| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| Français | |||
| Canon Pali | Commentaires | Sous-commentaires | Autres |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| Deutsch | |||
| Pali-Kanon | Kommentare | Subkommentare | Sonstige |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांना नमस्कार असो. วินยปิฏเก विनयपिटकामध्ये ปาจิตฺติย-อฏฺฐกถา पाचित्तिय-अट्ठकथा ๕. ปาจิตฺติยกณฺฑํ ५. पाचित्तियकाण्ड ๑. มุสาวาทวคฺโค १. मुसावादवग्ग ๑. มุสาวาทสิกฺขาปทวณฺณนา १. मुसावादसिक्खापदवण्णना เยสํ [Pg.1] นวหิ วคฺเคหิ, สงฺคโห สุปฺปติฏฺฐิโต; ขุทฺทกานํ อยํ ทานิ, เตสํ ภวติ วณฺณนา. ज्या (ब्याण्णव) क्षुल्लक शिक्षापदांचा नऊ वर्गांमध्ये (वग्ग) संग्रह चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित झाला आहे, आता त्या शिक्षापदांचे हे स्पष्टीकरण (अट्ठकथा) होत आहे. ๑. ตตฺถ มุสาวาทวคฺคสฺส ตาว ปฐมสิกฺขาปเท หตฺถโกติ ตสฺส เถรสฺส นามํ. สกฺยานํ ปุตฺโตติ สกฺยปุตฺโต. พุทฺธกาเล กิร สกฺยกุลโต อสีติ ปุริสสหสฺสานิ ปพฺพชึสุ, เตสํ โส อญฺญตโรติ. วาทกฺขิตฺโตติ ‘‘วาทํ กริสฺสามี’’ติ เอวํ ปริวิตกฺกิเตน วาเทน ปรวาทิสนฺติกํ ขิตฺโต ปกฺขิตฺโต ปหิโต เปสิโตติ อตฺโถ. วาทมฺหิ วา สเกน จิตฺเตน ขิตฺโต. ยตฺร ยตฺร วาโท ตตฺร ตตฺเรว สนฺทิสฺสตีติปิ วาทกฺขิตฺโต. อวชานิตฺวา อวชานาตีติ อตฺตโน วาเท กญฺจิ โทสํ สลฺลกฺเขนฺโต ‘‘นายํ มม วาโท’’ติ อวชานิตฺวา ปุน กเถนฺโต กเถนฺโต นิทฺโทสตํ สลฺลกฺเขตฺวา ‘‘มเมว อยํ วาโท’’ติ ปฏิชานาติ. ปฏิชานิตฺวา อวชานาตีติ กิสฺมิญฺจิเทว วจเน อานิสํสํ สลฺลกฺเขนฺโต ‘‘อยํ มม วาโท’’ติ ปฏิชานิตฺวา ปุน กเถนฺโต กเถนฺโต ตตฺถ โทสํ สลฺลกฺเขตฺวา [Pg.2] ‘‘นายํ มม วาโท’’ติ อวชานาติ. อญฺเญนญฺญํ ปฏิจรตีติ อญฺเญน การเณน อญฺญํ การณํ ปฏิจรติ ปฏิจฺฉาเทติ อชฺโฌตฺถรติ, ‘‘รูปํ อนิจฺจํ ชานิตพฺพโต’’ติ วตฺวา ปุน ‘‘ชาติธมฺมโต’’ติอาทีนิ วทติ. กุรุนฺทิยํ ปน ‘‘เอตสฺส ปฏิจฺฉาทนเหตุํ อญฺญํ พหุํ กเถตี’’ติ วุตฺตํ. ตตฺรายํ อธิปฺปาโย – ยํ ตํ ปฏิชานนญฺจ อวชานนญฺจ, ตสฺส ปฏิจฺฉาทนตฺถํ ‘‘โก อาห, กึ อาห, กิสฺมึ อาหา’’ติ เอวมาทิ พหุํ ภาสตีติ. ปุน มหาอฏฺฐกถายํ ‘‘อวชานิตฺวา ปฏิชานนฺโต ปฏิชานิตฺวา อวชานนฺโต เอว จ อญฺเญนญฺญํ ปฏิจรตี’’ติ วุตฺตํ. สมฺปชานมุสา ภาสตีติ ชานนฺโต มุสา ภาสติ. สงฺเกตํ กตฺวา วิสํวาเทตีติ ปุเรภตฺตาทีสุ ‘‘อสุกสฺมึ นาม กาเล อสุกสฺมึ นาม ปเทเส วาโท โหตู’’ติ สงฺเกตํ กตฺวา สงฺเกตโต ปุเร วา ปจฺฉา วา คนฺตฺวา ‘‘ปสฺสถ โภ, ติตฺถิยา น อาคตา ปราชิตา’’ติ ปกฺกมติ. १. त्या नऊ वर्गांपैकी, मुसावादवग्गच्या पहिल्या शिक्षापदात 'हत्थक' हे त्या थेरांचे नाव आहे. शाक्यांचे पुत्र म्हणून 'सक्यपुत्त' (शाक्यपुत्र). असे म्हटले जाते की, बुद्धकाळात शाक्य कुळातून ऐंशी हजार पुरुषांनी प्रव्रज्या घेतली होती, त्यापैकी ते (हत्थक थेर) एक होते. 'वादक्खित्त' म्हणजे "मी वाद (चर्चा) करेन" अशा विचाराने परवाद्यांच्या (इतर मतप्रणालीच्या लोकांच्या) जवळ पाठवलेला, प्रेषित केलेला असा अर्थ आहे. किंवा वादामध्ये स्वतःच्या मनाने स्वतःला झोकून देणारा. जेथे जेथे वाद (चर्चा) होत असे, तेथे तेथेच ते दिसत असत, म्हणूनही त्यांना 'वादक्खित्त' म्हटले जाते. 'नाकारून स्वीकारणे' म्हणजे आपल्या वादामध्ये (मतामध्ये) काही दोष पाहून "हा माझा वाद (मत) नाही" असे नाकारून, पुन्हा बोलता बोलता दोषरहितता पाहून "हा माझाच वाद आहे" असे स्वीकारणे (मान्य करणे). 'स्वीकारून नाकारणे' म्हणजे एखाद्या वचनात (भाषणामध्ये) फायदा पाहून "हा माझा वाद आहे" असे स्वीकारून, पुन्हा बोलता बोलता त्यात दोष पाहून "हा माझा वाद नाही" असे नाकारणे. 'एका गोष्टीने दुसरी गोष्ट झाकणे' (अञ्ञेनञ्ञं पटिचरति) म्हणजे एका कारणाने दुसरे कारण लपवणे, झाकणे किंवा आच्छादित करणे; जसे की "रूप हे जाणण्यायोग्य असल्यामुळे अनित्य आहे" असे म्हणून पुन्हा "ते जन्म घेण्याच्या स्वभावाचे असल्यामुळे" इत्यादी बोलणे. परंतु कुरुन्दी अट्ठकथेमध्ये "हे लपवण्यासाठी तो इतर अनेक गोष्टी बोलतो" असे म्हटले आहे. तेथे हा अभिप्राय आहे - जे ते स्वीकारणे आणि नाकारणे आहे, ते लपवण्यासाठी "कोणी म्हटले? काय म्हटले? कशात म्हटले?" इत्यादी अनेक गोष्टी तो बोलतो. पुन्हा महाअट्ठकथेमध्ये "नाकारून स्वीकारणारा आणि स्वीकारून नाकारणाराच एका गोष्टीने दुसरी गोष्ट झाकतो (अञ्ञेनञ्ञं पटिचरति)" असे म्हटले आहे. 'संपजानमुसा भासति' (जाणूनबुजून असत्य बोलणे) म्हणजे माहीत असूनही असत्य बोलणे. 'संकेत (वेळ व जागा ठरवून) करून फसवणे' म्हणजे भोजनापूर्वी इत्यादी वेळी "अमुक एका वेळी, अमुक एका ठिकाणी वाद (चर्चा) व्हावी" असा संकेत (नियम) करून, त्या संकेताच्या आधी किंवा नंतर जाऊन "हे पहा मित्रांनो, तीर्थिक आले नाहीत, ते पराभूत झाले" असे म्हणून निघून जाणे. ๒. สมฺปชานมุสาวาเทติ ชานิตฺวา ชานนฺตสฺส จ มุสา ภณเน. २. 'संपजानमुसावाद' (जाणूनबुजून असत्य बोलणे) म्हणजे (खोटे बोलण्यापूर्वी) "मी खोटे बोलणार आहे" हे जाणून आणि (खोटे बोलत असताना) "मी खोटे बोलत आहे" हे जाणत असताना असत्य बोलणे. ๓. วิสํวาทนปุเรกฺขารสฺสาติ วิสํวาทนจิตฺตํ ปุรโต กตฺวา วทนฺตสฺส. วาจาติ มิจฺฉาวาจาปริยาปนฺนวจนสมุฏฺฐาปิกา เจตนา. คิราติ ตาย เจตนาย สมุฏฺฐาปิตสทฺทํ ทสฺเสติ. พฺยปฺปโถติ วจนปโถ; วาจาเยว หิ อญฺเญสมฺปิ ทิฏฺฐานุคติมาปชฺชนฺตานํ ปถภูตโต พฺยปฺปโถติ วุจฺจติ. วจีเภโทติ วจีสญฺญิตาย วาจาย เภโท; ปเภทคตา วาจา เอว เอวํ วุจฺจติ. วาจสิกา วิญฺญตฺตีติ วจีวิญฺญตฺติ. เอวํ ปฐมปเทน สุทฺธเจตนา, มชฺเฌ ตีหิ ตํสมุฏฺฐาปิตสทฺทสหิตา เจตนา, อนฺเต เอเกน วิญฺญตฺติสหิตา เจตนา ‘‘กถิตา’’ติ เวทิตพฺพา. อนริยโวหาราติ อนริยานํ พาลปุถุชฺชนานํ โวหารา. ३. 'विसंवादनपुरेक्खारस्स' म्हणजे फसवणुकीचे चित्त पुढे ठेवून (मनात ठेवून) बोलणाऱ्याचे. 'वाचा' म्हणजे मिथ्या वाचेमध्ये समाविष्ट असणाऱ्या वचनाला उत्पन्न करणारी चेतना. 'गिरा' या शब्दाने त्या चेतनेद्वारे उत्पन्न झालेला शब्द (आवाज) दर्शवला जातो. 'ब्यप्पथ' म्हणजे वचनपथ (वाणीचा मार्ग); कारण इतरांच्याही अनुकरणाचा मार्ग बनल्यामुळे वाणीलाच 'ब्यप्पथ' असे म्हटले जाते. 'वचीभेद' म्हणजे 'वची' संज्ञेच्या वाणीचा भेद (शब्दांचे वेगळेपण); विविध रूपांत प्रकट झालेल्या वाणीलाच 'वचीभेद' असे म्हटले जाते. 'वाचसिका विञ्ञत्ति' म्हणजे वचीविज्ञप्ती (वाणीद्वारे प्रकट करणे). अशा प्रकारे, पहिल्या पदाने केवळ शुद्ध चेतना, मधल्या तीन पदांनी त्या चेतनेद्वारे उत्पन्न झालेल्या शब्दासह असणारी चेतना, आणि शेवटी एका पदाने विज्ञप्तीसह असणारी चेतना सांगितली आहे, असे समजावे. 'अनरियवोहार' म्हणजे अनर्यांचे (आर्य नसलेल्यांचे) म्हणजेच अज्ञानी पृथग्जनांचे (बालपुथुज्जनांचे) व्यवहार (बोलणे). เอวํ สมฺปชานมุสาวาทํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ อนฺเต วุตฺตานํ สมฺปชานมุสาวาทสงฺขาตานํ อนริยโวหารานํ ลกฺขณํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อทิฏฺฐํ ทิฏฺฐํ เม’’ติอาทิมาห. ตตฺถ อทิฏฺฐํ ทิฏฺฐํ เมติ เอวํ วทโต วจนํ ตํสมุฏฺฐาปิกา วา เจตนา เอโก อนริยโวหาโรติ อิมินา นเยน อตฺโถ เวทิตพฺโพ. อปิเจตฺถ จกฺขุวเสน อคฺคหิตารมฺมณํ อทิฏฺฐํ, โสตวเสน อคฺคหิตํ อสุตํ, ฆานาทิวเสน มุนิตฺวา ตีหิ อินฺทฺริเยหิ เอกาพทฺธํ วิย กตฺวา ปตฺวา อคฺคหิตํ อมุตํ, อญฺญตฺร ปญฺจหิ อินฺทฺริเยหิ สุทฺเธน [Pg.3] วิญฺญาเณเนว อคฺคหิตํ อวิญฺญาตนฺติ เวทิตพฺพํ. ปาฬิยํ ปน ‘‘อทิฏฺฐํ นาม น จกฺขุนา ทิฏฺฐ’’นฺติ เอวํ โอฬาริเกเนว นเยน เทสนา กตาติ. ทิฏฺฐาทีสุ จ อตฺตนาปิ ปเรนปิ ทิฏฺฐํ ทิฏฺฐเมว. เอวํ สุตมุตวิญฺญาตานีติ อยเมโก ปริยาโย. อปโร นโย ยํ อตฺตนา ทิฏฺฐํ ทิฏฺฐเมว ตํ. เอส นโย สุตาทีสุ. ยํ ปน ปเรน ทิฏฺฐํ, ตํ อตฺตนา สุตฏฺฐาเน ติฏฺฐติ. เอวํ มุตาทีนิปิ. अशा प्रकारे जाणूनबुजून असत्य बोलणे (संपजानमुसावाद) दाखवून, आता शेवटी सांगितलेल्या जाणूनबुजून असत्य बोलणे रूपी अनर्य व्यवहारांची लक्षणे दाखवण्यासाठी "अदिट्ठं दिट्ठं मे" (न पाहिलेले मी पाहिले आहे) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे, "न पाहिलेले मी पाहिले आहे" असे बोलणाऱ्याचे वचन किंवा ते वचन उत्पन्न करणारी चेतना हा एक 'अनर्य व्यवहार' आहे, या पद्धतीने अर्थ समजून घ्यावा. शिवाय, येथे डोळ्यांद्वारे ग्रहण न केलेले आलंबन (विषय) हे 'अदिट्ठ' (न पाहिलेले) आहे; कानांद्वारे ग्रहण न केलेले 'असुत' (न ऐकलेले) आहे; नाक इत्यादींद्वारे ग्रहण करून, three इंद्रियांनी जणू काही एकत्र बांधल्यासारखे करून, जवळ येऊनही ग्रहण न केलेले 'अमुत' (अनुभव न घेतलेले) आहे; आणि पाच इंद्रियांशिवाय केवळ शुद्ध विज्ञानानेच ग्रहण न केलेले 'अविञ्ञात' (न समजलेले) आहे, असे समजावे. परंतु पाळीमध्ये "अदिट्ठ म्हणजे डोळ्यांनी न पाहिलेले" अशा स्पष्ट (स्थूल) पद्धतीनेच उपदेश केला आहे, असे समजावे. आणि पाहिलेल्या इत्यादींमध्ये स्वतः किंवा दुसऱ्याने पाहिलेले हे 'पाहिलेलेच' (दिट्ठ) असते. याचप्रमाणे ऐकलेले, अनुभवलेले आणि समजलेले देखील समजावे, हा एक पर्याय (दृष्टिकोन) आहे. दुसरा मार्ग असा आहे की, जे स्वतः पाहिले आहे ते 'पाहिलेलेच' आहे. हाच नियम ऐकलेले इत्यादींच्या बाबतीतही लागू होतो. परंतु जे दुसऱ्याने पाहिले आहे, ते स्वतःसाठी ऐकलेल्याच्या स्थानी असते. याचप्रमाणे अनुभवलेले इत्यादींच्या बाबतीतही समजावे. ๔. อิทานิ เตสํ อนริยโวหารานํ วเสน อาปตฺตึ อาโรเปตฺวา ทสฺเสนฺโต ‘‘ตีหากาเรหี’’ติอาทิมาห. ตสฺสตฺโถ ‘‘ตีหิ อากาเรหิ ปฐมํ ฌานํ สมาปชฺชินฺติ สมฺปชานมุสา ภณนฺตสฺส อาปตฺติ ปาราชิกสฺสา’’ติ เอวมาทิจตุตฺถปาราชิกปาฬิวณฺณนายํ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. เกวลญฺหิ ตตฺถ ‘‘ปฐมํ ฌานํ สมาปชฺชิ’’นฺติ อิธ ‘‘อทิฏฺฐํ ทิฏฺฐํ เม’’ติ, ตตฺถ จ ‘‘อาปตฺติ ปาราชิกสฺสา’’ติ ‘‘อิธ อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสา’’ติ เอวํ วตฺถุมตฺเต อาปตฺติมตฺเต จ วิเสโส, เสสํ เอกลกฺขณเมวาติ. ४. आता त्या अनर्य व्यवहारांच्या आधारे आपत्ती (दोष/गुन्हा) लागू करून दाखवण्यासाठी "तीहाकारेहि" (तीन प्रकारांनी) इत्यादी म्हटले आहे. त्याचा अर्थ "तीन प्रकारांनी 'मी पहिल्या ध्यानाला प्राप्त झालो आहे' असे जाणूनबुजून असत्य बोलणाऱ्याला पाराजिक आपत्ती होते" अशा प्रकारे चौथ्या पाराजिक पाळीच्या स्पष्टीकरणात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा. केवळ फरक एवढाच आहे की, तेथे "पहिल्या ध्यानाला प्राप्त झालो" असे आहे, तर येथे "न पाहिलेले मी पाहिले आहे" असे आहे; आणि तेथे "पाराजिक आपत्ती होते" असे आहे, तर येथे "पाचित्तिय आपत्ती होते" असे आहे. अशा प्रकारे केवळ वस्तूमध्ये (विषयात) आणि आपत्तीमध्येच फरक आहे, उर्वरित सर्व नियम समान लक्षणांचेच आहेत, असे समजावे. ๙. ตีหากาเรหิ ทิฏฺเฐ เวมติโกติอาทีนมฺปิ อตฺโถ ‘‘ทิฏฺฐสฺส โหติ ปาราชิกํ ธมฺมํ อชฺฌาปชฺชนฺโต ทิฏฺเฐ เวมติโก’’ติ เอวมาทิทุฏฺฐโทสปาฬิวณฺณนายํ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. ปาฬิมตฺตเมว หิ เอตฺถ วิเสโส, อตฺเถ ปน สเถรวาเท กิญฺจิ นานากรณํ นตฺถิ. ९. "तीन प्रकारांनी पाहिलेल्या गोष्टीबद्दल शंका असणारा" इत्यादींचा अर्थ देखील "पाहिलेल्या गोष्टीबद्दल पाराजिक धर्माचा भंग करताना पाहिलेल्या गोष्टीबद्दल शंका असणारा" अशा प्रकारे दुट्ठदोस (दुष्टदोष) पाळीच्या स्पष्टीकरणात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा. येथे केवळ पाळीमध्येच (शब्दांमध्येच) फरक आहे, परंतु थेरवादासह असणाऱ्या अर्थामध्ये कोणताही फरक नाही. ๑๑. สหสา ภณตีติ อวีมํสิตฺวา อนุปธาเรตฺวา วา เวเคน ทิฏฺฐมฺปิ ‘‘อทิฏฺฐํ เม’’ติ ภณติ. อญฺญํ ภณิสฺสามีติ อญฺญํ ภณตีติ มนฺทตฺตา ชฬตฺตา ปกฺขลนฺโต ‘‘จีวร’’นฺติ วตฺตพฺเพ ‘‘จีร’’นฺติ อาทึ ภณติ. โย ปน สามเณเรน ‘‘อปิ ภนฺเต มยฺหํ อุปชฺฌายํ ปสฺสิตฺถา’’ติ วุตฺโต เกฬึ กุรุมาโน ‘‘ตว อุปชฺฌาโย ทารุสกฏํ โยเชตฺวา คโต ภวิสฺสตี’’ติ วา สิงฺคาลสทฺทํ สุตฺวา ‘‘กสฺสายํ ภนฺเต สทฺโท’’ติ วุตฺโต ‘‘มาตุยา เต ยาเนน คจฺฉนฺติยา กทฺทเม ลคฺคจกฺกํ อุทฺธรนฺตานํ อยํ สทฺโท’’ติ วา เอวํ เนว ทวา น รวา อญฺญํ ภณติ, โส อาปตฺตึ อาปชฺชติเยว. อญฺญา ปูรณกถา นาม โหติ, เอโก คาเม โถกํ เตลํ ลภิตฺวา วิหารํ อาคโต สามเณรํ ภณติ – ‘‘ตฺวํ อชฺช กุหึ คโต, คาโม เอกเตโล อโหสี’’ติ วา ปจฺฉิกาย ฐปิตํ ปูวขณฺฑํ ลภิตฺวา [Pg.4] ‘‘อชฺช คาเม ปจฺฉิกาหิ ปูเว จาเรสุ’’นฺติ วา, อยํ มุสาวาโทว โหติ. เสสํ อุตฺตานเมวาติ. ११. सहसा बोलणे म्हणजे विचार न करता किंवा न तपासता घाईघाईने, पाहिलेली गोष्ट देखील 'मी पाहिली नाही' असे बोलणे होय. 'दुसरे काहीतरी बोलेन' या उद्देशाने दुसरेच बोलणे म्हणजे मंदत्वामुळे किंवा अज्ञानामुळे जीभ घसरून 'चीवर' म्हणायचे असताना 'चीर' इत्यादी बोलणे होय. परंतु, जर एखाद्या सामणेराने 'भंते, आपण माझ्या उपाध्यायांना पाहिले का?' असे विचारले असता, थट्टा-मस्करी करण्याच्या हेतूने 'तुझे उपाध्याय लाकडाची गाडी जुंपून गेले असावेत' असे म्हणतो; किंवा कोल्ह्याचा आवाज ऐकून 'भंते, हा कोणाचा आवाज आहे?' असे विचारले असता, 'तुझी आई रथाने जात असताना चिखलात अडकलेले चाक बाहेर काढणाऱ्या लोकांचा हा आवाज आहे' असे म्हणतो. अशा प्रकारे थट्टा-मस्करी किंवा निरर्थक बडबड न करता जे दुसरेच काहीतरी बोलतो, तो आपत्तीलाच प्राप्त होतो. दुसरी 'पूरणकथा' (अतिशयोक्ती) नावाची गोष्ट असते; जसे की, एखादा भिक्खू गावात थोडेसे तेल मिळवून विहारात येतो आणि सामणेराला म्हणतो - 'तू आज कुठे गेला होतास? संपूर्ण गाव तेलमय झाले होते!' किंवा टोपलीत ठेवलेला पुऱ्याचा तुकडा मिळवून 'आज गावात टोपल्यांनी पुऱ्या वाटल्या जात होत्या' असे म्हणतो. हे देखील असत्यवचन (मुसावाद) च आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กายจิตฺตโต วาจาจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. तीन समुत्थाने – हे शिक्षापद काय-चित्त, वाचा-चित्त आणि काय-वाचा-चित्त यांपासून उत्पन्न होते; हे क्रिया (करण्यायोग्य नसलेले उल्लंघन करणे), संज्ञाविमोक्ष (उल्लंघनाची संज्ञा नसल्यास आपत्तीतून मुक्तता असणारे), सचित्तक (उल्लंघनाच्या चित्तासह असणारे), लोकवज्ज (लोकापवाद/जगात दोषयुक्त असणारे), कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि त्रिवेदना (तीन प्रकारच्या वेदनांनी युक्त) आहे. มุสาวาทสิกฺขาปทํ ปฐมํ. पहिले मुसावाद शिक्षापद समाप्त. ๒. โอมสวาทสิกฺขาปทวณฺณนา २. ओमसवाद शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๑๒. ทุติยสิกฺขาปเท โอมสนฺตีติ โอวิชฺฌนฺติ. ขุํเสนฺตีติ อกฺโกสนฺติ. วมฺเภนฺตีติ ปธํเสนฺติ. १२. दुसऱ्या शिक्षापदात 'ओमसन्ति' म्हणजे वाणीरूपी भाल्याने टोचणे (टोमणे मारणे). 'खुंसेन्ति' म्हणजे शिवीगाळ करणे (निंदा करणे). 'वम्भेन्ति' म्हणजे अपमानित करणे (दडपून टाकणे). ๑๓. ภูตปุพฺพนฺติ อิทํ วตฺถุํ ภควา โอมสวาทครหณตฺถํ อาหริ. นนฺทิวิสาโล นามาติ นนฺทีติ ตสฺส พลีพทฺทสฺส นามํ, วิสาณานิ ปนสฺส วิสาลานิ, ตสฺมา ‘‘นนฺทิวิสาโล’’ติ วุจฺจติ. โพธิสตฺโต เตน สมเยน นนฺทิวิสาโล นาม โหติ. พฺราหฺมโณ ตํ ยาคุภตฺตาทีหิ อติวิย โปเสสิ. อถ โส พฺราหฺมณํ อนุกมฺปมาโน ‘‘คจฺฉ ตฺว’’นฺติอาทิมาห. ตตฺเถว อฏฺฐาสีติ อเหตุกปฏิสนฺธิกาเลปิ ปรขุํสนํ อมนาปโตเยว ปจฺเจสิ, ตสฺมา พฺราหฺมณสฺส โทสํ ทสฺเสตุกาโม อฏฺฐาสิ. สกฏสตํ อติพทฺธํ ปวฏฺเฏสีติ ปฏิปาฏิยา ฐเปตฺวา เหฏฺฐารุกฺเข ทตฺวา เอกาพทฺธํ กตฺวา มุคฺคมาสวาลุกาทีหิ ปุณฺณํ สกฏสตํ ปวฏฺเฏนฺโต, กิญฺจาปิ ปุพฺเพ ปติฏฺฐิตารปฺปเทสํ ปุน อเร ปตฺเต ปวฏฺฏิตํ โหติ, โพธิสตฺโต ปน ปุริมสกเฏน ปติฏฺฐิตฏฺฐาเน ปจฺฉิมสกฏํ ปติฏฺฐาเปตุํ สกฏสตปฺปมาณํ ปเทสํ ปวฏฺเฏสิ. โพธิสตฺตานญฺหิ สิถิลกรณํ นาม นตฺถิ. เตน จตฺตมโน อหูติ เตน พฺราหฺมณสฺส ธนลาเภน อตฺตโน กมฺเมน จ โส นนฺทิวิสาโล อตฺตมโน อโหสิ. १३. 'भूतपुब्बं' (पूर्वी घडलेली गोष्ट) ही कथा भगवंतांनी ओमसवादाची (टोमणे मारण्याची) निंदा करण्यासाठी सांगितली. 'नन्दिविसालो' या नावामध्ये 'नन्दि' हे त्या बैलाचे नाव आहे, आणि त्याची शिंगे विशाल होती, म्हणून त्याला 'नन्दिविसाल' म्हटले गेले. त्या काळी बोधिसत्त्व 'नन्दिविसाल' नावाचे बैल होते. एका ब्राह्मणाने त्याला पेज, भात इत्यादी देऊन अत्यंत प्रेमाने पाळले होते. नंतर त्या बैलाने ब्राह्मणावर अनुकंपा करून 'तू जा...' इत्यादी म्हटले. 'तो तिथेच उभा राहिला' म्हणजे पशू योनीत जन्मलेला असतानाही, दुसऱ्याने केलेली निंदा त्याला अप्रियच वाटली. म्हणून ब्राह्मणाचा दोष दाखवून देण्याच्या इच्छेने तो उभा राहिला. 'शंभर गाड्या ओढल्या' म्हणजे एकापाठोपाठ एक गाड्या ठेवून, खाली लाकडे देऊन त्यांना एकमेकांशी बांधून, मूग, उडीद, वाळू इत्यादींनी भरलेल्या शंभर गाड्या ओढताना, जरी आधी स्थिर असलेल्या जागेवरून चाक पुढे सरकल्यावर पुन्हा फिरवले गेले, तरी बोधिसत्त्वांनी पहिल्या गाडीच्या जागेवर शेवटची गाडी आणून ठेवण्यासाठी शंभर गाड्यांच्या लांबीएवढ्या अंतरापर्यंत त्या ओढल्या. कारण बोधिसत्त्वांच्या ठायी कोणतेही काम ढिलेपणाने करणे नसते. 'त्यामुळे तो संतुष्ट झाला' म्हणजे त्या ब्राह्मणाला मिळालेल्या धनाच्या लाभामुळे आणि स्वतःच्या कर्मामुळे तो नन्दिविसाल बैल संतुष्ट झाला. ๑๕. อกฺโกเสนปีติ [Pg.5] เอตฺถ ปน ยสฺมา ปรโต ‘‘ทฺเว อกฺโกสา – หีโน จ อกฺโกโส อุกฺกฏฺโฐ จ อกฺโกโส’’ติ วิภชิตุกาโม, ตสฺมา ยถา ปุพฺเพ ‘‘หีเนนปิ อกฺโกเสน ขุํเสนฺตี’’ติ วุตฺตํ; เอวํ อวตฺวา ‘‘อกฺโกเสน’’ อิจฺเจวมาห. เวนชาตีติ ตจฺฉกชาติ; เวณุการชาตีติปิ วทนฺติ. เนสาทชาตีติ มิคลุทฺทกาทิชาติ. १५. 'शिवीगाळीने देखील' यामध्ये, कारण पुढे 'दोन प्रकारच्या शिव्या - हीन शिवी आणि उत्कृष्ट शिवी' अशी विभागणी करायची आहे, म्हणून पूर्वी 'हीन शिवीने देखील निंदा करतात' असे म्हटले होते; तसे न म्हणता केवळ 'शिवीगाळीने' असेच म्हटले आहे. 'वेणजाती' म्हणजे सुतारांची जात; काही जण बांबूचे काम करणाऱ्यांची जात असेही म्हणतात. 'नेसादजाती' म्हणजे शिकारी इत्यादींची जात. รถการชาตีติ จมฺมการชาติ. ปุกฺกุสชาตีติ ปุปฺผฉฑฺฑกชาติ. อวกณฺณกาทิ ทาสานํ นามํ โหติ; ตสฺมา หีนํ. โอญฺญาตนฺติ อวญฺญาตํ; ‘‘อุญฺญาต’’นฺติปิ ปฐนฺติ. อวญฺญาตนฺติ วมฺเภตฺวา ญาตํ. หีฬิตนฺติ ชิคุจฺฉิตํ. ปริภูตนฺติ กิเมเตนาติติ ปริภวกตํ. อจิตฺตีกตนฺติ น ครุกตํ. 'रथकारजाती' म्हणजे चर्मकारांची जात. 'पुक्कुसजाती' म्हणजे कचरा साफ करणाऱ्यांची जात. 'अवकर्णक' इत्यादी दासांची नावे असतात; म्हणून ती हीन आहेत. 'ओञ्ञातं' म्हणजे 'अवज्ञात' (तुच्छ मानलेले नाव); काही जण 'उञ्ञातं' असाही पाठ वाचतात. 'अवज्ञात' म्हणजे निंदा करून ओळखले गेलेले नाव. 'हीळितं' म्हणजे घृणास्पद. 'परिभूतं' म्हणजे 'या नावाचा काय उपयोग?' असे म्हणून अपमानित केलेले नाव. 'अचित्तीकतं' म्हणजे आदर न दिलेले नाव. โกฏฺฐกกมฺมนฺติ ตจฺฉกกมฺมํ. มุทฺทาติ หตฺถมุทฺทาคณนา. คณนาติ อจฺฉิทฺทกาทิอวเสสคณนา. เลขาติ อกฺขรเลขา. มธุเมหาพาโธ เวทนาย อภาวโต ‘‘อุกฺกฏฺโฐ’’ติ วุตฺโต. ปาฏิกงฺขาติ อิจฺฉิตพฺพา. ยกาเรน วา ภกาเรน วาติ ยการภกาเร โยเชตฺวา โย อกฺโกโส. กาฏโกฏจิกาย วาติ ‘‘กาฏ’’นฺติ ปุริสนิมิตฺตํ, ‘‘โกฏจิกา’’ติ อิตฺถินิมิตฺตํ; เอเตหิ วา โย อกฺโกโส, เอโส หีโน นาม อกฺโกโสติ. 'कोट्ठककम्मं' म्हणजे सुतारकाम. 'मुद्दा' म्हणजे हाताच्या बोटांनी मोजण्याची कला. 'गणना' म्हणजे इतर प्रकारची गणितीय गणना. 'लेखा' म्हणजे अक्षरलेखन. मधुमेह आजार हा वेदना नसल्यामुळे 'उत्कृष्ट' (मोठा आजार) म्हटला गेला आहे. 'पाटिकांखा' म्हणजे इच्छिण्यायोग्य. 'य' किंवा 'भ' अक्षरे जोडून केलेली शिवीगाळ. 'काटकोठचिका' यामध्ये 'काट' म्हणजे पुरुष जननेंद्रिय आणि 'कोटचिका' म्हणजे स्त्री जननेंद्रिय; यांच्याशी संबंधित जी शिवीगाळ केली जाते, ती 'हीन शिवी' मानली जाते. ๑๖. อิทานิ เตสํ ชาติอาทีนํ ปเภทวเสน อาปตฺตึ อาโรเปตฺวา ทสฺเสนฺโต ‘‘อุปสมฺปนฺโน อุปสมฺปนฺน’’นฺติอาทิมาห. ตตฺถ ขุํเสตุกาโม วมฺเภตุกาโม มงฺกุกตฺตุกาโมติ อกฺโกสิตุกาโม ปธํสิตุกาโม ครหิตุกาโม นิตฺเตชํ กตฺตุกาโมติ อตฺโถ. หีเนน หีนนฺติ หีเนน ชาติวจเนน หีนชาติกํ. เอเตน อุปาเยน สพฺพปเทสุ อตฺโถ เวทิตพฺโพ. १६. आता त्या जाती इत्यादींच्या भेदांनुसार आपत्ती लागू करून दाखवताना 'उपसंपन्न उपसंपन्नाला...' इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये 'खुंसेतुकामो' (निंदा करण्याची इच्छा असणारा), 'वम्भेतुकामो' (अपमान करण्याची इच्छा असणारा), 'मंकुकत्तुकामो' (तेजहीन करण्याची इच्छा असणारा) याचा अर्थ शिवीगाळ करण्याची, दडपून टाकण्याची, निंदा करण्याची आणि निस्तेज करण्याची इच्छा असणारा असा आहे. 'हीन शब्दाने हीन' म्हणजे हीन जातीच्या शब्दाने हीन जातीच्या व्यक्तीला बोलणे. या पद्धतीने सर्व पदांचा अर्थ समजून घ्यावा. เอตฺถ จ หีเนน หีนํ วทนฺโต กิญฺจาปิ สจฺจํ วทติ, โอมสิตุกามตาย ปนสฺส วาจาย วาจาย ปาจิตฺติยํ. อุกฺกฏฺเฐน หีนํ วทนฺโต จ กิญฺจาปิ อลิกํ ภณติ, โอมสิตุกามตาย ปน อิมินาว สิกฺขาปเทน ปาจิตฺติยํ อาปชฺชติ, น ปุริเมน. โยปิ ‘‘อติจณฺฑาโลสิ, อติพฺราหฺมโณสิ, ทุฏฺฐจณฺฑาโลสิ, ทุฏฺฐพฺราหฺมโณสี’’ติอาทีนิ วทติ, โสปิ อาปตฺติยา กาเรตพฺโพ. आणि येथे हीन शब्दाने हीन व्यक्तीला बोलणारा जरी खरे बोलत असला, तरी टोमणे मारण्याच्या इच्छेमुळे त्याच्या प्रत्येक शब्दाशब्दाला पाचित्तिय आपत्ती होते. आणि उत्कृष्ट शब्दाने हीन व्यक्तीला बोलणारा जरी खोटे बोलत असला, तरी अपमान करण्याच्या इच्छेमुळे याच शिक्षापदाने तो पाचित्तिय आपत्तीला प्राप्त होतो, पूर्वीच्या शिक्षापदाने नाही. जो कोणी 'तू अति-चांडाल आहेस, तू अति-ब्राह्मण आहेस, तू दुष्ट-चांडाल आहेस, तू दुष्ट-ब्राह्मण आहेस' इत्यादी बोलतो, त्यालाही या आपत्तीनुसार प्रायश्चित्त दिले पाहिजे. ๒๖. สนฺติ [Pg.6] อิเธกจฺเจติ วาเร ปน ปริหริตฺวา วุตฺตภาเวน ทุกฺกฏํ. เอเสว นโย เย นูน…เป… น มยนฺติ วาเรสุปิ. อนุปสมฺปนฺเน ปน จตูสุปิ วาเรสุ ทุกฺกฏเมว. โจโรสิ คณฺฐิเภทโกสีติอาทิวจเนหิ ปน อุปสมฺปนฺเนปิ อนุปมฺปนฺเนปิ สพฺพวาเรสุ ทุกฺกฏเมว. ทวกมฺยตาย ปน อุปสมฺปนฺเนปิ อนุปสมฺปนฺเนปิ สพฺพวาเรสุ ทุพฺภาสิตํ. ทวกมฺยตา นาม เกฬิหสาธิปฺปายตา. อิมสฺมิญฺจ สิกฺขาปเท ฐเปตฺวา ภิกฺขุํ ภิกฺขุนีอาทโย สพฺพสตฺตา อนุปสมฺปนฺนฏฺฐาเน ฐิตาติ เวทิตพฺพา. २६. 'येथे काही आहेत' या वारात मात्र अप्रत्यक्षपणे बोलल्यामुळे दुक्कट आपत्ती होते. हाच नियम 'कदाचित...' पे... 'आम्ही नाही' या वारांमध्येही लागू होतो. अनुपसंपन्नाच्या बाबतीत मात्र चारही वारांमध्ये duक्कट आपत्तीच होते. 'तू चोर आहेस, तू खिसेकापू आहेस' इत्यादी शब्दांनी बोलल्यास, उपसंपन्नाच्या बाबतीत असो वा अनुपसंपन्नाच्या बाबतीत असो, सर्व वारांमध्ये दुक्कट आपत्तीच होते. थट्टा-मस्करीच्या इच्छेने बोलल्यास, उपसंपन्नाच्या बाबतीत असो वा अनुपसंपन्नाच्या बाबतीत असो, सर्व वारांमध्ये दुब्भासित आपत्ती होते. 'दवकभ्यता' म्हणजे थट्टा-मस्करी किंवा खेळकर वृत्तीने बोलण्याची इच्छा. आणि या शिक्षापदात भिक्खूला सोडून भिक्खुणी इत्यादी सर्व प्राणी अनुपसंपन्नाच्या स्थानी आहेत असे समजावे. ๓๕. อตฺถปุเรกฺขารสฺสาติอาทีสุ ปาฬิยา อตฺถํ วณฺณยนฺโต อตฺถปุเรกฺขาโร; ปาฬึ วาเจนฺโต ธมฺมปุเรกฺขาโร; อนุสิฏฺฐิยํ ฐตฺวา ‘‘อิทานิปิ จณฺฑาโลสิ, ปาปํ มา อกาสิ, มา ตโม ตมปรายโณ อโหสี’’ติอาทินา นเยน กเถนฺโต อนุสาสนีปุเรกฺขาโร นามาติ เวทิตพฺโพ. เสสํ อุตฺตานเมว. ३५. 'अर्थपुरेक्खार' इत्यादी शब्दांमध्ये - पाळीचा अर्थ स्पष्ट करणारा 'अर्थपुरेक्खार' असतो; पाळी शिकवणारा 'धम्मपुरेक्खार' असतो; उपदेशात राहून 'तू आताही चांडाल आहेस, पाप करू नकोस, अंधाराकडून अंधाराकडे जाणारा होऊ नकोस' अशा पद्धतीने सांगणारा 'अनुसासनीपुरेक्खार' समजावा. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กายจิตฺตโต วาจาจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ. กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. ทุพฺภาสิตาปตฺติ ปเนตฺถ วาจาจิตฺตโต สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, อกุสลจิตฺตํ, ทฺวิเวทนํ สุขา จ มชฺฌตฺตา จาติ. हे तीन समुत्थानांचे आहे – काय-चित्त, वाचा-चित्त आणि काय-वाचा-चित्त यांद्वारे उत्पन्न होते. हे क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदना असणारे आहे. परंतु, यातील दुर्भाषित आपत्ती (दुब्भासितापत्ती) ही वाचा-चित्तापासून उत्पन्न होते; ती क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, अकुशलचित्त आणि सुख व मध्यस्थ (उपेक्षा) अशा दोन वेदनांनी युक्त (द्विवेदना) असणारी आहे. โอมสวาทสิกฺขาปทํ ทุติยํ. दुसरे ओमसव्वाद (अवमानकारक भाषण) शिक्षापद समाप्त. ๓. เปสุญฺญสิกฺขาปทวณฺณนา ३. पेसुञ्ञ (चुगली) शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๓๖. ตติยสิกฺขาปเท – ภณฺฑนชาตานนฺติ สญฺชาตภณฺฑนานํ. ภณฺฑนนฺติ กลหสฺส ปุพฺพภาโค, ‘‘อิมินา จ อิมินา จ อิทํ กตํ; เอวํ วุตฺเต เอวํ วกฺขามา’’ติอาทิกํ สกสกปกฺเข สมฺมนฺตนํ. กลโหติ อาปตฺติคามิโก กายวาจาวีติกฺกโม. วิวาโทติ วิคฺคาหิกกถา. ตํ วิวาทํ อาปนฺนานํ วิวาทาปนฺนานํ. เปสุญฺญนฺติ ปิสุณวาจํ, ปิยภาวสฺส สุญฺญกรณวาจนฺติ วุตฺตํ โหติ. ३६. तिसऱ्या शिक्षापदात – 'भण्डनजातानं' म्हणजे ज्यांच्यामध्ये भांडण उत्पन्न झाले आहे अशांचे. 'भण्डन' म्हणजे कलहाच्या आधीची अवस्था (पूर्वभाग), जसे की 'याने आणि त्याने हे केले आहे; त्यांनी असे म्हटले असता आपण असे बोलू' इत्यादी प्रकारे आपापल्या पक्षात केलेली मसलत (चर्चा). 'कलह' म्हणजे आपत्तीला कारणीभूत ठरणारे शरीर आणि वाणीचे उल्लंघन. 'विवाद' म्हणजे परस्परविरोधी संभाषण. त्या विवादाला प्राप्त झालेल्यांना 'विवादापन्नानं' म्हणतात. 'पेसुञ्ञ' (चुगली) म्हणजे पिसुणवाचा, जी प्रिय संबंधांना नष्ट (शून्य) करणारी वाणी आहे, असे म्हटले आहे. ๓๗. ภิกฺขุเปสุญฺเญติ [Pg.7] ภิกฺขูนํ เปสุญฺเญ; ภิกฺขุโต สุตฺวา ภิกฺขุนา ภิกฺขุสฺส อุปสํหฏเปสุญฺเญติ อตฺโถ. ३७. 'भिक्खुपेसुञ्ञे' म्हणजे भिक्खूंची चुगली करणे; एका भिक्खूकडून ऐकून दुसऱ्या भिक्खूने तिसऱ्या भिक्खूजवळ जाऊन केलेली चुगली, असा याचा अर्थ आहे. ๓๘. ทฺวีหากาเรหีติ ทฺวีหิ การเณหิ. ปิยกมฺยสฺส วาติ ‘‘เอวํ อหํ เอตสฺส ปิโย ภวิสฺสามี’’ติ อตฺตโน ปิยภาวํ ปตฺถยมานสฺส วา. เภทาธิปฺปายสฺส วาติ ‘‘เอวมยํ เอเตน สทฺธึ ภิชฺชิสฺสตี’’ติ ปรสฺส ปเรน เภทํ อิจฺฉนฺตสฺส วา. ชาติโตปีติอาทิ สพฺพํ ปุริมสิกฺขาปเท วุตฺตนยเมว. อิธาปิ ภิกฺขุนึ อาทึ กตฺวา สพฺเพ อนุปสมฺปนฺนา นาม. ३८. 'द्वीहाकारेहि' म्हणजे दोन कारणांनी. 'पियकम्यस्स वा' म्हणजे 'असे केल्याने मी याचा प्रिय होईन' अशी स्वतःच्या प्रिय होण्याची इच्छा धरणाऱ्याचे. 'भेदाधिप्पायस्स वा' म्हणजे 'असे केल्याने हा त्याच्याशी विभक्त होईल' अशी इतरांमध्ये फूट पाडण्याची इच्छा धरणाऱ्याचे. 'जातितोपि' इत्यादी सर्व पूर्वीच्या शिक्षापदात सांगितलेल्या पद्धतीप्रमाणेच समजावे. येथेही भिक्खुणीला आधी करून सर्वजण 'अनुपसंपन्न' या संज्ञेस पात्र आहेत. น ปิยกมฺยสฺส น เภทาธิปฺปายสฺสาติ เอกํ อกฺโกสนฺตํ เอกญฺจ ขมนฺตํ ทิสฺวา ‘‘อโห นิลฺลชฺโช, อีทิสมฺปิ นาม ภวนฺตํ ปุน วตฺตพฺพํ มญฺญิสฺสตี’’ติ เอวํ เกวลํ ปาปครหิตาย ภณนฺตสฺส อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานตฺถเมว. ติสมุฏฺฐานํ – กายจิตฺตโต วาจาจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. 'न पियकम्यस्स न भेदाधिप्पायस्स' म्हणजे प्रिय होण्याची किंवा फूट पाडण्याची इच्छा नसताना, एकाला शिवीगाळ करताना आणि दुसऱ्याला सहन करताना पाहून, 'अरेरे! हा किती निर्लज्ज आहे, अशा सहनशील पूज्य व्यक्तीलाही हा पुन्हा बोलण्यास पात्र समजतो!' अशा प्रकारे केवळ पापाची निंदा करण्याच्या हेतूने बोलणाऱ्या भिक्खूला आपत्ती होत नाही (अनापत्ती). उर्वरित भाग स्पष्ट अर्थाचाच आहे. हे तीन समुत्थानांचे आहे – काय-चित्त, वाचा-चित्त आणि काय-वाचा-चित्त यांद्वारे उत्पन्न होते. हे क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि त्रिवेदना (तीन वेदनांनी युक्त) असणारे आहे. เปสุญฺญสิกฺขาปทํ ตติยํ. तिसरे पेसुञ्ञ (चुगली) शिक्षापद समाप्त. ๔. ปทโสธมฺมสิกฺขาปทวณฺณนา ४. पदसोधम्म (पदाने धर्म शिकवणे) शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๔๔. จตุตฺถสิกฺขาปเท – อปฺปติสฺสาติ อปฺปติสฺสวา. อุปาสกาติ วุตฺเต วจนมฺปิ น โสตุกามา; อนาทราติ อตฺโถ. อปฺปติสฺสยา วา อนีจวุตฺติโนติ อตฺโถ. อสภาควุตฺติกาติ วิสภาคชีวิกา, ยถา ภิกฺขูสุ วตฺติตพฺพํ; เอวํ อปฺปวตฺตวุตฺติโนติ อตฺโถ. ४४. चौथ्या शिक्षापदात – 'अप्पतिस्सा' म्हणजे आदरपूर्वक ऐकण्याची इच्छा नसलेले. 'उпасक' असे म्हटले असता त्यांचे बोलणेही ऐकण्याची इच्छा नसलेले; म्हणजेच अनादर करणारे, असा अर्थ आहे. किंवा 'अप्पतिस्सया' म्हणजे आश्रय न घेणारे, नम्र वर्तन न ठेवणारे, असा अर्थ आहे. 'असभागवृत्तिका' म्हणजे भिन्न उपजीविका असणारे; भिक्खूंच्या बाबतीत जसे वर्तन करायला हवे, तसे वर्तन न ठेवणारे, असा अर्थ आहे. ๔๕. ปทโส ธมฺมํ วาเจยฺยาติ เอกโต ปทํ ปทํ ธมฺมํ วาเจยฺย; โกฏฺฐาสํ โกฏฺฐาสํ วาเจยฺยาติ อตฺโถ. ยสฺมา ปน ตํ โกฏฺฐาสนามกํ ปทํ จตุพฺพิธํ โหติ, ตสฺมา ตํ ทสฺเสตุํ ‘‘ปทํ อนุปทํ อนฺวกฺขรํ อนุพฺยญฺชน’’นฺติ ปทภาชนํ วุตฺตํ. ตตฺถ ปทนฺติ เอโก คาถาปาโท อธิปฺเปโต. อนุปทนฺติ ทุติยปาโท. อนฺวกฺขรนฺติ เอเกกมกฺขรํ. อนุพฺยญฺชนนฺติ ปุริมพฺยญฺชเนน สทิสํ ปจฺฉาพฺยญฺชนํ. ยํ กิญฺจิ วา เอกมกฺขรํ อนฺวกฺขรํ, อกฺขรสมูโห อนุพฺยญฺชนํ, อกฺขรานุพฺยญฺชนสมูโห ปทํ. ปฐมปทํ ปทเมว, ทุติยํ อนุปทนฺติ เอวเมตฺถ นานากรณํ เวทิตพฺพํ. ४५. 'पदसो धम्मं वाचेय्य' म्हणजे एकत्र मिळून पदोपदी धर्म शिकवणे; किंवा भागाभागाने शिकवणे, असा अर्थ आहे. परंतु, ते भागात्मक पद चार प्रकारचे असल्याने, ते दर्शवण्यासाठी 'पद, अनुपद, अन्वक्खर, अनुब्यञ्जन' असे पदभाजन सांगितले आहे. त्यामध्ये 'पद' म्हणजे गाथेचा एक चरण अभिप्रेत आहे. 'अनुपद' म्हणजे दुसरा चरण. 'अन्वक्खर' म्हणजे एकेक अक्षर. 'अनुब्यञ्जन' म्हणजे पहिल्या व्यंजनासारखेच नंतरचे व्यंजन. किंवा कोणतेही एक अक्षर म्हणजे 'अन्वक्खर', अक्षरांचा समूह म्हणजे 'अनुब्यञ्जन' आणि अक्षरे व व्यंजनांचा समूह म्हणजे 'पद' होय. पहिले पद हे 'पद'च आहे आणि दुसरे 'अनुपद' आहे, अशा प्रकारे यातील भेद समजून घ्यावा. อิทานิ [Pg.8] ปทํ นาม เอกโต ปฏฺฐเปตฺวา เอกโต โอสาเปนฺตีติ คาถาพนฺธํ ธมฺมํ วาเจนฺโต ‘‘มโนปุพฺพงฺคมา ธมฺมา’’ติ เอกเมกํ ปทํ สามเณเรน สทฺธึ เอกโต อารภิตฺวา เอกโตเยว นิฏฺฐาเปติ. เอวํ วาเจนฺตสฺส ปทคณนาย ปาจิตฺติยา เวทิตพฺพา. อนุปทํ นาม ปาเฏกฺกํ ปฏฺฐเปตฺวา เอกโต โอสาเปนฺตีติ เถเรน ‘‘มโนปุพฺพงฺคมา ธมฺมา’’ติ วุตฺเต สามเณโร ตํ ปทํ อปาปุณิตฺวา ‘‘มโนเสฏฺฐา มโนมยา’’ติ ทุติยปทํ เอกโต ภณติ, อิเม ปาเฏกฺกํ ปฏฺฐเปตฺวา เอกโต โอสาเปนฺติ นาม. เอวํ วาเจนฺตสฺสาปิ อนุปทคณนาย ปาจิตฺติยา. อนฺวกฺขรํ นาม รูปํ อนิจฺจนฺติ วุจฺจมาโน ‘‘รู’’ติ โอปาเตตีติ ‘‘รูปํ อนิจฺจนฺติ ภณ สามเณรา’’ติ วุจฺจมาโน รูการมตฺตเมว เอกโต วตฺวา ติฏฺฐติ. เอวํ วาเจนฺตสฺสาปิ อนฺวกฺขรคณนาย ปาจิตฺติยา. คาถาพนฺเธปิ จ เอส นโย ลพฺภติเยว. อนุพฺยญฺชนํ นาม รูปํ อนิจฺจนฺติ วุจฺจมาโน เวทนา อนิจฺจาติ สทฺทํ นิจฺฉาเรตีติ ‘‘รูปํ, ภิกฺขเว, อนิจฺจํ, เวทนา อนิจฺจา’’ติ อิมํ สุตฺตํ วาจยมาโน เถเรน ‘‘รูปํ อนิจฺจ’’นฺติ วุจฺจมาโน สามเณโร สีฆปญฺญตาย ‘‘เวทนา อนิจฺจา’’ติ อิมํ อนิจฺจปทํ เถรสฺส ‘‘รูปํ อนิจฺจ’’นฺติ เอเตน อนิจฺจปเทน สทฺธึ เอกโต ภณนฺโต วาจํ นิจฺฉาเรติ. เอวํ วาเจนฺตสฺสาปิ อนุพฺยญฺชนคณนาย ปาจิตฺติยา. อยํ ปเนตฺถ สงฺเขโป – อิเมสุ ปทาทีสุ ยํ ยํ เอกโต ภณติ เตน เตน อาปตฺตึ อาปชฺชตีติ. आता 'पद' म्हणजे एकत्र सुरू करून एकत्र संपवणे; गाथारूप धर्म शिकवताना 'मनोपुब्बङ्गमा धम्मा' हे एकेक पद सामणेरासोबत एकत्र सुरू करून एकत्रच संपवणे होय. असे शिकवणाऱ्याला पदांच्या संख्येनुसार पाचित्तिय आपत्ती होते, असे समजावे. 'अनुपद' म्हणजे स्वतंत्रपणे सुरू करून एकत्र संपवणे; थेरांनी 'मनोपुब्बङ्गमा धम्मा' असे म्हटले असता, सामणेर त्या पदापर्यंत न पोहोचता 'मनोसेट्ठा मनोमया' हे दुसरे पद एकत्र म्हणतो; याला स्वतंत्रपणे सुरू करून एकत्र संपवणे म्हणतात. असे शिकवणाऱ्यालाही अनुपदांच्या संख्येनुसार पाचित्तिय आपत्ती होते. 'अन्वक्खर' म्हणजे 'रूपं अनिच्चं' असे म्हणताना 'रू' असा उच्चार करणे; 'हे सामणेरा, रूपं अनिच्चं असे म्हण' असे म्हटले असता, तो केवळ 'रू' या अक्षराचाच एकत्र उच्चार करून थांबतो. असे शिकवणाऱ्यालाही अक्षरांच्या संख्येनुसार पाचित्तिय आपत्ती होते. गाथारचनेमध्येही हाच नियम लागू होतो. 'अनुब्यञ्जन' म्हणजे 'रूपं अनिच्चं' असे म्हणताना 'वेदना अनिच्चा' असा ध्वनी काढणे; 'भिक्खूंनो, रूप अनित्य आहे, वेदना अनित्य आहे' हे सुत्त शिकवताना, थेरांनी 'रूपं अनिच्चं' असे म्हटले असता, सामणेर आपल्या तीव्र बुद्धिमत्तेमुळे 'वेदना अनिच्चा' हे अनित्य-पद थेरांच्या 'रूपं अनिच्चं' या अनित्य-पदासोबत एकत्र म्हणत वाणीचा उच्चार करतो. असे शिकवणाऱ्यालाही अनुव्यंजनांच्या संख्येनुसार पाचित्तिय आपत्ती होते. याचा संक्षेप असा आहे – या पदादींमध्ये जे जे एकत्र म्हटले जाते, त्या त्या कारणाने आपत्ती प्राप्त होते. พุทฺธภาสิโตติ สกลํ วินยปิฏกํ อภิธมฺมปิฏกํ ธมฺมปทํ จริยาปิฏกํ อุทานํ อิติวุตฺตกํ ชาตกํ สุตฺตนิปาโต วิมานวตฺถุ เปตวตฺถุ พฺรหฺมชาลาทีนิ จ สุตฺตานิ. สาวกภาสิโตติ จตุปริสปริยาปนฺเนหิ สาวเกหิ ภาสิโต อนงฺคณสมฺมาทิฏฺฐิอนุมานสุตฺตจุฬเวทลฺลมหาเวทลฺลาทิโก. อิสิภาสิโตติ พาหิรปริพฺพาชเกหิ ภาสิโต สกโล ปริพฺพาชกวคฺโค, พาวริยสฺส อนฺเตวาสิกานํ โสฬสนฺนํ พฺราหฺมณานํ ปุจฺฉาติ เอวมาทิ. เทวตาภาสิโตติ เทวตาหิ ภาสิโต; โส เทวตาสํยุตฺตเทวปุตฺตสํยุตฺตมารสํยุตฺตพฺรหฺมสํยุตฺตสกฺกสํยุตฺตาทิวเสน เวทิตพฺโพ. 'बुद्धभाषित' म्हणजे संपूर्ण विनयपिटक, अभिधम्मपिटक, धम्मपद, चरियापिटक, उदान, इतिवृत्तक, जातक, सुत्तनिपात, विमानवत्थु, पेतवत्थु आणि ब्रह्मजाल इत्यादी सुत्ते होय. 'श्रावकभाषित' म्हणजे चार परिषदांमध्ये समाविष्ट असलेल्या श्रावकांनी उपदेशिलेले अनंगणसुत्त, सम्मादिट्ठिसुत्त, अनुमानसुत्त, चुळवेदल्लसुत्त, महावेदल्लसुत्त इत्यादी होय. 'इसिभाषित' (ऋषिभाषित) म्हणजे बाह्य परिव्राजकांनी उपदेशिलेला संपूर्ण परिव्राजकवर्ग, बावरिय ब्राह्मणाच्या सोळा शिष्यांचे प्रश्न इत्यादी होय. 'देवताभाषित' म्हणजे देवतांनी उपदेशिलेले होय; ते देवतासंयुत्त, देवपुत्तसंयुत्त, मारसंयुत्त, ब्रह्मसंयुत्त, सक्कसंयुत्त इत्यादींच्या आधारे समजून घ्यावे. อตฺถูปสญฺหิโตติ อฏฺฐกถานิสฺสิโต. ธมฺมูปสญฺหิโตติ ปาฬินิสฺสิโต; อุภเยนาปิ วิวฏฺฏูปนิสฺสิตเมว วทติ. กิญฺจาปิ วิวฏฺฏูปนิสฺสิตํ วทติ, ติสฺโส สงฺคีติโย อารุฬฺหธมฺมํเยว ปน ปทโส วาเจนฺตสฺส อาปตฺติ[Pg.9]. วิวฏฺฏูปนิสฺสิเตปิ นานาภาสาวเสน คาถาสิโลกพนฺธาทีหิ อภิสงฺขเต อนาปตฺติ. ติสฺโส สงฺคีติโย อนารุฬฺเหปิ กุลุมฺพสุตฺตํ ราโชวาทสุตฺตํ ติกฺขินฺทฺริยํ จตุปริวฏฺฏํ นนฺโทปนนฺทนฺติ อีทิเส อาปตฺติเยว. อปลาลทมนมฺปิ วุตฺตํ, มหาปจฺจริยมฺปน ปฏิสิทฺธํ. เมณฺฑกมิลินฺทปญฺเหสุ เถรสฺส สกปฏิภาเน อนาปตฺติ, ยํ รญฺโญ สญฺญาปนตฺถํ อาหริตฺวา วุตฺตํ, ตตฺถ อาปตฺติ. วณฺณปิฏกองฺคุลิมาลปิฏกรฏฺฐปาลคอชตอาฬวกคชฺชิตคุฬฺหมคฺคคุฬฺหเวสฺสนฺตรคุฬฺหวินยเวทลฺลปิฏกานิ ปน อพุทฺธวจนานิเยวาติ วุตฺตํ. สีลูปเทโส นาม ธมฺมเสนาปตินา วุตฺโตติ วทนฺติ, ตสฺมึ อาปตฺติเยว. อญฺญานิปิ มคฺคกถาอารมฺมณกถาพุทฺธิกทณฺฑก ญาณวตฺถุอสุภกถาทีนิ อตฺถิ, เตสุ สตฺตตึส โพธิปกฺขิยธมฺมา วิภตฺตา, ธุตงฺคปญฺเห ปฏิปทา วิภตฺตา; ตสฺมา เตสุ อาปตฺตีติ วุตฺตํ. มหาปจฺจริยาทีสุ ปน สงฺคีตึ อนารุฬฺเหสุ ราโชวาทติกฺขินฺทฺริยจตุปริวฏฺฏนนฺโทปนนฺทกุลุมฺพสุตฺเตสุเยว อาปตฺตีติ วตฺวา อวเสเสสุ ยํ พุทฺธวจนโต อาหริตฺวา วุตฺตํ, ตเทว อาปตฺติวตฺถุ โหติ, น อิตรนฺติ อยมตฺโถ ปริคฺคหิโต. ‘अत्थूपसंहितो’ म्हणजे अट्टकथेवर (टीकाग्रंथावर) आधारित. ‘धम्मूपसंहितो’ म्हणजे पाळीवर (मूळ पाठावर) आधारित; दोन्ही शब्दांद्वारे निर्वाणावर (संसारचक्रापासून मुक्तीवर) आधारित असलेल्या उपदेशाचाच निर्देश होतो. जरी निर्वाणावर आधारित उपदेशाचा निर्देश होत असला, तरी तीन संगीतींमध्ये (धर्मसंगीतींमध्ये) समाविष्ट केलेल्या धर्माचे शब्दाशब्दाने अध्यापन करणाऱ्या भिक्खूला आपत्ती (दोष) प्राप्त होते. निर्वाणावर आधारित असले तरी, विविध भाषांच्या माध्यमातून गाथा, श्लोक इत्यादी रचनांनी युक्त असलेल्या उपदेशाचे अध्यापन केल्यास अनापत्ती (दोष नाही) होते. तीन संगीतींमध्ये समाविष्ट नसले तरी, कुलुम्बसुत्त, राजोवादसुत्त, तिक्खिन्द्रिय, चतुपरिवट्ट, नन्दोपनन्द यांसारख्या सुत्तांचे अध्यापन केल्यास आपत्तीच होते. ‘अपलालदमन’ (अपलाल नागाचे दमन) या कथेबाबतही आपत्ती सांगितली आहे, परंतु महापंचरी अट्टकथेत त्याचा निषेध केला आहे (म्हणजे अनापत्ती मानली आहे). मेण्डकप्रश्न आणि मिलिन्दप्रश्नांमध्ये थेरांच्या (नागसेन थेरांच्या) स्वतःच्या प्रतिभेने (बुद्धीने) सांगितलेल्या कथनात अनापत्ती आहे; परंतु जे राजाला समजवण्यासाठी (पाळी-अट्टकथेतून) उद्धृत करून सांगितले आहे, त्यात आपत्ती होते. वर्णपिटक, अङ्गुलिमालपिटक, रट्ठपालगज्जित, आळवकगज्जित, गुळ्हमग्ग, गुळ्हवेस्सन्तर, गुळ्हविनय आणि वेदल्लपिटक हे बुद्धवचन नाहीत असे म्हटले आहे. ‘सीलोपदेस’ हा धर्मसेनापतींनी (सारिपुत्त थेरांनी) सांगितला आहे असे म्हणतात, त्याचे अध्यापन केल्यास आपत्तीच होते. इतरही मग्गकथा, आरम्मणकथा, बुद्धिक, दण्डक, ज्ञानवत्थु, असुभकथा इत्यादी ग्रंथ आहेत, ज्यामध्ये सदतीस बोधिपक्खिय धम्मांचे वर्गीकरण केले आहे, आणि धुतङ्गप्रश्नात प्रतिपदेचे (आचरणाचे) वर्गीकरण केले आहे; म्हणून त्यांचे अध्यापन केल्यास आपत्ती होते असे म्हटले आहे. परंतु महापंचरी इत्यादी अट्टकथांमध्ये, संगीतीमध्ये समाविष्ट नसलेल्या केवळ राजोवाद, तिक्खिन्द्रिय, चतुपरिवट्ट, नन्दोपनन्द आणि कुलुम्बसुत्तांमध्येच आपत्ती होते असे सांगून, उर्वरित ग्रंथांमध्ये जे बुद्धवचनातून उद्धृत करून सांगितले आहे, तेच आपत्तीचे कारण ठरते, इतर नाही, असा अर्थ स्वीकारला आहे. ๔๘. เอกโต อุทฺทิสาเปนฺโตติ อนุปสมฺปนฺเนน สทฺธึ เอกโต อุทฺเทสํ คณฺหนฺโตปิ เอกโต วทติ อนาปตฺตีติ อตฺโถ. ४८. ‘एकतो उद्दिसापेन्तो’ (एकत्र शिकवणारा) या पदाचा अर्थ असा आहे की, अनुपसंपन्नासोबत (गृहस्थ किंवा सामणेरासोबत) एकत्र पाठ शिकत असताना देखील जर भिक्खू एकत्र (एकाच वेळी) म्हणत असेल, तर अनापत्ती (दोष नाही) होते. ตตฺรายํ วินิจฺฉโย – อุปสมฺปนฺโน จ อนุปสมฺปนฺโน จ นิสีทิตฺวา อุทฺทิสาเปนฺติ. อาจริโย นิสินฺนานํ ภณามีติ เตหิ สทฺธึ เอกโต วทติ, อาจริยสฺส อาปตฺติ. อนุปสมฺปนฺเนน สทฺธึ คณฺหนฺตสฺส อนาปตฺติ. ทฺเวปิ ฐิตา คณฺหนฺติ, เอเสว นโย. ทหรภิกฺขุ นิสินฺโน, สามเณโร ฐิโต, นิสินฺนสฺส ภณามีติ ภณโต อนาปตฺติ. สเจ ทหโร ติฏฺฐติ, อิตโร นิสีทติ, ฐิตสฺส ภณามีติ ภณโตปิ อนาปตฺติ. สเจ พหูนํ ภิกฺขูนํ อนฺตเร เอโก สามเณโร นิสินฺโน โหติ, ตสฺมึ นิสินฺเน ปทโส ธมฺมํ วาเจนฺตสฺส อาจริยสฺส อจิตฺตกาปตฺติ. สเจ สามเณโร อุปจารํ มุญฺจิตฺวา ฐิโต วา นิสินฺโน วา โหติ, เยสํ วาเจติ, เตสุ อปริยาปนฺนตฺตา เอเกน ทิสาภาเคน ปลายนกคนฺถํ นาม คณฺหาตีติ สงฺขฺยํ คจฺฉติ, ตสฺมา อนาปตฺติ. เอกโต สชฺฌายํ กโรนฺโตปิ อนุปสมฺปนฺเนน สทฺธึ อุปสมฺปนฺโน เอกโต สชฺฌายํ กโรนฺโต [Pg.10] เตน สทฺธึเยว ภณติ, อนาปตฺติ. อนุปสมฺปนฺนสฺส สนฺติเก อุทฺเทสํ คณฺหนฺตสฺสปิ เตน สทฺธึ เอกโต ภณนฺตสฺส อนาปตฺติ. อยมฺปิ หิ เอกโต สชฺฌายํ กโรติจฺเจว สงฺขฺยํ คจฺฉติ. यावर हा निर्णय आहे – उपसंपन्न (भिक्खू) आणि अनुपसंपन्न (सामणेर किंवा गृहस्थ) बसून पाठ म्हणवून घेतात. आचार्य ‘मी बसलेल्यांना शिकवतो’ असा विचार करून त्यांच्यासोबत एकत्र (एकाच वेळी) म्हणतो, तर आचार्याला आपत्ती होते. परंतु अनुपसंपन्नासोबत पाठ शिकणाऱ्या भिक्खूला अनापत्ती (दोष नाही) होते. दोघेही उभे राहून शिकत असतील, तरी हाच नियम लागू होतो. जर तरुण भिक्खू बसलेला असेल आणि सामणेर उभा असेल, तर ‘मी बसलेल्याला शिकवतो’ असा विचार करून म्हणणाऱ्या आचार्याला अनापत्ती होते. जर तरुण भिक्खू उभा असेल आणि दुसरा (सामणेर) बसलेला असेल, तर ‘मी उभ्या असलेल्याला शिकवतो’ असा विचार करून म्हणणाऱ्या आचार्याला देखील अनापत्ती होते. जर अनेक भिक्खूंच्या मध्ये एक सामणेर बसलेला असेल, आणि तो बसलेला असताना शब्दाशब्दाने धर्माचे अध्यापन करणाऱ्या आचार्याला अचित्तक आपत्ती (अजाणतेपणी होणारा दोष) होते. जर तो सामणेर उपचाराची (१२ हातांचे अंतर) मर्यादा सोडून उभा किंवा बसलेला असेल, तर ज्यांना आचार्य शिकवत आहेत त्यांच्यात तो समाविष्ट न झाल्यामुळे, तो एका बाजूला राहून ‘पलायनक ग्रंथ’ (बाहेरून ऐकून शिकणे) शिकत आहे असे मानले जाते, म्हणून अनापत्ती होते. एकत्र सज्झाय (पाठपठण) करत असताना देखील, अनुपसंपन्नासोबत उपसंपन्न भिक्खू एकत्र सज्झाय करत असताना जर त्याच्यासोबतच म्हणत असेल, तर अनापत्ती होते. अनुपसंपन्नाच्या जवळ पाठ शिकत असताना देखील, त्याच्यासोबत एकत्र म्हणणाऱ्या भिक्खूला अनापत्ती होते. कारण हा देखील ‘एकत्र सज्झाय करत आहे’ असेच मानले जाते. เยภุยฺเยน ปคุณํ คนฺถํ ภณนฺตํ โอปาเตตีติ สเจ เอกคาถาย เอโก ปาโท น อาคจฺฉติ, เสสํ อาคจฺฉติ, อยํ เยภุยฺเยน ปคุณคนฺโถ นาม. เอเตน นเยน สุตฺเตปิ เวทิตพฺโพ. ตํ โอปาเตนฺตสฺส เอวํ ภณาหีติ เอกโตปิ ภณนฺตสฺส อนาปตฺติ. โอสาเรนฺตํ โอปาเตตีติ สุตฺตํ อุจฺจาเรนฺตํ ปริสมชฺเฌ ปริสงฺกมานํ เอวํ วเทหีติ เตน สทฺธึ เอกโตปิ วทนฺตสฺส อนาปตฺติ. ยํ ปน มหาปจฺจริยาทีสุ ‘‘มยา สทฺธึ มา วทา’’ติ วุตฺโต ยทิ วทติ, ‘‘อนาปตฺตี’’ติ วุตฺตํ, ตํ มหาอฏฺฐกถายํ นตฺถิ, นตฺถิภาโวเยว จสฺส ยุตฺโต. กสฺมา? กิริยสมุฏฺฐานตฺตา. อิตรถา หิ กิริยากิริยํ ภเวยฺย. เสสํ อุตฺตานตฺถเมว. ‘बहुतांश पाठ असलेल्या ग्रंथाचे पठण करणाऱ्याला पूर्ण करण्यास मदत करणे’ म्हणजे जर एका गाथेचा एक चरण आठवत नसेल, आणि उर्वरित चरण आठवत असतील, तर याला ‘बहुतांश पाठ असलेला ग्रंथ’ म्हणतात. याच नियमाने सुत्ताच्या (गद्य पाठाच्या) बाबतीतही समजून घ्यावे. तो पाठ पूर्ण करून देणाऱ्या भिक्खूने ‘असे म्हण’ असे सांगून एकत्र जरी म्हटले, तरी अनापत्ती होते. ‘पठण करणाऱ्याला सावरून पूर्ण करणे’ म्हणजे सुत्ताचे पठण करताना सभेच्या मध्ये अडखळणाऱ्या सामणेराला ‘असे म्हण’ असे सांगून त्याच्यासोबत एकत्र जरी म्हटले, तरी अनापत्ती होते. परंतु महापंचरी इत्यादी अट्टकथांमध्ये जे म्हटले आहे की, ‘माझ्यासोबत म्हणू नकोस’ असे आचार्यांनी सांगितल्यावरही जर सामणेर एकत्र म्हणत असेल, तर ‘अनापत्ती होते’, ते महाअट्टकथेत नाही; आणि त्याचे महाअट्टकथेत नसणेच योग्य आहे. कारण काय? कारण हा नियम क्रिया-समुत्थान (कृतीतून उद्भवणारा) आहे. अन्यथा हा नियम क्रिया-अक्रिया होईल. उर्वरित शब्दांचा अर्थ स्पष्टच आहे. ปทโสธมฺมสมุฏฺฐานํ – วาจโต จ วาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. पदसोधम्म (शब्दाशब्दाने धर्म शिकवण्याच्या) नियमाचे समुत्थान (उद्भव) – हे वाणीने आणि वाणी-चित्ताने उद्भवते; हे क्रियात्मक आहे, संज्ञेच्या अभावाने मुक्ती न देणारे (अजाणतेपणीही दोष लागणारे) आहे, अचित्तक आहे, प्रज्ञप्तिवद्य (बुद्धांनी नियम केल्यामुळे दोष ठरलेले) आहे, वचीकर्म आहे, तीन चित्तांनी युक्त आणि तीन वेदनांनी युक्त आहे. ปทโสธมฺมสิกฺขาปทํ จตุตฺถํ. चौथे पदसोधम्म सिक्खापद समाप्त. ๕. สหเสยฺยสิกฺขาปทวณฺณนา ५. सहसेय्य सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๔๙. ปญฺจมสิกฺขาปเท – มุฏฺฐสฺสตี อสมฺปชานาติ ปุพฺพภาเค สติสมฺปชญฺญสฺส อกรณวเสเนตํ วุตฺตํ, ภวงฺโคติณฺณกาเล ปน กุโต สติสมฺปชญฺญนฺติ! วิกูชมานาติ วิปฺปลปมานา. กากจฺฉมานาติ นาสาย กากสทฺทํ วิย นิรตฺถกสทฺทํ มุญฺจมานา. อุปาสกาติ ปฐมตรํ อุฏฺฐิตอุปาสกา. ४९. पाचव्या सिक्खापदात – ‘स्मृती गमावलेला आणि सजग नसलेला’ हे शब्द झोपण्यापूर्वीच्या पूर्वभागात स्मृती आणि संप्रजन्य (सजयता) न ठेवल्याच्या संदर्भात म्हटले आहे, कारण भवांगात (गाढ झोपेत) गेल्यावर स्मृती आणि संप्रजन्य कोठून असणार! ‘विकूजमाना’ म्हणजे झोपेत बरळणारे. ‘काकच्छमाना’ म्हणजे नाकातून कावळ्याच्या आवाजासारखा निरर्थक आवाज काढणारे (घोरणारे). ‘उकपासका’ म्हणजे (भिक्खूंच्या आधी) सर्वात आधी उठलेले उपासक. ๕๐. เอตทโวจุนฺติ ‘‘ภควตา อาวุโส ราหุล สิกฺขาปทํ ปญฺญตฺต’’นฺติ ภิกฺขู สิกฺขาปทคารเวเนว เอตํ อโวจุํ. ปกติยา ปน เต ภควติ จ คารเวน อายสฺมโต จ ราหุลสฺส สิกฺขากามตาย ตสฺส อายสฺมโต วสนฏฺฐานํ อาคตสฺส จูฬมญฺจกํ วา อปสฺเสนํ วา ยํ อตฺถิ ตํ ปญฺญเปตฺวา จีวรํ วา อุตฺตราสงฺคํ วา อุสฺสีสกรณตฺถาย เทนฺติ[Pg.11]. ตตฺริทํ ตสฺสายสฺมโต สิกฺขากามตาย – ภิกฺขู กิร ตํ ทูรโตว อาคจฺฉนฺตํ ทิสฺวา มุฏฺฐิสมฺมุญฺชนิญฺจ กจวรฉฑฺฑนกญฺจ พหิ ขิปนฺติ. อถญฺเญหิ ‘‘อาวุโส เกนิทํ ปาติต’’นฺติ วุตฺเต อญฺเญ เอวํ วทนฺติ – ‘‘ภนฺเต, ราหุโล อิมสฺมึ ปเทเส สญฺจริ, เตน นุ โข ปาติต’’นฺติ. โส ปนายสฺมา ‘‘น มยฺหํ ภนฺเต อิทํ กมฺม’’นฺติ เอกทิวสมฺปิ อวตฺวา ตํ ปฏิสาเมตฺวา ภิกฺขู ขมาเปตฺวา คจฺฉติ. วจฺจกุฏิยา เสยฺยํ กปฺเปสีติ ตํเยว สิกฺขากามตํ อนุพฺรูหนฺโต ธมฺมเสนาปติมหาโมคฺคลฺลานอานนฺทตฺเถราทีนํ สนฺติกํ อคนฺตฺวา ภควโต วฬญฺชนกวจฺจกุฏิยํ เสยฺยํ กปฺเปสิ. สา กิร กุฏิ กวาฏพทฺธา คนฺธปริภณฺฑกตา สโมสริตปุปฺผทามา เจติยฏฺฐานมิว ติฏฺฐติ, อปริโภคา อญฺเญสํ. ५०. ‘असे म्हणाले’ म्हणजे – ‘हे आयुष्यमान राहुल, भगवंतांनी सिक्खापद प्रज्ञप्त (लागू) केले आहे,’ असे भिक्खूंनी केवळ सिक्खापदावरील आदरापोटीच म्हटले. परंतु स्वभावतःच ते भिक्खू भगवंतांवरील आदरामुळे आणि आयुष्यमान राहुलांच्या शिक्षणाची आवड (सिक्खाकामता) पाहून, ते आयुष्यमान त्यांच्या निवासस्थानी आले असता, लहान मंचक (खाट) किंवा टेकण्याचा पाट जे काही उपलब्ध असेल ते मांडून देत असत, आणि डोक्याखाली घेण्यासाठी (उशी म्हणून) आपले चीवर किंवा उत्तरासंग देत असत. त्या आयुष्यमान राहुलांच्या शिक्षणाच्या आवडीचे (सिक्खाकामतेचे) हे एक उदाहरण आहे – भिक्खू त्यांना दुरूनच येत असताना पाहून झाडू आणि कचऱ्याची टोपली बाहेर फेकून देत असत. नंतर दुसऱ्या भिक्खूंनी ‘मित्रांनो, हे कोणी टाकले?’ असे विचारल्यावर इतर भिक्खू असे म्हणत – ‘भन्ते, राहुल या भागात फिरत होते, बहुधा त्यांनीच हे टाकले असावे.’ परंतु ते आयुष्यमान (राहुल) ‘भन्ते, हे माझे काम नाही’ असे एका दिवशीही न म्हणता, ते झाडू आणि टोपली व्यवस्थित ठेवून, भिक्खूंची क्षमा मागून निघून जात असत. ‘शौचालयात (वच्चकुटीत) झोपले’ म्हणजे त्याच शिक्षणाच्या आवडीला अधिक दृढ करत, ते धर्मसेनापती (सारिपुत्त), महामौद्गल्यायन, आनंद थेर इत्यादी थोर व्यक्तींकडे न जाता, भगवंतांच्या वैयक्तिक वापराच्या शौचालयात (वच्चकुटीत) झोपले. ती कुटी दारे लावलेली, सुगंधी द्रव्यांनी लेपन केलेली, फुलांच्या माळा टांगलेली अशी चैत्यासारखी पवित्र वाटत असे आणि इतरांच्या वापरासाठी नव्हती. ๕๑. อุตฺตริทิรตฺตติรตฺตนฺติ ภควา สามเณรานํ สงฺคหกรณตฺถาย ติรตฺตํ ปริหารํ อทาสิ. น หิ ยุตฺตํ กุลทารเก ปพฺพาเชตฺวา นานุคฺคเหตุนฺติ. สหเสยฺยนฺติ เอกโต เสยฺยํ. เสยฺยาติ กายปฺปสารณสงฺขาตํ สยนมฺปิ วุจฺจติ, ยสฺมึ เสนาสเน สยนฺติ, ตมฺปิ. ตตฺถ เสนาสนํ ตาว ทสฺเสตุํ ‘‘เสยฺยา นาม สพฺพจฺฉนฺนา’’ติอาทิ วุตฺตํ. กายปฺปสารณํ ทสฺเสตุํ อนุปสมฺปนฺเน นิปนฺเน ภิกฺขุ นิปชฺชตี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตสฺมา อยเมตฺถ อตฺโถ – ‘‘เสนาสนสงฺขาตํ เสยฺยํ ปวิสิตฺวา กายปฺปสารณสงฺขาตํ เสยฺยํ กปฺเปยฺย วิทเหยฺย สมฺปาเทยฺยา’’ติ. สพฺพจฺฉนฺนาติอาทินา ปน ตสฺสา เสนาสนสงฺขาตาย เสยฺยาย ลกฺขณํ วุตฺตํ. ตสฺมา ยํ เสนาสนํ อุปริ ปญฺจหิ ฉทเนหิ อญฺเญน วา เกนจิ สพฺพเมว ปฏิจฺฉนฺนํ, อยํ สพฺพจฺฉนฺนา นาม เสยฺยา. อฏฺฐกถาสุ ปน ปากฏโวหารํ คเหตฺวา วาจุคฺคตวเสน ‘‘สพฺพจฺฉนฺนา นาม ปญฺจหิ ฉทเนหิ ฉนฺนา’’ติ วุตฺตํ. กิญฺจาปิ วุตฺตํ? อถ โข ทุสฺสกุฏิยํ วสนฺตสฺสาปิ น สกฺกา อนาปตฺติ กาตุํ, ตสฺมา ยํ กิญฺจิ ปฏิจฺฉาทนสมตฺถํ อิธ ฉทนญฺจ ปริจฺฉนฺนญฺจ เวทิตพฺพํ. ปญฺจวิธจฺฉทเนเยว หิ คยฺหมาเน ปทรจฺฉนฺเนปิ สหเสยฺยา น ภเวยฺย. ยํ ปน เสนาสนํ ภูมิโต ปฏฺฐาย ยาว ฉทนํ อาหจฺจ ปากาเรน วา อญฺเญน วา เกนจิ อนฺตมโส วตฺเถนาปิ ปริกฺขิตฺตํ, อยํ สพฺพปริจฺฉนฺนา นาม เสยฺยา. ฉทนํ อนาหจฺจ สพฺพนฺติเมน ปริยาเยน ทิยฑฺฒหตฺถุพฺเพเธน ปาการาทินา ปริกฺขิตฺตาปิ สพฺพปริจฺฉนฺนาเยวาติ กุรุนฺทฏฺฐกถายํ วุตฺตํ. ยสฺสา ปน อุปริ พหุตรํ ฐานํ ฉนฺนํ, อปฺปํ อจฺฉนฺนํ, สมนฺตโต [Pg.12] วา พหุตรํ ปริกฺขิตฺตํ, อปฺปํ อปริกฺขิตฺตํ, อยํ เยภุยฺเยน ฉนฺนา เยภุยฺเยน ปริจฺฉนฺนา นาม. อิมินา หิ ลกฺขเณน สมนฺนาคโต สเจปิ สตฺตภูมโก ปาสาโท เอกูปจาโร โหติ, สตคพฺภํ วา จตุสฺสาลํ วา, เอกเสยฺยาอิจฺเจว สงฺขฺยํ คจฺฉติ. ตํ สนฺธาย วุตฺตํ ‘‘จตุตฺเถ ทิวเส อตฺถงฺคเต สูริเย อนุปสมฺปนฺเน นิปนฺเน ภิกฺขุ นิปชฺชติ, อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสา’’ติอาทิ. ५१. तीन रात्रींपेक्षा अधिक (उत्तरिदिरात्ततिरत्तं) याविषयी भगवंतांनी सामणेरांवर अनुग्रह करण्यासाठी तीन रात्रींची सवलत दिली. कारण कुलपुत्रांना प्रव्रजित करून त्यांच्यावर अनुग्रह न करणे योग्य नाही. 'सहशय्या' म्हणजे एकत्र झोपणे. 'शय्या' म्हणजे शरीराचे प्रसरण (पसरणे) रूपी झोपणे देखील म्हटले जाते, आणि ज्या शयनासनावर झोपतात, त्यालाही शय्या म्हणतात. त्यापैकी, शयनासन दर्शवण्यासाठी 'शय्या म्हणजे पूर्णपणे झाकलेली' इत्यादी म्हटले आहे. शरीराचे प्रसरण दर्शवण्यासाठी 'अनुपसंपन्न निजलेला असताना भिक्खू निजतो' इत्यादी म्हटले आहे. म्हणून येथे हा अर्थ आहे - 'शयनासन नावाच्या शय्येत प्रवेश करून शरीराचे प्रसरण रूपी शय्या करावी (झोपावे).' परंतु 'सब्बच्छन्ना' (पूर्णपणे झाकलेली) इत्यादी शब्दांनी त्या शयनासनरूपी शय्येचे लक्षण सांगितले आहे. म्हणून जे शयनासन वरून पाच प्रकारच्या छतांनी किंवा इतर कोणत्याही छताने पूर्णपणे झाकलेले असते, त्याला 'सब्बच्छन्ना' (पूर्णपणे आच्छादित) शय्या म्हणतात. परंतु अट्ठकथांमध्ये प्रसिद्ध व्यवहाराला धरून पाठाच्या सुलभतेसाठी 'सब्बच्छन्ना म्हणजे पाच प्रकारच्या छतांनी झाकलेली' असे म्हटले आहे. जरी असे म्हटले असले, तरी कापडाच्या कुटीत (तंबूत) राहणाऱ्यालाही आपत्तीपासून मुक्त करणे शक्य नाही, म्हणून येथे आच्छादन करण्यास समर्थ असलेले कोणतेही छत आणि आवरण (भिंत) ग्रहण करावे असे समजावे. कारण जर केवळ पाच प्रकारचीच छते घेतली, तर लाकडाच्या फळ्यांनी झाकलेल्या घरातही सहशय्या होणार नाही. परंतु जे शयनासन जमिनीपासून छतापर्यंत भिंतीने किंवा इतर कशाने, अगदी कापडाने सुद्धा पूर्णपणे वेढलेले असते, त्याला 'सब्बपरिच्छन्ना' (पूर्णपणे वेढलेली) शय्या म्हणतात. छताला स्पर्श न करता, सभोवताली दीड हात उंचीच्या भिंतीने वेढलेले असले तरी ती 'सब्बपरिच्छन्ना'च आहे, असे कुरुन्द अट्ठकथेमध्ये म्हटले आहे. परंतु ज्या शयनासनाचा वरचा बहुतांश भाग झाकलेला असतो आणि थोडा भाग उघडा असतो, किंवा सभोवतालचा बहुतांश भाग वेढलेला असतो आणि थोडा भाग उघडा असतो, त्याला 'येभुय्येन छन्ना' (बहुतांश झाकलेली) किंवा 'येभुय्येन परिच्छन्ना' (बहुतांश वेढलेली) म्हणतात. या लक्षणांनी युक्त असलेला सात मजली प्रासाद जरी असला, तरी तो एकाच उपचाराचा (परिसराचा) असेल, किंवा शंभर खोल्यांची धर्मशाळा (चतुःशाल विहार) असली, तरी ती 'एकशय्या' (एकच शय्या) याच संज्ञेस पात्र ठरते. त्यालाच उद्देशून म्हटले आहे: 'चौथ्या दिवशी सूर्य मावळल्यावर अनुपसंपन्न निजलेला असताना जर भिक्खू निजतो, तर पाचित्तिय आपत्ती होते' इत्यादी. ตตฺถ จ นิปชฺชนมตฺเตเนว ปาจิตฺติยํ. สเจ ปน สมฺพหุลา สามเณรา, เอโก ภิกฺขุ, สามเณรคณนาย ปาจิตฺติยา. เต เจ อุฏฺฐายุฏฺฐาย นิปชฺชนฺติ, เตสํ ปโยเค ปโยเค ภิกฺขุสฺส อาปตฺติ. ภิกฺขุสฺส อุฏฺฐายุฏฺฐาย นิปชฺชเน ปน ภิกฺขุสฺเสว ปโยเคน ภิกฺขุสฺส อาปตฺติ. สเจ ปน สมฺพหุลา ภิกฺขู เอโก สามเณโร สพฺเพสํ อาปตฺตึ กโรติ, ตสฺส อุฏฺฐายุฏฺฐาย นิปชฺชเนนปิ ภิกฺขูนํ อาปตฺติเยว. อุภเยสํ สมฺพหุลภาเวปิ เอเสว นโย. त्यात केवळ निजण्यानेच पाचित्तिय आपत्ती होते. परंतु जर अनेक सामणेर असतील आणि एक भिक्खू असेल, तर सामणेरांच्या संख्येनुसार पाचित्तिय आपत्ती होतात. जर ते पुन्हा पुन्हा उठून निजतात, तर त्यांच्या प्रत्येक प्रयत्नागणिक भिक्खूला आपत्ती होते. परंतु भिक्खूने पुन्हा पुन्हा उठून निजल्यास, भिक्खूच्या स्वतःच्याच प्रयत्नाने भिक्खूला आपत्ती होते. जर अनेक भिक्खू आणि एक सामणेर असेल, तर तो सर्वांना आपत्तीकारक ठरतो; त्याच्या पुन्हा पुन्हा उठून निजण्याने देखील सर्व भिक्खूंना आपत्तीच होते. दोन्ही बाजूला अनेक (भिक्खू आणि सामणेर) असल्यासही हाच नियम लागू होतो. อปิเจตฺถ เอกาวาสาทิกมฺปิ จตุกฺกํ เวทิตพฺพํ. โย หิ เอกสฺมึ อาวาเส เอเกเนว อนุปสมฺปนฺเนน สทฺธึ ติรตฺตํ สหเสยฺยํ กปฺเปติ, ตสฺส จตุตฺถทิวสโต ปฏฺฐาย เทวสิกา อาปตฺติ. โยปิ เอกสฺมึเยว อาวาเส นานาอนุปสมฺปนฺเนหิ สทฺธึ ติรตฺตํ สหเสยฺยํ กปฺเปติ, ตสฺสปิ. โยปิ นานาอาวาเสสุ เอเกเนว อนุปสมฺปนฺเนน สทฺธึ ติรตฺตํ สหเสยฺยํ กปฺเปติ, ตสฺสปิ. โยปิ นานาอาวาเสสุ นานาอนุปสมฺปนฺเนหิ สทฺธึ โยชนสตมฺปิ คนฺตฺวา สหเสยฺยํ กปฺเปติ, ตสฺสปิ จตุตฺถทิวสโต ปฏฺฐาย เทวสิกา อาปตฺติ. शिवाय, येथे 'एकावास' (एकच विहार) इत्यादी चार प्रकारचा गट (चतुष्क) समजून घ्यावा. जो भिक्खू एकाच विहारात एकाच अनुपसंपन्नासोबत तीन रात्री एकत्र शयन करतो, त्याला चौथ्या दिवसापासून दररोज आपत्ती होते. जो भिक्खू एकाच विहारात वेगवेगळ्या अनुपसंपन्नांसोबत तीन रात्री एकत्र शयन करतो, त्यालाही (चौथ्या दिवसापासून दररोज आपत्ती होते). जो भिक्खू वेगवेगळ्या विहारांमध्ये एकाच अनुपसंपन्नासोबत तीन रात्री एकत्र शयन करतो, त्यालाही (चौथ्या दिवसापासून दररोज आपत्ती होते). जो भिक्खू वेगवेगळ्या विहारांमध्ये वेगवेगळ्या अनुपसंपन्नांसोबत शंभर योजने दूर जाऊनही एकत्र शयन करतो, त्यालाही चौथ्या दिवसापासून दररोज आपत्ती होते. อยญฺจ สหเสยฺยาปตฺติ นาม ‘‘ภิกฺขุํ ฐเปตฺวา อวเสโส อนุปสมฺปนฺโน นามา’’ติ วจนโต ติรจฺฉานคเตนปิ สทฺธึ โหติ, ตตฺร ติรจฺฉานคตสฺส ปริจฺเฉโท เมถุนธมฺมาปตฺติยา วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. ตสฺมา สเจปิ โคธาพิฬาลมงฺคุสาทีสุ โกจิ ปวิสิตฺวา ภิกฺขุโน วสนเสนาสเน เอกูปจารฏฺฐาเน สยติ, สหเสยฺยาว โหติ. आणि ही 'सहशय्या आपत्ती' 'भिक्खूला सोडून उर्वरित सर्व अनुपसंपन्न आहेत' या वचनानुसार तिर्यंच प्राण्यांसोबत निजल्याने देखील होते. तेथे तिर्यंच प्राण्यांची मर्यादा मैथुनधर्म आपत्तीमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावी. म्हणून, जर घोरपड, मांजर, मुंगूस इत्यादींपैकी कोणताही प्राणी भिक्खूच्या राहण्याच्या शयनासनात एकाच उपचाराच्या ठिकाणी येऊन निजला, तर सहशय्याच होते. ยทิ ปน ถมฺภานํ อุปริ กตปาสาทสฺส อุปริมตเลน สทฺธึ อสมฺพทฺธภิตฺติกสฺส ภิตฺติยา อุปริ ฐิตสุสิรตุลาสีสสฺส สุสิเรน ปวิสิตฺวา ตุลาย อพฺภนฺตเร สยิตฺวา เตเนว สุสิเรน นิกฺขมิตฺวา คจฺฉติ, เหฏฺฐาปาสาเท [Pg.13] สยิตภิกฺขุสฺส อนาปตฺติ. สเจ ฉทเน ฉิทฺทํ โหติ, เตน ปวิสิตฺวา อนฺโตฉทเน วสิตฺวา เตเนว ปกฺกมติ, นานูปจาเร อุปริมตเล ฉทนพฺภนฺตเร สยิตสฺส อาปตฺติ, เหฏฺฐิมตเล สยิตสฺส อนาปตฺติ. สเจ อนฺโตปาสาเทเนว อาโรหิตฺวา สพฺพตลานิ ปริภุญฺชนฺติ, เอกูปจารานิ โหนฺติ, เตสุ ยตฺถ กตฺถจิ สยิตสฺส อาปตฺติ. परंतु, जर खांबांवर बांधलेल्या प्रासादाच्या वरच्या मजल्याशी न जोडलेल्या भिंतीच्या वर असलेल्या पोकळ तुळईच्या छिद्रातून आत शिरून, तुळईच्या आत निजून, त्याच छिद्रातून बाहेर पडून निघून गेला, तर खालच्या मजल्यावर निजलेल्या भिक्खूला आपत्ती होत नाही. जर छताला छिद्र असेल, आणि त्यातून आत शिरून छताच्या आत राहून त्याच छिद्रातून निघून गेला, तर भिन्न उपचार असलेल्या वरच्या मजल्यावर छताच्या आत निजलेल्या भिक्खूला आपत्ती होते, परंतु खालच्या मजल्यावर निजलेल्या भिक्खूला आपत्ती होत नाही. जर प्रासादाच्या आतूनच वर चढून सर्व मजल्यांचा वापर केला जात असेल, तर ते सर्व मजले एकाच उपचाराचे मानले जातात; अशा वेळी त्यांपैकी कोणत्याही मजल्यावर निजल्यास आपत्ती होते. สภาสงฺเขเปน กเต อฑฺฒกุฏฺฏกเสนาสเน สยิตสฺส วาฬสงฺฆาฏาทีสุ กโปตาทโย ปวิสิตฺวา สยนฺติ, อาปตฺติเยว. ปริกฺเขปสฺส พหิคเต นิพฺพโกสพฺภนฺตเร สยนฺติ, อนาปตฺติ. ปริมณฺฑลํ วา จตุรสฺสํ วา เอกจฺฉทนาย คพฺภมาลาย สตคพฺภํ เจปิ เสนาสนํ โหติ, ตตฺร เจ เอเกน สาธารณทฺวาเรน ปวิสิตฺวา วิสุํ ปากาเรน อปริจฺฉินฺนคพฺภูปจาเร สพฺพคพฺเภ ปวิสนฺติ, เอกคพฺเภปิ อนุปสมฺปนฺเน นิปนฺเน สพฺพคพฺเภสุ นิปนฺนานํ อาปตฺติ. สเจ สปมุขา คพฺภา โหนฺติ, ปมุขสฺส อุปริ อจฺฉนฺนํ อุจฺจวตฺถุกํ เจปิ โหติ, ปมุเข สยิโต คพฺเภ สยิตานํ อาปตฺตึ น กโรติ. สเจ ปน คพฺภจฺฉทเนเนว สทฺธึ สมฺพทฺธจฺฉทนํ โหติ, ตตฺร สยิโต สพฺเพสํ อาปตฺตึ กโรติ. กสฺมา? สพฺพจฺฉนฺนตฺตา สพฺพปริจฺฉนฺนตฺตา จ, คพฺภปริกฺเขโปเยว หิสฺส ปริกฺเขโปติ. เอเตเนว หิ นเยน อฏฺฐกถาสุ โลหปาสาทปริกฺเขปสฺส จตูสุ ทฺวารโกฏฺฐเกสุ อาปตฺติ วุตฺตา. सभेच्या आकाराने बनवलेल्या अर्ध्या भिंतीच्या शयनासनात निजलेल्या भिक्खूच्या वर, हिंस्त्र प्राण्यांच्या आकृत्या कोरलेल्या तुळयांवर इत्यादी ठिकाणी जर कबूतर इत्यादी पक्षी येऊन निजले, तर आपत्तीच होते. परंतु जर ते आच्छादनाच्या बाहेर असलेल्या छपराच्या कडांच्या आत निजले, तर अनापत्ती होते. गोल किंवा चौकोनी आकाराचे, एकाच छताखाली खोल्यांच्या रांगेने युक्त शंभर खोल्यांचे जरी शयनासन असले, आणि तेथे जर एकाच सामायिक दारातून प्रवेश करून, स्वतंत्र भिंतीने न विभागलेल्या खोल्यांच्या परिसरात सर्व खोल्यांमध्ये प्रवेश करता येत असेल, तर एका खोलीत जरी अनुपसंपन्न निजला, तरी सर्व खोल्यांमध्ये निजलेल्या भिक्खूंना आपत्ती होते. जर खोल्या ओसरीसह असतील, आणि ओसरीच्या वर छत नसेल व ती उंच पायावर बांधलेली असली, तरी ओसरीत निजलेला अनुपसंपन्न खोल्यांमध्ये निजलेल्या भिक्खूंना आपत्तीकारक ठरत नाही. परंतु जर खोलीच्या छताशीच जोडलेले ओसरीचे छत असेल, तर तेथे निजलेला अनुपसंपन्न सर्वांना आपत्तीकारक ठरतो. कारण काय? कारण ते पूर्णपणे आच्छादित आणि पूर्णपणे वेढलेले असते; कारण खोलीचे कुंपण (भिंत) हेच त्या ओसरीचे कुंपण असते. याच नियमाने अट्ठकथांमध्ये लोहप्रासादाच्या कुंपणाच्या चारही प्रवेशद्वारांच्या खोल्यांमध्ये आपत्ती सांगितली आहे. ยํ ปน อนฺธกฏฺฐกถายํ ‘‘อปริกฺขิตฺเต ปมุเข อนาปตฺตีติ ภูมิยํ วินา ชคติยา ปมุขํ สนฺธาย กถิน’’นฺติ วุตฺตํ, ตํ อนฺธกรฏฺเฐ ปาเฏกฺกสนฺนิเวสา เอกจฺฉทนา คพฺภปาฬิโย สนฺธาย วุตฺตํ. ยญฺจ ตตฺถ ‘‘ภูมิยํ วินา ชคติยา’’ติ วุตฺตํ, ตํ เนว อฏฺฐกถาสุ อตฺถิ; น ปาฬิยา สเมติ. ทสหตฺถุพฺเพธาปิ หิ ชคติ ปริกฺเขปสงฺขฺยํ น คจฺฉติ. ตสฺมา ยมฺปิ ตตฺถ ทุติยสิกฺขาปเท ชคติยา ปมาณํ วตฺวา ‘‘เอตํ เอกูปจารํ ปริจฺฉนฺนํ นาม โหตี’’ติ วุตฺตํ, ตํ น คเหตพฺพํ. เยปิ เอกสาลทฺวิสาลติสาลจตุสฺสาลสนฺนิเวสา มหาปาสาทา เอกสฺมึ โอกาเส ปาเท โธวิตฺวา ปวิฏฺเฐน สกฺกา โหนฺติ สพฺพตฺถ อนุปริคนฺตุํ, เตสุปิ สหเสยฺยาปตฺติยา น มุจฺจติ. สเจ ตสฺมึ ตสฺมึ ฐาเน อุปจารํ ปริจฺฉินฺทิตฺวา กตา โหนฺติ, เอกูปจารฏฺฐาเนเยว อาปตฺติ. परंतु, अंधक-अट्ठकथेमध्ये जे 'कुंपण नसलेल्या ओसरीवर (प्रमुखावर) आपत्ती होत नाही' असे जमिनीशिवाय जगतीवर (ओट्यावर) असलेल्या ओसरीला उद्देशून म्हटले आहे, ते अंधक देशातील स्वतंत्रपणे वसलेल्या, एकाच छताखाली असलेल्या खोल्यांच्या रांगांना उद्देशून म्हटले आहे. आणि जे तिथे 'जमिनीशिवाय जगतीवर' असे म्हटले आहे, ते प्राचीन अट्ठकथांमध्ये आढळत नाही; तसेच ते पाळीशी (मूळ पाठाशी) जुळत नाही. कारण दहा हात उंचीची असली तरीही जगती (ओटा) ही कुंपण किंवा भिंत म्हणून गणली जात नाही. त्यामुळे, तिथे दुसऱ्या सिक्खापदात जगतीचे प्रमाण सांगून 'हे एक उपचार (परिसर) असलेले आच्छादित स्थान होते' असे जे काही म्हटले आहे, ते स्वीकारू नये. जे एक-शाळा, द्वि-शाळा, त्रि-शाळा किंवा चतुःशाळा रचनेचे मोठे प्रासाद आहेत, जिथे एका ठिकाणी पाय धुवून प्रवेश केल्यावर सर्व ठिकाणी फिरणे शक्य होते, तिथे देखील सहशय्या आपत्तीपासून सुटका होत नाही. जर त्या त्या ठिकाणी उपचार (परिसर) मर्यादित करून बनवले असतील, तर एकाच उपचाराच्या ठिकाणीच आपत्ती होते. ทฺวีหิ [Pg.14] ทฺวาเรหิ ยุตฺตสฺส สุธาฉทนมณฺฑปสฺส มชฺเฌ ปาการํ กโรนฺติ, เอเกน ทฺวาเรน ปวิสิตฺวา เอกสฺมึ ปริจฺเฉเท อนุปสมฺปนฺโน สยติ, เอกสฺมึ ภิกฺขุ, อนาปตฺติ. ปากาเร โคธาทีนํ ปวิสนมตฺตมฺปิ ฉิทฺทํ โหติ, เอกสฺมิญฺจ ปริจฺเฉเท โคธา สยนฺติ, อนาปตฺติเยว. น หิ ฉิทฺเทน เคหํ เอกูปจารํ นาม โหติ. สเจ ปาการมชฺเฌ ฉินฺทิตฺวา ทฺวารํ โยเชนฺติ, เอกูปจารตาย อาปตฺติ. ตํ ทฺวารํ กวาเฏน ปิทหิตฺวา สยนฺติ, อาปตฺติเยว. น หิ ทฺวารปิทหเนน เคหํ นานูปจารํ นาม โหติ, ทฺวารํ วา อทฺวารํ. กวาฏญฺหิ สํวรณวิวรเณหิ ยถาสุขํ วฬญฺชนตฺถาย กตํ, น วฬญฺชนูปจฺเฉทนตฺถาย. สเจ ปน ตํ ทฺวารํ ปุน อิฏฺฐกาหิ ปิทหนฺติ, อทฺวารํ โหติ, ปุริเม นานูปจารภาเวเยว ติฏฺฐติ. ทีฆปมุขํ เจติยฆรํ โหติ. เอกํ กวาฏํ อนฺโต, เอกํ พหิ, ทฺวินฺนํ กวาฏานํ อนฺตเร อนุปสมฺปนฺโน อนฺโตเจติยฆเร สยนฺตสฺส อาปตฺตึ กโรติ, เอกูปจารตฺตา. दोन दरवाजे असलेल्या, चुन्याचे छत असलेल्या मंडपाच्या मध्ये जर भिंत बांधली, आणि एका दरवाजाने प्रवेश करून एका भागात अनुपसंपन्न झोपला व दुसऱ्या भागात भिक्खू झोपला, तर आपत्ती होत नाही. भिंतीमध्ये घोरपड इत्यादी प्राणी शिरू शकतील एवढे छिद्र असेल, आणि एका भागात घोरपडी झोपत असतील, तरीही आपत्ती होत नाही. कारण छिद्रामुळे घर 'एक उपचार' (एकच परिसर) बनत नाही. जर भिंतीच्या मध्ये तोडून दरवाजा बसवला, तर एक उपचार झाल्यामुळे आपत्ती होते. तो दरवाजा कवाडाने (दार लावून) बंद करून झोपले, तरीही आपत्ती होतेच. कारण दरवाजा बंद केल्याने घर 'नानोपचार' (भिन्न परिसर) बनत नाही, किंवा तो दरवाजा 'अ-दरवाजा' (दरवाजा नसलेला) होत नाही. कारण कवाड हे सोयीनुसार उघडण्या-बंद करण्याच्या वापरासाठी बनवले जाते, वापर पूर्णपणे बंद करण्यासाठी नाही. पण जर तो दरवाजा पुन्हा विटांनी बंद केला, तर तो 'अ-दरवाजा' होतो, आणि पूर्वीच्या 'नानोपचार' (भिन्न परिसर) स्थितीतच राहतो. लांब ओसरी असलेले चैत्यगृह असते. एक कवाड आत आणि एक कवाड बाहेर असते. दोन कवाडांच्या मध्ये अनुपसंपन्न असेल, तर चैत्यगृहाच्या आत झोपणाऱ्या भिक्खूला आपत्ती होते, कारण ते एकच उपचार (परिसर) आहे. ตตฺร ยสฺส ‘‘สิยา อยํ เอกูปจารนานูปจารตา นาม อุโทสิตสิกฺขาปเท วุตฺตา, อิธ ปน ‘เสยฺยา นาม สพฺพจฺฉนฺนา สพฺพปริจฺฉนฺนา เยภุยฺเยน ฉนฺนา เยภุยฺเยน ปริจฺฉนฺนา’ติ เอตฺตกเมว วุตฺตํ, ปิหิตทฺวาโร จ คพฺโภ สพฺพปริจฺฉนฺโนว โหติ. ตสฺมา ตตฺถ อนฺโต สยิเตเนว สทฺธึ อาปตฺติ, พหิ สยิเตน อนาปตฺตี’’ติ. โส เอวํ วตฺตพฺโพ – ‘‘อปิหิตทฺวาเร ปน กสฺมา พหิ สยิเตน อาปตฺตี’’ติ? ปมุขสฺส คพฺเภน สทฺธึ สพฺพจฺฉนฺนตฺตา. ‘‘กึ ปน คพฺเภ ปิหิเต ฉทนํ วิทฺธสฺตํ โหตี’’ติ? น วิทฺธสฺตํ, คพฺเภน สทฺธึ ปมุขสฺส สพฺพปริจฺฉนฺนตา น โหติ. ‘‘กึ ปริกฺเขโป วิทฺธสฺโต’’ติ? อทฺธา วกฺขติ ‘‘น วิทฺธสฺโต, กวาเฏน อุปจาโร ปริจฺฉนฺโน’’ติ. เอวํ ทูรมฺปิ คนฺตฺวา ปุน เอกูปจารนานูปจารตํเยว ปจฺจาคมิสฺสติ. त्यावर जर कोणाची अशी शंका असेल की: 'हे एक-उपचार आणि नानोपचार असणे उदोसित-सिक्खापदात सांगितले आहे. पण इथे तर 'शय्या म्हणजे पूर्णपणे आच्छादित, पूर्णपणे वेढलेली, बहुतांश आच्छादित, बहुतांश वेढलेली' एवढेच म्हटले आहे. आणि बंद दरवाजा असलेली खोली ही पूर्णपणे वेढलेलीच असते. त्यामुळे, तिथे आत झोपलेल्या अनुपसंपन्नासोबतच आपत्ती होईल, बाहेर झोपलेल्यासोबत नाही.' त्याला असे विचारले पाहिजे: 'पण दरवाजा उघडा असताना बाहेर झोपलेल्यासोबत आपत्ती का होते?' (तो उत्तर देईल:) 'कारण ओसरी खोलीसोबत पूर्णपणे आच्छादित असते.' (त्याला पुन्हा विचारावे:) 'पण खोली बंद केल्यावर छत नष्ट होते का?' (तो म्हणेल:) 'नष्ट होत नाही, पण खोलीसोबत ओसरीची पूर्णपणे वेढलेली स्थिती राहत नाही.' (पुन्हा विचारावे:) 'काय कुंपण नष्ट झाले आहे का?' तो नक्कीच असे उत्तर देईल: 'नष्ट झालेले नाही, पण कवाडाने (दाराने) उपचार (परिसर) विभक्त झाला आहे.' अशा प्रकारे कितीही दूर गेले तरी तो शेवटी 'एक-उपचार आणि नानोपचार' या सिद्धांतावरच परत येईल. อปิจ ยทิ พฺยญฺชนมตฺเตเยว อตฺโถ สุวิญฺเญยฺโย สิยา, สพฺพจฺฉนฺนาติ วจนโต ปญฺจนฺนํ อญฺญตเรน ฉทเนน ฉนฺนา เอว เสยฺยา สิยา, น อญฺเญน. เอวญฺจ สติ ปทรจฺฉนฺนาทีสุ อนาปตฺติ สิยา. ตโต ยทตฺถํ สิกฺขาปทํ ปญฺญตฺตํ, สฺเวว อตฺโถ ปริหาเยยฺย. ปริหายตุ วา มา วา, กถํ อวุตฺตํ คเหตพฺพนฺติ; โก วา วทติ ‘‘อวุตฺตํ คเหตพฺพ’’นฺติ? วุตฺตญฺเหตํ อนิยเตสุ – ‘‘ปฏิจฺฉนฺนํ นาม อาสนํ กุฏฺเฏน วา กวาเฏน วา กิลญฺเชน [Pg.15] วา สาณิปากาเรน วา รุกฺเขน วา ถมฺเภน วา โกฏฺฐลิกาย วา เยน เกนจิ ปฏิจฺฉนฺนํ โหตี’’ติ. ตสฺมา ยถา ตตฺถ เยน เกนจิ ปฏิจฺฉนฺนํ ปฏิจฺฉนฺนเมว, เอวมิธาปิ คเหตพฺพํ. ตสฺมา เสนาสนํ ขุทฺทกํ วา โหตุ มหนฺตํ วา อญฺเญน สทฺธึ สมฺพทฺธํ วา อสมฺพทฺธํ วา ทีฆํ วา วฏฺฏํ วา จตุรสฺสํ วา เอกภูมกํ วา, อเนกภูมกํ วา, ยํ ยํ เอกูปจารํ สพฺพตฺถ เยน เกนจิ ปฏิจฺฉาทเนน สพฺพจฺฉนฺเน สพฺพปริจฺฉนฺเน เยภุยฺเยน วา ฉนฺเน เยภุยฺเยน วา ปริจฺฉนฺเน สหเสยฺยาปตฺติ โหตีติ. शिवाय, जर केवळ शब्दावरूनच अर्थ समजायचा असेल, तर 'पूर्णपणे आच्छादित' या शब्दावरून पाच प्रकारच्या छतांपैकी कोणत्याही एका छताने आच्छादित असलेले स्थानच शय्या ठरेल, इतर नाही. आणि असे झाल्यास, फळ्यांनी आच्छादित केलेल्या इत्यादी स्थानांवर आपत्ती होणार नाही. त्यामुळे ज्या उद्देशासाठी हे सिक्खापद प्रज्ञप्त केले आहे, तो उद्देशच नष्ट होईल. 'उद्देश नष्ट होवो वा न होवो, जे सांगितले नाही ते कसे स्वीकारायचे?' असे जर कोणी म्हटले, तर 'जे सांगितले नाही ते स्वीकारायचे असे कोण म्हणत आहे?' कारण अनियत सिक्खापदांमध्ये भगवंतांनी असे म्हटले आहे की: 'आच्छादित आसन म्हणजे भिंत, कवाड, चटई, पडदा, झाड, खांब, कोठी किंवा इतर कोणत्याही गोष्टीने आच्छादित केलेले स्थान होय.' त्यामुळे, तिथे ज्याप्रमाणे कोणत्याही गोष्टीने आच्छादित केलेले स्थान हे आच्छादितच मानले जाते, तसेच इथेही स्वीकारले पाहिजे. त्यामुळे सेनासन (निवासस्थान) लहान असो वा मोठे, दुसऱ्याशी जोडलेले असो वा न जोडलेले, लांब असो, गोल असो, चौकोनी असो, एकमजली असो वा बहुमजली असो; जे जे एक उपचार (एकच परिसर) आहे, त्या सर्व ठिकाणी कोणत्याही प्रकारच्या आच्छादनाने पूर्णपणे आच्छादित, पूर्णपणे वेढलेल्या किंवा बहुतांश आच्छादित, बहुतांश वेढलेल्या ठिकाणी सहशय्या आपत्ती होते, असे समजावे. ๕๓. อุปฑฺฒจฺฉนฺเน อุปฑฺฒปริจฺฉนฺเน อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ เอตฺถ สพฺพจฺฉนฺเน อุปฑฺฒปริจฺฉนฺเนติ เอวมาทีสุปิ มหาปจฺจริยํ ทุกฺกฏเมวาติ วุตฺตํ. มหาอฏฺฐกถายํ ปน ‘‘สพฺพจฺฉนฺเน เยภุยฺเยนปริจฺฉนฺเน ปาจิตฺติยํ, สพฺพจฺฉนฺเน อุปฑฺฒปริจฺฉนฺเน ปาจิตฺติยํ, เยภุยฺเยนฉนฺเน อุปฑฺฒปริจฺฉนฺเน ปาจิตฺติยํ, สพฺพปริจฺฉนฺเน เยภุยฺเยนฉนฺเน ปาจิตฺติยํ, สพฺพปริฉนฺเน อุปฑฺฒจฺฉนฺเน ปาจิตฺติยํ, เยภุยฺเยนปริจฺฉนฺเน อุปฑฺฒจฺฉนฺเน ปาจิตฺติยํ, ปาฬิยํ วุตฺตปาจิตฺติเยน สทฺธึ สตฺต ปาจิตฺติยานี’’ติ วุตฺตํ. ‘‘สพฺพจฺฉนฺเน จูฬกปริจฺฉนฺเน ทุกฺกฏํ, เยภุยฺเยนฉนฺเน จูฬกปริจฺฉนฺเน ทุกฺกฏํ, สพฺพปริจฺฉนฺเน จูฬกจฺฉนฺเน ทุกฺกฏํ, เยภุยฺเยนปริจฺฉนฺเน จูฬกจฺฉนฺเน ทุกฺกฏํ, ปาฬิยํ ทุกฺกเฏน สห ปญฺจ ทุกฺกฏานี’’ติ วุตฺตํ. ५३. 'अर्धे आच्छादित आणि अर्धे वेढलेले असल्यास दुक्कट आपत्ती होते' या संदर्भात, 'पूर्णपणे आच्छादित आणि अर्धे वेढलेले' इत्यादी स्थानांमध्ये देखील महापंचरीमध्ये दुक्कट आपत्तीच सांगितली आहे. परंतु महा-अट्ठकथेमध्ये असे म्हटले आहे की: 'पूर्णपणे आच्छादित आणि बहुतांश वेढलेले असल्यास पाचित्तिय होते; पूर्णपणे आच्छादित आणि अर्धे वेढलेले असल्यास पाचित्तिय होते; बहुतांश आच्छादित आणि अर्धे वेढलेले असल्यास पाचित्तिय होते; पूर्णपणे वेढलेले आणि बहुतांश आच्छादित असल्यास पाचित्तिय होते; पूर्णपणे वेढलेले आणि अर्धे आच्छादित असल्यास पाचित्तिय होते; बहुतांश वेढलेले आणि अर्धे आच्छादित असल्यास पाचित्तिय होते. अशा प्रकारे पाळीमध्ये सांगितलेल्या पाचित्तिय आपत्तीसह एकूण सात पाचित्तिय आपत्त्या होतात.' तसेच 'पूर्णपणे आच्छादित आणि थोडेसे वेढलेले असल्यास दुक्कट होते; बहुतांश आच्छादित आणि थोडेसे वेढलेले असल्यास दुक्कट होते; पूर्णपणे वेढलेले आणि थोडेसे आच्छादित असल्यास दुक्कट होते; बहुतांश वेढलेले आणि थोडेसे आच्छादित असल्यास दुक्कट होते. अशा प्रकारे पाळीमध्ये सांगितलेल्या दुक्कट आपत्तीसह एकूण पाच दुक्कट आपत्त्या होतात' असे म्हटले आहे. ‘‘อุปฑฺฒจฺฉนฺเน จูฬกปริจฺฉนฺเน อนาปตฺติ, อุปฑฺฒปริจฺฉนฺเน จูฬกจฺฉนฺเน อนาปตฺติ, จูฬกจฺฉนฺเน จูฬกปริจฺฉนฺเน อนาปตฺติ, สพฺพจฺฉนฺเน สพฺพอปริจฺฉนฺเนติ จ เอตฺถ เสนมฺพมณฺฑปวณฺณํ โหตี’’ติ วุตฺตํ. อิมินาเปตํ เวทิตพฺพํ – ‘‘ยถา ชคติ ปริกฺเขปสงฺขย น คจฺฉตี’’ติ. เสสํ อุตฺตานตฺถเมว. 'अर्धे आच्छादित आणि थोडेसे वेढलेले असल्यास आपत्ती होत नाही; अर्धे वेढलेले आणि थोडेसे आच्छादित असल्यास आपत्ती होत नाही; थोडेसे आच्छादित आणि थोडेसे वेढलेले असल्यास आपत्ती होत नाही; आणि पूर्णपणे आच्छादित व अजिबात न वेढलेले असल्यास, इथे सेनांब-मंडपासारखी रचना होते' असे म्हटले आहे. यावरून हे देखील समजले पाहिजे की, 'ज्याप्रमाणे जगती (ओटा) ही कुंपण किंवा भिंत म्हणून गणली जात नाही.' उर्वरित भाग स्पष्ट अर्थाचाच आहे. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กายโต จ กายจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. हे एळकलोम-समुत्थान (मेंढीच्या लोकरीच्या सिक्खापदासारखे समुत्थान) आहे – हे काय (शरीर) आणि काय-चित्त (शरीर व मन) यांपासून उद्भवते; हे क्रिया-रूप आहे; यात संज्ञेमुळे (माहिती नसल्याने) मुक्ती मिळत नाही; हे अचित्तक आहे; हे पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तीचे उल्लंघन केल्याने दोषयुक्त ठरणारे) आहे; हे कायकर्म आहे; यात तीन प्रकारची चित्ते आणि तीन प्रकारच्या वेदना असतात. สหเสยฺยสิกฺขาปทํ ปญฺจมํ. पाचवे सहशय्या-सिक्खापद समाप्त. ๖. ทุติยสหเสยฺยสิกฺขาปทวณฺณนา ६. दुसऱ्या सहशय्या-सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण (वण्णना) समाप्त. ๕๕. ทุติยสหเสยฺยสิกฺขาปเท [Pg.16] – อาวสถาคารนฺติ อาคนฺตุกานํ วสนาคารํ. ปญฺญตฺตํ โหตีติ ปุญฺญกามตาย กตฺวา ฐปิตํ โหติ. เยน สา อิตฺถี เตนุปสงฺกมีติ อสุกสฺมึ นาม ฐาเน อาวสถาคารํ ปญฺญตฺตํ อตฺถีติ มนุสฺสานํ สุตฺวา อุปสงฺกมิ. คนฺธคนฺธินีติ อครุกุงฺกุมาทีนํ คนฺธานํ คนฺโธ คนฺธคนฺโธ, โส อสฺสา อตฺถีติ คนฺธคนฺธินี. สาฏกํ นิกฺขิปิตฺวาติ อปฺเปว นามสฺส อิมมฺปิ วิปฺปการํ ปสฺสนฺตสฺส ราโค อุปฺปชฺเชยฺยาติ จินฺเตตฺวา เอวมกาสิ. โอกฺขิปิตฺวาติ อโธ ขิปิตฺวา. อจฺจโยติ อปราโธ. มํ อจฺจคมาติ มํ อติกฺกมฺม อภิภวิตฺวา ปวตฺโต. เสสํ ปฐมสิกฺขาปเท วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. อยเมว หิ วิเสโส – ปฐมสิกฺขาปเท จตุตฺถทิวเส อาปตฺติ อิธ ปฐมทิวเสปิ. ยกฺขีเปตีหิ ทิสฺสมานกรูปาหิ ติรจฺฉานคติตฺถิยา จ เมถุนธมฺมวตฺถุภูตาย เอว ทุกฺกฏํ. เสสาหิ อนาปตฺติ. สมุฏฺฐานาทีนิ ปฐมสทิสาเนวาติ. ५५. दुसऱ्या सहशय्या शिक्यापदाबाबत (Dutiyasahaseyyasikkhāpade) – 'आवसथागारं' (āvasathāgāraṃ) म्हणजे आगंतुकांसाठीचे (पाहुण्यांसाठीचे) निवासस्थान (विश्रामगृह). 'पण्ञत्तं होति' (paññattaṃ hoti) म्हणजे पुण्य कमावण्याच्या इच्छेने बांधून ठेवलेले असते. 'येन सा इत्थी तेनुपसङ्कमि' (yena sā itthī tenupasaṅkamī) म्हणजे 'अमुक एका ठिकाणी विश्रामगृह तयार केले आहे' असे लोकांकडून ऐकून ती तिथे गेली. 'गन्धगन्धिनी' (gandhagandhinī) म्हणजे अगुरु, केशर इत्यादी सुवासांचा सुगंध जिच्या अंगी आहे ती. 'साटकं निक्खिपित्वा' (sāṭakaṃ nikkhipitvā) म्हणजे 'हा विकार (अवस्था) पाहून या भिक्खूच्या मनात कदाचित राग (वासना) उत्पन्न होईल' असा विचार करून तिने आपले वस्त्र बाजूला सारले (तसे केले). 'ओक्खिपित्वा' (okkhipitvā) म्हणजे खाली नजर टाकून. 'अच्चयो' (accayo) म्हणजे अपराध. 'मं अच्चगमा' (maṃ accagamā) म्हणजे मला ओलांडून किंवा माझ्यावर मात करून घडला. उर्वरित भाग पहिल्या शिक्यापदात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा. हाच काय तो फरक आहे – पहिल्या शिक्यापदात चौथ्या दिवशी आपत्ती (गुन्हा) होते, तर येथे पहिल्या दिवशीही आपत्ती होते. दृश्यमान रूप असलेल्या यक्षिणी, प्रेती आणि मैथुनधर्माचे माध्यम बनू शकणाऱ्या तिर्यंच (प्राणी) मादी यांच्यासोबत शयन करणाऱ्याला 'दुक्कट' (dukkaṭa) अपराध होतो. इतरांच्या बाबतीत अनापत्ती (अपराध नाही) आहे. समुत्थान इत्यादी सर्व पहिल्या शिक्यापदाप्रमाणेच आहेत. ทุติยสหเสยฺยสิกฺขาปทํ ฉฏฺฐํ. दुसरे सहशय्या शिक्यापद समाप्त (सहावे). ๗. ธมฺมเทสนาสิกฺขาปทวณฺณนา ७. धम्मदेसना शिक्यापदाचे स्पष्टीकरण (धम्मदेशना शिक्यापदवर्णना) ๖๐. สตฺตมสิกฺขาปเท – ฆรณีติ ฆรสามินี. นิเวสนทฺวาเรติ นิเวสนสฺส มหาทฺวาเร. ฆรสุณฺหาติ ตสฺมึ ฆเร สุณฺหา. อาวสถทฺวาเรติ โอวรกทฺวาเร. วิสฺสฏฺเฐนาติ สุนิคฺคเตน สทฺเทน. วิวเฏนาติ สุฏฺฐุ ปกาเสน อสํวุเตน. ธมฺโม เทเสตพฺโพติ อยํ สรณสีลาทิเภโท ธมฺโม กเถตพฺโพ. อญฺญาตุนฺติ อาชานิตุํ. วิญฺญุนา ปุริสวิคฺคเหนาติ วิญฺญุนา ปุริเสน, ปุริสวิคฺคหํ คเหตฺวาปิ ฐิเตน น ยกฺเขน น เปเตน น ติรจฺฉานคเตน. ६०. सातव्या शिक्यापदात – 'घरणी' (gharaṇī) म्हणजे घराची स्वामिनी (गृहस्वामिनी). 'निवेसनद्वारे' (nivesanadvāre) म्हणजे घराच्या मुख्य प्रवेशद्वारावर. 'घरसुण्हा' (gharasuṇhā) म्हणजे त्या घरातील सून. 'आवसथद्वारे' (āvasathadvāre) म्हणजे खोलीच्या दारावर. 'विस्सट्ठेन' (vissaṭṭhena) म्हणजे स्पष्टपणे बाहेर पडणाऱ्या आवाजाने. 'विवटेन' (vivaṭena) म्हणजे चांगल्या प्रकारे प्रकट झालेल्या, न झाकलेल्या आवाजाने. 'धम्मो देसेतब्बो' (dhammo desetabbo) म्हणजे शरणगमन, शील इत्यादी प्रकारचा हा धम्म सांगावा. 'अञ्ञातुं' (aññātuṃ) म्हणजे समजून घेण्यासाठी. 'विञ्ञुना पुरिसविग्गहेन' (viññunā purisaviggahena) म्हणजे सुजाण (समजदार) पुरुषाच्या उपस्थितीत; जो पुरुषाचे रूप घेऊन उभा असलेला यक्ष नाही, प्रेत नाही किंवा तिर्यंच (प्राणी) नाही, अशा सुजाण पुरुषाच्या उपस्थितीत. ๖๖. อนาปตฺติ วิญฺญุนา ปุริสวิคฺคเหนาติ วิญฺญุนา ปุริสวิคฺคเหน สทฺธึ ฐิตาย พหุมฺปิ ธมฺมํ เทเสนฺตสฺส อนาปตฺติ. ฉปฺปญฺจวาจาหีติ ฉหิ ปญฺจหิ วาจาหิ โย เทเสติ, ตสฺสปิ อนาปตฺติ. ตตฺถ เอโก คาถาปาโท เอกวาจาติ เอวํ สพฺพตฺถ วาจาปมาณํ เวทิตพฺพํ. สเจ อฏฺฐกถํ ธมฺมปทํ ชาตกาทิวตฺถุํ วา กเถตุกาโม โหติ, ฉปฺปญฺจปทมตฺตเมว กเถตุํ [Pg.17] วฏฺฏติ. ปาฬิยา สทฺธึ กเถนฺเตน เอกปทํ ปาฬิโต ปญฺจ อฏฺฐกถาโตติ เอวํ ฉ ปทานิ อนติกฺกาเมตฺวาว กเถตพฺโพ. ปทโสธมฺเม วุตฺตปฺปเภโท หิ อิธาปิ สพฺโพ ธมฺโมเยว. ตสฺมึ เทเสตีติ ตสฺมึ ขเณ เทเสติ. สมฺปทานตฺเถ วา เอตํ ภุมฺมวจนํ. ตสฺสา เทเสตีติ อตฺโถ. อญฺญิสฺสา มาตุคามสฺสาติ เอกิสฺสา เทเสตฺวา ปุน อาคตาคตาย อญฺญิสฺสาปิ เทเสตีติ เอวํ เอกาสเน นิสินฺโน มาตุคามสตสหสฺสนฺนมฺปิ เทเสตีติ อตฺโถ. มหาปจฺจริยฏฺฐกถายํ วุตฺตํ สมํ นิสินฺนานํ มาตุคามานํ ‘‘ตุมฺหากํ เอเกกิสฺสา เอเกกํ คาถํ เทเสสฺสามิ, ตํ สุณาถาติ เทเสติ, อนาปตฺติ. ปฐมํ เอเกกิสฺสา เอเกกํ คาถํ กเถสฺสามีติ อาโภคํ กตฺวา ชานาเปตฺวา กเถตุํ วฏฺฏติ, น ปจฺฉาติ. ปญฺหํ ปุจฺฉติ ปญฺหํ ปุฏฺโฐ กเถตีติ มาตุคาโม ‘‘ทีฆนิกาโย นาม ภนฺเต กิมตฺถํ ทีเปตี’’ติ ปุจฺฉติ. เอวํ ปญฺหํ ปุฏฺโฐ ภิกฺขุ สพฺพํ เจปิ ทีฆนิกายํ กเถติ, อนาปตฺติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานตฺถเมว. ६६. 'अनापत्ती विञ्ञुना पुरिसविग्गहेन' (anāpatti viññunā purisaviggahena) म्हणजे सुजाण पुरुषाच्या सोबत बसलेल्या स्त्रीला कितीही धम्म उपदेश केला तरी भिक्खूला अनापत्ती (दोष नाही) आहे. 'छप्पञ्चवाचाहि' (chappañcavācāhi) म्हणजे जो पाच किंवा सहा शब्दांत (वाक्यांत) उपदेश करतो, त्यालाही अनापत्ती आहे. त्यामध्ये, एक गाथापाद म्हणजे एक 'वाचा' (शब्द/वाक्य) असे सर्वत्र शब्दांचे प्रमाण समजावे. जर अट्ठकथा (भाष्य), धम्मपद किंवा जातक इत्यादी कथा सांगण्याची इच्छा असेल, तर केवळ पाच किंवा सहा पदेच सांगणे योग्य आहे. पाळी (मूळ मजकूर) सोबत सांगताना, एक पद पाळीतून आणि पाच पदे अट्ठकथेतून, याप्रमाणे सहा पदांचे उल्लंघन न करता सांगावे. कारण 'पदसोधम्म' शिक्यापदात सांगितलेले धम्माचे सर्व प्रकार येथेही लागू होतात. 'तस्मिं देसेति' (tasmiṃ desetī) म्हणजे त्या क्षणी उपदेश करतो. किंवा हे 'तस्मिं' सप्तमी विभक्तीचे रूप संप्रदान अर्थाने वापरले आहे, म्हणजेच 'तिला उपदेश करतो' असा याचा अर्थ आहे. 'अञ्ञिस्सा मातुगामस्स' (aññissā mātugāmassa) म्हणजे एका स्त्रीला उपदेश करून, पुन्हा पुन्हा येणाऱ्या दुसऱ्या स्त्रीलाही उपदेश करतो; या प्रकारे एकाच आसनावर बसून लाखो स्त्रियांनाही उपदेश केला तरी अनापत्ती आहे, असा याचा अर्थ आहे. 'महापच्चरी अट्ठकथा' मध्ये म्हटले आहे की, एकत्र बसलेल्या स्त्रियांना 'मी तुम्हा प्रत्येकीला एकेक गाथा सांगेन, ती ऐका' असे सांगून उपदेश केल्यास अनापत्ती आहे. सुरुवातीलाच 'मी प्रत्येकीला एकेक गाथा सांगेन' असा संकल्प करून, त्यांना याची जाणीव करून देऊन उपदेश करणे योग्य आहे, नंतर नाही. 'पण्हं पुच्छति पण्हं पुट्ठो कथेति' (pañhaṃ pucchati pañhaṃ puṭṭho katheti) म्हणजे जर एखाद्या स्त्रीने विचारले की, 'भंते, दीघनिकाय कशाचे स्पष्टीकरण करतो?' अशा प्रकारे प्रश्न विचारला असता, जर भिक्खूने संपूर्ण दीघनिकाय जरी सांगितला, तरी अनापत्ती आहे. उर्वरित सर्व भाग स्पष्ट अर्थाचाच आहे. ปทโสธมฺมสมุฏฺฐานํ – วาจโต จ วาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยากิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. पदसोधम्म शिक्यापदाप्रमाणेच याचे समुत्थान आहे – हे वाणीने आणि वाणी-चित्ताने उत्पन्न होते; हे क्रिया-अक्रियेने युक्त आहे; यात संज्ञेमुळे मुक्ती मिळत नाही (नोसञ्ञाविमोक्खं); हे अचित्तक आहे; प्रज्ञप्तीचे उल्लंघन केल्यामुळे यात दोष (पण्णत्तिवज्जं) आहे; हे वचीकर्म (वाणीचे कर्म) आहे; यात तीन चित्ते आणि तीन वेदना असतात. ธมฺมเทสนาสิกฺขาปทํ สตฺตมํ. धम्मदेशना शिक्यापद समाप्त (सातवे). ๘. ภูตาโรจนสิกฺขาปทวณฺณนา ८. भूतारोचन शिक्यापदाचे स्पष्टीकरण (भूतारोचन शिक्यापदवर्णना) ๖๗. อฏฺฐมสิกฺขาปเท – วตฺถุกถาย ตาว ยํ วตฺตพฺพํ สิยา, ตํ สพฺพํ จตุตฺถปาราชิกวณฺณนายํ วุตฺตนยเมว. อยเมว หิ วิเสโส – ตตฺถ อภูตํ อาโรเจสุํ, อิธ ภูตํ. ภูตมฺปิ ปุถุชฺชนา อาโรเจสุํ, น อริยา. อริยานญฺหิ ปยุตฺตวาจา นาม นตฺถิ, อตฺตโน คุเณ อาโรจยมาเน ปน อญฺเญ น ปฏิเสเธสุํ, ตถาอุปฺปนฺเน จ ปจฺจเย สาทิยึสุ, ตถาอุปฺปนฺนภาวํ อชานนฺตา. ६७. आठव्या शिक्यापदात – कथेच्या संदर्भात जे काही सांगायचे आहे, ते सर्व चौथ्या पाराजिक वर्णनेमध्ये (स्पष्टीकरणात) सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहे. हाच काय तो फरक आहे – तिथे असत्य (अभूत) सांगितले गेले होते, तर येथे सत्य (भूत) सांगितले गेले आहे. सत्य असूनही ते पृथग्जनांनी (सामान्य लोकांनी) सांगितले, अरियांनी (आर्य पुरुषांनी) नाही. कारण आर्यांच्या वाणीत स्वार्थाशी संबंधित (प्रयुक्त) शब्द नसतात. परंतु, जेव्हा पृथग्जन स्वतःच्या गुणांचे वर्णन करत होते, तेव्हा आर्यांनी त्यांना विरोध केला नाही, आणि त्यामुळे जे प्रत्यय (लाभ/सत्कार) उत्पन्न झाले, ते कशामुळे उत्पन्न झाले हे न जाणता त्यांनी त्यांचा स्वीकार केला. ‘‘อถ โข เต ภิกฺขู ภควโต เอตมตฺถํ อาโรเจสุ’’นฺติอาทิมฺหิ ปน เย อุตฺตริมนุสฺสธมฺมสฺส วณฺณํ ภาสึสุ, เต อาโรเจสุนฺติ เวทิตพฺพํ. ‘‘กจฺจิ ปน โว ภิกฺขเว ภูต’’นฺติ ปุจฺฉิเต ปน สพฺเพปิ ‘‘ภูตํ ภควา’’ติ ปฏิชานึสุ. อริยานมฺปิ หิ อพฺภนฺตเร ภูโต อุตฺตริมนุสฺสธมฺโมติ. อถ ภควา [Pg.18] อริยมิสฺสกตฺตา ‘‘โมฆปุริสา’’ติ อวตฺวา ‘‘กถญฺหิ นาม ตุมฺเห ภิกฺขเว’’ติ วตฺวา ‘‘อุทรสฺส การณา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ยสฺมา อริยา อญฺเญสํ สุตฺวา ‘‘อยฺโย กิร, ภนฺเต, โสตาปนฺโน’’ติอาทินา นเยน ปสนฺเนหิ มนุสฺเสหิ ปุจฺฉิยมานา อปญฺญตฺเต สิกฺขาปเท อนาทีนวทสฺสิโน สุทฺธจิตฺตตาย อตฺตโน จ ปเรสญฺจ วิเสสาธิคมํ ปฏิชานึสุ. เอวํ ปฏิชานนฺเตหิ จ เตหิ ยํ อญฺเญ อุทรสฺส การณา อุตฺตริมนุสฺสธมฺมสฺส วณฺณํ ภาสิตฺวา ปิณฺฑปาตํ อุปฺปาเทสุํ, ตํ สุทฺธจิตฺตตาย สาทิยนฺเตหิปิ อุทรสฺส การณา อุตฺตริมนุสฺสธมฺมสฺส วณฺโณ ภาสิโต วิย โหติ. ตสฺมา สพฺพสงฺคาหิเกเนว นเยน ‘‘กถญฺหิ นาม ตุมฺเห, ภิกฺขเว, อุทรสฺส การณา คิหีนํ อญฺญมญฺญํ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมสฺส วณฺณํ ภาสิสฺสถา’’ติ อาห. เสสํ จตุตฺถปาราชิกวตฺถุสทิสเมว. สิกฺขาปทวิภงฺเคปิ เกวลํ ตตฺถ ปาราชิกญฺเจว ถุลฺลจฺจยญฺจ อิธ ภูตตฺตา ปาจิตฺติยญฺเจว ทุกฺกฏญฺจ อยํ วิเสโส. เสสํ วุตฺตนยเมว. परंतु, 'अथ खो ते भिक्खू भगवतो एतमत्थं आरोचेसुं' (त्यानंतर त्या भिक्खूंनी भगवंतांना ही गोष्ट सांगितली) इत्यादी वाक्यांमध्ये, ज्यांनी उत्तरिमनुस्सधम्माच्या (लोकोत्तर गुणांच्या) महत्तेचे वर्णन केले होते, त्यांनीच ते सांगितले असे समजावे. 'हे भिक्खूंनो, हे सत्य आहे का?' असे विचारले असता, सर्वांनीच 'भगवंता, हे सत्य आहे' असे मान्य केले. कारण आर्यांच्या अंतरातही उत्तरिमनुस्सधम्म खरोखरच विद्यमान (भूत) होता. तेव्हा भगवान बुद्धांनी, आर्यांचे पृथग्जनांसोबतचे मिश्रण असल्यामुळे, त्यांना 'मोघपुरुष' (मूर्ख मनुष्य) असे न म्हणता, 'हे भिक्खूंनो, तुम्ही असे कसे करू शकता?' असे म्हणून 'उदराच्या कारणास्तव' (पोटासाठी) इत्यादी शब्द उच्चारले. तिथे, जेव्हा आर्यांनी इतरांकडून ऐकले की, 'भंते, हे आर्य तर सोतापन्न झाले आहेत' इत्यादी प्रकारे श्रद्धाळू लोकांनी विचारले असता, शिक्यापद प्रज्ञप्त (लागू) नसताना, दोषांकडे दुर्लक्ष करून शुद्ध चित्ताने स्वतःच्या आणि इतरांच्या विशेष अधिगमाची (गुणांची) कबुली दिली. अशा प्रकारे कबुली देणाऱ्या आर्यांमुळे, इतरांनी पोटाच्या कारणास्तव उत्तरिमनुस्सधम्माचे गुणगान करून जो पिंडपात (अन्न) मिळवला, तो शुद्ध चित्ताने स्वीकारणाऱ्या आर्यांच्या बाबतीतही तो पोटासाठीच उत्तरिमनुस्सधम्माचे गुणगान केल्यासारखा झाला. म्हणूनच, सर्वांना सामावून घेणाऱ्या पद्धतीने भगवंतांनी म्हटले की, 'हे भिक्खूंनो, तुम्ही पोटाच्या कारणास्तव गृहस्थांसमोर एकमेकांच्या उत्तरिमनुस्सधम्माचे गुणगान कसे काय करू शकता?' उर्वरित भाग चौथ्या पाराजिक कथेसारखाच आहे. शिक्यापद विभंगातही केवळ एवढाच फरक आहे की, तिथे पाराजिक आणि थुल्लच्चय (थुलच्चंय) अपराध होतो, तर येथे सत्य असल्यामुळे पाचित्तिय आणि दुक्कट अपराध होतो. उर्वरित सर्व भाग आधी सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहे. ๗๗. ‘‘อุปสมฺปนฺนสฺส ภูตํ อาโรเจตี’’ติ อุตฺตริมนุสฺสธมฺมเมว สนฺธาย วุตฺตํ. ปรินิพฺพานกาเล หิ อนฺตรา วา อติกฑฺฒิยมาเนน อุปสมฺปนฺนสฺส ภูตํ อาโรเจตุํ วฏฺฏติ. สุตปริยตฺติสีลคุณํ ปน อนุปสมฺปนฺนสฺสาปิ อาโรเจตุํ วฏฺฏติ. อาทิกมฺมิกสฺส อนาปตฺติ. ‘‘อุมฺมตฺตกสฺสา’’ติ อิทํ ปน อิธ น วุตฺตํ. กสฺมา? ทิฏฺฐิสมฺปนฺนานํ อุมฺมาทสฺส วา จิตฺตกฺเขปสฺส วา อภาวาติ. มหาปจฺจริยมฺปิ หิ วิจาริตํ ‘‘ฌานลาภี ปน ปริหีเน ฌาเน อุมฺมตฺตโก ภเวยฺย, ตสฺสปิ ภูตาโรจนปจฺจยา อนาปตฺติ น วตฺตพฺพา, ภูตสฺเสว อภาวโต’’ติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ७७. "उपसंपन्नाला खरे सांगणे" (उपसम्पन्नस्स भूतं आरोचेति) हे केवळ उत्तरिमनुस्सधम्मालाच (उत्कृष्ट मानवी गुणांनाच) उद्देशून म्हटले आहे. कारण परिनिर्वाणसमयी किंवा त्यापूर्वी (शब्दांनी) अत्यंत ओढून विचारले असता, उपसंपन्नाला खरे सांगणे योग्य आहे. परंतु ऐकलेले सुतगुण, शिकलेले परियत्तिगुण आणि शीलगुण हे अनुपसंपन्नाला देखील सांगणे योग्य आहे. आदिकर्मिकाला आपत्ती नाही. "वेड्याला" (उम्मत्तकस्स) हे वचन येथे म्हटलेले नाही. का? कारण दृष्टीसंपन्न (मार्गज्ञानाने युक्त) असलेल्या आर्य पुद्गलांना वेडेपणा किंवा चित्तविक्षेप नसतो म्हणून. महाप्रत्यरी (महापच्चरी) अट्ठकथेतही विचार केला गेला आहे की— "परंतु ध्यान प्राप्त केलेला पुरुष ध्यान नष्ट झाल्यावर वेडा होऊ शकतो, त्याला देखील खरे सांगण्याच्या कारणाने अनापत्ती म्हणू नये, कारण खरे (उत्तरिमनुस्सधम्म) अस्तित्वातच नसते." उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ภูตาโรจนํ นาเมตํ ปุพฺเพ อวุตฺเตหิ ตีหิ สมุฏฺฐาเนหิ สมุฏฺฐาติ – กายโต วาจโต กายวาจโต จาติ. กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, กุสลาพฺยากตจิตฺเตหิ ทฺวิจิตฺตํ, สุขมชฺฌตฺตเวทนาหิ ทฺวิเวทนนฺติ. हे भूतारोचन (खरे सांगणे) नावाचे शिक्षपद पूर्वी न सांगितलेल्या तीन समुत्थानांनी उत्पन्न होते— कायेने, वाचेने आणि काय-वाचेने. हे क्रिया-शिक्षपद, नोसञ्ञाविमोक्ख (संज्ञा नसली तरी आपत्तीतून सुटका न होणारे), अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तीमुळे दोषयुक्त), कायकर्म, वचीकर्म, कुशल व अव्याकृत चित्तांमुळे द्विचित्त (दोन चित्ते असणारे) आणि सुख व उपेक्षा वेदनांमुळे द्विवेदन (दोन वेदना असणारे) आहे. ภูตาโรจนสิกฺขาปทํ อฏฺฐมํ. आठवे भूतारोचन शिक्षपद समाप्त. ๙. ทุฏฺฐุลฺลาโรจนสิกฺขาปทวณฺณนา ९. दुट्ठुल्लारोचन शिक्षपदाचे वर्णन. ๗๘. นวมสิกฺขาปเท [Pg.19] – ทุฏฺฐุลฺลา นาม อาปตฺติ จตฺตาริ จ ปาราชิกานิ เตรส จ สงฺฆาทิเสสาติ อิมิสฺสา ปาฬิยา ‘‘ปาราชิกานิ ทุฏฺฐุลฺลสทฺทตฺถทสฺสนตฺถํ วุตฺตานิ, สงฺฆาทิเสสํ ปน อิธ อธิปฺเปต’’นฺติ อฏฺฐกถาสุ วุตฺตํ. ตตฺรายํ วิจารณา – สเจ ปาราชิกํ อาโรเจนฺตสฺส ปาจิตฺติยํ น ภเวยฺย, ยถา สมาเนปิ ภิกฺขุ-ภิกฺขุนีนํ อุปสมฺปนฺนสทฺเท ยตฺถ ภิกฺขุนี อนธิปฺเปตา โหติ, ตตฺถ ภิกฺขุํ ฐเปตฺวา อวเสโส อนุปสมฺปนฺโนติ วุจฺจติ; เอวมิธ สมาเนปิ ปาราชิกสงฺฆาทิเสสานํ ทุฏฺฐุลฺลสทฺเท ยทิ ปาราชิกํ อนธิปฺเปตํ, ‘‘ทุฏฺฐุลฺลา นาม อาปตฺติ เตรส สงฺฆาทิเสสา’’ติ เอตเทว วตฺตพฺพํ สิยา. ตตฺถ ภเวยฺย ‘‘โย ปาราชิกํ อาปนฺโน, โส ภิกฺขุภาวโต จุโต, ตสฺมา ตสฺส อาปตฺตึ อาโรเจนฺโต ทุกฺกฏํ อาปชฺชตี’’ติ. เอวํ สติ อกฺโกสนฺโตปิ ทุกฺกฏํ อาปชฺเชยฺย, ปาจิตฺติยเมว จ อาปชฺชติ. วุตฺตญฺเหตํ – ‘‘อสุทฺโธ โหติ ปุคฺคโล อญฺญตรํ ปาราชิกํ ธมฺมํ อชฺฌาปนฺโน, ตญฺเจ อสุทฺธทิฏฺฐิ สมาโน โอกาสํ การาเปตฺวา อกฺโกสาธิปฺปาโย วทติ, อาปตฺติ โอมสวาทสฺสา’’ติ (ปารา. ๓๘๙). เอวํ ปาฬิยา วิจาริยมานาย ปาราชิกํ อาโรเจนฺตสฺสาปิ ปาจิตฺติยเมว ทิสฺสติ. กิญฺจาปิ ทิสฺสติ, อถ โข สพฺพอฏฺฐกถาสุ วุตฺตตฺตา อฏฺฐกถาจริยาว เอตฺถ ปมาณํ, น อญฺญา วิจารณา. ปุพฺเพปิ จ อาโวจุมฺห – ‘‘พุทฺเธน ธมฺโม วินโย จ วุตฺโต, โย ตสฺส ปุตฺเตหิ ตเถว ญาโต’’ติอาทิ (ปารา. อฏฺฐ. ๑.คนฺถารมฺภกถา). อฏฺฐกถาจริยา หิ พุทฺธสฺส อธิปฺปายํ ชานนฺติ. ७८. नवव्या शिक्षपदात— "दुट्ठुल्ला नाम आपत्ती म्हणजे चार पाराजिक आणि तेरा संघादिसेस" या पाळीमध्ये "पाराजिक हे दुट्ठुल्ल शब्दाचा अर्थ दाखवण्यासाठी म्हटले आहे, परंतु येथे संघादिसेसच अभिप्रेत आहे" असे अट्ठकथांमध्ये म्हटले आहे. त्यामध्ये हा विचार आहे— जर पाराजिक सांगणाऱ्याला पाचित्तिय होणार नाही, तर ज्याप्रमाणे भिक्खू आणि भिक्खुणी यांच्यासाठी 'उपसंपन्न' हा शब्द समान असला तरी, ज्या शिक्षपदात भिक्खुणी अभिप्रेत नसते, तिथे भिक्खूला सोडून उर्वरित सर्वांना 'अनुपसंपन्न' म्हटले जाते; त्याचप्रमाणे येथे पाराजिक आणि संघादिसेस या दोन्हीसाठी 'दुट्ठुल्ल' शब्द समान असला तरी, जर पाराजिक अभिप्रेत नसेल, तर "दुट्ठुल्ला नाम आपत्ती म्हणजे तेरा संघादिसेस" एवढेच म्हणायला हवे होते. तिथे कोणाला शंका येऊ शकते की— "जो पाराजिक आपत्तीला प्राप्त झाला आहे, तो भिक्खूभावातून च्युत झाला आहे, म्हणून त्याची आपत्ती सांगणाऱ्याला दुक्कट आपत्ती प्राप्त होते." असे असल्यास, त्याला शिवीगाळ करणाऱ्यालाही दुक्कट आपत्ती प्राप्त व्हावी, परंतु त्याला पाचित्तियच प्राप्त होते. कारण असे म्हटले आहे की— "जो पुद्गल एखाद्या पाराजिक धम्माला प्राप्त होऊन अशुद्ध झाला आहे, त्याला अशुद्ध समजून, परवानगी घेऊन, शिवीगाळ करण्याच्या उद्देशाने जर कोणी बोलला, तर ओमसवादाची (अपमानकारक बोलण्याची) पाचित्तिय आपत्ती होते." अशा प्रकारे पाळीचे विश्लेषण केले असता, पाराजिक सांगणाऱ्याला देखील पाचित्तियच दिसून येते. जरी असे दिसून येत असले, तरी सर्व अट्ठकथांमध्ये सांगितल्याप्रमाणे अट्ठकथाचार्यच येथे प्रमाण आहेत, इतर कोणतेही विश्लेषण प्रमाण नाही. आणि पूर्वीही आम्ही म्हटले आहे की— "बुद्धांनी जो धम्म आणि विनय सांगितला आहे, तो त्यांच्या पुत्रांनी तसाच जाणला आहे" इत्यादी. कारण अट्ठकथाचार्य बुद्धांचा अभिप्राय जाणतात. อิมินาปิ เจตํ ปริยาเยน เวทิตพฺพํ. อญฺญตฺร ภิกฺขุสมฺมุติยาติ หิ วุตฺตํ. ภิกฺขุสมฺมุติยา จ อาโรจนํ อายตึ สํวรตฺถาย ปุน ตถารูปํ อาปตฺตึ อนาปชฺชนตฺถาย ภควตา อนุญฺญาตํ, น ตสฺส ภิกฺขุโน อวณฺณมตฺตปฺปกาสนตฺถาย, สาสเน จสฺส ปติฏฺฐานิเสธนตฺถาย, น จ ปาราชิกํ อาปนฺนสฺส ปุน ตถารูปาย อาปตฺติยา อนาปชฺชเนน ภิกฺขุภาโว นาม อตฺถิ. ตสฺมา ‘‘ปาราชิกานิ ทุฏฺฐุลฺลสทฺทตฺถทสฺสนตฺถํ วุตฺตานิ, สงฺฆาทิเสสํ ปน อิธาธิปฺเปต’’นฺติ ยํ อฏฺฐกถาสุ วุตฺตํ, ตํ สุวุตฺตเมว. याही कारणाने हे समजून घेतले पाहिजे. कारण "भिक्खूंच्या संमतीशिवाय" (अञ्ञत्र भिक्खुसम्मतिया) असे म्हटले आहे. आणि भिक्खूंच्या संमतीने सांगणे हे, भविष्यात संयम राखण्यासाठी आणि पुन्हा तशा प्रकारची आपत्ती ओढवून न घेण्यासाठी भगवंतांनी अनुमत केले आहे; त्या भिक्खूची केवळ अपकीर्ती करण्यासाठी किंवा शासनात त्याचे स्थान नाकारण्यासाठी अनुमत केलेले नाही. आणि पाराजिक आपत्तीला प्राप्त झालेल्या भिक्खूचा, पुन्हा तशा प्रकारची आपत्ती न ओढवून घेतल्याने भिक्खूभाव शिल्लक राहत नाही. म्हणून "पाराजिक हे दुट्ठुल्ल शब्दाचा अर्थ दाखवण्यासाठी म्हटले आहे, परंतु येथे संघादिसेसच अभिप्रेत आहे" असे जे अट्ठकथांमध्ये म्हटले आहे, ते अगदी योग्यच म्हटले आहे. ๘๐. อตฺถิ [Pg.20] ภิกฺขุสมฺมุติ อาปตฺติปริยนฺตาติอาทีสุ ปน ยา อยํ ภิกฺขุสมฺมุติ วุตฺตา, สา น กตฺถจิ อาคตา, อิธ วุตฺตตฺตาเยว ปน อภิณฺหาปตฺติกํ ภิกฺขุํ ทิสฺวา เอวเมส ปเรสุ หิโรตฺตปฺเปนาปิ อายตึ สํวรํ อาปชฺชิสฺสตีติ ตสฺส ภิกฺขุโน หิเตสิตาย ติกฺขตฺตุํ อปโลเกตฺวา สงฺเฆน กาตพฺพาติ เวทิตพฺพาติ. ८०. "अत्थि भिक्खुसम्मतु आपित्तिपरियन्ता" इत्यादी पाळीमध्ये जी ही भिक्खूसंमती सांगितली आहे, ती इतर कोणत्याही पाळीमध्ये आलेली नाही. परंतु येथे सांगितल्यामुळेच, वारंवार आपत्तीला प्राप्त होणाऱ्या भिक्खूला पाहून, "अशा प्रकारे हा इतरांच्या समोर लज्जा व भयाने (ह्री व अपत्राप्य) भविष्यात संयम राखेल" असा विचार करून, त्या भिक्खूच्या कल्याणाची इच्छा धरून, तीन वेळा विचारून (अपलोकेत्वा) संघाने ती संमती द्यावी, असे समजले पाहिजे. ๘๒. อทุฏฺฐุลฺลํ อาปตฺตึ อาโรเจติ อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ ปญฺจปิ อาปตฺติกฺขนฺเธ อาโรเจนฺตสฺส ทุกฺกฏํ. มหาปจฺจริยํ ปน ปาราชิกํ อาโรเจนฺตสฺสาปิ ทุกฺกฏเมว วุตฺตํ. อนุปสมฺปนฺนสฺส ทุฏฺฐุลฺลํ วา อทุฏฺฐุลฺลํ วา อชฺฌาจารนฺติ เอตฺถ อาทิโต ปญฺจ สิกฺขาปทานิ ทุฏฺฐุลฺโล นาม อชฺฌาจาโร, เสสานิ อทุฏฺฐุลฺโล. สุกฺกวิสฺสฏฺฐิกายสํสคฺคทุฏฺฐุลฺลอตฺตกามา ปนสฺส อชฺฌาจาโร นามาติ วุตฺตํ. ८२. "अदुट्ठुल्ल आपत्ती सांगतो, त्याला दुक्कट आपत्ती होते" म्हणजे पाचही आपत्तीस्कंधांविषयी सांगणाऱ्याला दुक्कट आपत्ती होते. परंतु महापच्चरी अट्ठकथेत पाराजिक सांगणाऱ्याला देखील दुक्कटच म्हटले आहे. "अनुपसंपन्नाचे duट्ठुल्ल किंवा aduट्ठुल्ल उल्लंघन" यामध्ये सुरुवातीची पाच शिक्षपदे हे 'दुट्ठुल्ल' नावाचे उल्लंघन आहे, आणि उर्वरित शिक्षपदे हे 'अदुट्ठुल्ल' उल्लंघन आहे. परंतु सुक्कविस्सट्ठि (वीर्यपात), कायसंसर्ग, दुट्ठुल्लवाचा आणि अत्तकाम हे त्याचे (अनुपसंपन्नाचे) उल्लंघन मानले जाते, असे म्हटले आहे. ๘๓. วตฺถุํ อาโรเจตีติ ‘‘อยํ สุกฺกวิสฺสฏฺฐึ อาปนฺโน, ทุฏฺฐุลฺลํ อาปนฺโน, อตฺตกามํ อาปนฺโน’’ กายสํสคฺคํ อาปนฺโนติ เอวํ วทนฺตสฺส อนาปตฺติ. อาปตฺตึ อาโรเจตีติ เอตฺถ ‘‘อยํ ปาราชิกํ อาปนฺโน, สงฺฆาทิเสสํ ถุลฺลจฺจยํ ปาจิตฺติยํ ปาฏิเทสนียํ ทุกฺกฏํ ทุพฺภาสิตํ อาปนฺโน’’ติ วทติ อนาปตฺติ. ‘‘อยํ อสุจึ โมเจตฺวา สงฺฆาทิเสสํ อาปนฺโน’’ติอาทินา ปน นเยน วตฺถุนา สทฺธึ อาปตฺตึ ฆเฏตฺวา อาโรเจนฺตสฺเสว อาปตฺติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ८३. "वस्तू सांगतो" म्हणजे "हा सुक्कविस्सट्ठिला प्राप्त झाला आहे, दुट्ठुल्लाला प्राप्त झाला आहे, अत्तकामाला प्राप्त झाला आहे, कायसंसर्गाला प्राप्त झाला आहे" असे बोलणाऱ्याला अनापत्ती आहे. "आपत्ती सांगतो" यामध्ये "हा पाराजिकला प्राप्त झाला आहे, संघादिसेसाला, थुल्लच्चयाला, पाचित्तियला, पाटिदेसनीयला, दुक्कटाला, दुब्भासिताला प्राप्त झाला आहे" असे बोलल्यास अनापत्ती आहे. परंतु "याने अशुद्ध (वीर्य) स्खलित करून संघादिसेस आपत्ती ओढवून घेतली आहे" इत्यादी पद्धतीने वस्तूशी (घटनेशी) जोडून आपत्ती सांगणाऱ्यालाच आपत्ती होते. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กายจิตฺตโต วาจาจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. हे तीन समुत्थानांनी युक्त आहे— काय-चित्ताने, वाचा-चित्ताने आणि काय-वाचा-चित्ताने उत्पन्न होते. हे क्रिया-शिक्षपद, सञ्ञाविमोक्ख (संज्ञा असल्यास आपत्तीतून सुटका होणारे), सचित्तक, लोकवज्ज (लोकात दोषयुक्त), कायकर्म, वचीकर्म, अकुशल चित्त असणारे आणि दुःख वेदना असणारे आहे. ทุฏฺฐุลฺลาโรจนสิกฺขาปทํ นวมํ. नववे दुट्ठुल्लारोचन शिक्षपद समाप्त. ๑๐. ปถวีขณนสิกฺขาปทวณฺณนา १०. पठवीखणन शिक्षपदाचे वर्णन. ๘๖. ทสมสิกฺขาปเท – ชาตา จ ปถวี อชาตา จ ปถวีติ อิเมหิ ปเทหิ ชาตปถวิญฺจ อชาตปถวิญฺจ ทสฺเสติ. อปฺปปาสาณาทีสุ อปฺปา ปาสาณา เอตฺถาติ อปฺปปาสาณาติ เอวมตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. ตตฺถ มุฏฺฐิปฺปมาณโต [Pg.21] อุปริ ปาสาณาติ เวทิตพฺพา, มุฏฺฐิปฺปมาณา สกฺขรา. กถลาติ กปาลขณฺฑานิ. มรุมฺพาติ กฏสกฺขรา. วาลิกาติ วาลุกาเยว. เยภุยฺเยน ปํสุกาติ ตีสุ โกฏฺฐาเสสุ ทฺเว โกฏฺฐาสา ปํสุ, เอโก ปาสาณาทีสุ อญฺญตโร. อทฑฺฒาปีติ อุทฺธนปตฺตปจนกุมฺภการาวาปาทิวเสน ตถา ตถา อทฑฺฒา. สา ปน วิสุํ นตฺถิ, สุทฺธปํสุอาทีสุ อญฺญตราว เวทิตพฺพา. เยภุยฺเยนสกฺขราติ พหุตรา สกฺขรา. หตฺถิกุจฺฉิยํ กิร เอกปจฺฉิปูรํ อาหราเปตฺวา โทณิยํ โธวิตฺวา ปถวิยา เยภุยฺเยน สกฺขรภาวํ ญตฺวา สยํ ภิกฺขู โปกฺขรณึ ขณึสุ. ยานิ ปน มชฺเฌ ‘‘อปฺปปํสุ อปฺปมตฺติกา’’ติ ทฺเว ปทานิ, ตานิ เยภุยฺเยนปาสาณาทิปญฺจกเมว ปวิสนฺติ เตสํเยว หิ ทฺวินฺนํ ปเภททสฺสนเมตํ. สยํ ขณติ อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสาติ เอตฺถ ปหาเร ปหาเร ปาจิตฺติยํ เวทิตพฺพํ. สกึ อาณตฺโต พหุกมฺปิ ขณตีติ สเจปิ สกลทิวสํ ขณติ, อาณาปกสฺส เอกํเยว ปาจิตฺติยํ. สเจ ปน กุสิโต โหติ, ปุนปฺปุนํ อาณาเปตพฺโพ. ตํ อาณาเปตฺวา ขณาเปนฺตสฺส วาจาย วาจาย ปาจิตฺติยํ. อยํ ตาว ปาฬิวณฺณนา. ८६. दहाव्या सिक्खापदात – 'जाता च पठवी' आणि 'अजाता च पठवी' या पदांद्वारे जातपठवी (सजीव माती) आणि अजातपठवी (निर्जीव माती) दर्शवितात. 'अप्पपासाण' इत्यादींमध्ये, 'येथे थोडे दगड आहेत' म्हणून ती 'अप्पपासाणा' (अल्पपाषाण - थोडे दगड असलेली माती) आहे, असा अर्थ समजला पाहिजे. त्यामध्ये, मुठीच्या आकारापेक्षा मोठे असणारे 'पासाण' (दगड) समजावे, आणि मुठीच्या आकाराचे असणारे 'सक्खरा' (खडे) समजावे. 'कथला' म्हणजे मडक्याचे तुकडे. 'मरुम्बा' म्हणजे मुरूम (कठीण खडे). 'वालिका' म्हणजे वाळूच होय. 'येभुय्येन पंसुका' (बहुतांश माती असलेली) म्हणजे तीन भागांपैकी दोन भाग माती आणि एक भाग दगड इत्यादींपैकी कोणताही एक भाग असणे. 'अदड्ढापि' (न भाजलेली देखील) म्हणजे चूल मांडणे, पात्र भाजणे किंवा कुंभाराची भट्टी इत्यादींच्या प्रभावाने त्या त्या प्रकारे न भाजलेली माती. परंतु ती स्वतंत्रपणे अस्तित्वात नसते, तर शुद्ध माती इत्यादींपैकीच एक समजावी. 'येभुय्येनसक्खरा' म्हणजे पुष्कळ खडे असलेली माती. असे ऐकिवात आहे की, हत्थिकुच्छी येथे भिक्खूंनी एक टोपलीभर माती आणवून, ती द्रोणीत (पात्रात) धुवून, त्या मातीमध्ये बहुतांश खडे असल्याचे जाणून स्वतःच तळे (पोक्खरणी) खणले होते. परंतु मध्ये जी 'अप्पपंसु' आणि 'अप्पमत्तिका' ही दोन पदे आहेत, ती 'येभुय्येनपासाण' इत्यादी पाच प्रकारांमध्येच समाविष्ट होतात; कारण हे त्या दोघांचेच भेद दर्शवणारे आहे. 'स्वतः खणल्यास पाचित्तिय आपत्ती होते' यामध्ये प्रत्येक घावागणिक पाचित्तिय आपत्ती समजावी. एकदाच आज्ञा दिली असता आदेशित व्यक्तीने पुष्कळ खणले, अगदी दिवसभर जरी खणले, तरी आज्ञा देणाऱ्याला एकच पाचित्तिय आपत्ती होते. परंतु जर तो आळशी असेल आणि त्याला वारंवार आज्ञा द्यावी लागत असेल, तर त्याला आज्ञा देऊन खणवून घेणाऱ्याला प्रत्येक आज्ञेगणिक पाचित्तिय आपत्ती होते. हे पाळीचे (पाठाचे) स्पष्टीकरण आहे. อยํ ปน ปาฬิมุตฺตกวินิจฺฉโย – ‘‘โปกฺขรณึ ขณา’’ติ วทติ, วฏฺฏติ. ขตาเยว หิ โปกฺขรณี นาม โหติ, ตสฺมา อยํ กปฺปิยโวหาโร. เอส นโย ‘‘วาปึ ตฬากํ อาวาฏํ ขณา’’ติอาทีสุปิ. ‘‘อิมํ โอกาสํ ขณ, อิมสฺมึ โอกาเส โปกฺขรณึ ขณา’’ติ วตฺตุํ ปน น วฏฺฏติ. ‘‘กนฺทํ ขณ, มูลํ ขณา’’ติ อนิยาเมตฺวา วตฺตุํ วฏฺฏติ. ‘‘อิมํ วลฺลึ ขณ, อิมสฺมึ โอกาเส กนฺทํ วา มูลํ วา ขณา’’ติ วตฺตุํ น วฏฺฏติ. โปกฺขรณึ โสเธนฺเตหิ โย กุเฏหิ อุสฺสิญฺจิตุํ สกฺกา โหติ ตนุกกทฺทโม, ตํ อปเนตุํ วฏฺฏติ, พหลํ น วฏฺฏติ. อาตเปน สุกฺขกทฺทโม ผลติ, ตตฺร โย เหฏฺฐา ปถวิยา อสมฺพทฺโธ, ตเมว อปเนตุํ วฏฺฏติ. อุทเกน คตฏฺฐาเน อุทกปปฺปฏโก นาม โหติ, วาตปฺปหาเรน จลติ, ตํ อปเนตุํ วฏฺฏติ. आता हा पाळी-मुक्त (पाठाबाहेरील) निर्णय आहे – 'तळे खणा' असे म्हणणे योग्य आहे. कारण तळे हे खणलेलेच असते, म्हणून हा कप्पिय-व्यवहार (योग्य बोलणे) आहे. हाच नियम 'विहीर, तलाव किंवा खड्डा खणा' इत्यादींच्या बाबतीतही लागू होतो. परंतु 'या जागेला खणा' किंवा 'या जागेवर तळे खणा' असे म्हणणे योग्य नाही. विशिष्ट निर्देश न करता 'कंद खणा, मूळ खणा' असे म्हणणे योग्य आहे. परंतु 'या वेलीला खणा' किंवा 'या जागेवर कंद किंवा मूळ खणा' असे म्हणणे योग्य नाही. तळे स्वच्छ करताना, जो पातळ चिखल घागरीने उपसता येणे शक्य आहे, तो काढून टाकणे योग्य आहे; परंतु घट्ट चिखल काढणे योग्य नाही. उन्हामुळे सुकलेला चिखल दुभंगतो, त्यातील जो भाग खालील मातीशी जोडलेला नसेल, तोच काढून टाकणे योग्य आहे. पाणी वाहून गेलेल्या ठिकाणी 'उदक-पप्पटक' (पाण्याचा सुकलेला पापुद्रा) तयार होतो, जो वाऱ्याच्या झोताने हलतो, तो काढून टाकणे योग्य आहे. โปกฺขรณีอาทีนํ ตฏํ ภิชฺชิตฺวา อุทกสามนฺตา ปตติ, สเจ โอมกจาตุมาสํ โอวฏฺฐํ, ฉินฺทิตุํ วา ภินฺทิตุํ วา วฏฺฏติ, จาตุมาสโต อุทฺธํ น [Pg.22] วฏฺฏติ. สเจ ปน อุทเกเยว ปตติ, เทเว อติเรกจาตุมาสํ โอวฏฺเฐปิ อุทเกเยว อุทกสฺส ปติตตฺตา วฏฺฏติ. ปาสาณปิฏฺฐิยํ โสณฺฑึ ขณนฺติ, สเจ ตตฺถ ปฐมเมว สุขุมรชํ ปตติ, ตญฺเจ เทเวน โอวฏฺฐํ โหติ, จาตุมาสจฺจเยน อกปฺปิยปถวีสงฺขฺยํ คจฺฉติ. อุทเก ปริยาทิณฺเณ โสณฺฑึ โสเธนฺเตหิ ตํ วิโกเปตุํ น วฏฺฏติ. สเจ ปฐมเมว อุทเกน ปูรติ, ปจฺฉา รชํ ปตติ, ตํ วิโกเปตุํ วฏฺฏติ. ตตฺถ หิ เทเว วสฺสนฺเตปิ อุทเกเยว อุทกํ ปตตีติ. ปิฏฺฐิปาสาเณ สุขุมรชํ โหติ, เทเว ผุสายนฺเต อลฺลียติ, ตมฺปิ จาตุมาสจฺจเยน วิโกเปตุํ น วฏฺฏติ. สเจ ปน อกตปพฺภาเร วมฺมิโก อุฏฺฐิโต โหติ, ยถาสุขํ วิโกเปตุํ วฏฺฏติ. สเจ อพฺโภกาเส อุฏฺฐหติ, โอมกจาตุมาสํ โอวฏฺโฐเยว วฏฺฏติ. รุกฺขาทีสุ อารุฬฺหอุปจิกามตฺติกายปิ เอเสว นโย. คณฺฑุปฺปาทคูถมูสิกุกฺกรโคกณฺฏกาทีสุปิ เอเสว นโย. तळे इत्यादींचा काठ तुटून पाण्याच्या जवळ पडतो; जर त्यावर पाऊस पडून चार महिन्यांपेक्षा कमी काळ झाला असेल, तर तो काठ कापणे किंवा फोडणे योग्य आहे; परंतु चार महिन्यांपेक्षा जास्त काळ झाला असल्यास योग्य नाही. परंतु जर तो काठ थेट पाण्यातच पडला असेल, तर चार महिन्यांपेक्षा जास्त काळ पाऊस पडलेला असला तरीही, तो पाण्यातच पडल्यामुळे तो काढणे योग्य आहे. दगडाच्या पृष्ठभागावर पाण्याचे कुंड खणतात; जर तेथे आधीच बारीक धूळ पडली असेल आणि ती पावसाने भिजली असेल, तर चार महिने उलटल्यानंतर ती 'अकप्पिय-पठवी' (अविहित माती) मानली जाते. पाणी सुकल्यावर ते कुंड स्वच्छ करणाऱ्यांनी ती माती उकरणे योग्य नाही. जर ते कुंड आधी पाण्याने भरले असेल आणि नंतर त्यावर धूळ पडली असेल, तर ती उकरणे योग्य आहे. कारण तेथे पाऊस पडला तरी पाण्यावरच पाणी पडते. सपाट दगडावर बारीक धूळ असते, पावसाचे थेंब पडल्याने ती चिकटते; ती देखील चार महिने उलटल्यानंतर उकरणे योग्य नाही. परंतु जर नैसर्गिक डोंगराच्या कपारीत वारूळ तयार झाले असेल, तर ते इच्छेनुसार उकरणे योग्य आहे. जर ते उघड्या जागेवर तयार झाले असेल, तर त्यावर पाऊस पडून चार महिन्यांपेक्षा कमी काळ झाला असेल तरच ते उकरणे योग्य आहे. झाडांवर चढलेल्या वाळवीच्या मातीच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. गांडुळाची विष्ठा, उंदराचे बीळ, कुत्र्याने उकरलेली माती, गोकंटक (गाईच्या खुरांनी उकरलेला चिखल) इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. โคกณฺฏโก นาม คาวีนํ ขุรจฺฉินฺนกทฺทโม วุจฺจติ. สเจ ปน เหฏฺฐิมตเลน ภูมิสมฺพนฺโธ โหติ, เอกทิวสมฺปิ น วฏฺฏติ. กสิตฏฺฐาเนปิ นงฺคลจฺฉินฺนมตฺติกาปิณฺฑํ คณฺหนฺตสฺส เอเสว นโย. ปุราณเสนาสนํ โหติ อจฺฉทนํ วา วินฏฺฐจฺฉทนํ วา, อติเรกจาตุมาสํ โอวฏฺฐํ ชาตปถวีสงฺขฺยเมว คจฺฉติ. ตโต อวเสสํ ฉทนิฏฺฐกํ วา โคปานสีอาทิกํ อุปกรณํ วา ‘‘อิฏฺฐกํ คณฺหามิ โคปนสึ ภิตฺติปาทํ ปทรตฺถรณํ ปาสาณตฺถมฺภํ คณฺหามี’’ติ สญฺญาย คณฺหิตุํ วฏฺฏติ. เตน สทฺธึ มตฺติกา ปตติ, อนาปตฺติ. ภิตฺติมตฺติกํ คณฺหนฺตสฺส ปน อาปตฺติ. สเจ ยา ยา อตินฺตา ตํ ตํ คณฺหาติ, อนาปตฺติ. गाईंच्या खुरांनी तुडवलेला चिखल 'गोकंटक' म्हणून ओळखला जातो. परंतु जर त्याचा खालचा भाग जमिनीशी जोडलेला असेल, तर तो एका दिवसाचा असला तरीही उकरणे योग्य नाही. नांगरलेल्या शेतातही नांगराने कापलेले मातीचे ढेकूळ घेणाऱ्याच्या बाबतीत हाच नियम आहे. जुने विहार (सेनासन) जे छप्पर नसलेले किंवा नष्ट झालेले छप्पर असलेले असते, त्यावर चार महिन्यांपेक्षा जास्त काळ पाऊस पडल्यास ते 'जातपठवी' (सजीव माती) मानले जाते. त्यातून उरलेले छपराचे विटांचे तुकडे किंवा वासे इत्यादी साहित्य 'मी वीट घेत आहे', 'मी वासा घेत आहे', 'मी भिंतीचा पाया घेत आहे', 'मी लाकडी फळी घेत आहे', 'मी दगडाचा खांब घेत आहे' अशा समजुतीने घेणे योग्य आहे. त्यासोबत जर माती पडली, तर अनापत्ती आहे. परंतु भिंतीची माती घेणाऱ्याला आपत्ती होते. जर कोणी न भिजलेली माती घेत असेल, तर अनापत्ती आहे. อนฺโตเคเห มตฺติกาปุญฺโช โหติ, ตสฺมึ เอกทิวสํ โอวฏฺเฐ เคหํ ฉาเทนฺติ, สเจ สพฺโพ ตินฺโต จาตุมาสจฺจเยน ชาตปถวีเยว. อถสฺส อุปริภาโคเยว ตินฺโต, อนฺโต อตินฺโต, ยตฺตกํ ตินฺตํ ตํ กปฺปิยการเกหิ กปฺปิยโวหาเรน อปนาเมตฺวา เสสํ ยถาสุขํ วฬญฺเชตุํ วฏฺฏติ. อุทเกน เตเมตฺวา เอกาพทฺธาเยว หิ ชาตปถวี โหติ, น อิตราติ. घराच्या आत मातीचा ढीग असतो, त्यावर एक दिवस पाऊस पडल्यावर घर शाकारले जाते; जर तो संपूर्ण ढीग भिजला असेल, तर चार महिने उलटल्यानंतर तो 'जातपठवी'च बनतो. जर त्याचा फक्त वरचा भाग भिजला असेल आणि आतील भाग भिजला नसेल, तर जितका भाग भिजलेला आहे, तितका भाग कप्पियकारकांकडून कप्पिय-व्यवहाराने बाजूला करून घेऊन, उरलेली माती इच्छेनुसार वापरणे योग्य आहे. कारण पाण्याने भिजून एकजीव झालेली मातीच 'जातपठवी' होते, दुसरी नाही. อพฺโภกาเส [Pg.23] มตฺติกาปากาโร โหติ, อติเรกจาตุมาสํ เจ โอวฏฺโฐ ชาตปถวีสงฺขฺยํ คจฺฉติ. ตตฺถ ลคฺคปํสุํ ปน อลฺลหตฺเถน ฉุปิตฺวา คเหตุํ วฏฺฏติ. สเจ อิฏฺฐกปากาโร โหติ, เยภุยฺเยนกถลฏฺฐาเน ติฏฺฐติ, ยถาสุขํ วิโกเปตุํ วฏฺฏติ. อพฺโภกาเส ฐิตมณฺฑปตฺถมฺภํ อิโต จิโต จ สญฺจาเลตฺวา ปถวึ วิโกเปนฺเตน คเหตุํ น วฏฺฏติ, อุชุกเมว อุทฺธริตุํ วฏฺฏติ. อญฺญมฺปิ สุกฺขรุกฺขํ วา สุกฺขขาณุกํ วา คณฺหนฺตสฺส เอเสว นโย. นวกมฺมตฺถํ ปาสาณํ วา รุกฺขํ วา ทณฺฑเกหิ อุจฺจาเลตฺวา ปวฏฺเฏนฺตา คจฺฉนฺติ, ตตฺถ ปถวี ภิชฺชติ, สเจ สุทฺธจิตฺตา ปวฏฺเฏนฺติ, อนาปตฺติ. อถ ปน เตน อปเทเสน ปถวึ ภินฺทิตุกามาเยว โหนฺติ, อาปตฺติ. สาขาทีนิ กฑฺฒนฺตานมฺปิ ปถวิยํ ทารูนิ ผาเลนฺตานมฺปิ เอเสว นโย. उघड्या जागेवर मातीची भिंत असते, जर त्यावर चार महिन्यांपेक्षा जास्त काळ पाऊस पडला असेल, तर ती 'जातपठवी' मानली जाते. तेथे चिकटलेली धूळ ओल्या हाताने स्पर्श करून घेणे योग्य आहे. जर ती विटांची भिंत असेल, तर ती बहुतांश करून खपराच्या श्रेणीत येते, म्हणून ती इच्छेनुसार पाडणे योग्य आहे. उघड्या जागेवर असलेला मांडवाचा खांब इकडेतिकडे हलवून, माती उकरून काढणे योग्य नाही; तो थेट सरळ वर उपटून काढणे योग्य आहे. इतर सुकलेले झाड किंवा सुकलेले खोड काढणाऱ्याच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. नवीन बांधकामासाठी दगड किंवा लाकूड काठ्यांनी वर उचलून आणि लोळवत नेतात, त्यामुळे जर माती उकरली गेली, आणि जर ते शुद्ध मनाने लोळवत नेत असतील, तर अनापत्ती आहे. परंतु जर त्या बहाण्याने माती उकरण्याचीच त्यांची इच्छा असेल, तर आपत्ती होते. झाडांच्या फांद्या ओढणाऱ्यांच्या किंवा जमिनीवर लाकडे फोडणाऱ्यांच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. ปถวิยํ อฏฺฐิสูจิกณฺฏกาทีสุปิ ยํกิญฺจิ อาโกเฏตุํ วา ปเวเสตุํ วา น วฏฺฏติ. ปสฺสาวธาราย เวเคน ปถวึ ภินฺทิสฺสามีติ เอวํ ปสฺสาวมฺปิ กาตุํ น วฏฺฏติ, กโรนฺตสฺส ภิชฺชติ, อาปตฺติ. วิสมภูมึ สมํ กริสฺสามีติ สมฺมุญฺชนิยา ฆํสิตุมฺปิ น วฏฺฏติ, วตฺตสีเสเนว หิ สมฺมชฺชิตพฺพํ. เกจิ กตฺตรยฏฺฐิยา ภูมึ โกฏฺเฏนฺติ, ปาทงฺคุฏฺฐเกน วิลิขนฺติ, ‘‘จงฺกมิตฏฺฐานํ ทสฺเสสฺสามา’’ติ ปุนปฺปุนํ ภูมึ ภินฺทนฺตา จงฺกมนฺติ, สพฺพํ น วฏฺฏติ. วีริยสมฺปคฺคหตฺถํ ปน สมณธมฺมํ กโรนฺเตน สุทฺธจิตฺเตน จงฺกมิตุํ วฏฺฏติ, ‘‘หตฺถํ โธวิสฺสามา’’ติ ปถวิยํ ฆํสนฺติ, น วฏฺฏติ. อฆํสนฺเตน ปน อลฺลหตฺถํ ปถวิยํ ฐเปตฺวา รชํ คเหตุํ วฏฺฏติ. เกจิ กณฺฑุกจฺฉุอาทีหิ อาพาธิกา ฉินฺนตฏาทีสุ องฺคปจฺจงฺคานิ ฆํสนฺติ น วฏฺฏติ. मातीमध्ये (जमिनीवर) हाड, सुई, काटा इत्यादींपैकी काहीही ठोकणे किंवा खुपसणे योग्य नाही. 'लघवीच्या धारेच्या वेगाने मी जमीन फोडीन' असा विचार करून अशा प्रकारे वेगाने लघवी करणे देखील योग्य नाही; असे करताना जर जमीन फुटली, तर आपत्ती (दोष) होते. 'विषम (उंचसखल) जमीन मी समपातळ करीन' असा विचार करून झाडूने ती घासणे देखील योग्य नाही, कारण केवळ कर्तव्याच्या (वत्त) भावनेनेच झाडलोट केली पाहिजे. काही जण काठीने जमीन ठोकतात, पायाच्या अंगठ्याने ओरबाडतात, 'आम्ही चंक्रमण करण्याची जागा दाखवू' असा विचार करून वारंवार जमीन खराब करत चंक्रमण करतात; हे सर्व करणे अयोग्य आहे. परंतु, वीर्य (प्रयत्न) दृढ करण्यासाठी श्रमणधर्माचे आचरण करणाऱ्याने शुद्ध चित्ताने चंक्रमण करणे योग्य आहे. 'आम्ही हात धुवू' असा विचार करून जमिनीवर हात घासणे अयोग्य आहे. परंतु, न घासता ओला हात जमिनीवर ठेवून धूळ घेणे योग्य आहे. काही जण खाज-खरुज इत्यादी रोगांनी ग्रस्त होऊन तुटलेल्या कड्यांवर आपले अवयव घासतात, ते अयोग्य आहे. ๘๗. ขณติ วา ขณาเปติ วาติ อนฺตมโส ปาทงฺคุฏฺฐเกนปิ สมฺมชฺชนีสลากายปิ สยํ วา ขณติ, อญฺเญน วา ขณาเปติ. ภินฺทติ วา เภทาเปติ วาติ อนฺตมโส อุทกมฺปิ ฉฑฺเฑนฺโต สยํ วา ภินฺทติ, อญฺเญน วา ภินฺทาเปติ. ทหติ วา ทหาเปติ วาติ อนฺตมโส ปตฺตมฺปิ ปจนฺโต สยํ วา ทหติ, อญฺเญน วา ทหาเปติ. ยตฺตเกสุ ฐาเนสุ อคฺคึ เทติ วา ทาเปติ วา ตตฺตกานิ ปาจิตฺติยานิ. ปตฺตํ ปจนฺเตนปิ หิ ปุพฺเพ ปกฺกฏฺฐาเนเยว หิ ปจิตพฺโพ. อทฑฺฒาย ปถวิยา อคฺคึ ฐเปตุํ น วฏฺฏติ. ปตฺตปจนกปาลสฺส ปน อุปริ อคฺคึ ฐเปตุํ วฏฺฏติ. ทารูนํ อุปริ ฐเปติ[Pg.24], โส อคฺคิ ตานิ ทหนฺโต คนฺตฺวา ปถวึ ทหติ, น วฏฺฏติ. อิฏฺฐกกปาลาทีสุปิ เอเสว นโย. ८७. 'खणतो किंवा खणायला लावतो' म्हणजे अगदी पायाच्या अंगठ्याने किंवा झाडूच्या काडीने देखील स्वतः खणणे किंवा दुसऱ्याकडून खणवून घेणे होय. 'फोडतो किंवा फोडायला लावतो' म्हणजे अगदी पाणी ओतून देखील स्वतः जमीन फोडणे किंवा दुसऱ्याकडून फोडवून घेणे होय. 'जाळतो किंवा जाळायला लावतो' म्हणजे अगदी भिक्षापात्र भाजताना देखील स्वतः जाळणे किंवा दुसऱ्याकडून पेटवून घेणे होय. जितक्या ठिकाणी तो स्वतः आग लावतो किंवा लावायला सांगतो, तितके पाचित्तिय होतात. कारण भिक्षापात्र भाजणाऱ्या भिक्खूने देखील पूर्वी जेथे आधीच भाजले गेले आहे अशाच ठिकाणी ते भाजावे. न जळालेल्या जमिनीवर आग ठेवणे योग्य नाही. परंतु, भिक्षापात्र भाजण्याच्या खापराच्या वर आग ठेवणे योग्य आहे. लाकडांवर आग ठेवली आणि ती आग लाकडे जाळत जाऊन जमिनीला जाळते, तर ते अयोग्य आहे. विटांच्या खापरांवर इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. ตตฺราปิ หิ อิฏฺฐกาทีนํเยว อุปริ ฐเปตุํ วฏฺฏติ. กสฺมา? เตสํ อนุปาทานตฺตา. น หิ ตานิ อคฺคิสฺส อุปาทานสงฺขฺยํ คจฺฉนฺติ. สุกฺขขาณุสุกฺขรุกฺขาทีสุปิ อคฺคึ ทาตุํ น วฏฺฏติ. สเจ ปน ปถวึ อปฺปตฺตเมว นิพฺพาเปตฺวา คมิสฺสามีติ เทติ, วฏฺฏติ. ปจฺฉา นิพฺพาเปตุํ น สกฺโกติ, อวิสยตฺตา อนาปตฺติ. ติณุกฺกํ คเหตฺวา คจฺฉนฺโต หตฺเถ ฑยฺหมาเน ภูมิยํ ปาเตติ, อนาปตฺติ. ปติตฏฺฐาเนเยว อุปาทานํ ทตฺวา อคฺคึ กาตุํ วฏฺฏตีติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. ทฑฺฒปถวิยา จ ยตฺตกํ ฐานํ อุสุมาย อนุคตํ, สพฺพํ วิโกเปตุํ วฏฺฏตีติ ตตฺเถว วุตฺตํ. โย ปน อชานนโก ภิกฺขุ อรณีสหิเตน อคฺคึ นิพฺพตฺเตตฺวา หตฺเถน อุกฺขิปิตฺวา ‘‘กึ กโรมี’’ติ วทติ, ‘‘ชาเลหี’’ติ วตฺตพฺโพ, ‘‘หตฺโถ ฑยฺหตี’’ติ วทติ, ‘‘ยถา น ฑยฺหติ ตถา กโรหี’’ติ วตฺตพฺโพ. ‘‘ภูมิยํ ปาเตหี’’ติ ปน น วตฺตพฺโพ. สเจ หตฺเถ ฑยฺหมาเน ปาเตติ ‘‘ปถวึ ทหิสฺสามี’’ติ อปาติตตฺตา อนาปตฺติ. ปติตฏฺฐาเน ปน อคฺคึ กาตุํ วฏฺฏตีติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. कारण तेथेही विटांच्या वरच आग ठेवणे योग्य आहे. का? कारण त्या इंधन नसतात. कारण त्या आगीचे इंधन मानल्या जात नाहीत. सुकलेले खुंट, सुकलेली झाडे इत्यादींवर देखील आग लावणे योग्य नाही. परंतु, जर 'जमिनीपर्यंत पोहोचण्यापूर्वीच ती विझवून मी जाईन' असा विचार करून आग लावली, तर ते योग्य आहे. नंतर जर ती विझवण्यास असमर्थ ठरला, तर आपल्या नियंत्रणाबाहेर असल्यामुळे अनापत्ती आहे. गवताची पेटती पळत घेऊन जात असताना हात भाजल्यामुळे ती जमिनीवर टाकली, तर अनापत्ती आहे. 'ज्या ठिकाणी ती पडली आहे, त्याच ठिकाणी इंधन देऊन आग लावणे योग्य आहे,' असे महापंचरीमध्ये म्हटले आहे. आणि जळालेल्या जमिनीचा जितका भाग उष्णतेने प्रभावित झाला आहे, तो सर्व भाग खणणे योग्य आहे, असे तेथेच म्हटले आहे. परंतु, जो अज्ञानी भिक्खू अरणीच्या साहाय्याने अग्नी निर्माण करून, तो हातात घेऊन 'मी काय करू?' असे विचारतो, त्याला 'तो पेटव' असे सांगावे. जर तो 'हात भाजत आहे' असे म्हणतो, तर 'ज्या प्रकारे हात भाजणार नाही, त्या प्रकारे कर' असे सांगावे. परंतु 'जमिनीवर टाक' असे सांगू नये. जर हात भाजत असताना तो ती आग खाली टाकतो, तर 'मी जमीन जाळीन' या हेतूने न टाकल्यामुळे अनापत्ती आहे. परंतु पडलेल्या ठिकाणी आग लावणे योग्य आहे, असे कुरुंदीमध्ये म्हटले आहे. ๘๘. อนาปตฺติ อิมํ ชานาติอาทีสุ ‘‘อิมสฺส ถมฺภสฺส อาวาฏํ ชาน, มหามตฺติกํ ชาน, ถุสมตฺติกํ ชาน, มหามตฺติกํ เทหิ, ถุสมตฺติกํ เทหิ, มตฺติกํ อาหร, ปํสุํ อาหร, มตฺติกาย อตฺโถ, ปํสุนา อตฺโถ, อิมสฺส ถมฺภสฺส อาวาฏํ กปฺปิยํ กโรหิ, อิมํ มตฺติกํ กปฺปิยํ กโรหิ, อิมํ ปํสุํ กปฺปิยํ กโรหี’’ติ เอวมตฺโถ เวทิตพฺโพ. ८८. 'हे जाणून घे' इत्यादी वाक्यांमध्ये अनापत्ती आहे, जसे की: 'या खांबाचा खड्डा जाणून घे, मोठी माती जाणून घे, भुसा मिसळलेली माती जाणून घे, मोठी माती दे, भुसा मिसळलेली माती दे, चिकणमाती आण, धूळ आण, चिकणमातीची गरज आहे, धुळीची गरज आहे, या खांबाचा खड्डा कप्पिय कर, ही चिकणमाती कप्पिय कर, ही धूळ कप्पिय कर' - असा अर्थ समजला पाहिजे. อสญฺจิจฺจาติ ปาสาณรุกฺขาทีนิ วา ปวฏฺเฏนฺตสฺส กตฺตรทณฺเฑน วา อาหจฺจ อาหจฺจ คจฺฉนฺตสฺส ปถวี ภิชฺชติ, สา ‘‘เตน ภินฺทิสฺสามี’’ติ เอวํ สญฺจิจฺจ อภินฺนตฺตา อสญฺจิจฺจ ภินฺนา นาม โหติ. อิติ อสญฺจิจฺจ ภินฺทนฺตสฺส อนาปตฺติ. อสติยาติ อญฺญวิหิโต เกนจิ สทฺธึ กิญฺจิ กเถนฺโต ปาทงฺคุฏฺฐเกน วา กตฺตรยฏฺฐิยา วา ปถวึ วิลิขนฺโต ติฏฺฐติ, เอวํ อสติยา วิลิขนฺตสฺส วา ภินฺทนฺตสฺส วา อนาปตฺติ. อชานนฺตสฺสาติ อนฺโตเคเห โอวฏฺฐํ ฉนฺนํ ปถวึ ‘‘อกปฺปิยปถวี’’ติ น ชานาติ, ‘‘กปฺปิยปถวี’’ติ สญฺญาย วิโกเปติ, ‘‘ขณามิ ภินฺทามิ ทหามี’’ติ วา น ชานาติ[Pg.25], เกวลํ สงฺโคปนตฺถาย ขณิตฺตาทีนิ วา ฐเปติ, ฑยฺหมานหตฺโถ วา อคฺคึ ปาเตติ, เอวํ อชานนฺตสฺส อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. 'असंचिच्च' म्हणजे दगड, लाकूड इत्यादी लोळवत असताना किंवा काठीने वारंवार टेकवत चालत असताना जमीन फुटते; ती 'मी याने जमीन फोडीन' अशा प्रकारे जाणूनबुजून न फोडल्यामुळे 'असंचिच्च भिन्ना' म्हटली जाते. अशा प्रकारे अजाणतेपणे जमीन फोडणाऱ्याला अनापत्ती आहे. 'असतिया' म्हणजे दुसऱ्या विचारात मग्न असलेला, कोणाशी तरी काही बोलत असताना पायाच्या अंगठ्याने किंवा काठीने जमीन ओरबाडत उभा राहतो; अशा प्रकारे बेसावधपणे ओरबाडणाऱ्या किंवा फोडणाऱ्या भिक्खूला अनापत्ती आहे. 'अजानंतस्स' म्हणजे घराच्या आत ओल्या झालेल्या आणि झाकलेल्या जमिनीला 'अकप्पिय जमीन' म्हणून ओळखत नाही, आणि 'कप्पिय जमीन' अशा समजुतीने ती खराब करतो; किंवा 'मी खणतो, फोडतो, जाळतो' हे त्याला माहीत नसते, केवळ सुरक्षित ठेवण्यासाठी कुदळ इत्यादी ठेवतो, किंवा हात भाजत असताना आग खाली पडते; अशा प्रकारे न जाणणाऱ्याला अनापत्ती आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กายจิตฺตโต วาจาจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ. กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. हे तीन समुत्थानांचे आहे - काय-चित्त, वाचा-चित्त आणि काय-वाचा-चित्त यांपासून उद्भवते. हे क्रियात्मक, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, प्रज्ञप्तिवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदना आहे. ปถวีขณนสิกฺขาปทํ ทสมํ. जमीन खणण्याचा दहावा शिक्षापद समाप्त. สมตฺโต วณฺณนากฺกเมน มุสาวาทวคฺโค ปฐโม. स्पष्टीकरणाच्या क्रमानुसार पहिला 'मुसावादवग्गो' समाप्त झाला. ๒. ภูตคามวคฺโค २. भूतगामवग्गो (भूतग्राम वर्ग) ๑. ภูตคามสิกฺขาปทวณฺณนา १. भूतगाम शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण ๘๙. เสนาสนวคฺคสฺส ปฐมสิกฺขาปเท – อนาทิยนฺโตติ ตสฺสา วจนํ อคณฺหนฺโต. ทารกสฺส พาหุํ อาโกเฏสีติ อุกฺขิตฺตํ ผรสุํ นิคฺคเหตุํ อสกฺโกนฺโต มนุสฺสานํ จกฺขุวิสยาตีเต มหาราชสนฺติกา ลทฺเธ รุกฺขฏฺฐกทิพฺพวิมาเน นิปนฺนสฺส ทารกสฺส พาหุํ ถนมูเลเยว ฉินฺทิ. น โข เมตํ ปติรูปนฺติอาทิมฺหิ อยํ สงฺเขปวณฺณนา – หิมวนฺเต กิร ปกฺขทิวเสสุ เทวตาสนฺนิปาโต โหติ, ตตฺถ รุกฺขธมฺมํ ปุจฺฉนฺติ – ‘‘ตฺวํ รุกฺขธมฺเม ฐิตา น ฐิตา’’ติ? รุกฺขธมฺโม นาม รุกฺเข ฉิชฺชมาเน รุกฺขเทวตาย มโนปโทสสฺส อกรณํ. ตตฺถ ยา เทวตา รุกฺขธมฺเม อฏฺฐิตา โหติ, สา เทวตาสนฺนิปาตํ ปวิสิตุํ น ลภติ. อิติ สา เทวตา อิมญฺจ รุกฺขธมฺเม อฏฺฐานปจฺจยํ อาทีนวํ อทฺทส, ภควโต จ สมฺมุขา สุตปุพฺพธมฺมเทสนานุสาเรน ตถาคตสฺส ฉทฺทนฺตาทิกาเล ปุพฺพจริตํ อนุสฺสริ. เตนสฺสา เอตทโหสิ – ‘‘น โข เมตํ ปติรูปํ…เป… โวโรเปยฺย’’นฺติ. ยํนูนาหํ ภควโต เอตมตฺถํ อาโรเจยฺยนฺติ อิทํ ปนสฺสา ‘‘อยํ ภิกฺขุ สปิติโก ปุตฺโต, อทฺธา ภควา อิมํ อิมสฺส อชฺฌาจารํ สุตฺวา มริยาทํ พนฺธิสฺสติ, สิกฺขาปทํ ปญฺญเปสฺสตี’’ติ ปฏิสญฺจิกฺขนฺติยา อโหสิ. สจชฺช ตฺวํ เทวเตติ สเจ อชฺช ตฺวํ เทวเต. ปสเวยฺยาสีติ ชเนยฺยาสิ อุปฺปาเทยฺยาสิ. เอวญฺจ ปน วตฺวา ภควา ตํ เทวตํ สญฺญาเปนฺโต – ८९. सेनासनवर्गाच्या पहिल्या शिक्षापदात – 'अनादियन्तो' म्हणजे तिचे बोलणे न मानणारा (तिच्या शब्दांकडे दुर्लक्ष करणारा). 'दारकस्स बाहुं आकोटेसि' म्हणजे उचललेली कुऱ्हाड आवरण्यास असमर्थ झाल्यामुळे, मानवांच्या दृष्टीपथापलीकडे असलेल्या, वैश्रवण महाराजांकडून मिळालेल्या वृक्षावरील दिव्य विमानात झोपलेल्या देवपुत्राचा (बालकाचा) हात खांद्यापाशीच (स्तनमुळापाशीच) कापला गेला. 'न खो मेतं पतिरूपं' इत्यादी गाथेत ही संक्षिप्त व्याख्या (संक्षेपवर्णना) आहे – असे म्हटले जाते की, हिमालयात पक्षाच्या दिवशी (पौर्णिमा-अमावास्येला) देवतांची सभा भरते. तेथे ते वृक्षधर्माविषयी विचारतात – "तू वृक्षधर्मावर स्थिर आहेस की नाही?" वृक्षधर्म म्हणजे वृक्ष कापला जात असताना वृक्षदेवतेने मनात द्वेष (क्रोध) न उत्पन्न करणे होय. तेथे जी देवता वृक्षधर्मावर स्थिर नसते, तिला देवतांच्या सभेत प्रवेश मिळत नाही. म्हणून त्या देवतेने वृक्षधर्मावर न राहण्याचा हा दोष पाहिला, आणि भगवंतांच्या संमुख पूर्वी ऐकलेल्या धर्मदेशनेनुसार, तथागतांच्या षड्दंत हत्ती इत्यादी जन्मांतील पूर्वचरित्राचे स्मरण केले. त्यामुळे तिच्या मनात असा विचार आला – "हे माझ्यासाठी योग्य नाही... (पे)... मी त्याचा जीव घेऊ नये." "मी भगवंतांना हा वृत्त सांगावा का?" हा विचार तिच्या मनात आला, कारण ती विचार करत होती की, "हा भिक्खू सपितृक पुत्र (पित्यासह असलेला पुत्र) आहे. नक्कीच भगवान या भिक्खूच्या या अतिचाराविषयी (उल्लंघनाविषयी) ऐकून मर्यादा घालतील आणि शिक्षापद प्रज्ञप्त करतील." 'ससज्ज त्वं देवते' म्हणजे "हे देवते, जर आज तू..." 'पसवेय्यासि' म्हणजे उत्पन्न करशील किंवा निर्माण करशील. आणि असे बोलून भगवान त्या देवतेला समजावताना म्हणाले – ‘‘โย [Pg.26] เว อุปฺปติตํ โกธํ, รถํ ภนฺตํว วารเย; ตมหํ สารถึ พฺรูมิ, รสฺมิคฺคาโห อิตโร ชโน’’ติ. (ธ. ป. ๒๒๒); "जो मनुष्य खरोखरच उत्पन्न झालेल्या क्रोधाला, वेगाने धावणाऱ्या रथाला रोखावे त्याप्रमाणे रोखतो, त्यालाच मी खरा सारथी म्हणतो; इतर लोक तर केवळ लगाम धरणारे आहेत." อิมํ คาถมภาสิ. คาถาปริโยสาเน สา เทวตา โสตาปตฺติผเล ปติฏฺฐาสิ. ปุน ภควา สมฺปตฺตปริสาย ธมฺมํ เทเสนฺโต – भगवंतांनी ही गाथा म्हटली. गाथेच्या शेवटी ती देवता स्रोतापत्ती फलावर प्रतिष्ठित झाली. पुन्हा भगवान उपस्थित जनसमुदायाला (परिषदेला) धर्म उपदेश करताना म्हणाले – ‘‘โย อุปฺปติตํ วิเนติ โกธํ, วิสฏํ สปฺปวิสํว โอสเธหิ; โส ภิกฺขุ ชหาติ โอรปารํ, อุรโค ชิณฺณมิวตฺตจํ ปุราณ’’นฺติ. (สุ. นิ. ๑); "जो मनुष्य पसरलेल्या सर्पविषाला औषधांनी नष्ट करावे त्याप्रमाणे उत्पन्न झालेल्या क्रोधाला नष्ट करतो, तो भिक्खू या आणि पलीकडच्या तीराला (संसाराला) सोडून देतो, ज्याप्रमाणे सर्प आपली जुनी जीर्ण त्वचा (कात) टाकून देतो." อิมํ คาถมภาสิ. ตตฺร ปฐมคาถา ธมฺมปเท สงฺคหํ อารุฬฺหา, ทุติยา สุตฺตนิปาเต, วตฺถุ ปน วินเยติ. อถ ภควา ธมฺมํ เทเสนฺโตเยว ตสฺสา เทวตาย วสนฏฺฐานํ อาวชฺชนฺโต ปติรูปํ ฐานํ ทิสฺวา ‘‘คจฺฉ, เทวเต, อสุกสฺมึ โอกาเส รุกฺโข วิวิตฺโต, ตสฺมึ อุปคจฺฉา’’ติ อาห. โส กิร รุกฺโข น อาฬวิรฏฺเฐ, เชตวนสฺส อนฺโตปริกฺเขเป, ยสฺส เทวปุตฺตสฺส ปริคฺคโห อโหสิ, โส จุโต; ตสฺมา ‘‘วิวิตฺโต’’ติ วุตฺโต. ตโต ปฏฺฐาย จ ปน สา เทวตา สมฺมาสมฺพุทฺธโต ลทฺธปริหารา พุทฺธุปฏฺฐายิกา อโหสิ. ยทา เทวตาสมาคโม โหติ, ตทา มเหสกฺขเทวตาสุ อาคจฺฉนฺตีสุ อญฺญา อปฺเปสกฺขา เทวตา ยาว มหาสมุทฺทจกฺกวาฬปพฺพตา ตาว ปฏิกฺกมนฺติ. อยํ ปน อตฺตโน วสนฏฺฐาเน นิสีทิตฺวาว ธมฺมํ สุณาติ. ยมฺปิ ปฐมยาเม ภิกฺขู ปญฺหํ ปุจฺฉนฺติ, มชฺฌิมยาเม เทวตา, ตํ สพฺพํ ตตฺเถว นิสีทิตฺวา สุณาติ. จตฺตาโร จ มหาราชาโนปิ ภควโต อุปฏฺฐานํ อาคนฺตฺวา คจฺฉนฺตา ตํ เทวตํ ทิสฺวาว คจฺฉนฺติ. भगवंतांनी ही गाथा म्हटली. त्यातील पहिली गाथा धम्मपदात समाविष्ट केली गेली आहे, दुसरी सुत्तनिपातात, आणि ही कथा विनयपिटकात समाविष्ट आहे. त्यानंतर भगवान धर्म उपदेश करत असतानाच त्या देवतेच्या राहण्याच्या जागेचा विचार करू लागले. योग्य जागा पाहून ते म्हणाले, "हे देवते, जा, अमुक ठिकाणी एक वृक्ष रिकामा (स्वामीविहीन) आहे, तू तेथे जा." तो वृक्ष आळवी देशात नव्हता, तर जेतवनाच्या आवारात होता. ज्या देवपुत्राच्या मालकीचा तो वृक्ष होता, तो च्युत (मृत) झाला होता; म्हणून त्याला 'रिकामा' (विवित्त) म्हटले गेले. तेव्हापासून ती देवता सम्यक्संबुद्धांकडून आश्रय मिळवून बुद्ध-उपस्थायिका (बुद्धांची सेवा करणारी) झाली. जेव्हा देवतांची सभा भरत असे, तेव्हा महान प्रभावशाली देवता आल्यावर इतर कमी प्रभावशाली देवता महासागर आणि चक्रवाळ पर्वतापर्यंत मागे हटत असत. परंतु ही देवता आपल्या राहण्याच्या ठिकाणी बसूनच धर्म ऐकू शकत असे. पहिल्या प्रहरात भिक्खू जे प्रश्न विचारत आणि मध्यम प्रहरात देवता जे प्रश्न विचारत, ते सर्व ती आपल्या विमानामध्ये बसूनच ऐकत असे. चार महाराज (चतुर्महाराज) देखील भगवंतांच्या सेवेसाठी येऊन परत जाताना त्या देवतेला भेटूनच जात असत. ๙๐. ภูตคามปาตพฺยตายาติ เอตฺถ ภวนฺติ อหุวุญฺจาติ ภูตา; ชายนฺติ วฑฺฒนฺติ ชาตา วฑฺฒิตา จาติ อตฺโถ. คาโมติ ราสิ; ภูตานํ คาโมติ ภูตคาโม; ภูตา เอว วา คาโม ภูตคาโม; ปติฏฺฐิตหริตติณรุกฺขาทีนเมตํ อธิวจนํ. ปาตพฺยสฺส ภาโว ปาตพฺยตา; เฉทนเภทนาทีหิ ยถารุจิ ปริภุญฺชิตพฺพตาติ อตฺโถ. ตสฺสา ภูตคามปาตพฺยตาย; นิมิตฺตตฺเถ ภุมฺมวจนํ, ภูตคามปาตพฺยตาเหตุ, ภูตคามสฺส เฉทนาทิปจฺจยา ปาจิตฺติยนฺติ อตฺโถ. ९०. 'भूतगामपातब्यताय' यामध्ये – जे अस्तित्वात आहेत आणि जे पूर्वी होते त्यांना 'भूत' म्हणतात; जे उत्पन्न होतात आणि वाढतात, किंवा जे उत्पन्न झाले आहेत आणि वाढले आहेत, असा याचा अर्थ आहे. 'गाम' म्हणजे समूह; भूतांचा (वनस्पतींचा) समूह म्हणजे 'भूतगाम'; किंवा भूत हेच समूह म्हणजे 'भूतगाम' होय. हे जमिनीत रुजलेले हिरवे गवत, वृक्ष इत्यादींचे नाव आहे. 'पातब्य' चा भाव म्हणजे 'पातब्यता'; कापून किंवा तोडून आपल्या इच्छेनुसार वापरणे असा याचा अर्थ आहे. 'तस्सा भूतगामपातब्यताय' यामध्ये सप्तमी विभक्ती कारणाचे दर्शक आहे; भूतगामाचा नाश करण्याच्या कारणाने, म्हणजेच भूतगाम कापण्या इत्यादी कारणांमुळे पाचित्तिय (प्रायश्चित्त) होते, असा याचा अर्थ आहे. ๙๑. อิทานิ [Pg.27] ตํ ภูตคามํ วิภชิตฺวา ทสฺเสนฺโต ภูตคาโม นาม ปญฺจ พีชชาตานีติอาทิมาห. ตตฺถ ภูตคาโม นามาติ ภูตคามํ อุทฺธริตฺวา ยสฺมึ สติ ภูตคาโม โหติ, ตํ ทสฺเสตุํ ‘‘ปญฺจ พีชชาตานี’’ติ อาหาติ อฏฺฐกถาสุ วุตฺตํ. เอวํ สนฺเตปิ ‘‘ยานิ วา ปนญฺญานิปิ อตฺถิ มูเล ชายนฺตี’’ติอาทีนิ น สเมนฺติ. น หิ มูลพีชาทีนิ มูลาทีสุ ชายนฺติ, มูลาทีสุ ชายมานานิ ปน ตานิ พีชากตานิ, ตสฺมา เอวเมตฺถ วณฺณนา เวทิตพฺพา – ภูตคาโม นามาติ วิภชิตพฺพปทํ. ปญฺจาติ ตสฺส วิภาคปริจฺเฉโท. พีชชาตานีติ ปริจฺฉินฺนธมฺมนิทสฺสนํ. ตสฺสตฺโถ – พีเชหิ ชาตานิ พีชชาตานิ; รุกฺขาทีนเมตํ อธิวจนํ. อปโร นโย – พีชานิ จ ตานิ วิชาตานิ จ ปสูตานิ นิพฺพตฺตปณฺณมูลานีติ พีชชาตานิ. เอเตน อลฺลวาลิกาทีสุ ฐปิตานํ นิพฺพตฺตปณฺณมูลานํ สิงฺคิเวราทีนํ สงฺคโห กโต โหติ. ९१. आता त्या भूतगामाचे वर्गीकरण करून दाखवताना भगवंतांनी "भूतगाम म्हणजे पाच प्रकारचे बीजसमूह" इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'भूतगाम' हा शब्द उद्धृत करून, ज्याच्या अस्तित्वामुळे भूतगाम होतो ते दाखवण्यासाठी "पाच प्रकारचे बीजसमूह" असे म्हटले आहे, असे अट्ठकथांमध्ये सांगितले आहे. असे असले तरी, "जी इतर मुळातून उत्पन्न होतात" इत्यादी विधानांशी हे जुळत नाही. कारण मूळ-बीज इत्यादी मुळामध्ये उत्पन्न होत नाहीत, तर मुळामध्ये उत्पन्न होणाऱ्या त्या वनस्पतींना बीजरूप मानले जाते. म्हणून येथे अशी व्याख्या समजली पाहिजे – 'भूतगाम' हे विश्लेषित करायचे पद आहे. 'पाच' हे त्याचे वर्गीकरण आहे. 'बीजजात' हे वर्गीकृत धर्माचे निदर्शन आहे. त्याचा अर्थ – बीजांपासून उत्पन्न झालेले ते 'बीजजात' होय; हे वृक्ष इत्यादींचे नाव आहे. दुसरा प्रकार असा – जे बीज आहेत आणि जे अंकुरित होऊन पाने व मुळे असलेले झाले आहेत, ते 'बीजजात' होत. याद्वारे ओल्या वाळूत इत्यादी ठिकाणी ठेवलेल्या, पाने व मुळे फुटलेल्या आल्या (आद्रक) इत्यादींचा समावेश होतो. อิทานิ เยหิ พีเชหิ ชาตตฺตา รุกฺขาทีนิ พีชชาตานีติ วุตฺตานิ, ตานิ ทสฺเสนฺโต ‘‘มูลพีช’’นฺติอาทิมาห. เตสํ อุทฺเทโส ปากโฏ เอว. นิทฺเทเส ยานิ วา ปนญฺญานิปิ อตฺถิ มูเล ชายนฺติ มูเล สญฺชายนฺตีติ เอตฺถ พีชโต นิพฺพตฺเตน พีชํ ทสฺสิตํ, ตสฺมา เอวเมตฺถ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ, ยานิ วา ปนญฺญานิปิ อตฺถิ อาลุวกเสรุกมลุปฺปลปุณฺฑรีกกุวลยกนฺทปาฏลิมูลาทิเภเท มูเล คจฺฉวลฺลิรุกฺขาทีนิ ชายนฺติ สญฺชายนฺติ, ตานิ ยมฺหิ มูเล ชายนฺติ เจว สญฺชายนฺติ จ ตญฺจ, ปาฬิยํ วุตฺตํ หลิทฺทาทิ จ สพฺพมฺปิ เอตํ มูลพีชํ นาม. เอเสว นโย ขนฺธพีชาทีสุ. เยวาปนกขนฺธพีเชสุ ปเนตฺถ อมฺพาฏกอินฺทสาลนุหีปาฬิภทฺทกณิการาทีนิ ขนฺธพีชานิ, อมูลวลฺลิ จตุรสฺสวลฺลิกณวีราทีนิ ผฬุพีชานิ มกจิสุมนชยสุมนาทีนิ อคฺคพีชานิ, อมฺพชมฺพูปนสฏฺฐิอาทีนิ พีชพีชานีติ ทฏฺฐพฺพานิ. आता ज्या बीजांपासून उत्पन्न झाल्यामुळे वृक्ष इत्यादींना 'बीजजात' म्हटले गेले आहे, ते दाखवताना भगवंतांनी "मूळ-बीज" इत्यादी म्हटले आहे. त्यांचे वर्गीकरण स्पष्टच आहे. स्पष्टीकरणात "जी इतर मुळातून उत्पन्न होतात आणि मुळात वाढतात" येथे बीजापासून उत्पन्न होणाऱ्या वनस्पतीद्वारे बीज दाखवले आहे. म्हणून येथे असा अर्थ समजला पाहिजे – जी इतर अळू, कशेरु, लाल कमळ, पांढरे कमळ, निळे कमळ, कंद, पाटल-मूळ इत्यादी विविध प्रकारच्या मुळांमध्ये झुडपे, वेली, वृक्ष इत्यादी उत्पन्न होतात आणि वाढतात; ती ज्या मुळात उत्पन्न होतात आणि वाढतात ते मूळ, आणि पाळीमध्ये (मूळ पाठात) सांगितलेले हळद इत्यादी, हे सर्व 'मूळ-बीज' म्हटले जाते. हाच नियम स्कंध-बीज (फांदी-बीज) इत्यादींना लागू होतो. येथे स्कंध-बीजांमध्ये अंबाडा, इंद्रसाल, निवडुंग (नुही), पारिभद्र, कर्णिकार इत्यादी स्कंध-बीज आहेत; अमूलवेली, चतुरस्रवेली, कण्हेर इत्यादी पेर-बीज (पर्व-बीज) आहेत; ताग (मकचि), जाई, जुई इत्यादी अग्र-बीज (शेंडा-बीज) आहेत; आणि आंबा, जांभूळ, फणस यांच्या बिया इत्यादी बीज-बीज आहेत, असे समजावे. ๙๒. อิทานิ ยํ วุตฺตํ ‘‘ภูตคามปาตพฺยตาย ปาจิตฺติย’’นฺติ ตตฺถ สญฺญาวเสน อาปตฺตานาปตฺติเภทํ ปาตพฺยตาเภทญฺจ ทสฺเสนฺโต พีเช พีชสญฺญีติอาทิมาห. ตตฺถ ยถา ‘‘สาลีนํ เจปิ โอทนํ ภุญฺชตี’’ติอาทีสุ (ม. นิ. ๑.๗๖) สาลิตณฺฑุลานํ โอทโน ‘‘สาลีนํ โอทโน’’ติ วุจฺจติ, เอวํ พีชโต สมฺภูโต ภูตคาโม ‘‘พีช’’นฺติ วุตฺโตติ เวทิตพฺโพ. ยํ [Pg.28] ปน ‘‘พีชคามภูตคามสมารมฺภา ปฏิวิรโต’’ติอาทีสุ (ที. นิ. ๑.๑๐) วุตฺตํ ภูตคามปริโมจนํ กตฺวา ฐปิตํ พีชํ, ตํ ทุกฺกฏวตฺถุ. อถ วา ยเทตํ ‘‘ภูตคาโม นามา’’ติ สิกฺขาปทวิภงฺคสฺส อาทิปทํ, เตน สทฺธึ โยเชตฺวา ยํ พีชํ ภูตคาโม นาม โหติ, ตสฺมึ พีเช พีชสญฺญี สตฺถกาทีนิ คเหตฺวา สยํ วา ฉินฺทติ อญฺเญน วา เฉทาเปติ, ปาสาณาทีนิ คเหตฺวา สยํ วา ภินฺทติ อญฺเญน วา เภทาเปติ, อคฺคึ อุปสํหริตฺวา สยํ วา ปจติ อญฺเญน วา ปจาเปติ, อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสาติ เอวเมตฺถ อตฺโถ เวทิตพฺโพ. ยถารุตํ ปน คเหตฺวา ภูตคามวินิมุตฺตสฺส พีชสฺส ฉินฺทนาทิเภทาย ปาตพฺยตาย ปาจิตฺติยํ น วตฺตพฺพํ. ९२. आता, "भूतगाम (सजीव वनस्पती) नष्ट केल्याने पाचित्तिय होते" असे जे म्हटले आहे, त्यामध्ये संज्ञेच्या (समजुतीच्या) आधारे आपत्ती (दोष) व अनापत्ती (दोषमुक्ती) यांचा भेद, तसेच विनाश करण्याचा भेद दर्शवण्यासाठी "बीजे बीजसञ्ञी" (बीजामध्ये बीजाची संज्ञा असणारा) इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये, ज्याप्रमाणे "साळीचा भात खातो" इत्यादी वाक्यांत साळीच्या तांदळाच्या भाताला "साळीचा भात" म्हटले जाते, त्याचप्रमाणे बीजापासून उत्पन्न झालेल्या भूतगामाला (वनस्पतीला) "बीज" म्हटले गेले आहे, असे समजावे. परंतु, "बीजगाम आणि भूतगाम नष्ट करण्यापासून विरत राहणे" इत्यादी सूत्रांमध्ये जे भूतगामापासून वेगळे करून ठेवलेले बीज सांगितले आहे, ते दुक्कट (दुष्कृत) आपत्तीचे कारण ठरते. किंवा, "भूतगाम म्हणजे काय" हे जे सिक्खापदविभंगाचे पहिले पद आहे, त्याच्याशी संबंध जोडून – जे बीज भूतगाम संज्ञक आहे, त्या बीजाविषयी 'हे बीज आहे' अशी संज्ञा ठेवून, चाकू इत्यादी शस्त्रे घेऊन स्वतः कापतो किंवा दुसऱ्याकडून कापवून घेतो, दगड इत्यादी घेऊन स्वतः फोडतो किंवा दुसऱ्याकडून फोडवून घेतो, अग्नी जवळ आणून स्वतः भाजतो किंवा दुसऱ्याकडून भाजवून घेतो, तर त्याला पाचित्तिय आपत्ती होते, असा येथे अर्थ समजावा. परंतु, केवळ शब्दाचा शब्दशः अर्थ घेऊन, भूतगामापासून मुक्त (वेगळ्या) झालेल्या बीजाला कापण्यादी विनाश केल्यामुळे पाचित्तिय होते, असे म्हणता येणार नाही. อยญฺเหตฺถ วินิจฺฉยกถา – ภูตคามํ วิโกเปนฺตสฺส ปาจิตฺติยํ ภูตคามปริโมจิตํ ปญฺจวิธมฺปิ พีชคามํ วิโกเปนฺตสฺส ทุกฺกฏํ. พีชคามภูตคาโม นาเมส อตฺถิ อุทกฏฺโฐ, อตฺถิ ถลฏฺโฐ. ตตฺถ อุทกฏฺโฐ สาสปมตฺติกา ติลพีชกาทิเภทา สปณฺณิกา อปณฺณิกา จ สพฺพา เสวาลชาติ อนฺตมโส อุทกปปฺปฏกํ อุปาทาย ‘‘ภูตคาโม’’ติ เวทิตพฺโพ. อุทกปปฺปฏโก นาม อุปริ ถทฺโธ ผรุสวณฺโณ, เหฏฺฐา มุทุ นีลวณฺโณ โหติ. ตตฺถ ยสฺส เสวาลสฺส มูลํ โอรูหิตฺวา ปถวิยํ ปติฏฺฐิตํ, ตสฺส ปถวี ฐานํ. โย อุทเก สญฺจรติ, ตสฺส อุทกํ. ปถวิยํ ปติฏฺฐิตํ ยตฺถ กตฺถจิ วิโกเปนฺตสฺส อุทฺธริตฺวา วา ฐานนฺตรํ สงฺกาเมนฺตสฺส ปาจิตฺติยํ. อุทเก สญฺจรนฺตํ วิโกเปนฺตสฺเสว ปาจิตฺติยํ. หตฺเถหิ ปน อิโต จิโต จ วิยูหิตฺวา นฺหายิตุํ วฏฺฏติ, สกลญฺหิ อุทกํ ตสฺส ฐานํ. ตสฺมา น โส เอตฺตาวตา ฐานนฺตรํ สงฺกามิโต โหติ. อุทกโต ปน อุทเกน วินา สญฺจิจฺจ อุกฺขิปิตุํ น วฏฺฏติ, อุทเกน สทฺธึ อุกฺขิปิตฺวา ปุน อุทเก ปกฺขิปิตุํ วฏฺฏติ. ปริสฺสาวนนฺตเรน นิกฺขมติ, กปฺปิยํ การาเปตฺวาว อุทกํ ปริภุญฺชิตพฺพํ. อุปฺปลินีปทุมินีอาทีนิ ชลชวลฺลิติณานิ อุทกโต อุทฺธรนฺตสฺส วา ตตฺเถว วิโกเปนฺตสฺส วา ปาจิตฺติยํ. ปเรหิ อุปฺปาฏิตานิ วิโกเปนฺตสฺส ทุกฺกฏํ. ตานิ หิ พีชคาเม สงฺคหํ คจฺฉนฺติ. ติลพีชกสาสปมตฺตกเสวาโลปิ อุทกโต อุทฺธโต อมิลาโต อคฺคพีชสงฺคหํ คจฺฉติ. มหาปจฺจริยาทีสุ [Pg.29] ‘‘อนนฺตกติลพีชกอุทกปปฺปฏกาทีนิ ทุกฺกฏวตฺถุกานี’’ติ วุตฺตํ, ตตฺถ การณํ น ทิสฺสติ. อนฺธกฏฺฐกถายํ ‘‘สมฺปุณฺณภูตคาโม น โหติ, ตสฺมา ทุกฺกฏ’’นฺติ วุตฺตํ, ตมฺปิ น สเมติ, ภูตคาเม หิ ปาจิตฺติยํ, พีชคาเม ทุกฺกฏํ วุตฺตํ. อสมฺปุณฺณภูตคาโม นาม ตติโย โกฏฺฐาโส เนว ปาฬิยํ น อฏฺฐกถาสุ อาคโต. อถ เอตํ พีชคามสงฺคหํ คจฺฉิสฺสตีติ, ตมฺปิ น ยุตฺตํ, อภูตคามมูลตฺตา ตาทิสสฺส พีชคามสฺสาติ. อปิจ ‘‘ครุกลหุเกสุ ครุเก ฐาตพฺพ’’นฺติ เอตํ วินยลกฺขณํ. या विषयावरील निर्णय असा आहे – भूतगाम (सजीव वनस्पती) नष्ट करणाऱ्याला पाचित्तिय होते, आणि भूतगामापासून वेगळे केलेल्या पाच प्रकारच्या बीजगामाला (बीजांना) नष्ट करणाऱ्याला दुक्कट (दुष्कृत) दोष होतो. हा बीजगाम आणि भूतगाम पाण्यात राहणारा (जलस्थ) आणि जमिनीवर राहणारा (स्थलस्थ) अशा दोन प्रकारचा असतो. त्यापैकी जलस्थ म्हणजे मोहरीच्या किंवा तिळाच्या आकाराचे शेवाळ, पानांसह किंवा पानांशिवाय असणारे सर्व प्रकारचे शेवाळ आणि अगदी पाण्याच्या थरापर्यंत (जलपर्पटक) सर्व वनस्पतींना 'भूतगाम' समजावे. जलपर्पटक (पाण्याचा थर) म्हणजे जो वरून कडक व खडबडीत रंगाचा आणि खालून मऊ व निळ्या रंगाचा असतो. त्या शेवाळांपैकी ज्या शेवाळाचे मूळ खाली जाऊन जमिनीत रुजलेले असते, त्याचे स्थान जमीन (पृथ्वी) आहे. जे पाण्यात तरंगत राहते, त्याचे स्थान पाणी आहे. जमिनीत रुजलेले शेवाळ कोणत्याही ठिकाणी नष्ट केल्यास किंवा उपटून दुसऱ्या ठिकाणी हलवल्यास पाचित्तिय होते. पाण्यात तरंगणारे शेवाळ केवळ नष्ट केल्यास पाचित्तिय होते. परंतु, हाताने ते इकडेतिकडे सारून स्नान करणे योग्य आहे, कारण संपूर्ण पाणीच त्याचे स्थान आहे. त्यामुळे तेवढ्याने ते दुसऱ्या ठिकाणी हलवले गेले असे होत नाही. परंतु, पाण्यातून पाण्याशिवाय जाणूनबुजून ते बाहेर काढणे योग्य नाही; पाण्यासह बाहेर काढून पुन्हा पाण्यात टाकणे योग्य आहे. जर गाळणीतून शेवाळ बाहेर येत असेल, तर कप्पिय (योग्य) करून घेऊनच पाण्याचा वापर करावा. कमळ, पद्म इत्यादी जलचर वेली व गवत पाण्यातून बाहेर काढणाऱ्याला किंवा तिथेच नष्ट करणाऱ्या भिक्खूला पाचित्तिय होते. इतरांनी उपटून टाकलेल्या वेली व गवत नष्ट केल्यास दुक्कट दोष होतो, कारण त्यांचा समावेश बीजगामात होतो. तिळाच्या किंवा मोहरीच्या आकाराचे शेवाळही पाण्यातून काढल्यावर जोपर्यंत सुकत नाही, तोपर्यंत त्याचा समावेश अग्रबीजात (अंकुर बीजात) होतो. महापंचरी इत्यादी ग्रंथांत "अनंतक, तिळाच्या आकाराचे शेवाळ, जलपर्पटक इत्यादी दुक्कट आपत्तीचे कारण आहेत" असे म्हटले आहे, परंतु त्याचे कारण दिसत नाही. अंधक अट्ठकथेत "ते पूर्ण भूतगाम नसतात, म्हणून दुक्कट होतो" असे म्हटले आहे, ते देखील जुळत नाही; कारण भूतगामामध्ये पाचित्तिय आणि बीजगामामध्ये दुक्कट सांगितले आहे. 'अपूर्ण भूतगाम' नावाचा तिसरा विभाग पाळिमध्ये किंवा अट्ठकथांमध्ये कुठेही आलेला नाही. जर असे म्हटले की त्याचा समावेश बीजगामात होईल, तर ते देखील योग्य नाही, कारण अशा बीजगामाचे मूळ भूतगाम नसते. शिवाय, "गुरू (गंभीर) आणि लघू (सौम्य) नियमांमध्ये गुरू नियमाचे पालन करावे" हे विनय लक्षण आहे. ถลฏฺเฐ – ฉินฺนรุกฺขานํ อวสิฏฺโฐ หริตขาณุ นาม โหติ. ตตฺถ กกุธกรญฺชปิยงฺคุปนสาทีนํ ขาณุ อุทฺธํ วฑฺฒติ, โส ภูตคาเมน สงฺคหิโต. ตาลนาฬิเกราทีนํ ขาณุ อุทฺธํ น วฑฺฒติ, โส พีชคาเมน สงฺคหิโต. กทลิยา ปน อผลิตาย ขาณุ ภูตคาเมน สงฺคหิโต, ผลิตาย พีชคาเมน. กทลี ปน ผลิตา ยาว นีลปณฺณา, ตาว ภูตคาเมเนว สงฺคหิตา, ตถา ผลิโต เวฬุ. ยทา ปน อคฺคโต ปฏฺฐาย สุสฺสติ, ตทา พีชคาเมน สงฺคหํ คจฺฉติ. กตรพีชคาเมน? ผฬุพีชคาเมน. กึ ตโต นิพฺพตฺตติ? น กิญฺจิ. ยทิ หิ นิพฺพตฺเตยฺย, ภูตคาเมเนว สงฺคหํ คจฺเฉยฺย. อินฺทสาลาทิรุกฺเข ฉินฺทิตฺวา ราสึ กโรนฺติ, กิญฺจาปิ ราสิกตทณฺฑเกหิ รตนปฺปมาณาปิ สาขา นิกฺขมนฺติ, พีชคาเมเนว สงฺคหํ คจฺฉนฺติ. ตตฺถ มณฺฑปตฺถาย วา วติอตฺถาย วา วลฺลิอาโรปนตฺถาย วา ภูมิยํ นิขณนฺติ, มูเลสุ เจว ปณฺเณสุ จ นิคฺคเตสุ ปุน ภูตคามสงฺขฺยํ คจฺฉนฺติ. มูลมตฺเตสุ ปน ปณฺณมตฺเตสุ วา นิคฺคเตสุ พีชคาเมน สงฺคหิตา เอว. स्थलस्थ (जमिनीवरील वनस्पतींविषयी) निर्णय असा आहे – कापलेल्या झाडांचा उरलेला भाग म्हणजे 'हिरवे खोड' (हिरवे थुंट) होय. त्यापैकी ककुध (अर्जुन), करंज, प्रियंगू, फणस इत्यादींचे खोड वर वाढते, म्हणून त्याचा समावेश भूतगामात होतो. ताड, नारळ इत्यादींचे खोड वर वाढत नाही, म्हणून त्याचा समावेश बीजगामात होतो. केळीच्या झाडाचे फळ न आलेले खोड भूतगामात समाविष्ट होते, आणि फळ आलेले खोड बीजगामात समाविष्ट होते. परंतु फळ आलेली केळी जोपर्यंत हिरव्या पानांची असते, तोपर्यंत ती भूतगामातच समाविष्ट असते; तसेच फळ आलेला बांबू देखील. पण जेव्हा तो शेंड्यापासून सुकू लागतो, तेव्हा त्याचा समावेश बीजगामात होतो. कोणत्या बीजगामात? फळु-बीजगामात (पेरांच्या बीजात). त्यापासून काय उत्पन्न होते? काहीच नाही. जर काही उत्पन्न झाले असते, तर त्याचा समावेश भूतगामातच झाला असता. इंदसाल (हळदू) इत्यादी झाडे कापून ढीग करतात, त्या ढिगाऱ्यातील लाकडांमधून जरी हातभर लांबीच्या फांद्या निघाल्या, तरी त्यांचा समावेश बीजगामातच होतो. जर ते खांब मांडवासाठी, कुंपणासाठी किंवा वेली चढवण्यासाठी जमिनीत पुरले आणि त्यांना मुळे व पाने फुटली, तर ते पुन्हा भूतगाम संज्ञेस प्राप्त होतात. परंतु केवळ मुळे किंवा केवळ पाने फुटली असतील, तर त्यांचा समावेश बीजगामातच राहतो. ยานิ กานิจิ พีชานิ ปถวิยํ วา อุทเกน สิญฺจิตฺวา ฐปิตานิ, กปาลาทีสุ วา อลฺลปํสุํ ปกฺขิปิตฺวา นิกฺขิตฺตานิ โหนฺติ, สพฺพานิ มูลมตฺเต ปณฺณมตฺเต วา นิคฺคเตปิ พีชานิเยว. สเจปิ มูลานิ จ อุปริ องฺกุโร จ นิคฺคจฺฉติ, ยาว องฺกุโร หริโต น โหติ, ตาว พีชานิเยว. มุคฺคาทีนํ ปน ปณฺเณสุ อุฏฺฐิเตสุ วีหิอาทีนํ วา องฺกุเร หริเต นีลปณฺณวณฺเณ ชาเต ภูตคามสงฺคหํ คจฺฉนฺติ. ตาลฏฺฐีนํ ปฐมํ สูกรทาฐา วิย มูลํ นิคฺคจฺฉติ. นิคฺคเตปิ ยาว อุปริ ปตฺตวฏฺฏิ น นิคฺคจฺฉติ, ตาว พีชคาโมเยว. นาฬิเกรสฺส ตจํ ภินฺทิตฺวา ทนฺตสูจิ วิย องฺกุโร นิคฺคจฺฉติ[Pg.30], ยาว มิคสิงฺคสทิสา นีลปตฺตวฏฺฏิ น โหติ, ตาว พีชคาโมเยว. มูเล อนิคฺคเตปิ ตาทิสาย ปตฺตวฏฺฏิยา ชาตาย อมูลกภูตคาเม สงฺคหํ คจฺฉติ. कोणतीही बीजे जी जमिनीत किंवा पाण्याने शिंपडून ठेवली असतील, किंवा खापराच्या भांड्यात ओली माती टाकून ठेवली असतील, ती सर्व केवळ मुळे किंवा केवळ पाने फुटली तरी बीजेच राहतात. जरी मुळे आणि वर अंकुर फुटला, तरी जोपर्यंत अंकुर हिरवा होत नाही, तोपर्यंत ती बीजेच राहतात. परंतु मूग इत्यादींची पाने बाहेर आल्यावर किंवा भात (धान्य) इत्यादींचे अंकुर हिरवे होऊन गडद हिरव्या रंगाचे झाल्यावर त्यांचा समावेश भूतगामात होतो. ताडाच्या बियांचे (कोयांचे) मूळ सुरुवातीला डुकराच्या सुळ्यासारखे बाहेर येते. ते बाहेर आले तरी जोपर्यंत वर पानांची गुंडाळी (कोंब) बाहेर येत नाही, तोपर्यंत तो बीजगामच असतो. नारळाची शेंडी/कवच फोडून हस्तिदंताच्या सुईसारखा अंकुर बाहेर येतो; जोपर्यंत हरणाच्या शिंगासारखी हिरवी पानांची गुंडाळी तयार होत नाही, तोपर्यंत तो बीजगामच असतो. मूळ बाहेर आले नसले तरी, तशी पानांची गुंडाळी तयार झाल्यास त्याचा समावेश अमूलक (मुळे नसलेल्या) भूतगामात होतो. อมฺพฏฺฐิอาทีนิ วีหิอาทีหิ วินิจฺฉินิตพฺพานิ. วนฺทากา วา อญฺญา วา ยา กาจิ รุกฺเข ชายิตฺวา รุกฺขํ โอตฺถรติ, รุกฺโขว ตสฺสา ฐานํ, ตํ วิโกเปนฺตสฺส วา ตโต อุทฺธรนฺตสฺส วา ปาจิตฺติยํ. เอกา อมูลิกา ลตา โหติ, องฺคุลิเวฐโก วิย วนปฺปคุมฺพทณฺฑเก เวเฐติ, ตสฺสาปิ อยเมว วินิจฺฉโย. เคหมุขปาการเวทิกาเจติยาทีสุ นีลวณฺโณ เสวาโล โหติ, ยาว ทฺเว ตีณิ ปตฺตานิ น สญฺชายนฺติ ตาว อคฺคพีชสงฺคหํ คจฺฉติ. ปตฺเตสุ ชาเตสุ ปาจิตฺติยวตฺถุ. ตสฺมา ตาทิเสสุ ฐาเนสุ สุธาเลปมฺปิ ทาตุํ น วฏฺฏติ. อนุปสมฺปนฺเนน ลิตฺตสฺส อุปริสฺเนหเลโป ทาตุํ วฏฺฏติ. สเจ นิทาฆสมเย สุกฺขเสวาโล ติฏฺฐติ, ตํ สมฺมุญฺชนีอาทีหิ ฆํสิตฺวา อปเนตุํ วฏฺฏติ. ปานียฆฏาทีนํ พหิ เสวาโล ทุกฺกฏวตฺถุ, อนฺโต อพฺโพหาริโก. ทนฺตกฏฺฐปูวาทีสุ กณฺณกมฺปิ อพฺโพหาริกเมว. วุตฺตญฺเหตํ – ‘‘สเจ เครุกปริกมฺมกตา ภิตฺติ กณฺณกิตา โหติ, โจฬกํ เตเมตฺวา ปีเฬตฺวา ปมชฺชิตพฺพา’’ติ (มหาว. ๖๖). आंब्याची कोय इत्यादींचा निर्णय भात (धान्य) इत्यादींप्रमाणेच करावा. झाडावर उगवणारी बांडगुळ (वंदाका) किंवा इतर कोणतीही वनस्पती जी झाडावर वाढून त्याला व्यापून टाकते, तिचे अधिष्ठान ते झाडच असते. तिला नष्ट करणाऱ्या किंवा तिथून उपटून काढणाऱ्या भिक्खूला पाचित्तिय होते. एक मूळ नसलेली वेल (अमुलिका लता) असते, जी अंगठीप्रमाणे जंगलातील झुडपांच्या फांद्यांना वेढून घेते; तिच्या बाबतीतही हाच निर्णय आहे. घराचे प्रवेशद्वार (मुख), भिंत, कठडा (वेदिका), चैत्य इत्यादींवर हिरवे शेवाळ उगवते; जोपर्यंत त्याला दोन-तीन पाने येत नाहीत, तोपर्यंत त्याचा समावेश 'अग्गबीज' (अंकुर-बीज) मध्ये होतो. पाने आल्यावर ते पाचित्तियचे कारण बनते. म्हणून अशा ठिकाणी चुना किंवा गिलावा (सुधालेप) करणेही योग्य नाही. अनुपसंपन्नाने (गृहस्थ किंवा सामणेराने) गिलावा केलेल्या भागावर तेल किंवा पॉलिश (स्नेहलेप) लावणे योग्य आहे. जर उन्हाळ्यात सुके शेवाळ तिथे असेल, तर ते झाडू इत्यादींनी घासून काढून टाकणे योग्य आहे. पिण्याच्या पाण्याच्या माठाच्या इत्यादींच्या बाहेरील बाजूचे शेवाळ दुक्कटचे कारण आहे, तर आतील बाजूचे शेवाळ नगण्य (अब्बोहारिक) आहे. दातवण (दंतकाष्ठ), खाण्याचे पदार्थ (पूव) इत्यादींवर आलेली बुरशी देखील नगण्यच आहे. कारण असे म्हटले आहे की – 'जर गेरूने रंगवलेल्या भिंतीवर बुरशी आली, तर कापड ओले करून, पिळून ती भिंत पुसून घ्यावी.' ปาสาณชาติปาสาณททฺทุเสวาลเสเลยฺยกาทีนิ อหริตวณฺณานิ อปตฺตกานิ จ ทุกฺกฏวตฺถุกานิ. อหิจฺฉตฺตกํ ยาว มกุฬํ โหติ, ตาว ทุกฺกฏวตฺถุ. ปุปฺผิตกาลโต ปฏฺฐาย อพฺโพหาริกํ. อลฺลรุกฺขโต ปน อหิจฺฉตฺตกํ คณฺหนฺโต รุกฺขตฺตจํ วิโกเปติ, ตสฺมา ตตฺถ ปาจิตฺติยํ. รุกฺขปปฺปฏิกายปิ เอเสว นโย. ยา ปน อินฺทสาลกกุธาทีนํ ปปฺปฏิกา รุกฺขโต มุจฺจิตฺวา ติฏฺฐติ, ตํ คณฺหนฺตสฺส อนาปตฺติ. นิยฺยาสมฺปิ รุกฺขโต มุจฺจิตฺวา ฐิตํ สุกฺขรุกฺเข วา ลคฺคํ คณฺหิตุํ วฏฺฏติ. อลฺลรุกฺขโต น วฏฺฏติ. ลาขายปิ เอเสว นโย. รุกฺขํ จาเลตฺวา ปณฺฑุปลาสํ วา ปริณตกณิการาทิปุปฺผํ วา ปาเตนฺตสฺส ปาจิตฺติยเมว. หตฺถกุกฺกุจฺเจน มุทุเกสุ อินฺทสาลนุหีขนฺธาทีสุ วา ตตฺถชาตกตาลปณฺณาทีสุ วา อกฺขรํ ฉินฺทนฺตสฺสาปิ เอเสว นโย. दगडावर उगवणारे दगडफूल (पाषाणदद्दु), दगडावरील शेवाळ, शिलाजित (सेलेय्यक) इत्यादी, जे हिरव्या रंगाचे नसतात आणि ज्यांना पाने नसतात, ते दुक्कटचे कारण आहेत. अळिंबी (भूछत्र) जोपर्यंत कळीच्या स्वरूपात असते, तोपर्यंत ती दुक्कटचे कारण असते. ती उमलल्यापासून पुढे ती नगण्य (अब्बोहारिक) ठरते. परंतु, जिवंत (ओल्या) झाडावरून अळिंबी काढताना जर झाडाची साल खराब होत असेल, तर त्यामध्ये पाचित्तिय होते. झाडाच्या सुक्या सालीच्या पापुद्र्यांच्या (पप्पटिका) बाबतीतही हाच नियम आहे. परंतु, जी अर्जुन (ककुध) किंवा इंद्रसाल इत्यादी झाडांची साल स्वतःच सुटून वेगळी झालेली असते, ती घेणाऱ्याला कोणतीही आपत्ती (गुन्हा) होत नाही. झाडापासून गळून पडलेला किंवा सुक्या झाडाला चिकटलेला डिंक (निर्यास) घेणे योग्य आहे. जिवंत (ओल्या) झाडावरून तो काढणे योग्य नाही. लाखेच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. झाड हलवून सुकलेली पाने किंवा उमललेली कांचन (कणिकार) इत्यादी फुले पाडणाऱ्याला पाचित्तियच होते. हाताच्या चाळवळीने मऊ असलेल्या इंद्रसाल किंवा निवडुंग (नुही) इत्यादींच्या खोडांवर किंवा तिथे उगवलेल्या ताडाच्या पानांवर अक्षरे कोरणार्यालाही हाच नियम लागू होतो. สามเณรานํ [Pg.31] ปุปฺผํ โอจินนฺตานํ สาขํ โอนาเมตฺวา ทาตุํ วฏฺฏติ. เตหิ ปน ปุปฺเผหิ ปานียํ น วาเสตพฺพํ. ปานียวาสตฺถิเกน สามเณรํ อุกฺขิปิตฺวา โอจินาเปตพฺพานิ. ผลสาขาปิ อตฺตนา ขาทิตุกาเมน น โอนาเมตพฺพา. สามเณรํ อุกฺขิปิตฺวา ผลํ คาหาเปตพฺพํ. ยํกิญฺจิ คจฺฉํ วา ลตํ วา อุปฺปาเฏนฺเตหิ สามเณเรหิ สทฺธึ คเหตฺวา อากฑฺฒิตุํ น วฏฺฏติ. เตสํ ปน อุสฺสาหชนนตฺถํ อนากฑฺฒนฺเตน กฑฺฒนาการํ ทสฺเสนฺเตน วิย อคฺเค คเหตุํ วฏฺฏติ. เยสํ รุกฺขานํ สาขา รุหติ, เตสํ สาขํ มกฺขิกาพีชนาทีนํ อตฺถาย กปฺปิยํ อการาเปตฺวา คหิตํ ตเจ วา ปตฺเต วา อนฺตมโส นเขนปิ วิลิขนฺตสฺส ทุกฺกฏํ. อลฺลสิงฺคิเวราทีสุปิ เอเสว นโย. สเจ ปน กปฺปิยํ การาเปตฺวา สีตเล ปเทเส ฐปิตสฺส มูลํ สญฺชายติ, อุปริภาเค ฉินฺทิตุํ วฏฺฏติ. สเจ องฺกุโร ชายติ, เหฏฺฐาภาเค ฉินฺทิตุํ วฏฺฏติ. มูเล จ นีลงฺกุเร จ ชาเต น วฏฺฏติ. सामणेर फुले तोडत असताना, त्यांच्यासाठी फांदी खाली वाकवून देणे योग्य आहे. परंतु, त्या फुलांनी पिण्याचे पाणी सुवासित करू नये. पिण्याचे पाणी सुवासित करण्याची इच्छा असलेल्या भिक्खूने सामणेराला वर उचलून धरून फुले तोडायला लावावीत. स्वतः फळ खाण्याची इच्छा असलेल्या भिक्खूने फळांची फांदी खाली वाकवू नये. सामणेराला वर उचलून धरून फळ काढायला लावावे. कोणतेही झुडूप किंवा वेल उपटून काढणाऱ्या सामणेरांसोबत स्वतः पकडून ते ओढणे योग्य नाही. परंतु, त्यांचा उत्साह वाढवण्यासाठी, स्वतः न ओढता, ओढल्यासारखे दाखवून केवळ टोकाला पकडणे योग्य आहे. ज्या झाडांच्या फांद्या लावल्यास रुजतात, अशा झाडांची फांदी माश्या हाकलण्याची चवरी इत्यादी बनवण्यासाठी 'कप्पिय' (अनुज्ञेय) न करून घेता घेतली असल्यास, तिच्या सालीवर किंवा पानावर नखाने जरी ओरखडा काढला, तरी दुक्कट होते. ओले आले (अद्रक) इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. परंतु, कप्पिय करून थंड ठिकाणी ठेवलेल्या आल्याला जर मूळ फुटले, तर वरचा भाग कापून घेणे योग्य आहे. जर अंकुर फुटला, तर खालचा भाग कापून घेणे योग्य आहे. मूळ आणि हिरवा अंकुर दोन्ही फुटले असल्यास, ते कापून घेणे योग्य नाही. ฉินฺทติ วา เฉทาเปติ วาติ อนฺตมโส สมฺมุญฺชโนสลากายปิ ติณานิ ฉินฺทิสฺสามีติ ภูมึ สมฺมชฺชนฺโต สยํ วา ฉินฺทติ, อญฺเญน วา เฉทาเปติ. ภินฺทติ วา เภทาเปติ วาติ อนฺตมโส จงฺกมนฺโตปิ ฉิชฺชนกํ ฉิชฺชตุ, ภิชฺชนกํ ภิชฺชตุ, จงฺกมิตฏฺฐานํ ทสฺเสสฺสามีติ สญฺจิจฺจ ปาเทหิ อกฺกมนฺโต ติณวลฺลิอาทีนิ สยํ วา ภินฺทติ อญฺเญน วา เภทาเปติ. สเจปิ หิ ติณํ วา ลตํ วา คณฺฐึ กโรนฺตสฺส ภิชฺชติ, คณฺฐิปิ น กาตพฺโพ. ตาลรุกฺขาทีสุ ปน โจรานํ อนารุหนตฺถาย ทารุมกฺกฏกํ อาโกเฏนฺติ, กณฺฏเก พนฺธนฺติ, ภิกฺขุสฺส เอวํ กาตุํ น วฏฺฏติ. สเจ ทารุมกฺกฏโก รุกฺเข อลฺลีนมตฺโตว โหติ, รุกฺขํ น ปีเฬติ, วฏฺฏติ. ‘‘รุกฺขํ ฉินฺท, ลตํ ฉินฺท, กนฺทํ วา มูลํ วา อุปฺปาเฏหี’’ติ วตฺตุมฺปิ วฏฺฏติ, อนิยามิตตฺตา. นิยาเมตฺวา ปน ‘‘อิมํ รุกฺขํ ฉินฺทา’’ติอาทิ วตฺตุํ น วฏฺฏติ. นามํ คเหตฺวาปิ ‘‘อมฺพรุกฺขํ จตุรสฺสวลฺลึ อาลุวกนฺทํ มุญฺชติณํ อสุกรุกฺขจฺฉลฺลึ ฉินฺท ภินฺท อุปฺปาเฏหี’’ติอาทิวจนมฺปิ อนิยามิตเมว โหติ. ‘‘อิมํ อมฺพรุกฺข’’นฺติอาทิวจนเมว หิ นิยามิตํ นาม, ตํ น วฏฺฏติ. 'तोडतो किंवा तोडायला लावतो' म्हणजे अगदी झाडूच्या काडीनेही 'मी गवत तोडीन' असा विचार करून जमीन झाडताना स्वतः ते तोडतो किंवा दुसऱ्याकडून तोडवून घेतो. 'नष्ट करतो किंवा नष्ट करायला लावतो' म्हणजे अगदी चंक्रमण करत असतानाही 'तुटणारे गवत तुटू दे, फुटणारी माती फुटू दे, मी चंक्रमणाचा मार्ग दाखवीन' असा जाणूनबुजून विचार करून पायांनी तुडवत गवत, वेली इत्यादी स्वतः नष्ट करतो किंवा दुसऱ्याकडून नष्ट करवून घेतो. कारण जर गवत किंवा वेलीची गाठ मारताना ती तुटत असेल, तर अशी गाठही मारू नये. ताड इत्यादी झाडांवर चोरांनी चढू नये म्हणून लोक लाकडी मेखा (दारुमक्कटक) ठोकतात किंवा काटे बांधतात; भिक्खूने असे करणे योग्य नाही. जर ती लाकडी मेख झाडाला केवळ टेकवून ठेवलेली असेल आणि झाडाला इजा पोहचवत नसेल, तर ते योग्य आहे. 'झाड तोड, वेल तोड, कंद किंवा मूळ उपटून काढ' असे म्हणणे देखील योग्य आहे, कारण यात विशिष्ट झाड निश्चित केलेले नाही. परंतु, निश्चित करून 'हे झाड तोड' इत्यादी म्हणणे योग्य नाही. नाव घेऊन देखील 'आंब्याचे झाड तोड, चतुरस्र वेल नष्ट कर, आळूचा कंद उपटून काढ, मुंज गवत उपटून काढ, अमुक झाडाची साल काढ' इत्यादी बोलणे देखील अनियमित (अविशिष्ट) च आहे. कारण 'हे आंब्याचे झाड' इत्यादी बोलणेच निश्चित (नियमित) मानले जाते, आणि तसे बोलणे योग्य नाही. ปจติ วา ปจาเปติ วาติ อนฺตมโส ปตฺตมฺปิ ปจิตุกาโม ติณาทีนํ อุปริ สญฺจิจฺจ อคฺคึ กโรนฺโต สยํ วา ปจติ, อญฺเญน วา ปจาเปตีติ [Pg.32] สพฺพํ ปถวีขณนสิกฺขาปเท วุตฺตนเยน เวทิตพฺพํ. อนิยาเมตฺวา ปน ‘‘มุคฺเค ปจ, มาเส ปจา’’ติอาทิ วตฺตุํ วฏฺฏติ. ‘‘อิเม มุคฺเค ปจ, อิเม มาเส ปจา’’ติ เอวํ วตฺตุํ น วฏฺฏติ. 'भाजतो किंवा भाजायला लावतो' म्हणजे अगदी पात्र (भिक्षापात्र) भाजण्याची इच्छा धरून, गवतावर इत्यादींवर जाणूनबुजून अग्नी ठेवून स्वतः भाजतो किंवा दुसऱ्याकडून भाजून घेतो – हे सर्व 'पठवीखणन सिक्खापद' (जमीन खोदण्याच्या शिक्षापदा) मध्ये सांगितलेल्या नियमाप्रमाणेच समजून घ्यावे. परंतु, निश्चित न करता 'मूग शिजव, उडीद शिजव' इत्यादी म्हणणे योग्य आहे. 'हे मूग शिजव, हे उडीद शिजव' असे म्हणणे योग्य नाही. อนาปตฺติ อิมํ ชานาติอาทีสุ ‘‘อิมํ มูลเภสชฺชํ ชาน, อิมํ มูลํ วา ปณฺณํ วา เทหิ, อิมํ รุกฺขํ วา ลตํ วา อาหร, อิมินา ปุปฺเผน วา ผเลน วา ปณฺเณน วา อตฺโถ, อิมํ รุกฺขํ วา ลตํ วา ผลํ วา กปฺปิยํ กโรหี’’ติ เอวมตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. เอตฺตาวตา ภูตคามปริโมจนํ กตํ โหติ. ปริภุญฺชนฺเตน ปน พีชคามปริโมจนตฺถํ ปุน กปฺปิยํ กาเรตพฺพํ. 'याला जाण' इत्यादींमध्ये अनापत्ती आहे, याचा अर्थ असा समजून घ्यावा की – 'या मूळ-औषधाला जाण (तपास)', 'हे मूळ किंवा पान दे', 'हे झाड किंवा वेल आण', 'मला या फुलाची, फळाची किंवा पानाची गरज आहे', 'हे झाड, वेल किंवा फळ कप्पिय (अनुज्ञेय) कर.' एवढ्या बोलण्याने ते 'भूतगाम' (सजीव वनस्पती) च्या बंधनातून मुक्त केले जाते. परंतु, त्याचा उपभोग घेताना, 'बीजगाम' (बीज-समूह) च्या बंधनातून मुक्त करण्यासाठी पुन्हा एकदा 'कप्पिय' (अनुज्ञेय) करून घेतले पाहिजे. กปฺปิยกรณญฺเจตฺถ อิมินา สุตฺตานุสาเรน เวทิตพฺพํ – ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ สมณกปฺเปหิ ผลํ ปริภุญฺชิตุํ อคฺคิปริชิตํ สตฺถปริชิตํ นขปริชิตํ อพีชํ นิพฺพฏฺฏพีชเมว ปญฺจม’’นฺติ. ตตฺถ ‘‘อคฺคิปริชิต’’นฺติ อคฺคินา ปริชิตํ อธิภูตํ ทฑฺฒํ ผุฏฺฐนฺติ อตฺโถ. ‘‘สตฺถปริชิต’’นฺติ สตฺเถน ปริชิตํ อธิภูตํ ฉินฺนํ วิทฺธํ วาติ อตฺโถ. เอส นโย นขปริชิเต. อพีชนิพฺพฏฺฏพีชานิ สยเมว กปฺปิยานิ. อคฺคินา กปฺปิยํ กโรนฺเตน กฏฺฐคฺคิโคมยคฺคิอาทีสุ เยน เกนจิ อนฺตมโส โลหขณฺเฑนปิ อาทิตฺเตน กปฺปิยํ กาตพฺพํ. ตญฺจ โข เอกเทเส ผุสนฺเตน ‘‘กปฺปิย’’นฺติ วตฺวาว กาตพฺพํ. สตฺเถน กโรนฺเตน ยสฺส กสฺสจิ โลหมยสตฺถสฺส อนฺตมโส สูจินขจฺเฉทนานมฺปิ ตุณฺเฑน วา ธาราย วา เฉทํ วา เวธํ วา ทสฺเสนฺเตน ‘‘กปฺปิย’’นฺติ วตฺวาว กาตพฺพํ. นเขน กปฺปิยํ กโรนฺเตน ปูตินเขน น กาตพฺพํ. มนุสฺสานํ ปน สีหพฺยคฺฆทีปิมกฺกฏาทีนํ สกุนฺตานญฺจ นขา ติขิณา โหนฺติ, เตหิ กาตพฺพํ. อสฺสมหึสสูกรมิคโครูปาทีนํ ขุรา อติขิณา, เตหิ น กาตพฺพํ, กตมฺปิ อกตํ โหติ. หตฺถินขา ปน ขุรา น โหนฺติ, เตหิ วฏฺฏติ. เยหิ ปน กาตุํ วฏฺฏติ, เตหิ ตตฺถชาตเกหิปิ อุทฺธริตฺวา คหิตเกหิปิ เฉทํ วา เวธํ วา ทสฺเสนฺเตน ‘‘กปฺปิย’’นฺติ วตฺวาว กาตพฺพํ. आणि येथे 'कप्पिय करणे' या सूत्राच्या अनुसरणाने जाणावे - 'भिक्खूंनो, मी पाच प्रकारच्या समणकप्पांनी (श्रमण-योग्य विधींनी) फळ ग्रहण करण्याची अनुमती देतो - अग्नीने डागलेले, शस्त्राने कापलेले, नखांनी कापलेले, बीजरहित आणि पाचवे म्हणजे ज्याचे बीज काढून टाकले आहे असे.' त्यात 'अग्गिपरीजित' (अग्नीने डागलेले) म्हणजे अग्नीने, कप्पिय करणाऱ्या व्यक्तीने, चहूबाजूंनी डागलेले, प्रभावित केलेले, जळालेले किंवा स्पर्श केलेले फळ असा अर्थ जाणावा. 'सत्थपरीजित' (शस्त्राने कापलेले) म्हणजे शस्त्राने चहूबाजूंनी कापलेले, वेधलेले किंवा तोडलेले फळ असा अर्थ जाणावा. हाच नियम नखपरीजित (नखांनी कापलेल्या) फळालाही लागू होतो. बीजरहित आणि ज्याचे बीज काढून टाकले आहे अशी फळे स्वतःच कप्पिय (योग्य) असतात. अग्नीने कप्पिय करणाऱ्याने लाकडाचा अग्नी, शेणाचा अग्नी इत्यादींपैकी कोणत्याही अग्नीने, अगदी कमीत कमी तापलेल्या लोखंडाच्या तुकड्याने देखील कप्पिय करावे. आणि ते देखील एका भागाला स्पर्श करून 'कप्पियं' (हे कप्पिय आहे) असे म्हणून करावे. शस्त्राने कप्पिय करणाऱ्याने कोणत्याही लोखंडी शस्त्राने, अगदी सुई किंवा नख कापण्याच्या लहान शस्त्राच्या टोकाने किंवा धारेने कापून किंवा टोचून दाखवत 'कप्पियं' असे म्हणून करावे. नखाने कप्पिय करणाऱ्याने कुजलेल्या नखाने करू नये. परंतु मानवांचे, तसेच सिंह, वाघ, चित्ता, माकड इत्यादींचे आणि पक्ष्यांचे नखे तीक्ष्ण असतात, त्यांनी कप्पिय करावे. घोडा, म्हैस, डुक्कर, हरिण, गाय इत्यादींचे खूर तीक्ष्ण नसतात, त्यांनी कप्पिय करू नये; केले तरी ते न केल्यासारखेच होते. हत्तीची नखे मात्र खूर नसतात, त्यामुळे त्यांनी कप्पिय करणे योग्य आहे. ज्यांच्या नखांनी कप्पिय करणे योग्य आहे, त्यांच्या शरीरावर असलेल्या नखांनी किंवा उपटून घेतलेल्या नखांनी कापून किंवा टोचून दाखवत 'कप्पियं' असे म्हणून करावे. ตตฺถ สเจปิ พีชานํ ปพฺพตมตฺโต ราสิ รุกฺขสหสฺสํ วา ฉินฺทิตฺวา เอกาพทฺธํ กตฺวา อุจฺฉูนํ วา มหาภาโร พนฺธิตฺวา ฐปิโต โหติ, เอกสฺมึ พีเช วา รุกฺขสาขาย วา อุจฺฉุมฺหิ วา กปฺปิเย กเต สพฺพํ กตํ โหติ. อุจฺฉู จ ทารูนิ จ เอกโต พทฺธานิ โหนฺติ, อุจฺฉุํ กปฺปิยํ กริสฺสามีติ ทารุํ [Pg.33] วิชฺฌติ, วฏฺฏติเยว. สเจ ปน ยาย รชฺชุยา วา วลฺลิยา วา พทฺธานิ, ตํ วิชฺฌติ, น วฏฺฏติ. อุจฺฉุขณฺฑานํ ปจฺฉึ ปูเรตฺวา อาหรนฺติ, เอกสฺมึ ขณฺเฑ กปฺปิเย กเต สพฺพํ กตเมว โหติ. มริจปกฺกาทีหิ มิสฺเสตฺวา ภตฺตํ อาหรนฺติ, ‘‘กปฺปิยํ กโรหี’’ติ วุตฺเต สเจปิ ภตฺตสิตฺเถ วิชฺฌติ, วฏฺฏติเยว. ติลตณฺฑุลาทีสุปิ เอเสว นโย. ยาคุยา ปกฺขิตฺตานิ ปน เอกาพทฺธานิ หุตฺวา น สนฺติฏฺฐนฺติ, ตตฺถ เอกเมกํ วิชฺฌิตฺวา กปฺปิยํ กาตพฺพเมว. กปิตฺถผลาทีนํ อนฺโต มิญฺชํ กฏาหํ มุญฺจิตฺวา สญฺจรติ, ภินฺทาเปตฺวา กปฺปิยํ การาเปตพฺพํ. เอกาพทฺธํ โหติ, กฏาเหปิ กาตุํ วฏฺฏติ. त्यात जरी बियांचा पर्वताएवढा मोठा ढीग असला, किंवा हजार झाडे कापून एकत्र बांधली असली, किंवा उसाचा मोठा भारा बांधून ठेवला असला, तरीही एका बीजावर, एका झाडाच्या फांदीवर किंवा एका उसावर कप्पिय केले असता सर्व कप्पिय होते. ऊस आणि लाकडे एकत्र बांधलेली असतील, आणि 'मी उसाला कप्पिय करीन' असा विचार करून लाकडाला टोचले, तरी ते योग्यच आहे. परंतु ज्या दोरीने किंवा वेलीने ते बांधले आहे, तिला जर टोचले, तर ते योग्य नाही. जर उसाच्या तुकड्यांनी टोपली भरून आणली, आणि एका तुकड्यावर कप्पिय केले, तर सर्व कप्पिय होते. पिकलेल्या मिरच्या इत्यादी मिसळून भात आणला, आणि 'कप्पिय कर' असे म्हटले असता जर भाताच्या शिताला टोचले, तरी ते योग्यच आहे. तीळ, तांदूळ इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. परंतु पेजमध्ये (यागूमध्ये) टाकलेल्या मिरच्या इत्यादी एकत्र जोडलेल्या नसतात, त्यामुळे तेथे एकेकाला टोचून कप्पिय करावेच लागते. कवट (कपित्थ) इत्यादी फळांच्या आतील गर जर कवचापासून सुटा होऊन आत हलत असेल, तर ते फोडून कप्पिय करून घ्यावे. जर गर कवचाशी जोडलेला असेल, तर कवचावर कप्पिय करणे देखील योग्य आहे. อสญฺจิจฺจาติ ปาสาณรุกฺขาทีนิ วา ปวฏฺเฏนฺตสฺส สาขํ วา กฑฺฒนฺตสฺส กตฺตรทณฺเฑน วา ภูมึ ปหริตฺวา คจฺฉนฺตสฺส ติณานิ ฉิชฺชนฺติ, ตานิ เตน ฉินฺทิสฺสามีติ เอวํ สญฺจิจฺจ อจฺฉินฺนตฺตา อสญฺจิจฺจ ฉินฺนานิ นาม โหนฺติ. อิติ อสญฺจิจฺจ ฉินฺทนฺตสฺส อนาปตฺติ. 'असंचिच्च' (जाणूनबुजून न करता) म्हणजे दगड, लाकूड इत्यादी लोळवताना, किंवा फांदी ओढताना, किंवा काठीने जमिनीवर मारत चालताना जर गवत तुटले, तर 'मी ते तोडीन' अशा हेतूने जाणूनबुजून न तोडल्यामुळे त्याला 'असंचिच्च छिन्न' (नकळत तोडलेले) म्हणतात. अशा प्रकारे नकळत तोडणाऱ्या भिक्खूला आपत्ती (दोष) होत नाही. อสติยาติ อญฺญวิหิโต เกนจิ สทฺธึ กิญฺจิ กเถนฺโต ปาทงฺคุฏฺฐเกน วา หตฺเถน วา ติณํ วา ลตํ วา ฉินฺทนฺโต ติฏฺฐติ, เอวํ อสติยา ฉินฺทนฺตสฺส อนาปตฺติ. 'असतिया' (अनवधानाने) म्हणजे दुसऱ्या विचारात मग्न असलेला भिक्खू कोणाशी तरी काही बोलत असताना पायाच्या अंगठ्याने किंवा हाताने गवत किंवा वेल तोडत उभा राहिला, तर अशा प्रकारे अनवधानाने तोडणाऱ्या भिक्खूला आपत्ती होत नाही. อชานนฺตสฺสาติ เอตฺถพฺภนฺตเร พีชคาโมติ วา ภูตคาโมติ วา น ชานาติ, ฉินฺทามีติปิ น ชานาติ, เกวลํ วติยา วา ปลาลปุญฺเช วา นิขาทนํ วา ขณิตฺตึ วา กุทาลํ วา สงฺโคปนตฺถาย ฐเปติ, ฑยฺหมานหตฺโถ วา อคฺคึ ปาเตติ, ตตฺร เจ ติณานิ ฉิชฺชนฺติ วา ฑยฺหนฺติ วา อนาปตฺติ. มนุสฺสวิคฺคหปาราชิกวณฺณนายํ ปน สพฺพอฏฺฐกถาสุ ‘‘สเจ ภิกฺขุ รุกฺเขน วา อชฺโฌตฺถโฏ โหติ, โอปาเต วา ปติโต สกฺกา จ โหติ รุกฺขํ ฉินฺทิตฺวา ภูมึ วา ขณิตฺวา นิกฺขมิตุํ, ชีวิตเหตุปิ อตฺตนา น กาตพฺพํ. อญฺเญน ปน ภิกฺขุนา ภูมึ วา ขณิตฺวา รุกฺขํ วา ฉินฺทิตฺวา อลฺลรุกฺขโต วา ทณฺฑกํ ฉินฺทิตฺวา ตํ รุกฺขํ ปวฏฺเฏตฺวา นิกฺขาเมตุํ วฏฺฏติ, อนาปตฺตี’’ติ วุตฺตํ. ตตฺถ การณํ น ทิสฺสติ – ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, ทวฑาเห ฑยฺหมาเน ปฏคฺคึ ทาตุํ, ปริตฺตํ กาตุ’’นฺติ (จูฬว. ๒๘๓) อิทํ ปน เอกเมว สุตฺตํ ทิสฺสติ. สเจ เอตสฺส อนุโลมํ ‘‘อตฺตโน น วฏฺฏติ, อญฺญสฺส วฏฺฏตี’’ติ [Pg.34] อิทํ นานากรณํ น สกฺกา ลทฺธุํ. อตฺตโน อตฺถาย กโรนฺโต อตฺตสิเนเหน อกุสลจิตฺเตเนว กโรติ, ปโร ปน การุญฺเญน, ตสฺมา อนาปตฺตีติ เจ. เอตมฺปิ อการณํ. กุสลจิตฺเตนาปิ หิ อิมํ อาปตฺตึ อาปชฺชติ. สพฺพอฏฺฐกถาสุ ปน วุตฺตตฺตา น สกฺกา ปฏิเสเธตุํ. คเวสิตพฺพา เอตฺถ ยุตฺติ. อฏฺฐกถาจริยานํ วา สทฺธาย คนฺตพฺพนฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. 'अजानन्तस्स' (माहिती नसताना) म्हणजे या कुंपणाच्या किंवा पेंढ्याच्या ढिगाऱ्याच्या आत बीजगाम (बियाणे) किंवा भूतगाम (वनस्पती) आहे हे माहीत नाही, आणि 'मी तोडत आहे' हेही माहीत नाही; केवळ कुंपणावर किंवा पेंढ्याच्या ढिगाऱ्यावर छिन्नी, कुदळ किंवा फावडे सुरक्षित ठेवण्यासाठी ठेवतो, किंवा हात भाजल्यामुळे अग्नी खाली पडतो, आणि तेथे जर गवत तुटले किंवा जळाले, तर आपत्ती होत नाही. परंतु मनुस्सविग्गह-पाराजिकच्या वर्णनात सर्व अट्ठकथांमध्ये असे म्हटले आहे की - 'जर भिक्खू झाडाखाली दबला गेला असेल, किंवा खड्ड्यात पडला असेल, आणि झाड कापून किंवा जमीन खणून बाहेर पडणे शक्य असेल, तरीही स्वतःच्या प्राणासाठी देखील त्याने स्वतः तसे करू नये. परंतु दुसऱ्या भिक्खूने जमीन खणून किंवा झाड कापून, किंवा ओल्या झाडाची फांदी तोडून, किंवा ते झाड बाजूला सारून त्याला बाहेर काढणे योग्य आहे, यात आपत्ती नाही.' तेथे याचे कारण दिसत नाही - 'भिक्खूंनो, वणवा पेटला असता प्रति-अग्नी देण्याची आणि संरक्षणाची भिंत करण्याची मी अनुमती देतो' हे एकच सूत्र दिसते. जर या सूत्राच्या अनुलोमाने 'स्वतःसाठी योग्य नाही, पण दुसऱ्यासाठी योग्य आहे' असा हा भेद स्वीकारायचा असेल, तर तो योग्य वाटत नाही. 'स्वतःच्या फायद्यासाठी करणारा स्वतःच्या मोहामुळे अकुशल चित्ताने करतो, तर दुसरा करुणेने करतो, म्हणून आपत्ती नाही' असे जर म्हटले, तर हे देखील योग्य कारण नाही. कारण कुशल चित्ताने देखील या आपत्तीला प्राप्त होता येते. परंतु सर्व अट्ठकथांमध्ये असे सांगितले असल्यामुळे त्याचा निषेध करता येत नाही. येथे योग्य युक्ती शोधली पाहिजे, किंवा अट्ठकथाचार्यांच्या वचनावर श्रद्धा ठेवूनच निर्णय घेतला पाहिजे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กายจิตฺตโต วาจาจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ. กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. हे सिक्खापद तीन समुट्ठानी (उत्पत्तीची तीन कारणे असलेले) आहे - काय-चित्ताने, वाचा-चित्ताने आणि काय-वाचा-चित्ताने उत्पन्न होते. हे क्रिया-रूप (न करण्यासारखे केल्याने होणारे), संज्ञाविमोक्ष (जाणीव नसताना आपत्तीतून मुक्तता देणारे), सचित्तक (चित्तासहित असणारे), पण्णत्तिवज्ज (नियम मोडल्यामुळे दोष असणारे), कायकम्म (कायिक कर्म), वचीकम्म (वाचिक कर्म), तिचित्त (तीन चित्ते असणारे) आणि त्रिवेदना (तीन वेदना असणारे) आहे. ภูตคามสิกฺขาปทํ ปฐมํ. पहिले भूतगाम सिक्खापद समाप्त. ๒. อญฺญวาทกสิกฺขาปทวณฺณนา २. अञ्ञवादक सिक्खापदाचे वर्णन (अञ्ञवादक सिक्खापदवण्णना). ๙๔. ทุติยสิกฺขาปเท – อนาจารํ อาจริตฺวาติ อกาตพฺพํ กตฺวา; กายวจีทฺวาเรสุ อาปตฺตึ อาปชฺชิตฺวาติ วุตฺตํ โหติ. อญฺเญนญฺญํ ปฏิจรตีติ อญฺเญน วจเนน อญฺญํ วจนํ ปฏิจรติ ปฏิจฺฉาเทติ อชฺโฌตฺถรติ; อิทานิ ตํ ปฏิจรณวิธึ ทสฺเสนฺโต ‘‘โก อาปนฺโน’’ติอาทิมาห. ตตฺรายํ วจนสมฺพนฺโธ – โส กิร กิญฺจิ วีติกฺกมํ ทิสฺวา ‘‘อาวุโส, อาปตฺตึ อาปนฺโนสี’’ติ สงฺฆมชฺเฌ อาปตฺติยา อนุยุญฺชิยมาโน ‘‘โก อาปนฺโน’’ติ วทติ. ‘‘ตโต ตฺว’’นฺติ วุตฺเต ‘‘อหํ กึ อาปนฺโน’’ติ วทติ. อถ ‘‘ปาจิตฺติยํ วา ทุกฺกฏํ วา’’ติ วุตฺเต วตฺถุํ ปุจฺฉนฺโต ‘‘อหํ กิสฺมึ อาปนฺโน’’ติ วทติ. ตโต ‘‘อสุกสฺมึ นาม วตฺถุสฺมิ’’นฺติ วุตฺเต ‘‘อหํ กถํ อาปนฺโน, กึ กโรนฺโต อาปนฺโนมฺหี’’ติ ปุจฺฉติ. อถ ‘‘อิทํ นาม กโรนฺโต อาปนฺโน’’ติ วุตฺเต ‘‘กํ ภณถา’’ติ วทติ. ตโต ‘‘ตํ ภณามา’’ติ วุตฺเต ‘‘กึ ภณถา’’ติ วทติ. ९४. दुसऱ्या सिक्खापदाच्या स्पष्टीकरणात – 'अनाचार आचरून' (अनाचारं आचरित्वा) म्हणजे न करण्याजोगे कृत्य करून; 'कायिक व वाचिक द्वारांनी आपत्तीला प्राप्त होऊन' असे म्हटले आहे. 'एका गोष्टीने दुसरी गोष्ट टाळणे/झाकणे' (अञ्ञेनञ्ञं पटिचरति) म्हणजे विचारलेल्या प्रश्नाव्यतिरिक्त दुसऱ्याच उत्तराने मूळ विचारलेला प्रश्न झाकणे, लपवणे किंवा दडपून टाकणे होय. आता ती टाळाटाळ करण्याची पद्धत दर्शवण्यासाठी 'को आपन्नो' (कोण आपत्तीला प्राप्त झाला आहे?) इत्यादी वाक्य म्हटले आहे. तेथे वाक्याचा संबंध असा आहे – तो भिक्खू खरोखरच काही नियमांचे उल्लंघन पाहून 'आयुष्यमान, तू आपत्तीला प्राप्त झाला आहेस' असे संघामध्ये आपत्तीबद्दल विचारले जात असताना 'कोण आपत्तीला प्राप्त झाला आहे?' असे म्हणतो. त्यानंतर 'तू (झाला आहेस)' असे म्हटले असता, 'मी कोणत्या आपत्तीला प्राप्त झालो आहे?' असे म्हणतो. नंतर 'पाचित्तिय किंवा दुक्कट आपत्तीला' असे म्हटले असता, मूळ कारण विचारत 'मी कशामुळे आपत्तीला प्राप्त झालो आहे?' असे म्हणतो. त्यानंतर 'अमुक एका कारणामुळे (वस्तूमुळे)' असे म्हटले असता, 'मी कसा आपत्तीला प्राप्त झालो? काय करत असताना आपत्तीला प्राप्त झालो?' असे विचारतो. नंतर 'अमुक एक कृत्य करत असताना आपत्तीला प्राप्त झालास' असे म्हटले असता, 'तुम्ही कोणाबद्दल बोलत आहात?' असे म्हणतो. त्यानंतर 'तुझ्याबद्दल बोलत आहोत' असे म्हटले असता, 'तुम्ही काय बोलत आहात?' असे म्हणतो. อปิเจตฺถ อยํ ปาฬิมุตฺตโกปิ อญฺเญนญฺญํ ปฏิจรณวิธิ – ภิกฺขูหิ ‘‘ตว สิปาฏิกาย กหาปโณ ทิฏฺโฐ, กิสฺเสวมสารุปฺปํ กโรสี’’ติ วุตฺโต ‘‘สุทิฏฺฐํ, ภนฺเต, น ปเนโส กหาปโณ; ติปุมณฺฑลํ เอต’’นฺติ ภณนฺโต วา ‘‘ตฺวํ สุรํ ปิวนฺโต ทิฏฺโฐ, กิสฺเสวํ กโรสี’’ติ วุตฺโต [Pg.35] ‘‘สุทิฏฺโฐ, ภนฺเต, น ปเนสา สุรา, เภสชฺชตฺถาย สมฺปาทิตํ อริฏฺฐ’’นฺติ ภณนฺโต วา ‘‘ตฺวํ ปฏิจฺฉนฺเน อาสเน มาตุคาเมน สทฺธึ นิสินฺโน ทิฏฺโฐ, กิสฺเสวมสารุปฺปํ กโรสี’’ติ วุตฺโต ‘‘เยน ทิฏฺฐํ สุทิฏฺฐํ, วิญฺญู ปเนตฺถ ทุติโย อตฺถิ, โส กิสฺส น ทิฏฺโฐ’’ติ ภณนฺโต วา, ‘‘อีทิสํ ตยา กิญฺจิ ทิฏฺฐ’’นฺติ ปุฏฺโฐ ‘‘น สุณามี’’ติ โสตมุปเนนฺโต วา, โสตทฺวาเร ปุจฺฉนฺตานํ จกฺขุํ อุปเนนฺโต วา, อญฺเญนญฺญํ ปฏิจรตีติ เวทิตพฺโพ. อญฺญวาทกํ โรเปตูติ อญฺญวาทกํ อาโรเปตุ; ปติฏฺฐาเปตูติ อตฺโถ. วิเหสกํ โรเปตูติ เอตสฺมิมฺปิ เอเสว นโย. शिवाय, येथे पाळि-ग्रंथात थेट न आलेली (पाळिमुत्तक) देखील एका गोष्टीने दुसरी गोष्ट टाळण्याची पद्धत अशी आहे – भिक्खूंनी 'तुझ्या पिशवीत कहापण (नाणे) पाहिले आहे, तू असे अयोग्य कृत्य का करतोस?' असे विचारले असता, 'भंते, तुम्ही नीट पाहिले आहे, पण हे कहापण नाही; हे तर जस्ताचे गोल कडे आहे' असे म्हणणारा; किंवा 'तू मद्य पिताना दिसला आहेस, तू असे का करतोस?' असे विचारले असता, 'भंते, तुम्ही नीट पाहिले आहे, पण हे मद्य नाही, हे औषधासाठी तयार केलेले अरिष्ट (औषधी काढा) आहे' असे म्हणणारा; किंवा 'तू एकांत आसनावर स्त्रीसोबत बसलेला दिसला आहेस, तू असे अयोग्य कृत्य का करतोस?' असे विचारले असता, 'ज्याने पाहिले त्याने नीट पाहिले आहे, परंतु येथे दुसरा एक समजूतदार व्यक्ती देखील उपस्थित होता, तो का दिसला नाही?' असे म्हणणारा; किंवा 'तुझ्याकडून असे काही पाहिले गेले आहे का?' असे विचारले असता, 'मला ऐकू येत नाही' असे म्हणून कानावर हात ठेवणारा किंवा कान पुढे करणारा; अथवा कान-द्वाराने (प्रश्नाद्वारे) विचारणाऱ्यांना डोळा पुढे करणारा (डोळ्याने खुणावणारा); हा 'एका गोष्टीने दुसरी गोष्ट टाळणारा' आहे असे समजावे. 'अञ्ञवादकं रोपेतु' म्हणजे अञ्ञवादक (दुसऱ्या गोष्टी बोलण्याचा दोष) आरोप करावा किंवा प्रस्थापित करावा, असा अर्थ आहे. 'विहेसकं रोपेतु' (त्रास देण्याचा दोष आरोप करावा) यावरही हाच नियम लागू होतो. ๙๘. อญฺญวาทเก วิเหสเก ปาจิตฺติยนฺติ เอตฺถ อญฺญํ วทตีติ อญฺญวาทกํ; อญฺเญนญฺญํ ปฏิจรณสฺเสตํ นามํ. วิเหเสตีติ วิเหสกํ; ตุณฺหีภูตสฺเสตํ นามํ, ตสฺมึ อญฺญวาทเก วิเหสเก. ปาจิตฺติยนฺติ วตฺถุทฺวเย ปาจิตฺติยทฺวยํ วุตฺตํ. ९८. 'अञ्ञवादके विहेसके पाचित्तियं' यात – जे विचारले आहे त्यापेक्षा वेगळेच बोलतो म्हणून तो 'अञ्ञवादक' होय; हे एका गोष्टीने दुसरी गोष्ट टाळण्याच्या कृत्याचे नाव आहे. संघाला त्रास देतो म्हणून तो 'विहेसक' होय; हे मौन बाळगण्याच्या (मौन राहून संघाला त्रास देण्याच्या) कृत्याचे नाव आहे. त्या अञ्ञवादक आणि विहेसक कृत्यामध्ये 'पाचित्तिय' म्हणजे या दोन कृत्यांमुळे दोन पाचित्तिय आपत्ती होतात, असे म्हटले आहे. ๑๐๐. อโรปิเต อญฺญวาทเกติ กมฺมวาจาย อนาโรปิเต อญฺญวาทเก. อโรปิเต วิเหสเกติ เอตสฺมิมฺปิ เอเสว นโย. १००. 'आरोपिते अञ्ञवादके' म्हणजे कम्मवाचेद्वारे अञ्ञवादक दोष अद्याप आरोप केला नसताना. 'आरोपिते विहेसके' यावरही हाच नियम लागू होतो. ๑๐๑. ธมฺมกมฺเม ธมฺมกมฺมสญฺญีติอาทีสุ ยํ ตํ อญฺญวาทกวิเหสกโรปนกมฺมํ กตํ, ตญฺเจ ธมฺมกมฺมํ โหติ, โส จ ภิกฺขุ ตสฺมึ ธมฺมกมฺมสญฺญี อญฺญวาทกญฺจ วิเหสกญฺจ กโรติ, อถสฺส ตสฺมึ อญฺญวาทเก จ วิเหสเก จ อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสาติ อิมินา นเยน อตฺโถ เวทิตพฺโพ. १०१. 'धम्मकम्मे धम्मकम्मसञ्ञी' इत्यादी वाक्यांमध्ये – जे अञ्ञवादक आणि विहेसक दोष आरोप करण्याचे कृत्य केले गेले आहे, ते जर धर्मसंगत कृत्य (धम्मकम्म) असेल, आणि तो भिक्खू त्या कृत्याला धर्मसंगत कृत्य समजणारा असून अञ्ञवादक (टाळाटाळ) आणि विहेसक (मौन राहून त्रास देणे) कृत्य करतो, तर त्याला त्या अञ्ञवादक आणि विहेसक कृत्यामुळे पाचित्तिय आपत्ती प्राप्त होते, या पद्धतीने अर्थ समजून घ्यावा. ๑๐๒. อชานนฺโต ปุจฺฉตีติ อาปตฺตึ วา อาปนฺนภาวํ อชานนฺโตเยว ‘‘กึ ตุมฺเห ภณถ, อหํ น ชานามี’’ติ ปุจฺฉติ. คิลาโน วา น กเถตีติ มุเข ตาทิโส พฺยาธิ โหติ, เยน กเถตุํ น สกฺโกติ. สงฺฆสฺส ภณฺฑนํ วาติอาทีสุ สงฺฆมชฺเฌ กถิเต ตปฺปจฺจยา สงฺฆสฺส ภณฺฑนํ วา กลโห วา วิวาโท วา ภวิสฺสติ, โส มา อโหสีติ มญฺญมาโน น กเถตีติ อิมินา นเยน อตฺโถ เวทิตพฺโพ. เสสํ อุตฺตานเมวาติ. १०२. 'अजाणता विचारतो' म्हणजे आपत्तीला प्राप्त झाल्याचे खरोखरच माहीत नसतानाच, 'तुम्ही काय बोलत आहात, मला माहीत नाही' असे विचारतो. 'किंवा आजारी असल्याने बोलत नाही' म्हणजे तोंडात असा काही आजार असतो, ज्यामुळे तो बोलू शकत नाही. 'संघाचा कलह होईल' इत्यादी वाक्यांमध्ये – संघामध्ये बोलले असता, त्या कारणामुळे संघाचा वाद, भांडण किंवा कलह होईल, 'तो होऊ नये' असा विचार करून बोलत नाही, या पद्धतीने अर्थ समजून घ्यावा. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กายจิตฺตโต วาจาจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, สิยา กิริยํ, สิยา อกิริยํ, อญฺเญนญฺญํ ปฏิจรนฺตสฺส หิ กิริยํ [Pg.36] โหติ, ตุณฺหีภาเวน วิเหสนฺตสฺส อกิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. हे तीन समुत्थानांचे (उत्पत्तीचे मार्ग असलेले) आहे – ते काय-चित्त, वाचा-चित्त आणि काय-वाचा-चित्त यांपासून उत्पन्न होते. कधी कृत्य केल्याने (किरिया) तर कधी कृत्य न केल्याने (अकिरिया) होते; कारण एका गोष्टीने दुसरी गोष्ट टाळणाऱ्यासाठी कृत्य केल्याने आपत्ती होते, तर मौन राहून त्रास देणाऱ्यासाठी कृत्य न केल्याने आपत्ती होते. हे संज्ञेमुळे (उल्लंघनाची संज्ञा नसल्यास) आपत्तीतून मुक्त होणारे, सचित्तक (उल्लंघनाच्या जाणिवेने युक्त), लोकवज्ज (लौकिक दृष्ट्या निंद्य), कायकर्म व वचीकर्म असलेले, अकुशल चित्ताने युक्त आणि दुःखद वेदनेने युक्त आहे. อญฺญวาทกสิกฺขาปทํ ทุติยํ. दुसरे अञ्ञवादक सिक्खापद समाप्त. ๓. อุชฺฌาปนกสิกฺขาปทวณฺณนา ३. उज्झापनक सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण ๑๐๓. ตติยสิกฺขาปเท – ทพฺพํ มลฺลปุตฺตํ ภิกฺขู อุชฺฌาเปนฺตีติ ‘‘ฉนฺทาย ทพฺโพ มลฺลปุตฺโต’’ติอาทีนิ วทนฺตา ตํ อายสฺมนฺตํ เตหิ ภิกฺขูหิ อวชานาเปนฺติ, อวญฺญาย โอโลกาเปนฺติ, ลามกโต วา จินฺตาเปนฺตี’’ติ อตฺโถ. ลกฺขณํ ปเนตฺถ สทฺทสตฺถานุสาเรน เวทิตพฺพํ. โอชฺฌาเปนฺตีติปิ ปาโฐ. อยเมวตฺโถ. ฉนฺทายาติ ฉนฺเทน ปกฺขปาเตน; อตฺตโน อตฺตโน สนฺทิฏฺฐสมฺภตฺตานํ ปณีตานิ ปญฺญเปตีติ อธิปฺปาโย. ขิยฺยนฺตีติ ‘‘ฉนฺทาย ทพฺโพ มลฺลปุตฺโต’’ติอาทีนิ วทนฺตา ปกาเสนฺติ. १०३. तिसऱ्या सिक्खापदात – 'भिक्खू डब्ब मल्लपुत्ताचा अवमान करतात' (उज्झापेन्ति) म्हणजे 'डब्ब मल्लपुत्त पक्षपाताने वागतो' इत्यादी बोलत, त्या आयुष्यमान डब्ब मल्लपुत्ताला इतर भिक्खूंच्या नजरेत कमी लेखतात, तुच्छतेने पाहायला लावतात किंवा हलक्या दर्जाचा म्हणून विचार करायला लावतात, असा अर्थ आहे. येथील व्याकरण लक्षण शब्दशास्त्रानुसार समजून घ्यावे. 'ओज्झापेन्ति' असाही पाठ आढळतो, त्याचाही हाच अर्थ आहे. 'छंदाय' म्हणजे छंदाने किंवा पक्षपाताने; आपल्या स्वतःच्या ओळखीच्या व जवळच्या मित्रांना उत्तम निवास नेमून देतो, असा अभिप्राय आहे. 'खिय्यन्ति' (निंदा करतात) म्हणजे 'डब्ब मल्लपुत्त पक्षपाताने वागतो' इत्यादी बोलून दोष उघड करतात. ๑๐๕. อุชฺฌาปนเก ขิยฺยนเก ปาจิตฺติยนฺติ เอตฺถ เยน วจเนน อุชฺฌาเปนฺติ, ตํ อุชฺฌาปนกํ. เยน จ ขิยฺยนฺติ ตํ ขิยฺยนกํ. ตสฺมึ อุชฺฌาปนเก ขิยฺยนเก. ปาจิตฺติยนฺติ วตฺถุทฺวเย ปาจิตฺติยทฺวยํ วุตฺตํ. १०५. 'उज्झापनके खिय्यनके पाचित्तियं' यात – ज्या शब्दांनी अवमान केला जातो, ते 'उज्झापनक' होय; आणि ज्या शब्दांनी निंदा केली जाते, ते 'खिय्यनक' होय. त्या उज्झापनक आणि खिय्यनक कृत्यामध्ये 'पाचित्तिय' म्हणजे या दोन कृत्यांमुळे दोन पाचित्तिय आपत्ती होतात, असे म्हटले आहे. ๑๐๖. อุชฺฌาปนกํ นาม อุปสมฺปนฺนํ สงฺเฆน สมฺมตํ เสนาสนปญฺญาปกํ วา…เป… อปฺปมตฺตกวิสฺสชฺชนกํ วาติ เอเตสํ ปทานํ ‘‘มงฺกุกตฺตุกาโม’’ติ อิมินา สมฺพนฺโธ. อวณฺณํ กตฺตุกาโม อยสํ กตฺตุกาโมติ อิเมสํ ปน วเสน อุปสมฺปนฺนนฺติอาทีสุ ‘‘อุปสมฺปนฺนสฺสา’’ติ เอวํ วิภตฺติวิปริณาโม กาตพฺโพ. อุชฺฌาเปติ วา ขิยฺยติ วา อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสาติ เอตฺถ ปน ยสฺมา ‘‘ขิยฺยนกํ นามา’’ติ เอวํ มาติกาปทํ อุทฺธริตฺวาปิ ‘‘อุชฺฌาปนกํ นามา’’ติ อิมสฺส ปทสฺส วุตฺตวิภงฺโคเยว วตฺตพฺโพ โหติ, อญฺญวาทกสิกฺขาปเท วิย อญฺโญ วิเสโส นตฺถิ, ตสฺมา ตํ วิสุํ อนุทฺธริตฺวา อวิภชิตฺวา นิคมนเมว เอกโต กตนฺติ เวทิตพฺพํ. ธมฺมกมฺเม ธมฺมกมฺมสญฺญีติอาทีสุ ยํ ตสฺส อุปสมฺปนฺนสฺส สมฺมุติกมฺมํ กตํ ตญฺเจ ธมฺมกมฺมํ โหติ, โส จ ภิกฺขุ ตสฺมึ ธมฺมกมฺมสญฺญี อุชฺฌาปนกญฺจ ขิยฺยนกญฺจ กโรติ, อถสฺส ตสฺมึ อุชฺฌาปนเก จ ขิยฺยนเก จ อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสาติ อิมินา นเยน อตฺโถ เวทิตพฺโพ. १०६. 'उज्झापनक म्हणजे उपसंपन्न भिक्खू, जो संघाद्वारे संमत केलेला सेनासन-नेमणूक करणारा किंवा...पे... क्षुल्लक वस्तूंचे वाटप करणारा आहे' या पदांचा 'त्याला लज्जित करण्याची इच्छा असणारा' या पदाशी संबंध जोडला पाहिजे. 'अपकीर्ती करण्याची इच्छा असणारा, अपेश आणण्याची इच्छा असणारा' या पदांच्या आधारे, 'उपसंपन्नं' इत्यादी पदांमध्ये 'उपसंपन्नस्स' (उपसंपन्नाची) असा विभक्ती-बदल केला पाहिजे. 'अवमान करतो किंवा निंदा करतो, तर पाचित्तिय आपत्ती होती' यात – कारण 'खिय्यनक म्हणजे' असे मातिकापद वेगळे मांडले तरी, 'उज्झापनक म्हणजे' या पदाचा जो सविस्तर विभाग सांगितला आहे, तोच पुन्हा सांगावा लागतो. अञ्ञवादक सिक्खापदाप्रमाणे यात दुसरा कोणताही विशेष फरक नाही, म्हणून ते मातिकापद वेगळे न मांडता आणि त्याचे स्वतंत्र वर्गीकरण न करता, निष्कर्ष एकत्रच केला आहे, असे समजावे. 'धम्मकम्मे धम्मकम्मसञ्ञी' इत्यादी वाक्यांमध्ये – त्या उपसंपन्न भिक्खूवर जे संमतीचे कृत्य केले गेले आहे, ते जर धर्मसंगत कृत्य असेल, आणि तो भिक्खू त्या कृत्याला धर्मसंगत कृत्य समजणारा असून अवमानकारक आणि निंदाजनक कृत्य करतो, तर त्याला त्या अवमानकारक आणि निंदाजनक कृत्यामुळे पाचित्तिय आपत्ती प्राप्त होते, या पद्धतीने अर्थ समजून घ्यावा. อนุปสมฺปนฺนํ [Pg.37] อุชฺฌาเปติ วา ขิยฺยติ วาติ เอตฺถ อุปสมฺปนฺนํ สงฺเฆน สมฺมตํ อญฺญํ อนุปสมฺปนฺนํ อุชฺฌาเปติ อวชานาเปติ, ตสฺส วา ตํ สนฺติเก ขิยฺยตีติ อตฺโถ. อุปสมฺปนฺนํ สงฺเฆน อสมฺมตนฺติ กมฺมวาจาย อสมฺมตํ เกวลํ ‘‘ตเวโส ภาโร’’ติ สงฺเฆน อาโรปิตภารํ ภิกฺขูนํ วา ผาสุวิหารตฺถาย สยเมว ตํ ภารํ วหนฺตํ, ยตฺร วา ทฺเว ตโย ภิกฺขู วิหรนฺติ, ตตฺร วา ตาทิสํ กมฺมํ กโรนฺตนฺติ อธิปฺปาโย. อนุปสมฺปนฺนํ สงฺเฆน สมฺมตํ วา อสมฺมตํ วาติ เอตฺถ ปน กิญฺจาปิ อนุปสมฺปนฺนสฺส เตรส สมฺมุติโย ทาตุํ น วฏฺฏนฺติ. อถ โข อุปสมฺปนฺนกาเล ลทฺธสมฺมุติโก ปจฺฉา อนุปสมฺปนฺนภาเว ฐิโต, ตํ สนฺธาย ‘‘สงฺเฆน สมฺมตํ วา’’ติ วุตฺตํ. ยสฺส ปน พฺยตฺตสฺส สามเณรสฺส เกวลํ สงฺเฆน วา สมฺมเตน วา ภิกฺขุนา ‘‘ตฺวํ อิทํ กมฺมํ กโรหี’’ติ ภาโร กโต, ตาทิสํ สนฺธาย ‘‘อสมฺมตํ วา’’ติ วุตฺตํ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมวาติ. "अनुपसम्पन्नं उज्झापेति वा खिय्यति वा" यामध्ये—संघाने संमत केलेल्या उपसंपन्न भिक्खूला इतर अनुपसंपन्नाजवळ (गृहस्थ किंवा सामणेराजवळ) तुच्छ लेखणे किंवा त्याचा अवमान करणे, अथवा त्याच्याजवळ त्या भिक्खूची निंदा करणे, असा अर्थ आहे. "उपसंपन्नं संघेन असंमतं" म्हणजे कम्मवाचेद्वारे संमत न केलेला, केवळ "हा तुझा भार (जबाबदारी) आहे" असे संघाने ज्याच्यावर भार सोपवला आहे अशा व्यक्तीला, किंवा भिक्खूंच्या सुखावह विहारासाठी स्वतःहूनच तो भार वाहणाऱ्या व्यक्तीला, किंवा ज्या विहारात दोन-तीन भिक्खू राहतात, तेथे तसे कार्य करणाऱ्या व्यक्तीला उद्देशून म्हटले आहे, असा अभिप्राय आहे. "अनुपसम्पन्नं संघेन संमतं वा असंमतं वा" यामध्ये—जरी अनुपसंपन्नाला तेरा प्रकारच्या संमती (संमुती) देणे योग्य नसले, तरी जो उपसंपन्न असताना संमुती प्राप्त करून नंतर अनुपसंपन्न भावात स्थित झाला आहे, त्याला उद्देशून "संघाने संमत केलेला" असे म्हटले आहे. परंतु ज्या चतुर (कुशल) सामणेरावर केवळ संघाने किंवा संमत भिक्खूने "तू हे काम कर" असा भार सोपवला आहे, अशा सामणेराला उद्देशून "असंमत वा" असे म्हटले आहे. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กายจิตฺตโต วาจาจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. हे तीन समुत्थानांचे (शिक्खापद) आहे—ते काय-चित्त, वाचा-चित्त आणि काय-वाचा-चित्त यांपासून उत्पन्न होते; हे क्रिया-रूप (अकरणीय कृत्य केल्याने होणारे), संज्ञाविमोक्ष (उल्लंघनाची संज्ञा नसताना आपत्तीतून मुक्त होणारे), सचित्तक (उल्लंघनाच्या चित्ताने युक्त), लोकवज्ज (लौकिक दृष्ट्या दोषयुक्त), कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्तयुक्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे. อุชฺฌาปนกสิกฺขาปทํ ตติยํ. तिसरे उज्झापनक शिक्खापद (समाप्त). ๔. ปฐมเสนาสนสิกฺขาปทวณฺณนา ४. पहिल्या सेनासन शिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๑๐๘. จตุตฺถสิกฺขาปเท – เหมนฺติเก กาเลติ เหมนฺตกาเล หิมปาตสมเย. กายํ โอตาเปนฺตาติ มญฺจปีฐาทีสุ นิสินฺนา พาลาตเปน กายํ โอตาเปนฺตา. กาเล อาโรจิเตติ ยาคุภตฺตาทีสุ ยสฺส กสฺสจิ กาเล อาโรจิเต. โอวฏฺฐํ โหตีติ หิมวสฺเสน โอวฏฺฐํ ตินฺตํ โหติ. १०८. चौथ्या शिक्खापदामध्ये—"हेमन्तिके काले" म्हणजे हेमंत ऋतूत (हिवाळ्यात) दव किंवा बर्फ पडण्याच्या वेळी. "कायं ओतापेन्ता" म्हणजे मंचक, पीठ इत्यादींवर बसून कोवळ्या उन्हाने शरीराला शेकवणारे. "काले आरोचिते" म्हणजे कांजी, भात इत्यादींपैकी कोणत्याही एकाची वेळ झाल्याचे कळवले असता. "ओवट्ठं होति" म्हणजे दव किंवा बर्फाच्या वर्षावाने ओले झालेले असते. ๑๑๐. อวสฺสิกสงฺเกเตติ วสฺสิกวสฺสานมาสาติ เอวํ อปญฺญตฺเต จตฺตาโร เหมนฺติเก จตฺตาโร จ คิมฺหิเก อฏฺฐ มาเสติ อตฺโถ. มณฺฑเป วาติ สาขามณฺฑเป วา ปทรมณฺฑเป วา. รุกฺขมูเล วาติ [Pg.38] ยสฺส กสฺสจิ รุกฺขสฺส เหฏฺฐา. ยตฺถ กากา วา กุลลา วา น อูหทนฺตีติ ยตฺถ ธุวนิวาเสน กุลาวเก กตฺวา วสมานา เอเต กากกุลลา วา อญฺเญ วา สกุนฺตา ตํ เสนาสนํ น อูหทนฺติ, ตาทิเส รุกฺขมูเล นิกฺขิปิตุํ อนุชานามีติ. ตสฺมา ยตฺถ โคจรปฺปสุตา สกุนฺตา วิสฺสมิตฺวา คจฺฉนฺติ, ตสฺส รุกฺขสฺส มูเล นิกฺขิปิตุํ วฏฺฏติ. ยสฺมึ ปน ธุวนิวาเสน กุลาวเก กตฺวา วสนฺติ, ตสฺส รุกฺขสฺส มูเล น นิกฺขิปิตพฺพํ. ‘‘อฏฺฐ มาเส’’ติ วจนโต เยสุ ชนปเทสุ วสฺสกาเล น วสฺสติ, เตสุปิ จตฺตาโร มาเส นิกฺขิปิตุํ น วฏฺฏติเยว. ‘‘อวสฺสิกสงฺเกเต’’ติ วจนโต ยตฺถ เหมนฺเต เทโว วสฺสติ, ตตฺถ เหมนฺเตปิ อชฺโฌกาเส นิกฺขิปิตุํ น วฏฺฏติ. คิมฺเห ปน สพฺพตฺถ วิคตวลาหกํ วิสุทฺธํ นภํ โหติ, เอวรูเป กาเล เกนจิเทว กรณีเยน อชฺโฌกาเส มญฺจปีฐํ นิกฺขิปิตุํ วฏฺฏติ. ११०. "अवस्सिकसङ्केते" म्हणजे वर्षा ऋतूचे महिने म्हणून न ओळखले जाणारे, हेमंत ऋतूचे चार आणि ग्रीष्म ऋतूचे चार असे एकूण आठ महिने, असा अर्थ आहे. "मण्डपे वा" म्हणजे पाना-फांद्यांच्या मांडवात किंवा लाकडी फळ्यांच्या मांडवात. "रुक्खमूले वा" म्हणजे कोणत्याही झाडाच्या खाली. "यत्थ काका वा कुलला वा न ऊहदन्ति" म्हणजे ज्या झाडावर कायमचे वास्तव्य करून, घरटे बांधून राहणारे हे कावळे, घारी किंवा इतर पक्षी त्या सेनासनावर विष्ठा करत नाहीत, अशा प्रकारच्या झाडाच्या खाली सेनासन ठेवण्यास अनुमती देतो. म्हणून, ज्या झाडावर अन्नाच्या शोधात फिरणारे पक्षी केवळ विश्रांती घेऊन निघून जातात, अशा झाडाच्या खाली सेनासन ठेवणे योग्य आहे. परंतु, ज्या झाडावर ते कायमचे घरटे बांधून राहतात, अशा झाडाच्या खाली सेनासन ठेवू नये. "आठ महिने" या वचनानुसार, ज्या देशांमध्ये वर्षा ऋतूत पाऊस पडत नाही, तेथेही (वर्षा ऋतूच्या) चार महिन्यांत सेनासन उघड्यावर ठेवणे योग्य नाहीच. "अवस्सिकसङ्केते" या वचनानुसार, ज्या देशात हेमंत ऋतूत पाऊस पडतो, तेथे हेमंत ऋतूतही उघड्यावर सेनासन ठेवणे योग्य नाही. ग्रीष्म ऋतूत मात्र सर्वच ठिकाणी ढगविरहित स्वच्छ आकाश असते, अशा वेळी कोणत्याही आवश्यक कामासाठी उघड्या जागेत मंचक-पीठ ठेवणे योग्य आहे. อพฺโภกาสิเกนาปิ วตฺตํ ชานิตพฺพํ, ตสฺส หิ สเจ ปุคฺคลิกมญฺจโก อตฺถิ, ตตฺเถว สยิตพฺพํ. สงฺฆิกํ คณฺหนฺเตน เวตฺเตน วา วาเกน วา วีตมญฺจโก คเหตพฺโพ. ตสฺมึ อสติ ปุราณมญฺจโก คเหตพฺโพ. ตสฺมิมฺปิ อสติ นววายิโม วา โอนทฺธโก วา คเหตพฺโพ. คเหตฺวา จ ปน ‘‘อหํ อุกฺกฏฺฐรุกฺขมูลิโก อุกฺกฏฺฐอพฺโภกาสิโก’’ติ จีวรกุฏิมฺปิ อกตฺวา อสมเย อชฺโฌกาเส รุกฺขมูเล วา ปญฺญเปตฺวา นิปชฺชิตุํ น วฏฺฏติ. สเจ ปน จตุคฺคุเณนปิ จีวเรน กตกุฏิ อเตเมนฺตํ รกฺขิตุํ น สกฺโกติ, สตฺตาหวทฺทลิกาทีนิ ภวนฺติ, ภิกฺขุโน กายานุคติกตฺตา วฏฺฏติ. उघड्यावर राहणाऱ्या (अब्भोकासिक) भिक्खूनेही आपले कर्तव्य जाणले पाहिजे. जर त्याचा स्वतःचा वैयक्तिक मंचक असेल, तर त्याने त्यावरच झोपावे. जर तो संघाचा (सांघिक) मंचक घेत असेल, तर त्याने वेताने किंवा वल्कलाने विणलेला लहान मंचक घ्यावा. तो उपलब्ध नसल्यास जुना मंचक घ्यावा. तोही उपलब्ध नसल्यास नवीन विणलेला किंवा चामड्याने मढवलेला मंचक घ्यावा. तो घेतल्यानंतर, "मी कडक वृक्षमुलीक (झाडाखाली राहणारा) किंवा कडक अब्भोकासिक (उघड्यावर राहणारा) आहे" असे सांगून, चिवराची कुटी (झोपडी) देखील न बनवता, अयोग्य वेळी उघड्यावर किंवा झाडाखाली मंचक मांडून झोपणे योग्य नाही. परंतु, जर चार पदरी चिवराने बनवलेली कुटी देखील पावसाचे पाणी रोखण्यास असमर्थ असेल आणि सात दिवस सतत पाऊस पडत असेल, तर भिक्खूच्या शरीराच्या संरक्षणासाठी (मंचक-पीठ उघड्यावर ठेवणे) योग्य आहे. อรญฺเญ ปณฺณกุฏีสุ วสนฺตานํ สีลสมฺปทาย ปสนฺนจิตฺตา มนุสฺสา นวํ มญฺจปีฐํ เทนฺติ ‘‘สงฺฆิกปริโภเคน ปริภุญฺชถา’’ติ วสิตฺวา คจฺฉนฺเตหิ สามนฺตวิหาเร สภาคภิกฺขูนํ เปเสตฺวา คนฺตพฺพํ, สภาคานํ อภาเว อโนวสฺสเก นิกฺขิปิตฺวา คนฺตพฺพํ, อโนวสฺสเก อสติ รุกฺเข ลคฺเคตฺวา คนฺตพฺพํ. เจติยงฺคเณ สมฺมชฺชนึ คเหตฺวา โภชนสาลงฺคณํ วา อุโปสถาคารงฺคณํ วา ปริเวณทิวาฏฺฐานอคฺคิสาลาทีสุ วา อญฺญตรํ สมฺมชฺชิตฺวา โธวิตฺวา ปุน สมฺมชฺชนีมาฬเกเยว ฐเปตพฺพา. อุโปสถาคาราทีสุ อญฺญตรสฺมึ คเหตฺวา อวเสสานิ สมฺมชฺชนฺตสฺสาปิ เอเสว นโย. अरण्यात पानाच्या कुटीत राहणाऱ्या भिक्खूंच्या शीलसंपदेवर प्रसन्न होऊन लोकांनी "सांघिक उपयोगाच्या पद्धतीने याचा वापर करा" असे म्हणून नवीन मंचक-पीठ दिले, तर तेथून निघून जाताना त्यांनी जवळच्या विहारातील समान शील असणाऱ्या (सभाग) भिक्खूंकडे ते पाठवून मगच जावे. सभाग भिक्खू नसतील, तर पाऊस न पडणाऱ्या (सुरक्षित) ठिकाणी ते ठेवून जावे. पाऊस न पडणारी जागा नसेल, तर झाडाला टांगून जावे. चैत्य अंगणात झाडू घेऊन, भोजनशाळेचे अंगण, उपोसथ घराचे अंगण किंवा परिवेण (विहार परिसर), दिवसा राहण्याची जागा, अग्निशाळा (शेकोटीची जागा) इत्यादींपैकी कोणत्याही एका जागेची झाडलोट करून व ती धुवून, झाडू पुन्हा झाडू ठेवण्याच्या जागेवरच ठेवावा. उपोसथ घरादींपैकी कोणत्याही एका ठिकाणचा झाडू घेऊन उर्वरित भोजनशाळेच्या अंगणाची इत्यादींची झाडलोट करणाऱ्या भिक्खूसाठीही हाच नियम आहे. โย [Pg.39] ปน ภิกฺขาจารมคฺคํ สมฺมชฺชนฺโตว คนฺตุกาโม โหติ, เตน สมฺมชฺชิตฺวา สเจ อนฺตรามคฺเค สาลา อตฺถิ, ตตฺถ ฐเปตพฺพา. สเจ นตฺถิ, วลาหกานํ อนุฏฺฐิตภาวํ สลฺลกฺเขตฺวา ‘‘ยาวาหํ คามโต นิกฺขมามิ, ตาว น วสฺสิสฺสตี’’ติ ชานนฺเตน ยตฺถ กตฺถจิ นิกฺขิปิตฺวา ปุน ปจฺจาคจฺฉนฺเตน ปากติกฏฺฐาเน ฐเปตพฺพา. สเจ วสฺสิสฺสตีติ ชานนฺโต อชฺโฌกาเส ฐเปติ, ทุกฺกฏนฺติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. สเจ ปน ตตฺร ตตฺเรว สมฺมชฺชนตฺถาย สมฺมชฺชนี นิกฺขิตฺตา โหติ, ตํ ตํ ฐานํ สมฺมชฺชิตฺวา ตตฺร ตตฺเรว นิกฺขิปิตุํ วฏฺฏติ. อาสนสาลํ สมฺมชฺชนฺเตน วตฺตํ ชานิตพฺพํ. ตตฺริทํ วตฺตํ – มชฺฌโต ปฏฺฐาย ปาทฏฺฐานาภิมุขา วาลิกา หริตพฺพา. กจวรํ หตฺเถหิ คเหตฺวา พหิ ฉฑฺเฑตพฺพํ. परंतु जो भिक्खू भिक्षाटनाच्या मार्गाची झाडलोट करतच जाऊ इच्छितो, त्याने झाडलोट करून जर वाटेत धर्मशाळा (शाळा) असेल, तर झाडू तेथे ठेवावा. जर धर्मशाळा नसेल, तर ढगांची स्थिती पाहून, "मी जोपर्यंत गावातून बाहेर पडत नाही, तोपर्यंत पाऊस पडणार नाही" असे जाणून, तो झाडू कोणत्याही एका ठिकाणी ठेवून द्यावा आणि परत येताना तो पुन्हा त्याच्या मूळ जागी आणून ठेवावा. जर पाऊस पडेल हे माहीत असूनही तो उघड्यावर झाडू ठेवतो, तर त्याला दुक्कट आपत्ती येते, असे महापंचरी अठ्ठकथेत म्हटले आहे. परंतु जर त्या त्या ठिकाणी झाडलोट करण्यासाठीच झाडू ठेवलेला असेल, तर त्या त्या जागेची झाडलोट करून तो झाडू तेथेच ठेवणे योग्य आहे. आसनशाळेची झाडलोट करणाऱ्या भिक्खूने कर्तव्य जाणले पाहिजे. ते कर्तव्य असे आहे—मध्यभागापासून सुरुवात करून पायांच्या जागेकडे (बाहेरच्या बाजूला) वाळू ढकलावी. कचरा हाताने उचलून बाहेर फेकावा. ๑๑๑. มสารโกติ มญฺจปาเท วิชฺฌิตฺวา ตตฺถ อฏนิโย ปเวเสตฺวา กโต. พุนฺทิกาพทฺโธติ อฏนีหิ มญฺจปาเท ฑํสาเปตฺวา ปลฺลงฺกสงฺเขเปน กโต. กุฬีรปาทโกติ อสฺสเมณฺฑกาทีนํ ปาทสทิเสหิ ปาเทหิ กโต. โย วา ปน โกจิ วงฺกปาทโก, อยํ วุจฺจติ กุฬีรปาทโก. อาหจฺจปาทโกติ อยํ ปน ‘‘อาหจฺจปาทโก นาม มญฺโจ องฺเค วิชฺฌิตฺวา กโต โหตี’’ติ เอวํ ปรโต ปาฬิยํเยว วุตฺโต, ตสฺมา อฏนิโย วิชฺฌิตฺวา ตตฺถ ปาทสิขํ ปเวเสตฺวา อุปริ อาณึ ทตฺวา กตมญฺโจ ‘‘อาหจฺจปาทโก’’ติ เวทิตพฺโพ. ปีเฐปิ เอเสว นโย. อนฺโต สํเวเฐตฺวา พทฺธํ โหตีติ เหฏฺฐา จ อุปริ จ วิตฺถตํ มชฺเฌ สงฺขิตฺตํ ปณวสณฺฐานํ กตฺวา พทฺธํ โหติ, ตํ กิร มชฺเฌ สีหพฺยคฺฆจมฺมปริกฺขิตฺตมฺปิ กโรนฺติ. อกปฺปิยจมฺมํ นาเมตฺถ นตฺถิ. เสนาสนญฺหิ โสวณฺณมยมฺปิ วฏฺฏติ, ตสฺมา ตํ มหคฺฆํ โหติ. อนุปสมฺปนฺนํ สนฺถราเปติ ตสฺส ปลิโพโธติ เยน สนฺถราปิตํ, ตสฺส ปลิโพโธ. เลฑฺฑุปาตํ อติกฺกมนฺตสฺส อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสาติ ถามมชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส เลฑฺฑุปาตํ อติกฺกมนฺตสฺส ปาจิตฺติยํ. १११. मसारक म्हणजे पलंगाचे पाय कोरून त्यात बाजूच्या पट्ट्या बसवून बनवलेला पलंग होय. बुन्दिकाबद्ध म्हणजे बाजूच्या पट्ट्यांनी पलंगाचे पाय जखडून पर्यंक स्वरूपात बनवलेला पलंग होय. कुळीरपादक म्हणजे घोडा, मेंढा इत्यादी प्राण्यांच्या पायांसारखे पाय असलेला बनवलेला पलंग होय. किंवा कोणताही वाकड्या पायांचा पलंग असेल, त्याला 'कुळीरपादक' असे म्हटले जाते. 'आहच्चपादक' या शब्दाचा अर्थ पुढे पाळीमध्येच असा सांगितला आहे की, 'आहच्चपादक नावाचा पलंग म्हणजे अंगात (पट्ट्यांमध्ये) छिद्र करून बनवलेला असतो.' म्हणून, बाजूच्या पट्ट्यांना छिद्र करून त्यात पायाचे टोक बसवून वरून मेख ठोकून बनवलेला पलंग 'आहच्चपादक' समजावा. पाठाच्या (आसनाच्या) बाबतीतही हाच नियम आहे. 'आत गुंडाळून बांधलेला असतो' म्हणजे खाली आणि वर रुंद असलेला आणि मध्ये अरुंद असलेला, डमरूच्या आकाराचा बनवून बांधलेला असतो. ते आसन मध्ये सिंह किंवा वाघाच्या कातड्याने वेढलेले देखील बनवतात असे म्हणतात. येथे अकल्पनीय (अयोग्य) कातडे असे काही नाही. कारण की, सोन्याचे बनवलेले शयनासन देखील चालते, म्हणून ते अत्यंत मौल्यवान असते. 'अनुपसंपन्नाकडून अंथरवून घेणे, हा त्याचा परिबोध आहे' म्हणजे ज्याने अंथरण्यास सांगितले आहे, हा त्याचाच परिबोध आहे. 'मातीचे ढेकूळ फेकण्याच्या अंतराचे उल्लंघन करणाऱ्याला पाचित्तिय आपत्ती होते' म्हणजे मध्यम शक्तीच्या माणसाने फेकलेले ढेकूळ जेथे पडते, त्या अंतराचे उल्लंघन करणाऱ्या भिक्खूला पाचित्तिय आपत्ती होते. อยํ ปเนตฺถ วินิจฺฉโย – เถโร โภชนสาลายํ ภตฺตกิจฺจํ กตฺวา ทหรํ อาณาเปติ ‘‘คจฺฉ ทิวาฏฺฐาเน มญฺจปีฐํ ปญฺญเปหี’’ติ. โส ตถา กตฺวา นิสินฺโน. เถโร ยถารุจึ วิจริตฺวา ตตฺถ คนฺตฺวา ถวิกํ วา อุตฺตราสงฺคํ วา ฐเปติ, ตโต ปฏฺฐาย เถรสฺส ปลิโพโธ. นิสีทิตฺวา สยํ [Pg.40] คจฺฉนฺโต เนว อุทฺธรติ, น อุทฺธราเปติ, เลฑฺฑุปาตาติกฺกเม ปาจิตฺติยํ. สเจ ปน เถโร ตตฺถ ถวิกํ วา อุตฺตราสงฺคํ วา อฏฺฐเปตฺวา จงฺกมนฺโตว ทหรํ ‘‘คจฺฉ ตฺว’’นฺติ ภณติ, เตน ‘‘อิทํ ภนฺเต มญฺจปีฐ’’นฺติ อาจิกฺขิตพฺพํ. สเจ เถโร วตฺตํ ชานาติ ‘‘ตฺวํ คจฺฉ, อหํ ปากติกํ กริสฺสามี’’ติ วตฺตพฺพํ. สเจ พาโล โหติ อนุคฺคหิตวตฺโต ‘‘คจฺฉ, มา อิธ ติฏฺฐ, เนว นิสีทิตุํ น นิปชฺชิตุํ เทมี’’ติ ทหรํ ตชฺเชติเยว. ทหเรน ‘‘ภนฺเต สุขํ สยถา’’ติ กปฺปํ ลภิตฺวา วนฺทิตฺวา คนฺตพฺพํ. ตสฺมึ คเต เถรสฺเสว ปลิโพโธ. ปุริมนเยเนว จสฺส อาปตฺติ เวทิตพฺพา. यावर हा निर्णय आहे - स्थविरांनी भोजनशाळेत भोजन उरकून तरुण भिक्खूला आज्ञा दिली की, 'जा, दिवसा विश्रांती घेण्याच्या ठिकाणी पलंग व आसन अंथर.' त्याने त्याप्रमाणे करून तेथे बसले. स्थवीर आपल्या इच्छेनुसार फिरून तेथे गेले आणि त्यांनी आपली पिशवी किंवा उत्तरासंग तेथे ठेवला, तेव्हापासून स्थविरांचा परिबोध सुरू होतो. तेथे बसून स्वतः जाताना ते स्वतःही ते उचलत नाहीत आणि दुसऱ्याकडूनही उचलून घेत नाहीत, तर ढेकूळ फेकण्याच्या अंतराचे उल्लंघन केल्यावर पाचित्तिय आपत्ती होते. पण जर स्थविरांनी तेथे पिशवी किंवा उत्तरासंग न ठेवता, चंक्रमण करत असतानाच तरुण भिक्खूला म्हटले की, 'तू जा,' तर त्याने (तरुण भिक्खूने) 'भंते, हे पलंग व आसन आहे' असे सांगावे. जर स्थविरांना विनय-नियम माहीत असेल, तर त्यांनी म्हणावे, 'तू जा, मी हे पूर्ववत ठेवीन.' जर ते अज्ञानी असतील किंवा त्यांनी विनय-नियम शिकलेले नसतील, तर 'जा, येथे उभा राहू नकोस, मी तुला येथे बसूही देणार नाही आणि झोपूही देणार नाही' असे म्हणून तरुण भिक्खूला धमकावतातच. तरुण भिक्खूने 'भंते, आपण सुखाने झोपावे' अशी अनुमती मिळवून, वंदन करून निघून जावे. तो निघून गेल्यावर स्थविरांचाच परिबोध राहतो. आणि पूर्वोक्त नियमानेच त्यांना आपत्ती होते असे समजावे. อถ ปน อาณตฺติกฺขเณเยว ทหโร ‘‘มยฺหํ ภนฺเต ภณฺฑกโธวนาทิ กิญฺจิ กรณียํ อตฺถี’’ติ วทติ, เถโร จ นํ ‘‘ตฺวํ ปญฺญเปตฺวา คจฺฉาหี’’ติ วตฺวา โภชนสาลโต นิกฺขมิตฺวา อญฺญตฺถ คจฺฉติ, ปาทุทฺธาเรน กาเรตพฺโพ. สเจ ตตฺเถว คนฺตฺวา นิสีทติ ปุริมนเยเนว จสฺส เลฑฺฑุปาตาติกฺกเม อาปตฺติ. สเจ ปน เถโร สามเณรํ อาณาเปติ, สามเณเร ตตฺถ มญฺจปีฐํ ปญฺญเปตฺวา นิสินฺเนปิ โภชนสาลโต อญฺญตฺถ คจฺฉนฺโต ปาทุทฺธาเรน กาเรตพฺโพ. คนฺตฺวา นิสินฺโน ปุน คมนกาเล เลฑฺฑุปาตาติกฺกเม อาปตฺติยา กาเรตพฺโพ. สเจ ปน อาณาเปนฺโต มญฺจปีฐํ ปญฺญเปตฺวา ตตฺเถว นิสีทาติ อาณาเปติ, ยตฺริจฺฉติ ตตฺร คนฺตฺวา อาคนฺตุํ ลภติ. สยํ ปน ปากติกํ อกตฺวา คจฺฉนฺตสฺส เลฑฺฑุปาตาติกฺกเม ปาจิตฺติยํ. อนฺตรสนฺนิปาเต มญฺจปีฐานิ ปญฺญเปตฺวา นิสินฺเนหิ คมนกาเล อารามิกานํ อิมํ ปฏิสาเมถาติ วตฺตพฺพํ, อวตฺวา คจฺฉนฺตานํ เลฑฺฑุปาตาติกฺกเม อาปตฺติ. पण जर आज्ञा देण्याच्या क्षणीच तरुण भिक्खू म्हणाला, 'भंते, माझे कपडे धुणे इत्यादी काही काम आहे,' आणि स्थविरांनी त्याला 'तू ते अंथरून मग जा' असे सांगून भोजनशाळेतून बाहेर पडून दुसऱ्या ठिकाणी गेले, तर पाऊल उचलल्याबरोबर त्यांना दोषी ठरवले जावे. जर ते तेथेच जाऊन बसले, तर पूर्वोक्त नियमानेच त्यांना ढेकूळ फेकण्याच्या अंतराचे उल्लंघन केल्यावर आपत्ती होते. पण जर स्थविरांनी श्रामणेराला आज्ञा दिली, आणि श्रामणेराने तेथे पलंग व आसन अंथरून तो तेथे बसला असला तरी, भोजनशाळेतून दुसऱ्या ठिकाणी जाणाऱ्या स्थविरांना पाऊल उचलल्याबरोबर दोषी ठरवले जावे. तेथे जाऊन बसलेल्या स्थविरांना पुन्हा निघून जाण्याच्या वेळी ढेकूळ फेकण्याच्या अंतराचे उल्लंघन केल्यावर आपत्तीने दोषी ठरवले जावे. पण जर आज्ञा देताना 'पलंग व आसन अंथरून तेथेच बसून राहा' अशी आज्ञा दिली असेल, तर ते आपल्या इच्छेनुसार तेथे जाऊन परत येऊ शकतात. पण स्वतः ते पूर्ववत न करता निघून जाणाऱ्याला ढेकूळ फेकण्याच्या अंतराचे उल्लंघन केल्यावर पाचित्तिय आपत्ती होते. मधल्या काळात झालेल्या सभेत पलंग व आसने अंथरून बसलेल्या भिक्खूंनी निघून जाण्याच्या वेळी आरामाच्या रक्षकांना 'हे उचलून ठेवा' असे सांगावे. न सांगता निघून जाणाऱ्यांना ढेकूळ फेकण्याच्या अंतराचे उल्लंघन केल्यावर आपत्ती होते. มหาธมฺมสวนํ นาม โหติ ตตฺถ อุโปสถาคารโตปิ โภชนสาลโตปิ อาหริตฺวา มญฺจปีฐานิ ปญฺญเปนฺติ. อาวาสิกานํเยว ปลิโพโธ. สเจ อาคนฺตุกา ‘‘อิทํ อมฺหากํ อุปชฺฌายสฺส อิทํ อาจริยสฺสา’’ติ คณฺหนฺติ, ตโต ปฏฺฐาย เตสํเยว ปลิโพโธ. คมนกาเล ปากติกํ อกตฺวา เลฑฺฑุปาตํ อติกฺกมนฺตานํ อาปตฺติ. มหาปจฺจริยํ ปุน วุตฺตํ – ‘‘ยาว อญฺเญ น นิสีทนฺติ, ตาว เยหิ ปญฺญตฺตํ, เตสํ ภาโร. อญฺเญสุ อาคนฺตฺวา นิสินฺเนสุ นิสินฺนกานํ ภาโร. สเจ เต อนุทฺธริตฺวา วา อนุทฺธราเปตฺวา วา คจฺฉนฺติ, ทุกฺกฏํ. กสฺมา? อนาณตฺติยา ปญฺญปิตตฺตา’’ติ. ธมฺมาสเน ปญฺญตฺเต ยาว อุสฺสารโก วา [Pg.41] ธมฺมกถิโก วา นาคจฺฉติ, ตาว ปญฺญาปกานํ ปลิโพโธ, ตสฺมึ อาคนฺตฺวา นิสินฺเน ตสฺส ปลิโพโธ. สกลํ อโหรตฺตํ ธมฺมสวนํ โหติ, อญฺโญ อุสฺสารโก วา ธมฺมกถิโก วา อุฏฺฐหติ, อญฺโญ นิสีทติ, โย โย อาคนฺตฺวา นิสีทติ, ตสฺส ตสฺส ภาโร. อุฏฺฐหนฺเตน ปน ‘‘อิทมาสนํ ตุมฺหากํ ภาโร’’ติ วตฺวา คนฺตพฺพํ. สเจปิ อิตรสฺมึ อนาคเตเยว ปฐมํ นิสินฺโน อุฏฺฐาย คจฺฉติ, ตสฺมิญฺจ อนฺโตอุปจารฏฺเฐเยว อิตโร อาคนฺตฺวา นิสีทติ, อุฏฺฐาย คโต อาปตฺติยา น กาเรตพฺโพ. สเจ ปน อิตรสฺมึ อนาคเตเยว ปฐมํ นิสินฺโน อุฏฺฐายาสนา เลฑฺฑุปาตํ อติกฺกมติ, อาปตฺติยา กาเรตพฺโพ. สพฺพตฺถ จ ‘‘เลฑฺฑุปาตาติกฺกเม ปฐมปาเท ทุกฺกฏํ, ทุติเย ปาจิตฺติย’’นฺติ อยํ นโย มหาปจฺจริยํ วุตฺโต. जेव्हा मोठा धर्मश्रवण असतो, तेव्हा उपोसथ घरांतून किंवा भोजनशाळेतून पलंग व आसने आणून अंथरतात. अशा वेळी स्थानिक भिक्खूंचाच परिबोध असतो. जर आगंतुक भिक्खूंनी 'हे आमच्या उपाध्यायांचे आहे, हे आमच्या आचार्यांचे आहे' असे म्हणून ते घेतले, तर तेव्हापासून त्यांचाच परिबोध असतो. निघून जाण्याच्या वेळी पूर्ववत न करता ढेकूळ फेकण्याच्या अंतराचे उल्लंघन करणाऱ्यांना आपत्ती होते. महाप्रत्यरीमध्ये पुन्हा असे म्हटले आहे - 'जोपर्यंत इतर भिक्खू बसत नाहीत, तोपर्यंत ज्यांनी ते अंथरले आहे, त्यांचीच जबाबदारी असते. इतर भिक्खू येऊन बसल्यावर, बसलेल्या भिक्खूंची जबाबदारी असते. जर ते स्वतः न उचलून घेता किंवा दुसऱ्याकडून न उचलवून घेता निघून गेले, तर दुक्कट आपत्ती होते. कारण काय? आज्ञा न देताच ते अंथरले गेले असल्यामुळे.' धर्मासन अंथरल्यावर जोपर्यंत उस्सारक किंवा धम्मकथिका येत नाहीत, तोपर्यंत अंथरणाऱ्या भिक्खूंचाच परिबोध असतो. ते आल्यावर आणि बसल्यावर त्यांचा परिबोध असतो. जर दिवस-रात्रभर धर्मश्रवण चालत असेल, आणि एक उस्सारक किंवा धम्मकथिका उठून जातात व दुसरे बसतात, तर जो जो येऊन बसतो, त्याची त्याची जबाबदारी असते. पण उठून जाणाऱ्याने 'हे आसन आपली जबाबदारी आहे' असे सांगून जावे. जर दुसरा येण्यापूर्वीच पहिला बसलेला भिक्खू उठून गेला, आणि तो उपचाराच्या आत असतानाच दुसरा येऊन बसला, तर उठून गेलेल्याला आपत्तीने दोषी ठरवू नये. पण जर दुसरा येण्यापूर्वीच पहिला बसलेला भिक्खू आसनावरून उठून ढेकूळ फेकण्याच्या अंतराचे उल्लंघन करतो, तर त्याला आपत्तीने दोषी ठरवावे. आणि सर्व ठिकाणी 'ढेकूळ फेकण्याच्या अंतराचे उल्लंघन करताना पहिल्या पावलावर दुक्कट आपत्ती आणि दुसऱ्या पावलावर पाचित्तिय आपत्ती होते' हा नियम महाप्रत्यरीमध्ये सांगितला आहे. ๑๑๒. จิมิลิกํ วาติอาทีสุ จิมิลิกา นาม สุธาทิปริกมฺมกตาย ภูมิยา วณฺณานุรกฺขณตฺถํ กตา โหติ, ตํ เหฏฺฐา ปตฺถริตฺวา อุปริ กฏสารกํ ปตฺถรนฺติ. อุตฺตรตฺถรณํ นาม มญฺจปีฐานํ อุปริ อตฺถริตพฺพกํ ปจฺจตฺถรณํ. ภูมตฺถรณํ นาม ภูมิยํ อตฺถริตพฺพา กฏสารกาทิวิกติ. ตฏฺฏิกํ นาม ตาลปณฺเณหิ วา วาเกหิ วา กตตฏฺฏิกา. จมฺมขณฺโฑ นาม สีหพฺยคฺฆทีปิตรจฺฉจมฺมาทีสุปิ ยํกิญฺจิ จมฺมํ. อฏฺฐกถาสุ หิ เสนาสนปริโภเค ปฏิกฺขิตฺตจมฺมํ นาม น ทิสฺสติ, ตสฺมา สีหจมฺมาทีนํ ปริหรเณเยว ปฏิกฺเขโป เวทิตพฺโพ. ปาทปุญฺฉนี นาม รชฺชุเกหิ วา ปิโลติกาหิ วา ปาทปุญฺฉนตฺถํ กตา. ผลกปีฐํ นาม ผลกมยํ ปีฐํ. อถ วา ผลกญฺเจว ทารุมยปีฐญฺจ; เอเตน สพฺพมฺปิ ทารุภณฺฑาทิ สงฺคหิตํ. มหาปจฺจริยํ ปน วิตฺถาเรเนว วุตฺตํ – ‘‘อาธารกํ ปตฺตปิธานํ ปาทกถลิกํ ตาลวณฺฏํ พีชนีปตฺตกํ ยํกิญฺจิ ทารุภณฺฑํ อนฺตมโส ปานียอุฬุงฺกํ ปานียสงฺขํ อชฺโฌกาเส นิกฺขิปิตฺวา คจฺฉนฺตสฺส ทุกฺกฏ’’นฺติ. มหาอฏฺฐกถายํ ปน เอส นโย ทุติยสิกฺขาปเท ทสฺสิโต. อชฺโฌกาเส รชนํ ปจิตฺวา รชนภาชนํ รชนอุฬุงฺโก รชนโทณิกาติ สพฺพํ อคฺคิสาลาย ปฏิสาเมตพฺพํ. สเจ อคฺคิสาลา นตฺถิ, อโนวสฺสเก ปพฺภาเร นิกฺขิปิตพฺพํ. ตสฺมิมฺปิ อสติ ยตฺถ โอโลเกนฺตา ภิกฺขู ปสฺสนฺติ, ตาทิเส ฐาเน ฐเปตฺวาปิ คนฺตุํ วฏฺฏติ. ११२. ‘चिमीलीका’ इत्यादी शब्दांमध्ये, ‘चिमीलीका’ म्हणजे चुना इत्यादींनी संस्कार केलेल्या जमिनीचा रंग सुरक्षित ठेवण्यासाठी तयार केलेले आच्छादन होय. ते खाली पसरवून त्यावर चटई पसरतात. ‘उत्तरत्थरण’ म्हणजे खाट किंवा पाटावर पसरवायचे पांघरूण (चादर). ‘भूमत्थरण’ म्हणजे जमिनीवर पसरवायची चटई इत्यादी विविध प्रकारची आच्छादने. ‘तट्टिका’ म्हणजे ताडाच्या पानांनी किंवा झाडाच्या सालीच्या धाग्यांनी बनवलेली चटई. ‘चम्मखंड’ (चामड्याचा तुकडा) म्हणजे सिंह, वाघ, चित्ता, अस्वल इत्यादींच्या कातड्यांपैकी कोणतेही कातडे. कारण अट्ठकथांमध्ये शयनासन उपयोगात वर्ज्य केलेले कातडे असे आढळत नाही, म्हणून सिंह इत्यादींच्या कातड्यांचा केवळ प्रवासात सोबत बाळगण्यास (वाहतूक करण्यास) निषेध आहे असे समजावे. ‘पादपुंछनी’ (पायपुसणी) म्हणजे दोऱ्यांनी किंवा चिंध्यांनी पाय पुसण्यासाठी बनवलेली वस्तू. ‘फलकपीठ’ म्हणजे फळीने बनवलेले आसन (पाट). किंवा फळी आणि लाकडी आसन; याद्वारे सर्व लाकडी साहित्याचा संग्रह होतो. महापंचरी अट्ठकथेमध्ये तर सविस्तर सांगितले आहे - 'पात्राचा आधार (स्टँड), पात्राचे झाकण, पाय धुण्याचा लाकडी पाट, ताडाचा पंखा, विणलेला पंखा, कोणतेही लाकडी भांडे, अगदी पिण्याच्या पाण्याचे भांडे (पळी) किंवा पाण्याचा शंख उघड्यावर ठेवून जाणाऱ्या भिक्खूला दुक्कट (दुष्कृत) गुन्हा होतो.' महाअट्ठकथेमध्ये हाच नियम दुसऱ्या सिक्खापदामध्ये दर्शविला आहे. उघड्यावर रंग शिजवून, रंगाचे भांडे, रंगाची पळी, रंगाची द्रोणी (कुंडी) हे सर्व अग्निशाळेत व्यवस्थित ठेवावे. जर अग्निशाळा नसेल, तर पाऊस न पडणाऱ्या डोंगराच्या कपारीत (गुहेत) ठेवावे. तेही नसल्यास, जेथून पाहणारे भिक्खू सहज पाहू शकतील अशा ठिकाणी ठेवून जाणे योग्य आहे। อญฺญสฺส [Pg.42] ปุคฺคลิเกติ ยสฺมึ วิสฺสาสคฺคาโห น รุหติ, ตสฺส สนฺตเก ทุกฺกฏํ. ยสฺมึ ปน วิสฺสาโส รุหติ, ตสฺส สนฺตกํ อตฺตโน ปุคฺคลิกมิว โหตีติ มหาปจฺจริยาทีสุ วุตฺตํ. ‘दुसऱ्याच्या वैयक्तिक मालकीचे’ म्हणजे ज्या व्यक्तीवर विश्वासाने घेण्याचा अधिकार चालत नाही, त्याच्या मालकीच्या वस्तूच्या बाबतीत (न उचलून किंवा न उचलवून जाताना) दुक्कट गुन्हा होतो. परंतु ज्याच्यावर विश्वास चालतो, त्याची वस्तू स्वतःच्या वैयक्तिक वस्तू सारखीच असते, असे महापंचरी इत्यादी अट्ठकथांमध्ये सांगितले आहे। ๑๑๓. อาปุจฺฉํ คจฺฉตีติ โย ภิกฺขุ วา สามเณโร วา อารามิโก วา ลชฺชี โหติ, อตฺตโน ปลิโพธํ วิย มญฺญติ, โย ตถารูปํ อาปุจฺฉิตฺวา คจฺฉติ, ตสฺส อนาปตฺติ. โอตาเปนฺโต คจฺฉตีติ อาตเป โอตาเปนฺโต อาคนฺตฺวา อุทฺธริสฺสามีติ คจฺฉติ; เอวํ คจฺฉโต อนาปตฺติ. เกนจิ ปลิพุทฺธํ โหตีติ เสนาสนํ เกนจิ อุปทฺทุตํ โหตีติ อตฺโถ. สเจปิ หิ วุฑฺฒตโร ภิกฺขุ อุฏฺฐาเปตฺวา คณฺหาติ, สเจปิ ยกฺโข วา เปโต วา อาคนฺตฺวา นิสีทติ, โกจิ วา อิสฺสโร อาคนฺตฺวา คณฺหาติ, เสนาสนํ ปลิพุทฺธํ โหติ, สีหพฺยคฺฆาทีสุ วา ปน ตํ ปเทสํ อาคนฺตฺวา ฐิเตสุปิ เสนาสนํ ปลิพุทฺธํ โหติเยว. เอวํ เกนจิ ปลิพุทฺเธ อนุทฺธริตฺวาปิ คจฺฉโต อนาปตฺติ. อาปทาสูติ ชีวิตพฺรหฺมจริยนฺตราเยสุ. เสสํ อุตฺตานเมวาติ. ११३. ‘विचारून जातो’ म्हणजे जो भिक्खू, सामणेर किंवा आरामिक (आरामाचा रक्षक) लज्जावान असतो आणि तो स्वतःचीच जबाबदारी मानतो, अशा व्यक्तीला विचारून जो जातो, त्याला आपत्ती (गुन्हा) होत नाही. ‘उन्हात वाळवत जातो’ म्हणजे उन्हात वाळत घालून 'परत आल्यावर मी हे उचलून ठेवीन' असा विचार करून जातो; अशा प्रकारे जाणाऱ्याला आपत्ती होत नाही. ‘कोणाकडून तरी अडथळा निर्माण झाला असल्यास’ म्हणजे शयनासनात कोणाकडून तरी उपद्रव किंवा अडथळा निर्माण झाला आहे असा अर्थ आहे. कारण जर आपल्यापेक्षा ज्येष्ठ भिक्खूने उठवून ते शयनासन घेतले असेल, किंवा यक्ष अथवा प्रेत येऊन त्यावर बसले असेल, किंवा एखादा अधिकारी येऊन ते घेत असेल, तर शयनासन अडथळायुक्त होते; किंवा सिंह, वाघ इत्यादी हिंस्र प्राणी त्या ठिकाणी येऊन थांबले तरीही शयनासन अडथळायुक्तच होते. अशा प्रकारे कोणाकडून तरी अडथळा निर्माण झाला असता, ते न उचलून जातानाही भिक्खूला आपत्ती होत नाही. ‘आपत्तीच्या वेळी’ म्हणजे जीवन आणि ब्रह्मचर्याला धोका निर्माण झाला असता (न उचलून जाताना आपत्ती होत नाही). उर्वरित भाग स्पष्टच आहे। กถินสมุฏฺฐานํ – กายวาจโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยากิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. हे सिक्खापद कठिन-समुत्थान आहे - ते काय-वाचेने आणि काय-वाचा-चित्ताने उत्पन्न होते, हे क्रिया-अक्रियेने युक्त आहे, यात संज्ञेचा अभाव असला तरी आपत्तीतून सुटका होत नाही, हे अचित्तक आहे, प्रज्ञप्ती-वद्य आहे, यात कायकर्म आहे, वचीकर्म आहे, तीन चित्ते असणारे आणि तीन वेदना असणारे आहे। ปฐมเสนาสนสิกฺขาปทํ จตุตฺถํ. पहिले शयनासन सिक्खापद चौथे समाप्त झाले। ๕. ทุติยเสนาสนสิกฺขาปทวณฺณนา ५. दुसऱ्या शयनासन सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण। ๑๑๖. ทุติยเสนาสนสิกฺขาปเท – ภิสีติ มญฺจกภิสิ วา ปีฐกภิสิ วา. จิมิลิกาทีนิปิ ปุริมสิกฺขาปเท วุตฺตปฺปการานิเยว. นิสีทนนฺติ สทสํ เวทิตพฺพํ. ปจฺจตฺถรณนฺติ ปาวาโร โกชโวติ เอตฺตกเมว วุตฺตํ. ติณสนฺถาโรติ เยสํ เกสญฺจิ ติณานํ สนฺถาโร. เอส นโย ปณฺณสนฺถาเร. ปริกฺเขปํ อติกฺกมนฺตสฺสาติ เอตฺถ ปฐมปาทํ อติกฺกาเมนฺตสฺส ทุกฺกฏํ, ทุติยาติกฺกเม ปาจิตฺติยํ. อปริกฺขิตฺตสฺส อุปจาโร นาม เสนาสนโต ทฺเว เลฑฺฑุปาตา. ११६. दुसऱ्या शयनासन सिक्खापदामध्ये - ‘भिसी’ (गादी) म्हणजे खाटेची गादी किंवा पाटाची गादी. चिमीलीका इत्यादी देखील पहिल्या सिक्खापदामध्ये सांगितल्याप्रमाणेच आहेत. ‘निसीदन’ (बैठक) म्हणजे झालर असलेली बैठक समजावी. ‘पच्चत्थरण’ (पांघरूण) म्हणजे पांघरण्याची चादर किंवा गालिचा; एवढेच सांगितले आहे. ‘तृण-संस्तार’ (गवताचे अंथरूण) म्हणजे कोणत्याही प्रकारच्या गवताचे अंथरूण. हाच नियम पानांच्या अंथरूणाच्या बाबतीतही लागू होतो. ‘सीमा ओलांडणाऱ्याला’ या संदर्भात पहिली पावले ओलांडताना दुक्कट गुन्हा होतो आणि दुसरी पावले ओलांडल्यावर पाचित्तिय गुन्हा होतो. कुंपण नसलेल्या आरामाची सीमा म्हणजे शयनासनापासून दोन दगडफेकीचे अंतर होय। อนาปุจฺฉํ [Pg.43] วา คจฺเฉยฺยาติ เอตฺถ ภิกฺขุมฺหิ สติ ภิกฺขุ อาปุจฺฉิตพฺโพ. ตสฺมึ อสติ สามเณโร, ตสฺมึ อสติ อารามิโก, ตสฺมิมฺปิ อสติ เยน วิหาโร การิโต โส วิหารสามิโก, ตสฺส วา กุเล โย โกจิ อาปุจฺฉิตพฺโพ. ตสฺมิมฺปิ อสติ จตูสุ ปาสาเณสุ มญฺจํ ฐเปตฺวา มญฺเจ อวเสสมญฺจปีฐานิ อาโรเปตฺวา อุปริ ภิสิอาทิกํ ทสวิธมฺปิ เสยฺยํ ราสึ กริตฺวา ทารุภณฺฑํ มตฺติกาภณฺฑํ ปฏิสาเมตฺวา ทฺวารวาตปานานิ ปิทหิตฺวา คมิยวตฺตํ ปูเรตฺวา คนฺตพฺพํ. สเจ ปน เสนาสนํ โอวสฺสติ, ฉทนตฺถญฺจ ติณํ วา อิฏฺฐกา วา อานีตา โหนฺติ, สเจ อุสฺสหติ, ฉาเทตพฺพํ. โน เจ สกฺโกติ, โย โอกาโส อโนวสฺสโก, ตตฺถ มญฺจปีฐาทีนิ นิกฺขิปิตฺวา คนฺตพฺพํ. สเจ สพฺพมฺปิ โอวสฺสติ, อุสฺสหนฺเตน อนฺโตคาเม อุปาสกานํ ฆเร ฐเปตพฺพํ. สเจ เตปิ ‘‘สงฺฆิกํ นาม ภนฺเต ภาริยํ, อคฺคิทาหาทีนํ ภายามา’’ติ น สมฺปฏิจฺฉนฺติ, อชฺโฌกาเสปิ ปาสาณานํ อุปริ มญฺจํ ฐเปตฺวา เสสํ ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว นิกฺขิปิตฺวา ติเณหิ จ ปณฺเณหิ จ ปฏิจฺฉาเทตฺวา คนฺตุํ วฏฺฏติ. ยญฺหิ ตตฺถ องฺคมตฺตมฺปิ อวสิสฺสติ, ตํ อญฺเญสํ ตตฺถ อาคตานํ ภิกฺขูนํ อุปการํ ภวิสฺสตีติ. ‘न विचारता निघून जावा’ या संदर्भात - भिक्खू उपस्थित असल्यास भिक्खूला विचारावे. तो नसल्यास सामणेराला विचारावे, तो नसल्यास आरामाच्या रक्षकाला विचारावे, तोही नसल्यास ज्याने विहार बांधला आहे त्या विहार-मालकाला किंवा त्याच्या कुटुंबातील कोणत्याही व्यक्तीला विचारावे. तेही नसल्यास चार दगडांवर खाट ठेवून, त्या खाटेवर उरलेल्या खाटा व पाट ठेवून, त्यावर गादी इत्यादी दहा प्रकारच्या अंथरूणांची थप्पी करून, लाकडी भांडी व मातीची भांडी सुरक्षित ठेवून, दारे व खिडक्या बंद करून, प्रवासाला जाणाऱ्याचे कर्तव्य पूर्ण करून जावे. परंतु जर शयनासन गळत असेल आणि छप्पर दुरुस्त करण्यासाठी गवत किंवा विटा आणलेल्या असतील, आणि जर तो समर्थ असेल, तर त्याने छप्पर दुरुस्त करावे. जर तो समर्थ नसेल, तर जी जागा गळत नाही, तेथे खाट, पाट इत्यादी ठेवून जावे. जर संपूर्ण विहारच गळत असेल, तर समर्थ भिक्खूने ते साहित्य गावातील उपासकांच्या घरी ठेवावे. जर ते उपासक देखील 'भंते, संघाची संपत्ती सांभाळणे कठीण आहे, आम्हाला आग लागणे इत्यादींची भीती वाटते' असे म्हणून स्वीकार करत नसतील, तर उघड्यावर देखील दगडांवर खाट ठेवून, उरलेले साहित्य पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच त्यावर ठेवून, गवत आणि पानांनी ते झाकून जाणे योग्य आहे. कारण तेथे जो काही थोडा भाग शिल्लक राहील, तो तेथे येणाऱ्या इतर भिक्खूंसाठी उपकारक ठरेल। ๑๑๗. วิหารสฺส อุปจาเรติอาทีสุ วิหารสฺสูปจาโร นาม ปริเวณํ. อุปฏฺฐานสาลาติ ปริเวณโภชนสาลา. มณฺฑโปติ ปริเวณมณฺฑโป. รุกฺขมูลนฺติ ปริเวณรุกฺขมูลํ. อยํ ตาว นโย กุรุนฺทฏฺฐกถายํ วุตฺโต. กิญฺจาปิ วุตฺโต, อถ โข วิหาโรติ อนฺโตคพฺโภ วา อญฺญํ วา สพฺพปริจฺฉนฺนํ คุตฺตเสนาสนํ เวทิตพฺพํ. วิหารสฺส อุปจาเรติ ตสฺส พหิ อาสนฺเน โอกาเส. อุปฏฺฐานสาลายํ วาติ โภชนสาลายํ วา. มณฺฑเป วาติ อปริจฺฉนฺเน ปริจฺฉนฺเน วาปิ พหูนํ สนฺนิปาตมณฺฑเป. รุกฺขมูเล วตฺตพฺพํ นตฺถิ. อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ วุตฺตปฺปการญฺหิ ทสวิธํ เสยฺยํ อนฺโตคพฺภาทิมฺหิ คุตฺตฏฺฐาเน ปญฺญเปตฺวา คจฺฉนฺตสฺส ยสฺมา เสยฺยาปิ เสนาสนมฺปิ อุปจิกาหิ ปลุชฺชติ, วมฺมิกราสิเยว โหติ, ตสฺมา ปาจิตฺติยํ วุตฺตํ. พหิ ปน อุปฏฺฐานสาลาทีสุ ปญฺญเปตฺวา คจฺฉนฺตสฺส เสยฺยามตฺตเมว นสฺเสยฺย, ฐานสฺส อคุตฺตตาย [Pg.44] น เสนาสนํ, ตสฺมา เอตฺถ ทุกฺกฏํ วุตฺตํ. มญฺจํ วา ปีฐํ วาติ เอตฺถ ยสฺมา น สกฺกา มญฺจปีฐํ สหสา อุปจิกาหิ ขายิตุํ, ตสฺมา ตํ วิหาเรปิ สนฺถริตฺวา คจฺฉนฺตสฺส ทุกฺกฏํ วุตฺตํ. วิหารูปจาเร ปน ตํ วิหารจาริกํ อาหิณฺฑนฺตาปิ ทิสฺวา ปฏิสาเมสฺสนฺติ. ११७. ‘विहाराच्या उपचारात’ इत्यादी शब्दांमध्ये, विहाराचा उपचार म्हणजे परिवेण (अंगण/परिसर) होय. ‘उपस्थानशाळा’ म्हणजे परिवेणातील भोजनशाळा. ‘मंडप’ म्हणजे परिवेणातील मंडप. ‘वृक्षमूल’ म्हणजे परिवेणातील वृक्षाच्या खालील जागा. हा नियम तर कुरुन्द अट्ठकथेत सांगितला आहे. जरी असे सांगितले असले, तरी ‘विहार’ म्हणजे अंतर्गर्भ (आतील खोली) किंवा इतर कोणतीही पूर्णपणे आच्छादित व सुरक्षित जागा (शयनासन) असे समजावे. ‘विहाराच्या उपचारात’ म्हणजे त्याच्या बाहेर जवळच असलेल्या जागेत. ‘उपस्थानशाळेत’ म्हणजे भोजनशाळेत. ‘मंडपात’ म्हणजे उघड्या किंवा बंदिस्त अशा अनेक भिक्खूंच्या एकत्र येण्याच्या मंडपात. ‘वृक्षमूलात’ याविषयी विशेष काही सांगण्यासारखे नाही. ‘दुक्कट आपत्ती’ याविषयी: वर सांगितलेल्या दहा प्रकारच्या शय्या अंतर्गर्भ इत्यादी सुरक्षित ठिकाणी मांडून जाणाऱ्या भिक्खूची शय्या आणि शयनासन दोन्ही वाळवीमुळे नष्ट होते आणि तिथे केवळ वारूळच उरते, म्हणून ‘पाचित्तिय’ आपत्ती सांगितली आहे. परंतु बाहेर उपस्थानशाळा इत्यादी ठिकाणी शय्या मांडून जाणाऱ्या भिक्खूची केवळ शय्याच नष्ट होईल, ती जागा सुरक्षित नसल्यामुळे शयनासन नष्ट होणार नाही, म्हणून येथे ‘दुक्कट’ आपत्ती सांगितली आहे. ‘मंच किंवा पीठ’ याविषयी: कारण मंच आणि पीठ वाळवी लगेच खाऊन नष्ट करू शकत नाही, म्हणून ते विहारातही मांडून जाणाऱ्या भिक्खूला ‘दुक्कट’ आपत्ती सांगितली आहे. विहाराच्या उपचारात (परिसरात) ते ठेवले असता, विहारात फिरणारे इतर भिक्खू ते पाहून व्यवस्थित ठेवून देतील (म्हणून तिथेही दुक्कट आपत्ती सांगितली आहे ही शंका नाही). ๑๑๘. อุทฺธริตฺวา คจฺฉตีติ เอตฺถ อุทฺธริตฺวา คจฺฉนฺเตน มญฺจปีฐกวาฏํ สพฺพํ อปเนตฺวา สํหริตฺวา จีวรวํเส ลคฺเคตฺวา คนฺตพฺพํ. ปจฺฉา อาคนฺตฺวา วสนกภิกฺขุนาปิ ปุน มญฺจปีฐํ วา ปญฺญเปตฺวา สยิตฺวา คจฺฉนฺเตน ตเถว กาตพฺพํ. อนฺโตกุฏฺฏโต เสยฺยํ พหิกุฏฺเฏ ปญฺญเปตฺวา วสนฺเตน คมนกาเล คหิตฏฺฐาเนเยว ปฏิสาเมตพฺพํ. อุปริปาสาทโต โอโรเปตฺวา เหฏฺฐาปาสาเท วสนฺตสฺสปิ เอเสว นโย. รตฺติฏฺฐานทิวาฏฺฐาเนสุ มญฺจปีฐํ ปญฺญเปตฺวาปิ คมนกาเล ปุน คหิตฏฺฐาเนเยว ฐเปตพฺพํ. ११८. ‘आवरून जातो’ याविषयी: आवरून जाणाऱ्या भिक्खूने मंच, पीठ, चटई इत्यादी सर्व बाजूला करून, ते एकत्र गुंडाळून चीवर टांगण्याच्या बांबूवर (चीवरवंशावर) लटकवून जावे. नंतर येऊन राहणाऱ्या भिक्खूने देखील पुन्हा मंच किंवा पीठ मांडून, त्यावर झोपून जाताना तसेच केले पाहिजे. भिंतीच्या आतून शय्या बाहेरच्या भिंतीपाशी मांडून राहणाऱ्या भिक्खूने जाताना ती ज्या जागेवरून घेतली होती, तिथेच परत ठेवली पाहिजे. प्रासादाच्या (इमारतीच्या) वरच्या मजल्यावरून खाली आणून खालच्या मजल्यावर राहणाऱ्या भिक्खूसाठीही हाच नियम आहे. रात्रीच्या आणि दिवसाच्या विश्रांतीच्या ठिकाणी मंच किंवा पीठ मांडले तरी जाताना ते पुन्हा ज्या जागेवरून घेतले होते, तिथेच ठेवले पाहिजेले. อาปุจฺฉํ คจฺฉตีติ เอตฺถายํ อาปุจฺฉิตพฺพานาปุจฺฉิตพฺพวินิจฺฉโย – ยา ตาว ภูมิยํ ทีฆสาลา วา ปณฺณสาลา วา โหติ, ยํ วา รุกฺขตฺถมฺเภสุ, กตเคหํ อุปจิกานํ อุฏฺฐานฏฺฐานํ โหติ, ตโต ปกฺกมนฺเตน ตาว อาปุจฺฉิตฺวาว ปกฺกมิตพฺพํ. ตสฺมิญฺหิ กติปยานิ ทิวสานิ อชคฺคิยมาเน วมฺมิกาว สนฺติฏฺฐนฺติ. ยํ ปน ปาสาณปิฏฺฐิยํ วา ปาสาณตฺถมฺเภสุ วา กตเสนาสนํ สิลุจฺจยเลณํ วา สุธาลิตฺตเสนาสนํ วา ยตฺถ อุปจิกาสงฺกา นตฺถิ, ตโต ปกฺกมนฺตสฺส อาปุจฺฉิตฺวาปิ อนาปุจฺฉิตฺวาปิ คนฺตุํ วฏฺฏติ, อาปุจฺฉนํ ปน วตฺตํ. สเจ ตาทิเสปิ เสนาสเน เอเกน ปสฺเสน อุปจิกา อาโรหนฺติ, อาปุจฺฉิตฺวาว คนฺตพฺพํ. โย ปน อาคนฺตุโก ภิกฺขุ สงฺฆิกํ เสนาสนํ คเหตฺวา วสนฺตํ ภิกฺขุํ อนุวตฺตนฺโต อตฺตโน เสนาสนํ อคฺคเหตฺวา วสติ, ยาว โส น คณฺหาติ, ตาว ตํ เสนาสนํ ปุริมภิกฺขุสฺเสว ปลิโพโธ. ยทา ปน โส เสนาสนํ คเหตฺวา อตฺตโน อิสฺสริเยน วสติ, ตโต ปฏฺฐาย อาคนฺตุกสฺเสว ปลิโพโธ. สเจ อุโภปิ วิภชิตฺวา คณฺหนฺติ, อุภินฺนมฺปิ ปลิโพโธ. มหาปจฺจริยํ ปน วุตฺตํ – ‘‘สเจ ทฺเว ตโย เอกโต หุตฺวา ปญฺญเปนฺติ, คมนกาเล สพฺเพหิปิ อาปุจฺฉิตพฺพํ. เตสุ เจ ปฐมํ คจฺฉนฺโต ‘ปจฺฉิโม ชคฺคิสฺสตี’ติ อาโภคํ กตฺวา คจฺฉติ วฏฺฏติ. ปจฺฉิมสฺส อาโภเคน มุตฺติ นตฺถิ. พหู เอกํ เปเสตฺวา สนฺถราเปนฺติ, คมนกาเล สพฺเพหิ วา อาปุจฺฉิตพฺพํ[Pg.45], เอกํ วา เปเสตฺวา อาปุจฺฉิตพฺพํ. อญฺญโต มญฺจปีฐาทีนิ อาเนตฺวา อญฺญตฺร วสิตฺวาปิ คมนกาเล ตตฺเถว เนตพฺพานิ. สเจ อญฺญาวาสโต อาเนตฺวา วสมานสฺส อญฺโญ วุฑฺฒตโร อาคจฺฉติ, น ปฏิพาหิตพฺโพ, ‘มยา ภนฺเต อญฺญาวาสโต อานีตํ, ปากติกํ กเรยฺยาถา’ติ วตฺตพฺพํ. เตน ‘เอวํ กริสฺสามี’ติ สมฺปฏิจฺฉิเต อิตรสฺส คนฺตุํ วฏฺฏติ. เอวมญฺญตฺถ หริตฺวาปิ สงฺฆิกปริโภเคน ปริภุญฺชนฺตสฺส นฏฺฐํ วา ชิณฺณํ วา โจเรหิ วา หฏํ คีวา น โหติ, ปุคฺคลิกปริโภเคน ปริภุญฺชนฺตสฺส ปน คีวา โหติ. อญฺญสฺส มญฺจปีฐํ ปน สงฺฆิกปริโภเคน วา ปุคฺคลิกปริโภเคน วา ปริภุญฺชนฺตสฺส นฏฺฐํ คีวาเยว’’. ‘विचारून जातो’ याविषयी हा विचारण्यायोग्य आणि न विचारण्यायोग्य गोष्टींचा निर्णय आहे – जमिनीवर असलेली लांब शाळा (धर्मशाळा) किंवा पर्णशाळा असो, याशिवाय लाकडी खांबांवर बांधलेले घर असो, जेथे वाळवी लागण्याची शक्यता असते, तेथून निघून जाताना विचारूनच (परवानगी घेऊनच) जावे. कारण जर काही दिवस त्याची निगा राखली नाही, तर तिथे वारूळच तयार होते. परंतु जे शयनासन खडकावर किंवा दगडाच्या खांबांवर बांधलेले असेल, किंवा डोंगरातील गुहा असेल, किंवा चुन्याने सारवलेले शयनासन असेल, जेथे वाळवी लागण्याची शंका नसते, तेथून निघून जाताना विचारून किंवा न विचारताही जाणे योग्य आहे; तरीही विचारणे हा विनय (कर्तव्य) आहे. जर अशा शयनासनातही एका बाजूने वाळवी चढत असेल, तर विचारूनच जावे. जो आगंतुक भिक्खू संघिक शयनासन घेऊन राहणाऱ्या भिक्खूच्या सोबत राहतो, परंतु स्वतःसाठी स्वतंत्र शयनासन न घेता राहतो, जोपर्यंत तो स्वतः शयनासन घेत नाही, तोपर्यंत त्या शयनासनाची जबाबदारी पहिल्या भिक्खूचीच असते. परंतु जेव्हा तो स्वतः शयनासन घेऊन स्वतःच्या अधिकाराने राहू लागतो, तेव्हापासून ती जबाबदारी त्या आगंतुक भिक्खूचीच असते. जर दोघांनीही वाटून घेतले असेल, तर दोघांचीही जबाबदारी असते. महाप्रत्यरीमध्ये सांगितले आहे – “जर दोन किंवा तीन भिक्खू एकत्र येऊन शय्या मांडतात, तर जाताना सर्वांनीच विचारले पाहिजे. त्यांच्यापैकी आधी जाणारा भिक्खू जर ‘मागे राहणारा भिक्खू काळजी घेईल’ असा विचार करून गेला, तर ते योग्य आहे. मागे राहणाऱ्या भिक्खूच्या केवळ विचाराने आपत्तीतून मुक्ती मिळत नाही. जर अनेक भिक्खूंनी एकाला पाठवून शय्या मांडायला लावली असेल, तर जाताना सर्वांनी विचारले पाहिजे किंवा एकाला पाठवून विचारले पाहिजे. दुसऱ्या विहारातून मंच, पीठ इत्यादी आणून दुसऱ्या ठिकाणी राहिल्यानंतरही, जाताना ते मूळ ठिकाणीच परत नेले पाहिजेत. जर दुसऱ्या विहारातून वस्तू आणून राहणाऱ्या भिक्खूपाशी दुसरा ज्येष्ठ भिक्खू आला, तर त्याला विरोध करू नये. ‘भंते, मी हे दुसऱ्या विहारातून आणले आहे, आपण हे पूर्ववत करावे,’ असे त्याला सांगावे. त्याने ‘मी तसे करीन’ असे मान्य केल्यावर दुसऱ्या भिक्खूला जाणे योग्य आहे. अशा प्रकारे दुसऱ्या ठिकाणी नेऊनही संघिक वस्तू म्हणून वापरत असताना ती हरवली, जीर्ण झाली किंवा चोरांनी चोरून नेली, तर भरपाई द्यावी लागत नाही; परंतु वैयक्तिक वस्तू म्हणून वापरत असताना तसे झाले तर भरपाई द्यावी लागते. दुसऱ्याचा मंच किंवा पीठ संघिक किंवा वैयक्तिक रूपात वापरत असताना हरवले, तर भरपाई द्यावीच लागते.” เกนจิ ปลิพุทฺธํ โหตีติ วุฑฺฒตรภิกฺขูอิสฺสริยยกฺขสีหวาฬมิคกณฺหสปฺปาทีสุ เยน เกนจิ เสนาสนํ ปลิพุทฺธํ โหติ. สาเปกฺโข คนฺตฺวา ตตฺถ ฐิโต อาปุจฺฉติ, เกนจิ ปลิพุทฺโธ โหตีติ อชฺเชว อาคนฺตฺวา ปฏิชคฺคิสฺสามีติ เอวํ สาเปกฺโข นทีปารํ วา คามนฺตรํ วา คนฺตฺวา ยตฺถสฺส คมนจิตฺตํ อุปฺปนฺนํ, ตตฺเถว ฐิโต กญฺจิ เปเสตฺวา อาปุจฺฉติ, นทีปูรราชโจราทีสุ วา เกนจิ ปลิพุทฺโธ โหติ อุปทฺทุโต, น สกฺโกติ ปจฺจาคนฺตุํ, เอวํภูตสฺสปิ อนาปตฺติ. เสสํ ปฐมสิกฺขาปเท วุตฺตนยเมว สทฺธึ สมุฏฺฐานาทีหีติ. ‘कोणाकडून तरी अडथळा निर्माण झाला असेल’ म्हणजे ज्येष्ठ भिक्खू, अधिकारी, यक्ष, सिंह, हिंस्र श्वापद, काळा साप इत्यादींपैकी कोणाकडूनही शयनासनात अडथळा निर्माण झाला असेल. ‘अपेक्षा ठेवून जाऊन तिथे उभा राहून विचारतो’ म्हणजे ‘मी आजच परत येऊन याची निगा राखेन’ अशी अपेक्षा ठेवून नदीच्या पलीकडे किंवा दुसऱ्या गावात जाऊन, जेथे त्याला पुढे जाण्याचा विचार आला, तिथेच थांबून कोणाला तरी पाठवून विचारतो. किंवा नदीला पूर येणे, राजा, चोर इत्यादींपैकी कोणामुळे तरी अडथळा किंवा उपद्रव निर्माण झाल्यामुळे तो परत येऊ शकत नाही, अशा स्थितीत असलेल्या भिक्खूलाही आपत्ती होत नाही. उर्वरित नियम पहिल्या सिक्खापदाप्रमाणेच समुत्थान इत्यादींसह समजावा. ทุติยเสนาสนสิกฺขาปทํ ปญฺจมํ. दुसरे सेनासन सिक्खापद पाचवे समाप्त. ๖. อนุปขชฺชสิกฺขาปทวณฺณนา ६. अनुपखज्ज सिक्खापदाचे वर्णन. ๑๑๙. ฉฏฺฐสิกฺขาปเท – ปลิพุนฺเธนฺตีติ ปฐมตรํ คนฺตฺวา ปตฺตจีวรํ อติหริตฺวา รุมฺภิตฺวา ติฏฺฐนฺติ. เถรา ภิกฺขู วุฏฺฐาเปนฺตีติ ‘‘อมฺหากํ อาวุโส ปาปุณาตี’’ติ วสฺสคฺเคน คเหตฺวา วุฏฺฐาเปนฺติ. อนุปขชฺช เสยฺยํ กปฺเปนฺตีติ ‘‘ตุมฺหากํ ภนฺเต มญฺจฏฺฐานํเยว ปาปุณาติ, น สพฺโพ วิหาโร. อมฺหากํ ทานิ อิทํ ฐานํ ปาปุณาตี’’ติ อนุปวิสิตฺวา มญฺจปีฐํ ปญฺญเปตฺวา นิสีทนฺติปิ นิปชฺชนฺติปิ สชฺฌายมฺปิ กโรนฺติ. ११९. सहाव्या सिक्खापदात – ‘अडथळा आणतात’ म्हणजे आधी जाऊन, आपले पात्र-चीवर तिथे ठेवून जागा अडवून ठेवतात. ‘स्थवीर भिक्खू उठवतात’ म्हणजे “आयुष्यमान, ही जागा आमच्या वाट्याला येते” असे सांगून वर्षाच्या ज्येष्ठतेनुसार ती जागा घेऊन त्यांना उठवतात. ‘जवळ येऊन शय्या मांडतात’ म्हणजे “भंते, आपल्याला केवळ मंचाची जागाच मिळते, संपूर्ण विहार मिळत नाही. आता ही उरलेली जागा आमच्या वाट्याला येते,” असे सांगून जवळ प्रवेश करून, मंच किंवा पीठ मांडून बसतात, झोपतात किंवा पाठपठण देखील करतात। ๑๒๐. ชานนฺติ ‘‘อนุฏฺฐาปนีโย อย’’นฺติ ชานนฺโต; เตเนวสฺส วิภงฺเค ‘‘วุฑฺโฒติ ชานาตี’’ติอาทิ วุตฺตํ. วุฑฺโฒ หิ อตฺตโน วุฑฺฒตาย อนุฏฺฐาปนีโย[Pg.46], คิลาโน คิลานตาย, สงฺโฆ ปน ภณฺฑาคาริกสฺส วา ธมฺมกถิกวินยธราทีนํ วา คณวาจกอาจริยสฺส วา พหูปการตํ คุณวิสิฏฺฐตญฺจ สลฺลกฺเขนฺโต ธุววาสตฺถาย วิหารํ สมฺมนฺนิตฺวา เทติ, ตสฺมา ยสฺส สงฺเฆน ทินฺโน, โสปิ อนุฏฺฐาปนีโย. กามญฺเจตฺถ คิลานสฺสาปิ สงฺโฆเยว อนุจฺฉวิกํ เสนาสนํ เทติ, คิลาโน ปน ‘‘อปโลเกตฺวา สงฺเฆน อทินฺนเสนาสโนปิ น ปีเฬตพฺโพ อนุกมฺปิตพฺโพ’’ติ ทสฺเสตุํ วิสุํ วุตฺโต. १२०. ‘हा उठवण्यास अयोग्य आहे’ असे जाणणारा; म्हणूनच त्याच्या विभंगात ‘वृद्ध आहे असे जाणतो’ इत्यादी भगवंतांनी म्हटले आहे. कारण वृद्ध भिक्खू आपल्या वृद्धत्वामुळे उठवण्यास अयोग्य असतो, आजारी भिक्खू आजारपणामुळे अयोग्य असतो. संघ मात्र भांडारिक (भांडारगृह प्रमुख), धम्मकथी, विनयधर इत्यादी किंवा गणाचे अध्यापन करणाऱ्या आचार्यांचे बहुउपकारित्व आणि गुणवैशिष्ट्य लक्षात घेऊन, त्यांच्या कायमस्वरूपी निवासासाठी विहार संमत करून देतो; म्हणून ज्याला संघाने विहार दिला आहे, तो देखील उठवण्यास अयोग्य आहे. आणि येथे आजारी भिक्खूला देखील संघच योग्य ते सेनासन देतो; परंतु ‘आजारी भिक्खूला संघाने विचारणा करून सेनासन दिले नसले तरीही, त्याला त्रास दिला जाऊ नये, तर त्याच्यावर अनुकंपा केली पाहिजे’ हे दर्शवण्यासाठी त्याचा स्वतंत्रपणे उल्लेख केला आहे। ๑๒๑. อุปจาเรติ เอตฺถ มญฺจปีฐานํ ตาว มหลฺลเก วิหาเร สมนฺตา ทิยฑฺโฒ หตฺโถ อุปจาโร, ขุทฺทเก ยโต ปโหติ ตโต ทิยฑฺโฒ หตฺโถ, ปาเท โธวิตฺวา ปวิสนฺตสฺส ปสฺสาวตฺถาย นิกฺขมนฺตสฺส จ ยาว ทฺวาเร นิกฺขิตฺตปาทโธวนปาสาณโต ปสฺสาวฏฺฐานโต จ มญฺจปีฐํ, ตาว ทิยฑฺฒหตฺถวิตฺถาโร มคฺโค อุปจาโร นาม. ตสฺมึ มญฺจสฺส วา ปีฐสฺส วา อุปจาเร ฐิตสฺส วา ภิกฺขุโน ปวิสนฺตสฺส วา นิกฺขมนฺตสฺส วา อุปจาเร โย อนุปขชฺช เสยฺยํ กปฺเปตุกาโม เสยฺยํ สนฺถรติ วา สนฺถราเปติ วา, อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺส. १२१. येथे ‘उपचार’ (परिसर) म्हणजे—मंच आणि पीठांच्या बाबतीत, मोठ्या विहारात चहूबाजूंनी दीड हात जागा हा उपचार असतो. लहान विहारात ज्या बाजूने जागा उपलब्ध असेल, त्या बाजूने दीड हात जागा हा उपचार असतो. पाय धुवून आत प्रवेश करणाऱ्या किंवा लघवीसाठी बाहेर जाणाऱ्या भिक्खूसाठी, दारापाशी ठेवलेल्या पाय धुण्याच्या दगडापासून आणि लघवीच्या जागेपासून मंच-पीठापर्यंतचा दीड हात रुंदीचा मार्ग म्हणजे ‘उपचार’ होय. त्या मंच किंवा पीठाच्या उपचारात उभ्या असलेल्या, प्रवेश करणाऱ्या किंवा बाहेर जाणाऱ्या भिक्खूच्या उपचारात जो भिक्खू जवळ येऊन (अडथळा आणून) झोपण्याच्या इच्छेने स्वतः अंथरूण घालतो किंवा दुसऱ्याकडून घालवून घेतो, त्याला दुक्कट आपत्ति होते। อภินิสีทติ วา อภินิปชฺชติ วาติ เอตฺถ อภินิสีทนมตฺเตน อภินิปชฺชนมตฺเตเนว วา ปาจิตฺติยํ. สเจ ปน ทฺเวปิ กโรติ, ทฺเว ปาจิตฺติยานิ. อุฏฺฐายุฏฺฐาย นิสีทโต วา นิปชฺชโต วา ปโยเค ปโยเค ปาจิตฺติยํ. ‘बसतो किंवा झोपतो’ यामध्ये केवळ बसण्याने किंवा केवळ झोपण्याने पाचित्तिय आपत्ति होते. परंतु जर दोन्ही करतो, तर दोन पाचित्तिय आपत्ति होतात. उठून-उठून बसणाऱ्या किंवा झोपणाऱ्या भिक्खूला प्रत्येक प्रयत्नामागे पाचित्तिय आपत्ति होते। ๑๒๒. อุปจารํ ฐเปตฺวา เสยฺยํ สนฺถรติ วา สนฺถราเปติ วาติ อิมสฺมึ อิโต ปเร จ ‘‘วิหารสฺส อุปจาเร’’ติอาทิเก ทุกฺกฏวาเรปิ ยถา อิธ อภินิสีทนมตฺเต อภินิปชฺชนมตฺเต อุภยกรเณ ปโยคเภเท จ ปาจิตฺติยปฺปเภโท วุตฺโต, เอวํ ทุกฺกฏปฺปเภโท เวทิตพฺโพ. เอวรูเปน หิ วิสภาคปุคฺคเลน เอกวิหาเร วา เอกปริเวเณ วา วสนฺเตน อตฺโถ นตฺถิ, ตสฺมา สพฺพตฺเถวสฺส นิวาโส วาริโต. อญฺญสฺส ปุคฺคลิเกติ อิธาปิ วิสฺสาสิกสฺส ปุคฺคลิกํ อตฺตโน ปุคฺคลิกสทิสเมว, ตตฺถ อนาปตฺติ. १२२. ‘उपचार वगळता अंथरूण घालतो किंवा घालवून घेतो’ या दुक्कट वारात आणि यानंतरच्या ‘विहाराच्या उपचारात’ इत्यादी दुक्कट वारात देखील, ज्याप्रमाणे येथे केवळ बसण्याने, केवळ झोपण्याने, दोन्ही करण्याने आणि प्रयत्नांच्या भेदाने पाचित्तिय आपत्तिचे भेद सांगितले आहेत, त्याचप्रमाणे दुक्कट आपत्तिचे भेद समजावेत. कारण अशा प्रकारच्या विसभाग (प्रतिकूल) व्यक्तीसोबत एकाच विहारात किंवा एकाच परिवेणात राहण्याने काही लाभ नाही, म्हणून सर्व ठिकाणीच त्याचा निवास वर्ज्य केला आहे. ‘दुसऱ्याच्या वैयक्तिक वस्तूवर’ यामध्ये येथे देखील विश्वासातील व्यक्तीची वैयक्तिक वस्तू स्वतःच्या वैयक्तिक वस्तू सारखीच मानली जाते, त्यामुळे तेथे अनापत्ति आहे। ๑๒๓. อาปทาสูติ [Pg.47] สเจ พหิ วสนฺตสฺส ชีวิตพฺรหฺมจริยนฺตราโย โหติ, เอวรูปาสุ อาปทาสุ โย ปวิสติ, ตสฺสาปิ อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมวาติ. ปฐมปาราชิกสมุฏฺฐานํ, กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. १२३. ‘आपत्तीच्या वेळी’ म्हणजे जर बाहेर राहणाऱ्या भिक्खूच्या जीवाला किंवा ब्रह्मचर्याला धोका निर्माण होत असेल, अशा प्रकारच्या आपत्तीच्या वेळी जो आत प्रवेश करतो, त्याला देखील अनापत्ति आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. हे पहिल्या पाराजिकाप्रमाणे समुत्थान असणारे, क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, अकुशलचित्तयुक्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे। อนุปขชฺชสิกฺขาปทํ ฉฏฺฐํ. अनुपखज्ज सिक्खापद सहावे समाप्त। ๗. นิกฺกฑฺฒนสิกฺขาปทวณฺณนา ७. निक्कड्ढन सिक्खापद वर्णन। ๑๒๖. สตฺตมสิกฺขาปเท – เอเกน ปโยเคน พหุเกปิ ทฺวาเร อติกฺกาเมตีติ เย จตุภูมกปญฺจภูมกา ปาสาทา ฉสตฺตโกฏฺฐกานิ วา จตุสฺสาลานิ, ตาทิเสสุ เสนาสเนสุ หตฺเถสุ วา คีวาย วา คเหตฺวา อนฺตรา อฏฺฐเปนฺโต เอเกน ปโยเคน อติกฺกาเมติ, เอกเมว ปาจิตฺติยํ. ฐเปตฺวา ฐเปตฺวา นานาปโยเคหิ อติกฺกาเมนฺตสฺส ทฺวารคณนาย ปาจิตฺติยานิ. หตฺเถน อนามสิตฺวา ‘‘นิกฺขมา’’ติ วตฺวา วาจาย นิกฺกฑฺฒนฺตสฺสาปิ เอเสว นโย. १२६. सातव्या सिक्खापदात—‘एकाच प्रयत्नाने अनेक दारे ओलांडून बाहेर काढतो’ म्हणजे जे चार मजली किंवा पाच मजली प्रासाद आहेत, किंवा सहा-सात खोल्यांचे चतुःशाल (चौकोनी विहार) आहेत, अशा प्रकारच्या सेनासनांमध्ये (भिक्खूला) हाताला किंवा गळ्याला धरून, मध्ये न थांबवता एकाच प्रयत्नाने बाहेर काढतो, तर एकच पाचित्तिय होते. थांबवून-थांबवून वेगवेगळ्या प्रयत्नांनी बाहेर काढणाऱ्याला दारांच्या संख्येनुसार पाचित्तिय होतात. हाताने स्पर्श न करता ‘बाहेर निघ’ असे म्हणून वाणीने बाहेर काढणाऱ्याच्या बाबतीतही हाच नियम लागू होतो। อญฺญํ อาณาเปตีติ เอตฺถ ‘‘อิมํ นิกฺกฑฺฒา’’ติ อาณตฺติมตฺเต ทุกฺกฏํ. สเจ โส สกึ อาณตฺโต พหุเกปิ ทฺวาเร อติกฺกาเมติ, เอกํ ปาจิตฺติยํ. สเจ ปน ‘‘เอตฺตกานิ ทฺวารานิ นิกฺกฑฺฒาหี’’ติ วา ‘‘ยาว มหาทฺวารํ ตาว นิกฺกฑฺฒาหี’’ติ วา เอวํ นิยาเมตฺวา อาณตฺโต โหติ, ทฺวารคณนาย ปาจิตฺติยานิ. ‘दुसऱ्याला आज्ञा देतो’ यामध्ये ‘याला बाहेर काढ’ अशी केवळ आज्ञा दिल्यास दुक्कट होते. जर तो एकदा आज्ञा मिळाल्यावर अनेक दारे ओलांडून बाहेर काढतो, तर एक पाचित्तिय होते. परंतु जर ‘एवढी दारे ओलांडून बाहेर काढ’ किंवा ‘मुख्य दारापर्यंत बाहेर काढ’ असे मर्यादित करून आज्ञा दिली असेल, तर दारांच्या संख्येनुसार पाचित्तिय होतात। ตสฺส ปริกฺขารนฺติ ยํกิญฺจิ ตสฺส สนฺตกํ ปตฺตจีวรปริสฺสาวนธมกรณมญฺจปีฐภิสิพิมฺโพหนาทิเภทํ, อนฺตมโส รชนฉลฺลิมฺปิ; โย นิกฺกฑฺฒติ วา นิกฺกฑฺฒาเปติ วา; ตสฺส วตฺถุคณนาย ทุกฺกฏานิ. คาฬฺหํ พนฺธิตฺวา ฐปิเตสุ ปน เอกาว อาปตฺตีติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. ‘त्याचे परिष्कार’ म्हणजे त्याचे स्वतःचे असलेले पात्र, चीवर, पाणी गाळण्याचे वस्त्र, धमकण (पाण्याची गाळणी), मंच, पीठ, गादी, उशी इत्यादी विविध परिष्कार, अगदी रंगवण्याची साल देखील; जो स्वतः बाहेर काढतो किंवा दुसऱ्याकडून बाहेर काढवून घेतो, त्याला वस्तूंच्या संख्येनुसार दुक्कट आपत्ति होतात. परंतु जर घट्ट बांधून ठेवलेल्या वस्तू असतील, तर एकच आपत्ति होते, असे महाप्रत्यरीमध्ये म्हटले आहे। ๑๒๗. อญฺญสฺส ปุคฺคลิเกติ อิธาปิ วิสฺสาสิกปุคฺคลิกํ อตฺตโน ปุคฺคลิกสทิสเมว. ยถา จ อิธ; เอวํ สพฺพตฺถ. ยตฺร ปน วิเสโส ภวิสฺสติ, ตตฺร วกฺขาม. १२७. ‘दुसऱ्याच्या वैयक्तिक वस्तूवर’ यामध्ये येथे देखील विश्वासातील व्यक्तीची वैयक्तिक वस्तू स्वतःच्या वैयक्तिक वस्तू सारखीच आहे. आणि ज्याप्रमाणे येथे आहे, त्याचप्रमाणे सर्व ठिकाणी समजावे. परंतु जेथे काही विशेष असेल, तेथे आम्ही सांगू। ๑๒๘. อลชฺชึ นิกฺกฑฺฒติ วาติอาทีสุ ภณฺฑนการกกลหการกเมว สกลสงฺฆารามโต นิกฺกฑฺฒิตุํ ลภติ, โส หิ ปกฺขํ ลภิตฺวา สงฺฆมฺปิ [Pg.48] ภินฺเทยฺย. อลชฺชีอาทโย ปน อตฺตโน วสนฏฺฐานโตเยว นิกฺกฑฺฒิตพฺพา, สกลสงฺฆารามโต นิกฺกฑฺฒิตุํ น วฏฺฏติ. อุมฺมตฺตกสฺสาติ สยํ อุมฺมตฺตกสฺส อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมวาติ. १२८. ‘अलज्जीला बाहेर काढतो’ इत्यादी पाठांमध्ये—भांडण करणाऱ्या आणि कलह करणाऱ्या भिक्खूलाच संपूर्ण संघारामातून बाहेर काढण्याची परवानगी मिळते; कारण तो गट मिळवून संघाचे देखील विभाजन करू शकतो. परंतु अलज्जी इत्यादी भिक्खूंना केवळ त्यांच्या राहण्याच्या जागेवरूनच बाहेर काढले पाहिजे, संपूर्ण संघारामातून बाहेर काढणे योग्य नाही. ‘वेड्याच्या बाबतीत’ म्हणजे स्वतः वेडा असलेल्या भिक्खूला अनापत्ति आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे। ติสมุฏฺฐานํ – กายจิตฺตโต วาจาจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. हे तीन समुत्थान असणारे आहे—हे काय-चित्तापासून, वाचा-चित्तापासून आणि काय-वाचा-चित्तापासून उत्पन्न होते; क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्तयुक्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे। นิกฺกฑฺฒนสิกฺขาปทํ สตฺตมํ. निक्कड्ढन सिक्खापद सातवे समाप्त। ๘. เวหาสกุฏิสิกฺขาปทวณฺณนา ८. वेहासकुटी सिक्खापद वर्णन। ๑๒๙. อฏฺฐมสิกฺขาปเท – อุปริเวหาสกุฏิยาติ อุปริ อจฺฉนฺนตลาย ทฺวิภูมิกกุฏิยา วา ติภูมิกาทิกุฏิยา วา. มญฺจํ สหสา อภินิสีทีติ มญฺจํ สหสา อภิภวิตฺวา อชฺโฌตฺถริตฺวา นิสีทิ. ภุมฺมตฺเถ วา เอตํ อุปโยควจนํ; มญฺเจ นิสีทีติ อตฺโถ. อภีติ อิทํ ปน ปทโสภนตฺถํ อุปสคฺคมตฺตเมว. นิปฺปติตฺวาติ นิปติตฺวา นิกฺขมิตฺวา วา. ตสฺส หิ อุปริ อาณีปิ น ทินฺนา, ตสฺมา นิกฺขนฺโต. วิสฺสรมกาสีติ วิรูปํ อาตุรสฺสรมกาสิ. १२९. आठव्या सिक्खापदात—‘वरच्या वेहासकुटीत’ म्हणजे वरच्या मजल्यावर छत नसलेल्या दोन मजली कुटीत किंवा तीन मजली इत्यादी कुटीत. ‘मंचावर अचानक बसला’ म्हणजे मंचावर अचानक भार टाकून किंवा जोराने बसला. किंवा येथे द्वितीया विभक्ती सप्तमी विभक्तीच्या अर्थात वापरली आहे; ‘मंचावर बसला’ असा याचा अर्थ आहे. ‘अभि’ हा शब्द केवळ पदशोभेसाठी वापरलेला उपसर्ग आहे. ‘निप्पतित्वा’ म्हणजे पडून किंवा बाहेर निघून. कारण त्याच्या वर खिळा किंवा कडी देखील लावली नव्हती, म्हणून तो बाहेर निघाला. ‘विस्सरमकासि’ म्हणजे वेदनेने विव्हळणारा विकृत आवाज केला। ๑๓๑. เวหาสกุฏิ นาม มชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส อสีสฆฏฺฏาติ ยา ปมาณมชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส สพฺพเหฏฺฐิมาหิ ตุลาหิ สีสํ น ฆฏฺเฏติ, เอเตน อิธ อธิปฺเปตา เวหาสกุฏิ ทสฺสิตา โหติ, น เวหาสกุฏิลกฺขณํ. ยา หิ กาจิ อุปริ อจฺฉินฺนตลา ทฺวิภูมิกา กุฏิ ติภูมิกาทิกุฏิ วา ‘‘เวหาสกุฏี’’ติ วุจฺจติ. อิธ ปน อสีสฆฏฺฏา อธิปฺเปตา. อภินิสีทนาทีสุ ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว ปโยควเสน อาปตฺติเภโท เวทิตพฺโพ. १३१. ‘वेहासकुटी म्हणजे मध्यम उंचीच्या माणसाचे डोके न टेकणारी’ म्हणजे जी मध्यम उंचीच्या माणसाचे डोके सर्वात खालच्या तुळईला टेकू देत नाही. यावरून येथे अभिप्रेत असलेली वेहासकुटी दर्शवली आहे, वेहासकुटीचे सामान्य लक्षण नाही. कारण वरच्या मजल्यावर छत नसलेली कोणतीही दोन मजली कुटी किंवा तीन मजली इत्यादी कुटी ‘वेहासकुटी’ म्हटली जाते. परंतु येथे डोके न टेकणारी कुटी अभिप्रेत आहे. बसणे इत्यादींच्या बाबतीत पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच प्रयत्नांच्या भेदानुसार आपत्तिचे भेद समजावेत। ๑๓๓. อเวหาสกุฏิยาติ ภูมิยํ กตปณฺณสาลาทีสุ อนาปตฺติ. น หิ สกฺกา ตตฺถ ปรสฺส ปีฬา กาตุํ. สีสฆฏฺฏายาติ ยายํ สีสฆฏฺฏา โหติ, ตตฺถาปิ อนาปตฺติ. น หิ สกฺกา ตตฺถ เหฏฺฐาปาสาเท อโนณเตน วิจริตุํ, ตสฺมา อสญฺจรณฏฺฐานตฺตา ปรปีฬา น ภวิสฺสติ[Pg.49]. เหฏฺฐา อปริโภคํ โหตีติ ยสฺสา เหฏฺฐา ทพฺพสมฺภาราทีนํ นิกฺขิตฺตตฺตา อปริโภคํ โหติ, ตตฺถาปิ อนาปตฺติ. ปทรสญฺจิตํ โหตีติ ยสฺสา อุปริมตลํ ทารุผลเกหิ วา ฆนสนฺถตํ โหติ, สุธาทิปริกมฺมกตํ วา ตตฺถาปิ อนาปตฺติ. ปฏาณิ ทินฺนา โหตีติ มญฺจปีฐานํ ปาทสิขาสุ อาณี ทินฺนา โหติ, ยตฺถ นิสีทนฺเตปิ น นิปฺปตนฺติ, ตาทิเส มญฺจปีเฐ นิสีทโตปิ อนาปตฺติ. ตสฺมึ ฐิโตติ อาหจฺจปาทเก มญฺเจ วา ปีเฐ วา ฐิโต อุปริ นาคทนฺตกาทีสุ ลคฺคิตกํ จีวรํ วา กิญฺจิ วา คณฺหาติ วา, อญฺญํ วา ลคฺเคติ, ตสฺสาปิ อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กายโต จ กายจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. १३३. "अवेहासकुटीत" म्हणजे जमिनीवर बनवलेल्या पानांच्या झोपड्या इत्यादींमध्ये (खाट किंवा पाटावर बसल्यास किंवा निजल्यास) आपत्ती (दोष) होत नाही. कारण तिथे दुसऱ्याला पीडा (त्रास) देणे शक्य नसते. "सीसघट्टा" म्हणजे ज्या कुटीचे छत डोक्याला स्पर्श करते, तिथेही आपत्ती होत नाही. कारण तिथे खालच्या मजल्यावर न वाकता फिरणे शक्य नसते; म्हणून ते फिरण्याचे ठिकाण नसल्यामुळे दुसऱ्याला पीडा होणार नाही. "खाली न वापरलेली" म्हणजे ज्या कुटीच्या खाली लाकूडफाटा इत्यादी साहित्य ठेवल्यामुळे ती वापरली जात नाही, तिथेही आपत्ती होत नाही. "फळ्यांनी आच्छादित" म्हणजे ज्या कुटीचा वरचा मजला लाकडी फळ्यांनी घट्ट आच्छादलेला असतो किंवा चुना इत्यादींनी गिलावा केलेला असतो, तिथेही आपत्ती होत नाही. "पाटाणी दिलेली" म्हणजे खाट किंवा पाटाच्या पायांच्या टोकांवर मेख (आणी/खीळ) ठोकलेली असते, ज्यावर बसले तरी पाय निखळून पडत नाहीत; अशा प्रकारच्या खाटेवर किंवा पाटावर बसणाऱ्यालाही आपत्ती होत नाही. "त्यावर उभा राहून" म्हणजे काढता येण्याजोगे पाय असलेल्या खाटेवर किंवा पाटावर उभे राहून, वर भिंतीच्या खुंटीवर (नागदंतक इत्यादींवर) टांगलेले चीवर किंवा इतर काही वस्तू काढतो किंवा दुसरी वस्तू टांगतो, तर त्यालाही आपत्ती होत नाही. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. हे (वेहासकुटी) शिक्षापद एळकलोम (मेंढीच्या लोकरीच्या) शिक्षापदाप्रमाणेच समुत्थान असणारे आहे – हे काय (शरीर) आणि काय-चित्त (शरीर व मन) यांपासून उत्पन्न होते; हे क्रियात्मक आहे; संज्ञेमुळे यात मुक्ती मिळत नाही (नोसञ्ञाविमोक्ख); हे अचित्तक आहे; प्रज्ञप्तीचे उल्लंघन केल्यामुळे यात दोष लागतो (पण्णत्तिवज्ज); हे कायकर्म आहे; यात तीन चित्त आणि तीन वेदना असतात. เวหาสกุฏิสิกฺขาปทํ อฏฺฐมํ. वेहासकुटी शिक्षापद आठवे समाप्त. ๙. มหลฺลกวิหารสิกฺขาปทวณฺณนา ९. महल्लक विहार (मोठ्या विहाराचे) शिक्षापदाचे वर्णन. ๑๓๕. นวมสิกฺขาปเท – ยาว ทฺวารโกสาติ เอตฺถ ทฺวารโกโส นาม ปิฏฺฐสงฺฆาฏสฺส สมนฺตา กวาฏวิตฺถารปฺปมาโณ โอกาโส. มหาปจฺจริยํ ปน ‘‘ทฺวารพาหโต ปฏฺฐาย ทิยฑฺโฒ หตฺโถ’’ติ วุตฺตํ. กุรุนฺทิยํ ปน ‘‘ทฺวารสฺส อุโภสุ ปสฺเสสุ กวาฏปฺปมาณ’’นฺติ. มหาอฏฺฐกถายํ ‘‘กวาฏํ นาม ทิยฑฺฒหตฺถมฺปิ โหติ ทฺวิหตฺถมฺปิ อฑฺฒเตยฺยหตฺถมฺปี’’ติ วุตฺตํ, ตํ สุวุตฺตํ. ตเทว หิ สนฺธาย ภควตาปิ ‘‘ปิฏฺฐสงฺฆาฏสฺส สมนฺตา หตฺถปาสา’’ติ อยํ อุกฺกฏฺฐนิทฺเทโส กโต. อคฺคฬฏฺฐปนายาติ สกวาฏกทฺวารพนฺธฏฺฐปนาย; สกวาฏกสฺส ทฺวารพนฺธสฺส นิจฺจลภาวตฺถายาติ อตฺโถ. ทฺวารฏฺฐปนายาติ อิทมฺปิ หิ ปทภาชนํ อิมเมวตฺถํ สนฺธาย ภาสิตํ. อยํ ปเนตฺถ อธิปฺปาโย – กวาฏญฺหิ ลหุปริวฏฺฏกํ วิวรณกาเล ภิตฺตึ อาหนติ, ปิทหนกาเล ทฺวารพนฺธํ. เตน อาหนเนน ภิตฺติ กมฺปติ, ตโต มตฺติกา จลติ, จลิตฺวา สิถิลา วา โหติ ปตติ วา. เตนาห ภควา ‘‘ยาว ทฺวารโกสา อคฺคฬฏฺฐปนายา’’ติ. ตตฺถ กิญฺจาปิ ‘‘อิทํ นาม กตฺตพฺพ’’นฺติ เนว มาติกายํ น ปทภาชเน วุตฺตํ, อฏฺฐุปฺปตฺติยํ ปน ‘‘ปุนปฺปุนํ ฉาทาเปสิ ปุนปฺปุนํ เลปาเปสี’’ติ อธิการโต ยาว ทฺวารโกสา อคฺคฬฏฺฐปนาย ปุนปฺปุนํ ลิมฺปิตพฺโพ วา เลปาเปตพฺโพ วาติ เอวมตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. १३५. नवव्या शिक्षापदात – "दाराच्या चौकटीपर्यंत" (याव द्वारकोसा) यात 'द्वारकोस' म्हणजे दाराच्या चौकटीच्या सभोवताली दाराच्या कपाटाच्या (झापाच्या) रुंदीइतकी जागा होय. परंतु महाप्रत्यरीमध्ये (महापच्चरी) म्हटले आहे की, "दाराच्या खांबापासून सुरू करून दीड हात जागा म्हणजे द्वारकोस होय." कुरुंदीमध्ये तर "दाराच्या दोन्ही बाजूंना दाराच्या कपाटाच्या आकाराची जागा" असे म्हटले आहे. महाअट्ठकथेमध्ये "दाराचे कपाट (झाप) दीड हात, दोन हात किंवा अडीच हात देखील असते" असे म्हटले आहे, ते योग्यच सांगितले आहे. त्यालाच अनुसरून भगवंतांनी देखील "दाराच्या चौकटीच्या सभोवताली हातभर अंतरापर्यंत (हत्थपास)" असा हा उत्कृष्ट निर्देश केला आहे. "अग्गळट्ठापनाय" म्हणजे कपाटासहित दाराची चौकट घट्ट बसवण्यासाठी; कपाटासहित दाराची चौकट न हलण्यासाठी, असा याचा अर्थ आहे. "द्वारट्ठापनाय" हे पदभाजन देखील याच अर्थाला अनुसरून सांगितले आहे. येथे हा अभिप्राय आहे – दाराचे कपाट सहजपणे फिरणारे असल्यामुळे उघडताना ते भिंतीवर आदळते आणि बंद करताना दाराच्या चौकटीवर आदळते. त्या आदळण्याने भिंत कंपित होते, त्यामुळे गिलाव्याची माती हलते, आणि हलल्यामुळे ती सैल होते किंवा गळून पडते. म्हणूनच भगवंतांनी "दाराच्या चौकटीपर्यंत कपाट घट्ट बसवण्यासाठी" असे म्हटले आहे. तिथे जरी "हे काम करावे" असे मातिका किंवा पदभाजनामध्ये कुठेही सांगितले नसले, तरी उत्पत्तीच्या प्रसंगात (अट्ठुप्पत्ति) "त्याने वारंवार छप्पर शाकारले, वारंवार गिलावा केला" या अधिकारावरून, दाराच्या चौकटीपर्यंत कपाट घट्ट बसवण्यासाठी वारंवार गिलावा करावा किंवा करून घ्यावा, असा अर्थ समजला पाहिजे. ยํ [Pg.50] ปน ปทภาชเน ‘‘ปิฏฺฐสงฺฆาฏสฺส สมนฺตา หตฺถปาสา’’ติ วุตฺตํ. ตตฺถ ยสฺส เวมชฺเฌ ทฺวารํ โหติ, อุปริภาเค อุจฺจา ภิตฺติ, ตสฺส ตีสุ ทิสาสุ สมนฺตา หตฺถปาสา อุปจาโร โหติ, ขุทฺทกสฺส วิหารสฺส ทฺวีสุ ทิสาสุ อุปจาโร โหติ. ตตฺราปิ ยํ ภิตฺตึ วิวริยมานํ กวาฏํ อาหนติ, สา อปริปูรอุปจาราปิ โหติ. อุกฺกฏฺฐปริจฺเฉเทน ปน ตีสุ ทิสาสุ สมนฺตา หตฺถปาสา ทฺวารสฺส นิจฺจลภาวตฺถาย เลโป อนุญฺญาโต. สเจ ปนสฺส ทฺวารสฺส อโธภาเคปิ เลโปกาโส อตฺถิ, ตมฺปิ ลิมฺปิตุํ วฏฺฏติ. อาโลกสนฺธิปริกมฺมายาติ เอตฺถ อาโลกสนฺธีติ วาตปานกวาฏกา วุจฺจนฺติ, เตปิ วิวรณกาเล วิทตฺถิมตฺตมฺปิ อติเรกมฺปิ ภิตฺติปฺปเทสํ ปหรนฺติ. อุปจาโร ปเนตฺถ สพฺพทิสาสุ ลพฺภติ, ตสฺมา สพฺพทิสาสุ กวาฏวิตฺถารปฺปมาโณ โอกาโส อาโลกสนฺธิปริกมฺมตฺถาย ลิมฺปิตพฺโพ วา เลปาเปตพฺโพ วาติ อยเมตฺถ อธิปฺปาโย. पदभाजनामध्ये जे "दाराच्या चौकटीच्या सभोवताली हातभर अंतरापर्यंत" असे म्हटले आहे. तिथे ज्या विहाराच्या मध्यभागी दार असते आणि वरच्या भागात उंच भिंत असते, त्याच्या तीन बाजूंना सभोवताली हातभर अंतरापर्यंतचा भाग हा 'उपचार' (परिसर) असतो; लहान विहाराच्या बाबतीत दोन बाजूंना उपचार असतो. तिथेही ज्या भिंतीवर उघडणारे कपाट आदळते, ती भिंत अपूर्ण उपचार असणारी (अडीच हातापेक्षा कमी) असू शकते. परंतु कमाल मर्यादेनुसार, तीन बाजूंना सभोवताली हातभर अंतरापर्यंत दार न हलण्यासाठी गिलावा करण्याची अनुमती दिली आहे. जर दाराच्या खालच्या भागातही गिलावा करण्याची जागा असेल, तर तिथेही गिलावा करणे योग्य आहे. "आलोकसंधिपरिकम्माय" यात 'आलोकसंधि' म्हणजे खिडकीची कपाटे (झडपा) म्हटली जातात; ती देखील उघडताना विणभर (वितस्ती) किंवा त्याहून अधिक भिंतीच्या भागावर आदळतात. येथे उपचार सर्व बाजूंनी मिळतो; म्हणून सर्व बाजूंनी खिडकीच्या कपाटाच्या रुंदीइतकी जागा खिडकीची कपाटे घट्ट बसवण्यासाठी स्वतः गिलावा करावी किंवा दुसऱ्याकडून करून घ्यावी, असा येथे अभिप्राय आहे. เสตวณฺณนฺติอาทิกํ น มาติกาย ปทภาชนํ. อิมินา หิ วิหารสฺส ภาริกตฺตํ นาม นตฺถีติ ปทภาชเนเยว อนุญฺญาตํ, ตสฺมา สพฺพเมตํ ยถาสุขํ กตฺตพฺพํ. "श्वेतवर्ण" (पांढरा रंग देणे) इत्यादी मातिकाचे पदभाजन नाही. कारण यामुळे विहाराला कोणताही जडपणा (भारिकत्व) येत नसल्यामुळे पदभाजनामध्येच याची अनुमती दिली आहे; म्हणून हे सर्व आपल्या सोयीनुसार (यथासुख) करावे. เอวํ เลปกมฺเม ยํ กตฺตพฺพํ, ตํ ทสฺเสตฺวา ปุน ฉทเน กตฺตพฺพํ ทสฺเสตุํ ‘‘ทฺวตฺติจฺฉทนสฺสา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ ทฺวตฺติจฺฉทนสฺส ปริยายนฺติ ฉทนสฺส ทฺวตฺติปริยายํ; ปริยาโย วุจฺจติ ปริกฺเขโป, ปริกฺเขปทฺวยํ วา ปริกฺเขปตฺตยํ วา อธิฏฺฐาตพฺพนฺติ อตฺโถ. อปฺปหริเต ฐิเตนาติ อหริเต ฐิเตน. หริตนฺติ เจตฺถ สตฺตธญฺญเภทํ ปุพฺพณฺณํ มุคฺคมาสติลกุลตฺถอลาพุกุมฺภณฺฑาทิเภทญฺจ อปรณฺณํ อธิปฺเปตํ. เตเนวาห – ‘‘หริตํ นาม ปุพฺพณฺณํ อปรณฺณ’’นฺติ. अशा प्रकारे गिलाव्याच्या कामात जे करायचे आहे ते दाखवून, पुन्हा छप्पराच्या कामात काय करायचे आहे हे दाखवण्यासाठी "द्वित्तिच्छदनस्स" (दोन किंवा तीन पदरी छप्पर) इत्यादी म्हटले आहे. तिथे "द्वित्तिच्छदनस्स परियायं" म्हणजे छप्पराचे दोन किंवा तीन थर; 'परियाय' म्हणजे वेढणे (थर देणे), दोन थर किंवा तीन थर निश्चित करावेत (अधिष्ठातव्य), असा याचा अर्थ आहे. "अपहरिते ठितेन" म्हणजे हिरवे पीक नसलेल्या जागेवर उभे राहून. येथे 'हरित' (हिरवे) म्हणजे सात प्रकारची धान्ये (पुब्बण्ण) आणि मूग, उडीद, तीळ, कुळीथ, दुधी भोपळा, तांबडा भोपळा इत्यादी इतर पिके (अपरण्ण) अभिप्रेत आहेत. म्हणूनच त्यांनी म्हटले आहे – "हरित म्हणजे धान्य (पुब्बण्ण) आणि इतर पिके (अपरण्ण) होय." สเจ หริเต ฐิโต อธิฏฺฐาติ, อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ เอตฺถ ปน ยสฺมิมฺปิ เขตฺเต วุตฺตํ พีชํ น ตาว สมฺปชฺชติ, วสฺเส วา ปน ปติเต สมฺปชฺชิสฺสติ, ตมฺปิ หริตสงฺขฺยเมว คจฺฉติ. ตสฺมา เอวรูเป เขตฺเตปิ ฐิเตน น อธิฏฺฐาตพฺพํ, อหริเตเยว ฐิเตน อธิฏฺฐาตพฺพํ. ตตฺราปิ อยํ ปริจฺเฉโท, ปิฏฺฐิวํสสฺส วา กูฏาคารกณฺณิกาย วา อุปริ ถุปิกาย วา ปสฺเส นิสินฺโน ฉทนมุขวฏฺฏิอนฺเตน โอโลเกนฺโต ยสฺมึ ภูมิภาเค ฐิตํ ปสฺสติ, ยสฺมิญฺจ ภูมิภาเค ฐิโต, ตํ อุปริ นิสินฺนกํ ปสฺสติ, ตสฺมึ [Pg.51] ฐาเน อธิฏฺฐาตพฺพํ. ตสฺส อนฺโต อหริเตปิ ฐตฺวา อธิฏฺฐาตุํ น ลพฺภติ. กสฺมา? วิหารสฺส หิ ปตนฺตสฺส อยํ ปตโนกาโสติ. "जर हिरव्या पिकावर उभा राहून निश्चित करतो, तर दुष्कृत (दुक्कट) आपत्ती होते." येथे ज्या शेतात पेरलेले बी अजून उगवले नाही, परंतु पाऊस पडल्यावर उगवेल, ते देखील 'हरित' (हिरवे पीक) याच संज्ञेत येते. म्हणून अशा प्रकारच्या शेतातही उभे राहून छप्पर निश्चित करू नये; केवळ हिरवे पीक नसलेल्या (अहरित) जागेवर उभे राहूनच ते निश्चित करावे. तिथेही ही मर्यादा आहे – वाशावर (पिट्ठिवंस) यावर किंवा छताच्या शिखरावर (कूडागारकण्णिका) किंवा कळसाच्या (थुपिका) बाजूला बसलेला माणूस छप्पराच्या काठावरून खाली पाहत असताना ज्या जमिनीच्या भागावर उभे राहिलेल्या भिक्खूला पाहू शकतो, आणि ज्या जमिनीच्या भागावर उभा राहिलेला भिक्खू वर बसलेल्या त्या माणसाला पाहू शकतो, अशा (परस्पर दिसणाऱ्या) ठिकाणी उभे राहून छप्पर निश्चित करावे. त्या मर्यादेच्या आत हिरवे पीक नसलेल्या जागेवर उभे राहूनही छप्पर निश्चित करण्याची अनुमती नाही. का? कारण विहार कोसळल्यास हाच त्याचा कोसळण्याचा भाग (पतन-अवकाश) असतो. ๑๓๖. มคฺเคน ฉาเทนฺตสฺสาติ เอตฺถ มคฺเคน ฉาทนํ นาม อปริกฺขิปิตฺวา อุชุกเมว ฉาทนํ; ตํ อิฏฺฐกสิลาสุธาหิ ลพฺภติ. ทฺเว มคฺเค อธิฏฺฐหิตฺวาติ ทฺเว มคฺคา สเจ ทุจฺฉนฺนา โหนฺติ, อปเนตฺวาปิ ปุนปฺปุนํ ฉาเทตุํ ลพฺภติ, ตสฺมา ยถา อิจฺฉติ; ตถา ทฺเว มคฺเค อธิฏฺฐหิตฺวา ตติยํมคฺคํ ‘‘อิทานิ เอวํ ฉาเทหี’’ติ อาณาเปตฺวา ปกฺกมิตพฺพํ. ปริยาเยนาติ ปริกฺเขเปน. เอวํฉทนํ ปน ติณปณฺเณหิ ลพฺภติ. ตสฺมา อิธาปิ ยถา อิจฺฉติ ตถา ทฺเว ปริยาเย อธิฏฺฐหิตฺวา ตติยํ ปริยายํ ‘‘อิทานิ เอวํ ฉาเทหี’’ติ อาณาเปตฺวา ปกฺกมิตพฺพํ. สเจ น ปกฺกมติ, ตุณฺหีภูเตน ฐาตพฺพํ. สพฺพมฺปิ เจตํ ฉทนํ ฉทนูปริ เวทิตพฺพํ. อุปรูปริจฺฉนฺโน หิ วิหาโร จิรํ อโนวสฺสโก โหตีติ มญฺญมานา เอวํ ฉาเทนฺติ. ตโต เจ อุตฺตรินฺติ ติณฺณํ มคฺคานํ วา ปริยายานํ วา อุปริ จตุตฺเถ มคฺเค วา ปริยาเย วา. १३६. ‘मग्गेन छादेन्तस्स’ (मार्गाने छादन करणाऱ्याचे) याविषयी, ‘मग्गेन छादनं’ म्हणजे सभोवताली न फिरवता सरळ रेषेतच छादन करणे होय; ते विटा, दगड आणि चुना यांच्याद्वारे केले जाते. ‘द्वे मग्गे अधिट्ठहित्वा’ (दोन मार्ग निश्चित करून) म्हणजे जर दोन मार्ग (थर) वाईट प्रकारे झाकले गेले असतील, तर ते काढून टाकूनही पुन्हा पुन्हा छादन करण्याची मुभा मिळते. म्हणून, ज्याप्रमाणे त्याला इच्छा असेल, त्याप्रमाणे दोन मार्ग निश्चित करून, तिसऱ्या मार्गाविषयी “आता या प्रकारे छादन कर” अशी आज्ञा देऊन निघून जावे. ‘परियायेन’ म्हणजे सभोवताली फिरवून (गोलाकार पद्धतीने) छादन करणे. असे छादन मात्र गवत आणि पानांनी केले जाते. म्हणून, येथेही ज्याप्रमाणे इच्छा असेल, त्याप्रमाणे दोन फेऱ्या (थर) निश्चित करून, तिसऱ्या फेऱ्याविषयी “आता या प्रकारे छादन कर” अशी आज्ञा देऊन निघून जावे. जर निघून जायचे नसेल, तर मौन धारण करून उभे राहावे. हे सर्व छादन देखील छपराच्या वर (थरावर थर) केले जाणारे छादन आहे असे समजावे. कारण वरचेवर छादन केलेला विहार दीर्घकाळ पावसाच्या पाण्यापासून सुरक्षित राहतो (गळत नाही), असे मानून ते या प्रकारे छादन करतात. ‘ततो चे उत्तरिं’ म्हणजे तीन मार्ग किंवा तीन फेऱ्यांच्या वर, चौथ्या मार्गात किंवा चौथ्या फेरीत. ๑๓๗. กรเฬ กรเฬติ ติณมุฏฺฐิยํ ติณมุฏฺฐิยํ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมวาติ. ฉสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. १३७. ‘करळे करळे’ म्हणजे गवताच्या प्रत्येक मुठीत (पेंढ्यामध्ये). यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. हे शिक्षापद सहा समुत्थानांचे असून ते क्रियात्मक, संज्ञेच्या अभावाने मुक्त न होणारे (असंज्ञाविमोक्ष), अचित्तक, प्रज्ञप्तिवद्य, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्तक आणि त्रिवेदनायुक्त आहे. มหลฺลกวิหารสิกฺขาปทํ นวมํ. महल्लकविहार शिक्षापद हे नववे होय. ๑๐. สปฺปาณกสิกฺขาปทวณฺณนา १०. सप्पाणक शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๑๔๐. ทสมสิกฺขาปเท – ชานํ สปฺปาณกนฺติ สปฺปาณกํ เอตนฺติ ยถา ตถา วา ชานนฺโต. สิญฺเจยฺย วา สิญฺจาเปยฺย วาติ เตน อุทเกน สยํ วา สิญฺเจยฺย, อญฺญํ วา อาณาเปตฺวา สิญฺจาเปยฺย. ปาฬิยํ ปน ‘‘สิญฺเจยฺยาติ สยํ สิญฺจตี’’ติ อีทิสานํ วจนานํ อตฺโถ ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. १४०. दहाव्या शिक्षापदात – ‘जानं सप्पाणकं’ (सजीव असल्याचे जाणून) म्हणजे “हे पाणी सजीव (कीटकांनी युक्त) आहे” असे कोणत्याही प्रकारे जाणत असताना. ‘सिंचेय्य वा सिंचापेय्य वा’ (सिंचन करावे किंवा सिंचन करवावे) म्हणजे त्या पाण्याने स्वतः सिंचन करावे किंवा दुसऱ्याला आज्ञा देऊन सिंचन करवावे. पाळीमध्ये (मूळ पाठात) मात्र “सिंचेय्य म्हणजे स्वतः सिंचन करतो” अशा प्रकारच्या वचनांचा अर्थ पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. ตตฺถ ธารํ อวิจฺฉินฺทิตฺวา สิญฺจนฺตสฺส เอกสฺมึ อุทกฆเฏ เอกาว อาปตฺติ. เอส นโย สพฺพภาชเนสุ. ธารํ วิจฺฉินฺทนฺตสฺส ปน ปโยเค ปโยเค อาปตฺติ[Pg.52]. มาติกํ สมฺมุขํ กโรติ, ทิวสมฺปิ สนฺทตุ, เอกาว อาปตฺติ. สเจ ตตฺถ ตตฺถ พนฺธิตฺวา อญฺญโต อญฺญโต เนติ, ปโยเค ปโยเค อาปตฺติ. สกฏภารมตฺตญฺเจปิ ติณํ เอกปโยเคน อุทเก ปกฺขิปติ, เอกาว อาปตฺติ. เอเกกํ ติณํ วา ปณฺณํ วา ปกฺขิปนฺตสฺส ปโยเค ปโยเค อาปตฺติ. มตฺติกายปิ อญฺเญสุปิ กฏฺฐโคมยาทีสุ เอเสว นโย. อิทํ ปน มหาอุทกํ สนฺธาย น วุตฺตํ, ยํ ติเณ วา มตฺติกาย วา ปกฺขิตฺตาย ปริยาทานํ คจฺฉติ, อาวิลํ วา โหติ, ยตฺถ ปาณกา มรนฺติ, ตาทิสํ อุทกํ สนฺธาย วุตฺตนฺติ เวทิตพฺพํ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมวาติ. त्या बाबतीत, पाण्याची धार न तोडता सिंचन करणाऱ्याला एका पाण्याच्या घागरीत एकच आपत्ती होते. हाच नियम सर्व प्रकारच्या भांड्यांच्या बाबतीत लागू होतो. परंतु, पाण्याची धार तोडून तोडून सिंचन करणाऱ्याला प्रत्येक प्रयोगागणिक आपत्ती होते. जर कोणी पाण्याचा पाट स्वतःच्या दिशेने वळवतो आणि पाणी दिवसभर वाहत राहिले, तरी एकच आपत्ती होते. जर ठिकठिकाणी बांध घालून वेगवेगळ्या ठिकाणी पाणी नेले, तर प्रत्येक प्रयोगागणिक आपत्ती होते. जर गाडीभर गवत देखील एकाच प्रयत्नाने पाण्यात टाकले, तर एकच आपत्ती होते. परंतु, एक-एक गवत किंवा पान टाकणाऱ्याला प्रत्येक प्रयोगागणिक आपत्ती होते. मातीच्या बाबतीत आणि लाकूड, शेण इत्यादी इतर गोष्टींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. हे मात्र मोठ्या जलाशयाला उद्देशून म्हटलेले नाही. ज्या पाण्यात गवत किंवा माती टाकल्याने ते पाणी शोषले जाते किंवा गढूळ होते, आणि ज्यामध्ये जीव मरतात, अशा प्रकारच्या पाण्याला उद्देशून हे म्हटले आहे असे समजावे. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กายจิตฺตโต วาจาจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ ติเวทนนฺติ. हे तीन समुत्थानांचे आहे – ते काय-चित्तापासून, वाचा-चित्तापासून आणि काय-वाचा-चित्तापासून उद्भवते; हे क्रियात्मक, संज्ञेच्या अभावाने मुक्त होणारे (ससंज्ञाविमोक्ष), सचित्तक, प्रज्ञप्तिवद्य, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्तक आणि त्रिवेदनायुक्त आहे. สปฺปาณกสิกฺขาปทํ ทสมํ. सप्पाणक शिक्षापद हे दहावे होय. สมตฺโต วณฺณนากฺกเมน เสนาสนวคฺโค ทุติโย. स्पष्टीकरणाच्या क्रमानुसार दुसरा सेनासनवर्ग समाप्त झाला. ๓. โอวาทวคฺโค ३. ओवादवर्ग ๑. โอวาทสิกฺขาปทวณฺณนา १. ओवाद शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๑๔๑-๑๔๔. ภิกฺขุนิวคฺคสฺส ปฐมสิกฺขาปเท – ลาภิโน โหนฺตีติ เอตฺถ น เตสํ ภิกฺขุนิโย เทนฺติ, น ทาเปนฺติ, มหากุเลหิ ปพฺพชิตา ปน กุลธีตโร อตฺตโน สนฺติกํ อาคตานํ ญาติมนุสฺสานํ ‘‘กุโต อยฺเย โอวาทํ อุทฺเทสํ ปริปุจฺฉํ ลภถา’’ติ ปุจฺฉนฺตานํ ‘‘อสุโก จ อสุโก จ เถโร โอวทตี’’ติ อสีติมหาสาวเก อุทฺทิสิตฺวา กถานุสาเรน เตสํ สีลสุตาจารชาติโคตฺตาทิเภทํ วิชฺชมานคุณํ กถยนฺติ. เอวรูปา หิ วิชฺชมานคุณา กเถตุํ วฏฺฏนฺติ. ตโต ปสนฺนจิตฺตา มนุสฺสา เถรานํ จีวราทิเภทํ มหนฺตํ ลาภสกฺการํ อภิหรึสุ. เตน วุตฺตํ – ‘‘ลาภิโน โหนฺติ จีวร…เป… ปริกฺขาราน’’นฺติ. १४१-१४४. भिक्खुनीवर्गाच्या पहिल्या शिक्षापदात – ‘लाभिनो होन्ति’ (लाभ मिळवणारे होतात) याविषयी, भिक्खुनी त्यांना स्वतः काही देत नाहीत आणि इतरांकडून देववतही नाहीत. परंतु, थोर कुळांमधून प्रव्रजित झालेल्या कुलकन्या आपल्याकडे आलेल्या नातेवाईक माणसांनी “आर्ये! आपण कोणाकडून उपदेश (ओवाद), पाठांतर (उद्देश) आणि प्रश्नोत्तरे (परिपृच्छा) प्राप्त करता?” असे विचारले असता, “अमुक आणि अमुक थेर उपदेश करतात” असे ऐंशी महाश्रावकांचा उल्लेख करून संभाषणाच्या ओघात त्यांच्या शील, श्रुत (ज्ञान), आचार, जात, गोत्र इत्यादी विविध विद्यमान गुणांचे वर्णन करतात. कारण अशा प्रकारचे विद्यमान गुण सांगणे योग्यच आहे. त्यामुळे प्रसन्न चित्त झालेले लोक थेरांसाठी चीवर इत्यादी विविध प्रकारचा मोठा लाभ आणि सत्कार घेऊन आले. म्हणूनच संगीतिकारांनी म्हटले आहे – “ते चीवर...पे... परिष्कारांचे लाभ मिळवणारे होतात.” ภิกฺขุนิโย [Pg.53] อุปสงฺกมิตฺวาติ เตสํ กิร สนฺติเก ตาสุ เอกา ภิกฺขุนีปิ น อาคจฺฉติ, ลาภตณฺหาย ปน อากฑฺฒิยมานหทยา ตาสํ อุปสฺสยํ อคมํสุ. ตํ สนฺธาย วุตฺตํ – ‘‘ภิกฺขุนิโย อุปสงฺกมิตฺวา’’ติ. ตาปิ ภิกฺขุนิโย จลจิตฺตตาย เตสํ วจนํ อกํสุเยว. เตน วุตฺตํ – ‘‘อถ โข ตา ภิกฺขุนิโย…เป… นิสีทึสู’’ติ. ติรจฺฉานกถนฺติ สคฺคมคฺคคมเนปิ ติรจฺฉานภูตํ ราชกถาทิมเนกวิธํ นิรตฺถกกถํ. อิทฺโธติ สมิทฺโธ, สหิตตฺโถ คมฺภีโร พหุรโส ลกฺขณปฏิเวธสํยุตฺโตติ อธิปฺปาโย. ‘भिक्खुनीयो उपसंकमित्वा’ (भिक्खुनींकडे जाऊन) म्हणजे त्यांच्या (षड्वर्गीय भिक्खूंच्या) जवळ त्या भिक्खुनींपैकी एकही भिक्खुनी आली नाही. परंतु, लाभाच्या तृष्णेने आकर्षित झालेल्या मनाचे ते षड्वर्गीय भिक्खू त्यांच्या उपाश्रयामध्ये गेले. त्या जाण्याला उद्देशून संगीतिकारांनी म्हटले आहे – “भिक्खुनींकडे जाऊन”. त्या भिक्खुनींनी देखील चंचल मनामुळे त्यांचे बोलणे ऐकलेच. म्हणूनच म्हटले आहे – “त्यानंतर त्या भिक्खुनी...पे... बसल्या.” ‘तिरच्छानकथा’ (हीनकथा) म्हणजे स्वर्ग आणि मोक्षाच्या मार्गात जाण्यासाठी देखील आडकाठी ठरणारी, राजांच्या गोष्टी इत्यादी अनेक प्रकारची निरर्थक चर्चा. ‘इद्धो’ म्हणजे समृद्ध, हितकारक अर्थाने युक्त, गंभीर, बहुविध रसांनी युक्त आणि लक्षणांच्या साक्षात्काराशी संबंधित असणारा, असा भगवंतांचा अभिप्राय आहे. ๑๔๕-๑๔๗. อนุชานามิ ภิกฺขเวติ เอตฺถ ยสฺมา เต ภิกฺขู ‘‘มา ตุมฺเห ภิกฺขเว ภิกฺขุนิโย โอวทิตฺถา’’ติ วุจฺจมานา อทิฏฺฐสจฺจตฺตา ตถาคเต อาฆาตํ พนฺธิตฺวา อปายุปคา ภเวยฺยุํ, ตสฺมา เนสํ ตํ อปายุปคตํ ปริหรนฺโต ภควา อญฺเญเนว อุปาเยน เต ภิกฺขุโนวาทโต ปริพาหิเร กตฺตุกาโม อิมํ ภิกฺขุโนวาทกสมฺมุตึ อนุชานีติ เวทิตพฺโพ. เอวํ อิธ ปริพาหิเร กตฺตุกามตาย อนุชานิตฺวา ปรโต กโรนฺโตว ‘‘อนุชานามิ ภิกฺขเว อฏฺฐหงฺเคหิ สมนฺนาคต’’นฺติอาทิมาห. อิมานิ หิ อฏฺฐงฺคานิ ฉพฺพคฺคิยานํ สุปินนฺเตนปิ น ภูตปุพฺพานีติ. १४५-१४७. ‘अनुजानामि भिक्खवे’ (भिक्खूंनो, मी अनुमती देतो) याविषयी, कारण ते (षड्वर्गीय) भिक्खू “भिक्खूंनो, तुम्ही भिक्खुनींना उपदेश करू नका” असे म्हटले असता, सत्य (चार आर्यसत्ये) न पाहिलेले असल्यामुळे तथागतांच्या विषयी द्वेष धरून दुर्गतीला प्राप्त झाले असते. म्हणून, त्यांचे ते दुर्गतीला जाणे टाळू इच्छिणाऱ्या भगवंतांनी दुसऱ्याच एका उपायाने त्या भिक्खूंना भिक्खुनींना उपदेश करण्यापासून दूर ठेवण्याची इच्छा धरून या ‘भिक्खुनी-उपदेशक संमतीला’ अनुमती दिली, असे समजावे. या प्रकारे, येथे त्यांना दूर ठेवण्याच्या इच्छेने अनुमती देऊन, पुढे त्यांना खरोखरच दूर करत भगवंतांनी “भिक्खूंनो, मी आठ गुणांनी युक्त असलेल्याला अनुमती देतो” इत्यादी म्हटले. कारण ही आठ अंगे (गुण) षड्वर्गीय भिक्खूंच्या बाबतीत स्वप्नात देखील कधीही अस्तित्वात नव्हती. ตตฺถ สีลมสฺส อตฺถีติ สีลวา. อิทานิ ยญฺจ ตํ สีลํ, ยถา จ ตํ ตสฺส อตฺถิ นาม โหติ, ตํ ทสฺเสนฺโต ‘‘ปาติโมกฺขสํวรสํวุโต’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ปาติโมกฺโขว สํวโร ปาติโมกฺขสํวโร. ปาติโมกฺขสํวเรน สํวุโต สมนฺนาคโตติ ปาติโมกฺขสํวรสํวุโต. त्यामध्ये, ज्याचे शील आहे तो ‘शीलवान’ होय. आता, जे ते शील आहे आणि ज्या प्रकारे ते त्याच्यामध्ये अस्तित्वात असते, ते दर्शवताना भगवंतांनी “पातिमोक्खसंवरसंवुतो” (प्रातिमोक्ष संवराने संवृत असलेला) इत्यादी म्हटले. त्यामध्ये, प्रातिमोक्ष हाच संवर (संयम) आहे, म्हणून तो ‘प्रातिमोक्ष संवर’ होय. प्रातिमोक्ष संवराने जो संवृत (संयमित) आणि युक्त आहे, तो ‘प्रातिमोक्षसंवरसंवृत’ होय. วิหรตีติ วตฺตติ. วุตฺตญฺเหตํ วิภงฺเค – ‘विहरति’ (विहार करतो) म्हणजे वर्ततो (जीवन व्यतीत करतो). कारण विभंगामध्ये असे म्हटले आहे – ‘‘ปาติโมกฺขนฺติ สีลํ ปติฏฺฐา อาทิ จรณํ สํยโม สํวโร โมกฺขํ ปโมกฺขํ กุสลานํ ธมฺมานํ สมาปตฺติยา; สํวโรติ กายิโก อวีติกฺกโม วาจสิโก อวีติกฺกโม กายิกวาจสิโก อวีติกฺกโม. สํวุโตติ อิมินา ปาติโมกฺขสํวเรน อุเปโต โหติ สมุเปโต อุปคโต สมุปคโต อุปปนฺโน สมุปปนฺโน สมฺปนฺโน สมนฺนาคโต, เตน วุจฺจติ ‘ปาติโมกฺขสํวรสํวุโต’ติ. วิหรตีติ อิริยติ วตฺตติ ปาเลติ ยเปติ ยาเปติ จรติ วิหรติ, เตน วุจฺจติ ‘วิหรตี’’’ติ (วิภ. ๕๑๑-๕๑๒). “पातिमोक्ख” म्हणजे शील, आधार (प्रतिष्ठा), पाऊल (निर्वाणाकडे जाण्याचे आचरण), काय-वाचेचा संयम, कायद्वार व वचीद्वाराचे संवरण (बंद करणे), आणि कुशल धर्मांच्या प्राप्तीसाठी मुक्ती (श्रेष्ठ धर्म) किंवा प्रमुक्ती (मुख्य धर्म) होय. “संवर” म्हणजे कायिक उल्लंघन न करणे, वाचिक उल्लंघन न करणे, कायिक व वाचिक उल्लंघन न करणे होय. “संवृत” म्हणजे या पातिमोक्ख संवराने युक्त असणे, पूर्णपणे युक्त असणे, प्राप्त असणे, पूर्णपणे प्राप्त असणे, संपन्न असणे, पूर्णपणे संपन्न असणे, समन्वागत असणे होय; म्हणून त्याला “पातिमोक्खसंवरसंवृत” असे म्हटले जाते. “विहरति” (विहार करतो) म्हणजे हालचाल करतो, जीवनचक्र चालवतो, रक्षण करतो, जीवन कंठतो, काळ घालवतो, आचरण करतो, विहार करतो; म्हणून त्याला “विहरति” असे म्हटले जाते. हे भगवंतांनी सांगितले आहे। อาจารโคจรสมฺปนฺโนติ [Pg.54] มิจฺฉาชีวปฏิเสธเกน น เวฬุทานาทินา อาจาเรน, เวสิยาทิอโคจรํ ปหาย สทฺธาสมฺปนฺนกุลาทินา จ โคจเรน สมฺปนฺโน. อณุมตฺเตสุ วชฺเชสุ ภยทสฺสาวีติ อปฺปมตฺตเกสุ วชฺเชสุ ภยทสฺสาวี, ตานิ วชฺชานิ ภยโต ทสฺสนสีโลติ วุตฺตํ โหติ. สมาทาย สิกฺขติ สิกฺขาปเทสูติ อธิสีลสิกฺขาทิภาเวน ติธา ฐิเตสุ สิกฺขาปเทสุ ตํ ตํ สิกฺขาปทํ สมาทาย สมฺมา อาทาย สาธุกํ คเหตฺวา อวิชหนฺโต สิกฺขตีติ อตฺโถ. อยเมตฺถ สงฺเขโป, วิตฺถาโร ปน โย อิจฺฉติ, เตน วิสุทฺธิมคฺคโต คเหตพฺโพ. “आचारगोचरसंपन्न” म्हणजे मिथ्या आजीविकेचा निषेध करणाऱ्या, बांबू देणे इत्यादी नसलेल्या सदाचाराने युक्त असणे, आणि वेश्या इत्यादी अयोग्य गोचरांचा (जाण्याच्या ठिकाणांचा) त्याग करून श्रद्धासंपन्न कुळे इत्यादी योग्य गोचरांनी संपन्न असणे होय. “अणुमात्र दोषांमध्ये भय पाहणारा” (अणुमत्तेसु वज्जेसु भयदस्सावी) म्हणजे अगदी लहान दोषांमध्येही भय पाहणारा, म्हणजेच त्या दोषांना भयाचे कारण म्हणून पाहण्याचा स्वभाव असणारा, असा याचा अर्थ आहे. “शिक्षानियमांचे ग्रहण करून शिकतो” (समादाय सिक्खति सिक्खापदेसू) म्हणजे अधिशील शिक्षा इत्यादी रूपाने तीन प्रकारे राहिलेल्या शिक्षानियमांमध्ये त्या त्या शिक्षानियमाला ग्रहण करून, सम्यक प्रकारे ग्रहण करून, चांगल्या प्रकारे स्वीकारून, त्याचा त्याग न करता शिकतो, असा अर्थ आहे. हा येथे संक्षेप आहे; परंतु ज्याला सविस्तर माहिती हवी असेल, त्याने ती 'विसुद्धिमग्ग' मधून घ्यावी। พหุ สุตมสฺสาติ พหุสฺสุโต. สุตํ ธาเรตีติ สุตธโร; ยทสฺส ตํ พหุ สุตํ นาม, ตํ น สุตมตฺตเมว; อถ โข นํ ธาเรตีติ อตฺโถ. มญฺชูสายํ วิย รตนํ สุตํ สนฺนิจิตมสฺมินฺติ สุตสนฺนิจโย. เอเตน ยํ โส สุตํ ธาเรติ, ตสฺส มญฺชูสาย โคเปตฺวา สนฺนิจิตรตนสฺเสว จิรกาเลนาปิ อวินาสนํ ทสฺเสติ. อิทานิ ตํ สุตํ สรูปโต ทสฺเสนฺโต ‘‘เย เต ธมฺมา’’ติอาทิมาห, ตํ เวรญฺชกณฺเฑ วุตฺตนยเมว. อิทํ ปเนตฺถ นิคมนํ – ตถารูปาสฺส ธมฺมา พหุสฺสุตา โหนฺติ, ตสฺมา พหุสฺสุโต. ธาตา, ตสฺมา สุตธโร. วจสา ปริจิตา มนสานุเปกฺขิตา, ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺธา; ตสฺมา สุตสนฺนิจโย. ตตฺถ วจสา ปริจิตาติ วาจาย ปคุณา กตา. มนสานุเปกฺขิตาติ มนสา อนุเปกฺขิตา, อาวชฺชนฺตสฺส ทีปสหสฺเสน โอภาสิตา วิย โหนฺติ. ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺธาติ อตฺถโต จ การณโต จ ปญฺญาย สุฏฺฐุ ปฏิวิทฺธา สุปจฺจกฺขกตา โหนฺติ. ज्याचे ऐकणे (श्रुत/ज्ञान) पुष्कळ आहे, तो “बहुश्रुत” (बहुस्सुत) होय. जो ऐकलेले धारण करतो, तो “श्रुतधर” (सुतधर) होय; त्याचे जे पुष्कळ ऐकणे आहे, ते केवळ ऐकण्यापुरतेच नाही, तर तो ते धारण करतो, असा अर्थ आहे. पेटीमध्ये साठवून ठेवलेल्या रत्नाप्रमाणे ज्याच्यामध्ये श्रुत (ज्ञान) साठवलेले असते, तो “श्रुतसंचय” (सुतसन्निचय) होय. याद्वारे, तो जे श्रुत धारण करतो, ते पेटीत सुरक्षित ठेवलेल्या रत्नाप्रमाणे दीर्घकाळानंतरही नष्ट होत नाही, हे दर्शवले आहे. आता त्या श्रुताचे स्वरूप दर्शवताना “ये ते धम्मा” (जे ते धर्म) इत्यादी म्हटले आहे, ते वेरंजकांडात सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहे. परंतु हा येथे निष्कर्ष आहे - अशा प्रकारचे धर्म त्याने पुष्कळ ऐकलेले असतात, म्हणून तो “बहुश्रुत” होय. तो ते धारण करतो, म्हणून “श्रुतधर” होय. ते वाचेने परिचीत (पाठ), मनाने अनुपेक्षित (चिंतन केलेले) आणि दृष्टीने (प्रज्ञेने) सुप्रतिविद्ध (चांगले समजलेले) असतात, म्हणून तो “श्रुतसंचय” होय. त्यामध्ये, “वाचेने परिचीत” म्हणजे वाणीने वारंवार सराव केलेले (पाठ केलेले) असतात. “मनाने अनुपेक्षित” म्हणजे मनाने वारंवार चिंतन केलेले; विचार करताना ते हजारो दिव्यांनी प्रकाशित केल्यासारखे स्पष्ट दिसतात. “दृष्टीने सुप्रतिविद्ध” म्हणजे अर्थाने व कारणाने प्रज्ञेद्वारे चांगल्या प्रकारे जाणलेले आणि प्रत्यक्ष अनुभवलेले असतात। อยํ ปน พหุสฺสุโต นาม ติวิโธ โหติ – นิสฺสยมุจฺจนโก, ปริสุปฏฺฐาปโก, ภิกฺขุโนวาทโกติ. ตตฺถ นิสฺสยมุจฺจนเกน อุปสมฺปทาย ปญฺจวสฺเสน สพฺพนฺติเมน ปริจฺเฉเทน ทฺเว มาติกา ปคุณา วาจุคฺคตา กาตพฺพา ปกฺขทิวเสสุ ธมฺมสาวนตฺถาย สุตฺตนฺตโต จตฺตาโร ภาณวารา, สมฺปตฺตานํ ปริกถนตฺถาย อนฺธกวินฺทมหาราหุโลวาทอมฺพฏฺฐสทิโส เอโก กถามคฺโค, สงฺฆภตฺตมงฺคลามงฺคเลสุ อนุโมทนตฺถาย ติสฺโส อนุโมทนา, อุโปสถปวารณาทิชานนตฺถํ กมฺมากมฺมวินิจฺฉโย[Pg.55], สมณธมฺมกรณตฺถํ สมาธิวเสน วา วิปสฺสนาวเสน วา อรหตฺตปริโยสานเมกํ กมฺมฏฺฐานํ, เอตฺตกํ อุคฺคเหตพฺพํ. เอตฺตาวตา หิ อยํ พหุสฺสุโต โหติ จาตุทฺทิโส, ยตฺถ กตฺถจิ อตฺตโน อิสฺสริเยน วสิตุํ ลภติ. हा बहुश्रुत भिक्षू तीन प्रकारचा असतो - निश्रयमुक्त (निस्यमुच्चनक), परिषद-उपस्थापक (परिसुपट्ठापक) आणि भिक्षुणी-उपदेशक (भिक्खुनोवादक). त्यापैकी, निश्रयमुक्त होणाऱ्या भिक्षूने उपसंपदेनंतर पाच वर्षांनी, किमान मर्यादेनुसार, दोन मातिका (भिक्षू व भिक्षुणींचे प्रातिमोक्ष) चांगल्या प्रकारे पाठ व मुखोद्गत केल्या पाहिजेत; पंधरवड्याच्या दिवशी (पक्षदिवशी) धर्मश्रवणासाठी सूत्रांमधून चार भाणवार (पाठ) मुखोद्गत केले पाहिजेत; आलेल्या परिषदेला उपदेश करण्यासाठी अंधकविन्द सुत्त, महाराजहुलोवाद सुत्त किंवा अम्बट्ठ सुत्त यांसारखा एक कथा मार्ग (उपदेश पद्धती) अवगत असावा; संघभोजन, मंगल व अमंगल प्रसंगी अनुमोदना करण्यासाठी तीन प्रकारच्या अनुमोदना अवगत असाव्यात; उपोसथ, प्रवारणा इत्यादी गोष्टी समजण्यासाठी कर्माकर्म-विनिर्णय (लहान व मोठ्या संघादेशांचे निर्णय) माहीत असावा; श्रमणधर्माचे आचरण करण्यासाठी समाधी किंवा विपश्यनेच्या द्वारे अर्हत्त्वापर्यंत पोहोचवणारे एक कर्मस्थान (ध्यान पद्धती) शिकले पाहिजे; एवढे ज्ञान त्याने संपादन केले पाहिजे. कारण एवढ्या ज्ञानाने हा भिक्षू बहुश्रुत व चारी दिशांना फिरणारा (चातुर्दिश) होतो, आणि तो कोणत्याही ठिकाणी स्वतःच्या अधिकाराने (निश्रयदात्या गुरुशिवाय) राहू शकतो। ปริสุปฏฺฐาปเกน อุปสมฺปทาย ทสวสฺเสน สพฺพนฺติเมน ปริจฺเฉเทน ปริสํ อภิวินเย วิเนตุํ ทฺเว วิภงฺคา ปคุณา วาจุคฺคตา กาตพฺพา, อสกฺโกนฺเตน ตีหิ ชเนหิ สทฺธึ ปริวตฺตนกฺขมา กาตพฺพา, กมฺมากมฺมญฺจ ขนฺธกวตฺตญฺจ อุคฺคเหตพฺพํ. ปริสาย ปน อภิธมฺเม วินยนตฺถํ สเจ มชฺฌิมภาณโก โหติ มูลปณฺณาสโก อุคฺคเหตพฺโพ, ทีฆภาณเกน มหาวคฺโค, สํยุตฺตภาณเกน เหฏฺฐิมา วา ตโย วคฺคา มหาวคฺโค วา, องฺคุตฺตรภาณเกน เหฏฺฐา วา อุปริ วา อุปฑฺฒนิกาโย อุคฺคเหตพฺโพ, อสกฺโกนฺเตน ติกนิปาตโต ปฏฺฐาย เหฏฺฐา อุคฺคเหตุมฺปิ วฏฺฏติ. มหาปจฺจริยํ ปน ‘‘เอกํ อุคฺคณฺหนฺเตน จตุกฺกนิปาตํ วา ปญฺจกนิปาตํ วา คเหตุํ วฏฺฏตี’’ติ วุตฺตํ. ชาตกภาณเกน สาฏฺฐกถํ ชาตกํ อุคฺคเหตพฺพํ, ตโต โอรํ น วฏฺฏติ. ธมฺมปทมฺปิ สห วตฺถุนา อุคฺคเหตุํ วฏฺฏตีติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. ตโต ตโต สมุจฺจยํ กตฺวา มูลปณฺณาสกมตฺตํ วฏฺฏติ, น วฏฺฏตีติ? ‘‘น วฏฺฏตี’’ติ กุรุนฺทฏฺฐกถายํ ปฏิกฺขิตฺตํ, อิตราสุ วิจารณาเยว นตฺถิ. อภิธมฺเม กิญฺจิ อุคฺคเหตพฺพนฺติ น วุตฺตํ. ยสฺส ปน สาฏฺฐกถมฺปิ วินยปิฏกํ อภิธมฺมปิฏกญฺจ ปคุณํ, สุตฺตนฺเต จ วุตฺตปฺปกาโร คนฺโถ นตฺถิ, ปริสํ อุปฏฺฐาเปตุํ น ลภติ. เยน ปน สุตฺตนฺตโต วินยโต จ วุตฺตปฺปมาโณ คนฺโถ อุคฺคหิโต, อยํ ปริสุปฏฺฐาปโก พหุสฺสุโต โหติ ทิสาปาโมกฺโข เยนกามงฺคโม, ปริสํ อุปฏฺฐาเปตุํ ลภติ. परिषद-उपस्थापक भिक्षूने उपसंपदेनंतर दहा वर्षांनी, किमान मर्यादेनुसार, आपल्या परिषदेला अधिविनयात (उच्च विनयात) प्रशिक्षित करण्यासाठी दोन विभंग (भिक्षू व भिक्षुणींचे सुत्तविभंग) चांगल्या प्रकारे पाठ व मुखोद्गत केले पाहिजेत; जर तो असमर्थ असेल, तर त्याने तीन भिक्षूंसोबत मिळून ते पाठ करून घेण्यास समर्थ असावे; तसेच कर्माकर्म (संघाचे लहान-मोठे विधी) आणि खन्धकातील आचरण (कर्तव्ये) शिकले पाहिजे. परिषदेला अभिधम्मात प्रशिक्षित करण्यासाठी, जर तो मज्झिमनिकायचा वाचक (मज्झिमभाणक) असेल, तर त्याने 'मूलपण्णासक' शिकले पाहिजे; दीघनिकायच्या वाचकाने 'महावग्ग' शिकले पाहिजे; संयुत्तनिकायच्या वाचकाने खालचे तीन वग्ग किंवा 'महावग्ग' शिकले पाहिजे; अंगुत्तरनिकायच्या वाचकाने खालचा किंवा वरचा अर्धा निकाय शिकला पाहिजे; जर तो असमर्थ असेल, तर त्याने तिकनिपातापासून खालचा भाग शिकणेही योग्य आहे. परंतु महाप्रत्यरी (महापच्चरी) अट्ठकथेत म्हटले आहे की, “अंगुत्तरनिकायातील एक निपात शिकणाऱ्याने चतुक्कनिपात किंवा पंचकनिपात शिकणे योग्य आहे.” जातक वाचकाने अट्ठकथेसह जातक शिकले पाहिजे, त्यापेक्षा कमी शिकणे योग्य नाही. धम्मपदसुद्धा कथेसह (वत्थुसह) शिकणे योग्य आहे, असे महाप्रत्यरीमध्ये म्हटले आहे. “विविध सूत्रांमधून संग्रह करून केवळ मूलपण्णासक एवढे शिकणे योग्य आहे की नाही?” यावर कुरुन्द अट्ठकथेत “योग्य नाही” असे म्हणून ते नाकारले आहे; इतर अट्ठकथांमध्ये तर यावर विचारच केलेला नाही. अभिधम्मात काही शिकले पाहिजे असे म्हटलेले नाही. परंतु ज्या भिक्षूला अट्ठकथेसह विनयपिटक आणि अभिधम्मपिटक अवगत आहे, पण सुत्तपिटकात वर सांगितलेला ग्रंथ अवगत नाही, त्याला परिषदेची व्यवस्था करण्याची परवानगी मिळत नाही. परंतु ज्याने सुत्तपिटक व विनयपिटक यांमधून वर सांगितलेल्या प्रमाणाचा ग्रंथ शिकला आहे, तो परिषद-उपस्थापक, बहुश्रुत, दिशाप्रमोख (सर्व दिशांमध्ये प्रसिद्ध) आणि इच्छेनुसार संचार करणारा होतो; त्याला परिषदेची व्यवस्था करण्याची परवानगी मिळते। ภิกฺขุโนวาทเกน ปน สาฏฺฐกถานิ ตีณิ ปิฏกานิ อุคฺคเหตพฺพานิ, อสกฺโกนฺเตน จตูสุ นิกาเยสุ เอกสฺส อฏฺฐกถา ปคุณา กาตพฺพา, เอกนิกาเยน หิ เสสนิกาเยสุปิ ปญฺหํ กเถตุํ สกฺขิสฺสติ. สตฺตสุ ปกรเณสุ จตุปฺปกรณสฺส อฏฺฐกถา ปคุณา กาตพฺพา, ตตฺถ ลทฺธนเยน หิ เสสปกรเณสุ ปญฺหํ กเถตุํ สกฺขิสฺสติ. วินยปิฏกํ ปน นานตฺถํ นานาการณํ, ตสฺมา ตํ สทฺธึ อฏฺฐกถาย ปคุณํ กาตพฺพเมว. เอตฺตาวตา หิ ภิกฺขุโนวาทโก พหุสฺสุโต นาม โหตีติ. परंतु भिक्षुणी-उपदेशकाने अट्ठकथेसह तीनही पिटके शिकली पाहिजेत; जर तो असमर्थ असेल, तर त्याने चार निकायांपैकी एका निकायाची अट्ठकथा चांगल्या प्रकारे अवगत केली पाहिजे; कारण एका निकायाच्या ज्ञानाने तो इतर निकायांच्या प्रश्नांची उत्तरे देण्यासही समर्थ होईल. (अभिधम्माच्या) सात ग्रंथांपैकी चार ग्रंथांची अट्ठकथा चांगल्या प्रकारे अवगत केली पाहिजे; कारण त्यामध्ये मिळालेल्या पद्धतीद्वारे तो उर्वरित ग्रंथांच्या प्रश्नांची उत्तरे देण्यास समर्थ होईल. परंतु विनयपिटक हे विविध अर्थांचे व विविध कारणांचे (प्रकरणांचे) आहे, म्हणून ते अट्ठकथेसह चांगल्या प्रकारे अवगत केलेच पाहिजे. कारण एवढ्या ज्ञानाने भिक्षुणी-उपदेशक हा खरोखर “बहुश्रुत” होतो, असे समजावे। อุภยานิ [Pg.56] โข ปนสฺสาติอาทิ ปน ยสฺมา อญฺญสฺมึ สกเล นวงฺเคปิ พาหุสฺสจฺเจ สติ สาฏฺฐกถํ วินยปิฏกํ วินา น วฏฺฏติเยว, ตสฺมา วิสุํ วุตฺตํ. ตตฺถ วิตฺถาเรนาติ อุภโตวิภงฺเคน สทฺธึ. สฺวาคตานีติ สุฏฺฐุ อาคตานิ. ยถา อาคตานิ ปน สฺวาคตานิ โหนฺติ, ตํ ทสฺเสตุํ ‘‘สุวิภตฺตานี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ สุวิภตฺตานีติ สุฏฺฐุ วิภตฺตานิ ปทปจฺจาภฏฺฐสงฺกรโทสวิรหิตานิ. สุปฺปวตฺตีนีติ ปคุณานิ วาจุคฺคตานิ. สุวินิจฺฉิตานิ สุตฺตโสติ ขนฺธกปริวารโต อาหริตพฺพสุตฺตวเสน สุฏฺฐุ วินิจฺฉิตานิ. อนุพฺยญฺชนโสติ อกฺขรปทปาริปูริยา จ สุวินิจฺฉิตานิ อขณฺฑานิ อวิปรีตกฺขรานิ. เอเตน อฏฺฐกถา ทีปิตา, อฏฺฐกถาโต หิ เอส วินิจฺฉโย โหตีติ. ‘उभयानि खो पनस्स’ (दोन्ही प्रातिमोक्ष) इत्यादी शब्द का वापरले आहेत? कारण, इतर सर्व नऊ अंगांचे (नवांग बुद्धशासनाचे) बहुश्रुतपण (ज्ञान) असले तरीही, अट्ठकथेसह विनयपिटकाशिवाय (भिक्खुनींना) उपदेश करणे योग्य नाही; म्हणूनच हे स्वतंत्रपणे सांगितले आहे. त्यामध्ये, ‘वित्थारेन’ (विस्ताराने) म्हणजे दोन्ही विभंगांसह (भिक्खू आणि भिक्खुनी विभंग). ‘स्वागतानि’ (सु-आगत) म्हणजे मुखोद्गत किंवा चांगल्या प्रकारे आत्मसात केलेले. ज्या प्रकारे आत्मसात केलेले ‘स्वागत’ होते, ते दर्शवण्यासाठी ‘सुविभत्तानि’ (सुविभक्त) इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये ‘सुविभत्तानि’ म्हणजे चांगल्या प्रकारे विभागलेले, जे शब्दांची पुनरावृत्ती आणि शब्दांचे मिश्रण या दोषांपासून मुक्त आहे. ‘सुप्पवत्तीनि’ (सुप्रवृत्त) म्हणजे कंठस्थ आणि अस्खलित असलेले. ‘सुविनिच्छितानि सुत्तसो’ (सूत्रांनुसार सुविनिश्चित) म्हणजे खंधक आणि परिवार यांमधून उद्धृत करावयाच्या सूत्रांच्या आधारे चांगल्या प्रकारे निर्णय केलेले. ‘अनुब्यञ्जनसो’ (व्यंजनांनुसार/अक्षरांच्या अनुक्रमाने) म्हणजे अक्षरे आणि पदांच्या परिपूर्णतेने सुविनिश्चित केलेले, अखंड आणि न बदललेल्या अक्षरांचे बनलेले. याद्वारे अट्ठकथा (टीका) स्पष्ट केली आहे, कारण हा निर्णय अट्ठकथेवरूनच होतो. กลฺยาณวาโจติ สิถิลธนิตาทีนํ ยถาวิธานวจเนน ปริมณฺฑลปทพฺยญฺชนาย โปริยา วาจาย สมนฺนาคโต วิสฺสฏฺฐาย อเนลคฬาย อตฺถสฺส วิญฺญาปนิยา. กลฺยาณวากฺกรโณติ มธุรสฺสโร, มาตุคาโม หิ สรสมฺปตฺติรโต, ตสฺมา ปริมณฺฑลปทพฺยญฺชนมฺปิ วจนํ สรสมฺปตฺติรหิตํ หีเฬติ. เยภุยฺเยน ภิกฺขุนีนํ ปิโย โหติ มนาโปติ สพฺพาสํ ปิโย นาม ทุลฺลโภ, พหุตรานํ ปน ปณฺฑิตานํ ภิกฺขุนีนํ สีลาจารสมฺปตฺติยา ปิโย โหติ มนวฑฺฒนโก. ปฏิพโล โหติ ภิกฺขุนิโย โอวทิตุนฺติ สุตฺตญฺจ การณญฺจ ทสฺเสนฺโต วฏฺฏภเยน ตชฺเชตฺวา ภิกฺขุนิโย โอวทิตุํ ตาทิสํ ธมฺมํ เทเสตุํ สมตฺโถ โหติ. กาสายวตฺถวสนายาติ กาสายวตฺถนิวตฺถาย. ครุธมฺมนฺติ คิหิกาเล ภิกฺขุนิยา กายสํสคฺคํ วา สิกฺขมานาสามเณรีสุ เมถุนธมฺมํ วา อนชฺฌาปนฺนปุพฺโพ โหติ. มาตุคาโม หิ ปุพฺเพ กตมนุสฺสรนฺโต สํวเร ฐิตสฺสาปิ ธมฺมเทสนาย คารวํ น กโรติ. อถ วา ตสฺมิเยว อสทฺธมฺเม จิตฺตํ อุปฺปาเทติ. วีสติวสฺโส วาติ อุปสมฺปทาย วีสติวสฺโส ตโต อติเรกวสฺโส วา. เอวรูโป หิ วิสภาเคหิ วตฺถูหิ ปุนปฺปุนํ สมาคจฺฉนฺโตปิ ทหโร วิย สหสา สีลวินาสํ น ปาปุณาติ, อตฺตโน วยํ ปจฺจเวกฺขิตฺวา อยุตฺตฏฺฐาเน ฉนฺทราคํ วิเนตุํ ปฏิพโล โหติ, เตน วุตฺตํ – ‘‘วีสติวสฺโส วา โหติ อติเรกวีสติวสฺโส วา’’ติ. ‘कल्याणवाचो’ (कल्याणकारी वाणी असलेले) म्हणजे शिथिल (मृदू) आणि धनित (कठोर) इत्यादी अक्षरांच्या नियमांनुसार उच्चार केल्यामुळे परिपूर्ण पद व व्यंजनांनी युक्त, सुसंस्कृत (नागरी), स्पष्ट, लाळ न गळणारी आणि अर्थ समजावून सांगणारी वाणी असलेले. ‘कल्याणवाक्करणो’ म्हणजे मधुर आवाज असलेले. कारण स्त्रिया (मातुगाम) आवाजाच्या माधुर्यामध्ये रमतात; म्हणून जरी भाषण परिपूर्ण पद व व्यंजनांनी युक्त असले, तरी ते आवाजाच्या माधुर्याशिवाय असेल तर त्या त्याचा अनादर करतात. ‘येभुय्येन भिक्खुनीनं पियो होति मनापो’ (बहुतांश भिक्खुनींना प्रिय आणि आवडणारे असणे) म्हणजे सर्वांनाच प्रिय असणे दुर्मिळ आहे, परंतु आपल्या शील आणि आचाराच्या संपन्नतेमुळे ते बहुतांश सुज्ञ भिक्खुनींना प्रिय आणि मनाला आनंद देणारे (मनवड्ढनको) असतात. ‘पटिबलो होति भिक्खुनीयो ओवदितुं’ (भिक्खुनींना उपदेश करण्यास समर्थ असणे) म्हणजे सूत्र आणि कारण दाखवून, संसारचक्राच्या भयाने (वट्टभय) भयभीत करून भिक्खुनींना उपदेश करण्यासाठी तशा प्रकारचा धम्म उपदेशिण्यास ते समर्थ असतात. ‘कासायवत्थवसनाय’ म्हणजे काषाय वस्त्र (भगवे वस्त्र) परिधान केलेल्या (भिक्खुनी, सिक्खमाना किंवा सामणेरीच्या बाबतीत). ‘गरुधम्मं’ म्हणजे गृहस्थदशेत असताना (गिहिकाले) ज्यांनी कधीही भिक्खुनीशी शारीरिक संपर्क (कायसंसग्ग) किंवा सिक्खमाना व सामणेरींसोबत मैथुनधर्म केलेला नाही. कारण स्त्री पूर्वी केलेल्या गोष्टींचे स्मरण करून, संयमात स्थित असलेल्या थेरांच्या धम्मोपदेशाचाही आदर करत नाही, किंवा त्याच असद्धम्मामध्ये (मैथुनधर्मात) तिचे चित्त उत्पन्न होते. ‘वीसतिवस्सो वा’ म्हणजे उपसंपदेपासून वीस वर्षे किंवा त्याहून अधिक वर्षे झालेले. कारण असे थेर (स्थवीर) विजातीय विषयांच्या (स्त्रियांच्या) वारंवार संपर्कात आले तरी तरुण भिक्खूप्रमाणे अचानक शीलभ्रष्ट होत नाहीत. ते आपल्या वयाचा विचार करून अयोग्य ठिकाणी निर्माण होणारा छंदराग (आसक्ती) नष्ट करण्यास समर्थ असतात; म्हणूनच म्हटले आहे – ‘वीसतिवस्सो वा होति अतिरेकवीसतिवस्सो वा’ (वीस वर्षांचे किंवा वीस वर्षांपेक्षा अधिक वर्षांचे असतात). เอตฺถ [Pg.57] จ ‘‘สีลวา’’ติอาทิ เอกมงฺคํ, ‘‘พหุสฺสุโต โหตี’’ติอาทิ ทุติยํ, ‘‘อุภยานิ โข ปนสฺสา’’ติอาทิ ตติยํ, ‘‘กลฺยาณวาโจ โหติ กลฺยาณวากฺกรโณ’’ติ จตุตฺถํ, ‘‘เยภุยฺเยน ภิกฺขุนีนํ ปิโย โหติ มนาโป’’ติ ปญฺจมํ, ‘‘ปฏิพโล โหติ ภิกฺขุนิโย โอวทิตุ’’นฺติ ฉฏฺฐํ, ‘‘น โข ปเนต’’นฺติอาทิ สตฺตมํ, ‘‘วีสติวสฺโส’’ติอาทิ อฏฺฐมนฺติ เวทิตพฺพํ. येथे ‘शीलवा’ (शीलवान) इत्यादी पहिले अंग, ‘बहुस्सुतो होति’ (बहुश्रुत असणे) इत्यादी दुसरे अंग, ‘उभयानि खो पनस्स’ इत्यादी तिसरे अंग, ‘कल्याणवाचो होति कल्याणवाक्करणो’ हे चौथे अंग, ‘येभुय्येन भिक्खुनीनं पियो होति मनापो’ हे पाचवे अंग, ‘पटिबलो होति भिक्खुनीयो ओवदितुं’ हे सहावे अंग, ‘न खो पनेतं’ इत्यादी सातवे अंग आणि ‘वीसतिवस्सो’ इत्यादी आठवे अंग आहे, असे जाणावे. ๑๔๘. ญตฺติจตุตฺเถนาติ ปุพฺเพ วตฺถุสฺมึ วุตฺเตเนว. ครุธมฺเมหีติ ครุเกหิ ธมฺเมหิ, เต หิ คารวํ กตฺวา ภิกฺขุนีหิ สมฺปฏิจฺฉิตพฺพตฺตา ครุธมฺมาติ วุจฺจนฺติ. เอกโตอุปสมฺปนฺนายาติ เอตฺถ ภิกฺขุนีนํ สนฺติเก เอกโตอุปสมฺปนฺนาย, โย ครุธมฺเมน โอวทติ, ตสฺส ทุกฺกฏํ. ภิกฺขูนํ สนฺติเก อุปสมฺปนฺนาย ปน ยถาวตฺถุกเมว. १४८. ‘ञत्तिचतुत्थेन’ (ज्ञप्तिचतुर्थ कर्माने) म्हणजे पूर्वीच्या कथेत सांगितल्याप्रमाणेच. ‘गरुधम्मेहि’ म्हणजे आदरणीय किंवा महत्त्वाच्या नियमांद्वारे; कारण भिक्खुनींनी आदरपूर्वक स्वीकार करावयाचे असल्यामुळे त्यांना ‘गरुधम्म’ (अष्ट गरूधर्म) असे म्हटले जाते. ‘एकतोउपसम्पन्नाय’ या संदर्भात, जी भिक्खुनी केवळ एका बाजूने (भिक्खुनी संघाच्या उपस्थितीत) उपसंपन्न झाली आहे, तिला जो गरुधम्माचा उपदेश करतो, त्याला दुक्कट (दुष्कृत) अपराध होतो. परंतु, भिक्खू संघाच्या उपस्थितीत उपसंपन्न झालेल्या भिक्खुनीला उपदेश केल्यास, तो मूळ घटनेच्या स्वरूपाप्रमाणेच (यथावत्थुकमेव) होतो. ๑๔๙. ปริเวณํ สมฺมชฺชิตฺวาติ สเจ ปาโต อสมฺมฏฺฐํ สมฺมฏฺฐมฺปิ วา ปุน ติณปณฺณาทีหิ อุกฺลาปํ ปาทปฺปหาเรหิ จ วิกิณฺณวาลิกํ ชาตํ, สมฺมชฺชิตพฺพํ. อสมฺมฏฺฐญฺหิ ตํ ทิสฺวา ‘‘อยฺโย อตฺตโน นิสฺสิตเก ทหรภิกฺขูปิ วตฺตปฏิปตฺติยํ น โยเชติ, ธมฺมํเยว กเถตี’’ติ ตา ภิกฺขุนิโย อโสตุกามา วิย ภเวยฺยุํ. เตน วุตฺตํ – ‘‘ปริเวณํ สมฺมชฺชิตฺวา’’ติ. อนฺโตคามโต ปน ภิกฺขุนิโย อาคจฺฉนฺติโย ปิปาสิตา จ กิลนฺตา จ โหนฺติ, ตา ปานียญฺจ หตฺถปาทมุขสีตลกรณญฺจ ปจฺจาสีสนฺติ, ตสฺมิญฺจ อสติ ปุริมนเยเนว อคารวํ ชเนตฺวา อโสตุกามาปิ โหนฺติ. เตน วุตฺตํ – ‘‘ปานียํ ปริโภชนียํ อุปฏฺฐเปตฺวา’’ติ. १४९. ‘परिवेणं सम्मज्जित्वा’ (अंगण झाडून) म्हणजे जर सकाळी अंगण झाडलेले नसेल, किंवा झाडलेले असूनही पुन्हा गवत, पाने इत्यादींमुळे अस्वच्छ झाले असेल, किंवा पावलांमुळे वाळू पसरली असेल, तर ते झाडले पाहिजे. कारण ते न झाडलेले पाहून त्या भिक्खुनी असा विचार करू शकतात की, ‘हे आर्य स्वतःच्या आश्रयाखालील तरुण भिक्खूंनाही कर्तव्याचे पालन करण्यास सांगत नाहीत, केवळ धम्मोपदेशच करतात!’ आणि त्यामुळे त्या उपदेश ऐकण्यास अनुत्सुक होऊ शकतात. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘परिवेणं सम्मज्जित्वा’. तसेच, गावातून येणाऱ्या भिक्खुनी तहानलेल्या आणि थकलेल्या असतात; त्या पिण्याच्या पाण्याची आणि हात, पाय व तोंड धुण्यासाठी थंड पाण्याची अपेक्षा करतात. ते पाणी उपलब्ध नसल्यास, पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच त्यांच्या मनात अनादर निर्माण होऊन त्या उपदेश ऐकण्यास अनुत्सुक होतात. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘पानीयं परिभोजनीयं उपट्ठपेत्वा’ (पिण्याचे आणि वापराचे पाणी ठेवून). อาสนนฺติ นีจปีฐกผลกตฏฺฏิกกฏสารกาทิเภทํ อนฺตมโส สาขาภงฺคมฺปิ ‘‘อิทํ ตาสํ อาสนํ ภวิสฺสตี’’ติ เอวํ อาสนํ ปญฺญเปตฺวา. ธมฺมเทสนาปตฺติโมจนตฺถํ ปน ทุติโย อิจฺฉิตพฺโพ. เตน วุตฺตํ – ‘‘ทุติยํ คเหตฺวา นิสีทิตพฺพ’’นฺติ. นิสีทิตพฺพนฺติ น วิหารปจฺจนฺเต, อถ โข วิหารมชฺเฌ อุโปสถาคารสฺส วา โภชนสาลาย วา ทฺวาเร สพฺเพสํ โอสรณฏฺฐาเน นิสีทิตพฺพํ. สมคฺคาตฺถาติ สพฺพา อาคตตฺถาติ อตฺโถ. วตฺตนฺตีติ อาคจฺฉนฺติ; ปคุณา วาจุคฺคตาติ อตฺโถ. นิยฺยาเทตพฺโพติ อปฺเปตพฺโพ. โอสาเรตพฺโพติ ปาฬิ วตฺตพฺพา. วสฺสสตูปสมฺปนฺนายาติอาทิ วตฺตพฺพปาฬิทสฺสนํ. ‘आसनं’ (आसन) म्हणजे सखल पाट, लाकडी फळी, चटई, गवताची चटई इत्यादी प्रकारांचे, अगदी शेवटी झाडाच्या तोडलेल्या फांद्यांचे का होईना, ‘हे त्यांचे आसन होईल’ असा विचार करून आसन तयार करावे. धम्मोपदेशाच्या वेळी होणाऱ्या आपत्तीपासून (दोषापासून) मुक्त होण्यासाठी दुसऱ्या भिक्खूची (सोबतीची) आवश्यकता असते. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘दुतियं गहेत्वा निसीदितब्बं’ (दुसऱ्याला सोबत घेऊन बसावे). ‘निसीदितब्बं’ (बसावे) म्हणजे विहाराच्या एका कोपऱ्यात बसू नये, तर विहाराच्या मध्यभागी, उपोसथ घराच्या किंवा भोजनशाळेच्या दाराजवळ, जेथे सर्व जण एकत्र येतात अशा ठिकाणी बसावे. ‘समग्गत्था’ (तुम्ही सर्व एकत्र आलात का?) याचा अर्थ ‘सर्व जणी आल्या आहेत का?’ असा आहे. ‘वत्तन्ति’ (पाठ आहेत का?) म्हणजे मुखोद्गत आहेत का, अस्खलित आहेत का, असा अर्थ आहे. ‘निय्यादेतब्बो’ म्हणजे सोपवावे किंवा समारोप करावा. ‘ओसारेतब्बो’ म्हणजे पाळि (पाठाचे) वाचन करावे. ‘वस्ससतुपसम्पन्नाय’ इत्यादी शब्द वाचायच्या पाळिचे दर्शन घडवणारे आहेत. ตตฺถ [Pg.58] สามีจิกมฺมนฺติ มคฺคสมฺปทานพีชนปานียาปุจฺฉนาทิกํ อนุจฺฉวิกวตฺตํ. เอตฺถ จ ภิกฺขุนิยา ภิกฺขุสฺส อภิวาทนํ นาม อนฺโตคาเม วา พหิคาเม วา อนฺโตวิหาเร วา พหิวิหาเร วา อนฺตรฆเร วา รถิกาย วา อนฺตมโส ราชุสฺสารณายปิ วตฺตมานาย เทเว วสฺสมาเน สกทฺทมาย ภูมิยา ฉตฺตปตฺตหตฺถายปิ หตฺถิอสฺสาทีหิ อนุพทฺธายปิ กาตพฺพเมว. เอกาพทฺธาย ปาฬิยา ภิกฺขาจารํ ปวิสนฺเต ทิสฺวา เอกสฺมึ ฐาเน ‘‘วนฺทามิ อยฺยา’’ติ วนฺทิตุํ วฏฺฏติ. สเจ อนฺตรนฺตรา ทฺวาทสหตฺเถ มุญฺจิตฺวา คจฺฉนฺติ, วิสุํ วิสุํ วนฺทิตพฺพา. มหาสนฺนิปาเต นิสินฺเน เอกสฺมึเยว ฐาเน วนฺทิตุํ วฏฺฏติ. เอส นโย อญฺชลิกมฺเมปิ. ยตฺถ กตฺถจิ นิสินฺนาย ปน ปจฺจุฏฺฐานํ กาตพฺพํ, ตสฺส ตสฺส สามีจิกมฺมสฺส อนุรูเป ปเทเส จ กาเล จ ตํ ตํ กาตพฺพํ. त्यामध्ये ‘सामीचिकम्मं’ (योग्य आदर दाखवणे) म्हणजे रस्ता देणे, पंख्याने वारा घालणे, पिण्याच्या पाण्यासाठी विचारणे इत्यादी योग्य कर्तव्ये. आणि येथे, भिक्खुनीने भिक्खूला अभिवादन करणे हे अनिवार्यच आहे – मग ते गावात असो वा गावाबाहेर, विहाराच्या आत असो वा विहाराच्या बाहेर, घराच्या आत असो वा रस्त्यावर, अगदी राजाच्या आगमनामुळे रस्ता मोकळा केला जात असताना, पाऊस पडत असताना, चिखलमय जमिनीवर, हातात छत्री आणि पात्र घेतलेले असताना, किंवा हत्ती-घोडे इत्यादी प्राणी मागे लागलेले असतानाही ते केलेच पाहिजे. भिक्खू एकापाठोपाठ एक सलग रांगेत भिक्षेसाठी प्रवेश करत असताना पाहून, एकाच ठिकाणी ‘वंदामि अय्या’ (आर्यांना वंदन करतो) असे म्हणून वंदन करणे योग्य आहे. जर ते आपापसात बारा हातांचे अंतर ठेवून चालत असतील, तर त्यांना वेगवेगळे वंदन केले पाहिजे. मोठ्या सभेत भिक्खू बसलेले असताना एकाच ठिकाणी वंदन करणे योग्य आहे. हाच नियम अंजलि कर्मालाही (हात जोडण्यालाही) लागू होतो. परंतु, भिक्खू कोठेही बसलेला असला तरी भिक्खुनीने उठून उभे राहिले पाहिजे (पच्चुठ्ठान), आणि त्या त्या आदराच्या कर्तव्यानुसार योग्य ठिकाणी आणि योग्य वेळी तो तो आदर व्यक्त केला पाहिजे. สกฺกตฺวาติ ยถา กโต สุกโต โหติ, เอวํ กตฺวา. ครุํกตฺวาติ ตตฺถ คารวํ ชเนตฺวา. มาเนตฺวาติ มเนน ปิยํ กตฺวา. ปูเชตฺวาติ อิเมสํเยว ติณฺณํ กิจฺจานํ กรเณน ปูเชตฺวา. อนติกฺกมนีโยติ น อติกฺกมิตพฺโพ. 'सक्कतवा' (सत्कार करून) म्हणजे ज्या प्रकारे केले असता ते सुकृत (चांगल्या प्रकारे केलेले) होते, त्या प्रकारे करून. 'गरुंकत्वा' (आदर करून) म्हणजे त्या (अभिवादन इत्यादी) मध्ये आदर उत्पन्न करून. 'मानेत्वा' (मान देऊन) म्हणजे मनाने प्रिय करून. 'पुजेत्वा' (पूजा करून) म्हणजे याच तीन कृत्यांच्या (सत्कार, आदर व मान देण्याच्या) करण्याद्वारे पूजा करून. 'अनतिक्कमनीयो' (अनुलंघनीय) म्हणजे उल्लंघन न करण्यायोग्य होय. อภิกฺขุเก อาวาเสติ เอตฺถ สเจ ภิกฺขุนุปสฺสยโต อฑฺฒโยชนพฺภนฺตเร โอวาททายกา ภิกฺขู น วสนฺติ, อยํ อภิกฺขุโก อาวาโส นาม. เอตฺถ วสฺสํ น วสิตพฺพํ. วุตฺตญฺเหตํ – ‘‘อภิกฺขุโก นาม อาวาโส น สกฺกา โหติ โอวาทาย วา สํวาสาย วา คนฺตุ’’นฺติ (ปาจิ. ๑๐๔๘). น จ สกฺกา ตโต ปรํ ปจฺฉาภตฺตํ คนฺตฺวา ธมฺมํ สุตฺวา อาคนฺตุํ. สเจ ตตฺถ วสฺสํ วสิตุํ อนิจฺฉมานา ภิกฺขุนิโย ญาตกา วา อุปฏฺฐากา วา เอวํวทนฺติ – ‘‘วสถ, อยฺเย, มยํ ภิกฺขู อาเนสฺสามา’’ติ วฏฺฏติ. สเจ ปน วุตฺตปฺปมาเณ ปเทเส วสฺสํ อุปคนฺตุกามา ภิกฺขู อาคนฺตฺวา สาขามณฺฑเปปิ เอกรตฺตํ วุตฺถา โหนฺติ; น นิมนฺติตา หุตฺวา คนฺตุกามา. เอตฺตาวตาปิ สภิกฺขุโก อาวาโส โหติ, เอตฺถ วสฺสํ อุปคนฺตุํ วฏฺฏติ. อุปคจฺฉนฺตีหิ จ ปกฺขสฺส เตรสิยํเยว ภิกฺขู ยาจิตพฺพา – ‘‘มยํ อยฺยา ตุมฺหากํ โอวาเทน วสิสฺสามา’’ติ. ยโต ปน อุชุนา มคฺเคน อฑฺฒโยชเน ภิกฺขูนํ วสนฏฺฐานํ, เตน ปน มคฺเคน คจฺฉนฺตีนํ ชีวิตนฺตราโย วา พฺรหฺมจริยนฺตราโย วา โหติ, อญฺเญน มคฺเคน คจฺฉนฺตีนํ [Pg.59] อติเรกฑฺฒโยชนํ โหติ, อยํ อภิกฺขุกาวาสฏฺฐาเนเยว ติฏฺฐติ. สเจ ปน ตโต คาวุตมตฺเต อญฺโญ ภิกฺขุนุปสฺสโย เขมฏฺฐาเน โหติ, ตาหิ ภิกฺขุนีหิ ตา ภิกฺขุนิโย ยาจิตฺวา ปุน คนฺตฺวา ภิกฺขู ยาจิตพฺพา ‘‘อยฺยา อมฺหากํ อุชุมคฺเค อนฺตราโย อตฺถิ, อญฺเญน มคฺเคน อติเรกฑฺฒโยชนํ โหติ. อนฺตรามคฺเค ปน อมฺหากํ อุปสฺสยโต คาวุตมตฺเต อญฺโญ ภิกฺขุนุปสฺสโย อตฺถิ, อยฺยานํ สนฺติกา ตตฺถ อาคตโอวาเทน วสิสฺสามา’’ติ. เตหิ ภิกฺขูหิ สมฺปฏิจฺฉิตพฺพํ. ตโต ตาหิ ภิกฺขุนีหิ ตํ ภิกฺขุนุปสฺสยํ อาคนฺตฺวา อุโปสโถ กาตพฺโพ, ตา วา ภิกฺขุนิโย ทิสฺวา อตฺตโน อุปสฺสยเมว คนฺตฺวา กาตุมฺปิ วฏฺฏติ. 'भिक्षू नसलेल्या आरामात' (अभिक्खुके आवासे) या पाठात, जर भिक्षुणींच्या विहारापासून अर्ध्या योजनेच्या आत उपदेश (ओवाद) देणारे भिक्षू राहत नसतील, तर याला 'अभिक्खुक आवास' (भिक्षू नसलेला आवास) असे म्हणतात. येथे वर्षावास करू नये. कारण असे म्हटले आहे की - 'भिक्षू नसलेल्या आरामात उपदेशासाठी किंवा संवासासाठी (उपोसथादी कर्मांसाठी) जाणे शक्य नसते.' आणि तिथून पुढे दुपारच्या जेवणानंतर जाऊन, धम्म ऐकून परत येणे शक्य नसते. जर तिथे वर्षावास करण्याची इच्छा नसलेल्या भिक्षुणींना त्यांचे नातेवाईक किंवा उपस्थायक (सेवक) असे म्हणतात की - 'आर्ये, तुम्ही येथेच राहा, आम्ही भिक्षूंना घेऊन येऊ,' तर तिथे राहणे योग्य आहे. परंतु, जर सांगितलेल्या प्रमाणाच्या (अर्ध्या योजनेच्या) प्रदेशात वर्षावास करू इच्छिणारे भिक्षू येऊन केवळ एका रात्रीसाठी पानांच्या मंडपात (शाखामंडपात) राहिले असतील; आणि ते निमंत्रित होऊन निघून जाऊ इच्छिणारे नसतील, तर तेवढ्यानेही तो 'सभिक्खुक आवास' (भिक्षू असलेला आवास) होतो. येथे वर्षावास करणे योग्य आहे. आणि वर्षावास करणाऱ्या भिक्षुणींनी पक्षाच्या (पंधरवड्याच्या) तेराव्या दिवशीच भिक्षूंना अशी विनंती करावी की - 'भन्ते, आम्ही आपल्या उपदेशाच्या (ओवादाच्या) आश्रयाने राहू.' परंतु, ज्या भिक्षुणींच्या विहारापासून सरळ मार्गाने अर्ध्या योजनेवर भिक्षूंचे राहण्याचे ठिकाण असेल, पण त्या सरळ मार्गाने जाणाऱ्या भिक्षुणींच्या जीवाला धोका (जीवितंतराय) किंवा ब्रह्मचर्याला धोका (ब्रह्मचरियंतराय) असेल, आणि दुसऱ्या (वाकड्या) मार्गाने जाणाऱ्यांना अर्ध्या योजनेपेक्षा जास्त अंतर पडत असेल, तर तो विहार 'अभिक्खुक आवास' याच श्रेणीत राहतो. परंतु, जर तिथून एक गाऊत अंतरावर सुरक्षित ठिकाणी दुसरा भिक्षुणी विहार असेल, तर त्या भिक्षुणींनी त्या दुसऱ्या विहारातील भिक्षुणींना विनंती करून, पुन्हा जाऊन भिक्षूंना अशी विनंती करावी की - 'भन्ते, आमच्या सरळ मार्गात धोका आहे, आणि दुसऱ्या मार्गाने अर्ध्या योजनेपेक्षा जास्त अंतर होते. परंतु आमच्या विहारापासून वाटेत एक गाऊत अंतरावर दुसरा भिक्षुणी विहार आहे. आम्ही पूज्य भन्ते यांच्याकडून तिथे येणाऱ्या उपदेशाच्या (ओवादाच्या) आश्रयाने राहू.' त्या भिक्षूंनी हे मान्य करावे. त्यानंतर त्या भिक्षुणींनी त्या भिक्षुणी विहारात येऊन उपोसथ करावा, किंवा त्या भिक्षुणींना भेटून स्वतःच्याच विहारात परत जाऊन उपोसथ करणेही योग्य आहे. สเจ ปน วสฺสํ อุปคนฺตุกามา ภิกฺขู จาตุทฺทเส วิหารํ อาคจฺฉนฺติ, ภิกฺขุนีหิ จ ‘‘อิธ อยฺยา วสฺสํ วสิสฺสถา’’ติ ปุจฺฉิตา ‘‘อามา’’ติ วตฺวา ปุน ตาหิ ‘‘เตนหิ อยฺยา มยมฺปิ ตุมฺหากํ โอวาทํ อนุชีวนฺติโย วสิสฺสามา’’ติ วุตฺตา ทุติยทิวเส คาเม ภิกฺขาจารสมฺปทํ อปสฺสนฺตา ‘‘น สกฺกา อิธ วสิตุ’’นฺติ ปกฺกมนฺติ. อถ ตา ภิกฺขุนิโย อุโปสถทิวเส วิหารํ คนฺตฺวา ภิกฺขู น ปสฺสนฺติ, เอตฺถ กึ กาตพฺพนฺติ? ยตฺถ ภิกฺขู วสนฺติ, ตตฺถ คนฺตฺวา ปจฺฉิมิกาย วสฺสํ อุปคนฺตพฺพํ. ‘‘ปจฺฉิมิกาย วสฺสํ อุปคนฺตุํ อาคมิสฺสนฺตี’’ติ วา อาโภคํ กตฺวา อาคตานํ สนฺติเก โอวาเทน วสิตพฺพํ. สเจ ปน ปจฺฉิมิกายปิ น เกจิ อาคจฺฉนฺติ, อนฺตรามคฺเค จ ราชภยํ วา โจรภยํ วา ทุพฺภิกฺขํ วา โหติ, อภิกฺขุกาวาเส วสนฺติยา อาปตฺติ, วสฺสจฺเฉทํ กตฺวา คจฺฉนฺติยาปิ อาปตฺติ, สา รกฺขิตพฺพา. อาปทาสุ หิ อภิกฺขุเก อาวาเส วสนฺติยา อนาปตฺติ วุตฺตา. สเจ อาคนฺตฺวา วสฺสํ อุปคตา ภิกฺขู ปุน เกนจิ การเณน ปกฺกมนฺติ, วสิตพฺพเมว. วุตฺตญฺเหตํ – ‘‘อนาปตฺติ วสฺสูปคตา ภิกฺขู ปกฺกนฺตา วา โหนฺติ วิพฺภนฺตา วา กาลงฺกตา วา ปกฺขสงฺกนฺตา วา อาปทาสุ อุมฺมตฺติกาย อาทิกมฺมิกายา’’ติ. ปวาเรนฺติยา ปน ยตฺถ ภิกฺขู อตฺถิ, ตตฺถ คนฺตฺวา ปวาเรตพฺพํ. परंतु, जर वर्षावास करू इच्छिणारे भिक्षू चौदाव्या दिवशी विहारात आले, आणि भिक्षुणींनी 'भन्ते, आपण येथे वर्षावास करणार का?' असे विचारले असता 'होय' असे म्हणून, पुन्हा त्या भिक्षुणींनी 'तर मग भन्ते, आम्हीही आपल्या उपदेशावर अवलंबून राहू' असे म्हटल्यावर, दुसऱ्या दिवशी गावात भिक्षेची सुलभता न दिसल्यामुळे 'येथे राहणे शक्य नाही' असे विचार करून निघून गेले. त्यानंतर त्या भिक्षुणी उपोसथाच्या दिवशी विहारात जाऊन भिक्षूंना पाहत नाहीत, तर अशा वेळी काय करावे? जिथे भिक्षू राहतात, तिथे जाऊन पश्चिमिक वर्षावास (दुसरा वर्षावास) करावा. किंवा 'पश्चिमिक वर्षावासासाठी भिक्षू येतील' असा विचार करून, आलेल्या भिक्षूंच्या जवळ उपदेशाच्या आश्रयाने राहावे. परंतु, जर पश्चिमिक वर्षावासालाही कोणी आले नाही, आणि वाटेत राजाचे भय (राजभय), चोरांचे भय (चोरभय) किंवा दुष्काळ असेल, तर भिक्षू नसलेल्या आरामात राहणाऱ्या भिक्षुणीला आपत्ती (दोष) होते, आणि वर्षावास खंडित करून जाणाऱ्या भिक्षुणीलाही आपत्ती होते; तिचे रक्षण केले पाहिजे. कारण आपत्तीच्या वेळी (संकटकाळात) भिक्षू नसलेल्या आरामात राहणाऱ्या भिक्षुणीला अनापत्ती (दोष नाही) असे म्हटले आहे. जर येऊन वर्षावास स्वीकारलेले भिक्षू पुन्हा काही कारणाने निघून गेले, तर तिथेच राहावे. कारण असे म्हटले आहे की - 'वर्षावास स्वीकारलेले भिक्षू निघून गेले असतील, किंवा धर्म सोडून गेले असतील, किंवा कालवश झाले असतील, किंवा दुसऱ्या पक्षात गेले असतील, तर अनापत्ती आहे; तसेच संकटाच्या वेळी, वेड्या भिक्षुणीला आणि आदिकर्मिकेला (प्रथम चूक करणाऱ्या भिक्षुणीला) अनापत्ती आहे.' परंतु, प्रवारणा (पवारणा) करणाऱ्या भिक्षुणीने जिथे भिक्षू असतील तिथे जाऊन प्रवारणा करावी. อนฺวทฺธมาสนฺติ อทฺธมาเส อทฺธมาเส. ทฺเว ธมฺมา ปจฺจาสีสิตพฺพาติ ทฺเว ธมฺมา อิจฺฉิตพฺพา. อุโปสถปุจฺฉกนฺติ อุโปสถปุจฺฉนํ, ตตฺถ ปนฺนรสิเก อุโปสเถ ปกฺขสฺส จาตุทฺทสิยํ จาตุทฺทสิเก เตรสิยํ คนฺตฺวา อุโปสโถ [Pg.60] ปุจฺฉิตพฺโพ. มหาปจฺจริยํ ปน ‘‘ปกฺขสฺส เตรสิยํเยว คนฺตฺวา ‘อยํ อุโปสโถ จาตุทฺทสิโก ปนฺนรสิโก’ติ ปุจฺฉิตพฺพ’’นฺติ วุตฺตํ. อุโปสถทิวเส โอวาทตฺถาย อุปสงฺกมิตพฺพํ. ปาฏิปททิวสโต ปน ปฏฺฐาย ธมฺมสวนตฺถาย คนฺตพฺพํ. อิติ ภควา อญฺญสฺส กมฺมสฺส โอกาสํ อทตฺวา นิรนฺตรํ ภิกฺขุนีนํ ภิกฺขูนํ สนฺติเก คมนเมว ปญฺญเปสิ. กสฺมา? มนฺทปญฺญตฺตา มาตุคามสฺส. มนฺทปญฺโญ หิ มาตุคาโม, ตสฺมา นิจฺจํ ธมฺมสวนํ พหูปการํ. เอวญฺจ สติ ‘‘ยํ มยํ ชานาม, ตเมว อยฺยา ชานนฺตี’’ติ มานํ อกตฺวา ภิกฺขุสงฺฆํ ปยิรูปาสมานา สาตฺถิกํ ปพฺพชฺชํ กริสฺสนฺติ, ตสฺมา ภควา เอวมกาสิ. ภิกฺขุนิโยปิ ‘‘ยถานุสิฏฺฐํ ปฏิปชฺชิสฺสามา’’ติ สพฺพาเยว นิรนฺตรํ วิหารํ อุปสงฺกมึสุ. วุตฺตญฺเหตํ – 'अन्वड्ढमासं' म्हणजे प्रत्येक पंधरवड्याला (अर्ध्या महिन्यात). 'द्वे धम्मा पच्चासीसितब्बा' म्हणजे दोन गोष्टींची (धर्मांची) अपेक्षा करावी (इच्छा करावी). 'उपोसथपुच्छकं' म्हणजे उपोसथाविषयी विचारणे. त्यात पंधरा दिवसांच्या उपोसथासाठी पक्षाच्या चौदाव्या दिवशी, आणि चौदा दिवसांच्या उपोसथासाठी तेराव्या दिवशी जाऊन उपोसथाविषयी विचारावे. परंतु 'महापच्चरी' मध्ये म्हटले आहे की - 'पक्षाच्या तेराव्या दिवशीच जाऊन हा उपोसथ चौदाव्या दिवशीचा आहे की पंधराव्या दिवशीचा? असे विचारावे.' उपोसथाच्या दिवशी उपदेशासाठी (ओवादासाठी) जावे. आणि प्रतिपदेच्या दिवसापासून धम्मश्रवणासाठी जावे. अशा प्रकारे भगवंतांनी इतर कोणत्याही कामाला सवड न देता, भिक्षुणींना सतत भिक्षूंच्या जवळ जाण्याचाच नियम केला. कशासाठी? स्त्रियांच्या अल्प बुद्धीमुळे. कारण स्त्रिया अल्प बुद्धीच्या असतात, म्हणून सतत धम्म ऐकणे त्यांच्यासाठी अत्यंत उपकारक ठरते. आणि असे झाले असता, 'जे आम्हाला माहीत आहे, तेच भन्ते लोकांनाही माहीत आहे' असा मान (अभिमान) न बाळगता, भिक्षुसंघाची सेवा करत त्या आपले प्रव्रज्या (दीक्षा) सार्थक करतील, म्हणूनच भगवंतांनी असा नियम केला. भिक्षुणींनीही 'जसा उपदेश केला आहे, तसेच आम्ही आचरण करू' असा विचार करून सर्वच भिक्षुणी सतत विहारात जाऊ लागल्या. कारण असे म्हटले आहे की - ‘‘เตน โข ปน สมเยน สพฺโพ ภิกฺขุนิสงฺโฆ โอวาทํ คจฺฉติ. มนุสฺสา อุชฺฌายนฺติ ขิยฺยนฺติ วิปาเจนฺติ ‘ชายาโย อิมา อิเมสํ, ชาริโย อิมา อิเมสํ, อิทานิเม อิมาหิ สทฺธึ อภิรมิสฺสนฺตี’ติ. ภควโต เอตมตฺถํ อาโรเจสุํ – ‘น, ภิกฺขเว, สพฺเพน ภิกฺขุนิสงฺเฆน โอวาโท คนฺตพฺโพ, คจฺเฉยฺย เจ, อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺส. อนุชานามิ ภิกฺขเว จตูหิ ปญฺจหิ ภิกฺขุนีหิ โอวาทํ คนฺตุ’นฺติ. ปุนปิ ตเถว อุชฺฌายึสุ. ปุน ภควา ‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, ทฺเว ติสฺโส ภิกฺขุนิโย โอวาทํ คนฺตุ’’’นฺติ อาห. 'त्या वेळी सर्व भिक्षुणीसंघ उपदेशासाठी (ओवादासाठी) जात असे. लोक निंदा करू लागले, टीका करू लागले आणि पसरवू लागले की - ह्या यांच्या मुख्य पत्नी आहेत, ह्या यांच्या उपपत्नी आहेत, आता हे यांच्यासोबत रममाण होतील. भगवंतांना ही गोष्ट सांगण्यात आली - भिक्षूंनो, सर्व भिक्षुणीसंघाने उपदेशासाठी जाऊ नये. जर गेल्या, तर दुक्कट (दुष्कृत) आपत्ती होते. भिक्षूंनो, मी चार किंवा पाच भिक्षुणींनी उपदेशासाठी जाण्यास अनुमती देतो. पुन्हा तसेच लोक निंदा करू लागले. पुन्हा भगवंतांनी म्हटले - भिक्षूंनो, मी दोन किंवा तीन भिक्षुणींनी उपदेशासाठी जाण्यास अनुमती देतो.' ตสฺมา ภิกฺขุนิสงฺเฆน ทฺเว ติสฺโส ภิกฺขุนิโย ยาจิตฺวา เปเสตพฺพา – ‘‘เอถยฺเย, ภิกฺขุสงฺฆํ โอวาทูปสงฺกมนํ ยาจถ, ภิกฺขุนิสงฺโฆ อยฺยา…เป… โอวาทูปสงฺกมน’’นฺติ (จูฬว. ๔๑๓). ตาหิ ภิกฺขุนีหิ อารามํ คนฺตพฺพํ. ตโต โอวาทปฏิคฺคาหกํ เอกํ ภิกฺขุํ อุปสงฺกมิตฺวา วนฺทิตฺวา โส ภิกฺขุ เอกาย ภิกฺขุนิยา เอวมสฺส วจนีโย ‘‘ภิกฺขุนิสงฺโฆ, อยฺย, ภิกฺขุสงฺฆสฺส ปาเท วนฺทติ, โอวาทูปสงฺกมนญฺจ ยาจติ, ลภตุ กิร อยฺย ภิกฺขุนิสงฺโฆ โอวาทูปสงฺกมน’’นฺติ. เตน ภิกฺขุนา ปาติโมกฺขุทฺเทสโก ภิกฺขุ อุปสงฺกมิตฺวา เอวมสฺส วจนีโย ‘‘ภิกฺขุนิสงฺโฆ ภนฺเต ภิกฺขุสงฺฆสฺส ปาเท วนฺทติ, โอวาทูปสงฺกมนญฺจ ยาจติ, ลภตุ กิร ภนฺเต ภิกฺขุนิสงฺโฆ โอวาทูปสงฺกมน’’นฺติ. ปาติโมกฺขุทฺเทสเกน วตฺตพฺโพ ‘‘อตฺถิ โกจิ ภิกฺขุ ภิกฺขุโนวาทโก สมฺมโต’’ติ. สเจ โหติ โกจิ ภิกฺขุ [Pg.61] ภิกฺขุโนวาทโก สมฺมโต, ปาติโมกฺขุทฺเทสเกน วตฺตพฺโพ ‘‘อิตฺถนฺนาโม ภิกฺขุ ภิกฺขุโนวาทโก สมฺมโต, ตํ ภิกฺขุนิสงฺโฆ อุปสงฺกมตู’’ติ. त्यामुळे भिक्खुनीसंघाने दोन किंवा तीन भिक्खुनींना विनंती करून पाठवावे – “या, आर्यांनो! भिक्खूसंघाकडे जाऊन ओवादासाठी (उपदेशासाठी) भेटीची याचना करा. भिक्खुनीसंघ आर्यांच्या... पे... ओवादासाठी भेटीची याचना करत आहे.” त्या भिक्खुनींनी आरामात जावे. त्यानंतर ओवाद स्वीकारणाऱ्या एका भिक्खूजवळ जाऊन, त्यांना वंदन करून, त्या भिक्खूला एका भिक्खुनीने याप्रमाणे सांगावे – “भन्ते, भिक्खुनीसंघ भिक्खूसंघाच्या चरणांना वंदन करतो आणि ओवादासाठी भेटीची याचना करतो. भन्ते, भिक्खुनीसंघाला ओवादासाठी भेटीची अनुमती मिळावी.” त्या भिक्खूने पातिमोक्ख उद्देशक भिक्खूजवळ जाऊन याप्रमाणे सांगावे – “भन्ते, भिक्खुनीसंघ भिक्खूसंघाच्या चरणांना वंदन करतो आणि ओवादासाठी भेटीची याचना करतो. भन्ते, भिक्खुनीसंघाला ओवादासाठी भेटीची अनुमती मिळावी.” पातिमोक्ख उद्देशकाने विचारावे – “भिक्खुनी-ओवादक म्हणून संमत असलेला कोणी भिक्खू आहे का?” जर भिक्खुनी-ओवादक म्हणून संमत असलेला कोणी भिक्खू असेल, तर पातिमोक्ख उद्देशकाने सांगावे – “अमुक नावाचा भिक्खू भिक्खुनी-ओवादक म्हणून संमत आहे, भिक्खुनीसंघाने त्यांच्याकडे जावे.” สเจ น โหติ โกจิ ภิกฺขุ ภิกฺขุโนวาทโก สมฺมโต, ปาติโมกฺขุทฺเทสเกน วตฺตพฺโพ – ‘‘โก อายสฺมา อุสฺสหติ ภิกฺขุนิโย โอวทิตุ’’นฺติ. สเจ โกจิ ภิกฺขุ อุสฺสหติ ภิกฺขุนิโย โอวทิตุํ, โส จ โหติ อฏฺฐหงฺเคหิ สมนฺนาคโต, สมฺมนฺนิตฺวา วตฺตพฺโพ – ‘‘อิตฺถนฺนาโม ภิกฺขุ ภิกฺขุโนวาทโก สมฺมโต, ตํ ภิกฺขุนิสงฺโฆ อุปสงฺกมตู’’ติ. जर भिक्खुनी-ओवादक म्हणून संमत असलेला कोणी भिक्खू नसेल, तर पातिमोक्ख उद्देशकाने विचारावे – “कोणते आयुष्यमान भिक्खुनींना उपदेश करण्यास उत्सुक आहेत?” जर कोणी भिक्खू भिक्खुनींना उपदेश करण्यास उत्सुक असेल आणि तो आठ अंगांनी युक्त असेल, तर त्याला संमत करून सांगावे – “अमुक नावाचा भिक्खू भिक्खुनी-ओवादक म्हणून संमत आहे, भिक्खुनीसंघाने त्यांच्याकडे जावे.” สเจ ปน โกจิ น อุสฺสหติ ภิกฺขุนิโย โอวทิตุํ, ปาติโมกฺขุทฺเทสเกน วตฺตพฺโพ – ‘‘นตฺถิ โกจิ ภิกฺขุ ภิกฺขุโนวาทโก สมฺมโต, ปาสาทิเกน ภิกฺขุนิสงฺโฆ สมฺปาเทตู’’ติ. เอตฺตาวตา หิ สกลํ สิกฺขตฺตยสงฺคหํ สาสนมาโรจิตํ โหติ. เตน ภิกฺขุนา ‘‘สาธู’’ติ สมฺปฏิจฺฉิตฺวา ปาฏิปเท ภิกฺขุนีนํ อาโรเจตพฺพํ. ภิกฺขุนิสงฺเฆนปิ ตา ภิกฺขุนิโย เปเสตพฺพา ‘‘คจฺฉถยฺเย, ปุจฺฉถ ‘กึ อยฺย ลภติ ภิกฺขุนิสงฺโฆ โอวาทูปสงฺกมน’’’นฺติ. ตาหิ ‘‘สาธุ อยฺเย’’ติ สมฺปฏิจฺฉิตฺวา อารามํ คนฺตฺวา ตํ ภิกฺขุํ อุปสงฺกมิตฺวา เอวํ วตฺตพฺพํ – ‘‘กึ อยฺย ลภติ ภิกฺขุนิสงฺโฆ โอวาทูปสงฺกมน’’นฺติ. เตน วตฺตพฺพํ – ‘‘นตฺถิ โกจิ ภิกฺขุ ภิกฺขุโนวาทโก สมฺมโต, ปาสาทิเกน ภิกฺขุนิสงฺโฆ สมฺปาเทตู’’ติ. ตาหิ ‘‘สาธุ อยฺยา’’ติ สมฺปฏิจฺฉิตพฺพํ. เอกโต อาคตานํ วเสน เจตํ วุตฺตํ, ตาสุ ปน เอกาย ภิกฺขุนิยา วตฺตพฺพญฺจ สมฺปฏิจฺฉิตพฺพญฺจ, อิตรา ตสฺสา สหายิกา. पण जर कोणीही भिक्खुनींना उपदेश करण्यास उत्सुक नसेल, तर पातिमोक्ख उद्देशकाने सांगावे – “भिक्खुनी-ओवादक म्हणून संमत असलेला कोणीही भिक्खू नाही. भिक्खुनीसंघाने प्रसन्नतेने परिपूर्ण करावे.” कारण एवढ्या सांगण्यानेच तिन्ही शिक्षांचा संग्रह असलेले संपूर्ण शासन सांगितले जाते. त्या भिक्खूने “भले” असे म्हणून ते स्वीकारून प्रतिपदेच्या दिवशी भिक्खुनींना सांगावे. भिक्खुनीसंघानेही त्या भिक्खुनींना पाठवावे – “जा आर्यांनो, विचारा – ‘भन्ते, भिक्खुनीसंघाला ओवादासाठी भेटीची अनुमती मिळाली आहे का?’” त्यांनी “भले, आर्या” असे स्वीकारून आरामात जावे आणि त्या भिक्खूजवळ जाऊन याप्रमाणे विचारावे – “भन्ते, भिक्खुनीसंघाला ओवादासाठी भेटीची अनुमती मिळाली आहे का?” त्यांनी सांगावे – “भिक्खुनी-ओवादक म्हणून संमत असलेला कोणीही भिक्खू नाही. भिक्खुनीसंघाने प्रसन्नतेने परिपूर्ण करावे.” त्यांनी “भले, भन्ते” असे म्हणून ते स्वीकारावे. हे एकत्र आलेल्या भिक्खुनींच्या संदर्भात सांगितले आहे, परंतु त्यांच्यापैकी एका भिक्खुनीने बोलावे व स्वीकारावे, आणि इतर भिक्खुनी तिच्या सोबती असतील. สเจ ปน ภิกฺขุนิสงฺโฆ วา ภิกฺขุสงฺโฆ วา น ปูรติ, อุภยโตปิ วา คณมตฺตเมว ปุคฺคลมตฺตํ วา โหติ, เอกา ภิกฺขุนี วา พหูหิ ภิกฺขุนุปสฺสเยหิ โอวาทตฺถาย เปสิตา โหติ, ตตฺรายํ วจนกฺกโม – ‘‘ภิกฺขุนิโย อยฺย ภิกฺขุสงฺฆสฺส ปาเท วนฺทนฺติ, โอวาทูปสงฺกมนญฺจ ยาจนฺติ, ลภนฺตุ กิร อยฺย ภิกฺขุนิโย โอวาทูปสงฺกมน’’นฺติ. ‘‘อหํ อยฺย ภิกฺขุสงฺฆสฺส ปาเท วนฺทามิ; โอวาทูปสงฺกมนญฺจ ยาจามิ, ลภามหํ อยฺย โอวาทูปสงฺกมน’’นฺติ. पण जर भिक्खुनीसंघ किंवा भिक्खूसंघ पूर्ण नसेल, किंवा दोन्ही बाजूंनी केवळ गण किंवा केवळ व्यक्तीच असतील, किंवा अनेक भिक्खुनी-विहारांतून एकाच भिक्खुनीला ओवादासाठी पाठवले असेल, तर तेथे बोलण्याचा क्रम असा असावा – “भन्ते, भिक्खुनी भिक्खूसंघाच्या चरणांना वंदन करतात आणि ओवादासाठी भेटीची याचना करतात. भन्ते, भिक्खुनींना ओवादासाठी भेटीची अनुमती मिळावी.” “भन्ते, मी भिक्खूसंघाच्या चरणांना वंदन करते आणि ओवादासाठी भेटीची याचना करते. भन्ते, मला ओवादासाठी भेटीची अनुमती मिळावी.” ‘‘ภิกฺขุนิสงฺโฆ [Pg.62] อยฺย อยฺยานํ ปาเท วนฺทติ, โอวาทูปสงฺกมนญฺจ ยาจติ, ลภตุ กิร อยฺย ภิกฺขุนีสงฺโฆ โอวาทูปสงฺกมน’’นฺติ. ‘‘ภิกฺขุนิโย อยฺย อยฺยานํ ปาเท วนฺทนฺติ, โอวาทูปสงฺกมนญฺจ ยาจนฺติ, ลภนฺตุ กิร อยฺย ภิกฺขุนิโย โอวาทูปสงฺกมน’’นฺติ. ‘‘อหํ อยฺย อยฺยานํ ปาเท วนฺทามิ, โอวาทูปสงฺกมนญฺจ ยาจามิ, ลภามหํ อยฺย โอวาทูปสงฺกมน’’นฺติ. “भन्ते, भिक्खुनीसंघ आर्यांच्या चरणांना वंदन करतो आणि ओवादासाठी भेटीची याचना करतो. भन्ते, भिक्खुनीसंघाला ओवादासाठी भेटीची अनुमती मिळावी.” “भन्ते, भिक्खुनी आर्यांच्या चरणांना वंदन करतात आणि ओवादासाठी भेटीची याचना करतात. भन्ते, भिक्खुनींना ओवादासाठी भेटीची अनुमती मिळावी.” “भन्ते, मी आर्यांच्या चरणांना वंदन करते आणि ओवादासाठी भेटीची याचना करते. भन्ते, मला ओवादासाठी भेटीची अनुमती मिळावी.” ‘‘ภิกฺขุนิสงฺโฆ อยฺย อยฺยสฺส ปาเท วนฺทติ, โอวาทูปสงฺกมนญฺจ ยาจติ, ลภตุ กิร อยฺย ภิกฺขุนิสงฺโฆ โอวาทูปสงฺกมน’’นฺติ. ‘‘ภิกฺขุนิโย อยฺย อยฺยสฺส ปาเท วนฺทนฺติ; โอวาทูปสงฺกมนญฺจ ยาจนฺติ, ลภนฺตุ กิร อยฺย ภิกฺขุนิโย โอวาทูปสงฺกมน’’นฺติ. ‘‘อหํ อยฺย อยฺยสฺส ปาเท วนฺทามิ, โอวาทูปสงฺกมนญฺจ ยาจามิ, ลภามหํ อยฺย โอวาทูปสงฺกมน’’นฺติ. “भन्ते, भिक्खुनीसंघ आर्याच्या चरणांना वंदन करतो आणि ओवादासाठी भेटीची याचना करतो. भन्ते, भिक्खुनीसंघाला ओवादासाठी भेटीची अनुमती मिळावी.” “भन्ते, भिक्खुनी आर्याच्या चरणांना वंदन करतात आणि ओवादासाठी भेटीची याचना करतात. भन्ते, भिक्खुनींना ओवादासाठी भेटीची अनुमती मिळावी.” “भन्ते, मी आर्याच्या चरणांना वंदन करते आणि ओवादासाठी भेटीची याचना करते. भन्ते, मला ओवादासाठी भेटीची अनुमती मिळावी.” ‘‘ภิกฺขุนิสงฺโฆ จ อยฺย ภิกฺขุนิโย จ ภิกฺขุนี จ ภิกฺขุสงฺฆสฺส อยฺยานํ อยฺยสฺส ปาเท วนฺทติ วนฺทนฺติ วนฺทติ, โอวาทูปสงฺกมนญฺจ ยาจติ ยาจนฺติ ยาจติ, ลภตุ กิร ลภนฺตุ กิร ลภตุ กิร อยฺย ภิกฺขุนิสงฺโฆ จ ภิกฺขุนิโย จ ภิกฺขุนี จ โอวาทูปสงฺกมน’’นฺติ. “भन्ते, भिक्खुनीसंघ, भिक्खुनी आणि भिक्खुनी हे भिक्खूसंघाच्या, आर्यांच्या आणि आर्याच्या चरणांना वंदन करतो, वंदन करतात, वंदन करते; आणि ओवादासाठी भेटीची याचना करतो, याचना करतात, याचना करते. भन्ते, भिक्खुनीसंघाला, भिक्खुनींना आणि भिक्खुनीला ओवादासाठी भेटीची अनुमती मिळावी.” เตนปิ ภิกฺขุนา อุโปสถกาเล เอวํ วตฺตพฺพํ – ‘‘ภิกฺขุนิโย ภนฺเต ภิกฺขุสงฺฆสฺส ปาเท วนฺทนฺติ, โอวาทูปสงฺกมนญฺจ ยาจนฺติ, ลภนฺตุ กิร ภนฺเต ภิกฺขุนิโย โอวาทูปสงฺกมน’’นฺติ. ‘‘ภิกฺขุนี ภนฺเต ภิกฺขุสงฺฆสฺส ปาเท วนฺทติ, โอวาทูปสงฺกมนญฺจ ยาจติ, ลภตุ กิร ภนฺเต ภิกฺขุนี โอวาทูปสงฺกมน’’นฺติ. त्या भिक्खूनेही उपोसथ काळी याप्रमाणे सांगावे – “भन्ते, भिक्खुनी भिक्खूसंघाच्या चरणांना वंदन करतात आणि ओवादासाठी भेटीची याचना करतात. भन्ते, भिक्खुनींना ओवादासाठी भेटीची अनुमती मिळावी.” “भन्ते, भिक्खुनी भिक्खूसंघाच्या चरणांना वंदन करते आणि ओवादासाठी भेटीची याचना करते. भन्ते, भिक्खुनीला ओवादासाठी भेटीची अनुमती मिळावी.” ‘‘ภิกฺขุนิสงฺโฆ ภนฺเต, ภิกฺขุนิโย ภนฺเต, ภิกฺขุนี ภนฺเต อายสฺมนฺตานํ ปาเท วนฺทติ, โอวาทูปสงฺกมนญฺจ ยาจติ, ลภตุ กิร ภนฺเต ภิกฺขุนี โอวาทูปสงฺกมน’’นฺติ. “भन्ते, भिक्खुनीसंघ; भन्ते, भिक्खुनी; भन्ते, भिक्खुनी आयुष्यमानांच्या चरणांना वंदन करतात आणि ओवादासाठी भेटीची याचना करतात. भन्ते, भिक्खुनीला ओवादासाठी भेटीची अनुमती मिळावी.” ‘‘ภิกฺขุนิสงฺโฆ จ ภนฺเต, ภิกฺขุนิโย จ ภิกฺขุนี จ ภิกฺขุสงฺฆสฺส อายสฺมนฺตานํ ปาเท วนฺทติ วนฺทนฺติ วนฺทติ, โอวาทูปสงฺกมนญฺจ ยาจติ ยาจนฺติ ยาจติ, ลภตุ กิร ลภนฺตุ กิร ลภตุ กิร ภนฺเต ภิกฺขุนิสงฺโฆ จ ภิกฺขุนิโย จ ภิกฺขุนี จ โอวาทูปสงฺกมน’’นฺติ. “भन्ते, भिक्खुनीसंघ, भिक्खुनी आणि भिक्खुनी हे भिक्खूसंघाच्या आणि आयुष्यमानांच्या चरणांना वंदन करतो, वंदन करतात, वंदन करते; आणि ओवादासाठी भेटीची याचना करतो, याचना करतात, याचना करते. भन्ते, भिक्खुनीसंघाला, भिक्खुनींना आणि भिक्खुनीला ओवादासाठी भेटीची अनुमती मिळावी.” ปาติโมกฺขุทฺเทสเกนาปิ สเจ สมฺมโต ภิกฺขุ อตฺถิ, ปุริมนเยเนว ตํ ภิกฺขุนิโย, ตํ ภิกฺขุนี, ตํ ภิกฺขุนิสงฺโฆ จ ภิกฺขุนิโย จ ภิกฺขุนี จ อุปสงฺกมนฺตุ อุปสงฺกมตุ อุปสงฺกมตูติ วตฺตพฺพํ. สเจ นตฺถิ, ปาสาทิเกน [Pg.63] ภิกฺขุนิสงฺโฆ จ ภิกฺขุนิโย จ ภิกฺขุนี จ สมฺปาเทตุ สมฺปาเทนฺตุ สมฺปาเทตูติ วตฺตพฺพํ. जरी प्रातिमोक्ष-उद्देशक (पातिमोक्खुद्देशक) म्हणून संमत (नियुक्त) असलेला भिक्खू असेल, तर पूर्वीच्याच पद्धतीने 'त्या भिक्खूंकडे भिक्खुनींनी, किंवा त्या भिक्खुनीने, किंवा भिक्खुनीसंघाने आणि भिक्खुनींनी व भिक्खुनीने जावे (उपसंक्रमण करावे)' असे म्हणावे. जर असा संमत भिक्खू नसेल, तर 'प्रसादाने (सौजन्याने/शांततेने) भिक्खुनीसंघाने, भिक्खुनींनी किंवा भिक्खुनीने (शील) संपादन करावे' असे म्हणावे. โอวาทปฏิคฺคาหเกน ปาฏิปเท ปจฺจาหริตฺวา ตเถว วตฺตพฺพํ. โอวาทํ ปน พาลคิลานคมิเก ฐเปตฺวา อญฺโญ สเจปิ อารญฺญโก โหติ, อปฺปฏิคฺคเหตุํ น ลภติ. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา – ओवाद-प्रतिग्राहक (उपदेश स्वीकारणाऱ्या) भिक्खूने प्रतिपदेच्या दिवशी (तो उपदेश) परत आणून तसाच सांगावा. परंतु, अज्ञानी (विनयात अकुशल), आजारी आणि प्रवासाला निघालेल्या भिक्खूंना वगळून, इतर कोणताही भिक्खू जरी आरण्यक (अरण्यात राहणारा) असला, तरी त्याला उपदेश न स्वीकारण्याची मुभा मिळत नाही. कारण भगवंतांनी असे म्हटले आहे – ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, ฐเปตฺวา พาลํ ฐเปตฺวา คิลานํ ฐเปตฺวา คมิกํ อวเสเสหิ โอวาทํ คเหตุ’’นฺติ (จูฬว. ๔๑๔). “भिक्खूंनो, अज्ञानी भिक्खूला वगळून, आजारी भिक्खूला वगळून आणि प्रवासाला निघालेल्या भिक्खूला वगळून, उर्वरित सर्व भिक्खूंनी उपदेश (ओवाद) ग्रहण करावा, अशी मी अनुमती देतो.” ตตฺถ โย จาตุทฺทสิกปนฺนรสิเกสุ วา อุโปสเถสุ ปาฏิปเท วา คนฺตุกาโม, โส คมิโก ทุติยปกฺขทิวเส คจฺฉนฺโตปิ อคฺคเหตุํ น ลภติ, ‘‘น, ภิกฺขเว, โอวาโท น คเหตพฺโพ, โย น คณฺเหยฺย, อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสา’’ติ (จูฬว. ๔๑๔) วุตฺตํ อาปตฺตึ อาปชฺชติเยว. โอวาทํ คเหตฺวา จ อุโปสถคฺเค อนาโรเจตุํ วา ปาฏิปเท ภิกฺขุนีนํ อปจฺจาหริตุํ วา น วฏฺฏติ. วุตฺตญฺเหตํ – त्यामध्ये, जो चतुर्दशी किंवा पौर्णिमेच्या उपोसथ दिवशी किंवा प्रतिपदेला प्रवासाला निघू इच्छितो, तो प्रवासी भिक्खू दुसऱ्या पक्षाच्या दिवशी जात असला तरी त्याला उपदेश न स्वीकारण्याची मुभा मिळत नाही. “भिक्खूंनो, उपदेश ग्रहण करू नये असे नाही, तो ग्रहण केलाच पाहिजे. जो ग्रहण करणार नाही, त्याला दुक्कट (दुष्कृत) चा गुन्हा लागू होईल,” असे म्हटले असल्याने तो नक्कीच आपत्तीला (गुन्ह्याला) प्राप्त होतो. उपदेश ग्रहण केल्यानंतर उपोसथगृहात तो न सांगणे किंवा प्रतिपदेला भिक्खुनींना तो परत न करणे योग्य नाही. कारण असे म्हटले आहे – ‘‘น, ภิกฺขเว, โอวาโท น อาโรเจตพฺโพ. โย น อาโรเจยฺย, อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสา’’ติ (จูฬว. ๔๑๕). “भिक्खूंनो, उपदेश न सांगणे योग्य नाही. जो सांगणार नाही, त्याला दुक्कटचा गुन्हा लागू होईल.” อปรมฺปิ วุตฺตํ – दुसरेही असे म्हटले आहे – ‘‘น, ภิกฺขเว, โอวาโท น ปจฺจาหริตพฺโพ. โย น ปจฺจาหเรยฺย, อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสา’’ติ (จูฬว. ๔๑๕). “भिक्खूंनो, उपदेश परत न करणे योग्य नाही. जो परत करणार नाही, त्याला दुक्कटचा गुन्हा लागू होईल.” ตตฺถ อารญฺญเกน ปจฺจาหรณตฺถํ สงฺเกโต กาตพฺโพ. วุตฺตญฺเหตํ – ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, อารญฺญเกน ภิกฺขุนา โอวาทํ คเหตุํ, สงฺเกตญฺจ กาตุํ, อตฺร ปฏิหริสฺสามี’’ติ. ตสฺมา อารญฺญโก ภิกฺขุ สเจ ภิกฺขุนีนํ วสนคาเม ภิกฺขํ ลภติ, ตตฺเถว จริตฺวา ภิกฺขุนิโย ทิสฺวา อาโรเจตฺวา คนฺตพฺพํ. โน จสฺส ตตฺถ ภิกฺขา สุลภา โหติ, สามนฺตคาเม จริตฺวา ภิกฺขุนีนํ คามํ อาคมฺม ตเถว กาตพฺพํ. สเจ ทูรํ คนฺตพฺพํ โหติ, สงฺเกโต กาตพฺโพ – ‘‘อหํ อมุกํ นาม ตุมฺหากํ คามทฺวาเร สภํ วา มณฺฑปํ วา รุกฺขมูลํ วา อุปสงฺกมิสฺสามิ, ตตฺถ อาคจฺเฉยฺยาถา’’ติ[Pg.64]. ภิกฺขุนีหิ ตตฺถ คนฺตพฺพํ, อคนฺตุํ น ลพฺภติ. วุตฺตญฺเหตํ – ‘‘น, ภิกฺขเว, ภิกฺขุนิยา สงฺเกตํ น คนฺตพฺพํ. ยา น คจฺเฉยฺย, อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสา’’ติ (จูฬว. ๔๑๕). त्यामध्ये, आरण्यक भिक्खूने उपदेश परत करण्यासाठी संकेत (वेळ व ठिकाण ठरवणे) केला पाहिजे. कारण असे म्हटले आहे – “भिक्खूंनो, आरण्यक भिक्खूने उपदेश ग्रहण करण्यासाठी आणि 'मी येथे उपदेश परत करीन' असा संकेत ठरवण्यासाठी मी अनुमती देतो.” म्हणून, आरण्यक भिक्खूला जर भिक्खुनींच्या राहत्या गावात भिक्षा मिळत असेल, तर त्याने तेथेच भिक्षेसाठी फिरून, भिक्खुनींना पाहून व त्यांना उपदेश सांगून मगच जावे. जर त्याला तेथे भिक्षा सहज मिळत नसेल, तर शेजारच्या गावात भिक्षेसाठी फिरून, भिक्खुनींच्या गावात येऊन पूर्वीप्रमाणेच करावे. जर दूर जावे लागत असेल, तर संकेत ठरवावा – “मी तुमच्या गावाच्या वेशीवर अमुक नावाच्या सभेत, मंडपात किंवा झाडाच्या मुळाशी येईन, तुम्ही तेथे यावे.” भिक्खुनींनी तेथे गेलेच पाहिजे, न जाण्याची मुभा त्यांना मिळत नाही. कारण असे म्हटले आहे – “भिक्खूंनो, भिक्खुनीने ठरवलेल्या संकेताच्या ठिकाणी न जाणे योग्य नाही. जी जाणार नाही, तिला दुक्कटचा गुन्हा लागू होईल.” อุภโตสงฺเฆ ตีหิ ฐาเนหิ ปวาเรตพฺพนฺติ เอตฺถ ภิกฺขุนีหิ จาตุทฺทเส อตฺตนา ปวาเรตฺวา อุโปสเถ ภิกฺขุสงฺเฆ ปวาเรตพฺพํ. วุตฺตญฺเหตํ – ‘दोन्ही संघांमध्ये तीन कारणांनी प्रवारणा करावी’ या नियमात, भिक्खुनींनी चतुर्दशीला स्वतः प्रवारणा करून, उपोसथ दिवशी भिक्खू संघासमोर प्रवारणा करावी. कारण असे म्हटले आहे – ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, อชฺชตนาย ปวาเรตฺวา อปรชฺชุ ภิกฺขุสงฺฆํ ปวาเรตุ’’นฺติ (จูฬว. ๔๒๗). “भिक्खूंनो, आज (स्वतः) प्रवारणा करून दुसऱ्या दिवशी भिक्खू संघासमोर प्रवारणा करण्याची मी अनुमती देतो.” ภิกฺขุนิขนฺธเก วุตฺตนเยเนว เจตฺถ วินิจฺฉโย เวทิตพฺโพ. วุตฺตญฺเหตํ – या बाबतीत भिक्खुनी खंधकामध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच निर्णय समजून घ्यावा. कारण असे म्हटले आहे – ‘‘เตน โข ปน สมเยน สพฺโพ ภิกฺขุนิสงฺโฆ ปวาเรนฺโต โกลาหลมกาสิ. ภควโต เอตมตฺถํ อาโรเจสุํ. อนุชานามิ, ภิกฺขเว, เอกํ ภิกฺขุนึ พฺยตฺตํ ปฏิพลํ สมฺมนฺนิตุํ ภิกฺขุนิสงฺฆสฺส อตฺถาย ภิกฺขุสงฺฆํ ปวาเรตุํ. เอวญฺจ ปน, ภิกฺขเว, สมฺมนฺนิตพฺพา. ปฐมํ ภิกฺขุนี ยาจิตพฺพา, ยาจิตฺวา พฺยตฺตาย ภิกฺขุนิยา ปฏิพลาย สงฺโฆ ญาเปตพฺโพ – “त्या वेळी सर्व भिक्खुनी संघ प्रवारणा करत असताना मोठा कोलाहल झाला. त्यांनी भगवंतांना ही गोष्ट सांगितली. (भगवंत म्हणाले) भिक्खूंनो, भिक्खुनी संघाच्या वतीने भिक्खू संघासमोर प्रवारणा करण्यासाठी एका चतुर व सक्षम भिक्खुनीची नियुक्ती करण्यास मी अनुमती देतो. आणि भिक्खूंनो, तिची नियुक्ती या प्रकारे करावी: प्रथम त्या भिक्खुनीला विनंती करावी. विनंती केल्यानंतर, चतुर व सक्षम भिक्खुनीने संघाला सूचित करावे – ‘‘สุณาตุ เม, อยฺเย สงฺโฆ, ยทิ สงฺฆสฺส ปตฺตกลฺลํ, สงฺโฆ อิตฺถนฺนามํ ภิกฺขุนึ สมฺมนฺเนยฺย ภิกฺขุนิสงฺฆสฺส อตฺถาย ภิกฺขุสงฺฆํ ปวาเรตุํ. เอสา ญตฺติ. “आर्य संघाने माझे ऐकावे. जर संघासाठी योग्य वेळ असेल, तर संघाने अमुक नावाच्या भिक्खुनीला भिक्खुनी संघाच्या वतीने भिक्खू संघासमोर प्रवारणा करण्यासाठी नियुक्त करावे. ही सूचना (ज्ञप्ति) आहे. ‘‘สุณาตุ เม, อยฺเย สงฺโฆ, สงฺโฆ อิตฺถนฺนามํ ภิกฺขุนึ สมฺมนฺเนยฺย ภิกฺขุนิสงฺฆสฺส อตฺถาย ภิกฺขุสงฺฆํ ปวาเรตุํ. ยสฺสา อยฺยาย ขมติ อิตฺถนฺนามาย ภิกฺขุนิยา สมฺมุติ ภิกฺขุนิสงฺฆสฺส อตฺถาย ภิกฺขุสงฺฆํ ปวาเรตุํ, สา ตุณฺหสฺส; ยสฺสา นกฺขมติ, สา ภาเสยฺย. “आर्य संघाने माझे ऐकावे. संघाने अमुक नावाच्या भिक्खुनीला भिक्खुनी संघाच्या वतीने भिक्खू संघासमोर प्रवारणा करण्यासाठी नियुक्त करावे. ज्या आर्यांना अमुक नावाच्या भिक्खुनीला भिक्खुनी संघाच्या वतीने भिक्खू संघासमोर प्रवारणा करण्यासाठी नियुक्त करणे संमत असेल, त्यांनी शांत राहावे; ज्यांना संमत नसेल, त्यांनी बोलावे. ‘‘สมฺมตา สงฺเฆน อิตฺถนฺนามา ภิกฺขุนี ภิกฺขุนิสงฺฆสฺส อตฺถาย ภิกฺขุสงฺฆํ ปวาเรตุํ. ขมติ สงฺฆสฺส, ตสฺมา ตุณฺหี, เอวเมตํ ธารยามี’’ติ (จูฬว. ๔๒๗). “संघाने अमुक नावाच्या भिक्खुनीला भिक्खुनी संघाच्या वतीने भिक्खू संघासमोर प्रवारणा करण्यासाठी नियुक्त केले आहे. हे संघाला संमत आहे, म्हणून संघ शांत आहे. असे मी हे गृहीत धरतो.” ตาย [Pg.65] สมฺมตาย ภิกฺขุนิยา ภิกฺขุนิสงฺฆํ อาทาย ภิกฺขุสงฺฆํ อุปสงฺกมิตฺวา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา อญฺชลึ ปคฺคเหตฺวา เอวมสฺส วจนีโย – ‘‘ภิกฺขุนิสงฺโฆ อยฺย, ภิกฺขุสงฺฆํ ปวาเรติ – ทิฏฺเฐน วา สุเตน วา ปริสงฺกาย วา. วทตยฺย ภิกฺขุสงฺโฆ ภิกฺขุนิสงฺฆํ อนุกมฺปํ อุปาทาย, ปสฺสนฺโต ปฏิกริสฺสติ. ทุติยมฺปิ อยฺย, ตติยมฺปิ อยฺย, ภิกฺขุนิสงฺโฆ…เป… ปฏิกริสฺสตี’’ติ. त्या नियुक्त भिक्खुनीने भिक्खुनी संघाला सोबत घेऊन भिक्खू संघाकडे जावे आणि एका खांद्यावर उत्तरासंग (वरचे वस्त्र) करून, हात जोडून असे म्हणावे – “भन्ते, भिक्खुनी संघ भिक्खू संघासमोर पाहिलेल्या, ऐकलेल्या किंवा शंका घेतलेल्या गोष्टींबाबत प्रवारणा करत आहे. भिक्खू संघाने भिक्खुनी संघावर अनुकंपा करून (दोष) सांगावेत. दोष दिसल्यास आम्ही त्याचे निवारण करू. दुसऱ्यांदाही भन्ते, तिसऱ्यांदाही भन्ते, भिक्खुनी संघ...पे... निवारण करेल.” สเจ ภิกฺขุนิสงฺโฆ น ปูรติ, ‘‘ภิกฺขุนิโย อยฺย ภิกฺขุสงฺฆํ ปวาเรนฺติ – ทิฏฺเฐน วา สุเตน วา ปริสงฺกาย วา, วทตยฺย ภิกฺขุสงฺโฆ ภิกฺขุนิโย อนุกมฺปํ อุปาทาย, ปสฺสนฺติโย ปฏิกริสฺสนฺตี’’ติ จ, ‘‘อหํ อยฺย ภิกฺขุสงฺฆํ ปวาเรมิ – ทิฏฺเฐน วา สุเตน วา ปริสงฺกาย วา, วทตุ มํ อยฺย ภิกฺขุสงฺโฆ อนุกมฺปํ อุปาทาย, ปสฺสนฺตี ปฏิกริสฺสามี’’ติ จ เอวํ ติกฺขตฺตุํ วตฺตพฺพํ. जर भिक्खुनी संघ पूर्ण नसेल (संख्या कमी असेल), तर “भन्ते, भिक्खुनी भिक्खू संघासमोर पाहिलेल्या, ऐकलेल्या किंवा शंका घेतलेल्या गोष्टींबाबत प्रवारणा करत आहेत. भिक्खू संघाने भिक्खुनींवर अनुकंपा करून सांगावे, दोष दिसल्यास त्या त्याचे निवारण करतील” असे आणि “भन्ते, मी भिक्खू संघासमोर पाहिलेल्या, ऐकलेल्या किंवा शंका घेतलेल्या गोष्टींबाबत प्रवारणा करत आहे. भिक्खू संघाने माझ्यावर अनुकंपा करून सांगावे, दोष दिसल्यास मी त्याचे निवारण करीन” असे तीन वेळा म्हणावे. สเจ ภิกฺขุสงฺโฆ น ปูรติ, ‘‘ภิกฺขุนิสงฺโฆ อยฺยา อยฺเย ปวาเรติ – ทิฏฺเฐน วา สุเตน วา ปริสงฺกาย วา, วทนฺตยฺยา ภิกฺขุนิสงฺฆํ อนุกมฺปํ อุปาทาย, ปสฺสนฺโต ปฏิกริสฺสตี’’ติ จ, ‘‘ภิกฺขุนิสงฺโฆ อยฺย อยฺยํ ปวาเรติ – ทิฏฺเฐน วา สุเตน วา ปริสงฺกาย วา, วทตยฺโย ภิกฺขุนิสงฺฆํ อนุกมฺปํ อุปาทาย, ปสฺสนฺโต ปฏิกริสฺสตี’’ติ จ เอวํ ติกฺขตฺตุํ วตฺตพฺพํ. जर भिक्खू संघ पूर्ण नसेल (संख्या कमी असेल), तर “आर्यांनो, भिक्खुनी संघ आर्यांसमोर प्रवारणा करत आहे – पाहिलेल्या, ऐकलेल्या किंवा शंका घेतलेल्या गोष्टींबाबत. आर्यांनी भिक्खुनी संघावर अनुकंपा करून सांगावे, दोष दिसल्यास निवारण केले जाईल” असे आणि “भन्ते, भिक्खुनी संघ आपल्यासमोर प्रवारणा करत आहे – पाहिलेल्या, ऐकलेल्या किंवा शंका घेतलेल्या गोष्टींबाबत. आपण भिक्खुनी संघावर अनुकंपा करून सांगावे, दोष दिसल्यास निवारण केले जाईल” असे तीन वेळा म्हणावे. อุภินฺนํ อปาริปูริยา ‘‘ภิกฺขุนิโย อยฺยา อยฺเย ปวาเรนฺติ – ทิฏฺเฐน วา สุเตน วา ปริสงฺกาย วา, วทนฺตยฺยา ภิกฺขุนิโย อนุกมฺปํ อุปาทาย, ปสฺสนฺติโย ปฏิกริสฺสนฺตี’’ติ จ, ‘‘ภิกฺขุนิโย อยฺย อยฺยํ ปวาเรนฺติ – ทิฏฺเฐน วา สุเตน วา ปริสงฺกาย วา, วทตยฺโย ภิกฺขุนิโย อนุกมฺปํ อุปาทาย, ปสฺสนฺติโย ปฏิกริสฺสนฺตี’’ติ จ, ‘‘อหํ อยฺยา อยฺเย ปวาเรมิ – ทิฏฺเฐน วา สุเตน วา ปริสงฺกาย วา, วทนฺตุ มํ อยฺยา อนุกมฺปํ อุปาทาย, ปสฺสนฺตี ปฏิกริสฺสามี’’ติ จ, ‘‘อหํ อยฺย อยฺยํ ปวาเรมิ – ทิฏฺเฐน วา สุเตน วา ปริสงฺกาย วา, วทตุ มํ อยฺโย อนุกมฺปํ อุปาทาย, ปสฺสนฺตี ปฏิกริสฺสามี’’ติ จ เอวํ ติกฺขตฺตุํ วตฺตพฺพํ. दोन्ही बाजूंच्या (भिक्खू आणि भिक्खुणी संघाच्या) अपूर्णतेमुळे (संख्या पूर्ण नसल्यास): "भिक्खुणींनो, आर्यांनो! भिक्खुणी आर्यांची (भिक्खू संघाची) पवारणा करतात – पाहिलेल्या, ऐकलेल्या किंवा शंका घेतलेल्या गोष्टींवरून. आर्यांनी अनुकंपा बुद्धीने आम्हाला सांगावे, दोष दिसल्यास आम्ही त्याचे प्रायश्चित्त करू" असे, आणि "भिक्खुणींनो, आर्य! भिक्खुणी आर्याची पवारणा करतात – पाहिलेल्या, ऐकलेल्या किंवा शंका घेतलेल्या गोष्टींवरून. आर्यांनी अनुकंपा बुद्धीने आम्हाला सांगावे, दोष दिसल्यास आम्ही त्याचे प्रायश्चित्त करू" असे, आणि "मी आर्यांची पवारणा करते – पाहिलेल्या, ऐकलेल्या किंवा शंका घेतलेल्या गोष्टींवरून. आर्यांनी अनुकंपा बुद्धीने मला सांगावे, दोष दिसल्यास मी त्याचे प्रायश्चित्त करेन" असे, आणि "मी आर्याची पवारणा करते – पाहिलेल्या, ऐकलेल्या किंवा शंका घेतलेल्या गोष्टींवरून. आर्यांनी अनुकंपा बुद्धीने मला सांगावे, दोष दिसल्यास मी त्याचे प्रायश्चित्त करेन" असे, या प्रकारे तीन वेळा म्हणावे. มานตฺตจรณญฺจ อุปสมฺปทาปริเยสนา จ ยถาฐาเนเยว อาวิ ภวิสฺสติ. मानत (मानत्त) आचरण करणे आणि उपसंपदेचा शोध घेणे हे आपापल्या योग्य ठिकाणीच स्पष्ट होईल. น [Pg.66] ภิกฺขุนิยา เกนจิ ปริยาเยนาติ ทสหิ วา อกฺโกสวตฺถูหิ อญฺเญน วา เกนจิ ปริยาเยน ภิกฺขุ เนว อกฺโกสิตพฺโพ, น ปริภาสิตพฺโพ, น ภเยน ตชฺเชตพฺโพ. โอวโฏติ ปิหิโต วาริโต ปฏิกฺขิตฺโต. วจนเยว วจนปโถ. อโนวโฏติ อปิหิโต อวาริโต อปฺปฏิกฺขิตฺโต. ตสฺมา ภิกฺขุนิยา อาธิปจฺจฏฺฐาเน เชฏฺฐกฏฺฐาเน ฐตฺวา ‘‘เอวํ อภิกฺกม, เอวํ ปฏิกฺกม, เอวํ นิวาเสหิ, เอวํ ปารุปาหี’’ติ เกนจิ ปริยาเยน เนว ภิกฺขุ โอวทิตพฺโพ, น อนุสาสิตพฺโพ. โทสํ ปน ทิสฺวา ‘‘ปุพฺเพ มหาเถรา น เอวํ อภิกฺกมนฺติ, น ปฏิกฺกมนฺติ, น นิวาเสนฺติ, น ปารุปนฺติ, อีทิสํ กาสาวมฺปิ น ธาเรนฺติ, น เอวํ อกฺขีนิ อญฺเชนฺตี’’ติอาทินา นเยน วิชฺชมานโทสํ ทสฺเสตุํ วฏฺฏติ. ภิกฺขูหิ ปน ‘‘อยํ วุฑฺฒสมณี เอวํ นิวาเสติ, เอวํ ปารุปติ, มา เอวํ นิวาเสหิ, มา เอวํ ปารุปาหิ, มา ติลกมฺมปณฺณกมฺมาทีนิ กโรหี’’ติ ยถาสุขํ ภิกฺขุนึ โอวทิตุํ อนุสาสิตุํ วฏฺฏติ. "भिक्खुणीने कोणत्याही प्रकारे नाही" याचा अर्थ असा की, दहा अक्कोसवस्तूंद्वारे (गालीगलोचच्या कारणांनी) किंवा इतर कोणत्याही मार्गाने भिक्खूची निंदा करू नये, त्याला अपशब्द बोलू नये, किंवा भीती दाखवून धमकावू नये. 'ओवट' (ovaṭa) म्हणजे बंद केलेला, प्रतिबंधित केलेला किंवा नाकारलेला. वचन (शब्द) हाच वचनपथ (भाषणमार्ग) होय. 'अनोवट' (anovaṭa) म्हणजे न बंद केलेला, अप्रतिबंधित किंवा न नाकारलेला. म्हणून, भिक्खुणीने स्वतःला श्रेष्ठ किंवा ज्येष्ठ स्थानावर ठेवून "असे पुढे जा, असे मागे फिरा, असे अंतर्वस्त्र (निवसन) नेसा, असे चीवर पांघरा" अशा कोणत्याही प्रकारे भिक्खूला उपदेश करू नये किंवा अनुशासने देऊ नयेत. परंतु दोष दिसल्यास, "पूर्वीचे महाथेर असे पुढे जात नव्हते, मागे फिरत नव्हते, असे नेसत नव्हते, पांघरत नव्हते, अशा प्रकारचे काषाय वस्त्र धारण करत नव्हते, डोळ्यांत असे काजळ घालत नव्हते" इत्यादी प्रकारे प्रत्यक्ष असलेला दोष दाखवून देणे योग्य आहे. परंतु भिक्खूंनी मात्र "ही वृद्ध श्रमणी अशी नेसते, अशी पांघरते; असे नेसू नकोस, असे पांघरू नकोस, तीळ कुटणे किंवा भाजी तोडणे इत्यादी कामे करू नकोस" अशा प्रकारे आपल्या इच्छेनुसार भिक्खुणीला उपदेश व अनुशासन करणे योग्य आहे. สมคฺคมฺหยฺยาติ ภณนฺตนฺติ ‘‘สมคฺคา อมฺห อยฺย’’ อิติ ภณนฺตํ ภิกฺขุนิสงฺฆํ. อญฺญํ ธมฺมํ ภณตีติ อญฺญํ สุตฺตนฺตํ วา อภิธมฺมํ วา. สมคฺคมฺหยฺยาติ วจเนน หิ โอวาทํ ปจฺจาสีสนฺติ, ตสฺมา ฐเปตฺวา โอวาทํ อญฺญํ ธมฺมํ ภณนฺตสฺส ทุกฺกฏํ. โอวาทํ อนิยฺยาเทตฺวาติ เอโส ภคินิโย โอวาโทติ อวตฺวา. "आम्ही सर्व एक आहोत, आर्य" असे म्हणणाऱ्या भिक्खुणीसंघाला उद्देशून. "इतर धर्म सांगणे" म्हणजे इतर सुत्तंत किंवा अभिधम्म सांगणे. कारण "आम्ही एक आहोत, आर्य" या शब्दांनी त्या उपदेशाची (ओवादाची) अपेक्षा करतात. म्हणून, उपदेश बाजूला ठेवून इतर धर्म सांगणाऱ्या भिक्खूला दुक्कट (दुष्कृत) दोष होतो. "उपदेश न सोपवता" म्हणजे "भगिनींनो, हा उपदेश आहे" असे न सांगता. ๑๕๐. อธมฺมกมฺเมติอาทีสุ ภิกฺขุโนวาทกสมฺมุติกมฺมํ กมฺมนฺติ เวทิตพฺพํ. ตตฺถ อธมฺมกมฺเม ทฺวินฺนํ นวกานํ วเสน อฏฺฐารส ปาจิตฺติยานิ. ธมฺมกมฺเม ทุติยสฺส นวกสฺส อวสานปเท อนาปตฺติ, เสเสสุ สตฺตรส ทุกฺกฏานิ. १५०. "अधम्मकम्मे" (अधार्मिक कर्म) इत्यादींमध्ये, भिक्खुणींना उपदेश देणाऱ्याची संमती देण्याच्या कर्माला 'कर्म' समजावे. त्या अधार्मिक कर्मामध्ये, दोन नऊच्या (नऊ-नऊच्या दोन गटांच्या) आधारे अठरा पाचित्तिय (पाचित्ती) होतात. धार्मिक कर्मामध्ये, दुसऱ्या नऊच्या शेवटच्या पदात अनापत्ती (दोष नसणे) असते, आणि उर्वरित पदांमध्ये सतरा दुक्कट (दोष) होतात. ๑๕๒. อุทฺเทสํ เทนฺโตติ อฏฺฐนฺนํ ครุธมฺมานํ ปาฬึ อุทฺทิสนฺโต. ปริปุจฺฉํ เทนฺโตติ ตสฺสาเยว ปคุณาย ครุธมฺมปาฬิยา อฏฺฐกถํ กเถนฺโตติ อตฺโถ. โอสาเรหิ อยฺยาติ วุจฺจมาโน โอสาเรตีติ เอวํ วุจฺจมาโน อฏฺฐครุธมฺมปาฬึ โอสาเรตีติ อตฺโถ. เอวํ อุทฺเทสํ เทนฺโต, ปริปุจฺฉํ เทนฺโต, โย จ โอสาเรหีติ วุจฺจมาโน อฏฺฐ ครุธมฺเม ภณติ, ตสฺส ปาจิตฺติเยน อนาปตฺติ. อญฺญํ ธมฺมํ ภณนฺตสฺส ทุกฺกเฏน อนาปตฺติ. ปญฺหํ ปุจฺฉติ, ปญฺหํ ปุฏฺโฐ กเถตีติ ภิกฺขุนี ครุธมฺมนิสฺสิตํ วา ขนฺธาทินิสฺสิตํ วา ปญฺหํ ปุจฺฉติ, ตํ โย ภิกฺขุ กเถติ, ตสฺสาปิ [Pg.67] อนาปตฺติ. อญฺญสฺสตฺถาย ภณนฺตนฺติ จตุปริสตึ ธมฺมํ เทเสนฺตํ ภิกฺขุํ อุปสงฺกมิตฺวา ภิกฺขุนิโย สุณนฺติ, ตตฺราปิ ภิกฺขุสฺส อนาปตฺติ. สิกฺขมานาย สามเณริยาติ เอตาสํ เทเสนฺตสฺสาปิ อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานตฺถเมว. १५२. 'उद्देश देणे' म्हणजे आठ गरूधम्मांची पाळी (पाठांतर) म्हणून दाखवणे. 'परिपृच्छा देणे' म्हणजे त्याच चांगल्या प्रकारे अभ्यासलेल्या गरूधम्म-पाळीची अट्ठकथा (टीका) सांगणे, असा अर्थ आहे. "आर्य, पाठ करा" असे विचारले असता पाठ करतो, याचा अर्थ असा विचारले असता आठ गरूधम्म-पाळीचे पठण करतो. अशा प्रकारे उद्देश देताना, परिपृच्छा देताना, आणि "पाठ करा" असे विचारले असता जो आठ गरूधम्म सांगतो, त्याला पाचित्तिय दोष लागत नाही (अनापत्ती होते). इतर धर्म सांगणाऱ्याला दुक्कट दोषापासून अनापत्ती होते. "प्रश्न विचारते, प्रश्न विचारला असता सांगतो" म्हणजे भिक्खुणीने गरूधम्मावर आधारित किंवा स्कंध इत्यादींवर आधारित प्रश्न विचारला आणि जो भिक्खू त्याचे उत्तर देतो, त्यालाही अनापत्ती होते. "इतरांच्या कल्याणासाठी सांगणे" म्हणजे चारही परिषदांना धर्मोपदेश करणाऱ्या भिक्खूजवळ येऊन जर भिक्खुणी ऐकत असतील, तर तिथेही भिक्खूला अनापत्ती होते. "सिक्खमाना आणि सामणेरी" यांना उपदेश करणाऱ्या भिक्खूलाही अनापत्ती होते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ปทโสธมฺมสมุฏฺฐานํ – วาจโต จ วาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ ติเวทนนฺติ. हे पदसोधम्मसमुट्ठाण (पदरचना-धर्म-समुत्थान) आहे – हे वाणीने आणि वाणी-चित्ताने उत्पन्न होते, क्रियात्मक (करण्याने होणारे) आहे, संज्ञेच्या अभावाने (जाणीव नसली तरी) मुक्ती न देणारे (दोषमुक्त न करणारे) आहे, अचित्तक (चित्ताशिवाय होणारे) आहे, पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तीमुळे दोषयुक्त) आहे, वचीकर्म (वाणीचे कर्म) आहे, तीन चित्ते आणि तीन वेदना असणारे आहे. โอวาทสิกฺขาปทํ ปฐมํ. पहिले ओवादसिक्खापद (उपदेश-शिक्षापद) समाप्त. ๒. อตฺถงฺคตสิกฺขาปทวณฺณนา २. अत्थंगतिसिक्खापद-वर्णना (अस्तंगत-शिक्षापद-वर्णन) ๑๕๓. ทุติยสิกฺขาปเท – ปริยาเยนาติ วาเรน, ปฏิปาฏิยาติ อตฺโถ. อธิเจตโสติ อธิจิตฺตวโต, สพฺพจิตฺตานํ อธิเกน อรหตฺตผลจิตฺเตน สมนฺนาคตสฺสาติ อตฺโถ. อปฺปมชฺชโตติ นปฺปมชฺชโต, อปฺปมาเทน กุสลานํ ธมฺมานํ สาตจฺจกิริยาย สมนฺนาคตสฺสาติ วุตฺตํ โหติ. มุนิโนติ ‘‘โย มุนาติ อุโภ โลเก, มุนิ เตน ปวุจฺจตี’’ติ (ธ. ป. ๒๖๙) เอวํ อุภยโลกมุนเนน วา, โมนํ วุจฺจติ ญาณํ, เตน ญาเณน สมนฺนาคตตฺตา วา ขีณาสโว มุนิ นาม วุจฺจติ, ตสฺส มุนิโน. โมนปเถสุ สิกฺขโตติ อรหตฺตญาณสงฺขาตสฺส โมนสฺส ปเถสุ สตฺตตึสโพธิปกฺขิยธมฺเมสุ ตีสุ วา สิกฺขาสุ สิกฺขโต. อิทญฺจ ปุพฺพภาคปฏิปทํ คเหตฺวา วุตฺตํ, ตสฺมา เอวํ ปุพฺพภาเค สิกฺขโต อิมาย สิกฺขาย มุนิภาวํ ปตฺตสฺส มุนิโนติ เอวเมตฺถ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. โสกา น ภวนฺติ ตาทิโนติ ตาทิสสฺส ขีณาสวมุนิโน อพฺภนฺตเร อิฏฺฐวิโยคาทิวตฺถุกา โสกา น สนฺติ. อถ วา ตาทิโนติ ตาทิลกฺขณสมนฺนาคตสฺส เอวรูปสฺส มุนิโน โสกา น ภวนฺตีติ อยเมตฺถ อตฺโถ. อุปสนฺตสฺสาติ ราคาทีนํ อุปสเมน อุปสนฺตสฺส. สทา สตีมโตติ สติเวปุลฺลปฺปตฺตตฺตา นิจฺจกาลํ สติยา อวิรหิตสฺส. อากาเส อนฺตลิกฺเขติ อนฺตลิกฺขสงฺขาเต อากาเส, น กสิณุคฺฆาฏิเม, น ปน รูปปริจฺเฉเท. จงฺกมติปิ ติฏฺฐติปีติ ตาสํ ภิกฺขุนีนํ กถํ [Pg.68] สุตฺวา ‘‘อิมา ภิกฺขุนิโย มํ ‘เอตฺตกเมว อยํ ชานาตี’ติ อวมญฺญนฺติ, หนฺท ทานิ เอตาสํ อตฺตโน อานุภาวํ ทสฺเสมี’’ติ ธมฺมพหุมานํ อุปฺปาเทตฺวา อภิญฺญาปาทกํ จตุตฺถชฺฌานํ สมาปชฺชิตฺวา วุฏฺฐาย เอวรูปํ อิทฺธิปาฏิหาริยํ ทสฺเสสิ – ‘‘อากาเส อนฺตลิกฺเข จงฺกมติปิ…เป… อนฺตรธายติปี’’ติ. ตตฺถ อนฺตรธายติปีติ อนฺตรธายติปิ อทสฺสนมฺปิ คจฺฉตีติ อตฺโถ. ตญฺเจว อุทานํ ภณติ อญฺญญฺจ พหุํ พุทฺธวจนนฺติ เถโร กิร อตฺตโน ภาตุเถรสฺส สนฺติเก – १५३. दुसऱ्या शिक्षापदात – 'पर्यायेन' म्हणजे अळीपाळीने, 'पटिपाटिया' म्हणजे क्रमाने असा अर्थ आहे. 'अधिचेतसो' म्हणजे उत्कृष्ट चित्त असलेल्या, सर्व चित्तांपेक्षा श्रेष्ठ अशा अर्हत्त्वफलचित्ताने युक्त असलेल्याचा, असा अर्थ आहे. 'अप्पमज्जतो' म्हणजे प्रमाद न करणाऱ्या, अप्रमादाने (जागरूकतेने) कुशल धर्मांचे निरंतर आचरण करणाऱ्याचा, असे म्हटले आहे. 'मुनिनो' म्हणजे "जो दोन्ही लोक जाणतो, म्हणून त्याला मुनी म्हटले जाते" अशा प्रकारे दोन्ही लोकांच्या ज्ञानामुळे किंवा 'मोन' म्हणजे ज्ञान म्हटले जाते, त्या ज्ञानाने युक्त असल्यामुळे क्षीणास्रव (अर्हत) व्यक्तीला 'मुनी' म्हटले जाते, त्या मुनीच्या. 'मोनपथेसु सिक्खतो' म्हणजे अर्हत्त्वज्ञानाचे मार्ग असलेल्या सदतीस बोधिपक्खिय धर्मांमध्ये किंवा तीन शिक्षांमध्ये अभ्यास करणाऱ्या. आणि हे पूर्वभागाची प्रतिपदा (सुरुवातीची साधना) गृहीत धरून म्हटले आहे, म्हणून अशा प्रकारे पूर्वभागात अभ्यास करणाऱ्या आणि या शिक्षेमुळे मुनिभावाला प्राप्त झालेल्या मुनीच्या बाबतीत, असा येथे अर्थ समजला पाहिजे. 'सोका न भवन्ति तादिनो' म्हणजे अशा प्रकारच्या क्षीणास्रव मुनीच्या अंतरात प्रिय वस्तूंच्या वियोगादी कारणांमुळे होणारे शोक नसतात. किंवा 'तादिनो' म्हणजे तादि-लक्षणाने (समतेने) युक्त असलेल्या अशा मुनीला शोक होत नाहीत, असा येथे अर्थ आहे. 'उपसन्तस्स' म्हणजे रागादी क्लेशांच्या उपशमनाने शांत झालेल्याचा. 'सदा सतीमतो' म्हणजे स्मृतीच्या विपुलतेला प्राप्त झाल्यामुळे नेहमी स्मृतीने युक्त असलेल्याचा. 'आकासे अन्तलिक्खे' म्हणजे अंतरीक्ष नावाच्या आकाशात, कसिण-उद्घाटनजन्य आकाशात नव्हे आणि रूपपरिच्छेद आकाशातही नव्हे. 'चङ्कमतिपि तिट्ठतिपी' म्हणजे त्या भिक्खुनींचे बोलणे ऐकून "या भिक्खुनी माझा 'हा केवळ एवढेच जाणतो' असा अवमान करत आहेत, तर आता मी यांना माझा प्रभाव दाखवतो" असा विचार करून, धर्माबद्दल आदर निर्माण करून, अभिज्ञांचे पादक (पाया) असलेल्या चतुर्थ ध्यानात समापन्न होऊन, त्यातून उठून आकाशात अशा प्रकारचे ऋद्धिप्रातिहार्य दाखवले - "आकाशात अंतरीक्षात चंक्रमणही करतो...पे... अंतर्धानही पावतो". तेथे 'अन्तरधायतिपि' म्हणजे अंतर्धान पावतो, अदृश्य होतो असा अर्थ आहे. "तेच उदान आणि इतर अनेक बुद्धवचन म्हणतो" याविषयी - थेर (चूळपंथक) आपल्या थोरल्या भावाच्या (महापंथक थेरांच्या) जवळ - ‘‘ปทุมํ ยถา โกกนุทํ สุคนฺธํ,ปาโต สิยา ผุลฺลมวีตคนฺธํ; องฺคีรสํ ปสฺส วิโรจมานํ,ตปนฺตมาทิจฺจมิวนฺตลิกฺเข’’ติ. (สํ. นิ. ๑.๑๒๓); "ज्याप्रमाणे सकाळी उमललेले, सुगंधी आणि सुगंधाने युक्त असे तांबडे कमळ (कोकनद) शोभून दिसते, त्याप्रमाणे अंतरीक्षात तळपणाऱ्या सूर्यासारखे देदीप्यमान आणि अंगीरस (ज्यांच्या शरीरातून रश्मी बाहेर पडतात अशा) सम्यक्संबुद्धांना पाहा." อิมํ คาถํ อุทฺทิสาเปตฺวา จตฺตาโร มาเส สชฺฌายิ. น จ ปคุณํ กตฺตุมสกฺขิ. ตโต นํ เถโร ‘‘อภพฺโพ ตฺวํ อิมสฺมึ สาสเน’’ติ วิหารา นิกฺกฑฺฒาเปสิ, โส โรทมาโน ทฺวารโกฏฺฐเก อฏฺฐาสิ. อถ ภควา พุทฺธจกฺขุนา เวเนยฺยสตฺเต โอโลเกนฺโต ตํ ทิสฺวา วิหารจาริกํ จรมาโน วิย ตสฺส สนฺติกํ คนฺตฺวา ‘‘จูฬปนฺถก, กสฺมา โรทสี’’ติ อาห. โส ตมตฺถํ อาโรเจสิ. อถสฺส ภควา สุทฺธํ ปิโลติกขณฺฑํ ทตฺวา ‘‘อิทํ ‘รโชหรณํ รโชหรณ’นฺติ ปริมชฺชาหี’’ติ อาห. โส ‘‘สาธู’’ติ สมฺปฏิจฺฉิตฺวา อตฺตโน นิวาสฏฺฐาเน นิสีทิตฺวา ตสฺส เอกมนฺตํ ปริมชฺชิ, ปริมชฺชิตฏฺฐานํ กาฬกมโหสิ. โส ‘‘เอวํ ปริสุทฺธมฺปิ นาม วตฺถํ อิมํ อตฺตภาวํ นิสฺสาย กาฬกํ ชาต’’นฺติ สํเวคํ ปฏิลภิตฺวา วิปสฺสนํ อารภิ. อถสฺส ภควา อารทฺธวีริยภาวํ ญตฺวา ‘‘อธิเจตโส’’ติ อิมํ โอภาสคาถํ อภาสิ. เถโร คาถาปริโยสาเน อรหตฺตํ ปาปุณิ. ตสฺมา เถโร ปกติยาว อิมํ คาถํ มมายติ, โส ตํ อิมิสฺสา คาถาย มมายนภาวํ ชานาเปตุํ ตํเยว ภณติ. อญฺญญฺจ อนฺตรนฺตรา อาหริตฺวา พหุํ พุทฺธวจนํ. เตน วุตฺตํ – ‘‘ตญฺเจว อุทานํ ภณติ, อญฺญญฺจ พหุํ พุทฺธวจน’’นฺติ. या गाथेचा उपदेश घेऊन त्यांनी चार महिने सज्झाय (पठण) केला. परंतु ते ती गाथा कंठस्थ करू शकले नाहीत. त्यामुळे थेरांनी (त्यांच्या थोरल्या भावाने) "तू या शासनात राहण्यास अयोग्य आहेस" असे म्हणून त्यांना विहारातून बाहेर काढून दिले. ते रडत रडत विहाराच्या प्रवेशद्वारापाशी उभे राहिले. तेव्हा भगवान बुद्धांनी बुद्धचक्षूंनी विनेय जीवांना (उपदेशास पात्र असलेल्यांना) पाहत असताना त्यांना पाहिले आणि विहारात फेरफटका मारल्यासारखे त्यांच्याजवळ जाऊन विचारले, "चूळपंथक, तू का रडत आहेस?" त्यांनी तो सर्व वृत्तांत सांगितला. तेव्हा भगवंतांनी त्यांना एक स्वच्छ कापडाचा तुकडा (पिलोतिकखंड) दिला आणि म्हणाले, "या कापडाला 'रजोहरणं रजोहरणं' (मळ दूर करणारे) असे म्हणत घास." त्यांनी "फार चांगले, भंते" असे म्हणून ते स्वीकारले आणि आपल्या राहण्याच्या ठिकाणी बसून त्या कापडाचा एक कोपरा घासला. घासलेला भाग काळा पडला. त्यांनी विचार केला, "असे अत्यंत स्वच्छ कापडसुद्धा या शरीराच्या संपर्काने काळे पडले!" असा संवेग (वैराग्य) प्राप्त करून त्यांनी विपश्यनेला सुरुवात केली. तेव्हा भगवंतांनी त्यांचा वीर्य-आरंभ (प्रयत्न) जाणून 'अधिचेतसो' ही प्रकाशयुक्त गाथा भाषिली. गाथेच्या शेवटी थेरांनी अर्हत्त्व प्राप्त केले. म्हणूनच थेर स्वभावत:च या गाथेला आपली मानत असत. ते या गाथेवरील आपले प्रेम दर्शवण्यासाठी तीच गाथा म्हणत असत आणि मध्ये-मध्ये इतर अनेक बुद्धवचने उद्धृत करून म्हणत असत. म्हणूनच म्हटले आहे - "तेच उदान आणि इतर अनेक बुद्धवचन म्हणतो." ๑๕๖. เอกโต อุปสมฺปนฺนายาติ [Pg.69] ภิกฺขุนิสงฺเฆ อุปสมฺปนฺนาย, ภิกฺขุสงฺเฆ ปน อุปสมฺปนฺนํ โอวทนฺตสฺส ปาจิตฺติยํ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. อิทมฺปิ จ ปทโสธมฺมสมุฏฺฐานเมว. १५६. 'एकतो उपसम्पन्नाय' म्हणजे भिक्खुनीसंघात उपसंपदा प्राप्त झालेल्या भिक्खुनीला; परंतु भिक्खूसंघात उपसंपदा प्राप्त झालेल्या भिक्खुनीला उपदेश करणाऱ्या भिक्खूला पाचित्तिय होते. उर्वरित भाग येथे स्पष्टच आहे. आणि हा नियम देखील पदसोधम्मसमुट्ठानाचाच आहे. อตฺถงฺคตสิกฺขาปทํ ทุติยํ. अत्थंगता शिक्षापद दुसरे समाप्त. ๓. ภิกฺขุนุปสฺสยสิกฺขาปทวณฺณนา ३. भिक्खुनुपस्सय शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๑๖๒. ตติยสิกฺขาปเท – อญฺญตฺร สมยา โอวทติ อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสาติอาทีสุ อฏฺฐหิ ครุธมฺเมหิ โอวทนฺตสฺเสว ปาจิตฺติยํ, อญฺเญน ธมฺเมน ทุกฺกฏนฺติ เวทิตพฺพํ. เอกโตอุปสมฺปนฺนายาติ ภิกฺขุนิสงฺเฆ อุปสมฺปนฺนาย, ภิกฺขุสงฺเฆ อุปสมฺปนฺนาย ปน โอวทโต ปาจิตฺติยเมว. อิโต ปรมฺปิ ยตฺถ ยตฺถ ‘‘เอกโตอุปสมฺปนฺนา’’ติ วุจฺจติ, สพฺพตฺถ อยเมว อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. เสสํ อุตฺตานเมว. १६२. तिसऱ्या शिक्षापदात - 'अञ्ञत्र समया ओवदति आपत्ति पाचित्तियस्स' इत्यादींमध्ये आठ गरूधर्मांनी उपदेश करणाऱ्यालाच पाचित्तिय होते, इतर धर्माने (उपदेश केल्यास) दुक्कट होते, असे समजावे. 'एकतोउपसम्पन्नाय' म्हणजे भिक्खुनीसंघात उपसंपदा प्राप्त झालेल्या भिक्खुनीला; परंतु भिक्खूसंघात उपसंपदा प्राप्त झालेल्या भिक्खुनीला उपदेश केल्यास पाचित्तियच होते. यापुढेही जिथे जिथे 'एकतोउपसम्पन्ना' असे म्हटले आहे, तिथे सर्वत्र हाच अर्थ समजावा. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. กถินสมุฏฺฐานํ – กายวาจโต, กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. हे कठीणसमुट्ठानाचे आहे - हे काय-वाचेने आणि काय-वाचा-चित्ताने उत्पन्न होते; क्रिया, नोसञ्ञाविमोक्ख (संज्ञा नसली तरी मुक्ती नाही), अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज (पज्ञप्तीमुळे दोषयुक्त), कायकर्म, वचीकर्म, तिचित्त (तीन चित्त असलेले) आणि तिवेदन (तीन वेदना असलेले) आहे. ภิกฺขุนุปสฺสยสิกฺขาปทํ ตติยํ. भिक्खुनुपस्सय शिक्षापद तिसरे समाप्त. อิทํ ปเนตฺถ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ ปกิณฺณกํ – อสมฺมโต เจ ภิกฺขุ อตฺถงฺคเต สูริเย ภิกฺขุนุปสฺสยํ อุปสงฺกมิตฺวา อฏฺฐหิ ครุธมฺเมหิ โอวทติ, ตีณิ ปาจิตฺติยานิ. อญฺเญน ธมฺเมน โอวทโต ทฺเว ทุกฺกฏานิ, เอกํ ปาจิตฺติยํ. กถํ? อสมฺมตมูลกํ ทุกฺกฏํ, อุปสฺสยํ คนฺตฺวา อญฺเญน ธมฺเมน โอวทนมูลกํ ทุกฺกฏํ, อตฺถงฺคเต สูริเย โอวทนมูลกํ ปาจิตฺติยนฺติ. สมฺมตสฺส อตฺถงฺคเต สูริเย ตตฺถ คนฺตฺวา อฏฺฐหิ ครุธมฺเมหิ โอวทนฺตสฺส เอกา อนาปตฺติ, ทฺเว ปาจิตฺติยานิ. กถํ? สมฺมตตฺตา อนาปตฺติ, อตฺถงฺคเต สูริเย โอวทนมูลกํ เอกํ, คนฺตฺวา ครุธมฺเมหิ โอวทนมูลกํ เอกนฺติ ทฺเว ปาจิตฺติยานิ. ตสฺเสว อญฺเญน ธมฺเมน โอวทโต เอกา อนาปตฺติ, เอกํ ทุกฺกฏํ, เอกํ ปาจิตฺติยํ. กถํ? สมฺมตตฺตา อนาปตฺติ, คนฺตฺวา อญฺเญน ธมฺเมน โอวทนมูลกํ ทุกฺกฏํ, อตฺถงฺคเต สูริเย โอวทนมูลกํ ปาจิตฺติยนฺติ. ทิวา [Pg.70] ปน คนฺตฺวา โอวทโต สมฺมตสฺส จ อสมฺมตสฺส จ รตฺตึ โอวทนมูลกํ เอกํ ปาจิตฺติยํ อปเนตฺวา อวเสสา อาปตฺตานาปตฺติโย เวทิตพฺพาติ. या संदर्भात महाप्रत्यय (महापच्चरी) अठ्ठकथेत सांगितलेला हा संकीर्ण (मिश्र) निर्णय आहे – जर असंमत (न नेमलेला) भिक्खू सूर्य मावळल्यावर भिक्खुनींच्या विहारात जाऊन आठ गरूधम्मांद्वारे उपदेश करतो, तर तीन पाचित्तिय (प्रायश्चित्त) होतात. इतर (गरूधम्मांशिवाय इतर) धम्माने उपदेश केल्यास दोन दुक्कट (दुष्कृत) आणि एक पाचित्तिय होते. ते कसे? असंमत असण्यामुळे एक दुक्कट, विहारात जाऊन इतर धम्माने उपदेश केल्यामुळे दुसरे दुक्कट, आणि सूर्य मावळल्यावर उपदेश केल्यामुळे एक पाचित्तिय होते. संमत (नेमलेल्या) भिक्खूने सूर्य मावळल्यावर तेथे जाऊन आठ गरूधम्मांद्वारे उपदेश केल्यास एक अनापत्ती (आपत्ती नसणे) आणि दोन पाचित्तिय होतात. ते कसे? संमत असल्यामुळे अनापत्ती; सूर्य मावळल्यावर उपदेश केल्यामुळे एक पाचित्तिय आणि विहारात जाऊन गरूधम्मांद्वारे उपदेश केल्यामुळे एक पाचित्तिय, अशी दोन पाचित्तिय होतात. त्याच (संमत) भिक्खूने इतर धम्माने उपदेश केल्यास एक अनापत्ती, एक दुक्कट आणि एक पाचित्तिय होते. ते कसे? संमत असल्यामुळे अनापत्ती; विहारात जाऊन इतर धम्माने उपदेश केल्यामुळे एक दुक्कट आणि सूर्य मावळल्यावर उपदेश केल्यामुळे एक पाचित्तिय होते. परंतु दिवसा जाऊन उपदेश करणाऱ्या संमत आणि असंमत भिक्खूच्या बाबतीत, रात्री उपदेश केल्यामुळे होणारे एक पाचित्तिय वगळून उर्वरित आपत्ती व अनापत्ती जाणाव्यात. ปกิณฺณกกถา นิฏฺฐิตา. संकीर्ण कथा समाप्त झाली. ๔. อามิสสิกฺขาปทวณฺณนา ४. आमिष सिक्खापद स्पष्टीकरण ๑๖๔. จตุตฺถสิกฺขาปเท – น พหุกตาติ น กตพหุมานา, น ธมฺเม พหุมานํ กตฺวา โอวทนฺตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘ภิกฺขุโนวาทกํ อวณฺณํ กตฺตุกาโม’’ติอาทีนํ อุชฺฌาปนเก วุตฺตนเยเนวตฺโถ เวทิตพฺโพ. १६४. चौथ्या सिक्खापदात – 'न बहुकता' म्हणजे आदर न दाखवता, धम्माचा आदर न करता उपदेश करतात असा अभिप्राय आहे. "भिक्खूंच्या उपदेशाची निंदा करण्याची इच्छा असणारा" इत्यादी शब्दांचा अर्थ उज्ज्हापनक सिक्खापदात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. อุปสมฺปนฺนํ สงฺเฆน อสมฺมตนฺติ เอตฺถ อสมฺมโต นาม สมฺมเตน วา สงฺเฆน วา ภารํ กตฺวา ฐปิโต เวทิตพฺโพ. อนุปสมฺปนฺนํ สมฺมตํ วา อสมฺมตํ วาติ เอตฺถ ปน ภิกฺขุกาเล สมฺมุตึ ลภิตฺวา สามเณรภูมิยํ ฐิโต สมฺมโต, สมฺมเตน วา สงฺเฆน วา ฐปิโต พหุสฺสุโต สามเณโร อสมฺมโตติ เวทิตพฺโพ. เสสํ วุตฺตนยตฺตา อุตฺตานเมว. 'उपसंपन्नं संघेन असंमतं' यामध्ये 'असंमत' म्हणजे संमत भिक्खूने किंवा संघाने ज्याच्यावर जबाबदारी सोपवून नियुक्त केलेले नाही, असा समजावा. 'अनुपसंपन्नं संमतं वा असंमतं वा' यामध्ये भिक्खू असताना संमती मिळवून नंतर सामणेर अवस्थेत राहिलेला 'संमत' समजावा; आणि संमत भिक्खूने किंवा संघाने जबाबदारी देऊन नियुक्त केलेला बहुश्रुत सामणेर 'असंमत' समजावा. उर्वरित भाग आधी सांगितलेल्या पद्धतीनुसार स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กายจิตฺตโต วาจาจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. हे तीन समुत्थान असणारे सिक्खापद आहे – हे काय-चित्त, वाचा-चित्त आणि काय-वाचा-चित्त यांपासून उद्भवते; हे क्रियात्मक (किरिय), संज्ञाविमोक्ष (जाणीव नसताना आपत्तीतून मुक्तता असणारे), सचित्तक (सचेतन), लोकवज्ज (लोकापवादकारक), कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे. อามิสสิกฺขาปทํ จตุตฺถํ. चौथे आमिष सिक्खापद समाप्त. ๕. จีวรทานสิกฺขาปทวณฺณนา ५. चीवरदान सिक्खापद स्पष्टीकरण ๑๖๙. ปญฺจมสิกฺขาปเท – วิสิขายาติ รถิกาย. ปิณฺฑาย จรตีติ นิพทฺธจารวเสน อภิณฺหํ จรติ. สนฺทิฏฺฐาติ สนฺทิฏฺฐมิตฺตา อเหสุํ. เสสเมตฺถ ปทโต อุตฺตานตฺถํ, วินิจฺฉยโต จีวรปฏิคฺคหณสิกฺขาปเท วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ สทฺธึ สมุฏฺฐานาทีหิ. ตตฺร หิ ภิกฺขุ ปฏิคฺคาหโก, อิธ ภิกฺขุนี, อยํ วิเสโส. เสสํ ตาทิสเมวาติ. १६९. पाचव्या सिक्खापदात – 'विसिखाय' म्हणजे रस्त्यावर (गल्लीत). 'पिंडाय चरति' म्हणजे नियमितपणे भिक्षेसाठी वारंवार फिरणे. 'संदिट्ठा' म्हणजे पूर्वी पाहिलेले मित्र होते. येथील उर्वरित शब्दांचा अर्थ स्पष्ट आहे. निर्णयाच्या बाबतीत, समुत्थानासह सर्व गोष्टी चीवरप्रतिग्रहण सिक्खापदात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजाव्यात. कारण तेथे भिक्खू हा स्वीकारणारा (प्रतिग्राहक) आहे, तर येथे भिक्खुनी स्वीकारणारी आहे, हाच विशेष फरक आहे. उर्वरित सर्व भाग तसाच आहे. จีวรทานสิกฺขาปทํ ปญฺจมํ. पाचवे चीवरदान सिक्खापद समाप्त. ๖. จีวรสิพฺพนสิกฺขาปทวณฺณนา ६. चीवरशिवण सिक्खापद स्पष्टीकरण ๑๗๕. ฉฏฺฐสิกฺขาปเท [Pg.71] – อุทายีติ ลาฬุทายี. ปฏฺโฐติ ปฏิพโล, นิปุโณ เจว สมตฺโถ จาติ วุตฺตํ โหติ. อญฺญตรา ภิกฺขุนีติ ตสฺเสว ปุราณทุติยิกา. ปฏิภานจิตฺตนฺติ อตฺตโน ปฏิภาเนน กตจิตฺตํ, โส กิร จีวรํ รชิตฺวา ตสฺส มชฺเฌ นานาวณฺเณหิ วิปฺปกตเมถุนํ อิตฺถิปุริสรูปมกาสิ. เตน วุตฺตํ – ‘‘มชฺเฌ ปฏิภานจิตฺตํ วุฏฺฐาเปตฺวา’’ติ. ยถาสํหฏนฺติ ยถาสํหริตเมว. १७५. सहाव्या सिक्खापदात – 'उदायी' म्हणजे लाळुदायी (चंचल मनाचा उदायी). 'पट्ठो' म्हणजे समर्थ, निपुण आणि कार्यक्षम असा अर्थ आहे. 'अञ्ञतरा भिक्खुनी' म्हणजे त्याचीच पूर्वपत्नी. 'पटिभानचित्त' म्हणजे स्वतःच्या कल्पकतेने तयार केलेले चित्र; त्याने चीवर रंगवून त्याच्या मध्यभागी वेगवेगळ्या रंगांच्या धाग्यांनी अपूर्ण मैथुन दर्शवणारे स्त्री-पुरुषाचे चित्र काढले होते. म्हणूनच "मध्यभागी पटिभानचित्त कोरून" असे म्हटले आहे. 'यथासंहटं' म्हणजे जसे घडी घातले होते तसेच. ๑๗๖. จีวรนฺติ ยํ นิวาสิตุํ วา ปารุปิตุํ วา สกฺกา โหติ, เอวญฺหิ มหาปจฺจริยาทีสุ วุตฺตํ. สยํ สิพฺพตีติ เอตฺถ สิพฺพิสฺสามีติ วิจาเรนฺตสฺสาปิ ฉินฺทนฺตสฺสาปิ ทุกฺกฏํ, สิพฺพนฺตสฺส ปน ปาจิตฺติยํ. อาราปเถ อาราปเถติ สูจึ ปเวเสตฺวา ปเวเสตฺวา นีหรเณ. สเจ ปน สกลสูจึ อนีหรนฺโต ทีฆสุตฺตปฺปเวสนตฺถํ สตกฺขตฺตุมฺปิ วิชฺฌิตฺวา นีหรติ, เอกเมว ปาจิตฺติยํ. สกึ อาณตฺโตติ สกึ ‘‘จีวรํ สิพฺพา’’ติ วุตฺโต. พหุกมฺปิ สิพฺพตีติ สเจปิ สพฺพํ สูจิกมฺมํ ปริโยสาเปตฺวา จีวรํ นิฏฺฐาเปติ, เอกเมว ปาจิตฺติยํ. อถ ปน ‘‘อิมสฺมึ จีวเร กตฺตพฺพกมฺมํ ตว ภาโร’’ติ วุตฺโต กโรติ, อาณตฺตสฺส อาราปเถ อาราปเถ เอกเมกํ ปาจิตฺติยํ, อาณาปกสฺส เอกวาจาย สมฺพหุลานิปิ. ปุนปฺปุนํ อาณตฺติยํ ปน วตฺตพฺพเมว นตฺถิ. १७६. 'चीवर' म्हणजे जे नेसता किंवा पांघरता येते; महाप्रत्यय इत्यादी अठ्ठकथांमध्ये असेच म्हटले आहे. 'स्वतः शिवतो' यामध्ये "मी शिवेन" असा विचार करणाऱ्याला किंवा कापणाऱ्यालाही दुक्कट होते, परंतु शिवणाऱ्याला पाचित्तिय होते. 'आरापथे आरापथे' म्हणजे सुई वारंवार आत घालून बाहेर काढणे. परंतु जर संपूर्ण सुई बाहेर न काढता, लांब धागा घालण्यासाठी शंभर वेळाही टोचून बाहेर काढले, तर एकच पाचित्तिय होते. 'एकदा आज्ञा दिलेला' म्हणजे एकदा "चीवर शीव" असे सांगितलेला. 'खूप शिवतो' म्हणजे जरी सर्व सुईचे काम संपवून चीवर पूर्ण केले, तरी एकच पाचित्तिय होते. परंतु जर "या चीवराचे काम करणे ही तुझी जबाबदारी आहे" असे सांगितल्यावर तो करतो, तर आज्ञा मिळालेल्याला प्रत्येक टाक्यागणिक (सुईच्या मार्गावर) एकेक पाचित्तिय होते, आणि आज्ञा देणाऱ्याला एकाच शब्दाने अनेक पाचित्तिय होतात. वारंवार आज्ञा देण्याच्या बाबतीत तर अधिक सांगण्याची गरजच नाही. เยปิ สเจ อาจริยุปชฺฌาเยสุ อตฺตโน ญาติกานํ จีวรํ สิพฺพนฺเตสุ เตสํ นิสฺสิตกา ‘‘อาจริยุปชฺฌายวตฺตํ วา กถินวตฺตํ วา กโรมา’’ติ สิพฺพนฺติ, เตสมฺปิ อาราปถคณนาย อาปตฺติโย. อาจริยุปชฺฌายา อตฺตโน ญาติกานํ จีวรํ อนฺเตวาสิเกหิ สิพฺพาเปนฺติ, อาจริยุปชฺฌายานํ ทุกฺกฏํ, อนฺเตวาสิกานํ ปาจิตฺติยํ. อนฺเตวาสิกา อตฺตโน ญาติกานํ อาจริยุปชฺฌาเยหิ สิพฺพาเปนฺติ, ตตฺราปิ เอเสว นโย. อนฺเตวาสิกานมฺปิ อาจริยุปชฺฌายานมฺปิ ญาติกาย จีวรํ โหติ, อาจริยุปชฺฌายา ปน อนฺเตวาสิเก วญฺเจตฺวา สิพฺพาเปนฺติ, อุภินฺนมฺปิ ทุกฺกฏํ. กสฺมา? อนฺเตวาสิกานํ อญฺญาติกสญฺญาย สิพฺพิตตฺตา, อิตเรสํ อกปฺปิเย นิโยชิตตฺตา. ตสฺมา ‘‘อิทํ เต มาตุ จีวรํ, อิทํ ภคินิยา’’ติ อาจิกฺขิตฺวา สิพฺพาเปตพฺพํ. जर आचार्य आणि उपाध्याय आपल्या नातेवाईक भिक्खुनींचे चीवर शिवत असताना, त्यांचे आश्रित शिष्य "आचार्य-उपाध्यायांचे कर्तव्य किंवा कठिन-कर्तव्य पूर्ण करतो" असे म्हणून शिवतात, तर त्यांनाही टाक्यांच्या संख्येनुसार आपत्ती होतात. जर आचार्य-उपाध्याय आपल्या नातेवाईक भिक्खुनींचे चीवर अंतेवासिकांकडून (शिष्यांकडून) शिववून घेतात, तर आचार्य-उपाध्यायांना दुक्कट होते आणि अंतेवासिकांना पाचित्तिय होते. जर अंतेवासिक आपल्या नातेवाईक भिक्खुनींचे चीवर आचार्य-उपाध्यायांकडून शिववून घेतात, तर तेथेही हाच नियम लागू होतो. जर अंतेवासिकांच्या आणि आचार्य-उपाध्यायांच्या नातेवाईक भिक्खुनीचे चीवर असेल, परंतु आचार्य-उपाध्याय अंतेवासिकांना न सांगता (फसवून) शिववून घेतात, तर दोघांनाही दुक्कट होते. कारण काय? अंतेवासिकांनी ती नातेवाईक नाही अशा समजुतीने शिवल्यामुळे, आणि इतरांनी (आचार्यांनी) अयोग्य कामात प्रवृत्त केल्यामुळे. म्हणून "हे तुझ्या आईचे चीवर आहे, हे बहिणीचे आहे" असे सांगूनच शिववून घ्यावे. ๑๗๙. อญฺญํ [Pg.72] ปริกฺขารนฺติ ยํกิญฺจิ อุปาหนตฺถวิกาทึ. เสสํ อุตฺตานเมว. ฉสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. १७९. 'इतर परिष्कार' म्हणजे पादत्राणे, पिशवी इत्यादी काहीही. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. हे सहा समुत्थान असणारे सिक्खापद आहे – हे क्रियात्मक (किरिय), नोसंज्ञाविमोक्ष (जाणीव नसली तरी आपत्तीतून मुक्तता न होणारे), अचित्तक (चित्त नसलेले), पण्णत्तिवज्ज (नियमांचे उल्लंघन करणारे), कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदनायुक्त आहे. จีวรสิพฺพนสิกฺขาปทํ ฉฏฺฐํ. सहावे चीवरशिवण सिक्खापद समाप्त. ๗. สํวิธานสิกฺขาปทวณฺณนา ७. संविधान सिक्खापद स्पष्टीकरण ๑๘๑. สตฺตมสิกฺขาปเท – ปจฺฉา คจฺฉนฺตีนํ โจรา อจฺฉินฺทึสูติ ปจฺฉา คจฺฉนฺตีนํ ปตฺตจีวรํ โจรา หรึสุ. ทูเสสุนฺติ ตา ภิกฺขุนิโย โจรา ทูสยึสุ, สีลวินาสํ ปาปยึสูติ อตฺโถ. १८१. सातव्या सिक्खापदात – 'मागाहून जाणाऱ्यांना चोरांनी लुटले' म्हणजे मागाहून जाणाऱ्या भिक्खुनींचे पात्र व चीवर चोरांनी हिरावून घेतले. 'दूषित केले' म्हणजे चोरांनी त्या भिक्खुनींवर अत्याचार केला, त्यांचा शीलभंग केला, असा अर्थ आहे. ๑๘๒-๓. สํวิธายาติ สํวิทหิตฺวา, คมนกาเล สงฺเกตํ กตฺวาติ อตฺโถ. กุกฺกุฏสมฺปาเทติ เอตฺถ ยสฺมา คามา นิกฺขมิตฺวา กุกฺกุโฏ ปทสาว อญฺญํ คามํ คจฺฉติ, อยํ กุกฺกุฏสมฺปาโทติ วุจฺจติ. ตตฺรายํ วจนตฺโถ – สมฺปทนฺติ เอตฺถาติ สมฺปาโท. เก สมฺปทนฺติ? กุกฺกุฏา. กุกฺกุฏานํ สมฺปาโท กุกฺกุฏสมฺปาโท. อถ วา สมฺปาโทติ คมนํ, กุกฺกุฏานํ สมฺปาโท เอตฺถ อตฺถีติปิ กุกฺกุฏสมฺปาโท. กุกฺกุฏสมฺปาเต อิติปิ ปาโฐ, ตตฺถ ยสฺส คามสฺส เคหจฺฉทนปิฏฺฐิโต กุกฺกุโฏ อุปฺปติตฺวา อญฺญสฺส เคหจฺฉทนปิฏฺฐิยํ ปตติ, อยํ กุกฺกุฏสมฺปาโตติ วุจฺจติ. วจนตฺโถ ปเนตฺถ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. ทฺวิธา วุตฺตปฺปกาโรปิ เจส คาโม อจฺจาสนฺโน โหติ, อุปจาโร น ลพฺภติ. ยสฺมึ ปน คาเม ปจฺจูเส วสฺสนฺตสฺส กุกฺกุฏสฺส สทฺโท อนนฺตเร คาเม สุยฺยติ, ตาทิเสหิ คาเมหิ สมฺปุณฺณรฏฺเฐ คามนฺตเร คามนฺตเร ปาจิตฺติยนฺติ อฏฺฐกถายํ วุตฺตํ. กิญฺจาปิ วุตฺตํ, ‘‘คามนฺตเร คามนฺตเร อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสา’’ติ วจนโต ปน สเจปิ รตนมตฺตนฺตโร คาโม โหติ, โย ตสฺส มนุสฺเสหิ ฐปิตอุปจาโร, ตํ โอกฺกมนฺตสฺส อาปตฺติเยว. १८२-३. संविधाय (नियोजन करून) म्हणजे नियोजन करून, जाण्याच्या वेळी वेळ व ठिकाण निश्चित करून, असा अर्थ आहे. 'कुक्कुटसंपादे' (कोंबड्याच्या पोहोचण्याच्या अंतरावर) यामध्ये - ज्या गावापासून निघून कोंबडा पायानेच (चालतच) दुसऱ्या गावाला जाऊ शकतो, त्याला 'कुक्कुटसंपाद' असे म्हटले जाते. तेथे हा शब्दाचा अर्थ आहे - येथे चांगल्या प्रकारे जाऊ शकतात म्हणून ते 'संपाद' (जाण्याचे ठिकाण) होय. कोण चांगल्या प्रकारे जाऊ शकतात? कोंबडे. कोंबड्यांचे जाणे म्हणजे 'कुक्कुटसंपाद' होय. किंवा 'संपाद' म्हणजे गमन (जाणे); येथे कोंबड्यांचे गमन शक्य आहे, म्हणून देखील 'कुक्कुटसंपाद' म्हटले जाते. 'कुक्कुटसंपाते' असाही पाठ आहे; त्या पाठात - ज्या गावाच्या घराच्या छपरावरून कोंबडा उडून दुसऱ्या गावाच्या घराच्या छपरावर पडतो (उतरतो), त्याला 'कुक्कुटसंपात' असे म्हटले जाते. येथे शब्दाचा अर्थ पूर्वोक्त पद्धतीनेच समजून घ्यावा. दोन्ही प्रकारे सांगितलेला हा गाव अतिशय जवळ असतो, त्यामुळे (गावाचा) उपचार (सीमा) मिळत नाही. परंतु ज्या गावामध्ये पहाटेच्या वेळी आरवणाऱ्या कोंबड्याचा आवाज लगतच्या गावामध्ये ऐकू येतो, अशा गावांनी भरलेल्या देशात एका गावातून दुसऱ्या गावात जाताना पाचित्तिय होते, असे अट्ठकथेत म्हटले आहे. जरी असे म्हटले असले तरी, 'प्रत्येक गावाच्या दरम्यान पाचित्तिय आपत्ती होते' या वचनामुळे, जर दोन गावांच्या दरम्यान केवळ एक हात एवढेच अंतर असेल, तरीही त्या गावाच्या लोकांनी ठरवलेली जी सीमा (उपचार) आहे, त्या सीमेमध्ये प्रवेश करणाऱ्या भिक्खूला आपत्तीच होते. ตตฺรายํ อาปตฺติวินิจฺฉโย – สํวิธานกาเล หิ สเจ อุโภปิ ภิกฺขุนุปสฺสเย วา อนฺตราราเม วา อาสนสาลาย วา ติตฺถิยเสยฺยาย วา ฐตฺวา สํวิทหนฺติ, อนาปตฺติ กปฺปิยภูมิ กิรายํ. ตสฺมา เอตฺถ สํวิทหนปจฺจยา [Pg.73] ทุกฺกฏาปตฺตึ น วทนฺติ, คจฺฉนฺตสฺส ยถาวตฺถุกเมว. สเจ ปน อนฺโตคาเม ภิกฺขุนุปสฺสยทฺวาเร รถิกาย อญฺเญสุ วา จตุกฺกสิงฺฆาฏกหตฺถิสาลาทีสุ สํวิทหนฺติ, ภิกฺขุโน อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺส. เอวํ สํวิทหิตฺวา คามโต นิกฺขมนฺติ, นิกฺขมเน อนาปตฺติ, อนนฺตรคามสฺส อุปจาโรกฺกมเน ปน ภิกฺขุโน ปาจิตฺติยํ. ตตฺราปิ ‘‘ปฐมปาเท ทุกฺกฏํ, ทุติยปาเท ปาจิตฺติย’’นฺติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. คามโต นิกฺขมิตฺวา ปน ยาว อนนฺตรคามสฺส อุปจารํ น โอกฺกมนฺติ, เอตฺถนฺตเร สํวิทหิเตปิ ภิกฺขุโน ทุกฺกฏํ, อนนฺตรคามสฺส อุปจาโรกฺกมเน ปุริมนเยเนว อาปตฺติ. สเจ ทูรํ คนฺตุกามา โหนฺติ, คามูปจารคณนาย โอกฺกมเน โอกฺกมเน อาปตฺติ, ตสฺส ตสฺส ปน คามสฺส อติกฺกมเน อนาปตฺติ. สเจ ปน ภิกฺขุนี ‘‘อสุกํ นาม คามํ คมิสฺสามี’’ติ อุปสฺสยโต นิกฺขมติ, ภิกฺขุปิ ตเมว คามํ สนฺธาย ‘‘อสุกํ นาม คามํ คมิสฺสามี’’ติ วิหารโต นิกฺขมติ. อถ ทฺเวปิ คามทฺวาเร สมาคนฺตฺวา ‘‘ตุมฺเห กุหึ คจฺฉถ, อสุกํ นาม คามํ ตุมฺเห กุหินฺติ, มยมฺปิ ตตฺเถวา’’ติ วตฺวา ‘‘เอหิ ทานิ, คจฺฉามา’’ติ สํวิธาย คจฺฉนฺติ, อนาปตฺติ. กสฺมา? ปุพฺพเมว คมิสฺสามาติ นิกฺขนฺตตฺตาติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. ตํ เนว ปาฬิยา น เสสอฏฺฐกถาย สเมติ. त्यामध्ये हा आपत्तीचा निर्णय आहे - नियोजनाच्या वेळी जर दोघेही (भिक्खू आणि भिक्खुनी) भिक्खुनींच्या विहारात, किंवा गावातील आरामात, किंवा भोजनशाळेत, किंवा तीर्थिकांच्या निवासस्थानात थांबून नियोजन करतात, तर अनापत्ती होते; कारण ही कल्प्य भूमी (योग्य जागा) आहे. म्हणून येथे नियोजन करण्याच्या कारणामुळे 'दुक्कट' आपत्ती सांगत नाहीत; जाणाऱ्या भिक्खूला परिस्थितीनुसारच आपत्ती होते. परंतु जर ते गावाच्या आत, भिक्खुनींच्या विहाराच्या दारावर, रस्त्यावर किंवा इतर चौक, तिठा, हत्तीशाळा इत्यादी ठिकाणी नियोजन करतात, तर भिक्खूला दुक्कट आपत्ती होते. अशा प्रकारे नियोजन करून जर ते गावातून बाहेर पडतात, तर बाहेर पडताना अनापत्ती होते; परंतु लगतच्या गावाच्या सीमेमध्ये प्रवेश करताना भिक्खूला पाचित्तिय होते. तेथेही 'पहिल्या पाऊलावर दुक्कट होते, दुसऱ्या पाऊलावर पाचित्तिय होते' असे महाप्रत्यरीमध्ये म्हटले आहे. गावातून बाहेर पडल्यानंतर जोपर्यंत ते लगतच्या गावाच्या सीमेमध्ये प्रवेश करत नाहीत, तोपर्यंत या दरम्यानच्या काळात नियोजन केले असले तरी भिक्खूला दुक्कट होते; लगतच्या गावाच्या सीमेमध्ये प्रवेश करताना पूर्वोक्त पद्धतीनेच (पाचित्तिय) आपत्ती होते. जर ते दूरवर जाऊ इच्छिणारे असतील, तर गावांच्या सीमांच्या मोजणीनुसार प्रत्येक सीमेत प्रवेश करताना आपत्ती होते; परंतु त्या त्या गावाचे उल्लंघन करताना (ते पार करताना) अनापत्ती होते. परंतु जर भिक्खुनी 'मी अमुक नावाच्या गावाला जाईन' असा विचार करून विहारातून बाहेर पडते, आणि भिक्खू देखील त्याच गावाला उद्देशून 'मी अमुक नावाच्या गावाला जाईन' असा विचार करून विहारातून बाहेर पडतो; त्यानंतर दोघेही गावाच्या वेशीवर एकत्र येऊन 'तुम्ही कोठे जात आहात?' 'आम्ही अमुक नावाच्या गावाला जात आहोत.' 'तुम्ही कोठे जात आहात?' असे विचारल्यावर 'आम्ही देखील तेथेच जात आहोत' असे म्हणून 'चल आता, जाऊ या' असे ठरवून जातात, तर अनापत्ती होते. का? कारण ते आधीच 'जाऊ या' असा विचार करून निघालेले असल्यामुळे, असे महाप्रत्यरीमध्ये म्हटले आहे. ते वचन पाळिपाठाशी जुळत नाही आणि इतर अट्ठकथांशी देखील जुळत नाही, हा आपत्तीचा निर्णय आहे. อทฺธโยชเน อทฺธโยชเนติ เอกเมกํ อทฺธโยชนํ อติกฺกมนฺตสฺส อิทานิ อติกฺกมิสฺสตีติ ปฐมปาเท ทุกฺกฏํ, ทุติยปาเท ปาจิตฺติยํ. อิมสฺมิญฺหิ นเย อติกฺกมเน อาปตฺติ, โอกฺกมเน อนาปตฺติ. अर्ध्या-अर्ध्या योजनेवर म्हणजे - प्रत्येक अर्धे योजन पार करणाऱ्या भिक्खूच्या बाबतीत, 'आता तो अर्धे योजन पार करेल' असे म्हणण्याच्या वेळी पहिल्या पाऊलावर दुक्कट होते, दुसऱ्या पाऊलावर पाचित्तिय होते. कारण या पद्धतीमध्ये (योजन) पार करताना आपत्ती होते, आणि (सीमेत) प्रवेश करताना अनापत्ती होते. ๑๘๔. ภิกฺขุ สํวิทหตีติ นครทฺวาเร วา รถิกาย วา ภิกฺขุนึ ทิสฺวา ‘‘อสุกํ คามํ นาม คตปุพฺพตฺถา’’ติ วทติ, ‘‘นามฺหิ อยฺย คตปุพฺพา’’ติ ‘‘เอหิ คจฺฉามา’’ติ วา ‘‘สฺเว อหํ คมิสฺสามิ, ตฺวมฺปิ อาคจฺเฉยฺยาสี’’ติ วา วทติ. ภิกฺขุนี สํวิทหตีติ คามนฺตเร เจติยวนฺทนตฺถํ คามโต นิกฺขมนฺตํ ภิกฺขุํ ทิสฺวา ‘‘อยฺย กุหึ คจฺฉถา’’ติ วทติ. ‘‘อสุกํ นาม คามํ เจติยวนฺทนตฺถ’’นฺติ. ‘‘อหมฺปิ อยฺย อาคจฺฉามี’’ติ เอวํ ภิกฺขุนีเยว สํวิทหติ, น ภิกฺขุ. १८४. भिक्खू नियोजन करतो म्हणजे - नगरद्वारावर किंवा रस्त्यावर भिक्खुनीला पाहून 'तुम्ही अमुक नावाच्या गावाला पूर्वी गेला आहात का?' असे विचारतो. ती 'भंते, मी पूर्वी गेले नाही' असे म्हणते. तेव्हा तो 'चल, जाऊ या' असे किंवा 'उद्या मी जाईन, तू देखील सोबत चल' असे म्हणतो. भिक्खुनी नियोजन करते म्हणजे - दुसऱ्या गावाच्या दरम्यान चेतिय वंदनेसाठी गावातून बाहेर पडणाऱ्या भिक्खूला पाहून 'भंते, आपण कोठे जात आहात?' असे विचारते. भिक्खू 'अमुक नावाच्या गावाला चेतिय वंदनेसाठी जात आहे' असे म्हणतात. तेव्हा 'भंते, मी देखील सोबत येते' अशा प्रकारे भिक्खुनीच नियोजन करते, भिक्खू नाही. ๑๘๕. วิสงฺเกเตนาติ เอตฺถ ‘‘ปุเรภตฺตํ คจฺฉิสฺสามา’’ติ วตฺวา ปจฺฉาภตฺตํ คจฺฉนฺติ, ‘‘อชฺช วา คมิสฺสามา’’ติ วตฺวา สฺเว คจฺฉนฺติ. เอวํ กาลวิสงฺเกเตเยว [Pg.74] อนาปตฺติ, ทฺวารวิสงฺเกเต ปน มคฺควิสงฺเกเต วา สติปิ อาปตฺติเยว. อาปทาสูติ รฏฺฐเภเท จกฺกสมารุฬฺหา ชนปทา ปริยายนฺติ เอวรูปาสุ อาปทาสุ อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมวาติ. १८५. विसंकेताने यामध्ये - 'दुपारच्या जेवणापूर्वी जाऊ या' असे ठरवून दुपारच्या जेवणानंतर जातात, किंवा 'आज जाऊ या' असे ठरवून उद्या जातात. अशा प्रकारे केवळ वेळेचा विसंकेत (वेळ चुकणे) असल्यास अनापत्ती होते; परंतु द्वाराचा विसंकेत किंवा मार्गाचा विसंकेत असला तरी आपत्तीच होते. आपत्तीच्या वेळी म्हणजे - देशात अराजक माजल्यामुळे गाड्यांवर बसून जनपदवासीय लोक इकडेतिकडे भटकतात, अशा प्रकारच्या आपत्तींमध्ये (नियोजन करून जाणाऱ्या भिक्खूला) अनापत्ती होते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे, असे जाणावे. จตุสมุฏฺฐานํ – กายโต กายวาจโต กายจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. चार समुत्थानांचे - हे शिक्षापद कायाने, काया व वाचेने, काया व चित्ताने, आणि काया, वाचा व चित्ताने उत्पन्न होते; हे क्रियात्मक आहे, संज्ञा नसली तरी आपत्तीतून सुटका न होणारे आहे, चित्त नसतानाही घडणारे आहे, प्रज्ञप्तीचे उल्लंघन केल्याने दोषयुक्त ठरणारे आहे, कायकर्म असलेले, वचीकर्म असलेले, तीन चित्ते असणारे आणि तीन वेदना असणारे आहे. สํวิธานสิกฺขาปทํ สตฺตมํ. सातवे संविधान शिक्षापद समाप्त. ๘. นาวาภิรุหนสิกฺขาปทวณฺณนา ८. नाव-अभिरुहण शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण ๑๘๘. อฏฺฐมสิกฺขาปเท – สํวิธายาติ โลกสฺสาทมิตฺตสนฺถววเสน กีฬาปุเรกฺขารา สํวิทหิตฺวา. อุทฺธํคามินินฺติ อุทฺธํ นทิยา ปฏิโสตํ คจฺฉนฺตึ. ยสฺมา ปน โย อุทฺธํ ชวนโต อุชฺชวนิกาย นาวาย กีฬติ, โส ‘‘อุทฺธํคามินึ อภิรุหตี’’ติ วุจฺจติ. เตนสฺส ปทภาชเน อตฺถเมว ทสฺเสตุํ ‘‘อุชฺชวนิกายา’’ติ วุตฺตํ. อโธคามินินฺติ อโธ อนุโสตํ คจฺฉนฺตึ. ยสฺมา ปน โย อโธ ชวนโต โอชวนิกาย นาวาย กีฬติ, โส ‘‘อโธคามินึ อภิรุหตี’’ติ วุจฺจติ. เตนสฺสาปิ ปทภาชเน อตฺถเมว ทสฺเสตุํ ‘‘โอชวนิกายา’’ติ วุตฺตํ. ตตฺถ ยํ ติตฺถสมฺปฏิปาทนตฺถํ อุทฺธํ วา อโธ วา หรนฺติ, เอตฺถ อนาปตฺติ. ติริยํ ตรณายาติ อุปโยคตฺเถ นิสฺสกฺกวจนํ. १८८. आठव्या शिक्षापदात - 'संविधाय' (नियोजन करून) म्हणजे लौकिक सुखासाठी किंवा मैत्रीच्या संबंधामुळे क्रीडेला प्राधान्य देणारे होऊन नियोजन करून. 'उद्धंगामिनी' म्हणजे नदीच्या वरच्या दिशेने प्रवाहाच्या विरुद्ध दिशेने जाणारी. परंतु ज्या अर्थी जो भिक्खू वरच्या दिशेने वेगाने जाण्याच्या स्वभावामुळे 'उज्जवनिका' नावाच्या नावेने क्रीडा करतो, त्याला 'उद्धंगामिनी नावेवर चढतो' असे म्हटले जाते. म्हणून त्याच्या पदभाजनामध्ये अर्थच दर्शवण्यासाठी 'उज्जवनिका' असे म्हटले आहे. 'अधोगामिनी' म्हणजे खालील दिशेने प्रवाहाच्या सोबतीने जाणारी. परंतु ज्या अर्थी जो भिक्खू खालील दिशेने वेगाने जाण्याच्या स्वभावामुळे 'ओजवनिका' नावाच्या नावेने क्रीडा करतो, त्याला 'अधोगामिनी नावेवर चढतो' असे म्हटले जाते. म्हणून त्याच्या देखील पदभाजनामध्ये अर्थच दर्शवण्यासाठी 'ओजवनिका' असे म्हटले आहे. त्यामध्ये, जी नाव घाटावर पोहोचण्यासाठी वरच्या दिशेने किंवा खालील दिशेने नेली जाते, तेथे अनापत्ती आहे. 'तिरियं तरणाय' (तिरपे पार करण्यासाठी) यामध्ये 'तरणाय' हा शब्द द्वितीया विभक्तीच्या अर्थात पंचमी विभक्तीचा शब्द आहे. ๑๘๙. คามนฺตเร คามนฺตเรติ เอตฺถ ยสฺสา นทิยา เอกํ ตีรํ กุกฺกุฏสมฺปาทคาเมหิ นิรนฺตรํ, เอกํ อคามกํ อรญฺญํ, ตสฺสา สคามกตีรปสฺเสน คมนกาเล คามนฺตรคณนาย ปาจิตฺติยานิ, อคามกตีรปสฺเสน คมนกาเล อทฺธโยชนคณนาย. ยา ปน โยชนวิตฺถตา โหติ, ตสฺสา มชฺเฌน คมเนปิ อทฺธโยชนคณนาย ปาจิตฺติยานิ เวทิตพฺพานิ. อนาปตฺติ ติริยํ ตรณายาติ เอตฺถ น เกวลํ นทิยา, โยปิ มหาติตฺถปฏฺฏนโต ตามลิตฺตึ วา สุวณฺณภูมึ วา คจฺฉติ, ตสฺสาปิ อนาปตฺติ. สพฺพอฏฺฐกถาสุ หิ นทิยํเยว อาปตฺติ วิจาริตา, น สมุทฺเท. १८९. एका गावापासून दुसऱ्या गावापर्यंत (गामंतरे गामंतरेति) याविषयी: ज्या नदीचा एक काठ कोंबड्यांच्या उड्डाणाच्या अंतरावर असलेल्या गावांनी निरंतर व्यापलेला आहे आणि दुसरा काठ गावरहित अरण्य आहे, त्या नदीच्या गाव असलेल्या काठाच्या बाजूने प्रवास करताना गावांच्या संख्येनुसार पाचित्तिय होतात; आणि गावरहित काठाच्या बाजूने प्रवास करताना अर्ध्या योजनेच्या हिशोबाने पाचित्तिय होतात. परंतु जी नदी एक योजन रुंद आहे, तिच्या मध्यभागातून प्रवास करताना देखील अर्ध्या योजनेच्या हिशोबाने पाचित्तिय समजावे. 'तिरपे पार केल्यास आपत्ती नाही' (अनापत्ती तिरियं तरणाय) यात केवळ नदीच नाही, तर जो कोणी महातीर्थ बंदरावरून तामलित्ती किंवा सुवण्णभूमीला जातो, त्यालाही अनापत्ती आहे. कारण सर्व अट्ठकथांमध्ये केवळ नदीच्या बाबतीतच आपत्तीचा विचार केला गेला आहे, समुद्राच्या बाबतीत नाही. ๑๙๑. วิสงฺเกเตนาติ [Pg.75] อิธาปิ กาลวิสงฺเกเตเนว อนาปตฺติ, ติตฺถวิสงฺเกเตน ปน นาวาวิสงฺเกเตน วา คจฺฉนฺตสฺส อาปตฺติเยว. เสสํ ปฐมสิกฺขาปทสทิสเมว สทฺธึ สมุฏฺฐานาทีหีติ. १९१. 'संकेत मोडल्यामुळे' (विसंकेतेन) याविषयी: येथे देखील केवळ वेळेचा संकेत मोडल्यामुळेच अनापत्ती होते. परंतु घाटाचा संकेत मोडल्यामुळे किंवा नौकेचा संकेत मोडल्यामुळे जाणाऱ्याला आपत्तीच होते. उर्वरित भाग समुत्थान इत्यादींसह पहिल्या सिक्खापदासारखाच आहे. นาวาภิรุหนสิกฺขาปทํ อฏฺฐมํ. आठवे नावाभिरुहन सिक्खापद समाप्त. ๙. ปริปาจิตสิกฺขาปทวณฺณนา ९. परिपाचित सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๑๙๒. นวมสิกฺขาปเท – มหานาเค ติฏฺฐมาเนติ ภุมฺมตฺเถ อุปโยควจนํ, มหานาเคสุ ติฏฺฐมาเนสูติ อตฺโถ. อถ วา มหานาเค ติฏฺฐมาเน ‘‘อทิสฺวา’’ติ อยเมตฺถ ปาฐเสโส ทฏฺฐพฺโพ. อิตรถา หิ อตฺโถ น ยุชฺชติ. อนฺตรากถาติ อวสานํ อปฺปตฺวา อารมฺภสฺส จ อวสานสฺส จ เวมชฺฌฏฺฐานํ ปตฺตกถา. วิปฺปกตาติ กยิรมานา โหติ. สจฺจํ มหานาคา โข ตยา คหปตีติ อทฺธจฺฉิเกน โอโลกยมานา เถเร ปวิสนฺเต ทิสฺวา เตหิ สุตภาวํ ญตฺวา เอวมาห. १९२. नवव्या सिक्खापदामध्ये - 'महानागे तिट्ठमाने' हा द्वितीया विभक्तीचा प्रयोग सप्तमी विभक्तीच्या अर्थात आहे; म्हणजेच 'महान नागांच्या (अर्हतांच्या) उपस्थितीत' असा अर्थ आहे. किंवा 'महान नागांना उपस्थित असताना न पाहता' (अदिस्वा) असा पाठशेष येथे समजला पाहिजे. कारण अन्यथा अर्थ जुळत नाही. 'अंतरा कथा' म्हणजे समाप्तीपर्यंत न पोहोचता, सुरुवातीच्या आणि समाप्तीच्या मध्यभागी पोहोचलेली चर्चा. 'विप्पकता' म्हणजे केली जात असलेली. 'हे गृहपती, खरोखरच तुझ्याद्वारे महान नाग...' (सच्चं महानागा खो तया गहपती) हे तिने तिरप्या नजरेने पाहत असताना, थेरांना प्रवेश करताना पाहून आणि त्यांनी आपले बोलणे ऐकले आहे हे जाणून असे म्हटले. ๑๙๔. ภิกฺขุนิปริปาจิตนฺติ ภิกฺขุนิยา ปริปาจิตํ, คุณปฺปกาสเนน นิปฺผาทิตํ; ลทฺธพฺพํ กตนฺติ อตฺโถ. ปทภาชเน ปนสฺส ภิกฺขุนิญฺจ ตสฺสา ปริปาจนาการญฺจ ทสฺเสตุํ ‘‘ภิกฺขุนี นาม อุภโตสงฺเฆ อุปสมฺปนฺนา, ปริปาเจติ นาม ปุพฺเพ อทาตุกามาน’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. ปุพฺเพ คิหิสมารมฺภาติ เอตฺถ ปุพฺเพติ ปฐมํ. สมารมฺโภติ สมารทฺธํ วุจฺจติ, ปฏิยาทิตสฺเสตํ อธิวจนํ. คิหีนํ สมารมฺโภ คิหิสมารมฺโภ. ภิกฺขุนิยา ปริปาจนโต ปฐมเมว ยํ คิหีนํ ปฏิยาทิตํ ภตฺตํ, ตโต อญฺญตฺร ตํ ปิณฺฑปาตํ ฐเปตฺวา อญฺญํ ภุญฺชนฺตสฺส อาปตฺติ, ตํ ปน ภุญฺชนฺตสฺส อนาปตฺตีติ วุตฺตํ โหติ. ปทภาชเน ปน ยสฺมา ญาตกปวาริเตหิ ภิกฺขุสฺสตฺถาย อสมารทฺโธปิ ปิณฺฑปาโต อตฺถโต สมารทฺโธว โหติ, ยถาสุขํ อาหราเปตพฺพโต, ตสฺมา พฺยญฺชนํ อนาทิยิตฺวา อตฺถเมว ทสฺเสตุํ ‘‘คิหิสมารมฺโภ นาม ญาตกา วา โหนฺติ ปวาริตา วา’’ติ วุตฺตํ. १९४. 'भिक्खुनीपरिपाचितं' म्हणजे भिक्खुनीने तयार करवून घेतलेले, गुणांचे कौतुक करून मिळवून दिलेले किंवा मिळवण्यास योग्य केलेले असा अर्थ आहे. पदभाजनामध्ये भिक्खुनी आणि तिच्याद्वारे अन्न तयार करवून घेण्याची पद्धत दर्शवण्यासाठी 'भिक्खुनी म्हणजे दोन्ही संघांमध्ये उपसंपन्न झालेली, परिपाचेती म्हणजे पूर्वी देण्याची इच्छा नसलेल्यांना...' इत्यादी म्हटले आहे. 'पुब्बे गिहिसमारंभा' यात 'पुब्बे' म्हणजे आधी. 'समारंभ' म्हणजे चांगल्या प्रकारे आरंभ केलेले, हे 'पटियादित' चे समानार्थी नाव आहे. गृहस्थांनी तयार केलेले अन्न म्हणजे 'गिहिसमारंभ'. भिक्खुनीने अन्न तयार करवून घेण्यापूर्वीच गृहस्थांनी जे अन्न तयार केले आहे, त्याव्यतिरिक्त तो पिंडपात सोडून दुसरे अन्न खाणाऱ्याला आपत्ती होते; परंतु ते अन्न खाणाऱ्याला अनापत्ती आहे, असे म्हटले आहे. परंतु पदभाजनामध्ये, नातेवाईक किंवा निमंत्रित करणाऱ्यांनी भिक्खूसाठी आधीच अन्न तयार केले नसले तरी, ते इच्छेनुसार मागवून घेता येत असल्यामुळे अर्थाच्या दृष्टीने ते तयार केलेलेच असते. म्हणून शब्दांवर न जाता केवळ अर्थ दर्शवण्यासाठी 'गिहिसमारंभ म्हणजे नातेवाईक किंवा निमंत्रित केलेले लोक' असे म्हटले आहे. ๑๙๕. ปกติปฏิยตฺตนฺติ [Pg.76] ปกติยา ตสฺเสว ภิกฺขุโน อตฺถาย ปฏิยาทิตํ โหติ ‘‘เถรสฺส ทสฺสามา’’ติ. มหาปจฺจริยํ ปน ‘‘ตสฺส อญฺญสฺสา’’ติ อวตฺวา ‘‘ภิกฺขูนํ ทสฺสามาติ ปฏิยตฺตํ โหตี’’ติ อวิเสเสน วุตฺตํ. १९५. 'पकतिपटियत्तं' म्हणजे स्वाभाविकपणे त्याच भिक्खूसाठी 'आम्ही थेरांना देऊ' असा विचार करून तयार केलेले अन्न होय. परंतु महापच्चरी ग्रंथामध्ये 'त्याच्यासाठी किंवा दुसऱ्यासाठी' असे न सांगता, 'भिक्खूंना देऊ म्हणून तयार केलेले अन्न' असे सामान्यपणे म्हटले आहे. ๑๙๗. ปญฺจ โภชนานิ ฐเปตฺวา สพฺพตฺถ อนาปตฺตีติ ยาคุขชฺชกผลาผเล สพฺพตฺถ ภิกฺขุนิปริปาจิเตปิ อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ปฐมปาราชิกสมุฏฺฐานํ – กายจิตฺตโต สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. १९७. 'पाच भोजने सोडून सर्वत्र अनापत्ती' म्हणजे यागू, खाजक, फळे व लहान-मोठी फळे या सर्व बाबतीत भिक्खुनीने तयार करवून घेतले असले तरी अनापत्ती आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. हे सिक्खापद पहिल्या पाराजिकाप्रमाणे समुत्थान असणारे आहे - हे काय आणि चित्तापासून उत्पन्न होते, क्रियात्मक आहे, संज्ञाविमोक्ष असणारे आहे, सचित्तक आहे, पण्णत्तिवज्ज आहे, कायकर्म आहे, यात तीन चित्त आणि तीन वेदना असतात. ปริปาจิตสิกฺขาปทํ นวมํ. नववे परिपाचित सिक्खापद समाप्त. ๑๐. รโหนิสชฺชสิกฺขาปทวณฺณนา १०. रहोनिषद्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๑๙๘. ทสมสิกฺขาปเท – สพฺโพ ปาฬิอตฺโถ จ วินิจฺฉโย จ ทุติยอนิยเต วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. อิทญฺหิ สิกฺขาปทํ ทุติยานิยเตน จ อุปริ อุปนนฺธสฺส จตุตฺถสิกฺขาปเทน จ สทฺธึ เอกปริจฺเฉทํ, อฏฺฐุปฺปตฺติวเสน ปน วิสุํ ปญฺญตฺตนฺติ. १९८. दहाव्या सिक्खापदामध्ये - सर्व पाळी अर्थ आणि निर्णय दुसऱ्या अनियत सिक्खापदामध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. कारण हे सिक्खापद दुसऱ्या अनियताशी आणि पुढे येणाऱ्या उपनंदाच्या चौथ्या सिक्खापदाशी समान मर्यादा असणारे आहे, परंतु उत्पत्तीच्या कारणावरून हे स्वतंत्रपणे प्रज्ञप्त केले गेले आहे, असे समजावे. รโหนิสชฺชสิกฺขาปทํ ทสมํ. दहावे रहोनिषद्या सिक्खापद समाप्त. สมตฺโต วณฺณนากฺกเมน ภิกฺขุนิวคฺโค ตติโย. स्पष्टीकरणाच्या क्रमाने तिसरा भिक्खुनीवर्ग समाप्त झाला. ๔. โภชนวคฺโค ४. भोजनवर्ग. ๑. อาวสถปิณฺฑสิกฺขาปทวณฺณนา १. आवसथपिंड सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๒๐๓. โภชนวคฺคสฺส ปฐมสิกฺขาปเท – อาวสถปิณฺโฑติ อาวสเถ ปิณฺโฑ. สมนฺตา ปริกฺขิตฺตํ อทฺธิกคิลานคพฺภินิปพฺพชิตานํ ยถานุรูปํ ปญฺญตฺตมญฺจปีฐํ อเนกคพฺภปมุขปริจฺเฉทํ อาวสถํ กตฺวา ตตฺถ ปุญฺญกามตาย ปิณฺโฑ ปญฺญตฺโต โหติ, ยาคุภตฺตเภสชฺชาทิ สพฺพํ เตสํ เตสํ ทานตฺถาย ฐปิตํ โหตีติ อตฺโถ. หิยฺโยปีติ สฺเวปิ. อปสกฺกนฺตีติ [Pg.77] อปคจฺฉนฺติ. มนุสฺสา อุชฺฌายนฺตีติ ติตฺถิเย อปสฺสนฺตา ‘‘ติตฺถิยา กุหึ คตา’’‘‘อิเม ปสฺสิตฺวา ปกฺกนฺตา’’ติ สุตฺวา อุชฺฌายนฺติ. กุกฺกุจฺจายนฺโตติ กุกฺกุจฺจํ กโรนฺโต, อกปฺปิยสญฺญํ อุปฺปาเทนฺโตติ อตฺโถ. २०३. भोजनवर्गाच्या पहिल्या सिक्खापदामध्ये - 'आवसथपिंड' म्हणजे धर्मशाळेत मिळणारे अन्न. सभोवताली कुंपण असलेली, वाटसरू, आजारी, गरोदर स्त्रिया आणि प्रव्रजित यांच्यासाठी योग्यतेनुसार मंच-पीठ मांडलेली, अनेक खोल्या व व्हरांडे असलेली धर्मशाळा बांधून, तेथे पुण्य मिळवण्याच्या इच्छेने अन्न ठेवलेले असते; तसेच यागू, भात, औषध इत्यादी सर्व काही त्या त्या वाटसरू इत्यादींना देण्यासाठी ठेवलेले असते, असा अर्थ आहे. 'हिय्योपि' म्हणजे 'स्वेपि'. 'अपसक्कन्ति' म्हणजे निघून जातात. 'मनुस्सा उज्झायन्ति' म्हणजे तीर्थिकांना न पाहून लोक 'तीर्थिक कोठे गेले?' असे विचारतात आणि 'यांना पाहून ते निघून गेले' असे ऐकून लोक निंदा करतात. 'कुक्कुच्चायन्तो' म्हणजे शंका बाळगणारा, अकल्पनीय संज्ञा उत्पन्न करणारा, असा अर्थ आहे. ๒๐๖. สกฺโกติ ตมฺหา อาวสถา ปกฺกมิตุนฺติ อทฺธโยชนํ วา โยชนํ วา คนฺตุํ สกฺโกติ. น สกฺโกตีติ เอตฺตกเมว น สกฺโกติ. อโนทิสฺสาติ อิเมสํเยว วา เอตฺตกานํเยว วาติ เอกํ ปาสณฺฑํ อนุทฺทิสิตฺวา สพฺเพสํ ปญฺญตฺโต โหติ. ยาวทตฺโถติ โภชนมฺปิ เอตฺตกนฺติ อปริจฺฉินฺทิตฺวา ยาวทตฺโถ ปญฺญตฺโต โหติ. สกึ ภุญฺชิตพฺพนฺติ เอกทิวสํ ภุญฺชิตพฺพํ, ทุติยทิวสโต ปฏฺฐาย ปฏิคฺคหเณ ทุกฺกฏํ, อชฺโฌหาเร อชฺโฌหาเร ปาจิตฺติยํ. २०६. 'त्या धर्मशाळेतून निघून जाण्यास समर्थ आहे' म्हणजे अर्धा योजन किंवा एक योजन प्रवास करण्यास समर्थ आहे. 'समर्थ नाही' म्हणजे एवढा प्रवास करण्यास समर्थ नाही. 'अनोट्टिस्सा' म्हणजे केवळ यांच्यासाठीच किंवा एवढ्यांसाठीच, असा कोणत्याही एका पाखंडी समूहाचा उल्लेख न करता सर्वांसाठी अन्न ठेवलेले असते. 'यावदत्थो' म्हणजे भोजन देखील एवढेच असावे अशी मर्यादा न घालता, गरजेनुसार अन्न ठेवलेले असते. 'एकदाच जेवावे' म्हणजे एका दिवशी जेवावे; दुसऱ्या दिवसापासून स्वीकार केल्यास दुक्कट होते आणि प्रत्येक घासागणिक पाचित्तिय होते. อยํ ปเนตฺถ วินิจฺฉโย – เอกกุเลน วา นานากุเลหิ วา เอกโต หุตฺวา เอกสฺมึ ฐาเน วา นานาฐาเนสุ วา ‘‘อชฺช เอกสฺมึ; สฺเว เอกสฺมิ’’นฺติ เอวํ อนิยมิตฏฺฐาเน วา ปญฺญตฺตํ เอกสฺมึ ฐาเน เอกทิวสํ ภุญฺชิตฺวา ทุติยทิวเส ตสฺมึ ฐาเน อญฺญสฺมึ วา ภุญฺชิตุํ น วฏฺฏติ. นานากุเลหิ ปน นานาฐาเนสุ ปญฺญตฺตํ เอกสฺมึ ฐาเน เอกทิวสํ ภุญฺชิตฺวา ทุติยทิวเส อญฺญตฺถ ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. ปฏิปาฏึ ปน เขเปตฺวา ปุน อาทิโต ปฏฺฐาย ภุญฺชิตุํ น วฏฺฏตีติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. เอกปูคนานาปูคเอกคามนานาคาเมสุปิ เอเสว นโย. โยปิ เอกกุลสฺส วา นานากุลานํ วา เอกโต ปญฺญตฺโต ตณฺฑุลาทีนํ อภาเวน อนฺตรนฺตรา ฉิชฺชติ, โสปิ น ภุญฺชิตพฺโพ. สเจ ปน ‘‘น สกฺโกม ทาตุ’’นฺติ อุปจฺฉินฺทิตฺวา ปุน กลฺยาณจิตฺเต อุปฺปนฺเน ทาตุํ อารภนฺติ, เอตํ ปุน เอกทิวสํ ภุญฺชิตุํ วฏฺฏตีติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. यावर हा निर्णय आहे – एका कुळाने किंवा अनेक कुळांनी एकत्र येऊन, एका ठिकाणी किंवा वेगवेगळ्या ठिकाणी, अथवा "आज एका ठिकाणी, उद्या एका ठिकाणी" अशा प्रकारे अनिश्चित ठिकाणी ठरवलेले भोजन एका ठिकाणी एका दिवशी ग्रहण करून, दुसऱ्या दिवशी त्याच ठिकाणी किंवा इतर ठिकाणी ग्रहण करणे योग्य नाही. परंतु, वेगवेगळ्या कुळांनी वेगवेगळ्या ठिकाणी ठरवलेले भोजन एका ठिकाणी एका दिवशी ग्रहण करून, दुसऱ्या दिवशी दुसऱ्या ठिकाणी ग्रहण करणे योग्य आहे. मात्र, ती पाळी (क्रम) संपवून पुन्हा सुरुवातीपासून ग्रहण करणे योग्य नाही, असे महापच्चरीमध्ये म्हटले आहे. एक समूह, अनेक समूह, एक गाव आणि अनेक गावे यांच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. जे भोजन एका कुळाने किंवा अनेक कुळांनी एकत्र मिळून ठरवले आहे, परंतु तांदूळ इत्यादींच्या अभावामुळे मध्येच खंडित झाले आहे, ते देखील ग्रहण करू नये. परंतु, जर "आम्ही देण्यास असमर्थ आहोत" असे म्हणून ते बंद केले आणि पुन्हा चांगले चित्त उत्पन्न झाल्यावर त्यांनी देण्यास सुरुवात केली, तर ते पुन्हा एका दिवशी ग्रहण करणे योग्य आहे, असे महापच्चरीमध्ये म्हटले आहे. ๒๐๘. อนาปตฺติ คิลานสฺสาติ คิลานสฺส อนุวสิตฺวา ภุญฺชนฺตสฺส อนาปตฺติ. คจฺฉนฺโต วาติ โย คจฺฉนฺโต อนฺตรามคฺเค เอกทิวสํ คตฏฺฐาเน จ เอกทิวสํ ภุญฺชติ, ตสฺสาปิ อนาปตฺติ. อาคจฺฉนฺเตปิ เอเสว นโย. คนฺตฺวา ปจฺจาคจฺฉนฺโตปิ อนฺตรามคฺเค เอกทิวสํ อาคตฏฺฐาเน จ เอกทิวสํ ภุญฺชิตุํ ลภติ. คจฺฉิสฺสามีติ ภุญฺชิตฺวา นิกฺขนฺตสฺส นที วา ปูรติ โจราทิภยํ วา โหติ, โส นิวตฺติตฺวา เขมภาวํ ญตฺวา คจฺฉนฺโต ปุน เอกทิวสํ ภุญฺชิตุํ ลภตีติ สพฺพมิทํ มหาปจฺจริยาทีสุ วุตฺตํ[Pg.78]. โอทิสฺส ปญฺญตฺโต โหตีติ ภิกฺขูนํเยว อตฺถาย อุทฺทิสิตฺวา ปญฺญตฺโต โหติ. น ยาวทตฺโถติ ยาวทตฺถํ ปญฺญตฺโต น โหติ, โถกํ โถกํ ลพฺภติ, ตาทิสํ นิจฺจมฺปิ ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. ปญฺจ โภชนานิ ฐเปตฺวา สพฺพตฺถาติ ยาคุขชฺชกผลาผลาทิเภเท สพฺพตฺถ อนาปตฺติ. ยาคุอาทีนิ หิ นิจฺจมฺปิ ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. เสสํ อุตฺตานเมว. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กายโต จ กายจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. २०८. "आजारी भिक्खूला आपत्ती नाही" (अनापत्ति गिलांनस्स) याचा अर्थ असा की, आजारी भिक्खूने दररोज राहून भोजन केल्यास आपत्ती होत नाही. "प्रवास करणारा" (गच्छन्तो वा) म्हणजे जो प्रवास करत असताना वाटेत एक दिवस आणि पोहोचण्याच्या ठिकाणी एक दिवस भोजन करतो, त्यालाही आपत्ती होत नाही. परत येणाऱ्याच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. जाऊन परत येणाऱ्यालाही वाटेत एक दिवस आणि परत आलेल्या ठिकाणी एक दिवस भोजन करण्याची परवानगी मिळते. "मी जाईन" असा विचार करून भोजन करून निघालेल्या भिक्खूच्या मार्गात जर नदीला पूर आला किंवा चोरांचे भय निर्माण झाले, आणि तो मागे फिरून, सुरक्षितता जाणून घेऊन पुन्हा प्रवास करताना त्याला आणखी एक दिवस भोजन करण्याची परवानगी मिळते; हे सर्व महापच्चरी इत्यादी अट्ठकथांमध्ये सांगितले आहे. "उद्देशून ठरवलेले असते" (ओदिस्स पण्ञत्तो होति) म्हणजे केवळ भिक्खूंच्याच उपयोगासाठी उद्देशून ठरवलेले असते. "इच्छेनुसार नाही" (न यावदत्थं) म्हणजे इच्छेनुसार (भरपूर) ठरवलेले नसते, थोडे थोडे मिळते; अशा प्रकारचे भोजन रोज देखील ग्रहण करणे योग्य आहे. "पाच भोजने सोडून सर्वत्र" (पञ्च भोजने ठपेत्वा सब्बत्थ) म्हणजे यागू (पेज), खाद्यपदार्थ, फळे इत्यादींच्या बाबतीत सर्वत्र अनापत्ती आहे. कारण यागू इत्यादी रोज देखील ग्रहण करणे योग्य आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. हे एळकलोम-समुत्थान (मेंढीच्या लोकरीच्या नियमाप्रमाणे समुत्थान असणारे) आहे – हे शरीरापासून आणि शरीर-चित्तापासून उत्पन्न होते; क्रियात्मक आहे; संज्ञा नसली तरी मुक्ती न देणारे (नोसञ्ञाविमोक्ख) आहे; अचित्तक आहे; प्रज्ञप्तिवज्ज (नियमाच्या उल्लंघनामुळे दोषयुक्त) आहे; कायकर्म आहे; तीन चित्त आणि तीन वेदना असणारे आहे. อาวสถปิณฺฑสิกฺขาปทํ ปฐมํ. पहिले आवसथपिंड सिक्खापद समाप्त. ๒. คณโภชนสิกฺขาปทวณฺณนา २. गणभोजन सिक्खापदाचे वर्णन ๒๐๙. ทุติยสิกฺขาปเท – ปริหีนลาภสกฺกาโรติ โส กิร อชาตสตฺตุนา ราชานํ มาราเปตฺวาปิ อภิมาเร โยเชตฺวาปิ รุหิรุปฺปาทํ กตฺวาปิ คุฬฺหปฏิจฺฉนฺโน อโหสิ. ยทา ปน ทิวาเยว ธนปาลกํ ปโยเชสิ, ตทา ปากโฏ ชาโต. ‘‘กถํ เทวทตฺโต หตฺถึ ปโยเชสี’’ติ ปริกถาย อุปฺปนฺนาย ‘‘น เกวลํ หตฺถึ ปโยเชสิ, ราชานมฺปิ มาราเปสิ, อภิมาเรปิ เปเสสิ, สิลมฺปิ ปวิชฺฌิ, ปาโป เทวทตฺโต’’ติ ปากโฏ อโหสิ. ‘‘เกน สทฺธึ อิทํ กมฺมมกาสี’’ติ จ วุตฺเต ‘‘รญฺญา อชาตสตฺตุนา’’ติ อาหํสุ. ตโต นาครา ‘‘กถญฺหิ นาม ราชา เอวรูปํ โจรํ สาสนกณฺฏกํ คเหตฺวา วิจริสฺสตี’’ติ อุฏฺฐหึสุ. ราชา นครสงฺโขภํ ญตฺวา เทวทตฺตํ นีหริ. ตโต ปฏฺฐาย จสฺส ปญฺจถาลิปากสตานิ อุปจฺฉินฺทิ, อุปฏฺฐานมฺปิสฺส น อคมาสิ, อญฺเญปิสฺส มนุสฺสา น กิญฺจิ ทาตพฺพํ วา กาตพฺพํ วา มญฺญึสุ. เตน วุตฺตํ – ‘‘ปริหีนลาภสกฺกาโร’’ติ. กุเลสุ วิญฺญาเปตฺวา วิญฺญาเปตฺวา ภุญฺชตีติ ‘‘มา เม คโณ ภิชฺชี’’ติ ปริสํ โปเสนฺโต ‘‘ตฺวํ เอกสฺส ภิกฺขุโน ภตฺตํ เทหิ, ตฺวํ ทฺวินฺน’’นฺติ เอวํ วิญฺญาเปตฺวา สปริโส กุเลสุ ภุญฺชติ. २०९. दुसऱ्या सिक्खापदात – 'ज्याचा लाभ आणि सत्कार नष्ट झाला आहे' (परिहीनलाभसक्कारो) याविषयी सांगितले आहे की, तो (देवदत्त) अजातशत्रूकडून राजाला (बिंबिसाराला) मारून, मारेकऱ्यांना पाठवून आणि (बुद्धांच्या पायाला) रक्त आणून देखील गुप्तपणे लपलेला होता (त्याचे गुन्हे उघड झाले नव्हते). परंतु जेव्हा त्याने दिवसाढवळ्या धनपालक हत्तीला सोडले, तेव्हा तो उघडकीस आला. 'देवदत्ताने हत्ती कसा सोडला?' अशी चर्चा सुरू झाल्यावर, 'त्याने केवळ हत्तीच सोडला नाही, तर राजालाही मारवले, मारेकरीही पाठवले, शिळाही लोटली, देवदत्त पापी आहे' असे उघड झाले. 'त्याने हे कृत्य कोणासोबत केले?' असे विचारले असता, लोकांनी 'राजा अजातशत्रूसोबत' असे सांगितले. त्यामुळे नगरवासी 'राजा अशा चोराला आणि शासनाच्या (धम्माच्या) काट्याला सोबत घेऊन कसा काय फिरू शकतो?' असे म्हणून संतप्त झाले. राजाने नगरातील खळबळ जाणून देवदत्ताला हाकलून दिले. तेव्हापासून त्याने देवदत्तासाठी पाठवले जाणारे पाचशे अन्न शिजवण्याचे भांडे (भोजन) बंद केले, त्याच्या सेवेसाठी जाणेही बंद केले, आणि इतर लोकांनीही त्याला काही देणे किंवा त्याच्यासाठी काही करणे योग्य मानले नाही. म्हणूनच म्हटले आहे – 'ज्याचा लाभ आणि सत्कार नष्ट झाला आहे'. 'कुळांमध्ये याचना करून करून भोजन करतो' (कुलेसु विञ्ञापेत्वा विञ्ञापेत्वा भुञ्जति) याचा अर्थ असा की, 'माझा संघ विखुरला जाऊ नये' असा विचार करून आपल्या अनुयायांचे पोषण करत, 'तू एका भिक्खूला भोजन दे, तू दोघांना दे' अशी याचना करून तो आपल्या अनुयायांसह कुळांमध्ये भोजन करत असे. ๒๑๑. จีวรํ ปริตฺตํ อุปฺปชฺชตีติ ภตฺตํ อคณฺหนฺตานํ จีวรํ น เทนฺติ, ตสฺมา ปริตฺตํ อุปฺปชฺชติ. २११. "चीवर थोडे उत्पन्न होते" (चीवरं परित्तं उप्पज्जति) याचा अर्थ असा की, जे भोजन स्वीकारत नाहीत त्यांना लोक चीवर देखील देत नाहीत, त्यामुळे चीवर थोडेच उत्पन्न होते. ๒๑๒. จีวรการเก [Pg.79] ภิกฺขู ภตฺเตน นิมนฺเตนฺตีติ คาเม ปิณฺฑาย จริตฺวา จิเรน จีวรํ นิฏฺฐาเปนฺเต ทิสฺวา ‘‘เอวํ ลหุํ นิฏฺฐาเปตฺวา จีวรํ ปริภุญฺชิสฺสนฺตี’’ติ ปุญฺญกามตาย นิมนฺเตนฺติ. २१२. "चीवर बनवणाऱ्या भिक्खूंना भोजनाचे आमंत्रण देतात" (चीवरकारके भिक्खू भत्तेन निमन्तेन्ति) याचा अर्थ असा की, गावात पिंडपातासाठी फिरून उशिराने चीवर पूर्ण करताना पाहून, "अशा प्रकारे (भोजन दिल्यास) ते लवकर चीवर पूर्ण करून त्याचा वापर करू शकतील" असा विचार करून, पुण्याच्या इच्छेने लोक त्यांना आमंत्रित करतात. ๒๑๕. นานาเวรชฺชเกติ นานาวิเธหิ อญฺญรชฺเชหิ อาคเต. ‘‘นานาวิรชฺชเก’’ติปิ ปาโฐ, อยเมวตฺโถ. २१५. "नानावेरज्जके" म्हणजे वेगवेगळ्या इतर राज्यांतून आलेले. "नानाविरज्जके" असाही पाठ आढळतो, त्याचा अर्थ हाच आहे. ๒๑๗-๘. คณโภชเนติ คณสฺส โภชเน. อิธ จ คโณ นาม จตฺตาโร ภิกฺขู อาทึ กตฺวา ตตุตฺตรึ ภิกฺขู อธิปฺเปตา, เตเนว สพฺพนฺติมํ ปริจฺเฉทํ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘ยตฺถ จตฺตาโร ภิกฺขู…เป… เอตํ คณโภชนํ นามา’’ติ. ตํ ปเนตํ คณโภชนํ ทฺวีหากาเรหิ ปสวติ นิมนฺตนโต วา วิญฺญตฺติโต วา. กถํ นิมนฺตนโต ปสวติ? จตฺตาโร ภิกฺขู อุปสงฺกมิตฺวา ‘‘ตุมฺเห, ภนฺเต, โอทเนน นิมนฺเตมิ, โอทนํ เม คณฺหถ อากงฺขถ โอโลเกถ อธิวาเสถ ปฏิมาเนถา’’ติ เอวํ เยน เกนจิ เววจเนน วา ภาสนฺตเรน วา ปญฺจนฺนํ โภชนานํ นามํ คเหตฺวา นิมนฺเตติ. เอวํ เอกโต นิมนฺติตา ปริจฺฉินฺนกาลวเสน อชฺชตนาย วา สฺวาตนาย วา เอกโต คจฺฉนฺติ, เอกโต คณฺหนฺติ, เอกโต ภุญฺชนฺติ, คณโภชนํ โหติ, สพฺเพสํ อาปตฺติ. เอกโต นิมนฺติตา เอกโต วา นานโต วา คจฺฉนฺติ, เอกโต คณฺหนฺติ, นานโต ภุญฺชนฺติ, อาปตฺติเยว. ปฏิคฺคหณเมว หิ เอตฺถ ปมาณํ. เอกโต นิมนฺติตา เอกโต วา นานโต วา คจฺฉนฺติ, นานโต คณฺหนฺติ, เอกโต วา นานโต วา ภุญฺชนฺติ, อนาปตฺติ. จตฺตาริ ปริเวณานิ วา วิหาเร วา คนฺตฺวา นานโต นิมนฺติตา เอกฏฺฐาเน ฐิเตสุเยว วา เอโก ปุตฺเตน เอโก ปิตราติ เอวมฺปิ นานโต นิมนฺติตา เอกโต วา นานโต วา คจฺฉนฺตุ, เอกโต วา นานโต วา ภุญฺชนฺตุ, สเจ เอกโต คณฺหนฺติ, คณโภชนํ โหติ, สพฺเพสํ อาปตฺติ. เอวํ ตาว นิมนฺตนโต ปสวติ. २१७-८. "गणभोजने" (गणभोजने) म्हणजे गणाचे (समूहाचे) भोजन करणे. येथे 'गण' म्हणजे चार भिक्खूंपासून सुरुवात करून त्याहून अधिक भिक्खू अभिप्रेत आहेत, म्हणूनच सर्वात शेवटची मर्यादा दाखवताना भगवंतांनी म्हटले आहे – 'जिथे चार भिक्खू... पे... याला गणभोजन म्हणतात.' ते हे गणभोजन दोन प्रकारे उद्भवते – आमंत्रणाने किंवा याचनेने. आमंत्रणाने कसे उद्भवते? चार भिक्खूंकडे जाऊन 'भंते, मी आपल्याला भाताचे आमंत्रण देतो, माझे अन्न स्वीकारा, इच्छा करा, याकडे पहा, याला स्वीकृती द्या, सन्मान करा' अशा प्रकारे कोणत्याही समानार्थी शब्दाने किंवा इतर भाषेने पाच प्रकारच्या भोजनांपैकी एकाचे नाव घेऊन आमंत्रित करतो. अशा प्रकारे एकत्र आमंत्रित केलेले भिक्खू ठरवलेल्या वेळेनुसार आजच्या किंवा उद्याच्या भोजनासाठी एकत्र जातात, एकत्र स्वीकारतात आणि एकत्र भोजन करतात, तर ते गणभोजन होते आणि सर्वांना आपत्ती होते. एकत्र आमंत्रित केलेले भिक्खू एकत्र किंवा वेगवेगळ्या प्रकारे जातात, एकत्र स्वीकारतात आणि वेगवेगळे भोजन करतात, तरीही आपत्तीच होते. कारण येथे ग्रहण करणे (स्वीकारणे) हेच मुख्य प्रमाण आहे. एकत्र आमंत्रित केलेले भिक्खू एकत्र किंवा वेगवेगळ्या प्रकारे जातात, वेगवेगळे स्वीकारतात आणि एकत्र किंवा वेगवेगळे भोजन करतात, तर आपत्ती होत नाही. चार विहारांमध्ये किंवा कुटींमध्ये जाऊन वेगवेगळ्या प्रकारे आमंत्रित केलेले असताना, किंवा एकाच ठिकाणी थांबलेल्या भिक्खूंमध्ये एकाला मुलाने आणि एकाला वडिलांनी आमंत्रित केले असेल, अशा प्रकारे वेगवेगळ्या प्रकारे आमंत्रित केलेले भिक्खू एकत्र किंवा वेगवेगळ्या प्रकारे जावोत, एकत्र किंवा वेगवेगळ्या प्रकारे भोजन करोत, परंतु जर त्यांनी एकत्र स्वीकारले, तर ते गणभोजन होते आणि सर्वांना आपत्ती होते. अशा प्रकारे पहिल्यांदा आमंत्रणाने गणभोजन उद्भवते. กถํ วิญฺญตฺติโต? จตฺตาโร ภิกฺขู เอกโต ฐิตา วา นิสินฺนา วา อุปาสกํ ทิสฺวา ‘‘อมฺหากํ จตุนฺนมฺปิ ภตฺตํ เทหี’’ติ วา วิญฺญาเปยฺยุํ, ปาเฏกฺกํ วา ปสฺสิตฺวา ‘‘มยฺหํ เทหิ, มยฺหํ เทหี’’ติ เอวํ เอกโต วา นานโต วา วิญฺญาเปตฺวา เอกโต วา คจฺฉนฺตุ นานโต วา, ภตฺตํ คเหตฺวาปิ เอกโต วา ภุญฺชนฺตุ นานโต วา, สเจ เอกโต คณฺหนฺติ, คณโภชนํ โหติ, สพฺเพสํ อาปตฺติ. เอวํ วิญฺญตฺติโต ปสวติ. याचना केल्याने (मागितल्याने) कसे (गणभोजन होते)? चार भिक्खू एकत्र उभे राहून किंवा बसून एखाद्या उपासकाला पाहून 'आम्हा चौघांनाही भोजन द्या' अशी याचना करतात, किंवा प्रत्येकाला स्वतंत्रपणे पाहून 'मला द्या, मला द्या' अशी एकत्र किंवा वेगवेगळ्या प्रकारे याचना करून, एकत्र जावोत किंवा वेगवेगळ्या मार्गाने जावोत, भोजन घेऊन एकत्र जेवोत किंवा वेगवेगळ्या ठिकाणी जेवोत, जर ते एकत्र भोजन स्वीकारतात, तर ते गणभोजन होते आणि सर्वांना आपत्ती (दोष) प्राप्त होते. अशा प्रकारे याचना केल्याने गणभोजन दोष उत्पन्न होतो. ปาทาปิ [Pg.80] ผลิตาติ ยถา มหาจมฺมสฺส ปรโต มํสํ ทิสฺสติ; เอวํ ผาลิตา, วาลิกาย วา สกฺขราย วา ปหฏมตฺเต ทุกฺขํ อุปฺปาเทนฺติ, น สกฺกา โหติ อนฺโตคาเม ปิณฺฑาย จริตุํ. อีทิเส เคลญฺเญ คิลานสมโยติ ภุญฺชิตพฺพํ, น เลสกปฺปิยํ กาตพฺพํ. 'पाय फाटलेले असणे' म्हणजे ज्याप्रमाणे जाड कातडीच्या आतून मांस दिसावे, अशा प्रकारे पाय फाटलेले असणे. वाळू किंवा खडे लागल्याबरोबर तीव्र वेदना उत्पन्न होतात आणि गावाच्या आत पिंडपातासाठी फिरणे शक्य होत नाही. अशा आजारपणात 'हा आजारी भिक्खूचा काळ (गिलाणसमय) आहे' असे ठरवून गणभोजन घेता येते, केवळ नावापुरते (खोटे) कारण करून तसे करू नये. จีวเร กยิรมาเนติ ยทา สาฏกญฺจ สุตฺตญฺจ ลภิตฺวา จีวรํ กโรนฺติ ตทา; วิสุญฺหิ จีวรการสมโย นาม นตฺถิ. ตสฺมา โย ตตฺถ จีวเร กตฺตพฺพํ ยํกิญฺจิ กมฺมํ กโรติ, มหาปจฺจริยญฺหิ ‘‘อนฺตมโส สูจิเวธนโก’’ติปิ วุตฺตํ, เตน จีวรการสมโยติ ภุญฺชิตพฺพํ. กุรุนฺทิยํ ปน วิตฺถาเรเนว วุตฺตํ. โย จีวรํ วิจาเรติ, ฉินฺทติ, โมฆสุตฺตํ ฐเปติ, อาคนฺตุกปฏฺฏํ ฐเปติ, ปจฺจาคตํ สิพฺพติ, อาคนฺตุกปฏฺฏํ พนฺธติ, อนุวาตํ ฉินฺทติ ฆฏฺเฏติ อาโรเปติ, ตตฺถ ปจฺจาคตํ สิพฺพติ, สุตฺตํ กโรติ วเลติ, ปิปฺผลิกํ นิเสติ, ปริวตฺตนํ กโรติ, สพฺโพปิ จีวรํ กโรติเยวาติ วุจฺจติ. โย ปน สมีเป นิสินฺโน ชาตกํ วา ธมฺมปทํ วา กเถติ, อยํ น จีวรการโก. เอตํ ฐเปตฺวา เสสานํ คณโภชเน อนาปตฺตีติ. 'चीवर बनवले जात असताना' म्हणजे जेव्हा कापड आणि दोरा मिळवून चीवर तयार केले जाते तेव्हा; कारण स्वतंत्रपणे 'चीवर बनवण्याचा काळ' असा दुसरा कोणताही काळ नाही. म्हणून जो कोणी त्या चीवराच्या कामात काहीही काम करतो—महाप्रत्यरीमध्ये म्हटले आहे की 'अगदी सुईने छिद्र पाडणे' देखील यात समाविष्ट आहे—त्याने 'हा चीवर बनवण्याचा काळ (चीवरकारसमय) आहे' असे ठरवून गणभोजन घ्यावे. कुरुंदी अट्ठकथेत मात्र हे सविस्तर सांगितले आहे. जो चीवराचे नियोजन करतो, कापतो, तात्पुरता दोरा घालतो, बाहेरील पट्टी जोडतो, पुन्हा शिवतो, बाहेरील पट्टी बांधतो, काठ कापतो, घासतो, जोडतो, त्यावर पुन्हा शिवतो, दोरा तयार करतो किंवा गुंडाळतो, लहान सुरीला धार लावतो, दोरा गुंडाळण्याचे यंत्र चालवतो, या सर्वांना 'चीवर बनवणारे' असेच म्हटले जाते. परंतु जो जवळ बसून जातक कथा किंवा धम्मपद सांगतो, तो चीवर बनवणारा नाही. त्याला सोडून इतर (चीवर बनवणाऱ्या) भिक्खूंना गणभोजनात आपत्ती (दोष) होत नाही. อทฺธโยชนนฺติ เอตฺตกมฺปิ อทฺธานํ คนฺตุกาเมน. โย ปน ทูรํ คนฺตุกาโม, ตตฺถ วตฺตพฺพเมว นตฺถิ. คจฺฉนฺเตนาติ อทฺธานํ คจฺฉนฺเตน, อทฺธโยชนพฺภนฺตเร คาวุเตปิ ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. คเตน ภุญฺชิตพฺพนฺติ คเตน เอกทิวสํ ภุญฺชิตพฺพํ. นาวาภิรุหเนปิ เอเสว นโย. อยํ ปน วิเสโส – อภิรุฬฺเหน อิจฺฉิตฏฺฐานํ คนฺตฺวาปิ ยาว น โอโรหติ ตาว ภุญฺชิตพฺพนฺติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. จตุตฺเถ อาคเตติ อยํ อนฺติมปริจฺเฉโท, จตุตฺเถปิ อาคเต ยตฺถ น ยาเปนฺติ; โส มหาสมโย. ยตฺถ ปน สตํ วา สหสฺสํ วา สนฺนิปตนฺติ, ตตฺถ วตฺตพฺพเมว นตฺถิ. ตสฺมา ตาทิเส กาเล ‘‘มหาสมโย’’ติ อธิฏฺฐหิตฺวา ภุญฺชิตพฺพํ. โย โกจิ ปริพฺพาชกสมาปนฺโนติ สหธมฺมิเกสุ วา ติตฺถิเยสุ วา อญฺญตโร, เอเตสญฺหิ เยน เกนจิ กเต ภตฺเต ‘‘สมณภตฺตสมโย’’ติ ภุญฺชิตพฺพํ. 'अर्धा योजन' म्हणजे इतक्या अंतराच्या प्रवासाला जाण्याची इच्छा असलेल्या भिक्खूने. जो यापेक्षा जास्त दूर जाऊ इच्छितो, त्याच्याविषयी तर बोलण्याची गरजच नाही. 'प्रवास करत असताना' म्हणजे प्रवास करणाऱ्या भिक्खूने अर्ध्या योजनेच्या आत एका गावुताच्या अंतरावरही गणभोजन घेणे योग्य आहे. 'पोहोचल्यावर भोजन करावे' म्हणजे इच्छित स्थळी पोहोचल्यावर एका दिवसासाठी गणभोजन घेता येते. नौकेत (नावेत) बसून प्रवास करण्याच्या बाबतीतही हाच नियम लागू होतो. परंतु यात हा विशेष फरक आहे की—नावेत बसलेला भिक्खू इच्छित स्थळी पोहोचल्यावरही जोपर्यंत नावेतून खाली उतरत नाही, तोपर्यंत तो गणभोजन घेऊ शकतो, असे महाप्रत्यरीमध्ये म्हटले आहे. 'चौथा आल्यावर' ही अंतिम मर्यादा आहे; चौथा भिक्खू आल्यावरही जेथे अन्न पुरेसे पडत नाही, तो 'महासमय' (मोठा प्रसंग) आहे. जेथे शंभर किंवा हजार भिक्खू एकत्र येतात, तिथे तर बोलण्याची गरजच नाही. म्हणून अशा वेळी 'हा महासमय आहे' असे ठरवून गणभोजन घ्यावे. 'जो कोणी परिव्राजक अवस्थेला प्राप्त झालेला' म्हणजे सधार्मिक किंवा इतर पंथांतील कोणीही एक; कारण यांच्यापैकी कोणीही भोजन तयार केले असता 'हा श्रमणभोजन काळ (समणभत्तसमय) आहे' असे ठरवून गणभोजन घ्यावे. ๒๒๐. อนาปตฺติ สมเยติ สตฺตสุ สมเยสุ อญฺญตรสฺมึ อนาปตฺติ. ทฺเว ตโย เอกโตติ เยปิ อกปฺปิยนิมนฺตนํ สาทิยิตฺวา ทฺเว วา ตโย วา เอกโต คเหตฺวา ภุญฺชนฺติ, เตสมฺปิ อนาปตฺติ. २२०. 'योग्य वेळी आपत्ती नाही' म्हणजे सात प्रसंगांपैकी (समयांपैकी) कोणत्याही एका प्रसंगी गणभोजन घेतल्यास आपत्ती होत नाही. 'दोन किंवा तीन एकत्र' म्हणजे ज्या भिक्खूंनी अयोग्य आमंत्रण स्वीकारले असूनही, दोन किंवा तीन भिक्खूंनी एकत्र येऊन भोजन स्वीकारले आणि जेवले, त्यांनाही आपत्ती होत नाही. ตตฺถ [Pg.81] อนิมนฺติตจตุตฺถํ, ปิณฺฑปาติกจตุตฺถํ, อนุปสมฺปนฺนจตุตฺถํ, ปตฺตจตุตฺถํ, คิลานจตุตฺถนฺติ ปญฺจนฺนํ จตุกฺกานํ วเสน วินิจฺฉโย เวทิตพฺโพ. กถํ? อิเธกจฺโจ จตฺตาโร ภิกฺขู ‘‘ภตฺตํ คณฺหถา’’ติ นิมนฺเตติ. เตสุ ตโย คตา, เอโก น คโต. อุปาสโก ‘‘เอโก ภนฺเต เถโร กุหิ’’นฺติ ปุจฺฉติ. นาคโต อุปาสกาติ. โส อญฺญํ ตงฺขณปฺปตฺตํ กญฺจิ ‘‘เอหิ ภนฺเต’’ติ ปเวเสตฺวา จตุนฺนมฺปิ ภตฺตํ เทติ, สพฺเพสํ อนาปตฺติ. กสฺมา? คณปูรกสฺส อนิมนฺติตตฺตา. ตโย เอว หิ ตตฺถ นิมนฺติตา คณฺหึสุ, เตหิ คโณ น ปูรติ, คณปูรโก จ อนิมนฺติโต, เตน คโณ ภิชฺชตีติ อิทํ อนิมนฺติตจตุตฺถํ. त्यामध्ये, १. अनिमंत्रित-चतुष्क (आमंत्रण नसलेला चौथा), २. पिंडपातिक-चतुष्क, ३. अनुपसंपन्न-चतुष्क, ४. पात्र-चतुष्क, आणि ५. गिलाण-चतुष्क या पाच चतुष्कांच्या आधारे निर्णय समजून घ्यावा. तो कसा? येथे एखादा उपासक चार भिक्खूंना 'भोजन स्वीकार करा' असे निमंत्रण देतो. त्यांच्यापैकी तीन भिक्खू गेले, एक गेला नाही. उपासक विचारतो, 'भंते, एक स्थवीर कुठे आहेत?' भिक्खू म्हणतात, 'उपासका, ते आले नाहीत.' तो उपासक त्याच वेळी तिथे आलेल्या दुसऱ्याच एखाद्या भिक्खूला 'भंते, या' असे म्हणून घरात बोलावतो आणि चौघांनाही भोजन देतो, अशा वेळी सर्वांना आपत्ती (दोष) होत नाही. का? कारण गण (चार भिक्खूंचा समूह) पूर्ण करणाऱ्या चौथ्या भिक्खूला आमंत्रित केले नव्हते. तिथे केवळ तीनच आमंत्रित भिक्खूंनी भोजन स्वीकारले, ज्यांच्यामुळे गण पूर्ण होत नाही, आणि गण पूर्ण करणारा चौथा भिक्खू अनिमंत्रित होता, ज्यामुळे गण भंग पावतो. याला 'अनिमंत्रित-चतुष्क' म्हणतात. ปิณฺฑปาติกจตุตฺเถ – นิมนฺตนกาเล เอโก ปิณฺฑปาติโก โหติ, โส นาธิวาเสติ. คมนเวลาย ปน ‘‘เอหิ ภนฺเต’’ติ วุตฺเต อนธิวาสิตตฺตา อนาคจฺฉนฺตมฺปิ ‘‘เอถ ภิกฺขํ ลจฺฉถา’’ติ คเหตฺวา คจฺฉนฺติ, โส ตํ คณํ ภินฺทติ. ตสฺมา สพฺเพสํ อนาปตฺติ. पिंडपातिक-चतुष्कामध्ये—निमंत्रणाच्या वेळी एक भिक्खू पिंडपातिक असतो, तो निमंत्रण स्वीकारत नाही. परंतु जाण्याच्या वेळी 'भंते, चला' असे म्हटले असता, निमंत्रण न स्वीकारल्यामुळे तो जाऊ इच्छित नसला तरी, 'चला, भिक्षा मिळेल' असे सांगून इतर भिक्खू त्याला सोबत घेऊन जातात. तो (पिंडपातिक भिक्खू) त्या गणाचा भंग करतो. म्हणून सर्वांना आपत्ती होत नाही. อนุปสมฺปนฺนจตุตฺเถ – สามเณเรน สทฺธึ นิมนฺติตา โหนฺติ, โสปิ คณํ ภินฺทติ. अनुपसंपन्न-चतुष्कामध्ये—भिक्खूंना एखाद्या सामणेरासोबत आमंत्रित केले जाते, तो (सामणेर) देखील गणाचा भंग करतो. ปตฺตจตุตฺเถ – เอโก สยํ อคนฺตฺวา ปตฺตํ เปเสติ; เอวมฺปิ คโณ ภิชฺชติ. ตสฺมา สพฺเพสํ อนาปตฺติ. पात्र-चतुष्कामध्ये—एक भिक्खू स्वतः न जाता आपले पात्र पाठवतो; अशानेही गणाचा भंग होतो. म्हणून सर्वांना आपत्ती होत नाही. คิลานจตุตฺเถ – คิลาเนน สทฺธึ นิมนฺติตา โหนฺติ, ตตฺถ คิลานสฺเสว อนาปตฺติ, อิตเรสํ ปน คณปูรโก โหติ. น หิ คิลาเนน คโณ ภิชฺชติ. ตสฺมา เตสํ อาปตฺติเยว. มหาปจฺจริยํ ปน อวิเสเสน วุตฺตํ. गिलाण-चतुष्कामध्ये—आजारी भिक्खूसोबत आमंत्रित केले जाते, तिथे केवळ आजारी भिक्खूलाच आपत्ती होत नाही, इतरांसाठी मात्र तो गण पूर्ण करणारा ठरतो. कारण आजारी भिक्खूमुळे गणाचा भंग होत नाही. म्हणून इतर भिक्खूंना आपत्ती होतेच. महाप्रत्यरीमध्ये मात्र कोणताही भेद न करता (सर्वांनाच अनापत्ती असल्याचे) म्हटले आहे. สมยลทฺธโก สยเมว มุจฺจติ, เสสานํ คณปูรกตฺตา อาปตฺติกโร โหติ. ตสฺมา จีวรทานสมยลทฺธกาทีนมฺปิ วเสน จตุกฺกานิ เวทิตพฺพานิ. สเจ ปน อธิวาเสตฺวา คเตสุปิ จตูสุ ชเนสุ เอโก ปณฺฑิโต ภิกฺขุ ‘‘อหํ ตุมฺหากํ คณํ ภินฺทิสฺสามิ, นิมนฺตนํ สาทิยถา’’ติ วตฺวา ยาคุขชฺชกาวสาเน ภตฺตตฺถาย ปตฺตํ คณฺหนฺตานํ อทตฺวา ‘‘อิเม ตาว ภิกฺขู โภเชตฺวา วิสฺสชฺเชถ, อหํ ปจฺฉา อนุโมทนํ กตฺวา คมิสฺสามี’’ติ นิสินฺโน. เตสุ ภุตฺวา คเตสุ ‘‘เทถ ภนฺเต ปตฺต’’นฺติ อุปาสเกน ปตฺตํ คเหตฺวา ภตฺเต ทินฺเน ภุญฺชิตฺวา อนุโมทนํ [Pg.82] กตฺวา คจฺฉติ, สพฺเพสํ อนาปตฺติ. ปญฺจนฺนญฺหิ โภชนานํเยว วเสน คณโภชเน วิสงฺเกตํ นตฺถิ. โอทเนน นิมนฺติตา กุมฺมาสํ คณฺหนฺตาปิ อาปตฺตึ อาปชฺชนฺติ. ตานิ จ เตหิ เอกโต น คหิตานิ. ยาคุอาทีสุ ปน วิสงฺเกตํ โหติ, ตานิ เตหิ เอกโต คหิตานีติ. เอวํ เอโก ปณฺฑิโต อญฺเญสมฺปิ อนาปตฺตึ กโรติ. ज्याला योग्य वेळ (प्रसंग) मिळाला आहे, तो स्वतःच आपत्तीतून मुक्त होतो, परंतु इतरांसाठी तो गण पूर्ण करणारा ठरत असल्याने त्यांना आपत्ती प्राप्त होते. म्हणून चीवरदान-समय प्राप्त झालेल्या भिक्खूंच्या बाबतीतही अशाच प्रकारे चतुष्क समजून घ्यावेत. परंतु जर निमंत्रण स्वीकारून गेलेल्या चार भिक्खूंमध्ये एक चतुर भिक्खू 'मी तुमचा गण भंग करीन, तुम्ही निमंत्रण स्वीकारा' असे सांगतो, आणि पेज व खाद्यान्न संपल्यावर भोजनासाठी पात्र घेणाऱ्या उपासकांना आपले पात्र न देता, 'आधी या भिक्खूंना भोजन देऊन निरोप द्या, मी नंतर अनुमोदन करून जाईन' असे सांगून बसून राहतो. ते भिक्खू जेवून निघून गेल्यावर, 'भंते, पात्र द्या' असे उपासकाने म्हटल्यावर पात्र देऊन, भोजन वाढल्यावर ते ग्रहण करून, अनुमोदन करून निघून जातो, तर सर्वांना आपत्ती होत नाही. कारण पाच प्रकारच्या भोजनांच्या बाबतीतच गणभोजनात विसंकेत (नियमभंग) होत नाही. भाताचे निमंत्रण असताना कुम्मास स्वीकारले तरी आपत्ती प्राप्त होते, आणि ते त्यांनी एकत्र स्वीकारलेले नसते. परंतु पेज इत्यादींच्या बाबतीत विसंकेत होतो, आणि ते त्यांनी एकत्र स्वीकारलेले असते. अशा प्रकारे एक चतुर भिक्खू इतरांनाही आपत्तीतून मुक्त करतो. ตสฺมา สเจ โกจิ สงฺฆภตฺตํ กตฺตุกาเมน นิมนฺตนตฺถาย เปสิโต วิหารํ อาคมฺม ‘‘ภนฺเต, สฺเว อมฺหากํ ฆเร ภิกฺขํ คณฺหถา’’ติ อวตฺวา ‘‘ภตฺตํ คณฺหถา’’ติ วา ‘‘สงฺฆภตฺตํ คณฺหถา’’ติ วา ‘‘สงฺโฆ ภตฺตํ คณฺหาตู’’ติ วา วทติ, ภตฺตุทฺเทสเกน ปณฺฑิเตน ภวิตพฺพํ, เนมนฺตนิกา คณโภชนโต ปิณฺฑปาติกา จ ธุตงฺคเภทโต โมเจตพฺพา. กถํ? เอวํ ตาว วตฺตพฺพํ – ‘‘สฺเว น สกฺกา อุปาสกา’’ติ. ‘‘ปุนทิวเส, ภนฺเต’’ติ. ‘‘ปุนทิวเสปิ น สกฺกา’’ติ. เอวํ ยาว อทฺธมาสมฺปิ หริตฺวา ปุน วตฺตพฺโพ – ‘‘ตฺวํ กึ อวจา’’ติ? สเจ ปุนปิ ‘‘สงฺฆภตฺตํ คณฺหถา’’ติ วทติ, ตโต ‘‘อิมํ ตาว อุปาสก ปุปฺผํ กปฺปิยํ กโรหิ, อิมํ ติณ’’นฺติ เอวํ วิกฺเขปํ กตฺวา ปุน ‘‘กึ กถยิตฺถา’’ติ ปุจฺฉิตพฺโพ. สเจ ปุนปิ ตเถว วทติ, ‘‘อาวุโส, ตฺวํ ปิณฺฑปาติเก วา มหาเถเร วา น ลจฺฉสิ, สามเณเร ลจฺฉสี’’ติ วตฺตพฺโพ. ‘‘นนุ, ภนฺเต อสุกสฺมิญฺจ อสุกสฺมิญฺจ คาเม ภทนฺเต โภเชสุํ, อหํ กสฺมา น ลภามี’’ติ จ วุตฺเต ‘‘เต นิมนฺเตตุํ ชานนฺติ, ตฺวํ น ชานาสี’’ติ. เต กถํ นิมนฺเตสุํ ภนฺเตติ? เต เอวมาหํสุ – ‘‘อมฺหากํ, ภนฺเต, ภิกฺขํ คณฺหถา’’ติ. สเจ โสปิ ตเถว วทติ, วฏฺฏติ. อถ ปุนปิ ‘‘ภตฺตํ คณฺหถา’’ติ วทติ, ‘‘น ทานิ ตฺวํ, อาวุโส, พหู ภิกฺขู ลจฺฉสิ, ตโย เอว ลจฺฉสี’’ติ วตฺตพฺโพ. ‘‘นนุ, ภนฺเต, อสุกสฺมิญฺจ อสุกสฺมิญฺจ คาเม สกลํ ภิกฺขุสงฺฆํ โภเชสุํ, อหํ กสฺมา น ลภามี’’ติ? ‘‘ตฺวํ นิมนฺเตตุํ น ชานาสี’’ติ. ‘‘เต กถํ นิมนฺเตสุ’’นฺติ? เต ‘‘ภิกฺขํ คณฺหถา’’ติ อาหํสูติ. สเจ โสปิ ‘‘ภิกฺขํ คณฺหถา’’ติ วทติ, วฏฺฏติ. อถ ปุนปิ ‘‘ภตฺตเมวา’’ติ วทติ, ตโต วตฺตพฺโพ – ‘‘คจฺฉ ตฺวํ, นตฺถมฺหากํ ตว ภตฺเตนตฺโถ, นิพทฺธโคจโร เอส อมฺหากํ, มยเมตฺถ ปิณฺฑาย จริสฺสามา’’ติ. ตํ ‘‘จรถ, ภนฺเต’’ติ วตฺวา อาคตํ ปุจฺฉนฺติ – ‘‘กึ โภ ลทฺธา ภิกฺขู’’ติ. ‘‘กึ เอเตน พหุ เอตฺถ วตฺตพฺพํ, ‘เถรา สฺเว ปิณฺฑาย จริสฺสามา’ติ อาหํสุ. มา ทานิ ตุมฺเห ปมชฺชิตฺถา’’ติ. ทุติยทิวเส เจติยวตฺตํ กตฺวา ฐิตา ภิกฺขู สงฺฆตฺเถเรน [Pg.83] วตฺตพฺพา – ‘‘อาวุโส, ธุรคาเม สงฺฆภตฺตํ อปณฺฑิตมนุสฺโส ปน อคมาสิ, คจฺฉาม ธุรคาเม ปิณฺฑาย จริสฺสามา’’ติ. ภิกฺขูหิ เถรสฺส วจนํ กาตพฺพํ, น ทุพฺพเจหิ ภวิตพฺพํ, คามทฺวาเร อฏฺฐตฺวาว ปิณฺฑาย จริตพฺพํ. เตสุ ปตฺตานิ คเหตฺวา นิสีทาเปตฺวา โภเชนฺเตสุ ภุญฺชิตพฺพํ. สเจ อาสนสาลาย ภตฺตํ ฐเปตฺวา รถิกาสุ อาหิณฺฑนฺตา อาโรเจนฺติ – ‘‘อาสนสาลาย, ภนฺเต, ภตฺตํ คณฺหถา’’ติ น วฏฺฏติ. म्हणून जर संघभक्त (संघाला भोजनदान) देण्याची इच्छा असणाऱ्याने आमंत्रण देण्यासाठी पाठवलेला कोणी (दूत) विहारात येऊन, "भन्ते, उद्या आमच्या घरी भिक्षा ग्रहण करावी" असे न म्हणता, "भोजन ग्रहण करावे" किंवा "संघभक्त ग्रहण करावा" किंवा "संघाने भोजन ग्रहण करावे" असे म्हणतो, तर भोजन वाटप करणाऱ्या (भत्तुद्देशक) भिक्खूने चतुर असावे. त्याने आमंत्रण स्वीकारणाऱ्या भिक्खूंना गणभोजन आपत्तीपासून आणि पिंडपातिक भिक्खूंना धुतंगभंगापासून मुक्त केले पाहिजे. कसे? आधी असे म्हणावे - "उपासका, उद्या येणे शक्य नाही." "दुसऱ्या दिवशी, भन्ते?" "दुसऱ्या दिवशीही शक्य नाही." याप्रमाणे पंधरवड्यापर्यंत वेळ लावून पुन्हा विचारावे - "तू काय म्हणालास?" जर तो पुन्हा "संघभक्त ग्रहण करा" असे म्हणतो, तर "उपासका, आधी हे फूल कप्पिय (योग्य) कर, हे गवत कप्पिय कर" अशा प्रकारे त्याचे लक्ष विचलित करून पुन्हा विचारावे - "तू काय म्हणालास?" जर तो पुन्हा तसेच म्हणतो, तर त्याला म्हणावे - "आयुष्यमाना, तुला पिंडपातिक भिक्खू किंवा महाथेर मिळणार नाहीत, केवळ सामणेर मिळतील." "भन्ते, अमुक अमुक गावात लोकांनी भदन्तांना भोजन दिले ना? मला का मिळत नाही?" असे विचारल्यावर म्हणावे - "ते आमंत्रण देण्यास जाणतात, तू जाणत नाहीस." "भन्ते, त्यांनी कसे आमंत्रित केले?" "त्यांनी असे म्हटले - भन्ते, आमची भिक्षा ग्रहण करावी." जर तो सुद्धा तसेच म्हणतो, तर ते योग्य आहे. पण जर तो पुन्हा "भोजन ग्रहण करावे" असे म्हणतो, तर त्याला म्हणावे - "आयुष्यमाना, आता तुला अनेक भिक्खू मिळणार नाहीत, केवळ तीनच मिळतील." "भन्ते, अमुक अमुक गावात लोकांनी संपूर्ण भिक्खू संघाला भोजन दिले ना? मला का मिळत नाही?" "तू आमंत्रण देण्यास जाणत नाहीस." "त्यांनी कसे आमंत्रित केले?" "त्यांनी भिक्षा ग्रहण करावी असे म्हटले." जर तो सुद्धा "भिक्षा ग्रहण करावी" असे म्हणतो, तर ते योग्य आहे. पण जर तो पुन्हा "भोजनच" असे म्हणतो, तर त्याला म्हणावे - "तू जा, आम्हाला तुझ्या भोजनाची गरज नाही. हे आमचे नियमित भिक्षाटन करण्याचे गाव आहे, आम्ही येथे भिक्षेसाठी फिरू." त्याला "भन्ते, फिरावे" असे म्हणून परत आलेल्या त्या उपासकाला इतर लोक विचारतात - "काय रे, भिक्खू मिळाले का?" "याने काय होणार? येथे सांगण्यासारखे खूप काही आहे. थेर म्हणाले आहेत की उद्या आम्ही भिक्षेसाठी फिरू. आता तुम्ही गाफील राहू नका." दुसऱ्या दिवशी चैत्यवंदन करून थांबलेल्या भिक्खूंना संघथेराने म्हणावे - "आयुष्यमानांनो, जवळच्या गावात संघभक्तासाठी एक अज्ञानी माणूस आला होता. चला, आपण जवळच्या गावात भिक्षेसाठी फिरू या." भिक्खूंनी थेरांचे वचन ऐकावे, उद्धट होऊ नये. गावाच्या वेशीवर न थांबता थेट भिक्षेसाठी फिरावे. त्यांनी पात्रे घेऊन, बसवून भोजन दिले तर जेवावे. जर त्यांनी भोजनशाळेत भोजन ठेवून, रस्त्यांवर फिरत असताना सांगितले की - "भन्ते, भोजनशाळेत भोजन ग्रहण करावे", तर ते ग्रहण करणे योग्य नाही. อถ ปน ภตฺตํ อาทาย ตตฺถ ตตฺถ คนฺตฺวา ‘‘ภตฺตํ คณฺหถา’’ติ วทนฺติ, ปฏิกจฺเจว วา วิหารํ อภิหริตฺวา ปติรูเป ฐาเน ฐเปตฺวา อาคตาคตานํ เทนฺติ, อยํ อภิหฏภิกฺขา นาม วฏฺฏติ. สเจ ปน ภตฺตสาลาย ทานํ สชฺเชตฺวา ตํ ตํ ปริเวณํ ปหิณนฺติ ‘‘ภตฺตสาลาย ภตฺตํ คณฺหถา’’ติ, น วฏฺฏติ. เย ปน มนุสฺสา ปิณฺฑจาริเก ภิกฺขู ทิสฺวา อาสนสาลํ สมฺมชฺชิตฺวา ตตฺถ นิสีทาเปตฺวา โภเชนฺติ, น เต ปฏิกฺขิปิตพฺพา. เย ปน คาเม ภิกฺขํ อลภิตฺวา คามโต นิกฺขมนฺเต ภิกฺขู ทิสฺวา ‘‘ภนฺเต ภตฺตํ คณฺหถา’’ติ วทนฺติ, เต ปฏิกฺขิปิตพฺพา, น วา นิวตฺติตพฺพํ. สเจ ‘‘นิวตฺตถ, ภนฺเต, ภตฺตํ คณฺหถา’’ติ วทนฺติ, ‘‘นิวตฺตถา’’ติ วุตฺตปเท นิวตฺติตุํ วฏฺฏติ. ‘‘นิวตฺตถ ภนฺเต, ฆเร ภตฺตํ กตํ, คาเม ภตฺตํ กต’’นฺติ วทนฺติ, เคเห จ คาเม จ ภตฺตํ นาม ยสฺส กสฺสจิ โหตีติ นิวตฺติตุํ วฏฺฏติ. ‘‘นิวตฺตถ, ภตฺตํ คณฺหถา’’ติ สมฺพนฺธํ กตฺวา วทนฺติ, นิวตฺติตุํ น วฏฺฏติ. อาสนสาลโต ปิณฺฑาย จริตุํ นิกฺขมนฺเต ทิสฺวา ‘‘นิสีทถ ภนฺเต ภตฺตํ คณฺหถา’’ติ วุตฺเตปิ เอเสว นโย. นิจฺจภตฺตนฺติ ธุวภตฺตํ วุจฺจติ. ‘‘นิจฺจภตฺตํ คณฺหถา’’ติ วทนฺติ, พหูนมฺปิ เอกโต คเหตุํ วฏฺฏติ. สลากภตฺตาทีสุปิ เอเสว นโย. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. पण जर भोजन घेऊन तिथे तिथे जाऊन "भोजन ग्रहण करावे" असे म्हणतात, किंवा आधीच विहारात आणून योग्य ठिकाणी ठेवून येणाऱ्या-जाणाऱ्या भिक्खूंना देतात, तर याला 'अभिहतभिक्षा' (आणून दिलेली भिक्षा) म्हणतात, ती ग्रहण करणे योग्य आहे. पण जर भोजनशाळेत दान तयार करून वेगवेगळ्या परिवेणात निरोप पाठवतात की "भोजनशाळेत भोजन ग्रहण करावे", तर ते योग्य नाही. पण जे लोक भिक्षाटनासाठी फिरणाऱ्या भिक्खूंना पाहून, आसनशाळा झाडून, तिथे त्यांना बसवून भोजन देतात, त्यांना नकार देऊ नये. पण जे लोक गावात भिक्षा न मिळाल्यामुळे गावातून बाहेर पडणाऱ्या भिक्खूंना पाहून "भन्ते, भोजन ग्रहण करावे" असे म्हणतात, त्यांना नकार दिला पाहिजे किंवा मागे फिरू नये. जर ते "भन्ते, मागे फिरा, भोजन ग्रहण करा" असे म्हणतात, तर "मागे फिरा" या शब्दावरून मागे फिरणे योग्य आहे. जर ते "भन्ते, मागे फिरा, घरी भोजन तयार केले आहे, गावात भोजन तयार केले आहे" असे म्हणतात, तर घर किंवा गावातील भोजन हे कोणासाठीही असू शकते, म्हणून मागे फिरणे योग्य आहे. पण जर ते "मागे फिरा, भोजन ग्रहण करा" असे जोडून म्हणतात, तर मागे फिरणे योग्य नाही. आसनशाळेतून भिक्षेसाठी बाहेर पडताना पाहून "भन्ते, बसा आणि भोजन ग्रहण करा" असे म्हटल्यास देखील हाच नियम लागू होतो. 'नित्यभक्त' म्हणजे नियमित दिले जाणारे भोजन होय. 'नित्यभक्त ग्रहण करावे' असे म्हटल्यास, अनेक भिक्खूंनी एकत्र मिळून ते ग्रहण करणे योग्य आहे. शलाकाभक्त इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. हे (सिक्खापद) एळकलोम (मेंढीच्या लोकरीच्या) नियमाप्रमाणेच समुत्थान असणारे, क्रिया (करणे), नोसञ्ञाविमोक्ख (संज्ञा नसली तरी आपत्तीतून सुटका न होणारे), अचित्तक (चित्त नसतानाही घडणारे), पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तीचे उल्लंघन केल्यामुळे दोष असणारे), कायकर्म, त्रिचित्तक (तीन चित्त असणारे) आणि त्रिवेदन (तीन वेदना असणारे) आहे. คณโภชนสิกฺขาปทํ ทุติยํ. दुसरे गणभोजन सिक्खापद समाप्त. ๓. ปรมฺปรโภชนสิกฺขาปทวณฺณนา ३. परंपराभोजन सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना). ๒๒๑. ตติยสิกฺขาปเท – น โข อิทํ โอรกํ ภวิสฺสติ, ยถยิเม มนุสฺสา สกฺกจฺจํ ภตฺตํ กโรนฺตีติ, เยน นิยาเมน อิเม มนุสฺสา สกฺกจฺจํ ภตฺตํ [Pg.84] กโรนฺติ, เตน ญายติ – ‘‘อิทํ สาสนํ อิทํ วา พุทฺธปฺปมุเข สงฺเฆ ทานํ น โข โอรกํ ภวิสฺสติ, ปริตฺตํ ลามกํ เนว ภวิสฺสตี’’ติ. กิรปติโกติ เอตฺถ ‘‘กิโร’’ติ ตสฺส กุลปุตฺตสฺส นามํ; อธิปจฺจฏฺเฐน ปน ‘‘กิรปติโก’’ติ วุจฺจติ. โส กิร อิสฺสโร อธิปติ มาสอุตุสํวจฺฉรนิยาเมน เวตนํ ทตฺวา กมฺมการเก กมฺมํ กาเรติ. พทรา ปฏิยตฺตาติ อุปจารวเสน วทติ. พทรมิสฺเสนาติ พทรสาฬเวน. २२१. तिसऱ्या सिक्खापदात - 'हे क्षुल्लक असणार नाही, ज्या प्रकारे हे लोक आदराने भोजन तयार करत आहेत' याचा अर्थ असा की, ज्या पद्धतीने हे लोक आदराने भोजन तयार करत आहेत, त्यावरून हे समजते की - 'हे शासन किंवा बुद्धांच्या प्रमुखतेखालील संघाला दिलेले हे दान क्षुल्लक असणार नाही, ते थोडे किंवा हीन दर्जाचे मुळीच असणार नाही.' 'किरपतिक' यामध्ये 'किर' हे त्या कुलपुत्राचे नाव आहे; पण अधिपत्य (अधिपती असणे) या अर्थाने त्याला 'किरपतिक' म्हटले जाते. तो खरोखरच स्वामी आणि अधिपती असून महिना, ऋतू किंवा वर्षाच्या नियमाने वेतन देऊन कामगारांकडून काम करून घेत असे. 'बदरा पटियत्ता' (बोरे तयार केली आहेत) हे तो उपचाराने (लाक्षणिक अर्थाने) म्हणतो. 'बदरमिस्सेन' म्हणजे बोरांच्या रसाने (बोरांच्या सरबताने). ๒๒๒. อุสฺสูเร อาหริยิตฺถาติ อติทิวา อาหริยิตฺถ. २२२. 'उस्सूरी आहरियित्थ' म्हणजे खूप उशिरा (दुपार टळल्यावर) आणले गेले. ๒๒๖. มยฺหํ ภตฺตปจฺจาสํ อิตฺถนฺนามสฺส ทมฺมีติ อยํ ภตฺตวิกปฺปนา นาม สมฺมุขาปิ ปรมฺมุขาปิ วฏฺฏติ. สมฺมุขา ทิสฺวา ‘‘ตุยฺหํ วิกปฺเปมี’’ติ วตฺวา ภุญฺชิตพฺพํ, อทิสฺวา ปญฺจสุ สหธมฺมิเกสุ ‘‘อิตฺถนฺนามสฺส วิกปฺเปมี’’ติ วตฺวา ภุญฺชิตพฺพํ. มหาปจฺจริยาทีสุ ปน ปรมฺมุขาวิกปฺปนาว วุตฺตา. สา จายํ ยสฺมา วินยกมฺเมน สงฺคหิตา, ตสฺมา ภควโต วิกปฺเปตุํ น วฏฺฏติ. ภควติ หิ คนฺธกุฏิยํ นิสินฺเนปิ สงฺฆมชฺเฌ นิสินฺเนปิ สงฺเฆน คณปฺปโหนเก ภิกฺขู คเหตฺวา ตํ ตํ กมฺมํ กตํ สุกตเมว โหติ, ภควา เนว กมฺมํ โกเปติ; น สมฺปาเทติ. น โกเปติ ธมฺมิสฺสรตฺตา, น สมฺปาเทติ อคณปูรกตฺตา. २२६. माझ्या भोजनाची आशा मी अमुक नावाच्या भिक्षूला देतो, याला 'भत्तविकप्पना' (भोजन-विकल्पना) असे म्हणतात. हे प्रत्यक्ष (समोर असताना) किंवा परोक्ष (अप्रत्यक्ष) दोन्ही प्रकारे योग्य आहे. प्रत्यक्ष पाहून 'मी तुम्हाला हे विकल्पित करतो' असे म्हणून भोजन करावे; आणि न पाहिल्यास, पाच सहधार्मिकांपैकी 'मी अमुक नावाच्या भिक्षूला हे विकल्पित करतो' असे म्हणून भोजन करावे. परंतु महाप्रत्यरी इत्यादी अट्ठकथांमध्ये केवळ परोक्ष विकल्पनाच सांगितली आहे. आणि ही भत्तविकल्पना विनयकर्मामध्ये समाविष्ट असल्यामुळे, भगवंतांच्या उद्देशाने विकल्पना करणे योग्य नाही. कारण भगवान गंधकुटीमध्ये बसलेले असताना किंवा संघामध्ये बसलेले असतानाही, संघाने गणापुरते भिक्षू घेऊन केलेले ते ते कर्म सुकृत (योग्य प्रकारे केलेले) ठरते; भगवान कर्माला नष्ट करत नाहीत आणि ते पूर्णही करत नाहीत. धम्माचे स्वामी असल्यामुळे ते कर्माला नष्ट करत नाहीत, आणि गणपूरक (संघाची संख्या पूर्ण करणारे) नसल्यामुळे ते पूर्ण करत नाहीत. ๒๒๙. ทฺเว ตโย นิมนฺตเน เอกโต ภุญฺชตีติ ทฺเว ตีณิ นิมนฺตนานิ เอกปตฺเต ปกฺขิปิตฺวา มิสฺเสตฺวา เอกํ กตฺวา ภุญฺชตีติ อตฺโถ. ทฺเว ตีณิ กุลานิ นิมนฺเตตฺวา เอกสฺมึ ฐาเน นิสีทาเปตฺวา อิโต จิโต จ อาหริตฺวา ภตฺตํ อากิรนฺติ, สูปพฺยญฺชนํ อากิรนฺติ, เอกมิสฺสกํ โหติ, เอตฺถ อนาปตฺตีติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. สเจ ปน มูลนิมนฺตนํ เหฏฺฐา โหติ, ปจฺฉิมํ ปจฺฉิมํ อุปริ, ตํ อุปริโต ปฏฺฐาย ภุญฺชนฺตสฺส อาปตฺติ. หตฺถํ ปน อนฺโต ปเวเสตฺวา ปฐมนิมนฺตนโต เอกมฺปิ กพฬํ อุทฺธริตฺวา ภุตฺตกาลโต ปฏฺฐาย ยถา ตถา วา ภุญฺชนฺตสฺส อนาปตฺติ. สเจปิ ตตฺถ ขีรํ วา รสํ วา อากิรนฺติ, เยน อชฺโฌตฺถตํ ภตฺตํ เอกรสํ โหติ, โกฏิโต ปฏฺฐาย ภุญฺชนฺตสฺส อนาปตฺตีติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. มหาอฏฺฐกถายํ ปน วุตฺตํ – ‘‘ขีรภตฺตํ วา รสภตฺตํ วา ลภิตฺวา นิสินฺนสฺส ตตฺเถว อญฺเญปิ ขีรภตฺตํ วา รสภตฺตํ วา อากิรนฺติ, ขีรํ วา รสํ วา ปิวโต อนาปตฺติ. ภุญฺชนฺเตน ปน ปฐมํ ลทฺธมํสขณฺฑํ วา ภตฺตปิณฺฑํ [Pg.85] วา มุเข ปกฺขิปิตฺวา โกฏิโต ปฏฺฐาย ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. สปฺปิปายาเสปิ เอเสว นโย’’ติ. २२९. 'दोन किंवा तीन निमंत्रणे एकत्र करून जेवतो' याचा अर्थ असा की, दोन किंवा तीन निमंत्रणांचे अन्न एकाच पात्रात टाकून, एकत्र करून, एक बनवून जेवणे. दोन किंवा तीन कुळांनी निमंत्रित करून एका ठिकाणी बसवले आणि इकडून तिकडून अन्न आणून वाढले, सूप-व्यंजन (आमटी-भाजी) वाढले आणि ते सर्व एकत्र झाले, तर अशा वेळी भोजन करणाऱ्याला अनापत्ती (दोष नाही) आहे, असे महाप्रत्यरीमध्ये म्हटले आहे. परंतु जर मूळ निमंत्रणाचे अन्न खाली असेल आणि नंतरचे नंतरचे अन्न वर असेल, तर वरून सुरुवात करून जेवणाऱ्याला आपत्ती (दोष) होते. परंतु आत हात घालून पहिल्या निमंत्रणातील किमान एक घास काढून खाल्ल्यानंतर, त्यानंतर कसेही जेवले तरी अनापत्ती आहे. जर त्यावर दूध किंवा रस ओतला असेल, ज्यामुळे ते अन्न झाकले जाऊन एकरस झाले असेल, तर कडेपासून सुरुवात करून जेवणाऱ्याला अनापत्ती आहे, असे महाप्रत्यरीमध्ये म्हटले आहे. परंतु महाअट्ठकथेमध्ये म्हटले आहे - 'दूध-भात किंवा रस-भात मिळून बसलेल्या भिक्षूच्या पात्रात इतर लोकही दूध-भात किंवा रस-भात ओततात, तर ते दूध किंवा रस पिणाऱ्याला अनापत्ती आहे. परंतु जेवणाऱ्याने आधी मिळालेला मांसाचा तुकडा किंवा भाताचा घास तोंडात टाकून कडेपासून जेवणे योग्य आहे. तूप-खीर (सप्पिपायस) मध्येही हाच नियम आहे.' มหาอุปาสโก ภิกฺขุํ นิมนฺเตติ, ตสฺส กุลํ อุปคตสฺส อุปาสโกปิ ตสฺส ปุตฺตทารภาติกภคินิอาทโยปิ อตฺตโน อตฺตโน โกฏฺฐาสํ อาหริตฺวา ปตฺเต ปกฺขิปนฺติ, อุปาสเกน ปฐมํ ทินฺนํ อภุญฺชิตฺวา ปจฺฉา ลทฺธํ ภุญฺชนฺตสฺส ‘‘อนาปตฺตี’’ติ มหาอฏฺฐกถายํ วุตฺตํ. กุรุนฺทฏฺฐกถายํ ปน วฏฺฏตีติ วุตฺตํ. มหาปจฺจริยํ ‘‘สเจ ปาเฏกฺกํ ปจนฺติ, อตฺตโน อตฺตโน ปกฺกภตฺตโต อาหริตฺวา เทนฺติ, ตตฺถ ปจฺฉา อาหฏํ ปฐมํ ภุญฺชนฺตสฺส ปาจิตฺติยํ. ยทิ ปน สพฺเพสํ เอโกว ปาโก โหติ, ปรมฺปรโภชนํ น โหตี’’ติ วุตฺตํ. มหาอุปาสโก นิมนฺเตตฺวา นิสีทาเปติ, อญฺโญ มนุสฺโส ปตฺตํ คณฺหาติ, น ทาตพฺพํ. กึ ภนฺเต น เทถาติ? นนุ อุปาสก ตยา นิมนฺติตมฺหาติ! โหตุ ภนฺเต, ลทฺธํ ลทฺธํ ภุญฺชถาติ วทติ, ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. อญฺเญน อาหริตฺวา ภตฺเต ทินฺเน อาปุจฺฉิตฺวาปิ ภุญฺชิตุํ วฏฺฏตีติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. एका महाउपासकाने भिक्षूला निमंत्रित केले. त्याच्या घरी गेलेल्या भिक्षूच्या पात्रात तो उपासक आणि त्याचे मुले, पत्नी, भाऊ, बहीण इत्यादी आपापला हिस्सा आणून टाकतात. उपासकाने आधी दिलेले अन्न न जेवता नंतर मिळालेले अन्न जेवणाऱ्याला 'अनापत्ती' आहे, असे महाअट्ठकथेमध्ये म्हटले आहे. परंतु कुरुन्द अट्ठकथेमध्ये 'हे योग्य आहे' असे म्हटले आहे. महाप्रत्यरीमध्ये म्हटले आहे - 'जर ते स्वतंत्रपणे स्वयंपाक करत असतील आणि आपापल्या शिजवलेल्या अन्नातून आणून देत असतील, तर नंतर आणलेले अन्न आधी जेवणाऱ्याला पाचित्तिय होते. परंतु जर सर्वांचा स्वयंपाक एकच असेल, तर परंपराभोजन होत नाही.' महाउपासकाने निमंत्रित करून बसवले आणि दुसरा माणूस पात्र घेऊ लागला, तर ते देऊ नये. 'भंते, का देत नाही?' असे विचारल्यास, 'हे उपासका, आम्ही तुझ्याद्वारे निमंत्रित आहोत ना!' असे म्हणावे. 'असू द्या भंते, जे काही मिळाले आहे ते ग्रहण करा,' असे तो म्हणाला, तर जेवणे योग्य आहे. दुसऱ्याने अन्न आणून दिले असता, मूळ निमंत्रक उपासकाला विचारूनही जेवणे योग्य आहे, असे कुरुन्दीमध्ये म्हटले आहे. อนุโมทนํ กตฺวา คจฺฉนฺตํ ธมฺมํ โสตุกามา ‘‘สฺเวปิ ภนฺเต อาคจฺเฉยฺยาถา’’ติ สพฺเพ นิมนฺเตนฺติ, ปุนทิวเส อาคนฺตฺวา ลทฺธํ ลทฺธํ ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. กสฺมา? สพฺเพหิ นิมนฺติตตฺตา. เอโก ภิกฺขุ ปิณฺฑาย จรนฺโต ภตฺตํ ลภติ, ตมญฺโญ อุปาสโก นิมนฺเตตฺวา ฆเร นิสีทาเปติ, น จ ตาว ภตฺตํ สมฺปชฺชติ. สเจ โส ภิกฺขุ ปิณฺฑาย จริตฺวา ลทฺธภตฺตํ ภุญฺชติ, อาปตฺติ. อภุตฺวา นิสินฺเน ‘‘กึ ภนฺเต น ภุญฺชสี’’ติ วุตฺเต ‘‘ตยา นิมนฺติตตฺตา’’ติ วตฺวา ลทฺธํ ลทฺธํ ภุญฺชถ ภนฺเต’’ติ วุตฺโต ภุญฺชติ, วฏฺฏติ. अनुमोदन करून जाणाऱ्या भिक्षूकडून धम्म ऐकण्याची इच्छा असणारे सर्वजण 'भंते, उद्याही यावे,' असे निमंत्रण देतात. दुसऱ्या दिवशी येऊन जे काही मिळाले आहे ते जेवणे योग्य आहे. का? कारण सर्वांनी निमंत्रित केले असल्यामुळे. एक भिक्षू पिंडपातासाठी फिरत असताना त्याला अन्न मिळते. दुसरा एक उपासक त्याला निमंत्रित करून घरात बसवतो, परंतु अजून भोजन तयार झालेले नसते. जर तो भिक्षू पिंडपाताने मिळालेले अन्न जेवतो, तर आपत्ती होते. न जेवता बसलेल्या भिक्षूला 'भंते, आपण का जेवत नाही?' असे विचारल्यावर, 'तू निमंत्रित केले असल्यामुळे (मी जेवत नाही)' असे म्हटल्यावर, 'भंते, जे काही मिळाले आहे ते ग्रहण करा,' असे म्हटल्यावर जेवल्यास योग्य आहे. สกเลน คาเมนาติ สกเลน คาเมน เอกโต หุตฺวา นิมนฺติตสฺเสว ยตฺถ กตฺถจิ ภุญฺชโต อนาปตฺติ. ปูเคปิ เอเสว นโย. นิมนฺติยมาโน ภิกฺขํ คเหสฺสามีติ ภณตีติ ‘‘ภตฺตํ คณฺหา’’ติ นิมนฺติยมาโน ‘‘น มยฺหํ ตว ภตฺเตนตฺโถ, ภิกฺขํ คณฺหิสฺสามี’’ติ วทติ. เอตฺถ ปน มหาปทุมตฺเถโร อาห – ‘‘เอวํ วทนฺโต อิมสฺมึ สิกฺขาปเท อนิมนฺตนํ กาตุํ สกฺโกติ, ภุญฺชนตฺถาย ปน โอกาโส กโต โหตีติ เนว คณโภชนโต น จาริตฺตโต มุจฺจตี’’ติ. มหาสุมตฺเถโร อาห – ‘‘ยทคฺเคน อนิมนฺตนํ กาตุํ สกฺโกติ, ตทคฺเคน เนว คณโภชนํ น จาริตฺตํ โหตี’’ติ. เสสํ อุตฺตานเมว. 'संपूर्ण गावाने' म्हणजे संपूर्ण गावाने एकत्र येऊन निमंत्रित केले असता, कोणत्याही घरात जेवल्यास अनापत्ती आहे. पूग (संघटना/समूह) च्या बाबतीतही हाच नियम आहे. 'निमंत्रित केले जात असताना मी भिक्षा घेईन असे म्हणतो' म्हणजे 'भोजन स्वीकारा' असे निमंत्रित केले जात असताना 'मला तुझ्या भोजनाची गरज नाही, मी भिक्षा घेईन' असे म्हणतो. यावर महापदुम थेर म्हणतात - 'असे म्हणणारा भिक्षू या शिक्षापदामध्ये निमंत्रण नसलेले (अनिमंत्रण) करू शकतो, परंतु जेवणासाठी संधी दिली गेल्यामुळे तो गणभोजनाच्या दोषातून किंवा charitt (चारित्त) दोषातून मुक्त होत नाही.' महासुम थेर म्हणतात - 'ज्या प्रमाणात तो अनिमंत्रण करू शकतो, त्या प्रमाणात गणभोजन किंवा चारित्त दोष होत नाही.' उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. กถินสมุฏฺฐานํ [Pg.86] – กายวาจโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยากิริยํ เอตฺถ หิ โภชนํ กิริยา, อวิกปฺปนํ อกิริยา, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. कठिण-समुत्थान - हे काय-वाचेने आणि काय-वाचा-चित्ताने उत्पन्न होते. हे क्रिया-अक्रियात्मक आहे. कारण येथे भोजन करणे ही 'क्रिया' आहे आणि विकल्पना न करणे ही 'अक्रिया' आहे. हे नोसञ्ञाविमोक्ख (संज्ञा नसली तरी आपत्तीतून सुटका न होणारे), अचित्तक (चित्त नसतानाही दोष लागणारे), पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तीमुळे दोष असणारे), कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त (तीन चित्त असणारे) आणि त्रिवेदना (तीन वेदना असणारे) आहे. ปรมฺปรโภชนสิกฺขาปทํ ตติยํ. परंपराभोजन शिक्षापद तिसरे (समाप्त). ๔. กาณมาตาสิกฺขาปทวณฺณนา ४. काणमाता शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๒๓๐. จตุตฺถสิกฺขาปเท – กาณมาตาติ กาณาย มาตา. สา กิรสฺสา ธีตา อภิรูปา อโหสิ, เย เย ตํ ปสฺสนฺติ, เต เต ราเคน กาณา โหนฺติ, ราคนฺธา โหนฺตีติ อตฺโถ. ตสฺมา ปเรสํ กาณภาวกรณโต ‘‘กาณา’’ติ วิสฺสุตา อโหสิ. ตสฺสา วเสน มาตาปิสฺสา ‘‘กาณมาตา’’ติ ปากฏา ชาตา. อาคตนฺติ อาคมนํ. กิสฺมึ วิยาติ กีทิสํ วิย; ลชฺชนกํ วิย โหตีติ อธิปฺปาโย. ริตฺตหตฺถํ คนฺตุนฺติ ริตฺตา หตฺถา อสฺมึ คมเน ตทิทํ ริตฺตหตฺถํ, ตํ ริตฺตหตฺถํ คมนํ คนฺตุํ ลชฺชนกํ วิย โหตีติ วุตฺตํ โหติ. ปริกฺขยํ อคมาสีติ อุปาสิกา อริยสาวิกา ภิกฺขู ทิสฺวา สนฺตํ อทาตุํ น สกฺโกติ, ตสฺมา ตาว ทาเปสิ, ยาว สพฺพํ ปริกฺขยํ อคมาสิ. ธมฺมิยา กถายาติ เอตฺถ กาณาปิ มาตุ อตฺถาย เทสิยมานํ ธมฺมํ สุณนฺตี เทสนาปริโยสาเน โสตาปนฺนา อโหสิ. อุฏฺฐายาสนา ปกฺกามีติ อาสนโต อุฏฺฐหิตฺวา คโต. โสปิ ปุริโส ‘‘สตฺถา กิร กาณมาตาย นิเวสนํ อคมาสี’’ติ สุตฺวา กาณํ อาเนตฺวา ปกติฏฺฐาเนเยว ฐเปสิ. २३०. चौथ्या शिक्यापदात (नियमात) – 'काणमाता' म्हणजे काणाची आई. असे म्हटले जाते की तिची ती मुलगी अत्यंत रूपवान होती. जे जे पुरुष तिला पाहत असत, ते ते रागाने (वासनेने) आंधळे होत असत, म्हणजेच रागांध होत असत, असा अर्थ आहे. म्हणून, इतरांना आंधळे बनवण्याच्या कारणाने ती 'काणा' या नावाने प्रसिद्ध झाली. तिच्या संबंधामुळे तिची आई देखील 'काणमाता' म्हणून प्रसिद्ध झाली. 'आगतं' म्हणजे येणे. 'कस्मिं विय' म्हणजे कशासारखे? लज्जास्पद असल्यासारखे वाटते, असा अभिप्राय आहे. 'रित्तहत्थं गन्तुं' म्हणजे या जाण्यात हात रिकामे असणे याला 'रित्तहत्थ' (रिकाम्या हाताने) म्हणतात. अशा रिकाम्या हाताने जाणे लज्जास्पद असल्यासारखे वाटते, असे म्हटले आहे. 'परिक्खयं अगमासि' म्हणजे ती उपासिका, जी आर्यश्राविका होती, भिक्खूंना पाहून आपल्याकडे असलेली वस्तू न देता राहू शकत नव्हती. म्हणून जोपर्यंत सर्व काही संपले नाही, तोपर्यंत तिने दान दिले. 'धम्मिया कथाय' यामध्ये काणा देखील तिच्या आईसाठी उपदेशिला जाणारा धम्म ऐकत असताना, धम्मोपदेशाच्या शेवटी सोतापन्न (स्रोतापन्न) झाली. 'उठ्ठाय आसना पक्कामि' म्हणजे आसनावरून उठून निघून गेले. त्या पुरुषाने देखील "शास्ता (बुद्ध) काणमातेच्या घरी गेले आहेत" असे ऐकून, काणाला परत आणले आणि तिला तिच्या मूळ पत्नीच्या स्थानी प्रस्थापित केले. ๒๓๑. อิมสฺมึ ปน วตฺถุสฺมึ อุปฺปนฺนมตฺเต อปฺปญฺญตฺเตเยว สิกฺขาปเท ปาเถยฺยวตฺถุ อุทปาทิ, ตสฺมา อนนฺตรเมว เจตํ ทสฺเสตุํ ‘‘เตน โข ปน สมเยนา’’ติอาทิ วุตฺตํ. โสปิ จ อุปาสโก อริยสาวกตฺตา สพฺพเมว ทาเปสิ. เตน วุตฺตํ – ‘‘ปริกฺขยํ อคมาสี’’ติ. २३१. परंतु, ही घटना घडली मात्र असताना आणि शिक्यापद (नियम) अद्याप प्रज्ञापित झाले नसतानाच, पाथेय्य (प्रवासाच्या शिदोरीची) घटना उद्भवली. म्हणून, लगेचच हे दर्शवण्यासाठी "तेन खो पन समयेन" (त्या वेळी) इत्यादी म्हटले गेले आहे. तो उपासक देखील आर्यश्रावक असल्यामुळे त्याने सर्व काही दान दिले. म्हणूनच म्हटले आहे - "परिक्खयं अगमासि" (सर्व संपून गेले). ๒๓๓. ยํกิญฺจิ ปเหณกตฺถายาติ ปณฺณาการตฺถาย ปฏิยตฺตํ ยํกิญฺจิ อติรสกโมทกสกฺขลิกาทิ สพฺพํ อิธ ปูโวตฺเวว สงฺขฺยํ คจฺฉติ. ยํกิญฺจิ [Pg.87] ปาเถยฺยตฺถายาติ มคฺคํ คจฺฉนฺตานํ อนฺตรามคฺคตฺถาย ปฏิยตฺตํ ยํกิญฺจิ พทฺธสตฺตุอพทฺธสตฺตุติลตณฺฑุลาทิ สพฺพํ อิธ มนฺโถตฺเวว สงฺขฺยํ คจฺฉติ. ตโต เจ อุตฺตรินฺติ สเจปิ ตติยํ ปตฺตํ ถูปีกตํ คณฺหาติ, ปูวคณนาย ปาจิตฺติยํ. २३३. 'यंकिंचि पहेणकत्थाय' म्हणजे भेटीसाठी (भेटवस्तू म्हणून) तयार केलेले कोणतेही अतिरसत, मोदक, लाडू इत्यादी सर्व पदार्थ येथे 'पूव' (पिष्टान्न/खाद्यपदार्थ) या संज्ञेत समाविष्ट होतात. 'यंकिंचि पाथेय्यत्थाय' म्हणजे प्रवासाला जाणाऱ्यांच्या प्रवासातील खाण्यासाठी तयार केलेले कोणतेही सत्तू, तीळ, तांदूळ इत्यादी सर्व पदार्थ येथे 'मन्थ' (सत्तूचे पीठ) या संज्ञेत समाविष्ट होतात. 'ततो चे उत्तरिं' म्हणजे जर तिसरे पात्र देखील काठोकाठ भरून (स्तूप किंवा ढिगासारखे) घेतले, तर त्या पिष्टान्नाच्या मोजणीनुसार पाचित्तिय (प्रायश्चित्त) होते. ทฺวตฺติปตฺตปูเร ปฏิคฺคเหตฺวาติ มุขวฏฺฏิยา เหฏฺฐิมเลขาย สมปูเร ปตฺเต คเหตฺวา. อมุตฺร มยา ทฺวตฺติปตฺตปูราติ เอตฺถ สเจ ทฺเว คหิตา, ‘‘อตฺร มยา ทฺเว ปตฺตปูรา ปฏิคฺคหิตา, ตฺวํ เอกํ คณฺเหยฺยาสี’’ติ วตฺตพฺพํ. เตนาปิ อญฺญํ ปสฺสิตฺวา ‘‘ปฐมํ อาคเตน ทฺเว ปตฺตปูรา คหิตา, มยา เอโก, มา ตฺวํ คณฺหี’’ติ วตฺตพฺพํ. เยน ปฐมํ เอโก คหิโต, ตสฺสาปิ ปรมฺปราโรจเน เอเสว นโย. เยน ปน สยเมว ตโย คหิตา, เตน อญฺญํ ทิสฺวา ‘‘มา โข เอตฺถ ปฏิคฺคณฺหิ’’ จฺเจว วตฺตพฺพํ. ปฏิกฺกมนํ นีหริตฺวาติ อาสนสาลํ หริตฺวา, อาสนสาลํ คจฺฉนฺเตน จ ฉฑฺฑิตสาลา น คนฺตพฺพา. ยตฺถ มหา ภิกฺขุสงฺโฆ นิสีทติ, ตตฺถ คนฺตพฺพํ. มหาปจฺจริยํ ปน วุตฺตํ ‘‘ยา ลทฺธฏฺฐานโต อาสนฺนา อาสนสาลา, ตตฺถ คนฺตพฺพํ. อตฺตโน ‘สนฺทิฏฺฐานํ วา สมฺภตฺตานํ วา เอกนิกายิกานํ วา ทสฺสามี’ติ อญฺญตฺถ คนฺตุํ น ลพฺภติ. สเจ ปนสฺส นิพทฺธนิสีทนฏฺฐานํ โหติ, ทูรมฺปิ คนฺตุํ วฏฺฏตี’’ติ. 'द्वत्तिपत्तपूरे पटिग्गहेत्वा' म्हणजे पात्राच्या काठाच्या खालच्या रेषेपर्यंत समप्रमाणात भरलेली पात्रे स्वीकारून. 'अमुत्र मया द्वत्तिपत्तपूरा' यामध्ये जर दोन पात्रे भरून स्वीकारली असतील, तर "येथे मी दोन पात्रे भरून स्वीकारली आहेत, आपण एक पात्र भरून स्वीकारावे," असे म्हणावे. त्याने देखील दुसऱ्या भिक्खूला पाहून म्हणावे, "प्रथम आलेल्या भिक्खूने दोन पात्रे भरून स्वीकारली आहेत, मी एक स्वीकारले आहे, आपण स्वीकारू नये." ज्याने प्रथम एक पात्र स्वीकारले आहे, त्याच्यासाठी देखील परंपरेने (एकामागून एक) सांगण्याचा हाच नियम आहे. परंतु ज्याने स्वतःच तीन पात्रे भरून स्वीकारली आहेत, त्याने दुसऱ्या भिक्खूला पाहून "येथे स्वीकारू नका" असेच म्हणावे. 'पटिक्कमनं नीहरित्वा' म्हणजे आसनशाळेत घेऊन जाऊन. आसनशाळेत जाणाऱ्या भिक्खूने भिक्खूंनी सोडून दिलेल्या रिकाम्या शाळेत (झोपडीत) जाऊ नये. जेथे मोठा भिक्खूसंघ बसतो, तेथे जावे. परंतु महाप्रत्यरीमध्ये म्हटले आहे - "ज्या ठिकाणाहून अन्न मिळाले आहे, तिथून जी सर्वात जवळची आसनशाळा असेल, तेथे जावे. 'मी माझ्या परिचितांना किंवा मित्रांना किंवा एकाच निकायातील भिक्खूंना देईन' असा विचार करून इतर ठिकाणी जाण्याची परवानगी नाही. परंतु जर त्याचे नियमित बसण्याचे ठिकाण असेल, तर दूर जाणे देखील योग्य आहे." สํวิภชิตพฺพนฺติ สเจ ตโย ปตฺตปูรา คหิตา, เอกํ อตฺตโน ฐเปตฺวา ทฺเว ภิกฺขุสงฺฆสฺส ทาตพฺพา. สจฺเจ ทฺเว คหิตา, เอกํ อตฺตโน ฐเปตฺวา เอโก สงฺฆสฺส ทาตพฺโพ, ยถามิตฺตํ ปน ทาตุํ น ลพฺภติ. เยน เอโก คหิโต, น เตน กิญฺจิ อกามา ทาตพฺพํ, ยถารุจิ กาตพฺพํ. 'संविभजितब्बं' म्हणजे जर तीन पात्रे भरून स्वीकारली असतील, तर एक स्वतःसाठी ठेवून दोन पात्रे भिक्खूसंघाला द्यावीत. जर दोन पात्रे स्वीकारली असतील, तर एक स्वतःसाठी ठेवून एक संघाला द्यावे. परंतु आपल्या आवडीच्या मित्राला देण्याची परवानगी नाही. ज्याने एकच पात्र स्वीकारले आहे, त्याने इच्छेविरुद्ध काहीही देण्याची गरज नाही, तो आपल्या आवडीनुसार करू शकतो. ๒๓๕. คมเน ปฏิปฺปสฺสทฺเธติ อนฺตรามคฺเค อุปทฺทวํ วา ทิสฺวา อนตฺถิกตาย วา ‘‘มยํ อิทานิ น เปสิสฺสาม, น คมิสฺสามา’’ติ เอวํ คมเน ปฏิปฺปสฺสทฺเธ อุปจฺฉินฺเน. ญาตกานํ ปวาริตานนฺติ เอเตสํ พหุมฺปิ เทนฺตานํ ปฏิคฺคณฺหนฺตสฺส อนาปตฺติ. อฏฺฐกถาสุ ปน ‘‘เตสมฺปิ ปาเถยฺยปเหณกตฺถาย ปฏิยตฺตโต ปมาณเมว วฏฺฏตี’’ติ วุตฺตํ. เสสํ อุตฺตานเมว. २३५. 'गमने पटिप्पस्सद्धे' म्हणजे वाटेत संकट पाहून किंवा जाण्याची इच्छा नसल्यामुळे "आम्ही आता पाठवणार नाही, जाणार नाही" अशा प्रकारे जाण्याचा विचार शांत (रद्द) किंवा खंडित झाला असता. 'ञातकानं पवारितानं' म्हणजे नातेवाईक किंवा निमंत्रित केलेल्यांनी भरपूर दिले तरी ते स्वीकारणाऱ्या भिक्खूला आपत्ती (दोष) लागत नाही. परंतु अट्ठकथांमध्ये म्हटले आहे - "त्यांच्याकडून देखील प्रवासाच्या शिदोरीसाठी किंवा भेटवस्तूसाठी तयार केलेल्या अन्नातून योग्य प्रमाणातच घेणे योग्य आहे." उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ฉสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. हे शिक्यापद सहा समुत्थानांनी युक्त आहे - क्रिया (करण्याने होणारे), नोसञ्ञाविमोक्ख (संज्ञा नसली तरी मुक्ती न मिळणारे), अचित्तक (चित्त नसतानाही घडणारे), पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तीचे उल्लंघन केल्याने दोषयुक्त होणारे), कायकम्म (कायिक कर्म), वचीकम्म (वाचिक कर्म), तिचित्त (तीन चित्त असणारे), तिवेदन (तीन वेदना असणारे) आहे. กาณมาตาสิกฺขาปทํ จตุตฺถํ. चौथे काणमाता शिक्यापद समाप्त. ๕. ปฐมปวารณสิกฺขาปทวณฺณนา ५. पहिल्या पवारणा शिक्यापदाचे स्पष्टीकरण. ๒๓๖. ปญฺจมสิกฺขาปเท [Pg.88] – ภิกฺขู ภุตฺตาวี ปวาริตาติ พฺราหฺมเณน ‘‘คณฺหถ, ภนฺเต, ยาว อิจฺฉถา’’ติ เอวํ ยาวทตฺถปวารณาย, สยญฺจ ‘‘อลํ, อาวุโส, โถกํ โถกํ เทหี’’ติ เอวํ ปฏิกฺเขปปวารณาย ปวาริตา. ปฏิวิสฺสเกติ สามนฺตฆรวาสิเก. २३६. पाचव्या शिक्यापदात - 'भिक्खू भुत्तावी पवारिता' म्हणजे ब्राह्मणाने "भंते, आपल्याला हवे तितके घ्या" अशा प्रकारे 'यावदत्थ-पवारणा' (इच्छेनुसार निमंत्रण) केल्यावर, आणि स्वतः भिक्खूंनी "बस, बंधू, थोडे थोडे द्या" अशा प्रकारे 'पटिक्खेप-पवारणा' (नकार देणारे निमंत्रण) करून नकार दिला असता. 'पटिविस्सके' म्हणजे शेजारी राहणारे (शेजारी). ๒๓๗. กาโกรวสทฺทนฺติ กากานํ โอรวสทฺทํ; สนฺนิปติตฺวา วิรวนฺตานํ สทฺทํ. อลเมตํ สพฺพนฺติ เอตฺถ ติการํ อวตฺวาว ‘‘อลเมตํ สพฺพํ’’ เอตฺตกํ วตฺตุํ วฏฺฏติ. २३७. 'काकोरवसहदं' म्हणजे कावळ्यांचा ओरडण्याचा आवाज; एकत्र येऊन ओरडणाऱ्या कावळ्यांचा आवाज. 'अलमेतं सब्बं' यामध्ये 'ति' हा वर्ण न उच्चारता केवळ "अलमेतं सब्बं" (हे सर्व पुरेसे आहे) एवढेच म्हणणे योग्य आहे. ๒๓๘-๙. ภุตฺตาวีติ ภุตฺตวา. ตตฺถ จ ยสฺมา เยน เอกมฺปิ สิตฺถํ สงฺขาทิตฺวา วา อสงฺขาทิตฺวา วา อชฺโฌหริตํ โหติ, โส ‘‘ภุตฺตาวี’’ติ สงฺขฺยํ คจฺฉติ, เตนสฺส ปทภาชเน ‘‘ภุตฺตาวี นาม ปญฺจนฺนํ โภชนาน’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. ปวาริโตติ กตปวารโณ, กตปฏิกฺเขโป. โสปิ จ ยสฺมา น ปฏิกฺเขปมตฺเตน, อถ โข ปญฺจงฺควเสน, เตนสฺส ปทภาชเน ‘‘ปวาริโต นาม อสนํ ปญฺญายตี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ ยสฺมา ‘‘อสนํ ปญฺญายตี’’ติ อิมินา วิปฺปกตโภชโน, ‘‘ปวาริโต’’ติ วุตฺโต. โย จ วิปฺปกตโภชโน, เตน กิญฺจิ ภุตฺตํ, กิญฺจิ อภุตฺตํ, ยญฺจ ภุตฺตํ; ตํ สนฺธาย ‘‘ภุตฺตาวี’’ติปิ สงฺขฺยํ คจฺฉติ, ตสฺมา ภุตฺตาวีวจเนน วิสุํ กญฺจิ อตฺถสิทฺธึ น ปสฺสาม. ‘‘ทิรตฺตติรตฺตํ, ฉปฺปญฺจวาจาหี’’ติอาทีสุ (ปาจิ. ๖๑-๖๒) ปน ทิรตฺตาทิวจนํ วิย ปวาริตปทสฺส ปริวารกภาเวน พฺยญฺชนสิลิฏฺฐตาย เจตํ วุตฺตนฺติ เวทิตพฺพํ. २३८-९. 'भुत्तावी' म्हणजे जेवण झालेला (भोजन केलेला). आणि त्यामध्ये, ज्या अर्थी ज्याने भाताचा एक कण देखील चावून किंवा न चावता गिळला आहे, तो 'भुत्तावी' (भोजन केलेला) या संज्ञेस पात्र ठरतो, म्हणूनच त्याच्या पदभाजनामध्ये "भुत्तावी नाम पंचन्नं भोजनानं" (पाच प्रकारच्या भोजनांपैकी भोजन केलेला) इत्यादी म्हटले आहे. 'पवारितो' म्हणजे ज्याने पवारणा (नकार) केली आहे. आणि तो देखील केवळ नकाराने होत नाही, तर पाच अंगांच्या आधारे होतो, म्हणूनच त्याच्या पदभाजनामध्ये "पवारितो नाम असनं पञ्ञायति" (पवारित म्हणजे भोजन समोर दिसत असताना नकार देणे) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे "असनं पञ्ञायति" या वाक्याने अपूर्ण भोजन घेतलेल्या (भोजन करत असलेल्या) भिक्खूला 'पवारित' म्हटले आहे. आणि जो अपूर्ण भोजन घेतलेला आहे, त्याने काही भोजन केले आहे आणि काही केलेले नाही. जे भोजन केले आहे, त्याला उद्देशून 'भुत्तावी' ही संज्ञा देखील लागू होते. म्हणून 'भुत्तावी' या शब्दाने वेगळा कोणताही अर्थ सिद्ध होत असल्याचे आपल्याला दिसत नाही. परंतु "दिरत्ततिरत्तं, छप्पञ्चवाचाहि" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'दिरत्त' (दोन रात्री) इत्यादी शब्दांप्रमाणे, 'पवारित' या पदाचा पूरक भाग म्हणून आणि शब्दांच्या सुसंवादासाठी (व्यंजनश्लिष्टतेसाठी) हे म्हटले गेले आहे, असे समजावे. อสนํ ปญฺญายตีติอาทีสุ วิปฺปกตโภชนํ ทิสฺสติ, ภุญฺชมาโน เจโส ปุคฺคโล โหตีติ อตฺโถ. โภชนํ ปญฺญายตีติ ปวารณปฺปโหนกโภชนํ ทิสฺสติ. โอทนาทีนํ เจ อญฺญตรํ ปฏิกฺขิปิตพฺพํ โภชนํ โหตีติ อตฺโถ. หตฺถปาเส ฐิโตติ ปวารณปฺปโหนกํ โภชนํ คณฺหิตฺวา ทายโก อฑฺฒเตยฺยหตฺถปฺปมาเณ โอกาเส โหตีติ อตฺโถ. อภิหรตีติ โส เจ ทายโก ตสฺส ตํ ภตฺตํ กาเยน อภิหรตีติ อตฺโถ. ปฏิกฺเขโป ปญฺญายตีติ ปฏิกฺเขโป ทิสฺสติ; ตญฺเจ อภิหฏํ โส ภิกฺขุ กาเยน วา วาจาย วา ปฏิกฺขิปตีติ อตฺโถ. เอวํ ปญฺจนฺนํ องฺคานํ วเสน ปวาริโต นาม โหตีติ. วุตฺตมฺปิ เจตํ – "असनं पञ्ञायति" (भोजन करणे स्पष्ट होते) इत्यादी वाक्यांमध्ये, अपूर्ण राहिलेले भोजन दिसते आणि तो व्यक्ती भोजन करत असतो, असा अर्थ आहे. "भोजनं पञ्ञायति" (भोजन स्पष्ट होते) म्हणजे पवाराणासाठी पुरेसे असलेले भोजन दिसते. भात इत्यादी पाच प्रकारच्या भोजनांपैकी कोणतेही एक नाकारण्याजोगे भोजन असावे, असा अर्थ आहे. "हत्थपासे ठितो" (हातभर अंतरावर उभा असलेला) म्हणजे पवाराणासाठी पुरेसे भोजन घेऊन दाता अडीच हात अंतराच्या मर्यादेत उभा असतो, असा अर्थ आहे. "अभिहरति" (सादर करतो) म्हणजे जर तो दाता त्या भिक्खूसाठी ते अन्न शरीराने (कायेने) सादर करतो, असा अर्थ आहे. "पटिक्खेपो पञ्ञायति" (नकार देणे स्पष्ट होते) म्हणजे नकार देणे दिसते; आणि सादर केलेल्या त्या अन्नाला तो भिक्खू कायेने (शरीराने) किंवा वाचेने (शब्दाने) नाकारतो, असा अर्थ आहे. अशा प्रकारे पाच अंगांच्या आधारे 'पवारित' (भोजन नाकारलेला) होतो. हे देखील म्हटले आहे – ‘‘ปญฺจหิ [Pg.89] อุปาลิ อากาเรหิ ปวารณา ปญฺญายติ – อสนํ ปญฺญายติ, โภชนํ ปญฺญายติ, หตฺถปาเส ฐิโต, อภิหรติ, ปฏิกฺเขโป ปญฺญายตี’’ติ (ปริ. ๔๒๘). "हे उपाली! पाच कारणांनी पवाराणा (भोजन नाकारणे) स्पष्ट होते – भोजन करणे स्पष्ट होते, भोजन स्पष्ट होते, (दाता) हातभर अंतरावर उभा असतो, (तो अन्न) सादर करतो, आणि नकार देणे स्पष्ट होते." हे सूत्र देखील भगवंतांनी सांगितले आहे. ตตฺรายํ วินิจฺฉโย – ‘‘อสน’’นฺติอาทีสุ ตาว ยญฺจ อสฺนาติ ยญฺจ โภชนํ หตฺถปาเส ฐิเตน อภิหฏํ ปฏิกฺขิปติ, ตํ ‘‘โอทโน, กุมฺมาโส, สตฺตุ, มจฺโฉ, มํส’’นฺติ อิเมสํ อญฺญตรเมว เวทิตพฺพํ. ตตฺถ โอทโน นาม – สาลิ, วีหิ, ยโว, โคธุโม, กงฺคุ, วรโก, กุทฺรูสโกติ สตฺตนฺนํ ธญฺญานํ ตณฺฑุเลหิ นิพฺพตฺโต. ตตฺถ ‘‘สาลี’’ติ อนฺตมโส นีวารํ อุปาทาย สพฺพาปิ สาลิชาติ. ‘‘วีหี’’ติ สพฺพาปิ วีหิชาติ. ‘‘ยวโคธุเมสุ’’ เภโท นตฺถิ. ‘‘กงฺคู’’ติ เสตรตฺตกาฬเภทา สพฺพาปิ กงฺคุชาติ. ‘‘วรโก’’ติ อนฺตมโส วรกโจรกํ อุปาทาย สพฺพา เสตวณฺณา วรกชาติ. ‘‘กุทฺรูสโก’’ติ กาฬโก ทฺรโว เจว สามากาทิเภทา จ สพฺพาปิ ติณธญฺญชาติ. त्यामध्ये हा निर्णय आहे – "असन" इत्यादी शब्दांमध्ये सर्वप्रथम, जो भोजन करतो आणि ज्या भोजनाला हातभर अंतरावर उभे राहिलेल्या दात्याने सादर केले असता तो नाकारतो, ते "ओदन (भात), कुम्मास (यवाचे अन्न), सत्तु (पीठ/सत्तू), मच्छ (मासे), मांस" या पाच प्रकारच्या भोजनांपैकी एकच समजावे. त्यामध्ये 'ओदन' म्हणजे – शाळी, वीही, यव (जव), गोधूम (गहू), कंगू (राळा), वरक (वरई), कुद्रूसक (कोद्रू) या सात प्रकारच्या धान्यांच्या तांदळापासून बनवलेले अन्न होय. त्यामध्ये 'शाळी' म्हणजे अगदी नीवार (रानटी भात) पासून सुरू करून सर्व प्रकारच्या शाळी जाती होत. 'वीही' म्हणजे सर्व प्रकारच्या वीही जाती होत. 'यव' आणि 'गोधूम' (जव आणि गहू) यामध्ये कोणताही भेद नाही. 'कंगू' म्हणजे पांढरा, तांबडा आणि काळा अशा भेदांसह सर्व प्रकारच्या कंगू (राळा) जाती होत. 'वरक' म्हणजे अगदी वरकचोरक पासून सुरू करून सर्व पांढऱ्या रंगाच्या वरक जाती होत. 'कुद्रूसक' म्हणजे काळा कोद्रू आणि सामाक इत्यादी भेदांसह सर्व प्रकारची तृणधान्ये होत. นีวารวรกโจรกา เจตฺถ ‘‘ธญฺญานุโลมา’’ติ วทนฺติ. ธญฺญานิ วา โหนฺตุ ธญฺญานุโลมานิ วา, เอเตสํ วุตฺตปฺปเภทานํ สตฺตนฺนํ ธญฺญานํ ตณฺฑุเล คเหตฺวา ‘‘ภตฺตํ ปจิสฺสามา’’ติ วา ‘‘ยาคุํ ปจิสฺสามา’’ติ วา ‘‘อมฺพิลปายาสาทีสุ อญฺญตรํ ปจิสฺสามา’’ติ วา ยํกิญฺจิ สนฺธาย ปจนฺตุ, สเจ อุณฺหํ สีตลํ วา ภุญฺชนฺตานํ โภชนกาเล คหิตคหิตฏฺฐาเน โอธิ ปญฺญายติ, โอทนสงฺคหเมว คจฺฉติ, ปวารณํ ชเนติ. สเจ โอธิ น ปญฺญายติ, ยาคุสงฺคหํ คจฺฉติ, ปวารณํ น ชเนติ. आणि येथे नीवार आणि वरकचोरक यांना "धान्य-अनुलोम" (धान्यसदृश) म्हणतात. ती धान्ये असोत किंवा धान्यसदृश असोत, वर सांगितलेल्या सात प्रकारच्या धान्यांचे तांदूळ घेऊन "आम्ही भात शिजवू" किंवा "आम्ही कांजी (यागु) शिजवू" किंवा "आम्ही आंबट खीर (पायस) इत्यादींपैकी काहीतरी शिजवू" असा कोणताही हेतू ठेवून ते शिजवू देत; जर ते गरम किंवा थंड खात असताना, भोजनाच्या वेळी ज्या ज्या ठिकाणाहून अन्न घेतले जाते तिथे जर सीमा (भाग/आकार) स्पष्ट दिसत असेल, तर ते 'ओदन' (भात) च्या वर्गातच जाते आणि पवाराणा उत्पन्न करते. जर सीमा स्पष्ट दिसत नसेल, तर ते 'यागु' (कांजी) च्या वर्गात जाते आणि पवाराणा उत्पन्न करत नाही. โยปิ ปายาโส วา ปณฺณผลกฬีรมิสฺสกา อมฺพิลยาคุ วา อุทฺธนโต โอตาริตมตฺตา อพฺภุณฺหา โหติ, อาวชฺชิตฺวา ปิวิตุํ สกฺกา, หตฺเถน คหิโตกาเสปิ โอธึ น ทสฺเสติ, ปวารณํ น ชเนติ. สเจ ปน อุสุมาย วิคตาย สีตลีภูตา ฆนภาวํ คจฺฉติ, โอธึ ทสฺเสติ, ปุน ปวารณํ ชเนติ. ปุพฺเพ ตนุภาโว น รกฺขติ. สเจปิ ทธิตกฺกาทีนิ อาโรเปตฺวา พหุปณฺณผลกฬีเร ปกฺขิปิตฺวา มุฏฺฐิมตฺตาปิ ตณฺฑุลา ปกฺขิตฺตา โหนฺติ, โภชนกาเล เจ โอธิ ปญฺญายติ, ปวารณํ ชเนติ. อยาคุเก นิมนฺตเน ‘‘ยาคุํ ทสฺสามา’’ติ ภตฺเต อุทกกญฺชิกขีราทีนิ อากิริตฺวา ‘‘ยาคุํ คณฺหถา’’ติ เทนฺติ. กิญฺจาปิ ตนุกา โหนฺติ, ปวารณํ ชเนติเยว[Pg.90]. สเจ ปน ปกฺกุถิเตสุ อุทกาทีสุ ปกฺขิปิตฺวา ปจิตฺวา เทนฺติ, ยาคุสงฺคหเมว คจฺฉติ. ยาคุสงฺคหํ คเตปิ ตสฺมึ วา อญฺญสฺมึ วา ยตฺถ มจฺฉมํสํ ปกฺขิปนฺติ, สเจ สาสปมตฺตมฺปิ มจฺฉมํสขณฺฑํ วา นฺหารุ วา ปญฺญายติ, ปวารณํ ชเนติ. जी खीर (पायस) किंवा पाने, फळे आणि कोंब मिश्रित आंबट कांजी (यागु) नुकतीच चुलीवरून उतरवलेली आणि अत्यंत गरम असते, जी भांडे कलते करून पिता येणे शक्य असते, आणि हाताने घेतलेल्या जागी देखील जी सीमा (आकार) दाखवत नाही, ती पवाराणा उत्पन्न करत नाही. पण जर वाफ निघून गेल्यावर ती थंड होऊन घट्ट झाली आणि सीमा दाखवू लागली, तर ती पुन्हा पवाराणा उत्पन्न करते. पूर्वीचा पातळपणा (पवाराणा होण्यापासून) वाचवू शकत नाही. जरी दही, ताक इत्यादी चुलीवर ठेवून, त्यात भरपूर पाने, फळे आणि कोंब टाकून, अगदी मूठभर तांदूळ टाकलेले असले, तरी भोजनाच्या वेळी जर सीमा स्पष्ट दिसत असेल, तर ती पवाराणा उत्पन्न करते. कांजी नसलेल्या आमंत्रणात "आम्ही कांजी देऊ" असे म्हणून भातामध्ये पाणी, आंबिल, दूध इत्यादी ओतून "कांजी घ्या" असे म्हणून देतात; ती जरी पातळ असली, तरी ती पवाराणा उत्पन्न करतेच. पण जर उकळत्या पाण्यात इत्यादींमध्ये (तांदूळ) टाकून, शिजवून देतात, तर ते 'यागु' (कांजी) च्या वर्गातच जाते. ते 'यागु' च्या वर्गात गेले असले तरी, त्यामध्ये किंवा इतर कशामध्ये जिथे मासे किंवा मांस टाकतात, जर मोहरीच्या दाण्याएवढा देखील माशाचा किंवा मांसाचा तुकडा किंवा शिरा स्पष्ट दिसत असेल, तर ती पवाराणा उत्पन्न करते. สุทฺธรสโก ปน รสกยาคุ วา น ชเนติ. ฐเปตฺวา วุตฺตธญฺญานํ ตณฺฑุเล อญฺเญหิ เวณุตณฺฑุลาทีหิ วา กนฺทมูลผเลหิ วา เยหิ เกหิจิ กตํ ภตฺตมฺปิ ปวารณํ น ชเนติ, ปเคว ฆนยาคุ. สเจ ปเนตฺถ มจฺฉมํสํ ปกฺขิปนฺติ, ชเนติ. มหาปจฺจริยํ ‘‘ปุปฺผอตฺถาย ภตฺตมฺปิ ปวารณํ ชเนตี’’ติ วุตฺตํ. ปุปฺผิอตฺถาย ภตฺตํ นาม ปุปฺผิขชฺชกตฺถาย กุถิตตูทเก ปกฺขิปิตฺวา เสทิตตณฺฑุลา วุจฺจนฺติ. สเจ ปน เต ตณฺฑุเล สุกฺขาเปตฺวา ขาทนฺติ, วฏฺฏติ; เนว สตฺตุสงฺขฺยํ น ภตฺตสงฺขฺยํ คจฺฉนฺติ. ปุน เตหิ กตภตฺตํ ปวาเรติเยว. เต ตณฺฑุเล สปฺปิเตลาทีสุ วา ปจนฺติ, ปูวํ วา กโรนฺติ, น ปวาเรนฺติ. ปุถุกา วา ตาหิ กตสตฺตุภตฺตาทีนิ วา น ปวาเรนฺติ. पण केवळ रस्सा किंवा रस्सा असलेली कांजी पवाराणा उत्पन्न करत नाही. वर सांगितलेल्या धान्यांचे तांदूळ वगळून, इतर बांबूचे तांदूळ इत्यादींनी किंवा कंदमुळे व फळांनी किंवा इतर कोणत्याही वस्तूंनी बनवलेला भात देखील पवाराणा उत्पन्न करत नाही, मग घट्ट कांजीबद्दल काय सांगावे! पण जर त्यात मासे किंवा मांस टाकले, तर ती पवाराणा उत्पन्न करते. महाप्रत्यरीमध्ये म्हटले आहे की, "पुप्फि (लाह्या) बनवण्यासाठी बनवलेला भात देखील पवाराणा उत्पन्न करतो." पुप्फिसाठी बनवलेला भात म्हणजे पुप्फि नावाचे खाद्य बनवण्यासाठी उकळत्या पाण्यात टाकून शिजवलेले तांदूळ होय. पण जर ते तांदूळ वाळवून खाल्ले, तर ते योग्य आहे; ते ना सत्तूच्या संज्ञेला प्राप्त होतात, ना भाताच्या संज्ञेला. पुन्हा त्यांच्यापासून बनवलेला भात पवाराणा उत्पन्न करतोच. जर ते तांदूळ तूप, तेल इत्यादींमध्ये शिजवले किंवा त्यांचे पूप (गोड पदार्थ/केक) बनवले, तर ते पवाराणा उत्पन्न करत नाहीत. पोहे किंवा त्यांच्यापासून बनवलेले सत्तू, भात इत्यादी पवाराणा उत्पन्न करत नाहीत। กุมฺมาโส นาม ยเวหิ กตกุมฺมาโส. อญฺเญหิ ปน มุคฺคาทีหิ กตกุมฺมาโส ปวารณํ น ชเนติ. สตฺตุ นาม สาลิวีหิยเวหิ กตสตฺตุ. กงฺคุวรกกุทฺรูสกสีสานิปิ ภชฺชิตฺวา อีสกํ โกฏฺเฏตฺวา ถุเส ปลาเปตฺวา ปุน ทฬฺหํ โกฏฺเฏตฺวา จุณฺณํ กโรนฺติ. สเจปิ ตํ อลฺลตฺตา เอกาพทฺธํ โหติ, สตฺตุสงฺคหเมว คจฺฉติ. ขรปากภชฺชิตานํ วีหีนํ ตณฺฑุเล โกฏฺเฏตฺวา เทนฺติ, ตมฺปิ จุณฺณํ สตฺตุสงฺคหเมว คจฺฉติ. สมปากภชฺชิตานํ ปน วีหีนํ วา วีหิปลาปานํ วา ตณฺฑุลา ภชฺชิตตณฺฑุลา เอว วา น ปวาเรนฺติ. เตสํ ปน ตณฺฑุลาทีนํ จุณฺณํ ปวาเรติ. ขรปากภชฺชิตานํ วีหีนํ กุณฺฑกมฺปิ ปวาเรติ. สมปากภชฺชิตานํ ปน อาตปสุกฺขานํ วา กุณฺฑกํ น ปวาเรติ. ลาชา วา เตหิ กตภตฺตสตฺตุอาทีนิ วา น ปวาเรนฺติ. ภชฺชิตปิฏฺฐํ วา ยํกิญฺจิ สุทฺธขชฺชกํ วา น ปวาเรติ. มจฺฉมํสปูริตขชฺชกํ ปน สตฺตุโมทโก วา ปวาเรติ. มจฺโฉ มํสญฺจ ปากฏเมว. อยํ ปน วิเสโส – สเจปิ ยาคุํ ปิวนฺตสฺส ยาคุสิตฺถมตฺตาเนว ทฺเว มจฺฉขณฺฑานิ วา มํสขณฺฑานิ วา เอกภาชเน วา นานาภาชเน วา เทนฺติ, ตานิ เจ อขาทนฺโต อญฺญํ ยํกิญฺจิ ปวารณปฺปโหนกํ ปฏิกฺขิปติ[Pg.91], น ปวาเรติ. ตโต เอกํ ขาทิตํ, เอกํ หตฺเถ วา ปตฺเต วา โหติ, โส เจ อญฺญํ ปฏิกฺขิปติ, ปวาเรติ. ทฺเวปิ ขาทิตานิ โหนฺติ, มุเข สาสปมตฺตมฺปิ อวสิฏฺฐํ นตฺถิ, สเจปิ อญฺญํ ปฏิกฺขิปติ, น ปวาเรติ. कुम्मास म्हणजे यवांपासून (किंवा गव्हापासून) बनवलेले अर्धवट शिजवलेले अन्न होय. परंतु, मूग इत्यादी इतर धान्यांपासून बनवलेले कुम्मास पवारणा घडवून आणत नाही. सत्तू म्हणजे शाली तांदूळ, साळीचे तांदूळ किंवा यव यांपासून बनवलेले पीठ होय. राळा, वराक आणि कोद्रू यांच्या लोंब्या देखील भाजून, थोड्या कुटून, फोलपटे उडवून देऊन, पुन्हा चांगल्या कुटून त्याचे पीठ करतात. जरी ते पीठ ओलेपणामुळे एकत्र चिकटून गोळा झाले, तरीही ते सत्तूच्याच वर्गात समाविष्ट होते. कडक भाजलेल्या साळीच्या तांदळांना कुटून जर दिले, तर ते पीठ देखील सत्तूच्याच वर्गात समाविष्ट होते. परंतु, मध्यम भाजलेल्या साळीचे किंवा साळीच्या फोलपटांचे तांदूळ, अथवा भाजलेले तांदूळ पवारणा घडवून आणत नाहीत. परंतु, त्या तांदूळ इत्यादींचे पीठ पवारणा घडवून आणते. कडक भाजलेल्या साळीचा कोंडा देखील पवारणा घडवून आणतो. परंतु, मध्यम भाजलेल्या किंवा उन्हात सुकवलेल्या साळीचा कोंडा पवारणा घडवून आणत नाही. लाह्या किंवा त्यांपासून बनवलेला भात, सत्तू इत्यादी पवारणा घडवून आणत नाहीत. भाजलेले पीठ किंवा कोणतेही शुद्ध खाज्जक (कोरडे खाद्य) पवारणा घडवून आणत नाही. परंतु, मासे किंवा मांसाने भरलेले खाज्जक अथवा सत्तूचे मोदक (लाडू) पवारणा घडवून आणतात. मासे आणि मांस (पवारणा घडवून आणतात हे) उघडच आहे. परंतु यात हा विशेष फरक आहे – जर यागू (पेज) पिणाऱ्या भिक्खूला यागूच्या शिताच्या आकाराचे माशाचे किंवा मांसाचे दोन तुकडे एकाच पात्रात किंवा वेगवेगळ्या पात्रांत दिले, आणि त्याने ते न खाता, पवारणा घडवण्यास समर्थ असलेले इतर कोणतेही अन्न नाकारले, तर पवारणा होत नाही. त्यांपैकी एक तुकडा खाल्ला आणि दुसरा हातात किंवा पात्रात असेल, आणि जर तो इतर अन्न नाकारतो, तर पवारणा होते. जर दोन्ही तुकडे खाल्ले गेले असतील आणि तोंडात मोहरीच्या दाण्याएवढाही भाग शिल्लक नसेल, तर त्याने इतर अन्न नाकारले तरी पवारणा होत नाही. กปฺปิยมํสํ ขาทนฺโต กปฺปิยมํสํ ปฏิกฺขิปติ, ปวาเรติ. กปฺปิยมํสํ ขาทนฺโต อกปฺปิยมํสํ ปฏิกฺขิปติ, น ปวาเรติ. กสฺมา? อวตฺถุตาย. ยญฺหิ ภิกฺขุโน ขาทิตุํ วฏฺฏติ, ตํเยว ปฏิกฺขิปโต ปวารณา โหติ. อิทํ ปน ชานนฺโต อกปฺปิยตฺตา ปฏิกฺขิปติ, อชานนฺโตปิ ปฏิกฺขิปิตพฺพฏฺฐาเน ฐิตเมว ปฏิกฺขิปติ นาม, ตสฺมา น ปวาเรติ. สเจ ปน อกปฺปิยมํสํ ขาทนฺโต กปฺปิยมํสํ ปฏิกฺขิปติ, ปวาเรติ. กสฺมา? วตฺถุตาย. ยญฺหิ เตน ปฏิกฺขิตฺตํ, ตํ ปวารณาย วตฺถุ. ยํ ปน ขาทติ, ตํ กิญฺจาปิ ปฏิกฺขิปิตพฺพฏฺฐาเน ฐิตํ, ขาทิยมานํ ปน มํสภาวํ น ชหติ, ตสฺมา ปวาเรติ. อกปฺปิยมํสํ ขาทนฺโต อกปฺปิยมํสํ ปฏิกฺขิปติ, ปุริมนเยเนว น ปวาเรติ. กปฺปิยมํสํ วา อกปฺปิยมํสํ วา ขาทนฺโต ปญฺจนฺนํ โภชนานํ ยํกิญฺจิ กปฺปิยโภชนํ ปฏิกฺขิปติ, ปวาเรติ. กุลทูสกเวชฺชกมฺมอุตฺตริมนุสฺสธมฺมาโรจนสาทิตรูปิยาทีหิ นิพฺพตฺตํ พุทฺธปฏิกุฏฺฐํ อเนสนาย อุปฺปนฺนํ อกปฺปิยโภชนํ ปฏิกฺขิปติ, น ปวาเรติ. กปฺปิยโภชนํ วา อกปฺปิยโภชนํ วา ภุญฺชนฺโตปิ กปฺปิยโภชนํ ปฏิกฺขิปติ, ปวาเรติ. อกปฺปิยโภชนํ ปฏิกฺขิปติ, น ปวาเรตีติ สพฺพตฺถ วุตฺตนเยเนว การณํ เวทิตพฺพํ. कप्पिय (विहित) मांस खात असताना जर कोणी कप्पिय मांस नाकारतो, तर पवारणा होते. कप्पिय मांस खात असताना जर कोणी अकप्पिय (अविहित) मांस नाकारतो, तर पवारणा होत नाही. का? कारण ते पवारणेचे अधिष्ठान (वस्तू) नाही. कारण जे मांस भिक्खूला खाण्यास योग्य आहे, तेच नाकारल्यास पवारणा होते. परंतु, हे अकप्पिय आहे असे जाणून अकप्पिय असल्यामुळे तो ते नाकारतो; किंवा न जाणताही, नाकारण्याच्या योग्य ठिकाणी असलेल्या अकप्पिय मांसालाच तो नाकारतो, म्हणून पवारणा होत नाही. परंतु, जर अकप्पिय मांस खात असताना तो कप्पिय मांस नाकारतो, तर पवारणा होते. का? कारण ते पवारणेचे अधिष्ठान आहे. कारण त्याने जे नाकारले आहे, ते पवारणेचे अधिष्ठान आहे. आणि तो जे खात आहे, ते जरी नाकारण्याच्या ठिकाणी असले, तरी खाल्ले जात असताना ते मांसाचे स्वरूप सोडत नाही, म्हणून पवारणा होते. अकप्पिय मांस खात असताना अकप्पिय मांस नाकारल्यास, पूर्वोक्त नियमानुसारच पवारणा होत नाही. कप्पिय किंवा अकप्पिय मांस खात असताना, पाच प्रकारच्या भोजनांपैकी कोणतेही कप्पिय भोजन नाकारल्यास पवारणा होते. कुलदूषक कार्य, वैद्यकर्म, उत्तरिमनुस्सधम्माची घोषणा करणे, सोने-चांदी इत्यादींचा स्वीकार करणे यांद्वारे प्राप्त झालेले, बुद्धांनी निषिद्ध मानलेले आणि चुकीच्या उपजीविकेने (अनेषणाने) उत्पन्न झालेले अकप्पिय भोजन नाकारल्यास पवारणा होत नाही. कप्पिय किंवा अकप्पिय भोजन करत असतानाही, कप्पिय भोजन नाकारल्यास पवारणा होते. अकप्पिय भोजन नाकारल्यास पवारणा होत नाही; या सर्व ठिकाणी पूर्वोक्त नियमानेच कारण समजून घ्यावे. เอวํ ‘‘อสน’’นฺติอาทีสุ ยญฺจ อสฺนาติ, ยญฺจ โภชนํ หตฺถปาเส ฐิเตน อภิหฏํ ปฏิกฺขิปนฺโต ปวารณํ อาปชฺชติ, ตํ ญตฺวา อิทานิ ยถา อาปชฺชติ, ตสฺส ชานนตฺถํ อยํ วินิจฺฉโย – ‘‘‘อสนํ โภชน’นฺติ เอตฺถ ตาว เยน เอกสิตฺถมฺปิ อชฺโฌหฏํ โหติ, โส สเจ ปตฺตมุขหตฺถานํ ยตฺถ กตฺถจิ ปญฺจสุ โภชเนสุ เอกสฺมิมฺปิ สติ อญฺญํ ปญฺจสุ โภชเนสุ เอกมฺปิ ปฏิกฺขิปติ, ปวาเรติ. กตฺถจิ โภชนํ นตฺถิ, อามิสคนฺธมตฺตํ ปญฺญายติ, น ปวาเรติ. มุเข จ หตฺเถ จ โภชนํ นตฺถิ, ปตฺเต อตฺถิ, ตสฺมึ ปน อาสเน น ภุญฺชิตุกาโม, วิหารํ ปวิสิตฺวา ภุญฺชิตุกาโม, อญฺญสฺส วา ทาตุกาโม, ตสฺมึ เจ อนฺตเร โภชนํ ปฏิกฺขิปติ, น ปวาเรติ. กสฺมา? วิปฺปกตโภชนภาวสฺส อุปจฺฉินฺนตฺตา. โยปิ อญฺญตฺร คนฺตฺวา ภุญฺชิตุกาโม มุเข ภตฺตํ [Pg.92] คิลิตฺวา เสสํ อาทาย คจฺฉนฺโต อนฺตรามคฺเค อญฺญํ โภชนํ ปฏิกฺขิปติ, ตสฺสาปิ ปวารณา น โหตี’’ติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. ยถา จ ปตฺเต; เอวํ หตฺเถปิ. มุเขปิ วา วิชฺชมานโภชนํ สเจ อนชฺโฌหริตุกาโม โหติ, ตสฺมิญฺจ ขเณ อญฺญํ ปฏิกฺขิปติ, น ปวาเรติ. เอกสฺมิญฺหิ ปเท วุตฺตลกฺขณํ สพฺพตฺถ เวทิตพฺพํ โหติ. อปิจ กุรุนฺทิยํ เอส นโย ทสฺสิโตเยว. วุตฺตญฺหิ ตตฺถ ‘‘มุเข ภตฺตํ คิลิตํ, หตฺเถ ภตฺตํ วิฆาสาทสฺส ทาตุกาโม, ปตฺเต ภตฺตํ ภิกฺขุสฺส ทาตุกาโม, สเจ ตสฺมึ ขเณ ปฏิกฺขิปติ, น ปวาเรตี’’ติ. หตฺถปาเส ฐิโตติ เอตฺถ ปน สเจ ภิกฺขุ นิสินฺโน โหติ, อาสนสฺส ปจฺฉิมนฺตโต ปฏฺฐาย, สเจ ฐิโต, ปณฺหิอนฺตโต ปฏฺฐาย, สเจ นิปนฺโน, เยน ปสฺเสน นิปนฺโน, ตสฺส ปาริมนฺตโต ปฏฺฐาย, ทายกสฺส นิสินฺนสฺส วา ฐิตสฺส วา นิปนฺนสฺส วา ฐเปตฺวา ปสาริตหตฺถํ ยํ อาสนฺนตรํ องฺคํ, ตสฺส โอริมนฺเตน ปริจฺฉินฺทิตฺวา อฑฺฒเตยฺยหตฺโถ ‘‘หตฺถปาโส’’ติ เวทิตพฺโพ. ตสฺมึ ฐตฺวา อภิหฏํ ปฏิกฺขิปนฺตสฺเสว ปวารณา โหติ, น ตโต ปรํ. अशा प्रकारे, 'असन' (भोजन करणे) इत्यादी गाथांमध्ये, जो भोजन करत आहे आणि हत्थपासामध्ये उभ्या असलेल्या व्यक्तीने आणलेले भोजन नाकारताना ज्या प्रकारे पवारणा प्राप्त होते, ते जाणून घेऊन, आता ती ज्या कारणाने प्राप्त होते ते समजण्यासाठी हा निर्णय खालीलप्रमाणे आहे – प्रथम 'असनं भोजनं' याविषयी: ज्याने भाताचा एक शीत जरी गिळला असेल, आणि त्याच्या पात्र, तोंड किंवा हात यांपैकी कोठेही पाच प्रकारच्या भोजनांपैकी एखादे भोजन शिल्लक असताना, जर तो पाच प्रकारच्या भोजनांपैकी इतर कोणतेही भोजन नाकारतो, तर याची पवारणा होते. जर कोठेही भोजन शिल्लक नसेल, केवळ अन्नाचा सुवास येत असेल, तर पवारणा होत नाही. तोंडात आणि हातात भोजन नाही, परंतु पात्रात आहे; मात्र त्याला त्या आसनावर जेवण्याची इच्छा नाही, तर विहारात जाऊन जेवण्याची इच्छा आहे, किंवा ते अन्न दुसऱ्याला देण्याची इच्छा आहे; या दरम्यान जर तो भोजन नाकारतो, तर पवारणा होत नाही. का? कारण अपूर्ण राहिलेल्या भोजनाची क्रिया खंडित झाली आहे. 'जो भिक्खू दुसऱ्या ठिकाणी जाऊन जेवण्याच्या इच्छेने तोंडातला घास गिळून, उरलेले अन्न घेऊन जात असताना वाटेत दुसरे भोजन नाकारतो, त्याचीही पवारणा होत नाही,' असे महापच्चरी अट्टकथेत म्हटले आहे. ज्याप्रमाणे पात्राच्या बाबतीत आहे, तसेच हाताच्या बाबतीतही समजावे. किंवा तोंडात असलेले भोजन देखील जर तो गिळू इच्छित नसेल, आणि त्या क्षणी तो दुसरे अन्न नाकारतो, तर पवारणा होत नाही. कारण एका पदात सांगितलेले लक्षण सर्व ठिकाणी लागू होते असे समजावे. शिवाय, कुरुंदी अट्टकथेत हाच नियम स्पष्टपणे दर्शवला आहे. तेथे म्हटले आहे की: 'तोंडातला घास गिळला आहे, हातातील भात उष्टे खाणाऱ्याला देण्याची इच्छा आहे, पात्रातील भात दुसऱ्या भिक्खूला देण्याची इच्छा आहे; अशा वेळी जर तो भोजन नाकारतो, तर पवारणा होत नाही.' 'हत्थपासामध्ये उभा असलेला' याविषयी निर्णय असा समजावा: जर भिक्खू बसलेला असेल तर आसनाच्या मागील टोकापासून, जर उभा असेल तर टाचेच्या मागील टोकापासून, जर झोपलेला असेल तर ज्या कुशीवर झोपला आहे त्या कुशीच्या बाहेरील टोकापासून मोजावे; आणि देणाऱ्याच्या (दायकाच्या) बसलेल्या, उभ्या किंवा झोपलेल्या स्थितीतील पसरलेला हात वगळता, त्याचे जे अंग सर्वात जवळ असेल, त्याच्या आतील टोकापासून अडीच हात अंतराला 'हत्थपास' समजावे. त्या हत्थपासामध्ये राहून आणलेले भोजन नाकारणाऱ्या भिक्खूचीच पवारणा होते, त्याबाहेर होत नाही. อภิหรตีติ หตฺถปาสพฺภนฺตเร ฐิโต คหณตฺถํ อุปนาเมติ. สเจ ปน อนนฺตรนิสินฺโนปิ ภิกฺขุ หตฺเถ วา อูรูสุ วา อาธารเก วา ฐิตปตฺตํ อนภิหริตฺวาว ‘‘ภตฺตํ คณฺหา’’ติ วทติ, ตํ ปฏิกฺขิปโต ปวารณา นตฺถิ. ภตฺตปจฺฉึ อาเนตฺวา ปุรโต ภูมิยํ ฐเปตฺวา ‘‘คณฺหาหี’’ติ วุตฺเตปิ เอเสว นโย. อีสกํ ปน อุทฺธริตฺวา วา อปนาเมตฺวา วา ‘‘คณฺหถา’’ติ วุตฺเต ปฏิกฺขิปโต ปวารณา โหติ. เถราสเน นิสินฺโน เถโร ทูเร นิสินฺนสฺส ทหรภิกฺขุสฺส ปตฺตํ เปเสตฺวา ‘‘อิโต โอทนํ คณฺหาหี’’ติ วทติ, คณฺหิตฺวา ปน คโต ตุณฺหี ติฏฺฐติ, ทหโร ‘‘อลํ มยฺห’’นฺติ ปฏิกฺขิปติ, น ปวาเรติ. กสฺมา? เถรสฺส ทูรภาวโต ทูตสฺส จ อนภิหรณโตติ. สเจ ปน คเหตฺวา อาคโต ภิกฺขุ ‘‘อิทํ ภตฺตํ คณฺหา’’ติ วทติ, ตํ ปฏิกฺขิปโต ปวารณา โหติ. ‘अभिहरति’ (जवळ आणणे) म्हणजे हस्तपासाच्या (हातभर अंतराच्या) आत उभे राहून स्वीकार करण्यासाठी जवळ आणणे. पण जर जवळच बसलेला भिक्खू देखील हातात, मांड्यांवर किंवा पात्राच्या आधारावर (स्टँडवर) ठेवलेले पात्र समोर न आणताच 'भात घ्या' असे म्हणतो, तर ते नाकारणाऱ्याची पवारणा होत नाही. भाताची टोपली आणून समोर जमिनीवर ठेवून 'घ्या' असे म्हटले तरी हाच नियम लागू होतो. परंतु, जर ती टोपली थोडी वर उचलून किंवा (त्याच्याकडे) झुकवून 'घ्या' असे म्हटले असता, नाकारणाऱ्याची पवारणा होते. थेरासनावरील ज्येष्ठ थेर भिक्खू दूर बसलेल्या तरुण भिक्खूकडे पात्र पाठवून 'यातून भात घे' असे म्हणतात, आणि पात्र घेऊन गेलेला भिक्खू शांत उभा राहतो, तेव्हा तो तरुण भिक्खू 'माझ्यासाठी पुरेसे आहे' असे म्हणून नकार देतो, तर त्याची पवारणा होत नाही. का? कारण थेर दूर असल्यामुळे आणि दूताने (पात्र) समोर न आणल्यामुळे. पण जर पात्र घेऊन आलेला भिक्खू 'हे भोजन घ्या' असे म्हणतो, तर ते नाकारणाऱ्याची पवारणा होते. ปริเวสนาย เอโก เอเกน หตฺเถน โอทนปจฺฉึ เอเกน กฏจฺฉุํ คเหตฺวา ภิกฺขู ปริวิสติ, ตตฺร เจ อญฺโญ อาคนฺตฺวา ‘‘อหํ ปจฺฉึ ธาเรสฺสามิ, ตฺวํ โอทนํ เทหี’’ติ วตฺวา คหิตมตฺตกเมว กโรติ, ปริเวสโก เอว ปน ตํ ธาเรติ, ตสฺมา สา อภิหฏาว โหติ. ตโต ทาตุกามตาย คณฺหนฺตํ ปฏิกฺขิปนฺตสฺส ปวารณา โหติ. สเจ [Pg.93] ปน ปริวิสเกน ผุฏฺฐมตฺตาว โหติ, อิตโรว นํ ธาเรติ, ตโต ทาตุกามตาย คณฺหนฺตํ ปฏิกฺขิปนฺตสฺส ปวารณา น โหติ. กฏจฺฉุนา อุทฺธฏภตฺเต ปน โหติ. กฏจฺฉุอภิหาโรเยว หิ ตสฺส อภิหาโร. ทฺวินฺนํ สมภาเรปิ ปฏิกฺขิปนฺโต ปวาเรติเยวาติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. อนนฺตรสฺส ภิกฺขุโน ภตฺเต ทิยฺยมาเน อิตโร ปตฺตํ หตฺเถหิ ปิทหติ, ปวารณา นตฺถิ. กสฺมา? อญฺญสฺส อภิหเฏ ปฏิกฺขิตฺตตฺตา. भोजन वाढण्याच्या वेळी एक जण एका हाताने भाताची टोपली आणि दुसऱ्या हाताने पळी धरून भिक्खूंना वाढतो. तिथे जर दुसरा कोणी येऊन 'मी टोपली धरतो, तू भात वाढ' असे म्हणून केवळ स्पर्श करण्यापुरतेच धरतो, पण वाढणाराच ती टोपली धरून ठेवतो, त्यामुळे ती टोपली (वाढणाऱ्याकडूनच) समोर आणलेली मानली जाते. त्यामुळे, देण्याच्या इच्छेने (भात) काढत असताना नकार देणाऱ्याची पवारणा होते. पण जर वाढणाऱ्याने केवळ स्पर्शच केला असेल आणि दुसऱ्यानेच ती टोपली धरली असेल, तर देण्याच्या इच्छेने (भात) काढत असताना नकार देणाऱ्याची पवारणा होत नाही. परंतु, पळीने भात बाहेर काढला असता पवारणा होते. कारण पळीने समोर आणणे हेच त्याचे समोर आणणे (अभिहार) आहे. दोघांनी समान भार उचलला असतानाही नकार देणाऱ्याची पवारणा होतेच, असे 'महापच्चरी' मध्ये म्हटले आहे. शेजारील भिक्खूला भोजन दिले जात असताना, दुसरा भिक्खू आपले पात्र हाताने झाकतो, तर पवारणा होत नाही. का? कारण दुसऱ्यासाठी समोर आणलेल्या भोजनाचा नकार केल्यामुळे. ปฏิกฺเขโป ปญฺญายตีติ เอตฺถ วาจาย อภิหฏํ ปฏิกฺขิปโต ปวารณา นตฺถิ. กาเยน อภิหฏํ ปน กาเยน วา วาจาย วา ปฏิกฺขิปนฺตสฺส ปวารณา โหตีติ เวทิตพฺโพ. ‘नकार समजून येतो’ या संदर्भात, केवळ वाणीने (शब्दाने) समोर आणलेल्या भोजनाचा नकार करणाऱ्याची पवारणा होत नाही. परंतु शरीराने (कायेने) समोर आणलेल्या भोजनाचा, शरीराने किंवा वाणीने नकार देणाऱ्याची पवारणा होते, असे समजावे. ตตฺถ กาเยน ปฏิกฺเขโป นาม องฺคุลึ วา หตฺถํ วา มจฺฉิกพีชนึ วา จีวรกณฺณํ วา จาเลติ, ภมุกาย วา อาการํ กโรติ, กุทฺโธ วา โอโลเกติ, วาจาย ปฏิกฺเขโป นาม ‘‘อล’’นฺติ วา, ‘‘น คณฺหามี’’ติ วา, ‘‘มา อากิรา’’ติ วา, ‘‘อปคจฺฉา’’ติ วา วทติ; เอวํ เยน เกนจิ อากาเรน กาเยน วา วาจาย วา ปฏิกฺขิตฺเต ปวารณา โหติ. त्यामध्ये, कायेने (शरीराने) नकार देणे म्हणजे बोट, हात, माश्या हाकलण्याचा पंखा किंवा चीवराचे टोक हलवणे, किंवा भुवयांनी (नकाराचा) हावभाव करणे, किंवा रागाने पाहणे होय. वाणीने नकार देणे म्हणजे 'पुरे', 'मी घेत नाही', 'ओतू नका' किंवा 'दूर व्हा' असे म्हणणे होय. अशा प्रकारे, कोणत्याही स्वरूपात कायेने किंवा वाणीने नकार दिला असता पवारणा होते. เอโก อภิหเฏ ภตฺเต ปวารณาย ภีโต หตฺถ อปเนตฺวา ปุนปฺปุนํ ปตฺเต โอทนํ อากิรนฺตํ ‘‘อากิร อากิร โกฏฺเฏตฺวา ปูเรหี’’ติ วทติ, เอตฺถ กถนฺติ? มหาสุมตฺเถโร ตาว ‘‘อนากิรณตฺถาย วุตฺตตฺตา ปวารณา โหตี’’ติ อาห. มหาปทุมตฺเถโร ปน ‘‘‘อากิร ปูเรหี’ติ วทนฺตสฺส นาม ‘กสฺสจิ ปวารณา อตฺถี’ติ วตฺวา ‘น ปวาเรตี’’’ติ อาห. อปโร ภตฺตํ อภิหรนฺตํ ภิกฺขุํ สลฺลกฺเขตฺวา ‘‘กึ อาวุโส อิโตปิ กิญฺจิ คณฺหิสฺสสิ, ทมฺมิ เต กิญฺจี’’ติ อาห. ตตฺราปิ ‘‘‘เอวํ นาคมิสฺสตี’ติ วุตฺตตฺตา ‘ปวารณา โหตี’’’ติ มหาสุมตฺเถโร อาห. มหาปทุมตฺเถโร ปน ‘‘‘คณฺหิสฺสสี’ติ วทนฺตสฺส นาม ‘กสฺสจิ ปวารณา อตฺถี’ติ วตฺวา ‘น ปวาเรตี’’’ติ อาห. एक भिक्खू भोजन समोर आणले असता पवारणा होण्याच्या भीतीने आपला हात पात्रावरून बाजूला करून, पात्रात वारंवार भात ओतणाऱ्या दात्याला 'ओत, ओत, दाबून दाबून भर' असे म्हणतो. यावर काय निर्णय आहे? प्रथम महासुमा थेरांनी म्हटले की, 'न ओतण्याच्या उद्देशाने (उपरोधाने) म्हटल्यामुळे पवारणा होते.' परंतु महापदुम थेरांनी म्हटले की, ''ओत, भर' असे म्हणणाऱ्याची कधी पवारणा होते का?' असे सांगून 'पवारणा होत नाही' असे म्हटले. दुसरा एक भिक्खू भोजन घेऊन येणाऱ्या भिक्खूला पाहून 'आयुष्यमाना, तू यातूनही काही घेणार का? मी तुला काही देऊ का?' असे म्हणतो. तिथेही, 'असे म्हटल्याने तो पुढे येणार नाही' या विचाराने म्हटल्यामुळे 'पवारणा होते' असे महासुमा थेरांनी म्हटले. परंतु महापदुम थेरांनी म्हटले की, ''तू घेणार का?' असे म्हणणाऱ्याची कधी पवारणा होते का?' असे सांगून 'पवारणा होत नाही' असे म्हटले. เอโก สมํสกํ รสํ อภิหริตฺวา ‘‘รสํ คณฺหถา’’ติ วทติ, ตํ สุตฺวา ปฏิกฺขิปโต ปวารณา นตฺถิ. ‘‘มจฺฉรสํ มํสรส’’นฺติ วุตฺเต ปฏิกฺขิปโต โหติ, ‘‘อิทํ คณฺหถา’’ติ วุตฺเตปิ โหติเยว. มํสํ วิสุํ กตฺวา ‘‘มํสรสํ คณฺหถา’’ติ วทติ, ตตฺถ เจ สาสปมตฺตมฺปิ มํสขณฺฑํ อตฺถิ[Pg.94], ตํ ปฏิกฺขิปโต ปวารณา โหติ. สเจ ปน ปริสฺสาวิโต โหติ, ‘‘วฏฺฏตี’’ติ อภยตฺเถโร อาห. एक जण मांसाचे तुकडे असलेला रस्सा घेऊन येतो आणि 'रस्सा घ्या' असे म्हणतो, ते ऐकून नकार देणाऱ्याची पवारणा होत नाही. 'माशाचा रस्सा किंवा मांसाचा रस्सा घ्या' असे म्हटले असता नकार देणाऱ्याची पवारणा होते, आणि 'हे घ्या' असे म्हटले तरी पवारणा होतेच. मांस वेगळे करून 'मांसाचा रस्सा घ्या' असे म्हणतो, त्यात जर मोहरीच्या दाण्याएवढा जरी मांसाचा तुकडा असेल, तर तो नाकारणाऱ्याची पवारणा होते. पण जर तो रस्सा गाळलेला असेल, तर 'चालते' असे अभय थेरांनी म्हटले आहे. มํสรเสน อาปุจฺฉนฺตํ มหาเถโร ‘‘มุหุตฺตํ อาคเมหี’’ติ วตฺวา ‘‘ถาลกํ อาวุโส อาหรา’’ติ อาห. เอตฺถ กถนฺติ? มหาสุมตฺเถโร ตาว ‘‘อภิหารกสฺส คมนํ ปฐมํ อุปจฺฉินฺนํ, ตสฺมา ปวาเรตี’’ติ อาห. มหาปทุมตฺเถโร ปน ‘‘อยํ กุหึ คจฺฉติ, กีทิสํ เอตสฺส คมนํ, คณฺหนฺตสฺสาปิ นาม ปวารณา อตฺถี’’ติ วตฺวา ‘‘น ปวาเรตี’’ติ อาห. กฬีรปนสาทีหิ มิสฺเสตฺวา มํสํ ปจนฺติ, ตํ คเหตฺวา ‘‘กฬีรสูปํ คณฺหถ, ปนสพฺยญฺชนํ คณฺหถา’’ติ วทนฺติ, เอวมฺปิ น ปวาเรติ. กสฺมา? อปวารณารหสฺส นาเมน วุตฺตตฺตา. สเจ ปน ‘‘มจฺฉสูปํ มํสสูป’’นฺติ วา ‘‘อิมํ คณฺหถา’’ติ วา วทนฺติ, ปวาเรติ. มํสกรมฺพโก นาม โหติ, ตํ ทาตุกาโมปิ ‘‘กรมฺพกํ คณฺหถา’’ติ วทติ, วฏฺฏติ; น ปวาเรติ. ‘‘มํสกรมฺพก’’นฺติ วา ‘‘อิท’’นฺติ วา วุตฺเต ปน ปวาเรติ. เอเสว นโย สพฺเพสุ มจฺฉมํสมิสฺสเกสุ. मांसाच्या रश्श्याबद्दल विचारणाऱ्याला महाथेरांनी 'एक क्षण थांब' असे सांगून 'आयुष्यमाना, वाटी घेऊन ये' असे म्हटले. यावर काय निर्णय आहे? प्रथम महासुमा थेरांनी म्हटले की, 'घेऊन येणाऱ्याचे जाणे आधीच थांबवले गेले, म्हणून पवारणा होते.' परंतु महापदुम थेरांनी म्हटले की, 'हा कुठे जात आहे? याचे जाणे कसले? घेणाऱ्याची देखील कधी पवारणा होते का?' असे सांगून 'पवारणा होत नाही' असे म्हटले. बांबूचे कोंब (कळीर), फणस इत्यादींसोबत मिसळून मांस शिजवतात, ते घेऊन 'बांबूच्या कोंबांचे सूप घ्या, फणसाची भाजी घ्या' असे म्हणतात, तरीही पवारणा होत नाही. का? कारण पवारणेला अपात्र असलेल्या पदार्थांच्या नावाने विचारल्यामुळे. पण जर 'माशाचे सूप, मांसाचे सूप घ्या' किंवा 'हे घ्या' असे म्हणतात, तर पवारणा होते. 'मांसकरंबक' (मांस मिश्रित अन्न) नावाचा पदार्थ असतो, तो देण्याची इच्छा असूनही जर 'करंबक घ्या' असे म्हणतो, तर चालते; पवारणा होत नाही. परंतु 'मांसकरंबक' किंवा 'हे' असे म्हटले असता पवारणा होते. मासे आणि मांस मिश्रित सर्व पदार्थांच्या बाबतीत हाच नियम आहे. โย ปน นิมนฺตเน ภุญฺชมาโน มํสํ อภิหฏํ ‘‘อุทฺทิสฺส กต’’นฺติ มญฺญมาโน ปฏิกฺขิปติ, ปวาริโตว โหตีติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. มิสฺสกกถา ปน กุรุนฺทิยํ สุฏฺฐุ วุตฺตา. เอวญฺหิ ตตฺถ วุตฺตํ – ปิณฺฑปาตจาริโก ภิกฺขุ ภตฺตมิสฺสกํ ยาคุํ อาหริตฺวา ‘‘ยาคุํ คณฺหถา’’ติ วทติ, น ปวาเรติ. ‘‘ภตฺตํ คณฺหถา’’ติ วุตฺเต ปวาเรติ. กสฺมา? เยนาปุจฺฉิโต, ตสฺส อตฺถิตาย. อยเมตฺถ อธิปฺปาโย – ‘‘ยาคุมิสฺสกํ คณฺหถา’’ติ วทติ, ตตฺร เจ ยาคุ พหุตรา วา โหติ สมสมา วา, น ปวาเรติ. ยาคุ มนฺทา, ภตฺตํ พหุตรํ, ปวาเรติ. อิทญฺจ สพฺพอฏฺฐกถาสุ วุตฺตตฺตา น สกฺกา ปฏิกฺขิปิตุํ, การณํ ปเนตฺถ ทุทฺทสํ. ‘‘ภตฺตมิสฺสกํ คณฺหถา’’ติ วทติ, ภตฺตํ พหุกํ วา สมํ วา อปฺปตรํ วา โหติ, ปวาเรติเยว. ภตฺตํ วา ยาคุํ วา อนามสิตฺวา ‘‘มิสฺสกํ คณฺหถา’’ติ วทติ, ตตฺร เจ ภตฺตํ พหุตรํ วา สมกํ วา โหติ, ปวาเรติ. อปฺปตรํ น ปวาเรติ. อิทญฺจ กรมฺพเกน น สมาเนตพฺพํ. กรมฺพโก หิ มํสมิสฺสโกปิ โหติ อมํสมิสฺสโกปิ, ตสฺมา ‘‘กรมฺพก’’นฺติ วุตฺเต ปวารณา นตฺถิ. อิทํ ปน ภตฺตมิสฺสกเมว. เอตฺถ วุตฺตนเยเนว ปวารณา โหติ. พหุรเส ภตฺเต รสํ, พหุขีเร ขีรํ พหุสปฺปิมฺหิ จ [Pg.95] ปายาเส สปฺปึ คณฺหถาติ วิสุํ กตฺวา เทติ, ตํ ปฏิกฺขิปโต ปวารณา นตฺถิ. पण जो भिक्खू आमंत्रणात भोजन करत असताना, समोर आणलेले मांस हे 'माझ्यासाठीच (उद्दिष्ट करून) तयार केले आहे' असे मानून नाकारतो, तो प्रवारितच होतो, असे महापच्चरी अट्ठकथेत म्हटले आहे. मिश्रित आहारासंबंधीची चर्चा (मिस्सककथा) मात्र कुरुन्दी अट्ठकथेत चांगल्या प्रकारे स्पष्ट केली आहे. तेथे असे म्हटले आहे – पिंडपातासाठी फिरणारा भिक्खू भात मिश्रित पेज (यागु) घेऊन येऊन जर 'पेज घ्या' असे म्हणतो, तर तो प्रवारित होत नाही. पण जर 'भात घ्या' असे म्हटले असता तो प्रवारित होतो. असे का? कारण ज्या भाताविषयी विचारले गेले आहे, तो तेथे उपलब्ध आहे. येथे हा अभिप्राय आहे – जर तो 'पेज-मिश्रित अन्न घ्या' असे म्हणतो, आणि त्यात जर पेज जास्त असेल किंवा भाताच्या बरोबरीची असेल, तर तो प्रवारित होत नाही. जर पेज कमी असेल आणि भात जास्त असेल, तर तो प्रवारित होतो. आणि हे सर्व अट्ठकथांमध्ये सांगितलेले असल्यामुळे नाकारता येत नाही, परंतु येथे याचे कारण समजणे कठीण आहे. जर तो 'भात-मिश्रित अन्न घ्या' असे म्हणतो, आणि त्यात भात जास्त असो, समान असो किंवा कमी असो, तो प्रवारित होतोच. भात किंवा पेज असा उल्लेख न करता जर तो 'मिश्रित अन्न घ्या' असे म्हणतो, आणि त्यात जर भात जास्त किंवा समान असेल, तर तो प्रवारित होतो. जर भात कमी असेल, तर प्रवारित होत नाही. आणि याची तुलना 'करम्बक' (मिश्रित अन्नविशेष) सोबत केली जाऊ नये. कारण करम्बक हा मांस-मिश्रितही असू शकतो आणि विना-मांसाचाही असू शकतो, म्हणून 'करम्बक घ्या' असे म्हटले असता प्रवारणा होत नाही. परंतु हे केवळ भात-मिश्रितच आहे. येथे सांगितलेल्या पद्धतीनेच प्रवारणा होते. पुष्कळ रस (आमटी) असलेल्या भातातील रस, पुष्कळ दूध असलेल्या भातातील दूध, आणि पुष्कळ तूप असलेल्या खिरीतील (पायस) तूप 'घ्या' असे वेगळे करून दिले असता, ते नाकारणाऱ्या भिक्खूची प्रवारणा होत नाही. โย ปน คจฺฉนฺโต ปวาเรติ, โส คจฺฉนฺโตว ภุญฺชิตุํ ลภติ. กทฺทมํ วา อุทกํ วา ปตฺวา ฐิเตน อติริตฺตํ กาเรตพฺพํ. สเจ อนฺตรา นที ปูรา โหติ, นทีตีเร คุมฺพํ อนุปริยายนฺเตน ภุญฺชิตพฺพํ. อถ นาวา วา เสตุ วา อตฺถิ, ตํ อภิรุหิตฺวาปิ จงฺกมนฺเตนว ภุญฺชิตพฺพํ, คมนํ น อุปจฺฉินฺทิตพฺพํ. ยาเน วา หตฺถิอสฺสปิฏฺเฐ วา จนฺทมณฺฑเล วา สูริยมณฺฑเล วา นิสีทิตฺวา ปวาริเตน ยาว มชฺฌนฺหิกํ, ตาว เตสุ คจฺฉนฺเตสุปิ นิสินฺเนเนว ภุญฺชิตพฺพํ. โย ฐิโต ปวาเรติ, ฐิเตเนว, โย นิสินฺโน ปวาเรติ, นิสินฺเนเนว ภุญฺชิตพฺพํ. ตํ ตํ อิริยาปถํ โกเปนฺเตน อติริตฺตํ กาเรตพฺพํ. โย อุกฺกุฏิโก นิสีทิตฺวา ปวาเรติ, เตน อุกฺกุฏิเกเนว ภุญฺชิตพฺพํ. ตสฺส ปน เหฏฺฐา ปลาลปีฐํ วา กิญฺจิ วา นิสีทนกํ ทาตพฺพํ. ปีฐเก นิสีทิตฺวา ปวาริเตน อาสนํ อจาเลตฺวาว จตสฺโส ทิสา ปริวตฺตนฺเตน ภุญฺชิตุํ ลพฺภติ. มญฺเจ นิสีทิตฺวา ปวาริเตน อิโต วา เอตฺโต วา สํสริตุํ น ลพฺภติ. สเจ ปน นํ สห มญฺเจน อุกฺขิปิตฺวา อญฺญตฺร เนนฺติ, วฏฺฏติ. นิปชฺชิตฺวา ปวาริเตน นิปนฺเนเนว ภุญฺชิตพฺพํ. ปริวตฺตนฺเตน เยน ปสฺเสน นิปนฺโน, ตสฺส ฐานํ นาติกฺกเมตพฺพํ. पण जो चालत असताना प्रवारित होतो, त्याला चालत असतानाच भोजन करण्याची अनुमती मिळते. चिखल किंवा पाणी आल्यामुळे थांबलेल्या भिक्खूने अतिरित्त (अतिरिक्त भोजन विधी) करवून घेतले पाहिजे. जर प्रवासाच्या दरम्यान नदी पाण्याने भरलेली असेल, तर नदीकाठच्या झाडीभोवती फिरत फिरत भोजन केले पाहिजे. किंवा जर नाव अथवा पूल असेल, तर त्यावर चढून चंक्रमण (ये-जा) करतच भोजन केले पाहिजे, चालण्याची क्रिया खंडित करू नये. वाहन, हत्ती किंवा घोड्याची पाठ, किंवा चंद्रमंडळ अथवा सूर्यमंडळ यावर बसून प्रवारित झालेल्या भिक्खूने दुपारपर्यंत (मध्यान्हापर्यंत) ते चालत असताना देखील बसूनच भोजन केले पाहिजे. जो उभे राहून प्रवारित होतो त्याने उभे राहूनच, आणि जो बसून प्रवारित होतो त्याने बसूनच भोजन केले पाहिजे. त्या त्या शारीरिक स्थितीचा (इरियापथाचा) भंग करणाऱ्याने अतिरित्त विधी करवून घेतला पाहिजे. जो उकिडवे बसून प्रवारित होतो, त्याने उकिडवे बसूनच भोजन केले पाहिजे. परंतु त्याच्या खाली पेंढ्याचे आसन (पलालपीठ) किंवा इतर कोणतेही छोटे आसन दिले पाहिजे. लहान पाटावर (पीठावर) बसून प्रवारित झालेल्या भिक्खूला आपले आसन न हलवता चारही दिशांना वळून भोजन करण्याची अनुमती आहे. खाटेवर बसून प्रवारित झालेल्या भिक्खूला इकडे किंवा तिकडे सरकण्याची अनुमती नाही. परंतु जर त्याला खाटेसह उचलून दुसऱ्या ठिकाणी नेले, तर ते योग्य आहे. झोपून प्रवारित झालेल्या भिक्खूने झोपलेल्या अवस्थेतच भोजन केले पाहिजे. बाजू बदलताना, तो ज्या बाजूने झोपला होता, त्या जागेचे उल्लंघन करू नये. อนติริตฺตนฺติ น อติริตฺตํ; น อธิกนฺติ อตฺโถ. ตํ ปน ยสฺมา กปฺปิยกตาทีหิ สตฺตหิ วินยกมฺมากาเรหิ อกตํ วา คิลานสฺส อนธิกํ วา โหติ, ตสฺมา ปทภาชเน ‘‘อกปฺปิยกต’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ อกปฺปิยกตนฺติ ยํ ตตฺถ ผลํ วา กนฺทมูลาทิ วา ปญฺจหิ สมณกปฺเปหิ กปฺปิยํ อกตํ; ยญฺจ อกปฺปิยมํสํ วา อกปฺปิยโภชนํ วา, เอตํ อกปฺปิยํ นาม. ตํ อกปฺปิยํ ‘‘อลเมตํ สพฺพ’’นฺติ เอวํ อติริตฺตํ กตมฺปิ อกปฺปิยกตนฺติ เวทิตพฺพํ. อปฺปฏิคฺคหิตกตนฺติ ภิกฺขุนา อปฺปฏิคฺคหิตํเยว ปุริมนเยเนว อติริตฺตํ กตํ. อนุจฺจาริตกตนฺติ กปฺปิยํ การาเปตุํ อาคเตน ภิกฺขุนา อีสกมฺปิ อนุกฺขิตฺตํ วา อนปนามิตํ วา กตํ. อหตฺถปาเส กตนฺติ กปฺปิยํ การาเปตุํ อาคตสฺส หตฺถปาสโต พหิ ฐิเตน กตํ. อภุตฺตาวินา กตนฺติ โย ‘‘อลเมตํ สพฺพ’’นฺติ อติริตฺตํ กโรติ, เตน ปวารณปฺปโหนกํ โภชนํ อภุตฺเตน กตํ. ภุตฺตาวินา ปวาริเตน อาสนา วุฏฺฐิเตน กตนฺติ อิทํ อุตฺตานเมว. อลเมตํ สพฺพนฺติ อวุตฺตนฺติ วจีเภทํ กตฺวา เอวํ อวุตฺตํ โหติ. อิติ อิเมหิ [Pg.96] สตฺตหิ วินยกมฺมากาเรหิ ยํ อติริตฺตํ กปฺปิยํ อกตํ, ยญฺจ น คิลานาติริตฺตํ, ตทุภยมฺปิ อนติริตฺตนฺติ เวทิตพฺพํ. 'अनतिरित्त' म्हणजे जे अतिरित्त (अतिरिक्त) नाही; जे अधिक नाही, असा अर्थ आहे. परंतु ते अन्न कप्पिय-करण इत्यादी सात प्रकारच्या विनयकर्मांच्या विधींनी न केलेले असल्यामुळे किंवा आजारी भिक्खूसाठी अतिरिक्त नसल्यामुळे, पदभाजनात 'अकप्पियकत' इत्यादी म्हटले आहे. त्यात 'अकप्पियकत' म्हणजे जे फळ किंवा कंदमुळे इत्यादी पाच प्रकारच्या श्रमण-कप्पांनी कप्पिय (योग्य) केलेले नाही; आणि जे अकप्पिय मांस किंवा अकप्पिय भोजन आहे, त्याला 'अकप्पिय' असे म्हणतात. त्या अकप्पिय अन्नाला 'हे सर्व पुरेसे आहे' असे म्हणून जरी अतिरित्त केले गेले असले, तरी ते 'अकप्पियकत' असेच समजले पाहिजे. 'अप्पटिग्गहितकत' म्हणजे भिक्खूने ग्रहण न केलेलेच अन्न पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीने अतिरित्त केले गेले असणे. 'अनुच्चारितकत' म्हणजे कप्पिय करवून घेण्यासाठी आलेल्या भिक्खूने थोडे देखील न उचललेले किंवा विनयधराकडे न झुकवलेले अन्न अतिरित्त करणे. 'अहत्थपासे कत' म्हणजे कप्पिय करवून घेण्यासाठी आलेल्या भिक्खूच्या हस्तपासाच्या (हाताच्या अंतराच्या) बाहेर राहून विनयधराने केलेले अतिरित्त. 'अभुत्ताविना कत' म्हणजे जो 'हे सर्व पुरेसे आहे' असे म्हणून अतिरित्त करतो, त्या विनयधराने प्रवारणेसाठी पुरेसे असलेले भोजन स्वतः न जेवता केलेले अतिरित्त. 'भुक्तवंताने, प्रवारित झालेल्याने, आसनावरून उठून केलेले' हे अंग अगदी स्पष्टच आहे. 'हे सर्व पुरेसे आहे' असे न बोलणे म्हणजे शब्दांचे उच्चारण न करता असे न म्हटलेले असणे. अशा प्रकारे, या सात विनयकर्मांच्या विधींनी जे अन्न अतिरित्त किंवा कप्पिय केलेले नाही, आणि जे आजारी भिक्खूचे उरलेले अन्न नाही, त्या दोन्ही प्रकारच्या अन्नाला 'अनतिरित्त' समजावे. อติริตฺตํ ปน ตสฺเสว ปฏิปกฺขนเยน เวทิตพฺพํ. อปิเจตฺถ ภุตฺตาวินา กตํ โหตีติ อนนฺตเร นิสินฺนสฺส สภาคสฺส ภิกฺขุโน ปตฺตโต เอกมฺปิ สิตฺถํ วา มํสหีรํ วา ขาทิตฺวา กตมฺปิ ภุตฺตาวินาว กตํ โหตีติ เวทิตพฺพํ. อาสนา อวุฏฺฐิเตนาติ เอตฺถ ปน อสมฺโมหตฺถํ อยํ วินิจฺฉโย – ทฺเว ภิกฺขู ปาโตว ภุญฺชมานา ปวาริตา โหนฺติ – เอเกน ตตฺเถว นิสีทิตพฺพํ, อิตเรน นิจฺจภตฺตํ วา สลากภตฺตํ วา อาเนตฺวา อุปฑฺฒํ ตสฺส ภิกฺขุโน ปตฺเต อากิริตฺวา หตฺถํ โธวิตฺวา เสสํ เตน ภิกฺขุนา กปฺปิยํ การาเปตฺวา ภุญฺชิตพฺพํ. กสฺมา? ยญฺหิ ตสฺส หตฺเถ ลคฺคํ, ตํ อกปฺปิยํ โหติ. สเจ ปน ปฐมํ นิสินฺโน ภิกฺขุ สยเมว ตสฺส ปตฺตโต หตฺเถน คณฺหาติ, หตฺถโธวนกิจฺจํ นตฺถิ. สเจ ปน เอวํ กปฺปิยํ การาเปตฺวา ภุญฺชนฺตสฺส ปุน กิญฺจิ พฺยญฺชนํ วา ขาทนียํ วา ปตฺเต อากิรนฺติ, เยน ปฐมํ กปฺปิยํ กตํ, โส ปุน กาตุํ น ลภติ. เยน อกตํ, เตน กาตพฺพํ. ยญฺจ อกตํ, ตํ กาตพฺพํ. ‘‘เยน อกต’’นฺติ อญฺเญน ภิกฺขุนา เยน ปฐมํ น กตํ, เตน กาตพฺพํ. ‘‘ยญฺจ อกต’’นฺติ เยน ปฐมํ กปฺปิยํ กตํ, เตนาปิ ยํ อกตํ ตํ กาตพฺพํ. ปฐมภาชเน ปน กาตุํ น ลพฺภติ. ตตฺถ หิ กริยมานํ ปฐมํ กเตน สทฺธึ กตํ โหติ, ตสฺมา อญฺญสฺมึ ภาชเน กาตุํ วฏฺฏตีติ อธิปฺปาโย. เอวํ กตํ ปน เตน ภิกฺขุนา ปฐมํ กเตน สทฺธึ ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. अतिरित्त (शिल्लक राहिलेले अन्न) हे त्याच्या विरुद्ध पद्धतीने समजून घ्यावे. तसेच, येथे 'जेवलेल्या व्यक्तीने केलेले असते' (भुत्ताविना कतं होतीति) याचा अर्थ असा समजायचा की, जवळच बसलेल्या समान दर्जाच्या भिक्षूच्या पात्रातून एक भाताचा कण किंवा मांसाचा तुकडा खाऊन केलेले कप्पिय देखील जेवलेल्या व्यक्तीनेच केलेले असते. 'आसनावरून न उठलेल्याने' (आसना अवुट्ठितेनाति) याविषयी संभ्रम दूर करण्यासाठी हा निर्णय आहे – दोन भिक्षू सकाळी जेवत असताना 'पवारित' (तृप्त/जेवण थांबवलेले) झाले, तर एकाने तिथेच बसून राहावे, आणि दुसऱ्याने नित्यभक्त किंवा शलाकाभक्त आणून, त्यातील अर्धे त्या बसलेल्या भिक्षूच्या पात्रात ओतावे, स्वतःचे हात धुवावे आणि उरलेले अन्न त्या भिक्षूकडून 'कप्पिय' (अतिरिक्त विधी) करवून घेऊन खावे. का? कारण त्याच्या हातात जे अन्न चिकटलेले असते, ते 'अकप्पिय' (अयोग्य) असते. पण जर आधी बसलेला भिक्षू स्वतःच त्याच्या पात्रातून हाताने अन्न घेतो, तर हात धुण्याची आवश्यकता नसते. परंतु, अशा प्रकारे कप्पिय करवून घेऊन जेवत असताना जर पुन्हा काही व्यंजन (भाजी) किंवा खाद्यपदार्थ पात्रात ओतले, तर ज्याने आधी कप्पिय केले होते, त्याला पुन्हा करण्याची परवानगी नसते. ज्याने केले नाही, त्याने करावे. आणि जे कप्पिय केले गेले नाही, ते करावे. 'ज्याने केले नाही' म्हणजे दुसऱ्या भिक्षूने ज्याने आधी केले नव्हते, त्याने करावे. 'आणि जे केले नाही' म्हणजे ज्याने आधी कप्पिय केले होते, त्यानेही जे कप्पिय केले गेले नाही ते करावे. परंतु पहिल्या पात्रात कप्पिय करण्याची परवानगी नाही. कारण तिथे केले गेल्यास ते आधी केलेल्या कप्पिय अन्नासोबतच केले जाते, म्हणून दुसऱ्या पात्रात करणे योग्य आहे, असा अभिप्राय आहे. अशा प्रकारे केलेले अन्न त्या भिक्षूने आधी केलेल्या अन्नासोबत खाणे योग्य आहे. กปฺปิยํ กโรนฺเตน จ น เกวลํ ปตฺเตเยว, กุณฺเฑปิ ปจฺฉิยมฺปิ ยตฺถ กตฺถจิ ปุรโต ฐเปตฺวา โอนามิตภาชเน กาตพฺพํ. ตํ สเจปิ ภิกฺขุสตํ ปวาริตํ โหติ, สพฺเพสํ ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ, อปฺปวาริตานมฺปิ วฏฺฏติ. เยน ปน กปฺปิยํ กตํ, ตสฺส น วฏฺฏติ. สเจปิ ปวาเรตฺวา ปิณฺฑาย ปวิฏฺฐํ ภิกฺขุํ ปตฺตํ คเหตฺวา อวสฺสํ ภุญฺชนเก มงฺคลนิมนฺตเน นิสีทาเปนฺติ, อติริตฺตํ กาเรตฺวาว ภุญฺชิตพฺพํ. สเจ ตตฺถ อญฺโญ ภิกฺขุ นตฺถิ, อาสนสาลํ วา วิหารํ วา ปตฺตํ เปเสตฺวา กาเรตพฺพํ. กปฺปิยํ กโรนฺเตน ปน อนุปสมฺปนฺนสฺส หตฺเถ ฐิตํ น กาตพฺพํ. สเจ อาสนสาลายํ อพฺยตฺโต ภิกฺขุ โหติ, สยํ คนฺตฺวา กปฺปิยํ การาเปตฺวา อาเนตฺวา ภุญฺชิตพฺพํ. कप्पिय करणाऱ्याने केवळ पात्रातच नव्हे, तर भांड्यात किंवा टोपलीत देखील, समोर कुठेही ठेवून, झुकवलेल्या पात्रात कप्पिय करावे. ते अन्न जरी शंभर पवारित (तृप्त) भिक्षू असले तरी सर्वांना खाणे योग्य आहे, आणि जे पवारित नाहीत त्यांनाही योग्य आहे. परंतु ज्याने कप्पिय केले आहे, त्याला ते खाणे योग्य नाही. जर पवारित झाल्यानंतर पिंडपातासाठी गावात प्रवेश केलेल्या भिक्षूला पात्र घेऊन नक्कीच जेवावे लागणाऱ्या अशा मंगल आमंत्रणात बसवले, तर अतिरित्त (कप्पिय) करवून घेऊनच जेवावे. जर तिथे दुसरा भिक्षू नसेल, तर आसनशाळेत किंवा विहारात पात्र पाठवून कप्पिय करवून घ्यावे. कप्पिय करणाऱ्याने अनुपसंपन्नाच्या (गृहस्थ किंवा सामणेराच्या) हातात असलेले अन्न कप्पिय करू नये. जर आसनशाळेत अकुशल (विधी न जाणणारा) भिक्षू असेल, तर स्वतः जाऊन कप्पिय करवून आणून जेवावे. คิลานาติริตฺตนฺติ [Pg.97] เอตฺถ น เกวลํ ยํ คิลานสฺส ภุตฺตาวเสสํ โหติ, ตํ คิลานาติริตฺตํ; อถ โข ยํกิญฺจิ คิลานํ อุทฺทิสฺส อชฺช วา สฺเว วา ยทา วา อิจฺฉติ, ตทา ขาทิสฺสตีติ อาหฏํ, ตํ สพฺพํ ‘‘คิลานาติริตฺต’’นฺติ เวทิตพฺพํ. ยํ ยามกาลิกาทีสุ อชฺโฌหาเร อชฺโฌหาเร ทุกฺกฏํ, ตํ อสํสฏฺฐวเสน วุตฺตํ. สเจ ปน อามิสสํสฏฺฐานิ โหนฺติ, อาหารตฺถายปิ อนาหารตฺถายปิ ปฏิคฺคเหตฺวา อชฺโฌหรนฺตสฺส ปาจิตฺติยเมว. ‘गिलानातिरित्त’ (आजारी भिक्षूचे शिल्लक अन्न) याविषयी केवळ आजारी भिक्षूने जेवून उरलेले अन्नच गिलानातिरित्त नसते; तर आजारी भिक्षूला उद्देशून आज किंवा उद्या किंवा जेव्हा इच्छा असेल तेव्हा तो खाईल, असे समजून आणलेले ते सर्व अन्न ‘गिलानातिरित्त’ म्हणून जाणावे. यामकालिक इत्यादींमध्ये प्रत्येक घासागणिक जे दुक्कट (दुष्कृत) होते, ते अमिश्रित स्वरूपात सांगितले आहे. पण जर ते आमिष-मिश्रित (अन्नाशी मिसळलेले) असेल, तर आहारासाठी असो वा आहाराव्यतिरिक्त असो, ते ग्रहण करून गिळणाऱ्या भिक्षूला पाचित्तियच होते. ๒๔๑. สติ ปจฺจเยติ ยามกาลิกํ ปิปาสาย สติ ปิปาสจฺเฉทนตฺถํ, สตฺตาหกาลิกํ ยาวชีวิกญฺจ เตน เตน อุปสเมตพฺพเก อาพาเธ สติ ตสฺส อุปสมนตฺถํ ปริภุญฺชโต อนาปตฺติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. २४१. ‘प्रत्यय (कारण/गरज) असताना’ म्हणजे तहान लागली असता तहान शमवण्यासाठी यामकालिक, आणि त्या त्या औषधाने बरे होणाऱ्या आजारात तो आजार बरा करण्यासाठी सताहकालिक व यावजीविक औषधांचे सेवन करणाऱ्याला अनापत्ती (दोष नाही) आहे. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. กถินสมุฏฺฐานํ – กายวาจโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยากิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. हे कठीण-समुत्थान आहे – काय-वाचेने आणि काय-वाचा-चित्ताने उगम पावणारे, क्रिया-अक्रिया, संज्ञेमुळे मुक्ती नसलेले, अचित्तक, प्रज्ञप्ति-वज्ज (नियम उल्लंघनाचा दोष), कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदना असणारे आहे. ปฐมปวารณสิกฺขาปทํ ปญฺจมํ. पहिले पवारणा शिक्षापद पाचवे समाप्त. ๖. ทุติยปวารณสิกฺขาปทวณฺณนา ६. दुसऱ्या पवारणा शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना). ๒๔๒. ฉฏฺฐสิกฺขาปเท – อนาจารํ อาจรตีติ ปณฺณตฺติวีติกฺกมํ กโรติ. อุปนนฺธีติ อุปนาหํ ชเนนฺโต ตสฺมึ ปุคฺคเล อตฺตโน โกธํ พนฺธิ; ปุนปฺปุนํ อาฆาตํ ชเนสีติ อตฺโถ. อุปนทฺโธ ภิกฺขูติ โส ชนิตอุปนาโห ภิกฺขุ. २४२. सहाव्या शिक्षापदात – ‘अनाचार करतो’ म्हणजे प्रज्ञप्तीचे (नियमाचे) उल्लंघन करतो. ‘उपनंधी’ म्हणजे वैर निर्माण करत त्या व्यक्तीवर आपला राग धरून ठेवला; वारंवार द्वेष निर्माण केला, असा अर्थ आहे. ‘उपनद्ध भिक्षू’ म्हणजे तो वैर बाळगणारा भिक्षू. ๒๔๓. อภิหฏฺฐุํ ปวาเรยฺยาติ อภิหริตฺวา ‘‘หนฺท ภิกฺขุ ขาท วา ภุญฺช วา’’ติ เอวํ ปวาเรยฺย. ปทภาชเน ปน ‘‘หนฺท ภิกฺขู’’ติอาทึ อนุทฺธริตฺวา สาธารณเมว อภิหฏฺฐุํ ปวารณาย อตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘ยาวตกํ อิจฺฉสิ ตาวตกํ คณฺหาหี’’ติ วุตฺตํ. ชานนฺติ ปวาริตภาวํ ชานนฺโต. ตํ ปนสฺส ชานนํ ยสฺมา ตีหากาเรหิ โหติ, ตสฺมา ‘‘ชานาติ นาม สามํ วา ชานาตี’’ติอาทินา นเยน ปทภาชนํ วุตฺตํ. อาสาทนาเปกฺโขติ อาสาทนํ โจทนํ มงฺกุกรณภาวํ อเปกฺขมาโน. २४३. ‘समोर आणून निमंत्रित करावे’ म्हणजे समोर आणून ‘हे भिक्षू, घ्या, खा किंवा जेवा’ असे निमंत्रित करावे. पदभाजनामध्ये मात्र ‘हे भिक्षू’ इत्यादींचा उल्लेख न करता, सामान्यपणे समोर आणून निमंत्रित करण्याचा अर्थ दर्शवण्यासाठी ‘तुला जितके हवे तितके घे’ असे म्हटले आहे. ‘जाणतो’ म्हणजे तो पवारित (तृप्त) असल्याचे जाणणारा. त्याचे ते जाणणे तीन प्रकारांमुळे होत असल्याने, म्हणून ‘जाणतो म्हणजे स्वतः जाणतो’ इत्यादी पद्धतीने पदभाजन सांगितले आहे. ‘आसादनापेक्खो’ म्हणजे अपमान करणे, दोषारोप करणे किंवा खजील करण्याची इच्छा बाळगणारा. ปฏิคฺคณฺหาติ [Pg.98] อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ ยสฺส อภิหฏํ ตสฺมึ ปฏิคฺคณฺหนฺเต อภิหารกสฺส ภิกฺขุโน ทุกฺกฏํ. อิตรสฺส ปน สพฺโพ อาปตฺติเภโท ปฐมสิกฺขาปเท วุตฺโต, อิมสฺมึ ปน สิกฺขาปเท สพฺพา อาปตฺติโย อภิหารกสฺเสว เวทิตพฺพา. เสสํ ปฐมสิกฺขาปเท วุตฺตนยตฺตา ปากฏเมว. ‘स्वीकारतो, दुक्कटची आपत्ती होते’ म्हणजे ज्याच्यासाठी अन्न समोर आणले आहे, त्याने ते स्वीकारले असता, अन्न घेऊन येणाऱ्या भिक्षूला दुक्कट (दोष) होतो. दुसऱ्या भिक्षूच्या बाबतीत सर्व आपत्तींचे प्रकार पहिल्या शिक्षापदात सांगितले आहेत, परंतु या शिक्षापदात सर्व आपत्ती केवळ अन्न घेऊन येणाऱ्या भिक्षूलाच होतात असे जाणावे. उर्वरित भाग पहिल्या शिक्षापदात सांगितलेल्या पद्धतीनुसार स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กายจิตฺตโต วาจาจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. हे त्रिसमुत्थान आहे – काय-चित्ताने, वाचा-चित्ताने आणि काय-वाचा-चित्ताने उगम पावणारे, क्रिया, संज्ञेमुळे मुक्ती असणारे, सचित्तक, lokavajja (लोकनिंदेचा दोष), कायकर्म, वचीकर्म, अकुशल चित्त आणि दुःखद वेदना असणारे आहे. ทุติยปวารณสิกฺขาปทํ ฉฏฺฐํ. दुसरे पवारणा शिक्षापद सहावे समाप्त. ๗. วิกาลโภชนสิกฺขาปทวณฺณนา ७. विकालभोजन शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना). ๒๔๗. สตฺตมสิกฺขาปเท – คิรคฺคสมชฺโชติ คิริมฺหิ อคฺคสมชฺโช, คิริสฺส วา อคฺคเทเส สมชฺโช. โส กิร สตฺตเม ทิวเส ภวิสฺสตีติ นคเร โฆสนา กริยติ, นครสฺส พหิทฺธา สเม ภูมิภาเค ปพฺพตจฺฉายาย มหาชนกาโย สนฺนิปตติ, อเนกปฺปการานิ นฏนาฏกานิ ปวตฺตนฺติ, เตสํ ทสฺสนตฺถํ มญฺจาติมญฺเจ พนฺธนฺติ. สตฺตรสวคฺคิยา อปญฺญตฺเต สิกฺขาปเท ทหราว อุปสมฺปนฺนา, เต ‘‘นาฏกานิ อาวุโส ปสฺสิสฺสามา’’ติ ตตฺถ อคมํสุ. อถ เนสํ ญาตกา ‘‘อมฺหากํ อยฺยา อาคตา’’ติ ตุฏฺฐจิตฺตา นฺหาเปตฺวา วิลิมฺเปตฺวา โภเชตฺวา อญฺญมฺปิ ปูวขาทนียาทึ หตฺเถ อทํสุ. เต สนฺธาย วุตฺตํ – ‘‘มนุสฺสา สตฺตรสวคฺคิเย ภิกฺขู ปสฺสิตฺวา’’ติอาทิ. २४७. सातव्या शिक्षापदात – 'गिरग्गसमज्जो' म्हणजे डोंगरावर होणारा श्रेष्ठ मेळा (उत्सव), किंवा डोंगराच्या शिखरावर (श्रेष्ठ भागात) होणारा मेळा. तो मेळा सातव्या दिवशी होईल, अशी नगरात दवंडी पिटवली जाते (घोषणा केली जाते). नगराच्या बाहेर, डोंगराच्या सावलीत असलेल्या सपाट मैदानावर मोठा जनसमुदाय गोळा होतो. अनेक प्रकारचे नट-नर्तकांचे खेळ (नाट्य-नृत्य-वादन) चालतात. ते पाहण्यासाठी लोक एकावर एक मंच बांधतात. सत्तरसवर्गीय भिक्खू, हे शिक्षापद प्रज्ञप्त होण्यापूर्वी, तरुण वयातच उपसंपन्न झाले होते. ते 'मित्रांनो, आपण खेळ पाहूया' असे म्हणून तिथे गेले. तेव्हा त्यांच्या नातेवाईकांनी 'आमचे पूज्य स्वामी आले आहेत' असे म्हणून प्रसन्न चित्ताने त्यांना स्नान घालून, सुगंधी उटणे लावून, भोजन देऊन, इतरही खाण्याचे पदार्थ (मोदक, खाजा इत्यादी) त्यांच्या हातात दिले. त्यांना उद्देशूनच 'लोकांनी सत्तरसवर्गीय भिक्खूंना पाहून...' इत्यादी म्हटले आहे. ๒๔๘-๙. วิกาเลติ วิคเต กาเล. กาโลติ ภิกฺขูนํ โภชนกาโล อธิปฺเปโต, โส จ สพฺพนฺติเมน ปริจฺเฉเทน มชฺฌนฺหิโก, ตสฺมึ วีติวตฺเตติ อธิปฺปาโย. เตเนวสฺส ปทภาชเน ‘‘วิกาโล นาม มชฺฌนฺหิเก วีติวตฺเต ยาว อรุณุคฺคมนา’’ติ วุตฺตํ, ฐิตมชฺฌนฺหิโกปิ กาลสงฺคหํ คจฺฉติ. ตโต ปฏฺฐาย ปน ขาทิตุํ วา ภุญฺชิตุํ วา น สกฺกา, สหสา ปิวิตุํ สกฺกา ภเวยฺย, กุกฺกุจฺจเกน ปน น กตฺตพฺพํ. กาลปริจฺเฉทชานนตฺถญฺจ กาลตฺถมฺโภ โยเชตพฺโพ, กาลนฺตเรว ภตฺตกิจฺจํ กาตพฺพํ. २४८-९. 'विकाल' म्हणजे योग्य वेळ निघून गेल्यावर (अवेळी). 'काल' म्हणजे भिक्खूंच्या भोजनाची वेळ अभिप्रेत आहे, आणि ती वेळ अंतिम मर्यादेनुसार मध्यान्ह (दुपार) पर्यंत असते. ती मध्यान्हाची वेळ उलटून गेल्यावर, असा याचा अभिप्राय आहे. म्हणूनच याच्या पदभाजनात भगवंतांनी म्हटले आहे – 'विकाल म्हणजे मध्यान्ह उलटून गेल्यापासून ते अरुणोदयापर्यंतचा काळ होय.' स्थिर मध्यान्ह काळ (सूर्य डोक्यावर स्थिरावण्याची वेळ) देखील योग्य काळातच समाविष्ट होतो. परंतु, त्या वेळेपासून पुढे खाणे किंवा जेवणे शक्य नाही. घाईघाईने पिणे कदाचित शक्य होईल, परंतु शंका घेणाऱ्या भिक्खूने तसे करू नये. काळाची मर्यादा समजण्यासाठी कालस्तंभ (सावली मोजणारा खांब) वापरावा आणि योग्य काळातच भोजनाचे कार्य केले पाहिजे. อวเสสํ [Pg.99] ขาทนียํ นามาติ เอตฺถ ยํ ตาว สกฺขลิโมทกาทิปุพฺพณฺณาปรณฺณมยํ, ตตฺถ วตฺตพฺพเมว นตฺถิ. ยมฺปิ วนมูลาทิปฺปเภทํ อามิสคติกํ โหติ, เสยฺยถิทํ – มูลขาทนียํ กนฺทขาทนียํ มูฬาลขาทนียํ มตฺถกขาทนียํ ขนฺธขาทนียํ ตจขาทนียํ ปตฺตขาทนียํ ปุปฺผขาทนียํ ผลขาทนียํ อฏฺฐิขาทนียํ ปิฏฺฐขาทนียํ นิยฺยาสขาทนียนฺติ, อิทมฺปิ ขาทนียสงฺขฺยเมว คจฺฉติ. 'अवशिष्ट खादनिय' या संदर्भात – जे खाजा, लाडू इत्यादी धान्य व डाळींपासून बनवलेले अन्न आहे, त्याविषयी काही सांगण्याची गरजच नाही (ते खादनिय आहेच). परंतु जे जंगलातील मुळे इत्यादी प्रकारांचे असून आमिष-तुल्य (अन्नासारखे) असते, जसे की – मूळ-खादनिय, कंद-खादनिय, मुळाल-खादनिय (कमळ-देठ), मस्तक-खादनिय (अंकुर), स्कंध-खादनिय (खोड), त्वचा-खादनिय (साल), पत्र-खादनिय (पाने), पुष्प-खादनिय (फुले), फल-खादनिय (फळे), अठ्ठि-खादनिय (बिया), पीठ-खादनिय आणि निर्यास-खादनिय (चिक/डिंक); हे सर्व देखील खादनिय वर्गातच गणले जाते. ตตฺถ ปน อามิสคติกสลฺลกฺขณตฺถํ อิทํ มุขมตฺตนิทสฺสนํ – มูลขาทนีเย ตาว มูลกมูลํ ขารกมูลํ จจฺจุมูลํ ตมฺพกมูลํ ตณฺฑุเลยฺยกมูลํ วตฺถุเลยฺยกมูลํ วชกลิมูลํ ชชฺฌรีมูลนฺติ เอวมาทีนิ สูเปยฺยปณฺณมูลานิ อามิสคติกานิ. เอตฺถ จ วชกลิมูเล ชรฏฺฐํ ฉินฺทิตฺวา ฉฑฺเฑนฺติ, ตํ ยาวชีวิกํ โหติ. อญฺญมฺปิ เอวรูปํ เอเตเนว นเยน เวทิตพฺพํ. มูลกขารกชชฺฌรีมูลานํ ปน ชรฏฺฐานิปิ อามิสคติกาเนวาติ วุตฺตํ. ยานิ ปน ปาฬิยํ – त्यामध्ये, आमिष-तुल्य (अन्नासारखे) असणारे ओळखण्यासाठी हे केवळ एक उदाहरण आहे – मूळ-खादनिमध्ये प्रथम मुळ्याचे मूळ, खारकाचे मूळ, चच्चूचे मूळ, तांबड्या भाजीचे मूळ, तांदुळजाचे मूळ, वास्तुक भाजीचे मूळ, वजकलीचे मूळ आणि जज्झरीचे मूळ इत्यादी भाजी बनवण्यायोग्य पानांच्या वनस्पतींची मुळे आमिष-तुल्य असतात. आणि यामध्ये वजकलीच्या मुळाचा जुनाट (पक्व) भाग कापून फेकून देतात, तो भाग 'यावजीविक' असतो. इतरही अशाच प्रकारच्या वनस्पतींच्या बाबतीत याच पद्धतीने समजून घ्यावे. परंतु मुळा, खारक आणि जज्झरी यांच्या मुळांचे जुनाट (पक्व) भाग देखील आमिष-तुल्यच असतात, असे म्हटले आहे. आणि जी पाळीमध्ये – ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, มูลานิ เภสชฺชานิ หลิทฺทึ สิงฺคิเวรํ วจํ วจตฺตํ อติวิสํ กฏุกโรหิณึ อุสีรํ ภทฺทมุตฺตกํ, ยานิ วา ปนญฺญานิปิ อตฺถิ มูลานิ เภสชฺชานิ เนว ขาทนีเย ขาทนียตฺถํ ผรนฺติ, น โภชนีเย โภชนียตฺถํ ผรนฺตี’’ติ (มหาว. ๒๖๓) – "भिक्खूंनो, मी औषधी मुळांना अनुमती देतो – हळद, आले, वेखंड, सुगंधी वेखंड, अतिविष, कुटकी, वाळा, नागरमोथा, किंवा इतरही जी औषधी मुळे आहेत, जी खादनिय पदार्थांमध्ये खाद्याचे काम करत नाहीत आणि भोजनिय पदार्थांमध्ये भोजनाचे काम करत नाहीत." วุตฺตานิ, ตานิ ยาวชีวิกานิ. เตสํ จูฬปญฺจมูลํ มหาปญฺจมูลนฺติอาทินา นเยน คณิยมานานํ คณนาย อนฺโต นตฺถิ. ขาทนียตฺถํ โภชนียตฺถญฺจ ผรณาภาโวเยว ปน เตสํ ลกฺขณํ. ตสฺมา ยํกิญฺจิ มูลํ เตสุ เตสุ ชนปเทสุ ปกติอาหารวเสน มนุสฺสานํ ขาทนียตฺถํ โภชนียตฺถญฺจ ผรติ, ตํ ยาวกาลิกํ; อิตรํ ยาวชีวิกนฺติ เวทิตพฺพํ. เตสุ พหุํ วตฺวาปิ หิ อิมสฺมึเยว ลกฺขเณ ฐาตพฺพํ. นามสญฺญาสุ ปน วุจฺจมานาสุ ตํ ตํ นามํ อชานนฺตานํ สมฺโมโหเยว โหติ, ตสฺมา นามสญฺญาย อาทรํ อกตฺวา ลกฺขณเมว ทสฺสิตํ. असे म्हटले आहे, ती 'यावजीविक' आहेत. त्यांची 'चूळपंचमूळ', 'महापंचमूळ' इत्यादी पद्धतीने गणना केल्यास त्या संख्येला अंत नाही. परंतु, खादनिय किंवा भोजनिय पदार्थांचे काम न करणे, हेच त्यांचे लक्षण आहे. म्हणून, जे कोणतेही मूळ त्या त्या प्रदेशांत नेहमीच्या आहाराच्या रूपात माणसांच्या खादनिय किंवा भोजनिय पदार्थांचे काम करते, ते 'यावकालिक' समजावे; आणि इतर (जे आहाराचे काम करत नाही ते) 'यावजीविक' समजावे. त्यांच्याविषयी खूप काही सांगितले तरी याच लक्षणावर ठाम राहिले पाहिजे. कारण नावांच्या संज्ञा सांगितल्या असता, ती ती नावे न जाणणाऱ्या लोकांचा गोंधळच उडतो, म्हणून नावांच्या संज्ञेकडे विशेष लक्ष न देता केवळ लक्षणच दाखवले आहे. ยถา จ มูเล; เอวํ กนฺทาทีสุปิ ยํ ลกฺขณํ ทสฺสิตํ, ตสฺเสว วเสน วินิจฺฉโย เวทิตพฺโพ. ยญฺจ ตํ ปาฬิยํ หลิทฺทาทิ อฏฺฐวิธํ วุตฺตํ, ตสฺส ขนฺธตจปุปฺผผลมฺปิ สพฺพํ ยาวชีวิกนฺติ วุตฺตํ. आणि ज्याप्रमाणे मुळांच्या बाबतीत; त्याचप्रमाणे कंद इत्यादींच्या बाबतीतही जे लक्षण दाखवले आहे, त्यानुसारच निर्णय समजून घ्यावा. आणि पाळीमध्ये हळद इत्यादी जे आठ प्रकारचे औषध सांगितले आहे, त्याचे खोड, साल, फूल आणि फळ हे सर्व देखील 'यावजीविक' आहे, असे म्हटले आहे. กนฺทขาทนีเย [Pg.100] ทุวิโธ กนฺโท – ทีโฆ จ รสฺโส จ ภิสกึสุกกนฺทาทิ วฏฺโฏ อุปฺปลกเสรุกกนฺทาทิ, ยํ ‘‘คณฺฐี’’ติปิ วทนฺติ. ตตฺถ สพฺเพสํ กนฺทานํ ชิณฺณชรฏฺฐานญฺจ ฉลฺลิ จ สุขุมมูลานิ จ ยาวชีวิกานิ. ตรุโณ ปน สุขขาทนีโย, สาลกลฺยาณีโปตกกนฺโท กึสุกโปตกกนฺโท อมฺพาฏกกนฺโท เกตกกนฺโท มาลุวกนฺโท ภิสสงฺขาโต ปทุมปุณฺฑรีกกนฺโท ปิณฺฑาลุมสาลุอาทโย จ ขีรวลฺลิกนฺโท อาลุวกนฺโท สิคฺคุกนฺโท ตาลกนฺโท นีลุปฺปลรตฺตุปฺปลกุมุทโสคนฺธิกานํ กนฺทา กทลิกนฺโท เวฬุกนฺโท กเสรุกกนฺโทติ เอวมาทโย เตสุ เตสุ ชนปเทสุ ปกติอาหารวเสน มนุสฺสานํ ขาทนียตฺถญฺจ โภชนียตฺถญฺจ ผรณกกนฺทา ยาวกาลิกา. कंद-खादनिमध्ये कंद दोन प्रकारचे असतात – लांब आणि गोल. कमळ-देठ, पळसाचा कंद इत्यादी लांब कंद; आणि गोल कंद जसे की कमळ-कंद, कशेरुक इत्यादी, ज्याला 'गाठ' (ग्रंथी) असेही म्हणतात. त्यामध्ये सर्व कंदांचे जुने व कडक झालेले भाग, त्यांची साल आणि बारीक मुळे ही 'यावजीविक' असतात. परंतु कोवळे आणि सहज खाण्यायोग्य असणारे – सालकल्याणीचा कोवळा कंद, पळसाचा कोवळा कंद, अंबाड्याचा कंद, केवड्याचा कंद, मालुवाचा कंद, 'भिस' (कमळ-देठ) म्हणून ओळखला जाणारा पद्म आणि पुंडरीक कमळाचा कंद, पिंडाळू, साळू इत्यादी, खीरवल्लीचा कंद, अळूचा कंद, शेवग्याचा कंद, ताडाचा कंद, निळे कमळ, तांबडे कमळ, कुमुद आणि सौगंधिक कमळांचे कंद, केळीचा कंद, बांबूचा कंद आणि कशेरुक कंद इत्यादी जे त्या त्या प्रदेशांत नेहमीच्या आहाराच्या रूपात माणसांच्या खादनिय किंवा भोजनिय पदार्थांचे काम करणारे कंद आहेत, ते 'यावकालिक' असतात. ขีรวลฺลิกนฺโท อโธโต ยาวชีวิโก, โธโต ยาวกาลิโก. ขีรกาโกลีชีวิกอุสภกลสุณาทิกนฺทา ปน ยาวชีวิกา. เต ปาฬิยํ – ‘‘ยานิ วา ปนญฺญานิปิ อตฺถิ มูลานิ เภสชฺชานี’’ติ เอวํ มูลเภสชฺชสงฺคเหเนว สงฺคหิตา. खीरवल्लीचा कंद न धुतलेला असताना 'यावजीविक' असतो, आणि धुतलेला असताना 'यावकालिक' असतो. परंतु क्षीरकाकोली, जीवक, ऋषभक, लसूण इत्यादी कंद 'यावजीविक' असतात. ते पाळीमध्ये 'किंवा इतरही जी औषधी मुळे आहेत' यानुसार मूळ-औषधांच्या संग्रहातच समाविष्ट केले गेले आहेत. มูฬาลขาทนีเย ปน ปทุมมูฬาลํ ปุณฺฑรีกมุฬาลสทิสเมว. เอรกมูลํ กนฺทุลมูลนฺติ เอวมาทิ เตสุ เตสุ ชนปเทสุ ปกติอาหารวเสน มนุสฺสานํ ขาทนียตฺถญฺจ โภชนียตฺถญฺจ ผรณกมุฬาลํ ยาวกาลิกํ. หลิทฺทิสิงฺคิเวรมกจิจตุรสฺสวลฺลิเกตกตาลหินฺตาลกุนฺตาลนาฬิเกรปูครุกฺขาทิมุฬาลํ ปน ยาวชีวิกํ, ตํ สพฺพมฺปิ ปาฬิยํ – ‘‘ยานิ วา ปนญฺญานิปิ อตฺถิ มูลานิ เภสชฺชานี’’ติ (มหาว. ๒๖๓) เอวํ มูลเภสชฺชสงฺคเหเนว สงฺคหิตํ. मुळाल-खादनिमध्ये पद्म कमळाचा कोंब हा पुंडरीक कमळाच्या कोंबासारखाच असतो. एरकाचे कोंब, कंदुलाचे कोंब इत्यादी जे त्या त्या प्रदेशांत नेहमीच्या आहाराच्या रूपात माणसांच्या खादनिय किंवा भोजनिय पदार्थांचे काम करणारे कोंब आहेत, ते 'यावकालिक' असतात. परंतु हळद, आले, मकची, चतुरसवल्ली, केवडा, ताड, हिंताल, कुंताल, नारळ, सुपारी इत्यादी झाडांचे कोंब 'यावजीविक' असतात. ते सर्व देखील पाळीमध्ये 'किंवा इतरही जी औषधी मुळे आहेत' यानुसार मूळ-औषधांच्या संग्रहातच समाविष्ट केले गेले आहेत. มตฺถกขาทนีเย ตาลหินฺตาลกุนฺตาลเกตกนาฬิเกรปูครุกฺขขชฺชูรีเวตฺตเอรกกทลีนํ กฬีรสงฺขาตา มตฺถกา เวณุกฬีโร นฬกฬีโร อุจฺฉุกฬีโร มูลกกฬีโร สาสปกฬีโร สตาวริกฬีโร สตฺตนฺนํ ธญฺญานํ กฬีราติ เอวมาทิ เตสุ เตสุ ชนปเทสุ ปกติอาหารวเสน มนุสฺสานํ ขาทนียตฺถํ โภชนียตฺถญฺจ ผรณโก รุกฺขวลฺลิอาทีนํ มตฺถโก ยาวกาลิโก. หลิทฺทิสิงฺคิเวรวจมกจิลสุณานํกฬีรา ตาลหินฺตาลกุนฺตาลนาฬิเกรกฬีรานญฺจ ฉินฺทิตฺวา ปาติโต ชรฏฺฐพุนฺโท ยาวชีวิโก. अंकुर किंवा शेंडे खाण्यायोग्य पदार्थांमध्ये (मत्थकखादनीयात) – ताड, हिंताल, कुंतल, केतकी, नारळ, सुपारी, खजूर, वेत, एरका आणि केळी इत्यादींचे अंकुर म्हणून ओळखले जाणारे शेंडे; बांबूचा अंकुर, नळाचा अंकुर, उसाचा अंकुर, मुळ्याचा अंकुर, मोहरीचा अंकुर, शतावरीचा अंकुर आणि सात प्रकारच्या धान्यांचे अंकुर इत्यादी; त्या त्या प्रदेशांमध्ये नेहमीचा आहार म्हणून मनुष्यांच्या खाण्याचे व जेवणाचे प्रयोजन पूर्ण करणारे वृक्ष, वेली इत्यादींचे शेंडे (अंकुर) हे 'यावकालिक' (दुपारपर्यंत ग्रहण करण्यायोग्य) असतात. हळद, आले, वेखंड, चवक व लसूण यांचे अंकुर; आणि ताड, हिंताल, कुंतल व नारळ यांच्या अंकुरांना कापून पाडलेला पक्व कंद (गाठ) हे 'यावजीविक' (आयुष्यभर औषध म्हणून वापरता येणारे) असतात। ขนฺธขาทนีเย [Pg.101] อนฺโตปถวีคโต สาลกลฺยาณีขนฺโธ อุจฺฉุขนฺโธ นีลุปฺปลรตฺตุปฺปลกุมุทโสคนฺธิกานํ ขนฺธกาติ เอวมาทิ เตสุ เตสุ ชนปเทสุ ปกติอาหารวเสน มนุสฺสานํ ขาทนียตฺถํ โภชนียตฺถญฺจ ผรณโก ขนฺโธ ยาวกาลิโก. อุปฺปลชาตีนํ ปณฺณทณฺฑโก ปทุมชาตีนํ สพฺโพปิ ทณฺฑโก การวินฺทกทณฺฑาทโย จ อวเสสสพฺพขนฺธา ยาวชีวิกา. खोड किंवा कांडे खाण्यायोग्य पदार्थांमध्ये (खंधखादनीयात) – जमिनीच्या आत असलेले सालकल्याणीचे खोड, उसाचे खोड, नीलकमळ, रक्तकमळ, कुमुद आणि सौगंधिक कमळांचे खोड इत्यादी; त्या त्या प्रदेशांमध्ये नेहमीचा आहार म्हणून मनुष्यांच्या खाण्याचे व जेवणाचे प्रयोजन पूर्ण करणारे खोड हे 'यावकालिक' असतात. उत्पल (कमळ) जातीच्या पानांचे देठ, पद्म (कमळ) जातीचे सर्वच देठ, कारविन्दकाचे देठ इत्यादी आणि उरलेले इतर सर्व खोड हे 'यावजीविक' असतात। ตจขาทนีเย อุจฺฉุตโจว เอโก ยาวกาลิโก, โสปิ สรโส. เสโส สพฺโพ ยาวชีวิโก. เตสํ ปน มตฺถกขนฺธตจานํ ติณฺณํ ปาฬิยํ กสาวเภสชฺเชน สงฺคโห เวทิตพฺโพ. วุตฺตญฺเหตํ – साल किंवा त्वचा खाण्यायोग्य पदार्थांमध्ये (तचखादनीयात) – केवळ उसाची सालच एकटी 'यावकालिक' आहे, तीसुद्धा रसाने युक्त (ओली) असतानाच. उरलेली सर्व साल 'यावजीविक' आहे. आणि त्या अंकुर, खोड आणि साल या तिन्हींचा पाळीमध्ये (विनय पाठात) कषाय (तुरट) औषधांमध्ये समावेश समजला पाहिजे. कारण भगवंतांनी असे म्हटले आहे – ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, กสาวานิ เภสชฺชานิ นิมฺพกสาวํ, กุฏชกสาวํ, ปโฏลกสาวํ, ผคฺควกสาวํ นตฺตมาลกสาวํ, ยานิ วา ปนญฺญานิปิ อตฺถิ กสาวานิ เภสชฺชานิ เนว ขาทนีเย ขาทนียตฺถํ ผรนฺติ, น โภชนีเย โภชนียตฺถํ ผรนฺตี’’ติ (มหาว. ๒๖๓). “भिक्खूहो, मी कषाय (तुरट) औषधांना अनुमती देतो – कडुनिंबाचा कषाय, कुटजाचा कषाय, पडवळाचा कषाय, फग्गवाचा कषाय, करंजाचा कषाय, किंवा इतरही जे काही कषाय औषधे आहेत, जे खाण्याच्या पदार्थांमध्ये खाण्याचे प्रयोजन पूर्ण करत नाहीत आणि जेवणाच्या पदार्थांमध्ये जेवणाचे प्रयोजन पूर्ण करत नाहीत।” เอตฺถ หิ เอเตสมฺปิ สงฺคโห สิชฺฌติ. วุตฺตกสาวานิ จ สพฺพานิ กปฺปิยานีติ เวทิตพฺพานิ. कारण येथे यांचाही (अंकुर, खोड व साल यांचाही) समावेश सिद्ध होतो. आणि सांगितलेले सर्व कषाय कल्प्य (स्वीकारण्यास योग्य) आहेत असे समजले पाहिजे। ปตฺตขาทนีเย มูลกํ ขารโก จจฺจุ ตมฺพโก ตณฺฑุเลยฺยโก ปปุนฺนาโค วตฺถุเลยฺยโก วชกลิ ชชฺฌรี เสลฺลุ สิคฺคุ กาสมทฺทโก อุมฺมา จีนมุคฺโค มาโส ราชมาโส ฐเปตฺวา มหานิปฺผาวํ อวเสสนิปฺผาโว อคฺคิมนฺโถ สุนิสนฺนโก เสตวรโณ นาฬิกา ภูมิยํ ชาตโลณีติ เอเตสํ ปตฺตานิ อญฺญานิ จ เอวรูปานิ เตสุ เตสุ ชนปเทสุ ปกติอาหารวเสน มนุสฺสานํ ขาทนียตฺถํ โภชนียตฺถญฺจ ผรณกานิ ปตฺตานิ เอกํเสน ยาวกาลิกานิ. ยา ปนญฺญา มหานขปิฏฺฐิมตฺตา ปณฺณโลณิ รุกฺเข จ คจฺเฉ จ อาโรหติ, ตสฺสา ปตฺตํ ยาวชีวิกํ. พฺรหฺมีปตฺตญฺจ ยาวกาลิกนฺติ ทีปวาสิโน วทนฺติ. อมฺพปลฺลวํ ยาวกาลิกํ, อโสกปลฺลวํ ปน ยาวชีวิกํ. पाने खाण्यायोग्य पदार्थांमध्ये (पत्तखादनीयात) – मुळा, खारको, चच्चु, तांबको, तांदुळजा, टाकळा, चाकवत, वजकली, जज्झरी, शेळू, शेवगा, कासवंदा, अळशी, मूग, उडीद, राजमा, मोठे पावटे वगळून उरलेले पावटे, अरणी, सुनिषण्णक, पांढरा वरण, naळिका आणि जमिनीवर उगवणारी घोळ भाजी; यांची पाने आणि यांसारखी इतर पाने, जी त्या त्या प्रदेशांमध्ये नेहमीचा आहार म्हणून मनुष्यांच्या खाण्याचे व जेवणाचे प्रयोजन पूर्ण करतात, ती निश्चितपणे 'यावकालिक' असतात. परंतु जी दुसरी मोठ्या नखाच्या पाठीच्या आकाराची पाने असलेली घोळ भाजी झाडांवर आणि झुडपांवर चढते, तिचे पान 'यावजीविक' असते. ब्राह्मीचे पान 'यावकालिक' असते असे द्वीपवासी (श्रीलंकेतील रहिवासी) म्हणतात. आंब्याची पालवी 'यावकालिक' असते, परंतु अशोकाची पालवी 'यावजीविक' असते। ยานิ วา ปนญฺญานิ ปาฬิยํ – किंवा इतर जी पाने पाळीमध्ये (विनय पाठात) – ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, ปณฺณานิ เภสชฺชานิ นิมฺพปณฺณํ กุฏชปณฺณํ ปโฏลปณฺณํ สุลสิปณฺณํ กปฺปาสกปณฺณํ ยานิ วา ปนญฺญานิปิ อตฺถิ [Pg.102] ปณฺณานิ เภสชฺชานิ เนว ขาทนีเย ขาทนียตฺถํ ผรนฺติ น โภชนีเย โภชนียตฺถํ ผรนฺตี’’ติ (มหาว. ๒๖๓) – “भिक्खूहो, मी औषधी पानांना अनुमती देतो – कडुनिंबाचे पान, कुटजाचे पान, पडवळाचे पान, तुळशीचे पान, कपाशीचे पान, किंवा इतरही जी काही औषधी पाने आहेत, जे खाण्याच्या पदार्थांमध्ये खाण्याचे प्रयोजन पूर्ण करत नाहीत आणि जेवणाच्या पदार्थांमध्ये जेवणाचे प्रयोजन पूर्ण करत नाहीत।” วุตฺตานิ, ตานิ ยาวชีวิกานิ. น เกวลญฺจ ปณฺณานิเยว เตสํ ปุปฺผผลาทีนิปิ ยาวชีวิกานิ. ปณฺณานํ ผคฺควปณฺณํ อชฺชุกปณฺณํ ผณิชฺชกปณฺณํ ปโฏลปณฺณํ ตมฺพูลปณฺณํ ปทุมินิปณฺณนฺติ เอวํ คณนวเสน อนฺโต นตฺถิ. असे सांगितले आहे, ती पाने 'यावजीविक' असतात. आणि केवळ पानेच नव्हे, तर त्यांची फुले, फळे इत्यादी देखील 'यावजीविक' असतात. पानांमध्ये – फग्गवाचे पान, रानतुळशीचे पान, मरव्याचे पान, पडवळाचे पान, विड्याचे पान, कमळाचे पान इत्यादी, अशा प्रकारे मोजायला गेल्यास त्यांचा अंत नाही। ปุปฺผขาทนีเย มูลกปุปฺผํ ขารกปุปฺผํ จจฺจุปุปฺผํ ตมฺพกปุปฺผํ วชกลิปุปฺผํ ชชฺฌรีปุปฺผํ จูฬนิปฺผาวปุปฺผํ มหานิปฺผาวปุปฺผํ กเสรุกปุปฺผํ นาฬิเกรตาลเกตกานํ ตรุณปุปฺผานิ เสตวรณปุปฺผํ สิคฺคุปุปฺผํ อุปฺปลปทุมชาติกานํ ปุปฺผานิ กณฺณิกมตฺตํ อคนฺธิกปุปฺผํ กฬีรปุปฺผํ ชีวนฺตีปุปฺผนฺติ เอวมาทิ เตสุ เตสุ ชนปเทสุ ปกติอาหารวเสน มนุสฺสานํ ขาทนียตฺถํ โภชนียตฺถญฺจ ผรณกปุปฺผํ ยาวกาลิกํ. อโสกพกุลกุยฺยกปุนฺนาคจมฺปกชาติกณวีรกณิการกุนฺทนวมาลิกมลฺลิกาทีนํ ปน ปุปฺผํ ยาวชีวิกํ ตสฺส คณนาย อนฺโต นตฺถิ. ปาฬิยํ ปนสฺส กสาวเภสชฺเชเนว สงฺคโห เวทิตพฺโพ. फुले खाण्यायोग्य पदार्थांमध्ये (पुप्फखादनीयात) – मुळ्याचे फूल, खारकोचे फूल, चच्चुचे फूल, तांबकोचे फूल, वजकलीचे फूल, जज्झरीचे फूल, लहान पावट्याचे फूल, मोठ्या पावट्याचे फूल, कशेरुकाचे फूल, नारळ, ताड व केतकीची कोवळी फुले, पांढऱ्या वरणाचे फूल, शेवग्याचे फूल, उत्पल व पद्म जातीच्या कमळांची फुले, केवळ फुलांच्या मध्यभागासारखे असणारे सुवास नसलेले पळसाचे फूल, कळीराचे फूल आणि जिवंतीचे फूल इत्यादी; त्या त्या प्रदेशांमध्ये नेहमीचा आहार म्हणून मनुष्यांच्या खाण्याचे व जेवणाचे प्रयोजन पूर्ण करणारे फूल हे 'यावकालिक' असते. परंतु अशोक, बकुळ, कुय्यक, पुन्नाग, चाफा, जाई, कण्हेर, कर्णिकार, कुंद, नवमालिका, मोगरा इत्यादींची फुले 'यावजीविक' असतात, त्यांची गणना करण्यास अंत नाही. आणि पाळीमध्ये (विनय पाठात) याचा कषाय औषधांमध्येच समावेश समजला पाहिजे। ผลขาทนีเย ปนสลพุชตาลนาฬิเกรอมฺพชมฺพูอมฺพาฏกตินฺติณิกมาตุลุงฺคกปิตฺถลาพุกุมฺภณฺฑปุสฺสผลติมฺพรูสกติปุสวาติงฺคณโจจโมจมธุกาทีนํ ผลานิ ยานิ โลเก เตสุ เตสุ ชนปเทสุ ปกติอาหารวเสน มนุสฺสานํ ขาทนียตฺถํ โภชนียตฺถญฺจ ผรนฺติ, สพฺพานิ ตานิ ยาวกาลิกานิ. นามคณนวเสน เนสํ น สกฺกา ปริยนฺตํ ทสฺเสตุํ. ยานิ ปน ปาฬิยํ – फळे खाण्यायोग्य पदार्थांमध्ये (फलखादनीयात) – फणस, बडहर, ताड, नारळ, आंबा, जांभूळ, अंबाडा, चिंच, महाळुंग, कवठ, दुधी भोपळा, कोहळा, काकडी (पुस्सफल), टेंभुर्णी, काकडी (तिपुस), वांगे, रानकेळी, केळी, महुआ इत्यादींची जी फळे जगात आहेत, जी त्या त्या प्रदेशांमध्ये नेहमीचा आहार म्हणून मनुष्यांच्या खाण्याचे व जेवणाचे प्रयोजन पूर्ण करतात, ती सर्व फळे 'यावकालिक' असतात. नावांच्या गणनेनुसार त्यांची मर्यादा दाखवणे शक्य नाही. परंतु जी पाळीमध्ये (विनय पाठात) – ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, ผลานิ เภสชฺชานิ – พิลงฺคํ, ปิปฺผลึ, มริจํ, หรีตกํ, วิภีตกํ, อามลกํ, โคฏฺฐผลํ, ยานิ วา ปนญฺญานิปิ อตฺถิ ผลานิ เภสชฺชานิ เนว ขาทนีเย ขาทนียตฺถํ ผรนฺติ น โภชนีเย โภชนียตฺถํ ผรนฺตี’’ติ (มหาว. ๒๖๓) – “भिक्खूहो, मी औषधी फळांना अनुमती देतो – वावडिंग, पिंपळी, मिरी, हिरडा, बेहडा, आवळा, गोठफल, किंवा इतरही जी काही औषधी फळे आहेत, जे खाण्याच्या पदार्थांमध्ये खाण्याचे प्रयोजन पूर्ण करत नाहीत आणि जेवणाच्या पदार्थांमध्ये जेवणाचे प्रयोजन पूर्ण करत नाहीत।” วุตฺตานิ, ตานิ ยาวชีวิกานิ. เตสมฺปิ อปริปกฺกานิ อจฺฉิว พิมฺพวรณเกตกกาสฺมรีอาทีนํ ผลานิ ชาติผลํ กฏุกผลํ เอฬา ตกฺโกลนฺติ เอวํ นามวเสน น สกฺกา ปริยนฺตํ ทสฺเสตุํ. असे सांगितले आहे, ती फळे 'यावजीविक' असतात. त्यांची देखील न पिकलेली (कच्ची) फळे; अच्छिव, तोंडली, वायवर्ण, केतकी, शिवण इत्यादींची फळे; जायफळ, कुटकी, वेलची, तक्कोल इत्यादी, अशा प्रकारे नावांच्या आधारे त्यांची मर्यादा दाखवणे शक्य नाही। อฏฺฐิขาทนีเย [Pg.103] ลพุชฏฺฐิ ปนสฏฺฐิ อมฺพาฏกฏฺฐิ สาลฏฺฐิ ขชฺชูรีเกตกติมฺพรูสกานํ ตรุณผลฏฺฐิ ตินฺติณิกฏฺฐิ พิมฺพผลฏฺฐิ อุปฺปล ปทุมชาตีนํ โปกฺขรฏฺฐีติ เอวมาทีนิ เตสุ เตสุ ชนปเทสุ มนุสฺสานํ ปกติอาหารวเสน ขาทนียตฺถํ โภชนียตฺถญฺจ ผรณกานิ อฏฺฐีนิ ยาวกาลิกานิ. มธุกฏฺฐิ ปุนฺนาคฏฺฐิ หรีตกาทีนํ อฏฺฐีนิ สิทฺธตฺถกฏฺฐิ ราชิกฏฺฐีติ เอวมาทีนิ อฏฺฐีนิ ยาวชีวิกานิ. เตสํ ปาฬิยํ ผลเภสชฺเชเนว สงฺคโห เวทิตพฺโพ. बिया खाण्यायोग्य पदार्थांमध्ये (अट्ठिखादनीयात) – बडहरची बी, फणसाची बी, अंबाड्याची बी, साल वृक्षाची बी, khजूर, केतकी व टेंभुर्णीच्या कोवळ्या फळांची बी, चिंचेची बी, तोंडल्याची बी, उत्पल व पद्म जातीच्या कमळांच्या बिया इत्यादी; त्या त्या प्रदेशांमध्ये मनुष्यांच्या नेहमीचा आहार म्हणून खाण्याचे व जेवणाचे प्रयोजन पूर्ण करणाऱ्या बिया या 'यावकालिक' असतात. महुआची बी, पुन्नागाची बी, हिरडा इत्यादींच्या बिया, पांढऱ्या मोहरीची बी, काळ्या मोहरीची बी इत्यादी बिया 'यावजीविक' असतात. पाळीमध्ये (विनय पाठात) त्यांचा फल औषधांमध्येच समावेश समजला पाहिजे। ปิฏฺฐขาทนีเย สตฺตนฺนํ ตาว ธญฺญานํ ธญฺญานุโลมานํ อปรณฺณานญฺจ ปิฏฺฐํ ปนสปิฏฺฐํ ลพุชปิฏฺฐํ อมฺพาฏกปิฏฺฐํ สาลปิฏฺฐํ โธตกตาลปิฏฺฐญฺจ ขีรวลฺลิปิฏฺฐญฺจาติ เอวมาทีนิ เตสุ เตสุ ชนปเทสุ ปกติอาหารวเสน มนุสฺสานํ ขาทนียตฺถํ โภชนียตฺถญฺจ ผรณกานิ ปิฏฺฐานิ ยาวกาลิกานิ. อโธตกํ ตาลปิฏฺฐํ ขีรวลฺลิปิฏฺฐํ อสฺสคนฺธาทิปิฏฺฐานิ จ ยาวชีวิกานิ. เตสํ ปาฬิยํ กสาเวหิ จ มูลผเลหิ จ สงฺฆโห เวทิตพฺโพ. पिठाच्या खाद्यपदार्थांमध्ये (पिठखादनीय) प्रथम सात प्रकारच्या धान्यांचे, धान्यासारख्या इतर पदार्थांचे आणि डाळींचे पीठ, फणसाच्या बियांचे पीठ, बडहर (तांबड्या फणसाच्या) बियांचे पीठ, अंबाड्याच्या बियांचे पीठ, सालाच्या बियांचे पीठ, धुवून स्वच्छ केलेले ताडाच्या बियांचे पीठ आणि क्षीरवल्लीचे पीठ इत्यादींचा समावेश होतो. त्या त्या जनपदांमध्ये नेहमीचा आहार म्हणून मनुष्यांच्या खाण्यासाठी आणि भोजनासाठी तृप्ती देणारे हे पीठ 'यावकालिक' असते. न धुवलेले ताडाच्या बियांचे पीठ, क्षीरवल्लीचे पीठ आणि अश्वगंधा इत्यादींचे पीठ हे 'यावजीविक' असते. पाळीमध्ये (मूळ पाठात) कषाय (काढे), मुळे आणि फळांमध्ये त्यांचा समावेश समजला पाहिजे. นิยฺยาสขาทนีเย เอโก อุจฺฉุนิยฺยาโสว สตฺตาหกาลิโก. เสสา ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, ชตูนิ เภสชฺชานิ – หิงฺคุํ หิงฺคุชตุํ หิงฺคุสิปาฏิกํ ตกํ ตกปตฺตึ ตกปณฺณึ สชฺชุลสํ ยานิ วา ปนญฺญานิปิ อตฺถิ ชตูนิ เภสชฺชานี’’ติ (มหาว. ๒๖๓) เอวํ ปาฬิยํ วุตฺตนิยฺยาสา ยาวชีวิกา. ตตฺถ เยวาปนกวเสน สงฺคหิตานํ อมฺพนิยฺยาโส กณิการนิยฺยาโสติ เอวํ นามวเสน น สกฺกา ปริยนฺตํ ทสฺเสตุํ. เอวํ อิเมสุ มูลขาทนียาทีสุ ยํกิญฺจิ ยาวกาลิกํ, สพฺพมฺปิ อิมสฺมึ อตฺเถ ‘‘อวเสสํ ขาทนียํ นามา’’ติ สงฺคหิตํ. डिंकाच्या खाद्यपदार्थांमध्ये (निय्यासखादनीय) केवळ एक उसाचा रस/चिक हा 'सप्ताहकालिक' आहे. उर्वरित, 'भिक्खूंनो, मी डिंकयुक्त औषधांना अनुमती देतो - हिंग, हिंगाचा डिंक, हिंगाची साल, लाख, लाखाचा रस, लाखाची पाने, राळ आणि इतरही जी काही डिंकयुक्त औषधे आहेत ती' अशा प्रकारे पाळीमध्ये सांगितलेले डिंक हे 'यावजीविक' आहेत. तेथे 'येवापनक' (इतर जे काही) या नियमाने समाविष्ट केलेल्या डिंकांमध्ये आंब्याचा डिंक, कण्णिकार (चाफ्याचा) डिंक इत्यादींचा नावांच्या आधारे अंत (मर्यादा) दाखवणे शक्य नाही. अशा प्रकारे या मूळ-खाद्यादींमध्ये जे काही यावकालिक आहे, ते सर्व या अर्थामध्ये 'अवशिष्ट खाद्य' (अवसेसं खादनीयं नाम) या संज्ञेखाली समाविष्ट केले आहे. โภชนียํ นาม ปญฺจ โภชนานีติอาทิมฺหิ ยํ วตฺตพฺพํ ตํ วุตฺตเมว. ขาทิสฺสามิ ภุญฺชิสฺสามีติ, ปฏิคฺคณฺหาตีติ โย ภิกฺขุ วิกาเล เอตํ ขาทนียํ โภชนียญฺจ ปฏิคฺคณฺหาติ, ตสฺส ปฏิคฺคหเณ ตาว อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺส. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. 'भोजनीय म्हणजे पाच प्रकारची भोजने' इत्यादींमध्ये जे सांगायचे आहे, ते आधीच (पहिल्या पवारणा सिक्खापदामध्ये) सांगितले आहे. 'मी खाईन, मी जेवेन' या उद्देशाने जो भिक्खू विकाल (अवेळी) हे खाद्य किंवा भोज्य ग्रहण करतो, त्याला ग्रहण केल्यामुळे प्रथम 'दुक्कट' आपत्ती होते. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กายโต จ กายจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. हे सिक्खापद एळकलोम (मेंढीच्या लोकरीच्या) सिक्खापदाप्रमाणे समुत्थान असणारे आहे - ते काय (शरीर) आणि काय-चित्त (शरीर व मन) यापासून समुत्थित होते; हे क्रिया-रूप आहे; संज्ञा (जाणीव) नसली तरी आपत्तीतून सुटका होत नाही; अचित्तक आहे; प्रज्ञप्तिवज्ज (बुद्धांच्या नियमाच्या उल्लंघनामुळे दोषयुक्त) आहे; कायकर्म आहे; त्रिचित्तक (तीन चित्त असणारे) आणि त्रिवेदना (तीन वेदना असणारे) आहे. วิกาลโภชนสิกฺขาปทํ สตฺตมํ. विकालभोजन सिक्खापद सातवे समाप्त. ๘. สนฺนิธิการกสิกฺขาปทวณฺณนา ८. सन्निधिकारक सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๒๕๒. อฏฺฐมสิกฺขาปเท [Pg.104] – เพลฏฺฐสีโส นาม ชฏิลสหสฺสพฺภนฺตโร มหาเถโร. อรญฺเญ วิหรตีติ เชตวนสฺส อวิทูเร ปธานฆเร เอกสฺมึ อาวาเส วสติ. สุกฺขกุรนฺติ อสูปพฺยญฺชนํ โอทนํ. โส กิร อนฺโตคาเม ภุญฺชิตฺวา ปจฺฉา ปิณฺฑาย จริตฺวา ตาทิสํ โอทนํ อาหรติ, ตญฺจ โข อปฺปิจฺฉตาย, น ปจฺจยคิทฺธตาย. เถโร กิร สตฺตาหํ นิโรธสมาปตฺติยา วีตินาเมตฺวา สมาปตฺติโต วุฏฺฐาย ตํ ปิณฺฑปาตํ อุทเกน เตเมตฺวา ภุญฺชติ, ตโต ปุน สตฺตาหํ สมาปตฺติยา นิสีทติ. เอวํ ทฺเวปิ ตีณิปิ จตฺตาริปิ สตฺตาหานิ วีตินาเมตฺวา คามํ ปิณฺฑาย ปวิสติ. เตน วุตฺตํ – ‘‘จิเรน คามํ ปิณฺฑาย ปวิสตี’’ติ. २५२. आठव्या सिक्खापदामध्ये - बेलट्ठसीस नावाचे एक महाथेर होते, जे एक हजार जटिलांपैकी एक होते. 'अरण्यात विहार करतात' म्हणजे ते जेतवनाच्या जवळच असलेल्या एका प्रधानघरात (ध्यानकुटीत) एका विहारात राहत असत. 'सुक्खकुरं' म्हणजे वरण-भाजी नसलेला कोरडा भात. असे म्हणतात की, ते गावात भोजन करून, नंतर पिंडाचारासाठी (भिक्षेसाठी) फिरून तसा कोरडा भात घेऊन येत असत; आणि ते देखील अल्पेच्छतेमुळे, साधनांच्या लोभामुळे नव्हे. असे म्हणतात की, ते थेर सात दिवस निरोध-समापत्तीमध्ये घालवून, समापत्तीमधून उठून, तो कोरडा पिंडपात पाण्याने ओला करून ग्रहण करत असत. त्यानंतर पुन्हा सात दिवस समापत्तीमध्ये बसत असत. अशा प्रकारे दोन, तीन किंवा चार आठवडे घालवून ते गावात भिक्षेसाठी प्रवेश करत असत. म्हणूनच संगीतिकार थेरांनी म्हटले आहे - 'ते बऱ्याच काळाने गावात भिक्षेसाठी प्रवेश करतात.' ๒๕๓. กาโร กรณํ กิริยาติ อตฺถโต เอกํ, สนฺนิธิกาโร อสฺสาติ สนฺนิธิการํ; สนฺนิธิการเมว สนฺนิธิการกํ. ปฏิคฺคเหตฺวา เอกรตฺตํ วีตินามิตสฺเสตํ อธิวจนํ. เตเนวสฺส ปทภาชเน วุตฺตํ – ‘‘สนฺนิธิการกํ นาม อชฺช ปฏิคฺคหิตํ อปรชฺชู’’ติ. २५३. 'कार', 'करण' आणि 'क्रिया' हे अर्थाच्या दृष्टीने एकच आहेत. ज्याचा संचय (सन्निधि) केला जातो, ते 'सन्निधिकार' होय; सन्निधिकार म्हणजेच 'सन्निधिकारक'. ग्रहण करून एक रात्र व्यतीत केलेल्या अन्नपदार्थाचे हे नाव (अधिवचन) आहे. म्हणूनच याच्या पदभाजनामध्ये म्हटले आहे - 'सन्निधिकारक म्हणजे आज ग्रहण केलेले आणि दुसऱ्या दिवशी (वापरलेले).' ปฏิคฺคณฺหาติ อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ เอวํ สนฺนิธิกตํ ยํกิญฺจิ ยาวกาลิกํ วา ยามกาลิกํ วา อชฺโฌหริตุกามตาย คณฺหนฺตสฺส ปฏิคฺคหเณ ตาว อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺส. อชฺโฌหรโต ปน เอกเมกสฺมึ อชฺโฌหาเร ปาจิตฺติยํ. สเจปิ ปตฺโต ทุทฺโธโต โหติ, ยํ องฺคุลิยา ฆํสนฺตสฺส เลขา ปญฺญายติ, คณฺฐิกปตฺตสฺส วา คณฺฐิกนฺตเร สฺเนโห ปวิฏฺโฐ โหติ, โส อุณฺเห โอตาเปนฺตสฺส ปคฺฆรติ, อุณฺหยาคุยา วา คหิตาย สนฺทิสฺสติ, ตาทิเส ปตฺเตปิ ปุนทิวเส ภุญฺชนฺตสฺส ปาจิตฺติยํ. ตสฺมา ปตฺตํ โธวิตฺวา ปุน ตตฺถ อจฺโฉทกํ วา อาสิญฺจิตฺวา องฺคุลิยา วา ฆํสิตฺวา นิสฺเนหภาโว ชานิตพฺโพ. สเจ หิ อุทเก วา สฺเนหภาโว ปตฺเต วา องฺคุลิเลขา ปญฺญายติ, ทุทฺโธโต โหติ. เตลวณฺณปตฺเต ปน องฺคุลิเลขา ปญฺญายติ, สา อพฺโพหาริกา. ยํ ภิกฺขู นิรเปกฺขา สามเณรานํ ปริจฺจชนฺติ, ตญฺเจ สามเณรา นิทหิตฺวา เทนฺติ, สพฺพํ วฏฺฏติ. สยํ ปฏิคฺคเหตฺวา อปริจฺจตฺตเมว หิ ทุติยทิวเส น วฏฺฏติ. ตโต หิ เอกสิตฺถมฺปิ อชฺโฌหรโต ปาจิตฺติยเมว. 'ग्रहण करतो, तर दुक्कट आपत्ती होते' म्हणजे अशा प्रकारे संचय केलेले कोणतेही यावकालिक किंवा यामकालिक अन्न खाण्याच्या इच्छेने ग्रहण करणाऱ्या भिक्खूला ग्रहण केल्यामुळे प्रथम 'दुक्कट' आपत्ती होते. आणि खाताना प्रत्येक घासागणिक 'पाचित्तिय' आपत्ती होते. जर पात्र नीट धुतलेले नसेल, ज्याला बोटाने घासले असता बोटाची रेघ दिसते, किंवा गाठ असलेल्या पात्राच्या गाठींच्या फटीत तेल/तूप (स्नेह) शिरलेले असते, जे उन्हात ठेवले असता वितळून बाहेर येते, किंवा गरम पेज घेतल्यावर तरंगताना दिसते, अशा पात्रात दुसऱ्या दिवशी भोजन करणाऱ्या भिक्खूला पाचित्तिय आपत्ती होते. म्हणून पात्र धुवून, पुन्हा त्यात स्वच्छ पाणी ओतून किंवा बोटाने घासून ते तेलकट नाही ना, याची खात्री करून घ्यावी. कारण जर पाण्यात तेलकटपणा किंवा पात्रावर बोटाची रेघ दिसत असेल, तर ते पात्र नीट धुतलेले नाही असे मानले जाते. परंतु तेलाच्या रंगाच्या पात्रावर जर बोटाची रेघ दिसत असेल, तर ती नगण्य (अब्बोहारिक) मानली जाते. जे अन्न भिक्खू निरपेक्ष होऊन श्रामणेरांना दान करतात, ते जर श्रामणेरांनी साठवून ठेवले आणि नंतर दिले, तर ते सर्व कल्प्य (योग्य) आहे. कारण स्वतः ग्रहण केलेले आणि न त्यागलेले अन्न दुसऱ्या दिवशी कल्प्य नसते. कारण त्यातील एक शीत (भाताचा कण) जरी खाल्ला, तरी पाचित्तिय आपत्तीच होते. อกปฺปิยมํเสสุ [Pg.105] มนุสฺสมํเส ถุลฺลจฺจเยน สทฺวึ ปาจิตฺติยํ, อวเสเสสุ ทุกฺกเฏน สทฺธึ. ยามกาลิกํ สติ ปจฺจเย อชฺโฌหรโต ปาจิตฺติยํ. อาหารตฺถาย อชฺโฌหรโต ทุกฺกเฏน สทฺธึ ปาจิตฺติยํ. สเจ ปวาริโต หุตฺวา อนติริตฺตกตํ อชฺโฌหรติ, ปกติอามิเส ทฺเว ปาจิตฺติยานิ, มนุสฺสมํเส ถุลฺลจฺจเยน สทฺธึ ทฺเว, เสสอกปฺปิยมํเส ทุกฺกเฏน สทฺธึ, ยามกาลิกํ สติ ปจฺจเย สามิเสน มุเขน อชฺโฌหรโต ทฺเว, นิรามิเสน เอกเมว. อาหารตฺถาย อชฺโฌหรโต วิกปฺปทฺวเยปิ ทุกฺกฏํ วฑฺฒติ. สเจ วิกาเล อชฺโฌหรติ, ปกติโภชเน สนฺนิธิปจฺจยา จ วิกาลโภชนปจฺจยา จ ทฺเว ปาจิตฺติยานิ, อกปฺปิยมํเสสุ ถุลฺลจฺจยญฺจ ทุกฺกฏญฺจ วฑฺฒติ. ยามกาลิเกสุ วิกาลปจฺจยา อนาปตฺติ, อนติริตฺตปจฺจยา ปน วิกาเล สพฺพวิกปฺเปสุ อนาปตฺติ. अकल्प्य मांसांमध्ये मानवी मांसाच्या बाबतीत थुल्लच्चय (स्थूलात्यय) आपत्तीसह पाचित्तिय आपत्ती होते, उर्वरित मांसांच्या बाबतीत दुक्कट आपत्तीसह पाचित्तिय आपत्ती होते. यामकालिक अन्न कारण असताना खाणाऱ्याला पाचित्तिय आपत्ती होते. आहारासाठी खाणाऱ्याला दुक्कट आपत्तीसह पाचित्तिय आपत्ती होते. जर प्रवारित असून अतिरिक्त न केलेले अन्न खाल्ले, तर सामान्य अन्नामध्ये दोन पाचित्तिय आपत्ती होतात; मानवी मांसाच्या बाबतीत थुल्लच्चय आपत्तीसह दोन पाचित्तिय होतात; उर्वरित अकल्प्य मांसाच्या बाबतीत दुक्कट आपत्तीसह दोन पाचित्तिय होतात; यामकालिक अन्न कारण असताना आमिषयुक्त मुखाने खाणाऱ्याला दोन पाचित्तिय होतात, आमिषरहित मुखाने खाणाऱ्याला केवळ एकच पाचित्तिय होते. आहारासाठी खाणाऱ्याला दोन्ही विकल्पांमध्ये दुक्कट आपत्ती वाढते. जर विकाल (अवेळी) खाल्ले, तर सामान्य भोजनामध्ये संचय केल्याच्या (सन्निधि) कारणामुळे आणि विकालभोजनाच्या कारणामुळे दोन पाचित्तिय आपत्ती होतात; अकल्प्य मांसाच्या बाबतीत थुल्लच्चय आणि दुक्कट आपत्ती वाढते. यामकालिकांच्या बाबतीत विकाल या कारणामुळे अनापत्ती आहे, परंतु अनतिरिक्त या कारणामुळे विकाल काळात सर्व विकल्पांमध्ये अनापत्ती आहे. ๒๕๕. สตฺตาหกาลิกํ ยาวชีวิกํ อาหารตฺถายาติ อาหารตฺถาย ปฏิคฺคณฺหโต ปฏิคฺคหณปจฺจยา ตาว ทุกฺกฏํ, อชฺโฌหรโต ปน สเจ นิรามิสํ โหติ, อชฺโฌหาเร อชฺโฌหาเร ทุกฺกฏํ. อถ อามิสสํสฏฺฐํ ปฏิคฺคเหตฺวา ฐปิตํ โหติ, ยถาวตฺถุกํ ปาจิตฺติยเมว. २५५. 'सप्ताहकालिक आणि यावजीविक आहारासाठी' म्हणजे आहारासाठी ग्रहण करणाऱ्याला ग्रहण करण्याच्या कारणामुळे प्रथम दुक्कट आपत्ती होते, आणि खाताना जर ते आमिषरहित असेल, तर प्रत्येक घासागणिक दुक्कट आपत्ती होते. जर आमिषमिश्रित अन्न ग्रहण करून ठेवलेले असेल, तर वस्तूच्या स्वरूपानुसार पाचित्तिय आपत्तीच होते. ๒๕๖. อนาปตฺติ ยาวกาลิกนฺติอาทิมฺหิ วิกาลโภชนสิกฺขาปเท นิทฺทิฏฺฐํ ขาทนียโภชนียํ ยาว มชฺฌนฺติกสงฺขาโต กาโล, ตาว ภุญฺชิตพฺพโต ยาวกาลิกํ. สทฺธึ อนุโลมปาเนหิ อฏฺฐวิธํ ปานํ ยาว รตฺติยา ปจฺฉิมยามสงฺขาโต ยาโม, ตาว ปริภุญฺชิตพฺพโต ยาโม กาโล อสฺสาติ ยามกาลิกํ. สปฺปิอาทิ ปญฺจวิธํ เภสชฺชํ สตฺตาหํ นิเธตพฺพโต สตฺตาโห กาโล อสฺสาติ สตฺตาหกาลิกํ. ฐเปตฺวา อุทกํ อวเสสํ สพฺพมฺปิ ยาวชีวํ ปริหริตฺวา สติ ปจฺจเย ปริภุญฺชิตพฺพโต ยาวชีวกนฺติ วุจฺจติ. २५६. विकालभोजन सिक्खापदामध्ये 'अनापत्ति यावकालिकं' इत्यादी वाक्यात निर्दिष्ट केलेले खादनीय व भोजनीय, जोपर्यंत माध्यान्ह (दुपार) नावाचा काळ असतो तोपर्यंतच खाण्यायोग्य असल्यामुळे त्याला 'यावकालिक' म्हणतात. अनुलोम पेयांसह आठ प्रकारची पेये, रात्रीच्या अंतिम प्रहरापर्यंत उपभोग घेण्यायोग्य असल्यामुळे, त्याचा उपभोग घेण्याचा काळ तो प्रहर असेपर्यंत असतो, म्हणून त्याला 'यामकालिक' म्हणतात. तूप इत्यादी पाच प्रकारची औषधे सात दिवसांपर्यंत साठवून ठेवता येत असल्यामुळे, त्याचा काळ सात दिवस असतो, म्हणून त्याला 'सप्ताहकालिक' म्हणतात. पाणी वगळता उर्वरित सर्व (औषधी) वस्तू जीवनभर सोबत बाळगून, योग्य कारण (आजारपण) असताना उपभोग घेण्यायोग्य असल्यामुळे त्याला 'यावजीविक' असे म्हटले जाते. ตตฺถ อรุโณทเยว ปฏิคฺคหิตํ ยาวกาลิกํ สตกฺขตฺตุมฺปิ นิทหิตฺวา ยาวกาโล นาติกฺกมติ ตาว, ยามกาลิกํ เอกํ อโหรตฺตํ, สตฺตาหกาลิกํ สตฺตรตฺตํ, อิตรํ สติ ปจฺจเย, ยาวชีวมฺปิ ปริภุญฺชนฺตสฺส อนาปตฺติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. อฏฺฐกถาสุ ปน อิมสฺมึ ฐาเน ปานกถา กปฺปิยานุโลมกถา ‘‘กปฺปติ นุ โข ยาวกาลิเกน ยามกาลิก’’นฺติอาทิกถา จ กปฺปิยภูมิกถา จ วิตฺถาริตา, ตํ มยํ อาคตฏฺฐาเนเยว กถยิสฺสาม. त्या (चार कालिकां) मध्ये, अरुणोदयाच्या वेळीच ग्रहण केलेले यावकालिक अन्न शंभर वेळा साठवून ठेवूनही, जोपर्यंत भोजनाचा काळ निघून जात नाही तोपर्यंत; यामकालिक एका अहोरात्रापर्यंत (दिवस-रात्र); सप्ताहकालिक सात रात्रींपर्यंत; आणि इतर (यावजीविक) योग्य कारण असताना जीवनभर उपभोग घेणाऱ्या भिक्खूंना कोणतीही आपत्ती (दोष) होत नाही. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. परंतु अट्ठकथांमध्ये या ठिकाणी पानकथा (पेयांची चर्चा), कप्पिय-अनुलोम कथा, 'यावकालिकासोबत यामकालिक कल्पते (योग्य ठरते) काय?' इत्यादी चर्चा आणि कप्पियभूमी कथा सविस्तर सांगितली आहे, ती आम्ही योग्य ठिकाणीच सांगू. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ [Pg.106] – กายโต จ กายจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. हे सिक्खापद एळकलोम सिक्खापदाप्रमाणे समुत्थान असणारे आहे – ते कायेने आणि काय-चित्ताने समुत्थित होते; क्रियात्मक आहे; संज्ञेमुळे (जाणीव नसल्याने) मुक्ती न देणारे आहे; अचित्तक आहे; प्रज्ञप्तिवद्य (नियम मोडल्यामुळे दोषयुक्त) आहे; कायकर्म आहे; तीन चित्ते आणि तीन वेदना असणारे आहे. สนฺนิธิการกสิกฺขาปทํ อฏฺฐมํ. सन्निधिकारक सिक्खापद हे आठवे होय. ๙. ปณีตโภชนสิกฺขาปทวณฺณนา ९. पणीतभोजन सिक्खापद वर्णन ๒๕๗. นวมสิกฺขาปเท – ปณีตโภชนานีติ อุตฺตมโภชนานิ. กสฺส สมฺปนฺนํ น มนาปนฺติ สมฺปตฺติยุตฺตํ กสฺส น ปิยํ. สาทุนฺติ สุรสํ. २५७. नवव्या सिक्खापदामध्ये – 'पणीतभोजनानि' म्हणजे उत्तम भोजन. 'कस्स सम्पन्नं न मनापं' म्हणजे समृद्धीने युक्त (उत्कृष्ट) भोजन कोणाला प्रिय असणार नाही? 'सादुं' म्हणजे सुरस (स्वादिष्ट). ๒๕๙. โย ปน ภิกฺขุ เอวรูปานิ ปณีตโภชนานิ อคิลาโน อตฺตโน อตฺถาย วิญฺญาเปตฺวา ภุญฺเชยฺยาติ เอตฺถ สุทฺธานิ สปฺปิอาทีนิ วิญฺญาเปตฺวา ภุญฺชนฺโต ปาจิตฺติยํ นาปชฺชติ, เสขิเยสุ สูโปทนวิญฺญตฺติทุกฺกฏํ อาปชฺชติ, โอทนสํสฏฺฐานิ ปน วิญฺญาเปตฺวา ภุญฺชนฺโต ปาจิตฺติยํ อาปชฺชตีติ เวทิตพฺโพ, อยํ กิเรตฺถ อธิปฺปาโย. เตเนว จ ‘‘ปณีตานี’’ติ อวตฺวา ‘‘ปณีตโภชนานี’’ติ สุตฺเต วุตฺตํ. ‘‘ปณีตานี’’ติ หิ วุตฺเต สปฺปิอาทีนํเยว คหณํ โหติ, ‘‘ปณีตโภชนานี’’ติ วุตฺเต ปน ปณีตสํสฏฺฐานิ สตฺตธญฺญนิพฺพตฺตานิ โภชนานิ ปณีตโภชนานีติ อยมตฺโถ ปญฺญายติ. २५९. 'जो भिक्खू निरोगी असताना स्वतःसाठी अशा प्रकारच्या पणीत भोजनाची मागणी करून ते खाईल...' या वाक्यात – केवळ शुद्ध तूप इत्यादींची मागणी करून खाणाऱ्या भिक्खूंना पाचित्तिय दोष लागत नाही, तर ते सेखिय नियमांनुसार 'सूपोदनविज्ञप्ति' (वरण-भाताची मागणी करणे) चा दुक्कट दोष प्राप्त करतात; परंतु भाताशी मिश्रित असलेल्या (तूप इत्यादींची) मागणी करून खाणाऱ्यांना पाचित्तिय दोष लागतो, असे समजावे. हाच येथे अभिप्रेत अर्थ आहे. म्हणूनच सूत्रात 'पणीतानि' (उत्कृष्ट वस्तू) असे न म्हणता 'पणीतभोजनानि' (उत्कृष्ट भोजन) असे म्हटले आहे. कारण 'पणीतानि' असे म्हटले असता केवळ तूप इत्यादींचेच ग्रहण होते, परंतु 'पणीतभोजनानि' असे म्हटले असता, पणीत (उत्कृष्ट) पदार्थांनी मिश्रित असलेले आणि सात प्रकारच्या धान्यांपासून बनवलेले भोजन म्हणजे 'पणीतभोजन' होय, हा अर्थ स्पष्ट होतो. อิทานิ วิญฺญาเปติ ปโยเค ทุกฺกฏนฺติอาทีสุ อยํ วินิจฺฉโย – ‘‘สปฺปินา ภตฺตํ เทหิ, สปฺปึ อากิริตฺวา เทหิ, สปฺปิมิสฺสกํ กตฺวา เทหิ, สหสปฺปินา เทหิ, สปฺปิญฺจ ภตฺตญฺจ เทหี’’ติ วิญฺญาเปนฺตสฺส วิญฺญตฺติยา ทุกฺกฏํ, ปฏิคฺคหเณ ทุกฺกฏํ, อชฺโฌหาเร ปาจิตฺติยํ. ‘‘สปฺปิภตฺตํ เทหี’’ติ วุตฺเต ปน ยสฺมา สาลิภตฺตํ วิย สปฺปิภตฺตํ นาม นตฺถิ; ตสฺมา สูโปทนวิญฺญตฺติทุกฺกฏเมว เวทิตพฺพํ. आता 'मागणी करण्याच्या प्रयोगात दुक्कट' इत्यादी वाक्यांमध्ये हा निर्णय आहे – 'तुपासह भात द्या, तूप ओतून द्या, तूप मिश्रित करून द्या, तुपासोबत द्या, तूप आणि भात दोन्ही द्या' अशी मागणी करणाऱ्या भिक्खूंना मागणी केल्यामुळे दुक्कट दोष होतो, ग्रहण केल्यावर दुक्कट दोष होतो आणि खाताना (गिळताना) पाचित्तिय दोष होतो. परंतु 'तूप-भात द्या' असे म्हटले असता, ज्याप्रमाणे 'साळीचा भात' असतो, तसा 'तूप-भात' नावाचा कोणताही स्वतंत्र भात नसतो; म्हणून तो केवळ 'सूपोदनविज्ञप्ति' चा दुक्कट दोषच समजावा. สเจ ปน ‘‘สปฺปินา ภตฺตํ เทหี’’ติ วุตฺเต ภตฺตํ ทตฺวา ‘‘สปฺปึ กตฺวา ภุญฺชา’’ติ นวนีตํ วา ขีรํ วา ทธึ วา เทติ, มูลํ วา ปน เทติ, ‘‘อิมินา สปฺปึ คเหตฺวา ภุญฺชา’’ติ ยถาวตฺถุกเมว. ‘‘โคสปฺปินา ภตฺตํ เทหี’’ติ วุตฺเต ปน โคสปฺปินา วา เทตุ, โคสปฺปิมฺหิ อสติ, ปุริมนเยเนว โคนวนีตาทีนิ วา คาวึเยว วา เทตุ ‘‘อิโต สปฺปินา ภุญฺชา’’ติ ยถาวตฺถุกเมว. สเจ [Pg.107] ปน โคสปฺปินา ยาจิโต อชิยา สปฺปิอาทีหิ เทติ, วิสงฺเกตํ. เอวญฺหิ สติ อญฺญํ ยาจิเตน อญฺญํ ทินฺนํ นาม โหติ, ตสฺมา อนาปตฺติ. เอส นโย อชิยา สปฺปินา เทหีติ อาทีสุปิ. पण जर 'तुपासह भात द्या' असे मागितले असता, भात देऊन 'याचे तूप करून खा' असे म्हणून लोणी, दूध किंवा दही दिले, किंवा पैसे देऊन 'याने तूप विकत घेऊन खा' असे म्हटले, तर ते मूळ वस्तूच्या नियमाप्रमाणेच (दोषयुक्त) होते. परंतु 'गायीच्या तुपासह भात द्या' असे मागितले असता, गायीचे तूप दिले तरी, किंवा गायीचे तूप नसताना पूर्वोक्त पद्धतीने गायीचे लोणी इत्यादी दिले किंवा 'या गायीपासून तूप करून खा' असे म्हणून गायच दिली तरी, ते मूळ वस्तूच्या नियमाप्रमाणेच (दोषयुक्त) होते. पण जर गायीचे तूप मागितले असता शेळीचे तूप इत्यादी दिले, तर ते 'विसंकेत' (मागणीपेक्षा वेगळे देणे) होते. कारण असे झाले असता, एक वस्तू मागितली असता दुसरी वस्तू दिली असे होते, म्हणून (भिक्खूंना) दोष होत नाही. 'शेळीच्या तुपासह द्या' इत्यादी मागण्यांमध्येही हाच नियम लागू होतो. ‘‘กปฺปิยสปฺปินา เทหี’’ติ วุตฺเต อกปฺปิยสปฺปินา เทติ, วิสงฺเกตเมว. ‘‘อกปฺปิยสปฺปินาติ วุตฺเต อกปฺปิยสปฺปินา เทติ, ปฏิคฺคหเณปิ ปริโภเคปิ ทุกฺกฏเมว. อกปฺปิยสปฺปิมฺหิ อสติ ปุริมนเยเนว อกปฺปิยนวนีตาทีนิ เทติ ‘‘สปฺปึ กตฺวา ภุญฺชา’’ติ อกปฺปิยสปฺปินาว ทินฺนํ โหติ. ‘‘อกปฺปิยสปฺปินา’’ติ วุตฺเต กปฺปิเยน เทติ, วิสงฺเกตํ. ‘‘สปฺปินา’’ติ วุตฺเต เสเสสุ นวนีตาทีสุ อญฺญตเรน เทติ, วิสงฺเกตเมว. เอส นโย นวนีเตน เทหีติอาทีสุปิ. เยน เยน หิ วิญฺญตฺติ โหติ, ตสฺมึ วา ตสฺส มูเล วา ลทฺเธ, ตํ ตํ ลทฺธเมว โหติ. 'कल्प्य (योग्य) तुपासह द्या' असे मागितले असता अकल्प्य (अयोग्य) तूप दिले, तर ते विसंकेतच होते. 'अकल्प्य तुपासह द्या' असे मागितले असता अकल्प्य तूप दिले, तर ग्रहण करण्यात आणि उपभोग घेण्यात दुक्कट दोषच होतो. अकल्प्य तूप नसताना पूर्वोक्त पद्धतीने 'तूप करून खा' असे म्हणून अकल्प्य लोणी इत्यादी दिले, तर ते अकल्प्य तूप दिल्यासारखेच होते. 'अकल्प्य तुपासह द्या' असे मागितले असता कल्प्य तूप दिले, तर ते विसंकेत होते. 'तुपासह द्या' असे मागितले असता उर्वरित लोणी इत्यादींपैकी कोणतेही दिले, तर ते विसंकेतच होते. 'लोण्यासह द्या' इत्यादी मागण्यांमध्येही हाच नियम आहे. कारण ज्या ज्या वस्तूची मागणी केली जाते, ती वस्तू किंवा तिचे मूल्य मिळाले असता, तीच वस्तू मिळाली असे मानले जाते. สเจ ปน อญฺญํ ปาฬิยา อาคตํ วา อนาคตํ วา เทนฺติ, วิสงฺเกตํ. ปาฬิยํ อาคตนวนีตาทีนิ ฐเปตฺวา อญฺเญหิ นวนีตาทีหิ วิญฺญาเปนฺตสฺส ทุกฺกฏํ. ยถา จ ‘‘สปฺปิภตฺตํ เทหี’’ติ วุตฺเต สาลิภตฺตสฺส วิย สปฺปิภตฺตสฺส อภาวา สูโปทนวิญฺญตฺติทุกฺกฏเมว โหตีติ วุตฺตํ. เอวํ นวนีตภตฺตํ เทหีติอาทีสุปิ. ปฏิปาฏิยา เอกเมกํ วิตฺถาเรตฺวา วุจฺจมาเนปิ หิ อยเมวตฺโถ วตฺตพฺโพ สิยา, โส จ สงฺเขเปนปิ สกฺกา ญาตุํ, กึ ตตฺถ วิตฺถาเรน? เตน วุตฺตํ – ‘‘เอส นโย นวนีเตน เทหีติอาทีสุปี’’ติ. पण जर पाळीमध्ये (पाठात) आलेली किंवा न आलेली दुसरीच वस्तू दिली, तर ते विसंकेत होते. पाळीमध्ये आलेल्या लोणी इत्यादींना सोडून इतर लोणी इत्यादींची मागणी करणाऱ्या भिक्खूंना दुक्कट दोष होतो. आणि ज्याप्रमाणे 'तूप-भात द्या' असे मागितले असता, साळीच्या भातासारखा तूप-भात अस्तित्वात नसल्यामुळे केवळ 'सूपोदनविज्ञप्ति' चा दुक्कट दोषच होतो असे म्हटले आहे, त्याचप्रमाणे 'लोणी-भात द्या' इत्यादी मागण्यांमध्येही होते. कारण अनुक्रमाने एकेकाचे सविस्तर वर्णन केले तरी हाच अर्थ सांगावा लागेल, आणि तो संक्षेपाने (थोडक्यात) देखील समजणे शक्य आहे, तर मग तिथे विस्ताराची काय गरज? म्हणूनच 'लोण्यासह द्या इत्यादींमध्येही हाच नियम आहे' असे म्हटले गेले. สเจ ปน สพฺเพหิปิ สปฺปิอาทีหิ เอกฏฺฐาเน วา นานาฏฺฐาเน วา วิญฺญาเปตฺวา ปฏิลทฺธํ เอกภาชเน อากิริตฺวา เอกรสํ กตฺวา ตโต กุสคฺเคนาปิ ชิวฺหคฺเค พินฺทุํ ฐเปตฺวา อชฺโฌหรติ, นว ปาจิตฺติยานิ อาปชฺชติ. วุตฺตมฺปิ เจตํ ปริวาเร – पण जर तूप इत्यादी सर्वच पणीत भोजनांची एकाच ठिकाणी किंवा वेगवेगळ्या ठिकाणी मागणी करून, मिळालेले अन्न एकाच पात्रात ओतून एकरस करून, त्यातून कुशाच्या (गवताच्या) टोकाने देखील जिभेच्या टोकावर एक थेंब ठेवून ते खातात, तर ते नऊ पाचित्तिय दोष प्राप्त करतात. परिवार पाठामध्ये देखील हे म्हटले आहे – ‘‘กายิกานิ น วาจสิกานิ,สพฺพานิ นานาวตฺถุกานิ; อปุพฺพํ อจริมํ อาปชฺเชยฺย เอกโต,ปญฺหาเมสา กุสเลหิ จินฺติตา’’ติ. (ปริ. ๔๘๑); 'कायेने होणारे, वाचेने नव्हे, विविध वस्तूंच्या बाबतीत होणारे सर्व पाचित्तिय दोष मागे-पुढे न होता एकाच वेळी (एकत्रच) प्राप्त होतात; हा प्रश्न विधीतज्ज्ञांनी विचारपूर्वक मांडला आहे.' ๒๖๑. อคิลาโน คิลานสญฺญีติ เอตฺถ สเจ คิลานสญฺญีปิ หุตฺวา เภสชฺชตฺถาย ปญฺจ เภสชฺชานิ วิญฺญาเปติ, มหานามสิกฺขาปเทน กาเรตพฺโพ[Pg.108]. นว ปณีตโภชนานิ วิญฺญาเปนฺโต ปน อิมินา สิกฺขาปเทน กาเรตพฺโพ. ภิกฺขุนีนํ ปน เอตานิ ปาฏิเทสนียวตฺถูนิ โหนฺติ, สูโปทนวิญฺญตฺติยํ อุภเยสมฺปิ เสขปณฺณตฺติทุกฺกฏเมว. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. २६१. 'निरोगी असूनही आजारी असल्याची संज्ञा असणारा' या वाक्यात – जर आजारी असल्याची संज्ञा ठेवून औषधासाठी पाच औषधांची मागणी करतात, तर महानाम सिक्खापदानुसार त्यांचा न्याय केला जावा. परंतु नऊ पणीत भोजनांची मागणी करणाऱ्यांचा न्याय या (पणीतभोजन) सिक्खापदानुसार केला जावा. भिक्खुणींसाठी मात्र या वस्तू पाटिदेसनीय दोषाच्या वस्तू ठरतात, आणि वरण-भाताची मागणी करण्याच्या बाबतीत दोघांनाही (भिक्खू व भिक्खुणी) सेखिय नियमांनुसार दुक्कट दोषच होतो. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. จตุสมุฏฺฐานํ – กายโต กายวาจโต กายจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, हे चार समुत्थान असणारे आहे – ते कायेने, काय-वाचेने, काय-चित्ताने आणि काय-वाचा-चित्ताने समुत्थित होते. กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. हे शिकापद क्रिया (कृतीद्वारे उल्लंघन होणारे), नोसञ्ञाविमोक्ख (जाणीव नसली तरी आपत्तीतून मुक्त न होणारे), अचित्तक (चित्ताशिवाय होणारे), पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तीमुळे दोषयुक्त असणारे), कायकम्म (कायिक कर्म असणारे), वचीकम्म (वाचिक कर्म असणारे), तिचित्त (तीन चित्त असणारे) आणि तिवेदन (तीन वेदना असणारे) आहे. ปณีตโภชนสิกฺขาปทํ นวมํ. नववे प्रणीतभोजन शिकापद. ๑๐. ทนฺตโปนสิกฺขาปทวณฺณนา १०. दंतपोन शिकापदाचे स्पष्टीकरण. ๒๖๓. ทสมสิกฺขาปเท – จตูสุ ปจฺจเยสุ อนฺตมโส ทนฺตกฏฺฐมฺปิ สพฺพํ ปํสุกูลเมว อสฺสาติ สพฺพปํสุกูลิโก. โส กิร สุสาเน ฉฑฺฑิตภาชนเมว ปตฺตํ กตฺวา ตตฺถ ฉฑฺฑิตโจฬเกเหว จีวรํ กตฺวา ตตฺถ ฉฑฺฑิตมญฺจปีฐกานิเยว คเหตฺวา ปริภุญฺชติ. อยฺยโวสาฏิตกานีติ เอตฺถ อยฺยา วุจฺจนฺติ กาลงฺกตา ปิติปิตามหา. โวสาฏิตกานิ วุจฺจนฺติ เตสํ อตฺถาย สุสานาทีสุ ฉฑฺฑิตกานิ ขาทนียโภชนียานิ; มนุสฺสา กิร กาลงฺกเต ญาตเก อุทฺทิสฺส ยํ เตสํ สชีวกาเล ปิยํ โหติ, ตํ เอเตสุ สุสานาทีสุ ปิณฺฑํ ปิณฺฑํ กตฺวา ‘‘ญาตกา โน ปริภุญฺชนฺตูติ ฐเปนฺติ. โส ภิกฺขุ ตํ คเหตฺวา ภุญฺชติ, อญฺญํ ปณีตมฺปิ ทิยฺยมานํ น อิจฺฉติ. เตน วุตฺตํ – ‘‘สุสาเนปิ รุกฺขมูเลปิ อุมฺมาเรปิ อยฺยโวสาฏิตกานิ สามํ คเหตฺวา ปริภุญฺชตี’’ติ. เถโรติ ถิโร ฆนพทฺโธ. วฐโรติ ถูโล; ถูโล จ ฆนสรีโร จายํ ภิกฺขูติ วุตฺตํ โหติ. มนุสฺสมํสํ มญฺเญ ขาทตีติ มนุสฺสมํสํ ขาทตีติ นํ สลฺลกฺเขม; มนุสฺสมํสํ ขาทนฺตา หิ อีทิสา ภวนฺตีติ อยํ เตสํ อธิปฺปาโย. २६३. दहाव्या शिकापदात – चार प्रत्ययांमध्ये अगदी दंतकाष्ठापर्यंत (दातून) सर्व काही पांसुकूलच (फेकून दिलेले) असावे, म्हणून तो 'सब्बपांसुकूलिक' (सर्व-पांसुकूलिक) होय. तो खरोखर स्मशानात फेकून दिलेल्या पात्रालाच आपले पात्र बनवून, तेथे फेकून दिलेल्या चिंध्यांपासूनच चीवर बनवून, आणि तेथे फेकून दिलेली खाट व पाट घेऊनच वापरत असे. 'अय्यवोसाटितकानि' यामध्ये 'अय्य' म्हणजे मृत झालेले आई-वडील, आजोबा इत्यादी पूर्वज म्हटले जातात. 'वोसाटितकानि' म्हणजे त्यांच्यासाठी स्मशान इत्यादी ठिकाणी फेकून दिलेले (अर्पण केलेले) खाद्य आणि भोज्य पदार्थ म्हटले जातात. लोक खरोखर मृत नातेवाईकांना उद्देशून, जे त्यांच्या जिवंतपणी त्यांना प्रिय होते, ते या स्मशान इत्यादी ठिकाणी पिंड-पिंड (गोळे) करून 'आमचे नातेवाईक याचा उपभोग घेवोत' असे म्हणून ठेवत असत. तो भिक्खू ते घेऊन खात असे, इतर कोणतेही उत्तम (प्रणीत) अन्न दिले तरी त्याची इच्छा करत नसे. म्हणूनच म्हटले आहे – 'तो स्मशानात, वृक्षाच्या मुळाशी किंवा उंबरठ्यावर ठेवलेले अय्यवोसाटितक (पूर्वजांना अर्पण केलेले अन्न) स्वतः घेऊन उपभोगत असे.' 'थेरो' म्हणजे स्थिर, मजबूत शरीराचा. 'वठरो' म्हणजे स्थूल (जाड); हा भिक्खू स्थूल आणि मजबूत शरीराचा आहे, असा याचा अर्थ आहे. 'मला वाटते हा मानवी मांस खातो' याचा अर्थ 'हा मानवी मांस खातो' असे आम्ही मानतो; कारण मानवी मांस खाणारे असेच (स्थूल व मजबूत शरीराचे) असतात, असा त्या लोकांचा अभिप्राय होता. ๒๖๔. อุทกทนฺตโปเน กุกฺกุจฺจายนฺตีติ เอตฺถ เต ภิกฺขู ‘‘อทินฺนํ มุขทฺวารํ อาหารํ อาหเรยฺยา’’ติ ปทสฺส สมฺมา อตฺถํ อสลฺลกฺเขตฺวา กุกฺกุจฺจายิสุํ, ภควา ปน ยถาอุปฺปนฺนสฺส วตฺถุสฺส วเสน ปิตา วิย ทารเก เต ภิกฺขู สญฺญาเปนฺโต อนุปญฺญตฺตึ ฐเปสิ. २६४. 'पाणी आणि दंतपोन (दातून) याविषयी शंका घेत' यामध्ये, त्या भिक्खूंनी 'न दिलेला आहार मुखद्वारात घेऊ नये' या पदाचा योग्य अर्थ न समजल्यामुळे शंका (कुक्कुच्च) घेतली. परंतु भगवंतांनी, जशी घटना घडली त्या प्रसंगाच्या आधारे, जसा पिता आपल्या मुलांना समजावतो, तसे त्या भिक्खूंना समजावून सांगत ही अनुप्रज्ञप्ती (नियम) प्रस्थापित केली. ๒๖๕. อทินฺนนฺติ [Pg.109] กาเยน วา กายปฏิพทฺเธน วา คณฺหนฺตสฺส กายกายปฏิพทฺธนิสฺสคฺคิยานํ อญฺญตรวเสน น ทินฺนํ. เอตเทว หิ สนฺธาย ปทภาชเน ‘‘อทินฺนํ นาม อปฺปฏิคฺคหิตกํ วุจฺจตี’’ติ วุตฺตํ. ทุติยปาราชิเก ปน ‘‘อทินฺนํ นาม ปรปริคฺคหิตกํ วุจฺจตี’’ติ วุตฺตํ. ทินฺนนฺติ อิทํ ปน ตสฺเสว อทินฺนสฺส ปฏิปกฺขวเสน ลกฺขณทสฺสนตฺถํ อุทฺธฏํ. นิทฺเทเส จสฺส ‘‘กาเยน วา กายปฏิพทฺเธน วา นิสฺสคฺคิเยน วา เทนฺเต’’ติ เอวํ อญฺญสฺมึ ททมาเน ‘‘หตฺถปาเส ฐิโต กาเยน วา กายปฏิพทฺเธน วา ปฏิคฺคณฺหาตีติ ตํ เอวํ ทิยฺยมานํ อนฺตมโส รถเรณุมฺปิ สเจ ปุพฺเพ วุตฺตลกฺขเณ หตฺถปาเส ฐิโต กาเยน วา กายปฏิพทฺเธน วา ปฏิคฺคณฺหาติ, เอตํ เอวํ ปฏิคฺคหิตํ ทินฺนํ นาม วุจฺจติ. น ‘‘อิทํ คณฺห, อิทํ ตว โหตู’’ติอาทิวจเนน นิสฺสฏฺฐํ. २६५. 'अदिन्नं' (न दिलेले) म्हणजे शरीराने किंवा शरीराशी संबंधित वस्तूने ग्रहण करणाऱ्या भिक्खूला, कायिक, काय-प्रतिबद्ध किंवा निसर्गिय (फेकून देणे) यांपैकी कोणत्याही एका प्रयोगाने न दिलेले. याच गोष्टीचा संदर्भ घेऊन पदभाजनामध्ये 'अदिन्नं म्हणजे ग्रहण न केलेले (अप्रतिगृहीत) म्हटले जाते' असे भगवंतांनी म्हटले आहे. परंतु दुसऱ्या पाराजिकात 'अदिन्नं म्हणजे दुसऱ्याच्या मालकीचे (परपरिगृहीत) म्हटले जाते' असे म्हटले आहे. 'दिन्नं' (दिलेले) हे पद मात्र त्याच 'अदिन्न' च्या विरुद्ध अर्थाने त्याचे लक्षण दाखवण्यासाठी पदभाजनात उद्धृत केले आहे. आणि त्याच्या निर्देशात 'शरीराने, शरीराशी संबंधित वस्तूने किंवा फेकून देण्याच्या प्रयोगाने देत असताना' अशा प्रकारे दुसऱ्याने दिले असता, 'हस्तपाशामध्ये उभा राहून शरीराने किंवा शरीराशी संबंधित वस्तूने ग्रहण करतो', अशा प्रकारे दिले जाणारे अगदी रथरज (धुलीकण) जरी असले, आणि जर तो पूर्वी सांगितलेल्या लक्षणानुसार हस्तपाशात उभा राहून शरीराने किंवा शरीराशी संबंधित वस्तूने ग्रहण करत असेल, तर अशा प्रकारे ग्रहण केलेल्या वस्तूला 'दिन्नं' (दिलेले) म्हटले जाते. 'हे घे, हे तुझे असो' इत्यादी शब्दांनी केवळ त्याग केलेल्या (पण योग्य प्रकारे न दिलेल्या) वस्तूला 'दिन्नं' म्हटले जात नाही. ตตฺถ กาเยนาติ หตฺถาทีสุ เยน เกนจิ สรีราวยเวน; อนฺตมโส ปาทงฺคุลิยาปิ ทิยฺยมานํ กาเยน ทินฺนํ นาม โหติ, ปฏิคฺคหเณปิ เอเสว นโย. เยน เกนจิ หิ สรีราวยเวน คหิตํ กาเยน คหิตเมว โหติ. สเจปิ นตฺถุกรณิยา ทิยฺยมานํ นาสาปุเฏน อกลฺลโก วา มุเขน ปฏิคฺคณฺหาติ. อาโภคมตฺตเมว หิ เอตฺถ ปมาณนฺติ อยํ นโย มหาปจฺจริยํ วุตฺโต. กายปฏิพทฺเธนาติ กฏจฺฉุอาทีสุ เยน เกนจิ อุปกรเณน ทินฺนํ กายปฏิพทฺเธน ทินฺนํ นาม โหติ. ปฏิคฺคหเณปิ เอเสว นโย. เยน เกนจิ สรีรปฏิพทฺเธน ปตฺตถาลกาทินา คหิตํ กายปฏิพทฺเธน คหิตเมว โหติ. นิสฺสคฺคิเยนาติ กายโต จ กายปฏิพทฺธโต จ โมเจตฺวา หตฺถปาเส ฐิตสฺส กาเยน วา กายปฏิพทฺเธน วา ปาติยมานมฺปิ นิสฺสคฺคิเยน ปโยเคน ทินฺนํ นาม โหติ. อยํ ตาว ปาฬิวณฺณนา. त्यामध्ये 'कायेन' (शरीराने) म्हणजे हात इत्यादींपैकी शरीराच्या कोणत्याही अवयवाने; अगदी पायाच्या बोटाने जरी दिले जात असले, तरी ते 'शरीराने दिलेले' म्हटले जाते. ग्रहण करण्याच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. कारण शरीराच्या कोणत्याही अवयवाने ग्रहण केलेले हे 'शरीराने ग्रहण केलेलेच' असते. जर औषध घालण्याच्या नळीने दिले जाणारे औषध नाकपुडीने किंवा आजारी असल्यामुळे तोंडाने ग्रहण केले, तरीही ते शरीराने ग्रहण केलेलेच मानले जाते. कारण येथे केवळ ग्रहण करण्याचा विचार (आभोग) असणे हेच प्रमाण आहे; हा नियम 'महापच्चरी' मध्ये सांगितला आहे. 'कायपटिबद्धेन' (शरीराशी संबंधित वस्तूने) म्हणजे चमचा इत्यादी उपकरणांपैकी कोणत्याही उपकरणाने दिलेले अन्न 'शरीराशी संबंधित वस्तूने दिलेले' म्हटले जाते. ग्रहण करण्याच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. शरीराशी संबंधित असलेल्या पात्र, थाळी इत्यादी कोणत्याही वस्तूने ग्रहण केलेले हे 'शरीराशी संबंधित वस्तूने ग्रहण केलेलेच' असते. 'निसग्गियेन' (फेकून देण्याच्या प्रयोगाने) म्हणजे शरीरापासून किंवा शरीराशी संबंधित वस्तूपासून मुक्त करून (सोडून देऊन), हस्तपाशात उभे असलेल्या व्यक्तीच्या शरीरावर किंवा शरीराशी संबंधित वस्तूवर पाडले जाणारे अन्न देखील 'निसग्गिय प्रयोगाने दिलेले' म्हटले जाते. हे आधी पाळीचे (पाठाचे) स्पष्टीकरण आहे. อยํ ปเนตฺถ ปาฬิมุตฺตกวินิจฺฉโย – ปญฺจงฺเคหิ ปฏิคฺคหณํ รุหติ – ถามมชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส อุจฺจารณมตฺตํ โหติ, หตฺถปาโส ปญฺญายติ, อภิหาโร ปญฺญายติ, เทโว วา มนุสฺโส วา ติรจฺฉานคโต วา กาเยน วา กายปฏิพทฺเธน วา นิสฺสคฺคิเยน วา เทติ, ตํ เจ ภิกฺขุ กาเยน วา กายปฏิพทฺเธน วา ปฏิคฺคณฺหาติ. เอวํ ปญฺจหงฺเคหิ ปฏิคฺคหณํ รุหติ. आणि येथे हा पाळी-मुक्त निर्णय (पाठाबाहेरील निर्णय) आहे – पाच अंगांनी (अटींनी) ग्रहण करणे सिद्ध होते – १. मध्यम शक्तीच्या माणसाला उचलण्याजोगे (वजन) असावे, २. हस्तपाश (हातभर अंतर) स्पष्ट असावा, ३. देण्याची क्रिया (अभिहार) स्पष्ट असावी, ४. देव, मनुष्य किंवा प्राणी शरीराने, शरीराशी संबंधित वस्तूने किंवा फेकून देण्याच्या प्रयोगाने देत असावा, ५. आणि भिक्खू ते शरीराने किंवा शरीराशी संबंधित वस्तूने ग्रहण करत असावा. अशा प्रकारे पाच अंगांनी ग्रहण करणे सिद्ध होते. ตตฺถ ฐิตนิสินฺนนิปนฺนานํ ปวารณสิกฺขาปเท วุตฺตนเยเนว หตฺถปาโส เวทิตพฺโพ. สเจ ปน ทายกปฏิคฺคาหเกสุ เอโก อากาเส โหติ, เอโก [Pg.110] ภูมิยํ, ภูมฏฺฐสฺส จ สีเสน อากาสฏฺฐสฺส จ ฐเปตฺวา ทาตุํ วา คเหตุํ วา ปสาริตหตฺถํ, ยํ อาสนฺนตรํ องฺคํ, ตสฺส โอริมนฺเตน หตฺถปาสปฺปมาณํ ปริจฺฉินฺทิตพฺพํ. สเจปิ เอโก กูเป โหติ, เอโก กูปตเฏ, เอโก วา ปน รุกฺเข, เอโก ปถวิยํ, วุตฺตนเยเนว หตฺถปาสปฺปมาณํ ปริจฺฉินฺทิตพฺพํ. เอวรูเป หตฺถปาเส ฐตฺวา สเจปิ ปกฺขี มุขตุณฺฑเกน วา หตฺถี วา โสณฺฑาย คเหตฺวา ปุปฺผํ วา ผลํ วา เทติ, ปฏิคฺคหณํ รุหติ. สเจ ปน อทฺธฏฺฐมรตนสฺสาปิ หตฺถิโน ขนฺเธ นิสินฺโน, เตน โสณฺฑาย ทิยฺยมานํ คณฺหาติ, วฏฺฏติเยว. त्यामध्ये, उभे राहिलेल्या, बसलेल्या किंवा झोपलेल्या व्यक्तींच्या बाबतीत पहिल्या पवारणा शिकापदात सांगितलेल्या पद्धतीनेच हस्तपाश समजावा. जर देणारा आणि घेणारा यांपैकी एक जण आकाशात (हवेत) असेल आणि दुसरा जमिनीवर असेल, तर जमिनीवर असलेल्याच्या डोक्यापासून आणि आकाशात असलेल्याच्या (देण्यासाठी किंवा घेण्यासाठी) पसरवलेला हात वगळता जे अंग सर्वात जवळ असेल, त्याच्या या बाजूच्या टोकापासून हस्तपाशाचे प्रमाण निश्चित करावे. जर एक जण विहिरीत असेल आणि दुसरा विहिरीच्या काठावर असेल, किंवा एक जण झाडावर असेल आणि दुसरा जमिनीवर असेल, तरीही वर सांगितलेल्या पद्धतीनेच हस्तपाशाचे प्रमाण निश्चित करावे. अशा प्रकारच्या हस्तपाशात राहून जर पक्ष्याने आपल्या चोचीने किंवा हत्तीने आपल्या सोंडेने धरून फूल किंवा फळ दिले, तरीही ग्रहण करणे सिद्ध होते. परंतु जर साडेसात हात उंचीच्या हत्तीच्या खांद्यावर बसलेला भिक्खू, त्या हत्तीने सोंडेने दिलेली वस्तू ग्रहण करत असेल, तर ते योग्यच आहे. เอโก พหูนิ ภตฺตพฺยญฺชนภาชนานิ สีเส กตฺวา ภิกฺขุสฺส สนฺติกํ อาคนฺตฺวา ฐิตโกว คณฺหถาติ วทติ, น ตาว อภิหาโร ปญฺญายติ, ตสฺมา น คเหตพฺพํ. สเจ ปน อีสกมฺปิ โอนมติ, ภิกฺขุนา หตฺถํ ปสาเรตฺวา เหฏฺฐิมภาชนํ เอกเทเสนาปิ สมฺปฏิจฺฉิตพฺพํ. เอตฺตาวตา สพฺพภาชนานิ ปฏิคฺคหิตานิ โหนฺติ, ตโต ปฏฺฐาย โอโรเปตฺวา วา อุคฺฆาเฏตฺวา วา ยํ อิจฺฉติ, ตํ คเหตฺวา ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. สภตฺตปจฺฉิอาทิมฺหิ ปน เอกภาชเน วตฺตพฺพเมว นตฺถิ, กาเชน ภตฺตํ หรนฺโตปิ สเจ กาชํ โอนาเมตฺวา เทติ, วฏฺฏติ. ตึสหตฺโถ เวณุ โหติ, เอกสฺมึ อนฺเต คุฬกุมฺโภ พทฺโธ, เอกสฺมึ สปฺปิกุมฺโภ, ตญฺเจ ปฏิคฺคณฺหาติ, สพฺพํ ปฏิคฺคหิตเมว. อุจฺฉุยนฺตโทณิโต ปคฺฆรนฺตเมว รสํ คณฺหถาติ วทติ, อภิหาโร น ปญฺญายตีติ น คเหตพฺโพ. สเจ ปน กสฏํ ฉฑฺเฑตฺวา หตฺเถน อุสฺสิญฺจิตฺวา อุสฺสิญฺจิตฺวา เทติ, วฏฺฏติ. एखादा मनुष्य डोक्यावर अनेक भात आणि भाजीची भांडी घेऊन भिक्खूच्या जवळ येतो आणि उभा राहूनच 'स्वीकार करा' असे म्हणतो, तोपर्यंत दान देण्याची क्रिया (अभिहार) स्पष्ट होत नाही, म्हणून ते स्वीकारू नये. परंतु, जर तो थोडेसे खाली वाकतो, तर भिक्खूने हात पसरून सर्वात खालच्या भांड्याला अंशतः स्पर्श करूनही त्याचा स्वीकार करावा. एवढ्यानेच सर्व भांडी स्वीकारली गेली असे होते; त्यानंतर ती खाली उतरवून किंवा उघडून जे हवे असेल ते घेऊन भोजन करणे योग्य आहे. भाताच्या टोपलीसारख्या एकाच भांड्याच्या बाबतीत तर काही सांगण्याची गरजच नाही. कावडीने भात वाहून आणणारा देखील जर कावड खाली वाकवून देतो, तर ते स्वीकारणे योग्य आहे. जर तीस हात लांब बांबूची कावड असेल, जिच्या एका टोकाला गुळाचा घडा आणि दुसऱ्या टोकाला तुपाचा घडा बांधलेला असेल, आणि जर भिक्खू ती कावड स्वीकारतो, तर सर्व काही स्वीकारले गेले असेच होते. उसाच्या चरकातून गळणारा रस 'स्वीकार करा' असे जर कोणी म्हणत असेल, तर दान देण्याची क्रिया स्पष्ट होत नसल्याने तो स्वीकारू नये. परंतु, जर तो चोथा बाजूला करून, हाताने रस उपसून उपसून देतो, तर ते स्वीकारणे योग्य आहे. พหู ปตฺตา มญฺเจ วา ปีเฐ วา กฏสารเก วา โทณิยํ วา ผลเก วา ฐปิตา โหนฺติ, ยตฺถ ฐิตสฺส ทายโก หตฺถปาเส โหติ, ตตฺถ ฐตฺวา ปฏิคฺคหณสญฺญาย มญฺจาทีนิ องฺคุลิยาปิ ผุสิตฺวา ฐิเตน วา นิสินฺเนน วา นิปนฺเนน วา ยํ เตสุ ปตฺเตสุ ทิยฺยติ, ตํ สพฺพํ ปฏิคฺคหิตํ โหติ. สเจปิ ปฏิคฺคเหสฺสามีติ มญฺจาทีนิ อารุหิตฺวา นิสีทติ, วฏฺฏติเยว. สเจ ปน มญฺจาทีนิ หตฺเถน คเหตฺวา มญฺเจ นิสีทติ, วตฺตพฺพเมว นตฺถิ. अनेक पात्रे पलंगावर, पाटावर, चटईवर, लाकडी द्रोणीत किंवा फळीवर ठेवलेली असतील, आणि जेथे उभे राहिलेल्या भिक्खूच्या हस्तपासात (हाताच्या अंतरावर) दाता असतो, तेथे उभे राहून स्वीकार करण्याच्या संज्ञेने पलंग इत्यादींना बोटाने देखील स्पर्श करून उभे असलेल्या, बसलेल्या किंवा झोपलेल्या भिक्खूने त्या पात्रांमध्ये जे काही दिले जाते, ते सर्व स्वीकारले गेले असे होते. जर 'मी स्वीकार करीन' या विचाराने पलंग इत्यादींवर चढून बसतो, तरीही ते योग्यच आहे. पण जर पलंग इत्यादींना हाताने धरून पलंगावर बसतो, तर मग काही सांगण्याची गरजच नाही. ปถวิยํ ปน สเจปิ กุจฺฉิยา กุจฺฉึ อาหจฺจ ฐิตา โหนฺติ, ยํ ยํ องฺคุลิยา วา สูจิยา วา ผุสิตฺวา นิสินฺโน โหติ, ตตฺถ ตตฺถ ทิยฺยมานเมว ปฏิคฺคหิตํ โหติ. ‘‘ยตฺถ กตฺถจิ มหากฏสารหตฺถตฺถรณาทีสุ ฐปิตปตฺเต ปฏิคฺคหณํ น รุหตี’’ติ วุตฺตํ, ตํ หตฺถปาสาติกฺกมํ สนฺธาย [Pg.111] วุตฺตนฺติ เวทิตพฺพํ. หตฺถปาเส ปน สติ ยตฺถ กตฺถจิ วฏฺฏติ อญฺญตฺร ตตฺถชาตกา. परंतु, जमिनीवर जर पात्रे एकमेकांना अगदी लागून ठेवलेली असतील, तरीही ज्या ज्या पात्राला बोटाने किंवा सुईने स्पर्श करून भिक्खू बसलेला असतो, त्या त्या पात्रात दिले जाणारे अन्नच स्वीकारले गेले असे होते. 'मोठ्या चटईवर किंवा हत्तीच्या पाठीवरील आसनावर ठेवलेल्या पात्रात केलेले दान स्वीकारले जात नाही' असे जे म्हटले आहे, ते हस्तपासाचे (हाताच्या अंतराचे) उल्लंघन लक्षात घेऊन म्हटले आहे असे समजावे. हस्तपास असताना मात्र, 'तत्तजातक' (त्याच झाडाला लागलेली पाने) सोडून इतर कोठेही दान स्वीकारणे योग्य आहे. ตตฺถชาตเก ปน ปทุมินิปณฺเณ วา กึสุกปณฺณาทิมฺหิ วา น วฏฺฏติ. น หิ ตํ กายปฏิพทฺธสงฺขฺยํ คจฺฉติ. ยถา จ ตตฺถชาตเก; เอวํ ขาณุเก พนฺธิตฺวา ฐปิตมญฺจาทิมฺหิ อสํหาริเม ผลเก วา ปาสาเณ วา น รุหติเยว, เตปิ หิ ตตฺถชาตกสงฺเขปุปคา โหนฺติ. ภูมิยํ อตฺถเตสุ สุขุเมสุ ตินฺติณิกาทิปณฺเณสุปิ ปฏิคฺคหณํ น รุหติ, น หิ ตานิ สนฺธาเรตุํ สมตฺถานีติ. มหนฺเตสุ ปน ปทุมินิปณฺณาทีสุ รุหติ. สเจ หตฺถปาสํ อติกฺกมฺม ฐิโต ทีฆทณฺฑเกน อุฬุงฺเกน เทติ, อาคนฺตฺวา เทหีติ วตฺตพฺโพ. วจนํ อสุตฺวา วา อนาทิยิตฺวา วา ปตฺเต อากิรติเยว, ปุน ปฏิคฺคเหตพฺพํ. ทูเร ฐตฺวา ภตฺตปิณฺฑํ ขิปนฺเตปิ เอเสว นโย. परंतु, त्याच झाडाला लागलेल्या कमळाच्या पानावर किंवा पळसाच्या पानावर इत्यादींवर दान स्वीकारणे योग्य नाही. कारण ते शरीराशी जोडलेले (कायप्रतिबद्ध) मानले जात नाही. आणि ज्याप्रमाणे तत्तजातकाच्या बाबतीत आहे, त्याचप्रमाणे खुंट्याला बांधून ठेवलेल्या पलंग इत्यादींवर, किंवा न हलवता येणाऱ्या फळीवर किंवा दगडावर दान स्वीकारले जात नाही; कारण ते देखील तत्तजातकाच्या श्रेणीतच येतात. जमिनीवर पसरलेल्या चिंचेच्या पानांसारख्या अत्यंत लहान पानांवर देखील दान स्वीकारले जात नाही, कारण ती पाने दिलेले अन्न पेलण्यास समर्थ नसतात. परंतु, (झाडावरून तोडलेल्या) मोठ्या कमळाच्या पानांवर इत्यादींवर दान स्वीकारले जाते. जर हस्तपासाचे उल्लंघन करून उभा असलेला दाता लांब दांड्याच्या पळीने दान देतो, तर त्याला 'जवळ येऊन द्या' असे सांगावे. जर तो बोलणे न ऐकता किंवा त्याकडे दुर्लक्ष करून पात्रात अन्न ओततोच, तर ते पुन्हा स्वीकारले पाहिजे. लांब उभे राहून भाताचा गोळा फेकून देणाऱ्याच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. สเจ ปตฺตตฺถวิกโต นีหริยมาเน ปตฺเต รชนจุณฺณานิ โหนฺติ, สติ อุทเก โธวิตพฺโพ, อสติ รชนจุณฺณํ ปุจฺฉิตฺวา ปฏิคฺคเหตฺวา วา ปิณฺฑาย จริตพฺพํ. สเจ ปิณฺฑาย จรนฺตสฺส รชํ ปตติ, ปฏิคฺคเหตฺวา ภิกฺขา คณฺหิตพฺพา. อปฺปฏิคฺคเหตฺวา คณฺหโต วินยทุกฺกฏํ. ตํ ปน ปุน ปฏิคฺคเหตฺวา ภุญฺชโต อนาปตฺติ. สเจ ปน ‘‘ปฏิคฺคเหตฺวา เทถา’’ติ วุตฺเต วจนํ อสุตฺวา วา อนาทิยิตฺวา วา ภิกฺขํ เทนฺติเยว, วินยทุกฺกฏํ นตฺถิ, ปุน ปฏิคฺคเหตฺวา อญฺญา ภิกฺขา คเหตพฺพา. जर पात्राच्या पिशवीतून पात्र बाहेर काढताना पात्रात रंगाची पूड असेल, तर पाणी उपलब्ध असल्यास ते धुवावे; पाणी नसल्यास ती पूड पुसून किंवा पात्र पुन्हा स्वीकारून भिक्षेसाठी फिरावे. जर भिक्षेसाठी फिरत असताना पात्रात धूळ पडते, तर पात्र पुन्हा स्वीकारून भिक्षा घ्यावी. पुन्हा न स्वीकारता भिक्षा घेणाऱ्या भिक्खूला विनयानुसार दुक्कट (दुष्कृत) गुन्हा होतो. परंतु, ते अन्न पुन्हा स्वीकारून ग्रहण केल्यास कोणताही गुन्हा होत नाही. पण जर 'स्वीकार करून द्या' असे म्हटले असता, बोलणे न ऐकता किंवा दुर्लक्ष करून ते भिक्षा देतातच, तर दुक्कट गुन्हा होत नाही; परंतु ते पुन्हा स्वीकारून दुसरी भिक्षा घ्यावी. สเจ มหาวาโต ตโต ตโต รชํ ปาเตติ, น สกฺกา โหติ ภิกฺขํ คเหตุํ, ‘‘อนุปสมฺปนฺนสฺส ทสฺสามี’’ติ สุทฺธจิตฺเตน อาโภคํ กตฺวา คณฺหิตุํ วฏฺฏติ. เอวํ ปิณฺฑาย จริตฺวา วิหารํ วา อาสนสาลํ วา คนฺตฺวา ตํ อนุปสมฺปนฺนสฺส ทตฺวา ปุน เตน ทินฺนํ วา ตสฺส วิสฺสาเสน วา ปฏิคฺคเหตฺวา ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. जर मोठा वारा इकडून तिकडून धूळ उडवून पाडत असेल आणि धूळ न पडता भिक्षा घेणे शक्य नसेल, तर 'मी हे अनुपसंपन्नाला (गृहस्थ किंवा सामणेराला) देईन' अशा शुद्ध चित्ताने विचार करून ती भिक्षा घेणे योग्य आहे. अशा प्रकारे भिक्षाटन करून विहारात किंवा भोजनशाळेत जाऊन ती भिक्षा अनुपसंपन्नाला देऊन, पुन्हा त्याने दिलेली किंवा त्याच्यावरील विश्वासाने ती स्वीकारून भोजन करणे योग्य आहे. สเจ ภิกฺขาจาเร สรชํ ปตฺตํ ภิกฺขุสฺส เทติ, โส วตฺตพฺโพ – ‘‘อิมํ ปฏิคฺคเหตฺวา ภิกฺขํ วา คณฺเหยฺยาสิ, ปริภุญฺเชยฺยาสิ วา’’ติ เตน ตถา กาตพฺพํ. สเจ รชํ อุปริ อุปฺปิลวติ, กญฺชิกํ ปวาเหตฺวา เสสํ ภุญฺชิตพฺพํ. สเจ อนฺโต ปวิฏฺฐํ โหติ, ปฏิคฺคเหตพฺพํ. อนุปสมฺปนฺเน อสติ หตฺถโต อโมเจนฺเตน, ยตฺถ อนุปสมฺปนฺโน อตฺถิ ตตฺถ เนตฺวา ปฏิคฺคเหตพฺพํ[Pg.112]. สุกฺขภตฺเต ปติตรชํ อปเนตฺวา ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. สเจ อติสุขุมํ โหติ, อุปริภตฺเตน สทฺธึ อปเนตพฺพํ, ปฏิคฺคเหตฺวา วา ภุญฺชิตพฺพํ. ยาคุํ วา สูปํ วา ปุรโต ฐเปตฺวา อาลุเลนฺตานํ ภาชนโต ผุสิตานิ อุคฺคนฺตฺวา ปตฺเต ปตนฺติ, ปตฺโต ปฏิคฺคเหตพฺโพ. जर भिक्षाटनाच्या वेळी एखादा भिक्खू दुसऱ्या भिक्खूला धूळ पडलेले पात्र देतो, तर त्याला सांगावे - 'हे पात्र स्वीकारून भिक्षा घे किंवा भोजन कर.' त्याने त्याप्रमाणेच करावे. जर धूळ अन्नाच्या वर तरंगत असेल, तर कांजी (पेज) ओतून देऊन उरलेले अन्न खावे. जर धूळ अन्नाच्या आत गेली असेल, तर पात्र पुन्हा स्वीकारले पाहिजे. जर अनुपसंपन्न जवळ नसेल, तर पात्रावरून हात न काढता, जेथे अनुपसंपन्न असेल तेथे पात्र नेऊन ते पुन्हा स्वीकारले पाहिजे. सुक्या भातावर पडलेली धूळ बाजूला करून भोजन करणे योग्य आहे. जर धूळ अत्यंत बारीक असेल, तर वरच्या भातासह ती बाजूला करावी किंवा पात्र पुन्हा स्वीकारून भोजन करावे. जर समोर ठेवलेल्या पेज किंवा आमटीच्या भांड्यातून, ते ढवळणाऱ्या अनुपसंपन्नांच्या भांड्यातील थेंब उडून भिक्खूच्या पात्रात पडतात, तर पात्र पुन्हा स्वीकारले पाहिजे. อุฬุงฺเกน อาหริตฺวา เทนฺตานํ ปฐมตรํ อุฬุงฺกโต เถวา ปตฺเต ปตนฺติ, สุปติตา, อภิหฏตฺตา โทโส นตฺถิ. สเจปิ จรุเกน ภตฺเต อากิริยมาเน จรุกโต มสิ วา ฉาริกา วา ปตติ, อภิหฏตฺตา เนวตฺถิ โทโส. อนนฺตรสฺส ภิกฺขุโน ทิยฺยมานํ ปตฺตโต อุปฺปติตฺวา อิตรสฺส ปตฺเต ปตติ, สุปติตํ. ปฏิคฺคหิตเมว หิ ตํ โหติ. पळीने अन्न आणून देणाऱ्या अनुपसंपन्नांच्या पळीतून अन्न पात्रात टाकण्यापूर्वीच जर काही थेंब पात्रात पडतात, तर ते योग्य प्रकारे पडलेले मानले जाते; ते दान देण्याच्या उद्देशानेच आणले गेल्यामुळे त्यात कोणताही दोष नाही. जर छोट्या भांड्याने भात ओतत असताना भांड्यातून कोळसा किंवा राख पात्रात पडली, तरीही ती दान देण्याच्या उद्देशाने आणली गेल्यामुळे कोणताही दोष नाही. शेजारील भिक्खूला दिले जाणारे अन्न त्याच्या पात्रातून उडून दुसऱ्या भिक्खूच्या पात्रात पडते, तर ते योग्य प्रकारे पडलेले मानले जाते. कारण ते आधीच स्वीकारले गेलेले असते. สเจ ชชฺฌริสาขาทึ ผาเลตฺวา เอกสฺส ภิกฺขุโน เทนฺตานํ สาขโต ผุสิตานิ อญฺญสฺส ปตฺเต ปตนฺติ, ปตฺโต ปฏิคฺคเหตพฺโพ. ยสฺส ปตฺตสฺส อุปริ ผาเลนฺติ, ตสฺส ปตฺเต ปติเตสุ ทาตุกามตาย อภิหฏตฺตา โทโส นตฺถิ. ปายาสสฺส ปูเรตฺวา ปตฺตํ เทนฺติ, อุณฺหตฺตา เหฏฺฐา คเหตุํ น สกฺโกติ, มุขวฏฺฏิยาปิ คเหตุํ วฏฺฏติ. สเจ ตถาปิ น สกฺโกติ, อาธารเกน คณฺหิตพฺโพ. जर भाजीची फांदी इत्यादी तोडून एका भिक्खूला देत असताना, त्या फांदीवरील थेंब दुसऱ्या भिक्खूच्या पात्रात पडतात, तर पात्र पुन्हा स्वीकारले पाहिजे. ज्याच्या पात्रावर फांदी तोडली जाते, त्याच्या पात्रात थेंब पडल्यास, दान देण्याच्या इच्छेनेच ते आणले गेल्यामुळे कोणताही दोष नाही. जर खीर पूर्ण भरून पात्र दिले जाते आणि गरम असल्यामुळे ते खालून पकडणे शक्य नसेल, तर पात्राच्या काठाला पकडूनही ते स्वीकारणे योग्य आहे. जर तसेही करणे शक्य नसेल, तर पात्राच्या आधाराने (पात्र-स्टँडने) ते स्वीकारले पाहिजे. อาสนสาลาย ปตฺตํ คเหตฺวา นิสินฺโน ภิกฺขุ นิทฺทํ โอกฺกนฺโต โหติ, เนว อาหริยมานํ น ทิยฺยมานํ ชานาติ, อปฺปฏิคฺคหิตํ โหติ. สเจ ปน อาโภคํ กตฺวา นิสินฺโน โหติ, วฏฺฏติ. สเจปิ โส หตฺเถน อาธารกํ มุญฺจิตฺวา ปาเทน เปลฺเลตฺวา นิทฺทายติ, วฏฺฏติเยว. ปาเทน อาธารกํ อกฺกมิตฺวา ปฏิคฺคณฺหนฺตสฺส ปน ชาครนฺตสฺสปิ อนาทรปฏิคฺคหณํ โหติ, ตสฺมา น กาตพฺพํ. เกจิ เอวํ อาธารเกน ปฏิคฺคหณํ กายปฏิพทฺธปฏิพทฺเธน ปฏิคฺคหณํ นาม โหติ, ตสฺมา น วฏฺฏตีติ วทนฺติ. ตํ เตสํ วจนมตฺตเมว. อตฺถโต ปน สพฺพมฺเปตํ กายปฏิพทฺธเมว โหติ. กายสํสคฺเคปิ เจส นโย ทสฺสิโตว. ยมฺปิ ภิกฺขุสฺส ทิยฺยมานํ ปตติ, ตมฺปิ สามํ คเหตฺวา ปริภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. ตตฺริทํ สุตฺตํ – आसनशाळेत पात्र घेऊन बसलेला भिक्खू जर झोपेच्या आधीन झाला असेल (डुलकी घेत असेल), आणि त्याला आणले जात असलेले किंवा दिले जात असलेले अन्न समजत नसेल, तर ते ग्रहण न केलेले (अस्वीकृत) ठरते. परंतु, जर तो ग्रहण करण्याच्या उद्देशाने बसला असेल, तर ते योग्य आहे. जरी त्याने हाताने पात्राचा आधार (पात्र-स्टँड) सोडून पायाने दाबून धरला असेल आणि तो झोपला असेल, तरीही ते योग्यच आहे. परंतु, पायाने पात्र-स्टँड दाबून धरून स्वीकार करणाऱ्या भिक्खूने, तो जागा असतानाही, तसे करणे म्हणजे अनादरपूर्वक स्वीकार करणे होय; म्हणून तसे करू नये. काही आचार्य म्हणतात की, अशा प्रकारे पात्र-स्टँडद्वारे स्वीकार करणे म्हणजे शरीराशी संबंधित असलेल्या वस्तूशी संबंधित वस्तूने स्वीकार करणे होय, म्हणून ते योग्य नाही. परंतु ते केवळ त्यांचे शब्दमात्र आहे. अर्थाच्या दृष्टीने पाहता, हे सर्व (पात्र आणि पात्र-स्टँड) शरीराशी संबंधितच असते. कायसंसर्ग नियमामध्ये देखील हाच नियम दर्शविला आहे. भिक्खूला दिले जात असताना जे अन्न खाली पडते, ते देखील स्वतः उचलून ग्रहण करणे योग्य आहे. त्या संदर्भात हे सूत्र आहे — ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, ยํ ทิยฺยมานํ ปตติ, ตํ สามํ คเหตฺวา ปริภุญฺชิตุํ ปริจฺจตฺตํ ตํ, ภิกฺขเว, ทายเกหี’’ติ (จูฬว. ๒๗๓). “भिक्खूंनो! दिले जात असताना जे अन्न खाली पडते, ते स्वतः उचलून ग्रहण करण्यास मी अनुमती देतो. भिक्खूंनो! कारण दात्यांनी त्याचा त्याग केलेला (दान दिलेले) असतो.” อิทญฺจ [Pg.113] ปน สุตฺตํ เนยฺยตฺถํ. ตสฺมา เอวเมตฺถ อธิปฺปาโย เวทิตพฺโพ – ยํ ทิยฺยมานํ ทายกสฺส หตฺถโต ปริคฬิตฺวา สุทฺธาย วา ภูมิยา ปทุมินิปณฺณวตฺถกฏสารกาทีสุ วา ปตติ, ตํ สามํ คเหตฺวา ปริภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. ยํ ปน สรชาย ภูมิยา ปตติ, ตํ รชํ ปุญฺฉิตฺวา วา โธวิตฺวา วา ปฏิคฺคเหตฺวา วา ปริภุญฺชิตพฺพํ. สเจ ปน ปวฏฺฏนฺตํ อญฺญสฺส ภิกฺขุโน สนฺติกํ คจฺฉติ, เตน อาหราเปตุมฺปิ วฏฺฏติ. สเจ ตํ ภิกฺขุํ วทติ ‘‘ตฺวํเยว ขาทา’’ติ ตสฺสาปิ ขาทิตุํ วฏฺฏติ. อนาณตฺเตน ปน เตน น คเหตพฺพํ. อนาณตฺเตนาปิ ‘‘อิตรสฺส ทสฺสามี’’ติ คเหตุํ วฏฺฏตีติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. กสฺมา ปเนตํ อิตรสฺส ภิกฺขุโน คเหตุํ น วฏฺฏตีติ? ภควตา อนนุญฺญาตตฺตา. ภควตา หิ ‘‘สามํ คเหตฺวา ปริภุญฺชิตุ’’นฺติ วทนฺเตน ยสฺเสว ตํ ทิยฺยมานํ ปตติ, ตสฺส อปฺปฏิคฺคหิตกมฺปิ ตํ คเหตฺวา ปริโภโค อนุญฺญาโต. ‘‘ปริจฺจตฺตํ ตํ ภิกฺขเว ทายเกหี’’ติ วจเนน ปเนตฺถ ปรสนฺตกาภาโว ทีปิโต. ตสฺมา อญฺญสฺส สามํ คเหตฺวา ปริภุญฺชิตุํ น วฏฺฏติ, ตสฺส ปน อาณตฺติยา วฏฺฏตีติ อยํ กิเรตฺถ อธิปฺปาโย. आणि हे सूत्र 'नेय्यार्थ' (स्पष्टीकरणाची गरज असलेले) आहे. त्यामुळे, यात भगवंतांचा अभिप्राय असा जाणून घ्यावा — दिले जात असताना दात्याच्या हातातून निसटून जे अन्न स्वच्छ जमिनीवर किंवा कमळाच्या पानावर, वस्त्रावर, चटईवर इत्यादींवर पडते, ते स्वतः उचलून ग्रहण करणे योग्य आहे. परंतु जे अन्न धुळीने माखलेल्या जमिनीवर पडते, ते धूळ पुसून किंवा धुवून किंवा पुन्हा स्वीकार करून घेऊन ग्रहण करावे. परंतु जर ते घसरत दुसऱ्या भिक्खूच्या जवळ गेले, तर त्या दुसऱ्या भिक्खूने ते स्वतःकडे आणवून घेणे देखील योग्य आहे. जर मूळ भिक्खूने त्या दुसऱ्या भिक्खूला म्हटले की, “तुम्हीच ते खा,” तर त्याला देखील ते खाणे योग्य आहे. परंतु आज्ञा नसताना त्या दुसऱ्या भिक्खूने ते उचलून घेऊ नये. आज्ञा नसली तरीही, “मी हे दुसऱ्याला (मूळ भिक्खूला) देईन” या विचाराने ते उचलणे योग्य आहे, असे कुरुंदी अट्ठकथेत म्हटले आहे. परंतु हे अन्न दुसऱ्या भिक्खूला उचलणे का योग्य नाही? कारण भगवंतांनी तशी अनुमती दिलेली नाही. कारण भगवंतांनी “स्वतः उचलून ग्रहण करावे” असे म्हणताना, ज्या भिक्खूला दिले जात असताना ते खाली पडते, त्यालाच ते ग्रहण न केलेले असले तरीही उचलून ग्रहण करण्याची अनुमती दिली आहे. “भिक्खूंनो, दात्यांनी त्याचा त्याग केला आहे” या वचनाने ते दुसऱ्याच्या मालकीचे राहिलेले नाही हे स्पष्ट केले आहे. त्यामुळे दुसऱ्या भिक्खूने ते स्वतः उचलून ग्रहण करणे योग्य नाही, परंतु त्याच्या (मूळ भिक्खूच्या) सांगण्यावरून ते ग्रहण करणे योग्य आहे, असा यात अभिप्राय आहे. ยสฺมา จ ตํ อปฺปฏิคฺคหิตกตฺตา อนุญฺญาตํ, ตสฺมา ยถาฐิตํเยว อนามสิตฺวา เกนจิ ปิทหิตฺวา ฐปิตํ ทุติยทิวเสปิ ปริภุญฺจิตุํ วฏฺฏติ, สนฺนิธิปจฺจยา อนาปตฺติ. ปฏิคฺคเหตฺวา ปน ปริภุญฺชิตพฺพํ. ตํทิวสํเยว หิ ตสฺส สามํ คเหตฺวา ปริโภโค อนุญฺญาโต, น ตโต ปรนฺติ อยมฺปิ กิเรตฺถ อธิปฺปาโย. आणि ज्या अर्थी ते अन्न अजून स्वीकार न केल्यामुळे अनुमत केले आहे, त्यामुळे ते जसे आहे तसेच स्पर्श न करता कशाने तरी झाकून ठेवले असता, दुसऱ्या दिवशी देखील ग्रहण करणे योग्य आहे; संनिधी (साठा करण्याच्या) प्रत्ययामुळे दोष लागत नाही. परंतु पुन्हा स्वीकार करून घेऊनच ते ग्रहण करावे. कारण त्याच दिवशी त्या भिक्खूला स्वतः उचलून ग्रहण करण्याची अनुमती दिली आहे, त्यानंतरच्या दिवसासाठी नाही, असा देखील यात अभिप्राय आहे. อิทานิ อพฺโพหาริกนโย วุจฺจติ – ภุญฺชนฺตานญฺหิ ทนฺตา ขิยฺยนฺติ, นขา ขิยฺยนฺติ, ปตฺตสฺส วณฺโณ ขิยฺยติ, สพฺพํ อพฺโพหาริกํ. ยมฺปิ สตฺถเกน อุจฺฉุอาทีสุ ผาลิเตสุ มลํ ปญฺญายติ, เอตํ นวสมุฏฺฐิตํ นาม ปฏิคฺคเหตฺวา ปริภุญฺชิตพฺพํ. สตฺถกํ โธวิตฺวา ผาลิเตสุ มลํ น ปญฺญายติ, โลหคนฺธมตฺตํ โหติ, ตํ อพฺโพหาริกํ. ยมฺปิ สตฺถกํ คเหตฺวา ปริหรนฺติ, เตน ผาลิเตปิ เอเสว นโย. น หิ ตํ ปริโภคตฺถาย ปริหรนฺตีติ. มูลเภสชฺชาทีนิ ปิสนฺตานํ วา โกฏฺเฏนฺตานํ วา นิสทนิสทโปตกอุทุกฺขลมุสลาทีนิ ขิยฺยนฺติ, ปริหรณกวาสึ ตาเปตฺวา เภสชฺชตฺถาย ตกฺเก วา ขีเร วา ปกฺขิปนฺติ, ตตฺถ นีลิกา ปญฺญายติ. สตฺถเก วุตฺตสทิโสว วินิจฺฉโย. อามกตกฺกาทีสุ ปน สยํ น ปกฺขิปิตพฺพา. ปกฺขิปติ เจ, สามปากโต น มุจฺจติ. आता 'अब्बोहारिक' (नगण्य असण्याचा) नियम सांगितला जात आहे — जेवत असताना दात झीजतात, नखे झीजतात, पात्राचा रंग झीजतो; हे सर्व अब्बोहारिक (नगण्य) आहे. जेव्हा स्वीकार केलेल्या सुरीने ऊस इत्यादी कापले जाते आणि त्यावर जी घाण दिसून येते, ती नवनवीन उत्पन्न झालेली मानली जाते, म्हणून तिचा स्वीकार करून घेऊनच ग्रहण करावे. सुरी धुवून कापले असता जर घाण दिसून येत नसेल, केवळ लोखंडाचा वास येत असेल, तर ते अब्बोहारिक आहे. जी सुरी स्वीकार न करता सोबत बाळगली जाते, तिने कापलेल्या अन्नाच्या बाबतीत देखील हाच नियम लागू होतो. कारण ती सुरी खाण्याच्या उद्देशाने सोबत बाळगलेली नसते. औषधी मुळे इत्यादी वाटत असताना किंवा कुटत असताना पाटा, वरवंटा, उखळ, मुसळ इत्यादी झीजतात. सोबत बाळगण्याची सुरी तापवून औषधासाठी ताकात किंवा दुधात टाकतात, आणि त्यात जर निळसरपणा दिसून आला, तर सुरीच्या बाबतीत सांगितलेल्या निर्णयाप्रमाणेच निर्णय होतो. परंतु कच्च्या ताकात इत्यादींमध्ये स्वतः (भिक्खूने) ती टाकू नये. जर टाकली, तर स्वतः शिजवण्याच्या (सामपाक) दोषापासून मुक्तता होत नाही. เทเว [Pg.114] วสฺสนฺเต ปิณฺฑาย จรนฺตสฺส สรีรโต วา จีวรโต วา กิลิฏฺฐอุทกํ ปตฺเต ปตติ, ตํ ปฏิคฺคเหตพฺพํ. รุกฺขมูลาทีสุ ภุญฺชนฺตสฺส ปติเตปิ เอเสว นโย. สเจ ปน สตฺตาหํ วสฺสนฺเต เทเว สุทฺธํ อุทกํ โหติ, อพฺโภกาสโต วา ปตติ, วฏฺฏติ. สามเณรสฺส โอทนํ เทนฺเตน ตสฺส ปตฺตคตํ อจฺฉุปนฺเตเนว ทาตพฺโพ. ปตฺโต วาสฺส ปฏิคฺคเหตพฺโพ. อปฺปฏิคฺคหิเต โอทนํ ฉุปิตฺวา ปุน อตฺตโน ปตฺเต โอทนํ คณฺหนฺตสฺส อุคฺคหิตโก โหติ. पाऊस पडत असताना पिंडपातासाठी फिरणाऱ्या भिक्खूच्या शरीरावरून किंवा चीवरावरून अस्वच्छ पाणी जर पात्रात पडले, तर त्या पात्राचा पुन्हा स्वीकार करावा. झाडाखाली इत्यादी ठिकाणी जेवत असताना पाणी पडले तरीही हाच नियम आहे. परंतु जर सात दिवस सतत पाऊस पडत असताना स्वच्छ पाणी असेल, किंवा उघड्या आकाशातून ते पडले असेल, तर ते योग्य आहे. सामणेराला भात (अन्न) देणाऱ्या भिक्खूने त्याच्या पात्रातील अन्नाला स्पर्श न करताच ते द्यावे. किंवा त्याचे पात्र स्वीकारून घ्यावे. स्वीकार न केलेल्या पात्रातील अन्नाला स्पर्श करून पुन्हा स्वतःच्या पात्रात अन्न घेणाऱ्या भिक्खूचे ते अन्न 'उग्गहितक' (अस्वीकृत) होते. สเจ ปน ทาตุกาโม หุตฺวา ‘‘อาหร สามเณร ปตฺตํ, โอทนํ คณฺหา’’ติ วทติ, อิตโร จ ‘‘อลํ มยฺห’’นฺติ ปฏิกฺขิปติ, ปุน ตเวเวตํ มยา ปริจฺจตฺต’’นฺติ จ วุตฺเตปิ ‘‘น มยฺหํ เอเตนตฺโถ’’ติ วทติ. สตกฺขตฺตุมฺปิ ปริจฺจชตุ, ยาว อตฺตโน หตฺถคตํ ปฏิคฺคหิตเมว โหติ. परंतु जर देण्याची इच्छा धरून भिक्खू म्हणाला की, “सामणेरा, पात्र आण, अन्न घे,” आणि सामणेराने “मला पुरे झाले” असे म्हणून नकार दिला, आणि पुन्हा भिक्खूने “हे मी तुलाच दिले आहे” असे म्हटले तरीही सामणेर म्हणाला की, “मला याची गरज नाही.” अशा वेळी शंभर वेळा जरी त्याचा त्याग केला, तरी जोपर्यंत ते स्वतःच्या हातात असते, तोपर्यंत ते स्वीकारलेलेच राहते. สเจ ปน อาธารเก ฐิตํ นิรเปกฺโข ‘‘คณฺหา’’ติ วทติ, ปุน ปฏิคฺคเหตพฺพํ. สาเปกฺโข อาธารเก ปตฺตํ ฐเปตฺวา ‘‘เอตฺโต ปูวํ วา ภตฺตํ วา คณฺหา’’ติ สามเณรํ วทติ, สามเณโร หตฺถํ โธวิตฺวา สเจปิ สตกฺขตฺตุํ คเหตฺวา อตฺตโน ปตฺตคตํ อผุสนฺโตว อตฺตโน ปตฺเต ปกฺขิปติ, ปุน ปฏิคฺคหณกิจฺจํ นตฺถิ. ยทิ ปน อตฺตโน ปตฺตคตํ ผุสิตฺวา ตโต คณฺหาติ, สามเณรสนฺตเกน สํสฏฺฐํ โหติ, ปุน ปฏิคฺคเหตพฺพํ. เกจิ ปน ‘‘สเจปิ คยฺหมานํ ฉิชฺชิตฺวา ตตฺถ ปตติ, ปุน ปฏิคฺคเหตพฺพ’’นฺติ วทนฺติ. ตํ ‘‘เอกํ ภตฺตปิณฺฑํ คณฺห, เอกํ ปูวํ คณฺห, อิมสฺส คุฬปิณฺฑสฺส เอตฺตกํ ปเทสํ คณฺหา’’ติ เอวํ ปริจฺฉินฺทิตฺวา วุตฺเต เวทิตพฺพํ. อิธ ปน ปริจฺเฉโท นตฺถิ. ตสฺมา ยํ สามเณรสฺส ปตฺเต ปตติ, ตเทว ปฏิคฺคหณํ วิชหติ. หตฺถคตํ ปน ยาว สามเณโร วา ‘‘อล’’นฺติ น โอรมติ, ภิกฺขุ วา น วาเรติ, ตาว ภิกฺขุสฺเสว สนฺตกํ, ตสฺมา ปฏิคฺคหณํ น วิชหติ. परंतु जर पात्र-स्टँडवर ठेवलेल्या पात्राच्या बाबतीत निरपेक्ष (अपेक्षा न ठेवता) होऊन भिक्खू म्हणाला की, “घे,” तर पुन्हा स्वीकार करावा लागेल. जर सापेक्ष (अपेक्षा ठेवून) पात्र-स्टँडवर पात्र ठेवून भिक्खू सामणेराला म्हणाला की, “यातून मिठाई (पुडा) किंवा भात घे,” आणि सामणेराने हात धुवून, जरी शंभर वेळा अन्न घेतले तरी स्वतःच्या पात्रातील अन्नाला स्पर्श न करताच ते स्वतःच्या पात्रात टाकले, तर पुन्हा स्वीकार करण्याची गरज नाही. परंतु जर त्याने स्वतःच्या पात्रातील अन्नाला स्पर्श करून त्यातून घेतले, तर ते सामणेराच्या अन्नाशी मिश्रित होते, म्हणून पुन्हा स्वीकार करावा लागेल. परंतु काही आचार्य म्हणतात की, “जरी घेतले जात असलेले अन्न तुटून भिक्खूच्या पात्रात पडले, तरी पुन्हा स्वीकार करावा लागेल.” हे विधान “एक भाताचा गोळा घे, एक मिठाई घे, या गुळाच्या ढेपेचा एवढा भाग घे,” अशा प्रकारे विशिष्ट भाग ठरवून सांगितले असेल तेव्हाच लागू होते असे समजावे. परंतु येथे अशी कोणतीही मर्यादा नाही. त्यामुळे जे अन्न सामणेराच्या पात्रात पडते, तेवढेच अन्न स्वीकारलेल्या स्थितीला सोडते (अस्वीकृत होते). परंतु सामणेराच्या हातात असलेले अन्न, जोपर्यंत सामणेर स्वतः “पुरे झाले” असे म्हणून थांबत नाही किंवा भिक्खू त्याला थांबवत नाही, तोपर्यंत ती भिक्खूचीच मालमत्ता असते; त्यामुळे ते स्वीकारलेल्या स्थितीला सोडत नाही (स्वीकृतच राहते). สเจ อตฺตโน วา ภิกฺขูนํ วา ยาคุปจนกภาชเน เกสญฺจิ อตฺถาย โอทนํ ปกฺขิปติ, ‘‘สามเณร, ภาชนสฺส อุปริ หตฺถํ กโรหี’’ติ วตฺวา ตสฺส หตฺเถ ปกฺขิปิตพฺพํ, ตสฺส หตฺถโต ภาชเน ปติตญฺหิ ทุติยทิวเส ภาชนสฺส อกปฺปิยภาวํ น กโรติ, ปริจฺจตฺตตฺตา. สเจ เอวํ อกตฺวา ปกฺขิปติ, ปตฺตมิว ภาชนํ นิรามิสํ กตฺวา ปริภุญฺชิตพฺพํ. ทายกา ยาคุกุฏํ ฐเปตฺวา คตา, ตํ ทหรสามเณโร ปฏิคฺคณฺหาเปตุํ น สกฺโกติ, ภิกฺขุ ปตฺตํ อุปนาเมติ, สามเณโร กุฏสฺส คีวํ ปตฺตสฺส มุขวฏฺฏิยํ [Pg.115] ฐเปตฺวา อาวชฺเชติ, ปตฺตคตา ยาคุ ปฏิคฺคหิตาว โหติ. อถ วา ภิกฺขุ ภูมิยํ หตฺถํ ฐเปติ, สามเณโร ปวฏฺเฏตฺวา ตตฺถ อาโรเปติ, วฏฺฏติ. ปูวปจฺฉิภตฺตปจฺฉิอุจฺฉุภาราทีสุปิ เอเสว นโย. जर स्वतःसाठी किंवा इतर भिक्षूंसाठी किंवा कोणा (शामणेर इत्यादींच्या) हितासाठी कांजी शिजवण्याच्या भांड्यात भात टाकायचा असेल, तर 'शामणेरा, भांड्यावर तुझा हात ठेव' असे सांगून त्याच्या हातावर तो टाकावा. कारण त्याच्या हातातून भांड्यात पडलेला भात दुसऱ्या दिवशी भांड्याला अकप्पिय (अग्राह्य) बनवत नाही, कारण तो आधीच त्याग केलेला असतो. जर असे न करता तो टाकला, तर पात्राप्रमाणेच भांड्याला आमिषरहित (अन्नाचा अंश नसलेले) करून त्याचा वापर करावा. दायक कांजीचे मोठे भांडे ठेवून निघून गेले, आणि लहान शामणेर ते ग्रहण करून देण्यास असमर्थ आहे, अशा वेळी भिक्षूंनी आपले पात्र जवळ न्यावे, शामणेराने भांड्याचे तोंड पात्राच्या कडेवर ठेवून ते कलते करावे; पात्रात आलेली कांजी ग्रहण केलेलीच मानली जाते. किंवा भिक्षूंनी जमिनीवर हात ठेवावा, शामणेराने ते भांडे लोळवत आणून भिक्षूंच्या हातावर ठेवावे, हे योग्य आहे. मिठाईच्या टोपल्या, भाताच्या टोपल्या, उसाचे भारे इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. สเจ ปฏิคฺคหณูปคํ ภารํ ทฺเว ตโย สามเณรา เทนฺติ, เอเกน วา พลวตา อุกฺขิตฺตํ ทฺเว ตโย ภิกฺขู คณฺหนฺติ, วฏฺฏติ. มญฺจสฺส วา ปีฐสฺส วา ปาเท เตลฆฏํ วา ผาณิตฆฏํ วา นวนีตฆฏํ วา ลคฺเคนฺติ, ภิกฺขุสฺส มญฺเจปิ ปีเฐปิ นิสีทิตุํ วฏฺฏติ. อุคฺคหิตกํ นาม น โหติ. जर ग्रहण करण्यास योग्य असा भारा दोन किंवा तीन शामणेर मिळून देत असतील, किंवा एका बलवान शामणेराने उचलून दिलेला भारा दोन किंवा तीन भिक्षू मिळून ग्रहण करत असतील, तर ते योग्य आहे. जर पलंगाच्या किंवा पाटाच्या पायाला तेलाचा घडा, गुळाचा घडा किंवा लोण्याचा घडा टांगलेला असेल, तर भिक्षूंना त्या पलंगावर किंवा पाटावर बसणे योग्य आहे. ते उग्गहितक होत नाही. นาคทนฺตเก วา องฺกุสเก วา ทฺเว เตลฆฏา ลคฺคิตา โหนฺติ, อุปริ ปฏิคฺคหิตโก เหฏฺฐา อปฺปฏิคฺคหิตโก, อุปริมํ คเหตุํ วฏฺฏติ. เหฏฺฐา ปฏิคฺคหิตโก อุปริ อปฺปฏิคฺคหิตโก, อุปริมํ คเหตฺวา อิตรํ คณฺหโต อุปริโม อุคฺคหิตโก โหติ. เหฏฺฐามญฺเจ อปฺปฏิคฺคหิตกํ เตลถาลกํ โหติ, ตํ เจ สมฺมชฺชนฺโต สมฺมุญฺชนิยา ฆฏฺเฏติ, อุคฺคหิตกํ น โหติ. ปฏิคฺคหิตกํ คณฺหิสฺสามีติ อปฺปฏิคฺคหิตกํ คเหตฺวา ญตฺวา ปุน ฐเปติ, อุคฺคหิตกํ น โหติ. พหิ นีหริตฺวา สญฺชานาติ, พหิ อฏฺฐเปตฺวา หริตฺวา ตตฺเถว ฐเปตพฺพํ, นตฺถิ โทโส. สเจ ปน ปุพฺเพ วิวริตฺวา ฐปิตํ น ปิทหิตพฺพํ; ยถา ปุพฺเพ ฐิตํ ตเถว ฐเปตพฺพํ. สเจ พหิ ฐเปติ, ปุน น ฉุปิตพฺพํ. जर भिंतीवरील खुंटीवर किंवा आकड्यावर तेलाचे दोन घडे टांगलेले असतील, आणि वरचा घडा ग्रहण केलेला व खालचा ग्रहण न केलेला असेल, तर वरचा घडा घेणे योग्य आहे. जर खालचा घडा ग्रहण केलेला आणि वरचा ग्रहण न केलेला असेल, तर वरचा घडा काढून दुसरा (खालचा) घडा घेणाऱ्या भिक्षूसाठी वरचा घडा उग्गहितक होतो. पलंगाच्या खाली ग्रहण न केलेले तेलाचे भांडे असेल, आणि झाडू मारताना भिक्षूचा झाडू त्याला स्पर्श करतो, तर ते उग्गहितक होत नाही. 'मी ग्रहण केलेले भांडे घेईन' असे समजून ग्रहण न केलेले भांडे घेतले, आणि नंतर ते समजल्यावर पुन्हा ठेवून दिले, तर ते उग्गहितक होत नाही. जर बाहेर नेल्यावर समजले, तर ते बाहेर न ठेवता परत आणून त्याच ठिकाणी ठेवावे, यात काही दोष नाही. पण जर ते आधी उघडे ठेवलेले असेल, तर ते झाकू नये; जसे ते आधी ठेवलेले होते तसेच ठेवावे. जर ते बाहेर ठेवले, तर त्याला पुन्हा स्पर्श करू नये. เหฏฺฐาปาสาทํ โอโรหนฺโต นิสฺเสณิมชฺเฌ สญฺชานาติ, อโนกาสตฺตา อุทฺธํ วา อโธ วา หริตฺวา ฐเปตพฺพํ. ปฏิคฺคหิตเก เตลาทิมฺหิ กณฺณกํ อุฏฺเฐติ, สิงฺคิเวราทิมฺหิ ฆนจุณฺณํ, ตํสมุฏฺฐานเมว นาเมตํ, ปุน ปฏิคฺคหณกิจฺจํ นตฺถิ. प्रासादावरून खाली उतरताना जिन्याच्या मध्यभागी असताना जर समजले (की हे ग्रहण न केलेले आहे), तर तिथे जागा नसल्यामुळे ते वर किंवा खाली नेऊन ठेवावे. ग्रहण केलेल्या तेलावर बुरशी चढली किंवा आल्यावर दाट पूड तयार झाली, तर ती त्या तेल किंवा आल्यापासूनच उत्पन्न झालेली असल्यामुळे, पुन्हा ग्रहण करण्याची आवश्यकता नाही. ตาลํ วา นาฬิเกรํ วา อารุฬฺโห โยตฺเตน ผลปิณฺฑึ โอตาเรตฺวา อุปริ ฐิโตว คณฺหถาติ วทติ, น คเหตพฺพํ. สเจ อญฺโญ ภูมิยํ ฐิโต โยตฺตปาสเก คเหตฺวา อุกฺขิปิตฺวา เทติ, วฏฺฏติ. สผลํ มหาสาขํ กปฺปิยํ กาเรตฺวา ปฏิคฺคณฺหาติ, ผลานิ ปฏิคฺคหิตาเนว โหนฺติ, ยถาสุขํ ปริภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. ताड किंवा नारळाच्या झाडावर चढलेला माणूस दोरीने फळांचा घड खाली सोडून, वरूनच 'घ्या' असे म्हणतो, तर ते ग्रहण करू नये. जर जमिनीवर उभा असलेला दुसरा कोणी दोरीचे टोक धरून, ते वर उचलून देतो, तर ते योग्य आहे. फळांसह असलेली मोठी फांदी कप्पिय करून ग्रहण केली, तर ती फळे ग्रहण केलेलीच मानली जातात, आणि इच्छेनुसार त्यांचा उपभोग घेणे योग्य आहे. อนฺโตวติยํ ฐตฺวา วตึ ฉินฺทิตฺวา อุจฺฉุํ วา ติมฺพรูสกํ วา เทนฺติ, หตฺถปาเส สติ วฏฺฏติ. วติทณฺฑเกสุ อปฺปหริตฺวา นิคฺคตํ คณฺหนฺตสฺส วฏฺฏติ. ปหริตฺวา นิคฺคเต อฏฺฐกถาสุ โทโส น ทสฺสิโต. มยํ ปน ยํ [Pg.116] ฐานํ ปหฏํ, ตโต สยํปติตเมว โหตีติ ตกฺกยาม. ตสฺมิมฺปิ อฏฺฐตฺวา คจฺฉนฺเต ยุชฺชติ, สุงฺกฆาตโต ปวฏฺเฏตฺวา พหิปติตภณฺฑํ วิย. วตึ วา ปาการํ วา ลงฺฆาเปตฺวา เทนฺติ, สเจ ปน น ปุถุโล ปากาโร, อนฺโตปากาเร จ พหิปากาเร จ ฐิตสฺส หตฺถปาโส ปโหติ, หตฺถสตมฺปิ อุทฺธํ คนฺตฺวา สมฺปตฺตํ คเหตุํ วฏฺฏติ. कुंपणाच्या आत उभे राहून, कुंपण कापून ऊस किंवा कवठ देतात, तर हस्तपाश असल्यास ते योग्य आहे. कुंपणाच्या काठ्यांना स्पर्श न करता बाहेर आलेले फळ घेणाऱ्यासाठी ते योग्य आहे. धक्का लागून बाहेर आलेल्या फळाच्या बाबतीत अट्ठकथांमध्ये दोष दाखवलेला नाही. परंतु आमचे (बुद्धघोषांचे) असे मत आहे की, ज्या भागाला धक्का लागला आहे, तिथून ते स्वतःच पडल्यासारखे होते. त्यामुळे ते तिथे न थांबता खाली पडत असताना ग्रहण करणे योग्य आहे, जसे जकात नाक्यावरून लोळत बाहेर पडलेले सामान असते. जर कुंपणावरून किंवा भिंतीवरून ओलांडून देतात, आणि जर भिंत रुंद नसेल, आणि भिंतीच्या आत व बाहेर उभे असलेल्यांचा हस्तपाश पुरेसा असेल, तर शंभर हात उंचीवरून खाली पडणारे फळही ग्रहण करणे योग्य आहे. ภิกฺขุ คิลานํ สามเณรํ ขนฺเธน วหติ, โส ผลาผลํ ทิสฺวา คเหตฺวา ขนฺเธ นิสินฺโนว เทติ, วฏฺฏติ. อปโร ภิกฺขุํ วหนฺโต ขนฺเธ นิสินฺนสฺส ภิกฺขุโน เทติ, วฏฺฏติเยว. भिक्षू आजारी शामणेराला खांद्यावर वाहून नेत आहेत, आणि तो शामणेर फळे पाहून, ती घेऊन, खांद्यावर बसलेला असतानाच भिक्षूंना देतो, तर ते योग्य आहे. दुसरा कोणी आजारी भिक्षूंना वाहून नेत असताना, खांद्यावर बसलेल्या भिक्षूंना देतो, तर ते योग्यच आहे. ภิกฺขุ ผลินึ สาขํ ฉายตฺถาย คเหตฺวา คจฺฉติ, ผลานิ ขาทิตุํ จิตฺเต อุปฺปนฺเน ปฏิคฺคหาเปตฺวา ขาทิตุํ วฏฺฏติ. มจฺฉิกวารณตฺถํ กปฺปิยํ กาเรตฺวา ปฏิคฺคณฺหาติ, ขาทิตุกาโม เจ โหติ, มูลปฏิคฺคหณเมว วฏฺฏติ, ขาทนฺตสฺส นตฺถิ โทโส. भिक्षू फळांनी युक्त असलेली फांदी सावलीसाठी घेऊन जात आहेत, आणि फळे खाण्याची इच्छा मनात उत्पन्न झाल्यावर, ती ग्रहण करवून घेऊन खाणे योग्य आहे. माश्या घालवण्यासाठी ती फांदी कप्पिय करून ग्रहण केली असेल, आणि नंतर ती फळे खाण्याची इच्छा झाली, तर मूळ ग्रहण करणेच योग्य ठरते, ते खाणाऱ्या भिक्षूला काही दोष नाही. ภิกฺขุ ปฏิคฺคหณารหํ ภณฺฑํ มนุสฺสานํ ยาเน ฐเปตฺวา มคฺคํ คจฺฉติ, ยานํ กทฺทเม ลคฺคติ, ทหโร จกฺกํ คเหตฺวา อุกฺขิปติ, วฏฺฏติ, อุคฺคหิตกํ นาม น โหติ. นาวาย ฐเปตฺวา นาวํ อริตฺเตน วา ปาเชติ, หตฺเถน วา กฑฺฒติ, วฏฺฏติ. อุฬุมฺเปปิ เอเสว นโย. จาฏิยํ กุณฺฑเก วา ฐเปตฺวาปิ ตํ อนุปสมฺปนฺเนน คาหาเปตฺวา อนุปสมฺปนฺนํ พาหายํ คเหตฺวา ตริตุํ วฏฺฏติ. ตสฺมิมฺปิ อสติ อนุปสมฺปนฺนํ คาหาเปตฺวา ตํ พาหายํ คเหตฺวา ตริตุํ วฏฺฏติ. भिक्षू ग्रहण करण्यास योग्य वस्तू लोकांच्या गाडीवर ठेवून रस्त्याने जात आहेत, गाडी चिखलात अडकते, आणि तरुण भिक्षू चाक धरून वर उचलतो, तर ते योग्य आहे, ते उग्गहितक होत नाही. नौकेवर वस्तू ठेवून नौका वल्ह्याने चालवणे किंवा हाताने ओढणे योग्य आहे. तराफ्याच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. मोठ्या मातीच्या भांड्यात किंवा लहान भांड्यात वस्तू ठेवून, ते अनुपसंपन्नाला पकडायला सांगून, त्या अनुपसंपन्नाचा हात धरून नदी पार करणे योग्य आहे. ते भांडे नसतानाही, अनुपसंपन्नाला वस्तू पकडायला सांगून, त्याचा हात धरून पार करणे योग्य आहे. อุปาสกา คมิกภิกฺขูนํ ปาเถยฺยตณฺฑุเล เทนฺติ. สามเณรา ภิกฺขูนํ ตณฺฑุเล คเหตฺวา อตฺตโน ตณฺฑุเล คเหตุํ น สกฺโกนฺติ, ภิกฺขู เตสํ ตณฺฑุเล คณฺหนฺติ. สามเณรา อตฺตนา คหิตตณฺฑุเลสุ ขีเณสุ อิตเรหิ ตณฺฑุเลหิ ยาคุํ ปจิตฺวา สพฺเพสํ ปตฺตานิ ปฏิปาฏิยา ฐเปตฺวา ยาคุํ อากิรนฺติ. ปณฺฑิโต สามเณโร อตฺตโน ปตฺตํ คเหตฺวา เถรสฺส เทติ, เถรสฺส ปตฺตํ อนุเถรสฺสาติ เอวํ สพฺพานิ ปริวตฺเตติ, สพฺเพหิ สามเณรสฺส สนฺตกํ ภุตฺตํ โหติ, วฏฺฏติ. उपासक प्रवासाला जाणाऱ्या भिक्षूंना प्रवासाची शिदोरी म्हणून तांदूळ देतात. शामणेर भिक्षूंचे तांदूळ घेतल्यामुळे स्वतःचे तांदूळ घेण्यास असमर्थ ठरतात, म्हणून भिक्षू त्यांचे तांदूळ घेतात. शामणेरांनी स्वतः घेतलेले तांदूळ संपल्यावर, इतर (भिक्षूंनी घेतलेल्या) तांदुळांची कांजी शिजवून, सर्वांची पात्रे ओळीने ठेवून त्यात कांजी ओततात. चतुर शामणेर आपले पात्र घेऊन थेरांना देतो, थेरांचे पात्र अनुथेरांना देतो, अशा प्रकारे सर्व पात्रे बदलून देतो; यामुळे सर्वांनी शामणेराच्या मालकीचेच अन्न खाल्ल्यासारखे होते, म्हणून हे योग्य आहे. สเจปิ สามเณโร อปณฺฑิโต โหติ, อตฺตโน ปตฺเต ยาคุํ สยเมว ปาตุํ อารภติ, ‘‘อาวุโส ตุยฺหํ ยาคุํ มยฺหํ เทหี’’ติ เอวํ เถเรหิ ปฏิปาฏิยา ยาจิตฺวาปิ ปิวิตุํ วฏฺฏติ, สพฺเพหิ สามเณรสฺส สนฺตกเมว [Pg.117] ภุตฺตํ โหติ, เนว อุคฺคหิตปจฺจยา น สนฺนิธิปจฺจยา วชฺชํ ผุสนฺติ. เอตฺถ ปน มาตาปิตูนํ เตลาทีนิ ฉายาทีนํ อตฺถาย สาขาทีนิ จ หรนฺตานํ อิเมสญฺจ วิเสโส น ทิสฺสติ. ตสฺมา การณํ อุปปริกฺขิตพฺพํ. जरी शामणेर चतुर नसेल आणि आपल्या पात्रातील कांजी स्वतःच पिण्यास सुरुवात करतो, तरी 'आयुष्यमाना, तुझी कांजी मला दे' असे थेरांनी ओळीने मागून घेऊन पिणे योग्य आहे. सर्वांनी शामणेराच्या मालकीचेच अन्न खाल्ल्यासारखे होते, त्यामुळे उग्गहित किंवा सन्निधि (साठा करणे) या कारणांमुळे कोणताही दोष लागत नाही. परंतु येथे, आई-वडिलांसाठी तेल इत्यादी किंवा सावलीसाठी फांद्या इत्यादी वाहून नेणाऱ्या भिक्षूंमध्ये आणि यांच्यात काही फरक दिसत नाही. म्हणून यामागचे कारण नीट तपासून पाहिले पाहिजे. สามเณโร ภตฺตํ ปจิตุกาโม ตณฺฑุเล โธวิตฺวา นิจฺจาเลตุํ น สกฺโกติ. ภิกฺขุนา ตณฺฑุเล จ ภาชนญฺจ ปฏิคฺคเหตฺวา ตณฺฑุเล โธวิตฺวา นิจฺจาเลตฺวา ภาชนํ อุทฺธนํ อาโรเปตพฺพํ, อคฺคิ น กาตพฺโพ, ปกฺกกาเล วิวริตฺวา ปกฺกภาโว ชานิตพฺโพ. สเจ ทุปฺปกฺกํ โหติ, ปากตฺถาย ปิทหิตุํ น วฏฺฏติ. รชสฺส วา ฉาริกาย วา อปตนตฺถาย วฏฺฏติ, ปกฺกกาเล อาโรเปตุมฺปิ ภุญฺชิตุมฺปิ วฏฺฏติ, ปุน ปฏิคฺคหณกิจฺจํ นตฺถิ. सामणेर भात शिजवू इच्छितात, परंतु तांदूळ धुवून त्यातील पाणी पूर्णपणे निथळण्यास ते असमर्थ आहेत. अशा वेळी भिक्खूंनी तांदूळ आणि भांडे (दान म्हणून) स्वीकारून, तांदूळ धुवून व निथळून भांडे चुलीवर ठेवावे; परंतु भिक्खूंनी स्वतः अग्नी पेटवू नये. भात शिजण्याच्या वेळी झाकण उघडून तो शिजला आहे की नाही हे तपासावे. जर भात नीट शिजला नसेल, तर तो अधिक शिजवण्यासाठी पुन्हा झाकणे योग्य नाही. मात्र, धूळ किंवा राख पडू नये म्हणून झाकणे योग्य आहे. भात शिजल्यावर तो खाली उतरवणे आणि ग्रहण करणे योग्य आहे; यासाठी पुन्हा दान स्वीकारण्याची आवश्यकता नसते। สามเณโร ปฏิพโล ปจิตุํ, ขโณ ปนสฺส นตฺถิ, กตฺถจิ คนฺตุกาโม. ภิกฺขุนา สตณฺฑุโลทกภาชนํ ปฏิคฺคเหตฺวา อุทฺธนํ อาโรเปตฺวา อคฺคึ ชาเลตฺวา คจฺฉาหีติ วตฺตพฺโพ. ตโต ปรํ ปุริมนเยเนว สพฺพํ กาตุํ วฏฺฏติ. सामणेर शिजवण्यास समर्थ आहेत, परंतु त्यांच्याकडे वेळ नाही आणि त्यांना कोठेतरी जायचे आहे. अशा वेळी भिक्खूंनी तांदूळ व पाण्यासह असलेले भांडे स्वीकारून, ते चुलीवर ठेवून व अग्नी पेटवून त्यांना 'तुम्ही जा' असे सांगावे. त्यानंतर पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच सर्व काही करणे योग्य आहे। ภิกฺขุ ยาคุอตฺถาย สุทฺธํ ภาชนํ อาโรเปตฺวา อุทกํ ตาเปติ, วฏฺฏติ. ตตฺเต อุทเก สามเณโร ตณฺฑุเล ปกฺขิปติ, ตโต ปฏฺฐาย ภิกฺขุนา อคฺคิ น กาตพฺโพ. ปกฺกยาคุํ ปฏิคฺคเหตฺวา ปาตุํ วฏฺฏติ. भिक्खूंनी कांजीसाठी (यागूसाठी) स्वच्छ भांडे चुलीवर ठेवून पाणी गरम करणे योग्य आहे. पाणी गरम झाल्यावर सामणेरांनी त्यात तांदूळ टाकावेत. त्यानंतर भिक्खूंनी अग्नी पेटवू नये (किंवा लाकडे घालू नयेत). शिजलेली कांजी स्वीकारून ती पिणे योग्य आहे। สามเณโร ยาคุํ ปจติ, หตฺถกุกฺกุจฺจโก ภิกฺขุ กีฬนฺโต ภาชนํ อามสติ, ปิธานํ อามสติ, อุคฺคตํ เผณํ ฉินฺทิตฺวา หรติ, ตสฺเสว ปาตุํ น วฏฺฏติ, ทุรุปจิณฺณํ นาม โหติ. สเจ ปน ทพฺพึ วา อุฬุงฺกํ วา คเหตฺวา อนุกฺขิปนฺโต อาลุเฬติ, สพฺเพสํ น วฏฺฏติ, สามปากญฺเจว โหติ ทุรุปจิณฺณญฺจ. สเจ อุกฺขิปติ, อุคฺคหิตกมฺปิ โหติ. सामणेर कांजी शिजवत असताना, एखादा खोडकर भिक्खू खेळत-खेळत भांड्याला किंवा झाकणाला स्पर्श करतो, अथवा वर आलेला फेस काढून टाकतो, तर केवळ त्यांनाच ती कांजी पिणे अयोग्य ठरते; याला 'दुरुपचिण्ण' (अयोग्य वर्तन) म्हणतात. परंतु, जर त्यांनी पळी किंवा चमचा घेऊन, तो वर न उचलता कांजी ढवळली, तर ती कांजी सर्वच भिक्खूंसाठी अयोग्य ठरते; कारण ते स्वतः शिजवल्यासारखे आणि अयोग्य वर्तन ठरते. जर त्यांनी भांडे वर उचलले, तर ते 'उग्गहितक' (न स्वीकारता स्वतः घेतलेले) ठरते। ภิกฺขุนา ปิณฺฑาย จริตฺวา อาธารเก ปตฺโต ฐปิโต โหติ, ตตฺร เจ อญฺโญ โลลภิกฺขุ กีฬนฺโต ปตฺตํ อามสติ, ปตฺตปิธานํ อามสติ, ตสฺเสว ตโต ลทฺธํ ภตฺตํ น วฏฺฏติ. สเจ ปน ปตฺตํ อุกฺขิปิตฺวา ฐเปติ, สพฺเพสํ น วฏฺฏติ. ตตฺถชาตกผลานิ สาขาย วา วลฺลิยา วา คเหตฺวา จาเลติ, ตสฺเสว ตโต ลทฺธํ ผลํ น วฏฺฏติ, ทุรุปจิณฺณทุกฺกฏญฺจ อาปชฺชติ. ผลรุกฺขํ ปน อปสฺสยิตุํ วา ตตฺถ กณฺฑเก วา พนฺธิตุํ วฏฺฏติ, ทุรุปจิณฺณํ น โหตีติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. भिक्खूंनी पिंडपातासाठी (भिक्षेसाठी) फिरून आल्यावर आपले पात्र पात्राच्या आधारावर (स्टँडवर) ठेवले असता, तेथे जर दुसरा एखादा चंचल भिक्खू खेळत-खेळत त्या पात्राला किंवा पात्राच्या झाकणाला स्पर्श करतो, तर केवळ त्यांनाच त्या पात्रातील मिळालेला भात ग्रहण करणे अयोग्य ठरते. परंतु, जर त्यांनी ते पात्र वर उचलून पुन्हा ठेवले, तर ते सर्वांसाठीच अयोग्य ठरते. तसेच, झाडावर लागलेली फळे मिळवण्यासाठी जर कोणी फांदी किंवा वेल पकडून हलवतो, तर केवळ त्यांनाच त्यातून मिळालेले फळ अयोग्य ठरते आणि ते 'दुरुपचिण्ण' मुळे दुक्कट (दुष्कृत) आपत्तीला प्राप्त होतात. परंतु, फळझाडाला टेकणे किंवा त्यावर काटे बांधणे योग्य आहे; 'ते दुरुपचिण्ण ठरत नाही,' असे महापच्चरीमध्ये म्हटले आहे। อรญฺเญ [Pg.118] ปติตํ ปน อมฺพผลาทึ ทิสฺวา สามเณรสฺส ทสฺสามีติ อาหริตฺวา ทาตุํ วฏฺฏติ. สีหวิฆาสาทึ ทิสฺวาปิ สามเณรสฺส ทสฺสามีติ ปฏิคฺคเหตฺวา วา อปฺปฏิคฺคเหตฺวา วา อาหริตฺวา ทาตุํ วฏฺฏติ. สเจ ปน สกฺโกติ วิตกฺกํ โสเธตุํ, ตโต ลทฺธํ ขาทิตุมฺปิ วฏฺฏติ, เนว อามกมํสปฏิคฺคหณปจฺจยา น อุคฺคหิตกปจฺจยา วชฺชํ ผุสติ. जंगलात पडलेले आंब्याचे फळ इत्यादी पाहून, 'मी हे सामणेरांना देईन' असा विचार करून ते घेऊन येऊन देणे योग्य आहे. सिंहाने खाऊन उरलेले अन्न (शिकार) इत्यादी पाहूनही, 'मी हे सामणेरांना देईन' असा विचार करून, ते स्वीकारून किंवा न स्वीकारता घेऊन येऊन देणे योग्य आहे. परंतु, जर भिक्खू आपला विचार शुद्ध ठेवू शकत असतील (म्हणजे स्वतःच्या लोभाशिवाय), तर त्या सामणेरांकडून मिळालेले ते अन्न स्वतः खाणे देखील योग्य आहे. यामुळे कच्चे मांस स्वीकारल्याचा दोष किंवा 'उग्गहितक' चा दोष लागत नाही। มาตาปิตูนํ อตฺถาย เตลาทีนิ คเหตฺวา คจฺฉโต อนฺตรามคฺเค พฺยาธิ อุปฺปชฺชติ, ตโต ยํ อิจฺฉติ, ตํ ปฏิคฺคเหตฺวา ปริภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. สเจ ปน มูเลปิ ปฏิคฺคหิตํ โหติ, ปุน ปฏิคฺคหณกิจฺจํ นตฺถิ. มาตาปิตูนํ ตณฺฑุเล อาหริตฺวา เทติ, เต ตโตเยว ยาคุอาทีนิ สมฺปาเทตฺวา ตสฺส เทนฺติ, วฏฺฏติ สนฺนิธิปจฺจยา วา อุคฺคหิตกปจฺจยา วา โทโส นตฺถิ. आई-वडिलांसाठी तेल इत्यादी घेऊन जाणाऱ्या भिक्खूंना जर वाटेत आजार उद्भवला, तर त्यातील जे काही त्यांना हवे असेल, ते स्वीकारून उपभोगणे योग्य आहे. परंतु, जर ते सुरुवातीलाच (घेऊन निघताना) स्वीकारलेले असेल, तर पुन्हा स्वीकारण्याची आवश्यकता नसते. जर भिक्खूंनी आई-वडिलांना तांदूळ आणून दिले आणि त्यांनी त्याच तांदुळापासून कांजी इत्यादी तयार करून त्यांना दिली, तर ते ग्रहण करणे योग्य आहे; यात साठवणुकीचा (सन्निधि) किंवा 'उग्गहितक' चा कोणताही दोष लागत नाही। ภิกฺขุ ปิทหิตฺวา อุทกํ ตาเปติ, ยาว ปริกฺขยา ปริภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. สเจ ปเนตฺถ ฉาริกา ปตติ, ปฏิคฺคเหตพฺพํ. ทีฆสณฺฑาเสน ถาลกํ คเหตฺวา เตลํ ปจนฺตสฺส ฉาริกา ปตติ, หตฺเถน อมุญฺจนฺเตเนว ปจิตฺวา โอตาเรตฺวา ปฏิคฺคเหตพฺพํ. สเจ องฺคาราปิ ทารูนิ วา ปฏิคฺคเหตฺวา ฐปิตานิ, มูลปฏิคฺคหณเมว วฏฺฏติ. भिक्खूंनी भांडे झाकून पाणी गरम केले असल्यास, ते पाणी संपेपर्यंत वापरणे योग्य आहे. परंतु, जर त्यात राख पडली, तर ते पुन्हा स्वीकारले पाहिजे. लांब चिमट्याने भांडे पकडून तेल शिजवत असताना जर त्यात राख पडली, तर चिमटा हाताने न सोडताच तेल शिजवून पूर्ण करावे आणि खाली उतरवल्यावर ते पुन्हा स्वीकारले पाहिजे. जर निखारे किंवा लाकडे आधीच स्वीकारून ठेवलेली असतील, तर मूळ स्वीकारणेच वैध ठरते। ภิกฺขุ อุจฺฉุํ ขาทติ, สามเณโร ‘‘มยฺหมฺปิ เทถา’’ติ วทติ. ‘‘อิโต ฉินฺทิตฺวา คณฺหา’’ติ วุตฺโต คณฺหาติ, อวเสเส ปุน ปฏิคฺคหณกิจฺจํ นตฺถิ. คุฬปิณฺฑกํ ขาทนฺตสฺสาปิ เอเสว นโย. วุตฺโตกาสโต ฉินฺทิตฺวา คหิตาวเสสญฺหิ อชหิตปฏิคฺคหณเมว โหติ. भिक्खू ऊस खात असताना सामणेर म्हणाले, 'मलाही द्या.' भिक्खूंनी 'यातून तोडून घे' असे म्हटल्यावर सामणेरांनी तो घेतला, तर उरलेल्या उसाच्या भागासाठी भिक्खूंना पुन्हा स्वीकारण्याची (दान घेण्याची) आवश्यकता नसते. गुळाचा खडा खात असतानाही हाच नियम लागू होतो. कारण सांगितलेल्या भागातून तोडून घेतल्यानंतर उरलेला भाग हा 'स्वीकारणे न सोडलेलाच' (अजहित-पठिग्गहण) असतो। ภิกฺขุ คุฬํ ภาเชนฺโต ปฏิคฺคเหตฺวา โกฏฺฐาเส กโรติ, ภิกฺขูปิ สามเณราปิ อาคนฺตฺวา เอกคหเณเนว เอกเมกํ โกฏฺฐาสํ คณฺหนฺติ, คหิตาวเสสํ ปฏิคฺคหิตเมว โหติ. สเจ โลลสามเณโร คณฺหิตฺวา คณฺหิตฺวา ปุน ฐเปติ, ตสฺส คหิตาวเสสํ อปฺปฏิคฺคหิตกํ โหติ. भिक्खू गुळाचे वाटप करण्यासाठी तो स्वीकारून त्याचे भाग करतात. इतर भिक्खू आणि सामणेर येऊन एकाच वेळी पकडून एकेक भाग घेतात, तेव्हा घेतल्यानंतर उरलेला गूळ स्वीकारलेलाच राहतो. परंतु, जर एखाद्या चंचल सामणेराने तो गूळ वारंवार उचलून पुन्हा ठेवला, तर त्याने घेतल्यानंतर उरलेला गूळ अस्वीकृत (अकपट) ठरतो। ภิกฺขุ ธูมวฏฺฏึ ปฏิคฺคเหตฺวา ธูมํ ปิวติ, มุขญฺจ กณฺโฐ จ มโนสิลาย ลิตฺโต วิย โหติ, ยาวกาลิกํ ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ, ยาวกาลิเกน ยาวชีวิกสํสคฺเค โทโส นตฺถิ. भिक्खूंनी धूम्रवर्तिका (औषधी विडी) स्वीकारून धूम्रपान केले असता, त्यांचे तोंड आणि गळा मनःशिलेने (एक औषधी धातू) लेपल्यासारखा होतो; तरीही त्यांना यावकालिक (मध्यान्हापूर्वी घेण्याचे अन्न) ग्रहण करणे योग्य आहे. यावकालिक अन्नाचा यावजीविक (औषध) शी संपर्क आल्यास कोणताही दोष नाही। ปตฺตํ [Pg.119] วา รชนํ วา ปจนฺตสฺส กณฺณนาสมุขจฺฉิทฺเทหิ ธูโม ปวิสติ, พฺยาธิปจฺจยา ปุปฺผํ วา ผลํ วา อุปสิงฺฆติ, อพฺโพหาริกตฺตา วฏฺฏติ. ภตฺตุคฺคาโร ตาลุํ อาหจฺจ อนฺโตเยว ปวิสติ, อวิสยตฺตา วฏฺฏติ. มุขํ ปวิฏฺฐํ ปน อชฺโฌหรโต วิกาเล อาปตฺติ. ทนฺตนฺตเร ลคฺคสฺส อามิสสฺส รโส ปวิสติ, อาปตฺติเยว. สเจ สุขุมํ อามิสํ โหติ, รโส น ปญฺญายติ, อพฺโพหาริกปกฺขํ ภชติ. पात्र भाजत असताना किंवा रंग उकळत असताना कान, नाक आणि तोंडाच्या छिद्रांतून धूर आत शिरल्यास, अथवा आजारपणामुळे फूल किंवा फळाचा वास घेतल्यास, ते 'अब्बोहारिक' (नगण्य) असल्यामुळे योग्य आहे. ढेकर आल्यामुळे अन्न टाळूला लागून आतच परत गेल्यास, ते नियंत्रणाबाहेरचे असल्यामुळे योग्य आहे. परंतु, तोंडात आलेले अन्न अवेळी (विकाल वेळी) पुन्हा गिळल्यास आपत्ती (दोष) येते. दातांच्या फटीत अडकलेल्या अन्नाचा रस आत गेल्यास ती आपत्तीच ठरते. जर ते अन्न अतिशय सूक्ष्म असेल आणि त्याचा रस जाणवत नसेल, तर ते 'अब्बोहारिक' (नगण्य) मानले जाते। อุปกฏฺเฐ กาเล นิรุทกฏฺฐาเน ภตฺตํ ภุญฺชิตฺวา กกฺขาเรตฺวา ทฺเว ตโย เขฬปิณฺเฑ ปาเตตฺวา อุทกฏฺฐานํ คนฺตฺวา มุขํ วิกฺขาเลตพฺพํ. ปฏิคฺคเหตฺวา ฐปิตสิงฺคิเวราทีนํ องฺกุรา นิกฺขมนฺติ, ปุน ปฏิคฺคหณกิจฺจํ นตฺถิ. โลเณ อสติ สมุทฺโททเกน โลณกิจฺจํ กาตุํ วฏฺฏติ. ปฏิคฺคเหตฺวา ฐปิตํ โลโณทกํ โลณํ โหติ, โลณํ วา อุทกํ โหติ, รโส วา ผาณิตํ โหติ, ผาณิตํ วา รโส โหติ, มูลปฏิคฺคหณเมว วฏฺฏติ. หิมกรกา อุทกคติกา เอว. ปริหาริเกน กตกฏฺฐินา อุทกํ ปสาเทนฺติ, ตํ อพฺโพหาริกํ, อามิเสน สทฺธึ วฏฺฏติ. อามิสคติเกหิ กปิตฺถผลาทีหิ ปสาทิตํ ปุเรภตฺตเมว วฏฺฏติ. मध्यान्ह काळ जवळ आला असता, पाणी नसलेल्या ठिकाणी जेवण केल्यावर, गळा साफ करून दोन-तीन वेळा थुंकी टाकून द्यावी आणि नंतर पाण्याच्या ठिकाणी जाऊन तोंड धुवावे. स्वीकारून ठेवलेल्या आल्याला (आले इत्यादींना) जर कोंब फुटले, तर पुन्हा स्वीकारण्याची आवश्यकता नसते. मीठ उपलब्ध नसताना समुद्राच्या पाण्याने मिठाचे काम भागवणे योग्य आहे. स्वीकारून ठेवलेले मिठाचे पाणी मीठ बनले, किंवा मीठ वितळून पाणी झाले, अथवा उसाचा रस काकवी बनला, किंवा काकवी वितळून रस झाली, तरी मूळ स्वीकारणेच वैध ठरते. बर्फ आणि गारा पाण्याचेच रूप आहेत. सोबत बाळगण्याच्या निर्मळीच्या बियाने (कतक लाकडाने) पाणी स्वच्छ केले असता, ते 'अब्बोहारिक' (नगण्य) मानले जाते आणि ते अन्नासोबत पिणे योग्य आहे. परंतु, अन्नाच्या स्वरूपातील कवठ इत्यादी फळांनी स्वच्छ केलेले पाणी केवळ मध्यान्हापूर्वीच ग्रहण करणे योग्य आहे। โปกฺขรณีอาทีสุ อุทกํ พหลํ โหติ, วฏฺฏติ. สเจ ปน มุเข จ หตฺเถ จ ลคฺคติ, น วฏฺฏติ, ปฏิคฺคเหตฺวา ปริภุญฺชิตพฺพํ. เขตฺเตสุ กสิตฏฺฐาเน พหลํ อุทกํ โหติ, ปฏิคฺคเหตพฺพํ. สเจ สนฺทิตฺวา กนฺทราทีนิ ปวิสิตฺวา นทึ ปูเรติ, วฏฺฏติ. กกุธโสพฺภาทโย โหนฺติ, รุกฺขโต ปติเตหิ ปุปฺเผหิ สญฺฉนฺโนทกา, สเจ ปุปฺผรโส น ปญฺญายติ, ปฏิคฺคหณกิจฺจํ นตฺถิ. ปริตฺตํ อุทกํ โหติ, รโส ปญฺญายติ, ปฏิคฺคเหตพฺพํ. ปพฺพตกนฺทราทีสุ กาฬวณฺณปณฺณสญฺฉนฺนอุทเกปิ เอเสว นโย. पुष्करिणी (तलाव) इत्यादींमध्ये पाणी दाट असते, ते कल्प्य आहे. पण जर ते तोंडात आणि हाताला चिकटत असेल, तर कल्प्य नाही; ते ग्रहण करूनच (दान म्हणून स्वीकारूनच) वापरावे. शेतातील नांगरलेल्या जागी दाट पाणी असते, ते ग्रहण करावे. जर ते वाहून जाऊन दऱ्याखोऱ्यांत इत्यादींमध्ये प्रवेश करून नदीला भरत असेल, तर कल्प्य आहे. ककुध वृक्षाचे डोह इत्यादी असतात, जे झाडावरून पडलेल्या फुलांनी आच्छादित पाण्याचे असतात; जर फुलांचा रस जाणवत नसेल, तर ग्रहण करण्याचे काही प्रयोजन नाही. जर पाणी थोडे असेल आणि रस जाणवत असेल, तर ते ग्रहण करावे. पर्वतांच्या दऱ्याखोऱ्यांमधील काळ्या रंगाच्या पानांनी आच्छादित पाण्यातही हाच नियम आहे. ปานียฆเฏ สเรณุกานิ วา สวณฺฏขีรานิ วา ปุปฺผานิ ปกฺขิตฺตานิ โหนฺติ, ปฏิคฺคเหตพฺพํ. ปุปฺผานิ วา ปฏิคฺคเหตฺวา ปกฺขิปิตพฺพานิ. ปาฏลิจมฺปกมลฺลิกา ปกฺขิตฺตา โหนฺติ, วาสมตฺตํ ติฏฺฐติ ตํ อพฺโพหาริกํ, ทุติยทิวเสปิ อามิเสน สทฺธึ วฏฺฏติ. ภิกฺขุนา ฐปิตปุปฺผวาสิตกปานียโต สามเณโร ปานียํ คเหตฺวา ปีตาวเสสํ ตตฺเถว อากิรติ, ปฏิคฺคเหตพฺพํ. ปทุมสราทีสุ อุทกํ สนฺถริตฺวา ฐิตํ ปุปฺผเรณุํ ฆเฏน [Pg.120] วิกฺขมฺเภตฺวา อุทกํ คเหตุํ วฏฺฏติ. กปฺปิยํ การาเปตฺวา ปฏิคฺคเหตฺวา ฐปิตํ ทนฺตกฏฺฐํ โหติ, สเจ ตสฺส รสํ ปิวิตุกาโม, มูลปฏิคฺคหณเมว วฏฺฏติ. อปฺปฏิคฺคเหตฺวา ฐปิตํ ปฏิคฺคเหตพฺพํ. อชานนฺตสฺส รเส ปวิฏฺเฐปิ อาปตฺติเยว. อจิตฺตกญฺหิ อิทํ สิกฺขาปทํ. पिण्याच्या पाण्याच्या भांड्यात परागकणांसह किंवा देठाच्या चिकासह फुले टाकलेली असतील, तर ते पाणी ग्रहण करावे. किंवा फुले ग्रहण करूनच त्यात टाकावीत. पाटली, चंपक, मल्लिका फुले टाकलेली असतील आणि केवळ सुगंध उरला असेल, तर तो अव्यवहार्य (नगण्य) मानला जातो; दुसऱ्या दिवशीही आमिषासोबत (अन्नासोबत) ते पिणे कल्प्य आहे. भिक्खूने ठेवलेल्या फुलांनी सुवासित केलेल्या पिण्याच्या पाण्यातून सामणेराने पाणी घेऊन, पिऊन उरलेले पाणी तिथेच ओतले, तर ते पुन्हा ग्रहण करावे. पद्म सरोवरांमध्ये पाण्यावर पसरलेले फुलांचे परागकण भांड्याने बाजूला सारून पाणी घेणे कल्प्य आहे. कल्प्य करून घेऊन, ग्रहण करून ठेवलेली दंतकाष्ठ असेल आणि जर तिचा रस पिण्याची इच्छा असेल, तर मूळ ग्रहण करणेच कल्प्य ठरते. ग्रहण न करता ठेवलेले दंतकाष्ठ ग्रहण करावे. नकळत रस पोटात गेला तरी आपत्तीच होते, कारण हे शिक्षापद अचित्तक आहे. มหาภูเตสุ กึ วฏฺฏติ, กึ น วฏฺฏตีติ? ขีรํ ตาว วฏฺฏติ, กปฺปิยมํสขีรํ วา อกปฺปิยมํสขีรํ วา โหตุ, ปิวนฺตสฺส อนาปตฺติ. อสฺสุ เขโฬ สิงฺฆาณิกา มุตฺตํ กรีสํ เสมฺหํ ทนฺตมลํ อกฺขิคูถโก กณฺณคูถโก สรีเร อุฏฺฐิตโลณนฺติ อิทํ สพฺพํ วฏฺฏติ. ยํ ปเนตฺถ ฐานโต จวิตฺวา ปตฺเต วา หตฺเถ วา ปตติ, ตํ ปฏิคฺคเหตพฺพํ. องฺคลคฺคํ ปฏิคฺคหิตกเมว. อุณฺหํปายาสํ ภุญฺชนฺตสฺส เสโท องฺคุลิอนุสาเรน เอกาพทฺโธว หุตฺวา ปายาเส สนฺติฏฺฐติ, ปิณฺฑาย วา จรนฺตสฺส หตฺถโต ปตฺตสฺส มุขวฏฺฏึโต วา ปตฺตตลํ โอโรหติ, เอตฺถ ปฏิคฺคหณกิจฺจํ นตฺถิ. ฌามมหาภูเตสุ อิทํ นาม น วฏฺฏตีติ นตฺถิ, ทุชฺฌาปิตํ ปน น วฏฺฏติ. สุชฺฌาปิตํ มนุสฺสฏฺฐิมฺปิ จุณฺณํ กตฺวา เลเห อุปเนตุํ วฏฺฏติ. महाभूतांमध्ये काय कल्प्य आहे आणि काय कल्प्य नाही? प्रथम दूध कल्प्य आहे; मग ते कल्प्य मांसाच्या प्राण्याचे दूध असो वा अकल्प्य मांसाच्या प्राण्याचे दूध असो, ते पिणाऱ्याला आपत्ती होत नाही. अश्रू, लाळ, शेंबूड, मूत्र, विष्ठा, कफ, दातांवरील मळ, डोळ्यांतील मळ, कानातील मळ आणि शरीरावर आलेले मीठ - हे सर्व कल्प्य आहे. परंतु, या शरीरातील महाभूतांपैकी जे आपल्या स्थानावरून च्युत होऊन पात्रात किंवा हातात पडते, ते ग्रहण करावे. शरीराला चिकटलेले आधीच ग्रहण केलेलेच मानले जाते. गरम खीर खाताना घाम बोटांच्या वाटेने एकसंध होऊन खिरीमध्ये पडतो, किंवा भिक्षेसाठी फिरताना हातातून किंवा पात्राच्या कडेवरून पात्राच्या तळाशी उतरतो, तर येथे पुन्हा ग्रहण करण्याचे प्रयोजन नाही. जळालेल्या महाभूतांमध्ये 'हे कल्प्य नाही' असे काही नाही; परंतु जे नीट जळालेले नाही ते कल्प्य नाही. नीट जळालेल्या मानवी हाडांचे देखील चूर्ण करून चाटण इत्यादी औषधांमध्ये वापरणे कल्प्य आहे. จตฺตาริ มหาวิกฏานิ อสติ กปฺปิยการเก สามมฺปิ คเหตฺวา ปริภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. เอตฺถ จ ทุพฺพโจปิ อสมตฺโถปิ กปฺปิยการโก อสนฺตปกฺเขเยว ติฏฺฐติ. ฉาริกาย อสติ สุกฺขทารุํ ฌาเปตฺวา ฉาริกา คเหตพฺพา. สุกฺขทารุมฺหิ อสติ อลฺลทารุํ รุกฺขโต ฉินฺทิตฺวาปิ กาตุํ วฏฺฏติ. อิทํ ปน จตุพฺพิธมฺปิ มหาวิกฏํ กาโลทิสฺสํ นาม สปฺปทฏฺฐกฺขเณเยว วฏฺฏติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. कल्प्यकारक नसताना चार महाविकट औषधे स्वतःच घेऊन वापरणे कल्प्य आहे. आणि येथे उद्धट किंवा असमर्थ कल्प्यकारक हा देखील नसलेल्याच्याच गटात गणला जातो. राख नसताना सुके लाकूड जाळून राख घ्यावी. सुके लाकूड नसताना ओले लाकूड झाडावरून तोडूनही राख तयार करणे कल्प्य आहे. हे चारही प्रकारचे महाविकट 'कालोद्दिष्ट' नावाचे औषध असून ते केवळ सर्पदंशाच्या वेळीच कल्प्य आहे. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กายโต จ กายจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. एडकलोम शिक्षापदाचे समुत्थान – कायेपासून आणि काय-चित्तापासून उत्पन्न होते; हे क्रियात्मक, संज्ञेअभावी आपत्तीतून सुटका न होणारे, अचित्तक, प्रज्ञप्तिवद्य, कायकर्म, त्रिचित्तक आणि त्रिवेदनक आहे. ทนฺตโปนสิกฺขาปทํ ทสมํ. दंतपोन (दंतकाष्ठ) शिक्षापद दहावे समाप्त. สมตฺโต วณฺณนากฺกเมน โภชนวคฺโค จตุตฺโถ. वर्णनक्रमानुसार चौथा भोजनवर्ग समाप्त झाला. ๕. อเจลกวคฺโค ५. अचेलकवर्ग ๑. อเจลกสิกฺขาปทวณฺณนา १. अचेलक शिक्षापद वर्णन ๒๖๙. อเจลกวคฺคสฺส [Pg.121]๙ ปฐมสิกฺขาปเท – ปริเวสนนฺติ ปริวิสนฏฺฐานํ. ปริพฺพาชกสมาปนฺโนติ ปพฺพชฺชํ สมาปนฺโน. เทติ อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสาติ สมติตฺติกํ ยาคุปตฺตํ เอกปโยเคน เทติ, เอกํ ปาจิตฺติยํ. อวจฺฉินฺทิตฺวา อวจฺฉินฺทิตฺวา เทติ, ปโยเค ปโยเค ปาจิตฺติยํ. เอเสว นโย ปูวภตฺตาทีสุ. ติตฺถิเย อติตฺถิยสญฺญีติ มาตา วา ปิตา วา ติตฺถิเยสุ ปพฺพชติ, เตสํ มาตาปิตุสญฺญาย เทนฺตสฺสาปิ ปาจิตฺติยเมว โหติ. ทาเปตีติ อนุปสมฺปนฺเนน ทาเปติ. २६९. अचेलकवर्गाच्या पहिल्या शिक्षापदात – 'परिवेषण' म्हणजे वाढण्याची जागा. 'परिव्राजक समापन्न' म्हणजे प्रव्रज्येला प्राप्त झालेला. 'देतो, तर पाचित्तिय आपत्ती होते' म्हणजे काठोकाठ भरलेले कंजीचे पात्र एकाच प्रयत्नाने देतो, तर एक पाचित्तिय होते. तोडून तोडून देतो, तर प्रत्येक प्रयत्नागणिक पाचित्तिय होते. हाच नियम खाद्यपदार्थ आणि भात इत्यादींच्या बाबतीतही आहे. 'तित्थिय असूनही अतित्थिय समजून' म्हणजे आई किंवा वडील तीर्थकांमध्ये प्रव्रजित झाले असतील, तर त्यांना 'आई-वडील' या भावनेने देत असतानाही पाचित्तियच होते. 'देववितो' म्हणजे अनुपसंपन्नाद्वारे देववितो. ๒๗๓. อุปนิกฺขิปิตฺวา เทตีติ ตถารูเป ภาชเน ฐเปตฺวา ตํ ภาชนํ เตสํ สนฺติเก ภูมิยํ นิกฺขิปิตฺวา เทติ, เตสํ วา ภาชนํ นิกฺขิปาเปตฺวา ตตฺถ เทติ, ปตฺตํ อาธารเก วา ภูมิยํ วา ฐเปตฺวาปิ ‘‘อิโต คณฺหถา’’ติ วตฺตุํ วฏฺฏติ. สเจ ติตฺถิโย วทติ ‘‘มยฺหํ นาม อิทํ สนฺตกํ, อิธ น อากิรถา’’ติ อากิริตพฺพํ. ตสฺส สนฺตกตฺตา สหตฺถา ทานํ นาม น โหติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. २७३. 'जवळ ठेवून देतो' म्हणजे तशा प्रकारच्या पात्रात ठेवून, ते पात्र त्यांच्याजवळ जमिनीवर ठेवून देतो, किंवा त्यांचे पात्र खाली ठेवायला लावून त्यात देतो. पात्र पात्राधारावर किंवा जमिनीवर ठेवूनही "यातून घ्या" असे म्हणणे कल्प्य आहे. जर तीर्थक म्हणाला, "हे माझे स्वतःचे आहे, यात ओता," तर ओतावे. ते त्याचे स्वतःचे असल्यामुळे स्वतःच्या हाताने देणे असे होत नाही. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. एडकलोम शिक्षापदाचे समुत्थान – हे क्रियात्मक, संज्ञेअभावी आपत्तीतून सुटका न होणारे, अचित्तक, प्रज्ञप्तिवद्य, कायकर्म, त्रिचित्तक आणि त्रिवेदनक आहे. อเจลกสิกฺขาปทํ ปฐมํ. अचेलक शिक्षापद पहिले समाप्त. ๒. อุยฺโยชนสิกฺขาปทวณฺณนา २. उय्योजन (पाठवून देणे) शिक्षापद वर्णन ๒๗๔. ทุติยสิกฺขาปเท – ปฏิกฺกมเนปีติ อาสนสาลายมฺปิ. ภตฺตวิสฺสคฺคนฺติ ภตฺตกิจฺจํ. น สมฺภาเวสีติ น ปาปุณิ. २७४. दुसऱ्या शिक्षापदात – 'पटीक्कमन' म्हणजे आसनशाळेत देखील. 'भत्तविसग्ग' म्हणजे भोजनविधी. 'न संभावेसि' म्हणजे पोहोचला नाही. ๒๗๖. อนาจารนฺติ วุตฺตาวเสสํ กายวจีทฺวารวีติกฺกมํ. ทสฺสนูปจารํ วา สวนูปจารํ วา วิชหนฺตสฺสาติ เอตฺถ ยทิ ฐิโต วา นิสินฺโน วา อุยฺโยเชติ; โย อุยฺโยชิโต, โส วิชหติ, ตสฺส จ อาปตฺติ นาม นตฺถิ. ตสฺมึ ปน วิชหนฺเตปิ อตฺถโต อิตเรน วิชหิตเมว โหติ. ตสฺมา โย อุยฺโยเชติ, ตสฺเสวายํ อาปตฺติ. ตตฺถ สเจ [Pg.122] อุปจารพฺภนฺตเร เอโก ปาโท โหติ, ทุกฺกฏํ. สีมาติกฺกเม ปาจิตฺติยํ. เอตฺถ จ ทสฺสนูปจารสฺส อพฺโภกาเส ทฺวาทสหตฺถปฺปมาณํ, ตถา สวนูปจารสฺส. สเจ ปน อนฺตรา กุฏฺฏทฺวารปาการาทโย โหนฺติ, เตหิ อนฺตริตภาโว ทสฺสนูปจาราติกฺกโม, ตสฺส วเสน อาปตฺติ เวทิตพฺพา. น อญฺโญ โกจิ ปจฺจโย โหตีติ ฐเปตฺวา วุตฺตปฺปการมนาจารํ อญฺญํ กิญฺจิ การณํ น โหติ. २७६. 'अनाचार' म्हणजे पाळीत सांगितलेल्या व्यतिरिक्त काय आणि वाचेच्या द्वाराने होणारे उल्लंघन. 'दर्शनोपचार किंवा श्रवणोपचार सोडणाऱ्याच्या' या बाबतीत – जर उभे राहून किंवा बसून पाठवून देतो; ज्याला पाठवले आहे, तो तो उपचार सोडतो, तर त्याला आपत्ती होत नाही. परंतु, त्याने तो सोडला तरी अर्थतः दुसऱ्यानेच (पाठवणाऱ्यानेच) तो सोडल्यासारखे होते. म्हणून, जो पाठवतो, त्यालाच ही आपत्ती होते. त्यात जर उपचाराच्या आत एक पाऊल असेल, तर दुक्कट आपत्ती होते. सीमा ओलांडल्यावर पाचित्तिय होते. आणि येथे मोकळ्या जागेत दर्शनोपचाराचे प्रमाण बारा हात असते, तसेच श्रवणोपचाराचेही असते. पण जर मध्ये भिंत, दार, कुंपण इत्यादी असतील, तर त्यांच्यामुळे होणारा अडथळा हा दर्शनोपचाराचे उल्लंघन मानला जातो, त्यानुसार आपत्ती जाणावी. 'दुसरा कोणताही प्रत्यय नसतो' म्हणजे वर सांगितलेला अनाचार वगळता इतर कोणतेही कारण नसते. ๒๗๗. กลิสาสนํ อาโรเปตีติ ‘‘กลี’’ติ โกโธ; ตสฺส สาสนํ อาโรเปติ; โกธสฺส อาณํ อาโรเปติ; โกธวเสน ฐานนิสชฺชาทีสุ โทสํ ทสฺเสตฺวา ‘‘ปสฺสถ โภ อิมสฺส ฐานํ, นิสชฺชํ อาโลกิตํ วิโลกิตํ ขาณุโก วิย ติฏฺฐติ, สุนโข วิย นิสีทติ, มกฺกโฏ วิย อิโต จิโต จ วิโลเกตี’’ติ เอวํ อมนาปวจนํ วทติ ‘‘อปฺเปว นาม อิมินาปิ อุพฺพาฬฺโห ปกฺกเมยฺยา’’ติ. เสสํ อุตฺตานเมว. २७७. "कलिसासनं आरोपेति" (कलीचे शासन लादतो) यामध्ये "कली" म्हणजे क्रोध; त्याचे शासन लादतो म्हणजे क्रोधाची आज्ञा लादतो. क्रोधाच्या वश होऊन उभे राहणे, बसणे इत्यादींमध्ये दोष दाखवून, "अहो, या (भिक्खूचे) उभे राहणे, बसणे, समोर पाहणे, इकडेतिकडे पाहणे बघा; हा सुक्या झाडाच्या बुंध्यासारखा (खुंटासारखा) उभा राहतो, कुत्र्यासारखा बसतो, माकडासारखा इकडेतिकडे पाहतो," असे अप्रिय वचन बोलतो. "कदाचित याने त्रासून तो निघून जाईल" या विचाराने तो असे बोलतो. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กายจิตฺตโต วาจาจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. त्रिसमुत्थान (तीन प्रकारे उत्पन्न होणारे) – काय-चित्तापासून, वाचे-चित्तापासून आणि काय-वाचा-चित्तापासून उत्पन्न होते; क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज (लोकापवाद), कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त, आणि तीन वेदना (त्रिवेदना) असणारे आहे. อุยฺโยชนสิกฺขาปทํ ทุติยํ. दुसरे उय्योजन सिक्खापद (पाठविण्यासंबंधीचे शिक्षापद) समाप्त. ๓. สโภชนสิกฺขาปทวณฺณนา ३. सभोजन सिक्खापदाचे वर्णन (स्पष्टीकरण). ๒๗๙. ตติยสิกฺขาปเท – สยนิฆเรติ สยนิยฆเร. ยโต อยฺยสฺส ภิกฺขา ทินฺนาติ ยสฺมา ภิกฺขา ทินฺนา, ยํ อาคเตน ลทฺธพฺพํ ตํ โว ลทฺธํ; คจฺฉถาติ อธิปฺปาโย. ปริยุฏฺฐิโตติ ราคปริยุฏฺฐิโต; เมถุนาธิปฺปาโยติ อตฺโถ. २७९. तिसऱ्या सिक्खापदामध्ये – "सयनिघरे" म्हणजे शयनगृहात (झोपण्याच्या खोलीत). "यतो अय्यस्स भिक्खा दिन्ना" म्हणजे ज्या अर्थी भिक्षा दिली गेली आहे, आलेल्या भिक्खूने जे मिळवायचे होते ते आपण मिळवले आहे; "आता आपण जावे" असा (त्या पुरुषाचा) अभिप्राय आहे. "परियुट्ठितो" म्हणजे रागाने (कामासक्तीने) ग्रासलेला; "मेथुनाधिप्पायो" (मैथुनाचा हेतू असलेला) असा अर्थ आहे. ๒๘๐. สห อุโภหิ ชเนหีติ สโภชนํ; ตสฺมึ สโภชเน. อถ วา สโภชเนติ สโภเค. ราคปริยุฏฺฐิตสฺส หิ ปุริสสฺส อิตฺถี โภโค อิตฺถิยา จ ปุริโส. เตเนวสฺส ปทภาชเน – ‘‘อิตฺถี เจว โหติ ปุริโส จา’’ติอาทิ วุตฺตํ. มหลฺลเก ฆเรติ มหลฺลเก สยนิฆเร. ปิฏฺฐสงฺฆาฏสฺส หตฺถปาสํ วิชหิตฺวาติ ตสฺส สยนิฆเร คพฺภสฺส โย ปิฏฺฐสงฺฆาโฏ, ตสฺส หตฺถปาสํ วิชหิตฺวา; อนฺโตสยนสฺส อาสนฺเน [Pg.123] ฐาเน นิสีทตีติ อตฺโถ. อีทิสญฺจ สยนิฆรํ มหาจตุสฺสาลาทีสุ โหติ. ปิฏฺฐิวํสํ อติกฺกมิตฺวาติ อิมินา มชฺฌาติกฺกมํ ทสฺเสติ. ตสฺมา ยถา วา ตถา วา กตสฺส ขุทฺทกสฺส สยนิฆรสฺส มชฺฌาติกฺกเม อาปตฺติ เวทิตพฺพา. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. २८०. "दोन्ही व्यक्तींसह (पती-पत्नीसह) असणे" म्हणजे सभोजन; त्या सभोशनात. किंवा "सभोजने" म्हणजे उपभोगासह (स्त्री आणि पुरुष एकत्र असणे). कारण कामासक्तीने ग्रासलेल्या पुरुषासाठी स्त्री हा उपभोग आहे आणि स्त्रीसाठी पुरुष हा उपभोग आहे. म्हणूनच याच्या पदभाजनामध्ये भगवंतांनी "स्त्री आणि पुरुष दोन्ही असतात" इत्यादी म्हटले आहे. "महल्लके घरे" म्हणजे मोठ्या शयनगृहात. "पिट्ठसंघाटस्स हत्थपासं विजहित्वा" म्हणजे त्या शयनगृहाच्या खोलीच्या दाराच्या चौकटीचा (दारपट्ट्याचा) हातभर अंतराचा (हत्थपास) त्याग करून; "अन्तोसयनस्स आसन्ने ठाने निसीदति" म्हणजे शयनकक्षाच्या आत जवळच्या ठिकाणी बसतो, असा अर्थ आहे. आणि असे शयनगृह मोठ्या चौसोपी घरांमध्ये (महाचतुःशाला इत्यादींमध्ये) असते. "पिट्ठवंसं अतिक्कमित्वा" याने मध्यभागाचे उल्लंघन करणे दाखवले आहे. म्हणून, कोणत्याही प्रकारे बनवलेल्या लहान शयनगृहाच्या मध्यभागाचे उल्लंघन केल्यास आपत्ती (दोष) समजावी. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ปฐมปาราชิกสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทฺวิเวทนนฺติ. प्रथम पाराजिकाप्रमाणे समुत्थान असणारे – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज (लोकापवाद), कायकर्म, अकुशलचित्त आणि दोन वेदना (द्विवेदना) असणारे आहे. สโภชนสิกฺขาปทํ ตติยํ. तिसरे सभोजन सिक्खापद समाप्त. ๒๘๔. จตุตฺถปญฺจมสิกฺขาปเทสุ ยํ วตฺตพฺพํ สิยา, ตํ สพฺพํ อนิยตทฺวเย วุตฺตนยเมว. ยถา จ สโภชนสิกฺขาปทํ, เอวเมตานิปิ ปฐมปาราชิกสมุฏฺฐานาเนวาติ. २८४. चौथ्या आणि पाचव्या सिक्खापदांमध्ये जे काही सांगायचे आहे, ते सर्व दोन अनियत नियमांमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीप्रमाणेच आहे. आणि जसे सभोजन सिक्खापद आहे, तसेच हे (चौथे व पाचवे सिक्खापद) देखील प्रथम पाराजिकाप्रमाणेच समुत्थान असणारे आहेत. รโหปฏิจฺฉนฺนสิกฺขาปทํ จตุตฺถํ, รโหนิสชฺชสิกฺขาปทํ ปญฺจมํ. चौथे रहोपटिच्छन्न सिक्खापद (एकांतात लपून बसण्यासंबंधीचे शिक्षापद) आणि पाचवे रहोनिसज्ज सिक्खापद (एकांतात बसण्यासंबंधीचे शिक्षापद) समाप्त. ๖. จาริตฺตสิกฺขาปทวณฺณนา ६. चारित्त सिक्खापदाचे वर्णन (स्पष्टीकरण). ๒๙๔. ฉฏฺฐสิกฺขาปเท – เทถาวุโส ภตฺตนฺติ เอตฺถ ตํ กิร ภตฺตํ อภิหฏํ อโหสิ, ตสฺมา เอวมาหํสุ. อนภิหเฏ ปน เอวํ วตฺตุํ น ลพฺภติ, ปยุตฺตวาจา โหติ. २९४. सहाव्या सिक्खापदामध्ये – "देथावुसो भत्तं" (आयुष्यमानांनो, भोजन द्या) यामध्ये ते भोजन खरोखरच आणले गेले होते, म्हणून त्यांनी असे म्हटले. परंतु, भोजन आणले गेले नसताना असे बोलण्याची परवानगी नाही, ती प्रयुक्त वाचा (याचनायुक्त शब्द) ठरते. ๒๙๕. เตน หิ ภิกฺขเว ปฏิคฺคเหตฺวา นิกฺขิปถาติ อิทํ ปน ภควา กุลสฺส สทฺธานุรกฺขณตฺถาย อาห. ยทิ ‘‘ภาเชตฺวา ขาทถา’’ติ วเทยฺย, มนุสฺสานํ ปสาทญฺญถตฺตํ สิยา. อุสฺสาริยิตฺถาติ ปฏิหริยิตฺถ; ฆรํเยว นํ คเหตฺวา อคมํสูติ วุตฺตํ โหติ. २९५. "तर मग भिक्खूंनो, ते स्वीकारून बाजूला ठेवा" हे भगवंतांनी कुळाच्या (दायकांच्या) श्रद्धेचे रक्षण करण्यासाठी म्हटले आहे. जर त्यांनी "ते वाटून खा" असे म्हटले असते, तर लोकांच्या श्रद्धेमध्ये बदल (श्रद्धाभंग) झाला असता. "उस्सारियित्थ" म्हणजे परत नेले गेले; ते (खाद्य) घेऊन ते आपल्या घरीच परत गेले, असा अर्थ आहे. ๒๙๘. สนฺตํ ภิกฺขุนฺติ เอตฺถ กิตฺตาวตา สนฺโต โหติ, กิตฺตาวตา อสนฺโตติ? อนฺโตวิหาเร ยตฺถ ฐิตสฺส กุลานิ ปยิรุปาสนจิตฺตํ อุปฺปนฺนํ, ตโต ปฏฺฐาย ยํ ปสฺเส วา อภิมุเข วา ปสฺสติ, ยสฺส สกฺกา โหติ ปกติวจเนน อาโรเจตุํ, อยํ สนฺโต นาม. อิโต จิโต จ ปริเยสิตฺวา อาโรจนกิจฺจํ นาม นตฺถิ. โย หิ เอวํ ปริเยสิตพฺโพ, โส อสนฺโตเยว. อปิจ อนฺโตอุปจารสีมาย ภิกฺขุํ ทิสฺวา อาปุจฺฉิสฺสามีติ คนฺตฺวา ตตฺถ ยํ ปสฺสติ, โส [Pg.124] อาปุจฺฉิตพฺโพ. โน เจ ปสฺสติ, อสนฺตํ ภิกฺขุํ อนาปุจฺฉา ปวิฏฺโฐ นาม โหติ. २९८. "सन्तं भिक्खुं" (विद्यमान भिक्खू) यामध्ये किती मर्यादेने भिक्खू 'विद्यमान' (संत) असतो आणि किती मर्यादेने 'अविद्यमान' (असंत) असतो? विहारामध्ये ज्या ठिकाणी उभे असताना कुळांकडे (दायकांकडे) जाण्याचा विचार मनात येतो, तिथून पुढे जो भिक्खू बाजूला किंवा समोर दिसतो, ज्याला सामान्य आवाजात सांगणे शक्य असते, त्याला 'विद्यमान' (संत) म्हटले जाते. इकडेतिकडे शोधून सांगण्याचे कोणतेही कर्तव्य नाही. कारण ज्याला अशा प्रकारे शोधावे लागते, तो 'अविद्यमान' (असंत) च असतो. शिवाय, विहाराच्या उपचार सीमेच्या आत भिक्खूला पाहून "मी विचारून जाईन" असा विचार करून गेल्यावर तिथे जो भिक्खू दिसतो, त्याला विचारले पाहिजे. जर कोणी दिसला नाही, तर अविद्यमान भिक्खूला न विचारता प्रवेश केला असे मानले जाते. ๓๐๒. อนฺตรารามนฺติ อนฺโตคาเม วิหาโร โหติ, ตํ คจฺฉติ. ภตฺติยฆรนฺติ นิมนฺติตฆรํ วา สลากภตฺตาทิทายกานํ วา ฆรํ. อาปทาสูติ ชีวิตพฺรหฺมจริยนฺตราเยสุ สติ คนฺตุํ วฏฺฏติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ३०२. "अन्तरायामं" म्हणजे गावाच्या आत विहार असतो, तिथे तो जातो. "भत्तियघरं" म्हणजे निमंत्रित केलेले घर किंवा शलाका-भक्त (चिट्ठ्यांचे अन्न) इत्यादी देणाऱ्या दायकांचे घर. "आपदासु" म्हणजे जीवन किंवा ब्रह्मचर्याला धोका निर्माण झाला असता जाणे योग्य ठरते. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. กถินสมุฏฺฐานํ – กายวาจโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยากิรยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. कठीण नियमाप्रमाणे समुत्थान असणारे – काय-वाचेपासून आणि काय-वाचा-चित्तापासून उत्पन्न होते; क्रिया-अक्रिया, नोसंज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्ति-दोष), कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि तीन वेदना (त्रिवेदना) असणारे आहे. จาริตฺตสิกฺขาปทํ ฉฏฺฐํ. सहावे चारित्त सिक्खापद समाप्त. ๗. มหานามสิกฺขาปทวณฺณนา ७. महानाम सिक्खापदाचे वर्णन (स्पष्टीकरण). ๓๐๓. สตฺตมสิกฺขาปเท – มหานาโม นาม ภควโต จูฬปิตุปุตฺโต มาสมตฺเตน มหลฺลกตโร ทฺวีสุ ผเลสุ ปติฏฺฐิโต อริยสาวโก. เภสชฺชํ อุสฺสนฺนํ โหตีติ วชโต อาหริตฺวา ฐปิตสปฺปิ พหุ โหติ. ३०३. सातव्या सिक्खापदामध्ये – महानाम हे भगवंतांच्या चुलत्यांचे (लहान काकांचे) सुपुत्र होते, जे वयाने भगवंतांपेक्षा सुमारे एक महिन्याने मोठे होते आणि दोन फळांमध्ये (सकृदागामी फळात) प्रतिष्ठित झालेले आर्यश्रावक होते. "भेसज्जं उस्सन्नं होति" म्हणजे गोठ्यातून आणून ठेवलेले तूप मुबलक प्रमाणात होते. ๓๐๖. สาทิตพฺพาติ ตสฺมึ สมเย โรโค นตฺถีติ น ปฏิกฺขิปิตพฺพา; โรเค สติ วิญฺญาเปสฺสามีติ อธิวาเสตพฺพา. เอตฺตเกหิ เภสชฺเชหิ ปวาเรมีติ นามวเสน สปฺปิเตลาทีสุ ทฺวีหิ ตีหิ วา ปริมาณวเสน ปตฺเถน นาฬิยา อาฬฺหเกนาติ วา.อญฺญํ เภสชฺชํ วิญฺญาเปตีติ สปฺปินา ปวาริโต เตลํ วิญฺญาเปติ, อาฬฺหเกน ปวาริโต โทณํ. น เภสชฺเชน กรณีเยนาติ มิสฺสกภตฺเตนปิ เจ ยาเปตุํ สกฺโกติ, น เภสชฺชกรณียํ นาม โหติ. ३०६. "सादितब्बा" म्हणजे "या वेळी कोणताही आजार नाही" असे म्हणून (ती आमंत्रणे) नाकारू नयेत; तर "आजार असताना मी मागणी करीन" असा विचार करून ती स्वीकारली पाहिजेत. "एत्तकेहि भेसज्जेहि पवारेमि" (इतक्या औषधांनी मी आमंत्रित करतो) म्हणजे नावाच्या स्वरूपात तूप, तेल इत्यादींपैकी दोन किंवा तीन औषधांनी, किंवा प्रमाणाच्या स्वरूपात पत्थ (एक माप), नाळी (एक पात्र) किंवा आळ्हक (एक मोठे माप) याद्वारे आमंत्रित करणे होय. "अञ्ञं भेसज्जं विञ्ञापेति" म्हणजे तुपाने आमंत्रित केले असताना तेलाची मागणी करतो, किंवा आळ्हक प्रमाणाने आमंत्रित केले असताना दोण (त्याहून मोठे माप) प्रमाणाची मागणी करतो. "न भेसज्जेन करणीyeन" म्हणजे जर तो मिश्र अन्नाने देखील स्वतःचा उदरनिर्वाह करण्यास समर्थ असेल, तर औषधाची आवश्यकता नसते. ๓๑๐. ปวาริตานนฺติ เย อตฺตโน ปุคฺคลิกาย ปวารณาย ปวาริตา; เตสํ ปวาริตานุรูเปน วิญฺญตฺติยา อนาปตฺติ. สงฺฆวเสน ปวาริเตสุ ปน ปมาณํ สลฺลกฺเขตพฺพเมวาติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ३१०. "पवारितानं" म्हणजे ज्यांनी स्वतःच्या वैयक्तिक आमंत्रणाने आमंत्रित केले आहे; त्यांनी आमंत्रित केल्यानुसार मागणी केल्यास आपत्ती (दोष) होत नाही. परंतु, संघाच्या वतीने आमंत्रित केले असल्यास प्रमाणाचे (मर्यादेचे) भान ठेवलेच पाहिजे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ฉสมุฏฺฐานํ [Pg.125] – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. सहा प्रकारे समुत्थान असणारे (षट्समुत्थान) – क्रिया, नोसंज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्ति-दोष), कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि तीन वेदना (त्रिवेदना) असणारे आहे. มหานามสิกฺขาปทํ สตฺตมํ. सातवे महानाम सिक्खापद समाप्त. ๘. อุยฺยุตฺตเสนาสิกฺขาปทวณฺณนา ८. उय्युत्तसेना सिक्खापदाचे वर्णन (स्पष्टीकरण). ๓๑๑. อฏฺฐเม – อพฺภุยฺยาโตติ อภิอุยฺยาโต; ปรเสนํ อภิมุโข คมิสฺสามีติ นครโต นิคฺคโตติ อตฺโถ. อุยฺยุตฺตนฺติ กตอุยฺโยคํ; คามโต นิกฺขนฺตนฺติ อตฺโถ. ३११. आठव्या सिक्खापदामध्ये – "अब्भुय्यातो" म्हणजे कूच केलेला; "मी शत्रूच्या सैन्यासमोर जाईन" असा विचार करून शहरातून बाहेर पडलेला, असा अर्थ आहे. "उय्युत्तं" म्हणजे युद्धाची तयारी केलेला; गावातून बाहेर पडलेला, असा अर्थ आहे. ๓๑๔. ทฺวาทสปุริโส หตฺถีติ จตฺตาโร อาโรหกา เอเกกปาทรกฺขกา ทฺเว ทฺเวติ เอวํ ทฺวาทสปุริโส โหติ. ติปุริโส อสฺโสติ เอโก อาโรหโก ทฺเว ปาทรกฺขกาติ เอวํ ติปุริโส โหติ. จตุปุริโส รโถติ เอโก สารถิ เอโก โยโธ ทฺเว อาณิรกฺขกาติ เอวํ จตุปุริโส โหติ. จตฺตาโร ปุริสา สรหตฺถาติ อาวุธหตฺถา จตฺตาโร ปุริสาติ อยํ ปจฺฉิมโกฏิยา จตุรงฺคสมนฺนาคตา เสนา นาม. อีทิสํ เสนํ ทสฺสนาย คจฺฉโต ปเท ปเท ทุกฺกฏํ. ทสฺสนูปจารํ วิชหิตฺวาติ เกนจิ อนฺตริตา วา นินฺนํ โอรุฬฺหา วา น ทิสฺสติ; อิธ ฐตฺวา น สกฺกา ทฏฺฐุนฺติ อญฺญํ ฐานํ คนฺตฺวา ปสฺสโต ปโยเค ปโยเค ปาจิตฺติยนฺติ อตฺโถ. ३१४. बारा पुरुष असलेला हत्ती म्हणजे: चार स्वार आणि प्रत्येक पायाचे रक्षण करणारे दोन-दोन सैनिक, अशा प्रकारे बारा पुरुष असतात. तीन पुरुष असलेला घोडा म्हणजे: एक स्वार आणि दोन पायांचे रक्षण करणारे सैनिक, अशा प्रकारे तीन पुरुष असतात. चार पुरुष असलेला रथ म्हणजे: एक सारथी, एक योद्धा आणि दोन आणी-रक्षक (चाकांचे रक्षक) सैनिक, अशा प्रकारे चार पुरुष असतात. हातात धनुष्य असलेले चार पुरुष म्हणजे: हातात शस्त्रे असलेले चार पुरुष. ही अंतिम मर्यादेनुसार चतुरंग (चार अंगांनी युक्त) सेना म्हटली जाते. अशा सेनेला पाहण्यासाठी जाणाऱ्या भिक्खूच्या प्रत्येक पावलावर 'दुक्कट' आपत्ती होते. 'दृष्टीचा टप्पा सोडून' म्हणजे: एखाद्या गोष्टीने आडून गेल्यामुळे किंवा सखल भागात उतरल्यामुळे ती सेना दिसत नाही; 'येथे उभे राहून पाहणे शक्य नाही' असा विचार करून दुसऱ्या ठिकाणी जाऊन पाहणाऱ्या भिक्खूला प्रत्येक प्रयत्नात 'पाचित्तिय' आपत्ती होते, असा अर्थ आहे. ๓๑๕. เอกเมกนฺติ หตฺถิอาทีสุ จตูสุ องฺเคสุ เอกเมกํ; อนฺตมโส เอกปุริสารุฬฺหกหตฺถิมฺปิ เอกมฺปิ สรหตฺถํ ปุริสํ. อนุยฺยุตฺตา นาม ราชา อุยฺยานํ วา นทึ วา คจฺฉติ; เอวํ อนุยฺยุตฺตา โหติ. ३१५. 'एक-एक' म्हणजे हत्ती इत्यादी चार अंगांपैकी प्रत्येक एक; अगदी कमीत कमी एका माणसाने स्वार झालेला हत्ती किंवा हातात धनुष्य असलेला एक पुरुष सुद्धा. 'अनुय्युत्त' (न निघालेली सेना) म्हणजे राजा ज्या सेनेसोबत उद्यानात किंवा नदीवर जातो; अशी सेना 'अनुय्युत्त' असते. ๓๑๖. อาปทาสูติ ชีวิตพฺรหฺมจริยนฺตราเยสุ สติ เอตฺถ คโต มุญฺจิสฺสามีติ คจฺฉโต อนาปตฺติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ३१६. 'आपत्तीच्या वेळी' म्हणजे जीवन किंवा ब्रह्मचर्याला धोका निर्माण झाला असता, 'येथे गेल्यावर मी संकटातून सुटेन' असा विचार करून जाणाऱ्या भिक्खूला अनापत्ती आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. याचे समुत्थान एळकलोम (मेंढीच्या लोकरीच्या) नियमाप्रमाणे आहे – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष नसलेले, अचित्तक, लोकवज्ज (लोकविरुद्ध), कायकर्म, अकुशलचित्त आणि त्रिवेदना असणारे आहे. อุยฺยุตฺตเสนาสิกฺขาปทํ อฏฺฐมํ. उय्युत्तसेना (सज्ज सेना) पाहाण्यासंबंधीचे आठवे सिक्खापद समाप्त. ๙. เสนาวาสสิกฺขาปทวณฺณนา ९. सेनावास सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना). ๓๑๙. นวเม [Pg.126] – อตฺถงฺคเต สูริเย เสนาย วสตีติ ติฏฺฐตุ วา นิสีทตุ วา สยตุ วา สเจปิ อากาเส อิทฺธิยา กญฺจิ อิริยาปถํ กปฺเปติ, ปาจิตฺติยเมว. เสนา วา ปฏิเสนาย รุทฺธา โหตีติ ยถา สญฺจาโร ฉิชฺชติ; เอวํ รุทฺธา โหติ. ปลิพุทฺโธติ เวริเกน วา อิสฺสเรน วา รุทฺโธ. เสสํ อุตฺตานเมว. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ३१९. नवव्या सिक्खापदात – 'सूर्यास्त झाल्यावर सेनेत राहतो' म्हणजे तो उभा असो, बसलेला असो, झोपलेला असो किंवा आकाशात ऋद्धीने कोणतीही शारीरिक स्थिती धारण करत असला, तरीही पाचित्तियच होते. 'सेना किंवा शत्रूच्या सेनेने वेढलेली असते' म्हणजे ज्या प्रकारे येणे-जाणे बंद होते; अशा प्रकारे वेढलेली असते. 'अडवून ठेवलेली' म्हणजे शत्रूने किंवा राजाने अडवून ठेवलेली असते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. याचे समुत्थान एळकलोम नियमाप्रमाणे आहे – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष नसलेले, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तिविरुद्ध), कायकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदना असणारे आहे. เสนาวาสสิกฺขาปทํ นวมํ. सेनावास सिक्खापद नववे समाप्त. ๑๐. อุยฺโยธิกสิกฺขาปทวณฺณนา १०. उय्योधिक (युद्धभूमी) सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना). ๓๒๒. ทสเม – อุคฺคนฺตฺวา อุคฺคนฺตฺวา เอตฺถ ยุชฺฌนฺตีติ อุยฺโยธิกํ; สมฺปหารฏฺฐานสฺเสตํ อธิวจนํ. พลสฺส อคฺคํ ชานนฺติ เอตฺถาติ พลคฺคํ; พลคณนฏฺฐานนฺติ อตฺโถ. เสนาย วิยูหํ เสนาพฺยูหํ; เสนานิเวสสฺเสตํ อธิวจนํ. ตโย หตฺถี ปจฺฉิมํ หตฺถานีกนฺติ โย ปุพฺเพ วุตฺโต ทฺวาทสปุริโส หตฺถีติ เตน หตฺถินา ตโย หตฺถี. เสเสสุปิ เอเสว นโย. เสสํ อุยฺยุตฺตเสนาสิกฺขาปเท วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ สทฺธึ สมุฏฺฐานาทีหีติ. ३२२. दहाव्या सिक्खापदात – 'आगेकूच करून जेथे युद्ध करतात' ते 'उय्योधिक' (युद्धभूमी) होय; हे युद्धक्षेत्राचे नाव आहे. 'जेथे सैन्याची संख्या मोजतात' ते 'बलग्ग' होय; याचा अर्थ सैन्याची मोजणी करण्याचे ठिकाण असा आहे. सेनेची विशिष्ट रचना म्हणजे 'सेनाब्यूह' (सैन्याची मांडणी); हे लष्करी छावणीचे नाव आहे. 'तीन हत्ती हे अंतिम हत्ती-दल आहे' म्हणजे पूर्वी 'बारा पुरुष असलेला हत्ती' जो सांगितला आहे, तशा हत्तींसह तीन हत्ती. इतर अंगांच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. उर्वरित भाग समुत्थानासह 'उय्युत्तसेना सिक्खापदा'मध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनुसारच समजावा. อุยฺโยธิกสิกฺขาปทํ ทสมํ. उय्योधिक सिक्खापद दहावे समाप्त. สมตฺโต วณฺณนากฺกเมน อเจลกวคฺโค ปญฺจโม. स्पष्टीकरणाच्या क्रमानुसार पाचवा अचेलकवर्ग समाप्त झाला. ๖. สุราปานวคฺโค ६. सुरापानवर्ग ๑. สุราปานสิกฺขาปทวณฺณนา १. सुरापान सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना). ๓๒๖. สุราปานวคฺคสฺส ปฐมสิกฺขาปเท – ภทฺทวติกาติ เอโก คาโม, โส ภทฺทิกาย วติยา สมนฺนาคตตฺตา เอตํ นาม ลภิ. ปถาวิโนติ อทฺธิกา. เตชสา เตชนฺติ อตฺตโน เตชสา อานุภาเวน นาคสฺส เตชํ. กาโปติกาติ กโปตปาทสมวณฺณรตฺโตภาสา. ปสนฺนาติ สุรามณฺฑสฺเสตํ [Pg.127] อธิวจนํ. อนนุจฺฉวิยํ ภิกฺขเว สาคตสฺสาติ ปญฺจาภิญฺญสฺส สโต มชฺชปานํ นาม น อนุจฺฉวิยนฺติ วุตฺตํ โหติ. ३२६. सुरापानवर्गाच्या पहिल्या सिक्खापदात – 'भद्दवतिका' हे एका गावाचे नाव आहे, ते गाव सुंदर कुंपणाने युक्त असल्यामुळे त्याला हे नाव मिळाले. 'पथावी' म्हणजे प्रवासी. 'तेजाने तेज' म्हणजे स्वतःच्या (सागत स्थविरांच्या) तेजाने व प्रभावाने नागाचे तेज पराभूत केले. 'कापोतिका' म्हणजे कबुतराच्या पायासारखा लालसर रंग असलेली मद्य. 'प्रसन्ना' हे सुरामांडाचे (मद्याच्या वरच्या स्वच्छ पाण्याचे) नाव आहे. 'हे भिक्खूंनो, सागताला हे शोभत नाही' म्हणजे पाच अभिज्ञा प्राप्त असलेल्या सागत स्थविरांना मद्यपान करणे योग्य नाही, असे म्हटले आहे. ๓๒๘. ปุปฺผาสโว นาม มธุกปุปฺผาทีนํ รเสน กโต. ผลาสโว นาม มุทฺทิกผลาทีนิ มทฺทิตฺวา เตสํ รเสน กโต. มธฺวาสโว นาม มุทฺทิกานํ ชาติรเสน กโต; มกฺขิกมธุนาปิ กริยตีติ วทนฺติ. คุฬาสโว นาม อุจฺฉุรสาทีหิ กริยติ. สุรา นาม ปิฏฺฐกิณฺณปกฺขิตฺตา; นาฬิเกราทีนมฺปิ รเสน กตา สุราตฺเวว สงฺขฺยํ คจฺฉติ, ตสฺสาเยว กิณฺณปกฺขิตฺตาย มณฺเฑ คหิเต เมรโยตฺเวว สงฺขฺยํ คจฺฉตีติ วทนฺติ. อนฺตมโส กุสคฺเคนปิ ปิวตีติ เอตํ สุรํ วา เมรยํ วา พีชโต ปฏฺฐาย กุสคฺเคน ปิวโตปิ ปาจิตฺติยนฺติ อตฺโถ. เอเกน ปน ปโยเคน พหุมฺปิ ปิวนฺตสฺส เอกา อาปตฺติ. วิจฺฉินฺทิตฺวา วิจฺฉินฺทิตฺวา ปิวโต ปโยคคณนาย อาปตฺติโย. ३२८. 'पुप्फासव' म्हणजे महुआच्या फुलांच्या रसापासून बनवलेले मद्य. 'फलासव' म्हणजे द्राक्षे इत्यादी फळे कुस्करून त्यांच्या रसापासून बनवलेले मद्य. 'मध्वासव' म्हणजे द्राक्षांच्या नैसर्गिक रसापासून बनवलेले मद्य; काही जण म्हणतात की ते मधमाश्यांच्या मधापासूनही बनवले जाते. 'गुळासव' म्हणजे उसाच्या रसापासून बनवलेले मद्य. 'सुरा' म्हणजे पिठात यीस्ट (किण्ण) टाकून बनवलेले मद्य; नारळ इत्यादींच्या रसापासून बनवलेल्या मद्यालाही 'सुरा'च म्हटले जाते. त्याच यीस्ट टाकलेल्या सुराचा वरचा स्वच्छ भाग (मंड) घेतला असता त्याला 'मेरय' म्हटले जाते, असे म्हणतात. 'अगदी कुशाच्या (गवताच्या) टोकाने जरी प्यायले' म्हणजे या सुरा किंवा मेरयाला अगदी सुरुवातीपासून कुशाच्या टोकाने जरी प्यायले, तरीही पाचित्तिय आपत्ती होते, असा अर्थ आहे. परंतु, एकाच प्रयत्नात पुष्कळ प्यायल्यास एकच आपत्ती होते. थांबून-थांबून पिणाऱ्याला प्रयत्नांच्या संख्येनुसार आपत्ती होतात. ๓๒๙. อมชฺชญฺจ โหติ มชฺชวณฺณํ มชฺชคนฺธํ มชฺชรสนฺติ โลณโสวีรกํ วา สุตฺตํ วา โหติ. สูปสมฺปาเกติ วาสคาหาปนตฺถํ อีสกํ มชฺชํ ปกฺขิปิตฺวา สูปํ ปจนฺติ, ตสฺมึ อนาปตฺติ. มํสสมฺปาเกปิ เอเสว นโย. เตลํ ปน วาตเภสชฺชตฺถํ มชฺเชน สทฺธึ ปจนฺติ, ตสฺมิมฺปิ อนติกฺขิตฺตมชฺเชเยว อนาปตฺติ, ยํ ปน อติกฺขิตฺตมชฺชํ โหติ, เอตฺถ มชฺชสฺส วณฺณคนฺธรสา ปญฺญายนฺติ, ตสฺมึ อาปตฺติเยว. อมชฺชํ อริฏฺฐนฺติ โย อริฏฺโฐ มชฺชํ น โหติ, ตสฺมึ อนาปตฺติ. อามลกาทีนํเยว กิร รเสน อริฏฺฐํ กโรนฺติ, โส มชฺชวณฺณคนฺธรโสเยว โหติ, น จ มชฺชํ; ตํ สนฺธาเยตํ วุตฺตํ. โย ปน สมฺภารปกฺขิตฺโต, โส มชฺชํ โหติ, พีชโต ปฏฺฐาย น วฏฺฏติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ อกุสลจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. วตฺถุอชานนตาย เจตฺถ อจิตฺตกตา เวทิตพฺพา, อกุสเลเนว ปาตพฺพตาย โลกวชฺชตาติ. ३२९. 'जे मद्य नाही, पण मद्यासारखा रंग, वास व चव असलेले आहे' म्हणजे लोणसोवीरक किंवा सुत्त होय. 'आमटी शिजवताना' सुवास येण्यासाठी थोडे मद्य टाकून आमटी शिजवतात, त्यात अनापत्ती आहे. मांस शिजवतानाही हाच नियम आहे. वातविकाराच्या औषधासाठी मद्यासोबत तेल शिजवतात, त्यातही मद्याचे प्रमाण जास्त नसलेल्या तेलाच्या सेवनात अनापत्ती आहे. परंतु, ज्या तेलात मद्याचे प्रमाण जास्त असते आणि मद्याचा रंग, वास व चव स्पष्ट जाणवते, त्यात आपत्तीच होते. 'जे मद्य नसलेले अरिष्ट आहे' म्हणजे जे अरिष्ट मद्य नाही, त्याच्या सेवनात अनापत्ती आहे. आवळा इत्यादींच्या रसापासून अरिष्ट बनवतात, त्याला मद्यासारखा रंग, वास व चव असली तरी ते मद्य नसते; त्याला उद्देशून हे म्हटले आहे. परंतु, ज्या अरिष्टात मद्य बनवण्याचे घटक टाकलेले असतात, ते मद्यच असते; ते सुरुवातीपासूनच अयोग्य आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. याचे समुत्थान एळकलोम नियमाप्रमाणे आहे – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष नसलेले, अचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, अकुशलचित्त आणि त्रिवेदना असणारे आहे. येथे वस्तूचे अज्ञान असल्यामुळे 'अचित्तकता' समजावी, आणि अकुशल चित्तानेच प्यायले जात असल्यामुळे 'लोकवज्जता' समजावी. สุราปานสิกฺขาปทํ ปฐมํ. सुरापान सिक्खापद पहिले समाप्त. ๒. องฺคุลิปโตทกสิกฺขาปทวณฺณนา २. अंगुलिपतोदक (बोटाने गुदगुल्या करणे) सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना). ๓๓๐. ทุติเย [Pg.128] – องฺคุลิปโตทเกนาติ องฺคุลีหิ อุปกจฺฉกาทิฆฏฺฏนํ วุจฺจติ. อุตฺตสนฺโตติ อติหาเสน กิลมนฺโต. อนสฺสาสโกติ อุปจฺฉินฺนอสฺสาสปสฺสาสสญฺจาโร หุตฺวา. อนุปสมฺปนฺนํ กาเยน กายนฺติ เอตฺถ ภิกฺขุนีปิ อนุปสมฺปนฺนฏฺฐาเน ฐิตา, ตมฺปิ ขิฑฺฑาธิปฺปาเยน ผุสนฺตสฺส ทุกฺกฏํ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ३३०. दुसऱ्या सिक्खापदात – 'अंगुलिपतोदक' म्हणजे बोटांनी काख इत्यादी ठिकाणी स्पर्श करणे (गुदगुल्या करणे) होय. 'घाबरणारा' म्हणजे अतिशय हसण्यामुळे दमलेला. 'श्वास कोंडलेला' म्हणजे श्वासोच्छ्वास थांबल्यासारखा झालेला. 'अनुपसंपन्नाला शरीराने स्पर्श करणे' यामध्ये भिक्खुणी देखील अनुपसंपन्नाच्या स्थानी आहे; तिलाही खेळण्याच्या उद्देशाने स्पर्श करणाऱ्या भिक्खूला दुक्कट आपत्ती होते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ปฐมปาราชิกสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทฺวิเวทนนฺติ. याचे समुत्थान पहिल्या पाराजिका नियमाप्रमाणे आहे – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष असलेले, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, अकुशलचित्त आणि द्विवेदना असणारे आहे. องฺคุลิปโตทกสิกฺขาปทํ ทุติยํ. अंगुलिपतोदक सिक्खापद दुसरे समाप्त. ๓. หสธมฺมสิกฺขาปทวณฺณนา ३. हसधम्म (पाण्यात खेळणे) सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना). ๓๓๕. ตติเย – อปฺปกตญฺญุโนติ ยํ ภควตา ปกตํ ปญฺญตฺตํ, ตํ น ชานนฺตีติ อตฺโถ. ३३५. तिसऱ्या सिक्खापदात – 'अप्पकतञ्ञू' (न जाणणारे) म्हणजे भगवंतांनी जे प्रज्ञप्त (नियमबद्ध) केले आहे, ते न जाणणारे, असा अर्थ आहे. ๓๓๖. อุทเก หสธมฺเมติ อุทกกีฬิกา วุจฺจติ. อุปริโคปฺผเกติ โคปฺผกานํ อุปริภาคปฺปมาเณ. หสาธิปฺปาโยติ กีฬาธิปฺปาโย. นิมุชฺชติ วาติอาทีสุ นิมุชฺชนตฺถาย โอโรหนฺตสฺส ปทวาเร ปทวาเร ทุกฺกฏํ. นิมุชฺชนุมฺมุชฺชเนสุ ปโยเค ปโยเค ปาจิตฺติยํ. นิมุชฺชิตฺวา อนฺโตอุทเกเยว คจฺฉนฺตสฺส หตฺถวารปทวาเรสุ สพฺพตฺถ ปาจิตฺติยํ. ปลวตีติ ตรติ. หตฺเถหิ ตรนฺตสฺส หตฺถวาเร หตฺถวาเร ปาจิตฺติยํ. ปาเทสุปิ เอเสว นโย. เยน เยน องฺเคน ตรติ, ตสฺส ตสฺส ปโยเค ปโยเค ปาจิตฺติยํ. ตีรโต วา รุกฺขโต วา อุทเก ปตติ, ปาจิตฺติยเมว. นาวาย กีฬตีติ ผิยาริตฺตาทีหิ นาวํ ปาเชนฺโต วา ตีเร อุสฺสาเรนฺโต วา นาวาย กีฬติ, ทุกฺกฏํ. ३३६. ‘पाण्यात हसणे’ (उदके हसधम्मे) म्हणजे पाण्यात क्रीडा करणे (खेळणे) असे म्हटले जाते. ‘घोट्यांच्या वर’ (उपरिगोप्पहके) म्हणजे घोट्यांच्या वरच्या भागाच्या प्रमाणात असलेल्या पाण्यात. ‘हसण्याच्या इच्छेने’ (हसाधिप्पायो) म्हणजे खेळण्याच्या इच्छेने. पाण्यात बुडी मारण्यासाठी खाली उतरणाऱ्या भिक्खूच्या प्रत्येक पावलावर दुक्कट आपत्ती होते. पाण्यात बुडी मारणे आणि वर येणे या प्रत्येक प्रयत्नात पाचित्तिय आपत्ती होते. पाण्यात बुडी मारून पाण्याच्या आतच पुढे जाणाऱ्या भिक्खूच्या हाताच्या व पायाच्या प्रत्येक हालचालीत सर्वत्र पाचित्तिय आपत्ती होते. ‘पोहतो’ (पलवति) म्हणजे पोहणे. हातांनी पोहणाऱ्या भिक्खूच्या हाताच्या प्रत्येक हालचालीवर पाचित्तिय आपत्ती होते. पायांच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. ज्या ज्या अवयवाने तो पोहतो, त्या त्या अवयवाच्या प्रत्येक प्रयत्नात पाचित्तिय आपत्ती होते. किनाऱ्यावरून किंवा झाडावरून पाण्यात उडी मारल्यास पाचित्तिय आपत्तीच होते. ‘नावेने खेळतो’ म्हणजे वल्हे इत्यादींनी नाव चालवत किंवा किनाऱ्यावरून ती ढकलत नावेने खेळल्यास दुक्कट आपत्ती होते. หตฺเถน วาติอาทีสุปิ ปโยเค ปโยเค ทุกฺกฏํ. เกจิ หตฺเถน อุทเก ขิตฺตาย กถลาย ปตนุปฺปตนวาเรสุ ทุกฺกฏํ วทนฺติ, ตํ น คเหตพฺพํ. ตตฺถ หิ เอกปโยคตฺตา เอกเมว ทุกฺกฏํ, อปิจ อุปริโคปฺผเก วุตฺตานิ อุมฺมุชฺชนาทีนิ ฐเปตฺวา อญฺเญน เยน เกนจิ อากาเรน อุทกํ โอตริตฺวา วา อโนตริตฺวา วา ยตฺถ กตฺถจิ ฐิตํ อุทกํ [Pg.129] อนฺตมโส พินฺทุํ คเหตฺวา ขิปนกีฬายปิ กีฬนฺตสฺส ทุกฺกฏเมว, อตฺถโชตกํ ปน อกฺขรํ ลิขิตุํ วฏฺฏติ, อยเมตฺถ วินิจฺฉโย. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. हाताने इत्यादी (पाण्यात मारणे इत्यादी) प्रत्येक प्रयत्नातही दुक्कट आपत्ती होते. काही आचार्य म्हणतात की, हाताने पाण्यात फेकलेल्या खापराच्या तुकड्याच्या पाण्यात पडण्याच्या आणि वर उडण्याच्या प्रत्येक वेळी दुक्कट आपत्ती होते, परंतु ते स्वीकारू नये. कारण तेथे एकच प्रयत्न असल्यामुळे एकच दुक्कट आपत्ती होते. शिवाय, घोट्यांच्या वरच्या पाण्यात सांगितलेले वर येणे इत्यादी सोडून, इतर कोणत्याही प्रकारे पाण्यात उतरून किंवा न उतरता, कोठेही असलेल्या पाण्यातून अगदी पाण्याचा थेंब घेऊन फेकण्याच्या खेळाने खेळणाऱ्यालाही दुक्कट आपत्तीच होते. परंतु, अर्थ स्पष्ट करणारे अक्षर पाण्यात लिहिणे योग्य आहे. हा या संदर्भातील निर्णय आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ปฐมปาราชิกสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. पहिल्या पाराजिकाप्रमाणे याचे समुत्थान आहे – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, अकुशलचित्त आणि तीन वेदना. หสธมฺมสิกฺขาปทํ ตติยํ. हसधम्म (पाण्यात खेळण्याचे) तिसरे शिक्षापद समाप्त. ๔. อนาทริยสิกฺขาปทวณฺณนา ४. अनादरिय शिक्षापदाचे वर्णन. ๓๔๒. จตุตฺเถ – กถายํ นสฺเสยฺยาติ กถํ อยํ ธมฺโม ตนฺติ ปเวณี นสฺเสยฺย. ตํ วา น สิกฺขิตุกาโมติ เยน ปญฺญตฺเตน วุจฺจติ, ตํ ปญฺญตฺตํ น สิกฺขิตุกาโม. อปญฺญตฺเตนาติ สุตฺเต วา อภิธมฺเม วา อาคเตน. ३४२. चौथ्या शिक्षापदात – ‘कथा कशी नष्ट होईल’ (कथायं नस्सेय्या) म्हणजे हा धर्म, ही परंपरा, हा वंश कसा नष्ट होईल? ‘किंवा ते शिकण्याची इच्छा नसलेला’ (तं वा न सिक्खितुकामो) म्हणजे ज्या प्रज्ञप्त केलेल्या शिक्षापदाविषयी बोलले जात आहे, ते प्रज्ञप्त केलेले शिक्षापद आचरण्याची इच्छा नसलेला. ‘जे प्रज्ञप्त केलेले नाही’ (अपञ्ञत्तेन) म्हणजे सुत्तात किंवा अभिधम्मात आलेल्या धर्मवचनाने. ๓๔๔. เอวํ อมฺหากํ อาจริยานํ อุคฺคโหติ เอตฺถ คารยฺโห อาจริยุคฺคโห น คเหตพฺโพ; ปเวณิยา อาคโต อาจริยุคฺคโหว คเหตพฺโพ. กุรุนฺทิยํ ปน ‘‘โลกวชฺเช อาจริยุคฺคโห น วฏฺฏติ, ปณฺณตฺติวชฺเช ปน วฏฺฏตี’’ติ วุตฺตํ. มหาปจฺจริยํ ‘‘สุตฺตํ สุตฺตานุโลมญฺจ อุคฺคหิตกานํเยว อาจริยานํ อุคฺคโห ปมาณํ, อชานนฺตานํ กถา อปฺปมาณนฺติ วุตฺตํ. ตํ สพฺพํ ปเวณิยา อาคเตสโมธานํ คจฺฉติ. เสสํ อุตฺตานเมวาติ. ३४४. ‘अशा प्रकारे आमच्या आचार्यांचे ग्रहण आहे’ यात निंदनीय आचार्यांचे मत स्वीकारू नये; परंपरेने आलेले आचार्यांचे मतच स्वीकारावे. परंतु कुरुन्दीमध्ये म्हटले आहे की, ‘लोकवज्ज शिक्षापदात आचार्यांचे मत स्वीकारणे योग्य नाही, परंतु पण्णत्तिवज्ज शिक्षापदात ते योग्य आहे.’ महापंचरीमध्ये म्हटले आहे की, ‘ज्यांनी सुत्त आणि सुत्तानुलोम (अट्ठकथा) शिकले आहे, अशाच आचार्यांचे मत प्रमाण मानले जावे; जे जाणत नाहीत, अशा आचार्यांचे बोलणे अप्रमाण आहे.’ हे सर्व परंपरेने आलेल्या मतामध्ये समाविष्ट होते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กายจิตฺตโต วาจาจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. तीन समुत्थाने – काय-चित्तापासून, वाचा-चित्तापासून आणि काय-वाचा-चित्तापासून समुत्थान होते; क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदना. อนาทริยสิกฺขาปทํ จตุตฺถํ. अनादरिय शिक्षापद चौथे समाप्त. ๕. ภึสาปนสิกฺขาปทวณฺณนา ५. भिंसापन (भय दाखवण्याच्या) शिक्षापदाचे वर्णन. ๓๔๕. ปญฺจเม – รูปูปหาราทโย มนุสฺสวิคฺคเห วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพา. เสสํ อุตฺตานเมว. สมุฏฺฐานาทีนิ อนาทริยสทิสาเนวาติ. ३४५. पाचव्या शिक्षापदात – रूपाचे प्रदर्शन इत्यादी गोष्टी मनुस्सविग्गह शिक्षापदात सांगितलेल्या नियमाप्रमाणेच जाणाव्यात. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. समुत्थान इत्यादी अनादरिय शिक्षापदासारखेच आहेत. ภึสาปนสิกฺขาปทํ ปญฺจมํ. भिंसापन (भय दाखवण्याचे) पाचवे शिक्षापद समाप्त. ๖. โชติสิกฺขาปทวณฺณนา ६. जोति (अग्नी पेटवण्याच्या) शिक्षापदाचे वर्णन. ๓๕๐. ฉฏฺเฐ [Pg.130] – ภคฺคาติ ชนปทสฺส นามํ. สํสุมารคิรนฺติ นครสฺส. เภสกฬาวนนฺติ ตนฺนิสฺสิตวนสฺส. ตํ ปน มิคานํ ผาสุวิหารตฺถาย ทินฺนตฺตา มิคทาโยติ วุจฺจติ. สมาทหิตฺวาติ ชาเลตฺวา. ปริปาเตสีติ อนุพนฺธิ. ३५०. सहाव्या शिक्षापदात – ‘भग्ग’ हे जनपदाचे नाव आहे. ‘संसुमारगिर’ हे नगराचे नाव आहे. ‘भेसकळावन’ हे त्या नगराजवळील अरण्याचे नाव आहे. परंतु, ते अरण्य प्राण्यांना निर्भयपणे राहण्यासाठी (अभयारण्य म्हणून) दिले असल्यामुळे त्याला ‘मिगदाय’ (मृगदाय) असे म्हटले जाते. ‘समिदहित्वा’ म्हणजे अग्नी पेटवून. ‘परिपातेसि’ म्हणजे पाठलाग केला. ๓๕๒. ปทีเปปีติ ปทีปุชฺชลเนปิ. โชติเกปีติ ปตฺตปจนเสทกมฺมาทีสุ โชติกรเณ. ตถารูปปจฺจยาติ ปทีปาทิปจฺจยา. ३५२. ‘दिव्यामध्येही’ (पदीपेपि) म्हणजे दिवा पेटवण्यामध्येही. ‘अग्नीमध्येही’ (जोतिकेपि) म्हणजे पात्र भाजणे, घाम काढणे इत्यादींसाठी अग्नी तयार करण्यामध्ये. ‘तशा प्रकारच्या कारणाने’ (तथारूपपच्चया) म्हणजे दिवा पेटवणे इत्यादी कारणांमुळे. ๓๕๔-๕. สยํ สมาทหตีติ เอตฺถ โชตึ สมาทหิตุกามตาย อรณิสณฺฐปนโต ปฏฺฐาย ยาว ชาลา น อุฏฺฐหติ, ตาว สพฺพปโยเคสุ ทุกฺกฏํ. ปฏิลาตํ อุกฺขิปตีติ ทยฺหมานํ อลาตํ ปติตํ อุกฺขิปติ, ปุน ยถาฐาเน ฐเปตีติ อตฺโถ. เอวํ อวิชฺฌาตํ อุกฺขิปิตฺวา ปกฺขิปนฺตสฺเสว ทุกฺกฏํ, วิชฺฌาตํ ปุน ชาลาเปนฺตสฺส ปาจิตฺติยเมว. ३५४-५. ‘स्वतः अग्नी पेटवतो’ यात अग्नी पेटवण्याच्या इच्छेने अरणी (अग्नी मंथनाचे लाकूड) ठेवल्यापासून जोपर्यंत अग्नीची ज्वाला निर्माण होत नाही, तोपर्यंतच्या सर्व प्रयत्नांमध्ये दुक्कट आपत्ती होते. ‘विझणारे निखारे उचलतो’ म्हणजे जळणारे व खाली पडलेले निखारे उचलून पुन्हा मूळ जागी ठेवतो, असा अर्थ आहे. अशा प्रकारे न विझलेले निखारे उचलून पुन्हा अग्नीत टाकणाऱ्या भिक्खूलाच दुक्कट आपत्ती होते. परंतु विझलेले निखारे पुन्हा पेटवणाऱ्या भिक्खूला पाचित्तिय आपत्तीच होते. ๓๕๖. ตถารูปปจฺจยาติ ฐเปตฺวา ปทีปาทีนิ อญฺเญนปิ ตถารูเปน ปจฺจเยน สมาทหนฺตสฺส อนาปตฺติ. อาปทาสูติ ทุฏฺฐวาฬมิคอมนุสฺเสหิ อุปทฺทโว โหติ, ตตฺถ สมาทหนฺตสฺสาปิ อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมวาติ. ฉสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ३५६. ‘तशा प्रकारच्या कारणाने’ म्हणजे दिवा पेटवणे इत्यादी सोडून, इतर कोणत्याही तशा प्रकारच्या योग्य कारणाने अग्नी पेटवणाऱ्याला आपत्ती होत नाही. ‘आपत्तीच्या वेळी’ (आपदासू) म्हणजे दुष्ट हिंस्त्र पशू किंवा अमनुष्य यांच्यापासून उपद्रव होत असल्यास, तेथे अग्नी पेटवणाऱ्यालाही आपत्ती होत नाही. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. सहा समुत्थाने – क्रिया, नोसंज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि तीन वेदना. โชติสิกฺขาปทํ ฉฏฺฐํ. जोति (अग्नी पेटवण्याचे) सहावे शिक्षापद समाप्त. ๗. นหานสิกฺขาปทวณฺณนา ७. नहान (स्नान करण्याच्या) शिक्षापदाचे वर्णन. ๓๖๔. สตฺตเม – จุณฺเณน วา มตฺติกาย วาติ เอตฺถ จุณฺณมตฺติกานํ อภิสงฺขรณกาลโต ปฏฺฐาย สพฺพปโยเคสุ ทุกฺกฏํ. ३६४. सातव्या शिक्षापदात – ‘चूर्णाने किंवा मातीने’ यात चूर्ण (साबण पावडर) किंवा माती तयार करण्याच्या वेळेपासून सुरू होणाऱ्या सर्व प्रयत्नांमध्ये दुक्कट आपत्ती होते. ๓๖๖. ปารํ คจฺฉนฺโต นฺหายตีติ เอตฺถ สุกฺขาย นทิยา วาลิกํ อุกฺกิริตฺวา กตอาวาฏเกสุปิ นฺหายิตุํ วฏฺฏติ. อาปทาสูติ ภมราทีหิ อนุพทฺธสฺส อุทเก นิมุชฺชิตุํ วฏฺฏตีติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ३६६. ‘पलीकडे जाताना स्नान करतो’ यात कोरड्या नदीतील वाळू उकरून तयार केलेल्या खड्ड्यांमध्येही स्नान करणे योग्य आहे. ‘आपत्तीच्या वेळी’ म्हणजे भुंगे इत्यादी कीटकांनी पाठलाग केलेल्या भिक्खूला पाण्यात बुडी मारणे योग्य आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. एळकलोम (मेंढीच्या लोकरीच्या) शिक्षापदाप्रमाणे याचे समुत्थान आहे – क्रिया, नोसंज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज, कायकर्म, त्रिचित्त आणि तीन वेदना. นหานสิกฺขาปทํ สตฺตมํ. नहान (स्नान करण्याचे) सातवे शिक्षापद समाप्त. ๘. ทุพฺพณฺณกรณสิกฺขาปทวณฺณนา ८. दुब्बण्णकरण (कपड्यांना विद्रूप रंगाने रंगवण्याच्या) शिक्षापदाचे वर्णन. ๓๖๘-๙. อฏฺฐเม [Pg.131] – นวํ ปน ภิกฺขุนา จีวรลาเภนาติ เอตฺถ อลภีติ ลโภ; ลโภเยว ลาโภ. กึ อลภิ? จีวรํ. กีทิสํ? นวํ. อิติ ‘‘นวจีวรลาเภนา’’ติ วตฺตพฺเพ อนุนาสิกโลปํ อกตฺวา ‘‘นวจีวรลาเภนา’’ติ วุตฺตํ; ปฏิลทฺธนวจีวเรนาติ อตฺโถ. มชฺเฌ ฐิตปททฺวเย ปนาติ นิปาโต. ภิกฺขุนาติ เยน ลทฺธํ ตสฺส นิทสฺสนํ. ปทภาชเน ปน พฺยญฺชนํ อนาทิยิตฺวา ยํ ลทฺธํ ตํ ทสฺเสตุํ ‘‘จีวรํ นาม ฉนฺนํ จีวราน’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. จีวรนฺติ เอตฺถ ยํ นิวาเสตุํ วา ปารุปิตุํ วา สกฺกา โหติ, ตเทว เวทิตพฺพํ. เตเนว ‘‘วิกปฺปนุปคปจฺฉิม’’นฺติ น วุตฺตํ. กํสนีลนฺติ จมฺมการนีลํ. มหาปจฺจริยํ ปน ‘‘อโยมลํ โลหมลํ เอตํ กํสนีลํ นามา’’ติ วุตฺตํ. ปลาสนีลนฺติ โย โกจิ นีลวณฺโณ ปณฺณรโส. ทุพฺพณฺณกรณํ อาทาตพฺพนฺติ เอตํ กปฺปพินฺทุํ สนฺธาย วุตฺตํ; น นีลาทีหิ สกลจีวรสฺส ทุพฺพณฺณกรณํ. ตญฺจ ปน กปฺปํ อาทิยนฺเตน จีวรํ รชิตฺวา จตูสุ วา โกเณสุ ตีสุ วา ทฺวีสุ วา เอกสฺมึ วา โกเณ โมรสฺส อกฺขิมณฺฑลมตฺตํ วา มงฺกุลปิฏฺฐิมตฺตํ วา อาทาตพฺพํ. มหาปจฺจริยํ ‘‘ปตฺเต วา คณฺฐิยํ วา น วฏฺฏตี’’ติ วุตฺตํ. มหาอฏฺฐกถายํ ปน ‘‘วฏฺฏติเยวา’’ติ วุตฺตํ. ปาฬิกปฺปกณฺณิกกปฺปาทโย ปน สพฺพตฺถ ปฏิสิทฺธา, ตสฺมา ฐเปตฺวา เอกํ วฏฺฏพินฺทุํ อญฺเญน เกนจิปิ วิกาเรน กปฺโป น กาตพฺโพ. ३६८-९. आठव्या सिक्खापदात – 'नवं पन भिक्खुना चीवरलाभेन' यामध्ये 'अलभि' (मिळवले) म्हणून 'लाभो' (लाभ) म्हटले आहे; लाभ मिळवणारा भिक्खूच 'लाभो' आहे. काय मिळवले? चीवर. कसले? नवीन. या प्रकारे 'नवचीवरलाभेन' असे म्हणायचे असताना अनुनासिकाचा लोप न करता भगवंतांनी 'नवं चीवरलाभेन' असे म्हटले आहे; याचा अर्थ 'नवीन चीवर प्राप्त झालेल्या भिक्खूने' असा आहे. मध्ये असलेल्या दोन पदांमधील 'पन' हा निपात आहे. 'भिक्खुना' हा शब्द ज्याला चीवर मिळाले आहे त्या भिक्खूचा निदर्शक आहे. पदभाजनामध्ये शब्दाचा शब्दशः अर्थ न घेता, जे मिळाले आहे ते दाखवण्यासाठी भगवंतांनी 'चीवरं नाम छन्नं चीवरानं' (चीवर म्हणजे सहा प्रकारची चीवरे) इत्यादी म्हटले आहे. येथे 'चीवर' म्हणजे जे नेसता येते किंवा पांघरता येते, तेच समजले पाहिजे. म्हणूनच 'विकल्पनोपग-पश्चिम' असे म्हटले नाही. 'कांस्यनील' म्हणजे चर्मकाराचा निळा रंग. महाप्रत्यरीमध्ये 'लोखंडाचा मळ किंवा तांब्याचा मळ याला कांस्यनील म्हणतात' असे म्हटले आहे. 'पलाशनील' म्हणजे कोणताही निळ्या रंगाचा पानांचा रस. 'दुर्वर्णकरण करावे' (दुब्बण्णकरणं आदातब्बं) हे कप्पबिंदूच्या संदर्भात म्हटले आहे; निळ्या इत्यादी रंगांनी संपूर्ण चीवर दुर्वर्ण करण्याच्या संदर्भात नाही. आणि तो कप्पबिंदू लावताना भिक्खूने चीवर रंगवल्यानंतर चार कोपऱ्यांवर, किंवा तीन, किंवा दोन, किंवा एका कोपऱ्यावर मोराच्या डोळ्याच्या आकाराचा किंवा ढेकणाच्या पाठीच्या आकाराचा कप्पबिंदू लावावा. महाप्रत्यरीमध्ये 'पात्रावर किंवा गाठीवर लावणे योग्य नाही' असे म्हटले आहे. महाअट्ठकथेमध्ये मात्र 'योग्यच आहे' असे म्हटले आहे. पाळिकप्प, कण्णिकाकप्प इत्यादी सर्व अट्ठकथांमध्ये निषिद्ध मानले गेले आहेत, म्हणून एक गोल बिंदू सोडून इतर कोणत्याही विकाराने (प्रकाराने) कप्पबिंदू करू नये. ๓๗๑. อคฺคเฬติอาทีสุ เอตานิ อคฺคฬาทีนิ กปฺปกตจีวเร ปจฺฉา อาโรเปตฺวา กปฺปกรณกิจฺจํ นตฺถิ. เสสํ อุตฺตานเมว. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยากิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ; กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ३७१. अग्गळ (ठिगळ) इत्यादींच्या बाबतीत, कप्पबिंदू लावलेल्या चीवरावर नंतर हे ठिगळ इत्यादी लावल्यास पुन्हा कप्पबिंदू लावण्याचे कार्य उरत नाही. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. याचे समुत्थान एडकलोम सिक्खापदाप्रमाणे आहे – क्रिया-अक्रिया, नोसञ्ञाविमोक्ख (संज्ञाविमोक्ष नसलेले), अचित्तक, प्रज्ञप्तिवद्य; कायकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदन आहे. ทุพฺพณฺณกรณสิกฺขาปทํ อฏฺฐมํ. दुर्वर्णकरण सिक्खापद आठवे समाप्त. ๙. วิกปฺปนสิกฺขาปทวณฺณนา ९. विकल्पन सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๓๗๔. นวเม – ตสฺส วา อทินฺนนฺติ จีวรสามิกสฺส ‘‘ปริภุญฺช วา วิสฺสชฺเชหิ วา ยถาปจฺจยํ วา กโรหี’’ติ เอวํ วตฺวา อทินฺนํ. ตสฺส วา อวิสฺสสนฺโตติ เยน วินยกมฺมํ กตํ, ตสฺส อวิสฺสาเสน วา. เตน [Pg.132] ปน ทินฺนํ วา ตสฺส วิสฺสาเสน วา ปริภุญฺชนฺตสฺส อนาปตฺติ. เสสเมตฺถ ตึสกวณฺณนายํ วุตฺตนยตฺตา อุตฺตานเมวาติ. กถินสมุฏฺฐานํ – กายวาจโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยากิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ३७४. नवव्या सिक्खापदात – 'तस्स वा अदिन्नं' (किंवा त्याला न दिलेले) म्हणजे चीवरचा मूळ मालक असलेल्या त्या भिक्खूने 'वापर किंवा विसर्जन कर किंवा इच्छेनुसार काहीही कर' असे न सांगता दिलेले नसलेले चीवर. 'तस्स वा अविस्ससंतो' (किंवा त्याच्यावर विश्वास नसताना) म्हणजे ज्याच्यासोबत विनयकर्म केले आहे, त्याच्यावर विश्वास नसताना जे चीवर वापरले जाते ते. परंतु, त्याने दिलेले चीवर किंवा त्याच्यावरील विश्वासाने वापरणाऱ्याला आपत्ती येत नाही. येथील उर्वरित भाग तिंसक-वर्णनेमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीने स्पष्टच आहे. याचे समुत्थान कठीण सिक्खापदाप्रमाणे आहे – काय-वाचेने आणि काय-वाचा-चित्ताने समुत्थान होते; क्रिया-अक्रिया, नोसञ्ञाविमोक्ख, अचित्तक, प्रज्ञप्तिवद्य, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदन आहे. วิกปฺปนสิกฺขาปทํ นวมํ. विकल्पन सिक्खापद नववे समाप्त. ๑๐. จีวราปนิธานสิกฺขาปทวณฺณนา १०. चीवरापनिधान सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๓๗๗-๘๑. ทสเม – อปนิเธนฺตีติ อปเนตฺวา นิเธนฺติ. หสาเปกฺโขติ หสาธิปฺปาโย. อญฺญํ ปริกฺขารนฺติ ปาฬิยา อนาคตํ ปตฺตตฺถวิกาทึ. ธมฺมึ กถํ กตฺวาติ ‘‘สมเณน นาม อนิหิตปริกฺขาเรน ภวิตุํ น วฏฺฏตี’’ติ เอวํ ธมฺมกถํ กเถตฺวา ทสฺสามีติ นิกฺขิปโต อนาปตฺติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ३७७-८१. दहाव्या सिक्खापदात – 'अपनिधेन्ति' म्हणजे मूळ जागेवरून हलवून लपवून ठेवतात. 'हसापेक्खो' म्हणजे थट्टा-मस्करी करण्याच्या उद्देशाने. 'अञ्ञं परिक्खारं' म्हणजे पाळीमध्ये उल्लेख न आलेले पात्र-पिशवी इत्यादी इतर परिष्कार. 'धम्मिं कथं कत्वा' म्हणजे 'श्रमणाने आपले परिष्कार न आवरता ठेवणे योग्य नाही' अशी धम्मकथा सांगून, 'मी नंतर परत देईन' या विचाराने लपवून ठेवणाऱ्या भिक्खूला आपत्ती येत नाही. येथील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. याचे त्रिसमुत्थान आहे – क्रिया, सञ्ञाविमोक्ख, sचित्तक, लोकवद्य, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि त्रिवेदन आहे. จีวราปนิธานสิกฺขาปทํ ทสมํ. चीवरापनिधान सिक्खापद दहावे समाप्त. สมตฺโต วณฺณนากฺกเมน สุราปานวคฺโค ฉฏฺโฐ. स्पष्टीकरणाच्या क्रमाने सहावा सुरापानवर्ग समाप्त झाला. ๗. สปฺปาณกวคฺโค ७. सप्पाणकवर्ग. ๑. สญฺจิจฺจปาณสิกฺขาปทวณฺณนา १. सञ्चिच्चपाण (जाणूनबुजून प्राण्याची हत्या करणे) सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๓๘๒. สปฺปาณกวคฺคสฺส ปฐมสิกฺขาปเท – อิสฺสาโส โหตีติ คิหิกาเล ธนุคฺคหาจริโย โหติ. ชีวิตา โวโรปิตาติ ชีวิตา วิโยชิตา. ३८२. सप्पाणकवर्गाच्या पहिल्या सिक्खापदात – 'इस्सासो होति' म्हणजे गृहस्थदशेत धनुर्विद्येचा आचार्य होता. 'जीविता वोरोपिता' म्हणजे जीवितापासून विलग केले. สิกฺขาปเทปิ โวโรเปยฺยาติ วิโยเชยฺย. ยสฺมา ปน โวหารมตฺตเมเวตํ; น เหตฺถ กิญฺจิ วิโยชิเต สีสาลงฺกาเร สีสํ วิย ชีวิตา โวโรปิเต ปาเณปิ ชีวิตํ นาม วิสุํ ติฏฺฐติ, อญฺญทตฺถุ อนฺตรธานเมว [Pg.133] คจฺฉติ, ตสฺมา ตมตฺถํ ทสฺเสตุํ ปทภาชเน ‘‘ชีวิตินฺทฺริยํ อุปจฺฉินฺทตี’’ติอาทิ วุตฺตํ. อิมสฺมิญฺจ สิกฺขาปเท ติรจฺฉานคโตเยว ‘‘ปาโณ’’ติ เวทิตพฺโพ. ตํ ขุทฺทกมฺปิ มหนฺตมฺปิ มาเรนฺตสฺส อาปตฺตินานากรณํ นตฺถิ. มหนฺเต ปน อุปกฺกมมหนฺตตฺตา อกุสลมหตฺตํ โหติ. ปาเณ ปาณสญฺญีติ อนฺตมโส มญฺจปีฐํ โสเธนฺโต มงฺคุลพีชเกปิ ปาณสญฺญี นิกฺการุณิกตาย ตํ ภินฺทนฺโต อปเนติ, ปาจิตฺติยํ. ตสฺมา เอวรูเปสุ ฐาเนสุ การุญฺญํ อุปฏฺฐเปตฺวา อปฺปมตฺเตน วตฺตํ กาตพฺพํ. เสสํ มนุสฺสวิคฺคเห วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ สทฺธึ สมุฏฺฐานาทีหีติ. सिक्खापदात देखील 'वोरोपेय्य' म्हणजे विलग करावे. कारण हा केवळ व्यवहाराचा शब्द आहे; कारण जसे डोक्यावरील अलंकार विलग केल्यावर डोके वेगळे राहते, तसे प्राण्याला जीवितापासून विलग केल्यावर 'जीवित' नावाचे काही वेगळे शिल्लक राहत नाही, तर ते पूर्णपणे नाहीसे होते. म्हणून तो अर्थ दाखवण्यासाठी पदभाजनामध्ये 'जीवितेंद्रियाचा उच्छेद करतो' इत्यादी भगवंतांनी म्हटले आहे. आणि या सिक्खापदात केवळ तिर्यंच (प्राणी) यालाच 'पाण' (प्राणी) समजावे. लहान किंवा मोठ्या प्राण्याला मारताना आपत्तीमध्ये काही फरक पडत नाही. परंतु मोठ्या प्राण्याच्या बाबतीत, प्रयत्नांच्या मोठेपणामुळे अकुशलाची तीव्रता अधिक असते. 'प्राण्यामध्ये प्राणी अशी संज्ञा असणे' म्हणजे अगदी खाट किंवा पाट स्वच्छ करताना ढेकणाच्या अंड्यांमध्ये देखील प्राण्याची संज्ञा असताना, कारुण्य नसल्यामुळे त्यांना फोडून बाजूला करतो, तर पाचित्तिय आपत्ती होते. म्हणून अशा प्रसंगी कारुण्य जागृत ठेवून सावधगिरीने सेनासन-कर्तव्य करावे. उर्वरित भाग मनुस्सविग्गह सिक्खापदात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समुत्थान इत्यादींसह समजून घ्यावा. สญฺจิจฺจปาณสิกฺขาปทํ ปฐมํ. सञ्चिच्चपाण सिक्खापद पहिले समाप्त. ๒. สปฺปาณกสิกฺขาปทวณฺณนา २. सप्पाणक सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๓๘๗. ทุติเย – สปฺปาณกนฺติ เย ปาณกา ปริโภเคน มรนฺติ, เตหิ ปาณเกหิ สปฺปาณกํ, ตาทิสญฺหิ ชานํ ปริภุญฺชโต ปโยเค ปโยเค ปาจิตฺติยํ. ปตฺตปูรมฺปิ อวิจฺฉินฺทิตฺวา เอกปโยเคน ปิวโต เอกา อาปตฺติ. ตาทิเสน อุทเกน สามิสํ ปตฺตํ อาวิญฺฉิตฺวา โธวโตปิ ตาทิเส อุทเก อุณฺหยาคุปตฺตํ นิพฺพาปยโตปิ ตํ อุทกํ หตฺเถน วา อุฬุงฺเกน วา คเหตฺวา นฺหายโตปิ ปโยเค ปโยเค ปาจิตฺติยํ. อุทกโสณฺฑึ วา โปกฺขรณึ วา ปวิสิตฺวา พหินิกฺขมนตฺถาย วีจึ อุฏฺฐาปยโตปิ. โสณฺฑึ วา โปกฺขรณึ วา โสเธนฺเตหิ ตโต คหิตอุทกํ อุทเกเยว อาสิญฺจิตพฺพํ. สมีปมฺหิ อุทเก อสติ กปฺปิยอุทกสฺส อฏฺฐ วา ทส วา ฆเฏ อุทกสณฺฐานกปฺปเทเส อาสิญฺจิตฺวา ตตฺถ อาสิญฺจิตพฺพํ. ‘‘ปวฏฺฏิตฺวา อุทเก ปติสฺสตี’’ติ อุณฺหปาสาเณ อุทกํ นาสิญฺจิตพฺพํ. กปฺปิยอุทเกน ปน ปาสาณํ นิพฺพาเปตฺวา อาสิญฺจิตุํ วฏฺฏติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ३८७. दुसऱ्या सिक्खापदात – 'सप्पाणकं' म्हणजे जे कीटक पाण्याचा वापर केल्याने मरतात, त्या कीटकांसह असलेले पाणी. असे पाणी आहे हे जाणून ते वापरणाऱ्या भिक्खूला प्रत्येक प्रयोगागणिक पाचित्तिय आपत्ती होते. पात्रात भरलेले पाणी देखील न थांबता एकाच वेळी पिणाऱ्याला एकच आपत्ती होते. अशा पाण्याने अन्नाने खरकटलेले पात्र विसळून धुणाऱ्याला, किंवा अशा पाण्यात गरम पेजेचे पात्र थंड करण्यासाठी बुडवणाऱ्याला, किंवा ते पाणी हाताने किंवा पळीने घेऊन स्नान करणाऱ्याला देखील प्रत्येक प्रयोगागणिक पाचित्तिय आपत्ती होते. पाण्याच्या डोहात किंवा तळ्यात उतरून पाणी बाहेर घालवण्यासाठी लाटा निर्माण करणाऱ्याला देखील प्रत्येक प्रयोगागणिक पाचित्तिय आपत्ती होते. डोह किंवा तळे स्वच्छ करणाऱ्यांनी त्यातून काढलेले पाणी दुसऱ्या पाण्यातच ओतावे. जवळ पाणी नसल्यास, कप्पिय पाण्याच्या आठ किंवा दहा घागरी पाणी साचू शकेल अशा ठिकाणी ओतून, त्यात ते पाणी ओतावे. 'वाहून जाऊन पाण्यात पडेल' या विचाराने गरम दगडावर पाणी ओतू नये. परंतु कप्पिय पाण्याने दगड थंड करून त्यावर ओतणे योग्य आहे. येथील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, याचे त्रिसमुत्थान आहे – क्रिया, सञ्ञाविमोक्ख, सचित्तक, प्रज्ञप्तिवद्य, कायकर्म... วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. เอตฺถ จ ปฏงฺคปาณกานํ ปตนํ ญตฺวาปิ สุทฺธจิตฺตตาย ทีปชาลเน วิย สปฺปาณกภาวํ ญตฺวาปิ อุทกสญฺญาย ปริภุญฺชิตพฺพโต ปณฺณตฺติวชฺชตา เวทิตพฺพาติ. वचीकम्म (वाचिक कर्म), तिचित्त (तीन चित्त), तिवेदन (तीन वेदना) असे समजावे. आणि येथे, पतंग नावाच्या लहान कीटकांचे पडणे माहीत असूनही, शुद्ध चित्ताने दिवा लावण्याप्रमाणे, किंवा (पाण्यात) सजीव असणे माहीत असूनही, 'हे केवळ पाणी आहे' अशा संज्ञेने (समजुतीने) त्याचा उपभोग घेता येत असल्यामुळे, हा केवळ प्रज्ञप्ति-वद्य (नियम मोडण्याचा दोष) आहे, असे समजावे. สปฺปาณกสิกฺขาปทํ ทุติยํ. सप्राणक (सजीव पाणी) शिक्षापद दुसरे समाप्त. ๓. อุกฺโกฏนสิกฺขาปทวณฺณนา ३. उक्कोटन (निर्णय फिरवणे) शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๓๙๒. ตติยสิกฺขาปเท [Pg.134] – อุกฺโกเฏนฺตีติ ตสฺส ตสฺส ภิกฺขุโน สนฺติกํ คนฺตฺวา ‘‘อกตํ กมฺม’’นฺติอาทีนิ วทนฺตา อุจฺจาเลนฺติ; ยถาปติฏฺฐิตภาเวน ปติฏฺฐาตุํ น เทนฺติ. ३९२. तिसऱ्या शिक्षापदात – 'उक्कोटेन्ति' (उकरून काढतात/फिरवतात) म्हणजे त्या त्या भिक्खूच्या जवळ जाऊन 'कर्म (संघकार्य) अकृत (झालेले नाही)' इत्यादी बोलून ते (निर्णय) हलवतात किंवा उत्तेजित करतात; जसा तो निर्णय प्रस्थापित झाला आहे, तसा तो प्रस्थापित राहू देत नाहीत. ๓๙๓. ยถาธมฺมนฺติ โย ยสฺส อธิกรณสฺส วูปสมนาย ธมฺโม วุตฺโต, เตเนว ธมฺเมนาติ อตฺโถ. นิหตาธิกรณนฺติ นิหตํ อธิกรณํ; สตฺถารา วุตฺตธมฺเมเนว วูปสมิตํ อธิกรณนฺติ อตฺโถ. ३९३. 'यथाधम्मं' म्हणजे ज्या अधिकरणाच्या (वादाच्या) शमनासाठी जो धम्म (नियम/पद्धत) भगवंतांनी सांगितला आहे, त्याच धम्माने (नियमाने) असा अर्थ आहे. 'निहताधिकरणं' म्हणजे शांत केलेले अधिकरण; शास्त्यांनी (बुद्धांनी) सांगितलेल्या धम्मानेच शांत केलेले अधिकरण असा अर्थ आहे. ๓๙๕. ธมฺมกมฺเม ธมฺมกมฺมสญฺญีติ เยน กมฺเมน ตํ อธิกรณํ วูปสมิตํ, ตญฺเจ ธมฺมกมฺมํ โหติ, ตสฺมึ ธมฺมกมฺเม อยมฺปิ ธมฺมกมฺมสญฺญี หุตฺวา ยทิ อุกฺโกเฏติ, ปาจิตฺติยํ อาปชฺชตีติ อตฺโถ. เอเตน นเยน เสสปทานิปิ เวทิตพฺพานิ. อยเมตฺถ สงฺเขโป, วิตฺถาโร ปน ‘‘อิเมสํ จตุนฺนํ อธิกรณานํ กติ อุกฺโกฏนา’’ติอาทินา นเยน ปริวาเร วุตฺโต. อฏฺฐกถาสุ ตํ สพฺพํ อาหริตฺวา ตสฺเสวตฺโถ วณฺณิโต. มยํ ปน ตํ ตตฺเถว วณฺณยิสฺสาม. อิธ อาหริตฺวา วณฺณิยมาเน หิ สุฏฺฐุตรํ สมฺโมโห ภเวยฺยาติ น วณฺณยิมฺห. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. ३९५. 'धम्मकम्मे धम्मकम्मसञ्ञी' म्हणजे ज्या कर्माने ते अधिकरण शांत केले गेले आहे, आणि जर ते धर्मकर्म (नियमानुसार केलेले कार्य) असेल, तर त्या धर्मकर्मात हा भिक्खू देखील 'हे धर्मकर्म आहे' अशी संज्ञा (समजूत) ठेवून जर ते उकरून काढतो (निर्णय फिरवतो), तर तो पाचित्तिय आपत्तीला प्राप्त होतो, असा अर्थ आहे. याच पद्धतीने उर्वरित पदे देखील समजावीत. हा येथे संक्षेप (थोडक्यात सारांश) आहे, तर सविस्तर वर्णन 'इमेसं चतुन्नं अधिकरणानं कति उक्कोटना' इत्यादी पद्धतीने परिवारात सांगितले आहे. अट्ठकथांमध्ये ते सर्व येथे आणून त्याचाच अर्थ स्पष्ट केला आहे. परंतु आम्ही त्याचे स्पष्टीकरण तेथेच (परिवारातच) करू. कारण येथे ते सर्व आणून स्पष्ट केले असता अधिक गोंधळ निर्माण होईल, म्हणून आम्ही येथे स्पष्टीकरण केले नाही. उर्वरित भाग येथे स्पष्टच आहे. तीन समुत्थान – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकम्म, वचीकम्म, अकुसलचित्त, आणि दुःखवेदना. อุกฺโกฏนสิกฺขาปทํ ตติยํ. उक्कोटन शिक्षापद तिसरे समाप्त. ๔. ทุฏฺฐุลฺลสิกฺขาปทวณฺณนา ४. दुट्ठुल्ल (गंभीर/दुष्टुल) शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๓๙๙. จตุตฺเถ – ทุฏฺฐุลฺลา นาม อาปตฺตีติ เอตฺถ จตฺตาริ ปาราชิกานิ อตฺถุทฺธารวเสน ทสฺสิตานิ, สงฺฆาทิเสสาปตฺติ ปน อธิปฺเปตา, ตํ ฉาเทนฺตสฺส ปาจิตฺติยํ. ธุรํ นิกฺขิตฺตมตฺเตติ ธุเร นิกฺขิตฺตมตฺเต. สเจปิ ธุรํ นิกฺขิปิตฺวา ปจฺฉา อาโรเจติ, น รกฺขติ; ธุรํ นิกฺขิตฺตมตฺเตเยว ปาจิตฺติยนฺติ วุตฺตํ โหติ. สเจ ปน เอวํ ธุรํ นิกฺขิปิตฺวา ปฏิจฺฉาทนตฺถเมว อญฺญสฺส อาโรเจติ, โสปิ อญฺญสฺสาติ เอเตนุปาเยน สมณสตมฺปิ สมณสหสฺสมฺปิ อาปตฺตึ อาปชฺชติเยว ตาว, ยาว โกฏิ น ฉิชฺชติ. กทา ปน โกฏิ ฉิชฺชตีติ? มหาสุมตฺเถโร ตาว วทติ – ‘‘อาปตฺตึ อาปนฺโน เอกสฺส [Pg.135] อาโรเจติ, โส ปฏินิวตฺติตฺวา ตสฺเสว อาโรเจติ; เอวํ โกฏิ ฉิชฺชตี’’ติ. มหาปทุมตฺเถโร ปนาห – ‘‘อยญฺหิ วตฺถุปุคฺคโลเยว. อาปตฺตึ อาปนฺโน ปน เอกสฺส ภิกฺขุโน อาโรเจติ, อยํ อญฺญสฺส อาโรเจติ, โส ปฏินิวตฺติตฺวา เยนสฺส อาโรจิตํ, ตสฺเสว อาโรเจติ; เอวํ ตติเยน ปุคฺคเลน ทุติยสฺส อาโรจิเต โกฏิ ฉินฺนา โหตี’’ติ. ३९९. चौथ्या शिक्षापदात – 'दुट्ठुल्ला नाम आपत्ती' (गंभीर आपत्ती) यामध्ये अर्थ स्पष्ट करण्याच्या हेतूने चार पाराजिक दाखवले गेले आहेत, परंतु येथे संघादिसेस आपत्ती अभिप्रेत आहे; ती लपवणाऱ्या भिक्खूला पाचित्तिय होते. 'धुरं निक्खित्तमत्ते' म्हणजे कर्तव्य किंवा प्रयत्न सोडून दिल्याबरोबर. जरी कर्तव्य सोडून दिल्यानंतर तो नंतर सांगतो, तरी तो आपत्तीपासून वाचत नाही; कर्तव्य सोडून दिल्याबरोबरच पाचित्तिय होते, असे म्हटले आहे. परंतु जर अशा प्रकारे कर्तव्य सोडून देऊन केवळ लपवण्याच्या उद्देशाने तो दुसऱ्याला सांगतो, आणि तो दुसरा तिसऱ्याला सांगतो, तर या पद्धतीने जोपर्यंत ही साखळी तुटत नाही, तोपर्यंत शंभर भिक्खू किंवा हजार भिक्खू देखील आपत्तीला प्राप्त होतातच. मग ही साखळी कधी तुटते? महासुम थेर म्हणतात – 'आपत्तीला प्राप्त झालेला भिक्खू एकाला सांगतो, तो परत फिरून त्याच आपत्ती प्राप्त भिक्खूला सांगतो; अशा प्रकारे साखळी तुटते.' परंतु महापदुम थेर म्हणतात – 'हा तर केवळ वस्तूचा मालक (मूळ व्यक्ती) आहे. परंतु आपत्ती प्राप्त झालेला भिक्खू एका भिक्खूला सांगतो, तो दुसऱ्याला सांगतो, आणि तो तिसरा भिक्खू परत फिरून ज्याने त्याला सांगितले होते, त्याच दुसऱ्या भिक्खूला सांगतो; अशा प्रकारे तिसऱ्या व्यक्तीने दुसऱ्याला सांगितल्यावर साखळी तुटते.' ๔๐๐. อทุฏฺฐุลฺลํ อาปตฺตินฺติ อวเสเส ปญฺจาปตฺติกฺขนฺเธ. อนุปสมฺปนฺนสฺส ทุฏฺฐุลฺลํ วา อทุฏฺฐุลฺลํ วา อชฺฌาจารนฺติ เอตฺถ อนุปสมฺปนฺนสฺส สุกฺกวิสฺสฏฺฐิ จ กายสํสคฺโค จาติ อยํ ทุฏฺฐุลฺลอชฺฌาจาโร นาม. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมวาติ. ธุรนิกฺเขปสมุฏฺฐานํ – กายวาจาจิตฺตโต สมุฏฺฐาติ, อกิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. ४००. 'अदुट्ठुल्लं आपत्तिं' म्हणजे उर्वरित पाच आपत्ती-स्कंध. 'अनुपसम्पन्नस्स दुट्ठुल्लं वा अदुट्ठुल्लं वा अज्झाचारं' यामध्ये अनुपसम्पन्नाच्या (उपसंपदा न झालेल्याच्या) बाबतीत सुक्कविस्सट्ठि (वीर्यपात) आणि कायसंसग्ग (शारीरिक संपर्क) हे दोन 'दुट्ठुल्ल-अज्झाचार' (गंभीर उल्लंघन) नावाचे आहेत. उर्वरित भाग येथे स्पष्टच आहे. धुरनिक्खेपसमुट्ठान (कर्तव्य सोडण्याचे समुत्थान) – काय, वाचा आणि चित्तापासून उत्पन्न होते, अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकम्म, वचीकम्म, अकुसलचित्त, आणि दुःखवेदना. ทุฏฺฐุลฺลสิกฺขาปทํ จตุตฺถํ. दुट्ठुल्ल शिक्षापद चौथे समाप्त. ๕. อูนวีสติวสฺสสิกฺขาปทวณฺณนา ५. ऊनवीसतिवस्स (वीस वर्षांपेक्षा कमी वय) शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๔๐๒. ปญฺจมสิกฺขาปเท – องฺคุลิโย ทุกฺขา ภวิสฺสนฺตีติ อกฺขรานิ ลิขนฺตสฺส องฺคุลิโย ทุกฺขา ภวิสฺสนฺตีติ จินฺเตสุํ. อุรสฺส ทุกฺโขติ คณนํ สิกฺขนฺเตน พหุํ จินฺเตตพฺพํ โหติ, เตนสฺส อุโร ทุกฺโข ภวิสฺสตีติ มญฺญึสุ. อกฺขีนิ ทุกฺขา ภวิสฺสนฺตีติ รูปสุตฺตํ สิกฺขนฺเตน กหาปณา ปริวตฺเตตฺวา ปริวตฺเตตฺวา ปสฺสิตพฺพา โหนฺติ, เตนสฺส อกฺขีนิ ทุกฺขานิ ภวิสฺสนฺตีติ มญฺญึสุ. ฑํสาทีสุ ฑํสาติ ปิงฺคลมกฺขิกาโย. ทุกฺขานนฺติ ทุกฺขมานํ. ติพฺพานนฺติ พหลานํ. ขรานนฺติ ติขิณานํ. กฏุกานนฺติ ผรุสานํ; อมนาปตาย วา กฏุกรสสทิสานํ. อสาตานนฺติ อมธุรานํ. ปาณหรานนฺติ ชีวิตหรานํ. ४०२. पाचव्या शिक्षापदात – 'अङ्गुलियो दुक्खा भविस्सन्ति' (बोटे दुखतील) म्हणजे अक्षरे लिहिणाऱ्या (उपालि) ची बोटे दुखतील, असा त्यांनी विचार केला. 'उरस्स दुक्खो' (छाती दुखणे) म्हणजे गणित शिकणाऱ्याला खूप विचार करावा लागतो, त्यामुळे त्याची छाती दुखेल (किंवा जळजळेल), असे त्यांनी मानले. 'अक्खीनि दुक्खा भविस्सन्ति' (डोळे दुखतील) म्हणजे रूपसूत्र (नाण्यांची परीक्षा) शिकणाऱ्याला कहापण (नाणी) उलटून-पालटून पाहावे लागतात, त्यामुळे त्याचे डोळे दुखतील, असे त्यांनी मानले. 'दंसादीसु दंसा' म्हणजे पिंगट रंगाच्या माश्या (किंवा डास). 'दुक्खानं' म्हणजे कठीणतेने सहन केले जाणारे. 'तिब्बानं' म्हणजे दाट/तीव्र. 'खरानं' म्हणजे तीक्ष्ण. 'कटुकानं' म्हणजे कठोर/कडू; किंवा अप्रिय असल्यामुळे कडू रसासारखे. 'असातानं' म्हणजे मधुर नसलेले (अगोड). 'पाणहरानं' म्हणजे प्राण हरण करणारे (जीव घेणारे). ๔๐๔. สีมํ สมฺมนฺนตีติ นวํ สีมํ พนฺธติ. กุรุนฺทิยํ ปน อุทกุกฺเขปปริจฺฉินฺทเนปิ ทุกฺกฏํ วุตฺตํ. ปริปุณฺณวีสติวสฺโสติ ปฏิสนฺธิคฺคหณโต ปฏฺฐาย ปริปุณฺณวีสติวสฺโส; คพฺภวีโสปิ หิ ปริปุณฺณวีสติวสฺโสตฺเวว สงฺขฺเย คจฺฉติ. ยถาห – ४०४. 'सीमं सम्मन्नतीति' म्हणजे नवीन सीमा बांधणे (निश्चित करणे). परंतु कुरुन्दी अट्ठकथेत उदकुक्खेप (पाणी फेकून सीमा निश्चित करणे) च्या मर्यादेत देखील दुक्कट आपत्ती सांगितली आहे. 'परिपुण्णवीसतिवस्सो' म्हणजे गर्भधारणेच्या (प्रतिसंधीच्या) काळापासून सुरू करून पूर्ण वीस वर्षे झालेला; कारण गर्भातील काळासह वीस वर्षे झालेली व्यक्ती देखील 'पूर्ण वीस वर्षे झालेली' याच संख्येत गणली जाते. जसे म्हटले आहे – ‘‘เตน [Pg.136] โข ปน สมเยน อายสฺมา กุมารกสฺสโป คพฺภวีโส อุปสมฺปนฺโน โหติ. อถ โข อายสฺมโต กุมารกสฺสปสฺส เอตทโหสิ – ‘ภควตา ปญฺญตฺตํ, น อูนวีสติวสฺโส ปุคฺคโล อุปสมฺปาเทตพฺโพติ. อหญฺจมฺหิ คพฺภวีโส อุปสมฺปนฺโน. อุปสมฺปนฺโน นุโขมฺหิ, นนุ โข อุปสมฺปนฺโน’ติ. ภควโต เอตมตฺถํ อาโรเจสุํ. ยํ ภิกฺขเว มาตุกุจฺฉิมฺหิ ปฐมํ จิตฺตํ อุปฺปนฺนํ, ปฐมํ วิญฺญาณํ ปาตุภูตํ ตทุปาทาย สาวสฺส ชาติ. อนุชานามิ, ภิกฺขเว, คพฺภวีสํ อุปสมฺปาเทตุ’’นฺติ (มหาว. ๑๒๔). "त्या वेळी आयुष्यमान कुमारकस्सप हे गर्भातील काळासह वीस वर्षांचे असताना उपसंपन्न (दीक्षित) झाले होते. तेव्हा आयुष्यमान कुमारकस्सप यांच्या मनात असा विचार आला – 'भगवंतांनी नियम केला आहे की, वीस वर्षांपेक्षा कमी वयाच्या व्यक्तीला उपसंपदा दिली जाऊ नये. आणि मी तर गर्भातील काळासह वीस वर्षांचा असताना उपसंपन्न झालो आहे. मग मी उपसंपन्न झालो आहे की नाही?' त्यांनी भगवंतांना ही गोष्ट सांगितली. (भगवंत म्हणाले –) 'भिक्खूंनो, आईच्या गर्भात जे पहिले चित्त उत्पन्न होते, जे पहिले विज्ञान प्रकट होते, त्याला आरंभ मानून त्या भिक्खूचा तो जन्म (गर्भकाळ) मानला जातो. भिक्खूंनो, मी गर्भातील काळासह वीस वर्षे पूर्ण झालेल्या व्यक्तीला उपसंपदा देण्याची अनुमती देतो।'" ตตฺถ โย ทฺวาทสมาเส มาตุกุจฺฉิสฺมึ วสิตฺวา มหาปวารณาย ชาโต, โส ตโต ปฏฺฐาย ยาว เอกูนวีสติเม วสฺเส มหาปวารณา, ตํ อติกฺกมิตฺวา ปาฏิปเท อุปสมฺปาเทตพฺโพ. เอเตนุปาเยน หายนวฑฺฒนํ เวทิตพฺพํ. त्यामध्ये असा निर्णय समजावा – जो बालक बारा महिने आईच्या गर्भात राहून महापवारणा (आश्विन पौर्णिमा) दिवशी जन्मला, त्याला त्या जन्माच्या दिवसापासून सुरू करून एकोणिसाव्या वर्षातील महापवारणा उलटून गेल्यावर, प्रतिपदेच्या (पाडव्याच्या) दिवशी उपसंपन्न केले जाऊ शकते. या पद्धतीने (महिन्यांची) घट किंवा वाढ समजावी. โปราณกตฺเถรา ปน เอกูนวีสติวสฺสํ สามเณรํ นิกฺขมนียปุณฺณมาสึ อติกฺกมฺม ปาฏิปททิวเส อุปสมฺปาเทนฺติ, ตํ กสฺมาติ? วุจฺจเต – เอกสฺมึ วสฺเส ฉ จาตุทฺทสิกอุโปสถา โหนฺติ. อิติ วีสติยา วสฺเสสุ จตฺตาโร มาสา ปริหายนฺติ. ราชาโน ตติเย ตติเย วสฺเส วสฺสํ อุกฺกฑฺฒนฺติ. อิติ อฏฺฐารสสุ วสฺเสสุ ฉ มาสา วฑฺฒนฺติ, ตโต อุโปสถวเสน ปริหีเน จตฺตาโร มาเส อปเนตฺวา ทฺเว มาสา อวเสสา โหนฺติ, เต ทฺเว มาเส คเหตฺวา วีสติวสฺสานิ ปริปุณฺณานิ โหนฺตีติ นิกฺกงฺขา หุตฺวา นิกฺขมนียปุณฺณมาสึ อติกฺกมฺม ปาฏิปเท อุปสมฺปาเทนฺติ. เอตฺถ ปน โย ปวาเรตฺวา วีสติวสฺโส ภวิสฺสติ, ตํ สนฺธาย ‘‘เอกูนวีสติวสฺส’’นฺติ วุตฺตํ. ตสฺมา โย มาตุกุจฺฉิสฺมึ ทฺวาทสมาเส วสิ, โส เอกวีสติวสฺโส โหติ. โย สตฺตมาเส วสิ, โส สตฺตมาสาธิกวีสติวสฺโส. ฉมาสชาโต ปน น ชีวติ. प्राचीन थेर तर एकोणीस वर्षांच्या सामणेराला निक्खमनीय पौर्णिमा ओलांडून प्रतिपदेच्या दिवशी उपसंपदा देतात. ते कशामुळे? उत्तर दिले जाते – एका वर्षात सहा चातुर्दशी उपोसथ असतात. अशा प्रकारे वीस वर्षांत चार महिने कमी होतात. राजे दर तिसऱ्या वर्षी वर्ष (अधिक मास) वाढवतात. अशा प्रकारे अठरा वर्षांत सहा महिने वाढतात. त्यातून उपोसथाच्या कारणाने कमी झालेले चार महिने वजा करून दोन महिने शिल्लक राहतात. ते दोन महिने धरून वीस वर्षे पूर्ण होतात, अशी खात्री पटल्यामुळे ते निक्खमनीय पौर्णिमा ओलांडून प्रतिपदेला उपसंपदा देतात. येथे जो पवारणा करून वीस वर्षांचा होईल, त्याला उद्देशून 'एकू्नवीसतिवस्स' (एकोणीस वर्षांचा) असे म्हटले आहे. म्हणून जो आईच्या गर्भात बारा महिने राहिला, तो एकवीस वर्षांचा होतो. जो सात महिने राहिला, तो सात महिने अधिक वीस वर्षांचा होतो. सहा महिन्यांचा जन्मलेला मात्र जगत नाही. ๔๐๖. อนาปตฺติ อูนวีสติวสฺสํ ปริปุณฺณวีสติวสฺสสญฺญีติ เอตฺถ กิญฺจาปิ อุปสมฺปาเทนฺตสฺส อนาปตฺติ, ปุคฺคโล ปน อนุปสมฺปนฺโนว โหติ. สเจ ปน โส ทสวสฺสจฺจเยน อญฺญํ อุปสมฺปาเทติ, ตญฺเจ มุญฺจิตฺวา คโณ ปูรติ, สูปสมฺปนฺโน. โสปิ จ ยาว น ชานาติ, ตาวสฺส เนว สคฺคนฺตราโย [Pg.137] น โมกฺขนฺตราโย, ญตฺวา ปน ปุน อุปสมฺปชฺชิตพฺพํ. เสสํ อุตฺตานเมว. ४०६. येथे 'एकोणीस वर्षांच्या सामणेराला वीस वर्षे पूर्ण झाल्याची संज्ञा असताना उपसंपदा दिली तर अनापत्ती' यामध्ये जरी उपसंपदा देणाऱ्याला अनापत्ती असली, तरी तो पुद्गल अनुपसंपन्नच राहतो. पण जर तो दहा वर्षांनंतर दुसऱ्याला उपसंपदा देतो, आणि त्याला वगळून जर गण पूर्ण होत असेल, तर तो सु-उपसंपन्न होतो. आणि तो देखील जोपर्यंत हे जाणत नाही, तोपर्यंत त्याला स्वर्गाचा अंतराय होत नाही आणि मोक्षाचा अंतराय होत नाही. पण जाणल्यानंतर पुन्हा उपसंपदा घेतली पाहिजे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, त्रिसमुत्थान - क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, प्रज्ञप्तिवद्य, कायकर्म, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. वचीकर्म, त्रिचित्त, त्रिवेदन होय. อูนวีสติวสฺสสิกฺขาปทํ ปญฺจมํ. ऊनवीसतिवर्ष (एकोणीस वर्षे) शिक्षापद पाचवे समाप्त. ๖. เถยฺยสตฺถสิกฺขาปทวณฺณนา ६. थेय्यसत्थ (चोर-सार्थ) शिक्षापदाचे वर्णन. ๔๐๗. ฉฏฺเฐ – ปฏิยาโลกนฺติ สูริยาโลกสฺส ปฏิมุขํ; ปจฺฉิมทิสนฺติ อตฺโถ. กมฺมิยาติ สุงฺกฏฺฐาเน กมฺมิกา. ४०७. सहाव्या शिक्षापदात - 'पटियालोकं' म्हणजे सूर्याच्या प्रकाशाच्या विरुद्ध दिशा, म्हणजेच पश्चिम दिशा असा अर्थ आहे. 'कम्मिया' म्हणजे जकात नाक्यावर काम करणारे कर्मचारी. ๔๐๙. ราชานํ วา เถยฺยํ คจฺฉนฺตีติ ราชานํ วา เถเนตฺวา วญฺเจตฺวา รญฺโญ สนฺตกํ กิญฺจิ คเหตฺวา อิทานิ น ตสฺส ทสฺสามาติ คจฺฉนฺติ. ४०९. 'राजानं वा थेय्यं गच्छन्ति' म्हणजे राजाला चोरून किंवा फसवून, राजाची कोणतीही वस्तू घेऊन, 'आता आम्ही ती त्याला देणार नाही' असा विचार करून जातात. ๔๑๑. วิสงฺเกเตนาติ กาลวิสงฺเกเตน ทิวสวิสงฺเกเตน จ คจฺฉโต อนาปตฺติ. มคฺควิสงฺเกเตน ปน อฏวิวิสงฺเกเตน วา อาปตฺติเยว. เสสเมตฺถ ภิกฺขุนิวคฺเค วุตฺตนยตฺตา อุตฺตานตฺถเมว. เถยฺยสตฺถสมุฏฺฐานํ – กายจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ४११. 'विसंकेतेन' म्हणजे कालविसंकेताने (वेळेच्या चुकीमुळे) आणि दिवसविसंकेताने (दिवसाच्या चुकीमुळे) जाणाऱ्याला अनापत्ती आहे. परंतु मार्गविसंकेताने (रस्त्याच्या चुकीमुळे) किंवा अरण्यविसंकेताने (अरण्याच्या चुकीमुळे) गेल्यास आपत्तीच होते. येथील उर्वरित भाग भिक्खुनीवर्गात सांगितलेल्या पद्धतीने स्पष्टच आहे. थेय्यसत्थसमुत्थान - काय-चित्तापासून आणि काय-वाचा-चित्तापासून उत्पन्न होते; क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, प्रज्ञप्तिवद्य, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त, त्रिवेदन होय. เถยฺยสตฺถสิกฺขาปทํ ฉฏฺฐํ. थेय्यसत्थ (चोर-सार्थ) शिक्षापद सहावे समाप्त. ๗. สํวิธานสิกฺขาปทวณฺณนา ७. संविधान शिक्षापदाचे वर्णन. ๔๑๒. สตฺตเม – ปธูเปนฺโต นิสีทีติ ปชฺฌายนฺโต อตฺตานํเยว ปริภาสนฺโต นิสีทิ. นายฺโย โส ภิกฺขุ มํ นิปฺปาเตสีติ อยฺโย อยํ ภิกฺขุ มํ น นิกฺขาเมสิ; น มํ คเหตฺวา อคมาสีติ อตฺโถ. เสสเมตฺถ ภิกฺขุนิยา สทฺธึ สํวิธานสิกฺขาปเท วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ สทฺธึ สมุฏฺฐานาทีหีติ. ४१२. सातव्या शिक्षापदात - 'पधूपेन्तो niसीदि' म्हणजे चिंता करत, स्वतःलाच दोष देत बसला. 'नाय्यो सो भिक्खु मं निप्पातेसि' म्हणजे 'आर्य! या भिक्खूने मला बाहेर काढले नाही; मला सोबत घेऊन गेले नाहीत' असा अर्थ आहे. येथील उर्वरित भाग भिक्खुनीसोबतच्या संविधानाच्या शिक्षापदात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समुत्थान इत्यादींसह समजून घ्यावा. สํวิธานสิกฺขาปทํ สตฺตมํ. संविधान शिक्षापद सातवे समाप्त. ๘. อริฏฺฐสิกฺขาปทวณฺณนา ८. अरिट्ठ शिक्षापदाचे वर्णन. ๔๑๗. อฏฺฐเม [Pg.138] – คทฺเธ พาธยึสูติ คทฺธพาธิโน; คทฺธพาธิโน ปุพฺพปุริสา อสฺสาติ คทฺธพาธิปุพฺโพ, ตสฺส คทฺธพาธิปุพฺพสฺส คิชฺฌฆาตกกุลปฺปสุตสฺสาติ อตฺโถ. ४१७. आठव्या शिक्षापदात - 'गद्धे बाधयिंसु' म्हणजे गिधाडांना मारणारे ते 'गद्धबाधि'; ज्याचे पूर्वज गिधाडांना मारणारे होते तो 'गद्धबाधिपुब्ब'; त्या गद्धबाधिपुब्बाचा म्हणजे गिधाडे मारणाऱ्या कुळात जन्मलेल्याचा, असा अर्थ आहे. สคฺคโมกฺขานํ อนฺตรายํ กโรนฺตีติ อนฺตรายิกา. เต กมฺมกิเลสวิปากอุปวาทอาณาวีติกฺกมวเสน ปญฺจวิธา. ตตฺถ ปญฺจานนฺตริยกมฺมา กมฺมนฺตรายิกา นาม. ตถา ภิกฺขุนีทูสกกมฺมํ, ตํ ปน โมกฺขสฺเสว อนฺตรายํ กโรติ, น สคฺคสฺส. นิยตมิจฺฉาทิฏฺฐิธมฺมา กิเลสนฺตรายิกา นาม. ปณฺฑกติรจฺฉานคตอุภโตพฺยญฺชนกานํ ปฏิสนฺธิธมฺมา วิปากนฺตรายิกา นาม. อริยูปวาทา อุปวาทนฺตรายิกา นาม, เต ปน ยาว อริเย น ขมาเปนฺติ ตาวเทว, น ตโต ปรํ. สญฺจิจฺจ อาปนฺนา อาปตฺติโย อาณาวีติกฺกมนฺตรายิกา นาม, ตาปิ ยาว ภิกฺขุภาวํ วา ปฏิชานาติ, น วุฏฺฐาติ วา น เทเสติ วา ตาวเทว, น ตโต ปรํ. जे स्वर्ग आणि मोक्षाला अंतराय निर्माण करतात, त्यांना 'अंतरायिक' म्हणतात. ते कर्म, क्लेश, विपाक, उपवाद आणि आज्ञाव्यतिक्रम या भेदाने पाच प्रकारचे आहेत. त्यामध्ये पाच आनंतर्य कर्मे हे 'कर्म-अंतरायिक' आहेत. तसेच भिक्खुणीला दूषित करण्याचे कर्म देखील; परंतु ते केवळ मोक्षालाच अंतराय करते, स्वर्गाला नाही. नियत मिथ्यादृष्टी धर्म हे 'क्लेश-अंतरायिक' आहेत. पंडक, तिर्यंच आणि उभतोव्यंजनक यांचे प्रतिसंधी धर्म हे 'विपाक-अंतरायिक' आहेत. आर्यांची निंदा (अरियूपवाद) हे 'उपवाद-अंतरायिक' आहेत; परंतु ते जोपर्यंत आर्यांची क्षमा मागत नाहीत तोपर्यंतच अंतरायिक असतात, त्यानंतर नाही. जाणूनबुजून घेतलेल्या आपत्ती या 'आज्ञाव्यतिक्रम-अंतरायिक' आहेत; त्या देखील जोपर्यंत तो भिक्खूभाव स्वीकारतो, किंवा आपत्तीतून उठत नाही किंवा देशना करत नाही तोपर्यंतच अंतरायिक असतात, त्यानंतर नाही. ตตฺรายํ ภิกฺขุ พหุสฺสุโต ธมฺมกถิโก เสสนฺตรายิเก ชานาติ, วินเย ปน อโกวิทตฺตา ปณฺณตฺติวีติกฺกมนฺตรายิเก น ชานาติ, ตสฺมา รโหคโต เอวํ จินฺเตสิ – ‘‘อิเม อาคาริกา ปญฺจ กามคุเณ ปริภุญฺชนฺตา โสตาปนฺนาปิ สกทาคามิโนปิ อนาคามิโนปิ โหนฺติ, ภิกฺขูปิ มนาปิกานิ จกฺขุวิญฺเญยฺยานิ รูปานิ ปสฺสนฺติ…เป… กายวิญฺเญยฺเย โผฏฺฐพฺเพ ผุสนฺติ, มุทุกานิ อตฺถรณปาวุรณาทีนิ ปริภุญฺชนฺติ, เอตํ สพฺพํ วฏฺฏติ. กสฺมา อิตฺถิรูปา…เป… อิตฺถิโผฏฺฐพฺพา เอว น วฏฺฏนฺติ, เอเตปิ วฏฺฏนฺตี’’ติ. เอวํ รเสน รสํ สํสนฺทิตฺวา สจฺฉนฺทราคปริโภคญฺจ นิจฺฉนฺทราคปริโภคญฺจ เอกํ กตฺวา ถูลวาเกหิ สทฺธึ อติสุขุมสุตฺตํ ฆเฏนฺโต วิย สาสเปน สทฺธึ สิเนรุํ อุปสํหรนฺโต วิย ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ อุปฺปาเทตฺวา ‘‘กึ ภควตา มหาสมุทฺทํ พนฺธนฺเตน วิย มหตา อุสฺสาเหน ปฐมปาราชิกํ ปญฺญตฺตํ, นตฺถิ เอตฺถ โทโส’’ติ สพฺพญฺญุตญฺญาเณน สทฺธึ ปฏิวิรุชฺฌนฺโต ภพฺพปุคฺคลานํ อาสํ ฉินฺทนฺโต ชินสฺส อาณาจกฺเก ปหารมทาสิ. เตนาห – ‘‘ตถาหํ ภควตา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานามี’’ติอาทิ. त्यामध्ये हा भिक्खू बहुश्रुत आणि धम्मकथिक असल्याने इतर अंतरायिक धर्मांना जाणत होता, परंतु विनयात अकुशल असल्यामुळे प्रज्ञप्तिव्यतिक्रम अंतरायिक धर्मांना जाणत नव्हता. म्हणून एकांतात जाऊन त्याने असा विचार केला - 'हे गृहस्थ पाच कामगुणांचा उपभोग घेत असताना देखील सोतापन्न, सकदागामी आणि अनागामी होतात. भिक्खू देखील डोळ्यांनी जाणता येण्याजोग्या प्रिय रूपांना पाहतात... पे... शरीराने जाणता येण्याजोग्या स्प्रष्टव्यांना स्पर्श करतात, मऊ बिछाने आणि पांघरूण इत्यादींचा उपभोग घेतात, हे सर्व चालते. मग स्त्रीचे रूप... पे... स्त्रीचा स्पर्शच का चालत नाही? हे देखील चालते.' अशा प्रकारे रसाशी रसाची तुलना करून, सच्छंदराग उपभोग आणि निच्छंदराग उपभोग यांना एक करून, जणू काही जाड धाग्यांसोबत अत्यंत सूक्ष्म धागा जोडल्याप्रमाणे किंवा मोहरीच्या दाण्यासोबत सुमेरू पर्वताची तुलना केल्याप्रमाणे, त्याने पापी मिथ्यादृष्टी उत्पन्न केली आणि विचार केला - 'भगवंतांनी महासागराला बांध घालण्यासारख्या मोठ्या उत्साहाने पहिले पाराजिक का प्रज्ञप्त केले? यात काही दोष नाही.' अशा प्रकारे सर्वज्ञता-ज्ञानाशी विरोध करत, भव्य पुद्गलांची आशा तोडत, त्याने जिनांच्या आज्ञाचक्रावर प्रहार केला. म्हणूनच म्हटले आहे - 'भगवंतांनी ज्या प्रकारे धम्म देशना केली आहे, त्यावरून मी असे समजतो...' इत्यादी. อฏฺฐิกงฺกลูปมาติอาทิมฺหิ [Pg.139] อฏฺฐิกงฺกลูปมา อปฺปสฺสาทฏฺเฐน. มํสเปสูปมา พหุสาธารณฏฺเฐน. ติณุกฺกูปมา อนุทหนฏฺเฐน. องฺคารกาสูปมา มหาภิตาปนฏฺเฐน. สุปินกูปมา อิตฺตรปจฺจุปฏฺฐานฏฺเฐน. ยาจิตกูปมา ตาวกาลิกฏฺเฐน. รุกฺขผลูปมา สพฺพงฺคปจฺจงฺคปลิภญฺชนฏฺเฐน. อสิสูนูปมา อธิกุฏฺฏนฏฺเฐน. สตฺติสูลูปมา วินิวิชฺฌนฏฺเฐน. สปฺปสิรูปมา สาสงฺกสปฺปฏิภยฏฺเฐนาติ อยเมตฺถ สงฺเขโป. วิตฺถาโร ปน ปปญฺจสูทนิยํ มชฺฌิมฏฺฐกถายํ (ม. นิ. ๑.๒๓๔ อาทโย; ๒.๔๒ อาทโย) คเหตพฺโพ. เอวํ พฺยาโขติ เอวํ วิย โข. เสสเมตฺถ ปุพฺเพ วุตฺตนยตฺตา อุตฺตานเมว. ‘अट्ठिकङ्कलूपमा’ (हाडांच्या सांगाड्याची उपमा) इत्यादींमध्ये—अल्प आस्वाद असण्याच्या अर्थाने ‘हाडांच्या सांगाड्याची उपमा’ दिली आहे. अनेक प्राण्यांशी सामायिक असण्याच्या अर्थाने ‘मांसाच्या तुकड्याची उपमा’ दिली आहे. अनुक्रमाने जाळण्याच्या अर्थाने ‘गवताच्या मशालीची उपमा’ दिली आहे. अत्यंत तापदायक असण्याच्या अर्थाने ‘धगधगत्या कोळशाच्या खड्ड्याची उपमा’ दिली आहे. अल्पकाळ टिकणाऱ्या स्वरूपाच्या अर्थाने ‘स्वप्नाची उपमा’ दिली आहे. तात्पुरत्या वापराच्या अर्थाने ‘उसने घेतलेल्या वस्तूची उपमा’ दिली आहे. सर्व अंग-प्रत्यंग मोडून टाकण्याच्या अर्थाने ‘वृक्षाच्या फळाची उपमा’ दिली आहे. कापण्याच्या/तुकडे करण्याच्या अर्थाने ‘खाटीकखान्यातील सुरी आणि लाकडी ठोकळ्याची उपमा’ दिली आहे. आरपार भेदण्याच्या अर्थाने ‘भाला आणि शूलाची उपमा’ दिली आहे. शंका आणि भयाने युक्त असण्याच्या अर्थाने ‘सापाच्या डोक्याची उपमा’ दिली आहे—हा येथे संक्षेप आहे. सविस्तर वर्णन मात्र ‘पपञ्चसूदनी’ नावाच्या मज्झिम निकाय अट्ठकथेतून घ्यावे. ‘एवं ब्याखो’ म्हणजे ‘याप्रमाणेच’. उर्वरित भाग पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनुसार स्पष्टच आहे. สมนุภาสนสมุฏฺฐานํ – กายวาจาจิตฺตโต สมุฏฺฐาติ, อกิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. समंनुभासन समुत्थान (समन्वयपूर्वक उपदेशाचे समुत्थान) – हे काय, वाचा आणि चित्तापासून उत्पन्न होते; अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज (लोकनिंद्य), कायकर्म, वचीकर्म, अकुशल चित्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे. อริฏฺฐสิกฺขาปทํ อฏฺฐมํ. अरिठ्ठ सिक्खापद आठवे समाप्त. ๙. อุกฺขิตฺตสมฺโภคสิกฺขาปทวณฺณนา ९. उक्खित्तसंभोग सिक्खापदाचे वर्णन (स्पष्टीकरण). ๔๒๔-๕. นวเม – อกฏานุธมฺเมนาติ อนุธมฺโม วุจฺจติ อาปตฺติยา อทสฺสเน วา อปฺปฏิกมฺเม วา ปาปิกาย ทิฏฺฐิยา อปฺปฏินิสฺสคฺเค วา ธมฺเมน วินเยน สตฺถุสาสเนน อุกฺขิตฺตกสฺส อนุโลมวตฺตํ ทิสฺวา กตา โอสารณา; โส โอสารณสงฺขาโต อนุธมฺโม ยสฺส น กโต, อยํ อกฏานุธมฺโม นาม, ตาทิเสน สทฺธินฺติ อตฺโถ. เตเนวสฺส ปทภาชเน ‘‘อกฏานุธมฺโม นาม อุกฺขิตฺโต อโนสาริโต’’ติ วุตฺตํ. ४२४-५. नवव्या सिक्खापदात – ‘अकटानुधम्मेन’ म्हणजे अनुधर्म असे म्हटले जाते की, आपत्ती न स्वीकारल्यामुळे, या प्रायश्चित्त न घेतल्यामुळे, किंवा पापयुक्त चुकीच्या दृष्टीचा त्याग न केल्यामुळे, धर्म, विनय आणि शास्त्यांच्या शासनानुसार बहिष्कृत केलेल्या भिक्खूचे अनुकूल वर्तन पाहून त्याला संघात पुन्हा समाविष्ट करणे (ओसारणा) याला ‘अनुधर्म’ म्हणतात. ज्याच्यासाठी हा समाविष्ट करण्याचा अनुधर्म केला गेला नाही, त्याला ‘अकटानुधर्म’ म्हणतात; अशा भिक्खू सोबत, असा अर्थ आहे. म्हणूनच पदभाजनामध्ये “अकटानुधर्म म्हणजे बहिष्कृत केलेला परंतु पुन्हा संघात समाविष्ट न केलेला” असे भगवंतांनी म्हटले आहे. เทติ วา ปฏิคฺคณฺหาติ วาติ เอกปโยเคน พหุมฺปิ ททโต วา คณฺหโต วา เอกํ ปาจิตฺติยํ. วิจฺฉินฺทิตฺวา วิจฺฉินฺทิตฺวา เทนฺตสฺส จ คณฺหนฺตสฺส จ ปโยคคณนาย ปาจิตฺติยานิ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ‘देतो किंवा स्वीकारतो’ म्हणजे एकाच प्रयत्नाने पुष्कळ दिले किंवा घेतले तरी एकच पाचित्तिय होते. परंतु, थांबून थांबून (तुकड्या-तुकड्याने) देणाऱ्या आणि घेणाऱ्याला प्रयत्नांच्या संख्येनुसार अनेक पाचित्तिय होतात. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. त्रिसमुत्थान – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, पण्णत्तिवज्ज (नियमभंग), कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदनायुक्त आहे. อุกฺขิตฺตสมฺโภคสิกฺขาปทํ นวมํ. उक्खित्तसंभोग सिक्खापद नववे समाप्त. ๑๐. กณฺฏกสิกฺขาปทวณฺณนา १०. कण्टक सिक्खापदाचे वर्णन (स्पष्टीकरण). ๔๒๘. ทสเม [Pg.140] – ทิฏฺฐิคตํ อุปฺปนฺนนฺติ อริฏฺฐสฺส วิย เอตสฺสาปิ อโยนิโส อุมฺมุชฺชนฺตสฺส อุปฺปนฺนํ. นาเสตูติ เอตฺถ ติวิธา นาสนา – สํวาสนาสนา, ลิงฺคนาสนา, ทณฺฑกมฺมนาสนาติ. ตตฺถ อาปตฺติยา อทสฺสนาทีสุ อุกฺเขปนา สํวาสนาสนา นาม. ‘‘ทูสโก นาเสตพฺโพ (ปารา. ๖๖) เมตฺติยํ ภิกฺขุนึ นาเสถา’’ติ (ปารา. ๓๘๔) อยํ ลิงฺคนาสนา นาม. ‘‘อชฺชตคฺเค เต อาวุโส สมณุทฺเทส น เจว โส ภควา สตฺถา อปทิสิตพฺโพ’’ติ อยํ ทณฺฑกมฺมนาสนา นาม. อยํ อิธ อธิปฺเปตา. เตนาห – ‘‘เอวญฺจ ปน ภิกฺขเว นาเสตพฺโพ…เป… วินสฺสา’’ติ. ตตฺถ จราติ คจฺฉ. ปิเรติ ปร อมามก. วินสฺสาติ นสฺส; ยตฺถ เต น ปสฺสาม, ตตฺถ คจฺฉาติ. ४२८. दहाव्या सिक्खापदात – ‘चुकीची दृष्टी उत्पन्न झाली’ म्हणजे अरिठ्ठप्रमाणेच याच्याही मनात अयोग्य विचारांमुळे (अयोनिशो मनसिकारामुळे) चुकीची दृष्टी उत्पन्न झाली. ‘नाश करावा’ यामध्ये तीन प्रकारचे नाशन (बहिष्कार) आहेत – संवासनाशन, लिंगनाशन आणि दंडकर्मनाशन. त्यापैकी, आपत्ती न पाहिल्यामुळे इत्यादी कारणांनी बहिष्कृत करणे म्हणजे ‘संवासनाशन’ होय. “भ्रष्ट व्यक्तीचा नाश करावा (वेष काढून घ्यावा)” किंवा “मेत्तिया भिक्खुणीचा नाश करावा” हे ‘लिंगनाशन’ होय. “आजपासून हे आवुसो श्रमणोद्देश! तुला त्या भगवंतांना शास्ता म्हणून सांगता येणार नाही” हे ‘दंडकर्मनाशन’ होय. हे येथे अभिप्रेत आहे. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे – “आणि भिक्खूंनो, याप्रमाणे नाश करावा...पे... नष्ट हो.” त्यामध्ये ‘चर’ म्हणजे ‘जा’. ‘पिर’ म्हणजे ‘पर’ (परका/बाहेरचा), जो त्रिरत्नांवर प्रेम करत नाही. ‘विनस्स’ म्हणजे ‘नष्ट हो’; “जिथे आम्ही तुला पाहणार नाही, तिथे निघून जा” असा अर्थ आहे. ๔๒๙. อุปลาเปยฺยาติ สงฺคณฺเหยฺย. อุปฏฺฐาเปยฺยาติ เตน อตฺตโน อุปฏฺฐานํ การาเปยฺย. เสสํ อริฏฺฐสิกฺขาปเท วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ สทฺธึ สมุฏฺฐานาทีหีติ. ४२९. ‘उप्लापेय्य’ म्हणजे जवळ घ्यावे (संग्रह करावा). ‘उपिट्ठापेय्य’ म्हणजे त्याच्याकडून स्वतःची सेवा करून घ्यावी. उर्वरित भाग समुत्थानासह अरिठ्ठ सिक्खापदात सांगितलेल्या पद्धतीनुसारच समजावा. กณฺฏกสิกฺขาปทํ ทสมํ. कण्टक सिक्खापद दहावे समाप्त. สมตฺโต วณฺณนากฺกเมน สปฺปาณกวคฺโค สตฺตโม. वर्णनक्रमानुसार सातवा सप्पाणक वर्ग समाप्त. ๘. สหธมฺมิกวคฺโค ८. सहधम्मिक वर्ग ๑. สหธมฺมิกสิกฺขาปทวณฺณนา १. सहधम्मिक सिक्खापदाचे वर्णन (स्पष्टीकरण). ๔๓๔. สหธมฺมิกวคฺคสฺส ปฐมสิกฺขาปเท – เอตสฺมึ สิกฺขาปเทติ เอตสฺมึ สิกฺขาปเท ยํ วุตฺตํ, ตํ น ตาว สิกฺขิสฺสามิ. อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสาติ เอตฺถ ปน วาจาย วาจาย อาปตฺติ เวทิตพฺพา. สิกฺขมาเนน ภิกฺขเว ภิกฺขุนาติ โอวาทํ สิรสา สมฺปฏิจฺฉิตฺวา สิกฺขิตุกาเมเนว หุตฺวา อาชานิตพฺพญฺเจว ปุจฺฉิตพฺพญฺจ อุปปริกฺขิตพฺพญฺจ. เสสเมตฺถ ทุพฺพจสิกฺขาปเท วุตฺตนเยเนว ปทตฺถโต เวทิตพฺพํ. วินิจฺฉยโต อุตฺตานเมว. ४३४. सहधम्मिक वर्गाच्या पहिल्या सिक्खापदात – ‘या सिक्खापदात’ म्हणजे या सिक्खापदात जे सांगितले आहे, “ते मी तोपर्यंत शिकणार नाही”. ‘पाचित्तिय आपत्ती होते’ यामध्ये प्रत्येक शब्दाशब्दाला आपत्ती समजावी. “भिक्खूंनो, शिकणाऱ्या भिक्खूने” म्हणजे उपदेशाचा नम्रपणे स्वीकार करून, शिकण्याची इच्छा ठेवूनच जाणून घेतले पाहिजे, विचारले पाहिजे आणि परीक्षण केले पाहिजे. उर्वरित भाग दुब्बच सिक्खापदात सांगितलेल्या पद्धतीनुसार शब्दांच्या अर्थावरून समजावा. निर्णयाच्या दृष्टीने तो स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. त्रिसमुत्थान – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज (लोकनिंद्य), कायकर्म, वचीकर्म, अकुशल चित्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे. สหธมฺมิกสิกฺขาปทํ ปฐมํ. सहधम्मिक सिक्खापद पहिले समाप्त. ๒. วิเลขนสิกฺขาปทวณฺณนา २. विलेखन सिक्खापदाचे वर्णन (स्पष्टीकरण). ๔๓๘. ทุติเย [Pg.141] – วินยกถํ กเถตีติ วินยกถา นาม กปฺปิยากปฺปิยอาปตฺตานาปตฺติสํวรปหานปฏิสํยุตฺตกถา, ตํ กเถติ. วินยสฺส วณฺณํ ภาสตีติ วินยสฺส วณฺโณ นาม ปญฺจนฺนมฺปิ สตฺตนฺนมฺปิ อาปตฺติกฺขนฺธานํ วเสน มาติกํ นิกฺขิปิตฺวา ปทภาชเนน วณฺณนา, ตํ ภาสติ. วินยปริยตฺติยา วณฺณํ ภาสตีติ วินยํ ปริยาปุณนฺตานํ วินยปริยตฺติมูลกํ วณฺณํ คุณํ อานิสํสํ ภาสติ. วินยธโร หิ วินยปริยตฺติมูลเก ปญฺจานิสํเส ฉานิสํเส สตฺตานิสํเส อฏฺฐานิสํเส นวานิสํเส ทสานิสํเส เอกาทสานิสํเส จ ลภติ เต สพฺเพ ภาสตีติ อตฺโถ. กตเม ปญฺจานิสํเส ลภตีติ? อตฺตโน สีลกฺขนฺธสุคุตฺติอาทิเก. วุตฺตญฺเหตํ – ४३८. दुसऱ्या सिक्खापदात – ‘विनयकथा सांगतो’ म्हणजे विनयकथा म्हणजे कप्पिय-अकप्पिय (योग्य-अयोग्य), आपत्ती-अनापत्ती, संवर (संयम) आणि प्रहाण (त्याग) यासंबंधीची चर्चा; ती तो सांगतो. ‘विनयाची प्रशंसा करतो’ म्हणजे पाच किंवा सात आपत्ती-स्कंधांच्या आधारे मातृका मांडून पदभाजनाद्वारे त्याचे स्पष्टीकरण करणे; ते तो सांगतो. ‘विनय-शिक्षणाची प्रशंसा करतो’ म्हणजे विनय शिकणाऱ्यांच्या विनय-शिक्षणावर आधारित गुणांची, महत्त्वाची आणि फायद्यांची प्रशंसा करतो. कारण विनयधर भिक्खू विनय-शिक्षणावर आधारित पाच, सहा, सात, आठ, नऊ, दहा आणि अकरा फायदे मिळवतो; त्या सर्वांचे तो वर्णन करतो, असा अर्थ आहे. कोणते पाच फायदे मिळवतो? स्वतःच्या शीलस्कंधाचे रक्षण करणे इत्यादी. हे असे म्हटले आहे – ‘‘ปญฺจิเม, ภิกฺขเว, อานิสํสา วินยธเร ปุคฺคเล – อตฺตโน สีลกฺขนฺโธ สุคุตฺโต โหติ สุรกฺขิโต, กุกฺกุจฺจปกตานํ ปฏิสรณํ โหติ, วิสารโท สงฺฆมชฺเฌ โวหรติ, ปจฺจตฺถิเก สหธมฺเมน สุนิคฺคหิตํ นิคฺคณฺหาติ, สทฺธมฺมฏฺฐิติยา ปฏิปนฺโน โหตี’’ติ (ปริ. ๓๒๕). “भिक्खूंनो, विनयधर व्यक्तीमध्ये हे पाच फायदे असतात – स्वतःचा शीलस्कंध चांगल्या प्रकारे रक्षित आणि सुरक्षित असतो, संशयी भिक्खूंसाठी तो आश्रयस्थान असतो, तो आत्मविश्वासाने संघामध्ये बोलतो, विरोधकांचे धर्मानुसार चांगल्या प्रकारे दमन करतो आणि सद्धर्माच्या चिरस्थायी अस्तित्वासाठी कार्यरत असतो.” กถมสฺส อตฺตโน สีลกฺขนฺโธ สุคุตฺโต โหติ สุรกฺขิโต? อิเธกจฺโจ ภิกฺขุ อาปตฺตึ อาปชฺชนฺโต ฉหากาเรหิ อาปชฺชติ – อลชฺชิตา, อญฺญาณตา, กุกฺกุจฺจปกตตา, อกปฺปิเย กปฺปิยสญฺญิตา, กปฺปิเย อกปฺปิยสญฺญิตา, สติสมฺโมสาติ. त्याचा स्वतःचा शीलस्कंध कसा रक्षित आणि सुरक्षित असतो? येथे एखादा भिक्खू सहा कारणांनी आपत्तीत पडतो – निर्लज्जपणामुळे, अज्ञानामुळे, संशयी वृत्तीमुळे, अयोग्य गोष्टीला योग्य समजल्यामुळे, योग्य गोष्टीला अयोग्य समजल्यामुळे आणि स्मृतीच्या भ्रंशामुळे (विसरभोळेपणामुळे). กถํ อลชฺชิตาย อาปตฺตึ อาปชฺชติ? อกปฺปิยภาวํ ชานนฺโตเยว มทฺทิตฺวา วีติกฺกมํ กโรติ. วุตฺตมฺปิ เจตํ – निर्लज्जपणामुळे आपत्तीत कसा पडतो? अयोग्य असल्याचे माहीत असूनही, नियमांचे उल्लंघन करून तो अतिचार करतो. हे असेही म्हटले आहे – ‘‘สญฺจิจฺจ อาปตฺตึ อาปชฺชติ, อาปตฺตึ ปริคูหติ; อคติคมนญฺจ คจฺฉติ, เอทิโส วุจฺจติ อลชฺชิปุคฺคโล’’ติ. (ปริ. ๓๕๙); “जो जाणूनबुजून आपत्तीत पडतो, आपत्ती लपवतो आणि चुकीच्या मार्गाने जातो; अशा व्यक्तीला निर्लज्ज (अलज्जी) व्यक्ती म्हटले जाते.” กถํ อญฺญาณตาย อาปชฺชติ? อญฺญาณปุคฺคโล หิ มนฺโท โมมูโห กตฺตพฺพากตฺตพฺพํ อชานนฺโต อกตฺตพฺพํ กโรติ, กตฺตพฺพํ วิราเธติ; เอวํ อญฺญาณตาย อาปชฺชติ. अज्ञानामुळे आपत्तीत कसा पडतो? अज्ञानी व्यक्ती मंद आणि अत्यंत संभ्रमित असते, काय करावे आणि काय करू नये हे न जाणता ती न करण्याजोगे काम करते आणि करण्याजोगे काम चुकवते; अशा प्रकारे अज्ञानामुळे ती आपत्तीत पडते. กถํ [Pg.142] กุกฺกุจฺจปกตตาย อาปชฺชติ? กปฺปิยากปฺปิยํ นิสฺสาย กุกฺกุจฺเจ อุปฺปนฺเน วินยธรํ ปุจฺฉิตฺวา กปฺปิยญฺเจ กตฺตพฺพํ สิยา, อกปฺปิยญฺเจ น กตฺตพฺพํ, อยํ ปน ‘‘วฏฺฏตี’’ติ มทฺทิตฺวา วีติกฺกมติเยว; เอวํ กุกฺกุจฺจปกตตาย อาปชฺชติ. शंकेखोर स्वभावामुळे (भिक्खू) आपत्ती कशी प्राप्त करतो? कल्प्य (योग्य) आणि अकल्प्य (अयोग्य) गोष्टींविषयी शंका उत्पन्न झाली असता, विनयधरांना विचारून जर ते कल्प्य असेल तर ते करावे, आणि जर अकल्प्य असेल तर ते करू नये; परंतु हा (शंकेखोर स्वभाव असलेला भिक्खू) "हे योग्य आहे" असे मानून नियमांचे उल्लंघन करून अतिक्रमणच करतो; अशा प्रकारे शंकेखोर स्वभावामुळे तो आपत्ती प्राप्त करतो. กถํ อกปฺปิเย กปฺปิยสญฺญิตาย อาปชฺชติ? อจฺฉมํสํ สูกรมํสนฺติ ขาทติ, ทีปิมํสํ มิคมํสนฺติ ขาทติ, อกปฺปิยโภชนํ กปฺปิยโภชนนฺติ ภุญฺชติ, วิกาเล กาลสญฺญาย ภุญฺชติ, อกปฺปิยปานกํ กปฺปิยปานกนฺติ ปิวติ; เอวํ อกปฺปิเย กปฺปิยสญฺญิตาย อาปชฺชติ. अकल्प्य गोष्टीमध्ये कल्प्य संज्ञेने (योग्य समजून) आपत्ती कशी प्राप्त होते? अस्वलाचे मांस हे डुकराचे मांस आहे अशा समजुतीने खातो, चित्त्याचे मांस हे हरणाचे मांस आहे अशा समजुतीने खातो, अकल्प्य भोजन हे कल्प्य भोजन आहे अशा समजुतीने जेवतो, विकाल वेळी (अवेळी) योग्य वेळ आहे अशा समजुतीने जेवतो, अकल्प्य पेय हे कल्प्य पेय आहे अशा समजुतीने पितो; अशा प्रकारे अकल्प्य गोष्टीमध्ये कल्प्य संज्ञेने आपत्ती प्राप्त होते. กถํ กปฺปิเย อกปฺปิยสญฺญิตาย อาปชฺชติ? สูกรมํสํ อจฺฉมํสนฺติ ขาทติ, มิคมํสํ ทีปิมํสนฺติ ขาทติ, กปฺปิยโภชนํ อกปฺปิยโภชนนฺติ ภุญฺชติ, กาเล วิกาลสญฺญาย ภุญฺชติ, กปฺปิยปานกํ อกปฺปิยปานกนฺติ ปิวติ; เอวํ กปฺปิเย อกปฺปิยสญฺญิตาย อาปชฺชติ. कल्प्य गोष्टीमध्ये अकल्प्य संज्ञेने (अयोग्य समजून) आपत्ती कशी प्राप्त होते? डुकराचे मांस हे अस्वलाचे मांस आहे अशा समजुतीने खातो, हरणाचे मांस हे चित्त्याचे मांस आहे अशा समजुतीने खातो, कल्प्य भोजन हे अकल्प्य भोजन आहे अशा समजुतीने जेवतो, योग्य वेळी विकाल वेळ आहे अशा समजुतीने जेवतो, कल्प्य पेय हे अकल्प्य पेय आहे अशा समजुतीने पितो; अशा प्रकारे कल्प्य गोष्टीमध्ये अकल्प्य संज्ञेने आपत्ती प्राप्त होते. กถํ สติสมฺโมสาย อาปชฺชติ? สหเสยฺยจีวรวิปฺปวาสเภสชฺชจีวรกาลาติกฺกมนปจฺจยา อาปตฺติญฺจ สติสมฺโมสาย อาปชฺชติ; เอวมิเธกจฺโจ ภิกฺขุ อิเมหิ ฉหากาเรหิ อาปตฺตึ อาปชฺชติ. स्मृतीच्या विस्मरणामुळे (बेसावधपणामुळे) आपत्ती कशी प्राप्त होते? अनुपसंपन्नासोबत एकत्र झोपणे, चीवरापासून विलग राहणे, औषध आणि चीवराचा काळ ओलांडणे या कारणांमुळे आणि स्मृतीच्या विस्मरणामुळे आपत्ती प्राप्त होते; अशा प्रकारे या जगात एखादा भिक्खू या सहा प्रकारांनी आपत्ती प्राप्त करतो. วินยธโร ปน อิเมหิ ฉหากาเรหิ อาปตฺตึ นาปชฺชติ. กถํ ลชฺชิตาย นาปชฺชติ? โส หิ ‘‘ปสฺสถ โภ, อยํ กปฺปิยากปฺปิยํ ชานนฺโตเยว ปณฺณตฺติวีติกฺกมํ กโรตี’’ติ อิมํ ปรูปวาทํ รกฺขนฺโตปิ นาปชฺชติ; เอวํ ลชฺชิตาย นาปชฺชติ. สหสา อาปนฺนมฺปิ เทสนาคามินึ เทเสตฺวา วุฏฺฐานคามินิยา วุฏฺฐหิตฺวา สุทฺธนฺเต ปติฏฺฐาติ. ตโต – परंतु विनयधर या सहा प्रकारांनी आपत्ती प्राप्त करत नाही. लज्जेमुळे (लज्जाशील स्वभावामुळे) तो आपत्ती कशी प्राप्त करत नाही? कारण तो विनयधर, "हे पहा मित्रांनो, हा कल्प्य आणि अकल्प्य गोष्टी जाणत असूनही प्रज्ञप्तीचे (नियमांचे) उल्लंघन करतो," या लोकांच्या निंदेपासून स्वतःचे रक्षण करत असतानाही आपत्ती प्राप्त करत नाही; अशा प्रकारे लज्जेमुळे तो आपत्ती प्राप्त करत नाही. अचानक प्राप्त झालेल्या देशनागामी आपत्तीची देशना करून (ती कबूल करून) आणि वुट्ठानगामी आपत्तीतून मुक्त होऊन तो शुद्धतेमध्ये प्रतिष्ठित होतो. त्यानंतर - ‘‘สญฺจิจฺจ อาปตฺตึ น อาปชฺชติ, อาปตฺตึ น ปริคูหติ; อคติคมนญฺจ น คจฺฉติ, เอทิโส วุจฺจติ ลชฺชิปุคฺคโล’’ติ. (ปริ. ๓๕๙) "जो जाणूनबुजून आपत्ती प्राप्त करत नाही, आपत्ती लपवत नाही आणि अगतिकडे (चुकीच्या मार्गांकडे) जात नाही, अशा व्यक्तीला 'लज्जाशील पुद्गल' (लज्जावान व्यक्ती) म्हटले जाते." อิมสฺมึ ลชฺชิภาเว ปติฏฺฐิโตว โหติ. तो या लज्जाशीलतेमध्येच प्रतिष्ठित असतो. กถํ ญาณตาย นาปชฺชติ? โส หิ กปฺปิยากปฺปิยํ ชานาติ, ตสฺมา กปฺปิยเมว กโรติ, อกปฺปิยํ น กโรติ; เอวํ ญาณตาย นาปชฺชติ. ज्ञानामुळे तो आपत्ती कशी प्राप्त करत नाही? कारण तो कल्प्य आणि अकल्प्य गोष्टी जाणतो, म्हणून तो कल्प्य गोष्टीच करतो, अकल्प्य गोष्टी करत नाही; अशा प्रकारे ज्ञानामुळे तो आपत्ती प्राप्त करत नाही. กถํ อกุกฺกุจฺจปกตตาย นาปชฺชติ? โส หิ กปฺปิยากปฺปิยํ นิสฺสาย กุกฺกุจฺเจ อุปฺปนฺเน วตฺถุํ โอโลเกตฺวา มาติกํ ปทภาชนํ อนฺตราปตฺตึ [Pg.143] อาปตฺตึ อนาปตฺติญฺจ โอโลเกตฺวา กปฺปิยญฺเจ โหติ กโรติ, อกปฺปิยญฺเจ น กโรติ; เอวํ อกุกฺกุจฺจปกตตาย นาปชฺชติ. शंकेखोर स्वभाव नसल्यामुळे तो आपत्ती कशी प्राप्त करत नाही? कारण कल्प्य आणि अकल्प्य गोष्टींविषयी शंका उत्पन्न झाली असता, तो वस्तू (प्रकरण), मातिका (नियम), पदभाजन (शब्दांचे विश्लेषण), अंतरापत्ती, आपत्ती आणि अनापत्ती पाहून, जर ते कल्प्य असेल तर करतो, आणि जर अकल्प्य असेल तर करत नाही; अशा प्रकारे शंकेखोर स्वभाव नसल्यामुळे तो आपत्ती प्राप्त करत नाही. กถํ อกปฺปิยาทิสญฺญิตาย นาปชฺชติ? โส หิ กปฺปิยากปฺปิยํ ชานาติ, ตสฺมา อกปฺปิเย กปฺปิยสญฺญี น โหติ, กปฺปิเย อกปฺปิยสญฺญี น โหติ; สุปฺปติฏฺฐิตา จสฺส สติ โหติ, อธิฏฺฐาตพฺพํ อธิฏฺเฐติ, วิกปฺเปตพฺพํ วิกปฺเปติ. อิติ อิเมหิ ฉหากาเรหิ อาปตฺตึ นาปชฺชติ. อาปตฺตึ อนาปชฺชนฺโต อขณฺฑสีโล โหติ ปริสุทฺธสีโล; เอวมสฺส อตฺตโน สีลกฺขนฺโธ สุคุตฺโต โหติ สุรกฺขิโต. अकल्प्य इत्यादी संज्ञेमुळे (भ्रम न झाल्यामुळे) तो आपत्ती कशी प्राप्त करत नाही? कारण तो कल्प्य आणि अकल्प्य गोष्टी जाणतो, त्यामुळे अकल्प्य गोष्टीमध्ये त्याची कल्प्य संज्ञा होत नाही आणि कल्प्य गोष्टीमध्ये अकल्प्य संज्ञा होत नाही; त्याची स्मृती उत्तम प्रकारे प्रस्थापित असते, तो अधिष्ठान करण्यायोग्य गोष्टींचे अधिष्ठान करतो आणि विकल्पन करण्यायोग्य गोष्टींचे विकल्पन करतो. अशा प्रकारे या सहा प्रकारांनी तो आपत्ती प्राप्त करत नाही. आपत्ती प्राप्त न करता तो अखंड शील असलेला आणि परिशुद्ध शील असलेला होतो; अशा प्रकारे त्याचा स्वतःचा शीलस्कंध सुगुप्त आणि सुरक्षित होतो. กถํ กุกฺกุจฺจปกตานํ ปฏิสรณํ โหติ? ติโรรฏฺเฐสุ ติโรชนปเทสุ จ อุปฺปนฺนกุกฺกุจฺจา ภิกฺขู ‘‘อสุกสฺมึ กิร วิหาเร วินยธโร วสตี’’ติ ทูรโตปิ ตสฺส สนฺติกํ อาคนฺตฺวา กุกฺกุจฺจํ ปุจฺฉนฺติ, โส เตหิ กตสฺส กมฺมสฺส วตฺถุํ โอโลเกตฺวา อาปตฺตานาปตฺติครุกลหุกาทิเภทํ สลฺลกฺเขตฺวา เทสนาคามินึ เทสาเปตฺวา วุฏฺฐานคามินิยา วุฏฺฐาเปตฺวา สุทฺธนฺเต ปติฏฺฐาเปติ; เอวํ กุกฺกุจฺจปกตานํ ปฏิสรณํ โหติ. शंकेखोर भिक्खूंसाठी तो आश्रय कसा बनतो? इतर देशांमध्ये आणि इतर जनपदांमध्ये ज्या भिक्खूंना शंका उत्पन्न झाली आहे, ते "अमुक एका विहारामध्ये विनयधर राहत आहेत म्हणे" असे ऐकून दूरवरूनही त्या विनयधरांच्या जवळ येऊन आपली शंका विचारतात. ते विनयधर त्यांनी केलेल्या कर्माची पार्श्वभूमी पाहून, आपत्ती, अनापत्ती, गुरुकापत्ती, लहुकापत्ती इत्यादी भेद लक्षात घेऊन, देशनागामी आपत्ती असेल तर त्यांची देशना करायला लावून आणि वुट्ठानगामी आपत्ती असेल तर तिच्यातून मुक्त व्हायला लावून त्यांना शुद्धतेमध्ये प्रतिष्ठित करतात; अशा प्रकारे शंकेखोर भिक्खूंसाठी तो आश्रय बनतो. วิสารโท สงฺฆมชฺเฌ โวหรตีติ อวินยธรสฺส หิ สงฺฆมชฺเฌ กเถนฺตสฺส ภยํ สารชฺชํ โอกฺกมติ, วินยธรสฺส ตํ น โหติ. กสฺมา? ‘‘เอวํ กเถนฺตสฺส โทโส โหติ; เอวํ น โทโส’’ติ ญตฺวา กถนโต. "तो आत्मविश्वासाने संघामध्ये बोलतो" याविषयी - संघाच्या मध्ये बोलणाऱ्या अविनयधराच्या (जो विनयधर नाही त्याच्या) मनात भय आणि संकोच निर्माण होतो, परंतु विनयधराच्या मनात ते होत नाही. का? कारण "असे बोलल्याने दोष होतो आणि असे बोलल्याने दोष होत नाही" हे जाणून घेऊनच तो बोलत असतो. ปจฺจตฺถิเก สหธมฺเมน สุนิคฺคหิตํ นิคฺคณฺหาตีติ เอตฺถ ทฺวิธา ปจฺจตฺถิกา นาม – อตฺตปจฺจตฺถิกา จ สาสนปจฺจตฺถิกา จ. ตตฺถ เมตฺติยภุมฺมชกา จ ภิกฺขู วฑฺโฒ จ ลิจฺฉวี อมูลเกน อนฺติมวตฺถุนา โจเทสุํ, อิเม อตฺตปจฺจตฺถิกา นาม. เย วา ปนญฺเญปิ ทุสฺสีลา ปาปธมฺมา, สพฺเพ เต อตฺตปจฺจตฺถิกา. วิปรีตทสฺสนา ปน อริฏฺฐภิกฺขุกณฺฏกสามเณรเวสาลิกวชฺชิปุตฺตกา ปรูปหารอญฺญาณกงฺขาปรวิตรณาทิวาทา มหาสงฺฆิกาทโย จ อพุทฺธสาสนํ ‘‘พุทฺธสาสน’’นฺติ วตฺวา กตปคฺคหา สาสนปจฺจตฺถิกา นาม. เต สพฺเพปิ สหธมฺเมน สการเณน วจเนน ยถา ตํ อสทฺธมฺมํ ปติฏฺฐาเปตุํ น สกฺโกนฺติ, เอวํ สุนิคฺคหิตํ กตฺวา นิคฺคณฺหาติ. "तो विरोधकांचे सधर्माने चांगल्या प्रकारे दमन करतो" याविषयी - विरोधक दोन प्रकारचे असतात: वैयक्तिक विरोधक (आत्मप्रत्यर्थिक) आणि शासनाचे (धम्माचे) विरोधक (शासनप्रत्यर्थिक). त्यापैकी, मेत्तिय व भुम्मजक भिक्खू आणि वड्ढ लिच्छवी यांनी (भिक्खूंवर) निराधार अंतिम वस्तूने (पाराजिकाच्या आरोपाने) चोदना (आरोप) केली होती; हे वैयक्तिक विरोधक होत. तसेच इतरही जे दुःशील आणि पापी स्वभावाचे आहेत, ते सर्व वैयक्तिक विरोधक होत. दुसरीकडे, विपरीत दृष्टी असलेले अरिट्ठ भिक्खू, कण्टक सामणेर, वैशालीचे वज्जीपुत्तक आणि परोपहारवाद, अज्ञानवाद, कंखावाद, परवितरणवाद इत्यादी वाद मानणारे महासांघिक इत्यादी, जे बुद्धवचन नसलेल्या गोष्टीला "बुद्धवचन" असे म्हणून त्याचे समर्थन करतात, ते शासनाचे (धम्माचे) विरोधक होत. त्या सर्वांचे, सधर्माने आणि सकारण वचनाने, ते आपला असद्धम्म प्रस्थापित करू शकणार नाहीत अशा प्रकारे, चांगल्या प्रकारे दमन करून तो (विनयधर) त्यांचे दमन करतो. สทฺธมฺมฏฺฐิติยา [Pg.144] ปฏิปนฺโน โหตีติ เอตฺถ ปน ติวิโธ สทฺธมฺโม ปริยตฺติปฏิปตฺติอธิคมวเสน. ตตฺถ เตปิฏกํ พุทฺธวจนํ ปริยตฺติสทฺธมฺโม นาม. เตรส ธุตงฺคคุณา จุทฺทส ขนฺธกวตฺตานิ ทฺเวอสีติ มหาวตฺตานีติ อยํ ปฏิปตฺติสทฺธมฺโม นาม. จตฺตาโร มคฺคา จ ผลานิ จาติ อยํ อธิคมสทฺธมฺโม นาม. "तो सद्धम्माच्या स्थितीसाठी (स्थैर्यासाठी) कार्यरत असतो" याविषयी - परियत्ती, पटिपत्ती आणि अधिगम यांच्या भेदाने सद्धम्म तीन प्रकारचा आहे. त्यापैकी, त्रिपिटक रूपी बुद्धवचन हे 'परियत्ती सद्धम्म' होय. तेरा धुतांग गुण, चौदा खंधक वत्त (कर्तव्ये) आणि ब्याऐंशी महावत्त (मोठी कर्तव्ये) हा 'पटिपत्ती सद्धम्म' होय. चार मार्ग आणि चार फळे हा 'अधिगम सद्धम्म' होय. ตตฺถ เกจิ เถรา ‘‘โย โว, อานนฺท, มยา ธมฺโม จ วินโย จ เทสิโต ปญฺญตฺโต, โส โว มมจฺจเยน สตฺถา’’ติ (ที. นิ. ๒.๒๑๖) อิมินา สุตฺเตน ‘‘สาสนสฺส ปริยตฺติ มูล’’นฺติ วทนฺติ. เกจิ เถรา ‘‘อิเม จ สุภทฺท ภิกฺขู สมฺมา วิหเรยฺยุํ, อสุญฺโญ โลโก อรหนฺเตหิ อสฺสา’’ติ (ที. นิ. ๒.๒๑๔) อิมินา สุตฺเตน ‘‘สาสนสฺส ปฏิปตฺติมูล’’นฺติ วตฺวา ‘‘ยาว ปญฺจ ภิกฺขู สมฺมา ปฏิปนฺนา สํวิชฺชนฺติ, ตาว สาสนํ ฐิตํ โหตี’’ติ อาหํสุ. อิตเร ปน เถรา ปริยตฺติยา อนฺตรหิตาย สุปฺปฏิปนฺนสฺสปิ ธมฺมาภิสมโย นตฺถี’’ติ อาหํสุ. สเจ ปญฺจ ภิกฺขู จตฺตาริ ปาราชิกานิ รกฺขณกา โหนฺติ, เต สทฺเธ กุลปุตฺเต ปพฺพาเชตฺวา ปจฺจนฺติเม ชนปเท อุปสมฺปาเทตฺวา ทสวคฺคํ คณํ ปูเรตฺวา มชฺฌิเม ชนปเทปิ อุปสมฺปทํ กริสฺสนฺติ, เอเตนุปาเยน วีสติวคฺคคณํ สงฺฆํ ปูเรตฺวา อตฺตโนปิ อพฺภานกมฺมํ กตฺวา สาสนํ วุฑฺฒึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลํ คมยิสฺสนฺติ. เอวมยํ วินยธโร ติวิธสฺสาปิ สทฺธมฺมสฺส จิรฏฺฐิติยา ปฏิปนฺโน โหตีติ เอวมยํ วินยธโร อิเม ตาว ปญฺจานิสํเส ปฏิลภตีติ เวทิตพฺโพ. त्या (तीन सद्धम्मां) पैकी काही थेर (स्थवीर) “हे आनंदा, मी जो धम्म आणि विनय उपदेशिला व प्रज्ञप्त केला आहे, तोच माझ्या पश्चात तुमचा शास्ता असेल” या सूत्राद्वारे “परियत्ति हे शासनाचे मूळ आहे” असे म्हणतात. काही थेर “हे सुभद्दा, जर हे भिक्खू सम्यक प्रकारे विहरतील, तर हा लोक अरहंतांनी शून्य होणार नाही” या सूत्राद्वारे “प्रतिपत्ती हे शासनाचे मूळ आहे” असे सांगून “जोपर्यंत पाच भिक्खू सम्यक प्रतिपन्न (योग्य आचरण करणारे) विद्यमान आहेत, तोपर्यंत शासन टिकून राहील” असे म्हणाले. परंतु इतर थेर “परियत्ति लुप्त झाल्यावर, योग्य आचरण करणाऱ्यालाही धम्माभिसमय (सत्याचा साक्षात्कार) होत नाही” असे म्हणाले. जर चार पाराजिकांचे रक्षण करणारे पाच भिक्खू असतील, तर ते श्रद्धाळू कुलपुत्रांना प्रवज्जित करून, सीमावर्ती जनपदांमध्ये उपसंपदा देऊन, दहा जणांचा गण पूर्ण करून, मध्य जनपदातही उपसंपदा करतील. या उपायाने वीस जणांचा संघ पूर्ण करून, स्वतःचे अब्भानकर्म करून, शासनाला वृद्धी, वृद्धिंगतता आणि विपुलतेप्रत नेतील. अशा प्रकारे हा विनयधर तिन्ही प्रकारच्या सद्धम्माच्या चिरस्थितीसाठी प्रयत्नशील होतो. म्हणून या विनयधराला हे पहिले पाच आनुशंस (फायदे) प्राप्त होतात, असे जाणावे. กตเม ฉ อานิสํเส ลภตีติ? ตสฺสาเธยฺโย อุโปสโถ, ปวารณา, สงฺฆกมฺมํ, ปพฺพชฺชา, อุปสมฺปทา, นิสฺสยํ เทติ สามเณรํ อุปฏฺฐาเปติ. कोणते सहा आनुशंस प्राप्त होतात? उपोसथ त्याच्या अधीन असतो, पवारणा, संघकर्म, प्रवज्जा, उपसंपदा (त्याच्या अधीन असतात), तो निस्सय (आश्रय) देतो आणि सामणेराची सेवा स्वीकारतो. เย อิเม จาตุทฺทสิโก, ปนฺนรสิโก, สามคฺคิอุโปสโถ, สงฺเฆ อุโปสโถ, คเณ ปุคฺคเล อุโปสโถ, สุตฺตุทฺเทโส, ปาริสุทฺธิ, อธิฏฺฐานอุโปสโถติ นว อุโปสถา, สพฺเพ เต วินยธรายตฺตา. जे हे चातुर्दशी उपोसथ, पंचदशी उपोसथ, सामग्गी उपोसथ, संघातील उपोसथ, गणातील उपोसथ, पुद्गलाचा उपोसथ, सुत्तुद्देस उपोसथ, पारिसुद्धि उपोसथ आणि अधिष्ठान उपोसथ असे नऊ उपोसथ आहेत, ते सर्व विनयधराच्या अधीन आहेत. ยาปิ จ อิมา จาตุทฺทสิกา ปนฺนรสิกา, สามคฺคิปวารณา, สงฺเฆ ปวารณา คเณ ปุคฺคเล ปวารณา, เตวาจิกา, ทฺเววาจิกา, สมานวสฺสิกา ปวารณาติ นว ปวารณาโย, ตาปิ วินยธรายตฺตา เอว, ตสฺส สนฺตกา, โส ตาสํ สามี. आणि ज्या या चातुर्दशी पवारणा, पंचदशी पवारणा, सामग्गी पवारणा, संघातील पवारणा, गणातील पवारणा, पुद्गलाची पवारणा, तेवाचिका पवारणा, द्वेवाचिका पवारणा आणि समानवस्सिका पवारणा अशा नऊ पवारणा आहेत, त्या देखील विनयधराच्याच अधीन आहेत, त्या त्याच्या मालकीच्या आहेत आणि तो त्यांचा स्वामी आहे. ยานิปิ [Pg.145] อิมานิ อปโลกนกมฺมํ ญตฺติกมฺมํ ญตฺติทุติยกมฺมํ ญตฺติจตุตฺถกมฺมนฺติ จตฺตาริ สงฺฆกมฺมานิ, ตานิ วินยธรายตฺตานิ. आणि जी ही अपलोकन कर्म, ज्ञत्ति कर्म, ज्ञत्ति-द्वितीय कर्म आणि ज्ञत्ति-चतुर्थ कर्म अशी चार संघकर्मे आहेत, ती विनयधराच्या अधीन आहेत. ยาปิ จายํ อุปชฺฌาเยน หุตฺวา กุลปุตฺตานํ ปพฺพชฺชา จ อุปสมฺปทา จ กาตพฺพา, อยมฺปิ วินยธรายตฺตาว. น หิ อญฺโญ ทฺวิปิฏกธโรปิ เอตํ กาตุํ ลภติ. โส เอว นิสฺสยํ เทติ, สามเณรํ อุปฏฺฐาเปติ. อญฺโญ เนว นิสฺสยํ ทาตุํ ลภติ, น สามเณรํ อุปฏฺฐาเปตุํ. สามเณรูปฏฺฐานํ ปจฺจาสีสนฺโต ปน วินยธรสฺส สนฺติเก อุปชฺฌํ คาหาเปตฺวา วตฺตปฏิปตฺตึ สาทิตุํ ลภติ. เอตฺถ จ นิสฺสยทานญฺเจว สามเณรูปฏฺฐานญฺจ เอกมงฺคํ. आणि उपाध्याय बनून कुलपुत्रांना जी प्रवज्जा आणि उपसंपदा दिली पाहिजे, ती देखील विनयधराच्याच अधीन आहे. कारण दुसरा कोणी द्विपिटकधर असला तरी त्याला हे करण्याचा अधिकार मिळत नाही. तोच निस्सय देतो आणि सामणेराची सेवा स्वीकारतो. दुसऱ्या कोणाला निस्सय देण्याचा अधिकार मिळत नाही, ना सामणेराची सेवा स्वीकारण्याचा. परंतु सामणेराच्या सेवेची इच्छा बाळगणाऱ्याने विनयधराजवळ उपाध्यायत्व ग्रहण करून व्रत-प्रतिपत्तीचे पालन करावे. आणि येथे निस्सय देणे आणि सामणेराची सेवा स्वीकारणे हे दोन्ही मिळून एकच अंग मानले आहे. อิติ อิเมสุ ฉสุ อานิสํเสสุ เอเกน สทฺธึ ปุริมา ปญฺจ ฉ โหนฺติ, ทฺวีหิ สทฺธึ สตฺต, ตีหิ สทฺธึ อฏฺฐ, จตูหิ สทฺธึ นว, ปญฺจหิ สทฺธึ ทส, สพฺเพหิ เปเตหิ สทฺธึ เอกาทสาติ เอวํ วินยธโร ปุคฺคโล ปญฺจ ฉ สตฺต อฏฺฐ นว ทส เอกาทส จ อานิสํเส ลภตีติ เวทิตพฺโพ. เอวํ ภควา อิเม อานิสํเส ทสฺเสนฺโต วินยปริยตฺติยา วณฺณํ ภาสตีติ เวทิตพฺโพ. अशा प्रकारे या सहा आनुशंसांपैकी एकासह मागील पाच मिळून सहा होतात, दोघांसह सात, तिघांसह आठ, चौघांसह नऊ, पाच जणांसह दहा आणि या सर्वांसह मिळून अकरा होतात. अशा प्रकारे विनयधर व्यक्ती पाच, सहा, सात, आठ, नऊ, दहा आणि अकरा आनुशंस प्राप्त करते, असे जाणावे. अशा प्रकारे भगवान हे आनुशंस दाखवून विनय-परियत्तीची प्रशंसा करतात, असे जाणावे. อาทิสฺส อาทิสฺสาติ ปุนปฺปุนํ ววตฺถเปตฺวา วิสุํ วิสุํ กตฺวา. อายสฺมโต อุปาลิสฺส วณฺณํ ภาสตีติ วินยปริยตฺตึ นิสฺสาย อุปาลิตฺเถรสฺส คุณํ ภาสติ โถเมติ ปสํสติ. กสฺมา? อปฺเปว นาม มม วณฺณนํ สุตฺวาปิ ภิกฺขู อุปาลิสฺส สนฺติเก วินยํ อุคฺคเหตพฺพํ ปริยาปุณิตพฺพํ มญฺเญยฺยุํ, เอวมิทํ สาสนํ อทฺธนิยํ ภวิสฺสติ, ปญฺจวสฺสสหสฺสานิ ปวตฺติสฺสตีติ. ‘आदिस्स आदिस्स’ म्हणजे वारंवार निश्चित करून, वेगवेगळे करून. ‘आयुष्यमान उपालींची प्रशंसा करतात’ म्हणजे विनय-परियत्तीच्या आधारे उपाली थेरांच्या गुणांचे वर्णन करतात, स्तुती करतात आणि प्रशंसा करतात. कशासाठी? “माझी ही प्रशंसा ऐकून तरी भिक्खूंनी आयुष्यमान उपालींच्या जवळ विनय ग्रहण करावा, त्याचा अभ्यास करावा असे त्यांना वाटावे, जेणेकरून हे शासन दीर्घकाळ टिकेल आणि पाच हजार वर्षे कार्यरत राहील.” เตธ พหู ภิกฺขูติ เต อิมํ ภควโต วณฺณนํ สุตฺวา ‘‘อิเม กิรานิสํเส เนว สุตฺตนฺติกา น อาภิธมฺมิกา ลภนฺตี’’ติ ยถาปริกิตฺติตานิสํสาธิคเม อุสฺสาหชาตา พหู ภิกฺขู เถรา จ นวา จ มชฺฌิมา จ อายสฺมโต อุปาลิสฺส สนฺติเก วินยํ ปริยาปุณนฺตีติ อยเมตฺถ อตฺโถ. อิธาติ นิปาตมตฺตเมว. ‘तेध बहू भिक्खू’ म्हणजे भगवंतांची ही प्रशंसा ऐकून, “हे आनुशंस सुत्तन्तिक किंवा आभिधम्मिक यांना मिळत नाहीत,” असा विचार करून, वर्णन केलेल्या आनुशंसांच्या प्राप्तीसाठी उत्साही झालेले अनेक भिक्खू - जे थेर (ज्येष्ठ), नव (नवीन) आणि मध्यम होते, ते आयुष्यमान उपालींच्या जवळ विनयाचा अभ्यास करू लागले, हा येथे अर्थ आहे. ‘इध’ हा केवळ एक निपात आहे. ๔๓๙-๔๐. อุทฺทิสฺสมาเนติ อาจริเยน อนฺเตวาสิกสฺส อุทฺทิสฺสมาเน, โส ปน ยสฺมา อาจริเย อตฺตโน รุจิยา อุทฺทิสนฺเต วา อาจริยํ ยาจิตฺวา [Pg.146] อนฺเตวาสิเกน อุทฺทิสาเปนฺเต วา โย นํ ธาเรติ, ตสฺมึ สชฺฌายํ กโรนฺเต วา อุทฺทิสฺสมาโน นาม โหติ, ตสฺมา ‘‘อุทฺทิสนฺเต วา อุทฺทิสาเปนฺเต วา สชฺฌายํ วา กโรนฺเต’’ติ ปทภาชนํ วุตฺตํ. ขุทฺทานุขุทฺทเกหีติ ขุทฺทเกหิ จ อนุขุทฺทเกหิ จ. ยาวเทวาติ เตสํ สํวตฺตนมริยาทปริจฺเฉทวจนํ. อิทํ วุตฺตํ โหติ – เอตานิ หิ เย อุทฺทิสนฺติ, อุทฺทิสาเปนฺติ สชฺฌายนฺติ วา, เตสํ ตาว สํวตฺตนฺติ ยาว ‘‘กปฺปติ นุ โข, น กปฺปติ นุ โข’’ติ กุกฺกุจฺจสงฺขาโต วิปฺปฏิสาโร วิเหสา วิจิกิจฺฉาสงฺขาโต มโนวิเลโข จ อุปฺปชฺชติเยว. อถ วา ยาวเทวาติ อติสยววตฺถาปนํ; ตสฺส สํวตฺตนฺตีติ อิมินา สมฺพนฺโธ, กุกฺกุจฺจาย วิเหสาย วิเลขาย อติวิย สํวตฺตนฺติเยวาติ วุตฺตํ โหติ. อุปสมฺปนฺนสฺส วินยํ วิวณฺเณตีติ อุปสมฺปนฺนสฺส สนฺติเก ตสฺส ตสฺมึ วิมตึ อุปฺปาเทตุกาโม วินยํ วิวณฺเณติ นินฺทติ ครหติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ४३९-४०. ‘उद्दिस्समाने’ म्हणजे आचार्यांनी अंत्यवासिकाला (शिष्याला) शिकवत असताना. परंतु तो ज्या अर्थी, आचार्य आपल्या इच्छेने शिकवत असताना किंवा शिष्याने आचार्यांना विनंती करून शिकवून घेत असताना, जो त्याचे धारण करतो किंवा त्याचे पठण करत असताना ‘उद्दिस्समान’ (शिकवले जाणारे) असे म्हटले जाते. म्हणूनच “शिकवत असताना, शिकवून घेत असताना किंवा पठण करत असताना” असे पदभाजन भगवंतांनी सांगितले आहे. ‘खुद्दानुखुद्दकेहि’ म्हणजे क्षुद्र (लहान) आणि अनुक्षुद्र (त्याहून लहान) नियमांद्वारे. ‘यावदेव’ हा शब्द त्यांच्या उद्भवण्याच्या मर्यादेचा परिच्छेद (मर्यादा निश्चित करणारा) शब्द आहे. हे असे म्हटले आहे - जे कोणी हे नियम शिकवतात, शिकवून घेतात किंवा त्यांचे पठण करतात, त्यांच्यामध्ये तोपर्यंत उद्भवतात जोपर्यंत “हे योग्य आहे की अयोग्य?” अशी कुक्कुच्च (पश्चात्ताप) नावाचा विप्रतिसार (मनस्ताप), विहेसा (त्रास) आणि विचिकित्सा (संशय) नावाचा मनोविलेख (मनाचा गोंधळ) उत्पन्न होतोच. किंवा ‘यावदेव’ हा शब्द अतिशयता दर्शवणारा आहे; त्याचा ‘संवत्तन्ति’ या पदाशी संबंध आहे, म्हणजे ते कुक्कुच्च, विहेसा आणि विलेखासाठी अत्यंत कारणीभूत ठरतात, असे म्हटले आहे. ‘उपसंपन्नाच्या विनयाची निंदा करतो’ म्हणजे उपसंपन्नाच्या जवळ, त्याच्या मनात त्या नियमाविषयी संशय निर्माण करण्याच्या इच्छेने विनयाची निंदा करतो, निर्भत्सना करतो आणि दोष देतो. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. त्रिसमुत्थान - क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज (लोकनिंद्य), कायकर्म, वचीकर्म (वाचिक कर्म), अकुशल चित्त आणि दुःखवेदना. วิเลขนสิกฺขาปทํ ทุติยํ. विलेखन सिक्खापद (दुसरे) समाप्त. ๓. โมหนสิกฺขาปทวณฺณนา ३. मोहन सिक्खापदाचे वर्णन (मोहनसिक्खापदवण्णना). ๔๔๔. ตติเย – อนฺวทฺธมาสนฺติ อนุปฏิปาฏิยา อทฺธมาเส อทฺธมาเส; ยสฺมา ปน โส อุโปสถทิวเส อุทฺทิสิยติ, ตสฺมา ‘‘อนุโปสถิก’’นฺติ ปทภาชเน วุตฺตํ. อุทฺทิสฺสมาเนติ อุทฺทิสิยมาเน. ยสฺมา ปน โส ปาติโมกฺขุทฺเทสเก อุทฺทิสนฺเต อุทฺทิสิยมาโน นาม โหติ, ตสฺมา ‘‘อุทฺทิสนฺเต’’ติ ปทภาชเน วุตฺตํ. ยญฺจ ตตฺถ อาปตฺตึ อาปนฺโนติ ตสฺมึ อนาจาเร จิณฺเณ ยํ อาปตฺตึ อาปนฺโน. ยถาธมฺโม กาเรตพฺโพติ อญฺญาเณน อาปนฺนตฺตา ตสฺสา อาปตฺติยา โมกฺโข นตฺถิ, ยถา ปน ธมฺโม จ วินโย จ ฐิโต, ตถา กาเรตพฺโพ. เทสนาคามินิญฺเจ อาปนฺโน โหติ, เทสาเปตพฺโพ, วุฏฺฐานคามินิญฺเจ, วุฏฺฐาเปตพฺโพติ อตฺโถ. สาธุกนฺติ สุฏฺฐุ. อฏฺฐึกตฺวาติ อตฺถิกภาวํ กตฺวา; อตฺถิโก หุตฺวาติ วุตฺตํ โหติ. ४४४. तिसऱ्यामध्ये – 'अन्वद्धमासं' म्हणजे अनुक्रमाने प्रत्येक पंधरवड्याला; परंतु ज्याअर्थी तो (पातिमोक्ख) उपोसथ दिवशी उद्देशित केला जातो (पठण केला जातो), म्हणून पदभाजनामध्ये भगवंतांनी 'अनुपोसथिक' असे म्हटले आहे. 'उद्दिस्समाने' म्हणजे उद्देशित केले जात असताना (पठण केले जात असताना). परंतु ज्याअर्थी पातिमोक्ख पठण करणाऱ्या भिक्खूने पठण करत असताना तो उद्देशित केला जात असतो, म्हणून पदभाजनामध्ये 'उद्दिसन्ते' (पठण करत असताना) असे म्हटले आहे. 'आणि जी तेथे आपत्ती प्राप्त झाली' म्हणजे त्या अनाचारात (अयोग्य वर्तनात) आचरण केल्यावर जी आपत्ती प्राप्त झाली आहे. 'यथाधम्म कारेय्य' (धम्मानुसार करावे) म्हणजे अज्ञानामुळे आपत्ती प्राप्त झाल्याने त्या आपत्तीतून सुटका नाही, परंतु ज्याप्रमाणे धम्म आणि विनय प्रस्थापित आहेत, त्याप्रमाणेच करावे (निर्णय घ्यावा). जर देशनागामी (देशनेने शुद्ध होणारी) आपत्ती प्राप्त झाली असेल, तर देशना करवून घ्यावी, आणि जर वुट्ठानगामी (संघाच्या प्रक्रियेने शुद्ध होणारी) आपत्ती असेल, तर वुट्ठान (शुद्धीकरण) करवून घ्यावे, असा अर्थ आहे. 'साधुकं' म्हणजे चांगल्या प्रकारे. 'अट्ठिंकत्वा' म्हणजे हितकारक भाव ठेवून किंवा हितकारक होऊन (लक्षपूर्वक ऐकून) असे म्हटले आहे. ๔๔๗. ธมฺมกมฺเมติอาทีสุ [Pg.147] โมหาโรปนกมฺมํ อธิปฺเปตํ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. ४४७. 'धम्मकम्मे' इत्यादी शब्दांमध्ये मोहारोपन कर्म अभिप्रेत आहे. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. तीन समुत्थान आहेत – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज (लोकनिंद्य), कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदना. โมหนสิกฺขาปทํ ตติยํ. मोहनसिक्खापद तिसरे (समाप्त). ๔. ปหารสิกฺขาปทวณฺณนา ४. प्रहारसिक्खापद वर्णन ๔๔๙. จตุตฺเถ – ปหารํ เทนฺตีติ ‘‘อาวุโส ปีฐกํ ปญฺญเปถ, ปาทโธวนํ อาหรถา’’ติอาทีนิ วตฺวา ตถา อกโรนฺตานํ ปหารํ เทนฺติ. ४४९. चौथ्यामध्ये – 'प्रहार करतात' म्हणजे 'आयुष्यमानांनो! आसन (पीठक) लावा, पाय धुण्याचे पाणी आणा' इत्यादी बोलून, त्याप्रमाणे न करणाऱ्या (सत्तरसवर्गीय भिक्खूंना) प्रहार करतात (मारतात). ๔๕๑. ปหารํ เทติ อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสาติ เอตฺถ ปหริตุกามตาย ปหาเร ทินฺเน สเจปิ มรติ ปาจิตฺติยเมว. ปหาเรน หตฺโถ วา ปาโท วา ภิชฺชติ, สีสํ วา ภินฺนํ โหติ, ปาจิตฺติยเมว. ‘‘ยถายํ สงฺฆมชฺเฌ น วิโรจติ, ตถา นํ กโรมี’’ติ เอวํ วิรูปกรณาธิปฺปาเยน กณฺณํ วา นาสํ วา ฉินฺทติ, ทุกฺกฏํ. ४५१. 'प्रहार करतो, पाचित्तिय आपत्ती होते' यामध्ये – मारण्याच्या इच्छेने प्रहार केला असता, जरी तो मरून गेला, तरी पाचित्तियच होते. प्रहारामुळे हात किंवा पाय मोडला, किंवा डोके फुटले, तरी पाचित्तियच होते. 'ज्यामुळे हा संघाच्या मध्ये शोभून दिसणार नाही, तसे मी याला करतो' अशा प्रकारे कुरूप (रुपहीन) करण्याच्या हेतूने कान किंवा नाक कापतो, तर दुक्कट आपत्ती होते. ๔๕๒. อนุปสมฺปนฺนสฺสาติ คหฏฺฐสฺส วา ปพฺพชิตสฺส วา อิตฺถิยา วา ปุริสสฺส วา อนฺตมโส ติรจฺฉานคตสฺสาปิ ปหารํ เทติ, ทุกฺกฏํ. สเจ ปน รตฺตจิตฺโต อิตฺถึ ปหรติ, สงฺฆาทิเสโส. ४५२. 'अनुपसंपन्नाला' म्हणजे गृहस्थाला किंवा (इतर) प्रव्रजिताला (सामणेराला), स्त्रीला किंवा पुरुषाला, अगदी प्राण्याला (तिर्यंचगताला) सुद्धा प्रहार करतो, तर दुक्कट आपत्ती होते. परंतु जर रागासक्त (कामवासनेने युक्त) चित्ताने स्त्रीला प्रहार करतो, तर संघादिसेस आपत्ती होते. ๔๕๓. เกนจิ วิเหฐิยมาโนติ มนุสฺเสน วา ติรจฺฉานคเตน วา วิเหฐิยมาโน. โมกฺขาธิปฺปาโยติ ตโต อตฺตโน โมกฺขํ ปตฺถยมาโน. ปหารํ เทตีติ กายกายปฏิพทฺธนิสฺสคฺคิยานํ อญฺญตเรน ปหารํ เทติ, อนาปตฺติ. สเจปิ อนฺตรามคฺเค โจรํ วา ปจฺจตฺถิกํ วา วิเหเฐตุกามํ ทิสฺวา ‘‘อุปาสก, เอตฺเถว ติฏฺฐ, มา อาคมี’’ติ วตฺวา วจนํ อนาทิยิตฺวา อาคจฺฉนฺตํ ‘‘คจฺฉ เร’’ติ มุคฺคเรน วา สตฺถเกน วา ปหริตฺวา ยาติ, โส เจ เตน ปหาเรน มรติ, อนาปตฺติเยว. วาฬมิเคสุปิ เอเสว นโย. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. สมุฏฺฐานาทีนิ ปนสฺส ปฐมปาราชิกสทิสานิ, อิทํ ปน ทุกฺขเวทนนฺติ. ४५३. 'कोणाकडून तरी पीडित केला जात असताना' म्हणजे मनुष्याकडून किंवा प्राण्याकडून पीडित केला जात असताना. 'मुक्त होण्याच्या हेतूने' म्हणजे त्यापासून स्वतःची सुटका करून घेण्याची इच्छा ठेवून. 'प्रहार करतो' म्हणजे शरीर किंवा शरीराशी संबंधित वस्तू किंवा फेकण्याच्या शस्त्रांपैकी कोणत्याही एकाने प्रहार करतो, तर अनापत्ती (आपत्ती नाही) आहे. जर प्रवासाच्या दरम्यान चोर किंवा पीडा देण्याची इच्छा असणारा शत्रू पाहून, 'उपासका! तिथेच थांब, पुढे येऊ नकोस' असे म्हणून, त्याचे बोलणे न ऐकता येणाऱ्याला, 'जा रे!' असे म्हणून सोट्याने (मुद्गराने) किंवा लहान चाकूने (शस्त्रकाने) प्रहार करून निघून जातो, आणि तो जर त्या प्रहारामुळे मरतो, तरी अनापत्तीच आहे. हिंस्र श्वापदांच्या (सिंह, वाघ इत्यादींच्या) बाबतीतही हाच नियम आहे. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. याचे समुत्थान इत्यादी प्रथम पाराजिकासारखेच आहेत, परंतु यामध्ये दुःखवेदना असते. ปหารสิกฺขาปทํ จตุตฺถํ. प्रहारसिक्खापद चौथे (समाप्त). ๕. ตลสตฺติกสิกฺขาปทวณฺณนา ५. तलसत्तिकसिक्खापद वर्णन ๔๕๔. ปญฺจเม [Pg.148] – ตลสตฺติกํ อุคฺคิรนฺตีติ ปหารทานาการํ ทสฺเสตฺวา กายมฺปิ กายปฏิพทฺธมฺปิ อุจฺจาเรนฺติ. เต ปหารสมุจฺจิตา โรทนฺตีติ เต ปหารปริจิตา ปุพฺเพปิ ลทฺธปหารตฺตา อิทานิ จ ปหารํ ทสฺสนฺตีติ มญฺญมานา โรทนฺตีติ อตฺโถ. ‘‘ปหารสฺส มุจฺจิตา’’ติปิ สชฺฌายนฺติ, ตตฺถ ‘‘ปหารสฺส ภีตา’’ติ อตฺโถ. ४५४. पाचव्यामध्ये – 'तलसत्तिक (हात किंवा शस्त्र) उगारतात' म्हणजे प्रहार करण्याचा आकार (भाव) दाखवून, शरीर किंवा शरीराशी संबंधित शस्त्र वर उचलतात (उगारतात). 'ते प्रहाराने भयभीत होऊन रडतात' म्हणजे ते (सत्तरसवर्गीय भिक्खू) प्रहार खाण्याची सवय असलेले असल्याने आणि पूर्वीही प्रहार खाल्लेले असल्याने, 'आताही हे प्रहार करतील' असे मानून रडतात, असा अर्थ आहे. 'पहारस्स मुच्चिता' असाही पाठ वाचतात, तेथे 'प्रहाराला घाबरून' असा अर्थ आहे. ๔๕๗. อุคฺคิรติ อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสาติ เอตฺถ สเจ อุคฺคิริตฺวา วิรทฺโธ ปหารํ เทติ, อวสฺสํ ธาเรตุํ อสกฺโกนฺตสฺส ปหาโร สหสา ปตติ, น ปหริตุกามตาย ทินฺนตฺตา ทุกฺกฏํ. เตน ปหาเรน หตฺถาทีสุ ยํกิญฺจิ ภิชฺชติ, ทุกฺกฏเมว. ४५७. 'उगारतो, पाचित्तिय आपत्ती होते' यामध्ये – जर उगारून हात सुटल्याने प्रहार करतो, स्वतःला रोखण्यास असमर्थ असलेल्या भिक्खूचा प्रहार अचानक पडतो, मारण्याच्या इच्छेने न दिल्यामुळे दुक्कट आपत्ती होते. त्या प्रहारामुळे हात इत्यादी अवयवांपैकी काही मोडले, तरी दुक्कटच होते. ๔๕๘. โมกฺขาธิปฺปาโย ตลสตฺติกํ อุคฺคิรตีติ เอตฺถ ปุพฺเพ วุตฺเตสุ วตฺถูสุ ปุริมนเยเนว ตลสตฺติกํ อุคฺคิรนฺตสฺส อนาปตฺติ. สเจปิ วิรชฺฌิตฺวา ปหารํ เทติ, อนาปตฺติเยว. เสสํ ปุริมสทิสเมว สทฺธึ สมุฏฺฐานาทีหีติ. ४५८. 'मुक्त होण्याच्या हेतूने तलसत्तिक उगारतो' यामध्ये – पूर्वी सांगितलेल्या चोर इत्यादी प्रकरणांमध्ये पूर्वीच्याच नियमाने तलसत्तिक (हात किंवा शस्त्र) उगारणाऱ्याला अनापत्ती आहे. जरी हात सुटून प्रहार झाला, तरी अनापत्तीच आहे. उर्वरित भाग समुत्थान इत्यादींसह पूर्वीसारखाच आहे. ตลสตฺติกสิกฺขาปทํ ปญฺจมํ. तलसत्तिकसिक्खापद पाचवे (समाप्त). ๖. อมูลกสิกฺขาปทวณฺณนา ६. अमूलकसिक्खापद वर्णन ๔๕๙. ฉฏฺเฐ – อนุทฺธํเสนฺตีติ เต กิร สยํ อากิณฺณโทสตฺตา ‘‘เอวํ ภิกฺขู อมฺเห เนว โจเทสฺสนฺติ, น สาเรสฺสนฺตี’’ติ อตฺตปริตฺตาณํ กโรนฺตา ปฏิกจฺเจว ภิกฺขู อมูลเกน สงฺฆาทิเสเสน โจเทนฺติ. เสสเมตฺถ เตรสกมฺหิ อมูลกสิกฺขาปเท วุตฺตนยตฺตา อุตฺตานเมว. ४५९. सहाव्यामध्ये – 'आरोप करतात (दोषारोप करतात)' म्हणजे ते (छब्बग्गीय भिक्खू) स्वतः दोषांनी युक्त असल्याने, 'अशा प्रकारे (आम्ही आधीच आरोप केल्यास) भिक्खू आमच्यावर आरोप करणार नाहीत किंवा आम्हाला दोषांची आठवण करून देणार नाहीत' स्वतःचे रक्षण करू इच्छिणारे होऊन, आधीच (पूर्व तयारीने) भिक्खूंवर निराधार (अमूलक) संघादिसेस आपत्तीचा आरोप करतात. यातील उर्वरित भाग तेरा संघादिसेस मधील अमूलक सिक्खापदामध्ये सांगितलेल्या नियमाप्रमाणे स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. तीन समुत्थान आहेत – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज (लोकनिंद्य), कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदना. อมูลกสิกฺขาปทํ ฉฏฺฐํ. अमूलकसिक्खापद सहावे (समाप्त). ๗. สญฺจิจฺจสิกฺขาปทวณฺณนา ७. संचिच्चसिक्खापद वर्णन ๔๖๔. สตฺตเม – อุปทหนฺตีติ อุปฺปาเทนฺติ. กุกฺกุจฺจํ อุปทหติ อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสาติ วาจาย วาจาย อาปตฺติ. อนุปสมฺปนฺนสฺสาติ สามเณรสฺส[Pg.149]. มาตุคาเมน สทฺธึ รโห มญฺเญ ตยา นิสินฺนํ นิปนฺนํ ภุตฺตํ ปีตํ, สงฺฆมชฺเฌ อิทญฺจิทญฺจ กตนฺติอาทินา นเยน กุกฺกุจฺจํ อุปทหติ, วาจาย วาจาย ทุกฺกฏํ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. สมุฏฺฐานาทีนิปิ อมูลกสทิสาเนวาติ. ४६४. सातव्यामध्ये – 'उत्पन्न करतात' म्हणजे निर्माण करतात. 'संशय (कुक्कुच्च) उत्पन्न करतो, पाचित्तिय आपत्ती होते' म्हणजे प्रत्येक शब्दाशब्दाला आपत्ती होते. 'अनुपसंपन्नाच्या बाबतीत' म्हणजे सामणेराच्या बाबतीत. 'मला वाटते की तू मातृग्रामासोबत (स्त्रीसोबत) एकांतात बसला होतास, निजला होतास, जेवला होतास, प्यायला होतास, आणि संघाच्या मध्ये हे आणि हे केलेस' इत्यादी प्रकारे संशय उत्पन्न करतो, तर प्रत्येक शब्दाशब्दाला दुक्कट आपत्ती होते. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. समुत्थान इत्यादी देखील अमूलक सिक्खापदासारखेच आहेत. สญฺจิจฺจสิกฺขาปทํ สตฺตมํ. संचिच्चसिक्खापद सातवे (समाप्त). ๘. อุปสฺสุติสิกฺขาปทวณฺณนา ८. उपस्सुतिसिक्खापद वर्णन ๔๗๑. อฏฺฐเม – อธิกรณชาตานนฺติ เอเตหิ ภณฺฑนาทีหิ อุปฺปนฺนวิวาทาธิกรณานํ. อุปสฺสุตินฺติ สุติสมีปํ; ยตฺถ ฐตฺวา สกฺกา โหติ เตสํ วจนํ โสตุํ, ตตฺถาติ อตฺโถ. คจฺฉติ อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ เอตฺถ ปทวาเร ปทวาเร ทุกฺกฏํ. มนฺเตนฺตนฺติ อญฺเญน สทฺธึ อญฺญสฺมึ มนฺตยมาเน; ‘‘มนฺเตนฺเต’’ติ วา ปาโฐ, อยเมวตฺโถ. ४७१. आठव्यामध्ये – 'अधिकरण उत्पन्न झालेल्यांचे' म्हणजे या भांडण इत्यादींमुळे उत्पन्न झालेल्या विवाद अधिकरणांचे. 'उपस्सुति' (चोरून ऐकणे) म्हणजे ऐकू येण्याच्या जवळ; जेथे उभे राहून त्यांचे बोलणे ऐकणे शक्य होते, तेथे, असा अर्थ आहे. 'जातो, दुक्कट आपत्ती होते' यामध्ये – प्रत्येक पावलापावलाला दुक्कट आपत्ती होते. 'गुप्त चर्चा करत असताना' म्हणजे दुसऱ्या भिक्खूसोबत गुप्त चर्चा करत असताना; किंवा 'मन्तेन्ते' असाही पाठ आहे, त्याचाही हाच अर्थ आहे. ๔๗๓. วูปสมิสฺสามีติ อุปสมํ คมิสฺสามิ, กลหํ น กริสฺสามิ. อตฺตานํ ปริโมเจสฺสามีติ มม อการกภาวํ กเถตฺวา อตฺตานํ โมเจสฺสามิ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ४७३. 'मी शांत करीन' म्हणजे मी शांतीला प्राप्त होईन, भांडण करणार नाही. 'स्वतःला मुक्त करीन' म्हणजे मी यात काही केले नाही (माझा निरपराधपणा) हे सांगून स्वतःला अधिकरणातून मुक्त करीन. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. เถยฺยสตฺถสมุฏฺฐานํ – กายจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, สิยา กิริยํ โสตุกามตาย คมนวเสน, สิยา อกิริยํ ฐิตฏฺฐานํ อาคนฺตฺวา มนฺตยมานานํ อชานาปนวเสน, รูปิยํ อญฺญวาทกํ อุปสฺสุตีติ อิมานิ หิ ตีณิ สิกฺขาปทานิ เอกปริจฺเฉทานิ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. थेय्यसत्थसमुत्थान (चोरांच्या तांड्यासोबत प्रवास करण्याचे समुत्थान) हे काय-चित्त आणि काय-वाचा-चित्त यांपासून उत्पन्न होते. कधीकधी ऐकण्याच्या इच्छेने जाण्याच्या क्रियेमुळे (क्रिया), तर कधीकधी गुप्तपणे बोलणाऱ्यांच्या जवळ येऊन त्यांना न कळू देता ऐकण्याच्या अक्रियेमुळे (अक्रिया) हे घडते. रूपिय (चांदी-नाणे), अञ्ञवादक (दुसरेच बोलणे) आणि उपस्सुति (गुप्तपणे ऐकणे) हे तीन शिक्षापदे एकाच मर्यादेचे (एकपरिच्छेद) आहेत. हे सञ्ञाविमोक्ख (संज्ञाविमोक्ष), सचित्तक, लोकवज्ज, कायकम्म, वचीकम्म, अकुसलचित्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहेत। อุปสฺสุติสิกฺขาปทํ อฏฺฐมํ. उपस्सुति शिक्षापद (गुप्तपणे ऐकण्याचे शिक्षापद) आठवे समाप्त। ๙. กมฺมปฏิพาหนสิกฺขาปทวณฺณนา ९. कम्मपटिबाहन शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (कर्मप्रतिबाहन शिक्षापदवर्णना)। ๔๗๔. นวเม – สเจ จ มยํ ชาเนยฺยามาติ สเจ มยํ ชาเนยฺยาม; จกาโร ปน นิปาตมตฺตเมว. ธมฺมิกานนฺติ ธมฺเมน วินเยน สตฺถุสาสเนน กตตฺตา ธมฺมา เอเตสุ อตฺถีติ ธมฺมิกานิ; เตสํ ธมฺมิกานํ จตุนฺนํ สงฺฆกมฺมานํ. ขิยฺยติ อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสาติ เอตฺถ วาจาย วาจาย ปาจิตฺติยํ[Pg.150]. เสสํ อุตฺตานเมว. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. ४७४. नवव्या शिक्षापदात – 'सचे च मयं जानेय्यामा' म्हणजे जर आम्ही जाणू; येथे 'च' हा शब्द केवळ निपात (अव्यय) आहे. 'धम्मिकानं' म्हणजे धर्मानुसार, विनयानुसार आणि शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) शासनानुसार (नत्ति-कम्मवाचेने) केल्यामुळे ज्यांच्यामध्ये धर्म आहे ते 'धम्मिक' (धार्मिक/न्याय्य) होत; त्या धार्मिक चार संघकर्मांच्या बाबतीत. 'खिय्यति आपत्ति पाचित्तियस्स' येथे प्रत्येक वचनागणिक पाचित्तिय (प्रायश्चित्त) होते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. हे त्रिसमुत्थान आहे – क्रिया, सञ्ञाविमोक्ख, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकम्म, वचीकम्म, अकुसलचित्त आणि दुःखवेदनायुक्त। กมฺมปฏิพาหนสิกฺขาปทํ นวมํ. कम्मपटिबाहन शिक्षापद नववे समाप्त। ๑๐. ฉนฺทํอทตฺวาคมนสิกฺขาปทวณฺณนา १०. छन्दं अदत्वा गमन शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (छंद न देता जाण्याचे शिक्षापदवर्णना)। ๔๘๑. ทสเม – วตฺถุ วา อาโรจิตนฺติ โจทเกน จ จุทิตเกน จ อตฺตโน กถา กถิตา, อนุวิชฺชโก สมฺมโต, เอตฺตาวตาปิ วตฺถุเมว อาโรจิตํ โหติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ४८१. दहाव्या शिक्षापदात – 'वत्थु वा आरोचितं' म्हणजे चोदक (आरोप करणारा) आणि चुदितक (आरोपी) या दोघांनीही आपापली बाजू मांडली आहे, आणि अनुविज्जक (चौकशी करणारा विनयधर भिक्खू) नियुक्त केला गेला आहे, एवढ्यावरूनच 'वस्तू (प्रकरण) कळविली गेली आहे' असे होते. उर्वरित भाग येथे स्पष्टच आहे। ธุรนิกฺเขปสมุฏฺฐานํ – กายวาจาจิตฺตโต สมุฏฺฐาติ, กิริยากิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. धुरनिक्खेपसमुत्थान (जवाबदारी सोडून देण्याचे समुत्थान) हे काय-वाचा-चित्त यांपासून उत्पन्न होते. हे क्रिया-अक्रिया, सञ्ञाविमोक्ख, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकम्म, वचीकम्म, अकुसलचित्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे। ฉนฺทํ อทตฺวา คมนสิกฺขาปทํ ทสมํ. छन्दं अदत्वा गमन शिक्षापद दहावे समाप्त। ๑๑. ทุพฺพลสิกฺขาปทวณฺณนา ११. दुब्बल शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (दुर्बल शिक्षापदवर्णना)। ๔๘๔. เอกาทสเม – ยถามิตฺตตาติ ยถามิตฺตตาย; โย โย มิตฺโต, ตสฺส ตสฺส เทตีติ วุตฺตํ โหติ. เอส นโย สพฺพปเทสุ. เสสํ อุชฺฌาปนกาทีสุ วุตฺตนยตฺตา อุตฺตานตฺถเมว. ४८४. अकराव्या शिक्षापदात – 'यथामित्तता' म्हणजे मैत्रीच्या नात्याने; जो जो मित्र असेल, त्याला त्याला देतो, असा याचा अर्थ आहे. हाच नियम सर्व पदांना (यथासन्दिट्ठता, यथासम्भत्तता, यथासमानुपज्झायक्ता, यथासमानाचरियकता इत्यादी) लागू होतो. उर्वरित भाग उज्झापनक (तक्रार करणे) इत्यादी शिक्षापदांमध्ये सांगितल्याप्रमाणे स्पष्ट अर्थाचाच आहे। ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. हे त्रिसमुत्थान आहे – क्रिया, सञ्ञाविमोक्ख, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकम्म, वचीकम्म, अकुसलचित्त आणि दुःखवेदनायुक्त। ทุพฺพลสิกฺขาปทํ เอกาทสมํ. दुब्बल शिक्षापद अकरावे समाप्त। ๑๒. ปริณามนสิกฺขาปทวณฺณนา १२. परिणामन शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (परिणामन शिक्षापदवर्णना)। ๔๘๙. ทฺวาทสเม – ยํ วตฺตพฺพํ สิยา, ตํ สพฺพํ ตึสเก ปริณามนสิกฺขาปเท วุตฺตนยเมว. อยเมว หิ วิเสโส – ตตฺถ อตฺตโน ปริณามิตตฺตา นิสฺสคฺคิยํ ปาจิตฺติยํ, อิธ ปุคฺคลสฺส ปริณามิตตฺตา สุทฺธิกปาจิตฺติยนฺติ. ४८९. बाराव्या शिक्षापदात – जे काही सांगायचे आहे, ते सर्व तिंसक (निसग्गिय पाचित्तिय मधील तिसावे) परिणामन शिक्षापदात सांगितल्याप्रमाणेच आहे. विशेष फरक एवढाच आहे की – तिथे स्वतःकडे वळविल्यामुळे 'निसग्गिय पाचित्तिय' होते, तर इथे दुसऱ्या व्यक्तीकडे वळविल्यामुळे केवळ 'शुद्ध पाचित्तिय' (सुद्धिकपाचित्तिय) होते। ติสมุฏฺฐานํ [Pg.151] – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. हे त्रिसमुत्थान आहे – क्रिया, सञ्ञाविमोक्ख, सचित्तक, लोकवज्ज (लोकवद्य), कायकम्म, वचीकम्म, अकुसलचित्त आणि त्रिवेदनायुक्त (तिन्ही प्रकारच्या वेदना)। ปริณามนสิกฺขาปทํ ทฺวาทสมํ. परिणामन शिक्षापद बारावे समाप्त। สมตฺโต วณฺณนากฺกเมน สหธมฺมิกวคฺโค อฏฺฐโม. स्पष्टीकरणाच्या क्रमाने आठवा सहधम्मिकवग्ग समाप्त। ๙. รตนวคฺโค ९. रतनवग्ग (रत्नवर्ग)। ๑. อนฺเตปุรสิกฺขาปทวณฺณนา १. अन्तेपुर शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (अन्तःपूर शिक्षापदवर्णना)। ๔๙๔. ราชวคฺคสฺส ปฐมสิกฺขาปเท – โอรโกติ ปริตฺตโก. อุปริปาสาทวรคโตติ ปาสาทวรสฺส อุปริคโต. อยฺยานํ วาหสาติ อยฺยานํ การณา; เตหิ ชานาปิตตฺตา ชานามีติ วุตฺตํ โหติ. ४९४. राजवग्गच्या पहिल्या शिक्षापदात – 'ओरको' म्हणजे लहान किंवा कनिष्ठ दर्जाचा. 'उपरिपासादवरगतो' म्हणजे श्रेष्ठ प्रासादाच्या (राजवाड्याच्या) वरच्या मजल्यावर गेलेला. 'अय्यानं वाहसा' म्हणजे आर्यांच्या (पूजनीय भिक्खूंच्या) कारणाने; त्यांनी मला कळविल्यामुळे मी जाणतो, असा याचा अर्थ आहे। ๔๙๗. ปิตรํ ปตฺเถตีติ อนฺตรํ ปสฺสิตฺวา ฆาเตตุํ อิจฺฉติ. ราชนฺเตปุรํ หตฺถิสมฺมทฺทนฺติอาทีสุ หตฺถีหิ สมฺมทฺโท เอตฺถาติ หตฺถิสมฺมทฺทํ; หตฺถิสมฺพาธนฺติ อตฺโถ. อสฺสรถสมฺมทฺทปเทปิ เอเสว นโย. ‘‘สมฺมตฺต’’นฺติ เกจิ ปฐนฺติ, ตํ น คเหตพฺพํ. ‘‘รญฺโญ อนฺเตปุเร หตฺถิสมฺมทฺท’’นฺติปิ ปาโฐ, ตตฺถ หตฺถีนํ สมฺมทฺทํ หตฺถิสมฺมทฺทนฺติ อตฺโถ, รญฺโญ อนฺเตปุเร หตฺถิสมฺมทฺโท อตฺถีติ วุตฺตํ โหติ. เอส นโย เสสปเทสุปิ. รชนียานีติ ตสฺมึ อนฺเตปุเร เอทิสานิ รูปาทีนิ. ४९७. 'पितरं पत्थेती' म्हणजे संधी साधून (वडिलांना) मारण्याची इच्छा करतो. 'राजन्तेपुरं हत्थिसम्मदं' इत्यादी शब्दांमध्ये – जेथे हत्तींची गर्दी (मर्दन) असते ते 'हत्थिसम्मदं'; याचा अर्थ हत्तींमुळे अरुंद किंवा दाटीवाटीची जागा असा आहे. 'अस्सरथसम्मद' (घोडे व रथ यांची गर्दी) या पदांमध्येही हाच नियम आहे. काही जण 'सम्मत्तं' असा पाठ वाचतात, पण तो स्वीकारू नये. 'रञ्ञो अन्तेपुरे हत्थिसम्मदं' असाही पाठ आढळतो, तिथे हत्तींचे एकमेकांना धडकणे किंवा गर्दी असणे असा अर्थ आहे, म्हणजेच राजाच्या अंतःपुरात हत्तींची गर्दी असते, असा याचा अर्थ आहे. हाच नियम उर्वरित पदांनाही लागू होतो. 'रजनीयानि' म्हणजे त्या अंतःपुरात अशी राग उत्पन्न करणारी (आकर्षक) रूपे इत्यादी असतात। ๔๙๘. มุทฺธาวสิตฺตสฺสาติ มุทฺธนิ อวสิตฺตสฺส. อนิกฺขนฺโต ราชา อิโตติ อนิกฺขนฺตราชกํ, ตสฺมึ อนิกฺขนฺตราชเก; สยนิฆเรติ อตฺโถ. รตนํ วุจฺจติ มเหสี, นิคฺคตนฺติ นิกฺขนฺตํ, อนิคฺคตํ รตนํ อิโตติ อนิคฺคตรตนกํ, ตสฺมึ อนิคฺคตรตนเก; สยนิฆเรติ อตฺโถ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ४९८. 'मुद्धावसित्तस्स' म्हणजे ज्याच्या मस्तकावर राज्याभिषेकाचे जल शिंपडले आहे असा (अभिषिक्त राजा). 'अनिक्खन्तो राजा इतो' (ज्यातून राजा अजून बाहेर पडलेला नाही) म्हणून ते 'अनिक्खन्तराजकं' (राजाने न सोडलेले); याचा अर्थ 'त्या शयनगृहात' असा आहे. 'रतनं' म्हणजे पट्टराणी (महेसी) होय. 'निग्गतं' म्हणजे बाहेर पडलेली; 'अनिग्गतं रतनं इतो' (ज्यातून राणीरत्न अजून बाहेर पडलेले नाही) म्हणून ते 'अनिग्गतरतनकं'; याचा अर्थ 'त्या शयनगृहात' असा आहे. उर्वरित भाग येथे स्पष्टच आहे। กถินสมุฏฺฐานํ – กายวาจโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยากิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. कठिनसमुत्थान (कठिन-संबंधित नियमांचे समुत्थान) हे काय-वाचा आणि काय-वाचा-चित्त यांपासून उत्पन्न होते. हे क्रिया-अक्रिया, नोसञ्ञाविमोक्ख (संज्ञाविमोक्ष नसलेले), अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तिवद्य), कायकम्म, वचीकम्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदनायुक्त आहे। อนฺเตปุรสิกฺขาปทํ ปฐมํ. अन्तेपुर शिक्षापद पहिले समाप्त। ๒. รตนสิกฺขาปทวณฺณนา २. रतन शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (रत्न शिक्षापदवर्णना)। ๕๐๒-๓. ทุติเย [Pg.152] – วิสฺสริตฺวาติ ปมุสฺสิตฺวา. ปุณฺณปตฺตํ นาม สตโต ปญฺจ กหาปณา. กฺยาหํ กริสฺสามีติ กึ อหํ กริสฺสามิ. อาภรณํ โอมุญฺจิตฺวาติ มหาลตํ นาม นวโกฏิอคฺฆนกํ อลงฺการํ อปเนตฺวา. ५०२-३. दुसऱ्या शिक्षापदात – 'विस्सरित्वा' म्हणजे विसरून (स्मृती गमावून). 'पुण्णपत्त' म्हणजे शंभर कशापणांपैकी पाच कहापण. 'क्याहं करिस्सामि' म्हणजे 'मी काय करू?'. 'आभरणं ओमुञ्चित्वा' म्हणजे 'महालता' नावाचा नऊ कोटी मूल्य असलेला अलंकार काढून ठेवून। ๕๐๔. อนฺเตวาสีติ ปริจารโก. ५०४. 'अन्तेवासी' म्हणजे सेवक किंवा परिचारक। ๕๐๖. อปริกฺขิตฺตสฺส อุปจาโรติ เอตฺถ อุปจาโร นาม อารามสฺส ทฺเว เลฑฺฑุปาตา – ‘‘อาวสถสฺส ปน สุปฺปปาโต วา มุสลปาโต วา’’ติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. อุคฺคณฺหาติ อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสาติ เอตฺถ ชาตรูปรชตํ อตฺตโน อตฺถาย อุคฺคณฺหนฺตสฺส วา อุคฺคณฺหาเปนฺตสฺส วา นิสฺสคฺคิยํ ปาจิตฺติยํ, สงฺฆคณปุคฺคลเจติยนวกมฺมานํ อตฺถาย ทุกฺกฏํ, อวเสสํ มุตฺตาทิรตนํ อตฺตโน วา สงฺฆาทีนํ วา อตฺถาย อุคฺคณฺหนฺตสฺส วา อุคฺคณฺหาเปนฺตสฺส วา ทุกฺกฏํ. กปฺปิยวตฺถุ วา อกปฺปิยวตฺถุ วา โหตุ, อนฺตมโส มาตุ กณฺณปิฬนฺธนตาฬปณฺณมฺปิ คิหิสนฺตกํ ภณฺฑาคาริกสีเสน ปฏิสาเมนฺตสฺส ปาจิตฺติยเมว. ५०६. 'अपरीक्खित्तस्स उपचारो' (कुंपण नसलेल्या जागेचा परिसर) यामध्ये 'उपचार' म्हणजे आरामाच्या (विहाराच्या) बाहेर दोन ढेकूळफेकीचे अंतर (दोन लेड्डुपात). 'घराच्या (आवासथ) बाबतीत मात्र सुप्पपात (सूप पडण्याचे अंतर) किंवा मुसलपात (मुसळ पडण्याचे अंतर) होय' असे महापंचरीमध्ये म्हटले आहे. 'उग्गण्हाति आपत्ति पाचित्तियस्स' यामध्ये – स्वतःच्या उपयोगासाठी सोने-चांदी स्वतः उचलणाऱ्या किंवा दुसऱ्याकडून उचलवून घेणाऱ्या भिक्खूला 'निसग्गिय पाचित्तिय' होते; संघ, गण, पुद्गल, चेतिय (चैत्य) किंवा नवकम्मासाठी (नवीन बांधकामासाठी) उचलल्यास 'दुक्कट' (दुष्कृत) होते. सोने-चांदी व्यतिरिक्त इतर मोती इत्यादी रत्ने स्वतःसाठी किंवा संघासाठी उचलल्यास किंवा उचलवून घेतल्यास 'दुक्कट' होते. ती वस्तू कप्पिय (योग्य) असो वा अकप्पिय (अयोग्य) असो, अगदी आईचे कानात घालायचे ताडपत्राचे दागिने असले तरी, गृहस्थांच्या मालकीची वस्तू भांडारपाल (भांडागारिक) म्हणून सुरक्षित ठेवणाऱ्या भिक्खूला 'पाचित्तिय'च होते। สเจ ปน มาตาปิตูนํ สนฺตกํ อวสฺสํ ปฏิสาเมตพฺพํ กปฺปิยภณฺฑํ โหติ, อตฺตโน อตฺถาย คเหตฺวา ปฏิสาเมตพฺพํ. ‘‘อิทํ ปฏิสาเมตฺวา เทหี’’ติ วุตฺเต ปน ‘‘น วฏฺฏตี’’ติ ปฏิกฺขิปิตพฺพํ. สเจ ‘‘ปฏิสาเมหี’’ติ ปาเตตฺวา คจฺฉนฺติ, ปลิโพโธ นาม โหติ, ปฏิสาเมตุํ วฏฺฏติ. วิหาเร กมฺมํ กโรนฺตา วฑฺฒกีอาทโย วา ราชวลฺลภา วา อตฺตโน อุปกรณภณฺฑํ วา สยนภณฺฑํ วา ‘‘ปฏิสาเมตฺวา เทถา’’ติ วทนฺติ, ฉนฺเทนปิ ภเยนปิ น กาตพฺพเมว, คุตฺตฏฺฐานํ ปน ทสฺเสตุํ วฏฺฏติ. พลกฺกาเรน ปาเตตฺวา คเตสุ จ ปฏิสาเมตุํ วฏฺฏติ. परंतु, जर आई-वडिलांची मालमत्ता ही नक्कीच सुरक्षित ठेवण्याजोगी कप्पिय (योग्य) वस्तू असेल, तर ती स्वतःच्या मालकीची समजून घेऊन सुरक्षित ठेवावी. पण जर त्यांनी 'हे सुरक्षित ठेवून द्या' असे म्हटले, तर 'हे मला योग्य नाही' असे म्हणून नकार द्यावा. जर त्यांनी 'सुरक्षित ठेवा' असे म्हणून ती वस्तू तिथेच टाकून दिली आणि निघून गेले, तर ती एक जबाबदारी (पलिबोध) बनते, त्यामुळे ती सुरक्षित ठेवणे योग्य ठरते. विहारात काम करणारे सुतार (वड्ढकी) इत्यादी किंवा राजाचे जवळचे लोक जर स्वतःची अवजारे किंवा बिछाना इत्यादी वस्तू 'सुरक्षित ठेवून द्या' असे सांगत असतील, तर प्रेमापोटी किंवा भीतीपोटी तसे करू नये. परंतु, त्यांना सुरक्षित जागा दाखवून देणे योग्य आहे. जर त्यांनी बळजबरीने ती वस्तू तिथेच टाकून दिली आणि निघून गेले, तर ती सुरक्षित ठेवणे योग्य ठरते। อชฺฌาราเม วา อชฺฌาวสเถ วาติ เอตฺถ สเจ มหาวิหารสทิโส มหาราโม โหติ, ตตฺถ ปาการปริกฺขิตฺเต ปริเวเณ ยตฺถ ภิกฺขูหิ วา สามเณเรหิ วา คหิตํ ภวิสฺสตีติ สงฺกา อุปฺปชฺชติ, ตาทิเส เอว ฐาเน อุคฺคณฺหิตฺวา วา อุคฺคณฺหาเปตฺวา วา ฐเปตพฺพํ. มหาโพธิทฺวารโกฏฺฐกอมฺพงฺคณสทิเสสุ ปน มหาชนสญฺจรณฏฺฐาเนสุ น คเหตพฺพํ, ปลิโพโธ น โหติ. กุรุนฺทิยํ ปน วุตฺตํ ‘‘เอโก มคฺคํ คจฺฉนฺโต นิมนุสฺสฏฺฐาเน กิญฺจิ ภณฺฑํ ปสฺสติ, อากิณฺณมนุสฺเสปิ ชาเต มนุสฺสา ตเมว [Pg.153] ภิกฺขุํ อาสงฺกนฺติ, ตสฺมา มคฺคา โอกฺกมฺม นิสีทิตพฺพํ. สามิเกสุ อาคเตสุ ตํ อาจิกฺขิตพฺพํ. สเจ สามิเก น ปสฺสติ ปติรูปํ กริสฺสตี’’ติ. ‘अज्झारामे वा अज्झावसथे वा’ (आरामात किंवा वस्तीत) यामध्ये जर महाविहारासारखा मोठा आराम (विहार) असेल, तर तेथे तटबंदीने वेढलेल्या प्रांगणात (परिवेणात) जेथे भिक्खू किंवा सामणेरांनी ते घेतले असेल अशी शंका निर्माण होते, अशाच ठिकाणी ते स्वतः उचलून किंवा दुसऱ्याकडून उचलवून ठेवावे. परंतु महाबोधीचे द्वार, मंडप किंवा अंगण यांसारख्या लोकांची वर्दळ असलेल्या ठिकाणी ते उचलून घेऊ नये, कारण तेथे अडथळा (पलिबोध) नसतो. कुरुन्दी अट्टकथेत म्हटले आहे की— ‘एक भिक्खू मार्गाने जात असताना निर्जन ठिकाणी एखादी वस्तू पाहतो. नंतर तेथे लोकांची गर्दी झाली तरी लोक त्याच भिक्खूवर संशय घेतात. म्हणून मार्गावरून बाजूला होऊन बसावे. मालक आल्यावर त्यांना ती वस्तू दाखवावी. जर मालक दिसला नाही, तर योग्य वाटेल ते करावे.’ รูเปน วา นิมิตฺเตน วา สญฺญาณํ กตฺวาติ เอตฺถ รูปํ นาม อนฺโตภณฺฑิกาย ภณฺฑํ; ตสฺมา ภณฺฑิกํ มุญฺจิตฺวา คเณตฺวา เอตฺตกา กหาปณา วา ชาตรูปรชตํ วาติ สลฺลกฺเขตพฺพํ. นิมิตฺตนฺติ ลญฺฉนาทิ; ตสฺมา ลญฺฉิตาย ภณฺฑิกาย มตฺติกาลญฺฉนนฺติ วา ลาขาลญฺฉนนฺติ วา นีลปิโลติกาย ภณฺฑิกา กตาติ วา เสตปิโลติกาย กตาติ วา เอวมาทิ สพฺพํ สลฺลกฺเขตพฺพํ. ‘रूपाने किंवा चिन्हाने खूण करून’ यामध्ये ‘रूप’ म्हणजे गाठोड्याच्या आतील वस्तू; म्हणून गाठोडे सोडून, मोजून, ‘एवढे कहापण किंवा एवढे सोने-चांदी आहे’ अशी नोंद ठेवावी. ‘निमित्त’ म्हणजे मुद्रा (सील) इत्यादी; म्हणून सील केलेल्या गाठोड्यावर मातीचे सील आहे की लाखेचे सील आहे, किंवा निळ्या कापडाने गाठोडे बांधले आहे की पांढऱ्या कापडाने बांधले आहे, इत्यादी सर्व गोष्टींची नोंद ठेवावी. ภิกฺขู ปติรูปาติ ลชฺชิโน กุกฺกุจฺจกา. โลลชาติกานญฺหิ หตฺเถ ฐเปตุํ น ลภติ. โย ปน เนว ตมฺหา อาวาสา ปกฺกมติ, น สามิเก ปสฺสติ, เตนาปิ อตฺตโน จีวราทิมูลํ น กาตพฺพํ; ถาวรํ ปน เสนาสนํ วา เจติยํ วา โปกฺขรณี วา กาเรตพฺพา. สเจ ทีฆสฺส อทฺธุโน อจฺจเยน สามิโก อาคจฺฉติ, ‘‘อุปาสก ตว สนฺตเกน อิทํ นาม กตํ, อนุโมทาหี’’ติ วตฺตพฺโพ. สเจ อนุโมทติ, อิจฺเจตํ กุสลํ; โน เจ อนุโมทติ, ‘‘มม ธนํ เทถา’’ติ โจเทติเยว, อญฺญํ สมาทเปตฺวา ทาตพฺพํ. ‘योग्य भिक्खू’ म्हणजे लज्जा बाळगणारे आणि संकोच करणारे (कुकुच्चक) भिक्खू. कारण चंचल स्वभावाच्या भिक्खूंच्या हातात ते सोपवता येत नाही. जो भिक्खू त्या आवसातून बाहेर जात नाही आणि मालकालाही पाहत नाही, त्यानेही त्या पैशातून स्वतःसाठी चीवर इत्यादींचे मूल्य करू नये; तर त्याऐवजी स्थायी सेनासन, चेतिय (स्तूपासारखे) किंवा पोखरण (तलाव) बांधावे. जर दीर्घ काळानंतर मालक आला, तर त्याला म्हणावे— ‘उपासका, तुझ्या या धनाने हे अमुक कार्य केले आहे, याचे अनुमोदन कर.’ जर त्याने अनुमोदन केले, तर ते उत्तम आहे; जर त्याने अनुमोदन केले नाही आणि ‘माझे धन मला परत द्या’ अशी मागणी केली, तर दुसऱ्या कोणाकडून दान मिळवून ते त्याला परत द्यावे. ๕๐๗. รตนสมฺมตํ วิสฺสาสํ คณฺหาตีติอาทีสุ อามาสเมว สนฺธาย วุตฺตํ. อนามาสํ น วฏฺฏติเยว. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ฉสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ५०७. ‘रत्न मानून विश्वासाने घेणे’ इत्यादींमध्ये स्पर्श करण्यास योग्य (आमास) असलेल्या वस्तूंच्या संदर्भातच हे म्हटले आहे. स्पर्श करण्यास अयोग्य (अनामास) वस्तू विश्वासाने घेणे मुळीच योग्य नाही. उर्वरित भाग येथे स्पष्टच आहे. सहा समुत्थान— क्रिया, नोसञ्ञाविमोक्ख, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज, कायकम्म, वचीकम्म, तिचित्त, तिवेदन. รตนสิกฺขาปทํ ทุติยํ. रत्नसिक्खापद दुसरे समाप्त. ๓. วิกาลคามปฺปวิสนสิกฺขาปทวณฺณนา ३. विकालगामप्पविसन सिक्खापद वर्णन ๕๐๘. ตติเย – ติรจฺฉานกถนฺติ อริยมคฺคสฺส ติรจฺฉานภูตํ กถํ. ราชกถนฺติ ราชปฏิสํยุตฺต กถํ. โจรกถาทีสุปิ เอเสว นโย. ५०८. तिसऱ्यामध्ये— ‘तिरच्छानकथा’ म्हणजे आर्यमार्गाच्या आड येणारी (विरुद्ध असलेली) चर्चा. ‘राजकथा’ म्हणजे राजाशी संबंधित चर्चा. चोरकथा इत्यादींमध्येही हाच नियम लागू होतो. ๕๑๒. สนฺตํ ภิกฺขุนฺติ เอตฺถ ยํ วตฺตพฺพํ, ตํ จาริตฺตสิกฺขาปเท วุตฺตเมว. สเจ สมฺพหุลา เกนจิ กมฺเมน คามํ ปวิสนฺติ, ‘‘วิกาเล คามปฺปเวสนํ อาปุจฺฉามี’’ติ [Pg.154] สพฺเพหิ อญฺญมญฺญํ อาปุจฺฉิตพฺพํ. ตสฺมึ คาเม ตํ กมฺมํ น สมฺปชฺชตีติ อญฺญํ คามํ คจฺฉนฺติ, คามสตมฺปิ โหตุ, ปุน อาปุจฺฉนกิจฺจํ นตฺถิ. สเจ ปน อุสฺสาหํ ปฏิปฺปสฺสมฺเภตฺวา วิหารํ คจฺฉนฺตา อนฺตรา อญฺญํ คามํ ปวิสิตุกามา โหนฺติ, ปุน อาปุจฺฉิตพฺพเมว. ५१२. ‘संतं भिक्खुं’ (विद्यमान भिक्खू) याविषयी जे सांगायचे आहे, ते चारित्तसिक्खापदात सांगितलेच आहे. जर अनेक भिक्खू काही कामानिमित्त गावात प्रवेश करत असतील, तर ‘मी अकाली गावात प्रवेश करण्याची परवानगी मागतो’ असे सर्वांनी एकमेकांना विचारले पाहिजे. जर त्या गावात ते काम पूर्ण झाले नाही आणि ते दुसऱ्या गावात गेले, तर शंभर गावे असली तरी पुन्हा परवानगी मागण्याची गरज नाही. परंतु जर त्यांनी जाण्याचा विचार सोडून विहाराकडे जात असताना वाटेत दुसऱ्या गावात प्रवेश करण्याची इच्छा केली, तर पुन्हा परवानगी मागितलीच पाहिजे. กุลฆเร วา อาสนสาลาย วา ภตฺตกิจฺจํ กตฺวา เตลภิกฺขาย วา สปฺปิภิกฺขาย วา จริตุกาโม โหติ, สเจ ปสฺเส ภิกฺขุ อตฺถิ, อาปุจฺฉิตฺวา คนฺตพฺพํ. อสนฺเต นตฺถีติ คนฺตพฺพํ. วีถึ โอตริตฺวา ภิกฺขุํ ปสฺสติ, อาปุจฺฉนกิจฺจํ นตฺถิ, อนาปุจฺฉิตฺวาปิ จริตพฺพเมว. คามมชฺเฌน มคฺโค โหติ, เตน คจฺฉนฺตสฺส เตลาทิภิกฺขาย จริสฺสามีติ จิตฺเต อุปฺปนฺเน สเจ ปสฺเส ภิกฺขุ อตฺถิ, อาปุจฺฉิตฺวา จริตพฺพํ. มคฺคา อโนกฺกมฺม ภิกฺขาย จรนฺตสฺส ปน อาปุจฺฉนกิจฺจํ นตฺถิ, อปริกฺขิตฺตสฺส คามสฺส อุปจาโร อทินฺนาทาเน วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. कुळघरात (गृहस्थाच्या घरी) किंवा आसनशाळेत भोजन करून जर तेलाच्या भिक्षेसाठी किंवा तुपाच्या भिक्षेसाठी फिरण्याची इच्छा असेल, आणि शेजारी भिक्खू असेल, तर त्याला विचारून जावे. भिक्खू नसल्यास ‘कोणी नाही’ असा विचार करून जावे. रस्त्यावर उतरल्यावर जर भिक्खू दिसला, तर विचारण्याची गरज नाही, न विचारताही भिक्षेसाठी फिरता येते. गावाच्या मध्यातून रस्ता असेल आणि त्यावरून जात असताना ‘मी तेल इत्यादींच्या भिक्षेसाठी फिरेन’ असा विचार मनात आल्यास, जर शेजारी भिक्खू असेल, तर त्याला विचारून फिरावे. परंतु मार्गावरून बाजूला न जाता भिक्षेसाठी फिरणाऱ्याला विचारण्याची गरज नाही. कुंपण नसलेल्या गावाच्या उपचाराविषयी (परिसराविषयी) अदिन्नादान सिक्खापदात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावे. ๕๑๕. อนฺตรารามนฺติอาทีสุ น เกวลํ อนาปุจฺฉา กายพนฺธนํ อพนฺธิตฺวา สงฺฆาฏึ อปารุปิตฺวา คจฺฉนฺตสฺสปิ อนาปตฺติ. อาปทาสูติ สีโห วา พฺยคฺโฆ วา อาคจฺฉติ, เมโฆ วา อุฏฺเฐติ, อญฺโญ วา โกจิ อุปทฺทโว อุปฺปชฺชติ, อนาปตฺติ. เอวรูปาสุ อาปทาสุ พหิคามโต อนฺโตคามํ ปวิสิตุํ วฏฺฏติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ५१५. ‘अंतराआराम’ इत्यादींमध्ये केवळ न विचारता जाणेच नव्हे, तर कायबंधन (कमरपट्टा) न बांधता आणि संघात (वरचे वस्त्र) न पांघरता जाणाऱ्या भिक्खूलाही आपत्ती येत नाही. ‘आपत्तीच्या वेळी’ म्हणजे सिंह किंवा वाघ आला असेल, पाऊस येत असेल किंवा इतर कोणतीही अडचण निर्माण झाली असेल, तर आपत्ती येत नाही. अशा प्रकारच्या आपत्तींमध्ये गावाबाहेरून गावात प्रवेश करणे योग्य आहे. उर्वरित भाग येथे स्पष्टच आहे. กถินสมุฏฺฐานํ – กายวาจโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยากิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. कठिनसमुत्थान— काय-वाचेने आणि काय-वाचा-चित्ताने उत्पन्न होते; क्रिया-अक्रिया, नोसञ्ञाविमोक्ख, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज, कायकम्म, वचीकम्म, तिचित्त, तिवेदन. วิกาลคามปฺปวิสนสิกฺขาปทํ ตติยํ. विकालगामप्पविसन सिक्खापद तिसरे समाप्त. ๔. สูจิฆรสิกฺขาปทวณฺณนา ४. सूचिघर सिक्खापद वर्णन ๕๑๗-๒๐. จตุตฺเถ – เภทนเมว เภทนกํ; ตํ อสฺส อตฺถีติ เภทนกเมว. อรณิเกติ อรณิธนุเก. วิเธติ เวธเก. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ฉสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ५१७-२०. चौथ्यामध्ये— तोडणे हेच भेदक आहे; ते ज्याला आहे ते भेदकच. ‘अरणि’ म्हणजे अरणिधनुष्य (मंथन काष्ठ). ‘विध’ म्हणजे वेधक (छिद्र पाडणारे साधन). उर्वरित भाग येथे स्पष्टच आहे. सहा समुत्थान— क्रिया, नोसञ्ञाविमोक्ख, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज, कायकम्म, वचीकम्म, तिचित्त, तिवेदन. สูจิฆรสิกฺขาปทํ จตุตฺถํ. सूचिघर सिक्खापद चौथे समाप्त. ๕. มญฺจสิกฺขาปทวณฺณนา ५. मञ्च सिक्खापद वर्णन ๕๒๒. ปญฺจเม [Pg.155] – เฉทนกํ วุตฺตนยเมว. ५२२. पाचव्यामध्ये— छेदक (कापणे) हे आधी सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहे. ๕๒๕. ฉินฺทิตฺวา ปริภุญฺชตีติ เอตฺถ สเจ น ฉินฺทิตุกาโม โหติ, ภูมิยํ นิขณิตฺวา ปมาณํ อุปริ ทสฺเสติ, อุตฺตานํ วา กตฺวา ปริภุญฺชติ, อุกฺขิปิตฺวา วา ตุลาสงฺฆาเฏ ฐเปตฺวา อฏฺฏํ กตฺวา ปริภุญฺชติ, สพฺพํ วฏฺฏติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ฉสมุฏฺฐานํ. ५२५. ‘कापून वापरणे’ यामध्ये जर कापण्याची इच्छा नसेल, तर जमिनीत पुरून (आठ बोटांचे) प्रमाण वर दाखवावे, किंवा उताणे करून वापरावे, किंवा वर उचलून, तुळईवर ठेवून, माळा करून वापरावे; हे सर्व करणे योग्य आहे. उर्वरित भाग येथे स्पष्टच आहे. सहा समुत्थान. มญฺจสิกฺขาปทํ ปญฺจมํ. मञ्च सिक्खापद पाचवे समाप्त. ๖. ตูโลนทฺธสิกฺขาปทวณฺณนา ६. तूलोनद्ध सिक्खापद वर्णन ๕๒๖. ฉฏฺเฐ – ตูลํ โอนทฺธเมตฺถาติ ตูโลนทฺธํ; ตูลํ ปกฺขิปิตฺวา อุปริ จิมิลิกาย โอนทฺธนฺติ วุตฺตํ โหติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ฉสมุฏฺฐานํ. ५२६. सहाव्यामध्ये— ज्यामध्ये कापूस भरला आहे ते ‘तूलोनद्ध’ (कापूस भरलेले); कापूस भरून वरून जाड्या कापडाने शिवलेले, असा याचा अर्थ आहे. उर्वरित भाग येथे स्पष्टच आहे. सहा समुत्थान. ตูโลนทฺธสิกฺขาปทํ ฉฏฺฐํ. तूलोनद्ध सिक्खापद सहावे समाप्त. ๗. นิสีทนสิกฺขาปทวณฺณนา ७. निसीदन सिक्खापद वर्णन ๕๓๑-๔. สตฺตเม – นิสีทนํ อนุญฺญาตํ โหตีติ กตฺถ อนุญฺญาตํ? จีวรกฺขนฺธเก ปณีตโภชนวตฺถุสฺมึ. วุตฺตญฺหิ ตตฺถ – ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, กายคุตฺติยา จีวรคุตฺติยา เสนาสนคุตฺติยา นิสีทน’’นฺติ (มหาว. ๓๕๓). เสยฺยถาปิ ปุราณาสิโกฏฺโฐติ ยถา นาม ปุราณจมฺมกาโรติ อตฺโถ. ยถา หิ จมฺมกาโร จมฺมํ วิตฺถตํ กริสฺสามีติ อิโต จิโต จ สมญฺฉติ, กฑฺฒติ; เอวํ โสปิ ตํ นิสีทนํ. เตน ตํ ภควา เอวมาห – ‘‘นิสีทนํ นาม สทสํ วุจฺจตี’’ติ สนฺถตสทิสํ สนฺถริตฺวา เอกสฺมึ อนฺเต สุคตวิทตฺถิยา วิทตฺถิมตฺเต ปเทเส ทฺวีสุ ฐาเนสุ ผาเลตฺวา ติสฺโส ทสา กริยนฺติ, ตาหิ ทสาหิ สทสํ นาม วุจฺจติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ฉสมุฏฺฐานํ. ५३१-४. सातव्या (शिक्षापदामध्ये) – 'निसीदन (बैठकीचे आसन) अनुमत केले आहे' हे कोठे अनुमत केले आहे? चीवरक्खन्धकामध्ये, प्रणीतभोजनवस्तूमध्ये. तेथे म्हटलेच आहे – "भिक्खूहो, शरीराच्या रक्षणासाठी, चीवराच्या रक्षणासाठी आणि शयनासनाच्या (विहाराच्या) रक्षणासाठी मी निसीदनाची (बैठकीच्या आसनाची) अनुमती देतो." 'सेय्यथापि पुराणासिकोट्ठो' म्हणजे ज्याप्रमाणे जुना चर्मकार (चांभार) असा अर्थ आहे. ज्याप्रमाणे चर्मकार चामडे पसरवण्यासाठी (मोठे करण्यासाठी) इकडून तिकडून ओढतो, ताणतो; त्याचप्रमाणे त्यानेही (उदायीने) त्या निसीदनाला (ओढले). म्हणून भगवंतांनी त्याला असे म्हटले – "निसीदन सदास (झालरीसह/किनाऱ्यासह) म्हटले जाते" म्हणजे संथतासारखे (आस्तरासारखे) पसरवून एका टोकाला सुगत-वितस्तीच्या (भगवंतांच्या वितीच्या) प्रमाणात दोन ठिकाणी फाडून तीन दशा (झालरी/किनाऱ्या) केल्या जातात, त्या दशांमुळे त्याला 'सदास' (झालरीसह) म्हटले जाते. उर्वरित भाग येथे स्पष्टच आहे. सहा समुत्थान (उत्पत्तीचे मार्ग) आहेत. นิสีทนสิกฺขาปทํ สตฺตมํ. सातवे निसीदनसिक्खापद समाप्त. ๘. กณฺฑุปฏิจฺฉาทิสิกฺขาปทวณฺณนา ८. कण्डुपटिच्छादि-सिक्खापद-वण्णना (खाज खाजविण्याच्या वस्त्राच्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण). ๕๓๗. อฏฺฐเม [Pg.156] – กณฺฑุปฏิจฺฉาทิ อนุญฺญาตา โหตีติ กตฺถ อนุญฺญาตา? จีวรกฺขนฺธเก เพลฏฺฐสีสวตฺถุสฺมึ. วุตฺตญฺหิ ตตฺถ – ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, ยสฺส กณฺฑุ วา ปิฬกา วา อสฺสาโว วา ถุลฺลกจฺฉุ วา อาพาโธ ตสฺส กณฺฑุปฏิจฺฉาทิ’’นฺติ (มหาว. ๓๕๔). ५३७. आठव्या (शिक्षापदामध्ये) – 'कण्डुपटिच्छादि (खाजेचे वस्त्र) अनुमत केले आहे' हे कोठे अनुमत केले आहे? चीवरक्खन्धकामध्ये, बेलट्ठसीसवस्तूमध्ये. तेथे म्हटलेच आहे – "भिक्खूहो, ज्याला खाज, किंवा पुरळ, किंवा स्राव (वाहणारी जखम), किंवा मोठी खाज (वैल) हा आजार असेल, त्याला मी कण्डुपटिच्छादि (खाजेचे वस्त्र) अनुमत करतो." ๕๓๙. ยสฺส อโธนาภิ อุพฺภชาณุมณฺฑลนฺติ ยสฺส ภิกฺขุโน นาภิยา เหฏฺฐา ชาณุมณฺฑลานํ อุปริ. กณฺฑูติ กจฺฉุ. ปิฬกาติ โลหิตตุณฺฑิกา สุขุมปิฬกา. อสฺสาโวติ อริสภคนฺทรมธุเมหาทีนํ วเสน อสุจิปคฺฆรณกํ. ถุลฺลกจฺฉุ วา อาพาโธติ มหาปิฬกาพาโธ วุจฺจติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ฉสมุฏฺฐานํ. ५३९. 'ज्याला नाभीच्या खाली आणि गुडघ्यांच्या वर' म्हणजे ज्या भिक्खूच्या नाभीच्या खाली आणि गुडघ्यांच्या वर (आजार असेल). 'कण्डू' म्हणजे खाज. 'पिळका' म्हणजे टोकावर रक्त असलेली लहान पुरळ. 'अस्साव' म्हणजे मूळव्याध, भगंदर, मधुमेह इत्यादींमुळे अशुद्ध (स्त्राव) वाहणारी जखम. 'थुल्लकच्छु वा आबाध' म्हणजे मोठा पुरळ किंवा मोठी खाज असलेला आजार म्हटला जातो. उर्वरित भाग येथे स्पष्टच आहे. सहा समुत्थान आहेत. กณฺฑุปฏิจฺฉาทิสิกฺขาปทํ อฏฺฐมํ. आठवे कण्डुपटिच्छादिसिक्खापद समाप्त. ๙. วสฺสิกสาฏิกสิกฺขาปทวณฺณนา ९. वस्सिकासाटिक-सिक्खापद-वण्णना (वर्षावास-वस्त्राच्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण). ๕๔๒. นวเม – วสฺสิกสาฏิกา อนุญฺญาตา โหตีติ กตฺถ อนุญฺญาตา? จีวรกฺขนฺธเก วิสาขาวตฺถุสฺมึ. วุตฺตญฺหิ ตตฺถ – ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, วสฺสิกสาฏิก’’นฺติ (มหาว. ๓๕๒). เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ฉสมุฏฺฐานํ. ५४२. नवव्या (शिक्षापदामध्ये) – 'वस्सिकासाटिका (पावसाळी वस्त्र) अनुमत केली आहे' हे कोठे अनुमत केले आहे? चीवरक्खन्धकामध्ये, विशाखावस्तूमध्ये. तेथे म्हटलेच आहे – "भिक्खूहो, मी वस्सिकासाटिका (पावसाळी वस्त्र) अनुमत करतो." उर्वरित भाग येथे स्पष्टच आहे. सहा समुत्थान आहेत. วสฺสิกสาฏิกสิกฺขาปทํ นวมํ. नववे वस्सिकासाटिकसिक्खापद समाप्त. ๑๐. นนฺทตฺเถรสิกฺขาปทวณฺณนา १०. नन्दत्थेर-सिक्खापद-वण्णना (नंद स्थविराच्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण). ๕๔๗. ทสเม – จตุรงฺคุโลมโกติ จตูหิ องฺคุเลหิ อูนกปฺปมาโณ. เสสํ อุตฺตานเมว. ฉสมุฏฺฐานํ. ५४७. दहाव्या (शिक्षापदामध्ये) – 'चतुरङ्गुलमोक' म्हणजे चार बोटांनी कमी प्रमाणाचा. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. सहा समुत्थान आहेत. นนฺทตฺเถรสิกฺขาปทํ ทสมํ. दहावे नन्दसिक्खापद समाप्त. สมตฺโต วณฺณนากฺกเมน รตนวคฺโค นวโม. स्पष्टीकरणाच्या क्रमाने नववा रतनवग्ग (रत्नवर्ग) समाप्त झाला. อุทฺทิฏฺฐา โขติอาทิ วุตฺตนยเมวาติ. 'उद्दिठ्ठा खो' इत्यादी आधी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावे. สมนฺตปาสาทิกาย วินยสํวณฺณนาย समन्तपासादिका नावाच्या विनय-स्पष्टीकरणामध्ये (विनय-अट्ठकथेमध्ये), ขุทฺทกวณฺณนา สมตฺตา. खुद्दक-वण्णना (लहान शिक्षापदांचे स्पष्टीकरण) समाप्त झाली. ปาจิตฺติยกณฺฑํ นิฏฺฐิตํ. पाचित्तिय-काण्ड (पाचित्तिय खंड) समाप्त झाले. ๖. ปาฏิเทสนียกณฺฑํ ६. पाटिदेसनीय-काण्ड (पाटिदेसनीय खंड). ๑. ปฐมปาฏิเทสนียสิกฺขาปทวณฺณนา १. पहिले पाटिदेसनीय-सिक्खापद-वण्णना (पहिल्या पाटिदेसनीय शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण). ปาฏิเทสนียา [Pg.157] ธมฺมา, ขุทฺทกานํ อนนฺตรา; ฐปิตา เย อยํ ทานิ, เตสํ ภวติ วณฺณนา. खुद्दक (लहान शिक्षापदां) नंतर जे पाटिदेसनीय धर्म (नियम) संगीतिकारांनी ठेवले आहेत, आता त्यांचे हे स्पष्टीकरण होत आहे. ๕๕๒. ปฐมปาฏิเทสนีเย ตาว ปฏิกฺกมนกาเลติ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปฏิอาคมนกาเล. สพฺเพว อคฺคเหสีติ สพฺพเมว อคฺคเหสิ. ปเวเธนฺตีติ กมฺปมานา. อเปหีติ อปคจฺฉ. ५५२. पहिल्या पाटिदेसनीय शिक्षापदामध्ये प्रथम – 'पटिक्कमनकाले' म्हणजे पिंडाचारासाठी (भिक्षेसाठी) जाऊन परत येण्याच्या वेळी. 'सब्बेव अग्गहेसि' म्हणजे सर्वच (भोजन) घेतले. 'पवेधेन्ति' म्हणजे थरथर कापत. 'अपेहि' म्हणजे दूर जा. ๕๕๓-๕. คารยฺหํ อาวุโสติอาทิ ปฏิเทเสตพฺพาการทสฺสนํ. รถิกาติ รจฺฉา. พฺยูหนฺติ อนิพฺพิชฺฌิตฺวา ฐิตา คตปจฺจาคตรจฺฉา. สิงฺฆาฏกนฺติ จตุกฺโกณํ วา ติโกณํ วา มคฺคสโมธานฏฺฐานํ. ฆรนฺติ กุลฆรํ. เอเตสุ ยตฺถ กตฺถจิ ฐตฺวา คณฺหนฺตสฺส คหเณ ทุกฺกฏํ, อชฺโฌหาเร อชฺโฌหารคณนาย ปาฏิเทสนียํ. หตฺถิสาลาทีสุ คณฺหนฺตสฺสาปิ เอเสว นโย. ภิกฺขุนี รถิกาย ฐตฺวา เทติ, ภิกฺขุ สเจปิ อนฺตรารามาทีสุ ฐตฺวา คณฺหาติ, อาปตฺติเยว. ‘‘อนฺตรฆรํ ปวิฏฺฐายา’’ติ หิ วจนโต ภิกฺขุนิยา อนฺตรฆเร ฐตฺวา ททมานาย วเสเนตฺถ อาปตฺติ เวทิตพฺพา, ภิกฺขุสฺส ฐิตฏฺฐานํ ปน อปฺปมาณํ. ตสฺมา สเจปิ วีถิอาทีสุ ฐิโต ภิกฺขุ อนฺตรารามาทีสุ ฐตฺวา ททมานาย ภิกฺขุนิยา คณฺหาติ, อนาปตฺติเยว. ५५३-५. 'गारय्हं आवुसो' इत्यादी शब्द हे कशा प्रकारे दोष कबूल करावा (पाटिदेसेतब्ब) हे दर्शवणारे आहेत. 'रथिका' म्हणजे रस्ता (रथ मार्ग). 'ब्यूह' म्हणजे आरपार न जाता थांबलेला, येण्या-जाण्याचा रस्ता. 'सिङ्घाटक' म्हणजे चौकोनी किंवा त्रिकोणी रस्त्यांचा संगम असणारे ठिकाण (चौक किंवा तिठा). 'घर' म्हणजे कुळघर (क्षत्रिय इत्यादींचे घर). यांपैकी कोणत्याही ठिकाणी उभे राहून (भोजन) स्वीकारणाऱ्या भिक्खूला स्वीकारल्यामुळे दुक्कट (दुष्कृत) आपत्ती होते, आणि गिळल्यामुळे (खाल्ल्यामुळे) प्रत्येक घासाच्या गणनेनुसार पाटिदेसनीय आपत्ती होते. हत्तीशाळा इत्यादी ठिकाणी उभे राहून स्वीकारणाऱ्या भिक्खूच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. जर भिक्खुणी रस्त्यावर उभी राहून देते आणि भिक्खू अंतरामात (विहाराच्या आत) उभा राहून स्वीकारतो, तरीही आपत्तीच होते. कारण "अंतर्घरात प्रवेश केलेल्या" या वचनानुसार, भिक्खुणीने अंतर्घरात (गावाच्या आत) उभे राहून दिलेल्या दानाच्या संबंधात येथे आपत्ती समजावी, भिक्खूच्या उभे राहण्याचे स्थान महत्त्वाचे नाही. म्हणून, जर रस्त्यावर उभा असलेला भिक्खू अंतरामात (विहाराच्या आत) उभे राहून देणाऱ्या भिक्खुणीच्या हातातून स्वीकारतो, तर अनापत्तीच (दोष नाही) आहे. ยามกาลิกํ สตฺตาหกาลิกํ ยาวชีวิกํ อาหารตฺถาย ปฏิคฺคณฺหาติ, อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺส. อชฺโฌหาเร อชฺโฌหาเร อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ อิทํ อามิเสน อสมฺภินฺนํ สนฺธาย วุตฺตํ, สมฺภินฺเน ปน เอกรเส ปาฏิเทสนียเมว. เอกโต อุปสมฺปนฺนายาติ ภิกฺขุนีนํ สนฺติเก อุปสมฺปนฺนาย. ภิกฺขูนํ สนฺติเก อุปสมฺปนฺนาย ปน ยถาวตฺถุกเมว. जर यामकालिक, सताहकालिक किंवा यावजीविक अन्न खाण्यासाठी स्वीकारतो, तर दुक्कट आपत्ती होते. 'प्रत्येक घासागणिक दुक्कट आपत्ती होते' हे विना-मिश्रित (अन्नाशी न मिसळलेल्या) औषधादींच्या संदर्भात भगवंतांनी म्हटले आहे. परंतु जर ते अन्नाशी मिश्रित होऊन एकरस झाले असेल, तर पाटिदेसनीय आपत्तीच होते. 'एकतो उपसंपन्नाय' म्हणजे भिक्खुणींच्या संघात उपसंपदा प्राप्त झालेल्या भिक्खुणीच्या हातातून. परंतु भिक्खूंच्या संघात उपसंपदा प्राप्त झालेल्या भिक्खुणीच्या हातातून स्वीकारल्यास वस्तूच्या स्वरूपानुसारच (आपत्ती) होते. ๕๕๖. ทาเปติ น เทตีติ อญฺญาติกา อญฺเญน เกนจิ ทาเปติ ตํ คณฺหนฺตสฺส อนาปตฺติ. อุปนิกฺขิปิตฺวา เทตีติ ภูมิยํ ฐเปตฺวา ‘‘อิทํ อยฺย ตุมฺหากํ ทมฺมี’’ติ เทติ, เอวํ ทินฺนํ ‘‘สาธุ ภคินี’’ติ สมฺปฏิจฺฉิตฺวา ตาย เอว วา ภิกฺขุนิยา อญฺเญน วา เกนจิ ปฏิคฺคหาเปตฺวา ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. สิกฺขมานาย [Pg.158] สามเณริยาติ เอตาสํ ททมานานํ คณฺหนฺตสฺส อนาปตฺติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ५५६. 'दापेति न देति' म्हणजे नातेवाईक नसलेली भिक्खुणी स्वतः न देता दुसऱ्या कोणाकडून देववते, तर ते स्वीकारणाऱ्या भिक्खूला अनापत्ती आहे. 'उपनिक्खिपित्वा देति' म्हणजे जमिनीवर ठेवून "भंते, हे मी आपल्याला देत आहे" असे सांगून देते; अशा प्रकारे दिलेले अन्न "ठीक आहे, भगिनी" असे म्हणून स्वीकारून, त्याच भिक्खुणीकडून किंवा दुसऱ्या कोणाकडून ग्रहण करवून (पात्रामध्ये टाकून घेऊन) भोजन करणे योग्य आहे. 'सिक्खमानाय सामणेरिया' म्हणजे सिक्खमाना (शिक्षमाण) किंवा सामणेरी (श्रामणेरी) यांनी दिले असता ते स्वीकारल्यास अनापत्ती आहे. उर्वरित भाग येथे स्पष्टच आहे. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. एळकलोम-सिक्खापदाप्रमाणे याचे समुत्थान आहे – क्रिया, नोसञ्ञाविमोक्ख (संज्ञाविमोक्ष नसलेले), अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तिवद्य), कायकर्म, तिचित्त (तीन चित्त केलेले), आणि त्रिवेदना (तीन वेदना केलेले) असे आहे. ปฐมปาฏิเทสนียํ. पहिले पाटिदेसनीय सिक्खापद समाप्त. ๒. ทุติยปาฏิเทสนียสิกฺขาปทวณฺณนา २. दुसरे पाटिदेसनीय-सिक्खापद-वण्णना (दुसऱ्या पाटिदेसनीय शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण). ๕๕๘. ทุติเย – อปสกฺก ตาว ภคินีติอาทิ อปสาเทตพฺพาการทสฺสนํ. ५५८. दुसऱ्या (शिक्षापदामध्ये) – 'अपसक्क ताव भगिनी' (भगिनी, जरा बाजूला हो) इत्यादी शब्द कशा प्रकारे बाजूला करावे हे दर्शवणारे आहेत. ๕๖๑. อตฺตโน ภตฺตํ ทาเปติ น เทตีติ เอตฺถ สเจปิ อตฺตโน ภตฺตํ เทติ, อิมินา สิกฺขาปเทน อนาปตฺติเยว, ปุริมสิกฺขาปเทน อาปตฺติ. อญฺเญสํ ภตฺตํ เทติ น ทาเปตีติ เอตฺถ สเจปิ ทาเปยฺย, อิมินา สิกฺขาปเทน อาปตฺติ ภเวยฺย. เทนฺติยา ปน เนว อิมินา น ปุริเมน อาปตฺติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. กถินสมุฏฺฐานํ – กิริยากิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ५६१. 'स्वतःचे भोजन देववते, स्वतः देत नाही' यामध्ये जर ती स्वतःचे भोजन देते, तर या शिक्षापदानुसार अनापत्तीच आहे, परंतु पूर्व शिक्षापदानुसार आपत्ती होते. 'दुसऱ्यांचे भोजन देते, देववत नाही' यामध्ये जर ती देववते, तर या शिक्षापदानुसार आपत्ती होईल. परंतु स्वतः देणाऱ्या भिक्खुणीला या शिक्षापदाने किंवा पूर्व शिक्षापदाने कोणतीही आपत्ती होत नाही. उर्वरित भाग येथे स्पष्टच आहे. कठीण-समुत्थान आहे – क्रिया-अक्रिया, नोसञ्ञाविमोक्ख, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, तिचित्त, आणि त्रिवेदना असे आहे. ทุติยปาฏิเทสนียํ. दुसरे पाटिदेसनीय सिक्खापद समाप्त. ๓. ตติยปาฏิเทสนียสิกฺขาปทวณฺณนา ३. तिसरे पाटिदेसनीय-सिक्खापद-वण्णना (तिसऱ्या पाटिदेसनीय शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण). ๕๖๒. ตติเย – อุภโตปสนฺนนฺติ ทฺวีหิ ปสนฺนํ อุปาสเกนปิ อุปาสิกายปิ. ตสฺมึ กิร กุเล อุโภปิ เต โสตาปนฺนาเยว. โภเคน หายตีติ เอทิสญฺหิ กุลํ สเจปิ อสีติโกฏิธนํ โหติ, โภเคหิ หายติเยว. กสฺมา? ยสฺมา ตตฺถ เนว อุปาสิกา น อุปาสโก โภเค รกฺขติ. ५६२. तिसऱ्या (शिक्षापदामध्ये) – 'उभतोपसन्न' म्हणजे दोघांकडूनही प्रसन्न (श्रद्धावान) असलेले – उपासकाकडूनही आणि उपासिकेकडूनही. त्या कुळामध्ये ते दोघेही (पती-पत्नी) सोतापन्न (श्रोतापन्न) होते. 'भोगेने हायति' (भोगाने क्षीण होते) म्हणजे अशा प्रकारचे कुळ जरी ऐंशी कोटी धनाचे मालक असले, तरी ते भोगांनी (संपत्तीने) क्षीण होतेच. का? कारण तेथे उपासिका किंवा उपासक कोणीही संपत्तीचे रक्षण करत नाही. ๕๖๙. ฆรโต นีหริตฺวา เทนฺตีติ อาสนสาลํ วา วิหารํ วา อาเนตฺวา เทนฺติ. สเจปิ อนาคเต ภิกฺขุมฺหิ ปฐมํเยว นีหริตฺวา ทฺวาเร ฐเปตฺวา ปจฺฉา สมฺปตฺตสฺส เทนฺติ, วฏฺฏติ. ภิกฺขุํ ปน ทิสฺวา อนฺโตเคหโต นีหริตฺวา ทิยฺยมานํ น วฏฺฏตีติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว[Pg.159]. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ५६९. घरातून बाहेर काढून देतात म्हणजे आसनशाळेत (भोजनशाळेत) किंवा विहारात आणून देतात. जरी भिक्खू आलेला नसताना आधीच (घरातून अन्न) बाहेर काढून, दारापाशी ठेवून, नंतर आलेल्या भिक्खूला दिले तरी ते ग्रहण करणे योग्य आहे. परंतु, भिक्खूला पाहून घराच्या आतून बाहेर काढून दिले जाणारे अन्न ग्रहण करणे योग्य नाही, असे 'महापच्चरी' अट्ठकथेत म्हटले आहे. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. याचे समुत्थान एळकलोम सिक्खापदाप्रमाणे आहे – क्रिया, नोसंज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, प्रज्ञप्तिवद्य, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदन होय. ตติยปาฏิเทสนียํ. तिसरे पाटिदेसनीय समाप्त. ๔. จตุตฺถปาฏิเทสนียสิกฺขาปทวณฺณนา ४. चौथ्या पाटिदेसनीय सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๕๗๐. จตุตฺเถ – อวรุทฺธา โหนฺตีติ ปฏิวิรุทฺธา โหนฺติ. ५७०. चौथ्या सिक्खापदात – 'अवरुद्धा होन्ती' म्हणजे परस्परांच्या विरुद्ध (शत्रू) झालेले असतात. ๕๗๓. ปญฺจนฺนํ ปฏิสํวิทิตนฺติ ปญฺจสุ สหธมฺมิเกสุ ยํกิญฺจิ เปเสตฺวา ขาทนียํ โภชนียํ อาหริสฺสามาติ ปฏิสํวิทิตํ กตมฺปิ อปฺปฏิสํวิทิตเมวาติ อตฺโถ. อารามํ อารามูปจารํ ฐเปตฺวาติ อารญฺญกเสนาสนารามญฺจ ตสฺส อุปจารญฺจ ฐเปตฺวา; อุปจารโต นิกฺขนฺตํ อนฺตรามคฺเค ภิกฺขุํ ทิสฺวา วา คามํ อาคตสฺส วา ปฏิสํวิทิตํ กตมฺปิ อปฺปฏิสํวิทิตเมว โหตีติ เวทิตพฺพํ. สเจ สาสงฺกํ โหติ สาสงฺกนฺติ อาจิกฺขิตพฺพนฺติ กสฺมา อาจิกฺขิตพฺพํ? อาราเม โจเร วสนฺเต อมฺหากํ นาโรเจนฺตีติ วจนปฏิโมจนตฺถํ. โจรา วตฺตพฺพา มนุสฺสา อิธูปจรนฺตีติ กสฺมา วตฺตพฺพํ? อตฺตโน อุปฏฺฐาเกหิ อมฺเห คณฺหาเปนฺตีติ วจนปฏิโมจนตฺถํ. ५७३. पाच जणांना पूर्वकल्पना देणे म्हणजे पाच सहधार्मिकांपैकी कोणा एकाला पाठवून आम्ही खाद्य किंवा भोज्य आणू अशी पूर्वकल्पना दिली असली तरी, ती पूर्वकल्पना न दिल्यासारखीच आहे, असा अर्थ आहे. आराम आणि आरामाचा परिसर वगळून म्हणजे आरण्यक सेनासन आराम आणि त्याचा परिसर वगळून; परिसराबाहेर गेलेल्या, वाटेत भिक्खूला पाहून किंवा गावात आलेल्या भिक्खूला पूर्वकल्पना दिली असली तरी, ती पूर्वकल्पना न दिल्यासारखीच होते, असे समजावे. जर शंकास्पद असेल तर सांगावे असे का सांगावे? आरामात चोर राहत असताना त्यांनी आम्हाला सांगितले नाही या निंदेपासून मुक्त होण्यासाठी सांगावे. चोर येथे वावरत आहेत असे का सांगावे? स्वतःच्या उपस्थायकांकडून (सेवकांकडून) त्यांनी आम्हाला पकडून दिले या निंदेपासून मुक्त होण्यासाठी सांगावे. ยาคุยา ปฏิสํวิทิเต ตสฺสา ปริวาโร อาหริยฺยตีติ ยาคุยา ปฏิสํวิทิตํ กตฺวา ‘‘กึ สุทฺธยาคุยา ทินฺนาย ปูวภตฺตาทีนิปิ เอติสฺสา ยาคุยา ปริวารํ กตฺวา ทสฺสามา’’ติ เอวํ ยํ กิญฺจิ อาหรนฺติ, สพฺพํ ปฏิสํวิทิตเมว โหติ. ภตฺเตน ปฏิสํวิทิเตติอาทีสุปิ เอเสว นโย. อสุกํ นาม กุลํ ปฏิสํวิทิตํ กตฺวา ขาทนียาทีนิ คเหตฺวา คจฺฉตีติ สุตฺวา อญฺญานิปิ เตน สทฺธึ อตฺตโน เทยฺยธมฺมํ อาหรนฺติ, วฏฺฏติ. ยาคุยา ปฏิสํวิทิตํ กตฺวา ปูวํ วา ภตฺตํ วา อาหรนฺติ, เอตมฺปิ วฏฺฏตีติ กุรุนฺทิยํ วุตฺตํ. यागूची पूर्वकल्पना दिली असता तिचा परिवार आणला जातो म्हणजे यागूची पूर्वकल्पना देऊन केवळ साधी यागू दिल्याने काय होणार? पिष्टान्न (मऊ अन्न), भात इत्यादी देखील या यागूचा परिवार (सोबतचे अन्न) करून देऊ असा विचार करून जे काही आणतात, ते सर्व पूर्वकल्पना दिलेलेच मानले जाते. भाताची पूर्वकल्पना दिली असता इत्यादींमध्येही हाच नियम आहे. अमुक एक कुटुंब पूर्वकल्पना देऊन खाद्य इत्यादी घेऊन जात आहे असे ऐकून इतर कुटुंबेही त्यांच्यासोबत स्वतःचे देय्यधम्म (दान साहित्य) आणतात, तर ते ग्रहण करणे योग्य आहे. यागूची पूर्वकल्पना देऊन जर ते पिष्टान्न किंवा भात आणतात, तर तेही ग्रहण करणे योग्य आहे, असे 'कुरुन्दी' अट्ठकथेत म्हटले आहे. ๕๗๕. คิลานสฺสาติ อปฺปฏิสํวิทิเตปิ คิลานสฺส อนาปตฺติ. ปฏิสํวิทิเต วา คิลานสฺส วา เสสกนฺติ เอกสฺสตฺถาย ปฏิสํวิทิตํ กตฺวา อาหฏํ, ตสฺส เสสกํ อญฺญสฺสาปิ ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. จตุนฺนํ ปญฺจนฺนํ วา ปฏิสํวิทิตํ กตฺวา พหุํ อาหฏํ โหติ, อญฺเญสมฺปิ ทาตุํ อิจฺฉนฺติ, เอตมฺปิ [Pg.160] ปฏิสํวิทิตเสสกเมว, สพฺเพสมฺปิ วฏฺฏติ. อถ อธิกเมว โหติ, สนฺนิธึ โมเจตฺวา ฐปิตํ ทุติยทิวเสปิ วฏฺฏติ. คิลานสฺส อาหฏาวเสเสปิ เอเสว นโย. ยํ ปน อปฺปฏิสํวิทิตเมว กตฺวา อาภตํ, ตํ พหิอารามํ เปเสตฺวา ปฏิสํวิทิตํ กาเรตฺวา อาหราเปตพฺพํ, ภิกฺขูหิ วา คนฺตฺวา อนฺตรามคฺเค คเหตพฺพํ. ยมฺปิ วิหารมชฺเฌน คจฺฉนฺตา วา วนจรกาทโย วา วนโต อาหริตฺวา เทนฺติ, ปุริมนเยเนว ปฏิสํวิทิตํ กาเรตพฺพํ. ตตฺถชาตกนฺติ อาราเม ชาตกเมว; มูลขาทนียาทึ อญฺเญน กปฺปิยํ กตฺวา ทินฺนํ ปริภุญฺชโต อนาปตฺติ. สเจ ปน ตํ คามํ หริตฺวา ปจิตฺวา อาหรนฺติ, น วฏฺฏติ. ปฏิสํวิทิตํ กาเรตพฺพํ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ५७५. आजारी भिक्खूसाठी म्हणजे पूर्वकल्पना न दिलेल्या खाद्याचे सेवन केले तरी आजारी भिक्खूला आपत्ती येत नाही. पूर्वकल्पना दिलेल्या अन्नाचा किंवा आजारी भिक्खूच्या अन्नाचा उर्वरित भाग म्हणजे एका भिक्खूसाठी पूर्वकल्पना देऊन आणलेल्या अन्नाचा उर्वरित भाग दुसऱ्या भिक्खूलाही खाणे योग्य आहे. चार किंवा पाच भिक्खूंसाठी पूर्वकल्पना देऊन भरपूर अन्न आणले असेल आणि ते इतरांनाही देऊ इच्छित असतील, तर ते देखील पूर्वकल्पना दिलेल्या अन्नाचा उर्वरित भागच मानले जाते आणि ते सर्वांसाठी योग्य आहे. जर ते अन्न अधिकच असेल, तर संनिधी (साठा करण्याची) आपत्ती टाळून ठेवलेले अन्न दुसऱ्या दिवशीही चालते. आजारी भिक्खूसाठी आणलेल्या अन्नाच्या उर्वरित भागाबाबतही हाच नियम आहे. परंतु, जे अन्न पूर्वकल्पना न देताच आणले गेले आहे, ते आरामाच्या बाहेर पाठवून, पूर्वकल्पना द्यायला लावून मगच आणायला हवे, किंवा भिक्खूंनी स्वतः जाऊन वाटेतच ते ग्रहण करावे. तसेच, विहाराच्या मधून जाणारे लोक किंवा शिकारी इत्यादी जंगलातून आणून जे अन्न देतात, त्याबाबतही पूर्वीच्या नियमाप्रमाणेच पूर्वकल्पना द्यायला लावली पाहिजे. तेथेच उत्पन्न झालेले म्हणजे आरामातच उगवलेले कंदमुळे इत्यादी खाद्य दुसऱ्या कोणाकडून कप्पिय (योग्य) करून दिले गेले असता, त्याचे सेवन करणाऱ्या भिक्खूला आपत्ती येत नाही. परंतु, जर ते गावात घेऊन जाऊन, शिजवून परत आणले, तर ते ग्रहण करणे योग्य नाही. याची पूर्वकल्पना द्यायला लावली पाहिजे. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. กถินสมุฏฺฐานํ – กิริยากิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. याचे समुत्थान कठिन सिक्खापदाप्रमाणे आहे – क्रिया-अक्रिया, नोसंज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, प्रज्ञप्तिवद्य, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदन होय. จตุตฺถปาฏิเทสนียํ. चौथे पाटिदेसनीय समाप्त. สมนฺตปาสาทิกาย วินยสํวณฺณนาย समंतपासादिका नामक विनय-अट्ठकथेतील... ปาฏิเทสนียวณฺณนา นิฏฺฐิตา. पाटिदेसनीय वर्णन समाप्त झाले. ปาฏิเทสนียกณฺฑํ นิฏฺฐิตํ. पाटिदेसनीय काण्ड समाप्त झाले. ๗. เสขิยกณฺฑํ ७. सेखिय काण्ड. ๑. ปริมณฺฑลวคฺควณฺณนา १. परिमंडल वग्गचे स्पष्टीकरण. ยานิ [Pg.161] สิกฺขิตสิกฺเขน, เสขิยานีติ ตาทินา; ภาสิตานิ อยํ ทานิ, เตสมฺปิ วณฺณนากฺกโม. चार मार्गांनी तिन्ही शिक्षांचे आचरण केलेल्या आणि तादिगुणाने युक्त असलेल्या भगवंतांनी ज्या सिक्खापदांना सेखिय म्हणून सांगितले आहे, आता त्या सेखिय सिक्खापदांच्या स्पष्टीकरणाचा देखील हा क्रम सुरू होत आहे. ๕๗๖. ตตฺถ ปริมณฺฑลนฺติ สมนฺตโต มณฺฑลํ. นาภิมณฺฑลํ ชาณุมณฺฑลนฺติ อุทฺธํ นาภิมณฺฑลํ อโธ ชาณุมณฺฑลํ ปฏิจฺฉาเทนฺเตน ชาณุมณฺฑลสฺส เหฏฺฐา ชงฺฆฏฺฐิกโต ปฏฺฐาย อฏฺฐงฺคุลมตฺตํ นิวาสนํ โอตาเรตฺวา นิวาเสตพฺพํ, ตโต ปรํ โอตาเรนฺตสฺส ทุกฺกฏนฺติ วุตฺตํ. ยถา นิสินฺนสฺส ชาณุมณฺฑลโต เหฏฺฐา จตุรงฺคุลมตฺตํ ปฏิจฺฉนฺนํ โหตีติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ; เอวํ นิวาเสนฺตสฺส ปน นิวาสนํ ปมาณิกํ วฏฺฏติ. ตตฺริทํ ปมาณํ – ทีฆโต มุฏฺฐิปญฺจกํ, ติริยํ อฑฺฒเตยฺยหตฺถํ. ตาทิสสฺส ปน อลาเภ ติริยํ ทฺวิหตฺถปมาณมฺปิ วฏฺฏติ ชาณุมณฺฑลปฏิจฺฉาทนตฺถํ, นาภิมณฺฑลํ ปน จีวเรนาปิ สกฺกา ปฏิจฺฉาเทตุนฺติ. ตตฺถ เอกปฏฺฏจีวรํ เอวํ นิวตฺถมฺปิ นิวตฺถฏฺฐาเน น ติฏฺฐติ, ทุปฏฺฏํ ปน ติฏฺฐติ. ५७६. त्या सेखिय सिक्खापदांमध्ये, परिमंडल म्हणजे चहूबाजूंनी गोलाकार. नाभीमंडल आणि जानुमंडल म्हणजे वर नाभीमंडल (नाभीचा भाग) आणि खाली जानुमंडल (गुडघे) झाकले जाईल अशा प्रकारे, गुडघ्यांच्या खाली नडगीच्या हाडापासून सुरू करून आठ अंगुळे खालीपर्यंत अंतर्वासक (नेसण्याचे वस्त्र) सोडून नेसावे. त्यापेक्षा जास्त खाली सोडणाऱ्या भिक्खूला दुक्कट आपत्ती होते, असे म्हटले आहे. ज्या प्रकारे बसलेल्या भिक्खूच्या गुडघ्यांच्या खाली चार अंगुळे भाग झाकलेला राहील, असे महापच्चरी मध्ये म्हटले आहे. अशा प्रकारे नेसणाऱ्या भिक्खूचे अंतर्वासक योग्य प्रमाणाचे असणे आवश्यक आहे. त्याचे प्रमाण हे आहे – लांबीला पाच हात (मुठीसह) आणि रुंदीला अडीच हात. परंतु, तसे वस्त्र न मिळाल्यास, गुडघे झाकण्यासाठी रुंदीला दोन हात प्रमाणाचे वस्त्र देखील योग्य ठरते. नाभीचा भाग तर चीवराने देखील झाकता येतो, असे महापच्चरीमध्ये म्हटले आहे. त्यात एकपदरी चीवर अशा प्रकारे नेसले तरी ते नेसलेल्या जागी टिकून राहत नाही, परंतु दुपदरी चीवर टिकून राहते. โอลมฺเพนฺโต นิวาเสติ อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ เอตฺถ น เกวลํ ปุรโต จ ปจฺฉโต จ โอลมฺเพตฺวา นิวาเสนฺตสฺเสว ทุกฺกฏํ, เย ปนญฺเญ ‘‘เตน โข ปน สมเยน ฉพฺพคฺคิยา ภิกฺขู คิหินิวตฺถํ นิวาเสนฺติ หตฺถิโสณฺฑกํ มจฺฉวาลกํ จตุกฺกณฺณกํ ตาลวณฺฏกํ สตวลิกํ นิวาเสนฺตี’’ติอาทินา (จูฬว. ๒๘๐) นเยน ขนฺธเก นิวาสนโทสา วุตฺตา, ตถา นิวาเสนฺตสฺสาปิ ทุกฺกฏเมว. เต สพฺเพ วุตฺตนเยน ปริมณฺฑลํ นิวาเสนฺตสฺส น โหนฺติ. อยเมตฺถ สงฺเขโป, วิตฺถารโต ปน ตตฺเถว อาวิ ภวิสฺสติ. लोबळत ठेवून नेसल्यास दुक्कट आपत्ती होते या पाठात केवळ पुढे आणि मागे लोबळत ठेवून नेसणाऱ्या भिक्खूलाच दुक्कट आपत्ती होते असे नाही, तर इतर जे त्या वेळी षड्वर्गीय भिक्खू गृहस्थांप्रमाणे नेसत असत – हत्तीच्या सोंडेसारखे सोडून, माशाच्या शेपटीसारखे सोडून, चार कोपरे सोडून, ताडपत्राच्या पंख्यासारखे सोडून, अनेक घड्या घालून नेसत असत इत्यादी प्रकारे खंधकात नेसण्याचे जे दोष भगवंतांनी सांगितले आहेत, त्या प्रकारे नेसणाऱ्यालाही दुक्कट आपत्तीच होते. सांगितले दिलेल्या पद्धतीने परिमंडल (गोलाकार) नेसणाऱ्या भिक्खूच्या बाबतीत हे सर्व दोष उद्भवत नाहीत. हा या विषयाचा संक्षेप आहे, सविस्तर माहिती तेथेच (चुल्लवग्गात) स्पष्ट होईल. อสญฺจิจฺจาติ ปุรโต วา ปจฺฉโต วา โอลมฺเพตฺวา นิวาเสสฺสามีติ เอวํ อสญฺจิจฺจ; อถ โข ปริมณฺฑลํเยว นิวาเสสฺสามีติ วิรชฺฌิตฺวา อปริมณฺฑลํ นิวาเสนฺตสฺส อนาปตฺติ. อสฺสติยาติ อญฺญวิหิตสฺสาปิ ตถา นิวาเสนฺตสฺส อนาปตฺติ. อชานนฺตสฺสาติ เอตฺถ นิวาสนวตฺตํ อชานนฺตสฺส โมกฺโข นตฺถิ. นิวาสนวตฺตญฺหิ สาธุกํ อุคฺคเหตพฺพํ, ตสฺส อนุคฺคหณเมวสฺส อนาทริยํ. ตํ ปน สญฺจิจฺจ อนุคฺคณฺหนฺตสฺส ยุชฺชติ, ตสฺมา อุคฺคหิตวตฺโตปิ โย อารุฬฺหภาวํ วา โอรุฬฺหภาวํ วา น ชานาติ, ตสฺส [Pg.162] อนาปตฺติ. กุรุนฺทิยํ ปน ‘‘ปริมณฺฑลํ นิวาเสตุํ อชานนฺตสฺส อนาปตฺตี’’ติ วุตฺตํ. โย ปน สุกฺขชงฺโฆ วา มหาปิณฺฑิกมํโส วา โหติ, ตสฺส สารุปฺปตฺถาย ชาณุมณฺฑลโต อฏฺฐงฺคุลาธิกมฺปิ โอตาเรตฺวา นิวาเสตุํ วฏฺฏติ. असंचिच्च (जाणूनबुजून न करता) म्हणजे—'मी पुढे किंवा मागे लोबंत ठेवून (लोंबकळत ठेवून) नेसेन' असा जाणूनबुजून विचार न करता; परंतु 'मी समंततः (गोलाकार) नेसेन' असा विचार करूनही चुकून अगोलाकार नेसणाऱ्या भिक्खूला आपत्ती (दोष) होत नाही. अस्सतिया (स्मृती नसताना) म्हणजे—दुसऱ्या विचारात असलेल्या भिक्खूनेही तसेच (अगोलाकार) नेसल्यास आपत्ती होत नाही. अजानन्तस्स (न जाणणाऱ्याला) याविषयी निर्णय असा समजावा—नेसण्याचा नियम (निवासनवत्त) न जाणणाऱ्या भिक्खूला आपत्तीतून मुक्ती नाही. कारण नेसण्याचा नियम चांगल्या प्रकारे शिकला पाहिजे, तो न शिकणे हाच त्या भिक्खूचा अनादर आहे. आणि तो अनादर जाणूनबुजून न शिकणाऱ्या भिक्खूच्या बाबतीत योग्य ठरतो. म्हणून, ज्याने नेसण्याचा नियम शिकला आहे, परंतु नेसताना ते वर गेले आहे की खाली गेले आहे हे ज्याला समजत नाही, त्याला आपत्ती होत नाही. परंतु कुरुन्दी अठ्ठकथेत म्हटले आहे की—'समंततः कसे नेसावे हे न जाणणाऱ्याला आपत्ती होत नाही.' परंतु ज्या भिक्खूच्या पिंढऱ्या सुकलेल्या आहेत किंवा ज्याच्या पिंढऱ्यांचे मांस मोठे आहे, त्याला योग्य दिसण्यासाठी गुडघ्यापासून आठ बोटे अधिक खाली सोडून नेसणे योग्य आहे. คิลานสฺสาติ ชงฺฆาย วา ปาเท วา วโณ โหติ, อุกฺขิปิตฺวา วา โอตาเรตฺวา วา นิวาเสตุํ วฏฺฏติ. อาปทาสูติ วาฬมิคา วา โจรา วา อนุพนฺธนฺติ, เอวรูปาสุ อาปทาสุ อนาปตฺติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. गिलाणस्स (आजारी भिक्खूला) म्हणजे—ज्या भिक्खूच्या पिंढरीवर किंवा पायावर जखम आहे, त्याला वस्त्र वर करून किंवा खाली करून नेसणे योग्य आहे. आपदासु (आपत्तीच्या वेळी) म्हणजे—हिंस्र पशू किंवा चोर मागे लागले असताना, अशा प्रकारच्या आपत्तींमध्ये अगोलाकार नेसणाऱ्या भिक्खूला आपत्ती होत नाही. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ปฐมปาราชิกสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. ผุสฺสเทวตฺเถโร ‘‘อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, ติเวทน’’นฺติ อาห. อุปติสฺสตฺเถโร ปน ‘‘อนาทริยํ ปฏิจฺจา’’ติ วุตฺตตฺตา ‘‘โลกวชฺชํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทน’’นฺติ อาห. याचे समुत्थान पहिल्या पाराजिकाप्रमाणे आहे—क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज (लोकनिंद्य), कायकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदना. फुस्सदेव थेरांनी 'अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज (नियमभंग), त्रिवेदना' असे म्हटले आहे. परंतु उपतिस्स थेरांनी 'अनादरामुळे' असे म्हटल्यामुळे 'लोकवज्ज, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदना' असे म्हटले आहे. ๕๗๗. ปริมณฺฑลํ ปารุปิตพฺพนฺติ ‘‘เตน โข ปน สมเยน ฉพฺพคฺคิยา ภิกฺขู คิหิปารุตํ ปารุปนฺตี’’ติ (จูฬว. ๒๘๐) เอวํ วุตฺตํ อเนกปฺปการํ คิหิปารุปนํ อปารุปิตฺวา อิธ วุตฺตนเยเนว อุโภ กณฺเณ สมํ กตฺวา ปารุปนวตฺตํ ปูเรนฺเตน ปริมณฺฑลํ ปารุปิตพฺพํ. อิมานิ จ ทฺเว สิกฺขาปทานิ อวิเสเสน วุตฺตานิ. ตสฺมา วิหาเรปิ อนฺตรฆเรปิ ปริมณฺฑลเมว นิวาเสตพฺพญฺจ ปารุปิตพฺพญฺจาติ. สมุฏฺฐานาทีนิ ปฐมสิกฺขาปเท วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพานิ สทฺธึ เถรวาเทน. ५७७. परिमण्डल पांघरावे (समंततः पांघरावे) म्हणजे—'त्या वेळी छब्बग्गिय भिक्खू गृहस्थांप्रमाणे पांघरत असत' अशा प्रकारे चुल्लवग्गात सांगितलेले अनेक प्रकारचे गृहस्थांचे पांघरण्याचे प्रकार न पांघरता, येथे सांगितलेल्या पद्धतीनेच दोन्ही कोपरे समान करून, पांघरण्याचा नियम पूर्ण करत समंततः (गोलाकार) पांघरावे. आणि ही दोन्ही शिक्षापदे विशेष भेद न करता (सामान्यतः) सांगितली आहेत. म्हणून विहारातही आणि अंतर्गृहातही (वस्तीत) समंततःच नेसले पाहिजे आणि पांघरले पाहिजे, असे समजावे. समुत्थान इत्यादी गोष्टी पहिल्या शिक्षापदात सांगितलेल्या पद्धतीनेच थेरवादासह समजून घ्याव्यात. ๕๗๘. กายํ วิวริตฺวาติ ชตฺตุมฺปิ อุรมฺปิ วิวริตฺวา. สุปฺปฏิจฺฉนฺเนนาติ น สสีสํ ปารุเตน; อถ โข คณฺฐิกํ ปฏิมุญฺจิตฺวา อนุวาตนฺเตน คีวํ ปฏิจฺฉาเทตฺวา อุโภ กณฺเณ สมํ กตฺวา ปฏิสํหริตฺวา ยาว มณิพนฺธํ ปฏิจฺฉาเทตฺวา อนฺตรฆเร คนฺตพฺพํ. ทุติยสิกฺขาปเท – คลวาฏกโต ปฏฺฐาย สีสํ มณิพนฺธโต ปฏฺฐาย หตฺเถ ปิณฺฑิกมํสโต จ ปฏฺฐาย ปาเท วิวริตฺวา นิสีทิตพฺพํ. ५७८. कायं विवरित्वा (शरीर उघडे करून) म्हणजे—खांदा आणि छाती उघडी करून. सुप्पटिच्छन्नेन (चांगल्या प्रकारे झाकून) म्हणजे—डोक्यासह पांघरून जाणे नव्हे; तर गाठ (काज-बटण) लावून, काठाने मान झाकून, दोन्ही कोपरे समान करून, घडी करून मनगटापर्यंत हात झाकून अंतर्गृहात जावे. दुसऱ्या शिक्षापदात—कंठकूपापासून (गळ्याच्या खळग्यापासून) डोके, मनगटापासून हात आणि पिंढरीच्या मांसापासून पाय उघडे ठेवून बसावे. ๕๗๙. วาสูปคตสฺสาติ วาสตฺถาย อุปคตสฺส รตฺติภาเค วา ทิวสภาเค วา กายํ วิวริตฺวาปิ นิสีทโต อนาปตฺติ. ५७९. वासूपगतस्स (राहण्यासाठी गेलेल्या) म्हणजे—राहण्याच्या हेतूने गेलेल्या भिक्खूला रात्रीच्या वेळी किंवा दिवसाच्या वेळी शरीर उघडे करून बसल्यास आपत्ती होत नाही. ๕๘๐. สุสํวุโตติ หตฺถํ วา ปาทํ วา อกีฬาเปนฺโต; สุวินีโตติ อตฺโถ. ५८०. सुसंवुतो (सुसंवृत) म्हणजे—हात किंवा पाय न हलवता (खेळवता); सुविनीत (चांगल्या प्रकारे संयमित) असा अर्थ आहे. ๕๘๒. โอกฺขิตฺตจกฺขูติ [Pg.163] เหฏฺฐา ขิตฺตจกฺขุ หุตฺวา. ยุคมตฺตํ เปกฺขมาโนติ ยุคยุตฺตโก หิ ทนฺโต อาชาเนยฺโย ยุคมตฺตํ เปกฺขติ, ปุรโต จตุหตฺถปฺปมาณํ ภูมิภาคํ; อิมินาปิ เอตฺตกํ เปกฺขนฺเตน คนฺตพฺพํ. โย อนาทริยํ ปฏิจฺจ ตหํ ตหํ โอโลเกนฺโตติ โย ตํตํทิสาภาคํ ปาสาทํ กูฏาคารํ วีถึ โอโลเกนฺโต คจฺฉติ, อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺส. เอกสฺมึ ปน ฐาเน ฐตฺวา หตฺถิอสฺสาทิปริสฺสยาภาวํ โอโลเกตุํ วฏฺฏติ. นิสีทนฺเตนาปิ โอกฺขิตฺตจกฺขุนาว นิสีทิตพฺพํ. ५८२. ओक्खित्तचक्खु (खाली नजर ठेवलेला) म्हणजे—खाली नजर झुकवलेला होऊन. युगमात्र पाहत (युगमत्तं पेक्खमानो) म्हणजे—जूने जोडलेला, प्रशिक्षित असा उमदा घोडा जसा केवळ एका जूएवढे (सुमारे चार हात) अंतर समोर पाहतो; या भिक्खूनेही तेवढ्याच अंतरावर (सुमारे चार हात जमिनीवर) पाहत जावे. जो अनादरामुळे इकडेतिकडे पाहत जातो, म्हणजे जो त्या त्या देशाकडे, प्रासादाकडे, कुटागाराकडे (शिखरयुक्त घराकडे) किंवा रस्त्याकडे पाहत जातो, त्याला दुक्कट (दुष्कृत) आपत्ती होते. परंतु एका ठिकाणी उभे राहून हत्ती, घोडे इत्यादींचा धोका नाही ना, हे पाहणे योग्य आहे. बसतानाही खाली नजर ठेवूनच बसावे. ๕๘๔. อุกฺขิตฺตกายาติ อุกฺเขเปน; อิตฺถมฺภูตลกฺขเณ กรณวจนํ เอกโต วา อุภโต วา อุกฺขิตฺตจีวโร หุตฺวาติ อตฺโถ. อนฺโตอินฺทขีลโต ปฏฺฐาย น เอวํ คนฺตพฺพํ. นิสินฺนกาเล ปน ธมกรณํ นีหรนฺเตนาปิ จีวรํ อนุกฺขิปิตฺวาว นีหริตพฺพนฺติ. ५८४. उक्खित्तकाया म्हणजे—वस्त्र वर उचलून; 'इत्थंभूतलक्षण' अर्थात हे तृतीया विभक्तीचे रूप आहे. एका बाजूने किंवा दोन्ही बाजूंनी वस्त्र वर उचललेला होऊन, असा अर्थ आहे. इंद्रखिलाच्या (उंबरठ्याच्या) आतून पुढे अशा प्रकारे वस्त्र वर उचलून जाऊ नये. परंतु बसलेल्या वेळी पाणी गाळण्याचे साधन (धमकरण) काढतानाही वस्त्र वर न उचलताच ते काढावे. ปฐโม วคฺโค. पहिला वग्ग (वर्ग). ๒. อุชฺชคฺฆิกวคฺควณฺณนา २. उज्झग्घिकवग्ग वण्णना (उज्झग्घिक वर्ग स्पष्टीकरण) ๕๘๖. อุชฺชคฺฆิกายาติ มหาหสิตํ หสนฺโต. วุตฺตนเยเนเวตฺถ กรณวจนํ. ५८६. उज्झग्घिकाय म्हणजे—मोठ्याने हसत. येथे पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच तृतीया विभक्तीचे रूप आहे. ๕๘๘. อปฺปสทฺโท อนฺตรฆเรติ เอตฺถ กิตฺตาวตา อปฺปสทฺโท โหติ? ทฺวาทสหตฺเถ เคเห อาทิมฺหิ สงฺฆตฺเถโร, มชฺเฌ ทุติยตฺเถโร, อนฺเต ตติยตฺเถโรติ เอวํ นิสินฺเนสุ สงฺฆตฺเถโร ทุติเยน สทฺธึ มนฺเตติ, ทุติยตฺเถโร ตสฺส สทฺทญฺเจว สุณาติ, กถญฺจ ววตฺถเปติ. ตติยตฺเถโร ปน สทฺทเมว สุณาติ, กถํ น ววตฺถเปติ. เอตฺตาวตา อปฺปสทฺโท โหติ. สเจ ปน ตติยตฺเถโร กถํ ววตฺถเปติ, มหาสทฺโท นาม โหติ. ५८८. अंतर्गृहात मंद आवाजात (अप्पसद्दो) याविषयी किती प्रमाणात बोलल्यास मंद आवाज होतो? बारा हातांच्या घरात सुरुवातीला संघथेर, मध्ये दुसरे थेर आणि शेवटी तिसरे थेर अशा प्रकारे बसले असता, संघथेर दुसऱ्या थेरांशी चर्चा करतात, तेव्हा दुसरे थेर त्यांचा आवाजही ऐकतात आणि शब्दांचा अर्थही समजून घेतात. परंतु तिसरे थेर केवळ आवाज ऐकतात, शब्दांचा अर्थ समजू शकत नाहीत. एवढ्या प्रमाणातील बोलण्याला 'मंद आवाज' म्हणतात. जर तिसऱ्या थेरांनाही शब्दांचा अर्थ समजला, तर त्याला 'मोठा आवाज' (महासद्दो) म्हणतात. ๕๙๐. กายํ ปคฺคเหตฺวาติ นิจฺจลํ กตฺวา อุชุเกน กาเยน สเมน อิริยาปเถน คนฺตพฺพญฺเจว นิสีทิตพฺพญฺจ. ५९०. कायं पग्गहेत्वा (शरीर सावरून) म्हणजे—शरीर स्थिर करून, सरळ शरीराने आणि शांत इरियापथाने (हालचालीने) जावे आणि बसावे. ๕๙๒. พาหุํ ปคฺคเหตฺวาติ นิจฺจลํ กตฺวา. ५९२. बाहुं पग्गहेत्वा (हात सावरून) म्हणजे—हात स्थिर करून (न हलवता जावे व बसावे). ๕๙๔. สีสํ ปคฺคเหตฺวาติ นิจฺจลํ อุชุํ ฐปยิตฺวา. ५९४. सीसं पग्गहेत्वा (डोके सावरून) म्हणजे—डोके स्थिर व सरळ ठेवून (जावे व बसावे). ทุติโย วคฺโค. दुसरा वग्ग (वर्ग). ๓. ขมฺภกตวคฺควณฺณนา ३. खम्भकतवग्ग वण्णना (खम्भकत वर्ग स्पष्टीकरण) ๕๙๖-๘. ขมฺภกโต [Pg.164] นาม กฏิยํ หตฺถํ ฐเปตฺวา กตขมฺโภ. โอคุณฺฐิโตติ สสีสํ ปารุโต. ५९६-८. खम्भकत म्हणजे—कंबरेवर हात ठेवून उभे राहणे (कंबरेवर हात ठेवणे). ओगुण्ठितो म्हणजे—डोक्यासह पांघरलेला. ๖๐๐. อุกฺกุฏิกายาติ เอตฺถ อุกฺกุฏิกา วุจฺจติ ปณฺหิโย อุกฺขิปิตฺวา อคฺคปาเทหิ วา, อคฺคปาเท วา อุกฺขิปิตฺวา ปณฺหีหิเยว วา ภูมึ ผุสนฺตสฺส คมนํ. กรณวจนํ ปเนตฺถ วุตฺตลกฺขณเมว. ६००. उक्कुटिका (उकडू चालणे) म्हणजे—टाचा वर करून केवळ पायाच्या बोटांनी, किंवा पायाची बोटे वर करून केवळ टाचांनी जमिनीला स्पर्श करत चालणे, याला 'उक्कुटिका' म्हणतात. येथे तृतीया विभक्तीचे रूप पूर्वी सांगितलेल्या लक्षणाप्रमाणेच आहे. ๖๐๑. ทุสฺสปลฺลตฺถิกายาติ เอตฺถ อาโยคปลฺลตฺถิกาปิ ทุสฺสปลฺลตฺถิกา เอว. ६०१. दुस्सपल्लत्थिका (कपड्याने गुडघे बांधून बसणे) यामध्ये 'आयोगपल्लत्थिका' (पट्ट्याने गुडघे बांधणे) देखील 'दुस्सपल्लत्थिका'च आहे. ๖๐๒. สกฺกจฺจนฺติ สตึ อุปฏฺฐเปตฺวา. ६०२. सक्कच्चं (आदरपूर्वक) म्हणजे—स्मृती (जागरूकता) प्रस्थापित करून. ๖๐๓. อากิรนฺเตปีติ ปิณฺฑปาตํ เทนฺเตปิ. ปตฺตสญฺญีติ ปตฺเต สญฺญํ กตฺวา. ६०३. आकिरन्तेपि म्हणजे—पिंडपात (भिक्षा) देत असतानाही. पत्तसञ्ञी म्हणजे—पात्रावर (भिक्षापात्रावर) लक्ष केंद्रित करून. ๖๐๔. สมสูปโก นาม ยตฺถ ภตฺตสฺส จตุตฺถภาคปฺปมาโณ สูโป โหติ. มุคฺคสูโป มาสสูโปติ เอตฺถ กุลตฺถาทีหิ กตสูปาปิ สงฺคหํ คจฺฉนฺติเยวาติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. รสรเสติ เอตฺถ ฐเปตฺวา ทฺเว สูเป อวเสสานิ โอโลณีสากสูเปยฺยมจฺฉรสมํสรสาทีนิ รสรสาติ เวทิตพฺพานิ. ตํ รสรสํ พหุมฺปิ คณฺหนฺตสฺส อนาปตฺติ. ६०४. समसूपक म्हणजे—ज्यामध्ये भाताच्या चौथ्या भागाच्या प्रमाणात वरण (सूप) असते. 'मुग्गसूप' (मुगाचे वरण) आणि 'माससूप' (उडदाचे वरण) यामध्ये कुळीथ इत्यादींपासून बनवलेले वरण देखील समाविष्ट होते, असे महापच्चरी अठ्ठकथेत म्हटले आहे. 'रसरस' यामध्ये मुगाचे वरण आणि उडदाचे वरण हे दोन सोडून उर्वरित अळणी भाजी, पालेभाजी, सूप, माशांचा रस्सा, मांसाचा रस्सा इत्यादींना 'रसरस' (चवदार रस्से) समजावे. तो रसरस जास्त प्रमाणात घेतला तरी आपत्ती होत नाही. ๖๐๕. สมติตฺติกนฺติ สมปุณฺณํ สมภริตํ. ถูปีกตํ ปิณฺฑปาตํ ปฏิคฺคณฺหาติ, อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ เอตฺถ ถูปีกโต นาม ปตฺตสฺส อนฺโตมุขวฏฺฏิเลขํ อติกฺกมิตฺวา กโต; ปตฺเต ปกฺขิตฺโต รจิโต ปูริโตติ อตฺโถ. เอวํ กตํ อคเหตฺวา อนฺโตมุขวฏฺฏิเลขาสมปฺปมาโณ คเหตพฺโพ. ६०५. ‘समतित्तिकं’ म्हणजे काठोकाठ भरलेले, पूर्ण भरलेले. ‘थूपीकतं पिण्डपातं पटिग्गण्हाति, आपत्ति दुक्कटस्स’ (शिखराकार करून पिंडपात ग्रहण करतो, तर दुक्कट आपत्ति होते) यामध्ये ‘थूपीकत’ (शिखराकार) म्हणजे पात्राच्या आतील काठाची रेषा ओलांडून वर रचलेला; पात्रात टाकलेला, रचलेला आणि भरलेला असा अन्नपिंड, असा अर्थ आहे. याप्रमाणे (शिखरासारखा उंच) केलेला आहार न घेता, पात्राच्या आतील काठाच्या रेषेच्या बरोबरीच्या प्रमाणाचा आहार ग्रहण करावा. ตตฺถ ถูปีกตํ นาม ‘‘ปญฺจหิ โภชเนหิ กต’’นฺติ อภยตฺเถโร อาห. ติปิฏกจูฬนาคตฺเถโร ปน ‘‘ปิณฺฑปาโต นาม ยาคุปิ ภตฺตมฺปิ ขาทนียมฺปิ จุณฺณปิณฺโฑปิ ทนฺตกฏฺฐมฺปิ ทสิกสุตฺตมฺปี’’ติ อิทํ สุตฺตํ วตฺวา ทสิกสุตฺตมฺปิ ถูปีกตํ น วฏฺฏตีติ อาห. เตสํ วาทํ สุตฺวา ภิกฺขู โรหณํ คนฺตฺวา จูฬสุมนตฺเถรํ ปุจฺฉึสุ – ‘‘ภนฺเต ถูปีกตปิณฺฑปาโต เกน ปริจฺฉินฺโน’’ติ? เตสญฺจ เถรานํ วาทํ อาโรเจสุํ. เถโร สุตฺวา อาห [Pg.165] – ‘‘อโห, จูฬนาโค สาสนโต ภฏฺโฐ, อหํ เอตสฺส สตฺตกฺขตฺตุํ วินยํ วาเจนฺโต น กทาจิ เอวํ อวจํ, อยํ กุโต ลภิตฺวา เอวํ วทสี’’ติ. ภิกฺขู เถรํ ยาจึสุ – ‘‘กเถถ ทานิ, ภนฺเต, เกน ปริจฺฉินฺโน’’ติ? ‘‘ยาวกาลิเกนาวุโส’’ติ เถโร อาห. ตสฺมา ยํกิญฺจิ ยาคุภตฺตํ วา ผลาผลํ วา อามิสชาติกํ สมติตฺติกเมว คเหตพฺพํ. ตญฺจ โข อธิฏฺฐานุปเคน ปตฺเตน, อิตเรน ปน ถูปีกตมฺปิ วฏฺฏติ. ยามกาลิกสตฺตาหกาลิกยาวชีวิกานิ ปน อธิฏฺฐานุปคปตฺเตปิ ถูปีกตานิ วฏฺฏนฺติ. ทฺวีสุ ปตฺเตสุ ภตฺตํ คเหตฺวา เอกสฺมึ ปูเรตฺวา วิหารํ เปเสตุํ วฏฺฏตีติ มหาปจฺจริยํ ปน วุตฺตํ. ยํ ปตฺเต ปกฺขิปิยมานํ ปูวอุจฺฉุขณฺฑผลาผลาทิ เหฏฺฐา โอโรหติ, ตํ ถูปีกตํ นาม น โหติ. ปูววฏํสกํ ฐเปตฺวา ปิณฺฑปาตํ เทนฺติ, ถูปีกตเมว โหติ. ปุปฺผวฏํสกตกฺโกลกฏุกผลาทิวฏํสเก ปน ฐเปตฺวา ทินฺนํ ถูปีกตํ น โหติ. ภตฺตสฺส อุปริ ถาลกํ วา ปตฺตํ วา ฐเปตฺวา ปูเรตฺวา คณฺหาติ, ถูปีกตํ นาม น โหติ. กุรุนฺทิยมฺปิ วุตฺตํ – ‘‘ถาลเก วา ปณฺเณ วา ปกฺขิปิตฺวา ตํ ปตฺตมตฺถเก ฐเปตฺวา เทนฺติ, ปาเฏกฺกภาชนํ วฏฺฏตี’’ติ. त्यामध्ये, ‘थूपीकत’ (शिखराकार) म्हणजे पाच प्रकारच्या भोजनांनी तयार केलेले, असे अभय थेरांनी म्हटले. परंतु, त्रिपिटक चुळनाग थेरांनी “पिंडपात म्हणजे यागू (पेज), भात, खाजक (खाद्य), चूर्णपिंड (साबण पावडर), दंतकाष्ठ (दातून) आणि दसिकसुत्त (धागा) देखील होय” हे सूत्र सांगून, दसिकसुत्त (धागा) देखील शिखराकार करून स्वीकारणे योग्य नाही, असे म्हटले. त्यांचा हा वाद ऐकून भिक्खूंनी रोहण जनपदाला जाऊन चुळसुमन थेरांना विचारले— ‘भंते, शिखराकार पिंडपात कशाने मर्यादित केला आहे?’ आणि त्यांनी त्या थेरांचा वादही त्यांना सांगितला. थेरांनी ते ऐकून म्हटले— ‘अहो! चुळनाग शासनापासून भ्रष्ट झाला आहे. मी त्याला सात वेळा विनय शिकवताना कधीही असे म्हटले नाही. याने हे कुठून मिळवून असे म्हटले आहे?’ भिक्खूंनी थेरांना पुन्हा विनंती केली— ‘भंते, आता आपणच सांगा, हे कशाने मर्यादित केले आहे?’ थेरांनी म्हटले— ‘आवुसो, यावकालिक वस्तूने हे मर्यादित केले आहे.’ म्हणून, कोणतीही यागू, भात किंवा लहान-मोठी फळे यांसारखी आमिषयुक्त (यावकालिक) वस्तू काठोकाठ (पात्राच्या काठाच्या बरोबरीने) एवढीच ग्रहण करावी. आणि ती देखील अधिष्ठान करण्यायोग्य पात्रानेच स्वीकारावी; परंतु इतर पात्राने शिखराकार करून घेतलेली देखील चालते. परंतु यामकालिक, सत्ताहकालिक आणि यावजीविक वस्तू अधिष्ठान केलेल्या पात्रात देखील शिखराकार करून घेतल्यास चालतात. दोन पात्रांमध्ये भात घेऊन, तो एका पात्रात पूर्ण भरून विहारात पाठवणे योग्य आहे, असे महापंचरी अट्टकथेत म्हटले आहे. पात्रात टाकत असताना जे पुव (पक्वान्न), उसाचे तुकडे, लहान-मोठी फळे इत्यादी खाली घसरतात, त्याला ‘थूपीकत’ (शिखराकार) म्हटले जात नाही. पात्रावर पक्वान्नाचा मुकुट ठेवून पिंडपात देतात, तो शिखराकारच होतो. परंतु फुलांचा मुकुट, तक्कोल किंवा कडू फळे इत्यादी वर ठेवून दिलेले अन्न शिखराकार होत नाही. भाताच्या वर लहान वाटी किंवा पानाची द्रोण ठेवून, ती भरून ग्रहण करतो, तर ते शिखराकार होत नाही. कुरुंदी अट्टकथेत देखील म्हटले आहे— ‘वाटीत किंवा पानात अन्न टाकून, ते पात्राच्या वर ठेवून देतात, तर ते स्वतंत्र भांडे मानले जात असल्याने चालते.’ อิธ อนาปตฺติยํ คิลาโน น อาคโต, ตสฺมา คิลานสฺสปิ ถูปีกตํ น วฏฺฏติ. สพฺพตฺถ ปน ปฏิคฺคเหตุเมว น วฏฺฏติ. ปฏิคฺคหิตํ ปน สุปฏิคฺคหิตเมว โหติ, ปริภุญฺชิตุํ วฏฺฏตีติ. या शिकवणुकीत अनापत्तीच्या (अपवाद) भागात ‘ग्लान’ (आजारी भिक्खू) असा उल्लेख आलेला नाही; म्हणून आजारी भिक्खूला देखील शिखराकार करून घेतलेले यावकालिक अन्न चालत नाही. परंतु सर्व बाबतीत केवळ ग्रहण करणेच अयोग्य आहे. ग्रहण केलेले अन्न मात्र सुगृहीतच असते आणि ते ग्रहण करणे (खाणे) योग्य आहे, असे समजावे. ตติโย วคฺโค. तिसरा वर्ग (वग्ग). ๔. สกฺกจฺจวคฺควณฺณนา ४. सक्कच्चवग्ग-वर्णना (सत्कारपूर्वक वर्गाचे वर्णन) ๖๐๖. สกฺกจฺจนฺติ เอตฺถาปิ อสกฺกจฺจํ ปฏิคฺคหเณเยว อาปตฺติ, ปฏิคฺคหิตํ ปน สุปฏิคฺคหิตเมว. สกฺกจฺจนฺติ จ ปตฺตสญฺญีติ จาติ อุภยํ วุตฺตนยเมว. ६०६. ‘सक्कच्चं’ (आदराने) यामध्ये देखील, अनादराने केवळ ग्रहण करण्यातच आपत्ती होते; परंतु ग्रहण केलेले अन्न सुगृहीतच असते. ‘सक्कच्चं’ आणि ‘पत्तसञ्ञी’ हे दोन्ही आधी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावे. ๖๐๘. สปทานนฺติ ตตฺถ ตตฺถ โอธึ อกตฺวา อนุปฏิปาฏิยา. สมสูปเก วตฺตพฺพํ วุตฺตเมว. ६०८. ‘सपदानं’ म्हणजे त्या त्या ठिकाणी मर्यादा न करता अनुक्रमाने घेणे. ‘समसूपक’ शिकवणुकीत जे सांगायचे होते, ते आधीच सांगितले आहे. ๖๑๐. ถูปกโตติ มตฺถกโต; เวมชฺฌโตติ อตฺโถ. ६१०. ‘थूपकतो’ म्हणजे शिखरावरून किंवा मधोमध, असा अर्थ आहे. ๖๑๑. ปฏิจฺฉาเทตฺวา [Pg.166] เทนฺตีติ มาฆาตสมยาทีสุ ปฏิจฺฉนฺนํ พฺยญฺชนํ กตฺวา เทนฺติ. วิญฺญตฺติยํ วตฺตพฺพํ นตฺถิ. ६११. ‘पटिच्छादेत्वा देन्ति’ (झाकून देतात) म्हणजे प्राणीहत्येवर बंदी असलेल्या काळात (माघात समयी) इत्यादी प्रसंगी, झाकलेले व्यंजन (मांस-मच्छीचे कालवण) करून देतात. ‘विञ्ञत्ति’ (याचना) शिकवणुकीत जे सांगायचे आहे, ते येथे वेगळे सांगण्यासारखे काही नाही. ๖๑๔. อุชฺฌานสญฺญีสิกฺขาปเทปิ คิลาโน น มุจฺจติ. ६१४. ‘उज्झानसञ्ञी’ शिकवणुकीत देखील आजारी भिक्खू आपत्तीतून मुक्त होत नाही. ๖๑๕. นาติมหนฺโต กพโฬติ มยูรณฺฑํ อติมหนฺตํ, กุกฺกุฏณฺฑํ อติขุทฺทกํ, เตสํ เวมชฺฌปฺปมาโณ. ขชฺชเกติ เอตฺถ มูลขาทนียาทิ สพฺพํ คเหตพฺพํ. ६१५. ‘नातिमहन्तो कवळो’ (फार मोठा नसलेला घात) यामध्ये, मोराचे अंडे अतिशय मोठे असते आणि कोंबडीचे अंडे अतिशय लहान असते; त्यांच्या मध्यम आकाराचा घास (म्हणजे फार मोठा नसलेला घास होय). ‘खज्जके’ (खाद्यपदार्थ) यामध्ये मूळ-खादनीय (मुळापासून बनवलेले खाद्य) इत्यादी सर्व खाद्यपदार्थ ग्रहण करावेत. จตุตฺโถ วคฺโค. चौथा वर्ग (वग्ग). ๕. กพฬวคฺควณฺณนา ५. कवळवग्ग-वर्णना (कवळ वर्गाचे वर्णन) ๖๑๗. อนาหเฏติ อนาหริเต; มุขทฺวารํ อสมฺปาปิเตติ อตฺโถ. ६१७. ‘अनाहटे’ म्हणजे न आणलेल्या, म्हणजेच मुखद्वारापर्यंत (तोंडापर्यंत) न पोहोचवलेल्या, असा अर्थ आहे. ๖๑๘. สพฺพํ หตฺถนฺติ สกลหตฺถํ. ६१८. ‘सब्बं हत्थं’ म्हणजे संपूर्ण हात (सर्व बोटे). ๖๑๙. สกพเฬนาติ เอตฺถ ธมฺมํ กเถนฺโต หรีตกํ วา ลฏฺฐิมธุกํ วา มุเข ปกฺขิปิตฺวา กเถติ. ยตฺตเกน วจนํ อปริปุณฺณํ น โหติ, ตตฺตเก มุขมฺหิ สนฺเต กเถตุํ วฏฺฏติ. ६१९. ‘सकवळेन’ (घास तोंडात असताना) यामध्ये, धम्म उपदेश करताना हिरडा किंवा ज्येष्ठमध तोंडात ठेवून बोलतात. ज्याच्यामुळे शब्द अपूर्ण होत नाहीत, तेवढी वस्तू तोंडात असताना बोलणे योग्य आहे. ๖๒๐. ปิณฺฑุกฺเขปกนฺติ ปิณฺฑํ อุกฺขิปิตฺวา อุกฺขิปิตฺวา. ६२०. ‘पिण्डुक्खेपकं’ म्हणजे घास वर फेकून-फेकून (खाणे). ๖๒๑. กพฬาวจฺเฉทกนฺติ กพฬํ อวจฺฉินฺทิตฺวา อวจฺฉินฺทิตฺวา. ६२१. ‘कवळावच्छेदकं’ म्हणजे घास तोडून-तोडून (खाणे). ๖๒๒. อวคณฺฑการกนฺติ มกฺกโฏ วิย คณฺเฑ กตฺวา กตฺวา. ६२२. ‘अवगण्डकारकं’ म्हणजे माकडाप्रमाणे गालात (घास) साठवून-साठवून (खाणे). ๖๒๓. หตฺถนิทฺธุนกนฺติ หตฺถํ นิทฺธุนิตฺวา นิทฺธุนิตฺวา. ६२३. ‘हत्थनिद्धुनकं’ म्हणजे हात झटकून-झटकून (खाणे). ๖๒๔. สิตฺถาวการกนฺติ สิตฺถานิ อวกิริตฺวา อวกิริตฺวา. ६२४. ‘सित्थावकारकं’ म्हणजे भाताचे शीत (कण) विखरून-विखरून (खाणे). ๖๒๕. ชิวฺหานิจฺฉารกนฺติ ชิวฺหํ นิจฺฉาเรตฺวา นิจฺฉาเรตฺวา. ६२५. ‘जिव्हानिच्छारकं’ म्हणजे जीभ बाहेर काढून-काढून (खाणे). ๖๒๖. จปุจปุการกนฺติ จปุ จปูติ เอวํ สทฺทํ กตฺวา กตฺวา. ६२६. ‘चपुचपुकारकं’ म्हणजे ‘चपु-चपु’ असा आवाज करून-करून (खाणे). ปญฺจโม วคฺโค. पाचवा वर्ग (वग्ग). ๖. สุรุสุรุวคฺควณฺณนา ६. सुरुसुरुवग्ग-वर्णना (सुरुसुरु वर्गाचे वर्णन) ๖๒๗. สุรุสุรุการกนฺติ [Pg.167] สุรุสุรูติ เอวํ สทฺทํ กตฺวา กตฺวา. ทโวติ ปริหาสวจนํ; ตํ เยน เกนจิ ปริยาเยน ‘‘กึ พุทฺโธ, สิลกพุทฺโธ, ปฏิพุทฺโธ; กึ ธมฺโม, โคธมฺโม, อชธมฺโม; กึ สงฺโฆ, มิคสงฺโฆ, ปสุสงฺโฆ’’ติอาทินา นเยน ตีณิ รตนานิ อารพฺภ น กาตพฺพนฺติ อตฺโถ. ६२७. ‘सुरुसुरुकारकं’ म्हणजे ‘सुरु-सुरु’ असा आवाज करून-करून (खाणे). ‘दवो’ म्हणजे थट्टा-मस्करीचे शब्द; ती थट्टा-मस्करी कोणत्याही प्रकारे, ‘बुद्ध म्हणजे काय? दगडाचे बुद्ध की प्रतिबुद्ध? धम्म म्हणजे काय? गाईचा धम्म की शेळीचा धम्म? संघ म्हणजे काय? हरणांचा संघ की पशूंचा संघ?’ इत्यादी प्रकारे त्रिरत्नांच्या बाबतीत करू नये, असा अर्थ आहे. ๖๒๘. หตฺถนิลฺเลหกนฺติ หตฺถํ นิลฺเลหิตฺวา นิลฺเลหิตฺวา. ภุญฺชนฺเตน หิ องฺคุลิมตฺตมฺปิ นิลฺเลหิตุํ น วฏฺฏติ. ฆนยาคุผาณิตปายาสาทิเก ปน องฺคุลีหิ คเหตฺวา องฺคุลิโย มุเข ปเวเสตฺวา ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. ปตฺตนิลฺเลหกโอฏฺฐนิลฺเลหเกสุปิ เอเสว นโย. ตสฺมา เอกงฺคุลิยาปิ ปตฺโต น นิลฺเลหิตพฺโพ, เอกโอฏฺโฐปิ ชิวฺหาย น นิลฺเลหิตพฺโพ, โอฏฺฐมํเสหิ เอว ปน คเหตฺวา อนฺโต ปเวเสตุํ วฏฺฏติ. ६२८. ‘हत्थनिल्लेहकं’ म्हणजे हात चाटून-चाटून (खाणे). भोजन करणाऱ्याने बोट देखील चाटणे योग्य नाही. परंतु दाट यागू, गुळ किंवा खीर इत्यादी बोटांनी घेऊन, बोटे तोंडात घालून खाणे योग्य आहे. ‘पत्तनिल्लेहक’ (पात्र चाटणे) आणि ‘ओट्ठनिल्लेहक’ (ओठ चाटणे) या शिकवणुकीत देखील हाच नियम आहे. म्हणून एका बोटाने देखील पात्र चाटू नये, एका बाजूचा ओठ देखील जिभेने चाटू नये, परंतु केवळ ओठांच्या साहाय्यानेच अन्न घेऊन तोंडात टाकणे योग्य आहे. ๖๓๑. โกกนเทติ เอวํนามเก. โกกนทนฺติ ปทุมํ วุจฺจติ, โส จ ปาสาโท ปทุมสณฺฐาโน, เตนสฺส โกกนโทตฺเวว นามํ อกํสุ. น สามิเสน หตฺเถน ปานียถาลกนฺติ เอตํ ปฏิกฺกูลวเสน ปฏิกฺขิตฺตํ, ตสฺมา สงฺฆิกมฺปิ ปุคฺคลิกมฺปิ คิหิสนฺตกมฺปิ อตฺตโน สนฺตกมฺปิ สงฺขมฺปิ สราวมฺปิ ถาลกมฺปิ น คเหตพฺพเมว, คณฺหนฺตสฺส ทุกฺกฏํ. สเจ ปน หตฺถสฺส เอกเทโส อามิสมกฺขิโต น โหติ, เตน ปเทเสน คเหตุํ วฏฺฏติ. ६३१. ‘कोकनदे’ म्हणजे या नावाच्या प्रासादात. ‘कोकनद’ कमळाला म्हटले जाते, आणि तो प्रासाद कमळाच्या आकाराचा होता, म्हणून त्याचे नाव ‘कोकनद’ असे ठेवले गेले. ‘न सामिसेन हत्थेन पानीयथालकं’ (खरकट्या हाताने पाण्याचे भांडे धरू नये) हे अमंगळ असल्यामुळे वर्ज्य केले आहे. म्हणून संघाचे असो, वैयक्तिक असो, गृहस्थांचे असो किंवा स्वतःचे असो, शंख, मातीचे भांडे किंवा पाण्याचे भांडे खरकट्या हाताने धरूच नये; ते धरणाऱ्याला दुक्कट आपत्ती होते. परंतु जर हाताचा एखादा भाग खरकटा नसेल, तर त्या भागाने ते भांडे धरण्यास हरकत नाही. ๖๓๒. อุทฺธริตฺวา วาติ สิตฺถานิ อุทกโต อุทฺธริตฺวา เอกสฺมึ ฐาเน ราสึ กตฺวา อุทกํ ฉฑฺเฑติ. ภินฺทิตฺวา วาติ สิตฺถานิ ภินฺทิตฺวา อุทกคติกานิ กตฺวา ฉฑฺเฑติ. ปฏิคฺคเห วาติ ปฏิคฺคเหน ปฏิจฺฉนฺโต นํ ปฏิคฺคเห ฉฑฺเฑติ. นีหริตฺวาติ พหิ นีหริตฺวา ฉฑฺเฑติ; เอวํ ฉฑฺเฑนฺตสฺส อนาปตฺติ. ६३२. 'उद्धरित्वा' (बाहेर काढून) म्हणजे भाताचे शीत पाण्यातून बाहेर काढून एका ठिकाणी त्याचा ढीग करून पाणी टाकून देणे होय. 'भिन्दित्वा' (बारीक करून) म्हणजे भाताचे शीत बारीक करून पाण्यासारखे पातळ करून टाकून देणे होय. 'पटिग्गहे' (हात धुण्याच्या पात्रात) म्हणजे स्वीकारणारा ते भाताचे शीत हात धुण्याच्या पात्रात टाकून देतो. 'नीहरित्वा' (बाहेर नेऊन) म्हणजे बाहेर नेऊन टाकून देणे होय. अशा प्रकारे टाकून देणाऱ्या भिक्खूंना आपत्ती होत नाही (अनापत्ती असते). ๖๓๔. เสตจฺฉตฺตนฺติ วตฺถปลิคุณฺฐิตํ ปณฺฑรจฺฉตฺตํ. กิลญฺชจฺฉตฺตนฺติ วิลีวจฺฉตฺตํ. ปณฺณจฺฉตฺตนฺติ ตาลปณฺณาทีหิ เยหิ เกหิจิ กตํ. มณฺฑลพทฺธํ สลากพทฺธนฺติ อิทํ ปน ติณฺณมฺปิ ฉตฺตานํ ปญฺชรทสฺสนตฺถํ วุตฺตํ. ตานิ หิ มณฺฑลพทฺธานิ เจว โหนฺติ สลากพทฺธานิ จ. ยมฺปิ ตตฺถชาตกทณฺฑเกน กตํ เอกปณฺณจฺฉตฺตํ โหติ, ตมฺปิ ฉตฺตเมว. เอเตสุ ยํกิญฺจิ ฉตฺตํ ปาณิมฺหิ [Pg.168] อสฺสาติ ฉตฺตปาณิ. โส ตํ ฉตฺตํ ธารยมาโน วา อํเส วา กตฺวา อูรุมฺหิ วา ฐเปตฺวา ยาว หตฺเถน น มุจฺจติ, ตาวสฺส ธมฺมํ เทเสตุํ น วฏฺฏติ, เทเสนฺตสฺส วุตฺตนเยน ทุกฺกฏํ. สเจ ปนสฺส อญฺโญ ฉตฺตํ ธาเรติ, ฉตฺตปาทุกาย วา ฐิตํ โหติ, หตฺถโต อปคตมตฺเต ฉตฺตปาณิ นาม น โหติ. ตสฺส ธมฺมํ เทเสตุํ วฏฺฏติ. ธมฺมปริจฺเฉโท ปเนตฺถ ปทโสธมฺเม วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. ६३४. 'सेतछत्तं' (श्वेतछत्र) म्हणजे पांढऱ्या कापडाने वेढलेले पांढरे छत्र होय. 'किलञ्जछत्तं' म्हणजे बांबूच्या कामट्यांनी बनवलेले छत्र होय. 'पण्णछत्तं' (पर्णछत्र) म्हणजे ताडपत्रादी कोणत्याही पानांनी बनवलेले छत्र होय. 'मण्डलबद्धं सलाकाबद्धं' (वर्तुळाकार बांधलेले, कामट्यांनी बांधलेले) हे मात्र तिन्ही प्रकारच्या छत्रांचा सांगाडा दर्शवण्यासाठी म्हटले आहे. कारण ती छत्रे वर्तुळाकार बांधलेली किंवा कामट्यांनी बांधलेली असतात. त्या झाडाच्या दांड्याने बनवलेले एका पानाचे छत्र जरी असले, तरी ते सुद्धा छत्रच मानले जाते. या छत्रांपैकी कोणतेही छत्र ज्याच्या हातात असते, त्याला 'छत्रपाणि' (हातात छत्र असलेला) म्हणतात. त्याने ते छत्र धरलेले असो, खांद्यावर ठेवलेले असो किंवा मांडीवर ठेवलेले असो, जोपर्यंत ते हातातून सुटत नाही, तोपर्यंत त्यांना धम्मोपदेश करणे योग्य नाही; उपदेश केल्यास सांगितलेल्या नियमानुसार दुक्कट (दुष्कृत) आपत्ती होते. पण जर दुसऱ्या कोणी त्यांच्यासाठी छत्र धरले असेल किंवा ते छत्र छत्राच्या स्टँडवर (छत्रपादुकेवर) ठेवलेले असेल, तर हातातून छत्र दूर होताच तो 'छत्रपाणि' राहत नाही. त्यांना धम्मोपदेश करणे योग्य आहे. येथे धम्माची व्याख्या 'पदसोधम्म' सिक्खापदात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजली पाहिजे. ๖๓๕. ทณฺฑปาณิสฺสาติ เอตฺถ ทณฺโฑ นาม มชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส จตุหตฺถปฺปมาโณ ทณฺฑปาณิภาโว ปนสฺส ฉตฺตปาณิมฺหิ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. ६३५. 'दण्डपाणिस्स' (हातात काठी घेतलेल्याला) यामध्ये 'दंड' म्हणजे मध्यम आकाराच्या पुरुषाच्या चार हात प्रमाणाची काठी (दंड) होय. त्याची 'दंडपाणि' असण्याची स्थिती 'छत्रपाणि' च्या बाबतीत सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजली पाहिजे. ๖๓๖. สตฺถปาณิมฺหิปิ เอเสว นโย. อสึ สนฺนหิตฺวา ฐิโตปิ หิ สตฺถปาณิสงฺขฺยํ น คจฺฉติ. ६३६. 'सत्थपाणि' (हातात शस्त्र घेतलेल्या) च्या बाबतीत सुद्धा हाच नियम आहे. कारण तलवार (कमरेला) बांधून उभा असलेला मनुष्य सुद्धा 'सत्थपाणि' च्या व्याख्येत येत नाही. ๖๓๗. อาวุธปาณิสฺสาติ เอตฺถ กิญฺจาปิ วุตฺตํ – ‘‘อาวุธํ นาม จาโป โกทณฺโฑ’’ติ, อถ โข สพฺพาปิ ธนุวิกติ สทฺธึ สรวิกติยา อาวุธนฺติ เวทิตพฺพํ. ตสฺมา สทฺธึ วา สเรน ธนุํ คเหตฺวา สุทฺธธนุํ วา สุทฺธสรํ วา สชิยธนุํ วา นิชฺชิยธนุํ วา คเหตฺวา ฐิตสฺส วา นิสินฺนสฺส วา ธมฺโม เทเสตุํ น วฏฺฏติ. สเจ ปนสฺส ธนุํ กณฺเฐปิ ปฏิมุกฺกํ โหติ, ยาว หตฺเถน น คณฺหาติ, ตาว ธมฺมํ เทเสตุํ วฏฺฏติเยวาติ. ६३७. 'आवुधपाणिस्स' (हातात आयुध घेतलेल्याला) यामध्ये जरी असे म्हटले असले की, "आयुध म्हणजे चाप किंवा कोदंड (धनुष्य)", तरीसुद्धा बाणांच्या विविध रूपांसह सर्व प्रकारची धनुष्ये 'आयुध' (शस्त्र) म्हणून समजली पाहिजेत. म्हणून, बाणासह धनुष्य घेऊन, किंवा केवळ धनुष्य घेऊन, किंवा केवळ बाण घेऊन, किंवा प्रत्यंचा चढवलेले धनुष्य घेऊन, किंवा प्रत्यंचा नसलेले धनुष्य घेऊन उभा असलेल्या किंवा बसलेल्या व्यक्तीला धम्मोपदेश करणे योग्य नाही. पण जर त्याचे धनुष्य गळ्यात अडकवलेले असेल, तर जोपर्यंत तो हाताने ते धरत नाही, तोपर्यंत धम्मोपदेश करणे योग्यच आहे. ฉฏฺโฐ วคฺโค. सहावा वग्ग समाप्त. ๗. ปาทุกวคฺควณฺณนา ७. पादुकावग्ग-वर्णना (पादुका वग्गाचे स्पष्टीकरण) ๖๓๘. อกฺกนฺตสฺสาติ ฉตฺตทณฺฑเก องฺคุลนฺตรํ อปฺปเวเสตฺวา เกวลํ ปาทุกํ อกฺกมิตฺวา ฐิตสฺส. ปฏิมุกฺกสฺสาติ ปฏิมุญฺจิตฺวา ฐิตสฺส. อุปาหนายปิ เอเสว นโย. โอมุกฺโกติ ปเนตฺถ ปณฺหิกพทฺธํ โอมุญฺจิตฺวา ฐิโต วุจฺจติ. ६३८. 'अक्कन्तस्स' (पादुकांवर पाय ठेवलेल्याला) म्हणजे पादुकेच्या खुंटीमध्ये बोटांमधील जागा न घालता केवळ पादुकेवर पाय ठेवून उभा असलेल्याला. 'पटिमुक्कस्स' म्हणजे पादत्राणे घालून उभा असलेल्याला. चपलेच्या (उपाहानाच्या) बाबतीत सुद्धा हाच नियम आहे. येथे 'ओमुक्को' म्हणजे टाचेचा बंध (टाचेची पट्टी) काढून उभा असलेला मनुष्य होय. ๖๔๐. ยานคตสฺสาติ เอตฺถ สเจปิ ทฺวีหิ ชเนหิ หตฺถสงฺฆาเฏน คหิโต, สาฏเก วา ฐเปตฺวา วํเสน วยฺหติ, อยุตฺเต วา วยฺหาทิเก ยาเน[Pg.169], วิสงฺขริตฺวา วา ฐปิเต จกฺกมตฺเตปิ นิสินฺโน ยานคโตตฺเวว สงฺขฺยํ คจฺฉติ. สเจ ปน ทฺเวปิ เอกยาเน นิสินฺนา โหนฺติ, วฏฺฏติ. วิสุํ นิสินฺเนสุปิ อุจฺเจ ยาเน นิสินฺเนน นีเจ นิสินฺนสฺส เทเสตุํ วฏฺฏติ, สมปฺปมาเณปิ วฏฺฏติ. ปุริเม ยาเน นิสินฺเนน ปจฺฉิเม นิสินฺนสฺส วฏฺฏติ. ปจฺฉิเม ปน อุจฺจตเรปิ นิสินฺเนน เทเสตุํ น วฏฺฏติ. ६४०. 'यानगतस्स' (वाहनात बसलेल्याला) यामध्ये, जरी दोन माणसांनी हातांची साखळी करून उचललेले असेल, किंवा कपड्यात ठेवून बांबूने वाहून नेले जात असेल, याशिवाय बैल-घोडे न जुंपलेल्या पालखी इत्यादी वाहनात बसलेला असेल, किंवा सुटे करून ठेवलेल्या केवळ चाकांवर बसलेला असेल, तरी तो 'यानगत' (वाहनात बसलेला) याच संज्ञेस प्राप्त होतो. पण जर दोघेही एकाच वाहनात बसलेले असतील, तर उपदेश करणे योग्य आहे. वेगवेगळ्या वाहनात बसलेले असताना मात्र, उंच वाहनात बसलेल्या भिक्खूंनी खालच्या वाहनात बसलेल्या व्यक्तीला धम्मोपदेश करणे योग्य आहे, तसेच समान उंचीच्या वाहनात बसलेल्याला सुद्धा उपदेश करणे योग्य आहे. पुढच्या वाहनात बसलेल्या भिक्खूंनी मागच्या वाहनात बसलेल्या व्यक्तीला उपदेश करणे योग्य आहे. पण मागच्या अधिक उंच वाहनात बसलेल्या भिक्खूंनी (पुढच्या वाहनातील व्यक्तीला) उपदेश करणे योग्य नाही. ๖๔๑. สยนคตสฺสาติ อนฺตมโส กฏสารเกปิ ปกติภูมิยมฺปิ นิปนฺนสฺส อุจฺเจปิ มญฺจปีเฐ วา ภูมิปเทเส วา ฐิเตน นิสินฺเนน วา เทเสตุํ น วฏฺฏติ. สยนคเตน ปน สยนคตสฺส อุจฺจตเร วา สมปฺปมาเณ วา นิปนฺเนน เทเสตุํ วฏฺฏติ. นิปนฺเนน จ ฐิตสฺส วา นิสินฺนสฺส วา เทเสตุํ วฏฺฏติ, นิสินฺเนนาปิ ฐิตสฺส วา นิสินฺนสฺส วา วฏฺฏติ. ฐิเตน ฐิตสฺเสว วฏฺฏติ. ६४१. 'sayanagatassā' (शय्येवर असलेल्याला) म्हणजे अगदी चटईवर किंवा साध्या जमिनीवर निजलेल्या (झोपलेल्या) व्यक्तीला, उंच पलंग-पाटावर किंवा जमिनीवर उभे राहून किंवा बसून धम्मोपदेश करणे योग्य नाही. शय्येवर असलेल्या भिक्खूंनी मात्र शय्येवर असलेल्या व्यक्तीला, अधिक उंच किंवा समान उंचीच्या शय्येवर निजलेल्या अवस्थेत उपदेश करणे योग्य आहे. आणि निजलेल्या भिक्खूंनी उभे असलेल्या किंवा बसलेल्या व्यक्तीला उपदेश करणे योग्य आहे, तसेच बसलेल्या भिक्खूंनी सुद्धा उपदेश करणे योग्य आहे. उभे असलेल्या भिक्खूंनी केवळ उभे असलेल्या व्यक्तीलाच उपदेश करणे योग्य आहे. ๖๔๒. ปลฺลตฺถิกายาติ อาโยคปลฺลตฺถิกาย วา หตฺถปลฺลตฺถิกาย วา ทุสฺสปลฺลตฺถิกาย วา ยาย กายจิ ปลฺลตฺถิกาย นิสินฺนสฺส อคิลานสฺส เทเสตุํ น วฏฺฏติ. ६४२. 'पल्लत्थिकाय' (गुडघे बांधून बसलेल्याला) म्हणजे योगपट्ट बांधून, हाताने गुडघे बांधून किंवा कपड्याने गुडघे बांधून, अशा कोणत्याही प्रकारे गुडघे बांधून बसलेल्या निरोगी व्यक्तीला धम्मोपदेश करणे योग्य नाही. ๖๔๓. เวฐิตสีสสฺสาติ ทุสฺสเวฐเนน วา โมฬิอาทีหิ วา ยถา เกสนฺโต น ทิสฺสติ; เอวํ เวฐิตสีสสฺส. ६४३. 'वेठितसीसस्स' (डोके वेढलेल्याला) म्हणजे कपड्याच्या वेढणाने (पगडीने) किंवा मुकुट इत्यादींनी ज्या प्रकारे केसांची सीमा दिसत नाही, अशा प्रकारे डोके वेढलेल्याला. ๖๔๔. โอคุณฺฐิตสีสสฺสาติ สสีสํ ปารุตสฺส. ६४४. 'ओगुण्ठितसीसस्स' (डोके ओढून घेतलेल्याला) म्हणजे डोक्यासह संपूर्ण शरीर पांघरलेल्याला (डोक्यावरून वस्त्र ओढून घेतलेल्याला). ๖๔๕. ฉมายํ นิสินฺเนนาติ ภูมิยํ นิสินฺเนน. อาสเน นิสินฺนสฺสาติ อนฺตมโส วตฺถมฺปิ ติณานิปิ สนฺถริตฺวา นิสินฺนสฺส. ६४५. 'छमायं निसिन्नेन' म्हणजे जमिनीवर बसलेल्या भिक्खूंनी. 'आसने निसिन्नस्स' म्हणजे अगदी कमीत कमी कपडा किंवा गवत पसरून त्यावर बसलेल्याला. ๖๔๗. ฉปกสฺสาติ จณฺฑาลสฺส. ฉปกีติ จณฺฑาลี. นิลีโนติ ปฏิจฺฉนฺโน หุตฺวา. ยตฺร หิ นามาติ โย หิ นาม. สพฺพมิทํ จริมํ กตนฺติ ตตฺเถว ปริปตีติ ‘‘สพฺโพ อยํ โลโก สงฺกรํ คโต นิมฺมริยาโท’’ติ อิมํ วจนํ วตฺวา ตตฺเถว เตสํ ทฺวินฺนมฺปิ อนฺตรา รุกฺขโต ปติโต. ปติตฺวา จ ปน อุภินฺนมฺปิ ปุรโต ฐตฺวา อิมํ คาถํ อภาสิ – ६४७. 'छपकस्स' म्हणजे चांडाळाचे. 'छपकी' म्हणजे चांडाळी. 'निलीनो' म्हणजे लपलेला होऊन. 'यत्र हि नाम' म्हणजे जो कोणी. "हा सर्व लोक संकराला प्राप्त झाला आहे आणि मर्यादाहीन झाला आहे" असे हे वचन बोलून, तिथेच त्या दोघांच्या मध्ये झाडावरून पडला. आणि पडल्यानंतर त्या दोघांच्याही समोर उभा राहून ही गाथा म्हणाला – ‘‘อุโภ อตฺถํ น ชานนฺติ…เป… อสฺมา กุมฺภมิวาภิทา’’ติ. "दोघेही अर्थ जाणत नाहीत...पे... दगडाने घागरीसारखे फुटेल." ตตฺถ อุโภ อตฺถํ น ชานนฺตีติ ทฺเวปิ ชนา ปาฬิยา อตฺถํ น ชานนฺติ. ธมฺมํ น ปสฺสเรติ ปาฬึ น ปสฺสนฺติ. กตเม เต อุโภติ? ‘‘โย จายํ มนฺตํ [Pg.170] วาเจติ, โย จาธมฺเมนธียตี’’ติ. เอวํ พฺราหฺมณญฺจ ราชานญฺจ อุโภปิ อธมฺมิกภาเว ฐเปสิ. त्या गाथेत, 'उभो अत्थं न जानन्ति' म्हणजे दोघेही जण पाळीचा (पाठाचा) अर्थ जाणत नाहीत. 'धम्मं न पस्सरे' म्हणजे पाळीला (पाठाला) पाहत नाहीत. ते दोघे कोण? "जो हा मंत्र शिकवतो आणि जो अधर्माने शिकतो." अशा प्रकारे त्याने ब्राह्मण आणि राजा या दोघांनाही अधार्मिकतेच्या स्थितीत ठेवले. ตโต พฺราหฺมโณ สาลีนนฺติ คาถมาห. ตสฺสตฺโถ – ชานามหํ โภ ‘‘อยํ อธมฺโม’’ติ; อปิ จ โข มยา ทีฆรตฺตํ สปุตฺตทารปริชเนน รญฺโญ สนฺตโก สาลีนํ โอทโน ภุตฺโต. สุจิมํสูปเสจโนติ นานปฺปการวิกติสมฺปาทิตํ สุจิมํสูปเสจนํ มิสฺสีกรณมสฺสาติ สุจิมํสูปเสจโน. ตสฺมา ธมฺเม น วตฺตามีติ ยสฺมา เอวํ มยา รญฺโญ โอทโน ภุตฺโต, อญฺเญ จ พหู ลาภา ลทฺธา, ตสฺมา ธมฺเม อหํ น วตฺตามิ อุทเร พทฺโธ หุตฺวา, น ธมฺมํ อชานนฺโต. อยญฺหิ ธมฺโม อริเยหิ วณฺณิโต ปสตฺโถ โถมิโตติ ชานามิ. तदनंतर ब्राह्मणाने 'सालीनं' ही गाथा म्हटली. तिचा अर्थ असा – "हे महाशया, 'हा अधर्म आहे' हे मी जाणतो; तरीसुद्धा मी माझ्या पुत्र, पत्नी आणि परिवारासह दीर्घकाळापर्यंत राजाचा साळीच्या तांदळाचा भात खाल्ला आहे." 'सुचिमंसूपसे चनो' म्हणजे विविध प्रकारच्या पक्वान्नांनी युक्त आणि शुद्ध मांसाच्या रसाने मिश्रित असलेला भात होय. "म्हणून मी धम्माचे आचरण करत नाही" म्हणजे ज्याअर्थी मी राजाचा भात खाल्ला आहे आणि इतरही अनेक लाभ प्राप्त केले आहेत, म्हणून मी पोटाच्या स्वार्थासाठी धम्माचे आचरण करत नाही, धम्म जाणत नसल्यामुळे नाही. कारण "हा धम्म आर्यांनी (सत्पुरुषांनी) वर्णित, प्रशंसित आणि स्तुती केलेला आहे" हे मी जाणतो. อถ นํ ฉปโก ‘‘ธิรตฺถู’’ติอาทินา คาถาทฺวเยน อชฺฌภาสิ. ตสฺสตฺโถ – โย ตยา ธนลาโภ จ ยสลาโภ จ ลทฺโธ, ธิรตฺถุ ตํ ธนลาภํ ยสลาภญฺจ พฺราหฺมณ. กสฺมา? ยสฺมา อยํ ตยา ลทฺโธ ลาโภ อายตึ อปาเยสุ วินิปาตนเหตุนา สมฺปติ จ อธมฺมจรเณน วุตฺติ นาม โหติ. เอวรูปา ยา วุตฺติ อายตึ วินิปาเตน อิธ อธมฺมจรเณน วา นิปฺปชฺชติ, กึ ตาย วุตฺติยา? เตน วุตฺตํ – त्यानंतर त्या चांडाळाने (छपक) 'धिरत्थु' (धिक्कार असो) इत्यादी दोन गाथांद्वारे त्या ब्राह्मणाला संबोधित केले. त्याचा अर्थ असा आहे – हे ब्राह्मणा, तुला जो धनलाभ आणि यशोलाभ मिळाला आहे, त्या धनलाभाचा आणि यशोलाभाचा धिक्कार असो! का? कारण तुझ्याद्वारे प्राप्त झालेला हा लाभ भविष्यात अपायांमध्ये (दुर्गतीमध्ये) पडण्याचे कारण बनतो आणि सध्या अधर्माचरणाने चालणारी ही उपजीविका (वृत्ती) आहे. अशी उपजीविका, जी भविष्यात दुर्गतीला कारणीभूत ठरते किंवा या जन्मात अधर्माचरणाने सिद्ध होते, अशा उपजीविकेचा काय उपयोग? म्हणूनच असे म्हटले आहे – ‘‘ธิรตฺถุ ตํ ธนลาภํ, ยสลาภญฺจ พฺราหฺมณ; ยา วุตฺติ วินิปาเตน, อธมฺมจรเณน วา’’ติ. “हे ब्राह्मणा, त्या धनलाभाचा आणि यशोलाभाचा धिक्कार असो; जी उपजीविका दुर्गतीला कारणीभूत ठरून किंवा अधर्माचरणाने प्राप्त होते.” ปริพฺพช มหาพฺรหฺเมติ มหาพฺราหฺมณ อิโต ทิสา สีฆํ ปลายสฺสุ. ปจนฺตญฺเญปิ ปาณิโนติ อญฺเญปิ สตฺตา ปจนฺติ เจว ภุญฺชนฺติ จ; น เกวลํ ตฺวญฺเจว ราชา จ. มา ตฺวํ อธมฺโม อาจริโต อสฺมา กุมฺภมิวาภิทาติ สเจ หิ ตฺวํ อิโต อปริพฺพชิตฺวา อิมํ อธมฺมํ อาจริสฺสสิ, ตโต ตฺวํ โส อธมฺโม เอวํ อาจริโต ยถา อุทกกุมฺภํ ปาสาโณ ภินฺเทยฺย; เอวํ เภจฺฉติ, เตน มยํ ตํ วทาม – ‘परिव्वज महाब्रह्मे’ (हे महाब्राह्मणा, येथून निघून जा) म्हणजे हे महाब्राह्मणा, या दिशेकडून वेगाने पळून जा. ‘पचन्तञ्ञेपि पाणिनो’ म्हणजे इतर प्राणी देखील शिजवून खातात; केवळ तू आणि राजाच शिजवून खात नाही. ‘मा त्वं अधम्मो आचरितो अस्मा कुम्भमिवाभिदा’ म्हणजे जर तू येथून निघून न जाता या अधर्माचे आचरण करत राहिलास, तर तुझ्याद्वारे आचरलेला तो अधर्म तुला तसाच नष्ट करेल (फोडून टाकेल), ज्याप्रमाणे दगड पाण्याचा घडा फोडून टाकतो. म्हणूनच आम्ही तुला सांगतो – ‘‘ปริพฺพช มหาพฺรหฺเม, ปจนฺตญฺเญปิ ปาณิโน; มา ตฺวํ อธมฺโม อาจริโต, อสฺมา กุมฺภมิวาภิทา’’ติ. “हे महाब्राह्मणा, येथून निघून जा, इतर प्राणी देखील शिजवून खातात; तुझ्याद्वारे आचरलेला अधर्म तुला तसा नष्ट न करो, जसा दगड पाण्याचा घडा फोडून टाकतो.” อุจฺเจ อาสเนติ อนฺตมโส ภูมิปฺปเทเสปิ อุนฺนตฏฺฐาเน นิสินฺนสฺส เทเสตุํ น วฏฺฏติ. ‘उच्चे आसने’ म्हणजे अगदी जमिनीवर सुद्धा उंच जागेवर बसलेल्या (निरोगी) व्यक्तीला धम्म उपदेश करणे योग्य नाही. ๖๔๘. น [Pg.171] ฐิโต นิสินฺนสฺสาติ สเจปิ เถรุปฏฺฐานํ คนฺตฺวา ฐิตํ ทหรภิกฺขุํ อาสเน นิสินฺโน มหาเถโร ปญฺหํ ปุจฺฉติ, น กเถตพฺพํ. คารเวน ปน เถรํ อุฏฺฐหิตฺวา ปุจฺฉถาติ วตฺตุํ น สกฺกา, ปสฺเส ฐิตภิกฺขุสฺส กเถมีติ กเถตุํ วฏฺฏติ. ६४८. ‘न ठितो निसिन्नस्स’ (उभ्या असलेल्याने बसलेल्याला उपदेश करू नये) म्हणजे जर आसनावर बसलेले महाथेर, थेरांच्या सेवेसाठी येऊन उभ्या असलेल्या तरुण भिक्खूला प्रश्न विचारतात, तर त्याने उत्तर देऊ नये. परंतु, आदरापोटी थेरांना 'उठून विचारा' असे सांगणे शक्य नाही, म्हणून 'मी बाजूला उभ्या असलेल्या भिक्खूला सांगत आहे' असा विचार करून उत्तर देणे योग्य ठरते. ๖๔๙. น ปจฺฉโต คจฺฉนฺเตนาติ เอตฺถ สเจ ปุรโต คจฺฉนฺโต ปจฺฉโต คจฺฉนฺตํ ปญฺหํ ปุจฺฉติ, น กเถตพฺพํ. ปจฺฉิมสฺส ภิกฺขุโน กเถมีติ กเถตุํ วฏฺฏติ. สทฺธึ อุคฺคหิตธมฺมํ ปน สชฺฌายิตุํ วฏฺฏติ. สมธุเรน คจฺฉนฺตสฺส กเถตุํ วฏฺฏติ. ६४९. ‘न पच्छतो गच्छन्तेन’ (मागे चालणाऱ्याने पुढे चालणाऱ्याला उपदेश करू नये) यामध्ये जर पुढे चालणारी व्यक्ती मागे चालणाऱ्या व्यक्तीला प्रश्न विचारते, तर उत्तर देऊ नये. 'मी मागे असणाऱ्या भिक्खूला सांगत आहे' असा विचार करून बोलणे योग्य ठरते. परंतु, गुरुंकडून शिकलेल्या धम्माचे एकत्र पठण (सज्झाय) करणे योग्य आहे. बरोबरीने (समांतर) चालणाऱ्या व्यक्तीला उपदेश करणे योग्य आहे. ๖๕๐. น อุปฺปเถนาติ เอตฺถาปิ สเจ ทฺเวปิ สกฏปเถ เอเกกจกฺกปเถน วา อุปฺปเถน วา สมธุรํ คจฺฉนฺติ, วฏฺฏติ. ६५०. ‘न उप्पथेन’ (चुकीच्या मार्गाने चालताना उपदेश करू नये) यामध्ये देखील जर दोघेही बैलगाडीच्या रस्त्यावरून, एका-एका चाकाच्या मार्गाने किंवा बाजूच्या मार्गाने बरोबरीने चालत असतील, तर उपदेश करणे योग्य आहे. ๖๕๑. อสญฺจิจฺจาติ ปฏิจฺฉนฺนฏฺฐานํ คจฺฉนฺตสฺส สหสา อุจฺจาโร วา ปสฺสาโว วา นิกฺขมติ, อสญฺจิจฺจ กโต นาม อนาปตฺติ. ६५१. ‘असंचिच्च’ (अनावधानाने/इच्छा नसताना) म्हणजे एखाद्या झाकलेल्या जागेकडे जात असताना अचानक मल किंवा मूत्र विसर्जन झाले, तर ते अनावधानाने केलेले मानले जाते आणि त्यात कोणताही आक्षेप (अनापत्ती) नसतो. ๖๕๒. น หริเตติ เอตฺถ ยมฺปิ ชีวรุกฺขสฺส มูลํ ปถวิยํ ทิสฺสมานํ คจฺฉติ, สาขา วา ภูมิลคฺคา คจฺฉติ, สพฺพํ หริตสงฺขาตเมว. ขนฺเธ นิสีทิตฺวา อปฺปหริตฏฺฐาเน ปาเตตุํ วฏฺฏติ. อปฺปหริตฏฺฐานํ โอโลเกนฺตสฺเสว สหสา นิกฺขมติ, คิลานฏฺฐาเน ฐิโต โหติ, วฏฺฏติ. อปฺปหริเต กโตติ อปฺปหริตํ อลภนฺเตน ติณณฺฑุปกํ วา ปลาลณฺฑุปกํ วา ฐเปตฺวา กโตปิ ปจฺฉา หริตํ โอตฺถรติ, วฏฺฏติเยว. เขเฬน เจตฺถ สิงฺฆาณิกาปิ สงฺคหิตาติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. ६५२. ‘न हरिते’ (हिरवळीवर मलमूत्र विसर्जन करू नये) यामध्ये जिवंत झाडाचे जे मूळ जमिनीवर उघडे दिसते किंवा जी फांदी जमिनीला टेकलेली असते, ते सर्व 'हरित' (हिरवळ) मानले जाते. झाडाच्या खोडावर बसून हिरवळ नसलेल्या जागेवर विसर्जन करणे योग्य आहे. हिरवळ नसलेली जागा शोधत असतानाच जर अचानक विसर्जन झाले, तर तो आजारी व्यक्तीच्या स्थितीत मानला जातो, त्यामुळे ते योग्य आहे. ‘अप्पहरिते कतो’ म्हणजे हिरवळ नसलेली जागा न मिळाल्यास भिक्खूने गवताची पेंढी (तिणण्डुपक) किंवा पेंढ्याची पेंढी ठेवून त्यावर विसर्जन केले आणि नंतर ते हिरवळीवर पसरले, तरी ते योग्यच आहे. या शिक्षापदामध्ये लाळ आणि शेंबूड यांचाही समावेश होतो, असे 'महापच्चरी' मध्ये म्हटले आहे. ๖๕๓. น อุทเกติ เอตํ ปริโภคอุทกเมว สนฺธาย วุตฺตํ, วจฺจกุฏิสมุทฺทาทิอุทเกสุ ปน อปริโภเคสุ อนาปตฺติ. เทเว วสฺสนฺเต สมนฺตโต อุทโกโฆ โหติ, อนุทกฏฺฐานํ โอโลเกนฺตสฺเสว นิกฺขมติ, วฏฺฏติ. มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ – ‘‘เอตาทิเส กาเล อนุทกฏฺฐานํ อลภนฺเตน กาตุํ วฏฺฏตี’’ติ. เสสํ สพฺพสิกฺขาปเทสุ อุตฺตานตฺถเมว. ६५३. ‘न उदके’ (पाण्यात मलमूत्र विसर्जन करू नये) हे केवळ वापरण्यायोग्य पाण्याच्या संदर्भात भगवंतांनी म्हटले आहे. परंतु, शौचालयातील पाणी किंवा समुद्राचे पाणी यांसारख्या न वापरण्यायोग्य पाण्यात विसर्जन केल्यास कोणताही आक्षेप (अनापत्ती) नाही. पाऊस पडत असताना सर्वत्र पाण्याचा पूर आलेला असतो, अशा वेळी कोरडी जागा शोधत असतानाच जर विसर्जन झाले, तर ते योग्य आहे. 'महापच्चरी' मध्ये म्हटले आहे – 'अशा वेळी कोरडी जागा न मिळाल्यास विसर्जन करणे योग्य आहे.' उर्वरित सर्व शिक्षापदांचा अर्थ स्पष्टच आहे. สตฺตโม วคฺโค. सातवा वर्ग समाप्त. สมุฏฺฐานาทิทีปนตฺถาย ปเนตฺถ อิทํ ปกิณฺณกํ – อุชฺชคฺฆิกอุจฺจาสทฺทปฏิสํยุตฺตานิ จตฺตาริ, สกพเฬน มุเขน พฺยาหรณํ เอกํ, ฉมานีจาสนฐานปจฺฉโตคมนอุปฺปถคมนปฏิสํยุตฺตานิ ปญฺจาติ อิมานิ ทส สิกฺขาปทานิ สมนุภาสนสมุฏฺฐานานิ กายวาจาจิตฺตโต สมุฏฺฐหนฺติ, กิริยานิ, สญฺญาวิโมกฺขานิ[Pg.172], สจิตฺตกานิ, โลกวชฺชานิ, กายกมฺมวจีกมฺมานิ, อกุสลจิตฺตานิ, ทุกฺขเวทนานีติ. उत्पत्ती (समुत्थान) इत्यादी स्पष्ट करण्यासाठी येथे हा संकीर्ण निर्णय आहे – मोठ्याने हसणे आणि मोठ्याने आवाज करणे यासंबंधीची चार शिक्षापदे, तोंडात घास असताना बोलण्याचे एक शिक्षापद, आणि जमिनीवर बसणे, खालच्या आसनावर बसणे, उभे राहणे, मागे चालणे व चुकीच्या मार्गाने चालणे यासंबंधीची पाच शिक्षापदे – अशी ही दहा शिक्षापदे 'समनुभासन' शिक्षापदाप्रमाणेच उत्पत्ती असणारी आहेत. ती काय, वाचा आणि चित्तापासून उत्पन्न होतात; ती क्रियात्मक (किरिया) आहेत, संज्ञेपासून मुक्त (सञ्ञाविमोक्ख) आहेत, सचित्तक (सचेतन) आहेत, लोकवज्ज (लोकनिंद्य) आहेत, कायकर्म व वचीकर्म रूप आहेत, अकुशल चित्ताने युक्त आणि दुःखद वेदना देणारी आहेत. สูโปทนวิญฺญตฺติสิกฺขาปทํ เถยฺยสตฺถสมุฏฺฐานํ กายจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. वरण किंवा भाताची मागणी करण्याचे शिक्षापद (सूपोदनविञ्ञत्तिसिक्खापद) हे 'थेय्यसत्थ' (चोरीच्या तांड्यासोबत प्रवास करणे) शिक्षापदाप्रमाणे उत्पत्ती असणारे आहे. ते काय-चित्त आणि काय-वाचा-चित्तापासून उत्पन्न होते; ते क्रियात्मक आहे, संज्ञेपासून मुक्त आहे, सचित्तक आहे, लोकवज्ज आहे, कायकर्म व वचीकर्म रूप आहे, अकुशल चित्ताने युक्त आणि दुःखद वेदना देणारे आहे. ฉตฺตปาณิทณฺฑปาณิสตฺถปาณิอาวุธปาณิปาทุกอุปาหนยานสยนปลฺลตฺถิกเวฐิตโอคุณฺฐิตนามกานิ เอกาทส สิกฺขาปทานิ ธมฺมเทสนสมุฏฺฐานานิ วาจาจิตฺตโต สมุฏฺฐหนฺติ, กิริยากิริยานิ, สญฺญาวิโมกฺขานิ, สจิตฺตกานิ, โลกวชฺชานิ, วจีกมฺมานิ, อกุสลจิตฺตานิ, ทุกฺขเวทนานีติ. छत्र (छत्री) हातात असणे, काठी हातात असणे, शस्त्र हातात असणे, आयुध हातात असणे, पादत्राणे घातलेले असणे, चपला घातलेले असणे, वाहनात असणे, शय्येवर असणे, गुडघ्याला विळखा घालून बसणे, डोक्याला वेढलेले असणे आणि डोके झाकलेले असणे या नावांची अकरा शिक्षापदे 'धम्मदेशना' शिक्षापदाप्रमाणे उत्पत्ती असणारी आहेत. ती वाचा आणि चित्तापासून उत्पन्न होतात; ती क्रिया-अक्रियात्मक (किरियाकिरिया) आहेत, संज्ञेपासून मुक्त आहेत, सचित्तक आहेत, लोकवज्ज आहेत, वचीकर्म रूप आहेत, अकुशल चित्ताने युक्त आणि दुःखद वेदना देणारी आहेत. อวเสสานิ เตปณฺณาส สิกฺขาปทานิ ปฐมปาราชิกสมุฏฺฐานานีติ. उर्वरित त्रेपन्न (५३) शिक्षापदे पहिल्या पाराजिकाप्रमाणे उत्पत्ती असणारी आहेत. สพฺพเสขิเยสุ อาพาธปจฺจยา อนาปตฺติ, ถูปีกตปิณฺฑปาเต สูปพฺยญฺชเนน ปฏิจฺฉาทเน อุชฺฌานสญฺญิมฺหีติ ตีสุ สิกฺขาปเทสุ คิลาโน นตฺถีติ. सर्व सेखिय शिक्षापदांमध्ये आजारपणामुळे अनापत्ती (आक्षेप नसणे) असते. परंतु, 'थूपीकतपिण्डपात' (पिंडपाताचा ढीग करणे), 'सूपब्यञ्जनेन पटिच्छादन' (वरणाने किंवा व्यंजनाने अन्न झाकणे) आणि 'उज्झानसञ्ञी' (दोष शोधण्याच्या दृष्टीने पाहणे) या तीन शिक्षापदांमध्ये आजारी व्यक्तीसाठी सूट नाही. เสขิยวณฺณนา นิฏฺฐิตา. सेखिय शिक्षापदांचे स्पष्टीकरण (वर्णना) समाप्त झाले. เสขิยกณฺฑํ นิฏฺฐิตํ. सेखिय काण्ड समाप्त झाले. ๘. สตฺตาธิกรณสมถา ८. सात अधिकरण समथ ๖๕๕. อธิกรณสมเถสุ – สตฺตาติ เตสํ ธมฺมานํ สงฺขฺยาปริจฺเฉโท. จตุพฺพิธํ อธิกรณํ สเมนฺติ วูปสเมนฺตีติ อธิกรณสมถา. เตสํ วิตฺถาโร ขนฺธเก จ ปริวาเร จ วุตฺโต, ตสฺสตฺถํ ตตฺเถว วณฺณยิสฺสาม. เสสํ สพฺพตฺถ อุตฺตานเมวาติ. ६५५. अधिकरण समथांमध्ये – 'सात' ही त्या नियमांची संख्यात्मक मर्यादा आहे. जे चार प्रकारच्या अधिकरणांचे शमन किंवा शांतता करतात, म्हणून त्यांना 'अधिकरण समथ' म्हणतात. त्यांचे सविस्तर वर्णन खन्धक आणि परिवार ग्रंथात केले आहे, त्याचा अर्थ आम्ही तेथेच स्पष्ट करू. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. สมนฺตปาสาทิกาย วินยสํวณฺณนาย समन्तपासादिका नामक विनय-अट्ठकथेमध्ये... ภิกฺขุวิภงฺควณฺณนา นิฏฺฐิตา. भिक्खू विभंग स्पष्टीकरण (वर्णना) समाप्त झाले. อนนฺตราเยน ยถา, นิฏฺฐิตา วณฺณนา อยํ; อนนฺตราเยน ตถา, สนฺตึ ปปฺโปนฺตุ ปาณิโน. ज्याप्रमाणे हे स्पष्टीकरण (वर्णना) कोणत्याही विघ्नाशिवाय पूर्ण झाले आहे, त्याचप्रमाणे सर्व प्राणी कोणत्याही विघ्नाशिवाय शांतीला (निर्वाणाला) प्राप्त होवोत. จิรํ ติฏฺฐตุ สทฺธมฺโม, กาเล วสฺสํ จิรํ ปชํ; ตปฺเปตุ เทโว ธมฺเมน, ราชา รกฺขตุ เมทนินฺติ. सद्धम्म चिरकाळ टिकून राहो! योग्य वेळी पाऊस पडो! पर्जन्यदेव प्रजेला चिरकाळ तृप्त करो! आणि राजा धर्माने पृथ्वीचे रक्षण करो! มหาวิภงฺโค นิฏฺฐิโต. महाविभंग समाप्त झाला. นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส त्या पूजनीय, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवंतांना माझा नमस्कार असो. ภิกฺขุนีวิภงฺควณฺณนา भिक्खुनी विभंग स्पष्टीकरण (वर्णना) ๑. ปาราชิกกณฺฑํ (ภิกฺขุนีวิภงฺควณฺณนา) १. पाराजिका काण्ड (भिक्खुनी विभंग स्पष्टीकरण) โย [Pg.173] ภิกฺขูนํ วิภงฺคสฺส, สงฺคหิโต อนนฺตรํ; ภิกฺขุนีนํ วิภงฺคสฺส, ตสฺส สํวณฺณนากฺกโม. संग्रहित केलेल्या भिक्खू विभंगानंतर, आता भिक्खुनी विभंगाच्या स्पष्टीकरणाचा (वर्णनेचा) क्रम येतो. ปตฺโต ยโต ตโต ตสฺส, อปุพฺพปทวณฺณนํ; กาตุํ ปาราชิเก ตาว, โหติ สํวณฺณนา อยํ. तो क्रम प्राप्त झाला असल्यामुळे, त्यातील नवीन (पूर्वी न आलेल्या) पदांचे स्पष्टीकरण करण्यासाठी, सर्वप्रथम पाराजिका काण्डामध्ये हे स्पष्टीकरण केले जात आहे. ๑. ปฐมปาราชิกสิกฺขาปทวณฺณนา १. पहिल्या पाराजिका शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना) ๖๕๖. เตน สมเยน พุทฺโธ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ…เป… สาฬฺโห มิคารนตฺตาติ เอตฺถ สาฬฺโหติ ตสฺส นามํ; มิคารมาตุยา ปน นตฺตา โหติ, เตน วุตฺตํ – ‘‘มิคารนตฺตา’’ติ. นวกมฺมิกนฺติ นวกมฺมาธิฏฺฐายิกํ. ปณฺฑิตาติ ปณฺฑิจฺเจน สมนฺนาคตา. พฺยตฺตาติ เวยฺยตฺติเกน สมนฺนาคตา. เมธาวินีติ ปาฬิคฺคหเณ สติปุพฺพงฺคมาย ปญฺญาย อตฺถคฺคหเณ ปญฺญาปุพฺพงฺคมาย สติยา สมนฺนาคตา. ทกฺขาติ เฉกา; อวิรชฺฌิตฺวา สีฆํ กตฺตพฺพการินีติ อตฺโถ. อนลสาติ อาลสิยวิรหิตา. ตตฺรุปายายาติ เตสุ เตสุ กมฺเมสุ อุปายภูตาย. วีมํสายาติ กตฺตพฺพกมฺมุปปริกฺขาย. สมนฺนาคตาติ สมฺปยุตฺตา. อลํ กาตุนฺติ สมตฺถา ตํ ตํ กมฺมํ กาตุํ. อลํ สํวิธาตุนฺติ เอวญฺจ เอวญฺจ อิทํ โหตูติ เอวํ สํวิทหิตุมฺปิ สมตฺถา. กตากตํ ชานิตุนฺติ กตญฺจ อกตญฺจ ชานิตุํ. เตติ เต อุโภ; สา จ สุนฺทรีนนฺทา โส จ สาฬฺโหติ อตฺโถ. ภตฺตคฺเคติ ปริเวสนฏฺฐาเน. นิกูเฏติ โกณสทิสํ กตฺวา ทสฺสิเต คมฺภีเร. วิสฺสโร เม ภวิสฺสตีติ วิรูโป เม สโร [Pg.174] ภวิสฺสติ; วิปฺปการสทฺโท ภวิสฺสตีติ อตฺโถ. ปติมาเนนฺตีติ อเปกฺขมานา. กฺยาหนฺติ กึ อหํ. ชราทุพฺพลาติ ชราย ทุพฺพลา. จรณคิลานาติ ปาทโรเคน สมนฺนาคตา. ६५६. त्या वेळी बुद्ध भगवान श्रावस्ती येथे विहार करत होते... 'साळ्हो मिगारनत्ता' (मिगाराचा नातू साळ्ह) यामध्ये 'साळ्ह' हे त्याचे नाव आहे. तो मिगारमाता (विशाखा) हिचा नातू होता, म्हणून 'मिगारनत्ता' (मिगाराचा नातू) असे म्हटले आहे. 'नवकम्मिकं' म्हणजे नवीन बांधकामाची देखरेख करणारा (नवकम्माधिष्ठायक). 'पंडिता' म्हणजे बुद्धिमत्तेने (पांडित्याने) युक्त असलेली. 'ब्यत्ता' (व्यक्ता) म्हणजे चतुरतेने/कुशलतेने युक्त असलेली. 'मेधाविनी' म्हणजे पाळी (मूळ मजकूर) ग्रहण करताना स्मृतीला अग्रभागी ठेवून प्रज्ञेने युक्त असलेली, आणि अर्थ ग्रहण करताना प्रज्ञेला अग्रभागी ठेवून स्मृतीने युक्त असलेली. 'दक्खा' (दक्षा) म्हणजे चतुर/कुशल; न चुकता वेगाने कर्तव्य पार पाडणारी, असा अर्थ आहे. 'अनलसा' म्हणजे आळस नसलेली (आळसरहित). 'तत्रुपायया' म्हणजे त्या त्या कामांमध्ये योग्य उपाय शोधणारी. 'वीमंसाया' (विमर्शाने) म्हणजे करावयाच्या कामाची योग्य तपासणी/परीक्षण करणारी. 'समन्नागता' म्हणजे युक्त असलेली. 'अलं कातुं' म्हणजे ते ते काम स्वतः करण्यास समर्थ असलेली. 'अलं संविधातुं' म्हणजे 'हे असे आणि असे व्हावे' या प्रकारे व्यवस्था करण्यासही समर्थ असलेली. 'कताकतं जानितुं' म्हणजे केलेले आणि न केलेले काम जाणण्यास. 'ते' म्हणजे ते दोघेही; ती सुन्दरीनन्दा आणि तो साळ्ह, असा अर्थ आहे. 'भत्तग्गे' (भक्तगृहात) म्हणजे भोजन वाढण्याच्या ठिकाणी. 'निकूटे' म्हणजे कोपऱ्यासारख्या केलेल्या, अंधाऱ्या/खोल जागी. 'विस्सरो मे भविस्सती' म्हणजे 'माझा आवाज विकृत होईल; विसंगत आवाज येईल', असा अर्थ आहे. 'पतिमानेन्ती' म्हणजे वाट पाहत असलेली (अपेक्षा करत असलेली). 'क्याहं' म्हणजे 'किं अहं' (मी काय). 'जरादुब्बला' म्हणजे म्हातारपणामुळे (जरेमुळे) दुर्बल झालेली. 'चरणगिलाना' म्हणजे पायाच्या आजाराने ग्रस्त असलेली. ๖๕๗-๘. อวสฺสุตาติ กายสํสคฺคราเคน อวสฺสุตา; ตินฺตา กิลินฺนาติ อตฺโถ. ปทภาชเน ปนสฺส ตเมว ราคํ คเหตฺวา ‘‘สารตฺตา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ สารตฺตาติ วตฺถํ วิย รงฺคชาเตน กายสํสคฺคราเคน สุฏฺฐุ รตฺตา. อเปกฺขวตีติ ตสฺเสว ราคสฺส วเสน ตสฺมึ ปุริเส ปวตฺตาย อเปกฺขาย สมนฺนาคตา. ปฏิพทฺธจิตฺตาติ เตน ราเคน ตสฺมึ ปุริเส พนฺธิตฺวา ฐปิตจิตฺตา วิย. เอส นโย ทุติยปทวิภงฺเคปิ. ปุริสปุคฺคลสฺสาติ ปุริสสงฺขาตสฺส ปุคฺคลสฺส. อธกฺขกนฺติ อกฺขกานํ อโธ. อุพฺภชาณุมณฺฑลนฺติ ชาณุมณฺฑลานํ อุปริ. ปทภาชเน ปน ปทปฏิปาฏิยา เอว ‘‘เหฏฺฐกฺขกํ อุปริชาณุมณฺฑล’’นฺติ วุตฺตํ. เอตฺถ จ อุพฺภกปฺปรมฺปิ อุพฺภชาณุมณฺฑเลเนว สงฺคหิตํ. เสสํ มหาวิภงฺเค วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. ปุริมาโย อุปาทายาติ สาธารณปาราชิเกหิ ปาราชิกาโย จตสฺโส อุปาทายาติ อตฺโถ. อุพฺภชาณุมณฺฑลิกาติ อิทํ ปน อิมิสฺสา ปาราชิกาย นามมตฺตํ, ตสฺมา ปทภาชเน น วิจาริตํ. ६५७-८. 'अवस्सुता' (वासनायुक्त/ओली झालेली) म्हणजे शारीरिक स्पर्शाच्या रागाने (वासनेने) ओलावलेली; ओली झालेली किंवा भिजलेली, असा अर्थ आहे. पदभाजनामध्ये (शब्दांच्या विश्लेषणात) तोच राग (वासना) गृहीत धरून 'सारत्ता' (अतिशय आसक्त) इत्यादी म्हटले आहे. त्यात 'सारत्ता' म्हणजे ज्याप्रमाणे कपडा रंगाने रंगवला जातो, त्याप्रमाणे शारीरिक स्पर्शाच्या रागाने पूर्णपणे रंगलेली (आसक्त झालेली). 'अपेक्खवती' म्हणजे त्याच रागाच्या वशतेमुळे त्या पुरुषाविषयी निर्माण झालेल्या अपेक्षेने (आसक्तीने) युक्त असलेली. 'पटिबद्धचित्ता' म्हणजे त्या रागाने त्या पुरुषाशी बांधून ठेवलेल्या चित्तासारखी. हाच नियम दुसऱ्या पदाच्या विश्लेषणातही (विभंगातही) लागू होतो. 'पुरिसपुग्गलस्स' म्हणजे पुरुष संज्ञक पुद्गलाचा (व्यक्तीचा). 'अधक्खकं' म्हणजे गळ्याच्या हाडांच्या (अक्षक/clavicles) खाली. 'उब्भजाणुमण्डलं' म्हणजे गुडघ्यांच्या (जानुमण्डलांच्या) वर. परंतु पदभाजनामध्ये पदांच्या क्रमानुसारच 'हेट्ठक्खकं उपरिजाणुमण्डलं' (गळ्याच्या हाडाखाली आणि गुडघ्याच्या वर) असे म्हटले आहे. आणि येथे कोपराच्या वरील भागाचाही (उब्भकप्परं) 'उब्भजाणुमण्डल' या शब्दानेच समावेश केला आहे. उर्वरित भाग महाविभंगात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा. 'पुरिमायो उपादाया' म्हणजे भिक्खूंशी सामायिक असलेल्या पहिल्या चार पाराजिका गृहीत धरून, असा अर्थ आहे. परंतु 'उब्भजाणुमण्डलिका' हे या पाराजिकाचे केवळ नाव आहे, म्हणून पदभाजनामध्ये यावर चर्चा केलेली नाही. ๖๕๙. เอวํ อุทฺทิฏฺฐสิกฺขาปทํ ปทานุกฺกเมน วิภชิตฺวา อิทานิ อวสฺสุตาทิเภเทน อาปตฺติเภทํ ทสฺเสตุํ ‘‘อุภโตอวสฺสุเต’’ติอาทิมาห. ตตฺถ อุภโตอวสฺสุเตติ อุภโตอวสฺสเว; ภิกฺขุนิยา เจว ปุริสสฺส จ กายสํสคฺคราเคน อวสฺสุตภาเว สตีติ อตฺโถ. กาเยน กายํ อามสตีติ ภิกฺขุนี ยถาปริจฺฉินฺเนน กาเยน ปุริสสฺส ยํกิญฺจิ กายํ ปุริโส วา เยน เกนจิ กาเยน ภิกฺขุนิยา ยถาปริจฺฉินฺนํ กายํ อามสติ, อุภยถาปิ ภิกฺขุนิยา ปาราชิกํ. กาเยน กายปฏิพทฺธนฺติ วุตฺตปฺปกาเรเนว อตฺตโน กาเยน ปุริสสฺส กายปฏิพทฺธํ. อามสตีติ เอตฺถ สยํ วา อามสตุ, ตสฺส วา อามสนํ สาทิยตุ, ถุลฺลจฺจยเมว. กายปฏิพทฺเธน กายนฺติ อตฺตโน วุตฺตปฺปการกายปฏิพทฺเธน ปุริสสฺส กายํ. อามสตีติ อิธาปิ สยํ วา อามสตุ, ตสฺส วา อามสนํ สาทิยตุ, ถุลฺลจฺจยเมว. อวเสสปเทสุปิ อิมินาว นเยน วินิจฺฉโย เวทิตพฺโพ. ६५९. अशा प्रकारे निर्दिष्ट केलेल्या शिक्षापदाचे पदांच्या क्रमाने विश्लेषण करून, आता 'अवस्सुत' (वासनायुक्त) इत्यादींच्या भेदाने आपत्तीचा (गुन्ह्याचा) भेद दर्शवण्यासाठी 'उभतोअवस्सुते' (दोन्ही बाजू वासनायुक्त असताना) इत्यादी म्हटले आहे. त्यात 'उभतोअवस्सुते' म्हणजे दोन्ही बाजूंच्या वासनेच्या ओलाव्यामध्ये; भिक्खुणी आणि पुरुष या दोघांच्याही मनात शारीरिक स्पर्शाच्या रागाने वासनायुक्त भाव असताना, असा अर्थ आहे. 'कायेन कायं आमसती' (शरीराने शरीराला स्पर्श करणे) म्हणजे भिक्खुणीने आपल्या शरीराच्या विशिष्ट भागाने पुरुषाच्या शरीराच्या कोणत्याही भागाला स्पर्श करणे, किंवा पुरुषाने आपल्या शरीराच्या कोणत्याही भागाने भिक्खुणीच्या शरीराच्या विशिष्ट भागाला स्पर्श करणे; या दोन्ही परिस्थितींमध्ये भिक्खुणीला पाराजिका आपत्ती होते. 'कायेन कायपटिबद्धं' म्हणजे वर सांगितलेल्या पद्धतीनेच स्वतःच्या शरीराने पुरुषाच्या शरीराशी संबंधित असलेल्या वस्तूला (वस्त्रादींना) स्पर्श करणे. 'आमसती' यामध्ये तिने स्वतः स्पर्श करावा किंवा त्याच्या स्पर्शाचा स्वीकार (अनुमोदन) करावा, दोन्हीत थुल्लच्चय (स्थूलदोष) आपत्तीच होते. 'कायपटिबद्धेन कायं' म्हणजे स्वतःच्या शरीराशी संबंधित असलेल्या वस्तूंनी पुरुषाच्या शरीराला स्पर्श करणे. 'आमसती' यामध्ये येथेही तिने स्वतः स्पर्श करावा किंवा त्याच्या स्पर्शाचा स्वीकार करावा, थुल्लच्चय आपत्तीच होते. उर्वरित पदांमध्येही याच पद्धतीने निर्णय (विनिच्चय) समजून घ्यावा. สเจ [Pg.175] ปน ภิกฺขุ เจว ภิกฺขุนี จ โหติ, ตตฺร เจ ภิกฺขุนี อามสติ, ภิกฺขุ นิจฺจโล หุตฺวา จิตฺเตน สาทิยติ, ภิกฺขุ อาปตฺติยา น กาเรตพฺโพ. สเจ ภิกฺขุ อามสติ, ภิกฺขุนี นิจฺจลา หุตฺวา จิตฺเตเนว อธิวาเสติ, กายงฺคํ อโจปยมานาปิ ปาราชิกกฺเขตฺเต ปาราชิเกน, ถุลฺลจฺจยกฺเขตฺเต ถุลฺลจฺจเยน, ทุกฺกฏกฺเขตฺเต ทุกฺกเฏน กาเรตพฺพา. กสฺมา? ‘‘กายสํสคฺคํ สาทิเยยฺยา’’ติ วุตฺตตฺตา. อยํ อฏฺฐกถาสุ วินิจฺฉโย. เอวํ ปน สติ กิริยาสมุฏฺฐานตา น ทิสฺสติ, ตสฺมา ตพฺพหุลนเยน สา วุตฺตาติ เวทิตพฺพา. परंतु जर भिक्खू आणि भिक्खुणी असतील, आणि तेथे जर भिक्खुणी स्पर्श करते आणि भिक्खू शांत राहून मनातल्या मनात त्याचा स्वीकार करतो, तर भिक्खूला आपत्तीसाठी दोषी धरले जाऊ नये. जर भिक्खू स्पर्श करतो आणि भिक्खुणी शांत राहून केवळ मनानेच त्याचा स्वीकार करते, तर शरीराचा अवयव न हलवताही, पाराजिकाच्या क्षेत्रात पाराजिका आपत्तीने, थुल्लच्चयच्या क्षेत्रात थुल्लच्चय आपत्तीने, आणि दुक्कटच्या क्षेत्रात दुक्कट आपत्तीने तिला दोषी धरले जावे. का? कारण 'शारीरिक स्पर्शाचा स्वीकार करावा' असे म्हटले असल्यामुळे. हा अट्ठकथांमधील (टीकाग्रंथांमधील) निर्णय आहे. परंतु असे असताना क्रिया-समुत्थान (कृतीची उत्पत्ती) दिसून येत नाही, म्हणून बहुतांश नियमांच्या आधारे (तब्बहुलनयेन) ती सांगितली आहे, असे समजावे. ๖๖๐. อุพฺภกฺขกนฺติ อกฺขกานํ อุปริ. อโธชาณุมณฺฑลนฺติ ชาณุมณฺฑลานํ เหฏฺฐา. เอตฺถ จ อโธกปฺปรมฺปิ อโธชาณุมณฺฑเลเนว สงฺคหิตํ. ६६०. 'उब्भक्खकं' म्हणजे गळ्याच्या हाडांच्या (अक्षकांच्या) वर. 'अधोजाणुमण्डलं' म्हणजे गुडघ्यांच्या खाली. आणि येथे कोपराच्या खालील भागाचाही (अधोकप्परं) 'अधोजाणुमण्डल' या शब्दानेच समावेश केला आहे. ๖๖๒. เอกโตอวสฺสุเตติ เอตฺถ กิญฺจาปิ เอกโตติ อวิเสเสน วุตฺตํ, ตถาปิ ภิกฺขุนิยา เอว อวสฺสุเต สติ อยํ อาปตฺติเภโท วุตฺโตติ เวทิตพฺโพ. ६६२. 'एकतोअवस्सुते' (एका बाजूने वासनायुक्त असताना) यामध्ये जरी 'एकतो' (एका बाजूने) असे सामान्यपणे म्हटले असले, तरी केवळ भिक्खुणीच वासनायुक्त असताना हा आपत्तीचा भेद सांगितला आहे, असे समजावे. ตตฺรายํ อาทิโต ปฏฺฐาย วินิจฺฉโย – ภิกฺขุนี กายสํสคฺคราเคน อวสฺสุตา, ปุริโสปิ ตเถว. อธกฺขเก อุพฺภชาณุมณฺฑเล กายปฺปเทเส กายสํสคฺคสาทิยเน สติ ภิกฺขุนิยา ปาราชิกํ. ภิกฺขุนิยา กายสํสคฺคราโค, ปุริสสฺส เมถุนราโค วา เคหสฺสิตเปมํ วา สุทฺธจิตฺตํ วา โหตุ, ถุลฺลจฺจยเมว. ภิกฺขุนิยา เมถุนราโค, ปุริสสฺส กายสํสคฺคราโค วา เมถุนราโค วา คเหสฺสิตเปมํ วา สุทฺธจิตฺตํ วา โหตุ, ทุกฺกฏํ. ภิกฺขุนิยา เคหสฺสิตเปมํ, ปุริสสฺส วุตฺเตสุ จตูสุ ยํ วา ตํ วา โหตุ, ทุกฺกฏเมว. ภิกฺขุนิยา สุทฺธจิตฺตํ, ปุริสสฺส วุตฺเตสุ จตูสุ ยํ วา ตํ วา โหตุ, อนาปตฺติ. त्यात सुरुवातीपासूनचा निर्णय असा आहे – भिक्खुणी शारीरिक स्पर्शाच्या रागाने वासनायुक्त आहे आणि पुरुषही तसाच आहे. गळ्याच्या हाडाखाली आणि गुडघ्याच्या वरच्या शरीराच्या भागात शारीरिक स्पर्शाचा स्वीकार केला असता भिक्खुणीला पाराजिका आपत्ती होते. जर भिक्खुणीला शारीरिक स्पर्शाचा राग असेल, आणि पुरुषाला मैथुनराग किंवा गृहस्थी प्रेम (गेहस्सितपेमं) यांपैकी काहीही असो किंवा शुद्ध चित्त असो, तर थुल्लच्चय आपत्तीच होते. जर भिक्खुणीला मैथुनराग असेल, आणि पुरुषाला शारीरिक स्पर्शाचा राग, मैथुनराग, गृहस्थी प्रेम किंवा शुद्ध चित्त यांपैकी काहीही असो, तर दुक्कट आपत्ती होते. जर भिक्खुणीला गृहस्थी प्रेम असेल, आणि पुरुषाला वर सांगितलेल्या चार प्रकारांपैकी कोणतेही असो, तर दुक्कट आपत्तीच होते. जर भिक्खुणीचे चित्त शुद्ध असेल, आणि पुरुषाला वर सांगितलेल्या चार प्रकारांपैकी कोणतेही असो, तर अनापत्ती (दोष नाही) होते. สเจ ปน ภิกฺขุ เจว โหติ ภิกฺขุนี จ อุภินฺนํ กายสํสคฺคราโค, ภิกฺขุสฺส สงฺฆาทิเสโส, ภิกฺขุนิยา ปาราชิกํ. ภิกฺขุนิยา กายสํสคฺคราโค, ภิกฺขุสฺส เมถุนราโค วา เคหสฺสิตเปมํ วา, ภิกฺขุนิยา ถุลฺลจฺจยํ, ภิกฺขุสฺส ทุกฺกฏํ. อุภินฺนํ เมถุนราโค วา เคหสฺสิตเปมํ วา, อุภินฺนมฺปิ ทุกฺกฏเมว. ยสฺส ยตฺถ สุทฺธจิตฺตํ, ตสฺส ตตฺถ อนาปตฺติ. อุภินฺนมฺปิ สุทฺธจิตฺตํ, อุภินฺนมฺปิ อนาปตฺติ. परंतु जर भिक्खू आणि भिक्खुणी असतील आणि दोघांनाही शारीरिक स्पर्शाचा राग असेल, तर भिक्खूला संघादिसिस (संघादिशेष) आपत्ती होते आणि भिक्खुणीला पाराजिका आपत्ती होते. जर भिक्खुणीला शारीरिक स्पर्शाचा राग असेल आणि भिक्खूला मैथुनराग किंवा गृहस्थी प्रेम असेल, तर भिक्खुणीला थुल्लच्चय आपत्ती होते आणि भिक्खूला दुक्कट आपत्ती होते. जर दोघांनाही मैथुनराग किंवा गृहस्थी प्रेम असेल, तर दोघांनाही दुक्कट आपत्तीच होते. ज्याचे ज्या ठिकाणी चित्त शुद्ध असेल, त्याला त्या ठिकाणी अनापत्ती असते. जर दोघांचेही चित्त शुद्ध असेल, तर दोघांनाही अनापत्ती असते. ๖๖๓. อนาปตฺติ [Pg.176] อสญฺจิจฺจาติอาทีสุ วิรชฺฌิตฺวา วา อามสนฺติยา อญฺญวิหิตาย วา ‘‘อยํ ปุริโส วา อิตฺถี วา’’ติ อชานนฺติยา วา เตน ผุฏฺฐายปิ ตํ ผสฺสํ อสาทิยนฺติยา วา อามสเนปิ สติ อนาปตฺติ. เสสํ สพฺพตฺถ อุตฺตานเมว. ६६३. ‘अनापत्ति असञ्चिच्चा’ (अनावधानाने स्पर्श केल्यास आपत्ती नाही) इत्यादींमध्ये—चुकून स्पर्श करणाऱ्या भिक्खुणीला, किंवा अन्यत्र चित्त विचलित असताना स्पर्श करणाऱ्या भिक्खुणीला, किंवा 'हा पुरुष आहे की स्त्री आहे' हे न जाणता स्पर्श करणाऱ्या भिक्खुणीला, किंवा त्या पुरुषाने स्पर्श केला असताही त्या स्पर्शाचे सुख न घेणाऱ्या भिक्खुणीला, स्पर्श झाला तरीही कोणतीही आपत्ती (अनापत्ती) होत नाही. उर्वरित सर्व ठिकाणी अर्थ स्पष्टच आहे. ปฐมปาราชิกสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทฺวิเวทนนฺติ. पहिले पाराजिक समुत्थान (उत्पत्तीचे कारण) – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक (सचेतन), लोकवज्ज (लोकनिंद्य), कायकर्म, अकुशलचित्त आणि द्विवेदना (दोन प्रकारच्या वेदना) असे आहे. ปฐมปาราชิกํ. पहिले पाराजिक समाप्त झाले. ๒. ทุติยปาราชิกสิกฺขาปทวณฺณนา २. दुसऱ्या पाराजिक सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना) ๖๖๔. ทุติเย ปาราชิเก – กจฺจิ โน สาติ กจฺจิ นุ สา. อวณฺโณติ อคุโณ. อกิตฺตีติ นินฺทา. อยโสติ ปริวารวิปตฺติ; ปรมฺมุขครหา วา. ६६४. दुसऱ्या पाराजिकमध्ये – ‘कच्चि नो सा’ म्हणजे ‘ती (सुन्दरीनन्दा) काय गर्भवती आहे का?’. ‘अवण्णो’ म्हणजे अवगुण (दोष). ‘अकित्ती’ म्हणजे निंदा. ‘अयसो’ म्हणजे अनुयायांचा किंवा परिवाराचा नाश, किंवा पाठीमागे केलेली निंदा. ๖๖๕. วชฺชปฏิจฺฉาทิกาติ อิทมฺปิ อิมิสฺสา ปาราชิกาย นามมตฺตเมว, ตสฺมา ปทภาชเน น วิจาริตํ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ६६५. ‘वज्जपटिच्छादिका’ (दोष लपवणारी) हा शब्द देखील या पाराजिकाचे केवळ एक नावच आहे, म्हणून पदभाजनामध्ये (शब्दांच्या विश्लेषणात) यावर चर्चा केलेली नाही. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ๖๖๖. สา วา อาโรเจตีติ ยา ปาราชิกํ อาปนฺนา, สา สยํ อาโรเจติ. อฏฺฐนฺนํ ปาราชิกานํ อญฺญตรนฺติ ภิกฺขูหิ สาธารณานํ จตุนฺนํ อสาธารณานญฺจ จตุนฺนเมว อญฺญตรํ. อิทญฺจ ปาราชิกํ ปจฺฉา ปญฺญตฺตํ, ตสฺมา ‘‘อฏฺฐนฺน’’นฺติ วิภงฺเค วุตฺตํ. ปุริเมน ปน สทฺธึ ยุคฬตฺตา อิมสฺมึ โอกาเส ฐปิตนฺติ เวทิตพฺพํ. ธุรํ นิกฺขิตฺตมตฺเตติ ธุเร นิกฺขิตฺตมตฺเต. วิตฺถารกถา ปเนตฺถ สปฺปาณกวคฺคมฺหิ ทุฏฺฐุลฺลสิกฺขาปเท วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพา. ตตฺร หิ ปาจิตฺติยํ, อิธ ปาราชิกนฺติ อยเมว วิเสโส. เสสํ ตาทิสเมว. วชฺชปฏิจฺฉาทิกาติ อิทมฺปิอิมิสฺสา ปาราชิกาย นามมตฺถาเมว, ตสฺมา ปทภาชเน น วิจาริตํ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ६६६. ‘सा वा आरोचेति’ म्हणजे जी भिक्खुणी पाराजिक आपत्तीला प्राप्त झाली आहे, ती स्वतः येऊन सांगते. ‘अट्ठन्नं पाराजिकानं अञ्ञतरं’ म्हणजे भिक्खूंसोबत सामायिक (साधारण) असलेल्या चार पाराजिकांपैकी किंवा केवळ भिक्खुणींसाठीच असलेल्या चार असाधारण पाराजिकांपैकी कोणतेही एक. हे पाराजिक नंतर प्रज्ञप्त (लागू) करण्यात आले, म्हणून विभंगामध्ये ‘अट्ठन्नं’ (आठ पाराजिकांपैकी) असे म्हटले आहे. परंतु, पहिल्या पाराजिकासोबत जोडी असल्यामुळे ते या दुसऱ्या पाराजिकाच्या ठिकाणी ठेवले गेले आहे, असे समजावे. ‘धुरं निक्खित्तमत्ते’ म्हणजे जबाबदारी सोडल्याबरोबर. याविषयीची सविस्तर चर्चा ‘सप्पाणकवग्ग’ मधील ‘दुट्ठुल्लसिक्खापद’ (दुष्ठुल्लापत्ती लपवण्याचे सिक्खापद) मध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावी. कारण तेथे ‘पाचित्तिय’ (प्रायश्चित्त) होते, तर येथे ‘पाराजिक’ होते, हाच केवळ फरक आहे. उर्वरित सर्व नियम तशाच प्रकारचे आहेत. ‘वज्जपटिच्छादिका’ हा शब्द देखील या पाराजिकाचे केवळ नावच आहे, म्हणून पदभाजनामध्ये यावर चर्चा केलेली नाही. उर्वरित सर्व स्पष्टच आहे. ธุรนิกฺเขปสมุฏฺฐานํ – กายวาจาจิตฺตโต สมุฏฺฐาติ, อกิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. धुरनिक्खेप (जबाबदारी सोडणे) समुत्थान – हे काय, वाचा आणि चित्त यांपासून उत्पन्न होते; हे अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे. ทุติยปาราชิกํ. दुसरे पाराजिक समाप्त झाले. ๓. ตติยปาราชิกสิกฺขาปทวณฺณนา ३. तिसऱ्या पाराजिक सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना) ๖๖๙. ตติเย [Pg.177] – ธมฺเมนาติ ภูเตน วตฺถุนา. วินเยนาติ โจเทตฺวา สาเรตฺวา. ปทภาชนํ ปนสฺส ‘‘เยน ธมฺเมน เยน วินเยน อุกฺขิตฺโต สุอุกฺขิตฺโต โหตี’’ติ อิมํอธิปฺปายมตฺตํ ทสฺเสตุํ วุตฺตํ. สตฺถุสาสเนนาติ ญตฺติสมฺปทาย เจว อนุสาวนสมฺปทาย จ. ปทภาชเน ปนสฺส ‘‘ชินสาสเนน พุทฺธสาสเนนา’’ติ เววจนมตฺตเมว วุตฺตํ. สงฺฆํ วา คณํ วาติอาทีสุ เยน สงฺเฆน กมฺมํ กตํ, ตํ สงฺฆํ วา ตตฺถ สมฺพหุลปุคฺคลสงฺขาตํ คณํ วา, เอกปุคฺคลํ วา ตํ กมฺมํ วา น อาทิยติ, น อนุวตฺตติ, น ตตฺถ อาทรํ ชเนตีติ อตฺโถ. สมานสํวาสกา ภิกฺขู วุจฺจนฺติ สหายา, โส เตหิ สทฺธึ นตฺถีติ เอตฺถ ‘‘เอกกมฺมํ เอกุทฺเทโส สมสิกฺขตา’’ติ อยํ ตาว สํวาโส; สมาโน สํวาโส เอเตสนฺติ สมานสํวาสกา.เอวรูปา ภิกฺขู ภิกฺขุสฺส ตสฺมึ สํวาเส สห อยนภาเวน สหายาติ วุจฺจนฺติ. อิทานิ เยน สํวาเสน เต สมานสํวาสกาติ วุตฺตา, โส สํวาโส ตสฺส อุกฺขิตฺตกสฺส เตหิ สทฺธึ นตฺถิ. เยหิ จ สทฺธึ ตสฺส โส สํวาโส นตฺถิ, น เตน เต ภิกฺขู อตฺตโน สหายา กตา โหนฺติ. ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘สมานสํวาสกา ภิกฺขู วุจฺจนฺติ สหายา, โส เตหิ สทฺธึ นตฺถิ, เตน วุจฺจติ อกตสหาโย’’ติ. เสสํ สงฺฆเภทสิกฺขาปทาทีสุ วุตฺตนยตฺตา อุตฺตานตฺถเมว. ६६९. तिसऱ्यामध्ये – ‘धम्मेन’ म्हणजे सत्य कारणाने (वस्तूने). ‘विनयेन’ म्हणजे चोदना करून (दोष दाखवून) आणि स्मरण करून देऊन. या पदाच्या पदभाजनामध्ये ‘yehi dhammena yehi vinayena ukkhitto suukkhitto hoti’ (ज्या धर्माने व ज्या विनयाने बहिष्कृत केलेला चांगल्या प्रकारे बहिष्कृत होतो) असे केवळ त्याचा अभिप्राय दर्शवण्यासाठी म्हटले आहे. ‘सत्थुसासनेन’ म्हणजे ज्ञत्तिसंपदा (प्रस्ताव पूर्णता) आणि अनुसावनसंपदा (घोषणा पूर्णता) या दोन्हीद्वारे. पदभाजनामध्ये मात्र ‘जिनसासनेन बुद्धसासनेना’ असे केवळ समानार्थी शब्द सांगितले आहेत. ‘सङ्घं वा गणं वा’ इत्यादींमध्ये—ज्या संघाने कर्म (बहिष्करण) केले आहे, त्या संघाचा किंवा तेथील अनेक व्यक्तींचा समूह असलेल्या गणाचा किंवा एका व्यक्तीचा किंवा त्या कर्माचा जो स्वीकार करत नाही, अनुकरण करत नाही आणि त्याविषयी आदर बाळगत नाही, असा अर्थ आहे. ‘समानसंवासका भिक्खू वुच्चन्ति सहाया, सो तेहि सद्धिं नत्थि’ यामध्ये—‘एककर्म, एकउद्देश आणि समसिक्खता’ हा संवास (सहवास) आहे; ज्यांचा संवास समान आहे ते ‘समानसंवासक’ होत. अशा प्रकारच्या भिक्खूंना त्या संवासामध्ये एकत्र राहण्यामुळे भिक्खूचे ‘सहायक’ (मित्र) म्हटले जाते. आता, ज्या संवासामुळे त्यांना ‘समानसंवासक’ म्हटले गेले आहे, तो संवास त्या बहिष्कृत भिक्खूचा त्यांच्यासोबत उरलेला नाही. आणि ज्यांच्यासोबत त्याचा तो संवास नाही, त्या भिक्खूंना त्याने आपले सहायक बनवलेले नसते. म्हणूनच ‘समानसंवासका भिक्खू वुच्चन्ति सहाया, सो तेहि सद्धिं नत्थि, तेन वुच्चति अकतसहायोग्गो’ (समानसंवासक भिक्खूंना सहायक म्हटले जाते, तो त्यांच्यासोबत नाही, म्हणून त्याला अकृतसहायक म्हटले जाते) असे म्हटले आहे. उर्वरित भाग संघभेद सिक्खापद इत्यादींमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीप्रमाणेच स्पष्ट अर्थाचा आहे. สมนุภาสนสมุฏฺฐานํ – กายวาจาจิตฺตโต สมุฏฺฐาติ, อกิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. समंनुभाषण (समर्थन करणे) समुत्थान – हे काय, वाचा आणि चित्त यांपासून उत्पन्न होते; हे अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे. ตติยปาราชิกํ. तिसरे पाराजिक समाप्त झाले. ๔. จตุตฺถปาราชิกสิกฺขาปทวณฺณนา ४. चौथ्या पाराजिक सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना) ๖๗๕. จตุตฺเถ – อวสฺสุตาติ โลกสฺสาทมิตฺตสนฺถววเสน กายสํสคฺคราเคน อวสฺสุตา. ทุติยปเทปิ เอเสว นโย. ปุริสปุคฺคลสฺส หตฺถคฺคหณํ วาติอาทีสุ ปน ยํ ปุริสปุคฺคเลน หตฺเถ คหณํ กตํ, ตํ ปุริสปุคฺคลสฺส หตฺถคฺคหณนฺติ วุตฺตํ. เอเสว นโย สงฺฆาฏิกณฺณคฺคหเณปิ. หตฺถคฺคหณนฺติ เอตฺถ จ หตฺถคฺคหณญฺจ อญฺญมฺปิ อปาราชิกกฺเขตฺเต คหณญฺจ [Pg.178] เอกชฺฌํ กตฺวา หตฺถคฺคหณนฺติ วุตฺตนฺติ เวทิตพฺพํ. เตเนวสฺส ปทภาชเน ‘‘หตฺถคฺคหณํ วา สาทิเยยฺยาติ หตฺโถ นาม กปฺปรํ อุปาทาย ยาว อคฺคนขา, เอตสฺส อสทฺธมฺมสฺส ปฏิเสวนตฺถาย อุพฺภกฺขกํ อโธชาณุมณฺฑลํ คหณํ สาทิยติ, อาปตฺติ ถุลฺลจฺจยสฺสา’’ติ วุตฺตํ. เอตฺถ จ อสทฺธมฺโมติ กายสํสคฺโค เวทิตพฺโพ, น เมถุนธมฺโม. น หิ เมถุนสฺส สามนฺตา ถุลฺลจฺจยํ โหติ. ‘‘วิญฺญู ปฏิพโล กายสํสคฺคํ สมาปชฺชิตุนฺติ วจนมฺปิ เจตฺถ สาธกํ. ६७५. चौथ्यामध्ये – ‘अवस्सुता’ म्हणजे लौकिक सुखाच्या इच्छेने व मैत्रीच्या भावनेने कायसंसर्ग (शारीरिक स्पर्श) करण्याच्या रागाने ओलावलेली (कामवासनेने युक्त झालेली). दुसऱ्या पदामध्येही हाच नियम आहे. ‘पुरिसपुग्गलस्स हत्थग्गहणं वा’ इत्यादींमध्ये पुरुषाने हाताला पकडणे याला ‘पुरिसपुग्गलस्स हत्थग्गहणं’ असे म्हटले आहे. हाच नियम ‘सङ्घाटिकण्णग्गहण’ (संघाटीच्या टोकाला पकडणे) या बाबतीतही लागू होतो. ‘हत्थग्गहणं’ यामध्ये हाताला पकडणे आणि पाराजिक क्षेत्राव्यतिरिक्त इतर ठिकाणी पकडणे या दोन्ही गोष्टी एकत्र करून ‘हत्थग्गहणं’ असे म्हटले आहे, हे समजावे. म्हणूनच याच्या पदभाजनामध्ये ‘हत्थग्गहणं वा सादियेय्याति... आपत्ति थुल्लच्चयस्स’ (हाताला पकडणे स्वीकारल्यास... थुल्लच्चय आपत्ती होते) असे म्हटले आहे. येथे ‘असद्धम्मो’ म्हणजे कायसंसर्ग (शारीरिक स्पर्श) समजावा, मैथुनधर्म नव्हे. कारण मैथुनाच्या जवळ थुल्लच्चय आपत्ती होत नाही. ‘विञ्ञू पटिबलो कायसंसग्गं समापज्जितुं’ (शारीरिक स्पर्श करण्यास समर्थ असलेला सुज्ञ पुरुष) हे वचन देखील या अर्थाला सिद्ध करणारे आहे. ‘‘ติสฺสิตฺถิโย เมถุนํ ตํ น เสเว,ตโย ปุริเส ตโย จ อนริยปณฺฑเก; น จาจเร เมถุนํ พฺยญฺชนสฺมึ,เฉชฺชา สิยา เมถุนธมฺมปจฺจยา; ปญฺหา เมสา กุสเลหิ จินฺติตา’’ติ. (ปริ. ๔๘๑); “तीन प्रकारच्या स्त्रियांसोबत मैथुन करू नये, तीन प्रकारचे पुरुष आणि तीन प्रकारचे अनार्य पंडक (नपुंसक) यांच्याशीही मैथुन करू नये; तसेच स्वतःच्या जननेंद्रियातही मैथुन करू नये. मैथुनधर्माच्या कारणाने (शासनातून) उच्छेद (पाराजिक) होतो; हा प्रश्न विद्वानांनी विचारपूर्वक सोडवला आहे.” อิมาย ปริวาเร วุตฺตาย เสทโมจกคาถาย วิรุชฺฌตีติ เจ? น; เมถุนธมฺมสฺส ปุพฺพภาคตฺตา. ปริวาเรเยว หิ ‘‘เมถุนธมฺมสฺส ปุพฺพภาโค ชานิตพฺโพ’’ติ ‘‘วณฺณาวณฺโณ กายสํสคฺโค ทุฏฺฐุลฺลวาจา อตฺตกามปาริจริยาคมนุปฺปาทน’’นฺติ เอวํ สุกฺกวิสฺสฏฺฐิอาทีนิ ปญฺจ สิกฺขาปทานิ เมถุนธมฺมสฺส ปุพฺพภาโคติ วุตฺตานิ. ตสฺมา กายสํสคฺโค เมถุนธมฺมสฺส ปุพฺพภาคตฺตา ปจฺจโย โหติ. อิติ เฉชฺชา สิยา เมถุนธมฺมปจฺจยาติ เอตฺถ อิมินา ปริยาเยน อตฺโถ เวทิตพฺโพ. เอเตนุปาเยน สพฺพปเทสุ วินิจฺฉโย เวทิตพฺโพ. อปิจ ‘‘สงฺเกตํ วา คจฺเฉยฺยา’’ติ เอตสฺส ปทภาชเน ‘‘อิตฺถนฺนามํ อาคจฺฉา’’ติ. เอวํนามกํ ฐานํ อาคจฺฉาติ อตฺโถ. परिवार पाठात सांगितलेल्या या ‘सेदमोचक गाथे’शी (घाम सोडवणाऱ्या गाथेशी) हा विरोध होतो का? नाही; कारण कायसंसर्ग हा मैथुनधर्माचा पूर्वभाग (पूर्व अवस्था) आहे. कारण परिवारातच ‘मैथुनधर्माचा पूर्वभाग जाणावा’ असे सांगून ‘शुक्रविसर्ग (वीर्यपात), कायसंसर्ग, दुष्ठुल्लवाचा (अश्लील संभाषण), आत्मकामपारिचर्या (स्वतःच्या सुखासाठी सेवा करून घेणे) आणि गमनोत्पादन (मध्यस्थी करणे)’ या पाच सिक्खापदांना मैथुनधर्माचा पूर्वभाग म्हटले आहे. म्हणून कायसंसर्ग हा मैथुनधर्माचा पूर्वभाग असल्यामुळे त्याचा हेतू (कारण) ठरतो. ‘मैथुनधर्माच्या कारणाने उच्छेद होतो’ या वाक्याचा अर्थ या पर्यायाने समजून घ्यावा. याच पद्धतीने सर्व पदांमधील निर्णय समजून घ्यावा. तसेच ‘सङ्केतं वा गच्छेय्या’ याच्या पदभाजनामध्ये ‘इत्थन्नामं आगच्छा’ म्हणजे ‘अमुक नावाच्या ठिकाणी ये’ असा अर्थ आहे. ๖๗๖. อฏฺฐมํ วตฺถุํ ปริปูเรนฺตี อสฺสมณี โหตีติ อนุโลมโต วา ปฏิโลมโต วา เอกนฺตริกาย วา เยน เตน นเยน อฏฺฐมํ วตฺถุํ ปริปูเรนฺตีเยว อสฺสมณี โหติ. ยา ปน เอกํ วา วตฺถุํ สตฺต วา วตฺถูนิ สตกฺขตฺตุมฺปิ ปูเรติ, เนว อสฺสมณี โหติ. อาปนฺนา อาปตฺติโย เทเสตฺวา มุจฺจติ. อปิเจตฺถ คณนูปิกา อาปตฺติ เวทิตพฺพา. วุตฺตญฺเหตํ ‘‘อตฺถาปตฺติ เทสิตา คณนูปิกา, อตฺถาปตฺติ เทสิตา น คณนูปิกา’’ติ. ตตฺรายํ วินิจฺฉโย – อิทานิ นาปชฺชิสฺสามีติ ธุรนิกฺเขปํ กตฺวา เทสิตา คณนูปิกา เทสิตคณนํ อุเปติ ปาราชิกสฺส องฺคํ น [Pg.179] โหติ. ตสฺมา ยา เอกํ อาปนฺนา ธุรนิกฺเขปํ กตฺวา เทเสตฺวา ปุน กิเลสวเสน อาปชฺชติ, ปุน เทเสติ, เอวํ อฏฺฐ วตฺถูนิ ปูเรนฺตีปิ ปาราชิกา น โหติ. ยา ปน อาปชฺชิตฺวา ปุนปิ อญฺญํ วตฺถุํ อาปชฺชิสฺสามีติ สอุสฺสาหาว เทเสติ, ตสฺสา สา อาปตฺติ นคณนูปิกา, เทสิตาปิ อเทสิตา โหติ, เทสิตคณนํ น คจฺฉติ, ปาราชิกสฺเสว องฺคํ โหติ. อฏฺฐเม วตฺถุมฺหิ ปริปุณฺณมตฺเต ปาราชิกา โหติ. เสสํ อุตฺตานเมวาติ. ६७६. आठवी वस्तू पूर्ण करणारी अश्रमणी होते - अनुलोम (सरळ क्रमाने) किंवा प्रतिलोम (उलट क्रमाने) किंवा एकाआड एक (एकांतरिका) किंवा ज्या कोणत्याही पद्धतीने आठवी वस्तू पूर्ण करताच ती अश्रमणी (भिक्षुणी नसलेली) होते. परंतु जी भिक्षुणी एका वस्तूची किंवा सात वस्तूंची शंभर वेळाही पूर्तता करते, ती अश्रमणी होत नाही. ती झालेल्या आपत्तींची देशना करून (कबूल करून) मुक्त होते. तरीही येथे 'गणनूपिका' (मोजणीत येणारी) आपत्ती समजली पाहिजे. कारण परिवारात असे म्हटले आहे - 'अशी आपत्ती आहे जी देशना केली असता मोजणीत येते, आणि अशी आपत्ती आहे जी देशना केली तरी मोजणीत येत नाही.' त्याबाबत हा निर्णय आहे - 'आता मी पुन्हा गुन्हा करणार नाही' असा निश्चय करून (जबाबदारी सोडून/धुरनिक्खेप करून) देशना केलेली आपत्ती ही 'गणनूपिका' (मोजणीत येणारी) ठरते, ती देशनेच्या मोजणीत समाविष्ट होते आणि ती पाराजिकाचे अंग (कारण) बनत नाही. म्हणून, जी भिक्षुणी एका वस्तूचा गुन्हा करून, निश्चय करून (धुरनिक्खेप करून) देशना करते, आणि पुन्हा क्लेशांच्या प्रभावामुळे गुन्हा करते व पुन्हा देशना करते, अशा प्रकारे आठ वस्तू पूर्ण केल्या तरी ती पाराजिका होत नाही. परंतु जी भिक्षुणी गुन्हा करून, 'मी पुन्हा दुसरी वस्तू (गुन्हा) करेनच' अशा उत्साहाने देशना करते, तिची ती आपत्ती 'न-गणनूपिका' (मोजणीत न येणारी) असते. ती देशना केली तरी अ-देशित (देशना न केल्यासारखीच) असते, ती देशनेच्या मोजणीत जात नाही आणि ती पाराजिकाचेच अंग बनते. आठवी वस्तू पूर्ण होताच ती पाराजिका होते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ธุรนิกฺเขปสมุฏฺฐานํ – กายวาจาจิตฺตโต สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทฺวิเวทนนฺติ. धुरनिक्खेपसमुत्थान (जबाबदारी सोडण्याचे समुत्थान) - हे काय, वाचा आणि चित्तापासून उत्पन्न होते; हे क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज (लोकनिंद्य), कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि द्विवेद (दोन प्रकारचे) आहे. จตุตฺถปาราชิกํ. चौथे पाराजिक. อุทฺทิฏฺฐา โข อยฺยาโย อฏฺฐ ปาราชิกา ธมฺมาติ ภิกฺขู อารพฺภ ปญฺญตฺตา สาธารณา จตฺตาโร อิเม จ จตฺตาโรติ เอวํ ปาติโมกฺขุทฺเทสมคฺเคน อุทฺทิฏฺฐา โข อยฺยาโย อฏฺฐ ปาราชิกา ธมฺมาติ เอวเมตฺถ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. เสสํ มหาวิภงฺเค วุตฺตนยเมวาติ. 'हे आर्यांनो, आठ पाराजिक धर्म उद्दिष्ट (घोषित) केले आहेत' याचा अर्थ असा समजला पाहिजे की - भिक्षूंना उद्देशून प्रज्ञप्त केलेले चार साधे (साधारण) पाराजिक आणि हे (भिक्षुणींचे) चार असाधारण पाराजिक, अशा प्रकारे प्रातिमोक्ष उद्देशमार्गाने 'हे आर्यांनो, आठ पाराजिक धर्म उद्दिष्ट केले आहेत' असा येथे अर्थ घ्यावा. उर्वरित भाग महाविभंगात सांगितलेल्या पद्धतीप्रमाणेच आहे. สมนฺตปาสาทิกาย วินยสํวณฺณนาย ภิกฺขุนีวิภงฺเค समंतपासादिका नामक विनय-अट्ठकथेतील भिक्षुणीविभंगात, ปาราชิกกณฺฑวณฺณนา นิฏฺฐิตา. पाराजिककाण्ड-वर्णना समाप्त झाली. ปาราชิกกณฺฑํ นิฏฺฐิตํ. पाराजिककाण्ड समाप्त झाले. ๒. สงฺฆาทิเสสกณฺฑํ (ภิกฺขุนีวิภงฺควณฺณนา) २. संघादिशेषकाण्ड (भिक्षुणीविभंग-वर्णना) ๑. ปฐมสงฺฆาทิเสสสิกฺขาปทวณฺณนา १. पहिले संघादिशेष सिक्खापद-वर्णना ปาราชิกานนฺตรสฺส[Pg.180], อยํ ทานิ ภวิสฺสติ; สงฺฆาทิเสสกณฺฑสฺส, อนุตฺตานตฺถวณฺณนา. पाराजिक काण्डानंतर आता संघादिशेष कांडाची ही अस्पष्ट अर्थांची व्याख्या (अनुत्तानार्थ-वर्णना) होईल. ๖๗๘. อุโทสิตนฺติ ภณฺฑสาลา. มายฺโย เอวํ อวจาติ อยฺโย มา เอวํ อวจ. อปินายฺยาติ อปินุ อยฺยา. อจฺจาวทถาติ อติกฺกมิตฺวา วทถ; อกฺโกสถาติ วุตฺตํ โหติ. ६७८. 'उदोसितं' म्हणजे भांडशाला (भांडारगृह). 'माय्यो एवं अवच' म्हणजे 'हे आर्य, असे बोलू नका.' 'अपिनाय्या' या पदाचा 'अपि नु अय्या' असा पदच्छेद करावा. 'अच्चावदथ' म्हणजे मर्यादा ओलांडून बोलणे; 'अक्कोसथ' म्हणजे शिवीगाळ करणे असा अर्थ येथे सांगितला आहे. ๖๗๙. อุสฺสยวาทิกาติ มานุสฺสยวเสน โกธุสฺสยวเสน วิวทมานา. ยสฺมา ปน สา อตฺถโต อฏฺฏการิกา โหติ, ตสฺมา ‘‘อุสฺสยวาทิกา นาม อฑฺฑการิกา วุจฺจตี’’ติ ปทภาชเน วุตฺตํ. เอตฺถ จ อฑฺโฑติ โวหาริกวินิจฺฉโย วุจฺจติ, ยํ ปพฺพชิตา ‘‘อธิกรณ’’นฺติปิ วทนฺติ. ทุติยํ วา ปริเยสตีติ สกฺขึ วา สหายํ วา ปริเยสติ, ทุกฺกฏํ. คจฺฉติ วาติ อุปสฺสโย วา โหตุ ภิกฺขาจารมคฺโค วา, ยตฺถ ฐิตาย ‘‘อฑฺฑํ กริสฺสามี’’ติ จิตฺตํ อุปฺปชฺชติ, ตโต โวหาริกานํ สนฺติกํ คจฺฉนฺติยา ปทวาเร ปทวาเร ทุกฺกฏํ. เอกสฺส อาโรเจตีติ ทฺวีสุ ชเนสุ ยสฺส กสฺสจิ เอกสฺส กถํ โย โกจิ โวหาริกานํ อาโรเจติ. ทุติยสฺส อาโรเจตีติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. ६७९. 'उस्सयवादिका' म्हणजे अभिमानाच्या (मान-उस्सय) किंवा क्रोधाच्या (क्रोध-उस्सय) प्रभावाने वाद घालणारी. परंतु, ती अर्थाच्या दृष्टीने खटला दाखल करणारी (अड्डकारिका) असल्याने, पदभाजनामध्ये 'उस्सयवादिका म्हणजे अड्डकारिका (खटला दाखल करणारी) म्हटले जाते' असे सांगितले आहे. आणि येथे 'अड्ड' म्हणजे न्यायाधीशांचा निर्णय (व्यावहारिक विनिच्चय) होय, ज्याला प्रव्रजित 'अधिकरण' असेही म्हणतात. 'दुतियं वा परियेसति' म्हणजे साक्षीदार किंवा सोबती शोधणे, यात दुक्कट (दुष्कृत) आपत्ती होते. 'गच्छति वा' म्हणजे भिक्षुणींचा निवास असो वा भिक्षाटन करण्याचा मार्ग असो, ज्या ठिकाणी उभे राहून 'मी खटला दाखल करेन' असा विचार मनात येतो, तिथून न्यायाधीशांकडे जाणाऱ्या भिक्षुणीला पाऊलोपाऊली दुक्कट आपत्ती होते. 'एकस्स आरोचेति' म्हणजे दोन व्यक्तींपैकी कोणत्याही एका व्यक्तीची बाजू कोणी न्यायाधीशांना सांगणे. 'दुतियस्स आरोचेति' यामध्येही हाच नियम लागू होतो. อยํ ปเนตฺถ อสมฺโมหตฺถาย วิตฺถารกถา – ยตฺถ กตฺถจิ อนฺตมโส ภิกฺขุนุปสฺสยํ อาคเตปิ โวหาริเก ทิสฺวา ภิกฺขุนี อตฺตโน กถํ อาโรเจติ, ภิกฺขุนิยา ทุกฺกฏํ. อุปาสโก อตฺตโน กถํ อาโรเจติ, ภิกฺขุนิยา ถุลฺลจฺจยํ. ปฐมํ อุปาสโก อตฺตโน กถํ อาโรเจติ, ภิกฺขุนิยา ทุกฺกฏํ. อถ สา อตฺตโน กถํ อาโรเจติ, ถุลฺลจฺจยํ. ภิกฺขุนี อุปาสกํ วทติ – ‘‘มม จ ตว จ กถํ ตฺวํเยว อาโรเจหี’’ติ, โส อตฺตโน วา กถํ ปฐมํ อาโรเจตุ ภิกฺขุนิยา วา, ปฐมาโรจเน ทุกฺกฏํ, ทุติยาโรจเน ถุลฺลจฺจยํ. อุปาสโก ภิกฺขุนึ วทติ – ‘‘มม จ ตว จ กถํ ตฺวํเยว อาโรเจหี’’ติ, เอตฺถาปิ เอเสว นโย. संभ्रम टाळण्यासाठी येथे सविस्तर स्पष्टीकरण दिले आहे - कोणत्याही ठिकाणी, अगदी भिक्षुणींच्या विहारात आलेल्या न्यायाधीशांना पाहून जर भिक्षुणी आपली बाजू सांगते, तर भिक्षुणीला दुक्कट आपत्ती होते. जर उपासक आपली बाजू सांगतो, तर भिक्षुणीला थुळ्ळच्चय (स्थूलात्यय) आपत्ती होते. आधी उपासक आपली बाजू सांगतो, तेव्हा भिक्षुणीला दुक्कट आपत्ती होते. त्यानंतर ती स्वतःची बाजू सांगते, तेव्हा थुळ्ळच्चय आपत्ती होते. भिक्षुणी उपासकाला म्हणते - 'माझी आणि तुझी बाजू तूच सांग,' तेव्हा त्याने स्वतःची बाजू आधी सांगितली किंवा भिक्षुणीची बाजू आधी सांगितली, तरी पहिल्यांदा सांगण्यात दुक्कट आपत्ती आणि दुसऱ्यांदा सांगण्यात थुळ्ळच्चय आपत्ती होते. उपासक भिक्षुणीला म्हणतो - 'माझी आणि तुझी बाजू तूच सांग,' येथेही हाच नियम लागू होतो. ภิกฺขุนี [Pg.181] กปฺปิยการเกน กถาเปติ, ตตฺถ กปฺปิยการโก วา ภิกฺขุนิยา กถํ ปฐมํ อาโรเจตุ, อิตโร วา อตฺตโน กถํ, กปฺปิยการโก วา อุภินฺนมฺปิ กถํ, อิตโร วา อุภินฺนมฺปิ กถํ อาโรเจตุ, ยถา วา ตถา วา อาโรจิยมาเน ปฐเม อาโรจเน ภิกฺขุนิยา ทุกฺกฏํ, ทุติเย ถุลฺลจฺจยํ. ยถา วา ตถา วา อาโรจิตํ ปน อุภินฺนมฺปิ กถํ สุตฺวา โวหาริเกหิ วินิจฺฉเย กเต อฑฺฑปริโยสานํ นาม โหติ, ตสฺมึ อฑฺฑปริโยสาเน ภิกฺขุนิยา ชเยปิ ปราชเยปิ สงฺฆาทิเสโส. สเจ ปน คติคตํ อธิกรณํ โหติ, สุตปุพฺพํ โวหาริเกหิ. อถ เต ภิกฺขุนิญฺจ อฑฺฑการกญฺจ ทิสฺวาว ‘‘ตุมฺหากํ กถนกิจฺจํ นตฺถิ, ชานาม มยํ เอตฺถ ปวตฺติ’’นฺติ สยเมว วินิจฺฉินิตฺวา เทนฺติ, เอวรูเป อฑฺฑปริโยสาเนปิ ภิกฺขุนิยา อนาปตฺติ. भिक्षुणी कप्पियकारकाद्वारे (सेवकाद्वारे) सांगते, तिथे कप्पियकारकाने भिक्षुणीची बाजू आधी सांगावी, किंवा दुसऱ्याने (उपासकाने) स्वतःची बाजू आधी सांगावी, किंवा कप्पियकारकाने दोघांचीही बाजू सांगावी, किंवा दुसऱ्याने दोघांचीही बाजू सांगावी; कोणत्याही प्रकारे सांगितले गेले तरी पहिल्यांदा सांगण्यात भिक्षुणीला दुक्कट आपत्ती आणि दुसऱ्यांदा सांगण्यात थुळ्ळच्चय आपत्ती होते. कोणत्याही प्रकारे सांगितलेली दोघांचीही बाजू ऐकून न्यायाधीशांनी निर्णय दिल्यावर त्याला 'अड्डपरियोसान' (खटल्याचा शेवट) म्हणतात. त्या खटल्याच्या शेवटी भिक्षुणीचा विजय असो वा पराजय, तिला संघादिशेष आपत्ती होते. परंतु, जर ते अधिकरण (खटला) अनेक ठिकाणी गेले असेल आणि न्यायाधीशांनी ते आधीच ऐकले असेल, आणि त्यानंतर ते भिक्षुणीला व खटला दाखल करणाऱ्या उपासकाला पाहूनच म्हणतात - 'तुम्हाला काही सांगण्याची गरज नाही, आम्हाला या प्रकरणाची माहिती आहे' आणि स्वतःच निर्णय देतात, तर अशा प्रकारच्या खटल्याच्या शेवटी भिक्षुणीला अनापत्ती (कोणतीही आपत्ती नाही) होते. ปฐมํ อาปตฺติ เอตสฺสาติ ปฐมาปตฺติโก; วีติกฺกมกฺขเณเยว อาปชฺชิตพฺโพติ อตฺโถ, ตํ ปฐมาปตฺติกํ. ปทภาชเน ปน อธิปฺปายมตฺตํ ทสฺเสตุํ ‘‘สห วตฺถุชฺฌาจารา อาปชฺชติ อสมนุภาสนายา’’ติ วุตฺตํ. อยญฺเหตฺถ อตฺโถ – สห วตฺถุชฺฌาจารา ยํ ภิกฺขุนี อาปชฺชติ, น ตติยาย สมนุภาสนาย, อยํ ปฐมเมว สห วตฺถุชฺฌาจาเรน อาปชฺชิตพฺพตฺตา ปฐมาปตฺติโกติ. ภิกฺขุนิสงฺฆโต นิสฺสาเรตีติ นิสฺสารณีโย; ตํ นิสฺสารณียํ. ปทภาชเน ปน อธิปฺปายมตฺตํ ทสฺเสตุํ ‘‘สงฺฆมฺหา นิสฺสารียตีติ วุตฺตํ. ตตฺถ ยํ อาปนฺนา ภิกฺขุนี สงฺฆโต นิสฺสารียติ, โส นิสฺสารณีโยติ เอวมตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. น หิ โส เอว ธมฺโม สงฺฆมฺหา เกนจิ นิสฺสารียติ. เตน ปน ธมฺเมน ภิกฺขุนี นิสฺสารียติ, ตสฺมา โส นิสฺสาเรตีติ นิสฺสารณีโย. जिची पहिलीच आपत्ती असते ती 'पठमापत्तिका' (प्रथमापत्तिका) होय; म्हणजेच नियमभंग केल्याच्या क्षणीच ती आपत्ती प्राप्त होते, ती प्रथमापत्तिका होय. पदभाजनामध्ये केवळ अभिप्राय दर्शवण्यासाठी 'वस्तूच्या उल्लंघनासोबतच (सहा वत्थुज्झाचारा) आपत्ती प्राप्त होते, समनुभाषणाने (ताकीद देऊन) नाही' असे भगवंतांनी सांगितले आहे. याचा अर्थ असा आहे - वस्तूच्या उल्लंघनासोबतच जी आपत्ती भिक्षुणीला प्राप्त होते, तिसऱ्या समनुभाषणाने (ताकीद दिल्याने) नाही, ती पहिल्यांदाच वस्तूच्या उल्लंघनासोबत प्राप्त होत असल्यामुळे तिला 'प्रथमापत्तिका' म्हणतात. भिक्षुणीसंघातून बाहेर काढते म्हणून 'निस्सारणीय' (निसारणीय); ती निसारणीय आपत्ती होय. पदभाजनामध्ये केवळ अभिप्राय दर्शवण्यासाठी 'संघातून बाहेर काढले जाते' असे भगवंतांनी सांगितले आहे. तिथे, ज्या आपत्तीला प्राप्त झालेली भिक्षुणी संघातून बाहेर काढली जाते, ती आपत्ती 'निसारणीय' आहे, असा अर्थ समजला पाहिजे. कारण तो धर्म (आपत्ती) स्वतः कोणाद्वारे संघातून बाहेर काढला जात नाही, तर त्या आपत्तीमुळे भिक्षुणीला संघातून बाहेर काढले जाते, म्हणून ती बाहेर काढणारी असल्यामुळे 'निसारणीय' म्हटली जाते. อากฑฺฒิยมานา คจฺฉตีติ อฑฺฑการกมนุสฺเสหิ สยํ วา อาคนฺตฺวา ทูตํ วา เปเสตฺวา เอหีติ วุจฺจมานา โวหาริกานํ สนฺติกํ คจฺฉติ, ตโต อฑฺฑการโก อตฺตโน วา กถํ ปฐมํ อาโรเจตุ ภิกฺขุนิยา วา, เนว ปฐมาโรจเน ทุกฺกฏํ, น ทุติยาโรจเน ถุลฺลจฺจยํ. อมจฺเจหิ วินิจฺฉินิตฺวา กเต อฑฺฑปริโยสาเนปิ อนาปตฺติเยว. สเจปิ อฑฺฑการโก ภิกฺขุนึ วทติ ‘‘มม จ ตว จ กถํ ตฺวเมว กเถหี’’ติ; กเถนฺติยาปิ กถํ สุตฺวา กเต อฑฺฑปริโยสาเนปิ อนาปตฺติเยว. "ओढून नेली जात असताना जाते" म्हणजे खटला दाखल करणाऱ्या माणसांनी स्वतः यावे किंवा दूत पाठवून "चल" असे म्हणावे, आणि असे म्हटले असता ती न्यायाधीशांच्या जवळ जाते. त्यानंतर खटला दाखल करणारा स्वतःची बाजू आधी मांडो किंवा भिक्खुणीची बाजू आधी मांडो; पहिल्यांदा सांगण्यात दुक्कट होत नाही आणि दुसऱ्यांदा सांगण्यात थुल्लच्चय होत नाही. न्यायाधीशांनी निर्णय देऊन खटला संपवला तरीही अनापत्तीच आहे. जरी खटला दाखल करणारा भिक्खुणीला म्हणाला, "माझी आणि तुझी बाजू तूच सांग"; आणि तिचे बोलणे ऐकून खटल्याचा निकाल लागला तरीही अनापत्तीच आहे. รกฺขํ [Pg.182] ยาจตีติ ธมฺมิกํ รกฺขํ ยาจติ, อนาปตฺติ. อิทานิ ยถายาจิตา รกฺขา ธมฺมิกา โหติ, ตํ ทสฺเสตุํ อโนทิสฺส อาจิกฺขตีติ อาห. ตตฺถ อตีตํ อารพฺภ อตฺถิ โอทิสฺสอาจิกฺขนา, อตฺถิ อโนทิสฺสอาจิกฺขนา, อนาคตํ อารพฺภาปิ อตฺถิ โอทิสฺสอาจิกฺขนา, อตฺถิ อโนทิสฺสอาจิกฺขนา. "संरक्षणाची याचना करते" म्हणजे धार्मिक (न्याय्य) संरक्षणाची याचना करते, यात अनापत्ती आहे. आता, ज्या प्रकारे याचना केलेले संरक्षण धार्मिक ठरते, ते दर्शवण्यासाठी "उल्लेख न करता सांगणे" (अनोदिस्स आचिक्खति) असे म्हटले आहे. त्यामध्ये, भूतकाळाला अनुसरून उल्लेख करून सांगणे असते आणि उल्लेख न करता सांगणे असते; तसेच भविष्यकाळाला अनुसरूनही उल्लेख करून सांगणे असते आणि उल्लेख न करता सांगणे असते. กถํ อตีตํ อารพฺภ โอทิสฺสอาจิกฺขนา โหติ? ภิกฺขุนุปสฺสเย คามทารกา ธุตฺตาทโย วา เย เกจิ อนาจารํ วา อาจรนฺติ, รุกฺขํ วา ฉินฺทนฺติ, ผลาผลํ วา หรนฺติ, ปริกฺขาเร วา อจฺฉินฺทนฺติ. ภิกฺขุนี โวหาริเก อุปสงฺกมิตฺวา ‘‘อมฺหากํ อุปสฺสเย อิทํ นาม กต’’นฺติ วทติ. ‘‘เกนา’’ติ วุตฺเต ‘‘อสุเกน จ อสุเกน จา’’ติ อาจิกฺขติ. เอวํ อตีตํ อารพฺภ โอทิสฺสอาจิกฺขนา โหติ, สา น วฏฺฏติ. ตญฺเจ สุตฺวา เต โวหาริกา เตสํ ทณฺฑํ กโรนฺติ, สพฺพํ ภิกฺขุนิยา คีวา โหติ. ทณฺฑํ คณฺหิสฺสนฺตีติ อธิปฺปาเยปิ สติ คีวาเยว โหติ. สเจ ปน ตสฺส ทณฺฑํ คณฺหถาติ วทติ, ปญฺจมาสกมตฺเต คหิเต ปาราชิกํ โหติ. भूतकाळाला अनुसरून उल्लेख करून सांगणे कसे होते? भिक्खुणींच्या विहारात गावातील मुले किंवा व्यसनी लोक इत्यादी जे कोणी अनाचार करतात, झाडे तोडतात, फळे चोरून नेतात, किंवा परिष्कार (साहित्य) हिरावून घेतात. भिक्खुणी न्यायाधीशांकडे जाऊन "आमच्या विहारात अमुक अमुक कृत्य केले गेले आहे" असे सांगते. "कोणी केले?" असे विचारल्यावर "अमुक आणि तमुक व्यक्तीने केले" असे सांगते. अशा प्रकारे भूतकाळाला अनुसरून उल्लेख करून सांगणे होते, ते योग्य नाही. ते ऐकून जर त्या न्यायाधीशांनी त्यांना दंड केला, तर तो सर्व दंड भिक्खुणीच्या गळ्यावर येतो. "ते दंड वसूल करतील" असा हेतू असला तरीही तो तिच्या गळ्यावरच येतो. पण जर ती "त्याला दंड करा" असे म्हणते, आणि पाच माषक मूल्याचा दंड घेतला गेला, तर पाराजिक होते. ‘‘เกนา’’ติ วุตฺเต ปน ‘‘อสุเกนาติ วตฺตุํ อมฺหากํ น วฏฺฏติ, ตุมฺเหเยว ชานิสฺสถ. เกวลญฺหิ มยํ รกฺขํ ยาจาม, ตํ โน เทถ, อวหฏภณฺฑญฺจ อาหราเปถา’’ติ วตฺตพฺพํ. เอวํ อโนทิสฺส อาจิกฺขนา โหติ, สา วฏฺฏติ. เอวํ วุตฺเต สเจปิ เต โวหาริกา การเก คเวสิตฺวา เตสํ ทณฺฑํ กโรนฺติ, สพฺพํ สาปเตยฺยมฺปิ คหิตํ ภิกฺขุนิยา, เนว คีวา น อาปตฺติ. पण "कोणी केले?" असे विचारल्यावर "अमुक व्यक्तीने केले असे सांगणे आम्हाला योग्य नाही, तुम्हीच जाणून घ्या. आम्ही केवळ संरक्षणाची याचना करतो, ते आम्हाला द्या, आणि चोरलेली मालमत्ता परत मिळवून द्या" असे म्हणावे. अशा प्रकारे उल्लेख न करता सांगणे होते, ते योग्य आहे. असे म्हटल्यावर जर त्या न्यायाधीशांनी कृत्य करणाऱ्यांचा शोध घेऊन त्यांना दंड केला, किंवा सर्व मालमत्ता हस्तगत केली, तरीही भिक्खुणीच्या गळ्यावर येत नाही आणि आपत्ती होत नाही. ปริกฺขารํ หรนฺเต ทิสฺวา เตสํ อนตฺถกามตาย โจโร โจโรติ วตฺตุมฺปิ น วฏฺฏติ. เอวํ วุตฺเตปิ หิ ยํ เตสํ ทณฺฑํ กโรนฺติ, สพฺพมฺปิ ภิกฺขุนิยา คีวา โหติ. อตฺตโน วจนกรํ ปน ‘‘อิมินา เม ปริกฺขาโร คหิโต, ตํ อาหราเปหิ, มา จสฺส ทณฺฑํ กโรหี’’ติ วตฺตุํ วฏฺฏติ. ทาสทาสีวาปิอาทีนํ อตฺถาย อฑฺฑํ กโรนฺติ, อยํ อกปฺปิยอฑฺโฑ นาม, น วฏฺฏติ. परिष्कार चोरून नेताना पाहून, त्यांच्याबद्दलच्या अहितबुद्धीने "चोर, चोर!" असे म्हणणे देखील योग्य नाही. कारण असे म्हटल्यावरही त्यांना जो दंड केला जाईल, तो सर्व भिक्खुणीच्या गळ्यावर येतो. परंतु, आपले ऐकणाऱ्या (न्यायाधीशास) "याने माझा परिष्कार घेतला आहे, तो परत मिळवून द्या, पण त्याला दंड करू नका" असे सांगणे योग्य आहे. दास-दासी, विहीर-तलाव इत्यादींच्या फायद्यासाठी खटला दाखल करणे, याला 'अकप्पिय खटला' (अयोग्य खटला) म्हणतात, तो योग्य नाही. กถํ อนาคตํ อารพฺภ โอทิสฺสอาจิกฺขนา โหติ? วุตฺตนเยเนว ปเรหิ อนาจาราทีสุ กเตสุ ภิกฺขุนี โวหาริเก เอวํ วทติ ‘‘อมฺหากํ อุปสฺสเย อิทญฺจิทญฺจ กโรนฺติ, รกฺขํ โน เทถ อายตึ อกรณตฺถายา’’ติ. ‘‘เกน เอวํ กต’’นฺติ วุตฺเต จ ‘‘อสุเกน อสุเกน จา’’ติ [Pg.183] อาจิกฺขติ. เอวํ อนาคตํ อารพฺภ โอทิสฺสอาจิกฺขนา โหติ, สาปิ น วฏฺฏติ. เตสญฺหิ ทณฺเฑ กเต ปุริมนเยเนว สพฺพํ ภิกฺขุนิยา คีวา. เสสํ ปุริมสทิสเมว. भविष्यकाळाला अनुसरून उल्लेख करून सांगणे कसे होते? पूर्वोक्त पद्धतीनेच इतरांनी अनाचार इत्यादी कृत्य केले असता, भिक्खुणी न्यायाधीशांना असे म्हणते: "आमच्या विहारात ते अमुक अमुक कृत्य करतात, भविष्यात असे घडू नये म्हणून आम्हाला संरक्षण द्या." आणि "असे कोणी केले?" असे विचारल्यावर "अमुक आणि तमुक व्यक्तीने केले" असे सांगते. अशा प्रकारे भविष्यकाळाला अनुसरून उल्लेख करून सांगणे होते, ते देखील योग्य नाही. कारण त्यांना दंड केला गेल्यास पूर्वोक्त पद्धतीनेच सर्व दंड भिक्खुणीच्या गळ्यावर येतो. उर्वरित भाग पूर्वीसारखाच आहे. สเจ ปน โวหาริกา ‘‘ภิกฺขุนุปสฺสเย เอวรูปํ อนาจารํ กโรนฺตานํ อิมํ นาม ทณฺฑํ กโรมา’’ติ เภรึ จราเปตฺวา อาณาย อติฏฺฐมาเน ปริเยสิตฺวา ทณฺฑํ กโรนฺติ, ภิกฺขุนิยา เนว คีวา น อาปตฺติ. पण जर न्यायाधीशांनी "भिक्खुणींच्या विहारात अशा प्रकारचा अनाचार करणाऱ्यांना अमुक दंड करू" अशी दवंडी पिटवून, आज्ञा न मानणाऱ्यांचा शोध घेऊन त्यांना दंड केला, तर भिक्खुणीच्या गळ्यावर येत नाही आणि आपत्ती होत नाही. โย จายํ ภิกฺขุนีนํ วุตฺโต, ภิกฺขูนมฺปิ เอเสว นโย. ภิกฺขุโนปิ หิ โอทิสฺสอาจิกฺขนา น วฏฺฏติ. ยํ ตถา อาจิกฺขิเต ทณฺฑํ กโรนฺติ, สพฺพํ คีวา โหติ. วุตฺตนเยเนว ทณฺฑํ คณฺหาเปนฺตสฺส ปาราชิกํ. โย ปน ‘‘ทณฺฑํ กริสฺสนฺตี’’ติ ชานนฺโตปิ อโนทิสฺส กเถติ, เต จ ปริเยสิตฺวา ทณฺฑํ กโรนฺติเยว, น โทโส. วิหารสีมาย รุกฺขาทีนิ ฉินฺทนฺตานํ วาสิผรสุอาทีนิ คเหตฺวา ปาสาเณหิ โกฏฺเฏนฺติ, น วฏฺฏติ. สเจ ธารา ภิชฺชติ, การาเปตฺวา ทาตพฺพา. อุปธาวิตฺวา เตสํ ปริกฺขาเร คณฺหนฺติ, ตมฺปิ น กาตพฺพํ, ลหุปริวตฺตญฺหิ จิตฺตํ, เถยฺยเจตนาย อุปฺปนฺนาย มูลจฺเฉชฺชมฺปิ คจฺเฉยฺย. เสสํ อุตฺตานเมว. जो हा नियम भिक्खुणींसाठी सांगितला आहे, तोच नियम भिक्खूंसाठीही आहे. कारण भिक्खूनेही उल्लेख करून सांगणे योग्य नाही. तसे सांगितल्यावर जो दंड केला जातो, तो सर्व भिक्खूच्या गळ्यावर येतो. पूर्वोक्त पद्धतीनेच दंड वसूल करवून घेणाऱ्याला पाराजिक होते. पण जो "ते दंड करतील" हे जाणूनही उल्लेख न करता सांगतो, आणि त्यांनी शोध घेऊन दंड केलाच, तर दोष होत नाही. विहारसीमेत झाडे इत्यादी तोडणाऱ्यांचे वासी (तसणी), कुऱ्हाड इत्यादी घेऊन दगडाने ठेचणे योग्य नाही. जर धार तुटली, तर ती दुरुस्त करून दिली पाहिजे. धावत जाऊन त्यांचे साहित्य (परिष्कार) हिरावून घेणे, हे देखील करू नये; कारण चित्त अत्यंत चंचल असते, चोरीची चेतना उत्पन्न झाल्यास मूलोच्छेदाला (पाराजिकाला) प्राप्त होऊ शकतो. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. กถินสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. कठिन-समुत्थान - क्रिया, संज्ञाविमोक्ष नसलेले, अचित्तक, प्रज्ञप्तिवद्य, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त, त्रिवेदन असे आहे. สตฺตรสเก ปฐมสิกฺขาปทํ. सत्तरसक (सतरा संघादिसेस) मधील पहिले शिक्षापद. ๒. ทุติยสงฺฆาทิเสสสิกฺขาปทวณฺณนา २. दुसऱ्या संघादिसेस शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๖๘๒. ทุติเย – วรภณฺฑนฺติ มุตฺตามณิเวฬุริยาทิ มหคฺฆภณฺฑํ. ६८२. दुसऱ्या शिक्षापदात - 'वरभंड' म्हणजे मोती, मणी, वैडूर्य इत्यादी मौल्यवान वस्तू. ๖๘๓. อนปโลเกตฺวาติ อนาปุจฺฉิตฺวา. คณํ วาติ มลฺลคณภฏิปุตฺตคณาทิกํ. ปูคนฺติ ธมฺมคณํ. เสณินฺติ คนฺธิกเสณิทุสฺสิกเสณิอาทิกํ. ยตฺถ ยตฺถ หิ ราชาโน คณาทีนํ คามนิคเม นิยฺยาเตนฺติ ‘‘ตุมฺเหว เอตฺถ อนุสาสถา’’ติ, ตตฺถ ตตฺถ เต เอว อิสฺสรา โหนฺติ. ตสฺมา เต สนฺธาย อิทํ วุตฺตํ. เอตฺถ จ ราชานํ วา คณาทิเก วา อาปุจฺฉิตฺวาปิ ภิกฺขุนิสงฺโฆ อาปุจฺฉิตพฺโพว. ฐเปตฺวา กปฺปนฺติ ติตฺถิเยสุ วา [Pg.184] อญฺญภิกฺขุนีสุ วา ปพฺพชิตปุพฺพํ กปฺปคติกํ ฐเปตฺวาติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ६८३. 'अनपलोकेत्वा' म्हणजे न विचारता. 'गणं वा' म्हणजे मल्ल गण, भटपुत्र गण इत्यादी. 'पूगं' म्हणजे धर्मगण. 'सेणिं' म्हणजे गंधिक श्रेणी, दुस्सिक श्रेणी इत्यादी. कारण ज्या ज्या ठिकाणी राजे लोक गण इत्यादींना "तुम्हीच येथे शासन चालवा" असे म्हणून गावे व नगरे सोपवतात, त्या त्या ठिकाणी तेच स्वामी असतात. म्हणून त्यांना उद्देशून हे म्हटले आहे. आणि येथे राजाला किंवा गण इत्यादींना विचारले असले तरीही भिक्खुणीसंघाला विचारलेच पाहिजे. 'ठपेत्वा कप्पं' म्हणजे तीर्थिकांमध्ये किंवा इतर भिक्खुणींमध्ये पूर्वी प्रव्रजित झालेल्या कप्पगतिकाला वगळून. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. โจรีวุฏฺฐาปนสมุฏฺฐานํ – เกนจิ กรณีเยน ปกฺกนฺตาสุ ภิกฺขุนีสุ อคนฺตฺวา ขณฺฑสีมํ ยถานิสินฺนฏฺฐาเนเยว อตฺตโน นิสฺสิตกปริสาย สทฺธึ วุฏฺฐาเปนฺติยา วาจาจิตฺตโต สมุฏฺฐาติ, ขณฺฑสีมํ วา นทึ วา คนฺตฺวา วุฏฺฐาเปนฺติยา กายวาจาจิตฺตโต สมุฏฺฐาติ, อนาปุจฺฉา วุฏฺฐาปนวเสน กิริยากิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. चोरीवुट्ठापनसमुत्थान (चोरटीला उपसंपदा देण्याचे समुत्थान) - काही कारणास्तव भिक्खुणी निघून गेल्यावर, खंडसीमेत न जाता, बसलेल्या ठिकाणीच आपल्या आश्रित परिषदेसह उपसंपदा देणाऱ्या भिक्खुणीच्या वाणी आणि चित्तापासून हे समुत्थान होते; किंवा खंडसीमेत किंवा नदीवर जाऊन उपसंपदा देणाऱ्या भिक्खुणीच्या काय, वाणी आणि चित्तापासून हे समुत्थान होते. न विचारता उपसंपदा देण्याच्या कारणाने हे क्रिया-अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, प्रज्ञप्तिवद्य, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त, त्रिवेदन असे आहे. ทุติยสิกฺขาปทํ. दुसरे शिक्षापद समाप्त. ๓. ตติยสงฺฆาทิเสสสิกฺขาปทวณฺณนา ३. तिसऱ्या संघादिसेस शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๖๙๒. ตติเย – ปริกฺเขปํ อติกฺกาเมนฺติยาติ เอตฺถ เอกํ ปาทํ อติกฺกาเมนฺติยา ถุลฺลจฺจยํ, ทุติเยน อติกฺกนฺตมตฺเต สงฺฆาทิเสโส. อปริกฺขิตฺตสฺส คามสฺส อุปจารนฺติ เอตฺถ ปริกฺเขปารหฏฺฐานํ เอเกน ปาเทน อติกฺกมติ ถุลฺลจฺจยํ, ทุติเยน อติกฺกนฺตมตฺเต สงฺฆาทิเสโส. อปิเจตฺถ สกคามโต นิกฺขมนฺติยา คามนฺตรปจฺจยา อนาปตฺติ, นิกฺขมิตฺวา ปน คามนฺตรํ คจฺฉนฺติยา ปทวาเร ปทวาเร ทุกฺกฏํ, เอเกน ปาเทน อิตรสฺส คามสฺส ปริกฺเขเป วา อุปจาเร วา อติกฺกนฺตมตฺเต ถุลฺลจฺจยํ, ทุติเยน อติกฺกนฺตมตฺเต สงฺฆาทิเสโส. ตโต นิกฺขมิตฺวา ปุน สกคามํ ปวิสนฺติยาปิ เอเสว นโย. สเจ ปน ขณฺฑปากาเรน วา วติฉิทฺเทน วา ภิกฺขุนิวิหารภูมิเยว สกฺกา โหติ ปวิสิตุํ, เอวํ ปวิสมานาย กปฺปิยภูมึ นาม ปวิฏฺฐา โหติ, ตสฺมา วฏฺฏติ. สเจปิ หตฺถิปิฏฺฐิอาทีหิ วา อิทฺธิยา วา ปวิสติ, วฏฺฏติเยว. ปทสา คมนเมว หิ อิธาธิปฺเปตํ. เตเนว ‘‘ปฐมํ ปาทํ อติกฺกาเมนฺติยา’’ติอาทิมาห. ६९२. तिसऱ्यामध्ये – ‘परिक्खेपं अतिक्कामेन्तिया’ (कुंपण ओलांडताना) यामध्ये निर्णय असा समजावा: एका पावलाने ओलांडणाऱ्या भिक्खुणीला थुल्लच्चय आपत्ती होते, आणि दुसऱ्या पावलाने ओलांडल्याबरोबर संघादिसेस आपत्ती होते. ‘अपरीक्खित्तस्स गामस्स उपचारं’ (कुंपण नसलेल्या गावाच्या उपचारात) यामध्ये निर्णय असा समजावा: कुंपण घालण्यास योग्य असलेल्या जागेला एका पावलाने ओलांडल्यास थुल्लच्चय आपत्ती होते, आणि दुसऱ्या पावलाने ओलांडल्याबरोबर संघादिसेस आपत्ती होते. शिवाय, येथे स्वतःच्या गावातून बाहेर पडणाऱ्या भिक्खुणीला दुसऱ्या गावात जाण्याच्या कारणाने अनापत्ती (आपत्ती नाही) आहे. परंतु, बाहेर पडून दुसऱ्या गावाकडे जाणाऱ्या भिक्खुणीला पावलोपावली दुक्कट आपत्ती होते. एका पावलाने दुसऱ्या गावाच्या कुंपणाला किंवा उपचाराला (परिसराला) ओलांडल्याबरोबर थुल्लच्चय आपत्ती होते, आणि दुसऱ्या पावलाने ओलांडल्याबरोबर संघादिसेस आपत्ती होते. तिथून बाहेर पडून पुन्हा स्वतःच्या गावात प्रवेश करणाऱ्या भिक्खुणीच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. पण जर तुटलेल्या भिंतीतून किंवा कुंपणाच्या फटीतून भिक्खुणी विहाराच्याच भूमीत प्रवेश करणे शक्य असेल, आणि अशा प्रकारे प्रवेश केला, तर तिने कप्पियभूमीमध्ये (विहित भूमीत) प्रवेश केला असे मानले जाते, म्हणून ते योग्य आहे. जरी हत्तीच्या पाठीवरून इत्यादीने किंवा ऋद्धीने (अलौकिक शक्तीने) प्रवेश केला, तरीही ते योग्यच आहे. कारण येथे पायी चालून जाणेच अभिप्रेत आहे. म्हणूनच ‘पहिला पाय ओलांडताना’ इत्यादी म्हटले आहे। ทฺเว คามา ภิกฺขุนิวิหาเรน สมฺพทฺธวติกา โหนฺติ, ยสฺมึ คาเม ภิกฺขุนิวิหาโร, ตตฺถ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปุน วิหารํ ปวิสิตฺวา สเจ วิหารมชฺเฌน อิตรสฺส คามสฺส มคฺโค อตฺถิ, คนฺตุํ วฏฺฏติ. ตโต ปน คามโต เตเนว มคฺเคน ปจฺจาคนฺตพฺพํ. สเจ คามทฺวาเรน นิกฺขมิตฺวา อาคจฺฉติ, ปุริมนเยเนว อาปตฺติเภโท เวทิตพฺโพ. สกคามโต เกนจิ [Pg.185] กรณีเยน ภิกฺขุนีหิ สทฺธึ นิกฺขนฺตาย ปุน ปวิสนกาเล หตฺถิ วา มุจฺจติ, อุสฺสารณา วา โหติ, อิตรา ภิกฺขุนิโย สหสา คามํ ปวิสนฺติ, ยาว อญฺญา ภิกฺขุนี อาคจฺฉติ, ตาว พหิคามทฺวาเร ฐาตพฺพํ. สเจ น อาคจฺฉติ, ทุติยิกา ภิกฺขุนี ปกฺกนฺตา นาม โหติ, ปวิสิตุํ วฏฺฏติ. दोन गावांचे कुंपण भिक्खुणी विहाराशी जोडलेले असेल, आणि ज्या गावात भिक्खुणी विहार आहे, तिथे पिंडपातासाठी फिरून, पुन्हा विहारात प्रवेश करून, जर विहाराच्या मध्यातून दुसऱ्या गावाचा रस्ता असेल, तर जाणे योग्य आहे. परंतु त्या गावातून त्याच मार्गाने परत यावे. जर गावाच्या वेशीतून बाहेर पडून येत असेल, तर पूर्वी सांगितलेल्या नियमानेच आपत्तीचा भेद समजावा. स्वतःच्या गावातून काही कामासाठी इतर भिक्खुणींसोबत बाहेर पडलेल्या भिक्खुणीने, पुन्हा प्रवेश करतेवेळी, जर हत्ती सुटला असेल किंवा लोकांची पळापळ झाली असेल, आणि इतर भिक्खुणी घाईघाईने गावात प्रवेश करत असतील, तर जोपर्यंत दुसरी भिक्खुणी येत नाही, तोपर्यंत गावाच्या वेशीबाहेर थांबावे. जर ती आली नाही, तर सोबतीची भिक्खुणी निघून गेली असे मानले जाते, म्हणून प्रवेश करणे योग्य आहे। ปุพฺเพ มหาคาโม โหติ, มชฺเฌ ภิกฺขุนิวิหาโร. ปจฺฉา ตํ คามํ จตฺตาโร ชนา ลภิตฺวา วิสุํ วิสุํ วติปริกฺเขปํ กตฺวา วิภชิตฺวา ภุญฺชนฺติ, วิหารโต เอกํ คามํ คนฺตุํ วฏฺฏติ. ตโต อปรํ คามํ ทฺวาเรน วา วติฉิทฺเทน วา ปวิสิตุํ น วฏฺฏติ. ปุน วิหารเมว ปจฺจาคนฺตุํ วฏฺฏติ. กสฺมา? วิหารสฺส จตุคามสาธารณตฺตา. पूर्वी एक मोठे गाव होते, ज्याच्या मध्यभागी भिक्खुणी विहार होता. नंतर त्या गावाला चार लोकांनी मिळवून, वेगवेगळे कुंपण घालून आणि विभागून त्याचा उपभोग घेतला. अशा वेळी विहारातून एका गावात जाणे योग्य आहे. तिथून दुसऱ्या गावात दरवाजातून किंवा कुंपणाच्या फटीतून प्रवेश करणे योग्य नाही. पुन्हा विहारातच परतणे योग्य आहे. का? कारण विहार हा चारही गावांना सामायिक (साधारण) असल्यामुळे। อนฺตรวาสโก เตมิยตีติ ยตฺถ ยถา ติมณฺฑลปฏิจฺฉาทนํ โหติ; เอวํ นิวตฺถาย ภิกฺขุนิยา วสฺสกาเล ติตฺเถน วา อติตฺเถน วา โอตริตฺวา ยตฺถ กตฺถจิ อุตฺตรนฺติยา เอกทฺวงฺคุลมตฺตมฺปิ อนฺตรวาสโก เตมิยติ. เสสํ นทีลกฺขณํ นทีนิมิตฺตกถาย อาวิ ภวิสฺสติ. เอวรูปํ นทึ ติตฺเถน วา อติตฺเถน วา โอตริตฺวา อุตฺตรณกาเล ปฐมํ ปาทํ อุทฺธริตฺวา ตีเร ฐเปนฺติยา ถุลฺลจฺจยํ, ทุติยปาทุทฺธาเร สงฺฆาทิเสโส. เสตุนา คจฺฉติ, อนาปตฺติ. ปทสา โอตริตฺวา อุตฺตรณกาเล เสตุํ อาโรหิตฺวา อุตฺตรนฺติยาปิ อนาปตฺติ. เสตุนา ปน คนฺตฺวา อุตฺตรณกาเล ปทสา คจฺฉนฺติยา อาปตฺติเยว. ยานนาวาอากาสคมนาทีสุปิ เอเสว นโย. โอริมตีรโต ปน ปรตีรเมว อกฺกมนฺติยา อนาปตฺติ. รชนกมฺมตฺถํ คนฺตฺวา ทารุสงฺกฑฺฒนาทิกิจฺเจน ทฺเว ติสฺโส อุภยตีเรสุ วิจรนฺติ, วฏฺฏติ. สเจ ปเนตฺถ กาจิ กลหํ กตฺวา อิตรํ ตีรํ คจฺฉติ, อาปตฺติ. ทฺเว เอกโต อุตฺตรนฺติ, เอกา มชฺเฌ นทิยา กลหํ กตฺวา นิวตฺติตฺวา โอริมตีรเมว อาคจฺฉติ, อาปตฺติ. อิตริสฺสา ปน อยํ ปกฺกนฺตฏฺฐาเน ฐิตา โหติ, ตสฺมา ปรตีรํ คจฺฉนฺติยาปิ อนาปตฺติ. นฺหายิตุํ วา ปาตุํ วา โอติณฺณา ตเมว ตีรํ ปจฺจุตฺตรติ, อนาปตฺติ. ‘अंतरवासको तेमियति’ (अंतरवासक ओला होतो) म्हणजे, ज्या नदीत, ज्या प्रकारे परिधान केले असता तिमण्डल-प्रच्छादन (गुडघे आणि नाभी झाकणे) होते; अशा प्रकारे परिधान केलेल्या भिक्खुणीचा, पावसाळ्यात घाटावरून किंवा घाटाशिवाय इतर ठिकाणाहून उतरून, कोणत्याही ठिकाणी नदी पार करून वर चढताना, एक किंवा दोन बोटे जरी अंतरवासक (नेसूचे वस्त्र) ओला होत असेल, तर ती नदी म्हटली जाते. उर्वरित नदीचे लक्षण ‘नदीनिमित्तकथा’ (उपोसतक्खन्धक) मध्ये स्पष्ट होईल. अशा प्रकारच्या नदीत घाटावरून किंवा घाटाशिवाय उतरून, वर चढताना पहिला पाय उचलून तीरावर ठेवणाऱ्या भिक्खुणीला थुल्लच्चय आपत्ती होते, आणि दुसरा पाय उचलल्यास संघादिसेस आपत्ती होते. पुलावरून गेल्यास अनापत्ती आहे. पायी उतरून, वर चढताना पुलावर चढून पार करणाऱ्या भिक्खुणीलाही अनापत्ती आहे. परंतु पुलावरून जाऊन, वर चढताना पायी जाणाऱ्या भिक्खुणीला आपत्तीच होते. वाहन, नाव, आकाशगमन इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. परंतु अलीकडच्या तीरावरून थेट पलीकडच्या तीरावरच पाऊल ठेवणाऱ्या भिक्खुणीला अनापत्ती आहे. कपडे रंगवण्यासाठी जाऊन, लाकडे गोळा करणे इत्यादी कामासाठी दोन किंवा तीन भिक्खुणी दोन्ही तीरांवर फिरतात, तर ते योग्य आहे. पण जर त्यांच्यापैकी कोणी भांडण करून दुसऱ्या तीरावर गेली, तर आपत्ती होते. दोन भिक्खुणी एकत्र नदी पार करत असताना, एकीने नदीच्या मध्यभागी भांडण करून मागे फिरून अलीकडच्या तीरावरच परत आल्यास आपत्ती होते. परंतु दुसऱ्या भिक्खुणीसाठी ही (मागे फिरलेली) निघून गेलेल्या व्यक्तीच्या जागी असते, म्हणून ती पलीकडच्या तीरावर गेली तरी तिला अनापत्ती आहे. स्नान करण्यासाठी किंवा पाणी पिण्यासाठी उतरलेली भिक्खुणी त्याच तीरावर परत चढली, तर अनापत्ती आहे। สห อรุณุคฺคมนาติ เอตฺถ สเจ สชฺฌายํ วา ปธานํ วา อญฺญํ วา กิญฺจิ กมฺมํ กุรุมานา ปุเรอรุเณเยว ทุติยิกาย สนฺติกํ คมิสฺสามีติ อาโภคํ กโรติ, อชานนฺติยา เอว จสฺสา อรุโณ อุคฺคจฺฉติ, อนาปตฺติ. อถ ปน ‘‘ยาว อรุณุคฺคมนา อิเธว ภวิสฺสามี’’ติ วา อนาโภเคน วา วิหารสฺส เอกเทเส อจฺฉติ, ทุติยิกาย หตฺถปาสํ น [Pg.186] โอตรติ, อรุณุคฺคมเน สงฺฆาทิเสโส. หตฺถปาโสเยว หิ อิธ ปมาณํ, หตฺถปาสาติกฺกเม เอกคพฺโภปิ น รกฺขติ. ‘सह अरुणुग्गमना’ (अरुणोदयाबरोबर) यामध्ये, जर सज्झाय (पठण) किंवा प्रधान (ध्यानसाधना) यांसारखे इतर कोणतेही काम करत असताना, ‘अरुणोदयापूर्वीच सोबतीणीच्या जवळ जाईन’ असा संकल्प करते, आणि तिला नकळतच अरुणोदय झाला, तर अनापत्ती आहे. परंतु जर ‘अरुणोदयापर्यंत मी इथेच राहीन’ असा विचार करून, किंवा असा विचार न करता (दुर्लक्ष करून) विहाराच्या एका भागात राहते, आणि सोबतीणीच्या हस्तपासात (हातभर अंतरात) येत नाही, तर अरुणोदय झाल्यावर संघादिसेस आपत्ती होते. कारण येथे हस्तपास हेच प्रमाण आहे, हस्तपासाचे उल्लंघन झाल्यास एकाच खोलीत असणे देखील आपत्तीपासून वाचवू शकत नाही। อคามเก อรญฺเญติ เอตฺถ ‘‘นิกฺขมิตฺวา พหิ อินฺทขีลา สพฺพเมตํ อรญฺญ’’นฺติ เอวํ วุตฺตลกฺขณเมว อรญฺญํ. ตํ ปเนตํ เกวลํ คามาภาเวน ‘‘อคามก’’นฺติ วุตฺตํ, น วิญฺฌาฏวิสทิสตาย. ตาทิเส อรญฺเญ โอกฺกนฺเต ทสฺสนูปจาเร วิชหิเต สเจปิ สวนูปจาโร อตฺถิ, อาปตฺติ. เตเนว วุตฺตํ อฏฺฐกถายํ ‘‘สเจ ภิกฺขุนีสุ มหาโพธิองฺคณํ ปวิสนฺตีสุ เอกา พหิ ติฏฺฐติ, ตสฺสาปิ อาปตฺติ. โลหปาสาทํ ปวิสนฺตีสุปิ ปริเวณํ ปวิสนฺตีสุปิ เอเสว นโย. มหาเจติยํ วนฺทมานาสุ เอกา อุตฺตรทฺวาเรน นิกฺขมิตฺวา คจฺฉติ, ตสฺสาปิ อาปตฺติ. ถูปารามํ ปวิสนฺตีสุ เอกา พหิ ติฏฺฐติ, ตสฺสาปิ อาปตฺตี’’ติ. เอตฺถ จ ทสฺสนูปจาโร นาม ยตฺถ ฐิตํ ทุติยิกา ปสฺสติ. สเจ ปน สาณิปาการนฺตริกาปิ โหติ, ทสฺสนูปจารํ วิชหติ นาม. สวนูปจาโร นาม ยตฺถ ฐิตา มคฺคมูฬฺหสทฺเทน วิย ธมฺมสวนาโรจนสทฺเทน วิย จ ‘‘อยฺเย’’ติ สทฺทายนฺติยา สทฺทํ สุณาติ. อชฺโฌกาเส ทูเรปิ ทสฺสนูปจาโร นาม โหติ. โส เอวรูเป สวนูปจาเร วิชหิเต น รกฺขติ, วิชหิตมตฺเตว อาปตฺติ สงฺฆาทิเสสสฺส. ‘अगामके अरञ्ञे’ (गाव नसलेल्या अरण्यात) यामध्ये, ‘इंद्रखिलाच्या (वेशीच्या) बाहेर पडल्यावर हे सर्व अरण्य आहे’ असे सांगितलेल्या लक्षणांचेच अरण्य समजावे. परंतु ते केवळ गाव नसल्यामुळे ‘अगामक’ म्हटले आहे, विंध्याटवीसारखे भयानक अरण्य असल्यामुळे नाही. अशा अरण्यात प्रवेश केल्यावर, दर्शन-उपचार (दिसण्याची मर्यादा) सोडल्यावर, जरी श्रवण-उपचार (ऐकू येण्याची मर्यादा) शिल्लक असला, तरीही आपत्ती होते. म्हणूनच अट्ठकथेत म्हटले आहे: ‘जर भिक्खुणी महाबोधीच्या अंगणात प्रवेश करत असताना, एकीने बाहेर उभे राहावे, तर तिलाही आपत्ती होते. लोहप्रासादात प्रवेश करताना किंवा त्याच्या परिवेणात प्रवेश करतानाही हाच नियम आहे. महाचेतीची वंदना करत असताना, एकीने उत्तर दरवाजातून बाहेर पडून जावे, तर तिलाही आपत्ती होते. थूपारामात प्रवेश करत असताना, एकीने बाहेर उभे राहावे, तर तिलाही आपत्ती होते.’ आणि येथे ‘दर्शन-उपचार’ म्हणजे अशी जागा जिथे उभे राहिलेल्या व्यक्तीला सोबतीण पाहू शकते. पण जर ती पडद्याच्या पलीकडे असेल, तर दर्शन-उपचार सोडला असे मानले जाते. ‘श्रवण-उपचार’ म्हणजे अशी जागा जिथे उभे राहून, रस्ता चुकलेल्या व्यक्तीच्या आवाजाप्रमाणे किंवा धर्मश्रवणाची घोषणा करणाऱ्या आवाजाप्रमाणे ‘अय्ये!’ (आर्ये!) अशी हाक मारणाऱ्या भिक्खुणीचा आवाज ऐकू येतो. उघड्या मैदानात दूरवर देखील दर्शन-उपचार असतो. असा दर्शन-उपचार, अशा प्रकारचा श्रवण-उपचार सुटल्यावर आपत्तीपासून वाचवू शकत नाही, तो सुटल्याबरोबर संघादिसेस आपत्ती होते। เอกา มคฺคํ คจฺฉนฺตี โอหียติ. สอุสฺสาหา เจ หุตฺวา อิทานิ ปาปุณิสฺสามีติ อนุพนฺธติ, อนาปตฺติ. สเจ ปุริมาโย อญฺเญน มคฺเคน คจฺฉนฺติ, ปกฺกนฺตา นาม โหนฺติ, อนาปตฺติเยว. ทฺวินฺนํ คจฺฉนฺตีนํ เอกา อนุพนฺธิตุํ อสกฺโกนฺตี ‘‘คจฺฉตุ อย’’นฺติ โอหียติ, อิตราปิ ‘‘โอหียตุ อย’’นฺติ, คจฺฉติ, ทฺวินฺนมฺปิ อาปตฺติ. สเจ ปน คจฺฉนฺตีสุ ปุริมาปิ อญฺญํ มคฺคํ คณฺหาติ, ปจฺฉิมาปิ อญฺญํ, เอกา เอกิสฺสา ปกฺกนฺตฏฺฐาเน ติฏฺฐติ, ทฺวินฺนมฺปิ อนาปตฺติ. एक भिक्खुणी मार्गाने जात असताना मागे राहते. जर ती उत्साहाने 'आता मी त्यांना गाठेन' असा विचार करून मागे धावते (पाठलाग करते), तर तिला आपत्ती (दोष) नाही. जर आधीच्या भिक्खुणी दुसऱ्या मार्गाने गेल्या, तर त्या 'निघून गेल्या' असे म्हटले जाते, त्यामुळेही आपत्ती नाही. एकत्र जाणाऱ्या दोन भिक्खुणींपैकी एकीला मागे धावणे (गाठणे) शक्य न झाल्यामुळे 'ही पुढे जावो' असा विचार करून ती मागे राहते, आणि दुसरीही 'ही मागे राहो' असा विचार करून पुढे जाते, तर दोघींनाही आपत्ती होते. परंतु, जर जात असताना आधीची भिक्खुणी दुसरा मार्ग धरते आणि मागची भिक्खुणीही दुसरा मार्ग धरते, आणि एकीच्या निघून जाण्याच्या ठिकाणी दुसरी उभी राहते, तर दोघींनाही आपत्ती नाही. ๖๙๓. ปกฺขสงฺกนฺตา วาติ ติตฺถายตนํ สงฺกนฺตา, เสสํ อุตฺตานเมว. ปฐมปาราชิกสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ६९३. 'पक्खसंकन्ता' (पक्षात गेलेली) म्हणजे तित्थियांच्या (तीर्थिकांच्या) आश्रमात गेलेली. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. पहिल्या पाराजिकाप्रमाणे याचे समुत्थान आहे – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तिवद्य), कायकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदन. ตติยสิกฺขาปทํ. तिसरे शिक्षापद समाप्त. ๔. จตุตฺถสงฺฆาทิเสสสิกฺขาปทวณฺณนา ४. चौथ्या संघादिसेस शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๖๙๔-๘. จตุตฺเถ [Pg.187] – ปาทปีฐํ นาม โธตปาทฏฺฐปนกํ. ปาทกฐลิกา นาม อโธตปาทฏฺฐปนกํ. อนญฺญาย คณสฺส ฉนฺทนฺติ ตสฺเสว การกคณสฺส ฉนฺทํ อชานิตฺวา. วตฺเต วตฺตนฺตินฺติ เตจตฺตาลีสปฺปเภเท เนตฺถารวตฺเต วตฺตมานํ. เสสํ อุตฺตานเมว. ६९४-८. चौथ्या शिक्षापदात – 'पादपीठ' म्हणजे धुतलेले पाय ठेवण्याचे लहान आसन (पाट). 'पादकठलिका' म्हणजे न धुतलेले पाय ठेवण्याचे लहान आसन. 'अनञ्ञाय गणस्स छन्दं' म्हणजे त्या कर्म करणाऱ्या गणाचा (संघाचा) छंद (संमती) न जाणून घेता. 'वत्ते वत्तन्तिं' म्हणजे त्रेचाळीस प्रकारच्या नेत्थारवत्तामध्ये (कर्तव्यपालनात) वर्तणाऱ्या भिक्खुणीला. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ธุรนิกฺเขปสมุฏฺฐานํ – กายวาจาจิตฺตโต สมุฏฺฐาติ, กิริยากิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. धुरनिक्खेपसमुत्थान (जवाबदारी सोडण्याचे समुत्थान) – हे काय, वाचा आणि चित्तापासून उत्पन्न होते; क्रिया-अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज (लोकवद्य), कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदन आहे. จตุตฺถสิกฺขาปทํ. चौथे शिक्षापद समाप्त. ๕. ปญฺจมสงฺฆาทิเสสสิกฺขาปทวณฺณนา ५. पाचव्या संघादिसेस शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๗๐๑. ปญฺจเม – เอกโต อวสฺสุเตติ เอตฺถ ‘‘ภิกฺขุนิยา อวสฺสุตภาโว ทฏฺฐพฺโพ’’ติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. มหาอฏฺฐกถายํ ปเนตํ น วุตฺตํ, ตํ ปาฬิยา สเมติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ७०१. पाचव्या शिक्षापदात – 'एकतो अवस्सुते' याविषयी 'महापच्चरी' मध्ये म्हटले आहे की, 'भिक्खुणीचा अवस्सुतभाव (रागयुक्त ओलावा) पाहावा.' परंतु 'महाअट्ठकथा' मध्ये हे म्हटलेले नाही, ते पाळीशी सुसंगत आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ปฐมปาราชิกสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทฺวิเวทนนฺติ. पहिल्या पाराजिकाप्रमाणे याचे समुत्थान आहे – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज (लोकवद्य), कायकर्म, अकुशलचित्त आणि द्विवेदन. ปญฺจมสิกฺขาปทํ. पाचवे शिक्षापद समाप्त. ๖. ฉฏฺฐสงฺฆาทิเสสสิกฺขาปทวณฺณนา ६. सहाव्या संघादिसेस शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๗๐๕-๖. ฉฏฺเฐ – ยโต ตฺวนฺติ ยสฺมา ตฺวํ. อุยฺโยเชติ อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติอาทิกา สงฺฆาทิเสสปริโยสานา อาปตฺติโย กสฺสา โหนฺตีติ? อุยฺโยชิกาย. วุตฺตญฺเจตํ ปริวาเรปิ – ७०५-६. सहाव्या शिक्षापदात – 'यतो त्वं' म्हणजे 'ज्या कारणाने तू'. 'उय्योजेति आपत्ति दुक्कटस्स' इत्यादी संघादिसेसपर्यंतच्या आपत्ती कोणाला होतात? तर उय्योजिका (प्रवृत्त करणाऱ्या/उत्तेजन देणाऱ्या) भिक्खुणीला होतात. हे 'परिवार' मध्येही म्हटले आहे – ‘‘น เทติ น ปฏิคฺคณฺหาติ, ปฏิคฺคโห เตน น วิชฺชติ; อาปชฺชติ ครุกํ น ลหุกํ, ตญฺจ ปริโภคปจฺจยา; ปญฺหา เมสา กุสเลหิ จินฺติตา’’ติ. (ปริ. ๔๘๑); “ती देत नाही आणि स्वीकारतही नाही, त्यामुळे तिथे स्वीकारणे घडत नाही; तरीही ती हलक्या (लहुक) नव्हे तर जड (गरुक, संघादिसेस) आपत्तीला प्राप्त होते, आणि ती उपभोगाच्या प्रत्ययाने (कारणाने) प्राप्त होते; हा प्रश्न कुशल (विद्वानांनी) विचार केला आहे.” อยญฺหิ [Pg.188] คาถา อิมํ อุยฺโยชิกํ สนฺธาย วุตฺตา. อิตริสฺสา ปน อาปตฺติเภโท ปฐมสิกฺขาปเท วิภตฺโตติ. เสสํ อุตฺตานเมว. कारण ही गाथा या उय्योजिका (प्रवृत्त करणाऱ्या) भिक्खुणीला उद्देशून म्हटली आहे. परंतु दुसऱ्या (प्रवृत्त केलेल्या) भिक्खुणीच्या आपत्तीचा भेद पहिल्या शिक्षापदात स्पष्ट केला आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. त्रिसमुत्थान – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज (लोकवद्य), कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि त्रिवेदन. ฉฏฺฐสิกฺขาปทํ. सहावे शिक्षापद समाप्त. ๗. สตฺตมสงฺฆาทิเสสสิกฺขาปทวณฺณนา ७. सातव्या संघादिसेस शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๗๐๙. สตฺตเม – ยาวตติยกปทตฺโถ มหาวิภงฺเค วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. เสสํ อุตฺตานเมวาติ. ७०९. सातव्या शिक्षापदात – 'यावततियक' या पदाचा अर्थ महाविभंगात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. สมนุภาสนสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. समणुभासनसमुत्थान (समर्थन/समजावण्याच्या कर्माचे समुत्थान) – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज (लोकवद्य), कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदन. สตฺตมสิกฺขาปทํ. सातवे शिक्षापद समाप्त. ๘. อฏฺฐมสงฺฆาทิเสสสิกฺขาปทวณฺณนา ८. आठव्या संघादिसेस शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๗๑๕. อฏฺฐเม – กิสฺมิญฺจิเทว อธิกรเณติ จตุนฺนํ อญฺญตรสฺมึ. ปทภาชเน ปน เกวลํ อธิกรณวิภาคํ ทสฺเสตุํ ‘‘อธิกรณํ นาม จตฺตาริ อธิกรณานี’’ติอาทิ วุตฺตํ. เสสํ อุตฺตานเมว สทฺธึ สมุฏฺฐานาทีหีติ. ७१५. आठव्या शिक्षापदात – 'किस्मिञ्चिदेव अधिकरणे' म्हणजे चार अधिकरणांपैकी कोणत्याही एका अधिकरणात. परंतु पदभाजनात केवळ अधिकरणांचे वर्गीकरण दाखवण्यासाठी भगवंतांनी 'अधिकरणं नाम चत्तारि अधिकरणानि' इत्यादी म्हटले आहे. उर्वरित भाग समुत्थानासह स्पष्टच आहे. อฏฺฐมสิกฺขาปทํ. आठवे शिक्षापद समाप्त. ๙. นวมสงฺฆาทิเสสสิกฺขาปทวณฺณนา ९. नव्या संघादिसेस शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๗๒๓. นวเม – สํสฏฺฐาติ มิสฺสีภูตา. อนนุโลมิเกนาติ ปพฺพชิตานํ อนนุโลเมน กายิกวาจสิเกน. สํสฏฺฐาติ คิหีนํ โกฏฺฏนปจนคนฺธปิสนมาลาคนฺถนาทินา กายิเกน สาสนปฏิสาสนาหรณสญฺจริตฺตาทินา วาจสิเกน จ สํสฏฺฐา. ปาโป กิตฺติสทฺโท เอตาสนฺติ ปาปสทฺทา[Pg.189]. ปาโป อาชีวสงฺขาโต สิโลโก เอตาสนฺติ ปาปสิโลกา. เสสํ อุตฺตานเมว สทฺธึ สมุฏฺฐานาทีหีติ. ७२३. नव्या शिक्षापदात – 'संसट्ठा' म्हणजे एकत्र आलेल्या (मिश्रित झालेल्या). 'अननुलोमिकेन' म्हणजे प्रवृत्त झालेल्या (प्रव्रजित) भिक्खुणींना अयोग्य अशा कायिक व वाचिक व्यवहाराने. 'संसट्ठा' म्हणजे गृहस्थांच्या धान्याची कांडण-पिळण करणे, स्वयंपाक करणे, सुगंधी द्रव्ये वाटणे, फुलांचे हार गुंफणे इत्यादी कायिक कर्माने आणि निरोप पोहोचवणे, निरोप आणणे, मध्यस्थी करणे इत्यादी वाचिक कर्माने एकत्र आलेल्या. ज्यांची वाईट कीर्ती (अपकीर्ती) पसरली आहे, त्या 'पापसद्दा' (वाईट कीर्तीच्या) होत. ज्यांचा उपजीविकेशी संबंधित वाईट लौकिक (अपकीर्ती) आहे, त्या 'पापसिलोका' होत. उर्वरित भाग समुत्थानासह स्पष्टच आहे. นวมสิกฺขาปทํ. नवे शिक्षापद समाप्त. ๑๐. ทสมสงฺฆาทิเสสสิกฺขาปทวณฺณนา १०. दहाव्या संघादिसेस शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๗๒๗. ทสเม – เอวาจาราติ เอวํอาจารา. ยาทิโส ตุมฺหากํ อาจาโร, ตาทิสา อาจาราติ อตฺโถ. เอส นโย สพฺพตฺถ. อุญฺญายาติ อวญฺญาย นีจํ กตฺวา ชานนาย. ปริภเวนาติ กึ อิมา กริสฺสนฺตีติ เอวํ ปริภวิตฺวา ชานเนน. อกฺขนฺติยาติ อสหนตาย; โกเธนาติ อตฺโถ. เวภสฺสิยาติ พลวภสฺสภาเวน; อตฺตโน พลปฺปกาสเนน สมุตฺราสเนนาติ อตฺโถ. ทุพฺพลฺยาติ ตุมฺหากํ ทุพฺพลภาเวน. สพฺพตฺถ อุญฺญาย จ ปริภเวน จาติ เอวํ สมุจฺจยตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. วิวิจฺจถาติ วินา โหถ. เสสํ อุตฺตานเมว สทฺธึ สมุฏฺฐานาทีหีติ. ७२७. दहाव्या शिक्षापदात – 'एवाचारा' म्हणजे अशा आचरणाच्या. 'जसे तुमचे आचरण आहे, तशाच आचरणाच्या' असा अर्थ आहे. हाच नियम सर्वत्र लागू होतो. 'उञ्ञाय' म्हणजे अवहेलना करून, कमी लेखून समजण्याने. 'परिभवेन' म्हणजे 'ह्या काय करणार आहेत?' अशा प्रकारे तिरस्कार करून समजण्याने. 'अक्खन्तिया' म्हणजे असहनशीलतेने, क्रोधाने असा अर्थ आहे. 'वेभस्सिय' म्हणजे कठोर बोलण्याने, स्वतःचे बळ दाखवण्यासाठी आणि तुम्हाला घाबरवण्यासाठी असा अर्थ आहे. 'दुब्बल्य' म्हणजे तुमच्या दुर्बलतेमुळे. सर्वत्र 'उञ्ञाय च परिभवेन च' अशा प्रकारे समुच्चय अर्थ समजावा. 'विविच्चथ' म्हणजे वेगळ्या व्हा. उर्वरित भाग समुत्थानासह स्पष्टच आहे. ทสมสิกฺขาปทํ. दहावे शिक्षापद समाप्त. อุทฺทิฏฺฐา โข อยฺยาโย สตฺตรส สงฺฆาทิเสสาติ เอตฺถ ฉนฺนํ ปฐมาปตฺติกานํ อนนฺตรา สญฺจริตฺตํ, ทฺเว ทุฏฺฐโทสาติ อิมานิ ตีณิ สิกฺขาปทานิ มหาวิภงฺคโต ปกฺขิปิตฺวา นว ปฐมาปตฺติกา, จตุนฺนํ ยาวตติยกานํ อนนฺตรา มหาวิภงฺคโตปิ จตฺตาโร ยาวตติยเก ปกฺขิปิตฺวา อฏฺฐ ยาวตติยกา เวทิตพฺพา. เอวํ สพฺเพปิ ปาติโมกฺขุทฺเทสมคฺเคน อุทฺทิฏฺฐา โข อยฺยาโย สตฺตรส สงฺฆาทิเสสา ธมฺมาติ เอวเมตฺถ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. เสสํ อุตฺตานเมว อญฺญตฺร ปกฺขมานตฺตา. ตํ ปน ขนฺธเก วิตฺถาเรน วณฺณยิสฺสามาติ. 'उद्दिठ्ठा खो अय्यायो सत्तरस सङ्घादिसेसा' यामध्ये – सहा पठमापत्तिकांच्या (पहिल्या आपत्तींच्या) नंतर संचरित्त शिक्षापद आणि दोन दुट्ठदोस शिक्षापदे, अशी ही three शिक्षापदे महाविभंगातून समाविष्ट करून नऊ पठमापत्तिका समजाव्यात; आणि चार यावततियकांच्या नंतर महाविभंगातूनही चार यावततियक समाविष्ट करून आठ यावततियक समजावेत. अशा प्रकारे, 'हे आर्यांनो, पातिमोक्खाच्या उद्देशमार्गाने सर्व सतरा संघादिसेस धर्म उद्दिष्ट (घोषित) केले आहेत' असा येथे अर्थ समजावा. पक्खमानत्त (पक्षमानत्व) वगळता उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. त्या पक्खमानत्ताचे स्पष्टीकरण आम्ही खन्धकामध्ये विस्ताराने करू. สมนฺตปาสาทิกาย วินยสํวณฺณนาย ภิกฺขุนีวิภงฺเค समन्तपासादिका नावाच्या विनय-टीकेतील भिक्खुणीविभंगात – สตฺตรสกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. सतरा संघादिसेसांचे स्पष्टीकरण समाप्त झाले. สงฺฆาทิเสสกณฺฑํ นิฏฺฐิตํ. संघादिसेस काण्ड समाप्त झाले. ๓. นิสฺสคฺคิยกณฺฑํ (ภิกฺขุนีวิภงฺควณฺณนา) ३. निस्सग्गिय काण्ड (भिक्खुणीविभंग स्पष्टीकरण). ปฐมนิสฺสคฺคิยปาจิตฺติยสิกฺขาปทวณฺณนา पहिल्या निस्सग्गिय पाचित्तिय शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ตึส [Pg.190] นิสฺสคฺคิยา ธมฺมา, ภิกฺขุนีนํ ปกาสิตา; เย เตสํ ทานิ ภวติ, อยํ สํวณฺณนากฺกโม. भिक्खुणींसाठी जे तीस निस्सग्गिय धर्म (आपत्ती) भगवंतांनी घोषित केले आहेत, आता त्यांचे स्पष्टीकरण करण्याचा हा क्रम आहे. ๗๓๓. อามตฺติกาปณนฺติ อมตฺตานิ วุจฺจนฺติ ภาชนานิ; ตานิ เย วิกฺกิณนฺติ, เต วุจฺจนฺติ อามตฺติกา; เตสํ อาปโณ อามตฺติกาปโณ; ตํ วา ปสาเรสฺสนฺตีติ อตฺโถ. ७३३. 'आमत्तिकापणं' यामध्ये – पात्रांना (भांड्यांना) 'अमत्त' म्हटले जाते; जे ती विकतात त्यांना 'आमत्तिक' म्हटले जाते; त्यांचे दुकान म्हणजे 'आमत्तिकापण' (भांड्यांचे दुकान); किंवा 'ते दुकान थाटतील का?' असा अर्थ आहे. ๗๓๔. ปตฺตสนฺนิจยํ กเรยฺยาติ ปตฺตสนฺนิธึ กเรยฺย; เอกาหํ อนธิฏฺฐหิตฺวา วา อวิกปฺเปตฺวา วา ปตฺตํ ฐเปยฺยาติ อตฺโถ. เสสํ มหาวิภงฺเค วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. อยเมว หิ วิเสโส – ตตฺถ ทสาหํ ปริหาโร, อิธ เอกาหมฺปิ นตฺถิ. เสสํ ตาทิสเมว. ७३४. "पत्तसन्निचयं करेय्या" (पात्राचा संचय करावा) म्हणजे पात्राचा संग्रह (पत्तसन्निधि) करावा; एक दिवस सुद्धा अधिष्ठान न करता किंवा विकल्पन न करता पात्र ठेवावे, असा अर्थ आहे. उर्वरित भाग महाविभंगात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा. हाच विशेष फरक आहे - तेथे (भिक्खू महाविभंगात) दहा दिवसांची मुदत (परिहार) आहे, येथे (भिक्खुनी विभंगात) एक दिवसाचीही मुदत नाही. उर्वरित सर्व तसेच आहे. อิทมฺปิ กถินสมุฏฺฐานํ – กายวาจโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, อกิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. हे सुद्धा कठीण-समुत्थान आहे - हे काय-वाचेपासून आणि काय-वाचा-चित्तापासून समुत्थित होते; अक्रिया, नोसञ्ञाविमोक्ख (संज्ञा-विमोक्ष नसलेले), अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्ति-वद्य), कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदन आहे. ปฐมสิกฺขาปทํ. पहिले शिक्षापद समाप्त. ทุติยนิสฺสคฺคิยปาจิตฺติยสิกฺขาปทวณฺณนา दुसऱ्या निस्सग्गिय पाचित्तिय शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๗๓๘. ทุติเย – ทุจฺโจฬาติ วิรูปโจฬา; ชิณฺณโจฬาติ อตฺโถ. อปยฺยาหีติ อปิ อยฺยาหิ. ७३८. दुसऱ्या शिक्षापदात - "दुच्चोळा" म्हणजे विरूप वस्त्रे (कुरूप कपडे) किंवा जीर्ण वस्त्रे (फाटलेले कपडे) परिधान केलेल्या, असा अर्थ आहे. "अपय्याहि" म्हणजे "अपि अय्याहि" (आर्यांनी/भगिनींनी मिळवले आहे काय?). ๗๔๐. อาทิสฺส ทินฺนนฺติ สมฺปตฺตา ภาเชนฺตูติ วตฺวาปิ อิทํ คณสฺส อิทํ ตุมฺหากํ ทมฺมีติ วตฺวา วา ทาตุกมฺยตาย ปาทมูเล ฐเปตฺวา วา ทินฺนมฺปิ อาทิสฺส ทินฺนํ นาม โหติ. เอตํ สพฺพมฺปิ อกาลจีวรํ. อยฺยาย ทมฺมีติ เอวํ ปฏิลทฺธํ ปน ยถาทาเนเยว อุปเนตพฺพํ. เสสํ อุตฺตานเมว. ७४०. "आदिस्स दिन्नं" (उद्देशून दिलेले) म्हणजे आलेल्या भिक्खुनींनी ते वाटून घ्यावे असे म्हणून दिलेले, किंवा "हे मी गणाला (संघाला) देतो" किंवा "हे मी तुम्हांला देतो" असे म्हणून दिलेले, किंवा देण्याच्या इच्छेने चरणांजवळ ठेवून दिलेले चिवर सुद्धा 'आदिस्स दिन्न' (उद्देशून दिलेले) असे म्हटले जाते. हे सर्व 'अकालचिवर' (अवेळी मिळालेले चिवर) आहे. परंतु, "मी आर्यांना (भगिनींना) देतो" असे म्हणून मिळालेले चिवर ज्या उद्देशाने दिले आहे, त्याच अकालचिवर म्हणून स्वीकारले पाहिजे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. त्रिसमुत्थान - क्रिया, संज्ञा-विमोक्ष, सचित्तक, लोकवद्य, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि त्रिवेदन आहे. ทุติยสิกฺขาปทํ. दुसरे शिक्षापद समाप्त. ตติยนิสฺสคฺคิยปาจิตฺติยสิกฺขาปทวณฺณนา तिसऱ्या निस्सग्गिय पाचित्तिय शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๗๔๓-๕. ตติเย [Pg.191] – หนฺทาติ คณฺห. สยํ อจฺฉินฺทตีติ เอกํ ทตฺวา เอกํ อจฺฉินฺทนฺติยา เอกํ นิสฺสคฺคิยํ, พหูสุ พหูนิ. สเจ สํหริตฺวา ฐปิตานิ เอกโต อจฺฉินฺทติ, วตฺถุคณนาย อาปตฺติโย. พนฺธิตฺวา ฐปิเตสุ ปน เอกาว อาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ७४३-५. तिसऱ्या शिक्षापदात - "हन्द" म्हणजे घे. "स्वतः हिरावून घेणे" (सयं अच्छिन्दति) म्हणजे एक चिवर देऊन दुसरे हिरावून घेणाऱ्या भिक्खुनीला एक निस्सग्गिय (आपत्ती) होते, आणि अनेक चिवरे हिरावून घेतल्यास अनेक निस्सग्गिय आपत्ती होतात. जर घडी करून ठेवलेली चिवरे एकत्रच हिरावून घेतली, तर वस्तूंच्या संख्येनुसार आपत्ती होतात. परंतु, जर ती बांधून ठेवलेली असतील आणि ती हिरावून घेतली, तर एकच आपत्ती होते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. त्रिसमुत्थान - क्रिया, संज्ञा-विमोक्ष, सचित्तक, लोकवद्य, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदन आहे. ตติยสิกฺขาปทํ. तिसरे शिक्षापद समाप्त. จตุตฺถนิสฺสคฺคิยปาจิตฺติยสิกฺขาปทวณฺณนา चौथ्या निस्सग्गिय पाचित्तिय शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๗๔๘. จตุตฺเถ – กเยนาติ มูเลน. น เม อาวุโส สปฺปินา อตฺโถ; เตเลน เม อตฺโถติ อิทํ กิร สา อาหฏสปฺปึ ทตฺวา เตลมฺปิ อาหริสฺสตีติ มญฺญมานา อาห. วิญฺญาเปตฺวาติ ชานาเปตฺวา; อิทํ นาม อาหราติ ยาจิตฺวา วา. ७४८. चौथ्या शिक्षापदात - "कयेन" म्हणजे मूल्याने (किंमतीने). "हे बंधू, मला तुपाची गरज नाही, मला तेलाची गरज आहे" हे वाक्य ती (थुल्लनंदा) आणलेले तूप देऊन तेलही आणून देईल, अशा विचाराने बोलली असे म्हणतात. "विञ्ञापेत्वा" म्हणजे स्वतःची इच्छा कळवून किंवा "अमुक वस्तू आणून दे" अशी याचना करून. ๗๕๒. ตญฺเญว วิญฺญาเปตีติ ยํ ปฐมํ วิญฺญตฺตํ ตํ โถกํ นปฺปโหติ, ตสฺมา ปุน ตญฺเญว วิญฺญาเปตีติ อตฺโถ. อญฺญญฺจ วิญฺญาเปตีติ สเจ ปฐมํ สปฺปิวิญฺญตฺตํ, ยมกํ ปจิตพฺพนฺติ จ เวชฺเชน วุตฺตตฺตา เตเลน อตฺโถ โหติ, ตโต เตเลนาปิ เม อตฺโถติ เอวํ อญฺญญฺจ วิญฺญาเปติ. อานิสํสํ ทสฺเสตฺวาติ สเจ กหาปณสฺส สปฺปิ อาภตํ โหติ, อิมินา มูเลน ทิคุณํ เตลํ ลพฺภติ, เตนาปิ จ อิทํ กิจฺจํ นิปฺผชฺชติ, ตสฺมา เตลํ อาหราติ เอวํ อานิสํสํ ทสฺเสตฺวา วิญฺญาเปตีติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ७५२. "तञ्ञेव विञ्ञापेति" (त्याच गोष्टीची मागणी करते) म्हणजे जी गोष्ट आधी मागितली होती ती कमी पडते, म्हणून पुन्हा त्याच गोष्टीची मागणी करते, असा अर्थ आहे. "अञ्ञञ्च विञ्ञापेति" (दुसऱ्या गोष्टीची मागणी करते) म्हणजे जर आधी तूप मागितले असेल, आणि वैद्याने "तूप आणि तेल दोन्ही एकत्र करून शिजवावे" असे सांगितल्यामुळे तेलाची गरज निर्माण झाली, तर "मला तेलाचीही गरज आहे" असे म्हणून दुसऱ्या गोष्टीची मागणी करते. "आनिसंसं दस्सेत्वा" (फायदा दाखवून) म्हणजे जर एका कहापणाचे तूप आणले असेल, तर "याच मूल्याने दुप्पट तेल मिळू शकते, आणि त्यानेही हे औषधाचे काम पूर्ण होईल, म्हणून तेल घेऊन ये" असा फायदा दाखवून मागणी करते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ฉสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. षट्समुत्थान - क्रिया, संज्ञा-विमोक्ष नसलेले, अचित्तक, प्रज्ञप्ति-वद्य, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदन आहे. จตุตฺถสิกฺขาปทํ. चौथे शिक्षापद समाप्त. ปญฺจมนิสฺสคฺคิยปาจิตฺติยสิกฺขาปทวณฺณนา पाचव्या निस्सग्गिय पाचित्तिय शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๗๕๓. ปญฺจเม [Pg.192] – น เม สิกฺขมาเนติ อิทํ กิร สา กุลธีตา ‘‘อยํ อทฺธา เอวํ วุตฺตา อิทํ เตลํ ฐเปตฺวา สปฺปิมฺปิ เม อตฺตโน กุลฆรา อาหริสฺสตี’’ติ มญฺญมานา อาห. เจตาเปตฺวาติ ชานาเปตฺวา อิจฺเจว อตฺโถ. เสสํ สพฺพตฺถ จตุตฺถสทิสเมวาติ. ७५३. पाचव्या शिक्षापदात - "न मे सिक्खमान" हे वाक्य ती कुलकन्या (सिक्खमाना) "असे म्हटल्यावर ही नक्कीच हे तेल ठेवून माझ्यासाठी स्वतःच्या कुलाच्या घरातून तूपही घेऊन येईल" अशा विचाराने बोलली असे म्हणतात. "चेतापेत्वा" या पदाचा अर्थ "जानापेत्वा" (इच्छा कळवून) असाच आहे. उर्वरित सर्व भाग चौथ्या शिक्षापदासारखाच आहे. ปญฺจมสิกฺขาปทํ. पाचवे शिक्षापद समाप्त. ฉฏฺฐนิสฺสคฺคิยปาจิตฺติยสิกฺขาปทวณฺณนา सहाव्या निस्सग्गिय पाचित्तिय शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๗๕๘. ฉฏฺเฐ – ฉนฺทกนฺติ ‘‘อิทํ นาม ธมฺมกิจฺจํ กริสฺสาม, ยํ สกฺโกถ; ตํ เทถา’’ติ เอวํ ปเรสํ ฉนฺทญฺจ รุจิญฺจ อุปฺปาเทตฺวา คหิตปริกฺขารสฺเสตํ อธิวจนํ. อญฺญทตฺถิเกนาติ อญฺญสฺสตฺถาย ทินฺเนน. อญฺญุทฺทิสิเกนาติ อญฺญํ อุทฺทิสิตฺวา ทินฺเนน. สงฺฆิเกนาติ สงฺฆสฺส ปริจฺจตฺเตน. ७५८. सहाव्या शिक्षापदात - "छन्दकं" हा शब्द "आम्ही हे धार्मिक कार्य करणार आहोत, जे तुम्ही देऊ शकता ते द्या" अशा प्रकारे इतरांमध्ये इच्छा आणि आवड निर्माण करून मिळवलेल्या परिष्काराचे (साहित्याचे) नाव आहे. "अञ्ञदत्थिकेन" म्हणजे दुसऱ्या परिष्काराच्या उद्देशाने दिलेल्या साहित्याने. "अञ्ञुद्दिसिकेन" म्हणजे दुसऱ्या व्यक्तीला उद्देशून दिलेल्या साहित्याने. "सङ्घिकेन" म्हणजे संघाला समर्पित केलेल्या साहित्याने. ๗๖๒. เสสกํ อุปเนตีติ ยทตฺถาย ทินฺโน, ตํ เจตาเปตฺวา อวเสสํ อญฺญสฺสตฺถาย อุปเนติ. สามิเก อปโลเกตฺวาติ ‘‘ตุมฺเหหิ จีวรตฺถาย ทินฺโน, อมฺหากญฺจ จีวรํ อตฺถิ, เตลาทีหิ ปน อตฺโถ’’ติ เอวํ อาปุจฺฉิตฺวา อุปเนติ. อาปทาสูติ ตถารูเปสุ อุปทฺทเวสุ; ภิกฺขุนิโย วิหารํ ฉฑฺเฑตฺวา ปกฺกมนฺติ, เอวรูปาสุ อาปทาสุ ยํ วา ตํ วา เจตาเปตุํ วฏฺฏติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ७६२. "सेसकं उपनेति" (शिल्लक राहिलेले दुसऱ्या कामासाठी वापरणे) म्हणजे ज्या परिष्कारासाठी दिले होते, ते खरेदी करून उरलेले मूल्य दुसऱ्या परिष्कारासाठी वापरणे. "सामिके अपलोकेत्वा" (मालकांना विचारून) म्हणजे "तुम्ही चिवरासाठी दिले होते, आमच्याकडे चिवर आहे, परंतु आम्हाला तेल इत्यादींची गरज आहे" असे विचारून ते वापरणे. "आपदासु" म्हणजे अशा प्रकारच्या संकटांमध्ये; जेव्हा भिक्खुनी विहार सोडून निघून जातात, अशा प्रकारच्या आपत्तींमध्ये कोणतीही वस्तू खरेदी करणे योग्य ठरते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ฉสมุฏฺฐานํ – กิริยากิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. षट्समुत्थान - क्रिया-अक्रिया, संज्ञा-विमोक्ष नसलेले, अचित्तक, प्रज्ञप्ति-वद्य, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदन आहे. ฉฏฺฐสิกฺขาปทํ. सहावे शिक्षापद समाप्त. สตฺตมนิสฺสคฺคิยปาจิตฺติยสิกฺขาปทวณฺณนา सातव्या निस्सग्गिय पाचित्तिय शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๗๖๔. สตฺตเม – สญฺญาจิเกนาติ สยํ ยาจิตเกน. เอตเทเวตฺถ นานากรณํ. เสสํ ฉฏฺฐสทิสเมวาติ. ७६४. सातव्या शिक्षापदात - "सञ्ञाचिकेन" म्हणजे स्वतः याचना करून मिळवलेल्या परिष्काराने. हाच या शिक्षापदातील फरक आहे. उर्वरित भाग सहाव्या शिक्षापदासारखाच आहे. สตฺตมสิกฺขาปทํ. सातवे शिक्षापद समाप्त. อฏฺฐมนิสฺสคฺคิยปาจิตฺติยสิกฺขาปทวณฺณนา आठव्या निस्सग्गिय पाचित्तिय शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๗๖๙. อฏฺฐเม [Pg.193] – มหาชนิเกนาติ คณสฺส ปริจฺจตฺเตน. เอตเทเวตฺถ นานากรณํ. ७६९. आठव्या शिक्षापदात - "महाजनिकेन" म्हणजे गणाला (भिक्खुनी संघाला) समर्पित केलेल्या परिष्काराने. हाच या शिक्षापदातील फरक आहे. อฏฺฐมสิกฺขาปทํ. आठवे शिक्षापद समाप्त. นวมนิสฺสคฺคิยปาจิตฺติยสิกฺขาปทวณฺณนา नव्या निस्सग्गिय पाचित्तिय शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๗๗๔. นวมสิกฺขาปเท – สญฺญาจิเกนาติ อิทํ ปทํ อิโต อธิกตรํ. ७७४. नव्या शिक्षापदात - "सञ्ञाचिकेन" हे पद या (आठव्या शिक्षापदापेक्षा) अधिक आहे. นวมสิกฺขาปทํ. नवे शिक्षापद समाप्त. ทสมนิสฺสคฺคิยปาจิตฺติยสิกฺขาปทวณฺณนา दहाव्या निस्सग्गिय पाचित्तिय शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๗๗๘. ทสเม – ปริเวณํ อุนฺทฺริยตีติ ปริเวณํ วินสฺสติ; ปริปตตีติ อตฺโถ. อิทญฺจ ปทํ ปุคฺคลิเกน สญฺญาจิเกนาติ อิทญฺจ เอตฺตกเมว นานากรณํ. เสสํ ปุพฺพสทิสเมวาติ. ७७८. दहाव्या शिक्षापदात - "परिवेणं उन्द्रियति" म्हणजे परिवेण (प्रांगण/कुटी) नष्ट होते किंवा कोसळते, असा अर्थ आहे. हे पद आणि "पुग्गलिकेन सञ्ञाचिकेन" हे पद, एवढाच यात फरक आहे. उर्वरित भाग पूर्वीसारखाच आहे. ทสมสิกฺขาปทํ. दहावे शिक्षापद समाप्त. เอกาทสมนิสฺสคฺคิยปาจิตฺติยสิกฺขาปทวณฺณนา अकराव्या निस्सग्गिय पाचित्तिय शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๗๘๔. เอกาทสเม – ครุปาวุรณนฺติ สีตกาเล ปาวุรณํ. จตุกฺกํสปรมนฺติ เอตฺถ กํโส นาม จตุกฺกหาปณิโก โหติ; ตสฺมา ปทภาชเน ‘‘โสฬสกหาปณคฺฆนก’’นฺติ วุตฺตํ. ७८४. अकराव्या शिक्षापदात - "गरुपावरणं" म्हणजे हिवाळ्यात (थंडीच्या दिवसात) पांघरायचे मोठे वस्त्र. "चतुक्कंसपरमं" यामध्ये 'कंस' म्हणजे चार कहापण मूल्याचे असते; म्हणूनच पदभाजनामध्ये भगवंतांनी "सोळा कहापण मूल्याचे" असे म्हटले आहे. เอกาทสมสิกฺขาปทํ. अकरावे शिक्षापद समाप्त. ทฺวาทสมนิสฺสคฺคิยปาจิตฺติยสิกฺขาปทวณฺณนา बाराव्या निस्सग्गिय पाचित्तिय सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण ๗๘๙. ทฺวาทสเม – ลหุปาวุรณนฺติ อุณฺหกาเล ปาวุรณํ. เสสํ สิกฺขาปททฺวเยปิ อุตฺตานเมว. ७८९. बाराव्या सिक्खापदात – 'लहुपावरणं' (हलके पांघरूण) म्हणजे उष्ण काळात (उन्हाळ्यात) पांघरायचे वस्त्र. उर्वरित भाग दोन्ही सिक्खापदांमध्ये स्पष्टच आहे. ฉสมุฏฺฐานํ [Pg.194] – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. सहा समुत्थान – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष नसलेले, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्ति-दोष), कायकर्म, वचीकर्म, तिचित्त (तीन चित्ते) आणि तीन वेदना असणारे आहे. ทฺวาทสมสิกฺขาปทํ. बारावे सिक्खापद समाप्त. อุทฺทิฏฺฐา โข อยฺยาโย ตึส นิสฺสคฺคิยา ปาจิตฺติยา ธมฺมาติ เอตฺถ มหาวิภงฺเค จีวรวคฺคโต โธวนญฺจ ปฏิคฺคหณญฺจาติ ทฺเว สิกฺขาปทานิ อปเนตฺวา อกาลจีวรํ กาลจีวรนฺติ อธิฏฺฐหิตฺวา ภาชิตสิกฺขาปเทน จ ปริวตฺเตตฺวา อจฺฉินฺนจีวเรน จ ปฐมวคฺโค ปูเรตพฺโพ. ปุน เอฬกโลมวคฺคสฺส อาทิโต สตฺต สิกฺขาปทานิ อปเนตฺวา สตฺต อญฺญทตฺถิกานิ ปกฺขิปิตฺวา ทุติยวคฺโค ปูเรตพฺโพ. ตติยวคฺคโต ปฐมปตฺตํ วสฺสิกสาฏิกํ อารญฺญกสิกฺขาปทนฺติ อิมานิ ตีณิ อปเนตฺวา ปตฺตสนฺนิจยครุปาวุรณลหุปาวุรณสิกฺขาปเทหิ ตติยวคฺโค ปูเรตพฺโพ. อิติ ภิกฺขุนีนํ ทฺวาทส สิกฺขาปทานิ เอกโตปญฺญตฺตานิ, อฏฺฐารส อุภโตปญฺญตฺตานีติ เอวํ สพฺเพปิ ปาติโมกฺขุทฺเทสมคฺเคน ‘‘อุทฺทิฏฺฐา โข อยฺยาโย ตึส นิสฺสคฺคิยา ปาจิตฺติยา ธมฺมา’’ติ เอวเมตฺถ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. เสสํ วุตฺตนยเมวาติ. 'हे आर्यांनो, तीस निस्सग्गिय पाचित्तिय धम्मांचा उद्देश केला गेला आहे' यामध्ये, महाविभंगातील चीवरवग्गमधून 'धोवन' (धुणे) आणि 'पटिग्गहण' (स्वीकारणे) ही दोन सिक्खापदे वगळून, 'अकालचीवर' हे 'कालचीवर' म्हणून अधिष्ठान करून विभागणी करण्याच्या सिक्खापदाने बदलून आणि 'अच्छिन्नचीवर' सिक्खापदाने पहिला वर्ग (पठमवग्ग) पूर्ण करावा. पुन्हा, एळकलोमवग्गच्या सुरुवातीची सात सिक्खापदे वगळून, सात 'अञ्ञदत्थिक' (इतर उद्देशांसाठी असलेली) सिक्खापदे समाविष्ट करून दुसरा वर्ग (दुतियवग्ग) पूर्ण करावा. तिसऱ्या वर्गातून (ततियवग्ग) पहिले 'पत्त' (पात्र), 'वस्सिकासातिक' (वर्षावास वस्त्र) आणि 'आरण्यक' सिक्खापद ही तीन वगळून, 'पत्तसन्निचय' (पात्र साठवणे), 'गरुपावरण' (जड पांघरूण) आणि 'लहुपावरण' (हलके पांघरूण) या सिक्खापदांद्वारे तिसरा वर्ग पूर्ण करावा. अशा प्रकारे भिक्खुनींसाठी बारा सिक्खापदे केवळ एका बाजूने (एकतोपण्ञत्तानि) प्रज्ञप्त आहेत आणि अठरा दोन्ही बाजूंसाठी (उभतोपण्ञत्तानि) प्रज्ञप्त आहेत. अशा प्रकारे सर्व तीस निस्सग्गिय पाचित्तिय धम्म पातिमोक्ख उद्देशाच्या क्रमाने 'हे आर्यांनो, तीस निस्सग्गिय पाचित्तिय धम्मांचा उद्देश केला गेला आहे' याप्रमाणे येथे अर्थ समजून घ्यावा. उर्वरित भाग आधी सांगितल्याप्रमाणेच आहे. สมนฺตปาสาทิกาย วินยสํวณฺณนาย ภิกฺขุนีวิภงฺเค समन्तपासादिका नावाच्या विनय-टीकेमध्ये, भिक्खुनीविभंगातील ตึสกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. तीस (निस्सग्गिय) नियमांचे स्पष्टीकरण समाप्त झाले. นิสฺสคฺคิยกณฺฑํ นิฏฺฐิตํ. निस्सग्गिय काण्ड समाप्त झाले. ๔. ปาจิตฺติยกณฺฑํ (ภิกฺขุนีวิภงฺควณฺณนา) ४. पाचित्तिय काण्ड (भिक्खुनीविभंग स्पष्टीकरण) ๑. ลสุณวคฺโค १. लसुणवग्ग (लसूण वर्ग) ๑. ปฐมลสุณสิกฺขาปทวณฺณนา १. पहिल्या लसुण सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण ตึสกานนฺตรํ [Pg.195] ธมฺมา, ฉสฏฺฐิสตสงฺคหา; สงฺคีตา เย อยํ ทานิ, โหติ เตสมฺปิ วณฺณนา. तीस (निस्सग्गिय) नियमांनंतर, ज्या एकशे सहासठ (१६६) धम्मांचा संगीतिकारांनी संग्रह केला आहे, आता त्यांचे देखील हे स्पष्टीकरण प्रस्तुत आहे. ๗๙๓. ตตฺถ ลสุณวคฺคสฺส ตาว ปฐมสิกฺขาปเท – ทฺเว ตโย ภณฺฑิเกติ ทฺเว วา ตโย วา โปฏฺฏลิเก; สมฺปุณฺณมิญฺชานเมตํ อธิวจนํ. น มตฺตํ ชานิตฺวาติ ปมาณํ อชานิตฺวา เขตฺตปาลสฺส วาเรนฺตสฺส พหุํ ลสุณํ หราเปสิ. ७९३. त्यामध्ये, लसुणवग्गच्या पहिल्या सिक्खापदात – 'द्वे तयो भण्डिके' म्हणजे दोन किंवा तीन लसणाच्या कांड्या (गड्डे); हे पूर्ण पाकळ्या असलेल्या लसणाचे नाव आहे. 'न मत्तं जानित्वा' म्हणजे प्रमाण न जाणता, शेत राखणाऱ्याने मनाई करत असतानाही भरपूर लसूण काढून घेतला. อญฺญตรํ หํสโยนินฺติ สุวณฺณหํสโยนึ. โส ตาสํ เอเกกนฺติ โส หํโส ชาติสฺสโร อโหสิ, อถ ปุพฺพสิเนเหน อาคนฺตฺวา ตาสํ เอเกกํ ปตฺตํ เทติ, ตํ ตาปนตาลนจฺเฉทนกฺขมํ สุวณฺณเมว โหติ. 'अञ्ञतरं हंसयोनिं' म्हणजे सुवर्णहंस योनीमध्ये (सोन्याचा हंस म्हणून जन्मलेला). 'सो तासं एकेकं' म्हणजे तो हंस जातिस्मर (पूर्वजन्माची आठवण असलेला) होता. नंतर, पूर्व स्नेहामुळे येऊन तो त्या मायलेकींना एकेक पंख देत असे. तो पंख तापवणे, ठोकणे आणि कापण्यास योग्य असे अस्सल सोनेच असायचा. ๗๙๕. มาคธกนฺติ มคเธสุ ชาตํ. มคธรฏฺเฐ ชาตลสุณเมว หิ อิธ ลสุณนฺติ อธิปฺเปตํ, ตมฺปิ ภณฺฑิกลสุณเมว, น เอกทฺวิติมิญฺชกํ. กุรุนฺทิยํ ปน ชาตเทสํ อวตฺวา ‘‘มาคธกํ นาม ภณฺฑิกลสุณ’’นฺติ วุตฺตํ. อชฺโฌหาเร อชฺโฌหาเรติ เอตฺถ สเจ ทฺเว ตโย ภณฺฑิเก เอกโตเยว สงฺขาทิตฺวา อชฺโฌหรติ, เอกํ ปาจิตฺติยํ. ภินฺทิตฺวา เอเกกํ มิญฺชํ ขาทนฺติยา ปน ปโยคคณนาย ปาจิตฺติยานีติ. ७९५. 'मागधकं' म्हणजे मगध देशात उत्पन्न झालेले. येथे 'लसूण' या शब्दाने मगध देशात उत्पन्न यायला हवा असलेला लसूणच अभिप्रेत आहे, आणि तो देखील अनेक पाकळ्यांचा गड्डा असलेला लसूणच अभिप्रेत आहे, एक, दोन किंवा तीन पाकळ्यांचा नव्हे. परंतु कुरुन्दी अट्ठकथेमध्ये उत्पत्तीच्या देशाचा उल्लेख न करता 'मागधक म्हणजे अनेक पाकळ्यांचा लसणाचा गड्डा' असे म्हटले आहे. 'अज्झोहारे अज्झोहारे' (प्रत्येक घास गिळताना) या संदर्भात, जर दोन किंवा तीन लसणाचे गड्डे एकत्रच चावून गिळले, तर एक पाचित्तिय होते. परंतु, जर ते सोलून एकेक पाकळी खाल्ली, तर खाण्याच्या प्रयत्नांच्या संख्येनुसार (पयोगाच्या गणनेनुसार) अनेक पाचित्तिय होतात. ๗๙๗. ปลณฺฑุกาทีนํ วณฺเณน วา มิญฺชาย วา นานตฺตํ เวทิตพฺพํ – วณฺเณน ตาว ปลณฺฑุโก ปณฺฑุวณฺโณ โหติ. ภญฺชนโก โลหิตวณฺโณ. หริตโก หริตปณฺณวณฺโณ. มิญฺชาย ปน ปลณฺฑุกสฺส เอกา มิญฺชา โหติ, ภญฺชนกสฺส ทฺเว, หริตกสฺส ติสฺโส. จาปลสุโณ อมิญฺชโก, องฺกุรมตฺตเมว หิ ตสฺส โหติ. มหาปจฺจริยาทีสุ ปน ‘‘ปลณฺฑุกสฺส ตีณิ มิญฺชานิ, ภญฺชนกสฺส ทฺเว, หริตกสฺส เอก’’นฺติ วุตฺตํ[Pg.196]. เอเต ปลณฺฑุกาทโย สภาเวเนว วฏฺฏนฺติ. สูปสมฺปากาทีสุ ปน มาคธกมฺปิ วฏฺฏติ. ตญฺหิ ปจฺจมาเนสุ มุคฺคสูปาทีสุ วา มจฺฉมํสวิกติยา วา เตลาทีสุ วา พทรสาฬวาทีสุ วา อมฺพิลสากาทีสุ วา อุตฺตริภงฺเคสุ วา ยตฺถ กตฺถจิ อนฺตมโส ยาคุภตฺเตปิ ปกฺขิปิตุํ วฏฺฏติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ७९७. पलाण्डु (कांदा) इत्यादींचा फरक रंगावरून किंवा पाकळ्यांवरून समजून घ्यावा – रंगावरून सांगायचे तर, पलाण्डु हा फिकट पिवळसर रंगाचा असतो. भञ्जनक हा लाल रंगाचा असतो. हरितक हा हिरव्या पानाच्या रंगाचा असतो. पाकळ्यांच्या बाबतीत, पलाण्डुला एकच पाकळी असते, भञ्जनकाला दोन, आणि हरितकाला तीन असतात. चापलसूण हा पाकळी नसलेला असतो, त्याला केवळ अंकुरच असतो. परंतु महापच्चरी इत्यादी अट्ठकथांमध्ये 'पलाण्डुला तीन पाकळ्या, भञ्जनकाला दोन आणि हरितकाला एक पाकळी असते' असे म्हटले आहे. हे पलाण्डु इत्यादी नैसर्गिक स्वरूपातच कल्प्य आहेत. परंतु सूप (वरण) शिजवताना इत्यादींमध्ये मागधक (मगध देशातील) लसूण देखील कल्प्य आहे. कारण शिजवल्या जाणाऱ्या मुगाच्या वरणामध्ये, किंवा मासे व मांसाच्या विविध पदार्थांमध्ये, तेलात, बोरांच्या मुराव्यात, आंबट भाज्यांमध्ये, तोंडी लावण्याच्या पदार्थांमध्ये किंवा अगदी पेज व भातामध्ये देखील तो टाकणे कल्प्य आहे. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. एळकलोम समुत्थान – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष नसलेले, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्ति-दोष), कायकर्म, तिचित्त आणि तीन वेदना असणारे आहे. ลสุณสิกฺขาปทํ ปฐมํ. पहिले लसुण सिक्खापद समाप्त. ๒. ทุติยสิกฺขาปทวณฺณนา २. दुसऱ्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๗๙๙. ทุติเย – สมฺพาเธติ ปฏิจฺฉนฺโนกาเส. ตสฺส วิภาคทสฺสนตฺถํ ปน ‘‘อุโภ อุปกจฺฉกา มุตฺตกรณ’’นฺติ วุตฺตํ. เอกมฺปิ โลมนฺติ กตฺตริยา วา สณฺฑาสเกน วา ขุเรน วา เยน เกนจิ เอกปโยเคน วา นานาปโยเคน วา เอกํ วา พหูนิ วา สํหราเปนฺติยา ปโยคคณนาย ปาจิตฺติยานิ, น โลมคณนาย. ७९९. दुसऱ्या सिक्खापदात – 'सम्बाधे' म्हणजे झाकलेल्या (गुप्तांगाच्या) जागी. त्याचे वर्गीकरण दाखवण्यासाठी भगवंतांनी 'दोन्ही काखा आणि मूत्रकरण (गुप्तांग)' असे म्हटले आहे. 'एकमपि लोमं' (एक जरी केस) म्हणजे कात्रीने, चिमट्याने, वस्तऱ्याने किंवा इतर कोणत्याही साधनाने, एकाच प्रयत्नाने किंवा वेगवेगळ्या प्रयत्नांनी, एक किंवा अनेक केस काढल्यास, प्रयत्नांच्या संख्येनुसार पाचित्तिय होते, केसांच्या संख्येनुसार नाही. ๘๐๑. อาพาธปจฺจยาติ กณฺฑุกจฺฉุอาทิอาพาธปจฺจยา สํหราเปนฺติยา อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. จตุสมุฏฺฐานํ – กายโต กายวาจโต กายจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ८०१. 'आबाधपच्चया' म्हणजे खाज, खरूज इत्यादी आजारांच्या कारणास्तव केस काढल्यास आपत्ती होत नाही. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. चार समुत्थान – काय, काय-वाचा, काय-चित्त आणि काय-वाचा-चित्त यांपासून उत्पन्न होणारे; क्रिया, संज्ञाविमोक्ष नसलेले, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, तिचित्त आणि तीन वेदना असणारे आहे. ทุติยสิกฺขาปทํ. दुसरे सिक्खापद समाप्त. ๓. ตติยสิกฺขาปทวณฺณนา ३. तिसऱ्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๘๐๓-๔. ตติเย – ตลฆาตเกติ มุตฺตกรณตลฆาตเน. อนฺตมโส อุปฺปลปตฺเตนาปีติ เอตฺถ ปตฺตํ ตาว มหนฺตํ, เกสเรนาปิ ปหารํ เทนฺติยา อาปตฺติเยว. ८०३-४. तिसऱ्या सिक्खापदात – 'तलघातके' म्हणजे मूत्रकरणावर (गुप्तांगावर) हाताने मारणे. 'अन्तमसो उप्पलपत्तेनापि' या संदर्भात, कमळाचे पान तर मोठेच आहे, परंतु कमळाच्या परागकणाने (केसराने) जरी प्रहार केला, तरी आपत्तीच होते. ๘๐๕. อาพาธปจฺจยาติ [Pg.197] คณฺฑํ วา วณํ วา ปหริตุํ วฏฺฏติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ปฐมปาราชิกสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ८०५. 'आबाधपच्चया' म्हणजे गळू किंवा जखम यावर औषधोपचारासाठी हळूच मारणे कल्प्य आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. पहिल्या पाराजिकाप्रमाणे समुत्थान – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष असलेले, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, अकुशल चित्त आणि तीन वेदना असणारे आहे. ตติยสิกฺขาปทํ. तिसरे सिक्खापद समाप्त. ๔. จตุตฺถสิกฺขาปทวณฺณนา ४. चौथ्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๘๐๖. จตุตฺเถ – ปุราณราโชโรธาติ ปุราเณ คิหิภาเว รญฺโญ โอโรธา. จิราจิรํ คจฺฉตีติ จิเรน จิเรน คจฺฉติ. ธาเรถาติ สกฺโกถ. กสฺสิทํ กมฺมนฺติ วุตฺเต อนาโรจิเตปิ เอตา มยิ อาสงฺกํ กริสฺสนฺตีติ มญฺญมานา เอวมาห – ‘‘มยฺหิทํ กมฺม’’นฺติ. ८०६. चौथ्या सिक्खापदात – 'पुराणराजोरोधा' म्हणजे पूर्वीच्या गृहस्थ जीवनात राजाची अंतःपूरची राणी असलेली. 'चिराचिरं गच्छति' म्हणजे खूप विलंबाने जाते. 'धारेथ' म्हणजे तुम्ही समर्थ आहात का? 'हे कोणाचे काम आहे?' असे विचारले असता, न सांगताही 'या माझ्यावर संशय घेतील' असा विचार करून तिने असे म्हटले – 'हे माझे काम आहे.' ๘๐๗. ชตุมฏฺฐเกติ ชตุนา กเต มฏฺฐทณฺฑเก. วตฺถุวเสเนเวตํ วุตฺตํ, ยํกิญฺจิ ปน ทณฺฑกํ ปเวเสนฺติยา อาปตฺติเยว. เตนาห – ‘‘อนฺตมโส อุปฺปลปตฺตมฺปิ มุตฺตกรณํ ปเวเสตี’’ติ. เอตมฺปิ จ อติมหนฺตํ, เกสรมตฺตมฺปิ ปน ปเวเสนฺติยา อาปตฺติ เอว. เสสํ อุตฺตานเมว. สมุฏฺฐานาทีนิ ตลฆาตเก วุตฺตสทิสาเนวาติ. ८०७. 'जतुमट्ठके' म्हणजे लाखेने बनवलेली गुळगुळीत काठी. हे केवळ वस्तूच्या संदर्भाने भगवंतांनी म्हटले आहे, परंतु कोणतीही काठी आत घालणाऱ्या भिक्खुनीला आपत्तीच होते. म्हणूनच म्हटले आहे – 'अगदी कमळाचे पान जरी मूत्रकरणात घालते.' हे देखील खूप मोठे आहे, परंतु कमळाच्या परागकणाएवढी वस्तू जरी आत घातली, तरी आपत्तीच होते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. समुत्थान इत्यादी 'तलघातक' सिक्खापदात सांगितल्याप्रमाणेच आहेत. จตุตฺถสิกฺขาปทํ. चौथे सिक्खापद समाप्त. ๕. ปญฺจมสิกฺขาปทวณฺณนา ५. पाचव्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๘๑๐. ปญฺจเม – อติคมฺภีรํ อุทกสุทฺธิกํ อาทิยนฺตีติ อติอนฺโต ปเวเสตฺวา อุทเกน โธวนํ กุรุมานา. ८१०. पाचव्या (सिक्खापदात) - 'अतिगम्भीरं उदकसुद्धिकं आदियन्ति' म्हणजे अत्यंत आतमध्ये प्रवेश करून पाण्याने धुण्याची क्रिया करणे. ๘๑๒. เกสคฺคมตฺตมฺปิ อติกฺกาเมตีติ วิตฺถารโต ตติยํ วา จตุตฺถํ วา องฺคุลํ คมฺภีรโต ทฺวินฺนํ ปพฺพานํ อุปริ เกสคฺคมตฺตมฺปิ ปเวเสนฺติยา ปาจิตฺติยนฺติ อตฺโถ. วุตฺตญฺเหตํ มหาปจฺจริยํ – ‘‘เอกิสฺสา องฺคุลิยา ตีณิ ปพฺพานิ อาทาตุํ น ลภติ, ติณฺณํ วา จตุนฺนํ วา เอเกกมฺปิ ปพฺพํ อาทาตุํ น [Pg.198] ลภตี’’ติ. เสสํ อุตฺตานเมว. สมุฏฺฐานาทีนิปิ ตลฆาตเก วุตฺตสทิสาเนวาติ. ८१२. 'केसग्गमत्तम्पि अतिक्कामेति' म्हणजे रुंदीच्या दृष्टीने तिसरे किंवा चौथे बोट, आणि खोलीच्या दृष्टीने दोन पेरांच्या वर केसाच्या अग्राएवढा भाग जरी प्रवेश केला, तरी भिक्खुणीला पाचित्तिय आपत्ती होते, असा अर्थ आहे. महापंच्चरीमध्ये असे म्हटले आहे - 'एका बोटाची three पेरे आत घालण्याची परवानगी नाही, किंवा तीन अथवा चार बोटांचे एकेक पेरही आत घालण्याची परवानगी नाही.' उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. समुत्थान इत्यादी बाबी 'तलघातक' सिक्खापदात सांगितल्याप्रमाणेच आहेत. ปญฺจมสิกฺขาปทํ. पाचवे सिक्खापद समाप्त. ๖. ฉฏฺฐสิกฺขาปทวณฺณนา ६. सहाव्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๘๑๕. ฉฏฺเฐ – ภตฺตวิสฺสคฺคนฺติ ภตฺตกิจฺจํ. ปานีเยน จ วิธูปเนน จ อุปติฏฺฐิตฺวาติ เอเกน หตฺเถน ปานียถาลกํ เอเกน พีชนึ คเหตฺวา พีชมานา สมีเป ฐตฺวาติ อตฺโถ. อจฺจาวทตีติ ปุพฺเพปิ ตุมฺเห เอวํ ภุญฺชถ, อหํ เอวํ อุปฏฺฐานํ กโรมี’’ติ ปพฺพชิตจาริตฺตํ อติกฺกมิตฺวา เคหสฺสิตกถํ กเถตีติ อตฺโถ. ८१५. सहाव्या (सिक्खापदात) - 'भत्तविस्सग्गं' म्हणजे भोजनाचे कार्य. 'पानीयने च विधूपनेन च उपतिट्ठित्वा' म्हणजे एका हाताने पाण्याचे भांडे आणि दुसऱ्या हाताने पंखा धरून, वारा घालत जवळ उभे राहणे, असा अर्थ आहे. 'अच्चावदति' म्हणजे पूर्वीही 'तुम्ही असे जेवत होता, मी अशी सेवा करत होते' असे म्हणून प्रव्रजितांच्या आचरणाचे उल्लंघन करून गृहस्थाश्रमी गोष्टी बोलणे, असा अर्थ आहे. ๘๑๗. ยํกิญฺจิ ปานียนฺติ สุทฺธอุทกํ วา โหตุ, ตกฺกทธิมตฺถุรสขีราทีนํ วา อญฺญตรํ. ยา กาจิ พีชนีติ อนฺตมโส จีวรกณฺโณปิ. หตฺถปาเส ติฏฺฐติ อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสาติ อิธ ฐานปจฺจยาว ปาจิตฺติยํ วุตฺตํ. ปหารปจฺจยา ปน ขนฺธเก ทุกฺกฏํ ปญฺญตฺตํ. ८१७. 'यंकिञ्चि पानीयं' म्हणजे शुद्ध पाणी असो किंवा ताक, दही, पाणी, दूध इत्यादींपैकी कोणतेही पेय असो. 'या काचि बीजनी' म्हणजे अगदी कमीत कमी चीवराचा कोपरा देखील पंखा समजला जातो. 'हत्थपासे तिट्ठति आपत्ति पाचित्तियस्स' म्हणजे येथे जवळ उभे राहण्याच्या कारणामुळेच पाचित्तिय आपत्ती सांगितली आहे. परंतु वारा घालण्याच्या क्रियेमुळे खन्धकामध्ये दुक्कट आपत्ती प्रज्ञप्त केली आहे. ๘๑๙. เทติ ทาเปตีติ ปานียํ วา สูปาทึ วา อิมํ ปิวถ, อิมินา ภุญฺชถาติ เทติ; ตาลวณฺฏํ อิมินา พีชนฺตา ภุญฺชถาติ เทติ; อญฺเญน วา อุภยมฺปิ ทาเปติ, อนาปตฺติ. อนุปสมฺปนฺนํ อาณาเปตีติ อุปติฏฺฐนตฺถํ สามเณรึ อาณาเปติ, อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ८१९. 'देति दापेति' म्हणजे पाणी किंवा वरण (सूप) इत्यादी देऊन 'हे प्या, याने जेवा' असे देणे; किंवा ताडाचा पंखा देऊन 'याने वारा घालत जेवा' असे देणे; किंवा दुसऱ्या कोणाकडून देणे किंवा दोन्ही गोष्टी देणे, यात अनापत्ती आहे. 'अनुपसम्पन्नं आणापेति' म्हणजे जवळ उभे राहण्यासाठी सामणेरीला आज्ञा देणे, यात अनापत्ती आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. एळकलोम सिक्खापदाप्रमाणे याचे समुत्थान आहे - क्रिया, नोसञ्ञाविमोक्ख, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज, कायकर्म, तिचित्त आणि त्रिवेदन आहे. ฉฏฺฐสิกฺขาปทํ. सहावे सिक्खापद समाप्त. ๗. สตฺตมสิกฺขาปทวณฺณนา ७. सातव्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๘๒๒. สตฺตเม – ภุญฺชิสฺสามีติ ปฏิคฺคณฺหาติ อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ อิทํ ปโยคทุกฺกฏํ นาม, ตสฺมา น เกวลํ ปฏิคฺคหเณเยว [Pg.199] โหติ, ปฏิคฺคณฺหิตฺวา ปน อรญฺญโต อาหรเณปิ สุกฺขาปเนปิ วทฺทลิทิวเส ภชฺชนตฺถาย อุทฺธนสชฺชเนปิ กปลฺลสชฺชเนปิ ทพฺพิสชฺชเนปิ ทารูนิ อาทาย อคฺคิกรเณปิ กปลฺลมฺหิ ธญฺญปกฺขิปเนปิ ทพฺพิยา สงฺฆฏฺฏเนสุปิ โกฏฺฏนตฺถํ อุทุกฺขลมุสลาทิสชฺชเนสุปิ โกฏฺฏนปปฺโผฏนโธวนาทีสุปิ ยาว มุเข ฐเปตฺวา อชฺโฌหรณตฺถํ ทนฺเตหิ สงฺขาทติ, ตาว สพฺพปโยเคสุ ทุกฺกฏานิ, อชฺโฌหรณกาเล ปน อชฺโฌหรณคณนาย ปาจิตฺติยานิ. เอตฺถ จ วิญฺญตฺติ เจว โภชนญฺจ ปมาณํ. ตสฺมา สยํ วิญฺญาเปตฺวา อญฺญาย ภชฺชนโกฏฺฏนปจนานิ การาเปตฺวา ภุญฺชนฺติยาปิ อาปตฺติ. อญฺญาย วิญฺญาเปตฺวา สยํ ภชฺชนาทีนิ กตฺวา ภุญฺชนฺติยาปิ อาปตฺติ. มหาปจฺจริยํ ปน วุตฺตํ – ‘‘อิทํ อามกธญฺญํ นาม มาตรมฺปิ วิญฺญาเปตฺวา ภุญฺชนฺติยา ปาจิตฺติยเมว, อวิญฺญตฺติยา ลทฺธํ สยํ ภชฺชนาทีนิ กตฺวา วา การาเปตฺวา วา ภุญฺชนฺติยา ทุกฺกฏํ. อญฺญาย วิญฺญตฺติยา ลทฺธํ สยํ วา ภชฺชนาทีนิ กตฺวา ตาย วา การาเปตฺวา อญฺญาย วา การาเปตฺวา ภุญฺชนฺติยาปิ ทุกฺกฏเมวา’’ติ. ปุนปิ วุตฺตํ ‘‘อญฺญาย วิญฺญตฺติยา ลทฺธํ, สยํ ภชฺชนาทีนิ กตฺวา ภุญฺชนฺติยา ปาจิตฺติยเมว. ภชฺชนาทีนิ การาเปตฺวา ภุญฺชนฺติยา ปน ทุกฺกฏ’’นฺติ. ตํ ปุพฺพาปรวิรุทฺธํ โหติ, น หิ ภชฺชนาทีนํ กรเณ วา การาปเน วา วิเสโส อตฺถิ. มหาอฏฺฐกถายํ ปน ‘‘อญฺญาย วิญฺญตฺตํ ภุญฺชนฺติยา ทุกฺกฏ’’นฺติ อวิเสเสน วุตฺตํ. ८२२. सातव्या (सिक्खापदात) - 'मी खाईन' असे म्हणून स्वीकारल्यास दुक्कट आपत्ती होते, याला 'प्रयोगदुक्कट' म्हणतात. म्हणून केवळ स्वीकारण्यानेच दुक्कट होत नाही, तर स्वीकारून जंगलातून आणणे, वाळवणे, पावसाळ्याच्या दिवसात भाजण्यासाठी चूल तयार करणे, कढई तयार करणे, पळी तयार करणे, लाकडे आणून अग्नी प्रज्वलित करणे, कढईत धान्य टाकणे, पळीने ढवळणे, कांडण्यासाठी उखळ-मुसळ इत्यादी तयार करणे, कांडणे, पाखडणे, धुणे इत्यादी सर्व क्रियांमध्ये, जोपर्यंत तोंडात ठेवून गिळण्यासाठी दातांनी चावले जात नाही, तोपर्यंतच्या सर्व प्रयोगांमध्ये दुक्कट आपत्ती होते. परंतु गिळण्याच्या वेळी, गिळण्याच्या संख्येनुसार पाचित्तिय आपत्ती होते. आणि येथे याचना (मागणी) आणि भोजन हेच प्रमाण आहे. म्हणून स्वतः याचना करून दुसऱ्याकडून भाजणे, कांडणे, शिजवणे इत्यादी करवून घेऊन खाणाऱ्या भिक्खुणीलाही आपत्ती होते. दुसऱ्याने याचना करून स्वतः भाजणे इत्यादी करून खाणाऱ्या भिक्खुणीलाही आपत्ती होते. महापंच्चरीमध्ये मात्र असे म्हटले आहे - 'या कच्च्या धान्याची (आमकधान्य) आईकडे देखील याचना करून खाणाऱ्या भिक्खुणीला पाचित्तियच होते. याचना न करता मिळालेले कच्चे धान्य स्वतः भाजणे इत्यादी करून किंवा दुसऱ्याकडून करवून घेऊन खाणाऱ्या भिक्खुणीला दुक्कट होते. दुसऱ्याच्या याचनेने मिळालेले कच्चे धान्य स्वतः भाजणे इत्यादी करून किंवा तिच्याकडून करवून घेऊन किंवा अन्य कोणाकडून करवून घेऊन खाणाऱ्या भिक्खुणीला देखील दुक्कटच होते.' पुन्हा असेही म्हटले आहे - 'दुसऱ्याच्या याचनेने मिळालेले कच्चे धान्य स्वतः भाजणे इत्यादी करून खाणाऱ्या भिक्खुणीला पाचित्तियच होते. परंतु भाजणे इत्यादी करवून घेऊन खाणाऱ्या भिक्खुणीला दुक्कट होते.' हे विधान परस्परविरोधी आहे, कारण भाजणे इत्यादी स्वतः करणे किंवा दुसऱ्याकडून करवून घेणे यात काही फरक नाही. महाअट्ठकथेमध्ये मात्र 'दुसऱ्याने याचना केलेले कच्चे धान्य खाणाऱ्या भिक्खुणीला दुक्कट होते' असे सामान्यपणे म्हटले आहे. ๘๒๓. อาพาธปจฺจยาติ เสทกมฺมาทีนํ อตฺถาย ธญฺญวิญฺญตฺติยา อนาปตฺติ. ‘‘อวิญฺญตฺติยา ลพฺภมานํ ปน นวกมฺมตฺถาย สมฺปฏิจฺฉิตุํ วฏฺฏตี’’ติ มหาปจฺจริยํ วุตฺตํ. อปรณฺณํ วิญฺญาเปตีติ ฐเปตฺวา สตฺต ธญฺญานิ มุคฺคมาสาทึ วา ลาพุกุมฺภณฺฑาทึ วา อญฺญํ ยํกิญฺจิ ญาตกปวาริตฏฺฐาเน วิญฺญาเปนฺติยา อนาปตฺติ. อามกธญฺญํ ปน ญาตกปวาริตฏฺฐาเน น วฏฺฏติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ८२३. 'आबाधपच्चया' म्हणजे घाम काढणे (स्वेदनकर्म) इत्यादी उपचारांच्या उद्देशाने धान्याची याचना केल्यास अनापत्ती आहे. 'याचना न करता मिळणारे कच्चे धान्य नवकर्मासाठी स्वीकारणे योग्य आहे,' असे महापंच्चरीमध्ये म्हटले आहे. 'अपरण्णं विञ्ञापेति' म्हणजे सात प्रकारची धान्ये वगळून मूग, उडीद इत्यादी किंवा भोपळा, कोहळा इत्यादी किंवा इतर कोणतेही कडधान्य नातेवाईक किंवा निमंत्रित केलेल्यांच्या ठिकाणी याचना केल्यास अनापत्ती आहे. परंतु कच्चे धान्य नातेवाईक किंवा निमंत्रित केलेल्यांच्या ठिकाणी देखील याचना करणे योग्य नाही. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. จตุสมุฏฺฐานํ – กายโต กายวาจโต กายจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. चार समुत्थानांनी युक्त आहे - काय, काय-वाचा, काय-चित्त आणि काय-वाचा-चित्त यांपासून समुत्थान होते; क्रिया, नोसञ्ञाविमोक्ख, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, तिचित्त आणि त्रिवेदन आहे. สตฺตมสิกฺขาปทํ. सातवे सिक्खापद समाप्त. ๘. อฏฺฐมสิกฺขาปทวณฺณนา ८. आठव्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๘๒๔. อฏฺฐเม [Pg.200] – นิพฺพิฏฺโฐ ราชภโฏ รญฺโญ ภติ เกณิ เอเตนาติ นิพฺพิฏฺฐราชภโฏ, เอกํ ฐานนฺตรํ เกณิยา คเหตฺวา ตโต ลทฺธอุทโยติ อตฺโถ. ตญฺเญว ภฏปถํ ยาจิสฺสามีติ รญฺโญ เกณึ ทตฺวา ปุน ตํเยว ฐานนฺตรํ ยาจิสฺสามีติ จินฺเตนฺโต. ปริภาสีติ ตา ภิกฺขุนิโย ‘‘มา ปุน เอวํ กริตฺถา’’ติ สนฺตชฺเชสิ. ८२४. आठव्या (सिक्खापदात) - 'निब्बिट्ठो राजभटो' म्हणजे ज्याने राजाचा कर किंवा वेतन देऊन एखादे विशिष्ट स्थान मिळवले आहे आणि त्यातून नफा मिळवत आहे, असा अर्थ आहे. 'तञ्ञेव भटपथं याचिस्सामि' म्हणजे राजाला कर देऊन पुन्हा तेच स्थान मागण्याचा विचार करत. 'परिभासि' म्हणजे त्या भिक्खुणींना 'पुन्हा असे करू नका' असे म्हणून धमकावले. ๘๒๖. สยํ ฉฑฺเฑตีติ จตฺตาริปิ วตฺถูนิ เอกปโยเคน ฉฑฺเฑนฺติยา เอกาว อาปตฺติ, ปาเฏกฺกํ ฉฑฺเฑนฺติยา วตฺถุคณนาย อาปตฺติโย. อาณตฺติยมฺปิ เอเสว นโย. ทนฺตกฏฺฐฉฑฺฑเนปิ ภิกฺขุนิยา ปาจิตฺติยเมว. ภิกฺขุสฺส สพฺพตฺถ ทุกฺกฏํ. เสสํ อุตฺตานเมว. ८२६. 'सयं छड्डेति' म्हणजे चारही वस्तू (मलमूत्र, कचरा, उष्टे अन्न) एकाच प्रयत्नाने टाकल्यास एकच आपत्ती होते; वेगवेगळ्या टाकल्यास वस्तूंच्या संख्येनुसार आपत्ती होतात. आज्ञा देण्याच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. दात घासण्याची काडी टाकण्याच्या बाबतीतही भिक्खुणीला पाचित्तियच होते. भिक्खूला सर्व बाबतीत दुक्कट होते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ฉสมุฏฺฐานํ – กิริยากิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. सहा समुत्थानांनी युक्त आहे - क्रिया-अक्रिया, नोसञ्ञाविमोक्ख, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, तिचित्त आणि त्रिवेदन आहे. อฏฺฐมสิกฺขาปทํ. आठवे सिक्खापद समाप्त. ๙. นวมสิกฺขาปทวณฺณนา ९. नवव्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๘๓๐-๒. นวเม – ยํ มนุสฺสานํ อุปโภคปริโภคํ โรปิมนฺติ เขตฺตํ วา โหตุ นาฬิเกราทิอาราโม วา, ยตฺถ กตฺถจิ โรปิมหริตฏฺฐาเน เอตานิ วตฺถูนิ ฉฑฺเฑนฺติยา ปุริมนเยเนว อาปตฺติเภโท เวทิตพฺโพ. เขตฺเต วา อาราเม วา นิสีทิตฺวา ภุญฺชมานา อุจฺฉุอาทีนิ วา ขาทนฺตี; คจฺฉมานา อุจฺฉิฏฺโฐทกจลกาทีนิ หริตฏฺฐาเน ฉฑฺเฑติ, อนฺตมโส อุทกํ ปิวิตฺวา มตฺถกจฺฉินฺนนาฬิเกรมฺปิ ฉฑฺเฑติ, ปาจิตฺติยเมว. ภิกฺขุโน ทุกฺกฏํ. กสิตฏฺฐาเน ปน นิกฺขิตฺตพีเช ยาว องฺกุรํ น อุฏฺฐหติ, ตาว สพฺเพสํ ทุกฺกฏํ. อนิกฺขิตฺตพีเชสุ เขตฺตโกณาทีสุ วา อสญฺชาตโรปิเมสุ เขตฺตมริยาทาทีสุ วา ฉฑฺเฑตุํ วฏฺฏติ. มนุสฺสานํ กจวรฉฑฺฑนฏฺฐาเนปิ วฏฺฏติ. ฉฑฺฑิตเขตฺเตติ มนุสฺเสสุ สสฺสํ อุทฺธริตฺวา คเตสุ ฉฑฺฑิตเขตฺตํ นาม โหติ, ตตฺถ วฏฺฏติ. ยตฺถ ปน ลายิตมฺปิ ปุพฺพณฺณาทิ ปุน อุฏฺฐหิสฺสตีติ รกฺขนฺติ, ตตฺถ ยถาวตฺถุกเมว. เสสํ อุตฺตานเมว. ฉสมุฏฺฐานํ – กิริยากิริยํ…เป… ติเวทนนฺติ. ८३०-२. नवव्या सिक्खापदात – 'जे माणसांच्या उपयोगासाठी लावलेले आहे' मग ते शेत असो किंवा नारळ इत्यादींची बाग असो, जेथे कोठेही लावलेल्या हिरवळीच्या जागी या वस्तू टाकणाऱ्या भिक्खुणीला पूर्वीच्या नियमाप्रमाणेच आपत्तीचा भेद समजावा. शेतात किंवा बागेत बसून जेवताना किंवा ऊस इत्यादी खाताना; किंवा चालताना उष्टे पाणी, उसाचा चोथा इत्यादी हिरवळीच्या जागी टाकल्यास, अगदी शेवटी नारळ पाणी पिऊन वरचा भाग कापलेला नारळ जरी टाकला तरी पाचित्तियच होते. भिक्खूला दुक्कट होते. परंतु नांगरलेल्या जागी पेरलेले बी असेपर्यंत जोपर्यंत अंकुर फुटत नाही, तोपर्यंत सर्वांना दुक्कट होते. बी न पेरलेल्या शेताच्या कोपऱ्यात किंवा जेथे रोपे उगवली नाहीत अशा शेताच्या बांधावर इत्यादी ठिकाणी टाकणे योग्य आहे. माणसांच्या कचरा टाकण्याच्या जागी सुद्धा टाकणे योग्य आहे. 'टाकलेले शेत' (छड्डितखेत्त) म्हणजे लोकांनी पीक काढून घेतल्यावर रिकामे झालेले शेत होय, तेथे टाकणे योग्य आहे. परंतु जेथे कापणी केलेले धान्य इत्यादी पुन्हा उगवेल या आशेने रक्षण केले जाते, तेथे वस्तूच्या स्वरूपानुसारच आपत्ती होते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. सहा समुत्थान – क्रिया-अक्रिया...पे... तीन वेदना आहेत. นวมสิกฺขาปทํ. नववे सिक्खापद समाप्त. ๑๐. ทสมสิกฺขาปทวณฺณนา १०. दहाव्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण ๘๓๕. ทสเม [Pg.201] – ยํกิญฺจิ นจฺจนฺติ นฏาทโย วา นจฺจนฺตุ โสณฺฑา วา, อนฺตมโส โมรสุวมกฺกฏาทโยปิ, สพฺพมฺเปตํ นจฺจเมว. ยํกิญฺจิ คีตนฺติ ยํกิญฺจิ นฏาทีนํ วา คีตํ โหตุ, อริยานํ ปรินิพฺพานกาเล รตนตฺตยคุณูปสํหิตํ สาธุกีฬิตคีตํ วา อสํยตภิกฺขูนํ ธมฺมภาณกคีตํ วา, สพฺพมฺเปตํ คีตเมว. ยํกิญฺจิ วาทิตนฺติ ตนฺติพทฺธาทิวาทนียภณฺฑวาทิตํ วา โหตุ, กุฏเภริวาทิตํ วา, อนฺตมโส อุทกเภริวาทิตมฺปิ, สพฺพมฺเปตํ วาทิตเมว. ८३५. दहाव्या सिक्खापदात – 'जे काही नाचणे' म्हणजे नट इत्यादी नाचोत किंवा मद्यपी नाचोत, अगदी शेवटी मोर, पोपट, माकड इत्यादी प्राणी नाचोत, हे सर्व नाचणेच आहे. 'जे काही गाणे' म्हणजे नट इत्यादींचे गाणे असो, किंवा आर्यांच्या (अरहंतांच्या) परिनिर्वाण समयी त्रिरत्नांच्या गुणांनी युक्त असलेले साधुक्रीडा गीत असो, किंवा असंयत भिक्खूंचे धम्मभाणक गीत असो, हे सर्व गाणेच आहे. 'जे काही वाजवणे' म्हणजे तंतुवाद्य इत्यादी वाजवण्याचे वाद्य असो, कुटभेरी (मातीचा नगारा) वाजवणे असो, अगदी शेवटी जलतरंग वाजवणे असो, हे सर्व वाजवणेच आहे. ๘๓๖. ทสฺสนาย คจฺฉติ อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ ปทวารคณนาย อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺส. ยตฺถ ฐิตา ปสฺสติ วา สุณาติ วาติ เอกปโยเคน โอโลเกนฺตี ปสฺสติ, เตสํเยว คีตวาทิตํ สุณาติ, เอกเมว ปาจิตฺติยํ. สเจ ปน เอกํ ทิสํ โอโลเกตฺวา นจฺจํ ปสฺสติ, ปุน อญฺญโต โอโลเกตฺวา คายนฺเต ปสฺสติ อญฺญโต วาเทนฺเต, ปาเฏกฺกา อาปตฺติโย. ภิกฺขุนี สยมฺปิ นจฺจิตุํ วา คายิตุํ วา วาทิตุํ วา น ลภติ, อญฺเญ ‘‘นจฺจ, คาย, วาเทหี’’ติ วตฺตุมฺปิ น ลภติ. ‘‘เจติยสฺส อุปหารํ เทถ, อุปาสกา’’ติ วตฺตุมฺปิ ‘‘ตุมฺหากํ เจติยสฺส อุปฏฺฐานํ กโรมา’’ติ วุตฺเต ‘‘สาธู’’ติ สมฺปฏิจฺฉิตุมฺปิ น ลภติ. สพฺพตฺถ ปาจิตฺติยนฺติ สพฺพอฏฺฐกถาสุ วุตฺตํ. ภิกฺขุโน ทุกฺกฏํ. ‘‘ตุมฺหากํ เจติยสฺส อุปฏฺฐานํ กโรมา’’ติ วุตฺเต ปน ‘‘อุปฏฺฐานกรณํ นาม สุนฺทร’’นฺติ วตฺตุํ วฏฺฏติ. ८३६. 'पाहण्यासाठी जाणाऱ्याला दुक्कट आपत्ती होते' म्हणजे पाऊल टाकण्याच्या संख्येनुसार दुक्कट आपत्ती होते. 'जेथे उभी राहून पाहते किंवा ऐकते' म्हणजे एकाच प्रयत्नाने पाहत असताना पाहते आणि त्यांचेच गाणे व वाजवणे ऐकते, तर एकच पाचित्तिय होते. परंतु जर एका दिशेला पाहून नाच पाहते, पुन्हा दुसऱ्या दिशेला पाहून गाणाऱ्यांना पाहते, आणि दुसऱ्या दिशेला वाजवणाऱ्यांना पाहते, तर वेगवेगळ्या आपत्ती होतात. भिक्खुणीला स्वतः नाचणे, गाणे किंवा वाजवणे योग्य नाही, तसेच इतरांना 'नाचा, गावा, वाजवा' असे सांगणे देखील योग्य नाही. 'उपासकांनो, चैत्याला पूजा अर्पण करा' असे सांगणे, किंवा 'आम्ही तुमच्या चैत्याची सेवा करतो' असे लोकांनी म्हटले असता 'ठीक आहे' असे स्वीकारणे देखील योग्य नाही. सर्व ठिकाणी पाचित्तिय होते, असे सर्व अट्ठकथांमध्ये सांगितले आहे. भिक्खूला दुक्कट होते. परंतु 'आम्ही तुमच्या चैत्याची सेवा करतो' असे म्हटले असता, 'सेवा करणे चांगली गोष्ट आहे' असे म्हणणे योग्य आहे. ๘๓๗. อาราเม ฐิตาติ อาราเม ฐตฺวา อนฺตราราเม วา พหิอาราเม วา นจฺจาทีนิ ปสฺสติ วา สุณาติ วา, อนาปตฺติ. สติ กรณีเยติ สลากภตฺตาทีนํ วา อตฺถาย อญฺเญน วา เกนจิ กรณีเยน คนฺตฺวา คตฏฺฐาเน ปสฺสติ วา สุณาติ วา, อนาปตฺติ. อาปทาสูติ ตาทิเสน อุปทฺทเวน อุปทฺทุตา สมชฺชฏฺฐานํ ปวิสติ, เอวํ ปวิสิตฺวา ปสฺสนฺติยา วา สุณนฺติยา วา อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ८३७. 'आरामात उभी असलेली' म्हणजे आरामात राहून आरामाच्या आत किंवा आरामाच्या बाहेर नाच इत्यादी पाहते किंवा ऐकते, तर अनापत्ती आहे. 'काम असताना' म्हणजे शलाका-भक्त इत्यादींच्या उद्देशाने किंवा इतर कोणत्याही कामासाठी जाऊन, पोहोचलेल्या ठिकाणी पाहते किंवा ऐकते, तर अनापत्ती आहे. 'आपत्तीच्या वेळी' म्हणजे अशा प्रकारच्या संकटाने पीडित होऊन जत्रेच्या ठिकाणी प्रवेश करते, आणि अशा प्रकारे प्रवेश करून पाहणाऱ्या किंवा ऐकणाऱ्या भिक्खुणीला अनापत्ती आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. एळकलोम-समुत्थान – क्रिया, नोसञ्ञाविमोक्ख (संज्ञाविमोक्ष नसलेले), अचित्तक, लोकवद्य, कायकर्म, अकुशलचित्त, तीन वेदना आहेत. ทสมสิกฺขาปทํ. दहावे सिक्खापद समाप्त. ลสุณวคฺโค ปฐโม. पहिला लसुणवग्ग समाप्त. ๒. อนฺธการวคฺโค २. अंधकारवग्ग ๑. ปฐมสิกฺขาปทวณฺณนา १. पहिल्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण ๘๓๙. อนฺธการวคฺคสฺส [Pg.202] ปฐมสิกฺขาปเท – อปฺปทีเปติ ปทีปจนฺทสูริยอคฺคีสุ เอเกนาปิ อโนภาสิเต. เตเนวสฺส ปทภาชเน ‘‘อนาโลเก’’ติ วุตฺตํ. สลฺลเปยฺย วาติ เคหสฺสิตกถํ กเถยฺย. ८३९. अंधकारवग्गाच्या पहिल्या सिक्खापदात – 'दिवा नसताना' म्हणजे दिवा, चंद्र, सूर्य, अग्नी यांपैकी एकानेही प्रकाशित नसलेल्या जागी. म्हणूनच त्याच्या पदभाजनामध्ये 'अनालोके' (प्रकाशाशिवाय) असे भगवंतांनी म्हटले आहे. 'संभाषण करावे' म्हणजे घरासंबंधीची (गृहस्थीची) चर्चा करावी. ๘๔๑. อรโหเปกฺขา อญฺญวิหิตาติ น รโหอสฺสาทาเปกฺขา รโหอสฺสาทโต อญฺญวิหิตาว หุตฺวา ญาตึ วา ปุจฺฉติ, ทาเน วา ปูชาย วา มนฺเตติ. เสสํ อุตฺตานเมว. เถยฺยสตฺถสมุฏฺฐานํ – กายจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทฺวิเวทนนฺติ. ८४१. 'एकांतात राहण्याची इच्छा नसलेली आणि अन्य विचारात असलेली' म्हणजे एकांताच्या सुखाची अपेक्षा न करता, एकांताच्या सुखाव्यतिरिक्त इतर विचारात मन ठेवून नातेवाईकांबद्दल विचारते, याचक किंवा पूजेविषयी चर्चा करते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. थेय्यसत्थ-समुत्थान – काय-चित्त आणि काय-वाचा-चित्त यांपासून समुत्थान होते, क्रिया, सञ्ञाविमोक्ख (संज्ञाविमोक्ष असलेले), सचित्तक, लोकवद्य, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त, दोन वेदना आहेत. ปฐมสิกฺขาปทํ. पहिले सिक्खापद समाप्त. ๒. ทุติยสิกฺขาปทวณฺณนา २. दुसऱ्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण ๘๔๒. ทุติเย – ปฏิจฺฉนฺเน โอกาเสติ อิทเมว นานํ. เสสํ สพฺพํ ปุริมสทิสเมวาติ. ८४२. दुसऱ्या सिक्खापदात – 'झाकलेल्या जागी' हाच फरक आहे. उर्वरित सर्व पूर्वीच्या सिक्खापदासारखेच आहे. ทุติยสิกฺขาปทํ. दुसरे सिक्खापद समाप्त. ๓. ตติยสิกฺขาปทวณฺณนา ३. तिसऱ्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण ๘๔๖. ตติเย – อชฺโฌกาเสติ นานํ, เสสํ สพฺพํ ตาทิสเมวาติ. ८४६. तिसऱ्या सिक्खापदात – 'उघड्या जागी' हा फरक आहे, उर्वरित सर्व पूर्वीच्या सिक्खापदासारखेच आहे. ตติยสิกฺขาปทํ. तिसरे सिक्खापद समाप्त. ๔. จตุตฺถสิกฺขาปทวณฺณนา ४. चौथ्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण ๘๕๐-๓. จตุตฺเถ – นิกณฺณิกนฺติ กณฺณมูลํ วุจฺจติ; กณฺณมูเล ชปฺเปยฺยาติ วุตฺตํ โหติ. สติ กรณีเยติ สลากภตฺตาทีนํ อาหรณตฺถาย วิหาเร วา ทุนฺนิกฺขิตฺตํ ปฏิสามนตฺถาย. เสสํ อุตฺตานเมว. สมุฏฺฐานาทีนิ ปุริมสทิสาเนวาติ. ८५०-३. चौथ्या सिक्खापदात – 'निकण्णिकं' म्हणजे कानाचा मूळ भाग (कानशीळ) म्हटले जाते; कानाच्या मुळाशी (कानात) कुजबुजावे, असा याचा अर्थ आहे. 'काम असताना' म्हणजे शलाका-भक्त इत्यादी आणण्यासाठी किंवा विहारात अस्ताव्यस्त ठेवलेल्या वस्तू व्यवस्थित ठेवण्यासाठी. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. समुत्थान इत्यादी पहिल्या सिक्खापदासारखेच आहेत. จตุตฺถสิกฺขาปทํ. चौथे सिक्खापद समाप्त. ๕. ปญฺจมสิกฺขาปทวณฺณนา ५. पाचव्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण ๘๕๔. ปญฺจเม [Pg.203] – ฆรํ โสเธนฺตาติ เตสํ กิร เอตทโหสิ – ‘‘เถริยา โกจิ กายิกวาจสิโก วีติกฺกโม น ทิสฺสติ, ฆรมฺปิ ตาว โสเธมา’’ติ, ตโต ฆรํ โสเธนฺตา นํ อทฺทสํสุ. ८५४. पाचव्या सिक्खापदात – 'घर साफ करताना' म्हणजे त्यांना असे वाटले की – 'थेरीचा कोणताही कायिक किंवा वाचिक अतिचार दिसत नाही, तर आपण घर साफ करूया.' त्यानंतर घर साफ करताना त्यांनी ते पाहिले. ๘๕๖. อโนวสฺสกํ อติกฺกาเมนฺติยาติ ปฐมํ ปาทํ อติกฺกาเมนฺติยา ทุกฺกฏํ, ทุติยํ อติกฺกาเมนฺติยา ปาจิตฺติยํ, อุปจาราติกฺกเม เอเสว นโย. ८५६. 'अनोवस्सक (पावसापासून सुरक्षित नसलेली जागा) ओलांडणाऱ्या भिक्खुणीला' म्हणजे पहिले पाऊल ओलांडताना दुक्कट होते, दुसरे पाऊल ओलांडताना पाचित्तिय होते. उपचाराचा (परिसराचा) अतिचार करतानाही हाच नियम आहे. ๘๕๘. คิลานายาติ ยา ตาทิเสน เคลญฺเญน อาปุจฺฉิตุํ น สกฺโกติ. อาปทาสูติ ฆเร อคฺคิ วา อุฏฺฐิโต โหติ, โจรา วา; เอวรูเป อุปทฺทเว อนาปุจฺฉา ปกฺกมติ, อนาปตฺติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ८५८. 'आजारी भिक्खुणीला' म्हणजे जी अशा आजारपणामुळे विचारण्यास असमर्थ असते, तिला अनापत्ती आहे. 'आपत्तीच्या वेळी' म्हणजे घरात आग लागली असेल किंवा चोर आले असतील; अशा प्रकारच्या संकटात न विचारता निघून गेल्यास अनापत्ती आहे. यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. กถินสมุฏฺฐานํ – กายวาจโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยากิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. कठीण-समुत्थान – काय-वाचा आणि काय-वाचा-चित्त यांपासून समुत्थान होते, क्रिया-अक्रिया, नोसञ्ञाविमोक्ख (संज्ञाविमोक्ष नसलेले), अचित्तक, प्रज्ञप्तिवद्य, कायकर्म, वचीकर्म, तीन चित्त, तीन वेदना आहेत. ปญฺจมสิกฺขาปทํ. पाचवे सिक्खापद समाप्त. ๖. ฉฏฺฐสิกฺขาปทวณฺณนา ६. सहाव्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण ๘๖๐. ฉฏฺเฐ – อภินิสีเทยฺยาติ นิสีเทยฺย. นิสีทิตฺวา คจฺฉนฺติยา เอกา อาปตฺติ, อนิสีทิตฺวา นิปชฺชิตฺวา คจฺฉนฺติยา เอกา, นิสีทิตฺวา นิปชฺชิตฺวา คจฺฉนฺติยา ทฺเว. ८६०. सहाव्या सिक्खापदात – 'बसावे' म्हणजे बसावे. बसून जाणाऱ्या भिक्खुणीला एक आपत्ती होते, न बसता झोपून जाणाऱ्या भिक्खुणीला एक आपत्ती होते, बसून आणि झोपून जाणाऱ्या भिक्खुणीला दोन आपत्ती होतात. ๘๖๓. ธุวปญฺญตฺเตติ ภิกฺขุนีนํ อตฺถาย นิจฺจปญฺญตฺเต. เสสํ อุตฺตานเมว. กถินสมุฏฺฐานํ…เป… ติเวทนนฺติ. ८६३. "धुवपण्णत्तेति" म्हणजे भिक्खुणींच्या हितासाठी नेहमीच अंथरलेले (नित्य-प्रज्ञप्त). उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. कठीणसमुत्थान...पे... तीन वेदनायुक्त आहे. ฉฏฺฐสิกฺขาปทํ. सहावे शिक्षापद समाप्त. ๗. สตฺตมสิกฺขาปทวณฺณนา ७. सातव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๘๖๔. สตฺตเมปิ – สพฺพํ ฉฏฺเฐ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. ८६४. सातव्यामध्ये सुद्धा - सर्व काही सहाव्या शिक्षापदात सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावे. สตฺตมสิกฺขาปทํ. सातवे शिक्षापद समाप्त. ๘. อฏฺฐมสิกฺขาปทวณฺณนา ८. आठव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๘๖๙. อฏฺฐเม [Pg.204] – สพฺพํ อุตฺตานเมว. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. ८६९. आठव्यामध्ये - सर्व काही स्पष्टच आहे. त्रिसमुत्थान - क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे. อฏฺฐมสิกฺขาปทํ. आठवे शिक्षापद समाप्त. ๙. นวมสิกฺขาปทวณฺณนา ९. नवव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๘๗๕. นวเม – อภิสเปยฺยาติ สปถํ กเรยฺย. นิรเยน อภิสปติ นาม ‘‘นิรเย นิพฺพตฺตามิ, อวีจิมฺหิ นิพฺพตฺตามิ, นิรเย นิพฺพตฺตตุ, อวีจิมฺหิ นิพฺพตฺตตู’’ติ เอวมาทินา นเยน อกฺโกสติ. พฺรหฺมจริเยน อภิสปติ นาม ‘‘คิหินี โหมิ, โอทาตวตฺถา โหมิ, ปริพฺพาชิกา โหมิ, อิตรา วา เอทิสา โหตู’’ติ เอวมาทินา นเยน อกฺโกสติ; วาจาย วาจาย ปาจิตฺติยํ. ฐเปตฺวา ปน นิรยญฺจ พฺรหฺมจริยญฺจ ‘‘สุนขี สูกรี กาณา กุณี’’ติอาทินา นเยน อกฺโกสนฺติยา วาจาย วาจาย ทุกฺกฏํ. ८७५. नवव्यामध्ये - "अभिसपेय्य" म्हणजे शाप देणे किंवा शपथ घेणे. नरकाची शपथ घेऊन शाप देणे म्हणजे "मी नरकात जन्माला येईन, मी अवीची नरकात जन्माला येईन, किंवा ही (दुसरी भिक्खुणी) नरकात जन्माला जावो, ही अवीची नरकात जन्माला जावो" अशा प्रकारे शिवीगाळ करणे होय. ब्रह्मचर्याची शपथ घेऊन शाप देणे म्हणजे "मी गृहस्थ स्त्री होईन, मी पांढरे वस्त्र परिधान करणारी स्त्री होईन, मी परिव्राजिका होईन, किंवा दुसरी भिक्खुणी अशी होवो" अशा प्रकारे शिवीगाळ करणे होय; प्रत्येक शब्दागणिक पाचित्तिय (प्रायश्चित्तिय) आपत्ती होते. परंतु, नरक आणि ब्रह्मचर्य सोडून, "कुत्री, डुकरीण, काणी, लुळी" इत्यादी शब्दांनी शिवीगाळ करणाऱ्या भिक्खुणीला प्रत्येक शब्दागणिक दुक्कट (दुष्कृत) आपत्ती होते. ๘๗๘. อตฺถปุเรกฺขารายาติ อฏฺฐกถํ กเถนฺติยา. ธมฺมปุเรกฺขารายาติ ปาฬึ วาเจนฺติยา. อนุสาสนิปุเรกฺขารายาติ ‘‘อิทานิปิ ตฺวํ เอทิสา, สาธุ วิรมสฺสุ, โน เจ วิรมสิ, อทฺธา ปุน เอวรูปานิ กมฺมานิ กตฺวา นิรเย อุปฺปชฺชิสฺสสิ, ติรจฺฉานโยนิยา อุปฺปชฺชิสฺสสี’’ติ เอวํ อนุสาสนิยํ ฐตฺวา วทนฺติยา อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ८७८. "अत्थपुरेक्खाराय" म्हणजे अट्ठकथा (अर्थकथा) सांगणाऱ्या भिक्खुणीला आपत्ती नाही. "धम्मपुरेक्खाराय" म्हणजे पाळी (मूळ बुद्धवचन) शिकवणाऱ्या भिक्खुणीला आपत्ती नाही. "अनुसासनीपुरेक्खाराय" म्हणजे "आताही तू अशीच आहेस, बरे होईल की तू यापासून परावृत्त हो. जर तू परावृत्त झाली नाहीस, तर नक्कीच पुन्हा अशी कर्मे करून तू नरकात जन्म घेशील किंवा तिर्यक योनीत (प्राणी योनीत) जन्म घेशील" अशा प्रकारे उपदेशाच्या भूमिकेत राहून बोलणाऱ्या भिक्खुणीला आपत्ती नाही. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. त्रिसमुत्थान - क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे. นวมสิกฺขาปทํ. नववे शिक्षापद समाप्त. ๑๐. ทสมสิกฺขาปทวณฺณนา १०. दहाव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๘๗๙. ทสเม – สพฺพํ อุตฺตานเมว. ธุรนิกฺเขปสมุฏฺฐานํ – กายวาจาจิตฺตโต สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลกมฺมํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. ८७९. दहाव्यामध्ये - सर्व काही स्पष्टच आहे. धुरनिक्खेपसमुत्थान - काय, वाचा आणि चित्तापासून उत्पन्न होते; क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलकर्म आणि दुःखवेदनायुक्त आहे. ทสมสิกฺขาปทํ. दहावे शिक्षापद समाप्त. อนฺธการวคฺโค ทุติโย. दुसरा अंधकारवर्ग समाप्त. ๓. นคฺควคฺโค ३. नग्गवर्ग (नग्नवर्ग). ๑. ปฐมสิกฺขาปทวณฺณนา १. पहिल्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๘๘๓-๖. นคฺควคฺคสฺส [Pg.205] ปฐมสิกฺขาปเท – พฺรหฺมจริยํ จิณฺเณนาติ พฺรหฺมจริเยน จิณฺเณน; อถ วา พฺรหฺมจริยสฺส จรเณนาติ; เอวํ กรณตฺเถ วา สามิอตฺเถ วา อุปโยควจนํ เวทิตพฺพํ. อจฺฉินฺนจีวริกายาติ อิทํ อุทกสาฏิกํ สนฺธาย วุตฺตํ, น อญฺญํ จีวรํ. ตสฺมา อุทกสาฏิกาย อจฺฉินฺนาย วา นฏฺฐาย วา นคฺคาย นฺหายนฺติยา อนาปตฺติ. สเจปิ อุทกสาฏิกจีวรํ มหคฺฆํ โหติ, น สกฺกา นิวาเสตฺวา พหิ คนฺตุํ, เอวมฺปิ นคฺคาย นฺหายิตุํ วฏฺฏติ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ८८३-६. नग्गवर्गाच्या पहिल्या शिक्षापदात - "ब्रह्मचरियं चिण्णेन" म्हणजे आचरलेल्या ब्रह्मचर्याने; अथवा ब्रह्मचर्याच्या आचरणाने; अशा प्रकारे करण अर्थात (तृतीया विभक्ती) किंवा स्वामी अर्थात (षष्ठी विभक्ती) द्वितीया विभक्ती (उपयोगवचन) समजली पाहिजे. "अच्छिन्नचीवरिकाय" हे वाक्य उदकसाटिका (स्नानवस्त्र) लक्षात घेऊन भगवंतांनी म्हटले आहे, इतर चीवरांना उद्देशून नाही. म्हणून, जर स्नानवस्त्र हिरावून घेतले गेले असेल किंवा हरवले असेल, तर नग्न अवस्थेत स्नान करणाऱ्या भिक्खुणीला आपत्ती नाही. जरी स्नानवस्त्र अत्यंत मौल्यवान असेल आणि ते परिधान करून बाहेर जाणे शक्य नसेल, तरीही अशा स्थितीत नग्न होऊन स्नान करणे योग्य आहे. या शिक्षापदातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. एळकलोमसमुत्थान - क्रिया, नोसंज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज, कायकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदनयुक्त आहे. ปฐมสิกฺขาปทํ. पहिले शिक्षापद समाप्त. ๒. ทุติยสิกฺขาปทวณฺณนา २. दुसऱ्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๘๘๗. ทุติเย – สพฺพํ อุตฺตานเมว. ฉสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ८८७. दुसऱ्यामध्ये - सर्व काही स्पष्टच आहे. छहसमुत्थान - क्रिया, नोसंज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदनयुक्त आहे. ทุติยสิกฺขาปทํ. दुसरे शिक्षापद समाप्त. ๓. ตติยสิกฺขาปทวณฺณนา ३. तिसऱ्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๘๙๓-๔. ตติเย – อนนฺตรายิกินีติ ทสสุ อนฺตราเยสุ เอเกนปิ อนฺตราเยน อนนฺตรายา. ธุรํ นิกฺขิตฺตมตฺเตติ ธุรํ นิกฺขิปิตฺวา สเจปิ ปจฺฉา สิพฺพติ, อาปตฺติเยวาติ อตฺโถ. เสสํ อุตฺตานเมว. ८९३-४. तिसऱ्यामध्ये - "अनन्तरायकिनी" म्हणजे दहा अंतरायांपैकी एकाही अंतरायाने बाधित न होता, अंतरायरहित असणे. "धुरं निक्खित्तमत्ते" म्हणजे जबाबदारी सोडून दिल्यानंतर जरी नंतर ते शिवले, तरीही आपत्तीच होते, असा अर्थ आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ธุรนิกฺเขปสมุฏฺฐานํ – อกิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. धुरनिक्खेपसमुत्थान - अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे. ตติยสิกฺขาปทํ. तिसरे शिक्षापद समाप्त. ๔. จตุตฺถสิกฺขาปทวณฺณนา ४. चौथ्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๘๙๘-๙. จตุตฺเถ [Pg.206] – ปญฺจ อหานิ ปญฺจาหํ, ปญฺจาหเมว ปญฺจาหิกํ. สงฺฆาฏีนํ จาโร สงฺฆาฏิจาโร; ปริโภควเสน วา โอตาปนวเสน วา สงฺฆฏิตฏฺเฐน สงฺฆาฏีติ ลทฺธนามานํ ปญฺจนฺนํ จีวรานํ ปริวตฺตนนฺติ อตฺโถ. ตสฺมาเยว ปทภาชเน ‘‘ปญฺจมํ ทิวสํ ปญฺจ จีวรานี’’ติอาทิมาห. อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสาติ เอตฺถ จ เอกสฺมึ จีวเร เอกา อาปตฺติ; ปญฺจสุ ปญฺจ. ८९८-९. चौथ्यामध्ये - पाच दिवस म्हणजे पंचाह, पाच दिवस म्हणजेच पंचाहिक. "संघाटीचार" म्हणजे संघाटींचे फिरवणे (बदलणे); वापराच्या दृष्टीने किंवा उन्हात वाळवण्याच्या दृष्टीने, एकत्र जोडलेले (शिवलेले) असल्यामुळे ज्यांना "संघाटी" हे नाव मिळाले आहे, अशा पाच चीवरांचे आलटून-पालटून वापरणे असा अर्थ आहे. म्हणूनच पदभाजनामध्ये भगवंतांनी "पाचव्या दिवशी पाच चीवरे" इत्यादी म्हटले आहे. "आपत्ति पाचित्तियस्स" यामध्ये एका चीवराच्या बाबतीत एक आपत्ती होते; पाच चीवरांच्या बाबतीत पाच आपत्ती होतात. ๙๐๐. อาปทาสูติ มหคฺฆํ จีวรํ, น สกฺกา โหติ โจรภยาทีสุ ปริภุญฺชิตุํ; เอวรูเป อุปทฺทเว อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. กถินสมุฏฺฐานํ – อกิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ९००. "आपदासू" म्हणजे मौल्यवान चीवर चोरांच्या भयामुळे वापरणे शक्य नसते; अशा प्रकारच्या संकटाच्या वेळी आपत्ती नाही. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. कठीणसमुत्थान - अक्रिया, नोसंज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदनयुक्त आहे. จตุตฺถสิกฺขาปทํ. चौथे शिक्षापद समाप्त. ๕. ปญฺจมสิกฺขาปทวณฺณนา ५. पाचव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๙๐๓. ปญฺจเม – จีวรสงฺกมนียนฺติ สงฺกเมตพฺพํ จีวรํ; อญฺญิสฺสา สนฺตกํ อนาปุจฺฉา คหิตํ ปุน ปฏิทาตพฺพจีวรนฺติ อตฺโถ. ९०३. पाचव्यामध्ये - "चीवरसंकमनीय" म्हणजे हस्तांतरित करण्याजोगे चीवर; दुसऱ्या भिक्खुणीच्या मालकीचे चीवर न विचारता घेतले असता, ते पुन्हा परत देण्याजोगे चीवर असा अर्थ आहे. ๙๐๖. อาปทาสูติ สเจ อปารุตํ วา อนิวตฺถํ วา โจรา หรนฺติ, เอวรูปาสุ อาปทาสุ ธาเรนฺติยา อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. กถินสมุฏฺฐานํ – กิริยากิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ९०६. "आपदासू" म्हणजे जर पांघरलेले नसलेले किंवा नेसलेले नसलेले चीवर चोर घेऊन गेले, तर अशा प्रकारच्या आपत्तीच्या वेळी परिधान करणाऱ्या भिक्खुणीला आपत्ती नाही. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. कठीणसमुत्थान - क्रिया-अक्रिया, नोसंज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदनयुक्त आहे. ปญฺจมสิกฺขาปทํ. पाचवे शिक्षापद समाप्त. ๖. ฉฏฺฐสิกฺขาปทวณฺณนา ६. सहाव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण. ๙๐๙-๑๐. ฉฏฺเฐ – อญฺญํ ปริกฺขารนฺติ ยํกิญฺจิ ถาลกาทีนํ วา สปฺปิเตลาทีนํ วา อญฺญตรํ. อานิสํสนฺติ ‘‘กิตฺตกํ อคฺฆนกํ ทาตุกามตฺถา’’ติ ปุจฺฉติ, ‘‘เอตฺตกํ นามา’’ติ วทนฺติ, ‘‘อาคเมถ ตาว, อิทานิ วตฺถํ มหคฺฆํ, กติปาเหน กปฺปาเส อาคเต สมคฺฆํ ภวิสฺสตี’’ติ เอวํ วตฺวา นิวาเรนฺติยา อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ९०९-१०. सहाव्यामध्ये - "अञ्ञं परिक्खारं" (इतर परिष्कार) म्हणजे वाटी इत्यादींपैकी किंवा तूप, तेल इत्यादींपैकी कोणतेही एक. "आनिसंसन्ति" म्हणजे "तुम्ही किती मूल्याची वस्तू देऊ इच्छिता?" असे विचारते, आणि ते "इतक्या मूल्याची" असे सांगतात, तेव्हा "थोड्या वेळ थांबा, सध्या कापड महाग आहे, काही दिवसांत कापूस आल्यावर ते स्वस्त होईल" असे सांगून (दान देण्यापासून) रोखणाऱ्या भिक्खुणीला आपत्ती नाही. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ [Pg.207] – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. त्रिसमुत्थान - क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि त्रिवेदनयुक्त आहे. ฉฏฺฐสิกฺขาปทํ. सहावे शिक्षापद समाप्त. ๗. สตฺตมสิกฺขาปทวณฺณนา ७. सातव्या शिक्षापदाचे वर्णन ๙๑๑. สตฺตเม – ปกฺกมึสูติ อญฺญาสมฺปิ อาคมนํ อาคเมนฺตี ‘‘อทฺธา อมฺหากมฺปิ อาคเมสฺสตี’’ติ ตตฺถ ตตฺถ อคมํสุ. ปฏิพาเหยฺยาติ ปฏิเสเธยฺย. ९११. सातव्या (शिक्षापदात) – 'पक्कमिंसु' (निघून गेल्या) म्हणजे 'इतर भिक्खुणींच्याही येण्याची वाट पाहत असताना, त्या नक्कीच आमच्याही येण्याची वाट पाहतील' असा विचार करून त्या वेगवेगळ्या ठिकाणी गेल्या. 'पटिबाहय्य' म्हणजे मनाई करावी (प्रतिषेध करावा). ๙๑๕. อานิสํสนฺติ ‘‘เอกิสฺสา เอกํ สาฏกํ นปฺปโหติ, อาคเมถ ตาว, กติปาเหน อุปฺปชฺชิสฺสติ, ตโต ภาเชสฺสามี’’ติ เอวํ อานิสํสํ ทสฺเสตฺวา ปฏิพาหนฺติยา อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ९१५. 'आनिसंसं' (फायदा/लाभ दर्शवून) म्हणजे 'एका भिक्खुणीसाठी एक वस्त्र पुरेसे नाही, तोपर्यंत वाट पहा, काही दिवसांत चीवर प्राप्त होईल, त्यानंतर मी त्याचे वाटप करेन' अशा प्रकारे लाभ दाखवून मनाई करणाऱ्या भिक्खुणीला आपत्ती होत नाही. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. तीन समुत्थान असणारे – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, प्रज्ञप्तिवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, तीन चित्त आणि तीन वेदना असणारे आहे. สตฺตมสิกฺขาปทํ. सातवे शिक्षापद समाप्त. ๘. อฏฺฐมสิกฺขาปทวณฺณนา ८. आठव्या शिक्षापदाचे वर्णन ๙๑๖-๘. อฏฺฐเม – นฏา นาม เย นาฏกํ นาเฏนฺติ. นฏกา นาม เย นจฺจนฺติ. ลงฺฆกา นาม เย วํสวรตฺตาทีสุ ลงฺฆนกมฺมํ กโรนฺติ. โสกชฺฌายิกา นาม มายาการา. กุมฺภถูณิกา นาม ฆฏเกน กีฬนกา; พิมฺพิสกวาทกาติปิ วทนฺติ. เทติ อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสาติ เอตฺถ จีวรคณนาย อาปตฺติโย เวทิตพฺพา. เสสํ อุตฺตานเมว. ९१६-८. आठव्या (शिक्षापदात) – 'नट' म्हणजे जे नाटक बसवतात (नृत्य शिकवतात). 'नाटक' म्हणजे जे स्वतः नृत्य करतात. 'लङ्घक' म्हणजे जे बांबू किंवा दोरी इत्यादींवर उड्या मारण्याचे काम करतात. 'सोकज्झायिक' म्हणजे जादूगार. 'कुम्भथूणिक' म्हणजे लहान घागरीने खेळणारे; त्यांना 'बिम्बिसकवादक' (चौकोनी ढोल वाजवणारे) असेही म्हणतात. 'देती आपत्ती पाचित्तियस्स' यामध्ये चीवरांच्या संख्येनुसार आपत्ती समजावी. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ฉสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. सहा समुत्थान असणारे – क्रिया, नोसंज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, प्रज्ञप्तिवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, तीन चित्त आणि तीन वेदना असणारे आहे. อฏฺฐมสิกฺขาปทํ. आठवे शिक्षापद समाप्त. ๙. นวมสิกฺขาปทวณฺณนา ९. नव्या शिक्षापदाचे वर्णन ๙๒๑-๔. นวเม [Pg.208] – ทุพฺพลจีวรปจฺจาสายาติ ทุพฺพลาย จีวรปจฺจาสาย. อานิสํสนฺติ กิญฺจาปิ ‘‘น มยํ อยฺเย สกฺโกมา’’ติ วทนฺติ, ‘‘อิทานิ ปน เตสํ กปฺปาโส อาคมิสฺสติ, สทฺโธ ปสนฺโน ปุริโส อาคมิสฺสติ, อทฺธา ทสฺสตี’’ติ เอวํ อานิสํสํ ทสฺเสตฺวา นิวาเรนฺติยา อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ९२१-४. नव्या (शिक्षापदात) – 'दुब्बलचीवरपच्चासाय' म्हणजे दुर्बल चीवराच्या आशेने. 'आनिसंसं' म्हणजे जरी (दाते) 'आर्ये, आम्ही असमर्थ आहोत' असे म्हणत असले, तरीही 'आता त्यांचा कापूस येईल, एखादा श्रद्धाळू व प्रसन्न मनुष्य येईल आणि तो नक्कीच दान करेल' अशा प्रकारे लाभ दाखवून रोखणाऱ्या भिक्खुणीला आपत्ती होत नाही. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. तीन समुत्थान असणारे – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि तीन वेदना असणारे आहे. นวมสิกฺขาปทํ. नवे शिक्षापद समाप्त. ๑๐. ทสมสิกฺขาปทวณฺณนา १०. दहाव्या शिक्षापदाचे वर्णन ๙๒๗. ทสเม – กถินุทฺธารํ น ทสฺสนฺตีติ กีทิโส กถินุทฺธาโร ทาตพฺโพ, กีทิโส น ทาตพฺโพติ? ยสฺส อตฺถารมูลโก อานิสํโส มหา, อุพฺภารมูลโก อปฺโป, เอวรูโป น ทาตพฺโพ. ยสฺส ปน อตฺถารมูลโก อานิสํโส อปฺโป, อุพฺภารมูลโก มหา, เอวรูโป ทาตพฺโพ. สมานิสํโสปิ สทฺธาปริปาลนตฺถํ ทาตพฺโพว. ९२७. दहाव्या (शिक्षापदात) – 'कठिनुद्धारं न दस्सन्ति' म्हणजे कशा प्रकारचा कठीण-उद्धार (कठीण निष्कासन) द्यावा आणि कशा प्रकारचा देऊ नये? ज्या कठीण-उद्धाराचा अत्थार-मूलक (कठीण पसरवण्यावर आधारित) लाभ मोठा असतो आणि उब्भार-मूलक (कठीण काढण्यावर आधारित) लाभ कमी असतो, तशा प्रकारचा कठीण-उद्धार देऊ नये. परंतु ज्याचा अत्थार-मूलक लाभ कमी आणि उब्भार-मूलक लाभ मोठा असतो, तशा प्रकारचा कठीण-उद्धार द्यावा. समान लाभ असला तरीही दात्याच्या श्रद्धेचे रक्षण करण्यासाठी तो दिलाच पाहिजे. ๙๓๑. อานิสํสนฺติ ภิกฺขุนิสงฺโฆ ชิณฺณจีวโร, กถินานิสํสมูลโก มหาลาโภติ เอวรูปํ อานิสํสํ ทสฺเสตฺวา ปฏิพาหนฺติยา อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ९३१. 'आनिसंसं' म्हणजे 'भिक्खुणी संघ कडे जीर्ण चीवर आहे, कठीण-लाभावर आधारित मोठा लाभ मिळणार आहे' अशा प्रकारचा लाभ दाखवून मनाई करणाऱ्या भिक्खुणीला आपत्ती होत नाही. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. तीन समुत्थान असणारे – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि तीन वेदना असणारे आहे. ทสมสิกฺขาปทํ. दहावे शिक्षापद समाप्त. นคฺควคฺโค ตติโย. तिसरा नग्नवर्ग समाप्त. ๔. ตุวฏฺฏวคฺโค ४. तुवट्टवर्ग ๑. ปฐมสิกฺขาปทวณฺณนา १. पहिल्या शिक्षापदाचे वर्णन ๙๓๓. ตุวฏฺฏวคฺคสฺส [Pg.209] ปฐมสิกฺขาปเท – ตุวฏฺเฏยฺยุนฺติ นิปชฺเชยฺยุํ. เสสํ อุตฺตานเมว. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ९३३. तुवट्टवर्गाच्या पहिल्या शिक्षापदात – 'तुवट्टेय्युं' म्हणजे झोपावे (शय्या करावी). उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. एळकलोम समुत्थान असणारे – क्रिया, नोसंज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, प्रज्ञप्तिवज्ज, कायकर्म, तीन चित्त आणि तीन वेदना असणारे आहे. ปฐมสิกฺขาปทํ. पहिले शिक्षापद समाप्त. ๒. ทุติยสิกฺขาปทวณฺณนา २. दुसऱ्या शिक्षापदाचे वर्णन ๙๓๗. ทุติเย – เอกํ อตฺถรณญฺเจว ปาวุรณญฺจ เอตาสนฺติ เอกตฺถรณปาวุรณา; สํหาริมานํ ปาวารตฺถรณกฏสารกาทีนํ เอกํ อนฺตํ อตฺถริตฺวา เอกํ ปารุปิตฺวา ตุวฏฺเฏนฺตีนเมตํ อธิวจนํ. ९३७. दुसऱ्या (शिक्षापदात) – ज्यांचे एकच अंथरूण आणि एकच पांघरूण असते, त्यांना 'एकत्थरणपावुरणा' म्हणतात; हलवता येण्याजोगे पांघरूण, अंथरूण, चटई इत्यादींचा एक कोपरा अंथरून व दुसरा कोपरा पांघरून झोपणाऱ्या भिक्खुणींसाठी हे नाव वापरले जाते. ๙๔๐. ววตฺถานํ ทสฺเสตฺวาติ มชฺเฌ กาสาวํ วา กตฺตรยฏฺฐึ วา อนฺตมโส กายพนฺธนมฺปิ ฐเปตฺวา นิปชฺชนฺตีนํ อนาปตฺตีติ อตฺโถ. เสสํ อุตฺตานเมว. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ९४०. 'ववत्थानं दस्सेत्वा' म्हणजे मध्ये काषाय वस्त्र किंवा काठी (दंडा) किंवा अगदी कमरेचा पट्टा (कायबंधन) ठेवून झोपणाऱ्या भिक्खुणींना आपत्ती होत नाही, असा अर्थ आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. एळकलोम समुत्थान असणारे – क्रिया, नोसंज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, प्रज्ञप्तिवज्ज, कायकर्म, तीन चित्त आणि तीन वेदना असणारे आहे. ทุติยสิกฺขาปทํ. दुसरे शिक्षापद समाप्त. ๓. ตติยสิกฺขาปทวณฺณนา ३. तिसऱ्या शिक्षापदाचे वर्णन ๙๔๑. ตติเย – อุฬารสมฺภาวิตาติ อุฬารกุลา ปพฺพชิตตฺตา คุเณหิ จ อุฬารตฺตา อุฬาราติ สมฺภาวิตา. อิสฺสาปกตาติ อิสฺสาย อปกตา; อภิภูตาติ อตฺโถ. สญฺญตฺติ พหุลา เอตาสนฺติ สญฺญตฺติพหุลา; ทิวสํ มหาชนํ สญฺญาปยมานาติ อตฺโถ. วิญฺญตฺติ พหุลา เอตาสนฺติ วิญฺญตฺติพหุลา. วิญฺญตฺตีติ เหตูทาหรณาทีหิ วิวิเธหิ นเยหิ ญาปนา เวทิตพฺพา, น ยาจนา. ९४१. तिसऱ्या (शिक्षापदात) – 'उळारसम्भाविता' म्हणजे उच्च कुळातून येऊन प्रव्रजित झाल्यामुळे आणि शील इत्यादी गुणांमुळे श्रेष्ठ मानल्या गेलेल्या. 'इस्सापकाता' म्हणजे ईर्षेने ग्रासलेल्या; ईर्षेने पराभूत झालेल्या असा अर्थ आहे. 'सञ्ञत्तिबहुला' म्हणजे ज्यांच्याकडे लोकांना पटवून देण्याची (समजावण्याची) प्रवृत्ती जास्त असते; दिवसभर लोकांना समजावून सांगणाऱ्या असा अर्थ आहे. 'विञ्ञत्तिबहुला' म्हणजे ज्यांच्याकडे विविध प्रकारे सूचना देण्याची प्रवृत्ती जास्त असते. 'विञ्ञत्ति' म्हणजे कारण, उदाहरण इत्यादी विविध मार्गांनी समजावून सांगणे असे समजावे, याचना करणे नव्हे. ๙๔๓. จงฺกมเน [Pg.210] นิวตฺตนคณนาย อาปตฺติโย เวทิตพฺพา. ติฏฺฐติ วาติอาทีสุ ปโยคคณนาย. อุทฺทิสติ วาติอาทีสุ ปทาทิคณนาย. เสสํ อุตฺตานเมว. ९४३. चक्रमणात (चालताना) मागे वळण्याच्या संख्येनुसार आपत्ती समजावी. 'तिट्ठति वा' (उभी राहते) इत्यादींमध्ये प्रयोगाच्या संख्येनुसार. 'उद्दि सति वा' (शिकवते) इत्यादींमध्ये पदांच्या संख्येनुसार आपत्ती समजावी. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยากิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. तीन समुत्थान असणारे – क्रिया-अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदना असणारे आहे. ตติยสิกฺขาปทํ. तिसरे शिक्षापद समाप्त. ๔. จตุตฺถสิกฺขาปทวณฺณนา ४. चौथ्या शिक्षापदाचे वर्णन ๙๔๙. จตุตฺเถ – สติ อนฺตราเยติ ทสวิเธ อนฺตราเย สติ. ปริเยสิตฺวา น ลภตีติ อญฺญํ อุปฏฺฐายิกํ น ลภติ. คิลานายาติ สยํ คิลานาย. อาปทาสูติ ตถารูเป อุปทฺทเว สติ อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ९४९. चौथ्या (शिक्षापदात) – 'सति अंतराये' म्हणजे दहा प्रकारच्या अंतरायांपैकी (अडथळ्यांपैकी) एखादा अंतराय असताना. 'परियेसित्वा न लभति' म्हणजे दुसरी परिचारिका (सेवा करणारी) न मिळाल्यास. 'गिलानाय' म्हणजे स्वतः आजारी असताना. 'आपदासु' म्हणजे तशा प्रकारची आपत्ती किंवा संकट असताना आपत्ती होत नाही. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ธุรนิกฺเขปสมุฏฺฐานํ – อกิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. धुरनिक्क्षेप समुत्थान असणारे – अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदना असणारे आहे. จตุตฺถสิกฺขาปทํ. चौथे शिक्षापद समाप्त. ๕. ปญฺจมสิกฺขาปทวณฺณนา ५. पाचव्या शिक्षापदाचे वर्णन ๙๕๒. ปญฺจเม – อญฺญํ อาณาเปตีติ เอตฺถ สเจ นิกฺกฑฺฒาติ อาณตฺตา เอกปโยเคน พหูนิปิ ทฺวารานิ อติกฺกาเมติ, เอกา อาปตฺติ. อถ อิมญฺจิมญฺจ ทฺวารํ อติกฺกาเมหีติ เอวํ อาณตฺตา อติกฺกาเมติ, ทฺวารคณนาย อาปตฺติโย. เสสํ อุตฺตานเมว. ९५२. पाचव्या (शिक्षापदात) – 'अञ्ञं आणापेति' यामध्ये जर 'बाहेर काढ' अशी आज्ञा मिळालेली भिक्खुणी एकाच प्रयत्नाने अनेक दारे ओलांडून जाते, तर एकच आपत्ती होते. परंतु जर 'या आणि या दाराबाहेर काढ' अशी आज्ञा देऊन ती ओलांडते, तर दारांच्या संख्येनुसार आपत्ती होतात. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. तीन समुत्थान असणारे – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदना असणारे आहे. ปญฺจมสิกฺขาปทํ. पाचवे शिक्षापद समाप्त. ๖. ฉฏฺฐสิกฺขาปทวณฺณนา ६. सहाव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण ๙๕๕. ฉฏฺเฐ [Pg.211] – สพฺพํ อุตฺตานเมว. สมนุภาสนสมุฏฺฐานํ – อกิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. ९५५. सहाव्यामध्ये – सर्व काही स्पष्टच आहे. समनुभाषणसमुत्थान – अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त, दुःखवेदना. ฉฏฺฐสิกฺขาปทํ. सहावे शिक्षापद समाप्त. ๗-๘-๙. สตฺตมอฏฺฐมนวมสิกฺขาปทวณฺณนา ७-८-९. सातव्या, आठव्या आणि नवव्या शिक्षापदांचे स्पष्टीकरण ๙๖๑. สตฺตมอฏฺฐมนวเมสุ สพฺพํ อุตฺตานเมว. สพฺพานิ เอฬกโลมสมุฏฺฐานานิ, กิริยานิ, โนสญฺญาวิโมกฺขานิ, อจิตฺตกานิ, ปณฺณตฺติวชฺชานิ, กายกมฺมานิ, ติจิตฺตานิ ติเวทนานีติ. ९६१. सातव्या, आठव्या आणि नवव्या शिक्षापदांमध्ये सर्व काही स्पष्टच आहे. सर्व (शिक्षापदे) एळकलोम-समुत्थान, क्रिया, नो-संज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज, कायकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदना असणारे आहेत. สตฺตมอฏฺฐมนวมสิกฺขาปทานิ. सातवे, आठवे आणि नववे शिक्षापद समाप्त. ๑๐. ทสมสิกฺขาปทวณฺณนา १०. दहाव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण ๙๗๓. ทสเม – อาหุนฺทริกาติ สมฺพาธา. ९७३. दहाव्यामध्ये – 'आहुन्दरिका' म्हणजे अरुंद किंवा संकुचित. ๙๗๕. ธุรํ นิกฺขิตฺตมตฺเตติ สเจปิ ธุรํ นิกฺขิปิตฺวา ปจฺฉา ปกฺกมติ, อาปตฺติเยวาติ อตฺโถ. ปวาเรตฺวา ปญฺจ โยชนานิ คจฺฉนฺติยาปิ อนาปตฺติ. ฉสุ วตฺตพฺพเมว นตฺถิ. สเจ ปน ตีณิ คนฺตฺวา เตเนว มคฺเคน ปจฺจาคจฺฉติ, น วฏฺฏติ. อญฺเญน มคฺเคน อาคนฺตุํ วฏฺฏติ. ९७५. 'धुरं निक्खित्तमत्ते' म्हणजे जरी (जाण्याची) जबाबदारी सोडून देऊन नंतर निघून गेली, तरीही आपत्तीच येते, असा अर्थ आहे. प्रवारणा करून पाच योजने जाणाऱ्या भिक्षुणीलाही अनापत्ती आहे. सहा योजने जाणाऱ्या भिक्षुणीच्या बाबतीत तर बोलण्याची गरजच नाही. परंतु, जर तीन योजने जाऊन त्याच मार्गाने परत येत असेल, तर ते योग्य नाही. दुसऱ्या मार्गाने परत येणे योग्य आहे. ๙๗๖. อนฺตราเยติ ทสวิเธ อนฺตราเย – ปรํ คจฺฉิสฺสามีติ นิกฺขนฺตา, นทีปูโร ปน อาคโต, โจรา วา มคฺเค โหนฺติ, เมโฆ วา อุฏฺฐาติ, นิวตฺติตุํ วฏฺฏติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ปฐมปาราชิกสมุฏฺฐานํ – อกิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. ९७६. 'अंतराये' म्हणजे दहा प्रकारच्या अंतरायांमध्ये – 'मी दुसऱ्या ठिकाणी जाईन' असे विचार करून निघाली असता, नदीला पूर आला, किंवा मार्गात चोर आले, किंवा ढग दाटून आले, तर मागे फिरणे योग्य आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. प्रथम पाराजिकाप्रमाणे समुत्थान – अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, अकुशलचित्त, दुःखवेदना. ทสมสิกฺขาปทํ. दहावे शिक्षापद समाप्त. ตุวฏฺฏวคฺโค จตุตฺโถ. चौथा तुवट्टवर्ग समाप्त. ๕. จิตฺตาคารวคฺโค ५. चित्तागारवर्ग ๑. ปฐมสิกฺขาปทวณฺณนา १. पहिल्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण ๙๗๘. จิตฺตาคารวคฺคสฺส [Pg.212] ปฐมสิกฺขาปเท – ราชาคารนฺติ รญฺโญ กีฬนฆรํ. จิตฺตาคารนฺติ กีฬนจิตฺตสาลํ. อารามนฺติ กีฬนอุปวนํ. อุยฺยานนฺติ กีฬนุยฺยานํ. โปกฺขรณีนฺติ กีฬนโปกฺขรณึ. ตสฺมาเยว ปทภาชเน ‘‘ยตฺถ กตฺถจิ รญฺโญ กีฬิตุ’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. ทสฺสนาย คจฺฉติ อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺสาติ เอตฺถ ปทวารคณนาย ทุกฺกฏํ. ยตฺถ ฐิตา ปสฺสตีติ เอตฺถ ปน สเจ เอกสฺมึเยว ฐาเน ฐิตา ปทํ อนุทฺธรมานา ปญฺจปิ ปสฺสติ, เอกเมว ปาจิตฺติยํ. ตํ ตํ ทิสาภาคํ โอโลเกตฺวา ปสฺสนฺติยา ปน ปาเฏกฺกา อาปตฺติโย. ภิกฺขุสฺส ปน สพฺพตฺถ ทุกฺกฏํ. ९७८. चित्तागारवर्गाच्या पहिल्या शिक्षापदात – 'राजागार' म्हणजे राजाचे क्रीडागृह. 'चित्तागार' म्हणजे क्रीडा-चित्रशाळा. 'आराम' म्हणजे क्रीडा-उपवन. 'उद्यान' म्हणजे क्रीडा-उद्यान. 'पोक्खरणी' म्हणजे क्रीडा-पुष्कळणी. म्हणूनच पदभाजनामध्ये 'जिथे कुठे राजा क्रीडा करतो' इत्यादी म्हटले आहे. 'दर्शनासाठी जाते, तेव्हा दुक्कट आपत्ती होते' यामध्ये पावलांच्या संख्येनुसार दुक्कट आपत्ती होते. 'जिथे उभी राहून पाहते' यामध्ये जर एकाच ठिकाणी उभी राहून, पाऊल न उचलता पाचही गोष्टी पाहते, तर एकच पाचित्तिय आपत्ती होते. परंतु, वेगवेगळ्या दिशांना पाहून पाहणाऱ्या भिक्षुणीला प्रत्येक दर्शनासाठी स्वतंत्र आपत्ती होते. भिक्षूसाठी मात्र सर्व ठिकाणी दुक्कट आपत्ती होते. ๙๘๑. อาราเม ฐิตาติ อชฺฌาราเม ราชาคาราทีนิ กโรนฺติ, ตานิ ปสฺสนฺติยา อนาปตฺติ. คจฺฉนฺตี วา อาคจฺฉนฺตี วาติ ปิณฺฑปาตาทีนํ อตฺถาย คจฺฉนฺติยา มคฺโค โหติ, ตานิ ปสฺสติ, อนาปตฺติ. สติ กรณีเย คนฺตฺวาติ รญฺโญ สนฺติกํ เกนจิ กรณีเยน คนฺตฺวา ปสฺสติ, อนาปตฺติ. อาปทาสูติ เกนจิ อุปทฺทุตา ปวิสิตฺวา ปสฺสติ, อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ९८१. 'आरामात उभी असलेली' म्हणजे आरामाच्या आत राजाचे क्रीडागृह इत्यादी बनवत असताना, ते पाहणाऱ्या भिक्षुणीला अनापत्ती आहे. 'जाताना किंवा येताना' म्हणजे पिंडपातासाठी जाणाऱ्या भिक्षुणीचा तो मार्ग असेल आणि ती ते पाहते, तर अनापत्ती आहे. 'काम असताना जाऊन' म्हणजे राजाकडे काही कामासाठी जाऊन पाहते, तर अनापत्ती आहे. 'आपत्तीच्या वेळी' म्हणजे एखाद्या संकटाने पीडित होऊन आत पळून जाऊन पाहते, तर अनापत्ती आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. एळकलोम-समुत्थान – क्रिया, नो-संज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, अकुशलचित्त, त्रिवेदना. ปฐมสิกฺขาปทํ. पहिले शिक्षापद समाप्त. ๒. ทุติยสิกฺขาปทวณฺณนา २. दुसऱ्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण ๙๘๒. ทุติเย – อภินิสีทนาภินิปชฺชเนสุ ปโยคคณนาย อาปตฺติโย เวทิตพฺพา. เสสํ อุตฺตานเมว. ९८२. दुसऱ्यामध्ये – बसणे आणि झोपणे यांमधील प्रयोगांच्या संख्येनुसार आपत्ती जाणाव्यात. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. एळकलोम-समुत्थान – क्रिया, नो-संज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज, कायकर्म, त्रिचित्त, त्रिवेदना. ทุติยสิกฺขาปทํ. दुसरे शिक्षापद समाप्त. ๓. ตติยสิกฺขาปทวณฺณนา ३. तिसऱ्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण ๙๘๘. ตติเย [Pg.213] – อุชฺชวุชฺชเวติ ยตฺตกํ หตฺเถน อญฺฉิตํ โหติ, ตสฺมึ ตกฺกมฺหิ เวฐิเต เอกา อาปตฺติ. กนฺตนโต ปน ปุพฺเพ กปฺปาสวิจินนํ อาทึ กตฺวา สพฺพปโยเคสุ หตฺถวารคณนาย ทุกฺกฏํ. ९८८. तिसऱ्यामध्ये – 'उज्जवुज्जवे' म्हणजे हाताने जेवढा दोरा ओढला जातो, तो आसनावर गुंडाळला असता एक आपत्ती होते. परंतु, सूत कातण्यापूर्वी कापूस निवडण्यापासून सुरुवात करून सर्व प्रयोगांमध्ये हाताच्या हालचालींच्या संख्येनुसार दुक्कट आपत्ती होते. ๙๘๙. กนฺติตสุตฺตนฺติ ทสิกสุตฺตาทึ สงฺฆาเฏตฺวา กนฺตติ, ทุกฺกนฺติตํ วา ปฏิกนฺตติ. เสสํ อุตฺตานเมว. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ९८९. 'कातलेले सूत' म्हणजे काठाचे सूत इत्यादी एकत्र करून कातते, किंवा खराब कातलेले सूत पुन्हा कातते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. एळकलोम-समुत्थान – क्रिया, नो-संज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज, कायकर्म, त्रिचित्त, त्रिवेदना. ตติยสิกฺขาปทํ. तिसरे शिक्षापद समाप्त. ๔. จตุตฺถสิกฺขาปทวณฺณนา ४. चौथ्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण ๙๙๒. จตุตฺเถ – ยาคุํ วาติอาทีสุ ตณฺฑุลโกฏฺฏนํ อาทึ กตฺวา สพฺเพสุ ปุพฺพปโยเคสุ ปโยคคณนาย ทุกฺกฏํ. ยาคุภตฺเตสุ ภาชนคณนาย, ขาทนียาทีสุ รูปคณนาย ปาจิตฺติยานิ. ९९२. चौथ्यामध्ये – 'पेज किंवा...' इत्यादींमध्ये तांदूळ सडण्यापासून सुरुवात करून सर्व पूर्व-प्रयोगांमध्ये प्रयोगांच्या संख्येनुसार दुक्कट आपत्ती होते. पेज आणि भाताच्या बाबतीत भांड्यांच्या संख्येनुसार, आणि खाद्यान्न इत्यादींच्या बाबतीत आकारांच्या संख्येनुसार पाचित्तिय आपत्ती होतात. ๙๙๓. ยาคุปาเนติ มนุสฺเสหิ สงฺฆสฺสตฺถาย กริยมาเน ยาคุปาเน วา สงฺฆภตฺเต วา เตสํ สหายิกภาเวน ยํกิญฺจิ ปจนฺติยา อนาปตฺติ. เจติยปูชาย สหายิกา หุตฺวา คนฺธาทีนิ ปูเชติ, วฏฺฏติ. อตฺตโน เวยฺยาวจฺจกรสฺสาติ สเจปิ มาตาปิตโร อาคจฺฉนฺติ, ยํกิญฺจิ พีชนึ วา สมฺมุญฺชนิทณฺฑกํ วา การาเปตฺวา เวยฺยาวจฺจกรฏฺฐาเน ฐเปตฺวาว ยํกิญฺจิ ปจิตุํ วฏฺฏติ. เสสํ อุตฺตานเมว. สมุฏฺฐานาทีนิ ตติยสทิสาเนวาติ. ९९३. 'पेज पिणे' म्हणजे लोकांनी संघासाठी तयार केलेल्या पेजेच्या वेळी किंवा संघभत्ताच्या वेळी त्यांची मदतनीस म्हणून काही शिजवणाऱ्या भिक्षुणीला अनापत्ती आहे. चैत्यपूजेमध्ये मदतनीस होऊन गंध इत्यादींनी पूजा करते, तर ते योग्य आहे. 'आपल्या वैय्यावृत्य करणाऱ्याला' म्हणजे जरी आई-वडील आले, तरी त्यांच्याकडून पंखा किंवा झाडू बनवून घेऊन, त्यांना वैय्यावृत्य करणाऱ्याच्या ठिकाणी ठेवूनच काही शिजवणे योग्य आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. समुत्थान इत्यादी तिसऱ्या शिक्षापदासारखेच आहेत. จตุตฺถสิกฺขาปทํ. चौथे शिक्षापद समाप्त. ๕. ปญฺจมสิกฺขาปทวณฺณนา ५. पाचव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण ๙๙๖. ปญฺจเม – อสติ อนฺตราเยติ ทสวิเธ อนฺตราเย อสติ. ธุรํ นิกฺขิปิตฺวา ปจฺฉา วินิจฺฉินนฺตี อาปตฺตึ อาปชฺชิตฺวาว วินิจฺฉินาติ. ९९६. पाचव्यामध्ये – 'अंतराय नसताना' म्हणजे दहा प्रकारच्या अंतरायांपैकी कोणताही अंतराय नसताना. कर्तव्य सोडून देऊन नंतर निर्णय देणारी भिक्षुणी आपत्तीला प्राप्त होऊनच निर्णय देते. ๙๙๘. ปริเยสิตฺวา [Pg.214] น ลภตีติ สหายิกา ภิกฺขุนิโย น ลภติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ธุรนิกฺเขปสมุฏฺฐานํ – อกิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ ทุกฺขเวทนนฺติ. ९९८. 'शोधूनही मिळत नाही' म्हणजे सोबती भिक्षुणी मिळत नाही. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. धुरनिक्क्षेप-समुत्थान – अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त, दुःखवेदना. ปญฺจมสิกฺขาปทํ. पाचवे शिक्षापद समाप्त. ๖. ฉฏฺฐสิกฺขาปทวณฺณนา ६. सहाव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण ๙๙๙. ฉฏฺเฐ – สพฺพํ นคฺควคฺเค อาคาริกสิกฺขาปเท วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. อยํ ปน วิเสโส, ตํ ฉสมุฏฺฐานํ. อิทํ ‘‘สหตฺถา’’ติ วุตฺตตฺตา เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ, กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ९९९. सहाव्यामध्ये – सर्व काही नग्नवर्गातील 'आगारिक शिक्षापदात' सांगितलेल्या पद्धतीनेच जाणावे. परंतु हा विशेष फरक आहे की, ते सहा समुत्थानांचे आहे. हे 'स्वतःच्या हाताने' असे म्हटल्यामुळे एळकलोम-समुत्थान, क्रिया, नो-संज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज, कायकर्म, त्रिचित्त, त्रिवेदना असणारे आहे. ฉฏฺฐสิกฺขาปทํ. सहावे शिक्षापद समाप्त. ๗. สตฺตมสิกฺขาปทวณฺณนา ७. सातव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण ๑๐๐๗. สตฺตเม – ปุน ปริยาเยนาติ ปุนวาเร. อาปทาสูติ มหคฺฆจีวรํ สรีรโต โมเจตฺวา สุปฏิสามิตมฺปิ โจรา หรนฺติ, เอวรูปาสุ อาปทาสุ อนิสฺสชฺชิตฺวา นิวาเสนฺติยา อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมวาติ. १००७. सातव्यामध्ये – 'पुन्हा पर्यायाने' म्हणजे दुसऱ्या वेळी. 'आपत्तीच्या वेळी' म्हणजे मौल्यवान चीवर शरीरावरून काढून चांगल्या प्रकारे सुरक्षित ठेवले असले तरी चोर ते चोरून नेतात, अशा प्रकारच्या आपत्तीच्या वेळी न सोडता परिधान करणाऱ्या भिक्षुणीला अनापत्ती आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. กถินสมุฏฺฐานํ – กายวาจโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยากิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. कठिनसमुत्थान – हे काय-वाचेपासून आणि काय-वाचा-चित्तापासून उत्पन्न होते; हे क्रिया-अक्रिया, नोसञ्ञाविमोक्ख (संज्ञाविमोक्ष नसलेले), अचित्तक (चित्तरहित), पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तिवद्य), कायकर्म, वचीकर्म, तिचित्त (तीन चित्त असणारे) आणि त्रिविध वेदना असणारे आहे। สตฺตมสิกฺขาปทํ. सातवे शिक्षापद समाप्त झाले। ๘. อฏฺฐมสิกฺขาปทวณฺณนา ८. आठव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण। ๑๐๐๘. อฏฺฐเม – อนิสฺสชฺชิตฺวาติ รกฺขณตฺถาย อทตฺวา; ‘‘อิมํ ชคฺเคยฺยาสี’’ติ เอวํ อนาปุจฺฉิตฺวาติ อตฺโถ. १००८. आठव्या शिक्षापदात – 'अनिस्सज्जित्वा' (हस्तांतरित न करता) म्हणजे रक्षणासाठी न देता; 'या विहाराचे रक्षण कर' असे न विचारता (परवानगी न घेता) निघून जाणे, असा अर्थ आहे। ๑๐๑๒. ปริเยสิตฺวา น ลภตีติ ปฏิชคฺคิกํ น ลภติ. คิลานายาติ วจีเภทํ กาตุํ อสมตฺถาย. อาปทาสูติ รฏฺเฐ ภิชฺชนฺเต อาวาเส [Pg.215] ฉฑฺเฑตฺวา คจฺฉนฺติ, เอวรูปาสุ อาปทาสุ อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. สมุฏฺฐานาทีนิ อนนฺตรสิกฺขาปทสทิสาเนวาติ. १०१२. 'परियेसित्वा न लभति' (शोधूनही न मिळणे) म्हणजे काळजी घेणारा (रक्षक) न मिळणे. 'गिलानाय' (आजारी असल्यामुळे) म्हणजे वाणीचा उच्चार करण्यास असमर्थ असल्यामुळे. 'आपदासु' (आपत्तीच्या वेळी) म्हणजे देशात अशांतता झाल्यावर विहार सोडून जावे लागते; अशा प्रकारच्या आपत्तींमध्ये (विहार न सोपवता गेल्यास) अनापत्ती (दोष नाही) होते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. समुत्थान इत्यादी मागील शिक्षापदासारखेच समजावे। อฏฺฐมสิกฺขาปทํ. आठवे शिक्षापद समाप्त झाले। ๙. นวมสิกฺขาปทวณฺณนา ९. नवव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण। ๑๐๑๕-๖. นวเม – พาหิรกํ อนตฺถสํหิตนฺติ หตฺถิอสฺสรถธนุถรุสิปฺปอาถพฺพณขีลนวสีกรณโสสาปนมนฺตาคทปฺปโยคาทิเภทํ ปรูปฆาตกรํ. ปริตฺตนฺติ ยกฺขปริตฺตนาคมณฺฑลาทิเภทํ สพฺพมฺปิ วฏฺฏติ. เสสํ อุตฺตานเมว. १०१५-६. नवव्या शिक्षापदात – 'बाहिरकं अनत्थसंहितं' (बाह्य अनर्थकारक विद्या) म्हणजे हत्ती, घोडा, रथ, धनुष्य, तलवार चालवण्याची कला, अथर्वण मंत्र, खीलण मंत्र, वशीकरण मंत्र, सोसापन मंत्र, विषप्रयोग इत्यादी प्रकारच्या इतरांना इजा पोहोचवणाऱ्या विद्या. 'परित्तं' (परित्राण) म्हणजे यक्ष-परित्राण, नाग-मंडळ इत्यादी सर्व प्रकारचे (संरक्षण मंत्र) शिकणे योग्य आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे। ปทโสธมฺมสมุฏฺฐานํ – วาจโต วาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. पदशोधम्मसमुत्थान – हे वाचेपासून आणि वाचा-चित्तापासून उत्पन्न होते; हे क्रिया, नोसञ्ञाविमोक्ख (संज्ञाविमोक्ष नसलेले), अचित्तक (चित्तरहित), पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तिवद्य), वचीकर्म, तिचित्त (तीन चित्त असणारे) आणि त्रिविध वेदना असणारे आहे। นวมสิกฺขาปทํ. नववे शिक्षापद समाप्त झाले। ๑๐. ทสมสิกฺขาปทวณฺณนา १०. दहाव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण। ๑๐๑๘. ทสเม วาเจยฺยาติ ปทํ วิเสโส, เสสํ นวเม วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ สทฺธึ สมุฏฺฐานาทีหีติ. १०१८. दहाव्या शिक्षापदात 'वाचेय्य' (शिकवावे) हा शब्द विशेष आहे; उर्वरित भाग नवव्या शिक्षापदात सांगितलेल्या पद्धतीनुसारच समुत्थान इत्यादींसह समजून घ्यावा। ทสมสิกฺขาปทํ. दहावे शिक्षापद समाप्त झाले। จิตฺตาคารวคฺโค ปญฺจโม. पाचवा चित्तागारवर्ग समाप्त झाला। ๖. อารามวคฺโค ६. आरामवर्ग ๑. ปฐมสิกฺขาปทวณฺณนา १. पहिल्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण। ๑๐๒๕. อารามวคฺคสฺส ปฐมสิกฺขาปเท – ปริกฺเขปํ อติกฺกาเมนฺติยา, อุปจารํ โอกฺกมนฺติยาติ เอตฺถ ปฐมปาเท ทุกฺกฏํ, ทุติยปาเท ปาจิตฺติยํ. १०२५. आरामवर्गाच्या पहिल्या शिक्षापदात – 'परिक्खेपं अतिक्कामेन्तिया' (सीमा ओलांडताना), 'उपचारं ओक्कमन्तिया' (परिसरात प्रवेश करताना) यामध्ये पहिल्या पावलावर दुक्कट (दुष्कृत) दोष होतो आणि दुसऱ्या पावलावर पाचित्तिय (प्रायश्चित्तिय) दोष होतो। ๑๐๒๗. สีสานุโลกิกาติ ปฐมํ ปวิสนฺตีนํ ภิกฺขุนีนํ สีสํ อนุโลเกนฺตี ปวิสติ, อนาปตฺติ. ยตฺถ ภิกฺขุนิโยติ ยตฺถ ภิกฺขุนิโย ปฐมตรํ ปวิสิตฺวา สชฺฌายเจติยวนฺทนาทีนิ กโรนฺติ, ตตฺถ ตาสํ [Pg.216] สนฺติกํ คจฺฉามีติ คนฺตุํ วฏฺฏติ. อาปทาสูติ เกนจิ อุปทฺทุตา โหติ, เอวรูปาสุ อาปทาสุ ปวิสิตุํ วฏฺฏติ. เสสํ อุตฺตานเมว. १०२७. 'सीसानुलोकिका' म्हणजे प्रथम प्रवेश करणाऱ्या भिक्खुणींच्या डोक्याकडे वर पाहत प्रवेश केल्यास अनापत्ती (दोष नाही) होते. 'यत्थ भिक्खुनियो' म्हणजे ज्या आरामात भिक्खुणींनी आधीच प्रवेश करून सज्झाय (पाठपठण), चेतियवंदना (चैत्यवंदना) इत्यादी गोष्टी केल्या आहेत, तिथे 'मी त्यांच्याजवळ जात आहे' असा विचार करून जाणे योग्य आहे. 'आपदासु' म्हणजे एखाद्या संकटाने पीडित असताना; अशा प्रकारच्या आपत्तींमध्ये प्रवेश करणे योग्य आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे। ธุรนิกฺเขปสมุฏฺฐานํ – กิริยากิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. धुरनिक्खेपसमुत्थान – हे क्रिया-अक्रिया, सञ्ञाविमोक्ख (संज्ञाविमोक्ष असलेले), सचित्तक (चित्तसहित), पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तिवद्य), कायकर्म, वचीकर्म, तिचित्त (तीन चित्त असणारे) आणि त्रिविध वेदना असणारे आहे। ปฐมสิกฺขาปทํ. पहिले शिक्षापद समाप्त झाले। ๒. ทุติยสิกฺขาปทวณฺณนา २. दुसऱ्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण। ๑๐๒๘. ทุติเย – อายสฺมา กปฺปิตโกติ อยํ ชฏิลสหสฺสพฺภนฺตโร เถโร. สํหรีติ สงฺกาเมสิ. สํหโฏติ สงฺกามิโต. กาสาวโฏติ นฺหาปิตา กาสาวํ นิวาเสตฺวา กมฺมํ กโรนฺติ, ตํ สนฺธายาหํสุ. เสสํ อุตฺตานเมว. १०२८. दुसऱ्या शिक्षापदात – 'आयुष्मान कप्पितक' हे एक हजार जटिलांमध्ये समाविष्ट असलेले थेर (स्थवीर) होते. 'संहरी' म्हणजे हलवले (स्थानांतरित केले). 'संहटो' म्हणजे हलवलेले (स्थानांतरित केलेले). 'कासावटो' म्हणजे न्हावी काषाय वस्त्र परिधान करून काम करतात, त्या संदर्भाने हे म्हटले आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे। ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. त्रिसमुत्थान – हे क्रिया, सञ्ञाविमोक्ख (संज्ञाविमोक्ष असलेले), सचित्तक (चित्तसहित), लोकवज्ज (लोकवद्य), कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःख वेदना असणारे आहे। ทุติยสิกฺขาปทํ. दुसरे शिक्षापद समाप्त झाले। ๓. ตติยสิกฺขาปทวณฺณนา ३. तिसऱ्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण। ๑๐๓๖. ตติเย – อนุสาสนิปุเรกฺขารายาติ อิทานิปิ ตฺวํ พาลา อพฺยตฺตาติอาทินา นเยน อนุสาสนิปกฺเข ฐตฺวา วทนฺติยา อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. สมุฏฺฐานาทีนิ อนนฺตรสิกฺขาปทสทิสาเนวาติ. १०३६. तिसऱ्या शिक्षापदात – 'अनुसासनिपुरेक्खाराय' म्हणजे 'अजूनही तू अज्ञानी आणि अकुशल आहेस' इत्यादी प्रकारे उपदेश करण्याच्या हेतूने बोलणाऱ्या भिक्खुणीला अनापत्ती (दोष नाही) होते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. समुत्थान इत्यादी मागील शिक्षापदासारखेच समजावे। ตติยสิกฺขาปทํ. तिसरे शिक्षापद समाप्त झाले। ๔. จตุตฺถสิกฺขาปทวณฺณนา ४. चौथ्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण। ๑๐๓๗. จตุตฺเถ – สพฺพํ อุตฺตานเมว. จตุสมุฏฺฐานํ – กายโต กายวาจโต กายจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ. นิมนฺติตาย อนาปุจฺฉา ภุญฺชนฺติยา อาปตฺติสมฺภวโต สิยา กิริยากิริยํ, ปวาริตาย กปฺปิยํ กาเรตฺวาปิ อกาเรตฺวาปิ ภุญฺชนฺติยา อาปตฺติสมฺภวโต [Pg.217] สิยา กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. १०३७. चौथ्या शिक्षापदात – सर्व काही स्पष्टच आहे. चतुःसमुत्थान – हे कायेपासून, काय-वाचेपासून, काय-चित्तापासून आणि काय-वाचा-चित्तापासून उत्पन्न होते. निमंत्रित असताना (दायकांना) न विचारता भोजन केल्यास आपत्ती (दोष) संभवत असल्याने कधी क्रिया-अक्रिया होते; प्रवारणा झाली असताना कप्पिय (योग्य) करून किंवा न करता भोजन केल्यास आपत्ती संभवत असल्याने कधी क्रिया होते; हे नोसञ्ञाविमोक्ख (संज्ञाविमोक्ष नसलेले), अचित्तक (चित्तरहित), पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तिवद्य), कायकर्म, वचीकर्म, तिचित्त (तीन चित्त असणारे) आणि त्रिविध वेदना असणारे आहे। จตุตฺถสิกฺขาปทํ. चौथे शिक्षापद समाप्त झाले। ๕. ปญฺจมสิกฺขาปทวณฺณนา ५. पाचव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण। ๑๐๔๓. ปญฺจเม – กุเล มจฺฉโร กุลมจฺฉโร, กุลมจฺฉโร เอติสฺสา อตฺถีติ กุลมจฺฉรินี กุลํ วา มจฺฉรายตีติ กุลมจฺฉรินี. กุลสฺส อวณฺณนฺติ ตํ กุลํ อสฺสทฺธํ อปฺปสนฺนนฺติ. ภิกฺขุนีนํ อวณฺณนฺติ ภิกฺขุนิโย ทุสฺสีลา ปาปธมฺมาติ. १०४३. पाचव्या शिक्षापदात – कुलाविषयी मत्सर म्हणजे कुलमत्सर; ज्या भिक्खुणीमध्ये कुलमत्सर असतो ती 'कुलमच्छरिनी' (कुलमत्सरी) होय, किंवा जी कुलाविषयी मत्सर करते ती 'कुलमच्छरिनी' होय. 'कुलस्सा अवण्णं' (कुलाची निंदा) म्हणजे 'ते कुल अश्रद्ध आणि अप्रसन्न (त्रिरत्नांवर श्रद्धा नसलेले) आहे' असे बोलणे. 'भिक्खुनीनं अवण्णं' (भिक्खुणींची निंदा) म्हणजे 'भिक्खुणी दुःशील आणि पापी आचरणाच्या आहेत' असे बोलणे। ๑๐๔๕. สนฺตํเยว อาทีนวนฺติ กุลสฺส วา ภิกฺขุนีนํ วา สนฺตํ อคุณํ. เสสํ อุตฺตานเมว. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ ทุกฺขเวทนนฺติ. १०४५. 'सन्तंयेव आदीनवं' म्हणजे कुलाचे किंवा भिक्खुणींचे प्रत्यक्ष असलेले दोष सांगणाऱ्या भिक्खुणीला अनापत्ती (दोष नाही) होते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. त्रिसमुत्थान – हे क्रिया, सञ्ञाविमोक्ख (संज्ञाविमोक्ष असलेले), सचित्तक (चित्तसहित), लोकवज्ज (लोकवद्य), कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःख वेदना असणारे आहे। ปญฺจมสิกฺขาปทํ. पाचवे शिक्षापद समाप्त झाले। ๖. ฉฏฺฐสิกฺขาปทวณฺณนา ६. सहाव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण। ๑๐๔๘. ฉฏฺเฐ – โอวาทายาติ ครุธมฺมตฺถาย. สํวาสายาติ อุโปสถปวารณาปุจฺฉนตฺถาย. อยเมตฺถ สงฺเขโป. วิตฺถาโร ปน ภิกฺขุโนวาทกสิกฺขาปทวณฺณนายํ วุตฺโตเยว. १०४८. सहाव्या शिक्षापदात – 'ओवादाय' म्हणजे गरूधर्माच्या उपदेशासाठी. 'संवासाय' म्हणजे उपोसथ आणि प्रवारणा विचारण्यासाठी. हा येथे संक्षेप आहे. सविस्तर वर्णन तर 'भिक्खुनोवादक शिक्षापदाच्या स्पष्टीकरणात' आधीच सांगितले आहे। เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. एळकलोमसमुत्थान – हे क्रिया, नोसञ्ञाविमोक्ख (संज्ञाविमोक्ष नसलेले), अचित्तक (चित्तरहित), पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तिवद्य), कायकर्म, तिचित्त (तीन चित्त असणारे) आणि त्रिविध वेदना असणारे आहे। ฉฏฺฐสิกฺขาปทํ. सहावे शिक्षापद समाप्त झाले। ๗. สตฺตมสิกฺขาปทวณฺณนา ७. सातव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण। ๑๐๕๓. สตฺตเม – ปริเยสิตฺวา น ลภตีติ ภิกฺขุนึ น ลภติ. เสสํ อุตฺตานเมว. อิมสฺสาปิ วิตฺถาโร ภิกฺขุโนวาทเก วุตฺโตเยว. १०५३. सातव्या शिक्षापदात – 'परियेसित्वा न लभति' म्हणजे भिक्खुणी न मिळणे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. याचेही सविस्तर वर्णन 'भिक्खुनोवादक' शिक्षापदात आधीच सांगितले आहे। ธุรนิกฺเขปสมุฏฺฐานํ [Pg.218] – อกิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. धुरनिक्खेपसमुट्ठान (कर्तव्य सोडण्याने उत्पन्न होणारे) – अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे। สตฺตมสิกฺขาปทํ. सातवे शिक्षापद समाप्त झाले। ๘. อฏฺฐมสิกฺขาปทวณฺณนา ८. आठव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (अट्ठमशिक्षापदवण्णना)। ๑๐๕๖. อฏฺฐเม – เอกกมฺมนฺติอาทีหิ อุโปสถปวารณาเยว วุตฺตา. เสสํ อุตฺตานเมว. อิมสฺสาปิ วิตฺถาโร ภิกฺขุโนวาทเก วุตฺโตเยว. १०५६. आठव्या शिक्षापदात – 'एककम्मं' (एकच कर्म) इत्यादी शब्दांद्वारे केवळ उपोसथ आणि पवारणा यांविषयीच सांगितले आहे। उर्वरित भाग स्पष्टच आहे। याचा सविस्तर विस्तार देखील 'भिक्खुनोवादक' (भिक्षूंच्या ओवादात) मध्ये सांगितलेलाच आहे। ปฐมปาราชิกสมุฏฺฐานํ – อกิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. प्रथम पाराजिकासमुट्ठान (पहिल्या पाराजिकाप्रमाणे उत्पन्न होणारे) – अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे। อฏฺฐมสิกฺขาปทํ. आठवे शिक्षापद समाप्त झाले। ๙. นวมสิกฺขาปทวณฺณนา ९. नवव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (नवमशिक्षापदवण्णना)। ๑๐๕๘. นวเม – สพฺพํ อุตฺตานเมว. อิมสฺสาปิ วิตฺถาโร ภิกฺขุโนวาทเก วุตฺโตเยว. १०५८. नवव्या शिक्षापदात – सर्व काही स्पष्टच आहे। याचा सविस्तर विस्तार देखील 'भिक्खुनोवादक' मध्ये सांगितलेलाच आहे। ธุรนิกฺเขปสมุฏฺฐานํ – อกิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. धुरनिक्खेपसमुट्ठान – अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे। นวมสิกฺขาปทํ. नववे शिक्षापद समाप्त झाले। ๑๐. ทสมสิกฺขาปทวณฺณนา १०. दहाव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (दसमशिक्षापदवण्णना)। ๑๐๖๒. ทสเม – ปสาเขติ อโธกาเย. อโธกาโย หิ ยสฺมา ตโต รุกฺขสฺส สาขา วิย อุโภ อูรู ปภิชฺชิตฺวา คตา, ตสฺมา ปสาโขติ วุจฺจติ. १०६२. दहाव्या शिक्षापदात – 'पसाख' म्हणजे शरीराचा खालचा भाग। कारण ज्याप्रमाणे झाडाच्या फांद्या विभागून पसरतात, त्याचप्रमाणे शरीराच्या खालच्या भागापासून दोन्ही मांडीचे भाग विभागून पसरतात, म्हणून त्याला 'पसाख' (शाखा/उरुसंधि) असे म्हणतात। ๑๐๖๕. ภินฺทาติอาทีสุ สเจ ‘‘ภินฺท, ผาเลหี’’ติ สพฺพานิ อาณาเปติ, โส จ ตเถว กโรติ, ฉ อาณตฺติทุกฺกฏานิ ฉ จ ปาจิตฺติยานิ อาปชฺชติ. อถาปิ เอวํ อาณาเปติ – ‘‘อุปาสก, ยํกิญฺจิ เอตฺถ กาตพฺพํ, ตํ สพฺพํ กโรหี’’ติ, โส จ สพฺพานิปิ เภทนาทีนิ กโรติ; เอกวาจาย ฉ [Pg.219] ทุกฺกฏานิ ฉ ปาจิตฺติยานีติ ทฺวาทส อาปตฺติโย. สเจ ปน เภทนาทีสุปิ เอกํเยว วตฺวา ‘‘อิทํ กโรหี’’ติ อาณาเปติ, โส จ สพฺพานิ กโรติ, ยํ อาณตฺตํ, ตสฺเสว กรเณ ปาจิตฺติยํ. เสเสสุ อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. १०६५. 'भिन्द' (फोडा) इत्यादी शब्दांमध्ये, जर ती "फोडा, चिरा" असे सर्व आदेश देते आणि तो (उपासक) तसेच करतो, तर ती सहा आज्ञा-दुक्कट आणि सहा पाचित्तिय आपत्तींना प्राप्त होते। किंवा जर ती असा आदेश देते की – "उपासका, येथे जे काही करायचे आहे, ते सर्व कर," आणि तो फोडणे इत्यादी सर्व क्रिया करतो; तर एकाच वचनामुळे सहा दुक्कट आणि सहा पाचित्तिय अशा बारा आपत्ती होतात। परंतु, जर ती फोडणे इत्यादींपैकी एकाच गोष्टीचा उल्लेख करून "हे कर" असा आदेश देते आणि तो सर्व काही करतो, तर ज्या गोष्टीचा आदेश दिला होता, केवळ ती केल्यामुळे पाचित्तिय आपत्ती होते। उर्वरित क्रियांमध्ये अनापत्ती (आपत्ती नसणे) आहे। उर्वरित भाग स्पष्टच आहे। กถินสมุฏฺฐานํ – กิริยากิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. कठीणसमुट्ठान (कठीण संस्काराप्रमाणे उत्पन्न होणारे) – क्रिया-अक्रिया, नोसंज्ञाविमोक्ष (संज्ञेने सुटका न होणारे), अचित्तक (चित्त नसतानाही होणारे), पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तीचे उल्लंघन असणारे), कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदनायुक्त आहे। ทสมสิกฺขาปทํ. दहावे शिक्षापद समाप्त झाले। อารามวคฺโค ฉฏฺโฐ. सहावा आरामवर्ग समाप्त झाला। ๗. คพฺภินิวคฺโค ७. गब्भिनी वर्ग (गर्भिणी वर्ग)। ๑. ปฐมสิกฺขาปทวณฺณนา १. पहिल्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (पठमशिक्षापदवण्णना)। ๑๐๖๙. คพฺภินิวคฺคสฺส ปฐมสิกฺขาปเท – อาปนฺนสตฺตาติ กุจฺฉิปวิฏฺฐสตฺตา. १०६९. गब्भिनी वर्गाच्या पहिल्या शिक्षापदात – 'आपन्नसत्त्वा' म्हणजे जिच्या गर्भात (कुशीत) जीव प्रविष्ट झाला आहे अशी स्त्री (गर्भिणी)। ปฐมสิกฺขาปทํ. पहिले शिक्षापद समाप्त झाले। ๒. ทุติยสิกฺขาปทวณฺณนา २. दुसऱ्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (दुतियशिक्षापदवण्णना)। ๑๐๗๓-๔. ทุติเย – ปายนฺตินฺติ ถญฺญํ ปายมานํ. มาตา วา โหตีติ ยํ ทารกํ ปาเยติ, ตสฺส มาตา วา โหติ ธาติ วา. เสสํ อุตฺตานเมว. อุภยมฺปิ ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. १०७३-४. दुसऱ्या शिक्षापदात – 'पायन्ती' म्हणजे स्तनपान करवणारी (दूध पाजणारी) स्त्री। 'माता वा होती' म्हणजे ज्या बालकाला ती दूध पाजते, त्याची ती स्वतः आई असते किंवा दाई (धाय) असते। उर्वरित भाग स्पष्टच आहे। दोन्ही शिक्षापदे (पहिले व दुसरे) त्रिसमुट्ठान (तीन प्रकारे उत्पन्न होणारे) – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, पण्णत्तिवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदनायुक्त आहेत। ทุติยสิกฺขาปทํ. दुसरे शिक्षापद समाप्त झाले। ๓. ตติยสิกฺขาปทวณฺณนา ३. तिसऱ्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (ततियशिक्षापदवण्णना)। ๑๐๗๗. ตติเย – สิกฺขาสมฺมุตึ ทาตุนฺติ กสฺมา ทาเปสิ? ‘‘มาตุคาโม นาม โลโล โหติ ทฺเว วสฺสานิ ฉสุ ธมฺเมสุ อสิกฺขิตฺวา สีลานิ ปูรยมาโน กิลมติ, สิกฺขิตฺวา ปน ปจฺฉา น กิลมิสฺสติ, นิตฺถริสฺสตี’’ติ ทาเปสิ. १०७७. तिसऱ्या शिक्षापदात – 'सिक्खासम्मुति' (शिक्षेची संमती) देण्याविषयी विचारले आहे की, ती का देण्यास लावली? "स्त्री स्वभावतः चंचल असते। दोन वर्षे सहा नियमांचे (धम्मांचे) शिक्षण न घेता शील पूर्ण करण्याचा प्रयत्न केल्यास ती थकून जाते (कष्ट पावते); परंतु शिक्षण घेतल्यावर नंतर ती थकून जाणार नाही आणि पार पडू शकेल," असा विचार करून भगवान बुद्धांनी ही संमती देण्यास लावली। ๑๐๗๙. ปาณาติปาตา [Pg.220] เวรมณึ ทฺเว วสฺสานิ อวีติกฺกมฺม สมาทานํ สมาทิยามีติ ยํ ตํ ปาณาติปาตา เวรมณีติ ปญฺญตฺตํ สิกฺขาปทํ, ตํ ปาณาติปาตา เวรมณิสิกฺขาปทํ ทฺเว วสฺสานิ อวีติกฺกมิตพฺพสมาทานํ กตฺวา สมาทิยามีติ อตฺโถ. เอส นโย สพฺพตฺถ. อิมา ฉ สิกฺขาโย สฏฺฐิวสฺสายปิ ปพฺพชิตาย ทาตพฺพาเยว, น เอตาสุ อสิกฺขิตา อุปสมฺปาเทตพฺพา. १०७९. "प्राणातिपाता वेरमणी (जीवहिंसेपासून विरत राहणे) या नियमाचे दोन वर्षे उल्लंघन न करता मी पालन करण्याची प्रतिज्ञा घेते" – याचा अर्थ असा की, जे 'प्राणातिपाता वेरमणी' असे प्रज्ञप्त केलेले शिक्षापद आहे, त्या प्राणातिपात विरती शिक्षापदाचे दोन वर्षे उल्लंघन न करण्याचे व्रत घेऊन मी ते स्वीकारते। हाच नियम सर्व शिक्षापदांच्या बाबतीत लागू होतो। या सहा शिक्षा (नियम) साठ वर्षांच्या प्रव्रजित स्त्रीला देखील दिल्याच पाहिजेत। या नियमांचे शिक्षण न घेतलेल्या स्त्रीला उपसंपदा दिली जाऊ नये। ตติยสิกฺขาปทํ. तिसरे शिक्षापद समाप्त झाले। ๔. จตุตฺถสิกฺขาปทวณฺณนา ४. चौथ्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (चतुत्थशिक्षापदवण्णना)। ๑๐๘๔. จตุตฺเถ – สพฺพํ อุตฺตานเมว. สเจ ปน ปฐมํ วุฏฺฐานสมฺมุติ น ทินฺนา โหติ, อุปสมฺปทมาฬเกปิ ทาตพฺพาเยว. อิมา ทฺเวปิ มหาสิกฺขมานา นาม. १०८४. चौथ्या शिक्षापदात – सर्व काही स्पष्टच आहे। परंतु, जर आधी 'वुट्ठाणसम्मुति' (उपसंपदेसाठीची संमती) दिली गेली नसेल, तर उपसंपदा सीमामंडळात (माळकामध्ये) देखील ती दिलीच पाहिजे। या दोन्ही प्रकारच्या स्त्रियांना 'महासिक्खमाना' असे म्हणतात। จตุตฺถสิกฺขาปทํ. चौथे शिक्षापद समाप्त झाले। ๕. ปญฺจมสิกฺขาปทวณฺณนา ५. पाचव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (पञ्चमशिक्षापदवण्णना)। ๑๐๙๐. ปญฺจเม – กิญฺจาปิ อูนทฺวาทสวสฺสํ ปริปุณฺณสญฺญาย วุฏฺฐาเปนฺติยา อนาปตฺติ, สา ปน อนุปสมฺปนฺนาว โหติ. เสสํ อุตฺตานเมว. १०९०. पाचव्या शिक्षापदात – जरी बारा वर्षांपेक्षा कमी वय असलेल्या (विवाहित) स्त्रीला 'तिचे वय पूर्ण झाले आहे' अशा समजुतीने उपसंपदा दिली, तरी (देणाऱ्या भिक्षुणीला) अनापत्ती आहे; परंतु ती स्त्री मात्र अनुपसंपन्न (उपसंपदा न मिळालेलीच) राहते। उर्वरित भाग स्पष्टच आहे। ปญฺจมสิกฺขาปทํ. पाचवे शिक्षापद समाप्त झाले। ๖. ฉฏฺฐสิกฺขาปทวณฺณนา ६. सहाव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (छट्ठशिक्षापदवण्णना)। ๑๐๙๕. ฉฏฺเฐ – ทสวสฺสาย คิหิคตาย สิกฺขาสมฺมุตึ ทตฺวา ปริปุณฺณทฺวาทสวสฺสํ อุปสมฺปาเทตุํ วฏฺฏติ. १०९५. सहाव्या शिक्षापदात – दहा वर्षांच्या विवाहित स्त्रीला (गिहीगता) शिक्षेची संमती (सिक्खासम्मुति) देऊन, तिचे वय पूर्ण बारा वर्षे झाल्यावर तिला उपसंपदा देणे योग्य आहे। ฉฏฺฐสิกฺขาปทํ. सहावे शिक्षापद समाप्त झाले। ๗. สตฺตมสิกฺขาปทวณฺณนา ७. सातव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (सत्तमशिक्षापदवण्णना)। ๑๑๐๑. สตฺตเม [Pg.221] – สพฺพํ อุตฺตานเมว. สมุฏฺฐานาทีนิปิ สพฺเพสุ ทุติเย วุตฺตสทิสาเนว. อยํ ปน วิเสโส – ยตฺถ สมฺมุติ อตฺถิ, ตตฺถ กิริยากิริยํ โหตีติ. ११०१. सातव्या शिक्षापदात – सर्व काही स्पष्टच आहे। तिसऱ्या शिक्षापदापासून सर्व शिक्षापदांचे समुट्ठान इत्यादी देखील दुसऱ्या शिक्षापदात सांगितल्याप्रमाणेच आहेत। परंतु हा विशेष फरक आहे की – ज्या शिक्षापदात संमती (सम्मुति) असते, तेथे क्रिया-अक्रिया असते। สตฺตมสิกฺขาปทํ. सातवे शिक्षापद समाप्त झाले। ๘. อฏฺฐมสิกฺขาปทวณฺณนา ८. आठव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (अट्ठमशिक्षापदवण्णना)। ๑๑๐๘. อฏฺฐเม – น อนุคฺคณฺหาเปยฺยาติ ‘‘อิมิสฺสา อยฺเย อุทฺเทสาทีนิ เทหี’’ติ เอวํ อุทฺเทสาทีหิ น อนุคฺคณฺหาเปยฺย. ११०८. आठव्या शिक्षापदात – 'न अनुग्गण्हापेय्य' (मदत करू नये) म्हणजे "हे आर्या, हिला उद्देस (पाठ शिकवणे) इत्यादी द्यावे" अशा प्रकारे उद्देस इत्यादींद्वारे मदत करू नये. ๑๑๑๐. ปริเยสิตฺวาติ อญฺญํ ปริเยสิตฺวา น ลภติ, สยํ คิลานา โหติ, น สกฺโกติ อุทฺเทสาทีนิ ทาตุํ, ตสฺสา อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ธุรนิกฺเขปสมุฏฺฐานํ – อกิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. १११०. 'परियेसित्वा' (शोधून) म्हणजे दुसऱ्या शिक्षिकेचा शोध घेऊनही जर ती मिळत नसेल, स्वतः आजारी असेल, उद्देस इत्यादी देण्यास असमर्थ असेल, तर तिला आपत्ती (दोष) होत नाही. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. हे धुरनिक्खेपसमुट्ठान (कर्तव्य सोडल्याने उत्पन्न होणारे) – अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे. อฏฺฐมสิกฺขาปทํ. आठवे शिक्षापद समाप्त. ๙. นวมสิกฺขาปทวณฺณนา ९. नवव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना). ๑๑๑๓. นวเม – น อุปฏฺฐเหยฺยาติ จุณฺเณน มตฺติกาย ทนฺตกฏฺเฐน มุโขทเกนาติ เอวํ เตน เตน กรณีเยน น อุปฏฺฐเหยฺย. เสสํ อุตฺตานเมว. ปฐมปาราชิกสมุฏฺฐานํ – อกิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. १११३. नवव्या शिक्षापदात – 'न उपट्ठहेय्य' (सेवा करू नये) म्हणजे स्नानचूर्ण (साबण पावडर), माती, दंतकाष्ठ (दातून), मुखोदक (तोंड धुण्याचे पाणी) इत्यादी त्या-त्या आवश्यक गोष्टींनी सेवा करू नये. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. हे प्रथमपाराजिकसमुट्ठान – अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे. นวมสิกฺขาปทํ. नववे शिक्षापद समाप्त. ๑๐. ทสมสิกฺขาปทวณฺณนา १०. दहाव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना). ๑๑๑๖. ทสเม – เนว วูปกาเสยฺยาติ น คเหตฺวา คจฺเฉยฺย. น วูปกาสาเปยฺยาติ ‘‘อิมํ อยฺเย คเหตฺวา คจฺฉา’’ติ อญฺญํ น อาณาเปยฺย. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. ธุรนิกฺเขปสมุฏฺฐานํ – อกิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ[Pg.222], สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. १११६. दहाव्या शिक्षापदात – 'नेव वूपकासेय्य' म्हणजे स्वतः सोबत घेऊन जाऊ नये. 'न वूपकासापेय्य' म्हणजे "हे आर्या, हिला सोबत घेऊन जा" असे दुसऱ्या भिक्खुणीला सांगू नये (आज्ञा देऊ नये). यातील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. हे धुरनिक्खेपसमुट्ठान – अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे. ทสมสิกฺขาปทํ. दहावे शिक्षापद समाप्त. คพฺภินิวคฺโค สตฺตโม. गब्भिनीवर्ग सातवा समाप्त. ๘. กุมาริภูตวคฺโค ८. कुमारीभूतवर्ग. ๑-๒-๓. ปฐมทุติยตติยสิกฺขาปทวณฺณนา १-२-३. पहिल्या, दुसऱ्या आणि तिसऱ्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना). ๑๑๑๙. กุมาริภูตวคฺคสฺส ปฐมทุติยตติยสิกฺขาปทานิ ตีณิ ตีหิ คิหิคตสิกฺขาปเทหิ สทิสานิ. ยา ปน ตา สพฺพปฐมา ทฺเว มหาสิกฺขมานา, ตา อติกฺกนฺตวีสติวสฺสาติ เวทิตพฺพา. ตา คิหิคตา วา โหนฺตุ อคิหิคตา วา, สิกฺขมานา อิจฺเจว วตฺตพฺพา, คิหิคตาติ วา กุมาริภูตาติ วา น วตฺตพฺพา. คิหิคตาย ทสวสฺสกาเล สิกฺขาสมฺมุตึ ทตฺวา ทฺวาทสวสฺสกาเล อุปสมฺปทา กาตพฺพา. เอกาทสวสฺสกาเล ทตฺวา เตรสวสฺสกาเล กาตพฺพา, ทฺวาทสเตรสจุทฺทสปนฺนรสโสฬสสตฺตรสอฏฺฐารสวสฺสกาเล สมฺมุตึ ทตฺวา วีสติวสฺสกาเล อุปสมฺปทา กาตพฺพา. อฏฺฐารสวสฺสกาลโต ปฏฺฐาย จ ปนายํ คิหิคตาติปิ กุมาริภูตาติปิ วตฺตุํ วฏฺฏติ, กุมาริภูตา ปน คิหิคตาติ น วตฺตพฺพา, กุมาริภูตา อิจฺเจว วตฺตพฺพา. มหาสิกฺขมานา ปน คิหิคตาติปิ วตฺตุํ น วฏฺฏติ, กุมาริภูตาติปิ วตฺตุํ น วฏฺฏติ, สิกฺขาสมฺมุติทานวเสน ปน ติสฺโสปิ สิกฺขมานาติ วตฺตุํ วฏฺฏติ. १११९. कुमारीभूतवर्गातील पहिली, दुसरी आणि तिसरी ही तिन्ही शिक्षापदे 'गिहीगता' (गृहस्थ जीवन जगलेल्या स्त्री) च्या तीन शिक्षापदांसारखीच आहेत. परंतु ज्या सर्वात पहिल्या दोन 'महासिक्खमाना' आहेत, त्या वीस वर्षांपेक्षा जास्त वयाच्या समजाव्यात. त्या गिहीगता (विवाहित) असोत वा अगिहीगता (अविवाहित), त्यांना केवळ 'सिक्खमाना' असेच म्हणावे; त्यांना 'गिहीगता' किंवा 'कुमारीभूता' म्हणू नये. गिहीगता स्त्रीला दहाव्या वर्षी शिक्षेची संमती (सिक्खासम्मेती) देऊन बाराव्या वर्षी उपसंपदा द्यावी. अकराव्या वर्षी संमती देऊन तेराव्या वर्षी उपसंपदा द्यावी. बाराव्या, तेराव्या, चौदाव्या, पंधराव्या, सोळाव्या, सतराव्या आणि अठराव्या वर्षी संमती देऊन विसाव्या वर्षी उपसंपदा द्यावी. अठराव्या वर्षापासून पुढे तिला 'गिहीगता' किंवा 'कुमारीभूता' असेही म्हणणे योग्य आहे. परंतु कुमारीभूता (अविवाहित) स्त्रीला 'गिहीगता' म्हणू नये, तिला केवळ 'कुमारीभूता' असेच म्हणावे. महासिक्खमाना स्त्रीला 'गिहीगता' म्हणणेही योग्य नाही आणि 'कुमारीभूता' म्हणणेही योग्य नाही. परंतु शिक्षेची संमती देण्याच्या दृष्टीने तिन्ही प्रकारच्या स्त्रियांना 'सिक्खमाना' म्हणणे योग्य आहे. ปฐมทุติยตติยานิ. पहिले, दुसरे आणि तिसरे शिक्षापद समाप्त. ๔-๕-๖. จตุตฺถปญฺจมฉฏฺฐสิกฺขาปทวณฺณนา ४-५-६. चौथ्या, पाचव्या आणि सहाव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना). ๑๑๓๖. จตุตฺถปญฺจมฉฏฺเฐสุ สพฺพํ อุตฺตานเมว. สพฺพานิ ติสมุฏฺฐานานิ จตุตฺถํ กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ปญฺจมํ กิริยากิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ[Pg.223], กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ยญฺเจตฺถ สงฺเฆน ปริจฺฉินฺทิตพฺพาติ วุตฺตํ, ตสฺส อุปปริกฺขิตพฺพาติ อตฺโถ. ฉฏฺฐํ กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ ทุกฺขเวทนนฺติ. ยํ ปเนตฺถ ‘‘ปริจฺฉินฺทิตฺวา’’ติ วุตฺตํ, ตสฺส อุปปริกฺขิตฺวาติ อตฺโถ. ११३६. चौथ्या, पाचव्या आणि सहाव्या शिक्षापदांमध्ये सर्व काही स्पष्टच आहे. ही सर्व तिन्ही शिक्षापदे त्रिसमुत्थान (तीन प्रकारे उत्पन्न होणारी) आहेत. तिथे चौथे शिक्षापद क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, प्रज्ञप्तिवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदनायुक्त आहे. पाचवे शिक्षापद क्रिया-अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, प्रज्ञप्तिवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदनायुक्त आहे. येथे जे "संघाने निश्चित करावे" (सङ्घेन परिच्छिन्दितब्बा) असे म्हटले आहे, त्याचा अर्थ "तпасणी करावी/विचार करावा" (उपपरिक्खितब्बा) असा आहे. सहावे शिक्षापद क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे. येथे जे "निश्चित करून" (परिच्छिन्दित्वा) असे म्हटले आहे, त्याचा अर्थ "तपासणी करून/विचार करून" (उपपरिक्खित्वा) असा आहे. จตุตฺถปญฺจมฉฏฺฐสิกฺขาปทานิ चौथे, पाचवे आणि सहावे शिक्षापद समाप्त. ๗. สตฺตมสิกฺขาปทวณฺณนา ७. सातव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना). ๑๑๕๐. สตฺตเม – สพฺพํ อุตฺตานเมว. ธุรนิกฺเขปสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, โลกวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, อกุสลจิตฺตํ, ทุกฺขเวทนนฺติ. ११५०. सातव्या शिक्षापदात – सर्व काही स्पष्टच आहे. हे धुरनिक्खेपसमुट्ठान – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, लोकवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, अकुशलचित्त आणि दुःखवेदनायुक्त आहे. สตฺตมสิกฺขาปทํ. सातवे शिक्षापद समाप्त. ๘. อฏฺฐมสิกฺขาปทวณฺณนา ८. आठव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना). ๑๑๕๔. อฏฺฐเมปิ – สพฺพํ อุตฺตานเมว. สมุฏฺฐานาทีนิปิ อนนฺตรสทิสาเนวาติ. ११५४. आठव्या शिक्षापदातही – सर्व काही स्पष्टच आहे. याचे समुत्थान इत्यादी देखील मागील (सातव्या) शिक्षापदासारखेच आहेत. อฏฺฐมสิกฺขาปทํ. आठवे शिक्षापद समाप्त. ๙. นวมสิกฺขาปทวณฺณนา ९. नवव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना). ๑๑๕๘. นวเม – โสกาวาสนฺติ สงฺเกตํ กตฺวา อคจฺฉมานา ปุริสานํ อนฺโต โสกํ ปเวเสตีติ โสกาวาสา, ตํ โสกาวาสํ. เตเนวาห – ‘‘โสกาวาสา นาม ปเรสํ ทุกฺขํ อุปฺปาเทตี’’ติ. อถ วา ฆรํ วิย ฆรสามิกา, อยมฺปิ ปุริสสมาคมํ อลภมานา โสกํ อาวิสติ. อิติ ยํ อาวิสติ, สฺวาสฺสา อาวาโส โหตีติ โสกาวาสา. เตนาห – ‘‘โสกํ อาวิสตี’’ติ. อชานนฺตีติ เอทิสา [Pg.224] อยนฺติ อชานมานา. เสสํ อุตฺตานเมว. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ११५८. नवव्या शिक्षापदात – 'सोकावासा' (शोकाचा निवास) म्हणजे संकेत (वेळ/ठिकाण) ठरवून न गेल्यामुळे पुरुषांच्या मनात शोक निर्माण करणारी, म्हणून ती 'सोकावासा' होय; त्या सोकावासाला. म्हणूनच म्हटले आहे – "सोकावासा म्हणजे इतरांना दुःख उत्पन्न करणारी." किंवा जसे घराचे मालक घरात प्रवेश करतात, तसेच ही (सिक्खमाना) देखील पुरुषांचा सहवास न मिळाल्यामुळे शोकात प्रवेश करते. अशा प्रकारे ज्या शोकात ती प्रवेश करते, तोच तिचा निवास (आवास) बनतो, म्हणून ती 'सोकावासा' होय. म्हणूनच म्हटले आहे – "शोकात प्रवेश करते." 'अजानन्ती' म्हणजे ही अशा प्रकारची आहे हे न जाणणारी. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. हे त्रिसमुत्थान – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, प्रज्ञप्तिवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदनायुक्त आहे. นวมสิกฺขาปทํ. नववे शिक्षापद समाप्त. ๑๐. ทสมสิกฺขาปทวณฺณนา १०. दहाव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना). ๑๑๖๔. ทสเม – อนาปุจฺฉาติ อนาปุจฺฉิตฺวา. ภิกฺขุนีหิ ทฺวิกฺขตฺตุํ อาปุจฺฉิตพฺพํ – ปพฺพชฺชากาเล จ อุปสมฺปทากาเล จ, ภิกฺขูนํ ปน สกึ อาปุจฺฉิเตปิ วฏฺฏติ. ११६४. दहाव्या शिक्षापदात – 'अनापुच्छा' म्हणजे न विचारता (परवानगी न घेता). भिक्खुणींनी दोन वेळा विचारले पाहिजे – प्रव्रज्येच्या वेळी आणि उपसंपदेच्या वेळी; परंतु भिक्षूंना एकदा विचारले तरी चालते. ๑๑๖๕. อชานนฺตีติ มาตาทีนํ อตฺถิภาวํ อชานนฺตี. เสสํ อุตฺตานเมว. อิทํ อปุพฺพสมุฏฺฐานสีสํ. จตุสมุฏฺฐานํ – วาจโต กายวาจโต วาจาจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ. กถํ? อพฺภานกมฺมาทีสุ เกนจิเทว กรณีเยน ขณฺฑสีมายํ นิสินฺนา ‘‘ปกฺโกสถ สิกฺขมานํ, อิเธว นํ อุปสมฺปาเทสฺสามา’’ติ อุปสมฺปาเทติ; เอวํ วาจโต สมุฏฺฐาติ. อุปสฺสยโต ปฏฺฐาย อุปสมฺปาเทสฺสามีติ วตฺวา ขณฺฑสีมํ คจฺฉนฺติยา กายวาจโต สมุฏฺฐาติ. ทฺวีสุปิ ฐาเนสุ ปณฺณตฺติภาวํ ชานิตฺวาว วีติกฺกมํ กโรนฺติยา วาจาจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ. อนนุชานาเปตฺวา อุปสมฺปาทนโต กิริยากิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ११६५. 'अजानन्ती' म्हणजे आई इत्यादींचे अस्तित्व न जाणणारी. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. हे अपूर्वसमुत्थानशीर्ष (नवीन प्रकारे उत्पन्न होणारे) आहे. हे चतुःसमुत्थान (चार प्रकारे उत्पन्न होणारे) आहे – वाणीने, काय-वाणीने, वाणी-चित्ताने आणि काय-वाणी-चित्ताने उत्पन्न होते. कसे? अब्भानकर्म इत्यादींमध्ये कोणत्याही एका आवश्यक कारणाने खंडसीमामध्ये बसून "सिक्खमानाला बोलवा, येथेच तिला उपसंपदा देऊ" असे म्हणून उपसंपदा देते; अशा प्रकारे हे वाणीने उत्पन्न होते. विहार (उपाश्रय) पासून निघून "मी उपसंपदा देईन" असे म्हणून खंडसीमेकडे जाणाऱ्या भिक्खुणीच्या काय-वाणीने उत्पन्न होते. दोन्ही ठिकाणी नियम (प्रज्ञप्ति) माहीत असूनही उल्लंघन करणाऱ्या भिक्खुणीच्या वाणी-चित्ताने आणि काय-वाणी-चित्ताने उत्पन्न होते. परवानगी न घेता उपसंपदा देण्यामुळे हे क्रिया-अक्रिया, नोसंज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, प्रज्ञप्तिवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदनायुक्त आहे. ทสมสิกฺขาปทํ. दहावे शिक्षापद समाप्त. ๑๑. เอกาทสมสิกฺขาปทวณฺณนา ११. अकराव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण (वर्णना). ๑๑๖๗-๘. เอกาทสเม – ปาริวาสิกฉนฺททาเนนาติ ปาริวาสิเยน ฉนฺททาเนน. ตตฺถ จตุพฺพิธํ ปาริวาสิยํ – ปริสปาริวาสิยํ, รตฺติปาริวาสิยํ, ฉนฺทปาริวาสิยํ, อชฺฌาสยปาริวาสิยนฺติ. ตตฺถ ปริสปาริวาสิยํ นาม ภิกฺขู เกนจิเทว กรณีเยน สนฺนิปติตา โหนฺติ, อถ เมโฆ วา อุฏฺฐาติ, อุสฺสารณา วา กริยติ, มนุสฺสา วา อชฺโฌตฺถรนฺตา อาคจฺฉนฺติ, ภิกฺขู [Pg.225] ‘‘อโนกาสา มยํ อญฺญตฺร คจฺฉามา’’ติ ฉนฺทํ อวิสฺสชฺเชตฺวาว อุฏฺฐหนฺติ. อิทํ ปริสปาริวาสิยํ. กิญฺจาปิ ปริสปาริวาสิยํ, ฉนฺทสฺส ปน อวิสฺสฏฺฐตฺตา กมฺมํ กาตุํ วฏฺฏติ. ११६७-८. अकराव्या (सिक्खापदात) – 'पारिवासिकछन्ददानेन' म्हणजे पारिवासिक (शून्य/नष्ट झालेल्या) छंदाच्या दानाने. तेथे चार प्रकारचे पारिवासिय (शून्यत्व/नष्ट होणे) आहे – परिसपारिवासिय (परिषदेचे शून्यत्व), रत्तिपारिवासिय (रात्रीचे शून्यत्व), छन्दपारिवासिय (छंदाचे शून्यत्व) आणि अज्झासयपारिवासिय (अध्याशयाचे शून्यत्व). तेथे 'परिसपारिवासिय' म्हणजे – भिक्खू काही कारणास्तव एकत्र जमलेले असतात, तेव्हा पाऊस येतो किंवा गर्दी हटवली जाते (लोकांना बाजूला केले जाते) किंवा लोक गर्दी करत येतात, तेव्हा भिक्खू 'आपल्याला येथे वाव (संधी) नाही, आपण दुसऱ्या ठिकाणी जाऊ या' असा विचार करून, (संघाचे कार्य करण्याचा) छंद न सोडताच उठून जातात. याला 'परिसपारिवासिय' म्हणतात. जरी हे परिसपारिवासिय असले, तरी छंद न सोडल्यामुळे दुसऱ्या ठिकाणी संघकर्म करणे योग्य ठरते. ปุน ภิกฺขู ‘‘อุโปสถาทีนิ กริสฺสามา’’ติ รตฺตึ สนฺนิปติตฺวา ‘‘ยาว สพฺเพ สนฺนิปตนฺติ, ตาว ธมฺมํ สุณิสฺสามา’’ติ เอกํ อชฺเฌสนฺติ, ตสฺมึ ธมฺมกถํ กเถนฺเตเยว อรุโณ อุคฺคจฺฉติ. สเจ ‘‘จาตุทฺทสิกํ อุโปสถํ กริสฺสามา’’ติ นิสินฺนา ‘‘ปนฺนรโส’’ติ กาตุํ วฏฺฏติ. สเจ ปนฺนรสิกํ กาตุํ นิสินฺนา ปาฏิปเท อนุโปสเถ อุโปสถํ กาตุํ น วฏฺฏติ, อญฺญํ ปน สงฺฆกิจฺจํ กาตุํ วฏฺฏติ. อิทํ รตฺติปาริวาสิยํ นาม. पुन्हा, भिक्खू 'आपण उपोसथ इत्यादी करू या' असा विचार करून रात्री एकत्र जमतात आणि 'जोपर्यंत सर्व जण एकत्र येत नाहीत, तोपर्यंत आपण धम्म ऐकू या' असे म्हणून एका भिक्खूला (धम्मदेशना करण्यासाठी) विनंती करतात. तो भिक्खू धम्मकथा सांगत असतानाच पहाट होते (अरुणोदय होतो). जर ते 'चातुर्दशीचा उपोसथ करू या' म्हणून बसले असतील, तर 'पंधरवड्याचा (पौर्णिमेचा/अमावास्येचा) उपोसथ' करणे योग्य ठरते. जर ते पंधरवड्याचा उपोसथ करण्यासाठी बसले असतील, तर प्रतिपदेला (पाडव्याला) जो उपोसथ नसलेला दिवस आहे, उपोसथ करणे योग्य ठरत नाही, परंतु इतर संघकार्य करणे योग्य ठरते. याला 'रत्तिपारिवासिय' (रात्रीचे शून्यत्व) म्हणतात. ปุน ภิกฺขู ‘‘กิญฺจิเทว อพฺภานาทิสงฺฆกมฺมํ กริสฺสามา’’ติ นิสินฺนา โหนฺติ, ตตฺเรโก นกฺขตฺตปาฐโก ภิกฺขุ เอวํ วทติ – ‘‘อชฺช นกฺขตฺตํ ทารุณํ, มา อิมํ กมฺมํ กโรถา’’ติ. เต ตสฺส วจเนน ฉนฺทํ วิสฺสชฺเชตฺวา ตตฺเถว นิสินฺนา โหนฺติ. อถญฺโญ อาคนฺตฺวา ‘‘นกฺขตฺตํ ปฏิมาเนนฺตํ อตฺโถ พาลํ อุปจฺจคา’’ติ (ชา. ๑.๑.๔๙) วตฺวา ‘‘กึ นกฺขตฺเตน กโรถา’’ติ วทติ. อิทํ ฉนฺทปาริวาสิยญฺเจว อชฺฌาสยปาริวาสิยญฺจ. เอตสฺมึ ปาริวาสิเย ปุน ฉนฺทปาริสุทฺธึ อนาเนตฺวา กมฺมํ กาตุํ น วฏฺฏติ. पुन्हा, भिक्खू 'आपण अब्भान (पुनर्वसन) इत्यादी काही संघकर्म करू या' असा विचार करून बसलेले असतात. तेथे एक नक्षत्र जाणणारा (ज्योतिषी) भिक्खू असे म्हणतो – 'आज नक्षत्र क्रूर (अशुभ) आहे, हे कर्म करू नका.' त्याच्या सांगण्यावरून ते (संघकर्म करण्याचा) छंद सोडून तेथेच बसून राहतात. त्यानंतर दुसरा भिक्खू येऊन 'नक्षत्राची वाट पाहणाऱ्या मूर्ख माणसाचा लाभ निघून जातो' असे म्हणून 'नक्षत्राचे काय करता?' असे विचारतो. हे 'छन्दपारिवासिय' (छंदाचे शून्यत्व) आणि 'अज्झासयपारिवासिय' (अध्याशयाचे शून्यत्व) दोन्ही आहे. या पारिवासियमध्ये पुन्हा छन्दपारिसुद्धि (छंदाची शुद्धता) आणल्याशिवाय संघकर्म करणे योग्य ठरत नाही. วุฏฺฐิตาย ปริสายาติ ฉนฺทํ วิสฺสชฺเชตฺวา กาเยน วา วาจาย วา ฉนฺทวิสฺสชฺชนมตฺเตเนว วา อุฏฺฐิตาย ปริสาย. 'वुट्ठिताय परिसाय' म्हणजे छंद सोडून शरीराने किंवा वाचेने किंवा केवळ छंद सोडण्यामात्रेने परिषद उठून गेल्यानंतर. ๑๑๖๙. อนาปตฺติ อวุฏฺฐิตาย ปริสายาติ ฉนฺทํ อวิสฺสชฺเชตฺวา อวุฏฺฐิตาย อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. ติสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, สญฺญาวิโมกฺขํ, สจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ११६९. 'अनापत्ति अवुट्ठिताय परिसाय' म्हणजे छंद न सोडता परिषद उठण्यापूर्वी (सिक्खमान उठली तर) आपत्ती होत नाही. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. हे तीन समुत्थानांचे आहे – क्रिया, संज्ञाविमोक्ष, सचित्तक, पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तिवद्य), कायकर्म, वचीकर्म, तिचित्त आणि तिवेदन. เอกาทสมสิกฺขาปทํ. अकरावे सिक्खापद समाप्त. ๑๒. ทฺวาทสมสิกฺขาปทวณฺณนา १२. बाराव्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๑๑๗๐. ทฺวาทสเม – อุปสฺสโย น สมฺมตีติ วสโนกาโส นปฺปโหติ. เสสํ อุตฺตานเมว. สมุฏฺฐานาทีนิ อนนฺตรสทิสาเนวาติ. ११७०. बाराव्या (सिक्खापदात) – 'उपस्सयो न सम्मती' म्हणजे राहण्याची जागा पुरेशी नसते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. समुत्थान इत्यादी मागील सिक्खापदासारखेच आहेत. ทฺวาทสมสิกฺขาปทํ. बारावे सिक्खापद समाप्त. ๑๓. เตรสมสิกฺขาปทวณฺณนา १३. तेराव्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๑๑๗๕. เตรสเม [Pg.226] – เอกํ วสฺสํ ทฺเวติ เอกนฺตริเก เอกสฺมึ สํวจฺฉเร ทฺเว วุฏฺฐาเปติ. เสสํ อุตฺตานเมว. สมุฏฺฐานาทีนิปิ วุตฺตสทิสาเนวาติ. ११७५. तेराव्या (सिक्खापदात) – 'एकं वस्सं द्वे' म्हणजे एका वर्षाआड एका वर्षात दोन (सिक्खमानांना) उपसंपदा देते. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. समुत्थान इत्यादी देखील सांगितल्याप्रमाणेच आहेत. เตรสมสิกฺขาปทํ. तेरावे सिक्खापद समाप्त. กุมาริภูตวคฺโค อฏฺฐโม. कुमारीभूतवर्ग आठवा समाप्त. ๙. ฉตฺตุปาหนวคฺโค ९. छत्तुपाहन वर्ग (छत्र-उपानह वर्ग - नववा वर्ग) ๑. ปฐมสิกฺขาปทวณฺณนา १. पहिल्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๑๑๘๑. ฉตฺตวคฺคสฺส ปฐมสิกฺขาปเท – สกิมฺปิ ธาเรติ อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสาติ มคฺคคมเน เอกปโยเคเนว ทิวสมฺปิ ธาเรติ, เอกาว อาปตฺติ. สเจ กทฺทมาทีนิ ปตฺวา อุปาหนา โอมุญฺจิตฺวา ฉตฺตเมว ธาเรนฺตี คจฺฉติ, ทุกฺกฏํ. อถาปิ คจฺฉาทีนิ ทิสฺวา ฉตฺตํ อปนาเมตฺวา อุปาหนารุฬฺหาว คจฺฉติ, ทุกฺกฏเมว. สเจ ฉตฺตมฺปิ อปนาเมตฺวา อุปาหนาปิ โอมุญฺจิตฺวา ปุน ธาเรติ, ปุน ปาจิตฺติยํ. เอวํ ปโยคคณนาย อาปตฺติโย เวทิตพฺพา. เสสํ อุตฺตานเมว. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. ११८१. छत्रवर्गाच्या पहिल्या सिक्खापदात – 'सकिम्पि धारेति आपत्ति पाचित्तियस्स' म्हणजे प्रवासात एकाच प्रयत्नाने दिवसभर जरी छत्र धारण केले, तरी एकच पाचित्तिय आपत्ती होते. जर चिखल इत्यादी ठिकाणी पोहोचून, पादत्राणे (चप्पल) काढून केवळ छत्रच धारण करून चालली, तर दुक्कट आपत्ती होते. तसेच, झुडपे इत्यादी पाहून छत्र बाजूला करून, केवळ पादत्राणे घालून चालली, तरी दुक्कट आपत्तीच होते. जर छत्रही बाजूला करून आणि पादत्राणेही काढून पुन्हा (दोन्ही) धारण केले, तर पुन्हा पाचित्तिय आपत्ती होते. अशा प्रकारे प्रयत्नांच्या संख्येनुसार आपत्ती समजाव्यात. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. हे एळकलोम (मेंढीच्या लोकरीच्या) सिक्खापदासारखे समुत्थान असणारे आहे – क्रिया, नोसंज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तिवद्य), कायकर्म, तिचित्त आणि तिवेदन. ปฐมสิกฺขาปทํ. पहिले सिक्खापद समाप्त. ๒. ทุติยสิกฺขาปทวณฺณนา २. दुसऱ्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๑๑๘๔. ทุติเย – ยาเนน ยายนฺตีติ เอตฺถาปิ โอโรหิตฺวา ปุนปฺปุนํ อภิรุหนฺติยา ปโยคคณนาย อาปตฺติโย เวทิตพฺพา. เสสํ ปฐเม วุตฺตนยเมวาติ. ११८४. दुसऱ्या (सिक्खापदात) – 'यानेन यायन्ति' यामध्ये देखील वाहनातून उतरून वारंवार चढणाऱ्या भिक्खुणीच्या प्रयत्नांच्या संख्येनुसार आपत्ती समजाव्यात. उर्वरित भाग पहिल्या सिक्खापदात सांगितल्याप्रमाणेच आहे. ทุติยสิกฺขาปทํ. दुसरे सिक्खापद समाप्त. ๓. ตติยสิกฺขาปทวณฺณนา ३. तिसऱ्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๑๑๙๐. ตติเย [Pg.227] – วิปฺปกิริยึสูติ มณโย วิปฺปกิณฺณา. อิธาปิ โอมุญฺจิตฺวา ธาเรนฺติยา ปโยคคณนาย อาปตฺติโย. สมุฏฺฐานาทีนิ วุตฺตนยาเนว. เกวลํ อิธ อกุสลจิตฺตํ โหตีติ. ११९०. तिसऱ्या (सिक्खापदात) – 'विप्पकिरियिंसु' म्हणजे मणी (दागिने) विखुरले गेले. येथेही (दागिने) काढून पुन्हा धारण करणाऱ्या भिक्खुणीच्या प्रयत्नांच्या संख्येनुसार आपत्ती समजाव्यात. समुत्थान इत्यादी पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच आहेत. केवळ येथे अकुशल चित्त असते. ตติยสิกฺขาปทํ. तिसरे सिक्खापद समाप्त. ๔. จตุตฺถสิกฺขาปทวณฺณนา ४. चौथ्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๑๑๙๔. จตุตฺเถ – สีสูปคาทีสุ ยํ ยํ ธาเรติ, ตสฺส ตสฺส วเสน วตฺถุคณนาย อาปตฺติโย เวทิตพฺพา. เสสํ ตติเย วุตฺตนยเมวาติ. ११९४. चौथ्या (सिक्खापदात) – डोक्याचे अलंकार इत्यादींपैकी जे जे अलंकार ती धारण करते, त्या त्या अलंकाराच्या संख्येनुसार आपत्ती समजाव्यात. उर्वरित भाग तिसऱ्या सिक्खापदात सांगितल्याप्रमाणेच आहे. จตุตฺถสิกฺขาปทํ. चौथे सिक्खापद समाप्त. ๕. ปญฺจมสิกฺขาปทวณฺณนา ५. पाचव्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๑๑๙๙. ปญฺจเม – คนฺธวณฺณเกนาติ คนฺเธน จ วณฺณเกน จ. เสสํ อุตฺตานเมว. สมุฏฺฐานาทีนิ ตติยสทิสาเนวาติ. ११९९. पाचव्या (सिक्खापदात) – 'गन्धवण्णकेन' म्हणजे सुगंधाने (किंवा सुगंधी पाण्याने) आणि वर्णकाने (सौंदर्य प्रसाधनाने किंवा रंगाने). उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. समुत्थान इत्यादी तिसऱ्या सिक्खापदासारखेच आहेत. ปญฺจมสิกฺขาปทํ. पाचवे सिक्खापद समाप्त. ๖. ฉฏฺฐสิกฺขาปทวณฺณนา ६. सहाव्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๑๒๐๒. ฉฏฺเฐ – สพฺพํ ปญฺจเม วุตฺตสทิสเมวาติ. १२०२. सहाव्या (सिक्खापदात) – सर्व काही पाचव्या सिक्खापदात सांगितल्याप्रमाणेच आहे. ฉฏฺฐสิกฺขาปทํ. सहावे सिक्खापद समाप्त. ๗. สตฺตมสิกฺขาปทวณฺณนา ७. सातव्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๑๒๐๘-๙. สตฺตเม – อุมฺมทฺทาเปติ อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสาติ เอตฺถ หตฺถํ อโมเจตฺวา อุมฺมทฺทเน เอกาว อาปตฺติ, โมเจตฺวา โมเจตฺวา อุมฺมทฺทเน ปโยคคณนาย [Pg.228] อาปตฺติโย. สมฺพาหเนปิ เอเสว นโย. คิลานายาติ อนฺตมโส มคฺคคมนปริสฺสเมนาปิ สาพาธาย. อาปทาสูติ โจรภยาทีหิ สรีรกมฺปนาทีสุ. เสสํ อุตฺตานเมว. สมุฏฺฐานาทีนิ ตติยสทิสาเนวาติ. १२०८-९. सातव्या (सिक्खापदात) – 'उम्मद्दापेति आपत्ति पाचित्तियस्स' यामध्ये हात न काढता (सतत) चोळल्यास एकच आपत्ती होते, आणि हात वारंवार काढून चोळल्यास प्रयत्नांच्या संख्येनुसार आपत्ती होतात. अंग दाबून घेण्याबाबतही (मालिश करण्याबाबतही) हाच नियम आहे. 'गिलानाय' म्हणजे अगदी प्रवासाच्या थकव्यामुळे पीडित असली तरीही (ती आजारीच समजली जाते). 'आपदासु' म्हणजे चोरांचे भय इत्यादींमुळे शरीराला कंप सुटणे इत्यादी प्रसंगी (आपत्ती होत नाही). उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. समुत्थान इत्यादी तिसऱ्या सिक्खापदासारखेच आहेत. สตฺตมสิกฺขาปทํ. सातवे सिक्खापद समाप्त. ๘-๙-๑๐. อฏฺฐมนวมทสมสิกฺขาปทวณฺณนา ८-९-१०. आठव्या, नवव्या आणि दहाव्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๑๒๑๐. อฏฺฐมาทีสุ ตีสุ สิกฺขมานาย สามเณริยา, คิหินิยาติ อิทเมว นานากรณํ, เสสํ สตฺตเม วุตฺตสทิสเมวาติ. १२१०. आठव्या इत्यादी तीन सिक्खापदांमध्ये 'सिक्खमानाय, सामणेरिया, गिहिनिया' (सिक्खमान, सामणेरी, गृहस्थ स्त्री कडून) हाच केवळ फरक आहे, उर्वरित भाग सातव्या सिक्खापदात सांगितल्याप्रमाणेच आहे. อฏฺฐมนวมทสมสิกฺขาปทานิ. आठवे, नववे आणि दहावे सिक्खापद समाप्त. ๑๑. เอกาทสมสิกฺขาปทวณฺณนา ११. अकराव्या सिक्खापदाचे स्पष्टीकरण. ๑๒๑๔. เอกาทสเม – ภิกฺขุสฺส ปุรโตติ อภิมุขเมวาติ อตฺโถ. อิทํ ปน อุปจารํ สนฺธาย กถิตนฺติ เวทิตพฺพํ. เสสํ อุตฺตานเมว. กถินสมุฏฺฐานํ – กายวาจโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยากิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. १२१४. अकराव्या (सिक्खापदात) – 'भिक्खुस्स पुरतो' म्हणजे समोरच असा अर्थ आहे. परंतु, हे उपचाराला (बारा हातांच्या मर्यादेला) उद्देशून सांगितले आहे असे समजावे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. हे कठीण (कठिन) सिक्खापदासारखे समुत्थान असणारे आहे – काय-वाचेने आणि काय-वाचा-चित्ताने समुत्थान होते, क्रिया-अक्रिया, नोसंज्ञाविमोक्ष, अचित्तक, पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तिवद्य), कायकर्म, वचीकर्म, तिचित्त आणि तिवेदन. เอกาทสมสิกฺขาปทํ. अकरावे शिक्षापद समाप्त. ๑๒. ทฺวาทสมสิกฺขาปทวณฺณนา १२. बाराव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण ๑๒๑๙-๒๓. ทฺวาทสเม – อโนกาสกตนฺติ อสุกสฺมึ นาม ฐาเน ปุจฺฉามีติ เอวํ อกตโอกาสํ. เตเนวาห – ‘‘อโนกาสกตนฺติ อนาปุจฺฉา’’ติ. อโนทิสฺสาติ อสุกสฺมึ นาม ฐาเน ปุจฺฉามีติ เอวํ อนิยเมตฺวา เกวลํ ‘‘ปุจฺฉิตพฺพํ อตฺถิ, ปุจฺฉามิ อยฺยา’’ติ เอวํ วตฺวา. เสสํ อุตฺตานเมว. ปทโสธมฺมสมุฏฺฐานํ – วาจโต วาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยากิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. १२१९-२३. बाराव्या (शिक्षापदात) – 'अनओकासकतं' (परवानगी न घेता) म्हणजे 'मी अमुक ठिकाणी विचारतो' अशी परवानगी न घेतलेली. म्हणूनच म्हटले आहे – 'अनओकासकतं म्हणजे न विचारता (अनापुच्छा)'. 'अनोदिस्सा' म्हणजे 'मी अमुक ठिकाणी विचारतो' असे निश्चित न करता, केवळ 'आर्या, मला काही विचारायचे आहे, मी विचारू का?' असे बोलून विचारणे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. पदसोधम्मसमुत्थान (पदशोधर्मसमुत्थान) प्रमाणे – हे वाणीने किंवा वाणी आणि चित्ताने उत्पन्न होते; क्रिया-अक्रिया, संज्ञाविमोक्ष नसलेले, अचित्तक, प्रज्ञप्तिवज्ज (नियमभंगजन्य), वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदन आहे. ทฺวาทสมสิกฺขาปทํ. बारावे शिक्षापद समाप्त. ๑๓. เตรสมสิกฺขาปทวณฺณนา १३. तेराव्या शिक्षापदाचे स्पष्टीकरण ๑๒๒๖. เตรสเม [Pg.229] – ปริกฺเขปํ อติกฺกาเมนฺติยาติ เอเกน ปาเทน อติกฺกนฺเต ทุกฺกฏํ, ทุติเยน ปาจิตฺติยํ. อุปจาเรปิ เอเสว นโย. १२२६. तेराव्या (शिक्षापदात) – 'परिक्खेपं अतिक्कामेन्तिया' (कुंपण किंवा सीमा ओलांडताना) म्हणजे एका पायाने ओलांडल्यास दुक्कट (दुष्कृत) दोष होतो, आणि दुसऱ्या पायाने ओलांडल्यास पाचित्तिय (प्रायश्चित्तिय) दोष होतो. उपचारात (सीमेच्या जवळच्या भागात) देखील हाच नियम लागू होतो. ๑๒๒๗. อจฺฉินฺนจีวริกายาติอาทีสุ สงฺกจฺจิกจีวรเมว จีวรนฺติ เวทิตพฺพํ. อาปทาสูติ มหคฺฆํ โหติ สงฺกจฺจิกํ, ปารุปิตฺวา คจฺฉนฺติยาว อุปทฺทโว อุปฺปชฺชติ, เอวรูปาสุ อาปทาสุ อนาปตฺติ. เสสํ อุตฺตานเมว. เอฬกโลมสมุฏฺฐานํ – กิริยํ, โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. १२२७. 'अच्छिन्नचीवरिकाय' इत्यादी शब्दांमध्ये संकच्चिक (स्तनपट्ट/चोळी) चीवरलाच 'चीवर' समजावे. 'आपदासु' (आपत्तीच्या वेळी) म्हणजे संकच्चिक खूप महाग असेल किंवा ते परिधान करून जात असताना काही संकट/उपद्रव निर्माण होत असेल, अशा प्रकारच्या आपत्तींमध्ये अनापत्ती (दोष नाही) आहे. उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. एळकलोमसमुत्थान (मेंढीच्या लोकरीच्या नियमाप्रमाणे) – हे क्रिया, संज्ञाविमोक्ष नसलेले, अचित्तक, प्रज्ञप्तिवज्ज, कायकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदन आहे. เตรสมสิกฺขาปทํ. तेरावे शिक्षापद समाप्त. ฉตฺตุปาหนวคฺโค นวโม. छत्तउपाहनवग्गो (छत्र-उपानह वर्ग) नववा समाप्त. อุทฺทิฏฺฐา โข อยฺยาโย ฉสฏฺฐิสตํ ปาจิตฺติยา ธมฺมาติ เอตฺถ สพฺพาเนว ภิกฺขุนีนํ ขุทฺทเกสุ ฉนฺนวุติ, ภิกฺขูนํ ทฺเวนวุตีติ อฏฺฐาสีติสตํ สิกฺขาปทานิ, ตโต สกลํ ภิกฺขุนีวคฺคํ, ปรมฺปรโภชนํ, อนติริตฺตโภชนํ, อนติริตฺเตน อภิหฏฺฐุํ ปวารณํ, ปณีตโภชนวิญฺญตฺติ, อเจลกสิกฺขาปทํ, ทุฏฺฐุลฺลปฏิจฺฉาทนํ, อูนวีสติวสฺสุปสมฺปาทนํ, มาตุคาเมน สทฺธึ สํวิธาย อทฺธานคมนํ, ราชนฺเตปุรปฺปเวสนํ, สนฺตํ ภิกฺขุํ อนาปุจฺฉา วิกาเล คามปฺปเวสนํ, นิสีทนํ วสฺสิกสาฏิกนฺติ อิมานิ ทฺวาวีสติ สิกฺขาปทานิ อปเนตฺวา เสสานิ สตญฺจ ฉสฏฺฐิ จ สิกฺขาปทานิ ปาติโมกฺขุทฺเทสมคฺเคน อุทฺทิฏฺฐานิ โหนฺตีติ เวทิตพฺพานิ. เตนาห – ‘‘อุทฺทิฏฺฐา โข อยฺยาโย ฉสฏฺฐิสตํ ปาจิตฺติยา ธมฺมา…เป… เอวเมตํ ธารยามี’’ติ. 'हे आर्यांनो, एकशे सहासष्ट पाचित्तिय धर्म उद्दिष्ट (घोषित) केले आहेत' यामध्ये भिक्षुणींच्या क्षुद्रक (लहान) नियमांमधील ९६ आणि भिक्षूंच्या ९२ मिळून एकूण १८८ शिक्षापदे आहेत. त्यातून संपूर्ण भिक्षुणीवर्ग, परंपरभोजन, अनतिरिक्तभोजन, अनतिरिक्ताने आणून दिलेले प्रवारणा, प्रणीतभोजनविज्ञप्ती, अचेलक शिक्षापद, दुट्ठुल्लपटिच्छादन (दुष्टुलप्रच्छादन), उणे-वीस वर्षांच्या उपसंपदा, मातृग्रामासोबत (स्त्रीसोबत) ठरवून प्रवासाला जाणे, राजवाड्याच्या अंतःपुरात प्रवेश करणे, भिक्षूला न विचारता विकाल वेळी गावात प्रवेश करणे, निसीदन (आसन) आणि वस्सिकासातिक (वर्षाशाटी) – ही २२ शिक्षापदे वगळून उर्वरित १६६ शिक्षापदे प्रातिमोक्ष उद्देश मार्गाने उद्दिष्ट (घोषित) केली जातात, असे समजावे. म्हणूनच म्हटले आहे – 'हे आर्यांनो, एकशे सहासष्ट पाचित्तिय धर्म उद्दिष्ट केले आहेत... पे... मी हे असेच धारण करतो.' ตตฺรายํ สงฺเขปโต สมุฏฺฐานวินิจฺฉโย – คิรคฺคสมชฺชํ, จิตฺตาคารสิกฺขาปทํ, สงฺฆาณิ, อิตฺถาลงฺกาโร, คนฺธวณฺณโก, วาสิตกปิญฺญาโก, ภิกฺขุนีอาทีหิ อุมฺมทฺทนปริมทฺทนานีติ อิมานิ ทส สิกฺขาปทานิ อจิตฺตกานิ โลกวชฺชานิ. อยํ ปเนตฺถ อธิปฺปาโย – วินาปิ จิตฺเตน อาปชฺชิตพฺพตฺตา อจิตฺตกานิ, จิตฺเต ปน สติ อกุสเลเนว อาปชฺชิตพฺพตฺตา โลกวชฺชานิ. อวเสสานิ อจิตฺตกานิ, ปณฺณตฺติวชฺชาเนว. โจรีวุฏฺฐาปนํ, คามนฺตรํ, อารามสิกฺขาปทํ คพฺภินิวคฺเค อาทิโต ปฏฺฐาย สตฺต, กุมาริภูตวคฺเค อาทิโต ปฏฺฐาย ปญฺจ, ปุริสสํสฏฺฐํ ปาริวาสิยฉนฺททานํ, อนุวสฺสวุฏฺฐาปนํ, เอกนฺตริกวุฏฺฐาปนนฺติ [Pg.230] อิมานิ เอกูนวีสติ สิกฺขาปทานิ สจิตฺตกานิ ปณฺณตฺติวชฺชานิ, อวเสสานิ สจิตฺตกานิ โลกวชฺชาเนวาติ. त्यामध्ये संक्षेपाने हा समुत्थान-निर्णय आहे – गिरग्गसमज्ज (गिरी-अग्र समाज), चित्तागार शिक्षापद, संघानी (कमरपट्टा), स्त्री-अलंकार, गंध-वर्णक (सुगंधी उटणे), वासितक-पिण्याक (सुगंधी पेंड), भिक्षुणी इत्यादींकडून अंगमर्दन व चोळवून घेणे – ही १० शिक्षापदे अचित्तक आणि लोकवज्ज (लोकनिंद्य) आहेत. येथे हा अभिप्राय आहे – चित्ताशिवाय (जाणिवेविना) देखील आपत्ती (दोष) प्राप्त होत असल्यामुळे ती 'अचित्तक' आहेत, परंतु चित्त असताना केवळ अकुशल चित्तानेच आपत्ती प्राप्त होत असल्यामुळे ती 'लोकवज्ज' आहेत. उर्वरित (३६) अचित्तक आणि केवळ पण्णत्तिवज्ज (प्रज्ञप्तिवद्य - केवळ नियमभंगजन्य) आहेत. चोरीवुट्ठापन (चोर स्त्रीला दीक्षा देणे), गामन्तर (गावाबाहेर जाणे), आराम शिक्षापद, गर्भिणी वर्गातील सुरुवातीपासूनचे ७, कुमारीभूत वर्गातील सुरुवातीपासूनचे ५, पुरुषसंसर्ग, पारिवासिय-छंददान, अनुवस्सवुट्ठापन (दरवर्षी दीक्षा देणे), एकन्तरिकवुट्ठापन – ही १९ शिक्षापदे सचित्तक आणि पण्णत्तिवज्ज आहेत, तर उर्वरित (३३) सचित्तक आणि लोकवज्जच आहेत. สมนฺตปาสาทิกาย วินยสํวณฺณนาย ภิกฺขุนีวิภงฺเค समंतपासादिका नावाच्या विनय-टीकेतील भिक्षुणीविभंगात ขุทฺทกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. क्षुद्रक-वर्णना (क्षुद्रक शिक्षापदांचे स्पष्टीकरण) समाप्त झाली. ปาจิตฺติยกณฺฑํ นิฏฺฐิตํ. पाचित्तिय-कांड समाप्त झाले. ๕. ปาฏิเทสนียกณฺฑํ (ภิกฺขุนีวิภงฺควณฺณนา) ५. पाटिदेसनीय-कांड (भिक्षुणीविभंग स्पष्टीकरण) ปาฏิเทสนียสิกฺขาปทวณฺณนา पाटिदेसनीय शिक्षापदांचे स्पष्टीकरण ปาฏิเทสนียา นาม, ขุทฺทกานํ อนนฺตรา; เย ธมฺมา อฏฺฐ อารุฬฺหา, สงฺเขเปเนว สงฺคหํ; เตสํ ปวตฺตเต เอสา, สงฺเขเปเนว วณฺณนา. क्षुद्रक शिक्षापदांनंतर लगेचच पाटिदेसनीय नावाचे जे आठ धर्म संक्षेपाने संगीतीमध्ये (संग्रहात) समाविष्ट केले आहेत, त्यांचे हे संक्षेपाने स्पष्टीकरण केले जात आहे. ๑๒๒๘. ยานิ หิ เอตฺถ ปาฬิยํ สปฺปิเตลาทีนิ นิทฺทิฏฺฐานิ, ตานิเยว วิญฺญาเปตฺวา ภุญฺชนฺติยา ปาฏิเทสนียา. ปาฬิวินิมุตฺตเกสุ ปน สพฺเพสุ ทุกฺกฏํ. เสสเมตฺถ อุตฺตานเมว. อฏฺฐวิธมฺปิ ปเนตํ ปาฏิเทสนียํ จตุสมุฏฺฐานํ – กายโต กายวาจโต กายจิตฺตโต กายวาจาจิตฺตโต จ สมุฏฺฐาติ, กิริยํ โนสญฺญาวิโมกฺขํ, อจิตฺตกํ, ปณฺณตฺติวชฺชํ, กายกมฺมํ, วจีกมฺมํ, ติจิตฺตํ, ติเวทนนฺติ. १२२८. कारण येथे पालिमध्ये तूप, तेल इत्यादी जे पदार्थ निर्दिष्ट केले आहेत, तेच मागवून खाणाऱ्या भिक्षुणीला पाटिदेसनीय (दोष) होतो. परंतु पालिबाहेरील इतर सर्व पदार्थांच्या बाबतीत दुक्कट (दुष्कृत) दोष होतो. येथील उर्वरित भाग स्पष्टच आहे. हे आठ प्रकारचे पाटिदेसनीय चार समुत्थानांचे आहे – ते कायेने, काय-वाणीने, काय-चित्ताने आणि काय-वाणी-चित्ताने उत्पन्न होते; क्रिया, संज्ञाविमोक्ष नसलेले, अचित्तक, प्रज्ञप्तिवज्ज, कायकर्म, वचीकर्म, त्रिचित्त आणि त्रिवेदन आहे. ปาฏิเทสนียวณฺณนา นิฏฺฐิตา. पाटिदेसनीय-वर्णना समाप्त झाली. ปาฏิเทสนียกณฺฑํ นิฏฺฐิตํ. पाटिदेसनीय-कांड समाप्त झाले. เสขิยา ปน อุทฺทิฏฺฐา, เย ธมฺมา ปญฺจสตฺตติ; เตสํ อนนฺตราเยว, สตฺตาธิกรณวฺหยา. जे पंच्याहत्तर सेखिय धर्म उद्दिष्ट (घोषित) केले आहेत, त्यांच्या लगेचच नंतर सात अधिकरणसमथ नावाचे धर्म आहेत. มหาวิภงฺเค โย วุตฺโต, เตสํ อตฺถวินิจฺฉโย; ภิกฺขุนีนํ วิภงฺเคปิ, ตาทิสํเยว ตํ วิทู. महाविभंगात त्यांचा जो अर्थ-निर्णय सांगितला आहे, भिक्षुणीविभंगात देखील तो तसाच समजावा, असे ज्ञानी लोक जाणतात. ยสฺมา [Pg.231] ตสฺมา วิสุํ เตสํ, ธมฺมานํ อตฺถวณฺณนา; น วุตฺตา ตตฺถ ยา วุตฺตา, วุตฺตาเยว หิ สา อิธาติ. ज्या कारणाने, त्या कारणाने त्या धर्मांचे अर्थ-स्पष्टीकरण स्वतंत्रपणे सांगितले नाही; कारण जे तिथे (महाविभंगात) सांगितले आहे, तेच येथे देखील सांगितले गेले आहे. สมนฺตปาสาทิกาย วินยสํวณฺณนาย समंतपासादिका नावाच्या विनय-टीकेतील ภิกฺขุนีวิภงฺควณฺณนา นิฏฺฐิตา. भिक्षुणीविभंग-वर्णना समाप्त झाली. สพฺพาสวปหํ เอสา, นิฏฺฐิตา วณฺณนา ยถา; สพฺพาสวปหํ มคฺคํ, ปตฺวา ปสฺสนฺตุ นิพฺพุตินฺติ. सर्व आसवांचा नाश करणारे हे स्पष्टीकरण ज्याप्रमाणे पूर्ण झाले आहे, त्याचप्रमाणे सर्व प्राणी सर्व आसवांचा नाश करणाऱ्या मार्गाला (अर्हत मार्गाला) प्राप्त करून निर्वाण पाहू देत (साक्षात करोत). อุภโตวิภงฺคฏฺฐกถา นิฏฺฐิตา. उभतोविभंग-अट्ठकथा (दोन्ही विभंगांची अट्ठकथा) समाप्त झाली. | |||
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |