසහස්සානීති තෙසු ගාමෙසු වසන්තානං කුලපුත්තානං අසීතිසහස්සානි. කෙනචිදෙව කරණීයෙනාති කෙනචි කරණීයෙන විය; න පනස්ස කිඤ්චි කරණීයං අත්ථි අඤ්ඤත්ර තස්ස දස්සනා. රාජා කිර තානිපි අසීතිකුලපුත්තසහස්සානි සන්නිපාතාපෙන්තො ‘‘එවං අපරිසඞ්කන්තො සොණො ආගමිස්සතී’’ති සන්නිපාතාපෙසි. දිට්ඨධම්මිකෙ අත්ථෙති ‘‘කසිවණිජ්ජාදීනි ධම්මෙන කත්තබ්බානි, මාතාපිතරො ධම්මෙන පොසිතබ්බා’’ති එවමාදිනා නයෙන ඉධලොකහිතෙ අත්ථෙ අනුසාසිත්වා. සො නො භගවාති සො අම්හාකං භගවා තුම්හෙ සම්පරායිකෙ අත්ථෙ අනුසාසිස්සතීති අත්ථො. 'असीतिगामिकसहस्सानी' का अर्थ है उन गाँवों में रहने वाले अस्सी हजार कुलपुत्र। 'केनचिदेव करणीयेन' का अर्थ है किसी कार्य के बहाने; वास्तव में उसके दर्शन के अतिरिक्त राजा का कोई अन्य कार्य नहीं था। राजा ने उन अस्सी हजार कुलपुत्रों को यह सोचकर इकट्ठा किया कि "इस प्रकार सोण बिना किसी शंका के आएगा"। 'दिट्ठधम्मिके अत्थे' का अर्थ है "खेती, व्यापार आदि धर्मपूर्वक करने चाहिए, माता-पिता का पालन धर्मपूर्वक करना चाहिए" इत्यादि रीति से इस लोक के हितकारी अर्थों का उपदेश देकर। 'सो नो भगवा' का अर्थ है कि वे हमारे भगवान तुम्हें पारलौकिक (परलोक के) हितों का उपदेश देंगे। භගවන්තං පටිවෙදෙමීති භගවන්තං ජානාපෙමි. පාටිකාය නිමුජ්ජිත්වාති සොපානස්ස හෙට්ඨා අඩ්ඪචන්දපාසාණෙ නිමුජ්ජිත්වා. යස්ස දානි භන්තෙ භගවා කාලං මඤ්ඤතීති යස්ස තෙසං හිතකිරියත්ථස්ස භගවා කාලං ජානාති. විහාරපච්ඡායායන්ති විහාරපච්චන්තෙ ඡායායං. සමන්නාහරන්තීති පසාදවසෙන පුනප්පුනං මනසි කරොන්ති. භිය්යොසොමත්තායාති භිය්යොසොමත්තාය පුන විසිට්ඨතරං දස්සෙහීති අත්ථො. අන්තරධායතීති අදස්සනං හොති. 'भगवन्तं पटिवेदेमि' का अर्थ है भगवान को सूचित करता हूँ। 'पाटिकाया निमुज्जित्वा' का अर्थ है सीढ़ी के नीचे अर्धचन्द्राकार पत्थर (चन्द्रशिला) पर उतरकर। 'यस्स दानि भन्ते भगवा कालं मञ्ञति' का अर्थ है कि भगवान उन (लोगों) के हित के कार्य के लिए जो समय उचित समझें। 'विहारपच्छायायं' का अर्थ है विहार के पिछले भाग की छाया में। 'समन्नाहरन्ति' का अर्थ है श्रद्धावश बार-बार मन में विचार करते हैं। 'भिय्योसोमत्ताया' का अर्थ है और अधिक विशिष्ट रूप से दिखाएंगे। 'अन्तरधायति' का अर्थ है अदृश्य हो जाना। සොණස්ස පබ්බජ්ජාකථා सोण के प्रव्रज्या की कथा। 243. ලොහිතෙන [Pg.365] ඵුටො හොතීති ලොහිතෙන මක්ඛිතො හොති. ගවාඝාතනන්ති යත්ථ ගාවො හඤ්ඤන්ති, තාදිසොති අත්ථො. කුසලො නාම වීණාය වාදනකුසලො. වීණාය තන්තිස්සරෙති වීණාය තන්තියා සරෙ. අච්චායතාති අතිආයතා ඛරමුච්ඡිතා. සරවතීති සරසම්පන්නා. කම්මඤ්ඤාති කම්මක්ඛමා. අතිසිථිලාති මන්දමුච්ඡනා. සමෙ ගුණෙ පතිට්ඨිතාති මජ්ඣිමෙ සරෙ ඨපෙත්වා මුච්ඡිතා. වීරියසමතං අධිට්ඨහාති වීරියසම්පයුත්තසමතං අධිට්ඨාහි, වීරියං සමථෙන යොජෙහීති අත්ථො. ඉන්ද්රියානඤ්ච සමතං පටිවිජ්ඣාති සද්ධාදීනං ඉන්ද්රියානං සමතං සමභාවං. තත්ථ සද්ධං පඤ්ඤාය, පඤ්ඤඤ්ච සද්ධාය, වීරියං සමාධිනා, සමාධිඤ්ච වීරියෙන යොජයමානො ඉන්ද්රියානං සමතං පටිවිජ්ඣ. තත්ථ ච නිමිත්තං ගණ්හාහීති තස්මිං සමථෙ සති, යෙන ආදාසෙ මුඛබිම්බෙනෙව නිමිත්තෙන උප්පජ්ජිතබ්බං, තං සමථනිමිත්තං විපස්සනානිමිත්තං මග්ගනිමිත්තං ඵලනිමිත්තඤ්ච ගණ්හාහි, නිබ්බත්තෙහීති අත්ථො. २४३. 'लोहितेन फुटो होति' का अर्थ है रक्त से सना हुआ होना। 'गवाघातनं' का अर्थ है वह स्थान जहाँ गायें मारी जाती हैं। 'कुसलो' का अर्थ है वीणा बजाने में कुशल। 'वीणाय तन्तिस्सरे' का अर्थ है वीणा के तारों के स्वर में। 'अच्चायता' का अर्थ है अत्यधिक खींचे हुए और कर्कश स्वर वाले। 'सरवती' का अर्थ है मधुर स्वर से युक्त। 'कम्मञ्ञा' का अर्थ है वादन के कार्य के योग्य। 'अतिसिथिला' का अर्थ है बहुत ढीले या मंद स्वर वाले। 'समे गुणे पतिट्ठिता' का अर्थ है मध्यम स्वर में रखकर बजाए गए। 'वीरियसमतं अधिट्ठहा' का अर्थ है वीर्य (उत्साह) से युक्त शमथ (एकाग्रता) को अधिष्ठित करो, अर्थात् वीर्य को शमथ के साथ जोड़ो। 'इन्द्रियानञ्च समतं पटिविज्झा' का अर्थ है श्रद्धा आदि इन्द्रियों की समता या समान भाव। वहाँ श्रद्धा को प्रज्ञा के साथ, प्रज्ञा को श्रद्धा के साथ, वीर्य को समाधि के साथ और समाधि को वीर्य के साथ जोड़ते हुए इन्द्रियों की समता का साक्षात्कार करो। 'तत्थ च निमित्तं गण्हाहि' का अर्थ है कि उस शमथ के होने पर, जैसे दर्पण में मुख का प्रतिबिम्ब उत्पन्न होता है, वैसे ही जिस निमित्त को उत्पन्न होना चाहिए, उस शमथ-निमित्त, विपश्यना-निमित्त, मार्ग-निमित्त और फल-निमित्त को ग्रहण करो, अर्थात् उन्हें उत्पन्न करो। 244. අඤ්ඤං බ්යාකරෙය්යන්ති අරහා අහන්ති ජානාපෙය්යං. ඡ ඨානානීති ඡ කාරණානි. අධිමුත්තො හොතීති පටිවිජ්ඣිත්වා පච්චක්ඛං කත්වා ඨිතො හොති. නෙක්ඛම්මාධිමුත්තොතිආදි සබ්බං අරහත්තවසෙන වුත්තං. අරහත්තඤ්හි සබ්බකිලෙසෙහි නික්ඛන්තත්තා නෙක්ඛම්මං, තෙහෙව පවිවිත්තත්තා පවිවෙකො, බ්යාපජ්ජාභාවතො අබ්යාපජ්ජං, උපාදානස්ස ඛයන්තෙ උප්පන්නත්තා උපාදානක්ඛයො, තණ්හාක්ඛයන්තෙ උප්පන්නත්තා තණ්හක්ඛයො, සම්මොහාභාවතො අසම්මොහොති ච වුච්චති. २४४. 'अञ्ञं ब्याकरेय्युं' का अर्थ है "मैं अर्हत् हूँ" ऐसा जनाना। 'छ ठानानि' का अर्थ है छह कारण। 'अधिमुत्तो होति' का अर्थ है साक्षात्कार करके और प्रत्यक्ष करके स्थित होना। 'नेक्खम्माधिमुत्तो' आदि सब कुछ अर्हत्त्व के सन्दर्भ में कहा गया है। अर्हत्त्व को ही सभी क्लेशों से निकल जाने के कारण 'नैष्क्रम्य' (नेक्खम्म), उन्हीं से विविक्त (अलग) होने के कारण 'प्रविवेक' (पविवेक), व्यापाद (द्वेष) के अभाव के कारण 'अव्यापाद', उपादान के क्षय के अन्त में उत्पन्न होने के कारण 'उपादान-क्षय', तृष्णा के क्षय के अन्त में उत्पन्न होने के कारण 'तृष्णा-क्षय' और सम्मोह (मोह) के अभाव के कारण 'असम्मोह' कहा जाता है। කෙවලං සද්ධාමත්තකන්ති පටිවෙධරහිතං කෙවලං පටිවෙධපඤ්ඤාය අසම්මිස්සං සද්ධාමත්තකං. පටිචයන්ති පුනප්පුනං කරණෙන වුඩ්ඪිං. වීතරාගත්තාති මග්ගප්පටිවෙධෙන රාගස්ස විගතත්තායෙව නෙක්ඛම්මසඞ්ඛාතං අරහත්තං පටිවිජ්ඣිත්වා ඨිතො හොති. ඵලසමාපත්තිවිහාරෙනෙව විහරති, තන්නින්නමානසොයෙව හොතීති අත්ථො. සෙසපදෙසුපි එසෙව නයො. 'केवलं सद्धामत्तकं' का अर्थ है साक्षात्कार से रहित, केवल साक्षात्कार वाली प्रज्ञा से अमिश्रित मात्र श्रद्धा। 'पटिचयन्ति' का अर्थ है बार-बार करने से वृद्धि। 'वीतरागत्ता' का अर्थ है मार्ग के साक्षात्कार द्वारा राग के दूर हो जाने के कारण ही नैष्क्रम्य संज्ञक अर्हत्त्व का साक्षात्कार करके स्थित होना। वह फल-समापत्ति के विहार से ही विहार करता है और उसी में झुके हुए मन वाला होता है। शेष पदों में भी यही न्याय (विधि) है। ලාභසක්කාරසිලොකන්ති [Pg.366] චතුපච්චයලාභඤ්ච තෙසංයෙව සුකතභාවඤ්ච වණ්ණභණනඤ්ච. නිකාමයමානොති ඉච්ඡමානො පත්ථයමානො. පවිවෙකාධිමුත්තොති විවෙකෙ අධිමුත්තො අහන්ති එවං අරහත්තං බ්යාකරොතීති අත්ථො. 'लाभसक्कारसिलोकं' का अर्थ है चार प्रत्ययों का लाभ, उनकी सुलभता और प्रशंसा का कथन। 'निकामयमानो' का अर्थ है इच्छा करते हुए, प्रार्थना करते हुए। 'पविवेकधिमुत्तो' का अर्थ है "मैं विवेक में अधिमुक्त (लीन) हूँ", इस प्रकार अर्हत्त्व की घोषणा करता है। සීලබ්බතපරාමාසන්ති සීලඤ්ච වතඤ්ච පරාමසිත්වා ගහිතගහණමත්තං. සාරතො පච්චාගච්ඡන්තොති සාරභාවෙන ජානන්තො. අබ්යාපජ්ජාධිමුත්තොති අබ්යාපජ්ජං අරහත්තං බ්යාකරොතීති අත්ථො. ඉමිනාව නයෙන සබ්බවාරෙසු අත්ථො වෙදිතබ්බො. 'सीलब्बतपरामासं' का अर्थ है शील और व्रत का गलत परामर्श (पकड़ना) करके मात्र ग्रहण किया गया आग्रह। 'सारतो पच्चागच्छन्तो' का अर्थ है सार रूप में जानते हुए। 'अब्यापज्जाधिमुत्तो' का अर्थ है अव्यापाद रूपी अर्हत्त्व की घोषणा करता है। इसी रीति से सभी अवसरों पर अर्थ समझना चाहिए। භුසාති බලවන්තො. නෙවස්ස චිත්තං පරියාදියන්තීති එතස්ස ඛීණාසවස්ස චිත්තං ගහෙත්වා ඨාතුං න සක්කොන්ති. අමිස්සීකතන්ති අමිස්සකතං. කිලෙසාහි ආරම්මණෙන සද්ධිං චිත්තං මිස්සං කරොන්ති, තෙසං අභාවා අමිස්සීකතං. ඨිතන්ති පතිට්ඨිතං. ආනෙඤ්ජප්පත්තන්ති අචලනප්පත්තං. වයඤ්චස්සානුපස්සතීති තස්ස චිත්තස්ස උප්පාදම්පි වයම්පි පස්සති. 'भुसा' का अर्थ है बलवान। 'नेवस्स चित्तं परियादियन्ति' का अर्थ है कि वे इस क्षीणास्त्रव (अर्हत्) के चित्त को वश में करके स्थित नहीं हो सकते। 'अमिस्सीकतं' का अर्थ है अमिश्रित। क्लेश ही आलम्बन के साथ चित्त को मिश्रित करते हैं, उनके अभाव के कारण वह अमिश्रित है। 'ठितं' का अर्थ है प्रतिष्ठित। 'आनेञ्जप्पत्तं' का अर्थ है अचलता को प्राप्त। 'वयञ्चस्सानुपस्सति' का अर्थ है वह उस चित्त के उत्पाद और व्यय (विनाश) को भी देखता है। නෙක්ඛම්මං අධිමුත්තස්සාති අරහත්තං පටිවිජ්ඣිත්වා ඨිතස්ස. සෙසපදෙහිපි අරහත්තමෙව කථිතං. උපාදානක්ඛයස්සාති උපයොගත්ථෙ සාමිවචනං. අසම්මොහඤ්ච චෙතසොති චිත්තස්ස ච අසම්මොහං අධිමුත්තස්ස. දිස්වා ආයතනුප්පාදන්ති ආයතනානං උප්පාදඤ්ච වයඤ්ච දිස්වා. සම්මා චිත්තං විමුච්චතීති සම්මා හෙතුනා නයෙන ඉමාය විපස්සනාය පටිපත්තියා ඵලසමාපත්තිවසෙන චිත්තං විමුච්චති, නිබ්බානාරම්මණෙ අධිමුච්චති. සන්තචිත්තස්සාති නිබ්බුතචිත්තස්ස. තාදිනොති ඉට්ඨානිට්ඨෙ අනුනයපටිඝෙහි අකම්පියත්තා තාදී, තස්ස තාදිනො. "नैष्क्रम्य में अधिमुक्त" का अर्थ है अर्हत्व प्राप्त कर उसमें स्थित होना। शेष पदों (अव्यापाद, असम्मोह आदि) द्वारा भी अर्हत्व ही कहा गया है। "उपादानक्खयस्स" (उपादान के क्षय का) यहाँ षष्ठी विभक्ति (सामिवचन) द्वितीया (उपयोगत्थ) के अर्थ में प्रयुक्त हुई है। "चित्त का असम्मोह" का अर्थ है चित्त के असम्मोह (अर्हत्व फल) में अधिमुक्त होना। "आयतन के उत्पाद को देखकर" का अर्थ है आयतनों के उत्पाद और व्यय को देखकर। "चित्त सम्यक् रूप से विमुक्त होता है" का अर्थ है सम्यक् कारण और विधि से, इस विपश्यना प्रतिपत्ति द्वारा, फल-समापत्ति के वश से चित्त विमुक्त होता है, अर्थात् निर्वाण रूपी आलम्बन में अधिमुक्त होता है। "शान्त चित्त वाले का" का अर्थ है निर्वाण प्राप्त (शांत) चित्त वाले का। "तादी" (तथाभावी) का अर्थ है इष्ट और अनिष्ट विषयों में अनुनय (लोभ) और प्रतिघ (द्वेष) द्वारा विचलित न होने के कारण 'तादी', उस तादी (अर्हत्) का चित्त स्थिर रहता है। දිගුණාදිඋපාහනපටික්ඛෙපකථා द्विगुण (दो परतों वाली) आदि खड़ाऊँ (उपाहन) के निषेध की कथा। 245. අඤ්ඤං බ්යාකරොන්තීති අරහත්තං බ්යාකරොන්ති. අත්ථො ච වුත්තොති යෙන අරහාති ඤායති, සො අත්ථො වුත්තො. සුත්තත්ථො පන සුත්තවණ්ණනතොයෙව ගහෙතබ්බො. අත්තා ච අනුපනීතොති අහං අරහාති එවං බ්යඤ්ජනවසෙන අත්තා න උපනීතො. අථ ච පනිධෙකච්චෙ මොඝපුරිසාති අඤ්ඤෙ පන තුච්ඡපුරිසා හසමානා විය අසන්තමෙව අඤ්ඤං වචනමත්තෙන සන්තං කත්වා බ්යාකරොන්ති. එකපලාසිකන්ති එකපටලං[Pg.367]. අසීතිසකටවාහෙති එත්ථ ද්වෙ සකටභාරා එකො වාහොති වෙදිතබ්බො. සත්තහත්ථිකඤ්ච අනීකන්ති එත්ථ ඡ හත්ථිනියො එකො ච හත්ථීති ඉදමෙකං අනීකං. ඊදිසානි සත්ත අනීකානි සත්තහත්ථිකං අනීකං නාම. දිගුණාති ද්විපටලා. තිගුණාති තිපටලා. ගණඞ්ගුණූපාහනාති චතුපටලතො පට්ඨාය වුච්චති. २४५. "अन्या (ज्ञान) की व्याख्या करते हैं" का अर्थ है अर्हत्व की घोषणा करते हैं। "अर्थ कहा गया है" का अर्थ है जिससे 'अर्हत्' ऐसा जाना जाता है, वह अर्थ कहा गया है। सूत्र का अर्थ तो सूत्र की व्याख्या (अट्ठकथा) से ही ग्रहण करना चाहिए। "आत्मा उपनीत नहीं है" का अर्थ है 'मैं अर्हत् हूँ' इस प्रकार शब्दों के माध्यम से स्वयं को (अहंकारपूर्वक) प्रस्तुत नहीं किया गया है। "किन्तु यहाँ कुछ मोघ पुरुष" का अर्थ है अन्य तुच्छ पुरुष, उपहास करते हुए के समान, असत्य अर्हत्व को केवल वचनों मात्र से सत्य बनाकर घोषित करते हैं। "एकपलासिक" का अर्थ है एक परत वाला। "अस्सी छकड़ा भार" यहाँ दो छकड़ा भार को एक 'वाह' समझना चाहिए। "सात हाथियों की सेना" यहाँ छह हथिनियाँ और एक हाथी मिलकर एक 'अनीक' (सेना की इकाई) होता है। ऐसे सात अनीक 'सत्तहत्थिक अनीक' कहलाते हैं। "द्विगुण" का अर्थ है दो परतों वाले। "त्रिगुण" का अर्थ है तीन परतों वाले। "गुणंगुण उपाहन" चार परतों से लेकर आगे के जूतों को कहा जाता है। සබ්බනීලිකාදිපටික්ඛෙපකථා पूर्णतः नीले आदि जूतों के निषेध की कथा। 246. සබ්බනීලිකාති සබ්බාව නීලිකා. එස නයො සබ්බපීතිකාදීසුපි. තත්ථ ච නීලිකා උමාපුප්ඵවණ්ණා හොති, පීතිකා කණිකාරපුප්ඵවණ්ණා, ලොහිතිකා ජයසුමනපුප්ඵවණ්ණා, මඤ්ජිට්ඨිකා මඤ්ජිට්ඨවණ්ණා එව, කණ්හා අද්දාරිට්ඨකවණ්ණා, මහාරඞ්ගරත්තා සතපදිපිට්ඨිවණ්ණා, මහානාමරත්තා සම්භින්නවණ්ණා හොති පණ්ඩුපලාසවණ්ණා. කුරුන්දියං පන ‘‘පදුමපුප්ඵවණ්ණා’’ති වුත්තා. එතාසු යංකිඤ්චි ලභිත්වා රජනං චොළකෙන පුඤ්ඡිත්වා වණ්ණං භින්දිත්වා ධාරෙතුං වට්ටති. අප්පමත්තකෙපි භින්නෙ වට්ටතියෙව. २४६. "सब्बनीलिका" का अर्थ है पूरी तरह से नीले। यही नियम 'सब्बपीतिका' (पूरी तरह पीले) आदि पदों में भी है। उनमें 'नीलिका' अलसी के फूल के रंग की होती है, 'पीतिका' कणिकार (अमलतास) के फूल के रंग की, 'लोहितिका' जयसुमन (गुड़हल) के फूल के रंग की, 'मंजिट्ठिका' मजीठ के रंग की ही, 'कण्हा' (काली) गीले रीठा के फल के रंग की, 'महारंगरत्ता' (गहरे रंग में रँगी) कनखजूरे की पीठ के रंग की, और 'महानामरत्ता' मिश्रित रंग की या पीले पत्तों के रंग की होती है। कुरुन्दी (अट्ठकथा) में तो इसे "पद्म के फूल के रंग की" कहा गया है। इनमें से कोई भी प्राप्त होने पर, रंग को कपड़े से पोंछकर या रंग को बदलकर पहनना कल्पनीय है। थोड़ा सा भी रंग बदल जाने पर पहनना कल्पनीय ही है। නීලකවද්ධිකාති යාසං වද්ධායෙව නීලා. එසෙව නයො සබ්බත්ථ. එතාපි වණ්ණභෙදං කත්වා ධාරෙතබ්බා. ඛල්ලකබද්ධාති පණ්හිපිධානත්ථං තලෙ ඛල්ලකං බන්ධිත්වා කතා. පුටබද්ධාති යොනකඋපාහනා වුච්චති, යා යාවජඞ්ඝතො සබ්බපාදං පටිච්ඡාදෙති. පාලිගුණ්ඨිමාති පලිගුණ්ඨිත්වා කතා; යා උපරි පාදමත්තමෙව පටිච්ඡාදෙති, න ජඞ්ඝං. තූලපුණ්ණිකාති තූලපිචුනා පූරෙත්වා කතා. තිත්තිරපත්තිකාති තිත්තිරපත්තසදිසා විචිත්තබද්ධා. මෙණ්ඩවිසාණවද්ධිකාති කණ්ණිකට්ඨානෙ මෙණ්ඩකසිඞ්ගසණ්ඨානෙ වද්ධෙ යොජෙත්වා කතා. අජවිසාණවද්ධිකාදීසුපි එසෙව නයො. විච්ඡිකාළිකාපි තත්ථෙව විච්ඡිකනඞ්ගුට්ඨසණ්ඨානෙ වද්ධෙ යොජෙත්වා කතා. මොරපිඤ්ඡපරිසිබ්බිතාති තලෙසු වා වද්ධෙසු වා මොරපිඤ්ඡෙහි සුත්තකසදිසෙහි පරිසිබ්බිතා. චිත්රාති විචිත්රා; එතාසු යංකිඤ්චි ලභිත්වා, සචෙ තානි ඛල්ලකාදීනි අපනෙත්වා සක්කා හොන්ති වළඤ්ජිතුං, වළඤ්ජෙතබ්බා. තෙසු පන සති වළඤ්ජන්තස්ස දුක්කටං. සීහචම්මපරික්ඛටා නාම පරියන්තෙසු චීවරෙ අනුවාතං විය සීහචම්මං යොජෙත්වා කතා. ලූවකචම්මපරික්ඛටාති පක්ඛිබිළාලචම්මපරික්ඛටා[Pg.368]. එතාසුපි යා කාචි ලභිත්වා තං චම්මං අපනෙත්වා ධාරෙතබ්බා. "नीलकवद्धिका" वे जूते हैं जिनकी केवल तनियाँ (बद्ध) नीली हों। यही नियम सब जगह है। इन्हें भी रंग बदलकर ही पहनना चाहिए। "खल्लकबद्ध" वे जूते हैं जो एड़ी को ढंकने के लिए तले में खल्लक (एड़ी का आवरण) बाँधकर बनाए गए हों। "पुटबद्ध" यवन देश के जूतों को कहा जाता है, जो पिंडली तक पूरे पैर को ढंक लेते हैं। "पालिगुण्ठिमा" वे जूते हैं जो लपेटकर बनाए गए हों; जो केवल पैर के ऊपरी हिस्से को ढंकते हैं, पिंडली को नहीं। "तूलपुण्णिका" वे जूते हैं जो रुई से भरकर बनाए गए हों। "तित्तिरपत्तिका" वे जूते हैं जिनकी तनियाँ तीतर के पंखों के समान विचित्र हों। "मेण्डविसाणवद्धिका" वे जूते हैं जिनमें अँगूठे के पास मेढ़े के सींग के आकार की तनियाँ लगाकर बनाया गया हो। 'अजविसाणवद्धिका' (बकरी के सींग वाली तनी) आदि में भी यही नियम है। "विच्छिकालिका" भी वहीं बिच्छू की पूँछ के आकार की तनियाँ लगाकर बनाए जाते हैं। "मोरपिञ्छपरिसिब्बता" वे जूते हैं जिनके तलों या तनियों में धागे के समान मोर के पंखों से सिलाई की गई हो। "चित्रा" का अर्थ है विचित्र; इनमें से कोई भी प्राप्त होने पर, यदि उन खल्लक आदि को हटाकर उपयोग करना संभव हो, तो उपयोग करना चाहिए। उनके रहते हुए उपयोग करने वाले को दुष्कृत अपराध होता है। "सीहचम्मपरिक्खटा" वे जूते कहलाते हैं जिनके किनारों पर चीवर के अनुवात (किनारी) की तरह सिंह की खाल लगाकर बनाया गया हो। "लूवकचम्मपरिक्खटा" का अर्थ है उड़ने वाली बिल्ली की खाल से मढ़े हुए जूते। इनमें से भी जो कोई प्राप्त हो, उस खाल को हटाकर ही पहनना चाहिए। 247. ඔමුක්කන්ති පටිමුඤ්චිත්වා අපනීතං. නවාති අපරිභුත්තා. २४७. "ओमुक्क" का अर्थ है पहनकर उतारा हुआ। "नवा" का अर्थ है जिसका उपयोग न किया गया हो (नया)। අජ්ඣාරාමෙඋපාහනපටික්ඛෙපකථා आराम (विहार) के भीतर जूते पहनने के निषेध की कथा। 248. අභිජීවනිකස්සාති යෙන සිප්පෙන අභිජීවන්ති, ජීවිකං කප්පෙන්ති, තස්ස කාරණාති අත්ථො. ඉධ ඛො තං භික්ඛවෙති එත්ථ තන්ති නිපාතමත්තං, ඉධ ඛො භික්ඛවෙ සොභෙය්යාථාති අත්ථො. යං තුම්හෙති යෙ තුම්හෙ. අථ වා යදි තුම්හෙති වුත්තං හොති. යදිසද්දස්ස හි අත්ථෙ අයං නිපාතො. ආචරියෙසූතිආදිම්හි පබ්බජ්ජාචරියො, උපසම්පදාචරියො, නිස්සයාචාරියො, උද්දෙසාචරියොති ඉමෙ චත්තාරොපි ඉධ ආචරියා එව. අවස්සිකස්ස ඡබ්බස්සො ආචරියමත්තො. සො හි චතුවස්සකාලෙ තං නිස්සාය වච්ඡති; එවං එකවස්සස්ස සත්තවස්සො, දුවස්සස්ස අට්ඨවස්සො, තිවස්සස්ස නවවස්සො, චතුවස්සස්ස දසවස්සො. ඉමෙපි ආචරියමත්තා එව. උපජ්ඣායස්ස සන්දිට්ඨසම්භත්තා පන සහායභික්ඛූ, යෙ වා පන කෙචි දසහි වස්සෙහි මහන්තතරා තෙ සබ්බෙපි උපජ්ඣායමත්තා නාම. එත්තකෙසු භික්ඛූසු අනුපාහනෙසු චඞ්කමන්තෙසු සඋපාහනස්ස චඞ්කමතො ආපත්ති. २४८. "अभिजीवनी" का अर्थ है जिस शिल्प से आजीविका चलाते हैं, जीवन यापन करते हैं, उस कारण से। "इध खो तं भिक्खवे" यहाँ 'तं' शब्द केवल निपात मात्र है; इसका अर्थ है "हे भिक्षुओं! यहाँ (इस शासन में) तुम सुशोभित होओगे"। "यं तुम्हे" का अर्थ है 'जो तुम'। अथवा इसका अर्थ 'यदि तुम' भी है, क्योंकि यह निपात 'यदि' शब्द के अर्थ में प्रयुक्त होता है। "आचार्यों में" आदि पाठ में—प्रव्रज्या-आचार्य, उपसम्पदा-आचार्य, निश्रय-आचार्य और उद्देश-आचार्य—ये चारों ही यहाँ 'आचार्य' हैं। बिना वर्षावास वाले भिक्षु के लिए छह वर्षावास वाला भिक्षु 'आचार्य-तुल्य' है। क्योंकि वह चार वर्ष का होने पर उसका आश्रय लेकर रहेगा; इसी प्रकार एक वर्षावास वाले के लिए सात वर्ष वाला, दो वर्ष वाले के लिए आठ वर्ष वाला, तीन वर्ष वाले के लिए नौ वर्ष वाला और चार वर्ष वाले के लिए दस वर्ष वाला भिक्षु आचार्य-तुल्य है। ये भी आचार्य-तुल्य ही हैं। उपाध्याय के परिचित और घनिष्ठ मित्र भिक्षु, अथवा जो कोई भी दस वर्षों से अधिक बड़े हों, वे सभी 'उपाध्याय-तुल्य' कहलाते हैं। इतने भिक्षुओं के बिना जूते पहने चंक्रमण करने पर, जूते पहनकर चंक्रमण करने वाले को दुष्कृत की आपत्ति होती है। 249. පාදඛීලාබාධො නාම පාදතො ඛීලසදිසං මංසං නික්ඛන්තං හොති. २४९. "पादखील" (पैर की कील) नामक रोग वह है जिसमें पैर से कील के समान मांस बाहर निकल आता है। 251. තිණපාදුකාති යෙන කෙනචි තිණෙන කතපාදුකා. හින්තාලපාදුකාති ඛජ්ජූරීපත්තෙහි කතපාදුකා; හින්තාලපත්තෙහිපි න වට්ටතියෙව. කමලපාදුකාති කමලතිණං නාම අත්ථි, තෙන කතපාදුකා; උසීරපාදුකාතිපි වදන්ති. කම්බලපාදුකාති උණ්ණාහි කතපාදුකා. අසඞ්කමනීයාති භූමියං සුප්පතිට්ඨිතා නිච්චලා අසංහාරියා. २५१. "तृण-पादुका" का अर्थ है किसी भी घास से बनी हुई खड़ाऊँ। "हिन्ताल-पादुका" खजूर के पत्तों से बनी खड़ाऊँ है; हिन्ताल के पत्तों से बनी भी कल्पनीय नहीं है। "कमल-पादुका"—'कमल-तृण' नामक एक घास होती है, उससे बनी खड़ाऊँ; इसे 'उशीर-पादुका' (खस की खड़ाऊँ) भी कहते हैं। "कम्बल-पादुका" ऊन से बनी खड़ाऊँ है। "असंक्रमणीया" का अर्थ है जो भूमि पर अच्छी तरह स्थित हो, अचल हो और जिसे हटाया न जा सके। 252. අඞ්ගජාතං ඡුපන්තීති අඞ්ගජාතෙනෙව අඞ්ගජාතං ඡුපන්ති. ඔගාහෙත්වා මාරෙන්තීති අන්තො උදකෙ දළ්හං ගහෙත්වා මාරෙන්ති. २५२. "अंगजात का स्पर्श करते हैं" का अर्थ है अपने अंगजात से ही (गायों के) अंगजात का स्पर्श करते हैं। "डुबोकर मारते हैं" का अर्थ है पानी के भीतर मजबूती से पकड़कर मारते हैं। යානාදිපටික්ඛෙපකථා यान आदि के निषेध की कथा। 253. ඉත්ථියුත්තෙනාති [Pg.369] ධෙනුයුත්තෙන. පුරිසන්තරෙනාති පුරිසසාරථිනා. පුරිසයුත්තෙනාති ගොණයුත්තෙන. ඉත්ථන්තරෙනාති ඉත්ථිසාරථිනා. ගඞ්ගාමහියායාති ගඞ්ගාමහකීළිකාය. පුරිසයුත්තං හත්ථවට්ටකන්ති එත්ථ පුරිසයුත්තං ඉත්ථිසාරථි වා හොතු, පුරිසසාරථි වා වට්ටති. හත්ථවට්ටකං පන ඉත්ථියො වා වට්ටෙන්තු පුරිසා වා, වට්ටතියෙව. යානුග්ඝාතෙනාති යානං අභිරුහන්තස්ස සබ්බො කායො චලති තප්පච්චයා. සිවිකන්ති පීඨකසිවිකං. පාටඞ්කින්ති වංසෙ ලග්ගෙත්වා කතං පටපොතලිකං. २५३. "स्त्री-युक्त" का अर्थ है गाय से जुता हुआ। "पुरुष-चालक" का अर्थ है पुरुष सारथी वाला। "पुरुष-युक्त" का अर्थ है बैल से जुता हुआ। "स्त्री-चालक" का अर्थ है स्त्री सारथी वाली। "गंगा-मही" का अर्थ है गंगा नदी के उत्सव में खेलने के समय के समान। "पुरुष-युक्त हस्त-वर्तक" (हाथ से खींचे जाने वाले यान) के विषय में, चाहे स्त्री सारथी हो या पुरुष सारथी, वह कल्प्य (उचित) है। और हाथ से खींचे जाने वाले यान को चाहे स्त्रियाँ खींचें या पुरुष, वह कल्प्य ही है। "यान के झटके से" का अर्थ है यान पर चढ़ने वाले का सारा शरीर उस कारण से हिलता है। "शिविका" का अर्थ है तख्तों आदि से बनी पालकी। "पातंकी" का अर्थ है बाँस में लटकाकर बनाया गया कपड़े का झूला (पालकी)। 254. උච්චාසයනමහාසයනනානීති එත්ථ උච්චාසයනන්ති පමාණාතික්කන්තං මඤ්චං. මහාසයනන්ති අකප්පියත්ථරණං, ආසන්දීආදීසු ආසන්දීති පමාණාතික්කන්තාසනං. පල්ලඞ්කොති පාදෙසු වාළරූපානි ඨපෙත්වා කතො. ගොනකොති දීඝලොමකො මහාකොජවො; චතුරඞ්ගුලාධිකානි කිර තස්ස ලොමානි. චිත්තකාති වානචිත්රො උණ්ණාමයත්ථරණො. පටිකාති උණ්ණාමයො සෙතත්ථරණො. පටලිකාති ඝනපුප්ඵකො උණ්ණාමයලොහිතත්ථරණො; යො ආමලකපට්ටොතිපි වුච්චති. තූලිකාති පකතිතූලිකායෙව. විකතිකාති සීහබ්යග්ඝාදිරූපවිචිත්රො උණ්ණාමයත්ථරණො. උද්දලොමීති එකතො උග්ගතලොමං උණ්ණාමයත්ථරණං; ‘‘උද්ධලොමී’’තිපි පාඨො. එකන්තලොමීති උභතො උග්ගතලොමං උණ්ණාමයත්ථරණං. කට්ටිස්සන්ති රතනපරිසිබ්බිතං කොසෙය්යකට්ටිස්සමයං පච්චත්ථරණං. කොසෙය්යන්ති රතනපරිසිබ්බිතං කොසියසුත්තමයං පච්චත්ථරණං; සුද්ධකොසෙය්යං පන වට්ටති. २५४. "उच्चशयन-महाशयन" में "उच्चशयन" का अर्थ है प्रमाण (नियत माप) से अधिक ऊँचा मंच (पलंग)। "महाशयन" का अर्थ है अकल्प्य (अनुचित) बिछावन। "आसंदी" आदि में "आसंदी" का अर्थ है प्रमाण से अधिक ऊँचा आसन। "पर्यंक" (पलंग) वह है जिसके पायों पर सिंह, व्याघ्र आदि हिंसक पशुओं के चित्र बने हों। "गोनक" लंबे रोएँ वाला बड़ा ऊनी कालीन है; कहते हैं कि इसके रोएँ चार अंगुल से अधिक लंबे होते हैं। "चित्तक" बुनाई से विचित्र बना हुआ ऊनी बिछावन है। "पटिका" सफेद ऊनी बिछावन है। "पटलिका" घने फूलों के चित्रों वाला लाल ऊनी बिछावन है; जिसे "आमलक-पत्ती" (आँवले के पत्ते के समान) भी कहा जाता है। "तूलिका" साधारण रुई भरा हुआ गद्दा ही है। "विकतिका" सिंह, व्याघ्र आदि के चित्रों से विचित्र ऊनी बिछावन है। "उद्दलोमी" एक ओर रोएँ वाला ऊनी बिछावन है; "उद्धलोमी" भी पाठ है। "एकंतलोमी" दोनों ओर रोएँ वाला ऊनी बिछावन है। "कट्टिस्स" रत्नों से जड़ा हुआ और रेशमी एवं सुनहरे धागों से बुना हुआ बिछावन है। "कोसेय्य" रत्नों से जड़ा हुआ और रेशमी धागों से बना बिछावन है; किंतु शुद्ध रेशमी बिछावन कल्प्य है। කුත්තකන්ති සොළසන්නං නාටකිත්ථීනං ඨත්වා නච්චනයොග්ගං උණ්ණාමයඅත්ථරණං. හත්ථත්ථරඅස්සත්ථරාති හත්ථිඅස්සපිට්ඨීසු අත්ථරණකඅත්ථරණා එව. රථත්ථරෙපි එසෙව නයො. අජිනප්පවෙණීති අජිනචම්මෙහි මඤ්චප්පමාණෙන සිබ්බිත්වා කතා පවෙණී. කදලීමිගපවරපච්චත්ථරණන්ති කදලීමිගචම්මං නාම අත්ථි, තෙන කතං පවරපච්චත්ථරණං, උත්තමපච්චත්ථරණන්ති අත්ථො. තං කිර සෙතවත්ථස්ස උපරි කදලීමිගචම්මං පත්ථරිත්වා සිබ්බිත්වා කරොන්ති. සඋත්තරච්ඡදන්ති සහ උත්තරච්ඡදනෙන; උපරිබද්ධෙන රත්තවිතානෙන සද්ධින්ති අත්ථො[Pg.370]. සෙතවිතානම්පි හෙට්ඨා අකප්පියපච්චත්ථරණෙ සති න වට්ටති, අසති පන වට්ටති. උභතොලොහිතකූපධානන්ති සීසූපධානඤ්ච පාදූපධානඤ්චාති මඤ්චස්ස උභතොලොහිතකූපධානං, එතං න කප්පති. යං පන එකමෙව උපධානං උභොසු පස්සෙසු රත්තං වා හොති, පදුමවණ්ණං වා චිත්රං වා, සචෙ පමාණයුත්තං, වට්ටති. මහාඋපධානං පන පටික්ඛිත්තං. "कुत्तक" सोलह नर्तकियों के खड़े होकर नाचने के योग्य ऊनी बिछावन है। "हत्थत्थर-अस्सत्थर" हाथी और घोड़े की पीठ पर बिछाए जाने वाले बिछावन ही हैं। "रथत्थर" (रथ के बिछावन) में भी यही नियम है। "अजिन-प्रवेणी" काले हिरण के चमड़ों को मंच (पलंग) के आकार में सीकर बनाया गया बिछावन है। "कदली-मृग-प्रवर-पच्चत्थरण" का अर्थ है कदली मृग का चर्म होता है, उससे बना श्रेष्ठ बिछावन। कहते हैं कि सफेद कपड़े के ऊपर कदली मृग के चर्म को फैलाकर और सीकर इसे बनाते हैं। "स-उत्तरच्छद" का अर्थ है ऊपर के आवरण (छत) के साथ; ऊपर बँधे हुए लाल चंदोवे के साथ। सफेद चंदोवा भी यदि नीचे अकल्प्य बिछावन हो तो कल्प्य नहीं है, किंतु यदि नीचे अकल्प्य बिछावन न हो तो कल्प्य है। "दोनों ओर लाल तकिये वाला" का अर्थ है सिर की ओर का तकिया और पैर की ओर का तकिया; पलंग के दोनों ओर लाल तकिये होना अकल्प्य है। किंतु जो एक ही तकिया दोनों ओर से लाल, पद्म-वर्ण (कमल के रंग का) या विचित्र हो, यदि वह उचित माप का है, तो कल्प्य है। किंतु बड़े तकिये का निषेध किया गया है। සබ්බචම්මපටික්ඛෙපාදිකථා सभी प्रकार के चमड़ों के निषेध आदि की कथा। 255. දීපිච්ඡාපොති දීපිපොතකො. ඔගුම්ඵියන්තීති භිත්තිදණ්ඩකාදීසු වෙඨෙත්වා බන්ධන්ති. २५५. "दीपिच्छाप" का अर्थ है तेंदुए का बच्चा। "लपेटे जाते हैं" का अर्थ है दीवार के डंडों (कड़ियों) आदि में लपेटकर बाँधते हैं। 256. අභිනිසීදිතුන්ති අභිනිස්සාය නිසීදිතුං; අපස්සයං කත්වා නිසීදිතුන්ති අත්ථො. ගිලානෙන භික්ඛුනා සඋපාහනෙනාති එත්ථ ගිලානො නාම යො න සක්කොති අනුපාහනො ගාමං පවිසිතුං. २५६. "बैठने के लिए" का अर्थ है सहारा लेकर बैठना; सहारा बनाकर बैठना। "जूते सहित बीमार भिक्षु द्वारा" यहाँ "बीमार" वह है जो बिना जूते के गाँव में प्रवेश करने में समर्थ नहीं है। 257. කුරරඝරෙති එවංනාමකෙ නගරෙ; එතෙනස්ස ගොචරගාමො වුත්තො. පපතකෙ පබ්බතෙති පපතනාමකෙ පබ්බතෙ; එතෙනස්ස නිවාසනට්ඨානං වුත්තං. සොණොති තස්ස නාමං. කොටිඅග්ඝනකං පන කණ්ණපිළන්ධනකං ධාරෙති, තස්මා ‘‘කුටිකණ්ණො’’ති වුච්චති; කොටිකණ්ණොති අත්ථො. පාසාදිකන්ති පසාදජනකං. පසාදනීයන්ති ඉදං තස්සෙව අත්ථවෙවචනං. උත්තමදමථසමථන්ති උත්තමං දමථඤ්ච සමථඤ්ච පඤ්ඤඤ්ච සමාධිඤ්ච කායූපසමඤ්ච චිත්තූපසමඤ්චාතිපි අත්ථො. දන්තන්ති සබ්බෙසං විසූකායිකවිප්ඵන්දිතානං උපච්ඡින්නත්තා දන්තං; ඛීණකිලෙසන්ති අත්ථො. ගුත්තන්ති සංවරගුත්තියා ගුත්තං. සන්තින්ද්රියන්ති යතින්ද්රියං. නාගන්ති ආගුවිරහිතං. තිණ්ණං මෙ වස්සානං අච්චයෙනාති මම පබ්බජ්ජාදිවසතො පට්ඨාය තිණ්ණං වස්සානං අච්චයෙන. උපසම්පදං අලත්ථන්ති අහං උපසම්පදං අලභිං. කණ්හුත්තරාති කණ්හමත්තිකුත්තරා; උපරි වඩ්ඪිතකණ්හමත්තිකාති අත්ථො. ගොකණ්ටකහතාති ගුන්නං ඛුරෙහි අක්කන්තභූමිතො සමුට්ඨිතෙහි ගොකණ්ටකෙහි උපහතා. තෙ කිර ගොකණ්ටකෙ එකපටලිකා උපාහනා රක්ඛිතුං න සක්කොන්ති; එවං ඛරා හොන්ති. එරගූ, මොරගූ, මජ්ජාරූ, ජන්තූති ඉමා චතස්සොපි තිණජාතියො; එතෙහි කටසාරකෙ ච තට්ටිකායො ච කරොන්ති. එත්ථ එරගූති [Pg.371] එරකතිණං; තං ඔළාරිකං. මොරගූතිණං තම්බසීසං මුදුකං සුඛසම්ඵස්සං, තෙන කතතට්ටිකා නිපජ්ජිත්වා වුට්ඨිතමත්තෙ පුන උද්ධුමාතා හුත්වා තිට්ඨති. මජ්ජාරුනා සාටකෙපි කරොන්ති. ජන්තුස්ස මණිසදිසො වණ්ණො හොති. සෙනාසනං පඤ්ඤපෙසීති භිසිං වා කටසාරකං වා පඤ්ඤපෙසි; පඤ්ඤපෙත්වා ච පන සොණස්ස ආරොචෙති – ‘‘ආවුසො සත්ථා තයා සද්ධිං එකාවාසෙ වසිතුකාමො, ගන්ධකුටියංයෙව තෙ සෙනාසනං පඤ්ඤත්ත’’න්ති. २५७. "कुररघर में" का अर्थ है इस नाम के नगर में; इससे उनके गोचर-ग्राम (भिक्षाटन के गाँव) का उल्लेख किया गया है। "पपातक पर्वत पर" का अर्थ है पपात नामक पर्वत पर; इससे उनके निवास स्थान का उल्लेख किया गया है। "सोण" उनका नाम है। वे एक करोड़ मूल्य का कर्ण-आभूषण पहनते थे, इसलिए उन्हें "कुटिकण्ण" (करोड़-कर्ण) कहा जाता है। "प्रासादिक" का अर्थ है प्रसन्नता उत्पन्न करने वाला। "प्रसादनीय" इसी का पर्यायवाची शब्द है। "उत्तम दमथ-शमथ" का अर्थ है उत्तम दमन, शम, प्रज्ञा, समाधि, कायिक शांति और मानसिक शांति। "दांत" (दमित) का अर्थ है सभी प्रकार की चंचलता और विक्षेपों के कट जाने के कारण दमित; अर्थात् क्षीणास्त्रव (जिसके क्लेश नष्ट हो गए हों)। "गुप्त" का अर्थ है संवर-गुप्ति से सुरक्षित। "शांतेंद्रिय" का अर्थ है संयमित इंद्रियों वाला। "नाग" का अर्थ है पापों से रहित। "मेरे तीन वर्षों के बीतने पर" का अर्थ है मेरे प्रव्रज्या के दिन से तीन वर्ष बीतने पर। "उपसंपदा प्राप्त की" का अर्थ है मैंने उपसंपदा प्राप्त की। "कृष्णोत्तरा" का अर्थ है ऊपर काली मिट्टी वाली; अर्थात् ऊपर बढ़ी हुई काली मिट्टी वाली। "गो-कंटक-हत" का अर्थ है गायों के खुरों से रौंदी गई भूमि से उभरे हुए गो-कंटकों (कठोर मिट्टी के ढेलों या काँटों) से क्षतिग्रस्त। कहते हैं कि उन गो-कंटकों से एक परत वाले जूते रक्षा नहीं कर सकते; वे इतने कठोर होते हैं। एरगु, मोरगु, मज्जारु, जंतु—ये चारों घास की जातियाँ हैं; इनसे चटाइयाँ और आसन बनाए जाते हैं। यहाँ "एरगु" एरका घास है; वह खुरदरी होती है। "मोरगु" घास लाल फुनगी वाली, कोमल और सुखद स्पर्श वाली होती है; उससे बनी चटाई पर लेटने के बाद उठने पर वह पुनः फूलकर ऊपर उठ जाती है। "मज्जारु" से वस्त्र भी बनाते हैं। "जंतु" का रंग मणि के समान होता है। "सेनासन बिछाया" का अर्थ है गद्दी या चटाई बिछाई; और बिछाने के बाद सोण से कहते हैं— "आयुष्मान्! शास्ता आपके साथ एक ही आवास में विहार करना चाहते हैं, गंधकुटी में ही आपके लिए सेनासन बिछा दिया गया है।" 258. අයං ඛ්වස්ස කාලොති අයං ඛො කාලො භවෙය්ය. පරිදස්සීති පරිදස්සෙසි. ‘‘ඉදඤ්චිදඤ්ච වදෙය්යාසීති යං මෙ උපජ්ඣායො ජානාපෙසි, තස්ස අයං කාලො භවෙය්ය, හන්ද දානි ආරොචෙමි තං සාසන’’න්ති අයමෙත්ථ අධිප්පායො. २५८. 'अयं ख्वस्स कालो' का अर्थ है कि यह उसके लिए समय हो सकता है। 'परिदस्सी' का अर्थ है 'दिखाया'। 'यह और वह कहना चाहिए' - जो मेरे उपाध्याय ने मुझे सिखाया था, उसके लिए यह समय हो सकता है, अब मैं वह संदेश देता हूँ - यहाँ यही अभिप्राय है। 259. විනයධරපඤ්චමෙනාති අනුස්සාවනාචරියපඤ්චමෙන. අනුජානාමි භික්ඛවෙ සබ්බපච්චන්තිමෙසු ජනපදෙසු ගුණඞ්ගුණූපාහනන්ති එත්ථ මනුස්සචම්මං ඨපෙත්වා යෙන කෙනචි චම්මෙන උපාහනා වට්ටති. උපාහනකොසකසත්ථකොසකකුඤ්චිකකොසකෙසුපි එසෙව නයො. චම්මානි අත්ථරණානීති එත්ථ පන යංකිඤ්චි එළකචම්මං අජචම්මඤ්ච අත්ථරිත්වා නිපජ්ජිතුං වා නිසීදිතුං වා වට්ටති. මිගචම්මෙ එණීමිගො වාතමිගො පසදමිගො කුරඞ්ගමිගො මිගමාතුකො රොහිතමිගොති එතෙසංයෙව චම්මානි වට්ටන්ති. අඤ්ඤෙසං පන – २५९. 'विनयधरपञ्चमेन' का अर्थ है अनुसावन आचार्य सहित पाँच। 'भिक्षुओं, मैं सभी सीमावर्ती जनपदों में कई परतों वाले जूतों की अनुमति देता हूँ' - यहाँ मनुष्य की खाल को छोड़कर किसी भी खाल से बने जूते कल्प्य हैं। जूतों के थैले, तलवार के म्यान और चाबी के थैलों के विषय में भी यही नियम है। 'चम्मानि अत्थरणानि' (खाल के बिछावन) के विषय में, किसी भी भेड़ या बकरी की खाल बिछाकर लेटना या बैठना कल्प्य है। मृगों की खाल में - एणी मृग, वात मृग, पसद मृग, कुरंग मृग, मृगमातृक, और रोहित मृग - केवल इन्हीं मृगों की खाल कल्प्य है। दूसरों की (नहीं) - මක්කටො කාළසීහො ච, සරභො කදලීමිගො; යෙ ච වාළමිගා කෙචි, තෙසං චම්මං න වට්ටති. बंदर, काला सिंह (लंगूर), सरभ, कदली मृग, और जो भी हिंसक पशु (व्याल मृग) हैं, उनकी खाल कल्प्य नहीं है। තත්ථ වාළමිගාති සීහබ්යග්ඝඅච්ඡතරච්ඡා; න කෙවලඤ්ච එතෙසංයෙව, යෙසං පන චම්මං වට්ටතීති වුත්තං, තෙ ඨපෙත්වා අවසෙසා අන්තමසො ගොමහිංසසසබිළාරාදයොපි සබ්බෙ ඉමස්මිං අත්ථෙ වාළමිගාත්වෙව වෙදිතබ්බා. එතෙසඤ්හි සබ්බෙසං චම්මං න වට්ටති. න තාව තං ගණනූපගං යාව න හත්ථං ගච්ඡතීති යාව ආහරිත්වා වා න දින්නං, තුම්හාකං භන්තෙ චීවරං උප්පන්නන්ති පහිණිත්වා වා නාරොචිතං, තාව ගණනං න උපෙති. සචෙ අනධිට්ඨිතං, වට්ටති; අධිට්ඨිතඤ්ච ගණනං න උපෙතීති අත්ථො. යදා පන ආනෙත්වා වා දින්නං හොති, උප්පන්නන්ති වා සුතං, තතො පට්ඨාය දසාහමෙව පරිහාරං ලභතීති. वहाँ 'व्याल मृग' का अर्थ है सिंह, व्याघ्र, भालू और लकड़बग्घा। केवल इन्हीं की नहीं, बल्कि जिनकी खाल कल्प्य कही गई है, उन्हें छोड़कर शेष सभी, यहाँ तक कि गाय, भैंस, खरगोश, बिल्ली आदि भी इस संदर्भ में 'व्याल मृग' ही समझने चाहिए। इन सभी की खाल कल्प्य नहीं है। 'जब तक वह हाथ में न आ जाए, तब तक वह गणना में नहीं आता' - इसका अर्थ है कि जब तक लाकर न दिया जाए या 'भन्ते, आपके लिए चीवर उत्पन्न हुआ है' ऐसा कहकर सूचित न किया जाए, तब तक वह गणना में नहीं आता। यदि वह अधिष्ठित नहीं है, तो कल्प्य है; और अधिष्ठित चीवर गणना में नहीं आता, यह अर्थ है। लेकिन जब लाकर दिया जाता है या 'उत्पन्न हुआ है' ऐसा सुना जाता है, तब से केवल दस दिन तक ही उसे रखने की अनुमति मिलती है। චම්මක්ඛන්ධකවණ්ණනා නිට්ඨිතා. चर्मस्कन्धक की व्याख्या समाप्त हुई। 6. භෙසජ්ජක්ඛන්ධකං ६. भेषज्जस्कन्धक (औषधि स्कन्धक) පඤ්චභෙසජ්ජාදිකථා पाँच औषधियों आदि की कथा 260. භෙසජ්ජක්ඛන්ධකෙ [Pg.372] – සාරදිකෙන ආබාධෙනාති සරදකාලෙ උප්පන්නෙන පිත්තාබාධෙන, තස්මිඤ්හි කාලෙ වස්සොදකෙනපි තෙමෙන්ති, කද්දමම්පි මද්දන්ති, අන්තරන්තරා ආතපොපි ඛරො හොති, තෙන තෙසං පිත්තං කොට්ඨබ්භන්තරගතං හොති. ආහාරත්ථඤ්ච ඵරෙය්යාති ආහාරත්ථං සාධෙය්ය. २६०. भेषज्जस्कन्धक में - 'सारदिकेन आबाधेन' का अर्थ है शरद ऋतु में उत्पन्न पित्त का रोग। उस समय वर्षा के जल से भी भीगते हैं, कीचड़ में भी चलते हैं, और बीच-बीच में धूप भी तेज होती है, जिससे उनका पित्त कोष्ठ (पेट) के भीतर चला जाता है। 'आहारत्थञ्च फरेय्या' का अर्थ है आहार के कार्य को सिद्ध करे। 261. නච්ඡාදෙන්තීති න ජිරන්ති, න වාතරොගං පටිප්පස්සම්භෙතුං සක්කොන්ති. සෙනෙසිතානීති සිනිද්ධානි. භත්තාච්ඡාදකෙනාති භත්තං අරොචිකෙන. २६१. 'नच्छादेन्ति' का अर्थ है पचते नहीं हैं, या वात रोग को शांत करने में समर्थ नहीं होते। 'सेनेसितानि' का अर्थ है स्निग्ध (चिकने)। 'भत्ताच्छादकेन' का अर्थ है अरुचि उत्पन्न करने वाली औषधि के कारण भोजन (न भाना)। 262. අච්ඡවසන්තිආදීසු නිස්සග්ගියවණ්ණනායං වුත්තනයෙනෙව විනිච්ඡයො වෙදිතබ්බො. කාලෙ පටිග්ගහිතන්තිආදීසු මජ්ඣන්හිකෙ අවීතිවත්තෙ පටිග්ගහෙත්වා පචිත්වා පරිස්සාවෙත්වා චාති අත්ථො. තෙලපරිභොගෙන පරිභුඤ්ජිතුන්ති සත්තාහකාලිකතෙලපරිභොගෙන පරිභුඤ්ජිතුං. २६२. 'अच्छवसन्ति' आदि में निस्सग्गिय की व्याख्या में बताए गए तरीके से ही निर्णय समझना चाहिए। 'काले पटिग्गहितं' आदि में दोपहर बीतने से पहले ग्रहण करके, पकाकर और छानकर - यह अर्थ है। 'तेलपरिभोगेन परिभुञ्जितुं' का अर्थ है सात दिन तक रखी जाने वाली (सत्ताहकालिक) तेल के उपभोग की विधि से उपभोग करना। 263. මූලභෙසජ්ජාදි විනිච්ඡයොපි ඛුද්දකවණ්ණනායං වුත්තොයෙව. තස්මා ඉධ යං යං පුබ්බෙ අවුත්තං තං තදෙව වණ්ණයිස්සාම. වචත්තන්ති සෙතවචං. නිසදං නිසදපොතකන්ති පිසනසිලා ච පිසනපොතො ච. ඵග්ගවන්ති ලතාජාති. නත්තමාලන්ති කරඤ්ජං. හිඞ්ගුහිඞ්ගුජතුහිඞ්ගුසිපාටිකා හිඞ්ගුජාතියොයෙව. තකතකපත්තිතකපණ්ණියො ලාඛාජාතියො. २६३. मूल औषधियों आदि का निर्णय भी खुद्दक (विनय) की व्याख्या में कहा ही गया है। इसलिए यहाँ जो पहले नहीं कहा गया है, केवल उसी की व्याख्या करेंगे। 'वचत्तं' का अर्थ है सफेद वचा। 'निसदं निसदपोतकं' का अर्थ है पीसने वाली शिला और पीसने वाला पत्थर (लोढ़ा)। 'फग्गवं' एक प्रकार की लता है। 'नत्तमालं' का अर्थ है करंज। हींग, हींगुजतु, और हींगुसिपाटिका - ये हींग की ही किस्में हैं। टकतक, पत्तितक, और पण्णिय - ये लाख की किस्में हैं। සාමුද්දන්ති සමුද්දතීරෙ වාලුකා විය සන්තිට්ඨති. කාළලොණන්ති පකතිලොණං. සින්ධවන්ති සෙතවණ්ණං පබ්බතෙ උට්ඨහති. උබ්භිදන්ති භූමිතො අඞ්කුරං උට්ඨහති. බිලන්ති දබ්බසම්භාරෙහි සද්ධිං පචිතං, තං රත්තවණ්ණං. 'सामुद्दं' वह नमक है जो समुद्र के किनारे बालू की तरह जमा होता है। 'काळलोणं' प्राकृतिक नमक है। 'सिन्धवं' वह है जो सफेद रंग का होकर सिन्धु पर्वत पर उत्पन्न होता है। 'उब्भिदं' वह है जो पृथ्वी से अंकुर की तरह निकलता है। 'बिलं' वह नमक है जो अन्य द्रव्यों के साथ पकाया जाता है, वह लाल रंग का होता है। 264-6. කායො වා දුග්ගන්ධොති කස්සචි අස්සාදීනං විය කායගන්ධො හොති, තස්සාපි සිරීසකොසුම්බාදිචුණ්ණානි වා ගන්ධචුණ්ණානි වා සබ්බානි වට්ටන්ති. ඡකණන්ති ගොමයං. රජනනිප්පක්කන්ති රජනකසටං. පාකතිකචුණ්ණම්පි කොට්ටෙත්වා උදකෙන තෙමෙත්වා න්හායිතුං වට්ටති; එතම්පි රජනනිප්පක්කසඞ්ඛෙපමෙව ගච්ඡති. २६४-६. 'कायो वा दुग्गन्धो' का अर्थ है किसी का शरीर घोड़े आदि की गंध की तरह दुर्गंधयुक्त होता है, उसके लिए भी शिरीष, कुसुम्भ आदि का चूर्ण या कोई भी सुगंधित चूर्ण कल्प्य है। 'छकणं' का अर्थ है गोबर। 'रजननिप्पक्कं' का अर्थ है रंजक (रंग) का उबला हुआ अवशेष। साधारण चूर्ण को भी कूटकर और पानी से भिगोकर स्नान करना कल्प्य है; यह भी उबले हुए रंजक के अंतर्गत ही आता है। ආමකමංසඤ්ච [Pg.373] ඛාදි ආමකලොහිතඤ්ච පිවීති න තං භික්ඛු ඛාදි න පිවි, අමනුස්සො ඛාදිත්වා ච පිවිත්වා ච පක්කන්තො, තෙන වුත්තං – ‘‘තස්ස සො අමනුස්සිකාබාධො පටිප්පස්සම්භී’’ති. 'कच्चा मांस खाया और कच्चा रक्त पिया' - वह भिक्षु ने नहीं खाया और न ही पिया, बल्कि अमनुष्य ने खाकर और पीकर प्रस्थान किया, इसलिए कहा गया है - 'उसका वह अमनुष्य-जनित रोग शांत हो गया'। අඤ්ජනන්ති සබ්බසඞ්ගාහිකවචනමෙතං. කාළඤ්ජනන්ති එකා අඤ්ජනජාති. රසඤ්ජනං නානාසම්භාරෙහි කතං. සොතඤ්ජනන්ති නදීසොතාදීසු උප්පජ්ජනකං අඤ්ජනං. ගෙරුකො නාම සුවණ්ණගෙරුකො. කපල්ලන්ති දීපසිඛතො ගහිතමසි. අඤ්ජනූපපිංසනෙහීති අඤ්ජනෙන සද්ධිං එකතො පිංසිතබ්බෙහි, න හි කිඤ්චි අඤ්ඤනූපපිංසනං න වට්ටති. චන්දනන්ති ලොහිතචන්දනාදිකං යංකිඤ්චි. තගරාදීනි පාකටානි, අඤ්ඤානිපි නීලුප්පලාදීනි වට්ටන්තියෙව. 'अञ्जनं' यह शब्द सभी प्रकार के अंजन का संग्रहवाचक शब्द है। 'काळाञ्जनं' अंजन का एक प्रकार है। 'रसाञ्जनं' विभिन्न सामग्रियों से बनाया जाता है। 'सोतञ्जनं' वह अंजन है जो नदियों के स्रोतों आदि में उत्पन्न होता है। 'गेरुक' का अर्थ है स्वर्ण-गेरू। 'कपालं' दीपक की लौ से प्राप्त कालिख है। 'अञ्जनूपपिंसनेहि' का अर्थ है अंजन के साथ एक साथ पीसने योग्य औषधियों के साथ; कोई भी अंजन के साथ पीसने योग्य औषधि अकल्प्य नहीं है, वह कल्प्य ही है। 'चन्दनं' का अर्थ है लाल चंदन आदि कोई भी चंदन। तगर आदि प्रसिद्ध हैं। अन्य भी, जैसे नीलकमल आदि, कल्प्य ही हैं। අට්ඨිමයන්ති මනුස්සට්ඨිං ඨපෙත්වා අවසෙසඅට්ඨිමයං. දන්තමයන්ති හත්ථිදන්තාදිසබ්බදන්තමයං. විසාණමයෙපි අකප්පියං නාම නත්ථි, නළමයාදයො එකන්තකප්පියායෙව. සලාකට්ඨානියන්ති යත්ථ සලාකං ඔදහන්ති, තං සුසිරදණ්ඩකං වා ථවිකං වා අනුජානාමීති අත්ථො. අංසබද්ධකොති අඤ්ජනිත්ථවිකාය අංසබද්ධකො. යමකනත්ථුකරණින්ති සමසොතාහි ද්වීහි පනාළිකාහි එකං නත්ථුකරණිං. 'अट्ठिमयं' का अर्थ है मनुष्य की हड्डी को छोड़कर शेष हड्डियों से बना। 'दन्तमयं' का अर्थ है हाथी के दांत आदि सभी प्रकार के दांतों से बना। सींग से बने पात्र में भी कुछ अकल्प्य नहीं है। नरकुल आदि से बने पात्र एकांततः कल्प्य ही हैं। 'सलाकट्ठानीयं' का अर्थ है जहाँ शलाका रखी जाती है, वह खोखली नली या थैली - इसकी मैं अनुमति देता हूँ, यह अर्थ है। 'अंसबद्धको' का अर्थ है अंजन की थैली को कंधे पर बाँधने वाली डोरी। 'यमकनत्थुकरणिं' का अर्थ है दो नलियों वाली एक नासिका-यंत्र जिससे दोनों नथुनों में समान रूप से औषधि जाए। 267. අනුජානාමි භික්ඛවෙ තෙලපාකන්ති යංකිඤ්චි භෙසජ්ජපක්ඛිත්තං සබ්බං අනුඤ්ඤාතමෙව හොති. අතිපක්ඛිත්තමජ්ජානීති අතිවිය ඛිත්තමජ්ජානි; බහුං මජ්ජං පක්ඛිපිත්වා යොජිතානීති අත්ථො. २६७. 'भिक्षुओं, मैं तेल-पाक की अनुमति देता हूँ' - इसमें जो भी औषधि डाली गई हो, वह सब अनुमत ही है। 'अतिपक्खित्तमज्जानि' का अर्थ है जिसमें बहुत अधिक मद्य डाली गई हो; बहुत अधिक मद्य डालकर तैयार किया गया - यह अर्थ है। අඞ්ගවාතොති හත්ථපාදෙ වාතො. සම්භාරසෙදන්ති නානාවිධපණ්ණභඞ්ගසෙදං. මහාසෙදන්ති මහන්තං සෙදං; පොරිසප්පමාණං ආවාටං අඞ්ගාරානං පූරෙත්වා පංසුවාලිකාදීහි පිදහිත්වා තත්ථ නානාවිධානි වාතහරණපණ්ණානි සන්ථරිත්වා තෙලමක්ඛිතෙන ගත්තෙන තත්ථ නිපජ්ජිත්වා සම්පරිවත්තන්තෙන සරීරං සෙදෙතුං අනුජානාමීති අත්ථො. භඞ්ගොදකන්ති නානාපණ්ණභඞ්ගකුථිතං උදකං; තෙහි පණ්ණෙහි ච උදකෙන ච සිඤ්චිත්වා සිඤ්චිත්වා සෙදෙතබ්බො. උදකකොට්ඨකන්ති උදකකොට්ඨෙ චාටිං වා දොණිං වා උණ්හොදකස්ස පූරෙත්වා තත්ථ පවිසිත්වා සෙදකම්මකරණං අනුජානාමීති අත්ථො. 'अङ्गवातो' का अर्थ है हाथ-पैरों में वायु का विकार। 'सम्भारसेद' का अर्थ है विभिन्न प्रकार के पत्तों के टुकड़ों से पसीना निकालना। 'महासेद' का अर्थ है बड़ा स्वेद (पसीना निकालना); पुरुष के प्रमाण के बराबर गड्ढे को अंगारों से भरकर, धूल-बालू आदि से ढँककर, वहाँ विभिन्न प्रकार के वायु-नाशक पत्तों को बिछाकर, तेल लगे शरीर से वहाँ लेटकर और करवटें बदलकर शरीर से पसीना निकालने की अनुमति देता हूँ - यह अर्थ है। 'भङ्गोदक' का अर्थ है विभिन्न पत्तों के टुकड़ों के साथ उबाला गया जल; उन पत्तों और उस जल से बार-बार सींचकर पसीना निकालना चाहिए। 'उदककोट्ठक' का अर्थ है जल-कोष्ठ (स्नानघर) में मटके या द्रोणी (टब) को गर्म जल से भरकर, उसमें प्रवेश कर स्वेद-कर्म (पसीना निकालने की क्रिया) करने की अनुमति देता हूँ - यह अर्थ है। පබ්බවාතො [Pg.374] හොතීති පබ්බෙ පබ්බෙ වාතො විජ්ඣති. ලොහිතං මොචෙතුන්ති සත්ථකෙන ලොහිතං මොචෙතුං. පජ්ජං අභිසඞ්ඛරිතුන්ති යෙන ඵාලිතපාදා පාකතිකා හොන්ති; තං නාළිකෙරාදීසු නානාභෙසජ්ජානි පක්ඛිපිත්වා පජ්ජං අභිසඞ්ඛරිතුං; පාදානං සප්පායභෙසජ්ජං පචිතුන්ති අත්ථො. තිලකක්කෙන අත්ථොති පිට්ඨෙහි තිලෙහි අත්ථො. කබළිකන්ති වණමුඛෙ සත්තුපිණ්ඩං පක්ඛිපිතුං. සාසපකුඩ්ඩෙනාති සාසපපිට්ඨෙන. වඩ්ඪමංසන්ති අධිකමංසං ආණි විය උට්ඨහති. ලොණසක්ඛරිකාය ඡින්දිතුන්ති ඛුරෙන ඡින්දිතුං. විකාසිකන්ති තෙලරුන්ධනපිලොතිකං. සබ්බං වණපටිකම්මන්ති යංකිඤ්චි වණපරිකම්මං නාම අත්ථි; සබ්බං අනුජානාමීති අත්ථො. 'पब्बवातो होति' का अर्थ है प्रत्येक जोड़ (पर्व) में वायु का चुभना। 'लोहितं मोचेतुं' का अर्थ है शस्त्र (चाकू) से रक्त निकालना। 'पज्जं अभिसङ्खरितुं' का अर्थ है जिससे फटे हुए पैर सामान्य हो जाएँ; नारियल आदि में विभिन्न औषधियाँ डालकर उस पद-भेषज (पैर की दवा) को तैयार करना; पैरों के लिए उपयुक्त औषधि पकाने का अर्थ है। 'तिलकक्केन अत्थो' का अर्थ है पिसे हुए तिल की आवश्यकता। 'कवळिकं' का अर्थ है घाव के मुख पर सत्तू का पिण्ड रखना। 'सासपकुड्डेन' का अर्थ है सरसों के चूर्ण से। 'वड्ढमंसं' का अर्थ है अतिरिक्त मांस जो कील (मेख) की तरह उभर आता है। 'लोणसक्खरिकाय छिन्दितुं' का अर्थ है छुरे से काटना। 'विकासिकं' का अर्थ है तेल को रोकने वाली पट्टी (कपड़ा)। 'सब्बं वणपटिकम्मं' का अर्थ है जो कुछ भी घाव की चिकित्सा (व्रण-परिकर्म) कहलाती है; उस सबकी अनुमति देता हूँ - यह अर्थ है। 268. සාමං ගහෙත්වාති ඉදං න කෙවලං සප්පදට්ඨස්සෙව, අඤ්ඤස්මිම්පි දට්ඨවිසෙ සති සාමං ගහෙත්වා පරිභුඤ්ජිතබ්බං; අඤ්ඤෙසු පන කාරණෙසු පටිග්ගහිතමෙව වට්ටති. කතො න පුන පටිග්ගහෙතබ්බොති සචෙ භූමිප්පත්තො, පටිග්ගහෙතබ්බො; අප්පත්තං පන ගහෙතුං වට්ටති. २६८. 'सामं गहेत्वा' का अर्थ है कि यह (महाविकट औषधि) न केवल साँप के काटे हुए के लिए है, बल्कि अन्य किसी के काटने से विष होने पर भी स्वयं लेकर सेवन करना चाहिए; किन्तु अन्य कारणों में ग्रहण की हुई (दी गई) ही कल्प्य है। 'कतो न पुन पटिग्गहेतब्बो' का अर्थ है कि यदि वह भूमि पर गिर गया है, तो उसे ग्रहण करना चाहिए; किन्तु यदि भूमि पर नहीं पहुँचा है, तो स्वयं लेना कल्प्य है। 269. ඝරදින්නකාබාධොති වසීකරණපානකසමුට්ඨිතරොගො. සීතාලොළින්ති නඞ්ගලෙන කසන්තස්ස ඵාලෙ ලග්ගමත්තිකං උදකෙන ආලොළෙත්වා පායෙතුං අනුජානාමීති අත්ථො. २६९. 'घरदिन्नकाबाधो' का अर्थ है वशीकरण के लिए पिलाए गए पेय से उत्पन्न रोग। 'सीतालोळिं' का अर्थ है हल से जोतते समय हल के फल (फाळ) में लगी मिट्टी को जल में घोलकर पिलाने की अनुमति देता हूँ - यह अर्थ है। දුට්ඨගහණිකොති විපන්නගහණිකො; කිච්ඡෙන උච්චාරො නික්ඛමතීති අත්ථො. ආමිසඛාරන්ති සුක්ඛොදනං ඣාපෙත්වා තාය ඡාරිකාය පග්ඝරිතං ඛාරොදකං. මුත්තහරීතකන්ති ගොමුත්තපරිභාවිතං හරීතකං. අභිසන්නකායොති උස්සන්නදොසකායො. අච්ඡකඤ්ජියන්ති තණ්ඩුලොදකමණ්ඩො. අකටයුසන්ති අසිනිද්ධො මුග්ගපචිතපානීයො. කටාකටන්ති සොව ධොතසිනිද්ධො. පටිච්ඡාදනීයෙනාති මංසරසෙන. 'दुट्ठगहणिको' का अर्थ है बिगड़ी हुई ग्रहणी (पाचन शक्ति) वाला; कठिनाई से मल निकलता है - यह अर्थ है। 'आमिसखारं' का अर्थ है सूखे भात को जलाकर उस राख से टपकाया गया क्षार-जल। 'मुत्तहरीतकं' का अर्थ है गोमूत्र में भिगोई हुई हरड़। 'अभिसन्नकायो' का अर्थ है दोषों की अधिकता वाला शरीर। 'अच्छकञ्जियं' का अर्थ है चावल के धोवन का माँड। 'अकटयूसं' का अर्थ है बिना चिकनाई वाला मूँग का उबला हुआ पानी। 'कटाकटं' का अर्थ है वही धोया हुआ और चिकनाई युक्त। 'पटिच्छादनीयेन' का अर्थ है मांस के रस से। ගුළාදිඅනුජානනකථා गुड़ आदि की अनुमति का कथन। 272. සචෙ භික්ඛවෙ පක්කාපි මුග්ගා ජායන්තීති පක්කා මුග්ගා සචෙපි ජායන්ති, යථාසුඛං පරිභුඤ්ජිතබ්බා. පක්කත්තා හි තෙ කප්පියා එව. २७२. "हे भिक्षुओं! यदि पकाए हुए मूँग भी उग जाते हैं", तो पकाए हुए मूँग यदि उग भी जाएँ, तो उन्हें इच्छानुसार सेवन करना चाहिए। क्योंकि पका हुआ होने के कारण वे कल्प्य ही हैं। 274. අන්තොවුත්ථන්ති [Pg.375] අකප්පියකුටියං වුත්ථං. සාමං පක්කන්ති එත්ථ යංකිඤ්චි ආමිසං භික්ඛුනො පචිතුං න වට්ටති. සචෙපිස්ස උණ්හයාගුයා සුලසිපණ්ණානි වා සිඞ්ගිවෙරං වා ලොණං වා පක්ඛිපන්ති, තම්පි චාලෙතුං න වට්ටති, ‘‘යාගුං නිබ්බාපෙමී’’ති පන චාලෙතුං වට්ටති. උත්තණ්ඩුලභත්තං ලභිත්වාපි පිදහිතුං න වට්ටති. සචෙ පන මනුස්සා පිදහිත්වාව දෙන්ති, වට්ටති; ‘‘භත්තං වා මා නිබ්බායතූ’’ති පිදහිතුං වට්ටති. ඛීරතක්කාදීසු පන සකිං කුථිතෙසු අග්ගිං දාතුං වට්ටති, පුනපාකස්ස අනුඤ්ඤාතත්තා. උක්කපිණ්ඩකාපි ඛාදන්තීති බිළාමූසිකගොධාමඞ්ගුසා ඛාදන්ති. දමකාති විඝාසාදා. २७४. 'अन्तोवुत्थं' का अर्थ है अकल्प्य कुटी में रखा हुआ। 'सामं पक्कं' के विषय में - यहाँ भिक्षु को कोई भी आमिष (खाद्य पदार्थ) पकाना कल्प्य नहीं है। यदि उसके लिए गर्म यवागू में तुलसी के पत्ते, अदरक या नमक डालते हैं, तो उसे चलाना (पकाने के लिए) कल्प्य नहीं है, किन्तु "यवागू को ठंडा कर रहा हूँ" - ऐसा सोचकर चलाना कल्प्य है। अधपका भात मिलने पर भी पात्र को ढँकना कल्प्य नहीं है। किन्तु यदि मनुष्य ढँककर ही देते हैं, तो कल्प्य है; अथवा "भात ठंडा न हो जाए" - ऐसा सोचकर ढँकना कल्प्य है। दूध-छाछ आदि के एक बार उबल जाने पर पुनः आग देना कल्प्य है, क्योंकि दोबारा पकाने की अनुमति दी गई है। 'उक्कपिण्डकापि खादन्ति' का अर्थ है बिल्ली, चूहे, गोह और नेवले खाते हैं। 'दमका' का अर्थ है जूठन खाने वाले। 276. තතො නීහටන්ති යත්ථ නිමන්තිතා භුඤ්ජන්ති, තතො නීහටං. २७६. 'ततो नीहटं' का अर्थ है जहाँ निमंत्रित होकर भोजन करते हैं, वहाँ से बाहर लाया गया। 278. වනට්ඨං පොක්ඛරට්ඨන්ති වනෙ චෙව පදුමිනිගච්ඡෙ ච ජාතං. අබීජන්ති තරුණඵලං, යස්ස බීජං න අඞ්කුරං ජනෙති. නිබ්බට්ටබීජන්ති බීජං නිබ්බට්ටෙත්වා අපනෙත්වා පරිභුඤ්ජිතබ්බකං අම්බපනසාදි. २७८. 'वनट्ठं पोक्खरट्ठं' का अर्थ है वन में और कमलिनी के समूह में उत्पन्न। 'अबीजं' का अर्थ है कोमल फल, जिसका बीज अंकुर पैदा नहीं करता। 'निब्बट्टबीजं' का अर्थ है बीज को निकालकर या हटाकर सेवन करने योग्य आम, कटहल आदि। 279. දුරොපයො වණොති දුක්ඛෙන රුහති, දුක්ඛෙන පාකතිකො හොතීති අත්ථො. දුප්පරිහාරං සත්ථන්ති සම්බාධෙ දුක්ඛෙන සත්ථං පරිහරෙය්යං. සත්ථකම්මං වා වත්ථිකම්මං වාති යථාපරිච්ඡින්නෙ ඔකාසෙ යෙන කෙනචි සත්ථෙන වා සූචියා වා කණ්ටකෙන වා සත්තිකාය වා පාසාණසක්ඛලිකාය වා නඛෙන වා ඡින්දනං වා ඵාලනං වා විජ්ඣනං වා ලෙඛනං වා න කාතබ්බං; සබ්බඤ්හෙතං සත්ථකම්මමෙව හොති. යෙන කෙනචි පන චම්මෙන වා වත්ථෙන වා වත්ථිපීළනම්පි න කාතබ්බං; සබ්බඤ්හෙතං වත්ථිකම්මමෙව හොති. එත්ථ ච සම්බාධස්ස සාමන්තා ද්වඞ්ගුලාති ඉදං සත්ථකම්මංයෙව සන්ධාය වුත්තං. වත්ථිකම්මං පන සම්බාධෙයෙව පටික්ඛිත්තං. තත්ථ පන ඛාරං ආදාතුං යෙන කෙනචි රජ්ජුකෙන වා බන්ධිතුං වට්ටති. යදි තෙන ඡිජ්ජති, සුච්ඡින්නං. අණ්ඩවුඩ්ඪිරොගෙපි සත්ථකම්මං න වට්ටති, තස්මා අණ්ඩං ඵාලෙත්වා බීජානි උද්ධරිත්වා ‘‘අරොගං කරිස්සාමී’’ති න කත්තබ්බං. අග්ගිතාපනභෙසජ්ජාලිම්පනෙසු පන පටික්ඛෙපො නත්ථි. වච්චමග්ගෙ භෙසජ්ජමක්ඛිතා ආදානවට්ටි වා වෙළුනාළිකා වා වට්ටති, යාය ඛාරකම්මං වා කරොන්ති, තෙලං වා පවෙසෙන්ති. २७९. 'दुरोपयो वणो' का अर्थ है जो कठिनाई से भरता है, कठिनाई से सामान्य होता है - यह अर्थ है। 'दुप्परिहारं सत्थं' का अर्थ है संबाध (गुह्य स्थान) में कठिनाई से शस्त्र का प्रयोग करना चाहिए। 'सत्थकम्मं वा वत्थिकम्मं वा' का अर्थ है कि निर्धारित स्थान पर किसी भी शस्त्र, सुई, काँटे, छोटी बर्छी, कंकड़ या नाखून से काटना, फाड़ना, छेदना या खुरचना नहीं चाहिए; यह सब 'शस्त्र-कर्म' ही है। किसी चमड़े या कपड़े से वस्ति (बस्ती/मूत्राशय) को दबाना भी नहीं चाहिए; यह सब 'वस्ति-कर्म' ही है। और यहाँ "संबाध के चारों ओर दो अंगुल" - यह बात शस्त्र-कर्म के संदर्भ में ही कही गई है। वस्ति-कर्म तो संबाध (गुह्य स्थान) में ही निषिद्ध है। किन्तु वहाँ क्षार लगाने या किसी धागे से बाँधने की अनुमति है। यदि उससे कट जाता है, तो वह सुविच्छिन्न (ठीक से कटा हुआ) है। अंडवृद्धि (हर्निया/अंडकोश की सूजन) के रोग में भी शस्त्र-कर्म कल्प्य नहीं है, इसलिए अंडकोश को फाड़कर बीजों को निकालकर "निरोग करूँगा" - ऐसा सोचकर (शस्त्र-कर्म) नहीं करना चाहिए। किन्तु अग्नि से तपाने और औषधि लेपन में कोई निषेध नहीं है। गुदा-मार्ग में औषधि लगी हुई कपड़े की बत्ती या बाँस की नली कल्प्य है, जिससे वे क्षार-कर्म करते हैं या तेल प्रवेश कराते हैं। 280. පවත්තමංසන්ති [Pg.376] මතස්ස මංසං. මාඝාතොති තං දිවසං න ලබ්භා කෙනචි කිඤ්චි ජීවිතා වොරොපෙතුං. පොත්ථනිකන්ති මංසච්ඡෙදනසත්ථකං වුච්චති. කිම්පිමායාති කිම්පි ඉමාය. න භගවා උස්සහතීති න භගවා සක්කොති. යත්ර හි නාමාති යස්මා නාම. පටිවෙක්ඛීති වීමංසි; පටිපුච්ඡීති වුත්තං හොති. අප්පටිවෙක්ඛිත්වාති අප්පටිපුච්ඡිත්වා. සචෙ පන අසුකමංසන්ති ජානාති, පටිපුච්ඡනකිච්චං නත්ථි, අජානන්තෙන පන පුච්ඡිත්වාව ඛාදිතබ්බං. २८०. 'पवत्तमांस' का अर्थ है मृत पशु का मांस। 'माघात' का अर्थ है कि उस दिन किसी के द्वारा किसी भी प्राणी का जीवन से वियोग (वध) नहीं किया जा सकता। 'पोत्थनिक' मांस काटने वाले छोटे चाकू को कहा जाता है। 'किम्पिमाय' का अर्थ है 'इससे क्या भी'। 'न भगवा उस्सहिति' का अर्थ है भगवान समर्थ नहीं हैं। 'यत्र हि नाम' का अर्थ है 'क्योंकि'। 'पटिवेक्खी' का अर्थ है जाँच की या पुनः पूछा। 'अप्पटिवेक्खित्वा' का अर्थ है बिना पूछे। यदि कोई जानता है कि यह अमुक मांस है, तो पूछने की आवश्यकता नहीं है; यदि नहीं जानता, तो भिक्षु को पूछकर ही खाना चाहिए। හත්ථිමංසාදිපටික්ඛෙපකථා हाथी के मांस आदि के निषेध की कथा। 281. සුනඛමංසන්ති එත්ථ අරඤ්ඤකොකා නාම සුනඛසදිසා හොන්ති, තෙසං මංසං වට්ටති. යො පන ගාමසුනඛියා වා කොකෙන කොකසුනඛියා වා ගාමසුනඛෙන සංයොගා උප්පන්නො, තස්ස මංසං න වට්ටති, සො හි උභයං භජතීති. අහිමංසන්ති කස්සචි අපාදකස්ස දීඝජාතිකස්ස මංසං න වට්ටති. සීහමංසාදීනි පාකටානෙව. २८१. 'सुनखमांस' (कुत्ते का मांस) के विषय में, जंगली भेड़िये कुत्तों के समान होते हैं, उनका मांस कल्प्य (उचित) है। लेकिन जो ग्राम-कुतिया और भेड़िये के संयोग से, या भेड़िया-मादा और ग्राम-कुत्ते के संयोग से उत्पन्न हुआ है, उसका मांस कल्प्य नहीं है, क्योंकि वह दोनों पक्षों (भेड़िया और कुत्ता) से संबंधित है। 'अहिमांस' (साँप का मांस) - किसी भी बिना पैर वाले लंबी जाति के जीव का मांस कल्प्य नहीं है। सिंह का मांस आदि प्रसिद्ध ही हैं (कि वे निषिद्ध हैं)। එත්ථ ච මනුස්සමංසං සජාතිතාය පටික්ඛිත්තං, හත්ථිඅස්සමංසං රාජඞ්ගතාය, සුනඛමංසඤ්ච අහිමංසඤ්ච පටිකූලතාය, සීහමංසාදීනි පඤ්ච අත්තනො අනුපද්දවත්ථායාති. ඉමෙසං මනුස්සාදීනං දසන්නං මංසම්පි අට්ඨිපි ලොහිතම්පි චම්මම්පි ලොමම්පි සබ්බං න වට්ටති, යංකිඤ්චි ඤත්වා වා අඤත්වා වා ඛාදන්තස්ස ආපත්තියෙව. යදා ජානාති, තදා දෙසෙතබ්බා. ‘‘අපුච්ඡිත්වා ඛාදිස්සාමී’’ති ගණ්හතො පටිග්ගහණෙ දුක්කටං, ‘‘පුච්ඡිත්වා ඛාදිස්සාමී’’ති ගණ්හතො අනාපත්ති. උද්දිස්ස කතං පන ජානිත්වා ඛාදන්තස්සෙව ආපත්ති, පච්ඡා ජානන්තො ආපත්තියා න කාරෙතබ්බොති. यहाँ मनुष्य का मांस अपनी ही जाति का होने के कारण निषिद्ध है; हाथी और घोड़े का मांस राजकीय अंग होने के कारण; कुत्ते और साँप का मांस घृणास्पद होने के कारण; और सिंह आदि पाँच प्रकार के मांस अपनी सुरक्षा (उन हिंसक पशुओं से) के लिए निषिद्ध हैं। इन मनुष्यों आदि दस प्रकार के प्राणियों का मांस, हड्डी, रक्त, चर्म और रोम—सब कुछ अकल्प्य है। जानते हुए या अनजाने में, जो कोई भी इन्हें खाता है, उसे आपत्ति (दोष) ही होती है। जब पता चले, तब देशना (प्रायश्चित) करनी चाहिए। "बिना पूछे खाऊँगा" ऐसा सोचकर ग्रहण करने वाले को ग्रहण करने पर दुक्कट (दोष) होता है। "पूछकर खाऊँगा" ऐसा सोचकर ग्रहण करने वाले को आपत्ति नहीं होती। विशेष रूप से (भिक्षु के लिए) तैयार किए गए मांस को जानकर खाने वाले को ही आपत्ति होती है; बाद में जानने वाले को आपत्ति का भागी नहीं बनाना चाहिए। යාගුමධුගොළකාදිකථා यवागू (कांजी), मधु और गुड़ के गोलों आदि की कथा। 282. එකත්තකොති එකකො, නත්ථි මෙ දුතියොති අත්ථො. පහූතං යාගුඤ්ච මධුගොළකඤ්ච පටියාදාපෙත්වාති සො කිර සතසහස්සං වයං කත්වා පටියාදාපෙසි. අනුමොදනාගාථාපරියොසානෙ ‘‘පත්ථයතං ඉච්ඡත’’න්ති පදානං ‘‘අලමෙව දාතු’’න්ති ඉමිනා සම්බන්ධො. සචෙ පන ‘‘පත්ථයතා ඉච්ඡතා’’ති පාඨො අත්ථි, සොයෙව ගහෙතබ්බො. २८२. 'एकत्तको' का अर्थ है अकेला, "मेरा कोई दूसरा नहीं है"। बहुत सी यवागू और मधु-गुड़ के गोले तैयार करवाकर—उसने एक लाख (मुद्राएँ) व्यय करके तैयार करवाया। अनुमोदन गाथा के अंत में "पत्थयतं इच्छतं" पदों का संबंध "अलमेव दातुं" के साथ है। यदि "पत्थयता इच्छता" ऐसा पाठ है, तो वही ग्रहण करना चाहिए। 283. භොජ්ජයාගුන්ති යා පවාරණං ජනෙති. යදග්ගෙනාති යං ආදිං කත්වා. සග්ගා තෙ ආරද්ධාති සග්ගනිබ්බත්තකපුඤ්ඤං උපචිතන්ති අත්ථො. යථාධම්මො [Pg.377] කාරෙතබ්බොති පරම්පරභොජනෙන කාරෙතබ්බො, භොජ්ජයාගුයා හි පවාරණා හොතීති. २८३. 'भोज्जयागु' वह है जो पवारणा (भोजन के निषेध) को उत्पन्न करती है। 'यदग्गेन' का अर्थ है जिसे आदि (शुरुआत) मानकर। "तुम्हारे लिए स्वर्ग का मार्ग आरम्भ हो गया है" का अर्थ है स्वर्ग में उत्पन्न करने वाले पुण्य का संचय कर लिया गया है। 'यथाधम्मो कारेतब्बो' का अर्थ है परम्परा-भोजन (नियम) के अनुसार व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि भोज्जयागु से पवारणा होती है। 284. නාහං තං කච්චානාති තස්මිං කිර අවසිට්ඨගුළෙ දෙවතා සුඛුමොජං පක්ඛිපිංසු, සා අඤ්ඤෙසං පරිණාමං න ගච්ඡති, තස්මා එවමාහ. ගිලානස්ස ගුළන්ති තථාරූපෙන බ්යාධිනා ගිලානස්ස පච්ඡාභත්තං ගුළං අනුජානාමීති අත්ථො. २८४. "हे कच्चान! मैं उसे (अनुमति) नहीं देता"—ऐसा इसलिए कहा गया क्योंकि उस बचे हुए गुड़ में देवताओं ने सूक्ष्म ओज (दिव्य रस) डाल दिया था, जो दूसरों के शरीर में पच नहीं सकता। 'ग्लान के लिए गुड़' का अर्थ है कि ऐसे रोग से पीड़ित व्यक्ति के लिए, जो गुड़ खाने से ठीक हो सकता है, विकाल (दोपहर के बाद) में गुड़ की अनुमति देता हूँ। පාටලිගාමවත්ථුකථා पाटलिग्राम की कथा। 285. සබ්බසන්ථරින්ති යථා සබ්බං සන්ථතං හොති, එවං. २८५. 'सब्बसंथरिं' का अर्थ है—जिस प्रकार सब कुछ बिछाया गया हो, वैसे। 286. සුනිධවස්සකාරාති සුනිධො ච වස්සකාරො ච ද්වෙ බ්රාහ්මණා මගධරඤ්ඤො මහාමත්තා මහාමච්චා. වජ්ජීනං පටිබාහායාති වජ්ජිරාජකුලානං ආයමුඛපච්ඡින්දනත්ථං. වත්ථූනීති ඝරවත්ථූනි. චිත්තානි නමන්ති නිවෙසනානි මාපෙතුන්ති තා කිර දෙවතා වත්ථුවිජ්ජාපාඨකානං සරීරෙ අධිමුච්චිත්වා එවං චිත්තානි නාමෙන්ති. කස්මා? අම්හාකං යථානුරූපං සක්කාරං කරිස්සන්තීති අත්ථො. තාවතිංසෙහීති ලොකෙ කිර සක්කං දෙවරාජානං විස්සකම්මඤ්ච උපාදාය තාවතිංසා පණ්ඩිතාති සද්දො අබ්භුග්ගතො, තෙනෙවාහ තාවතිංසෙහීති, තාවතිංසෙහි සද්ධිං මන්තෙත්වා විය මාපෙන්තීති අත්ථො. යාවතා අරියං ආයතනන්ති යත්තකං අරියමනුස්සානං ඔසරණට්ඨානං නාම අත්ථි. යාවතා වණිප්පථොති යත්තකං වාණිජානං ආභතභණ්ඩස්ස රාසිවසෙනෙව කයවික්කයට්ඨානං නාම අත්ථි. ඉදං අග්ගනගරන්ති තෙසං අරියායතනවණිප්පථානං ඉදං අග්ගනගරං භවිස්සති. පුටභෙදනන්ති පුටභෙදනට්ඨානං මොචනට්ඨානන්ති වුත්තං හොති. අග්ගිතො වාතිආදීසු සමුච්චයත්ථො වා සද්දො. තත්ර හි එකස්ස කොට්ඨාසස්ස අග්ගිතො, එකස්ස උදකතො, එකස්ස අබ්භන්තරතො, අඤ්ඤමඤ්ඤභෙදා අන්තරායො භවිස්සති. උළුම්පන්ති පාරගමනත්ථාය ආණියො ආකොටෙත්වා කතං. කුල්ලන්ති වල්ලිආදීහි බන්ධිත්වා කතං. २८६. 'सुनिधवस्सकारा'—सुनिध और वस्सकार मगधराज के दो महामात्र (मंत्री) ब्राह्मण थे। 'वज्जीनं पटिबहाया'—वज्जी राजकुलों के आय के स्रोतों को रोकने के लिए। 'वत्थूनी' का अर्थ है घर बनाने की भूमि। "देवता आवास बनाने के लिए चित्त को झुकाते हैं"—वे देवता वास्तु-विद्या के जानकारों के शरीर में प्रविष्ट होकर उनके चित्त को इस प्रकार झुकाते हैं। क्यों? "वे हमारा उचित सत्कार करेंगे" ऐसा सोचकर। 'तावतिंसेहीति'—संसार में देवराज सक्क और विस्सकम्म को लेकर तावतिंस (त्रयस्त्रिंश) देव बुद्धिमान हैं, ऐसी ख्याति फैली हुई है; इसीलिए बुद्ध ने कहा "तावतिंसों के साथ", जिसका अर्थ है कि वे उनके साथ परामर्श करके ही निर्माण कर रहे हों। 'यावता अरियं आयतनं'—जहाँ तक आर्य मनुष्यों के निवास का स्थान है। 'यावता वणिप्पथो'—जहाँ तक व्यापारियों द्वारा लाए गए माल के क्रय-विक्रय का स्थान है। 'इदं अग्गनगरं'—यह पाटलिपुत्र उन आर्य निवासों और व्यापारिक केंद्रों में श्रेष्ठ नगर होगा। 'पुटभेदनं'—माल की पोटलियाँ खोलने का स्थान। 'अग्गितो वा' आदि में 'वा' शब्द समुच्चय (और) के अर्थ में है। वहाँ एक भाग को अग्नि से, एक को जल से और एक को आंतरिक फूट (आपसी मतभेद) से खतरा होगा। 'उळुम्प'—पार जाने के लिए खूँटियाँ ठोककर बनाया गया बेड़ा। 'कुल्ल'—लताओं आदि से बाँधकर बनाया गया बाँस का बेड़ा। අණ්ණවන්ති සබ්බන්තිමෙන පරිච්ඡෙදෙන යොජනමත්තං ගම්භීරස්ස ච පුථුල්ලස්ස ච උදකට්ඨානස්සෙතං අධිවචනං. සරන්ති ඉධ නදී අධිප්පෙතා. ඉදං වුත්තං හොති – යෙ [Pg.378] ගම්භීරං විත්ථතං තණ්හාසරං තරන්ති, තෙ අරියමග්ගසඞ්ඛාතං සෙතුං කත්වාන විසජ්ජ පල්ලලානි අනාමසිත්වාව උදකභරිතානි නින්නට්ඨානානි; අයං පන ඉදං අප්පමත්තකං උදකං උත්තරිතුකාමොපි කුල්ලඤ්හි පරිජනො බන්ධති, බුද්ධා පන බුද්ධසාවකා ච විනා එව කුල්ලෙන තිණ්ණා මෙධාවිනො ජනාති. 'अण्णव'—यह शब्द अंततः एक योजन गहरे और चौड़े जल-स्थान का पर्यायवाची है। यहाँ इससे 'नदी' अभिप्रेत है। इसका अर्थ यह है—जो गंभीर और विस्तृत तृष्णा-रूपी नदी को पार करते हैं, वे आर्यमार्ग-रूपी सेतु (पुल) बनाकर, दलदलों को छोड़कर और जल से भरे निचले स्थानों को छुए बिना ही पार कर जाते हैं; किन्तु ये सामान्य लोग इस थोड़े से (गंगा के) जल को पार करने की इच्छा रखते हुए भी बेड़ा बाँधते हैं, जबकि बुद्ध और बुद्ध के श्रावक, जो बुद्धिमान जन हैं, बिना बेड़े के ही पार हो गए हैं। 287. අනනුබොධාති අබුජ්ඣනෙන. සන්ධාවිතන්ති භවතො භවං ගමනවසෙන සන්ධාවිතං. සංසරිතන්ති පුනප්පුනං ගමනවසෙන සංසරිතං. මමඤ්චෙව තුම්හාකඤ්චාති මයා ච තුම්හෙහි ච. අථ වා සන්ධාවිතං සංසරිතන්ති සන්ධාවනං සංසරණං මමඤ්චෙව තුම්හාකඤ්ච අහොසීති එවමෙත්ථ අත්ථො දට්ඨබ්බො. සංසිතන්ති සංසරිතං. භවනෙත්ති සමූහතාති භවතො භවගමනා සන්ධාවනා තණ්හාරජ්ජු සුට්ඨු හතා ඡින්නා අප්පවත්තිකතා. २८७. 'अननुबोधा (Ananubodha)' का अर्थ है न जानने के कारण। 'सन्धावितं (Sandhāvitaṃ)' का अर्थ है एक भव से दूसरे भव में जाने के कारण निरंतर दौड़ना। 'संसरितं (Saṃsaritanti)' का अर्थ है बार-बार जाने के कारण संसार में भटकना। 'ममञ्चेव तुम्हाकञ्च (Mamañceva tumhākañca)' का अर्थ है मेरे द्वारा और तुम्हारे द्वारा। अथवा 'सन्धावितं संसरितं' का अर्थ है कि मेरा और तुम्हारा निरंतर दौड़ना और संसार में भटकना हुआ है—इस प्रकार यहाँ अर्थ समझना चाहिए। 'संसितं (Saṃsitaṃ)' का अर्थ है संसरित (भटका हुआ)। 'भवनेत्ति समूहाता (Bhavanetti samūhatā)' का अर्थ है एक भव से दूसरे भव में जाने का कारण, दौड़ने का कारण, तृष्णा रूपी रस्सी को अच्छी तरह नष्ट कर दिया गया है, काट दिया गया है और पुनः उत्पन्न न होने वाला बना दिया गया है। 289. නීලාති ඉදං සබ්බසඞ්ගාහකං. නීලවණ්ණාතිආදි තස්සෙව විභාගදස්සනත්ථං. තත්ථ න තෙසං පකතිවණ්ණා නීලා, නීලවිලෙපනානං විචිත්තතාවසෙනෙතං වුත්තං. පටිවට්ටෙසීති පහාරෙසි. සාහාරං දජ්ජෙය්යාථාති සජනපදං දදෙය්යාථ. අඞ්ගුලිං ඵොටෙසුන්ති අඞ්ගුලිං චාලෙසුං. අම්බකායාති ඉත්ථිකාය. ඔලොකෙථාති පස්සථ. අපලොකෙථාති පුනප්පුනං පස්සථ. උපසංහරථාති උපනෙථ. ඉමං ලිච්ඡවිපරිසං තුම්හාකං චිත්තෙන තාවතිංසපරිසං හරථ, තාවතිංසස්ස සමකං කත්වා පස්සථාති අත්ථො. २८९. 'नीला (Nīlā)' यह शब्द सभी नीले रंगों का संग्रह करने वाला है। 'नीलवण्णा (Nīlavaṇṇā)' आदि शब्द उसी के विभाग दिखाने के लिए हैं। वहाँ उन (लिच्छवियों) का प्राकृतिक वर्ण नीला नहीं था, बल्कि नीले विलेपनों (लेपों) की विचित्रता के कारण ऐसा कहा गया है। 'पटिवट्टेसि (Paṭivaṭṭesi)' का अर्थ है प्रहार किया (टकराया)। 'साहारं दज्जेय्याथ (Sāhāraṃ dajjeyyāthā)' का अर्थ है जनपद सहित (वैशाली) दे दें। 'अङ्गुलिं फोटेसुं (Aṅguliṃ phoṭesuṃ)' का अर्थ है अंगुलियाँ हिलाईं। 'अम्बकाया (Ambakāyā)' का अर्थ है स्त्री। 'ओलोकेथ (Oloketha)' का अर्थ है देखो। 'अपलोकेथ (Apaloketha)' का अर्थ है बार-बार देखो। 'उपसंहरथ (Upasaṃharatha)' का अर्थ है पास लाओ। इस लिच्छवि परिषद को अपने चित्त में तावतिंस (देवलोक की) परिषद के समान मानकर देखो—यह अर्थ है। සීහසෙනාපතිවත්ථුආදිකථා सीह सेनापति की कथा आदि। 290. ධම්මස්ස ච අනුධම්මං බ්යාකරොන්තීති භගවතා වුත්තකාරණස්ස අනුකාරණං කථෙන්ති. සහධම්මිකො වාදානුවාදොති අපරෙහි වුත්තකාරණෙන සකාරණො හුත්වා තුම්හාකං වාදො විඤ්ඤුගරහිතබ්බං කාරණං කොචි අප්පමත්තකොපි කිං න ආගච්ඡති. ඉදං වුත්තං හොති ‘‘කිං සබ්බකාරෙනාපි තුම්හාකං වාදෙ ගාරය්හකාරණං නත්ථී’’ති. අනබ්භක්ඛාතුකාමාති අභිභවිත්වා න ආචික්ඛිතුකාමා. २९०. 'धम्मस्स च अनुधम्मं ब्याकरोन्ति (Dhammassa ca anudhammaṃ byākaronti)' का अर्थ है भगवान द्वारा कहे गए कारण के अनुकूल कारण कहते हैं। 'सहधम्मिको वादानुवादो (Sahadhammiko vādānuvādoti)' का अर्थ है दूसरों द्वारा कहे गए कारण से युक्त होकर, क्या आपका वाद (कथन) विद्वानों द्वारा निंदा किए जाने योग्य किसी भी सूक्ष्म कारण तक नहीं पहुँचता? इसका अर्थ यह है: 'क्या सभी प्रकार से आपके वाद में कोई निंदनीय कारण नहीं है?' 'अनब्भक्खातुकामा (Anabbhakkhātukāmā)' का अर्थ है अभिभूत करके (दबाकर) न कहने की इच्छा वाले, या दोषारोपण न करने की इच्छा वाले। 293. අනුවිච්චකාරන්ති අනුවිදිත්වා චින්තෙත්වා තුලයිත්වා කාතබ්බං කරොහීති වුත්තං හොති. ඤාතමනුස්සානන්ති ලොකෙ පාකටානං. සාධු හොතීති [Pg.379] සුන්දරං හොති. පටාකං පරිහරෙය්යුන්ති පටාකං උක්ඛිපිත්වා නගරෙ ඝොසන්තා ආහිණ්ඩෙය්යුං. කස්මා? ‘‘එවං නො අම්හාකං මහන්තභාවො භවිස්සතී’’ති. ඔපානභූතන්ති පටියත්තඋදපානො විය ඨිතං. කුලන්ති නිවෙසනං. දාතබ්බං මඤ්ඤෙය්යාසීති මා ඉමෙසං දෙය්යධම්මං උපච්ඡින්දිත්ථ, සම්පත්තානඤ්හි දාතබ්බමෙවාති ඔවදති. ඔකාරොති අවකාරො ලාමකභාවො. සාමුක්කංසිකාති අත්තනායෙව උද්ධරිත්වා ගහිතා; අසාධාරණං අඤ්ඤෙසන්ති අත්ථො. උද්දිස්ස කතන්ති උද්දිසිත්වා කතං. २९३. 'अनुविच्चकारं (Anuviccakāraṃ)' का अर्थ है जानकर, सोचकर और तुलना करके जो करने योग्य है उसे करो—यह कहा गया है। 'ञातमनुस्सानं (Ñātamanussānaṃ)' का अर्थ है लोक में प्रसिद्ध लोगों का। 'साधु होति (Sādhu hoti)' का अर्थ है सुंदर (अच्छा) होता है। 'पताकं परिहरेय्युं (Paṭākaṃ parihareyyuṃ)' का अर्थ है पताका (ध्वज) उठाकर नगर में घोषणा करते हुए घूमें। क्यों? 'इस प्रकार हमारा बड़प्पन होगा।' 'ओपानभूतं (Opānabhūtaṃ)' का अर्थ है तैयार किए गए कुएँ के समान स्थित। 'कुलं (Kulaṃ)' का अर्थ है घर (निवास)। 'दातब्बं मञ्ञेय्यासि (Dātabbaṃ maññeyyāsi)' का अर्थ है इन (निगंठों) को दिए जाने वाले दान को मत रोको, क्योंकि आए हुए याचक को देना ही चाहिए—ऐसा उपदेश देते हैं। 'ओकारो (Okāro)' का अर्थ है अवकार (हीन अवस्था), तुच्छता। 'सामुक्कंसिका (Sāmukkaṃsikā)' का अर्थ है स्वयं के द्वारा ही उद्धृत करके ग्रहण की गई; दूसरों के साथ असाधारण (साझा न होने वाली)—यह अर्थ है। 'उद्दिस कतं (Uddissa kataṃ)' का अर्थ है (किसी को) उद्देश्य करके किया गया। 294. පටිච්චකම්මන්ති අත්තානං පටිච්ච කතන්ති අත්ථො. අථ වා පටිච්චකම්මන්ති නිමිත්තකම්මස්සෙතං අධිවචනං, තං පටිච්චකම්මං එත්ථ අත්ථීති මංසම්පි පටිච්චකම්මන්ති වුත්තං. යො හි එවරූපං මංසං පරිභුඤ්ජති, සොපි තස්ස කම්මස්ස දායාදො හොති, වධකස්ස විය තස්සාපි පාණඝාතකම්මං හොතීති අධිප්පායො. ජිරිදන්තිති ජිරන්ති අබ්භාචික්ඛන්තා න ජිරන්ති, අබ්භක්ඛානස්ස අන්තං න ගච්ඡන්තීති අත්ථො. තිකොටිපරිසුද්ධකථා සඞ්ඝභෙදසික්ඛාපදවණ්ණනායං වුත්තා. २९४. 'पटिच्चकम्मं (Paṭiccakammaṃ)' का अर्थ है स्वयं को निमित्त बनाकर किया गया। अथवा 'पटिच्चकम्मं' यह निमित्त-कर्म का पर्यायवाची है; चूँकि इस मांस में वह निमित्त-कर्म है, इसलिए मांस को भी 'पटिच्चकम्मं' कहा गया है। जो कोई इस प्रकार के मांस का उपभोग करता है, वह भी उस कर्म का भागी होता है; वध करने वाले के समान उसे भी प्राणातिपात (जीव हत्या) का कर्म लगता है—यह निगंठों का अभिप्राय है। 'जिरिदन्ति (Jiridanti)' का अर्थ है वे जीर्ण होते हैं (नष्ट होते हैं), लेकिन झूठा आरोप लगाने वाले जीर्ण नहीं होते, वे दोषारोपण के अंत तक नहीं पहुँच पाते—यह अर्थ है। 'तिकोटिपरिसुद्धकथा' (तीन कोटियों से शुद्ध होने की कथा) मेरे द्वारा संघभेद सिक्खापद की व्याख्या में कही गई है। කප්පියභූමිඅනුජානනකථා कप्पिय भूमि (कल्प्य भूमि) की अनुमति देने की कथा। 295. සකටපරිවට්ටන්ති සකටෙහි පරික්ඛෙපං විය කත්වා අච්ඡන්ති. පච්චන්තිමන්ති අභිලාපමත්තමෙතං ‘‘යං සඞ්ඝො ආකඞ්ඛතී’’ති වුත්තත්තා පන ධුරවිහාරොපි සම්මන්නිතුං වට්ටති, කම්මවාචං අවත්වා අපලොකනෙනාපි වට්ටතියෙව. කාකොරවසද්දන්ති තත්ථ තත්ථ පවිට්ඨානං ආමිසඛාදනත්ථාය අනුප්පගෙයෙව සන්නිපතිතානං කාකානං ඔරවසද්දං. යසොජො නාම කපිලසුත්තපරියොසානෙ පබ්බජිතානං පඤ්චන්නං සතානං අග්ගපුරිසො. २९५. 'सकटपरिवट्टं (Sakaṭaparivaṭṭaṃ)' का अर्थ है गाड़ियों से घेरा बनाकर रहने के समान। 'पच्चन्तिमं (Paccantimaṃ)' यह केवल एक संज्ञा मात्र है; चूँकि 'जो संघ चाहे' ऐसा कहा गया है, इसलिए मुख्य विहार को भी (कप्पिय भूमि के रूप में) सम्मत करना उचित है; बिना कम्मवाचा पढ़े केवल अनुमति (अपालोकन) से भी यह उचित ही है। 'काकोरवसद्दं (Kākoravasaddaṃ)' का अर्थ है यहाँ-वहाँ प्रविष्ट हुए, भोजन (आमिष) खाने के लिए सुबह-सुबह ही एकत्रित हुए कौओं का शोर। 'यसोज' नाम का व्यक्ति कपिल सुत्त के अंत में प्रव्रजित हुए पाँच सौ पुरुषों में श्रेष्ठ पुरुष था। උස්සාවනන්තිකන්තිආදීසු උස්සාවනන්තිකා තාව එවං කත්තබ්බා. යො ථම්භානං වා උපරි භිත්තිපාදෙ වා නිඛනිත්වා විහාරො කරියති, තස්ස හෙට්ඨා ථම්භපටිච්ඡකා පාසාණා භූමිගතිකා එව. පඨමථම්භං පන පඨමභිත්තිපාදං වා පතිට්ඨාපෙන්තෙහි බහූහි සම්පරිවාරෙත්වා ‘‘කප්පියකුටිං කරොම, කප්පියකුටිං කරොමා’’ති වාචං නිච්ඡාරෙන්තෙහි මනුස්සෙසු උක්ඛිපිත්වා පතිට්ඨාපෙන්තෙසු ආමසිත්වා වා සයං උක්ඛිපිත්වා වා ථම්භෙ වා භිත්තිපාදො වා පතිට්ඨාපෙතබ්බො. කුරුන්දිමහාපච්චරීසු පන ‘‘කප්පියකුටි කප්පියකුටී’’ති වත්වා පතිට්ඨාපෙතබ්බන්ති වුත්තං. අන්ධකට්ඨකථායං ‘‘සඞ්ඝස්ස කප්පියකුටිං අධිට්ඨාමී’’ති වුත්තං. තං පන අවත්වාපි අට්ඨකථාසු වුත්තනයෙන වුත්තෙ [Pg.380] දොසො නත්ථි. ඉදං පනෙත්ථ සාධාරණලක්ඛණං, ථම්භපතිට්ඨානඤ්ච වචනපරියොසානඤ්ච සමකාලං වට්ටති. සචෙ හි අනිට්ඨිතෙ වචනෙ ථම්භො පතිට්ඨාති, අප්පතිට්ඨිතෙ වා තස්මිං වචනං නිට්ඨාති, අකතා හොති කප්පියකුටි. තෙනෙව මහාපච්චරියං වුත්තං – ‘‘බහූහි සම්පරිවාරෙත්වා වත්තබ්බං, අවස්සඤ්හි එත්ථ එකස්සපි වචනනිට්ඨානඤ්ච ථම්භපතිට්ඨානඤ්ච එකතො භවිස්සතී’’ති. 'उस्सावनन्तिका (Ussāvanantikā)' आदि में, उस्सावनन्तिका कुटी इस प्रकार बनानी चाहिए। जो विहार खंभों के ऊपर या दीवारों की नींव खोदकर बनाया जाता है, उसके नीचे खंभों को सहारा देने वाले पत्थर भूमि के समान ही होते हैं। पहले खंभे या पहली दीवार की नींव को स्थापित करते समय, बहुत से भिक्षुओं को उसे घेरकर 'कप्पियकुटिं करोम, कप्पियकुटिं करोम' (हम कल्प्य कुटी बनाते हैं) ऐसा शब्द उच्चारण करते हुए, जब मनुष्य (कारीगर) उसे उठाकर स्थापित कर रहे हों, तब भिक्षुओं को उसे छूकर या स्वयं उठाकर खंभे या दीवार की नींव को स्थापित करना चाहिए। कुरुन्दी और महा पच्चरी अट्ठकथाओं में 'कप्पियकुटि कप्पियकुटि' कहकर स्थापित करना चाहिए—ऐसा कहा गया है। अंधक अट्ठकथा में 'संघस्स कप्पियकुटिं अधिट्ठामि' (मैं संघ की कल्प्य कुटी का अधिष्ठान करता हूँ) ऐसा कहा गया है। लेकिन उसे न कहकर भी यदि अट्ठकथाओं में बताई गई विधि के अनुसार कहा जाए, तो कोई दोष नहीं है। यहाँ यह सामान्य लक्षण है कि खंभे का स्थापित होना और शब्दों का उच्चारण समाप्त होना एक ही समय में होना चाहिए। यदि शब्द समाप्त होने से पहले खंभा स्थापित हो जाए, या खंभा स्थापित होने से पहले शब्द समाप्त हो जाएँ, तो वह कल्प्य कुटी नहीं बनती। इसीलिए महा पच्चरी में कहा गया है—'बहुत से भिक्षुओं द्वारा घेरकर कहना चाहिए, क्योंकि यहाँ निश्चित रूप से किसी एक का शब्द समाप्त होना और खंभे का स्थापित होना एक साथ हो जाएगा।' ඉට්ඨකසිලාමත්තිකාකුට්ටිකාසු පන කුටීසු හෙට්ඨා චයං බන්ධිත්වා වා අබන්ධිත්වා වා කරොන්තු, යතො පට්ඨාය භිත්තිං උට්ඨාපෙතුකාමා හොන්ති, තං සබ්බපඨමං ඉට්ඨකං වා සිලං වා මත්තිකාපිණ්ඩං වා ගහෙත්වා වුත්තනයෙනෙව කප්පියකුටි කාතබ්බා. ඉට්ඨකාදයො හි භිත්තියා පඨමිට්ඨකාදීනං හෙට්ඨා න වට්ටන්ති, ථම්භා පන උපරි උග්ගච්ඡන්ති, තස්මා වට්ටන්ති. අන්ධකට්ඨකථායං ‘‘ථම්භෙහි කරියමානෙ චතූසු කොණෙසු චත්තාරො ථම්භා ඉට්ඨකාදිකුට්ටෙ චතූසු කොණෙසු ද්වෙ තිස්සො ඉට්ඨකා අධිට්ඨාතබ්බා’’ති වුත්තං. තථා පන අකතායපි දොසො නත්ථි, අට්ඨකථාසු හි වුත්තමෙව පමාණං. ईंट, पत्थर या मिट्टी की दीवारों वाली कुटियों में नीचे चय (नींव) बनाकर या बिना बनाए, जहाँ से दीवार उठाना चाहते हैं, सबसे पहले उस ईंट, पत्थर या मिट्टी के पिण्ड को लेकर बताए गए तरीके से ही कप्पियकुटि बनानी चाहिए। दीवार की पहली ईंट आदि के नीचे ईंट आदि (कप्पियकुटि के रूप में) मान्य नहीं हैं, लेकिन खम्भे ऊपर की ओर जाते हैं, इसलिए वे मान्य हैं। अन्धक-अट्ठकथा में कहा गया है कि खम्भों से बनाई जाने वाली कुटि में चारों कोनों पर चार खम्भे और ईंट आदि की दीवार वाली कुटि में चारों कोनों पर दो-तीन ईंटें अधिष्ठित करनी चाहिए। वैसा न करने पर भी दोष नहीं है, क्योंकि अट्ठकथाओं में जो कहा गया है वही प्रमाण है। ගොනිසාදිකා දුවිධා – ආරාමගොනිසාදිකා, විහාරගොනිසාදිකාති. තාසු යත්ථ නෙව ආරාමො න සෙනාසනානි පරික්ඛිත්තානි හොන්ති, අයං ‘‘ආරාමගොනිසාදිකා’’ නාම. යත්ථ සෙනාසනානි සබ්බානි වා එකච්චානි වා පරික්ඛිත්තානි, ආරාමො අපරික්ඛිත්තො, අයං ‘‘විහාරගොනිසාදිකා’’ නාම. ඉති උභයත්රාපි ආරාමස්ස අපරික්ඛිත්තභාවොයෙව පමාණං. ආරාමො පන උපඩ්ඪපරික්ඛිත්තොපි බහුතරං පරික්ඛිත්තොපි පරික්ඛිත්තොයෙව නාමාති කුරුන්දිමහආපච්චරියාදීසු වුත්තං. එත්ථ කප්පියකුටිං ලද්ධුං වට්ටති. गोनिसादिता दो प्रकार की है - आराम-गोनिसादिता और विहार-गोनिसादिता। उनमें जहाँ न तो आराम (बगीचा) घिरा हो और न ही आवास घिरे हों, वह 'आराम-गोनिसादिता' कहलाती है। जहाँ सभी या कुछ आवास घिरे हों, लेकिन आराम न घिरा हो, वह 'विहार-गोनिसादिता' कहलाती है। इस प्रकार दोनों में आराम का न घिरा होना ही प्रमाण है। कुरुन्दि और महापच्चरी आदि में कहा गया है कि यदि आराम आधा घिरा हो या अधिकांश घिरा हो, तो भी वह घिरा हुआ ही माना जाता है। यहाँ कप्पियकुटि प्राप्त करना उचित है। ගහපතීති මනුස්සා ආවාසං කත්වා ‘‘කප්පියකුටිං දෙම, පරිභුඤ්ජථා’’ති වදන්ති, එසා ගහපති නාම. ‘‘කප්පියකුටිං කාතුං දෙමා’’ති වුත්තෙපි වට්ටතියෙව. අන්ධකට්ඨකථායං පන ‘‘යස්මා භික්ඛුං ඨපෙත්වා සෙසසහධම්මිකානං සබ්බෙසඤ්ච දෙවමනුස්සානං හත්ථතො පටිග්ගහො ච සන්නිධි ච අන්තොවුත්ථඤ්ච තෙසං සන්තකං භික්ඛුස්ස වට්ටති, තස්මා තෙසං ගෙහානි වා තෙහි දින්නා කප්පියකුටි වා ගහපතීති වුච්චතී’’ති වුත්තං. පුනපි වුත්තං – ‘‘භික්ඛුසඞ්ඝස්ස විහාරං ඨපෙත්වා භික්ඛුනුපස්සයො වා ආරාමිකානං වා තිත්ථියානං වා දෙවතානං වා නාගානං වා අපි බ්රහ්මානං විමානං කප්පියකුටි හොතී’’ති, තං සුවුත්තං; සඞ්ඝසන්තකමෙව [Pg.381] හි භික්ඛුසන්තකං වා ගෙහං ගහපතිකුටිකා න හොති. සම්මුතිකා නාම කම්මවාචං සාවෙත්වා කතාති. 'गहपति' का अर्थ है कि मनुष्य आवास बनाकर कहते हैं— "हम कप्पियकुटि देते हैं, आप इसका उपयोग करें", वह गहपति कुटि कहलाती है। "हम कप्पियकुटि बनाने के लिए देते हैं" कहने पर भी वह मान्य ही है। अन्धक-अट्ठकथा में कहा गया है कि चूँकि भिक्षु को छोड़कर शेष सभी सहधार्मिकों और सभी देव-मनुष्यों के हाथ से ग्रहण करना, संग्रह करना और उनके स्वामित्व वाली वस्तु का कुटि के भीतर रखा होना (अन्तोवुत्थ) भिक्षु के लिए कल्प्य है, इसलिए उनके घर या उनके द्वारा दी गई कप्पियकुटि को 'गहपति' कहा जाता है। फिर कहा गया है— "भिक्षु संघ के विहार को छोड़कर, भिक्षुणी-आवास, आरामपालों के घर, तीर्थिकों के आवास, देवताओं, नागों या यहाँ तक कि ब्रह्माओं के विमान भी कप्पियकुटि होते हैं", यह सही कहा गया है; क्योंकि संघ या किसी भिक्षु के स्वामित्व वाला घर गहपति-कुटिका नहीं होता। 'सम्मति' वह है जो कम्मवाचा पढ़कर बनाई गई हो। යං ඉමාසු චතූසු කප්පියභූමීසු වුත්ථං ආමිසං, තං සබ්බං අන්තොවුත්ථසඞ්ඛ්යං න ගච්ඡති. භික්ඛූනඤ්ච භික්ඛුනීනඤ්ච අන්තොවුත්ථඅන්තොපක්කමොචනත්ථඤ්හි කප්පියකුටියො අනුඤ්ඤාතා. යං පන අකප්පියභූමියං සහසෙය්යප්පහොනකෙ ගෙහෙ වුත්ථං සඞ්ඝිකං වා පුග්ගලිකං වා භික්ඛුස්ස භික්ඛුනියා වා සන්තකං එකරත්තම්පි ඨපිතං, තං අන්තොවුත්ථං; තත්ථ පක්කඤ්ච අන්තොපක්කං නාම හොති, එතං න කප්පති. සත්තාහකාලිකං පන යාවජීවිකඤ්ච වට්ටති. इन चार प्रकार की कप्पिय-भूमियों में जो आमिष (भोजन) रखा जाता है, वह सब 'अन्तोवुत्थ' (भीतर रखा हुआ) की श्रेणी में नहीं आता। भिक्षुओं और भिक्षुणियों को अन्तोवुत्थ और अन्तोपक्क (भीतर पका हुआ) के दोष से बचाने के लिए ही भगवान ने कप्पियकुटियों की अनुमति दी है। लेकिन जो अकप्पिय-भूमि में साथ सोने योग्य घर में रखा गया हो, चाहे वह संघ का हो, पुद्गल का हो, भिक्षु का हो या भिक्षुणी का, यदि वह एक रात भी रखा गया है, तो वह 'अन्तोवुत्थ' है; और वहाँ पकाया गया भोजन 'अन्तोपक्क' कहलाता है, वह कल्प्य नहीं है। लेकिन सप्ताह-कालिक और यावज्जीविक वस्तुएँ मान्य हैं। තත්රායං විනිච්ඡයො – සාමණෙරො භික්ඛුස්ස තණ්ඩුලාදිකං ආමිසං ආහරිත්වා කප්පියකුටියං නික්ඛිපිත්වා පුනදිවසෙ පචිත්වා දෙති, අන්තොවුත්ථං න හොති. තත්ථ අකප්පියකුටියං නික්ඛිත්තසප්පිආදීසු යංකිඤ්චි පක්ඛිපිත්වා දෙති, මුඛසන්නිධි නාම හොති. මහාපච්චරියං පන ‘‘අන්තොවුත්ථං හොතී’’ති වුත්තං. තත්ථ නාමමත්තමෙව නානාකරණං. භික්ඛු අකප්පියකුටියං ඨපිතසප්පිඤ්ච යාවජීවිකපණ්ණඤ්ච එකතො පචිත්වා පරිභුඤ්ජති, සත්තාහං නිරාමිසං වට්ටති. සචෙ ආමිසසංසට්ඨං කත්වා පරිභුඤ්ජති, අන්තොවුත්ථඤ්චෙව සාමංපාකඤ්ච හොති. එතෙනුපායෙන සබ්බසංසග්ගා වෙදිතබ්බා. यहाँ यह निर्णय है— यदि श्रामणेर भिक्षु के लिए चावल आदि आमिष लाकर कप्पियकुटि में रख देता है और अगले दिन पकाकर देता है, तो वह 'अन्तोवुत्थ' नहीं होता। यदि वहाँ अकप्पियकुटि में रखे हुए घी आदि में से कुछ भी डालकर देता है, तो वह 'मुख-सन्निधि' कहलाता है। महापच्चरी में तो इसे 'अन्तोवुत्थ' कहा गया है। वहाँ केवल नाम का ही अंतर है। यदि भिक्षु अकप्पियकुटि में रखे घी और यावज्जीविक पत्तों को एक साथ पकाकर उपभोग करता है, तो सात दिन तक बिना आमिष के वह कल्प्य है। यदि आमिष (चावल आदि) के साथ मिलाकर उपभोग करता है, तो वह 'अन्तोवुत्थ' और 'सामंपाक' (स्वयं पकाया हुआ) दोनों होता है। इसी विधि से सभी प्रकार के मिश्रणों को समझना चाहिए। ඉමා පන කප්පියකුටියො කදා ජහිතවත්ථුකා හොන්ති? උස්සාවනන්තිකා තාව යා ථම්භානං උපරි භිත්තිපාදෙ වා නිඛණිත්වා කතා, සා සබ්බෙසු ථම්භෙසු ච භිත්තිපාදෙසු ච අපනීතෙසු ජහිතවත්ථුකා හොති. සචෙ පන ථම්භෙ වා භිත්තිපාදෙ වා පරිවත්තෙන්ති, යො යො ඨිතො තත්ථ තත්ථ පතිට්ඨාති, සබ්බෙසුපි පරිවත්තිතෙසු අජහිතවත්ථුකාව හොති. ඉට්ඨකාදීහි කතා චයස්ස උපරි භිත්තිඅත්ථාය ඨපිතං ඉට්ඨකං වා සිලං වා මත්තිකාපිණ්ඩං වා ආදිංකත්වා විනාසිතකාලෙ ජහිතවත්ථුකා හොති. යෙහි පන ඉට්ඨකාදීහි අධිට්ඨිතා, තෙසු අපනීතෙසුපි තදඤ්ඤාසු පතිට්ඨිතාසු අජහිතවත්ථුකාව හොති. ये कप्पियकुटियाँ कब अपना आधार खो देती हैं (जहितवत्थुका होती हैं)? उस्सावनन्तिका कुटि, जो खम्भों के ऊपर या दीवार की नींव खोदकर बनाई गई है, वह सभी खम्भों और दीवार की नींव के हटा दिए जाने पर अपना आधार खो देती है। यदि खम्भों या दीवार की नींव को बदलते हैं, तो जो-जो खम्भा या नींव खड़ी रहती है, वहीं-वहीं वह स्थित रहती है; सभी के बदल दिए जाने पर भी वह अपना आधार नहीं खोती। ईंट आदि से बनी कुटि, जो चय (नींव) के ऊपर दीवार के लिए रखी गई ईंट, पत्थर या मिट्टी के पिण्ड से शुरू होकर नष्ट होने के समय अपना आधार खो देती है। जिन ईंटों आदि से वह अधिष्ठित की गई थी, उनके हटा दिए जाने पर भी यदि दूसरी ईंटें वहाँ स्थित हों, तो वह अपना आधार नहीं खोती। ගොනිසාදිකා පාකාරාදීහි පරික්ඛෙපෙ කතෙ ජහිතවත්ථුකා හොති. පුන තස්මිං ආරාමෙ කප්පියකුටි ලද්ධුං වට්ටති. සචෙ පන පුනපි පාකාරාදයො තත්ථ තත්ථ ඛණ්ඩා හොන්ති, තතො තතො ගාවො පවිසන්ති, පුන කප්පියකුටි හොති. ඉතරා පන ද්වෙ ගොපානසීමත්තං ඨපෙත්වා [Pg.382] සබ්බස්මිං ඡදනෙ විනට්ඨෙ ජහිතවත්ථුකා හොන්ති. සචෙ ගොපානසීනං උපරි එකම්පි පක්ඛපාසකමණ්ඩලං අත්ථි, රක්ඛති. गोनिसादिता कुटि चहारदीवारी आदि से घेर दिए जाने पर अपना आधार खो देती है। फिर उस आराम में कप्पियकुटि प्राप्त करना उचित है। यदि फिर से चहारदीवारी आदि कहीं-कहीं से टूट जाए और वहाँ से गायें प्रवेश करने लगें, तो वह फिर से कप्पियकुटि हो जाती है। अन्य दो (गहपति और सम्मति) कुटियाँ कड़ियाँ (rafters) मात्र छोड़कर पूरा छप्पर नष्ट हो जाने पर अपना आधार खो देती हैं। यदि कड़ियों के ऊपर एक भी बाँस का घेरा (pakkhapāsaka-maṇḍala) बचा हो, तो वह कुटि की रक्षा करता है। යත්ර පනිමා චතස්සොපි කප්පියභූමියො නත්ථි, තත්ථ කිං කාතබ්බං? අනුපසම්පන්නස්ස දත්වා තස්ස සන්තකං කත්වා පරිභුඤ්ජිතබ්බං. තත්රිදං වත්ථු – කරවිකතිස්සත්ථෙරො කිර විනයධරපාමොක්ඛො මහාසීවත්ථෙරස්ස සන්තිකං අගමාසි. සො දීපාලොකෙන සප්පිකුම්භං පස්සිත්වා ‘‘භන්තෙ කිමෙත’’න්ති පුච්ඡි. ථෙරො ‘‘ආවුසො ගාමතො සප්පිකුම්භො ආභතො, ලූඛදිවසෙ සප්පිනා භුඤ්ජනත්ථායා’’ති ආහ. තතො නං තිස්සත්ථෙරො ‘‘න වට්ටති භන්තෙ’’ති ආහ. ථෙරො පුනදිවසෙ පමුඛෙ නික්ඛිපාපෙසි. තිස්සත්ථෙරො පුන එකදිවසෙ ආගතො තං දිස්වා තථෙව පුච්ඡිත්වා ‘‘භන්තෙ සහසෙය්යප්පහොනකට්ඨානෙ ඨපෙතුං න වට්ටතී’’ති ආහ. ථෙරො පුනදිවසෙ බහි නීහරාපෙත්වා නික්ඛිපාපෙසි, තං චොරා හරිංසු. සො පුන එකදිවසං ආගතං තිස්සත්ථෙරං ආහ – ‘‘ආවුසො තයා ‘න වට්ටතී’ති වුත්තො සො කුම්භො බහි නික්ඛිත්තො චොරෙහි අවහතො’’ති. තතො නං තිස්සත්ථෙරො ආහ – ‘‘නනු භන්තෙ අනුපසම්පන්නස්ස දාතබ්බො අස්ස, අනුපසම්පන්නස්ස හි දත්වා තස්ස සන්තකං කත්වා පරිභුඤ්ජිතුං වට්ටතී’’ති. जहाँ ये चारों कप्पिय-भूमियाँ (अनुमत स्थान) नहीं हैं, वहाँ क्या करना चाहिए? किसी अनुपसम्पन्न (गृहस्थ या सामणेर) को देकर, उसे उसकी संपत्ति बनाकर उपयोग करना चाहिए। यहाँ यह कथा है - विनयधरों में प्रमुख करविक तिस्स थेर, महासीव थेर के पास गए। उन्होंने दीपक के प्रकाश में घी का घड़ा देखकर पूछा, "भन्ते, यह क्या है?" थेर ने कहा, "आयुष्मन्, गाँव से घी का घड़ा लाया गया है, ताकि रूखे दिनों में घी के साथ भोजन किया जा सके।" तब तिस्स थेर ने उनसे कहा, "भन्ते, यह उचित नहीं है।" अगले दिन थेर ने उसे बरामदे (मुखमण्डप) में रखवा दिया। तिस्स थेर फिर एक दिन आए और उसे देखकर वैसे ही पूछा और कहा, "भन्ते, साथ सोने के योग्य स्थान पर इसे रखना उचित नहीं है।" अगले दिन थेर ने उसे बाहर निकलवा कर रखवा दिया, जिसे चोर ले गए। फिर एक दिन आए हुए तिस्स थेर से उन्होंने कहा - "आयुष्मन्, तुम्हारे द्वारा 'उचित नहीं है' कहे जाने पर वह घड़ा बाहर रखा गया और चोरों द्वारा चुरा लिया गया।" तब तिस्स थेर ने उनसे कहा - "भन्ते, क्या वह किसी अनुपसम्पन्न को नहीं दिया जाना चाहिए था? क्योंकि अनुपसम्पन्न को देकर, उसे उसकी संपत्ति बनाकर उपयोग करना उचित है।" 296-9. මෙණ්ඩකවත්ථු උත්තානමෙව. අපි චෙත්ථ අනුජානාමි භික්ඛවෙ පඤ්ච ගොරසෙති ඉමෙ පඤ්ච ගොරසෙ විසුං පරිභොගෙන පරිභුඤ්ජිතුම්පි අනුජානාමීති අත්ථො. පාථෙය්යං පරියෙසිතුන්ති එත්ථ සචෙ කෙචි සයමෙව ඤත්වා දෙන්ති, ඉච්චෙතං කුසලං; නො චෙ දෙන්ති, ඤාතිපවාරිතට්ඨානතො වා භික්ඛාචාරවත්තෙන වා පරියෙසිතබ්බං. තථා අලභන්තෙන අඤ්ඤාතිකඅපවාරිතට්ඨානතො යාචිත්වාපි ගහෙතබ්බං. එකදිවසෙන ගමනීයෙ මග්ගෙ එකභත්තත්ථාය පරියෙසිතබ්බං. දීඝෙ අද්ධානෙ යත්තකෙන කන්තාරං නිත්ථරති, තත්තකං පරියෙසිතබ්බං. २९६-९. मेण्डक की कथा स्पष्ट ही है। और यहाँ "भिक्षुओं, मैं पाँच गोरसों की अनुमति देता हूँ" - इसका अर्थ है कि इन पाँच गोरसों को अलग-अलग उपभोग के रूप में उपयोग करने की भी अनुमति देता हूँ। "पाथेय (यात्रा के लिए भोजन) खोजना" - यहाँ यदि कुछ लोग स्वयं जानकर देते हैं, तो वह अच्छा है; यदि वे नहीं देते हैं, तो रिश्तेदारों या निमन्त्रण देने वालों के स्थान से अथवा भिक्षाटन के नियम से खोजना चाहिए। उसी प्रकार, न मिलने पर, जो रिश्तेदार नहीं हैं या जिन्होंने निमन्त्रण नहीं दिया है, उनसे भी माँगकर ग्रहण करना चाहिए। एक दिन में तय होने वाले मार्ग के लिए एक समय के भोजन के लिए खोजना चाहिए। लम्बी यात्रा में जितने भोजन से दुर्गम मार्ग पार किया जा सके, उतना खोजना चाहिए। කෙණියජටිලවත්ථුකථා केणिय जटिल की कथा। 300. කාජෙහි ගාහාපෙත්වාති පඤ්චහි කාජසතෙහි සුසඞ්ඛතස්ස බදරපානස්ස කුටසහස්සං ගාහාපෙත්වා. එතස්මිං නිදානෙ එතස්මිං පකරණෙ ධම්මිං කථං කත්වාති ‘‘සාධු භික්ඛවෙ පානං අපිවන්තා සමණස්ස ගොතමස්ස [Pg.383] සාවකා පච්චයබාහුල්ලිකාති වාදං න උප්පාදයිත්ථ, මයි ච ගාරවං අකත්ථ, මම ච තුම්හෙසු ගාරවං ජනයිත්ථ, ඉති වො අහං ඉමිනා කාරණෙන සුට්ඨු පසන්නො’’තිආදිනා නයෙන ධම්මිං කථං කත්වා අනුජානාමි භික්ඛවෙ අට්ඨ පානානීතිආදිමාහ. ३००. ३००. "काँवरों (भार-यष्टियों) से ग्रहण करवाकर" का अर्थ है - पाँच सौ काँवरों द्वारा अच्छी तरह तैयार किए गए बेर के शरबत के एक हजार घड़ों को ग्रहण करवाकर। "इस निदान में, इस प्रकरण में धम्म-कथा करके" का अर्थ है - "भिक्षुओं, साधु! साधु! शरबत न पीते हुए आप श्रमण गौतम के श्रावक 'प्रत्यय-बाहुल्लिक' (परिष्कारों के लोभी) हैं, ऐसा विवाद उत्पन्न नहीं होने दिया, और मुझमें गौरव किया, और मेरे मन में आपके प्रति गौरव उत्पन्न किया, इसलिए मैं इस कारण से आप पर बहुत प्रसन्न हूँ" - इस प्रकार के नय से धम्म-कथा करके "भिक्षुओं, मैं आठ प्रकार के शरबतों की अनुमति देता हूँ" आदि कहा। තත්ථ අම්බපානන්ති ආමෙහි වා පක්කෙහි වා අම්බෙහි කතපානං. තත්ථ ආමෙහි කරොන්තෙන අම්බතරුණානි භින්දිත්වා උදකෙ පක්ඛිපිත්වා ආතපෙ ආදිච්චපාකෙන පචිත්වා පරිස්සාවෙත්වා තදහුපටිග්ගහිතෙහි මධුසක්කරකප්පූරාදීහි යොජෙත්වා කාතබ්බං. එවං කතං පුරෙභත්තමෙව කප්පති. අනුපසම්පන්නෙහි කතං ලභිත්වා පන පුරෙභත්තං පටිග්ගහිතං පුරෙභත්තං සාමිසපරිභොගෙනාපි වට්ටති, පච්ඡාභත්තං නිරාමිසපරිභොගෙන යාව අරුණුග්ගමනා වට්ටතියෙව. එස නයො සබ්බපානෙසු. वहाँ "अम्बपान" का अर्थ है - कच्चे या पके आमों से बनाया गया शरबत। वहाँ कच्चे आमों से बनाने वाले को चाहिए कि वह कच्चे आमों को काटकर या कुचलकर पानी में डालकर धूप में सूर्य की गर्मी से पकाकर, छानकर, उसी दिन ग्रहण किए गए शहद, शक्कर, कपूर आदि के साथ मिलाकर बनाए। इस प्रकार बनाया गया शरबत पूर्वाह्न (दोपहर से पहले) में ही कल्प्य (उचित) है। किन्तु अनुपसम्पन्न द्वारा बनाए गए शरबत को प्राप्त कर, यदि वह पूर्वाह्न में ग्रहण किया गया हो, तो पूर्वाह्न में आमिष (भोजन) के साथ भी उचित है, और अपराह्न (दोपहर के बाद) में बिना आमिष के अरुणोदय (अगले दिन की भोर) तक उचित ही है। यही नियम सभी शरबतों के लिए है। තෙසු පන ජම්බුපානන්ති ජම්බුඵලෙහි කතපානං. චොචපානන්ති අට්ඨිකෙහි කදලිඵලෙහි කතපානං. මොචපානන්ති අනට්ඨිකෙහි කදලිඵලෙහි කතපානං. මධුකපානන්ති මධුකානං ජාතිරසෙන කතපානං; තං පන උදකසම්භින්නං වට්ටති, සුද්ධං න වට්ටති. මුද්දිකපානන්ති මුද්දිකා උදකෙ මද්දිත්වා අම්බපානං විය කතපානං. සාලූකපානන්ති රත්තුප්පලනීලුප්පලාදීනං සාලූකෙ මද්දිත්වා කතපානං. ඵාරුසකපානන්ති ඵාරුසකඵලෙහි අම්බපානං විය කතපානං. ඉමානි අට්ඨ පානානි සීතානිපි ආදිච්චපාකානිපි වට්ටන්ති, අග්ගිපාකානි න වට්ටන්ති. ධඤ්ඤඵලරසන්ති සත්තන්නං ධඤ්ඤානං ඵලරසං. ඩාකරසන්ති පක්කඩාකරසං. යාවකාලිකපත්තානඤ්හි පුරෙභත්තංයෙව රසො කප්පති. යාවජීවිකානං පටිග්ගහෙත්වා ඨපිතසප්පිආදීහි සද්ධිං පක්කානං සත්තාහං කප්පති. සචෙ පන සුද්ධඋදකෙන පචති, යාවජීවම්පි වට්ටති. ඛීරාදීහි පන සද්ධිං පචිතුං න වට්ටති. අඤ්ඤෙහි පක්කම්පි ඩාකරසසඞ්ඛ්යමෙව ගච්ඡති. කුරුන්දියං පන ‘‘යාවකාලිකපත්තානම්පි සීතොදකෙන මද්දිත්වා කතරසො වා ආදිච්චපාකො වා වට්ටතී’’ති වුත්තං. ඨපෙත්වා මධුකපුප්ඵරසන්ති එත්ථ මධුකපුප්ඵරසො අග්ගිපාකො වා හොතු ආදිච්චපාකො වා, පච්ඡාභත්තං න වට්ටති. පුරෙභත්තම්පි යං පානං ගහෙත්වා මජ්ජං කරොන්ති, සො ආදිතො පට්ඨාය න වට්ටති. මධුකපුප්ඵං පන අල්ලං වා සුක්ඛං වා භජ්ජිතං වා තෙන කතඵාණිතං වා යතො පට්ඨාය මජ්ජං න කරොන්ති, තං සබ්බං පුරෙභත්තං වට්ටති. උච්ඡුරසො නිකසටො පච්ඡාභත්තං වට්ටති[Pg.384]. ඉති පානානි අනුජානන්තෙන ඉමෙපි චත්තාරො රසා අනුඤ්ඤාතාති. අග්ගිහුත්තමුඛා යඤ්ඤාතිආදීසු අග්ගිහුතං සෙට්ඨං, අග්ගිහුතං මුඛන්ති වුත්තං හොති. उनमें से "जम्बुपान" का अर्थ है - जामुन के फलों से बनाया गया शरबत। "चोचपान" का अर्थ है - बीजों वाले जंगली केलों के फलों से बनाया गया शरबत। "मोचपान" का अर्थ है - बिना बीज वाले केलों के फलों से बनाया गया शरबत। "मधुकपान" का अर्थ है - महुआ के फलों के प्राकृतिक रस से बनाया गया शरबत; वह पानी के साथ मिश्रित होने पर उचित है, शुद्ध उचित नहीं है। "मुद्दिकापान" का अर्थ है - मुनक्कों को पानी में मसलकर अम्बपान की तरह बनाया गया शरबत। "सालुकपान" का अर्थ है - लाल कमल, नील कमल आदि के कन्दों को मसलकर बनाया गया शरबत। "फारुसकपान" का अर्थ है - फालसा के फलों से अम्बपान की तरह बनाया गया शरबत। ये आठों शरबत ठंडे हों या सूर्य की गर्मी से पकाए गए हों, उचित हैं; अग्नि से पकाए गए उचित नहीं हैं। "धञ्ञफलरस" का अर्थ है - सात प्रकार के धान्य (अनाज) के फलों का रस। "डाकरस" का अर्थ है - पकाए गए साग का रस। क्योंकि यावकालिक पत्तों का रस पूर्वाह्न में ही उचित है। यावजीविक वस्तुओं के साथ, जैसे ग्रहण करके रखे गए घी आदि के साथ पकाए गए पत्तों का रस सात दिनों तक उचित है। यदि केवल शुद्ध जल के साथ पकाता है, तो वह जीवनभर भी उचित है। किन्तु दूध आदि के साथ पकाना उचित नहीं है। अन्य यावकालिक वस्तुओं के साथ पकाए जाने पर भी वह 'डाकरस' की श्रेणी में ही आता है। कुरुन्दी में कहा गया है - "यावकालिक पत्तों का भी ठंडे पानी से मसलकर बनाया गया रस या सूर्य की गर्मी से पकाया गया रस उचित है।" "मधुकपुप्फरस को छोड़कर" - यहाँ महुआ के फूलों का रस चाहे अग्नि से पकाया गया हो या सूर्य की गर्मी से, वह अपराह्न में उचित नहीं है। पूर्वाह्न में भी जिस रस को लेकर मदिरा बनाई जाती है, वह आरम्भ से ही उचित नहीं है। किन्तु महुआ का फूल चाहे ताजा हो, सूखा हो या भुना हुआ हो, उससे बनाया गया फाणित जब से मदिरा बनाने के काम में नहीं लिया जाता, तब से वह सब पूर्वाह्न में उचित है। गन्ने का रस यदि बिना तलछट हो, तो अपराह्न में उचित है। इस प्रकार शरबतों की अनुमति देते हुए बुद्ध ने इन चार रसों की भी अनुमति दी है - ऐसा समझना चाहिए। "अग्गिहुत्तमुखा यञ्ञा" आदि गाथाओं में "अग्निहोत्र श्रेष्ठ है, अग्निहोत्र मुख्य है" - ऐसा कहा गया है। රොජමල්ලාදිවත්ථුකථා रोज मल्ल आदि की कथा। 301-2. රොජවත්ථු උත්තානත්ථමෙව. තත්ථ සඞ්කරං අකංසූති කතිකං අකංසු. උළාරං ඛො තෙ ඉදන්ති සුන්දරං ඛො තෙ ඉදං. නාහං භන්තෙ ආනන්ද බහුකතොති නාහං බුද්ධාදිගතපසාදබහුමානෙන ඉධාගතොති දස්සෙති. සබ්බඤ්ච ඩාකන්ති සප්පිආදීහි පක්කං වා අපක්කං වා යංකිඤ්චි ඩාකං. පිට්ඨඛාදනීයන්ති පිට්ඨමයං ඛාදනීයං; රොජො කිර ඉදං උභයම්පි සතසහස්සං වයං කත්වා පටියාදාපෙසි. ३०१-२. रोजवत्थु (रोज की कथा) का अर्थ स्पष्ट ही है। वहाँ 'संकरं अकंसु' का अर्थ है—उन्होंने प्रतिज्ञा (समझौता) की। 'उळारं खो ते इदं' का अर्थ है—तुम्हारा यह (बुद्ध का स्वागत करना) श्रेष्ठ है। 'नाहं भन्ते आनन्द बहुकतो' के माध्यम से वह यह दर्शाता है कि—"हे भन्ते आनन्द! मैं बुद्ध आदि के प्रति उत्पन्न श्रद्धा और अत्यधिक सम्मान के कारण यहाँ नहीं आया हूँ।" 'सब्बञ्च डाकं' का अर्थ है—घी आदि के साथ पकाया हुआ या बिना पकाया हुआ कोई भी साग। 'पिट्ठखादनीयं' का अर्थ है—आटे से बना हुआ खाद्य पदार्थ। कहा जाता है कि रोज ने इन दोनों (साग और आटे के खाद्य) के लिए एक लाख (मुद्राएँ) व्यय करके इन्हें तैयार करवाया था। 303. මඤ්ජුකාති මධුරවචනා. පටිභානෙය්යකාති සකෙ සිප්පෙ පටිභානසම්පන්නා. දක්ඛාති ඡෙකා, අනලසා වා. පරියොදාතසිප්පාති නිද්දොසසිප්පා. නාළියාවාපකෙනාති නාළියා ච ආවාපකෙන ච. ආවාපකො නාම යත්ථ ලද්ධං ලද්ධං ආවපන්ති, පක්ඛිපන්තීති වුත්තං හොති. න ච භික්ඛවෙ නහාපිතපුබ්බෙන ඛුරභණ්ඩන්ති එත්ථ ගහෙත්වා පරිහරිතුමෙව න වට්ටති, අඤ්ඤස්ස සන්තකෙන කෙසෙ ඡෙදෙතුං වට්ටති. සචෙ වෙතනං ගහෙත්වා ඡින්දති, න වට්ටති. යො අනහාපිතපුබ්බො තස්ස පරිහරිතුම්පි වට්ටති, තං වා අඤ්ඤං වා ගහෙත්වා කෙසෙ ඡෙදෙතුම්පි වට්ටති. ३०३. 'मञ्जुका' का अर्थ है—मधुर बोलने वाले। 'पटिभानेय्यका' का अर्थ है—अपने शिल्प (नाई के कार्य) में प्रतिभा-सम्पन्न (बुद्धिमान)। 'दक्खा' का अर्थ है—चतुर या आलस्य रहित। 'परियोदातसिप्पा' का अर्थ है—निर्दोष शिल्प वाले। 'नाळियावापकेन' का अर्थ है—नाली (छोटी नली/पात्र) और आवापक (झोली/बर्तन) के साथ। 'आवापक' उसे कहते हैं जहाँ प्राप्त हुई वस्तुओं को रखा जाता है। "भिक्षुओं, पूर्व में नाई रहे व्यक्ति को उस्तरा आदि (क्षुरभाण्ड) नहीं रखना चाहिए"—यहाँ स्वयं का मानकर साथ लेकर चलना उचित नहीं है, किन्तु दूसरे के उस्तरे से बाल काटना उचित है। यदि वह शुल्क लेकर बाल काटता है, तो यह उचित नहीं है। जो व्यक्ति पहले नाई नहीं था, उसके लिए (उस्तरा आदि) साथ रखना भी उचित है और अपने या दूसरे के उस्तरे से बाल काटना भी उचित है। 304. භාගං දත්වාති දසමභාගං දත්වා; ඉදං කිර ජම්බුදීපෙ පොරාණකචාරිත්තං, තස්මා දසකොට්ඨාසෙ කත්වා එකො කොට්ඨාසො භූමිසාමිකානං දාතබ්බො. ३०४. 'भागं दत्वा' का अर्थ है—दसवाँ भाग देकर। कहा जाता है कि जम्बुद्वीप में यह प्राचीन परम्परा थी, इसलिए दस भाग करके एक भाग भूमि के स्वामियों को देना चाहिए। චතුමහාපදෙසකථා चतुर्महापदेश कथा 305. යං භික්ඛවෙ මයා ඉදං න කප්පතීති ඉමෙ චත්තාරො මහාපදෙසෙ භගවා භික්ඛූනං නයග්ගහණත්ථාය ආහ. තත්ථ ධම්මසඞ්ගාහකත්ථෙරා සුත්තං ගහෙත්වා පරිමද්දන්තා ඉදං අද්දසංසු. ඨපෙත්වා ධඤ්ඤඵලරසන්ති සත්තධඤ්ඤරසානි පච්ඡාභත්තං න කප්පන්තීති පටික්ඛිත්තානි. තාලනාළිකෙරපනසලබුජඅලාබුකුම්භණ්ඩපුස්සඵලතිපුසඵලඑළාලුකානි, නව මහාඵලානි සබ්බඤ්ච අපරණ්ණං, ධඤ්ඤගතිකමෙව. තං කිඤ්චාපි න පටික්ඛිත්තං, අථ ඛො අකප්පියං අනුලොමෙති, තස්මා පච්ඡාභත්තං න කප්පති. අට්ඨ [Pg.385] පානානි අනුඤ්ඤාතානි. අවසෙසානි වෙත්තතින්තිණිකමාතුලුඞ්ගකපිත්ථකොසම්බකරමන්දාදිඛුද්දකඵලපානානි අට්ඨපානගතිකානෙව, තානි කිඤ්චාපි න අනුඤ්ඤාතානි, අථ ඛො කප්පියං අනුලොමෙන්ති, තස්මා කප්පන්ති. ඨපෙත්වා හි සානුලොමං ධඤ්ඤඵලරසං අඤ්ඤං ඵලපානං නාම අකප්පියං නත්ථි, සබ්බං යාමකාලිකංයෙවාති කුරුන්දියං වුත්තං. ३०५. "भिक्षुओं, जो मेरे द्वारा यह नहीं कल्पित (अयोग्य) है..."—भगवान ने भिक्षुओं को विधि समझाने के लिए ये चार महाप्रदेश कहे हैं। वहाँ धम्म-संग्राहक स्थविरों ने पालि को लेकर विचार-मंथन करते हुए यह देखा। 'ठपेत्वा धञ्ञफलरसं' के अनुसार सात प्रकार के धान्य-रस (अनाज के रस) विकाल (दोपहर के बाद) में कल्पित नहीं हैं, ऐसा निषेध किया गया है। ताड़, नारियल, कटहल, बड़हल, लौकी, कुम्हड़ा, ककड़ी, खीरा और पेठा—ये नौ महाफल और सभी दलहन (अपरण्ण) धान्य के समान ही हैं। यद्यपि इनका सीधा निषेध नहीं किया गया है, फिर भी ये अकल्पित (अयोग्य) के अनुकूल हैं, इसलिए दोपहर के बाद कल्पित नहीं हैं। आठ प्रकार के पान (पेय) अनुमत हैं। शेष—बेंत, इमली, बिजौरा नींबू, कैथ, कोसंबा, करौंदा आदि छोटे फलों के रस उन आठ पेयों के समान ही हैं; यद्यपि वे सीधे अनुमत नहीं हैं, फिर भी वे कल्पित के अनुकूल हैं, इसलिए कल्पित (योग्य) हैं। वास्तव में, धान्य-रस को छोड़कर अन्य कोई फल-रस अकल्पित नहीं है; सभी 'यामकालिक' ही हैं—ऐसा कुरुन्दी (अट्ठकथा) में कहा गया है। භගවතා ඡ චීවරානි අනුඤ්ඤාතානි. ධම්මසඞ්ගාහකත්ථෙරෙහි තෙසං අනුලොමානි දුකූලං, පත්තුණ්ණං, චීනපට්ටං, සොමාරපට්ටං, ඉද්ධිමයිකං, දෙවදත්තියන්ති අපරානි ඡ අනුඤ්ඤාතානි. තත්ථ ‘‘පත්තුණ්ණ’’න්ති පත්තුණ්ණදෙසෙ පාණකෙහි සඤ්ජාතවත්ථං. ද්වෙ පටා දෙසනාමෙනෙව වුත්තා. තානි තීණි කොසෙය්යස්සානුලොමානි. දුකූලං සාණස්ස, ඉතරානි ද්වෙ කප්පාසිකස්ස වා සබ්බෙසං වා. भगवान ने छह प्रकार के चीवरों की अनुमति दी थी। धम्म-संग्राहक स्थविरों ने उनके अनुकूल छह अन्य चीवरों की अनुमति दी—दुकूल (रेशमी वस्त्र), पत्तुण्ण, चीनपट्ट (चीनी रेशम), सोमारपट्ट, इद्धिमयिक (ऋद्धि-निर्मित) और देवदत्तिय (देवताओं द्वारा प्रदत्त)। वहाँ 'पत्तुण्ण' का अर्थ है—पत्तुण्ण देश में कीड़ों से उत्पन्न होने वाला वस्त्र। दो वस्त्रों (चीनपट्ट और सोमारपट्ट) के नाम उनके देशों के आधार पर कहे गए हैं। ये तीन (पत्तुण्ण, चीनपट्ट, सोमारपट्ट) रेशमी वस्त्र (कोसेय्य) के अनुकूल हैं। दुकूल सन (साण) के वस्त्र के अनुकूल है। शेष दो (इद्धिमयिक और देवदत्तिय) सूती (कप्पासिक) या सभी छह प्रकार के चीवरों के अनुकूल हैं। භගවතා එකාදස පත්තෙ පටික්ඛිපිත්වා ද්වෙ පත්තා අනුඤ්ඤාතා – ලොහපත්තො චෙව මත්තිකාපත්තො ච. ලොහථාලකං, මත්තිකාථාලකං, තම්බලොහථාලකන්ති තෙසංයෙව අනුලොමානි. භගවතා තයො තුම්බා අනුඤ්ඤාතා – ලොහතුම්බො, කට්ඨතුම්බො, ඵලතුම්බොති. කුණ්ඩිකා, කඤ්චනකො, උදකතුම්බොති තෙසංයෙව අනුලොමානි. කුරුන්දියං පන ‘‘පානීයසඞ්ඛපානීයසරාවකානි එතෙසං අනුලොමානී’’ති වුත්තං. පට්ටිකා, සූකරන්තන්ති ද්වෙ කායබන්ධනානි අනුඤ්ඤාතානි, දුස්සපට්ටෙන රජ්ජුකෙන ච කතකායබන්ධනානි තෙසං අනුලොමානි. සෙතච්ඡත්තං, කිලඤ්ජච්ඡත්තං, පණ්ණච්ඡත්තන්ති තීණි ඡත්තානි අනුඤ්ඤාතානි. එකපණ්ණච්ඡත්තං තෙසංයෙව අනුලොමන්ති ඉමිනා නයෙන පාළිඤ්ච අට්ඨකථඤ්ච අනුපෙක්ඛිත්වා අඤ්ඤානිපි කප්පියාකප්පියානං අනුලොමානි වෙදිතබ්බානි. भगवान ने ग्यारह प्रकार के पात्रों का निषेध कर दो प्रकार के पात्रों की अनुमति दी—लोह-पात्र (लोहे का) और मृत्तिका-पात्र (मिट्टी का)। लोहे की कटोरी, मिट्टी की कटोरी और ताँबे की कटोरी—ये उन्हीं (पात्रों) के अनुकूल हैं। भगवान ने तीन प्रकार के तुम्बों (पात्र/डिब्बे) की अनुमति दी—लोह-तुम्ब, काष्ठ-तुम्ब और फल-तुम्ब। कुण्डिका (कमंडल), कञ्चनक (तसला/बर्तन) और जल-तुम्ब—ये उन्हीं के अनुकूल हैं। कुरुन्दी में कहा गया है कि—"पानी पीने का शंख और पानी पीने का सरावक (सकोरा) इनके अनुकूल हैं।" पट्टिका और सूकरन्त—इन दो प्रकार के काय-बन्धन (कमरबंद) की अनुमति दी गई है; कपड़े की पट्टी और रस्सी से बने काय-बन्धन इनके अनुकूल हैं। श्वेत-छत्र, चटाई का छत्र और पत्तों का छत्र—इन तीन छत्रों की अनुमति दी गई है। एक पत्ते वाला छत्र उन्हीं के अनुकूल है। इस प्रकार पालि और अट्ठकथा का अनुशीलन करके अन्य कल्पित और अकल्पित वस्तुओं के अनुकूल वस्तुओं को जानना चाहिए। තදහුපටිග්ගහිතං කාලෙ කප්පතීතිආදි සබ්බං සම්භින්නරසං සන්ධාය වුත්තං. සචෙ හි ඡල්ලිම්පි අනපනෙත්වා සකලෙනෙව නාළිකෙරඵලෙන සද්ධිං පානකං පටිග්ගහිතං හොති, නාළිකෙරං අපනෙත්වා තං විකාලෙපි කප්පති. උපරි සප්පිපිණ්ඩං ඨපෙත්වා සීතලපායාසං දෙන්ති, යං පායාසෙන අසංසට්ඨං සප්පි, තං අපනෙත්වා සත්තාහං පරිභුඤ්ජිතුං වට්ටති. බද්ධමධුඵාණිතාදීසුපි එසෙව නයො. තක්කොලජාතිඵලාදීහි අලඞ්කරිත්වා පිණ්ඩපාතං දෙන්ති, තානි උද්ධරිත්වා ධොවිත්වා යාවජීවං පරිභුඤ්ජිතබ්බානි. යාගුයං පක්ඛිපිත්වා දින්නසිඞ්ගිවෙරාදීසුපි තෙලාදීසු පක්ඛිපිත්වා දින්නලට්ඨිමධුකාදීසුපි එසෙව නයො. එවං යං යං අසම්භින්නරසං හොති, තං තං එකතො පටිග්ගහිතම්පි යථා [Pg.386] සුද්ධං හොති, තථා ධොවිත්වා වා තච්ඡෙත්වා වා තස්ස තස්ස කාලවසෙන පරිභුඤ්ජිතුං වට්ටති. "उसी दिन ग्रहण किया हुआ काल (समय) में कल्पित है" आदि सब कुछ मिश्रित रस (स्वाद) के सन्दर्भ में कहा गया है। यदि छिलका उतारे बिना पूरे नारियल के साथ पेय ग्रहण किया गया हो, तो नारियल को हटा देने पर वह (पेय) विकाल में भी कल्पित है। ठंडी खीर (पायस) के ऊपर घी का पिण्ड रखकर दान देते हैं; जो घी खीर के साथ मिश्रित नहीं हुआ है, उसे हटाकर सात दिनों तक उपयोग करना उचित है। शहद, गुड़ आदि के विषय में भी यही विधि है। कक्कोल, जायफल आदि से सजाकर पिण्डपात (भोजन) देते हैं; उन्हें (भोजन से) निकालकर और धोकर जीवनभर (यावजीविक) उपयोग किया जा सकता है। यवागू (कांजी/लप्सी) में डाले गए अदरक आदि के विषय में, तथा तेल आदि में डाले गए मुलेठी आदि के विषय में भी यही विधि है। इस प्रकार, जो-जो वस्तुएँ अमिश्रित रस वाली होती हैं, उन्हें एक साथ ग्रहण करने पर भी, जिस प्रकार वे शुद्ध हो जाएँ, वैसे धोकर या (मिश्रित भाग को) छीलकर, उस-उस (यामकालिक, सप्ताहकालिक, यावजीविक) वस्तु के काल के अनुसार उपयोग करना उचित है। සචෙ පන සම්භින්නරසං හොති සංසට්ඨං, න වට්ටති. යාවකාලිකඤ්හි අත්තනා සද්ධිං සම්භින්නරසානි තීණිපි යාමකාලිකාදීනි අත්තනො සභාවං උපනෙති, යාමකාලිකං ද්වෙපි සත්තාහකාලිකාදීනි අත්තනො සභාවං උපනෙති, සත්තාහකාලිකම්පි අත්තනා සද්ධිං සංසට්ඨං යාවජීවිකං අත්තනො සභාවඤ්ඤෙව උපනෙති; තස්මා තෙන තදහුපටිග්ගහිතෙන සද්ධිං තදහුපටිග්ගහිතං වා පුරෙපටිග්ගහිතං වා යාවජීවිකං සත්තාහං කප්පති ද්වීහපටිග්ගහිතෙන ඡාහං, තීහපටිග්ගහිතෙන පඤ්චාහං…පෙ… සත්තාහපටිග්ගහිතෙන තදහෙව කප්පතීති වෙදිතබ්බං. තස්මායෙව හි ‘‘සත්තාහකාලිකෙන භික්ඛවෙ යාවජීවිකං තදහුපටිග්ගහිත’’න්ති අවත්වා ‘‘පටිග්ගහිතං සත්තාහං කප්පතී’’ති වුත්තං. यदि वह मिश्रित रस वाला (सम्भिन्नरस) और संसृष्ट (मिला हुआ) हो, तो वह उचित नहीं है। क्योंकि यावकालिक (वस्तु) अपने साथ मिश्रित रस वाली तीनों यामकालिक आदि वस्तुओं को अपने स्वभाव (यावकालिक) में ले आती है; यामकालिक (वस्तु) दोनों सत्ताहकालिक आदि को अपने स्वभाव में ले आती है; और सत्ताहकालिक भी अपने साथ संसृष्ट यावजीविक को अपने ही स्वभाव (सत्ताहकालिक) में ले आती है। इसलिए, उस दिन ग्रहण की गई उस (सत्ताहकालिक वस्तु) के साथ, उसी दिन ग्रहण की गई या पहले ग्रहण की गई यावजीविक वस्तु सात दिनों तक कल्प्य (उचित) होती है; दो दिन पहले ग्रहण की गई के साथ छह दिन, तीन दिन पहले ग्रहण की गई के साथ पाँच दिन... (पेय्यालम)... सात दिन पहले ग्रहण की गई के साथ उसी दिन तक कल्प्य होती है, ऐसा जानना चाहिए। इसीलिए भगवान ने यह न कहकर कि "हे भिक्षुओं, सत्ताहकालिक के साथ यावजीविक उसी दिन ग्रहण किया गया (होता है)", यह कहा कि "ग्रहण किया हुआ सात दिन तक कल्प्य है।" කාලයාමසත්තාහාතික්කමෙසු චෙත්ථ විකාලභොජනසන්නිධිභෙසජ්ජසික්ඛාපදානං වසෙන ආපත්තියො වෙදිතබ්බා. ඉමෙසු ච පන චතූසු කාලිකෙසු යාවකාලිකං යාමකාලිකන්ති ඉදමෙව ද්වයං අන්තොවුත්ථකඤ්චෙව සන්නිධිකාරකඤ්ච හොති, සත්තාහකාලිකඤ්ච යාවජීවිකඤ්ච අකප්පියකුටියං නික්ඛිපිතුම්පි වට්ටති, සන්නිධිම්පි න ජනෙතීති. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. और यहाँ काल (मध्याह्न), याम (रात्रि के प्रहर) और सात दिनों के बीत जाने पर विकालभोजन, सन्निधि (संग्रह) और भेषज शिक्षापदों के वश से आपत्तियाँ जाननी चाहिए। और इन चार कालिकों में से, यावकालिक और यामकालिक—ये दो ही 'अन्तोवुत्थक' (भीतर रखा हुआ) और 'सन्निधिकारक' (संग्रह दोष) उत्पन्न करने वाले होते हैं; सत्ताहकालिक और यावजीविक को अकल्प्य कुटी (अनुचित स्थान) में रखना भी उचित है और वे सन्निधि (दोष) उत्पन्न नहीं करते। शेष सभी स्थानों पर अर्थ स्पष्ट ही है। භෙසජ්ජක්ඛන්ධකවණ්ණනා නිට්ඨිතා. भेषज स्कन्धक की व्याख्या समाप्त हुई। 7. කථිනක්ඛන්ධකං ७. कठिन स्कन्धक। කථිනානුජානනකථා कठिन (चीवर) की अनुमति की कथा। 306. කථිනක්ඛන්ධකෙ [Pg.387] – පාවෙය්යකාති පාවෙය්යරට්ඨවාසිනො. පාවෙය්යං නාම කොසලෙසු පච්ඡිමදිසාභාගෙ රට්ඨං; තත්ථ වාසිනොති වුත්තං හොති. කොසලරඤ්ඤො එකපිතුකභාතූනං භද්දවග්ගියත්ථෙරානං එතං අධිවචනං. තෙසු සබ්බජෙට්ඨකො අනාගාමී, සබ්බපච්ඡිමකො සොතාපන්නො, එකොපි අරහා වා පුථුජ්ජනො වා නත්ථි. ආරඤ්ඤිකාති ධුතඞ්ගසමාදානවසෙන ආරඤ්ඤිකා; න අරඤ්ඤවාසමත්තෙන. පිණ්ඩපාතිකාදිභාවෙපි තෙසං එසෙව නයො. සීසවසෙන චෙතං වුත්තං. ඉමෙ පන තෙරසාපි ධුතඞ්ගානි සමාදායෙව වත්තන්ති. උදකසඞ්ගහෙති උදකෙන සඞ්ගහිතෙ ඝටිතෙ සංසට්ඨෙ; ථලෙ ච නින්නෙ ච එකොදකීභූතෙති අත්ථො. ३०६. कठिन स्कन्धक में—'पावेय्यका' का अर्थ है पावेय्य राष्ट्र के निवासी। पावेय्य कोसल देश के पश्चिमी भाग में स्थित एक राष्ट्र का नाम है; वहाँ के निवासियों को (पावेय्यका) कहा गया है। यह कोसल नरेश के एक ही पिता के पुत्र (भाई) भद्रवर्गीय स्थविरों का विशेषण है। उनमें सबसे ज्येष्ठ अनागामी थे, सबसे कनिष्ठ स्रोतापन्न थे; उनमें से एक भी न तो अर्हत् था और न ही पृथग्जन। 'आरञ्ञिका' का अर्थ है धुतंग समादान के वश से अरण्यवासी; केवल जंगल में रहने मात्र से नहीं। पिण्डपातिक आदि होने के विषय में भी यही न्याय (नियम) है। और यह (आरञ्ञिका आदि) प्रधानता के वश से कहा गया है। किन्तु ये (तीस भिक्षु) सभी तेरह धुतंगों को धारण कर उनका पालन करते थे। 'उदकसङ्गहे' का अर्थ है जल से घिरे हुए, सटे हुए या मिश्रित; स्थल और निम्न (गड्ढों) में एक ही जल (जलमग्न) हो जाने पर, यह अर्थ है। උදකචික්ඛල්ලෙති අක්කන්තඅක්කන්තට්ඨානෙ උදකචික්ඛල්ලො උට්ඨහිත්වා යාව ආනිසදා පහරති, ඊදිසෙ චික්ඛල්ලෙති අත්ථො. ඔකපුණ්ණෙහීති උදකපුණ්ණෙහි. තෙසං කිර චීවරානි ඝනානි, තෙසු පතිතං උදකං න පග්ඝරති ඝනත්තා පුටබද්ධං විය තිට්ඨති. තෙන වුත්තං – ‘‘ඔකපුණ්ණෙහි චීවරෙහී’’ති. ‘‘ඔඝපුණ්ණෙහී’’තිපි පාඨො. 'उदकचिक्खल्ले' का अर्थ है—जहाँ-जहाँ पैर रखा जाता था, वहाँ-वहाँ जल-मिश्रित कीचड़ उछलकर नितम्बों तक प्रहार करता था (लगता था); ऐसे कीचड़ में, यह अर्थ है। 'ओकपुण्णेहि' का अर्थ है जल से भरे हुए। उनके चीवर सघन (मोटे) थे, उन पर गिरा हुआ जल सघनता के कारण बाहर नहीं निकलता था, बल्कि पोटली में बँधे हुए के समान टिका रहता था। इसीलिए कहा गया—"जल से भरे हुए चीवरों के साथ"। 'ओघपुण्णेहि' ऐसा पाठ भी मिलता है। අවිවදමානා වස්සං වසිම්හාති එත්ථ ආගන්තුකට්ඨානෙ සෙනාසනඵාසුතාය අභාවෙන ච භගවතො දස්සනාලාභෙන උක්කණ්ඨිතතාය ච තෙ භික්ඛූ ඵාසුං න වසිංසු, තස්මා ‘‘අවිවදමානා ඵාසුකං වස්සං වසිම්හා’’ති නාවොචුං. ධම්මිං කථං කත්වාති භගවා තෙසං භික්ඛූනං අනමතග්ගියකථං කථෙසි. තෙ සබ්බෙපි කථාපරියොසානෙ අරහත්තං පාපුණිත්වා නිසින්නට්ඨානතොයෙව ආකාසෙ උප්පතිත්වා අගමංසු, තං සන්ධාය වුත්තං – ‘‘ධම්මිං කථං කත්වා’’ති. තතො භගවා ‘‘සචෙ කථිනත්ථාරො පඤ්ඤත්තො අභවිස්ස, එතෙ භික්ඛූ එකං චීවරං ඨපෙත්වා සන්තරුත්තරෙන ආගච්ඡන්තා න එවං කිලන්තා අස්සු, කථිනත්ථාරො ච නාමෙස සබ්බබුද්ධෙහි අනුඤ්ඤාතො’’ති චින්තෙත්වා කථිනත්ථාරං අනුජානිතුකාමො භික්ඛූ ආමන්තෙසි, ආමන්තෙත්වා ච පන ‘‘අනුජානාමි භික්ඛවෙ’’තිආදිමාහ. 'अविवदमाना वस्सं वसिम्हा' (बिना विवाद किए वर्षावास बिताया)—यहाँ नवागंतुक स्थान में शयनासन की असुविधा के कारण और भगवान के दर्शन न मिल पाने की उत्कंठा के कारण, वे भिक्षु सुखपूर्वक नहीं रह सके; इसलिए उन्होंने यह नहीं कहा कि "हमने सुखपूर्वक वर्षावास बिताया"। 'धम्मिं कथं कत्वा' (धार्मिक कथा करके)—भगवान ने उन भिक्षुओं को 'अनमतग्गिय' कथा सुनाई। वे सभी कथा के अंत में अर्हत् पद प्राप्त कर, अपने बैठने के स्थान से ही आकाश में उड़कर चले गए; उसी के संदर्भ में कहा गया—"धार्मिक कथा करके"। उसके बाद भगवान ने सोचा—"यदि कठिन-आस्तरण (कठिन की रस्म) प्रज्ञप्त होती, तो ये भिक्षु एक चीवर छोड़कर केवल दो चीवरों (अन्तरवासक और उत्तरासंग) के साथ आते हुए इतने थकित न होते; और यह कठिन-आस्तरण सभी बुद्धों द्वारा अनुमत है"—ऐसा सोचकर कठिन-आस्तरण की अनुमति देने की इच्छा से भिक्षुओं को आमंत्रित किया, और आमंत्रित कर "अनुजानामि भिक्खवे" (हे भिक्षुओं, मैं अनुमति देता हूँ) आदि कहा। තත්ථ [Pg.388] අත්ථතකථිනානං වොති නිපාතමත්තං වොකාරො; අත්ථතකථිනානන්ති අත්ථො. එවඤ්හි සති පරතො ‘‘සො නෙසං භවිස්සතී’’ති යුජ්ජති. අථ වා වොති සාමිවචනමෙවෙතං. සො නෙසන්ති එත්ථ පන සො චීවරුප්පාදො යෙ අත්ථතකථිනා, තෙසං භවිස්සතීති අත්ථො. वहाँ 'अत्थतकठिनानं वो' में 'वो' शब्द केवल एक निपात है; इसका अर्थ 'अत्थतकठिनानं' (जिनका कठिन बिछाया गया है, उन भिक्षुओं का) ही है। ऐसा होने पर ही आगे का वाक्य "सो नेसं भविस्सति" (वह उनका होगा) संगत होता है। अथवा, 'वो' यह षष्ठी विभक्ति (सामिवचन) ही है। 'सो नेसं' यहाँ 'सो' का अर्थ है वह चीवर की उत्पत्ति, जो कठिन बिछाने वाले भिक्षुओं की होगी, यह अर्थ है। තත්ථ අනාමන්තචාරොති යාව කථිනං න උද්ධරියති, තාව අනාමන්තෙත්වා චරණං කප්පිස්සති, චාරිත්තසික්ඛාපදෙන අනාපත්ති භවිස්සතීති අත්ථො. අසමාදානචාරොති තිචීවරං අසමාදාය චරණං; චීවරවිප්පවාසො කප්පිස්සතීති අත්ථො. ගණභොජනන්ති ගණභොජනම්පි කප්පිස්සති. යාවදත්ථචීවරන්ති යාවත්තකෙන චීවරෙන අත්ථො, තාවත්තකං අනධිට්ඨිතං අවිකප්පිතං කප්පිස්සතීති අත්ථො. යො ච තත්ථ චීවරුප්පාදොති තත්ථ කථිනත්ථතසීමායං මතකචීවරං වා හොතු සඞ්ඝං උද්දිස්ස දින්නං වා සඞ්ඝිකෙන තත්රුප්පාදෙන ආභතං වා, යෙන කෙනචි ආකාරෙන යං සඞ්ඝිකචීවරං උප්පජ්ජති, තං තෙසං භවිස්සතීති අත්ථො. वहाँ 'अनामन्तचारो' का अर्थ है—जब तक कठिन का उद्धार (समाप्ति) नहीं होता, तब तक बिना पूछे (आमंत्रित किए) विचरण करना कल्प्य होगा, चारित्र शिक्षापद से आपत्ति नहीं होगी, यह अर्थ है। 'असमादानचारो' का अर्थ है—तीनों चीवरों को साथ लिए बिना विचरण करना; चीवर-विप्रवास (चीवर से अलग रहना) कल्प्य होगा, यह अर्थ है। 'गणभोजनं' का अर्थ है—गणभोजन भी कल्प्य होगा। 'यावदत्थचीवरं' का अर्थ है—जितने चीवरों की आवश्यकता है, उतने चीवर बिना अधिष्ठान या बिना विकल्पन के भी कल्प्य होंगे, यह अर्थ है। 'यो च तत्थ चीवरुप्पादो' का अर्थ है—उस कठिन-आस्तरण की सीमा के भीतर चाहे मृतक-चीवर हो, या संघ को उद्देश्य कर दिया गया संघिक चीवर हो, या संघिक वस्तु से प्राप्त चीवर हो; जिस किसी भी प्रकार से जो संघिक चीवर उत्पन्न होता है, वह उन (कठिन बिछाने वाले भिक्षुओं) का होगा, यह अर्थ है। එවඤ්ච පන භික්ඛවෙ කථිනං අත්ථරිතබ්බන්ති එත්ථ කථිනත්ථාරං කෙ ලභන්ති, කෙ න ලභන්තීති? ගණනවසෙන තාව පච්ඡිමකොටියා පඤ්ච ජනා ලභන්ති, උද්ධං සතසහස්සම්පි, පඤ්චන්නං හෙට්ඨා න ලභන්ති. වුත්ථවස්සවසෙන පුරිමිකාය වස්සං උපගන්ත්වා පඨමපවාරණාය පවාරිතා ලභන්ති, ඡින්නවස්සා වා පච්ඡිමිකාය උපගතා වා න ලභන්ති, අඤ්ඤස්මිං විහාරෙ වුත්ථවස්සාපි න ලභන්තීති මහාපච්චරියං වුත්තං. පුරිමිකාය උපගතානං පන සබ්බෙ ගණපූරකා හොන්ති, ආනිසංසං න ලභන්ති, ආනිසංසො ඉතරෙසංයෙව හොති. සචෙ පුරිමිකාය උපගතා චත්තාරො වා හොන්ති තයො වා ද්වෙ වා එකො වා, ඉතරෙ ගණපූරකෙ කත්වා කථිනං අත්ථරිතබ්බං. අථ චත්තාරො භික්ඛූ උපගතා, එකො පරිපුණ්ණවස්සො සාමණෙරො, සො චෙ පච්ඡිමිකාය උපසම්පජ්ජති, ගණපූරකො චෙව හොති, ආනිසංසඤ්ච ලභති. තයො භික්ඛූ ද්වෙ සාමණෙරා, ද්වෙ භික්ඛූ තයො සාමණෙරා, එකො භික්ඛු චත්තාරො සාමණෙරාති එත්ථාපි එසෙව නයො. සචෙ පුරිමිකාය උපගතා කථිනත්ථාරකුසලා න හොන්ති, අත්ථාරකුසලා ඛන්ධකභාණකථෙරා පරියෙසිත්වා ආනෙතබ්බා. කම්මවාචං සාවෙත්වා කථිනං අත්ථරාපෙත්වා දානඤ්ච භුඤ්ජිත්වා ගමිස්සන්ති. ආනිසංසො පන ඉතරෙසංයෙව හොති. हे भिक्षुओं! 'इस प्रकार कठिन का आस्तरण करना चाहिए' - यहाँ कठिन-आस्तरण किसे प्राप्त होता है और किसे नहीं? संख्या के अनुसार, न्यूनतम सीमा पाँच व्यक्ति हैं जो इसे प्राप्त करते हैं, और ऊपर एक लाख तक भी; पाँच से कम होने पर प्राप्त नहीं होता। वर्षावास के अनुसार, जिन्होंने पूर्ववर्ती वर्षावास (पुरिमिका वस्स) में प्रवेश किया है और प्रथम प्रवारणा के दिन प्रवारणा की है, वे इसे प्राप्त करते हैं। जिनका वर्षावास खंडित हो गया है या जिन्होंने पश्चवर्ती वर्षावास (पच्छिमिका वस्स) में प्रवेश किया है, वे इसे प्राप्त नहीं करते। किसी अन्य विहार में वर्षावास व्यतीत करने वाले भी इसे प्राप्त नहीं करते - ऐसा महाप्रत्यय (महापच्चरी) में कहा गया है। पूर्ववर्ती वर्षावास में प्रवेश करने वाले सभी 'गणपूरक' (कोरम पूरा करने वाले) होते हैं, लेकिन उन्हें आनृशंस (लाभ) प्राप्त नहीं होता; आनृशंस केवल अन्यों को ही होता है। यदि पूर्ववर्ती वर्षावास में प्रवेश करने वाले चार, तीन, दो या एक हों, तो अन्यों को गणपूरक बनाकर कठिन का आस्तरण करना चाहिए। यदि चार भिक्षु और एक पूर्ण आयु वाला श्रमणेर वर्षावास में रहे हों, और वह (श्रमणेर) पश्चवर्ती काल में उपसंपदा प्राप्त कर ले, तो वह गणपूरक भी होता है और आनृशंस भी प्राप्त करता है। तीन भिक्षु और दो श्रमणेर, दो भिक्षु और तीन श्रमणेर, एक भिक्षु और चार श्रमणेर - यहाँ भी यही विधि है। यदि पूर्ववर्ती वर्षावास में रहने वाले कठिन-आस्तरण में कुशल न हों, तो आस्तरण में कुशल खन्धक-भाणक (खन्धक का पाठ करने वाले) स्थविरों को खोजकर लाना चाहिए। वे कम्मवाचा सुनाकर, कठिन का आस्तरण करवाकर और दान ग्रहण कर चले जाएँगे। किन्तु आनृशंस केवल अन्यों (स्थानीय भिक्षुओं) को ही प्राप्त होता है। කථිනං [Pg.389] කෙන දින්නං වට්ටති? යෙන කෙනචි දෙවෙන වා මනුස්සෙන වා පඤ්චන්නං වා සහධම්මිකානං අඤ්ඤතරෙන දින්නං වට්ටති. කථිනදායකස්ස වත්තං අත්ථි, සචෙ සො තං අජානන්තො පුච්ඡති – ‘‘භන්තෙ කථං කථිනං දාතබ්බ’’න්ති තස්ස එවං ආචික්ඛිතබ්බං – ‘‘තිණ්ණං චීවරානං අඤ්ඤතරප්පහොනකං සූරියුග්ගමනසමයෙ වත්ථං ‘කථිනචීවරං දෙමා’ති දාතුං වට්ටති, තස්ස පරිකම්මත්ථං එත්තකා නාම සූචියො, එත්තකං සුත්තං, එත්තකං රජනං, පරිකම්මං කරොන්තානං එත්තකානං භික්ඛූනං යාගුභත්තඤ්ච දාතුං වට්ටතී’’ති. कठिन किसके द्वारा दिया गया मान्य होता है? किसी भी देव या मनुष्य द्वारा, अथवा पाँच प्रकार के सहधार्मिकों में से किसी एक के द्वारा दिया गया कठिन मान्य होता है। कठिन-दाता का एक कर्तव्य (वत्त) होता है; यदि वह उसे न जानते हुए पूछे— 'भन्ते! कठिन कैसे देना चाहिए?' तो उसे इस प्रकार बताना चाहिए— 'सूर्योदय के समय तीनों चीवरों में से किसी एक के लिए पर्याप्त वस्त्र को 'हम कठिन-चीवर देते हैं' कहकर देना उचित है। उसकी तैयारी (परिकम्म) के लिए इतनी सुइयाँ, इतना धागा, इतना रंग, और तैयारी करने वाले इतने भिक्षुओं के लिए यवागू (कांजी) और भोजन देना उचित है'। කථිනත්ථාරකෙනාපි ධම්මෙන සමෙන උප්පන්නං කථිනං අත්ථරන්තෙන වත්තං ජානිතබ්බං. තන්තවායගෙහතො හි ආභතසන්තානෙනෙව ඛලිමක්ඛිතසාටකො න වට්ටති, මලීනසාටකොපි න වට්ටති, තස්මා කථිනත්ථාරසාටකං ලභිත්වා සුට්ඨු ධොවිත්වා සූචිආදීනි චීවරකම්මූපකරණානි සජ්ජෙත්වා බහූහි භික්ඛූහි සද්ධිං තදහෙව සිබ්බිත්වා නිට්ඨිතසූචිකම්මං රජිත්වා කප්පබින්දුං දත්වා කථිනං අත්ථරිතබ්බං. සචෙ තස්මිං අනත්ථතෙයෙව අඤ්ඤං කථිනසාටකං ආහරති, අඤ්ඤානි ච බහූනි කථිනානිසංසවත්ථානි දෙති, යො ආනිසංසං බහුං දෙති, තස්ස සන්තකෙනෙව අත්ථරිතබ්බං. ඉතරො යථා තථා ඔවදිත්වා සඤ්ඤාපෙතබ්බො. कठिन का आस्तरण करने वाले को भी, धर्मपूर्वक और न्यायसंगत रूप से प्राप्त कठिन का आस्तरण करते समय, कर्तव्य (वत्त) को जानना चाहिए। बुनकर के घर से लाए गए रूप में ही, मांड (कंजी) लगा हुआ वस्त्र मान्य नहीं होता; मैला वस्त्र भी मान्य नहीं होता। इसलिए, कठिन-आस्तरण के लिए वस्त्र प्राप्त कर, उसे अच्छी तरह धोकर, सुई आदि चीवर बनाने के उपकरणों को तैयार कर, बहुत से भिक्षुओं के साथ उसी दिन उसे सीकर, सिलाई का काम पूरा होने पर उसे रंगकर और 'कप्प-बिन्दु' लगाकर कठिन का आस्तरण करना चाहिए। यदि उसके आस्तरण से पूर्व ही कोई अन्य कठिन-वस्त्र ले आता है और कठिन के लाभ के रूप में अन्य बहुत से वस्त्र देता है, तो जो अधिक लाभ (वस्त्र) देता है, उसी के वस्त्र से आस्तरण करना चाहिए। दूसरे (दाता) को यथोचित समझा-बुझाकर संतुष्ट कर देना चाहिए। කථිනං පන කෙන අත්ථරිතබ්බං? යස්ස සඞ්ඝො කථිනචීවරං දෙති. සඞ්ඝෙන පන කස්ස දාතබ්බං? යො ජිණ්ණචීවරො හොති. සචෙ බහූ ජිණ්ණචීවරා හොන්ති, වුඩ්ඪස්ස දාතබ්බං. වුඩ්ඪෙසුපි යො මහාපරිසො තදහෙව චීවරං කත්වා අත්ථරිතුං සක්කොති, තස්ස දාතබ්බං. සචෙ වුඩ්ඪො න සක්කොති නවකතරො සක්කොති, තස්ස දාතබ්බං. අපිච සඞ්ඝෙන මහාථෙරස්ස සඞ්ගහං කාතුං වට්ටති, තස්මා ‘‘තුම්හෙ භන්තෙ ගණ්හථ, මයං කත්වා දස්සාමා’’ති වත්තබ්බං. තීසු චීවරෙසු යං ජිණ්ණං හොති, තදත්ථාය දාතබ්බං. පකතියා දුපට්ටචීවරස්ස දුපට්ටත්ථායෙව දාතබ්බං. සචෙපිස්ස එකපට්ටචීවරං ඝනං හොති, කථිනසාටකො ච පෙලවො, සාරුප්පත්ථාය දුපට්ටප්පහොනකමෙව දාතබ්බං, ‘‘අහං අලභන්තො එකපට්ටං පාරුපාමී’’ති වදන්තස්සාපි දුපට්ටං දාතුං වට්ටති. යො පන ලොභපකතිකො හොති, තස්ස න දාතබ්බං. තෙනාපි ‘‘කථිනං අත්ථරිත්වා පච්ඡා සිබ්බිත්වා ද්වෙ චීවරානි කරිස්සාමී’’ති න ගහෙතබ්බං. යස්ස පන දීයති, තස්ස යෙන විධිනා දාතබ්බං, තං [Pg.390] දස්සෙතුං ‘‘එවඤ්ච පන භික්ඛවෙ කථිනං අත්ථරිතබ්බ’’න්ති ආරභිත්වා සුණාතු මෙ භන්තෙතිආදිකා දානකම්මවාචා තාව වුත්තා. किन्तु कठिन का आस्तरण किसके द्वारा किया जाना चाहिए? जिसे संघ कठिन-चीवर देता है। संघ द्वारा किसे दिया जाना चाहिए? जिसका चीवर पुराना (जीर्ण) हो गया हो। यदि बहुत से भिक्षुओं के चीवर पुराने हों, तो स्थविर (वरिष्ठ) को देना चाहिए। स्थविरों में भी उसे देना चाहिए जिसके पास बड़ा परिषद (सहायक) हो और जो उसी दिन चीवर बनाकर आस्तरण करने में समर्थ हो। यदि स्थविर समर्थ न हो और कोई कनिष्ठ समर्थ हो, तो उसे देना चाहिए। फिर भी, संघ के लिए महास्थविर का अनुग्रह करना उचित है, इसलिए कहना चाहिए— 'भन्ते! आप इसे ग्रहण करें, हम इसे (चीवर) बनाकर आपको देंगे।' तीनों चीवरों में से जो पुराना हो, उसी के लिए (वस्त्र) देना चाहिए। स्वभावतः दोहरी परत वाला चीवर (दुपाट्ट) रखने वाले को दोहरी परत के लिए ही देना चाहिए। यदि उसका इकहरी परत वाला चीवर मोटा हो और कठिन-वस्त्र झीना (पतला) हो, तो उपयुक्तता के लिए दोहरी परत के योग्य ही वस्त्र देना चाहिए; 'यदि मुझे (दोहरा) नहीं मिला, तो मैं इकहरा ही पहन लूँगा'— ऐसा कहने वाले को भी दोहरी परत वाला ही देना उचित है। किन्तु जो लोभी स्वभाव का हो, उसे नहीं देना चाहिए। उसे भी यह सोचकर ग्रहण नहीं करना चाहिए कि 'कठिन का आस्तरण कर बाद में सीकर दो चीवर बना लूँगा।' जिसे दिया जाता है, उसे जिस विधि से देना चाहिए, उसे दिखाने के लिए 'हे भिक्षुओं! इस प्रकार कठिन का आस्तरण करना चाहिए' से आरम्भ कर 'सुणातु मे भन्ते' (भन्ते! मेरी बात सुनें) आदि दान-कम्मवाचा कही गई है। එවං දින්නෙ පන කථිනෙ සචෙ තං කථිනදුස්සං නිට්ඨිතපරිකම්මමෙව හොති, ඉච්චෙතං කුසලං. නො චෙ නිට්ඨිතපරිකම්මං හොති, ‘‘අහං ථෙරො’’ති වා ‘‘බහුස්සුතො’’ති වා එකෙනාපි අකාතුං න ලබ්භති, සබ්බෙහෙව සන්නිපතිත්වා ධොවනසිබ්බනරජනානි නිට්ඨාපෙතබ්බානි. ඉදඤ්හි කථිනවත්තං නාම බුද්ධප්පසත්ථං. අතීතෙ පදුමුත්තරොපි භගවා කථිනවත්තං අකාසි. තස්ස කිර අග්ගසාවකො සුජාතත්ථෙරො නාම කථිනං ගණ්හි, තං සත්ථා අට්ඨසට්ඨියා භික්ඛුසතසහස්සෙහි සද්ධිං නිසීදිත්වා අකාසි. इस प्रकार कठिन (वस्त्र) दिए जाने पर, यदि वह कठिन-वस्त्र पहले से ही तैयार (निठ्ठित-परिकम्म) हो, तो यह अच्छा है। यदि वह तैयार न हो, तो 'मैं स्थविर हूँ' या 'मैं बहुश्रुत हूँ' कहकर किसी एक के लिए भी (कार्य) न करना वर्जित है; सभी को एकत्रित होकर धोने, सीने और रंगने के कार्य को पूरा करना चाहिए। क्योंकि यह कठिन-कर्तव्य (कठिन-वत्त) बुद्धों द्वारा प्रशंसित है। अतीत में, भगवान पदुमुत्तर ने भी कठिन-कर्तव्य का पालन किया था। कहा जाता है कि उनके अग्रश्रावक सुजात स्थविर ने कठिन ग्रहण किया था, जिसे शास्ता (बुद्ध) ने अड़सठ लाख भिक्षुओं के साथ बैठकर संपन्न किया था। කතපරියොසිතං පන කථිනං ගහෙත්වා අත්ථාරකෙන භික්ඛුනා ‘‘සචෙ සඞ්ඝාටියා කථිනං අත්ථරිතුකාමො හොති, පොරාණිකා සඞ්ඝාටි පච්චුද්ධරිතබ්බා, නවා සඞ්ඝාටි අධිට්ඨාතබ්බා. ‘ඉමාය සඞ්ඝාටියා කථිනං අත්ථරාමී’ති වාචා භින්දිතබ්බා’’තිආදිනා පරිවාරෙ වුත්තවිධානෙන කථිනං අත්ථරිතබ්බං. අත්ථරිත්වා ච පන ‘‘තෙන කථිනත්ථාරකෙන භික්ඛුනා සඞ්ඝං උපසඞ්කමිත්වා එකංසං උත්තරාසඞ්ගං කරිත්වා අඤ්ජලිං පග්ගහෙත්වා එවමස්ස වචනීයො – ‘අත්ථතං භන්තෙ සඞ්ඝස්ස කථිනං, ධම්මිකො කථිනත්ථාරො, අනුමොදථා’ති තෙහි අනුමොදකෙහි භික්ඛූහි එකංසං උත්තරාසඞ්ගං කරිත්වා අඤ්ජලිං පග්ගහෙත්වා එවමස්ස වචනීයො – ‘අත්ථතං ආවුසො සඞ්ඝස්ස කථිනං, ධම්මිකො කථිනත්ථාරො, අනුමොදාමා’’ති එවමාදිනා පරිවාරෙ වුත්තවිධානෙනෙව අනුමොදාපෙතබ්බං, ඉතරෙහි ච අනුමොදිතබ්බං. එවං සබ්බෙසං අත්ථතං හොති කථිනං. වුත්තඤ්හෙතං පරිවාරෙ ‘‘ද්වින්නං පුග්ගලානං අත්ථතං හොති කථිනං – අත්ථාරකස්ස ච අනුමොදකස්ස චා’’ති (පරි. 403). පුනපි වුත්තං – ‘‘න සඞ්ඝො කථිනං අත්ථරති, න ගණො කථිනං අත්ථරති, පුග්ගලො කථිනං අත්ථරති, සඞ්ඝස්ස අනුමොදනා ගණස්ස අනුමොදනා පුග්ගලස්ස අත්ථාරා සඞ්ඝස්ස අත්ථතං හොති කථිනං, ගණස්ස අත්ථතං හොති කථිනං, පුග්ගලස්ස අත්ථතං හොති කථිනං’’ති (පරි. 414). और कठिन (वस्त्र) के कार्य को पूरा कर लेने के बाद, कठिन फैलाने वाले भिक्षु को (यह विचार करना चाहिए कि) "यदि वह संघाटी से कठिन फैलाना चाहता है, तो पुरानी संघाटी का प्रत्याद्धार (त्याग) करना चाहिए और नई संघाटी का अधिष्ठान करना चाहिए। 'इस संघाटी से मैं कठिन फैलाता हूँ' - इस प्रकार वाणी का उच्चारण करना चाहिए।" इस प्रकार परिवार (पालि) में बताए गए विधान के अनुसार कठिन फैलाना चाहिए। कठिन फैलाने के बाद, उस कठिन फैलाने वाले भिक्षु को संघ के पास जाकर, उत्तरासंग को एक कंधे पर रखकर और अंजलिबद्ध होकर इस प्रकार कहना चाहिए - "भन्ते! संघ का कठिन फैल गया है, कठिन का फैलाना धर्मसम्मत है, आप इसका अनुमोदन करें।" उन अनुमोदन करने वाले भिक्षुओं को उत्तरासंग को एक कंधे पर रखकर और अंजलिबद्ध होकर इस प्रकार कहना चाहिए - "आयुष्मन्! संघ का कठिन फैल गया है, कठिन का फैलाना धर्मसम्मत है, हम अनुमोदन करते हैं।" इस प्रकार परिवार में बताए गए विधान के अनुसार ही अनुमोदन कराना चाहिए और अन्य (भिक्षुओं) द्वारा भी अनुमोदन किया जाना चाहिए। इस प्रकार सभी के लिए कठिन फैल जाता है। परिवार में यह कहा गया है - "दो व्यक्तियों के लिए कठिन फैल जाता है - फैलाने वाले के लिए और अनुमोदन करने वाले के लिए।" फिर से कहा गया है - "संघ कठिन नहीं फैलाता, गण कठिन नहीं फैलाता, व्यक्ति कठिन फैलाता है; संघ के अनुमोदन से, गण के अनुमोदन से और व्यक्ति के फैलाने से संघ का कठिन फैल जाता है, गण का कठिन फैल जाता है और व्यक्ति का कठिन फैल जाता है।" එවං අත්ථතෙ පන කථිනෙ සචෙ කථිනචීවරෙන සද්ධිං ආභතං ආනිසංසං දායකා ‘‘යෙන අම්හාකං කථිනං ගහිතං, තස්සෙව දෙමා’’ති දෙන්ති[Pg.391], භික්ඛුසඞ්ඝො අනිස්සරො. අථ අවිචාරෙත්වාව දත්වා ගච්ඡන්ති, භික්ඛුසඞ්ඝො ඉස්සරො. තස්මා සචෙ කථිනත්ථාරකස්ස සෙසචීවරානිපි දුබ්බලානි හොන්ති, සඞ්ඝෙන අපලොකෙත්වා තෙසම්පි අත්ථාය වත්ථානි දාතබ්බානි. කම්මවාචා පන එකායෙව වට්ටති. අවසෙසෙ කථිනානිසංසෙ බලවවත්ථානි වස්සාවාසිකට්ඨිතිකාය දාතබ්බානි, ඨිතිකාය අභාවෙ ථෙරාසනතො පට්ඨාය දාතබ්බානි, ගරුභණ්ඩං න භාජෙතබ්බං. සචෙ පන එකසීමාය බහූ විහාරා හොන්ති, සබ්බෙ භික්ඛූ සන්නිපාතෙත්වා එකත්ථ කථිනං අත්ථරිතබ්බං, විසුං විසුං අත්ථරිතුං න වට්ටති. इस प्रकार कठिन फैल जाने पर, यदि कठिन चीवर के साथ लाए गए आनुषंगिक (अतिरिक्त) वस्त्रों को दायक यह कहकर देते हैं कि "जिसने हमारा कठिन ग्रहण किया है, हम उसी को देते हैं", तो भिक्षु-संघ का उस पर अधिकार नहीं होता। यदि वे बिना विचार किए (बिना किसी को निर्दिष्ट किए) देकर चले जाते हैं, तो भिक्षु-संघ का उस पर अधिकार होता है। इसलिए, यदि कठिन फैलाने वाले भिक्षु के शेष चीवर भी दुर्बल (पुराने) हों, तो संघ की अनुमति लेकर उन (चीवरों) के लिए भी वस्त्र दिए जाने चाहिए। किन्तु कम्मवाचा एक ही पर्याप्त है। शेष कठिन के आनुषंगिक मजबूत वस्त्रों को वर्षावास की स्थिति (वरिष्ठता) के अनुसार दिया जाना चाहिए; यदि स्थिति (नियम) न हो, तो स्थविर के आसन से आरम्भ कर (वरिष्ठता क्रम से) देना चाहिए; गुरुभाण्ड का विभाजन नहीं करना चाहिए। यदि एक ही सीमा में बहुत से विहार हों, तो सभी भिक्षुओं को एकत्रित कर एक ही स्थान पर कठिन फैलाना चाहिए, अलग-अलग फैलाना उचित नहीं है। 308. ඉදානි යථා ච කථිනං අත්ථතං හොති, යථා ච අනත්ථතං, තං විධිං විත්ථාරතො දස්සෙතුං එවඤ්ච පන භික්ඛවෙ අත්ථතං හොති කථිනං එවං අනත්ථතන්ති වත්වා අකරණීයඤ්චෙව මහාභූමිකඤ්ච අනත්ථතලක්ඛණං තාව දස්සෙන්තො න උල්ලිඛිතමත්තෙනාතිආදිකෙ චතුවීසති ආකාරෙ දස්සෙසි. තතො පරං අත්ථතලක්ඛණං දස්සෙන්තො අහතෙන අත්ථතන්තිආදිකෙ සත්තරස ආකාරෙ දස්සෙසි. පරිවාරෙපි හි ‘‘චතුවීසතියා ආකාරෙහි අනත්ථතං හොති කථිනං, සත්තරසහි ආකාරෙහි අත්ථතං හොති කථින’’න්ති ඉදමෙව ලක්ඛණං වුත්තං. ३०८. अब, जिस प्रकार कठिन फैल जाता है और जिस प्रकार नहीं फैलता, उस विधि को विस्तार से दिखाने के लिए "भिक्षुओं! इस प्रकार कठिन फैल जाता है और इस प्रकार नहीं फैलता" - ऐसा कहकर, भगवान ने पहले न करने योग्य और महान आधार वाले 'न फैलने' (अनत्थत) के लक्षणों को दिखाते हुए 'न उल्लिखितमत्तेन' (केवल रेखांकित करने मात्र से नहीं) आदि चौबीस प्रकारों को दिखाया। उसके बाद 'फैलने' (अत्थत) के लक्षणों को दिखाते हुए 'अहतेन अत्थतं' (नये वस्त्र से फैलता है) आदि सत्रह प्रकारों को दिखाया। परिवार (पालि) में भी यही लक्षण कहे गए हैं कि "चौबीस प्रकारों से कठिन नहीं फैलता और सत्रह प्रकारों से कठिन फैल जाता है।" තත්ථ උල්ලිඛිතමත්තෙනාති දීඝතො ච පුථුලතො ච පමාණග්ගහණමත්තෙන. පමාණඤ්හි ගණ්හන්තො තස්ස තස්ස පදෙසස්ස සඤ්ජානනත්ථං නඛාදීහි වා පරිච්ඡෙදං දස්සෙන්තො උල්ලිඛති, නලාටාදීසු වා ඝංසති, තස්මා තං පමාණග්ගහණං ‘‘උල්ලිඛිතමත්ත’’න්ති වුච්චති. ධොවනමත්තෙනාති කථිනදුස්සධොවනමත්තෙන. චීවරවිචාරණමත්තෙනාති ‘‘පඤ්චකං වා සත්තකං වා නවකං වා එකාදසකං වා හොතූ’’ති එවං විචාරිතමත්තෙන. ඡෙදනමත්තෙනාති යථාවිචාරිතස්ස වත්ථස්ස ඡෙදනමත්තෙන. බන්ධනමත්තෙනාති මොඝසුත්තකාරොපනමත්තෙන. ඔවට්ටියකරණමත්තෙනාති මොඝසුත්තකානුසාරෙන දීඝසිබ්බිතමත්තෙන. කණ්ඩුසකරණමත්තෙනාති මුද්ධියපත්තබන්ධනමත්තෙන. දළ්හීකම්මකරණමත්තෙනාති ද්වෙ චිමිලිකායො එකතො කත්වා සිබ්බිතමත්තෙන. අථ වා පඨමචිමිලිකා ඝටෙත්වා ඨපිතා හොති, කථිනසාටකං තස්සා කුච්ඡිචිමිලිකං කත්වා සිබ්බිතමත්තෙනාතිපි අත්ථො. මහාපච්චරියං [Pg.392] ‘‘පකතිචීවරස්ස උපස්සයදානෙනා’’ති වුත්තං. කුරුන්දියං පන ‘‘පකතිපත්තබද්ධචීවරං දුපට්ටං කාතුං කුච්ඡිචිමිලිකං අල්ලියාපනමත්තෙනා’’ති වුත්තං. අනුවාතකරණමත්තෙනාති පිට්ඨිඅනුවාතාරොපනමත්තෙන. පරිභණ්ඩකරණමත්තෙනාති කුච්ඡිඅනඋවාතාරොපනමත්තෙන. ඔවද්ධෙය්යකරණමත්තෙනාති ආගන්තුකපත්තාරොපනමත්තෙන. කථිනචීවරතො වා පත්තං ගහෙත්වා අඤ්ඤස්මිං අකථිනචීවරෙ පත්තාරොපනමත්තෙන. वहाँ 'उल्लिखितमत्तेन' का अर्थ है - लम्बाई और चौड़ाई में केवल माप लेने मात्र से। माप लेते समय, उस-उस स्थान की पहचान के लिए नाखूनों आदि से सीमा दिखाते हुए रेखा खींची जाती है या ललाट आदि पर रगड़ा जाता है, इसलिए उस माप लेने को 'उल्लिखितमत्त' कहा जाता है। 'धोवनमत्तेन' का अर्थ है - कठिन के वस्त्र को केवल धोने मात्र से। 'चीवरविचारिकमत्तेन' का अर्थ है - "पाँच खण्ड वाला, सात खण्ड वाला, नौ खण्ड वाला या ग्यारह खण्ड वाला हो" - इस प्रकार केवल विचार (निश्चय) करने मात्र से। 'छेदनमत्तेन' का अर्थ है - विचार किए गए वस्त्र को केवल काटने मात्र से। 'बन्धनमत्तेन' का अर्थ है - केवल कच्चे धागे (मोधसुत्तक) डालने मात्र से। 'ओवट्टियकरणमत्तेन' का अर्थ है - कच्चे धागे के अनुसार केवल लम्बी सिलाई करने मात्र से। 'कण्डुसकरणमत्तेन' का अर्थ है - केवल खण्डों (पत्त) को जोड़ने मात्र से। 'दळ्हीकम्मकरणमत्तेन' का अर्थ है - दो परतों (चिमिलिका) को एक साथ कर केवल सीने मात्र से। अथवा, पहली परत जोड़कर रखी गई हो और कठिन के वस्त्र को उसकी भीतरी परत (कुच्छिचिमिलिका) बनाकर केवल सीने मात्र से - यह भी अर्थ है। महाप्रत्यरी में कहा गया है - "प्राकृतिक (सामान्य) चीवर के ऊपर एक और परत देने मात्र से (कठिन नहीं होता)"। कुरुन्दी में कहा गया है - "प्राकृतिक रूप से जुड़े हुए खण्डों वाले चीवर को दोहरी परत वाला बनाने के लिए भीतरी परत चिपकाने मात्र से (कठिन नहीं होता)"। 'अनुवातकरणमत्तेन' का अर्थ है - पीठ की ओर की अनुवात (किनारी) लगाने मात्र से। 'परिभण्डकरणमत्तेन' का अर्थ है - पेट की ओर की अनुवात लगाने मात्र से। 'ओवद्धेय्यकरणमत्तेन' का अर्थ है - अतिरिक्त खण्ड (आगन्तुकपत्त) लगाने मात्र से; अथवा कठिन चीवर से खण्ड लेकर दूसरे गैर-कठिन चीवर में खण्ड लगाने मात्र से (कठिन नहीं होता)। කම්බලමද්දනමත්තෙනාති එකවාරංයෙව රජනෙ පක්ඛිත්තෙන දන්තවණ්ණෙන පණ්ඩුපලාසවණ්ණෙන වා. සචෙ පන සකිං වා ද්වික්ඛත්තුං වා රත්තම්පි සාරුප්පං හොති, වට්ටති. නිමිත්තකතෙනාති ‘‘ඉමිනා දුස්සෙන කථිනං අත්ථරිස්සාමී’’ති එවං නිමිත්තකතෙන. එත්තකමෙව හි පරිවාරෙ වුත්තං. අට්ඨකථාසු පන ‘‘අයං සාටකො සුන්දරො, සක්කා ඉමිනා කථිනං අත්ථරිතු’න්ති එවං නිමිත්තකම්මං කත්වා ලද්ධෙනා’’ති වුත්තං. පරිකථාකතෙනාති ‘‘කථිනං නාම දාතුං වට්ටති, කථිනදායකො බහුං පුඤ්ඤං පසවතී’’ති එවං පරිකථාය උප්පාදිතෙන. කථිනං නාම අතිඋක්කට්ඨං වට්ටති, මාතරම්පි විඤ්ඤාපෙතුං න වට්ටති, ආකාසතො ඔතිණ්ණසදිසමෙව වට්ටතීති. කුක්කුකතෙනාති තාවකාලිකෙන. සන්නිධිකතෙනාති එත්ථ දුවිධො සන්නිධි කරණසන්නිධි ච නිචයසන්නිධි ච. තත්ථ තදහෙව අකත්වා ඨපෙත්වා කරණං කරණසන්නිධි. සඞ්ඝො අජ්ජ කථිනදුස්සං ලභිත්වා පුනදිවසෙ දෙති, අයං නිචයසන්නිධි. "कम्बलमद्दनमत्तेन" का अर्थ है केवल एक बार रंग में डालने से हाथी के दाँत के रंग का या पीले (सूखे) पत्ते के रंग का होना। यदि एक या दो बार रंगा हुआ भी उपयुक्त (सारुप्प) हो, तो वह कल्पनीय है। "निमित्तकतेन" का अर्थ है "इस वस्त्र से कठिन फैलाऊँगा" इस प्रकार निमित्त करने से। परिवार (ग्रन्थ) में इतना ही कहा गया है। किन्तु अट्ठकथाओं में "यह शाटक (वस्त्र) सुन्दर है, इससे कठिन फैलाया जा सकता है" इस प्रकार निमित्त-कर्म करके प्राप्त वस्त्र के बारे में कहा गया है। "परिकथाकतेन" का अर्थ है "कठिन दान देना उचित है, कठिन दायक बहुत पुण्य अर्जित करता है" इस प्रकार की परिकथा (परोक्ष चर्चा) से उत्पन्न वस्त्र से। कठिन अत्यन्त उत्कृष्ट होना चाहिए, यहाँ तक कि माता से भी माँगना उचित नहीं है, यह आकाश से गिरे हुए के समान होना चाहिए। "कुक्कुुकतेन" का अर्थ है तात्कालिक (उधार लिया हुआ)। "सन्निधिकतेन" यहाँ दो प्रकार की सन्निधि है: करण-सन्निधि और निचय-सन्निधि। उसी दिन (सिलाई-रंगाई) न करके रख छोड़ना करण-सन्निधि है। संघ आज कठिन वस्त्र प्राप्त कर अगले दिन देता है, यह निचय-सन्निधि है। නිස්සග්ගියෙනාති රත්තිනිස්සග්ගියෙන. පරිවාරෙපි වුත්තං – ‘‘නිස්සග්ගියං නාම කරියමානෙ අරුණං උට්ඨහතී’’ති. අකප්පකතෙනාති අනාදින්නකප්පබින්දුනා. අඤ්ඤත්ර සඞ්ඝාටියාතිආදීසු ඨපෙත්වා සඞ්ඝාටිඋත්තරාසඞ්ගඅන්තරවාසකෙ අඤ්ඤෙන පච්චත්ථරණාදිනා අත්ථතං අනත්ථතං හොතීති. අඤ්ඤත්ර පඤ්චකෙන වා අතිරෙකපඤ්චකෙන වාති පඤ්ච වා අතිරෙකානි වා ඛණ්ඩානි කත්වා මහාමණ්ඩලඅඩ්ඪමණ්ඩලානි දස්සෙත්වා කතෙනෙව වට්ටති. එවඤ්හි සමණ්ඩලිකතං හොති, තං ඨපෙත්වා අඤ්ඤෙන අච්ඡින්නකෙන වා ද්වත්තිචතුඛණ්ඩෙන වා න වට්ටති. අඤ්ඤත්ර පුග්ගලස්ස අත්ථාරාති පුග්ගලස්ස අත්ථාරං ඨපෙත්වා න අඤ්ඤෙන සඞ්ඝස්ස වා ගණස්ස වා අත්ථාරෙන අත්ථතං හොති. නිස්සීමට්ඨො අනුමොදතීති බහිඋපචාරසීමාය ඨිතො අනුමොදති. "निस्सग्गियेन" का अर्थ है रात्रि-अतिपात (रात बीत जाने) से निस्सग्गिय हुए वस्त्र से। परिवार में भी कहा गया है— "कठिन करते समय अरुणोदय हो जाने पर वह निस्सग्गिय हो जाता है।" "अकप्पकतेन" का अर्थ है जिस पर कप्प-बिन्दु (बिन्दु-कल्प) न लगाया गया हो। "अञ्ञत्र सङ्घाटिया" आदि में संघातिक, उत्तरासंग और अन्तरवासक को छोड़कर अन्य बिछौने आदि से फैलाया गया कठिन, फैलाया हुआ नहीं माना जाता। "अञ्ञत्र पञ्चकेन वा अतिरेकपञ्चकेन वा" का अर्थ है पाँच या पाँच से अधिक खण्डों (टुकड़ों) को जोड़कर, महामण्डल और अर्धमण्डल दिखाकर बनाए गए वस्त्र से ही कठिन फैलाना कल्पनीय है। इस प्रकार वह 'समण्डलिकत' (मण्डल युक्त) होता है; उसे छोड़कर बिना कटे हुए या दो, तीन, चार खण्डों वाले वस्त्र से कठिन फैलाना उचित नहीं है। "अञ्ञत्र पुग्गलस्स अत्थारा" का अर्थ है पुद्गल (व्यक्तिगत भिक्षु) के आस्तरण (फैलाने) को छोड़कर संघ या गण के आस्तरण से कठिन फैलाया हुआ नहीं होता। "निस्सीमिट्ठो अनुमोदति" का अर्थ है उपचार-सीमा के बाहर स्थित होकर अनुमोदन करना। 309. අහතෙනාති [Pg.393] අපරිභුත්තෙන. අහතකප්පෙනාති අහතසදිසෙන එකවාරං වා ද්වික්ඛත්තුං වා ධොතෙන. පිලොතිකායාති හතවත්ථකසාටකෙන. පංසුකූලෙනාති තෙවීසතියා ඛෙත්තෙසු උප්පන්නපංසුකූලෙන. පංසුකූලිකභික්ඛුනා චොළකභික්ඛං ආහිණ්ඩිත්වා ලද්ධචොළකෙහි කතචීවරෙනාතිපි කුරුන්දිමහාපච්චරීසු වුත්තං. පාපණිකෙනාති ආපණද්වාරෙ පතිතපිලොතිකං ගහෙත්වා කථිනත්ථාය දෙති, තෙනාපි වට්ටතීති අත්ථො. සෙසං වුත්තවිපල්ලාසෙනෙව වෙදිතබ්බං. ඉමස්මිං පන ඨානෙ ‘‘සහ කථිනස්ස අත්ථාරා කති ධම්මා ජායන්තී’’තිආදි බහුඅට්ඨකථාසු වුත්තං, තං සබ්බං පරිවාරෙ පාළිආරූළ්හමෙව, තස්මා තත්ථ ආගතනයෙනෙව වෙදිතබ්බං. න හි තෙන ඉධ අවුච්චමානෙන කථිනත්ථාරකස්ස කිඤ්චි පරිහායති. ३०९. "अहतेन" का अर्थ है बिना उपयोग किए हुए (नये) वस्त्र से। "अहतकप्पेन" का अर्थ है नये के समान, एक या दो बार धोए हुए वस्त्र से। "पिलोटिकाय" का अर्थ है फटे-पुराने वस्त्र के टुकड़ों से। "पंसुकूलेन" का अर्थ है तेईस स्थानों से प्राप्त पांसुकुल वस्त्र से। पांसुकुलिक भिक्षु द्वारा चिथड़ों की भिक्षा के लिए घूमकर प्राप्त टुकड़ों से बनाए गए चीवर से भी कठिन होता है—ऐसा कुरुन्दी और महापच्चरी (अट्ठकथाओं) में कहा गया है। "पापणिकेन" का अर्थ है दुकान के द्वार पर गिरे हुए चिथड़े को लेकर कठिन के लिए देना, उससे भी कठिन फैलाना उचित है। शेष पदों को पूर्वोक्त के विपरीत अर्थ में समझना चाहिए। इस स्थान पर "कठिन फैलाने के साथ कितने धर्म उत्पन्न होते हैं" आदि बहुत सी बातें अट्ठकथाओं में कही गई हैं, वे सब परिवार (ग्रन्थ) की पालि में समाहित हैं, इसलिए उन्हें वहाँ बताए गए तरीके से ही समझना चाहिए। क्योंकि यहाँ उन बातों को न कहने से कठिन फैलाने वाले भिक्षु का कुछ भी नुकसान नहीं होता। 310. එවං කථිනත්ථාරං දස්සෙත්වා ඉදානි උබ්භාරං දස්සෙතුං කථඤ්ච භික්ඛවෙ උබ්භතං හොති කථිනන්තිආදිමාහ. තත්ථ මාතිකාති මාතරො; ජනෙත්තියොති අත්ථො. කථිනුබ්භාරඤ්හි එතා අට්ඨ ජනෙත්තියො. තාසු පක්කමනං අන්තො අස්සාති පක්කමනන්තිකා. එවං සෙසාපි වෙදිතබ්බා. ३१०. इस प्रकार कठिन के आस्तरण (फैलाने) को दिखाकर, अब उसके उद्धार (समाप्ति) को दिखाने के लिए "भिक्षुओं, कठिन का उद्धार कैसे होता है" आदि कहा। वहाँ "मातिका" का अर्थ माताएँ है; अर्थात् जननी (उत्पन्न करने वाली)। ये आठ मातिकाएँ ही कठिन के उद्धार की जननी हैं। उनमें से जिसके अन्त (समाप्ति) में 'प्रस्थान' (पक्कमन) हो, वह "पक्कमनन्तिका" है। इसी प्रकार शेष को भी समझना चाहिए। ආදායසත්තකකථා आदाय-सत्तक कथा (सात प्रकार के लेकर जाने संबंधी चर्चा)। 311. න පච්චෙස්සන්ති න පුන ආගමිස්සං. එතස්මිං පන පක්කමනන්තිකෙ කථිනුද්ධාරෙ පඨමං චීවරපලිබොධො ඡිජ්ජති, පච්ඡා ආවාසපලිබොධො. එවං පක්කමතො හි චීවරපලිබොධො අන්තොසීමායමෙව ඡිජ්ජති, ආවාසපලිබොධො සීමාතික්කමෙ. වුත්තම්පි චෙතං පරිවාරෙ – ३११. "न पच्चेसन्ति" का अर्थ है "मैं पुनः नहीं आऊँगा"। इस पक्कमनन्तिक कठिन-उद्धार में पहले चीवर-पलिबोध (चीवर संबंधी बाधा) कटता है, बाद में आवास-पलिबोध। इस प्रकार प्रस्थान करने वाले का चीवर-पलिबोध सीमा के भीतर ही कट जाता है, और आवास-पलिबोध सीमा पार करने पर। परिवार में भी यह कहा गया है— ‘‘පක්කමනන්තිකො කථිනුද්ධාරො, වුත්තො ආදිච්චබන්ධුනා; එතඤ්ච තාහං විස්සජ්ජිස්සං, චීවරපලිබොධො පඨමං ඡිජ්ජති; පච්ඡා ආවාසපලිබොධො ඡිජ්ජතී’’ති. (පරි. 415); "पक्कमनन्तिक कठिन-उद्धार सूर्यवंश के बन्धु (बुद्ध) द्वारा कहा गया है; और इस प्रश्न का मैं उत्तर दूँगा—चीवर-पलिबोध पहले कटता है, बाद में आवास-पलिबोध कटता है।" චීවරං ආදායාති අකතචීවරං ආදාය. බහිසීමගතස්සාති අඤ්ඤං සාමන්තවිහාරං ගතස්ස. එවං හොතීති තස්මිං විහාරෙ සෙනාසනඵාසුකං වා සහායසම්පත්තිං වා දිස්වා එවං හොති. එතස්මිං පන නිට්ඨානන්තිකෙ කථිනුද්ධාරෙ ආවාසපලිබොධො පඨමං ඡිජ්ජති, සො හි ‘‘න පච්චෙස්ස’’න්ති චිත්තෙ උප්පන්නමත්තෙයෙව ඡිජ්ජති. වුත්තම්පි චෙතං – "चीवरं आदाय" का अर्थ है बिना सिला हुआ चीवर लेकर। "बहिसीमगतस्स" का अर्थ है दूसरे समीपवर्ती विहार में गए हुए का। "एवं होति" का अर्थ है उस विहार में शयनासन की सुगमता या मित्रों की उपलब्धि देखकर ऐसा विचार होता है। इस निट्ठानन्तिक कठिन-उद्धार में आवास-पलिबोध पहले कटता है, वह "मैं वापस नहीं जाऊँगा" ऐसा चित्त में उत्पन्न होते ही कट जाता है। यह कहा भी गया है— ‘‘නිට්ඨානන්තිකො [Pg.394] කථිනුද්ධාරො, වුත්තො ආදිච්චබන්ධුනා; එතඤ්ච තාහං විස්සජ්ජිස්සං, ආවාසපලිබොධො පඨමං ඡිජ්ජති; චීවරෙ නිට්ඨිතෙ චීවරපලිබොධො ඡිජ්ජතී’’ති. "निट्ठानन्तिक कठिन-उद्धार सूर्यवंश के बन्धु द्वारा कहा गया है; और इस प्रश्न का मैं उत्तर दूँगा—आवास-पलिबोध पहले कटता है; चीवर के बन जाने पर चीवर-पलिबोध कटता है।" එතෙන නයෙන සෙසමාතිකාවිභජනෙපි අත්ථො වෙදිතබ්බො. අයං පන විසෙසො – ‘‘සන්නිට්ඨානන්තිකෙ ද්වෙපි පලිබොධා නෙවිමං චීවරං කාරෙස්සං, න පච්චෙස්සන්ති චිත්තෙ උප්පන්නමත්තෙයෙව එකතො ඡිජ්ජන්තීති. වුත්තඤ්හෙතං – इसी पद्धति से शेष मातिकाओं के विभाजन में भी अर्थ समझना चाहिए। किन्तु यहाँ यह विशेषता है— "सन्निट्ठानन्तिक (निश्चय-अन्त) में दोनों ही पलिबोध 'न मैं यह चीवर बनाऊँगा और न ही वापस जाऊँगा' ऐसा चित्त में उत्पन्न होते ही एक साथ कट जाते हैं।" यह कहा भी गया है— ‘‘සන්නිට්ඨානන්තිකො කථිනුද්ධාරො, වුත්තො ආදිච්චබන්ධුනා; එතඤ්ච තාහං විස්සජ්ජිස්සං, ද්වෙ පලිබොධා අපුබ්බං අචරිමං ඡිජ්ජන්තී’’ති. "सन्निट्ठानन्तिक कठिन-उद्धार सूर्यवंश के बन्धु द्वारा कहा गया है; और इस प्रश्न का मैं उत्तर दूँगा—दोनों पलिबोध बिना आगे-पीछे (एक साथ) कट जाते हैं।" එවං සබ්බකථිනුද්ධාරෙසු පලිබොධුපච්ඡෙදො වෙදිතබ්බො. සො පන යස්මා ඉමිනා ච වුත්තනයෙන පරිවාරෙ ච ආගතභාවෙන සක්කා ජානිතුං, තස්මා විත්ථාරතො න වුත්තො. අයං පනෙත්ථ සඞ්ඛෙපො – නාසනන්තිකෙ ආවාසපලිබොධො පඨමං ඡිජ්ජති, චීවරෙ නට්ඨෙ චීවරපලිබොධො ඡිජ්ජති. යස්මා චීවරෙ නට්ඨෙ චීවරපලිබොධො ඡිජ්ජති, තස්මා ‘‘නාසනන්තිකො’’ති වුත්තං. इस प्रकार सभी कठिन-उद्धारों में पलिबोध के कटने को समझना चाहिए। चूँकि उसे इस बताए गए तरीके से और परिवार (ग्रन्थ) में आए होने के कारण जाना जा सकता है, इसलिए विस्तार से नहीं कहा गया। यहाँ संक्षेप यह है— नासनन्तिक (नष्ट होने के अन्त) में आवास-पलिबोध पहले कटता है, और चीवर के नष्ट होने पर चीवर-पलिबोध कटता है। चूँकि चीवर के नष्ट होने पर चीवर-पलिबोध कटता है, इसलिए इसे "नासनन्तिक" कहा गया है। සවනන්තිකෙ චීවරපලිබොධො පඨමං ඡිජ්ජති, තස්මා තස්ස සහ සවනෙන ආවාසපලිබොධො ඡිජ්ජති. सवनन्तिक (सुनने के साथ समाप्त होने वाले) कठिन उद्धार में चीवर-पलिबोध पहले समाप्त होता है, इसलिए सुनने के साथ ही उस भिक्षु का आवास-पलिबोध भी समाप्त हो जाता है। ආසාවච්ඡෙදිකෙ ආවාසපලිබොධො පඨමං ඡිජ්ජති. චීවරාසාය උපච්ඡින්නාය චීවරපලිබොධො ඡිජ්ජති. අයං පන යස්මා ‘‘අනාසාය ලභති; ආසාය න ලභති; තස්ස එවං හොති ‘ඉධෙවිමං චීවරං කාරෙස්සං, න පච්චෙස්ස’’’න්තිආදිනා නයෙන ඉතරෙහි උද්ධාරෙහි සද්ධිං වොමිස්සකදෙසනො අනෙකප්පභෙදො හොති, තස්මා පරතො විසුං විත්ථාරෙත්වා වුත්තො, ඉධ න වුත්තො. ඉධ පන සවනන්තිකස්ස අනන්තරං සීමාතික්කන්තිකො වුත්තො. තත්ථ චීවරපලිබොධො පඨමං ඡිජ්ජති, තස්ස බහිසීමෙ ආවාසපලිබොධො ඡිජ්ජති. සහුබ්භාරෙ ද්වෙ පලිබොධා අපුබ්බං අචරිමං ඡිජ්ජන්තීති. आशावच्छेदिक कठिन उद्धार में आवास-पलिबोध पहले समाप्त होता है। चीवर की आशा के टूट जाने पर चीवर-पलिबोध समाप्त होता है। चूँकि यह आशावच्छेदिक उद्धार अन्य उद्धारों के साथ मिश्रित उपदेश वाला और अनेक प्रकार का है, इसलिए इसे आगे विस्तार से कहा गया है, यहाँ नहीं। यहाँ सवनन्तिक के बाद सीमातिक्कान्तिक (सीमा पार करने वाला) कहा गया है। वहाँ चीवर-पलिबोध पहले समाप्त होता है और सीमा के बाहर जाने पर आवास-पलिबोध समाप्त होता है। सहुब्भार (सामूहिक उद्धार) में दोनों पलिबोध एक साथ (न पहले, न बाद में) समाप्त होते हैं। यह संक्षेप है। 316-325. එවං [Pg.395] ආදායවාරෙ සත්තකථිනුද්ධාරෙ දස්සෙත්වා පුන සමාදායවාරෙපි විප්පකතචීවරස්ස ආදායසමාදායවාරෙසුපි යථාසම්භවං තෙයෙව දස්සිතා. තතො පරං අන්තොසීමායං ‘‘පච්චෙස්සං න පච්චෙස්ස’’න්ති ඉමං විධිං අනාමසිත්වාව ‘‘න පච්චෙස්ස’’න්ති ඉමමෙව ආමසිත්වා අනධිට්ඨිතෙනා’’තිආදිනා නයෙන ච යෙ යෙ යුජ්ජන්ති, තෙ තෙ දස්සිතා. තතො පරං ‘‘චීවරාසාය පක්කමතී’’තිආදිනා නයෙන ඉතරෙහි සද්ධිං වොමිස්සකනයෙන අනෙකක්ඛත්තුං ආසාවච්ඡෙදිකං දස්සෙත්වා පුන දිසංගමියවසෙන ච ඵාසුවිහාරිකවසෙන ච නිට්ඨානන්තිකෙසු යුජ්ජමානා කථිනුද්ධාරා දස්සිතා. එවං පභෙදතො කථිනුද්ධාරං දස්සෙත්වා ඉදානි යෙ තෙන තෙන කථිනුද්ධාරෙන පලිබොධා ඡිජ්ජන්තීති වුත්තා, තෙසං පටිපක්ඛෙ දස්සෙන්තො ද්වෙමෙ භික්ඛවෙ කථිනස්ස පලිබොධාතිආදිමාහ. තත්ථ චත්තෙනාති යෙන චිත්තෙන සො ආවාසො චත්තො හොති, තං චත්තං නාම, තෙන චත්තෙන. වන්තමුත්තෙසුපි එසෙව නයො. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. ३१६-३२५. इस प्रकार आदाय-वार में सात प्रकार के कठिन उद्धार को दिखाकर, पुनः समादाय-वार में भी और विप्रकृत-चीवर के आदाय-समादाय वारों में भी यथासंभव उन्हीं सात कठिन उद्धारों को भगवान ने दिखाया है। उसके बाद सीमा के भीतर 'मैं वापस आऊँगा' या 'नहीं आऊँगा'—इस विधि का स्पर्श न करते हुए केवल 'नहीं आऊँगा' का स्पर्श करके 'अनधिष्ठित' आदि नय से जो-जो उचित हैं, उन्हें दिखाया गया है। उसके बाद 'चीवर की आशा से प्रस्थान करता है' आदि नय से अन्य उद्धारों के साथ मिश्रित रूप में अनेक बार आशावच्छेदिक को दिखाकर, पुनः दिशा-गमन और फासुविहार (सुखपूर्वक विहार) के वश से निष्ठानान्तिक में होने वाले कठिन उद्धारों को भगवान ने दिखाया है। इस प्रकार भेदों के साथ कठिन उद्धार को दिखाकर, अब जिन-जिन कठिन उद्धारों से जो पलिबोध समाप्त होते हैं, उनके प्रतिपक्ष को दिखाते हुए भगवान ने 'भिक्षुओं, कठिन के ये दो पलिबोध हैं' आदि कहा। वहाँ 'चत्तेन' का अर्थ है—जिस चित्त से वह आवास त्याग दिया गया है, वह 'चत्त' कहलाता है। वन्त-मुत्त (त्यागे हुए) में भी यही नय है। शेष सभी जगह अर्थ स्पष्ट है। කථිනක්ඛන්ධකවණ්ණනා නිට්ඨිතා. कठिन-खन्धक की व्याख्या समाप्त हुई। 8. චීවරක්ඛන්ධකං ८. चीवर-खन्धक। ජීවකවත්ථුකථා जीवक-वस्तु की कथा। 326. චීවරක්ඛන්ධකෙ [Pg.396] – පදක්ඛිණාති ඡෙකා කුසලා. අභිසටාති අභිගතා. කෙහි අභිගතාති? අත්ථිකෙහි අත්ථිකෙහි මනුස්සෙහි; කරණත්ථෙ පන සාමිවචනං කත්වා ‘‘අත්ථිකානං අත්ථිකානං මනුස්සාන’’න්ති වුත්තං. පඤ්ඤාසාය ච රත්තිං ගච්ඡතීති පඤ්ඤාස කහාපණෙ ගහෙත්වා රත්තිං ගච්ඡති. නෙගමොති කුටුම්බියගණො. ३२६. चीवर-खन्धक में—'पदक्खिणा' का अर्थ है चतुर, कुशल। 'अभिसटा' का अर्थ है पहुँचे हुए। किनके द्वारा पहुँचे हुए? इच्छुक मनुष्यों के द्वारा; यहाँ करण अर्थ में षष्ठी विभक्ति का प्रयोग करके 'अत्थिकानं अत्थिकानं मनुस्सानं' कहा गया है। 'पञ्ञासाय च रत्तिं गच्छति' का अर्थ है पचास कहापण लेकर रात में जाता है। 'नेगमो' का अर्थ है गृहपतियों का समूह। 327. සාලවතිං කුමාරිං ගණිකං වුට්ඨාපෙසීති නාගරා ද්වෙ සතසහස්සානි, රාජා සතසහස්සන්ති තීණි සතසහස්සානි, අඤ්ඤඤ්ච ආරාමුය්යානවාහනාදිපරිච්ඡෙදං දත්වා වුට්ඨාපෙසුං; ගණිකට්ඨානෙ ඨපෙසුන්ති අත්ථො. පටිසතෙන ච රත්තිං ගච්ඡතීති රත්තිං පටිසතෙන ගච්ඡති. ගිලානං පටිවෙදෙය්යන්ති ගිලානභාවං ජානාපෙය්යං. කත්තරසුප්පෙති ජිණ්ණසුප්පෙ. ३२७. 'सालबती कुमारी को गणिका के रूप में स्थापित किया'—नगरवासियों ने दो लाख और राजा ने एक लाख, इस प्रकार तीन लाख तथा अन्य उद्यान, उपवन, वाहन आदि की व्यवस्था देकर उसे स्थापित किया; अर्थात् गणिका के पद पर रखा। 'पटिसतेन च रत्तिं गच्छति' का अर्थ है रात में सौ (कहापण) लेकर जाती है। 'गिलानं पटिवेदेय्यं' का अर्थ है रुग्णता की सूचना दूँ। 'कत्तरसुप्पे' का अर्थ है पुराने सूप (सको) में। 328. කා මෙ දෙව මාතා, කො පිතාති කස්මා පුච්ඡි? තං කිර අඤ්ඤෙ රාජදාරකා කීළන්තා කලහෙ උට්ඨිතෙ ‘‘නිම්මාතිකො නිප්පිතිකො’’ති වදන්ති. යථා ච අඤ්ඤෙසං දාරකානං ඡණාදීසු චුළමාතාමහාමාතාදයො කිඤ්චි පණ්ණාකාරං පෙසෙන්ති, තථා තස්ස න කොචි කිඤ්චි පෙසෙති. ඉති සො තං සබ්බං චින්තෙත්වා ‘‘නිම්මාතිකොයෙව නු ඛො අහ’’න්ති ජානනත්ථං ‘‘කා මෙ දෙව මාතා, කො පිතා’’ති පුච්ඡි. ३२८. 'हे देव, मेरी माता कौन है, पिता कौन है?'—उसने ऐसा क्यों पूछा? कहते हैं कि अन्य राजकुमार खेलते समय विवाद होने पर उसे 'बिना माँ का, बिना बाप का' कहते थे। और जैसे अन्य बालकों के लिए उत्सव आदि के समय उनकी मौसी, नानी आदि कुछ उपहार भेजती थीं, वैसे उसके लिए कोई कुछ नहीं भेजता था। इसलिए उसने वह सब सोचकर 'क्या मैं वास्तव में अनाथ हूँ?' यह जानने के लिए पूछा—'हे देव, मेरी माता कौन है, पिता कौन है?' යන්නූනාහං සිප්පං සික්ඛෙය්යන්ති යංනූන අහං වෙජ්ජසිප්පං සික්ඛෙය්යන්ති චින්තෙසි. තස්ස කිර එතදහොසි – ‘‘ඉමානි ඛො හත්ථිඅස්සසිප්පාදීනි පරූපඝාතපටිසංයුත්තානි, වෙජ්ජසිප්පං මෙත්තාපුබ්බභාගං සත්තානං හිතපටිසංයුත්ත’’න්ති. තස්මා වෙජ්ජසිප්පමෙව සන්ධාය ‘‘යංනූනාහං සිප්පං සික්ඛෙය්ය’’න්ති චින්තෙසි. අපිචායං ඉතො කප්පසතසහස්සස්ස උපරි පදුමුත්තරස්ස භගවතො උපට්ඨාකං ‘‘බුද්ධුපට්ඨාකො අය’’න්ති චතුපරිසන්තරෙ පත්ථතගුණං වෙජ්ජං දිස්වා ‘‘අහො වතාහම්පි එවරූපං ඨානන්තරං පාපුණෙය්ය’’න්ති චින්තෙත්වා සත්තාහං බුද්ධප්පමුඛස්ස සඞ්ඝස්ස දානං දත්වා භගවන්තං වන්දිත්වා ‘‘අහම්පි භගවා තුම්හාකං [Pg.397] උපට්ඨාකො අසුකවෙජ්ජො විය අනාගතෙ බුද්ධුපට්ඨාකො භවෙය්ය’’න්ති පත්ථනමකාසි. තාය පුරිමපත්ථනාය චොදියමානොපෙස වෙජ්ජසිප්පමෙව සන්ධාය ‘‘යංනූනාහං සිප්පං සික්ඛෙය්ය’’න්ති චින්තෙසි. 'क्यों न मैं कोई शिल्प (कला) सीखूँ'—उसने सोचा कि क्यों न मैं वैद्यक-शिल्प (चिकित्सा शास्त्र) सीखूँ। उसे ऐसा विचार आया—'ये हाथी-घोड़े की विद्याएँ दूसरों को कष्ट पहुँचाने से संबंधित हैं, जबकि वैद्यक-शिल्प मैत्रीपूर्ण है और प्राणियों के हित से जुड़ा है।' इसलिए वैद्यक-शिल्प के उद्देश्य से ही उसने सोचा—'क्यों न मैं शिल्प सीखूँ।' इसके अतिरिक्त, इस कल्प से एक लाख कल्प पूर्व पदुमुत्तर बुद्ध के समय, वह बुद्ध का उपस्थाक (सेवक) था; वहाँ उसने 'यह बुद्ध का उपस्थाक है'—इस प्रकार चारों परिषदों के बीच विख्यात गुणों वाले एक वैद्य को देखकर सोचा—'अहो! मैं भी भविष्य में ऐसा ही पद प्राप्त करूँ।' उसने बुद्ध प्रमुख संघ को सात दिनों तक दान देकर भगवान की वंदना की और प्रार्थना की—'हे भगवन, मैं भी भविष्य में आप जैसे बुद्ध का उपस्थाक वैसा ही वैद्य बनूँ।' उस पूर्व प्रार्थना से प्रेरित होकर ही उसने वैद्यक-शिल्प के उद्देश्य से सोचा—'क्यों न मैं शिल्प सीखूँ।' 329. දිසාපාමොක්ඛොති සබ්බදිසාසු විදිතො පාකටො පධානො වාති අත්ථො. තස්මිඤ්ච සමයෙ තක්කසීලතො වාණිජා අභයරාජකුමාරං දස්සනාය අගමංසු. තෙ ජීවකො ‘‘කුතො තුම්හෙ ආගතා’’ති පුච්ඡි. ‘‘තක්කසීලතො’’ති වුත්තෙ ‘‘අත්ථි තත්ථ වෙජ්ජසිප්පාචරියො’’ති පුච්ඡි. ‘‘ආම කුමාර, තක්කසීලායං දිසාපාමොක්ඛො වෙජ්ජො පටිවසතී’’ති සුත්වා ‘‘තෙන හි යදා ගච්ඡථ, මය්හං ආරොචෙය්යාථා’’ති ආහ. තෙ තථා අකංසු. සො පිතරං අනාපුච්ඡා තෙහි සද්ධිං තක්කසීලං අගමාසි. තෙන වුත්තං – ‘‘අභයං රාජකුමාරං අනාපුච්ඡා’’තිආදි. ३२९. 'दिसापामोक्खो' का अर्थ है सभी दिशाओं में ज्ञात, प्रसिद्ध या प्रधान। उस समय तक्षशिला से व्यापारी राजकुमार अभय के दर्शन के लिए आए। जीवक ने उनसे पूछा—'आप लोग कहाँ से आए हैं?' 'तक्षशिला से'—कहने पर उसने पूछा—'क्या वहाँ कोई वैद्यक-शिल्प का आचार्य है?' 'हाँ राजकुमार, तक्षशिला में दिशा-प्रमुख (प्रसिद्ध) वैद्य रहता है'—यह सुनकर उसने कहा—'तो जब आप वापस जाएँ, तो मुझे बता देना।' उन्होंने वैसा ही किया। वह अपने पिता से बिना पूछे उनके साथ तक्षशिला चला गया। इसीलिए कहा गया है—'राजकुमार अभय से बिना पूछे' आदि। ඉච්ඡාමහං ආචරිය සිප්පං සික්ඛිතුන්ති තං කිර උපසඞ්කමන්තං දිස්වා සො වෙජ්ජො ‘‘කොසි ත්වං තාතා’’ති පුච්ඡි. සො ‘‘බිම්බිසාරමහාරාජස්ස නත්තා අභයකුමාරස්ස පුත්තොම්හී’’ති ආහ. ‘‘කස්මා පන ත්වමසි තාත ඉධාගතො’’ති, තතො සො ‘‘තුම්හාකං සන්තිකෙ සිප්පං සික්ඛිතු’’න්ති වත්වා ඉච්ඡාමහං ආචරිය සිප්පං සික්ඛිතුන්ති ආහ. බහුඤ්ච ගණ්හාතීති යථා අඤ්ඤෙ ඛත්තියකුමාරාදයො ආචරියස්ස ධනං දත්වා කිඤ්චි කම්මං අකත්වා සික්ඛන්තියෙව, න සො එවං. සො පන කිඤ්චි ධනං අදත්වා ධම්මන්තෙවාසිකොව හුත්වා එකං කාලං උපජ්ඣායස්ස කම්මං කරොති, එකං කාලං සික්ඛති. එවං සන්තෙපි අභිනීහාරසම්පන්නො කුලපුත්තො අත්තනො මෙධාවිතාය බහුඤ්ච ගණ්හාති, ලහුඤ්ච ගණ්හාති, සුට්ඨු ච උපධාරෙති, ගහිතඤ්චස්ස න සම්මුස්සති. “मैं शिल्प (वैद्यक विद्या) सीखना चाहता हूँ, आचार्य” - उसे पास आते देखकर उस वैद्य ने पूछा, “तात! तुम कौन हो?” उसने कहा, “मैं महाराज बिम्बिसार का पौत्र और अभय राजकुमार का पुत्र हूँ।” “तात! तुम यहाँ किसलिए आए हो?” तब उसने कहा, “आपके पास शिल्प सीखने के लिए आया हूँ,” और फिर कहा, “आचार्य! मैं शिल्प सीखना चाहता हूँ।” ‘बहुत ग्रहण करता है’ का अर्थ है कि जैसे अन्य क्षत्रिय कुमार आदि आचार्य को धन देकर बिना कोई काम किए ही सीखते हैं, वह वैसा नहीं था। बल्कि वह कोई धन दिए बिना ‘धम्मन्तेवासिक’ (धार्मिक अन्तेवासी) बनकर एक समय उपाध्याय का काम करता था और एक समय सीखता था। ऐसा होने पर भी, अभिनिहार (पुण्य संकल्प) से संपन्न वह कुलपुत्र अपनी मेधाशक्ति के कारण बहुत ग्रहण करता था, शीघ्र ग्रहण करता था, अच्छी तरह विचार करता था और उसका सीखा हुआ विस्मृत नहीं होता था। සත්ත ච මෙ වස්සානි අධීයන්තස්ස නයිමස්ස සිප්පස්ස අන්තො පඤ්ඤායතීති එත්ථ අයං කිර ජීවකො යත්තකං ආචරියො ජානාති, යං අඤ්ඤෙ සොළසහි වස්සෙහි උග්ගණ්හන්ති, තං සබ්බං සත්තහි වස්සෙහි උග්ගහෙසි. සක්කස්ස පන දෙවරඤ්ඤො එතදහොසි – ‘‘අයං බුද්ධානං උපට්ඨාකො අග්ගවිස්සාසකො භවිස්සති, හන්ද නං භෙසජ්ජයොජනං සික්ඛාපෙමී’’ති ආචරියස්ස සරීරෙ අජ්ඣාවසිත්වා යථා ඨපෙත්වා කම්මවිපාකං අවසෙසරොගං එකෙනෙව භෙසජ්ජයොගෙන තිකිච්ඡිතුං සක්කොති, තථා නං භෙසජ්ජයොජනං සික්ඛාපෙසි. සො පන ‘‘ආචරියස්ස සන්තිකෙ සික්ඛාමී’’ති මඤ්ඤති, තස්මා ‘‘සමත්ථො ඉදානි ජීවකො තිකිච්ඡිතු’’න්ති [Pg.398] සක්කෙන විස්සට්ඨමත්තෙ එවං චින්තෙත්වා ආචරියං පුච්ඡි. ආචරියො පන ‘‘න ඉමිනා මමානුභාවෙන උග්ගහිතං, දෙවතානුභාවෙන උග්ගහිත’’න්ති ඤත්වාව තෙන හි භණෙතිආදිමාහ. සමන්තා යොජනං ආහිණ්ඩන්තොති දිවසෙ දිවසෙ එකෙකෙන ද්වාරෙන නික්ඛමිත්වා චත්තාරො දිවසෙ ආහිණ්ඩන්තො. පරිත්තං පාථෙය්යං පාදාසීති අප්පමත්තකං අදාසි. කස්මා? තස්ස කිර එතදහොසි – ‘‘අයං මහාකුලස්ස පුත්තො ගතමත්තොයෙව පිතිපිතාමහානං සන්තිකා මහාසක්කාරං ලභිස්සති, තතො මය්හං වා සිප්පස්ස වා ගුණං න ජානිස්සති, අන්තරාමග්ගෙ පන ඛීණපාථෙය්යො සිප්පං පයොජෙත්වා අවස්සං මය්හඤ්ච සිප්පස්ස ච ගුණං ජානිස්සතී’’ති පරිත්තං දාපෙසි. “सात वर्ष तक पढ़ते हुए भी मुझे इस शिल्प का अंत नहीं दिख रहा है” - यहाँ यह भाव है कि जितना आचार्य जानते थे और जिसे अन्य लोग सोलह वर्षों में सीखते थे, वह सब जीवक ने सात वर्षों में ही सीख लिया। तब देवराज शक्र को यह विचार आया - “यह बुद्धों का उपस्थाक और परम विश्वासी बनेगा, चलो इसे औषध-मिश्रण (भेषज-योजन) सिखाता हूँ।” आचार्य के शरीर में प्रविष्ट होकर, उन्होंने उसे इस प्रकार सिखाया कि वह कर्म-विपाक को छोड़कर शेष रोगों को एक ही औषध-योग से ठीक करने में समर्थ हो गया। उसने सोचा, “मैं आचार्य के पास सीख रहा हूँ।” इसलिए, “अब जीवक चिकित्सा करने में समर्थ है” - शक्र द्वारा प्रेरित किए जाने पर उसने ऐसा सोचकर आचार्य से पूछा। आचार्य ने यह जानकर कि “इसने मेरे प्रभाव से नहीं, बल्कि देवता के प्रभाव से सीखा है,” ‘तेन हि भणे’ आदि कहा। ‘चारों ओर एक योजन तक घूमते हुए’ का अर्थ है कि प्रतिदिन एक-एक द्वार से निकलकर चार दिनों तक घूमते हुए। ‘थोड़ा सा पाथेय (रास्ते का खर्च) दिया’ का अर्थ है बहुत कम दिया। क्यों? आचार्य ने सोचा - “यह महाकुल का पुत्र है, पहुँचते ही अपने पिता-पितामहों से बहुत सत्कार प्राप्त करेगा, तब वह मेरे या शिल्प के गुण को नहीं जान पाएगा। मार्ग के बीच में पाथेय समाप्त होने पर जब वह शिल्प का प्रयोग करेगा, तब वह अवश्य ही मेरे और शिल्प के गुण को जान पाएगा,” इसलिए थोड़ा पाथेय दिलवाया। සෙට්ඨිභරියාදිවත්ථුකථා श्रेष्ठी-भार्या आदि की कथा। 330. පසතෙනාති එකහත්ථපුටෙන. පිචුනාති කප්පාසපටලෙන. යත්රහි නාමාති යා නාම. කිම්පිමායන්ති කිම්පි මෙ අයං. උපජානාමෙතස්ස සංයමස්සාති කතස්ස ච රොගූපසමස්ස ච උපකාරං ජානාමාති අධිප්පායො. ३३०. ‘पसतेन’ का अर्थ है एक अंजलि (हाथ की ओक) भर। ‘पिचुना’ का अर्थ है रुई के फाहे से। ‘यत्र हि नाम’ का अर्थ है जो (श्रेष्ठी-पत्नी)। ‘किम्पिमायन्ति’ का अर्थ है यह मुझे क्या (देय-धर्म) देगी? ‘उपजानामेतस्स संयमस्स’ का अर्थ है कि किए गए उपचार और रोग की शांति के उपकार को हम जानते हैं - यह अभिप्राय है। 331. සබ්බාලඞ්කාරං තුය්හං හොතූති රාජා කිර ‘‘සචෙ ඉමං ගණ්හිස්සති, පමාණයුත්තෙ ඨානෙ නං ඨපෙස්සාමි. සචෙ න ගණ්හිස්සති, අබ්භන්තරිකං නං විස්සාසකං කරිස්සාමී’’ති චින්තෙත්වා එවමාහ. අභයකුමාරස්සාපි නාටකානම්පි චිත්තං උප්පජ්ජි ‘‘අහො වත න ගණ්හෙය්යා’’ති. සොපි තෙසං චිත්තං ඤත්වා විය ‘‘ඉදං මෙ දෙව අය්යිකානං ආභරණං, නයිදං මය්හං ගණ්හිතුං පතිරූප’’න්ති වත්වා අලං දෙවාතිආදිමාහ. අධිකාරං මෙ දෙවො සරතූති කතස්ස උපකාරං මෙ දෙවො සරතූති අත්ථො. රාජා පසන්නො සබ්බාකාරසම්පන්නං ගෙහඤ්ච අම්බවනුය්යානඤ්ච අනුසංවච්ඡරං සතසහස්සඋට්ඨානකං ගාමඤ්ච මහාසක්කාරඤ්ච දත්වා තෙන හි භණෙතිආදිමාහ. ३३१. “सभी अलंकार तुम्हारे हों” - राजा ने सोचा, “यदि यह इन्हें ग्रहण करेगा, तो मैं इसे उपयुक्त स्थान पर नियुक्त करूँगा। यदि नहीं ग्रहण करेगा, तो इसे अपना आंतरिक विश्वासी बनाऊँगा।” अभय कुमार और नर्तकियों के मन में भी यह विचार आया कि “अहो! काश यह न ले।” उसने उनके मन की बात जानकर कहा, “देव! यह मेरी दादियों के आभूषण हैं, इन्हें लेना मेरे लिए उचित नहीं है,” और ‘अलम् देव’ आदि कहा। ‘अधिकारं मे देवो सरतू’ का अर्थ है कि देव मेरे द्वारा किए गए उपकार (सेवा) को याद रखें। राजा ने प्रसन्न होकर उसे सब प्रकार से संपन्न घर, आम्रवन उद्यान और प्रतिवर्ष एक लाख की आय वाला गाँव तथा महान सत्कार देकर ‘तेन हि भणे’ आदि कहा। රාජගහසෙට්ඨිවත්ථුකථා राजगृह के श्रेष्ठी की कथा। 332. සක්ඛිස්සසි පන ත්වං ගහපතීති කස්මා ආහ? ඉරියාපථසම්පරිවත්තනෙන කිර මත්ථලුඞ්ගං න සණ්ඨාති, අස්ස ච තීහි සත්තාහෙහි නිච්චලස්ස [Pg.399] නිපන්නස්ස මත්ථලුඞ්ගං සණ්ඨහිස්සතීති ඤත්වා අප්පෙව නාම සත්තසත්තමාසෙ පටිජානිත්වා සත්තසත්තදිවසෙපි නිපජ්ජෙය්යාති නං එවමාහ. තෙනෙව පරතො වුත්තං ‘‘අපි ච පටිකච්චෙව මයා ඤාතො’’ති. සීසච්ඡවිං උප්පාටෙත්වාති සීසචම්මං අපනෙත්වා. සිබ්බිනිං විනාමෙත්වාති සිබ්බිනිං විවරිත්වා. නාහං ආචරිය සක්කොමීති තස්ස කිර සරීරෙ මහාඩාහො උප්පජ්ජි, තස්මා එවමාහ. තීහි සත්තාහෙහීති තීහි පස්සෙහි එකෙකෙන සත්තාහෙන. ३३२. “गृहपति! क्या तुम समर्थ होगे?” - ऐसा क्यों कहा? क्योंकि करवट बदलने से मस्तिष्क स्थिर नहीं हो पाता। यदि वह तीन सप्ताह तक निश्चल होकर लेटा रहे, तो मस्तिष्क स्थिर हो जाएगा - ऐसा जानकर, “शायद सात-सात महीने का वादा करने पर वह सात-सात दिन तो लेटा रहेगा,” ऐसा सोचकर उससे यह कहा। इसीलिए आगे कहा गया है - “किन्तु मैंने पहले ही जान लिया था।” ‘सीसच्छविं उप्पाटेत्वा’ का अर्थ है सिर की त्वचा हटाकर। ‘सिब्बिनिं विनामेत्वा’ का अर्थ है सीवन (टाँकों/जोड़) को खोलकर। “आचार्य! मैं समर्थ नहीं हूँ” - क्योंकि उसके शरीर में बड़ी जलन पैदा हुई थी, इसलिए उसने ऐसा कहा। ‘तीहि सत्ताहेहि’ का अर्थ है तीन करवटों से, प्रत्येक में एक-एक सप्ताह। 333. ජනං උස්සාරෙත්වාති ජනං නීහරාපෙත්වා. ३३३. ‘जनं उस्सारेत्वा’ का अर्थ है लोगों को बाहर निकालकर। පජ්ජොතරාජවත්ථුකථා राजा प्रद्योत की कथा। 334. ජෙගුච්ඡං මෙ සප්පීති අයං කිර රාජා විච්ඡිකස්ස ජාතො, විච්ඡිකවිසපටිඝාතාය ච සප්පි භෙසජ්ජං හොති විච්ඡිකානං පටිකූලං, තස්මා එවමාහ. උද්දෙකං දස්සතීති උග්ගාරං දස්සති. පඤ්ඤාස යොජනිකා හොතීති පඤ්ඤාස යොජනානි ගන්තුං සමත්ථා හොති. න කෙවලඤ්චස්ස රඤ්ඤො හත්ථිනීයෙව, නාළාගිරි නාම හත්ථී යොජනසතං ගච්ඡති, චෙලකණ්ණො ච මුඤ්චකෙසො චාති ද්වෙ අස්සා වීසයොජනසතං ගච්ඡන්ති, කාකො දාසො සට්ඨියොජනානි ගච්ඡති. ३३४. “मुझे घी से घृणा है” - यह राजा बिच्छू से उत्पन्न हुआ था, और बिच्छू के विष को दूर करने के लिए घी औषधि है, जो बिच्छुओं के लिए प्रतिकूल (अरुचिकर) होती है, इसलिए उसने ऐसा कहा। ‘उद्देकं दस्सति’ का अर्थ है डकार आएगी। ‘पञ्ञास योजनिका होति’ का अर्थ है पचास योजन जाने में समर्थ है। न केवल उस राजा की हथिनी ही, बल्कि नालागिरि नामक हाथी सौ योजन जाता है, चेलकण्ण और मुञ्चकेस नामक दो घोड़े एक सौ बीस योजन जाते हैं, और काक नामक दास साठ योजन जाता है। එකස්ස කිර කුලපුත්තස්ස අනුප්පන්නෙ බුද්ධෙ එකදිවසං භුඤ්ජිතුං නිසින්නස්ස පච්චෙකබුද්ධො ද්වාරෙ ඨත්වා අගමාසි, තස්සෙකො පුරිසො ‘‘පච්චෙකබුද්ධො ආගන්ත්වා ගතො’’ති ආරොචෙසි. සො සුත්වා ‘‘ගච්ඡ, වෙගෙන පත්තං ආහරා’’ති ආහරාපෙත්වා අත්තනො සජ්ජිතං භත්තං සබ්බං දත්වා පෙසෙසි. ඉතරො තං ආහරිත්වා පච්චෙකබුද්ධස්ස හත්ථෙ ඨපෙත්වා ‘‘අහං භන්තෙ තුම්හාකං කතෙන ඉමිනා කායවෙය්යාවතිකෙන යත්ථ යත්ථ නිබ්බත්තොපි වාහනසම්පන්නො හොමී’’ති පත්ථනං අකාසි. සො අයං එතරහි පජ්ජොතො නාම රාජා ජාතො, තාය පත්ථනාය අයං වාහනසම්පත්ති. कहा जाता है कि बुद्ध के प्रादुर्भाव से पूर्व, एक दिन एक कुलपुत्र भोजन के लिए बैठा था, तभी एक प्रत्येकबुद्ध उसके द्वार पर आकर खड़े हुए। एक व्यक्ति ने उसे सूचित किया—'प्रत्येकबुद्ध आकर चले गए हैं।' यह सुनकर उसने कहा—'जाओ, शीघ्रता से उनका पात्र ले आओ।' उसने पात्र मँगवाकर अपने लिए तैयार सारा भोजन उसमें डालकर भेज दिया। दूसरे व्यक्ति ने वह पात्र ले जाकर प्रत्येकबुद्ध के हाथ में रख दिया और प्रार्थना की—'भन्ते! आपके लिए की गई इस शारीरिक सेवा के पुण्य से मैं जहाँ-जहाँ भी जन्म लूँ, वहाँ-वहाँ वाहनों से संपन्न रहूँ।' वही व्यक्ति अब पज्जोत नामक राजा हुआ है। उसी प्रार्थना के कारण उसे यह वाहन-संपत्ति प्राप्त हुई है। සප්පිං පායෙත්වාති සප්පිඤ්ච පායෙත්වා; පරිචාරිකානඤ්ච ආහාරාචාරෙ විධිං ආචික්ඛිත්වා. නඛෙන භෙසජ්ජං ඔලුම්පෙත්වාති නඛෙන භෙසජ්ජං ඔදහිත්වා; පක්ඛිපිත්වාති අත්ථො. නිච්ඡාරෙසීති විරෙචෙසි. 'सप्पिं पायेत्वा' का अर्थ है घी पिलाकर और परिचारकों को आहार के सेवन की विधि बताकर। 'नखेन भेसज्जं ओलुम्पेत्वा' का अर्थ है नाखून से औषधि रखकर; अर्थात् पात्र में डालकर। 'निच्छारेसि' का अर्थ है विरेचन कराया। සිවෙය්යකදුස්සයුගකථා सिवैय्यक-वस्त्र-युगल-कथा 335. සිවෙය්යකං [Pg.400] නාම උත්තරකුරූසු සිවථිකං අවමඞ්ගලවත්ථං. තත්ථ කිර මනුස්සා මතං තෙන වත්ථෙන වෙඨෙත්වා නික්ඛිපන්ති, තං ‘‘මංසපෙසී’’ති සල්ලක්ඛෙත්වා හත්ථිසොණ්ඩකසකුණා උක්ඛිපිත්වා හිමවන්තකූටෙ ඨපෙත්වා වත්ථං අපනෙත්වා ඛාදන්ති. අථ වනචරකා වත්ථං දිස්වා රඤ්ඤො ආහරන්ති. එවමිදං පජ්ජොතෙන ලද්ධං. සිවිරට්ඨෙ කුසලා ඉත්ථියො තීහි අංසූහි සුත්තං කන්තන්ති, තෙන සුත්තෙන වායිතවත්ථං එතන්තිපි වදන්ති. ३३५. उत्तरकुरु में 'सिवैय्यक' नामक एक अमंगल वस्त्र होता है जो श्मशान में पाया जाता है। वहाँ लोग मृतक को उस वस्त्र से लपेटकर छोड़ देते हैं। हाथी की सूँड़ जैसे मुख वाले पक्षी उसे मांस का लोथड़ा समझकर उठा ले जाते हैं और हिमालय की चोटियों पर रखकर, वस्त्र हटाकर मांस खा लेते हैं। तब वनवासी शिकारी उस वस्त्र को देखकर राजा के पास ले आते हैं। इस प्रकार यह वस्त्र राजा पज्जोत को प्राप्त हुआ। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि सिवि राष्ट्र की कुशल स्त्रियाँ तीन धागों से सूत कातती हैं और उस सूत से बुना हुआ यह वस्त्र है। සමත්තිංසවිරෙචනකථා तीस विरेचनों की कथा 336. සිනෙහෙථාති කිං පන භගවතො කායො ලූඛොති න ලූඛො? භගවතො හි ආහාරෙ සදා දෙවතා දිබ්බොජං පක්ඛිපන්ති, සිනෙහපානං පන සබ්බත්ථ දොසෙ තෙමෙති, සිරා මුදුකා කරොති, තෙනායං එවමාහ. තීණි උප්පලහත්ථානීති එකං ඔළාරිකදොසහරණත්ථං, එකං මජ්ඣිමදොසහරණත්ථං, එකං සුඛුමදොසහරණත්ථං. නචිරස්සෙව පකතත්තො අහොසීති එවං පකතත්තෙ පන කායෙ නාගරා දානං සම්පාදෙසුං. ජීවකො ආගන්ත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘භගවා අජ්ජ නාගරා තුම්හාකං දානං දාතුකාමා, මා අන්තොගාමං පිණ්ඩාය පවිසථා’’ති. මහාමොග්ගල්ලානත්ථෙරො චින්තෙසි – ‘‘කුතො නු ඛො අජ්ජ භගවතො පඨමං පිණ්ඩපාතො ලද්ධුං වට්ටතී’’ති. තතො චින්තෙසි – ‘‘සොණො සෙට්ඨිපුත්තො ඛෙත්තපරිකම්මතො පට්ඨාය අඤ්ඤෙහි අසාධාරණානං ඛීරොදකසෙචනසංවද්ධානං ගන්ධසාලීනං ඔදනං භුඤ්ජති, තතො භගවතො පිණ්ඩපාතං ආහරිස්සාමී’’ති ඉද්ධියා ගන්ත්වා තස්ස පාසාදතලෙ අත්තානං දස්සෙසි. සො ථෙරස්ස පත්තං ගහෙත්වා පණීතං පිණ්ඩපාතං අදාසි. ථෙරස්ස ච ගමනාකාරං දිස්වා ‘‘භුඤ්ජථ භන්තෙ’’ති ආහ. ථෙරො තමත්ථං ආරොචෙසි ‘‘භුඤ්ජථ භන්තෙ, අහං අඤ්ඤං භගවතො දස්සාමී’’ති ථෙරං භොජෙත්වා ගන්ධෙහි පත්තං උබ්බට්ටෙත්වා පිණ්ඩපාතස්ස පූරෙත්වා අදාසි, තං ථෙරො ආහරිත්වා භගවතො අදාසි. ३३६. 'सिनेहेथा' (स्नेहन करें)—क्या भगवान का शरीर रूखा था? नहीं, रूखा नहीं था। क्योंकि देवता भगवान के आहार में सदैव दिव्य ओज डाल देते हैं। किन्तु स्नेहन सभी दोषों को गीला कर देता है और शिराओं को कोमल बना देता है, इसलिए जीवक ने ऐसा कहा। 'तीणि उप्पलहत्थानि'—एक स्थूल दोषों को दूर करने के लिए, एक मध्यम दोषों को दूर करने के लिए और एक सूक्ष्म दोषों को दूर करने के लिए अर्पित की। 'नचिरस्सेव पकतत्तो अहोसी'—इस प्रकार जब शरीर स्वस्थ हो गया, तब नगरवासियों ने दान की व्यवस्था की। जीवक ने आकर भगवान से यह कहा—'भन्ते! आज नगरवासी आपको दान देना चाहते हैं, अतः आप भिक्षा के लिए गाँव के भीतर प्रवेश न करें।' महामौद्गल्यायन स्थविर ने सोचा—'आज भगवान के लिए प्रथम पिण्डपात कहाँ से प्राप्त करना उचित होगा?' फिर उन्होंने सोचा—'श्रेष्ठि-पुत्र सोण खेत की तैयारी के समय से ही अन्य चावलों से भिन्न, दूध और जल से सींचकर बढ़ाए गए सुगंधित शालि चावलों का भात खाता है। मैं वहीं से भगवान के लिए पिण्डपात लाऊँगा।' वे ऋद्धि से जाकर उसके प्रासाद के तल पर प्रकट हुए। उसने स्थविर का पात्र लेकर उत्तम पिण्डपात दिया। स्थविर के जाने का ढंग देखकर उसने कहा—'भन्ते! आप यहीं भोजन करें।' स्थविर ने कारण बताया। उसने कहा—'भन्ते! आप भोजन करें, मैं भगवान के लिए दूसरा पिण्डपात दूँगा।' उसने स्थविर को भोजन कराकर, पात्र को सुगंधित द्रव्यों से माँजकर, पिण्डपात से भरकर दिया। स्थविर ने उसे लाकर भगवान को अर्पित किया। රාජාපි ඛො බිම්බිසාරො ‘‘අජ්ජ භගවා කිං භුඤ්ජිස්සතී’’ති විහාරං ආගන්ත්වා පවිසමානොව පිණ්ඩපාතගන්ධං ඝායිත්වා භුඤ්ජිතුකාමො අහොසි. භගවතො [Pg.401] ද්වීසුයෙව පිණ්ඩපාතෙසු භාජනගතෙසු දෙවතා ඔජං පක්ඛිපිංසු – යඤ්ච සුජාතා අදාසි; යඤ්ච පරිනිබ්බානකාලෙ චුන්දො කම්මාරපුත්තො; අඤ්ඤෙසු කබළෙ කබළෙ පක්ඛිපිංසු, තස්මා භගවා රඤ්ඤො ඉච්ඡං ජානිත්වා අපක්ඛිත්තොජමෙව ථොකං පිණ්ඩපාතං රඤ්ඤො දාපෙසි. සො පරිභුඤ්ජිත්වා පුච්ඡි – ‘‘කිං භන්තෙ, උත්තරකුරුතො ආභතං භොජන’’න්ති? ‘‘න මහාරාජ, උත්තරකුරුතො; අපිච ඛො තවෙව රට්ඨවාසිනො ගහපතිපුත්තස්ස භොජනං එත’’න්ති වත්වා සොණස්ස සම්පත්තිං ආචික්ඛි. තං සුත්වා රාජා සොණං දට්ඨුකාමො හුත්වා චම්මක්ඛන්ධකෙ වුත්තනයෙන අසීතියා කුලපුත්තසහස්සෙහි සද්ධිං සොණස්ස ආගමනං අකාසි. තෙ භගවතො ධම්මදෙසනං සුත්වා සොතාපන්නා ජාතා. සොණො පන පබ්බජිත්වා අරහත්තෙ පතිට්ඨිතො. භගවාපි එතදත්ථමෙව රඤ්ඤො පිණ්ඩපාතං දාපෙසි. राजा बिम्बिसार ने भी सोचा—'आज भगवान क्या भोजन करेंगे?' और विहार आकर प्रवेश करते ही पिण्डपात की सुगंध पाकर उनकी भोजन करने की इच्छा हुई। भगवान के केवल दो ही पिण्डपातों में, जब वे पात्र में आए, देवताओं ने ओज डाला था—एक जो सुजाता ने दिया था और दूसरा जो परिनिर्वाण के समय कर्मार-पुत्र चुन्द ने दिया था। अन्य पिण्डपातों में वे प्रत्येक ग्रास में ओज डालते थे। इसलिए भगवान ने राजा की इच्छा जानकर, बिना ओज डाला हुआ ही थोड़ा सा पिण्डपात राजा को दिलवाया। राजा ने उसे ग्रहण कर पूछा—'भन्ते! क्या यह भोजन उत्तरकुरु से लाया गया है?' भगवान ने कहा—'महाराज! यह उत्तरकुरु से नहीं लाया गया है, बल्कि यह आपके ही राज्य के एक गृहपति-पुत्र का भोजन है' और सोण की समृद्धि के बारे में बताया। यह सुनकर राजा सोण को देखने का इच्छुक हुआ और 'चम्मक्खन्धक' में वर्णित विधि के अनुसार अस्सी हजार कुलपुत्रों के साथ सोण का आगमन कराया। वे भगवान की धर्म-देशना सुनकर स्रोतआपन्न हो गए। सोण ने प्रव्रज्या ग्रहण की और अर्हत् पद प्राप्त किया। भगवान ने राजा को पिण्डपात इसी प्रयोजन के लिए दिलवाया था। වරයාචනකථා वर-याचना-कथा 337. එවං කතභත්තකිච්චෙ භගවති අථ ඛො ජීවකො කොමාරභච්චො තං සිවෙය්යකං දුස්සයුගං ආදාය…පෙ… එතදවොච. අතික්කන්තවරාති එත්ථ විනිච්ඡයො මහාඛන්ධකෙ වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බො. භගවා භන්තෙ පංසුකූලිකො භික්ඛුසඞ්ඝො චාති භගවතො හි බුද්ධත්තං පත්තතො පට්ඨාය යාව ඉදං වත්ථං, එත්ථන්තරෙ වීසති වස්සානි න කොචි ගහපතිචීවරං සාදියි, සබ්බෙ පංසුකූලිකාව අහෙසුං. තෙනායං එවමාහ. ගහපතිචීවරන්ති ගහපතීහි දින්නචීවරං. ධම්මියා කථායාති වත්ථදානානිසංසපටිසංයුත්තාය කථාය. ඉතරීතරෙනාපීති අප්පග්ඝෙනපි මහග්ඝෙනපි; යෙන කෙනචීති අත්ථො. පාවාරොති සලොමකො කප්පාසාදිභෙදො. අනුජානාමි භික්ඛවෙ කොජවන්ති එත්ථ පකතිකොජවමෙව වට්ටති, මහාපිට්ඨියකොජවං න වට්ටති. මහාපිට්ඨියකොජවන්ති උණ්ණාමයො පාවාරසදිසො කොජවො. ३३७. इस प्रकार भगवान के भोजन कर लेने पर, कौमारभृत्य जीवक वह सिवैय्यक वस्त्र-युगल लेकर... (पे)... यह बोला। 'अतिक्कान्तवरा' के विषय में विनिश्चय 'महाखन्धक' में वर्णित विधि के अनुसार ही समझना चाहिए। 'भगवा भन्ते पंसुकूलिको भिक्खुसङ्घो च'—भगवान के बुद्धत्व प्राप्ति से लेकर इस वस्त्र के प्राप्त होने तक, इन बीस वर्षों के बीच किसी भी भिक्षु ने गृहपति-चीवर स्वीकार नहीं किया था, सभी पांसुकूलिक ही थे। इसलिए जीवक ने ऐसा कहा। 'गहपतिचीवरं' अर्थात् गृहपतियों द्वारा दिया गया चीवर। 'धम्मिया कथाय' अर्थात् वस्त्र-दान के लाभ से संबंधित कथा से। 'इतरीतरेनापि' अर्थात् कम मूल्य वाले या अधिक मूल्य वाले; अर्थात् किसी भी वस्त्र से। 'पावारो' अर्थात् रोएँदार सूती आदि प्रकार का वस्त्र। 'अनुजानामि भिक्खवे कोजवं'—यहाँ साधारण कम्बल ही कल्प्य है, महापिट्ठिय-कोजव कल्प्य नहीं है। 'महापिट्ठिय-कोजव' का अर्थ है ऊन से बना दुशाले जैसा बड़ा कम्बल। කම්බලානුජානනාදිකථා कम्बल-अनुज्ञान आदि की कथा 338. කාසිරාජාති කාසීනං රාජා; පසෙනදිස්ස එකපිතිකභාතා එස. අඩ්ඪකාසියන්ති එත්ථ කාසීති සහස්සං වුච්චති තං අග්ඝනකො කාසියො[Pg.402]. අයං පන පඤ්චසතානි අග්ඝති, තස්මා ‘‘අඩ්ඪකාසියො’’ති වුත්තො. තෙනෙවාහ – ‘‘උපඩ්ඪකාසීනං ඛමමාන’’න්ති. ३३८. "कासिराजा" का अर्थ है कासियों का राजा; वह (राजा) प्रसेनजित का एक ही पिता से उत्पन्न भाई है। "अड्ढकासियं" (अर्धकासिक) यहाँ 'कासि' का अर्थ एक हजार कहा जाता है, उस मूल्य का कम्बल 'कासिय' कहलाता है। किन्तु यह पाँच सौ मूल्य का है, इसलिए इसे "अड्ढकासियो" (अर्धकासिक) कहा गया है। इसीलिए (संगीतकार ने) कहा है - "उपड्ढकासीनं खममानं" (आधे कासियों के मूल्य के बराबर)। 339. උච්චාවචානීති සුන්දරානි ච අසුන්දරානි ච. භඞ්ගං නාම ඛොමාදීහි පඤ්චහි සුත්තෙහි මිස්සෙත්වා කතං; වාකමයමෙවාතිපි වදන්ති. ३३९. "उच्चावचानि" का अर्थ है अच्छे और बुरे। "भङ्ग" उसे कहते हैं जो क्षौम (अलसी) आदि पाँच प्रकार के धागों को मिलाकर बनाया गया हो; कुछ लोग इसे वल्कल (छाल) से बना हुआ भी कहते हैं। 340. එකංයෙව භගවතා චීවරං අනුඤ්ඤාතං න ද්වෙති තෙ කිර ඉතරීතරෙන චීවරෙනාති එතස්ස ‘‘ගහපතිකෙන වා පංසුකූලෙන වා’’ති එවං අත්ථං සල්ලක්ඛිංසු. නාගමෙසුන්ති යාව තෙ සුසානතො ආගච්ඡන්ති, තාව තෙ න අච්ඡිංසු; පක්කමිංසුයෙව. නාකාමා භාගං දාතුන්ති න අනිච්ඡාය දාතුං; යදි පන ඉච්ඡන්ති, දාතබ්බො. ආගමෙසුන්ති උපචාරෙ අච්ඡිංසු. තෙනාහ භගවා ආහ – ‘‘අනුජානාමි භික්ඛවෙ ආගමෙන්තානං අකාමා භාගං දාතු’’න්ති. යදි පන මනුස්සා ‘‘ඉධාගතා එව ගණ්හන්තූ’’ති දෙන්ති, සඤ්ඤාණං වා කත්වා ගච්ඡන්ති ‘‘සම්පත්තා ගණ්හන්තූ’’ති සම්පත්තානං සබ්බෙසම්පි පාපුණන්ති. සචෙ ඡඩ්ඩෙත්වා ගතා, යෙන ගහිතං, සො එව සාමී. සදිසා සුසානං ඔක්කමිංසූති සබ්බෙ සමං ඔක්කමිංසු; එකදිසාය වා ඔක්කමිංසූතිපි අත්ථො. තෙ කතිකං කත්වාති ලද්ධං පංසුකූලං සබ්බෙ භාජෙත්වා ගණ්හිස්සාමාති බහිමෙව කතිකං කත්වා. ३४०. "भगवान द्वारा केवल एक ही चीवर अनुमत है, दो नहीं" - उन्होंने "इतरीतरेन चीवरेन" (जिस किसी चीवर से) इस पाठ का अर्थ "गृहपति द्वारा दिए गए या पांसुकुलिक" ऐसा समझा। "नागमेसुं" (प्रतीक्षा नहीं की) - जब तक वे पांसुकुलिक भिक्षु श्मशान से लौटते, तब तक वे अन्य भिक्षु नहीं रुके; वे चले ही गए। "नाकामा भागं दातुं" (बिना इच्छा के हिस्सा न देना) - बिना इच्छा के न देना; यदि वे चाहते हैं, तो हिस्सा दिया जा सकता है। "आगमेसुं" (प्रतीक्षा की) - श्मशान के परिसर में प्रतीक्षा की। इसीलिए भगवान ने कहा - "भिक्षुओं, मैं प्रतीक्षा करने वालों को बिना इच्छा के हिस्सा देने की अनुमति देता हूँ।" यदि लोग "यहाँ आए हुए भिक्षु ही ग्रहण करें" ऐसा कहकर दान देते हैं, या "पहुँचे हुए भिक्षु ग्रहण करें" ऐसा संकेत (लिखकर) छोड़कर चले जाते हैं, तो वह सभी पहुँचने वाले भिक्षुओं को प्राप्त होता है। यदि वे (लोग) त्याग कर चले गए हों, तो जिसने उसे ग्रहण किया, वही उसका स्वामी है। "सदिसं सुसानं ओक्कमिंसु" - सभी एक साथ श्मशान में उतरे; या एक ही दिशा से उतरे, यह भी अर्थ है। "ते कतिकं कत्वा" - प्राप्त पांसुकुल को हम सभी बाँटकर लेंगे, ऐसा श्मशान के बाहर ही नियम (कतिकवत) बनाकर। 342. චීවරපටිග්ගාහකන්ති යො ගහපතිකෙහි සඞ්ඝස්ස දීයමානං චීවරං ගණ්හාති. යො න ඡන්දාගතිං ගච්ඡෙය්යාතිආදීසු චීවරපටිග්ගාහකෙසු පච්ඡා ආගතානම්පි අත්තනො ඤාතකාදීනං පඨමතරං පටිග්ගණ්හන්තො වා එකච්චස්මිං පෙමං දස්සෙත්වා ගණ්හන්තො වා ලොභපකතිකතාය අත්තනො පරිණාමෙන්තො වා ඡන්දාගතිං ගච්ඡති නාම. පඨමතරං ආගතස්සාපි කොධවසෙන පච්ඡා ගණ්හන්තො වා දුග්ගතමනුස්සෙසු අවමඤ්ඤං කත්වා ගණ්හන්තො වා ‘‘කිං වො ඝරෙ ඨපනොකාසො නත්ථි, තුම්හාකං සන්තකං ගහෙත්වා ගච්ඡථා’’ති එවං සඞ්ඝස්ස ලාභන්තරායං කරොන්තො වා දොසාගතිං ගච්ඡති නාම. යො පන මුට්ඨස්සති අසම්පජානො, අයං මොහාගතිං ගච්ඡති නාම. පච්ඡා ආගතානම්පි ඉස්සරානම්පි භයෙන පඨමතරං පටිග්ගණ්හන්තො වා ‘‘චීවරපටිග්ගාහකට්ඨානං නාමෙතං භාරිය’’න්ති සන්තසන්තො වා භයාගතිං ගච්ඡති නාම. ‘‘මයා ඉදඤ්චිදඤ්ච ගහිතං, ඉදඤ්චිංදඤ්ච න ගහිත’’න්ති එවං ජානන්තො ගහිතාගහිතං ජානාති නාම. තස්මා යො න ඡන්දාගතිආදිවසෙන ගච්ඡති, ඤාතකඅඤ්ඤාතකඅඩ්ඪදුග්ගතෙසු විසෙසං අකත්වා [Pg.403] ආගතපඅපාටියා ගණ්හාති, සීලාචාරපටිපත්තියුත්තො හොති, සතිමා මෙධාවී බහුස්සුතො, සක්කොති දායකානං විස්සට්ඨවාචාය පරිමණ්ඩලෙහි පදබ්යඤ්ජනෙහි අනුමොදනං කරොන්තො පසාදං ජනෙතුං, එවරූපො සම්මන්නිතබ්බො. ३४२. "चीवर-प्रतिग्राहक" वह है जो गृहपतियों द्वारा संघ को दिए जाने वाले चीवर को ग्रहण करता है। "जो छन्दागति (पक्षपात) न करे" आदि में, चीवर-प्रतिग्राहकों में जो बाद में आए हुए अपने रिश्तेदारों आदि को पहले चीवर देता है, या किसी के प्रति प्रेम दिखाकर ग्रहण करता है, या लोभ के कारण अपनी ओर झुकाता है, वह "छन्दागति" (पक्षपात) को प्राप्त होता है। जो पहले आए हुए के प्रति भी क्रोधवश बाद में ग्रहण करता है, या निर्धन मनुष्यों का अपमान करके ग्रहण करता है, या "क्या तुम्हारे घर में रखने की जगह नहीं है, अपना सामान लेकर जाओ" इस प्रकार संघ के लाभ में बाधा डालता है, वह "दोषागति" (द्वेष) को प्राप्त होता है। जो स्मृतिभ्रष्ट और असंप्रजन्य (असावधान) होता है, वह "मोहागति" (मोह) को प्राप्त होता है। जो बाद में आए हुए प्रभावशाली लोगों के डर से पहले ग्रहण करता है, या "यह चीवर-प्रतिग्राहक का पद बहुत भारी (कठिन) है" ऐसा सोचकर डरता है, वह "भयागति" (भय) को प्राप्त होता है। "मैंने यह और यह ग्रहण किया है, यह और यह ग्रहण नहीं किया है" इस प्रकार जानने वाला "गृहीत-अगृहीत" को जानने वाला कहलाता है। इसलिए, जो छन्दागति आदि के वश में नहीं होता, जो रिश्तेदारों-गैर-रिश्तेदारों और धनवानों-निर्धनों में भेद किए बिना आने के क्रम से ग्रहण करता है, जो शीलाचार और प्रतिपत्ति से युक्त होता है, स्मृतिमान, बुद्धिमान और बहुश्रुत होता है, और जो स्पष्ट वाणी तथा परिपूर्ण पदों और व्यंजनों के साथ अनुमोदना करते हुए दाताओं में श्रद्धा उत्पन्न करने में समर्थ होता है, ऐसे भिक्षु को नियुक्त (सम्मत) करना चाहिए। එවඤ්ච පන භික්ඛවෙ සම්මන්නිතබ්බොති එත්ථ පන එතාය යථාවුත්තාය කම්මවාචායපි අපලොකනෙනාපි අන්තොවිහාරෙ සබ්බසඞ්ඝමජ්ඣෙපි ඛණ්ඩසීමායපි සම්මන්නිතුං වට්ටතියෙව. එවං සම්මතෙන ච විහාරපච්චන්තෙ වා පධානඝරෙ වා න අච්ඡිතබ්බං. යත්ථ පන ආගතාගතා මනුස්සා සුඛං පස්සන්ති, තාදිසෙ ධුරවිහාරට්ඨානෙ බීජනිං පස්සෙ ඨපෙත්වා සුනිවත්ථෙන සුපාරුතෙන නිසීදිතබ්බන්ති. "और भिक्षुओं, इस प्रकार नियुक्त करना चाहिए" - यहाँ इस पूर्वोक्त कर्मवाचा द्वारा या अपलोकन (सूचना) द्वारा विहार के भीतर, समस्त संघ के मध्य या खण्ड-सीमा में भी नियुक्त करना उचित ही है। इस प्रकार नियुक्त भिक्षु को विहार के छोर पर या प्रधान-घर (ध्यान कक्ष) में नहीं रहना चाहिए। बल्कि जहाँ आते-जाते मनुष्य आसानी से देख सकें, ऐसे मुख्य विहार स्थान पर पंखा बगल में रखकर, अच्छी तरह से पहने हुए अंतर्वासक और ओढ़े हुए उत्तरासंग के साथ बैठना चाहिए। තත්ථෙව උජ්ඣිත්වාති ‘‘පටිග්ගහණමෙව අම්හාකං භාරො’’ති වත්වා ගහිතට්ඨානෙයෙව ඡඩ්ඩෙත්වා ගච්ඡන්ති. චීවරනිදහකන්ති චීවරපටිසාමකං. යො න ඡන්දාගතිං ගච්ඡෙය්යාතිආදීසු චෙත්ථ ඉතො පරඤ්ච සබ්බත්ථ වුත්තනයෙනෙව විනිච්ඡයො වෙදිතබ්බො. සම්මුතිවිනිච්ඡයොපි කථිතානුසාරෙනෙව ජානිතබ්බො. "वहीं छोड़कर" का अर्थ है - "ग्रहण करना ही हमारा भार (उत्तरदायित्व) है" ऐसा कहकर ग्रहण किए गए स्थान पर ही छोड़कर चले जाते हैं। "चीवर-निदहक" का अर्थ है चीवर को संचित करने वाला (रखने वाला) भिक्षु। "जो छन्दागति न करे" आदि में और इसके बाद भण्डागारिक-सम्मति आदि सभी स्थानों पर पूर्वोक्त विधि से ही निर्णय समझना चाहिए। सम्मति का निर्णय भी कहे गए अनुसार ही जानना चाहिए। භණ්ඩාගාරසම්මුතිආදිකථා भण्डागार-सम्मति (भण्डार-गृह की नियुक्ति) आदि की कथा। 343. විහාරං වාතිආදීසු යො ආරාමමජ්ඣෙ ආරාමිකසාමණෙරාදීහි අවිවිත්තො සබ්බෙසං සමොසරණට්ඨානෙ විහාරො වා අඩ්ඪයොගො වා හොති, සො සම්මන්නිතබ්බො. පච්චන්තසෙනාසනං පන න සම්මන්නිතබ්බං. ඉදං පන භණ්ඩාගාරං ඛණ්ඩසීමං ගන්ත්වා ඛණ්ඩසීමාය නිසින්නෙහි සම්මන්නිතුං න වට්ටති, විහාරමජ්ඣෙයෙව සම්මන්නිතබ්බං. ३४३. "विहारं वा" आदि में, जो आराम (विहार) के मध्य में आरामपालों, श्रमणेरों आदि से रहित न हो और सभी के एकत्र होने का स्थान हो, ऐसा विहार या अर्धयोग (दो तरफ ढाल वाली छत वाला घर) नियुक्त करना चाहिए। विहार के सीमावर्ती (प्रान्त) आवास को नियुक्त नहीं करना चाहिए। इस भण्डागार को खण्ड-सीमा में जाकर वहाँ बैठे हुए भिक्षुओं द्वारा नियुक्त करना उचित नहीं है, विहार के मध्य में ही नियुक्त करना चाहिए। ගුත්තාගුත්තඤ්ච ජානෙය්යාති එත්ථ යස්ස තාව ඡදනාදීසු කොචි දොසො නත්ථි, තං ගුත්තං. යස්ස පන ඡදනතිණං වා ඡදනිට්ඨකා වා යත්ථ කත්ථචි පතිතා, යෙන ඔවස්සති වා, මූසිකාදීනං වා පවෙසො හොති, භිත්තිආදීසු වා කත්ථචි ඡිද්දං හොති, උපචිකා වා උට්ඨහන්ති, තං සබ්බං අගුත්තං නාම. තං සල්ලක්ඛෙත්වා පටිසඞ්ඛරිතබ්බං. සීතසමයෙ ද්වාරඤ්ච වාතපානඤ්ච සුපිහිතං කාතබ්බං, සීතෙන හි චීවරානි කණ්ණකිතානි හොන්ති. උණ්හසමයෙ අන්තරන්තරා වාතප්පවෙසනත්ථං විවරිතබ්බං. එවං කරොන්තො හි ගුත්තාගුත්තං ජානාති නාම. "सुरक्षित और असुरक्षित को जाने" - यहाँ जिस (विहार) की छत आदि में कोई दोष नहीं है, वह "सुरक्षित" (गुत्त) है। जिसकी छत की घास या खपरैल कहीं गिर गई हो, जिससे वर्षा का पानी टपकता हो, या चूहों आदि का प्रवेश होता हो, या दीवारों आदि में कहीं छेद हो, या दीमक लग गई हो, वह सब "असुरक्षित" (अगुत्त) कहलाता है। उसे देखकर मरम्मत करनी चाहिए। शीत ऋतु में द्वार और खिड़कियों को अच्छी तरह बंद रखना चाहिए, क्योंकि ठंड से चीवरों में फफूँद लग जाती है। ग्रीष्म ऋतु में बीच-बीच में हवा आने के लिए उन्हें खोल देना चाहिए। इस प्रकार करने वाला भिक्षु "सुरक्षित-असुरक्षित" को जानने वाला कहलाता है। ඉමෙහි [Pg.404] පන චීවරපටිග්ගාහකාදීහි තීහිපි අත්තනො වත්තං ජානිතබ්බං. තත්ථ චීවරපටිග්ගාහකෙන තාව යං යං මනුස්සා ‘‘කාලචීවර’’න්ති වා ‘‘අකාලචීවර’’න්ති වා ‘‘අච්චෙකචීවර’’න්ති වා ‘‘වස්සිකසාටික’’න්ති වා ‘‘නිසීදන’’න්ති වා ‘‘පච්චත්ථරණ’’න්ති වා ‘‘මුඛපුඤ්ඡනචොළ’’න්ති වා දෙන්ති, තං සබ්බං එකරාසිං කත්වා මිස්සෙත්වා න ගණ්හිතබ්බං, විසුං විසුං කත්වාව ගණ්හිත්වා චීවරනිදහකස්ස තථෙව ආචික්ඛිත්වා දාතබ්බං. චීවරනිදහකෙනාපි භණ්ඩාගාරිකස්ස දදමානෙන ඉදං කාලචීවරං…පෙ… ඉදං මුඛපුඤ්ඡනචොළන්ති ආචික්ඛිත්වාව දාතබ්බං. භණ්ඩාගාරිකෙනාපි තථෙව විසුං විසුං විය සඤ්ඤාණං කත්වා ඨපෙතබ්බං. තතො සඞ්ඝෙන ‘‘කාලචීවරං ආහරා’’ති වුත්තෙ කාලචීවරමෙව දාතබ්බං…පෙ… මුඛපුඤ්ඡනචොළකං ආහරාති වුත්තෙ තදෙව දාතබ්බං. इन तीन—चीवर-प्रतिग्राहक (चीवर ग्रहण करने वाले) आदि—को अपने कर्तव्यों को जानना चाहिए। वहाँ, चीवर-प्रतिग्राहक को सबसे पहले, जो-जो चीवर मनुष्य 'काल-चीवर' या 'अकाल-चीवर' या 'अच्चेक-चीवर' या 'वस्सिकासोटिक' (वर्षा-शाटी) या 'निसीदन' या 'पच्चत्थरण' (बिछौना) या 'मुखपुञ्छनचोळ' (मुँह पोंछने का कपड़ा) कहकर देते हैं, उन सबको एक साथ मिलाकर ग्रहण नहीं करना चाहिए। उन्हें अलग-अलग करके ही ग्रहण करना चाहिए और चीवर-निदहक (चीवर रखने वाले) को उसी प्रकार बताकर देना चाहिए। चीवर-निदहक को भी भण्डागारिक (कोषाध्यक्ष) को देते समय 'यह काल-चीवर है... यह मुखपुञ्छनचोळ है'—ऐसा बताकर ही देना चाहिए। भण्डागारिक को भी उसी प्रकार अलग-अलग पहचान (चिह्न) बनाकर रखना चाहिए। उसके बाद, जब संघ द्वारा 'काल-चीवर लाओ' कहा जाए, तब काल-चीवर ही देना चाहिए... 'मुखपुञ्छनचोळ लाओ' कहने पर वही देना चाहिए। ඉති භගවතා චීවරපටිග්ගාහකො අනුඤ්ඤාතො, චීවරනිදහකො අනුඤ්ඤාතො, භණ්ඩාගාරං අනුඤ්ඤාතං, භණ්ඩාගාරිකො අනුඤ්ඤාතො, න බාහුලිකතාය න අසන්තුට්ඨියා; අපිච ඛො සඞ්ඝස්සානුග්ගහාය. සචෙ හි ආහටාහටං ගහෙත්වා භික්ඛූ භාජෙය්යුං, නෙව ආහටං න අනාහටං න දින්නං නාදින්නං න ලද්ධං නාලද්ධං ජානෙය්යුං, ආහටාහටං ථෙරාසනෙ වා දදෙය්යුං, ඛණ්ඩාඛණ්ඩං වා ඡින්දිත්වා ගණ්හෙය්යුං; එවං සති අයුත්තපරිභොගො ච හොති, න ච සබ්බෙසං සඞ්ගහො කතො හොති. භණ්ඩාගාරෙ පන චීවරං ඨපෙත්වා උස්සන්නකාලෙ එකෙකස්ස භික්ඛුනො තිචීවරං වා ද්වෙ ද්වෙ වා එකෙකං වා චීවරං දස්සන්ති, ලද්ධාලද්ධං ජානිස්සන්ති, අලද්ධභාවං ඤත්වා සඞ්ගහං කාතුං මඤ්ඤිස්සන්තීති. इस प्रकार भगवान द्वारा चीवर-प्रतिग्राहक को अनुमति दी गई, चीवर-निदहक को अनुमति दी गई, भण्डागार (भण्डार) को अनुमति दी गई, और भण्डागारिक को अनुमति दी गई; यह अधिकता (संचय) के लिए या असंतोष के लिए नहीं, बल्कि संघ के अनुग्रह (कल्याण) के लिए है। क्योंकि यदि भिक्षु लाए गए चीवरों को (बिना व्यवस्था के) लेकर बाँटें, तो वे न तो लाए गए को जानेंगे, न न-लाए गए को, न दिए गए को, न न-दिए गए को, न प्राप्त को, न अप्राप्त को जानेंगे; वे लाए गए चीवरों को स्थविर के आसन पर दे देंगे, या उन्हें टुकड़ों में काटकर ले लेंगे। ऐसा होने पर अनुचित उपभोग होता है और सभी का संग्रह (कल्याण) नहीं होता। परन्तु भण्डागार में चीवर रखकर, प्रचुरता के समय, प्रत्येक भिक्षु को तीन चीवर, या दो-दो, या एक-एक चीवर देंगे; वे प्राप्त और अप्राप्त को जानेंगे, और अप्राप्त की स्थिति जानकर संग्रह (सहायता) करना चाहेंगे। න භික්ඛවෙ භණ්ඩාගාරිකො වුට්ඨාපෙතබ්බොති එත්ථ අඤ්ඤෙපි අවුට්ඨාපනීයා ජානිතබ්බා. චත්තාරො හි න වුට්ඨාපෙතබ්බා – වුඩ්ඪතරො, භණ්ඩාගාරිකො, ගිලානො, සඞ්ඝතො ලද්ධසෙනාසනොති. තත්ථ වුඩ්ඪතරො අත්තනො වුඩ්ඪතාය නවකතරෙන න වුට්ඨාපෙතබ්බො, භණ්ඩාගාරිකො සඞ්ඝෙන සම්මන්නිත්වා භණ්ඩාගාරස්ස දින්නතාය, ගිලානො අත්තනො ගිලානතාය, සඞ්ඝො පන බහුස්සුතස්ස උද්දෙසපරිපුච්ඡාදීහි බහුපකාරස්ස භාරනිත්ථාරකස්ස ඵාසුකං ආවාසං අනුට්ඨාපනීයං කත්වා දෙති, තස්මා සො උපකාරතාය ච සඞ්ඝතො ලද්ධතාය ච න වුට්ඨාපෙතබ්බොති. हे भिक्षुओं! 'भण्डागारिक को (आसन या आवास से) नहीं उठाना चाहिए'—यहाँ अन्य भी न उठाने योग्य व्यक्तियों को जानना चाहिए। चार व्यक्तियों को नहीं उठाना चाहिए—वृद्धतर (वरिष्ठ), भण्डागारिक, ग्लान (रोगी), और संघ से आवास प्राप्त व्यक्ति। वहाँ, वृद्धतर को उसकी वरिष्ठता के कारण कनिष्ठ द्वारा नहीं उठाना चाहिए। भण्डागारिक को संघ द्वारा सम्मत (नियुक्त) होने और भण्डागार (आवास) दिए जाने के कारण नहीं उठाना चाहिए। ग्लान को उसकी रुग्णता के कारण नहीं उठाना चाहिए। और संघ बहुश्रुत, उपदेश और परिपृच्छा आदि के द्वारा बहुत उपकारी और भार वहन करने वाले व्यक्ति को सुखद आवास देता है जिसे नहीं उठाना चाहिए; इसलिए उसे उपकारिता के कारण और संघ से प्राप्त होने के कारण नहीं उठाना चाहिए। උස්සන්නං [Pg.405] හොතීති බහු රාසිකතං හොති, භණ්ඩාගාරං න ගණ්හාති. සම්මුඛීභූතෙනාති අන්තොඋපචාරසීමායං ඨිතෙන. භාජෙතුන්ති කාලං ඝොසෙත්වා පටිපාටියා භාජෙතුං. කොලාහලං අකාසීති ‘‘අම්හාකං ආචරියස්ස දෙථ, උපජ්ඣායස්ස දෙථා’’ති එවං මහාසද්දං අකාසි. චීවරභාජනකඞ්ගෙසු සභාගානං භික්ඛූනං අපාපුණන්තම්පි මහග්ඝං චීවරං දෙන්තො ඡන්දාගතිං ගච්ඡති නාම. අඤ්ඤෙසං වුඩ්ඪතරානං පාපුණන්තම්පි මහග්ඝං චීවරං අදත්වා අප්පග්ඝං දෙන්තො දොසාගතිං ගච්ඡති නාම. මොහමූළ්හො චීවරදානවත්තං අජානන්තො මොහාගතිං ගච්ඡති නාම. මුඛරානං නවකානම්පි භයෙන අපාපුණන්තමෙව මහග්ඝං චීවරං දෙන්තො භයාගතිං ගච්ඡති නාම. යො එවං න ගච්ඡති, සබ්බෙසං තුලාභූතො පමාණභූතො මජ්ඣත්තො හොති, සො සම්මන්නිතබ්බො. භාජිතාභාජිතන්ති ‘‘එත්තකානි වත්ථානි භාජිතානි, එත්තකානි අභාජිතානී’’ති ජානන්තො ‘‘භාජිතාභාජිතඤ්ච ජානෙය්යා’’ති වුච්චති. 'उस्सन्नं होति' का अर्थ है बहुत अधिक राशि (ढेर) होना, जिसे भण्डागार समाहित न कर सके। 'सम्मुखीभूतेन' का अर्थ है उपचार-सीमा के भीतर स्थित संघ द्वारा। 'भाजेतुं' का अर्थ है समय की घोषणा करके क्रम से बाँटना। 'कोलाहलं अकासि' का अर्थ है 'हमारे आचार्य को दें, हमारे उपाध्याय को दें'—इस प्रकार ऊँचा शब्द (शोर) करना। चीवर-विभाजन के अंगों में, समान (सभाग) भिक्षुओं को न मिलने वाला भी बहुमूल्य चीवर देना 'छन्दागति' कहलाता है। अन्य वृद्धतरों को मिलने वाला भी बहुमूल्य चीवर न देकर अल्पमूल्य देना 'दोषागति' कहलाता है। मोह से मूढ़ होकर चीवर-दान के नियम को न जानते हुए (बाँटना) 'मोहागति' कहलाता है। मुखर (कठोर बोलने वाले) नवोदित भिक्षुओं को भी भय के कारण, न मिलने योग्य भी बहुमूल्य चीवर देना 'भयागति' कहलाता है। जो इन (चारों) में नहीं जाता, वह सबके लिए तराजू के समान, प्रमाण स्वरूप और मध्यस्थ होता है, उसे ही (विभाजक) नियुक्त करना चाहिए। 'भाजिताभाजितं' का अर्थ है 'इतने वस्त्र बाँटे गए, इतने नहीं बाँटे गए'—यह जानने वाले को 'भाजिताभाजितं च जानेय्या' कहा जाता है। උච්චිනිත්වාති ‘‘ඉදං ථූලං, ඉදං සණ්හං, ඉදං ඝනං, ඉදං තනුකං, ඉදං පරිභුත්තං, ඉදං අපරිභුත්තං, ඉදං දීඝතො එත්තකං පුථුලතො එත්තක’’න්ති එවං වත්ථානි විචිනිත්වා. තුලයිත්වාති ‘‘ඉදං එත්තකං අග්ඝති, ඉදං එත්තක’’න්ති එවං අග්ඝපරිච්ඡෙදං කත්වා. වණ්ණාවණ්ණං කත්වාති සචෙ සබ්බෙසං එකෙකමෙව දසග්ඝනකං පාපුණාති, ඉච්චෙතං කුසලං; නො චෙ පාපුණාති, යං නව වා අට්ඨ වා අග්ඝති, තං අඤ්ඤෙන එකඅග්ඝනකෙන ච ද්විඅග්ඝනකෙන ච සද්ධිං බන්ධිත්වා එතෙන උපායෙන සමෙ පටිවීසෙ ඨපෙත්වාති අත්ථො. භික්ඛූ ගණෙත්වා වග්ගං බන්ධිත්වාති සචෙ එකෙකස්ස දියමානෙ දිවසො නප්පහොති, දස දස භික්ඛූ ගණෙත්වා දස දස චීවරපටිවීසෙ එකවග්ගං බන්ධිත්වා එකං භණ්ඩිකං කත්වා එවං චීවරපටිවීසං ඨපෙතුං අනුජානාමීති අත්ථො. එවං ඨපිතෙසු චීවරපටිවීසෙසු කුසො පාතෙතබ්බො. තෙහිපි භික්ඛූහි පුන කුසපාතං කත්වා භාජෙතබ්බං. 'उच्चिनित्वा' का अर्थ है—'यह मोटा है, यह महीन है, यह सघन है, यह पतला है, यह उपयोग किया हुआ है, यह उपयोग नहीं किया हुआ है, यह लंबाई में इतना है, चौड़ाई में इतना है'—इस प्रकार वस्त्रों को चुनकर। 'तुलयित्वा' का अर्थ है—'यह इतना मूल्यवान है, यह इतना'—इस प्रकार मूल्य का निर्धारण करके। 'वण्णावण्णं कत्वा' का अर्थ है—यदि सभी को एक-एक दस (इकाई) मूल्य वाला चीवर प्राप्त होता है, तो यह अच्छा है; यदि प्राप्त नहीं होता, तो जो नौ या आठ मूल्य का है, उसे अन्य एक मूल्य वाली और दो मूल्य वाली वस्तु के साथ बाँधकर, इस उपाय से समान भाग बनाकर रखना—यह अर्थ है। 'भिक्खू गणेत्वा वग्गं बंधित्वा' का अर्थ है—यदि एक-एक को देने में दिन पर्याप्त नहीं होता, तो दस-दस भिक्षुओं को गिनकर, दस-दस चीवर-भागों का एक समूह (वर्ग) बाँधकर, एक पोटली बनाकर इस प्रकार चीवर-भाग रखने की अनुमति देता हूँ—यह अर्थ है। इस प्रकार चीवर-भाग रखे जाने पर 'कुश' (शलाका/लॉटरी) डालना चाहिए। उन भिक्षुओं को भी पुनः कुश डालकर (आपस में) बाँटना चाहिए। සාමණෙරානං උපඩ්ඪපටිවීසන්ති එත්ථ යෙ සාමණෙරා අත්තිස්සරා භික්ඛුසඞ්ඝස්ස කත්තබ්බකම්මං න කරොන්ති, උද්දෙසපරිපුච්ඡාසු යුත්තා ආචරියුපජ්ඣායානංයෙව වත්තපටිපත්තිං කරොන්ති, අඤ්ඤෙසං න කරොන්ති, එතෙසංයෙව උපඩ්ඪභාගො දාතබ්බො. යෙ පන පුරෙභත්තඤ්ච පච්ඡාභත්තඤ්ච භික්ඛුසඞ්ඝස්සෙව කත්තබ්බකිච්චං කරොන්ති, තෙසං සමකො දාතබ්බො. ඉදඤ්ච පිට්ඨිසමයෙ [Pg.406] උප්පන්නෙන භණ්ඩාගාරෙ ඨපිතෙන අකාලචීවරෙනෙව කථිතං. කාලචීවරං පන සමකමෙව දාතබ්බං. තත්රුප්පාදවස්සාවාසිකං සම්මුඤ්ජනීබන්ධනාදි සඞ්ඝස්ස ඵාතිකම්මං කත්වා ගහෙතබ්බං. එතඤ්හෙත්ථ සබ්බෙසං වත්තං. භණ්ඩාගාරිකචීවරෙපි සචෙ සාමණෙරා ආගන්ත්වා ‘‘භන්තෙ මයං යාගුං පචාම, භත්තං පචාම, ඛජ්ජකං පචාම, අප්පහරිතකං කරොම, දන්තකට්ඨං ආහරාම, රඞ්ගඡල්ලිං කප්පියං කත්වා දෙම, කිං අම්හෙහි න කතං නාමා’’ති උක්කුට්ඨිං කරොන්ති, සමභාගොව දාතබ්බො. එතං යෙ ච විරජ්ඣිත්වා කරොන්ති, යෙසඤ්ච කරණභාවො න පඤ්ඤායති, තෙ සන්ධාය වුත්තං. කුරුන්දියං පන ‘‘සචෙ සාමණෙරා ‘කස්මා මයං භන්තෙ සඞ්ඝකම්මං න කරොම, කරිස්සාමා’ති යාචන්ති, සමපටිවීසො දාතබ්බො’’ති වුත්තං. यहाँ सामणेरों के आधे हिस्से के विषय में यह विनिश्चय समझना चाहिए। जो सामणेर स्वतंत्र (अत्तिस्सरा) हैं, भिक्षु संघ के कर्तव्यों को नहीं करते हैं, केवल पाठ और पूछताछ (उद्देस-परिपृच्छा) में लगे रहते हैं और केवल अपने आचार्यों और उपाध्यायों की ही सेवा करते हैं, दूसरों की नहीं, उन्हें आधा हिस्सा ही दिया जाना चाहिए। लेकिन जो भोजन से पहले और बाद में भिक्षु संघ के कर्तव्यों को करते हैं, उन्हें (भिक्षुओं के) समान हिस्सा दिया जाना चाहिए। यह बात 'पिट्ठिसमय' (चीवर काल के बाद) में उत्पन्न और भंडार में रखे हुए 'अकाल-चीवर' के बारे में कही गई है। 'काल-चीवर' तो समान ही दिया जाना चाहिए। वहाँ उत्पन्न 'वस्सावासिक' चीवर को बुहारने और झाड़ू बनाने आदि संघ के कार्यों को करके ही ग्रहण करना चाहिए। क्योंकि यहाँ यह सभी (भिक्षुओं और सामणेरों) का कर्तव्य है। भंडार के चीवर के विषय में भी यदि सामणेर आकर यह कहें कि 'भन्ते, हम यवागू (कांजी) पकाते हैं, भात पकाते हैं, खाद्य पदार्थ पकाते हैं, घास-फूस साफ करते हैं, दातून लाते हैं, रंग के लिए छाल को कल्पनीय बनाकर देते हैं; हमारे द्वारा क्या नहीं किया गया है?' और इस प्रकार शोर मचाते हैं, तो उन्हें समान हिस्सा ही दिया जाना चाहिए। यह उन सामणेरों के लिए कहा गया है जो काम में चूक करते हैं या जिनका काम करना स्पष्ट नहीं है। कुरुन्दी (अट्ठकथा) में तो कहा गया है—'यदि सामणेर यह प्रार्थना करते हैं कि भन्ते, हम संघ का काम क्यों नहीं करेंगे? हम करेंगे, तो उन्हें समान हिस्सा दिया जाना चाहिए'। උත්තරිතුකාමොති නදිං වා කන්තාරං වා උත්තරිතුකාමො; සත්ථං ලභිත්වා දිසා පක්කමිතුකාමොති අත්ථො. සකං භාගං දාතුන්ති ඉදං භණ්ඩාගාරතො චීවරානි නීහරිත්වා පුඤ්ජෙ කතෙ ඝණ්ටියා පහටාය භික්ඛුසඞ්ඝෙ සන්නිපතිතෙ සත්ථං ලභිත්වා ගන්තුකාමො ‘‘සත්ථතො මා පරිහායී’’ති එතමත්ථං සන්ධාය වුත්තං. තස්මා අනීහතෙසු වා චීවරෙසු අප්පහටාය වා ඝණ්ටියා අසන්නිපතිතෙ වා සඞ්ඝෙ දාතුං න වට්ටති. චීවරෙසු පන නීහතෙසු ඝණ්ටිං පහරිත්වා භික්ඛුසඞ්ඝෙ සන්නිපතිතෙ චීවරභාජකෙන ‘‘ඉමස්ස භික්ඛුනො කොට්ඨාසෙන එත්තකෙන භවිතබ්බ’’න්ති තක්කෙත්වා නයග්ගාහෙන චීවරං දාතබ්බං. තුලාය තුලිතමිව හි සමසමං දාතුං න සක්කා, තස්මා ඌනං වා හොතු අධිකං වා, එවං තක්කෙන නයෙන දින්නං සුදින්නං. නෙව ඌනකං පුන දාතබ්බං, නාතිරිත්තං පටිග්ගණ්හිතබ්බන්ති. 'पार जाने का इच्छुक' का अर्थ है नदी या जंगल को पार करने का इच्छुक; अर्थात् सार्थ (काफिला) पाकर दिशाओं में प्रस्थान करने का इच्छुक। 'अपना हिस्सा देने के लिए' यह बात भंडार से चीवरों को निकालकर ढेर लगाने, घंटा बजाने और भिक्षु संघ के एकत्रित होने पर, सार्थ पाकर जाने के इच्छुक भिक्षु के लिए 'वह सार्थ से पिछड़ न जाए' इस उद्देश्य से भगवान द्वारा कही गई है। इसलिए, चीवरों को निकाले बिना या घंटा बजाए बिना या संघ के एकत्रित हुए बिना हिस्सा देना उचित नहीं है। लेकिन चीवरों को निकालने, घंटा बजाने और भिक्षु संघ के एकत्रित होने पर, चीवर-वितरक (चीवर-भाजनक) को 'इस भिक्षु का हिस्सा इतना होना चाहिए' ऐसा अनुमान लगाकर युक्तिपूर्वक चीवर देना चाहिए। क्योंकि तराजू से तौले हुए के समान बिल्कुल बराबर देना संभव नहीं है, इसलिए वह कम हो या अधिक, इस प्रकार अनुमान और युक्ति से दिया गया चीवर 'सुदत्त' (भली-भाँति दिया गया) होता है। न तो कम होने पर दोबारा देना चाहिए और न ही अधिक होने पर वापस लेना चाहिए। අතිරෙකභාගෙනාති දස භික්ඛූ හොන්ති, සාටකාපි දසෙව, තෙසු එකො ද්වාදස අග්ඝති, සෙසා දසග්ඝනකා. සබ්බෙසු දසග්ඝනකවසෙන කුසෙ පාතිතෙ යස්ස භික්ඛුනො ද්වාදසග්ඝනකො කුසො පාතිතො, සො ‘‘එත්තකෙන මම චීවරං පහොතී’’ති තෙන අතිරෙකභාගෙන ගන්තුකාමො හොති. භික්ඛූ ‘‘අතිරෙකං ආවුසො සඞ්ඝස්ස සන්තක’’න්ති වදන්ති, තං සුත්වා භගවා ‘‘සඞ්ඝිකෙ ච ගණසන්තකෙ ච අප්පකං නාම නත්ථි, සබ්බත්ථ සංයමො කාතබ්බො, ගණ්හන්තෙනාපි කුක්කුච්චායිතබ්බ’’න්ති දස්සෙතුං ‘‘අනුජානාමි භික්ඛවෙ අනුක්ඛෙපෙ දින්නෙ’’ති ආහ. තත්ථ අනුක්ඛෙපො නාම යංකිඤ්චි අනුක්ඛිපිතබ්බං අනුප්පදාතබ්බං කප්පියභණ්ඩං; යත්තකං [Pg.407] තස්ස පටිවීසෙ අධිකං, තත්තකෙ අග්ඝනකෙ යස්මිං කිස්මිඤ්චි කප්පියභණ්ඩෙ දින්නෙති අත්ථො. 'अतिरिक्त हिस्से के साथ' का अर्थ है—दस भिक्षु हैं और वस्त्र (शाटक) भी दस ही हैं, उनमें से एक बारह (कार्षापण) मूल्य का है और शेष दस-दस मूल्य के हैं। सभी में दस-दस मूल्य के हिसाब से शलाका (मैल) डालने पर जिस भिक्षु को बारह मूल्य वाली शलाका मिली, वह 'इतने से मेरा चीवर पर्याप्त है' ऐसा कहकर उस अतिरिक्त हिस्से के साथ जाना चाहता है। भिक्षु कहते हैं—'आयुष्मन्, अतिरिक्त हिस्सा संघ का है'। यह सुनकर भगवान ने यह दिखाने के लिए कि 'सांघिक और गण के स्वामित्व वाली वस्तु में 'थोड़ा' जैसा कुछ नहीं होता, हर जगह संयम रखना चाहिए और उसे ग्रहण करने वाले को भी संकोच (कुक्कुच्च) करना चाहिए', यह कहा—'भिक्षुओं, मैं अनुज्ञा देता हूँ कि अनुक्षेप (पूरक वस्तु) देने पर (वह हिस्सा दिया जा सकता है)'। वहाँ 'अनुक्षेप' का अर्थ है कोई भी जोड़ी जाने वाली या दी जाने वाली कल्पनीय वस्तु; अर्थात् उसके हिस्से में जितना अधिक है, उतने ही मूल्य की कोई भी कल्पनीय वस्तु देने पर (वह हिस्सा दिया जा सकता है)। විකලකෙ තොසෙත්වාති එත්ථ චීවරවිකලකං පුග්ගලවිකලකන්ති ද්වෙ විකලකා. චීවරවිකලකං නාම සබ්බෙසං පඤ්ච පඤ්ච වත්ථානි පත්තානි, සෙසානිපි අත්ථි, එකෙකං පන න පාපුණාති, ඡින්දිත්වා දාතබ්බානි. ඡින්දන්තෙහි ච අඩ්ඪමණ්ඩලාදීනං වා උපාහනත්ථවිකාදීනං වා පහොනකානි ඛණ්ඩානි කත්වා දාතබ්බානි, හෙට්ඨිමපරිච්ඡෙදෙන චතුරඞ්ගුලවිත්ථාරම්පි අනුවාතප්පහොනකායාමං ඛණ්ඩං කත්වා දාතුං වට්ටති, අපරිභොගං පන න කාතබ්බන්ති එවමෙත්ථ චීවරස්ස අප්පහොනකභාවො චීවරවිකලකං. ඡින්දිත්වා දින්නෙ පන තං තොසිතං හොති, අථ කුසපාතො කාතබ්බො. සචෙපි එකස්ස භික්ඛුනො කොට්ඨාසෙ එකං වා ද්වෙ වා වත්ථානි නප්පහොන්ති, තත්ථ අඤ්ඤං සාමණකං පරික්ඛාරං ඨපෙත්වා යො තෙන තුස්සති, තස්ස තං භාගං දත්වා පච්ඡා කුසපාතො කාතබ්බො. ඉදම්පි චීවරවිකලකන්ති අන්ධකට්ඨකථායං වුත්තං. 'विकळकों (कमियों) को संतुष्ट करके' यहाँ चीवर-विकळक और पुग्गल-विकळक—ये दो प्रकार की कमियाँ हैं। चीवर-विकळक का अर्थ है—सभी को पाँच-पाँच वस्त्र मिल गए हैं, शेष वस्त्र भी हैं, लेकिन वे एक-एक (पूरे) नहीं पहुँचते, तो उन्हें काटकर देना चाहिए। काटने वालों को अर्ध-मण्डल आदि के लिए या जूते के थैले आदि के लिए पर्याप्त टुकड़ों को बनाकर देना चाहिए। न्यूनतम सीमा के रूप में, चार अंगुल चौड़ा और अनुवात (किनारी) के लिए पर्याप्त लंबाई वाला टुकड़ा बनाकर देना भी उचित है, लेकिन उसे अनुपयोगी नहीं बनाना चाहिए। इस प्रकार यहाँ चीवर की अपर्याप्तता 'चीवर-विकळक' है। काटकर देने पर वह (कमी) संतुष्ट हो जाती है, फिर शलाका (मैल) डालनी चाहिए। यदि एक भिक्षु के हिस्से में एक या दो वस्त्र कम पड़ते हैं, तो वहाँ कोई अन्य श्रमण-परिष्कार रखकर, जो उससे संतुष्ट हो, उसे वह हिस्सा देकर बाद में शलाका डालनी चाहिए। अंधक-अट्ठकथा में कहा गया है कि यह भी 'चीवर-विकळक' ही है। පුග්ගලවිකලකං නාම දස දස භික්ඛූ ගණෙත්වා වග්ගං කරොන්තානං එකො වග්ගො න පූරති, අට්ඨ වා නව වා හොන්ති, තෙසං අට්ඨ වා නව වා කොට්ඨාසා ‘‘තුම්හෙ ඉමෙ ගහෙත්වා විසුං භාජෙථා’’ති දාතබ්බා. එවමයං පුග්ගලානං අප්පහොනකභාවො පුග්ගලවිකලකං. විසුං දින්නෙ පන තං තොසිතං හොති, එවං තොසෙත්වා කුසපාතො කාතබ්බොති. අථ වා විකලකෙ තොසෙත්වාති යො චීවරවිභාගො ඌනකො, තං අඤ්ඤෙන පරික්ඛාරෙන සමං කත්වා කුසපාතො කාතබ්බො. पुग्गल-विकळक का अर्थ है—दस-दस भिक्षुओं की गणना करके समूह बनाते समय एक समूह पूरा नहीं होता, आठ या नौ ही होते हैं, तो उन्हें आठ या नौ हिस्से यह कहकर देने चाहिए कि 'आप इन्हें लेकर अलग से बाँट लें'। इस प्रकार व्यक्तियों की यह अपर्याप्तता 'पुग्गल-विकळक' है। अलग से देने पर वह (कमी) संतुष्ट हो जाती है, इस प्रकार संतुष्ट करके शलाका डालनी चाहिए। अथवा, 'विकळकों को संतुष्ट करके' का अर्थ है—जो चीवर का हिस्सा कम है, उसे अन्य परिष्कार के साथ बराबर करके शलाका डालनी चाहिए। චීවරරජනකථා चीवर रंगने की कथा। 344. ඡකණෙනාති ගොමයෙන. පණ්ඩුමත්තිකායාති තම්බමත්තිකාය. මූලරජනාදීසු හලිද්දිං ඨපෙත්වා සබ්බං මූලරජනං වට්ටති. මඤ්ජිට්ඨිඤ්ච තුඞ්ගහාරඤ්ච ඨපෙත්වා සබ්බං ඛන්ධරජනං වට්ටති. තුඞ්ගහාරො නාම එකො සකණ්ටකරුක්ඛො, තස්ස හරිතාලවණ්ණං ඛන්ධරජනං හොති. ලොද්දඤ්ච කණ්ඩුලඤ්ච ඨපෙත්වා සබ්බං තචරජනං වට්ටති. අල්ලිපත්තං නීලිපත්තඤ්ච ඨපෙත්වා සබ්බං පත්තරජනං වට්ටති. ගිහිපරිභුත්තං පන අල්ලිපත්තෙන එකවාරං රජිතුං වට්ටති. කිංසුකපුප්ඵඤ්ච කුසුම්භපුප්ඵඤ්ච ඨපෙත්වා සබ්බං පුප්ඵරජනං වට්ටති. ඵලරජනෙ පන න කිඤ්චි න වට්ටති. ३४४. "छकणेन" का अर्थ है गोबर से। "पण्डुमत्तिकाया" का अर्थ है लाल मिट्टी से। मूल-रंजकों (जड़ों के रंगों) में हल्दी को छोड़कर सभी मूल-रंजक कल्प्य (अनुमत) हैं। मञ्जिष्ठा और तुङ्गहार को छोड़कर सभी स्कन्ध-रंजक (तने के रंग) कल्प्य हैं। तुङ्गहार एक प्रकार का काँटेदार वृक्ष है, जिसके तने का रंग हरिताल (पीले) वर्ण का होता है। लोध्र और कण्डुल को छोड़कर सभी त्वचा-रंजक (छाल के रंग) कल्प्य हैं। मेंहदी के पत्ते और नील के पत्ते को छोड़कर सभी पत्र-रंजक (पत्तियों के रंग) कल्प्य हैं। लेकिन गृहस्थों द्वारा उपयोग किए गए पुराने वस्त्रों को मेंहदी के पत्तों से एक बार रंगना कल्प्य है। पलाश के फूल और कुसुम्भ के फूल को छोड़कर सभी पुष्प-रंजक कल्प्य हैं। फल-रंजकों में तो ऐसा कुछ भी नहीं है जो कल्प्य न हो (अर्थात सभी कल्प्य हैं)। සීතුදකාති [Pg.408] අපක්කරජනං වුච්චති. උත්තරාළුම්පන්ති වට්ටාධාරකං, රජනකුම්භියා මජ්ඣෙ ඨපෙත්වා තං ආධාරකං පරික්ඛිපිත්වා රජනං පක්ඛිපිතුං අනුජානාමීති අත්ථො. එවඤ්හි කතෙ රජනං න උත්තරති. උදකෙ වා නඛපිට්ඨිකාය වාති සචෙ පරිපක්කං හොති, උදකපාතියා දින්නො ථෙවො සහසා න විසරති, නඛපිට්ඨියම්පි අවිසරන්තො තිට්ඨති. රජනුළුඞ්කන්ති රජනඋළුඞ්කං. දණ්ඩකථාලකන්ති තමෙව සදණ්ඩකං. රජනකොලම්බන්ති රජනකුණ්ඩං. ඔමද්දන්තීති සම්මද්දන්ති. න ච අච්ඡින්නෙ ථෙවෙ පක්කමිතුන්ති යාව රජනබින්දු ගළිතං න ඡිජ්ජති, තාව න අඤ්ඤත්ර ගන්තබ්බං. පත්ථින්නන්ති අතිරජිතත්තා ථද්ධං. උදකෙ ඔසාරෙතුන්ති උදකෙ පක්ඛිපිත්වා ඨපෙතුං. රජනෙ පන නික්ඛන්තෙ තං උදකං ඡඩ්ඩෙත්වා චීවරං මද්දිතබ්බං. දන්තකාසාවානීති එකං වා ද්වෙ වා වාරෙ රජිත්වා දන්තවණ්ණානි ධාරෙන්ති. "सीतुदक" का अर्थ है कच्चा रंजक (बिना पका हुआ रंग)। "उत्तराळुम्प" का अर्थ है एक गोलाकार आधार (छल्ला), जिसे रंजक के बर्तन के बीच में रखकर और उस आधार से घेरकर रंजक डालने की अनुमति दी गई है। ऐसा करने पर रंजक उफनता नहीं है। "उदके वा नखपिट्ठिकाय वा" का अर्थ है कि यदि रंजक पूरी तरह पक गया हो, तो पानी के पात्र में डाली गई एक बूंद तुरंत नहीं फैलती, और नाखून के ऊपर डाली गई बूंद भी बिना फैले टिकी रहती है। "रजनुळुङ्क" का अर्थ है रंजक निकालने का करछुल। "दण्डकथालक" का अर्थ है डंडे (हैंडल) वाला वही पात्र। "रजनकोलम्ब" का अर्थ है रंजक रखने का कुण्ड (बड़ा बर्तन)। "ओमद्दन्ति" का अर्थ है अच्छी तरह मलना या गूँधना। "न च अच्छिन्ने थेवे पक्कमितुं" का अर्थ है कि जब तक रंजक की बूंदों का गिरना बंद न हो जाए, तब तक कहीं और नहीं जाना चाहिए। "पत्थिन्न" का अर्थ है अत्यधिक रंगे जाने के कारण कड़ा या सख्त हो जाना। "उदके ओसारेतुं" का अर्थ है पानी में डालकर रखना। जब रंजक निकल जाए, तो उस पानी को फेंककर चीवर को मलना चाहिए। "दन्तकासावानि" का अर्थ है एक या दो बार रंगे हुए हाथी के दाँत के रंग जैसे चीवर धारण करना। ඡින්නකචීවරානුජානනකථා छिन्नक-चीवर (कटे हुए टुकड़ों से बने चीवर) की अनुमति का कथन। 345. අච්ඡිබද්ධන්ති චතුරස්සකෙදාරකබද්ධං. පාළිබද්ධන්ති ආයාමතො ච විත්ථාරතො ච දීඝමරියාදබද්ධං. මරියාදබද්ධන්ති අන්තරන්තරා රස්සමරියාදබද්ධං. සිඞ්ඝාටකබද්ධන්ති මරියාදාය මරියාදං විනිවිජ්ඣිත්වා ගතට්ඨානෙ සිඞ්ඝාටකබද්ධං; චතුක්කසණ්ඨානන්ති අත්ථො. සංවිදහිතුන්ති කාතුං. උස්සහසි ත්වං ආනන්දාති සක්කොසි ත්වං ආනන්ද. උස්සහාමි භගවාති තුම්හෙහි දින්නනයෙන සක්කොමීති දස්සෙති. යත්ර හි නාමාති යො නාම. කුසිම්පි නාමාතිආදීසු කුසීති ආයාමතො ච විත්ථාරතො ච අනුවාතාදීනං දීඝපත්තානමෙතං අධිවචනං. අඩ්ඪකුසීති අන්තරන්තරා රස්සපත්තානං නාමං. මණ්ඩලන්ති පඤ්චඛණ්ඩිකචීවරස්ස එකෙකස්මිං ඛණ්ඩෙ මහාමණ්ඩලං. අඩ්ඪමණ්ඩලන්ති ඛුද්දකමණ්ඩලං. විවට්ටන්ති මණ්ඩලඤ්ච අඩ්ඪමණ්ඩලඤ්ච එකතො කත්වා සිබ්බිතං මජ්ඣිමඛණ්ඩං. ३४५. "अच्छिबद्ध" का अर्थ है चौकोर खेत के आकार में बना हुआ। "पाळिबद्ध" का अर्थ है लंबाई और चौड़ाई में लंबी मेड़ (सीमा) के आकार में बना हुआ। "मरियादबद्ध" का अर्थ है बीच-बीच में छोटी मेड़ों के आकार में बना हुआ। "सिङ्घाटकबद्ध" का अर्थ है जहाँ एक मेड़ दूसरी मेड़ को काटती हो, वहाँ चौराहे के आकार में बना हुआ; इसका अर्थ है 'चतुष्क' (चौराहे) के आकार वाला। "संविदहितुं" का अर्थ है बनाने के लिए। "उस्सहसि त्वं आनन्द" का अर्थ है 'क्या तुम समर्थ हो, आनन्द?'। "उस्सहामि भगवा" से यह दर्शाया गया है कि 'आपके द्वारा बताए गए तरीके से मैं बनाने में समर्थ हूँ'। "यत्र हि नाम" का अर्थ है 'जो'। "कुसिम्पि नाम" आदि में "कुसि" लंबाई और चौड़ाई में अनुवात (किनारी) आदि की लंबी पट्टियों का नाम है। "अड्ढकुसि" बीच-बीच की छोटी पट्टियों का नाम है। "मण्डल" पाँच खण्डों वाले चीवर के प्रत्येक खण्ड में बड़ा घेरा (बड़ा खण्ड) है। "अड्ढमण्डल" छोटा घेरा (छोटा खण्ड) है। "विवट्ट" मण्डल और अड्डमण्डल को एक साथ जोड़कर सिला गया मध्य खण्ड है। අනුවිවට්ටන්ති තස්ස උභොසු පස්සෙසු ද්වෙ ඛණ්ඩානි. ගීවෙය්යකන්ති ගීවාවෙඨනට්ඨානෙ දළ්හීකරණත්ථං අඤ්ඤං සුත්තසංසිබ්බිතං ආගන්තුකපත්තං. ජඞ්ඝෙය්යකන්ති ජඞ්ඝපාපුණනට්ඨානෙ තථෙව සංසිබ්බිතං පත්තං. ගීවට්ඨානෙ ච ජඞ්ඝට්ඨානෙ ච පත්තානමෙවෙතං නාමන්තිපි වදන්ති. බාහන්තන්ති අනුවිවට්ටානං බහි එකෙකං ඛණ්ඩං. ඉති පඤ්චඛණ්ඩිකචීවරෙනෙතං විචාරිතන්ති. අථ වා අනුවිවට්ටන්ති විවට්ටස්ස [Pg.409] එකපස්සතො ද්වින්නං එකපස්සතො ද්වින්නන්ති චතුන්නම්පි ඛණ්ඩානමෙතං නාමං. බාහන්තන්ති සුප්පමාණං චීවරං පාරුපන්තෙන සංහරිත්වා බාහාය උපරි ඨපිතා උභො අන්තා බහිමුඛා තිට්ඨන්ති, තෙසං එතං නාමං. අයමෙව හි නයො මහාඅට්ඨකථායං වුත්තොති. "अनुविवट्ट" का अर्थ है उसके (मध्य खण्ड के) दोनों ओर के दो खण्ड। "गीवेय्यक" का अर्थ है गर्दन के लपेटने के स्थान पर मजबूती के लिए धागों से सिला गया एक अन्य अतिरिक्त टुकड़ा (परत)। "जङ्घेय्यक" का अर्थ है पिंडलियों के स्थान पर उसी तरह सिला गया टुकड़ा। कुछ लोग इसे गर्दन और पिंडलियों के स्थान पर लगी पट्टियों का नाम भी कहते हैं। "बाहन्त" का अर्थ है अनुविवट्ट के बाहर का एक-एक खण्ड। इस प्रकार यह पाँच खण्डों वाले चीवर का विवरण है। अथवा, "अनुविवट्ट" विवट्ट (मध्य खण्ड) के एक ओर के दो और दूसरी ओर के दो, इस प्रकार चारों खण्डों का नाम है। "बाहन्त" का अर्थ है—सही माप के चीवर को ओढ़ने वाले भिक्षु द्वारा उसे समेटकर बाँह के ऊपर रखने पर जो दोनों किनारे बाहर की ओर निकले रहते हैं, उनका नाम है। महाअट्ठकथा में यही विधि बताई गई है। තිචීවරානුජානනකථා त्रि-चीवर (तीन चीवरों) की अनुमति का कथन। 346. චීවරෙහි උබ්භණ්ඩිකෙති චීවරෙහි උබ්භණ්ඩෙ කතෙ; යථා උක්ඛිත්තභණ්ඩා හොන්ති එවං කතෙ; උක්ඛිත්තභණ්ඩිකභාවං ආපාදිතෙති අත්ථො. චීවරභිසින්ති එත්ථ භිසීති ද්වෙ තීණි එකතො කත්වා භිසිසඞ්ඛෙපෙන සංහරිතචීවරානි වුත්තානි. තෙ කිර භික්ඛූ ‘‘දක්ඛිණාගිරිතො භගවා ලහුං පටිනිවත්තිස්සතී’’ති තත්ථ ගච්ඡන්තා ජීවකවත්ථුස්මිං ලද්ධචීවරානි ඨපෙත්වා අගමංසු. ඉදානි පන චිරෙන ආගමිස්සතීති මඤ්ඤමානා ආදාය පක්කමිංසු. අන්තරට්ඨකාසූති මාඝස්ස ච ඵග්ගුණස්ස ච අන්තරා අට්ඨසු. න භගවන්තං සීතං අහොසීති භගවතො සීතං නාහොසි. එතදහොසි යෙපි ඛො තෙ කුලපුත්තාති න භගවා අජ්ඣොකාසෙ අනිසීදිත්වා එතමත්ථං න ජානාති, මහාජනසඤ්ඤාපනත්ථං පන එවමකාසි. සීතාලුකාති සීතපකතිකා; යෙ පකතියාව සීතෙන කිලමන්ති. දිගුණං සඞ්ඝාටින්ති දුපට්ටං සඞ්ඝාටිං. එකච්චියන්ති එකපට්ටං. ඉති ‘‘භගවා අත්තනා චතූහි චීවරෙහි යාපෙති, අම්හාකං පන තිචීවරං අනුජානාතී’’ති වචනස්ස ඔකාසං උපච්ඡින්දිතුං දිගුණං සඞ්ඝාටිං අනුජානාති, එකච්චිකෙ ඉතරෙ. එවඤ්හි නෙසං චත්තාරි භවිස්සන්තීති. ३४६. "चीवरेहि उब्भण्डिके" का अर्थ है चीवरों की गठरी ऊपर लादे हुए; जिस प्रकार सामान ऊपर उठाया हुआ हो, वैसा करने पर; इसका अर्थ है सामान ऊपर उठाए हुए होने की अवस्था को प्राप्त। "चीवरभिसि" में 'भिसि' का अर्थ है दो या तीन चीवरों को एक साथ मिलाकर तकिये की तरह समेटे हुए चीवर। वे भिक्षु यह सोचकर कि "भगवान् दक्षिणागिरि से शीघ्र ही लौट आएँगे", जीवक-वस्तु में प्राप्त चीवरों को वहीं छोड़कर चले गए थे। लेकिन अब "वे देर से लौटेंगे" ऐसा मानकर उन्हें साथ लेकर चल दिए। "अन्तरट्ठकासु" का अर्थ है माघ और फाल्गुन महीने के बीच के आठ दिन। "न भगवन्तं सीतं अहोसि" का अर्थ है भगवान् को ठंड नहीं लगी। "एतदहोसि येपि खो ते कुलपुत्ता" का अर्थ है—ऐसा नहीं है कि भगवान् ने खुले आकाश में बिना बैठे इस बात को नहीं जाना, बल्कि उन्होंने महाजनों (लोगों) को समझाने के लिए ऐसा किया। "सीतालुका" का अर्थ है शीत-प्रकृति वाले; जो स्वभाव से ही ठंड से कष्ट पाते हैं। "दिगुणं सङ्घाटिं" का अर्थ है दोहरी परत वाली संघाटी। "एकच्चियं" का अर्थ है एक परत वाली। इस प्रकार, "भगवान् स्वयं तो चार चीवरों से निर्वाह करते हैं, और हमें केवल तीन चीवरों की अनुमति देते हैं"—इस तरह के कथन के अवसर को समाप्त करने के लिए उन्होंने दोहरी संघाटी और अन्य को एक-एक परत वाली रखने की अनुमति दी। इस प्रकार उनके पास कुल चार परतें हो जाएँगी। අතිරෙකචීවරාදිකථා अतिरेक-चीवर (अतिरिक्त चीवर) आदि का कथन। 348. අග්ගළං අච්ඡුපෙය්යන්ති ඡිද්දට්ඨානෙ පිලොතිකඛණ්ඩං ලග්ගාපෙය්යං. අහතකප්පානන්ති එකවාරං ධොතානං. උතුද්ධටානන්ති උතුතො දීඝකාලතො උද්ධටානං හතවත්ථකානං, පිලොතිකානන්ති වුත්තං හොති. පාපණිකෙති අන්තරාපණතො පතිතපිලොතිකචීවරෙ. උස්සාහො කරණීයොති පරියෙසනා කාතබ්බා. පරිච්ඡෙදො පනෙත්ථ නත්ථි, පට්ටසතම්පි වට්ටති. සබ්බමිදං සාදියන්තස්ස භික්ඛුනො වසෙන වුත්තං. අග්ගළං තුන්නන්ති එත්ථ උද්ධරිත්වා අල්ලීයාපනඛණ්ඩං අග්ගළං, සුත්තෙන සංසිබ්බිතං තුන්නං; වට්ටෙත්වා කරණං ඔවට්ටිකං [Pg.410] . කණ්ඩුසකං වුච්චති මුද්දිකා. දළ්හීකම්මන්ති අනුද්ධරිත්වාව උපස්සයං කත්වා අල්ලීයාපනකං වත්ථඛණ්ඩං. ३४८. "अग्गलं अच्छुपेय्यं" का अर्थ है छिद्र वाले स्थान पर कपड़े का टुकड़ा (पैच) लगाना। "अहतकप्पानं" का अर्थ है एक बार धोया हुआ। "उतुद्धटानं" का अर्थ है लंबे समय के बाद निकाला गया, पीटा और धोया गया पुराना कपड़ा। "पापणिके" का अर्थ है दुकान से गिरा हुआ कपड़े का टुकड़ा। "उस्साहो करणीयो" का अर्थ है खोज की जानी चाहिए। यहाँ कोई सीमा नहीं है, सौ परतें भी स्वीकार्य हैं। यह सब स्वीकार करने वाले भिक्षु के संदर्भ में भगवान द्वारा कहा गया है। "अग्गलं तुन्नं" यहाँ सड़े हुए हिस्से को हटाकर पैच लगाने को 'अग्गलं' और धागे से सिलने को 'तुन्नं' कहते हैं; मोड़कर सिलने को 'ओवट्टिकं' कहते हैं। 'कण्डुसकं' को 'मुद्दिका' कहा जाता है। 'दळ्हीकम्मं' का अर्थ है पुराने हिस्से को हटाए बिना ऊपर से कपड़े का टुकड़ा लगाकर मजबूती देना। 349-351. විසාඛාවත්ථු උත්තානත්ථං. තතො පරං පුබ්බෙ විනිච්ඡිතමෙව. සොවග්ගිකන්ති සග්ගප්පත්තහෙතුකං. තෙනෙවාහ ‘‘සොවග්ගික’’න්ති. සොකං අපනෙතීති සොකනුදං. අනාමයාති අරොගා. සග්ගම්හි කායම්හීති සග්ගොපපන්නා. ३४९-३५१. विशाखा की कथा का अर्थ स्पष्ट है। उसके बाद के पद पहले ही विनिश्चित किए जा चुके हैं। "सोवग्गिकं" का अर्थ है स्वर्ग प्राप्ति का हेतु। इसीलिए भगवान ने "सोवग्गिकं" कहा है। "सोकनुदं" का अर्थ है शोक को दूर करने वाला। "अनामया" का अर्थ है रोगरहित (स्वस्थ)। "सग्गम्हि कायम्हि" का अर्थ है स्वर्ग में उत्पन्न होना। 353. පුථුජ්ජනා කාමෙසු වීතරාගාති ඣානලාභිනො. ३५३. "पुथुज्जना कामेसु वीतरागा" का अर्थ है ध्यान (झान) प्राप्त करने वाले व्यक्ति। 356. සන්දිට්ඨොති දිට්ඨමත්තකමිත්තො. සම්භත්තොති එකසම්භොගො දළ්හමිත්තො. ආලපිතොති ‘‘මම සන්තකං යං ඉච්ඡෙය්යාසි, තං ගණ්හාහී’’ති එවං වුත්තො. එතෙසු තීසු අඤ්ඤතරනාමෙන සද්ධිං ජීවති, ගහිතෙ අත්තමනො හොතීති ඉමෙහි ගහිතවිස්සාසො රුහති. ३५६. "संदिट्ठो" का अर्थ है केवल देखा हुआ मित्र। "सम्भत्तो" का अर्थ है साथ में उपभोग करने वाला दृढ़ मित्र। "आलपितो" का अर्थ है जिसे ऐसा कहा गया हो कि "मेरी जो भी वस्तु तुम चाहो, उसे ले लो"। इन तीनों में से किसी एक के साथ रहने पर या वस्तु लेने पर प्रसन्न होने से विश्वास (विस्सासो) पुष्ट होता है। පච්ඡිමවිකප්පනුපගචීවරාදිකථා पश्चिमी-विकल्पन-उपग-चीवर आदि की कथा। 359. පංසුකූලකතොති කතපංසුකූලො. ගරුකො හොතීති ජිණ්ණජිණ්ණට්ඨානෙ අග්ගළාරොපනෙන ගරුකො හොති. සුත්තලූඛං කාතුන්ති සුත්තෙනෙව අග්ගළං කාතුන්ති අත්ථො. විකණ්ණො හොතීති සුත්තං අච්ඡෙත්වා අච්ඡෙත්වා සිබ්බන්තානං එකො සඞ්ඝාටිකොණො දීඝො හොති. විකණ්ණං උද්ධරිතුන්ති දීඝකොණං ඡින්දිතුං. ඔකිරියන්තීති ඡින්නකොණතො ගළන්ති. අනුවාතං පරිභණ්ඩන්ති අනුවාතඤ්චෙව පරිභණ්ඩඤ්ච. පත්තා ලුජ්ජන්තීති මහන්තෙසු පත්තමුඛෙසු දින්නානි සුත්තානි ගළන්ති, තතො පත්තා ලුජ්ජන්ති. අට්ඨපදකං කාතුන්ති අට්ඨපදකච්ඡන්නෙන පත්තමුඛං සිබ්බිතුං. ३५९. "पंसुकूलकतो" का अर्थ है पांसुकूल बनाया हुआ। "गरुको होति" का अर्थ है पुराने स्थानों पर पैच लगाने के कारण भारी हो जाना। "सुत्तलूखं कातुं" का अर्थ है केवल धागे से पैच लगाना। "विकण्णो होति" का अर्थ है धागे को खींच-खींच कर सीने वाले भिक्षुओं के संघात (चीवर) का एक कोना लंबा हो जाता है। "विकण्णं उद्धरितुं" का अर्थ है लंबे कोने को काटना। "ओकिरियन्ति" का अर्थ है कटे हुए कोने से धागे गिरते हैं। "अनुवातं परिभण्डं" का अर्थ है लंबाई और चौड़ाई की सीमा (बॉर्डर)। "पत्ता लुज्जन्ति" का अर्थ है बॉर्डर के बड़े सिरों पर दिए गए धागे गिर जाते हैं, जिससे बॉर्डर नष्ट हो जाते हैं। "अट्ठपदकं कातुं" का अर्थ है बॉर्डर के सिरों को चौकोर (आठ खाने वाले) पैटर्न में सीना। 360. අන්වාධිකම්පි ආරොපෙතුන්ති ආගන්තුකපත්තම්පි දාතුං. ඉදං පන අප්පහොනකෙ ආරොපෙතබ්බං. සචෙ පහොති, ආගන්තුකපත්තං න වට්ටති, ඡින්දිතබ්බමෙව. ३६०. "अन्वाधिकम्पि आरोपेतुं" का अर्थ है अतिरिक्त परत (आगन्तुक पट्ट) लगाना। यह तब करना चाहिए जब चीवर पर्याप्त न हो। यदि पर्याप्त हो, तो अतिरिक्त परत लगाना उचित नहीं है, उसे काट देना चाहिए। 361. න ච භික්ඛවෙ සද්ධාදෙය්යන්ති එත්ථ සෙසඤාතීනං දෙන්තො විනිපාතෙතියෙව. මාතාපිතරො පන සචෙ රජ්ජෙ ඨිතා පත්ථයන්ති, දාතබ්බං. ३६१. "न च भिक्खवे सद्धादेय्यं" यहाँ माता-पिता के अतिरिक्त अन्य रिश्तेदारों को दान की वस्तु देना उसे व्यर्थ गँवाना है। परंतु यदि माता-पिता, भले ही वे राजपद पर हों, इच्छा करें तो उन्हें देना चाहिए। 362. ගිලානොති [Pg.411] ගිලානතාය ගහෙත්වා ගන්තුං අසමත්ථො. වස්සිකසඞ්කෙතන්ති වස්සිකෙ චත්තාරො මාසෙ. නදීපාරන්ති නදියා පාරෙ භත්තං භුඤ්ජිතබ්බං හොති. අග්ගළගුත්තිවිහාරොති සබ්බෙස්වෙව චෙතෙසු ගිලානවස්සිකසඞ්කෙතනදීපාරගමනඅත්ථතකථිනභාවෙසු අග්ගළගුත්තියෙව පමාණං. ගුත්තෙ එව හි විහාරෙ එතෙසු කාරණෙසු නික්ඛිපිත්වා බහි ගන්තුං වට්ටති, න අගුත්තෙ. ආරඤ්ඤකස්ස පන විහාරො න සුගුත්තො හොති, තෙන භණ්ඩුක්ඛලිකාය පක්ඛිපිත්වා පාසාණසුසිර රුක්ඛසුසිරාදීසු සුප්පටිච්ඡන්නෙසු ඨපෙත්වා ගන්තබ්බං. ३६२. "गिलानो" का अर्थ है बीमारी के कारण चीवर लेकर जाने में असमर्थ। "वस्सिकासंकेतं" का अर्थ है वर्षा ऋतु के चार महीने। "नदीपारं" का अर्थ है नदी के उस पार भोजन करना हो। "अग्गळगुत्तिविहारो" का अर्थ है इन सभी स्थितियों में—बीमारी, वर्षा ऋतु, नदी पार जाना, और कठिन का फैला होना—किवाड़ (दरवाजे) से विहार की सुरक्षा ही मुख्य पैमाना है। सुरक्षित विहार में इन कारणों से चीवर छोड़कर बाहर जाना उचित है, असुरक्षित में नहीं। वनवासी भिक्षु का विहार सुरक्षित नहीं होता, इसलिए उसे बड़े बर्तन (भाण्डकुण्डिका) में रखकर या पत्थर की दरारों, पेड़ के खोखलों आदि सुरक्षित स्थानों में छिपाकर जाना चाहिए। සඞ්ඝිකචීවරුප්පාදකථා संघिक चीवर की उत्पत्ति की कथा। 363. තුය්හෙව භික්ඛු තානි චීවරානීති අඤ්ඤත්ථ ගහෙත්වා හටානිපි තුය්හෙව; න තෙසං අඤ්ඤො කොචි ඉස්සරොති. එවඤ්ච පන වත්වා අනාගතෙපි නික්කුක්කුච්චා ගණ්හිස්සන්තීති දස්සෙතුං ඉධ පනාතිආදිමාහ. තස්සෙව තානි චීවරානි යාව කථිනස්ස උබ්භාරාති සචෙ ගණපූරකෙ භික්ඛූ ලභිත්වා කථිනං අත්ථතං හොති, පඤ්චමාසෙ; නො චෙ අත්ථතං හොති, එකං චීවරමාසමෙව. යං ‘‘සඞ්ඝස්ස දෙමා’’ති වා දෙන්ති, ‘‘සඞ්ඝං උද්දිස්ස දෙමා’’ති වා දෙන්ති, ‘‘වස්සංවුත්ථසඞ්ඝස්ස දෙමා’’ති වා දෙන්ති, ‘‘වස්සාවාසිකං දෙමා’’ති වා දෙන්ති, සචෙපි මතකචීවරං අවිභජිත්වා තං විහාරං පවිසන්ති, තං සබ්බං තස්සෙව භික්ඛුනො හොති. යම්පි සො වස්සාවාසත්ථාය වඩ්ඪිං පයොජෙත්වා ඨපිතඋපනික්ඛෙපතො වා තත්රුප්පාදතො වා වස්සාවාසිකං ගණ්හාති, සබ්බං සුග්ගහිතමෙව හොති. ඉදමෙත්ථ ලක්ඛණං, යෙන තෙනාකාරෙන සඞ්ඝස්ස උප්පන්නං වත්ථං අත්ථතකථිනස්ස පඤ්චමාසෙ, අනත්ථතකථිනස්ස එකං චීවරමාසං පාපුණාතීති. යං පන ‘‘ඉදං ඉධ වස්සංවුත්ථසඞ්ඝස්ස දෙමා’’ති වා ‘‘වස්සාවාසිකං දෙමා’’ති වා වත්වා දින්නං, තං අනත්ථතකථිනස්සාපි පඤ්චමාසෙ පාපුණාති. තතො පරං පන උප්පන්නං වස්සාවාසිකං පුච්ඡිතබ්බං – ‘‘කිං අතීතවස්සෙ ඉදං වස්සාවාසිකං, උදාහු අනාගතවස්සෙ’’ති! කස්මා? පිට්ඨිසමයෙ උප්පන්නත්තා. ३६३. "तुय्हेव भिक्खु तानि चीवरानि" का अर्थ है कि अन्य स्थान से लाए जाने पर भी वे तुम्हारे ही हैं; उन पर किसी अन्य का अधिकार नहीं है। ऐसा कहकर भगवान ने यह दर्शाया कि भविष्य में भी भिक्षु बिना किसी संकोच (कुक्कुच्च) के उन्हें ग्रहण करें। "तस्सेव तानि चीवरानि याव कठिनस्स उब्भारा" का अर्थ है कि यदि गण-पूरक भिक्षुओं को प्राप्त कर कठिन फैलाया गया हो, तो पाँच महीने तक; यदि नहीं फैलाया गया हो, तो केवल एक महीने (चीवर मास) तक वे उसी के होते हैं। जो "संघ को देते हैं", "संघ के उद्देश्य से देते हैं", "वर्षावास पूर्ण करने वाले संघ को देते हैं" या "वस्सावासिक (वर्षाकालीन) चीवर देते हैं" कहकर दिया जाता है, या यदि मृत भिक्षु के चीवर का विभाजन किए बिना वे उस विहार में प्रवेश करते हैं, तो वह सब उसी (अकेले रहने वाले) भिक्षु का होता है। यहाँ तक कि यदि वह वर्षावास के लिए ब्याज (वृद्धि) से या उस स्थान के बगीचे आदि की उपज से वर्षाकालीन चीवर प्राप्त करता है, तो वह सब उचित रूप से ग्रहण किया हुआ ही है। यहाँ यह लक्षण (नियम) है: जिस किसी भी प्रकार से संघ के लिए उत्पन्न वस्त्र, कठिन फैलाने वाले भिक्षु को पाँच महीने तक और न फैलाने वाले को एक महीने तक प्राप्त होता है। परंतु जो "यहाँ वर्षावास पूर्ण करने वाले संघ को देते हैं" या "वस्सावासिक देते हैं" कहकर दिया गया है, वह कठिन न फैलाने वाले को भी पाँच महीने तक प्राप्त होता है। उसके बाद उत्पन्न वर्षाकालीन चीवर के बारे में पूछना चाहिए— "क्या यह पिछले वर्षावास का है या आने वाले वर्षावास का?" क्यों? क्योंकि यह चीवर-काल के बाद के समय में उत्पन्न हुआ है। උතුකාලන්ති වස්සානතො අඤ්ඤං කාලං. තානි චීවරානි ආදාය සාවත්ථිං ගන්ත්වාති එත්ථ තානි චීවරානි ගතගතට්ඨානෙ සඞ්ඝිකානෙව හොන්ති, භික්ඛූහි දිට්ඨමත්තමෙවෙත්ථ පමාණං. තස්මා සචෙ කෙචි පටිපථං ආගච්ඡන්තා ‘‘කුහිං [Pg.412] ආවුසො ගච්ඡසී’’ති පුච්ඡිත්වා තමත්ථං සුත්වා ‘‘කිං ආවුසො මයං සඞ්ඝො න හොමා’’ති තත්ථෙව භාජෙත්වා ගණ්හන්ති, සුග්ගහිතානි. සචෙපි එස මග්ගා ඔක්කමිත්වා කඤ්චි විහාරං වා ආසනසාලං වා පිණ්ඩාය චරන්තො එකං ගෙහමෙව වා පවිසති, තත්ර ච නං භික්ඛූ දිස්වා තමත්ථං පුච්ඡිත්වා භාජෙත්වා ගණ්හන්ති, සුග්ගහිතානෙව. "ऋतुकाल" का अर्थ है वर्षा ऋतु के अतिरिक्त अन्य समय। उन चीवरों को लेकर सावत्थी जाने के संदर्भ में, वे चीवर जहाँ-जहाँ ले जाए जाते हैं, वहाँ वे संघिक (संघ के) ही होते हैं; यहाँ भिक्षुओं द्वारा केवल देखा जाना ही प्रमाण है। इसलिए, यदि मार्ग में आते हुए कुछ भिक्षु पूछें कि "आयुष्मन, कहाँ जा रहे हो?" और उस बात को सुनकर कहें कि "क्या हम संघ नहीं हैं?" और वहीं विभाजित करके ग्रहण कर लेते हैं, तो वह सुगृहीत (सही ढंग से ग्रहण किया हुआ) है। यदि वह मार्ग से हटकर किसी विहार, आसनशाला या भिक्षा के लिए किसी घर में प्रवेश करता है, और वहाँ भिक्षु उसे देखकर, बात पूछकर और विभाजित करके ग्रहण करते हैं, तो वह भी सुगृहीत ही है। අධිට්ඨාතුන්ති එත්ථ අධිට්ඨහන්තෙන වත්තං ජානිතබ්බං. තෙන හි භික්ඛුනා ඝණ්ටිං පහරිත්වා කාලං ඝොසෙත්වා ථොකං ආගමෙත්වා සචෙ ඝණ්ටිසඤ්ඤාය වා කාලසඤ්ඤාය වා භික්ඛූ ආගච්ඡන්ති, තෙහි සද්ධිං භාජෙතබ්බානි. නො චෙ ආගච්ඡන්ති, ‘‘මය්හිමානි චීවරානි පාපුණන්තී’’ති අධිට්ඨාතබ්බානි. එවං අධිට්ඨිතෙ සබ්බානි තස්සෙව හොන්ති, ඨිතිකා පන න තිට්ඨති. "अधिष्ठान करने" के विषय में, अधिष्ठान करने वाले भिक्षु को कर्तव्य (वत्त) जानना चाहिए। उस भिक्षु को घंटा बजाकर, समय की घोषणा कर और थोड़ी प्रतीक्षा करनी चाहिए; यदि घंटे की ध्वनि या समय की सूचना से भिक्षु आते हैं, तो उनके साथ विभाजित करना चाहिए। यदि वे नहीं आते हैं, तो "ये चीवर मुझे प्राप्त होते हैं" ऐसा अधिष्ठान करना चाहिए। इस प्रकार अधिष्ठान करने पर सब उसी के हो जाते हैं, परंतु 'स्थितिका' (नियम की निरंतरता) नहीं रहती। සචෙ එකෙකං උද්ධරිත්වා ‘‘අයං පඨමභාගො මය්හං පාපුණාති, අයං දුතියභාගො’’ති එවං ගණ්හාති, ගහිතානි ච සුග්ගහිතානි හොන්ති, ඨිතිකා ච තිට්ඨති. එවං පාපෙත්වා ගණ්හන්තෙනාපි අධිට්ඨිතමෙව හොති. සචෙ පන ඝණ්ටිං පහරිත්වා වා අප්පහරිත්වා වා කාලම්පි ඝොසෙත්වා වා අඝොසෙත්වා වා ‘‘අහමෙවෙත්ථ මය්හමෙව ඉමානි චීවරානී’’ති ගණ්හාති, දුග්ගහිතානි හොන්ති. අථ ‘‘අඤ්ඤො කොචි ඉධ නත්ථි, මය්හං එතානි පාපුණන්තී’’ති ගණ්හාති, සුග්ගහිතානි. यदि वह एक-एक करके निकालते हुए "यह पहला भाग मुझे प्राप्त होता है, यह दूसरा भाग..." इस प्रकार ग्रहण करता है, तो वे सुगृहीत होते हैं और 'स्थितिका' भी बनी रहती है। इस प्रकार प्राप्त कर ग्रहण करने वाले का भी वह अधिष्ठित ही होता है। यदि वह घंटा बजाकर या बिना बजाए, समय की घोषणा कर या बिना किए, "यहाँ केवल मैं ही हूँ, ये चीवर मेरे ही हैं" ऐसा सोचकर ग्रहण करता है, तो वे दुगृहीत (गलत तरीके से ग्रहण किए हुए) होते हैं। यदि वह सोचता है कि "यहाँ कोई अन्य नहीं है, ये मुझे प्राप्त होते हैं" और ग्रहण करता है, तो वे सुगृहीत हैं। පාතිතෙ කුසෙති එකකොට්ඨාසෙ කුසදණ්ඩකෙ පාතිතමත්තෙ සචෙපි භික්ඛුසහස්සං හොති, ගහිතමෙව නාම චීවරං. නාකාමා භාගො දාතබ්බො. සචෙ පන අත්තනො රුචියා දාතුකාමා හොන්ති, දෙන්තු. අනුභාගෙපි එසෙව නයො. "कुश (शलाका) डालने पर" का अर्थ है कि एक भाग के लिए कुश-दंड (चिह्न) डाल दिए जाने मात्र से, चाहे वहाँ एक हजार भिक्षु भी क्यों न हों, वह चीवर ग्रहण किया हुआ ही माना जाता है। अनिच्छा से भाग नहीं देना चाहिए। यदि वे अपनी रुचि से देना चाहते हैं, तो दे सकते हैं। अनुभाग (बाद के हिस्सों) में भी यही नियम है। සචීවරානීති ‘‘කාලචීවරම්පි සඞ්ඝස්ස ඉතොව දස්සාම, විසුං සජ්ජියමානෙ අතිචිරං හොතී’’ති ඛිප්පංයෙව සචීවරානි භත්තානි අකංසු. ථෙරෙ ආගම්ම උප්පන්නානීති තුම්හෙසු පසාදෙන ඛිප්පං උප්පන්නානි. "सचीवर" का अर्थ है—"काल-चीवर भी हम संघ को यहीं से देंगे, अलग से तैयार करने में बहुत समय लगेगा"—ऐसा सोचकर उन्होंने शीघ्र ही चीवरों के साथ भोजन (भत्त) तैयार किया। "स्थविरों के कारण उत्पन्न" का अर्थ है—आप लोगों के प्रति श्रद्धा के कारण शीघ्र ही उत्पन्न हुए। සඞ්ඝස්ස දෙමාති චීවරානි දෙන්තීති සකලම්පි චීවරකාලං සණිකං සණිකං දෙන්තියෙව. පුරිමෙසු පන ද්වීසු වත්ථූසු පච්ඡින්නදානත්තා අදංසූති වුත්තං. සම්බහුලා ථෙරාති විනයධරපාමොක්ඛථෙරා. ඉදං පන වත්ථුං සද්ධිං පුරිමෙන ද්වෙභාතිකවත්ථුනා පරිනිබ්බුතෙ භගවති උප්පන්නං, ඉමෙ ච ථෙරා දිට්ඨපුබ්බා තථාගතං, තස්මා පුරිමෙසු වත්ථූසු තථාගතෙන පඤ්ඤත්තනයෙනෙව කථෙසුං. "संघ को देते हैं" का अर्थ है कि वे संपूर्ण चीवर-काल में धीरे-धीरे चीवर देते ही रहते हैं। पूर्व के दो विषयों में दान की क्रिया समाप्त हो जाने के कारण "दिया" ऐसा कहा गया है। "सम्बहुला थेरा" का अर्थ है विनयधर प्रमुख स्थविर। यह (चौथी) कथा पूर्व की 'द्वेभातिक' (दो भाइयों वाली) कथा के साथ भगवान के परिनिर्वाण के बाद उत्पन्न हुई थी, और इन स्थविरों ने तथागत को पहले देखा था, इसलिए उन्होंने पूर्व के विषयों में तथागत द्वारा प्रज्ञप्त (निर्धारित) विधि के अनुसार ही बात कही। උපනන්දසක්යපුත්තවත්ථුකථා उपनन्द शाक्यपुत्र की कथा। 364. ගාමකාවාසං [Pg.413] අගමාසීති අප්පෙව නාම චීවරානි භාජෙන්තා මය්හම්පි සඞ්ගහං කරෙය්යුන්ති චීවරභාජනකාලං සල්ලක්ඛෙත්වාව අගමාසි. සාදියිස්සසීති ගණ්හිස්සසි. එත්ථ ච කිඤ්චාපි තස්ස භාගො න පාපුණාති. අථ ඛො ‘‘නගරවාසිකො අයං මුඛරො ධම්මකථිකො’’ති තෙ භික්ඛූ ‘‘සාදියිස්සසී’’ති ආහංසු. යො සාදියෙය්ය ආපත්ති දුක්කටස්සාති එත්ථ පන කිඤ්චාපි ලහුකා ආපත්ති, අථ ඛො ගහිතානි ගහිතට්ඨානෙ දාතබ්බානි. සචෙපි නට්ඨානි වා ජිණ්ණානි වා හොන්ති, තස්සෙව ගීවා. දෙහීති වුත්තෙ අදෙන්තො ධුරනික්ඛෙපෙ භණ්ඩග්ඝෙන කාරෙතබ්බො. ३६४. "ग्राम-आवास को गया" का अर्थ है—"चीवर विभाजित करते समय शायद वे मेरा भी सत्कार (संग्रह) करें"—ऐसा सोचकर चीवर विभाजन के समय को लक्षित करके ही वह गया। "स्वीकार करोगे" का अर्थ है—ग्रहण करोगे। यहाँ यद्यपि उसे कोई भाग प्राप्त नहीं होता, फिर भी "यह नगरवासी, मुखर (वाचाल) और धर्मकथक है"—ऐसा सोचकर उन भिक्षुओं ने "क्या स्वीकार करोगे?" ऐसा कहा। "जो स्वीकार करे उसे दुक्कट की आपत्ति होती है"—यहाँ यद्यपि आपत्ति हल्की है, फिर भी ग्रहण किए हुए चीवर ग्रहण किए गए स्थान पर ही लौटा देने चाहिए। यदि वे नष्ट हो गए हों या पुराने हो गए हों, तो वह उसी का उत्तरदायित्व (ग्रीवा) है। "दो" ऐसा कहने पर यदि वह नहीं देता, तो कार्य-त्याग (धुरनिक्खेप) के कारण उसे वस्तु के मूल्य के अनुसार दंडित (निर्णय) करना चाहिए। එකාධිප්පායන්ති එකං අධිප්පායං; එකං පුග්ගලපටිවීසමෙව දෙථාති අත්ථො. ඉදානි යථා සො දාතබ්බො, තං දස්සෙතුං තන්තිං ඨපෙන්තො ඉධ පනාතිආදිමාහ. තත්ථ සචෙ අමුත්ර උපඩ්ඪං අමුත්ර උපඩ්ඪන්ති එකෙකස්මිං එකාහමෙකාහං වා සත්තාහං සත්තාහං වා සචෙ වසති, එකෙකස්මිං විහාරෙ යං එකො පුග්ගලො ලභති, තතො තතො උපඩ්ඪං උපඩ්ඪං දාතබ්බං. එවං එකාධිප්පායො දින්නො හොති. යත්ථ වා පන බහුතරන්ති සචෙ එකස්මිං විහාරෙ වසන්තො ඉතරස්මිං සත්තාහවාරෙන අරුණමෙව උට්ඨාපෙති, එවං පුරිමස්මිං බහුතරං වසති නාම. තස්මා තතො බහුතරං වසිතවිහාරතො තස්ස පටිවීසො දාතබ්බො. එවම්පි එකාධිප්පායො දින්නො හොති. ඉදඤ්ච නානාලාභෙහි නානූපචාරෙහි එකසීමවිහාරෙහි කථිතං, නානාසීමවිහාරෙ පන සෙනාසනග්ගාහො පටිප්පස්සම්භති. තස්මා තත්ථ චීවරපටිවීසො න පාපුණාති. සෙසං පන ආමිසභෙසජ්ජාදි සබ්බං සබ්බත්ථ අන්තොසීමගතස්ස පාපුණාති. "एकाधिप्राय" का अर्थ है एक अभिप्राय; अर्थात् एक व्यक्ति का हिस्सा ही दो। अब जिस प्रकार वह दिया जाना चाहिए, उसे दर्शाने के लिए पालि-क्रम को रखते हुए "इध पन" आदि कहा गया है। वहाँ यदि वह एक-एक (विहार) में एक-एक दिन या सात-सात दिन रहता है, तो प्रत्येक विहार में एक व्यक्ति को जो प्राप्त होता है, उसमें से आधा-आधा भाग उसे दिया जाना चाहिए। इस प्रकार एक हिस्सा दिया हुआ होता है। "अथवा जहाँ अधिक (समय रहता है)"—यदि एक विहार में रहते हुए दूसरे में सात दिनों के अंतराल पर केवल अरुणोदय (भोर) बिताता है, तो पहले वाले में उसका अधिक रहना माना जाता है। इसलिए उस अधिक निवास वाले विहार से उसे हिस्सा दिया जाना चाहिए। इस प्रकार भी एक हिस्सा दिया हुआ होता है। यह बात विभिन्न लाभों और विभिन्न उपचारों वाले एक-सीमा के विहारों के लिए कही गई है, परंतु नाना-सीमा वाले विहारों में शयनासन-ग्रहण का नियम समाप्त हो जाता है। इसलिए वहाँ चीवर का हिस्सा प्राप्त नहीं होता। शेष अन्य सभी आमिष, भेषज आदि सामग्री सभी स्थानों पर सीमा के भीतर स्थित भिक्षु को प्राप्त होती है। ගිලානවත්ථුකථා ग्लान (रोगी) भिक्षु की कथा। 365. මඤ්චකෙ නිපාතෙසුන්ති එවං ධොවිත්වා අඤ්ඤං කාසාවං නිවාසෙත්වා මඤ්චකෙ නිපජ්ජාපෙසුං; නිපජ්ජාපෙත්වා ච පනායස්මා ආනන්දො මුත්තකරීසකිලිට්ඨං කාසාවං ධොවිත්වා භූමියං පරිභණ්ඩං අකාසි. යො භික්ඛවෙ මං උපට්ඨහෙය්ය, සො ගිලානං උපට්ඨහෙය්යාති යො මං ඔවාදානුසාසනීකරණෙන උපට්ඨහෙය්ය, සො ගිලානං උපට්ඨහෙය්ය; මම ඔවාදකාරකෙන ගිලානො උපට්ඨාතබ්බොති අයමෙවෙත්ථ අත්ථො. භගවතො ච ගිලානස්ස ච උපට්ඨානං එකසදිසන්ති එවං පනෙත්ථ අත්ථො න ගහෙතබ්බො. සඞ්ඝෙන උපට්ඨාතබ්බොති යස්සෙතෙ උපජ්ඣාදයො තස්මිං විහාරෙ නත්ථි, ආගන්තුකො හොති එකචාරිකො භික්ඛු, සො සඞ්ඝස්ස භාරො, තස්මා සඞ්ඝෙන [Pg.414] උපට්ඨාතබ්බො. නො චෙ උපට්ඨහෙය්ය, සකලස්ස සඞ්ඝස්ස ආපත්ති. වාරං ඨපෙත්වා ජග්ගන්තෙසු පන යො අත්තනො වාරෙ න ජග්ගති, තස්සෙව ආපත්ති. සඞ්ඝත්ථෙරොපි වාරකො න මුච්චති. සචෙ සකලො සඞ්ඝො එකස්ස භාරං කරොති, එකො වා වත්තසම්පන්නො භික්ඛු අහමෙව ජග්ගිස්සාමීති පටිජග්ගති, සඞ්ඝො ආපත්තිතො මුච්චති. ३६५. "मंचके निपातेसुन्ति" का अर्थ है कि इस प्रकार धोकर और दूसरा काषाय वस्त्र पहनाकर मंच (पलंग) पर लिटा दिया। लिटाने के बाद आयुष्मान् आनन्द ने मल-मूत्र से सने हुए काषाय वस्त्र को धोया और भूमि को स्वच्छ किया। "भिक्षुओं! जो मेरी सेवा करना चाहता है, वह बीमार की सेवा करे" का अर्थ है कि जो मेरे उपदेशों और शिक्षाओं का पालन करके मेरी सेवा करना चाहता है, वह बीमार की सेवा करे। मेरे उपदेशों का पालन करने वाले को बीमार की सेवा करनी चाहिए—यही यहाँ अर्थ है। भगवान् की सेवा और बीमार की सेवा एक समान है, ऐसा अर्थ यहाँ नहीं लेना चाहिए। "संघ द्वारा सेवा की जानी चाहिए" का अर्थ है कि जिसके उपाध्याय आदि उस विहार में नहीं हैं, वह आगन्तुक है या अकेला रहने वाला भिक्षु है, तो वह संघ का उत्तरदायित्व है; इसलिए संघ द्वारा उसकी सेवा की जानी चाहिए। यदि सेवा नहीं की जाती है, तो पूरे संघ को आपत्ति (दोष) होती है। बारी (पारी) तय करके सेवा करते समय जो अपनी बारी में सेवा नहीं करता, उसे ही आपत्ति होती है। संघस्थविर भी अपनी बारी से मुक्त नहीं होते। यदि पूरा संघ किसी एक का उत्तरदायित्व लेता है, या कोई एक कर्तव्यनिष्ठ भिक्षु कहता है कि "मैं ही सेवा करूँगा" और सेवा करता है, तो संघ आपत्ति से मुक्त हो जाता है। 366. අභික්කමන්තං වා අභික්කමතීතිආදීසු වඩ්ඪන්තං වා ආබාධං ‘‘ඉදං නාම මෙ පරිභුඤ්ජන්තස්ස වඩ්ඪති, ඉදං පරිභුඤ්ජන්තස්ස පරිහායති, ඉදං පරිභුඤ්ජන්තස්ස තිට්ඨතී’’ති යථාභූතං නාවිකරොතීති එවමත්ථො දට්ඨබ්බො. නාලන්ති න පතිරූපො, න යුත්තො උපට්ඨාතුං. භෙසජ්ජං සංවිධාතුන්ති භෙසජ්ජං යොජෙතුං අසමත්ථො හොති. ආමිසන්තරොති ආමිසං අස්ස අන්තරන්ති ආමිසන්තරො. අන්තරන්ති කාරණං වුච්චති; ආමිසකාරණා යාගුභත්තපත්තචීවරානි පත්ථෙන්තො උපට්ඨාතීති අත්ථො. ३६६. "अभिक्कमन्तं वा अभिक्कमती" आदि में बढ़ती हुई बीमारी के बारे में "यह (दवा या भोजन) लेने से मेरी बीमारी बढ़ती है, यह लेने से घटती है, यह लेने से स्थिर रहती है"—इस प्रकार यथार्थ रूप से प्रकट नहीं करता है, ऐसा अर्थ समझना चाहिए। "नालं" का अर्थ है सेवा करने के लिए अयोग्य या अनुचित। "भेषज्जं संविधातुं" का अर्थ है दवा तैयार करने में असमर्थ होना। "आमिसन्तरो" का अर्थ है जिसके भीतर आमिष (भौतिक लाभ) का कारण हो। "अन्तर" का अर्थ कारण कहा गया है; आमिष के कारण से यवागू, भोजन, पात्र और चीवर की इच्छा रखते हुए सेवा करता है—यह अर्थ है। මතසන්තකකථා मृतक की वस्तुओं (सम्पत्ति) के सम्बन्ध में कथा। 367. කාලඞ්කතෙති කාලකිරියාය. ගිලානුපට්ඨාකානං දාතුන්ති එත්ථ අනන්තරං වුත්තාය කම්මවාචාය දින්නම්පි අපලොකෙත්වා දින්නම්පි දින්නමෙව හොති, වට්ටති. ३६७. "कालङ्कते" का अर्थ है मृत्यु होने पर। "बीमार की सेवा करने वालों को देना चाहिए"—यहाँ इसके बाद कही गई कर्मवाचा द्वारा दिया गया हो या अपलोकन (पूछकर) करके दिया गया हो, वह दिया हुआ ही माना जाता है और उचित है। 369. යං තත්ථ ලහුභණ්ඩං යං තත්ථ ගරුභණ්ඩන්ති එත්ථ ලහුභණ්ඩගරුභණ්ඩානං නානාකරණං පරතො වණ්ණයිස්සාම. ගිලානුපට්ඨාකලාභෙ පන අයං ආදිතො පට්ඨාය විනිච්ඡයො – ३६९. "जो वहाँ लघुभाण्ड (हल्की वस्तु) है और जो वहाँ गुरुभाण्ड (भारी वस्तु) है"—यहाँ लघुभाण्ड और गुरुभाण्ड के भेद की व्याख्या आगे करेंगे। बीमार की सेवा करने वालों को मिलने वाले लाभ के विषय में आरम्भ से यह विनिश्चय (निर्णय) है— සචෙ සකලෙ භික්ඛුසඞ්ඝෙ උපට්ඨහන්තෙ කාලං කරොති, සබ්බෙපි සාමිකා. අථ එකච්චෙහි වාරෙ කතෙ එකච්චෙහි අකතෙයෙව කාලං කරොති, තත්ථ එකච්චෙ ආචරියා වදන්ති – ‘‘සබ්බෙපි අත්තනො වාරෙ සම්පත්තෙ කරෙය්යුං, තස්මා සබ්බෙපි සාමිනො’’ති. එකච්චෙ වදන්ති – ‘‘යෙහි ජග්ගිතො තෙ එව ලභන්ති, ඉතරෙ න ලභන්තී’’ති. සාමණෙරෙ කාලඞ්කතෙ සචෙ චීවරං අත්ථි, ගිලානුපට්ඨාකානං දාතබ්බං. නො චෙ අත්ථි යං අත්ථි, තං දාතබ්බං. අඤ්ඤස්මිං පරික්ඛාරෙ සති චීවරභාගං කත්වා දාතබ්බං. यदि पूरे भिक्षु संघ के सेवा करते समय मृत्यु होती है, तो सभी स्वामी (अधिकारी) हैं। यदि कुछ लोगों द्वारा बारी पूरी करने पर और कुछ की बारी आने से पहले ही मृत्यु हो जाती है, तो वहाँ कुछ आचार्य कहते हैं—"सभी को अपनी बारी आने पर सेवा करनी ही थी, इसलिए सभी स्वामी हैं।" कुछ कहते हैं—"जिन्होंने सेवा की है, उन्हें ही मिलता है, दूसरों को नहीं।" श्रामणेर की मृत्यु होने पर यदि चीवर है, तो सेवा करने वालों को देना चाहिए। यदि चीवर नहीं है, तो जो भी वस्तु है, वह देनी चाहिए। अन्य परिष्कारों के होने पर चीवर के हिस्से के बराबर करके देना चाहिए। භික්ඛු [Pg.415] ච සාමණෙරො ච සචෙ සමං උපට්ඨහිංසු, සමකො භාගො දාතබ්බො. අථ සාමණෙරොව උපට්ඨහති, භික්ඛුස්ස සංවිදහනමත්තමෙව හොති, සාමණෙරස්ස ජෙට්ඨකභාගො දාතබ්බො. සචෙ සාමණෙරො භික්ඛුනා ආනීතඋදකෙන යාගුං පචිත්වා පටිග්ගාහාපනමත්තමෙව කරොති, භික්ඛු උපට්ඨහති, භික්ඛුස්ස ජෙට්ඨකභාගො දාතබ්බො. यदि भिक्षु और श्रामणेर ने समान रूप से सेवा की है, तो समान हिस्सा देना चाहिए। यदि केवल श्रामणेर सेवा करता है और भिक्षु केवल व्यवस्था करता है, तो श्रामणेर को बड़ा हिस्सा देना चाहिए। यदि श्रामणेर भिक्षु द्वारा लाए गए जल से यवागू पकाकर केवल ग्रहण कराने का कार्य करता है और भिक्षु सेवा करता है, तो भिक्षु को बड़ा हिस्सा देना चाहिए। බහූ භික්ඛූ සමග්ගා හුත්වා උපට්ඨහන්ති, සබ්බෙසං සමකො භාගො දාතබ්බො. යො පනෙත්ථ විසෙසෙන උපට්ඨහති, තස්ස විසෙසො කාතබ්බො. යෙන පන එකදිවසම්පි ගිලානුපට්ඨාකවසෙන යාගුභත්තං වා පචිත්වා දින්නං, නහානං වා පටියාදිතං, සොපි ගිලානුපට්ඨාකොව. යො සමීපං අනාගන්ත්වා භෙසජ්ජතණ්ඩුලාදීනි පෙසෙති, අයං ගිලානුපට්ඨාකො න හොති. යො පරියෙසිත්වා ගාහාපෙත්වා ආගච්ඡති, අයං ගිලානුපට්ඨාකොව. यदि बहुत से भिक्षु मिलकर सेवा करते हैं, तो सभी को समान हिस्सा देना चाहिए। जो उनमें विशेष रूप से सेवा करता है, उसे विशेष देना चाहिए। जिसने एक दिन भी बीमार की सेवा के रूप में यवागू या भोजन पकाकर दिया है, या स्नान की व्यवस्था की है, वह भी सेवा करने वाला ही है। जो पास न आकर केवल दवा, चावल आदि भेज देता है, वह सेवा करने वाला नहीं है। जो खोजकर और मँगवाकर स्वयं आता है, वह सेवा करने वाला ही है। එකො වත්තසීසෙන ජග්ගති; එකො පච්චාසාය, මතකාලෙ උභොපි පච්චාසීසන්ති, උභින්නම්පි දාතබ්බං. එකො උපට්ඨහිත්වා ගිලානස්ස වා කම්මෙන අත්තනො වා කම්මෙන කත්ථචි ගතො ‘‘පුන ආගන්ත්වා ජග්ගිස්සාමී’’ති, එතස්සපි දාතබ්බං. එකො චිරං උපට්ඨහිත්වා ‘‘ඉදානි න සක්කොමී’’ති ධුරං නික්ඛිපිත්වා ගච්ඡති, සචෙපි තංදිවසමෙව ගිලානො කාලංකරොති, උපට්ඨාකභාගො න දාතබ්බො. एक कर्तव्य भाव से सेवा करता है; एक आशा से सेवा करता है; मृत्यु के समय यदि दोनों आशा रखते हैं, तो दोनों को देना चाहिए। एक सेवा करके बीमार के काम से या अपने काम से कहीं गया है और यह सोचकर गया है कि "एक बार फिर आकर सेवा करूँगा", तो उसे भी देना चाहिए। एक बहुत समय तक सेवा करके "अब मैं नहीं कर सकता" ऐसा कहकर प्रयास छोड़कर चला जाता है, तो भले ही उसी दिन बीमार की मृत्यु हो जाए, उसे सेवा का हिस्सा नहीं देना चाहिए। ගිලානුපට්ඨාකො නාම ගිහි වා හොතු පබ්බජිතො වා, අන්තමසො මාතුගාමොපි, සබ්බෙ භාගං ලභන්ති. සචෙ තස්ස භික්ඛුනො පත්තචීවරමත්තමෙව හොති, අඤ්ඤං නත්ථි; සබ්බං ගිලානුපට්ඨාකානංයෙව දාතබ්බං. සචෙපි සහස්සං අග්ඝති, අඤ්ඤං පන බහුම්පි පරික්ඛාරං තෙ න ලභන්ති; සඞ්ඝස්සෙව හොති. අවසෙසං භණ්ඩං බහුකඤ්චෙව මහග්ඝඤ්ච, තිචීවරං අප්පග්ඝං; තතො ගහෙත්වා තිචීවරපරික්ඛාරො දාතබ්බො. සබ්බඤ්චෙතං සඞ්ඝිකතොව ලබ්භති. बीमार की सेवा करने वाला चाहे गृहस्थ हो या प्रव्रजित, यहाँ तक कि महिला भी हो, सभी हिस्सा पाते हैं। यदि उस भिक्षु के पास केवल पात्र और चीवर ही है, अन्य कुछ नहीं है, तो वह सब सेवा करने वालों को ही देना चाहिए। भले ही उसका मूल्य एक हजार हो। किन्तु अन्य बहुत से परिष्कार उन्हें नहीं मिलते; वे संघ के ही होते हैं। यदि शेष सामग्री बहुत और बहुमूल्य हो और त्रिचीवर कम मूल्य का हो, तो उसमें से लेकर त्रिचीवर के साथ अन्य परिष्कार देने चाहिए। और यह सब संघ की सम्पत्ति में से ही प्राप्त होता है। සචෙ පන සො ජීවමානොයෙව සබ්බං අත්තනො පරික්ඛාරං නිස්සජ්ජිත්වා කස්සචි අදාසි, කොචි වා විස්සාසං අග්ගහෙසි, යස්ස දින්නං, යෙන ච ගහිතං, තස්සෙව හොති. තස්ස රුචියා එව ගිලානුපට්ඨාකා ලභන්ති, අඤ්ඤෙසං අදත්වා දූරෙ ඨපිතපරික්ඛාරාපි තත්ථ තත්ථ සඞ්ඝස්සෙව හොන්ති. ද්වින්නං සන්තකං හොති අවිභත්තං, එකස්මිං කාලඞ්කතෙ ඉතරො සාමී[Pg.416]. බහූනම්පි සන්තකෙ එසෙව නයො. සබ්බෙසු මතෙසු සඞ්ඝිකං හොති. සචෙපි අවිභජිත්වා සද්ධිවිහාරිකාදීනං දෙන්ති අදින්නමෙව හොති. විභජිත්වා දින්නං පන සුදින්නං. තං තෙසු මතෙසුපි සද්ධිවිහාරිකාදීනංයෙව හොති, න සඞ්ඝස්ස. यदि वह (भिक्षु) जीवित रहते हुए ही अपने सभी परिष्कारों (सामग्रियों) का त्याग कर किसी को दे देता है, या कोई विश्वास के कारण उन्हें ग्रहण कर लेता है, तो वे उसी के हो जाते हैं जिसे दिए गए हैं या जिसने ग्रहण किए हैं। उसकी इच्छा के अनुसार ही ग्लान-उपस्थापक (रोगी की सेवा करने वाले) उन्हें प्राप्त करते हैं; दूसरों को न देकर दूर रखे गए परिष्कार भी उन-उन स्थानों पर संघ के ही होते हैं। यदि दो व्यक्तियों की संपत्ति अविभाजित है, तो एक की मृत्यु होने पर दूसरा उसका स्वामी होता है। बहुतों की संपत्ति के विषय में भी यही नियम है। सभी की मृत्यु हो जाने पर वह संघ की संपत्ति (सांघिक) हो जाती है। यदि बिना विभाजित किए सद्धिविहारिक आदि को दिया जाता है, तो वह नहीं दिया गया ही माना जाता है। किंतु विभाजित करके दिया गया दान 'सुदत्त' (भली-भांति दिया गया) है। वह उन (दाताओं) की मृत्यु के बाद भी सद्धिविहारिक आदि का ही होता है, संघ का नहीं। කුසචීරාදිපටික්ඛෙපකථා कुश-चीवर आदि के निषेध की कथा 371. කුසචීරාදීසු අක්කනාළන්ති අක්කනාළමයං. පොත්ථකොති මකචිමයො වුච්චති. සෙසානි පඨමපාරාජිකවණ්ණනායං වුත්තානි. තෙසු පොත්ථකෙ එව දුක්කටං. සෙසෙසු ථුල්ලච්චයානීති. අක්කදුස්සකදලිදුස්සඑරකදුස්සානි පන පොත්ථකගතිකානෙව. ३७१. कुश-चीवर आदि में 'अक्कनाळ' का अर्थ अक्कनाळ (मदार की डंठल) से बना चीवर है। 'पोत्थक' सन (मकचि) से बने चीवर को कहा जाता है। शेष का वर्णन प्रथम पाराजिक की व्याख्या में किया गया है। उनमें से पोत्थक पहनने पर 'दुक्कट' (दुष्कृत) दोष होता है, और शेष में 'थुल्लच्चय' (स्थूलात्यय) दोष होता है। अक्क-वस्त्र, कदली-वस्त्र और एरक-वस्त्र पोत्थक के समान ही हैं। 372. සබ්බනීලකාදීනි රජනං ධොවිත්වා පුන රජිත්වා ධාරෙතබ්බානි. න සක්කා චෙ හොන්ති ධොවිතුං, පච්චත්ථරණානි වා කාතබ්බානි. දුපට්ටචීවරස්ස වා මජ්ඣෙ දාතබ්බානි. තෙසං වණ්ණනානත්තං උපාහනාසු වුත්තනයමෙව. අච්ඡින්නදසදීඝදසානි දසා ඡින්දිත්වා ධාරෙතබ්බානි. කඤ්චුකං ලභිත්වා ඵාලෙත්වා රජිත්වා පරිභුඤ්ජිතුං වට්ටති. වෙඨනෙපි එසෙව නයො. තිරීටකං පන රුක්ඛඡල්ලිමයං; තං පාදපුඤ්ඡනං කාතුං වට්ටති. ३७२. पूर्णतः नीले आदि चीवरों को धोकर (रंग निकालकर), पुनः रंजित कर धारण करना चाहिए। यदि उन्हें धोना संभव न हो, तो उन्हें बिछाने के वस्त्र (आस्तरण) बना लेना चाहिए या दोहरी तह वाले चीवर के बीच में डाल देना चाहिए। उनके रंगों की भिन्नता के विषय में वही नियम है जो जूतों (उपानह) के संदर्भ में कहा गया है। बिना कटी हुई दशा (झालर) या लंबी दशा वाले चीवरों की दशाओं को काटकर धारण करना चाहिए। कंचुक (अंगरखा) प्राप्त होने पर उसे फाड़कर और रंजित कर उपयोग करना उचित है। पगड़ी (वेठन) के विषय में भी यही नियम है। तिरीटक वृक्ष की छाल से बना वस्त्र है; उसे पैर पोंछने का वस्त्र (पादपुञ्छन) बनाना उचित है। 374. පතිරූපෙ ගාහකෙති සචෙ කොචි භික්ඛු ‘‘අහං තස්ස ගණ්හාමී’’ති ගණ්හාති, දාතබ්බන්ති අත්ථො. එවමෙතෙසු තෙවීසතියා පුග්ගලෙසු සොළස ජනා න ලභන්ති, සත්ත ජනා ලභන්තීති. ३७४. 'उपयुक्त ग्रहण करने वाले' के विषय में अर्थ यह है कि यदि कोई भिक्षु यह कहकर ग्रहण करता है कि 'मैं उसके लिए इसे लेता हूँ', तो उसे देना चाहिए। इस प्रकार, इन तेईस व्यक्तियों में से सोलह व्यक्ति प्राप्त नहीं करते हैं और सात व्यक्ति प्राप्त करते हैं। සඞ්ඝෙභින්නෙචීවරුප්පාදකථා संघ के विभाजित होने पर चीवर की उत्पत्ति की कथा 376. සඞ්ඝො භිජ්ජතීති භිජ්ජිත්වා කොසම්බකභික්ඛූ විය ද්වෙ කොට්ඨාසා හොන්ති. එකස්මිං පක්ඛෙති එකස්මිං කොට්ඨාසෙ දක්ඛිණොදකඤ්ච ගන්ධාදීනි ච දෙන්ති, එකස්මිං චීවරානි. සඞ්ඝස්සෙවෙතන්ති සකලස්ස සඞ්ඝස්ස ද්වින්නම්පි කොට්ඨාසානං එතං හොති, ඝණ්ටිං පහරිත්වා ද්වීහිපි පක්ඛෙහි එකතො භාජෙතබ්බං. පක්ඛස්සෙවෙතන්ති එවං දින්නෙ යස්ස කොට්ඨාසස්ස උදකං දින්නං, තස්ස උදකමෙව හොති; යස්ස චීවරං දින්නං, තස්සෙව චීවරං. යත්ථ පන දක්ඛිණොදකං පමාණං හොති, තත්ථ එකො පක්ඛො දක්ඛිණොදකස්ස [Pg.417] ලද්ධත්තා චීවරානි ලභති, එකො චීවරානමෙව ලද්ධත්තාති උභොහිපි එකතො හුත්වා යථාවුඩ්ඪං භාජෙතබ්බං. ඉදං කිර පරසමුද්දෙ ලක්ඛණන්ති මහාඅට්ඨකථායං වුත්තං. තස්මිංයෙව පක්ඛෙති එත්ථ පන ඉතරො පක්ඛො අනිස්සරොයෙව. චීවරපෙසනවත්ථූනි පාකටානෙව. ३७६. 'संघ विभाजित होता है' का अर्थ है कि कौशाम्बी के भिक्षुओं की तरह विभाजित होकर दो समूह हो जाते हैं। 'एक पक्ष में' का अर्थ है कि एक समूह को दान का जल (दक्षिणादक) और गंध आदि देते हैं, और दूसरे को चीवर। 'यह संघ का ही है' का अर्थ है कि वह संपूर्ण संघ के दोनों समूहों का है; घंटा बजाकर दोनों पक्षों को एक साथ मिलकर विभाजित करना चाहिए। 'पक्ष का ही है' का अर्थ है कि इस प्रकार दिए जाने पर जिस समूह को जल दिया गया है, वह जल उसी का होता है; जिसे चीवर दिया गया है, वह चीवर उसी का होता है। किंतु जहाँ दान का जल ही प्रमाण (मुख्य) होता है, वहाँ एक पक्ष को जल प्राप्त होने के कारण चीवर मिलते हैं और दूसरे को चीवर प्राप्त होने के कारण चीवर मिलते हैं; अतः दोनों को एक होकर वरिष्ठता के अनुसार विभाजित करना चाहिए। महाअट्ठकथा में कहा गया है कि यह समुद्र के उस पार (जम्बूद्वीप) का लक्षण (नियम) है। 'उसी पक्ष में' यहाँ दूसरा पक्ष अधिकारहीन ही है। चीवर भेजने की घटनाएँ स्पष्ट ही हैं। අට්ඨචීවරමාතිකාකථා आठ चीवर-मातृका की कथा 379. ඉදානි ආදිතො පට්ඨාය වුත්තචීවරානං පටිලාභඛෙත්තං දස්සෙතුං ‘‘අට්ඨිමා භික්ඛවෙ මාතිකා’’තිආදිමාහ. සීමාය දෙතීතිආදි පුග්ගලාධිට්ඨානනයෙන වුත්තං. එත්ථ පන සීමාය දානං එකා මාතිකා, කතිකාය දානං දුතියා…පෙ… පුග්ගලස්ස දානං අට්ඨමා. තත්ථ සීමාය දම්මීති එවං සීමං පරාමසිත්වා දෙන්තො සීමාය දෙති නාම. එස නයො සබ්බත්ථ. ३७९. अब प्रारंभ से कहे गए चीवरों की प्राप्ति के क्षेत्र को दिखाने के लिए भगवान ने 'भिक्षुओं, ये आठ मातृकाएँ हैं' आदि कहा। 'सीमा को देता है' आदि पुद्गलाधिष्ठान (व्यक्ति-परक) विधि से कहा गया है। यहाँ 'सीमा को दान देना' पहली मातृका है, 'कतिपय (नियम/समझौते) के अनुसार दान देना' दूसरी है... 'पुद्गल (व्यक्ति) को दान देना' आठवीं है। वहाँ 'मैं सीमा को देता हूँ'—इस प्रकार सीमा का उल्लेख कर दान देने वाला 'सीमा को देता है' कहलाता है। यही नियम सर्वत्र लागू होता है। සීමාය දෙති, යාවතිකා භික්ඛූ අන්තොසීමගතා තෙහි භාජෙතබ්බන්තිආදිම්හි පන මාතිකානිද්දෙසෙ සීමාය දෙතීති එත්ථ තාව ඛණ්ඩසීමා, උපචාරසීමා, සමානසංවාසසීමා, අවිප්පවාසසීමා, ලාභසීමා, ගාමසීමා, නිගමසීමා, නගරසීමා, අබ්භන්තරසීමා, උදකුක්ඛෙපසීමා, ජනපදසීමා, රට්ඨසීමා, රජ්ජසීමා, දීපසීමා, චක්කවාළසීමාති පන්නරස සීමා වෙදිතබ්බා. 'सीमा को देता है, सीमा के भीतर जितने भिक्षु हैं उनके द्वारा विभाजित किया जाना चाहिए' आदि मातृका-निर्देश में, 'सीमा को देता है' के अंतर्गत पंद्रह सीमाएँ जाननी चाहिए: खण्ड-सीमा, उपचार-सीमा, समान-संवास-सीमा, अविप्रवास-सीमा, लाभ-सीमा, ग्राम-सीमा, निगम-सीमा, नगर-सीमा, अभ्यंतर-सीमा, उदकुक्खेप-सीमा, जनपद-सीमा, राष्ट्र-सीमा, राज्य-सीमा, द्वीप-सीमा और चक्रवाल-सीमा। තත්ථ ඛණ්ඩසීමා සීමාකථායං වුත්තාව. උපචාරසීමා පරික්ඛිත්තස්ස විහාරස්ස පරික්ඛෙපෙන අපරික්ඛිත්තස්ස පරික්ඛෙපාරහට්ඨානෙන පරිච්ඡින්නා හොති. අපිච භික්ඛූනං ධුවසන්නිපාතට්ඨානතො වා පරියන්තෙ ඨිතභොජනසාලතො වා නිබද්ධවසනකආවාසතො වා ථාමමජ්ඣිමස්ස පුරිසස්ස ද්වින්නං ලෙඩ්ඩුපාතානං අන්තො උපචාරසීමා වෙදිතබ්බා, සා පන ආවාසෙසු වඩ්ඪන්තෙසු වඩ්ඪති, පරිහායන්තෙසු පරිහායති. මහාපච්චරියං පන ‘‘භික්ඛූසුපි වඩ්ඪන්තෙසු වඩ්ඪතී’’ති වුත්තං. තස්මා සචෙ විහාරෙ සන්නිපතිතභික්ඛූහි සද්ධිං එකාබද්ධා හුත්වා යොජනසතම්පි පූරෙත්වා නිසීදන්ති, යොජනසතම්පි උපචාරසීමාව හොති, සබ්බෙසං ලාභො පාපුණාති. සමානසංවාසඅවිප්පවාසසීමාද්වයම්පි වුත්තමෙව. उनमें से खण्ड-सीमा का वर्णन सीमा-कथा में किया जा चुका है। उपचार-सीमा घेरे हुए विहार के घेरे (प्राकार) से, और बिना घेरे वाले विहार के घेरे के योग्य स्थान से परिच्छिन्न (निर्धारित) होती है। इसके अतिरिक्त, भिक्षुओं के नियमित एकत्र होने के स्थान से, या सीमा पर स्थित भोजनशाला से, या स्थायी निवास-स्थान से, मध्यम शक्ति वाले पुरुष द्वारा दो ढेले फेंकने की दूरी के भीतर के क्षेत्र को उपचार-सीमा समझना चाहिए। वह आवासों के बढ़ने पर बढ़ती है और घटने पर घटती है। महाप्रत्यय (महापच्चरी) में कहा गया है कि 'भिक्षुओं के बढ़ने पर भी वह बढ़ती है'। इसलिए, यदि विहार में एकत्रित भिक्षुओं के साथ एक-दूसरे से सटकर बैठते हुए सौ योजन तक की दूरी भर जाए, तो वह सौ योजन भी उपचार-सीमा ही होती है, और लाभ सभी को प्राप्त होता है। समान-संवास और अविप्रवास, इन दोनों सीमाओं का वर्णन भी किया जा चुका है। ලාභසීමා [Pg.418] නාම නෙව සම්මාසම්බුද්ධෙන අනුඤ්ඤාතා, න ධම්මසඞ්ගාහකත්ථෙරෙහි ඨපිතා; අපිච ඛො රාජරාජමහාමත්තා විහාරං කාරෙත්වා ගාවුතං වා අඩ්ඪයොජනං වා යොජනං වා සමන්තතො පරිච්ඡින්දිත්වා ‘‘අයං අම්හාකං විහාරස්ස ලාභසීමා’’ති නාමලිඛිතකෙ ථම්භෙ නිඛණිත්වා ‘‘යං එත්ථන්තරෙ උප්පජ්ජති, සබ්බං තං අම්හාකං විහාරස්ස දෙමා’’ති සීමං ඨපෙන්ති, අයං ලාභසීමා නාම. ගාමනිගමනගරඅබ්භන්තරඋදකුක්ඛෙපසීමාපි වුත්තා එව. ජනපදසීමා නාම – කාසිකොසලරට්ඨාදීනං අන්තො බහූ ජනපදා හොන්ති, තත්ථ එකෙකො ජනපදපරිච්ඡෙදො ජනපදසීමා. රට්ඨසීමා නාම කාසිකොසලාදිරට්ඨපරිච්ඡෙදො. රජ්ජසීමා නාම ‘‘චොළභොගො කෙරළභොගො’’ති එවං එකෙකස්ස රඤ්ඤො ආණාපවත්තිට්ඨානං. දීපසීමා නාම සමුද්දන්තෙන පරිච්ඡින්නමහාදීපා ච අන්තරදීපා ච. චක්කවාළසීමා නාම චක්කවාළපබ්බතෙනෙව පරිච්ඡින්නා. 'लाभसीमा' नाम की सीमा न तो सम्यक्सम्बुद्ध द्वारा अनुमत है और न ही धर्मसंग्राहक स्थविरों द्वारा स्थापित की गई है। फिर भी, राजाओं और राज-महामात्रों ने विहार बनवाकर, उसके चारों ओर एक गावुत, आधा योजन या एक योजन की सीमा निर्धारित कर, 'यह हमारे विहार की लाभसीमा है' ऐसा नाम लिखे हुए खंभे गाड़कर, 'जो कुछ भी इस अंतराल में उत्पन्न होता है, वह सब हम अपने विहार को देते हैं' ऐसा कहकर जो सीमा स्थापित की है, उसे 'लाभसीमा' कहा जाता है। ग्राम, निगम, नगर, अभ्यंतर और उदकुक्खेप सीमाएँ पहले ही कही जा चुकी हैं। जनपद-सीमा का अर्थ है—काशि, कोसल आदि राष्ट्रों के भीतर बहुत से जनपद होते हैं, वहाँ प्रत्येक जनपद का परिच्छेद (सीमा) जनपद-सीमा है। राष्ट्र-सीमा का अर्थ काशि, कोसल आदि राष्ट्रों का परिच्छेद है। राज्य-सीमा का अर्थ 'चोल-भोग, केरल-भोग' इस प्रकार प्रत्येक राजा के आज्ञा-प्रवर्तन का स्थान है। द्वीप-सीमा का अर्थ समुद्र के अंत तक परिच्छिन्न महाद्वीप और अंतर्द्वीप हैं। चक्रवाल-सीमा का अर्थ चक्रवाल पर्वत द्वारा ही परिच्छिन्न सीमा है। එවමෙතාසු සීමාසු ඛණ්ඩසීමාය කෙනචි කම්මෙන සන්නිපතිතං සඞ්ඝං දිස්වා ‘‘එත්ථෙව සීමාය සඞ්ඝස්ස දෙමී’’ති වුත්තෙ යාවතිකා භික්ඛූ අන්තොඛණ්ඩසීමගතා, තෙහි භාජෙතබ්බං. තෙසංයෙව හි තං පාපුණාති. අඤ්ඤෙසං සීමන්තරිකාය වා උපචාරසීමාය වා ඨිතානම්පි න පාපුණාති. ඛණ්ඩසීමාය ඨිතෙ පන රුක්ඛෙ වා පබ්බතෙ වා ඨිතස්ස හෙට්ඨා වා පථවීවෙමජ්ඣගතස්ස පාපුණාතියෙව. ‘‘ඉමිස්සා උපචාරසීමාය සඞ්ඝස්ස දම්මී’’ති දින්නං පන ඛණ්ඩසීමාසීමන්තරිකාසු ඨිතානම්පි පාපුණාති. ‘‘සමානසංවාසසීමාය දම්මී’’ති දින්නං පන ඛණ්ඩසීමාසීමන්තරිකාසු ඨිතානං න පාපුණාති. අවිප්පවාසසීමාලාභසීමාසු දින්නං තාසු සීමාසු අන්තොගතානං පාපුණාති. ගාමසීමාදීසු දින්නං තාසං සීමානං අබ්භන්තරෙ බද්ධසීමාය ඨිතානම්පි පාපුණාති. අබ්භන්තරසීමාඋදකුක්ඛෙපසීමාසු දින්නං තත්ථ අන්තොගතානංයෙව පාපුණාති. ජනපදරට්ඨරජ්ජදීපචක්කවාළසීමාසුපි ගාමසීමාදීසු වුත්තසදිසොයෙව විනිච්ඡයො. इस प्रकार इन सीमाओं में, खण्डसीमा में किसी कर्म के लिए एकत्रित संघ को देखकर यदि कोई कहे कि "मैं इसी सीमा में संघ को दान देता हूँ", तो जितने भिक्षु खण्डसीमा के भीतर हैं, उन्हीं के द्वारा उसे विभाजित किया जाना चाहिए। क्योंकि वह उन्हीं को प्राप्त होता है। सीमांतरिका या उपचारसीमा में स्थित अन्य भिक्षुओं को वह प्राप्त नहीं होता। परंतु खण्डसीमा में स्थित वृक्ष या पर्वत पर स्थित, अथवा नीचे पृथ्वी के मध्य में स्थित भिक्षु को वह प्राप्त होता ही है। "मैं इस उपचारसीमा में स्थित संघ को देता हूँ"—ऐसा कहकर दिया गया दान खण्डसीमा और सीमांतरिका में स्थित भिक्षुओं को भी प्राप्त होता है। "मैं समान-संवास-सीमा में देता हूँ"—ऐसा कहकर दिया गया दान खण्डसीमा और सीमांतरिका में स्थित भिक्षुओं को प्राप्त नहीं होता। अविप्रवास-सीमा और लाभसीमा में दिया गया दान उन सीमाओं के भीतर आए हुए भिक्षुओं को प्राप्त होता है। ग्रामसीमा आदि में दिया गया दान उन सीमाओं के भीतर बद्धसीमा में स्थित भिक्षुओं को भी प्राप्त होता है। अभ्यंतरसीमा और उदकुक्खेपसीमा में दिया गया दान वहाँ केवल भीतर आए हुए भिक्षुओं को ही प्राप्त होता है। जनपद, राष्ट्र, राज्य, द्वीप और चक्रवाल सीमाओं में भी ग्रामसीमा आदि के समान ही विनिश्चय (निर्णय) होता है। සචෙ පන ජම්බුදීපෙ ඨිතො ‘‘තම්බපණ්ණිදීපෙ සඞ්ඝස්ස දම්මී’’ති දෙති, තම්බපණ්ණිදීපතො එකොපි ගන්ත්වා සබ්බෙසං ගණ්හිතුං ලභති. සචෙපි තත්රෙව එකො සභාගභික්ඛු සභාගානං භාගං ගණ්හාති, න වාරෙතබ්බො. එවං තාව යො සීමං පරාමසිත්වා දෙති, තස්ස දානෙ විනිච්ඡයො වෙදිතබ්බො. यदि जम्बुद्वीप में स्थित कोई व्यक्ति यह कहकर दान देता है कि "मैं ताम्रपर्णी द्वीप (श्रीलंका) के संघ को देता हूँ", तो ताम्रपर्णी द्वीप से एक भी भिक्षु जाकर सभी के लिए उसे ग्रहण कर सकता है। यदि वहीं (जम्बुद्वीप में) कोई एक सभाग-भिक्षु (समान स्थिति वाला) उन सभाग-भिक्षुओं का हिस्सा ग्रहण करता है, तो उसे रोकना नहीं चाहिए। इस प्रकार, जो सीमा का उल्लेख करके दान देता है, उसके दान के विषय में यह विनिश्चय जानना चाहिए। යො [Pg.419] පන අසුකසීමායාති වත්තුං න ජානාති, කෙවලං සීමාති වචනමත්තමෙව ජානන්තො විහාරං ගන්ත්වා ‘‘සීමාය දම්මී’’ති වා ‘‘සීමට්ඨකසඞ්ඝස්ස දම්මී’’ති වා භණති, සො පුච්ඡිතබ්බො – ‘‘සීමා නාම බහුවිධා, කතරසීමං සන්ධාය භණසී’’ති? සචෙ වදති – ‘‘අහං අසුකසීමාති න ජානාමි, සීමට්ඨකසඞ්ඝො භාජෙත්වා ගණ්හාතූ’’ති කතරසීමාය භාජෙතබ්බං? මහාසීවත්ථෙරො කිරාහ – ‘‘අවිප්පවාසසීමායා’’ති. තතො නං ආහංසු – ‘‘අවිප්පවාසසීමා නාම තියොජනාපි හොති, එවං සන්තෙ තියොජනෙ ඨිතා ලාභං ගණ්හිස්සන්ති, තියොජනෙ ඨත්වා ආගන්තුකවත්තං පූරෙත්වා ආරාමං පවිසිතබ්බං භවිස්සති, ගමිකො තියොජනං ගන්ත්වා සෙනාසනං ආපුච්ඡිස්සති, නිස්සයපටිපන්නස්ස තියොජනාතික්කමෙ නිස්සයො පටිප්පස්සම්භිස්සති, පාරිවාසිකෙන තියොජනං අතික්කමිත්වා අරුණං උට්ඨාපෙතබ්බං භවිස්සති, භික්ඛුනියා තියොජනෙ ඨත්වා ආරාමප්පවෙසනං ආපුච්ඡිතබ්බං භවිස්සති, සබ්බම්පෙතං උපචාරසීමාය පරිච්ඡෙදවසෙනෙව කාතුං වට්ටති. තස්මා උපචාරසීමායමෙව භාජෙතබ්බ’’න්ති. परंतु जो यह कहना नहीं जानता कि "अमुक सीमा में", केवल 'सीमा' शब्द मात्र को जानते हुए विहार जाकर कहता है कि "मैं सीमा को देता हूँ" या "सीमा में स्थित संघ को देता हूँ", तो उससे पूछा जाना चाहिए—"सीमाएँ अनेक प्रकार की होती हैं, तुम किस सीमा के उद्देश्य से कह रहे हो?" यदि वह कहता है—"मैं नहीं जानता कि अमुक सीमा कौन सी है, सीमा में स्थित संघ विभाजित कर ग्रहण करे", तो किस सीमा में विभाजन करना चाहिए? सुना जाता है कि महासीव स्थविर ने कहा—"अविप्रवास-सीमा में।" तब उनसे (अन्य स्थविरों ने) कहा—"अविप्रवास-सीमा तीन योजन की भी होती है, ऐसा होने पर तीन योजन में स्थित भिक्षु लाभ ग्रहण करेंगे; तीन योजन की दूरी पर स्थित होकर आगंतुक-व्रत का पालन कर आराम (विहार) में प्रवेश करना होगा; जाने वाला भिक्षु तीन योजन जाकर शयनासन के लिए पूछेगा; निश्रय (निसय) लेकर रहने वाले भिक्षु का तीन योजन पार करने पर निश्रय समाप्त हो जाएगा; परिवास में स्थित भिक्षु को तीन योजन पार कर अरुणोदय कराना होगा; भिक्षुणी को तीन योजन पर स्थित होकर आराम-प्रवेश के लिए पूछना होगा। यह सब उपचारसीमा के परिच्छेद के अनुसार ही करना उचित है। इसलिए उपचारसीमा में ही विभाजन करना चाहिए।" කතිකායාති සමානලාභකතිකාය. තෙනෙවාහ – ‘‘සම්බහුලා ආවාසා සමානලාභා හොන්තී’’ති. තත්රෙවං කතිකා කාතබ්බා, එකස්මිං විහාරෙ සන්නිපතිතෙහි භික්ඛූහි යං විහාරං සඞ්ගණ්හිතුකාමා සමානලාභං කාතුං ඉච්ඡන්ති, තස්ස නාමං ගහෙත්වා අසුකො නාම විහාරො පොරාණකොති වා බුද්ධාධිවුත්ථොති වා අප්පලාභොති වා යංකිඤ්චි කාරණං වත්වා තං විහාරං ඉමිනා විහාරෙන සද්ධිං එකලාභං කාතුං සඞ්ඝස්ස රුච්චතීති තික්ඛත්තුං සාවෙතබ්බං. එත්තාවතා තස්මිං විහාරෙ නිසින්නොපි ඉධ නිසින්නොව හොති, තස්මිං විහාරෙපි සඞ්ඝෙන එවමෙව කාතබ්බං. එත්තාවතා ඉධ නිසින්නොපි තස්මිං නිසින්නොව හොති. එකස්මිං ලාභෙ භාජියමානෙ ඉතරස්මිං ඨිතස්ස භාගං ගහෙතුං වට්ටති. එවං එකෙන විහාරෙන සද්ධිං බහූපි ආවාසා එකලාභා කාතබ්බා. 'कतिका' (कतिपय नियम) का अर्थ है—समान लाभ के लिए किया गया समझौता। इसीलिए (भगवान ने) कहा है—"बहुत से आवास समान लाभ वाले होते हैं।" वहाँ इस प्रकार समझौता करना चाहिए—एक विहार में एकत्रित भिक्षुओं द्वारा, जिस विहार का वे उपकार करना चाहते हैं और उसे समान लाभ वाला बनाना चाहते हैं, उस विहार का नाम लेकर—"अमुक विहार पुराना है" या "यहाँ बुद्ध निवास कर चुके हैं" या "यहाँ लाभ कम है"—ऐसा कोई भी कारण बताकर, "इस विहार को इस विहार के साथ समान लाभ वाला बनाना संघ को स्वीकार है?"—ऐसा तीन बार सूचित करना चाहिए। इतने मात्र से, उस विहार में बैठा हुआ भिक्षु भी यहीं बैठा हुआ माना जाता है। उस विहार में भी संघ द्वारा इसी प्रकार किया जाना चाहिए। इतने मात्र से, यहाँ बैठा हुआ भिक्षु भी उस विहार में बैठा हुआ माना जाता है। एक विहार में लाभ का विभाजन होने पर, दूसरे विहार में स्थित भिक्षु का हिस्सा लेना उचित है। इस प्रकार, एक विहार के साथ बहुत से आवासों को समान लाभ वाला बनाया जा सकता है। භික්ඛාපඤ්ඤත්තියාති අත්තනො පරිච්චාගපඤ්ඤාපනට්ඨානෙ. තෙනෙවාහ – ‘‘යත්ථ සඞ්ඝස්ස ධුවකාරා කරියන්තී’’ති. තස්සත්ථො – යස්මිං විහාරෙ ඉමස්ස චීවරදායකස්ස සන්තකං සඞ්ඝස්ස පාකවට්ටං වා වත්තති, යස්මිං වා විහාරෙ භික්ඛූ අත්තනො භාරං කත්වා සදා ගෙහෙ භොජෙති, යත්ථ වා [Pg.420] අනෙන ආවාසො කාරිතො, සලාකභත්තාදීනි වා නිබද්ධානි, යෙන පන සකලොපි විහාරො පතිට්ඨාපිතො, තත්ථ වත්තබ්බමෙව නත්ථි, ඉමෙ ධුවකාරා නාම. තස්මා සචෙ සො ‘‘යත්ථ මය්හං ධුවකාරා කරීයන්ති, තත්ථ දම්මී’’ති වා ‘‘තත්ථ දෙථා’’ති වා භණති, බහූසු චෙපි ඨානෙසු ධුවකාරා හොන්ති, සබ්බත්ථ දින්නමෙව හොති. 'भिक्खापञ्ञत्ति' का अर्थ है स्वयं के त्याग (दान) को निर्धारित करने का स्थान। इसीलिए भगवान ने कहा है - 'जहाँ संघ के लिए ध्रुवकार (नियमित दान) किए जाते हैं।' उसका अर्थ इस प्रकार समझना चाहिए - जिस विहार में इस चीवर-दायक का संघ के लिए भोजन-प्रबंध (पाकवट्ट) चलता है, या जिस विहार में वह भिक्षुओं का भार स्वयं लेकर सदा अपने घर पर भोजन कराता है, या जहाँ उसने आवास बनवाया है, या शलाका-भक्त आदि नियमित किए हैं। जिसने पूरा विहार ही स्थापित किया है, वहाँ तो (ध्रुवकार के विषय में) कहना ही क्या है। इन्हें 'ध्रुवकार' कहते हैं। इसलिए यदि वह कहता है - 'जहाँ मेरे ध्रुवकार किए जाते हैं, वहाँ मैं देता हूँ' या 'वहाँ दें', तो यदि बहुत से स्थानों पर ध्रुवकार हों, तो सभी जगह दिया हुआ ही माना जाता है। සචෙ පන එකස්මිං විහාරෙ භික්ඛූ බහුතරා හොන්ති, තෙහි වත්තබ්බං – ‘‘තුම්හාකං ධුවකාරෙ එකත්ථ භික්ඛූ බහූ එකත්ථ අප්පකා’’ති. සචෙ ‘‘භික්ඛුගණනාය ගණ්හථා’’ති භණති, තථා භාජෙත්වා ගණ්හිතුං වට්ටති. එත්ථ ච වත්ථභෙසජ්ජාදි අප්පකම්පි සුඛෙන භාජියති. යදි පන මඤ්චො වා පීඨකං වා එකමෙව හොති, තං පුච්ඡිත්වා යස්ස වා විහාරස්ස එකවිහාරෙපි වා යස්ස සෙනාසනස්ස සො විචාරෙති, තත්ථ දාතබ්බං. සචෙ ‘‘අසුකභික්ඛු ගණ්හාතූ’’ති වදති, වට්ටති. අථ ‘‘මය්හං ධුවකාරෙ දෙථා’’ති වත්වා අවිචාරෙත්වාව ගච්ඡති, සඞ්ඝස්සාපි විචාරෙතුං වට්ටති. එවං පන විචාරෙතබ්බං – ‘‘සඞ්ඝත්ථෙරස්ස වසනට්ඨානෙ දෙථා’’ති වත්තබ්බං. සචෙ තස්ස සෙනාසනං පරිපුණ්ණං හොති, යත්ථ නප්පහොති, තත්ථ දාතබ්බං. සචෙ එකො භික්ඛු ‘‘මය්හං වසනට්ඨානෙ සෙනාසනපරිභොගභණ්ඩං නත්ථී’’ති වදති, තත්ථ දාතබ්බං. यदि एक विहार में भिक्षु अधिक हों, तो उनसे कहना चाहिए - 'आपके ध्रुवकार वाले एक स्थान पर भिक्षु अधिक हैं और एक स्थान पर कम।' यदि वह कहे - 'भिक्षुओं की गणना के अनुसार ग्रहण करें', तो वैसे ही विभाजित कर ग्रहण करना उचित है। यहाँ वस्त्र, औषधि आदि अल्प वस्तुओं को भी सुगमता से विभाजित किया जा सकता है। यदि मंच (पलंग) या पीठ (चौकी) एक ही हो, तो उस दायक से पूछकर, जिस विहार के लिए या जिस सेनासन के लिए वह निर्देश दे, वहाँ देना चाहिए। यदि वह कहे - 'अमुक भिक्षु ग्रहण करे', तो उचित है। यदि 'मेरे ध्रुवकार वाले स्थान पर दें' कहकर बिना निर्देश दिए चला जाए, तो संघ को निर्णय करना चाहिए। इस प्रकार निर्णय करना चाहिए - 'संघस्थविर के निवास स्थान पर दें।' यदि उनका सेनासन पूर्ण हो, तो जहाँ कमी हो वहाँ देना चाहिए। यदि एक भिक्षु कहे - 'मेरे निवास स्थान पर सेनासन-परिभोग की वस्तु नहीं है', तो वहाँ देना चाहिए। සඞ්ඝස්ස දෙතීති විහාරං පවිසිත්වා ‘‘ඉමානි චීවරානි සඞ්ඝස්ස දම්මී’’ති දෙති. සම්මුඛීභූතෙනාති උපචාරසීමාය ඨිතෙන සඞ්ඝෙන ඝණ්ටිං පහරිත්වා කාලං ඝොසෙත්වා භාජෙතබ්බං. සීමට්ඨස්ස අසම්පත්තස්සාපි භාගං ගණ්හන්තො න වාරෙතබ්බො. විහාරො මහා හොති, ථෙරාසනතො පට්ඨාය වත්ථෙසු දිය්යමානෙසු අලසජාතිකා මහාථෙරා පච්ඡා ආගච්ඡන්ති, ‘‘භන්තෙ වීසතිවස්සානං දිය්යති, තුම්හාකං ඨිතිකා අතික්කන්තා’’ති න වත්තබ්බා, ඨිතිකං ඨපෙත්වා තෙසං දත්වා පච්ඡා ඨිතිකාය දාතබ්බං. 'संघ को देता है' का अर्थ है विहार में प्रवेश कर 'ये चीवर मैं संघ को देता हूँ' कहकर देना। 'सम्मुखीभूतेन' का अर्थ है उपचार-सीमा में स्थित संघ द्वारा घण्टा बजाकर और समय की घोषणा कर विभाजित करना चाहिए। सीमा में स्थित किन्तु वितरण स्थल पर न पहुँचे हुए भिक्षु का भाग लेने वाले को रोकना नहीं चाहिए। यदि विहार बड़ा हो, स्थविरासन से आरम्भ कर वस्त्र दिए जा रहे हों और आलसी स्वभाव वाले महास्थविर बाद में आएँ, तो यह नहीं कहना चाहिए - 'भन्ते! बीस वर्ष वालों (के क्रम) को दिया जा रहा है, आपकी बारी (ठितिका) निकल गई है।' उनकी बारी को सुरक्षित रखकर उन्हें देकर फिर क्रम से देना चाहिए। අසුකවිහාරෙ කිර බහුං චීවරං උප්පන්නන්ති සුත්වා යොජනන්තරිකවිහාරතොපි භික්ඛූ ආගච්ඡන්ති, සම්පත්තසම්පත්තානං ඨිතට්ඨානතො පට්ඨාය දාතබ්බං. අසම්පත්තානම්පි උපචාරසීමං පවිට්ඨානං අන්තෙවාසිකාදීසු ගණ්හන්තෙසු දාතබ්බමෙව. ‘‘බහිඋපචාරසීමාය ඨිතානං දෙථා’’ති වදන්ති, න දාතබ්බං. සචෙ පන උපචාරසීමං ඔක්කන්තෙහි එකාබද්ධා හුත්වා අත්තනො විහාරද්වාරෙ වා අන්තොවිහාරෙයෙව වා හොන්ති, පරිසවසෙන වඩ්ඪිතා නාම හොති සීමා[Pg.421], තස්මා දාතබ්බං. සඞ්ඝනවකස්ස දින්නෙපි පච්ඡා ආගතානං දාතබ්බමෙව. දුතියභාගෙ පන ථෙරාසනං ආරුළ්හෙ ආගතානං පඨමභාගො න පාපුණාති, දුතියභාගතො වස්සග්ගෙන දාතබ්බං. 'अमुक विहार में बहुत चीवर उत्पन्न हुए हैं' ऐसा सुनकर एक योजन दूर के विहार से भी भिक्षु आते हैं। जो-जो आते जाएँ, उनके खड़े होने के स्थान के क्रम से देना चाहिए। जो अभी पहुँचे नहीं हैं किन्तु उपचार-सीमा में प्रवेश कर चुके हैं, उनके अन्तेवासिक आदि द्वारा भाग ग्रहण करने पर देना ही चाहिए। यदि वे कहें - 'उपचार-सीमा के बाहर स्थित भिक्षुओं को दें', तो नहीं देना चाहिए। यदि उपचार-सीमा में प्रविष्ट भिक्षुओं के साथ एक कतार में जुड़कर अपने विहार के द्वार पर या विहार के भीतर ही हों, तो परिषद (भीड़) के कारण सीमा बढ़ी हुई मानी जाती है, इसलिए देना चाहिए। संघ-नवक (सबसे कनिष्ठ) को देने के बाद भी बाद में आए भिक्षुओं को देना ही चाहिए। दूसरे भाग में, जब स्थविरासन पर क्रम पहुँच जाए, तो बाद में आने वालों को प्रथम भाग नहीं मिलता, दूसरे भाग से वर्षा (वरिष्ठता) के अनुसार देना चाहिए। එකස්මිං විහාරෙ දස භික්ඛූ හොන්ති, ‘‘දස වත්ථානි සඞ්ඝස්ස දෙමා’’ති දෙන්ති, පාටෙක්කං භාජෙතබ්බානි. සචෙ ‘‘සබ්බානෙව අම්හාකං පාපුණන්තී’’ති ගහෙත්වා ගච්ඡන්ති, දුප්පාපිතානි චෙව දුග්ගහිතානි ච ගතගතට්ඨානෙ සඞ්ඝිකානෙව හොන්ති. එකං පන උද්ධරිත්වා ‘‘ඉදං තුම්හාකං පාපුණාතී’’ති සඞ්ඝත්ථෙරස්ස දත්වා ‘‘සෙසානි අම්හාකං පාපුණන්තී’’ති ගහෙතුං වට්ටති. एक विहार में दस भिक्षु हैं, 'दस वस्त्र संघ को देते हैं' ऐसा कहकर दायक देते हैं, तो उन्हें अलग-अलग विभाजित करना चाहिए। यदि वे 'ये सभी हमें ही प्राप्त होते हैं' कहकर लेकर चले जाते हैं, तो वे अनुचित रूप से पहुँचाए गए और अनुचित रूप से ग्रहण किए गए होते हैं, और जहाँ-जहाँ वे जाते हैं, वे सांघिक ही रहते हैं। किन्तु एक वस्त्र को अलग कर 'यह आपको प्राप्त होता है' ऐसा संघस्थविर को देकर 'शेष हमें प्राप्त होते हैं' कहकर ग्रहण करना उचित है। එකමෙව වත්ථං සඞ්ඝස්ස දෙමාති ආහරන්ති, අභාජෙත්වාව අම්හාකං පාපුණන්තීති ගණ්හන්ති, දුප්පාපිතඤ්චෙව දුග්ගහිතඤ්ච. සත්ථකෙන පන හලිද්දිආදිනා වා ලෙඛං කත්වා එකං කොට්ඨාසං ‘‘ඉමං ඨානං තුම්හාකං පාපුණාතී’’ති සඞ්ඝත්ථෙරස්ස පාපෙත්වා ‘‘සෙසං අම්හාකං පාපුණාතී’’ති ගහෙතුං වට්ටති. යං පන වත්ථස්සෙව පුප්ඵං වා වලි වා, තෙන පරිච්ඡෙදං කාතුං න වට්ටති. සචෙ එකං තන්තං උද්ධරිත්වා ‘‘ඉදං ඨානං තුම්හාකං පාපුණාතී’’ති සඞ්ඝත්ථෙරස්ස දත්වා ‘‘සෙසං අම්හාකං පාපුණාතී’’ති ගණ්හන්ති, වට්ටති. ඛණ්ඩං ඛණ්ඩං ඡින්දිත්වා භාජියමානං වට්ටතියෙව. 'एक ही वस्त्र संघ को देते हैं' ऐसा कहकर लाते हैं, और बिना विभाजित किए ही 'यह हमें प्राप्त होता है' ऐसा सोचकर ग्रहण करते हैं, तो वह अनुचित रूप से पहुँचाया गया और अनुचित रूप से ग्रहण किया गया होता है। किन्तु चाकू से या हल्दी आदि से चिह्न बनाकर एक अंश के लिए 'यह भाग आपको प्राप्त होता है' ऐसा संघस्थविर को अर्पित कर 'शेष हमें प्राप्त होता है' कहकर ग्रहण करना उचित है। वस्त्र के ही किसी फूल या सिलवट से सीमा निर्धारित करना उचित नहीं है। यदि एक धागा निकालकर 'यह भाग आपको प्राप्त होता है' ऐसा संघस्थविर को देकर 'शेष हमें प्राप्त होता है' कहकर ग्रहण करते हैं, तो उचित है। टुकड़े-टुकड़े काटकर विभाजित किया जाना भी उचित ही है। එකභික්ඛුකෙ විහාරෙ සඞ්ඝස්ස චීවරෙසු උප්පන්නෙසු සචෙ පුබ්බෙ වුත්තනයෙනෙව සො භික්ඛු ‘‘සබ්බානි මය්හං පාපුණන්තී’’ති ගණ්හාති, සුග්ගහිතානි, ඨිතිකා පන න තිට්ඨති. සචෙ එකෙකං උද්ධරිත්වා ‘‘ඉදං මය්හං පාපුණාතී’’ති ගණ්හාති, ඨිතිකා තිට්ඨති. තත්ථ අට්ඨිතාය ඨිතිකාය පුන අඤ්ඤස්මිං චීවරෙ උප්පන්නෙ සචෙ එකො භික්ඛු ආගච්ඡති, මජ්ඣෙ ඡින්දිත්වා ද්වීහිපි ගහෙතබ්බං. ඨිතාය ඨිතිකාය පුන අඤ්ඤස්මිං චීවරෙ උප්පන්නෙ සචෙ නවකතරො ආගච්ඡති, ඨිතිකා හෙට්ඨා ඔරොහති. සචෙ වුඩ්ඪතරො ආගච්ඡති, ඨිතිකා උද්ධං ආරොහති. අථඤ්ඤො නත්ථි, පුන අත්තනො පාපෙත්වා ගහෙතබ්බං. एक भिक्षु वाले विहार में संघ के लिए चीवर उत्पन्न होने पर, यदि पहले कहे गए नियम के अनुसार वह भिक्षु 'सब मुझे ही प्राप्त होते हैं' कहकर ग्रहण करता है, तो वे सुगृहीत हैं, किन्तु 'ठितिका' (क्रम-स्थिति) नहीं रहती। यदि वह एक-एक को अलग कर 'यह मुझे प्राप्त होता है' कहकर ग्रहण करता है, तो 'ठितिका' बनी रहती है। वहाँ 'ठितिका' न रहने पर, पुनः अन्य चीवर उत्पन्न होने पर यदि एक अन्य भिक्षु आता है, तो बीच से काटकर दोनों को ग्रहण करना चाहिए। 'ठितिका' रहने पर, पुनः अन्य चीवर उत्पन्न होने पर यदि कोई कनिष्ठ आता है, तो 'ठितिका' नीचे उतरती है। यदि कोई वरिष्ठ आता है, तो 'ठितिका' ऊपर चढ़ती है। यदि कोई अन्य नहीं है, तो पुनः स्वयं को अर्पित कर ग्रहण करना चाहिए। ‘‘සඞ්ඝස්ස දෙමා’’ති වා ‘‘භික්ඛුසඞ්ඝස්ස දෙමා’’ති වා යෙන කෙනචි ආකාරෙන සඞ්ඝං ආමසිත්වා දින්නං පන පංසුකූලිකානං න වට්ටති, ‘‘ගහපතිචීවරං පටික්ඛිපාමි පංසුකූලිකඞ්ගං සමාදියාමී’’ති වුත්තත්තා, න පන අකප්පියත්තා[Pg.422]. භික්ඛුසඞ්ඝෙන අපලොකෙත්වා දින්නම්පි න ගහෙතබ්බං. යං පන භික්ඛු අත්තනො සන්තකං දෙති, තං භික්ඛුදත්තියං නාම වට්ටති, පංසුකූලං පන න හොති. එවං සන්තෙපි ධුතඞ්ගං න භිජ්ජති. ‘‘භික්ඛූනං දෙම, ථෙරානං දෙමා’’ති වුත්තෙ පන පංසුකූලිකානම්පි වට්ටති. ‘‘ඉදං වත්ථං සඞ්ඝස්ස දෙම, ඉමිනා උපාහනත්ථවිකපත්තත්ථවිකආයොගඅංසබද්ධකාදීනි කරොන්තූ’’ති දින්නම්පි වට්ටති. "हम संघ को देते हैं" या "हम भिक्षु संघ को देते हैं" - इस प्रकार किसी भी तरह से संघ को संबोधित कर जो दान दिया जाता है, वह पांसुकूलिक (पांसुकूल धारण करने वाले) भिक्षुओं के लिए कल्प्य (उचित) नहीं है। क्योंकि उन्होंने यह कहा होता है कि "मैं गृहपति-चीवर का त्याग करता हूँ और पांसुकूलिक अंग को ग्रहण करता हूँ।" यह अकल्प्य होने के कारण नहीं (बल्कि व्रत के कारण) अनुचित है। भिक्षु संघ द्वारा अनुमति (अपलोकित) देकर दिए जाने पर भी इसे ग्रहण नहीं करना चाहिए। परंतु जो भिक्षु अपनी निजी वस्तु देता है, उसे 'भिक्षुदत्तिय' कहा जाता है और वह पांसुकूलिकों के लिए कल्प्य है, यद्यपि वह पांसुकूल नहीं होता। ऐसा होने पर भी धुतंग भंग नहीं होता। यदि "हम भिक्षुओं को देते हैं, स्थविरों को देते हैं" ऐसा कहा जाए, तो वह पांसुकूलिकों के लिए भी कल्प्य है। "यह वस्त्र हम संघ को देते हैं, इससे उपानह-थैली (जूते का थैला), पात्र-थैली, आयोग-पट्ट (योग-पट्ट), अंस-बद्धक (कंधे की पट्टी) आदि बनाएँ" - इस प्रकार दिया गया दान भी कल्प्य है। පත්තත්ථවිකාදීනං අත්ථාය දින්නානි බහූනිපි හොන්ති, චීවරත්ථායපි පහොන්ති, තතො චීවරං කත්වා පාරුපිතුං වට්ටති. සචෙ පන සඞ්ඝො භාජිතාතිරිත්තානි වත්ථානි ඡින්දිත්වා උපාහනත්ථවිකාදීනං අත්ථාය භාජෙති, තතො ගහෙතුං න වට්ටති. සාමිකෙහි විචාරිතමෙව හි වට්ටති, න ඉතරං. पात्र-थैली आदि के लिए दिए गए वस्त्र यदि बहुत अधिक हों और चीवर के लिए भी पर्याप्त हों, तो उनसे चीवर बनाकर धारण करना कल्प्य है। परंतु यदि संघ वितरण के बाद बचे हुए वस्त्रों को काटकर उपानह-थैली आदि के लिए बाँटता है, तो उनमें से (चीवर के लिए) ग्रहण करना कल्प्य नहीं है। क्योंकि स्वामियों (दाताओं) द्वारा जिस प्रयोजन के लिए निर्धारित किया गया है, वही कल्प्य है, दूसरा नहीं। ‘‘පංසුකූලිකසඞ්ඝස්ස ධමකරණපටාදීනං අත්ථාය දෙමා’’ති වුත්තෙපි ගහෙතුං වට්ටති, පරික්ඛාරො නාම පංසුකූලිකානම්පි ඉච්ඡිතබ්බො. යං තත්ථ අතිරෙකං හොති, තං චීවරෙපි උපනෙතුං වට්ටති. සුත්තං සඞ්ඝස්ස දෙන්ති, පංසුකූලිකෙහිපි ගහෙතබ්බං. අයං තාව විහාරං පවිසිත්වා ‘‘ඉමානි චීවරානි සඞ්ඝස්ස දම්මී’’ති දින්නෙසු විනිච්ඡයො. "हम पांसुकूलिक संघ को धमककरण (जल-छन्नी) के वस्त्र आदि के लिए देते हैं" - ऐसा कहने पर भी ग्रहण करना कल्प्य है, क्योंकि परिष्कार (उपकरण) तो पांसुकूलिकों के लिए भी आवश्यक होते हैं। उसमें जो अतिरिक्त हो, उसे चीवर में भी उपयोग करना कल्प्य है। यदि संघ को सूत (धागा) देते हैं, तो उसे पांसुकूलिकों द्वारा भी ग्रहण किया जाना चाहिए। यह विहार में प्रवेश कर "ये चीवर मैं संघ को देता हूँ" - इस प्रकार दिए गए दानों के विषय में विनिश्चय है। සචෙ පන බහිඋපචාරසීමායං අද්ධානප්පටිපන්නෙ භික්ඛූ දිස්වා ‘‘සඞ්ඝස්ස දම්මී’’ති සඞ්ඝත්ථෙරස්ස වා සඞ්ඝනවකස්ස වා ආරොචෙති, සචෙපි යොජනං ඵරිත්වා පරිසා ඨිතා හොති, එකබද්ධා චෙ, සබ්බෙසං පාපුණාති. යෙ පන ද්වාදසහි හත්ථෙහි පරිසං අසම්පත්තා, තෙසං න පාපුණාති. यदि विहार की उपचार-सीमा से बाहर, मार्ग पर चलते हुए भिक्षुओं को देखकर कोई संघ-स्थविर या संघ-नवक (कनिष्ठ भिक्षु) से कहता है कि "मैं संघ को देता हूँ", तो यदि वह परिषद (भिक्षुओं का समूह) एक योजन तक फैली हो और एक-दूसरे से जुड़ी (निरंतर) हो, तो वह दान सभी को प्राप्त होता है। परंतु जो भिक्षु उस परिषद से बारह हाथ की दूरी के भीतर नहीं पहुँचे हैं, उन्हें वह प्राप्त नहीं होता। උභතොසඞ්ඝස්ස දෙතීති එත්ථ ‘‘උභතොසඞ්ඝස්ස දම්මී’’ති වුත්තෙපි ‘‘ද්විධා සඞ්ඝස්ස දම්මි, ද්වින්නං සඞ්ඝානං දම්මි, භික්ඛුසඞ්ඝස්ස ච භික්ඛුනිසඞ්ඝස්ස ච දම්මී’’ති වුත්තෙපි උභතොසඞ්ඝස්ස දින්නමෙව හොති. උපඩ්ඪං දාතබ්බන්ති ද්වෙභාගෙ සමෙ කත්වා එකො දාතබ්බො. ‘‘උභතොසඞ්ඝස්ස ච තුය්හඤ්ච දම්මී’’ති වුත්තෙ සචෙ දස දස භික්ඛූ ච භික්ඛුනියො ච හොන්ති, එකවීසති පටිවීසෙ කත්වා එකො පුග්ගලස්ස දාතබ්බො, දස භික්ඛුසඞ්ඝස්ස, දස භික්ඛුනිසඞ්ඝස්ස යෙන පුග්ගලිකො ලද්ධො සො සඞ්ඝතොපි අත්තනො වස්සග්ගෙන ගහෙතුං ලභති. කස්මා? උභතොසඞ්ඝග්ගහණෙන ගහිතත්තා. "उभय संघ (दोनों संघों) को देता हूँ" - यहाँ "मैं उभय संघ को देता हूँ" कहने पर, या "दो प्रकार के संघ को देता हूँ", "दो संघों को देता हूँ", "भिक्षु संघ और भिक्षुणी संघ को देता हूँ" कहने पर भी वह उभय संघ को दिया गया ही होता है। "आधा दिया जाना चाहिए" का अर्थ है कि दो समान भाग करके एक-एक भाग दिया जाना चाहिए। यदि "उभय संघ को और आपको देता हूँ" ऐसा कहा जाए और यदि दस-दस भिक्षु और भिक्षुणियाँ हों, तो इक्कीस भाग करके एक भाग उस व्यक्ति (पुद्गल) को दिया जाना चाहिए, दस भिक्षु संघ को और दस भिक्षुणी संघ को। जिस व्यक्ति को व्यक्तिगत भाग मिला है, वह संघ के भाग से भी अपनी उपसंपदा की वरिष्ठता (वर्षा) के अनुसार हिस्सा प्राप्त करने का अधिकारी है। क्यों? क्योंकि 'उभय संघ' शब्द के ग्रहण से वह भी उसमें सम्मिलित है। ‘‘උභතොසඞ්ඝස්ස [Pg.423] ච චෙතියස්ස ච දම්මී’’ති වුත්තෙපි එසෙව නයො. ඉධ පන චෙතියස්ස සඞ්ඝතො පාපුණනකොට්ඨාසො නාම නත්ථි, එකපුග්ගලස්ස පත්තකොට්ඨාසසමොව කොට්ඨාසො හොති. "उभय संघ को और चैत्य को देता हूँ" - ऐसा कहने पर भी यही नियम है। परंतु यहाँ चैत्य के लिए संघ की ओर से प्राप्त होने वाला (वरिष्ठता आधारित) कोई अतिरिक्त भाग नहीं होता; उसे केवल एक व्यक्ति को मिलने वाले भाग के समान ही भाग प्राप्त होता है। ‘‘උභතොසඞ්ඝස්ස ච තුය්හඤ්ච චෙතියස්ස චා’’ති වුත්තෙ පන ද්වාවීසති කොට්ඨාසෙ කත්වා දස භික්ඛූනං, දස භික්ඛුනීනං, එකො පුග්ගලස්ස, එකො චෙතියස්ස දාතබ්බො. තත්ථ පුග්ගලො සඞ්ඝතොපි අත්තනො වස්සග්ගෙන පුන ගහෙතුං ලභති, චෙතියස්ස එකොයෙව. "उभय संघ को, आपको और चैत्य को देता हूँ" - ऐसा कहने पर बाईस भाग करके दस भिक्षुओं को, दस भिक्षुणियों को, एक व्यक्ति को और एक चैत्य को दिया जाना चाहिए। वहाँ वह व्यक्ति संघ के भाग से भी अपनी वरिष्ठता के अनुसार पुनः हिस्सा प्राप्त कर सकता है, चैत्य को केवल एक ही भाग मिलता है। ‘‘භික්ඛුසඞ්ඝස්ස ච භික්ඛුනීනඤ්ච දම්මී’’ති වුත්තෙ පන න මජ්ඣෙ භින්දිත්වා දාතබ්බං, භික්ඛූ ච භික්ඛුනියො ච ගණෙත්වා දාතබ්බං. ‘‘භික්ඛුසඞ්ඝස්ස ච භික්ඛුනීනඤ්ච තුය්හඤ්චා’’ති වුත්තෙ පන පුග්ගලො විසුං න ලභති, පාපුණනට්ඨානතො එකමෙව ලභති. කස්මා? භික්ඛුසඞ්ඝග්ගහණෙන ගහිතත්තා. ‘‘භික්ඛුසඞ්ඝස්ස ච භික්ඛුනීනඤ්ච තුය්හඤ්ච චෙතියස්ස චා’’ති වුත්තෙපි චෙතියස්ස එකපුග්ගලපටිවීසො ලබ්භති, පුග්ගලස්ස විසුං න ලබ්භති, තස්මා එකං චෙතියස්ස දත්වා අවසෙසං භික්ඛූ ච භික්ඛුනියො ච ගණෙත්වා භාජෙතබ්බං. "भिक्षु संघ को और भिक्षुणियों को देता हूँ" - ऐसा कहने पर बीच से दो भाग करके नहीं देना चाहिए, बल्कि भिक्षुओं और भिक्षुणियों की गणना करके देना चाहिए। "भिक्षु संघ को, भिक्षुणियों को और आपको देता हूँ" - ऐसा कहने पर उस व्यक्ति को अलग से भाग नहीं मिलता, उसे प्राप्त होने वाले स्थान से केवल एक ही भाग मिलता है। क्यों? क्योंकि 'भिक्षु संघ' शब्द के ग्रहण से वह उसमें सम्मिलित है। "भिक्षु संघ को, भिक्षुणियों को, आपको और चैत्य को देता हूँ" - ऐसा कहने पर भी चैत्य को एक व्यक्ति के बराबर भाग मिलता है, व्यक्ति को अलग से नहीं मिलता; इसलिए एक भाग चैत्य को देकर शेष भाग भिक्षुओं और भिक्षुणियों की गणना करके विभाजित करना चाहिए। ‘‘භික්ඛූනඤ්ච භික්ඛුනීනඤ්ච දම්මී’’ති වුත්තෙපි මජ්ඣෙ භින්දිත්වා න දාතබ්බං, පුග්ගලගණනාය එව විභජිතබ්බං. ‘‘භික්ඛූනඤ්ච භික්ඛුනීනඤ්ච තුය්හඤ්ච චෙතියස්ස චා’’ති එවං වුත්තෙපි චෙතියස්ස එකපුග්ගලපටිවීසො ලබ්භති, පුග්ගලස්ස විසුං නත්ථි, භික්ඛූ ච භික්ඛුනියො ච ගණෙත්වා එව භාජෙතබ්බං. යථා ච භික්ඛුසඞ්ඝං ආදිං කත්වා නයො නීතො, එවං භික්ඛුනිසඞ්ඝං ආදිං කත්වාපි නෙතබ්බො. ‘‘භික්ඛුසඞ්ඝස්ස ච තුය්හඤ්චා’’ති වුත්තෙ පුග්ගලස්ස විසුං න ලබ්භති, වස්සග්ගෙනෙව ගහෙතබ්බං. ‘‘භික්ඛුසඞ්ඝස්ස ච චෙතියස්ස චා’’ති වුත්තෙ පන චෙතියස්ස විසුං පටිවීසො ලබ්භති. ‘‘භික්ඛුසඞ්ඝස්ස ච තුය්හඤ්ච චෙතියස්ස චා’’ති වුත්තෙපි චෙතියස්සෙව ලබ්භති, න පුග්ගලස්ස. "भिक्षुओं को और भिक्षुणियों को देता हूँ" - ऐसा कहने पर भी बीच से दो भाग करके नहीं देना चाहिए, बल्कि व्यक्तियों की संख्या के अनुसार ही विभाजित करना चाहिए। "भिक्षुओं को, भिक्षुणियों को, आपको और चैत्य को देता हूँ" - ऐसा कहने पर भी चैत्य को एक व्यक्ति के बराबर भाग मिलता है, व्यक्ति के लिए अलग से भाग नहीं है; भिक्षुओं और भिक्षुणियों की गणना करके ही विभाजित करना चाहिए। जैसे भिक्षु संघ को आदि (प्रमुख) मानकर नियम बताया गया है, वैसे ही भिक्षुणी संघ को आदि मानकर भी नियम समझना चाहिए। "भिक्षु संघ को और आपको देता हूँ" - ऐसा कहने पर व्यक्ति को अलग से भाग नहीं मिलता, उसे वरिष्ठता (वर्षा) के अनुसार ही ग्रहण करना चाहिए। "भिक्षु संघ को और चैत्य को देता हूँ" - ऐसा कहने पर चैत्य को अलग से भाग मिलता है। "भिक्षु संघ को, आपको और चैत्य को देता हूँ" - ऐसा कहने पर भी चैत्य को ही (अलग से) भाग मिलता है, व्यक्ति को नहीं। ‘‘භික්ඛූනඤ්ච තුය්හඤ්චා’’ති වුත්තෙපි විසුං න ලබ්භති. ‘‘භික්ඛූනඤ්ච චෙතියස්ස චා’’ති වුත්තෙ පන චෙතියස්ස ලබ්භති. ‘‘භික්ඛූනඤ්ච තුය්හඤ්ච චෙතියස්ස චා’’ති වුත්තෙපි චෙතියස්සෙව විසුං ලබ්භති, න පුග්ගලස්ස. භික්ඛුනිසඞ්ඝං ආදිං කත්වාපි එවමෙව යොජෙතබ්බං. "भिक्षुओं को और आपको देता हूँ" - ऐसा कहने पर भी अलग से भाग नहीं मिलता। "भिक्षुओं को और चैत्य को देता हूँ" - ऐसा कहने पर चैत्य को भाग मिलता है। "भिक्षुओं को, आपको और चैत्य को देता हूँ" - ऐसा कहने पर भी चैत्य को ही अलग से भाग मिलता है, व्यक्ति को नहीं। भिक्षुणी संघ को आदि मानकर भी इसी प्रकार योजना करनी चाहिए। පුබ්බෙ බුද්ධප්පමුඛස්ස උභතොසඞ්ඝස්ස දානං දෙන්ති, භගවා මජ්ඣෙ නිසීදති, දක්ඛිණතො භික්ඛූ වාමතො භික්ඛුනියො නිසීදන්ති, භගවා උභින්නං සඞ්ඝත්ථෙරො, තදා භගවා අත්තනා ලද්ධපච්චයෙ අත්තනාපි පරිභුඤ්ජති, භික්ඛූනම්පි [Pg.424] දාපෙති. එතරහි පන පණ්ඩිතමනුස්සා සධාතුකං පටිමං වා චෙතියං වා ඨපෙත්වා බුද්ධප්පමුඛස්ස උභතොසඞ්ඝස්ස දානං දෙන්ති. පටිමාය වා චෙතියස්ස වා පුරතො ආධාරකෙ පත්තං ඨපෙත්වා දක්ඛිණොදකං දත්වා බුද්ධානං දෙමාති, තත්ථ යං පඨමං ඛාදනීයං භොජනීයං දෙන්ති, විහාරං වා ආහරිත්වා ඉදං චෙතියස්ස දෙමාති පිණ්ඩපාතඤ්ච මාලාගන්ධාදීනි ච දෙන්ති, තත්ථ කථං පටිපජ්ජිතබ්බන්ති? මාලාගන්ධාදීනි තාව චෙතියෙ ආරොපෙතබ්බානි, වත්ථෙහි පටාකා, තෙලෙන පදීපා කාතබ්බා, පිණ්ඩපාතමධුඵාණිතාදීනි පන යො නිබද්ධචෙතියජග්ගකො හොති පබ්බජිතො වා ගහට්ඨො වා, තස්සෙව දාතබ්බානි. නිබද්ධජග්ගකෙ අසති ආහටභත්තං ඨපෙත්වා වත්තං කත්වා පරිභුඤ්ජිතුං වට්ටති. උපකට්ඨෙ කාලෙ භුඤ්ජිත්වා පච්ඡාපි වත්තං කාතුං වට්ටතියෙව. प्राचीन काल में (बुद्ध के समय में), लोग बुद्ध की अध्यक्षता में दोनों संघों (भिक्षु और भिक्षुणी संघ) को दान देते थे। भगवान बुद्ध बीच में बैठते थे, दाहिनी ओर भिक्षु और बाईं ओर भिक्षुणियाँ बैठती थीं। भगवान दोनों संघों के संघस्थविर (प्रमुख) होते थे। उस समय भगवान स्वयं प्राप्त प्रत्ययों (वस्तुओं) का उपभोग करते थे और भिक्षुओं को भी दिलवाते थे। लेकिन अब, बुद्धिमान लोग धातु-सहित प्रतिमा या चैत्य को स्थापित कर बुद्ध की अध्यक्षता में दोनों संघों को दान देते हैं। प्रतिमा या चैत्य के सामने आधार पर पात्र रखकर और दान का जल (दक्षिणा जल) देकर कहते हैं, "हम बुद्धों को दान देते हैं।" वहाँ जो पहले खाद्य या भोज्य पदार्थ देते हैं, या विहार में लाकर "यह हम चैत्य को देते हैं" कहकर पिण्डपात और माला-गंध आदि देते हैं, वहाँ कैसे व्यवहार करना चाहिए? माला-गंध आदि तो चैत्य पर चढ़ा देने चाहिए। वस्त्रों से ध्वजाएँ और तेल से दीप बनाने चाहिए। पिण्डपात, मधु, फाणित (गुड़) आदि जो व्यक्ति (भिक्षु या गृहस्थ) निरंतर चैत्य की सेवा करने वाला हो, उसे ही देना चाहिए। यदि निरंतर सेवा करने वाला न हो, तो लाए हुए भोजन को रखकर, (चैत्य के प्रति) कर्तव्य (वत्त) पूरा करके उपभोग करना उचित है। यदि समय (दोपहर का) निकट हो, तो भोजन करके बाद में भी कर्तव्य पूरा करना उचित ही है। මාලාගන්ධාදීසු ච යං කිඤ්චි ‘‘ඉදං හරිත්වා චෙතියස්සපූජං කරොථා’’ති වුත්තෙ දූරම්පි හරිත්වා පූජෙතබ්බං. ‘‘භික්ඛං සඞ්ඝස්ස හරා’’ති වුත්තෙපි හරිතබ්බං. සචෙ පන ‘‘අහං පිණ්ඩාය චරාමි, ආසනසාලාය භික්ඛූ අත්ථි, තෙ ආහරිස්සන්තී’’ති වුත්තෙ ‘‘භන්තෙ තුය්හංයෙව දම්මී’’ති වදති, භුඤ්ජිතුං වට්ටති. අථ පන ‘‘භික්ඛුසඞ්ඝස්ස දස්සාමී’’ති හරන්තස්ස ගච්ඡතො අන්තරාව කාලො උපකට්ඨො හොති, අත්තනො පාපෙත්වා භුඤ්ජිතුං වට්ටති. माला-गंध आदि में से किसी भी वस्तु के लिए यदि कहा जाए कि "इसे ले जाकर चैत्य की पूजा करें," तो उसे दूर ले जाकर भी पूजा करनी चाहिए। "भिक्षा संघ के पास ले जाओ" कहने पर भी ले जाना चाहिए। लेकिन यदि "मैं भिक्षा के लिए जा रहा हूँ, आसनशाला में भिक्षु हैं, वे ले आएँगे" कहने पर (दाता) कहे, "भन्ते, मैं आपको ही देता हूँ," तो उसे ग्रहण करना या खाना उचित है। और यदि "भिक्षु संघ को दूँगा" सोचकर ले जाते हुए रास्ते में ही (भोजन का) समय निकट आ जाए, तो अपने पास पहुँचाकर (स्वयं) भोजन करना उचित है। වස්සංවුට්ඨසඞ්ඝස්ස දෙතීති විහාරං පවිසිත්වා ‘‘ඉමානි චීවරානි වස්සංවුට්ඨසඞ්ඝස්ස දම්මී’’ති දෙති. යාවතිකා භික්ඛූ තස්මිං ආවාසෙ වස්සංවුට්ඨාති යත්තකා වස්සච්ඡෙදං අකත්වා පුරිමවස්සංවුට්ඨා, තෙහි භාජෙතබ්බං, අඤ්ඤෙසං න පාපුණාති. දිසාපක්කන්තස්සාපි සති පටිග්ගාහකෙ යාව කථිනස්සුබ්භාරා දාතබ්බං, අනත්ථතෙ පන කථිනෙ අන්තොහෙමන්තෙ එවඤ්ච වත්වා දින්නං, පච්ඡිමවස්සංවුට්ඨානම්පි පාපුණාතීති ලක්ඛණඤ්ඤූ වදන්ති. අට්ඨකථාසු පනෙතං න විචාරිතං. "वर्षावास पूर्ण करने वाले संघ को देता हूँ" - ऐसा कहकर विहार में प्रवेश कर "ये चीवर मैं वर्षावास पूर्ण करने वाले संघ को देता हूँ" इस प्रकार दान देता है। उस आवास में जितने भिक्षुओं ने वर्षावास पूर्ण किया है, जिन्होंने वर्षावास भंग न करते हुए 'पुरिम-वस्सा' (प्रथम वर्षावास) पूर्ण किया है, उनके द्वारा इसे विभाजित किया जाना चाहिए; दूसरों को यह प्राप्त नहीं होता। यदि कोई अन्य दिशा में चला गया हो, तो भी (चीवर) ग्रहण करने वाले के होने पर कठिन के उद्धार (समाप्ति) तक उसे देना चाहिए। लेकिन यदि कठिन न बिछाया गया हो और हेमंत ऋतु के भीतर इस प्रकार कहकर दान दिया गया हो, तो वह 'पच्छिम-वस्सा' (द्वितीय वर्षावास) पूर्ण करने वालों को भी प्राप्त होता है - ऐसा लक्षण (विनय) जानने वाले कहते हैं। अट्टकथाओं में इस पर विशेष विचार नहीं किया गया है। සචෙ පන බහිඋපචාරසීමායං ඨිතො ‘‘වස්සංවුට්ඨසඞ්ඝස්ස දම්මී’’ති වදති, සම්පත්තානං සබ්බෙසං පාපුණාති. අථ ‘‘අසුකවිහාරෙ වස්සංවුට්ඨසඞ්ඝස්සා’’ති වදති, තත්ර වස්සංවුට්ඨානමෙව යාව කථිනස්සුබ්භාරා පාපුණාති. සචෙ පන ගිම්හානං පඨමදිවසතො පට්ඨාය එවං වදති, තත්ර සම්මුඛීභූතානං සබ්බෙසං පාපුණාති. කස්මා? පිට්ඨිසමයෙ උප්පන්නත්තා. අන්තොවස්සෙයෙව ‘‘වස්සං වසන්තානං දම්මී’’ති වුත්තෙ ඡින්නවස්සා න ලභන්ති, වස්සං වසන්තාව ලභන්ති. චීවරමාසෙ [Pg.425] පන ‘‘වස්සං වසන්තානං දම්මී’’ති වුත්තෙ පච්ඡිමිකාය වස්සූපගතානංයෙව පාපුණාති, පුරිමිකාය වස්සූපගතානඤ්ච ඡින්නවස්සානඤ්ච න පාපුණාති. यदि कोई (दाता) उपचार-सीमा के बाहर खड़ा होकर कहे, "मैं वर्षावास पूर्ण करने वाले संघ को देता हूँ," तो वह वहाँ उपस्थित सभी भिक्षुओं को प्राप्त होता है। यदि वह कहे, "अमुक विहार में वर्षावास पूर्ण करने वाले संघ को देता हूँ," तो वहाँ वर्षावास पूर्ण करने वालों को ही कठिन के उद्धार तक प्राप्त होता है। यदि वह ग्रीष्म ऋतु के प्रथम दिन से ऐसा कहता है, तो वहाँ उपस्थित सभी को प्राप्त होता है। क्यों? क्योंकि यह चीवर-काल के बाद उत्पन्न हुआ है। वर्षावास के भीतर ही "वर्षावास करने वालों को देता हूँ" कहने पर, जिनका वर्षावास खंडित हो गया है उन्हें नहीं मिलता, केवल वर्षावास करने वालों को ही मिलता है। चीवर-मास (आश्विन पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा) में "वर्षावास करने वालों को देता हूँ" कहने पर, केवल 'पच्छिमिका वस्सा' (द्वितीय वर्षावास) में प्रविष्ट भिक्षुओं को ही प्राप्त होता है; 'पुरिमिका वस्सा' (प्रथम वर्षावास) वालों और खंडित वर्षावास वालों को नहीं मिलता। චීවරමාසතො පට්ඨාය යාව හෙමන්තස්ස පච්ඡිමො දිවසො, තාව වස්සාවාසිකං දෙමාති වුත්තෙ කථිනං අත්ථතං වා හොතු අනත්ථතං වා අතීතවස්සංවුට්ඨානමෙව පාපුණාති. ගිම්හානං පඨමදිවසතො පට්ඨාය වුත්තෙ පන මාතිකා ආරොපෙතබ්බා – ‘‘අතීතවස්සාවාසස්ස පඤ්ච මාසා අතික්කන්තා, අනාගතො චතුමාසච්චයෙන භවිස්සති, කතරවස්සාවාසස්ස දෙතී’’ති? සචෙ ‘‘අතීතවස්සංවුට්ඨානං දම්මී’’ති වදති, තංඅන්තොවස්සංවුට්ඨානමෙව පාපුණාති, දිසාපක්කන්තානම්පි සභාගා ගණ්හිතුං ලභන්ති. चीवर-मास से लेकर हेमंत ऋतु के अंतिम दिन (फाल्गुन पूर्णिमा) तक यदि "हम वर्षावासिक (चीवर) देते हैं" कहा जाए, तो कठिन बिछाया गया हो या न बिछाया गया हो, वह केवल अतीत वर्षावास पूर्ण करने वालों को ही प्राप्त होता है। ग्रीष्म ऋतु के प्रथम दिन से कहने पर, यह प्रश्न (मातिका) उठाना चाहिए - "अतीत वर्षावास को पाँच महीने बीत चुके हैं, आगामी वर्षावास चार महीने बाद होगा, आप किस वर्षावास के लिए दान दे रहे हैं?" यदि वह कहे, "अतीत वर्षावास पूर्ण करने वालों को देता हूँ," तो वह उसी वर्षावास में रहने वालों को ही प्राप्त होता है; अन्य दिशाओं में गए हुए समान भिक्षु भी उसे ग्रहण कर सकते हैं। සචෙ ‘‘අනාගතෙ වස්සාවාසිකං දම්මී’’ති වදති, තං ඨපෙත්වා වස්සූපනායිකදිවසෙ ගහෙතබ්බං. අථ ‘‘අගුත්තො විහාරො, චොරභයං අත්ථි, න සක්කා ඨපෙතුං, ගණ්හිත්වා වා ආහිණ්ඩිතු’’න්ති වුත්තෙ ‘‘සම්පත්තානං දම්මී’’ති වදති, භාජෙත්වා ගහෙතබ්බං. සචෙ වදති ‘‘ඉතො මෙ භන්තෙ තතියෙ වස්සෙ වස්සාවාසිකං න දින්නං, තං දම්මී’’ති, තස්මිං අන්තොවස්සෙ වුට්ඨභික්ඛූනං පාපුණාති. සචෙ තෙ දිසා පක්කන්තා, අඤ්ඤො විස්සාසිකො ගණ්හාති, දාතබ්බං. අථ එකොයෙව අවසිට්ඨො, සෙසා කාලඞ්කතා, සබ්බං එකස්සෙව පාපුණාති. සචෙ එකොපි නත්ථි, සඞ්ඝිකං හොති, සම්මුඛීභූතෙහි භාජෙතබ්බං. यदि वह कहे, "मैं आगामी वर्षावास के लिए वर्षावासिक देता हूँ," तो उसे सुरक्षित रखकर वर्षावास प्रारंभ होने के दिन ग्रहण करना चाहिए। यदि "विहार सुरक्षित नहीं है, चोरों का भय है, इसे रखना या साथ लेकर घूमना संभव नहीं है" कहने पर वह कहे, "उपस्थित भिक्षुओं को देता हूँ," तो उसे विभाजित कर ग्रहण करना चाहिए। यदि वह कहे, "भन्ते, मैंने आज से तीसरे वर्ष पहले का वर्षावासिक नहीं दिया था, वह देता हूँ," तो वह उस अतीत के तीसरे वर्षावास में रहने वाले भिक्षुओं को प्राप्त होता है। यदि वे अन्य दिशाओं में चले गए हों और कोई विश्वसनीय भिक्षु उसे ग्रहण करे, तो उसे देना चाहिए। यदि केवल एक ही शेष बचा हो और बाकी कालगत (मृत) हो गए हों, तो सब कुछ उसी एक को प्राप्त होता है। यदि एक भी न हो, तो वह संघ की संपत्ति (सांघिक) हो जाती है और उपस्थित भिक्षुओं द्वारा विभाजित की जानी चाहिए। ආදිස්ස දෙතීති ආදිසිත්වා පරිච්ඡින්දිත්වා දෙති; යාගුයා වාතිආදීසු අයමත්ථො – යාගුයා වා…පෙ… භෙසජ්ජෙ වා ආදිස්ස දෙති. තත්රායං යොජනා – භික්ඛූ අජ්ජතනාය වා ස්වාතනාය වා යාගුයා නිමන්තෙත්වා තෙසං ඝරං පවිට්ඨානං යාගුං දෙති, යාගුං දත්වා පීතාය යාගුයා ‘‘ඉමානි චීවරානි, යෙහි මය්හං යාගු පීතා, තෙසං දම්මී’’ති දෙති, යෙහි නිමන්තිතෙහි යාගු පීතා, තෙසංයෙව පාපුණාති. යෙහි පන භික්ඛාචාරවත්තෙන ඝරද්වාරෙන ගච්ඡන්තෙහි වා ඝරං පවිට්ඨෙහි වා යාගු ලද්ධා, යෙසං වා ආසනසාලතො පත්තං ආහරිත්වා මනුස්සෙහි නීතා, යෙසං වා ථෙරෙහි පෙසිතා, තෙසං න පාපුණාති. සචෙ පන නිමන්තිතභික්ඛූහි සද්ධිං අඤ්ඤෙපි බහූ ආගන්ත්වා අන්තොගෙහඤ්ච බහිගෙහඤ්ච පූරෙත්වා නිසින්නා, දායකො ච එවං වදති – ‘‘නිමන්තිතා වා හොන්තු අනිමන්තිතා වා, යෙසං මයා යාගු දින්නා, සබ්බෙසං ඉමානි වත්ථානි හොන්තූ’’ති සබ්බෙසං පාපුණන්ති. යෙහි පන ථෙරානං හත්ථතො යාගු ලද්ධා[Pg.426], තෙසං න පාපුණන්ති. අථ සො ‘‘යෙහි මය්හං යාගු පීතා, සබ්බෙසං හොන්තූ’’ති වදති, සබ්බෙසං පාපුණන්ති. භත්තඛාදනීයෙසුපි එසෙව නයො. "निर्दिष्ट करके देता है" (आदिस्स देति) का अर्थ है—उद्देश्य करके या परिच्छिन्न (सीमित) करके देना। 'यवागू (कांजी) के लिए' आदि वाक्यों में यही अर्थ है—यवागू के लिए... या औषधि के लिए निर्दिष्ट करके देता है। यहाँ यह योजना है—भिक्षुओं को आज के लिए या कल के लिए यवागू के लिए निमंत्रित कर, घर में प्रविष्ट हुए उन भिक्षुओं को यवागू देता है। यवागू देकर, यवागू पी लेने पर, "ये चीवर उन्हें देता हूँ जिन्होंने मेरी यवागू पी है," ऐसा कहकर देता है। जिन निमंत्रित भिक्षुओं ने यवागू पी है, उन्हें ही प्राप्त होता है। लेकिन जो भिक्षाटन के नियम से घर के द्वार से जा रहे थे या घर में प्रविष्ट हुए और यवागू प्राप्त की, या जिनके लिए भोजनशाला से पात्र लाकर मनुष्यों द्वारा यवागू ले जाई गई, या जिन्हें स्थविरों द्वारा भेजी गई, उन्हें प्राप्त नहीं होता। यदि निमंत्रित भिक्षुओं के साथ अन्य बहुत से भिक्षु भी आकर घर के भीतर और बाहर भर कर बैठे हों, और दायक ऐसा कहे—"चाहे निमंत्रित हों या अनिमंत्रित, जिन्हें मैंने यवागू दी है, उन सभी के लिए ये वस्त्र हों," तो सभी को प्राप्त होते हैं। लेकिन जिन्होंने स्थविरों के हाथ से यवागू प्राप्त की, उन्हें प्राप्त नहीं होता। यदि वह कहता है—"जिन्होंने मेरी यवागू पी है, उन सभी के लिए हों," तो सभी को प्राप्त होते हैं। भोजन और खाद्य पदार्थों के विषय में भी यही नियम है। චීවරෙ වාති පුබ්බෙපි යෙන වස්සං වාසෙත්වා භික්ඛූනං චීවරං දින්නපුබ්බං හොති, සො චෙ භික්ඛූ භොජෙත්වා වදති – ‘‘යෙසං මයා පුබ්බෙ චීවරං දින්නං, තෙසංයෙව ඉමං චීවරං වා සුත්තං වා සප්පිමධුඵාණිතාදීනි වා හොන්තූ’’ති, සබ්බං තෙසංයෙව පාපුණාති. සෙනාසනෙ වාති යො මයා කාරිතෙ විහාරෙ වා පරිවෙණෙ වා වසති, තස්සිදං හොතූ’’ති වුත්තෙ තස්සෙව හොති. භෙසජ්ජෙ වාති ‘‘මයං කාලෙන කාලං ථෙරානං සප්පිආදීනි භෙසජ්ජානි දෙම, යෙහි තානි ලද්ධානි, තෙසංයෙවිදං හොතූ’’ති වුත්තෙ තෙසංයෙව හොති. "चीवर के विषय में" का अर्थ है—पहले भी जिस (दायक) ने वर्षावास कराकर भिक्षुओं को चीवर दान दिया हो, वह यदि भिक्षुओं को भोजन कराकर कहता है—"जिन्हें मैंने पहले चीवर दिया था, उन्हीं के लिए यह चीवर या सूत या घी, शहद, गुड़ आदि हों," तो सब उन्हीं को प्राप्त होता है। "शयनासन के विषय में" का अर्थ है—"जो मेरे द्वारा बनवाए गए विहार या परिवेण में रहता है, उसके लिए यह हो," ऐसा कहने पर उसी को प्राप्त होता है। "औषधि के विषय में" का अर्थ है—"हम समय-समय पर स्थविरों को घी आदि औषधियाँ देते हैं, जिन्हें वे प्राप्त हुई हैं, उन्हीं के लिए यह हो," ऐसा कहने पर उन्हीं को प्राप्त होता है। පුග්ගලස්ස දෙතීති ‘‘ඉමං චීවරං ඉත්ථන්නාමස්ස දම්මී’’ති එවං පරම්මුඛා වා පාදමූලෙ ඨපෙත්වා ‘‘ඉමං භන්තෙ තුම්හාකං දම්මී’’ති එවං සම්මුඛා වා දෙති. සචෙ පන ‘‘ඉදං තුම්හාකඤ්ච තුම්හාකං අන්තෙවාසිකානඤ්ච දම්මී’’ති එවං වදති, ථෙරස්ස ච අන්තෙවාසිකානඤ්ච පාපුණාති. උද්දෙසං ගහෙතුං ආගතො ගහෙත්වා ගච්ඡන්තො ච අත්ථි, තස්සාපි පාපුණාති. ‘‘තුම්හෙහි සද්ධිං නිබද්ධචාරිකභික්ඛූනං දම්මී’’ති වුත්තෙ උද්දෙසන්තෙවාසිකානං වත්තං කත්වා උද්දෙසපරිපුච්ඡාදීනි ගහෙත්වා විචරන්තානං සබ්බෙසං පාපුණාති. අයං පුග්ගලස්ස දෙතීති ඉමස්මිං පදෙ විනිච්ඡයො. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. "पुद्गल (व्यक्ति) को देता है" का अर्थ है—"यह चीवर अमुक नाम वाले को देता हूँ," इस प्रकार परोक्ष में, या चरणों के पास रखकर "भन्ते! यह आपको देता हूँ," इस प्रकार प्रत्यक्ष में देता है। यदि वह कहता है—"यह आपको और आपके अन्तेवासियों (शिष्यों) को देता हूँ," तो स्थविर और अन्तेवासियों को प्राप्त होता है। जो पाठ सीखने के लिए आया है और जो सीखकर जा रहा है, उसे भी प्राप्त होता है। "आपके साथ निरंतर विचरण करने वाले भिक्षुओं को देता हूँ," ऐसा कहने पर, पाठ सीखने वाले अन्तेवासियों को, और सेवा-शुश्रूषा करके पाठ-पूछताछ आदि ग्रहण कर विचरण करने वाले सभी भिक्षुओं को प्राप्त होता है। "पुद्गल को देता है" इस पद का यही विनिश्चय है। शेष सभी जगह अर्थ स्पष्ट ही है। චීවරක්ඛන්ධකවණ්ණනා නිට්ඨිතා. चीवरस्कन्धक की व्याख्या समाप्त हुई। 9. චම්පෙය්යක්ඛන්ධකං ९. चम्पेय्यस्कन्धक කස්සපගොත්තභික්ඛුවත්ථුකථා कश्यपगोत्र भिक्षु की कथा 380. චම්පෙය්යක්ඛන්ධකෙ [Pg.427] – ගග්ගරාය පොක්ඛරණියා තීරෙති ගග්ගරානාමිකාය ඉත්ථියා කාරිතපොක්ඛරණියා තීරෙ. තන්තිබද්ධොති තස්මිං ආවාසෙ කත්තබ්බතාතන්තිපටිබද්ධො. උස්සුක්කම්පි අකාසි යාගුයාතිආදීසු මනුස්සෙහි ආගන්තුකෙසු ආගතෙසු ආචික්ඛෙය්යාථාති වුත්තට්ඨානෙයෙව උස්සුක්කං කාතුං වට්ටති; න අවුත්තට්ඨානෙ. ගච්ඡ ත්වං භික්ඛූති සත්ථා තස්ස භික්ඛුනො තත්ථෙව සෙනාසනං සප්පායන්ති අද්දස, තෙනෙවමාහ. ३८०. चम्पेय्यस्कन्धक में—"गग्गरा पुष्करिणी के तट पर" का अर्थ है गग्गरा नामक स्त्री द्वारा बनवाई गई पुष्करिणी के तट पर। "तन्तिबद्धो" का अर्थ है उस आवास में किए जाने वाले कार्यों की परंपरा (कर्तव्य) से बँधा हुआ। "यवागू के लिए उत्सुकता (प्रयत्न) भी की" आदि में विनिश्चय इस प्रकार समझना चाहिए—मनुष्यों द्वारा "आगन्तुक भिक्षुओं के आने पर हमें बताइएगा" इस प्रकार कहे गए स्थान पर ही उत्सुकता (प्रयत्न) करना उचित है; न कहे गए स्थान पर नहीं। "भिक्षु, तुम जाओ" (गच्छ त्वं भिक्खु)—शास्ता ने देखा कि उस भिक्षु के लिए उसी वासभ ग्राम में सेनासन अनुकूल है, इसलिए ऐसा कहा। 382. අධම්මෙන වග්ගකම්මං කරොන්තීතිආදීනං පරතො පාළියංයෙව නානාකරණං ආගමිස්සති. ३८२. "अधर्म से वर्ग-कर्म (विभाजित कर्म) करते हैं" आदि का भेद आगे पालि में ही आएगा। 385. අඤ්ඤත්රාපි ධම්මා කම්මං කරොන්තීති අඤ්ඤත්රාපි ධම්මං කම්මං කරොන්ති, අයමෙව වා පාඨො. භූතෙන වත්ථුනා කතං ධම්මෙන කතං නාම හොති, තථා න කරොන්තීති අත්ථො. අඤ්ඤත්රාපි විනයා කම්මං, අඤ්ඤත්රාපි සත්ථුසාසනා කම්මන්ති එතෙසුපි එසෙව නයො. එත්ථ පන විනයොති චොදනා ච සාරණා ච. සත්ථුසාසනන්ති ඤත්තිසම්පදා අනුස්සාවනසම්පදා ච; තාහි විනා කම්මං කරොන්තීති අත්ථො. පටිකුට්ඨකතන්ති පටිකුට්ඨඤ්චෙව කතඤ්ච; යං අඤ්ඤෙසු පටික්කොසන්තෙසු කතං තං පටිකුට්ඨඤ්චෙව හොති කතඤ්ච; තාදිසම්පි කම්මං කරොන්තීති අත්ථො. ३८५. "धर्म के बिना भी कर्म करते हैं" का अर्थ है धर्म को छोड़कर भी कर्म करते हैं, अथवा यही पाठ है। यथार्थ वस्तु (कारण) से किया गया कर्म 'धर्म से किया गया' कहलाता है, वैसा वे नहीं करते—यह अर्थ है। "विनय के बिना भी कर्म," "शास्ता के शासन के बिना भी कर्म"—इन पदों में भी यही नियम है। यहाँ 'विनय' का अर्थ है चोदना (दोषारोपण) और सारणा (दोष स्मरण कराना)। 'शास्ता का शासन' का अर्थ है ज्ञप्ति-सम्पदा और अनुसावन-सम्पदा; उनके बिना कर्म करते हैं—यह अर्थ है। "प्रतिषिद्ध किया गया" (पटिकुट्ठकतं) का अर्थ है जो प्रतिषिद्ध (वर्जित) भी है और किया भी गया है; जो अन्य भिक्षुओं के मना करने पर भी किया गया, वह 'पटिकुट्ठ' भी है और 'कत' भी; वैसा भी कर्म करते हैं—यह अर्थ है। 387. ඡයිමානි භික්ඛවෙ කම්මානි අධම්මකම්මන්තිආදීසු පන ‘‘ධම්මො’’ති පාළියා අධිවචනං. තස්මා යං යථාවුත්තාය පාළියා න කරියති, තං අධම්මකම්මන්ති වෙදිතබ්බං. අයමෙත්ථ සඞ්ඛෙපො, විත්ථාරො පන පාළියංයෙව ආගතො. සො ච ඛො ඤත්තිදුතියඤත්තිචතුත්ථකම්මානංයෙව වසෙන. යස්මා පන ඤත්තිකම්මෙ ඤත්තිදුතියඤත්තිචතුත්ථෙසු විය හාපනං වා අඤ්ඤථා කරණං වා නත්ථි, අපලොකනකම්මඤ්ච සාවෙත්වාව කරියති, තස්මා තානි පාළියං න දස්සිතානි, තෙසං සබ්බෙසම්පි කම්මානං විනිච්ඡයං පරතො වණ්ණයිස්සාම. ३८७. "भिक्षुओं! ये छह कर्म अधर्म-कर्म हैं" आदि में 'धम्म' पालि का ही पर्यायवाची है। इसलिए, जो उक्त पालि के अनुसार नहीं किया जाता, उसे 'अधर्म-कर्म' समझना चाहिए। यहाँ यह संक्षेप है, विस्तार तो पालि में ही आया है। और वह विस्तार ज्ञप्ति-द्वितीय और ज्ञप्ति-चतुर्थ कर्मों के वश से ही आया है। चूँकि ज्ञप्ति-कर्म में ज्ञप्ति-द्वितीय और ज्ञप्ति-चतुर्थ की भाँति न्यूनता या अन्यथा-करण (फेरबदल) नहीं होता, और अपलोकन-कर्म भी सुनाकर ही किया जाता है, इसलिए उन्हें पालि में विस्तार से नहीं दिखाया गया है। उन सभी कर्मों का विनिश्चय हम आगे कहेंगे। චතුවග්ගකරණාදිකථා चतुर्वर्ग-करण आदि की कथा 388. ඉදානි [Pg.428] යදිදං ඡට්ඨං ධම්මෙන සමග්ගකම්මං නාම, තං යෙහි සඞ්ඝෙහි කාතබ්බං, තෙසං පභෙදං දස්සෙතුං ‘‘පඤ්ච සඞ්ඝා’’තිආදි වුත්තං. කම්මප්පත්තොති කම්මං පත්තො, කම්මයුත්තො කම්මාරහො; න කිඤ්චි කම්මං කාතුං නාරහතීති අත්ථො. ३८८. अब, जो यह छठा 'धर्म से समग्र-कर्म' है, वह जिन संघों द्वारा किया जाना चाहिए, उनके भेद दिखाने के लिए "पाँच संघ" आदि कहा गया है। "कर्म प्राप्त" (कम्मप्पत्तो) का अर्थ है कर्म को प्राप्त, कर्म-युक्त, कर्म के योग्य; ऐसा नहीं है कि वह कोई कर्म करने के योग्य नहीं है—यह अर्थ है। 389. චතුවග්ගකරණඤ්චෙ භික්ඛවෙ කම්මං භික්ඛුනිචතුත්ථොතිආදි පරිසතො කම්මවිපත්තිදස්සනත්ථං වුත්තං. තත්ථ උක්ඛිත්තකග්ගහණෙන කම්මනානාසංවාසකො ගහිතො, නානාසංවාසකග්ගහණෙන ලද්ධිනානාසංවාසකො. නානාසීමාය ඨිතචතුත්ථොති සීමන්තරිකාය වා බහිසීමාය වා හත්ථපාසෙ ඨිතෙනාපි සද්ධිං චතුවග්ගො හුත්වාති අත්ථො. ३८९. हे भिक्षुओं, 'चतुवग्गकरणञ्च' इत्यादि शब्द भगवान द्वारा परिषद (सभा) के कारण कर्म की विफलता (कम्मविपत्ति) दिखाने के लिए कहे गए हैं। वहाँ 'उक्खित्तक' (उत्क्षिप्तक) शब्द के ग्रहण से कर्म के कारण नाना-संवासक (अलग संवास वाला) लिया गया है, और 'नानासंवासक' शब्द के ग्रहण से दृष्टि (लद्धि) के कारण नाना-संवासक लिया गया है। 'नानासीमा में स्थित चौथा' का अर्थ है कि सीमा-अन्तराल में या सीमा के बाहर हाथ के घेरे (हत्थपास) में स्थित भिक्षु के साथ मिलकर चार का समूह होना। 393. පාරිවාසිකචතුත්ථොතිආදි පරිවාසාදිකම්මානංයෙව පරිසතො විපත්තිදස්සනත්ථං වුත්තං, තෙසං විනිච්ඡයං පරතො වණ්ණයිස්සාම. ३९३. 'पारिवासिक-चतुत्थो' (परिवास वाला चौथा) इत्यादि शब्द केवल परिवास आदि कर्मों की परिषद के कारण विफलता दिखाने के लिए कहे गए हैं; उनका निर्णय हम आगे (चुल्लवग्ग में) करेंगे। 394. එකච්චස්ස භික්ඛවෙ සඞ්ඝමජ්ඣෙ පටික්කොසනා රුහතීතිආදි පටිකුට්ඨකතකම්මස්ස කුප්පාකුප්පභාවදස්සනත්ථං වුත්තං. පකතත්තස්සාති අවිපන්නසීලස්ස පාරාජිකං අනජ්ඣාපන්නස්ස. ආනන්තරිකස්සාති අත්තනො අනන්තරං නිසින්නස්ස. ३९४. हे भिक्षुओं, 'एकच्चस्स... संघमज्झे पटिक्कोसना रुहति' इत्यादि शब्द प्रतिषिद्ध (रोके गए) और किए गए कर्म की अमान्यता या मान्यता (कुप्पाकुप्पभाव) दिखाने के लिए कहे गए हैं। 'पकतत्तस्स' (प्रकृतस्थ) का अर्थ है—जिसका शील खंडित न हुआ हो और जिसने पाराजिक आपत्ति न की हो। 'आनन्तरिकस्स' का अर्थ है—अपने ठीक बगल में बैठे हुए (भिक्षु) का। ද්වෙනිස්සාරණාදිකථා दो निस्सारणा (निष्कासन) आदि की कथा। 395. ද්වෙමා භික්ඛවෙ නිස්සාරණාතිආදි වත්ථුතො කම්මානං කුප්පාකුප්පභාවදස්සනත්ථං වුත්තං. තත්ථ ‘‘අප්පත්තො නිස්සාරණං, තඤ්චෙ සඞ්ඝො නිස්සාරෙති, සුනිස්සාරිතො’’ති ඉදං පබ්බාජනීයකම්මං සන්ධාය වුත්තං. පබ්බාජනීයකම්මෙන හි විහාරතො නිස්සාරෙන්ති, තස්මා තං ‘‘නිස්සාරණා’’ති වුච්චති. තඤ්චෙස යස්මා කුලදූසකො න හොති, තස්මා ආවෙණිකෙන ලක්ඛණෙන අප්පත්තො. යස්මා පනස්ස ආකඞ්ඛමානො සඞ්ඝො පබ්බාජනීයකම්මං කරෙය්යාති වුත්තං, තස්මා සුනිස්සාරිතො හොති. තඤ්චෙ සඞ්ඝො නිස්සාරෙතීති සචෙ සඞ්ඝො තජ්ජනීයකම්මාදිවසෙන නිස්සාරෙති, සො යස්මා තත්ථ ‘‘තිණ්ණං භික්ඛවෙ භික්ඛූනං ආකඞ්ඛමානො සඞ්ඝො තජ්ජනීයකම්මං කරෙය්ය – එකො භණ්ඩනකාරකො හොති කලහකාරකො විවාදකාරකො භස්සකාරකො සඞ්ඝෙ අධිකරණකාරකො, එකො බාලො [Pg.429] හොති අබ්යත්තො ආපත්තිබහුලො අනපදානො, එකො ගිහිසංසට්ඨො විහරති අනනුලොමිකෙහි ගිහිසංසග්ගෙහී’’ති (චූළව. 395) එවං එකෙකෙනපි අඞ්ගෙන නිස්සාරණා අනුඤ්ඤාතා, තස්මා සුනිස්සාරිතො. ३९५. हे भिक्षुओं, 'द्वेमा निस्सारणा' इत्यादि शब्द वस्तु (व्यक्ति) के आधार पर कर्मों की मान्यता या अमान्यता दिखाने के लिए कहे गए हैं। वहाँ 'जो निष्कासन (निस्सारण) के योग्य नहीं है, यदि संघ उसे निष्कासित करता है, तो वह भली-भांति निष्कासित है'—यह प्रवार्जनीय-कर्म (पब्बापनीयकम्म) के संदर्भ में कहा गया है। क्योंकि प्रवार्जनीय-कर्म द्वारा विहार से बाहर निकाला जाता है, इसलिए इसे 'निस्सारणा' कहा जाता है। चूँकि वह व्यक्ति कुल-दूषक नहीं है, इसलिए वह विशिष्ट लक्षणों के आधार पर (प्रवार्जनीय-कर्म के) योग्य नहीं है। फिर भी, चूँकि संघ चाहे तो उसके विरुद्ध प्रवार्जनीय-कर्म कर सकता है, इसलिए वह 'सुनिस्सारित' (भली-भांति निष्कासित) होता है। 'यदि संघ उसे निष्कासित करता है' का अर्थ है कि यदि संघ तर्जनीय-कर्म (तज्जनीयकम्म) आदि के माध्यम से निष्कासित करता है, तो चूँकि वहाँ कहा गया है—'हे भिक्षुओं, संघ तीन प्रकार के भिक्षुओं के विरुद्ध तर्जनीय-कर्म कर सकता है: एक जो कलहकारी, झगड़ालू, विवादी, बहुत बोलने वाला और संघ में अधिकरण (विवाद) पैदा करने वाला हो; दूसरा जो मूर्ख, अकुशल, बहुत आपत्तियों वाला और अमर्यादित हो; और तीसरा जो गृहस्थों के साथ अनुचित संसर्ग में रहता हो'—इस प्रकार इनमें से किसी एक अंग के होने पर भी निष्कासन की अनुमति है, अतः वह 'सुनिस्सारित' है। 396. ඔසාරණාති පවෙසනා. තත්ථ තඤ්චෙ සඞ්ඝො ඔසාරෙතීති උපසම්පදකම්මවසෙන පවෙසෙති. දොසාරිතොති දුඔසාරිතො. සහස්සක්ඛත්තුම්පි උපසම්පාදිතො අනුපසම්පන්නොව හොති ආචරියුපජ්ඣායා ච සාතිසාරා, තථා සෙසො කාරකසඞ්ඝො, න කොචි ආපත්තිතො මුච්චති. ඉති ඉමෙ එකාදස අභබ්බපුග්ගලා දොසාරිතා. හත්ථච්ඡින්නාදයො පන ද්වත්තිංස සුඔසාරිතා, උපසම්පාදිතා උපසම්පන්නාව හොන්ති, න තෙ ලබ්භා කිඤ්චි වත්තුං. ආචරියුපජ්ඣායා පන කාරකසඞ්ඝො ච සාතිසාරා, න කොචි ආපත්තිතො මුච්චති. ३९६. 'ओसारणा' का अर्थ है प्रवेश कराना (सम्मिलित करना)। वहाँ 'यदि संघ उसे ओसारित करता है' का अर्थ है उपसंपदा-कर्म के माध्यम से प्रवेश कराना। 'दोसारितो' का अर्थ है—गलत तरीके से प्रवेश कराया गया। यदि (अभव्य पुद्गल को) हज़ार बार भी उपसंपदा दी जाए, तो भी वह अनुपसंपन्न (बिना उपसंपदा वाला) ही रहता है, और आचार्य तथा उपाध्याय आपत्ति के भागी होते हैं; इसी प्रकार शेष कार्यक-संघ भी दोषी होता है, कोई भी आपत्ति से मुक्त नहीं होता। इस प्रकार ये ग्यारह अभव्य पुद्गल 'दोसारित' (गलत प्रविष्ट) हैं। किन्तु हाथ कटे हुए आदि बत्तीस प्रकार के व्यक्ति 'सुओसारित' (सही प्रविष्ट) हैं; उपसंपदा दिए जाने पर वे उपसंपन्न ही होते हैं, उनके विषय में कुछ (गलत) नहीं कहा जा सकता। फिर भी, आचार्य, उपाध्याय और कार्यक-संघ आपत्ति के भागी होते हैं, कोई भी आपत्ति से मुक्त नहीं होता। 397. ඉධ පන භික්ඛවෙ භික්ඛුස්ස න හොති ආපත්ති දට්ඨබ්බාතිආදි අභූතවත්ථුවසෙන අධම්මකම්මං, භූතවත්ථුවසෙන ධම්මකම්මඤ්ච දස්සෙතුං වුත්තං. තත්ථ පටිනිස්සජ්ජිතාති පටිනිස්සජ්ජිතබ්බා. ३९७. हे भिक्षुओं, 'इध पन भिक्खवे भिक्खुस्स न होति आपत्ति दट्ठब्बा' इत्यादि शब्द असत्य वस्तु (आधार) के कारण अधर्म-कर्म को, और सत्य वस्तु के कारण धर्म-कर्म को दिखाने के लिए कहे गए हैं। वहाँ 'पटिनिस्सज्जिता' का अर्थ है—त्यागने योग्य (पटिनिस्सज्जितब्बा)। උපාලිපුච්ඡාකථා उपालि के प्रश्नों की कथा। 400. උපාලිපඤ්හෙසුපි වත්ථුවසෙනෙව ධම්මාධම්මකම්මං විභත්තං. තත්ථ ද්වෙ නයා – එකමූලකො ච ද්විමූලකො ච. එකමූලකො උත්තානොයෙව. ද්විමූලකෙ යථා සතිවිනයො අමූළ්හවිනයෙන සද්ධිං එකා පුච්ඡා කතා, එවං අමූළ්හවිනයාදයොපි තස්සපාපිය්යසිකාදීහි. අවසානෙ පන උපසම්පදාරහං උපසම්පාදෙතීති එකමෙව පදං හොති. පරතො භික්ඛූනම්පි සතිවිනයං ආදිං කත්වා එකෙකෙන සද්ධිං සෙසපදානි යොජෙතබ්බානි. ४००. उपालि के प्रश्नों में भी वस्तु (विषय) के आधार पर ही धर्म-कर्म और अधर्म-कर्म का विभाजन किया गया है। वहाँ दो नय (विधियाँ) हैं—एकमूलक और द्विमूलक। एकमूलक स्पष्ट ही है। द्विमूलक में जैसे स्मृति-विनय (सतिविनय) के साथ अमूढ़-विनय का एक प्रश्न किया गया है, वैसे ही अमूढ़-विनय आदि का तस्सपापिय्यसिका आदि के साथ (प्रश्न किया गया है)। अन्त में 'उपसंपदा के योग्य को उपसंपदा देता है'—यह एक ही पद होता है। आगे भिक्षुओं के संदर्भ में भी स्मृति-विनय को आदि मानकर एक-एक के साथ शेष पदों को जोड़ना चाहिए। තජ්ජනීයකම්මකථා तर्जनीय-कर्म की कथा। 407. ඉධ පන භික්ඛවෙ භික්ඛු භණ්ඩනකාරකොතිආදි ‘‘අධම්මෙනවග්ගං, අධම්මෙනසමග්ගං; ධම්මෙනවග්ගං, ධම්මපතිරූපකෙනවග්ගං, ධම්මපතිරූපකෙනසමග්ග’’න්ති ඉමෙසං වසෙන චක්කං බන්ධිත්වා තජ්ජනීයාදීසු සත්තසු කම්මෙසු පටිපස්සද්ධීසු ච [Pg.430] විපත්තිදස්සනත්ථං වුත්තං. තත්ථ අනපදානොති අපදානවිරහිතො. අපදානං වුච්චති පරිච්ඡෙදො; ආපත්තිපරිච්ඡෙදවිරහිතොති අත්ථො. තතො පරං පටිකුට්ඨකතකම්මප්පභෙදං දස්සෙතුං සායෙව පාළි ‘‘අකතං කම්ම’’න්තිආදීහි සංසන්දිත්වා වුත්තා. තත්ථ න කිඤ්චි පාළිඅනුසාරෙන න සක්කා විදිතුං, තස්මා වණ්ණනං න විත්ථාරයිම්හාති. ४०७. हे भिक्षुओं, 'इध पन भिक्खवे भिक्खु भण्डनकारको' इत्यादि शब्द 'अधर्म से वर्ग (गुटबाजी), अधर्म से समग्र (एकता), धर्म से वर्ग, धर्म-प्रतिरूपक से वर्ग, धर्म-प्रतिरूपक से समग्र'—इनके आधार पर चक्र बनाकर सात प्रकार के तर्जनीय आदि कर्मों और उनकी शांति (पटिपस्सद्धि) में विफलता दिखाने के लिए कहे गए हैं। वहाँ 'अनपदानो' का अर्थ है—मर्यादा रहित (अपदान-विरहित)। 'अपदान' मर्यादा (परिच्छेद) को कहते हैं; अतः इसका अर्थ है—आपत्ति की मर्यादा से रहित। उसके बाद प्रतिषिद्ध कर्म के भेदों को दिखाने के लिए वही पालि 'अकतं कम्मं' इत्यादि के साथ मिलाकर कही गई है। वहाँ पालि के अनुसार ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे समझा न जा सके, इसलिए हमने व्याख्या का विस्तार नहीं किया है। චම්පෙය්යක්ඛන්ධකවණ්ණනා නිට්ඨිතා. चम्पेय्य-खन्धक की व्याख्या समाप्त हुई। 10. කොසම්බකක්ඛන්ධකං १०. कोसम्बक-खन्धक। කොසම්බකවිවාදකථා कोशाम्बी के विवाद की कथा। 451. කොසම්බකක්ඛන්ධකෙ [Pg.431] – තං භික්ඛුං ආපත්තියා අදස්සනෙ උක්ඛිපිංසූති එත්ථ අයමනුපුබ්බිකථා – ද්වෙ කිර භික්ඛූ එකස්මිං ආවාසෙ වසන්ති විනයධරො ච සුත්තන්තිකො ච. තෙසු සුත්තන්තිකො භික්ඛු එකදිවසං වච්චකුටිං පවිට්ඨො ආචමනඋදකාවසෙසං භාජනෙ ඨපෙත්වාව නික්ඛමි. විනයධරො පච්ඡා පවිට්ඨො තං උදකං දිස්වා නික්ඛමිත්වා තං භික්ඛුං පුච්ඡි – ‘‘ආවුසො, තයා ඉදං උදකං ඨපිත’’න්ති? ‘‘ආමාවුසො’’ති. ‘‘කිං ත්වං එත්ථ ආපත්තිභාවං න ජානාසී’’ති? ‘‘ආම, න ජානාමී’’ති. ‘‘හොති, ආවුසො එත්ථ ආපත්තී’’ති? ‘‘සචෙ හොති, දෙසිස්සාමී’’ති. ‘‘සචෙ පන තෙ, ආවුසො, අසඤ්චිච්ච අසතියා කතං, නත්ථි ආපත්තී’’ති. සො තස්සා ආපත්තියා අනාපත්තිදිට්ඨි අහොසි. ४५१. कोसम्बक-खन्धक में—'उस भिक्षु को आपत्ति न देखने के कारण निष्कासित (उत्क्षिप्त) कर दिया'—यहाँ यह अनुक्रमिक कथा है: सुना जाता है कि एक आवास में दो भिक्षु रहते थे—एक विनयधर और एक सुत्तन्तिक। उनमें से सुत्तन्तिक भिक्षु एक दिन शौचालय (वच्चकुटि) गया और आचमन (शौच) के जल का अवशेष पात्र में ही छोड़कर बाहर निकल आया। विनयधर ने बाद में प्रवेश किया और उस जल को देखकर बाहर आकर उस भिक्षु से पूछा—'आयुष्मान्, क्या यह जल आपने रखा है?' उसने कहा—'हाँ, आयुष्मान्।' विनयधर ने पूछा—'क्या आप इसमें आपत्ति होने की बात नहीं जानते?' उसने कहा—'हाँ, मैं नहीं जानता।' विनयधर ने कहा—'आयुष्मान्, इसमें आपत्ति होती है।' उसने कहा—'यदि आपत्ति है, तो मैं देशना (प्रायश्चित) करूँगा।' विनयधर ने कहा—'आयुष्मान्, यदि आपने यह बिना सोचे-समझे और असावधानी से किया है, तो आपत्ति नहीं है।' तब उस भिक्षु की उस आपत्ति के प्रति 'अनापत्ति' (आपत्ति न होने) की दृष्टि हो गई। විනයධරොපි අත්තනො නිස්සිතකානං ‘‘අයං සුත්තන්තිකො ආපත්තිං ආපජ්ජමානොපි න ජානාතී’’ති ආරොචෙසි. තෙ තස්ස නිස්සිතකෙ දිස්වා ‘‘තුම්හාකං උපජ්ඣායො ආපත්තිං ආපජ්ජිත්වාපි ආපත්තිභාවං න ජානාතී’’ති ආහංසු. තෙ ගන්ත්වා අත්තනො උපජ්ඣායස්ස ආරොචෙසුං. සො එවමාහ – ‘‘අයං විනයධරො පුබ්බෙ අනාපත්තී’’ති වත්වා ‘‘ඉදානි ආපත්තී’’ති වදති. මුසාවාදී එසොති. තෙ ගන්ත්වා ‘‘තුම්හාකං උපජ්ඣායො මුසාවාදී’’ති එවං අඤ්ඤමඤ්ඤං කලහං වඩ්ඪයිංසු. තතො විනයධරො ඔකාසං ලභිත්වා තස්ස ආපත්තියා අදස්සනෙ උක්ඛෙපනීයකම්මං අකාසි. තෙන වුත්තං – ‘‘තං භික්ඛුං ආපත්තියා අදස්සනෙ උක්ඛිපිංසූ’’ති. विनयधर ने भी अपने आश्रितों (शिष्यों) से कहा, "यह सुत्तन्तिक (सूत्रों का ज्ञाता) आपत्ति (दोष) करते हुए भी उसे नहीं जानता।" उन्होंने (विनयधर के शिष्यों ने) उसके (सुत्तन्तिक के) आश्रितों को देखकर कहा, "तुम्हारे उपाध्याय आपत्ति में पड़कर भी आपत्ति के भाव को नहीं जानते।" उन्होंने जाकर अपने उपाध्याय को बताया। उसने ऐसा कहा— "यह विनयधर पहले 'अनापत्ति' (दोष नहीं है) कहकर अब 'आपत्ति' (दोष है) कहता है। यह मृषावादी (झूठा) है।" उन्होंने जाकर "तुम्हारा उपाध्याय मृषावादी है" इस प्रकार आपस में कलह को बढ़ाया। तब विनयधर ने अवसर पाकर उस (सुत्तन्तिक) पर आपत्ति को न देखने के कारण उत्क्षेपणीय कर्म (संघ से निष्कासन) किया। इसीलिए कहा गया है— "उस भिक्षु को आपत्ति न देखने के कारण उत्क्षेपित (निष्कासित) कर दिया गया।" 453. භින්නො භික්ඛුසඞ්ඝො භින්නො භික්ඛුසඞ්ඝොති එත්ථ න තාව භින්නො; අපිච ඛො යථා දෙවෙ වුට්ඨෙ ‘‘ඉදානි සස්සං නිප්ඵන්න’’න්ති වුච්චති, අවස්සඤ්හි තං නිප්ඵජ්ජිස්සති, එවමෙව ඉමිනා කාරණෙන ආයතිං අවස්සං භිජ්ජිස්සති, සො ච ඛො කලහවසෙන න සඞ්ඝභෙදවසෙන, තස්මා ‘‘භින්නො’’ති වුත්තං. සම්භමඅත්ථවසෙන චෙත්ථ ආමෙඩිතං වෙදිතබ්බං. ४५३. "भिक्षु संघ भिन्न (विभाजित) हो गया है, भिक्षु संघ भिन्न हो गया है"—यहाँ अभी संघ विभाजित नहीं हुआ है; अपितु जैसे वर्षा होने पर कहा जाता है कि "अब फसल तैयार हो गई है", क्योंकि वह निश्चित रूप से तैयार हो जाएगी, वैसे ही इस कारण से भविष्य में संघ निश्चित रूप से विभाजित हो जाएगा। और वह कलह के कारण विभाजित होगा, न कि संघ-भेद (औपचारिक विभाजन) के कारण, इसलिए "भिन्न" कहा गया है। यहाँ पुनरुक्ति (आमेड़ित) को शीघ्रता या घबराहट के अर्थ में समझना चाहिए। 454. එතමත්ථං [Pg.432] භාසිත්වා උට්ඨායාසනා පක්කාමීති කස්මා එවං භාසිත්වා පක්කාමි? සචෙ හි භගවා උක්ඛෙපකෙ වා ‘‘අකාරණෙ තුම්හෙහි සො භික්ඛු උක්ඛිත්තො’’ති වදෙය්ය, උක්ඛිත්තානුවත්තකෙ වා ‘‘තුම්හෙ ආපත්තිං ආපන්නා’’ති වදෙය්ය, ‘‘එතෙසං භගවා පක්ඛො, එතෙසං භගවා පක්ඛො’’ති වත්වා ආඝාතං බන්ධෙය්යුං, තස්මා තන්තිමෙව ඨපෙත්වා එතමත්ථං භාසිත්වා උට්ඨායාසනා පක්කාමි. ४५४. "इस अर्थ को कहकर आसन से उठकर चले गए"—ऐसा कहकर वे क्यों चले गए? यदि भगवान उत्क्षेपक (निष्कासित करने वाले) भिक्षुओं से कहते कि "तुमने बिना कारण उस भिक्षु को निष्कासित किया है", या उत्क्षेपित के अनुयायियों से कहते कि "तुम आपत्ति में पड़ गए हो", तो वे "भगवान इनका पक्ष ले रहे हैं, भगवान इनका पक्ष ले रहे हैं" ऐसा कहकर द्वेष पाल लेते। इसलिए केवल पालि-मर्यादा (तन्ति) को स्थापित कर और इस अर्थ को कहकर वे आसन से उठकर चले गए। 455. අත්තනා වා අත්තානන්ති එත්ථ යො සඞ්ඝෙන උක්ඛෙපනීයකතානං අධම්මවාදීනං පක්ඛෙ නිසින්නො ‘‘තුම්හෙ කිං භණථා’’ති තෙසඤ්ච ඉතරෙසඤ්ච ලද්ධිං සුත්වා ‘‘ඉමෙ අධම්මවාදිනො, ඉතරෙ ධම්මවාදිනො’’ති චිත්තං උප්පාදෙති, අයං තෙසං මජ්ඣෙ නිසින්නොව තෙසං නානාසංවාසකො හොති, කම්මං කොපෙති, ඉතරෙසම්පි හත්ථපාසං අනාගතත්තා කොපෙති. එවං අත්තනා වා අත්තානං නානාසංවාසකං කරොති. සමානසංවාසකන්ති එත්ථාපි යො අධම්මවාදීනං පක්ඛෙ නිසින්නො ‘‘අධම්මවාදිනො ඉමෙ, ඉතරෙ ධම්මවාදිනො’’ති තෙසං මජ්ඣං පවිසති, යත්ථ වා තත්ථ වා පන පක්ඛෙ නිසින්නො ‘‘ඉමෙ ධම්මවාදිනො’’ති ගණ්හාති, අයං අත්තනා වා අත්තානං සමානසංවාසකං කරොතීති වෙදිතබ්බො. ४५५. "स्वयं के द्वारा स्वयं को" यहाँ जो भिक्षु संघ द्वारा उत्क्षेपणीय कर्म किए गए अधर्मवादियों के पक्ष में बैठा हुआ "आप क्या कह रहे हैं?" ऐसा पूछकर, उनके और दूसरों के मत को सुनकर "ये अधर्मवादी हैं, दूसरे धर्मवादी हैं" ऐसा विचार उत्पन्न करता है, वह उनके बीच बैठा हुआ ही उनसे 'नाना-संवासक' (अलग संवास वाला) हो जाता है, वह कर्म को बाधित करता है, और दूसरों के भी हस्तपाश (निकट) न आने के कारण कर्म को बाधित करता है। इस प्रकार वह स्वयं ही स्वयं को नाना-संवासक बना लेता है। "समान-संवासक" के विषय में भी—जो अधर्मवादियों के पक्ष में बैठा हुआ "ये अधर्मवादी हैं, दूसरे धर्मवादी हैं" ऐसा जानकर उनके (धर्मवादियों के) बीच चला जाता है, अथवा किसी भी पक्ष में बैठा हुआ "ये धर्मवादी हैं" ऐसा स्वीकार करता है, उसे स्वयं ही स्वयं को समान-संवासक बनाने वाला समझना चाहिए। 456. කායකම්මං වචීකම්මන්ති එත්ථ කායෙන පහරන්තා කායකම්මං උපදංසෙන්ති, ඵරුසං වදන්තා වචීකම්මං උපදංසෙන්තීති වෙදිතබ්බා. හත්ථපරාමාසං කරොන්තීති කොධවසෙන හත්ථෙහි අඤ්ඤමඤ්ඤං පරාමසනං කරොන්ති. අධම්මියායමානෙති අධම්මියානි කිච්චානි කුරුමානෙ. අසම්මොදිකාවත්තමානායාති අසම්මොදිකාය වත්තමානාය. අයමෙව වා පාඨො. සම්මොදනකථාය අවත්තමානායාති අත්ථො. එත්තාවතා න අඤ්ඤමඤ්ඤන්ති එත්ථ ද්වෙ පන්තියො කත්වා උපචාරං මුඤ්චිත්වා නිසීදිතබ්බං, ධම්මියායමානෙ පන සම්මොදිකාය වත්තමානාය ආසනන්තරිකාය නිසීදිතබ්බං, එකෙකං ආසනං අන්තරං කත්වා නිසීදිතබ්බං. ४५६. "काय-कर्म और वची-कर्म"—यहाँ शरीर से प्रहार करने वाले काय-कर्म प्रदर्शित करते हैं, और कठोर वचन बोलने वाले वची-कर्म प्रदर्शित करते हैं, ऐसा समझना चाहिए। "हाथों से स्पर्श करते हैं"—क्रोध के कारण हाथों से एक-दूसरे को छूते (पकड़ते) हैं। "अधार्मिक कार्य करते हुए"—अधार्मिक कृत्यों को करते समय। "असंमोदिका (अप्रिय वाणी) के प्रवर्तमान होने पर"—जब प्रसन्नता न देने वाली वाणी बोली जा रही हो। अथवा यही पाठ है। इसका अर्थ है—"संमोदन-कथा (प्रिय चर्चा) के न होने पर"। "इतने मात्र से एक-दूसरे के साथ नहीं"—यहाँ दो पंक्तियाँ बनाकर और उपचार (दूरी) छोड़कर बैठना चाहिए। किन्तु धार्मिक कार्य करते समय और प्रिय वाणी के प्रवर्तमान होने पर, आसनों के बीच एक-एक आसन का अंतर रखकर बैठना चाहिए। 457-458. මා භණ්ඩනන්තිආදීසු ‘‘අකත්ථා’’ති පාඨසෙසං ගහෙත්වා ‘‘මා භණ්ඩනං අකත්ථා’’ති එවමත්ථො දට්ඨබ්බො. අධම්මවාදීති උක්ඛිත්තානුවත්තකෙසු අඤ්ඤතරො. අයං පන භික්ඛු භගවතො අත්ථකාමො, අයං කිරස්ස අධිප්පායො [Pg.433] ‘‘ඉමෙ භික්ඛූ කොධාභිභූතා සත්ථු වචනං න ගණ්හන්ති, මා භගවා එතෙ ඔවදන්තො කිලමිත්ථා’’ති තස්මා එවමාහ. භගවා පන ‘‘පච්ඡාපි සඤ්ඤං ලභිත්වා ඔරමිස්සන්තී’’ති තෙසං අනුකම්පාය අතීතවත්ථුං ආහරිත්වා කථෙසි. තත්ථ අනත්ථතොති අනත්ථො අතො; එතස්මා මෙ පුරිසා අනත්ථොති වුත්තං හොති. අථ වා අනත්ථතොති අනත්ථදො. සෙසං පාකටමෙව. ४५७-४५८. "मा भण्डनं" (कलह मत करो) आदि में "अकत्था" (किया) इस शेष पाठ को लेकर "कलह मत करो" ऐसा अर्थ देखना चाहिए। "अधर्मवादी"—उत्क्षेपित के अनुयायियों में से एक। यह भिक्षु भगवान का हित चाहने वाला है, उसका अभिप्राय यह था— "ये भिक्षु क्रोध से अभिभूत हैं और शास्ता के वचनों को ग्रहण नहीं कर रहे हैं, भगवान इन्हें उपदेश देते हुए थके नहीं (कष्ट न पाएँ)", इसलिए उसने ऐसा कहा। किन्तु भगवान ने "बाद में भी होश आने पर ये रुक जाएँगे" ऐसा सोचकर, उन पर अनुकम्पा के कारण अतीत की कथा (जातक) सुनाई। वहाँ "अनत्थतो" का अर्थ है—इस (पुरुष) से अनर्थ (हानि); "इस पुरुष से मुझे अनर्थ होगा" यह कहा गया है। अथवा "अनत्थतो" का अर्थ है—अनर्थ देने वाला। शेष स्पष्ट ही है। 464. පුථුසද්දොතිආදිගාථාසු පන පුථු මහා සද්දො අස්සාති පුථුසද්දො. සමජනොති සමානො එකසදිසො ජනො; සබ්බො චායං භණ්ඩනකාරකොජනො සමන්තතො සද්දනිච්ඡාරණෙන පුථුසද්දො චෙව සදිසො චාති වුත්තං හොති. න බාලො කොචි මඤ්ඤථාති තත්ථ කොචි එකොපි ‘‘අහං බාලො’’ති න මඤ්ඤිත්ථ; සබ්බෙපි පණ්ඩිතමානිනොයෙව. නාඤ්ඤං භිය්යො අමඤ්ඤරුන්ති කොචි එකොපි ‘‘අහං බාලො’’ති ච න මඤ්ඤිත්ථ; භිය්යො ච සඞ්ඝස්මිං භිජ්ජමානෙ අඤ්ඤම්පි එකං ‘‘මය්හං කාරණා සඞ්ඝො භිජ්ජතී’’ති ඉදං කාරණං න මඤ්ඤිත්ථාති අත්ථො. ४६४. "पुथुसद्दो" आदि गाथाओं में, जिसका शब्द (शोर) महान (पुथु) हो, वह 'पुथुसद्दो' है। "समजनो"—कलह करने के स्वभाव में एक समान लोग; यह सभी कलहकारी लोग चारों ओर से शोर मचाने के कारण 'पुथुसद्दो' (बड़े शोर वाले) और 'सदिसो' (एक समान) हैं, ऐसा कहा गया है। "न बालो कोचि मञ्ञथ"—वहाँ कोई एक भी "मैं मूर्ख हूँ" ऐसा नहीं मानता था; सभी स्वयं को पण्डित ही मानते थे। "नाञ्ञं भिय्यो अमञ्ञरुं"—कोई एक भी "मैं मूर्ख हूँ" ऐसा नहीं मानता था, और इससे भी बढ़कर, संघ के विभाजित होते समय "मेरे कारण संघ टूट रहा है" इस कारण को भी नहीं जानते थे, यह अर्थ है। පරිමුට්ඨාති පරිමුට්ඨස්සතිනො. වාචාගොචරභාණිනොති රාකාරස්ස රස්සාදෙසො කතො, වාචාගොචරා න සතිපට්ඨානාදිගොචරා. භාණිනො ච කථං භාණිනො? යාවිච්ඡන්ති මුඛායාමං යාව මුඛං පසාරෙතුං ඉච්ඡන්ති, තාව පසාරෙත්වා භාණිනො, එකොපි සඞ්ඝගාරවෙන මුඛසඞ්කොචං න කරොතීති අත්ථො. යෙන නීතාති යෙන කලහෙන ඉමං නිල්ලජ්ජභාවං නීතා. න තං විදූති න තං ජානන්ති, ‘‘එවං සාදීනවො අය’’න්ති. "परिमुट्ठा"—जिनकी स्मृति (होश) खो गई है। "वाचागोचरभाणिनो"—यहाँ 'रा' अक्षर को ह्रस्व किया गया है; जिनकी चर्या (गोचर) केवल वाणी है, स्मृति-प्रस्थान (सतिपट्ठान) आदि नहीं। और वे कैसे बोलने वाले हैं? "जितना मुँह फैलाना चाहते हैं"—जितना वे अपना मुँह खोलना चाहते हैं, उतना खोलकर बोलने वाले हैं; संघ के गौरव के कारण कोई एक भी अपने मुख को सिकोड़ता (संयम करता) नहीं है, यह अर्थ है। "येन नीता"—जिस कलह के द्वारा इस निर्लज्ज अवस्था तक लाए गए हैं। "न तं विदू"—वे उसे नहीं जानते कि "यह (कलह) इस प्रकार दोषपूर्ण है।" යෙ ච තං උපනය්හන්තීති තං ‘‘අක්කොච්ඡි මං, අවධි ම’’න්තිආදිකං ආකාරං යෙ ච උපනය්හන්ති. සනන්තනොති පොරාණො. "ये च तं उपनय्हन्ति"—जो उस "उसने मुझे गाली दी, उसने मुझे मारा" आदि क्रोध के भाव को मन में बाँधकर रखते हैं। "सनन्तनो"—प्राचीन (सनातन) या पुराना नियम। පරෙති පණ්ඩිතෙ ඨපෙත්වා තතො අඤ්ඤෙ භණ්ඩනකාරකා පරෙ නාම. තෙ එත්ථ සඞ්ඝමජ්ඣෙ කලහං කරොන්තා ‘‘මයං යමාමසෙ උපයමාම; සතතං සමිතං මච්චුසන්තිකං ගච්ඡාමා’’ති න ජානන්ති. යෙ ච තත්ථ විජානන්තීති යෙ තත්ථ පණ්ඩිතා ‘‘මයං මච්චුසමීපං ගච්ඡාමා’’ති විජානන්ති. තතො [Pg.434] සම්මන්ති මෙධගාති එවඤ්හි තෙ ජානන්තා යොනිසොමනසිකාරං උප්පාදෙත්වා මෙධගානං කලහානං වූපසමාය පටිපජ්ජන්ති. पारे (pare) का अर्थ है पंडितों को छोड़कर अन्य झगड़ा करने वाले लोग। वे इस संघ के मध्य कलह करते हुए यह नहीं जानते कि 'हम मृत्यु के समीप जा रहे हैं; हम निरंतर मृत्यु के पास जा रहे हैं।' जो वहाँ जानते हैं, वे वहाँ के पंडित हैं जो जानते हैं कि 'हम मृत्यु के समीप जा रहे हैं।' उससे झगड़े शांत हो जाते हैं, क्योंकि इस प्रकार जानते हुए वे उचित मनसिकार उत्पन्न कर झगड़ों की शांति के लिए प्रतिपन्न होते हैं। අට්ඨිච්ඡින්නාති අයං ගාථා බ්රහ්මදත්තඤ්ච දීඝාවුකුමාරඤ්ච සන්ධාය වුත්තා. තෙසම්පි හොති සඞ්ගති, කස්මා තුම්හාකං න හොති, යෙසං වො නෙව මාතාපිතූනං අට්ඨීනි ඡින්නානි, න පාණා හතා, න ගවාස්සධනානි හටානීති. 'अट्ठिच्छिन्ना' यह गाथा ब्रह्मदत्त और दीघावु कुमार के संदर्भ में कही गई है। उनकी भी संगति (मेल-मिलाप) हो गई, तो तुम्हारी क्यों नहीं होती, जिनके माता-पिता की न तो हड्डियाँ काटी गईं, न प्राण हरे गए, न गाय-घोड़े और धन छीने गए। සචෙ ලභෙථාතිආදිගාථා පණ්ඩිතසහායස්ස ච බාලසහායස්ස ච වණ්ණාවණ්ණදීපනත්ථං වුත්තා. අභිභුය්ය සබ්බානි පරිස්සයානීති පාකටපරිස්සයෙ ච පටිච්ඡන්නපරිස්සයෙ ච අභිභවිත්වා තෙන සද්ධිං අත්තමනො සතිමා චරෙය්ය. 'सचे लभेथ' आदि गाथा पंडित सहायक और मूर्ख सहायक के गुण-दोषों को दर्शाने के लिए कही गई है। 'सारे संकटों को अभिभूत कर' का अर्थ है प्रकट और प्रच्छन्न (छिपे हुए) संकटों को जीतकर उस पंडित सहायक के साथ प्रसन्नचित्त और स्मृतिमान होकर विचरण करना चाहिए। රාජාව රට්ඨං විජිතන්ති යථා අත්තනො විජිතං රට්ඨං මහාජනකරාජා ච අරින්දමමහාරාජා ච පහාය එකකා චරිංසු; එවං චරෙය්යාති අත්ථො. මාතඞ්ගරඤ්ඤෙව නාගොති මාතඞ්ගො අරඤ්ඤෙ නාගොව. මාතඞ්ගොති හත්ථී වුච්චති; නාගොති මහන්තාධිවචනමෙතං. යථා හි මාතුපොසකො මාතඞ්ගනාගො අරඤ්ඤෙ එකො චරි, න ච පාපානි අකාසි. යථා ච පාලිලෙය්යකො, එවං එකො චරෙ, න ච පාපානි කයිරාති වුත්තං හොති. 'राजा की तरह विजित राष्ट्र को' का अर्थ है जैसे राजा महाजनक और राजा अरिन्दम अपने विजित राष्ट्र को छोड़कर अकेले विचरण करते थे, वैसे ही विचरण करना चाहिए। 'मातंग हाथी की तरह वन में' का अर्थ है मातंग वन में हाथी के समान है। 'मातंग' हाथी को कहते हैं; 'नाग' यह महानता का वाचक है। जैसे अपनी माता का पोषण करने वाला मातंग नाग वन में अकेला विचरता था और पाप नहीं करता था, और जैसे पालिलेय्यक हाथी, वैसे ही अकेले विचरण करना चाहिए और पाप नहीं करना चाहिए, यह कहा गया है। පාලිලෙය්යකගමනකථා पालिलेय्यक जाने की कथा 467. පාලිලෙය්යකෙ විහරති රක්ඛිතවනසණ්ඩෙති පාලිලෙය්යකං උපනිස්සාය රක්ඛිතවනසණ්ඩෙ විහරති. හත්ථිනාගොති මහාහත්ථී. හත්ථිකලභෙහීති හත්ථිපොතකෙහි. හත්ථිච්ඡාපෙහීති ඛීරූපකෙහි දහරපොතකෙහි. ඡින්නග්ගානීති තෙහි පුරතො පුරතො ගච්ඡන්තෙහි ඡින්නග්ගානි ඛායිතාවසෙසානි ඛාණුසදිසානි තිණානි ඛාදති. ඔභග්ගොභග්ගන්ති තෙන හත්ථිනාගෙන උච්චට්ඨානතො භඤ්ජිත්වා භඤ්ජිත්වා පාතිතං. අස්ස සාඛාභඞ්ගන්ති එතස්ස සන්තකං සාඛාභඞ්ගං තෙ ඛාදන්ති. ආවිලානීති තෙහි පඨමතරං ඔතරිත්වා පිවන්තෙහි ආලුලිතානි කද්දමොදකානි පිවති. ඔගාහාති තිත්ථතො. ४६७. 'पालिलेय्यक के रक्षितवनखण्ड में विहार करते हैं' का अर्थ है पालिलेय्यक गाँव के आश्रय में रक्षितवनखण्ड में विहार करते हैं। 'हत्थिनागो' का अर्थ है महाहाथी। 'हत्थिकलभेहि' का अर्थ है हाथी के बच्चों के साथ। 'हत्थिच्छापेहि' का अर्थ है दूध पीने वाले छोटे बच्चों के साथ। 'छिन्नाग्गानि' का अर्थ है उनके द्वारा आगे-आगे चलते हुए काटे गए अग्रभाग वाले, खाकर छोड़े गए खूँटों के समान घास को वह खाता है। 'ओभग्गोभग्गं' का अर्थ है उस हाथी द्वारा ऊँचे स्थान से तोड़-तोड़कर गिराई गई। 'अस्स साखाभङ्गं' का अर्थ है उसकी तोड़ी हुई शाखाओं को वे दूसरे हाथी खा जाते हैं। 'आविलानि' का अर्थ है उनके द्वारा पहले उतरकर पीते समय गंदा किया गया कीचड़युक्त पानी वह पीता है। 'ओगाहा' का अर्थ है घाट से। නාගස්ස නාගෙනාති හත්ථිනාගස්ස බුද්ධනාගෙන. ඊසාදන්තස්සාති රථඊසාසදිසදන්තස්ස. යදෙකො රමතී වනෙති යස්මා බුද්ධනාගො විය අයම්පි හත්ථිනාගො එකො පවිවිත්තො වනෙ රමති; තස්මාස්ස නාගස්ස [Pg.435] නාගෙන චිත්තං සමෙති, එකීභාවරතියා එකසදිසං හොතීති අත්ථො. 'नाग का नाग के साथ' का अर्थ है हस्ति-नाग का बुद्ध-नाग के साथ। 'ईसादन्तस्स' का अर्थ है रथ की धुरी के समान दाँतों वाले का। 'जो वन में अकेला रमता है' का अर्थ है क्योंकि बुद्ध-नाग की तरह यह हस्ति-नाग भी अकेला विविक्त होकर वन में रमता है; इसलिए उस नाग का चित्त बुद्ध-नाग के चित्त के साथ मिलता है, एकाकीपन की रति के कारण एक समान होता है, यह अर्थ है। යථාභිරන්තං විහරිත්වාති එත්ථ තෙමාසං භගවා තත්ථ විහාසීති වෙදිතබ්බො. එත්තාවතා කොසම්බකෙහි කිර උබ්බාළ්හො භගවා තෙමාසං අරඤ්ඤං පවිසිත්වා වසීති සබ්බත්ථ කථා පත්ථටා අහොසි. 'यथाभिरन्तं विहरित्वा' यहाँ यह समझना चाहिए कि भगवान वहाँ तीन महीने तक रहे। इतने समय में 'कोशाम्बी के भिक्षुओं द्वारा सताए जाने पर भगवान तीन महीने तक वन में जाकर रहे' ऐसी चर्चा सब जगह फैल गई। අථ ඛො කොසම්බකා උපාසකාති අථ ඛො ඉමං කථාසල්ලාපං සුත්වා කොසම්බිවාසිනො උපාසකා. 'तब कोशाम्बी के उपासक' का अर्थ है तब इस बातचीत को सुनकर कोशाम्बी निवासी उपासकों ने विचार किया। අට්ඨාරසවත්ථුකථා अठारह वस्तुओं की कथा 468. අධම්මං ධම්මොතිආදීනි අට්ඨාරස භෙදකරවත්ථූනි සඞ්ඝභෙදකක්ඛන්ධකෙ වණ්ණයිස්සාම. ४६८. 'अधर्म को धर्म' आदि अठारह संघ-भेद करने वाली वस्तुओं की व्याख्या हम संघभेदक स्कन्धक में करेंगे। 475. තං උක්ඛිත්තකං භික්ඛුං ඔසාරෙත්වාති තං ගහෙත්වා සීමං ගන්ත්වා ආපත්තිං දෙසාපෙත්වා කම්මවාචාය ඔසාරෙත්වා. තාවදෙව උපොසථොති තංදිවසමෙව උපොසථක්ඛන්ධකෙ වුත්තනයෙනෙව සාමග්ගීඋපොසථො කාතබ්බො. ४७५. 'उस उत्क्षिप्त भिक्षु को पुनः सम्मिलित कर' का अर्थ है उसे लेकर सीमा में जाकर, आपत्ति की देशना कराकर, कर्मवाच्य द्वारा सम्मिलित कर। 'तभी उपोसथ' का अर्थ है उसी दिन उपोसथ स्कन्धक में बताई गई विधि के अनुसार ही सामग्गी-उपोसथ करना चाहिए। 476. අමූලා මූලං ගන්ත්වාති න මූලා මූලං ගන්ත්වා; තං වත්ථුං අවිනිච්ඡිනිත්වාති අත්ථො. අයං වුච්චති උපාලි සඞ්ඝසාමග්ගී අත්ථාපෙතා බ්යඤ්ජනූපෙතාති අත්ථතො අපගතා, ‘‘සඞ්ඝසාමග්ගී’’ති ඉමං පන බ්යඤ්ජනමත්තං උපෙතා. ४७६. 'अमूल से मूल तक जाकर' का अर्थ है मूल से मूल तक न जाकर; उस विषय का निर्णय न करके, यह अर्थ है। 'हे उपालि! यह संघ-सामग्री अर्थ-रहित और व्यंजन-युक्त कही जाती है' का अर्थ है जो अर्थ से दूर है, केवल 'संघ-सामग्री' इस शब्द मात्र से युक्त है। 477. සඞ්ඝස්ස කිච්චෙසූති සඞ්ඝස්ස කරණීයෙසු උප්පන්නෙසු. මන්තනාසූති විනයමන්තනාසු. අත්ථෙසු ජාතෙසූති විනයඅත්ථෙසු උප්පන්නෙසු. විනිච්ඡයෙසූති තෙසංයෙව අත්ථානං විනිච්ඡයෙසු. මහත්ථිකොති මහාඋපකාරො. පග්ගහාරහොති පග්ගණ්හිතුං වුත්තො. ४७७. 'संघ के कृत्यों में' का अर्थ है संघ के करणीय कार्यों के उत्पन्न होने पर। 'मन्त्रणाओं में' का अर्थ है विनय संबंधी मन्त्रणाओं में। 'अर्थों के उत्पन्न होने पर' का अर्थ है विनय के अर्थों के उत्पन्न होने पर। 'विनिर्णयों में' का अर्थ है उन्हीं अर्थों के निर्णयों में। 'महत्थिक' का अर्थ है महान उपकारक। 'पग्गहारहो' का अर्थ है अनुग्रह के योग्य कहा गया है। අනානුවජ්ජො පඨමෙන සීලතොතිආදිම්හියෙව තාව සීලතො න උපවජ්ජො. අවෙක්ඛිතාචාරොති අපෙක්ඛිතාචාරො; ආලොකිතෙ විලොකිතෙ සම්පජානකාරීතිආදිනා නයෙන උපපරික්ඛිතාචාරො. අට්ඨකථාසු පන ‘‘අප්පටිච්ඡන්නාචාරො’’ති වුත්තං. 'शील की दृष्टि से प्रथम अनिन्दनीय' का अर्थ है सबसे पहले शील की दृष्टि से निंदा के योग्य न होना। 'अवेक्खिताचारो' का अर्थ है अपेक्षित आचार वाला; देखने-भालने आदि में सम्प्रजन्य पूर्वक कार्य करने की विधि से परीक्षित आचार वाला। अट्ठकथाओं में तो 'अप्पटिच्छन्नाचारो' (प्रच्छन्न आचार न रखने वाला) कहा गया है। විසය්හාති [Pg.436] අභිභවිත්වා. අනුය්යුතං භණන්ති අනුඤ්ඤාතං අනපගතං භණන්තො. යස්මා හි සො අනුය්යුතං භණති, උසූයාය වා අගතිගමනවසෙන වා කාරණාපගතං න භණති, තස්මා අත්ථං න හාපෙති. උසූයාය පන අගතිගමනවසෙන වා භණන්තො අත්ථං හාපෙති, කාරණං න දෙති, තස්මා සො පරිසගතො ඡම්භති චෙව වෙධති ච. යො ඊදිසො න හොති, අයං ‘‘පග්ගහාරහො’’ති දස්සෙති. 'विसय्ह' का अर्थ है अभिभूत करके। 'अनुय्युतं भणन्ति' का अर्थ है अनुमत और युक्तिसंगत बात कहना। क्योंकि वह अनुमत बात कहता है, ईर्ष्या या पक्षपात के वश में होकर कारण-रहित बात नहीं कहता, इसलिए वह अर्थ की हानि नहीं करता। इसके विपरीत, ईर्ष्या या पक्षपात के वश में होकर बोलने वाला अर्थ की हानि करता है, सही कारण नहीं देता, इसलिए वह परिषद में जाकर स्तंभित हो जाता है और काँपने लगता है। जो ऐसा नहीं होता, वह 'अनुग्रह के योग्य' है, यह दर्शाता है। කිඤ්ච භිය්යො ‘‘තථෙව පඤ්හ’’න්ති ගාථා, තස්සත්ථො – යථා ච අනුය්යුතං භණන්තො අත්ථං න හාපෙති, තථෙව පරිසාය මජ්ඣෙ පඤ්හං පුච්ඡිතො සමානො න චෙව පජ්ඣායති, න ච මඞ්කු හොති. යො හි අත්ථං න ජානාති, සො පජ්ඣායති. යො වත්තුං න සක්කොති, සො මඞ්කු හොති. යො පන අත්ථඤ්ච ජානාති, වත්තුඤ්ච සක්කොති; සො න පජ්ඣායති, න මඞ්කු හොති. කාලාගතන්ති කථෙතබ්බයුත්තකාලෙ ආගතං. බ්යාකරණාරහන්ති පඤ්හස්ස අත්ථානුලොමතාය බ්යාකරණානුච්ඡවිකං. වචොති වදන්තො; එවරූපං වචනං භණන්තොති අත්ථො. රඤ්ජෙතීති තොසෙති. විඤ්ඤූපරිසන්ති විඤ්ඤූනං පරිසං. और अधिक क्या? "तथेव पञ्हं" (उसी प्रकार प्रश्न) यह गाथा है, इसका अर्थ यह है - जैसे अनुमति प्राप्त वचन बोलते हुए वह अर्थ को नहीं खोता है, वैसे ही सभा के बीच में प्रश्न पूछे जाने पर वह न तो चिन्ता करता है और न ही विचलित (मङ्कु) होता है। क्योंकि जो अर्थ को नहीं जानता, वह चिन्ता करता है। जो बोलने में समर्थ नहीं होता, वह विचलित होता है। किन्तु जो अर्थ को भी जानता है और बोलने में भी समर्थ है, वह न तो चिन्ता करता है और न ही विचलित होता है। "कालागतं" का अर्थ है - कहने के योग्य उचित समय पर आया हुआ। "ब्याकरणांरहं" का अर्थ है - प्रश्न के अर्थ के अनुकूल व्याख्या के योग्य। "वचो" का अर्थ है - बोलते हुए; इस प्रकार के वचन को बोलते हुए, यह अर्थ है। "रञ्जेति" का अर्थ है - प्रसन्न करता है। "विञ्ञूपरिसं" का अर्थ है - विद्वानों की सभा। ආචෙරකම්හි ච සකෙති අත්තනො ආචරියවාදෙ. අලං පමෙතුන්ති වීමංසිතුං තං තං කාරණං පඤ්ඤාය තුලයිතුං සමත්ථො. පගුණොති කතපරිචයො ලද්ධාසෙවනො. කථෙතවෙති කථෙතබ්බෙ. විරද්ධිකොවිදොති විරද්ධට්ඨානකුසලො. "आचेरकम्हि च सके" का अर्थ है - अपने आचार्य के वाद (सिद्धान्त) में। "अलं पमेतुं" का अर्थ है - उन-उन कारणों की प्रज्ञा से मीमांसा करने और तुलना करने में समर्थ। "पगुणो" का अर्थ है - किया हुआ परिचय (अभ्यास) वाला, प्राप्त किया हुआ सेवन वाला। "कथेतवे" का अर्थ है - कहने योग्य विषय में। "विरद्धिकोविदो" का अर्थ है - त्रुटिपूर्ण स्थान (गलती) को जानने में कुशल। පච්චත්ථිකා යෙන වජන්තීති අයං ගාථා යාදිසෙ කථෙතබ්බෙ පගුණො, තං දස්සෙතුං වුත්තා. අයඤ්හෙත්ථ අත්ථො – යාදිසෙන කථිතෙන පච්චත්ථිකා ච නිග්ගහං ගච්ඡන්ති, මහාජනො ච සඤ්ඤපනං ගච්ඡති; සඤ්ඤත්තිං අවබොධනං ගච්ඡතීති අත්ථො. යඤ්ච කථෙන්තො සකං ආදායං අත්තනො ආචරියවාදං න හාපෙති, යස්මිං වත්ථුස්මිං අධිකරණං උප්පන්නං, තදනුරූපං අනුපඝාතකරං පඤ්හං බ්යාකරමානො තාදිසෙ කථෙතබ්බෙ පගුණො හොතීති. "पच्चत्थिका येन वजन्ति" यह गाथा यह दिखाने के लिए कही गई है कि किस प्रकार के कहने योग्य विषय में वह निपुण होता है। यहाँ यह अर्थ है - जिस प्रकार के कथन से विरोधी निग्रह (हार) को प्राप्त होते हैं और महाजन समझ (बोध) को प्राप्त होते हैं; 'सञ्ञत्तिं' का अर्थ है अवबोध (ज्ञान) प्राप्त करना। और जिसे कहते हुए वह अपने ग्रहण किए हुए आचार्य के वाद को नहीं छोड़ता, जिस विषय में अधिकरण (विवाद) उत्पन्न हुआ है, उसके अनुरूप और बिना किसी आघात के प्रश्न की व्याख्या करते हुए, वह उस प्रकार के कहने योग्य विषय में निपुण होता है। දූතෙය්යකම්මෙසු අලන්ති අට්ඨහි දූතඞ්ගෙහි සමන්නාගතත්තා සඞ්ඝස්ස දූතෙය්යකම්මෙසු සමත්ථො. සුට්ඨු උග්ගණ්හාතීති සමුග්ගහො. ඉදං වුත්තං හොති [Pg.437] – යථා නාම ආහුනං ආහුතිපිණ්ඩං සමුග්ගණ්හන්ති, එවං පීතිසොමනස්සජාතෙනෙව චෙතසා සඞ්ඝස්ස කිච්චෙසු සමුග්ගහො, සඞ්ඝස්සකිච්චෙසු තස්ස තස්ස කිච්චස්ස පටිග්ගාහකොති අත්ථො. කරං වචොති වචනං කරොන්තො. න තෙන මඤ්ඤතීති තෙන වචනකරණෙන ‘‘අහං කරොමි, සඞ්ඝභාරං නිත්ථරාමී’’ති න මානාතිමානං ජප්පෙති. "दूतेय्यकम्मेसु अलं" का अर्थ है - दूत के आठ अंगों से युक्त होने के कारण संघ के दूत-कार्यों में समर्थ। "सुट्ठु उग्गण्हाति" (भली-भाँति ग्रहण करता है) इसलिए "समुग्गहो" है। यह कहा गया है - जैसे लोग आहुति (दान) और आहुति-पिण्ड को भली-भाँति ग्रहण करते हैं, वैसे ही प्रीति और सौमनस्य से युक्त चित्त से संघ के कार्यों को स्वीकार करना "समुग्गहो" है; संघ के कार्यों में उन-उन कार्यों को स्वीकार करने वाला, यह अर्थ है। "करं वचो" का अर्थ है - वचन का पालन करने वाला। "न तेन मञ्ञति" का अर्थ है - उस वचन-पालन के कारण "मैं करता हूँ, मैं संघ के भार का निर्वहन करता हूँ" इस प्रकार मान और अतिमान को उत्पन्न नहीं करता। ආපජ්ජති යාවතකෙසු වත්ථූසූති යත්තකෙසු වත්ථූසු ආපත්තිං ආපජ්ජමානො ආපජ්ජති. හොති යථා ච වුට්ඨිතීති තස්සා ච ආපත්තියා යථා වුට්ඨානං හොති. එතෙ විභඞ්ගාති යෙසු වත්ථූසු ආපජ්ජති, යථා ච වුට්ඨානං හොති, ඉමෙසං අත්ථානං ජොතකා එතෙ විභඞ්ගා. උභයස්සාති උභයෙ අස්ස. ස්වාගතාති සුට්ඨු ආගතා. ආපත්තිවුට්ඨානපදස්ස කොවිදොති ආපත්තිවුට්ඨානකාරණකුසලො. "आपज्जति यावतकेसु वत्थूसु" का अर्थ है - जितने विषयों (वस्तुओं) के कारण आपत्ति (दोष) में पड़ता हुआ वह आपत्ति को प्राप्त होता है। "होति यथा च वुट्ठिति" का अर्थ है - उस आपत्ति से जिस प्रकार निकलना (वुट्ठान) होता है। "एते विभङ्गा" का अर्थ है - जिन विषयों में आपत्ति होती है और जिस प्रकार उससे निकलना होता है, इन अर्थों को प्रकाशित करने वाले ये विभङ्ग हैं। "उभयस्स" का अर्थ है - ये दोनों उसके (कण्ठस्थ) हों। "स्वागता" का अर्थ है - भली-भाँति आए हुए (कण्ठस्थ)। "आपत्तिवुट्ठानपदस्स कोविदो" का अर्थ है - आपत्ति से निकलने के कारणों में कुशल। යානි චාචරන්ති යානි ච භණ්ඩනකාරණාදීනි ආචරන්තො තජ්ජනීයකම්මාදිවසෙන නිස්සාරණං ගච්ඡති. ඔසාරණං තංවුසිතස්ස ජන්තුනොති තං වත්තං වුසිතස්ස ජන්තුනො, යා ඔසාරණා කාතබ්බා, එතම්පි ජානාති. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානමෙවාති. "यानि चाचरन्ति" का अर्थ है - जिन झगड़े के कारणों आदि का आचरण करते हुए तज्जनीय-कर्म आदि के वश से निष्कासन (निसारण) को प्राप्त होता है। "ओसारणं तंवुसितस्स जन्तुनो" का अर्थ है - उस व्रत का पालन करने वाले व्यक्ति का जो पुनः प्रवेश (ओसारणा) किया जाना चाहिए, इसे भी वह जानता है। शेष सभी स्थानों पर अर्थ स्पष्ट ही है। කොසම්බකක්ඛන්ධකවණ්ණනා නිට්ඨිතා. कोसम्बक खन्धक की व्याख्या समाप्त हुई। සමන්තපාසාදිකාය විනයසංවණ්ණනාය समन्तपासादिका नामक विनय-व्याख्या में। මහාවග්ගවණ්ණනා සමත්තා. महावग्ग की व्याख्या पूर्ण हुई। මහාවග්ග-අට්ඨකථා නිට්ඨිතා. महावग्ग-अट्ठकथा समाप्त हुई। | |||
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| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |